ISSN 2229-547X विदेह सदेह ३० स्कूल कॉलेजक विद्यार्थी लेल गद्य आ पद्य रचना (विदेह www.videha.co.in/ पेटार अंक १-३५० सँ) विदेह-सदेह शृंखला- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ गद्य आ पद्यक एकटा समानान्तर संकलन विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथीक सर्वाधिकार सुरक्षित अछि। काॅपीराइट (©) धारकक लिखित अनुमतिक बिना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रतिएवं रिकॉडिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक अथवा यांत्रिक, कोनो माध्यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्पादित अथवा संचारित-प्रसारित नै कएल जा सकैत अछि। (c) २०००- अद्यतन। सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर) केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ "विदेह" पड़लै।इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA (c)२०००- अद्यतन। सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि। सम्पादक 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऐ ई-पत्रिकामे ई-प्रकाशित/ प्रथम प्रकाशित रचनाक प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ मूल आ अनूदित आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। (The Editor, Videha holds the right for print-web archive/ right to translate those archives and/ or e-publish/ print-publish the original/ translated archive). ऐ ई-पत्रिकामे कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। ISSN: 2229-547X मूल्य : भा. रू. ६,५००/- संस्करण: २०२२ Videha Sadeha 30: A Collection of Maithili Prose and Verse for School & College Students e-published in Videha e-journal issues 1-350 at www.videha.co.in ). अनुक्रम गद्य-खण्ड (पृ. १-२०९०) नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली- (पृ. २-८) मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली- (पृ.९-१२) उच्चारण निर्देश- (पृ.१३-१६) हरिमोहन झा समग्र समर्पण- (पृ.१७-१८) गजेन्द्र ठाकुर- नचिकेता जीक नाटक नो एण्ट्री: मा प्रविश, मैथिली राम चरित मानस-मैथिली समालोचनाक विफलता, मैथिली उपन्यासपर अंग्रेजी साहित्यक प्रभाव, चारिटा उत्तर आधुनिक नाटक: सैमुअल बैकेटक फ्रेंच नाटक “वेटिंग फॉर गोडो”, हैरोल्ड पिंटरक अंग्रेजी नाटक “द बर्थडे पार्टी”, बादल सरकारक बांग्ला नाटक “एवम् इन्द्रजीत” आ उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’क मैथिली नाटक “नो एण्ट्री: मा प्रविश”, इन्फॉरमेशन सोसाइटी, सार्वभौम मानवाधिकार घोषणा आ भारतीय संविधान, अन्हारक विरोधमे हाथी चलए बजार -अरविन्द ठाकुर आ देवशंकर नवीन, नचिकेताक मध्यमपुरुष एकवचन, मैथिली लेल एकटा अनुवाद सिद्धान्त, भारोपीय भाषा परिवार मध्य मैथिलीक स्थान, डॉ. बाबासाहेब आम्बेडकर (१८९१-१९५६), छुतहर/ छुतहर घैल/ छुतहा घैल मिथिला आ संस्कृत- कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालयक प्रासांगिकता, साहित्यिक रचना, बनैत-बिगड़ैत-सुभाषचन्द्र यादवक कथा संग्रहक समीक्षा, केदारनाथ चौधरीक उपन्यास “चमेली रानी” आ माहुर, फील्ड-वर्कपर आधारित खिस्सा सीत-बसंत, वर्णमाला शिक्षा: अंकिता, कियो बूझि नै सकल हमरा-(गजलकार श्री ओम प्रकाश झा), रामिवलास साहुजीक दधू बेचनी लघुकथा संग्रह, राजदेव मण्डलक अम्बरा, मैथिलीक भिखारी ठाकुरक नामसँ प्रसिद्ध मैथिलीक पहिल जनकवि रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार’क गीत आ झारू - “हमरा बिनु जगत सुन्ना छै”, मुन्नाजीक “माँझ आंगनमे कतिआएल छी”, मुन्नाजीक मैथिली विहनि कथाक संग्रह “प्रतीक”, रामविलास साहु जीक कविता, गीत, हाइकू, शेनर्यू आ टनका संग्रह “रथक चक्का उलटि चलै बाट”, उमेश मण्डल जीक “निश्तुकी” कविता, लघु-कविता, हाइकू/ टनका आ गजलक संग्रह, उमेश पासवानक कविता संग्रह “वर्णित रस”, सुजीतक जिद्दी, विनीत ठाकुरक बाँकी अछि हमर दूधक कर्ज, संतोष कुमार मिश्र- “एना किए..?”, संतोष कुमार मिश्र- मिथिला (नेपाल)केर पोसपुत कथा संग्रह- मिथिलाक्षरमे प्रकाशित मैथिली पोथी, लोरिक गाथामे समाज ओ संस्कृति, पंजी-प्रबन्ध, मिथिला कला, विस्मृत कवि- पं. रामजी चौधरी (१८७२-१९५२), संगीत-शिक्षा,रामाश्रय झा ’रामरंग’, सर्वतंत्र स्वतंत्र श्री धर्मदत्त झा(बच्चा झा) (१८६०-१९१८ ई.), म.म. शंकर मिश्र, जनक, याज्ञवल्क्य, चाणक्य...कौटिल्य, मैथिली भाषापाक १-३, की अहाँकेँ बुझल अछि? (पृ. १९-३७६) श्री मैथिली पुत्र प्रदीप- आध्यात्म (पृ. ३७७-३८२) धनाकर ठाकुर- प्रज्वलित प्रज्ञा (पूर्व राष्ट्रपति डा॰ कलामक पोथी Ignited Minds क डा॰ नित्यानन्द लाल दास द्वारा मैथिली अनुवाद) क समीक्षा, जगदीश प्रसाद मंडलक “ गामक जिनगी”, समीक्षा – फूल तितली आ तुलबुल (लेखक -श्री सियाराम झा 'सरस') (पृ. ३८३-३९९) मुन्ना जी- बाल गजलः पुरान देहक नव चेहरा, विहनि कथा संसार, अझुको क्षणकेँ अंगीकार करैछ “क्षणिका”, अनमोल झाक समयकेँ साक्षी राखि ....! (पृ. ४००-४२१) डा. रमण झा- फोंका-एक विहगावलोकन, मैथिली चित्रकथा (पृ. ४२२-४३१) जीवकान्त- उत्तराधिकारी आ लेखक, जगदीश प्रसाद मंडलक ‘जिनगीक जीत’ उपन्यासपर (पृ. ४३२-४४१) डॉ. राजीव कुमार वर्मा- कारी घटा बरसैत मेघ (पृ. ४४२-४४५) मानेश्वर मनुज- मानसरोवरक भूमिकाक प्रासंगिकता, मैथिल दृष्टिक प्रसंग मुम्बइसँ एक चिट्ठी/ बुच्ची दाइक निलामी कोना से देखू (पृ. ४४६-४६८) ओम प्रकाश झा- भोथ हथियार, मैथिली बाल गजलक अवधारणा, बहुरूपिया रचना मे, घोघ उठबैत गजल (पृ. ४६९-४८४) डॉ. बचेश्वर झा- समीक्षा- मौलाइल गाछक फूल (पृ. ४८५-४८७) शिव कुमार झा ‘टिल्लू’- मैथिली नाटकक विकासमे आनंद जीक योगदान, मौलाइल गाछक फूल- (समीक्षा), भफाइत चाहक जिनगी- समीक्षा, समीक्षा (अर्चिस), यू.पी.एस.सी. लेल- चित्राक सनेस, समीक्षा- मिथिलाक बेटी (नाटक), समीक्षा- विभारानीक नाटक बलचन्दा, किस्त-किस्त जीवन-शेफालिका वर्मा-(समीक्षा), मैथिली उपन्यास साहित्यक विकासमे हरिमोहन झाक योगदान, पृथ्वीपुत्र, मैथिली कथा साहित्यक विकासमे राजकमलक योगदान, कृष्णजन्म :: कथाकाव्यक सूत्रपात, क्षणप्रभा, बहिरा नाचए अपने ताल, मिथिलाक लोक देवता, इन्द्रधनुषी अकासमे सामाजिक विमर्श, कथा किरणमे यथार्थवोध ओ नारी विमर्श, आशु कवित्वक हृदयांतरिक किलोल- कलानिधि, निश्तुकी, समीक्षा- अम्बरा (राजदेव मण्डल), मैथिली कविता संचयन- (संपादक- गंगेश गुंजन), कुरूक्षेत्रम् अर्न्तमनक- (समीक्षा), समीक्षा -गोनू झा आ आन मैथिली चित्रकथा, समीक्षा- तरेगन, समीक्षा- हम पुछैत छी- कविता संग्रह (विनित उत्पल), मैथिलीक विकासमे बाल कविताक योगदान, मैथिली उपन्यास साहित्यमे दलित पात्रक चित्रण, पोथी- समीक्षा-भावांजलि, रमाजीक काव्य यात्रा, समीक्षा- अरिपन (कविता संकलन), समीक्षा- बिन वाती दीप जरय (पृ.४८८-७१२) रमाकान्त राय ‘रमा’- गामक जिनगी -कथा संग्रह- जगदीश प्रसाद मंडल- समीक्षा, मैथिल पत्र-पत्रिका : समस्या ओ समाधान : आचार्य दिव्यचक्षु, नव गीतक पुरोधा : महाकवि प्रवासी, पोथी समीक्षा- प्रगतिशील एवं सनातन विचारधाराक समन्वयात्मक उपन्यास (पृ. ७१३-७३५) देवशंकर नवीन- लघुकथा लेखनमे अवरोधक तत्व, अदद्दी पेनकें मजगुत करबाक आवश्यकता, बटुआमे बिहाड़ि आ बिर्ड़ो- (राजकमल चौधरीक उपन्यास) (पृ. ७३६-८१२) मुन्नी कामत- कतऽ जा रहल छी हम! (पृ. ८१३-८१४) जगदानन्द झा 'मनु'- करुण हृदयक मालिक महाराज रणजीत सिंह, संकल्पक धनी विल्मा रुडोंल्फ, बाल गजलक अवधारणा (पृ. ८१५-८२०) चंदन कुमार झा- मैथिली बाल-साहित्य आ' बाल-गजल, मिथिला-मैथिली आंदोलन (पृ. ८२१-८३१) उमेश मण्डल- मैथिली युवा रचना-धर्मिता :: परंपरा परिवर्त्तन आ भविष्य (पृ. ८३२-८३६) श्री राज- यात्राीक कवितामे गाम (पृ. ८३७-८४५) मिहिर झा- बाल गजल (पृ. ८४६-८४७) अमित मिश्र- बाल गजल: कोमल करेजक आखर, कतिआएल आखर (पृ. ८४८-८५४) आशीष अनचिन्हार- आधुनिकताक समस्या (आलोचना), गजलक साक्ष्य- समालोचना, की थिक बाल गजल, अन्हार पर इजोतक कहिऒ विजय नहि, बेचन ठाकुरजीक नाटक छीनरदेवी- बेचन ठाकुरजीक नाटक- बेटीक अपमान, काफिया, काफिया आ बहर (पृ. ८५५-९८०) बलराम साहु- विस्मित होइत हमर लोक संस्कृति (पृ. ९८१-९८२) शत्रुधन प्रसाद साह- मैथिली महिला आ जिद्दी (पृ. ९८३-९८५) विजय मस्त- सुजीतक सम्पूर्ण कथा एकटा नया स्वाद देलक(पृ. ९८६-९८८) कैलास दास- महिलाक प्रेरक कथा संग्रह ‘जिद्दी’, 'अंगना सुखल घरमे पानि', खोजय पड़त मातृत्व बालगीत, म्याराथन दौड़ आ जनकपुर (पृ. ९८९-१०००) डॉ प्रफुल्ल कुमार सिंह “मौन”- पंचदेवोपासक भूमि मिथिला (पृ. १००१-१०८०) मनोज मुक्ति- त्रिभुवन विश्वविद्यालयद्धारा मिथिलाक्षर फन्टक विकास, मकर सँक्रान्ति अर्थात तीला सकराँइत, जितिया पावनि, मनोज मुक्ति संग अन्तर्वार्ता- डा. राम दयाल राकेश (सँस्कृति विद) (पृ. १०८१-१०८९) डा.रमानन्द झा ‘रमण‘- शब्द विभक्ति सम्वाद, अनुवाद, कलकत्ता विश्वविद्यालयमे मैथिली- राजा टंकनाथ चौधरी, सगर राति दीप जरय मिथिलाक ग्रामांचल मे, मिथिलांचलक दलित समाजमे लोकगाथा :मैथिली लोकगाथामे दीनाभद्री, सार्वभौम मानवाधिकार घोषणा : मैथिली अनुवाद रमानन्द झा 'रमण' : भाषा सम्पादन गोविन्द झा (पृ. १०९०-११५३) हृदय नारायण झा- लुप्तप्राय मैथिली लोकगीत (पृ. ११५४-११८३) कृपानन्द झा- मैथिलक जन नायक चुनचुन मिश्र, चौकपर आणविक समझौता (पृ. ११७४-११९२) महेन्द्र मलंगिया- मूर्दाः श्रृंगार संघर्ष आ द्वन्द्व, प्रकाश चन्द्र झा: मैथिली रंगकर्ममे थ्री-इन-वन (पृ. ११९३-१२१२) धीरेन्द्र प्रेमर्षि- मैथिलीमे गजल आ एकर संरचना, नव भोर जोहैत मिथिला, मधुश्रावणी : मिथिलाक पारम्परिक हनिमून (पृ. १२१३-१२३५) अमरनाथ झा- हाँ ई तँ कहियो नहि देखने रही, विष्णु प्रभाकर जी सादगीक प्रतिमूर्ति छलाह।, पूर्वजक जन्मभूमिकेँ शत-शत प्रणाम, आचार्य पंकज (पृ. १२३६-१२४३) उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- गजेन्द्र ठाकुरक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक, गजेन्द्र ठाकुरक मैथिली-अंग्रेजी शब्दकोशपर (पृ. १२४४-१२५९) विनीत उत्पल- आजुक कालमे बाबा, कतय गेल फिल्मक बाल कलाकार (पृ. १२६०-१२६९) डॉ. गंगेश गुंजन- कविक आत्मोक्तिःकविताक अयना -विनीत उत्पलक कविता संग्रहपर (पृ. १२७०-१२७५) रामभरोस कापडि ‘भ्रमर’- यात्रा प्रसंग- ह्वेन सांगसं चीनमे भेंटघांट, यात्रा प्रसंग- हमर कल्पनाक सेती..... बहैत..... अविचल !, संचार एवं साहित्य क्षेत्रमे समावेशी स्वरुपक अपेक्षा (पृ. १२७६-१२९०) कमलानन्द झा- मैथिली समस्याक टोह लैत कथा-संकलन: उदाहरण (पृ. १२९१-१२९७) डॉ पालन झा- सन्त साहेब रामदास (पृ. १२९८-१३०८) सुशांत झा- की बलिराज गढ़ मिथिलाक प्राचीन राजधानी अछि?, मैथिली, मैथिल संस्कृति आ मिथिला राज्य, विकास के तेजी मे कहीं छुटि नै जाय मिथिला…, हमर सपना केर मिथिला, मैथिली के ल क किछु असुविधाजनक प्रश्न.. , बिहार मे प्रलय, लेकिन की छैक निदान?, मिथिला मंथन १-२, मैथिली भाषा- संस्कृति के रक्षाक लेल एकटा संस्था जरुरी अछि (पृ. १३०९५-१३४२) शक्ति शेखर- कखन बदलब हम (पृ. १३४३-१३४५) ओमप्रकाश झा- मिथिले तक नहि छथि मैथिल (पृ. १३४६-१३४८) बी.के कर्ण- संकट गुणक (रिस्क फैक्टर) आ मैथिल- मिथिलाक विकास क़ेना आ कखन (पृ. १३४९-१३५६) जितेन्द्र झा- स्वरक माला गँथती अंशु, प्रिय पाहुन (पृ.१३५७-१३६१) महाप्रकाश- सुभाष चन्द्र यादव (पृ. १३६२-१३६३) ज्योति प्रकाश लाल- आजुक समय मे कम्प्युटर शिक्षाक महत्व (पृ. १३६४-१३७६) जितमोहन झा- वृद्ध-बुजुर्गक सामाजिक स्थितिपर- थम्हने राखू ई डोरी (वृद्ध-बुजुर्ग समस्यापर लेख) , कन्या भ्रूण हत्या, प्रकृति के साथ खिलवार, हम लड़की वला छी जनाब ..., नारीक प्रति दोहरा दृष्टिकोण कियेक ....? (पृ. १३७७-१३८६) नवेन्दु कुमार झा- बिहारक लोक पर्व-छठि, बिहारमे सूर्योपासनाक प्रमुख केन्द्र, विद्यापति स्मृति दिवस (११ नवम्बर २००८) पर विशेष-यशस्वी कवि छलाह महाकवि विद्यापति, उपेक्षित अछि सोनपुर आ हरिहर क्षेत्र मेला, प्रदेशमे नहि थमि रहल जातीय हिंसाक दौर, राजगीरमे सम्पन्न भेल संघ क तीन दिवसीय बैसक गामे-गामे सक्रिय होयत संघ, गाम मे विज्ञान केँ लोकप्रिय बनबऽ मे लागल छथि मानस बिहारी (पृ. १३८७-१४१५) सुजीत कुमार झा- सुनिल मल्लिक- सफल व्यक्ति- आब मिथिला ग्रामक तैयारी, एकटा लाजवाव कलाकार मदन ठाकुर, थाल माटिक पावनि (पृ. १४१६-१४२५) डॉ. उमेश मंडल- मैथिली उपन्यास साहित्यमे संवेदनाक स्वर, कबिलपुरक कथा गाेष्ठी (पृ. १४२६-१४३६) प्रा परमेश्वर कापड़ि- मानकताक बात विखपाद अछि !, छठिमाइके आसि आ लोकजीवनमे हिनक महत्व (पृ. १४३७-१४४६) अतुलेश्वर- सोचब आवश्यक जे......, मातृभाषा दिवस क बहन्ने, गाम मे नहि फागु आ नहि भोरक पराती, तीन तिरहुतिया तेरह पाक, समयलाई सलाम आ धीरेन्द्र प्रेमर्षिक अभिमत, यात्रीक प्रसंग, हिन्दीक दृष्टि आ मैथिली भाषा, वैश्विक सोच ?, भाषाक प्रति एक नव सोच, भाषाक मानकीकरण आ साहित्यक राजनीति, मैथिली साहित्य आ मुसलमान भाई, ‘चिड़ै’ आ ओकरे लाथेँ नेपालीय मैथिली कथाक स्वर, ‘बदलैत स्वर’ आ मैथिली आलोचना, मैथिली : पंडिताम वा आम? , पंडित गोविन्द झा, मैथिली आ अध्ययन, उजरैत गाम बसैत शहर........, विद्यापति समारोह, बिहार गीत आ मैथिल, पूर्वी भारतीय भाषाक सेमिनार क बहन्ने, विश्वक डॉ. इन्दिरा गोस्वामी आ असमिया लोकक मामोनी बाइदेउ, धीरेन्द्र, मैथिली आ शिष्य (पृ. १४४७-१५१४) डॉ॰ शशिधर कुमर- पोथी समीक्षा : गामक जिनगी, पोथी समीक्षा – अम्बरा (पृ. १५१५-१५२९) सुमित आनन्द- अक्षरपुरूष-विश्वनाथ (पृ. १५३०-१५३१) डॉ. योगानन्द झा- ग्रामजीवनक सत्यक संवाहक :: अर्द्धांगिनी, मैथिली बाललोककथा : स्थिति आ अपेक्षा, वनदेवी आ नारी अस्मिताक गाथा, आदर्शक उपस्थापन : मौलाइल गाछक फूल, आस्था, जिजीविषा ओ संघर्षक प्रवाह, इसवी सन 2010: मैथिलीक गतिविधि (पृ. १५३२-१५९६) राजेश्वर नेपाली- कवि पं. प्रतापनारायण झा कें छठम पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धाञ्जलि (पृ. १५९७-१६०२) बिपिन झा- ग्रन्थ समीक्षा- 'महाराज महेश ठाकुर ओ कंकाली भगवती', ग्रन्थ समीक्षा-प्रकृति परिक्रमा, श्रोत्रिय समाजमे रक्तबीजक जन्म, जनमानस हेतु प्रत्यभिज्ञादर्शनक वैशिष्ट्य, कथं ’संस्कृतं’ संस्कृतम् , ये बान्धवाऽबान्धवा वा, चहकैत चौक आ कनैत दलान, आवश्यकता अछि सकारात्मक मौलिक चिन्तनक, स्वातन्त्रोत्तरयुगीन संस्कृत साहित्यक संवर्द्धन मे मिथिलाक भूमिका (पृ. १६०३-१६२७) डा. राजेन्द्र विमल- साहित्य–सङ्गम- गीतकार धीरेन्द्र प्रेमर्षिक सुर–ताल, ‘घरमुहाँ’ – प्रभाव आ प्रतिक्रिया, नव–नव क्षितिजक सन्धान करैत सुजीतक जिद्दी (पृ. १६२८-१६४४) नीलिमा- मखानक खीर, मेथीक परोठा, मुगलई कोबी, केसर पुलाव, मूरक परोठा (पृ. १६४५-१६४८) छवि झा/ कुमुद सिंह- मिथिला चित्रकला: अर्थक अधिकता आ सार्थकता (पृ. १६४९-१६५८) नूतन झा- जानकी-नवमी, वटसावित्री, कृष्णाष्टमी / जन्माष्टमी, कुशोत्पतन / कुशी अमावस्या, दुर्गा पूजा, शरत्पूर्णिमा / कोजगरा, दीपावली, मिथिलांचलक भ्रातृद्वितीया, बाराती-सत्कार, चौठचन्द्र पूजा (पृ. १६५९-१६७५) विद्यानन्द झा पञीकार ‘मोहनजी’ - पंजी प्रबंध (प्. १६७६-१७०४) राजेन्द्र कुमार प्रधान- २१म शताब्दीक पहिल दशकक मैथिली उपन्यासमे राजनीतिक चेतना (पृ. १७०५-१७०८) खुशबू झा- हमरा नजरिमे सुजीतक रिपोर्टर डायरी, मैथिली कथा संग्रह जिद्दी पढलापर (पृ. १७०९-१७१४) चन्द्रकिशोर- समयक साक्षी सुजीतक रिपोर्टर डायरी (पृ. १७१५-१७२४) सुदीप झा- सामाजिक मूल्य मान्यताकें चोच मारैत ‘चिड़ै’ (पृ. १७२५-१७२८) राजेश कुमार कर्ण- चिरबिर–चिरबिर करैत उडि रहल चिडै (पृ. १७२९-१७३३) चन्द्रेश- रचनात्मक बिमर्शक अयनामे ‘चिड़ै’, संवेनशील मोनकेँ छुबैत हुगली ऊपर बहैत गंगा, यर्थाथक अनुभुतिमे ऐतिहासिक दिनः झिझिया नृत्य महोत्सव (पृ. १७३४-१७५८) प्रकाश झा- नचिकेताक ‘प्रियंवदा’: एक विश्लेषण, ‘प्रयोग’ एकांकीक रंगमंचीय दृष्टि, प्रयोग एकांकीक रंगमंचीय प्रयोग, पोथी-समीक्षा- पुरुष परीक्षा, रंगदृष्टि, मिथिला मे रंगकलाक समकालीन दृष्टि (पृ. १७५९-१७९२) गोपाल प्रसाद- मिथिला कवि कोकिल विद्यापति, हिंदी, मैथिली, मिथिला, बिहार ओ मैथिल लोकनि सं अपेक्षा, सामाजिक परिवर्तनक संदर्भमे मैथिलीक दशा ओ दिशा, सामाजिक परिवर्तनक संदर्भमे मैथिलीक दशा ओ दिशा (पृ. १७९३-१८११) पंचानन मिश्र- मऊ वाजितपुर सँ विद्यापतिनगर परिवर्त्तन-यात्रा, मिथिलाक कतिआएल सिद्धपीठ (पृ. १८१२-१८२२) भीमनाथ झा- चन्दा झा, हरिमोहन झा मिलिकऽ, मखान खानि ई मिथिला (पृ. १८२३-१८३५) कुमार राधारमण- पाकिस्तान मे सेक्स-विचार (पृ. १८३६-१८४०) डा. शंकरदेवझा- मिथिलाक विस्मृत राजधनी देवकुली (पृ. १८४१-१८६०) राजदेव मंडल- जगदीश प्रसाद मण्डलक कविता संग्रह- राति-दिन, जगदीश प्रसाद मंडलक उपन्यास उत्थान-पतनपर, कुरूक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल पत्र (पत्रोत्तर शैलीक समीक्षा) (पृ. १८६१-१८८९) डॉ. मेघन प्रसाद- मैथिलीमे अनुवाद-कलाक शास्त्रीयकरणक इतिहास (पृ. १८९०-१८९९) डॉ. इन्दुधर झा- दू-पत्र: एक विश्लेषण (पृ. १९००-१९०२) रामलोचन ठाकुर- समकालीन मैथिली-कथाक यथार्थ-उर्फ यथार्थक-कथा (पृ. १९०३-१९१०) केदार कानन- जगदीश प्रसाद मंडलक पछताबा पर एक दृष्टि (पृ. १९११-१९१२) श्यामसुन्दर शशि- साहित्यकार डा़. धीरेश्वर झा धिरेन्द्रक ६ अम वार्षिकीपर विशेष- नमन गुरुदेव (पृ. १९१३-१९१६) फूल चन्द्र झा ‘प्रवीण’ - मैथिली शिशु साहित्य लोक (पृ. १९१७-१९३३) रमेश- बहस- पंकज पराशरक साहित्यिक चोरि मैथिली साहित्यक कारी अध्याय थिक, प्रो. मायानन्द मिश्रक रमनगर कथामे लागल “मुदा”... (पृ. १९३४-१९५१) मंत्रेश्वर झा- चरित्र चित्रणक वाजीगर- जगदीश प्रसाद मंडल (पृ. १९५२-१९५४) सुभाष चन्द्र यादव- रचनाक पाठ आ लेखक, जगदीश प्रसाद मंडल, मैथिली लोक-कथा (पृ. १९५५-१९६३) अच्छेलाल शास्त्री- रणभूमि आ कविता नामक शीर्षक कवितापर दू शब्द (पृ. १९६४-१९६४) दुर्गानन्द मंडल- शिव कुमार झा टिल्लू जीक लिखल खोंइछक लेल साड़ी- कथापर दू शब्द, नाटक बेटीक अपमानपर एक नजरि, जीवन-मरण, पोथी समीक्षा-मौलाइल गाछक फूल, टैगोर साहित्य पुरस्कारक बहन्ने- यात्रा वृत्तान्त (पृ. १९६५-१९९६) प्रो. वीणा ठाकुर- प्राचीन भारतीय संस्कृतिमे मिथिलाक योगदान, गोनू झा आ आन मैथिली चित्रकथा, जिनगीक जीत उपन्यासक समीक्षा, महाकवि मार्कण्डेय प्रवासी (पृ. १९९७-२०२२) अशोक- बनैत कम बिगड़ैत बेसी-सुभाष चन्द्र यादवक दोसर कथा संग्रह (पृ. २०२३-२०३१) उषाकिरण खान- अनुभूतिः एकटा पाठकीय प्रतिक्रिया (पृ. २०३२-२०३५) नागेन्द्र कुमार कर्ण- मिथिला पञ्चकोशी परिक्रमा, सुजित कुमार झा पर (पृ. २०३६-२०४९) भालचन्द्र झा- बाल-शिक्षणपर निबन्ध- हमर शिक्षण-यात्रा (पृ. २०५०-२०७२) ब्युटी कुमारी- राहुलजी एक नजरिमे (पृ. २०७३-२०७८) बसन्त झा- उगना (पृ. २०७९-२०८३) धीरेन्द्र कुमार- नो एंट्री : मा प्रविश- (उदय नारायण सिंह 'नचिकेता'), प्रीति ठाकुरक दुनू चित्रकथापर धीरेन्द्र कुमार एक नजरि (पृ. २०८४-२०८८) डॉ. शेफालिका वर्मा- प्रीति ठाकुर क मैथिली चित्रकथा (पृ. २०८९-९०) अरविन्द ठाकुर- लोकदेव भीम केवट, लोकदेव लोरिक (पृ. २०९१-२०९८) पद्य-खण्ड (पृ. २०९९- गजेन्द्र ठाकुर- मिथिलाक ध्वज गीत (पृ. २१००-२१००) किछु संस्कृत सुभाषितक संकलन (पृ. २१०१-२१०५) बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक (पृ. २१०६-२११०) संदेश (पृ. २१११-२१२४) 2
गद्य खण्ड मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत् - हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम् अक्खर (अक्षर ) खम्भा तिहुअन खेत्तहि काञि तसु कित्तिवल्लि पसरेइ। अक्खर खम्भारम्भ जउ मञ्चो बन्धि न देइ॥ [कीर्तिलता प्रथमः पल्लवः पहिल दोहा।] माने अक्षररूपी स्तम्भ निर्माण कए ओहिपर (काव्यरूपी) मंच जँ नहि बान्हल जाए तँ एहि त्रिभुवनरूपी क्षेत्रमे ओकर कीर्तिरूपी लता (वल्लि) प्रसारित कोना होयत। नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। हमसभ हुनक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ चलबाक प्रयास कएलहुँ अछि। पोथीक वर्णविन्यास कक्षा ९ क पोथीसँ किछु मात्रामे भिन्न अछि। निरन्तर अध्ययन, अनुसन्धान आ विश्लेषणक कारणे ई सुधारात्मक भिन्नता आएल अछि। भविष्यमे आनहु पोथीकेँ परिमार्जित करैत मैथिली पाठ्यपुस्तकक वर्णविन्यासमे पूर्णरूपेण एकरूपता अनबाक हमरासभक प्रयत्न रहत। कक्षा १० मैथिली लेखन तथा परिमार्जन महेन्द्र मलंगिया/ धीरेन्द्र प्रेमर्षि संयोजन- गणेशप्रसाद भट्टराई प्रकाशक शिक्षा तथा खेलकूद मन्त्रालय, पाठ्यक्रम विकास केन्द्र,सानोठिमी, भक्तपुर सर्वाधिकार पाठ्यक्रम विकास केन्द्र एवं जनक शिक्षा सामग्री केन्द्र, सानोठिमी, भक्तपुर। पहिल संस्करण २०५८ बैशाख (२००२ ई.) योगदान: शिवप्रसाद सत्याल, जगन्नाथ अवा, गोरखबहादुर सिंह, गणेशप्रसाद भट्टराई, डा. रामावतार यादव, डा. राजेन्द्र विमल, डा. रामदयाल राकेश, धर्मेन्द्र विह्वल, रूपा धीरू, नीरज कर्ण, रमेश रञ्जन भाषा सम्पादन- नीरज कर्ण, रूपा झा मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली १. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ- ग्राह्य एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए। २. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह। ३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि। ४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि। ५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह। ६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)। ७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि। ८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह। ९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ। १०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि। ११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए। १२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय। १३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ। १४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक। १५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक। १६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं। १७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय। १८. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि। १९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय। २०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय। २१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय। ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६ उच्चारण निर्देश: दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नहि सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जेकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जेकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जेकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ ऐछ छथि- छ इ थ – छैथ पहुँचि- प हुँ इ च आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ एहि सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा एहिमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- एहि लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ/ के/ कऽ हटा कऽ। एहिमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नहि। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो एहि तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/ के / कऽ केर- क (केर क प्रयोग नहि करू ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के / राम कऽ सेहो) सँ- सऽ चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नहि। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ) रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ तऽ त केर एहि सभक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना के कहलक? नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ एहि सभक उच्चारण- नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नहि) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नहि- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नहि)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नहि)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नहि) मे केँ सँ पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेशी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। एकटा दूटा (मुदा कैक टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नहि। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नहि (जेना दिअ, आ ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नहि दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। हरिमोहन झा समग्र समर्पण कन्यादानक समर्पण- जे समाज कन्या कैं जड़ पदार्थवत् दान कय देबा मे कुंठित नहि होइत छथि, जाहि समाजक सूत्रधार लोकनि बालक कैं पढ़ैबाक पाछाँ हजारक हजार पानि मे बहबैत छथि और कन्याक हेतु चारि कैञ्चाक सिलेटो कीनब आवश्यक नहि बुझैत छथि, जाहि समाजमे बी.ए. पास पतिक जीवन-संगिनी ए बी पर्यन्त नहि जनैत छथिन्ह, जाहि समाज कैं दाम्पत्य-जीवनक गाड़ी मे सरकसिया घोड़ाक संग निरीह बाछी कैं जोतैत कनेको ममता नहि लगैत छन्हि, ताही समाजक महारथी लोकनिक कर-कुलिश मे ई पुस्तक सविनय, सानुरोध ओ सभय समर्पित। प्रणम्य देवताक समर्पण- आइ सँ सात वर्ष पूर्व जे कार्तिकी पूर्णिमाक करार पर हमरा सँ पैंच लऽ गेलाह और तहियासँ पुनः कहियो दर्शन देबाक कृपा नहि कैलन्हि, जनिक चिर-स्मरणीय कीर्ति-कलाप प्रथमे कथा मे विशद रूप सँ वर्णित छैन्ह, जे “प्रणम्य देवता” क मध्य सर्वश्रेष्ठ आसन पर अधिकार जमा सकैत छथि, जनिक वन्दनीय बन्धुवर्ग ई पुस्तक देखि विनु मङनहि अपन स्वत्व स्थापित कय लऽ सकैत छथि, तेहन प्रमुख चरित-नायक, विकट पाहुन भीमेन्द्रनाथ क सुदृढ़ विशाल मुष्टिमे ई विचित्र-चरित्र-पूर्ण पोथी विवशतापूर्वक अर्पित छैन्ह! खट्टर ककाक तरंगक समर्पण- जे भंगक तरंगमे काव्य-शास्त्र-विनोदक धारा बहा दैत छथि; जनिक प्रवाहमे थोड़ेक कालक हेतु वेद-पुराण, धर्मशास्त्र, सभटा भसिया जाइत अछि; जे बात-बातमे अद्भुत रस ओ चमत्कारक चाशनी घोरि दैत छथि; जे मर्मस्पर्षी व्यंग्य द्वारा लोकक अन्तस्तल मे पहुँचि गुदगुदी लगा दैत छथि; तेहन चिर आनन्दमूर्ति, परिहास-प्रिय खट्टर कका कैं- त्व्दीयं वस्तु पितृव्य! तुभ्यमेव समर्पितम्। रंगशालाक समर्पण- जे अक्षययौवना नटी एहि अनादि अनन्त रंगशालाक प्रवर्तिका थिकीह, जे मनोहर वीणा-वादिनी सम्पूर्ण चराचर विश्वकैं अपना आंगुरक अग्रभाग पर नचा रहल छथि, जे रहस्यमयी अपन मोहिनी लीलाक झलक देखाय ककरो स्पर्श नहि करय दैत छथिन्ह, जे कल्पनाक रंगीन पाँखि पर आबि कलाकारक कलामे रसक संचार करैत छथिन्ह, तेहन आश्चर्यकारिणी चिरसुन्दरी त्रैलोक्य-विजयिनी माया देवी कैं। गजेन्द्र ठाकुर नचिकेता जीक नाटक नो एण्ट्री: मा प्रविश इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओऽ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे www.videha.com पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका www.videha.co.in पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आऽ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आऽ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आऽ पाठक एके छथि।कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आऽ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आऽ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आऽ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आऽ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आऽ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आऽ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आऽ सातो दिन उपलब्ध होए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होए आऽ जाहिसँ वितरण केर समस्या आऽ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आऽ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आऽ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। पुरान अंक pdf स्वरूपमे डाउनलोड कएल जा सकैत अछि आऽ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आऽ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि। नचिकेता जीक नाटक नो एण्ट्री: मा प्रविश विदेह- ई-पत्रिकामे धारावाहिक रूपेँ लगातार ८ अंकमे पत्रिकाक आठम अंक (तिथि १५ अप्रैल २००८) सँ पन्द्रहम अंक (तिथि १ अगस्त २००८) धरि ई-प्रकाशित भए सम्प्रति प्रेसमे प्रिंटक लेल गेल अछि। आब ई सभटा अंक पी.डी.एफ. रूपमे विदेह आर्काइवमे डाउनलोडक लेल उपलब्ध अछि। लगातार १२० दिन ई नाटक वेबपर रहल आऽ ५० देशक २५० स्थानसँ १५९६० पाठक एकरा पढ़ि चुकल छथि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा), आऽ एहिमे आर्काइवसँ विदेहक पुरान-अंक-डाउनलोड कएल गेल संख्या नहि जोड़ल गेल अछि। नाटकक कथानक: प्रथम कल्लोल: ई नाटक ज्योतिरीश्वरक परम्परामे कल्लोलमे (वर्ण रत्नाकर कल्लोलमे मुदा धूर्त-समागम अंकमे विभक्त अछि) विभाजित अछि। चारि कल्लोलक विभाजनक प्रथम कल्लोल स्वर्ग (वा नरक) केर द्वारपर आरम्भ होइत अछि। ओतए बहुत रास मुइल लोक द्वारक भीतर प्रवेशक लेल पंक्तिबद्ध छथि। क्यो पथ दुर्घटनामे शिकार भेल बाजारी छथि तँ संगमे युद्दमे मृत भेल सैनिक आऽ चोरि करए काल मारल गेल चोर, उच्चक्का आऽ पॉकिटमार सेहो छथि। ज्योतिरीश्वरक धूर्तसमागममे जे अति आधुनिक अब्सर्डिटी अछि से नो एण्ट्री: मा प्रविश मे सेहो देखऽमे अबैत अछि। प्रथम कल्लोलमे जे बाजारी छथि से पंक्ति तोड़ि आगाँ बढ़ला उत्तर चोर आऽ उचक्का दुनू गोटेकेँ कॉलर पकड़ि पुनः हुनकर सभक मूल स्थानपर दए अबैत छथि। उचक्का जे बादमे पता चलैत अछि जे गुण्डा-दादा थिक मुदा बाजारी लग सञ्च-मञ्च रहैत अछि, अंगा छोड़बाक लेल कहैत अछि। मुदा जखन पॉकेटमार बाजारी दिससँ चोरक विपक्षमे बजैत अछि तखन उचक्का चक्कू निकालि अपन असल रूपमे आबि जाइत अछि आऽ पॉकेटमारपर मारि-मारि कए उठैत अछि। मुदा जखन चोर कहैत छनि जे ई सेहो अपने बिरादरीक अछि जे छोट-छीन पॉकेटमार मात्र बनि सकल ओकर जकाँ माँजल चोर नहि, आऽ उचक्का जेकाँ गुण्डा-बदमाश बनबाक तँ सोचिओ नञि सकल, तखन उचक्का महराज चोरक पाछँ पड़ि जाइत छथि, जे बदमाश ककरा कहलँह। आब पॉकेटमार मौका देखि पक्ष बदलैत अछि आऽ उचक्काकेँ कहैत छन्हि जे अहाँकेँ नहि हमरा कहलक। संगे ईहो कहैत अछि जे चोरि तँ ई तेहन करए जनैत अछि, जे गिरहथक बेटा आऽ कुकुर सभ चोरि करैत काल पीटैत-पीटैत एतऽ पठा देलक आऽ हमर खिधांश करैत अछि। बड़का चोर भेलाऽ हँ। भद्र व्यक्ति चोरक बगेबानी देखि ई विश्वास नहि कए पबैत छथि जे ओऽ चोर थिकाह। ताहिपर पॉकेटमार, चोर महाराजकेँ आर किचकिचबैत छन्हि। तखन ओऽ चोर महराज एहि गपपर दुख प्रकट करैत छथि जे नहि तँ ओहि राति एहि पॉकेटमारकेँ चोरिपर लए जएतथि आऽ ने ओऽ हुनका पिटैत देखि सकैत। एम्हर बजारी जे पहिने चोर आऽ उच्क्काकेँ कॉलर पकड़ि घिसिया चुकल छलाह, गुम्म भेल सभटा सुनैत छथि आऽ दुख प्रकट करैत छथि जे एकरा सभक संग स्वर्गमे रहब तँ स्वर्ग केहन होएत से नहि जानि। आब बजारी महराज गीतक एकटा टुकड़ी एहि विषयपर पढ़ैत छथि। जेना धूर्तसमागममे गीत अछि तहिना नो एण्ट्री: मा प्रविश मे सेहो, ई एहि स्थलपर प्रारम्भ होइत अछि जे एहि नाटककेँ संगीतक बना दैत अछि। ओम्हर पॉकेटमारजी सभक पॉकेट काटि लैत छथि आऽ बटुआ साफ कए दैत छथि। आब फेर गीतमय फकड़ा शुरू भए जाइत अछि मुदा तखने एकटा मृत रद्दीबला सभक तंद्राकेँ तोड़ि दैत छथि ई कहि जे यमालयक बन्द दरबज्जाक ओहि पार, ई बटुआ आऽ पाइ-कौड़ी कोनो काजक नहि अछि। आब दुनू मृत भद्र व्यक्ति सेहो बजैत छथि, जे हँ दोसर देसमे दोसर देसक सिक्का कहाँ चलैत अछि। आब एकटा रमणीमोहन नाम्ना मृत रसिक भद्र व्यक्तिक दोसर देसक सिक्का नहि चलबाक विषयमे टीप दैत छथि जे हँ ई तँ ओहिना अछि जेना प्रेयसीक दोसरक पत्नी बनब। आब एहि गपपर घमर्थन शुरू भए जाइत अछि। तखन रमणी मोहन गपक रुखि घुमा दैत छथि जे दरबज्जाक भीतर रम्भा-मेनका सभ हेतीह। भिखमंगनी जे तावत अपन कोरामे लेल एकटा पुतराकेँ दोसराक हाथमे दए बहसमे शामिल भऽ गेल छथि ईर्ष्यावश रम्भा-मेनकाकेँ मुँहझड़की इत्यादि कहैत छथि। मुदा पॉकेटमार कहैत अछि जे भीतरमे सुख नहि दुखो भए सकैत अछि। एहिपर बीमा बाबू अपन कार्यक स्कोप देखि प्रसन्न भए जाइत छथि। आब पॉकेटमार इन्द्रक वज्र पर रुपैय्याक बोली शुरू करैत अछि। एहि बेर बजारी तन्द्रा भंग करैत अछि आऽ दुनू भद्र व्यक्ति हुनकर समर्थन करैत कहैत अछि जे ई अद्भुत नीलामी, जे करबाऽ रहल अछि पॉकेटमार आऽ शामिल अछि चोर आऽ भिखमंगनी, पहिले-पहिल सुनल अछि आऽ फेर संगीतमय फकड़ा सभ शुरू भए जाइत अछि। मुदा तखने नंदी-भृंगी शास्त्रीय संगीतपर नचैत प्रवेश करैत छथि। आब नंदी-भृंगीक ई पुछलापर जे दरबज्जाक भीतर की अछि सभ गोटे अपना-अपना हिसाबसँ स्वर्ग-नरक आऽ अकास-पताल कहैत छथि। मुदा नंदी-भृंगी कहैत छथि जे सभ गोटे सत्य छी आऽ क्यो गोटे पूर्ण सत्य नहि बजलहुँ। फेर बजैत-बजैत ओऽ कहए लगैत छथि क्यो चोरि काल मारल गेलाह (चोर ई सुनि भागए लगैत छथि तँ दु-तीन गोटे पकड़ि सोझाँ लए अनैत छन्हि!) तँ क्यो एक्सीडेन्टसँ आऽ एहि तरहेँ सभटा गनबए लगैत छथि, मुदा बीमा-बाबू कोना बिन मृत्युक एतए आयल छथि से हुनकहु लोकनिकेँ नहि बुझल छन्हि! बीमा बाबू कहैत छथि जे ओऽ नव मार्केटक अन्वेषणमे आएल छथि! से बिन मरल सेहो एक गोटे ओतए छथि! भृंगी नंदीकेँ ढ़ेर रास बीमा कम्पनीक आगमनसँ आएल कम्पीटिशनक विषयमे बुझबैत छथि! एम्हर प्रेमी-प्रेमिकामे घोंघाउज शुरू होइत छन्हि, कारण प्रेमी आब घुरि जाए चाहैत छथि। रमणी मोहन प्रेमीक गमनसँ प्रसन्न होइत छथि जे प्रेमिका आब असगरे रहतीह आऽ हुनका लेल मौका छन्हि। मुदा भृंगी ई कहि जे एतएसँ गेनाइ तँ संभव नहि मुदा ई भऽ सकैत अछि जे दुनू जोड़ी माय-बाप(!)केँ एक्सीडेन्ट करबाए एतहि बजबाऽ लेल जाए। मुदा अपना लेल माय-बापक बलि लेल प्रेमी-प्रेमिका तैयार नहि छथि। तखन नंदी भृंगी दुनू गोटेक विवाह गाजा-बाजाक संग कराऽ दैत छथि आऽ कन्यादान करैत छथि बजारी। दोसर कल्लोल: दोसर कल्लोलक आरम्भ होइत अछि एहि भाषसँ, जे क्यो नेता मरलाक बाद आबएबला छथि, हुनकर दुनू अनुचर मृत भए आबि चुकल छथि आऽ नेताजीक अएबाक सभ क्यो प्रतीक्षा कए रहल छथि, दुनू अनुचर छोट-मोट भाषण दए नेताजीक विलम्बसँ अएबाक (मृत्युक बादो!) क्षतिपूर्ति कए रहल छथि, गीतक योग दए। एकटा गीत चोर नहि बुझैत छथि मुदा भिखमंगनी आऽ रद्दीबला बुझि जाइत छथि, ताहि पर बहस शुरू होइत अछि। चोरकेँ चोर कहलापर आपत्ति अछि आऽ भिखमंगनीकेँ ओऽ भिख-मंग कहैत अछि तँ भिखमंगनी ओकरा रोकि कहैत छथि जे ओऽ सरिसवपाहीक अनसूया छथि, मिथिला-चित्रकार, मुदा दिल्लीक अशोकबस्ती आबि बुझलन्हि जे एहि नगरमे कला-वस्तु क्यो नहि किनैत अछि आऽ चौबटियाक भिखमंगनी बनि रहि गेलीह। चोर कहैत अछि जे मात्र ओऽ बदनाम छथि, चोरि तँ सभ करैत अछि। नव बात कोनो नहि अछि, सभ अछि पुरनकाक चोरि। तकर बाद नेताजी पहुँचि जाइत छथि आऽ लोकक चोर, उचक्का आऽ पॉकेटमार होएबाक कारण, समाजक स्थितिकेँ कहैत छथि। तखने एकटा वामपंथी अबैत छथि आऽ ओऽ ई देखि क्षुब्ध छथि जे नेताजी चोर, उचक्का आऽ पॉकेटमारसँ घिरल छथि। मुदा चोर अपन तर्क लए पुनः प्रस्तुत होइत अछि आऽ नेताजीक राखल “चोर-पुराण” नामक आधारपर बजारी जी गीत शुरू कए दैत छथि। तेसर कल्लोल: आब नेताजी आऽ वामपंथीमे गठबंधन आऽ वामपंथी द्वारा सरकारक बाहरसँ देल समर्थनपर चरचा शुरू भए जाइत अछि। नेताजी फेर गीतमय होइत छथि आकि तखने स्टंट-सीन करैत एकटा मुइल अभिनेता विवेक कुमारक अएलासँ आकर्षण ओम्हर चलि जाइत अछि। टटका-ब्रेकिंग न्यूज देबाक मजबूरीपर नेताजी व्यंग्य करैत छथि। वामपंथी दू बेर दू गोट गप नव गप कहि जाइत छथि, एक जे बिन अभिनेता बनने क्यो नेता नहि बनि सकैत अछि आऽ दोसर जे चोर नेता नहि बनि सकैछ (ई चोर कहैत अछि) मुदा नेता सभ तँ चोरि करबामे ककरोसँ पाछाँ नहि छथि। तखने एकटा उच्च वंशीय महिला अबैत छथि आऽ हुनकर प्रश्नोत्तरक बाद एकटा सामान्य क्यूक संग एकटा वी.आइ.पी.क्यू बनि जाइत अछि। अभिनेता, नेता आऽ वामपंथी सभ वी.आइ.पी.क्यूमे ठाढ़ भऽ जाइत छथि! ई पुछलापर की, कतार किएक बनल अछि ताहिपर चोर-पॉकेटमार कहैत छथि जे हुनका लोकनिकेँ पंक्ति बनएबाक (आऽ तोड़बाक सेहो) अभ्यास छन्हि। चतुर्थ कल्लोल: यमराज सभक खाता-खेसरा देखि लैत छथि आऽ चित्रगुप्त ई रहस्योद्घाटन करैत छथि जे एक युग छल जखन सोझाँक दरबज्जा खुजितो छल आऽ बन्न सेहो होइत छल। नंदी भृंगी पहिनहि सूचित कए देलन्हि जे सोझाँक दरबज्जा स्वप्न नहि, मात्र बुझबाक दोष छल। दरबज्जाक ओहिपार की अछि ताहि विषयमे सभ क्यो अपना-अपना हिसाबसँ अनुभवक उत्तर दैत छथि। चित्रगुप्त कहैत छथि जे ई सभटा छैक ओहिपार। नंदी-भृंगी सूचित करैत छथि जे एहि गेटमे प्रवेश निषेध छैक, नो एण्ट्री केर बोर्ड लागल छैक। आहि रे ब्बा! आब की होए! नेताजीकेँ पठाओल जाइत छन्हि यमराजक सोझाँ, मुदा हुनकर सरस्वती ओतए मन्द भए जाइत छन्हि। बदरी विशाल मिश्र प्रसिद्ध नेताजी केर खिंचाई शुरू होइत छन्हि असली केर बदला सर्टिफिकेट बला कम कए लिखाओल उमरिपर। पचपन बरिख आयु आऽ शश योग कहैत अछि जे सत्तरि से ऊपर जीताह से ओऽ आऽ संगमे मृत चारू सैनिककेँ आपिस पठा देल जाइत अछि। दूटा सैनिक नेताजीक संग चलि जाइत छथि आऽ दू टा अनुचर सेहो जाए चाहैत अछि। मुदा नेताजीक अनुचर सभक अपराध बड़ भारी, से चित्रगुप्तक आदेशपर नंदी-भृंगी हुनका लए, कराहीमे भुनबाक लेल बाहर लए जाइत छथि तँ बाँचल दुनू सैनिक हुनका पकड़ि केँ लए जाइत छथि आऽ नंदी-भृंगी फेर मंचपर घुरि अबैत छथि। तहिना तर्कक बाद प्रेमी-प्रेमिका, दुनू भद्र पुरुष आऽ बजारीकेँ सेहो त्राण भेटैत छन्हि ढोल-पिपहीक संग हुनका बाहर लए गेल जाइत अछि। आब नन्दी जखन अभिनेताक नाम विवेक कुमार उर्फ...बजैत छथि तँ अभिनेता जी रोकि दैत छथि जे कतेक मेहनतिसँ जाति हुनकर पाछाँ छोड़ि सकल अछि, से उर्फ तँ छोड़िए देल जाए। वामपंथी गोष्ठीकेँ अभिनेता द्वारा मदति केर विवरणपर वामपंथी प्रतिवाद करैत छथि। हुनको पठा देल जाइत छनि। वामपंथीक की हेतन्हि, हुनकर कथामे तँ, ने स्वर्ग-नर्क अछि आऽ ने यमराज-चित्रगुप्त। हुनका अपन भविष्यक निर्णय स्वयं करबाक अवसर देल जाइत छन्हि। मुदा वामपंथी कहैत छथि जे हुनकर शिक्षा आन प्रकारक छलन्हि मुदा एखन जे सोझाँ घटित भए रहल छन्हि ताहिपर कोना अविश्वास करथु? मुदा यमराज कहैत छथि जे भऽ सकैत अछि , जे अहाँ देखि रहल छी से दुःस्वप्न होए, जतए घुसए जाएब ओतए लिखल अछि नो एण्ट्री। आब यमराज प्रश्न पुछैत छथि जे विषम के, मनुक्ख आकि प्रकृति? वामपंथी कहैत छथि जे दुनू, मुदा प्रकृतिमे तँ नेचुरल जस्टिस कदाचित् होइतो छैक मुदा मनुक्खक स्वभावमे से गुन्जाइश कहाँ? मुदा वामपंथी राजनीति एकर (समानताक, सुधार केर) प्रयास करैत अछि। ताहिपर हुनका संग चोर-उचक्का आऽ पॉकेटमारकेँ पठाओल जाइत अछि ई अवसर दैत जे हिनका सभकेँ बदलू। चोर कनेक जाएमे इतस्तः करैत अछि आऽ ई जिज्ञासा करैत अछि जे हम सभ तँ जाइए रहल छी मुदा एहिसँ आगाँ? नंदी-चित्रगुप्त-यमराज समवेत स्वरमे कहैत छथि- नो एण्ट्री। भृंगी तखने अबैत छथि, अभिनेताकेँ छोड़ने। यमराज कहैत छथि मा प्रविश। भृंगी नीचाँमे होइत चरचाक गप कहैत अछि जे एतुक्का निअम बदलल जएबाक आऽ कतेक गोटेकेँ पृथ्वपर घुरए देल जएबाक चरचा सर्वत्र भए रहल छथि। यमदूत सभ अनेरे कड़ाह लग ठाढ़ छथि क्यो भुनए लेल कहाँ भेटल छन्हि (मात्र दू टा अनुचर)। आब क्यो नहि आबए बला बचल अछि, से सभ कहैत छथि। चित्रगुप्त अपन नमहर दाढ़ी आऽ यमराज अपन मुकुट उतारि लैत छथि आऽ स्वाभाविक मनुक्ख रूपमे आबि जाइत छथि! मुदा चित्रगुप्तक मेकप बला नमहर दाढ़ी देखि भिखमंगनी जे ओतए छलीह, हँसि दैत छथि। भृंगी उद्घाटन करैत छथि जे भिखमंगनी हुनके सभ जेकाँ कलाकार छथि! कोन अभिनय! तकर विवरण मुहब्बत आऽ गुदगुदीपर खतम होइत अछि तँ भिखमंगनी कहैत छथि जे नहि एहि तरहक अभिनय तँ ओतए (देखा कए) भऽ रहल अछि। ओत्तऽ रमणी मोहन आऽ उच्चवंशीय महिला निभाक रोमांस चलि रहल अछि। मुदा निभाजी तँ बजिते नहि छथि। भिखमंगनी यमराजसँ कहैत छथि जे ओऽ तखने बजतीह जखन एहि दरबज्जाक तालाक चाभी हुनका भेटतन्हि, बुझतीह जे अपसरा बनबामे यमराज मदति दए सकैत छथि, ई रमणीक हृदय थिक एतहु नो एण्ट्री! यमराज खखसैत छथि, तँ चित्रगुप्त बुझि जाइत छथि जे यमराज “पंचशर”सँ ग्रसित भए गेल छथि! चित्रगुप्तक कहला उत्तर सभ क्यो एक कात लए जाओल जाइत छथि मात्र यमराज आऽ निभा मंचपर रहि जाइत छथि। यमराज निभाक सोझाँ- सुनू ने निभा... कहि रुकि जाइत छथि। सभक उत्साहित कएलापर यमराज बड़का चाभी हुनका दैत छथि, मुदा निभा चाभी भेटलापर रमणी मोहनक संग तेना आगाँ बढ़ैत छथि जेना ककरो अनका चिन्हिते नहि होथि! ओऽ चाभी रमणी मोहनकेँ दए दैत छथि मुदा ओऽ ताला नहि खोलि पबैत छथि। फेर निभा अपने प्रयास करए लेल आगाँ बढ़ैत छथि मुदा चित्रगुप्त कहैत छथि जे ई मोनक दरबज्जा थिक, ओना नहि खुजत। महिला ठकए लेल चाभी देबाक! बात कहैत छथि। सभ क्यो हँसी करैत छनि जे मोन कतए छोड़ि अएलहुँ? ताहिपर एकबेर पुनः रमणी मोहन आऽ निभा मोन संजोगि कए ताला खोलबाक असफल प्रयास करैत छथि। नंदी-भृंगी-भिखमंगनी गीत गाबए लगैत छथि जकर तात्पर्य ईएह जे मोनक ताला अछि लागल, मुदा ओतए अछि नो एण्ट्री। मुदा ऋतु वसन्तमे प्रेम होइछ अनन्त आऽ करेज कहैत अछि मैना-मैना, तँ एतहि नो एण्ट्री दरबज्जापर धरना देल जाए। विवेचन: भारत आऽ पाश्चात्य नाट्य सिद्धांतक तुलनात्मक अध्ययनसँ ई ज्ञात होइत अछि मानवक चिन्तन भौगोलिक दूरीकक अछैत कतेक समानता लेने रहैत अछि। भारतीय नाट्यशास्त्र मुख्यतः भरतक “नाट्यशास्त्र” आऽ धनंजयक दशरूपकपर आधारित अछि। पाश्चात्य नाट्यशास्त्रक प्रामाणिक ग्रंथ अछि अरस्तूक “काव्यशास्त्र”। भरत नाट्यकेँ “कृतानुसार” “भावानुकार” कहैत छथि, धनंजय अवस्थाक अनुकृतिकेँ नाट्य कहैत छथि। भारतीय साहित्यशास्त्रमे अनुकरण नट कर्म अछि, कवि कर्म नहि। पश्चिममे अनुकरण कर्म थिक कवि कर्म, नटक कतहु चरचा नहि अछि। अरस्तू नाटकमे कथानकपर विशेष बल दैत छथि। ट्रेजेडीमे कथानक केर संग चरित्र-चित्रण, पद-रचना, विचार तत्व, दृश्य विधान आऽ गीत रहैत अछि। भरत कहैत छथि जे नायकसँ संबंधित कथावस्तु आधिकारिक आऽ आधिकारिक कथावस्तुकेँ सहायता पहुँचाबएबला कथा प्रासंगिक कहल जाएत। मुदा सभ नाटकमे प्रासंगिक कथावस्तु होए से आवश्यक नहि, नो एण्ट्री: मा प्रविश मे नहि तँ कोनो तेहन आधिकारिक कथावस्तु अछि आऽ नहिए कोनो प्रासांगिक, कारण एहिमे नायक कोनो सर्वमान्य नायक नहि अछि। जे बजारी उच्क्काकेँ कॉलर पकड़ैत छथि से कनेक कालक बाद गौण पड़ि जाइत छथि। जाहि उच्क्काक सोझाँ चोर सकदम रहैत अछि से किछु कालक बाद, किछु नव नहि होइछ केर दर्शनपर गप करैत सोझाँ अबैत छथि। जे यमराज सभकेँ थर्रेने छथि से स्वयं निभाक सोझाँमे अपन तेज, मध्यम होइत देखैत छथि। भिखमंगनी हुनका दैवी स्वरूप उतारने देखैत हँसैत छथि तँ रमणी मोहन आऽ निभा सेहो हुनका आऽ चित्रगुप्तकेँ अन्तमे अपशब्द कहैत छथि। वामपंथीक आऽ अभिनेताक सएह हाल छन्हि। कोनो पात्र कमजोर नहि छथि आऽ रिबाउन्ड करैत छथि। कथा इतिवृत्तिक दृष्टिसँ प्रख्यात, उत्पाद्य आऽ मिश्र तीन प्रकारक होइत अछि। प्रख्यात कथा इतिहास पुराणसँ लेल जाइत अछि आऽ उत्पाद्य कल्पित होइत अछि। मिश्रमे दुनूक मेल होइत छथि। नो एण्ट्री: मा प्रविश मे मिश्र इतिवृत्तिक होएबाक कोनो टा गुंजाइश तखने खतम भए जाइत अछि जखन चित्रगुप्त आऽ यमराज अपन नकली भेष उतारैत छथि आऽ भिखमंगनीक हँसलापर भृंगी कहैत छथि जे ई भिखमंगनी सेहो हमरे सभ जेकाँ कलाकार छथि! मात्र यमराज आऽ चित्रगुप्त नामसँ कथा इतिहास-पुराण सम्बद्ध नहि अछि आऽ इतिवृत्ति पूर्णतः उत्पाद्य अछि। अरस्तू कथानककेँ सरल आऽ जटिल दू प्रकारक मानैत छथि। ताहि हिसाबसँ नो एण्ट्री: मा प्रविश मे आकस्मिक घटना आदि जाहि सरलताक संग फ्लोमे अबैत अछि, से ई नाटक सरल कथानक आधारित कहल जाएत। फेर अरस्तू इतिवृत्तकेँ दन्तकथा, कल्पना आऽ इतिहास एहि तीन प्रकारसँ सम्बन्धित मनैत छथि। नो एण्ट्री: मा प्रविश केँ काल्पनिकमूलक श्रेणीमे एहि हिसाबसँ राखल जाएत। अरस्तूक ट्रेजेडीक चरित्र, य़शस्वी आऽ कुलीन छथि- सत् असत् केर मिश्रण। नो एण्ट्री: मा प्रविश मे जे चरित्र सभ छथि ताहिमे सभ चरित्रमे सत् असत् केर मिश्रण अछि। निभा उच्चवंशीय छथि मुदा रमणी मोहन जे बलात्कारक बादक पिटाई केर बाद मृत भेल छथि हुनकासँ हिलि-मिलि जाइत छथि। भिखमंगनी मिथिला चित्रकार अनसूया छथि। दुनू भद्रपुरुष बजारी आऽ चारू सैनिक एहि प्रकारेँ बिन कलुषताक सोझाँ अबैत छथि। भरत नृत्य संगीतक प्रेमीकेँ धीरललित, शान्त प्रकृतिकेँ धीरप्रशान्त, क्षत्रिय प्रवृत्तिकेँ धीरोदत्त आऽ ईर्ष्यालूकेँ धीरोद्धत्त कहैत छथि। बजारी आऽ दुनू भद्रपुरुष संगीतक बेश प्रेमी छथि तँ रमणी मोहन प्रेमी-प्रेमिकाकेँ देखि कए ईर्ष्यालू, सैनिक सभ शान्त छथि क्षत्रियोचत गुण सेहो छन्हि से धीरोदत्त आऽ धीरप्रशान्त दुनू छथि। मुदा नो एण्ट्री: मा प्रविश मे एहि प्रकारक विभाजन सम्भव नहि अछि। भारतीय सिद्धांत कार्यक आरम्भ, प्रयत्न, प्राप्त्याशा, नियताप्ति आऽ फलागम धरिक पाँच टा अवस्थाक वर्णन करैत छथि। प्राप्त्याशामे फल प्राप्तिक प्रति निराशा अबैत अछि तँ नियताप्तिमे फल प्राप्तिक आशा घुरि अबैत अछि। पाश्चात्य सिद्धांत आरम्भ, कार्य-विकास, चरम घटना, निगति आऽ अन्तिम फल। प्रथम तीन अवस्थामे उलझन अबैत अछि, अन्तिम दू मे सुलझन। कार्यावस्थाक पंच विभाजन- बीया, बिन्दु, पताका, प्रकरी आऽ कार्य अछि। नो एण्ट्री: मा प्रविश मे बीया अछि एकटा द्वन्द मृत्युक बादक लोकक, बीमा एजेन्ट एतए बिनु मृत्युक पहुँचि जाइत छथि। यमराज आऽ चित्रगुप्त मेकप आर्टिस्ट निकलैत छथि। विभिन्न बिन्दु द्वारा एकटा चरित्र ऊपर नीचाँ होइत रहैत अछि। पताका आऽ प्रकरी अवान्तर कथामे होइत अछि से नो एण्ट्री: मा प्रविश मे नहि अछि। बीआक विकसित रूप कार्य अछि मुदा नो एण्ट्री: मा प्रविश मे ओऽ धरणापर खतम भए जाइत अछि! अरस्तू एकरा बीआ, मध्य आऽ अवसान कहैत छथि। आब आऊ सन्धिपर, मुख-सन्धि भेल बीज आऽ आरम्भकेँ जोड़एबला, प्रतिमुख-सन्धि भेल बिन्दु आऽ प्रयत्नकेँ जोड़एबला, गर्भसन्धि भेल पताका आऽ प्राप्त्याशाकेँ जोड़एबला, विमर्श सन्धि भेल प्रकरी आऽ नियताप्तिकेँ जोड़एबला आऽ निर्वहण सन्धि भेल फलागम आऽ कार्यकेँ जोड़एबला। नो एण्ट्री: मा प्रविश मे मुख/ प्रतिमुख आऽ निर्वहण सन्धि मात्र अछि, शेष दू टा सन्धि नहि अछि। पाश्चात्य सिद्धांत स्थान, समय आऽ कार्यक केन्द्र तकैत अछि। नो एण्ट्री: मा प्रविश मे स्थान एकहि अछि, समय लगातार आऽ कार्य अछि द्वारक भीतर पैसबाक आकांक्षा। दू घण्टाक नाटकमे दुइये घण्टाक घटनाक्रम वर्णित अछि नो एण्ट्री: मा प्रविश मे कार्य सेहो एकेटा अछि। अभिनवगुप्त सेहो कहैत छथि जे एक अंकमे एक दिनक कार्यसँ बेशीक समावेश नहि होए आऽ दू अंकमे एक वर्षसँ बेशीक घटनाक समावेश नहि होय। नो एण्ट्री: मा प्रविश मे कल्लोलक विभाजन घटनाक निर्दिष्ट समयमे भेल कार्यक आऽ नव कार्यारम्भमे भेल विलम्बक कारण आनल गेल अछि। मुदा एहि त्रिकक विरोध ड्राइडन कएने छलाह आऽ शेक्सपिअरक नाटकक स्वच्छन्दताक ओऽ समर्थन कएलन्हि। मुदा नो एण्ट्री: मा प्रविश मे एहि तरहक कोनो समस्या नहि अबैत अछि। नो एण्ट्री: मा प्रविश मे आपसी गपशपमे- जकरा फ्लैशबैक सेहो कहि सकैत छी- ककर मृत्यु कोना भेल से नीक जेकाँ दर्शित कएल गेल अछि। भारतमे नाटकक दृश्यत्वक समर्थन कएल गेल मुदा अरस्तू आऽ प्लेटो एकर विरोध कएलन्हि। मुदा १६म शताब्दीमे लोडोविको कैस्टेलवेट्रो दृश्यत्वक समर्थन कएलन्हि। डिटेटार्ट सेहो दृश्यत्वक समर्थन कएलन्हि तँ ड्राइडज नाटकक पठनीयताक समर्थन कएलन्हि। देसियर पठनीयता आऽ दृश्यत्व दुनूक समर्थन कएलन्हि। अभिनवगुप्त सेहो कहने छलाह जे पूर्ण रसास्वाद अभिनीत भेला उत्तर भेटैत अछि मुदा पठनसँ सेहो रसास्वाद भेटैत अछि। नो एण्ट्री: मा प्रविश मे पहिल कल्लोलक प्रारम्भमे ई स्पष्ट भऽ जाइत अछि जे एतए दृश्यत्वकेँ प्रधानता देल गेल अछि। पश्चिमी रंगमंच नाट्यविधान वास्तविक अछि मुदा भारतीय रंगमंचपर सांकेतिक। जेना अभिज्ञानशाकुंतलम् मे कालिदास कहैत छथि- इति शरसंधानं नाटयति। नो एण्ट्री: मा प्रविश मे भारतीय विधानकेँ अंगीकृत कएल गेल- जेना मृत्यु प्राप्त सभ गोटे द्वारा स्वर्ग प्रवेश द्वारक अदृश्य देबाड़क गपशप आऽ अभिनय कौशल द्वारा स्पष्टता। अंकिया नाटमे सेहो प्रदर्शन तत्वक प्रधानता छल। कीर्तनियाँ एक तरहेँ संगीतक छल आऽ एतहु अभिनय तत्वक प्रधानता छल। अंकीया नाटक प्रारम्भ मृदंग वादनसँ होइत छल। नो एण्ट्री: मा प्रविश मैथिलीक परम्परासँ अपनाकेँ जोड़ने अछि मुदा संगहि इतिहास, पुराण आऽ समकालीन जीवनचक्रकेँ देखबाक एकटा नव दृष्टिकोण लए आएल अछि, सोचबाऽ लए एकटा नव अंतर्दृष्टि दैत अछि। ज्योतिरीश्वरक धूर्तसमागम, विद्यापतिक गोरक्षविजय, कीर्तनिञा नाटक, अंकीयानाट, मुंशी रघुनन्दन दासक मिथिला नाटक, जीवन झाक सुन्दर संयोग, ईशनाथ झाक चीनीक लड्डू, गोविन्द झाक बसात, मणिपद्मक तेसर कनियाँ, नचिकेताजीक “नायकक नाम जीवन, एक छल राजा”, श्रीशजीक पुरुषार्थ, सुधांशु शेखर चौधरीक भफाइत चाहक जिनगी, महेन्द्र मलंगियाक काठक लोक, राम भरोस कापड़ि भ्रमरक महिषासुर मुर्दाबाद, गंगेश गुंजनक बुधिबधिया केर परम्पराकेँ आगाँ बढ़बैत नचिकेताजीक नो एण्ट्री: मा प्रविश तार्किकता आऽ आधुनिकताक वस्तुनिष्टताकेँ ठाम-ठाम नकारैत अछि। वामपंथीकेँ यमराज ईहो कहैत छथिन्ह, जे वामपंथी देखि रहल छथि से सत्य नहि सपनो भए सकैत अछि। विज्ञानक ज्ञानक सम्पूर्णतापर टीका अछि ई नाटक। सत्य-असत्य, सभ अपन-अपन दृष्टिकोणसँ तकर वर्णन करैत छथि। चोरक अपन तर्क छन्हि आऽ वामपंथी सेहो कहैत छथि कि चोर नेता नहि बनि सकैत छथि मुदा नेताक चोरिपर उतरि अएलासँ चोरक वृति मारल जाए बला छन्हि। नाटकमे आत्म-केन्द्रित हास्यपूर्ण आऽ नीक-खराबक भावना रहि-रहि खतम होइत रहैत अछि। यमराज आऽ चित्रगुप्त तक मुखौटामे रहि जीबि रहल छथि। उत्तर आधुनिकताक ई सभ लक्षणक संग नो एण्ट्री: मा प्रविश मे एके गोटेक कैक तरहक चरित्र निकलि बाहर अबैत अछि, जेना उच्चवंशीय महिलाक। कोनो घटनाक सम्पूर्ण अर्थ नहि लागि पबैत अछि, सत्य कखन असत्य भए जएत तकर कोनो ठेकान नहि। उत्तर आधुनिकताक सतही चिन्तन आऽ चरित्र सभक नो एण्ट्री: मा प्रविश मे भरमार लागल अछि, आशावादिता तँ नहिए अछि मुदा निराशावादिता सेहो नहि अछि। यदि अछि तँ से अछि बतहपनी, कोनो चीज एक तरहेँ नहि कैक तरहेँ सोचए बला- विद्यमान छथि। कारण, नियन्त्रण आऽ योजनाक उत्तर परिणामपर विश्वास नहि वरन संयोगक उत्तर परिणामपर बेशी विश्वास दर्शाओल गेल अछि। गणतांत्रिक आऽ नारीवादी दृष्टिकोण आऽ लाल झंडा आदिक विचारधाराक संगे प्रतीकक रूपमे हास-परिहास सोझाँ अबैत अछि। एहि तरहेँ नो एण्ट्री: मा प्रविश मे उत्तर आधुनिक दृष्टिकोण दर्शित होइत अछि, एतए पाठक कथानकक मध्य उठाओल विभिन्न समस्यासँ अपनाकेँ परिचित पबैत छथि। जे द्वन्द नाटकक अंतमे दर्शित भेल से उत्तर-आधुनिक युगक पाठककेँ आश्चर्यित नहि करैत छन्हि, किएक तँ ओऽ दैनिक जीवनमे एहि तरहक द्वन्दक नित्य सामना करैत छथि। ई नाटक मैथिली नाटक लेखनकेँ एकटा नव दिशामे लए जाएत आऽ आन विधामे सेहो नूतनता आनत से आशा कए सकैत छी। नो एण्ट्री: मा प्रविश केर प्रिंट निकलबासँ पूर्वहि ततेक मात्रामे ई पाठक द्वारा पठित भेल जे एहिपर समीक्षा सेहो “विदेह” ई-पत्रिकाक १८म अंकमे आबि गेल श्री प्रेमशंकर सिंहक। तकर अंश सेहो पाठक लोकनिक लेल देल जाऽ रहल अछि। “टी.एस. एलियटक कथन छनि जे वाङमयी कलाक चरम उत्कर्ष तखन देखबामे अबैछ जखन रचनामे नाटकीयता कवित्व दिस झुकल दृष्टिगत हो आ कवित्व नाटकीयता दिस। उपर्युक्त कथनक परिप्रेक्ष्यमे प्रस्तुत नाटक “नो एण्ट्री: मा प्रविश”क इएह स्वरूप हमरा समक्ष अबैत अछि, जे नाटककार समाजक यथार्थ स्वरूपकेँ प्रस्तुत करबाक उपक्रम कयलनि अछि जाहिमे नाटकीयता आ कवित्व-शक्तिक अद्भुत समन्वयात्मक स्वरूप पाठककेँ उपलब्ध होइत छनि। मनुष्य जन्मजात क्यो नीक वा अधलाह नहि होइछ, प्रत्युत ओकरा समक्ष एहन परिस्थिति आबि कऽ उपस्थित होइछ जाहिसँ वाह्य भऽ कए ओ कर्ममे संलिप्त भऽ कए तदवत् कार्य करैछ, जकर फल ओकरा एही जीवनमे भोगए पड़ैछ। कारण मानवक सर्वोपरि इच्छा रहैछ जे सांसारिक जतेक सुखोपलब्धि थिक तकर उपलब्धि ओकरे हो, किन्तु ओ बिसरि जाइछ जे ओ जेहन कर्म करत तदनुरूपेँ ओकरा फलोपलब्धि सेहो होयतैक। वैश्वीकरणक फलस्वरूप मानवक इच्छा-शक्तिक एतेक बेसी बलवती भऽ गेल अछि ओ चिर-नूतनताक आग्रही भऽ ओकर अन्वेषणमे लागि, ओकर अनुयायी भऽ कए अपन पुरातन दुःख-दर्द, मान-अपमान, ग्लानि-मर्यादा आदिक इतिहासक पन्नामे ओझरायल रहब श्रेयस्कर नहि बुझैत अछि, अत्याधुनिक परिवेश वा परिस्थितिक कारणेँ उत्पन्न आधुनिकता आ पुरातन पोंगा-पन्थी विचारधारामे वर्तमान परिप्रेक्ष्यमे समन्वय नहि स्थापित कयल जाऽ सकैछ, कारण मनुष्यक इच्छा शक्ति अनादि आऽ अनन्त थिक तकरा नियन्त्रित करब दुःसाध्य थिक। मनुष्य परिस्थितिसँ प्रेरित भऽ कए अपन मानसिक सुखोपलब्धि निमित्त विश्वक रंगमंचपर उपस्थित भऽ विविध रूपा अभिनय करैछ तकर प्रत्यक्ष वा परोक्ष रूपेँ विविध कलाक प्रदर्शन करैछ तकर परिणाम ओकरा एत्तहि भोगय पड़ैछ, तथापि मानव स्वर्ग-नरकक द्वन्दमे सतत जीवित रहबाक आकांक्षी रहैछ। प्रयोगधर्मी नाटककार जनमानसमे जे ज्वार आयल अछि, जे लहरि परिव्याप्त भऽ गेल अछि जे ओ अपन अधिकार आऽ कर्तव्यक हेतु एतेक बेसी साकांक्ष भऽ गेल अछि जे ओ सिद्धांतकेँ स्वीकार कऽ कए, ओकर अनुयायी भऽ कए ओ आधुनिक परिप्रेक्ष्यमे दृष्टिबोध कऽ रहल अछि। मानव-समाजक पुरातन इतिहासपर दृष्टिपात कयलासँ स्पष्ट भऽ जाइछ जे चाहे सतयुग हो, द्वापरयुग हो, त्रेता युग हो वा कलियुग हो सब समयक प्रामाणिक इतिहास साक्षी थिक जे अत्याचार-अनाचार, दुःख-दर्द, सुख-समृद्धि, पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म आदि-आदिक प्रबल आकांक्षी रहल अछि मानव समुदाय। किन्तु आधुनिक युगक सर्वोपरि उपलब्धि थिक देश-प्रेमक अपेक्षा विश्व-प्रेम। एकर परिणाम प्रत्यक्ष अछि जे जनमानससँ लऽ कए राजनीति दल सेहो समन्वयवादी भऽ कए ओकर अनुगामी जकर प्रमाण थिक सम्मिलित सरकार। प्रस्तुत नाटक एक प्रतीक नाटक थिक, कारण एहिमे सामाजिक परिप्रेक्ष्यमे एकर कथामुखकेँ उत्थापित कऽ कए प्रतीक योजना नियोजित कयलनि अछि, नाटककार जाहिमे समाजक सब वर्ग यथा चाहे ओऽ चोर हो, उचक्का हो, पाकेटमार हो, नेता हो, अभिनेता हो, कलाकार हो, साहित्यकार हो, बीमा कम्पनीक एजेण्ट हो, प्रेमी-प्रेमिका हो, उच्चवंशीय महिला, अप्सरा हो, नृत्यांगना हो, रद्दी कागज बेचनिहार वा किननिहार हो, नेताक चमचा हो सभक मानसिक पृष्ठभूमिमे प्रवेश कऽ कए नाटककार एक मनोवैज्ञानिक सदृश ओकर साइको-एनालिसिस करबाक उपक्रम कयलनि अछि जे सभक आन्तरिक अभिलाषा रहैछ जे वैह समाजक सर्वश्रेष्ठ प्राणी थिक आऽ स्वर्ग जएबाक अभिलाषाक पूत्यर्थ तद्वत कार्यमे संलिप्त भऽ जाइछ। अन्ततः सब एकत्रित भऽ कए स्वर्गक फाटक लग क्यू लगबैछ, किन्तु चित्रगुप्त द्वारा ओकर कयल गेल कार्य-विवरणी प्रस्तुत कऽ कए पुनः पृथ्वीपर प्रत्यागत हैबाक आदेश दैत छथि आऽ ओतए नो एण्ट्रीक साइन बोर्ड लागि जाइछ आऽ यमराज सेहो प्रत्यागत भऽ जाइछ। इएह द्वन्द्व नाटकमे सर्वत्र दृष्टिगत जे एकर एक नवोपलब्धि थिक। एहि नाटकक वैशिष्ट्य अछि जे मैथिलीमे प्रथमे-प्रथम ने तँ अंक विभाजन अछि ने दृश्य-विभाजन कयलनि, प्रत्युत सम्पूर्ण नाटककेँ प्रयोगधर्मी नाटककार चारि कल्लोलमे विभाजित कऽ कए वर्तमान समाजक सामाजिक पृष्ठभूमिकेँ समाहित कयलनि अछि जे एहने लहर समाजान्तरगत परिव्याप्त अछि। पत्रोचित भाषाक प्रयोग आऽ छोट-छोट वाक्य-विन्यास, नाटकीयता कवित्व-शक्तिसँ ओत-प्रोत रहलाक कारणेँ ई नाटक दर्शकपर अमिट प्रभावोत्पादकता उत्पन्न करत से हमर विश्वास अछि। सम्पूर्ण नाटकान्तर्गत अनेक स्थलपर छोट-छोट गेय पदक प्रयोग कऽ कए एकरसताक परिहार करबामे सहायक भेल अछि। नचिकेता स्वयं अभिनेता छथि, तेँ मैथिली रंगमंचक यथार्थ स्थितिसँ चिर-परिचित छथि जे मैथिलानी रंगकर्मीक अभाव अछि तेँ एहिमे अत्यल्प महिला पात्रकेँ समायोजित कयलनि अछि जे एकर मंचनमे व्यवधान नहि हो। भविष्यमे आर अभिनव प्रयोगधर्मी नाटककारक कृतिक अपेक्षा मैथिली रंगकर्मीकेँ बनल रहत जकर ओऽ पूर्ति करताह।“ मैथिली राम चरित मानस-मैथिली समालोचनाक विफलता मैथिली साहित्यकेँ पढ़निहारक समक्ष मैथिलीमे रामचरित किंवा रामायण 1. श्री चंदा झा कृत मिथिला भाषा रामायण आऽ 2.श्री लालदासक रमेश्वर चरित मिथिला रामायण -एहि दू गोट ग्रंथक रूपमे प्राप्त होइत छन्हि।पाठ्यक्रमक अंतर्गत स्कूल,कॉलेज-विश्वविद्यालयक मैथिली विषयक पाठ हो किंवा सामान्य आलोचनग्रंथ आकि पत्र-पत्रिकामे छिड़ियायल लेख सभ एहि दू गोट रामायणक अतिरिक्त कोनो तेसर रामायणक अस्तित्वो धरि नहि स्वीकार कएल गेल अछि। एकर संग ईहो बुझि लियह जे जनमानस समालोचनाशास्त्रक आधार पर राखल विचारकेँ तखने स्वीकार करैत अछि जखन की ओऽ सत्यताक प्रतीक हो। आइयो मिथिलामे अखंड रामायण पाठ होइत अछि-बाल्मीकि रामायणक किंवा तुलसीक रामचरितमानसक। एकर कारण पर हम बहुत दिन धरि विचार करैत रहलहुँ।कैकटा चन्द्र रामायण आऽ लालदासकृत मिथिला रामायण रामायण अखंड पाठ केनिहार लोकनिकेँ बँटबो कएलहुँ, मुदा सबहक ईएह विचार छल, जे ई दुनू ग्रंथ मैथिली साहित्यक अमूल्य धरोहर अछि, मुदा अखंड पाठक सुर जे तुलसीक मानसमे अछि से दोसर भाषाक रहला उत्तरो संगीतमय अछि। शंकरदेव अपन मातृभाषा असमियाक बदला मैथिली भाषाक प्रयोग संगीतमय भाषा होयबाक द्वारे कएलन्हि ताहि भाषामे संगीतमय रामायणक रचना जे अखण्ड पाठमे प्रयोग भय सकय, केर निर्माण संभव नहि भय सकल अछि से हमर मोन मानबाक हेतु तैयार नहि छल। तखने एकटा लाइब्ररीमे हमरा श्री रामलोचनशरण-कृत यथासम्भव पूर्णभावरक्षित समश्लोकी मैथिली श्रीरामचरितमानसक दर्शन भेल । एहि ग्रंथकेँ पूर्णरूपेँ पढ़बाक मोह हम नहि त्यागि सकलहुँ आऽ आब एहि पर एक गोट छोट-छीन समीक्षा लिखबाक पहिने हम समस्त मैथिल समाजसँ दुइ गोट प्रश्न पुछय चाहैत छी। 1.अपन समीक्षक लोकनि एहि मोतीकेँ चिन्हबामे सफल किएक नहि भय सकलाह,एकर चर्चो तक मैथिलीक उपरोक्त दुनू रामायणक समक्ष किएक नहि केल गेल। आचार्य रामलोचन शरण मैथिलीक सभसँ पैघ महाकाव्यक रचयिता छथि आऽ हमरा विचारे सभसँ संपूर्ण मैथिली रामायणक सेहो। जखन हम एहि महाकाव्यक फोटोकॉपी लाइब्ररियनक विशेष अनुकंपासँ लेबामे सफल भेलहुँ आऽ एकर पूर्वाँचल मिथिलाक रामायण- अखंड- पाठक संस्थाकेँ देलहुँ, तँ ओ ऽ लोकनि एकरा देखि कय आश्चर्यचकित रहि गेलाह आऽ अगिला साल एहि रामायणक अखंड पाठक निर्णय कएलन्हि। एकरा मैथिलीक समालोचनाशास्त्रक विफलता मानल जाय, किएक तँ ई महाकाव्य तँ विफल भैये नहि सकैत अछि। आचार्यक मनोहरपोथीक चर्चा हम अपन बाल्येवस्थासँ सुनैत रही। 2. मैथिलीक सभसँ पैघ महाकाव्यक चर्चा मात्र सीतायन पर आबि किएक खतम भय जाइत अछि।आचार्य श्री रामलोचनशरणक मैथिली श्री रामचरितमानस सभसँ पैघ महाकाव्य अछि ई एकटा तथ्य अछि आऽ से समालोचनाकार किंवा मैथिली भाषाक इतिहासकार लोकनिक कृपाक वशीभूत नहि अछि। अपन ग्रंथक किञ्चित् पूर्ववृत्तम् मे आचार्य लिखैत छथि- मिथिलाभाषायाः मूर्द्धन्या लेखकाः श्रीहरिमोहनझामहोदया निशम्यैतद् वृत्तं परमाह्लादं गता भूयो भूयश्च मामुत्साहितवन्तः। आगाँ ओऽ लिखैत छथि-प्राध्यापकस्य श्री सुरेन्द्रझा ‘सुमन’ तथा सम्पादनविभागस्थ पण्डित श्री शिवशंकरझा-महोदयस्य हृदयेनाहं कृतज़्ज्ञोऽस्मि। आचार्यजीक सुन्दरकाण्डक पारंभ देखू- जामवंत केर वचन सोहाओल। सुनि हनुमंत हृदय अति भाओल॥1॥ ता धारि बाट देखब सहि सूले। खा कय बंधु कंद फल मूले॥2॥ जाधरि आबी सीतहिँ देखी। होयत काज मन हरख विसेखी॥3॥ ई कहि सबहिँ झुकाकय माथे। चलल हरषि हिय धय रघुनाथे॥4॥ सिंधु तीर एक सुंदर भूधर। कौतुक कूदि चढ़ल तेहि ऊपर॥5॥ पुनु पुनि रघुवीरहिँ उर धारी। फनला पवनतनय बल भारी॥6॥ जहि गिरि चरन देथि हनुमंते। से चल जाय पताल तुरंते॥7॥ सर अमोघ रघुपति केर जहिना। चलला हनूमान झट तहिना॥8॥ जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। कह मैनाक हौ श्रम भारी॥9॥ आऽ आब देखू श्री रामचरित मानसक बानगी। तुलसी अकबरक समकालीन छलाह आऽ हुनकर भाषा आऽ अखुनका भाषामे किछु अंतर आबि गेल अछि, मुदा तुलसीक गेयता ओहिनाक ओहिना अछि। आचार्यजी तुलसीक गेयता उठओलन्हि अछि, आऽ दुरूहता खतम कय देने अछि। सभ काण्डक शुरूमे देल संस्कृत पद्य तुलसीक मानससँ लेलन्हि अछि। कवि चन्द्र आऽ लालदास दुनू गोटे अप्पन संस्कृत पद्य बनओलन्हि अछि। आचार्यजीक ई मैथिली रमचरितमानस तुलसीक मानसक रूपांतर तँ अछि,मुदा ई मैथिलीक मूल महाकाव्यक रूपमे परिगणित होयबाक अधिकारी अछि जेना कंबनक तमिल रामायण आऽ तुलसीक मानस अपन-अपन भाषामे केल जा रहल अछि। कंबन बाल्मीकी रामायणक रूपांतर तमिलमे कय रहल छलाह आऽ बाल्मीकि रामायणक विषयमे कहलन्हि जे- ई रामायण एकटा दूधक समुद्र छे आऽ हम छी एकटा बिलाड़ि जे मोनसूबा बना रहल अछि जे एहि सभटा दूधकेँ पीबि जाइ। ओना इइहो सत्य जे कंबन कहियो -आचार्यजी सेहो एहिना कएलन्हि- रामायण केँ अपन मौलिक कृति नहि कहलन्हि वरन बाल्मीकिक कृतिक रूपांतरे कहलन्हि,जखन कि ओ ऽ अपन कृतिमे रामकेँ भगवान बनाय देलन्हि।बाल्मीकि रामकेँ मर्यादा पुरुष अहि मानैत छलाह।बाल्मीकि सुग्रीवक विवाह बालीक पत्नीसँ बालीक मरबाक पश्चात होयबाक वर्णन करैत छथि मुदा कंबन बालीक पत्नीक आजीवन वैधव्यक वर्णन करैत छथि। आछर्यजीकेँ ई करबाक आवश्यकता नहि पड़लन्हि किएकतँ तुलसीक मानस लोकक कंठमे बसि गेल छल,आऽ ओऽ एकर निर्वाह कएलन्हि। आब मानसक एकटा विवादास्पद पद्यक चर्चा करी। अर्थक अनर्थ कोना होइत अछि से देखू। आचार्यजी सुन्दरकाण्डक अंतमे लिखैत छथि जखन सिंधु (समुद्र)रामकेँ लंका जयबाक रस्ता नहि दैत छथि तखन राम कहैत छथि, लछुमन बान सरासन आनू। सोखब बारिधि बिसिख कृसानू॥1॥ तखन सिंधु कर जोरि बजैत छथि- ढोल गमार सुद्र पसु नारी। सब थिक ताड़न केर अधिकारी॥ एकर अर्थ ई सभ -ढोल गमार सुद्र पसु नारी- ई सभ शिक्षाकिंवा सबक देबा योग्य अछि,गमार सुद्र आऽ नारीमे शिक्षाक अभाव अछि तेँ आ ऽ पसुमे मनुष्यक अपेक्षा बुद्धि नहि छैक तेँ, ढोलक प्रयोग बिना शिक्षाक करब तँ संगीत नहि ध्वनि भय जायत। नीचाँ तुलसीक श्रीरामचरित मानसमे सेहो देखू- फेर समुद्र ओहि स्थितिमे खलनायक बनि रहल छल आ ओकर वक्त्तव्य कविक आकि रचनाकारक वक्त्तव्य नहि भय सकैत अछि। रचनाकारक रचनामे नीक अधलाह सभ पात्र रहैत अछि, आ ऽ ओहि पात्रक मुँह सँ नीक आ ऽ अधलाह दुनू गप निकलत। रचनाकारक सफलता एहि पर निर्भर करैत अछि, जे ओ ऽ अपनाकेँ अपन पत्रसँ फराक कय पबैत अछि कि नहि। एहि आलोचना निबंधक उद्देश्य चन्द्र कवि आकि कवि लालदासक रचनाकेँ छोट करब नहि अछि वरन् हुनकर रचनाक समकक्ष आचार्यक रचनाकेँ अनबा मात्र अछि जाहिसँ तुलसीक मानसक वर्चस्व आचार्यजीक रचना खतम कय सकय। तुलसीक प्रासंगिकता नहि वरण ओकर दुरूहताकेँ आचार्य खतम कएने छथि। रामलोचन शरणक मैथिली राम चरित मानस- सारांश महाकाव्य वा गीत प्रबन्ध: महाकाव्यक वर्णन जे ई कतेक सर्गमे हुअए, एकर नायक केहन प्रकृतिक हुअए आ ओ उच्च कुल उत्पन्न हुअए आदि आब बुद्धिविलास मात्र कहल जाएत। जेना गद्यमे कथा होइत अछि आ विस्तारक अनुसार लघुकथा, कथा आ उपन्यासमे विभक्त कएल जाइत अछि तइ सन्दर्भमे उपन्यास (वा बीच-बीचमे नाटककक) पद्य रूपान्तरण महाकाव्य कहल जाएत। जँ ऋगवैदिक परम्परामे जाइ तँ महाकाव्यकेँ गीत-प्रबन्ध कहल जएबाक चाही। आचार्य रामलोचन शरणक गीत-प्रबन्ध मैथिली रामचरित मानस: मैथिली साहित्यकेँ पढ़निहारक समक्ष मैथिलीमे रामचरित किंवा रामायण श्री चंदा झा कृत मिथिला भाषा रामायण आ श्री लालदासक रमेश्वर चरित मिथिला रामायण - ऐ दू गोट ग्रंथक रूपमे प्राप्त होइत अछि। पाठ्यक्रमक अंतर्गत स्कूल, कॉलेज-विश्वविद्यालयक मैथिली विषयक पाठ हो किंवा सामान्य आलोचना ग्रंथ आकि पत्र-पत्रिकामे छिड़िआयल लेख सभ, ऐ तेसर रामायणक अस्तित्वो धरि नै स्वीकार कएल गेल अछि। एकर संग ईहो बुझि लिअ जे जनमानस समालोचनाशास्त्रक आधारपर राखल विचारकेँ तखने स्वीकार करैत अछि जखन ओ सत्यताक प्रतीक हो। आइयो मिथिलामे जे अखंड रामायण पाठ होइत अछि से बाल्मीकि रामायणक किंवा तुलसीक रामचरितमानसक। एकर कारणपर हम बहुत दिन धरि विचार करैत रहलहुँ। कैकटा चन्द्र रामायण आ लालदासकृत मिथिला रामायण, रामायण अखंड पाठ केनिहार लोकनिकेँ बँटबो कएलहुँ मुदा सबहक ईएह विचार छल, जे ई दुनू ग्रंथ मैथिली साहित्यक अमूल्य धरोहर अछि, मुदा अखंड पाठक सुर जे तुलसीक मानसमे अछि से दोसर भाषाक रहला उत्तरो संगीतमय अछि। शंकरदेव अपन मातृभाषा असमियाक बदला मैथिली भाषाक प्रयोग संगीतमय भाषा होयबाक द्वारे कएलन्हि तइ भाषामे संगीतमय रामायणक रचना जे अखण्ड पाठमे प्रयोग भऽ सकए, केर निर्माण संभव नै भऽ सकल अछि, से हमर मोन मानबाक हेतु तैयार नै छल, श्री रामलोचनशरण-कृत यथासम्भव पूर्णभावरक्षित समश्लोकी मैथिली श्रीरामचरितमानस एकर प्रमाण अछि। अपन समीक्षक लोकनि ऐ मोतीकेँ चिन्हबामे सफल किए नै भऽ सकलाह, एकर चर्चो तक मैथिलीक उपरोक्त दुनू रामायणक समक्ष किए नै कएल जाइत अछि। स्व.हरिमोहन झाक कोनो पोथी मैथिली अकादमी द्वारा हुनका जिबैत प्रकाशित नै भेल आ साहित्य अकादमी पुरस्कार सेहो हुनका मृत्योपरांत देल गेलन्हि। आचार्य रामलोचन शरण मैथिलीक सभसँ पैघ महाकाव्यक रचयिता छथि आ हमरा विचारे सभसँ संपूर्ण मैथिली रामायणक सेहो। जखन हम ऐ महाकाव्यक फोटोकॉपी पूर्वाँचल मिथिलाक रामायण- अखंड- पाठक संस्थाकेँ देलहुँ, तँ ओ लोकनि एकरा देख कऽ आश्चर्यचकित रहि गेलाह आ अगिला साल ऐ रामायणक अखंड पाठक निर्णय कएलन्हि। एकरा मैथिलीक समालोचनाशास्त्रक विफलता मानल जाए, किएक तँ ई महाकाव्य तँ विफल भैये नै सकैत अछि। आचार्यक मनोहरपोथीक चर्चा हम अपन बाल्येवस्थासँ सुनैत रही, मुदा ऐ पोथीक नै। मैथिलीक सभसँ पैघ महाकाव्यक चर्चा मात्र सीतायनपर आबि किए खतम भऽ जाइत अछि। आचार्य श्री रामलोचनशरणक मैथिली श्री रामचरितमानस सभसँ पैघ महाकाव्य अछि ई एकटा तथ्य अछि आ से समालोचनाकार किंवा मैथिली भाषाक इतिहासकार लोकनिक कृपाक वशीभूत नै अछि। अपन ग्रंथक किञ्चित् पूर्ववृत्तम् मे आचार्य लिखैत छथि- मिथिलाभाषायाः मूर्द्धन्या लेखकाः श्रीहरिमोहनझामहोदया निशम्यैतद् वृत्तं परमाह्लादं गता भूयो भूयश्च मामुत्साहितवन्तः। आँगाँ ओ लिखैत छथि-प्राध्यापकस्य श्री सुरेन्द्रझा ‘सुमन’ तथा सम्पादनविभागस्थ पण्डित श्री शिवशंकरझा-महोदयस्य हृदयेनाहं कृतज़्ज्ञोऽस्मि। से सभकेँ ई देखल गुनल सेहो छलन्हि। आचार्य रामलोचन शरणक गीत-प्रबन्ध मैथिली रामचरित मानसक गेयता: आचार्यजीक सुन्दरकाण्डक प्रारंभ देखू आ एकर गेयताक तुलना चन्दा झाक रामायण आ लालदासक रामयणसँ करू:- जामवंत केर वचन सोहाओल। सुनि हनुमंत हृदय अति भाओल॥1॥ ता धारि बाट देखब सहि सूले। खा कय बंधु कंद फल मूले॥2॥ जाधरि आबी सीतहिँ देखी। होयत काज मन हरख विसेखी॥3॥ ई कहि सबहिँ झुकाकय माथे। चलल हरषि हिय धय रघुनाथे॥4॥ सिंधु तीर एक सुंदर भूधर। कौतुक कूदि चढ़ल तेहि ऊपर॥5॥ पुनु पुनि रघुवीरहिँ उर धारी। फनला पवनतनय बल भारी॥6॥ जहि गिरि चरन देथि हनुमंते। से चल जाय पताल तुरंते॥7॥ सर अमोघ रघुपति केर जहिना। चलला हनूमान झट तहिना॥8॥ जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। कह मैनाक हौ श्रम भारी॥9॥ तुलसी अकबरक समकालीन छलाह आ हुनकर भाषा आ अखुनका भाषामे किछु अंतर आबि गेल अछि, मुदा तुलसीक गेयता ओहिनाक ओहिना अछि। आचार्यजी तुलसीक गेयता उठओलन्हि अछि, आ दुरूहता खतम कऽ देने छथि। सभ काण्डक शुरूमे देल संस्कृत पद्य ओ तुलसीक मानससँ लेलन्हि अछि। आचार्यजीक ई मैथिली रामचरितमानस तुलसीक मानसक रूपांतर तँ अछि मुदा ई मैथिलीक मूल महाकाव्यक रूपमे परिगणित होयबाक अधिकारी अछि जेना कंबनक तमिल रामायण आ तुलसीक मानस अपन-अपन भाषामे परिगणित कएल जा रहल अछि। कंबन बाल्मीकि रामायणक रूपांतर तमिलमे कऽ रहल छलाह तखन ओ बाल्मीकि रामायणक विषयमे कहलन्हि जे- ई रामायण एकटा दूधक समुद्र अछि आ हम छी एकटा बिलाड़ि जे मनसूबा बना रहल अछि जे ऐ सभटा दूधकेँ एक्के बेरमे पीबि जाइ। ओना ईहो सत्य जे कंबन कहियो (आचार्यजी सेहो एहिना कएलन्हि) रामायण केँ अपन मौलिक कृति नै कहलन्हि वरन बाल्मीकिक कृतिक रूपांतरे कहलन्हि, जखन कि ओ अपन कृतिमे रामकेँ भगवान बना देलन्हि। बाल्मीकि रामकेँ मर्यादा पुरुष मानैत छलाह। बाल्मीकि सुग्रीवक विवाह बालीक पत्नीसँ बालीक मरबाक पश्चात होयबाक वर्णन करैत छथि मुदा कंबन बालीक पत्नीक आजीवन वैधव्यक वर्णन करैत छथि। आचार्यजीकेँ ई करबाक आवश्यकता नै पड़लन्हि किएक तँ लोकक कंठमे तुलसीक मानस बसि गेल छल, आ हुनका एकर गेयताक निर्वाह मात्र करबाक छलन्हि। आचार्य रामलोचन शरणक गीत-प्रबन्ध मैथिली रामचरित मानस आ एकर नारी आ शूद्र-वन्यजाति विरोध प्रदर्शन: आब मानसक एकटा विवादास्पद पद्यक चर्चा करी। अर्थक अनर्थ कोना होइत अछि से देखू। आचार्यजी सुन्दरकाण्डक अंतमे लिखैत छथि जखन सिंधु (समुद्र)रामकेँ लंका जयबाक रस्ता नहि दैत छथि तखन राम कहैत छथि, लछुमन बान सरासन आनू। सोखब बारिधि बिसिख कृसानू॥1॥ तखन सिंधु कर जोरि बजैत छथि- ढोल गमार सुद्र पसु नारी। सब थिक ताड़न केर अधिकारी॥ एकर अर्थ ई जे सभ -ढोल गमार सुद्र पसु नारी- ई सभ शिक्षा किंवा सबक देबा योग्य अछि, गमार सुद्र आ नारीमे शिक्षाक अभाव अछि तेँ आ पसुमे मनुष्यक अपेक्षा बुद्धि नै छैक तेँ, ढोलक प्रयोग बिना शिक्षाक करब तँ संगीत नै ध्वनि भऽ जाएत। फेर समुद्र ओइ स्थितिमे खलनायक बनि रहल छल आ ओकर वक्त्तव्य कविक आकि रचनाकारक वक्त्तव्य नै भऽ सकैत अछि। रचनाकारक रचनामे नीक अधलाह सभ पात्र रहैत छथि, आ ओइ पात्रक मुँहसँ नीक आ अधलाह दुनू गप निकलत। रचनाकारक सफलता ऐपर निर्भर करैत अछि, जे ओ अपनाकेँ अपन पात्रसँ फराक कऽ पबैत अछि आकि नै। मुदा तुलसी आ तेँ आचार्य रामलोचन शरण सेहो अपनाकेँ पात्रसँ बहुत ठाम फराक नै कऽ पबै छथि। जखन भारतमे सामन्तवादी सरकार छल तखन हुनकर शूद्र आ गएर द्विज जातिपर कएल टिप्पणी अनावश्यक बुझि पड़ैए। मिथिलाक स्मृतिकार लोकनि यएह परम्परा बादोमे रखलन्हि आ आश्चर्य तँ तखन होइए जखन ऐ तरहक गएर जरूरी टिप्पणी अंग्रेजी शासनकालमे प्रणीत संस्कृत ग्रन्थ सभमे मैथिल लोकनि द्वारा कएल देखै छी, ओइ अंग्रेजी शासनमे मे ब्राह्मण आ गएर ब्राह्मण सभकेँ ब्लैक इण्डियन कहै छलाह। तुलसीक प्रासंगिकता वा कट्टरता नै वरण मात्र ओकर दुरूहताकेँ आचार्य खतम कएने छथि। उपरोक्त विवादास्पद पदक अतिरिक्त आनोठाम ई जातिवादिता देखबामे अबैत अछि। मैथिली रामचरित मानस अयोध्याकाण्डक दोहा १२ क बादक तेसर पद देखू:- करय बिचार कुबुद्धि कुजाती। हैत अकाज कोन बिधि राती॥३॥ मैथिली रामचरित मानस अयोध्याकाण्डक दोहा ५९ क बादक पहिल पद देखू:- कोल किरात सुता बन जोगे। विधि रचलनि बंचित सुख भोगे॥१॥ मैथिली रामचरित मानस अयोध्याकाण्डक दोहा १६१ क बादक चारिम पद देखू:- विधियो सकथि न तिय हिय जानी। सकल कपट अघ अबगुन खानी॥४॥ (स्त्रीक हृदैक गति विधातो नै बुझि सकै छथि, ई कपट, पाप आ अवगुणसँ उगडुम अछि!!) मैथिली रामचरित मानस अयोध्याकाण्डक दोहा १९३ क बादक तेसर पद देखू:- लोकवेद सबतरि जे नीचे। छुबि जसु छाह लैछ जल सीचेँ॥३॥ तुलसी आ तेँ आचार्य रामलोचन शरण सेहो अपनाकेँ पात्रसँ बहुत ठाम फराक नै कऽ पबै छथि (कम्बन वाल्मीकिक अनुवाद करैत काल बहुत ठाम नव युगक अनुरूक अपनाकेँ फराक करैत छथि) आ तेँ मैथिली रामचरित मानस अयोध्याकाण्डक दोहा २५० क बादक तेसर पदमे वन्यजातिक मुँहसँ कहबै छथि:- यैह हमर अछि बुझु बड़ सेबे। बासन बसन चोराय न लेबे॥३॥ मैथिली रामचरित मानस बालकाण्डक दोहा ६२ क बादक सातम पद देखू:- जद्यपि जग दारुण दुख नाना। सब सौँ कठिन जाति अपमाना॥७॥ मुदा जखन बीसम शताब्दीमे साहित्य अकादेमीक पोथीमे लोरिकपर मैथिली आलेखमे एकटा सज्जन लिखै छथि जे ब्राह्मणपर कएल शूद्रक अत्याचारक विरुद्ध लोरिक ठाढ़ भेलाह तँ अकबरकालीन तुलसी आ ओकर छन्दोबद्ध अनुवादक आचार्य रामलोचन शरणकेँ की दोष देल जाए! जेना विष्णु शर्मा पंचतंत्रक कथा कहैत-कहैत स्त्री आ शूद्रक पाछाँ अकारण क्रूर भऽ जाइ छथि सएह हाल राम चरित मानसक अछि। आचार्य रामलोचन शरणक गीत-प्रबन्ध मैथिली रामचरित मानसक विशेषता: मैथिली रामचरित मानस बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्य़काण्ड, किष्किन्धाकाण्ड, सुन्दरकाण्ड, लंकाकाण्ड आ उत्तरकाण्डमे विभक्त अछि। वाल्मीकि रामायणक सुनियोजित कथ्यमे किछु हेरफेर कएल गेल अछि। एकर शैली आ चरित्रक अंकन उदात्त अछि। श्रृंगार रसक प्राधान्य नै अछि मुदा राम सीताक सन्दर्भमे वियोग आ संयोग दुनू कालमे एकर प्रयोग भेल अछि। मुख्य अंगी रस अछि शान्ति, ओना ई सभटा रामभक्तिमे समाहित अछि। भक्तिक प्रधानता अछि मुदा ज्ञान आ कर्मक महत्व कम नै कएल गेल अछि, सगुणक प्राधान्य रहितहुँ निर्गुण भक्तिक महत्व कम नै भेल अछि, राम ब्रह्म छथि आ हुनकर निर्गुण आ सगुण दू रूप छन्हि। जीव आ ब्रह्म एकहि अछि। वचनक पालन हुअए वा पितृभक्ति, भ्रातृभक्ति वा नारीक प्रेम वा पतिव्रतक मैथिली रामचरित मानस ऐ सभ आदर्शसँ ओतप्रोत अछि। मैथिली रामचरित मानसमे सभ अलंकार प्रयोगमे अछि मुदा मुख्य रूपेँ रूपक आ उपमा प्रयोगमे अछि। प्रेमाख्यानमे प्रयुक्त दोहा आ चौपाइ आधारित प्रबन्ध पद्धतिक कड़वक विधिक प्रयोगक बादो संस्कृत छन्द सभ प्रयुक्त भेल अछि। मैथिली रामचरित मानसमे विद्यापतिक गीत-विधि, वीरगाथा सभक छप्पय विधि, दोहा, सोरठा, भाट सभक कवित्त-सवैया, नीतिवाक्यक सूक्ति, घनाक्षरी, तोमर, त्रिभंगी छन्दक प्रयोग भेल अछि। मनुक्खक बहुत रास टोटमाक सेहो वर्णन यत्र-तत्र भेल अछि। एकर उद्देश्य अछि मोक्ष, लोककल्याण आ रामरायक स्थापना। मुदा ऐमे रामक अतिरिक्त कृष्ण, शिव (सेतुबन्ध कालमे राम द्वारा शिवक पूजा) आ गणेशक स्तुति अछि। प्रकृति आ चरित्र दुनूक चित्रणमे मैथिली रामचरितमानस अद्वितीय अछि। कवि खिस्सा कहि रहल छथि मुदा बीच-बीचमे ई भारद्वाज-याज्ञवल्क्य आ गरुड़ काकभशुण्डीक सम्वादक माध्यमसँ सेहो कहल गेल अछि। सम्वाद शैलीक प्रयोग मैथिली रामचरितमानसमे खूब भेल अछि। लक्ष्मण-परशुराम सम्वाद हुअए वा मंथरा आ कैकेयीक सम्वाद आकि रावण आ अंगदक सम्वाद, सभ ठाम नाटकक सम्वाद शैली सन रोचक पद्य अहाँकेँ भेटत। प्रारम्भक बालकाण्ड आ अन्तक उत्तरकाण्डमे ऐ गीत-प्रबन्धक दूटा ध्रुव दृष्टिमे आएत। उत्तरकाण्डमे गुरु-शिष्यक खराप होइत सम्बन्ध आ ब्राह्मणक वेद बेचबाक आ पतित हेबाक चर्चा भेटैत अछि मुदा उत्तरकाण्डमे रामराज्यक रूपरेसेहो सेहो भेटैत अछि। मैथिली साहित्यक गीत-प्रबन्ध मध्य मैथिली रामचरितमानसक स्थान: मैथिली वा कोनो भाषामे रामक चरित वाल्मीकि रामायणसँ प्रभावित भेने बिना नै रहि सकैए। आचार्य रामलोचन शरणक तुलसीक मानसक समश्लोकी मैथिली अनुवाद ओइ अर्थेँ आर विशिष्ट भऽ जाइत अछि जे आचार्य रामलोचनशरण खाँटी मैथिली तत्वक कतौ अवहेलना नै केने छथि आ ई गीत-प्रबन्ध मैथिलीक अखन धरिक आकारमे (आ गुणात्मक रूपेँ सेहो) मैथिलीक सभसँ पैघ गीत-प्रबन्ध (महाकाव्य) अछि। मैथिली उपन्यासपर अंग्रेजी साहित्यक प्रभाव उपन्यासक आरम्भ: वाणभट्टक कादम्बरी राजा शूद्रकक विदिशानगरीक वर्णनसँ प्रारम्भ होइत अछि। एकटा चाण्डाल अतीव सुन्दरी कन्या वैशम्पायन नाम्ना ज्ञानी सुग्गाकेँ लेने दरबार अबैत अछि आ प्रारम्भ होइत अछि सुग्गाक खिस्सा। चांडालक बस्ती पक्कणमे कियो भिखमंगा नै, कियो चोर नै, ओतुक्का राजा व्याघ्रदेव स्वयं रस्सी बँटैत छथि। संस्कृतक एहि उपन्यास नामसँ मराठीमे उपन्यासकेँ कादम्बरी कहल जाइत अछि। उपन्यासक बुर्जुआ प्रारम्भक अछैत एहिमे एतेक जटिलता होइत अछि जे एहिमे प्रतिभाक नीक जकाँ परीक्षण होइत अछि। उपन्यास विधाक बुर्जुआ आरम्भक कारण सर्वांतीजक “डॉन क्विक्जोट”, जे सत्रहम शताब्दीक प्रारम्भमे आबि गेल रहए, केर अछैत उपन्यास विधा उन्नैसम शताब्दीक आगमनसँ मात्र किछु समय पूर्व गम्भीर स्वरूप प्राप्त कऽ सकल। उपन्यासमे वाद-विवाद-सम्वादसँ उत्पन्न होइत अछि निबन्ध, युवक-युवतीक चरित्र अनैत अछि प्रेमाख्यान, लोक आ भूगोल दैत अछि वर्णन इतिहासक, आ तखन नीक- खराप चरित्रक कथा सोझाँ अबैत अछि। कखनो पाठककेँ ई हँसबैत अछि, कखनो ओकरा उपदेश दैत अछि। मार्क्सवाद उपन्यासक सामाजिक यथार्थक ओकालति करैत अछि। फ्रायड सभ मनुक्खकेँ रहस्यमयी मानैत छथि। ओ साहित्यिक कृतिकेँ साहित्यकारक विश्लेषण लेल चुनैत छथि तँ नव फ्रायडवाद जैविकक बदला सांस्कृतिक तत्वक प्रधानतापर जोर दैत देखबामे अबैत छथि। नव-समीक्षावाद कृतिक विस्तृत विवरणपर आधारित अछि। एहि सभक संग जीवनानुभव सेहो एक पक्षक होइत अछि आ तखन एतए दबाएल इच्छाक तृप्तिक लेल लेखक एकटा संसारक रचना कएलन्हि जाहिमे पाठक यथार्थ आ काल्पनिकताक बीचक आड़ि-धूरपर चलैत अछि। अंग्रेजी उपन्यासक वाद: उत्तर आधुनिक, अस्तित्ववादी, मानवतावादी, ई सभ विचारधारा दर्शनशास्त्रक विचारधारा थिक। पहिने दर्शनमे विज्ञान, इतिहास, समाज-राजनीति, अर्थशास्त्र, कला-विज्ञान आ भाषा सम्मिलित रहैत छल। मुदा जेना-जेना विज्ञान आ कलाक शाखा सभ विशिष्टता प्राप्त करैत गेल, विशेष कए विज्ञान, तँ दर्शनमे गणित आ विज्ञान मैथेमेटिकल लॉजिक धरि सीमित रहि गेल। दार्शनिक आगमन आ निगमनक अध्ययन प्रणाली, विश्लेषणात्मक प्रणाली दिस बढ़ल। मार्क्स जे दुनिया भरिक गरीबक लेल एकटा दैवीय हस्तक्षेपक समान छलाह, द्वन्दात्मक प्रणालीकेँ अपन व्याख्याक आधार बनओलन्हि। अंगेजी उपन्यासक आरम्भ आ विकास: अंग्रेजी उपन्यास पिल्ग्रिम्स प्रोग्रेस- लेखक कथाक मुख्यपात्रक यात्राक आ ओइ यात्रा मध्य आओल संघर्ष आ उत्साहक वर्णन करैत छथि। डेनियल डिफ़ो अपन रॊबिन्सन क्रूसो उपन्यासमे मुख्यपात्रक साहसिक समुद्र यात्राक वर्णन करैत छथि। सैमुअल रिचर्डसनक पेमेला अंग्रेजी उपन्यासकेँ पारिभाषिक स्वरूप देलक। एफ़्रा बेनक ओरूनोको उपन्यासक नायक कारी रंगक दास अछि तँ हुनक ’लव लैटर्स बिटवीन ए नोबल मैन एंड हिज सिस्टर’ मे सामंतक प्रेम कथाक वर्णन अछि। हैनरी फ़िल्डिंग ’टॉम जोन्स’ मे सामंतवादक आलोचना केने छथि समाजक विकृतिक चित्रण केने छथि। हेनरी जेम्स “द पोट्रेट ऑफ ए लेडी” मे कलात्मक प्रस्तुति लेल जिनगीक उपेक्षा करै छथि। रिचर्डसन ’कलैरिस’ मे मनुष्यक मनोविज्ञानक तहमे जाइ छथि। जोजफ कोनरेडक ’द शैडोलाइन’ क पात्र समाज आ जीवनक प्रति दृष्टिकोणक एक्द पक्षीय होएबापर सोचै छथि। डी.एच.लॉरेन्स “लेडी चैटर्लीज लवर” क पात्र विकृति लेल संस्कृति आधारित सभ्यताकेँ दोषी कहै छथि। रुडयार्ड किपलिंगक उपन्यास “किम” यूरोपी साम्राज्यवादक लेल एकटा बहन्ना ताकि रहल अछि, यूरोपी सभ्यताकेँ ओ उच्च मानै छथि। ई.एम.फोर्स्टरक “ए पैसेज टू इंडिया”मुदा शासक आ शासितक सम्बन्धकेँ व्याख्यायित करैत अछि। मैथिली उपन्यासक आरम्भ आ विकास: हरिमोहन झाक कन्यादान आ द्विरागमन मिथिलाक बहुत रास सामाजिक व्यवस्थाकेँ सोझाँ अनैत अछि, महिला शिक्षा आ अंध-पाश्चात्यकरणक सेहो हास्य रसमे चित्रण आधुनिक अंग्रेजी उपन्यासक रीतिएँ करैत छथि। यात्रीक बलचनमा यादव जातिक बलचनमाक आत्मकथ्यक रूपमे अछि। आर्थिक समस्या एकर मूल विषए छैक। बलचनमा कोना एकटा टहल करैबलासँ आगू जाइत किसानक हक लेल जान दैत अछि ताधरिक कथा। कांग्रेस आदि पार्टीक विरुद्ध कम्यूनिस्ट पार्टीक प्रति स्पष्ट झुकाव यात्रीजीक रहल छन्हि। आ पारो बलचनमाक आर्थिक समस्याक विपरीत सामाजिक लक्ष्य तकैत अछि। किछु दिनुका बाद एहि उपन्यासकेँ लोक असली फिक्शनक रूपमे लेताह कारण अगिला पीढ़ीकेँ विश्वास नै हेतै जे एहनो कोनो क्रूर व्यवस्था सभ मानवजातिक मध्य होइत हेतै। आ तैँ एकर महत्व आर बढ़ि जाइत अछि- ओहि सभ व्यवस्था सभकेँ पेटारमे सुरक्षित रखबाक जिम्मेदारी। मुदा जहिया यात्रीजी ओहि समस्यापर लिखने छलाह तहियासँ ओ समस्या रहै आ ई उपन्यास ओहिमे सार्थक हस्तक्षेप कएने छल। रमानन्द रेणुक दूध-फूल उपन्यास समाजक उपेक्षित वर्गकेँ सोझाँमे रखैत अछि आ कलात्मक उपस्थापन करैत अछि। ललितक पृथ्वीपुत्र सेहो समाजक उपेक्षित वर्गकेँ सोझाँमे रखैत अछि। ई उपन्यास कृषक जीवनक आर्थिक समस्यापर सेहो आंगुर धरैत अछि। लिली रे क पटाक्षेप वामपंथक वर्ग-संघर्षक उत्थान आ फेर ओकर दमनक कथा कहैत अछि आ देशक समस्यासँ साहित्यकार द्वारा स्वयंकेँ तत्काल जोड़बाक मार्ग प्रशस्त करैत अछि। धूमकेतुक मोड़ पर सेहो वामपंथी विचारक आलोकमे सामाजिक-आर्थिक समस्याक कथा बैकफ्लैशमे कहैत अछि। साकेतानन्दक सर्वस्वान्त बाढ़िक आ सरकारी नीति आ राहतक कथा अछि। जगदीश प्रसाद मण्डलक मौलाइल गाछक फूल गामक, गामसँ पलायनक आ गलल व्यवस्थाक पुनर्जीवनक लेल समाधानक उपन्यास अछि। चतुरानन मिश्रक कला कलादाइक माध्यमेँ गलल सामाजिक व्यवस्थापर प्रहार अछि। शेफालिका वर्माक नागफाँस अंग्रेजक धरतीपर विचरण करैत अछि। धारा आ सीमांतक मिलन एहि जिनगीमे कहियो हेतै, कोनो जादू हेतै की? आ अन्तमे : से जौँ गहींर नजरिसँ देखब तँ लागत जे अंग्रेजी उपन्यासकारक कृति ओहि समएक वाद आ दृष्टिकोणकेँ संग लऽ कऽ चलबाक प्रयास अछि। मुदा सिद्धान्तसँ प्रयोगक क्रममे किछु विशेषता स्वयमेव आबि जाइ छै। तहिना मैथिली उपन्यासक सेहो स्थिति अछि। रमानन्द रेणुक उपन्यास होअए वा शेफालिका वर्माक, ई तथ्य शिल्पमे स्पष्ट रूपसँ देखि सकै छी। लिली रे अपन कलमक धारसँ जेना अपन लग-पासक घटनाक, समाजक, राजनीतिक वर्णन करै छथि से अद्भुत तँ अछिये अंग्रेजी उपन्यास सभसँ एक डेग आगाँ जाइत अछि। ललित, यात्री आ धूमकेतु आर्थिक आ सामाजिक समस्याकेँ सोझाँ रखैत छथि, आ ओहि क्रममे कोनो तथ्यकेँ कोनो रूपेँ नुकबैत नै छथि। साकेतानन्द बाढ़िक समस्याकेँ सोझाँ रखै छथि। हरिमोहन झा अपन शैलीमे अंग्रेजी साहित्यक धारकेँ बहबैत छथि आ नायक द्वारा नायिकाकेँ देल पढाइक सिलेबसमे सेहो ई तथ्य सोझाँ अनैत छथि। चतुरानन मिश्र आ जगदीश प्रसाद मंडल कम्यूनिस्ट आन्दोलनसँ जुड़ल छथि, प्रायोगिक रूपमे, पार्टी स्तरपर, मुदा हिनकर दुनू गोटेक उपन्यास देखला उत्तर हमरा ई कहबामे कनेको कष्ट नै होइत अछि जे जाहि रूपमे यात्री आ धूमकेतु मार्क्सवादक बैशाखी लऽ उपन्यासकेँ ठाढ़ करै छथि तकर बेगरता एहि दुनू उपन्यासकारकेँ नै बुझना जाइत छन्हि। मार्क्सवादक असल अर्थ हिनके दुनूक रचनामे भेटत। कतौ पार्टीक नाम वा विचारधाराक चर्च नै मुदा जे असल डायलेक्टिकल मैटेरियलिज्म छैक तकर पहिचान, जिनगीक महत्वपर विश्वास, द्वन्दात्मक पद्धतिक प्रयोग आ ई तखने सम्भव होएत जखन लेखक दास कैपिटल सहित मार्क्सवादक गहन अध्ययन करत। मैथिली उपन्यासक भविष्य : सभ जीवित भाषामे सभसँ बेसी रचना उपन्यासक होइत छै मुदा मैथिलीमे सभसँ कम उपन्यास लिखल जाइत अछि। जाहि रूपमे अंग्रेजी शिक्षा आ साहित्यक अध्ययन कऽ मैथिली साहित्यमे आओल नव पीढ़ीक संख्या बढ़त, मैथिली साहित्य अपन सामाजिक- आर्थिक- राजनैतिक आ सांस्कृतिक अंतर्दृष्टिक विकास कऽ सकत। वीणा ठाकुरक भारती, आशा मिश्रक उचाट आ केदारनाथ चौधरीक चमेली रानी-माहुर आ करार हमर एहि दृष्टिकोणक पुष्टि करैत अछि। चारिटा उत्तर आधुनिक नाटक: सैमुअल बैकेटक फ्रेंच नाटक “वेटिंग फॉर गोडो”, हैरोल्ड पिंटरक अंग्रेजी नाटक “द बर्थडे पार्टी”, बादल सरकारक बांग्ला नाटक “एवम् इन्द्रजीत” आ उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’क मैथिली नाटक “नो एण्ट्री: मा प्रविश” [नो एण्ट्री: मा प्रविश २००८ ई. मे छपल आ साहित्य अकादेमी पुरस्कार लेल एकर चयन २०१०, २०११ बा २०१२ मे नै भऽ सकलै। आब ई पोथी मैथिली साहित्य लेल साहित्य अकादेमी पुरस्कार लेल उपलब्ध नै रहत। ऐ तरहक आनो उदाहरण रहल अछि। नो एण्ट्री: मा प्रविश क मैथिली साहित्य आ विश्व साहित्य मध्य स्थान नीचाँक आलेखमे निरूपित कएल जा रहल अछि। ई शृंखला आगाँ सेहो जारी रहत।] चारिटा उत्तर आधुनिक नाटक: सैमुअल बैकेटक फ्रेंच नाटक “वेटिंग फॉर गोडो”, हैरोल्ड पिंटरक अंग्रेजी नाटक “द बर्थडे पार्टी”, बादल सरकारक बांग्ला नाटक “एवम् इन्द्रजीत” आ उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’क मैथिली नाटक “नो एण्ट्री: मा प्रविश” ....................................... "वेटिंग फॉर गोडो” दू अंकीय ट्रेजी-कॉमेडी अछि। सैमुअल बैकेट द्वारा ई 1952 ई. मे फ्रेंच भाषामे लिखल गेल आ एकर पहिल प्रदर्शन पेरिसमे 1953 ई. मे भेल। एकर अंग्रेजी संस्करणक प्रदर्शन लंदनमे 1955 ई. मे भेल आ अंग्रेजी संस्करण 1956 ई. मे प्रकाशित भेल। हैरोल्ड पिंटरक अंग्रेजी नाटक “द बर्थडे पार्टी” कैम्ब्रिजमे 1958 ई. मे मंचित भेल आ 1960 ई. मे प्रकाशित भेल। बादल सरकारक बांग्ला नाटक “एवम् इन्द्रजीत” 1962 ई. मे लिखल गेल आ ई 1965 ई. मे कलकत्तामे मंचित भेल। उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’क “नो एण्ट्री: मा प्रविश” 2008 ई. मे ई-प्रकाशित आ फेर ओही बर्ख प्रकाशित भेल। 19 फरबरी 2011 केँ कुणालक निर्देशनमे कालिदास रंगालय, पटनामे ई डेढ़ घण्टाक नाटक मंचित भेल। फ्रेंच, अंग्रेजी, बांग्ला आ मैथिलीक ई चारू नाटक पोस्ट-मॉडर्न नाटकक श्रेणीमे गानल जाइत अछि। जखन सैमुअल बैकेटक “वेटिंग फॉर गोडो” देखि क’ लोक सभ घुरल रहथि तँ हुनका लोकनिकेँ एकटा विचित्र अनुभवसँ साक्षात्कार भेल छलन्हि। ऐ नाटकमे मात्र पाँचटा पात्र अछि- एस्ट्रागोन, व्लादीमीर, लकी, पोजो आ एकटा छौड़ा। एकटा कण्ट्री रोडपर साँझमे एकटा गाछ लग एस्ट्रागोन एकटा ढिमकापर बैसल अछि आ अपन जुत्ता दुनू हाथसँ निकालबाक प्रयास क’ रहल अछि आ अपस्याँत अछि, आ थाकि जाइए। व्लादीमीर संगे ओ गपक प्रारम्भ होइ छै, एम्हर ओम्हरक फुसियाँहीक नमगर गपशप होइ छै। पोजो आ लकी अबैए। पोजो बुझाइए मालिक अछि आ लकी दास। दासो तेहेन जकरा गर्दनिमे नमगर रस्सा पोजो लगेने अछि। पहिने लकी अबैए, फेर रस्सा पकड़ने पोजो। लकी बड़का बैग, एकटा फोल्डिंग स्टूल, एकटा पिकनिक बास्केट आ ग्रेटकोट उघने अछि। पोजो लग चाबुक छै। लकी आदेशपालक अछि। मालिकक गप मानि फेर सभ बोझ उठा क’ ठाढ़ भ’ जाइए। एस्ट्रागोन आ व्लादीमीरकेँ ओकर बोझा उघनाइ नीक नै लगै छै। मुदा पोजो जखन कहै छै जे ओ ओहिने छै तँ एस्ट्रागोन पोजोकेँ आततायी बुझै छै। एस्ट्रागोन लकीक नोर पोछैए तखन ओकरा लकी मुक्का मारै छै। पोजो कहै छै जे तोरा कहलियौ ने जे लकीकेँ अनचिन्हार लोक पसिन्न नै छै। आ एस्ट्रागोन आ व्लादीमीर ओत’ की क’ रहल अछि? ओ दुनू गोटे कोनो गोडो नाम्ना व्यक्तिक बाट जोहि रहल अछि। पोजो आ लकी चलि जाइए। एस्ट्रागोन आ व्लादीमीर लग एकटा छौड़ा अबै छै आ कहै छै जे गोडो आइ नै आबि सकता, काल्हि एता। फेर एम्हर ओम्हरक फुसियाँहीक गपशप होइए आ ओहो छौड़ा चलि जाइए। तखने मंचपर सँ बिजली चलि जाइ छै आ फेर राति भ’ जाइ छै, चन्द्रमा उगल छै। व्लादीमीर आ एस्ट्रागोनक गपशप शुरू होइ छै। फुसियाँहीक गपमे किछु अर्थपूर्ण गपशप सेहो होइ छै। दुनू गोटे जेबाक निर्णय करै छथि मुदा हिलै नै छथि। पहिल अंकक पर्दा खसैए। दोसर अंक, वएह समए आ स्थान। व्लादीमीरकेँ सभ किछु मोन छै मुदा एस्ट्रागोन बिसरि गेल अछि। एस्ट्रागोन कहैए जे ओ सभ किछु तुरत्ते बिसरि जाइए बा कहियो नै बिसरैए। ओकरा किछु-किछु मोनो पड़ै छै। पोजो आ लकी अबैए। पोजो आन्हर भ’ गेल अछि, लकी ओहिना बोझा उघने अछि। रस्सा सेहो छै मुदा किछु छोट। पोजो आ लकी खसि पड़ैए। पोजो सहायता लेल कहैए मुदा एस्ट्रागोन आ व्लादीमीर गपशप करैए। एस्ट्रागोन व्लादीमीरकेँ पहिल अंक जेकाँ “दीदी” कहैए। व्लादीमीर बाजैए जे “हमरा सभकेँ फुसियाँहीक गपशपमे समय नै बर्बाद करबाक चाही।“ पोजोक “सहायता”क आर्तनाद नियत अंतरालपर बेर-बेर होइ छै। मुदा तइपर एस्ट्रागोन आ व्लादीमीर ध्यान नै दैए। पोजो आब सहायता लेल सए फ्रैंक फेर दू सए फ्रैंकक लालच दैए। व्लादीमीर ओकरा उठबैले जाइए, प्रयासमे अपनो खसि पड़ैए आ सहायताक पुकार करैए। फेर किछु गपशपक बाद व्लादीमीरकेँ उठेबाक प्रयासमे एस्ट्रागोन खसि पड़ैए। व्लादीमीर पोजोकेँ मारैए, पोजो घुसकुनिया दैए। तखन व्लादीमीर ओकरा ताकैए, कहैए- आबि जो, तोरा नोकसान नै पहुँचेबौ। एस्ट्रागोन आ व्लादीमीर उठबाक प्रयास करबाक सोचैए आ उठि जाइए। एस्ट्रागोन कहैए- उठनाइ बच्चाक खेल सन हल्लुक अछि आ व्लादीमीर बजैए- ई मात्र आत्मशक्तिक प्रश्न अछि। पोजो सहायता लेल कहैए। दुनू पोजोकेँ उठबैए, फेर छोड़ैए, पोजो खसि पड़ैए। फेर दुनू ओकरा उठबैए आ पकड़ने रहैए। किछु कालमे कने छोड़ि क’ जाँचैए मुदा जखन पोजो खस’ लगैए तँ पकड़ि लैए। पोजो सेहो बुझा पड़ैए जे काल्हिक घटना बिसरल सन अछि। ओ कहैए जे ओ एक दिन सुति क’ उठल तँ अपनाकेँ आन्हर देखलक, ओ कहैए जे ओकरा लगै छै जे ओ अखनो सुतले तँ नै अछि। ओ लकीक विषयमे पूछैए। लागैए जे कोना ओ दुनू खसल, से ओकरा मोन नै छै। पोजो कहैए जे लकीक गर्दनिक रस्साकेँ जोरसँ खीचू बा मुँहपर जूतासँ मारू तँ ओ उठि जाएत। व्लादीमीर एस्ट्रागोनकेँ कहैए जे ओकरा लेल बदला लेबाक नीक अवसर छै। एस्ट्रागोन पुछैए (ओकर स्मृति घुरै छै!) जे जँ लकी अपन रक्षा करए तखन? तइपर पोजो बाजैए जे लकी कखनो अपन रक्षा नै करैए। मुदा एस्ट्रागोन नै व्लादीमीर लकीकेँ पएरसँ मार’ लगैए मुदा अपने ओकरा चोट लागि जाइ छै। घटनाक्रमसँ लगै छै जे पोजो आब अपनासँ ठाढ़ भ’ गेल अछि। पोजो जे लकीकेँ कोनो हाटमे बेचैले ल’ जा रहल अछि, केँ ने काल्हिक किछु मोन छै आ नहिये काल्हि आजुक किछु मोन रहतै। ओ लकीकेँ उठैले कहैए आ लकी उठि जाइए आ अपन बोझ उठा लैए। पोजो अपन चाबुक मांगैए। लकी सभ बोझ राखैए, आ चाबुक पोजोक हाथमे द’ क’ सभ बोझ उठा लैए। पोजो रस्सा मांगैए, लकी सभ बोझ राखि रस्सा पोजोकेँ पकड़ा क’ सभ बोझ उठा लैए! लकी आ पोजो चलि जाइए। ओ छौंड़ा अबैए। ओ व्लादीमीरकेँ अल्बर्ट कहि सम्बोधित करैए। व्लादीमीर पुछै छै जे की ओ ओकरा नै चिन्हलक, की ओ काल्हि नै आएल छल। छौड़ा कहैए जे आइ ओ पहिल बेर आएल अछि। संदेश वएह छै, गोडो आइ नै आएत मुदा काल्हि अवश्य आएत। व्लादीमीर पुछैए जे “गोडो” करैए की? तँ छौड़ा कहैए जे गोडो किछु नै करैए। व्लादीमीर पुछैए जे छौड़ाक भाए केहन छै। तँ उत्तर भेटै छै , ओ दुखित छै। व्लादीमीर पुछैए जे की काल्हि ओकर भाए आएल छलै- तँ से छौड़ाकेँ नै बुझल छै। छौड़ा उत्तर दैत कहैए जे गोडोकेँ दाढ़ी छै आ ओ कारी नै गोर छै। छौड़ा (पहिल अंक जकाँ) पुछैए जे ओ गोडोकेँ की जा क’ कहतै। व्लादीमीर कहैए- जा क’ कहू जे तोरा हमरा सभसँ भेँट भेलउ। व्लादीमीर छौड़ापर छड़पैए मुदा ओ पड़ा जाइए। सूर्यास्त होइ छै। चन्द्रमा देखा पड़ै छै। एस्ट्रागोन कहैए जे जँ दुनू गोटे अलग भ’ जाए तँ ई दुनू लेल नीक हेतै। जँ काल्हि गोडो नै एतै तँ ओ दुनू गोटे रस्सासँ लटकि जाएत (व्लादीमीर कहैए) आ जँ एतै तँ बचि जाएत। व्लादीमीर लकीक हैटमे ताकैए, हिलबैए, फेर पहिरैए। दुनू जेबाक निर्णय करैए मुदा कियो नै हिलैए। पर्दा खसैत अछि। ............ हैरोल्ड पिंटरक तीन अंकीय नाटक “द बर्थडे पार्टी” पीटे, मेग, स्टैनले, लुलु, गोल्डबर्ग आ मैककान एकर पात्र छथि। पहिल अंक- मेग पीटेकेँ जलखै दैए, पुछैए जे स्टेनली उठलै आकि नै। स्टेनली अबैए, ओकरो मेग जलखै दैए। पीटे काजपर चलि जाइए। मेग आ स्टैनलेमे अंतरंग गप होइए, हँसी मजाक होइए। पीटे मेगसँ कहने रहै जे दू गोटे एतै आ किछु दिन ओकरा घरमे रहतै। ओकर घर सूची (बोर्डिंग हाउस)मे छै। स्टैनली ई सुनि पूछ-पाछ करै छै, ओ चिंतित भ’ जाइए। स्टैनली कहैए जे ओकरा पेरिसमे नाइट क्लबमे पियानो बजेबाक नोकरीक ऑफर आएल छै। फेर एथेंस, कॉंन्सटेनटिनोपल, जाग्रेब, व्लादीवोस्टक सेहो। ई सम्पूर्ण विश्वक दर्शनबला नोकरी अछि। पुछलापर ओ कहैए जे ओ संपूर्ण विश्व, संपूर्ण देशमे पियानो बजेने अछि। एक बेर ओ कंसर्ट सेहो केने रहए। फेर ओ कहैए जे पहिल कंसर्ट मे ओ स्थानक पता हरा देलक आ नै पहुँचि सकल। दोसर कंसर्टमे जखन ओ पहुँचल तँ स्थलपर ताला लागल रहै। मेगक इच्छा नै छै जे स्टेनली कतौ जाए। स्टेनलीकेँ लागै छै जे ओ दुनू गोटे ककरो खोजमे अछि। लुलुक अबाज अबैए। मेग खरीदारीक झोरा ल’ क’ बहरा जाइए, कियो ओकरासँ मिसेज बोल्स सम्बोधित क’ गप करै छै। लुलु अबैए आ स्टैनलीसँ गप करैए। लुलु बहराइए तँ गोल्डबर्ग आ मैककेन अबैए। मैककेन गोल्डबर्गकेँ नैट कहि सम्बोधित करैए। स्टैनली चोरा क’ पहिनहिये बहरा जाइए। मेग अबैए, गोल्डबर्ग ओकरा मिसेज बोल्स कहि सम्बोधित करैए आ अपनाकेँ गोल्डबर्ग आ संगीकेँ मैककेन कहि परिचय दैए। गपशपक क्रममे गोल्डबर्ग पुछै छै जे ओइ रहनिहारक नाम की छै आ ओ की करैए। मेग कहैए जे ओकर नाम स्टैनले वेबर छै आ ओ एक बेर कंसर्ट देलक मुदा केयरटेकरक गलतीसँ रातिमे ओ ओतै बन्द रहि गेल आ भोर धरि बन्द रहल। आ फेर “टिप” ल’ क’ ट्रेन पकड़ि एत’ आबि गेल। तखने मेग कहैए जे आइ ओकर “बर्थडे” छिऐ। आ फेर “बर्थडे पार्टी” निर्धारित होइ छै 9 बजे। लुलुकेँ सेहो बेरू पहर नोति देल जेतै। तीनू बहराइए आ स्टैनली खिड़कीसँ ताकैए। मेग अबैए। स्टैनली ओइ दुनूसँ आशंकित अछि। नाम पुछैए तँ मेग नाम बिसरि जाइए आ ओकरा गोल्ड.. मोन पड़ै छै तँ स्टैनली मोन पाड़ै छै- गोल्डबर्ग। मेग पुछैए जे की स्टेनली ओकरा चिन्हैए तँ स्टैनली गुम्म रहैए। फेर स्टैनली कहैए जे आइ ओकर बर्थडे नै छिऐ। मेग ओकरा लेल बच्चाक ड्रम उपहारमे अनने अछि आ तकर बदलामे ओ स्टैनलीसँ चुम्मा मांगैए। अंक 2 मे स्टैनली आ मैक्कानक गपशप भ’ रहल छै। स्टैनली बाहर जाए चाहैए। ओ मैक्कानकेँ कहै छै जे ई बोर्डिंग हाउस नै छी, नहिये कहियो रहै। पीटे आ गोल्डबर्ग अबैए। गोल्डबर्ग पीटेकेँ मिस्टर बोल्स कहि सम्बोधित करैए। पीटेक गेलाक बाद स्टैनली कहैए जे ऐ घरक लोकक सुंघबाक शक्ति चलि गेल छै तेँ ओ गोल्डबर्ग आ मैक्कानक खतरा नै चीन्हि पाबि रहल छथि, हुनका सभक प्रति ओकर (स्टैनलीक) जिम्मेवारी छै। मैक्कान ओकरासँ चश्मा छीनि लैए। मैक्कान आ गोल्डबर्ग ओकरासँ पुछैए जे ओ किए अपन पत्नीक हत्या केलक। ओ नाम बदलने अछि आ चरित्रहीन अछि, स्त्रीकेँ दूषित करैए। झगड़ा शुरू होइ छै। मुदा झगड़ा रुकलाक बाद (प्रायः मेगकेँ नै बुझल छै) मेग पार्टी ड्रेसमे अबैए। सामान्य गप होइ छै। लुलु अबैए, गोल्डबर्ग ओकरा कोरामे बैसबैए। लुलुक पुछलापर जे ओकरा तँ होइ छलै जे ओ “नैट” छी, गोल्डबर्ग कहै छै जे ओकर पत्नी ओकरा “सिमे” कहि बजबै छै। पार्टीमे खेल शुरू होइए, आँखिमे पट्टी बान्हि क’। मिसेज बोल्सकेँ लुलु स्कार्फसँ आँखि बान्हैए। ओ जकरा छू देत तकरा आँखिपर पट्टी बान्हल जाएत। ओ मैक्केनकेँ छुबैए। फेर स्टैनली छुआइए। ओकर चश्मा लेल जाइ छै। स्टेनलीकेँ पट्टी बान्हल जाइ छै। मैक्केन स्टेनलीक चश्मा तोड़ि दैए। मैक्केन ड्रमकेँ स्टेनलीक रस्तामे राखैए, ओ खसि पड़ैए आ मेगक गर्दनि दबब’ चाहैए, मैक्केन आ गोल्डबर्ग बचबै छै। अन्हार पसरैए। स्टैनलीकेँ अबैत देखि लुलु बेहोश भ’ जाइए। स्टैनले लुलुकेँ टेबुलपर राखैए। मैक्कानकेँ टॉर्च भेटै छै। ओ टेबुल आ स्टैनलीपर टॉर्च बाड़ैए। अंक 3: पीटे आ मेगमे गप होइ छै। मेग स्टैनलीक विषयमे पीटेसँ पुछैए। लुलु अबैए, गोल्डबर्गसँ पुछैए जे ओकर पिता बा एडी (ओकर पहिल प्रेमी) की सोचत जँ ओ ई सुनत। ओ कहैए जे गोल्डबर्ग अपन दुष्ट पियास तृप्त केलक, ओ लुलुकेँ से सभ सिखेलक जे एकटा युवती तीन बेर बियाहल जेबाक बादे सीखत। गोल्डबर्ग कहैए जे ओ ई केलक कारण लुलु ओकरा ई कर’ देलक। लुलु जाइए। मेगक अनुपस्थितिमे गोल्डबर्ग आ मैक्कान स्टेनलीकेँ ल’ जाइए। पीटे ओकरा छोड़ैले कहैए। गोल्डबर्ग आ मैक्कान पीटेकेँ सेहो संगमे चलैले कहैए, कारमे जगह छै। पीटे स्थिर रहैए। पीटे असगरे रहि जाइए, मेग अबैए। पुछैए, ओ सभ गेल? पीटे कहैए- हँ। स्टेनलीक विषयमे मेग पुछैए- ओ सुतले अछि? पीटे कहैए- ओ सुतल अछि। -सुत’ दियौ। मेग पुछैए- की ई नीक पार्टी नै छल तँ पीटे कहैए- ओ बादमे आएल। पर्दा खसैए। ....... बादल सरकारक “एवम् इन्द्रजीत” “एवम् इन्द्रजीत” मे लेखक, काकी, मानसी, अमल, विमल, कमल, इन्द्रजीत आ इन्द्रजीतक पत्नी ( नाटकमे बादमे) दोसर मानसी पात्र अछि। अंक 1- लेखक एकटा नाटकक खोजमे अछि। ओकर काकी ओकर खेनाइ-पिनाइ छोड़ि लिखैत रहबापर तमसाएल छै। मानसी पुछैए जे ओ पढ़त जे किछु ओ लिखलक। लेखक कहैए, ओ किछु नै लिखलक। मानसी ओकरा प्रयास करैले कहै छै। लेखक दर्शकमेसँ चारिटा बादमे आबैबलाकेँ स्टेजपर बजबैए, अमल, विमल, कमल। चारिम अपन नाम निर्मल कुमार कहैए। लेखक कहैए- ई नै भ’ सकै छै, अपन असली नाम बताउ। ओ कहैए- इन्द्रजीत राय। अमल, विमल, कमल एवम् इन्द्रजीत। मानसी (असली नाम दोसर मुदा लेखक कहैए मानसीये) ओकर ममियौत बहिन छिऐ। ओ ओकरासँ प्रेम करैए, परम्परा तोड़’ चाहैए अंक 2: बादमे ओकरा लागै छै जे की जँ ई प्रेम सफल भइयो जेतै तँ ओकरा उत्तर भेटतै? नै ने। ओ लंदन सेहो जाएत। मृत्यु चाहैए, नै क’ पाबैए। लेखक द्वारा नामित इन्द्रजीतक मानसी अविवाहित अछि, हजारीबागमे पढ़बैए। मुदा अमल, विमल, कमलक विपरीत इन्द्रजीत लीखपर नै चलैए। अलग किछु कर’ चाहैए। काका, जकरा ओ माए कहैए, खाइले कहै छै आ मानसी लिखैले। मुदा जखन एक बेर मानसी लेखककेँ खाइले कहि दैए तँ लेखक दुखी भ’ जाइए, नै, अहूँ? नै। मुदा फेर मानसीकेँ गलतीक भान होइ छै, ओ ओकर लेखनक विषयमे पुछैए। लेखक चिंतित अछि, ई इन्द्रजीत वास्तविकताकेँ नै मानैए, कोनो प्रतिबद्धता ओकरामे नै छै। मुदा मानसी से नै मानैए। ओ सपना तँ देखैए ने। इन्द्रजीत लंदनसँ कोलकाता घुरैए, एकटा दोसर स्त्रीसँ बियाह करैए, ओकरो नाम मानसी छिऐ (इन्द्रजीत एकरा मानसी कहैए, पहिलुका मानसी जेकरा लेखक मानसी कहैए ओ इन्द्रजीतक ममियौत छिऐ, जकरासँ इन्द्रजीत प्रेम करैए मुदा ओ भाएक रिश्तासँ ओकरासँ बियाह नै करैए जे लोक की कहतै, आ इन्द्रजीत लेखककेँ कहैत रहैए जे ओकर नाम मानसी नै छिऐ। ) इन्द्रजीत बुझ’ लगैए (मानसीकेँ ओ कहैए) जे व्यक्तिक भिन्नताक मात्र भ्रम अछि। स्वप्न स्वप्न अछि ओ वास्तविकता नै बनि सकैए। मानसी, मानसी, मानसी, सभ मानसी, जेना अमल, विमल, कमल। लेखक पूछैए तँ इन्द्रजीत कहैए- अमल, विमल, कमल एवम् इन्द्रजीत (सेहो!)। लेखकक यात्राक कोनो लक्ष्य नै, कोनो उद्देश्य नै, फुसियाँहीक यात्रा जकर कोनो कारण नै। लेखक इन्द्रजीतकेँ कहैए, हमरा सभकेँ जीबाक अछि, चलबाक अछि, कोनो धर्मस्थल नै तैयो तीर्थयात्रा करबाक अछि। उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’क “नो एण्ट्री: मा प्रविश” प्रथम कल्लोल: ई नाटक ज्योतिरीश्वरक परम्परामे कल्लोलमे (हुनकर वर्ण रत्नाकर कल्लोलमे विभक्त अछि जे नाटक नहि छी, धूर्त-समागम जे ज्योतिरीश्वर लिखित नाटक अछि- अंकमे विभक्त अछि) विभाजित अछि। चारि कल्लोलक विभाजनक प्रथम कल्लोल स्वर्ग (वा नरक) केर द्वारपर आरम्भ होइत अछि। ओतए बहुत रास मुइल लोक द्वारक भीतर प्रवेशक लेल पंक्तिबद्ध छथि। क्यो पथ दुर्घटनामे शिकार भेल बाजारी छथि तँ संगमे युद्दमे मृत भेल सैनिक आ चोरि करए काल मारल गेल चोर, उच्चक्का आ पॉकिटमार सेहो छथि। ज्योतिरीश्वरक धूर्तसमागममे जे अति आधुनिक अब्सर्डिटी अछि से नो एण्ट्री: मा प्रविश मे सेहो देखबामे अबैत अछि। प्रथम कल्लोलमे जे बाजारी छथि से, पंक्ति तोड़ि आगाँ बढ़ला उत्तर, चोर आ उचक्का दुनू गोटेकेँ, कॉलर पकड़ि पुनः हुनकर सभक मूल स्थानपर दए अबैत छथि। उचक्का जे बादमे पता चलैत अछि जे गुण्डा-दादा थिक मुदा बाजारी लग सञ्च-मञ्च रहैत अछि, हुनकासँ अंगा छोड़बाक लेल कहैत अछि। मुदा जखन पॉकेटमार बाजारी दिससँ चोरक विपक्षमे बजैत अछि तखन उचक्का चक्कू निकालि अपन असल रूपमे आबि जाइत अछि आ पॉकेटमारपर मारि-मारि कए उठैत अछि। मुदा जखन चोर कहैत छनि जे ई सेहो अपने बिरादरीक अछि जे छोट-छीन पॉकेटमार मात्र बनि सकल, ओकर जकाँ माँजल चोर नहि, आ उचक्का जेकाँ गुण्डा-बदमाश बनबाक तँ सोचिओ नञि सकल, तखन उचक्का महराज चोरक पाछाँ पड़ि जाइत छथि, जे बदमाश ककरा कहलँह। आब पॉकेटमार मौका देखि पक्ष बदलैत अछि आ उचक्काकेँ कहैत छन्हि जे अहाँकेँ नहि हमरा कहलक। संगे ईहो कहैत अछि जे चोरि तँ ई तेहन करए जनैत अछि, जे गिरहथक बेटा आ कुकुर सभ चोरि करैत काल पीटैत-पीटैत एतऽ पठा देलकए आ हमर खिधांश करैत अछि, बड़का चोर भेला हँ। भद्र व्यक्ति चोरक बगेबानी देखि ई विश्वास नहि कए पबैत छथि जे ओ चोर थिकाह। ताहिपर पॉकेटमार, चोर महाराजकेँ आर किचकिचबैत छन्हि। तखन ओ चोर महराज एहि गपपर दुख प्रकट करैत छथि जे नहि तँ ओहि राति एहि पॉकेटमारकेँ चोरिपर लए जएतथि आ ने ओ हुनका पिटैत देखि सकैत। एम्हर बजारी जे पहिने चोर आ उच्क्काकेँ कॉलर पकड़ि घिसिया चुकल छलाह, गुम्म भेल सभटा सुनैत छथि आ दुख प्रकट करैत छथि जे एकरा सभक संग स्वर्गमे रहब, तँ स्वर्ग केहन होएत से नहि जानि। आब बजारी महराज गीतक एकटा टुकड़ी एहि विषयपर पढ़ैत छथि। जेना धूर्तसमागममे गीत अछि तहिना नो एण्ट्री: मा प्रविश मे सेहो, ई एहि स्थलपर प्रारम्भ होइत अछि जे एहि नाटककेँ संगीतक बना दैत अछि। ओम्हर पॉकेटमारजी सभक पॉकेट काटि लैत छथि आ बटुआ साफ कए दैत छथि। आब फेर गीतमय फकड़ा शुरू भए जाइत अछि मुदा तखने एकटा मृत रद्दीबला सभक तंद्राकेँ तोड़ि दैत छथि, ई कहि जे यमालयक बन्द दरबज्जाक ओहि पार, ई बटुआ आ पाइ-कौड़ी कोनो काजक नहि अछि। आब दुनू मृत भद्र व्यक्ति सेहो बजैत छथि, जे हँ दोसर देसमे दोसर देसक सिक्का कहाँ चलैत अछि। आब एकटा रमणीमोहन नाम्ना मृत रसिक भद्र व्यक्तिक दोसर देसक सिक्का नहि चलबाक विषयमे टीप दैत छथि, जे हँ ई तँ ओहिना अछि जेना प्रेयसीक दोसरक पत्नी बनब। आब एहि गपपर घमर्थन शुरू भए जाइत अछि। तखन रमणी मोहन गपक रुखि घुमा दैत छथि जे दरबज्जाक भीतर रम्भा-मेनका सभ हेतीह। भिखमंगनी जे तावत अपन कोरामे लेल एकटा पुतराकेँ दोसराक हाथमे दए बहसमे शामिल भऽ गेल छथि, ईर्ष्यावश रम्भा-मेनकाकेँ मुँहझड़की इत्यादि कहैत छथि। मुदा पॉकेटमार कहैत अछि जे भीतरमे सुख नहि दुखो भए सकैत अछि। एहिपर बीमा बाबू अपन कार्यक स्कोप देखि प्रसन्न भए जाइत छथि। आब पॉकेटमार इन्द्रक वज्र पर रुपैय्याक बोली शुरू करैत अछि। एहि बेर बजारी तन्द्रा भंग करैत अछि आ दुनू भद्र व्यक्ति हुनकर समर्थन करैत कहैत अछि, जे ई अद्भुत नीलामी अछि, जे करबा रहल अछि से पॉकेटमार आ ओहिमे शामिल अछि चोर आ भिखमंगनी, पहिले-पहिल सुनल अछि आ फेर संगीतमय फकड़ा सभ शुरू भए जाइत अछि। मुदा तखने नंदी-भृंगी शास्त्रीय संगीतपर नचैत प्रवेश करैत छथि। आब नंदी-भृंगीक ई पुछलापर जे दरबज्जाक भीतर की अछि, सभ गोटे अपना-अपना हिसाबसँ स्वर्ग-नरक आ अकास-पताल कहैत छथि। मुदा नंदी-भृंगी कहैत छथि जे सभ गोटे सत्य कहैत छी आ क्यो गोटे पूर्ण सत्य नहि बजलहुँ। फेर बजैत-बजैत ओ कहए लगैत छथि, क्यो चोरि काल मारल गेलाह (चोर ई सुनि भागए लगैत छथि तँ दु-तीन गोटे पकड़ि सोझाँ लए अनैत छन्हि!) तँ क्यो एक्सीडेन्टसँ, आ एहि तरहेँ सभटा गनबए लगैत छथि, मुदा बीमा-बाबू कोना बिन मृत्युक एतए आयल छथि से हुनकहु लोकनिकेँ नहि बुझल छन्हि ! बीमा बाबू कहैत छथि जे ओ नव मार्केटक अन्वेषणमे आएल छथि ! से बिन मरल सेहो एक गोटे ओतए छथि ! भृंगी नंदीकेँ ढ़ेर रास बीमा कम्पनीक आगमनसँ आएल कम्पीटिशनक विषयमे बुझबैत छथि ! एम्हर प्रेमी-प्रेमिकामे घोंघाउज शुरू होइत छन्हि, कारण प्रेमी आब घुरि जाए चाहैत छथि। रमणी मोहन प्रेमीक गमनसँ प्रसन्न होइत छथि जे प्रेमिका आब असगरे रहतीह आ हुनका लेल मौका छन्हि। मुदा भृंगी ई कहि जे एतएसँ गेनाइ तँ संभव नहि मुदा ई भऽ सकैत अछि जे दुनू जोड़ी माय-बाप (!) केँ एक्सीडेन्ट करबाए एतहि बजबा लेल जाए। मुदा अपना लेल माए-बापक बलि लेल प्रेमी-प्रेमिका तैयार नहि छथि। तखन नंदी भृंगी दुनू गोटेक विवाह गाजा-बाजाक संग करा दैत छथि आ कन्यादान करैत छथि बजारी। दोसर कल्लोल: दोसर कल्लोलक आरम्भ होइत अछि एहि आभाससँ, जे क्यो नेता मरलाक बाद आबएबला छथि, हुनकर दुनू अनुचर मृत भए आबि चुकल छथि आ नेताजीक अएबाक सभ क्यो प्रतीक्षा कए रहल छथि, दुनू अनुचर छोट-मोट भाषण दए नेताजीक विलम्बसँ अएबाक (मृत्युक बादो !) क्षतिपूर्ति कए रहल छथि, गीतक योग दए। एकटा गीत चोर नहि बुझैत छथि मुदा भिखमंगनी आ रद्दीबला बुझि जाइत छथि, ताहि पर बहस शुरू होइत अछि। चोरकेँ अपनाकेँ चोर कहलापर आपत्ति अछि आ भिखमंगनीकेँ ओ भिख-मंग कहैत अछि तँ भिखमंगनी ओकरा रोकि कहैत छथि जे ओ सरिसवपाहीक अनसूया छथि, मिथिला-चित्रकार, मुदा दिल्लीक अशोकबस्ती आबि बुझलन्हि जे एहि नगरमे कला-वस्तु क्यो नहि किनैत अछि आ तखन चौबटियाक भिखमंगनी बनि रहि गेलीह। चोर कहैत अछि जे मात्र ओ बदनाम छथि, चोरि तँ सभ करैत अछि। नव बात कोनो नहि अछि, सभ अछि पुरनकाक चोरि। तकर बाद नेताजी पहुँचि जाइत छथि आ लोकक चोर, उचक्का आ पॉकेटमार होएबाक कारण समाजक स्थितिकेँ कहैत छथि। तखने एकटा वामपंथी अबैत छथि आ ओ ई देखि क्षुब्ध छथि जे नेताजी चोर, उचक्का आ पॉकेटमारसँ घिरल छथि। मुदा चोर अपन तर्क लए पुनः प्रस्तुत होइत अछि आ नेताजीक राखल “चोर-पुराण” नामक आधारपर बजारी जी गीत शुरू कए दैत छथि। तेसर कल्लोल: आब नेताजी आ वामपंथीमे गठबंधन आ वामपंथी द्वारा सरकारक बाहरसँ देल समर्थनपर चरचा शुरू भए जाइत अछि। नेताजी फेर गीतमय होइत छथि आकि तखने स्टंट-सीन करैत एकटा मुइल अभिनेता विवेक कुमारक अएलासँ आकर्षण ओम्हर चलि जाइत अछि। टटका-ब्रेकिंग न्यूज देबाक मजबूरीपर नेताजी व्यंग्य करैत छथि। वामपंथी दू बेर दू गोट गप- नव गप कहि जाइत छथि, एक जे बिन अभिनेता बनने क्यो नेता नहि बनि सकैत अछि आ दोसर जे चोर नेता नहि बनि सकैछ (ई चोर कहैत अछि) मुदा नेता सभ तँ चोरि करबामे ककरोसँ पाछाँ नहि छथि। तखने एकटा उच्च वंशीय महिला अबैत छथि आ हुनकर प्रश्नोत्तरक बाद एकटा सामान्य क्यूक संग एकटा वी.आइ.पी.क्यू बनि जाइत अछि। अभिनेता, नेता आ वामपंथी सभ वी.आइ.पी.क्यूमे ठाढ़ भऽ जाइत छथि ! ई पुछलापर जे पंक्ति किएक बनल अछि (?) ताहिपर चोर-पॉकेटमार कहैत छथि जे हुनका लोकनिकेँ पंक्ति बनएबाक (आ तोड़बाक सेहो) अभ्यास छन्हि। चतुर्थ कल्लोल: यमराज सभक खाता-खेसरा देखि लैत छथि आ चित्रगुप्त ई रहस्योद्घाटन करैत छथि जे एक युग छल जखन सोझाँक दरबज्जा खुजितो छल आ बन्न सेहो होइत छल। नंदी भृंगी पहिनहि सूचित कए देलन्हि जे सोझाँक दरबज्जा स्वप्न नहि, मात्र बुझबाक दोष छल। दरबज्जाक ओहि पार की अछि ताहि विषयमे सभ क्यो अपना-अपना हिसाबसँ उत्तर दैत छथि। चित्रगुप्त कहैत छथि जे सभक वर्णनक सभ वस्तु छै ओहिपार। नंदी-भृंगी सूचित करैत छथि जे एहि गेटमे प्रवेश निषेध छै, नो एण्ट्री केर बोर्ड लागल छै। आहि रे ब्बा! आब की होअए ! नेताजीकेँ पठाओल जाइत छन्हि यमराजक सोझाँ, मुदा हुनकर सरस्वती ओतए मन्द भए जाइत छन्हि। बदरी विशाल मिश्र प्रसिद्ध नेताजी, केर खिंचाई शुरू होइत छन्हि असली केर बदला सर्टिफिकेट बला कम कए लिखाओल उमरिपर। पचपन बरिख आयु आ शश योग कहैत अछि जे सत्तरि से ऊपर जीताह से ओ आ संगमे मृत चारू सैनिककेँ आपिस पठा देल जाइत अछि। दूटा सैनिक नेताजीक संग चलि जाइत छथि आ दू टा अनुचर सेहो जाए चाहैत अछि। मुदा नेताजीक अनुचर सभक अपराध बड़ भारी, से चित्रगुप्तक आदेशपर नंदी-भृंगी हुनका लए, कराहीमे भुजबाक लेल बाहर लए जाइत छथि तँ बाँचल दुनू सैनिक हुनका पकड़ि केँ लए जाइत छथि आ नंदी-भृंगी फेर मंचपर घुरि अबैत छथि। तहिना तर्कक बाद प्रेमी-प्रेमिका, दुनू भद्र पुरुष आ बजारीकेँ सेहो त्राण भेटैत छन्हि ढोल-पिपहीक संग हुनका बाहर लए गेल जाइत अछि। आब नन्दी जखन अभिनेताक नाम विवेक कुमार उर्फ...बजैत छथि तँ अभिनेता जी रोकि दैत छथि, जे कतेक मेहनतिसँ जाति हुनकर पाछाँ छोड़ि सकल अछि, से उर्फ तँ छोड़िए देल जाए। वामपंथी गोष्ठीकेँ अभिनेता द्वारा मदति केर विवरणपर वामपंथी प्रतिवाद करैत छथि। हुनको पठा देल जाइत छनि। वामपंथीक की हेतन्हि, हुनकर कथामे तँ ने स्वर्ग-नर्क अछि आ ने यमराज-चित्रगुप्त। हुनका अपन भविष्यक निर्णय स्वयं करबाक अवसर देल जाइत छन्हि। मुदा वामपंथी कहैत छथि जे हुनकर शिक्षा आन प्रकारक छलन्हि, मुदा एखन जे सोझाँ घटित भए रहल छन्हि ताहिपर कोना अविश्वास करथु? मुदा यमराज कहैत छथि जे- भऽ सकैत अछि, जे अहाँ देखि रहल छी से दुःस्वप्न होअए, जतए पैसैत जाएब ओतए लिखल अछि नो एण्ट्री। आब यमराज प्रश्न पुछैत छथि जे विषम के, मनुक्ख आकि प्रकृति ? वामपंथी कहैत छथि जे दुनू, मुदा प्रकृतिमे तँ नेचुरल जस्टिस कदाचित् होइतो छै मुदा मनुक्खक स्वभावमे से गुन्जाइश कतए ? मुदा वामपंथी राजनीति एकर (समानताक, सुधार केर) प्रयास करैत अछि। ताहिपर हुनका संग चोर-उचक्का आ पॉकेटमारकेँ पठाओल जाइत अछि, ई अवसर दैत जे हिनका सभकेँ बदलू। चोर कनेक जाएमे इतस्तः करैत अछि आ ई जिज्ञासा करैत अछि जे हम सभ तँ जाइए रहल छी मुदा एहिसँ आगाँ ? नंदी-चित्रगुप्त-यमराज समवेत स्वरमे कहैत छथि- नो एण्ट्री। भृंगी तखने अबैत छथि, अभिनेताकेँ छोड़ने। यमराज कहैत छथि - मा प्रविश। भृंगी नीचाँमे होइत चरचाक गप कहैत अछि, जे एतुक्का निअम बदलल जएबाक आ कतेक गोटेकेँ पृथ्वीपर घुरए देल जएबाक चरचा सर्वत्र भए रहल अछि। यमदूत सभ अनेरे कड़ाह लग ठाढ़ छथि क्यो भुजए लेल कहाँ भेटल छन्हि (मात्र दू टा अनुचर छोड़ि)। आब क्यो नहि आबए बला बचल अछि, से सभ कहैत छथि। चित्रगुप्त अपन नमहर दाढ़ी आ यमराज अपन मुकुट उतारि लैत छथि आ स्वाभाविक मनुक्ख रूपमे आबि जाइत छथि! मुदा चित्रगुप्तक मेकप बला नमहर दाढ़ी देखि भिखमंगनी जे ओतए छलीह, हँसि दैत छथि। भृंगी उद्घाटन करैत छथि जे भिखमंगनी हुनके सभ जेकाँ कलाकार छथि ! कोन अभिनय ! तकर विवरण मुहब्बत आ गुदगुदीपर खतम होइत अछि, तँ भिखमंगनी कहैत छथि जे नहि एहि तरहक अभिनय तँ ओतए (देखा कए) भऽ रहल अछि। ओत्तऽ रमणी मोहन आ उच्चवंशीय महिला निभाक रोमांस चलि रहल अछि। मुदा निभाजी तँ बजिते नहि छथि। भिखमंगनी यमराजसँ कहैत छथि जे ओ तखने बजतीह जखन एहि दरबज्जाक तालाक चाभी हुनका भेटतन्हि, बुझतीह जे अपसरा बनबामे यमराज मदति दए सकैत छथि, ई रमणीक हृदय थिक एतहु नो एण्ट्री ! यमराज खखसैत छथि, तँ चित्रगुप्त बुझि जाइत छथि जे यमराज “पंचशर”सँ ग्रसित भए गेल छथि ! चित्रगुप्तक कहला उत्तर सभ क्यो एक कात लए जाओल जाइत छथि मात्र यमराज आ निभा मंचपर रहि जाइत छथि। यमराज निभाक सोझाँ- सुनू ने निभा... कहि रुकि जाइत छथि। सभक उत्साहित कएलापर यमराज बड़का चाभी हुनका दैत छथि, मुदा निभा चाभी भेटलापर रमणी मोहनक संग तेना आगाँ बढ़ैत छथि जेना ककरो अनका चिन्हिते नहि होथि ! ओ चाभी रमणी मोहनकेँ दए दैत छथि मुदा ओ ताला नहि खोलि पबैत छथि। फेर निभा अपने प्रयास करए लेल आगाँ बढ़ैत छथि मुदा चित्रगुप्त कहैत छथि जे ई मोनक दरबज्जा थिक, ओना नहि खुजत। महिला ठकए लेल चाभी देबाक (!) गप कहैत छथि। सभ क्यो हँसी करैत छनि जे मोन कतए छोड़ि अएलहुँ ? ताहिपर एकबेर पुनः रमणी मोहन आ निभा मोन संजोगि कए ताला खोलबाक असफल प्रयास करैत छथि। नंदी-भृंगी-भिखमंगनी गीत गाबए लगैत छथि जकर तात्पर्य ईएह जे मोनक ताला अछि लागल, मुदा ओतए अछि नो एण्ट्री। मुदा ऋतु वसन्तमे प्रेम होइछ अनन्त आ करेज कहैत अछि मैना-मैना । तँ एतहि नो एण्ट्री दरबज्जापर धरना देल जाए। उत्तर आधुनिक भावप्रधान निरर्थक (एबसर्ड) नाटक: एन एटेण्डेन्ट गोडो क सैमुअल बेकैट द्वारा स्वयं फ्रेंचसँ अंग्रेजीमे अनुवाद कएल गेल “वेटिंग फॉर गोडो” शीर्षकसँ आ उपशीर्षक “अ ट्रेजिकॉमेडी इन टू एक्ट्स” सेहो जोड़ल गेल जे फ्रेंच संस्करणमे नै छल। ट्रेजीकॉमेडी माने ट्रेजेडी आ कॉमेडीक मिश्रण। एकर कथानकसँ स्पष्ट भऽ गेल हएत जे एकर मुख्य पात्र “गोडो” ऐ नाटकमे छैहे नै, दोसर ओ भावक दृष्टिसँ सेहो नाटकक मुख्य तत्व नै छै। नाटकक मुख्य तत्व छै “वेटिंग” माने बाट तकनाइ। भाषा, स्टेज, बाजब, चुप्प रहब, चलबाक तरीका, ई सभ ऐ नाटकक अभिन्न अंग छिऐ। देश-कालमे भागैबला बनजारा जीवनशैलीक लोक सभ अछि एकर मुख्य पात्र। बिनु बजने शारीरिक भावसँ अभिनय करैबला “माइम कलाकार” जेकाँ ऐ नाटकक पात्र अभिनय करै छथि। नाटकमे प्लॉट आ संतुलनक नव परिभाषा ई नाटक गढ़ैत अछि। आधुनिक थियेटरकेँ ई नाटक नव युगमे प्रवेश कराबैत अछि। ब्रिटेनक “म्यूजिक हॉल” थियेटर मे संगीत हास्य रहै छलै जइमे जीवनक निराशा “क्रॉस-टॉक”सँ बेकेट आ राजनैतिक-सामाजिक आतंक हैरोल्ड पिन्टर हास्य रूपमे देखबैत छथि। “नो एण्ट्री: मा प्रविश” सेहो स्वर्क (बा नरक) क द्वारपर आरम्भ होइए जतए ओना तँ सभ मृत लोक पंक्तिबद्ध छथि मुदा एकटा जीवित व्यक्ति सेहो छथि!उचक्का बाजारी लग सञ्च-मञ्च रहैए! प्रेमी-प्रेमिकाक ओतए बियाहो भऽ जाइ छै! नेताजी मृत्युक बादो विलम्बसँ एबा लेल अभिशप्त छथि! वामपंथी ओतौ बाहरसँ समर्थन दै छथि! वी.आइ.पी. क्यू सँ ओतौ त्राण नै भेटै छै! मुदा जइ दरबज्जाक बाहर लोक पंक्तिबद्ध छथि से एक युगमे खुजितो छल आ बन्न सेहो होइत छल, ई रहस्योद्धाटन चित्रगुप्त करै छथि! माने आब ई नै खुजत तखन इन्तजारी कथीक? नन्दी-भृंगी कहैए जे सोझाँक दरबज्जा स्वप्न नै, मात्र बुझबाक दोष छल! अभिनेता विवेक कुमार अपन “सरनेम” पुछल गेलापर कहै छथि जे कतेक मोश्किलसँ तँ जाति हुनकर पाछाँ छोड़लक अछि से उर्फ तँ छोड़िये देल जाए। वामपंथीक कथामे ने स्वर्ग-नर्क होइ छै आ नहिये यमराज-चित्रगुप्त, मुदा एतुक्का परिस्थिति देखि कऽ ओ अविश्वास कोना करथु? मुदा यमराजे हुनका कहै छथिन्ह जे ई दुःस्वप्न हुअए। यमदूत सभ कड़ाह लग अनेरे ठाढ़ छथि कियो भूजैले भेटिते नै छन्हि, चित्रगुप्तक मेकप बला दाढ़ी देखि भिखमंगनीक हँसलापर भृंगी कहै छथि जे भिखमंगनी सेहो हुनके सभ जेकाँ कलाकार छथि। मोनक दरबज्जा मोन छोड़ि एलापर कोना खुजत? फ्रेंच नाटक “वेटिंग फॉर गोडो”, हैरोल्ड पिंटरक अंग्रेजी नाटक “द बर्थडे पार्टी”, बादल सरकारक बांग्ला नाटक “एवम् इन्द्रजीत” आ उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’क मैथिली नाटक “नो एण्ट्री: मा प्रविश” पुरान नाटक जेकाँ परिभाषित आरम्भ आ अन्तक परिधिसँ अलग अछि। ई कतौ सँ शुरू भऽ जाइत अछि, कतौ खतम भऽ जाइत अछि। एवम् इन्द्रजीत मे लेखक पात्र ताकि रहल अछि, आ अनचोक्के ओ दर्शक दीर्घाकेँ सम्बोधित करैत चारिटा देरीसँ आएल दर्शककेँ मंचपर बजा लैए आ ओकरा नाटकक पात्र बना दैए। चारिम पात्र ओकरा प्रिय छै, ओ निर्मल नै “इन्द्रजीत” छी। ओ अलग अछि, इन्द्रकेँ जीतैबला ऐतिहासिक पात्र अछि। ओ अमल विमल, कमल जेकाँ लीखपर नै चलत। मुदा अन्त जाइत जाइत इन्द्रजीत सेहो अमल विमल, कमल एवम् इन्द्रजीत भऽ जाइए। हैरोल्ड पिन्टरक “द बर्थडे पार्टी”क प्रारम्भमे तेहेन समीक्षा भेल जे हुनकर लेखकीय जीवन समाप्त हुअए पर आबि गेल। मुदा एकर पुनर्पाठ एकरा क्लासिक बना देलक। किछु रहस्य, किछु आतंककेँ ओ सम्पूर्ण नाटकमे बनेने रहलाह, हास्य कथ्यकेँ आर मजगूत केलक। स्टैनले की अछि, छल बा बनऽ चहैत अछि? की ओ स्त्रीकेँ दूषित करैए, बा ओ अपन पत्नीक हत्या केलक? मुदा मेग तँ ओकरा पसिन्न करै छै? ओकर पहिल आ दोसर कन्सर्ट, के तकर बाधक बनलै? की ओ झूठ बजैए बा वर्तमान सामाजिक आ राजनैतिक परिभाषासँ अलग व्यवहारक अछि? ओ मेगकेँ मोकऽ चाहैए मुदा तैयो किए मेग ओकरा पसिन्न करै छै आ सामाजिक आ राजनैतिक शक्ति ओकरा किए आ कोना उठा कऽ लऽ गेल जाइ छै, जकर सिपाही गोल्डबर्ग (गोल्डबर्गक लुलुक संग रहस्यमय व्यवहार) स्वयं आदर्श उपस्थित नै कऽ पाबै छथि। सुन्न-मसान सड़कक कातक माटिक ढिमका आ पत्रहीन नग्न गाछ “वेटिंग फॉर गोडो” क स्टेज छिऐ, ताला लागल दरबज्जाक बाहरक स्थल/ मण्डप “नो एण्ट्री: मा प्रविश”क स्टेज छिऐ तँ “एवम् इन्द्रजीत”मे दर्शक दीर्घा, सएह स्टेज बनि जाइए। “द बर्थडे पार्टी”मे घरक कोठली स्टेज छिऐ मुदा पिन्टर एकर पात्र स्टैनले केँ डेरीडाक “विखण्डन” पद्धतिसँ कखनो खण्ड कऽ दैत छथि तँ कखनो फेरसँ जोड़ि दै छथि। लोक बा दर्शक ओकरासँ ईर्ष्या करऽ लगैए, खने सहानुभूति करऽ लगैए खने घृणा करऽ लगैए, मुदा स्टैनली गोल्डबर्ग आ मैक्कानक सोझाँ जखन निर्बल बुझि पड़ैए तँ दर्शक ओकरा संग अपनाकेँ देखैए, जेना ओ “एवम् इन्द्रजीत” मे इन्द्रजीत संग अपनाकेँ देखैए। “वेटिंग फॉर गोडो” मे जखन लोक गुलाम संग अपनाकेँ देखैए तखने सहानुभूति देखेलापर चमेटा पड़लापर ओ हतप्रभ रहि जाइए। “नो एण्ट्री: मा प्रविश” मे भिखमंगनी ईर्ष्यावश रम्भा-मेनकाकेँ मुँहझड़की कहैए! पॉकेटमार इन्द्रक व्रजपर रुपैय्याक बोली लगबैए। नन्दी-भृंगी कहैए जे सभ गोटे सत्य छी मुदा क्यो गोटे पूर्ण सत्य नै बजलौं। “एवम् इन्द्रजीत”मे इन्द्रजीतक हाल सिसीफस सन छै। शापित ग्रीक मिथक सिसीफस, संगमरमरक पाथरपर चढ़बाक लेल अभिशप्त, आ जखने ओ चोटीपर पहुँचैए आकि पाथर फेर गुरकि कऽ ओकरा नीचाँ आनि दै छै। मनुक्खक काज आ जीवन निरर्थकतापर आधारित अछि। मनुक्ख असफल होइले अभिशप्त अछि, इन्द्रजीत जेकाँ? आकि “नो एण्ट्री: मा प्रविश”क स्वर्ग-नरक, यमराज-चित्रगुप्तक अमान्यता देखलाहा गपकेँ देखि बदलत? मुदा तखन यमराजे कहै छथि जे देखलाहा गप दुःस्वप्न भऽ सकैए? “वेटिंग फॉर गोडो” ईश्वरक इन्तजारी नै छिऐ, बेकेट स्वयं कहै छथि जे इन्तजारी “गॉड”क नै “गोडो”क भऽ रहल अछि, ओना क्रिस्टियेनिटी “मिथोलोजी” अछि से ओ तकर प्रयोग करै छथि। अस्तित्ववादी विचारधारा, मनुक्ख आ ब्रह्माण्ड सभ निरर्थक अछि, अबसर्ड अछि। इन्फॉरमेशन सोसाइटी, सार्वभौम मानवाधिकार घोषणा आ भारतीय संविधान इन्फॉरमेशन सोसाइटी किंवा सूचना-आधारित-समाज एकटा ओहेन समाज अछि जाहिमे सूचनाक निर्माण, वितरण, प्रसार, उपयोग, एकीकरण आ संशोधन, ई सभ एकटा महत्त्वपूर्ण आर्थिक, राजनीतिक आ सांस्कृतिक क्रिया होइत अछि। आ एहि समाजक भाग होएबामे समर्थ लोक अंकीय वा डिजिटल नागरिक कहल जाइत छथि। एहि उत्तर औद्योगिक समाजमे सूचना-प्रौद्योगिकी उत्पादन, अर्थव्यवस्था आ समाजकेँ निर्धारित करैत अछि। उत्तर-आधुनिक समाज, उत्तर औद्योगिक समाज आदि संकल्पना सँ ई निकट अछि। अर्थशास्त्री फ्रिट्ज मैचलप एकर संकल्पना देने छलाह। हुनकर ज्ञान-उद्योगक धारणा शिक्षा, शोध आ विकास, मीडिआ, सूचना प्रौद्योगिकी आ सूचना सेवाक पाँचटा अंगपर आधारित छल। प्रौद्योगिकी आ सूचनाक समाजपर भेल प्रभाव एतए दर्शित होइत अछि। ई वएह समाज थिक जाहिमे आइ-काल्हि हमरा सभ रही रहल छी। दुनू विश्वयुद्ध आ फासिज्मक चुनौतीक बाद १० दिसम्बर १९४८ केँ संयुक्त राष्ट्रसंघक महासभा द्वारा मानवाधिकारक सार्वभौम घोषणाक उद्घोषणा कएल गेल आ एकरा अंगीकार कएल गेल। ई घोषणा राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक आ धार्मिक भेदभावरहित एकटा सामान्य मानदण्ड प्रस्तुत करैत अछि जे सभ जन-समाज आ सभ राष्ट्र लेल अछि। सूचना समाजपर पहिल संयुक्त राष्ट्र विश्व सम्मेलन दू खेपमे भेल। पहिल १०-१२ दिसम्बर २००३ मे जेनेवा, स्विटजरलैंड मे आ दोसर खेप १६-१८ नवम्बर २००५ मे ट्युनिस, ट्यूनिसियामे। एतए मानवाधिकार आ सूचना प्रौद्योगिकीक बीचमे सम्बन्धकेँ मान्यता देल गेल छल। मानवाधिकारक सार्वभौम घोषणाक निम्न बिन्दु सभ सूचनाक समाजसँ सम्बन्धित अछि। (मानवाधिकारक सार्वभौम घोषणाक मैथिली अनुवाद डॉ. रमानन्द झा ‘रमण’) अनुच्छेद १२ केओ व्यक्ति कोनो आन व्यक्तिक एकान्तता, परिवार, निवास वा संलाप (पत्राचारादि) मे स्वेच्छया हस्तक्षेप नहि करत आने ओकर प्रतिष्ठा आ ख्याति पर प्रहार करत। प्रत्येक व्यक्तिकेँ एहन हस्तक्षेप वा प्रहारसँ कानूनी रक्षा पएबाक अधिकार छैक। अनुच्छेद १८ प्रत्येक व्यक्तिकेँ विचार, विवेक आ धर्म रखबाक अधिकार छैक। एहि अधिकारमे समाविष्ट अछि धर्म आ विश्वासक परिर्वतनक स्वतन्त्रता, एकसर वा दोसराक संग मिलि प्रकटतः वा एकान्तमे शिक्षण, अभ्यास, प्रार्थना आ अनुष्ठानक स्वतन्त्रता। अनुच्छेद १९ प्रत्येक व्यक्तिकेँ अभिमत एवं अभिव्यक्तिक स्वतन्त्रताक अधिकार छैक, जाहिमे समाविष्ट अछि बिना हस्तक्षेपक अभिमत धारण करब, जाहि कोनहु क्षेत्रसँ कोनहु माध्यमेँ सूचना आ विचारक याचना, आदान प्रदान करब। अनुच्छेद २७ १. प्रत्येक व्यक्तिकेँ समाजक सांस्कृतिक जीवनमे अबाध रूपेँ भाग लेबाक, कलाक आनन्द लेबाक तथा वैज्ञानिक विकासमे आ तकर लाभमे अंश पएबाक अधिकार छैक। २. प्रत्येक व्यक्तिकेँ अपन सृजित कोनहु वैज्ञानिक, साहित्यिक अथवा कलात्मक कृतिसँ उत्पन्न, भावनात्मक वा भौतिक हितक रक्षाक अधिकार छैक। अनुच्छेद२१ १. प्रत्येक व्यक्तिकेँ अपन देशक शासनमे प्रत्यक्षतः भाग लेबाक अथवा स्वतन्त्र रूपेँ निर्वाचित अपन प्रतिनिधि द्वारा भाग लेबाक अधिकार छैक। २. प्रत्येक व्यक्तिकेँ अपना देशक लोक-सेवामे समान अवसर पएबाक अधिकार छैक। ३. जनताक इच्छा शासकीय प्राधिकारक आधार होएत। ई इच्छा आवधिक आ निर्बाध निर्वाचनमे व्यक्त कएल जाएत आओर ई निर्वाचन सार्वभौम एवं समान मताधिकार द्वारा गुप्त मतदानसँ होएत अथवा समतुल्य मुक्त मतदान प्रक्रियासँ। अंकीय वा डिजिटल विभाजन एकटा ज्ञानक विभाजन, सामाजिक विभाजन आ आर्थिक विभाजन देखबैत अछि आ बिना भेदभावक एकटा सूचना समाजक निर्माणक आवश्यकता देखाबैत अछि, जाहिसँ सूचना प्रौद्योगिकीपर विकासशील देशक सार्वभौम अधिकार रहए। मानवाधिकार आ सूचना प्रौद्योगिकीक मध्य व्यक्तिक एकान्तक अधिकार सेहो सम्मिलित अछि। विद्वान, मानवाधिकार कार्यकर्ता आ आन सभ व्यक्ति द्वारा अभिव्यक्तिक स्वतंत्रता, सूचनाक अधिकार, एकान्तता, भेदभाव-रहित, स्त्री-समानता, प्रज्ञात्मक संपत्ति, राजनीतिक भागीदारी आ संगठनक मेलक संदर्भमे आ सूचना आ जनसंचार प्रौद्योगिकीक सन्दर्भमे एहि गपपर चरचा शुरू भेल अछि, जे सूचना-समाजमे मानवाधिकारकेँ बल देत आकि ओकरा हानि पहुँचाओत। ऑनलाइन पत्राचारक गोपनीयताक अधिकार, अन्तर्जालक सामग्रीक सांस्कृतिक आ भाषायी विविधता आ मीडिया शिक्षा। सूचना समाजक तकनीकी अओजार ओकर अधिकार आ स्वतंत्रतासँ लाभान्वित होइत अछि आ समाजक समग्र विकास, अधिकार आ स्वतंत्रताक सार्वभौमता, अधिकारक आपसी मतभिन्नता, स्वतंत्रता आ मूल्य निरूपणमे सहभागी होइत अछि। एहिसँ सूचना, ज्ञान आ संस्कृतिमे सरल पइठक वातावरण बनैत अछि आ ई उपयोगकर्ताकेँ वैश्विक सूचना समाजक अभिनेताक रूपमे परिणत करैत अछि। कारण ई उपयोगकर्ताकेँ पहिनेसँ बेशी अभिव्यक्तिक स्वतंत्रता आ नव सामग्री आ नव सामाजिक अन्तर्जाल-तंत्र निर्माण करबाक सामर्थ्य दैत अछि। एहिसँ एकटा नव विधि, आर्थिक आ सामाजिक मॉडेलक आवश्यकता सेहो अनूभूत कएल जा रहल अछि जाहि मे साझी कर्तव्य, ज्ञान आ समझ आधार बनत। बच्चाक हित एकटा आर चिन्ता अछि जे पैघक हितसँ सर्वदा ऊपर रखबाक चाही। आधुनिक समाजक आर्थिक, सामाजिक आ सांस्कृतिक धन एकत्र करबाक प्रवृत्ति सूचना समाजमे बढ़ल अछि आ प्रौद्योगिकी एकटा आधारभूत बेरोजगारी अनलक अछि। गरीबी, मजदूरक अधिकार आ कल्याणकारी राज्यक संकल्पना, लाभ-हानिक आगाँ कतहु पाछाँ छूटल जा रहल अछि। आब मात्र किछुए अभिनेता चाही, प्रकाशक लोकनि सेहो मात्र किछु बेशी बिकएबला पोथीक लेखकक प्रचार करैत छथि। यैह स्थिति रंगमंच, पेंटिंग , सिनेमा आ आन-आन क्षेत्रमे सेहो दृष्टिगोचर भऽ रहल अछि। सूचना सर्वदा लाभकारी नहि होइत अछि। ई मात्र कला, ग्रंथ धरि सीमित नहि अछि वरन सट्टा बाजार आ प्रायोजित सर्वेक्षण रपट सेहो एहिमे सम्मिलित अछि। समय आ स्थानक बीचक दूरीकेँ ई कम करैत अछि आ दुनूक बीचमे एकटा सन्तुलन बनबैत अछि। मानवक गरिमा मानवक जन्म आधारित सामाजिक स्थानसँ हटि कऽ मानवक गरिमाक अधिकारपर बल दैत अछि। मुक्ति आ स्त्री-मुक्ति आन्दोलन एहि दिशाक प्रयास अछि। सूचनाक स्वतंत्र उपयोग सीमित अछि, लोकक एकान्त खतम भऽ रहल अछि। बिल गेट्ससँ जखन हुनकर भारत यात्राक क्रममे पूछल गेल छलन्हि जे माइक्रोसॉफ्टक एक्स-बॉक्स भारतमे पाइरेसीक डरसँ देरीसँ उतारल गेल तँ ओ कहने रहथि जे माइक्रोसॉफ्ट कहियो कोनो उत्पाद पाइरेसीक डरसँ देरीसँ नहि आनलक। स्पैम आ पाइरेसीक डर खतम होएबाक चाही। सूचना समाज वैह समाज छी जकर बीचमे हम सभ रहि रहल छी। लोकतंत्र आ मानवाधिकारक सम्मान सूचना-समाज आ उत्तर सूचना-समाजमे होइत रहत। अभिव्यक्तिक स्वतंत्रता, एकान्तक अधिकार, सूचना साझी करबाक अधिकार आ सूचना धरि पहुँचक अधिकार जे सूचनाक संचारसँ सम्बन्धित अछि, ई सभ राज्य द्वारा आ सूचना-समाजक बाजारवादी झुकावक कारण खतराक अनुभूतिसँ त्रस्त अछि। अन्तर्जाल लोकक मीडिआ अछि आ एकटा एहन प्रणाली अछि जे लोकक बीच सम्वाद स्थापित करैत अछि। एहिसँ संचार-माध्यमक मठाधीश लोकनिक गढ़ टुटैत अछि। अन्तर्जालमे सामान्य रूपसँ सम्पादक नहि होइत छथि। एतए लोक विषयक आ सामग्रीक निर्माण कए स्वयं ओकर संचार करैत छथि। एहिसँ कतेक रास सामाजिक सम्वादक प्रारम्भ होइत अछि। मुदा कतेक रास समाज-विरोधी सामग्री सेहो अबैत अछि। तँ की ओहिपर प्रतिबन्ध होएबाक चाही। मुदा जे सॉफ्टवेयरक माध्यमसँ मशीनकेँ सामग्रीपर प्रतिबन्ध लगेबाक अधिकार देब, तखन ई अभिव्यक्तिक स्वतंत्रतापर पैघ आघात होएत। बौद्धिक सम्पदाक अधिकार लेखककेँ मृत्युक ६० बरख बादो प्रकाशन आ वितरणक अधिकार दैत अछि। अन्तर्जालमे सेहो पाइरेसीकेँ प्रतिबन्धित करए पड़त आ कमसँ कम लेखकक मृत्युक २० बरख बाद धरि लेखकक अधिकार ओकर सामग्रीपर रहए, से व्यवस्था करए पड़त। मुदा पेटेन्टक बेशी प्रयोग विकाशसील देशक सूचना अभिगमनमे बाधक होएत आ प्रौद्योगिकीक विकासमे सेहो बाधा पहुँचाओत। कॉपीराइटसँ सांस्कृतिक विकास मुदा होएत, जेना संगीत, फिल्म, आ चित्र-शृंखला(कॉमिक्स)क विकास। डिजिटल वातावरणमे प्रतिकृतिक बिना अहाँ अन्तर्जालपर सेहो सामग्री नहि देखि सकब, से ऑफ-लाइन कॉपीराइट आ ऑनलाइन कॉपीराइट दुनू मे थोड़बेक अन्तर अछि। ऑनलाइन कॉपीराइट प्रतिकृतिकेँ सेहो प्रतिबन्धित करैत अछि। आ प्रतिकृति कएल सामग्रीकेँ दोसर वस्तुमे जोड़ब वा संशोधित करब सेहो बड्ड सरल अछि। से नाम आ चित्र बिना ओकर निर्माताक अनुमतिक नहि प्रयोग होअए, दोसराक व्यक्तिगत वार्तालाप-चैटिंग-मे हस्तक्षेप नहि होअए आ दोसराक विरुद्ध कोनो एहन बयानबाजी नहि होअए जाहिसँ कोनो व्यक्तिक विरुद्ध गलत धारणा बनए। तहिना नौकरी-प्रदाता कोनो प्रकारक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण अपन कर्मचारीक नियन्त्रण लेल लगबैत अछि तँ से अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संघक दिशा-निर्देशक अनुरूप होएबाक चाही। ई-पत्रमे अनपेक्षित सन्देश आ चिकित्सकीय रिपोर्टक अनपेक्षित संग्रह आ उपयोग सेहो मानवाधिकारक हनन अछि। अन्तर्जालक उपयोग मुदा सीमित अछि, कारण बहुत रास सामग्री आ तंत्रांश मंगनीमे उपलब्ध नहि अछि आ महग अछि, डिजिटल विभाजन शिक्षाक स्तरकेँ आर बेशी देखार करैत अछि। शारीरिक श्रमक बदलामे मानसिक श्रमक एतए बेशी उपयोग होइत अछि, से ई आशा रहए जे स्त्री-असमानता सूचना-समाजमे घटत। मुदा सर्वेक्षण देखबैत अछि जे महिलाक पइठ सूचना प्रौद्योगिकीमे कम छन्हि। इलेक्ट्रॉनिक लाइब्रेरी आ ब्रेल-इनेबल कएल/ ध्वनि-इनेबल कएल कम्प्यूटर स्क्रीन/ इलेक्ट्रॉनिक लाइब्रेरी विकलांग आ अन्ध विकलांग लेल घर पर रहि ई-वाणिज्य करबामे सहायता दैत, मुदा एहि क्षेत्रमे कएल शोध आ ओकर परिणाम महग रहबाक कारणसँ ओतेक लाभ नहि दऽ सकल अछि। बाल, वृद्ध, विकलांग, स्त्री, कामगार, प्रवासी-कामगार आ दोसर सामाजिक रूपसँ अब्बल वर्ग सूचना समाजमे सेहो अपनाकेँ अब्बल अनुभव करैत छथि। सार्वभौम मानवाधिकार घोषणाक अनुच्छेद १२ एकान्तता [भारती संविधानक अन्तर्गता पास कएल कोनो विधि जे संसद द्वारा पारित होइत अछि, द्वारा सभ रक्षित अछि], अनुच्छेद १८ एकान्तमे शिक्षण आ विचारक स्वतंत्रता [भारती संविधानक धारा २५(१)], अनुच्छेद १९ कोनहु क्षेत्रसँ कोनहु माध्यमेँ सूचना आ विचारक याचना, आदान प्रदान करबाक अधिकार [भारती संविधानक धारा १९ (a)], आ अनुच्छेद २१ (१) [भारती संविधानक धारा ३२५], अनुच्छेद २१ (२) [भारती संविधानक धारा ३२६] आ अनुच्छेद २१(३) [भारती संविधानक धारा १६(१) आ १६(२)], अनुच्छेद २७ [भारती संविधानक धारा ५१(a)], वैज्ञानिक विकासमे आ तकर लाभमे अंश पएबाक अधिकार दैत अछि, संगे प्रत्येक व्यक्तिकेँ अपन सृजित कोनहु वैज्ञानिक, साहित्यिक अथवा कलात्मक कृतिसँ उत्पन्न, भावनात्मक वा भौतिक हितक रक्षाक अधिकार सेहो दैत अछि। एहि आधारपर सूचना-समाजमे मानवाधिकार केँ देखैत सूचना आ प्रसारण प्रौद्योगिकी द्वारा सामग्री निर्माण तेना होएबाक चाही आ कॉपीराइट आ बौद्धिक सम्पदा अधिकार सेहो ताहि तरहेँ होअए जे ओहिसँ सार्वभौम मानवाधिकार घोषणाक बिन्दु सभक अवहेलना नहि होअए वरन ओकर आदर होअए। सार्वभौम मानवाधिकार घोषणाक अनुच्छेद १२ एकान्तता [भारतीय संविधानक अन्तर्गता पास कएल कोनो विधि जे संसद द्वारा पारित होइत अछि, द्वारा सभ रक्षित अछि], अनुच्छेद १८ एकान्तमे शिक्षण आ विचारक स्वतंत्रता [भारती संविधानक धारा २५(१)], अनुच्छेद १९ कोनहु क्षेत्रसँ कोनहु माध्यमेँ सूचना आ विचारक याचना, आदान प्रदान करबाक अधिकार [भारती संविधानक धारा १९ (a)], आ अनुच्छेद २१ (१) [भारती संविधानक धारा ३२५], अनुच्छेद २१ (२) [भारती संविधानक धारा ३२६] आ अनुच्छेद २१(३) [भारती संविधानक धारा १६(१) आ १६(२)] :- अनुच्छेद २७ [भारती संविधानक धारा ५१(a)] अन्हारक विरोधमे हाथी चलए बजार -अरविन्द ठाकुर आ देवशंकर नवीन अरविन्द ठाकुर आ देवशंकर नवीन : अरविन्द ठाकुर(१९५४- ) आ देवशंकर नवीन (१९६२- ) दू टा एहन कथाकार छथि जे कनियाँ काकी आ बुच्ची दाइसँ हटि कऽ मैथिली कथा लिखै छथि, मुदा कम लिखै छथि, अरविन्द ठाकुर तँ बहुते कम, कारण एकहके टाक कथा संग्रह आइ-धरि आएल छन्हि, अन्हारक विरोधमे- अरविन्द ठाकुरक आ हाथी चलए बजार - देवशंकर नवीनक । अरविन्द ठाकुरक सशक्त पक्ष छन्हि राजनैतिक-आर्थिक कथा सभ तँ देवशंकर नवीन अपन भाषिक शब्दकोशक विशालता लेने सोझाँ अबै छथि। मैथिली कथाक जड़ता कम तँ होइत अछि मुदा बहुत रास आवश्यक पक्ष कम लिखबाक आ गबदी मारने (मैथिल गबदी ) रहबाक कारण छुटि जाइत अछि। देवशंकर नवीन एक्के प्लॉट बेर-बेर सोझाँ अनैत छथि, जेना ऋणखौक आ इजोतमे पुतोहुक ससुरकेँ मारबाक चर्च आ एहि तरहक आनो क्रम, जे आभास दैत अछि जे एकेटा कथाक प्लॉटसँ कैक टा कथा बनल अछि, तँ उस्सर जमीनक उत्तरार्धक प्लॉट, जकरा कथाकार नीक जेकाँ उपयोग नहि कऽ सकलाह। उत्तरार्धक प्लॉटक हम एहि द्वारे चर्चा कएलहुँ कारण ओहि प्लॉटक अनुभव सभ मैथिलकेँ छन्हि आ ओहि आधारपर कुमार पवन एकटा अविस्मरणीय कथा पइठ (अंतिकामे प्रकाशित) लिखि दैत छथि जे हुनकर यश एकमात्र अही कथाक कारण अक्षय रखबामे समर्थ अछि जेना चन्द्रधर शर्मा “गुलेरी” केँ उसने कहा था कथा रखलकन्हि। अरविन्द ठाकुर कथा लिखै छथि आ जे लिखै छथि से सामाजिक-राजनैतिक-आर्थिककेँ तेनाकेँ जोड़ि कऽ जे मैथिली कथाक एकटा रिक्तताक पूर्तिक प्रयास करैत अछि, मुदा बड्ड कम लिखै छथि से पाठक पियासल रहिये जाइत अछि, घट अपूर्णे रहैत अछि। अन्हारक विरोधमे- खिस्सा सियार-यार- रामनारायण महराज-एक्स एम.एल.ए. आ भूतपूर्व चेयरमैन सरकारी प्रकाशन कमिटी, तहिया कोनो घोटालामे मुख्यमंत्रीक भाइ रामाधार पांडे,एम.एल.ए. हिनका बचेने रहथिन्ह। गरीबदास आजाद जिला कमिटीक महामंत्री, अनेक बर्ख धरि सोशलिस्ट आ आब महासभा पार्टीमे, बेटा सेहो ट्रेनमे डकैती धरि करए लागल छन्हि। शालिगराम राय आ लखन यादव- मनबढ़ू सभ। मीटिंग। राजनाथ झा आ जीबछ मंडलक मुँहे राजनीतिपर किछु पैराग्राफ अबैत अछि।सदानन्द विद्रोही महासभापार्टीक विरोधी दलक स्वयंभू नेता तोफान सिंहक शागिर्द आ हुनका संग एकटा बम विस्फोटमे दहिना हाथ गमेने एकटा जुआन।हुनकर अफसोच करब, रघुबंश मंडलक जिला कमिटीक भाइस प्रेसिडेन्ट बनबामे पांडेजीक दाँव- बैकवार्डकेँ जगह भेटबाक चाही, आ चौधरीजीक प्रतिष्ठाकेँ देखि हुनकर चुप भए जाएब! राजमंगल श्रीवास्तव आ सतीश सिंह परमार (छत्तीस बाबू छत्री- मनबढ़ू शब्दावली )। एकावन गोट मेम्बरबला संस्था धेला कमिटीक सर्वेसर्वा परमारजी।श्रीवास्तव आ परमारक जोड़ी कुख्यात- अलग-अलग रहलापर दुहू गोटे एक दोसराकेँ गारि पढ़ैत छथि मुदा रहै छथि संगे।पूर्व प्रखण्ड अध्यक्ष शनिचर “शनि”-गाजा आदिक अनवरत सेवी आ वर्तमान युवा अध्यक्ष गणेश गुरमैता-पेटीशनबाज। चटर्जी दा- पटनासँ फोनपर रहै छथि- चौधरीजी आ पांडेजीक विरोधमे चौबेजीक संगे फ्रंटक नियार छनि। शनि-गुरमैताकेँ परमार गपमे ओझरा लैत छन्हि तँ क्यो गोटे दुनू गोटेकेँ फुसियाहीं कऽ सोर करै छन्हि आ त्राण दियाबै छन्हि। जटाशंकर मलिक प्रसिद्ध माखन बाबू (सभ नट वोल्टपर फिट होअएबला सलाइ-रिंच- मनबढ़ू शब्दावली )।अपनापर ध्यान आकर्षित करबा लेल पारसमणि चौधरीकेँ सोर करै छथि आ हुनकर प्रणामक उत्तर तीन प्रणामसँ दै छथि। हुनकर कार बेटा बौका बाबू (सम्प्रदायवादी पार्टीक मेम्बर) लऽ गेल छन्हि आ जीप खराप छन्हि- दुसधटोली बलाक पंचैती करबाक छलन्हि से रिक्शा मँगबाबए पड़लन्हि।च्यवनप्राश खाइते रहै छथि- राघोपुरसँ होमियोपैथिक इलाज करेने छथि।सीता बाबू महासभा पार्टीक प्रखण्ड अध्यक्ष (माखन बाबूक बहु- मनबढ़ू शब्दावली)।सुबोधनारायण सिंह प्रसिद्ध सुबोधजी।एक्स.एम.एल.ए. आ एक्स अध्यक्ष जिला महासभा पार्टी (समर्थक शब्दावली- जिलाक गाँधी, विरोधी शब्दावली- नटवरलाल आ मनबढ़ू शब्दावली- मुँहदुबरा)।सादगी रहन-सहन, विनम्र।रामाधार पांडेजीक भाए मुख्यमंत्री शिवाधार पांडेक प्रति समर्पित। मुदा चौधरीजीसँ बेसी सटबाक सजा मुदा शिवाधारजी हिनका पार्टीक उम्मीदबारी वापस लेबा लेल कहि कऽ देलखिन्ह। राजीव शर्मा-गलतफहमीक शिकार- जे छल-प्रपंच, फूसि आ विश्वासघातक बिनहु राजनीति कएल जा सकैत अछि। ठाँहि-पठाँहि बजै छथि आ से मनबढ़ू सभ कटाह कहै छन्हि। सुबोधजीक कहलापर जे शिवाधार बाबूक फोन अएलन्हि तेँ हुनका नाम आपिस करए पड़लन्हि, ओ कहै छथि जे एहि लुच्चा-लफंगा सभक सरदरबाक गोल्हड़ी झाड़ि देबनि हमरासभ। ओतहि रामसोगारथ मंडल सेहो छथि, स्वतंत्रता सेनानी मुदा सम्मान-पेंशन अस्वीकार कऽ चुकल छथि। कियो कहै छन्हि तँ कहै छथिन्ह जे जाऊ बाऊ जाऊ, ई गप सुन्नर ठाकुरकेँ सिखेबन्हि जे मुनिस्टर सभक केश-दाढ़ी बनबैत सुराजी पेंशन हथिआए नेने-ए। आ तखने अनघोल, फेर बाजी मारि लेलन्हि चमोक्कनि! आ माखन बाबू बड़का गाड़ीसँ उतरैत रामाधार पांडेक गरामे माला पहिरा दै छथि। फेर एकाएकी माला पहिरेबाक चलन आ फेर एकाएकी भाषण-भाख। आ ओम्हर रामसोगारथ मंडलक सपनामे कारी-कारी भयावह आकृति सोनहुला सपनाकेँ चारू कातसँ घेरि लैत छन्हि। पियासल पानि- रामचरनक खेती करब, आब हरबाही मुदा ओकर बेटा लखनाक माथपर छैक आ तखने ओकर गौना होइ छै आ अबैए नारायणपुरबाली। लेखक वा कथाक सूत्रधार कनियाँक मुँहदेखाइ लेल जाइत छथि आ देखै छथि ओकर अपार रूप-राशि। लखनाक काकी बेरियाबाली ठट्ठा करै छन्हि आ ओ बहार भऽ जाइ छथि। नारायणपुरबाली एक दिन सूत्रधारक पएर जाँतऽ लगै छथि। रोपनी, डोभनी, कटनी आ कमौनी, कोनो काजमे नारायणपुरबालीक जोड़ नहि। एक दिन अन्हरगरे सूत्रधार खेतमे कटनी करबए बिदा होइ छथि तँ आमक कलम लग नारायणपुरबालीक आतुर ठोर हुनकर गाल, माथ आ कंठपर निशान छोड़ि दै छन्हि। मुदा तखने घरैया नोकर सरजुगबाक अबाज अन्हारसँ अबै अछि आ बज्जर खसाबथुन भगवान एहि दुसमनमापर- कहैत निराशा, लालसा आ घृणासँ कुंडाबोर नारायणपुरबाली आगाँ बढ़ि जाइ छथि। ओम्हर नारायणपुरबालीपर डाकनी सवार छै से घोल होइए, देहपरक कपड़ा-बस्तर ओ फेकि लैए। मोतिया दुसाध दारू पिबैए, बरहम बाबाक परसादी आ फेर भगता बनि सात टा काँच करची नारायणपुरबालीक देहपर तोड़ि दैत अछि। आ डाकनीकेँ हरदुआरक श्मशान पीपर गाछपर भगा दैत अछि! भागि जाइए नारायणपुरबाली। दोसर बेर लखनाक बियाह होइ छै मुदा एहि बेर सूत्रधार एगारह गो टका अनका दिया पठा दै छथि। कनियाँक होनहारिक खबरि सुनि रामचरन प्रसन्न भेल मुदा लखना अपन कपार फोड़ि लैत अछि, कारण ओ नामरद अछि। नारायणपुरबाली...लछमी छलै, बेकसूर, बेचारी, अभागलि। अन्हारक विरोधमे- हो हल्ला। कथाकर वा सूत्रधार बहराइ छथि आ पहुँचै छथि अलाउद्दीन लग। कहै छनि अलाउद्दीन, मुसलमान कुजड़ा। जनारदन चौधरी ओकर यार। ओकरे टोलमे बिकुआ ओकर एहि यारक भाइकेँ गारि पढ़लकै। ओकर बेहुदपनीक शिकाइत लऽ कऽ जनारदनक भाइक आएब, भैया कहि सोर पारब, मुदा तखने बिकुआक मारब आ तखने ओकर घरक मौगी सभक ओकरा गारि पढ़ब शुरू भेलै। आ उनटे हिन्दू-मुसलमानक शगूफा सेहो छोड़ै रहै। कोन इज्जति रहि गेलै एहि टोलक। आकि तखने, चारू दिस अपन डराओन छाँह पसारने अन्हारक छातीकेँ चीरैत बिजलीक जगमग इजोत दूर-दूर धरि पसरि गेल।ढाँचा-१९९२- कथाक सूत्रधारक चिट्ठी। स्वीकारोक्ति जे जे किछु लिखा गेल छन्हि से वातावरणक दबाबमे। हालहिमे जॉन्डिस भेल छलन्हि, जीहकेँ रास लगा कऽ पड़ल छलाह। रौद, गरदा आ धुँआसँ अकच्छ छथि। एकटा आर विचित्र बेमारी, देहमे तेज हउहटि आ चमड़ापर नहुँ-नहुँ चकत्ता उभरऽ लगै छन्हि। एक दिन सहरसासँ घुरै छलाह आकि स्कूटर खराप भऽ गेलन्हि। मिस्तरी आधा घंटामे स्कूटर ठीक करबाक गप कहलन्हि मुदा पाट-पुरजा खोलि कऽ छिड़िया देलकन्हि आ चारि घंटा लगलन्हि। सुपौल घुरि डॉ. दासक क्लिनिक गेलाह, होमियोपैथिक दवाइक बुन्न असरि केलकन्हि मुदा घंटा लागि गेलन्हि। एक बेर सासुरसँ घुरैत काल सेहो एहिना भेलन्हि। एक तँ पत्नीसँ बिछोह आ दोसर हाड़ कंपकपाबय बला ठार आ सिहकैत हबा ! गोष्ठी, प्रो. राजेन्द्र, डॉ मुखर्जी आ के.के.इन्स्टीट्यूट ऑफ मैडोलॉजीक प्रिंसिपल झा। प्रो. राजेन्द्रक डॉ मुखर्जीसँ कहलापर जे इलाजक फीस पाँच टका तँ दऽ देब मुदा दबाइ देबए पड़त मुफ्तिया, फिजिशियन सैम्पल। ताहि पर मुखर्जीक कहब जे मेडिकल रिप्रेसेन्टेटिव सभ हुनका घासो नहि दै छन्हि आ एहि लेल तँ डॉ. दास लग जाए पड़त। फेर अयोध्यामे बाबरी मस्जिदक ढ़ाँचाक ध्वस्त हएब। सूत्रधारक देहक कँपकँपी, हउहटि, चकता आ सूजन फेरसँ। कोनो प्रत्यक्ष कारण नहि रहए एकर, मुदा तैयो हुनकर देह एकरा भोगने छलन्हि।मूस- ओ आ ओकर दबाइक दोकान। नबका ड्रग इंस्पेक्टर एहि दुर्गा पूजामे पाँच सए टाका सलामी लऽ गेलै। दोकान थसे जेकाँ लेने छै। अनुज बैसै छै दोकानपर। भुमिहार पेंच भिड़ाओत आकि दोकान करत ! बैंकक पुरना लोन, घरक पाँच सालक बिजलीक बिल।..जेठका सार नागपुरमे एकाउन्टेन्ट छै, सनगर नोकरी आ सेहन्तगर कनियाँ छै। जे ओ जादूगर रहैत आ तखन गिली-गिली फू आ अलाउद्दीनक चिराग जे रहितै ओकरा हाथमे तखन ! मुसबा तँ परेशान केने छै, खाइतो काल, मुदा एखन ओकरा एक्को रत्ती तामस नहि उठै छै।ई शहर अनुमण्डलसँ जिला मुख्यालय भऽ गेल छै, जमीनक दाम बढ़ि गेल छै। जमीन बेचि सभटा कर्जा-बर्जा सधा देत। निन्नक बदलामे पारदर्शी बुनबुना आ विभिन्न आकृतिक आ रूपक मूस , कुतरैत, लड़ैत , नचैत, प्रेम करैत, पोथी पढ़ैत आ रम्मी खेलाइत मूस। दोसर बेर बड़का टा बुनबुन्ना, मूसक कारणसँ प्लेग। मेहनतकश मूस बिहरि बनबैत अछि मुदा साँप ओहिमे रहैत अछि। अचकचाकऽ ओ उठि गेल। स्वर्गीय पिताक चित्र देखैत अछि। पूर्वजक अर्जित सम्पत्तिक उपयोग साँपे जेकाँ करत? केआरीमे अनेरुआ घास-पात खुरपीसँ साफ करऽ लागल। प्रजातंत्र परिकथा- एकटा हत्या आ दू टा घरमे डकैती। कमल कुमार शर्मा एहि खबरिकेँ देखैत अछि, सेन्सर्ड सन खबरि। ई गपक चर्चा नहि जे ओ डॉक्टर के.पी.भगत सेवानिवृत्त छल आ मामूली फीस लै छल। ओकर घरमे डकैत सभ गरीब मरीज आ ओकर परिजन बनि पैसल छल। ओहि पत्रकारपर कालाबाजारी आ मिलावटक केस एखनो लटकल अछि से ओ कोना लिखितए जे ओहि घरसँ पुलिस थाना अगबे एक सय डेगपर आ आरक्षी महोदयक निवास अगबे साठि-सत्तरि डेगक दूरीपर छलै। फेर डॉक्टर ओहिठामसँ ओ सभ राष्ट्रपति पदक प्राप्त हालहिमे रिटायर भेल शिक्षक विक्रम प्रसाद वर्माक घर पहुँचि गेल, डकैती सेहो केलक आ खेनाइ बनबाकेँ सेहो खएलक। विक्रम बाबूक भाइ गजानन बाबू आरक्षी अधीक्षकक ओहिठाम नजरि बचा कऽ पहुँचि गेलाह। मुदा तैयो किछु नहि भेल। अस्पतालक हाताक मुख्यद्वारपर लोक सभ जुटि गेल। मधुरेश किशोर द्विवेदीक केमिस्ट आ ड्रगिस्ट एसोशियेशन एकरा नेतृत्व दऽ रहल छलै। स्कूलसँ घुरैत बेदरा सभकेँ किछु भऽ जाय..। वक्ता सभ शुरू- दलाल ईश्वर चौधरी, भड़ुआ मुरलीधर अग्रवाल, मटिया तेल फेंटि कऽ पेट्रोल बेचिनिहार पत्रकार,चोरिक माल खरीद-बिक्री केनिहार नगरपालिका चेयरमैन बुचनू बाबू, मुनीमक कृपासँ चारिटा संतानक बाप पचीस वर्षीय सेठानीक साठि वर्षीय पति कालाबजरिया सेठ कनकधारीमल- ध्वनि विस्तारक यंत्रपर ओकर हँफसबाक स्वर छोट-मोट अन्हड़क भ्रम दैत छल। बार एशोसिएशनक अध्यक्ष ज्ञाननाथ सिंह जे खूनी आ डकैत सभ पैरवी करै छथि, बाढ़ि प्रभावित इलाकाकेँ डिजनीलैण्डमे परिवर्तित करबाक मुफ्त योजना प्रस्तुत करएबला गंजेड़ी छुटभैया कृष्णानन्द तिवारी..गोरका डाक्टर धरमचन्द सहाय जकरा बुझनुक लोक सभ डी.सी.एस. माने दारू, छौड़ी, सार बहानचो कहै छथि..ओकर धीपल-तबधल शब्द सभ। फेर भीड़क नेतृत्वहीन होएब, प्रतिनिधिमंडल नहि जन-समूह द्वारा डाइरेक्ट वार्ता करबाक गप, आ एहिनामे टैरेसपर ओल्ड फॉक्सक अन्तर्राष्ट्रिय समस्या सभपर बकथोथी। तखने मोटरसाइकिलक एकटा सवार भीड़केँ नियंत्रणमे लेमए चाहैत अछि, ओ बंदा एकटा संप्रदायवादी दलक नव्यतम रंगरूट छल। मधुरेशजी सावधानी बरतै छथि। एकटा धग्गर आ टटका जनमल नारा कमल आ अनकर ध्यान आकृष्ट करैत छन्हि। फेर अबै छथि प्रदीप क्रान्तिकारी जे समाजसेवाक वशीभूत अभियन्त्रणक पढ़ाइ छोड़ने छथि वा निशाबाजी आ बलात्कारक कारण निष्कासित कएल गेल छथि।अनुमंडलाधिकारीक जीपपर आक्रमण होइत अछि। प्रदीप क्रांतिकारी कहैत अछि- कोयला लयसेंसमे सात हजार टका चाही हरामजदाकेँ। देखलहक तूफान। मधुरेशजी किछु आर गोटेकेँ संगमे लऽ लेने छलाह जेना गजेन्द्रजी- स्थानीय कॉलेजक व्याख्याता आ व्यापारी संगठनक माधवजी आ कृष्णमोहनजी। बिना अप्रिय घटनाक भीड़ गाँधी चौक आ जयप्रकाश चौक पहुँचल। तखने मिठाइ दोकानपर बैसएबला गोल्डिया जे क्रिकेट सेहो खेलाइ छल आ तहूमे बॉलक सुविधाक ध्यान रखै छल..बैटपर आबि गेलै तँ छक्का आ नहि तँ क्लीन बोल्ड... से सरकारी गाड़ीकेँ देखि मार..आगि लगा दे.. बाजि उठल। किछु लोक गाड़ी दिस दरबर मारलक, मुदा गाड़ीक चालक गाड़ी भगौलक। न्याय चौक वा नबाब चौक पर विश्व हिन्दू सेनाक सेनानी सभ बजरंगबलीक स्थापना कऽ देने छल कारण तराजू आ आँखिपर पट्टी बला मूर्ति नहि लागि सकल रहए। बजरंग चौकक बोर्ड लागि गेल रहए। प्रशासनमे ओहि समए दलित अधिकारी सभक बाहुल्य छलै आ ओ सभ चौकक नाम अम्बेदकर चौक करए चाहै छलाह से ओ सभ बजरंगबलीकेँ गिरफ्तार कऽ थाना लऽ गेलाह जतए सुनै छियै आइयो हुनकर पूजा कएल जाइत छन्हि। से ई चौक नगरपालिकाक पार्श्वमे रहलासँ आब नगरपालिका चौक कहाइत अछि। अनुमंडलाधिकारी फोर्स लऽ कऽ एतए आबि गेल आ सभ मिलि लाठी भांज लागल। पुलिसबला सभ दूर धरि दरबर मारि रहल छल। मुदा फेर लोक सभ गर धऽ कऽ रोड़ा फेकब प्रारम्भ कएलक। पुलिस असबार भए भागल..एकटा हिटलर कट मोँछबला इंस्पेक्टर आएल.. बरगाँही सभ ओकर गाड़ी लऽ भागल रहै ! अनुमंडलाधिकारी आ दोसर सभ हाँइ-हाँइ जीपमे बैसिकऽ पतनुकान लऽ लेने छल।कमल नजरि खिरओने छल। गोल्डी ओकरासँ बहस केलकै तँ अमजद अली कमलक बाँहि गसिअयने ...क्रुद्ध चीता आ कूढ़मगज महिषक बीच दर्जन भरि लोक..। राजैतिक आ सामाजिक गुटबन्दीसँ बाहरक लोक ठकुरसोहाती नहि जनै छलाह। ने छल..कथी लेल एकर सभक मुँह लागै छी। दू गोट गिरफ्तार संगीक रिहा करबाक माँग..मुदा अधिकारी सभ अपन रक्षार्थ ताहि लेल तैयार नहि छलाह। लोफरकट डी.एस.पी.क मबालीकट अशिष्ट बोली..। मधुरेशजी बजलाह- अहाँ सभकेँ निखत्तर जयबाक सिहन्ता होअय आकि निछक्क जयपंथी-ए घेरने होअय तँ..। बन्हककेँ छोड़बापर सहमति भेल। मनुक्खक कोन कथा कोनो कागपंछी नहि देखाइत छलै..महाभारत समाप्त भेलापर की कुरुक्षेत्रो एहिना निसबध भेल होयतैक। बेदरा सभक एकटा गोल क्रिकेट खेलेबाक लेल मैदानमे प्रवेश कऽ रहल छल।अथ गिरगिट कथा- मुक्कन बाबू माने मुकुन्द जायसवाल- जनवितरण प्रणालीक दोकानक एकटा डीलर। एहि नामक एकटा दरोगा सेहो आयल छल आ खूब हँसोथि कऽ गेल छल। रामलखन पोद्दार, बी.एस.सी. ऑनर्स, वल्द किशन पोद्दार, चाह-पान बेचयबला, टॉपर मुदा नोकरी लेल जुत्ता खियाय गेलै। नगर-हबाक नापबाक यंत्र- कायराना भद्रताक पचहत्तरि प्रतिशत, स्वार्थाना यारीक बीस प्रतिशत आर मिसलेनियस वाइरस पाँच प्रतिशत अनुपातमे उपस्थित रहत। एकटा गोदाम सन मकानमे अछि पुलिस फाँड़ी आ तकरे सटल दारूक भट्ठी! एक दिन अनायासे दुनूक अहं सोझाँ-सोझी होइत छन्हि जखन मुकुन्द पुलिस फांड़ीसँ फराकैत भऽ निकलै छथि आ रामलखन भट्ठीसँ। झगड़ाक बाद पुलिसबला सभक सहानुभूति मुकुन्दक प्रति रहए आ भट्ठासँ बहराए बला सभक पोद्दारक पक्षमे। रामलखन पोद्दार गिरफ्तार भऽ गेल आ भोरमे ओकर बाप पुलिसबलाकेँ फूल-पत्ती चढ़ा कऽ ओकरा छोड़ओलक। फेर मुक्कन बाबू एक सोड़ह लोक लऽ नशा विरोधी नागरिक मंच बनेलन्हि आ भट्ठीपर धरना देलन्हि। ई सोलह गोटे छलाह सात गोट पितिऔत-ममिऔत-पिसिऔत-मसिऔत, दू टा हरबाहा, धनकुट्टा मशीनक आपरेटर, तीन कुख्यात मित्र आ कुलपुरोहितक दू टा लफंगा पुत्र। मुदा एम्हर पोद्दारजी अधिकार सुरक्षा हेतु ३६ गोटेक संगे आबि गेलाह। नशा विरोधी नागरिक मंचक सेनापति लंक लऽ पड़एलाह तँ शेषकेँ धरपटांग उठा देलकन्हि। फेर मारि-पीटक क्रम शुरू भेल। रंगबाजी स्पेशलिस्ट सुब्रत मुखर्जी एकरा गैंगवार कहैत छथि। मुदा तखने नगरपालिकाक चुनावक घोषणा भेल। स्वार्थाना यारीक वाइरस शीवाज रीगलक सोझाँ रंग धेलक। मुक्कन बाबू चेयरमैन छथि, पोद्दारजी वाइस-चेयरमैन। नगरमे शान्ति अछि।अय्यासी- दोसराक संग बैसलमे मौज मुदा पत्नीक बोल- तरकारी लेल दसटकही..किराना समान काल्हियो-परसू जे आबि जाय। दोसक ओतय बिदा भेल, बेटाक गप नहि सुनऽ चाहलक। पटेल चौक.... महात्मा गाँधी चौक पहुँचल।संगमे बिसटकही।रिक्शाबला अपन टोपर तानि कऽ सुस्ताइत रहए। रिक्शापर बैसल, रस्तामे दोस लेल दू टाकाक सिकरेट लेलक, अपन फेवरिट पत्रिका मोर बारह टाकामे आ चारि टाका रिक्शाबलाकेँ देलक। दोसक घरमे पंखाक हबासँ किछु आफियत अनुभव भेलै। बचल दू टाका ओकरा मुँह दुसलकै, घरक तरकारी आ बेटाक किताब-कापी.. घर घुरल देह घामसँ कुंडाबोर। पत्नीक फुलल-लाल आँखि देखि लगलै जे अय्यासी कऽ घुरल होअए।बैकबा-फोड़बा- मूल समाचार- मतायल हबाक पेट्रोलकेँ स्वार्थक सलाइ देखौने छल। घटना- प्रकाश अगरवालक फर्म “वृद्धिचन्द भँवरलाल वस्त्र भंडार”- उधारीक रकम लाख ठेकि गेलै तँ स्वरगीय रघुनाथ झाक पुत्र अठमा फेल मातृविहीन अबंड सिकन्दर झाकेँ वसूली लेल राखलक। एहि क्रममे ओ पहुँचल एक दिन रामचन्द मड़र लग, ओकर बेटा कालेश्वर मड़र जे आब नाममे यादव लिखै छल चारि बरख पहिने तीन हजारक थ्री-पीस सूट बनबेने छल। मुदा बाप ओकर ऋणक मादेँ मना कऽ देलकै। रस्तेमे पान खएबाक क्रममे मुन्ना ठाकुरक दोकानपर कालेश्वर यादवसँ ओकरा भेँट भेलै, कालेश्वर संगे परिवारक लोक आ कुटुम्ब सेहो छलै। पहिने सिकन्दर जे फिरंटगिरी करै छल सैह आइ काल्हि कालेश्वर करै छल से तगेदापर मारि बजड़ि गेल। सिकन्दर ओकरा छातीपर चढ़ि गेल। सिकन्दरक पुरनका संगी सभ जुटि गेल आ कालेश्वरक कुटुम्ब सभकेँ धोपलक। फेर दोसर दिन पिछड़ा एकताक जुलुस निकलल आ वस्त्र भंडारक शीसा फोड़लक। मुदा लठैत सभ आबि लाठी बरसाबऽ लागल। जकर जेने सिंग अंटलै, ओम्हरे पड़ायल। लूट, अराजकता..पसरि गेल। झलकी- दृश्य एक:जिलाध्यक्ष पुऋषोत्तम मंडलक स्वर, अठारह कोठली आ दू टा बड़का-बड़का हॉल बला राजनीतिक दलक कार्यालयमे। सद्भावना जुलुस निकलत..शिष्य चिरंजीव सिंह, पार्टीक युवा मंचक अध्यक्ष आ मंडलजीक घोर समर्थक। मुदा ओ तामसे घोर भऽ जाइत अछि- अहाँ सेहो छोट जातिक छी से ओकरा सभक पक्ष लेबे करबै। बहरा जाइत अछि। दृश्य दू: फूसक घर। धनीलाल, रामनारायण। बैकबा-फोड़बा की होइ छै। मटरू की जानय। किछु काल चुप रहलाक बाद आल्हा टेर देने अछि। दृश्य तीन:कामरेड रामसेवक साहुक चाह-नाश्ताक दोकान। बहस..विद्यानिवासजीक भाषण, जाति नामक कोनो वस्तु नहि। हुनका पागल कहि क्यो छौड़ा बहरा जाइत अछि। दृश्य चारि: टिफिनमे बच्चा सभक खेल: घास-फूस बला घर हमर आ हम बनब जादब। दोकान बिरजूक आ ओ बनत बाभन। दुनूमे झगड़ा होएत आ लल्लू, मोहन, नरेन आ बबलू आओत आ हमर घरमे आगि लगा देत। तखन सुरेश बनत नेता आ विनोद बनत दरोगा। सुरेश दरोगाकेँ कहत जे एकरा दुनूक घर-दोकान बनबा दियौक आ पकड़ि कऽ लाऊ। सुरेश दुनुक हाथ मिलबाकऽ दोस्ती कराओत। बैकबा-फोड़बा खेल भरि टिफिन चलैत रहल। विष-पान- वकालतखानाक कुर्सीपर बैसल गोपालजी कछमछाइत छथि। कचहरीक द्वारपर सुग्गाबला जोतखी बैसल छथि। ओतहि एकटा बैनर सेहो अछि आँखिक रोशनी बढ़बए बला ममीरा सुरमा। अदालतिक बरंडापरसँ अर्दली रामेसर मंडल बल्द जागेसर मंडल केँ चिकरैत अछि, मोकील वकीलकेँ अगिला तारीखपर बाँकी-बकियौता देबाक गप कहै छन्हि मुदा ओ कलमक उनटा छोरसँ कान खोदैत रहैत छथि। गोपाल सुनै छथि। गोपाल, एक दिन पानबला दोकानपर चतुरानन लाठी लेने आयल आ बरसाबय लागल। ओ खसि पड़लाह। बाबूजीक पुरान नोकर नेनिया आबि चतुराननकेँ बजाड़ि दैत अछि मुदा ओ मौका देखि भागि जाइत अछि। रामप्रसादक साठि वर्षीय माय मरौनावाली सभसँ पहिने गोपालक सुधि लेलक। फेर गोपाल अस्पताल आनल गेल। चतुरानन सेहो ओतय आयल रहय इलाज आ इन्जरी रिपोर्ट लेल, मुदा क्यो चीन्हि गेलै आ जरनाक चेरासँ ओकरा मारि कऽ भगा देलकै। चतुराननकेँ सभ आदि अपराधी कहै छल मुदा गोपाल ओकरा सुधारैक लेल प्रयासरत छलाह। से आब ओ भस्मासुर बनि गेल। पुलिस चतुराननसँ पाइ असूललक आ ओ घरहिमे रहै छल। प्रगतिक तारीख केसमे पड़ैत रहलन्हि आ हुनकर एक्स-रे प्लेट सेहो अस्पतालसँ निपत्ता भऽ गेल। तीन बर्खक बाद गबाही शुरू भेल आ फेर शुरू भेल जिरह, ओहि दिन भरि बाँहुक कमीज पहिरने छलाह, कालर आ जेबी रहै वा नहि, रंग..। जे लाठी बजरलन्हि तकर लम्बाइ, बनावटि..। वकील मित्र..मुदा एक दिन स्वरक तुर्शी नुकायल नहि रहलै.देखै छियै मोकील सभकेँ आखिर पाइ देने अछि तँ ओकर सभक काजकेँ प्राथमिकता तँ देबहि पड़त। आ ओहि दिन गवाही नहि गुजरि सकल..फाइलपर हाकिम विपरीत टिप्पणी कऽ देलन्हि। चतुरानन तीन हजारमे गप फिट कएलक जे ओहिसँ बेशी अहाँ दऽ सकी तँ..। एंटी-पार्टीक वकीलक मार्फत वकील-मित्र लग ऑफर सेहो आयल छलन्हि। मुदा गोपालक कहलापर कोर्ट ट्रांसफर करेबाक प्रक्रिया शुरू भेल। मुदा कोर्ट ट्रांसफर भेल शीलभद्र झाक कुटमैतीमे जे गोपालजीक राजनैतिक प्रतिद्वन्दी छलाह आ चतुरानन आइ-काल्हि हुनके छत्र-छायामे छल।मेल पेटीशनपर गोपाल दसखत कऽ दै छथि, आत्मसमर्पण जेना भारत-पाक युद्धमे एक लाख सेनाक संग जनरल नियाजी कएने छल। हाथी चलए बजार: कथा संग्रह तीन खण्डमे अछि, मूलधनमे सामान्य लम्बाइक कथा सभ अछि, मोटा-मोटी २००० शब्दक, जकरा अंग्रेजीमे शॉर्ट स्टोरी कहल जाइ छै। मुदा मैथिलीक शॉर्ट स्टोरी (लघु कथा) एक पन्नाक भीतर लिखल जाइत अछि आ तकर संग्रह ब्याजक अन्तर्गत दोसर खण्डमे कएल गेल अछि। अन्तिम खण्ड लोरहा-बिच्छामे कथाकार छोट-पैघ ओहि सभ कथाकेँ संकलित कएने छथि, जे हुनका दृष्टिएँ कनेक दब कथा अछि- मुदा पढ़ला उत्तर एहिमेसँ बहुत रास कथा मूलधन आ ब्याज क अन्तर्गत संकलित होएबा योग्य अछि, संगहि मूलधन आ ब्याजक बहुत रास कथा लोरहा-बिच्छा खण्डमे जाइ जोगर अछि। मूलधन: अन्हार- लौहार गाम बाटे जाइबला सड़क पक्की भेल छै, सरकारी जीप सभ, महिषी उग्रतारा लग बलिप्रदान देबऽ लेल खदबद-करैत जाइत छागर-पारा सभ। ओलतीसँ ओलती सटल गहूमक नारीसँ छाड़ल घरसँ बहराइत नेना सभ। तेतर मुसहर। सरौनी गामक गृहस्थ लग हरबाही करैत छल आ रमानन्द सिंहक सुतरी काटि रहल छल। कुलबन्त सिंहक ट्रकक पहिआ ओकर छौड़ापर चढ़ि गेलै। मुखियाजीक आगमन। छह हजार सरदार कुलवन्त सिंहसँ लेलन्हि आ दू हजार तेतराकेँ दएबाक गप केलन्हि। तेतराक सौंसे देह झनकि उठलैक, गनत कोना कऽ..कतेक पंचटकिया हेतै। कनियाँ बलुआहाबालीकेँ बुझबैत अछि, हमर-तोहर जिनगी रहत तँ बाल-बच्चा फेर नञि हेतैक? टैक्स फ्री- चलित्तर चिमनीपर काज करैए। साढ़े छह टाकाक बदला पाँच टका भेटै छै। डेढ़ टाका मुंशी मारि लै छै। मुदा काल्हिये बजट पास भेल छै आ जे वस्तु पौने पांच टकामे भेटैत रहए से आब सात टाका सत्तरि पाइमे भेटतै। जकरा ओ भोट देने छल से डाक बंगलापर आयल छै, चलित्तर ओतए जाइये। कहैत अछि जे भोटसँ पूर्व जतेक अधपेटा भेटैत छल सेहो आब नहि भेटैए। मुदा ओ मंत्री बनल नेता दुत्कारि दैत छन्हि, कतेक नुआ-फट्टा दियौलियै, टेलीविजन, भी.डी.ओ. टैक्स फ्री करबेलियै, तैयो जस देनिहार कियो नहि। चलित्तरकेँ पुलिस बाहर कऽ दै छै। घुस्सा, थापर, चमेटा सेहो लगै छै। ओ ककरासँ टैक्स फ्रीक अर्थ बुझत? बबूर- रौदी मरड़क महायात्रा। ओकर एक्केटा बेटा उदबा। गामक बाबू भैयासँ बाऊकेँ बड़ लागि रहै। बिदा भेल बभनटोली दिस। एकहको टाक ठाढ़ि देतै तँ ढेरी भऽ जएतैक। मुदा ओकरा सुनए पड़लै- पुरखा-पातिक मांसु तँ कुकुर कौआ खेलकनि आ रौदियाकेँ जड़बै लेल गाछ चाहियनि। उदबा समाद पठबैत अछि, लहासकेँ लऽ कऽ बान्हपर आ। ताबत ओ सरकारी जमीनपर सरकारी बबूर काटि-चीरि कए चिता सजा दैत अछि। उदबा आगि फूकि देलक। पंडीजी अएलाह आ पंडीजीक ई कहलापर जे बबूरक लकड़ीपर चिता केहन होइ छै, मुँहमे ऊक दऽ कऽ धारमे भसिया दितही, उदबा हुनकर पतरा छीनि लैत अछि आ ओही चितामे फेकि दैत अछि। उदबा पित्तीसँ बजैत अछि- तोरा आऊरक चानन ईएह बबूर छिअह।संबंध- सुगिया आ ओकर घरबला जीबछ। जीबछक घर एही चौकक कातमे छै। झिल्ली मुरही आ चीनीपाक मिठाइ, बतासाक उठल्लू दोकान।रतुका खाइक आ नीनसँ सुतैक बिचला अवधिमे दुनू एक दोसराक बाँहिमे पड़ल किछु गप्प करए। बुढ़िया जे एहि बरख टा जीबैत रहितए तँ ओकर सख संग लागल नहि जइतै..। सुगिया गर्भवती छल। आइ भात-परोड़ खाइत इतियौत-पितियौत सभक बापकेँ कंठ दाबि मारबाक ध्वनि सुनलक। ओ धरहड़िमे गेल मुदा ओ सभ ओकरेपर फरसा चला देलकै। फेर थाना..। ओतए दरोगाजी टेक्टरबलासँ सलटि रहल छलाह। फेर ओ सुगियासँ केसक फीस दू सए टाका मँगलन्हि। जीबछक कमीजक जेबीमे मात्र साठि टाका रहै। बाला आ हंसुली बेचए लेल सोनार लग गेल, ओहो मौका देखि कम पाइ लगेलक। टाकाक जोगार भेलै मुदा तावत जीबछ ढनमना गेलै। दरोगाजी कहलखिन्ह जे ई बिना कुछ बजने मरि गेल। भऽ सकैए तोँ दोसर मर्दक संग संबंध रखने छँह आ एकर खून गुंडासँ करबेने हेबहीं। दरोगाजी ओकरा हाजतिमे बन्न कऽ देलखिन आ अपन डेरामे समाद दऽ देलखिन्ह जे ओ आइ राति डेरा नहि आबि सकताह।अंतिम बेहोशी- कथाक सूत्रधार वा कथाकारक भौजी- माने ललिता मिश्र, प्रोफेसर समरेश मिश्र, विभागाध्यक्ष, रसायन शास्त्र विभागक धर्मपत्नी। दुनु पहिने प्रोफेसर आ शिष्या रहथि, फेर प्रेमी-प्रेमिका भेलाह आ तखन पति-पत्नी। उमरिमे कमसँ कम दस बर्खक अंतर होएतन्हि। तीन टा बच्चा दू टा बेटी चौदह बर्खक सुषमा आ बारह बर्खक माधुरी आ एक टा बेटा श्वेताभ दस बर्खक। भौजीक ई चारिम गर्भाधान। कारण जांघक भूख प्रबल। मुदा बेटीसभकेँ स्कूलमे लोक उपहास करए लगलै आ ओ सभ माइकेँ कहलक जे हमरा सभक उपहाससँ माथ फटैए आ तोरा बिआइसँ छुट्टीए नहि छौ। भौजी गर्भपातक प्रयास कएलन्हि मुदा समरेश भाइक कोनो मदति नहि भेटलन्हि। बेटी सभक गप..पेट उनारने बैसल अछि..बेलनाक हूड़सँ फोड़ि ने दे पेट कए। भौजी मूर्छित भऽ गेलीह। भौजी पहिल बच्चा भेलाक बाद जे चौदह बर्खक बाद गर्भवती होइतीह तँ की हुनकर बेटी, ओहो शिप्रा जेकाँ देवी-देवताक पूजा नहि करितए। शिप्रा सूत्रधारक कॉलेजमे छात्रा, सतरह बर्खक बाद ओकरा एकटा भाइ भेल छलै। बड़ प्रसन्न छलि। डाक्टरनीक मोन उछतगर नहि बुझि पड़लन्हि। भौजीक शिशु सूत्रधारक कोरामे छन्हि। भौजी चलि गेलीह, प्रपंचकेँ छोड़ि। छब्बीस घंटाक बच्चाकेँ लऽ कऽ सूत्रधार समरेश भाइक डेरा ढुकैत छथि। भौजीक दस बर्खक बेटा खुशीसँ ओकरा संग एकतरफा बतकही कऽ रहल छल। भौजीकेँ अंतिम बेर होश आयल छलन्हि तँ ई समाद कहबा लेल। दुनू बहिनकेँ अंग्रेजी स्कूल चंडी बना देने छै। ओ सभ एकरा नहि जीबऽ देतै। आब अहीं एकर माए आ बाप। कथाकार सोचमे छथि। दुनू बहिन स्कूल गेल छल। कोना भौजीक दस वर्षीय बेटाकेँ उतरी पहिरेताह।उस्सर जमीन:तेजो बाबू। कथाक सूत्रधारक दियादी पित्ती। खरहू सभ फूल कका कहै छन्हि। समर्थाइमे खेत-पथारमे काज करैबाली बोनिहारिनसँ राजी वा जबरदस्ती वासनाक पूर्ति करथि। आब दू-दू पुतोहु आ एकटा जमाएक ससुर भेलाह। फूल कका सूत्रधारक टेढ़ आँखिक नकल करथि आ से करैत-करैत आइ हुनकर दहिना आँखिक डीम उपरका पलमे ढुकि गेलनि अछि। आब अपन पोता-पोतीक खापड़िक पेन सन मुँह, बुढ़बा परोर सन ठोर, अल्लू सन-सन नाक, बिलाड़ि सन-सन आँखि आ फगुआक पू सन गाल देखै छथि तँ पश्चाताप करै छथि। हुनकर राम आ लछमन बेटाक भिनाउज लेल पंच बैसल अछि कारण राम बेटीक बाप छथि आ बेटीक बाप पहिनहिये बुढ़ा जाइत अछि- आ लछमन बेटाक बाप छथि । से लछमनक कनियाँ सिमराहा बाली सोचलन्हि जे जेठ जनकेँ परुकाँ एकटा कन्यादान हेतन्हि आ दोसरो लागले छन्हि से फूट भऽ जाइ आ एहि लेल उड़कुन तकलन्हि। पंच, अमीन आ अन्न जोखबा लेल पल्लेदार आयल। जे फूल कका अनका घरमे पंचैती करै छलाह, हुनका घरमे पंचैती। सभ वस्तुक हिस्सा भेल मुद लादि इनार एक्केटा। से लादि फोड़ि देल गेल आ इनार भथि देल गेल। मुदा माए-बापकेँ कोना फोड़ब आकि भथब? से रामक संग बुरहा आ लछमनक संग बुरही गेलीह। नूर-गोबरौर जेकाँ दुनू गोटे पड़ल छथि। कारण सिमराहीबाली समाराजसँ दू बीघा जमीन बुरहा-बुरहीकेँ देबामे नोकसान देखलन्हि। जे छोटकाक घरमे तस्मै बनै तँ बुढ़ीक पातोपर एकाध चम्मच खसै। मुदा असगरे खाइमे हुनकर हीया सालए लागनि। आब फूल काका दार्शनिक बनि गेल छथि। बांझ गाए, उस्सर जमीन आ कोढ़ि बरद सेवा-बरदासिक आश किऐ रखैए? पवन पुल- कथाक सूत्रधारक आइ.एस.सी.क परीक्षा भेल छन्हि , प्रैक्टिकल परीक्षा बाँचल छन्हि आ ओ ओहि अवधिमे गाम गेल छथि, कारण अल्पवेतनभोगी पिताक ऊपर बेसी जोर नहि देमए चाहैत रहथि। मात्र तीन दिन पहिने सहरसा गेल छथि। गाममे मृत्यु सय्यापर सूत्रधारक अनुजा सरोज पड़लि छथि। तीनू अनुजामे सभसँ पैघ मुदा सूत्रधारसँ तीन बर्ख छोट, जकर दस बर्खक बएसमे विवाह भेलै आ तेरह बर्खक बएसमे द्विरागमन। सासुर गेलाक छह मासमे ओकरा टाँगि कए नैहर आनल गेलै। हुनकर पति अज्ञानी-लफंगा छलखिन्ह, जिनका सूत्रधार कहथिन्ह जे ऑटोमेटिक घड़ीक ह्रिजए आ इंग्लिश रेले साइकिलक निर्माणक तिथि बताऊ, जे ई दुनू चीज चाही। आ एहि हँसी लेल सेहो सरोजकेँ तारणा भेटलन्हि। सूत्रधार प्रैक्टिकल परीक्षामे उत्तल तालक वक्रता नहि नापि सकलाह मुदा प्रात भेने सरोज ओहि वक्र सीमासँ मुक्त भऽ गेलीह। सझिला पित्ती, जिनका सूत्रधार बाबू कहै छथि, सूत्रधार आ सरोजकेँ जानसँ बेशी मानैत छथि। समाजक लोकक लहास उठबै लेल नहि आएब। सूत्रधारक काकीक ई सूचित करब जे अपनहि बैसि चारू दिआदनी कानी आ चारू-चारूकेँ चुप करी आ कोनटी-फटकीसँ अबाज, जे छौड़ी समर्थ होइत-होइत मरलैए, तेहेन डाकिन हेतैक जे टोलमे भरि-भरि राति घोड़दौर करतै। मुदा भोज कालमे रंगनाथ मिश्रक कहब, जे पहिल कर के उठाओत, मात्र एक्कैस ब्राह्मण छथि बाइससँ एक कम। सूत्रधारक छोट पित्ती अपने बैसि जाइ छथि। सूत्रधार रंगनाथ मिश्रकेँ बाँहि पकड़ि उठबैत छथि..निकलि जाउ जल्दी, अन्यथा एक्को जुत्ता नीचाँ नञि खसए देब..। जे कसाइ छथि, तिनका जाए दिअनु। हुनकर पात भिखो डोमक सूगरकेँ खोआ दिअनु..। चरित्र- घोर कम्युनिस्ट गौतमजी। जातिएँ कर्ण कायस्थ छथि- बीड़ी पीबि (ताहिसँ सर्वहारा छवि बनबैमे सुविधा छन्हि) मोंछक टुरनी कैल भऽ गेल छनि। कलकत्तामे बसल मैथिल। तीन टा बेटी। बेटी विवाह कालमे अपन प्रेमिका संगे लड़का देखए लेल जाइत छथि। ओतए एक ठाम अम्बष्ठ कायस्थ रहलाक कारण आ दोसर ठाम लड़काक पिता कर्णजीक दोसर पत्नीक क्रिश्चियन विधवा रहलाक कारण ओ कथा सभ हुनका सूट नहि करै छन्हि। एडलिनाक कथा बीचमे आबि जाइए..एहि क्रममे प्रधानाध्यापकक एड्लीनाक सम्बन्धमे टिप्पणीपर एकटा नवनियुक्त शिक्षकक टिप्पणी- एडलीना अहाँक छोटकी बेटीसँ दुइए-तीन बर्ख जेठ होएतीह..हुनका लेसि दै छन्हि। अस्तु, कथाक अन्त गौतम जीक माझिल बेटीक पिताकेँ देल रपटानक संग खतम होइत अछि।इजोत- मधुकरजीक संग कथाक सूत्रधारक शतरंजक खेल चलि रहल छन्हि। शतरंजक खेलक संग सूत्रधार मधुकरजीक शतरंजक संग जीवनमे कएल बेइमानीक संगे-संगे चरचा करै छथि। हुनका द्वारा मधुकर जीकेँ पातकी गुरुक चेला कहलापर मधुकरजी बिगड़ि जाइ छथि, कहै छथि जे ..हमहीं अहांक घरवालीकेँ सिखबै छी जे अहाँक माए-बापकेँ मारए, अहाँक घरक फजहति करए, अहाँक ससुरबासि बहिनकेँ घरमे नहि रहए दिअए। मधुकरजीक विशेषताक शतरंजक बिसातपर चर्च होइत अछि- बियाहमे भाँगठ करब, एकलव्य जेकाँ धनुर्विद्याक प्रयोग कुकुरक मुँह बन्द करबामे करब, सूत्रधारक कनियाँकेँ अनट-बनट पढ़ाएब। सूत्रधारक बहिनिक सासु-ससुरकेँ ओ कहि आएल छथिन्ह- दिल्लीमे जगह किनबा लेल पाइ छै आ बहिन बहनोइकेँ देबा लेल पाइ नहि छै? सूत्रधारक पत्नी सासु-ससुरकेँ पाँच बाढ़नि-पाँच सुपाठ चलबिते छलखिन्ह आब बहिन लेल पाँच बाढ़नि-सुपाठक काज आओर बढ़ि गेलन्हि..बेचारी परलोक गेलीह। अन्तमे सूत्रधार मधुकर जीक घोड़ा उठा कए पुरना जगहपर राखि दै छथि, आ चालिमे इमानदारी अनबाक लेल कहै छथि।हाथी चलए बजार- भवानी दाइ! बापक दुलारि। माएक मृत्युक बाद लालन-पालन आ विवाह। फेर कल्याणक योग्यता भेलन्हि तँ ई समाचार सुनि पिताक मृत्यु भऽ गेलन्हि, खुशीसँ । फेर भवानी दाइकेँ पुत्र भेलन्हि आ फेर हुनकर पतिक मृत्यु। फेर इनश्योरेन्स आ अनुकम्पाक नोकरी लेल हुनका दू तरहक अनुभव भेलन्हि। इनश्योरेन्स कम्पनीक मनेजर कम उमरिक लेखक, भद्र। सभटा काज मिनटमे भऽ गेलन्हि। मुदा पतिक कार्यालयक हाकिम पतित। कथाक अन्त हाकिमक बेटी गीताक पिताकेँ देल दुत्कारिसँ होइत अछि।छगुन्ता- बैरागीजी, रामाधीन पाण्डेय “बैरागी”, हुनकर बेटा कओलेजमे प्रोफेसर भऽ गेलखिन्ह। हुनकर बेटाक अपहरणसँ कथामे तेजी अबैत अछि। पचीस हजार भविष्य निधिसँ निकालि कऽ रखलथि आ सेहो गाएब छन्हि। हुनकर जेठ बेटा अरुण सेहो निपत्ता छथि। फेर कथामे दुखमोचनक चर्च अछि जे स्वतंत्रता सेनानी- जे पेंशन लेबासँ मना कऽ देलन्हि- क पुत्र छथि। मुदा अपराधी चरित्रक, हाइ स्कूलेसँ अपन भविष्यक परिचय देमए लगलाह, जखन जाति आ अर्थें हीन पड़ोसियाक बेटीपर हाथ साफ कऽ लेलनि। फेर बटमारी, छीना झपटी...निम्न जातीय एम.एल.ए. भगत जीक नेतृत्व पसिन्न नहि पड़लन्हि तँ ओ केसमे फसा देलखिन्ह आ आब ओ फरारी राजनीतिज्ञ भऽ गेलाह, अपन जातिक लोकक मदति सेहो भेटलन्हि। फेर हुनकर फल्लां दिन आत्म-समर्पण आ शक्ति प्रदर्शन हएत। निछक्का स्वजाति, एकवर्णा गहूम जेकाँ। आबालवृद्धवनिता। दुखमोचन पैघ लोक भऽ गेलाह। तही दुखमोचनसँ अरुणक धर्मयुद्ध। मुदा दुखमोचन जीक चीलर-चमोकनि सभ अरुण द्वारा वध भऽ रहल छलाह आ ओ दिल्ली-पटनामे मौज करै छथि।गति- जगत झा, गामक बिलाड़ि। गाम मोहनपुर। भुमिहार आ डोमक अतिरिक्त सभ जातिक लोक, भुमिहारक सामाजिक लोकाचारमे कोनो प्रयोजन नहि, मुदा डोमक होइ छै, से ओ अबैत अछि चन्द्रायणसँ। दु बरख दसैंया पासी लग बन्हकी लगलाक बाद फेरसँ मोहनपुर भिखो डोमक हिस्सामे आबि गेल अछि। गाममे मनोहर धानुकक बेटी चनरमा। बभनाक नेत खूब बुझै छल। बिआहक बाद सासुर बकौरसँ सांइकेँ डेनिअएने चलि अएल। कारण बकौरक राछछ सभकेँ ओकरा नहि चीन्हल छलै मुदा मोहनपुरक सभटा कुकुर ओकरा चीन्हल छलै। फेर चारिटा बेटी भेलै। जगत झा तरबन्नीसँ अबैत अनिल सिंहकेँ चनिया ओकर पाइ देलकै वा नहि पूछि भड़कबैत छथि। टी.टी.क बेटा अनिल सिंह। फेर मारि-पीट आ पुलिस-फौदारी। मुदा फेर जखन दुनू पक्षकेँ जगत बाबूक असलियत बुझबामे अबै छन्हि तँ फेर दुनू पक्ष मिलि कऽ..। मध्यांतर- जगतारणि आ अलकादेवी- दुनू सौतनि मुदा सौतिया डाहक कतहु लेशो नहि। अलका देवीक दू टा सन्तान। तारानन्द निर्धन परिवारक आ अलका - सुखी सम्पन्न परिवारक- एक्के संगे पढ़ैत रहथि। तारानन्द लोक सेवा आयोगक परीक्षा पास केलन्हि तँ बियाह जगतारणि- करिया पाथरक बनल मुरुत मुदा व्यवहारसँ सुन्दर- सँ दहेज प्रथाक कारण भऽ गेलन्हि। फेर कुरुप जगतारणिक प्रयाससँ अलका सेहो घर आबि गेलीह। फेर जगतारणिक दूरक संबंधक दीअर मनोहरक पत्नी जाहिल मीराक आगमन होइत अछि। फेर मीराक दामपत्य जीवनक सूत्रक कमजोर होएब आ वकीलक आगमन। मीरा केस जीति जाइत छथि मुदा मनोहरक ओकील, आ मीराक ओकील हुनका संगे गलत कर्म करैत अछि..। फेर जगतारणि द्वारा मीराकेँ भोल भरोस देल जाएब। ब्याज: किराया- पूर्णियाँ गुलाबबाग, देह व्यापारक अड्डा। ..कतेको कोढ़ीकेँ रगड़ि कए फुला देल गेल छल। आ..दस टाकामे होइ छौ अपनो साती आ बापोक साती..एहन सन अबाजक बीच कथाक सूत्रधारक प्रति शब्द..स्सालेकेँ ने जेबीमे दम रहै, ने डांड़मे। पतन- बाढ़िक कछाछोप पानिमे चनमा द्वारा झोली मिसरक सन्दूकक वस्तु-जात निकालबाक प्रयास आ साँपक फेंच तानि ठाढ़ होएब, जेना कहि रहल हो- हम तोरासँ बेसी बिखाह नहि छी। उसांस- विधवा थानाबाली, ओकर बेटी डोली बेराम रहै। हवेली गेनाइ नागा कऽ देलक। मालिक दस सटका घैंच देलकै। फेर माए रोहुआ बुआरक मोनिमे अत्याचार आ कब्बै द्वारा ओकर कंठमे काँट पसारि ओकरा मारबाक खिस्सा डोलीकेँ सुनबै छै। डोली कहै छै, ऐ मालिक लेल कोनो कब्बै नहि छै? ओटघन- मालिक-मलकाइन आ मुसबा, जितिया पाबनिमे मुसबाकेँ छुट्टी नहि भेटलैक। जितबाहनक तेल, मलकाइनक बच्चाकेँ माथमे लठ-लठ करैत लागए आ मुसबा ओहि तेलक एक ठोपक आस लगेने रहए। आ सपनामे जखन ओकरा माए कहै छै जे किए एलें, ओतए मलकाइन सुच्चा दूधक पौरल दहीसँ औटघन करबितौ, तँ ओ कहैए जे चढ़ौआ तेल तँ ओहि सिमबक्शीक हाथसँ बहरएबे नहि कएलैक आ ओटघन ओ की कराओत? जागृति- एकटा कौआ राजपथक दुफेरापर बैसि रहल, सोझाँ दूधसँ नहाएल संसद भवन, दूधसँ नहाएल नवयुवती जेकाँ चमकैत। आ पारम्परिक कथा- कुकुरक कौआसँ गीत गएबा लेल कहब जे ओ रोटी ओकरा खएबाक मौका भेटए। मुदा कौआ रोटीकेँ चांगुरमे राखि कए बजैत अछि जे खोहमे रहि बाहरी दुनियाँक गीत कोना सुनबह। जाति- कामेश्वर बाबू आ सुगनी हुनकर घरमे काज करएबाली। शारीरिक संबंध दुनूमे। मुदा बहुत दिनुका बाद ओकर बेटी सरोसतियाकेँ कामेश्वर बाबू कामवशीभूत देखै छथि आ पुछै छथि तँ सुगनी कहै छन्हि जे हँ जुआन तँ ई भइए गेल अछि, मुदा सोचै छी जे कोन जातिक लड़का एकरा लेल ताकी, अपना जातिक वा अहाँक जातिक। महामंत्री- अर्थशास्त्रमे एम.ए.पास विनोदक कृषि राज्य मंत्री पाण्डेयजीक चक्रचालिमे फँसि अपन धनकुटियाक धंधा खराप करब आ पाण्डेयजी द्वारा आबंटित राशिकेँ ऊपरे-ऊपर हँसोथि जएबाक खिस्सा। एकोदिष्ट- मालिक बाबाक एकोदिष्ट। हुनकर जेठ बेटा मधु भाइ (तामसे मधुकंता कहै छथि)क नोतपर नहि अएलापर तामसे बिख छथि, हुनकर कार्यालयक व्यस्ततासँ हुनका कोनो मतलब नहि छन्हि आ कहै छथि जे सुनराकें एकर बदला नोत किएक नहि देल गेल। धरफड़ाइत अबैत मधु भाइ ई सुनि लै छथि...। भारत- गाँधीजीक मूर्तिक खसब आ सभक ओकरा श्रद्धासँ नमन कए बढ़ि जएब मुदा उठेबाक पलखति ककरो नहि। एकटा भिखमंगाक ओतए कम भीख भेटलाक बादो ओतहि भीख माँगब, एहि आशामे जे गाँधीबाबा उठताह तँ देशक दशा कहबन्हि। कृतज्ञता- सुस्मित, अक्षयवट आ राकेश जाइत रहए गप करैत। रामनारायण सिंह प्रोफेसरक कृपासँ नीक अंक भेटल रहै। फेर प्रोफेसर साहेब सेहो सूत्रधारकेँ भेटै छथिन्ह आ फेर नीक छत्ताक उपहारक बदला देल अंकक भेद खुजैए। विसंगति- सूत्रधार मेडिकल रिप्रेसेन्टेटिव छथि, नाथो बहिनकेँ पेट दर्द, तेजो काकाकेँ तिलकैत केसक इलाज आ अवधेश भाइ लेल भूखक गोटी.. मुदा सूबेलाल हरबाह, जकर बेटा सूत्रधारसँ पाँच बर्ख जेठ छथिन्ह, सूत्रधारकेँ मालिक कहै छथिन्ह। पेट खरापक दबाइ गोटी हुनका मुदा नहि चाही, कारण जतेक अन्न पचेबाक तागति छन्हि ततेक तँ अन्नो नहि जुड़ै छन्हि, भूख कम करबाक जे कोनो दबाइ होइ तँ से मँगै छथि। बोइन- जुगो मरर, ओकर कनियाँ धोरएबाली बिन बोइनक खेरही डेंगाबए किंकर बाबूक अंगनामे, बेटा लालमोहरा सेहो पेटेपर ओहि अंगनामे काज करए। सूत्रधारक मदतिसँ वृद्धा पेंशन भेटलै, मुदा जेकरा ओतए ओ काज करैए ओ जे दू दिन ओकरा काजसँ दौगत, से दू दिनुका बोइन नहि देत। फेर ब्लॉकमे जखन ओकरासँ बिनु पाइ लेने हाकिम कागच राखि लै छथि तँ ओकरा होइ छै जे काज नहि भेल कारण बिन बोइनक तँ गरीबे-गुरबा सभ ने काज कऽ सकैए। पहिचान- वृखोत्सर्ग श्राद्धक क्रममे दगलासँ बाछीक मृत्यु। अनुत्तरित- दीना बाबूक काम लिप्सा आ हुनकर हरबाहक बेटी बुधनीक कहब जे ई सलवार फराक पहिरने हम हुनकर बड़की दैया सन लगै छिअइ ? योग्यता- रफीक साहेबक स्कूल खोलब आ योग्यतामे युवतीक उमरि पूछब। कथा सशक्त नहि। उद्देश्य- मुख्यमंत्री द्वारा शिक्षामंत्रीपर परीक्षामे चोरिपर प्रतिबन्धक गप आ त्यागपत्र माँगब। बोध- राजाक नागराजक पत्नीक ढोढ़िया संग संभोग देखब आ नागराजक पत्नीक कहब, मिसिया भरि पुंसत्व, पहाड़ भरि कुलशीलसँ पैघ होइत छैक? मोल-जोल- पांकी रोड डालटनगंजमे भरत बाबूक माइक श्राद्ध आ दूध-तेल गिरै लेल कंटाहा ब्राह्मण द्वारा एक सए एकावन आ फेर आर पचास टाका भेटलोपर मोन उछितगर नहि होएबाक बाद एकटा ब्राह्मण भिखमंगा द्वारा ओहि टाकाक बदला दूध-तिल पीबाक ऑफर। मूल्य- लखन बाबूक निर्देशनमे मनोरमाक पी.एच.डी. करब आ लखन बाबूक प्रणय निवेदनपर उत्तर, जे जाहि आँखिए अहाँक एतेक महान छवि देखने छी, ताहि आँखिए अहाँकेँ नांगट कोना देखब? आस्था- गोदानक बदलामे पंडितजीक द्वारा आपतमे एगारह टाका दए तिल-कुश-जौ-अक्षतसँ उसगरबाक गपपर सूत्रधार द्वारा आशंका करबापर कहब जे ओ कोनो मनुक्ख थिकै... जानवर थिकै, जानवर। अंतिम अभिलाष- मदर दासक अंतिम इच्छा पुछलापर ओकर कहब मोन करैए.. जे अल्लू दम आ भात खाइ। सरोकार- फूलबाबूक मृत्यु आ तखने अमेरिकामे छपल कविताक एवजमे डॉलरमे पाइ आएब आ मदनेश्वर बाबूक पूछब- एकर कतेक टाका भारतमे भेटतैक? प्रतिबद्धता- रामशरणजीक भारतक गरीबी आ नारी-शोषणक ज्ञान विदेशी लेखकक किताब पढ़लासँ एतेक फरिच्छ छनि। ललिता एक माससँ हुनकर कामक वशीभूत अछि, मुदा फेमिनिज्म लए कऽ ओहि दिन जखन वार्तामे भेद खुजैए तँ ओकर दुत्कारलापर रामशरणजी फेमिनिज्मकेँ अल्हड़ छौड़ीकेँ रागतर दाबऽ वला हथियार कहै छथि। जोगाड़- कुमार गंधर्वक स्वर्गवासपर जे.एन.यू. कावेरी हॉस्टलक दू टा अखबारी समीक्षकक विवाद- ओहिमेसँ एकटा तहिए सँ आलेख लिखि रहल छल जहियासँ गंधर्व दुखित भेल छलाह, से ओ दोसरकेँ कविता लिखबा लेल कहै छन्हि। पिंडदान- चक्रधर बाबूक झिंगुर झाक माइक मृत्युक बाद जमीन लेने बिना पाइ नहि देबाक निर्णय आ अपन पितरक पिंडदान लेल गया जएबाक भोरक रातिक स्वप्न- जीबैतकेँ नहि उजाड़, मरल लोक तँ अपनहि बसि जाएत। लोरहा-बिच्छा: भूख- सूत्रधारक बाल्यकालक संगी रमकिसना। मुदा आब ओ चरबाही करैत अछि आ सूत्रधार छथि प्रोफेसर। होलीक दिन सूत्रधार द्वारा रंग देबाक प्रयासपर ओकर कहब- मैल-कुचैलमे रंग पकड़बे नहि करत। पेटक चाम चारि दिनसँ जरि रहल छै ओकर। महगी उन्मूलन- मणीन्द्र अपन पिता आ परिवार संगे पटियालाक सड़कपर जा रहल अछि- एक भाषा-भाषीकेँ छोड़ि कऽ सभकेँ मुड़ै-भाटा जेकाँ काटि देल जाइत अछि। मणीन्द्र बचि जाइत अछि, फेर फागुमे महामहिम लग लाशक रंगक बदला दुर्गन्धयुक्त पानिसँ होली खेलाए पहुँचैत अछि, कारण ई बेशी सस्ता छै। कसाइ- बिलट सिंहक जमीन चौकोड़ हेबामे सुरेनमाक जमीन पड़ै छै मुदा ओ तैयार नहि अछि।मारि पड़ै छै। दरोगा पाइ मँगै छै मुदा एस.पी.क ओहिठाम कहलाक बादो काज नहि होइ छै, कारण दरोगा ओकरा पाइ दऽ कऽ बहाल भेल अछि। दहेज- छोट बहिनक द्विरागमन आ ओकरा द्वारा एकटा सलाइ आ एक टीन मटिया तेल लेने बिना सासुर नहि जएबाक गप।पीढ़ीक द्वन्द- नियतिक चक्र आ साहेब राय आ रामदेव रायमे मतभिन्नता आ पिताक नाम रामदेवसँ चतुर्भुज राय कराएब। पहिने, आइ, आ काल्हि- गोनू बाबासँ सूत्रधारक प्रश्न आ ओ लाउर , चाउर आ रिभलबॉल लेल भूत, वर्तमान आ भविष्यमे लोक कानत से गप कहै छथि। प्रतिफल- विज्ञानक भारती-शरत सिद्धांतक प्रतिफल। बेटा कोना होअए, से बेटीक संख्यामे कमी भेल। आ आब स्त्री लेल युद्ध। उपराग- कामो झाक पहिल पत्नी दिबड़ावाली आ दोसर मुरलीवाली। मुरलीवालीकेँ एक बेटा आ तीन बेटी। ओकर बेटा निरंजनकेँ साँप डसि लेलकै, से शिवलिंगकेँ छूबि कऽ पूजा केलासँ आकि सौतिनक हक्कलि डइनपनासँ। कामोक पिता मुसाइ झाक पुतोहु दिबड़ावालीसँ अवैध संबंध। मुरलीबालीक मृत्युपर ओकर आगि देबा लेल ओकर बेटा इन्द्रदेवकेँ लोकसभक कहलापर मुरलीबाली रहस्य खोलै छथि जे अहाँ हुनकर बेटा नहि छिअनि वरन छिअन्हि दी...दीअर! कोउ काहू मगन- सूत्रधार आ संगबए लोकनि टहलैत छथि, तखने एकटा दसटकही सड़कपर चौधरीजीकेँ भेटै छन्हि, ककर ई पाइ हएत-एक ठाम खाधि कएलेपर दोसर ठाम ऊँच हेतैक ने ? ऋणखौक- नीलेश गरीब परिवारक, फेर पढ़लक-लिखलक तँ गामक लोक सभ पिताकेँ दवाबमे दऽ विवाह करा देलन्हि- कनियाँ तेहन जे पिताकेँ मारै छल। फेर नीलेशक दोसर जातिमे विवाह करबाक निर्णय आ पड़ोसीक कहब- ई ऋणखौक अछि, पितृऋण बिना उतारनहि मरत। कथा: शिक्षित मध्यवर्गमे मैथिली भाषा नवम वर्गसँ स्नातक-स्नातकोत्तर धरि मैथिलीकेँ भाषा वा मातृभाषाक रूपमे लेनिहार एहिसँ स्नेह करै छथि। अन्तर्जालपर मैथिलीक आगमनसँ सेहो मातृभाषासँ स्नेह फेरसँ जागल। मैथिलीक पोथीक सुगमतासँ नहि भेटब जाहिमे सरकारी संस्थाक मैथिली पाठ्यपुस्तक सम्मिलित अछि। एहिमे अन्तर्जाल द्वारा सीमित रूपमे हस्तक्षेप भेल अछि। आ एहि सभक परिणामक रूपमे मैथिली लेखकक भीतर हीन भावना (सुपीरियोरिटी कॉम्प्लेक्स सेहो हीन भावनाक रूप अछि) पैसि गेल आ साहित्य सोंगरपर ठाढ़ कएल जाए लागल। वाद-विवाद उत्पन्न कऽ आरोप-प्रत्यारोप आधारित साहित्यक चर्चा प्रारम्भ भेल। पति-पत्नी, जिला-जबार आ पिता-पुत्रक अपन पक्षमे वातावरण तैयार करब आरम्भ भेल। माने ब्लैकमेलिंग आ ब्लैक-मार्केटिंग द्वारा कथा-कविताक पुरस्कार लेल लिखल जाएब। मुदा बुकर आ नोबल साहित्य पुरस्कार प्राप्त साहित्य सेहो कालातीत नहि रहि पबैत अछि, बहुत रासकेँ तँ लोक मोन रखैत अछि मुदा ढेर रास विस्मृत भऽ जाइत छथि आ पाठक ओकर मूल्यांकन कऽ दैत छथि। मुदा मैथिलीमे खाढ़ीक-खाढ़ी बीति जाइत अछि मुदा पाठकक अभावमे पति-पत्नी, पिता-पुत्र, जिला-जबार आ आब कथाकार-कविक बनल गोल सभ एकर ब्लैकमेलिंगक आधारपर मूल्यांकन करैत अछि। अन्तर्जालक हस्तक्षेप सीमित रहलाक कारण नीक साहित्य, सृजनात्मक साहित्य आ कल्याणकारी साहित्य सोझाँ नहि आबि पाबि रहल अछि, नहि सृजित कएल जा रहल अछि। विवाद कऽ समाचारमे रहएबला कवि-कथाकारकेँ अहाँ प्रश्रय देब कारण ओ ब्लैकमेलिंग कऽ रहल छथि वा धूरा-गर्दामे रहनिहार मानवतावादी कवि-कथाकारकेँ। आ जखन से करब तखने निरर्थक देखाएबला मैथिली साहित्यमे प्राणवायु भरि पाएब। नचिकेताक मध्यमपुरुष एकवचन गद्यसँ पद्य एहि अर्थे फराक होइत अछि जे एहिमे बिम्बक माध्यमसँ कम शब्दमे बेशी गप कहल जएबाक गुंजाएश रहैत अछि। तेँ पद्यकेँ समयाभावमे शुरू कएल गद्यक विकल्पक रूपमे देखब सम्भव नहि, ओना तेहनो उदाहरण भेटत। पद्य छन्दबद्ध होअए वा छन्द-लय विहीन, जे ओहिमे गुणवत्ता अछि तँ प्रभावित करबे टा करत। सीलिंगसँ जमीन बचेबा लेल वामपंथ वा दक्षिणपंथक प्रयोग लोक द्वारा होइत अछि। मुदा सीलिंगमे पड़ल साहित्यक लेल वामपंथ वा दक्षिणपंथक प्रयोग, छंदबद्धता-लयबद्धताक आग्रह वा अनाग्रह गोलौसीक विस्तार मात्र अछि। आ एहि मध्य नचिकेताक तैंतीस टा कविताक संकलन अछि मध्यमपुरुष एकवचन। एहिमे कवि जखन विरोध समुद्रसँ मे तोहर आ हमर बीचमे जे समुद्र अछि, जकर तटपर, ओकर परिणामपर क्यो कानि रहल अछि, बीचमे माछ आ चीलक झुण्ड आ एहि मध्य ज्वार सभक टीककेँ धेने छथि वरुणदेव, सोचैत जे प्रेमकेँ जीतए देताह आकि समुद्रकेँ, कहै छथि आ फेर वरुणदेवक ज्वारक टीककेँ धरब, चित्र सोझाँ अबैत अछि। ऋतु-विशेष पृथ्वीपर- मे प्रेमक ऋतु विशेष, जकर प्रारम्भेमे बरखा मासक बुन्न सुखाए लगैत अछि। शब्द लेल जाल लेने आ शब्द करैत अछि आत्मसमर्पण कविताक संन्यासमे। आ फेर घुरैत नदी कछेर- भोरुका मंत्रक उच्चारण लेल जे जलकेँ बनबैत अछि अकास। बंजर देशक बरसातिक देव जे अकासोकेँ कना सकै छै बेहिसाब। भूतक नाचब लाठी बजारि-बजारि आ तरुण राजकुमारक देखब साम्यवादक स्वप्न-फुक्का उड़ाय अकासमे। शब्दसँ समझौता आ सभ आहक डूमब शब्दक चीत्कारमे। फेर आह्वान अकाससँ, कानू भोकारि पारि, जाहि वज्रपातक शब्दसँ विश्वास हएत जे साओन अएल अछि पृथ्वीपर। आ आकांक्षा, छूबि कपारक टपकैत बुन्नक सङे आ अपन लिखल पाँति पढ़बाक। पछिला बेरक हुनकर अपूर्ण कएल कार्य। आ यैह छी ऋतुविशेष- मोन पाड़ब हुनका। तों- मे वाक्यक हकमैत पैसब, धीपल हाथक धरब, धधकल आगि हमर, एहिमे हम तोँ, कल्पतरुक डारि, बाकी सभ छुच्छ आ बुढ़िया नानीक कोनो खिस्सा। आ दशोदिशा पकैत ताहिमे- भ्रान्ति-पथ(भ्रमित!)। नौ मासक गर्वक, गर्भक दीर्घप्रहर। पाँचम ऋतु (!) छठम रिपु(!)- राग सेहो विलम्बित, द्रुत ताल (त्रस्त) आ भानु अस्तमित। रातुक आ दिनक कथा- मे सूतल दुनियाँ केँ छोड़ि बुद्ध बहार होइत छथि घरसँ मुदा कविक प्रयाण कविताक भीतर- कानूनी अनुबन्धक अन्तर्गत बान्हल विवाह- विधि-प्रसव वेदनाक बाहर। कविताक भीतर छंदहीन, वर्णहीन भाँगल ग्रंथि, उघरल सिलाइ, सूचीकर्म, मर्ममे झरैत बिन्दु आ एकटा मैल मोटिया तौनी जकाँ करैत अछि झँपबाक प्रयत्न हमर शरीरकेँ (भीतरसँ उगैत अस्थिरता) अव्यवहृत आ जखन भूख, व्यथा-विच्छेदक कथा। ठाढ़ होइत देखबा लेल यौनता परसैत जएत जखन, बनि सघन छत्तीसो व्यंजन तोहर भानसमे। मुदा हमर सक- मात्र कवितेक भीतरक संधान, द्वयर्थबोध पूर्ण अछि जे, सूक्ष्म तर्क तकर, ताल-लयसँ गलल। प्राकृत-यकृतमे ठूसल, महायोनि-लिंगबोध लदने जाहि शरीरपर। यैह टा सीखल उपाय- तोहर सपना देखैत रहब अनुखन। आ दुनियाँक जगलापर सूतब तोहर संग- हमर हे कविता कालरात्रि करबेटा करत, दूर करह व्यथा-विच्छेद, भूख-भय। एखने झलकि उठल उखा-किरण तेँ, आकांक्षाक आशा सन। चक्रान्त- मे अकासमे हेलैत अक्षरक मिजाज-तिक्त लहराबैत आगिक प्रवाह, ओकरा बुझाओत कविक दोख नहि। दुनियाँक चक्रक अन्त। मात्राक हुनका लग अएबाक कोनो आस-! ने हुनक कविता सजि सकती शब्द बनि बरसबाक लेल पहिनहि जेकाँ। दमयंतीकेँ उपदेश- मे तीर लग लोकक पथरल (!) पड़ल रहब। - बिना अंगक- अशक्त लोक। घास पात तकरा सभकेँ धेने आ सेमारमे सन्हिआयल-ओझरायल तक्षक। बसातमे डोलब आ झोंझमे झोंकाह आगिक सुनगब। दमयन्ती, दमयन्ती -सुन्न बोन। फूल-पातक बीचमे टुअर सुरुज(!), टुघड़ैत आ सावधानीसँ चिरैत हिरण्यक पेट, तैंतीस टा मूह, कुरुप, गाछ सभक एम्हर जाऊक उपदेश। दमयन्ती, जंगलपार नहि होऊ। अन्हारमे ईशान दिशामे देहक दलाल प्रतीक्षारत। दमयन्ती, समय। नैऋत कोणमे नुकएल नलदेव। गाछ-बिरीछक जानब-कविताक आगमन कोना होइत अछि। जानलक इतिहास, मनुक्खक निष्ठुरता। कोना महावन निर्विचार, उजार, उच्छन्न भेल। पोसुआ (!) गाछ बिसरल भाषा। दमयन्तीकेँ चेतौनी-मनुष्यपर विश्वास नहि करू, कथा-कविता-अफवाहसँ बान्हत ओ। नहि पार करू बोन। आ से भेने सभ टा गाछ लिखत दमयन्तीकेँ लऽ कऽ पहिल कविता। प्रश्नावली- मे अचल अन्तिम राति यैह? गीतक अंतिम पाँति यैह? आ हमर कविता पढ़ि सकै छी? हमर अंतिम दिवस यैह? किछु करबाक आब विवशता (!) तन भ्रमित, कोन दरिद्र (तत्क्षण अनुभूति) की? सूति सहल रहल की? हमर आखरक भवितव्य? अशान्त भ्रमर मनक विहंगम, अजर प्रेमक धार सन। भीतर उगैत शब्द- मे शब्दक ध्वनि तेहन सन जेना गुफामे बैसि केओ कानि रहल। पहाड़क शिखरक ठहाका। दबले पएर अएबाक आहटि, लिफाफ खोलबाक अबाज। पत्रक सभटा पाँतिसँ खदबद करैत शब्द। आ बहिनक बहैत नोर देरीसँ बूझब। वाक्यक भसियायब, शेष आकि समास नहि बनब, मोशकिलसँ बूझब टूटल रीढ़क हड्डीक मर्मर मुदा कठुआएल कविकेँ घिसिअबैत कंठ पकड़ि। कवितामे मुदा सुनल-गमल-बुझल वस्तुक आभाष बनि अएब। अपनहि भीतरसँ बहरएल मुदा एहि शब्द सभकेँ परिवर्तन करबाक अधिकार कविकेँ सेहो नहि। मात्र चुम्बन प्रेमक मैथुनक अधिकार। मुदा मन्थन ग्रन्थनक आ नहि कोनो घृणा क्रोधक अधिकार। आ तकरा सजा सकैत छी फूल-पातसँ, वेणी गूहि सकै छी रातुक पहर। सेउंथ चमका सकै छी पहिल सुरुजक लालीसँ, गराक सिङरहार, उष्म वृक्षक वल्कल शब्द शरीरपर घटित भेल तथ्यक सन्मान।–ई कविता कवि इलारानी सिंहकेँ कवि द्वारा समर्पित छन्हि। जानल-पहिचानल- मे शरीरकेँ पन्नाक-पन्ना पढ़ब आ जीवनक लागब जानल पहिचानल। तह आ गह्वरक गीत आ कवि द्वारीए कहब - हुनकर विश्वास हमर शब्दपर सँ हटब। आ मात्र स्पर्शक भाषा- एकटा ग्रामीण अनुभूति व्युत्पत्ति नहि दऽ सकैत अछि केओ, तकरा जीबै छी। समार्थपद- सपनाक नहि बाजब, बजैत तँ अहाँक सभटा नाम सुनबैत, कविक अनुमान। शब्द-ने धातुमे दुर्बलता ने उपसर्ग-प्रत्ययक अभाव। नहि तँ उचरि सकैत प्रतिशब्द (चलि गेल छथि अश्वखुरक संगे अश्रव्य दर्शनक भाषा अछि तकर)। आ ताहि लेल नव अमरकोष, नव कविता लिखए पड़त। अंकुर- चारि टा कविताक बीआक मोनमे उगब आ ताहिमे प्रेमक शब्दक लिखब। आ ओकरा तेहन प्रश्नमे ने ओझरा दियौक जकर उत्तर हमरो बूझल नहि अछि। सुनैत गप्प अपनहि एक्के संग चारि-चारि टा कविकेँ बाँटि देने शब्द सम्पदा। आ तैयो एहि चारूकेँ मिलाकऽ गाएब आ प्रेमक आंकुरक उगब। कत्ते बरसक बाद- मे ठाढ़ अहाँ सबहक अंगनापर एकटा कविता पढ़ऽ देब, नेनपनेमे भगा देने छलहुँ, छंदभंगक जुर्माना (!) छल। आ ताहिमे आन चीजक संग रहथि दुखी दाइ, छठिक नहि कोनो जोगार, सालक मात्र चारिटा मासक अन्न-भुटकल अनोन अल्हुआ त्राता। हमरा एगो कविता पढ़ऽ देब। किऐ नहि लिखै छी?- पूर्ण विराम। नहि आब एको पाँति अहाँक नाम। कथी ले ई जिद्द जे लिखबे करी प्रेम पत्र, अनकर बनायल अक्षरमे। चढ़ा कऽ रंग, अर्थ, वस्त्र, व्याकुलता। सुखाइत ठोर, तरबापर खेलाइत आंगुरक भाषा, अद्भुत अन्तर्देशी शब्द सभ आ तकर विन्यास। तखन पत्र नहि लिखबाक नहि देब उपराग। राजहंस- कविताक राजहंस, शरीरसँ अहाँक दूर चलि लैक दू डेग। उल्कापात आदिक द्वारे अवकास नहि भेटल अछि ओकरा। आ शरीरो तोहर बेबहार नहि भेल छौक। ओकरा कहबै एक बेर उड़बा लेल तोरा संग। जाधरि सहि सकत तोहर ओजन। नोरक बुन्न कविक उपमा नुकायल जे आँचर तर तरबापर कहबै राजहंसकेँ राखि दै जिज्ञासा युवती जे बनि गेलै। अन्हेर- चिड़ै कहलकन्हि, नहि बाजू किछुओ गोपनीय, नहि तँ अन्हेर भऽ जएत। काल्हि रातुक पहर कविता आयल छली आ हेरा गेली गद्यक भीड़मे। आ गोपनीय इतिहास पाप प्रणयसँ परिणय धरिक दूरी आ एहने सन। किऐक घबड़ाइत छी। क्यो नहि पूछत अहाँक नाम। नहि पूछत, चिड़ै बता की जनै छलेँ कवि दऽ जकर कबर एखनहि खोधल गेल अछि। एक अहीं छी- कएक बेर अहाँकेँ बजा कऽ देखने छी कवितामे। मुदा घुरियो कऽ नहि देखै छी अहाँ। मामूली प्रेमक दस्तावेज नहि जाहिमे लाभ-हानिक हिसाब रहत लिखल। ने साधारण निमंत्रण ने मामूली लोकक भोज्य वस्तु। अहाँकेँ कवितामे एकटा नाम देने छी जे चिड़ै चुनमुन उचरि सकै छल। एहन नहि जकरापर सनसनाइत कथा बनि सकत। मुदा अहाँ किछु बजिते ने छी। पुरातन प्रेम- माँगि रहल गीतक दाम। करैत प्रश्न-उत्तर (मुदा प्रकृतिक पाठशालामे कत्तऽ तकर गुंजाइश?) सीमित पुरातन प्रेम, पाठ्यपुस्तकसँ इतिहासक पाठ धरि। पुछैए प्रश्न-पुरनका शब्दक वाक्यमे प्रयोग। सभटा वाक्य सत्य अछि वा फूसि। भावार्थ कहू...। मुदा आब हम भेलहुँ चलाक।..पढ़ि सकै छी मन्दाक्रान्ता छन्दक व्यथा। नापि सकै छी शुद्ध धैवत् क पातिव्रत्य। हमर शोणित चीन्हि गेल अछि जीवन-गणितक बर्बरताकेँ ठीके। कम बजै छी, बजबो करै छी तँ भूतकाल दऽ नहि अनाहत-अनागत प्रेतकाल दिस। अकथित-अनूदित अनुभूति दिस बढ़ैत दर्शन हमर। मलिछाह कऽ देलक, केतारी खेतक अढ़, भुतिआएल माल-जाल आ पुरनका प्रेम। चाह- जे हमरा किछु चाही, आ हमरा चाहबे की करी। अहाँ अनन्त, विशेषणसँ हटिकऽ, हमर मोनक गप पूर करब तत्क्षण। आ जे हम चाहब तावत् प्रत्यय एहि प्रपंचक, हमर जिनगी सुप्तिङन्तम्, आ बान्हल पदबन्ध , घटल निघण्टु। दऽ सकै छी ह्रस्व, अति ह्रस्व, ओंकार ऋचा आकार। हमर छोट मोट आकांक्षा, भाषा भावना वेदना अनियमित, इमन-कल्याणक गमक नियंत्रित। हमर पतिक लेल-१- अहाँक घरक चारमे भेल भूर, कठोर सर्द वायु सेरा देलक माड़ आ अकासी नोर हमर अल्हुआकेँ झोरा देलक। भीजल ओछैन, अहाँ निस्बद्ध, ई भूर करत खतम अहाँकेँ। आ ताहि विनाशक गीतो तँ लिखू अपन हाथेँ। हमर पतिक लेल-२- ओ कहै छथि हमर स्थान हुनकर माथपर, मुदा नहि रहब हतकेशी शिखा संग। हृदयमे, नहि रहबाक श्वासयंत्र संगे। आँखिमे, नहि रहबाक चश्माक तरक नोरक संग। ठोढ़पर, नहि बनबाक पूजाक जप मोती। जीहपर (भानसक स्वाद द्वारे!), हँ ठीके, मुदा एहिसँ बहार होएबाक गर। पएरक जुत्ता तर, पृथ्वीपर, राजनीति बुझै छी। कोना जुत्ता पएर तरसँ चढ़ि अबै छै माथपर। से जहिया बुझि जएब तँ भेटि जएत प्रतिवादक पहिल सबक। हमर पतिक लेल-३- नहि पुछू व्याकरणक, लिपिक मादेँ। एहि कविताक ! की करू आगिमे फेकि दी हम, नहि कहू ई सभ। निरक्षर छी तेँ की। जादू-छड़ी छी घुमा सकैत। हमरापर जे कियो लिखत कविता आ हमर चित्तपर व्याकरण तँ कोन आश्चर्य? नहि कहब एकरा छद्माडंबर! हिसाब- पाँच टा शब्द हिरिया दै छै झौलीकेँ भोरमे बाउग करऽ जाइत काल। अनोन अल्हुआ संग खाइत एकटा गेल, आध टा खर्च भेल जखन भुसहु बाबू बरखामे पीपरतर देह बचबैत ओकरा तीन लात दैत छथि। बचल डेढ़, आ डेढ़ टा बान्हल अछि राखल चमरटोलीमे चुहड़ाक ठेकापर उधारक माल पीबाक काल। आ शेष शब्द (सात गुना चौदह गो शब्द!) ओ राखैए हाटमे वस्तुजात किनबाक लेल। साँझ धरि बचलै नहि एकोटा शब्द हिरियाक करेजपर रखबा लेल आ तखन बिनु शब्दक हिरिया कोना खोलत करेज, रहि जाइत अछि ठाढ़ ओस तर, भरि राति, अङनेमे। आत्मकथन- अहाँकेँ अपन मोनक विषयमे किछु बताबी, कपालकुंडल। मुदा हड़ताली बोनिहार जन-नेताक लेल ठाढ़ कएल गेलि गितहारि..। मदारी पढ़ैत हमरे कविता आ हम फराक डाँड़मे रस्सी पहिरने। तखन कविताक अतिरिक्त किछु गप करी। मुदा ने कोनो रस, ने शब्द, ने प्रहार कोनो बचल। ने हमर कोनो एहन नामे, बड्ड गद्यमय जीवन! चलू गद्यक चहरदेबारीक बाहरक किछु प्रश्न- कोन पुरुषक वचनमे ओझराएल, काल-कारकमे ओझरल अरण्यमे। अव्ययक विनाश, विशेषणक उघारब परिधेय आ विशेष्यक सिंहासनसँ उतारब। उपसर्ग देखि मनक भाव बुझबाक सामर्थ्य बला अछि कियो ? बान्हल पौरुषक जटाजालमे पाणिनी अहाँक पाणि। आ करताह चित्कार महेश्वर सूत्रमे जे हम अहाँसँ किछु बाजी। आ पतंजलि आ हेमचन्द्र द्वारा कविकेँ दबारब बुझाएब मध्यमपुरुष एकवचन । त्वम्, त्वाम्, त्वया, तुभ्यम्, त्वत्, तव, त्वयि । कपालकुंडले, मनसिसँ जतएसँ सभ निअम/ वर्ग/ लक्ष्य विहीन आ अहाँ मध्यमे मात्र एकवचन। अहीं सँ प्रेम, घृणा अहीं सँ- अहीं सँ प्रेम, घृणा (अहीं) सँ- अन्तिम सत्यक दिन, दिअ फाँसी तखन नहि सुनि सकब हमरा। हमरा गीरि लेब ताहिसँ पहिने फेकि देब अहाँकेँ। दीप सभ अहाँ लगसँ हटा देने छी। प्रेम करै छी, मुदा घृणा आर बेशी। आँखि, हाथ, दुनु ठोरक अन्त कएल। मुद तैयो अहाँक हँसी अनृत शब्द बनेलक बरफ हमर दर्शनकेँ, आ फेरसँ नस-नस चलब हुनकर। कनी टा जगह छोड़ि दियह- एहि कोनमे छोड़ि दिअ, आखरक ढेरक नीचाँ हमर अभिलाषा। हमरे लिखने छलियै, अहींकेँ लऽ कऽ करऽ लेल कविता ! जगह चाही, कारण तीनटा पएर कविक, एककेँ पशुतासँ मढ़ने छी, दोसरकाक नोकमे अछि रोशनाइ सुखाएल आ तेसर नकली हृदय। जे चाही हमरे सन कवि तँ कनेक जगह छोड़ि दिअ। भय-१- अथर्व कवि। पोथी ने चोरि भऽ जाए। तखन भरिसक कविता तँ दोसराक नामे रहि जाए मुदा कवि छूटि जएत इतिहाससँ। हमरा पोसबा लेल सेहो खरचा, हमर चिता सजेबा लेल सेहो तरद्दुत (गहन मंत्रसँ सजौलहुँ), हमर कविता कुपितापर लिखए पड़ल हैत कत्ते टा इतिहास! भय-२- आबि गेल चलक ऐब, आब ककरहुँसँ डर नहि। कारण बुझल भऽ गेल हेलबाक आ अधमतम होएबाक कला ! अश्रव्य शब्दसँ शशक उलूकक जागब आ अस्पृश्य बालाक स्पर्शसँ भूखक जागब? आ बुझि गेल छी विनष्ट होएबाक कला! आब अदन्त नहि रहलहुँ- दाँतक जोड़ा आबि गेल अछि! कठिन शब्द, शीतल स्तन, बृहत् वाक्य, कोमल रचना, विभीषण भाष्य आ बिखरल पाठ, अर्थ अनर्थक भावेँ विह्वल। नामकरण- चानकेँ चन्द्रमा, तरेगणकेँ निहारिका नाम दए रातुक अर्थे बदलि गेल! इजोतकेँ प्रत्युष आ सुरुजकेँ मार्तण्ड्य कहबासँ आँखिक चोन्हिआयब। जंगलकेँ उपवन आ घास-फूसकेँ दूर्वाक्षत कहने आबि गेल मंत्रक उच्चारण अपनहि। अथक खटनीकेँ निरलस प्रयास आ बेजोड़ शब्दक जोड़ीकेँ समास कहने टूटल भाङल करेज सेराय गेल! जीवन मात्र जीवितक, आ मात्र हमर अहाँक जे केओ रूप बदलि कऽ जी रहल छी, प्रतिपदा-प्रतिपदाक बदलैत राशिफल आ गणितक भरोसे। नाम हमर दुष्यन्त आ अहाँक शकुन्तला भेने कण्व आ मृगशिशुक फिकिर लागल रहत। आजुक कवि, बड़ उच्छृंखल कवि- आन्हल बान्हल, छंद निश्छंदक डोरीमे, फंसल फँसल, घायल आ घसल, अलंकारक व्यंजनमे रहू दहू, पकैत ढकैत, जुनि टपू पहाड़ दहाड़। धैवत रहू गबैत। कवि। अपन पंक्ति भऽ, जाइक पार! कवियारक ड्योढ़ीमे। आबि रहल छथि कविः कवी कवयः- धुन आधुनिक। कविता केँ जे करता छंदित बंधित आ वंदित सोचक आलोचक। रहए देता कविताकेँ आधा कविता अर्द्ध-अकविता, अर्द्धनारीश्वर अर्ध-पुरुषपर। बड़ उच्छृंखल ई आजुक कविवर हतनारीश्वर! अहाँ नहि बजलहुँ किछु- नहि बजलहुँ आइ धरि, दबा कऽ रखने छी शब्द-संपदा जमीन तर। मुदा जमीनक तर तँ गाड़ल जाइछ मुर्दा। मुदा हम तँ धर्मोन्माद हिन्दू प्रेमी छी, मरियो कऽ जमीन तर नहि जएब, जरब झरकब आ आगिमे भणब अपन गीत। नह केश हैत विलीन, कोन अनुशासन शास्त्र सिखेने अछि अनुभूतिपर लगाम लगायब- देह रहू झँपने अहंकार अलंकार तर, लगा दियौ ताला गरापर जे कोनो ध्वनि नहि बजा जाइक। मुदा हम सूर्यवंशी राजपूत, हमर अस्त्र अछि शब्द अर्थ स्वर लिपि। तर्कमे हारि जँ जाइ तँ करब आत्मसमर्पण! मुदा हारी वा जीती, बाजब अवश्ये। आलोकक यंत्र बेकल पड़ल, लाल-हरियर-पीयरक संकेत मूक। मोनमे हुलकी दऽ देखि रहल छी अहाँक योजना, वस्त्र-अस्त्र हरबाक, अर्द्धसत्यसँ अनृत बजएबाक, पाँतिमे बैसि अमृत चोरएबाक; द्योतक दावमे चढ़ल जिनगी शव शब्द! मुदा एखनो भरोस जे अहाँ बाजब किछु नहि तँ गाबिये उठब हमरे कोनो गीत। अपन कविता सुनाउ !- अहाँ अपन पुरातन प्रेमी माने हमरा लऽ गेलहुँ ओहि नवका मकानमे पहाड़क शिखरपर! अहाँक बाट पूछब मेघसँ ओहि ठामक, आ ओकर वंकिम मुस्कान, अहाँ सङे हमरा देखि! मुदा ने मेघक, ने तरेगणक, ने राशि-लग्न-अकासी ज्यामिति आ ने भाग्यक गणितक संक्रमणक कोनो गलती, जे सभ मिलि कएने रहए विच्छेदक संक्रमण ! अंतिम मिलन जे भेल छल चानक गह्वरमे। ने पाथरक दोष आ ने अन्हारक भूगोलक। सूर्य आ पृथ्वीक संकेत, तरेगणक हस्ताक्षर विच्छेदक भएकेँ मिलि कऽ कएलक चक्रान्त। जाहिसँ हम सभ नहि बाजि सकी कोनो स्मरणीय पाँति-शब्द सभ !-दुनू गोटे। गरा दबबैत निःशब्दता। मुदा दोष ने निःशब्दताक आ ने देबारपर लिखल शिलालेखक, जकर विजातीय अक्षर सभ हम पढ़ऽ सिखनहि नहि छलहुँ। गह्वर भरि गेल अहाँक कवितासँ, ऊपर उठैत कविताक पाँती सभ जकर शिखरपर चढ़बाक असफल प्रयास। ओहि पाँती सभकेँ दोषै नहि छी। विश्वासघातपर अहीं टाक अधिकार नहि। आब सीखि गेल छी अहींक भाषा, कामनासँ धधकैत पहाड़पर चढ़बा लेल, पढ़ै लेल सभटा पाँति, कविता आ शिलालेख! हम सीखि गेल छी अहाँक हस्ताक्षर पढ़ब। मुदा एहि शिलालेखपर अहाँ देखा रहल छी पजेबा, काठ, बालु आ सीमेंटक राशि, दरबज्जा, कब्जा आ फर्श सभ! मुदा हम सुनऽ चाहै छी कैक टा कविता, अहाँसँ अहाँक भाषामे, जे एखन हमरहु भाषा अछि। जीवनी- छावनीक द्रोह, तांतिया टोपे, विक्टोरिया, सरकारी कवि रवीन्द्रनाथक जन्म आ विधवा विवाहक चर्च? रंगमंचक पहिल पृष्ठ, हेराशिम लेबेडफपर एकटा पूरा पन्ना कीड़ा चाटि लेलक? मुदा आजुक रंगमंचक पुरोधाक लेल जे ओ पृष्ठ नहियो भेटै तँ हर्ज नहि। ओकर दोसर दिसुका पृष्ठपर माइकल मधुसूदनपर एकटा लेख आ आधुनिक कविताक श्रीगणेशपर सेहो, मुदा १९९० ई.क बादक अनपढ़ कवि कोना जनबै गऽ! आ तेँ ने पटि जाइ छी हमरा सन बहुरुपियासँ। आ १९५१ ई.एहि शताब्दीक सरकारी कविक जन्म, नेनपनक दलिद्दर दशा, अवहेलना शिशुकालक, विवेकानन्दक फूसि-कथा आ स्तोकवाणी? हमर कथासँ पहिने गिरीश घोष, सर आशुतोष आ नेताजीक पलायन आ महात्माक कारावास अएबाक चाही ? फूसि। कारण इतिहास शुरू होइछ गोडसेक आविर्भाव आ हमर जन्मक बादे? आ तखन टूटल भाङल भूगोल, हड़पक गणित आ शास्त्रीय वर्णभेद, “वेदणाक” मूर्धा। ह्रिजय ठीक करू? –अहाँ हमर सरकारी जीवनीकार ! अहाँक लेल अध्यायक अध्याय प्रारम्भ होएबाक चाही १९५१ ई.सँ। हमर विमाता कुल पितामही। मनगढ़ंत कथा, दादी-माँ दऽ, जे भऽ जाइ छली सोनबरसाक राजकन्या। कोना कविता अएलीह आ हमर जीवनमे आयलि रमणीक मादेँ? त्यागि रहल छी, ताकू आने ककरहु। अजन्मा वा अज्ञात् अनामा क्यो कवि। तावत् कविते हमर ध्यान रखती, बतओतीह जीवन-कथा हमर! मध्यमपुरुष एकवचन- अहाँकेँ छोड़ि अनके दऽ सोची -एहन आदेश ! मुदा गाछ-बृच्छ, फूल पाथरक वंचकता, विश्वासघाती व्याकरण धरि जाल पसारने ! मध्यमपुरुष एकवचन अहाँ तँ छी! राजनीति, देशक ऋणक पहाड़, भ्रष्ट नियुक्ति.. मध्यमपुरुष एकवचन अहाँ तँ छी मुदा..लिखू नव्यन्याय-अन्याय, लिखू वैशेषिकक ढेरी, बिसरू धन-व्याकरण, मध्यमपुरुष एकवचन अहीं तँ छी मुदा..बेकार शृंगार रस तत्त्व ध्वनिक, मात्र क्षणिक। आयु लऽ जटायु धरि, बचबै लेल अनकर सीता, गीता । चलति चलतः चलंती कविता ऋता वाग्धारा सन व्याकरण मध्यमपुरुष एकवचन अहाँ तँ छी मुदा... कोना किछु सोचि सकै छी अहाँकेँ छोड़ि? कविता: कविता लोक कम पढ़ैत अछि। संस्कृतसन भाषाक प्रचार-प्रसार लेल कएल जा रहल प्रयास, सम्भाषण-शिविरमे सरल संस्कृतक प्रयोग होइत अछि। कथा-उपन्यासक आधुनिक भाषा सभसँ संस्कृतमे अनुवाद होइत अछि मुदा कविता ओहि प्रक्रियामे बारल रहैत अछि। कारण कविता कियो नहि पढ़ैत अछि आ जाहि भाषा लेल शिविर लगेबाक आवश्यकता भऽ गेल अछि, ताहि भाषामे कविताक अनुवाद ऊर्जाक अनर्गल प्रयोग मानल जाइत अछि। मैथिलीमे स्थिति एहन सन भऽ गेल अछि, जे गाम आइ खतम भऽ जाए तँ एहि भाषाक बाजएबलाक संख्या बड्ड न्यून भऽ जएत। लोक सेमीनार आ बैसकीमे मात्र मैथिलीमे बजताह। मैथिली-उच्चारण लेल शिविर लगेबाक आवश्यकता तँ अनुभूत भइए रहल अछि। तँ एहि स्थितिमे मैथिलीमे कविता लिखबाक की आवश्यकता आ औचित्य ? समयाभावमे कविता लिखै छी, एहि गपपर जोर देलासँ ई स्थिति आर भयावह भऽ सोझाँ अबैत अछि। एहना स्थितिमे आस-पड़ोसक घटनाक्रम, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा, आक्षेप आ यात्रा-विवरणी यैह मैथिली कविताक विषय-वस्तु बनि गेल अछि। मुदा एहि सभ लेल गद्यक प्रयोग किएक नहि ? कथाक नाट्य-रूपान्तरण रंगमंच लेल कएल जाइत अछि मुदा गद्यक कवितामे रूपान्तरण कोन उद्देश्यसँ। समयाभावमे लिखल जा रहल एहि तरहक कविता सभक पाठक छथि गोलौसी केनिहार समीक्षक लोकनि आ स्वयं आमुखक माध्यमसँ अपन कविताक नीक समीक्षा केनिहार गद्यसँ पद्यमे रूपान्तरकार महाकवि लोकनि ! पद्य सर्जनाक मोल के बूझत ! व्यक्तिगत लौकिक अनुभव जे गहींर धरि नहि उतरत तँ से तुकान्त रहला उपरान्तो उत्कृष्ट कविता नहि बनि सकत। पारलौकिक चिन्तन कतबो अमूर्त रहत आ जे ओ लौकिकसँ नहि मिलत तँ ओ सेहो अतुकान्त वा गोलौसी आ वादक सोंगरक अछैतहुँ सिहरा नहि सकत। मनुक्खक आवश्यक अछि भोजन, वस्त्र आ आवास। आ तकर बाद पारलौकिक चिन्तन। जखन बुद्ध ई पुछै छथि जे ई सभ उत्सवमे भाग लेनिहार सभ सेहो मृत्युक अवश्यंभाविताकेँ जनै छथि? आ से जे जनै छथि तखन कोना उत्सवमे भाग लऽ रहल छथि। से आधुनिक मैथिली कवि जखन अपन भाषा-संस्कृतिक आ आर्थिक आधारक आधार अपना पएरसँ नीचाँसँ विलुप्त देखै छथि आ तखनहु आँखि मूनि कऽ ओहि सत्यताकेँ नहि मानैत छथि, तखन जे देश-विदेशक घटनाक्रमक वाद कवितामे घोसियाबए चाहै छथि, देशज दलित समाज लेल जे ओ उपकरि कऽ लिखऽ चाहै छथि, उपकार करऽ चाहै छथि, तँ ताहिमे धार नहि आबि पबै अछि। मुदा जखन राजदेव मंडल कविता लिखै छथि- .... टप-टप चुबैत खूनक बून सँ धरती भऽ रहल स्नात पूछि रहल अछि चिड़ै अपना मन सँ ई बात आबऽ बाला ई कारी आ भारी राति कि नहि बाँचत हमर जाति...? तँ से हमरा सभकेँ सिहरा दैत अछि। कविक कवित्वक जाति, ओहि चिड़ैक जाति आकि..। कोन गोलौसी आ आत्ममुग्ध आमुखक दरकार छै एहि कविताकेँ। कोन गोलौसीक आ पंथक सोंगर चाही एहि सम्वेदनाकेँ। तँ कविताकेँ उत्कृष्टता चाही। भाषा-संस्कृतिक आधार चाही। ओकरा खाली आयातित विषय-वस्तु नहि चाही, जे ओकरापर उपकार करबाक दृष्टिएँ आनल गेल छै। ओकरा आयातित सम्वेदना सेहो नहि चाही जे ओकर पएरक नीचासँ विलुप्त भाषा-संस्कृति आ आर्थिक आधारकेँ तकबाक उपरझपकी उपकृत प्रयास मात्र होअए। नीक कविता कोनो विषयपर लिखल जा सकैत अछि। बुद्धक मानवक भविष्यक चिन्ताकेँ लऽ कए, असञ्जाति मनकेँ सम्बल देबा लेल सेहो, नहि तँ लोक प्रवचनमे ढ़ोंगी बाबा लेल जाइते रहताह। समाजक भाषा-संस्कृति आ आर्थिक आधारक लेल सेहो, नहि तँ मैथिली लेल शिविर लगाबए पड़त। बिम्बक संप्रेषणीयता सेहो आवश्यक, नहि तँ कवि लेल पहिनेसँ वातावरण बनाबए पड़त आ हुनकर कविताक लेल मंचक ओरिआओन करए पड़त, हुनकर शब्दावली आ वादक लेल शिविर लगा कऽ प्रशिक्षण देल जएबाक आवश्यकता अनुभूत कएल जएत आ से कवि लोकनि कइयो रहल छथि ! मिथिलाक भाषाक कोमल आरोह-अवरोह, एतुक्का सर्वहारा वर्गक सर्वगुणसंपन्नता, संगहि एतुक्का रहन-सहन आ संस्कृतिक कट्टरता आ राजनीति, दिनचर्या, सामाजिक मान्यता, आर्थिक स्थिति, नैतिकता, धर्म आ दर्शन सेहो साहित्यमे अएबाक चाही। आ से नहि भेने साहित्य एकभगाह भऽ जएत, ओलड़ि जएत, फ्रेम लगा कऽ टँगबा जोगड़ भऽ जएत। कविता रचब विवशता अछि, साहित्यिक। जहिया मिथिलाक लोककेँ मैथिली भाषा सिखेबा लेल शिविर लगाओल जएबाक आवश्यकता अनुभूत होएत, तहिया कविताक अस्तित्वपर प्रश्न सेहो ठाढ़ कएल जा सकत। आ से दिन नहि आबए ताहि लेल सेहो कविकेँ सतर्क रहए पड़तन्हि। आ ओतए त्वम्, त्वाम्, त्वया, तुभ्यम्, त्वत्, तव, त्वयि-नचिकेताक मध्यमपुरुष एकवचन-अहम्, माम्, मया, मह्यम्, मत्, मम, मयि सँ फराक रूपमे सोझाँ अबैत अछि। मैथिली लेल एकटा अनुवाद सिद्धान्त गुणाढ्यक पैशाची भाषाक वृहत् कथाक क्षेमेन्द्रक कथा मंजरी वा सोमदेवक कथासरित्सागरक अनुवाद होएबाक कथा कथा कहबाक शैली सेहो भऽ सकैए मुदा ई अनुवादक कथाक प्रारम्भ तँ कहिते अछि। अनुवादक इतिहास बड्ड पुरान छै। कोनो प्राचीन भाषा जेना संस्कृत, अवेस्ता, ग्रीक आ लैटिनक कोनो कालजयी कृति जखन दुरूह हेबऽ लागल तँ ओइपर चाहे तँ भाष्य लिखबाक खगताक अनुभव भेल आ कनेक आर आगाँ ओकरा दोसर भाषामे अनुवाद कऽ बुझबाक खगताक अनुभव भेल। प्राचीन मौर्य साम्राज्यक सम्राट अशोकक पाथरपर कीलित शिलालेख सभ, कएकटा लिपि आ भाषामे, राज्यक आदेशकेँ विभिन्न प्रान्तमे प्रसारित केलक। भाष्य पहिने मूल भाषामे लिखल जाइत छल आ बादमे दोसर भाषामे लिखल जाए लागल। मैथिलीसँ दोसर भाषा आ दोसर भाषासँ मैथिलीमे अनुवाद लेल सिद्धान्त: मैथिलीसँ सोझे दोसर भाषामे अनुवाद अखन धरि संस्कृत, बांग्ला, नेपाली, हिन्दी आ अंग्रेजी धरि सीमित अछि। तहिना ऐ पाँचू भाषाक सोझ अनुवाद मैथिलीमे होइत अछि। ऐ पाँच भाषाक अतिरिक्त मराठी, मलयालम आदि भाषासँ सेहो सोझ मैथिली अनुवाद भेल अछि मुदा से नगण्य अछि। मैथिलीमे अनुवाद आ मैथिलीसँ अन्य भाषामे अनुवाद ऐ पाँचू भाषाकेँ मध्यस्थ भाषाक रूपमे लऽ कऽ होइत अछि। अहू पाँच भाषामे हिन्दी, नेपाली आ अंग्रेजीक अतिरिक्त आन दू भाषाक मध्यस्थ भाषाक रूपमे प्रयोग सीमित अछि। अनुवादसँ कने भिन्न अछि रूपान्तरण, जेना कथाक नाट्य रूपान्तरण वा गद्यक पद्यमे पद्यक गद्यमे रूपान्तरण। ऐ मे मैथिलीसँ मैथिलीमे विधाक रूपान्तरण होइत अछि आ अनुवाद सिद्धान्तक ज्ञान नै रहने रूपान्तरकार अर्थ आ भावक अनर्थ कऽ दैत अछि। मैथिलीमे आ मैथिलीसँ अनुवादमे तँ ई समस्या आर विकट अछि। उत्तम अनुवाद लेल किछु आवश्यक तत्त्व: शब्दशः अनुवाद करबा काल ध्यान राखू जे कहबी आ सन्दर्भक मूल भाव आबि रहल अछि आकि नै। श्ब्द, वाक्य आ भाषाक गढ़नि अक्षुण्ण रहए से ध्यानमे राखू। मूल भाषाक शब्द सभ जँ प्राचीन अछि तँ अनूदित भाषाक शब्द सभकेँ सेहो पुरान आ खाँटी राखू। मूल आ अनूदित भाषाक व्याकरण आ शब्द भण्डारक वृहत् ज्ञान एतए आवश्यक भऽ जाइत अछि। मूल भाषामे मुँह कोचिया कऽ बाजल रामनाथ, उमेशक प्रति सम्बोधनकेँ रामनाथो, उमेशोक बदलामे रामनाथहुँ, उमेशहुँ कऽ अनुवाद कएल जाएब उचित हएत मुदा सामान्य परिस्थितिमे से उचित नै हएत। से शब्द, भाव, प्रारूपमे सेहो आ मूल कृतिक देश-कालक भाषामे सेहो समानता चाही। अनुवादककेँ मूल आ अनूदित कएल जाएबला भाषाक ज्ञान तँ हेबाके चाही संगमे दुनू भाषा क्षेत्र इतिहास, भूगोल, लोककथा, कहबी आ ग्रम्य-वन्य आ नग्रक संस्कृतिक ज्ञान सेहो हेबाक चाही। ई मध्यस्थ भाषासँ अनुवाद करबा काल आर बेसी महत्वपूर्ण भऽ जाइत अछि। ऐ परिस्थितिमे “दुनू भाषा क्षेत्रक इतिहास, भूगोल, लोककथा, कहबी आ ग्रम्य-वन्य आ नग्रक संस्कृतिक ज्ञान” सँ तात्पर्य अनूदित आ मूल भाषा क्षेत्रसँ हएत मध्यस्थ भाषा क्षेत्रसँ नै। कखनो काल मूल भाषाक कोनो भाषासँ सम्बन्धित तत्त्व वा गएर भाषिक तत्व (सांस्कृतिक तत्त्व) क सही-सही उदाहरण अनूदित भाषामे नै भेटैत अछि आ तखन अनुवादक गपकेँ नमराबऽ लगैत छथि वा ओइ लेल एकटा सन्निकट शब्दावली (ओइ नै भेटल तत्त्वक) देमए लगैत छथि। ऐ परिस्थितिमे सन्निकट शब्दावली देबासँ नीक गपकेँ नमरा कऽ बुझाएब वा परिशिष्ट दऽ ओकरा स्पष्ट करब हएत। ऐ सँ मूल भाषासँ मध्यस्थ माषाक माध्यमसँ कएल अनुवादमे होइबला साहित्यिक घाटाकेँ न्यून कएल जा सकत। कथा, कविता, नाटक, उपन्यास, महाकाव्य (गीत-प्रबन्ध), निबन्ध, स्कूल-कॉलेजक पुस्तक, संगणक विज्ञान, समाजशास्त्र, समाज विज्ञान आ प्रकृति विज्ञानक पोथीक अनुवाद करबा काल किछु विशेष तकनीकक आवश्यकता पड़त। निबन्ध, स्कूल-कॉलेजक पुस्तक, संगणक विज्ञान, समाजशास्त्र, समाज विज्ञान आ प्रकृति विज्ञानक अनुवाद ऐ अर्थेँ सरल अछि जे ऐ सभमे विस्तारसँ विषयक चर्चा होइत अछि आ सर्जनात्मक साहित्य {कथा, कविता, नाटक, उपन्यास, महाकाव्य (गीत-प्रबन्ध)} क विपरीत भाव आ संस्कृतिक गुणांक नै रहैत अछि वा कम रहैत अछि। संगे एतए पाठक सेहो कक्षा/ विषयकक अनुसार सजाएल रहैत छथि। केमिकल नाम, बायोलोजिकल आ बोटेनिकल बाइनरी नाम आ आन सभ सिम्बल आदि जे विशिष्ट अन्तर्राष्ट्रीय संस्था सभ द्वारा स्वीकृत अछि तकर परिवर्तन वा अनुवाद अपेक्षित नै अछि। सर्जनात्मक साहित्यमे नाटक सभसँ कठिन अछि, फेर कविता अछि आ तखन कथा, जँ अनुवादकक दृष्टिकोणसँ देखी तखन। नाटकमे नाटकक पृष्ठभूमि आ परोक्ष निहितार्थकेँ चिन्हित करए पड़त संगहि पात्र सभक मनोविज्ञान बूझए पड़त। कवितामे कविताक विधासँ ओकर गढ़निसँ अनुवादकक परिचित भेनाइ आवश्यक, जेना हाइकूक मैथिलीसँ अंग्रेजी अनुवाद करै बेरमे मैथिलीक वार्णिक ५/७/५ क मेल जँ अंग्रेजीक अल्फाबेटसँ करेबै तँ अहाँक अनूदित हाइकू हास्यास्पद भऽ जाएत कारण अंग्रेजीमे ५/७/५ सिलेबलक हाइकू होइ छै आ मैथिलीमे जेना वर्ण आ सिलेबलक समानता होइ छै से अंग्रेजीमे नै होइ छै। ऐ सन्दर्भमे ज्योति सुनीत चौधरीक मैथिलीसँ अंग्रेजी अनुवाद एकटा प्रतिमान प्रस्तुत करैत अछि। कविताक लय, बिम्बपर विचार करए पड़त संगहि कविता खण्डक कविताक मुख्य शरीरसँ मिलान करए पड़त। कथामे कथाकारक आ कथाक पात्रक संग कथाक क्रम, बैकफ्लैशक समय-कालक ज्ञान आ वातावरणक ज्ञान आवश्यक भऽ जाइत अछि। आब महाकाव्यक अनुवाद देखू, रामलोचन शरणक मैथिली रामचरित मानस अवधीसँ मैथिलीमे अनुवाद अछि मुदा दोहा, चौपाइ, सोरठा सभ शास्त्रीय रूपेँ अनूदित भेल अछि। संस्कृत भाषाक अनुवादक माध्यमसँ पाठन आंग्ल शासक लोकनि द्वारा प्रारम्भ भेल। ऐ विधिसँ ने लैटिनक आ नहिये ग्रीकक अध्यापन कराओल गेल छल। ऐ विधिसँ जँ अहाँ संस्कत वा कोनो भाषा सीखब तँ आचार्य आ कोविद कऽ जाएब मुदा सम्भाषण नै कएल हएत। जँ कोनो भाषाकेँ अहाँ मातृभाषा रूपेँ सीखब तखने सम्भाषण कऽ सकब, संस्कृति आदिक परिचय पाठ्यक्रममे शब्दकोष; आ लोककथा आ इतिहास/ भूगोलक समावेश कऽ कएल जा सकैत अछि। संगणक द्वारा अनुवाद: सर्जनात्मक वा निबन्ध, स्कूल-कॉलेजक पुस्तक, संगणक विज्ञान, समाजशास्त्र, समाज विज्ञान आ प्रकृति विज्ञानक अनुवाद संगणक द्वारा प्रायोगिक रूपमे कएल जाइत अछि मुदा “कोल्ड ब्लडेड एनीमल” क अनुवाद हास्यास्पद रूपेँ “नृशंस जीव” कएल जाइत अछि। मुदा संगणकक द्वारा अनुवाद किछु क्षेत्रमे सफल रूपेँ भेल अछि, जेना विकीपीडियामे ५०० शब्दक एकटा “बेसी प्रयुक्त शब्दावली” आ २६०० शब्दक “शब्दावली”क अनुवाद केलासँ, गूगलक ट्रान्सलेशन अओजार आदिमे आधारभूत शब्दक अनुवाद केलासँ आ आन गवेषक जेना मोजिला फायरफॉक्स आदिमे अंग्रेजीक सभ पारिभाषिक संगणकीय शब्दक अनुवाद केलासँ त्रुटिविहीन स्वतः मैथिली अनुवाद भऽ जाइत अछि। भारोपीय भाषा परिवार मध्य मैथिलीक स्थान भाषाक पारिवारिक वर्गीकरण ऐतिहासिक आधारपर होइत अछि, जाहिमे भाषाक इतिहास, एक भाषाक दोसर भाषासँ उत्पत्ति, भाषाक आकृति-प्रकृति माने रचनात्मकताक संग अर्थ-तत्त्वपर सेहो ध्यान देल जाइत अछि। जेना कोनो व्यक्ति वा समूह बीजीपुरुषक संकल्पना करैत अछि आ ओतएसँ अपना धरि एकटा वंशवृक्षक निर्माण करैत अछि, तहिना भाषाक इतिहासक लेखक सेहो आदि, मध्य आ आधुनिक कालक आधारपर भाषाक पूर्ववर्ती आ बीज भाषाक संकल्पना सोझाँ अनैत छथि। मुदा भाषाक इतिहासमे पुत्री आ बहिन भाषाक संकल्पना सेहो एहि तरहेँ सोझाँ अबैत अछि। मैथिलीक भारोपीय भाषा परिवारमे स्थान स्थान, शब्द, व्याकरण आ ध्वनिक आधारपर भाषा एक-दोसरासँ लग होइत अछि। मुदा एहि मध्य किछु अपवाद सेहो अछि। अवेस्ता, अंग्रेजी आ जर्मन भाषा मैथिलीसँ भौगोलिक रूपसँ दूर रहलोपर एक्के परिवारक अछि, मुदा अरबी, तमिल आदि सापेक्ष रूपेँ भौगोलिक निकटता अछैत दोसर परिवारक अछि। फेर भाषा स्थित आयातित विदेशज शब्दावलीक आधारपर हम एक भाषाकेँ दोसर भाषाक परिवारक सिद्ध नहि कऽ सकै छी। तहिना ध्वनिमूलक आ शब्दमूलक अर्थक साम्य सेहो दू भाषा परिवारकेँ एक वर्गमे नहि आनि सकैत अछि, जेना संस्कृतक जाल्म आ अरबीक जालिम -शब्दमूलक साम्य वा मैथिलीक मियाऊँ आ चीनी मन्दारिन भाषाक म्याऊँ (बिलाड़ि)- ध्वनिमूलक साम्य। ध्वनिक साम्यमे सेहो कखनो काल गड़बड़ी होइत अछि, जेना मैथिलीमे ड़, ढ़ आ चन्द्रबिन्दुक खूब प्रयोग होइत अछि मुदा ई तीनू ध्वनि संस्कृतमे नहि अछि। भौगोलिक आधारपर सेहो “भारोपीय भाषा” ई नामकरण पूर्ण रूपसँ समीचीन नहि अछि, कारण सम्पूर्ण भारतमे भारोपीय भाषा परिवारक उपस्थिति नहि अछि आ भारतमे भारोपीय भाषाक अतिरिक्त आनो भाषा परिवारक उपस्थिति अछि। यूरोपमे सेहो काकेशियन आदि भाषा परिवार भारोपीय भाषा परिवारमे नहि अबैत अछि। व्याकरण साम्यक आधार दू भाषाकेँ एक परिवारमे रखबाक सभसँ सुदृढ़ आधार अछि। मूल रूपसँ भारोपीय परिवारक भाषामे प्रत्ययक प्रयोग खूब होइत अछि आ धातुमे प्रत्यय जोड़ि शब्द बनैत अछि। पुल्लिंग, स्त्रीलिंग आ नपुंसक लिंग, ई तीन तरहक लिंग अछि तँ एकवचन, द्विवचन आ बहुवचन एहि तीन तरहक वचन। मुदा आब अधिकांश भाषामे एकवचन आ बहुवचन यैह दूटा वचन होइत अछि। जाहि क्रियाक फल स्वयं प्राप्त हो से आत्मनेपदी आ जकर फल दोसरकेँ भेटए से परस्मैपदी, ई दू तरहक क्रिया भारोपीय भाषमे रहैत अछि। समासक प्रयोग सेहो मोटा-मोटी भारोपीय भाषाक विशेषता अछि। भारोपीय परिवारक दू भेद अछि। सए (१००) लेल प्रयुक्त मूल भारोपीय शब्द “क्मतोम” दू तरहेँ बाजल जाइत अछि। संस्कृतमे “शतम्” आ लैटिनमे “केन्टुम्”। एहि आधारपर संस्कृतसँ लग भाषा समूह अवेस्ता (भाषा आ ग्रंथ दुनूक नाम, जेन्द-अवेस्ता- ओहिपर भाष्य), फारसी, मैथिली, रूसी आदि अबैत अछि। केन्टुम् वर्गमे लैटिनसँ लग भाषा जेना ग्रीक, जर्मन, फ्रेंच, इटालियन आदि अबैत अछि। शतम् वर्गमे भारत-इरानी (वा इन्डो आर्यन), बाल्टो-स्लाविक, आर्मीनी आ इलीरी भाषा समूह अबैत अछि। इन्डो आर्यन वा भारतीय-ईरानी भाषा समूहमे ऋगवेद सभसँ प्राचीन अछि। जोराष्ट्रियन धर्मक अवेस्ता ग्रन्थ जे वैदिक कालक अछि ओ अवेस्ता भाषाक ग्रन्थ अछि। ईरानी भाषा समूहमे अवेस्ता, प्राचीन फारसी, पहलवी, पश्तो, बलूची आ कुर्द भाषा प्रमुख अछि। भारतीय आर्यभाषा समूहमे वैदिक संस्कृत, लौकिक संस्कृत, पाली (प्राचीन प्राकृत ५००. ई.पू.सँ १०० ई.पू. धरि), प्राकृत (मध्य प्राकृत १०० ई.पू. सँ ५०० ई. धरि), अपभ्रंश (५०० ई. सँ ९०० ई. धरि) आ अवहट्ट (९०० ई. सँ ११०० ई. धरि) आ तकर बाद मागधी प्राकृतसँ मैथिली, बंगला, ओड़िया, असमी आदि भाषा (११०० ई. सँ) अबैत अछि। विश्वक भाषाक पारिवारिक वर्ग (अ) यूरेशिया, (आ)अफ्रीका, (इ)प्रशान्त महासागरक क्षेत्र (पैसिफिक), (ई)अमेरिका (अ) यूरेशिया- (क)भारोपीय, (ख)द्राविड़, (ग)बुरुशस्की, (घ)काकेशी, (ङ)यूराल-अल्ताई, (च)चीनी, (छ)जापानी-कोरियाई, (ज)हाइपरबोरी, (झ)बास्क, (ञ)सेमीटिक-हेमिटिक- अफ्रीकामे (क)भारोपीय- (i) इन्डो आर्यन, (ii)बाल्टो-स्लाविक, (iii)आर्मीनियन, (iv) इलीरी, (v)ग्रीक, (vi)केल्टिक, (vii)जर्मानिक, (viii)इटालिक, (ix)हित्ती, (x)तोखारी (i) इन्डो आर्यन- (a)भारतीय आर्यभाषा, (b)ईरानी (a)भारतीय आर्यभाषा (A)प्राचीन भारतीय आर्यभाषा (२५०० ई.पू.सँ ५०० ई. पू.) (B)मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषा (५०० ई.पू.सँ १००० ई.) (C)आधुनिक भारतीय आर्यभाषा(१००० ई. सँ आइ धरि) (A)प्राचीन भारतीय आर्यभाषा (२५०० ई.पू.सँ ५०० ई. पू.)- वैदिक संस्कृत, लौकिक संस्कृत (बाल्मीकि - “मानुषिमिह संस्कृताम्”- संस्कृत आ मानुषी दुनू भाषा।) (B)मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषा (५०० ई.पू.सँ १००० ई.)- पहिल प्राकृत (पाली), दोसर प्राकृत (साहित्यिक प्राकृत- शौरसेनी, महाराष्ट्री, मागधी, अर्द्धमागधी, पैशाची, ब्राचड, खस), तेसर प्राकृत (अपभ्रंश- प्रथमे-प्रथम व्याडि आ पतंजलि द्वारा उल्लेख।) (C)आधुनिक भारतीय आर्यभाषा(१००० ई. सँ आइ धरि) (अ) शौरसेनीसँ खड़ी बोली, व्रजभाषा, बाँगरू, कन्नौजी, बुन्देली, मारवाड़ी, जयपुरी, मालवी, मेवाती, गुजराती (आ)महाराष्ट्रीसँ मराठी, कोंकणी, नागपुरी, बरारी (इ) मागधीसँ भोजपुरी, मगही, बांगला, ओड़िया, असमी, मैथिली (ई) अर्धमागधीसँ अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी (उ) पैशाचीसँ लहँदी (ऊ) ब्राचडसँ सिन्धी, पंजाबी (ए) खससँ पहाड़ी भाषाक विकास रेखांकित होइत अछि। बाल्मीकि द्वारा सुन्दरकाण्डमे मानुषिमिह संस्कृताम्- संस्कृत आ मानुषी दुनू भाषाक ज्ञान हनुमानजीसँ कहबाओल गेल अछि। ज्योतिरीश्वर- “पुनु कइसन भाट- संस्कृत, पराकृत, अवहठ, पैशाची, सौरसेनी, मागधी छहु भाषाक तत्वज्ञ” संगहि ज्योतिरीश्वर द्वारा सात “उपभाषक” चर्च भेल अछि। प्राकृतक कैकटा प्रकार छल। ओहिमे मागधी प्राकृत मैथिली आ अन्य पूर्वी भारतक भाषाक विकासमे योगदान देलक। अर्धमागधीमे जैन धर्मग्रन्थ आ पालीमे बौद्ध धर्मग्रन्थ लिखल गेल। कालिदासक संस्कृत नाटकमे संस्कृतक अतिरिक्त अपभ्रंशक प्रयोग गएर अभिजात्य वर्गक लेल प्रयुक्त भेल तँ चर्यापदक भाषा सेहो मागधी मिश्रित अपभ्रंश छल। मैथिली सहित आन आधुनिक भारतीय आर्यभाषा दोसर प्राकृतसँ विकसित भेल सेहो देखि पड़ैत अछि। अपभ्रंश परवर्ती कालमे पूर्वी भारतमे अवहट्टक रूप लेलक। मैथिलीक विशेषता जाहिमे एकर सभ शब्दक स्वरांत होएब, क्रियारूपक जटिल होएब (मुदा ताहिमे लैंगिक भेद नहि होएब), सर्वनामक सम्बन्ध कारक रूप आदिक रूपरेखा अवहट्टमे दृष्टिगोचर होएब शुरू भऽ गेल छल। ऐतिहासिक आधारपर भाषाक पारिवारिक वर्गीकरणमे अवहट्ट (अवहट्ठ) केँ “मैथिल अपभ्रंश” ताहि कारणसँ कहल जाइत अछि आ मागधी प्राकृतसँ सेहो एकर विकास दृष्टिगोचर होइत अछि। अवहट्ठ मैथिलीसँ लग रहितो शौरसेनी प्राकृत-अपभ्रंशसँ सेहो लग अछि, मुदा देशी शब्दक प्रयोगसँ एहिमे अपभ्रंशसँ बहुत रास व्याकरणिक परिवर्तन देखा पड़ैत अछि। विद्यापतिक “कीर्तिलता” अवहट्ठमे अछि, मुदा “चर्या गीत” आ “वर्ण रत्नाकर” कीर्तिलतासँ पूर्ववर्ती होएबाक बादो पुरान मैथिली अछि आ अवहट्ठसँ सेहो लग अछि। दामोदर पंडितक “उक्ति व्यक्ति प्रकरण” सेहो कीर्तिलतासँ पूर्ववर्ती अछि मुदा पुरान अवधी आ पुरान कोशलीक प्रतिमान प्रस्तुत करैत अछि आ अवहट्ठसँ लग अछि। भारोपीय भाषा परिवारमे मैथिलीक स्थान मोटा-मोटी संस्कृत, पाली, प्राकृत, अपभ्रंश आ अवहट्ठक ऐतिहासिक क्रममे अबैत अछि। मैथिली वा कोनो भाषाक उत्पत्तिक मूलमे मनुक्खक मुँहसँ बहराएल ध्वनि आ ओहि ध्वनिक अर्थ कोनो वस्तु, व्यक्ति वा विचारसँ होएब सिद्ध होएत। ध्वनि तँ चिड़ै, चुनमुनी, माल-जाल आ बौक व्यक्ति द्वार सेहो उत्पन्न होइत अछि मुदा से अर्थपूर्ण नहि भऽ पबैए आ भाषाक निर्माण नहि कऽ पबैए। १८६६ ई. मे पेरिसमे “ला सोसिएते द लिंग्विस्टीक” नाम्ना संस्था भाषाक उत्पत्ति आ विश्वक भाषा सभक निर्माण” एहि विषयकेँ अपन कार्यकारिणीसँ हटा देलक कारण एहि विषयक विवेचन अनुमानपर अधारित होएबाक कारणसँ वैज्ञानिक दृष्टिकोणसँ दूर रहैत अछि। वैदिक संस्कृतसँ लौकिक संस्कृत आ ओहिसँ पाली, प्राकृत, अपभ्रंश, अवहट्ट आ मैथिलीक क्रम ताकल जा सकैत अछि। मुदा वैदिक संस्कृतक प्राचीनतम ग्रन्थ ऋगवेदसँ पहिनेसँ ओ भाषा अस्तित्वमे रहल होएत। कतेक मौखिक साहित्य जेना गाथा, नाराशंसी, दैवत कथा आ आख्यान सभ ओहिमे रचल गेल होएत। एहने गाथा सभक गायकक लेल “गाथिन”, “गातुविद्” आ “गाथपति” ऋगवेदमे प्रयुक्त भेल। वैदिक संस्कृतक उत्पत्ति दैवी रूपमे भेल वा आंगिक-वाक संकेतक संप्रेषणीयता बढ़ेबाक लेल से मात्र अनुमानेक विषय भऽ सकैत अछि। भाषामे ध्वनि, शब्द, पद, वाक्य आ अर्थक परिवर्तन भेलासँ वैदिकसँ लौकिक संस्कृत बहराएल आ फेर पाली, प्राकृत, अपभ्रंश, अवहट्ट आ मैथिली। पाणिनी द्वारा भारतक विभिन्न क्षेत्रसँ लेल शब्दावली लौकिक संस्कृतकेँ ततेक समृद्ध कएलक जे ओहिसँ आन सभ भाषाक कतेको तरहक रूप बहार भेल। कतेक तरहक क्षेत्रीय प्राकृत आ अपभ्रंश ओहि भौगोलिक क्षेत्रक विस्तारकेँ लैत बहार भेल आ ओहिसँ आजुक आधुनिक भारतीय आर्य भाषा सभक उत्पत्ति भेल। मैथिली भारोपीय भाषा परिवारसँ सम्बन्धित अछि। भारोपीय भाषा परिवारक भीतर विश्वक लगभग चालीस प्रतिशत जनसंख्या अबैत अछि। ई सभसँ पैघ भाषा परिवार अछि, सभसँ समृद्ध सेहो। मोटा-मोटी एकर दू विभाग छैक, पहिल यूरोपक आर्य भाषा आ दोसर भारत-ईरानी शाखा। भारत-ईरानी आर्यभाषाक भीतर ईरानी, दरद आ भारतीय आर्यभाषा अबैत अछि। दरद भाषामे कश्मीरी आ पामीर पठारक पूर्व दक्षिणक भाषा सभ अछि। मैथिली भाषाक उद्गम आ विकास भारतीय आर्यभाषाक भीतर ताकल जाइत अछि। भाषाक उद्गम तँ अनुमानक विषय थिक। भाषाक उद्गमक आ तकर प्रयोगक कतेक वर्षक पश्चात् ओहिमे साहित्य रचना होइत अछि। तखन जा कऽ ओकर रूप स्थिर होइत अछि। वैदिक संस्कृतक प्राचीनतम ग्रन्थ ऋगवेद, लौककिक संस्कृतक प्राचीनतम ग्रन्थ वाल्मीकि रामायण, पालि भाषाक प्राचीनतम ग्रन्थ बुद्ध त्रिपिटक, प्राकृतक प्राचीनतम ग्रन्थ विमल सूरिक पउमचरिउ, अपभ्रंशक प्राचीनतम ग्रन्थ यूगीन्द्रक परमात्म प्रकाश अछि। आदि मैथिलीक प्राचीन साहित्य सिद्ध साहित्य, बौद्धगान आ ज्योतिरीश्वरक वर्ण रत्नाकर अछि। सिद्ध सरहपाद 700-780 सरहपाद-“सिद्धिरत्थु मइ पढ़मे पढ़िअउ ,मण्ड पिबन्तोँ बिसरउ एमइउ”।मिथिलामे अक्षरारम्भ सिद्धिरस्तु (गणेशजीक अंकुश आँजी) सँ होइत अछि। मिथिलामे ई धारणा अछि जे माँड़ पीलासँ स्मरण शक्ति क्षीण होइत अछि। दोसर उदाहरण- बलद बियायल गबैया बाँझे- बड़द बिया गेल आ गाए बाँझे अछि। मध्यकालीन मैथिलीक ग्रन्थ विद्यापतिक मैथिली साहित्य आ तकर बाद चतुर चतुर्भुज, शंकरदेव, विभिन्न मल्ल नरेश द्वारा रचित साहित्य, कीर्तनिया आ अंकिया नाटसँ मनबोध धरि अबैत अछि। आधुनिक मैथिली साहित्य चन्दा झासँ प्रारम्भ होइत अछि। प्राचीन भारतक आर्यभाषाक क्षेत्र वैदिक संस्कृतक प्राचीनतम ग्रन्थ ऋगवेदमे वर्णित धार सभक आधारपर निर्धारित कएल जा सकैत अछि आ एकर प्रसार कोना आन क्षेत्रमे भेल सेहो एहिसँ निर्धारित होइत अछि। ऋगवैदिक आर्य “सप्त सन्धव” माने सात धारक क्षेत्रमे रहैत छलाह- ई सात धार छल वितस्ता, अश्किनी, परुष्णी, शतुद्रु, विपाशा, क्रुमु आ गोमती। एहिमे पहिल पाँचटा धार पंजाबक आ शेष दूटा अफगानिस्तानमे बहैत छल। ई सातो धार ऋगवेद कालक सभसँ उपयोगी धार सिन्धुक सहायक छल। ऋगवेदमे सरस्वती धारक वर्णन “धार सभ माय”क रूपमे भेल अछि। ऋगवेदमे यमुनाक दू बेर आ गंगाक एक बेर वर्णन अछि। ऋगवेदक दसम मण्डलमे “धारक स्तुति” मे सिन्धु आ सप्तसैन्धवक स्तुति भेल अछि। ओइ कालमे पुरु, अनु, द्रुह्य, यदु आ तुर्वस नाम्ना पंचजन बसैत छलाह। क्रिवि, त्रित्सु, सेहो ओहि कालमे छलाह। पुरु आ सभसँ शक्तिवान भरत कबीला मिलि बादमे कुरु कबीला बनल। भरत कबीला दाशराज्ञ युद्धमे पाँच आर्य आ पाँच अनार्य कबीलाक संगठनकेँ हरेलक, जाहिमे भरतक पुरहित वशिष्ठ रहथि आ पाँच आर्य आ पाँच अनार्य (दस्यु) कबीलाक संगठनक पुरहित रहथि विश्वामित्र। बोगजकोई एशिया माइनरमे हित्ती शासकक १४म शती ई.पू.क उत्कीर्णित अभिलेखमे इन्द्र, दशरथ, अर्त्ततम आदि राजाक, इन्द्र, वरुण, नासत्य, आदि देवताक उल्लेख अछि। यजुर्वेदक प्रचलित संहिता वाजसनेयी आ सामवेदक संहिता कौथुम, सामवेदक आरण्यक आ उपनिषद छान्दोग्यक आधारपर मिथिलामे ब्राह्मणक वाजसनेयी आ छान्दोग्यमे उर्ध्वाधर विभाजन एखन धरि अछि। यजुर्वेदमे विदेहक वर्णन अछि तँ ऋगवेदमे वैदिक जनकक (सीताक पिता सीरध्वज जनक पछाति भेलाह।) 'वैदेह राजा' ऋगवेदिक कालक नमी सप्याक नामसँ छलाह, यज्ञ करैत सदेह स्वर्ग गेलाह, ऋगवेदमे वर्णन अछि। ओ इन्द्रक संग देलन्हि असुर नमुचीक विरुद्ध आ ताहिमे इन्द्र हुनका बचओलन्हि।शतपथ ब्राह्मणक विदेघमाथव आ पुराणक निमि दुनू गोटेक पुरोहित गौतम छथि से दुनू एके छथि आ एतएसँ विदेह राज्यक प्रारम्भ। माथवक पुरहित गौतम मित्रविन्द यज्ञक/ बलिक प्रारम्भ कएलन्हि आ पुनः एकर पुनःस्थापना भेल महाजनक-२ क समयमे याज्ञवल्क्य द्वारा। निमि गौतमक आश्रमक लग जयन्त आ मिथि -जिनका मिथिला नामसँ सेहो सोर कएल जाइत छन्हि, मिथिला नगरक निर्माण कएलन्हि। निमीक जयन्तपुर वर्तमान जनकपुरमे छल, मिथीक मिथिलानगरीक स्थान एखन धरि निर्धारित नहि भए सकल अछि, अनुमानित अछि जनकपुरक लग । ’सीरध्वज जनक’ सीताक पिता छथि आ एतयसँ मिथिलाक राजाक सुदृढ़ परम्परा देखबामे अबैत अछि। ’कृति जनक’ सीरध्वजक बादक 18म पुस्तमे भेल छलाह। कृति हिरण्यनाभक पुत्र छलाह आ जनक बहुलाश्वक पुत्र छलाह। याज्ञवलक्य हिरण्याभक शिष्य छलाह, हुनकासँ योगक शिक्षा लेने छलाह। कराल जनक द्वारा एकटा ब्राह्मण युवतीक शील-अपहरणक प्रयास भेल आ जनक राजवंश समाप्त भए गेल (संदर्भ अश्वघोष-बुद्धचरित आ कौटिल्य-अर्थशास्त्र)।अर्थशास्त्रमे(१.६ विनयाधिकारिके प्रथमाधिकरणे षडोऽध्यायः इन्द्रियजये अरिषड्वर्गत्यागः) कराल जनकक पतनक सेहो चर्चा अछि। तद्विरुद्धवृत्तिरवश्येन्द्रियश्चातुरन्तोऽपि राजा सद्यो विनश्यति- यथा दाण्डक्यो नाम भोजः कामाद् ब्राह्मण कन्यायमभिमन्यमानः सबन्धराष्ट्रो विननाश करालश्च वैदेहः,...। वैदिक संस्कृतक कालमे आर्य सप्तसन्धवसँ विदेह धरि आबि गेल छलाह। अनार्य (दस्यु)सँ ओही कालमे हुनकर सम्पर्क भऽ गेल छल आ शाब्दिक आदान-प्रदान सेहो भऽ गेल छल। यजुर्वेदमे बादमे अथर्ववेदमे ई आदान-प्रदान दृष्टिगोचर होइत अछि। अनार्य (दस्यु) आ व्रात्य (अनार्यसँ आर्य बनल जाति) दुनुक भाषा सप्तसैन्धव आर्यक भाषासँ मिलि गेल आ पुबरिया आ आन क्षेत्रीय बसात लगलासँ वैदिक संस्कृत लौकिक संस्कृतमे बदलि गेल। निरुक्तक समयमे सेहो वैदिक शब्दावली कठिन भऽ गेल छल, ओकर उत्पत्तिपर विवेचन शुरू भऽ गेल छल। पाणिनीक भाषा पुबरिया, दछिनबरिया, पछबरिया आ उत्तरबरिया सभ क्षेत्रक दस्यु आ व्रात्य भाषाक शब्दावलीकेँ समाहित कऽ बनल छल। ई संस्कारित भाषा बादक लोक मध्य संस्कृतक रूपमे विख्यात भेल। पाणिनी लौकिक संस्कृतकेँ जेना “भाषा” कहलन्हि, तहिना यास्क आ पाणिनी वैदिक संस्कृतकेँ “छन्दस्”। यैह छन्दस् अवेस्ता भाषाक भाष्य लेल जेन्द (छन्द) कहल गेल। संस्कृत, प्राकृत, अवहट्ट, मैथिली १. संस्कृत देवनागरीक अतिरिक्त्त समस्त उत्तर भारतीय भाषा नेपाल आ दक्षिणक (तमिलकेँ छोड़ि) सभ भाषा वर्णमालाक रूपमे स्वर आ कचटतप आ य, र ल व, श, स, ह क वर्णमालाक उपयोग करैत अछि। ग्वाङ हेतु संस्कृतमे दोसर वर्ण छैक (छान्दोग्य परम्परामे एकर उच्चारण नहि होइत अछि छथि मुदा वाजसनेयी परम्परामे खूब होइत अछि- जेना छान्दोग्य उच्चारण सभूमि तँ वाजसनेयी उच्चारण सभूमीग्वंङ), ई ह्रस्व दीर्घ दुनू होइत अछि। सिद्धिरस्तु लेल सेहो कमसँ कम छह प्रकारक वर्ण मिथिलाक्षरमे प्रयुक्त होइत अछि। वैदिक संस्कृतमे उदात्त, अनुदात्त आ स्वरित (क्रमशः क॑ क॒ क॓) उपयोग तँ मराठीमे ळ आ अर्द्ध ऱ् केर सेहो प्रयोग होइत अछि। मैथिलीमे ऽ (बिकारी वा अवग्रह) क प्रयोग संस्कृत जकाँ होइत अछि आ आइ काल्हि एकर बदलामे टाइपक सुविधानुसारे द’ (दऽ क बदलामे) एहन प्रयोग सेहो होइत अछि मुदा ई प्रयोग ओहि फॉंटमे एकटा तकनीकी न्यूनताक परिचायक अछि। मुदा आकार क बाद बिकारीक आवश्यकता नहि अछि। जेना फारसीमे अलिफ बे से आ रोमनमे ए बी सी होइत अछि तहिना मोटा-मोटी सभ भारतीय भाषामे लिपिक भिन्नताक अछैत वर्णमालाक स्वरूप एके रङ अछि। वर्णमालामे दू प्रकारक वर्ण अछि- स्वर आ व्यंजन। वर्णक संख्या अछि ६४ जाहिमे २२ टा स्वर आ ४२ टा व्यञ्जन अछि। स्वरक वर्णन एहि प्रकारेँ अछि- जाहि वर्णक उच्चारणमे दोसर वर्णक उच्चारणक अपेक्षा नहि रहैत अछि, से भेल स्वर। स्वरक तीन टा भेद अछि- ह्रस्व, दीर्घ आ प्लुत। जाहिमे बाजैमे एक मात्राक समय लागए से भेल ह्रस्व, जाहिमे दू मात्रा समय लागल से भेल दीर्घ आ जाहिमे तीन मात्राक समय लागल से भेल प्लुत। मूलभूत स्वर अछि- अ इ उ ऋ लृ पाणिनिसँ पूर्वक आचार्य एकरा समानाक्षर कहैत छलाह। दीर्घ मिश्र स्वर अछि- ए ऐ ओ औ पाणिनिसँ पूर्वक आचार्य एकरा सन्ध्यक्षर कहैत छलाह। लृ दीर्घ नहि होइत अछि आ सन्ध्यक्षर ह्रस्व नहि होइत अछि। अ इ उ ऋ एहि सभक ह्रस्व, दीर्घ (आ ई ऊ ॠ) आ प्लुत (आ३ ई३ ऊ३ ॠ३) सभ मिला कऽ १२ वर्ण भेल। लृ क ह्रस्व आ प्लुत दू भेद अछि (लॄ३), तँ २ टा ई भेल। ए ऐ ओ औ ई चारू दीर्घ मिश्रित स्वर अछि आ एहि चारूक प्लुत रूप सेहो (ए३ ऐ३ ओ३ औ३) होइत अछि, तँ ८ टा ई सेहो भेल। भऽ गेल सभटा मिला कए २२ टा स्वर। एहि सभटा २२ स्वरक वैदिक रूप तीन तरहक होइत अछि, उदात्त, अनुदात्त आ स्वरित। ऊँच भाग जेना तालुसँ उत्पन्न अकारादि वर्ण उदात्त गुणक होइत अछि आ तेँ उदात्त कहल जाइत अछि। नीचाँ भागसँ उत्पन्न स्वर अनुदात्त आ जाहि अकारादि स्वरक प्रथम भागक उच्चारण उदात्त आ दोसर भागक उच्चारण अनुदात्त रूपेँ होइत अछि से भेल स्वरित। स्वरक दू प्रकार आर अछि, सानुनासिक जेना अँ आ निरनुनासिक जेना अ। दत्तेन निर्वृत्तः कूपो दात्तः। दत्त नाम्ना पुरुष द्वारा विपाट्- ब्यास धारक उतरबरिया तटपर बनबाओल, एतए इनार भेल दात्त। अञ प्रत्यान्त भेलासँ ’दात्त’ आद्युदात्त भेल, अण् प्रत्यायान्त होइत तँ प्रत्यय स्वरसँ अन्तोदात्त होइत। रूपमे भेद नहि भेलोपर स्वरमे भेद अछि। एहिसँ सिद्ध भेल जे सामान्य कृषक वर्ग सेहो शब्दक सस्वर उच्चारण करैत छलाह। स्वरितकेँ दोसरो रूपमे बुझि सकैत छी- जेना एहिमे अन्तिम स्वरक तीव्र स्वरमे पुनरुच्चारण होइत अछि। आब व्यञ्जन पर आऊ। व्यञ्जन ४२ टा अछि। क् ख् ग् घ् ङ् च् छ् ज् झ् ञ् ट् ठ् ड् ढ् ण् त् थ् द् ध् न् प् फ् ब् भ् म् य् र् ल् व् श् ष् स् ह् य् व् ल् सानुनासिक सेहो होइत अछि, यँ वँ लँ आ निरुनासिक सेहो। एकर अतिरिक्त्त दू टा आर व्यञ्जन अछि- अनुस्वार आ विसर्जनीय वा विसर्ग। ई दुनूटा, स्वरक अनन्तर प्रयुक्त्त होइत अछि। विसर्जनीय मूल वर्ण नहि अछि, वरन् स् वा र् क विकार अछि। विसर्जनीय किछु ध्वनि भेद आ किछु रूपभेदसँ दू प्रकारक अछि- जिह्वामूलीय आ उपध्मानीय। जिह्वामूलीय मात्र क आ ख सँ पूर्व प्रयुक्त्त होइत अछि, दोसर मात्र प आ फ सँ पूर्व। अनुस्वार, विसर्जनीय, जिह्वामूलीय आ उपध्मानीयकेँ अयोगवाह कहल जाइत अछि। उपरोक्त्त वर्ण सभकेँ छोड़ि ४ टा आर वर्ण अछि, जकरा यम कहल गेल अछि। कुँ खुँ गुँ घुँ (यथा- पलिक् क्नी, चख ख्न्नुतः, अग् ग्निः, घ् घ्नन्ति) पञ्चम वर्ण आगाँ रहला पर पूर्व वर्ण सदृश जे वर्ण बीचमे उच्चारित होइत अछि से यम भेल। यम सेहो अयोगवाह होइत अछि। अ आ कवर्ग ह (असंयुक्त्त) आ विसर्जनीय क उच्चारण कण्ठमे होइत अछि। इ ई चवर्ग य श क उच्चारण तालुमे होइत अछि। ऋ ॠ टवर्ग र ष क उच्चारण मूर्धामे होइत अछि। लृ तवर्ग ल स क उच्चारण दाँतसँ होइत अछि। उ ऊ पवर्ग आ उपध्मानीय क उच्चारण ओष्ठसँ होइत अछि। व क उच्चारण उपरका दाँतसँ अधर ओष्ठक सहायतासँ होइत अछि। ए ऐ क उच्चारण कण्ठ आ तालुसँ होइत अछि। ओ औ क उच्चारण कण्ठ आ ओष्ठसँ होइत अछि। य र ल व अन्य व्यञ्जन जकाँ उच्चारणमे जिह्वाक अग्रादि भाग ताल्वादि स्थानकेँ पूर्णतया स्पर्श नहि करैत अछि। श् ष् स् ह् जकाँ एहिमे तालु आदि स्थानसँ घर्षण सेहो नहि होइत अछि। क सँ म धरि स्पर्श (वा स्फोटक कारण जिह्वाक अग्र द्वारा वायु प्रवाह रोकि कऽ छोड़ल जाइत अछि) वर्ण र सँ व अन्तःस्थ आ ष सँ ह घर्षक वर्ण भेल। सभ वर्गक पाँचम वर्ण अनुनासिक कहबैत अछि कारण आन स्थान समान रहितो एकर सभक नासिकामे सेहो उच्चारण होइत अछि- उच्चारणमे वायु नासिका आ मुँह बाटे बहार होइत अछि। अनुस्वार आ यम क उच्चारण मात्र नासिकामे होइत अछि- आ ई सभ नासिक्य कहबैत अछि- कारण एहि सभमे मुखद्वार बन्द रहैत अछि आ नासिकासँ वायु बहार होइत अछि। अनुस्वारक स्थान पर न् वा म् क उच्चारण नहि होएबाक चाही। जखन हमरा सभकेँ गप करबाक इच्छा होइत अछि, तखन संकल्पसँ जठराग्नि प्रेरित होइत अछि। नाभि लगक वायु वेगसँ उठैत मूर्धा धरि पहुँचि, जिह्वाक अग्रादि भाग द्वारा निरोध भेलाक अनन्तर मुखक तालु आदि भागसँ घर्षित होइत अछि आ तखन वर्णक उत्पत्ति होइत अछि। कम्पन भेलासँ वायु नादवान आ यैह गूँजित होइत पहुँचैत अछि मुँहमे आ ओकरा कहल जाइत अछि घोषवान, नादरहित भऽ पहुँचैत अछि श्वासमे आ ओकरा कहल जाइत अछि अघोषवान्। श्वास प्रकृतिक वर्ण भेल “अघोष” , आ नाद प्रकृतिक भेल “घोषवान्”। जाहि वर्णक उत्पत्तिमे प्राणवायुक अल्पता होइत अछि से अछि “अल्पप्राण” आ जकर उत्पत्तिमे प्राणवायुक बहुलता होइत अछि, से भेल “महाप्राण”। कचटतप क पहिल, तेसर आ पाँचम वर्ण भेल अल्पप्राण आ दोसर आ चारिम वर्ण भेल महाप्राण। संगहि कचटतप क पहिल आ दोसर भेल अघोष आ तेसर, चारिम आ पाँचम भेल घोषवान्। य र ल व भेल अल्पप्राण घोष। श ष स भेल महाप्राण अघोष आ ह भेल महाप्राण घोष।स्वर होइछ अल्पप्राण, उदात्त, अनुदात्त आ स्वरित। छन्दोबद्ध रचना पद्य कहबैत अछि-अन्यथा ओ गद्य थीक। छन्द माने भेल एहन रचना जे आनन्द प्रदान करए । मुदा एहिसँ ई नहि बुझबाक चाही जे आजुक नव कविता गद्य कोटिक अछि कारण वेदक सावित्री-गायत्री मंत्र सेहो शिथिल/ उदार नियमक कारण, सावित्री मंत्र गायत्री छंद, मे परिगणित होइत अछि तकर चरचा नीचाँ जा कए होएत - जेना यदि अक्षर पूरा नहि भेल तँ एक आकि दू अक्षर प्रत्येक पादकेँ बढ़ा लेल जाइत अछि। य आ व केर संयुक्ताक्षरकेँ क्रमशः इ आ उ लगा कए अलग कएल जाइत अछि। जेना- वरेण्यम्=वरेणियम् स्वः= सुवः। आजुक नव कविताक संग हाइकू/ क्षणिका/ हैकूक लेल मैथिली भाषा आ भारतीय, संस्कृत आश्रित लिपि व्यवस्था सर्वाधिक उपयुक्त्त अछि। तमिल छोड़ि शेष सभटा दक्षिण आ समस्त उत्तर-पश्चिमी आ पूर्वी भारतीय लिपि आ देवनागरी लिपि मे वैह स्वर आ कचटतप व्यञ्जन विधान अछि, जाहिमे जे लिखल जाइत अछि सैह बाजल जाइत अछि। मुदा देवनागरीमे ह्रस्व “इ” एकर अपवाद अछि, ई लिखल जाइत अछि पहिने, मुदा बाजल जाइत अछि बादमे। मुदा मैथिलीमे ई अपवाद सेहो नहि अछि- यथा 'अछि' ई बाजल जाइत अछि अ ह्र्स्व 'इ' छ वा अ इ छ। दोसर उदाहरण लिअ- राति- रा इ त। तँ सिद्ध भेल जे हैकूक लेल मैथिली सर्वोत्तम भाषा अछि। एकटा आर उदाहरण लिअ। सन्धि संस्कृतक विशेषता अछि, मुदा की इंग्लिशमे संधि नहि अछि ? तँ ई की अछि - आइम गोइङ टूवार्ड्सदएन्ड। एकरा लिखल जाइत अछि- आइ एम गोइङ टूवार्ड्स द एन्ड। मुदा पाणिनि ध्वनि विज्ञानक आधार पर संधिक निअम बनओलन्हि, मुदा इंग्लिशमे लिखबा कालमे तँ संधिक पालन नहि होइत छै, आइ एम केँ ओना आइम फोनेटिकली लिखल जाइत अछि, मुदा बजबा काल एकर प्रयोग होइत अछि। मैथिलीमे सेहो यथासंभव विभक्त्ति शब्दसँ सटा कए लिखल आ बाजल जाइत अछि। छन्द दू प्रकारक अछि।मात्रा छन्द आ वर्ण छन्द । वेदमे वर्णवृत्तक प्रयोग अछि मात्रिक छन्दक नहि । वार्णिक छन्दमे वर्ण/ अक्षरक गणना मात्र होइत अछि। हलंतयुक्त अक्षरकेँ नहि गानल जाइत अछि। एकार उकार इत्यादि युक्त अक्षरकेँ ओहिना एक गानल जाइत अछि जेना संयुक्ताक्षरकेँ। संगहि अ सँ ह केँ सेहो एक गानल जाइत अछि। एकसँ बेशी मान कोनो वर्ण/ अक्षरक नहि होइछ। मोटा-मोटी तीनटा बिन्दु मोन राखू- १. हलंतयुक्त अक्षर-० २. संयुक्त अक्षर-१ ३. अक्षर अ सँ ह -१ प्रत्येक। आब पहिल उदाहरण देखू- ई अरदराक मेघ नहि मानत रहत बरसि के=१+५+२+२+३+३+३+१=२० आब दोसर उदाहरण देखू पश्चात्=२ आब तेसर उदाहरण देखू आब=२ आब चारिम उदाहरण देखू स्क्रिप्ट=२ मुख्य वैदिक छन्द सात अछि- गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पङ्क्ति, त्रिष्टुप् आ जगती। शेष ओकर भेद अछि, अतिछन्द आ विच्छन्द। एतए छन्दकेँ अक्षरसँ चिन्हल जाइत अछि। जे अक्षर पूरा नहि भेल तँ एक आकि दू अक्षर प्रत्येक पादमे बढ़ा लेल जाइत अछि। य आ व केर संयुक्ताक्षरकेँ क्रमशः इ आ उ लगा कए अलग कएल जाइत अछि। जेना- वरेण्यम्=वरेणियम् स्वः= सुवः गुण आ वृद्धिकेँ अलग कए सेहो अक्षर पूर कए सकैत छी। ए = अ + इ ओ = अ + उ ऐ = अ/आ + ए औ = अ/आ + ओ छन्दः शास्त्रमे प्रयुक्त ‘गुरु’ आ ‘लघु’ छंदक परिचय प्राप्त करू। तेरह टा स्वर वर्णमे अ,इ,उ,ऋ,लृ ई पाँच ह्र्स्व आर आ,ई,ऊ,ऋ,ए.ऐ,ओ,औ, ई आठ दीर्घ स्वर अछि। ई स्वर वर्ण जखन व्यंजन वर्णक संग जुड़ि जाइत अछि तँ ओकरासँ ‘गुणिताक्षर’ बनैत अछि। क्+अ= क, क्+आ=का । एक स्वर मात्रा आकि एक गुणिताक्षरकेँ एक ‘अक्षर’ कहल जाइत अछि। कोनो व्यंजन मात्रकेँ अक्षर नहि मानल जाइत अछि- जेना ‘अवाक्’ शब्दमे दू टा अक्षर अछि, अ, वा । १. सभटा ह्रस्व स्वर आ ह्रस्व युक्त गुणिताक्षर ‘लघु’ मानल जाइत अछि। एकरा ऊपर U लिखि एकर संकेत देल जाइत अछि। २. सभटा दीर्घ स्वर आर दीर्घ स्वर युक्त गुणिताक्षर ‘गुरु’ मानल जाइत अछि, आ एकर संकेत अछि, ऊपरमे एकटा छोट -। ३. अनुस्वार किंवा विसर्गयुक्त सभ अक्षर गुरू मानल जाइत अछि। ४. कोनो अक्षरक बाद संयुक्ताक्षर किंवा व्यंजन मात्र रहलासँ ओहि अक्षरकेँ गुरु मानल जाइत अछि। जेना- अच्, सत्य। एहिमे अ आ स दुनू गुरु अछि। ५. जेना वार्णिक छन्द/ वृत्त वेदमे व्यवहार कएल गेल अछि तहिना स्वरक पूर्ण रूपसँ विचार सेहो ओहि युग सँ भेटैत अछि। स्थूल रीतिसँ ई विभक्त अछि:- १. उदात्त २. उदात्ततर ३. अनुदात्त ४. अनुदात्ततर ५. स्वरित ६. अनुदात्तानुरक्तस्वरित, ७. प्रचय (एकटा श्रुति-अनहत नाद जे बिना कोनो चीजक उत्पन्न होइत अछि, शेष सभटा अछि आहत नाद जे कोनो वस्तुसँ टकरओला पर उत्पन्न होइत अछि)। १. उदात्त- जे अकारादि स्वर कण्ठादि स्थानमे ऊर्ध्व भागमे बाजल जाइत अछि। एकरा लेल कोनो चेन्ह नहि अछि। २. उदातात्तर- कण्ठादि अति ऊर्ध्व स्थानसँ बाजल जाइत अछि। ३. अनुदात्त- जे कण्ठादि स्थानमे अधोभागमे उच्चारित होइछ।नीचाँमे तीर्यक चेन्ह खचित कएल जाइछ। ४. अनुदातात्ततर- कण्ठादिसँ अत्यंत नीचाँ बाजल जाइत अछि। ५. स्वरित- जाहिमे अनुदात्त रहैत अछि किछु भाग, आ किछु रहैत अछि उदात्त। ऊपरमे ठाढ़ रेखा खेंचल जाइत अछि, एहिमे। ६. अनुदाक्तानुरक्तस्वरित- जाहिमे उदात्त, स्वरित किंवा दुनू बादमे होइछ, ई तीन प्रकारक होइछ। ७. प्रचय-स्वरितक बादक अनुदात्त रहलासँ अनाहत नाद प्रचयक,तानक उत्पत्ति होइत अछि। १. पूर्वार्चिकमे क्रमसँ अग्नि, इन्द्र आ सोम पयमानकेँ संबोधित गीत अछि।तदुपरान्त आरण्यक काण्ड आ महानाम्नी आर्चिक अछि।आग्नेय, ऐन्द्र आ पायमान पर्वकेँ ग्रामगेयण आ पूर्वार्चिकक शेष भागकेँ आरण्यकगण सेहो कहल जाइछ। सम्मिलित रूपेँ एक प्रकृतिगण कहैत छी। २.उत्तरार्चिक: विकृति आ उत्तरगण सेहो कहैत छी। ग्रामगेयगण आ आरण्यकगणसँ मंत्र चुनि कय क्रमशः उहगण आ ऊह्यगण कहबैछ- तदन्तर प्रत्येक गण दशरात्र, संवत्सर, एकह, अहिन, प्रायश्चित आ क्षुद्र पर्वमे बाँटल जाइछ। पूर्वार्चिक मंत्रक लयकेँ स्मरण क’ उत्तरार्चिक केर द्विक, त्रिक, आ चतुष्टक आदि (२,३, आ ४ मंत्रक समूह) मे एहि लय सभक प्रयोग होइछ। अधिकांश त्रिक आदि प्रथम मंत्र पूर्वार्चिक होइत अछि, जकर लय पर पूरा सूक्त (त्रिक आदि) गाओल जाइछ। उत्तरार्चिक उहागण आ उह्यगण प्रत्येक लयकेँ तीन बेर तीन प्रकारेँ पढ़ैछ। वैदिक कर्मकाण्डमे प्रस्ताव, प्रस्तोतर द्वारा, उद्गीत उदगातर द्वारा, प्रतिघार प्रतिहातर द्वारा, उपद्रव पुनः उदगातृ द्वारा आ निधान तीनू द्वारा मिलि कय गाओल जाइछ। प्रस्तावक पहिने हिंकार (हिं,हुं,हं) तीनू द्वारा आ ॐ उदगातृ द्वारा उदगीतक पहिने गाओल जाइछ। ई पाँच भक्त्ति भेल। हाथक मुद्रा- हाथक मुद्रा १.१.औँठा(प्रथम आँगुर)-एक यव दूरी पर २.२. औँठा प्रथम आँगुरकेँ छुबैत ३.३. औँठा बीच आँगुरकेँ छुबैत ४.४. औँठा चारिम आँगुरकेँ छुबैत ५.५. औँठा पाँचम आँगुरकेँ छुबैत ६.११. छठम क्रुष्ट औँठा प्रथम आँगुरसँ दू यव दूरी पर ७.६. सातम अतिश्वर सामवेद ८.७. अभिगीत ऋग्वेद ग्रामगेयगान- ग्राम आ सार्वजनिक स्थल पर गाओल जाइत छल। आरण्यक गेयगान- वन आ पवित्र स्थानमे गाओल जाइत छल। ऊहगान- सोमयाग एवं विशेष धार्मिक अवसर पर। पूर्वार्चिकसँ संबंधित ग्रामगेयगान एहि विधिसँ। ऊह्यगान आकि रहस्यगान- वन आ पवित्र स्थान पर गाओल जाइत अछि। पूर्वार्चिकक आरण्यक गानसँ संबंध। नारदीय शिक्षामे सामगानक संबंधमे निर्देश:- १.स्वर-७ ग्राम-३ मूर्छना-२१ तान-४९ सात टा स्वर सा,रे,ग,म,प,ध,नि, आ तीन टा ग्राम-मध्य,मन्द,तीव्र। ७*३=२१ मूर्छना। सात स्वरक परस्पर मिश्रण ७*७=४९ तान। ऋगवेदक प्रत्येक मंत्र गौतमक २ सामगान (पर्कक) आ काश्यपक १ सामगान (पर्कक) कारण तीन मंत्रक बराबर भऽ जाइत अछि। मैकडॉवेल इन्द्राग्नि, मित्रावरुणौ, इन्द्राविष्णु, अग्निषोमौ एहि सभकेँ युगलदेवता मानलन्हि अछि। मुदा युगलदेव अछि –विशेषण-विपर्यय। वेदपाठ- १. संहिता पाठ अछि शुद्ध रूपमे पाठ। अ॒ग्निमी॑ळे पुरोहि॑त य॒घ्यस्य॑दे॒वम्त्विज॑म।होतार॑रत्न॒ धातमम्। २. पद पाठ- एहिमे प्रत्येक पदकें पृथक कए पढ़ल जाइत अछि। ३. क्रमपाठ- एतय एकक बाद दोसर, फेर दोसर तखन तेसर, फेर तेसर तखन चतुर्थ। एना कए पाठ कएल जाइत अछि। ४. जटापाठ- एहिमे ज्योँ तीन टा पद क, ख, आ ग अछि तखन पढ़बाक क्रम एहि रूपमे होएत। कख, खक, कख, खग, गख, खग। ५. घनपाठ-एहि मे ऊपरका उदाहरणक अनुसार निम्न रूप होयत- कख,खक,कखग,गखक,कखग। ६. माला, ७. शिखा, ८. रेखा, ९. ध्वज, १०. दण्ड, ११. रथ। अंतिम आठकेँ अष्टविकृति कहल जाइत अछि। साम विकार सेहो ६ टा अछि, जे गानकेँ ध्यानमे रखैत घटाओल, बढ़ाओल जा सकैत अछि। १. विकार-अग्नेकेँ ओग्नाय। २. विश्लेषण- शब्द/पदकेँ तोड़नाइ ३. विकर्षण-स्वरकेँ खिंचनाई/अधिक मात्राक बड़ाबर बजेनाइ। ४. अभ्यास- बेर-बेर बजनाइ।५. विराम- शब्दकेँ तोड़ि कय पदक मध्यमे ‘यति’। ६. स्तोभ-आलाप योग्य पदकेँ जोड़ि लेब। कौथुमीय शाखा ‘हाउ’ ‘राइ’ जोड़ैत छथि। राणानीय शाखा ‘हावु’, ‘रायि’ जोड़ैत छथि। मात्रिक छन्दक प्रयोग वेदमे नहि अछि वरन् वर्णवृत्तक प्रयोग अछि आ गणना पाद वा चरणक अनुसार होइत रहए। मुख्य छन्द गायत्री, एकर प्रयोग वेदमे सभसँ बेशी अछि। तकर बाद त्रिष्टुप आ जगतीक प्रयोग अछि। १. गायत्री- ८-८ केर तीन पाद। दोसर पादक बाद विराम। वा एक पदमे छह टा अक्षर। २. त्रिष्टुप- ११-११ केर ४ पाद। ३. जगती- १२-१२ केर ४ पाद। ४. उष्णिक- ८-८ केर दू तकर बाद १२ वर्ण-संख्याक पाद। ५. अनुष्टुप- ८-८ केर चारि पाद। एकर प्रयोग वेदक अपेक्षा संस्कृत साहित्यमे बेशी अछि। ६. बृहती- ८-८ केर दू आ तकरा बाद १२ आ ८ मात्राक दू पाद। ७. पंक्त्ति- ८-८ केर पाँच। प्रथम दू पदक बाद विराम अबैछ। यदि अक्षर पूरा नहि होइत अछि, तँ एक वा दू अक्षर निम्न प्रकारेँ घटा-बढ़ा लेल जाइत अछि। (अ) वरेण्यम् केँ वरेणियम् स्वः केँ सुवः। (आ) गुण आ वृद्धि सन्धिकेँ अलग कए लेल जाइत अछि। ए= अ + इ ओ= अ + उ ऐ= अ/आ + ए औ= अ/आ + ओ अहू प्रकारेँ नहि पुरलापर अन्य विराडादि नामसँ एकर नामकरण होइत अछि। यथा- गायत्री (२४)- विराट् (२२), निचृत् (२३), शुद्धा (२४), भुरिक् (२५), स्वराट्(२६)। ॐ भूर्भुवस्वः । तत् सवितुर्वरेण्यं। भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् । वैदिक ऋषि स्वयंकेँ आ देवताकेँ सेहो कवि कहैत छथि। सम्पूर्ण वैदिक साहित्य एहि कवि चेतनाक वाङ्मय मूर्त्ति अछि। ओतए आध्यात्म चेतना, अधिदैवत्वमे उत्तीर्ण भेल अछि, एवम् ओकरा आधिभौतिक भाषामे रूप देल गेल अछि। वैदिक (छन्दस् ) आ लौकिक संस्कृत (भाषा) क व्याकरण : वैदिक आ लौकिक दुनू संस्कृतमे संज्ञा, सर्वनाम आ विशेषणक पुल्लिंग, स्त्रीलिंग आ नपुंसक लिंग, तीन वचन- एक, दू आ बहुवचन रहल, पुल्लिंग, स्त्रीलिंग आ नपुंसक लिंग लिंगक द्योतक नहि अछि, दारा- पुल्लिंग, कलत्र- नपुंसक लिंग आ भार्या- स्त्रीलिंग; मुदा तीनू पत्नीक पर्यायवाची अछि। तहिना ईश्वरः (पुल्लिंग), ब्रह्म (नपुंसक लिंग) आ चितिः (स्त्री लिंग) होइत अछि। संज्ञा, सर्वनाम आ विशेषणक आठटा कारक (विभक्ति) सेहो होइत अछि। दस गणक धातुक रूप परस्मैपदी (फल दोसराकेँ), आत्मनेपदी (फल अपनाकेँ) आ उभयपदी ई तीन तरहक होइत अछि। कर्तृ, कर्म आ भव ई तीन वाच्य आ बारह लकार (लट्, लिट्, लङ्, लुङ्, लुट्, लृट्, लोट्, विधिलिंङ्, आर्शीलिंङ्, लृङ्, लेट् आ लेङ् ) होइत अछि। लेट् आ लेङ् लकार लौकिक संस्कृत (भाषा) मे नहि होइत अछि। संस्कृतमे तीनटा पुरुष- प्रथम (आन भाषाक अन्य पुरुष) , मध्यम आ उत्तम होइत अछि।उद्देश्य आ विधेय; कर्ता आ क्रिया; विशेष्य आ विशेषण आ संज्ञा आ सर्वनामक परस्पर गुण-समानता रहैत छै। वैदिक संस्कृतमे गीतात्मक आ बलात्मक स्वराघात रहए मुदा लौकिक संस्कृतमे खाली बलात्मक स्वराघात रहि गेल। वैदिक उच्चारण उदात्त, अनुदात्त आ स्वरित (संगीतशास्त्रक आरोह, अवरोह आ सम सँ तुलना द्रष्टव्य) लौकिक उच्चारणमे खतम भऽ गेल। वैदिक छन्दमे एक चरण, जकरा पाद कहैत छिऐ ओहि पादमे वर्णक गनती होइत अछि। छन्दमे गति (लय) आ यति (विराम) सेहो होइत अछि। ह्रस्व स्वर लघु होइत अछि, ह्रस्वक बाद संयुक्त वर्ण अएलासँ लघु स्वर गुरु स्वर भऽ जाइत अछि। उपसर्ग: लौकिक संस्कृतमे उपसर्ग क्रियासँ पहिने अबैत अछि मुदा वैदिक संस्कृतमे पहिने, बादमे, अलगसँ आ कतहु अन्तरालक बाद सेहो अबैत अछि। संगहि वैदिक संस्कृतमे जे एक बेर उपसर्ग क्रियाक संग आबि गेल तँ तकरा बाद ओहि मंत्रमे मात्र उपसर्गक प्रयोग होएत आ वैह उपसर्गयुक्त क्रियाक द्योतक होएत। समास: वैदिक संस्कृतमे समासमे सेहो कखनो काल भिन्नता छै, जेना अष्टक बाद कोनो शब्द होइ तँ ओ अष्टा भऽ जाइ छै- अष्टापदी। पितृ आ मातृक द्वन्द्व समास भेलापर दुनूमे आ लगै छै आ गुण होइ छै- पितरामातरा। लेट लकार: लौकिक संस्कृतमे लेट लकारक प्रयोग नहि होइत अछि मुदा वैदिक संस्कृतमे होइत अछि जेना भवाति, पताति लौकिकमे मात्र भवति, पततिसँ निदृष्ट होइत अछि। वैदिक आ लौकिक संस्कृत कोनो दू भाषा नहि अछि वरन् लौकिक संस्कृत, वैदिक संस्कृतिक सरल रूप अछि। वैदिक संस्कृतमे लौकिक संस्कृतसँ सभ किछु बेशी अछि (अपवाद- लुट् आ लृट् लकारक वैदिक संस्कृतमे कम उपयोग।) संहिता, ब्राह्मण ग्रंथ, आरण्यक आ उपनिषदक भाषा वैदिक संस्कृत कहल जाइत अछि आ तकर बादक संस्कृत लौकिक संस्कृत कहल जाइत अछि। दुनू संस्कृतमे धातु, शब्द आ अर्थ प्रायः एक्के अछि। दुनूमे तीन लिंग, तीन वचन आ तीन पुरुष होइत अछि। दुनूमे सभ शब्द प्रायः धातु अछि; रूढ़ शब्द बड्ड कम अछि। समास दुनूमे अछि, हँ लौकिक संस्कृतमे एकर बेशी प्रयोग देखबामे अबैत अछि। छन्द सेहो दुनूमे मोटा-मोटी एक्के रङक भेटत। धातुक गण मध्य विभाजन सेहो दुनूमे एक्के रङ भेटत। णिच्, सन् प्रत्यय दुनूमे एक्के रङ भेटत। पदक निर्माण दुनूमे एक्के तरीकासँ होइत अछि। सुप्-तिङ-कृत्-तद्धित दुनूमे एक्के रङ भेटत। दुनूमे शब्दक क्रम आगाँ पाछाँ भेने अर्थक परिवर्तन नहि होइत अछि। दुनूमे सन्धि, कारक आ विभक्ति होइत अछि। मुदा:- लौकिक संस्कृतमे उपध्मानीय आ जिह्वामूलीय ध्वनिक प्रयोग नहि होइत अछि आ तकर स्थानमे विसर्गसँ काज चलैत अछि। वैदिक संस्कृतमे ळ, ळह होइत अछि मुदा लौकिक संस्कृतमे नहि होइत अछि। वैदिक संस्कृतमे दू स्वर मध्य “ड” ळ भऽ जाइत अछि आ “ढ” ळह भऽ जाइत अछि। लौकिक संस्कृतमे से नहि अछि। ग्वाङ (ह्रस्व आ दीर्घ) लौकिक संस्कृतमे नहि अछि। यजुर्वेदमे ह, श, ष, स, र एहि सभसँ पूर्व अनुस्वार ग्वाङ भऽ जाइत अछि। उदात्त, अनुदात्त आ स्वरितक उच्चारण लौकिक संस्कृतमे स्पष्ट रूपसँ नहि होइत अछि। वैदिक संस्कृतमे लेट् लकारक प्रयोग होइत अछि, लौकिक संस्कृतमे नहि। वैदिक संस्कृतमे उपसर्ग धातुसँ पृथक् मुदा लौकिक संस्कृतमे संगमे प्रयोग होइत अछि। वैदिक संस्कृतमे कृत् प्रत्ययक तुमुन् से, सेन्, असे, अध्यै इत्यादि १५ टा प्रत्ययक प्रयोग होइत अछि मुदा लौकिक संस्कृतमे खाली “तुम्” प्रत्ययक प्रयोग होइत अछि। वैदिक संस्कृतक सन्धि निअम शिथिल होइत अछि मुदा लौकिक संस्कृतक दृढ़ होइत अछि। वैदिक कतेको शब्दक अर्थ लौकिक संस्कृतमे बदलि गेल अछि। जेना असुर वैदिक संस्कृतमे शक्तिवानकेँ कहल जाइत छल मुदा लौकिक संस्कृतमे राक्षसकेँ कहल जाइत अछि। धातुरूप सेहो वैदिक संस्कृतमे भिन्न अछि, अन्तिम स्वर दीर्घ सेहो होइत अछि। जेना चक्र- चक्रा: द्वित्वक अभाव होइत अछि जेना “ददाति”क स्थानमे “दाति”; कखनो काल परस्मैपदिक स्थानमे आत्म्नेपद आ आत्मनेपदिक स्थानमे परस्मैपद धातुक प्रयोग होइत अछि; शप् स्थानपर कखनो काल दोसर गणक विकरणक प्रयोग होइत अछि। वैदिक संस्कृतमे शब्द रूप, धातु रूप, प्रत्ययक विविधता बेशी अछि। वैदिक संस्कृतक काल-पुरुष-वचन-लिंगक ऐच्छिक परिवर्तन लौकिक संस्कृतमे मोटामोटी खतम भऽ गेल अछि। वैदिक संस्कृतक अच्, अम्, जिन्व्, पिन्व् आदि धातु लौकिक संस्कृतमेप्रयोग नहि होइत अछि। वैदिक संस्कृतमे तर-तम प्रत्यय संज्ञा शब्द सन आ लौकिक संस्कृतमे विशेषण सन प्रयुक्त होइत अछि। छन्दक हिसाबसँ वैदिक संस्कृतमे स्वर्-सुवर् आ दर्शत, दरशत लिखि लेल जाइत अछि। मुदा लौकिक संस्कृतमे से नहि होइत अछि। वैदिक संस्कृतमे “आन्” पदक अन्तमे रहलापर आ तकर बाद अ, इ, उ स्वर अएलापर न् लुप्त भऽ जाइत अछि आ आकारक बाद अनुस्वार भऽ जाइत अछि। जेना महान् इन्द्रः= महा इन्द्रः। लौकिक संस्कृतमे से नहि होइत अछि। वैदिक संस्कृत:-धातुरूप:- लट् लकार मध्यमपुरुष बहुवचन परस्मैपदि धातु थ, त, थन, तन ई चारू प्रत्यय लगैत अछि। जेना वद्- वदथ, वदथन, वदत, वदतन। लट् लकार उत्तमपुरुष-बहुवचन परस्मैपदि धातु मस् (मः), मसि ई दूटा प्रत्यय प्रयोग होइत अछि। जेना नाशयामः- नाशयामसि। इमः –इमसि। स्मः- स्मसि। लोट् लकारक मध्यमपुरुष एकवचन परस्मैपदि धातुमे हि, धि ई दूटा प्रत्यय होइत अछि। जेना श्रुणुहि, श्रुणुधि। लोट् लकार मध्यमपुरुष बहुवचन आत्मनेपद धातुमे ध्वम् आ ध्वात् ई दूटा प्रत्यय होइत अछि। जेना वारयध्वम्, वारयध्वात्। (छन्दसि लुङ् लङ् लिटः):- वैदिक संस्कृतमे लुङ्, लङ् आ लिट् लकारक प्रयोग लोट्, लट् लकारक अर्थमे प्रयोग होइत अछि। जेना आगमत् (वैदिक लुङ्)= आगच्छतु (लोट)। अवृणीत (वैदिक लङ्)= वृणीते (लट्)। ममार (वैदिक लिट्)= म्रियते (लट्)। वैदिक संस्कृत:-शब्दरूप:- [संस्कृत (सं= स्+म- ई ठीक अछि; एकर उच्चारण सं= स्+न गलत अछि।)] वैदिक संस्कृतमे शब्दरूपक भिन्नता लौकिकसँ बेशी होइत अछि। जेना अकारान्त पुल्लिंग देवः प्रथमा-स्वितीया-सम्बोधन-द्विवचन वैदिकमे देवा, देवौ दुनू होइत अछि मुदा लौकिकमे मात्र देवौ होइत अछि। प्रथमा-सम्बोधन-बहुवचन वैदिकमे देवासः, देवाः मुदा लौकिकमे मात्र देवाः होइत अछि। तृतीया-एकवचन वैदिकमे देवा, देवेन दुनू होइत अछि मुदा लौकिकमे मात्र देवेन होइत अछि। तृतीया-बहुवचन वैदिकमे देवेभिः, देवैः मुदा लौकिकमे देवैः होइत अछि। तहिना वैदिक संस्कृतमे ऋकारान्त शब्दक रूप पुल्लिंग-स्त्रीलिंगमे लौकिक संस्कृत जेकाँ होइत अछि, खाली प्रथमा-द्वितीया-सम्बोधन-द्विवचनमे दू रूप होइत अछि। जेना दातृ- दातारा, दातारौ। पितृ- पितरा, पितरौ। मातृ- मातरा, मातरौ। अस्मद्:- प्रथमा-द्विवचन वैदिक- वाम्, आवम्; लौकिक आवाम्। चतुर्थी-एकवच वैदिक- मह्य, मह्यम्; लौकिक- मह्यम्। पञ्चमी-द्विवचन वैदिक आवत्, आवाभ्याम्; लौकिक- आवाभ्याम्। सप्तमी-बहुवचन वैदिक-अस्मे, अस्मासु; लौकिक- अस्मासु। छन्द:- पिङ्गल मुनिक छन्द शास्त्रक आठमे सँ पहिल चारिम अध्यायक सातम सूत्र धरि वैदिक छन्दक आ तकरा बाद लौकिक छन्दक वर्णन अछि। वैदिक छन्दमे अक्षरक गणना होइत अछि। ओतए लघु आ गुरुक विचार नहि होइत अछि। ऋगवेदमे सभसँ बेशी त्रिष्टुप्, फेर गायत्री आ तखन जगती छन्दक प्रयोग भेल अछि। त्रिष्टुप्- ४४ अक्षर- ११ अक्षरक ४ पाद; गायत्री- २४ अक्षरक (ई २,३,४,५ पदक होइत अछि), सभसँ बेशी लोकप्रिय ८ अक्षरक तीन पादक गायत्री जाहिमे दोसर पादक बाद विराम होइत अछि। २३ अक्षरक गायत्री निचृद् गायत्री, २२ अक्षरक गायत्री विराड् गायत्री, २५ अक्षरक गायत्री भुरिग् गायत्री, २६ अक्षरक गायत्री स्वराड् गायत्री कहल जाइत अछि। सभ पादमे एक अक्षर कम भेलासँ “पादनिचृद् गायत्री” कहल जाइत अछि। जगती- ४८ अक्षर- १२ अक्षरक चारि पाद। पाठ:- वैदिक संस्कृतकेँ स्मरण रखबाक कएकटा विधि अछि। संहिता पाठ- मूलमंत्र सन्धि सहित सस्वर पढ़ल जाइत अछि। पदपाठ- मन्त्रक पदक पृथक पाठ होइत अछि। क्रमपाठ- क्रमसँ दू पदक पाठ होइत अछि। जटापाठ- अनुलोम १-२, विलोम २-१, अनुलोम १-२ शिखापाठ- जटापाठमे परिवर्तित उत्तरपदक योगसँ शिखापाठ होइत अछि। घनपाठ- शिखामुक्त विपर्यक पदक पुनः पाठ होइत अछि। वैदिक संस्कृतमे यज्ञ आ अध्यात्मिक विषयक चर्च होइत अछि। लौकिक संस्कृतमे इहलौकिक विषयवस्तु सेहो अबैत अछि। २.प्राकृत संस्कृतसँ पहिने प्राकृत रहए वा बादमे ई विवादक विषय भऽ सकैत अछि कारण ऋगवेदक शिथिर, दूलभ, इन्दर आदि शब्द जनभाषाक साहित्यीकरणक प्रमाण अछि। ओना एकर प्रारम्भिक प्रयोग अशोकक अभिलेखसँ तेरहम शताब्दी ई. धरि भेटि जाएत मुदा पारिभाषिक रूपमे जाहि प्राकृतक एतए चर्चा भऽ रहल अछि ओ पहिल ई.सँ छठम ई. धरि साहित्यक भाषा दू अर्थे रहल। पहिल संस्कृत साहित्यक नाटकमे जन सामान्य आ स्त्री पात्र लेल शौरसेनी, महाराष्ट्री आ मागधीक (वररुचि चारिम प्राकृतमे पैशाचीक नाम जोड़ै छथि) प्रयोग सेहो भेल (कालिदासक अभिज्ञान शाकुन्तलम्, मालविकाग्निमित्रम्, शूद्रकक मृच्छकटिकम्, श्रीहर्षक रत्नावली, भवभूतिक उत्तररामचरित, विशाखादत्तक मुद्राराक्षस) आ दोसर जे फेर एहि प्राकृत सभमे साहित्यक निर्माण स्वतंत्र रूपेँ होमए लागल। फेर एहि प्राकृत भाषाकेँ सेहो व्याकरणमे बान्हल गेल आ तखन ई भाषा अलंकृत होमए लागल आ अपभ्रंश आ अवहट्ठक प्रयोग लोक करए लगलाह, ओना अपभ्रंश प्राकृतक संग प्रयोग होइत रहए तकर प्रमाण सेहो उपलब्ध अछि। अशोकक अभिलेखमे शाहबाजगढ़ी आ मानसेराक अभिलेख उत्तर-पच्छिम, कलसी, मध्य, धौली, जौगड़ पूर्व आ गिरनार दक्षिण पच्छिमक जनभाषाक क्षेत्रीय प्रकारक दर्शन करबैत अछि। राजशेखर प्राकृतकेँ मिट्ठ आ संस्कृतकेँ कठोर कहै छथि (विद्यापति पछाति कहै छथि देसिल बयना सभ जन मिट्ठा)। प्राचीन प्राकृत पालीकेँ कहल जाइत अछि जाहिमे अशोकक अभिलेख, महवंश आ जातक लिखल गेल। मध्य प्राकृतमे साहित्यिक प्राकृत अबैत अछि। बादक प्राकृतमे अपभ्रंश आ अवहट्ठ अबैत अछि। मोटा-मोटी गद्य लेल शौरसेनी, पद्य लेल महाराष्ट्री आ धार्मिक साहित्य लेल मागधी-अर्धमागधीक प्रयोग भेल। नाटकमे स्त्री-विदूषक बजैत रहथि शौरसेनीमे मुदा पद्य कहथि महाराष्ट्रीमे, नाटकक तथाकथित निम्न श्रेणीक लोक मागधी बजैत छलाह। प्राकृतमे सुप् तिङ् धातुक संग मिज्झर भऽ जाइत अछि। प्राकृतमे धातुरूप १-२ प्रकारक (भ्वादिगण जेकाँ) आ शब्दरूप ३-४ (अकारान्त जेकाँ) प्रकारक रहि गेल, माने दुनू रूप कम भऽ गेल। मुदा एहिसँ अर्थमे अस्पष्टता आएल जकर निवारण कारकक चेन्ह कएलक। चतुर्थी, द्विवचन, लङ् लिट् लुङ् आत्म्नेपद आदिक अभाव भऽ गेल प्रथमा आ द्वितीयाक बहुवचन एक भऽ गेल। ध्वनि परिवर्तन भेल। ऋ, ऐ, औ, य, श, ष आ विसर्गक अभाव भेल (अपवाद मागधीमे य आ श अछि मुदा स नहि)। अन्तमे आएल व्यंजन लुप्त भेल (ह्रस्व स्वरक बाद दू आ दीर्घ स्वरक बाद एकसँ बेशी व्यंजन नहि रहि सकैत अछि।) २.प्राकृत संस्कृतसँ पहिने प्राकृत रहए वा बादमे ई विवादक विषय भऽ सकैत अछि कारण ऋगवेदक शिथिर, दूलभ, इन्दर आदि शब्द जनभाषाक साहित्यीकरणक प्रमाण अछि। ओना एकर प्रारम्भिक प्रयोग अशोकक अभिलेखसँ तेरहम शताब्दी ई. धरि भेटि जाएत मुदा पारिभाषिक रूपमे जाहि प्राकृतक एतए चर्चा भऽ रहल अछि ओ पहिल ई.सँ छठम ई. धरि साहित्यक भाषा दू अर्थे रहल। पहिल संस्कृत साहित्यक नाटकमे जन सामान्य आ स्त्री पात्र लेल शौरसेनी, महाराष्ट्री आ मागधीक (वररुचि चारिम प्राकृतमे पैशाचीक नाम जोड़ै छथि) प्रयोग सेहो भेल (कालिदासक अभिज्ञान शाकुन्तलम्, मालविकाग्निमित्रम्, शूद्रकक मृच्छकटिकम्, श्रीहर्षक रत्नावली, भवभूतिक उत्तररामचरित, विशाखादत्तक मुद्राराक्षस) आ दोसर जे फेर एहि प्राकृत सभमे साहित्यक निर्माण स्वतंत्र रूपेँ होमए लागल। फेर एहि प्राकृत भाषाकेँ सेहो व्याकरणमे बान्हल गेल आ तखन ई भाषा अलंकृत होमए लागल आ अपभ्रंश आ अवहट्ठक प्रयोग लोक करए लगलाह, ओना अपभ्रंश प्राकृतक संग प्रयोग होइत रहए तकर प्रमाण सेहो उपलब्ध अछि। अशोकक अभिलेखमे शाहबाजगढ़ी आ मानसेराक अभिलेख उत्तर-पच्छिम, कलसी, मध्य, धौली, जौगड़ पूर्व आ गिरनार दक्षिण पच्छिमक जनभाषाक क्षेत्रीय प्रकारक दर्शन करबैत अछि। राजशेखर प्राकृतकेँ मिट्ठ आ संस्कृतकेँ कठोर कहै छथि (विद्यापति पछाति कहै छथि देसिल बयना सभ जन मिट्ठा)। प्राचीन प्राकृत पालीकेँ कहल जाइत अछि जाहिमे अशोकक अभिलेख, महवंश आ जातक लिखल गेल। मध्य प्राकृतमे साहित्यिक प्राकृत अबैत अछि। बादक प्राकृतमे अपभ्रंश आ अवहट्ठ अबैत अछि। मोटा-मोटी गद्य लेल शौरसेनी, पद्य लेल महाराष्ट्री आ धार्मिक साहित्य लेल मागधी-अर्धमागधीक प्रयोग भेल। नाटकमे स्त्री-विदूषक बजैत रहथि शौरसेनीमे मुदा पद्य कहथि महाराष्ट्रीमे, नाटकक तथाकथित निम्न श्रेणीक लोक मागधी बजैत छलाह। प्राकृतमे सुप् तिङ् धातुक संग मिज्झर भऽ जाइत अछि। प्राकृतमे धातुरूप १-२ प्रकारक (भ्वादिगण जेकाँ) आ शब्दरूप ३-४ (अकारान्त जेकाँ) प्रकारक रहि गेल, माने दुनू रूप कम भऽ गेल। मुदा एहिसँ अर्थमे अस्पष्टता आएल जकर निवारण कारकक चेन्ह कएलक। चतुर्थी, द्विवचन, लङ् लिट् लुङ् आत्म्नेपद आदिक अभाव भऽ गेल प्रथमा आ द्वितीयाक बहुवचन एक भऽ गेल। ध्वनि परिवर्तन भेल। ऋ, ऐ, औ, य, श, ष आ विसर्गक अभाव भेल (अपवाद मागधीमे य आ श अछि मुदा स नहि)। अन्तमे आएल व्यंजन लुप्त भेल (ह्रस्व स्वरक बाद दू आ दीर्घ स्वरक बाद एकसँ बेशी व्यंजन नहि रहि सकैत अछि।) न ण मे, य ज मे आ श, ष स मे परिवर्तित भऽ जाइत अछि। पदमे उत्तरपदक पहिल अक्षरक लोप भऽ जाइत अछि, मुदा से धातुरूप अछि तखन लोप नहि होइत अछि। जेना आर्यपुत्र= अज्जउत्त मुदा आगतम्= आगदं अनुदात्त अव्ययक पहिल अक्षरक लोप होइत अछि। जेना च= अ भू धातुक भ परिवर्तित भऽ ह भऽ जाइत अछि। जेना भवति= होइ क ख मे आ प फ मे बदलि जाइत अछि। पनस= फणस, क्रीड्= केल उच्चारण स्थानक परिवर्तनक क्रममे दन्त्य उच्चारण स्थान तालव्यमे बदलि जाइत अछि। जेना त् = च् मध्यक य लोपित भऽ जाइत अछि। क, ग, च, ज, त, द क सेहो किछु अपवादकेँ छोड़ि लोप होइत अछि। प, ब, व क लोप सेहो कखनो आल होइत अछि। जेना- प्रिय= पिअ, लोक= लोअ, अनुराग= अणुराअ, प्रचुर= पउर, भोजन= भोअण, रसातल= रसाअल, हृदय= हिअअ, रूप= रूअ, विबुध= विउह, वियोग= विओअ मध्यक क, त, प क्रमसँ ग, द, ब भऽ जाइत अछि। ख, घ, थ, घ, फ, भ ई सभ ह भऽ जाइत अछि। जेना नायकः= णाअगु, आगतः= आगदो, दीप=दीब=दीव। मुख= मुह, सखी= सही, मेघ= मेह, लघुक= लहुअ, यूथ= जूह, रुधिर= रुहिर, वधू= वहू, शाफर= साहर, अभिनव= अहिणव। कखनो काल मध्यक व्यंजन दोबर भऽ जाइत अछि। जेना एक= एक्क मध्यक ट, ठ क्रमसँ ड, ढ भऽ जाइत अछि। जेना कुटुम्ब= कुडुम्ब, पठन= पढण मध्यक प, ब परिवर्तित भऽ व बनि जाइत अछि। जेना दीप= दीव। शबर= सवर। ड, त, द परिवर्तित भऽ ल बनि जाइत अछि। जेना क्रीडा= कीला, सातवाहन= सालवाहण, दोहद= दोहल। म परिवर्तित भऽ व बनि जाइत अछि। जेना ग्राम= गाँव। अन्तिम स्प्रश वर्णक लोप होइत अछि, अन्तिम अनुनासिकमे अनुस्वार नहि होइत अछि, अः बदलि कऽ ओ भऽ जाइत अछि वा ओकर लोप भऽ जाइत अछि। मोटा-मोटी शब्दक प्रारम्भमे एकेटा व्यंजन आ मध्यमे बेशीसँ बेशी दूटा व्यंजन सेहो द्वित्वमे जेना क्क वा क्ख रूपमे रहैत अछि। व्यंजनक बलक अनुरूपेँ निम्न प्रकारक क्रम होइत अछि।(अ) कवर्ग, चवर्ग,, टवर्ग, तवर्ग, पवर्ग मे क (सभसँ बेशी बलगर) सँ भ (क्रमसँ कम बलगर) धरि, सभ वर्गक पाँचम वर्ण छोड़ि कऽ। जेना कवर्गक ङ, चवर्गक ञ, टवर्गक ण, तवर्गक न आ पवर्गक म छोड़ि कऽ। फेर (आ) कचटतप वर्गक पाँचम वर्ण। फेर (इ) ल, स, व, य, र। एहिमे समानबलक वर्णमे बादबला वर्ण प्रबल होइत अछि, अन्यथा अधिक बलबला बेशी बलगर होइत आछि। जेना- उत्पल= उप्पल, खड्ग= खग्ग, अग्नि= अग्गि। फेर जे कचटतप वर्गक पाँचम वर्णक ओही वर्गक कोनो दोसर वर्ण होएत तँ पाँचम वर्ण ओहिना रहत, नहि तँ ओकर परिवर्तन अनुस्वारमे भऽ जाएत। जेना क्रौञ्च= कोञ्च, दिङ्मुख= दिंमुह। दोसर पदक प्रारम्भमे ज्ञ रहलासँ ओ ज्ज बनि जाइत अछि। मनोज्ञ= मणोज्ज। कचटतप वर्गक बाद श, ष, स रहलासँ च्छ होइत अछि। जेना अप्सरा= अच्छरा, मत्सर= मच्छर। क्ष बदलि कऽ क्ख भऽ जाइत अछि।जेना दक्षिण= दक्खिण। शौरसेनीमे क्ष बदलि कऽ क्ख आ मागधीमे च्छ भऽ जाइत अछि। जेना कुक्षि= कुक्खि (शौरसेनी), कुच्छि (मागधी)। प्राकृतमे ऋ आ लृ स्वर नहि होइत अछि। ऋ बदलि कऽ (अ) रि भऽ जाइत अछि। जेना ऋषि= रिषि, (आ) अ भऽ जाइत अछि। जेना कृत= कद। (इ) इ भऽ जाइत अछि। जेना दृष्टि= दिट्ठि। (ई) उ भऽ जाइत अछि। जेना पृच्छति= पुच्छदि। ऐ, औ बदलि कऽ ए भऽ जाइत अछि। जेना कौमुदी= कोमुदी। संयुक्ताक्षरसँ पूर्व ह्रस्व स्वर रहैत अछि। उ बदलि कऽ अ वा ओ भऽ जाइत अछि। जेना मुकुल= मउल। पुस्तक= पोत्थअ। ऊ बदलि कऽ ओ भऽ जाइत अछि। जेना मूल्य= मोल्ल। ए बदलि कऽ इ भऽ जाइत अछि। जेना एतेन= एदिणा। ओ बदलि कऽ उ भऽ जाइत अछि। जेना अन्योन्य= अण्णुण्ण। अनुस्वार+ अपि= पि आ अनुस्वार+इति= ति भऽ जाइत अछि। खलु= ख भऽ जाइत अछि। य् बदलि कऽ इ भऽ जाइत अछि। जेना कथयतु= कधेतु। प्राकृतमे अन्तिम व्यंजनक लोप भऽ जाइत अछि। व्यंजन सन्धिक मोटा-मोटी अभाव रहैत अछि। स्वर सन्धिमे सेहो मध्य वर्णक लोप भेलोपर सन्धि नहि होइत अछि। शब्दरूपमे द्विवचन खतम भऽ गेल। चतुर्थीक रूप षष्ठीमे मिलि गेल। व्यंजन अन्तबला शब्द खतम भऽ गेल। धातुरूपमे शब्दरूपसँ बेशी अन्तर आएल। व्यंजन अन्तबला धातु खतम भऽ गेल। धातुरूप एक्के रीतिसँ चलए लागल, द्विवचन खतम भऽ गेल, रूपक भिन्नता कम भऽ गेल। आत्मनेपद रूप मोटा-मोटी खतम भऽ गेल। लिट्, लिङ्, लुङ् रूप सेहो मोटा-मोटी खतम भऽ गेल। भूतकाल लेल कृदन्त प्रत्ययक प्रयोग होमए लागल। भ्वादिगण आ चुरादिगणक अलाबे सभ गण खतम भऽ गेल। शौरसेनीमे द्य, र्ज्, र्य् बदलि कऽ ज्ज् भऽ जाइत अछि। शौरसेनी आ माहाराष्ट्री- संस्कृतक मध्यक त शौरसेनीमे द भऽ जाइत अछि मुदा माहाराष्ट्रीमे ओ लोपित भऽ जाइत अछि। जेना- संस्कृत- जानाति= शौरसेनी जाणादि= माहाराष्ट्री जाणाइ संस्कृतक मध्यक थ शौरसेनीमे घ मुदा माहाराष्ट्रीमे ह भऽ जाइत अछि। जेना संस्कृत अथ= शौरसेनी अघ= माहाराष्ट्री अह। दोसर पदक प्रारम्भमे ज्ञ रहलासँ मागधीमे ञ्ञ बनि जाइत अछि। मागधीमे श, ष, स ई तीनू परिवर्तित भऽ श; र परिवर्तित भऽ ल; ज परिवर्तित भऽ य बनि जाइत अछि। अकारान्त प्रथमा एकवचनमे ए लगैत अछि। जेना दरिद्र= दलिद्द। मागधीमे ज बदलि कऽ य भऽ जाइत अछि। मागधीमे द्य, र्ज्, र्य् बदलि कऽ य्य भऽ जाइत अछि। मागधीमे ण्य, न्य,ज्ञ,ञ्ज बदलि कऽ ञ्ञ भऽ जाइत अछि। मागधीमे मध्यक च्छ बदलि कऽ श्च भऽ जाइत अछि। मागधीमे ष्क= स्क वा श्क, ष्ट= स्ट वा श्ट, ष्प= स्प, ष्फ= स्फ भऽ जाइत अछि। मागधीमे र्थ बदलि कऽ स्त भऽ जाइत अछि। विधिलिङ् क प्रयोग जैन प्राकृत- अर्धमागधी आ जैन महाराष्ट्रीमे प्रचलित रहल, आन प्राकृतमे ई मोटा-मोटी खतम भऽ गेल। संस्कृतक तुम् शौरसेनीमे दुं, मागधीमे सेहो दुं रहैत अछि मुदा महाराष्ट्रीमे उं भऽ जाइत अछि। प्राकृतक शौरसेनी, मागधी, महाराष्ट्रीक अतिरिक्त पैशाची प्राकृतक सेहो उल्लेख भेटैत अछि। गुणाढ्यक वृहत्कथा एहि प्राकृतमे लिखल गेल जे आब स्वतंत्र रूपसँ उपलब्ध नहि अछि। एकर उल्लेख उद्धरण रूपमे कखनो काल भेटैत अछि। ई पश्चिमोत्तर भारतक प्राकृत छल, उद्धरण रूपमे उपलब्ध साहित्यक अनुसार एहिमे निम्न विशेषता छल। ण बदलि कऽ न भऽ गेल। र बदलि कऽ ल भऽ गेल। ल बदलि कऽ र भऽ गेल। सघोष अघोष बनि गेल। दू स्वरक बीचक ल बदलि कऽ ळ भऽ गेल। स्वरक बीचमे ष बदलि कऽ श वा स, ज्ञ बदलि कऽ न्य आ ण्य बदलि कऽ ञ्ञ भऽ गेल। एहिमे आत्मनेपद आ परस्मैपद दुनू अछि। पश्चिमोत्तरक खोतानसँ प्राकृत धम्मपद खरोष्ठी लिपिमे दहिनसँ वाम लिखल लेख प्राप्त होइत अछि जाहिमे श, ष, स तीनूक प्रयोग अछि। मोटा-मोटी प्राकृतमे शब्द-धातुरूपक सरलीकरणक प्रक्रिया दृष्टिगोचर होइत अछि, द्वित्व, मूर्धन्यीकरण, अघोषीकरण आ सघोषीकरण, लकारक बदला कृदन्तक प्रयोग सेहो बढ़ि गेल। प्राकृत आ पालि: प्राकृतसँ वैदिक संस्कृत बहार भेल आकि वैदिक संस्कृतसँ प्राकृत? वेदमे नाराशंसी नाम्ना जन आख्यान यएह सिद्धकरैत अछि जे दुनू समानान्तर रूपेँ बहुत दिन धरि चलल। ई समानान्तर परम्परा दुनूकेँ प्रभावित केलक। आब ऋगवेद देखू- ओतए दुर्लभ लेल- दूलभ, (ऋगवेद ४.९.८) प्रयोग की सिद्ध करैत अछि? अथर्ववेदमे पश्चात् लेल पश्चा (अथर्ववेद १०.४.१०) की सिद्ध करैत अछि? गोपथ ब्राह्मणमे प्रतिसन्धाय लेल प्रतिसंहाय की सिद्द करैत अछि? (गोपथ ब्राह्मण २.४)। आ वैदिक कालमे संस्कृतकेँ संस्कृत नै भाषा कहल जाइ छल। आ जकरा आइ प्राकृत कहै छिऐ से पालिक बाद ओइ रूपमे बुझल गेल (साहित्य लेखन सम्बन्धमे)। भरतक नाट्यशास्त्रमे ७ टा आ वररुचि ४ टा प्राकृतक चर्चा करै छथि। ओना तँ महावीरक वचन अर्ध-मागधी प्राकृत आ बुद्धक वचन मागधी-प्राकृतमे देल गेल मुदा ई दुनू मूलतः जनभाषा रहए। मुदा जखन विभिन्न क्षेत्रक लोक जुमलाह तँ बुद्ध सभकेँ अपन क्षेत्रक भाषामे बुद्धवचन सिखबा लेल कहलन्हि: अनुजानामि भिक्खवे, सकायनिरुत्तियाबुद्धवचनं परियापुणितं- माने भिक्षु लोकनि, अपन-अपन भाषामे बुद्धवचन सिखबाक अनुमति दै छी। आ बुद्धवचनमे प्रधान तत्व जनभाषा मागधीक रहल मुदा आन आन भाषाक तत्व सेहो फेंटाएल; आ से भाषा पालि भऽ गेल। पालिमे: “ऋ”, “लृ”, “ऐ”, “औ” आ “अः” नै होइए आ “अं” स्वर नै व्यंजन होइए। तालव्य श आ मूर्धन्य ष सेहो नै होइए मात्र दन्त स होइए। संस्कृतक “ळ” व्यंजन होइए। संस्कृतक संयुक्त व्यंजन “क्ष”, “त्र” आ “ज्ञ” नै होइए। “ऋ” बदलि कऽ “अ”, “इ”, “अ,इ”, “इ,उ” भऽ जाइए। “वृ” बदलि कऽ “रु” भऽ जाइए। “लृ” बदलि कऽ “उ”भऽ जाइए। “ऐ” बदलि कऽ “इ” वा “ए” भऽ जाइए। “औ” बदलि कऽ “उ” आ “ओ” भऽ जाइए। संस्कृतक ह्रस्वक दीर्घ भेनाइ: सिंहः= सीहो संस्कृतक दीर्घक ह्रस्व भेनाइ: मुनीन्द्रः= मुनिन्दो निकटकस्वर: निषण्णः= निसिन्नो बलाघात: मध्यमः= मज्झिमो प्रसार: जयति=जेति स्वरलोप: इति= ति पालिमे ड आ ढ सेहो नै होइत अछि। तालव्य श आ मूर्धन्य ष लेल “स” वा “छ” प्रयुक्त होइए; ड लेल”ळ” आ ढ लेल “ल्ह” प्रयोग होइए। क बदलैए “य” मे: जेना लौकिकः= लोकियो वा “व” मे जेना शुकः= सुवो आगाँ-पाछाँ सेहो होइए: जेना मशकः=मकसोः, करेणुः=कणेरु कवर्ग चवर्गमे बदलैए: कुन्दः=चुन्दो तवर्ग टवर्गमे बदलैए: प्रथमः=पठमो “ख” उष्मीकृत भऽ “ह”मे बदलैए: प्रखरः= पहरो “क” घोषीकृत भऽ “ग” भऽ जाइए: मूकः=मूगो “ग” अघोषीकृत भऽ “क” बनि जाइए: तडागम् = तळाकं “झ” अल्पप्राणीकृत भऽ“ज” बनि जाइए: झल्लिका = जल्लिका “प” महाप्राणीकृत भऽ “फ” बनि जाइए: परश्ः= फरसु व्यञ्जनक लोप सेहो होइए: पविसिष्यामि= पविस्सामि दुर्बल संयुक्त व्यंजनक लोप: क्षत्रियः= खत्तियो ध्वजः= धजो आब सरलताक संधान देखो” गर्हा= गरहा; रत्नम् = रतनं पालिमे तीनटा सन्धि अछि: स्वर, व्यंजन आ अनुस्वार (निग्गहीत) सन्धि। स्वर सन्धि: स्वरक बाद स्वरमे पूर्ववर्ती/ परवर्ती स्वरक लोप वा ककरो लोप नै होइत अछि। व्यंजन सन्धि: ह्रस्व वा दीर्घ स्वरक बाद व्यंजन एलापर ओ स्वरक्रमसँ दीर्घ आ ह्रस्व भऽ जाइए। निग्गहीत सन्धि: अनुस्वार (निग्गहेत)क कतौ आगमन तँ कतौ लोप भऽ जाइए। जेना- त+खणे= तंखणे ;आ सं+रागो= सारागो पालिमे दुइयेटा वचन होइत अछि- एकवचन आ बहुवचन; आ सात टा विभक्ति: पठमा, दुतिया, ततिया, चतुत्थी,पञ्चमी, छट्ठी, सत्तमी, आलपन। ५०० सँ ८०० धरि धातु नौ गणमे आठ लकार (आशीर्लिङ आ लुट् लकार नै होइत अछि) होइत अछि। पालिमे समास संस्कृत सन होइत अछि। प्राकृतमे: ओना मूल बात यएह अछि जे सभ प्राकृत शब्दक संस्कृत रूप नै अछि। साहित्यिक प्राकृतक कएक प्रकार होइत अछि। पैशाची प्राकृतमे “ट” लेल “त” आ “ल” लेल”ळ” अर्धमागधी प्राकृतमे मध्यक स्वतंत्र “क” बदलि जाइए “ग”, “त” वा “य” मे। दू टा स्वरक बीच “प” बदलि जाइए “व” मे। शौरसेनी प्राकृतमे दू टा स्वरक बीचक स्वतंत्र “त” बदलि जाइए “द” मे आ “थ” बदलि जाइए “ह” वा ध” मे। मागधी प्राकृतमे “र” क स्थानपर “ल”, “य” केर स्थानपर “य्य” वा “ज्ज”, “स” आ “ष” क स्थानपर “श” क प्रयोग होइत अछि। प्राकृत मे ह्रस्व आ दीर्घ “ऋ”, “लृ”, “ऐ” आ “औ” नै होइत अछि। न केर बदला “ण” होइत अछि। ऋ बदलि जाइए: अ, आ, ई, उ, रि लृ बदलि जाइए: इलि ऐ बदलि जाइए: ए औ बदलि जाइए: उ दू स्वरक बीच क, ग, च, ज, त, द, य, व केर लोप होइत अछि जेना: लोक=लोअ, लावण्य= लाअण्ण ख परिवर्तित भऽ जाइए ह मे: शाखा= शाहा प्रारम्भक य भऽ जाइए ज, जेना: यम=जम श आ ष भऽ जाइए स; क्ष भऽ जाइए ख वा छ वा झ; ज्ञ भऽ जाइए ण; त्व भऽ जाइए च; थ्व भऽ जाइए छ, द्व भऽ जाइए ज; ध्व भऽ जाइए झ। सन्धि संस्कृत सन अछि। वचन दू- एकवचन आ बहुवचन, विभक्ति सात। संस्कृत जेकाँ धातु दस गण मे रहैत अछि, तुदादिगणक रूपक लोप भऽ जाइत अछि । भूत आ भविष्य मे एक्के-एक्के टा रूप होइत अछि। प्राकृतमे समास संस्कृत सन होइत अछि। ३. अवहट्ट अपभ्रंश जखन समापनपर छल तखन मोटामोटी एगारहमसँ चौदहम शताब्दी धरि “अवहट्ठ” साहित्यिक भाषाक रूपमे उपस्थित रहल। मैथिलीसँ एकर निकटताक कारण एकरा “मैथिल अपभ्रंश” सेहो कहल गेल आ ई अपभ्रंशक प्रकारक रूपमे सेहो मर्यादित रहल। विद्यापतिक स्वयं कीर्तिलता आ कीर्तिपताकाक भाषाकेँ अवहट्ठ कहै छथि मुदा ताहूसँ पूर्व एहि शब्दक प्रयोग भाषाक सन्दर्भमे पहराज केने छथि “पाउअकोस”मे। अद्दहमाण अपन कृति संदेशरासकमे आ वंशीधर प्राकृत पंगलम् क टीकामे अवहट्ठक भाषाक रूपमे उलीख कएने छथि। ज्योतिरीश्वर वर्णरत्नाकरमे लिखै छथि- “पुनु कइसन भाट- संस्कृत, पराकृत, अबहठ, पैशाची, सौरसेनी, मागधी छहु भाषाक तत्वज्ञ”। अपभ्रंश परवर्ती कालमे पूर्वी भारतमे अवहट्ठक रूप लेलक। मैथिलीक विशेषता जाहिमे एकर सभ शब्दक स्वरांत होएब, क्रियारोपाक जटिल होएब (मुदा ताहिमे लैंगिक भेद नहि होएब), सर्वनामक सम्बन्ध कारक रूप आदिक रूपरेखा अवहट्ठमे दृष्टिगोचर होएब शुरू भऽ गेल छल। खास कऽ विद्यापतिक अवहट्ठमे मैथिली वर्तनीक इकार, ओकार, आ अनुनासिकक बदलामे “कचटतप”वर्गक पाँचम अनुनासिक वर्णक प्रयोग देखबामे अबैत अछि मुदा हुनकर अवहट्ठ भाषामे कखनो काल बुझाइत अछि जे ई भाषा खाँटी मैथिली अछि तँ कखनो एहिमे प्राकृत, फारसी, गुजराती-सौराष्ट्री अवधी आ कोशली भाषाक शब्दावलीक बेशी प्रयोग भेटैत अछि। आ सैह कारण रहल होएत जे हुनकर अवहट्ठ सर्वदेशीय (राजशेखर कहै छथि “विश्व-कुतुहली”) बनि सकल। एकर दूटा देवनागरी पाण्डुलिपि दू ठामसँ- गुजरातक स्तम्भतीर्थमे आ उत्तर प्रदेशक फतेहपुर जिलाक असनी गाममे भेटल आ एकटा मिथिलाक्षरक पाण्डुलिपि नेपालसँ भेटल। ऐतिहासिक आधारपर भाषाक पारिवारिक वर्गीकरणमे अवहट्ठ (अवहट्ठ) केँ “मैथिल अपभ्रंश” ताहि कारणसँ कहल जाइत अछि आ मागधी प्राकृतसँ सेहो एकर विकास दृष्टिगोचर होइत अछि। मैथिलीक स्थान मोटा-मोटी संस्कृत, पाली, प्राकृत, अपभ्रंश आ अवहट्ठक ऐतिहासिक क्रममे अबैत अछि। अवहट्ठ मैथिलीसँ लग रहितो शौरसेनी प्राकृत-अपभ्रंशसँ सेहो लग अछि, मुदा देशी शब्दक प्रयोगसँ एहिमे अपभ्रंशसँ बहुत रास व्याकरणिक परिवर्तन देखा पड़ैत अछि। विद्यापतिक “कीर्तिलता” अवहट्ठमे अछि, मुदा “चर्या गीत” आ “वर्ण रत्नाकर” कीर्तिलतासँ पूर्ववर्ती होएबाक बादो पुरान मैथिली अछि आ अवहट्ठसँ सेहो लग अछि। दामोदर पंडितक “उक्ति व्यक्ति प्रकरण” सेहो कीर्तिलतासँ पूर्ववर्ती अछि मुदा पुरान अवधी आ पुरान कोशलीक प्रतिमान प्रस्तुत करैत अछि आ अवहट्ठसँ लग अछि। संगे ईहो सत्य जे कीर्तिलता आ कीर्तिपताकामे विद्यापति अवहट्ठक कतेको प्रकारसँ प्रयोग करै छथि। पहिने तँ ई अपभ्रंशक पर्यायक रूपमे प्रयुक्त होइत छल मुदा जेना जेना अपभ्रंशक विशेषताकेँ ई छोड़ैत गेल आ आधुनिक भारतीय भाषाक व्याकरणिक विशेषताक, खास कऽ मैथिलीक व्याकरणिक विशेषताक आधार बनऽ लागल तखन ई अपभ्रंशसँ पृथक् अवहट्ठक रूप लेलक। एकर प्रमुख व्याकरणिक विशेषता अछि- स्वर संयोग, क्षतिपूर्तिक लेल दीर्घीकरण, व्यंजनक अपन खास विशेषता, रूपक विचार ( लिंग-वचन), निर्विभक्तिक प्रयोग, कारक-परसर्ग, कारक विभक्ति, सर्वनाम, विशेषण, सार्वनामिक विशेषण, क्रिया, कृदन्त, आज्ञार्थक, पूर्वकालिक, संयुक्त क्रिया, क्रिया विशेषण, शब्दावलीक विशेषता, पूर्व स्वरपर स्वराघात, स्वर सानुनासिकतामे परिवर्तन, अकारण सानुनासिकताक प्रवृत्ति, एक संग अनेक स्वरक प्रयोग, अक्षर लोप, परसर्गक स्थानपर मूल शब्द, सर्वनामक प्रचुरता, क्रियापदक विकास आ वाक्य रचना। अवहट्ठ भाषामे जैन धर्मसँ सम्बन्धित रचना ढेर रास अछि आ ओहिमे शौरसेनीक प्रभाव अछि।अवहट्ठक मुख्य क्षेत्र छल मान्यखेत, गुजरात, बंगाल आ मिथिला। जैन धर्मसँ सम्बन्धित लोक मुख्य रूपसँ मान्यखेतमे रहथि। “वज्जालग्ग” श्वेताम्बर मुनि जयवल्लभ द्वारा संकलित सुभाषितक संग्रह छथिजाहिमे अवहट्ठक प्रभाव दृष्टिगोचर होइत अछि।शालिभद्र सूरीक “भरतेश्वर बाहुवली रास”, एकटा दोसर शालिभद्र सूरीक “पंच पाण्डव चरित”, स्थूलिभद्र रास, जयशेखर सूरीक “नेमिनाथ फागु”, सकलकीर्तिक “सोलह कारण रास”क अतिरिक्त मौखिक काव्य जेना बैद्ध सिद्ध साहित्य, डाक, धर्ममंगल काव्य, शून्यपुराण, माणिकचन्द्र राजार गान, लोरिकाइन जनक मध्य आएल। अवहट्ठक बाद ब्रजबुली द्वारा राय रमानन्द, शंकरदेव आ चैतन्यदव लोकभाषाक माध्यमसँ जन धरि पहुँचलाह। अवहट्ठक प्रभाव ब्रजबुली आ मैथिलीपर पड़ल। द्वारा बारहम शताब्दीक डाकार्णव नेपालमे रचित अछि जकर लिपि मिथिलाक्षर आ भाषा अवहट्ठ अछि। मिथिलामे कर्णाट आ ओइनवार राजवंशक कालमे अवहट्ठमे रचना कएल गेल।सिद्ध साहित्य, बौद्धक दोहाकोश-चर्यागीत आ ज्योतिरीश्वरक वर्णरत्नाकरमे अवहट्ठक प्रयोग प्रारम्भ भऽ गेल छल। मुनिराम सिंहक पाहुड दोहा आ बौद्ध धर्मक वज्रयानक ग्रन्थमे सेहो अवहट्ठक रूप देखबामे अबैत अछि। दामोदर पंडितक उक्तिव्यक्तिप्रकरण अवहट्ठमे रचित अछि, ई संस्कृत सिखेबाक ग्रन्थ अछि। बारहम शताब्दीक पूर्वार्धमे उद्दहभाण “संदेश रासय”क रचना कएलन्हि, रचयिता स्वयं एहि ग्रन्थक भाषाकेँ अवहट्ठ कहै छथि। प्राकृत् पैंगलम् -जे छन्दशास्त्रक संकलन अछि आ जकर संकलनकर्ताक नाम अज्ञात अछि- क टीकाकार सेहो एहि ग्रन्थक भाषाकेँ अवहट्ठ कहि सम्बोधित कएने छथि। विद्यापतिक कीर्तिलता आ कीर्तिपताका सेहो अवहट्ठमे रचित भेल। अवहट्ठक अपभ्रंशसँ व्याकरणिक भिन्नता आ मैथिलीसँ सन्निकटता: दीर्घ मिश्र स्वर अछि- ए ऐ ओ औ; पाणिनिसँ पूर्वक आचार्य एकरा सन्ध्यक्षर कहैत छलाह। संस्कृतक ऐ, औ क्रमसँ अइ, अउ ध्वनि बनि गेल आ ओहिसँ किछु आर स्वर बहार भेल। संस्कृतक बादबला भाषा खास कऽ मध्यकालिक भाषामे लगातार दू वा तीन स्वरक प्रयोगसँ ध्वनि आ लेखन दुनूमे विचित्रता आएल। आधुनिक भाषाक लेल आवश्यक छल जे पुनः व्यंजनक बेशी प्रयोग कऽ, तत्समक बेशी प्रयोग कऽ पूर्वस्थिति आनल जाए, जाहिसँ उच्चारण आ लेखन सरल भऽ सकए। क्रियाक अन्तमे आ आन पदक सभ स्थानमे स्वरकेँ संयुक्त करब प्रारम्भ भेल। एहिमे “ऐ” आ “औ” अवहट्ठक विशेषाता रूपमे परिगणित भेल। जेना टुट्टै=टूटै, गुण्णइ=गुणै, पइ=पै, रहइ=रहै, करउ=करौ, चअउर=चौरा, दुण्णउ=दूणौ, तउ=तौ, आअउ=आऔ। ऋ एहि तीन रूपमे ध्वनित होमए लागल। र्+अ, र्+इ , र्+उ आ मध्य रूप माने रि (र्+इ) एहि रूपमे स्थिर होमए लागल। जेना अमृत= अमिअ एहिमे मृ=मि भऽ गेल अछि। स्वरमे किछु आर परिवर्तन भेल। शब्द प्रारम्भक स्वरक दीर्घ होएब स्वाभाविक लगैत अछि, जेना आँचल=आँचर। स्त्रीलिंगमे अन्तिम आ लुप्त होमए लागल जेना भिक्षा=भीख। स्वरक बहुलताबला शब्दमे सन्धि आ लुप्तीकरण बढ़ल, जेना धरित्री=धरती, उपआस=उपास। अपभ्रंशक अंधआर=अंधार (संधि) बनि गेल। कज्ज=काज बनि गेल (दीर्घ) अंचल=आँचर (अनुनासिक) व्यंजन ओहिना रहल मुदा ण कम आ ञ बेशी प्रयोगमे आबए लागल आ ड़, ढ़ ई दुनू नव व्यंजन आएल। क्ष=क्+ष बदलि कऽ ष्ख होमए लागल। न आ ल मे सेहो पर्याय बनल जेना नहिअ=लहिअ आइ काल्हि सेहो मैथिलीमे लोर आ नोर दुनू बाजल जाइत अछि। उ सँ अन्त होमएबला संज्ञा रहल मुदा अ, आ, इ, ई, ऊ, ऐ ,ओ सेहो संज्ञाक अन्तमे आबए लागल। न्हि अन्तिममे लगा कऽ बहुवचन बनेबाक प्रवृत्ति बढ़ल, जेना युवराजन्हि। द्विवचन खतम भऽ गेल आ तकर बदला बहुवचनक प्रयोग भेल आ ताहि लेल सव्वउं (सभ)क प्रयोग प्रारम्भ भेल। लिंगसँ विशेषणक रूप परिवर्तन आ लुप्तविभक्ति-निर्विभक्तिक प्रयोग बेशी होमए लागल। विशेषणक रूप परिवर्तित भेल। जेना अइस, एत्ते, कतहु, पहिल, चारु। कारकक विभक्तिक संग सन, सउं, क, माझ, केर, लागि आदिक प्रयोग होमए लागल। पश्चिमी अवहट्ठमे विभक्तिक प्रयोग घटल मुदा पूर्वी अवहट्ठमे ए, हि विभक्तिसँ ढेर रास काज लेल गेल। सर्वनाम कर्ता लेल हौ, तोञ, सो आ संबंध लेल मोञ, तुम्ह, तिसु प्रयुक्त होमए लागल। क्रियामे करउँ, करसि, करथि प्रयुक्त होमए लागल। कृदन्त रूपमे पढ़न्ता, चलु, उपजु, गेल, भेल, कहल, मारल, चलल, करहुं, कहसि, जाहि, पावथि प्रयुक्त होमए लागल। संयुक्त काल जेना आवत्त हुअ प्रयुक्त होमए लागल। भविष्यत् कालक पूर्वी रूपमे व लगैत छल आ पछबरिया रूपमे ह लगैत छल। क्रियाविशेषणमे जनु, नहु,बिनु अबस प्रयुक्त होमए लागल। पूर्व स्वरपर स्वराघात, जेना: अक्खर= आखर। सर्वनामक संख्यामे वृद्धि भेल। क्रियापदमे विकासक फलस्वरूप कृदन्तक प्रयोग वर्तमानकालमे बेशी होमए लागल। आब वाक्यमे शब्दक स्थानक निर्धारण आवश्यक भऽ गेल। मोटामोटी कर्ता, कर्म आ आखिरीमे क्रिया राखल जाए लागल। संयुक्त कालक प्रयोग सेहो आरम्भ भेल। शब्दक पहिल अक्षरक स्वरक दीर्घ होएबाक प्रवृत्ति अवहट्ठमे बेशी अछि, स्त्रीलिंग शब्दमे शब्दक अन्तिम अक्षरक आ लुप्त होमए लागल। अनुनासिक शब्दक संख्यामे वृद्धि भेल। संज्ञाक लंग आ वचन तँ दुइयेटा रहल मुदा एकवचनक प्रयोग बहुवचनमे होमए लागल।प्रातिपदिक अधिकांशतः स्वरान्त अछि आ अकारान्त सेहो।विभक्तिक बदलामे परसर्गक प्रयोग होमए लागल। अपादान लेल हुंते, सउँ प्रयोगमे आबए लागल आ अधिकरण लेल माँझ, उप्परि आ एहि दुनू (अपादान आ अधिकरण) लेल कखनो काल चन्द्रबिन्दु टासँ काज चलि गेल, “हिं” विभक्ति सेहो कतेको कारकक लेल प्रयुक्त भेल आ “ए” विभक्ति सँ कर्म, करण, अधिकरण सभटाक भान होमए लागल। संज्ञाक एहि तरहक सरलीकरण सर्वनाममे सेहो देखबामे अबैत अछि। क्रियाक निर्माणमे सरलता आएल आ से भेल कृदन्तक बेशी प्रयोगसँ आ संयुक्त क्रियाक बढ़ोत्तरीसँ। भूतकाल “ल” लगा कऽ सेहो बनए लागल, आ भविष्यत् काल “व” लगा कऽ सेहो, जेना थाकल, पढ़ब जे बादमे मैथिलीमे सेहो आएल। पूर्व स्वरपर स्वराघात आ स्वरक क्षतिपूरक दीर्घीकरण अवहट्ठक मुख्य विशेषता अछि। अपभ्रंशक अक्खर, ठक्कुर आ नच्चइ क्रमसँ आखर, ठाकुर आ नाचइ भऽ गेल। स्वरक सानुनासिकतामे परिवर्तन भेल जाहिसँ पुरान निअममे परिवर्तन भेल। पहिने स्पर्श व्यंजनमे अनुस्वारक अभाव छल आ कचटतप क पाँचम वर्ण तकर बदलामे संयुक्त भऽ प्रयुक्त होइत छल। अपवादमे य सँ ह धरिक वर्णक उपस्थितिअहिमे अनुस्वार लगैत छल। पूर्व स्वरपर स्वराघात आ क्षतिपूरक दीर्घीकरणक अतिरिक्त युक्ताक्षरक पूर्वस्वरपर स्वराघातक संग अनुस्वार आबए लागल, जेना- ऊसास/ आंग/ आँकुस/ आँचर/ काँट/ लाँघि/ पाँच/ चाँद/ आँगन/ क्रमसँ उस्सास/ अंग/ अंकुस/ अंचल/ कण्टक/ लघ्/ पंच/ चन्द्र/ अंगण/ क बदलामे आबि गेल। स्वरक क्षतिपूरक दीर्घीकरणक अतिरिक्त अनुस्वारकेँ ह्रस्व कएल जाए लागल आ आधुनिक मैथिलीक अकारण आनुनासिकताक प्रवृत्तिक आरम्भ भेल, जेना- कज्ज=काँज, कच्चुः=काँच, भग्ग=भाँग, ओष्ठ=ओंदिम। अक्षर लोप: संकोच वा अक्षर लोपक कारणसँ अन्धकार=अन्हार, देवकुल= देउर, देवगृह=देवहा, कोट्टशीर्ष=कोसीस, उपवास=उपास, उत्तिष्ठ=उँट, सहकार=सहार, स्वर्णकार=सोनार, सुन्नाअर=सुन्नार, सहयार=साहार भऽ गेल। परसर्गक प्रयोगमे वृद्धि: अपभ्रंशक परसर्गक प्रयोगमे अवहट्ठ कालमे आर वृद्धि भेल। जेना- कर्ता- एन्ने करण-सन, सउं सम्प्रदान-लागि, लग्गि, लागे, प्रति, कारण अपादान-सओ, हुत, हुते, हुंति, सिउ संबंध- केर, कर, के, करेउ, कइ, क अधिकरण- माझ, ऊपर, माँझ, भीतर, माहि सर्वनामक आधिक्य: कीर्तिलतामे जेन्ने, आ आन ठाम मोर, मेरहु, तोरा, तोहार, तोहर, तोरा आदि सर्वनामक प्रयोग प्रारम्भ भेल। संबधवाचक सर्वनाम- जञोन, जेन्ने, जस, जसु, जे; प्रश्न वाचक- केहु, कोए; अनिश्चयवाचक- कोइ, केहु; निजवाचक- अपन, अपनेहु, निअ आदिक प्रयोग होमए लागल। कृदन्तक प्रयोग क्रियापदक विकसित रूप: आब कृदन्तक प्रयोगमे वृद्धि भेल जेना भूतकालक कृदन्तक प्रयोग वर्तमान जेकाँ होएब आ कखनो काल अपन पूर्ण रूपमे सेहो होएब। वर्तमान लेल कृन्तक प्रयोग पढ़न्ता, कहन्ता, आवन्ता; भविष्यत् काल लेल करहुं, करिहि आ भूतकाल लेल कृदन्तक प्रयोग जेना चलु, लागु क प्रयोग भेल। “अन्त” सँ आधुनिक “ता” निकलल अछि आ “अन्त” क प्रयोग बढ़ि गेल। संयुक्त क्रियाक प्रयोग प्रारम्भ भऽ गेल- जेना “ले” जोड़ि कऽ क्रिया बनाएब “खाइले”; सामर्थ्यसूचक पार आ आरम्भसूचक चाह/ लागु क प्रयोग आरम्भ भेल। ४.मैथिली ऐतिहासिक आधारपर भाषाक पारिवारिक वर्गीकरणमे अवहट्ठकेँ “मैथिल अपभ्रंश” ताहि कारणसँ कहल जाइत अछि आ मागधी प्राकृतसँ सेहो एकर विकास दृष्टिगोचर होइत अछि। अवहट्ठ मैथिलीसँ लग रहितो शौरसेनी प्राकृत-अपभ्रंशसँ सेहो लग अछि, मुदा देशी शब्दक प्रयोगसँ एहिमे अपभ्रंशसँ बहुत रास व्याकरणिक परिवर्तन देखा पड़ैत अछि। विद्यापतिक “कीर्तिलता” अवहट्ठमे अछि, मुदा “चर्या गीत” आ “वर्ण रत्नाकर” कीर्तिलतासँ पूर्ववर्ती होएबाक बादो पुरान मैथिली अछि आ अवहट्ठसँ सेहो लग अछि। भारोपीय भाषा परिवारमे मैथिलीक स्थान मोटा-मोटी संस्कृत, पाली, प्राकृत, अपभ्रंश आ अवहट्ठक ऐतिहासिक क्रममे अबैत अछि। ध्वनि: दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नहि सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जेकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जेकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जेकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। पानि-पाइन-पैन अछि- अ इ छ ऐछ छथि- छ इ थ – छैथ पहुँचि- प हुँ इ च तखन प्रश्न उठैत अछि जे “छथि” केँ छैथ लिखबामे की हर्ज? हर्ज अछि, कारण मिथिलाक बहुतो क्षेत्रमे छथि, छथी, पानि, पानी, पहुँचि, पहुँची सेहो बाजल जाइत अछि। से पानि, रहथि, पहुँचि लिखलासँ सभ क्षेत्रक प्रतिनिधित्व होइत अछि। आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ एहि सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा एहिमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- एहि लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ/ के/ कऽ हटा कऽ। एहिमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नहि। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो एहि तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/ के / कऽ केर- क (केर क प्रयोग नहि करू ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के / राम कऽ सेहो) सँ- सऽ चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नहि। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ) रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ तऽ त केर एहि सभक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना के कहलक? नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ एहि सभक उच्चारण- नै अ कखनो काल ओ भऽ जाइत अछि जेना मन=मोन, वन=बोन (वर्तुल) अ कखनो काल आ भऽ जाइत अछि, जेना- फंदा=फान, चन्द्र=चान (स्वराघात) घर=घऽर (उच्चारण) (स्वराघात) बुद्ध=बुद्धऽ (उच्चारण) (स्वराघात) घमसान=घमऽसान (दीर्घक पहिनेक ह्रस्व स्पश्ट उच्चरित- स्वराघात) “इ” क पहिने “आ” रहलापर “ऐ” उच्चरित होइत अछि- जेना पानि=पैन, मुदा विभिन्न क्षेत्रमे पानी, पानि बाजल जाइत अछि तेँ वर्तनीमे पानि, आगि लिखब उचिते अछि। आ कखनो काल अ भऽ जाइत अछि, जेना काका=कक्का। इ कखनो काल ओ भऽ जाइत अछि जेना रिवाज=रेबाज। ऋ कखनो काल इ/ ई/ ऊ भऽ जाइत अछि जेना कृष्ण=किसुन, पृष्ठ=पीठ, वृद्ध=बूढ़। अन्तमे “ई” क बदलामे इ लिखल जाइत अछि। ऋ कखनो काल अ भऽ जाइत अछि जेना- वृषभ=बसहा, अहृदी=अहदी। उ कखनो काल ओ भऽ जाइत अछि जेना दुकान=दोकान ऊ कखनो काल ओ भऽ जाइत अछि जेना मूल्य=मोल। अए कखनो काल ए भऽ जाइत अछि जेना कएलनि=केलनि। ऐ कखनो काल अइ/ अए भऽ जाइत अछि जेना भैया=भइया, पैर=पएर। आ+ओ कखनो काल औ भऽ जाइत अछि जेना गमाओल=गमौल। क कखनो काल ख/ ग भऽ जाइत अछि जेना पुष्करि=पोखरि, भक्त=भगत। ष कखनो काल शब्दक प्रारम्भ वा अन्तमे रहलापर ख भऽ जाइत अछि जेना षष्ठी=खष्ठी, भेष-भूषा=भेख-भूखा। क्ष कखनो काल ख भऽ जाइत अछि जेना क्षीर=खीर। ज्ञ कखनो काल ग भऽ जाइत अछि जेना यज्ञ=जाग। ग कखनो काल घ भऽ जाइत अछि जेना गर्ग=घाघ। त्य कखनो काल च भऽ जाइत अछि जेना सत्य=साँच। त्स्य कखनो काल छ भऽ जाइत अछि जेना मत्स्य=माँछ। य कखनो काल शब्दक प्रारम्भमे रहलापर ज भऽ जाइत अछि जेना यम=जम। द्य कखनो काल ज भऽ जाइत अछि जेना विद्युत=बिजुली। ध्य कखनो काल झ भऽ जाइत अछि जेना वंध्या=बाँझ। त कखनो काल ट भऽ जाइत अछि जेना कर्तन=काटब। न्थ कखनो काल ठ भऽ जाइत अछि जेना ग्रन्थि=गेंठ। द कखनो काल ड भऽ जाइत अछि जेना दण्ड=डाँट। त कखनो काल लुप्त भऽ जाइत अछि जेना जाइत=जाइ। स्त कखनो काल थ भऽ जाइत अछि जेनाप्रस्तर=पाथर। द कखनो काल ड भऽ जाइत अछि जेना दाह=डाह। ध कखनो काल शब्दक अन्तमे रहलापर दह भऽ जाइत अछि जेना गधा=गदहा। ल कखनो काल न भऽ जाइत अछि आ न कखनो काल ल भऽ जाइत अछि जेना नोर=लोर। प कखनो काल फ भऽ जाइत अछि जेना पाश=फाँस। फ कखनो काल “प” आ “ह” भऽ जाइत अछि जेना बेवकूफ=बेकूफ। ब कखनो काल म भऽ जाइत अछि जेना शैबाल=सेमार। म्भ कखनो काल म भऽ जाइत अछि जेना खम्भा=खमहा। म्ब कखनो काल म भऽ जाइत अछि जेना कम्बल=कम्मल। ल कखनो काल र भऽ जाइत अछि जेना हल=हर। व कखनो काल भ भऽ जाइत अछि जेना वाष्प=भाप। ह कखनो काल शब्दक अन्तमे रहलापर लुप्त भऽ जाइत अछि जेना गेलाह=गेला। त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नहि) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नहि- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नहि)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नहि)। मे केँ सँ पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेशी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। एकटा दूटा (मुदा कैक टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नहि। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नहि (जेना दिअ, आ ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारी (ऽ -संस्कृतमे एकरा अवग्रह आ बांग्लामे जफला कहल जाइत अछि) क बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नहि दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। मैथिलीक मात्रात्मक आघातमे ह्रस्व स्वरपर आघात पड़लापर ओ दीर्घ भऽ जाइत अछि।शब्दमे जौँ दीर्घ स्वर रहत तँ आघात ओहिपर, दीर्घ नहि रहत तँ उपान्त्य स्वरपर आ जतए दूटा दीर्घ लगातार अछि ओतए सेहो उपान्त्य दीर्घपर आघात पड़ैत अछि।पा’नि, ओसा’रा। बलात्मक आघात सेहो गपपर जोर देबा काल प्रयुक्त होइत अछि जेना- अपन=अप्पन। जाहि स्वरपर आघात पड़त तकर पूर्वक सभ स्वर ह्रस्व भऽ जाइत अछि। मैथिली व्याकरणक विशेषता: मैथिलीक विकास बौद्ध सिद्ध आचार्य, फेर कर्णाट आ ओइनवार राजवंश, मल्ल राजवंश आ मध्यकालक मैथिली आ आधुनिक मैथिलीक तथाकथित मानक आ पूब, पच्छिम, उत्तर, दक्षिण भिन्नताक अनुसार परिवर्तित होइत रहल अछि आ मैथिली व्याकरण एहि सभ विशेषताकेँ संग लऽ कऽ चलैत अछि। मैथिलीमे सभ शब्द स्वरांत, अ वृत्ताकार, ए, य, ऐ, यै, ओ, औ ई सभ स्पष्ट उच्चरित होइत अछि। सम्बन्ध कारक लेल सँ, क, केर (बेशी पद्यमे प्रयुक्त) प्रयुक्त होइत अछि। संज्ञा रूप कम-सरल (एकवचनसँ बहुवचन करबा लेल सभ आदि जोड़ि दियौ) मुदा क्रिया-धातुरूप बेशी होइत अछि। आदर आ अनादरपूर्ण प्रयोगमे क्रियापदमे परिवर्तन होइत अछि। मैथिलीमे क्रियाक रूप कर्ता आ वाक्यक दोसर संज्ञा, सर्वनाम (कर्तासँ सम्बद्ध) द्वारा निर्धारित होइत अछि। मैथिलीमे क्रिया पुरुष-भेदक अनुरूप बदलैत अछि। मैथिलीमे ब द्वारा भविष्यत् कालक अलाबे क्रियार्थी संज्ञा सेहो बनाओल जाइत अछि। ल प्रयुक्त कए कृदन्त कहल, गेल मे परिवर्तन मैथिलीक विशिष्टता अछि। मैथिलीमे शब्दक भिन्न-भिन्न वर्णपर बलाघात होइत अछि। मैथिलीमे कारक विभक्तिसँ ओना तँ तिर्यक रूप नहि देखबामे अबैत अछि, जेना गामक, मुदा सम्बन्ध कारकमे ई अपवाद अछि, जेना साँझ-साँझुक। क्रियार्थ संज्ञा रूपमे सेहो तिर्यक रूप होइत अछि। संज्ञा:कोनो वस्तुक नाममे लघु, गुरु आ गुरुतर ई तीन रूप होइत अछि- मनोज्, मनोज, मनोजबा। लिंग:लिंगरूप सरल अछि। निर्जीवक लिंग पुल्लिंग भऽ गेल अछि। संज्ञामे लिंगसँ शब्दक रूप परिवर्तन नहि होइत अछि मुदा विशेषण आ क्रियामे होइत अछि। वचन:संज्ञामे वचनक भिन्नतासँ परिवर्तन नहि होइत अछि। लोकनि, रास आदि शब्द जोड़ि कऽ तकर बोध कराओल जाइत अछि। “हम” एकवचन अछि आ “हमसभ” बहुवचन। विभक्ति:करण -ए- जेना काजे। अधिकरण- आँ-हि- जेना परुकाँ, चोट्टहि । कारक: कर्ता- रिक्त, कर्म- केँ, करण- सँ, संप्रदान- लए, अपादान- सँ, संबंध-क, केर(पद्यमे), अधिकरण—मे। सर्वनाम:उत्तम पुरुष- हम, हमे मध्यम पुरुष- तूँ, तोँ, अहाँ, अपने, ई अन्य पुरुष-ताहि, तकरा, तकर, हुनका, हुनि, ओकरा, हुनकर, ओकर, हिनका, एकर, हिनकर, जाहि, जकरा, जकर, के, की, ककरा, अपन, कोन, किछु, केदन, केहनदन, कोनादन, एतबा, कतबा, ततबा, ततेक। क्रियाविशेषण: एतए, कहाँ, कखन, जखन, जाबे, ताबे, आबे, आब, जहिआ, तहिआ, कहिआ, जेना, तेना, एम्हर, ओम्हर, जेम्हर, तेम्हर, भर(दक्षिणभर)। कालबोधक-आइ, काल्हि, परसू, लगले, परुकाँ; स्थानबोधक- जेना आगाँ, पाछाँ; प्रकारबोधक- जेना भने, कने-मने; संयोजक जेना मुदा, आर; सम्बोधन जेना रौ, हौ; समुच्चयबोधक जेना ईह, छी; बलद्योतक जेना –ए ; नहि, भरिसक आदि विविध क्रियाविशेषण होइत अछि। उपसर्ग: अ, अन, अध, अब, दु, नि, भरि, कम, ब, बद, बे, सर। प्रत्यय: अक्कड़, अंत, इल, आइन, आइ,आउ, आकू, आन, आना, आप, आयत, आर, इन, बाह, आरि, आरी, आहु, औन, इअल, इआ, ई, गर, ऐत, ओड़, ओला, औटी, औती, ओना, औबिल, क, त, औत, आइ, बान, म, बला, हार, हा, ई, कार, बाह, आनी, खाना, खोर, गरी, ची, बाज। विशेषण:एहिमे आदर आ लिंगक अनुसार परिवर्तन होइत अछि।सिलेबी, गोल, चर्की ई गाए-बड़द लेल प्रयुक्त होइत अछि आ विशेषणसँ प्राणिक बोध भऽ जाइत अछि। पढ़ल (पुल्लिंग) आ पढ़लि (स्त्रीलिंग), मझिला छौड़ा-माँझिल भाइ(आदर)। क्रिया: वचन भेद मैथिली क्रियामे नहि होइत अछि।पुरुषक अनुसार क्रियामे भेद अबैत अछि। आदर प्रदर्शनमे सेहो क्रियारूप बदलैत अछि।तिङन्त मे लिंगभेद नहि होइत अछि मुदा कृदन्तमे लिंगक अनुसार क्रियापद बदलि जाइत अछि। क्रिया कारकक अनुसार बदलैत अछि। एहि प्रकारसँ क्रिया देखि कऽ मात्र ई पता लागत जे कर्ता आदरणीय अछि वा नहि, क्रियाक कर्म कोन पुरुषमे अछि आ आदरणीय अछि वा नहि। क्रियाग चारि रूप जेना स्वयं मरब (मरैत अछि), मारब (मारैत अछि), दोसरासँ मरबाएब (मरबैत अछि) आ कर्मवाचानुसार ककरो कहि कऽ मरबाएब (मरबबैत अछि)- होइत अछि। धातुरूप- मैथिलीमे लगभग १२२५ धातुरूप दीनबन्धु झा संकलित कएने छथि जे पाणिनीक २००० धातुसँ कनिये कम अछि। आ यैह १२२५ टा धातु मैथिली भाषाक स्वतंत्र अस्तित्वकेँ असगरे बनओने रखबा लेल पर्याप्त अछि। किछु उदाहरण: छक- अविरोधपूर्वक अन्यक्रियासँ दबब अर्थमे- रूपलाल फुल तोड़बामे सोनेलालसँ छकलाह-जीतल गेलाह। ठक- परतारब, वञ्चना- ठक बुड़िबककेँ ठकैत अछि- ओकर वस्तु लए लेबाक हेतु भ्रम उत्पन्न करबैत अछि। डक- अपन उत्कट गन्धक प्रसारण- हीँगु डकैत अछि-अपन तीव्र गन्धक प्रसार करैत अछि। ढक- मिथ्या अपन अतिप्रशंसा करब- जयलाल ढकैत छथि-अपन मिथ्या अति प्रशंसा बजैत छथि। बक- अश्रव्य बहुत बाजब- जयलाल बकैत छथि- नहि सुनबाक योग्य कथा बहुत बजैत छथि। मक- हर्षसँ मालक धावनक्रीड़ा- बाछा मकैत अछि, लीलसँ एम्हर ओम्हर दौगि रहल अछि। बाल्मीकि द्वारा सुन्दरकाण्डमे मानुषिमिह संस्कृताम्- संस्कृत आ मानुषी दुनू भाषाक ज्ञान हनुमानजीसँ कहबाओल गेल अछि। ज्योतिरीश्वर वर्णरत्नाकरमे लिखै छथि- “पुनु कइसन भाट- संस्कृत, पराकृत, अबहठ, पैशाची, सौरसेनी, मागधी छहु भाषाक तत्वज्ञ” संगहि ज्योतिरीश्वर द्वारा सात “उपभाषक” चर्च भेल अछि। प्राकृतक कैकटा प्रकार छल। ओहिमे मागधी प्राकृत मैथिली आ अन्य पूर्वी भारतक भाषाक विकासमे योगदान देलक। अर्धमागधीमे जैन धर्मग्रन्थ आ पालीमे बौद्ध धर्मग्रन्थ लिखल गेल। कालिदासक संस्कृत नाटकमे संस्कृतक अतिरिक्त अपभ्रंशक प्रयोग गएर अभिजात्य वर्गक लेल प्रयुक्त भेल तँ चर्यापदक भाषा सेहो मागधी मिश्रित अपभ्रंश छल। मैथिली सहित आन आधुनिक भारतीय आर्यभाषा दोसर प्राकृतसँ विकसित भेल सेहो देखि पड़ैत अछि। अपभ्रंश परवर्ती कालमे पूर्वी भारतमे अवहट्ठक रूप लेलक। मैथिलीक विशेषता जाहिमे एकर सभ शब्दक स्वरांत होएब, क्रियारूपक जटिल होएब (मुदा ताहिमे लैंगिक भेद नहि होएब), सर्वनामक सम्बन्ध कारक रूप आदिक रूपरेखा अवहट्ठमे दृष्टिगोचर होएब शुरू भऽ गेल छल। डॉ. बाबासाहेब आम्बेडकर (१८९१-१९५६) १ महाराष्ट्रक एकटा नग्र रत्नागिरी। ओइ नग्र लग एकटा गाम अम्बावडे। ओइ गामसँ रामजी सपकाळक एकटा परिवार छल, भारतीय सेनामे एकटा स्कूलमे ओ हेडमास्टर रहथि। गौरांगी नीलाक्षी आ भीमा हुनकर पत्नी छलखिन्ह। हुनकर चौदहम सन्तान १४ अप्रैल १८९१ ई. केँ भीमाक कोखिसँ भेल आ तकर नाम भीम राखल गेल, तखन रामजी महूमे पदस्थापित रहथि। १८९४ ई. मे रामजी सेवानिवृत्त भऽ । भीम जखन ६ बर्खक रहथि तखने हुनकर मायक देहान्त भऽ गेलन्हि आ तकर बाद हुनकर पालन हुनकर अपंग दीदी केलखिन्ह। पिता फेरसँ विवाह केलखिन्हि आ नोकरी लेल गोरेगाँव चलि गेलाह। २ रामजी सपकाल अस्पृश्य महार जातिक रहथि। ओ कबीरक दोहा सुना कऽ भीमकेँ भोरे-भोर पढ़ैले उठा दै छलाह। सेवानिवृत्तिक बाद जखन ओ काप-दपोली १८९४ ई.मे एलाह तखन डपोली नगरपालिका शिक्षा विभाग अपन स्कूलमे अस्पृश्यक नामांकन नै लेबाक निर्णय कऽ लेलक। अखन धरि अस्पृश्यक बच्चाक नामांकन ओइ स्कूल सभमे होइ छलै। तखन रामजी मुम्बइ आ फेर सतारा चलि गेलाह। भीमक प्रारम्भिक शिक्षा सतारामे भेलन्हि। कोनो नौआ भीमक केश नै काटै छल से भीमक बहिन हुनकर केश काटै छलीह। स्कूलमे हुनकासँ सटि कऽ कियो नै बैसै छल। कटही गाड़ीबला हुनका तै शर्तपर बैसबै छल जे गाड़ी भीम चलेताह आ ओ आरामसँ बैसत। पानि पीबाक संकट, जलाशय हुनका लेल नै? हम विद्या प्राप्त करब, तखन ई सभ भेटत। संकल्प लेलन्हि भीम। ओतै विद्यालयमे पेंडसे आ आम्बेडकर ई दूटा शिक्षक रहथि। एक दिन भीम अपनाकेँ भिजा लेलन्हि जे स्कूलमे नै पढ़ऽ पड़ए। मुदा पेंडसे हुनका अपन घर पठेलन्हि आ हुनका धरिया पहिर कऽ स्कूलमे पढ़ाइ करऽ पड़लन्हि। आम्बेडकरक परम प्रिय शिष्य बनि गेलाह भीम। आम्बेडकर ब्राह्मण रहथि। एक दिनुका गप अछि। भीम खेनाइ नै आनने रहथि, असगरे भुखले पेटे एकटा गाछक छाह तर ओ बैसल रहथि। पुछलन्हि आम्बेडकर, भीम एना असगरे किए बैसल छी। भीम कहलन्हि जे आइ हम खेनाइ नै आनने छी। कहलन्हि आम्बेडकर, तँ की भेल, चलू आइ दुनू गुरु चेला रोटी तरकारी संगे खाइ छी। भीमक प्रति एहेन नीक आचरण आइ धरि कियो नै केने छल। भीम प्रसन्न भऽ गेलाह। कहलन्हि आम्बेडकर- भीम, हम अहाँकेँ अपन कुलनाम दै छी, आब अहाँ आम्बेडकर कहाएब। ३ रामजी मुम्बइ आबि गेलाह। एलफिंस्टन स्कूलमे ओ भर्ती भेलाह। १९०७मे स्कूलक शिक्षा ओ पूर्ण केलन्हि। केलुस्कर हुनका “बुद्धचरितम्” उपहारमे देलन्हि। भीमकेँ स्कूलमे संस्कृत पढ़बाक बड्ड इच्छा रहन्हि मुदा तकर अनुमति नै छल। जखन भीम १७ बर्खक रहथि तखन ९ बर्खक रमासँ हुनकर बियाह भेलन्हि। केलुस्कर महोदयक प्रयाससँ बड़ोदा नरेशक छात्रवृत्ति भीमकेँ प्राप्त भेलन्हि आ ओ १९१२ ई.मे बी.ए. पास भऽ गेलाह। बड़ोदा सरकार हुनका लेफ्टिनेन्ट पदपर तैनात केलक। मुदा तकर बाद पिताक मोन खराप भऽ गेलनि, भीम पितासँ भेँट करबाले एलाह, पिता प्रसन्न रहथि। पिता अपन प्रसन्नताक संगे प्रयाण केलन्हि, मृत्युक लीला, भीम जोर-जोरसँ कानथि। ४ बड़ोदा नरेशक छात्रवृत्तिसँ भीम १९१३ ई. मे अध्ययन लेल न्यूयार्क बिदा भेलाह। कोलम्बिया विश्वविद्यालय हुनकर प्रबन्ध स्वीकृत केलक आ हुनका “डॉक्टर ऑफ फिलोसोफी” उपाधि देलक। घुरलाह भीम। हुनकर सत्कार कएल जाए, भव्य सत्कार। सभ हित-सम्बन्धी विचारलन्हि। मुदा ओ नै स्वीकार केलन्हि अपन सत्कार। हमर सत्कारपर होमएबला खर्चासँ छात्रवृत्ति दियौ, वंचितकेँ पढ़ाउ। बड़ोदा नरेश हुनका बड़ोदा बजेलन्हि। हुनकर अवास-भोजनक व्यवस्था लेल कहलन्हि। मुदा कोनो भोजनालय वा धर्मशाला हुनका रखबा लेल तैयार नै भेल। एकटा पारसी भोजनालय किछु दिन हुनका रखलक मुदा फेर ओतैसँ हुनका निकालि देल गेल। एकटा गाछतर ओ कानए लगलाह। शिक्षा प्राप्त करब तँ हमर दोष दूर हएत, से सोचने रही। मुदा आब तँ हम शिक्षा प्राप्त केने छी, आब किए ई यातना देल जा रहल अछि हमरा। प्रण करै छी हम जे ऐ व्यवस्थाकेँ तोड़ि देब, ओकर जड़िपर प्रहार करब। ५ भीम घुरि एलाह मुम्बइ। ओ शिडेनहम महाविद्यालयमे प्राध्यापक बनि गेलाह। कोल्हापुरक छत्रपति साहू महराज उपेक्षित लोकक उद्धार लेल कटिबद्ध छलाह। भीम ओतए गेलाह, घोषणा केलन्हि माणग्राममे साहू महराज, हे उपेक्षित जन आबि गेल छथि अहाँ सभक उद्धारक- डॉ आम्बेडकर। मुदा एकटा आर आघात, पुत्र गंगाधरक मृत्युसँ पत्नी रमा खिन्न रहए लगलीह। यशवन्तक पालन ओ करैत रहलीह, पति बड्ड कम समए घरमे दै छलखिन्ह मुदा ओ सभटा सहैत रहलीह। ६ फेर अध्यापनपद छोड़ि ओ “इकोनोमिक एण्ड पोलिटिकल सायंस” नाम्ना लंडन स्थित संस्थामे “द प्रॉब्लेम ऑफ रुपी” पर प्रबन्ध देलन्हि। मुदा हुनका क्रान्तिकारी मानल गेल, से ओ संस्थाक मोनमाफिक संशोधित प्रबन्ध प्रस्तुत केलन्हि आ “डॉक्टर ऑफ सायंस” भऽ घुरलाह। विधिक अध्ययन केलाक बाद ओ न्यायालय सेहो जाइ छलाह। २० जुलाइ १९२४ ई. केँ ओ “बहिष्कृत हितकारिणी सभा” नामसँ एकटा संस्था बनेलन्हि। कारण हुनकर विश्वास चलनि जे अपन समस्याक समाधान अपने करए पड़त, आन से नै कऽ सकत। २० मार्च १९२७ ई. महाडमे जनान्दोलनक नेतृत्व कऽ “चवदार तळ” जलाशयसँ सभ पानि पीलन्हि। तकर बाद “बहिष्कृत भारत” मासिक द्वारा विचार प्रसारित केलन्हि। २ मार्च १९३० नाशिक राममन्दिरमे प्रवेशक प्रयासक जनान्दोलनक न्रेतृत्व, मुदा पुरहित द्वार बन्द कऽ लेलक, तखन सभ राम आ लक्ष्मण कुण्डमे स्नान कऽ घुरि गेलाह। मुदा १९३३ ई मे मुम्बइ प्रान्तमे सभ उपेक्षितक मन्दिर प्रवेशक विधान पास भेल। ७ १९२७ ई. मे अपन शिक्षक आम्बेडकरसँ हुनकर भेँट भेलन्हि। हुनकर चिट्ठी भीम स्नेहसँ रखने छलाह। गुरु-शिष्य भाव विह्वल भऽ गेलाह। साइमन कमीशनक समितिमे भीमक चयन भेल, वयस्क मतदानक अनुशंसा भीमक कएल छन्हि। लंडनमे “राउण्ड टेबल कान्फ्रेन्स”मे तीन बेर भाग लऽ कऽ दलितक समस्या उठेलन्हि ओ। मुदा फेर आघात। पत्नी रमाक मृत्य। १५ अप्रैल १९४८ ई. केँ शारदा-कबीर नाम्ना ब्राह्मण चिकित्सिकासँ विवाह केलन्हि। समए कम अछि। संघर्ष निष्फल भऽ रहल अछि। हिन्दू, अस्पृश्य हिन्दू! नै। हम असफल नै हएब। धर्मान्तर। केलुस्करक देल बुद्धचरितम् सम्बल बनत। १४ अक्टूबर १९५६ ई., दशमी, नागपुर ९ बजी भोरसँ ११ बजे धरि, गोरखपुरक महास्थाविर चन्द्रमणि धर्मान्तर करेताह, बौद्ध धर्ममे। ओ, हुनकर दोसर ब्राह्मण पत्नी सविता आ लाखक लाख लोक बौद्ध बनि गेलाह। बुद्धक पद धूलि माथपर लगा तीनबेर वन्दन केलन्हि। ८ स्वतंत्र भारतक विधि मंत्री बनलाह बाबासाहेब आम्बेडकर। संस्कृतक पैघ प्रेमी। संस्कृतमे सम्भाषण करै छलाह (आज, हिन्दी पत्रिका सितम्बर १५, १९४९ अंक; द लीडर, इलाहाबाद, १३ सितम्बर, १९४९)। ऑल इण्डिया सेड्यूल कास्ट फेडेरेशनमे संस्कृत राजभाषा हुअए, ई प्रस्ताव बाबासाहेब राखलन्हि मुदा युवा बी.पी. मौर्य आदिक विरोध भेल आ प्रस्ताव आपस भऽ गेल। लाखक लाख पोथी हुनकर निजी पुस्तकालयमे छलन्हि, सभटा पोथी ओ मुम्बइक सिद्धार्थ महाविद्यालयकेँ दऽ देलन्हि। पैघ भेलाक उपरान्तो ओ अपन सामाजसँ अपन लोकसँ दूर नै गेलाह। ६ दिसम्बर १९५६ ई.केँ ओ निर्वाण प्राप्त केलन्हि। छुतहर/ छुतहर घैल/ छुतहा घैल छुतहा घैल महेन्द्र मलंगियाक नवीन नाटकक नाम छन्हि। ऐ छोटसन नाटकक भूमिका ओ दस पन्नामे लिखने छथि। पहिने ऐ भूमिकापर आउ। हुनका कष्ट छन्हि जे रमानन्द झा “रमण” हुनका सुझाव देलखिन्ह जे “छुतहर घैल”केँ मात्र “छुतहर” कहल जाइ छै। से ओ तीन टा गप उठेलन्हि- पहिल- “तों कहियो पोथी के लेखी, हम कहियो अँखियन के देखी।” दोसर- यात्री जीक विलाप कविता- “काते रहै छी जनु घैल छुतहर आहि रे हम अभागलि कत बड़।” आ कहै छथि जे ओइ कविताक विधवा आ ऐ नाटकक कबूतरी देवीकेँ शिवक महेश्वरो सूत्र आ पाणिनीक दश लकारसँ (वैदिक संस्कृत लेल पाणिनी १२ लकार आ लौकिक संस्कृत लेल दस लकार निर्धारित कएने छथि..खएर…) कोन मतलब छै? तेसर ओ अपन स्थितिकेँ कापरनिकस सन भेल कहैत छथि, जे लोकक कहलासँ की हेतै आ गाम-घरमे लोक “छुतहर घैल” बजिते छैक!! मुदा ऐ तीनू बिन्दुपर तीनू तर्क मलंगियाजीक विरुद्ध जाइ छन्हि। “अँखियन देखी” आ लोकव्यवहार “छुतहर” मात्र कहल जाइत देखलक आ सुनलक अछि, घैलचीपर छुतहरकेँ अहाँ राखि सकै छी? लोइटसँ बड़ैबमे पान पटाओल जाइ छै तखन मलंगियाजीक हिसाबे ओकरा “लोइट घैल” कहबै। घैल, सुराही, कोहा, तौला, छुतहर, लोइट, खापड़ि, कुड़नी, कुरवाड़, कोसिया, सरबा, सोबरना ऐ सभ बौस्तुक अलग नामकरण छै। फूलचन्द्र मिश्र “रमण” (प्रायः फूलचन्द्रजी “छुतहा घैल” शब्दक सुझाव हँसीमे देने हेथिन्ह, आ जँ नै तँ ई एकटा नव भाषाक नव शब्द अछि!!)क सुझाव मानैत मलंगिया जी “छुतहर घैल” केँ “छुतहा घैल” कऽ देलन्हि, ई ऐ गपक द्योतक जे हुनका गलतीक अनुभव भऽ गेलन्हि मुदा रमानन्द झा “रमण”क गप मानि लेने छोट भऽ जइतथि से खुट्टा अपना हिसाबे गाड़ि देलन्हि। आ बादमे रमानन्द झा “रमण” चेतना समितिसँ ओइ पोथीकेँ छपेबाक आग्रह केलखिन्ह आ, चेतना समिति मात्र २५टा प्रति दैतन्हि तेँ ओ अपन संस्थासँ एकरा छपबेलन्हि, ऐ सभसँ पठककेँ कोन सरोकार? आब आउ यात्रीजीक गपपर, यात्रीजीकेँ हिन्दी पाठकक सेहो ध्यान राखऽ पड़ै छलन्हि, हुनका मोनो नै रहै छलन्हि जे कोन कविता हिन्दीमे छन्हि, कोन मैथिलीमे आ कोन दुनूमे, से ओ छुतहर घैल लिखि देलन्हि, एकर कारण यात्रीजीक तुकबन्दी मिलेबाक आग्रहमे सेहो देखि सकै छी। आ फेर आउ कॉपरनिकसपर, जँ यात्री जी वा मलंगिया जी “घैल छुतहर”, “छुतहर घैल” वा “छुतहा घैल” लिखिये देलन्हि तँ की नेटिव मैथिली भाषी छुतहरकेँ “घैल छुतहर”, “छुतहर घैल” वा “छुतहा घैल” बाजब शुरू कऽ देत। से कॉपरनिकस सेहो मलंगियाजीक विरुद्ध छथिन्ह। कॉपरनिकसक किंवदन्तीक सटीक प्रयोग मलंगियाजी नै कऽ सकलाह, प्रायः ओ गैलिलीयो सँ कॉपरनिकसकेँ कन्फ्यूज कऽ रहल छथि, कॉपरनिकसक सिद्धान्तक समर्थन पोप द्वारा भेल छल आ कॉपरनिकस पोप पॉल-३ केँ अपन हेलियोसेन्ट्रिक सिद्धान्तक चालीस पन्नाक पाण्डुलिपि समर्पित केने रहथि। खएर मलंगियाजीक विज्ञानक प्रति अनभिज्ञता आ विज्ञानक सिद्धान्तकेँ किवदन्तीसँ जोड़बाक सोचपर (सनसनीखेज साहित्यमे कतौ ई विवरण ओ पढ़नहियो हेता) अहाँकेँ आश्चर्य नै हएत जखन अहाँ हुनकर खाँटी लोककथा सभक अज्ञानताकेँ अही भूमिकामे देखब। “अली बाबा आ चालीस चोर”- सम्पूर्ण दुनियाँकेँ बुझल छै जे ई मध्यकालीन अरबी लोककथा अछि जे “अरेबियन नाइट्स (१००१ कथा)” मे संकलित अछि आ ओइमे विवाद अछि जे ई अरेबियन नाइट्समे बादमे घोसियाएल गेल वा नै, मुदा ई मध्यकालीन अरबी लोककथा अछि, ऐ मे कोनो विवाद नै अछि। बलबनक अत्याचार आदिक की की गप साम्प्रदायिक मानसिकता लऽ कऽ मलंगिया जी कहि जाइ छथि से हुनकर लोककथाक प्रति सतही लगाव मात्रकँण देखार करैत अछि। “मिथिला तत्व विमर्श” वा “रमानाथ झा”क पंजीक सतही ज्ञान बहुत पहिनहिये खतम कऽ देल गेल अछि, आ तेँ ई लिखित रूपसँ हमरा सभक पंजी पोथीमे वर्णित अछि। गोनू झा विद्यापति सँ ३०० बर्ख पहिने भेलाह, मुदा मलंगियाजी ५० साल पुरान गप-सरक्काक आधारपर आगाँ बढ़ै छथि। हुनका बुझल छन्हि जे गोनूकेँ धूर्ताचार्य कहल गेल छन्हि मुदा संगे गोनूकेँ महामहोपाध्याय सेहो कहल गेल छन्हि से हुनका नै बुझल छन्हि!! गोनू झाक समयमे मुस्लिम मिथिलामे रहबे नै करथि तखन “तहसीलदारक दाढ़ी” कतऽ सँ आओत। लोकक कण्ठमे छुतहर छै ओकरा “छुतहा घैल” कऽ दियौ, लोकक कण्ठमे “कर ओसूली”करैबलाक दाढ़ी छै ओकरा “तहसीलदार”क दाढ़ी कहि साम्प्रदायिक आधारपर मुस्लिमकेँ अत्याचारी करार कऽ दियौ, आ तेहेन भूमिका लिखि दियौ जे रमानन्द झा “रमण” आ आन गोटे डरे समीक्षा नै करताह। एकटा पैदल सैनिक आ एकटा सतनामी (दलित-पिछड़ल वर्ग द्वारा शुरू कएल एकटा प्रगतिवादी सम्प्रदाय)क झगड़ासँ शुरू भेल सतनामी विद्रोह औरंगजेबक नीतिक विरोधमे छल आ ओइमे मस्जिदकेँ सेहो जराओल गेलै, मुदा गोनू झाक कर ओसूली अधिकारी मुस्लिम नै रहथि, लोककथामे ई गप नै छै, हँ जँ साम्प्रदायिक लोककथाकार कहल कथामे अपन वाद घोसियेलक आ लिखै काल बेइमानी केलक तँ तइसँ मैथिली लोककथाकेँ कोन सरोकार? फील्डवर्कक आधारपर जँ लोककथाक संकलन नै करब तँ अहिना हएत। महेन्द्र नारायण राम लिखै छथि जे लोककथामे जातित-पाइत नै होइ छै, मुदा मलंगियाजी से कोना मानताह। भगता सेहो हुनकर कथामे एबे करै छन्हि। आ असल कारण जइ कारणसँ ई मलंगिया जीक नाटकक अभिन्न अंग बनि जाइत अछि से अछि हुनकर आनुवंशिक जातीय श्रेष्ठता आधारित सोच। हुनकर नाटकमे मोटा-मोटी अढ़ाइ-अढ़ाइ पन्नाक घीच तीरि कऽ सत्रहटा दृश्य अछि, जइमे पन्द्रहम दृश्य धरि ओ छोटका जाइतक (मलंगियाजीक अपन इजाद कएल भाषा द्वारा) कथित भाषापर सवर्ण दर्शकक हँसबाक, आ भगताक भ्रष्ट-हिन्दीक माध्यमसँ छद्म हास्य उत्पन्न करबाक अपन पुरान पद्धतिक अनुसरण करै छथि। कथाकेँ उद्देश्यपूर्ण बनेबाक आग्रह ओ सोलहम दृश्यसँ करै छथि मुदा बाजी तावत हुनका हाथसँ निकलि जाइ छन्हि। आइ जखन संस्कृत नाटकोमे प्राकृत वा कोनो दोसर भाषाक प्रयोग नै होइत अछि, मलंगियाजीक भरतकेँ गलत सन्दर्भमे सोझाँ आनब संस्कृतसँ हुनकर अनभिज्ञताकेँ देखार करैत अछि आ भरत नाट्यशास्त्रपर हिन्दीमे जे सेकेण्डरी सोर्सक आधारपर लोक सभ पोथी लिखने छथि, तकरे कएल अध्ययन सिद्ध करैत अछि। मलंगियाजीक ई कहब अछि जे नाटक जँ पढ़बामे नीक अछि तँ मंचन योग्य नै हएत, वा मंचन लेल लिखल नाटक पढ़बामे नीक नै लागत? हुनकर संस्कृत पाँतीकेँ उद्घृत करबासँ तँ यएह लगैत अछि। जँ नाटक पढ़बामे उद्वेलित नै करत तँ निर्देशक ओकर मंचनक निर्णय कोना लेत? आ मंचीय गुण की होइ छै, अढ़ाइ-अढ़ाइ पन्नाक सत्रहटा दृश्य, तथाकथित निम्न वर्गकेँ अपमानित करैबला जातिवादी भाषा, भगताक “बुझता है कि नहीं?” बला हिन्दी आ ऐ सभक सम्मिलनक ई “स्लैपस्टिक ह्यूमर”? आ जे एकर विरोध कऽ मैथिलीक समानान्तर रंगमंचक परिकल्पना प्रस्तुत करत से भऽ गेल नाटकक पठनीय तत्त्वक आग्रही आ जे पुरातनपंथी जातिवादी अछि से भेल नाटकक मंचीय तत्वक आग्रही!! की २१म शताब्दीमे मलंगियाजीक जाति आधारित वाक्य संरचना संस्कृत, हिन्दी वा कोनो आधुनिक भारतीय भाषाक नाटकमे (मैथिलीकेँ छोड़ि) स्वीकार्य भऽ सकत? आ जँ नै तँ ऐ शब्दावली लेल १८०० बर्ष पुरनका संस्कृत नाटकक गएर सन्दर्भित तथ्यकेँ, मूल संस्कृत भरत नाट्यशास्त्र नै पढ़ैबला नाटककार द्वारा, बेर-बेर ढालक रूपमे किए प्रयुक्त कएल जाइए? माथपर छिट्टा आ काँखमे बच्चा जँ कियो लेने अछि तँ ओ निम्न वर्गक अछि? ओकर आंगनक बारहमासामे ओ ऐ निम्न वर्गकेँ राड़ कहै छथि, कएक दशक बाद ई धरि सुधार आएल छन्हि जे ओ आब ओइ वर्गकेँ निम्न वर्ग कहि रहल छथि, ई सुधार स्वागत योग्य मुदा ऐ दीर्घ अवधि लेल बड्ड कम अछि। बबाजी कोना कथामे एलै आ गाजा कोना एलै आ ओइसँ बगियाक गाछक बगियाक कोन सम्बन्ध छै? मलंगियाजी अपन जाति-आधारित वाक्य संरचना, आ भ्रष्ट-हिन्दी मिश्रित वाक्य रचना कोना घोसिया सकितथि जँ भगता आ निम्न वर्गक छद्म संकल्पना नै अनितथि, ई तथ्य ओ बड्ड चतुराइसँ नुकेबाक प्रयास करै छथि, आ तेँ ओ मेडियोक्रिटीसँ आगाँ नै बढ़ि पबै छथि। आ तेँ हुनकामे ऐ नाट्य-कथाकेँ उद्देश्यपूर्ण बनेबाक आग्रह तँ छन्हि मुदा सामर्थ्य नै आबि पबै छन्हि आ ई नाटक स्लैपस्टिक ह्यूमर बनि कऽ रहि जाइए। मिथिला आ संस्कृत- कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालयक प्रासांगिकता मिथिला आऽ संस्कृतक संबंध बड्ड पुरान अछि। षड् दर्शनमे चारि दर्शनक प्रारंभ एतयसँ भेल। वाजसनेयी आऽ छांदोग्यक रूपमे दू गोट वैदिक शाखा अखनो ओतय अछि, मुदा नामे मात्रेक। मिथिलामे कतोक लोक भेटताह जे मात्र विवाह कालमे वाचसनय आऽ छंदोग्यक नमसँ परिचय प्राप्त करैत छथि। बीच रातिमे पता चलैत छन्हि जे वर छांदोग्य छथि आऽ स्त्रीगणमे शोर उठैत अछि जे आबतँ दू विवाह होयत-बड्ड समय लागत। वाजसनेयी आऽ छांदोग्य क्रमशः शुक्ल यजुर्वेद आऽ सामवेदक शाखा अछि से हम सभ बिसरि गेल छी। कार्यालयक कार्यावशात् हम इंदिरा गाँधी नेशनल सेंटर अऑफ आर्ट्स गेलहु तँ वेद पर एक गोट डी.वी.डी. देखबाक अवसर प्राप्त भेल।अखनो ओड़ीसा,महाराष्ट्र,केरल,कर्णाटक,आ ऽ तमिलनाडुमे वैदिक शाखा जीवित अछि, मुदा अपना अहिठाम शाखा रहितहुँ नामोसँ अर्थोसँ अनभिज्ञता। कविकुलगुरु कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालयक स्थापना प्रधानमंत्री नरसिम्हा रावक प्रयासेँ रामटेक,महाराष्ट्रमे खुजल। अल्पावधिमे ई वि.वि. संपूर्ण महाराष्ट्रमे वर्षावधि संस्कृत संभाषण शिविर चला रहल अछि। शिशुक हेतु 23 खंडमे किताब छपलक अछि,जखन की एकर भवन अखन बनिये रहल अछि। का.सि.संस्कृत वि.वि. दरिभङ्गा बहुत रास संस्कृत-मैथिली काव्यक उद्धार कएलक मुदा आब जा कय एकर योगदान सालमे एकटा पतरा छपब धरि सीमित भय गेल छैक- आ ऽ ई विश्वविद्यालय पंचांग सेहो अपन गणनाक हेतु विवादमे पड़ि गेल अछि। मुदा एहि अंकसँ हम एकर रचनात्मक कएल गेल कार्यक विवरण देब प्रारंभ कएल छी। विश्वविद्यालय द्वारा 20 सालसँ ऊपर भेल जखन संस्कृत-प्राकृत देसिल बयना सँ युकत नाटक सभक आलोचनात्मक संस्करण प्रकाशित भेल,जे भाषा मिश्रणक कारणेँ जहिना ई संस्कृतक तहिना मैथिलीक रचनामे परिगणित होइत अछि।भावोद्रेकक लेल गीतराशिक रचना कोमलकांत मिथिलाभाषहिमे निबद्ध भेल। विश्वविद्यालय द्वारा पहिल संपादित ग्रंथ ज्योतिरीश्वर ठाकुरक धूर्त्तसमागम अछि। धूर्त्तसमागम तेरहम शताब्दीमे ज्योतिरीश्वर ठाकुर द्वारा रचल गेल। ज्योतिरीश्वर ठाकुर धूर्त्तसमागममे मैथिली गीतक समावेश कएलन्हि। ई प्रहसनक कोटिमे अबैत अछि।मैथिलीक अधिकांश नाटक-नाटिका श्रीकृष्णक अथवा हुनकर वंश्धरक चरित पर अवलंबितएवं हरण आकि स्वयंबर कथा पर आधारित छल। मुदा धूर्त्तसमागममे साधु आऽ हुनकर शिष्य मुख्य पात्र अछि। धूर्त्तसमागम सभ पात्र एकसँ-एक ध्होर्त्त छथि।ताहि हेतु एकर नाम धूर्त्तसमागम सर्वथा उपयुक्त अछि।प्रहसनकेँ संगीतक सेहो कहल जाइछ,ताहि हेतु एहि मे मैथिली गीतक समावेश सर्वथा समीचीन अछि।एहिमे सूत्रधार,नटी स्नातक,विश्वनगर,मृतांगार,सुरतप्रिया,अनंगसेना,अस्ज्जाति मिश्र,बंधुवंचक,मूलनाशक आऽ नागरिक मुख्य पात्र छथि।सूत्रधार कर्णाट चूड़ामणि नरसिंहदेवक प्रशस्ति करैत अछि।फेर ज्योतिरीश्वरक प्रशस्ति होइत अछि। एहिमे एक प्रकारक एब्सर्डिटी अछि,जे नितांत आधुनिक अछि।जे लोच छैक से एकरा लोकनाट्य बनबैत छैक। विश्वनगर स्त्रीक अभावमेब्रह्मचारी छथि।शिष्य स्नातक संग भिक्षाक हेतु मृतांगार ठाकुरक घर जाइत छथि तँ अशौचक बहाना भेटैत छन्हि। विश्वनगर शिष्य स्नातक संग भिक्षाक हेतु सुरतप्रियाक घर जाइत छथि। फेर अनंगसेना नामक वैश्याकेँ लय कय गुरु-शिष्यमे मारि बजरि जाइत छन्हि। फेर गुरु-शिष्य अनंगसेनाक संग असज्जाति मिश्रक लग जाइत छथि तँ ओतय मिश्रजी लंपट निकलैत छथि।......जे जुआ खेलायब आ’ पांगना संगम ईएह दूटा केँ संसारक सार बुझैत छथि। असज्जति मिश्र पुछैत छथि जे के वादी आ’ के प्रतिवादी।स्नातक उत्तर दैत छथि-जे अभियोग कहबाक लेल हम वादी थिकहुँ आ’ शुल्क देबाक हेतु संन्यासी प्रतिवादी थिकाह। विश्वनगर अपन शुल्कमे स्नातकक गाजाक पोटरी प्रस्तुत करैत छथि। विदूषक असज्जाति मिश्रक कानमे अनंगसेनाक यौनक प्रशंसा करैत अछि। असज्जाति मिश्र अनंगसेनाकेँ बीचमे राखि दुनूक बदला अपना पक्षमे निर्णय लैत अछि। एम्हर विदूषक अनंगसेनाक कानमे कहैत अछि, जे ई संन्यासी दरिद्र अछि, स्नातक आवारा अछि आ’ ई मिश्र मूर्ख तेँ हमरा संग रहू। अनंगसेना चारूक दिशि देखि बजैछ , जे ई तँ असले धूर्तसमागम भय गेल। विश्वनगर स्नातकक संग पुनः सुरतप्रियाक घर दिशि जाइत छथि। एमहर मूलनाशक नौआ अनंगसेनासँ साल भरिक कमैनी मँगैछ। ओ’ हुनका असज्जातिमिश्रक लग पठबैत अछि। मूलनाशक असज्जातिमिश्रकेँ अनंसेनाक वर बुझैत अछि। गाजा शुल्कमे लय असज्जति मिश्रकेँ गतानि कए बान्हि तेना मालिश करैत अछि जे ओ’ बेहोश भय जाइत छथि। ओ’ हुनका मुइल बुझि कय भागि जाइत अछि। विदूषक अबैत अछि, आ’ हुनकर बंधन खोलैत अछि आ’ पुछैत अछि जे हम अहाँक प्राणरक्षा कएल अछि, आ’ जे किछु आन प्रिय कार्य होय तँ से कहू। असज्जाति कहल जे छलसँ संपूर्ण देशकेँ खएलहुँ, धूर्त्तवृत्तिसँ ई प्रिया पाओल, सेहो अहाँ सन आज्ञाकारी शिष्य पओलक, एहिसँ प्रिय आब किछु नहि अछि। तथापि सर्वत्र सुखशांति हो तकर कामना करैत छी। --------------------------------------------------------------- मिथिलामे संस्कृतक स्थिति- मिथिला क्षेत्रमे निम्न संस्थान कवि गुरु कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय,रामटेकसँ मान्यताक आवेदन कएल अछि। जेना बिहार विद्यालय परीक्षा समितिक अस्तव्यस्तताक कारण केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्डक मान्यता प्राप्त स्कूलक संख्या बढ़ल तहिना दरभंगाक संस्कृत विश्वविद्यालयक अस्तव्यस्तताक कारण नीक संस्थान सभ मान्यताक लेल बाहरक दिशि देखलक अछि। 1.J.N.B. Sanskrit Vidyalaya Bihar Post Lagma (R.B.Pur) Via-Lohna Road, Dist. Darbhanga 2.Laxmiharikant Sanskrit Prathamik,Madhyamik Vidyalaya,Post. Jhanjharpur Bazar, Dist.Madhubani, 3.Ajitkumar Mehta Sanskrit Shikshan Sansthan Post Ladora, Dist. Samastipur. 4.Dr.Mandanmishra Sanskrit Mahavidyalaya,Post Sanjat, Dist.Begusarai 5.Saraswati Adarsha Sanskrit Mahavidyalaya,Begusarai 6.Dr.R.M.Adarsha Sanskrit Mahavidyalaya,P.O. Malighat, Mujaffarpur एकर अतिरिक्त राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान, नई दिल्ली निम्न विद्यालय सभकेँ ग्रांट दय जीवित रखने अछि। 1.J.N.B. Adarsh Sanskrit Mahavidyalaya, PO. Lagma, Via - Lohna Road, Distt - Darbhanga. 2.Laxmi Devi Saraf Adarsh Sanskrit Mahavidyalaya, Kali Rekha, Distt- Deoghar. 3.Rajkumari Ganesh Sharma Sanskrit Vidyapeetha, Kolahnta Patori,Distt - Darbhanga 4.Ramji Mehta Adarsh Sanskrit Mahavidyalaya,Malighat, Muzaffarpur. एहिमे लगमाक विद्यालय कविकुलगुरु कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय सँ मान्यता मँगलक अछि, कियेकतँ दरभंगाक वि.वि. मे एहि तरहक कोनो परियोजनाक सर्वथा अभाव अछि। तीस वर्ष पहिने हिन्दीमे डा. रामप्रकाश शर्म्मा लिखित मिथिलाक इतिहास सेहो प्रकाशित भेल रहय। आजुक दिन नहि तँ एकरा अपन वेबसाइट छैक नहिये दूर शिक्षाक कोनो परियोजना। कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालयसँ प्रकाशित दोसर नाटक अछि- महाकवि विद्यापतिक गोरक्षविजय नाटक। एहिसँ पहिने कृष्ण पर आधारित नाटक प्रचल छल। एहि अर्थमे ई एकटा क्रांतिकरी नाटक कहल जायत। नाथ संप्रदाय किंवा गोरक्ष संप्रदायक प्रवर्त्तक योगी गोरक्षनाथक कथा ल’ कय एहि नाटकक कथावस्तु संगठित भेल अछि।गोरक्षनाथक गुरु मत्स्येन्द्रनाथ योग त्यागि कदलिपुरमे राजा 18 टा रानीक संग भए भोग कए रहल छथि। गोरक्ष आ’ काननीपादकेँ द्वारपाल रोकि दैत अछि।मंत्री ढोलहो पिटबा दैत अछि जे योगी सभक प्रवेश कतहु नहि हो आ’ रानी सभकेँ राजाक मोन मोहने रहबाक हेतु कहल जाइत अछि। गोरक्ष आ’ काननपाद नटुआक वेष धरैत छथि आ’ मोहक नृत्य राजाकेँ देखबैत छथि। एहि बीच राजाक एकमात्र पुत्र बौधनाथ खेलाइत-खेलाइत मरि जाइत अछि। राजाक शंका नट पर जाइत छैक तँ ओकरा मारबाक आदेश होइत छैक। नट बच्चाकेँ जिया दैत छैक। राजा हुनकर परिचय पुछैत छथि तखन ओ’ हुनका अपन पूर्व जन्मक सभटा गप बता दैत छन्हि, जे अहाँ तँ जोगी छी भोगी नहि। एहि नाटकक पात्रमे महामति(राजाक मंत्री) आ’ महादेवी- मत्स्येन्द्रनाथक ज्येष्ठ रानी सेहो छथि। मत्स्येन्द्रनाथ कदलीपुरक राजा आ’ पूर्व जन्मक योगी छथि। मत्स्येन्द्रनाथ अंतमे कहैत छथि जे गोरक्ष जेहन शिष्य हो आ’ महादेवी जेहन सभ नारी होथु। कामेश्वरसिंह दरभङ्गा संस्कृत विश्वविद्यालय द्वारा त्रैमासिकी संस्कृत पत्रिका ‘ विश्वमनीषा’ निकलैत छल। 1975 ई. सँ 1994 ई. धरि ई पत्रिका प्रकाशित होइत रहल, मुदा 14 वर्षसँ एकर प्रकाशन बंद अछि। हिन्दीमे मिथिलाक इतिहासक अतिरिक्त सात खण्डमे मैथिलीक परम्परागत नाटकक ( 1300 ई. सँ 1900ई. धरिक 16 टा नाटक)प्रकाशन कएल गेल छल। मैथिलीमे पं गोविन्द झा लिखित वातावरण नाटकक संस्कृत अनुवाद श्री पं शशिनाथ झा कएलन्हि आ’ तकरा विश्वविद्यालय प्रकाशित कएलक। ‘ स्मृति-साहस्री’ जे 20म शताब्दीक विद्वान्-साधकक जीवन पर आधारित प्रथम मैथिली महाकाव्य अछि, आ’ जकर रचयिता श्री बुद्धिधारी सिंह’रमाकर’ छथि केर प्रकाशन सेहो विश्वविद्यालय कएने अछि। रूपक समुच्चयः नामक पुस्तकमे चारि गोट रूपक अछि। एहि मे चारिम संस्कृत रूपक म.म.अमरेश्वर कृत धूर्त्तविडम्बन प्रहसनम् मैथिली अनुवादक संदेल गेल अछि। म.म. भवनाथ उपाध्यायक राजनीतिसारः सेहो मैथिली अनुवादक संग देल गेल अछि। संप्रति विश्वविद्यालयक कार्य सालमे एकबेर पंचाङ बनेबा धरि सीमित बुझाइत अछि। साहित्यिक रचना साहित्यक दू विधा अछि गद्य आऽ पद्य।छन्दोबद्ध रचना पद्य कहबैत अछि-अन्यथा ओऽ गद्य थीक। छन्द माने भेल-एहन रचना जे आनन्द प्रदान करए। छन्द दू प्रकारक अछि।मात्रिक आऽ वार्णिक। वेदमे मात्रिक छन्द अछि। पहिने मात्रिक छन्द परिचय लिय। एहिमे अक्षर जिनती मात्र होइत अछि। हलंतयुक्त अक्षरकेँ नहि गानल जाइत अछि। एकार उकार इत्यादि युक्त अक्षरकेँ ओहिना एक मात्रिक गानल जाइत अछि जेना संयुक्ताक्षरकेँ। संगहि अ सँ ह केँ सेहो एक मात्रिक गानल जाइत अछि।द्विमात्रिक कोनो अक्षर नहि होइछ।मुख्य तीनटा बिन्दु यादि राखू- 1.ह्अलंतयुकत अक्षर-0 2.संयुक्त अक्षर-1 3.अक्षर अ सँ ह -1 प्रत्येक। आब पहिल उदाहरण देखू ई अरदराक मेघ नहि मानत रहत बरसि के=1+5+2+2+3+3+1=17 मात्रा आब दोसर उदाहरण देखू पश्चात्=2 मात्रा आब तेसर उदाहरण देखू आऽब=2 मात्रा आब चारिम उदाहरण देखू स्क्रिप्ट=2 मात्रा मुख्य वैदिक छन्द सात अछि-गायत्री,उष्णिक् ,अनुष्टुप् ,बृहती,पङ् क्त्ति,त्रिष्टुप् आ ऽ जगती। शेष ओकर भेद अछि अतिछन्द आ ऽ विच्छन्द। छन्दकेँ अक्षरसँ चिन्हल जाइत अछि। यदि अक्षर पूरा नहि भेलतँ एक आकि दू अक्षर प्रत्येक पादमे बढ़ा लेल जाइत अछि।य आऽ व केर संयुक्ताक्षरकेँ क्रमशः इ आ ऽ उ लगा कय अलग केल जाइत अछि। वरेण्यम्=वरेणियम् स्वः= सुवः गुण आ ऽ वृद्धिकेँ अलग कयकेँ सेहो अक्षर पूर कय सकैत छी। ए = अ + ई ओ = अ + उ ऐ= अ+ए =आ+ए औ=अ+ओ =आ+ओ पछिला बेर मात्रिक छंदक जानकारी लेने छलहुँ। आब वार्णिक छंद पर आबी। पहिने छन्दः शास्त्रमे प्रयुक्त ‘गुरु’ आ’ ‘लघु’ छंदक परिचय प्राप्त करू। तेरह टा स्वर वर्णमे अ,इ,उ,ऋ,लृ ई पाँच ह्र्स्व आर आ,ई,ऊ,ऋ,ए.ऐ,ओ,औ, ई आठ दीर्घ स्वर अछि। ई स्वर वर्ण जखन व्यंजन वर्णक संग जुड़ि जाइत अछि तँ ओकरासँ ‘गुणिताक्षर’ बनैत अछि। क्+अ= क, क्+आ=का । एक स्वर मात्र आकि एक गुणिताक्षरकेँ एक ‘अक्षर’ कहल जाइत अछि। कोनो व्यंजन मात्रकेँ अक्षर नहि मानल जाइत अछि- जेना ‘अवाक्’ शब्दमे दू टा अक्षर अछि, अ , वा । 1. सभटा ह्रस्व स्वर आ’ ह्रस्व युक्त गुणिताक्षर ‘लघु’ मानल जाइत अछि। एकरा ऊपर U लिखि एकर संकेत देल जाइत अछि। 2. सभटा दीर्घ स्वर आर दीर्घ स्वर युक्त गुणिताक्षर ‘गुरु’ मानल जाइत अछि, आ’ एकर संकेत अछि , ऊपरमे एकटा छोट -। 3. अनुस्वार किंवा विसर्गयुक्त सभ अक्षर गुरू मानल जाइत अछि। 4. कोनो अक्षरक बाद संयुक्ताक्षर किंवा व्यंजन मात्र रहलासँ ओहि अक्षरकेँ गुरु मानल जाइत अछि। जेना- अच्, सत्य। एहिमे अ आ’ स दुनू गुरु अछि। जेना मात्रिक छन्द वेदमे व्यवहार कएल गेल अछि, तहिना स्वरक पूर्ण रूपसँ विचार सेहो ओहि युग सँ भेटैत अछि। स्थूल रीतिसँ ई विभक्त अछि:- 1. उदात्त 2. उदात्ततर 3. अनुदात्त 4. अनुदात्ततर 5. स्वरित 6. अनुदात्तानुरक्तस्वरित 7. प्रचय (एकटा श्रुति-अनहत नाद जे बिना कोनो चीजक उत्पन्न होइत अछि, शेष सभटा अछि आहत नाद जे कोनो वस्तुसँ टकरओला पर उत्पन्न होइत अछि।)। 1. उदात्त- जे अकारादि स्वर कण्ठादि स्थानमे ऊर्ध्व भागमे बाजल जाइत अछि। एकरा लेल कोनो चेन्ह नहि अछि। 2. उदातात्तर- कण्ठादि अति ऊर्ध्व स्थानसँ बाजल जाइत अछि। 3. अनुदात्त- जे कण्ठादि स्थानमे अधोभागमे उच्चारित होइछ।नीचाँमे तीर्यक चेन्ह खचित कएल जाइछ। 4.अनुदातात्ततर- कण्ठादिसँ अत्यंत नीचाँ बाजल जाइत अछि। 5. स्वरित- जाहिमे अनुदात्त रहैत अछि किछु भाग आ’ किछु रहैत अछि उदात्त। ऊपरमे ठाढ़ रेखा खेंचल जाइत अछि, एहिमे। 6. अनुदाक्तानुरक्तस्वरित- जाहिमे उदात्त, स्वरित किंवा दुनू बादमे होइछ ,ई 3 प्रकारक होइछ। 7.प्रचय-स्वरितक बादक अनुदात्त रहलासँ अनाहत नाद प्रचयक,तानक उत्पत्ति होइत अछि। शुद्ध स्वर तखन होइत अछि, जखन सातो स्वर अपन निश्चित स्थान पर रहैत अछि। एहि सातो पर कोनो चेन्ह नहि होइत अछि। जखन शुद्ध स्वर अपन स्थानसँ नीचाँ रहैत अछि तँ कोमल कहल जाइत अछि, आ’ ई चारिटा होइत अछि एहिमे नीचाँ क्षैतिज चेन्ह देल जाइत अछि, यथा- रे॒, ग॒, ध॒, नि॒। शुद्ध आ’ मध्यम स्वर जखन अपन स्थानसँ ऊपर जाइत अछि, तखन ई तीव्र स्वर कहाइत अछि, एहिमे ऊपर उर्ध्वाधर चेन्ह देल जाइत अछि। ई एकेटा अछि- म॑। एवम प्रकारे सात टा शुद्ध यथा- सा,रे,ग, म, प, ध, नि, चारिटा शुद्ध यथा- रे॒,ग॒,ध॒,नि॒ आ’ एकटा तीव्र यथा म॑ सभ मिला कय १२ टा स्वर भेल। एहिमे स्पष्ट अछि जे सा आ’ प अचल अछि, शेष चल किंवा विकृत। आब फेर कीबोर्ड पर आऊ। 37 टा की बला कीबोर्ड हम एहि हेतु कहने चालहुँ,किएक तँ 12, 12, 12 केर तीन सेट आ, अंतिम 37म तीव्र सां केर हेतु। सप्तक मे सातटा शुद्ध आ’ पाँचटा विकृत मिला कय 12 टा भेल! वाम कातसँ 12 टा उजरा आ’ कारी की मंद्र सप्तक, बीच बला 12 टा की मध्य सप्तक आ, 25 सँ 36 धरि की तार सप्तक कहल जाइत अछि। आरोह- नीचाँ सँ ऊपर गेनाइ, जेना मंद्र सप्तकसँ मध्य सप्तक आ’ मध्य सप्तकसँ तार सप्तक। मंद्र सप्तकमे नीचाँ बिन्दु, मध्य सप्तक सामान्य आ’ तार सप्तकमे ऊपर बिन्दु देल जाइत अछि, यथा- स़, ऱ,ग़,म़,प़,ध़,ऩ सा,रे,ग,म,प,ध,नी सां,रें,गं,मं,पं,धं,निं अवरोह- तारसँ मध्य आ’ मध्यसँ मंद्र केँ अवरोह कहल जाइत अछि। वादी स्वर- जाहि स्वरक सभसँ बेशी प्रयोग रागमे होइत अछि। समवादी स्वर- जकर प्रयोग वादीक बाद सभसँ बेशी होइत अछि। अनुवादी स्वर- वादी आ’ समवादी स्वरक बाद शेष स्वर। वर्ज्य स्वर- जाहि स्वरक प्रयोग कोनो विशेष रागमे नहि होइत अछि। पकड़- जाहि स्वरक समुदायसँ कोनो राग विशेषकेँ चिन्हैत छी। 1.पूर्वार्चिकमे क्रमसँ अग्नि, इन्द्र आ’ सोम पयमानकेँ संबोधित गीत अछि।तदुपरान्त आरण्यक काण्ड आ’ महानाम्नी आर्चिक अछि।आग्नेय, ऐन्द्र आ’ पायमान पर्वकेँ ग्रामगेयण आ’ पूर्वार्चिकक शेष भागकेँ आरण्यकगण सेहो कहल जाइछ। सम्मिलित रूपेँ एक प्रकृतिगण कहैत छी। 2.उत्तरार्चिक: विकृति आ’ उत्तरगण सेहो कहैत छी। ग्रामगेयगण आ’ आरण्यकगणसँ मंत्र चुनि कय क्रमशःउहगण आ’ ऊह्यगण कहबैछ- तदन्तर प्रत्येक गण दशरात्र, संवत्सर, एकह, अहिन, प्रायश्चित आ’ क्षुद्र पर्वमे बाँटल जाइछ। पूर्वार्चिक मंत्रक लयकेँ स्मरण क’ उत्तरार्चिक केर द्विक,त्रिक, आ’ चतुष्टक आदि (2,3, आ’ 4 मंत्रक समूह)मे एहि लय सभक प्रयोग होइछ। अधिकांश त्रिक आदि प्रथम मंत्र पूर्वार्चिक होइत अछि, जकर लय पर पूरा सूक्त(त्रिक आदि) गाओल जाइछ। उत्तरार्चिक उहागण आ’ उह्यगण प्रत्येक लयकेँ तीन बेर तीन प्रकारेँ पढ़ैछ। वैदिक कर्मकाण्डमे प्रस्ताव, प्रस्तोतर द्वारा, उद्गीत उदगातर द्वारा, प्रतिघार प्रतिहातर द्वारा, उपद्रव पुनः उदगातृ द्वारा आ’ निधान तीनू द्वारा मिलि कय गाओल जाइछ। प्रस्तावक पहिने हिंकार (हिं,हुं,हं) तीनू द्वारा आ’ ॐ उदगातृ द्वारा उदगीतक पहिने गाओल जाइछ। ई पाँच भक्त्ति भेल। हाथक मुद्रा 1.1.औँठा(प्रथम आँगुर)-एक यव दूरी पर 2.2.औँठा प्रथम आँगुरकेँ छुबैत 3.3.औँठा बीच आँगुरकेँ छुबैत 4.4. औँठा चारिम आँगुरकेँ छुबैत 5.5.औँठा पाँचम आँगुरकेँ छुबैत 6.11. छठम क्रुष्ट औँठा प्रथम आँगुरसँ दू यव दूरी पर 7.6. सातम अतिश्वर सामवेद 8.7.अभिगीत ऋग्वेद ग्रामगेयगान- ग्राम आ’ सार्वजनिक स्थल पर गाओल जाइत छल। आरण्यकगेयगान- वन आ’ पवित्र स्थानमे गाओल जाइत छल। ऊहगान- सोमयाग एवं विशेष धार्मिक अवसर पर। पूर्वार्चिकसँ संबंधित ग्रामगेयगान एहि विधिसँ। ऊह्यगान आकि रहस्यगान- वन आ’ पवित्र स्थान पर गाओल जाइत अछि। पूर्वार्चिकक आरण्यक गानसँ संबंध। नारदीय शिक्षामे सामगानक संबंधमे निर्देश:- 1.स्वर-7 ग्राम-3 मूर्छना-21 तान-49 सात टा स्वर सा,रे,ग,म,प,ध,नि, आ’ तीन टा ग्राम-मध्य,मन्द,तीव्र। 7*3=21 मूर्छन। सातू स्वरक परस्पर मिश्रण 7*7=49 तान। ऋगवेदक प्रत्येक मंत्र गौतमक 2 सामगान(पर्कक) आ’ काश्यपक 1 सामगान(पर्कक) कारण तीन मंत्रक बराबर भ’ जाइत अछि। मैकडॉवेल इन्द्राग्नि,मित्रावरुणौ,इन्द्राविष्णु,अग्निषोमौ एहि सभकेँ युगलदेवता मानलन्हि अछि। मुदा युगलदेव अछि –विशेषण-विपर्यय। वेदपाठ- १.संहिता पाठ अछि शुद्ध रूपमे पाठ। अ॒ग्निमी॑ळे पुरोहि॑त य॒घ्यस्य॑दे॒वम्त्विज॑म।होतार॑रत्न॒ धातमम्। २. पद पाठ- एहिमे प्रत्येक पदकें पृथक कए पढल जाइत अछि। ३.क्रमपाठ- एतय एकक बाद दोसर, फेर दोसर तखन तेसर, फेर तेसर तखन चतुर्थ। एना कए पाठ कएल जाइत अच्हि। ४. जटापाठ- एहिमे जौँ तीन टा पद क, ख, आ’ ग अछि तखन पढ़बाक क्रम एहि रूपमे होयत। कख,खक,कख,खग,गख,खग। ५.घनपाठ-एहि मे ऊपरका उदाहरणक अनुसार निम्न रूप होयत- कख,खक,कखग,गखक,कखग। ६.माला,७.शिखा,८.रेखा,९.ध्वज,१०.दण्ड,११.रथ। अतिम आठकेँ अष्टविकृति कहल जाइत अछि। साम विकार सेहो 6 टा अछि, जे गानकेँ ध्यानमे रखैत घटाओल, बढ़ाओल जा सकैत अछि। 1.विकार- अग्नेकेँ ओग्नाय। 2.विश्लेषण- शब्द/पदकेँ तोड़नाइ 3.विकर्षण-स्वरकेँ खिंचनाई/अधिक मात्राक बराबर बजेनाइ। 4.अभ्यास- बेर-बेर बजनाइ। 5.विराम- शब्दकेँ तोड़ि कय पदक मध्यमे ‘यति’। 6.स्तोभ-आलाप योग्य प्दकेँ जोड़ि लेब। कौथुमीय शाखा ‘हाउ’ ‘राइ’ जोड़ैत छथि। राणानीय शाखा ‘हावु’, ‘रायि’ जोड़ैत छथि। मात्रिक छन्दक प्रयोग वेदमे नहि अछि, वरन् वर्णवृत्तक प्रयोग अछि। मुख्य छन्द गायत्री, एकर प्रयोग सभसँ बेशी अछि। तकर बाद त्रिष्टुप आ’ जगतीक प्रयोग अछि। 1. गायत्री- 8-8 केर तीन पाद। 2. त्रिष्टुप- 11-11 केर 4 पाद। 3. जगती- 12-12 केर 4 पाद। 4. उष्णिक- 8-8 केर दू तकर बाद 12 वर्ण-संख्याक पाद। 5. अनुष्टुप- 8-8 केर चारि पाद। एकर प्रयोग वेदक अपेक्षा संस्कृत साहित्यमे बेशी अछि। 6. बृहती- 8-8 केर दू आ’ तकरा बाद 12 आ’ 8 मात्राक दू पाद। 7. पंक्त्ति- 8-8 केर पाँच। प्रथम दू पदक बाद विराम अबैछ। यदि अक्षर पूरा नहि होइत अछि, तँ एक वा दू अक्षर निम्न प्रकारेँ घटा-बढ़ा लेल जाइत अछि। (अ) वरेण्यम् केँ वरेणियम् स्वः केँ सुवः। (आ) गुण वृद्धिकेँ अलग कए लेल जाइत अछि। ’ए’ केँ ‘अ’, ‘इ’। ‘ओ’ केँ ‘अ’, ‘उ’। ’ऐ’ केँ ‘अ’, ‘आ’। ’ए’ ‘औ’ केँ ‘अ’, वा ‘आ’ आ’ ‘ओ’। एहू प्रकारेँ नहि भेलासँ अन्य विराडादि नामसँ एकर नामकरण होइत अछि। यथा- गायत्री(24), विराट् (22), निचृत्(23), शुद्धा(24),मुरिक् (25), स्वराट्(26) आदि। वैदिक ऋषि स्वयंकेँ आ’ देवताकेँ सेहो कवि कहैत छथि। स्म्पूर्ण वैदिक साहित्य एहि कवि चेतनाक वाङ्मय मूर्त्ति अछि। ओतय आध्यात्म चेतना, अधिदैवत्मे उत्तीर्ण भेल अछि, एवम् ओकरा आधिभूतिक भाषामे रूप देल गेल अछि। देवनागरीक अतिरिक्त्त समस्त उत्तरभारतीय भाषा नेपाल आऽ दक्षिणमे (तमिलकेँ छोड़ि) सभ भाषा वर्णमालाक रूपमे स्वर आऽ कचटतप आऽ य, र ल व, श, स, ह केर वर्णमालाक उपयोग करैत अछि। ग्वाण्ङ केर हेतु संस्कृतमे दोसर वर्ण छैक (छान्दोग्य एकर उच्चारण नहि करैत छथि मुदा वाजसनेयी खूब करैत छथि-जेना छान्दोग्य कहताह सभूमि तँ वाजसनेयी कहताह सभूमीग्वंङ), वैदिक संस्कृतमे उदात्त, अनुदात्त आऽ स्वरित (क्रमशः क॑ क॒ क॓) उपयोग तँ मराठीमे ळ आऽ अर्द्ध ऱ् केर सेहो प्रयोग होइत अछि। मैथिलीमे ऽ (बिकारी वा अवग्रह) केर प्रयोग श्स्कृत जेकाँ होइत अछि आऽ आइ काल्हि एकर बदलामे टाइपक सुविधानुसारे आ’ (आऽ केर बदलामे) एहन प्रयोग सेहो होइत अछि। जेना फारसीमे अलिफ बे से आऽ रोमनमे ए बी सी होइत अछि तहिना मोटा-मोटी सभ भारतीय भाषामे लिपिक भिन्नतक अछैत वर्णमालाक स्वरूप एके रङ अछि। वर्णमालामे दू प्रकारक वर्ण अछि- स्वर आऽ व्यंजन। वर्णक संख्या अछि ६४ जाहिमे २२ टा स्वर आऽ ४२ टा व्यञ्जन अछि। पहिने स्वरक वर्णन दैत छी- जाहि वर्णक उच्चारणमे दोसर वर्णक उच्चारणक अपेक्षा नहि रहैत अछि, से भेल स्वर। स्वरक तीन टा भेद अछि- ह्रस्व, दीर्घ आऽ प्लुत। जाहिमे एक मात्राक समय लागय बाजयमे से भेल ह्रस्व, जाहिमे दू मात्रा समय लागल से भेल दीर्घ आऽ जाहिमे तीन मात्रा समय लागल से भेल प्लुत। मूलभूत स्वर अछि- अ इ उ ऋ लृ पाणिनिसँ पूर्वक आचार्य एकरा समानाक्षर कहैत छलाह। दीर्घ मिश्र स्वर अछि- ए ऐ ओ औ पाणिनिसँ पूर्वक आचार्य एकरा सन्ध्यक्षर कहैत छलाह। लृ दीर्घ नहि होइत अछि आऽ सन्ध्यक्षर ह्रस्व नहि होइत अछि। अ इ उ ऋ एहि सभक ह्रस्व, दीर्घ (आ ई ऊ ॠ) आऽ प्लुत (आ३ ई३ ऊ३ ॠ३) सभ मिला कए १२ वर्ण भेल। लृ केर ह्रस्व आऽ प्लुत दू भेद अछि (लॄ३) तँ २ टा ई भेल। ए ऐ ओ औ ई चारू दीर्घ मिश्रित स्वर अछि आऽ एहि चारूक प्लुत रूप सेहो (ए३ ऐ३ ओ३ औ३) होइत अछि, तँ ८ टा ई सेहो भेल। भऽ गेल सभटा मिला कए २२ टा स्वर। एहि सभटा २२ स्वरक वैदिक रूप तीन तरहक होइत अछि, उदात्त, अनुदात्त आऽ स्वरित। ऊँच भाग जेना तालुसँ उत्पन्न अकारादि वर्ण उदात्त गुणक होइत अछि आऽ तेँ उदात्त कहल जाइत अछि। नीँचा भागसँ उत्पन्न स्वर अनुदात्त आऽ जाहि अकारादि स्वरक प्रथम भागक उच्चारण उदात्त आऽ दोसर भागक उच्चारण अनुदात्त रूपेँ होइत अछि से भेल स्वरित। स्वरक दू प्रकार आर अछि, सानुनासिक जेना अँ आऽ निरनुनासिक जेना अ। दत्तेन निर्वृत्तः कूपो दात्तः। दत्त नाम्ना पुरुष द्वारा विपाट्- ब्यास धारक उतरबरिया तट पर बनबाओल एल इनार भेल दात्त। अञ प्रत्यान्त भेलासँ ’दात्त’ आद्युदात्त भेल, अण् प्रत्यायान्त होइत तँ प्रत्यय स्वरसँ अन्तोदात्त होइत। रूपमे भेद नहि भेलो पर स्वरमे भेद अछि। एहिसँ सिद्ध भेल जे सामान्य कृषक वर्ग सेहो शब्दक सस्वर उच्चारण करैत छलाह। स्वरितकेँ दोसरो रूपमे बुझि सकैत छी- जेना एहिमे अन्तिम स्वरक तीव्रस्वरमे पुनरुच्चारण होइत अछि। आब व्यञ्जन पर आऊ। व्यञ्जन ४२ टा अछि। क् ख् ग घ् ङ् च् छ् ज् झ् ञ् ट् ठ् ड् ढ् ण् त् थ् द् ध् न् प् फ् ब् भ् म् य् र् ल् व् श् ष् स् ह् य् व् ल् सानुनासिक सेहो होइत अछि, यँ वँ लँ आऽ निरुनासिक। एकर अतिरिक्त्त दू टा आर व्यञ्जन अछि- अनुस्वार आऽ विसर्जनीय वा विसर्ग। ई दुनूटा स्वरक अनन्तर प्रयुक्त्त होइत अछि। विसर्जनीय मूल वर्ण नहि अछि, वरन् स् वा र् केर विकार थीक। विसर्जनीय किछु ध्वनि भेद आऽ किछु रूपभेदसँ दू प्रकारक अछि- जिह्वामूलीय आऽ उपध्मानीय। जिह्वामूलीय मात्र क आऽ ख सँ पूर्व प्रयुक्त्त होइत अछि, दोसर मात्र प आऽ फ सँ पूर्व। अनुस्वार, विसर्जनीय, जिह्वामूलीय आऽ उपध्मानीयकेँ अयोगवाह कहल जाइत अछि। उपरोक्त्त वर्ण सभकेँ छोड़ि ४ टा आर वर्ण अछि, जकरा यम कहल गेल अछि। कुँ खुँ गुँ घुँ (यथा- पलिक् क्नी, चख ख्न्नुतः, अग् ग्निः, घ् घ्नन्ति) पञ्चम वर्ण आगाँ रहला पर पूर्व वर्ण सदृश जे वर्ण बीचमे उच्चारित होइत अछि से यम भेल। यम सेहो अयोगवाह होइत अछि। अ आ कवर्ग ह (असंयुक्त्त) आऽ विसर्जनीय केर उच्चारण कण्ठमे होइत अछि। इ ई चवर्ग य श केर उच्चारण तालुमे होइत अछि। ऋ ॠ टवर्ग र ष केर उच्चारण मूर्धामे होइत अछि। लृ तवर्ग ल स केर उच्चारण दाँतसँ होइत अछि। उ ऊ पवर्ग आऽ उपध्मानीय केर उच्चारण ऒष्ठसँ होइत अछि। व केर उच्चारण उपरका दाँतसँ अधर ओष्ठ केर सहायतासँ होइत अछि। ए ऐ केर उच्चारण कण्ठ आऽ तालुसँ होइत अछि। ओ औ केर उच्चारण कण्ठ आऽ ओष्ठसँ होइत अछि। य र ल व अन्य व्यञ्जन जेकाँ उच्चारणमे जिह्वाक अग्रादि भाग ताल्वादि स्थानकेँ पूर्णतया स्पर्श नहि करैत अछि। श् ष् स् ह् जेकाँ एहिमे तालु आदि स्थानसँ घर्षण सेहो नहि होइत अछि। क सँ म धरि स्पर्श(वा स्फोटक कारण जिह्वाक अग्र द्वारा वायु प्रवाह रोकि कए छोड़ल जाइत अछि) वर्ण र सँ व अन्तःस्थ आऽ ष सँ ह घर्षक वर्ण भेल। सभ वर्गक पाँचम वर्ण अनुनासिक कहबैत अछि कारण आन स्थान समान रहितो एकर सभक नासिकामे सेहो उच्चारण होइत अछि- उच्चारणमे वायु नासिका आऽ मुँह बाटे बहार होइत अछि। अनुस्वार आऽ यम केर उच्चारण मात्र नासिकामे होइत अछि- आऽ ई सभ नासिक्य कहबैत अछि- कारण एहि सभमे मुखद्वार बन्द रहैत अछि आऽ नासिकासँ वायु बहार होइत अछि। अनुस्वारक स्थान पर न् वा म् केर उच्चारण नहि होयबाक चाही। जखन हमरा सभकेँ गप करबाक इच्छा होइत अछि, तखन संकल्पसँ जठराग्नि प्रेरित होइत अछि। नाभि लगक वायु वेगसँ उठैत मूर्धा धरि पहुँचि, जिह्वाक अग्रादि भाग द्वारा निरोध भेलाक अनन्तर मुखक तालु आदि भागसँ घर्षित होइत अछि आऽ तखन वर्णक उत्पत्ति होइत अछि। कम्पन भेलासँ वायु नादवान आऽ यैह गूँजित होइत पहुँचैत अछि मुँहमे आऽ ओकरा कहल जाइत अछि घोषवान, नादरहित भए पहुँचैत अछि श्वासमे आऽ ओकरा कहल जाइत अछि अघोषवान्। श्वास प्रकृतिक वर्ण भेल ’अघोष’ , आऽ नाद प्रकृतिक भेल ’घोषवान्’। जाहि वर्णक उत्पत्तिमे प्राणवायुक अल्पता होइत अछि से अछि ’अल्पप्राण’ आऽ जकर उत्पत्तिमे प्राणवायुक बहुलता होइत अछि, से भेल ’महाप्राण’। कचटतप केर पहिल, तेसर आऽ पाँचम वर्ण भेल अल्पप्राण आऽ दोसर आऽ चारिम वर्ण भेल महाप्राण। संगहि कचटतप केर पहिल आऽ दोसर भेल अघोष आऽ तेसर, चारिम आऽ पाँचम भेल घोषवान्। य र ल व भेल अल्पप्राण घोष। श ष स भेल महाप्राण अघोष आऽ ह भेल महाप्राण घोष।स्वर ओइछ अल्पप्राण, उदात्त, अनुदात्त आऽ स्वरित। बनैत-बिगड़ैत-सुभाषचन्द्र यादवक कथा संग्रहक समीक्षा सुभाषचन्द्र यादवजीक “बनैत बिगड़ैत” कथा-संग्रहक सभ कथामे सँ अधिकांशमे ई भेटत जे कथा खिस्सासँ बेशी एकटा थीम लए आगाँ बढ़ल अछि आ अपन काज खतम करितहि अन्त प्राप्त कएने अछि। दोसर विशेषता अछि एकर भाषा। बलचनमाक भाषा ओहि उपन्यासक मुख्य पात्रक आत्मकथात्मक भाषा अछि मुदा एतए ई भाषा कथाकारक अपन छन्हि आ ताहि अर्थेँ ई एकटा विशिष्ट स्वरूप लैत अछि। एक दिस कथाक उपदेशात्मक खिस्सा-पिहानी स्वरूप ग्रहण करबाक परिपाटीक विरुद्ध सुभाषजीक कथाकेँ एकटा सीमित परिमितिमे थीम लऽ कए चलबाक, भाषाक शिल्प जे खाँटी देशी अछि पर ध्यान देबाक सम्मिलित कारणसँ पाठकक एक वर्गकेँ एहि संग्रहक कथा सभमे असीम आनन्द भेटतन्हि तँ संगे-संग खिस्सा-पिहानीसँ बाहर नहि आबि सकल पाठक वर्गकेँ ई कथा संग्रह निराश नहि करत वरन हुनकर सभक रुचिक परिष्करण करत। किछु भाषायी मानकीकरण प्रसंग- जेना ऐछ, अछि, अ इ छ । जाहि कालमे मानकीकरण भऽ रहल छल ओहि समय एहिपर ध्यान देबाक आवश्यकता रहए। जेना “जाइत रही” केँ “जाति रही” लिखी आ फेर जाति (जा इ त) लेल प्रोनन्सिएशनक निअम बनाबी तेहने सन ऐछ संगे अछि। मुदा आब देरी भऽ गेल अछि से लेखको कनियाँ-पुतरा मे एकर प्रयोग कए दिशा देखबैत छथि मुदा दोसर कथा सभमे घुरि जाइत छथि। मुदा एहिसँ ई आवश्यकता तँ सिद्ध होइते अछि जे एकटा मानक रूप स्थिर कएल जाए आ “छै” लिखबाक अछि तँ सेहो ठीक आ “छैक” लिखबाक अछि तँ “अन्तक ’क’ साइलेन्ट अछि” से प्रोनन्सिएशनक निअम बनए। मुदा से जल्दी बनए आ सर्वग्राह्य होअए तकर बेगरता हमरा बुझाइत अछि, आजुक लोककेँ “य” लिखल जाए वा “ए” एहिपर भरि जिनगी लड़बाक समय नहि छै, जे ध्वनि सिद्धांत कहैत अछि से मानू, आ नहि तँ प्रोनन्सिएशनक निअम बनाऊ। “नहि” लेल “नञि” लिखब तँ बुझबामे अबैत अछि मुदा नइँ (अन्तिका), नइं (एन.बी.टी.) आ नँइ (साकेतानन्द - कालरात्रिश्च दारुणा) मे सँ साकेतानन्दजी बला प्रयोग ध्वनि-विज्ञान सिद्धांतसँ बेशी समीचीन सिद्ध होइत अछि आ से विश्वास नहि होअए तँ ध्वनि प्रयोगशाला सभक मदति लिअ।(वैज्ञानिक आ मानक मैथिली वर्णमालाक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइवक (http://www.videha.co.in/) विदेह ऑडियो लिंकपर डाउनलोड/श्रवण लेल उपलब्ध अछि।) “बनैत बिगड़ैत” पोथीक ई एकटा विशेषता अछि जे सुभाषचन्द्र यादवजी अपन विशिष्ट लेखन-शैलीक प्रयोग कएने छथि जे ध्वन्यात्मक अछि आ मानकीकरण सम्वादकेँ आगाँ लए जएबामे सक्षम अछि। कथाक यात्रा- वैदिक आख्यान, जातक कथा, ऐशप फेबल्स, पंचतंत्र आ हितोपदेश आ संग-संग चलैत रहल लोकगाथा सभ। सभ ठाम अभिजात्य वर्गक कथाक संग लोकगाथा रहिते अछि। कथामे असफलताक सम्भावना उपन्यास-महाकाव्य-आख्यान सँ बेशी होइत अछि, कारण उपन्यास अछि “सोप ओपेरा” जे महिनाक-महिना आ सालक-साल धरि चलैत अछि आ सभ एपीसोडक अन्तमे एकटा बिन्दुपर आबि खतम होइत अछि। माने सत्तरि एपीसोडक उपन्यासमे उन्हत्तरि एपीसोड धरि तँ आशा बनिते अछि जे कथा एकटा मोड़ लेत आ अन्त धरि जे कथाक दिशा नहिए बदलल तँ पुरनका सभटा एपीसोड हिट आ मात्र अन्तिम एपीसोड फ्लॉप। मुदा कथा एकर अनुमति नहि दैत अछि। ई एक एपीसोड बला रचना छी आ नीक तँ खूबे नीक आ नहि तँ खरापे-खराप। कथा-गाथा सँ बढ़ि आगू जाइ तँ आधुनिक कथा-गल्पक इतिहास उन्नैसम शताब्दीक अन्तमे भेल। एकरा लघुकथा, कथा आ गल्पक रूप मानल गेल। ओना एहि तीनूक बीचक भेद सेहो अनावश्यक रूपसँ व्याख्यायित कएल गेल। रवीन्द्रनाथ ठाकुरसँ शुरु भेल ई यात्रा भारतक एक कोनसँ दोसर कोन धरि सुधारवाद रूपी आन्दोलनक परिणामस्वरूप आगाँ बढ़ल। असमियाक बेजबरुआ, उड़ियाक फकीर मोहन सेनापति, तेलुगुक अप्पाराव, बंगलाक केदारनाथ बनर्जी ई सभ गोटे कखनो नारीक प्रति समर्थनमे तँ कखनो समाजक सूदखोरक विरुद्ध अबैत गेलाह। नेपाली भाषामे “देवी को बलि” सूर्यकान्त ज्ञवाली द्वारा दसहराक पशुबलि प्रथाक विरुद्ध लिखल गेल। कोनो कथा प्रेमक बंधनक मध्य जाति-धनक सीमाक विरुद्ध तँ कोनो दलित समाजक स्थिति आ धार्मिक अंधविश्वासक विषयमे लिखल गेल। आ ई सभ करैत सर्वदा कथाक अन्त सुखद होइत छल सेहो नहि। वाद: साहित्य: उत्तर आधुनिक, अस्तित्ववादी, मानवतावादी, ई सभ विचारधारा दर्शनशास्त्रक विचारधारा थिक। पहिने दर्शनमे विज्ञान, इतिहास, समाज-राजनीति, अर्थशास्त्र, कला-विज्ञान आ भाषा सम्मिलित रहैत छल। मुदा जेना-जेना विज्ञान आ कलाक शाखा सभ विशिष्टता प्राप्त करैत गेल, विशेष कए विज्ञान, तँ दर्शनमे गणित आ विज्ञान मैथेमेटिकल लॉजिक धरि सीमित रहि गेल। दार्शनिक आगमन आ निगमनक अध्ययन प्रणाली, विश्लेषणात्मक प्रणाली दिस बढ़ल। मार्क्स जे दुनिया भरिक गरीबक लेल एकटा दैवीय हस्तक्षेपक समान छलाह, द्वन्दात्मक प्रणालीकेँ अपन व्याख्याक आधार बनओलन्हि। आइ-काल्हिक “डिसकसन” वा द्वन्द जाहिमे पक्ष-विपक्ष, दुनू सम्मिलित अछि, दर्शनक (विशेष कए षडदर्शनक- माधवाचार्यक सर्वदर्शन संग्रह-द्रष्टव्य) खण्डन-मण्डन प्रणालीमे पहिनहिसँ विद्यमान छल। से इतिहासक अन्तक घोषणा कएनिहार फ्रांसिस फुकियामा -जे कम्युनिस्ट शासनक समाप्तिपर ई घोषणा कएने छलाह- किछु दिन पहिने एहिसँ पलटि गेलाह। उत्तर-आधुनिकतावाद सेहो अपन प्रारम्भिक उत्साहक बाद ठमकि गेल अछि। अस्तित्ववाद, मानवतावाद, प्रगतिवाद, रोमेन्टिसिज्म, समाजशास्त्रीय विश्लेषण ई सभ संश्लेषणात्मक समीक्षा प्रणालीमे सम्मिलित भए अपन अस्तित्व बचेने अछि। साइको-एनेलिसिस वैज्ञानिकतापर आधारित रहबाक कारण द्वन्दात्मक प्रणाली जेकाँ अपन अस्तित्व बचेने रहत। आधुनिक कथा अछि की? ई केहन होएबाक चाही? एकर किछु उद्देश्य अछि आकि होएबाक चाही? आ तकर निर्धारण कोना कएल जाए ? कोनो कथाक आधार मनोविज्ञान सेहो होइत अछि। कथाक उद्देश्य समाजक आवश्यकताक अनुसार आ कथा यात्रामे परिवर्तन समाजमे भेल आ होइत परिवर्तनक अनुरूपे होएबाक चाही। मुदा संगमे ओहि समाजक संस्कृतिसँ ई कथा स्वयमेव नियन्त्रित होइत अछि। आ एहिमे ओहि समाजक ऐतिहासिक अस्तित्व सोझाँ अबैत अछि। जे हम वैदिक आख्यानक गप करी तँ ओ राष्ट्रक संग प्रेमकेँ सोझाँ अनैत अछि। आ समाजक संग मिलि कए रहनाइ सिखबैत अछि। जातक कथा लोक-भाषाक प्रसारक संग बौद्ध-धर्म प्रसारक इच्छा सेहो रखैत अछि। मुस्लिम जगतक कथा जेना रूमीक “मसनवी” फारसी साहित्यक विशिष्ट ग्रन्थ अछि जे ज्ञानक महत्व आ राज्यक उन्नतिक शिक्षा दैत अछि। आजुक कथा एहि सभ वस्तुकेँ समेटैत अछि आ एकटा प्रबुद्ध आ मानवीय (!) समाजक निर्माणक दिस आगाँ बढ़ैत अछि। आ जे से नहि अछि तँ ई ओकर उद्देश्यमे सम्मिलित होएबाक चाही। आ तखने कथाक विश्लेषण आ समालोचना पाठकीय विवशता बनि सकत। कम्यूनिस्ट शासनक समाप्ति आ बर्लिनक देबालक खसबाक बाद फ्रांसिस फुकियामा घोषित कएलन्हि जे विचारधाराक आपसी झगड़ासँ सृजित इतिहासक ई समाप्ति अछि आ आब मानवक हितक विचारधारा मात्र आगाँ बढ़त। मुदा किछु दिन पहिनहि ओ एहि मतसँ आपस भऽ गेलाह आ कहलन्हि जे समाजक भीतर आ राष्ट्रीयताक मध्य एखनो बहुत रास भिन्न विचारधारा बाँचल अछि। तहिना उत्तर आधुनिकतावादी विचारक जैक्स देरीदा भाषाकेँ विखण्डित कए ई सिद्ध कएलन्हि जे विखण्डित भाग ढेर रास विभिन्न आधारपर आश्रित अछि आ बिना ओकरा बुझने भाषाक अर्थ हम नहि लगा सकैत छी। मनोविश्लेषण आ द्वन्दात्मक पद्धति जेकाँ फुकियामा आ देरीदाक विश्लेषण सेहो संश्लेषित भए समीक्षाक लेल स्थायी प्रतिमान बनल रहत। सुभाष चन्द्र यादवक कथा-संग्रह बनैत बिगड़ैत: स्वतन्त्रताक बादक पीढ़ीक कथाकार छथि सुभाषजी। कथाक माध्यमसँ जीवनकेँ रूप दैत छथि। शिल्प आ कथ्य दुनूसँ कथाकेँ अलंकृत कए कथाकेँ सार्थक बनबैत छथि। अस्तित्वक लेल सामान्य लोकक संघर्ष तँ एहि स्थितिमे हिनकर कथा सभमे भेटब स्वाभाविके। कएक दशक पूर्व लिखल हिनक कथा “काठक बनल लोक” क बदरिया साइते संयोग हंसैत रहए। एहु कथा संग्रहक सभ पात्र एहने सन विशेषता लेने अछि। हॉस्पीटलमे कनैत-कनैत सुतलाक बाद उठि कए कोनो पात्र फेरसँ कानए लगैत छथि तँ कोनो पात्र प्रेममे पड़ल छथि। किनकोमे बिजनेस सेन्स छन्हि तँ हरिवंश सन पात्र सेहो छथि जे उपकारक बदला सिस्टम फॉल्टक कारण अपकार कए जाइत छथि। आब “बनैत बिगड़ैत” कथा संग्रहक कथा सभपर गहिंकी नजरि दौगाबी। कनियाँ-पुतरा- एहि कथामे रस्तामे एकटा बचिया लेखकक पएर छानि फेर ठेहुनपर माथ राखि निश्चिन्त अछि, जेना माएक ठेहुनपर माथ रखने होअए। नेबो सन कोनो कड़गर चीज लेखकसँ टकरेलन्हि। ई लड़कीक छाती छिऐ। लड़की निर्विकार रहए जेना बाप-दादा वा भाए बहिन सऽ सटल हो। लेखक सोचैत छथि, ई सीता बनत की द्रौपदी। राबन आ दुर्जोधनक आशंका लेखककेँ घेर लैत छन्हि। कनियाँ-पुतरा पढ़बाक बाद वैह सड़कक चौबटिया अछि आ वैह रेड-लाइटपर गाड़ी चलबैत-रोकैत काल बालक-बालिका सभ देखबामे अबैत छथि। मुदा आब दृष्टिमे परिवर्तन भऽ जाइत अछि। कारक शीसा पोछि पाइ मँगनिहार बालक-बालिकाकेँ पाइ-देने वा बिन देने, मुदा बिनु सोचने आगाँ बढ़ि जाएबला दृष्टिक परिवर्तन। कनियाँ-पुतरा पढ़बाक बाद की हुनकर दृष्टिमे कोनो परिवर्तन नहि होएतन्हि? बालक तँ पैघ भए चोरि करत वा कोनो ड्रग कार्टेलक सभसँ निचुलका सीढ़ी बनत मुदा बालिका ? ओ सीता बनत आकि द्रौपदी आकि आम्रपाली। जे सामाजिक संस्था, ह्यूमन राइट्स ऑरगेनाइजेशन कोनो प्रेमीक बिजलीक खाम्हपर चढ़ि प्राण देबाक धमकीपर नीचाँ जाल पसारि कऽ टी.वी.कैमरापर अपन आ अपन संस्थाक नाम प्रचारित करैत छथि ओ एहि कथाकेँ पढ़लाक बाद ओहि पुरातन दृष्टिसँ काज कए सकताह? ओ सरकार जे कोनो हॉस्पीटलक नाम बदलि कए जयप्रकाश नारायणक नामपर करैत अछि वा हार्डिंग पार्कक नाम वीर कुँअर सिंहक नामपर कए अपन कर्त्तव्यक इतिश्री मानि लैत अछि ओ समस्याक जड़ि धरि पहुँचि नव पार्क आ नव हॉस्पीटल बना कए जयप्रकाश नारायण आ वीर कुँअर सिंहक नामपर करत आकि दोसरक कएल काजमे “मेड बाइ मी” केर स्टाम्प लगाओत? ई संस्था सभ आइ धरि मेहनतिसँ बचैत अएबाक आ सरल उपाय तकबाक प्रवृत्तिपर रोक नहि लगाओत? असुरक्षित- ट्रेनसँ उतरलाक बाद घरक २० मिनटक रस्ताक राति जतेक असुरक्षित भऽ गेल अछि तकर सचित्र वर्णन ई कथा करैत अछि। पहिने तँ एहन नहि रहैक- ई अछि लोकक मानसिक अवस्था। मुदा एहि तरहक समस्या दिस ककरो ध्यान कहाँ छै। पैघ-पैघ समस्या, उदारीकरण आन कतेक विषयपर मीडिआक ध्यान छै। चौक-चौराहाक एहि तरहक समस्यापर नव दृष्टि अबैत अछि, एहिमे स्टेशनसँ घरक बीचक दूरी रातिक अन्हारमे पहाड़ सन भऽ जाइत अछि। प्रदेशक तत्कालीन कानून-व्यवस्थापर ई एक तरहक टिप्पणी अछि। एकाकी- एहि कथामे कुसेसर हॉस्पीटलमे छथि। हॉस्पीटलक सचित्र विवरण भेल अछि। ओतए एकटा स्त्री पतिक मृत्युक बाद कनैत-कनैत प्रायः सुति गेलि आ फेर निन्न टुटलापर कानए लागलि। एना होइत अछि। कथाकार मानव जीवनक एकटा सत्यता दिस इशारा दैत आ हॉस्पीटलक बात-व्यवस्थापर टिप्पणी तेना भऽ कए नहि वरण जीवन्तता देखा कए करैत छथि। ओ लड़की- एहि कथामे हॉस्टलक लड़का-लड़कीक जीवनक बीच नवीन नामक युवक एकटा लड़कीक हाथमे ऐंठ खाली कप, जे ओहि लड़कीक आ ओकर प्रेमीक अछि, देखैत अछि। लड़की नवीनकेँ पुछैत छै जे ओ केम्हर जा रहल अछि। नवीनकेँ होइत छै जे ओ ओकरा अपनासँ दब बुझि कप फेंकबाक लेल पुछलक। नवीन ओकरा मना कऽ दैत अछि। विचार सभ ओकर मोनमे घुरमैत रहैत छै। ई कथा एकटा छोट घटनापर आधारित अछि...जे ओ हमरा दब बूझि चाहक कप फेकबाक लेल कहलक? आ ओ दृढ़तासँ नहि कहि आगाँ बढ़ि जाइत अछि। एकाकी जेकाँ ई कथा सेहो मनोवैज्ञानिक विश्लेषणपर आधारित अछि। एकटा प्रेम कथा- पहिने जकरा घरमे फोन रहैत छल तकरा घरमे दोसराक फोन अबैत रहैत छल, जे एकरा तँ ओकरा बजा दिअ। लेखकक घरमे फोन छलन्हि आ ओ एकटा प्रेमीक प्रेमिकाक फोन अएलापर, ओकर प्रेमीकेँ बजबैत रहैत छथि। प्रेमी मोबाइल कीनि लैत अछि से फोन आएब बन्द भऽ जाइत अछि। मुदा प्रेमी द्वारा नम्बर बदलि लेलापर प्रेमिकाक फोन फेरसँ लेखकक घरपर अबैत अछि। प्रेमिका, प्रेमीक ममियौत बहिनक सखी रितु छथि आ लेखक ओकर सहायताक लेल चिन्तित भऽ जाइत छथि। एहि कथामे प्रेमी-प्रेमिका, मोबाइल आ फोन ई सभ नव युगक संग नव कथामे सेहो स्वाभाविक रूपेँ अबैत अछि। टाइटल कथा अछि बनैत-बिगड़ैत। तीन टा नामित पात्र । माला, ओकर पति सत्तो आ पोती मुनियाँ । गाम-घरक जे सास-पुतोहुक गप छै, सेहन्ता रहि गेल जे कहियो नहेलाक बाद खाइ लेल पुछितए, एहन सन। मुदा सैह बेटा-पुतोहु जखन बाहर चलि जाइत छथि तँ वैह सासु कार कौआक टाहिपर चिन्तित होमए लगैत छथि। माइग्रेशनक बादक गामक यथार्थकेँ चित्रित करैत अछि ई कथा। सत्तोक संग कौआ सेहो एक दिन बिला जाएत आ मुनियाँ कौआ आ दादा दुनूकेँ तकैत रहत।प्रवासीक कथा, बेटा-पुतोहुक आ पोतीक कथा, सासु-पुतोहुक झगड़ा आ प्रेम ! अपन-अपन दुःख कथामे पत्नी, अपन अवहेलनाक स्थितिमे, धीया-पुताकेँ सरापैत छथि। रातिमे धीया-पुताक खेनाइ, खा लेबा उत्तर भनसाघरक ताला बन्द रहबाक स्थितिमे पत्नीक भूखल रहब आ परिणामस्वरूप पतिक फोंफक स्वरसँ कुपित होएब स्वाभाविक। सभक अपन संसार छै। लोक बुझैए जे ओकरे संसारक सुख आ दुःख मात्र सम्पूर्ण छै मुदा से नहि अछि। सभक अपन सुख-दुःख छै, अपन आशा आ आकांक्षा छै। कथाकार ओहन सत्यकेँ उद्घाटित करैत छथि, जे हुनकर अनुभवक अंतर्गत अबैत छन्हि। आत्मानुभूति परिवेश स्वतंत्र कोना भए सकत आ से सुभाष चन्द्र यादवजीक सभ कथामे सोझाँ अबैत अछि। आतंक कथामे कथाकारकेँ पुरान संगी हरिवंशसँ कार्यालयमे भेँट होइत छन्हि। लेखकक दाखिल-खारिज बला काज एहि लऽ कऽ नहि भेलन्हि जे हरिवंशक स्थानान्तरणक पश्चात् ने क्यो हुनकासँ घूस लेलक आ ताहि द्वारे काजो नहि केलक। हरिवंशक बगेबानी घूसक अनेर पाइक कारण छल से दोसर किएक अपन पाइ छोड़त ? लेखक आतंकित छथि। कार्यालयक परिवेश, भ्रष्टाचार आ एक गोटेक स्थानांतरणसँ बदलैत सामाजिक सम्बन्ध ई सभ एतए व्यक्त भेल अछि। आइ काल्हि हम आकि अहाँ ब्लॉकमे वा सचिवालयमे कोनो काज लेल जाइत छी, तँ यैह ने सुनए पड़ैत अछि, जे पाइ जे माँगत से दए देबैक आ तखन कोनो दिक्कत होअए तँ कहब ! आ पाइक बदला ककरो नाम वा पैरवी लए गेलहुँ तँ कर्मचारी ने पाइये लेत आ नहिये अहाँक काज होएत। एकटा अन्त कथामे ससुरक मृत्युपर लेखकक साढ़ू केश कटेने छथि आ लेखक नहि, एहिपर कैक तरहक गप होइत अछि। साढ़ू केश कटा कऽ निश्चिन्त छथि। ई जे सांस्कृतिक सिम्बोलिज्म आएल अछि, जे पकड़ा गेल से चोर आ खराप काज केनिहार, जे नहि पकड़ाएल से आदर्शवादी। पूरा-पूरी तँ नहि, मुदा अहू कथामे एहने आस्था जन्म लैत अछि आ टूटि जाइत अछि। हरियाणामे बापो मरलापर लोक केश नहि कटबैत अछि, तँ की ओकर दुःखमे कोनो कमी रहैत छै तेँ ? पंजाबक महिला एक बरखक बाद ने सिनूर लगबैत छथि आ ने चूड़ी पहिरैत छथि मुदा पहिल बरख कान्ह धरि चूड़ी भरल रहैत छन्हि, तँ की बियाहक पहिल बरखक बाद हुनकर पति-प्रेममे कोनो घटंती आबि जाइत छन्हि ? कबाछु कथा मे चम्पीबलाक लेखक लग आएब, जाँघपर हाथ राखब। अभिजात्य संस्कारक लोक लग बैसल रहबाक कारणसँ लेखक द्वारा ओकर हाथ हटाएब । चम्पीबला द्वारा ई गप बाजब जे छुअल देहकेँ छूलामे कोन संकोच। जेना चम्पीवला लेखककेँ बुझाइय रहन्हि जे हुनका युवती बुझि रहल छलन्हि। लेखककेँ लगैत छन्हि जे ओ स्त्री छथि आ चम्पीबला ओकर पुरान यार। ठाम-कुठाम आ समय-कुसमयक महीन समझ चम्पीवलाकेँ नहि छइ, नहि तँ लेखक ओतेक गरमीयोमे चम्पी करा लैतए। चम्पीवलाक दीनतापर अफसोच भेलन्हि मुदा ओकर शी-इ-इ केँ मोन पाड़ैत वितृष्णा सेहो। फ्रायडक मनोविश्लेषणक बड्ड आलोचना भेल जे ओ सेक्सकेँ केन्द्रमे राखि गप करैत छथि। मुदा अनुभवसँ ई गप सोझाँ अबैत अछि जे सेक्ससँ जतेक दूरी बनाएब, जतेक एकरा वार्तालाप-कथा-साहित्यसँ दूर राखब, ओकर आक्रमण ततेक तीव्र होएत। कारबार मे लेखकक भेँट मिस्टर वर्मा, सिन्हा आ दू टा आर गोटेसँ होइत अछि। बार मे सिन्हा दोस्ती आ बिजनेसकेँ फराक कहैत दू टा खिस्सा सुनबैत अछि। सभ चीजक मोल अछि, एहिपर एकटा दोस्तक वाइफ लेल टी.वी. किनबाक बाद फ्रिजक डिमान्ड अएबाक गप बीचेमे खतम भऽ जाइत अछि। दोसर खिस्सामे एकटा स्त्री पतिक जान बचबए लेल डॉक्टरक फीस देबाक लेल पूर्व प्रेमी लग जाइत अछि। पूर्व प्रेमी पाइ देबाक बदलामे ओकरा संगे राति बितबए लेल कहैत छै। सिन्हा एहि कथामे ककरो गलती नहि मानैत छथि, डॉक्टर बिना पाइ लेने किएक इलाज करत, पूर्व प्रेमी मँगनीमे पाइ किएक देत आ ओ स्त्री जे पूर्व प्रेमी संग राति नहि बिताओत, तँ ओकर पति मरि जएतैक। आब बारसँ लेखक निकलैत छथि तँ दरबानक सलाम मारलापर अहूमे पैसाक टनक सुनाइ पड़ए लगैत छन्हि। प्राचीन मूल्य, दोस्ती-यारी आ आदर्शक टूटबाक स्थिति एकटा एकाकीपनक अनुभव करबैत अछि। कुश्ती मे सेहो फ्रायड सोझाँ अबैत छथि, कथाक प्रारम्भ लुंगीपरक सुखाएल कड़गर भेल दागसँ शुरू होइत अछि। मुदा तुरत्ते स्पष्ट होइत अछि, जे ओ से दाग नहि अछि, वरन घावक दाग अछि। फेर हाटक कुश्तीमे गामक समस्याक निपटारा, हेल्थ सेन्टरक बन्द रहब, ओतए ईंटाक चोरिक चरचा अबैत अछि। छोट भाइ कोनो इलाजक क्रममे एलोपैथीसँ हटि कए होम्योपैथीपर विश्वास करए लगैत छथि, एहि गपक चरचा आएल अछि। लोक सभक घावक समाचार पुछबा लऽ अएनाइ आ लेखक द्वारा सभकेँ विस्तृत विवरण कहि सुनओनाइ मुदा उमरिमे कम वयसक कैक गोटेकेँ टारि देनाइ, ई सभ क्रम एकटा वातावरणक निर्माण करैत अछि। कैनरी आइलैण्डक लारेल कथामे सुभाष आ उपिया कथाक चरित्र छथि। एतए एकटा बिम्ब अछि- जेना निर्णय कोसीक धसना जकाँ। ममियौत भाइक चिट्ठी, कटारि देने नाहपर जएबाक, गेरुआ पानिक धारमे आएब, नाहक छीटपर उतारब, छीटक बादो बहुत दूर धरि जाँघ भरि पानिक रहब। धीपल बालुपर साइकिलकेँ ठेलैत देखि क्यो कहैत छन्हि- “साइकिल ससुरारिमे देलक-ए? कने बड़द जकाँ टिटकार दियौक”। दीदी-पीसा अहिठाम एहि गपक चरचा सुनलन्हि, जे कोटक खातिर हुनकर बेटीक विवाह दू दिन रुकि गेल छलन्हि आ ईहो जे बेसी पढ़ने लोक बताह भऽ जाइत अछि।सुभाष चाहियो कऽ दू सए टाका नहि माँगि पबैत छथि, दीदीक व्यवहार अस्पष्ट छन्हि, सुभाष आश्वस्त नहि छथि आ घुरि जाइत छथि। तृष्णा कथामे लेखककेँ अखिलन भेटैत छन्हि। श्रीलतासँ ओ अपन भेँटक विवरण कहि सुनबैत अछि। पाँचम दिन घुरलाक बाद ट्रेनमे ओ नहि भेटलीह। आब अखिलन की करत, विशाखापत्तनम आ विजयवाड़ाक बीचक रस्तामे चक्कर काटत आकि स्मृतिक संग दिन काटत। छोट-छोट भावनात्मक घटनाक विश्लेषण अछि कथा “कैनरी आइलैण्डक लारेल” आ “तृष्णा”। दाना कथामे मोहन इन्टरव्यू लेल गेल अछि, ओतए सहृदय चपरासी सूचित करैत छै जे बाहरीकेँ नहि लैत छै, पी.एच.डी. रहितए तँ कोनो बात रहितए। मोहनकेँ सभ चीज बीमार आ उदास लगैत रहए। फुद्दी आ मैना पावरोटीक टुकड़ीपर ची-ची करैत झपटैत रहए।प्रतियोगी परीक्षाक साक्षात्कारमे बाहरी आ लोकल केर जे संकल्पना आएल अछि तकर सम्वेदनात्मक वर्णन भेल अछि। दृष्टि कथामे पढ़ाइ खतम भेलाक बाद नोकरीक खोज, गाममे लोकसभक तीक्ष्ण कटाक्ष। फेर दक्षिण भारतीय पत्रकारक प्रेरणासँ कनियाँक विरोधक बावजूद गाममे लेखकक खेतीमे लागब। ई सभ गप एकटा सामान्य कथ्य रहलाक बादो ठाम-ठाम सामाजिक सत्य उद्घाटित करैत अछि। एतए गामक लोकक कुटीचाली अछि, जे काजक अभावमे खाली समय बेशी रहलाक कारण अबैत अछि। संगमे आइ-काल्हिक स्त्रीक शहरी जीवन जीबाक आकांक्षा सेहो प्रदर्शित करैत अछि। नदी कथामे कथ्य कथाक संगे चलैत अछि आ खतम भए जाइत अछि। गगनदेवक घरपर बिहारी आएल छै। शहरमे ओकरा एक साल रहबाक छै। गगनदेवकेँ ओकरा संग मकान खोजबाक क्रममे एकटा लड़कीसँ भेँट होइत छै। ओकरा छोड़ि आगाँ बढ़ल तँ ई बुझलाक बादो जे आब ओकरासँ फेर भेँट नहि हेतइ ओ उल्लास आ प्रेमक अनुभूतिसँ भरि गेल। परलय बाढिक कथा थिक, कोसीक कथा कहल गेल अछि एतए। बौकी बुनछेकक इन्तजारीमे अछि। मुदा धारमे पानि बढ़ि रहल छै। कोशीक बाढ़ि बढ़ल आबि रहल छै आ एम्हर माएक रद्द-दस्तसँ हाल-बेहाल छै। माल-जाल भूखसँ डिकरैत रहै। रामचरनक घरमे अन्नपानि बेशी छै से ओ सभकेँ नाहक इन्तजाम लेल कहैत छै। बौकूक घरसँ कटनियाँ दूर रहै। मृत्यु आ विनाश बौकूकेँ कठोर बना देलकैक, मोह तोड़ि देलकैक। मुदा बरखा रुकि गेलैक। बौकू चीज सभकेँ चिन्हबाक आ स्मरण करबाक प्रयत्न करए लागल। बात कथामे सेहो कथाकार अपन कथानककेँ बाट चलिते ताकि लैत छथि आ शिल्पसँ ओकरा आगाँ बढ़बैत छथि। नेबो दोकानपर नेबोवला आ एकटा लोकक बीचमे बहस सुनैत लेखक बीचमे कूदि पड़ैत छथि। नेबोवलासँ एक गोटे अपन छत्ता माँगि रहल अछि जे ओ नीचाँ रखने रहए।दुखक गप, लेखकक अनुसार, बेशी दिन धरि लोककेँ मोन रहैत छै। रंभा कथामे पुरुष-स्त्रीक बीचक बदलैत सम्बन्धक तीव्र गतिसँ वर्णन भेल अछि। पुरुष यावत स्त्रीसँ दूर रहैत अछि तँ सभ ओकरा मेनका आ रम्भा देखाइ पड़ैत छै। मुदा जे सम्वादक प्रारम्भ होइत अछि तँ बादमे लेखक केँ लगैत छन्हि जे ओ बेटीये छी।रस्तामे एक स्त्री अबैत अछि। लेखक सोचैत छथि जे ई के छी, रम्भा, मेनका आकि...। ओकरा संग बेटा छै, ओतेक सुन्नर नहि, कारण एकर वर सुन्दर नहि होएतैक। ओ गपशपमे कखनो लेखककेँ ससुर जकाँ, कखनो अपनाकेँ हुनकर बेटी तुल्य कहैत अछि। पहिने लेखककेँ खराप लगलन्हि। मुदा बादमे लेखककेँ नीक लगलन्हि। मुदा अन्तमे ओकर पएर छूबए लेल झुकब मुदा बिन छूने सोझ भऽ जाएब नहि बुझिमे अएलन्हि। हमर गाम कथामे लेखकक गामक रस्ता, कटनियाँ सँ मेनाही गामक लोकक छिड़िआएब आ बान्हक बीचमे अहुरिया काटैत लोकक वर्णन अछि। कोसिकन्हाक लोक- जानवरक समान, जानवरक हालतमे। कटनियाँमे लेखकक घर कटि गेलन्हि से ओ नथुनियाँ एहिठाम टिकैत छथि। मछबाहि आ चिड़ै बझाबऽ लेल नथुनी जोगार करैत अछि। जमीनक झगड़ा छन्हि, एक हिस्सेदारक जमीन धारमे डूमल छै से ओ लेखकक गहूमवला खेत हड़पए चाहैत अछि। शन आ स्त्रीक (!) पाछू लोक बेहाल अछि। स्त्रीक पाछू बिन कारण लेखक पड़ि गेल छथि जेना विष्णु शर्मा पंचतंत्रमे कथा कहैत-कहैत शूद्र आ महिलाक पाछाँ पड़ि जाइत छथि। यावत सभ कमलक घूर लग कपक अभावमे बेरा-बेरी चाह पिबैत छथि, फसिल कटि कऽ सिबननक एतए चलि जाइ-ए। झौआ, कास, पटेरक जंगल जखन रहए, चिड़ै बड्ड आबए, आब कम अबैत अछि। खढ़िया, हरिन, माछ, काछु, डोका सभ खतम भऽ रहल छै- जीवनक साधन दुर्लभ भऽ गेल अछि। साँझमे जमीनक पंचैती होइत अछि।सत्तोक बकड़ी मरि गेलैक, पुतोहु एकर कारण सासुक सरापब कहैत अछि। सासु एकर कारण बलि गछलोपर पाठी सभकेँ बेचब कहैत छथि। सत्तोक बेटीक जौबनक उभारकेँ लेखक पुरुष सम्पर्कक साक्षी कहैत छथि आ सकारण फेरसँ महिलाक पाछाँ पड़ि जाइत छथि, कारण ई धारणा लोकमे छै। सत्तोक बेटी एखन सासुर नहि बसैत छै। सुकन रामक एहिठाम खाइत काल लेखककेँ संकोच भेलन्हि, जकरासँ उबरबाक लेल ओ बजलाह- आइ तोरा जाति बना लेलिअह। कोसी सभ भेदभावकेँ पाटि देलक, डोम, चमार, मुसहर, दुसाध, तेली, यादव सभ एके कलसँ पानि भरैत अछि। एके पटियापर बैसैत अछि। ककरा लेल कथा लिखी? वा कही? कथाक वाद: जिनका विषयमे लिखब से तँ पढ़ताह नहि। कथा पढ़ि लोक प्रबुद्ध भऽ जाएत ? गीताक सप्पत खा कए झूठ बजनिहारक संख्या कम नहि। तेँ की एहन कसौटीपर रचित कथाक महत्व कम भए जाएत ? सभ प्रबुद्ध नहि होएताह तँ स्वस्थ मनोरंजन तँ प्राप्त कऽ सकताह। आ जे एकोटा व्यक्ति कथा पढ़ि ओहि दिशामे सोचत तँ कथाक सार्थकता सिद्ध होएत। आ जकरा लेल रचित अछि ई कथा जे ओ नहि, तँ ओकर ओहि परिस्थितिमे हस्तक्षेप करबामे सक्षम व्यक्ति तँ पढ़ताह। आ जा ई रहत ताधरि एहि तरहक कथा रचित कएल जाइत रहत। आ जे समाज बदलत तँ सामाजिक मूल्य सनातन रहत ? प्रगतिशील कथामे अनुभवक पुनर्निर्माण करब, परिवर्तनशील समाजक लेल, जाहिसँ प्राकृतिक आ सामाजिक यथार्थक बीच समायोजन होअए। आकि एहि परिवर्तनशील समयकेँ स्थायित्व देबा लेल परम्पराक स्थायी आ मूल तत्वपर आधारित कथाक आवश्यकता अछि ? व्यक्ति-हित आ समाज-हितमे द्वैध अछि आ दुनू परस्पर विरोधी अछि। एहिमे संयोजन आवश्यक। विश्व दृष्टि आवश्यक। कथा मात्र विचारक उत्पत्ति नहि अछि जे रोशनाइसँ कागतपर जेना-तेना उतारि देलियैक। ई सामाजिक-ऐतिहासिक दशासँ निर्दिशित होइत अछि। तँ कथा आदर्शवादी होअए, प्रकृतिवादी होअए वा यथार्थवादी होअए। आकि एहिमे सँ मानवतावादी, सामाजिकतावादी वा अनुभवकेँ महत्व देमएबला ज्ञानेन्द्रिय-यथार्थवादी होअए ? आ नहि तँ कथा प्रयोजनमूलक होअए। एहिमे उपयोगितावाद, प्रयोगवाद, व्यवहारवाद, कारणवाद, अर्थक्रियावाद आ फलवाद सभ सम्मिलित अछि। ई सभसँ आधुनिक दृष्टिकोण अछि। अपनाकेँ अभिव्यक्त कएनाइ मानवीय स्वभाव अछि। मुदा ओ सामाजिक निअममे सीमित भऽ जाइत अछि। परिस्थितिसँ प्रभावित भऽ जाइत अछि। तँ कथा अनुभवकेँ पुनर्रचित कए गढ़ल जाएत। आ व्यक्तिगत चेतना तखन सामाजिक आ सामूहिक चेतना बनि आओत। शोषककेँ अपन प्रवृत्तिपर अंकुश लगबए पड़तन्हि। तँ शोषितकेँ एकर विरोध मुखर रूपमे करए पड़तन्हि। स्वतंत्रता- सामाजिक परिवर्तन । कथा तखन संप्रेषित होएत, संवादक माध्यम बनत। कथा समाजक लेल शस्त्र तखने बनि सकत, शक्ति तखने बनि सकत। जे कथाकार उपदेश देताह तँ ज्ञानक हस्तांतरण करताह, जकर आवश्यकता आब नहि छै। जखन कथाकार सम्वाद शुरू करताह तखने मुक्तिक वातावरण बनत आ सम्वादमे भाग लेनिहार पाठक जड़तासँ त्राण पओताह। कथा क्रमबद्ध होअए आ सुग्राह्य होअए तखने ई उद्देश्य प्राप्त करत। बुद्धिपरक नहि व्यवहारपरक बनत। वैदिक साहित्यक आख्यानक उदारता संवादकेँ जन्म दैत छल जे पौराणिक साहित्यक रुढ़िवादिता खतम कए देलक। आ संवादक पुनर्स्थापना लेल कथाकारमे विश्वास होएबाक चाही- तर्क-परक विश्वास आ अनुभवपरक विश्वास, जे सुभाषचन्द्र यादवमे छन्हि। प्रत्यक्षवादक विश्लेषणात्मक दर्शन वस्तुक नहि, भाषिक कथन आ अवधारणाक विश्लेषण करैत अछि से सुभाषजीक कथामे सर्वत्र देखबामे आओत। विश्लेषणात्मक अथवा तार्किक प्रत्यक्षवाद आ अस्तित्ववादक जन्म विज्ञानक प्रति प्रतिक्रियाक रूपमे भेल। एहिसँ विज्ञानक द्विअर्थी विचारकेँ स्पष्ट कएल गेल। प्रघटनाशास्त्रमे चेतनाक प्रदत्तक प्रदत्त रूपमे अध्ययन होइत अछि। अनुभूति विशिष्ट मानसिक क्रियाक तथ्यक निरीक्षण अछि। वस्तुकेँ निरपेक्ष आ विशुद्ध रूपमे देखबाक ई माध्यम अछि। अस्तित्ववादमे मनुष्य-अहि मात्र मनुष्य अछि। ओ जे किछु निर्माण करैत अछि ओहिसँ पृथक ओ किछु नहि अछि, स्वतंत्र होएबा लेल अभिशप्त अछि (सार्त्र)। हेगेलक डायलेक्टिक्स द्वारा विश्लेषण आ संश्लेषणक अंतहीन अंतस्संबंध द्वारा प्रक्रियाक गुण निर्णय आ अस्तित्व निर्णय करबापर जोर देलन्हि। मूलतत्व जतेक गहींर होएत ओतेक स्वरूपसँ दूर रहत आ वास्तविकतासँ लग। क्वान्टम सिद्धान्त आ अनसरटेन्टी प्रिन्सिपल सेहो आधुनिक चिन्तनकेँ प्रभावित कएने अछि। देखाइ पड़एबला वास्तविकता सँ दूर भीतरक आ बाहरक प्रक्रिया सभ शक्ति-ऊर्जाक छोट तत्वक आदान-प्रदानसँ सम्भव होइत अछि। अनिश्चितताक सिद्धान्त द्वारा स्थिति आ स्वरूप, अन्दाजसँ निश्चित करए पड़ैत अछि। तीनसँ बेशी डाइमेन्सनक विश्वक परिकल्पना आ स्टीफन हॉकिन्सक “अ ब्रिफ हिस्ट्री ऑफ टाइम” सोझे-सोझी भगवानक अस्तित्वकेँ खतम कए रहल अछि कारण एहिसँ भगवानक मृत्युक अवधारणा सेहो सोझाँ आएल अछि, से एखन विश्वक नियन्ताक अस्तित्व खतरामे पड़ल अछि। भगवानक मृत्यु आ इतिहासक समाप्तिक परिप्रेक्ष्यमे मैथिली कथा कहिया धरि खिस्सा कहैत रहत ? लघु, अति-लघु कथा, कथा, गल्प आदिक विश्लेषणमे लागल रहत? जेना वर्चुअल रिअलिटी वास्तविकता केँ कृत्रिम रूपेँ सोझाँ आनि चेतनाकेँ ओकरा संग एकाकार करैत अछि तहिना बिना तीनसँ बेशी बीमक परिकल्पनाक हम प्रकाशक गतिसँ जे सिन्धुघाटी सभ्यतासँ चली तँ तइयो ब्रह्माण्डक पार आइ धरि नहि पहुँचि सकब। ई सूर्य अरब-खरब आन सूर्यमेसँ एकटा मध्यम कोटिक तरेगण- मेडिओकर स्टार- अछि। ओहि मेडिओकर स्टारक एकटा ग्रह पृथ्वी आ ओकर एकटा नगर-गाममे रहनिहार हम सभ अपन माथपर हाथ राखि चिन्तित छी जे हमर समस्यासँ पैघ ककर समस्या ? हमर कथाक समक्ष ई सभ वैज्ञानिक आ दार्शनिक तथ्य चुनौतीक रूपमे आएल अछि। होलिस्टिक आकि सम्पूर्णताक समन्वय करए पड़त ! ई दर्शन दार्शनिक सँ वास्तविक तखने बनत। पोस्टस्ट्रक्चरल मेथोडोलोजी भाषाक अर्थ, शब्द, तकर अर्थ, व्याकरणक निअम सँ नहि वरन् अर्थ निर्माण प्रक्रियासँ लगबैत अछि। सभ तरहक व्यक्ति, समूह लेल ई विभिन्न अर्थ धारण करैत अछि। भाषा आ विश्वमे कोनो अन्तिम सम्बन्ध नहि होइत अछि। शब्द आ ओकर पाठ केर अन्तिम अर्थ वा अपन विशिष्ट अर्थ नहि होइत अछि। आधुनिक आ उत्तर आधुनिक तर्क, वास्तविकता, सम्वाद आ विचारक आदान-प्रदानसँ आधुनिकताक जन्म भेल । मुदा फेर नव-वामपंथी आन्दोलन फ्रांसमे आएल आ सर्वनाशवाद आ अराजकतावाद आन्दोलन सन विचारधारा सेहो आएल। ई सभ आधुनिक विचार-प्रक्रिया प्रणाली ओकर आस्था-अवधारणासँ बहार भेल अविश्वासपर आधारित छल। पाठमे नुकाएल अर्थक स्थान-काल संदर्भक परिप्रेक्ष्यमे व्याख्या शुरू भेल आ भाषाकेँ खेलक माध्यम बनाओल गेल- लंगुएज गेम। आ एहि सभ सत्ताक आ वैधता आ ओकर स्तरीकरणक आलोचनाक रूपमे आएल पोस्टमॉडर्निज्म। कंप्युटर आ सूचना क्रान्ति जाहिमे कोनो तंत्रांशक निर्माता ओकर निर्माण कए ओकरा विश्वव्यापी अन्तर्जालपर राखि दैत छथि आ ओ तंत्रांश अपन निर्मातासँ स्वतंत्र अपन काज करैत रहैत अछि, किछु ओहनो कार्य जे एकर निर्माता ओकरा लेल निर्मित नहि कएने छथि। आ किछु हस्तक्षेप-तंत्रांश जेना वायरस, एकरा मार्गसँ हटाबैत अछि, विध्वंसक बनबैत अछि तँ एहि वायरसक एंटी वायरस सेहो एकटा तंत्रांश अछि, जे ओकरा ठीक करैत अछि आ जे ओकरो सँ ठीक नहि होइत अछि तखन कम्प्युटरक बैकप लए ओकरा फॉर्मेट कए देल जाइत अछि- क्लीन स्लेट ! पूँजीवादक जनम भेल औद्योगिक क्रान्तिसँ आ आब पोस्ट इन्डस्ट्रियल समाजमे उत्पादनक बदला सूचना आ संचारक महत्व बढ़ि गेल अछि, संगणकक भूमिका समाजमे बढ़ि गेल अछि। मोबाइल, क्रेडिट-कार्ड आ सभ एहन वस्तु चिप्स आधारित अछि। एहि बेरुका (२००८) कोसीक बाढ़िमे अनलकान्तजी गाममे फाँसल छलाह, भोजन लेल मारि पड़ैत रहए मुदा क्रेडिट कार्डसँ ए.सी.टिकट बुक भए गेलन्हि। मिथिलाक समाजमे सूचना आ संगणकक भूमिकाक आर कोन दोसर उदाहरण चाही? डी कन्सट्रक्शन आ री कन्सट्रक्शन विचार रचना प्रक्रियाक पुनर्गठन केँ देखबैत अछि जे उत्तर औद्योगिक कालमे चेतनाक निर्माण नव रूपमे भऽ रहल अछि। इतिहास तँ नहि मुदा परम्परागत इतिहासक अन्त भऽ गेल अछि। राज्य, वर्ग, राष्ट्र, दल, समाज, परिवार, नैतिकता, विवाह सभ फेरसँ परिभाषित कएल जा रहल अछि। मारते रास परिवर्तनक परिणामसँ, विखंडित भए सन्दर्भहीन भऽ गेल अछि कतेक संस्था। एहि परिप्रेक्ष्यमे मैथिली कथा गाथापर सेहो एकटा गहिंकी नजरि दौगाबी। रामदेव झा जलधर झाक “विलक्षण दाम्पत्य” (मैथिल हित साधन, जयपुर, १९०६ ई.) केँ मैथिलीक आधुनिक कथाक प्रारम्भ मानलन्हि । पुलकित मिश्रक “मोहिनी मोहन” (१९०७-०८), जनसीदनक “ताराक वैधव्य” (मिथिला मिहिर, १९१७ ई.), श्रीकृष्ण ठाकुरक चन्द्रप्रभा, तुलापति सिंहक मदनराज चरित, काली कुमार दासक अदलाक बदला आ कामिनीक जीवन, श्यामानन्द झाक अकिञ्चन, श्री बल्लभ झाक विलासिता, हरिनन्दन ठाकुर “सरोज”क ईश्वरीय रक्षा, शारदानन्द ठाकुर “विनय”क तारा आ श्याम सुन्दर झा “मधुप”क प्रतिज्ञा-पत्र, वैद्यनाथ मिश्र “विद्यासिन्धु”क गप्प-सप्पक खरिहान आ प्रबोध नारायण सिंहक बीछल फूल आएल। हरिमोहन झाक कथा आ यात्रीक उपन्यासिका, राजकमल चौधरी, ललित, रामदेव झा, बलराम, प्रभास कुमार चौधरी, धूमकेतु, राजमोहन झा, साकेतानन्द, विभूति आनन्द, सुन्दर झा “शास्त्री”, धीरेन्द्र, राजेन्द्र किशोर, रेवती रमण लाल, राजेन्द्र विमल, रामभद्र, अशोक, शिवशंकर श्रीनिवास, प्रदीप बिहारी, रमेश, मानेश्वर मनुज, श्याम दरिहरे, कुमार पवन, अनमोल झा, मिथिलेश कुमार झा, हरिश्चन्द्र झा, उपाध्याय भूषण, रामभरोस कापड़ि “भ्रमर”, भुवनेश्वर पाथेय, बदरी नारायण बर्मा, अयोध्यानाथ चौधरी, रा.ना.सुधाकर, जीतेन्द्र जीत, सुरेन्द्र लाभ, जयनारायण झा “जिज्ञासु”, श्याम सुन्दर “शशि”, रमेश रञ्जन, धीरेन्द्र प्रेमर्षि, परमेश्वर कापड़ि, तारानन्द वियोगी, नागेन्द्र कुमर, अमरनाथ, देवशंकर नवीन, अनलकान्त, श्रीधरम, नीता झा, विभा रानी, उषाकिरण खान, सुस्मिता पाठक, शेफालिका वर्मा, ज्योत्सना चन्द्रम, लालपरी देवी एहि यात्राकेँ आगाँ बढ़ेलन्हि। मैथिलीमे नीक कथा नहि, नीक नाटक नहि? मैथिलीमे व्याकरण नहि? पनिसोह आ पनिगर एहि तरहक विश्लेषण कतए अछि मैथिली व्याकरण मे, वैह अनल, पावक सभ अछि ! मुदा दीनबन्धु झाक धातु रूप पोथीमे जे १०२५ टा एहि तरहक खाँटी रूप अछि, रमानथ झाक मिथिलाभाषाप्रकाशमे जे खाँटी मैथिली व्याकरण अछि, ई दुनू रिसोर्स बुक लए मानकीकरण आ व्याकरणक निर्माण सर्वथा संभव अछि। मुदा भऽ रहल अछि ई जे पानीपतक पहिल युद्धक विश्लेषणमे ई लिखी जे पानीपत आ बाबरक बीचमे युद्ध भेल। रामभद्रकें धीरेन्द्र सर्वश्रेष्ठ मैथिली कथाकारक रूपमे वर्णित कएने छथि, मुदा एखन धरि हुनकर कएक टा कथाक विश्लेषण कएल गेल अछि ? नचिकेताक नाटक आ मैथिलीक सेक्सपिअर महेन्द्र मलंगियाक काजक आ रामभद्र आ सुभाष चन्द्र यादवक कथा यात्राक सन्दर्भमे ई गप कहब आवश्यक छल। जाहि समय मैथिलीक समस्या घर-घरसँ मैथिलीक निष्कासन अछि, जखन हिन्दीमे एक हाथ अजमेलाक बाद नाम नहि भेला उत्तर लोक मैथिलीक कथा-कविता लिखि आ सम्पादक-आलोचक भए, अपन महत्वाकांक्षाक भारसँ मैथिली कथा-कविताक वातावरणकेँ भरिया रहल छथि, मार्क्सवाद, फेमिनिज्म आ धर्मनिरपेक्षता घोसिया-घोसिया कए कथा-कवितामे भरल जा रहल अछि, तखन स्तरक निर्धारण सएह कऽ रहल अछि, स्तरहीनताक बेढ़ वाद बनल अछि। जे गरीब आ निम्न जातीयक शोषण आ ओकरा हतोत्साहित करबामे लागल छथि से मार्क्सवादक शरणमे, जे महिलाकेँ अपमानित केलन्हि से फेमिनिज्म आ मिथिला राज्य आ संघक शरणमे आ जे साम्प्रदायिक छथि ओ धर्मनिरपेक्षताक शरणमे जाइत छथि। ओना साम्प्रदायिक लोक फेमिनिस्ट, महिला विरोधी मार्क्सिस्ट आ एहि तरहक कतेक गठबंधन आ मठमे जाइत देखल गेल छथि। क्यो राजकमलक बड़ाइमे लागल अछि, तँ क्यो यात्रीक आ धूमकेतुक तँ क्यो सुमनजीक, आ हुनका लोकनिक तँ की पक्ष राखत तकर आरिमे अपनाकेँ आगाँ राखि रहल अछि। यात्रीक पारोकेँ आ राजकमल आ धूमकेतुक कथाकेँ आइयो स्वीकार नहि कएल गेल अछि- एहि तरहक अनर्गल प्रलाप ! क्यो तथाकथित विवादास्पद कथाक सम्पादन कए स्वयं विवाद उत्पन्न कए अपनाकेँ आगाँ राखि रहल छथि। मात्र मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थक लेखनक बीच सीमित प्रतियोगिता जाहि कवि-कथाकारकेँ विचलित कए रहल छन्हि आ हिन्दी छोड़ि मैथिलीमे अएबाक बाद जाहि गतिसँ ओ ई सभ करतब कए रहल छथि, तिनका मैथिलीक मुख्य समस्यापर ध्यान कहिया जएतन्हि से नहि जानि ? लोक ईहो बुझैत छथि जे हिन्दीक बाद जे मैथिलीमे लिखब , तँ स्वीकृति त्वरित गतिएँ भेटत ? जे मैथिलीक रचनाकारेँकेँ एहि तरहक भ्रम छन्हि आ आत्मविश्वासक अभाव छन्हि, अपन मातृभाषाक संप्रेषणीयतापर अविश्वास (!), तखन एहि भाषाक भविष्य हिनका लोकनिक कान्हपर दए कोन छद्म हम सभ संजोगि रहल छी ? सेमीनारमे साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त एहन जुझारू कथाकार, सम्पादक आ समालोचक सभकेँ अपन पुत्र-पुत्री-पत्नीक संग मैथिलीमे नहि वरन् हिन्दी मे (अंग्रेजी प्रायः सामर्थ्यसँ बाहर छन्हि तेँ) गप करैत देखि हतप्रभ रहि जाइत छी। मैथिलीमे बीस टा लिखनहार छलाह आ पाँचटा पढ़निहार, से कोन विवाद उठल होएत? राजकमल/ यात्रीक मैथिलीक लेखन सौम्य अछि, से हुनकर सभक गोट-गोट रचना पढ़ि कए हम कहि सकैत छी। ताहि स्थिति मे- ई विवाद रहए एहि कवितामे आ एहि कथामे- एहि तरहक गप आनि आ ओकर पक्षमे अपन तर्क दए अपन लेखनी चमकाएब ? आ तकर बाद यात्रीक बाद पहिल उपन्यासकार फलना आ राजकमलक बाद पहिल कवि चिलना-आब तँ कथाकार आ कविक जोड़ी सेहो सोझाँ अबैत अछि, एक दोसराक भक्तिमे आ आपसी वादकेँ आगाँ बढ़एबा लेल। मैथिलीक मुख्य समस्या अछि जे ई भाषा एहि सीमित प्रतियोगी (दुर्घर्ष!) सभक आपसी महत्वाकांक्षाक मारिक बीच मरि रहल अछि। कवि-कथाकार मैथिलीकेँ अपन कैरिअर बना लेलन्हि, घरमे मैथिलीकेँ निष्कासित कए सेमीनारक वस्तु बना देलन्हि। तखन कतए पाठक आ कोन विवाद ! जे समस्या हम देखि रहल छी जे बच्चाकेँ मैथिलीक वातावरण भेटओ आ सभ जातिक लोक एहि भाषासँ प्रेम करथि ताहि लेल कथा आ कविता कतए आगाँ अछि ? कएकटा विज्ञान कथा, बाल-किशोर कथा-कविता कैरियरजीवी कवि-कथाकार लिखि रहल छथि। आ ओ घर-घरमे पहुँचए ताहि लेल कोन प्रयास भए रहल अछि ? सए-दू सए कॉपी पोथी छपबा कए , तकर समीक्षा करबा कए, सए-दू सए कॉपी छपएबला पत्रिकामे छपबा कए , तकर फोटोस्टेट कॉपी फोल्डर बना कऽ घरमे राखि पुरस्कार लेल आ सिलेबसमे किताब लगेबा लेल कएल गेल तिकड़मक वातावरणमे हमर आस गैर मैथिल ब्राह्मण-कर्ण कायस्थ पाठक आ लेखकपर जाए स्थिर भए गेल अछि। जे अपन घर-परिवार नहि सम्हारि सकलाह से ढेरी-ढाकी भाषायी पुरस्कार लए बैसल छथि, मिथिला राज्य बनएबामे लागल छथि , पता नहि राज्य कोना सम्हारि सकताह आ ओकर विधान सभामे कोन भाषामे बजताह, जखन हुनका ओतए पुरस्कृत कएल जएतन्हि। जे घरमे मैथिली नहि बजैत छथि से लेखक आ कवि बनल छथि (हिन्दी-मैथिलीमे समान अधिकारसँ) हिन्दीमे सोचि लिखैत छथि आ तखन अनुवाद कए मौलिक मैथिली लिखैत छथि ! मैथिली कथा-कविता करैत छथि!! मराठी, उर्दू, तमिल, कन्नड़सँ मैथिली अनुवाद पुरस्कार निर्लज्जतासँ लैत छथि , वणक्कम केर अर्थ पुछबन्हि से नहि अबैत छन्हि, अलिफ-बे-से केर ज्ञान नहि, मराठीमे कोनो बच्चासँ गप करबाक सामर्थ्य नहि छन्हि। आ मैथिलीमे हुनकर माथ फुटबासँ एहि द्वारे बचि जाइत छन्हि कारण अपने छपबा कए समीक्षा करबैत छथि, से पाठक तँ छन्हि नहि। पाठक नहि रहएमे हुनका लोकनिकेँ फाएदा छन्हि। आ एहि पुरस्कार सभमे जूरी आ एडवाइजरी बोर्ड अपनाकेँ आगाँ करबामे जखन स्वयं आगाँ अबैत छथि तखन एहि सीमित प्रतियोगी लोकनिक आत्मविश्वास कतेक दुर्बल छन्हि , सएह सोझाँ अबैत अछि । सारंग कुमार छथि, तँ बलरामक चरचा फेरसँ कथाकारक रूपमे शुरू भेल अछि । आ जिनकर सन्तान साहित्यमे नहि अएलाह हुनकर चरचा फेर कोना होएत, हुनकर पक्ष के आगाँ राखत ? जीबैत धरि ने सभ अपन पक्ष स्वयं आगाँ राखि रहल छथि ? मुदा मुइलाक बाद ? मैथिली साहित्यक एहि सत्यकेँ देखार करबाक आवश्यकता अछि । आँखि मुनि कए सेहो एकर समाधान लोक मुदा ताकिये रहल छथि। क्यो चित्रगुप्त सभा खोलि मणिपद्मकेँ बेचि रहल छथि तँ क्यो मैथिल (ब्राह्मण) सभा खोलि सुमनजीक व्यापारमे लागल छथि-मणिपद्म आ सुमनजीक आरिमे अपन धंधा चमका रहल छथि आ मणिपद्म आ सुमनजीकेँ अपमानित कए रहल छथि। कथा-कविता संग्रह सभक सम्पादकक चेला चपाटी मैथिलीक सर्वकालीन कथाकार-कविक संकलनमे स्थान पाबि जाइत छथि , भने हुनकर कोनो पहिले संग्रह आएल होइन्हि वा कथा-कविताक संख्या हास्यास्पद रूपसँ कम होइन्हि। पत्रिका सभक सेहो वएह स्थिति अछि। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षामे कटाउझ करैत बिन पाठकक ई पत्रिका सभ स्वयं मरि रहल अछि आ मैथिलीकेँ मारि रहल अछि। ड्राइंग रूममे बिना फील्डवर्कक लिखल लोककथा जाहि भाषामे लिखल जाइत होअए, ओतए एहि तरहक हास्यास्पद कटाउझ स्वाभाविक अछि। आब तँ अन्तर्जालपर सेहो मैथिलीक किछु जालवृत्तपर जातिगत कटाउझ आ अपशब्दक प्रयोग देखबामे आएल अछि। मार्क्सिस्ट आ फेमिनिस्ट बनि तकरो व्यापार शुरू करब आ अपन स्तरक न्यूनताक एहि तरहेँ पूर्ति करब, सीमित प्रतियोगिता मध्य अल्प प्रतिभायुक्त साहित्यकारक ई हथियार बनि गेल अछि। जे मार्क्सक आदर करत से ई किएक कहत जे हम मार्क्सवादी आलोचक आकि लेखक छी ? हँ जे मार्क्सक धंधा करत तकर विषयमे की कही, धंधा तँ सुमन, राजकमल, यात्री, मणिपद्म, धूमकेतु......सभक शुरू भेल अछि। आ तकर कारण सेहो स्पष्ट। राष्ट्रीय सर्वेक्षण ई देखबैत अछि जे संस्कृत, हिन्दी, मैथिली आ आन साहित्य कॉलेजमे वैह पढ़ैत छथि जिनका दोसर विषयमे नामांकन नहि भेटैत छन्हि, पत्रकारितामे सेहो यैह सभ अबैत छथि। प्रतिभा विपन्न एहने साहित्यसेवीकेँ साहित्यक चश्का लागल छन्हि आ हिनके हाथमे मैथिली भाषाक भविष्य सुरक्षित रहत? मुदा एहि वास्तविकताक संग आगाँक बाट हमरा सभक प्रतीक्षामे अछि। सुच्चा मैथिली सेवी कथाकार आ पाठक जे धूरा-गरदामे जएबा लेल तैयार होथि, बच्चा आ स्त्री जनताक साहित्य रचथि आ अपन ऊर्जा मैथिलीकेँ जीवित रखबा मात्रमे लगाबथि ओ श्रेणी तैयार होएबे टा करत। मैथिलीक नामपर कोनो कम्प्रोमाइज नहि। सुभाषचन्द्र यादवजीक ई संग्रह धारावहिक रूपमे “विदेह” ई-पत्रिकामे (http://www.videha.co.in) अन्तर्जालपर ई-प्रकाशित भए हजारक-हजार पाठकक स्नेह पओलक, ऑनलाइन कामेन्ट एहि कथा सभकेँ भेटलैक जाहिमे बेशी पाठक गैर मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थ रहथि, से हम हुनकर सभक उपनाम देखि अन्दाज लगाओल।एतए ईहो गप सोझाँ आएल जे शिक्षाक अभावक कारण सेहो, भाषाक उच्चारण आ वाचन मे अंतर अबै-ए। तकर ई मतलब नै जे बलचनमाक भाषा एखनो यादव जी बजैत छथि, आब जे ओ भाषा यादव पात्र लेल प्रयोग करब तँ शांकुन्तलम् केर संस्कृत नाटकक बीच जनसामान्यक लेल प्रयुक्त प्राकृत जेकाँ लागत, आ ओहि वर्गक लोककेँ अपमानजनक सेहो लगतन्हि।भाषा चलायमान होइत अछि आ लेखन परम्परा ओकर मध्य स्थिरता अनैत अछि। से सुभाषजीक भाषामे सेहो ई अन्तर स्पष्ट देखबामे अबैत अछि, हुनकर कथाक भाषा आ निबन्धादिक भाषा मध्य। मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थ तँ पाठक बनि रहिये नहि सकैत छथि, शीघ्र यात्रीक बादक एकमात्र जन उपन्यासकार आ कुलानन्द मिश्रक बादक एकमात्र सही अर्थमे कविक उपाधि लेल लालायित भए जाइत छथि। अपनाकेँ घोड़ा आ बाघ आ दोसरकेँ गधा आ बकरी कहबा काल ओ मूल दिशा आ समस्यासँ अपनाकेँ फराक करैत छथि। अपन कथा-कवितापर अपने समीक्षा कए आत्ममुग्धताक ई स्थिति समीक्षाक दुर्बलतासँ आएल अछि। एहि एकमात्र शब्दसँ हमरा वितृष्णा अछि आ तकर निदान हम मैथिलीकेँ देल स्लो-पोइजनिंगक विरुद्ध “विदेह” ई-पत्रिकाक मैथिली साहित्य आन्दोलनमे देखैत छी। एतए साल भरिमे सएसँ बेशी लेखक जुड़लाह तँ पाठकक संख्या लाख टपि गेल। बच्चा आ महिलाक संग जाहि तरहेँ गैर मैथिल ब्राह्मण-कर्ण कायस्थ पाठक आ लेखक जुटलाह से अद्भुत छल। हमर एहि गपपर देल जोरकेँ किछु गोटे (मैथिली) साहित्यकेँ खण्डित करबाक प्रयास कहताह मुदा हमर प्राथमिकता मैथिली अछि, मैथिली साहित्य आन्दोलन अछि, ई भाषा जे मरि जाएत तखन ओकर ड्राइंग रूममे बैसल दुर्घर्ष सम्पादक-कवि-कथाकार-मिथिला राज्य आन्दोलकर्ता आ समालोचकक की होएतन्हि। सुभाषचन्द्र यादवजीक कथाक पुनः पाठ आ भाषाक पुनः पाठ एहि रूपमे हमरा आर आकर्षित करैत अछि। आ एतए ईहो सन्दर्भमे सम्मिलित अछि जे सुभाषचन्द्र यादवजीक ई संग्रह धारावहिक रूपमे अन्तर्जालपर ई-प्रकाशित भेल कथाक पुनः पाठ आ भाषाक पुनः पाठ लए। आ ई घटना सभ दिन आ सभ प़क्षमे मैथिलीकेँ सबल करत से आशा अछि। केदारनाथ चौधरीक उपन्यास “चमेली रानी” आ माहुर केदारनाथ चौधरी जीक पहिल उपन्यास चमेली रानी २००४ ई. मे आएल । एहि उपन्यासक अन्त एहि तरहेँ खतम भेल जे एकर दोसर भागक प्रबल माँग भेल आ लेखककेँ एकर दोसर भाग माहुर लिखए पड़लन्हि। धीरेन्द्रनाथ मिश्र चमेली रानीक समीक्षा करैत विद्यापति टाइम्समे लिखने रहथि- “...जेना हास्य-सम्राट हरिमोहन बाबूकेँ “कन्यादान”क पश्चात् “द्विरागमन” लिखए पड़लनि तहिना “चमेलीरानी”क दोसर भाग उपन्यासकारकेँ लिखए पड़तन्हि”। ई दुनू खण्ड कैक तरहेँ मैथिली उपन्यास लेखनमे मोन राखल जाएत। एक तँ जेना रामलोचन ठाकुर जी कहैत छथि- “..पारस-प्रतिभाक एहि लेखकक पदार्पण एते विलम्बित किएक?” ई प्रश्न सत्ये अनुत्तरित अछि। लेखक अपन ऊर्जाक संग अमेरिका, ईरान आ आन ठाम पढ़ाइ-लिखाइमे लागल रहथि रोजगारमे रहथि मुदा ममता गाबए गीतक निर्माता घुमि कऽ दरभंगा अएलाह तँ अपन समस्त जीवनानुभव एहि दुनू उपन्यासमे उतारि देलन्हि। राजमोहन झासँ एकटा साक्षात्कारमे हम एहि सम्बन्धमे पुछने रहियन्हि तँ ओ कहने रहथि जे बिना जीवनानुभवक रचना संभव नहि,जिनकर जीवनानुभव जतेक विस्तृत रहतन्हि से ओतेक बेशी विभिन्नता आ नूतनता आनि सकताह। केदारनाथ चौधरीक “चमेली रानी” आ “माहुर” ई सिद्ध करैत अछि। चमेली रानी बिक्रीक एकटा नव कीर्तिमान बनेलक। मात्र जनकपुरमे एकर ५०० प्रति बिका गेल। लेखक “चमेली रानी”क समर्पण “ओहि समग्र मैथिली प्रेमीकेँ जे अपन सम्पूर्ण जिनगीमे अपन कैंचा खर्च कऽ मैथिली-भाषाक कोनो पोथी-पत्रिका किनने होथि” केँ करैत छथि, मुदा जखन अपार बिक्रीक बाद एहि पोथीक दोसर संस्करण २००७ मे एकर दोसर खण्ड “माहुर”क २००८ मे आबए सँ पूर्वहि निकालए पड़लन्हि तखन दोसर भागमे समर्पण स्तंभ छोड़नाइये लेखककेँ श्रेयस्कर बुझेलन्हि। एकर एकटा विशिष्टता हमरा बुझबामे आएल २००८ केर अन्तिम कालमे जखन हरियाणाक उपमुख्यमंत्री एक मास धरि निपत्ता रहलाह, मुदा राजनयिक विवशताक अन्तर्गत जाधरि ओ घुरि कऽ नहि अएलाह तावत हुनकापर कोनो कार्यवाही नहि कएल जाऽ सकल। अपन गुलाब मिश्रजी तँ सेहो अही राजनीतिक विवशताक कारण निपत्ता रहलोपर गद्दीपर बैसले रहलाह्,क्यो हुनका हँटा नहि सकल। चाहे राज्यक संचालनमे कतेक झंझटि किएक नहि आएल होए। उपन्यास-लेखकक जीवनानुभव एकर सम्भावना चारि साल पहिनहिए लिखि कऽ राखि देलक। भविष्यवक्ता कोनो टोना-टापरसँ भेनाइ संभव नहि होइत अछि वरन् जीवनानुभव एकरा सम्भव बनबैत अछि। एहि दुनू उपन्यासक पात्र चमत्कारी छथि, आ सफल सेहो कारण उपन्यासकार एकरा एहि ढंगसँ सृजित करैत छथि जेना सभ वस्तुक हुनका व्यक्तिगत अनुभव होइन्ह। उपन्यासक बुर्जुआ प्रारम्भक अछैत एहिमे एतेक जटिलता होइत अछि जे एहिमे प्रतिभाक नीक जकाँ परीक्षण होइत अछि। “चमेली रानी” उपन्यासक प्रारम्भ करैत लेखक एकर पहिल परीक्षामे उत्तीर्ण होइत छथि जखन एकर लयात्मक प्रारम्भ पाठकमे रुचि उत्पन्न करैत अछि। कीर्तिमुखक पाँच टा बीटाक नामकरणक लेल ओकर जिगरी दोस कन्टीरक विचार जे – “पाँचो पाण्डव बला नाम बेटा सबहक राखि दहक। सुभिता हेतौ”। फेर एक ठाम लेखक कहैत छथि जे जतेक गतिसँ बच्चा होइत रहैक से कौरवक नाम राखए पड़ितैक। नायिका चमेली रानीक आगमन धरि कीर्तिमुखक बेटा सभक वर्णन फेर एहि क्रममे अंग्रेज डेम्सफोर्ड आ रूपकुम्मरिक सन्तान सुनयनाक विवरण अबैत अछि। फेर रूपकुम्मरिक बेटी सुनयनाक बेटी शनिचरी आ नेताजी रामठेंगा सिंह “चिनगारी”क विवाह आ नेताजी द्वारा शनिचरीकेँ कनही मोदियानि लग लोक-लाजक द्वारे राखि पटना जाएब, नेताजीक मृत्यु आ शनिचरी आ कीर्तिमुखक विवाहक वर्णन फेरसँ खिस्साकेँ समेटि लैत अछि। तकर बाद चमेली रानिक वर्णन अबैत छथि जे बरौनी रिफाइनरीक स्कूलमे बोर्डिंगमे पढ़ैत छथि आ एहि कनही मोदियानिक बेटी छथि। कनही मोदियानिक मृत्युक समय चमेली रानी दसमाक परीक्षा पास कऽ लेने छथि। भूखन सिंह चमेली रानीक धर्म पिता छथि। डकैतीक विवरणक संग उपन्यासक पहिल भाग खतम भऽ जाइत अछि। दोसर भागमे विधायकजीक पाइ आकि खजाना लुटबाक विवरण, जे कि पूर्व नियोजित छल, एहि तरहेँ देखाओल गेल अछि जेना ई विधायक नांगटनाथ द्वारा एकटा आधुनिक बालापर कएल बलात्कारक परिणामक फल रहए। आब ई नांगटनाथ रहथि मुख्यमंत्री गुलाब मिसिरक खबास जे राजनीतिक दाँवपेंचमे विधायक बनि गेलाह। २००८ ई.क अरविन्द अडिगक बुकर पुरस्कारसँ सम्मानित अंग्रेजी उपन्यास “द ह्वाइट टाइगर”क बलराम हलवाइक चरित्र जे चाहक दोकानपर काज करैत दिल्लीमे एकटा धनिकक ड्राइवर बनि फेर ओकरा मारि स्वयं धनिक बनि जाइत अछि, सँ बेश मिलैत अछि आ चारि बरख पूर्व लेख एहि चरित्रक निर्माण कऽ चुकल छथि। फेर के.जी.बी. एजेन्ट भाटाजीक आगमन होइत अछि जे उपन्यासक दोसर खण्ड “माहुर” धरि अपन उपस्थिति बेश प्रभावी रूपेँ रखबामे सफल होइत छथि। उपन्यासक तेसर भागमे अहमदुल्ला खाँक अभियान सेहो बेश रमनगर अछि आ वर्तमान राजनीतिक सभ कुरूपताकेँ समेटने अछि। उपन्यासक चारिम भाग गुलाब मिसिरक खेरहा कहैत अछि आ फेरसँ अरविन्द अडिगक बलराम हलवाइकेँ मोन पाड़ैत अछि। भुखन सिंहक संगी पन्नाकेँ गुलाब मिसिर बजबैत अछि आ ओकरा भुखन सिंहक नांगटनाथ आ अहमदुल्ला अभियानक विषयमे कहैत अछि। संगहि ओकरा मारबाक लेल कहैत अछि से ओ मना कऽ दैत छैक। मुदा गुलाब मिसिर भुखन सिंहकेँ छलसँ मरबा दैत अछि। पाँचम भागमे भुखन सिंहक ट्रस्टक चरचा अछि, चमेली रानी अपन अड्डा छोड़ि बैद्यनाथ धाम चलि जाइत छथि। आब चमेली रानीक राजनीतिक महत्वाकांक्षा सोझाँ अबैत अछि। स्टिंग ऑपरेशन होइत छथि आ गुलाब मिसिर घेरा जाइत छथि। उपन्यासक छठम भाग मुख्यमंत्रीक निपत्ता रहलाक उपरान्तो मात्र फैक्ट फाइंडिंग कमेटी बनाओल जएबाक चरचा होएबाक अछि जे कोलिशन पोलिटिक्सक विवशतापर टिप्पणी अछि। उपन्यासक दोसर खण्ड “माहुर”क पहिल भाग सेहो घुरियाइत-घुरियाइत चमेली रानीक पार्टीक संगठनक चारू कात आबि जाइत अछि। स्त्रीपर अत्याचार, बाल-विधवा आ वैश्यावृत्तिमे ठेलबाक संगठन सभकेँ लेखक अपन टिप्पणी लेल चुनैत छथि। माहुरक दोसर भागमे गुलाब मिसिरक राजधानी पदार्पणक चरचा अछि। चमेली रानी द्वारा अपन अभियानक समर्थनमे नक्सली नेताक अड्डापर जएबाक आ एहि बहन्ने समस्त आन्दोलनपर लेखकीय दृष्टिकोण, संगहि बोनक आ आदिवासी लोकनिक सचित्र-जीवन्त विवरण लेखकीय कौशलक प्रतीक अछि। चमेली रानी लग फेर रहस्योद्घाटन भेल जे हुनकर माए कनही मोदियाइन बड्ड पैघ घरक छथि आ हुनकर संग पटेल द्वारा अत्याचार कएल गेल, चमेली रानीक पिताक हत्या कऽ देल गेल आ बेचारी माए अपन जिनगी कनही मोदियाइन बनि निर्वाह कएलन्हि। ई सभ गप उपन्यासमे रोचकता आनि दैत अछि। माहुरक तेसर भाग फेरसँ पचकौड़ी मियाँ, गुलाब मिसिर, आइ.एस.आइ. आ के.जी.बी.क षडयन्त्रक बीच रहस्य आ रोमांच उत्पन्न करैत अछि। माहुरक चारिम भाग चमेली रानी द्वारा अपन माए-बापक संग कएल गेल अत्याचारक बदला लेबाक वर्णन दैत अछि, कैक हजार करोड़क सम्पत्ति अएलासँ चमेली रानी सम्पन्न भऽ गेलीह। माहुरक पाँचम भाग राजनैतिक दाँव-पेंच आ चमेली रानीक दलक विजयसँ खतम होइत अछि। विवेचन: उपन्यास विधाक बुर्जुआ आरम्भक कारण सर्वांतीजक “डॉन क्विक्जोट”, जे सत्रहम शताब्दीक प्रारम्भमे आबि गेल रहए, केर अछैत उपन्यास विधा उन्नैसम शताब्दीक आगमनसँ किछु समय पूर्व गम्भीर स्वरूप प्राप्त कऽ सकल। उपन्यासमे वाद-विवाद-सम्वादसँ उत्पन्न होइत अछि निबन्ध, युवक-युवती चरित्र अनैत अछि प्रेमाख्यान, लोक आ भूगोल दैत अछि वर्णन इतिहासक, नीक- खराप चरित्रक कथा सोझाँ अबैत अछि। कखनो पाठककेँ ई हँसबैत अछि, कखनो ओकरा उपदेश दैत अछि। मार्क्सवाद उपन्यासक सामाजिक यथार्थक ओकालति करैत अछि। फ्रायड सभ मनुक्खकेँ रहस्यमयी मानैत छथि। ओ साहित्यिक कृतिकेँ साहित्यकारक विश्लेषण लेल चुनैत छथि तँ नव फ्रायडवाद जैविकक बदला सांस्कृतिक तत्वक प्रधानतापर जोर दैत देखबामे अबैत छथि। नव-समीक्षावाद कृतिक विस्तृत विवरणपर आधारित अछि। जीवनानुभव सेहो एक पक्षक होइत अछि आ दबाएल इच्छाक तृप्तिक लेल लेखक एकटा संसारक रचना कएलन्हि जाहिमे पाठक यथार्थ आ काल्पनिकताक बीचक आड़ि-धूरपर चलैत अछि। फील्ड-वर्कपर आधारित खिस्सा सीत-बसंत -गजेन्द्र ठाकुर(गाम,मेहथ, भाया-झंझारपुर,जिला-मधुबनी) विशेष सहयोग श्री केशव महतो (बहादुरगंज, जिला किशनगंज, बिहार) एहि क्षेत्रकार्यक सूचक श्री केशव महतो सीत बसंतक फील्डवर्कमे विशेष सहयोगक कारण एहि प्रबन्धक सह-लेखक छथि।सीत बसंतक कथाक कैक टा विभिन्न रूप पाओल गेल आ ओहि सभक विवरण यथास्थान देल गेल अछि। समाज आ संस्कृतिकेँ बुझबामे लोक कथाक बड्ड महत्व अछि, मुदा बिना फील्ड-वर्क कएने लिखल लोककथा अपन उद्देश्य प्राप्तिमे असमर्थ रहैत अछि। श्री सुभाषचन्द्र यादवजीक हम सेहो आभारी छी जिनकर एहि विषयक आलेख (फील्डवर्क आ लोककथापर) एकटा सेमीनारमे सुनलाक बाद हम आर तन्मयतासँ एहि कार्यमे लागि गेलहुँ। एहि क्षेत्रकार्यमे आधुनिक फील्डवर्क तकनीक केर उपयोग कएल गेल आ सहभागिता, प्रेक्षण, साक्षात्कार,प्रश्नावलीक इत्यादिक आधारपर ई लोककथा निर्मित भेल अछि। लोककथा-कविताक कोनो स्वरूपमे कोनो परिवर्त्तन अवैज्ञानिक अछि आ तकर ध्यान एतए राखल गेल अछि । मणीपुर नगरक राजा महेश्वर सिंह छलाह। ओ बड्ड प्रतापी राजा छलाह। ओ बड्ड निकेनासँ राज्य चला रहल छलाह। किछु दिनुका बाद ओहि राजाकेँ दू टा बेटा जन्म लेलक। ओकर रानी सेहो बड्ड सुशील आ स्वाभिमानी छलीह। एक बेरुका गप अछि। रानी अपन महलमे रहैत छलीह आ बहुत दिनसँ ओहि महलमे दू टा पौरकी चिड़ै खोता बना कए रहैत छल। एक दिन ओ अपन खोतामे दू टा अंडा देलक। अंडासँ दू टा बच्चा बहार भेल। एक दिन अनचोक्केमे ओहि बच्चा सभक माए मरि गेल। तकर बाद पौरकी सभकेँ बड्ड कष्ट होमए लगलैक। ओकर बाप किछु दिनुका बाद एकटा बोनसँ एकटा पौरकी संग बियाह कए अनलक। तकर बाद दू-चारि दिन कोनो तरहेँ बीतल। तकर बाद एक दिन पौरकी ओहि दुनू बच्चाकेँ खेनाइ खुअएला काल मुँहमे काँट धऽ देलक। ओ दुनू बच्चा ओही काल मरि गेल। मरलाक बाद खोतासँ दुनू बच्चाकेँ लोलसँ धकेल कऽ नीचाँ खसा देलक। ओहि समय रानी महलमे छलीह आ बच्चा सभकेँ खसबैत ओ देखलन्हि। ओही दिनसँ रानीकेँ शंका भऽ गेलन्हि आ सभ दिन हुनका चिन्ता घेरि लेलकन्हि। राजाकेँ रानी कहलन्हि -– हे राजा। देखू। अपना महलमे दू टा पौरकी रहैत रहए। ओ दू टा बच्चा देलक। बच्चाक माए मरि गेल। तकर बाद ओ दोसर बियाहि कए अनलक। दू चारि दिनुका बाद ओ दुनू बच्चाकेँ मारि देलक। से हे राजा, कतहु हमहूँ मरि जाइ तँ अहाँ दोसर बियाह कए लेब तखन हमरो दुनू बच्चाक ईएह हाल ने भऽ जाए। राजा बाजल- यै रानी। एखन अहाँ जीवित छी, तखन एहि गपक अहाँ किएक चिन्ता कए रहल छी। रानी बजलीह - नहि राजा। यदि हम मरि गेलहुँ तँ अहाँ बियाह तँ नहि कए लेब? राजा उत्तर देलक – नहि । हम दोसर बियाह नहि करब। ई कहि राजा अपन दरबज्जामे आपस चलि गेल। ओही दिनसँ रानी दुखित रहए लगलीह आ अनचोक्के एक दिन मरि गेलीह। आब एहि गपकेँ लए राजा बड्ड चिन्तामे पड़ि गेल। आब दुनू भाए सीत आ बसन्त सेहो दिक्कतमे पड़ि गेलाह। राजाकेँ राजाक खबासिनी, मन्त्री, मुंशी आ मारते रास लोक सभ बुझाबए लागल। राजासँ कहए लगलाह- राजा यदि अहाँ बियाह नहि करैत छी तखन एहि दुनू बच्चाक की दशा होएत। ने एकरा सभक खेनाइक कोनो ठेकान रहत आ नहिये पढ़ाइक। ताहि द्वारे अहाँ एकटा बियाह करू। एहि तरहेँ बुझओलापर राजा बाजल - ठीक अछि। जखन अहाँ सभक यैह विचार अछि तखन जाऊ , कोनो गरीबक लड़की भेटत तँ हम ओकरा संग बियाह कए लेब। एहि तरहेँ राजाक सभटा गप बुझि-गुणि मुन्शी दीवान सभ क्यो लड़की ताकए लगलाह। एकटा लड़की राजाक नगरमे भेटल। ओ लड़की महागरीबक बेटी छलीह। राजा शुभलग्न बना कए ओहि लड़कीकेँ बियाह कए आनि लेलक। किछु दिन धरि ओ लड़की घरमे रहलीह। किछु दिनुका बाद ओकर ममता ओहि दुनू भाएपर कम होमए लागल। दुनू भाए स्कूलसँ पढ़ि कए घर आबथि आ अपन दरबज्जापर गेन्द लए खेलाइमे लागि जाथि। एक दिन अनचोक्केमे गेन्द आँगनमे जा कए खसि पड़ल। ओहि समयमे ओकर सभक सतमाए आँगनमे छलीह। गेन्द खसलाक संग ओ गेन्दकेँ उठा कए अपन कोरामे राखि लेलन्हि।ओ दुनू भाए गेन्द तकैत आँगनमे अएलाह आ कहलन्हि जे माए गेन्द हमरा सभकेँ दए दिअ। हम दुनू भाए खेला रहल छी। माँ कहलखिन्ह जे हमरा लग गेन्द नहि अछि, अहाँ सभ चलि जाऊ। गेन्दकेँ दुनू भाए मायक कोरामे देखलन्हि। फेर कहलन्हि - माँ हमरा सभकेँ गेन्द दिअ। हम सभ खेलाएब। एहि तरहेँ दुनू भाए मँगैत-मँगैत माँक कोरासँ गेन्द लए लेलन्हि । गेन्द लऽ लेलाक बाद रानीक हृदयमे बड्ड तामस अएलैक। रानी तामसे भेर भेल कोचपर आबि पड़ि रहलीह आ खेनाइ-पिनाइ त्यागि देलन्हि। खबासिनी सभ बुझा कए थाकि गेलीह जे रानी चलू, हमरा सभ खा ली। मुदा रानी कोनो उत्तर नहि देलन्हि। ओ कहलन्हि जे आब हम मरि जाएब। एतेक गप सुनि खबासिनी राजा लग जा कए कहलक जे रानी बड्ड दुखित छथि। आब बचबा योग्य नहि छथि। अहाँ जा कए देखू। राजा एतेक गप सुनि कए अपन महलमे गेलाह आ रानीसँ पुछलन्हि। रानी कहलन्हि जे तोहर एहन हालत कोना भेलह जल्दी बताबह। रानी कहलन्हि-अहाँ हमरासँ पुछैत छी तँ पहिने अहाँ हमरासँ सत करू तँ हम कहब। नहि तँ हम मरि जाएब। राजा किछु नहि सोचलन्हि। ओ रानीक संग सत कए लेलन्हि। सत केलाक बाद रानी कहलन्हि- हमर ई दशा अहाँक दुनू बेटा कएने अछि। हमर बिमारीक यैह एकटा उपाय अछि नहि तँ हम नहि बचि सकैत छी - अहाँ ओहि दुनूकेँ मारि ओकर करेज निकालि हमरा दिअ। तखन हम बचि सकैत छी। राजा एतेक गप सुनि कए बड्ड तमसा गेल। ओ दुनू बेटाकेँ बजा कए बड्ड मारि मारलक आ तकर बाद जल्लादक हाथसँ मरबएबा लेल पठा देलक। जल्लाद दुनू भाएकेँ मारैत-पिटैत बोनमे लए गेल। दुनू भाए बड्ड कानि रहल छलाह। जखन जल्लाद सभ ओकरा दुनू गोटेकेँ मारए लागल तँ ओ सभ कहलन्हि जे हमरा सभकेँ नहि मारू। हमरा सभकेँ छोड़ि देब तँ हम सभ घुरि कए नगर नहि जाएब। अहाँ सभ कोनो माल-जानवरकेँ मारि ओकर करेज जा कए दए दियौक। आ ई कहि दुनू भाए संगमे जतेक पाइ छलन्हि सेहो जल्लाद सभकेँ दए देलन्हि। एक जल्लाद कहलक जे मारि दियौक। दोसर कहलक जे नहि मारू। ई सभ घुरि कए जएबो करत तँ हम सभ कहबैक जे हम सभ की करू। हम सभ तँ करेज आनि कए देने छलहुँ। मरलाक बाद जीबि गेल होएत। जल्लाद ओहिना कएलक आ दुनू भाएकेँ छोड़ि देलक। कथा रूप १: जल्लाद ओहिना कएलक आ दुनू भाएकेँ छोड़ि देलक। दुनू भाए ओहि बोनमे भटकए लगलाह। रातुक मौसममे दुनू भाए एकटा गाछक नीचाँ सूति गेलाह। किछु कालक बाद दुनू भाए उठि गेलाह आ गाछक ऊपर एकटा साँपकेँ चढ़ैत देखलन्हि। ओहि गाछपर दू टा हंसक बच्चा रहैत छल। हंस चरबाक लेल गेल रहए। ओहि साँपकेँ देखि कए हंसक बच्चा बाजए लागल। दुनू भाए सोचलक- देखू। ई साँप बच्चाकेँ खा जाएत। एतेक सोचलाक बाद तलवारसँ मारि कए साँपकेँ ओ सभ नीचाँ खसा देलक। बच्चा बजनाइ बन्न कए देलक। जखन भोर भेल तँ हंस-हंसिनी चरि कए आएल आ बच्चा लेल खेनाइ अनलक। बच्चाकेँ आहार खुआबए लागल तँ बच्चा आहार नहि खएलक आ कहलक जे माँ हमरा ई बताऊ जे एहि गाछपर हम पहिल देल बच्चा छी आकि अहाँ पहिनहियो एहि एहि गाछपर बच्चा देने छी । माए कहलकै जे हम पहिनहियो देने छी मुदा आइ धरि मात्र अहाँ दुनु गोटेक मूँह देखि रहल छी। कथा रूप २: बेशी लोकप्रिय आ पसरल क्षेत्रमे: जल्लाद ओहिना कएलक आ दुनू भाएकेँ छोड़ि देलक। दुनू भाए ओहि बोनमे भटकए लागल, खूब बौआएल। रातुक समय दुनू भाए एकटा गाछक तरमे सूति गेल। भोरे बोनसँ बहराइत दोसर देश जाए लागल। दुनू भाए भूखल पिआसक मारे व्याकुल भऽ गेल। जा कए एकटा गाछक नीचाँ बैसि कए सुस्ताए लागल। ओ सभ सोचए लागल जे आब कोन उपाय करू। ओही समय ओहि गाछपर दू टा मएनाक बच्चा रहए। ओहिमेसँ एकटा कहैत अछि जे हमर जे काँचहि मौस खा जाएत तकरा बड्ड शीघ्र राज्य भेटि जएतैक। आ दोसर कहलक जे हमरा जे आगिमे पका कए खाओत तँ किछु दिनुका बाद ओ राज पाबि जाएत। एतेक गप दुनू भाए सुनलक आ हाथमे एकटा लाठी लए ओकरा सभकेँ मारि कए नीचाँ खसा देलक आ लऽ कए बिदा भेल। किछु दूर आगाँ गेल तँ देखलक जे गाए-महीस चराबए बला चरबाहा सभ एकटा बएरक काँटक बोन - झाँखुरकेँ जरा रहल छलाह। ओ दुनू भाए सोचलक जे अही अगिनवानमे पका कए एकरा खाएब। ओहि आगिमे दुनू गोटे मेनाक बच्चाकेँ पका कए खएलक। काँटमे जे ओ सभ पका कए खएलक तँ ओकर सभक भाग्यमे सेहो काँट लागि गेलैक। ओतएसँ दुनू भाए बिदा भेल। किछु दूर गेलाक बाद ओकरा सभकेँ आमक एकटा गाछी भेटलैक। बसन्त चलैत-चलैत थाकि गेल रहए आ ओकरा आर चलल नहि भऽ पाबि रहल छलए। सीत कहलक-भाइ, तूँ एतए बैस, हम ओहि गामसँ किछु माँगि कए अनैत छी आ तखन खा कए हमरा सभ आगाँ चलब। सीत मँगबा लेल गाममे चलि गेल। सीत जाहि गाममे (कथा रूप ३ गामक नाम हस्तिनापुर सेहो कतहु-कतहु कहल जाइत अछि) मँगबाक लेल गेल ओहि गाममे राजाक बेटीक स्वयम्बर रचाओल गेल छल। ओहि स्थान पर जन सम्मर्द छल। ओतए भीड़ देखि सीत अटकि गेल आ देखए लागल। सीत अपन भाएक सुरता बिसरि गेल । स्वयम्बरमे लड़की जयमाल लए सभामे घुरए लागलि आ माला सीतक गरदनिमे पहिरा देलक। ओहीठाम सीतक बियाह ओहि लड़कीक संग भए गेल। (रूप ४) बियाहक पहिने ओतुक्का लोक सभ बाजए लागल जे ई राजाक बेटी होइतो एकटा भिखमंगाक गरदनिमे माला पहिरा देलक। आ ईहो जे ओ लड़की बताहि भऽ गेल अछि। ओकर गरदनिसँ माला निकालि कए ककरो दोसराक गरदनिमे माला पहिराऊ नहि तँ बियाह नहि होमए देब। ई गप सुनि लड़की बाजलि जे हमर भाग्यमे ईएह भिखमंगा लिखल अछि तँ हमरा राजा कतएसँ भेटत ? हम एकरे संग बियाह करब। ई गप सुनि सभ राजा अपन-अपन घर चलि गेलाह आ कहलन्हि जे एहि लड़कीकेँ एहि गामसँ निकालि दिअ आ कोनो दोसर ठाम पठा दिअ। राजा ओनाही कएलक। ओहि दुनू गोटेकेँ अपन गामसँ बाहर पठा देलक। ओ ओही नगरमे रहए लागल। किछु दिनुका बाद लोक सभ राजाकेँ कहए लागल जे अहाँ ओहि लड़काक संग लड़कीसँ छोड़ा दियौक आ कोनो दोसर लड़काक संग ओकर बियाह कराए दियौक। सभक कहलापर राजा एकटा कुटनी बुढ़ियाकेँ जहर-माहुर संगमे दए पठेलक जतए सीत आ राजाक बेटी रहैत छल। ओ बुढ़िया ओकरा सभक संगे रहए लागल। किछु दिन धरि ओ ओतहि रहल। दुनू गोटेकेँ कोनो गपक चिन्ता नहि भेलैक। एक दिन सीतकेँ अनचोक्केमे बड्ड पियास लगलैक। ओ अपन रानीसँ बाजल-हमरा पानि पिया दिअ। बुढ़िया फटाकसँ उठि कए गेल आ एक गिलास पानिमे जहर घोरि सीतकेँ देलक। सीतकेँ बड़ जोरसँ पियास लागल रहैक से ओ खटसँ पानि लऽ कए पीबि गेल। पानि पीबिते सीतकेँ किछुए कालक उपरान्त बड्ड निशा अएलैक। स्थिरे-स्थिरे निसाँ बढ़ैत गेल। निसाँमे सीत ओन्घरा गेल। बुढ़िया बाजल जे कोनो गप नहि। चिन्ता नहि करू। सभ ठीक भऽ जाएत। कनेक कालक बाद सीत मरि गेल। रानी खूब हाक्रोस कए कानए लागलि। ओहि ठाम कोनो गाम नहि छल। सीतकेँ धारक कात लऽ जा कए गारि देल गेल। बुढ़िया कहलक- देखू चिन्ता नहि करू। आब हम सभ असनान कए ली। असनान करए गेल तँ एकटा नाह किनारमे लागल छल। बुढ़िया बाजल जे चलू, ओहि नाहपर बैसि कए स्नान कए लेब। तखन दुनू गोटे ओही नाहपर बैसिकए नहाए लागल। तखन आस्ते-आस्ते नाह आगाँ जाए लागल। जखन नाह बीच धारमे गेल तँ (रूप ५: एतए रानीक नाम फुलवन्ती सेहो अबैत अछि) रानी देखलक जे नाह बीच धारमे आबि गेल अछि। तखन ओकरा बुझबामे अएलैक जे ई बुढ़िया ओकरा ठकि कए लए जा रहल छैक। ओ रानी अपन पत्नीक बियोगमे छलीह। ओ हृदयमे सोचलक जे ओकर पति मरि गेल छैक तँ ओ जीवित रहि कए की करत। ई सोचि कए नाहसँ कूदि कऽ ओ धारमे फाँगि गेल। भँसैत-भँसैत ओ बड्ड दूर चलि गेल आ ओतए ओ कात लागि गेल। आब बसन्तक खिस्सा: बसन्त ओहि गाछीमे भाएक आस तकैत रहए। दिन साँझमे बदलए लागल। ओहि गाछीमे कुम्भकार लोकनि गाछीक पात बहारि रहल रहथि। तखने बसन्त कनैत-कनैत ओहि कुम्भकार लग गेल। कुम्भकार पुछलक-अहाँ किएक कानि रहल छी। बसन्त सभ गप बतेलक। कुम्भकार कहलक-अहाँ चिन्ता नहि करू। अहाँ हमरा घरपर चलू। अहाँ हमरा घरपर रहब। बसन्त कुम्भकार लग चलि गेल आ रहए लागल। ओतए रहैत-रहैत एक बेर एकटा बनिजारा अपन जहाज लए वाणिज्य करए लेल जा रहल छल आकि बीच धारमे ओकर जहाज बीचमे ठाढ़ भए गेलैक। जहाजक इन्जीनिअरसँ (रूप ६ एतए बनिजाराक नाम नैका बनिजारा सेहो कहैत सुनल गेल) बनिजारा पुछलक जे की जहाज एतएसँ आगाँ नहि जा रहल अछि। इन्जीनिअर कहलक-जहाज बलि माँगि रहल अछि। कोनो मनुक्खक बच्चाक बलि देलाक बाद जहाज आगाँ जाएत। एतेक गप ओ बनिजाराकेँ कहलक तँ बनिजारा तीन लाख रुपैया लए एकटा बच्चाक तलाशमे गेल। ताकैत-ताकैत ओ ओही गाममे गेल जाहि गाममे बसन्त रहैत छल। बनिजारा अबाज लगबैत जा रहल छल जे, जे क्यो एकटा बच्चा देत ओकरा हम तीन लाख रुपैया देब। एहि प्रकारसँ ओ अबाज लगबैत जा रहल छल। क्यो गोटे नहि बाजल। जखन ओ कुम्भकारक दरबज्जाक सोझाँ गेल तँ कुम्भकार कहलक-हँ हम एकटा लड़का देब। हमरा पाइ चाही। बनिजारा ओहि कुम्भकारकेँ तीन लाख टाका देलक आ ओतएसँ ओ बसन्तकेँ लए अपन जहाजक लग गेल। बसन्त ओकरासँ पुछलक-बनिजारा। अहाँ हमरा कतए लए जा रहल छी। बनिजारा बाजल-हम अहाँकेँ बलि चढ़एबा लेल लए जा रहल छी। किएक तँ हमर जहाज धारक बीचमे ठाढ़ भऽ गेल अछि। ताहि द्वारे अहाँक बलि हम चढ़ाएब। एतेक गप सुनि कए बसन्त बाजल जे हे बनिजारा। हमरा ओतए गेलाक बाद, जहाज छूलाक बाद जे जहाज खुजि जाएत तँ अहाँ हमरा छोड़ि देब ने? बनिजारा कहलक-हमर जहाज जे खुजि जाएत तँ हम अहाँकेँ छोड़ि देब। बसन्त बीच धारमे जा कए हाथसँ जहाजकेँ छूबि कए बाजल। जहाज अहाँ जाऊ तँ हमर जान बाँचि जाएत। एतेक कहबाक देरी रहए आकि जहाज ओतएसँ बिदा भऽ गेल। इन्जीनिअर बनिजाराकेँ कहलक-एकरा बैसा लिअ जहाजमे। कतहु आन ठाम ठढ़ भऽ जाएत तखन? बसन्त बाजल-हमरा मारि देने रहितहुँ तँ फेर जहाज ठाढ़ भेलाक बाद हमरा कतएसँ अनितहुँ? बनिजारा बाजल-छोड़ि दिअ एकरा। बसन्त ओतएसँ धारक काते-काते बिदा भेल आ ओतए पहुँचि गेल जतए सीतक स्त्री कानि रहल छलीह। बसन्त पुछलक-अहाँ किएक कानि रहल छी ? एतबा सुनितहि ओ कानब बन्द कए चुप भए गेलीह। बसन्त कहलक-हमहूँ दुखक मारल छी। हम दू सँ बिछुड़ि कए एक भए गेल छी। स्त्री पुछलक-अहाँक की नाम छी आ अहाँक भाएक की नाम छी? बसन्त बाजल-हमर नाम बसन्त छी आ हमर भाएक नाम सीत छल। ई बात सुनैत स्त्री फेरसँ कानए लागल आ कहलक जे अहाँक भाए स्वर्गवासी भए गेलाह। हुनके वियोगमे हम कानि रहल छी। ई गप सुनि कए (रूप:७ एतए नाम दिल बसन्त सेहो अबैत अछि) बसन्त कहलक जे आब हमरो जीवित नहि रहबाक अछि। ई गप सुनितहि सीतक स्त्री मरि गेलि आ बसन्त ओही समय बोनमे जा कए एकटा पैघ गाछपर चढ़ि कए अपन जान देबाक लेल तैयार भऽ गेल। ओही समय एकटा आकाशवाणी ओकरा अबाज देलक-बसन्त तूँ अपन जान नहि गमा। तोहर भाए जीवित छौक। जो जतए तोहर भाएक सारा छौक ओहिपर अपन दहिन हाथक कंगुरिया आँगुर काटि कए ओहिपर छीटि दे। तोहर भाए जीवित भए जएतौक। एतेक गप सुनि कए बसन्त गाछसँ नीचाँ उतरि गेल आ जतए ओकर भाएक सारा छल ओहिपर ओहिना कएलक। सीत राम-राम बजैत उठि गेल। दुनू भाइ गरा मिलल। ओहि ठामसँ दुनू भाए बिदा भेल। दिनसँ साँझ पड़ि गेल आ दुनू भाए एक ठाम गाछक नीचाँ अटकि गेलाह। सीत कहलक-भाए बसन्त एतहि रुकैत छी। भोर भऽ जाएत तखन फेर हम सभ बिदा होएब। दुनू भाए ओहि गाछक नीचाँ रात्रि व्यतीत करए लगलाह। खिस्सा रूप ८: रात्रिक बारह बाजल तँ बोनसँ एकटा साँप बहार भेल आ गाछपर चढ़ए लागल। ओही गाछपर हंसक खोता रहए। ओहि हंसक खोतामे दू टा हंसक बच्चा रहए। साँपकेँ देखि कए दुनू बच्चा अबाज देमए लागल। ई अबाज दुनू भाए सुनलक आ साँपकेँ गाछपर चढ़ैत देखलक आ सोचलक जे ई साँप बच्चा सभकेँ खा जाएत से एकरा जे मारि दी तँ बच्चा सभक जान बचि जाएत। ओ सभ साँपकेँ मारि देलक। तावत हंस दहमे चरए लेल गेल रहए। हंस ओहि खोतामे कतेक बेर बच्चा देने रहए मुदा एकोटा बचा उठा नहि सकल रहए। भोरे सकाले हंस दहसँ चरि कए आएल। बच्चा सभकेँ जीवित देखि बड्ड प्रसन्न भेल। बच्चाकेँ अहार देमए लागल। बच्चा मुँह घुमा लेलक आ पुछलक-माँ अहाँ एहि गाछपर कतेक बच्चा पाड़लहुँ आकि हमही पहिल बच्चा छी। माँ बाजलि-नहि एहि गाछपर कएक बेर हम बच्चा देलहुँ मुदा मुँह अहीं दुनूक हम आइ देखलहुँ। बच्चा बाजल जे हमरो मुँह अहाँ नहि देखि सकितहुँ , जे ई मुसाफिर नहि रहितए। नीचाँ देखू की पड़ल अछि। हंस देखलक जे नीचाँ मे एकटा साँप पड़ल छैक आ दू टा मुसाफिर फिरि रहल अछि। बच्चा बाजल-ओहि साँपकेँ यैह दुनू मुसाफिर मारलक अछि। पहिने जा कए ओही मुसाफिरकेँ खएबा लेल दियौक। ओ खाओत तँ हम खाएब। हंस नीचाँ उतरि कए आएल आ कहलक- मुसाफिर, जखन अहाँ नहि खाएब तँ ई दुनू बच्चा सेहो नहि खाएत। ई दुनू भाए कहलक-माँ खेनाइसँ प्रेम पैघ अछि। माँ हमहूँ सभ परिस्थितिक मारल छी। हमर सभक के सहायता करत ? हंस बाजल-हमर सहायता अहाँ कएलहुँ से अहाँक सहायता हम करब। लिअ एकटा बच्चा हम अहाँ सभकेँ दैत छी। ई अहाँक सहायता करत। सियान भेलापर ई अहाँ दुनू भाएकेँ अपन पाँखिपर बैसा कए उड़ि सकैत अछि। जतए मोन होएत ओतए जा सकैत छी। ई वरदान हम दैत छी जे अहाँ दुनू भाए सफल रहब। दुनू भाए प्रणाम कए ओतएसँ बिदा भेलाह। ओ सभ जतए कतहु बिलमैत रहथि ओतए हंस अपन दुनू पाँखि पसारि छाह कए दैत छल। एहि प्रकारेँ किछु दिन बीतल। हंसक बच्चा पैघ भऽ गेल। ओ आब दुनू भाएकेँ चढ़ा कए लऽ जाए योग्य भऽ गेल। हंस बाजल-भाए। आब तोँ दुनू भाए हमर ऊपर बैसि जाह। अहाँ जतए कतहु कहब हम अहाँ सभकेँ लए चलब। दुनू भाए ओतएसँ हंसपर सवार भए आगू बिदा भेलाह आ जा कए कंचनपुर शहर पहुँचलाह। नगरक बाहर एकटा बरक गाछ छल। ओही गाछक लग ओ सभ डेरा खसेलक आ रहए लागल आ शहरमे जा कए काज करए लागल। साँझ भेला उत्तर ओही गाछक लग खेनाइ खा कए ओ सभ सूति जाथि। हंस भरि राति दुनू भाएक देख-रेख करैत छल। किछु दिनुका बाद ओहि कंचनपुर शहरक राजाक कंचना नाम्ना बेटीसँ सीत प्रेम करए लागल। ओहि लड़कीक प्रत्येक दिन फूलसँ ओजन कएल जाइत छल। प्रेम कएलाक बाद लड़कीक ओजन बहुत बढ़ए लागल। राजाकेँ खबर भेल जे लड़कीक ओजन किएक बढ़ए लागल अछि। राजा अपन महलक चारू कात सिपाहीक पहरा दिआ देलक। ताहूपर सीत हंसपर सवार भए महलमे चलि जाइत छलाह। सम्पूर्ण शहरमे हिलकोर उठि गेल जे के ई लोक अछि जे हमर राजाक महलमे चोरिसँ चलि जाइत अछि। एक दिन संजोगसँ सीत गेल आ कोचपर बैसि दुनू गोटे हँसी मजाक करए लागल आ अहीमे दुनू गोटेकेँ निन्न लागि गेलैक। हंस बेचारा घुरि कए आपस अपन डेरापर आबि गेल आ भोरमे दुनू गोटेकेँ एक्के संग महलमे पकड़ि लेल गेलैक। राजा सभटा गप पुछलक। सीत सभटा गप बतेलक। लड़की कहलक जे हमर भाग्यमे यैह अछि आ यैह रहत। राजा सोचि कए कहलक-अहाँ अपन भाएकेँ लए आऊ आ हंसकेँ सेहो। बसन्त आ हंसकेँ सीत लए अनलक। हंसकेँ देखि कए राजा बड्ड प्रसन्न भेल। राजा कहलक-हमर मन्त्री लग एकटा आर बेटी छैक। दुनू भाएक एकहि बेर बियाह कए देल जाएत। बड्ड धूम-धामसँ दुनू भाएक बियाह भेल। सीतकेँ कंचनपुरक राज भेटल कारण राजाक तँ एकेटा बेटी रहए। ताहि द्वारे सीत किछु दिन बितलाक बाद कहलक जे आब हम अपन शहर जाएब। राजा खुशीक संग ओहि चारू गोटे बेटी-जमाएकेँ बिदा कएलक। सीत-बसन्त दुनू भाए अपन देश बिदा भेल। किछु दिनुका बाद ओ सभ अपन नगर पहुँचल तँ ओतुक्का हालत बड्ड गम्भीर देखलक। अपन राजक एक कोनमे ओ सभ अपन घर बनेलक आ रहए लागल। सीतक माए आ पिता दुनू गोटे आन्हर भए गेल रहथि। सभ दिसनसँ विपत्ति आएल छलन्हि। एक दिन हुनका पता लगलन्हि जे हुनकर राज्यक एक कोनमे कोनो दोसर राजा घर बना कए रहि रहल अछि। चलू ओकरासँ भेँट कए आबी। ओ सभ जखन अएलाह तँ दरबज्जापर सीत-बसन्त दुनू गोटे चीन्हि गेलथि जे यैह हमर माए-बाप छथि। दुनू भाए अपन-अपन स्त्रीकेँ इशारा कएलन्हि। एहि दुनू गोटेकेँ भीतर लए जइयन्हु आ नीक जेकाँ असनान करबाऊ, नीक कपड़ा पहिराऊ आ खूब आ नीक खेनाइ खुआऊ आ तकर बाद एतए आनू आ मंचपर बैसाऊ। तकर बाद सीत आ बसन्त दुनू भाए माँ-पिताक आगाँ ठाढ़ भए कहलन्हि-ई तँ बताऊ जे अहाँकेँ कैकटा बेटा अछि। राजा महेश्वर सिंह कहलन्हि-हमरा दू टा बेटा रहए मुदा आब एकोटा नहि अछि। हमर भाग्यक दोख अछि। नहि जानि ओ सभ जीवित अछि आकि मरि गेल? हम तँ मरबा देने रहियैक। सीत-बसन्त बाजल-नहि। अहाँक दुनू बेटा जीवित अछि। एतेक कहैत ओकरा सभक आँखि नोरा गेलैक। -–पिताजी वैह सीत-बसन्त हम सभ छी। ओही समय राजाक आँखि खुजि गेलैक आ दुनूकेँ अँकवारमे भरि पकड़िकेँ ओ कानए लागल आ अपन गल्ती स्वीकार कएलक। धन्य लाला, अहाँक अउरदा बढ़ए। अमर रहू । वर्णमाला शिक्षा: अंकिता अकादारुण समय छल । अंकिता अङैठीमोड़ कएलक। ओकर पिता कहलन्हि- “अतत्तह करए छी। जल्दीसँ झटकारि कऽ चलू। अंकिता अकच्छ भऽ गेलि। चलैत-चलैत ओकर पएर दुखा गेलैक। रस्तामे ओ एकटा लालछड़ी बलाकेँ देखलक। “हमरा लालछड़ी कीनि दिअ”। “अंकिता अकर-धकर नहि खाऊ”। “नहि। हमरा ई चाहबे करी”। “अहूँ अधक्की छी। एखने तँ कतेक रास चीज खएने रही”। पिता तैयो ओकरा लालछड़ी कीनि देलन्हि। रस्तामे अगिनवान देखि अंकिता बाजलि- “ई आगि किएक लागल अछि”? “बोन-झाँकुर खतम करबाक लेल”। “अक्खज गाछ सभ तैयो नहि जरल अछि”। प्रश्न: बचियाक नाम की छी? उत्तर: अंकिता। प्रश्न: समय केहन छल? उत्तर: अकादारुण। प्रश्न: अंकिता चलैत-चलैत.......भऽ गेल छलि। उत्तर: अकच्छ। प्रश्न: पिता ......खाए लेल मना केलन्हि। उत्तर: अकर-धकर। प्रश्न: रस्तामे बोन-झाकुँड़केँ आगिसँ जराओल जाइत रहए। ओहि आगिक लेल प्रयुक्त शब्द रहए...। उत्तर: अगिनवान। प्रश्न: अगिनवानमे केहन बोन-झाँकुड़ नहि जरल? उत्तर: अक्खज। आगाँ:- कनी काल दुनू बाप बेटी गाछक छाहमे बैसि जाइ गेलाह। अंकिता उकड़ू भए बैसि गेलि आ उकसपाकस करए लागलि। “अहाँकेँ उखी-बिखी किएक लागल अछि अंकिता? साँझ भऽ गेल अछि। कनेक काल आर चलब तँ घर आबि जाएत”। तखने अकासमे अंकिता उकापतङ्ग देखलक। “एक उखराहा चललाक बादो गामपर नहि पहुँचलहुँ”| “चलू। चली। रस्ता धऽ कऽ चलू नहि तँ उड़कुस्सी देहमे लागि जाएत”। “दिन रहितए तँ खेतमे ओड़हा खएतहुँ”। “कलममे ओगरबाह सभ आबि गेल। कड़ेकमान अछि, अपन-अपन मचानपर”। “इजोरियामे देखू। दिनमे बरखा भेल रहए से लोक सभ खेतमे कदबा केने अछि”। “कमरसारि आबि गेल आ अपन सभक घर सेहो”। टिप्पणी: पहिल भागमे अ उत्तरबला प्रश्न पूछल गेल छल। एहि भाग लेल “ओ” आ “क” वर्णसँ शुरू होअएबला उत्तर सभक लेल प्रश्न बनाऊ। एहिना कचटतप वर्णमालासँ शुरु होअएबला शब्द बहुल खिस्सा बनाऊ आ बच्चाकेँ सुनाऊ आ फेर ओकरासँ प्रश्न पूछू। खिस्सा कताक बेर बच्चाकेँ सुनाओल जाए, से बच्चाक क्षमता आ कथामे प्रयुक्त शब्दावलीक संख्याक हिसाबसँ निर्धारित करू। कियो बूझि नै सकल हमरा-(गजलकार श्री ओम प्रकाश झा) भदवारिमे मेघ लाधल रहै छै, विदागरी-तिदागरी नै होइ छै मुदा पनिऔरा फड़ै छै। भदवरिया लाधल छै, बितरोचारक कोनो खगता नै। गोलैसी नीक गप नै। मुदा जँ कोनो बहर दिस झोंकान भऽ जाए तँ कोनो हर्ज नै। जँ मैथिली साहित्यमे बहरमे कहल गजल सभक संकलन हुअए तँ तकर सर्वश्रेष्ठ कहबैका हेता ओम प्रकाश जी। “करेजासँ शोणित बहाबैत रहलौं करेजामे प्रेम बसै छै आ ओइसँ शोणित बहि रहल छन्हि, तँ कियो चक्कू भोकने हेतन्हि तखने ने। के अछि एहेन चण्ठ! मुदा शेरक दोसर मिसरा कहैए.. विरह-नोर कखनो कहाँ खसल हमरा” इतिहास बनैत-बनैत रहि गेल कारण? एकटा खिस्सा बनि जइते अहाँ संकेत जौं बुझितहुँ हमही छलहुँ अहाँक मोनमे कखनो तँ कहितहुँ से ने हिनके दोष ने हुनके। से हिनकर इच्छा छन्हि जे जड़ैत करेज आगिमे जड़िते रहए: पता नै कोन आगिमे जरैत रहल करेज हमर पानि नै खाली घीए टा चाहैत रहल करेज हमर तँ कोनो प्रेमीक प्रेमक आघात सहने छथि गजलकार, आ ओइ प्रेमीसँ एतेक लग छथि जे विरह-नोर बहेने ओकर बदनामी भऽ जेतै तेँ विरह नोर नै बहबैछथि। चाहै छथि जे करेज आगिमे जड़िते रहए, आ आगिमे पानि नै घी ढारल जाइत रहए। आ लोककेँ होइ छै जे हुनकर हृदय आ मोन कठोर छन्हि! आ तेँ ओ कहै छथि.. कहू की कियो बूझि नै सकल हमरा हँसी सभक लागल बहुत ठरल हमरा आ संगमे ईहो: एतेक मारि खेलक झूठ प्रेमक खेलमे जमानासँ कियो देखलक नै कुहरैत रहल करेज हमर मुदा लोकक बुझब नै बूझब, किदन साती ले! ओ बहरे मुतकारिबमे कहल एकटा दोसर गजलमे कहै छथि.. भिड़त आबि हमरासँ औकाति ककरो कहाँ छै जखन-जखन लडलौं हरदम अपनेसँ लडलौं हम तँ की गजलकार घमण्डी छथि, नै सेहो नै, ओ बहरे हजजमे कहै छथि: कटऽ दियौ "ओम"क मुड़ी आब दुनियाँ ले जँ गाम बचै झुकैसँ तँ पाग निखरै छै तँ की मैथिलीक गजलकार अखनो प्रेमे-विरहमे ओझराएल छथि? नव विषय नै पकड़ि रहल छथि? मुदा से नै छै, बहरे-सलीममे लिखल गजलक ई शेर सुनू: धरले रहत सभ हथियार शस्त्रागार बनलै मिसाइल भूखे झमारल लोक आ ई बाल-गजल सुनू। बाल-कविता/ गजल सुनिते लोककेँ उल्लासक स्वर सुना पड़ै छै, मुदा बाल-मजदूरक जिनगीमे से कतऽ पाबी, मुदा आस तँ छै, तेँ:- चारू कात पसरल दुखक अन्हरिया छै कटतै ई अन्हरिया आ बढ़बै हमहूँ आ ई आस आनो गजलमे अछि: सागरक कात सीप बिछैत रहब हम कोनो सीपमे कखनो मोती भेटेबे करतै ओम प्रकाश जीकेँ जहिया मोती भेटतन्हि तहिया, मुदा मैथिली साहित्यकेँ हुनका रूपमे एकटा मोती भेटि गेल छै, ओ चीन्हि लेल गेल छथि, बूझि लेल गेलछथि। रामिवलास साहुजीक दधू बेचनी लघुकथा संग्रह ‘गामक गाछी’ लघुकथामे बुधुआक दादा कालेसरक गछकट्टीमे दबि क’ मरि गेलाक प्रसंग पुरना गेल छलै, नवका पंच सभकेँ बुझले नै, आकि बुझल रहलोपर ओकर महत्त नै खड़िया क’ बुझल रहै। से जखन मुखियाजे ऐ गपक चर्चा कथाक क्लाइमेक्समे करै छथि तँ सभ महत्त बुझै छथि जे कोना बोन कलम-गाछी बनल। ‘कमतियाक कामत’ क खिस्सा आ कमतियाक घरकेँ हबेली कहैपर मदीना दादीक विरोधपर कमतिया हबेली शब्दावलीक जन्म ऐ कथाक शीर्षक उचिते बनल। ‘घुमि गाम चलू’ कथाकेँ कनी आर चुस्त करबाक खगता छल, कथा सोइरी घरसँ शुरू होइए मुदा अंत कपचा गेल लगैए। ‘बिपैत’ मे बिपैतक संग (बिपैत छोड़ि आर के?) नीक बनल अछि। ‘झंझैटक जड़ि सिनुरिया आमक गाछ’ भिन-भिनौजपर लिखल कथा छी। ‘जारैन’ मे नव चीजक विरोधक संग लेखक ठाढ़ बुझाइ छथि, कारण महिलाकेँ धुँआसँ होइबला कष्टकेँ ओ वाद-विवादमे नै अनलनि। ‘जेहेन पाठ ने पढ़ए पुत्ता अपने सिर विसए’ पढ़ि लेखक अंधविश्वासक पक्षमे ठाढ़ बुझाइ छथि। आइ काल्हि टी.वी. पर भुतहा आ अंधविश्वास आधारित सीरियलक पक्षमे यएह सफाइ शुरुहेमे देल जाइत अछि जे ई मात्र मनोरंजन लेल बनल अछि आ एकर उद्देश्य अंधविश्वासकेँ बढ़ाबा देब नै अछि। से ईहो कथा मनोरंजने उद्देश्यसँ पढ़ू। ‘कौल्हुक सुच्चा करु तेल’ हमरा हिसाबे ऐ लघुकथा संग्रहक सर्वश्रेष्ठ लघुकथा अछि। कोना लोक अपन कुटीर उद्योग पूँजीवादक फेरमे खतम केलक, ई कथा तकरे विस्तार अछि आ आशाक संग खतम होइए। ‘दूधबेचनी’ ऐ लघुकथा संग्रहक टाइटल कथा छी। बकलेलसँ बेटीक बियाह। पतिक मृत्यु आ पत्नी द्वारा असगरे बाल-बच्चाकेँ पोसब जिनगीक लक्ष्य। मुदा फेर मोहभंग आ फेर समाजक लेल किछु करबाक इच्छा संग कथाक समाप्ति। ‘गोदानक गाए घुमि घर आएल’ अंधविश्वासपर चोट अछि। से ‘जेहेन पाठ ने पढ़ए पुत्ता अपने सिर विसए’ क विपरीत। ‘असिरवाद’ यत्रा वृत्तांत सन अछि, आ ‘हम’ शैलीक रचना अछि। आ कारण आधारित संयोग आकि भविष्यवाणी ऐमे दू बेर भेल। एक कोसीक नाह आ दोसर घुरती काल बसक दुर्घटना। ‘ई केकर दोख’ मे कथानक आगू बढ़ैए मुदा सभ हीस नीकसँ नै फौदाइए। रूपनक कथा आकि कारीक? रूपनक कथा भँसियाइत अछि तँ कारीक कथा संग नीक जकाँ मिज्झर नै भ’ पबैए। कथा-संग्रह मुदा जीति गेल अछि। कारण अची एकर शब्दावली आ फकड़ा सभक सफलता। जँ एकर अनुवाद कएल जाए तँ भ’ सकैए जे ‘कौल्हुक सुच्चा करु तेल’ क अलाबे आन कथा सभ सामान्य बुझा पड़ए, मुदा मूल मैथिलीमे ई संग्रह जीतल अछि। गामक समाजक समस्याक वर्णन जे नग्रक लोककेँ छोट आ पुरान बुझा सकैए, गामक लोक लेल पैघ आ समकालीन अछि; आ राम विलास साहुजीक शब्दावली ऐ वर्णनक संग न्याय केने अछि। राजदेव मण्डलक अम्बरा कविता: कविता लोक कम पढ़ैत अछि। संस्कृतसन भाषाक प्रचार-प्रसार लेल कएल जा रहल प्रयासक अंतर्गत सम्भाषण-शिविरमे सरल संस्कृतक प्रयोग होइत अछि। कथा-उपन्यासक आधुनिक भाषा सभसँ संस्कृतमे अनुवाद होइत अछि मुदा कविता ओहि प्रक्रियामे बारल रहैत अछि। कारण कविता कियो नै पढ़ैत अछि आ जै भाषा लेल शिविर लगेबाक आवश्यकता भऽ गेल अछि, तै भाषामे कविताक अनुवाद ऊर्जाक अनर्गल प्रयोग मानल जाइत अछि। मैथिलीमे स्थिति एहन सन भऽ गेल अछि, जे गाम आइ खतम भऽ जाए तँ ऐ भाषाक बाजएबलाक संख्या बड्ड न्यून भऽ जाएत। लोक सेमीनार आ बैसकीमे मात्र मैथिलीमे बजताह। मैथिली-उच्चारण लेल शिविर लगेबाक आवश्यकता तँ अनुभूत भइए रहल अछि। तँ एहि स्थितिमे मैथिलीमे कविता लिखबाक की आवश्यकता आ औचित्य ? समयाभावमे कविता लिखै छी, एहि गपपर जोर देलासँ ई स्थिति आर भयावह भऽ सोझाँ अबैत अछि। एहना स्थितिमे आस-पड़ोसक घटनाक्रम, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा, आक्षेप आ यात्रा-विवरणी यएह मैथिली कविताक विषय-वस्तु बनि गेल अछि। मुदा ऐ सभ लेल गद्यक प्रयोग किए नै ? कथाक नाट्य-रूपान्तरण रंगमंच लेल कएल जाइत अछि मुदा गद्यक रूपान्तरण कवितामे कोन उद्देश्यसँ। समयाभावमे लिखल जा रहल ऐ तरहक कविता सभक पाठक छथि गोलौसी केनिहार समीक्षक लोकनि आ स्वयं आमुखक माध्यमसँ अपन कविताक नीक समीक्षा केनिहार गद्यसँ पद्यमे रूपान्तरकार महाकवि लोकनि ! पद्य सर्जनाक मोल के बूझत ! व्यक्तिगत लौकिक अनुभव जे गहींर धरि नै उतरत तँ से तुकान्त रहला उपरान्तो उत्कृष्ट कविता नै बनि सकत। पारलौकिक चिन्तन कतबो अमूर्त रहत आ जे ओ लौकिकसँ नै मिलत तँ ओ सेहो अतुकान्त वा गोलौसी आ वादक सोंगरक अछैतहुँ सिहरा नै सकत। मनुक्खक आवश्यक अछि भोजन, वस्त्र आ आवास। आ तकर बाद पारलौकिक चिन्तन। जखन बुद्ध ई पुछै छथि जे ई सभ उत्सवमे भाग लेनिहार सभ सेहो मृत्युक अवश्यंभाविताकेँ जनै छथि? आ से जे जनै छथि तखन कोना उत्सवमे भाग लऽ रहल छथि। से आधुनिक मैथिली कवि जखन अपन भाषा-संस्कृतिक आ आर्थिक आधारक आधार अपना पएरक नीचाँसँ विलुप्त होइत देखै छथि आ तखनहु आँखि मूनि कऽ ओहि सत्यताकेँ नै मानैत छथि, तखन जे देश-विदेशक घटनाक्रमक वाद कवितामे घोसियाबए चाहै छथि, देशज आ दलित समाज लेल जे ओ उपकरि कऽ लिखऽ चाहै छथि, उपकार करऽ चाहै छथि, तँ ताहिमे धार नै आबि पबै अछि। मुदा जखन राजदेव मंडल कविता लिखै छथि- .... टप-टप चुबैत खूनक बून सँ धरती भऽ रहल स्नात पूछि रहल अछि चिड़ै अपना मन सँ ई बात आबऽ बाला ई कारी आ भारी राति कि नहि बाँचत हमर जाति...? तँ से हमरा सभकेँ सिहरा दैत अछि। कविक कवित्वक जाति, ओइ चिड़ैक जाति आकि..। कोन गोलौसी आ आत्ममुग्ध आमुखक दरकार छै ऐ कविताकेँ। कोन गोलौसीक आ पंथक सोंगर चाही ऐ सम्वेदनाकेँ। तँ कविताकेँ उत्कृष्टता चाही। भाषा-संस्कृतिक आधार चाही। ओकरा खाली आयातित विषय-वस्तु नै चाही, जे ओकरापर उपकार करबाक दृष्टिएँ आनल गेल छै। ओकरा आयातित सम्वेदना सेहो नै चाही जे ओकर पएरक नीचासँ विलुप्त भाषा-संस्कृति आ आर्थिक आधारकेँ तकबाक उपरझपकी उपकृत प्रयास मात्र होअए। नीक कविता कोनो विषएपर लिखल जा सकैत अछि। बुद्धक मानवक भविष्यक चिन्ताकेँ लऽ कऽ असञ्जाति मनकेँ सम्बल देबा लेल सेहो, नै तँ लोक प्रवचनमे ढ़ोंगी बाबा लेल जाइते रहताह। समाजक भाषा-संस्कृति आ आर्थिक आधारक लेल सेहो, नै तँ मैथिली लेल शिविर लगाबए पड़त। बिम्बक संप्रेषणीयता सेहो आवश्यक, नै तँ कवि लेल पहिनेसँ वातावरण बनाबए पड़त आ हुनकर कविताक लेल मंचक ओरिआओन करए पड़त, हुनकर शब्दावली आ वादक लेल शिविर लगा कऽ प्रशिक्षण देल जएबाक आवश्यकता अनुभूत कएल जाएत आ से कवि लोकनि कइयो रहल छथि ! मिथिलाक भाषाक कोमल आरोह-अवरोह, एतुक्का सर्वहारा वर्गक सर्वगुणसंपन्नता, संगहि एतुक्का रहन-सहन आ सांस्कृतिक कट्टरता आ राजनीति, दिनचर्या, सामाजिक मान्यता, आर्थिक स्थिति, नैतिकता, धर्म आ दर्शन सेहो साहित्यमे अएबाक चाही। आ से नै भेने साहित्य एकभगाह भऽ जाएत, ओलड़ि जाएत, फ्रेम लगा कऽ टंगबा जोगड़ भऽ जाएत। कविता रचब विवशता अछि, साहित्यिक विवशता। जहिया मिथिलाक लोककेँ मैथिली भाषा सिखेबा लेल शिविर लगाओल जएबाक आवश्यकता अनुभूत होएत, तहिया कविताक अस्तित्वपर प्रश्न सेहो ठाढ़ कएल जा सकत। आ से दिन नै आबए तै लेल सेहो कविकेँ सतर्क रहए पड़तन्हि। आ से राजदेव मंडल सतर्क छथि आ तैँ हिनकर कविता-संग्रह अम्बरा एक्कैसम शताब्दीक पहिल दशकक सर्वश्रेष्ठ मैथिली कविता संग्रह बनि आएल अछि। मैथिलीक भिखारी ठाकुरक नामसँ प्रसिद्ध मैथिलीक पहिल जनकवि रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार’क गीत आ झारू - “हमरा बिनु जगत सुन्ना छै” मैथिलीक भिखारी ठाकुर “रामदेव प्रसाद मण्डल "झारूदार" ” दइ छथि माटि आ कहै छथि “हमरा बिनु जगत सुन्ना छै”। मैथिली साहित्य वा कोनो भाषाक साहित्यमे झारू नामक काव्य विधा सुनने रहिऐ? रामदेव प्रसाद मण्डल “झारूदार” जीक झारूकेँ छोड़ि कऽ? नै ने! कारण रामदेव प्रसाद मण्डिल “झारूदार” महीसक पीठ, खेतक आड़ि-धूर आ रस्ता चौबटियापर स्वतः स्फूर्त जे नव विधाक आविष्कार केने छथि से समाजक दुर्गुणकेँ खरड़ासँ खरड़बा लेल छै। फुलझाड़ूसँ खरिहान नै बहारल हएत, आ खरड़ा सँ ओसारा नै बहारि सकै छी। लाठीमे राहड़िक डाँटक झारूसँ झोल-झाल साफ कएल जाइए। से तरह-तरहक बाढ़नि, आ खरड़ाक प्रचलन अछि। रामदेव जी गीत सेहो लिखै छथि, आ पनिसोखा सन रंग बिरंगक झारू सेहो। जेहेन समस्या तेहने झारू। आ मैथिलीमे जखन गोत्र-मूलक उपनाम रखबाक प्रवृत्ति किछु नव आ पुरान लेखकमे देखल जा रहल अछि तखन ई “झारूदार” उपनाम की सभ चीज बिनु कहने कहि जाइए? आ कविक आत्मविश्वास, हम नै तँ किछु नै। हमरासँ पहिले कोनो नै शासन। नै छै कोनो धर्मक विधान।। हमरा बिनु जगत सुन्ना छै। हतैबला छै पशु समान।। आब ताकि लिअ ऐ झारूमे बौद्ध दर्शनक शून्यवाद आ शंकरक अद्वैत दर्शन! हुनका पैसाक रोग नै चाही तँ अंध्विश्वासक रोग सेहो नै। सभ बनल छै पैसा रोगी, अन्धनविश्वास, कुरीतक जोगी मुदा ऐ लेल रामक तीर कमान चाही की? कारण तइ लेल तँ रामक अवतारक प्रतीक्षा करए पड़त। नै, स्वयंपर करू विश्वास, कारण जँ समस्या अहाँ छी तँ समाधान सेहो अहीं। अहाँ बिना के ई दुख हरतै अहींसँ ई सभ दानव मरतै कलमकेँ एक बेर फेर बनाबू रामक तीर कमान यौ। आपसी एकताक महत्व कवि नीक जेकाँ बुझै छथि, मुदा एकता कोना आओत, तकर समाधान देखू: एकता बनैले सहए पड़ै छै घटो लगा कऽ बहए पड़ै छै अपन गलतपर लहए पड़ै छै। नारीक स्थिति, से ओ नारी गामक होथि वा ओ नेता ने किए बनि गेल होथि, अखनो टीस उठबैत अछि, आ कवि जँ झारूदार होथि तँ ओइ टीसक वर्ण एना होइत अछि: नारी सीता राधा अंश, पुरूष बनल छै रावण कंश। फेर कोना कऽ चलतै, ई घर दुनियाँदारी यौ। मुदा तकर उपाय, की पुरुष बदलत नारीक दशा? नै, ई आत्मविश्वास स्वयं नारीमे छन्हि, ओ शिक्षाक डोर पकड़ती आ… आब नै नारी रहब अनारी, बनबै सख्त कठोर यौ। तँ की वएह नारी वा जाति-पाति आदिक समस्या टा पर ध्यान छन्हि कविक? नै, ओ प्रदूषण सन विज्ञानक देनपर सेहो चिन्तित छथि: विज्ञानक ई देन प्रदूषण बनि घर घुसल चुहार यौ। बाघ बनि ई मुँह बौने अछि दुिनयाँ बनल सिकार यौ आ प्रदूषण कोना कम हएत, सेहो ओ नव खाढ़ीकेँ राह देखबै छथि: इंजन हो पूरा कंडीसन धुआँ नै छोड़ै बेकार यौ। करू खियाल किछु अगिला पिढ़ी कोना रचत संसार यौ। आ ऐ पर हुनकर एकटा झारू सेहो छन्हि, ओ वने टा नै वनवासीक सेहो संरक्षण चाहै छथि: वन झील नदी आ वनवासी पहार पठार संग रेगिस्तान। करू सुरक्षा पर्यावरण केर ऐ सँ देश बनत धनवान।। दहेज आ काटर प्रथापर रामदेव जी लिखै छथि: आइ हर घरमे सीता रोऐ छै राइत-राइत भरि नै जनक सुतै छै कतए सँ एतै दहेजक पैसा हेतै केना कन्यादान यौ मिथिलापर झारूदारकेँ गर्व छन्हि, कोन मिथिलापर: जगतरनी जतए गंगा धारा, ज्योति लिंग केर जतए उज्यारा। हजरत तुलसी वाल्मिकक गुँजि रहल उपदेश। मुदा बिहार अन्तर्गत जे मिथिला छै तकर दशापर झारूदार चिन्तित छथि आ बिहारक मुख्यमंत्री नीतिश कुमार, जे विकास पुत कहल जाइ छथि हुनका झारूदार किछु देखबऽ चाहै छथि: केमरासँ तस्वीर बनेबै मिथिला मैथिल परिवार केर। तकरा देखेबै पटना जा कऽ विकास पुत नीितश कुमारकेँ। फोटो बनेबै खेत असिंचित सिंचाइ पानि विजलीसँ वंचित। मानवता ककरामे हेतै, मानवे मे ने। आ तकरे ने भेटतै दुनियाँक ताज आ सएह ने जीतै बनि झारूदार! ताज मिलै सम्पूर्ण जगतक आ बनि जीबए झारूदार मानवमे मानवता होइ तँ बदलै नै ओकर अवतार तँ झारू आ गीत, जे बोन-झाँकुरमे खेत-पथारमे घुमैत-फिरैत लिखाएल से तँ विशिष्ट हेबे करतै आ ओकर लिखैबलाकेँ से ताज भेटबे करतै। मिथिलाक भिखारी ठाकुर ओइ ताजकेँ पहीरि झारूदार कहेबे करतै। मुन्नाजीक “माँझ आंगनमे कतिआएल छी” “माँझ आंगनमे कतिआएल छी” मुन्नाजीक रुबाइ आ गजल संग्रहक नाम अछि। कतिआएल आ सेहो माँझ आंगनमे! की कबीरक उलटबासीक प्रभाव अछि ई आकि गजलक स्वभाव अछि ई? नहिये ई कबीरक उलटबासीक प्रभाव अछि नहिये ई गजलक स्वभाव अछि, ई एकटा यथार्थ अछि। मुन्नाजी सन कतेको लोक कतिआएल छथि, प्रतिभा अछैत हेराएल छथि। मुदा गजलकार सभटा दोख अपनेपर लऽ लै छथि। आब तँ माँझ आंगनमे कतिआएल छी अपने चालिसँ आब बेरा गेलहुँ हम आ सएह कारण अछि जे ओ नोरक सुख भोगऽ लागै छथि। नोर तँ खसैए मुदा मजा सन लगैए केहन नीक प्रेमक दुख लेलहुँ हम बड़का खाधिमे खसै छथि आ तहू लेल अपनेकेँ दोखी मानै छथि: छोटको ठेससँ नै सबक लेलहुँ हम तँए बड़का खाधिमे खसि गेलहुँ हम तँ की गजलकार प्रेमक महत्व बिसरि गेल छथि, नै प्रेम तँ सभकेँ चाही। सभ उमेर वर्गकेँ प्रेम चाही मरितो धरि कुशल-छेम चाही आ हिनका जँ कोस दू-कोस मात्र चलबाक रहितन्हि तखन ने, हिनका तँ बहुत आगाँ बढ़बाक छन्हि तेँ प्रेम चाही। डाहसँ पहुँचब कोस-दू कोस आगू बढ़बा लेल तँ प्रेम चाही आ से सभ ठाम। एकटा हमर संगी छल, एकटा परीक्षामे टॉप केलक तँ बाजल- नै कम्पीट करै छी तँ नै करै छी, आ करै छी तँ टॉप करै छी। ओ गजलकार नै छल जँ रहितए तँ अहिना लिखितए जेना मुन्नाजी लिखै छथि: बदरी लादल रहै कोनो बात नै जदि बरसी तँ बरिसात बनि कऽ आ नजरि-नजरिक फेर आ हाफ ग्लास फुल, ई दुनू टा अवधारणा ऐ रूपमे ओ राखै छथि: नजरि उठा कऽ देखबै तँ खाली बुझाएत ई दुनियाँ नजरि गरा कऽ देखबै तँ सभ देखाएत ई दुनियाँ समालोचना आ विरोध दुनूकेँ गजलकार नीक मानै छथि। पक्षधरसँ राखू अपनाकेँ बचा कऽ विपक्षीक सभ बातकेँ नै तीत बुझू महगाइसँ लोक बेकल अछि मुदा तकरा लेल झुमैत मचानक बिम्ब देखू: महगाइसँ खूने नै हड्डियो सुखाइए आब झुलैत मचान सन लगैए लोक आ ई उलटबासी देखू, बिम्ब नव, भावना शाश्वत: हम तँ घूर जड़ेलौं गर्मी मासमे मिझाएल आगिसँ पसाही कहियो ई कोन गोष्ठी छी जे अछि कोन पत्रिकाक प्रायोजित चिट्ठी छपबाक राजनीति सन, ई रुबाइ देखू: मोन भए उठल दुखित होहकारीसँ उठि दर्शक भागल मारामारीसँ प्रायोजक तँ पथने रहल कान अपन कर्ता देखार भेला जतियारीसँ मुदा बाढ़िक विषय जँ मैथिली गजलक अंग नै बनए तँ बुझू जे गजलकार समाजसँ कतिआएल छथि। मुदा से नै अछि। धार एखन धरि तँ उफानपर अछि लोक ताका-ताकी करैत बान्हपर अछि आब पड़ाइन घटल अछि, मिथिलासँ पड़ाइन। बाहरी लोक बिहारीकेँ मजदूर आ श्रमिकक पर्यायवाची मानि लेने छथि। तहूपर गजलकारक कलम चलल अछि। बिहारक सिरखारी बदलि गेल सन लगैए आब श्रमिक घटलासँ कंपनी-मालिक लगै बिहारी जकाँ मुन्नाजीक गजल आ रुबाइ स्वच्छन्द रूपसँ बमकोला जेकाँ बहल अछि। शेरक स्वभाव होइ छै जे जँ ओकरा नीकसँ कहल जाए तँ आह-बाह लोक करिते अछि। मैथिलीमे गजल-रुबाइ जइ तरहेँ प्रसारित भऽ रहल अछि से देखि कऽ यएह लागि रहल अछि जे जतेक ई विधा अपनाकेँ पसारि रहल अछि तइसँ बेशी मैथिली लाभान्वित भऽ पसरि रहल अछि। मुन्नाजीक मैथिली विहनि कथाक संग्रह “प्रतीक” मुन्नाजीक मैथिली विहनि कथाक संग्रह “प्रतीक” विहनि कथाक प्रतीकात्मकताक प्रतीक बनि गेल अछि। बिरारसँ विहनि उपारि धान आ मेरचाइ रोपबाक प्रक्रिया ऐ संग्रहक सभ कथा सभमे देखमामे आओत। तेँ ई छिटुआ नै रोपुआ धानक खेती बनि गेल अछि। तीन मोनक कट्ठा सभ गोटे सुनैत होएब, मुदा एतऽ देखब। विहनि कथा हास्य कणिका नै अछि, ई कथाक जड़ि अछि, बीआ अछि, छिटुआ धानसँ भेल पौध आ विहनिसँ भेल पौधमे बड्ड अन्तर छै। छिटुआ धान फौदाइ नै छै। से हास्य कणिका बिठुकट्टा होइ छै, ऐ मे हँसी अबै छै, मुदा ओ छिटुआ धान जेकाँ अछि। दोसर बेर ओइ बिठुकट्टा कथाकेँ, हास्य कणिकाकेँ सुनब तँ ने हँसिये लागत आ नहिये छगुणते। तखन जँ बिनु सिझने विहनि कथा लिखाएत, बिनु सिझेने विहनि कथा लिखब तँ लतीफा बनबे टा करत। आ हास्य कणिका विहनि, लघु आ दीर्घ कथा वा उपन्यासमे लेखकीय सामर्थ्यक अनुसार प्रयुक्त होइत रहल अछि आ होइत रहत। मुदा उसना धानसँ बिराड़मे विहनि नै बहराएत। से बिनु उसीनने बीआ बाउग करऽ पड़त। बिनु उसीनने सिझाबऽ पड़त आ तइ लेल बेशी मेहनति करऽ पड़त। आ बीआ छीटब तैयो सभ धानसँ विहनि नै बहराएत, किछु सँ नहियो बहराएत। से विहनि कथाकेँ सफल हेबाक प्रतिशत कम छै, लघुकथाक सफलताक प्रतिशत कने बेशी छै, दीर्घ-कथा आ उपन्यासक सफलताक प्रतिशत आर बेशी छै। मुदा उपन्यास झंझटिया काज छै, मोन घोर कऽ दै छै, बेशी समए लागै छै। विहनि कथा धाँइ-धाँइ लिखाइ छै। मुदा जहिना कविता लेल आवेग चाही तहिना विहनि कथा लेल, नै तँ ने धाँइ-धाँइ लिखेबे करत आ पद्यक गद्य आ गद्यक पद्य बनबाक आशंका सेहो रहत। सभ उपन्यासकार कतेक रास विहनि उपाड़ि कऽ सजबैए। उपन्यास गद्य छिऐ मुदा ओइमे कोनो पात्र जँ गीत गाबऽ लागए तँ ओकरा अहाँ रोकि देबै? जे उपन्यासकार रहैए ओ विहनि देखि उपन्यासक धनखेती देखऽ लगैए, कखनो ओ विहनि कथा लिखियो दैए, फेर लोभ संवरण नै भेलासँ ओइ विहनिक प्रयोग उपन्यासमे, दीर्घकथामे, लघुकथामे सेहो करैए। तखन मुन्नाजीक विहनि कथाक की विशेषता। मुन्नाजी हमर पड़ोसी सुरजु भाइ छथि, ओ बिराड़मे जतेक बीआ लगबै छथि ओकर दशो प्रतिशत अपन खेतमे नै लगा पबै छथि। बाढ़िक इलाका छै से लोकक खेत पड़ल रहि जाइ छै बिनु विहनिक। से सुरजू भाइक पड़ोसी ओइसँ लाभ उठबै छथि कारण बाढ़िमे कखनो काल तीन-तीन बेर धनरोपनी होइ छै, एक बेर रोपू बाढ़ि आएल, दोसर बेर रोपू फेर बाढ़ि आएल। आ सुरजू भाइ छथि तेँ लोक विहनि लेल निश्चिन्त रहैए। आ मुन्नाजीक विहनि कथा सेहो निश्चिन्त करैए। “रेवाज” विहनि कथा लिअ। गाम घरमे मसोमातकेँ लोक डाइन कहै छै मुदा मुइलाक बाद घराड़ी लेल ओकरा आगि देबा लेल उपरौंझ होइ छै। एतऽ मुदा विहनि लेल जे बीआ छीटल गेल छै से कने उच्च स्तरक छै। एतऽ मृतककेँ बेटा नै छै मुदा पत्नी आ बेटी छै। से जखन मृतकक भाइ कोहा उठबऽ चाहैए तँ विधवा ओकरा रोकै छै आ बेटीकेँ कोहा उठबैले कहै छै। आ संग के देत ऐ नव रेवाजमे, जे आइयेसँ प्रारम्भ भेल अछि? तखन उत्तरो भेटैए- निपुतराहा सभ। तहिना “कमरुनिसा” विहनि कथा अछि। हसीना मंजिल सन एकटा आरो श्रेष्ठ उपन्यास ऐ विहनि कथा (सीड स्टोरी)सँ मुन्नाजी नै बना सकै छथि की? कमरुनिसाक पिता रहमान। लहठीक काज जेकाँ दम्मा सेहो ओकर सभक पुश्तैनी वौस्तु छलै। कमरुनिसाक अब्बा-अम्मीक जान ई दम्मा लेलकै आ फेर कमरुनिसा… “जिया जरए सगर राति”मे एड्सक समस्या आ लिविंग रिलेशनक चर्च अछि तँ “दियाद”मे पनहीक ऊपरसँ चिक्कन चुनमुन हेबाक मुदा नीचाँसँ खलओदार केने जेबाक विवरण देल गेल अछि। “नपना” मे स्त्रीक काजक स्वरूप तय कएल गेल छै। अखनो जनगणना कालमे सरकार स्त्रीक घरक काजकेँ आमदनीमे नै जोड़ैत अछि, आ ऐ कथामे अन्त होइए जखन एकटा स्त्रीक चर्च अबैए जे नोकरीयो करैए आ घरक काजो। “देह, मोन आ प्रेम” एकटा हास्य कणिकाकेँ कोना विहनि कथामे परिवर्तित कएल जाए, तकर उदाहरण अछि। सबीना आ मोहसिन नाम्ना पात्र लऽ कऽ ई चमत्कार मुन्नाजी केने छथि। आइ काल्हि जखन लोकक जिनगी गति पकड़ि लेने अछि तखन विहनि कथाक महत्व बढ़ि गेल अछि। मुन्नाजी विहनि कथा लेल समर्पित छथि आ ई संग्रह हुनकर ऐ समर्पणक गुणात्मक अभिव्यक्ति छन्हि। रामविलास साहु जीक कविता, गीत, हाइकू, शेनर्यू आ टनका संग्रह “रथक चक्का उलटि चलै बाट” “रथक चक्का उलटि चलै बाट” ई रामविलास साहु जीक कविता, गीत, हाइकू, शेनर्यू आ टनका संग्रहक नाम अछि। खाँटी शब्दावलीक प्रयोग आ ओइ माध्यमसँ तीन पाँतिक हाइकू/ शेनर्यू आ पाँच पाँतिक टनकामे हिनकर प्रकृति-प्रेमक माध्यमसँ भावोद्गारमे एतेक रास तथ्य सोझाँ अनैए, एतेक रास समस्या आ समाधान तकैए जे पढ़निहार बाजि सकैए, हँ ई हम किए नै सोचि सकलौं, मुदा आब सोचि सकब। रथक चक्का उलटि चलै बाट चाक चलै छै ठामे ठाम नचैत दुनु करै दू काम जापानक बाशो नै मोन पड़ि जाइ छथि रामविलास साहु जीक ऐ टनकासँ: सावन मास जलक बुन्नद पड़ै आसमानसँ बेंगक बाजा बजै खन्ता डबरा भरै हिनकर मानव आ प्रकृतिक मेल कतेक अद्भुत लगैत अछि: कारी काजर मुखड़ा िबगारैत कारी कोइली मधुर गीत गबै सभकेँ ललचाबै मुदा कारी काजरक उपमा एतै खतम नै भेल अछि: कारी काजर आँखि देत सुखाय कारी बादल बरखासँ डुबाय मुखरा देत बिगाड़ि रौदक गुण तँ प्रकृति-प्रेमी कवि पढ़ि लैए, वसन्त आ हेमन्त वर्णनासँ की ई कम अछि? चैतक रौद तपाबै माटि-पानि पछिया हवा पकाबै चना-गहुम बहारै धूर-कण कविता कहैमे कवि सेहो पाछाँ नै छथि, कोसी धार हुनका हिलोरै छन्हि: जिनगी बनल अछि हमर कंगाल झौआ, पटेर, काश खगरा हमरासँ करैए रगड़ा बाल बच्चा क जिनगी बाउलमे समाएल अन्धविश्वासपर कविक कलम चलै छन्हि: गाेसाँइ खेले भगता-भगतिनियाँ छत्तीस देवी चौदहो देबान अखन छौ देहपर िवरजमान जे मांगब से पूरा करतौ कारनीक सभ रोग वियाधि हरतौ फूल-अच्छतसँ वरदान देतौ बिगरल काज मनोकामना चुटकी बजिते पूरा करतौ बदलामे लड्डु-छागर-पाठी मांगतौ कवि किसान छथि तँ किसानी कोना बिसरताह: बिहानेसँ गजार कदबा हुअए लगल खेत हर जोतैत हरबाह बिरहा गाबैत आ फेर… “हरक नाश आ खेतक चासपर पेट भरबाक अछि सभकेँ आश।” आ तखन…… गहुमक दाना कोठीमे भरलौं भूसीकेँ भुसकाँरमे टलियेलौं चारि मासक गहुमक फसलि दिन-राति खटि कऽ घर केलौं साल-भरि रोटियो खाए जीअब गामक शब्दावली फकरा-कहबीक माध्यमसँ बहुत रास गप कहि जाइ छथि कवि: हाटक चाउर बाटक पानि बनियाँ घरक तरजूकेँ नै होइ छै कोनो माइन कारण.. हाटक चाउर बाटे बिलाएल घाटक पानि घाटे सुखाएल देशी इलाज आ रोगक रोकथाम सेहो कविकेँ बुझल छन्हि: इचना, पाेठी माछक चटनी संगे जे खाइ मरूआ रोटी नहि बनत रोगी मोटी रक्त चाप, मधुमेह, जलोदर रामविलास साहु जी चैतावर गबै (लिखै) छथि, बिरहा सुनै छथि, धनरोपनीपर आ किसानीपर कविता कहै छथि। आ ऐ सभ विषयपर हिनकर कविताक जोड़ा साहित्यमे भेटब कठिन। ई सभ विषय मैथिली कविताकेँ विस्तार देलक अछि, आ ओइपर लिखबाक सामर्थ्य रामविलास साहु जीमे छन्हि, ओकर भीतरमे ढुकि कऽ लिखबाक सामर्थ्य रामविलास साहुजीमे छन्हि। उमेश मण्डल जीक “निश्तुकी” कविता, लघु-कविता, हाइकू/ टनका आ गजलक संग्रहक उमेश मण्डल जीक “निश्तुकी” कविता, लघु-कविता, हाइकू/ टनका आ गजलक संग्रह थिक। मैथिलीक नव तुर मात्र उमेरकेँ प्रतिष्ठा नै देबऽ चाहैए, जँ ओ उमेर अग्रगामी नै होथि। आ से हेबाको चाही, काजक सम्मान छै उमेरक आ पुरानक नै। आ तेँ पुरान आ उमेरगर जँ अग्रगामी छथि तँ तिनका प्रतिष्ठा किए नै भेटन्हु? ई टनका देखू: समस्याँ आप्त सोलहनी सजल साहित्यकार लेखे पुरान छै आप्त केना एतै यथार्थ आ तेँ “बुढ़ारीमे” क्षणिकामे ओ कहै छथि: जिनगी चाह करैए कर्मक बाट देखबैए आ कर्मका बाट जँ पकड़ि लेब तखन धुधुएबे करब: भुरकी-सँ-भार बनि बील बोहरि धरि बनि-बनि असंतोष धोधरि बनि धुधुआ रहल अछि मिथिलासँ पड़ाइन भऽ रहल छै। से रहि-रहि कचोटै छन्हि कविकेँ। आ जँ वसन्तक आगमन भऽ जाए तखन तत्व ज्ञान भैये ने जाएत! बसंत आएल गाम जाएब आब एतए रहि नै पाएब बसंतेक खोजमे तँ छी बौआएल ऐ पड़ाइनसँ:- गामक मुँहथरि जंगल बनल अछि हुनका विचारक फाँट सेहो रहि-रहि देखा पड़ै छन्हि: अहाँक गप अपन मन दुनू मिलैए मिलि दुनू अछि चौचंग खोजि रहल अछि वसंत मुदा बसंतक चिड़ैकेँ संग नै राखए चाहै छी हम हुनका बुझऽमे आबि रहल छन्हि : भकोभन ओइ अन्हाार कोठरीमे आ ओ अहाँसँ पूछि रहल छथि: तखन शीशामे केना देखाएत ओकर चित्र केना आएत? आ कियो नै सुनऽ चाहै छथि ओ गीत जतऽ मात्र आ मात्र गाओल जा रहल अछि संस्कृतिक गीत: हनहनाइत, भनभनाइत ओइ स्वरकेँ सुनैले नै छथि कियो तैयार किए नै सुनै लेल छथि तैयार, कारण अछि डर, दर्दक डरे ओ नै सुनऽ चाहै छथि हनहनाइत, भनभनाइत ओइ स्वरकेँ। किछु अजीब बात सभ हुनका असहज लगै छन्हि: आगि-पानिकेँ मनक माइनकेँ कारण सेहो छै, अगिलहीक बिम्ब देखू: सप्पत खाइ काल देवता लोकक घर जड़बैकाल मित्ता ज्ञान आ ज्ञानी आ ज्ञानक प्रकाश सेहो हुनका कखनो ओझरीमे धऽ दै छन्हि: ज्ञानो भऽ जाइत अछि गुलाम सांकृत्यायन पड़ै छथि मोन धराम लहास जे अहाँकेँ बुझा पड़ैए सेहो आब बाजत: आब ओ बाजत बजैत-बजैत हँसत अहाँक कृतिपर बनल संस्कृ़तिपर मंगल आ मंगला हुनकर कवितामे सेहो कएक ठाम आएल अछि। विवशताक प्रतीक अछि मंगला! कातमे ठाढ़ भऽ मंगला आ आगाँ… अपनाकेँ केलक एकोर तँ सुखाएल घाटक घटवारी मंगलापर देखू ओकर विवशता: सुखलौ घाटक लेतै खेबाइ नै देबै तँ देत ई रेबाड़ि। सएह भेल मंगला घुरि गेल पछिमे मुरि गेल कवि कुम्हरौटक बिम्ब एना अनै छथि: काँच माटिक मूर्ति जहिना ढाॅचा मात्र कहबैए। तहिना तँ फूलोसँ बनल फल सिरखार मात्र कहबैए। आ वएह सिरखार ने आशा बान्हिा-बान्हि रौद-बसात सहैए आ अपने सन आर बटोही सेहो हिनका भेटि जाइ छन्हि: हमरे सन इहो सभ बटोही हराएल बाट बढ़ए चाहैए कविकेँ कोनो भ्रम नै छन्हि जे जेहने बाट चलब तेहने घाट भेटत आ तखन ओइ घाटपर पानि सेहो तेहने भेटत: जहिना चलैक बाट होइ छै तहिना तँ बुझैयोक बाट छै जेहेन जे बाट चलै छै तेहने घाट पहुँचै छै ई बाट आ विचार हुनकर एकटा आरो कवितामे अबैत अछि: विचारक संग जँ चालि रहल घाटपर जाइसँ कियो नै रोकत आ नीक वा अधलाह बाट कियो केना धरैए, तहूपर हुनकर लेखनी चलै छन्हि: जेहने घरक लोक रहै छै घरक मुँहथरि तेहने होइ छै। जेहने घरक मुँहथरि रहै छै तेहने ने बाटो धड़ै छै आ ई बाट हुनकर पछोड़ गजलमे सेहो नै छोड़ै छन्हि: गोर मौगी गौरबे आन्हर भेलि अड़ल करिया बाट बुझाइए चलू घुरि चली ओ निराश कखनो नै होइ छथि: मरलेमे मारि खा-खा मारल बुइध कहबै छी आ एकर कारण छै, ओ कहै छथि: जहिना पबिते अद्राक पानि मुइलहो धार जीबै छै। भलहिं जीतहा धार बीच तीन-मसुआ ओ कहबै छै आ ऐ आशा-आक्रोश आ निराशाक मध्य ओ लिखै छथि: छोड़ि देने टूटि जाएत समाज अपन उमेश जोड़तै तँ चहकतै लगैए ई। उमेश मण्डल जे किछु कहै छथि निश्तुकी कहै छथि, घुरछी, ओझरी सभटा चारू कात पसरल छन्हि। मुदा सोझराबै छथि, ओझराबै नै छथि। उमेश पासवानक कविता संग्रह “वर्णित रस” कविकेँ युवापर भरोस छन्हि, आ तेँ युवाकेँ सम्बोधितो करै छथि आ ओकर आह्वानो करै छथि, जेना “हम युवा” कवितामे - जाति-धर्म/ मजहब केर नामपर/ षडयंत्र रचैए कियो/ हमर देशकेँ/ भीतर आबि कऽ/ आतंकवादक/ गाछ रोपैए कियो आ तकर सम्बन्ध हुनकर “जीतक झण्डा” कवितामे भेटत जेना:- जरै जाउ/ वतन केर दुश्मन/ आगि सुनगाएल करू। ई जे दुश्मन अछि सएह फहरबाबइए जीतक झण्डा:- आगि सुनगाएल करू/ जीत केर झंडा फहराएल करू आ “हम युवा”मे सेहो ओ कहै छथि:- आतंकवादक/ गाछ रोपैए कियो/ भारतवासी शेर छी/ शेरकेँ मादमे आबि कऽ/ जगबैए कियो। कारण जे देशक युवा छथि से:- हम छी गोली,/ हम छी बारूद/ हमही खंजर तलवार छी। तखन ऐ गोली लेल पेस्तौल, बारुद लेल आगि के छथि? ओ छथि युवा जे छथि खंजर आ तलवार। तँ की दुश्मनी आधारित जोश छन्हि हुनकर कविता? नै से नै अछि- जौं दोस्तीक लेल हाथ बढ़ाएब/ तँ हमही फूलक माला/ गला केर हार छी। कविकेँ टंगघिच्चा-घिच्चीक खेल नै पसिन्न छन्हि। आ कवि कहै छथि। ऊपरसँ नूनू बौआ/ भितरे-भितर कहैए बकलेल/ बर्षोसँ देखि रहल छी/ हर तरहसँ दलितक उपेक्षा। बाढ़िक प्रकोप कविकेँ कहबापर विवश करै छन्हि: केना कऽ ऐबेर खेतक आड़िपर/ जा कऽ कहब/ सेर-बरोबरि/ उखैर सन बीट/ समाठ सन सिस। गबहा संक्रान्तिपर कविकेँ कहऽ पड़ै छन्हि: केना कऽ गुजर चलत/ उपजा कऽ कास-पटेर। ओ कोसीकेँ कहै छथि: कऽ देलिऐ मिथिलाकेँ दू-भागमे/ अहाँ पूबमे सहरसा-सुपौल/ पछिममे मधुबनी-दरभंगा/ बिचमे अगबे बालु आ धूल। मुदा फेर निर्मल्लीक पुल बनबाक चर्च: कहू आब कतेक चुप रहब/ ऐबेर हम बना देलौं पुल। पढ़ल-लिखल दलितक सामान्य दलितक प्रति व्यवहारपर जतेक अम्बेडकर दुखी रहथि ततबे चिन्ता उमेश पासवानकेँ सेहो छन्हि: स्वयं दलित छी/ दलितक दरद जनै छी/ किछु व्यक्तिक किरदानीसँ चकित छी/ दलित भऽ कऽ ओ/ व्यक्ति अपनो समाजकेँ बिसरि गेल/ अप्पन भाषा-भेष छोड़ि कऽ/ दोसरक रंग-ढंगमे ढलि गेल। ओ समाजसँ पुछै छथि: हम दलित छी/ मेहनति-मजदुरी कए कऽ बितबै छी अपन जीवन/ तैयो जरैत अछि। कवि जगदीश प्रसाद मण्डल जी सँ प्रभावित छथि आ से ओ एकटा कविताक माध्यमे कहै छथि: हम छी सेवक मैथिल/ जगदीश बाबूक चेला/ नै हमरा लड़ू खियौलनि/ नै देलथि मिश्रीक ढेला। मुदा हास्यसँ ओ दूर नै गेल छथि: झोटा झोटौबलि/ हेतौ नटिनिया/ तोरा संग अही बेर गे। वसन्तक आगमनसँ मात्र फूल-पात नै आन-आन जीवनसँ सम्बन्धित वौस्तुपर ध्यान जाइ छन्हि हुनकर: गाछ-वृक्षमे नव कनोजरिक संग मोजर फूल िनकलैत अछि/ खेतमे गहुम-खेसारी तिसी-मसुरी तोरीक फूलसँ समुच्चाह बाध गमकैत अछि/ मधुमाछी लगौने सेनुरिया आमक गाछपर छत्ता देखि कऽ लुक्खी डरैत अछि/ अरहुलक फूल चूसि कऽ फुलचोभी चिहुकैत अछि/ कौआ आ कोइलीमे भेल अछि कनाइर। पानि नै चलबाक गप नै बुझाइ छन्हि हुनका: देहसँ देह केना छुबाइ छै/ किएक नै चलैए हमर छुअल पानि यौ/ कोन जुलुमक सजा हमरा दऽ रहल छी/ किअए बुझै छी हमरा अपमानी यौ। सुदामा आ कृष्णक दोस्तीकेँ सभ अलग कऽ देलक: दुनू दोसकेँ अलग कऽ देलक लोक/ अप्पन रास्ताक दिवार जकाँ/ हँसैत खेलैत...। आ ई दशा किए भेल? :- सहलौं सभ किछु सलहेशक संतान रहितो/ जहिया तक चुप रहलौं हम। आ कहै छथि: कतेक लिखब दलितक बेथा/ सलहेश गामक संदेश। मुदा की मिथिलाक भाषा संस्कृति ककरो अनकर छी? नै ई तँ हमर छी आ तै पर गर्व करै छथि कवि: हरक पाछाँ बगुला घुमैए/ हरबाहा जोरसँ बरदकेँ बाबू भैया कहि हँकैए। देशक विकास आ नेता पर हुनका आक्रोश छन्हि: ऐठामक नेता छै माला-माल/ रोड-सड़ककेँ देखियौ तँ/ कदबा गजार सन छै थाल। आ जे बड़का-बड़का राष्ट्रीय राजमार्ग (नेशनल हाइवे, एन.एच.) छै से तकर विवरण किछु एना छै: मौतक चौराहा बनल अछि एन.एच भुतहा मोड़। आ लोकक दशा-दिशापर मुर्दा सेहो चिन्तित अछि: गारल मुर्दा छटपटा रहल अछि/ भितरसँ अंगुरी अप्पन उठा रहल अछि। नारीक कर्मनिष्ठ स्वभावपर हिनकर लेखनी खूब चलल छन्हि: ओमहर बिआ जे उखारै छै महिला जन/ कोइ करै छै, सासु-ननदिक निना-बिना/ कोइ गबै छै सोहर-समदाैन। कवि तुकमिलानीमे सेहो ढेर रास गप कहि जाइ छथि, पंजाबमे होइत मजदूरक पलायनक चर्च देखू: जौं अखार महिनामे बुढ़ बड़द/ पजरामे दरद/ पंजाबमे मरद अछि/ तँ समझू हे गेलहे घर छी। ओ आह्वान करै छथि: साहित्यक दलिदर कतेक जुलुम करैए हमरापर/ कियो तँ बाजू/ कियो हमरा दिससँ अवाज उठाउ। आ अधिकार तँ चाहबे करी: अप्पन सोल्हनी बला रसा आब नै सुनब हम/ बर्खा तोड़ि दैए बान्हकेँ आ बना दैए गाम केँ कोसी आ कमला: लधने छल सतहिया/ ढौसाबेंग किड़ी-मकौड़ी करै छल सोर/ भुरुकुबा कनी उगल छल चुह-चुहिया। तँ की कहल जाए ऐ “वर्णित रस” सभकेँ। की कविक वसन्त मात्र फूल-पात देखैए जे मात्र सुगन्ध दैए, आँखिकेँ सुख दैए, मुदा जरल पेटकेँ से नीक लगतै? तेँ कविक वर्णित वसन्तक रस ओ फल विहीन सुन्दर फूल नै भऽ सकैए, आ से नहिये अछि। दलित विमर्श दलित द्वारा, आ ओइ दलित द्वारा जेकर धुआधजा छै सलहेश सन, नै बिसरल अछि अपन संस्कृति, बोली-वाणी, नै बिसरल अछि सोहर-समदौन। आ से छथि उमेश पासवान। आ जे हुनकर वसन्तकेँ देखबाक, एन.एच.क चौराहाकेँ देखबाक दृष्टि फराक अछि तेँ हुनकर कविता सेहो फराक अछि। सुजीतक जिद्दी सुजीतक नव कथा संग्रह सम्वेदनामे गहींरधरि उतरल अछि । आदर्श कथामे कथाकार सुजीत महिला सूत्रधार बनल छथि, शैलीक भिन्नताक संग घर बलासँ पहिने नहाएल छी तऽ बाल्टिन माँजि दिय नहि तऽ घर बलाके उमेर घटैत छैक । सासुक मुँहसँ ई गप सूनि भैरहवा नगरमे पललि मुदा देहातमे बियाहलि महिला कथा सूत्रधार अपन विधवा सासुक विषयमे सोचै छथि जे जँ बाल्टिन मँजलासँ पतिक उमेर बढतै छै तऽ ओ किए विधवा भऽ गेली ! पति अरुण अकस–तिकसमे परल अछि । माए आ पत्नी दुनू ओकरा चाही । मुदा सूत्रधार घर छोड़ि एलीह । अरुण कहैत रहथि जे जँ हुनका बेटा हएतैन्हि तऽ ओ ओकर नाम आदर्श रखताह । जिद्दी कथामे शारदा अपन नृत्य आ अभिनयक बिच्चेमे छोड़ल जएबाक बात मोनमे रखने छथि आ बेटा जयन्त आ बेटी गिन्नीक नृत्य आ अभिनयक प्रति स्नेहमे अपन उद्देश्य देखै छथि । पति विरोध करै छथि । बेटा तऽ नृत्य आ अभिनय छोड़ि दैत अछि मुदा बेटी हुनकर उद्देश्यकेँ पूर्ण करैत देखाइत छैन्हि । मुदा तखने दारु, सिगरेट आ अनैतिक सम्बन्ध.. कथाक पूर्वार्धे नृत्य आ अभिनयक प्रति दृष्टिकोण उत्तरार्ध महिला सशक्तिकरण दिस जाइत–जाइत कतौ आन ठाम चलि जाइत अछि । बेटा नृत्य आ अभिनय छोड़ि दैछैन्हि मुदा शारदाक बेटी नै.. महिलाक आकांक्षा महिला द्वारा पूर्ण होइत–होइत अनचोक्के कथ्य आ उद्देश्य भसिया जाइत अछि । पूmल फुलाइएकऽ रहलमे सेहो महिला सूत्रधारक मानसिक विश्लेषण सोझाँ आएल अछि । कनेक रंग दब रहबाक कारण बियाहमे दिक्कत होइ छैन्हि, मुदा फेर एकटा सुन्नर लड़का भेटै छैन्हि । मुदा ओतौ धोखा.. मुदा ओ अपनाकेँ सम्हारि लै छथि आ किछु दिनमे सभ ठीक भऽ जाइत अछि । ‘केहन सजाय’ कथामे एकटा परिवार अपन गोद लेल बेटीकेँ छोड़ि दैत अछि, अधेर उमेरमे जखन ओकरा अपन बच्चा होइ छै तखन ! मुदा एहि कथामे सेहो कथा कहैत–कहैत कथाकार रितेश आ चमेलीक प्रेमकेँ फरिछा नइँ पबै छथि । चमेलीकेँ जे माता–पिता गोद लेलखिन्ह से यादव रहथि, ई कहबाक आवश्यकता कथाकारकेँ नइँ पड़बाक चाही, कारण एहि कथामे यादवक लोक संस्कृतिक कोनो वर्ण नै भेल छै । फेर कथाकार तखने पेटमे बच्चा भऽ गेल कहि कथाकेँ कपचि दैत छथि । आधुनिक कथा–कथामे कथ्य तऽ होइते अछि, मुदा ओहि संग जओं तहपर तह समस्या भेटैत अछि तऽ तकर समाधान लेल सेहो कथाकारकेँ शव्दावली, लोकव्यवहार आ शिल्पक संग लेबऽ पडैÞत छैन्हि। सम्वेदनाक तहमे कथाकार जाइ तऽ छथि, मुदा बेसी ठाम कथ्य कहि देबाधरि सिमित रहि गेलासँ कथा काँच रहि गेल सन बूझि पडैÞत अछि । आशा अछि आगाँक संग्रहमे कथाकारक सामथ्र्य आओर नीक जकाँ देखाइ पड़त । विनीत ठाकुरक बाँकी अछि हमर दूधक कर्ज बाँकी अछि हमर दूधक कर्ज- एहि नामसँ १० टा गीतक संग्रह लए श्री बिनीत ठाकुर- शिक्षक, प्रगति आदर्श ई. स्कूल, लगनखेल, ललितपुर प्रस्तुत भेल छथि। ई एहि सालक दोसर पोथी छी जे देवनागरीक संग मिथिलाक्षरमे सेहो आयल अछि, आऽ एकरा हम अंशुमन पाण्डेयकेँ पठा देलियन्हि, यूनीकोडक मैपिंगक लेल, कारण विनीतजी हमरा एहि पोथीकेँ ई-मेलसँ पठेबाक अनुमति देने छथि, ताहि लेल हुनका धन्यवाद। “भरल नोरमे” शीर्षक पद्यमे की सुतलासँ भेटलै अछि ककरो अधिकार आऽ “गाम नगरमे”- लोकतंत्रमे अपन अधिकार लऽ कऽ रहत मधेसी, ई घोषणा छन्हि कविक तँ “कोरो आऽ पाढ़ि’मे गरीब छोड़िकऽ के बुझतै गरीबीके मारि- ई कहि कवि अपन आर्थिक चिन्तन सेहो सोझाँ रखैत छथि। चहुँदिश अमङ्गलमे जङ्गलक विनाशपर –मुश्किलेसँ सुनी चिड़ियाके चिहुं-चिहुं- कहि कवि अपन पर्यावरण चिन्तन सोझाँ रखैत छथि। “जे करथि घोटाला” मे भ्रष्टाचारपर आऽ “जाइतक टुकड़ी”मे जाति प्रथापर कवि निर्ममतासँ चोट करैत छथि तँ “बेटीक भाग्यविधान”मे कविक भावना उफानपर अछि। “कम्प्युटरक दुनिया” आऽ “अङ्गरेजिया”मे कवि सामयिकताकेँ नहि बिसरल छथि तँ अन्तिम पद्य “ताल मिसरी” मे वरक सासुर प्रेम कनेक व्यंग्यात्मक सुरमे कवि कहि अपन एहि क्षेत्रमे सेहो दक्ष होएबाक प्रमाण दैत छथि। ओना तँ कविक ई प्रथम प्रकाशित कृति छन्हि, मुदा कवि जाहि लए सँ कविता कएने छथि ओऽ अभूतपूर्व रूपेँ प्रशंसनीय अछि। संतोष कुमार मिश्र- “एना किए..?” संतोषजीक “एना किए..?” पद्य संग्रह मैथिली पद्यक भविष्यक प्रति आश्वस्ति दैत अछि। एहिमे युवा कविक २४ गोट पद्यक संग्रह अछि। संतोषजीक कविता एना किए मे स्त्रीक समस्या तँ काल्पनीक सत्यमे जीवनक दर्शनक द्वन्द सोझाँ अनैत छथि। बिचित्र कविता सेहो द्वन्दे अछि आ अएना कविकेँ अपन बचहनक स्मृतिमे लऽ जाइत छन्हि। दुविधा कवितामे कवि एहि दुविधामे छथि जे अनुभवकेँ डुमा कए आ भावनाकेँ हेरा कए जे ओ प्रेममे पड़लाह से सामाजिक अपराध अछि ! भद्रक बलि मे सगरमाथा आ मकालुकेँ नहि छोड़बाक आ कोशी आ कर्णलीकेँ खा जएबाक बिम्ब कविताकेँ सार्थक करैत अछि। पहिने नुका कऽ मारैत छल आ आब देखा कऽ मारैत अछि, ओ राक्षस जकर हाथमे कानून छैक। हमर मायकेँ बुद्धिए नहि छैक मे आजुक समाजक सत्य उद्धाटित होइत अछि जतए नीक लोक ओ अछि जे पाइवला अछि; नीक पद प्राप्ति करबाक लेल घूस देमए पड़ैत छैक आ नमहर नेता बनबाक लेल जनताकेँ धोखा देल जाइत अछि। नामी बनिञाकेँ.. कवितामे कवि नीक गबैयाक स्वर सुनला उत्तर महाँ बेकार पबैत छथि। अन्नेसँ आनन्द कविता समाजक अंधविश्वासपर कटाक्ष अछि। टहटही इजोरियासँ कविक प्रश्न आ सौन्दर्यक परिभाषा इजोरिया कवितामे भेटैत अछि तँ मायकेँ प्रश्नमे सागरक पानिसँ बेशी नोर बहाबैत माएक दर्दकेँ कवि स्वर दैत छथि। मातृभूमि आ मिथिलाक जे छी तँ कविता मिथिला आ मैथिलीकेँ समर्पित अछि तँ हमर कनिञामे हास्यक संग दहेज आ अमेल विवाहक चर्चा होइत अछि। हमर आशमे बच्चाक आ नवीन शिक्षा पद्धति, डोनेशन आधारित एडमिशनक तँ हम आ हमरमे सेहो कवि सर-समाजक नीक-अधलाह वर्णन उठा कऽ कविता बना दैत छथि। मूल्य अभिबृद्धि कर अर्थव्यवस्थाक वर्णन करैत अछि। हमर मीत जीवन-मृत्युक तँ सभामे आब केओ नहि अछि निक लोक एतऽ कहि कवि अपन व्यथा सोझाँ रखैत छथि। बाटमे डेग-डेग पर गहुमन-धामन कवि देखैत छथि, मुदा जीबनमे कविक आशावादिता घुरि अबैत छन्हि। एहि संग्रहक पद्य भावना आ स्मृतिसँ जुड़ल अछि आ एकटा आन्तरिक भूचाल अनैत अछि। अपन एहि पद्य संग्रहमे कवि प्रतिभाक जे प्रदर्शन देने छथि से हमरा सभ आसमे छी जे हुनकर आर संग्रह सेहो अओतन्हि जे हमरा सभकेँ झमारि देत। संतोष कुमार मिश्र, मिथिला (नेपाल)केर पोसपुत कथा संग्रह- मिथिलाक्षरमे प्रकाशित मैथिली पोथी सन्तोष कुमार मिश्र केर कथा संग्रह पोसपुत प्राप्त भेल अछि। नेपालक एहि कथाकारक सात गोट कथा पोसपुत, एकटा ब्यथा पत्रमे, जखन कनिञा भेलखिन बिमार, सिपाहि, डाक्टर, भाग्य अप्पन-अप्पन आ’ दाग एहिमे सम्मिलित अछि। कथावस्तु प्रस्तुत करबासँ पहिने एकर अन्य पक्ष पर चर्च करब आवश्यक। पहिल गप जे एहि पुस्तकक समीक्षासँ एकर प्रारम्भ भेल अछि। श्री कालीकान्त ‘तृषित’, देपुरा रुपैठा, जनकपुर एकर सांगोपांग समीक्षा कएलन्हि अछि, आ’ ई कथाकारक उच्च मानसिकता अछि जे ओ’ एहि समीक्षाकेँ उचित रूपमे लेलन्हि, कारण जौँ से नहि रहैत तँ एकर एहि रूपमे स्थान पोथीमे नहि भेटैत। दोसर गप जे ई पोथी एक दिशिसँ देखला उत्तर देवनागरीमे आ’ दोसर दिशिसँ देखला उत्तर मिथिलाक्षरमे लिखल बुझि पड़ैत अछि आ’ से अछियो। 21म शताब्दीक ई प्रायः एहि तरहक प्रथम प्रयास अछि, जे मैथिलीमे देखबामे आएल अछि। आब पहिने तृषित जीक समालोचना देखैत छी। ओ’ लिखैत छथि, जे कथाकारक कथामे पलायनवादी सोचक प्रधानता रहैत अछि, संगहि ईहो गप उठबैत छथि जे साहित्य सृष्टाकेँ तटस्थ प्रस्तोता होयबाक चाही आकि पथ प्रदर्शक, पलायनवादे होयबाक चाही आकि संघर्षक प्रेरणाश्रोत? ‘पोसपुत’क विषयमे तृषित जी कहैत छथि, जे एहिमे तीनपुस्तक वर्णन अछि, आ’ राजा महेन्द्र आ’ राजा त्रिभुवनक समयमे भेल घटनाक वर्णन जोड़बाक अभिप्राय स्पष्ट नहि अछि। ’एकटा व्यथा पत्रमे’ केर विषयमे ऋषित कहैत छथि जे कालक गति , लोकक विवशता आ’ अनुभूतिक वर्णन अछि एहिमे। तेसर कथा ‘ जखन कनिञा भेलखिन बिमार’ केँ तृषित जी बिमार कथा घोषित करैत छथि। ‘सिपाही’ कथामे ओहि पदक विवरण अछि जे विवाह दानमे प्राथमिकता पबैत छल आ’ आब त्याज्य भ’ गेल अछि। ‘डॉक्टर’ कथाकेँ तृषितजी पलायनवादी सोचक पराकाष्ठा कहैत छथि। तृषितजीक विचारेँ डॉक्टरकेँ मरैत दम तक रोगीकेँ बचेबाक प्रयास करबाक चाही। ’भाग्य अपन अपन’ भाग्य चक्र पर आधारित अछि। ‘दाग’मे क्षणिक आवेशमे उठाओल गेल डेग, अपरिपक्व उम्रमे भेल प्रेमविवाह फेर तकरा बाद दोसराक संग भागि जायब ई सभ पथभ्रष्टताक प्रतीक अछि। पोसपुत आत्मकथात्मक शैलीमे लिखल गेल अछि, मुदा एकर समापन अकस्मात् होइत अछि, पोसपुतक किरदानीसँ आ’ मायक नैहरि जएबासँ। दोसर कथा पत्र शैलीमे अछि, जतय पोस्पुत कथा जेकाँ पात्र संतोष छथि। एहि कथाक समापन सेहो बड्ड हड़बड़ीमे भेल अछि, आ’ घटनाक तारतम्य लेखकसँ पाठक धरि नहि पहुँचि सकल। ओहिना जखन कनिञा भेलखिन बिमारमे लेखक अपन कथ्य स्पष्ट नहि कए सकलाह। सिपाहि कथामे सेहो पात्रक नाम संतोष छन्हि, मुदा कथ्य आत्मकथात्मक नहि अछि। डॉक्टरकेँ देशमे सेवा करबाक पुरस्कार भेटलैक प्रमाण-पत्रक रद्द होयब आ’ से ओकरा हेतु प्राणघातक सिद्ध भेल।भाग्य अपन-अपन पुरान खिस्सा कहबाक शैलीमे अछि, जे राजा देशमे सर्वेक्षण करएबाक हेतु राजकुमारकेँ पठबैत छथि आ’ ई कथ नीक बनि पड़ल अछि। दाग कथा कथात्मक अछि आ’ हड़बड़ीमे लिखल भाषित होइत अछि। एहि कथा संग्रहकेँ तृषित जी समीक्षाक संग भाषायी रूपसँ संपादित नहि कएलन्हि, कारण एहिमे मानकताक अभाव अछि। प्रूफ रीडिंग सेहो नीक जेँका नहि भेल अछि। मानकताक हेतु विदेह आ’ मिथिला मंथनसँ प्रयास शुरू भेल अछि, आ’ विदेहक रचना लेखन स्तंभमे एकरा स्थान देल गेल अछि।केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर द्वारा सेहो मैथिली स्टाइल मैनुअलक निर्माण भ’ रहल अछि, आवश्यकता अछि, जे नेपालक विद्वान लोकनि सेहो अपन मत मैथिली अकादमीक मानक निर्धारण शैलीक आधार पर बनाओल जा’ रहल शैली पर देथि, जाहिसँ ई सर्वग्राह्य होए। लोरिक गाथामे समाज ओ संस्कृति लोरिक गाथामे नहि तँ कोनो इतिहास प्रसिद्ध राजाक नाम आ नहिये लोरिकक जन्म आकि विवाहक तिथिक चरचा अछि। भाशाक स्वरूप मौखिक रहबाक कारणसँ गतिशील अछि। काल निर्धारण सेहो अनुमानपर आधारित अछि। लोरिकक जन्म-स्थान गौरा गाम अछि आ कार्य-कर्म क्षेत्र पंजाबसँ नेपाल आ बंगाल धरि अछि। सासुर अगोरी गाम अछि जे सोन धारक कातमे बताओल गेल अछि। लोरिकक विवाह- पहिल विवाह अगोरी गामक मंजरीसँ दोसर बियाह चनमासँ जकरासँ चनरैता नाम्ना पुत्र। तेसर बियाह हरदीगढ़क जादूगरनी जमुनी बनियाइनसँ जाहिसँ बोसारख नाम्ना पुत्र। वीर लोरिकक पैघ भाए सँवरू सेहो वीर। ओ कोल राजा देवसिया द्वारा मारल गेलाह। बादमे लोरिक सेहो युद्ध करैत घायल भऽ जाइत छथि आ बोहा बथानपर लोरिकक बेटा भोरिक देवसियाकेँ पराजित करैत अछि। लोरिक बूढ़ भेलापर अग्नि समाधि लैत छथि। लोरिकक कथा- साबौरक जन्म आ लोरिक वतार, सँवरूक विवाह, माँजैरक जन्म, लोरिक-माँजैर विवाह आ राजा मौलागत आ निरमलियासँ युद्ध, सँवरू आ सतियाक विवाह, झिमली-लोरिक युद्ध, चनैनिया-शिवहर विवाह आ लोरिक-बेंठा चमारक युद्ध। एहि गाथामे लोरिक-चनमा प्रेम आ हरदीगढ़ प्रस्थान आ राजा रणपाल आ महिपतसँ लोरिकक युद्ध। लोरिक आ चनमाक हरदीगढ़मे निवास, लोरिक गजभिमला युद्ध, नेऊरपुरक चढ़ाइ आ लोरिक-हरेबा-बरेबा युद्ध, संवरू आ कोल युद्धमे सँवरूक मृत्यु, लोरिकक बोहा बथान आगमन, पीपरीगढ़क चढ़ाई आ लोरिक आ देवसिया युद्ध, लोरिकक देहत्याग आ भोरिकक नेतृत्व। पिपरीक पहिल लड़ाइ सँवरूक संग, पिपरीक दोसर लड़ाइ लोरिकक संग भेल। फेर लोरिकक काशीवास आ मृत्यु होइत छन्हि। लोरिकक असली हरदीगढ़ आ प्रसिद्ध कर्मक्षेत्र सहरसा जिलाक हरदीस्थान अछि कारण सुपौलक पूब स्थित हरदीक संग दुर्गास्थान शब्द सम्मिलित अछि। एहि हरदीक संग महीचन्द्र साहू, राजा महबैर, नेऊरपुर (नौहट्टा), गंजेरीपुर (गौरीपुर), खेरदहा (खैरा धार), रहुआ-चन्द्रायन-मैना-गाम, बैराघाट, तिलाबे धार, बैरा गाछी आ महबैरिया गामक चरचा अछि। लोरिक गाथा स्थल बैराघाटसँ प्राप्त पजेबा आ हरदी हाइस्कूलसँ सटल पश्चिम खुदाइमे प्राप्त पजेबामे पाओल समानता एकर व्याख्या करैत अछि। सुपौल रेलवे स्टेशनपर रेलवे विभागक एकटा बोर्ड लागल अछि- एतएसँ पाँच किलोमीटर पूर्व हरदी दुर्गास्थानमे भगवती दुर्गा आ वीरपुरुष लोरिकक ऐतिहासिक स्थल दर्शनीय अछि। नौहट्टा लग महर्षि आ ओतए पालीभाषाक शिलालेख- पालवंशीय- हरिद्रागढ़ चौदह कोसमे विस्तृत। तेरहम शताब्दीक ’वर्णरत्नाकर’मे लोरिकक चरचा अछि। लोरिक मनुआर गाथाक धार्मिक सामाजिक आ राजनीतिक पक्ष। लोरिक अज्ञात नाम गोत्रसँ उत्पन्न। यादव जाति अपन पूज्य लोरिकक सम्मान छाँक पूजासँ करैत छथि आ लोकदेव, लोकनायक रूपेँ सम्मान दैत छथि। लोरिकायनक मैथिली स्व्वरूप पुरातत्ववेता अलेक्जेन्डर कनिंघमक संकलनमे अछि। क्वार्टरली जर्नल ऑफ द मीथिक सोसाइटी (भाग-५ , पृ.१२२ सँ १३५) मे भागलपुरक लोरिकायनक चरचा। आर्क्योलोजिकल दर्वे रिपोर्ट खण्ड 16 (1883 ई.) पृ.27-28 मे कनिँघमक यात्रा वृत्तानमे लोरिक आ सेउहर वा सरिकका नाम्ना दू टा पड़ोसी राजाकेँ गौरा गामक निवासी कहल गेल अछि। भागलपुर गजेटियर (पृ.४८-५०) मे जॉन हन्टर लोरिक विषयक रिपोर्ट देने छथि। लोरिक गाथा लोरिकायन, लोरिकी आ लोरिक मनिआर नामसँ प्रसिद्ध अछि। मिथिलामे एकर प्रशस्ति लोरिक मनिआर नामसँ अछि। लोरिकक नैतक (बेटाक बेटा) नाम इन्दल रहए। मैथिलीक लोरिक मनिआरमे लोरिकक विवाह प्रसंग आ लोरिकक कनियाँ तकबासँ लऽ राजा सहदेवसँ युद्ध केर विस्तृत चरचा अछि। महुअरि खण्डमे गजभीमलक अखाड़ा जएबाक लेल घोड़ा चुनब आ गजभीमलकेँ पटकि-पटकि कऽ मारबाक वर्णन। लोरिक द्वारा हरबा-बरबाक वध। गाथाक प्रारम्भमे सुमिरन आ बन्हन। सुमिरन- इनती करै छी दुरुगा मिनती तोहार। बन्हन- आ-दुरुगा गइ पुरुब खण्ड हे गइ १.विवाह खण्ड,२.महुअरि खण्ड,३.युद्ध खण्ड मणिपद्मजी- १.जन्म खण्ड२.सती माँजरि खण्ड,३.चनैन खण्ड,४.रणखण्ड,५.सावर खण्ड,६.बाजिल खण्ड,७.सझौती खण्ड आ ८.नेपालसँ प्राप्त भैरवी खण्ड। -गौरा गामक बुढ़कूवा राउत- तारक गाछक झठहा बनबैत रहथि। ५-७ सय पहलमानकेँ पीठपर लादि चौदह कोस टहलि आबथि। मुदा घर-घरारी किछुओ नहि छलन्हि। दू टा पुत्र लोरिक मनिआर आ साओद सरदार छलन्हि। -अगौरीक मुखिया सेवाचन राउत – अस्सी गजक धोती आ बावन गजक मुरेठा- तेतलिया घोड़ा छलन्हि। पुत्री छलखिन्ह माँजरि जे सात सय संगी संगे सुपती-मौनी खेलाइत रहथि।ओकर बियाह लेल सेवाचन बुढ़कूबाक ओतय लोरिकसँ अखड़हापर- छप्पन मोन माटिसँ तरहत्थी मलनिहार सेवाचनकेँ लोरिक टालि-गुल्ली जेकाँ ऊपर फेकि देलक आ गेन जेकाँ लोकि कए काँख तर दबा लेलक। बियाह दिन राजा उगरा पमार बूढ़कूबाकेँ पकड़बाक प्रयास मुदा बूढ़कूबा भकुला पहलमानक गरदनि काटि लेलक। विवाह सम्पन्न भेल। राजा उगरा पमार सनिका-मनिकाकेँ बजेलक- लोरिक सनिका-मनिकाक मूड़ी काटि लेलक। गौरा घुमैत काल हरदीक राजा सहदेवक आक्रमण, लोरिक सहदेवकेँ हरा कए ओकर पुत्री चनाइकेँ महीचनक आँगन लऽ जाए विवाह कएल। तखन राजा महुअरि महीचनकेँ कारामे दऽ देलक मुदा फेर लोरिकसँ डरा कए छोड़ि देलक। मुदा सिलहट अखड़हाक सरदार गजभीमलकेँ पठाओल। मुदा लोरिक ओकर मूड़ी काटि लेलक आ फेर राजासँ मित्रता भेल। दुनू मिलि राजा हरबा-बरबासँ युद्ध कएलक। हरबा-बरबा भागल मुदा धुथरा पहलमानकेँ पहाओल- लोरिक ओकर दहिना आँखि निकालिओकर जीह काइ लेलक। हरबा-बरबाक पुनः आक्रमण आ पलायन मुदा फेर भागिन कुमर अनार- लोरिक मूड़ी काटि हरबा-बरबाक रानी पद्मा लग ओकर मूड़ी फेकलक। फेर हरबा-बरबाक आक्रमण-डिहुलीक रणक्षेत्रमे हावीगढ़क राजा हरबा-बरबाक मूड़ी काटि राजप्रसादक अन्तःपुरमे फेकलक। लोरिक छत्तीस टा युद्ध कएलन्हि। लोरिक कृषिक विकासमे सजग छलाह। कारण दोसराक भूमिक अधिग्रहण कए बहुसंख्यक चिड़ँइ, जानवर आ कीट-पतंग उजड़ि गेल आ इन्द्र लग गेल। वर्णरत्नाकर- द्वितीय कल्लोलमे लोरिक नाचो- पहिने नाच छल आइ-काल्हि गाथा। “मिथिलायदयश्च मध्यंते रिपवो इति मिथिला नगरी”। -समाजक सीढ़ीक आइ-काल्हिक नीचाँक वर्ग आ नारी समाजक शक्तिक विस्तार, आध्यात्मिक आ लौकिक अर्थ दुनू तरहेँ। - सामाजिक सीढ़ीक विभिन्न स्तरक जातिक अन्तर्विरोध, आइ-काल्हिक तथाकथित निम्न जातिक दुराचारी पात्रक विनाश लोरिक द्वारा। लोरिकक भगवतीपर भक्ति छल ओकर विजयक कारण। मुदा लोरिकक शत्रुमे सामाजिक सीढ़ीपर ऊँच स्थान प्राप्त मोचनि आ गजभीमल छल तँ मित्रमे सेहो राजल सन सामाजिक सीढ़ीमे नीचाँ जातिक। हरबा राजाक चपेटसँ दुहबी-सुहबी ब्राह्मणी आ गांगे क्षत्रीक मुक्ति। उघरा पँवार, हरबा-बरबा, सोनिका, मनिका, बंठा, कोल्हमकड़ा, करना सभ जातीय सीढ़ीमे नीचाँक पात्र राजा छथि। मातृदेवीक उपासना, इन्द्रक पत्नीक दुर्गाक भेष बदलि आएब आ लोरिक द्वारा हुनका पत्नी बूझि छूबाक उपरान्त पीड़ा। लोरिक माँजरिक मिलन काशी-प्रयाण। -गाथा मेला, हाट बजार, विशिष्ट लोकक घर, सार्वजनिक स्थलपर से यादव जातिक अतिरिक्त आनो श्रोता। सर्जक आ श्रोताक प्रत्यक्ष संबंध, श्रवणीय, कथाक अनायास अलंकरण, मुदा सभटा साहित्यिक लक्षण जेना सर्ग, छन्दबद्ध, नाट्य-संधि आ संध्यांगक योजना आ वस्तु निर्देशक अभाव। वस्तु संगठन सुगथित नहि। गारिक प्रयोग आ मद्यपानक यत्र-तत्र वर्णन, ग्रामीण व्यवस्थामे चोरक स्थान आ ओकर वर्णन, स्थानीय देवी-देवताक चरचा, जातीय अस्मिताक प्रतीक। कथा-गायक आशु कवि होइत छथि-एकटा अस्थिपञ्जर अवश्य रहैत अछि मुदा ताहिपर अपन हिसाबसँ ओ गबैत छथि। शब्दशः ओ कण्ठस्थ नहि करैत छथि। प्रारम्भमे ईश्वर, वन्दना आ बीच-बीचमे ईश्वरसँ क्षमायाचना, ई सभ गायन क्षमता स्थिर करबाक उद्देश्यसँ कएल जाइत अछि। घण्टासँ ऊपर गायन बीचमे हुक्का-चिलम, मद्यपान, परिवेशक वर्णन गायनमे। निरक्षर मुदा कोनो साक्षरसँ बेशी ज्ञान भण्डार। लोरिक मनुआरमे श्रोताक संख्या, तन्मयता आ एकिआग्रचित्तताक प्रभाव कथा-गायकक कथा वाचनपर पड़ैत अछि कारण ई श्रोताक सोझाँ कएल जाइत अछि। एहि अर्थेँ सल्हेस किअथावाचकसँ हिनकापर बेशी बाह्य प्रभाव पड़ैत छन्हि। सल्हेस गाथा श्रोताक समक्ष नहि वरन आराध्य देवक समक्ष वाचन कएल जाइत अछि। गाथाक मूल कथा ओना तँ मोटा-मोटी समान रहैत अछि मुदा प्रस्तुतिकरण, विशिष्ट समाज, क्रियाकलाप आ सामाजिक मर्यादाक कारण विशिष्ट। युद्ध,द्यूत,प्रेम आ विवाह-सांस्कृतिक तत्त्व सभ महाकाव्यमे, द्यूत –मानसिक युद्ध-द्यूतमे मनुक्खकेँ बाजी लगाएब, महाभारतमे आ लोरिकायनमे। दुर्गा देवी द्वारा युद्धमे नायकक सहायता, चनैनक शिवधरकेँ छोड़ि लोरिक संग उढ़रि जाएब, दुसाध जातिक महपतियासँ लोरिकक जुआ खेलाएब आ लोरिक द्वारा चनैनकेँ जुआमे हारब-चनैन द्वारा प्रतिवाद-गहना गुरिया दाँवपर, चनैनक अश्लील हाव-भावसँ महपतियाक ध्यान बँटब आ लोरिकक जीतब। लोरिक द्वारा ओकर मूड़ी काअब। पति द्वारा अनुचित कएल जएबाक उपरान्तो पत्नी द्वारा बुझाएब। लोरिकक अवतारवाद आ रहस्य क्रोध-प्रेम दुनूमे गारि उन्मुक्त सांस्कृतिक काव्य चरित्र। प्रकृतिकेँ नुकाओल नहि गेल। नायक सेहो गारिक प्रयोग करैत अछि। शिव-शक्तिक पूजा, महाकाव्यक पात्रक नाम आ आन तत्वक ग्रहण जे लोरिक मनुआर गायकक उदार आ सहिष्णु चरित्रकेँ देखबैत अछि। प्रस्तुति क्षमता आ ज्ञान क्षेत्र हिनका अनक्षर कहबासँ हमरा रोकैत अछि। लोरिक मनुआरमे अलौकिक आ रहस्यमय घटना बेशी, वन्य जीवक (बोनमे)संख्या नहि केर बराबर, लोरिकक पात्र अवतारी मुदा विधिवत पूजा नहि। धार्मिक विश्वास, नायकक चरित्र आ सामाजिक आचार। जीवन-संस्कृति दृढ़तापूर्वक, महाकाव्यक अधिकांश ल़क्षण जेना रस, छंद,गुण,अलंकार,सर्गक ध्यान,व्यवहृत धार्मिक मूल्य,संस्कृतिक सम्पूर्णता, सृजन-क्षमता(गायकक)। लोकगाथा-नाचक फील्डवर्क-कथ्यमे बदलनाइ (जेना गारि), अपन संस्कृतिक नैतिक मानदण्डक आधारपर परिवर्तन अक्षम्य, अपनाकेँ ओहि समाजमे रखितहु उद्देश्यपर ध्यान, वाक्य शब्द रचनामे कोनो परिवर्तन नहि होएबाक चाही। बाजिल कौआ अधजरुआ गोइठासँ कौल्हमकड़ाक गढ़केँ जरबैत अछि। तिरिया, गामक रक्षा आ अनाचारीक विनाश-पशुपाल आ कृशिक समर्थन। -उधरा-पँवारक हाथी-कज्जल गिरि -लोरिकक कटरा घोड़ा -सेनापति बरबाक घोड़ा बरछेबा -बाजिल कौआ मुदा लोरिक मनुआर महराइ मे ई सभ वन्य नहि वरल पोसुआ अछि। लोरिकक मित्र बंठा चमार, वारू पहरेदार (पासवान), राजल धोबी, लोरिकक छोट भाइ साँवर। सलहेसक कथा ताराइ क्षेत्रक। वन्य जीव आ वनक बेशी वर्णन, वन्यजीव द्वारा सलहेसक सहायता, आखेट आ बलि। सल्हेअक पूजा स्थलपर माटिक घोड़ा राखल जाइत अछि मुदा लोरिकायनमे नहि। पंजी-प्रबन्ध पंजी प्रबन्धपूर्व मध्य कालमे ब्राह्मण कायस्थ आ क्षत्रिय वर्गक जाति शुद्धताक हेतु निर्मित कएल गेल। एहि अंकमे ब्राह्मणक पंजी-प्रबन्धक चर्च कएल जा रहल अछि। कोनो ब्राह्मणक जाति शुद्धताक हेतु उतेढ़ जानब आवश्यक छल।उतेढ़ छल सात पुरुषक परिचय जाहि हेतु एहि बत्तीस कुलक परिचय आवश्यक छल-पिता एवं माताक पितामह एवं पितामही आऽ मातामह एवं मातामही केर पितामह एवं पितामही आ माता एवं मातामही केर पिता। आ एहि बत्तीस पूर्वजसँ विवाहयोग्य व्यक्ति सातम पड़बाक चाही। एहि क्रममे श्रोत्रिय,योग्य आ पंजीबद्ध श्रेणी भय गेल। जे पंजीबद्ध नहि छलाह से जएबार भेलाह। उतेढ़मे श्रोत्रिय मातृपक्षमे पाँच पीढ़ी आ पितृपक्षमे सात पीढ़ी त्यागि विवाह करैत छलाह। योग्य मात्र श्रोत्रियसँ एहि अर्थमे भिन्न छलाह जे ओ लोकनि पितृ-पक्षमे सातम पीढ़ीक त्याग करैत छलाह मुदा योग्य नहि करैत छलाह। ई लोकनि पितृ पक्षमे छः पीढ़ी आ मातृ पक्षमे पाँच पीढ़ीक त्याह कय विवाह करैत छलाह। पंजीबद्ध लोकनि जिनका वंशज सेहो कहल जाइत अछि,मातृ पक्षमे चारि आ पितृ-पक्षमे छः पीढ़ी त्यागि कय विवाह करैत छलाह। 19 प्रकारक गोत्र 34 प्रकारक मूल आऽ 243 प्रकारक मूलग्राममे ई सभ विभक्त छल। पुनः कर्मकाण्डक आधार पर सामवेदी आऽ शुक्ल यजुर्वेदी ब्राह्मणक दू गोट उर्ध्वाधर विभाजन क्रमशः छन्दोग्य आऽ वाजसनेय ब्राह्मणक रूपमे बनले रहल। 19 गोट गोत्र आ’ 243 मूल ग्राममे मुख्य मूल 34 टा निर्धारित कएल गेल। एहि 243 ग्रामसँ सेहो ई सभ विभिन्न क्षेत्र आ’ ग्राममे पसरलाह। 19 गोट गोत्र निम्न प्रकारे अछि: 1. शाण्डिल्य 2. वत्स 3. सावर्ण 4. काश्यप 5. पराशर 6. भारद्वाज 7. कात्यायन 8. गर्ग 9. कौशिक 10. अलाम्बुकाक्ष 11. कृष्णात्रेय 12. गौतम 13. मौदगल्य 14. वशिष्ठ 15. कौण्डिन्य 16. उपमन्यु 17. कपिल 18. विष्णुवृद्धि 19. तण्डी मुख्य 34 मूल सेहो तीन श्रेणीमे विभक्त अछि। श्रेष्ठ-प्रथम श्रेणीमे 1. खड़ौरे, 2. खौआड़े, 3. बुधबाड़े, 4. मड़रे, 5. हरिहरे, 6. घसौते, 7. खिसौते, 8. कमहे, 9. नरौने, 10. वमनियामै, 11. हरिअम्मे, 12. सरिसवै, 13. सोदरपुरिये. द्वितीय श्रेणीमे 1. गंगोलिवार, 2. पगौलिवार, 3. कजौलिवार, 4. अड़ेवार, 5. वहड़िखाल, 6. सकड़िखार, 7. पलिवार, 8. विसेवार, 9. फनेवार, 10. उचितवार, 11. पडुलवार, 12. कटैवार, 13. तिलैवार. मध्यम मूल- 1. दिद्यवे, 2. बैलेचै, 3. एकहरे, 4. पंचोभे, 5. वलियासे, 6. जमजुआले, 7. टकवाले, 8. घड़ुए. प्रवर मैथिल ब्राह्मणक मध्य 2 वर्गक प्रवर परिवार होइत अछि- त्रिप्रवर आ’ पाँच प्रवर। जाहि गोत्रक तीन गोट पूर्वज ऋगवेदक सूक्तिक रचना कएल से त्रिप्रवर आ’ जाहि गोत्रक पाँच गोट पूर्वज लोकनि ऋगवेदक सूक्तक रचना कएल से पाँच प्रवर कहबैत छथि। एहि प्रकारेँ गोत्रानुसारे प्रवर निम्न प्रकार भेल:- त्रिप्रवर- 1.शाण्डिल्य, 2.काश्यप,3. पराशर, 4. भारद्वाज, 5. कात्यायन, 6. कौशिक, 7. अलाम्बुकाक्ष, 8. कृष्णात्रेय, 9. गौतम, 10. मौदगल्य, 11. वशिष्ठ, 12. कौण्डिन्य, 13. उपमन्यु, 14. कपिल, 15.विष्णुवृद्धि,16. तण्डी। पंचप्रवर- 1. वत्स, 2. सावर्ण, 3. गर्ग। प्रवरक विस्तृत विवरण निम्न प्रकारेँ अछि- 1. शाण्डिल्य- शाण्डिल्य, असित आ’ देवल. 2. वत्स---] ओर्व, च्यवन,भार्गव,जामदगन्य आ’ आप्लावन। 3. सावर्ण--] ओर्व, च्यवन,भार्गव,जामदगन्य आ’ आप्लावन। 4. काश्यप-काश्यप, अवत्सार आ’ नैघ्रूव. 5. पराशर-शक्ति, वशिष्ठ आ’ पराशर. 6. भारद्वाज-भारद्वाज, आंगिरस आ’ बार्ह्स्पत्य. 7. कात्यायन-कात्यायन, विष्णु आ’ आंगिरस. 8. गर्ग-गार्ग्य, घृत, वैशम्पायन, कौशिक आ’ माण्डव्याथर्वन। 9. कौशिक- कौशिक, अत्रि आ’ जमदग्नि. 10. अलाम्बुकाक्ष-गर्ग, गौतम आ’ वशिष्ठ. 11. कृष्णात्रेय-कृष्णात्रेय, आप्ल्वान आ’ सारस्वत. 12. गौतम-अंगिरा, वशिष्ठ आ’ बार्हस्पत. 13. मौदगल्य-मौदगल्य, आंगिरस आ’ बार्हस्पत्य. 14. वशिष्ठ-वशिष्ठ,अत्रि आ’ सांकृति. 15. कौण्डिन्य-आस्तिक,कौशिक आ कौण्डिन्य. 16. उपमन्यु-उपमन्यु, आंगिरस आ’ बार्हस्पत्य। 17. कपिल-शातातप, कौण्डिल्यआ’ कपिल. 18. विष्णुवृद्धि-विष्णुवृद्धि, कौरपुच्छ आ’ त्रसदस्य 19. तण्डी-तण्डी, सांख्य आ’ अंगीरस. एहिमे सावर्ण आ’ वत्सक पूर्वज एके छथि ताहि हेतु दू गोत्र र्हितो हिनका बीच विवाह नहि होइत छन्हि। छानदोग्य आ’ वाजसनेयक वैदिक युगीन उर्ध्वाधर विभाजन एकर संग रहबे कएल, आ’ यज्ञोपवीत मंत्र दुनूक भिन्न-भिन्न अछि। फेर यज्ञोपवीतमे तीन प्रवर आकि पाँच प्रवर देल जाय ताहि हेतु उपरका सूचीक प्रयोग कएल जाइछ। मिथिला कला पृथ्वी पूजा गौरी पूजा अरिपन पिठारसँ त्रिभुज बनाऊ। त्रिभुज पृथवीक प्रतीक अछि।त्रिभुजक ऊपर दूटा आर त्रिभुज बनाऊ।ओकर चारूकात बिन्दू जे हिमकणक समान होय,बनाऊ।मध्यमे अनेक त्रिकोणसँ आऽतीन टा रक्त बिन्दु युक्त गौरी यंत्र बनाऊ। कोनो बर्खक माघ मासक मकरसंक्रांतिसँ अगिलामाघ मासक मकरसंक्रांति धरि विवाहक बाद स्त्रीगण गौरीपूजन करैत छथि। सीताजीक गौरी पूजनक चर्च बाल्मीकि रामायणमे छैक। मौहक केर अरिपन महुअक मिथिलामे विवाहक बादक विधि छैक जे वर- वधूमे स्नेहक सृजन करबाक हेतु अछि। वर वधूकेँ दू आसन पर बैसा खीर ’ दही-चूड़ाक परसल जाइत अछि। दुनू गोटे एकरा सानि आ’ कौर बना कय एक दोसर पर फेकैत छथि। पहिने फेंकय बला विजयी होइत अछि। तीन दिन कोहबर घरमे आ’ चतुर्थी दिन कुलदेवताक घरमे ई विधि संपादित होइत अछि। नीचाँ देल अरिपन दुनू थारीक नीचाँ बनाओल जाइत अछि। चित्र निर्माण- छोट-पैघ चारि वृत्ताकार रेखा, सभसँ ऊपरका गोलाप चारू कात बिन्दु। दुनूकेँ कमल-नालसँ जोड़ल जाइत अछि। चारू आश्रमक शिक्षा वर वधूकेँ प्रेम सूत्रसँ बान्हिकेँ संतान सृष्टिक ज्ञान करा कय एहि अरिपन द्वारा कएल जाइत अछि। कुमरम मने कुमरम मने विवाह आ’ उपनयनसँ एक दिन पहिने क्रमशः कनियाँ आ’ बरुआकेँ आङ उङारल जाइत अछि मने श्रेष्ठ स्त्रीगण यव’ आन पदार्थसँ बनल उबटन लगबैथ छथि। एतय मंडप पर सबरंग पटिया पर षट पाइस अरिपनक समक्ष मंडप पर ई कार्य संपादित होइत अछि। ई एकटा रक्षा कवच थिक। विधि- तीनटा आयत बनाऊ एकक नीचाँ एक। पाँच खंड उर्ध्वाधर आ’ तीन क्षैतिज खंड करू। एहि 18 खंडमे फूल बनाऊ। मधुश्रावणी अरिपन श्रावन कृष्ण पंचमी (नाग पंचमीसँ) प्रारम्भ भ’ कय श्रावन शुक्ल तृतीया पर्यन्त नीचाँक अरिपन पर विभिन्न नागक पूजा कएल जाइत अछि, आ’ वृद्धा लोकनि एहि अवसर पर कथा सेहो कहैत छथि। नव वर-वधूकेँ संग बैसा कय पूजाक समापन होइत अछि। इइ अरिपन दूटा मेना-पात आ’ पूजा करयबालीक दुनू दिशि भूमि पर बनाओल जाइत अछि। वाम पात पर 101 सर्पिणी सिनूर आ’ काजरसँ आ’ दहिन कातक पात पर 101 सर्पिणी पिठारसँ बनाओल जाइत अछि। वाम कातक सर्पक मुखिया कुसुमावती आ’ दहिन कातक वौरस नागक पूजा होइत अछि। मेना पातमे सर्प वशीकरण शक्त्ति होइत अछि। संगमे सूर्य चन्द्र गौर, साठि आ’ नवग्रहक चित्र सेहो लिखल जाइत अछि। दशपात अरिपन कन्याक मुण्डन,कान छेदन आ' विवाहक अवसर पर कुलदेवताक घर आकि मण्डप पर बनाओल जाइत अछि। बनेबाक- विधि। एकर बनेबाक विधि सूक्ष्म अछि। ऊपरमे तीन पातक पुष्प, ,ओकरनीँचा पाँच-पातक कमल-पुष्प,ओकर नीचाँ सात-पात युक्त्त कमल, बीचमे अष्टदल कमल अछि। दश पात चारू दिशि अछि। नौ टा माँछक चित्र सेहो अछि। चित्र:प्रीति ठाकुर दशपात अरिपन पछिला अंकमे स्त्रीगणक दशिपात अरिपन देल गेल छल। एहि बेर पुरुषक दशिपात अरिपन देल गेल अछि। एकर नाम दसकर्मक बोध करएबाक कारण दशपात अछि, आ’ ई पुरुषक सभ संस्कारक अवसर पर लिखल जाइत अछि। ऊपरी भागमे दू टा मयूर,कमलक फूल,शुभ मत्स्य,भीतरमे 12 टा माँछक चित्र आ’ दसटा डाढ़िक चित्र देल गेल अछि,आ’, बीचमे अष्टदल कमल। चित्र:प्रीति ठाकुर एहिमे ४१ टा स्वास्तिक जोड़ल गेल अछि। स्वस्ति भेल आशीर्वाद। ई कार्त्तिक मासक तुलसी-पूजा,शारदीय दुर्गापूजामे तुलसी-चौड़ा/ दुर्गा-मन्दिरमे अष्टमी दिन पिठारसँ बनाओल जाइत अछि। ई वैदिक यज्ञक ’सर्वतोभद्र’ छथि आऽ यज्ञक चौड़ा पर सेहो लिख्ल जाइत छथि। बनेबाक विधि- ४१ टा स्वास्तिक आऽ ओकर बीचमे ४१ टा सिन्दूरक ठोप। नीचाँमे पाँचटा शंख, चारू कात आठ अस्त्रक अंकन, अर्ध्वमुख-अधोमुख त्रिकोण, षट्कोण, अष्टकोण, श्रीयंत्र बनाओल जाइत अछि। चित्र:प्रीति ठाकुर देवोत्थान एकादशी कार्तिक शुक्ल एकादशीकेँ मनाओल जाइत अछि, एहि दिन क्षीरसागरमे भगवान निन्नसँ जागल छलाह। गोसाउन घरमे आऽ तुलसी लगमे अरिपन होइत अछि। अरिपन पिठारसँ होइत छैक, सिन्दूर सेहो लगाओल जाइत छैक। तुलसी लगमे मखान, नारिकेर, मिश्रीक प्रसाद चढ़ैत अछि। भादव मासक एकादशीक दिन भगवान शंखासुर राक्षसकेँ मारि कए गाढ़ निन्नमे सूति गेलाह, आऽ कार्तिक शुक्ल एकादशीकेँ उठलाह, देवोत्थान ईएह अर्थ अछि।तुलसी तरक देवोत्थान अरिपन नीचाँक रीतिए बनाओल जाइत अछि। चित्र: तूलिका एक बेर कुबेर कोनहुना लक्ष्मीकेँ पत्नीक रूपमे प्राप्त कए लेलन्हि आऽ हुनका लेल समुद्रमे एकटा’कोवर’ घर बनेने रहथि। कोबर चित्रमे पुरैनक पात, पुष्पित बांस, मत्स्य,सांप, काछु, नवग्रह, शंख आदिक प्रयोग होइत अछि। एहि अंकमे कोबर (पुरैन) देल जाऽ रहल अछि। चित्र: तूलिका कोजगराक अरिपन कोजगरा मिथिलामे आश्विन पूर्णिमाक रातिमे मनाओल जाइत अछि।संध्यामे लक्ष्मीक पूजा कए मखानक भोग लगैत अछि। रत्रि जगरण कए चन्द्रमाक देखबाक आनन्द लेल जाइत अछि। नीचाँक लंब अरिपन पार कए देवता घरमे प्रवेश करैत छथि।कमलक फूल आऽ पद चिन्ह एहि निमित्त देल गेल अछि। अँगनाक पश्चिममे बनल कुल-देवताक घर जे ’गोसाउनि घर’ कहबैत अछि, ओतए बनाओल जाइत अछि। पश्चिम देबाल पर कारी छोड़ि दोसर रंगसँ ई चित्र बनाओल जाइत अछि। एकरे सरोवर कहल जाइत छैक। तूलिका(दहिनासँ पहिल)साभार:दैनिक जागरण-फोटोग्राफर-दीपूराज तूलिका: विदेह:सदेह:१ मे विदेह ई-पत्रिकाक पहिल २५ अंकक ११३ गोटेक रचना प्रकाशित भेल जाहिमे १४ वर्षीय तूलिकासँ लए ८८ वर्षीय श्री आद्याचरण झा धरि छलाह। तूलिका एहि बरख सी.बी.एस.ई.क १०म कक्षाक तैयारीमे लागल रहबाक कारण अपन रचना किछु दिनसँ नहि पठा रहल छलीह। आब ओहि परीक्षाक परिणाम आबि गेल अछि आ डी.ए.वी.,बी.एस.ई.वी.,पटनाक एहि छात्राकेँ ९६.८ प्रतिशत अंक भेटल अछि । विदेह लेल हुनकर रचना पुनः आएल अछि जे पाठकक समक्ष अछि।:-सम्पादक स्वास्तिका: कक्षा २ (माउन्ट कार्मेल, पटना) विस्मृत कवि- पं. रामजी चौधरी(१८७२-१९५२) जन्म स्थान- ग्राम-रुद्रपुर,थाना-अंधरा-ठाढ़ी,जिला-मधुबनी. मूल-पगुल्बार राजे गोत्र-शाण्डिल्य वंशावली- जीवन चौधरी(जन्म स्थान-पंचोभ-दरिभङ्गा) 1801 ई.मे रुद्रपुर आगमन -दुइ पुत्र--श्री रंगी चौधरी(रुद्रपुरमे जन्म) आ’ श्री कंत चौधरी(रुद्रपुरमे जन्म) -कंत चौधरीकेँ तीन पुत्र-श्री चुम्मन चौधरी,श्री बुधन चौधरी आ’ श्री बबुआ चौधरी -चुम्मन चौधरीकेँ दुइ पुत्र श्री गोनी चौधरी आ’ श्री पं कवि रामजी चौधरी. श्री जीवन चौधरी जे कविक वृद्ध-पितामह छलाह तनिकर दोखतरी रुद्रपुरमे रहन्हि,जाहि कारणसँ ओ’ 1801 ई.मे पंचोभ छोड़ि रुद्रपुर बसि गेलाह। कविजीक पितामह बहुत पैघ गवैय्या रहथिन्ह। हुनकर गायनक मुख्य क्षेत्र युगल सरकार सीतारामक भक्ति गीत होइत छल,तजकर प्रभाव कविजी पर खूब पड़ल। ओ’ अप्पन पौत्रक नाम रामजी एहि कारणसँ रखलन्हि। स्व.कविजी अपन नामक अनुरूप तुलसीकृत श्रीरामचरित मानस कंठस्थ कय गेल छलाह। ओ’ प्रत्येक प्रश्नक उत्तर रामायणक चौपायसँ करैत छलाह। हुनकर जीवनक सभसँ दुःखद घटना छन्हि जे ओ’ तीन विवाह कएल मुदा कोनो पत्नी चारि सालसँ बेशी नहि जीबि सकलखिन्ह। अंतिम विवाह ओ’ 53 वर्षक अवस्थामे कएल ,जे एक पुत्र, जनिकर नाम दुर्गानाथ चौधरी (दुखिया चौधरी) छन्हि,,,,केर जन्मदेलाक 15 दिनक भीतरे स्वर्गवासी भय गेलीह। कविजी अप्पन जीवनकालमे दरिभङ्गा राजक अंतर्गत जेठ रैय्यतक पद पर कार्यरत छलाह,तथा तेसर पत्नीक मृत्युक उपरांत ओ’ ईहो पद त्यागि कय भगवद भक्तिमे लागि गेलाह। हिनकर एकमात्र प्रकाशित पोथी “ विविध भजनावली” मे मैथिलीक संगे ब्रजबुलीक कविता सेहो अछि। संगीत-शिक्षा पहिने कमसँ कम 37 ‘की’ बला कीबोर्ड लिय। एहिमे 12-12 टाक तीन भाग करू। 13 आ’ 25 संख्या बला की सा,आ’ सां दुनूक बोध करबैत अछि। सभमेँ पाँचटा कारी आ’ सातटा उज्जर ‘की’ अछि। प्रथम 12 मंद्र सप्तक, बादक 12 मध्य सप्तक आ, सभसँ दहिन 12 तार सप्तक कहबैछ। 1 सँ 36 धरि मार्करसँ लिखि लिय। 1 आ तेरह सँ क्रमशः वाम आ’ दहिन हाथ चलत। 12 गोट ‘की’ केर सेटमे 5 टा कारी आ’ सात टा उज्जर ‘की’ अछि। प्रथम अभ्यासमे मात्र उजरा ‘की’ केर अभ्यास करू। पहिल सात टा उजरा ‘की’ सा, रे, ग, म, प, ध, नि, अछि आ’ आठम उजरा की तीव्र सं अछि जे अगूलका दोसर सेटक स अछि। वाम हाथक अनामिकासँ स, माध्यमिका सँ रे, इंडेक्स फिंगर सँ ग ,बुढ़बा आँगुरसँ म , फेर बुढ़बा आँगुरक नीचाँसँ अनामिका आनू आ’ प, फेर माध्यमिकासँ ध, इंडेक्स फिंगरसँ नि, आ’ बुढ़बा आँगुरसँ सां। दहिन हाथसँ 12 केरसेट पर पहिल’की’ पर बुढ़बा आँगुरसँ स, इंडेक्स फिंगरसँ रे, माध्यमिकासँ ग, अनामिकासँ म, फेर अनामिकाक नीचाँसँ बुढ़बा आँगुरकेँ आनू आ’ तख बुध्बा आँगुरसँ प, इंडेक्स फिंगरसँ ध, माध्यमिकासँ नि आ’ अनामिकसँ सां। दुनू हाथसँ सां दोसर 12 केर सेटक पहिल उज्जर ‘की’ अछि। आरोहमे पहिल सेटक सां अछि तँ दोसर सेटक प्रथम की रहबाक कारण सा। दोसर गप जे की बोर्डसँ जखन आवज निकलयतँ अपन कंठक आवाजसँ एकर मिलान करू। कनियो नीच-ऊँच नहि होय। तेसर गप जे संगीतक वर्ण अछि सा,रे,ग,म,प,ध,नि,सां एकरा देवनागरीक वर्ण बुझबाक गलती नहि करब। आरोह आ’ अवरोहमे कतेक नीच-ऊँच होय तकरे टा ई बोध करबैत अछि। जेना कोनो आन ध्वनि जेनाकि क केँ लिय आ, की बोर्ड पर निकलल सा,रे...केर ध्वनिक अनुसार क ध्वनिक आरोह आ’ अवरोह करू। ई जे सातो स्वरक वर्णन पिछला अंकमे देल गेल छल ओकरासँ आगू आऊ। एहि सातू स्वरमे षडज आ’ पंचम मने सा आ’ प अचल अछि, एकर सस्वर पाठमे ऊपर नीचाँ होयबाक गुंजाइस नहि छैक। सा अछि आश्रय आकि विश्राम आ’ प अछि उल्लासक भाव। शेष जे पाँचटा स्वर अछि से सभटा चल अछि, मने ऊपर नीचाँक अर्थात् विकृतिक गुंजाइस अछि एहिमे। सा आ’ प मात्र शुद्ध होइत अछि। आ’ आब विकृति भ’ सकैत अछि दू तरहेँ शुद्धसँ ऊपर स्वर जायत किंवा नीँचा। जदि ऊपर रहत स्वर तँ कहब ओकरा तीव्र आ’ नीचाँ रहत तँ कोमल कहायत। म कँ छोड़ि कय सभ अचल स्वरक विकृति होइत अछि नीचाँ, तखन बुझू जे “रे, ग,ध, नि” ई चारि टा स्वरक दू टा रूप भेल कोमल आ’ शुद्ध। ’म’ केर रूप सेहो दू तरहक अछि, शुद्ध आ’ तीव्र। रे दैत अछि उत्साह ग दैत अछि शांति म सँ होइत अछि भय ध सँ दुःख आ’ नि सँ आदेश। गायन काल सेहो सभ राग-रागिनीक हेतु निश्चित रहैत अछि। 12 बजे दिनसँ 12 बजे राति धरि पूर्वांग आ’ 12 बजे रातिसँ 12 बजे दिन धरि उत्तरांग राग गाओल-बजाओल जाइत अछि। पूर्वांग रागक वादी स्वर मे कोनो एक टा (सा, रे, ग, म, प ) होइत अछि। उत्तरांगक वादी स्वरमे (म,प,ध,नि,सा)मे सँ कोनो एक टा होइत अछि। सूर्योदय आ’ सूर्यास्तक समयमे गाओल ज्आय बला रागकेँ संधि प्रकाश राग कहल जाइत अछि। रागक जाति रागक आरोह आ’ अवरोहमे प्रयुक्त्त स्वरक संख्याक आधार पर रागक जातिक निर्धारण होइत अछि। एकर प्रधान जाति तीन टा अछि। 1. संपूर्ण (7) 2.षाड़व(6) 3.औड़व(5) आ’ एहिमे सामान्य स्वर संख्या क्रमशः 7,6,5 रहैत अछि। आब एहि आधार पर तीनूकेँ फेँटू। संपूर्ण-औरव की भेल? हँ पहिल रहत आरोही आ’ दोसर रहत अवरोही। कहू आब। (7,5) एहिमे सात आरोही स्वर संख्या आ’ 5 अवरोही स्वर संख्या अछि। संपूर्णक सामान्य स्वर संख्या ऊपर लिखल अछि(7) आ’ औड़वक (5) । तखन संपूर्ण-औड़व भेल(7,5)। अहिना 9 तरहक राग जाति होयत। 1.संपूर्ण-संपूर्ण(7,7) 2.संपूर्ण-षाड़व(7,6) 3.संपूर्ण-औड़व(7,5) 4. षाड़व-संपूर्ण- (6,7) 5. षाड़व- षाड़व - (6,6) 6. षाड़व -औड़व (6,5) 7.औड़व-संपूर्ण(5,7) 8.औड़व- षाड़व(5,6) 9. औड़व- औड़व(5,5) थाट- एकटा सप्तकमे सात शुद्ध, चारिटा कोमल आ’ एकटा तीव्र स्वर (12 स्वर) होइत अछि। एहिमे सात स्वरक ओ’ समुदाय, जेकरासँ कोनो रागक उत्पत्ति होइत अछि, तकरा थाट वा मेल कहल जाइत अछि। थाट रागक जनक अछि, थाटमे सात स्वर होइत छैक(संपूर्ण जाति)। थाटमे मात्र आरोही स्वर होइत अछि। थाटमे एकहि स्वरक शुद्ध आ’ विकृत स्वर संग-संग नहि रहैत अछि। विभिन्न रागक नाम पर थाट सभक नाम राखल गेल अछि। थाटक सातो टा स्वर क्रमानुसार होइत अछि आ’ एहिमे गेयता नहि होइत छैक। थाटक 10 टा अछि। 1.आसावरी-सा रे ग॒ म प ध॒ नि॒ 2.कल्याण-सा रे ग म॑ प ध नि 3.काफी-सा रे ग॒ म प ध नि॒ 4.खमाज-सा रे ग म प ध नि॒ 5.पूर्वी-सा रे॒ ग म॑ प ध॒ नि 6.बिलावल-सा रे ग म प ध नि 7.भैरव-सा रे॒ ग म प ध॒ नि 8.भैरवी-सा रे॒ ग॒ म प ध॒ नि॒ 9.मारवा-सा रे॒ ग म॑ प ध नि 10.तोड़ी-सा रे॒ ग॒ म॑ प ध॒ नि वर्णसँ रागक रूप-भाव प्रगट कएल जाइत छैक। एकर चारिटा प्रकार छैक। 1.स्थायी-जखन एकटा स्वर बेर-बेर अबैत अछि।ओकर अवृत्ति होइत अछि। 2.अवरोही- ऊपरसँ नीचाँ होइत स्वर समूह, एकरा अवरोही वर्ण कहल जाइत अछि। 3.आरोही- नीचाँसँ ऊपर होइत स्वर समूह, एकरा आरोही वर्ण कहल जाइत अछि। 4.संचारी-जाहिमे ऊपरका तीनू रूप लयमे होय। लक्षण गीत: रचना जाहिमे बादी, सम्बादी,जाति आ’ गायनक समय केर निर्देशक रागक लक्षण स्पष्ट भ’ जाय। स्थायी: कोनो गीतक पहिल भाग, जे सभ अन्तराक बाद दोहराओल जाइत अछि। अन्तरा: जकरा एकहि बेर स्थायीक बाद गाओल जाइत अछि। अलंकार/पलटा: स्वर समुदायक नियमबद्ध गायन/वादन भेल अलंकार। आलाप: कोनो विशेष रागक अन्तर्गत प्रयुक्त्त भेल स्वर समुदायक विस्तारपूर्ण गायन/वादन भेल आलाप। तान: रागमे प्रयुक्त्त भेल स्वरक त्वरित गायन/वादन भेल तान। तानक गति द्रुत होइत अछि आऽ ई दोबर गतिसँ गायन/वादन कएल जाइत अछि। आब आउ ताल पर। संगीतक गतिक अनूरूपेँ ई झपताल- १० मात्रा, त्रिताल- १६ मात्रा, एक ताल- १२ मात्रा, कह्रवा- ८ मात्रा दादरा- ६ मात्रा होइत अछि। गीत, वाद्य आऽ नृत्यक लेल आवश्यक समय भेल काल आऽ जाहि निश्चित गतिक ई अनुसरण करैत अछि, से भेल लय।जखन लय त्वरित अछि तँ भेल द्रुत, जखन आस्ते-आस्ते अछि, तँ भेल विलम्बित आऽ नञि आस्ते अछि आऽ नञि द्रुत तँ भेल मध्य लय। मात्रा ताल केर युनिट अछि आऽ एहिसँ लय केर नापल जाइत अछि। तालमे मात्रा संयुक्त रूपसँ उपस्थित रहला उत्तर ओकरा विभाग कहल जाइत अछि- जेना दादरामे तीन मात्रा संयुक्त्त रहला उत्तर २ विभाग। तालक विभागक नियमबद्ध विन्यास अछि छन्द।आऽ तालक प्रथम विभागक प्रथम मात्रा भेल सम आऽ एकर चेन्ह भेल + वा x आऽ जतय बिना तालीक तालकेँ बुझाओल जाइत अछि से भेल खाली आऽ एकर चेन्ह अछि ०. ओऽ सम्पूर्ण रचना जाहिसँ तालक बोल इंगित होइत अछि, जेना मात्रा, विभाग,ताली, खाली ई सभटा भेल ठेका। चेन्ह- तालीक स्थान पर ताल चेन्ह आऽ संख्या। सम + वा x खाली ० ऽ अवग्रह/बिकारी - एक मात्राक दू टा बोल - एक मात्राक चारिटा बोल एक मात्राक दूटा बोलकेँ धागे आऽ चारि टा बोलकेँ धागेतिट सेहो कहल जाइत अछि। तालक परिचय ताल कहरबा ४ टा मात्रा, एकटा विभाग, आऽ पहिल मात्रा पर सम। धागि नाति नक धिन। तीन ताल त्रिताल १६ टा मात्रा, ४-४ मात्राक ४ टा विभाग। १,५ आऽ १३ पर ताली आऽ ९ म मात्रा पर खाली रहैत अछि। धा धिं धिं धिं धा धिं धिं धा धा तिं तिं ता ता धिं धिं धा झपताल १० मात्रा। ४ विभाग, जे क्रमसँ २,३,२,३ मात्राक होइत अछि। १ मात्रा पर सम, ६ पर खली, ३,८ पर ताली रहैत अछि। धी ना धी धी ना ती ना धी धी ना ताल रूपक ७ मात्रा। ३,२,२ मात्राक विभाग। पहिल विभाग खाली, बादक दू टा भरल होइत अछि। पहिल मात्रा पर सम आऽ खाली, चारिम आऽ छठम पर ताली होइत अछि। धी धा त्रक धी धी धा त्रक रामाश्रय झा ’रामरंग’ भारतीय शास्त्रीय संगीतक समर्पित आऽ विलक्षण ओऽ विख्यात संगीतज्ञ पं रामाश्रय झा ’रामरंग’ केर जन्म ११ अगस्त १९२८ ई. तदनुसारभाद्र कृष्णपक्ष एकादशी तिथिकेँ मधुबनी जिलान्तर्गत खजुरा नामक गाममे भेलन्हि। हिनकर पिताक नाम पं सुखदेव झा आऽ काकाक नाम पं मधुसदन झा छन्हि। रामाश्रयजीक संगीत शिक्षा हिनका दुनू गोटेसँ हारमोनियम आऽ गायनक रूपमे मात्र ५ वर्षक आयुमे शुरू भए गेलन्हि। तकरा बाद श्री अवध पाठकजीसँ गायनक शिक्षा भेटलन्हि। १५ वर्ष धरि बनारसक एकटा प्रसिद्ध नाटक कम्पनीमे रामाश्रय झा जी कम्पोजरक रूपमे कार्य कएलन्हि। पं भोलानाथ भट्ट जी सँ २५ वर्ष धरि ध्रुवपद, धमार, खयाल, ठुमरी, दादरा, टप्पा शैली सभक विधिवत शिक्षा लेलन्हि। पं भट्ट जीक अतिरिक्त्त रामाश्रय झा जी पं बी.एन. ठकार (प्रयाग), उस्ताद हबीब खाँ (किराना), पं बी.एस. पाठक (प्रयाग) सँ सेहो संगीतक शिक्षा प्राप्त कएलन्हि। पं झा १९५४ सँ प्रयागमे स्थाई रूपसँ रहि रहल छथि। १९५५ ई.मे हिनकर नियुक्त्ति लूकरगंज संगीत विद्यालयमे संगीत अध्यापक रूपमे भेलन्हि। १९६० ई.मे हिनकर नियुक्त्ति प्रयाग संगीत समितिमे भेलन्हि, जतए १९७० धरि प्रभाकर आऽ संगीत प्रवीण कक्षाक शिक्षक रहलाह। १९७०मे इलाहाबाद विश्वविद्यालयक संगीत विभागाध्यक्ष श्री प्रो. उदयशंकर कोचकजी पं झाक संगीत क्षेत्रक सेवासँ प्रभावित भए विश्वविद्यालयमे हिनकर नियुक्त्ति कएलन्हि। पं झा उत्कृष्ट शिक्षक, गायक आऽ आकाशवाणीक प्रथम श्रेणीक कलाकार छथि। हिनकर अनेक शिष्य-शिष्या आकाशवाणीक प्रथम श्रेणीक कलाकार आऽ उत्तम शिक्षक छथि, जेना- डॉ. गीता बनर्जी, श्रीमति कमला बोस, श्रीमति शुभा मुद्गल, श्रीकान्त वैश्य,श्री शान्ता राम कशालकर, श्री शान्ता राम कशालकर, श्री कामता खन्ना, श्रीमति सत्या दास, डॉ. रूपाली रानी झा, डॉ इला मालवीय, श्री अनिल कुमार शर्मा, श्री रामशंकर सिंह, श्रीमति संगीता सक्सेना, श्री राजन पर्रिकर, श्रीमति रचना उपाध्याय, श्री नरसिंह भट्त, श्री भूपेन्द्र शुक्ला, श्री जगबन्धु इत्यादि। पं झा संगीत शास्त्र केर श्रेष्ठ लेखक छथि आऽ हिनकर लिखल अभिनव गीतांजलि केर पांचू भाग प्रकाशित भए चुकल अछि, जाहिमे २००सँ ऊपर रागक व्याख्या अछि आऽ दू हजारक आसपास बंदिश अछि। मिथिलावासी श्री रामरंग राग तीरभुक्त्ति, राग वैदेही भैरव, आऽ राग विद्यापति कल्याण केर रचना सेहो कएने छथि आऽ मैथिली भाषामे हिनकर खयाल ’रंजयति इति रागः’ केर अनुरूप अछि। १९८२ मे उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कारक संगे ’रत्न सदस्यता’ सेहो देल गेलन्हि। संगीत लेखनक हेतु काका हाथरसी पुरस्कार, आऽ भारतक सर्वोच्च संगीत संस्था आइ.टी.सी. केर सम्मान सेहो हिनक भेटि चुकल छन्हि। २०० ई. मे स्वर साधना रत्न अवार्ड, २००५ मे संगीत नाटक अकादेमीक राष्ट्रीय पुरस्कार, भारत संगीत रत्न, राग ऋषि, संत तुलसीदास सम्मान, प्रायाग गौरव एवं सोपरी अकादेमीक ’सा म प वितस्ता’ इत्यादि सम्मान श्री झाकेँ प्राप्त छन्हि। श्री रामरंग जी प्रयागमे ’वारिन दास संगीत परिषद’ केर स्थापना कए अनेकानेक संगीत समारोहक आयोजन सेहो कएने छथि। ’इलाहाबाद विश्वविद्यालय संगीत सम्मेलन’ ३० वर्षसँ बन्द पड़ल छल जकरा वार्षिक रूपसँ १९८० मे पुनः श्री झा आरम्भ करबओलन्हि। किएक तँ श्री झा लग कोनो औपचारिक डिग्री नहि छलन्हि, इलाहाबाद विश्वविद्यालय अपन नियममे परिवर्त्तन कएलक आऽ हिनका ओतए संगीत विभागाध्यक्ष बनाओल गेलन्हि, जतएसँ ओऽ १९८९ ई. मे सेवानिवृत्त भेलाह। तुलसीक मानसक आधार पर श्री झा सात काण्डक संगीत रामायणक सेहो रचना कएलन्हि। पं झा मुख्य रूपसँ खयाल, ठुमरी, दादरा, टप्पा आऽ संगहि ध्रुवपद, धमार, तराना, तिरवट, चतुरंग, रागमाला, रागसागर, रागताल सागर, भजन आऽ लोकगीत गायनमे सिद्ध छथि। अखन ८० वर्षक आयुमे प्रयागमे श्री झा संगीत साधनामे रत छथि। अभिनव गीतांजलि, हुनकर उच्चकोटिक शास्त्र रचना अछि, जे पाँच भागमे अछि। अपन साहित्यिक वाणी, शाब्दिक रूप जे होइत अछि कोनो संगीत रचनाक, आऽ धातु जे अछि स्वरक लयक रचना आऽ एहि सभ गुणसँ युक्त्त छथि “रामरंग”। रामरंगक बंदिश वा रचनामे अहाँकेँ भेटत स्वर, शब्द आऽ मात्राक लयबद्ध बंधन। पुरान ध्रुपद जेकाँ पद्य आऽ स्वरकेँ ओऽ तेनाकेँ बान्हि दैत छथि, जे दुनू एक दोसरमे मिलि जाइत अछि। हुनकर रचना हुनकर उच्चारणसँ मिलि कए मौलिक तात्त्विक स्थायी भरण, सभ बितैत दिन एकटा नव आत्मनिरीक्षण एकटा नव स्थायी। रामरंगमे संगीतक लाक्षणिक तत्त्व प्रखर होइत छन्हि। संगीतक व्याकरणक सम्पूर्ण पकड़ छन्हि, जाहिसँ उचित शब्दक प्रयोगक निर्णय ओऽ कए पबैत छथि। छन्द शास्त्रक, कोषक, अलंकारक, भावक आऽ रसक वृहत् ज्ञान छन्हि रामरंगकेँ। संगहि स्थानीय संस्कृतिक, विभिन्न भाषाक आऽ ललित कलाक सिद्धान्तक सेहो गहन अध्ययन छन्हि रामाश्रय झा जीकेँ। वादन, गाय आऽ नृत्यक, साधल-कण्ठ, लय-ताल-काल, देशी राग, दोसराक मनसमे जाऽ कए बुझनिहार, नव लय आऽ अभ्व्यक्त्ति, प्रबन्धक समस्त ज्ञान, कम समयमे गीत रचना, विभिन्न मौखिक संरचना निर्माण, आलापक प्रदर्शन आऽ गमक एहि सभटामे पारंगत छथि रामरंग। रामाश्रय झा “रामरंग” प्रसिद्ध अभिनव भातखण्डे जीक मृत्यु- हिन्दुस्तानी संगीतक गायक, शिक्षक आ वाग्यकार/ शास्त्रकार श्री रामाश्र झा “रामरंग” जीक मृत्यु १ जनवरी २००९ केँ कोलकातामे भऽ गेलन्हि। ओ ८० बरखक छलाह। संगीत नाटक अकादेमी, नई दिल्लीक २००५ मे पुरस्कार प्राप्त श्री रामरंग केँ यू.पी. संगीत नाटकक फेलोशिप सेहो प्रदान कएल गेल छलन्हि। श्री रामाश्रय झा “रामरंग”क जन्म १९२८ ई. मे मधुबनी जिलाक खजुरा गाममे भेलन्हि। हिनका संगीतक प्रारम्भिक शिक्षा अपन पिता सुखदेव झा सँ भेटलन्हि। बादमे ओ वाराणसीमे नाटक कम्पनीमे बहुत दिन धरि संगीत देलन्हि फेर पं भोलाराम भट्टसँ एलाहाबादमे संगीतक शिक्षा प्राप्त कएलन्हि। एलाहाबाद विश्वविद्यालयक संगीत विभागमे ई प्रोफेसर आ हेड रहलाह। रामरंग ढेर रास खयाल रचना बनओलन्हि आ कतेक रास नव रागक निर्माण कएलन्हि। हिनकर पाँच खण्डमे नव आ पुरान रागक वर्णन आ समालोचना “अभिनव गीताञ्जलि” हिनक बड्ड प्रसिद्दि प्रदान कएलकन्हि आ ई “अभिनव भातखण्डे” नामसँ प्रसिद्ध भऽ गेलाह। अपन ध्रुपद आ खयाल रचनाक आधारपर श्री “रामरंग” हनुमानकेँ समर्पित “संगीत रामायण”क रचना सेहो कएलन्हि। मैथिलीमे “विदेह” ई पत्रिका लेल पठाओल हिनकर “राग विद्यापति कल्याण”, “राग तीरभुक्ति”, “राग वैदेही भैरव” आदि नव राग आ ओहिपर आधारित मैथिली भाषाक रचना पाठकक मोनमे एखनो अछि। हुनकर स्मरण: एहि पंक्तिक लेखकक संग वार्तालापमे रामरंग जी अपन जीवनक समस्त अनुभव कहि सुनेने रहथि। रामरंग जीकेँ हजारो रचना कंठस्थ मोन छलन्हि मुदा बादमे हुनकर हाथ थरथड़ाइत छलन्हि आ ओ वार्ताक क्रममे कहनहिओ छलाह जे- के सीखत आ के लिखत। सर्वतंत्र स्वतंत्र श्री धर्मदत्त झा(बच्चा झा) (१८६०-१९१८ ई.) मिथिला आ’ संस्कृत स्तंभमे एहि अंकमे सर्वतंत्र स्वतंत्र श्री धर्मदत्त झा जिनकर प्रसिद्धि बच्चा झाक नामसँ बेशी छन्हि, केर जीवनी द’ रहल छी। मधुबनी जिलांतर्गत लवाणी(नवानी) गाममे हिनकर जन्म भेलन्हि। वाराणसीमे श्री विशुद्धानन्द सरस्वती आ’ बालशास्त्रीसँ शिक्षा ग्रहण करबाक बाद गाम आबि गेलाह आ’ शारदा भवन विद्यापीठक स्थापना गामेमे कएलन्हि।गुरुकुल पद्धति सँ एतय संन्यासी आ’ गृहस्थ शिक्षा ग्रहण करैत छलाह। विद्यार्थीगणक खर्चा गुरुजी उठबैत रहलाह। द्वारकाक शंकराचार्य हिनका आमंत्रित कए नव्यन्यायक अध्ययन कएलन्हि। आस्तिक आ’ नास्तिक आ’ नव्यन्यायक विद्वत्तक दृष्टिये हिनका सर्वतंत्र स्वतंत्रक उपाधि देल गेलन्हि। हिनका बच्चामे लोक बच्चा झा कहैत छलन्हि, आ’ ईएह नाम धर्मदत्त झाक अपेक्षा बेशी प्रचलित रहल। हिनक कृति सभ अछि। 1. सुलोचन-माधव चम्पू काव्य, 2.न्यायवार्त्तिक तात्पर्य व्याख्यान, 3.गूढ़ार्थ तत्त्वलोक(श्री मदभागवतगीता व्याख्याभूत मधुसूदनी टीका पर) 4.व्याप्तिपंचक टीका 5.अवच्छदकत्व निरुक्त्ति विवेचन 6.सव्यभिचार टिप्पण 7.सतप्रतिपक्ष टिप्पण 8.व्याप्तनुगन विवेचन 9.सिद्धांत लक्षण विवेक 10.व्युत्पत्तिवाद गूढार्थ तत्वालोक 11.शक्त्तिवाद टिप्पण 12.खण्डन-ख़ण्ड खाद्य टिप्पण 13. अद्वैत सिद्धि चन्द्रिका टिप्पण 14.कुकुकाञ्जलि प्रकाश टिप्पण. महाराज लक्ष्मीश्वर सिंहक सिंहासनारोहणक बहुत दिन बाद धरि धौत परीक्षा नहि भेल छल। ई परीक्षा दरभंगा राजक संस्थापक श्री महेश ठाकुर द्वारा प्रारम्भ कएल गेल छल आ’ एहिमे मौखिक परीक्षा द्वारा श्रेष्ठ पंडितक चयन कएल जाइत छल। महाराज रमेश्वर सिंह एकर आयोजन करबओलन्हि आ’ श्री गंगानाथ झाकेँ एकर दायित्व देल गेल। श्री गंगानाथ झा परीक्षार्थीक रूपमे सेहो आवेदन कएने छलाह। महाराज परेक्षाक हेतु लिखित पद्धतिक आदेश देने छलाह। प्रश्निक नियुक्त्त भेलाह श्री बच्चा झा आ’ श्री शिव कुमार मिश्र। ई दुनू गोटे क्लिष्ट प्राश्निक आ’ कृपण परीक्षक मानल जाइत छलाह। मुदा ताहि पर श्री गंगानाथ झाकेँ 200 मे 197 अंक भेटलन्हि। महाराज पुरान परम्पराक अनुसार हिनका धोती तँ देलखिन्ह, मुदा नवीन पद्धतिक अनुसार दुशाला नहि देलखिन्ह, कारण संस्कृतक विद्वान् होयतहुँ श्री गंगानाथ झाक झुकाव अंग्रेजी दिशि छल। श्री बच्चा झा प्रकाण्ड पण्डित छलाह। महाराष्ट्र आ’ काशीक पण्डितक प्रसंगमे ओ’ कहैत छलाह जे शब्द खण्डक प्रसंगमे ओ’ सभ किछु नहि जनैत छलाह। ओहि समयमे महामहोपाध्याय दामोदर शास्त्री काशीक एकटा प्रसिद्ध वैयाकरण छलाह। विद्वान लोकनिक सुझाव पर दरभंगा महाराज गुरुधाममे एकटा पंडित सभाक आयोजन कएलन्हि। एहिमे हथुआ महाराज विशिष्ट अतिथि छलाह। काशीक सभ प्रमुख विद्वान एहिमे उपस्थित छलाह। प्रतियोगी छलाह पं.बच्चा झा आ’ म.म. दामोदर शास्त्री भरद्वाज। निर्णायक छलाह पं.कैलाश शिरोमणि भट्टाचार्या आ’ म.म.पं शिव कुमार मिश्र। एकटा सरल समस्यासँ शास्त्रार्थ प्रारम्भ भेल। एकर नैय्यायिक पक्ष लेलन्हि बच्चा झा आ’ व्याकरण पक्ष पंदामोदर शास्त्री। दामोदर शास्त्री अपन जवाब अत्यंत सरल शब्दमे वैयाकरणिक आधार पर द’ देलन्हि। आब बच्चा झाक बेर आयल। बच्चा झा गहन परिष्कार प्रारम्भ कएलन्हि। विद्वान लोकनिमे विवाद भेलन्हि जे हुनकर प्रश्न प्रासंगिक छन्हि वा नहि। निर्णायक लोकनि एकरा प्रासंगिक मानलन्हि। जौँ-जौँ बच्चा झा आगू बढ़ैत गेलाह हुनकर उत्तर दामोदर शास्त्री आ’ निर्णायक लोकनिक हेतु अबोधगम्य होइत गेलन्हि। मध्य रात्रि तक ई चलल। अन्ततः अनिर्णीत राखि कए सभा विसर्जित भेल। पं. रत्नपाणि झाक पुत्र केँ बच्चा झाकेँ अपर गङ्गेश उपाध्याय सेहो कहल जाइत अछि। हिनकर प्रारम्भिक अध्ययन गामे पर भेलन्हि। तकरा बाद ओ’ विश्वनाथ झासँ अध्ययनक हेतु ‘ठाढ़ी’ गाम चलि गेलाह। फेर बबुजन झा आ’ ऋद्धि झासँ न्यायदर्शनक विधिवत अध्ययन कएलन्हि। फेर धर्मदत्त झा प्रसिद्ध बच्चा झा काशी गेलाह। ओतय स्वामी विशुद्धानन्द सरस्वतीसँ मीमांसा, वेदान्तक अध्ययन कएलन्हि। सन् 1886 ई. केर गप छी। एकटा पुष्करिणीक उद्घाटनक उत्सवमे दामोदर शास्त्री जी काशीसँ मिथिलाक राघोपुर ग्राममे निमंत्रित भेल छलाह। ओतय हुनकर शास्त्रार्थ परम्परानुसार बच्चा झाक विद्यागुरु ऋद्धि झासँ भेल छलन्हि। एहिमे ऋद्धि झा परास्त भेल छलाह। गुरुक पराजयक प्रतिशोध लेबाक हेतु सन् 1889 मे बच्चा झा काशी गेलाह। बच्चा झाक उम्र ओहि समयमे 29 वर्ष मात्र छलन्हि। ओ’ प्रायः दामोदर शास्त्रीकेँ लक्ष्य करैत छलाह, जे काशीक वैय्याकरणिक पण्डित लोकनिकेँ शब्द-खण्डक कोनो ज्ञान नहि छन्हि।बच्चा झा समस्त काशीक विद्वान् लोकनिकेँ शास्त्रार्थक हेतु ललकारा देलन्हि। दामोदर शास्त्रीसँ भेल शास्त्रार्थक वर्णन पछिला अंकमे कएल जा’ चुकल अछि। शास्त्रार्थ तीन दिन धरि चलल। ई शास्त्रार्थ सन्ध्यासँ शुरू होइत छल, आ’ मध्य रात्रि धरि चलैत छल।शास्त्रार्थक तेसर दिन दामोदर शास्त्री तर्क कएनाइ बन्न कए देलन्हि, आ’ श्रोताक रूपमे बच्चा झाक तर्क सुनैत रहलाह। पं शिवकुमार शास्त्री आ’ कैलाशचन्द्र शिरोमणि दू टा निर्णायक छलाह। शिरोमणिजीक दृष्टिमे वादी श्री बच्चा झाक पक्ष न्यायशास्त्रक दृष्टिसँ समुचित छल। शिवकुमारजीक सम्मतिमे प्रतिवादी श्री दामोदरशास्त्रीक पक्ष व्याकरणक मंतव्यानुसार औचित्यसम्पन्न छलन्हि।दुनू पण्डितक शास्त्रार्थ कलाक संस्तुति कएल गेल आ’ दुनू गोटेकेँ अपन सिद्धान्तक उत्कृष्ट व्यवस्थापनक लेल विजयी मानल गेल। बच्चा झा गामेमे रहि कए अध्यापन करैत छलाह। मुदा महाराजाधिराज दरभंगा नरेश श्री रमेश्वरसिंहक अकाट्य आग्रहक कारणसँ मुजफ्फरपुरक धर्म समाज संस्कृत कॉलेजक प्रधानाचार्यक पद स्वीकार कएलन्हि। मुदा एकर एकहि वर्षमे ओ’ शरीर त्याग कए देलन्हि। बच्चा झाजीकेँ समालोचकगण किछु उदण्ड आ’ अभिमानी मनबाक गलती करैत रहलाह अछि। मुदा एकटा उदाहरण हमरा लगमे एहन अछि, जाहिसँ ई गलत सिद्ध होइत अछि। ई घटना एहन सन अछि। मुजफ्फरपुर धर्मसमाज संस्कृत विद्यालयमे बच्चा झा प्रधानाचार्य/अध्यक्ष पद पर छलाह, आ’ हुनकर शिष्य पं बालकृष्ण मिश्र ओतय प्रध्यापक छलाह। ओहि समय काशीक पण्डित-पत्रमे गंगाधर शास्त्रीक एकटा श्लोकक विषयमे बच्चा झा कहलन्हि, जे एहि श्लोकमे एकहि पदर्थ वारिधर एक बेर मृदंग बजबय बला चेतन व्यक्त्तिक रूपमे आ’ दोसर बेर वैह अम्बुद- जवनिकारूपी अचेतन रूपमे वर्णित अछि। एतय पदार्थाशुद्धि अछि। एहि पर हुनकर शिष्य बालकृष्ण टोकलखिन्ह- गुरुजी! एहिमे कोनो दोष नहि अछि। किएक तँ वारिकेँ धारण करए बला मेघ(वारिधर) केर स्थिति आकाशमे ऊपर होइत अछि, आ’ अम्बु(जल) केँ देबय बला मेघ (अम्बुद) केर स्थिति नीचाँ होइत अछि।अतः दुनूमे स्थानक भिन्नता अछि। वारिधर आ’ वारिद एहि दुनू शब्दसँ दू भिन्न अर्थ ज्ञात होइत अछि। ताहि हेतु एतय पदार्थक अशुद्धि नहि अछि। ई श्लोक निम्न प्रकारे छल:- मृदुमृदङ्गनिनादमनोहरे, ध्वनित वारिधरे चपला नटी। वियति नृत्यति रङ्ग इवाम्बुदे, जवनिकामनुकुर्वति सम्प्रति॥ म.म. शंकर मिश्र पन्द्रहम शताब्दीमे भवनाथ मिश्रक घरमे मधुबनी जिलाक सरिसव ग्राममे शंकर मिश्रक जन्म भेल। भवनाथ मिश्र बहुत पैघ नैय्यायिक छलाह आऽ कहियो ककरोसँ कोनो वस्तुक याचना नहि कएलन्हि, ताहि लेल सभ हुनका अयाची मिश्र कहए लगलन्हि। शँकर मिश्र पितासँ अध्ययन प्राप्त कएलन्हि आऽ पैघ भाए जीवनाथ मिश्रससँ विद्याक अधिग्रहण कएलन्हि। जखन शंकर मिश्र पाँच वर्षक छलाह तँ महाराज शिव सिंहक सबारी जाऽ रहल छल। राजा ओहि प्रतिभाशाली बालककेँ देखलन्हि आऽ हुनकासँ परिचय पुछलन्हि। तखन उत्तर भेटलन्हि- बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ फेर राजाक आग्रह पर ओऽ दोसर श्लोक पढ़लन्हि- चलितश्चकितच्च्हन्नः प्रयाणे तव भूपते। सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्त्राक्षः सहस्रपात् ॥ राजा प्रसन्न भए द्रव्य देलखिन्ह जाहिसँ, शंकरक माए पोखरि खुनबेलन्हि, ओऽ पोखरि एखनो सरिसबमे अछि। शंकर मिश्र महाराज भैरव सिंहक कनिष्ठ पुत्र राजा पुरुषोत्तमदेवक आश्रित छलाह। एकर वर्णन रसार्णव ग्रंथमे भेटैत अछि। शंकर मिश्र कवि, नाटककार, धर्मशास्त्री आऽ न्याय-वैशेषिक केर व्याक्याकार रहथि। शंकर मिश्र ग्रंथावली- १. १.गौरी दिगम्बर प्रहसन २. २.कृष्ण विनोद नाटक ३. ३.मनोभवपराभव नाटक ४. ४.रसार्णव ५. ५.दुर्गा-टीका ६. ६.वादिविनोद ७. ७.वैशेषिक सूत्र पर उपस्कार ८. ८.कुसुमांजलि पर आमोद ९. ९.खण्डनखण्ड-खाद्य टीका १०.१०.छन्दोगाह्निकोद्धार ११.श्राद्ध प्रदीप १२.प्रायश्चित प्रदीप। अंतिम तीनू टा ग्रन्थ धर्मशास्त्र पर लिखल गेल आऽ क्रमसँ सामवेदक अनुसारे दैनिक धार्मिक कृत्यक नियमावली, श्राद्ध कर्म आऽ प्रायश्चितिक अनुष्ठानसँ संबंधित अछि। शंकर मिश्रसँ संबंधित बहुत रास जनश्रुति प्रसिद्ध अछि। अयाची वृद्ध भए गेल छलाह, परन्तु पुत्रविहीन रहथि। पत्नी भवानी दुःखसँ काँट भए गेल छलीह। तखन अयाची मिश्र बाबा वैद्यनाथसँ पुत्रक याचना कएलन्हि आऽ हुनकर मनोकामना पूर्ण भेलन्हि-स्वयं शंकर भगवान अवतरित भेलाह आऽ ताहि द्वारे बालकक नाम शंकर पड़ल। जन्म पर गामक आया किंवा चमैन इनाम मँगलखिन्ह, मुदा परिवारक लगमे किछु नहि छल आऽ ताहि हेतु भवानी वचन देलखिन्ह जे बालकक प्रथम कमाइ अहाँकेँ दए देब। से जखन एक बेर राजा शिव सिंह खुशी भए बालककें कहलखिन्ह जे अहाँ जतेक सोना-चाँदी लए जा सकी लए जाऊ। बालक मात्र धरिया पहिरने छलाह तेँ मात्र किछु सोनाक छड़ लए जाऽ सकलाह, आऽ सेहो भवानी अपन वचनक अनुरूपें आया-चमैनकेँ दए देलखिन्ह। चमैन ओहि पाइसँ एकटा पोखरि सरिसवमे खुनबएलन्हि, जे चमनियाँ पोख्रिक नामसँ एखनो विद्यमान अछि। जनक ’वैदेह राजा’ ऋगवेदिक कालक नमी सप्याक नामसँ छलाह, यज्ञ करैत सदेह स्वर्ग गेलाह। ऋगवेदमे वर्णन अछि। ओऽ इन्द्रक संग देलन्हि असुर नमुचीक विरुद्ध आऽ ताहिमे इन्द्र हुनका बचओलन्हि। पुरोहित गौतम राहूगण ऋगवेदक एकटा महत्त्वपूर्ण ऋषि छथि। शुक्ल यजुरवेदक लेखक रूपमे याज्ञवल्क्य प्रसिद्ध छथि। शतपथ ब्राह्म्णक माथव विदेह आऽ पुराणक निमि दुनू गोटेक पुरोहित गौतम छथि से दुनू एके छाथि आऽ एतएसँ विदेह राज्यक प्रारम्भ देखल जाऽ सकैत अछि। माथवक पुरहित गौतम मित्रविन्द यज्ञक/बलिक प्रारम्भ कएलन्हि आऽ पुनः एकर पुनःस्थापना भेल महाजनक २ केर समयमे याज्ञवल्क्य द्वारा। निमि गौतमक आश्रमक लग जयन्त आऽ मिथि जिनका मिथिला नामसँ सेहो सोर कएल जाइत छन्हि, मिथिला नगरक निर्माण कएलन्हि। ’सीरध्वज जनक’ सीताक पिता छथि आऽ एतयसँ मिथिलाक राजाक सुदृढ़ परम्परा देखबामे अबैत अछि। ’कृति जनक’ सीरध्वजक बादक 18म पुस्तमे भेल छलाह। कृति हिरण्यनाभक पुत्र छलाह, आऽ जनक बहुलाश्वक पुत्र छलाह। याज्ञवलक्य हिरण्याभक शिष्य छलाह, हुनकासँ योगक शिक्षा लेने छलाह। कराल जनक द्वारा एकटा ब्राह्मण युवतीक शील-अपहरणक प्रयास भेल आऽ जनक राजवंश समाप्त भए गेल (अश्वघोष-बुद्धचरित आऽ कौटिल्य-अर्थशास्त्र) याज्ञवल्क्य याज्ञवल्क्य मिथिलाक दार्शनिक राजा कृति जनकक दरबारमे छलाह। हुनकर माताक वा पिताक नाम सम्भवतः वाजसनी छलन्हि। ओना हुनकर पिता देवरातकेँ मानल जाइत छन्हि। हुनकर माता ऋषि वैशम्पायनक बहिन छलीह। वैशम्पायन याज्ञवल्क्यक मामा छलाह संझ्गहि हुनकर गुरु सेहो। हुनकर पिता खेनाइ पुरस्कारक रूपमे बँटैत रहथि आऽ तेँ हुनकर नाम बाजसनि सेहो छन्हि। ब्यासक चारू पुत्रसँ ओऽ चारू वेदक शिक्षा पओलन्हि। यजुर्वेद ओऽ वैशम्पायनसँ सेहो सिखलन्हि, वेदान्त उद्दालक आरुणिसँ आऽ योगक शिक्षा हिरण्यनाभसँ लेलन्हि। याज्ञवल्क्यक दू टा पत्नी छलथिन्ह, १. कात्यायनी आऽ दोसर मैत्रेयी। मत्रेयी ब्रह्मवादिनी छलीह। कात्यायनीसँ हुनका तीनटा पुत्र छलन्हि- चन्द्रकान्ता, महामेघ आऽ विजय। याज्ञवल्क्य १. शुक्ल यजुरवेद, २. शतपथ ब्राह्मण, बृहदारण्यक उपनिषद आऽ याज्ञवल्क्य स्मृतिक दृष्टा/लेखक छथि। याज्ञवल्क्य स्मृतिमे आचार, व्यवहार, आऽ प्रायश्चित अध्याय अछि।राजधर्म, सिविल आऽ क्रिमिनल लॉ एहिमे अछि।कौटिल्य जेकाँ याज्ञवल्क्य सेहो मानैत छथि जे राजा आऽ पुरहित दुनू दण्डनीतिक ज्ञान राखथि। याज्ञवल्क्य राज्यक सप्तांग सिद्धांतक चरचा सेहो विस्तारमे करैत छथि। चाणक्य...कौटिल्य चाण्क्य भारतकेँ एकटा सुदृढ़ आऽ केन्द्रीकृत शासन प्रदान कएलन्हि, जकर अनुभव भारतवासीकेँ पूर्वमे नहि छलन्हि। चाणक्यक जीवन आऽ वंश विषयक सूचना अप्रामाणिक अछि। चाणक्यक आन नाम सभ सेहो अछि। जेना कौटिल्य, विष्णुगुप्त, वात्स्यायन, मालांग, द्रामिल, पाक्षिल, स्वामी आऽ आंगुल। विष्णुगुप्त नाम कामंदक केर नीतिसार, विशाखादत्तक मुद्राराक्षस आऽ दंडीक दशकुमारचरितमे भेटैत अछि। अर्थशास्त्रक समापनमे सेहो ई चर्च अछि जे नन्द राजासँ भूमिकेँ उद्धार केनिहार विष्णुगुप्त द्वारा अर्थशास्त्रक रचना भेल। अर्थशास्त्रक सभटा अध्यायक समापनमे एकर रचयिताक रूपमे कौटिल्यक वर्णन अछि। जैन भिक्षु हेमचन्द्र हिनका चणकक पुत्र कहैत छथि। अर्थशास्त्रमे उल्लिखित अछि जे कौटिल्य कुटाल गोत्रमे उत्पन्न भेलाह। पन्द्रहम अधिकरणमे कौटिल्य अपनाकेँ ब्राह्मण कहैत छथि। कौटिल्य गोत्रक नाम, विष्णुगुप्त व्यक्तिगत नाम आऽ चाणक्य वंशगत नाम बुझना जाइत अछि। धर्म आऽ विधिक क्षेत्रमे कौटिल्यक अर्थशास्त्र आऽ याज्ञवल्क्य स्मृतिमे बड्ड समानत अछि जे चाणक्यक मिथिलावासी होयबाक प्रमाण अछि। अर्थशास्त्रमे(१.६ विनयाधिकारिके प्रथमाधिकरणे षडोऽध्यायः इन्द्रियजये अरिषड्वर्गत्यागः) कराल जनक केर पतनक सेहो चर्चा अछि। तद्विरुद्धवृत्तिरवश्येन्द्रियश्चातुरन्तोऽपि राजा सद्यो विनश्यति- यथा दाण्डक्यो नाम भोजः कामाद् ब्राह्मण कन्यायमभिमन्यमानः सबन्धराष्ट्रो विननाश करालश्च वैदेहः,...। अर्थशास्त्रमे १५ टा अधिकरण अछि। सभ अधिकरण केर विभाजन प्रकरणमे भेल अछि। कौटिल्यक राज्य संब्धी विचार सप्तांग सिद्धांतमे अछि।स्वामी, अमात्य, राष्ट्र, दुर्ग, कोष, दंड आऽ मित्र केर रूपमे राज्यक सातटा अंग अछि। कऊतिल्यक संप्रभुता सिद्धांतमे राज्यक प्राशसनिक विभा वा तीर्थक चर्च अछि- ई १८ ट अछि। १.मंत्री२.पुरोहित३.सेनापति४.युवराज५.दौवारिक६.अंतर्वांशिक७.प्रशास्त्र८.संहर्त्ता९.सन्निधात्रा१०.प्रदेष्टा११.नअयक१२.पौर व्यावहारिक१३.कर्मांतिक१४.मंत्रिपरिषदाध्यक्ष१५,.दंडपाल१६.दुर्गपाल१७.अंतर्पाल१८.आत्विक। विधिक चरिटा श्रोत अछि- धर्म, व्यवहार, चरित्र आऽ राजशासन। कौटिल्यक अतरराज्य संबंध केर सिद्धांत मंडल सिद्धांत केर नामसँ प्रतिपादित अछि। विजिगीषु राजा- विजय केर इच्छा बला राजा- केर चारू कात अरिप्रकृति राजा आऽ अरिप्रकृति राजाक सीमा पर निम्न प्रकृति राजा रहैत छथि। विजुगीषु राजाक सोझाँ मित्र, अरिमित्र, मित्र-मित्र आऽ अरिमित्र-मित्र रहैत छथि आऽ पाछाँ पार्ष्णिग्राह९फीठक शत्रु), आक्रंद (पीठक मित्र), पार्ष्णिग्राहासार (फार्ष्णिग्राहक मित्र) आऽ अक्रंदसार (आक्रंदक मित्र) रहैत छथि। विजिगीषुक षाड्गुण्य सिद्धांत अछि, संधि, विग्रह, यान, आसन, संश्रय आऽ द्वैधीभाव। कऊटिल्यक अर्थशास्त्रक प्रथम अधिकरणक पन्द्रहम अध्यायमे दूत आऽ गुप्तचर व्यवस्थाक वर्णन अछि। भारतीय शिलालेखसँ पता चलैत अछि जे चन्द्रगुप्त मौर्य ३२१ ई.पू. मे आऽ अशोकवर्द्धन २९६ ई.पू. मे राजा बललाह। तदनुसार अर्थशास्त्रक रचना ३२१ ई.पू आऽ २९६ ई.पू. केर बीच भेल सिद्ध होइत अछि। मैथिली भाषापाक गजेन्द्र ठाकुर विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary at http://www.videha.co.in/ विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। मूल्यांकन अत्युत्तम- 14-15 उत्तम- 12-13 बड़-बढ़िया- 09-11 पहिल 1.अरिया-दुर्भिक्ष: क. दाही ख. रौदी. ग. आरिक एक दिशि अकाल एक दिशि नहि घ. एहिमे सँ कोनो नहि। 2. कोलपति: क. चोकटल ख. फूलल ग. मसुआयल. घ. बसिया। 3. दकचब: क. यत्र-तत्र काटब ख. तोड़ब ग.फोड़ब घ. घँसब। 4. थकुचब: क. आघात पहुँचायब. ख.फेकब, ग. लोकब. घ. खसब। 5. निहुछल: क. फेकल. ख. राखल. ग. देवताकेँ पूजब. घ. देवताक प्रदानार्थ अलगसँ राखब। 6. ओड़हा: क. बदाम भूजल(घूरमे) ख. सुखायल दाना. ग. तरल दाना. घ. भीजल दाना। 7.खखड़ी: क. दानाविहीन धान ख.दाना सहित धान. ग. उसनल धान घ. भुस्सा। 8. गोजू: क. डंटाकेँ पानिमे भेसू. ख. डंटाकेँ जमीनमे भेसू. ग. डंटाकेँ हवामे भेसू. घ. डंटाकेँ आगिमे भेसू। 9. बर्जब: क. त्यागब. ख. आनब. ग. सहब. घ. हँसब। 10. सिटब: क. फेँकब ख. आनि कए राखब. ग. आनि कए फेंकब. घ. विन्यासयुक्त्त करब। 11. खुटब: क. लटकायब. ख. सुखायब. ग. खुट्टा गाड़ि नापब. घ.एहिमे सँ कोनो नहि। 12. गेँटब: क. एम्हर-ओम्हर एकत्र करब ख. तराउपड़ी एकत्र करब.ग. एक पंत्तिमे राखब. घ. एहिमे सँ कोनो नहि। 13. डपटब: क. हँसब. ख. कानब. ग. तमसायब घ. दुलार करब। 14. खटब: क. आलस्य करब. ख. फुर्ती करब. ग. अनवरत कार्य करब. घ. एहिमे सँ कोनो नहि। 15. हँटब: क. भागब. ख. दूर जायब. ग. दबाड़ब. घ. हँसायब। उत्तर मैथिली भाषापाक (1) केर उत्तर: 1. ग. (खेतक आरिक एक दिशि नीक खेती एक दिशि नहि)। 2. क. चोकटल आम। 3. क. यत्र-तत्र काटब। 4. क. आघात पहुँचायब. 5. घ. देवताक प्रदानार्थ अलगसँ राखब। 6. क. बदाम भूजल(घूरमे)-खेतमे। 7. क. दानाविहीन धान(दुद्धा धान बाढ़िक पानिमे पूराडूबि गेलाक परिणाम)। 8. क. डंटाकेँ पानिमे भेसू। 9. क. त्यागब। 10. घ. विन्यासयुक्त्त करब। 11. ग. खुट्टा गाड़ि नापब। 12. ख. तराउपड़ी एकत्र करब। 13. ग. तमसायब। 14. ग. अनवरत कार्य करब। 15. ग. दबाड़ब। दोसर 1.गतानब: क. खाट तानब ख. खाट खोलब. ग. खाट तोड़ब घ. एहिमे सँ कोनो नहि। 2. पलानिकेँ: क. कुमनसँ ख. यत्नपूर्बक ग. सोचि कए. घ. एहिमे सँ कोनो नहि। 3. टोनब: क. गाछ रोपब ख. गाछ जरायब ग.गाछ रोपब घ. डारि खण्ड करब। 4. अकानब: क. कान काटब. ख.कान लग बाजब. ग. ध्यान नहि देब. घ. कान पाथब । 5. गुदानब: क. देखब. ख. ध्यान राखब. ग. उपेक्षा करब. घ. मोजर देब। 6. उसनब: क. पानिमे आगिसँ सिद्ध करब ख. भुजब. ग. सुखायब. घ. एहिमे सँ कोनो नहि।। 7.बिधुनब: क. सरियायब ख.फेंकब. ग. उनटब-पुनटब घ. गेंटब। 8. पटब: क. लड़ब. ख. झगड़ा होएब. ग. मिलान नहि होयब. घ. मिलान होयब। 9. बिनब: क. नुआ बीनब-बनाएब. ख. नुआ सुखायब. ग. नुआ जराएब. घ. नुआ धोब। 10. खुनब: क. कोड़ब ख. चास देब. ग. पटाएब. घ. जोतब। 11. तुनब: क. कपड़ा बीनब. ख. कपड़ा सीब. ग. तूर तुनब. घ.भाड़ घोंटब। 12. बुनब: क. बीआ बाउग करब ख. बीआ उखाड़ब.ग. बीआ दहाएब. घ. एहिमे सँ कोनो नहि। 13. लुबधब: क. अरबधब. ख. सोहड़ि जाएब. ग. विहीन होएब घ. दुलार करब। 14. अरबधब: क. अवश्य करब. ख. फुर्ती करब. ग. अनवरत कार्य करब. घ. एहिमे सँ कोनो नहि। 15. छपब: क. तिरोधान होएब. ख. दूर जायब. ग. दबाड़ब. घ. हँसायब। उत्तर मैथिली भाषापाक (२) केर उत्तर: 1. क. खाट तानब । 2. ख. यत्नपूर्बक । 3. घ. डारि खण्ड करब। 4. घ. कान पाथब । 5. ग. उपेक्षा करब । 6. क. पानिमे आगिसँ सिद्ध करब । 7. ग. उनटब-पुनटब । 8. घ. मिलान होयब। 9. क. नुआ बीनब-बनाएब । 10. क. कोड़ब । 11. ग. तूर तुनब । 12. क. बीआ बाउग करब । 13. ख. सोहड़ि जाएब । 14. क. अवश्य करब । 15. क. तिरोधान होएब । तेसर 1.तग्गर: क. खाट ख. बाट. ग. पेय पदार्थ घ. एहिमे सँ कोनो नहि। 2. दोमब: क. हिलायब ख. यत्नपूर्बक सोचब ग. सोचि कए करब . घ. एहिमे सँ कोनो नहि। 3. ओधि: क. बाँसक जड़ि ख. गाछ जरायब ग.गाछ रोपब घ. डारि खण्ड करब। 4. पेटाढ़: क. कान काटब. ख. गँहीर बासन. ग. ध्यान नहि देब. घ. कान पाथब । 5. दौरा: क. देखब. ख. ध्यान राखब. ग. उपेक्षा करब. घ. उत्थर् पात्र। 6. मेघडम्बर: क. छाता ख. भुजब. ग. सुखायब. घ. एहिमे सँ कोनो नहि।। 7.बँसबिट्टी: क. सरियायब ख.फेंकब. ग. बाँसक बोन घ. गेंटब। 8. जाबी: क. लड़ब. ख. झगड़ा होएब. ग. जालाकार पात्र. घ. मिलान होयब। 9. कनसुपती: क. नुआ बीनब-बनाएब. ख. नुआ सुखायब. ग. नुआ जराएब. घ. सुखायल बाँसक पात। 10. छिट्टा: क. कोड़ब ख. चास देब. ग. पथिया. घ. जोतब। 11. दाबि: क. कपड़ा बीनब. ख. पैघ कत्ता. ग. तूर तुनब. घ.भाड़ घोंटब। 12. बोनि: क. बीआ बाउग करब ख. बीआ उखाड़ब.ग. बीआ दहाएब. घ. मजदूरी। 13. छोँपब: क. अरबधब. ख. सोहड़ि जाएब. ग. ऊपरसँ काटब घ. दुलार करब। 14.करची: क. अवश्य करब. ख. ऊपरसँ काटब. ग. बाँसक पातर शाखा. घ. एहिमे सँ कोनो नहि। 15. भालरि: क. तिरोधान होएब. ख. केराक पात. ग. दबाड़ब. घ. हँसायब। उत्तर मैथिली भाषापाक (२) केर उत्तर: 1. ग. पेय पदार्थ । 2. क. हिलायब । 3. क. बाँसक जड़ि । 4. ख. गँहीर बासन । 5. उत्थर् पात्र। 6. क. छाता । 7. ग. बाँसक बोन । 8. ग. जालाकार पात्र । 9. घ. सुखायल बाँसक पात। 10. ग. पथिया । 11. ख. पैघ कत्ता । 12. घ. मजदूरी । 13. ग. ऊपरसँ काटब । 14 . ग. बाँसक पातर शाखा । 15. ख. केराक पात । की अहाँकेँ बुझल अछि? 1.महात्मा गाँधी 15 अगस्त 1947 केँ कलकत्तामे रहथि आ’ भरि दिन उपास आ’ प्रार्थनामे बितओलन्हि। 2.विश्वक सभसँ पैघ कैंटीलीवर पुल ( दू टा बेम बीचमे योज्यसँ जुड़ल आ’ ऊपरमे लोहाक रस्सा सभसँ बैलेंस कएल) कनाडाक क्यूबेक पुल छैक। ई पुल क्यूबेक नगरक पश्चिममे सेंट लॉरेन्स धार पर अछि। 3. लिमिटेड लायबिलिटी कंपनीक पाँछा ltd लगैत छैक। तहिना जर्मनीमे एकरा हेतु एहि हेतु Gmbh , इटलीमे SpA आ’ संयुक्त्त राज्य अमेरिकामे LLC लगैत छैक। श्री मैथिली पुत्र प्रदीप (१९३६- )। ग्राम- कथवार, दरभंगा। प्रशिक्षित एम.ए., साहित्य रत्न, नवीन शास्त्री, पंचाग्नि साधक। हिनकर रचित "जगदम्ब अहीं अवलम्ब हमर’ आऽ ’सभक सुधि अहाँ लए छी हे अम्बे हमरा किए बिसरै छी यै" मिथिलामे लेजेंड भए गेल अछि। आध्यात्म ॐ (मा) एकटा प्रश्न उठि सकैछ, जे मोक्ष कामीक लेल वैदिक कर्मक प्रयोजन? एकर उत्तर ई भऽ सकैछ जे यज्ञ यागादि कर्मक फलश्रुतिमे स्वर्ग प्राप्त करबाक बात कहल गेल अछि। मुदा जे व्यक्ति स्वर्ग नहि चाहैत होथि, मोक्षेटा चाहैत होथि, हुनका लेल वैदिक कर्मक आवश्यकता, ई वृहदारण्यकोपनिषद केर वचनसँ पुष्ट होइत अछि। यथा- “ तमेतं वेदानु वचनेनं ब्राह्मणाः विविदिषन्ति यज्ञेन, दानेन तपसा नाशकेन”। अर्थात्- ब्राह्मणगण वेदाध्ययनसँ कामनारहित यज्ञ, दान एवं तपसँ ओहि ब्रह्मकेँ चिन्हबाक इच्छा करैत छथि। एहि वचनमे अनाशकेन अर्थात् कामनारहित “यज्ञ, दान, तप” विशेष महत्त्व रखैत अछि। तात्पर्य जे वेदोक्त यज्ञादि कर्म जखन आशक्तिक संग कएल जाइत अछि, तखन ओहिसँ मात्र स्वर्गक भोग प्राप्त होइत अछि। परन्तु जखन बिना आशक्ति रखने निःस्वार्थ भावसँ कयल जाइत अछि, तखन काम-क्रोधसँ मुक्त भऽ कऽ कार्य केनिहारक चित्त शुद्ध भऽ जाइत अछि। ओऽ मोक्षक अधिकारी भऽ जाइत छथि। श्रीमद्भगवदगीतामे भगवान् श्रीकृष्णक उक्ति अछि- अध्याय १८ (५-६) यज्ञदान तपः कर्म न साज्यं कार्यमेव तत। यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥ एतान्यापित कर्माणि संगं त्यक्त्वा फलानि च। कार्व्यानीति मे पार्थं निश्चितं मतमुत्तमम॥ अर्थात्- यज्ञ, दान, तप आदि कर्मक त्याग नहि करबाक चाही। मुदा ई समस्त कर्म निष्काम भावसँ करबाक चाही। अतएव उपनिषदक ’अनाशकेन’ एहि पदकेँ एहिठाम गीताक संगं त्यक्त्वा फलानि च पुष्ट करैत अछि। अतएव जे मनुष्य अपन आन्तरिक कल्याण चाहैत छथि अर्थात् जन्म-मृत्युक बन्धनसँ मुक्त हेबाक इच्छा करैत छथि, हुनका वैदिक कर्मकाण्डक फलस्वरूप स्वर्गक भोग केर इच्छा नहि राखि कऽ निष्काम भावसँ भगवानक प्रसन्नताक लेल मात्र कार्य करबाक चाही। ई बात मुण्डकोपनिषदमे सेहो आयल अछि। १,२,७. मनुष्यक चित्त अनेक प्रकारक कुकर्मसँ मलिन भऽ गेल रहैत अछि। एहि सभ मैलकेँ हटेबाक लेल सत् कर्म करब आवश्यक अछि। एहि सत्कर्मकेँ करबाक उद्देश्य होइत अछि वैदिक कर्म काण्ड। वेदोक्त कर्म कएलासँ चित्त शुद्ध होइत अछि। जकर बाद ब्रह्म विद्या अथवा ज्ञानक बात सुनलासँ सुफल भेटैत छैक। उपनयन संस्कारक बाद वेदोक्त कर्म करबाक लोक अधिकारी होइत छथि। वेदक अन्तिम लक्ष्य मोक्षे प्राप्त करब थीक। ईश्वरक उपासना योगक अभ्यास, धर्मक अनुष्ठान, विद्या प्राप्ति, ब्रह्मचर्य व्रतक पालन तथा सत्संग आदि मुक्तिक साधन गानल गेल अछि। कर्मफलक प्राप्तिक हेतु पुनर्जन्मक प्रतिपादन आत्मोन्नत्तिक लेल संस्कारक निरूपण, समुचित जीवन-यापन हेतु वर्णाश्रमक व्यवस्था एवं जीवनक पवित्रता हेतु भक्ष्या-भक्ष्यक निर्णय करब वेदक मुख्य विशेषता थीक। कर्मकाण्ड, उपासना-काण्ड तथा ज्ञान-काण्ड एहि तीनूक वर्णन मुख्यतया वेदमे भेटैत अछि। यज्ञान्तर्गत देवताक पूजा, ऋषि-महर्षिक सत्संग तथा दान ई तीनू क्रिया एक संग होइत अछि। तहिना ब्रह्मचर्य पालनसँ ऋषि-ऋण, यज्ञ द्वारा देव-ऋण तथा संतानोत्पत्तिसँ पितृऋण मुक्त हेबाक आदर्श वाक्य वेदेमे प्राप्त होइत अछि। यज्ञ दू प्रकारक होइत अछि। एक नित्य यज्ञ दोसर नैमित्तिक यज्ञ। नित्य यज्ञ केलासँ कोनो प्रत्यक्ष फल देखबामे तँ नहि अबैत अछिमुदा नहि केलासँ पाप लगैत अछि। जेना सन्ध्या वन्दनमे स्नान, ध्यान, गायत्री, जप, सूर्योपासना आदि नित्यकर्म थिक। पञ्च-महायज्ञमे पवित्र ग्रन्थक अध्ययन, हवन, देवार्चन, माता-पिताक सेवा, गुरु-पितरक प्रति श्रद्धा आदि भूत यज्ञमे सभ प्राणीक प्रति दया एवं भूखलकेँ भोजन आदि। पितृ यज्ञ जेना पिण्डदान, श्राद्ध एवं तर्पण आदि। मनुष्य यज्ञ जेना अतिथि सेवा आदि। नैमित्तिक यज्ञ दू प्रकारक होइत अछि- (1) श्राद्ध- ई श्रुति प्रतिपादित यज्ञ थीक। एहिमे मात्र वैदिक मन्त्र द्वारा कर्म होइत अछि। (२) स्मार्त यज्ञ- एहिमे वैदिक ओऽ पौराणिक एवं तांत्रिक एहि तीन मन्त्रक प्रयोग होइत अछि। वेदमे वैदिक देवताक स्तुतिक संगहि लौकिक एवं धार्मिक विषयसँ सम्बन्धित अनेक आध्यात्मिक एवं महत्त्वपूर्ण शक्ति अछि। एहिमे नासदीय सूक्तक विषेष महत्त्व अछि। जतऽ सृष्टिक मूल तत्त्व केर गूढ़ रहस्य प्रतिपादित भेल अछि। एकर प्रथम भागमे सृष्टिसँ पूर्वक स्थितिक वर्णन अछि। जाहि समयमे सत्, असत्, मृत्यु, अमरत्व एवं राति-दिन किछु नहि छल। ने अन्तरिक्ष छल ने आकाश छल। ने कोनो लोक छल ने जल छल। ने कोनो भोगक वस्तु छल ने कियो भोग केनिहार छल। मात्र सर्वस्व अन्हारे अन्हार छल। किन्तु नाम रूपादि विहीन एक मात्र अदृश्य सत्ता छल। ओहि अदृश्य सत्ताक महिमासँ संसारक कार्य प्रपञ्चक प्रादुर्भूत भेल। एकर तेसर भागमे सृष्टिक दुर्ज्ञेयताक निरूपण अछि। समस्त ब्रह्माण्डमे एहन कियो नहि छथि, जे ई कहि सकथि जे ई सृष्टि कोना उत्पन्न भेल। सृष्टिक पल गूढ़ तथ्यक रहस्यकेँ जे कियो जनैत छथि तँ मात्र ओऽ जे एहि समस्त सृष्टिक अधिष्ठाता थिकाह। ओऽ स्वयं वेद स्वरूप ब्रह्म छथि। एहि नासदीय सूत्रक गणना विश्वक शिखर साहित्यमे होइत अछि। एहिमे आध्यात्मिक धरातल पर ब्रह्माण्ड केर एकताक भावना स्पष्ट रूपसँ अभिव्यक्त भेल अछि। भारतीय क्षितिज पर मिथिलाक संस्कृतिमे ई धारणा निश्चित अछि जे ब्रह्माण्डमे एकेटा सत्ता विद्यमान अछि। जकर ने कोनो नाम अछि, ने रूप अछि। एहि सूक्तमे एहि सत्ताक अभिव्यक्ति भेल अछि। गायत्री मंत्र जे वेदक मूल रूप थीक तकरा आइ ईर्ष्यावशात् प्रतिस्पर्धी भावनासँ विद्रूप कएल जाऽ रहल अछि। जहिना अनभिज्ञ अनधिकारिक हाथमे आइ विज्ञानक दुरूपयोग भऽ रहल अछि। तत्सवितुर्वरेण्यम् भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात् – ऋगवेदक एहि मन्त्रक अर्थ होइत अछि जे “ हे सच्चिदानन्द परमात्म, अपनेक प्रेरणादायी विशुद्ध तेजकेँ हम अपन हृदयमे नित्य ध्यान करैत छी। जाहिसँ हमर सद्बुद्धि निरन्तर अपनेसँ प्रेरित होइत रहय एवं हमर कुमार्गसँ रोकि कऽ प्रकाशमय शुभ मार्ग दिस प्रेरित करैत रहय।ई समस्त वेद मन्त्रमे सर्वोपरि अछि। श्रेष्ठ ऋषिगण अधिकार प्राप्त ब्राह्मणकेँ एहिसँ विभूषित कऽ जीव सेवाक निमित्त तैयार केलनि। एहिमे आदेश अछि जे ब्राह्मणकेँ एहि महान साधनाक फलसँ समस्त समाजक कल्याण कामना करबाक चाही। कारण जे एकर् अधिकारी नहि छथि, मुदा अधिकारीक प्रति श्रद्धा रखैत छथि तथा ओहि अधिकारीकेँ अपन शारीरिक सेवासँ सहयोग करैत छथि हुनको कल्याण हेबाक चाही। एकर संगहि वेदमे किछु एहन व्यावहारिक मन्त्र सभ अछि जे समस्त समाजक लेल परम उपयोगी अछि। जेना ऋगवेदक १०, ३४/१३ मे अछि अश्वैर्मादीव्यः। अर्थात् जुआनदिग्रहनक तात्पर्य जे जुआ नहि खेलेबाक चाही। हिन्दू शिरोमणि सम्राट युधिष्ठिर जुआ खेलेलाह, समस्त राजपाटक संगहि पत्नी तककेँ दाओ पर लगा देलनि आऽ हारि गेलाह। भगवान् श्रीकृष्ण जे भक्तक प्रेममे रथक सहीस तक बनि गेल छला से मूक-दर्शक रहलाह। किये जानि-बूझि नर करहि-ढ़िठाई- ताको नर्क लिखा है भाई॥ अवश्यमेव भोक्तव्यं क्रितेक शुभाशुभम्। अशुभ कर्म करबैक तँ फल अशुभ हेबे करत। पवित्र कर्म करब तँ भगवान् मदति करबे करताह। तहिना यजुर्वेदमे अछि- ४०/९/ मा गृधः कस्यस्विद्धनम। अर्थात्- ककरो वस्तु नहि चोरेबाक चाही। पुनः अथर्ववेदमे अछि ६/२ “मा हिंसी पुरुषन्पशूंश्च” अर्थात्- मनुष्य सहित कोनो जीवकेँ (पशु, पक्षी, कीट, पर्वतादि) केँ कष्ट नहि दी। तहि सामवेदमे अछि-१५/६० मे जे भद्रं मनः कृणुष्न। हे प्रभु! अपने हमर मनकेँ कल्याण मार्ग दिस प्रेरित करी। एतावता भारतीय वेदमार्गक परिशुद्द रूप मिथिला ग्रहण कयने छल। तकरे प्रतिफलमे वेदजननी गायत्री स्वयं सीता बनिकए मिथिलामे अवतरित भऽ गेल छली। धनाकर ठाकुर प्रज्वलित प्रज्ञा (पूर्व राष्ट्रपति डा॰ कलामक पोथी Ignited Minds क डा॰ नित्यानन्द लाल दास द्वारा मैथिली अनुवाद) क समीक्षा ई ओहि पोथीक अनुवाद अछि जकरा 2002 ई॰ मे पढ़ि देशक राजनेता सोचने हेताह जे कलाम जँ राष्ट्रपति हेताह तँ ओ भारतकेँ विकासक ओहि मिसाइलक ऊँचाइ तक लए जेताह जाहि लेल ओ विख्यात छथि। ओहि पोथीक अनुवाद 2008 ई॰ मे पढ़ि कय अनुवादकक अथाह परिश्रमक संग-संग मूल पोथीक भावना पर सेहो भाव उठब स्वाभाविक अछि कारण जाहि 2020 ई॰क विकसित राष्ट्रक सपनाक कलाम एहि पोथीक कथ्य बनौलाह ओकर प्रायः आधा समय बीति चुकल अछि आ‘ जकर प्रायः आधा समय ओ स्वयं राष्ट्रपति रहलाह आ‘ जाहिमे आधा समयसँ स्वयं बाजपेयी सन प्रखर राष्ट्रीय व्यक्ति प्रधानमंत्री रहलाह आ‘ आधा समय डा॰ मनमोहन सिंह सन प्रखर अर्थ विषेशज्ञ व्यक्ति प्रधानमंत्री रहलाह। प्रस्तुत पोथीक दूई आधार छैक राष्ट्रीय भावना आ‘ विकसित अर्थ व्यवस्थाक सपना। भारतकेँ 2020 ई॰ तक जँ चारिम वा पाँचम विकसित अर्थ व्यवस्थाक सपना छैक तऽ आइ ओ कतऽ अछि। लगैत अछि स्वयं राष्ट्रपति बनि कलाम ओ समय बेकार कए लेलथि जे ओ नेना आ‘ युवा सभकेँ पदविहीन रहि उत्साहित केने रहितथि कारण एहि देशमे ऋषिक स्थान राजभवन नहि छैक। मुदा ताहिसँ कलामक अनुभूतिक मूल्य नहिं घटि जाइत छैन्हि आ‘ वैह प्रस्तुत पोथीक 2008 ई॰ मे अनुवादक औचित्य प्रमाणित करैत अछि। पोथीक जन्म जाहि झारखंडक बोकारोक एक हेलीकॉप्टर दुर्घटनासँ होइत अछि ओहि झारखंडक लेल देखल कलामक सपना एखनहुँ सपना अछि कारण राजनेताक चयन आ‘ प्रषिक्षण ओहि आधार पर नहिं होइत छैक जेना अन्तरिक्ष आ‘ रक्षा संधानमे कलामक अनुभव छलैन्हि।, दुर्घटनाक बाद ओ देखलाह बोकारोमे आगिक नदीक रूपमे बनैत स्टील देखलन्हि। झारखंडमे स्टीलक उपयोगी सामान बनैत तऽ अधिक लाभ एतुक्का लोककँे भेटतैक से दिल्ली उड़ानक मध्य सोचैत रहलाह। 116 पृष्ठक लघु पोथीमे पृष्ठ 96-102 मध्य ओ झारखंडरूपमे ‘एक नब राज्यक निर्माण‘ मे एहि राज्यक मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी द्वारा हिनका संरक्षक, विज्ञान प्रौद्यौगिकी परिषदक बनौला पष्चात एतुक्का प्रचूर वनौषधिक विकासक चर्चा करैत सेगहि क्षुद्र व्यापारिक लाभ लेल दुर्लभ प्राकृतिक संसाधनकेँ औद्यौगीकरणसँ नष्ट हेबाक शंका करैत छथि। षिक्षा आ‘ स्वास्थ्य पर केन्द्रित प्रो॰ बसुक नेतृत्वमे पहाड़ी भ्रमणक चर्चा त अछिए आ‘ चिन्मय विद्यालय, बोकारोक चर्चा छात्रसबसँ बातक सविस्तर चर्चा अछि जाहि मध्य हुनक रामेष्वरमसँ आएल फोन पर बात करक बाध्यता जे ओ दुर्घटनामे सुरक्षित छथि पर, ‘जेठ भाई ताजिनगी जेठ बनल रहैत छथि‘ एक सहज टिप्पणी अछि। बोकारोक सभा भवनमे ओ कहलाह केना बेरीलियम डायफ्राम नहि भेटला पर देशहिंमे गुण अभिवर्द्धन कएलन्हि। गांधी, आइन्सटीन, अशोक, उमर खलीफा, लिंकन सन पांच सर्वोत्तम मानव के ओतहि दवाइ प्रभावे देखल सपनाक बातसँ प्रारम्भ भेल पोथी सपना, त्रिपुरासँ प्रारम्भ भेल नेना छात्रसभक संग हुनक प्रष्नक उत्तर आ‘ नेताक त्रिकोणमे झूलैत अछि जाहिमे वैज्ञानिक कलाम एक चिन्तकक रूपमे उभरलाह अछि। कोनो नेनाक प्रष्न पाकिस्तानक शस्त्रास्त्रसँ भारतक ‘शास्त्रास्त्र‘ श्रेष्ठ वा नहिं (पृष्ठ 33) क कलामक जे उत्तर हो प्रूफ अषुद्धि रहितहुँ भारतक ‘शास्त्रास्त्र‘ श्रेष्ठ उत्तर रहैत। आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त, भास्कराचार्यक काल प्रूफ अषुद्धि भनहिं (पृष्ठ 37 ई॰र्पू॰ नहिं बाद हेबाक छल) हो ई हमर देशक ओ गौरव चित्र उपस्थित करैत अछि जाहि पर विकसित भारतक निर्माण सम्भव अछि। जगदीश चन्द्र बोस, रामण, मेघनाथ साहा, श्रीनिवास रामानुजन, के बाद नब रामानुजनक ताकक कलामक आग्रह सटीक अछि। 1910 सँ 1925क बीच 5-6 एहन अन्तरराष्ट्रीय व्यक्तित्व विविध क्षेत्रमे आबि गेलाह जाहिसँ हमर सभक प्रतिष्ठा बढ़ि गेल। बादमे कोठारी, भाभा आ साराभाई सन वैज्ञानिक जकर आधारषिला रखलाह ओ सभ फलित भेल धवन आदि द्वारा। परियोजना हमेषा परियोजना नायकसँ पैघ रहैत अछि।(पृष्ठ 45)। ‘हमरो लोकनि ई कए सकैत छी‘ ई कलामक टीम देखौलथि।(पृष्ठ 47) आ‘ रूसक डा॰ योफ्रोमोपक संग ब्रह्मपुत्र आ‘ मास्को पर ‘ब्रह्मोस‘ प्रक्षेपास्त्रक नाम रखलन्हि (पृष्ठ 48) ओना ‘ब्रह्मोल्गा‘ यदि वोल्गा नदीसँ लेल गेल रहैत तऽ अधिक समीचीन होइत जेना बीजू पटनायक कहियो ने केवल उड़ीसासँ स्वयं विमान चला इंडोनेषिया जा राष्ट्रपति सुकार्णोकेँ बेटी हेबापर बधाइ देब गेलाह आ‘ ओहि दिन लागल मेघ कारण मेघावती नामकरणहुँ केने छलाह (पृष्ठ 69) जे बादमे राष्ट्रपतियो भेलीह आ‘ कइएक मामलामे बदनाम। ओना बीजू पटनायकक भारतक आइसीबीएन क्षमता लेल व्यग्रता देखबैत अछि ओहि कालक नेताक ऊँचाइक। कुरियनक ‘एन अनफिनिस्ड ड्रीम‘ मे हुनक सुनल ‘लंदनक नालीक पानि जीवाणुसभक दृष्टिएँ मुम्बईक दूधसँ उत्तम अछि‘ (पृष्ठ 48) हूनका देशमे ‘श्वेत क्रांति‘ अनएकेँ प्रेरणा देलकैन्हि। डा॰ सुब्बारावक कैन्सरसँ वचाब पर ‘हँ‘ वा ‘नहिं‘ सँ कलाम प्रेरित भेलाह। दूरदृष्टि आ‘ मेधाक समागम कलाम जे॰आर॰डी॰ टाटा, विक्रम साराभाई, कुरियन, सतीश धवन आदि वैज्ञानिकमे देखैत छथि मुदा जखन ओ गुजरातक संत स्वामीनारायणक समक्ष षिक्षा ओ स्वास्थ्य,कृषि,सूचना ओ संचार, महत्वपूर्ण प्रौद्यौगिकीक पंचसूत्रीय मिशन भारतकेँ विकसित बनेबाक रखलन्हि तऽ स्वामीजीक छठम ईष्वरमे आस्था ओ आध्यात्मिक आधार पर मनुष्यक विकास जे षास्त्रीय नियम ओ ईष्वरीय निष्ठा पर आधारित हो कारण भारतमे अपरा(भौतिक) आ परा (आध्यात्मिक) दूनू आवष्यक मानल गेल अछि। कलाम पुण्य आत्मा, पुण्य नेता आ‘ पुण्य अधिकारी छलाह जे ‘तिरूकुरल‘ क भाव असफलताकेँ प्रसन्न भावसँ लेबक अनुसारे राकेटक पहिल असफल प्रक्षेपनसँ निराश नहि भेल छलाह। हुनका अजमेरमे गरीबनमाज आ‘ पुष्करक समान षांतिक संदेश आ तहिना कांची परमाचार्यक ग्रामीण विकासमे रूचि आ‘ ओतुक्का बगलक पुरान मस्जिदक सामंजस्य प्रभावित केलकैन्हि कहियो हुनक पिता रामेष्वरममे समुद्रमे एक मचानसँ खसल देवमूर्तिकेँ तुरन्त फानि निकालि प्रथम दर्शनक अधिकारी बनल छलाह। कलाम माउन्ट आबूमे ब्रह्माकुमारीसँ शान्तिक पाठ मध्य ‘भारतभूमि सभसँ सुन्दर बनत सुनि‘ मुदित भेलाह आ‘ ओ सत्य साईंक चिकित्सा संस्थान आ‘ चेन्नई लेल जलक व्यवस्थासँ आह्लादित भेलाह। त्रिशूल, आकाश, नाग, पृथ्वी, अग्नि, ब्रह्मोस, पिनाक, लक्ष्य नामक प्रखेपास्त्र बनबएबला कलाम एक छात्रकेँ उत्तर देलखिक्ष्ह ‘शक्तिए शक्तिक सम्मान करैत अछि नहिं कि शक्तिहीनक। डा अमर्त्य सेनसँ असहमत होइत बजलाह ओ भारतकेँ पष्चिमीय नजरिसँ देखैत छथि।‘ पूर्व एडमिरल रामदासक परमाणु परीक्षणक विरूद्ध राजघाट पर धरनाक बात सुनि बजलाह ओ धरना लेल व्हाइट आउस आ‘ क्रेमलिन पर पहिने प्रदर्षन करथु जे हजारो परमाणु बमक क्षमता रखने छथि। अनप उपलव्धि पर गर्व, एकत्व, समवेत पराक्रमक योग्यता सँ जँ भस्मीभूत जर्मनी महान भए सकैत अछि तऽ भारत किएक नहिं? कृषि, श्रम,पूंजी क बाद ज्ञान सामाजिक परिवर्तन आ धनक उत्पादन आई॰ टी॰ , बायोटेक्नालाजी आदि द्वारा होएत। 90 वर्षीय सुब्रह्मण्यममे ओ द्वितीय हरित क्रांतिक सपनासँ आ‘ 80 वर्षीय डा॰ महालिंगम जे 2000 वर्ष पूर्वक द्वितीय संगमक तमिल लिपि पढ़ने छलाहकेँ 5000 वर्ष पूर्वक प्रथम संगमक तमिल लिपि पढ़बाक सपनासँ कलाम अभिभूत भेलाह। ग्रामीण-नगरीय देषान्तरगमन षुन्य केना हो कलाम चिन्ता लेल आई॰ आई॰ टी॰ चेन्नई क उत्तर इन्दिरेशक ग्राम काया कल्प योजना लगलैन्हि । मदुराईमे ओ डा॰ नचियार लग लाइ्रनमे लागि अपन आँखि देखेनाइ पसन्द केलप्हि। देशमे 20 टा आओर आई॰ आई॰ टी॰ एवे अनेक चिकित्सा संस्थानक ओ जरूरत बुझलाह। विप्रोक अजीम, इन्फोसिसक नारायणरमूर्र्ति क अलावे रतन टाटाक कारक उपाख्यान संक्षेपमे ओहि सभ गोटेक सेग हुनक क्षणक चर्चा अछि एहि पोथीमे जे वर्तमानमे महत्वपूर्ण छथि। 20 वर्षमे भारत कोना विकसित देश बनत जे हम भारतक हम गीत गाबी विदेशक नहिं। चंडीगढक एक छात्रक एहि लेल प्राध्यापक बनब हुनका नीक लगलैन्हि तऽ चदुच्चेरीक एक उत्तर ‘एकाकी पुष्प पुष्पहार नहि बनबैत अछि। आ‘ तहिना गोवासँ एक उत्तर जे ओ एक इलेक्ट्रान जकाँ घुमैत रहत। अटलांटासँ एक अनिवासी भारतीयक उत्तर कलामकेँ नीक लगलैन्हि,‘जखन भारत कोनो दोसर देशक प्रति प्रतिबन्ध लगाएत तऽ हम सोहर गायब।‘भ् भारतक 35 वर्षसँ कमक 70 कोटि युवा कलामक विष्वासक कारण छथि। पारदर्षी भारत लेल अभियान ओहिना हो जेना स्वतंत्रता लेल भेल छल कारण पारदर्षिंता विकासक आधारषिला अछि। विकसित देशक कारण ओकर स्थिर विकासक उच्च दर अछि जे सिंगानुर लेल प्रथत आ‘ फेर अमेरिकाष् हांगकांगष् ताइवान, कनाडा लेल अछि। ब्रिटेन आठम, फ्रांस 23म, जर्मनी 25म आ‘ भारत 59म पर अछि। जी॰ डी॰ पी॰ मे भारत 75म पद अछि जे चारिम वा पांचम केना होए से विचारणीय। दायित्वधारी युवा नागरिक चाही जे बुझथि एकसरे काज नहि होइत छैक मुदा सहयोगसँ होइत छैक। सिलिकॉन वैलीक चन्द्रषेखर कहलखिन्ह जे खतरा मोल लेब हुनका नीक लगैत छैन्हि। कलाम अपन ओहि दिनकेँ याद केलथि जहिया मद्रासमे हुनक षिक्षक डा॰ श्रीनिवास कहलखिन्ह जँ तीन दिनमे काज पूरा नहि होएत तऽ हुनक छात्रवृर्ति बन्द। काज भेला पर प्रषंसा सेहो केलखिन्ह। कलामक कथन जे संकट घड़ीमे मानव प्रज्ञा प्रज्वलित भए उठैत अछि जतए सही ओतहि इहो जे एहने षिक्षक कलाम उत्पन्न करैत छथि राजनेता नहि तेँ षिक्षक कलाम सफल मुदा राजनेता कलाम असफल । इ सत्य जे असफल भेनहुँ अनुभव जरूर भेटैत छैक।(पृष्ठ 105) ष्‘कार्यं साधयामि वा शरीरे पातयामि‘ क संग अभियान संगठनसँ पैघ, संगठन संचालकसँ पैघ। टाटा, पी सी राय आदि पराधीन भारतमे राह देखौलथि। बी॰ एच॰ यू॰, ए॰ एम॰ यू॰ आदि बनल। हमरासभकेँ विकसित राष्ट्रक गौरव हो, पुनर्जन्म लए भारतक यषोगाथा गाबी लिखैत कलाम अपन धार्मिक विष्वाससँ ऊपर उठि जाइत छथि आ पोथीक समापन इन्टरनेट पर दू नेनाक ब्रह्म आ‘ आत्मा पर संवादसँ करैत कोलकाताक एक छात्र सर्वाननक प्रष्न ‘पीपर गाछक शक्ति ओकर निहित ओकर बीयामे मुदा सब कीयाकेँ अवसर कियैक नहि‘ के सुलझेबाक लेल देशक विभिन्न क्षेत्रक लाखों छात्र लग जेबाक निष्चय कए ष्‘हम ओ हमर राष्ट्र भारत‘ क युवा गीतसँ करैत छथि जे हमर देश विकसित देश हो। ‘प्रज्वलित प्रज्ञा‘ पोथी संग्रहणीय अछि। ओना कागद किछु दब मुद्रक द्वारा देल गेल अछि। सीमित प्रतिक पोथी प्राप्ति लेल मूल्य 150 टाका मनीआर्डरसेँ एहि पता पर पठौलासेँ डा॰ नित्यानन्द लाल दास, आचार्यपुरी, फारबिसगंज 854318 संपर्क मोबाइल 9430467019 जगदीश प्रसाद मंडलक “ गामक जिनगी” श्री जगदीश प्रसाद मंडलक “ गामक जिनगी” कथा संग्रहमे 19 कथा छनि। कथा सभक शीर्षक बहुत छोट राखव लेखकक विशेषता छनि मुदा एहि कारणे ई मुख्य पात्र प्रधान रहि जाइत अछि। गामक जिनगी केना शहरसँ अलग अछि संभवत: लेखक एकरहि प्रदर्शित करक प्रयास विविध कथामे केने छथि। औद्यौगिक क्रांतिक बाद बनल शहर गामहिसँ उपटल लोकसँ बसल अछि गामहिसँ जीविकाक खोजमे गेल लोकसँ जे बादमे क्रमश: गाम छोड़ि देलन्हि। गाम छोड़ि कोनो शहरमे जेवाक कारण प्रारम्भिक अवस्थामे औद्यौगिक पूंजी हो जाहिमे गामक वर्णवैषम्यक भाव भनहि रहल हो मिथिलाक लेल कोशी-कमला समेत अनेक नदीमे अबएबला बाढ़ि कारण रहल अछि ओना बाढ़ि स्वयं सेहो बड़का औद्यौगिक देशक सामान बेचक प्रकरण-उपकरणमे बनएबला बड़का बैराज-बांध आदिक कारणहि अछि। लेखककेँ मनमे कचोट छनि जे लोक किएक गाम छोड़ि बाहर जाइत अछि पंजाब तक जकर परिणाम होइत छनि बादमे नाव चलवैत, वा गामपर रिक्शा चलबैत लगक कसबा वा स्टेशनसँ जे पात्र कहैत छनि “हमर गामक लोक पंजाब नहि जाइत अछि।” किछु वर्ष पूर्व घोघरडीहा वा जयनगर सन स्टेशनसँ पंजाब आदिक छपल टिकट भेटैत छलैक जे एक दिनमे एक-एक स्टेशनसँ लाख- लाख टाकाक कटि जाइत छलैक जहिपर पंजाबमे हरिiत क्रांति अओलैक। प्रतिनिधि कथा “डाक्टर हेमन्त”, स्वयं डाक्टर होइक चलते हम सर्वप्रथम पढ़लहुँ। एक डाक्टरक बेटा डाक्टर हेमन्त प्राय: दरभंगामे काज करैत “लक्ष्मीपुर” (बाढ़िक गाव निर्मली लग) जाइत अछि अधिकारीक आदेशसँ। चूँकि ओ स्वयं एक गामसँ निकलल अछि पिताजीक उपार्जित धनक बंटवारामे मुकदमेबाजीसँ त्रस्त अछि। डाक्टर हेमन्त तँ मिथिलेक शहरमे रहलाह। जतए कि प्रमंडल एखन तक सहरसा या शहर सा कहबैत अछि। जतए कोनो शहर शहर सन नहि अछि बल्कि गामहिक एक प्रतिरूप अछि। मुदा हुनक बेटा कोनो दोसर प्रांतक शहरमे नौकरी लेल चलि गेलखिन्हि। डाक्टर नहि बनलखिन यद्यपि कहानीमे ई लिखल नहि अछि किएक मुदा संभवत: आब डाक्टरी पढ़नाइ कम टाका दऽ भए गेल अछि तँए। किछु वर्ष पहिने तकक बिहारक गुंडाराजमे फिरौती अपहरणक कथा सामान्य छल जकर धमकी स्वरूप लाख टाका वा मौतक धमकी हेमन्तकेँ सेहो भेटलनि मुदा ओहूसँ पैघ धमकी बाढ़ि क्षेत्रमे काज करए जाउ वा जेल जे सामान्यत: सुनल नहि गेल अछि मुदा शासनक आतंक चोर-गुंडासँ कम नहि तकर उदाहरण अछि एहिमे। फिरौतीक माँगसँ बँचवाक लेल यदि बाढ़ि-ड्यूटीकेँ हेमन्त अंतमे धन्यवाद दैत तँ कथाक पूर्णतामे एक डेग होइत आ तहिना बाढ़िमे कतहुँसँ आएल कोनो परिवारमे पालि ता सुकन्या सुलोचनाक प्रति डाक्टरक मनोभावक विकास कथामे नहि भऽ पाएल। सुन्दरी सुलोचनाक आयु किछु बढ़ा नवयौवना बना ओहिपर कामुक मनोदशाक चित्र खेंचल जा सकैत छल वा एक छोट कन्याक रूपमे बालिका सुलोचनाक प्रति वात्सल्यताक जे मैथिल परम्परा अनुसार होइत- “चलू दरभंगा ओतहि पढ़व अहाँ।” किएक तँ विदेशी मनोदृष्टिजन्य कामव्याधिसँ छोट बालिकामे कामुकता तकनाइ हमरा सबहक अग्राह्य रहैत। वा, सुलोचना किछु मास बाद दरभंगा कोनो बीमारी जेना सांपक विष (जकर चर्चा प्रारम्भमे अछि, लए डाक्टर हेमन्तक क्लिनिकपर आबि बचि जइतथि वा एन्टी-स्नेक भेनमक अभावमे तँ कहुना पहुँचियौ कऽ दम तोड़ि दितथि वा बँचलाक बाद ओहि समए डाक्टर हेमन्तक नौकरीया बेटा गामपर आएल रहैत आ ओकरा बियाहि बंगलोर लए जइतथि। मतलब जे कथामे बात उठए से पूर्ण हेबाक चाही। गामक पलायन रूकि जाए, दरिद्रा कम भऽ जाए आदि आ तहिना भाषागत शुद्धता हिन्दीसँ लेल शब्द लेल सेहो समान “सामान” जकाँ ग्रहण करब उचित लेखककेँ। किताबक छपाइ नीक मुदा फोन्ट एक एक पैघ हेबाक छल आ दाम किछु कम उपेक्षित छल जे प्रकाशकीय धर्मक अनुरूप होइत। समीक्षा – फूल तितली आ तुलबुल (लेखक -श्री सियाराम झा 'सरस') ३.६.२०१२क श्री सियाराम झा 'सरस'क पोथी ‘फूल तितली आ तुलबुल’क लोकार्पण रांचीमे भेलन्हि जाहिमे श्रीरमणजी, पटना मुख्य अतिथि छलाह। पोथी बै नी आ ह पि ना ला -१ यानी सतरंगी इन्द्रधनुषक रंगक जकां आबयबला सात कड़ीमे ई प्रथम अछि तकर विशेष संकेत पृष्ठ ४८मे (बाबा दिनकरमे पनिबोडा गीतके भीतर सातो रंग फरिछा देबाक छल). पोथीक अनेक पन्ना रंगीन अछि , बालोपयोगी अछि आ संस्कारवर्धक (पृ. २०मे अंटी-बँटी नहि कहू), आ ज्ञानवर्धक प्रायः सब पन्ना अछि जेना दिनक नाम(पृ. ३८), गाडीक प्रकार(पृ. ३९-४०), बापूक चरखा, सचिन, धोनी, विद्यापति, मंडेला, आवश्यकता आ आविष्कारमे मेट्रो रेलसँ मिसाइल कंप्यूटर तक, टाकाक लाथे (पृ.४२-४३मे) रूपाक नव निशान, खेल-खेलमे(पृ.४४-४५) कुश्तीस ओलम्पिक तक. विज्ञान लेखकक प्रिय विषय अछि (पृ.१८-१९,बिजली रानीमे पवन बिजली तकके चर्चा अछि संगही मिथिला-मैथिलीस प्रेमवर्धक (नेनाक मायस पृ. ६-७ मे नीक बात कहल गेल अछि जे मैथिली बाजय पढयबला सेहो नीक पद पर पहुँचैत अछि), मिथिलाक्षरहूँ अछि अंतमे. मिथिलाक एक नक्शा कतहु रहितय से नीक (अगिला कड़ीमे देल जाय), खेल -खेलमे सेहो राम, कृष्णक चर्चा(पृ. ४४-४५), जगदीशचन्द्र बसुक हँसैत-कनैत गाछक रूपमे ऋतु वर्णन(पृ.४९), सागरक वैविध्य वर्णन(पृ.६३-६४), विज्ञान प्रश्नोत्तरी(पृ. ६८), आविष्कारक माय आवश्यकता(पृ ७२) मे भारतक अंक- शून्यक अवदान आदि. म स मिथिला आर लेखक क गाम मेहथसँ आर की की नै ( पृ.६५)- एक कड़ी एहिना अ, आ सँ ज्ञ तक बनायल जा सकैत छैक बच्चाके अपन संस्कृतिक ज्ञान दैत. सब पन्ना सचित्र अछि ताकि नेना बुझि सकय अधिकाश गीत गेय अछि लगैत अछि बालोपयोगी जानि बहुत ठाम व्याकरणक नियम पालन नै भेल - जेना पोथीक नाममे फूलक बाद अल्पविराम (कोमा) बच्चा चुलबुलक नामके नेना भुटकाक उच्चारण तुलबुल आ एहेन अनेक ठाम (पृ.१४,.... ) बालक -बालिकाक जे चित्र मुखपृष्ठ पर देखावल गेल अछि ओहिमे कोनो गामक नहि, शहरीआ विकासकक परिचायक (पृ.२४) जखन की गामक चीज पर बहुत चर्चा अछि -चेत कबड्डी(पृ.५०), सोचु, सोचु(पृ.५१)मे किसानक महिमा) आ पर्यावरण(पृ.१२,२२,२३),आ रंगीन आर्ट पेपर पार्क फूलआ तितली, टून मून रे क जंतु संसार छपर छैयांक पनिबोडाक रंग, गाछ रोपिह फलदार, दादा-दादीक रोपल गुलाबक फूल(?) आ आन फूल पर बहुत चर्चा अछि, सौरमंडल , दुतियाक चान, (पृ.२५)क चुन्मुनी, २६, २७, २९ क आम, पृ.३३क बगुला, पृ.३५क फूलवती, बाबा दिनकर, ई धरती, सागरक संपदा, धरतीक सिगार चिडी-चुन्मुनी, गीध जकां दुर्लभ चिड़ी के बचबयके आग्रह, जाडक रौद, ऋतू वर्णनमे गाछ (पृ.४९), गाछ रोपीह (पृ.५७), सागरक सैर (पृ.६३),चिंता कचड़ास बचाब जल-नभ-स्थलके(पृ.६६), कछ्मछी(पृ.६७). एही लेल आ स्वतंत्रता हेतु, बाबा पोता गीत(पृ. ७१) मे अछि पर्यवरण, जल जीवन अछि (पृ.७६-७७ )मे जल संचय आ जल छाजनक बात अछि,बाघ मारक विरोध(पृ. ७९-८०) आदि. मुदा 'हैप्पी बल्थ डे'(पृ.१४)आआर्ट पेपर पर पर सेहो शुभ जन्मदिन आ तहिना दू-ददू बेर हैप्पी दिवाली आ हुक्का लोली(पृ.५४मे) मुदा भरदुतिया आ होली नहि भेटल जे सबस अधिक प्रिय बच्चाके स्वास्थ्य संबंधी नीक जानकारी(पृ.१५) संतुलित आहार (पृ.५५) नीक अछि जे नून आ चीनी कम खेबाक अछि आ फल फूल साग खेबाक आ पौष्टिक आहारक (पृ.१५,) मुदा टाफी चर्चा नै रहितय त नीक (पृ.२८), आमा माइक पेटारीमे (पृ.५२) ग्रामीण नुश्खा मे तुलसी, नेबो आदि ठीक मुदा धात्री फलं सदा पथ्यम नै देखल . संस्कार लेल अनेक बात अछि ((पृ.१६,३४) नब जटा - जटीन, विद्यार्थीक पञ्च लक्षणक सचित्र विवरण(पृ.५९), सर-कुटुम (पृ.४८), सीखक लेल भीख(पृ.८२), बालश्रमक विरोध(पृ.८३) ई ठीक बात नै . समाजक बिविध भागक जानकारी लेल मुस्लिम लेल अलीखान (पृ.६०), कारीगर (पृ. ६१-६२), राहुलक माता यशोधरास प्रश्न मार्मिक अछि (पृ.६९ )पिताजी कत गेलाह? आखर यागक धुआं मे शिक्षाक महत्ता अछि (पृ. ७०), मूलमंत्र(पृ. ७३-७४मे) सत्यनिष्ठा, समर्पणस गांधी, सचिन, कलाम बनक गाथा चिरई,चुट्टी, मूसक सतत कर्म जकां. भारत भक्तिक संग संगीतक वर्णन (पृ.७७), प्रकृति चित्रण अछि(पृ. ७८) आबी गेले अलेदाले भोर आ अनेक बालसुलभ गीत यथा (पृ.८१), अनेक सुधार अगिला संस्करणमे संभव अछि- बै नी आ ह पि ना ला क मैथिली पूरा रूप देनाई नीक जे केवल पीअ र लेल लिखी देलासँ भयजाइत (पि नहि) पृ.९- 'मात्रा के यात्रा' नहि 'मात्रक यात्रा'मे (आ तहिना बाबाक अंगुरी (पृ. ८१) 'बाबा के अंगुरी' क जगह), दीर्घे कीस दादीजी नीक रहैत -(स्कूलमे आब मिस पढ्बैत छथि दीदी कहाँ ?) पृ.१० एम् एल अ क उदहारण सटीक नै पृ.११- चटापटा शब्द ? पृ.४७- 'बड़े- बड़े' सपनामे, पृ.६३ सागरक 'सैर' मे हिन्दीक छाप अछि ( से आन अनेक आनो ठाम अछि) पृ.१२- स्कूलमे जाईबला बच्चा लेल हाती आ एहिना सब शब्द कियैक- या त नर्सरीक बच्चा लेल केवल अलग अध्याय हो (बादक बच्चा लेल ई अनुपयोगी गलत उच्चारण सीखबयबला जेना बिरस्पति(पृ. ३८) ? पृ. ३८- ६० अलीखानक इम्तिहान छनि त हुनक पिताजी नै अब्बाके आबक छल आ मायके नै अम्मीके आ तपक हुनका प्रयोजन? एहिना बहुत ठाम ध्यान राखी जे कोनो किताबक पाठकवर्गक आयु यदि तय अछि तखनहु ओकर विशेष आयु वर्ग लेल चीज बाँटल होयबाक चाही इन्द्रधनुषक सात रंग नै सात वर्ष तकके बच्चा लेल पोथी हर वर्ष लेल अलग अध्यायमे रहक छल आ जाहीमे पहिल माय लेल दोसर तुलबुल लेल आ एहिना होइत पांचम छठम लेल लिखैत काल शंकरक 'अपूर्णे पंचमे वर्षे.' जरूर याद राखक चाही - कार्यक्रममे गीतके प्रस्तुत करयबला जे बालक-बालिका छलथि ओहिमे अधिकांश शुद्ध उच्चारण कय सकयबला आयुवर्गक छलथि (पृ. ३०, ३१, ३७) ई ध्यान रखैत अध्यायभाजन अगिला कड़ीमे जरूर हो. लगैत अछि एतेक परिश्रमसँ तैयार किताबक ठीक सम्पादन नहि कयल गेल आ जे कियो सरसक गीतक प्रशंसक छलाह ओ सब एकर गीत बेर-बेर सुनि-सुनिकय सेहो केवल नीक -नीक बात बजयबला मुदा समाजमे स्वस्थ आलोचकक सेहो कमी नैपोथी लेखक सरस भनही दादा नहि भेलाह अछि (जे बादमे बात केला पर मालूम भेल) हमरा लागी रहल छल जे ई सरस ककाक(पृ.५ )नहि सरस दादाक उपहार अछि नेना भुटका लेल जे अनेक ठाम आयल अछि - बाबा, पोता संवाद(पृ. ७१), बाबाक अंगुरी (पृ. ८१) ('बाबा के अंगुरी' नहि). ८४ पृष्ठ + २४ आर्ट पृष्ठ पोथीक मूल्य १०१ रूपा अधिक नै अछि (जे कियो २०० रूपा राखि सकै त छल)- सरसजीक संपर्क – 9931346334, 0651-2560786 (NOTE-टाकाक जगह बेगुसरायक रूपा लिखब हमरा नीक लगैत अछि जे रानी विक्टोरियाक चांदीक/ सिक्का/ रूपा चाल जाहीस एक टाका बनल अछि) मुन्ना जी बाल गजलः पुरान देहक नव चेहरा घड़ीक पेण्डुलम सन झुलैत जिनगीमे स्थिरता भागल फिरैए। ने देह स्थिर आ ने चित्त। केखनो क' तँ अपनो ठर-ठेकान हेराएल सन लगैए लोककेँ। जँ चिन्तनशील भ' ताकब तँ ठकाएल सन अनुभव हएत। एहन स्थितिमे कोनो नव सोच वा नव अवधारणाकेँ घीचा-तीरीमे फँसि जेबाक आशंका घेरि लैए। मुदा रक्षात्मको भ' वएह नव अवधारणा, नव प्रयोग,नव रचना साहित्यकेँ जिया क' रखबाक क्षमता देखबैए। पद्य विधाक एकटा रूप गजल अपन आ समाजक सौन्दर्यबोध करबैए। हासिक, रसिक भ' प्रेममे ओझरा उब-डुब करैत अपन बाट पर ससरल जाइत देखाइए। गजलक बढ़ैत लोकप्रियता आब अपन विस्तार तकैए। आब गजल सभ भावमे चतरल-पसरल जा रहल अछि। ऐ बीच चर्चित युवा गजलकार आशीष अनचिन्हार जी गजलक क्षेत्रमे एकटा नव अवधारणा रखलन्हि। साहित्य अकादेमी आ मैलोरंगक संयुक्त तत्वावधानमे भेल कथा गोष्ठी २४ मार्च २०१२केँ अनचिन्हार जी बाल गजलक अवधारणाकेँ स्पष्ट करैत कहलन्हि "जेना गद्य विधा वा अन्य विधामे बाल साहित्य लिखल जाइत अछि तहिना गजलमे सेहो बाल मनोविज्ञान पर आधारित बाल गजल लिखल जाए"।२४ मार्च २०१२ के प्रस्तुत कएल गेल बाल गजलक परिकल्पनाक विधिवत् घोषणा अनचिन्हार आखर आ विदेहक फेसबुक वर्सन पर २७ मार्च २०१२केँ होइते बहुत रास परिपक्व बाल गजल सभ सोंझा आएल। घोषणा होइते ऐ विधाक पहिल रचनाकार भेलाह आशुतोष मिश्रा जे की नेपालसँ छथि मुदा यदा-कदा लिखैत छथि। दोसर स्थान पर भेलाह जगदानंद झा मनु आ तकरा बाद तँ अमित मिश्रा, रुबी झा, नवल श्री पंकज, चंदन झा, मिहिर झा, मुन्ना जी आ आन गजलकार सभहँक बाल गजलक प्रकाशनक क्रम बनि गेल। आ ऐँ तरहेँ ऐ अवधारणाक प्रथमे चरण ठोस भ' सोंझा आएल , जाहिसँ एकर मजगूत भविष्यक आकलन कएल जा सकैए। संगे एकर पूर्ण संभावना सेहो जागल देखाइए। अनचिन्हार आखर द्वारा बाल गजलक महत्वकेँ देखैत " गजल कमला-कोसी-बागमती-महानंदा सम्मान" अलगसँ देबाक घोषणा सेहो कएल गेल। आ ई मार्च माससँ प्रभावी मानल गेल। आ श्रीमती प्रिती ठाकुर जीकेँ मुख्यचयनकर्ती बनाएल गेल। एखन धरि जून मास धरिक प्रारंभिक चरणक चयन भेल अछि जे एना अछि----------------- १) मार्च लेल श्री मती रूबी झा जीकेँ चूनल गेल। २) अप्रैल लेल नवलश्री पंकज जीकेँ चूनल गेल। ३) मइ लेल अमित मिश्रा जीकेँ चूनल गेल। ४) जून लेल चंदन झा जीकेँ चूनल गेल। संप्रति विदेह द्वारा प्रस्तुत बाल गजल विशेषांक एकर आधारकेँ मजगूत करबाक दिशामे एकटा सशक्त प्रयास अछि जाहिसँ एकर विकासक संभावना अक्षुण्ण रहए। विहनि कथा संसार अदौ कालसँ चलि आबि रहल अछि कहबाक परिपाटी। कहबाक लेल समाद होइ छै। मुदा ओ क्षणिक सूचना मात्रा होइछ। कहबाक बेगरताक मूलमे यदि कथ्य वा कथानक हुअए। कहबाक लेल समादक विस्तार हुअए ओ कोनो फलकपर विस्तार लऽ कहऽ बलाक पूर्ण विचारकंे संप्रेषित करए, सएह कथाक नाम पबैछ। कथा एक लोकसँ दोसरा लोक धरि एक पीढ़ीसँ दोसरा पीढ़ी धरि मौखिक रूपेँ हस्तान्तरित होइत रहल। से तहिया भेल जहिया लिखबाक जनतब वा सरंजामक अभाव छल। कथा लेखनक प्रारम्भमे कथ्यकेँ सोझाँ-सोझी राखि देल जाइत छल। ओकर मूल बातकेँ बढ़ा-चढ़ा प्रस्तुत कएल जाइत छल, मुदा हुबहु। जेना पहिने मौखिक हल तकरे प्रतिरूप। ई प्रतिरूप समायन्तरे क्रमिक स्तरपर परिवर्तित होइत रहल। कथाक लेल अंग्रेजीमे स्टोरी शब्द अछि। आगू एकरा गढ़बाक प्रक्रिया आ पछाति मढ़बाक प्रक्रिया शुरू भेल, जे शैलीक रूपेँ सोझाँ आएल। फेर विकासक क्रमे एकरा अगिला चरणमे एकटा औसत सीमामे बान्हल जाए लागल, ओहो कथा रहल मुदा अंग्रेजी शब्द परिवर्तन कऽ नाम फरिछाएल शॉर्ट स्टोरी। मैथिली सहित अन्यान्यो भाषामे शॉर्ट स्टोरीक शाब्दिक अर्थ लघुकथा कहि प्रारम्भ भेल छोट-छोट कथा रचना। आ ओइ लघुकथाक छोट आकारकेँ सेहो लघुकथाक नामे लिखल आ प्रकाशित कएल जाए लागल। आब लोककेँ व्यस्ततामे ई छोट-छोट कथा सोहाए लगलै। आ पाठकीय उत्साह रचनाकार मनोबल बढ़बैत आत्मविश्वासकेँ दूना केलक। परिणाम स्वरूप ध्ुरझार लिखाए लागल अतिलघुकथा। ‘लघुकथा’ अछि हिन्दी भाषासँ लेल गेल शॉर्ट स्टोरीक उधारी शब्दकोषीय अनुवाद। तकर कारण रहल-पहिल, एकटा नव विधा देखिते मैथिली रचनाकार सब देखाउँसे लिखऽ लगला छोट अकारक कथा। दोसर, जेना हिन्दी साहित्य लेखन अंग्रेजी साहित्यसँ प्रभावित हेबाक संकटसँ उबरि नै पबैए तहिना मैथिली साहित्य रचना, विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलसँ पहिने, बहुत लग धरि (पूर्णतः नै) हिन्दी साहित्य लेखनसँ आच्छादित छल। तेँ मैथिली रचनाकारकेँ कखनो एकर मैथिली शब्द जेना हिन्दीक ‘कहानी’ मैथिलीमे ‘कथा’ अछि, (हिन्दीयोमे ठाम ठीम स्टोरीकेँ ‘कथा’ शब्देँ प्रयुक्त देखल जाइए) से नै फुराएल हेतन्हि। तेँ ओ अपने अतिलघुकथाकेँ लिखैत रहलाह लघुकथा। ईहो सोलह आना सत्य अछि जे ई नव विधा जहन मैथिलीमे हस्तान्तरित भेल तखन सनातनीये अतिलघु आकार-मात्राक कथा छल । एकर विकसित रूप तँ बीसम सदीक अन्तिम दशकमे देखाए लागल। जहन कि तकनीकी शिक्षा वा व्यावसायिक शिक्षासँ लगीच एवं वैश्विक परिवर्तनसँ प्रभावित नवका लोकक नव सोच विकसित भेल। अइ विधाक स्वतंत्र रूपक फरिछौट भेलाक पछाति बेगरता भेल ऐ विधा लेल अपन माटि-पानिसँ जुड़ल, अप्पन भाषिक शब्दक। वर्ष १९९५ मे ‘सहयात्री मंच’ लोहना, मध्ुबनीक साहित्यिक विमर्श प्रस्ताव रखलौं। जकरा हुलसैत सहृदये मैथिलीक कवि, कथाकार श्री राज द्वारा समर्थन कएल गेल। उपस्थित सम जन समवेते स्वीकार कएलनि। उपस्थित जन छलाह- श्री शैलेन्द्र आनन्द, भवनाथ भवन, कुमार राहुल, विजयानन्द हीरा, सच्चिदानन्द सच्चू एवं अन्यान्य। विहनि कथा (सीड स्टोरी), बीज कथा; स्वयंमे कथाक पूर्ण रूप अछि विहनि कथा। ई ने छोट अकारक कथा छी, आ ने कोनो कथाक छेँट। सामान्येतया कथा कतेको बिन्दुकेँ छुबैत बिरड़ो जकाँ उधियाइत पाठककेँ अपन उद्वेश्य कहबामे सक्षम भऽ पबैए। मुदा विहनि कथा माने बीज कथा स्वयंमे संपूर्ण कथा अछि। जे पाठककेँ एक मात्र अपने खुटापर खुटेसल सन राखि अपन उद्देश्यक पूर्णताकेँ एक क्रममे बिकछा लेखकीय मनस्थितिकेँ फरिछा दैए। आ पाठक ओइ सोचकेँ हुबहु मगजमे समा स्थिर भऽ जाइए। विहनि कथा एकटा बीया सन छोट की पैघ संपूर्ण गाछ हेबाक सामर्थ्य रखैए। तहिना विहनि कथा आकारेँ लघु होइतो कथाक सभ पक्ष, कथ्य, शिल्पकेँ एक खास बिन्दुपर समेटि कथाक संपूर्णता प्रदर्शित करबामे सक्षम अछि। जेना बीया पारबाक पछाति अँकुराइए, फेर दुपतिया सन देखाइत एकटा गाछक रूपमे अपन संपूर्णता पबैए तहिना विहनि कथा भूमिका, कथ्यक स्पष्टीकरणक संग सोद्देश्ये गढ़ल आ मढ़ल जाइए आ लेखकक समस्त विचारकेँ छोट आकारमे सोद्देश्यपूर्ण बना उजागर करबामे सक्षम होइए। जेना कोनो बीया अंकुरा कऽ गाछक सभ पक्ष यथा डारि, पात आदिसँ युक्त होइछ एकटा ठुट्ठ गाछ मात्र नै। तहिना विहनि कथा समस्त गुणेँ भरल-पूरल कथा छी। एहेन कथा नै जे दृष्टांत मात्र भऽ ठमकि जाए। एहेन कथा नै जकर कोनो ओर-छोड़ नै हुअए। विहनि कथा एहनो कथा नै अछि जकरा पूरा पढ़लाक पछाति लेखकक लेखन उद्देश्य बुझबाक लेल कात-करोट मुरियारी देबऽ पड़ए। एकर उद्देश्य सोझाँ सोझी फरिछाएल होइछ। विहनि कथा लघु अकारे शुरू भेल। आइ ई लघुकायमे ओइ लघुकथाक एकटा विकसित रूप अछि जे संभवतः मैथिलीमे बीसम सदीक अन्तिम दशकमे अपन स्वतंत्र रूपक वा विधाक फरिछौट करबामे सक्षम भऽ सकल। विहनि कथाक संपूर्णताकेँ ऐ तरहँे कहल जा सकैछ- विहनि कथा कथाक संपूर्ण गुणक संग ओइसँ ऊपर उठि, अपन लघुकायमे समेटल एक निश्चित बिन्दुपर ठाढ़ भेल लेखकक उद्देश्यक पूर्ति करबाक संग पाठकक मगजक भरपूर खोराक अछि। विहनि कथा २१म सदीमे रचनाकार, सम्पादक संग-संग पाठकक बीच सेहो फरिछाएल अछि। तकरे कारण अछि जे आब विहनि कथा छोट गातमे अपन सभ संपूर्णता नेने कागजपर उतरि सोझाँ अबैए। आबक समयमे दृष्टि विहीन नै, दृष्टि सम्पन्न रचनाकार सभ अइ विधाक विकासमे लागल छथि। तेँ ई आब नहिये चुटुक्का कहाइए आ नहिये कथाक छेँट वा दृष्टांत। हम पुनः ई स्पष्ट करैत कहब जे- विहनि कथा ठोस कथ्य, माँजल शिल्पमे कोनो विषयपर वर्णित ओ वौस्तु थिक जे पाठकक मन-मस्तिष्कपर चोट कऽ ओकरा सम्वेदित कऽ चिरकालिक छाप छोड़ि सकबामे सामर्थ्यवान होइए। विहनि कथा, मात्र गुदगुदी करैबला वा चुट्टी काटि बिसबिसी दैबला वौस्तु नै रहि गेल आब। ई रचनाकार आ पाठकक मोनमे समा स्थिर भऽ जाइ बला कथा थिक। आजुक व्यस्त जीवन मध्य लोककेँ कखनो ओतेक पलखति नै भऽ पबै छै जे ओ आब घंटा-घंटा भरि बैसकी लगा एके रचना पढ़ि मोनकेँ सांत्वना देत। क्षण-क्षण बदलैत परिस्थिति, बदलैत छेब-छटा आ तइ हेतु अधिकसँ अधिक अर्थक जोगार मध्य कटि जाइछ लोकक जिनगी। आजुक लोककेँ मीडियासँ क्षण-क्षण नव आ रोमांचित करएबला खोराक भेटि जाइत अछि तेँ साहित्यक प्रति बहुत रूचि नै बाँचब स्वाभाविक अछि। ओना आइयो उपन्यासकेँ खूब पढ़ल जाइछ। मुदा ओकरा आम पाठक मात्रक खोराक नै कहि सकै छी। तेँ रचनाकारकेँ सेहो आब सम्हरि कऽ सशक्त आ अल्प पलखतिक बीच सामंजस्य बैसाबऽ बला रचना करब आवश्यक अछि। रचनाकार, विशेष कऽ विहनि कथाकारक ई पहिल दायित्व बनैए जे ओ समयक संग चलि पाठकक समय संग भेल व्यस्तताकेँ देखि ओज आ सरल भाषिक रचनासँ विहनि कथा संसारमे योगदान सामर्थ्य हासिल करथु। पाठकक आजुक क्षण-क्षण बदलैत परिस्थिति मध्य विहनि कथाकारो जिबैत छथि। तँ ओ यदि आजुक बेहाल अर्थ तंत्र, मशीनी युगक मध्य लोकक मशीन सन हएब परिस्थितिकेँ गसिया कऽ पकड़थु। आ अही परिस्थितिकेँ पाठकक सोझाँ परसि कऽ पाठककेँ मजगूती देबामे अपनाकेँ सक्षम करबाक शक्ति अर्जित कऽ रचनारत रहथु। तहन विहनि कथा, विहनि कथाकार आ पाठकक मध्य सामंजस्य बैसि पाओत। पाठकक प्रत्येक क्षणक व्यस्तता, किछु नव करबाक सनक, अर्थोपार्जनक पाछाँ भगैत रहलासँ उपजल तनावसँ मुक्तिक साधन सेहो अछि विहनि कथा। पाठक जखन सभसँ विलग अल्पावधिक लेल खाली भेटल समयक उपयोग करऽ चाहैए तँ ओकर संग देबामे सक्षम अछि विहनि कथा। ऐ सभ बेगरता पूर्ति करबामे सक्षम विहनि कथा अपन फराक जगह छेकबामे सक्षम भेल अछि। आब विहनि कथाकार जखन समय संग चलि पाठकक मनोस्थितिक अनुकूल रचना देबामे सामर्थ्यवान छथि। ओ अपन पहिल दायित्व पाठकक मोनकेँ भाँपि तदनुकूल रचनासँ पाठककेँ बन्हवामे सक्षम भेल छथि। तहन बेगरता उठै छै एकर मूल्यांकनक। वर्तमानमे एहेन कोनो दृष्टि फरिच्छ समीक्षक वा समालोचक देखार भऽ ऐ विद्यापर काज करबामे सक्षम नै भऽ पौलाह अछि। तकर ठोस कारण अछि बदलैत समय आ परिस्थिति मध्य ओहने सोचक सामंजस्य। जे स्थापित समीक्षक छथि से दू तीन दशक पछातिक नजरिये रचनाकेँ देखबाक प्रयास करताह। हुनका ऐ मे भऽ सकैए किछु नै देखाइन। कारण जे ओ सभ कथाक जइ मूलकेँ देखैत भोगैत एलाह अछि विहनि कथा ओइसँ ऊपरक सोच आ फराक शैलीमे अछि। एकर सत्य आ पूर्ण गात तहिया फरिछाएल जहिया मठाधीश समीक्षक सबहक सोच ओइ कथा, ओकर प्राचीन चरित्र मध्य सन्हिया बैसि गेल। समाजक एकटा समस्या मँहगाइ उदाहरण स्वरूप सनातनी आ चिरायु अछि। ई कहियो खत्म होइबला चीज नै अछि। मुदा तैयो एकर चरित्र आ चेहरा सीढ़ी दर सीढ़ी बदलैत रहैए। आ ओइ संग ओइ मँहगाइक प्रतिफल सेहो ओहिना बदलैत नजरि अबैए। यथा यात्रीजीक कवितामे वर्णित मँहगाइ साहित्यमे चर्चित अछि। आइ ओहेन कोनो नव ठोस रचना मँहगाइपर नै अछि। तहिया लोक भूखे मरैत छल, पेट काटि कऽ जिबैत छल। गदैली ओढ़ि सर्दी कटै छल। आजुक मँहगाइ मध्य कियो भूखे नै मरैए। आ सामान्यो वर्गक लोक कम्मल ओढ़ि आ हीटर जरा सर्दी बितबैए। की ई फर्क सनातनी समीक्षक फरिछेबामे सफल भऽ सकताह? किन्नहुँॅ नै। किएक तँ अइ बदलल स्थितिपर ध्यान देबाक पलखति कहाँ छनि। ओ तँ प्रतिक्षा करै छथि रचनाकारकेँ जुएबाक, रचना चाहे खिज्जा रहि जाउन। कथासँ जुड़ल लोक विहनि कथा मादे विचार कऽ सकैत छलाह। मुदा हुनकर सभक दृष्टि ‘विहनि कथा’क प्रति फरिच्छ नै छनि, उदाहरणतः रंगकर्मी कुणाल, जे नाटकक संभ्रान्त, परिपक्व ज्ञाता छथि ओहो कथापर लिखबा काल विहनि कथाकेँ अस्तित्वहीन कहि बेरा दै छथि। मायानन्द मिश्र मैथिली कथा धाराक मजगूत खाम्ह छथि, ओ लघुकथा (विहनि कथा)केँ चुटुक्काक संज्ञा देलनि। माया बाबूक सोच समीचीन अछि किएक तँ ओ जइ दशकक सोचक लोक छथि तइमे लघुकथा (विहनि कथा) विद्या फरीछ नै छल। तेँ हुनको ऐ प्रति दृष्टि फरीछ नै हएब स्वाभाविक। ओ कथा विकासक आलेखमे लघुकथा (विहनि कथा)क चर्चे केलन्हि सएह बहुत अछि। [मैथिली कथाक विकास नामक आलेख, साहित्य अकादमी दिल्ली सँ प्रकाशित पोथी -‘मैथिली कथाक विकास’- सं. वासुकी नाथ झा, २००३]. विहनि कथा वा कथाकारक मूल्यांकन हेतु विहनि कथाकार स्वयं ऐ दिशामे कान्ह उठाबथि तँ सही मूल्यांकन संभव भऽ पाओत। मैथिली समीक्षाक एकटा कमजोर तत्व ईहो रहल जे ओ रचनात्मक दृष्टियेँ सड़क छाप होइत छथि। फरिछेबाक ई जे ओ अपन गुणगान मात्रा सुनऽ चाहै छथि। आलोचनामे कमी नै वाह वाही हेबाक चाही। जँ समीक्षक द्वारा हुनकर रचनात्मक दोष वा कमीकेँ उघारि सभक सोझाँ कऽ देल गेल तँ समीक्षक भऽ गेला हुनक कट्टर दुश्मन। आ तकर पछाति हुनका, रचनाकारक मुँहे, अज्ञानी, उदण्ड, स्वार्थी आदि संज्ञासँ जानए लागब। ईहो सोलह आना सत्य अछि जे मैथिली समीक्षामे किछु गोटे कृतित्वसँ पहिने व्यक्तित्वकेँ प्राथमिकता दऽ समीक्षा लिखि रइल छथि। तँ जा धरि रचनाकारमे आलोचनात्मक विचार वा कमी सहबाक सामर्थ्य नै हएत, स्वथ्य आलोचना कतऽ सँ टंाग पसारि सकत वा अपन बैसकीपर बैसि अराम कऽ सकत? ओहने किछु रचनाकार सभ द्वारा समीक्षाकेँ ओलि सधेबाक सूत्रक रूप सेहो ठाम-ठीम प्रयुक्त होइत देखाइत रहल अछि। आजुक विहनि कथा पहिने हिन्दी भाषासँ उधारी लेल शब्द ‘लघुकथा’ नामे लिखाइत रइल। अखन धरिक मौखिक जनतब अनुसारे लघुकथा शब्द प्रयोगे छपल पहिल कथा १९६८ मे मिथिला मिहिर मे काली कुमार दास लिखित ‘बुड़िबक वर’ छल। अइसँ पहिने छेँट कथा, कटपीस कथा, मिनी कथा, फिलर कथा........आदि नामे ई छपैत रहल छल। एकर पछाति जे रचनाकार विहनि कथामे सक्रिय भेला ओ नाम अछि- डॉ हंसराज, ए. सी. दीपक, तकर पछाति लिली रे, राजमोहन झा, एम. मणिकान्त, अमरनाथ, रामलोचन ठाकुर आदि। अइ नाममे सँ बेशी गोटे विहनि कथा लिखबाक प्रयोगधर्मिता मात्रक निर्वहन केलनि। हँ एम. मणिकान्त मिथिला मिहिरक माध्यमे कतेको वर्ष धरि विहनि कथा लेखनक नियमितता बनौने रहला। मुदा दुखद वा हास्यास्पद बात ई जे वर्त्तमानमे हुनक एको टा रचना उपलब्ध नै अछि। डा. हंसराज जी क मैथिलीक पहिल विहनि कथा संग्रह ‘जे की ने से’ (प्रकाशित १९७२ ई.) मैथिली विहनि कथा पेटारक पहिल सनेस कइल जा सकैए। ऐमे हास्य व्यंग्यसँ भरल लघुकायक कुल ३५ गोट विहनि कथा संग्रहित अछि। पन्नापर अंकित वर्षक अधारे एकर सभ रचना १९६३ सँ १९७२ मध्य लिखल रचना अछि। एकर कथा सभ तत्कालीन राजनैतिक सामाजिक कुव्यवस्थापर चोट करैत लिखल गेल अछि। किछु रचना आइयो प्रासंगिक अछि। हंसराज निश्चित रूपसँ विहनि कथा आन्दोलनक बीया बाउग केलनि आ तेँ आइ विहनि कथाक गाछ झमटगर होइत देखाइए। किछुए वर्ष पछाति हिनकर अगिला पीढ़ीक श्री अमरनाथ अपन ‘क्षणिका’ विहनि कथा संग्रह प्रस्तुत केलन्हि (वर्ष १९७५ ई. पुर्नप्रकाशन २०११ ई.) आ एकरा एक सीढ़ी आओर ऊपर लऽ जेबाक ठोस प्रयास केलनि। ऐ संग्रहक कथा सभ खलील जिब्रानक कथाक लगीच बुझाइए आ सभ बिन्दुकेँ छुबैत रचना कएल गेल बुझाइए। एकर अधिकांश रचना आइयोक समयसँ मेल खाइत बुझाइए। मुदा लेखकसँ दूरभाषिक वार्तालापक अनुसार राजहंस जकाँ हिनको कोनो रचना तत्कालीन पत्रिकामे प्रकाशित नै भऽ सोझे संग्रहित अछि। वर्ष १९७५ विहनि कथाक स्वर्णिम शुरूआत वर्षक रूपमे देखार भेल बुझाइए जखन ‘मिथिला मिहिर’ (पाक्षिक) अपन विहनि कथा विशेषांक (लघु कथा विशेषांक नामसँ) निकालि मोकाम तँ नै मुदा बाट अवश्ये देखार केलक। ई साहसिक काज भेल कविक द्वारा ऐ नव विधाक लेल। मिथिला मिहिरक अइ विशेषांकक समय सम्पादक छलाह आदरणीय भीमनाथ झा। ओना तँ ‘अन्हरीक गाए बियेलै तँ सभ डाबा लऽ कऽ दौड़ल’ बला कहावत चरितार्थ होइत देखाएल। फेर २३ बर्ख बीति गेल। खएर! बाँझ गाए गाभिन तँ भेबे कएल.....। कथानकक नब्जक सुन्नर पकड़ि रखनिहार श्री विभूति आनन्द जी जेबी पत्रिका ‘कुश’ क नवम अंक वर्ष-१९७८ मे पत्रिकाक गातक अनुसार छओ गोट विहनि कथाक समावेश कऽ निकाललनि विहनि कथा विशेषांक (लघुकथांक विशेषांक नामसँ)। अही वर्ष १९७८ जुलाइमे साहित्य अकादमी, दिल्ली द्वारा कथापर आयोजित सेमिनारमे परिचित कथाकार श्री रामदेव झा, कथापर प्रसंगे विहनि (लघु) कथाकेँ शामिल कऽ एक अनुच्छेद लिखि एकर विशिष्टता जतौने छलाह। जइमे विहनि (लघु) कथाक वैश्विक पटलपर खलील जिब्रानक चर्चा आ तुलना एवं मैथिली विहनि (लघु) कथाकार मे सँ अमरनाथ जीक योगदानक चर्चा कएने छलाह। आठम दशक विहनि कथाक संगोरसँ वंचित रहल। मुदा ई विहनि कथा लिखनिहारक एक टा पैघ हेँज तैयार केलक, जइमे प्रमुख नाम अछि- विभूति आनन्द, शैलेन्द्र आनन्द, श्रीराज, प्रेमकान्त झा, वैकुण्ठ झा, देवशंकर नवीन, प्रदीप बिहारी, ताराचन्द्र वियोगी, चण्डेश्वर खाँ आदि। ई समूह रचनाक दृष्टिये नव अँाखि पाँखिबला छल। साम्यवादी विचारसँ प्रभावित मुदा आपत कालक दुर्दशासँ प्रेरित आ पीड़ित। विहनि कथाक पहिल संग्रह १९७२ मे बहराएल दोसर १९७५ ई. मे आ तकर पछाति अकाल! किएक? २२ वर्षक एहेन खालीपन विहनि कथाक इतिहासकेँ ठमकि जेबाक लेल बाध्य केलक। एकर बाधक छलाह तत्कालीन संपादक, सरकारी आ निजी समिति-संस्था आ प्रकाशक। मुदा तहूँसँ बेशी जिम्मेवार ऐ पीढ़ीक रचनाकार छला जे अपनाकेँ दुनू विधापर कलम चला भरमा लेलनि वा गद्यक ऐ प्रकारक उस्सर खेत देखि डरि कऽ अपनाकेँ कतिया लेलनि। अइ पीढ़ीक कतिपय रचनाकार ऐ विहनि कथा विधाक राशि नवका रचनाकार सभकेँ पकड़ा निश्चिन्त भऽ सुस्ताए लगलाह। कारण छल जे एकर फरिछाएल रूप मध्य अपन अस्तित्व वा कोनो लाभक जोगार वा प्रतिष्ठिा नै नजरि एलनि। अही बीच आएल तन्त्रनाथ झा समग्र, ओइमे सेहो किछु विहनि कथा संकलित अछि। मैथिली साहित्यक जिरात मध्य विहनिकथाक प्रसंस्कृत बीया नव रूपे बाउग केलनि अइ पीढ़ीक नवतुरिया। जइमे नाम छल ज्योति सुनीत चौधरी, दुर्गानन्द मंडल, कपिलेश्वर राउत, धीरेन्द्र कुमार, राजदेव मंडल, बेचन ठाकुर, राम प्रवेश मंडल, भारत भूषण झा, मानेश्वर मनुज, उमेश मण्डल, जगदीश प्रसाद मण्डल (बाल विहनि कथा संग किछु सुन्दर विहनि कथा जेना थल-कमल/ घरडीह/ खाता-खेसरा/ सबूत/ कौआक मैनजन), रामकृष्ण मण्डल ‘छोटू', परमेश्वर कापड़ि, रघुनाथ मुखिया, ऋषि वशिष्ठ, शिव कुमार झा “टिल्लू”, मिथिलेश कुमार झा, सत्येन्द्र कुमार झा, नवनीत कुमार झा, कौशल कुमार, अनमोल झा, कुमार मनोज कश्यप, विनीत उत्पल, धनाकर ठाकुर, आशीष अनचिन्हार, सतीश चन्द्र झा, गजेन्द्र ठाकुर, भवनाथ भवन, राम विलास साहु, मुन्नी कामत, शंभु कुमार सिंह, संजय कुमार मंडल, मिथिलेश मंडल, लक्ष्मी दास, अमित मिश्र, जगदानन्द झा 'मनु', चन्दन झा, ओमप्रकाश झा, सन्दीप कुमार साफी, जवाहर लाल कश्यप, मिहिर झा, रामदेव प्रसाद मण्डल झारूदार, प्रेमचन्द्र पंकज, अखिलेश मंडल, अमलेन्दु शेखर पाठक, मध्ुकर भारद्वाज, श्रीधरम, देवेन्द्र झा, सच्चिदानन्द सच्चु, मिथिलेश कुमार झा, कुमार राहुल, दिलीप कुमार झा “लूटन”, मुन्नाजी आदिक। ऐ पीढ़िक समूह द्वारा विहनिकथा पर ध्ुरझार काज भेल। अइ ठामसँ असली फरिछौट भेल विहनि कथाक। आ हिन्दीक उधारी शब्द लघुकथा सँ विलग खाँटी शब्द- विहनिकथा स्थापित भेल। बीसम सदीक अन्तिम दशकक पहिल काज भेल स्व. ए. सी. दीपक जी द्वारा ‘विविध विहनि (लघु) कथा विशेषांक (मार्च-१९९४ मे)। तकरा पछाति नवका पीढ़ी सेहो कान्हपर वीरा उठेलक आ शुरू भेल वैश्विक बदलल सामाजिक परिदृश्य, तकनीकीय भेल नव-नव क्रान्तिक संग जनमल नव अवधरणाक संग विहनि कथा लेल नव-नव काज। १९७५ ई.मे आएल ‘क्षणिका’ क दू दशक बाद १९९५ ई. केँ विहनि कथाक स्मृतिवर्ष कहि सकैत छी। २० फरवरी १९९५ केँ मुन्नाजी एवं मलयनाथक संयोजनमे हटाढ़ रूपौली, मध्ुबनीमे आयोजित भेल विहनि कथा गोष्ठी, जकर अध्यक्षता केलनि पं यन्त्रनाथ मिश्र आ एकर मंच संचालन कुमार राहुल द्वारा भेल। ऐ अवसरपर उपस्थित विहनि कथा पाठ केनिहार छलाह- भवनाथ भवन, मलययाथ मण्डन, प्रेमचन्द्र पंकज, मुन्नाजी, शैलेन्द्र आनन्द, प्रभु कुमार मंडल, मतिनाथ मिश्र, उमाशंकर पाठक, श्यामाचन्द्र ठाकुर, कुमार राहुल, मीरा कर्ण, ललन प्रसाद, सुनील कर्ण, सच्चिदानन्द सच्चु एवं करणजी। पढ़ल गेल रचना सभपर समीक्षीय टिप्पणीकार छलाह- शैलेन्द्र आनन्द, मुन्नाजी, भवनाथ भवन एवं प्रेमचन्द्र पंकज। हमरा जनतबे विहनि कथाक ई पहिल गोष्ठी छल। ५ मार्च १९९५ केँ सहयात्री मंच लोहना, मध्ुबनी द्वारा मुन्नाजीक विहनि कथा ‘नामरद’ क एकल पाठ आ अइ पर ‘बहस’ क आयोजन कएल गेल। अइमे प्रमुख विचारक छलाह- श्रीराज, शैलेन्द्र आनन्द, विजयानन्द हीरा, भवनाथ भवन एवं प्रेमचन्द्र पंकज। हमरा जनतबे विहनि कथा आ कथाकारपर एहेन ‘बहस’ केर ई पहिल आयोजन छल। जुलाइ १९९५ मे कानपुर सँ बहराइत नवतुरिया त्रैमासिक पत्रिकाक विहनि कथा विशेषांक आएल, संपादक छलाह- प्रेमकान्त झा एवं वैकुण्ठ झा। अइमे १९ गोटेक कुल १९ गोट विहनि कथाक समायोजन छल, आ अइ विहनि कथा विधाक फरिछौट कऽ एकरा नव दिशा देखेबाक प्रयास करैत मुन्नाजीक आलेख अछि, जे कि कोनो विहनि कथा विशेषांकमे ऐ तरहक पहिल आलेख थिक। अही दशकमे प्रारम्भ भेल कथा गोष्ठी सेहो विहनि कथाक बाट बनेबा वा फरिछेबामे उत्प्रेरकक काज करैत रहल। कथा गोष्ठीक जुलाइ १९९७ क महिषीक आयोजनमे एके संग दु गोट पोथीक लोकार्पण भेल, ‘खंड-खंड जिनगी’ (प्रदीप बिहारी) आ ‘शिलालेख’ (तारानन्द वियोगी, जइमे कुल ३५ गोट रचना संकलित भेल अछि)। २१म सदीमे समय आ परिस्थितिकेँ अकानैत सभ रचनाकार खुलि कऽ विहनिकथा दिस जुमल छथि। पत्रिकाक संपादक सभ किछु कोना अइ लेल समर्पित करऽ लगलाह। अइ नव सदीक नव सोचक पहिल विहनि कथा संग्रह आयल- ‘बुझनूक’ (२००२ ई.), एकर रचनाकार श्री वैकुण्ठ झा जी अपन ३६ गोट रचना लऽ ऐ विधाकेँ बाट देखेबाक ठोस प्रयास केलन्हि। एकर बाद तँ संग्रहक झड़ी लागि गेल बुझू। अगिला संगोर हिन्दी मैथिलीक संयुक्त रचनाकार विहनिक कथाक दिशावाहक श्री देवेशंकर नवीन जी अपना कथा संग्रह-‘हाथी चलय बजार’ (२००४ ई. मे ३१ गोट विहनि कथाक संगोर) संग उपस्थिति दर्ज करौलनि। तँ २००५ ई. मे पुरान सोचक ठोस कथाकार श्री मनमोहन झा जी अपन विहनि कथाक संगोर, मिथिलाक निशापुर मे’ आनि एकरा एक डेग आओर आगाँ बढ़ेबाक प्रयास कएलनि। एकर आमुखमे श्री विजय मिश्र जी एकरा गद्य काव्यक संज्ञा देलनि अछि। वास्तवित रूपेँ तँ गद्य काव्य, काव्यक गद्यात्मक शैली थिक। ईहो सत्य अछि जे विहनि कथा गद्य रहि कविताक पूर्णतः लगीच मानल जाइए। मुदा अइमे संकलित २४ गोट रचना विहनि कथे थिक, आन किछु नै। वर्ष २००७ मे “अहींकेँ कहै छी” (सत्येन्द्र कुमार झाक ५१ गोट विहनि कथाक संग्रह) आएल। ई संग्रह विहनि कथाक प्रति पूर्ण सोझराएल आ दृष्टि फरीछ रचना सबहक संगोर थिक। युवा पीढ़ीक बहुविध, प्रतिभा संपन्न लेखक ओ संपादक श्री गजेन्द्र ठाकुर अपन रचना समग्र- कुरूक्षेत्रम् अर्न्तमनक- मे लघुकथाक संग १६ गोट ठोस आ कथ्य ओ शिल्पगते फरिछाएल विहनि कथा आनि विहनिकथा संसारमे श्रीवृद्धि केलनि अछि। अखन धरि एक लिखे चलैत विहनि कथाक लिख सँ हँटि २०१० ई. मे श्री जगदीश मण्डल जी सभसँ इतर बाल मनोवैज्ञानिक विहनि कथा संग्रह ‘तरेगन’ क संग आन रचनाकार केँ सम्मोहित केलनि। २१ म सदीक पहिल दशकक अन्तिम चरणमे मैथिली ई पाक्षिक ‘विदेह’ अइ विहनि कथाक नव इतिहास लिखबा वा बनेबामे अग्रणी मानल जाएत। अपन ६७म अंक विहनि कथा समायोजनमे देशी आ विदेशी ठोस रचनाक संगोर, एवं अइ विहनि कथाक शास्त्रीय विवेचन कऽ अएना स्वरूप झलका एकर बाटकेँ मोकामक लगीच अनबामे ई पूर्णतः सफल भेल अछि। अइ अंकमे कुल ३२ रचनाकारक ७९ गोट रचना अइ विधाकेँ पूर्णतः फरिछा, सभक सोझाँ अनबामे सौ प्रतिशत सक्षम भऽ देखार भेल अछि। संपादकक अलाबे एकर सफलताक श्रेय छन्हि अइ अंकक अतिथि संपादक-मुन्नाजीकेँ। मुन्नाजी जी बड गम्भीरता पूर्वक सभक समायोजन एवं अपन आलेखेँ दोसरो रचननात्मक प्रकृतिकेँ फरिछेबाक सफल प्रयास केलनि अछि। लगभग दू दशकसँ अइ विधामे रचनात्मक उपस्थिति दर्ज करबैत रहलाह, आ परिणाम “समय साक्षी थिक” २०११ मे आएल, ई संग्रह श्री अनमोल झा जीक कुल १५० रचनाक अपन जिनगीक भोगल यर्थाथक अएना थिक। २०१२ मे “टेक्नलजी” (अनमोल झा) एवं “टीस” (मिथिलेश झा) संग्रह सेहो विहनि कथाक बखारी भरबामे समर्थ बुझना जाइछ। अनमोल जीक १४९ रचनाक संग्रह सनातनी यथार्थ परसैए। ततै मिथिलेश झा जीक ‘टीस’ क ४५ गोट रचना पाठकक मानसिकताकेँ झंकृत करैए। जे कि विहनि कथाक थाती वा धराउ सदृश अनुभव करैए। १० दिसम्बर २०११केँ ‘सगर राति दीप जरय’क ७५म कथा गोष्ठीुक आयोजन पटनामे कएल गेल, ऐ अवसरपर मुन्नाजी द्वारा मैथिलीक पहिल विहनि कथा पोस्टर प्रदर्शनी कएल गेल छल। ऐ तरहंे विहनि कथा संसारक परिदृश्य पूर्णतः भरल पूरल भऽ गेल अछि। आइ सभ दिन कियो ने कियो स्वाभाविक रूपेँ जुड़ि अपन योगदान दैत एकरा मोकामक ड्योढ़िपर आनि पट खुलबाक प्रतिज्ञामे ठाढ़ देखाइत छथि। मोकाम भेटि गेलै तँ घर पैसैमे समय नै लगतै। अझुको क्षणकेँ अंगीकार करैछ “क्षणिका” विहनि कथाक नींवक पहिल ठोस खाम्ह बनि सोझाँ आएल “क्षणिका” पैंतीस बर्ख बाद पुनर्प्रकाशित अपनामे समेटने तीस गोट विहनि कथा (लघुकथा)क संगोर अछि। ऐ मे प्रकाशित अधिकांश कथा अपना गात आ विहनि कथाक शिल्पेँ आइयो प्रासंगिक आओर विवरणीय अछि। ऐमे प्रकाशित कथाक नींव आइसँ चारि दशक पहिने श्री अमरनाथजी द्वारा तहिया राखल गेल जहिया कि मैथिलीमे विहनि कथाक स्थिति द्वितीयाक चान जेकाँ छल। आन गद्य विधाक एक प्रकारेँ फरिछा गेल विहनि कथाक तहिया शैशवावस्था छल। शैशवो केहेन तँ जेना कहियो अप्पन समाजमे बेटीकेँ सोइरीयेमे नोन चटा अस्तित्वेकेँ मेटा देबाक सोच व्याप्त छलै। आइसँ चारि दशक पहिनेसँ आजुक सामाजिक परिवेशक तुलनात्मक स्थिति देखी तँ तहिया अमावश आ आइ पूर्णिमा सन देखाएत। तहियाक समग्र स्थितिक ठाम-ठीम चित्रण ऐ संगोरक कथा सभमे स्पष्ट देखाइछ। मुदा किछु सोच किछु कुरीतिक तहियाक चित्रण आइयो प्रासंगिक लगैछ जेनाकि “पपीहा” शीर्षक कथामे बुढ़ा-बुढ़ीक दुर्दशाकेँ बेटा-पुतौहक सेवासँ निराश भऽ स्वयं जीबाक लेल बाट तकैत ई बुजुर्ग दम्पत्तिक मानसिक चेतनाक शिकार अझुको बुजुर्गक दुर्दशाकेँ आलोकित करैए। ओना समाजक सभ व्यक्ति एके रंग अवचेतन नै होइछ जे तहियो छल आ आइयो अछि। आइयो ऐमे प्रकाशित कथा- “लालटेम”मे चित्रण जुआ जकाँ हारल जुआनीसँ वृद्ध भेल पिता जखन अपन आश्रय तकैत छथि तँ अपने विमोहित घरकेँ घुरि अबैत छथि। ई चेतना अझुको किछु धिया-पुतामे धारल उसारल राखल भेटत, पूर्णतः मूइल नै। धनिक गरीबक फाँट तँ सभ दिन रहलैए आ ई अमर अछि। चाहे वैज्ञानिक तकनीकी दृष्टिये संसार कतबो बदलि जाए। ऐ संगोरक श्रेष्ठ कथामे सँ एक “माटि पानि” साहेब सभ गरीबकेँ हेट कऽ रखैत छथि। हुनक ऐय्यासी, सामाजिक परिवर्तन हुनक संवेदनाकेँ सेहो सुखबैत जा रहल अछि। मुदा एकटा गरीबे एहेन अछि जे सभ संकटक घड़ीमे साहेबकेँ जिनगीक पटरीपर लऽ आनि आगू बढ़बाक रस्ता देखबैछ। उपरोक्त कथा सभकेँ पढ़लोपरान्त अहाँकेँ ई भान अवश्य होएत जे विहनि कथा, जे आइसँ चारि दशक पूर्व मैथिलीयोमे आने भाषाक लघुकथाक समकक्ष अपन खुट्टा गरबामे समर्थ भेल छल। ऐ “क्षणिका” नामक विहनि कथा संगोरकेँ प्रकाशित करबाक दुस्साहस अमरनाथजी देखौलनि जे आजुक विहनि कथाक बाटक हेतु मीलक पाथर साबित भऽ रहल अछि। चारि दशक पहिने अमरनाथजीक संगोर अवश्य सोझाँ आएल। मुदा ऐ विहनि कथाक ओ एसगर लेखक नै छलाह। ओही समएमे एहने निश्शन “विहनि कथा” मिथिला मिहिरक माध्यमे नियमित सोझाँ अबैत रहल, ओइ रचनाकारक नाम छल एम. मभिकान्त। मुदा ई दुनू गोटे विहनि कथाक फलकपर नै जानि कतऽ हेरा गेला। “विदेह” पाक्षिक ई पत्रिकाक ६७म अंक “जे विहनि कथा विशेषांक” छल तइमे विषयवस्तुजन्य व्यक्ति आ रचना जुटेबाक क्रममे भाइ अनमोल झाक माध्यमे संपर्के जुड़लहुँ ऐ रचनाकारसँ जे आइयो ओही उद्गारक संग अपन चारि गोट टटका रचना पठा ऐ संग्रहसँ एक डेग आओर आगाँ बढ़ि विहनि कथाकेँ मजगुत करबामे सार्थक सहयोग केलनि। एम. मणिकान्त एखनो हेराएले छथि...। ई रचनाकार युवाकालमे जै जोशे किछु निश्शन रचना सभ देलनि, चारि दशक बादो आजुक रचनाकार सभ ओतै केन्द्रित भऽ रचना करैत देखाइत छथि, जेना देखू “शान्ति” शीर्षक कथाकेँ। लोक जीवन जीबाक लेल जीवनमे शान्ति पेबाक लेल भागादौड़ीमे लागल सम्पूर्ण जिनगीकेँ अशान्त बना लेने अछि। आ जीवन भरि कतौ शान्ति नै भेटि पबै छै, जँ शान्तिक दर्शन होइत छैक तँ जिनगी शान्त भेलाक पछातिये जे आइयो सगरो ईएह स्थिति व्याप्त अछि। उपरोक्त ठोस रचनाक पछाति ऐ संग्रहकेँ आओर मजगुत आधार दैए सुमनजी द्वारा लिखल गेल आमुखमे सोदाहरण प्रस्तुत कएल गेल खलील जिब्रानकेँ। सत्य लघुकथाकेँ खलील द्वारा एक-एक बिन्दुपर देखार करैत जिनगीक सत्यकेँ सोझाँ अनलासँ साहित्य, सामाजिक आ राजनीतिक परिवेशमे खलबली मचि गेल रहै। जकर कोलाहल वा प्रासंगिकता आइयो बाँचल अछि आ सदा अमर रहत। मैथिली विहनि कथाक ऐ पहिल संग्रहक दोसर प्रस्तुति आइयो समीचीन भऽ ऐ साहित्यिक विधाकेँ एक प्रकारसँ आगाँ बढ़ेबा लेल उत्प्रेरकक काज करत। अनमोल झाक समयकेँ साक्षी राखि ....! विहिन कथा (लघु कथा) माने बीज कथा। ई कथा, एकटा बीयाक समान अछि। जेना कोनो बीयामे एकटा गाछ हेबाक समग्र गुण विद्यमान होइछ तहिना विहनि कथा अपनामे एकटा संपूर्ण कथाक समग्रता समेटने रहैछ। मैथिली कथाक किछु बानगीकेँ विलगा देल जाए तँ ओकर स्तर अन्यान्य कथा साहित्यक स्तरक सोझाँ खसल बुझाएत । मुदा गद्य विधाक एक प्रतिरूप विहनि कथाक वर्तमान परिदृश्य वैश्विक स्तरक समकक्ष आबि ठाढ़ अछि। एना मात्र तुलनात्मक रूपेँ अछि। किएक तँ एखन ई अपन सहजताकेँ एक सीमा मात्रमे समेटने संकुचित अछि। मैथिली साहित्य मध्य कथा जेना आन भाषाक कथाक तुलनामे अबेरसँ अपन अस्तित्व पौलक, ओइसँ दुर्लभ स्थिति विहनि कथाक अछि। अन्यान्य भाषाक लधु-कथा सेहो प्रारंभ मे मैथिली विहनि-कथा जकाँ एकपेड़िया बाट धऽ आगाँ बढ़ल मुदा ओइ सभ भाषाक सरकारी गैर सरकारी संस्था, प्रकाशक एवं रचनाकारक समग्र बल एकरा अपन फराक नाम आ अस्तित्व दऽ फरिछेबामे संग देलक, तकरे परिणाम स्वरूप बांग्लामे “ए मिनिटेर कथा”, पंजाबीमे “मिन्नी कथा” आदि नामे ई जानल जाए लागल। मुदा विहनि कथा आइयो डुब्बा पानि मध्य उगि डुबि रहल अछि, साहित्य अकादमी (दिल्ली), मैथिली-भोजपुरी अकादमी (दिल्ली सरकार), सी.आइ.आइ.एल. मैसूर वा अन्यान्य संस्था वा ऐपर पलथी मारि बैसल महंथ सभ एकर प्रकाशन , सेमिनार आयोजन वा ऐ मादे स्वतंत्र क्रिया–कलापक पक्षेँ आइ धरि सोझाँ नै आबि सकलाह। किछु भाषाक लघुकथामे स्वतंत्र शोध सेहो शुरू भेल अछि। मैथिलीयो अइमे पछुआएल नै अछि। जकर श्रेय अही रचनाकारकेँ जाइछ। परती-पराँत सन पड़ल जमीनकेँ अपन सर्वस्व ऊर्जा श्रोतेँ उपजा हरियरी अनैबला ऐ रचनाकारक प्रत्येक रचना विहनि कथाकेँ विलगा कऽ स्थान दियाओत। समुन्द्रमे हथोरिया देबै तँ प्रायः मुट्ठीमे पानिये टा आओत। ओहो शुद्द वा साफ नै माटिओसँ लेपटाएल सन। मैथिलीक गद्य विधाक एकटा प्रकार विहनि-कथाक स्थिति सेहो एहनाहेँ जकाँ रहल अछि। मैथिलीक गद्य संसारमे विहनि-कथा सेहो एहि मध्य लहरिक बीच-बीचमे उगैत डुबैत रहल। किछु रचनाकार सभ अपन लेखनीये डुबकी लगेबाक प्रयासो करैत रहलाह। परञ्च ओ ओइ लहरिकेँ सहबाक सामर्थ्य नै राखि लहरिक संग बिलाइत गेलाह। एहेन दुरूह परिस्थिति मध्य जे लेखक सभ किछु सहैत अपन सर्वस्व रचना शक्तिक ऊर्जा ऐमे लगबैत रहलाह ओ छथि श्री अनमोल झा। श्री झा “ समय साक्षी थिक”, अपन पहिल विहनि-कथा संग्रह लऽ सोझाँ एलाह अछि। ऐ संग्रहमे सत्य कही तँ समयान्तर अनुरूप रचना-संयोजन कएल गेल अछि जे हिनक कएक दशकक भोगल यथार्थक परिणाम थिक। ऐ संग्रह मध्य समाजक गम्भीर होइत परिस्थितिकेँ उजागर केलनि अछि। ऐमे क्षण-क्षण घटैत सामाजिक घटना, ओकर अधलाह असरिकेँ महीन गढ़निये उजागर करबामे सक्षम भेलाह अछि। ऐमे प्रकाशित अधिकांश रचना सभमे सामाजिक मूल्यक अवमूल्यन, संबंधक दोहन, तकनीकी परिवर्तने प्रभावित होइत सामाजिक अस्तित्वक सुंदर चित्रण परिलक्षित होइछ। ऐमे सङ्गोर भेल अधिकांश रचनाक धारदार समायोजन हिनक विहनि-कथा उद्देश्यकेँ सोझाँ अनबामे सक्षम बुझाइत अछि। किछु पारंपरिक कथानक आधारकेँ सेहो नव-नव परिवर्तन वा आकलनक संग जोड़ि देखवामे समर्थ भेल बुझना जाइछ । डा. रमण झा फोंका-एक विहगावलोकन काव्य वैह थिक जे रसिकक हृदयके ँ रसाप्लावित करय, गृहिणी वैह थिक जे अपन पतिके ँ अपन प्रेमपासमे जकरने रहय, भक्त वैह थिक जे भगवानके ँ अपन वषमे कयने रहय आ षत्रु वैह थिक जे मरितो दमधरि ष्षत्रुता नहि छोड़ए। अरसिक वा गँवारके ँ कविता सुनाके ँ की लाभ ? ते ँ ने संस्कृत साहित्यक प्रसिद्ध विद्वान एवं महाकवि वाणभट्ट कहने छथि-अरसिकस्तेषु काव्य निवेदनं षिरसि मा लिख! मा लिख! मा लिख!! वस्तुतः बानर नारिकेरक स्वाद की बूझत ? गँवार रत्नक महत्वके ँ की परखत ? तहिना अरसिक किंवा गँवारके ँ जँ कोनो कविता सुनयबैक तँ ओ अरण्यरोदने कहाओत, मुर्दाक शरीरपर उबटने लगायब होयत, स्थलपर कमल रोपबे सदृष कहाओत, ऊसर जमीनपर बेस काल धरि वर्षा करबे तुल्य होयत, कुकुरक नाडÛरिके ँ सोझे करब सदृष बुझाओत, बहिरक कानमे जपे करब तुल्य प्रतीत होयत अथवा आन्हरक आगाँमे दर्पणे रखबा सन भान होयत- अरण्य रुदितं कृतं षवषरीरमुद्वर्तितम्। स्थलेमारोपितं सुचिरमूसरे वर्षितम्।। स्वपुच्छमवनावितं वधिरकर्ण जापः कृतो। धृतोन्धमुखदर्पणः यद्वुधो जनः सेवितः।। (निदर्षनालंकार) जेना धनंजय नामक पाथरपर घसिकय सोनाक परीक्षा होइत अछि, रणक्षेत्रमे धनुर्धरक परीक्षा होइत अछि, विपत्तिक समयमे गृहिणीक परीक्षा होइत अछि आ श्रीमद्भागवतक अर्थ लगयबामे पण्डितक परीक्षा होइत अछि- धनंजये हाटक सम्परीक्षा रणांगनां षस्त्रभृतां परीक्षा। विपत्तिकाले गृहिणी परीक्षा विद्यावतां भागवते परीक्षा।। तहिना काव्यक परीक्षा काव्यषास्त्र रूपी कसौटीपर कयल जाइत अछि। प्रायः तथाकथित नव कविता लिखनिहार कवि लोकनि हमर एहि मतसँ सहमत नहियो होयताह मुदा वनस्पति कतबो शुद्ध रहय ओ शुद्ध घीक समता नहि कए सकैत अछि। वस्तुतः श्री कमलाकान्त झाजीक फोंका कविता संग्रह पढ़ि हमरा काव्यषास्त्रक अन्तर्गत पढ़ल शब्दषक्तिक भेद- लक्षणा-व्यंजनाक स्मरण कराए दैत अछि। एहि फोंकामे कुल 89 गोट कविता संगृहीत अछि जाहिमे अधिकांष कवितामे समाजक कोनो ने कोनो विरूपतापर प्रहार कयल गेल अछि, परषासनक कोनो ने कोनो अंगपर निषान साधल गेल अछि आ नेता लोकनिक भ्रष्ट चरित्रके ँ जगजियार कयल गेल अछि-एक शब्दमे जँ कही तऽ चारूकात पसरल भ्रष्टाचारपर व्यंग्यवाणक बौछार कयल गेल अछि। जँ एहि प्रकारक अवघात अभिधामे कयल जाय तँ मारि-पीट, पर-पंचैती, केस-मोकदमा सभ किछु भए जायत मुदा लक्षणा आ व्यंजनाक वाणसँ विद्ध लक्ष्य जालमे फँसल माछ सन छटपटाय लगैत अछि, आहुति युत होमक अग्नि जकाँ धधकि उठैत अछि आ चोटाओल नाग जकाँ फुफकार काटय लगैत अछि मुदा पलटवार नहि कए सकैत अछि। लक्षणा आ व्यंजनाक वाण लोकके ँ कतोक दिन धरि भीतरे भीतर दग्ध करैत रहैत अछि जेना सम्पूर्ण गात्रपर क ड़कल तेल वा घीक पड़ने भेल फोंका लोककें कतोक दिन धरि कुहरबैत रहैत छैक। कविश्रेष्ठ श्री कमलाकान्त झाजीक कवितामे कोन प्रकारक व्यंग्य निहित अछि से हुनक पंक्तिक अवलोकन विनु कयने अनुभव करब असंभव अछि। हिनक परिचय-नवरत्न शीर्षकमे समाजक प्रसिद्ध नओ पेषाक लोकपर जे व्यंग्य कयल गेल अछि ताहिमेसँ किछु द्रष्टव्य थिक- डाक्टर- पैघ डाक्टर वैह थिक चिन्हय सभटा रोग। अदलि - बदलि औषधि दिअए बाँचि सकए नहि लोग।। कवि- असली कवि थिक वैह जे कविता करए अनर्थ। लाम-काफ बेसी होअए श्रोता बुझए ने अर्थ।। अफसर- अफसर बड़का वैह थिक, जनिक पैध हो पेट। लेट-सेट कखनो पहुँचि, काटथि अनकर घे ँट।। गायक- असली गायक वैह थिक, जकर पैध हो तान। श्रोता सभ उठि हो विदा, बन्द होअए नहि गान।। फोंका-पृ. 40,41 कवि अपन काव्यमे सभसँ पैध निषान सधने छथि भ्रष्ट नेता लोकनिपर। किछु पंक्तिक उल्लेख करब आवष्यक बुझि पडै़त अछि- राजनीति हुनका लेल वरदान अछि प्हिने झोपड़ीमे रहैत छलाह आइ आलीषान मकान अछि। पुनष्च- ओ हस्ताक्षरक बदला अँउठा लगबैत छथि राजनेता छथि ते ँ विद्वान कहबैत छथि। फोंका -पृ. 51 राजनेतापर व्यंग्य करैत श्री झा मंत्रीजीकेँ कुकुर धरि कहि देबामे नहि हिचकैत छथि। हिनकहि शब्दमे द्रष्टव्य थिक- दिल्लीक अषोक पथपर मंत्रीक डेरासँ एक कुकुर नालीमे स्वयं जा खसि पड़ल हल्ला भेल लोक दौड़ल कुकुरके ँ निकालल गेल साबुन, तेल आ सेंट लगाओल गेल। कुकुरके ँ बैसा पुछल गेल मंत्रीक आवासक सुख त्यागि नालीमे बेर-बेर किएक? कुकुर सहज भावसँ बाजल- एक बंगलामे एकेटा कुकुर नीक। फोंका पृ.-93 कवि भविष्यद्रष्टा होइत छथि, समाज सुधारक होइत छथि आ सबसँ बेसी निर्भीक होइत छथि। हिनक निर्भीकताक पराकाष्ठा निम्नांकित पंक्तिमे व्यंजित अछि- मैडमजी पुछलनि सरदारजी अहाँ यू. पी. ए.क अर्थ जनैत छी- ओहिमे हमर की हैसियत मानैत छी ? सरदारजी बजलाह मैडम यू. पी. ए.क मतलब साफ छै एहिमे पी. ए. हम छी बाँकी सभ यू(अहाँ छी) फोंका-पृ.-6 हिनक एहि कविता संग्रहमे एहि प्रकारक व्यंग्य समाजक प्रत्येक वर्गपर अछि जतय कतहु हिनका व्यभिचार, अनाचार आ भ्रष्टाचारक अनुभूति होइत छनि। हिनक कविता संग्रहमे वक्रोक्ति(अलंकार)क माध्यमे सामान्यो गप्पके ँ तेनाने उपस्थापित कयल गेल अछि जे सुनितहि एक क्षणक हेतु अचंभित भए जाएब, हृदयमे गुदगुदी उठत आ मुहपर स्मितहास अवष्ये टपकि पड़त। अवलोकनीय थिक- एकटा मित्र पत्नीसँ पुछलथिन सुनैछी ? तुलसीदास कहने छथिन ‘ढ़ोल गँवार शूद्र पषु नारी ई सभ तारण के अधिकारी’ अर्थ बुझै छियै कि बुझाउ पत्नी बजलथिन एकर अर्थ तँ एकदम स्पष्ट छै एहिमे हम छी एक ठाम आ अहाँ छी चारि ठाम। फोंका-पृ.-44 श्री कमलाकान्त झाजीक कविता संग्रहमे जँ कतहु शृंगारिको वर्णन भेल अछि तऽ ओतहु व्यंग्येक माध्यमसँ। कने एहि अंषपर दृष्टिपात कयल जाय- क्रुद्ध वॉसक विनती करैत बजली घिघिया क’ पूर्वाह्नमे लेट एैल रही कम्पन्सेट क’ देब खराब नै मानी तँ साँझमे लेट क’ जैब। फोंका-पृ.-110 हिनक कविता सभमे ठाम-ठाम अलंकारक प्रयोग सेहो भेटैत अछि। एतय उत्प्रेक्षाक मालाक अवलोकन कयल जाय- तऽन मल-मल जकाँ, मोन मखमल जकाँ मूँह चाने जकाँ, दाँत मोती जकाँ । फोंका-पृ.-26 विनोक्ति अलंकार द्रष्टव्य थिक- बिनु चीनी केर चाह नहि, बिनु जलखइ केर प्लेट। बिनु सरिसो केर माँछ नहि, बिना धोधि केर सेठ।। फोंका-पृ.-41 पुनरुक्तिप्रकाष- एक आँखि स्वप्न-मिलन मेला लगौने एक आँखि विरही चकोर एक आँखि अपना लए जागल रहैए एक आँखि हुनका घर चोर। फोंका -पृ.-38 हिनक एहि संग्रहमे एक दिस जँ किछु मात्रिक छंदमे लिखल गेल कविता सभ अछि तऽ दोसर दिस आधुनिक कविक डेगमे डेग मिलबैत पूर्णतः अतुकान्त कविता सेहो अछि। किछु छन्दोबद्ध कविताक उल्लेख एतय कयल जा रहल अछि- कुण्डलिया-एहि छन्दमे दोहा एवं रोलाक मिश्रण एकटा शर्तक संग रहैत छैक जे दोहाक अंतिम पाद रोलाक आरम्भक पाद बनि जाइत अछि। एतबे नहि दोहा छन्दक आदि भागमे जे पद रहत से रोलाक अंतमे निष्चय देल जायत। एकर पूर्णतः निर्वाह कवि कयने छथि। कने देखल तऽ जाउ- खादीमे गुण बहुत छै, सभ दिन झॉपय अंग। छै उज्जर तँ की भेलै, एहिमे सातो रंग।। एहिमे सातो रंग दाममे सस्ते सस्ता सभठाँ छै उपलब्ध भेटै भरि बस्ता-बस्ता। कविगण बाजि उठथि सुनू औ भौतिकवादी बर्बादीसँ बचू मङा कऽ पहिरू खादी।। पुचष्च- खादी केर अछि बढ़ि रहल दिन- दिन दूना रेट। एकरा अंदरमे दबल भारी भरकम पेट।। भारी भरकम पेट देषके काला धंधा भ्रष्टाचारी चोर बजारिक बनल सुगन्धा। नैयायिक केर न्याय देहपर चढ़िते खादी सभटा नुका लैछ ई बापू केर खादी।। फोंका-पृ.-108 निष्कर्षतः यैह कहल जा सकैत अछि जे फोंका कविता संग्रह एकटा सफल काव्य संग्रह थिक जकर पाठक किंवा श्रोताके ँ धैर्य आ साहसक संग पारायण व श्रवण करबाक प्रयोजन छनि। फोंका पढ़ि एक बेरि अवष्ये लोकक देह सिहरि उठतैक, मोन उद्वेलित होयतैक आ कुमार्गके ँ छोड़ि सन्मार्गपर चलबाक प्रेरणा भेटतैक। हम एकर कविसँ आग्रह करबनि जे एहने सरस, सुन्दर आ संग्रहणीय रचनासँ मैथिली साहित्यक उद्यानके ँ सुरभित करैत रहथि। इत्यलम्। मैथिली चित्रकथा श्रीमती प्रीति ठाकुरक दू गोट सचित्र कथा संग्रह -मैथिली चित्रकथा एवं गोनू झा आ आन मैथिली चित्रकथा देखलहुँ आ पढ़लहुँ । चित्रक माध्यमे कथाक प्रस्तुति एकटा अभिनव प्रयोग थिक जे लोकके ँ, विषेषतः बच्चा सभके ँ अपना दिस आकृष्ट करत। खिस्सा पिहानी कहबाक आ सुनबाक परंपरा मिथिलामे अदौसँ चल आबि रहल अछि। बूढ़ पुरान स्त्रीगण लोकनि छोट-छोट बच्चा सभके ँ सुतयबाक काल नाना प्रकारक खिस्सा सभ सुनबैत छथि जे मनोरंजनक संग संग उपदेषप्रद एवं षिक्षाप्रद सेहो रहैत अछि। ओहि खिस्सा सभमे प्रसिद्ध अछि -दैत्य सभक खिस्सा, राज कुमार सभक खिस्सा, रामायण महाभारतक खिस्सा, गोनू झाक खिस्सा प्रभृति। उच्च विद्यालय एवं महाविद्यालयमे प्रवेष कयलाक बाद छात्र-छात्रा लोकनि स्वयं कथा पढ़ैत छथि, बुझैत छथि, ओकर रसास्वादन करैत छथि आ समयपर लोकके ँ सेहो सुनबैत छथि। मैथिलीक संग विडम्वना ई अछि जे महा विद्यालय एवं विष्वविद्यालय स्तरपर लोक विषयक रूपमे मैथिली रखितो अछि, पढ़ितो अछि किन्तु विद्यालय स्तरपर सरकारी घोसनाक बादो लोक ने मैथिली विषयक रूपमे रखैत अछि आने मैथिली माध्यमे कोनो आने विषय पढ़ैत अछि। एतेक धरि जे मिथिलांचलक विद्यालय सभमे गुरुओजी लोकनि मैथिलीमे पढ़यबामे हीनताक बोध करैत छथि। नव युवक लोकनि विवाह होइतहि पत्नीक संग हिन्दी झारय लगैत छथि। कनेक पढ़ल लिखल आ पदवीवला लोक सभके ँ देखबनि जे अपनामे जँ मैथिलीयोमे गप्प करताह तँ बच्चा सभसँ निष्चय रूपसँ हिन्दीमे। हुनका सभके ँ ई नहि बुझाइत छनि जे मैथिली भाषा कठिन छैक। एकर समुचित ज्ञान जँ बच्चामे नहि होयतैक तऽ बादमे होयब कठिन छैक । कवीष्वर चन्दा झा अमैथिलीभाषी(अन्यदेषीयक)क हेतु मैथिली भाषा ओहने कठिन कहलनि अछि जेहन एकटा इचना माछक बच्चाक हेतु समुद्रक सभटा जलके ँ पीयब छैक- भाषा यदन्यदेषीयोः मिथिलायाः भवेत्तदा। प्ीतमिंचाकपोतेन समस्तं वारिधेर्जलम्।। जतय धरि हिन्दीक प्रष्न अछि तऽ ओ तऽ राष्ट्रªभाषा थिक । अनिवार्य विषय थिक। ओकर ज्ञान तऽ स्वतः प्रत्येक व्यक्तिके ँ होयतैक आ रहिते छैक। एहन स्थितिमे श्रीमती प्रीति ठाकुरक उपर्युक्त विवेच्य पोथी देखि हमर मन गदगद भए गेल। गोनू आ आन मैथिली चित्रकथामे कुल 16 गोट कथा अछि जाहिमे गोनू झासँ सम्बद्ध नओ गोट कथा, महाकवि कालिदाससँ सम्बद्ध एक गोट आ शेष छओटामे राजा सलहेस, नैका बनिजारा इत्यादि प्रमुख चर्चित कथा सभ काल्पनिक चित्रक माध्यमे चित्रित कयल गेल अछि। एहि सभ कथामे किछु बात तऽ शब्दक माध्यमे अभिव्यक्त कयल गेल अछि आ किछु गप्प चित्र स्वयं कहैत अछि। एहि कथा सभक प्रसंग जे लोकक मनमे एकटा भावचित्र छल होयतैक से एतय बुझि पड़ैत अछि जेना साकार भए उठल हो। विदुषी कथा लेखिकाक दोसर संग्रह थिक मैथिली चित्रकथा जाहिमे कुल 10 गोट प्रमुख कथा सभ वर्णित अछि। एहि कथा सभक बीच बीचमे काल्पनिक चित्र सभक समायोजन कथाक यथार्थताके ँ प्रमाणित करैत अछि। एहि संग्रहमे संग्रहित महत्वपूर्ण कथा सभ थिक -राजा सलहेस, बोधि कायस्थ, दीना भदरी, नैका बनिजारा, विद्यापतिक आयु अवसान प्रभृति। हमरा पूर्ण विश्वास अछि जे उपर्युक्त दुनू कथा संग्रह बच्चा सभके ँ तऽ आकृष्ट करबे करत अपितु समाजक सभ वर्गक लोकके ँएक बेरि एकरा उलटयबाक लिप्सा होयबे करतैक। एहि दिशामे श्रीमती ठाकुरक स्तुत्य प्रयास अछि, साहसिक डेग अछि आ अभिनव प्रयोग अछि। हमर शुभकामना अछि जे कथा लेखिका एहने सरस, सहज आ सजल रचना सभसँ मैथिली साहित्यक भण्डारके ँ सुरभित करैत रहथि। जीवकान्त उत्तराधिकारी आ लेखक ओइ दिन फोनाचारमे एक अग्रज लेखक कहलनि जे हम मैथिलीमे कोनो उत्तराधिकारी नै दए सकलौं। हम देखै छी जे हुनक अपेक्षा बहुत जाइज छन्हि। बहुतो लेखककेँ वंशज लेखक भेल छथि आ से योग्यतापूर्वक आ आवेशपूर्वक ऐ काजमे लागल छथि। ओकर आगाँ ओ इहो कहलनि जे हुनके परिवारमे एक गोटे मैथिलीमे लिखैत अवश्य छथि, मुदा ओ मैथिलीमे कोनो वस्तु पढ़ैत नै छथि। हमरा भेल जे एकर चर्चा होएबाक चाही। लेखक भेनाइ आकस्मिक बात थिकैक। ऐ बातकेँ कोनो नियममे बान्हल नै जा सकैत छैक। कतेक लेखक छथि जनिक पुरखा लेखक भेल छलथिन। मुदा एकर विपरीतो बात ओतबे सत्य थिक जे बहुसंख्यक लेखक एहेन परिवारक सन्तान छथि जइमे कहियो लेखक आ कवि नै भेल छल। संसारमे अनेक वस्तुक पढ़ाइ छैक, जेना पढ़ाइ कए लोक डाक्टर भए सकैत अछि। लेखक बनबा लेल एहेन कोनो शिक्षण आ प्रशिक्षणक चर्या (पाठ्यक्रम) नै छैक। एमहर पत्रकारिताक पढ़ाइ शुरू भेल अछि। मास मीडियाक पढ़ाइ शुरू भेल अछि। नाटक विद्यालय आ फिल्म प्रशिक्षण संस्थान सभ सोहो अछि। लेखक बनएबाक कला आ विज्ञानक चर्चा नै सुनल अछि। मैथिलीमे जे कियो लेखक अछि, से सभ तपस्वी जकाँ तपोनिष्ठा अछि। ऐमे (मैथिली) पाठक नै छैक, अथवा बहुत सीमित पाठक-वर्ग छैक। देासर कारण प्रकाशक नै छैक। अपन पाइ गला कए पोथीक मुँह देखब संभव होइत छैक। कोनो आमदनी नै छैक। बहुत घाटा छैक, अजीवन प्रतिमास किछु धन ऐ भट्ठीमे झोंकए पड़ैत छैक। तखन जतबे छोट होउक, एक लेखक वर्ग छैक जे लिख रहल छैक। यशोलिप्सा एक कारण कहल जा सकैत अछि। प्रत्येक आदमीमे ई जन्मजात दुर्बलता होइत छैक जे ओ यशस्वी होअए। मुदा ऐ प्रेरणाकेँ एकमात्र प्रेरणा नै बूझल जएबाक चाही। एक देखार प्रेरक अछि जे ई सभ लोक भाषा-प्रेमसँ प्रेरित अछि आ चाहैत अछि जे भाषा (आ संस्कृति)केँ जिआ कए राखी आ विपरीत परिस्थितियोमे एकरा जिएबाक उद्योगमे लागल रही। हमर एक मात्र पौत्र (पितिऔत भाइक पौत्र) इन्कम टैक्समे हाकिम छथि। 2003ईं.मे मैथिली अकस्मात संसदसँ अनुमोदित भेल आ संविधानक भाषा-सूचीमे स्थान पाबि गेल। ओ पौत्र ओही दिन फोनपर हमरा कहलनि जे हमरे सबहक (मैथिली लेखक) सदुद्योगसँ आइ ई भाषा ऐ गौरवक अधिकारी भेल अछि। भाषा लेल जाधरि श्रद्धा-भक्ति नै होएतैक ताधरि ऐ भाषाकेँ लेखक नै भेटतैक। अनुभव कएल जा रहल अछि जे मैथिली भाषामे जतबा जे काज होइए, से सभ बूझबे सबहक हाथे भए रहल अछि। नव लोक ऐ काजमे नै लगैत अछि। प्राय: भारतक प्रत्येक भाषामे ई गंजन छैक। यद्यपि किछु भाषा देशमे अछि जइमे पोथी आ पत्रिकाक प्रसार-संख्या उत्साहजनक छैक, तइ सभमे किछु लेखक भर्ती होइत अछि। अधिकांश भाषामे मैथिलिए जकाँ रौदी-दाही छैक, तँ ई धंधे बिलताहु भेल छैक। ऐ कारणसँ केन्द्रीय साहित्य अकादेमी (दिल्ली) सभ भाषामे युवा लेखक पुरस्कार आरंभ देलक अछि। चालीस बर्खसँ कम वएसक लेखक पहिल पोथी सभमे सँ एकपर ई पुरस्कार देल जाएत। ई बात प्रशंसा योग्य अछि, मुदा चिन्ताजनक सेहो अछि। चिन्ता ऐ बात लेल जे चालीस बर्खसँ छोट वएसक लोक ऐ क्षेत्रमे आएब कदाचित पसिन्न नै करैत अछि। नारायणजी एक दिन दिल्ली मेट्रो रेलसँ पर्यटन कए रहल छलाह, ओहीठामसँ फोन लगा कए कहलनि। मेट्रो रेल स्टेशनपर पोथी पत्रिकाक कठघारा छैक। हिन्दीक एकहु पत्रिका आ पोथी नै। मैथिली चर्चा करब व्यर्थ। एकर दू अर्थ भए सकैत अछि, एक तँ ऐ देशमे लिखबा-पढ़बाक भाषा अंग्रेजी अछि। आ अंग्रेजिए टा अछि। दोसर जे कियो पाठक हिन्दीमे (तहिना मैथिलीमे) किताब, अखबार आ साप्ताहिक पत्र नै पढ़ए चाहैत अछि। कोंकणीमे एक लेखक छथि रवीन्द्र केलेकर। ओ भारतीय भाषा सबहक गंजनक चर्चा करैत एकठाम लिखै छथि जे संविधान हिन्दीक माथपर राजमुकुट राखि देलक, तइसँ किछु लाभ हिन्दीकेँ नै भेलैक। ओ लिखैत छथि जे अंग्रेजीकेँ हाथमे राजदण्ड छैक। तँए देशक शहरमे आ जंगलमे अंग्रेजी माध्यमक स्कूल चलि रहल छैक। (आश्चर्य जे मैथिली माध्यमक एकहु स्कूल नै फूजल छैक।) पूर्वोक्त अंग्रेजी लेखकक बातमे एक बात आर अछि जे मैथिली लेखक हुनक परिवारमे छन्हि, मुदा ओहो मैथिलीमे (पोथी) पढ़ब पसिन्न नै करै छथि। ई कोनो विशेष उदाहरण नै थिक। अग्रज महाशय जइ क्लशक चर्चा करैत छथि, से विरल घटना नै थिक, सार्वजनिक घटना थिक। मैथिली पोथी नै पढ़ल जा रहल अछि। कहल जाए जे ऐ पोथीक कोनो महत्व नै देल देल जाइत छैक। हम नवंबर 2010ईं.मे अपन प्रकाशित नव पोथीक दस-पन्द्रह प्रति पटना लए गेल रही। मोनमे रहए, लेखक सभकेँ देब। कोनो पुस्तक व्यवसायीकेँ देब। पोथी पटना-सन शहरमे दस प्रति किएक नै खपि जाएत, से धरणा सभ रहय। तीन सप्ताह धरि हम पटना रही। दसो गोटेकेँ फोन कएल, पोथी रखने छी, कृपया आउ, लए जाउ आ एकर वितरणमे मदति करू। सभटा व्यर्थ भेल। अन्तमे अनेक आमंत्रितमे सँ एक अजित कुमार आजाद अएलाह आ हमर भार हल्लुक कए देल, दस प्रति उठा कए ओ अपन मोटर साइकिलक डिक्कीमे धए लेल आ लए गेलाह। एक दिन प्रसिद्ध कवि उदयचन्द्र झा विनोद फोनाचारमे कहलनि, पोथी की छपाउ? पोथी लेल कियो (माने पाठक आलोचक, इतिहासकार, अनुसंधित्सु आदि) प्रतीक्षा कहाँ करैत अछि? पोथी छापि देल, तँ वाह-वाह, नै छापल, तैयो वाह-वाह। ने ककरो उत्सुकता छैक, ने ककरो ऐ बातक प्रत्याशा छैक। पटनाक एक पुस्तक व्यवसायी पुछलापर कहलनि- “मैथिलीमे वएह पोथी बिकाइत अछि जे प्रतियोगिता परीक्षामे ओकर सिलेबसमे लागल छैक। आर कोनो पोथीक पुछारि ग्राहक नै करैत अछि।” पूवोक्त अग्रज बंधुक चिन्ता ठीक छन्हि। हमरा सबहक घरमे लेखकक आ पाठकक जन्म नै भए रहल अछि। अपने घरसँ पुन: एक उदाहरण लै छी। एकटा पौत्र छथि जे लोहाक कारखानामे नोकरीमे लागल छथि। एक दिन ओ हमरा पुछलन- “गामपर अंग्रेजीक उपन्यास (सभ) अछि?” हम कहलियनि- “की बात थिकै?” ओ कहलनि- “अंगेजीक उपन्यास उपन्यास रहैत तँ गाम जइतौं आ ओइठामसँ किछु छाँटि कए पढ़बा लेल अनितौं, आर की?” जगदीश प्रसाद मंडलक ‘जिनगीक जीत’ उपन्यासपर मैथिलीमे नवोदित उपन्यासकार जगदीश प्रसाद मंडल। हिनक दोसर उपन्यास देखल- ‘जिनगीक जीत’। हिनकर अन्य उपन्यास अछि- ‘मौलाइल गाछक फूल, जीवन-सघर्ष, जीवन-मरण, उत्थान-पतन, इत्यादि। हिनकर नामपर कथा संग्रह आ नाटक सेहो अंकित अछि। एहि उपन्यासमे किछु नव अछि। मिथिलाक खेती-प्रधान गामक जीवन आएल अछि। मैथिलीमे एहि लेल आर नव सुखद अनुभूति अछि जे एकर लेखक खेतिहर समुदायक बहुसंख्यक समाजसँ आएल छथि। ओ अपन गामक लोकक भाषा अनने छथि। सवर्ण जातिक लेखक जखन गामक अशिक्षित आ दलित लोकक भाषा साहित्यमे टिपैत अछि, आ जे कदाचित होइत आएल अछि, से बनौआ आ कृत्रिम जकाँ लगैत अछि। लेखक जे भाषा लिखलनि अछि, से देशज मैथिली थिक। मैथिलीमे उर्वराशक्ति असीम आ कल्पनातीत अछि, से जगदीश जीक भाषा देखि-पढ़ि कए बूझल जा सकैत अछि। नव अछि जे एकर सभ पात्र खेतीसँ जुड़ल अछि। एहिमे कतहु बनियाँ-बेकाल, सूदखोर महाजन, शोषक सवर्ण भूस्वामी, पाकेटमार, डाकू, लम्पट आ खुनियाँ नहि आएल अछि। खेतीमे जतेक समस्या छैक, जतेक गरीबी आ अभाव भए सकैत अछि, जतेक अकर्मण्यता आ आलस भए सकैत छैक, से सभ विस्तारसँ आएल अछि। लेखकक दृष्टिकोण नव अछि। ओ कहैत अछि जे गामक उन्नति गामक लोकेक हाथमे छैक। ओ कहैत अछि गामसँ पलायन आ विस्थापनकेँ रोकबाक चाही। गामक धनिक आ गरीब मेल-पाँच कए खेतीमे पूँजी लगाबय, पूँजी जुटयबा लेल गामेमे संभावना ताकय आ तकर दोहन करय। शिक्षा पयबा लेल एक दोसरक मदति करय, बिलटलक मदति कए ओकर समर्थ आ सम्पन्न बनाबय। लेखक बैंकक कर्जा लए विकास करबाक बात नहि करैत अछि। ओ ब्लॉक आफिसक प्रखण्ड विकास पदाधिकारीक आ ओकर अमलाक चर्चा नहि करैत अछि। स्वयंसेवी आ स्वयं सहायता समूहक चर्चा नहि करैत अछि। देशक पंचवर्षीय योजना आ नहर योजनाक प्रादुर्भाव आ अभावक बात नहि करैत अछि। नव अछि जे ओ मनुक्खक जिनगीकेँ अनमोल मानैत अछि। ओकरा बचएबा लेल ओ सार्थक सहयोगक कथा कहैत अछि। मनुक्खक गरिमामे ओकर विश्वास छैक। एहि गरिमाकेँ स्थापित कएल जा सकैत अछि, से बात ओ एहि कथानककेँ लिखि कए देखा देलक अछि। एकटा महात्माक उक्ति क्यो उद्धृत कएने छथि- दू प्रकारक लोकक गरामे पाथर बान्हि कए पानिमे डुबेबाक थिक, एक तँ ओहि धनिककेँ जे धन अछैत दान नहि करैत अछि, आ दोसर ओहि गरीबकेँ जे हाथ-पाएर अछैत परिश्रम नहि करैत अछि। “जिनगीक जीत”मे एहेन धनिक अछि जे सामाजिक काज लेल दान करैत अछि। एकर उदाहरण थिक बचेलाल आ ओकर माय सुमित्रा। गरीबक एक एहेन उदाहरण थिक अच्छेलाल। दोसर उदाहरण थिक देवन आ बुधनी। लेखक जगदीश जीक उपन्यास मनुक्खक आदर आ गरिमाक बात करैए। सभ ठाम विभिन्न पात्र सभ एक दोसराक सम्मान करैए। विवेकानन्दक भाषण सभ मोन पड़ैए, ओ बात-बातमे पराधीन भारतक हिन्दू सभकेँ धिक्कार करैत छलाह। जे सक्षम छल तकर कर्तव्य छलैक जे अन्नहीनकेँ अन्न देअए, विद्याहीनकेँ विद्या देअए। जे एहेन नहि करैत छल, से मनुक्ख नहि छल। विदेशमे ओ कहि अबैत छलाह जे वेदमे अद्वैतवाद छैक, सभ मनुक्खकेँ एक समान मानैत अछि हिन्दू। देशमे आबि आर्थिक-सामाजिक विषमता देखि दुखी भए कहैत छलाह जे दीन-हीन-अज्ञानीकेँ समानता देबा लेल त्याग आ श्रम करू। लेखक जगदीश जी स्वामी विवेकानन्दक भाषा बजैत छथि। पहिल उपन्यास ‘मौलाइल गाछक फूल’मे रमाकान्तक चरित्र-चित्रण कएलनि अछि। रमाकान्त मद्रासमे, बेटा सभक मत बुझलाक बाद अपन जमीन-जाल भूमिहीन सभमे बँटबाक निर्णए लैत छथि, ताहि ठाम वेदान्तक अद्वैतवादक चर्चा लेखक कएने छथि। पोथीक अंतिम आवरणपर लेखकक परिचयमे कहल गेल अछि- ‘मार्क्सवादक गहन अध्ययन। हिनकर कथामे गामक लोकक जिजीविषाक वर्णन आ नव दृष्टिकोण दृष्टगोचर होइत अछि।’ ई रचनाकर पूरा उपन्यासमे मार्क्सवादी शब्दावली नहि अनैत छथि। अनेक ठाम मार्क्सवादक मूल धारणा सभकेँ स्थान देने छथि। बहुत चतुर चालाक छथि। कतहु कहताह, धर्म आ भाग्यकेँ मानब निरर्थक थिक कतहु कोनो समाजवादीक सम्वादमे कहबा दैत छथि जे उत्पादनक सभ स्रोतपर व्यक्तिक एकाधिकार नहि रहए देबाक थिक, ओहिपर मानव-समाजक अधिकार देब न्याय-संगत थिक। सामान्यत: उत्पादनक स्रोत तीनटा थिक- जमीन (खेती), कारखाना आ खान। समाज बदलबा लेल ओ अनेक ठाम कहैत छथि- मनुक्खकेँ मनुक्खक आदर करबाक चाही। एहि लेल व्यक्तिकेँ सभसँ पहिने अपनाकेँ मनुक्ख बनयबाक चाही। उपन्यासमे आदर्श अछि, गरीबक गरीबी दूर करबा लेल संगठित आ योजना बद्ध रूपेँ प्रयास होएबाक चाही। समाज बदलि सकैत अछि। से ओ किछु परिवारक उदाहरण लए कए देखा देलनि अछि। आजुक गाममे एहेन प्रयास छिटफुट होइत रहैत अछि। मुदा, गामक यथार्थ रूप भिन्न अछि। बैमानी-शैतानी अछि। गरीबक शोषण अछि। कमजोरक दमन अछि। धोखा, फरेब अछि। लगानी-भिरानी अछि। चक्रवृद्धि व्याजक ताण्डव नृत्य भए रहल अछि। कथानकक अन्तमे लेखक देवनक संग महंथान सभ दिस जाइत अछि। सुख आ समृद्धिक टापूपर ई मठ-मठाधीश अछि। महंथ सभ भोग-विलासमे डूबल अछि। महंथानमे शान्तीसँ भेँट होइत अछि। ओ महंथानमे भाेग विलास लेल अछि। ओकर नाटकीय ढंगसँ अपहरण भेल छै। बन्द कए राखल आ पोसल जाइ छै। ओ अभिशप्त अछि, काम-क्षुधा शान्ति लेल एक तुच्छ साधन भेल अछि। धर्मक विरूद्ध बजलाह बुद्ध। हुनको नामपर मठ-महंथ अछि। कबीर बजलाह। हुनको नामपर संगठित गुरूवार साहेबक परम्परा अछि। मार्क्स वर्गहीन, शोषणहीन समाज बनाएब लक्ष्य रखलनि। हुनको नामपर अनेक मस्तान मस्त भेल अछि। प्रजातंत्रमे हर राजनीतिक दल जनताक सुख-सुविधा लेल राजगद्दी मँगैत अछि। नेता सबहक रूपमे महंथ सभ अपन भोग-रागक व्यवस्था करैत अछि। कदाचित उपन्यासमे वर्णित महंथान प्रत्येक विचार-धाराक जन-विरोधी भए जएबाक आ होइत जयबाक संकेत कए दैत अछि। मनुक्ख बहुत पाखण्डी आ अनुदार होइत अछि। अन्तमे देवन आ शान्ती मुक्ति लेल, मानव-जातिक मुक्ति लेल संघर्षक बात करैत अछि, जीतक भावनासँ डेग उठबैत अछि। उपन्यासक अन्तिम पाँति सभ एहि प्रकारक संकल्प अंकति करैत अछि- “तेँ जरूरी अछि जे सभसँ पहिने अपने उठि कए मनुक्खक रास्तापर ठाढ़ होइ। जखन मनुक्खक रास्तापर ठाढ़ भए चलए लागब तखन जे गिरल मनुक्ख अछि ओकरा उठबैक कोशिश करैक चाही। उठबैक दुनू उपाय अछि। ककरो बाँहि पकड़ि खिंचैक अछि, ककरो पाछूसँ धक्का दए धकेलैक अछि।” यएह जिनगीक जीत थिक....। डॉ. राजीव कुमार वर्मा कारी घटा बरसैत मेघ तीस बरीख भ गेल दिल्ली मे I गामक जिनगी मोन पड़ैत अछि I शेफालिका जीक पोथी भावांजलि क कुच्छ पन्ना पलट लौं - हमर अपन गाम सजीव भ गेल -- आम , लताम , सीसो, सपाटू, नारियल वृक्षक फुनगी सँ धरती कें अशीशैत चान सुरुजक किरण I हेमंत-बसंतक सुन्नर प्रसून प्रसन्न I कोसी कछेरक प्रार्थना सदृश मंद मंद सुगन्धित , शीतल बयार हवा सँ अठखेली करैत खेत मे गहुमक बालि अनगिन हीरक जोत पसारैत मोइनक जलधार I नाह पर बैसल हम अहाँ पारिजात सुमन सन शुभ्र तारकक ज्योत्सना परिधान स्वर्गक मन्दाकिनी तीर सँ बरसावैत जीवन-दान ब्रह्मक थान सँ अबैत कीर्तन-गान प्राचीन ऋषि मुनिक आश्रम सन पावन शुभ्र स्निग्ध हमर इ डुमरा गाम बाबूजीक विश्वास माँ क ममत संभरल इ सुन्दर शुचि- धाम I हमरा मोन पड़ल गामक घनघोर मेघ I हथिया आ कान्हा नक्षत्र I चमकैत बिजुरि I मयूरक नाच I ऋतुक रानी वर्षा I मोन पड़ल ज्योतिरीश्वर ठाकुरक वर्णन - मेघक गज्ज , आकाशक मेचकता , विदुल्लताक तरंग , कदम्बक सौरभ , विष धरक संसार , ददुरक कोलाहल , धाराक संताप , आदित्यक तुच्छता I हम सभ ग्रीष्म ऋतुक ज्वालासं जखन मृतप्राय भ जायत छी तखन वर्षाक बूंद संजीवनिक काज करैत अछि I मोन पाडू भुवनेश्वर सिंह भुवनक शब्द - आएल आषाढ़ , आएल आषाढ़ I भए गेल तिरोहित ग्रीष्म गाढ़ I झर-झर-झर -झर झहरय फुहार I खुजि गेल प्रकृति-मंदिर-दुआर I विश्वनाथ विषपायी जीक पंक्ति सेहो याद अवैत अछि -- पट पहिरि हरित नव प्रकृति नटी पुनि गरा बान्हि कए बक्क माल I झिंगुर नूपुर पिक गीत गाबि फेकै अछि बिजुरिक नयन-जाल II विद्यापतिक नायिका कारी नुआ पहिरि मुह झाँपि, पएरक कड़ा कें ऊपर ससारि, नूपुरक मुह बंद कए पिच्छर मे अभिसारक निमित्त स्थल पर जाइत छथि जबकि वर्षा भए रहल अछि , मेघ गरैज रहल अछि , सांप सह-सह कए रहल अछि I दिल्ली मे वर्षाक इन्तजार मे आंखि मे दरद आ दिल मे बैचेनी I हथिया आ कान्हा क कोनो चर्चा नहि I झिन्गुरक गीत दुर्लभ आ मानव स्वयं विषधर I रत्ती भरि बूंद आ बाट पर गाड़ीक लम्बा जाम I पाईने- पाइन, गड्ढे -गड्ढा I नालीक यमुना रोड पर I नहि चाही हमरा दिल्ली मे हथिया आ कान्हा I दू बुन्न से काम चला लेब I गाम जायब ते हथिया - कान्हा देख लेब I खूब देखब कारी घटा आ बरसैत मेघ I लेखनी क विराम द रहल छी शेफालिका जीक भावांजलि क गोटेक शब्द सं - हमर हृदय मरुस्थल बनि जाइत अछि अहाँ मेघ बनि बरैस जाइत छी हम कृतज्ञ भ जाइत छी II मानेश्वर मनुज मानसरोवरक भूमिकाक प्रासंगिकता ओना तँ प्रेमचन्द सेहो अप्पन गुरु बंगलाक महान कथाकार शरतचन्द्रकेँ मानलन्हि, मुदा बंगलाक विभिन्न पत्र-पत्रिका कथा-चेतनाक हिसाबे प्रेमचन्दकेँ सर्वोपरि मानैत छथि। एहि बातमे कोनो संदेह नहि जे प्रेमचन्दक कथा साहित्य विश्वसाहित्यमे अप्पन समुचित स्थान रखैत अछि। गाँधीजी रवीन्द्रनाथ टैगोरक समक्ष नतमस्तक भऽ जखन हुनका गुरु कहलकन्हि तखन रवीन्द्रनाथ टैगोर सेहो आह्लादपूर्वक हुनका बापू कहलकन्हि। प्रेमचन्द जे सम्मान बंगला साहित्यकेँ< देलन्हि ताहिसँ कनिको कम सम्मान बंगलाक साहित्यकार प्रेमचन्दकेँ नहि दऽ रहल छथि। प्रेमचन्दक जे कथा सभ पाठ्यपुस्तकमे लागल अछि ताहिसँ हिन्दी आ मैथिली जगत पूर्णतः वाकिफ अछि, तकर अलावे समए-समएपर हिन्दीक पत्रिका सभ प्रेमचन्दक आनो कथा सभ प्रकाशित करैत रहैत अछि। एतेक सभ भेलाक बादो हिन्दी आ मैथिलीक आम पाठक की लेखको प्रेमचन्दसँ अनभिज्ञ भऽ रहल छथि, जाहि कारणेँ मैथिली की हिन्दियो साहित्य एको डेग आगाँ नहि बढ़ि रहल अछि।मानसरोवरक प्राकथनमे प्रेमचन्द भारतीय कथा साहित्यक गुढ़केँ कतेक गदिया कऽ पकड़ने छथि- देखल जा सकैत अछि आ हमरा लोकनि लीकसँ कतेक हटि गेल छी तकरो अनुमान कएल जा सकैत अछि। हिन्दीक कतेको पत्र अप्पन सम्पादकीयमे कहैत छल जे मैथिली पहिने अप्पन साहित्यकेँ मजगूत कऽ लिअए तखन सम्वैधानिक मान्यताक बात करए, मुदा मैथिलीक साहित्यकार लोकनि अपना हठपर अड़ल रहलथि। रोजगारक नामपर दर-दर भटकैत मैथिलजन सभतरि अपमानित भऽ रहल छथि तकर किनको चिन्ता नहि मुदा अप्पन हठ कायम रखताह। साहित्य वा राजनीति एहन हल्लुक चीज नहि जे सत्यसँ अलग पैर राखि आडम्बरक बलपर सफलता प्राप्त कऽ लिअए। सौ चोर मसियौत अइ तँ सौ साधु सहोदर, ई परम सत्य अइ। कथा साहित्य पाठकक सुन्दर भावनाक स्पर्श- मानसरोवरक प्राकक्थन-प्रेमचन्द- मैथिली रूपान्तर- मानेश्वर मनुज एक आलोचक लिखलन्हि अछि जे इतिहासमे सभ किछु यथार्थ होइतो ओ असत्य अछि आ कथा साहित्यमे सभ किछु काल्पनिक होइतो ओ सत्य अछि। अइ कथनक आशय एकर सिवाय आओर की भऽ सकैत अछि जे इतिहास आदिसँ अन्त धरि हत्या, संग्राम आ धोखाक प्रदर्शन करैत अछि जे असुन्दर अछि तैँ असत्य अछि, लोभक क्रूरसँ क्रूर अहंकारक नीचसँ नीच, ईर्ष्याक अधमसँ अधम घटना सभ अहाँकेँ ओतऽ भेटत आ अहाँ सोचऽ लागब जे मनुष्य एतेक अमानुषिक अछि, थोड़ स्वार्थक लेल भाए-भाएक हत्या करऽ पर लागल अछि। बेटा बापक हत्या कऽ दैत अछि आ राजा असंख्य प्रजाक हत्या कऽ दैत अछि। एकरा पढ़ि कऽ मोनमे ग्लानि होइत अछि आनन्द नहि। आ जे आनन्द प्रदान नहि कऽ सकैत अछि ओ सुन्दर नहि भऽ सकैत अछि आ ओ सत्य सेहो नहि भऽ सकैत अछि। जतऽ आनन्द अछि ओतै सत्य अछि। साहित्य काल्पनिक बस्तु अछि मुदा एकर प्रधान गुण अछि आनन्द प्रदान करब, आ एहि हेतु ओ सत्य अछि। मनुष्य जगतमे जे किछु सत्य आ सुन्दर पओलक अछि आ पाबि रहल अछि ओकरे साहित्य कहैत छैक आ गल्प सेहो साहित्यक एक भाग अछि। मनुष्य जाति लेल मनुष्ये सभसँ विकट पहेली अछि। ओ स्वयं अपना समझमे नहि अबैत अछि। कोनो ने कोनो रूपमे ओ अपने आलोचना करैत रहैत अछि, अपने मनोरहस्य खोलल करैत अछि। मानव संस्कृतिक विकासे एहि लेल भेल अछि कि मनुष्य अपनाकेँ समझाबय आध्यात्म आ दर्शन जकाँ साहित्यो एहि खोजमे लागल अछि, अन्तर एतनी अछि कि ओ अइ उद्योगमे रसक मिश्रण कऽ ओकरा आनन्दप्रद बना दैत अछि, एहि लेल आध्यात्म आ दर्शन सिर्फ ज्ञानी लोकनिक लेल अछि, साहित्य मनुष्य मात्र लेल। जेना हम ऊपर कहि गेल छी, गल्प आ आख्यायिका साहित्यक एक प्रधान अंग अछि। आइसँ नहि, आदिये कालसँ। हँ, आइ-काल्हुक आख्यायिका आ प्राचीनकालक आख्यायिकामे समयक गति आ रुचिक परिवर्तनसँ बहुत किछु अन्तर भेल अछि। प्राचीन आख्यायिका कुउतुहल प्रधान होइत छल आ आध्यात्म विषयक। उपनिषद आ महाभारतमे आध्यात्मिक रहस्यकेँ समझाबक लेल आख्यायिका सभक आश्रय लेल गेल अछि। “जातक”सेहो आख्यायिकाक सिवाय आओर की अछि? बाइबिलमे सेहो दृष्टान्त सभ आ आख्यायिका सभक द्वारे धर्म तत्व समझाएल गेल अछि। सत्य अइ रूपमे आबि कऽ साकार भऽ जाइत अछि आ तखने जनता ओकरा समझैत अछि आ ओकर व्यवहार करैत अछि। वर्तमान आख्यायिका मनोवैज्ञानिक-विश्लेषण आ जीवनक यथार्थ स्वभाविक चित्रणकेँ अप्पन ध्येय समझैत अछि। एहिमे कल्पनाक मात्रा कम, अनुभूतिक मात्रा अधिक होइत अछि, बल्कि अनुभूतिये रचनाशील भावनासँ अनुरंजित भऽ कऽ कथा बनि जाइत अछि, मगर ई समझब भूल होएत कि कथा जीवनक यथार्थ चित्र अछि। जीवनक चित्र तँ मनुष्य स्वयं भऽ सकैत अछि, मगर कथाक पात्र सभक सुख-दुःखसँ हम जतेक प्रभावित होइत छी ओतेक यथार्थ जीवनसँ नहि होइत छी, जावत तक ओ निजत्वक परिधिमे ने आबि जाए। कथा सभक पात्र सभमे हमरा एक्के-दू मिनटक परिचयमे निजत्व भऽ जाइत अछि आ हम ओकरा संग हँसऽ आ कानऽ लगैत छी, ओकर हर्ष आ विषाद हमर अप्पन हर्ष आ विषाद भऽ जाइत अछि, बल्कि कहानी पढ़ि कऽ ओ लोको कानैत आ हँसैत देखल जाइत अछि, जकरापर साधारणतः सुख-दुःखक कोनो असरि नहि पड़ैत अछि, जकर आँखि श्मशानमे या कब्रिस्तानमे सेहो सजग नहि होइत अछि, ओ लोक सेहो उपन्यासक मर्मस्पर्शी स्थल सभपर पहुँचि कऽ कानऽ लगैत अछि। शाइत एकर ईहो कारण होइक कि स्थूल प्राणी सूक्ष्म मनक ओतेक लग नहि पहुँच सकैत अछि जतेक कि कथाक सूक्ष्म चरित्रक। कथाक चरित्र सभ आ मनक बीचमे जड़ताक ई पर्दा नहि होइत अछि, जे एक मनुष्यक हृदयकेँ दोसर मनुष्यक हृदयसँ दूर रखैत अछि। आ अगर हम यथार्थकेँ हूबहू खीच कऽ राखि दी तँ ओहिमे कला कहाँ अछि। कला केवल यथार्थक नकलक नाम नहि अछि। कला देखाइत तँ यथार्थ अछि मुदा यथार्थ होइत नहि अछि। ओकर खूबी ई अछि कि ओ यथार्थ नहि होइतो यथार्थ लगैत अछिउ। एकर मापदण्ड सेहो जीवनक मापदण्डसँ अलग अछि, जीवनमे बहुधा हमर अंत ओही समय भऽ जाइत अछि जखन ओ वांछनीय नहि होइत अछि। जीवन ककरो दायी नहि अछि। ओकर सुख-दुःख, हानि-लाभ, जीवन-मरणमे कोनो क्रम कोनो सम्बन्ध ज्ञात नहि होइत अछि। कमसँ कम मनुष्यक लेल ई अज्ञेय अछि, लेकिन कला-साहित्य मनुष्यक रचल जगत अछि आ परिमिति हेबाक कारण सम्पूर्णतः हमरा सामने आबि जाइत अछि आ जहाँ ओ हमर मानवो-न्याय-बुद्धि आ अनुभूतिक अतिक्रमण करैत पाओल जाइत अछि, हम ओकरा दण्ड देबाक लेल तैयार भऽ जाइत छी। कथामे अगर ककरो सुख प्राप्त होइत छैक तँ एकर कारण बतवक हेतैक। दुःखो भेटैत छैक तँ ओकर कारण बतवक हेतैक। एतऽ कोनो चरित्र मरि नहि सकैत छैक जाबत तक मानव-न्याय-बुद्धि ओकर मौत ने मांगैक। सृष्टाकेँ जनताक अदालतमे अप्पन हर एक कृतिक लेल जवाब देबऽ पड़तैक। कलाक रहस्य भ्रान्ति अछि, मुदा ओ भ्रान्ति जाहिपर यथार्थक आवरण पड़ल हो। हमरा सभकेँ ई स्वीकार कऽ लेबऽ मे संकोच नहि हेबाक चाही कि उपन्यासोक जकाँ आख्यायिकाक कलो हम पश्चिमसँ लेल अछि। कमसँ कम एकर आइ-काल्हुक विकसित रूप तँ पश्चिमेक अछि। अनेक कारण सभसँ जीवनक अन्य धारा सभक तरहे साहित्योमे हमर प्रगति रुकि गेल आ हम प्राचीनसँ एको-रत्ती एम्हर-ओम्हर हटबो निषिद्ध बुझि लेलहुँ। साहित्यक लेल प्राचीन लोक सभ जे मर्यादा बाँधि देने छलथि, ओकर उल्लंघन करब वर्जित छल। अतएव काव्य, नाटक, कथा कथूमे हम अप्पन कदम बढ़ा नहि सकलहुँ। कोनो बस्तु बहुत सुन्दर भेलोपर अरुचिकर भऽ जाइत अछि, जावत तक ओइमे किछु नवीनता ने आनल जाए। एक्के तरहक नाटक, एक्के तरहक काव्य पढ़ैत-पढ़ैत आदमी ऊबि जाइत अछि आ ओ किछु नव चीज चाहैत अछि, चाहे ओ ओतेक सुन्दर आ उत्कृष्ट नहि हो। हमरा ओतऽ तँ ई इच्छा उठबे ने कएल या हम सभ एतेक सकुचएलहुँ कि ओ जड़ीभूत भऽ गेल। पश्चिम प्रगति करैत रहल, ओकरा नवीनताक भूख छलैक मर्यादाक बेड़ी सभसँ चिढ़। जीवनक हर एक विभागमे ओकर एहि अस्थिरताक, असंतोषक बेड़ी सभसँ मुक्त भऽ जेबाक छाप लागल अछि। साहित्यमे सेहो ओ क्रान्ति मचा देलक। शेक्सपियरक नाटक अनुपम अछि मुदा आइ ओइ नाटक सभक जनताक जीवनसँ कोनो सम्बन्ध नहि। आजुक नाटकक उद्देश्य किछु आओर अछि, आदर्श किछु आओर अछि, विषय किछु आओर अछि, शैली किछु आओर अछि। कथा-साहित्यमे सेहो विकास भेल आ ओकर विषयमे चाहे ओतेक पैघ परिवर्तन नहि भेलैक मुदा शैली तँ बिल्कुले बदलि गेलैक। अलिफलैला ओहि समयक आदर्श छलै, जाहिमे बहुरूपता छलै, वैचित्र्य छलै, कुतुहल छलै, रोमांस छलै, मुदा ओइमे जीवनक समस्या नहि छलै, मनोविज्ञानक रहस्य नहि छलै, अनुभूति सभक एतेक प्रचुरता नहि छलै, जीवन आ सत्य रूपमे ओतेक स्पष्टता नहि छलै। ओकर रूपान्तर भेलैक आ उपन्यासक उदय भेलैक जे कथा आ ड्रामाक बीचक बस्तु अछि। पुरान दृष्टान्त सभ रूपान्तरित भऽ गल्प बनि गेल। मुदा सए वर्ष पहिले यूरोप सेहो एहि कलासँ अनभिज्ञ छल। पैघ-पैघ, उच्च कोटिक दार्शनिक तथा ऐतिहासिक आ सामाजिक उपन्यास लिखल जाइत छल, लेकिन छोट-छोट कथा सभक दिस ककरो ध्यान नहि जाइत छलैक। हँ परी सभक आ भूत सभक कथा लिखल जाइत छल, किन्तु एहि एक शताब्दीक अन्दर या ओहूसँ कम बुझी छोट-कथा साहित्यक आन सभ अंगपर विजय प्राप्त कऽ लेलक अछि, आ ई गलत नहि होएत कि जेना कोनो जमानामे कविते साहित्यिक अभिव्यक्तिक व्यापक रूप छल ओहिना आइ कथा अछि। आ ओकरा ई गौरव प्राप्त भेलैक अछि यूरोपक कतेको महान कलाकारक प्रतिभासँ, जाहिमे बालजाँक, मोपासाँ, चेखब, टॉलस्टाय, मैक्सिम गोर्की आदि मुख्य अछि। हिन्दीमे पचीस-तीस साल पूर्व तक गल्पक जन्म नहि भेल छल। आइ तँ कोनो एहन पत्रिका नहि जाहिमे दू-चारि “कथा” नहि होअए, एतऽ तक कि कतेको पत्रिकामे केवल “कथे”देल जाइत अछि। कथाक एहि प्राबल्यक मुख्य कारण आजुक जीवन संग्राम आ समयाभाव अछि, आब ओ जमाना नहि रहल कि हम “बोस्ताने खयाल” लऽ कऽ बैस जाइ आ पूरा दिन ओकरे कुँजमे विचरैत रही। आब तँ हम संग्राममे एतेक तन्मय भऽ गेल छी कि हमरा मनोरंजनक लेल समय नहि भेटैत अछि, अगर किछु मनोरंजन स्वास्थ्यक लेल अनिवार्य नहि होइत आ हम विक्षिप्त भेले बिना अट्ठारह घंटा काज कऽ सकितहुँ तँ शाइत हम मनोरंजनक नाम तक नहि लितहुँ, मुदा प्रकृति हमरा विवश कऽ देलक अछि तैँ हम चाहैत छी कि थोड़सँ थोड़ समयमे अधिकसँ अधिक मनोरंजन भऽ जाए, तैँ सिनेमा घरक संख्या दिनो-दिन बढ़ैत जाइत अछि। जाहि उपन्यासकेँ पढ़ऽमे महीना लगैत ओकर आनन्द हम दू घंटामे उठा लैत छी। कथाक लेल पन्द्रह-बीसे मिनट काफी अछि। अतएब हम कथा एहन चाहैत छी कि ओ थोड़सँ थोड़ शब्दमे कहल जाए, ओहिमे एक वाक्य कि एक शब्दो अनावश्यक नहि आबि पाबए, ओकर पहिले वाक्य मनकेँ आकर्षित कऽ लिअए आ अन्त तक ओकरा मुग्ध कएने रहए, ओकरामे किछु छटपटाहट होइक, किछु ताजगी होइक, किछु विकास होइक आ ओकर संग किछु तत्वो होइक। तत्वहीन कथासँ चाहे मनोरंजन भऽ जाए मानसिक तृप्ति नहि होइत छैक। ई सत्य अछि जे हम कथामे उपदेश नहि चाहैत छी, मुदा विचारकेँ उत्तेजित करक लेल, मनक सुन्दर भावकेँ जागृत करक लेल किछु ने किछु अवश्य चाहैत छी। वैह कथा सफल होइत अछि जाहिमे अइ दुनूमे सँ मनोरंजन आ मानसिक तृप्तिमे सँ एक अवश्य उपलब्ध अछि। सभसँ उत्तम कथा ओ होइत अछि जकर आधार कोनो मनोवैज्ञानिक सत्यपर होइक। साधु पिताक अप्पन कुव्यसनी पुत्रक दशासँ दुखी होएब मनोवैज्ञानिक सत्य अछि। एहि आवेगमे पिताक मनोवेगकेँ चित्रित करब आ तदनुकूल ओकर व्यवहारकेँ प्रदर्शित करब कथाकेँ आकर्षक बना सकैत अछि। अधलाह लोक सेहो बिल्कुल अधलाह नह होइत अछि, ओकरोमे कतौ ने कतौ देवता अवश्य छिपल होइत छैक, ई मनोवैज्ञानिक सत्य अछि। ओइ देवताकेँ खोलि कऽ देखाए देब सफल आख्यायिकाक काज अछि। विपत्तिपर विपत्ति पड़लासँ मनुष्य कतेक दिलेर भऽ जाइत अछि एते तक कि ओ पैघसँ पैघ संकटक सामना करक लेल टाल-ठोकि कऽ तैयार भऽ जाइत अछि। ओकर सभ दुर्वासना भागि जाइत छैक। ओकरा हृदयक कोनो गुप्त स्थानमे छिपल जौहर निकलि अबैत छैक आ हमरा चकित कऽ दैत अछि, मनोवैज्ञानिक सत्य अछि। एक्के घटना वा दुर्घटना भिन्न-भिन्न प्रकृतक मनुष्यकेँ भिन्न-भिन्न रूपसँ प्रभावित करैत अछि। हम कथामे एकरा सफलताक संग देखा सकी तँ कथा अवश्य आकर्षक होएत। कोनो समस्याक समावेश कथाकेँ आकर्षक बनबाक सभसँ बड़का साधन अछि। जीवनमे एहन समस्या नित्ये उपस्थित होइत अछि आ ओहिमे पैदा होबऽबला द्वन्द्व आख्यायिकाकेँ चमका दैत अछि। सत्यवादी पिताकेँ पता चलैत छैक कि ओकर पुत्र हत्या केलक अछि ओ ओकरा न्यायक वेदीपर बलिदान कऽ दिअए वा अप्पन जीवन सिद्धान्तक हत्या कऽ दिअए? कतेक भीषण द्वन्द्व अछि! पश्चाताप एहन द्वन्द्वक अखण्ड श्रोत अछि। एक भाए दोसर भाएक सम्पत्ति छल-कपटसँ अपहरण कऽ लेलक अछि, ओकरा भिक्षा मांगैत देख कऽ की छली भाएकेँ कनिको पश्चाताप नहि हेतैक। अगर एना नहि होइक तँ ओ मनुष्य नहि अछि। उपन्यासेक जकाँ कथा सेहो किछु घटना प्रधान होइत अछि, किछु चरित्र प्रधान। चरित्र प्रधान कथाक पद उच्च बुझल जाइत अछि, मुदा कथामे बहुत विस्तृत विश्लेषणक गुंजाइश नहि होइत अछि। एतऽ हमर उद्देश्य सम्पूर्ण मनुष्यकेँ चित्रित करब नहि, बल्कि ओकर चरित्रक एक अंग देखाएब अछि। ई परमावश्यक अछि कि हमरा कथासँ जे परिणाम वा तत्व निकलए ओ सर्वमान्य होबए आ ओइमे किछु बारीकी होबए। ई एक साधारण निअम अछि कि हमरा ओही बातेक आनन्द अबैत अछि जाहिसँ हमर किछु सम्बन्ध होबए। जुआ खेलऽबलाकेँ जे उन्माद आ उल्लास होइत छैक ओ दर्शककेँ कदापि नहि भऽ सकैत अछि। जखन हमर चरित्र एतेक सजीव आ आकर्षक अछि कि पाठक स्वयंकेँ ओकरा स्थानपर समझि लैत अछ तखने ओकरा कथाक आनन्द प्राप्त होइत छैक। अगर लेखक अपना पात्रक प्रति पाठकमे ई सहानुभूति नहि उत्पन्न कऽ देलक तँ ओ अपना उद्देश्यमे असफल अछि। पाठकसँ ई कहक जरूरति नहि अछि कि अइ थोड़ दिनमे हिन्दी गल्पकला कतेक प्रौढ़ता प्राप्त कऽ लेलक अछि। पहिने हमरा सामने बंगला कथाक नमूना छल। आब हम संसारक सभ प्रमुख गल्प लेखकक रचना पढ़ैत छी, ओहिपर विचार अ बहस करैत छी, ओकर गुण-दोष निकालैत छी आ ओहिसँ प्रभावित भेने बिना नहि रहि सकैत छी। आब हिन्दीक गल्प लेखक सभमे विषय, दृष्टिकोण आ शैलीक अलग-अलग विकास होबऽ लागल अछि। कथा जीवनक बहुत निकट आबि गेल अछि। ओकर जमीन आब ओतेक लम्बा-चौड़ा नहि अछि। ओहिमे कतेक रस, कतेक चरित्र आ कतेक घटनाक लेल स्थान नहि रहल। आब ओ केवल एक प्रसंगक, आत्माक एक झलकक सजीव ह्रूदयस्पर्शी चित्रण अछि। ई एक तथ्यता, ओहिमे प्रभाव, आकस्मिकता आ तीव्रता भरि दी। आब ओहिमे व्याक्याक अंश कम संवेदनाक अंश बेसी रहैत अछि। एकर शैलियो आब प्रभावमय भऽ गेल अछि। लेखककेँ जे किछु कहक अछि ओ कमसँ कम शब्दमे कहि देबऽ चाहैत अछि। ओ अप्पन चरित्रक मनोभावनाक व्याख्या करैत नहि बैसैत अछि, केवल ओकरा दिस इशारा कऽ दैत अछि। कखनो-कखनो तँ संभाषणमे एक दू-शब्देसँ काज निकालि लैत अछि। एहन कतेको अवसर होइत अछि, जखन पात्रक मुँहसँ एक शब्द सुनि कऽ हम ओकर मनोभावक पूरा अनुमान कऽ लैत छी। पूरा वाक्यक जरूरतिये नहि रहैत अछि। आब हम कथाक मूल्य ओकर घटना विन्याससँ नहि लगबैत छी। हम चाहैत छी पात्रक मनोगति स्वयं घटनाक सृष्टि कराबए। घतनाक स्वतन्त्र कोनो महत्वे नहि रहल, ओकर महत्व कवल पात्रक मनोभावकेँ व्यक्त करबाक दृष्टिएसँ अछि- ओहिना जेना शालिग्राम स्वतन्त्र रूपस कवल पत्थरक एक गोल टुकड़ा छ्हथि, लेकिन उपासकक श्रद्धासँ प्रतिष्ठित भऽ कऽ देवता बनि जाइत छथि। खुलासा ई कि गल्पक आधार आब घटना नहि, मनोवैज्ञानिक अनुभूति अछि। आइ लेखक कोनो रोचक दृश्य देख कऽ कथा लिखऽ नहि बैस जाइत अछि। ओकर उद्देश्य स्थूल सौन्दर्य नहि। ओ तँ कोनो एहन प्रेरणा चाहैत अछि, जाहिमे सौन्दर्यक झलक होइक आ ओकरा द्वारा ओ पाठकक सुन्दर भावनाक स्पर्श कऽ सकए। मैथिल दृष्टिक प्रसंग मुम्बइसँ एक चिट्ठी/ बुच्ची दाइक निलामी कोना से देखू १ मुम्बइ ०६ जून २०११-०६-३० आदरणीय भाइ, हमरा पत्रकेँ सम्पादक लोकनि मिथिले-मिहिर टाइमसँ चर्चाक विशय बनबैत रहलन्हि अछि। सोमदेव कहैत छलथि जे पत्र-लेखकक रूपमे मितिला-मिहिरमे अहाँ चर्चित छलहुँ। कतेको सम्पादक हमरा आलेखकेँ पत्रक रूपमे छापि देने छथि आ कतेको एकरा सम्पादकीय बना देने छथि। मुक्तिबोध कविता छोड़ि की डायरी लिखऽ लागल छलथि। हम अप्पन दू-टूक बात बहुतो विद्वान् आ लेखककेँ पत्रसँ आकि फोनपर कहि चुकल छियनि। स्वार्थवश ओ लोकनि ओइपर ध्यान नै दैत छथिन। समीक्षक ओ आलोचककेँ लेखक आ कविक पहचान नै छनि, इतिहासकार लोकनि आलोचक आ समीक्षकक विषय किछु नै जनैत छथि। सभतरि मैथिलीक नामपर निजी स्वार्थ-साधना भऽ रहल अछि। दोसर दिस भाषा-वैज्ञानिक लोकनि डंकाक चोटपर कहि रहल छथि जे किछुये भाषा छोड़ि सभ भाषा मरि जाएत। भाषा मरि जाएत तँ के रोकतैक मुदा साहित्य तँ आनो भाषामे रूपान्तरित भऽ जीबि सकैत अछि। मुदा सभ विधाक विकासक दिशामे कहाँ कतौ निःस्वार्थ प्रयास भऽ रहल अछि। पत्र सेहो साहित्यक एक विधा अछि जे मरल जा रहल अछि। अहींक मानेश्वर मनुज २ मैथिल दृष्टिक प्रसंग मुम्बइसँ एक चिट्ठी जीवकान्त सभ दिन क्षेत्रीयताक पृष्ठ पोषक रहलथि अछि। ओ अप्पन वार्तामे सभ दिन कहैत रहलथि अछि जे जे शक्ति झंझारपुरक माटिमे छैक ओ बेनीपट्टीक माटिमे कतऽ सँ अओतैक आ राजनगरोमे कतऽसँ अओतैक। दोसर दिस ओ हरदम गाम आ शहरक बात करैत रहैत छथि। ओ गामक लेखक छथि। आ बहुतो गोटे शहरक लेखक छथि। हाइ स्कूलसँ बढ़ि कऽ कोनो स्कूल नै होइत छैक तकर ओ अध्यापक छलथि। पढ़बैत तँ विज्ञान छलथि मुदा ओ बी.ए.पास छथि। यानी कलाक ग्रेज्युएट छथि। ओ हाइ स्कूलक पाठ्यपुस्तक यथा अर्थशास्त्र, नागरिकशास्त्र, इतिहास, भूगोल, जीव विज्ञान आ गृह विज्ञानपर जरूर नजरि देने हेताह। ई सभ विषय एक संग बैस कऽ पढ़ि लेलाक बाद मोनक बहुत रास अन्हार हटि जाइत छैक। शहरीकरण आधुनिक सभ्यताक परिणति अछि। जाइ देशक जतेक अधिक लोक शहरमे आबि बसि गेल अछि ओ ओतेक सभ्य कहबैत अछि। विकसित देशमे बीज आ खाद हेलीकोप्टरसँ छीटल जाइत अछि। जोताइ आ कटाइ अत्याधुनिक मशीनसँ होइत अछि। समुन्नत गाँवकेँ शहर कहैत छैक आर शहर आ गाममे किछु अन्तर नै होइत अछि। शहरमे पाँच-पाँच एकड़ जमीनमे एकटा अस्पताल बनल रहैत अछि, दू-तीन एकड़क पार्क रहैत अछि, चौड़ा-चौड़ा सड़क रहैत अछि, नमहर-नमहर वाकिंग-स्पेस रहैत अछि, पैघ-पैघ लिफ्ट मल्टी-स्टोरी बिल्डिंगमे रहैत अछि। मुदा रहबाक लेल छोट-छोट रूम रहैत अछि। मुम्बइ महानगरमे दुपहरियाक समय जे जे होस्पीटलक अगल-बगलमे घुमि कऽ देखियौ- कतेक पिपरक गाछ आ कतेक बड़क गाछक निच्चामे कंगाल सभ बैसल छैक। जइ जगहपर एक रूमक दाम बीस लाखसँ कम नै ओतऽ भिखमंगो गुजर-बसर कऽ रहल छैक। कफ-परेड सन महग एरियामे बिल्डिंग- दोगा-दोगी- मजदूर वर्ग सेहो गुजर कऽ रहल छैक। झोपडपट्टी सभ- सरकारी जमीनक अनाधिकार अधिग्रहण छैक मुदा ओकरा केओ हटा नै पबैत छैक। मुम्बइ महानगरमे कमसँ कम एक लाख स्त्री-पुरुष- बीच शहरमे बनल रेल-लाइनपर खुलेआम मल्ल त्याग करैत रहैत अछि। भोर पाँच बजे जे लोकल ट्रेनसँ यात्रा करी तँ ई दृश्य देखल जा सकैत अछि। जे कोनो स्त्री-पुरुष नै देखने होथि ओ लाख-लाख स्त्री-पुरुषक अंग दर्शन कऽ सकैत छथि। दोसर दिस ओतुक्का जेवन-यापनमे एतेक भागम-दौड़ छैक जे प्रति दिन रेल आ अन्य दुर्घटनामे करीब पचास आदमी मरि जाइत अछि आ ओकर कतौ ओतबो चर्च-बर्च नै होइत छैक जतेक चर्च कतौ छागर वा मुर्गीकेँ कटलाक बाद होइत छैक। शहरमे बिल्डर सभ जमीन्दार भऽ गेल अछि, पैघ व्यापारी सभ जमीनदार भऽ गेल अछि। पैघ नेता आ पदाधिकारी सभ घोटाला कऽ आकि घुसखोरी कऽ जमीन्दार भऽ गेल अछि। ओ सभ समृद्ध (एफलुएन्ट) अछि। ओ सभ शहरक भोग कऽ रहल अछि। बाँकी सभ तँ शहरोमे गामेक दैन्य जीवन जी रहल अछि। दृष्टिक संकीर्णता यात्रासँ समाप्त होइत छैक। योगी लोकनिक दृष्टि विशाल होइत छनि कारण ओ सभ एक ठाम नै रहैत छथि, घुमैत-फिरैत रहैत छथि। कबीर पढ़ल-लिखल नै रहथि मुदा घुमैत-फिरैत रहथि। ओ अप्पन गुरु कतौ अगल-बगलमे नै तकलथि। ओ अप्पन गुरु आधुनिक महाराष्ट्रमे आबि तकलथि। रामकेँ कोन प्रयोजन छलनि जनकपुर अएबाक। कर्णकेँ भागलपुर (आधुनिक) केँ छोड़ि गुजरात जेबाक कोन प्रयोजन छलनि। कालिदास उच्चैठ की करऽ एलथि (लोक कथा आधार)। राजनेता लोकनि घुमैत-फिरैत लोक सभसँ बातचीत करैत लोकक दर्शन करैत अप्पन दृष्टि विकसित कऽ लैत छथि। यात्रीक दृष्टिमे आकि राजकमलक दृष्टिमे जे विस्तार छलन्हि ओ हुनका लोकनिक घुमकड़ी स्वभावक कारणेँ। आइ गौरीनाथ गाम घरसँ दूर दिल्ली महानगरमे पत्रकारिता क्षेत्रमे अप्पन स्थान बना लेलन्हि अछि एकर कारण की अछि? ओ मैथिलीक अलावे हिन्दीक अत्यधिक रचनाकारसँ सम्पर्क बना लेलन्हि अछि। बेनीपट्टीमे कहियो पाँच सौ आदमी एक दरखास्तपर दस्तखत कऽ कलक्टरक जनता दरबारमे नै देने हेतैक मुदा पाँच सौ डीलर अप्पन पक्ष लऽ जनता विरोधी पेटीशन दऽ दैत छैक। दिल्लीमे जे नै रहैत छथि आकि विश्व पुस्तक मेलामे नै जाइत छथि ओ की जानि सकैत छथि जे कतेक प्रकाशक एक ठाम जुटि सकैत अछि। एहन व्यवस्था छैक जे सभ क्षेत्रक कार्यकर्ता आकि नेता आकि साहित्यकार देशक आ विदेशक भ्रमण करथि। एक दोसरासँ हिलथि-मिलथि, मित्रता स्थापित करथि आ बात ओ विचारक आदान-प्रदान करथि। की कहियो मैथिलीक कोनो पत्रकारकेँ आकि लेखककेँ एहन अवसर भेटलन्हि अछि फेर दृष्टिमे विकास कोना हेतन्हि। जीवकान्तजी कहैत छथि जे हमर संस्कृति बाहर नै जाइत अछि। हमर पुस्तक बाहर नै पढ़ल जा रहल अछि। अंग्रेजीक पत्र जे एक दिनक लेल छपैत छैक एक-एक शब्दपर विचार कएल जाइत छैक, दस-दस बेर प्रुफ देखल जाइत छैक मुदा मैथिलीक पत्र-पत्रिका की पुस्तको बिना प्रुफ देखने निकलि जाइत अछि। तँ की चाहैत छी जे ई अन्यत्र पढ़ल जाएत? सरकारक अंग विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका आ राष्ट्रपति अछि। सभक ऊपर राष्ट्रपति अछि जे मात्र एक व्यक्ति अछि। एक-एक व्यक्ति एक राष्ट्र अछि। ऐ आशयसँ साहित्यसँ समाज कहिया ने हटि गेल अछि। मुदा हमरा लोकनि स्कुलिये विद्यार्थी जकाँ तोता-रटन्त कऽ रहल छी- साहित्य समाजक दर्पण होइत अछि। एक यात्रीजी भेट गेला कि सभ हुनके नाङरि पकड़ि पार उतरऽ लागब। स्वयं अपना आपकेँ एक व्यक्तिक रूपमे स्थापित करक कोशिस नै करब। एक अस्त्र बनैत अछि दोसर अस्त्रकेँ निरस्त कऽ देबक हेतु। एक कविता लिखाइत अछि ओइसँ पूर्वक कविताकेँ खारिज कऽ देबक हेतु। एक लेखक जन्म लैत छथि पूर्वक लेखककेँ खारिज कऽ देबक हेतु। एक संग्रह छपैत अछि पूर्वक संग्रहकेँ काटि देबक हेतु। ई स्पर्धा एक-दोसराक धारकेँ देखबाक हेतु व्याकुल करैत छैक। कतौ भोथ हाँसू पड़ल छैक लोक किएक देखत। रवीन्द्रनाथकेँ चिन्ता छलनि जे आइसँ सौ साले बाद कोन कवि जनताक मनोरंजन कराओत। मुदा प्रगतिवादी लेखक मनोरंजनसँ अपन आयकेँ फराक रखैत छथि। कतौ एतेक कल्पना भऽ जाइत अछि जे सत्यक कतौ कोनो स्थाने नै रहि जाइत अछि। कतौ एतेक सत्य/ यथार्थ आबि जाइत अछि कि ओ कथा सत्य-कथा यानी अपराध कथा बनि जाइत अछि। आ परिणाम एहन बिन्दुपर नै चलि जाइक जे उत्तेजनाक संचार होइक। कठिनतम विषयकेँ कलाक माध्यमसँ कहल जाइत छैक। राजमोहन झाक “प्रत्यावर्तन” कथामे पति-पत्नी होटलमे जा एक राति प्रेमी-प्रेमिकाक सुख भोगैत छथि आ जखन घर अबैत छथि तँ पत्नीसँ कहैत छथि जे – आ होटलक रूम लेल जे बीस रुपैया खर्च भऽ गेल ओकर मेक-अप कोना करब? स्वतन्त्रता कथिक लेल होइत छैक- व्यक्तिक सुखक लेल। अपना ओतेक कहब छैक- सुखमे सघौर, अहाँ तँ हमर सुख आ सौख दुनू मारि देलौं, दियरकेँ कहैत छैक छिनरा आ जाउतकेँ खेलड़ा! कलकत्तामे दुर्गापूजाक समय युवक आ युवती स्वतन्त्र भऽ जाइत अछि। जतऽ घुमी जतऽ फिरी। तहिना मुम्बइमे गणेश पूजामे दीआबातीमे पश्चिम भारतमे आ पश्चिम उत्तर भारतमे चान पृथ्वीपर आबि जाइत अछि। गुजराती समाज एक अति समृद्ध समाज अछि। नवरात्रामे डांडिया मुम्बइ, बड़ोदा, सूरत, अहमदाबाद आ आन सभ छोट आ पैघ जगहपर खेलल जाइत अछि। तकर बाद लाइन लागि जाइत अछि गर्भपात केन्द्र सभमे। बंगालमे कहल जाइत छैक जे विवाहसँ पूर्व सात घर देखी आ ओइमे सँ एक चुनि ली। आर बहुत बात अछि जे बंगालक ओपेन फैक्टक रूपमे जानल जाइत अछि जकरा साहित्यकार प्रेमक रूपमे रूपान्तर केने छथि। दक्षिणे मातुली कन्या अपन विस्तार पश्चिम तक लऽ लेने छथि। शिवभक्तिक अर्थमे मिथिला तमिलनाडु आ केरलसँ मिलैत अछि। माछ आ भोजनक अर्थमे मिथिला, बंगाल, उड़ीसा आ केरलसँ मिलैत अछि। वेश-भूषा आ शरीरक आकृतिक अर्थमे मिथिला गुजरातसँ मिलैत अछि। धार्मिक रीति-रेवाज इत्यादिक अर्थमे मिथिला उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र आ गुजरातसँ मिलैत अछि। आर्थिक दृष्टिसँ ई क्षेत्र सम्पूर्ण देशमे सभसँ पछुआएल अछि। कहैत छैक जे जतऽ दर्शन हेतैक ओतऽ मैनेजमेन्ट हेबे करतैक। जतऽ वैज्ञानिक हेतैक ओतऽ फैक्ट्री हेबे करतैक। जतऽ दवाइक फर्मूला हेतैक ओतऽ दवाइ बनबे करतैक। आइ कोन कारणसँ जाइ भोगेन्द्र झाक बड़हा गाममे सैकड़ों इन्जीनियर, ओइ गाममे एक रस्ता नै। आइ कोन कारण अछि जे जइ स्कूलक अध्यापक जीवकान्तजी ओ स्कूल सभसँ खराप। आइ किएक देशक सभ विश्वविद्यालयसँ पाछाँ मिथिला विश्वविद्यालय आ सभ अस्पतालसँ खराप दरभंगा अस्पताल। एहना स्थितिमे अपनामे सुधार नै आनि हमरा लोकनि मैथिल दृष्टि आ मैथिल दर्शनक बात करैत छी। मिथिलाक पंडित शिक्षक, भनसीया, योगी आ दरबान करीब-करीब अंग्रेजक समयेसँ बंगाल, असाम, राजस्थान आ गुजरात तक पसरल छल। ई क्रम चलिते रहल। हालक वर्षमे राज्यसँ बाहर रोजगारक गति किछु बेसी जोर पकड़लक अछि। नेवीमे देखू, एयर फोर्समे देखू, आर्मीमे देखू, विभिन्न आइ.आइ.टी. मे देखू, बैंकिंग सेवामे देखू, रेल-सेवामे देखू, स्वास्थ्य-विभागमे देखू। एक-एक ठाम बिहारक लोकक प्रतिशत निनानवे प्रतिशत तक पहुँच चुकल अछि। सभ राज्य चिन्तामे अछि जे कोन रस्तासँ दोसर ठामक लोककेँ ओतऽ रोजगार पयबासँ वंचित कएल जाए। जातीयताक बन्धन तँ लगाएले जा चुकल अछि, क्षेत्रीयता आ भाषाक बन्धन सेहो लगेबाक प्रयत्न कएल जा रहल अछि। कतेको ठाम उच्च शिक्षाधारीकेँ कोनो कार्यसँ वंचित राखल जा रहल अछि तँ कतौ अन्य क्षेत्रक लोककेँ वंचित राखल जा रहल अछि आ आब पुनः क्षेत्रीय भाषाक बात उठा दोसराकेँ रोकक प्रयास भऽ रहल अछि। बिहारक छात्रक प्रवेश-पत्र आ उत्तर-पुस्तिकापर असाम, तमिलनाडु, महाराष्ट्र सभतरि प्रहार भेल अछि। एकर अछैतो बेनीपट्टी- बेहटामे केओ युवक लिख देने छलथि- बेहटा हो कि गोहाटी, अपनी मिट्टी अपना पानी। जयकान्त मिश्र सभ दिन इलाहाबादमे रहलथि आ बात मिथिलाक माटि आ पानिक करैत रहलथि। जीवकान्तजी सेहो माटि आ पानि भाषा आ भूगोलक बात करैत रहलथि अछि। मुम्बइमे एक महाराष्ट्रियन एक मैथिलसँ कहैत अछि- झा भाइ, अब मुम्बइ तो आप लोगों का हो गया, अब हम लोगों को तो यहाँ से खुर्दूबारी भागना पड़ेगा। ओतै अपनाकेँ बाकी इन्डियासँ बीस-बर्ख आगाँ कहऽबला बंगाली अधबैसीकेँ पूणाक एक सुसभ्य सुसंस्कृत वृद्ध अंग्रेजीमे डाँटि रहल छलैक- आ ओ युवक बकर-बकर मुँह ताकि रहल छल। तैओ भीड़मेसँ आबि एक “गवाठी” कइएक फाइट ओकरा मुँहपर मारलकैक। चुप्प रहलासँ कि हारि मानि लेलासँ सेहो केओ छोड़ैत नै छैक। पटनाक बसमे एक मुम्बइ ट्रेन पकड़बाक लेल एक यात्री छल। बिपतिक मारले केओ परदेश जाइत अछि। वेश-भूषा वएह रहैक। केओ पुछलकैक, कतऽ जेबैक। तँ कहलकैक- बम्बइ। कोनो सुसभ्य आदमी कहलकैक- कतऽ बममे। किछुए दिनक बाद मुम्बइमे बम विस्फोट भेलैक। मिथिलाक दृष्टि आ व्यवस्था एतेक अकिंचन भऽ गेलैक अछि। किछु स्थानीय उच्च वर्गक भोथ दिमागक नोकरिहारा शिक्षक, बैंक कर्मचारी, राज्य सरकारक विभिन्न कार्यालयक कर्मचारी आ मध्यम वर्गीय किसान तक्षक नाग जकाँ अप्पन आसन जमौने छथि आ ओ आसन अछि सामन्तवादक आसन। सामन्ती सोचसँ मैथिली साहित्य तक भरल अछि। मिथिलाक संस्कृति जकरा कहैत छी ओ किछु अलग संस्कृति नै ओ हिन्दू जीवन पद्धति अछि जे सम्पूर्ण देशमे अछि। जे अमन चैनसँ सुतऽ चाहैत छथि तिनका पेटोकेँ छुट्टी देबऽ पड़तनि। ई पद्धति आलस्यक पद्धति अछि जकरा त्यागक प्रयोजन अछि। कोनो समयमे ऐ पद्धतिक प्रधानता छलै। पैघ-पैघ किसान छलै। लोक बाहरसँ रोजगारक लेल एतऽ अबैत छैक आ “गुहनार”मे अप्पन झोपड़ी-पट्टी बना लैत छल- छोट लोक कहबैत छल। मुम्बइमे तहिना दू अट्टालिकाक बीच आकि नालाक कात, गुहनारक, रेलक पटरीक काते-कात, पोस्ट ऑफिस आकि आन कोनो सरकारी कार्यालयक बगलमे, जकर भार केओ सरकारी कर्मचारी आकि अधिकारी लेबऽ लऽ तैयार नै, झोपड़ पट्टी बनि गेल अछि। पटनेमे गली सभक दुनू कात झोपड़ी ठाढ़ भऽ गेल अछि। ऐ हालातमे मिथिलाक लोक अन्यत्र जीवि रहल अछि। बोली सुन्दर छैक आवाज बहराइत छैक- हे, यौ, अ, अप्पन-पेपर जे छल ओ फेक देलनि। आब कथीपर सूतब। पूणे जाइत एक दम्पत्ति- जकरा देहपर कतौ लत्ता नै, आग्रह करैत छैक मुम्बइ जाएबला यात्रीसँ- जरूर आएब यौ, नासिकमे सेहो देखक बहुत चीज सभ छैक जकरा अही क्षेत्रवादक कारण खेहारि-खेहारि कऽ भगाओल जाइत अछि। मुदा मास्टर साहेबकेँ दुःख छनि- आब भरिया-खबास नै भेटैत छनि। भनसीया नै भेटैत छनि। मुदा ठिकेदार भेट जाइत छनि। ड्राइवर भेट जाइत छनि। ३ बुच्ची दाइक निलामी कोना से देखू विभा रानीक “एहिना एकटा बुच्ची दाइ” घर-बाहर पत्रिकाक अक्टूबर-दिसम्बर २००६ अंकमे छपल छल। फेर ओ “नवनीत” फरवरी २००७ मे हिन्दी कहानीक रूपमे “यूँ ही बुच्ची दाइ” नामसँ सेहो छपल छल। विभा रानीक कथा शुरुहे सँ ओइ सभ अवगुणसँ भरल रहैत अछि जे कोनो कथाकेँ कथा बनऽसँ वंचित करैत छैक। मैथिलीक सम्पादक आ आलोचक लोकनि जतेक प्रोत्साहित हुनका केलखिन्ह ततेक कोनो आन लेखिकाकेँ नै। विभा रानीक कथा आन बहुतो लेखक जकाँ ओइ सभ तत्वसँ शुरुहेसँ भरल रहैत छन्हि जे तत्व कोनो कथाकेँ कथा कहबऽ सँ वंचित करैत छैक। छात्र जीवनमे जखन हुनकर कथा देखैत छलौं तँ सोचैत रही जे हिनका आगाँ जखन बोध हेतन्हि तँ संग्रहमे एकरा सुधारि लेतीह मुदा ओ सभ पूर्ववत “खोहसँ निकसैत” मे आयल अछि। विभा रानी शुद्ध-अशुद्ध रूपमे अनपढ़क बीच प्रयोग होइत जे किछु सुनैत छथि आकि सुनने छथि –सभकेँ मिथिला वा मैथिल वा मैथिलीक संग जोड़ि दैत छथि- आ मिथिला नामक जतेक जे अर्जित क्रेडिट छैक- अपना माथपर लऽ लेबऽ चाहैत छथि। आइ नेता बनक हेतु जेना प्रचुर समय आ प्रचुर पैसा चाही तहिना लेखक बनक लेल सेहो प्रचुर समय आ पैसाक जरूरति पड़ैत छैक। एहन भाग्य दर्जन भरि मैथिलीक प्राध्यापक संग हिनका आ नवीन चौधरीकेँ प्राप्त छन्हि। हिन्दी विभाग सन अमन चैनक जिनगी कोनो नोकरिहारा हेतु दुर्लभ अछि आ ताहूमे हिन्दी पदाधिकारी तँ सोनामे सुगन्धे। हरिमोहन बाबूक बुच्ची दाइकेँ उठा कऽ विभा रानी “एहिना एकटा बुच्ची दाइ”मे लऽ अनलन्हि अछि। मिथिलामे विधवा विवाह आ अन्य समस्या सिर्फ उच्च कुल आ उच्च वर्गमे अछि। बोनिहार लोक वियाह आ तलाकक अर्थमे अमेरिका-इंगलैण्डोसँ आगाँ अछि। विभा रानी जहाँ-तहाँ विद्यापतिक प्रसिद्ध गीत सभक गलत रूपमे उल्लेख करैत छथि। शुद्ध एना अछि:- सर बिनु सरसिज सरसिज बिनु सर की सरसिज..............बिनु सूरे यौवन बिनु तन तन बिनु यौवन की यौवन.......पिये दूरे “एहिना एकटा बुच्ची दाइ” कथाक अन्तिम तीन पाँति “दुःखहि जनम लेल, दुखहि गमाओल नयन न तिरपित भेल हे भोलानाथ कखन हरब दुःख मोर!” क कतेक गलत प्रयोग भेल अछि, जे देखल जा सकैत अछि। ध्यानाकर्षणार्थ:- दुःखहि जनम भेल, दुःखहि गमाओल सुख सपनहुँ नहि भेल, हे भोला दानी कखन हरब दुःख मोर! “नयन न तिरपित भेल” अनावश्यक शिव स्तुतिमे मिला देल गेल अछि। शुद्ध रूप एना अछि:- “कत मधुआमिनी रभसि गमाओल नहि बुझि कैसन केलि सैहो मधुबोल श्रवणहि सूनल श्रुतिपथ नहि भेल जनम अवधि हम रूप निहारल नयन न तिरपित भेल।” विभा रानी शुरुहेसँ शब्दक प्रति अल्हड़पन देखबैत अएलथि अछि मुदा तैयो हुनकर कथा सभ ऐ नोटक संग आन सभ लेखिकाकेँ अपमानित करैत छपल अछि:- आन लेखिका जकाँ विभा रानीक कथा महिला कोटाक अन्तर्गत नै छापल जा रहल अछि।” “यूँ ही बुच्चीदाइ”क किछु शब्द देखू- माँ-बाउजी, कहाना-वहानी, लोग-वाग, पता नहीं, पारा-पारी, घास-पुआल, जैसी बढ़ती हो चली जाती, अगर ब्राह्मण की बहु रहतीन आपकी माँ तो वे भी एक के बाद एक के बाद एक लेद-गेद जनमाती रहती, पुरुषों का होता है हमारे में, लड़कियों का नहीं। मिथिला की बेटियाँ, तिलकोर के बेल की तरह चतर गयी, अलच्छा, रंडापा, सिद्धा, आज मगर कानून बन जाने के बाद भी कहाँ कोई जयदाद देता है।” ई सभ शब्द विभारानी ककरा लेल रचने छथि। हिनका मंडन मिश्रक पनिभरनी याद नै अबैत छन्हि जे शंकराचार्यसँ संस्कृतमे बात कएने छलथि। कथाक बहन्ने, लोक कथाक बहन्ने वा संस्कार ओ उत्सवक बहन्ने कतेको ठाम विभा रानी बिहार कि मिथिला कि मधुबनीक प्रयोग गलत अर्थमे कएने छथि। कोनो कथा थूक फेकक लेल वा गूँ-मूतक बात करक लेल नै लिखल जाइत छैक। कथा सभ्यताक पहिल डेग अछि। कथाकार रामधारी सिंह “दिवाकर” जीवन भरि दरभंगामे रहि कहानी लिखैत रहलथि मुदा ओ कतौ दरभंगा वा मिथिलाक नाम नै लेलन्हि। “जखन तखन” जनवरी-मार्च ०७ अंकमे पुनः विद्यापतिक पाँति गलत रूपमे दोहराएल गेल अछि। “बड़ रे जतन सँ सिया दाइकेँ पोसलहुँ सेहो रघुवंशी नेने जाय।” हेबाक चाही। पंडित लोकनि बड़ प्रयत्नसँ मैथिलीकेँ बचौने छथि। मैथिलीक बड़प्पन अष्टम अनुसूचीमे अएलासँ नै भेल अछि। मैथिली जहिया ज्ञानक भाषा बनत तहिया मैथिलीक बड़प्पन हएत। मैथिली अनपढ़क भाषा बनल रहत तँ कि ज्ञानक कोनो विषय मैथिलीक भरोसे बैसल रहत। जीवकान्त जी कहैत छलथि जे मैथिलीक लेखक कुंठित लोकक बीच रहैत छथि तँ कुंठा नै तँ की लिखताह। जिनका कोनो विषयक ज्ञान नै ओ शिक्षक बनैत छथि, जिनका कोनो अध्ययन नै ओ लेखक बनैत छथि, कारण ओ सुविधा जीवी छथि। जँ केओ अयोग्य व्यक्ति सम्पादक बनैत छथि कि पुरस्कारक हेतु जूरी बनैत छथि तँ ओ मैथिलीक टांग घीचि रहल छथि। किछु आलोचक लोकनि आब कथा आ कविता लिखऽ लगलथि अछि आ किछु कथाकार लोकनि आलोचना। हम जखन ककरो लाठी भँजैत देखैत छिऐक कि नचैत देखैत छिऐक कि गबैत देखैत छिऐक वा सर्कस-सिनेमामे अपन “करतब” करैत देखैत छिऐक तँ सोचैत छी जे ओ गुण मैथिलीक लेखक लोकनिमे किएक नै छैक। फुटबल, क्रिकेट कि सर्कसमे किछुओ गलती भऽ जाइत छैक तँ सभकेँ देखाइ दैत छैक मुदा साहित्यपर गवार राज्य कऽ रहल छैक से किएक ने केओ देख रहल छैक। एक गोटे कहैत छथि जे: देखैत तँ सभ छैक मुदा ककरो कोन मतलब। जेना राजमोहन झा कहलनि- लोकक सम्पर्कमे नै अएबैक तँ लोककेँ कोन मतलब जे अहाँ नीक लिखैत छी कि बेजाए। एतद्धि। ओम प्रकाश झा भोथ हथियार श्री सुरेन्द्र नाथक कहल मैथिली गजलक संग्रह अछि "गजल हमर हथियार थिक"। ऐ पोथी मे हुनकर अडसठि टा गजल प्रकाशित भेल अछि। ई संग्रह २००८ मे आएल अछि जकर आमुख श्री अजीत आजाद जी लिखने छथि। ऐ पोथी केँ आदि सँ अन्त धरि पढबाक बाद हमर यैह अभिमत अछि जे गजलक व्याकरणक दृष्टिसँ ऐ संग्रह मे अनेको कमी अछि, जाहि सँ बचल जा सकैत छल। पृष्ठ संख्या १३, ६७ आ ७० परहक गजल मे चारिये टा शेर छै, जखन की कोनो गजल मे कम सँ कम पाँच टा शेर हेबाक चाही। संग्रहक कोनो गजल बहर मे नै अछि। हमर ई स्पष्ट मनतब अछि जे गजलकार केँ प्रत्येक गजल मे बहरक उल्लेख करबाक चाही आ जँ आजाद गजल कहने छथि तँ इहो स्पष्ट रूपेँ लिखबाक चाही। ऐ पोथी मे काफियाक गलती भरमार अछि। कतौ कतौ तँ ई बूझना जाइ छै जे गजलकार बिना काफिया आ रदीफक मतलब बूझने गजल कहबा लेल बैस गेल छथि। एकर उदाहरण पृष्ठ १५ परहक गजल पढबा पर भेंट जाइ छै। ई तँ हम एकटा उदाहरण कहि रहल छी। आरो गजल ऐ दोख सँ प्रभावित छै, जतय काफियाक नियमक धज्जी उडा देल गेल अछि। जेना पृष्ठ १८, १९, २०, २१, २७, २९, ३१, ३४, ३५, ३६, ३९, ४०, ४१, ४३, ४४, ४५, ४६, ४७, ५२, ५३, ५६, ५७, ५८, ६६, ६७, ६८,७०, ७१, ७२, ७४, ७५,७७, ७९ आदिमे काफिया तकलासँ नै भेंटैत अछि आ ऐ खोजमे मोन अकच्छ भऽ जाइत छै। ओना आनो पृष्ठ काफिया दोखसँ ग्रसित अछि, मुदा ई उदाहरण हम ओइ पृष्ठ सभक देने छी, जतय काफियाक झलकियो तक नै भेंटै छै। मैथिली गजल आइ जाहि सोपान पर चढि चुकल अछि, ओइ हिसाबेँ ऐ तरहक रचना गजलक नामसँ स्वीकृत होइ बला नै अछि। कियाक तँ बिना दुरूस्त काफियाक गजल नै भऽ सकैत अछि। ई संग्रह "अनचिन्हार आखर" युगक शुरूआत भेलाक बाद लिखल गेल अछि, तैँ हमरा ई आस छल जे गजलकार कमसँ कम काफिया आ रदीफक नियमक पालन ठीकसँ केने हेताह, कियाक तँ "अनचिन्हार आखर" जुग मे आब गजलक व्याकरणक सभ नियम चिन्हार भऽ चुकल अछि। मुदा गजलकार काफिया आ रदीफक नियम पालन करबामे पूरा असफल रहलथि। ओना ऐ संग्रहक काफिया दोखकेँ पोथीक आमुख लेखक श्री अजीत आजाद पोथीक आमुखमे दाबल आवाजमे स्वीकार करैत कहै छथि जे कतेको ठाम काफिया "गडबडायल सन" बुझना जाइत अछि। ओना ई अलग गप थिक जे काफिया "गडबडायल सन" नै अपितु पूरा पूरी गडबडायल अछि। फेर श्री आजाद ऐ गलतीकेँ झाँपबा लेल इहो कहैत छथि जे "रचनाकारकेँ अपन सीमासँ बाहर आबि शब्द-व्यापार करबाक चाही"। मुदा गजलक अपन व्याकरण छै, जकर पालन केने बिना रचना गजल नै भऽ कऽ पद्य मात्र रहि जाइत छै। गजल आ कविताक बीचक अंतर जे अंतर छै, से ऐ तरहक तर्कसँ समाप्त नै भऽ जाइ छै। काफिया, रदीफ आ गजलक व्याकरणक अनुपालन नै हेबाक कारणेँ श्री सुरेन्द्र नाथक ई संग्रह गजल संग्रह नै भऽ कऽ एकटा पद्यक संग्रह भऽ कऽ रहि गेल अछि। संवेदनाक स्तर पर किछु रचना नीक अछि आ जँ गजलकार गजलक व्याकरण पर धेआन देने रहतथिन्ह, तँ नीक गजल लिखि सकैत छलाह। गजलकारक ई पहिलुक मैथिली गजल संग्रह बहुत आस तँ नै जगबैत अछि, मुदा हुनकर संवेदनात्मक प्रतिभा देखैत हम ई आस जरूर करै छी जे ओ गजलक व्याकरणक पालन करैत आगू नीक गजल कहताह आ "गजल हमर हथियार थिक" केँ चरितार्थ करताह। गजल तँ हथियार होइते अछि, मुदा बिनु काफिया, रदीफ आ बहरक नियमक पालन केने रचना गजल नै होइत अछि आ भोथ हथियार भऽ जाइत अछि। पद्यक हथियार पर काफिया आ बहरक सान चढल हुनकर नब गजल-हथियारक प्रतीक्षा रहत। मैथिली बाल गजलक अवधारणा जेना कि नाम सँ स्पष्ट अछि, बाल गजल माने भेल नेना-भुटकाक लेल गजल। बाल गजलक अवधारणा मैथिली मे एकदम नब अछि आ पहिल बेर २४ मार्च २०१२ केँ श्री आशीष अनचिन्हार ऐ अवधारणा केँ सामने आनलथि। बहुत अल्प समय मे बाल गजल बहुत प्रसिद्धि पओलक आ बाल गजल कहनिहार गजलकार सभक एकटा विशाल पाँति ठाढ भऽ गेल। ऐ मे सर्वश्री गजेन्द्र ठाकुर आ आशीष अनचिन्हार जकाँ स्थापित गजलकार तँ छथि, एकर अलावे नब गजलकार सब सेहो बाल गजल कहबा मे विशेष अभिरूचि देखौलन्हि। बाल गजल कहनिहार नब गजलकार सभ मे सर्वश्री मिहिर झा, मुन्ना जी, इरा मल्लिक, अमित मिश्रा, चन्दन झा, पंकज चौधरी 'नवलश्री', राजीव रंजन झा, जगदानंद झा 'मनु', रूबी झा, प्रशांत मैथिल आदि अनेको गजलकार छथि। "अनचिन्हार आखर", जे मैथिली गजलक एकमात्र ब्लाग अछि, देखला पर पता लागैत अछि जे बाल गजलक अवधारणा अयलाक बाद सँ एखन धरि(ई आलेख लिखबा तक) ७३(तिहत्तरि) टा बाल गजल ऐ ब्लाग पर पोस्ट भऽ चुकल अछि, जे अपने आप मे एकटा कीर्तिमान अछि। खास कऽ एतेक कम समय मे एतेक पोस्ट आएब बाल गजलक लोकप्रियताक खिस्सा कहि रहल अछि। बाल गजलक विधा एकटा स्वतन्त्र विधा बनबाक बाट मे अग्रसर अछि, जे एतेक कम समय मे एतेक संख्या मे बाल गजल कहनिहार गजलकार आ बाल गजलक संख्या सँ स्पष्ट अछि। संगहि किछु लोक केँ मिरचाई सेहो लागब शुरू अछि आ ओ लोकनि बाल गजलक सम्पूर्ण अवधारणा केँ नकारबाक कुत्सित असफल प्रयास मे जत्र कुत्र अंट शंट पोस्ट देबऽ लागलाह। ई गप आर स्पष्ट करैत अछि जे बाल गजलक विधा मजबूती सँ स्थापित भऽ रहल अछि। कियाक तँ सफल व्यक्ति आ विधा सभक आकर्षणक केन्द्र बनैत अछि आ बाल गजल सेहो सभक आकर्षणक केन्द्र बनि चुकल अछि, चाहे ओ गजलकार होईथि, पाठक होईथि, आलोचक होईथि वा जरनिहार लोक सभ होईथि। जखन मैथिलि गजलक चर्च भऽ रहल अछि, तखन श्री आशीष अनचिन्हारक चर्चा स्वभाविक अछि। मैथिली गजलक विकास मे हुनकर योगदान हुनकर धुर विरोधी लोकनि सेहो मानैत छथिन्ह। मैथिली बाल गजलक अवधारणा लेल श्री आशीष अनचिन्हार मैथिली साहित्य मे अपन अनुपम स्थान बना चुकल छथि। बाल गजलक अवधारणा सेहो हुनके छैन्हि, जे बहुत सफल भेल अछि। आब किछु गप करी मैथिली बाल गजलक रचना सभक संबंध मे। हमरा विचार सँ बाल गजल नेना भुटकाक लेल रूचिगर तँ हेबाके चाही, संगहि ऐ मे कोनो स्पष्ट सामाजिक सनेस होइ तँ ई सोन मे सोहाग जकाँ हएत। ओना तँ सभ बाल गजल कहनिहार गजलकार सभ ऐ मे सक्षम छथि आ नीक सँ नीक बाल गजल लिख रहल छथि, मुदा ऐ सन्दर्भ मे हम श्री गजेन्द्र ठाकुरजीक बाल गजलक उल्लेख करब उचित बूझि रहल छी। हुनकर एकटा बाल गजलक मतला अछिः- कनियाँ पुतरा छोड़ू आनू बार्बी जँ रंग गुलाबी छै तँ जानू बार्बी ऐ गजल केँ पूरा पढि कऽ कने देखियौ। ई गजल कनिया पुतराक उल्लेख करैत नेना-भुटकाक मनोरंजन तँ करिते अछि, संगहि अजुका बाजारवादक बलिवेदी पर कुर्बान भेल मनुक्खक मार्मिक विवेचना सेहो करैत अछि। एहन आरो कतेको बाल गजल सभ "अनचिन्हार आखर" पर भेंटैत अछि, जकरा ऐ ब्लाग पर पढल जा सकैत अछि। ई गजलकार सभक सामाजिक संवेदना केँ प्रकट करैत अछि आ हम ऐ लेल सभ गजलकार केँ साधुवाद दैत छियैन्हि। हम एहने बाल गजलक आस गजलकार सभ सँ लगओने छी। कियाक तँ गजलकारक सामाजिक दायित्व सेहो छै, जे पूरा हेबाक चाही। आधुनिक मैथिली गजलकार सब मे ई क्षमता अछि आ ओ दिन दूर नै अछि जखन एक सँ एक सुन्नर आ बालोपयोगीक संगे सामाजिक समस्या पर बाल गजलक भरमार हएत। व्याकरणक हिसाबेँ मैथिली बाल गजल नीक बाट धएने अछि। अनचिन्हार आखरक टीमक परिश्रमक कारणेँ मैथिली मे बहरयुक्त गजलक काल शुरू भऽ चुकल अछि आ सरल वार्णिक बहर(जकर अवधारणा श्री गजेन्द्र ठाकुरजी देलखिन्ह) केर अलावे आब अरबी बहर मे गजल कहनिहार गजलकारक कमी नै छै। बाल गजल अपन शुरूआते सँ बहरयुक्त अछि, जे बाल गजलक लेल शुभ संकेत अछि। शुरूआतिए समय मे जे आ जतबा बाल गजल लिखल गेल अछि, ओ सभ बहर मे अछि, चाहे सरल वार्णिक बहर होइ वा अरबी बहर। बहरक अलावे रदीफ आ काफियाक नियमक पालन सेहो पूरा पूरा भऽ रहल अछि। व्याकरण पालनक ई प्रतिबद्धता निश्चित रूपे बाल गजलक सफलताक गाथा लिखबा मे सहायक हएत। मैथिली गजलक बढैत डेग संग आब मैथिली बाल गजलक डेग सेहो उठि गेल अछि। मैथिली बाल गजल जाहि द्रुत गति सँ अपन डेग उठओलक अछि, ऐ सँ तँ यैह लागैत अछि जे अगिला साल आबैत आबैत मैथिली बाल गजलक पोथी प्रकाशित भऽ सकैत अछि। संगहि इसकूलक पाठ्यक्रम मे बाल गजल सम्मिलित हेबाक संभावना सेहो साकार रूप लऽ सकत। पाठ्यक्रम मे सम्मिलित हेबाक बाद मैथिली बाल गजल सभ पढनिहार-पढौनिहारक संज्ञान मे नीक जकाँ आओत आ सामाजिक विकासक संरचना मे अपन महत्वपूर्ण योगदान, जे अपेक्षित अछि, सेहो दऽ सकत। बहुरूपिया रचना मे गजल मे हम रूचि राखैत छी। संगहि मैथिली मे थोड बहुत गजल सेहो लिखै छी आ गजलक पोथी सब पढबाक इच्छा रहै ए। मैथिली मे बहुत कम गजल संग्रह अछि आ ओहो सुलभ नै होइत रहै ए। एहन परिस्थिति मे हमरा श्री अरविन्द ठाकुरजीक सद्यः प्रकाशित मैथिली गजल संग्रह "बहुरूपिया प्रदेश मे" पढबाक अवसर भेंटल आ हम एहि पोथी केँ आद्योपान्त पढलहुँ। सबसे पहिने हम श्री अरविन्द ठाकुरजी केँ मैथिली गजलक पोथी लिखबाक लेल बधाई दैत छियैन्हि। मैथिली गजलक उत्थान लेल प्रत्येक डेग हमरा महत्वपूर्ण लागै ए। पोथीक गेट अप बड्ड सुन्नर अछि। टाईप आ कागतक कोटि सेहो उत्तम अछि। पोथीक भूमिका गजलकार अपने लिखने छथि आ ओहि मे गजल आ एहि संग्रहक सम्बन्ध मे बहुत रास गप सब कहने छथि। जेना पृष्ठ संख्या सातक दोसर पारा मे गजलकार कहैत छथि जे "मैथिलीक मिजाजक सीमा (इ मैथिलीक नहि, हमर अपन सीमा भऽ सकैत अछि) केँ देखैत गजलक व्याकरण (रदीफ, काफिया, मिसरा, मतला, मकता आदि)क स्थापित मापदंडक कसबट्टी पर हमर सभ गजल खरा उतरत तकर दाबी तऽ नहिए टा अछि बल्कि हम तँ इ सकारय चाहै छी जे--------------------------------- हमर सीमाक कारणेँ प्रस्तुत गजल मे कएक जगह सुधि पाठक लोकनि केँ त्रुटि भेटि सकैत छनि।" एहि पाराक अन्त मे ओ कहै छथि जे बहरक दोख किछु शेर मे भेटि सकैत अछि। हम गजलकारक सराहना करैत छी जे ओ भूमिका मे अपने कएक ठाम बहरक आ आन दोख हएब स्वीकार कएने छथि। पोथी केँ आद्योपान्त पढला पर हमरा इ नै बुझाएल जे एहि संग्रहक गजल सब कोन-कोन बहर मे लिखल गेल अछि। अरबीक कोनो टा बहर मे कोनो गजल नहिए अछि, मैथिली मे आइ-काल्हि प्रयुक्त होइ बला सरल वार्णिक बहर मे सेहो कोनो गजल नै अछि। गजलकार केँ प्रत्येक गजल मे इ लिखबाक चाही छल जे कोन बहर मे गजल लिखल गेल अछि। जँ इ "आजाद-गजल"क संग्रह थीक, तँ हुनका एहि बातक उल्लेख करबाक चाही छल। भूमिकाक उपरोक्त पाराक शुरू मे गजलकार कहै छथि जे मैथिलीक मिजाज केँ देखैत एहि मे उर्दू-हिन्दी गजलक मिजाजक नकल करबाक प्रयास कएल जाइत तँ एकरा बुधियारी नहिए टा कहल जायत आओर सफलता सेहो नहि भेंटत। हम हुनकर गप सँ सहमत छी जे नकल करब उचित नहि। मुदा एकटा गप हम कहऽ चाहैत छी जे प्रत्येक विधाक एकटा नियम होइत छै आओर जाहि क्षेत्र मे ओहि विधाक उदय भेल रहैत छै ओहि क्षेत्र मे स्थापित भेल नियमक पालन केने बिना कोनो रचना मूल विधा मे कोना भऽ सकैत अछि। जेना मैथिली मे समदाउन आ सोहरक परम्परा छैक आ जँ पंजाबी मे वा गुजराती मे वा की कोनो आन भाषा मे समदाउन आ सोहर गाबऽ चाही तँ नियम कोना बदलि जेतैक। जँ नियम बदलतै तँ ओ दोसर चीज भऽ जेतैक। तहिना गजल अरब क्षेत्र मे जन्म लेलक आ इ स्वाभाविक छै जे एकर नियम (व्याकरण) ओहि क्षेत्रक स्थापित मानदण्डक आधार पर बनल। स्थापित मानदण्डक पालन करब नकल नहि कहल जा सकैत अछि। आ जे नकलक गप करी तँ 'गजल' कहब अरबी-हिन्दीक नकल थीक। एक दिस गजलकार 'गजल' कहबाक लोभ नै छोडि रहल छथि आ दोसर दिस गजलक व्याकरणक नियम पालन केँ नकल कहै छथि, इ उचित नै बुझाएल। गजल स्थापित मानदण्ड पर जँ नै कहल गेल तँ रचना केँ गजलक स्थान पर दोसर नाम देल जा सकैत अछि। पृष्ठ संख्या दस पर दोसर पारा मे गजलकार कहै छथि जे ओ जीवन सँ सिदहा लैत छथि। इ स्वागत योग्य गप भेल। जीवनक सिदहा सँ तैयार व्यंजन सोअदगर हेबे करतै। मुदा भोजन बनबै काल चाउरक सिदहा पानि मे सोझे फुला कऽ परसि देला सँ भात नहि कहाइत अछि। चाउरक सिदहा केँ अदहन मे देल जाइ छै तखन भात तैयार होइ छै। तहिना जीवनक सिदहा जँ व्याकरण, नियम आ चिन्तन-मननक अदहन मे पकाओल जाइत अछि तँ सोअदगर रचना भेटैत अछि। विधा विशेषक मापदण्ड तोडबाक क्रांतिकारी घोषणा कएला टा सँ किछु विशेष फायदा वा उमेद तँ नहिए जगै ए। जँ कियो मापदण्ड तोडै छथि, तँ मापदण्ड पर चलै बला केँ नकलची आ बाजीगर कहब उचित नहि। गजल आ फकरा आ दोहा मे थोडेक अन्तर तँ छै जे रहबे करतै। अस्तु, इ गजलकारक अपन विचार छैन्हि आ आब प्रकाशित सेहो छैन्हि। गजल संग्रहक सब गजल पढलौं। विषय वस्तु सब नीके लागल। गजलक व्याकरणक आधार पर कहि सकैत छी जे बहरक दोख तँ प्रत्येक गजल मे छैक आ जँ इ आजाद-गजलक संग्रह थीक तँ गजलकार इ गप कतौ नै कहने छथि। गजलकार केँ स्पष्ट करबाक चाही छल जे कोन कोन बहर मे गजल सब लिखल गेल अछि। हमरा बुझने गजलक कोनो शीर्षक नै होइत अछि, मुदा प्रत्येक गजल केँ एकटा शीर्षक देल गेल अछि। बहरक अतिरिक्त रदीफ आ काफियाक नियमक सेहो कएक ठाम पालन नै भेल अछि आ इ गप गजलकार भूमिका मे सेहो स्वीकार कएने छथि। जेना पृष्ठ बाईस मे मतलाक दुनू पाँति, दोसर शेर आ पाँचम शेर मे काफिया मे 'आयब' प्रयोग भेल अछि, तँ दोसर आ चारिम शेर मे 'अब' क प्रयोग अछि। पृष्ठ चौबीस मे मतलाक पहिल पाँति मे काफिया मे 'अ' आयल अछि आ दोसर पाँति आ अन्य शेर मे 'आत' आयल अछि। पृष्ठ पच्चीस मे काफिया की छै, से नै बुझाएल। पृष्ठ तिरपन मे प्रत्येक पाँति मे काफिया एकदम फराक फराक अछि। पृष्ठ अनठाबन मे मतला, दोसर शेर आ चारिम शेर मे काफिया मे 'अल' प्रयुक्त अछि आ आन सब शेर मे काफिया मे 'अ' प्रयुक्त अछि। पृष्ठ उनसठि मे सेहो रदीफ आ काफियाक स्पष्टता नै अछि। पृष्ठ छियासठि मे काफिया मे कतौ 'अल' आ कतौ 'आओल' प्रयुक्त अछि। पृष्ठ सडसठि आ तिहत्तरि मे सेहो काफियाक नियमक उल्लंघन भेल अछि। तहिना संयुक्ताक्षर बला काफियाक नियम सेहो एक दू ठाम हमरा हिसाबेँ ठीक नै अछि। एकर अतिरिक्त आओर कएक ठाम काफियाक नियमक पालन नै भेल अछि। हम उदाहरण स्वरूप किछु पृष्ठक उल्लेख कएलहुँ। हमर इ उद्देश्य नै अछि जे खाली दोख ताकल जाय, मुदा जँ गजल कहै छियै तँ गजलक नियमक पालन हेबाक चाही। सब गोटे केँ जानकारी लेल इ बता दी की बिना रदीफक गजल तँ भऽ सकैत अछि, मुदा बिना दुरूस्त काफिया भेने गजल नै भऽ सकैत अछि। भूमिका सँ एकटा बात आर स्पष्ट होइ ए जे गजलकार मई २००८ सँ मैथिली मे गजल लिखब शुरू केलथि, ओना ओ हिन्दी मे पहिनहुँ गजल लिखैत छलाह। एकर मतलब इ भेल जे गजलकार "अनचिन्हार आखर" (मैथिली गजल केँ समर्पित ब्लाग) सँ बहुत बाद मे मैथिली गजल लिखब शुरू कएने छथि आ मैथिली गजलक वरीयता मे बहुत बाद मे आयल छथि। "अनचिन्हार आखर" ब्लाग देखला सँ पता चलै छै जे गजलकार एहि ब्लाग पर सेहो अपन कएक टा गजल २००९ सँ एखन धरि देने छथि। ओ "अनचिन्हार आखर" ब्लाग सँ चिन्हार छथि, तैँ इ उमेद अछि जे एहि ब्लाग पर प्रकाशित मैथिली गजलक विस्तृत व्याकरण केँ जरूर देखने हेताह। इ उमेद छल जे प्रस्तुत गजल संग्रह मैथिली गजलक नब पीढी लेल एकटा उदाहरण बनत। मुदा एहि संग्रह मे गजलक व्याकरणक जे उपेक्षा भेल अछि, जे गजलकार भूमिका मे स्वयं स्वीकार कएने छथि, निराशा उत्पन्न करैत अछि। मुदा इ संग्रह गजलकारक पहिलुक मैथिली गजल संग्रह अछि, तैँ गजलक व्याकरणक गलती भेनाई स्वभाविक अछि। आशा व्यक्त करै छी जे हुनकर आगामी गजल संग्रह मैथिली गजल मे अपन अलग स्थान राखत। घोघ उठबैत गजल मैथिली गजलक पहिलुक प्रकाशित पोथी "उठा रहल घोघ तिमिर" पढबाक सौभाग्य भेंटल। ऐ गजल संग्रहक गजलकार श्री विभूति आनन्द छथि। एहि पोथी मे कुल चौंतीस गोट गजल अछि। पूरा पोथी केँ एकहि बैसार मे पढि गेलहुँ आ बेर-बेर पढलहुँ। सबसे पहिने हम श्री विभूति आनन्दजी केँ मैथिली गजलक पहिलुक संग्रह प्रकाशित करबा लेल धन्यवाद दैत छियैन्हि। एहि पोथीक भूमिका मे गजलकार कहै छथि जे "मैथिलीक गजल सोझे-सोझ हिन्दी सँ प्रभावित अछि मुदा हिन्दी जकाँ जमल नञि अछि एखनो धरि।" आगू हुनकर कहनाई छैन्हि- "पारम्परिक व्याकरण सम्बन्धित अगणित त्रुटि सभ ठाम लक्षित होएत। ओना हम दुस्साहसपूर्वक साहस करैत रहलहुँ अछि जे कथ्य-सामंजस्य लए व्याकरण दिस सँ यदि मूँहो घूमा लेल जाए तँ कोनो हर्ज नञि। किए तँ हम मानैत छी जे ई पाठ्यक्रमक वस्तु नञि अछि। विद्यार्थी मूर्ख नञि बनत। तैं की ------------------------ व्याकरण सँ भयभीत भऽ नञि लिखल जाए।" गजलकारक पहिलुक कथनक सम्बन्ध मे हमर निवेदन अछि जे गजलक परम्परा अरबी-फारसी सँ शुरू भेल अछि आ ओतहि सँ आन भारतीय भाषा मे पसरल अछि। हिन्दी-उर्दू मे गजल कहबाक परम्परा मैथिली सँ पहिने शुरू भेल, तैं बहुसंख्य लोक दिग्भ्रमित भऽ जाइत छथि जे मैथिलीक गजल हिन्दी गजलक नकल छी वा ओइ सँ प्रभावित भेल अछि। गजलकार सेहो एहि मिथ्या धारणा सँ प्रभावित छथि। आब गजलक व्याकरण थोड-बहुत समन्जनक संग सब भाषा मे तँ एक्के रहत। ऐ स्थिति केँ हमरा हिसाबेँ "प्रभावित भेनाई" कहबाक कोनो औचित्य नै अछि। गजलकारक दोसर कथन देखि हम निराश भेल छी। पता नै किया एखन धरि जे दुनू गजल संग्रह (सबसँ पहिलुक आ सबसँ अंतिम प्रकाशित) पढलहुँ, एहि दुनू मे गजलकार कथ्य-सामंजस्यक आगू व्याकरण केँ कोनो मोजर नै देबऽ चाहैत छथि। एकटा गप मोन रखबाक चाही जे साहित्यक निर्माण वैयाकरणिक अनुशासनक बादे सफल भेल अछि। इ फराक गप अछि जे समय-काल आ स्थानक हिसाबेँ सर्वमान्य परिवर्तन व्याकरण मे होइत रहल छैक। बिना वैयाकरणिक अनुशासनक भाषा पढबा, लिखबा आ बाजबा जोग रहत? जिनका मे साहित्य निर्माणक माद्दा छैन्हि, हुनका मे व्याकरण केँ पालनक साहस अबस्स हेबाक चाही। आब हम एहि संग्रहक गजलक सम्बन्ध मे किछु गप कहऽ चाहब। इ गजल संग्रह ओहि समय मे लिखल गेल अछि जखन मैथिली गजलक व्याकरण आ बहरक सम्बन्ध मे बहुत बेसी जनतब सार्वजनिक नै छल। हम एकरा एना कहऽ चाहब जे इ गजल संग्रह "अनचिन्हार आखर" जुग सँ पूर्वक गजल अछि जखन बहर, रदीफ आ काफियाक नियमक पालनक विषय मे बहुत रास गप सर्वजन सुलभ नै छल। एहि हिसाबेँ जँ ऐ संग्रहक गजल सभ मे बहरक दोख छैक तँ इ स्वभाविक बुझाईत अछि। एहि संग्रहक कोनो टा गजल कोनो बहर मे नै अछि। तैं ऐ संग्रहक वैध गजल (जाहि मे काफियाक नियमक पालन भेल हुए) सभ केँ "आजाद-गजल"क श्रेणी मे राखल जा सकैए। आब गजलक काफिया आ रदीफक सम्बन्ध मे किछु गप। एहि संग्रहक बहुत रास गजल मे काफिया आ रदीफक नियमक पालन भेल अछि। मुदा कएक गजल मे रदीफ आ काफियाक गलती अछि। जेना पृष्ठ चौदह पर मतला देखला पर बुझाईत अछि जे "इ मौसम" रदीफ अछि आ "लागैए" आओर "उलाबैए" काफियायुक्त शब्द अछि। मुदा दोसर शेर आ आगूक आन शेर मे एकर पालन नै भेल अछि आओर शेर सभ बिना रदीफक "अ" काफियायुक्त अछि। पृष्ठ पन्द्रह पर सेहो यैह दोख अछि, जाहि मे मतला मे रदीफ "कहाँ रहल"क प्रयोग अछि आ आन शेर सभ बिना रदीफक "अल" काफियायुक्त अछि। एहने दोख पृष्ठ सोलह मे देखल जा सकैत अछि, जतय मतला मे "करै छह" रदीफ मानल जयबाक चाही। ओना ऐ गजलक आन शेर सभ मे दू टा काफियाक सुन्नर प्रयोग अछि, जे नीक लागैए। हमरा हिसाबेँ काफियाक दोख पृष्ठ बीस, बाईस, चौबीस, पचीस, अट्ठाईस, उनतीस(संयुक्ताक्षर काफियाक नियमक दोख), बत्तीस आ सैंतीस मे सेहो अछि। एकर सबहक विस्तृत वर्णन देब हम अपेक्षित नै बूझि रहल छी, कियाक तँ इ हमर उद्देश्य कथमपि नै अछि। गजल संग्रहक सब गजलक विषय-वस्तु नीक अछि आ गजलकार अपन भावना नीक जकाँ प्रकट केने छथि। किछु गजलक काफिया आ रदीफक दोख जँ कात कऽ कऽ देखी, तँ इ गजल-संग्रह एकटा नीक गजल-संग्रह अछि। गजलकारक गजल कहबाक क्षमता सेहो नीक बुझाईत अछि। हमरा ई अचरज लागि रहल अछि जे ऐ संग्रहक बाद गजलकारक दोसर गजल-संग्रह किया नै आएल अछि। एकर कारण तँ गजलकारे केँ पता हेतैन्हि, मुदा अपन अनुभवक आधार पर हम कहऽ चाहै छी जे श्री विभूति आनन्द नीक गजल लिख सकैत छथि। जँ बहरक विचार नै करी, तँ २०१२ मे आएल श्री अरविन्द ठाकुरजीक गजल-संग्रह सँ करीब एकतीस बर्ख पहिने १९८१ मे लिखल गेल एहि संग्रहक गजल सब उम्दा कहल जा सकैत अछि। एकर कारण इ जे एहि संग्रहक गजल सब मे काफियाक नियम-पालनक प्रतिशत वर्तमान समयक संग्रह सब सँ बेसी अछि। कथ्यक मजबूती सेहो नीक कोटिक अछि। खाली कुहरल तुकमिलानी केने गजल नै कहल जा सकैत अछि, इ गप एहि संग्रह केँ पढलाक बाद एखुनका गजलकार सभ केँ सेहो बुझेतन्हि, इ आशा अछि। इहो एकटा अचरजक विषय अछि जे जखन मैथिली मे नीक गजल एतेक साल पहिनो कहल गेल छल, तखन एकर बाद गजलक विकास-यात्रा पचीस-तीस बर्ख धरि कतऽ आ किया ठमकि गेल। बीचक अवधि मे मैथिली गजलक विकासक धार मे बान्ह किया बनि गेल छल, इ विचारणीय गप अछि। ओना आब इ बान्ह टूटि रहल अछि आ आशाक नब जोति मे मैथिली गजलक घोघ उठि रहल अछि। डॉ. बचेश्वर झा, जन्म- १५ मार्च १९४७ईं, एम.ए.-पी.एच.डी., पूर्व प्रधानाचार्य, निर्मली महाविद्यालय, निर्मली। समीक्षा- मौलाइल गाछक फूल ‘मौलाइल गाछक फूल’क लेखक श्री जगदीश प्रसाद मंडलकेँ हम साधुवाद दैत छियन्हि जे हिन्दी आ राजनीति शास्त्रमे एम.ए.क अर्हता प्राप्त होइतहुँ अपन मातृभाषाक प्रति अटूट सिनेह राखि मैथिलीमे लेखन करबाक भगिरथी प्रयास कएल अछि। ओना तँ मैथिलीमे अनेकानेक साहिन्यकार लोकनि चेष्टा कएल अछि। हुनका लोकनिक भाषामे फेंट-फॉंट भेटल अछि, किन्तु मौलाइल गाछक फूलमे सुच्चा लोकभाषाक प्रयोग भेटैत अछि। प्रान्जल भाषा गमैया भाषाक आगॉं घुटना टेक दैत अछि, जन साधारण अल्पो शिक्षितकेँ गुद-गुदीक संग विषय अन्तस्थलीकेँ छुवि लैत अछि। वैचारिक दृढ़ता एवं हार्दिक मृदुलताक अद्भुत समाहार जगदीश जीमे विरल अस्तित्वक परिचए दैछ। उपन्यासक प्रत्येक लेखपर माने उपकथापर दृष्टि दैत छी तँ स्पष्ट प्रतीत होइछ जे एकर लेखक जेना प्रत्यक्षदर्शी भऽ विषयक निरूपण कएल अछि। ओना तँ शिक्षाक सीढ़ीकेँ पार कए लेखक कलाक बलवती इच्छा राखि मैथिलीक वाटिकाकेँ पल्लवित-पुष्पित करक भरपूर प्रयास कएलन्हि अछि। गाम ठामक बिलक्षण चित्रण हिनक लेखनीक विशेषता एहि पोथीमे देखल जाइछ। हिनका भाषानुरागीक संग मातृभाषाक सिनेही कही तँ सर्वथा उपयुक्त होएत। एहिमे सामाजक ओहि वर्गक समीक्षा कएल अछि जकरापर आइधरि केओ सोचबो ने कएने छल। माजल ठेंठ गमैआ बोलीक मैथिलीमे समाहित कएने छथि। हमरा तँ लगैत अछि माए मैथिली लेखकक माथपर चढ़ि कऽ एहन चमत्कारी उपन्यास लिखक हेतु प्रेरित कएल अछि। फणिश्वर नाथ रेणु आ यात्री जीक उपन्यासमे सामाजिक रहन-सहन वैचारिक भिन्नता अर्थाभावक कारणे स्वाभिमानक हनन जौं देववामे अबैत अछि तँ सम्प्रति उपन्यासमे वर्णित घटना आ घटनासँ पात्रक प्रत्यक्ष दिग्दर्शन अति मार्मिक अन्तर मोनकेँ सोचवाक लेल उत्प्रेरित करैछ। मधुबनी जिलाक बेरमा गाममे जन्म नेनिहार लेखक एतेक सुन्दर, सुवोध आ सुगम्य ढंगसँ विषएकेँ निरूपित कए पाठकक जिज्ञासाकेँ अन्त धरि बढ़बैत गेल छथि जे चिक्कन, चोटगर आ चयन लेल वाध्य करैत अछि। मैथिली साहित्याकाशक ई ज्योर्तिमान नक्षत्र सदृश उद्भूत भऽ मैथिली साहित्यक भंडारकेँ समृध्द्ता अनवामे योगदान कएल अछि। ओना तँ औपन्यासिक विचारानुसार एहि उपन्यासमे त्रुटि अछि। एकरा उपन्यास कहल जाए वा सामजिक निबंध ताहि परिप्रेक्ष्यमे विद्वान पाठके निर्णए कऽ सकैत छथि। मुदा हमरा तँ लेखकक एहि उपन्यासमे कालानुसार घटना आ पात्रक चित्रणमे ताल-मेलक अभाव भेटैत अछि जेना- एकओर अनुप वोनिहारक बेटा बौएलाल भूख-पियाससँ आकुल अछि इनारक पानि भरवामे डोरी डोलक प्रयोजन छैक तँ दोसर दिशि रमाकान्त आ हीरालालकेँ आधुनिक कालमे शराब चुस्कीक चर्चा होइत अछि तेँ उपन्यासक विषए-वस्तु समए बद्ध नहि रहलासँ औपन्यासिक दोष लक्षित होइत अछि। स्वीकार करए पड़ैत अछि जे हिनक ई उपन्यास विषय-वस्तुकेँ ताहि रूपेँ समेटने अछि जेना सितुआमे समुद्र समाएल हो। लेखक जगदीश प्रसाद मंडल जीक प्रयास आ आयास दुनू साराहनीय छन्हि। हम मॉं मैथिलीसँ प्रार्थना करैत छी जे हिनकामे स्फूरना बनल रहन्हि जाहिसँ मैथिली साहित्यक सम्वर्ध्दन होइत रहए। पोथिक नाम- मौलाइल गाछक फूल उपन्यासकार- जगदीश प्रसाद मंडल प्रकाशन- श्रृति प्रकाशन, दिल्ली पोथी-प्राप्तिक स्थान- Pallavi Distributors मोवाइल- ९५७२४५०४०५Ward no- 6, Nirmali (Supaul) मूल्य- २५० टाका शिव कुमार झा ‘टिल्लू’ मैथिली नाटकक विकासमे आनंद जीक योगदान जखन-जखन मैिथली भाषा साहित्यमे नाट्य विधाक चर्च होइत अछि तँ हठात् पंडित जीवन झासँ लऽ कऽ झिझिरकोना आ तालमुट्ठी सन नाटकक नाटककार अरविन्द कुमार अक्कू जीक विवेचन स्वभाविक भऽ जाइछ। एहि एक सय छ: बरखक नाट्य रचनमे बहुत रास नाटककार विविध शैलीक साहित्यिक नाटकक संग-संग लोकप्रियताक लेल चलन्त आ ओछ नाटक सेहो लिखलनि। किछु रचनाकार तँ नाटककारेक रूपेँ वेस चर्चित छथि संग-संग हुनका सभकेँ पुरस्कृत सेहो कएल गेल अछि। उदाहरणस्वरूप श्री महेन्द्र मलंगिया मैथिली साहित्यक प्रतिष्ठित सम्मान प्रबोध सम्मानसँ सम्मानित कएल गेल छथि। मलंगिया जी बहुत रास नाटक लिखलनि- लक्ष्मण रेखा : खण्डित, जुअाएल कनकनी, एक कमल नोरमे, ओकरा अॉगनक बारहमासा, कमलाकातक राम, लक्ष्मण ओ सीता आर काठक लोक। एहि नाटक सभमे 'एक कमल नोरमे' साहित्यक समग्र बिन्दुकेँ विम्बित करएबला नीक नाटक मानल जाइत अछि। मुदा 'काठक लोक' पढ़लासँ पाठक स्वयं िनर्णय सुनाबथि जे कतए धरि एकरा 'मैथिली नाटक' मानल जाए। बिम्व लोकगाथा आ विवेचन मैथिलीसँ बेसी हिन्दीमे। ओना सभ साहित्यिक कृतिमे आन भाषाक प्रयोग ठाम-ठाम कएल जाइत अछि मुदा मात्र पात्रक दशा आ परिस्थितिमे तारतम्य स्थापित करबाक लेल। मलंगियाजी एहि पोथीमे हिन्दीक प्रयोग कोन रूपेँ कएने छथि ई गप्प झारखंडक अंत:स्थ कक्षाक (मैथिली भाषी जौ उपलब्ध होथि) छात्र-छात्रासँ पुछल जा सकैत अछि किएक तँ 'काठक लोक' झारखण्ड अधिविद्य परिषद्क मैिथली पाठयक्रममे सम्मिलित अछि। मैिथलीक संग दुर्भाग्य मानल जाए वा विडम्वना किछु कथाकथित साहित्यकार आ समीक्षकक दलपुंज भाषापर अपन अधिकार चमौकनि जकाँ जमौने छथि। 'अहाँक सोहर हम गाएब आ हमर डहकन अहाँ बिदबिदाउ' एहि परिपेक्ष्यमे किछु प्रतिभा झॉपले रहि गेल, कतहु कोनो चर्च नहि। एहि बज्र पातक टटका शिकार छथि आधुनिक पिरहीक सनसनाइत युगान्कारी नाटककार- 'श्री आनंद कुमार झा' आनंद जीक एखन धरि पॉच गोट नाटक प्रकाशित भेल अछि 'टाकाक मोल (2000), 'कलह (2001), 'बदलैत समाज (2002), धधाइत नवकी कनियाँक लहास (2003) आ हठात् परिवर्त्तन 2005ई.मे। एहि नाटकक संग-संग आनंदजीक अप्रकाशित नाटकक गणना दू अंक धरि पहुँचि गेल अछि। आनंद जीक जन्म 1977ई.मे मिथिलाक सांस्कृतिक सेहंतित भूखण्ड 'मधुबनी जिला'क मेंहथ गाममे भेल। जौं समस्तीपुर खगड़िया आ बेगूसराय जिलाक लाल रहितथि तँ उपेक्षाक दंश स्वाभाविक छल मुदा ठामक वासी उपेक्षित भेलाह कनेक संत्रास जकाँ लगैछ। गाम-गामसँ लऽ कऽ कोलकाता शहर धरि मंचित एहि नाटकक कोनो समीक्षा नहि भेल, ई सभ मात्र मैथिली भाषामे संभव छैक। जौं बिम्वक उपयोगिताकेँ केन्द्र बिन्दु मानल जाए तँ मैथिली साहित्यक प्रवीण नाटक कारक समूहमे आनंद जीक स्थान निश्चित अछि। टाटाक मोल : आर्य भूमिक एकटा पैघ व्याधि काटर प्रथाक दु:स्थितिपर केन्द्रित एहि नाटकमे मिथिला संस्कृतिक कोढ़िक चित्रण नीक ढंगसँ कएल गेल अछि। कन्याक पिता नाओ गरीवनाथ संग-संग दरिद्र सेहो। अपन धर्मपत्नी सुमित्राक आश पूर्ण करवाक लेल 'पुत्र कामनार्थ' पॉच गोट कन्याकेँ जन्म देलनि। पहिल बेटीक विवाहमे डॉड़ टुटि गेलनि सभटा खेत बिका गेलनि। दोसर बेटीक कन्यादानक लेल आतुर छथि मात्र बारह कट्ठा जमीन बॉचल छन्हि। बेटी प्रभा कॉलेजमे पढ़ैत छथि, विवाह अपना मोने नहि करए चाहैत छथि- मात्र समाजक हेय दृष्टिसँ बचवाक लेल बेटीक विआह एहि शुद्धमे करवाक लेल परेशान छथि। हमरा सबहक समाजक कतेक कलुष रूप अछि अप्पन टेटर नहि देखि कऽ लोक सभ दोसरक फुसरीपर काग-दृष्टि लगौने रहैत छथि। कुमारि बेटी छन्हि गरीब झाक घरमे आ परेशान छथि समाजक लोक। एहि लेल नहि जे मिथिलाक बेेटीक उद्धार कएल जाए मात्र बारह कट्ठा जमीन लिखएबाक लोभमे। प्रभा अपन बहिनक देअर प्रभाकरसँ सिनेह करैत छथि लेकिन आंडबरधर्मी समाज एहि सिनेहक मंजूरी नहि देत तँए चुप्प। गरीव झा दलाल काकासँ संपर्क करैत छथि। जेहन नाअो तेहने कार्य। हुनक चेला कक्कासँ बेसी पारखी। दुनूक जोड़ी शुभ्म निसुम्भ जकाँ दुष्ट आ धृष्ठतासँ भरल। हर्षदमेहताक दलाली हिनका लग ओछ पड़ि जाइत। बालकक पिता लीलाम्बर बाबू वास्तवमे लीलाधारी छथि। भातिज सभसँ कम कैंचा पुत्रक विआहमे कोना लेतथि तँए पचहत्तरि हजारसँ कम टाका नहि चाही। दलाल काकाक मोहिनी मंत्रक जादूमे आबि पैंसठ हजारमे विआह करबाक िनर्णय सुनौलनि। शर्त्त छनि जे समाजमे पचहत्तरि हजारक उद्धोष कएल जाए। दलाल काकाक कलिजुगी उगना एहि उद्धोषणक लाभ लेवाक प्रयासमे सफल भेलनि। दलालीक दस हजार कमीशन दुनू चेला गुरूक पेटमे। गरीब झा अपन वॉचल जमीन 50 हजारमे बेिच लेलनि। मित्र गुणानंद जीसँ दस हजार टाकाक मदति भेटलनि, शेष प्रश्न ओझराएल पंद्रह हजार आव कोना हएत? येन केन प्रकारेन वरियाती दलान लागल। फेर धमगिज्जड़ि। माथक पाग खसि पड़लनि मुदा वरियाती आपिस। अंतमे प्रभाकरक संग प्रभाक विआह होइत अछि। लीलांवर जी काटरक टाका पचास हजार कन्यागतकेँ आपिस कएलनि। मुदा नाटककार ई स्पष्ट नहि कऽ सकलनि जे दलाल काका दलालीक दस हजार कन्यागतकेँ देलनि वा नहि। कथानकक किछु तथ्य वास्तविकता नहि भऽ कऽ कल्पना मात्र लागल। गरीब नाथक बेटी प्रभा काॅलेजमे पढ़ैत छथि आ छोट मांगल-चांगल भाए महीस चरबैत छन्हि। ओना तँ पुत्रक आकांक्षामे पॉच गोट पुत्रीक जन्म देमएबला माए-बापक अर्थव्यवस्था अव्यवस्थित हएव स्वाभाविक अछि। परंच मैथिल संस्कृतिक ग्रामीण व्यवस्थामे रहनिहार माता-पिताक जीवनमे संतानक रूपेँ पुत्रसँ पुत्रीक बेसी महत्व देव कल्पना मात्र छैक, वास्तवमे तँ बेटी जन्महिसँ आनक धरोहरि मानल जाइत अछि तँए बेटा महीस चराबथि आ बेटी कॉलेजमे पढ़तीह, आश्चर्य जनक लागल। कथानकक बीच-बीचमे अंग्रेजी शब्दक प्रयोग कऽ नाटककार आधुनिकता लेपन करवाक प्रयास कएलनि ई उचित अछि वा नहि, पाठकपर छोड़ि देवाक चाही। एकटा अनसोहॉत अवश्य लागल जे मैथिलीमे 'चुकल' शब्दक प्रयोग कहिया धरि रहत। निष्कर्षत: ई नाटक मंचनक योग्य अछि। कलह : कलह आनंदजी लिखित दोसर नाटक थिक। समाजमे जीवन्त धटना सभकेँ एक सूत्रमे जोड़ि कऽ एहि नाटकक सृजन कएल गेल। आकाश एकटा बेरोजगार नौजवान छथि। टाकाक लोभमे पिता सुरेश्वर हिनक विआह करा दैत छथिन्ह। आकाश सुरेश्वर बाबूक पहिल पत्नीक संतान छथि तँए विमाता सुमित्राक दृष्टिमे हिनक कोनो स्थान नहि। सुमित्रा तँ अपन कोखिसँ जनमल पुत्र राजीव आ ओकर कनियाँ कोमलक लेल ज्येष्ठ पुत्रक संग यातनाक सभटा बान्ह लॉधि देलनि। प्रौढ़ पिता मूक परिस्थितिक मारल मात्र दर्शक बनि कऽ रहि गेलाह। कालक मारिसँ भटकैत-भटकैत दुनू परानीक िनर्मम अंत होइत अछि। एकटा अबोध नेनाक जन्म भेल जे आकाशक अंतरंग मित्र योगेशक कोरमे कथाक अंत धरि.....। नाटककार एहि नाटकक रचना भऽ सकैत अछि जे कथानकमे संत्रास भरबाक संग-संग दर्शकक मध्य लोकप्रिय बनएवाक लेल केने होथि मुदा एहि सभसँ नाटकक प्रासंगिकतापर प्रश्न चिन्ह नहि लगाओल जा सकैत अछि। कतहु-कतहु बिम्व विश्लेषण चलंत आ हिन्दी भाषाक व्यवसायिक चलचित्र जकाँ लागल मुदा मैथिलीमे नवल प्रयोगकेँ किओ झॉपि नहि सकैत छथि, जतए-जतए एहि नाटकक िचत्रण होएत अवश्य छाप छोड़त। बदलैत समाज : बदलैत समाज नाटकक आरंभ एकटा ब्लड कैंसर पीड़ित बालकक अपन पत्नीक संग वार्तालापक संग होइत अछि। कर्जसँ मुक्तिक लेल घूरन जी अपन बीमार पुत्रक विआह करा दैत छथि। हुनका ओना बूझल नहि छलनि जे पुत्र अवधेश ब्लड-कैंसरसँ पीड़ित अछि। भजेन्द्र मुखियाक पुत्र दीपक अवधेशक बाल संगी छथि। ओ पहिनेसँ जनैत छलाह जे अवधेशक मृत्युक दिवस नजदीक छन्हि। तथािप ओ खुलि कऽ नहि बजलनि किएक तँ घूरन बाबू स्वयं बूढ़ लोक छथि। एकटा पिता अपन कान्हपर पुत्रक लाशक कल्पना मात्रसँ सिहरि सकैत छथि, वास्तविकता.........।। विविध घटनाक्रममे अवधेशक मृत्युक भऽ गेलनि। समाज हुनक विधवा शोभापर चरित्रदोष सेहो लगौलक। समाज की जाहि अवलापर ओकर सासुक विश्वास नहि हुअए ओकरापर आन के विश्वास करत। नाटकक अंतमे सबहक भ्रम टुटैत अछि जखन शोभा दीपककेँ 'भैया' कहि कऽ अश्रुलाप करैत छथि। अंतमे विधवा शोभाक एकटा सच्चरित्र युवक वीजेन्द्रसँ पुर्नविवाहक कल्पना कएल गेल। ओना तँ एहि नाटकमे जात-पातिक कोनो चर्च नहि मुदा प्रसंगसँ स्पष्ट होइत अछि जे सवर्ण परिवारक पृष्ठभूमिमे नाटक केन्द्रित अछि। नाटककारक ई कल्पना नीक लागल जे सवर्ण घरक विधवा युवतीक पुनर्विवाह भऽ सकैत अछि। नाटकक संवादमे ठाम-ठाम अलंकार आ लोकोक्तिक लेपन नीक लागल। 'सम्भावनाक आधारपर मनुष्य कल्पना करैत अछि। मुदा प्रकृतिक शास्वत नियमकेँ किओ नहि बदलि सकैत अछि' एहि संवादक माध्यमसँ अवधेश अपन मृत्युक संकेतकेँ बूझि रहल छथि। हुनक दोसर संवादमे- 'हम मृत्युसँ भयभीत नहि छी। भय अछि ओइ निस्सहाय अवला नारीक असीम दु:ख, पीड़ा आ वेदनासँ। भय अछि अनजानमे हमरासँ भेल गलतीसँ।' श्रंृगारक प्रवल लालसा रहितहुँ परिस्थिति मनुक्खकेँ वैरागी बना दैछ। जनतंत्रक कुटिल व्यवस्थापर सेहो एहि नाटकमे कटाक्ष कएल गेल। भजेन्द्रजी सन कुटिल गामक मुखिया छथि तँ विपक्ष हुनकोसँ बेसी कुटिल। तँए ने फुराइतो छन्हि हुनका 'ओ बनियाँ बुड़िवक होइत अछि जे पलड़ापर बटखड़ा रखलासँ पहिने समान चढ़ा दैत अछि।'' आनंदजीक चारिम नाटक धधाइत नवकी कनियाॅक लहास : कोनो काटक प्रथाक नाटक नहि। मात्र किछु गहनाक खातिर शिखाक आत्महत्याक प्रयास अजीव कहल जा सकैछ। हठात् परिवर्त्तन : देशभक्ति मूलक नाटक थिक। निष्कर्षत: ई कहल जा सकैत छथि जे आनंद जीक नाटक शैलीमे गोविन्द झाक हास्य समागम, ईशनाथ झाक अलंकार, जगदीश प्रसाद मंडल जीक साम्यवाद, अक्कूजीक आधुनिकता, लल्लन ठाकुर जीक मंचन शैली आ शेखर जीक जनभाषा कलकल अछि। मौलाइल गाछक फूल- (समीक्षा) कोनो भाषा साहित्यक विकासमे उपन्यासक एकटा अलग महत्व होइत अछि। औपन्यासिक कृतिकेँ जौं साहित्यक चक्षु द्वय कहल जाए तँ कोनो अतिशयोक्ति नहि होएत। मैथिली साहित्यमे उपन्यास सभक भंडार बड़ विस्तृत अछि। एहि प्रांजल साहित्यिक कृतिमे किछु कोसक पाथर सन रचना भेल जे आर्यावर्त्तक भाषाक गुच्छमे मैथिलीक स्थानकेँ सुवासित कऽ रहल अछि। सर्वकालीन मैथिली साहित्यक इतिहासमे सम्मिलित ओ सभ उपन्यास अछि- पंडित जन सीदन कृत शशिकला, प्रो. हरिमोहन झा रचित कन्यादान ओ द्विरागमन, योगानन्द झा रचित भलमानुष, श्री यात्री कृत पारो, डॉ. मणिपद्म कृति नैका वनिजारा, श्री सोमदेव कृत चानोदाइ, श्री सुधांशु शेखर चौधरी कृत दरिद्र छिम्मड़ि, श्रीमती लीलीरे कृत पटाक्षेप, श्री रमानंद रेणु कृत दूध-फूल, डाॅ. शेफालिका वर्मा कृत नागफांस, श्री साकेतानंद कृत सर्वस्वांत, श्री ललित कृत पृथ्वीपुत्र, श्रीमती गौरी मिश्र कृत चिनगी, श्री केदारनाथ चौधरी कृत माहूर आ श्री गजेन्द्र ठाकुर कृत सहस्त्रवाढ़नि। निश्चित रूपें एहि सभ उपन्याससँ मैथिली साहित्यकेँ नव दशा ओ दिशा भेटल, परंच एकर अतिरिक्त सेहो किछु कृति अछि जकर चर्च करव विना मैथिली उपन्यास विधाकेँ अपूर्ण मानल जाएत। ओहि कृतिमे सँ एक अछि श्री जगदीश प्रसाद मंडल द्वारा लिखित उपन्यास- ‘मौलाइल गाछक फूल’ शीर्षकसँ बुझना गेल जे प्रकृति वर्णनपर आधारित उपन्यास अछि, मुदा अध्ययनक पश्चात् समाजक मौलाइल स्वरूपक वर्णन आ पुनरूत्थानक सकारात्मक स्वरूपक आधारपर एहि उपन्यासक रचना भेल अछि। जौं मालीमे चेतना ओ अनुशीलन हो तँ मौलाइल गाछमे सेहो पुष्प खिलाओल जा सकैत अछि, ठीक ओहिना समाजमे एकरूपता, सामंजस्य ओ अनुग्रह हो तँ विगलित मिथिलाक स्वरूपमे हरियरी आबि सकैत अछि। मैथिल समाजक पहिल लोकसँ लऽ कऽ अंतिम लोकक व्यथा वा सुखद अनुभूतिकेँ रेखांकित कऽ रहल अछि- “मौलाइल गाछक फूल” एहि उपन्यासकेँ सम्पूर्ण उपन्यास एहि दुआरे मानल जा सकैत अछि जे एहिमे समाजक नकारात्मक स्वरूपपर सकारात्मक सिद्धान्तक विजय देखाओल गेल अछि। सत्यक विजय तँ वेस ठॉ होइत अछि, मुदा एहिमे असत्यक हृदय परिवर्त्तनक भऽ कऽ सत्यक जन्म होइत अछि। समाजक सभसँ अंतिम व्यक्तिक दशा ओकरे शब्दमे लिखल गेल, भाषा सम्पादन आ परिमार्जनक आड़िमे कोनो परिवर्तन नहि। सम्पूर्ण जीवन दर्शनमे नायकत्व, किओ खलनायक नहि। वास्तविक रूपे की एना संभव अछि? अवश्य भऽ सकैछ, जौं हम सभ स्वयंमे सम्यक सोच आ दृष्टिकोणकेँ स्थापित करी। कथाक विषय वस्तु कोनो एकटा कथापर केन्द्रित नहि भऽ कऽ बहुत रास उपकथाकेँ सहेजि कऽ बनाओल गेल अछि। कथाक प्रारंभ अकालक परिणामसँ होइत अछि। गरीव मजूर अनुपक पुत्र बौएलाल भुक्खक कारण मृत्युक अवाहन कऽ रहल अछि। माए रधिया अपन लोटा बेचि कऽ ओकर तृप्ति लेल चिक्कस कीनि कऽ अनैत अछि। तीनटा रोटी बनल, मुदा बौएलालक भाग्यमे मात्र एकटा रोटी आ दू लोटा पानि। श्रमजीवीक मार्मिक दशापर लिखल पहिल भागमे संवभत: रधिया अर्न्तमनसँ अनूपसँ कहैत छथि- की बुझवें ककरा कहै छै गरीवी, सपनहुँमे सुख नहि जतऽ श्रमजीवी, सूर्यास्तक पश्चात दू क्षणक लेल कुहेस अबैत अछि, फेर उषाक दर्शन अवश्यंभावी, यएह तँ प्रकृतिक लीला अछि। नथुआ अनूपक अन्हार कूपमे इजोतक सूक्ष्म बाती लऽ कऽ अबैत अछि। रमाकान्त बाबू पोखरि खुनौता तेँ मजूरक आवश्यकता अिछ। अनूपकेँ सपरिवार काज भेट गेलनि। मेट मूसनाक वरदहस्त जे छल। मालिकक मुंशीकेँ मेट कहल जाइत अछि। मूल रूपसँ दलालक प्रवृतिबला मूसन अनुपक लेल प्राणदायक अछि। किएक तँ दुनू परानीक संग-संग बारह बर्खक बौएलालकेँ सेहो काज दऽ देलक। बौएलाल सेहो पूर्ण तन्मय भऽ कऽ कएलक, तकर परिणाम भेल जे रमाकान्त बाबू आन जोनसँ बेसी मजदूरी बौएलालकेँ देलनि। कर्मक गति विचित्र होइत अछि। उपन्यासकार बाल श्रमिककेँ महिमा मंडित कऽ रहल छथि। हमरा सबहक संविधानमे 14 वर्खसँ कम उमेरक व्यक्तिकेँ ‘वाल’ कहल जाइत अछि- मजदूरी प्रतिवंधित। मुदा ओ भुक्खे मरि जाए एकर कोनो परिवाहि नहि। टेलिभीजनमे नाच पाँच बर्खक बच्चा कऽ सकैत छथि, एकरा प्रतिभाक प्रदर्शन मानल जाइत अछि मुदा 12 वर्खक बौएलाल मात्र मौलाइल गाछक मजदूर थिक, वास्तविक जीवनमे पकड़ल जाएत तँ दीन हीन पिताकेँ जेहल भेटल। ‘समरथकेँ नहि दोष गोसाईं। रमाकान्त बाबूक प्रतापसँ अपन कर्मक प्रकृतिसँ अनूपक गरीवी समाप्त भऽ गेल। बौएलाल काजक संग-संग शिक्षा सेहो ग्रहण करए लागल। बौएलालक जीवनमे विहान जे आएल ओ उपन्यासक अंत धरि जगमगाइते रहल। अंतमे रमाकान्त बाबूक जेठ वालक डॉ. महेन्द्रक सहकर्मी भऽ गेला बौएलाल। बौएलालसँ डॉ. बौएलाल- सभटा कर्मक प्रभाव। हिन्दी साहित्यक एकटा कविक उक्ति पूर्णत: सत्य प्रतीत होइत अछि- प्राणों की वर्तिका बनाकर, ओढ़ तिमिर की काली चादर जलने वाला दीपक ही तो जग का तिमिर मिटा पाता है रोने वाला ही गाता है। कथाक दोसर मोड़पर शशिशेखरक जीवन विहानसँ तिमिरमे प्रवेश करैत अछि। कृषि वैज्ञानिक बनावाक बाटेपर सभटा समाप्त भऽ गेल। माता-पिताक बिमारीमे सभटा चौपट्ट भऽ गेलनि। अधखरू शिक्षा बड़ कष्टदायी होइत अछि। आत्मगलानिक शिकार शशिशेखरक भाग्य सेहो फूजल। एकटा विधवा अपन जमीनसँ विद्यालय खोलवाक योजना बनायलि। गामक संभ्रान्तसँ लऽ कऽ गरीव गुरबाक समर्थन। शशिशेखर शिक्षक भऽ गेलाह। उपन्यासक तेसर खण्डमे सुगियाक शारीरिक व्यथाक आरंम्भक संग-संग पति सोने लालक समर्थन हृदयकेँ झकझोरि दैत अछि। येन-केन प्रकारेण सोनेलाल सुगियाक इलाज करा कऽ गाम घुरलाह। सुगिया स्वस्थ भेली, चिकित्साक प्रभावसँ मुदा कबुलाक प्रभाव मानि सोनेलाल कीर्त्तनक संग-संग भंडारक आयोजन कएलनि। हमरा सबहक समाजमे अंध विश्वासक चमौकनि अपन जालसँ सोचकेँ घेर नेने अछि। कीर्त्तनक दू दल आगाँक जातिक रमापतिक दल आ वेस पछाथिक संग-संग किछु सवर्ण साधुक मिश्रित दल- गंगादासक दल। उधेश्य एक, मुदा दृष्टिकोण अलग-अलग। रमापतिक दल गरीब सोनेलालसँ दक्षिणा लेलनि, दयाक कोनो संभावना नहि। गंगादासक दल दक्षिणा तँ लेलनि मुदा मात्र सिद्धान्तक रूपमे। वास्तवमे लऽ कऽ घुरा देलनि। आत्म सम्मानक भावक संग-संग गंगादासमे दया-भाव सेहो अछि। आब स्वत: बूझल जा सकैत अछि जे सवर्ण ककरा कही? चारिम खण्डक प्रारंभ रमाकान्त बावूक अपन पत्नी श्यामा आ नोकर जुगेसरक संग मद्रास प्रवाससँ होइत अछि। कतऽ गाम आ कतऽ मद्रासक जिनगी। एक दिस जगमगाइत रोशनी, साफ सड़क आ गगनचुम्बी महल तँ दोसर दिस दू कुहेसक वाट। मुदा वास्तविकता किछु आओर छल। पुतोहू-पुत्र डॉ मुदा भविष्यमे किछु नहि भेटबाक संभावना देखि रमाकान्तक हिया सुखा रहल छलनि। बेटा-पुतोहूसँ तँ खूब सम्मान आ सत्कार भेटलनि मुदा पाँचटा पोता-पोतीमे सँ केओ चिन्हवो नहि कएलनि। जे जीवितमे नहि जनैत अछि ओकरासँ जीवनक अंतिम अवस्थामे की आश करी? पलायनवादक पराकाष्ठा धरि लऽ जाएव उपन्यासकारक सोचसँ निश्चित रूपे अजगुत लगैत अछि। मिथिलाक भविष्य कतऽ धरि जाएत जगदीश बावूक संजय सन दृष्टि आश्चर्यजनक मुदा प्रासंगिक अछि। छोटकी पुतोहू सुजाताक जीवनक गाथा सुनि रमाकान्त बाबू पसिझ गेलाह। एकटा धोविनक तनयासँ छोटका बेटाक विवाह भेल दूटा संतान सेहो भऽ गेल, मुदा रमाकान्त बावू अपन पुतोहूक इतिहास नहि जनैत छलाह। साम्यवादी सोचक उन्नायक रमाकान्त बावूसँ एना संभव तँ मानल जा सकैत अछि, मुदा ओ अपन बेटाक विवाहमे शामिल किएक नहि भेलाह। पलायनक एहन फल मैथिलक समृद्ध वर्गकेँ कोना भेट सकैत अछि? गाममे दू सए बीघा जमीनक मालिक रमाकान्त बावूक दुनू लाल किएक नहि गामेमे अस्पताल खोललनि। जखन मद्रासक संभ्रान्त मिथिलामे नहि अबैत छथि तँ हम सभ िकए पलायन करैत छी? विपन्नक पलायन तँ बूझएमे अबैत अछि परंच सम्पन्नक पलायन.....? एहि उपन्यासक सभसँ पैघ विशेषता जे उपन्यासकार कोनो प्रकारक प्रश्नकेँ छोड़ि रचनाक इतिश्री नहि कएलनि। प्रश्नक संग-संग विश्लेषण आ समाधान पोथीमे अनायास भेट जाएत। कथाक अंतमे पलायनवादक इतिश्री कहल गेल। डॉ. महेन्द्र आ डॉ. सुजाता गामक गरीव गुरबाक इलाजक लेल तत्पर भेलीह। कोनो व्यक्तिकेँ असाध्य रोग यथा कैंसर, एड्स नहि। एहिसँ प्रमाणित होइत अछि जे गाममे रहनिहारक जीवन संतुलित अछि। वीमार छथि तकर कारण पोषण संतुलित नहि। श्रमजीवी आ श्रमपोषीक मध्यक खाधिक कारण ई दशा अछि। रमाकान्त बावू एहि दशासँ तीजि-भीजि गेलाह। क्षणहिमे अपन सभटा जमीन जाल गरीवक मध्य वॉटि देलनि। गरीबो आत्म सम्मानी आ वफादार। खेतसँ उपजल अन्न, तीमन तरकारी प्रथमत: रमाकान्त बावूकेँ दैत छथि। सम्यक समाजक रचना, केओ सवर्ण नहि केओ क्षुद्र नहि। सबल मिथिला, संवल मैथिलाक कल्याणकारी सोच मनोरम अछि। हीरानन्द सन सम्यक सोचबला सवर्ण जौं समाजमे आगाँ बढ़ति तँ मिथिलाक रूप रेखा बदलि जाएत। हीरानंदक जातिक उल्लेख तँ नहि कएल गेल अछि मुदा लिखवाक कलासँ स्पष्ट होइत अछि ओ निश्चित रूपेँ आगाँक जातिक छथि। अनुपक घरमे भोजन ग्रहन काल सबरी-रामक सिनेहक स्पष्ट दर्शन। जीवन दर्शनपर आधारित एहि उपन्यासमे कतहु जातिक उल्लेख नहि मुदा लक्षणसँ स्पष्टीकरण होइत अछि। सुबुधिक विवेकशीलतामे रचनाकारक दृष्टिकोण पारदर्शी लागल। बुझना जाइत अछि जे जगदीश बावू सुबुधक रूपेँ उपन्यासमे पैसल छथि। उपन्यासमे एकठॉ वर्ग संधर्षक स्थिति देखऽ मे आएल मुदा एकटा अवला अपन चरित्रक रक्षाक लेल पियक्करपर प्रहार कएलनि। ई सभ वास्तविकता अछि एकरा अनसोहाॅत नहि मानल जा सकैत अछि। विषय-वस्तुक मध्य झाॅपल दशापर वेवाक प्रस्तुति। ओना तँ सभटा रचनाकार अपनाकेँ साम्यवादी आ समाजवादी मानैत छथि। मुदा रचनाक संग-संग सबहक जीवनक दर्शन कएलापर स्थिति विपरीत भऽ सकैत छथि। मैथिली साहित्यक सम्यक चरित्र, सम्यक दृष्टि आ सम्यक जीवन शैलीमे जीबऽ बला किछुए मात्र साहित्यकारक समूहमे जगदीश बावूकेँ सेहो राखल जा सकैत अछि। अपन व्यक्तित्वसँ जीवनक नूतन आयामकेँ समाजमे ज्योतिक रूपमे पसारब मात्र रचनामे नहि, व्यक्तिगत जीवनोमे अवश्ये हएत। भऽ सकैत अछि वर्तमान पिरही एहि ग्रन्थक तादात्मयकेँ पूर्णत: स्वीकार नहि करए, परंच हमरा बुझने ई सम्पूर्ण पाठकक उपन्यास थिक। एहिमे ककरोसँ कोनो पूर्वाग्रह नहि। सम्भ्रान्त समाजकेँ विगलित आ ओछ समाजसँ जोड़ि सम्यक समाजक निर्माण करवाक उद्येश्यमे ‘‘सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दु:खभाग भवेत्’क दृष्टि परिलक्षित होइत अछि। कतहु-कतहु शब्द आ वाक्य सामंजस्यमे किछु त्रुटि सेहो देखऽ मे आएल मुदा भाव पवित्र, उद्येश्य पवित्र तेँ एकरा नजरअंदाज करव प्रासंगिक लागल। निश्चित रूपेँ सर्वश्रेष्ठ मैथिली उपन्यासक सूचीमे एहि उपन्यासक नाओ देल सकैत अछि। पोथीक नाम- मौलाइल गाछक फूल, विधा- उपन्यास रचनाकार- जगदीश प्रसाद मंडल प्रकाशक- श्रुति प्रकाशन राजेन्द्र नगर दिल्ली मूल्य- २५० टाका मात्र प्रकाशन वर्ष- सन् २००९ पोथी पाप्तिक स्थान- पल्लवी डिस्ट्रीब्यूटर्स, वार्ड न.६, निर्मली, सुपौल, मोवाइल न. ९५७२४५०४०५ भफाइत चाहक जिनगी- समीक्षा पूर्ण मैथिली भाषामे नाटक विधाक प्रारंभ पंडित जीवन झा कृत नाटक ‘सुन्दर संयोग’सँ सन् १९०४ई मे भेल। एहिसँ पूर्व मैथिलीमे उमापति, रामदास नन्दीपति आदि सेहो नाटकक रचना कएलन्हि, मुदा ओ सभ पूर्ण मैथिलीमे नहि लिखल गेल। सुन्दर संयोग’सँ लऽ कऽ श्री नचिकेता रचित ‘नो एन्ट्री मा प्रविश’, श्रीमती विभारानी कृत ‘भाग रौ आ बलचंदा’ आओर श्री जगदीश प्रसाद मंडल कृत ‘मिथिलाक बेटी’ धरि मैथिली साहित्यमे विविध विधाक नाटकक रास संग्रह उपलब्ध अछि। ओहि समग्र नाटकक मध्य किछु नाटक बड़ लाेकप्रिय भेल अछि ओहिमे- श्री ईशनाथ झा रचित ‘चीनीक लड्डू’ पंडित गोविन्द झा लिखित ‘बसात’ श्री मणिपद्म रचित झुमकी श्री ललन ठाकुर लिखित ‘लौंगिया मिरचाई’ प्रो. राधा कृष्ण चौधरी लिखित ‘राज्याभिषेक’ श्री सुरेन्द्र प्र. सिन्हा रचित ‘वीरचक्र’ श्री महेन्द्र मलंगिया रचित ‘एक कमल नोरमे’ श्री विन्देश्वरी मंडल रचित ‘क्षमादान’ श्री उत्तम लाल मंडल रचित ‘इजोत’ आ श्री गौरीकान्त चौधरी ‘कांत’ (मुखिया जी) रचित ‘वरदान’क संग-संग मैथिलीक मूर्द्धन्य साहित्यकार पंडित सुधांशु शेखर चौधरी रचित ‘भफाइत चाहक जिनगी’ प्रमुख अछि। स्व सुधांशु जी मूलत: मैथिली साहित्यक उपन्यासकारक रूपमे प्रसिद्ध छथि। अर्थनीतिकेँ आधार बना कऽ लिखबाक शैलीक कारण मैथिलीमे हिनक एकटा अलग स्थान अछि, एकटा कलाकार जौं अपन कलाक प्रदर्शन नाट्य रूपमे करए तँ कोनो अजगुत नहि। हिन्दीमे हिनक लिखल नाटक सभ लोकप्रिय भेल, तेँ अपन मातृभाषामे सेहो नाटक लिखए लगलाह। भफाइत चाहक जिनगी’मे समाजक सामान्य बिम्बकेँ विलक्षण रूपसँ विम्बित कऽ हास्य आ मर्मक सम्यक् तारतम्य स्थापित कएलन्हि। चाहक जिनगी कतेक क्षणक होइत अछि, भाफ उपटलासँ एकर अस्तित्व लुप्त भऽ जाइछ, मुदा जौं भनसियामे आत्म विश्वास हो तँ ओहि अस्तित्वविहीन चाहमे नीर-क्षीर मिश्रित कऽ ओकर फेरसँ सुस्वादु बनाओल जा सकैत अछि। नाटकक नायक महेशक जिनगी भफाइत चाहक जिनगी जकाँ अछि। एकटा सुशिक्षित व्यक्ति कर्मक प्रतिस्पर्धाक गतिमे सफल नहि भेलापर समाजक अधलाह मानल गेल कर्मकेँ अपन जीवनक डोरि बना कऽ ततेक आत्मबलसँ जीवैत अछि जे दीर्घसूत्री दृष्टिकोणक लोक सेहो एकरा लग नतमस्तक भऽ गेल। नाटकक कथा चेतना समिति पटनाक कार्यक्रमक मध्य धुरैत अछि। महेश चाहक स्थायी विक्रेता छथि, मुदा अधिक विक्रीक आशक संग मिथिला-मैथिलीसँ सिनेहक दुआरे त्रिदिवसीय कार्यक्रममे अपन दोकान लगौलनि। हुनक दोकानक पांजड़िमे गेना जीक पानक दोकान, मात्र मैथिलीक पावनि धरिक लेल। सम्पूर्ण नाटक एहि दू दोकानक दृश्यमे विम्वित अिछ। चेतना समितिक कार्यक्रमक प्रदर्शन मात्र नेपथ्यसँ कएल गेल। महेश-गेनाक शीत वसंतक वसातक संयोग जकाँ वार्तालापक क्रममे कार्यक्रमक कार्यकर्त्ता गोपालक प्रवेश। हिनक उद्येश्य चाह पीबाक संग कार्यक्रममे चाह पहुँचएवाक सेहो अछि। पान मंचपर अवश्य चाही, किएक तँ ई मैथिल संस्कृतिक प्रतीक अछि। गोपालक संग दिगम्वरक गप्प-सप्पमे अनसोहॉत कटाक्ष शैलीक विवेचन नीक वुझना जाइत अछि। अध्ययन सम्पन्न कऽ लेलाक पश्चात् दिगम्बर बावूकेँ नौकरी नहि भेटलन्हि। पटनामे दस दुआरि बनि पेट पोसि रहल छथि परंच महेशक चाह बेचवासँ ओ संतुष्ट नहि, हुनका गामक महेश चाहक दोकान खोलि गामक नाक कटा रहल अछि। वाह-रे मैथिल! भीख मांगि कऽ खाएव नीक, ठकि कऽ जीएव नीक मुदा छोट कर्म नहि करव। महेश तँ चाह बेिच कऽ अपन परिवारक प्रतिपाल करैत छथि, दू गोट बारह बरखक नेनाकेँ रोजगार देने छथि, मुदा दिगम्वर बावूकेँ अपन यायावरी जीवन नीक लगैत छन्हि। मुँहगर जे स्वयं अकर्मण्य हो ओ गोंग कर्मक पुरूषकेँ दूसय तँ की कहल जाए? महेश चुप्प नहि रहलाह, अपन कर्मक गतिक आड़िमे दिगमबरकेँ सत्यसँ परिचए करा देलनि। ओना ई दोसर गप्प जे महेशो अपन पितासँ असत्य बजने छथि। हुनक पिताकेँ ई वूझल छन्हि जे महेश पटनामे नौकरी करैत अछि। महेश मिथ्या बजलनि मात्र अपन पिताक मानसिक संतुष्टिक लेल, किएक तँ पुरना सोचक लोक अपन ठोप-चाननेटा पर विश्वास करैत छथि, वरू भुक्खे मरि जाएव मुदा विजातीय ओछ कर्म नहि करव। नाटकक देासर प्रमुख पात्र छथि उमानाथ आ चन्द्रमा, एकटा अकाश आ दोसर धरित्री। उमानाथ अभियंता छथि, नाओ टा लेल मैिथल, कार्यक्रम देखवाक लेल नहि अएलनि, मात्र अपन ंसगी सभसँ भेँट करवाक दुआरे चेतना समितिक दर्शक दीर्घा मे अशोकर्य लऽ कऽ पैसलनि। अपन कनियाँ चन्द्रमा टा सँ मैथिलीमे गप्प करैत छथि। की मजाल केओ देासर हुनका संग मैिथलीमे गप्प करवाक दु:साहस करए, ओकरा अपन सामर्थ्य देखा देताह। दुनू परानी चाह पीवाक क्रममे महेशक दोकानपर अबैत छथि, चाह बनल नहि की उमानाथ जीकेँ कोनो संगीपर नजरि पड़ि गेलनि। कनियाकेँ महेशक दोकानपर छोड़ि ठामे पड़ा गेलाह। यथाक्रममे मंचसँ महेश जीकेँ कविता पाठ करवाक आग्रह आएल। चन्द्रमा जीकेँ बिनु दामे दोकानक ओरवाही दऽ ओ मंचस्थ भऽ गेलाह। चन्द्रमा अजगुतमे पड़ि गेलीह, चाहक विक्रेता आ कवि? कालक लीला विचित्र लगलनि। दोकानपर गाहकि सभ आवए लागल, चन्द्रमा भावावेशमे पड़ि चाह बनावए लगलीह। गंगानाथ आ दयानंद सन गाहकिकेँ चाह विक्रेता कवि पचि नहि रहल छल। समितिक मंच हुनका लोकनिक मतेँ गनहा गेल। हरिकान्त बावूकेँ आधुनिक रूपक कार्यक्रम नीक नहि लागि रहल छनि, तँ शिवानंदकेँ पुरातन संस्कृतिसँ कोनो मोह वा छोह नहि। एहि मध्य उमानाथ बावू चन्द्रमाकेँ तकैत दोकानपर अएलाह। अपन कनियाकेँ चाह बनवैत देखिते माहुर भऽ गेलथि। छोड़बाक जिद्द कएलनि मुदा मैथिल नारी अपन उतरदायित्वसँ कोना भटकि सकैत अछि? एक खीरा तीन फॉक! बिगड़ि कऽ फेर पड़ा गेलाह। मोने-मोन महेशपर अगिनवान बरिसबैत छलथि। चन्द्रमा सेहो संकटक अवाहानमे सशंकित मुदा की करतीह? एक दिश भाव आ दोसर दिश कर्त्तव्य वोध, “आँखिक तीरक विख पानि नोर बनि झहड़ल हृदय झमान भेल।” कथाक अंतिम वनिता सरिताक कंठ चाहक लेल सुखए लागल तेँ अपन नोकर आ छोट नेनाक संग महेशक दोकानपर अबैत छथि। कविकाठी महेश कविता पाठ कऽ फेर अपन जीवनकेँ गुनि रहल छथि। सरिताकेँ देखिते स्वयंमे नुकएवाक असहज प्रयास करए लगलनि। वएह सरिता जे कहियो महेशक सह पाठिनी छलीह, आव एकटा आइ.ए.एस. अधिकारीक अर्द्धांगिनी छथि। सरिता महेशसँ साक्षात्कार करबाक प्रयास कऽ रहलीहेँ। महेश अपन भूतकालकेँ झॉपए चाहैत छथि मुदा सरिता घोघट कालक वऽर जकाँ ओकरा उधारि रहल छलीह। हुनक उद्येश्य सिनेहिल अछि तेँ महेश टूटि गेलाह। सरिता अश्रुधारसँ सिचिंत, जकर नोट्स पढ़ि अध्ययन पथपर बढ़ैत रहलीह ओ एहेन दशामे पहुँच गेल। चन्द्रमा सरिताक मोहमे विचरण करए लगलीह। एहि मर्मस्पर्शी क्षणक अंत भेल नहि की उमानाथ आवि महेशक गट्टा पकड़ि वास्तविक जीवनकेँ दर्शन कराबए लगलाह। चन्द्रमा एहि क्षण महेशक संग दऽ रहल छलीह। मैथिली साहित्यक लेल सभसँ विलग नूतन विषय वस्तुक मार्मिक विश्लेषणमे शेखर जीक अतुल्य प्रतिभाक झलक अनमोल अछि। पूर्ण रूपसँ एकरा नाटक नहि कहल जा सकैछ, किएक तँ दीर्ध एकांकीक रूपमे लिखल गेल अछि। कथाक चित्रण मात्र दू दोकानक परिधिमे भेल अछि तेँ दृश्य समायोजनमे कोनो प्रकारक विध्नक स्थिति नहि, सरिपहुँ एकरा शेखर जी नाटकक रूपमे प्रदर्शित कएलनि। महेश सन चरित्र हमरा सबहक समाजमे छथि, मुदा कर्त्तव्यबोधक एहेन पुरूष जौं मिथिलामे सभ ठाम होथि तँ हम सभ साधन वििहन रहितहुँ सम्यक जीवनक रचना कऽ सकैत छी। चन्द्रमा सन दीर्घसोची नारीक विवरणमे वास्तविकतासँ वेशी कल्पनाक आभास होइत अछि। नाटकक आत्मकथ्यमे शेखर जीक आत्मविश्वाससँ वेशी अहंकारक दर्शन भेल। ‘नाटकक क्षेत्रमे हमर किछु मोजर अछि’ सन उक्तिक संग बटुक भाय आ गजेन्द्र ना. चौधरीक प्रति कृतज्ञता ज्ञापनमे महिमा मंडनक भान श्ोशर जीक संस्कारपर बुझना जाइछ। केओ ककरो प्रेरणासँ रचनाकार नहि भऽ सकैत अछि, ई तँ नैसर्गिक प्रतिभाक परिणाम थिक। मुदा एहिसँ ‘भफाइत चाहक जिनगी’क मर्यादाकेँ क्षीण नहि बुझना जा सकैत अछि। मात्र छोट-छोट ३९ पृष्ठक नाटक (ओहुमे सँ आठ पृष्ठ विषय वस्तुसँ बाहरक) मैथिली साहित्यक लेल मरूभूमिमे नीरक सदृश बनल दृष्टिकोणकेँ परिलक्षित करैत अछि। एिह प्रकारक बिम्बक सृजन शेखर जी सन मांजल रचनाकारेसँ संभव भऽ सकैछ। निष्कर्षत: मिथिलाक संस्कृतिक मध्य कर्म प्रधान युगक आचमनिसँ नाटक ओत-प्रोत अछि। मात्र साहित्यक नहि, मंचनक लेल पूर्णत: उपयुक्त लागल। नाटक- भफाइत चाहक िजनगी रचनाकार- पं. सुधांशु शेखर चौधरी प्रथम संस्करण- नवम्वर १९७५ समीक्षा (अर्चिस) वर्तमान मैथिलीक कविताकेँ तरूण कवि आ कवयित्रीक पदार्पणसँ नव गति भेटि रहल अछि। एहि नवतुरिया मुदा विषए-वस्तुक दृष्टिकोणसँ सजल रचना सबहक रचनाकारक वर्गमे एकटा प्रवासी मैथिलीक कवयित्री छथि- श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरी। “अर्चिस” ज्योति जीक प्रथम संकलित कविता संग्रह थिक। एहि पोथीमे ३७ गोट कविता संग्रहित अछि। ज्योति जी कतेक दिनसँ रचना करैत छथि, ई तँ नहि बुझल अछि मुदा विदेहक पदार्पणक किछुए अंकसँ हिनक रचना प्रकाशित हुअए लगल। अर्चिसक अर्थ तत्सममे अग्नि आ तद्भवमे आग, अनल आदि मानल जाइत अछि मुदा मैथिलीमे आगि, अंगोर आ लुत्ती सेहो कहल जा सकैछ। एहि पोथीक शीर्षक मात्र कवयित्रीक भावनापर आधारित अछि, कविताक भावसँ एहि शीर्षकक कोनो संबंध नहि। पहिल कविता “हाइकू” प्रकृति वर्णन, श्रृंगार, विचार मूल आ विरहक मिश्रित चित्रांकन करैछ। हाइकू पहिने मैथिलीमे क्षणिका नाओसँ लिखल जाइत छल, मुदा ज्योति जी एकर वास्तविक रूपक चित्रण कएलनि अछि। सम्पूर्ण कवितामे अर्न्तद्वन्द्व आ प्रसन्नताक भीड़क मध्य व्यथा-टीशक अंतरंग हृदयक प्रवाहमयी प्रस्तुति..... मनोरम लागल। एकटा हेराएल सखीमे कवयित्री कविताक नायिकाकेँ अपन सखी मािन ओकरा सिनेहीसँ भेटल पीड़ाक उद्वोधन कऽ रहल छथि। नारी मोनमे अश्रुउच्छवासक संग-संग समर्पण सेहो रहैत अछि। ओना तँ आर्य ग्रन्थमे “त्रिया चरित्र: पुरूषस्य भाग्यम् देवो न जानाति कुतो मनुष्य:” लिखल गेल अछि, मुदा एकरा हम उचित नहि मानैत छी। आर्यावर्तक नारीक मोन विह्वलआ भावुक होइत अछि तेँ भावनात्मक छलक शिकार शीघ्र भऽ जएवाक संभावना देखल जा सकैछ। पुरूष प्रधान समाजमे दोस नारीपर देल जाइत अछि मुदा पुरूषक चरित्रहीनताक नाओ की देल जाए? जीवन भरि एक पुरूषक प्रति समर्पणकेँ केन्द्र विन्दु बना कऽ कवयित्री दुखित छथि अपन सखीक निश्छल समर्पणसँ। ई कविता सदेह ३ मे कल्पना शरणक रचनाक रूपमे प्रकाशित भेल अछि। नहि जानि बेरि-बेिर नाओ बदलि कऽ लिखवाक परम्परा कहिया धरि चलत। छद्म नाअोक निर्णक एकवेरिमे कऽ लेवाक चाही, नहि तँ रचनाकारक विलगित मानसिकताक बोध होइत अछि। वर्तमान महिला वर्गमे नौकरी करवाक इच्छा शक्ति प्रवल भऽ रहल अछि। स्वभाविके अछि जीवनक दोसर पहिया तँ नारी छथि। सृजन आ सृष्टिक रूपमे पहिल पहिया सेहो कहि सकैत छी। परंच युवा महिला वर्गक प्रवृति चंचल होइत अछि। एहि अल्हड़पनमे अपन कर्मगतिकेँ सेहो चंचल बनएवाक प्रयास कऽ रहल छथि कवयित्री अपन कविता “एकरा नौकरी चाही”मे। कार्यालयक सभटा काज हिनके मोनक होएवाक चाही। काज कम मुदा कैंचा वेसी चाहैत छथि। बॉसकेँ आन्हर आ वहिर होएवाक कामनामे हास्यक दर्शन होइत अछि। भऽ सकैत अछि हिनक एहेन दृष्टिकोण मात्र कवितेटा मे हुअए। “पनिभरनी” कविता पढ़ि हमर मॉथ सुन्न भऽ गेल, अकचका गेलहुँ। जाहि नारीक बाल काल जमशेदपुरमे बीतल हुअए, आब लंदनमे रहैत छथि हुनकासँ एहेन शब्दक आश कोना कएल जा सकैत अछि? गामोमे आब घैल आ इनारक रूप मृतपाय भऽ गेल अिछ। एकटा गरीव अवला पनिभरनीक प्रति आसक्तिसँ कविता ओत प्रोत अछि। विषय वस्तु आ दृष्टिकोण समंजन खूब नीक लागल। अपन जातिक प्रति सिनेहक मर्मस्पर्शी चित्रण भऽ सकैत अिछ जे एहि प्रकारक व्यस्थाक वर्णन अपन परिवारक बूढ़-पुरानसँ ज्योति जी सुनने हेती। दीपमे ज्योति पसरवाक शक्ति होइत अछि मुदा तरमे तँ अन्हार रहैछ। स्वाभाविक अछि जे जहानमे आनंद देवामे सक्षम होइछ ओकर अपन जीवन व्यथित भऽ जाइत अछि। एहि प्रकारक दर्शन भेल “शीतल बसात” कवितामे। वृक्ष दोसरकेँ शीतलता दैत अछि परंच ओकर पात भूखण्डपर खसिते अस्तित्व विहीन भऽ जाइत अछि। पतझड़िक बाद वसन्त, फेरि पतझड़ संगहि रौद क्षणहिमे छॉह ई तँ प्रकृतिक लीला अछि। मिथिलाक भूखण्डमे आमक गाछी बूढ़ पुरानक संग-संग बाल बोधक लेल गरमीक पिकनिक केन्द्र होइत अछि। भोज कोनो छप्पन प्रकारक भोज्य पदार्थक नहि, टिकुला आ झक्काक भोज। गरमी छुट्टीमे गामक प्रवासक ज्योति जीक अनुभव नीक बुझना जाइत अछि। “एकटा भीजल बगरा” कविता पढ़ि हिन्दी साहित्यक महान लेखिका महादेवी वर्मा जीक लिखल “गिल्लू” कथा मोन पड़ि गेल। ओहि कथामे वर्माजी एकटा लुक्खीक पीड़ाक वर्णन करैत ओकरा आत्मसात कऽ लैत छथि, तहिना ज्योति जी एकटा चिड़ैक प्रति सिनेहक जे भाव देखा रहल छथि ओ “सर्वे भवन्तु सुखित:” सिद्धान्तक द्योतक बुझना गेल। “हम एकटा मध्य वर्गक वालक” वाल साहित्यपर आधारित कविता अछि। वाल मनोविज्ञानक संग एकरा वाल गृहविज्ञान सेहो मानल जा सकैत अछि, मुदा एहि कवितामे प्रवाहक अभाव देखए मे आएल। शब्दकेँ तुकांत वनएवाक क्रममे मूल भावक प्रति अनाकर्षक देखए मे आबि रहल अछि। “टाइम मशीन” कवितामे आर्य भूमिक दृष्टिकोण आ पाश्चात्य देशक व्यवस्थासँ तुलना नीक लागल। विलासिताक प्रति हमरा सबहक समर्पण परतंत्रताक रूपमे परिणति भेल आ हम सभ सगरो क्षेत्रमे पंगु भऽ गेलहुँ। मिठगर रौद, पहिल फुहार आ वरसातक दृश्य कवितामे प्रकृति वर्णन सामान्य रूपसँ कएल गेल अछि। एहि प्रकारक कवितासँ हमर साहित्य ओत-प्रोत अछि। एहि प्रसंगमे किछु नव नहि देखए मे अाएल। जीवन सोपानमे जीवनक क्रमिक गतिक छंदसँ भरल प्रस्तुति सेहंतित अछि। “प्रतीक्षासँ परिणाम धरि” जीवन-दर्शनपर आधारित ज्योति जीक सोहनगरक कविता अछि। हमरा बुझने ई कविता एहि पोथीक सभसँ विलक्षण अध्याय थिक। श्रीमद्भगवतगीता आ शेष महाभारतक आधारपर कृष्ण चरितक वर्णनसँ कवयित्रीकेँ सिद्धहस्त मानल जा सकैछ। द्वापरसँ कलिमे प्रवेश निश्चित रूपेँ कवयित्रीक विस्तृत अध्ययन आ अनुशीलनक छाया देखा रहल अछि। “इन्टर नेट स्वयंवर” वियाहक नव रूपक चित्रण कऽ रहल अछि। वैदिक कालमे आठ प्रकारक पाणिग्रहण व्यवस्था छल। वर्तमान समएमे इंटरनेट चैटिंगसँ वियाह करवाक प्रणालीमे ठक व्यवस्था अछि तेँ कवयित्री जकरा विनु देखने प्रेम करवाक नाटक कएलनि ओ पुरूष नहि स्त्री अछि। क्षितिजक साक्षात दर्शनमे प्रवाहक पयोधि गतिशील अछि मुदा रचनामे तारतम्यक अभाव देखि रहल छी। हिम आवरित आ मेघाच्छादित सन शब्द तँ नियोजित अछि मुदा जखन हमरा सबहक भाषामे शब्द विन्यासक अभाव नहि तखन एहेन तद्भवक चयन करव नीक नहि लागि रहल अछि। जौं एहि कवितामे देसिल वयनाक मूल शब्दक प्रयोग करितथि तँ कविताक रूप वेसी नीक जएवाक भऽ संभावना छल। महावतक हाथी, विद्या धन, वर्फ ओढ़ने वातावरण आ गामक सूर्यास्त कविता तँ नीक अछि मुदा एकर विम्व कोनो नव नहि सभटा वएह पुरना कविक रचना सबहक रूप देखए मे आएल मुदा दृष्टिकोण हिनक अपन अछि, ककरो रचनाक नकल नहि कएने छथि। विशाल समुद्रमे जलोधिक छोट मुदा प्रासंगिक प्रस्तुित नीक लागल। आधुनिक जीवन दर्शन कविताक विम्व तँ नीक लागल मुदा विवेचन पक्ष दुर्वल भुझना गेल। मनुष्य आ ओकर भावनामे जीवनक वर्तमान रूपक अन्वेषण उद्धेश्यपूर्ण अछि। हम्मर गाम कवितामे गामक जिनगीक जीत दर्शनीय अछि। विकासमे मूल प्रकृतिक रूपकेँ वैज्ञानिक दृष्टिसँ परिवर्तनक प्रयाससँ निकलैत परिणामक वर्णन कएल गेल अछि। वालश्रम वर्तमान समाजमे कुष्टक रूप लऽ लेने अछि। साधनक अभावमे हम सभ नेनाक शैशव कालकेँ विसरि अवोधपर मानसिक आ शारीरिक अत्याचार करैत छी। मिथिलामे बाढ़िक परिणाम आ प्रलयक रूप मेघक उत्पात आ वरखा तूँ कहिया जेवैं कवितामे देखि रहल छी। “ईशक अराधना” शीर्षक कवितामे कर्म शक्तिक अवाहन कएल गेल अछि। एहि कविताक विम्व नीक, प्रवाह कलकल आ भाषा सरल अछि। एहि प्रकारक शब्द विन्यासक मैथिलीमे आवश्यकता अछि। “खरहाक भोज” शीर्षक कवितामे आन जीवसँ मनुष्यक तुलना नीक लागल। वौद्धिक रूपसँ विकसित मानवकेँ कर्म आ धैर्यपर विश्वास रखवाक चाही, आन जीवक जीवन-उद्धेश्य भोजन मात्र होइत अछि। कल्पना तखने साकार भऽ सकैत अछि जखन शिक्षाक विकास हएत, एहि प्रकार दृष्टिकोण कल्पना लोककेँ समृद्धि दऽ सकैत अछि। कोशीक प्रकोप कविताक विम्व वर्तमान कालक एकटा पैघ समस्याकेँ उद्घृत कऽ रहल अछि। “असल राज आ पतझड़क आगमन” कविताक विषय वस्तु सामान्य मुदा नीक लागल। वृद्धक अभिलाषामे प्राकृतिक संतुलनकेँ ध्यानमे राखि नव पिरहीक लेल सृजनशीलताक क्रममे वृक्षारोपनपर वल देल गेल अछि। “टेम्स धारमे नौका विहार” कवयित्रीक वास्तविक जीवन रेखाक विन्दु लंदनसँ अपन ठामक तुलनापर आधारित अछि। टेम्सक धारमे नौका विहार करऽ वालीकेँ अपन चनहा कोना मोन पड़ि गेलनि, निश्चय आन ठामक नीक व्यवस्था देखि हमरा सभकेँ अपन पिछड़ल दशापर मर्म होइत अछि। कतहु-कतहु किछु दुर्वल विन्दु रहलाक वादो एहि संग्रहकेँ खूब नीक मानल जा सकैत अछि। कवयित्री कखनो द्वापर युगमे चलि जाइत छथि तँ कखनो चैटिंग वियाहक अनुसंधानक आधुनिक युगमे। समग्र कविता संग्रहमे किछु स्थानकेँ छोड़ि विषय वस्तु चयन नीक लागल। वर्तमान युगक नवतुरिया पिरहीसँ एतेक आश नहि छल। निश्चय ज्योति जी धन्यवादक पात्र छथि। शेष...अशेष पोथीक नाम- अर्चिस रचयिता- श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरी दाम- १५० टका प्रकाशक- श्रुति प्रकाशन प्रकाशन वर्ष- २००९ यू.पी.एस.सी. लेल- चित्राक सनेस मिथिलाक भूमि पुरातन कालहिंसँ आर्यावर्तक संस्कृतिक आकर्षण केन्द्र रहल अछि। सभ दर्शनक संग-संग साहित्य सरिताक वैभव-विकासमे मिथिलाक योगदान अविस्मरणीय। एहि भूमिक जनभाषामे ज्योतिरीश्वरसँ लऽ कऽ अद्यतन काल धरि साहित्यकारक भरमारि लागल अछि। ओहि साहित्यकारक ढेरीमे एकटा एहेन साहित्यकार भेल छथि, जनिक नाम सुनिते हमरा सबहक वास्तविक रूप उपटि कऽ आिव जाइत अछि। ओ छथि- बैधनाथ मिश्र। तरौनी गामक लाल बैधनाथ मिश्र मैथिली साहित्यमे ‘यात्री’ नामसँ प्रसिद्ध भेलाह। बौद्ध दर्शनसँ प्रभावित रहवाक कारण हिन्दीमे ‘नागार्जुन’ नामसँ रचना करैत छलाह। प्रांरभिक रचना संस्कृतमे कएलनि, मुदा चौगमा गाम वासी आ मैथिलीक चर्चित महाकाव्य अम्बचरितक सृजनहार पं. सीता राम झाक प्रेरणासँ मैथिलीमे सेहो लिखए लगलाह। मैथिली साहित्यक हुनक प्रमुख कृति -पारो- मानल जाइत अछि, परंच एक छोट मुदा प्रासंगिक कविता संग्रह ‘िचत्रा’ हुनका कविक रूपेँ हमरा सबहक भाषाक ध्रुवतारा बना देलक। चित्राक रचना कोनो योजना बना कऽ नहि कएलन्हि। सन् १९३१सँ लए कऽ सन् १९४९ई. धरिक लिखल किछु कविताक संकलन एहि पोथीमे कएल गेल अछि। एक दिशि मातृभूमि प्रेम तँ दोसर दिशि मैथिलीक दशापर क्षोभ। जीवनक समग्र मूल्यक तात्विक विवेचन। अनियोजित रचना सबहक संकलन बड़ कष्टदायी होइत अछि, मुदा एहिमे भाव प्रवाहक अभाव नहि वुझना जाइत अछि। माॅ मिथिले शीर्षक कवितामे अपन ठाम, अपन गाम, अपन बुद्धि आ अपन दर्शनक सरल रूपमे प्रदर्शन कएल गेल। गौतम यज्ञवल्यकसँ लऽ कऽ रमेश्वर महाराजक महिमाक गुनगान। एहि गुनगानक मूल अछि- अपन संस्कृतिक विश्लेषण। भारती आ मंडन िमश्रक लेल कीर दंपतिक उदवोधनमे अपन पहिचान झलकैत अछि। उदयनाचार्य जग्रन्नाथपुरीमे सनातनक पुनरूद्वारक प्रमाणित भेलाह, ई मिथिलाक विजय थिक। विद्यापतिक कविता हमर धरोहरि अछि। अयाची मिश्रक सादा जीवन सेहंतित अछि, तँ शंकरक वालोहं जगदानंद.... वाल साहित्यक आ वाल कौशलक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण। एक दिशि ‘मॉ मिथिले’ कवितामे अपन माटिपर स्वाभिमानक दर्शन तँ दोसर दिशि ‘अंतिम प्रणाम’ कवितामे अपन जन्म-आ कर्मपर क्षोभ। अर्न्तद्वन्द्वक एहेना दशा वा वेदना कविमे िकएक उत्पन्न भेल? एहि कविताक माध्यमसँ कवि जागरण करवाक लेल पलाएन करए चाहैत छथि। अपन संस्कारमे निहित विषमतासँ अकच्छ कवि झाँपल व्यथाकेँ नि:शब्द उघारए चाहैत छथि। जेना अवोध अपन माएसँ घरसँ भागि जएवाक धमकी उपरे मोने दैत अछि, ओहिना कविक वेदनामे हृदएगत पलाएन नहि अछि। ‘कविक स्वप्न’ कवितामे कवि समाजक विगलित अर्थहीन व्यक्तिगणक कचोटक मार्मिक चित्रण कएलन्हि अछि मिथिलाक भूमिमे सम्यक अर्थनीतिक अभाव अछि तेँ समाजक परिदृश्यमे भारी अन्तर देखए मे अवैछ। एहि भूमिपर एकसँ वढ़ि कऽ एक महामानव भेलाह, परंच साधन आ शिक्षाक अभावमे कतेक प्रतिभा मोनइसँ बाहर नहि निकलि पबैत अछि- ‘तानसेन कतेक रविवर्मा कते घास छीलथि वाग्मतीक कछेड़मे कालिदास कतेक विद्यापति कते छथि हेड़ाएल महिम वारक हेड़मे’ जौं पेट-पांजड़ि अन्न जलक त्रासमे आकुल हो तँ शिक्षाक कल्पना निर्मूल प्रमाणित भऽ जाएत, परंच स्वपनोमे आशक दर्शन। कविकेँ समाजमे नव जोश उत्पन्न करवाक प्रेरणा भेटल तेँ प्रवासकेँ छोड़ि अपन मिथिला धुरि अएवाक निश्चय कएलन्हि। एहि कविताक रचना काशीमे कएलनि, मुदा मोन तरौनीमे घुिरया रहल छल। निश्चय जन्मभूमिक दशापर वेदनासँ कविक मोन तपि रहल होइतनि। ‘बूढ़ वर’ कविताक दर्शन कएलापर हास्यपर व्यथाक विजय दर्शित होइत अछि। शीर्षकसँ स्पस्ट होइत अछि जे विवाहमे कनिया-वरक वएसमे अन्तर अवश्य हएत। कविताक मूलमे जएवाक वाद तँ स्पष्ट भऽ गेल जे वरकेँ वरांठ वा खोरनांठ किछु कहल जाए अनसोहांत नहि लागत। जीवनक अंतिम अवस्थाक वर काँच-कुमारिक वरण कहलन्हि। विवाहिता नि:संतान रहि गेली। माएक विरोध नि:सफल भऽ गेल। स्त्रीगणक व्यथाकेँ के बूझत? वाप कैंचाक लोभमे बेटीकेँ बेचि लेलन्हि। मिथिलामे एहि प्रकारक पाप होइत रहल अछि। समाजक तथाकथित आगाँक पाँतिमे बैसल जातिक दीन आ कर्तव्यहीन जनमे ई व्यवस्था पलेगक रूप धारण कएने छल। अंतमे वेटी धरती माएसँ फटवाक लेल आग्रह करैत छथि। ‘विलाप’ कविताक विषएमे लिखब कठिन अछि जे एकरा वाल-वियाहक कुकृत्य वा विधवाक विलापमे सँ की मानल जाए? वाल कालक वियाह संस्कारमे आनंदक कोन रूप होइत अछि? दुरागमनमे कनिया सिखेलासँ कनैत छथि, मुदा नोरक अभिप्राय नहि बूझैत छथि। जखन नोरक अर्थ बुझवाक वएस भऽ गेलनि तँ वज्रपात? वैद्यव्य जीवनक मार्मिक छंद......। श्रंृगारसँ पहिने नीति आ वैराग्य, एहि जीवनक उदेश्यपर विचार करवाक आवश्यकता अछि। वैद्यव्य जीवन पतिक स्मृतिक संग जीबए चाहैत छथि। विहंुसलि नायिका, मुदा समाजक कुदृष्टिक डर। एहि कवितामे सेहो उच्च जातिक व्यवस्थापर कटाक्ष कएल गेल। विधवा वियाह मिथिला समाजक सवर्ण वर्गमे पूर्णत: वंचित छल, एखनो आंगुरेपर गनल-गुथल होइत अछि। जाहि वर्गक लोक शांतिसँ दु:खो नहि सहए दैवए चाहैत छथि, ओहिमे जन्मपर कोना गर्व करू? कविकेँ कतिपय व्यथा छन्हि एिह व्यवस्थासँ, खिन्न छथि उच्च जातिक अलच्द सदृश सोचसँ। पुरूषसूक्तमे कर्मक आधारपर जकरा चण्डाल आ छुद्र सन संज्ञा देल गेल, हुनक सोच एखन पारदर्शी अछि। ओहि वर्गक कांताकेँ ई अधिकार छन्हि जे कुकर्मी स्वामीसँ कखनो जान छोड़ा कऽ आन मनुक्खक वरण कऽ सकैत छथि मुदा आगाँक पाँतिमे बैसल प्रवुद्ध वर्गक विधवा अवला बनि उज्जर साड़ीमे दुवकलि छथि, मुदा तैयो वागमती कातक बगुला हुनक चरित्र हनन करवाक लेल सदिखन उद्धत छथि। एहि दशाकेँ देखि कोनो कविक ई उक्ति प्रासंगिक अछि- आगि भेल शीतल, पानि अदहन भऽ उधिएलै काँट बनल कोमल आ फूले गड़ि-गड़ि गेलै ककरासँ करतै तकरार हम जिनगी धिक-धिक जुआनी धिक्कार हमर जिनगी। कौशिकीक धार कवितामे कोशी माएक पसारल विनाश लीलासँ भेटल परिणामक पीड़ा मड़ोरि दैत अछि। मुदा ई थिक मिथिलाक शोक। ‘प्रेयसी’ कविता श्रृंगारसँ भरल अछि। प्रेमी द्वारा प्रेमिकाक प्रति समर्पित संवाोधन नीक लागल। एहि सिनेहमे प्रेमी प्रेमिकाकेँ अपन शक्ति मानैत छथि। सिनेहक मूल रूपक वर्णन, कतहु रूपक चर्च नहि। प्रेमी अपन प्रेमीकाकेँ तपवति छथि मुदा ओ अपन निर्णएसँ नहि विलग भेली। एहि समर्पणसँ प्रेमी िसनेहक जुआरि पानि फुटि गेल- अपन इच्छापर तोहर आशाक कैलियहु होम तों वनलि रहलि सदए सखि मोम ‘फेकनी’ कविताक नायिका फेकनी कंजूस महिला छथि। कैंचा वचा-वचा कऽ अपन संततिक लेल राखव छनि हुनक इच्छा। दूध बेचि कऽ टका जमा करैत छथि, ओहो दूधमे पानि मिला कऽ तेँ पानि जकाँ दिवस वितैत छन्हि। कोनो धर्म-कर्म नहि, कवि एहिसँ छुब्ध छथि। एहि प्रकारक घटना हमरा सबहक गाम-घर होइत अछि। पेट काटि कऽ जकरा लेल संयोजन करैत छथि, ओ ओहि धनकेँ की करताह? सहज अछि- पूत कपूत तँ किएक धन जोहव पूत सपूत तँ किए धन जोहव। ‘लखिमा’ कविता मिथिला नरेश राजा शिव सिंहक अर्द्धागिनी लखिमा रानीक प्रति समर्पित अछि। महाकवि विद्यापतिक श्रंृगार रसक सिद्धिमे लखिमा जीक व्यक्तित्व आ सुन्दरताक पैघ भूमिका छल। ओना विद्यापतिक चरित्रपर संदेह करव कविक ना दृष्टिकोण नहि अछि, मुदा हुनक श्रंृगारक नायिका लखिमा रानी छलीह। महाकविक रचनासँ स्पष्ट होइत अछि जे लखिमाक सौन्दर्य ततेक विलक्षण छल जे हुनक रचनाकेँ अमरत्व प्रदान कऽ देलक। विद्यापतिक नयनमे लखिमा अवश्य छलीह, परंच ओ कर्तव्यवंधसँ बान्हल छलाह। हुनक मनमे विरति छलन्हि। ‘उड़ान’ शीर्षक कविता कल्पनापर आधारित अछि। सहज अछि जे कल्पनाशील व्यक्तिकेँ कर्मसँ वेसी एहिपर विश्वास होइत छैक। वास्तविक जीवनमे कर्मक जतेक महत्व हो मुदा कल्पनाक उड़ान विलगित मानवकेँ आनंदक शिखरपर पहुँचा दैत अछि। कल्पना कहियो धोखा नहि दैत अछि, एहिमे ककरोसँ आश नहि होइत अछि। स्वप्नक भारकेँ केओ नहि डिगा सकैत छैक। ‘गामक चट्ठी’ कविता प्रवासमे रहनिहार एकटा गरीवक नाओ लिखल हुनक कनिया व्यथाक किछु पाँती थिक। गाममे अपन नेनाक संग रहैत दीनक दाराकेँ की-की सहए पड़ैत अछि, एकर मार्मिक वर्णन कएल गेल अछि। जौं हाथमे किछु कैंचा नहि हुअए तैयो गाम अएवाक निवेदन व्यथित कनियाँक हृदएगत कचोट बुझना गेल। चारू कातसँ समस्यासँ घेरल नारी अपन पतिसँ खाली हाथ गाम धुरि अएवाक लेल कहैत छथि। जीवन डोरिकेँ पकड़ि कऽ राखव कठिन भऽ गेलनि। सम्यक अर्थनीतिक उद्धोषण यात्री जीक एहि कवितामे देखएमे आएल। अपन सनेशकेँ कखनो उधारि, कखनो झाँपि यात्री जी असमान समाजक अस्तित्वकेँ ललकारि रहल छथि। दीनक नेना पितृक दर्शनक लेल आकुल छथि, ओ तँ नेना छथि मुदा माए किए बजावए चाहैत छथि अपन स्वामीकेँ। कविक एहि भावकेँ स्पष्ट करव आजुक लोकसँ संभव नहि बुझना जाइत अछि। ठीठर मामा कविता गाममे सभ दिन रहएबला ठीठर पाठकक पटना प्रवासक िस्थतिपर लिखल गेल अछि। भगजोगिनीक दर्शन करएबला लोककेँ हजार वोल्टक इजोतमे उजगुजाहटक अनुभव होइत एहि। एहि कविताक प्रसंग साधारण अछि आ भाषामे प्रवाहक अभाव बुझना गेल। ‘परमिटक साड़ी’ चारि अना वेहरी दऽ कऽ तीन टकामे परमिटसँ कनिया काकीक लेल आनल साड़ीपर आधारित अछि। गाम-घरमे बेहरी दऽ कऽ समान खरीदवाक परम्परा प्राचीन अछि। एहि कथाकेँ यात्री जी कोन उद्धेश्यसँ लिखलन्हि नहि स्पष्ट भेल। देश कालक दशापर सामान्य प्रस्तुति। कृतिका नक्षत्रमे, हिमगिरिक उत्संगमे, भए गेल प्रभात आ ताड़क गाछ शीर्षक कविता सभ प्रकृति वर्णनक छोट छाया प्रस्तुति करैत अछि। ई चारूटा कवितामे कविक उदेश्य हुनक शब्दसँ नहि प्रकट भऽ सकल। छंद समायोजन नीक लागल मुदा दोसर, कविता सभसँ तारतम्य नहि बुझना जाइत अछि। ‘द्वन्द्व’ कविताक शब्द-शब्दमे परिताप दर्शित भेल। किंकर्तव्य विमूढ़ छथि कवि, गाममे रहथि की प्रवासमे? गाममे विपन्नता, मुदा सिनेहक आवरण अछि। मोरंग वा आन ठामक प्रवासमे कैंचा-कौड़ी तँ अछि, मुदा परिवार समाजक िसनेह नहि। पावनि तिहारक जे आनंद गाममे भेटैत अछि, ओ शहरमे संभव नहि। एक ठाँ गामक जीवनसँ कविक मोन गुजगुजा गेलनि। गामक छोट लोक (साधन विहिन) पलाएन कऽ रहल अछि, तेँ सामाजिक व्यवस्थामे अन्तर आिव गेल। यात्री जीक अर्न्तमन समाजक बदलैत स्वरूपसँ संतुष्ट अछि, किएक तँ हुनक साम्यवादमे समाजवादक ज्योति प्रखर भेल अछि। ‘ऋृतु संधि’ शीर्षक प्रकृति वर्णनसँ जोड़ल अछि, मुदा एहिमे अर्थनीतिक मर्म झाँपल अछि। ग्रीष्मक तात्पर्य दीन मुदा उद्वेलित दीन, वर्षाक अर्थ नव जीवनक विश्वास। दीनमे साधनक अभाव परंच हुनक श्रद्धा उद्वेलित अछि। एहि कवितामे महाकवि पंतक छाया वादक झलकि देखएमे अबैत अछि। जौं यात्री जीक पद्य सागरक सुवासित सरिता चित्राकेँ मानल जाए तँ एहिमे सभसँ पैघ योगदान ‘वंदना’ कविताक देल जाएत। ‘वंदना’ कविताक शीर्षक मात्र माध्यम थिक हुनक जन जनक व्यथाकेँ नग्न करवाक लेल। मिथिलाक समग्र जीवन दर्शनकेँ एहि कवितामे कवि मंचस्थ कऽ देलनि। नेपथ्यमे िकछु नहि रहि गेल। अनुलोम-विलोम, आशक्त-घृणा सभटा उपटि कऽ बाहर कऽ देलनि। मिथिला वर्णनपर बहुत रास कविताक रचना भेल अछि। परंच वेसी किछु विशेष वर्गकेँ महिमामंडित कएलक। उपेक्षितकेँ सम्मान देवाक िहनक शैली आवएबला वास्तविक मैथिल संस्कृतिक रक्षकक लेल कोसक पाथर प्रमाणित हएत। मिथिलाक माटि-पानिमे रहनिहार, संस्कृतिकेँ आत्पसात केनिहार सभटा मैथिल छथि। मैथिलीमे एतेक सम्यक सोच रखएबला कतेक लोक छथि? मैथिली भाषीक चर्च होइते मैथिल ब्रह्मण आ मैथिल कर्ण कायस्थक नाओ उमरि जाइत अछि, मुदा अन्य वर्ग की मैथिल नहि? जौं दोसर भाषाक लोक उपर्युक्त दुनू जातिक लेल एहि भाषाक वाचकक प्रयोग करैत छथि, तँ दुनू किएक नहि िवरोध करैत छथि? ओना एहि वर्गक किछु लोक विस्तृत सोचक छथि, मुदा ओ सेहो एहि प्रश्नपर चुप भऽ जाइत छथिन्ह? यात्री जीक आत्मा निश्चित रूपसँ एहि कविता रचना करए काल काँपि गेल हेतनि। एहि सनेशकेँ जौं सभ गोटे आत्मसात कऽ ली तँ मैथिलीक परिदृश्य अवश्य बदलि जाएत। आर्य, द्रविड़, आंग्ल, इस्लाम आ पारसी सभ परिवारक सभटा भाषामे मात्र मैथिलीपर जातिवादी स्वरूपक कलंक लागल अछि। ‘चित्रा’ संग्रहक विशेष पक्ष अछि- एकर सम्पूर्णता। आंचलिक रचनाकेँ मैथिली साहित्यमे प्राथमिकता देल गेल अछि। एहि भ्रमकेँ यात्री जी ‘गाॅधी’ शीर्षक कविता लिखि कऽ तोड़ि देलनि। गाँधी मात्र एक व्यक्तिक नाअो नहि ‘भारतीय दर्शन’ थिक। एहि दर्शनमे कोनो विभेद नहि, सबहक लेल स्थान एहि दर्शनक मूल संस्कार थिक। विडंम्बना अछि जे समाजमे िदव्य ज्योति जगावएबलाक अंत निर्मम होइत छन्हि। इसा-मसीह आ सुकराते जकाँ गाँधी मर्म स्पर्शी रूपेँ विलोकित भेलाह। राजा भर्तृहरिक ‘वैराग्य शतक’ जकाँ यात्री जीक रचनामे क्षोभक अवलोकन कएल जा सकैत अछि। ‘आसिन मासक राति इजोरिया कहैमे तँ ज्योतिक प्रतीक थिक, मुदा बुढ़वा पीपरक ठुट्ठपर बैसल नील कंठक त्राससँ भरल जीवनमे एहि ज्योतिक कोन अर्थ? फागुनक इजोरिया टहाटही हो वा युग धर्म सभ ठाम विगलित असार जीवन रसकेँ छंदसँ यात्री जी पसारि देलनि। जेठक दुपहरियामे कालक प्रहारकेँ देखएबाक सार्थक प्रयास कएल गेल। देश दशाष्टक भ्रष्टाचारपर लिखल यात्री जीक अश्रुकण थिक। यात्री जीक यौवन परतंत्र भारतमे बीतल, मुदा स्वतंत्रताक दू बरख वाद एहि कविताक रचना कएलन्हि। जे आश अप्पन लोकसँ कहल गेल ओहि आशक पूर्णतामे संदेह देखएबाक यात्री जी प्रयास कएलनि। परम सत्यकेँ चित्राक सतोगुण कहल जा सकैत अछि। स्वामी विवेकानंदक शून्यवादी सोच सदृश यात्री जी जहानक अस्तित्वपर प्रश्न चिन्ह लगएवाक प्रयास कएलनि। प्रारंभमे वैराग्यक अनुभूति, मुदा शनै: शनै विश्वासक सोतीमे डुवकी लगावए लगलनि। यएह थिक गृहस्थ धर्म। मनुष्य विपत्तिमे संसारकेँ मायागृह बूझैत अछि, परंच मोहक तांडवसँ केओ नहि बचि सकैछ। अंतमे विश्वासक संग एहि कविताक दुरागमन कएल गेल। अंतिम पद्य एकटा पाछाँक पछातिमे विचरण करएवाली नारीक कर्मगाथा थिक- ‘गोट-विछनी’। नारी पुनरूत्थानपर भाषण खूव देल जाइत अछि मुदा अज्ञ, दीन, साधन विहीन, शोषित आ समाजक धारसँ बाढ़िक खाधि जकाँ कटलि नारीक व्यथा लग केओ नहि जा सकल। ‘चित्रा’ कविता संग्रह चित्रा नक्षत्रक तीत पानि जकाँ चिन्तन करवाक योग्य अछि। रचनाकारक जीवन चरित्र जौं सम्यक हो तँ रचनाक विषए-वस्तु समाजक लेल दर्शन भऽ जाइत अछि। समग्र जीवन संघर्षक पांजड़िमे वितएवाक कारण यात्री जी कर्म आ धर्मक हृदएमे घुसि गेल छथि। चित्रासँ स्पष्ट दर्शन भेल जे यात्री जी मानव धर्मी छथि। छनहिमे कचोट आ क्षणहिमे क्रान्तिक जुआरि, आवेग आ अतृप्तिक छोभ रहितहुँ विहानक विश्वास तृण-तृणकेँ िसहरा दैत अछि। एहि रचनाकेँ जौं आत्मसात कऽ लेल जाए तँ वैदेहीक मिथिलामे पुर्नस्तित्व सुधारससँ ओत प्रोत भऽ सकैत अछि। शेष- अशेष............ पोथीक नाओ- चित्रा रचनाकार- श्री यात्री प्रकाशक- अखिल भारतीय मैथिली साहित्य परिषद प्रयाग रचना वर्ष- १९४९ समीक्षा- मिथिलाक बेटी (नाटक) इसा संवत् सन २००८सँ लऽ कऽ वर्तमान कालकेँ अद्यतन मैथिली साहित्यिक आन्दोलनक क्रांति-काल कहल जा सकैत अछि। एहि अवधिमे रंग-विरंगक साहित्य सरितासँ सजल पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन प्रारंभ भेल अछि। जाहिमे प्रमुख अछि- विदेह ई पत्रिका, विदेह-सदेह, मिथिला दर्शन (पुनर्प्रकाशन), पुर्वोत्तर मैथिल, झारखंडक सनेस, नवारम्भ, मिथिला सृजन आदि-आदि। एहि पत्र-पत्रिकाक प्रयाससँ नव-नव साहित्यकारक प्रवेश मैथिली साहित्यमे भेल। जाहिमेसँ किछु साहित्यकार तँ अपन रचनासँ मिथिलाक मानस पटलपर एहेन स्थान बना लेलनि जाहिसँ हुनका जौं काल पुरूष माने मेन ऑफ टाइम कहल जाए तँ कोनो अतिशयोक्ति नहि हएत। एहि रचनाकारक भीड़मे एकटा साम्यवादी आ बहिर्मुखी प्रतिभासँ सम्पन्न रचनाकार छथि- श्री जगदीश प्रसाद मंडल। हिनक व्यक्तिगत जीवन कोनो रूपक हो मुदा साहित्यिक सृजनशीलतासँ हिनका बहिर्मुखी व्यक्तित्वक व्यक्ति कहल जा सकैत अछि। हिनक पहिल रचना ‘िवसॉंढ़’ आ ‘भैँटक लावा’ घर-बाहरमे आ दोसर रचना ‘चुनवाली’ मिथिला दर्शनमे प्रकाशित होइते मैथिली पत्रिकाक संपादक मंडलक संग-संग प्रबुद्ध पाठकक मध्य हड़होरि मचि गेल। ‘पहिने आउ आ पहिने पाउ’क आधारपर विदेहक संपादक श्री गजेन्द्र ठाकुर हिनक रचना सभकेँ अपन पत्रिकामे छपाबए लेल हथिया लेलन्हि। एहि प्रकारक शब्दक प्रयोग करवाक हमर तात्पर्य अछि जे जगदीश जी कोनो नव रचनाकार नहि छथि, तिरसठि बर्खक माजल साहित्यकार छथि, मुदा हिनक रचनाक प्रदर्शन नहि भेल छल। समग्र रचनासंसार हिनक पुत्र उमेश मंडल जीक कम्प्यूटरमे ओझराएल छल किएक तँ छपयवाक लेल कैंचा कतएसँ अएत? आदरणीय संपादक गजेन्द्र ठाकुरक विशेष अनुग्रह आ श्रुति प्रकाशनक अधिष्ठाता श्री नागेन्द्र कुमार झा आ श्रीमती नीतू कुमारी जीक कृपासँ हिनक एकसँ वढ़ि कऽ एक रचना हथिया नक्षत्रक गनगुआरि जकॉं पाठकक आगॉं आवि रहल अछि। एहि पुष्पांजलि महक एकटा फूल लऽ हम पाठकक सोझा राखि रहल छी- ‘मिथिलाक बेटी।’ मिथिलाक बेटी एकटा नाटकक नाम अछि। शीर्षकसँ स्पष्ट होइत अछि जे हमरा सभक समाजक वनिताक आस्तित्व आ अस्मितासँ एहि रचनाक संबंध अछि। मुदा....... पोथीक गर्भावलोकनक वाद हमर मोनसँ ई भ्रम भागि गेल। एहिमे समाजक विषमताक स्पष्ट दर्शनक अनुभूति भेल। जगदीश जी साम्यवादी विचार धाराक सम्पोषक छथि, तेँ समाजमे पसरल व्याधिपर श्रमक विजय, श्रमजीवीक विजय, दृष्टिकोणक विजय, इमानक विजय, सम्यक भौतिकताक विजय, वौद्धिक आ चेतनाक विजय देखयवाक प्रयास कएलनि। पॉंच अंकक एहि नाट्कमे नौ गोट पुरूष पात्र आ पॉंचटा नारी पात्र छथि। रचनाक केन्द्र विन्दु छथि पैंतालीस वर्खक विकट पुरूष पात्र- बावू कर्मनाथ- एकटा प्रशासनिक अधिकारी। विकट एहि दुआरे किएक तँ भ्रष्ट समाजक मध्य कर्तव्यपरायण इमानदार व्यक्ति आ बावू एहि दुअारे किएक तँ अधिकारी छथि। स्नातक उर्तीर्ण कएलाक वाद हिनक पिता सोमनाथ हिनक विवाह एकटा भौतिकवादी परिवारमे पक्का कए लेलनि। द्रव्य, धन धान्य आ बीस विघा जमीनक जुआरिमे। मुदा ओ कर्मनाथ जीक मौन समर्थनक आशमे बैसल छलाह। एहि मध्य जेठ मासक गरमीमे एकटा कायाहीन आ निर्धन व्यक्ति हिनक दलानपर अएलनि। व्यथित आ थाकल अपन कन्याक हेतु वर तकवाक क्रममे सोमनाथक दलानपर अचेत भऽ गेलाह। सोमनाथसँ हुनक व्यथा नहि देखल गेल। ओहि गरीबक कन्यासँ वियाह करवाक लेल आतुर भऽ गेलाह। कालान्तरमे ई वियाह सम्पन्न तँ भऽ गेल मुदा, परिवारमे सामंजस्य नहि रहि सकल। पिता सोमनाथ आ दू भाँइ क्रमश: नूनू आ लालबावू हिनक निर्णएसँ दुखी भऽ गेलनि, किएक तँ कुवेरक भंडारक आशपर कर्मनाथ जी नोन छीटि देलनि। प्रतिभाशाली छात्र कर्मनाथ प्रशासनिक अधिकारी बनि गेलाह परंच हिनक इमान भौतिकतापर भारी पड़ि गेल जाहिसँ नव-नव समस्या उत्पन्न भऽ गेल। पत्नी चमेली, पुत्र फुलेसर आ पुत्री द्वय चम्पा आ जूही- ई अछि हिनक परिवार। भावक सर आ विश्वासक शतदलक संग जीवन क्रम चलैत रहल। िपता सोमनाथ अदूर्दर्शी व्यक्ति छलाह, जाहिसँ अन्य दुनू पुत्र अवण्ड भऽ गेलनि। कर्महीन नूनू आ लालबावू जथा बेचि-बेचि कए कर्मनाथक बरावरि करवाक प्रयास कऽ रहल छलथि। पितासँ महिमा मंडित होएवाक कारणें दुनूक जीवन नारकीय भऽ गेल। परिवारक दशा ओ दिशाकेँ देखि कऽ कर्मनाथक माए आशाक आश टूटि रहल छल। कर्मनाथ जीक पितृ परिवारमे मात्र हिनक माएक व्यक्तित्व सोझराएल छल। किएक नहि रहत, सभ माएक इच्छा होइत अछि हुनक पुत्रक नाओसँ समाज गौरवान्वित होअए। जगदीश जी एहि नाट्य कथाक नायकक स्पष्ट उद्घोषण नहि कएलनि मुदा, हमर मतसँ एहि नाटकक नायक छथि विकास, एकटा सेवा निवृत्त शिक्षक। आदर्श आ सहज विचार धाराक व्यक्ति श्री विकास अपन समाजक चितंक छथि। मिथिलाक गाम एखनो विकासक धारामे पाछॉं पड़ल अछि। शिक्षाक अभाव, सामाजिक समरसताक अभाव आ साधनक अभावक कारण विकास सन प्रबुद्ध व्यक्तिक ग्राम्य समाजमे आवश्यकता अछि। गामक प्राय: नव आ अधवयस पीढ़ी हुनक छात्र रहलनि अत: हुनक सलाहकेँ मानैत छथि। श्रीचन किसान हाटपर प्रचार करवाक लेल आएल शंकर बीज कंपनीक प्रलोभनमे आवि टमाटरक विदेशी बीआ खरीद लैत छथि। टमाटर उपजाक कोन कथा जे लत्तिओ गलि गेल। श्रीचन संताप आ क्रोधक मारे आकुल छलाह। विकास जी हुनका सान्त्वना दैत कहलनि जे प्रचारक चकाचौंधमे नहि अएवाक चाही अपन स्वदेशी वस्तु ओहि विदेशी समानसँ सोहनगर अछि। विकास जीक प्रयासँ कर्मनाथक पुत्री चम्पाक वियाह रामविलास मिस्त्रीक पुत्र मदनसँ तँए कएल गेल। एहि वियाहकेँ केन्द्र विन्दु मानि एहि पोथीक रचना कएल गेल अछि। आव प्रश्न उठैत अछि जे एहि पोथीमे नव की भेटल? मिथिलाक बेटी नाट्क ‘कर्म प्रधान विश्व करि राखा’ सिद्धान्तक आधारपर लिखल गेल अछि। एकटा कर्मठ आ इमानदार व्यक्तिकेँ समाजमे की-की सहय पड़ैत अछि, ओहि परिपेक्ष्यक मार्मिक चित्रण कएल गेल अछि। कथाक मूलमे कर्मनाथक वियाह क्रममे आएल एकटा गरीब (चमेलीक पिता) व्यक्तिक मनोदशाक प्रस्तुति नीक अछि। ओ व्यक्ति गरीब छथि मुदा ‘चार्वाक दर्शन’क पालक। ‘पेटमे खढ़ नहि सिंहमे तेल’ जेवीमे कैंचा नहि मुदा नौ हन्नाक बटुआ जाहिमे भोगक वस्तु छलिया सुपारी पान आ तमाकू। हमरा सबहक गाममे एहिना होइत अछि, भोजन नहि मुदा, पान अवश्य। पग-पग पोखरि माछ मखान... मधुर बोल मुस्की मुख पान... नेना पढ़लक, नहि पता, कनियाकेँ पथ्य भेटल नहि जनै छी, बेटीक लेल दूध अछि... नहि। मुदा! पान अतिआवश्यक, हाथी मरि गेल, छान आ पग्घा लऽ कऽ बौआ रहल छी। कर्मनाथक अपन पत्नी चमेलीक संग वार्तालापमे ‘खट्टर ककाक तरंग’क दर्शन होइत अछि। गाममे प्रचलित लोकोक्तिक हास्य मुदा, सत्य प्रस्तुति। कर्मनाथ जीक पुत्रक नाम फुलेसर प्रशासनिक अधिकारी भऽ कऽ एहेन नाम.....। एहिसँ हुनक गामक प्रति सिनेहक झॉंकी भेटैत अछि। गाममे एहने नाम सभ होइत अछि। अपन दुनू पुत्री आ पुत्रकेँ छायावादी रूपमे जीवनक शिक्षा दैत छथि..... कर्मनाथ। एना करव आवश्यक किए तँ एहिसँ जिज्ञासा बढ़ैत अछि। राम विलास सेवा निवृत मिस्त्री छथि। वाल्यकाल साधनक अभावमे, युवावस्था संघर्षमे विता कऽ भौतिक साधन प्राप्त कएलनि। जीवनक अंतिम पड़ावमे माधुरीसँ माने अपन पत्नीसँ अपन जीवन-यात्राक व्याख्यान करैत छथि, आश्चर्यमे पड़ि गेलहुँ। जिनका संग चालीस बर्खक यात्रा कएलनि ओ हिनक जीवन दर्शन नहि जनैत छलीह। हमरा सबहक समाजमे एहि प्रकारक घटना होइते अछि। गरीव नेनपनक वाद सोझे प्रोढ़ भऽ जाइत छथि। जे कर्मवादी छथि हुनक अंतिम अवस्था सुखमय नहि तँ......। अपन कर्मक नावकेँ कलकत्तामे मजवुत कऽ सोझे गाम आवि जाइत छथि। मातृभूमिक प्रति सिनेह, गामेमे गैरेज खोलवाक योजना अछि। चौघारा घर बनाएव, दलान अवश्य रहत, किएक तँ दलान समाजक मर्यादा थिक गामक जीवन शहरसँ सुखमयी अछि। एहि पोथीमे पलायनवादक विरोध कएल गेल अछि। कर्मनाथक चरित्र पंडित गोविन्द झा लिखित ‘वसात’ नाटकक नायक कृष्णकान्तसँ मिलैत अछि। राम विलास जीवन संघर्षमे विजयी भेलाह तेँ पुत्रक वियाह आदर्श करताह। विकास जीक चरित्र नाटकक लेखक जगदीश बावूसँ मिलैत अछि। साम्यवादी, ग्रामीण सभ्यताक दिग्दर्शक। एहि पोथीमे जातिवादी व्यवस्थाक विरोध कएल गेल अछि। आन गामक स्वजातीयकेँ भोजमे निमंत्रण देवासँ अनिवार्य अछि अपन गामक सभ जातिकेँ आमंत्रित करब। िकएक तँ वेर-कुवेरमे पॉजरि लागल लोक काज दैत छथि, चाहे ओ कोनो जातिक हो। एहि पोथीमे जीवनक सभ रूपक व्यापक दर्शन कएल गेल अछि। कुलीन व्यक्ति जनिक परिवार नीचॉं मुँहे जा रहल अछि ओहि परिवारक कन्याक वियाह उर्ध्वमुखी साधारण परिवारक पुत्र (जे आव सम्पन्न छथि) हुनकासँ भऽ सकैत अछि। एहि पोथीमे अन्हारपर इजोतक विजय देखाओल गेल अछि। भौतिकतापर बौद्धिकता आ सम्यक जीवनक जीत एहि पोथीक केन्द्र विन्दुमे समेटल अछि पुत्रक वियाहमे तिलक लेवासँ वेसी अछि कुलीन कन्याक चयन। सम्पूर्ण पोथीमे देशज शब्दक प्रयोग कएल गेल अछि। पोथीक अंतिम पृष्ठपर श्री गजेन्द्र ठाकुरक कथन मैथिली साहित्यक इतिहास (जगदीश प्रसाद मंडलसँ पूर्व आ जगदीश प्रसाद मंडलसँ) पढ़लहुँ पहिने तँ अनसोहॉंत लागल मुदा पोथीक अध्ययन कएलाक पश्चात् हमरा सहज लागल। भाषा अत्यन्त सामान्य मुदा रस, अलंकार आ छंदसँ परिपूर्ण अछि। कलात्मक शैलीमे जगदीश जी अंक-अंकमे अपन दर्शनकेँ सहेजि लेने छथि। हिनक ई रचना कोनो विशेष कथाकार वा नाटक कारसँ प्रभावित नहि। हिनक रचनामे राजकमल जी, पंडित गोविन्द झा, हरिमोहन बावू, धूमकेतु, गुलेरी जी, लक्ष्मीनारायण मिश्र, ललन ठाकुर सन रचनाकारक शैलीक मिश्रित दर्शन होइत अछि। मिथिलाक बेटी अर्थनीतिसँ प्रभावित अछि मुदा, सम्यक अर्थनीतिसँ। अर्थपर मानवताक विजय, जगदीश जीक विश्वास नीक लागल। जेना कोनो व्यक्ति पूर्ण नहि भऽ सकैत अछि तहिना कोनो रचनाक संग होइत अछि। ‘मिथिलाक बेटी’पोथीमे किछु त्रुटिक दर्शन सेहो भेल। प्रथमत: एहि पोथीक शीर्षक अप्रासंगिक लागल। बेटी तँ एहि दर्शनक माध्यम मात्र अछि, स्त्रोत नहि। एहिमे मानवीयताक जीत देखाओल गेल अछि बेटीक जीवन तँ घटना मात्र थिक। एहि नाटकक भाषा सरल मुदा, शनै: शनै: गमनीय अछि तेँ मंचन करवाक योग्य नहि, मुदा एकर कलात्मक मंचन कएल जा कएल जा सकैत अछि। निष्कर्षत: जगदीश प्रसाद मंडल जी हमरा सबहक बीच एकटा नव जीवनक आयाम लऽ कए आएल छथि। बहुरंगी जीवनक आयाम आ सकारात्मक सोचक आयाम। मानवीय मूल्य एखनो धरि जीवित अछि। एहि तरहक घटना कठिन अछि मुदा असंभव नहि। विश्वास आ कर्मक संग जीवन जीवाक प्रयत्न करवाक चाही। एहि पोथीक शब्द-शब्दमे झंकार अछि। भाषा प्रवाहमयी लागल। प्रकाशन दलक प्रयास नीक, शब्द संयोजन आ संपादन अति उत्तम। धन्यवाद। पोथीक नाम- मिथिलाक बेटी रचनाकार- जगदीश प्रसाद मंडल प्रकाशक- श्रुति प्रकाशन राजेन्द्र नगर दिल्ली। मूल्य- १६० टाका मात्र। प्रकाशन वर्ष- सन् २००९ पोथी पाप्तिक स्थान- पल्लवी डिस्ट्रीब्यूटर्स, वार्ड न.६, निर्मली, सुपौल, मोवाइल न. ९५७२४५०४०५ समीक्षा- विभारानीक नाटक बलचन्दा श्रीमती विभा रानी मैथिली साहित्यक चर्चित लेखिका छथि। श्रुति प्रकाशनसँ प्रकाशित हुनक नाटक द्वय भाग रौ आ बलचन्दा पढ़लहुँ। भाग रौ बड़ नीक लागल, परंच बलचन्दा पढ़िते हृदयमे नव वेदना पसरि गेल आ समीक्षा लिखवाक दु:साहस कऽ देलहुँ। वास्तवमे वलचन्दा नाट्क नहि, छोट पोथीमे मात्र 20 पृष्ठक एकांकी थिक। सभसँ पैघ गप्प जे विभा जी वर्तमान सामाजिक जीवनक सभसँ पैघ समस्याकेँ अपन लेखनीक विषय बनौलन्हि। कन्या भ्रुण हत्या बर्तमान समाजमे विकट रूप लऽ रहल अछि। प्राय: नाटकमे पुरूष प्रधान पात्रकेँ नायक कहल जाइत अछि परंच एहि ठॉ रोहितक भूमिका खलनायकक अछि। विजातीय समाजक एक शिक्षितसँ क्षणक आवेगमे प्रेम कएलनि। विवाह सेहो भऽ गेल। मुदा ओहि स्त्रीकेँ की भेटल? अभियन्ताक शिक्षा ग्रहण कएलाक पश्चात् गृहिणी वनि कऽ रहि गेली। पुरूष प्रधान समाज तैयो पाछॉं नहि छोड़लक। प्रथम संतान बालक होएवाक चाही। आश्चर्यक गप्प ई जे एहि प्रकारक आदेश सासु द्वारा देल गेल। एक नारी द्वारा दोसर नारीसँ आबएबला नारीक नाश करबाक कुटिल आज्ञा एहि एकांकीक मूल विषए-वस्तु अछि। खलनायक चुप्प छथि, किएक तँ ओ मातृभक्त। तखन दोसर माएकेँ संतति हंता किए बनाबए चाहैत छथि। जीवन भरि संग देवाक शपथकेँ की भेल? जखन निर्वाह करबाक सामर्थ्य नहि छल तँ आन जातिक कन्याकेँ संगिनी किए बनौलन्हि। रोहितक प्रेम-सिनेह नहि वरन् वासना मात्र छल। स्त्रीकेँ भोग्या बना कऽ राखब ओहि परिवारक मूल संकल्प। ओहि लोकनिकेँ सोचवाक चाही जे आव ओ दिन बीति गेल, नारी लक्ष्मी तँ चंडी सेहो छथि। रोहितक स्त्री गर्भपातक प्रवल विरोध कएलनि। प्रतिज्ञा कए लेली जे अबैबला तनयाक पतिपाल स्वयं करब। एहि एकांकीक भाषा सरल आ सुन्दर अछि। विषए-वस्तुक सम्पादन सुन्दर आ आकर्षक। मैथिल संस्कृतिक व्यापक प्रदर्शन। जय-जय भैरविसँ प्रारंभ आ समदाओनसँ इति श्री। नारी व्यथाक मर्मस्पर्शी चित्रणक संग जाति व्यवस्थापर मैथिली साहित्यक लेल ई नाट्क नहि एकटा आन्दोलन कहल जा सकैत अछि। संस्कृतिक रक्षाक लेल आ सामाजिक संतुलन हेतु साहित्यिक आन्दोलन विभा जीकेँ नमन........ धन्यवाद। पोथिक नाम- भाग रौ आ बलचन्दा लेखिका- विभा रानी दाम- १००रू. प्रकाशक- श्रुति प्रकाशन, दिल्ली पोथी प्राप्तिक स्थान: Pallavi Distributors मोवाइल- ९५७२४५०४०५Ward no- 6, Nirmali (Supaul) किस्त-किस्त जीवन-शेफालिका वर्मा-(समीक्षा) साहित्य समाजक दर्पण होइत अछि आ साहित्यकार ओहि दर्पणक शिल्पी। शिल्प जतेक विलक्षण हएत छाया ततेक साफ। कोनो साहित्यक अध्ययनसँ रचनाकारक मनोवृत्ति स्पष्ट होइत अछि। मैथिली साहित्यक संग ई विडंवना रहल जे एहिमे वाल साहित्य, अर्थनीति आ आत्मकथाक विरल लेखन भेल। मात्र किछु साहित्यकार एहि विधामे अपन लेखनीक प्रयोग कएलनि। ओहि विरल साहित्यकारक गुच्छमे एकटा नाम अछि- डॉ. शेफालिका वर्मा। शेफालिका जीक रचना सभमे पारदर्शिता रहल ओ जे हृदएसँ सोचैत छथि ओकरा अपन कृति उतारि दैत छथि। हुनक रचनामे अर्न्तमनक ध्वनि स्पष्ट सुनल जा सकैत अछि। कतहु अर्न्तद्वन्द्व नहि, कतहु पूर्वाग्रह नहि। हुनक किछु कृति- विप्रलब्धा, अर्थयुग स्मृति रेखा, यायावरी आ भावांजलि पढ़लाक वाद हुनक जीवनक वास्तविक रूपक दर्शन कएल जा सकैत अछि। अपन रचना सभकेँ एकसूत्रमे सहेजि कऽ अपन आत्मकथा लिखलन्हि “किस्त-किस्त जीवन” अप्रत्याशित मुदा, प्रासंगिक नाम। जीवनक कतेक रूप होइत अछि, बाल, वयस्क, प्रौढ़.... सुख-दुख, काम निष्काम यएह थिक एहि रचनाक सार। अपन करूणामयी जीवनक बून-बूनकेँ ऑंजुरमे एकत्रित कऽ आत्मकथा लिखलन्हि। आमुखसँ स्पष्ट होइत अछि जे ओ नित डायरी लिखैत छथि तेँ अपन किस्त-किस्तक अनुभवकेँ वटोरि लेलनि। वाल-कालक गणित विषयक समस्या हो वा संगीत शिक्षक पंडित वाजपेयी जीक व्यवहारक मूक विश्लेषण सभ विन्दुपर पोथिक फुजल पन्ना जकॉं स्पष्ट प्रस्तुति। युवती वएसमे प्रवेश करैत काल कोनो अनचिनहार युवकक नजरि देखि कऽ अपन ब्रह्मास्त्रक (थूक फेकवाक) प्रयोग करैत छलीह। ओना एहि अस्त्रक शिकार विवाहसँ पूर्व ललन बावू सेहो भेल छलाह, जिनका संग ओ दाम्पत्य सूत्रमे बान्हल गेलीह। नव प्रकारक रक्षा सूत्रक विषए मे पढ़ि अकचका गेलहुँ, नीक नहि लागल मुदा, एहिसँ रचनाक प्रासंगिकतापर प्रश्नचिन्ह नहि लगाओल जा सकैत अछि। प्रवेशिका उत्तीर्ण कएलाक पश्चात शेफालिका जी पढ़ए नहि चाहैत छलीह। ललन बावूक विशेष प्रेरणासँ जहिना- तहिना स्नातक धरि शिक्षा ग्रहण कएलनि। तत्पश्चात् घर-गृहस्थी आ साहित्य साधनामे लीन भऽ गेली। साहित्यमे विशेष योगदानक लेल दरभंगामे डॉ. दिनराजी शाण्डिल्य द्वारा “विद्या वारिधी” सम्मानसँ सम्मानित कएल गेली। एहि सम्मानकेँ पावि भाव-विभोर भऽ मिथिला मिहिरकेँ अपन मनोदशा पठौलन्हि। मिथिला मिहिर द्वारा हुनक हस्त-लिपिकेँ यथावत् प्रकाशित कए देल गेल। मिथिला मिहिरक “होली विशेषांक”मे हिनक रचनाक रचनाकारक नाम देल गेल “दिन राजी डॉ शेफालिका वर्मा।” एहि मजाकसँ शेफालिका जी कॉपि गेली आ 18 वर्खक मौनव्रतकेँ तोड़ि पुन: शिक्षा ग्रहण करवाक लेल आतुर भऽ गेली। परिणाम सोझाँ अछि- एम.ए., पी.एच.डी प्राध्यापक डॉ. शेफालिका वर्मा। अपन सम्पूर्ण जीवनमे प्रेमकेँ जीवाक आधार मानि जीवि रहल छथि- रजनी जी। आरसी बावूक शेफालिका- कोना रजनीसँ शेफाली वनि गेली एहि रचनामे झॉंपल अछि। प्रेमक सभ रूपकेँ अर्न्तमनसँ स्वीकार करव हिनक जीवन दर्शन अछि। राजनीतिसँ दूर रहलीह, जखन की किछु प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ हिनका लग नतमस्तक रहैत छलाह। डार्विनवार “उपार्जित लक्षणक वंशावलि”क आधारपर एना संभव भेल। पिता स्व. मल्लिक साहित्कार आ सरल व्यक्तित्व छलाह। हिनक पति ललन बावू साहित्यकार तँ नहि छलाह परंच शेफालिका जीक साहित्यक सभसँ पैघ पाठक। अपन पति द्वारा निरंतर पग-पगपर संग देवाक कारण हिनका जीवनसँ कोनो शिकाइत नहि अछि। “जीवनक डोरि फूजि उड़ल व्योममे कातर प्राण मुदा जीवै छी।” आव प्रश्न उठैत अछि जे हुनक आत्मकथासँ समाजकेँ की भेटत वा की भेटल? कोनो व्यक्ति ओ महान हो वा नहि हो ओकर जीवनसँ शिक्षा लेल जा सकैत अछि। शेफालिका जी तँ मर्मज्ञ छथि जीवनक मर्मज्ञ, साहित्यक मर्मज्ञ आ सिनेहक मर्मज्ञ। पुरूष प्रधान समाजमे नारीक एहेन दृढ़ता देखि वर्तमान कालक बालाकेँ अवश्य नव दिशा भेटत। हुनक जीवन दर्शनकेँ कण-कणमे समा लेलहुँ, भाषा मनोरम आ प्रवाहमयी अछि। एतेक अविराम कृति रहलाक पश्चात् एहिमे किछु त्रुटिक दर्शन सेहो भेल। शेफालिका जी अपन जीवनक कचोटकेँ नुका लेली। ओ फूजल मानसिक प्रवृतिक महिला छथि, चरित्र उत्तम मुदा, पारदर्शी। सहज अछि जे एहिसँ हुनका किछु सामाजिक उपहासक अनुभव अवश्य भेल हेतनि। साहित्यकारक रूपमे उपेक्षाक शिकार अवश्य भेल हेती तकर मौन व्याख्या तँ कएल जा सकैत छल मुदा, नहि कएल गेल। भऽ सकैत अछि ओ मैथिल समाजक मध्य कोनो अनुत्तरित प्रश्न नहि उठवए चाहैत छथि। सम्पूर्ण सार अछि जे रचना सारगर्भित ओ सोहनगर लागल। शेष.....अशेष.......। पोथीक नाम- किस्त-किस्त जीबन रचनाकार- डॉ. शेफालिका वर्मा प्रकाशक- शेखर प्रकाशन, इन्द्रपुरी पटना-14 मूल्य- 300टाका मात्र प्रकाशन वर्ष- 2008 कुल पृष्ठ- 320 शमीक्षक- शिव कुमार झा “टिल्लू” जमशेदपुर मैथिली उपन्यास साहित्यक विकासमे हरिमोहन झाक योगदान मैथिली उपन्यास साहित्यक इतिहास बेसी प्रचीन नै अछि। ऐ भाषाक पहिलुक मान्य उपन्यासकार जनसीदन छथि। ओना तँ हरिमोहन झा बिम्व ओ शिल्पाच्छादित आवरणसँ युक्त कथाकारक रूपेँ चर्चित छथि, किएक तँ चर्चरी सन हास्य ओ मर्मक समागम हिनक अन्य विधाक कृतिमे नै भेटैछ, परंच साहित्यक जगतमे हिनक पदार्पण पाठकगणकेँ जइ कृतिसँ झंकृत केलक ओ थिक सन् 1933 ई.मे हिनक लिखल उपन्यास कन्यादान ओ सन 1945 ई.मे हिनक दोसर उपन्यास- द्विरागमन। जखन उपन्यास विधामे हरिमोहनक पदार्पण भेलनि तँ ई विधा काँच छल। अखन धरि जनसीदनक िनर्दयी सासु, शशिकला, कलियुगी सन्यसी, पुनर्विवाह, द्विरागमन रहस्य जीवछ मिश्रक रामेश्वर, पुण्यानंद झाक मिथिला दर्पण आ डाॅ. काँची नाथ झा किरणक चन्द्रग्रहण सन किछु जनप्रिय आ साहित्योपयोगी उपन्यास सभ पाठक लग पसरल गेल छल। मुदा कोनो उपन्यासमे ओ शक्ति वा आकर्षण नै छल जेकरा मैथिली पाठक पूर्णत: आत्मसात करथि। किएक तँ पोथी कीनि कऽ पढ़बाक दृष्टिसँ जौं मूल्यांकन कएल जाए तँ मैथिलीकेँ आन भाषाक पाठकसँ बेसी उदासीन मानल जाए। जइ भाषा साहित्यक प्रति पाठकमे ओ भक्ति-समागम नै ओइ भाषामे हरिमोहन सन उपन्यासकारक पदार्पण अवश्य क्रांतिकारी मानल जाए किएक तँ हिनक रचना शैलीमे ओ आकर्षण तँ अवश्य अछि जेकरा कारणें उदासीन पाठक वर्ग सेहो पोथ्ज्ञी कीनि कऽ पढ़बाक लेल वाध्य भऽ जाइत छथि। कथा बिम्वक आधारपर जौं िनर्णए लेल जाए तँ कन्यादान कोनो विशेष कथाक वाचक नै। मिथिला समाजक एकटा विकट मुदा सभसँ महत्वपूर्ण संस्कार विअाहकेँ केन्द्र बिन्दु बना कऽ लिखल गेल ऐ उपन्यासमे कथानक बड़ कमजोर अछि। बेटी जन्म लैत देरी मायकेँ ओकर विआहक चिन्ता भऽ जाइत छन्हि। तँए संभवत: वर भेटल नै मुदा कनियाँ माइक ओरिआओनसँ उपन्यासक आदि भेल। बारह अध्यायमे विभक्त ऐ उपन्यासकेँ कनियाँ माइक ओरिआओन, सभागाछीक दृश्य, तार केना पढ़ल गेल, जहाज परक गप्प-सप्प, गोसाँओनिक गीत, मिस्टर सी.सी. मिश्रा जटिल समस्या, गुप्प परामर्श, कौतुक, कन्यादान, चतुर्थीक राति आदि शीर्षकमे बॉटल गेल अछि। अंतिम शीर्षक प्रश्नवाचक किएक तँ दर्शनशास्त्रक ज्ञाता हरिमोहन झा धरि एकटा प्रश्न छोड़ि उपन्यासक इति श्री कएलनि। लालकका आ लालकाकीक कन्या बुचिया उपन्यासक नायिका छथि जनिक बिआह चण्डीचरण मिश्रा सन मात्र कहबाक लेल मैथिलसँ होइत अछि। सी.सी. मिश्रा अपन संस्कृतिसँ विलग वहसल एडभान्स लोक छथि। जिनका अपन अर्द्धांगिनीसँ बहुत रास आश छन्हि। बुचियाक जेठ भाय रेवती रमण ई जनैत छलाह, मुदा अपन बहिनक भविष्य उज्जलव करबाक लेल मिथ्याक डोरिमे लटकि सी.सी. मिश्रासँ अपन बहिनक पाणिग्रहण तँ करबा लेलनि, मुदा चतुर्थीक रातिमे नव विवाहित दंपति बिनु आत्मिक वरण केने विलग भऽ जाइत छथि। सी. सी. मिज्ञा जे अपनाकेँ कखनो कान्ट तँ कखनो कालिदास सन वद्वत मानैत छथि सत्य जानि लेलाक बाद बुचियाकेँ छोड़ि भागि गेलाह। कोबरघरमे रहि गेलीह कनैत बुचिया ओइ पत्रक संग जे सी. सी. मिश्रा रेवती रमणक नाओंसँ लिखि छोड़ि गेलनि। पत्रमे अशिक्षित कन्याक संग शिक्षित पुरुषक विष्ज्ञमताकेँ लिपित कएल गेल अछि। ऐ तरहेँ अंत करबाक लेल हरिमोहन जीक बड़ आलोचना भेलनि तँए समाधान करैत द्विरागमन लिखबाक लेल उपन्यासकार विवश भऽ गेलखिन। हरिमोहनजी मिथिलाक सामाजिक अवस्थापर प्रहार करैत बुचिया सन अशिक्षित नारीमे चेतना अनबाक प्रयास तँ करैत छथि, मुदा ई बिसरि गेलखिन जे सी. सी. मिश्रा सन पात्र आ ओकर संवादक जे रूप ऐ उपन्यसमे प्रस्तुत कएल गेल ओ “मैथिली”पर आधार मानल जाए। ओहेन पात्रकेँ नायक बनेबाक कोनो प्रयोजन नै जेकरा मैथिली संस्कृतिसँ लेस मात्र सिनेह वा ऐठामक बेवस्थाक कोनो ज्ञान नै हुअए। हिनक “ग्रेजुएट पुतोहु” कथाक नायािका सेहो विदुषी आ एडभान्स महिला छथि परन्च हुनक संवाद सभठाम खँटी मैथिलीमे छन्हि। सी.सी. मिश्रा अंग्रेजी आ हिन्दी मात्र बजैत छथि। मैथिली उपन्यासमे आन भाषक एतेक बेसी प्रयोगसँ एकर अपन संस्कार केना बाँचत....? हरिमोहनक सभसँ पैघ कमी ऐ उपन्यासक महतपर अवश्य ग्रहण लगा देलक। किछु मैथिली साहित्यकारक ई प्रवृत्ति रहल छन्हि जे जौं हिन्दीक प्रयोग कएल जाए तँ रचना आर सारगर्भित मानल जाएत आ लोक योग्य बुझताह। हरिमोहन विषय मर्ममे झाँपल यथार्थक हृदैस्पर्शी साहित्यकार छथि तँए हिनकासँ पाठक ई अपेक्षा तँ कथमपि नै रखलक। हास्य समागमसँ युक्त कन्यादानक संवाद उच्च कोटिक अछि। सी. सी. मित्रा हिन्दू विश्वविद्यालयक साहित्यक शोधार्थी तँ छथि मुदा कन्यादानमे हुनक स्थान एकटा पाश्चात्य संस्कृतिकेँ जानय बला जोकरसँ बेसी नै। बुचिया तँ बुचिये छथि। मि. मिश्र जखन जिज्ञाशा केलनि जे क्या तुम नर्सिग जानती हो...? बुचिया मनमे सोचलीह नरसिंह तँ गामक कोतबालक नाम छैक, देखू तँ भला हमरा कोतबाल लगा कऽ गारि पढ़ैत अछि....। ऐ अज्ञ अवलाकेँ रेवती रमण सन भाय केना सी. सी. मिश्रा सन “पाश्चात्य-जोकर”क हाथमे सौंपि देबाक िनर्णए केलक। ऐ लेल रेवती रमण जीकेँ अपन अर्द्धांगिनी बड़गामवाली सन नारी द्वारा मि. मिश्राक संग छल करबए पड़ैत छन्हि। ऐ तथ्यमे सत्यता झलकैत अछि। हमरा सबहक समाजमे बड़का गामवाली सन नारीकेँ कतेक बालाक पैतराखनि बनए पड़ैत छन्हि। एक अर्थमे ई उपन्यासक सबल स्थिति सेहो मानल जाए जे सन् 1933 ई.मे जखन पुरुष वर्गक अधिकांश लोक हमरा सबहक समाजमे अशिक्षित छलथि ओइ कालक नारीमे शिक्षा-विकासक एहेन कल्पना हरिमोहनसँ पूर्व मैथिलीमे निश्चित नै भेल। हिनक कथा वा उपन्यास किछु हुअए एकटा बड़ सकारात्मक तथ्य भेटैछ जे हिनक कृतिक महिला पात्र सदिखन गतिशील रहैत छथि, बैसि कऽ सोचैत नरीक चर्च बड़ कम ठाम देखएमे आएल। कन्यादानमे सेहो लालकाकी झट दऽ आवेश रानीक पैरक कनगुरिया आंगुरकेँ दाबि देलखिन, मुनियाँ माय चमकि कऽ घैल उठेलक आ लालकाकी द्वपसि कऽ मोटरी खोलय लगलीह सन क्रियाशील महिला समाजक दर्शन हरिमोहन झाक मैथिल संस्कृतिक आत्म आवलोकनक संग-संग नारी चेतनाक दर्पण मानल जाए। ठुनमुनकाकी आ लालकाकी दुनू दिआदिनी खूब लड़ैत छथि। भोलानाथ झाक पत्नी ठुनमुनकाकी गर्भवती छथिन। लड़बाक क्रममे गर्भ लगा कऽ शप्पत सेहो खाइत छथिन, मुदा बुचियाक बिआहक लेल ओरिआओनमे हुनक सहभागिता कने कनियाँ मायसँ कम नै। एकटा “संयुक्त परिवारक” महत्वपूर्ण सक्ल पक्ष मानल जाए। लालकाकीक पुतोहु बड़कागामवाली शिक्षित नारी छथि सदिखन किताबे संग लटपटाएल रहैवाली बड़कागाम वाली कनियाँ बिआहक लेल चंगेरा नै साँठतीह। आ ने चूल्हिये लग बैसतीह, मुदा जखन महीन काज अर्थात् सी. सी. मिश्राकेँ बिआहक पूर्व कनियाँसँ गप्प करेबाक लेल नाटक करबाक आवश्यकता भेल तँ रेवती रमण हिनकेसँ कनियाँक अभिनय करेलनि। ठकबा जे ऐ उपन्यासक अदना पात्र अछि ओकर माथक मोटरीमे भोलानाथ झाक पनही सेहो बान्हल छन्हि। ई समाजक कटु सत्रू केकरो पएरक पनही केकरो माथपर ई समन्वयवाद समाजक लेल कलंक किए नै मानल जसए। तखन जौं वएह ठकबाक पुत्र जखन अधिकारी बनि भोलानाथ झाक संतानक संग बदला लैत अछि तँ अग्र आसनपर बैसल लोक अकुला जाइत छथि। ओना एहेन बदलल परिस्थिति तँ हरिमोहनक उपन्यासमे कथपति नै भेटत किएक तँ हरिमोहन झाक कृति ब्राह्मवादी समाजक वृत्तिचित्र छन्हि। ऐमे समाजक कात लागल वर्गमे मुनियाँ माय सन पैनभरनी आ ठकवा सन खबास मात्र अछि तँए हिनक उपन्यास सम्पूर्ण समाजक प्रतिनिधि कृति कथमपि नै भऽ सकल। उपन्यासकार दलित वा परदलितक मर्मक स्पर्श तँ नै केलनि मुदा ब्राह्मणेमे ऊँच-नीच आ उत्तर-दक्षिणसँ क्षुब्ध अवश्य छथि। हरिमोहन जीक मातृक अवश्य भलमानुषक गाममे छन्हि मुदा पैतृक भूमि कुमर बाजितपुर वैशली भदेसमे, तँए भदेसक मर्मसँ आकुल तँ अवश्य छथि। सभागाछीक दृश्मे टुन्नी झा कनेक खखसि कऽ बजलाह- “मानि लियऽ वरक घऽर दक्षिणे भर छन्हि तऽ हर्ज की...? सेहो बेसी दूर नहि- दलसिंह सराय सँ चौदह कोसपर घऽर छन्हि।” मूलक चर्च भेलापर बिआहक अगुआ अर्थात सभागाछीक दलाल कहैत छथि जे मानि लिअ शुरगने छथि..., ऐ सभ कटु सत्यसँ प्रमाणित होइत अछि जे जखन ब्राह्मण-ब्रह्मणक मध्य मौलिक विषमता तँ मिथिलामे समन्वयवाद केना आबय...? गंभीर चिन्तनयोग्य विषयकेँ हरिमोहन जी हास्यक माध्यमसँ चर्च कऽ उपन्यासकेँ लोकप्रिय तँ अवश्य बना देलनि मुदा गंभीर चिन्तनकेँ हास्यक बोरिसँ लिप्त कएलासँ एकर उद्देश्य अवश्य लुप्त भऽ गेल। एकरा सुयोग्य उपन्यासकारक अदूरदर्शिता मानल जाए। किछु समालोचकक तर्क भऽ सकैत छन्हि जे हरिमोहन जीक ऐ कृतिक उद्देश्य समाजक विकृतिकेँ नागट करबासँ बेसी “हास्य समागम” करबाक लेल छलनि, मुदा ऐ तर्कसँ हम सहमति नै रखैत छी। कोनो हास्य जे समाजिक आ पारिवारिक समता आ शांतिकेँ बाधित करए ओ समाजक लेल कखनो स्वीकारर्य नै भऽ सकैत अछि। कालीदासचरित्रसँ प्रभावित सी. सी. मिश्रा बुच्चीदायकेँ “विधोत्तमा” बना कऽ स्वीकार करताह, ई परिस्थिति उपन्यासक कमजोर पक्ष थिक। कहबी छैक- “बड़ो से ने कीजिए ब्याह-प्रति और वैर” ऐ विस्मयकारी उपन्यासमे विषम परिस्थिति जौं मात्र हास्य समागमक लेल अाएल तैयाे उचित नै। एक उपन्यासमे समस्या आ दोसरमे जा कऽ ओकर निदान ई रचनाकारक कलात्मक कृति कखनो नै मानल जा सकैछ। मात्र हँसबाक लेल झारखण्डीनाथ, बटुक आ तोतराह पंडित नमोनाथ झा सन पात्रक उपस्थिति तँ प्रासंगिक मुदा हँसीक पात्र बना कऽ बुचियाकेँ कोवरमे कनैत छोड़ि उपन्यासक अंत देखाएब नारी जातिक अपमानसँ बेसी किछु नै। ऐ सभ कमजोर तथ्यसँ भरल रहलाक बादो “कन्यादान” मैथिली साहित्यमे महत्वपूर्ण स्थान रखैत अछि किएक तँ पाठकगण ऐ कृतिकेँ हिआसँ स्वीकार कऽ नेने छन्हि। कन्यादानक लोकप्रियताक मौलिक कारण थिक ग्राम्य जीवनक आधारभुत घटनाक चित्रणमे सहज मौलिकताक अनुपालन। हास्य समागम तँ स्वाभाविक किएक तँ ई रचनाकारक प्रकृति ओ प्रवृित रहल छन्हि। हास्यक क्रममे गंभीर दर्शन तँ हँसीमे उधिया गेल मुदा कोनो ठाम साहित्यिक मर्यादा ओ अनुगासनपर ग्रहार नै देखए मे आएल। ई उपन्यासकारक प्रांजल आ प्रवीण रचनाशीलताक द्योतक मानल जाए। जखन वर अर्थात् सी. सी. मिश्रा महिला मंडलीक मध्य बिआहसँ पूर्व परीक्षण हेतु अबैत छथि तँ अपन नाओं सी. सी. मिश्रा कहैत छथिन। क्षणेमे महिला मंडलीक एकटा बालिका सदस्याक चुटकी... तखन तँ बापक नाओं बोतल मिश्रा हेतन्हि। अतिवादी प्रवृतिक लोक पर हास्यक माध्यमसँ अनुशासित प्रहार गामक रीति-रिवाजक अतिक्रमणक प्रयासपर सहज रूपसँ कएल गेल। कनियाँ माइक ओरिआओन अध्ययाय पूर्णत: सहज मैथिल नारी समूहक झलकि देखबैत अछि। ऐठाम ई पूर्णत: मौलिक आ वास्तविक लगैछ। संवादक भाषा आ शैलीसँ स्पष्ट भऽ जाइछ जे हरिमोहनजी अपन संस्कृति आ रीति-रिवाजकेँ आत्मसात केने छथि। पृथ्वीपुत्र अतिक्रमण सबल व्यक्ति वा समूहक अमानुषिक प्रवृति रहल अछि। वैज्ञानिक मान्यताक अनुसारे सेहो अस्तित्वक लेल संघर्ष आ ओइ संघर्षमे योग्यतमक उत्तरजीविता कालक्रममे होइ रहल अछि। जखन सम्पूर्ण सृष्टिमे बौद्धिक चेतनासँ युक्त मानव अस्तित्वक लेल बेवस्थाक विरूद्ध संघर्ष केवल तखन मिथिलाक माटि-पानि कोना अछोप रहए। समाजक ऊँच-नीच आ जय-पराजयक वृत्ति-चित्रक रूपेँ ललितेश मिश्र ललित जीक उपन्यास पृथ्वी-पुत्र पुस्तकाकार सन् 1965 ई.मे प्रकाशित भेल। जेना की आमुखमे स्वयं उपन्यासकार लिखने छथि जे ई उपन्यास हंसराज जीक तगेदामे लिखल गेल, तँए ऐमे रचनाकारक सम्पूर्ण आत्मीयता देखब भ्रामक सिद्ध हएत। हमरा सबहक संग ई दुर्भाग्य रहल जे आत्मिक भाषामे रचनाकार अपन आशुत्वसँ बेशी तगेदाक कारणेँ रचना करैत रहलाहेँ। रचनाक कारण जे हुअनि मुदा एतबा तँ अवश्य प्रासांगिक आ मैथिली साहित्यक लेल वरदान मानल जाए जे पृथ्वीपुत्र उपन्यासक माध्यमसँ उपन्यसकार मिथिलाक माटि-पानिमे समाहित सभसँ अंतिम वर्गक समाज धरि पहुँचि गेल छथि जे सोझ मानसिक प्रवृत्तिक द्योतक अछि। ओना ललितक कथा “रमजानी” सेहो समाजक दलित वा पछड़ल लोकक वृत्तिचित्र थिक। स्वाभाविके छैक रचनाकार प्रशासनिक सेवामे रहल छथि,, समाजक ऊँच-नीच कृत्य-कुकृत्य आ वर्गक विषमताक दर्शन बरोबरि होइत हेतनि तँए अपन दैनन्दिनीक अनुभवकेँ कल्पनाक सरोवरिमे बोरि यथार्थवादी रूप देबाक प्रयास कएलनि जइमे अंशत: सफल सेहो भेलाह। उपन्यासक गाथा व्यावसायिक चलचित्र जकाँ मध्यसँ प्रारंभ होइत अछि। घटनाक गर्त्तमे गेलासँ ई उपन्यास दलित समाजमे सामन्तवादी शोषणक विरूद्ध वर्ग संघर्षक चलचित्र थिक। जंगी पासवानक पुत्र विसेखी पासवान कर्मसँ वैड-कैरेक्टरक चोर अछि। जकरा अपन दुनू पुत्र गेनालाल आ सरूपसँ बेशी अपन शिष्य छतरपर विश्वास छैक। गेनालाल जेकरा गेनमा कहल जाइछ ओकर चरित्र भकलोल-मनुख मुदा कर्मशील मजूरक छैक। सरूप ऐ उपन्यासक नायक थिक। जकरा कतौ उपन्यासकार दलित समाजक क्रांति-वीर वनएबाक प्रयास करैत छथि तँ कतौ अपन बहिन बिजलीक कल्पनाथ मिश्र उर्फ कलपू मिश्रक संग अनैतिक सिनेहक प्रोत्साहक वा साक्षी। सरूपक चित्रक ई अर्न्तद्वन्द्व दलित समाजक जीवन शैलीमे विराधाभास मानल जाए। गेना लालक अर्द्धागिनी बेनी अपन पतिक मृत्युक पश्चात् पारिवारिक सहमति आ उत्तरदायित्वक कारणे अपन देओर सरूपसँ बिआह कऽ लैत अछि। उपन्यास गाथाक विचित्र पात्र छथि बिजुली वा बिजो बिजुरी आ बिजुरिया सन छद्म नामसँ विभूषित बिसेखी पासवानक कन्या “बिजली”। कौमार्यक आंगनमे प्रवेश करिते बिजलीकेँ गामक पंडित कुलमे जनमल कल्पनाथ मिश्रसँ प्रेम भऽ जाइत अछि। कलपू मिसर विवाहित छथि मुदा पहिल प्रसव पीड़ाक क्रममे हिनक कनियाँक देहान्त भऽ गेलनि। ऐ अनर्गल आ िनष्कर्ष रहित प्रेमक आभास दलित समाजकेँ लागि जाइत अछि। फलत: रेलवेमे पेटमेन हीरालालसँ बिजलीक बिआह कऽ देल गेल। रीति-प्रीति आरंभे कालसँ साहित्यक महत्वपूर्ण बिन्दु रहल छैक। ओइ मार्गदर्शनपर आगाँ बढ़ैत ललित जी उपन्यासमे आकर्षणक सोमरस घोरबाक प्रयास करैत ऐ विचित्र पात्राकेँ ऐमे समाहित कएलनि। दू-तीन बेरि पेटमेन हीरा लालक सानिध्यसँ बिजली पड़ा कऽ गाम आबि गेलीह। मान-मनोबलक बाद फेर पतिक क्वाटरमे गयलाक बाद कोयला सन धुरधुर घऽर आ बऽर नीक नै लगलनि। हीरा लालकेँ बिजलीक चरित्रक वास्तविकताक भान भऽ जाइत अछि। पुरुष सभ किछु बर्दास्त कऽ सकैत अछि मुदा अपन दाराकेँ दोसर पुरुषक सन आत्मिक वा दैहिक वरण पुरुषक लेल घोंटव असंभव। बिजलीक प्रति हीरा लालक व्यवहार कर्कश भऽ जाइत अछि। अंतिम परिणति भेल जे बिजली सभ दिनक लेल नैहर आबि गेली। हीरा लाल पुनि आएल मुदा ओकरा चरित्रपर खलनायिका बिजली लांछना लगेबाक लेल सरुपकेँ उत्साहित केलक। गामक मानिजन अर्थात् जतिया राजा काी दासक अंतिम िनर्णय भेल जे बिजली आब हीरा लाल संगे नै जेतीह। ओना समाजक सभ पंच एकमत छलाह जे बिजलीक पुर्नविवाह कराओल जाए, मुदा जखन रचनाकार मात्र उपन्यासक आकर्षक लेल ऐ चरित्रक िनर्माण कएने छथि तँ क्रांतिक आश असंभव। कल्पनाथ मिश्र आ बिजलीक सिनेह पत्रहीन नग्न गाछ जकाँ मानल जाए जकर अस्तित्व नै। एक दिस जखन सरूप पुछैत अछि बिजलीसँ- “पाहुन मोन पड़लौ की....?” तँ बिजलीक उत्तर दार्शनिक जकाँ भेटल तँ दोसर दिस बिजली कलपू मिसर द्वारा दोहरि मोड़ि कऽ देबए काल बलजोरी शब्द सुनि बजैत अछि- तोरा संग कुश्तम पटकममे डाँड़ तँ नै हएत हमरा....। ई सिनेह कोन तरहक मानल जाए ई िनर्णए करब सर्वथा असंभव। उपन्यासगाथामे कथाक्रमानुसारे विकराल वर्ग संघर्ष देखार होइत अछि। सर्वे एलाक बाद गरीबक जमीन कागतपर तँ आपिस होइत अछि मुदा जंग बहादुर सिंह सन जमीन्दार दुसाध आ मुसहर समाजकेँ जमीन देबाक लेल तैयार नै अछि। वर्ग संघर्ष करबाक लेल सरूप उद्यत भेल। सरूपक दलमे जजाति कटबाक लेल गेनालाल सन माटिक पूत मात्र छल। जंग बहादुरक हँसेरीदल लोहा सिंहक नेतृत्वमे सरूपपर हमला कऽ देलक। अनुजकेँ वचेबाक क्रममे गेनमा मारल गेल। ऐ वर्ग संघर्षक अंत औचित्वहीन लगैत अछि। सन् 1965 ई.मे भारत आजाद भऽ गेल छल। तखन दलित समाजक एकटा माटिक लाल सामन्तवादी तत्वक आगाँ लुप्त भऽ गेल आ जंगबहादुर सन सामन्तीक ओइठाम पुलिस पहुँचल नै हएत...। ई अत्यन्त हास्यास्पद लगैत अछि। जौं ऐ तरहक घटना भेलो हएत तैयो उपन्यासकारकेँ ऐमे क्रांति अनबाक प्रयास करबाक छलनि। साम्यवादी लेखनीसँ िनकसल उपन्यासक अंश अत्यन्त िनर्बल मानल जाए। ऐ घटनासँ पूर्व बिजलीक चरित्रपर आधात दुर्योधन सिंह सन सिपाही करैत अछि। ओकरा सरूप काटि दैत अछि। पुत्रकेँ जेहलसँ बचएबाक लेल बिसेखी सभ दोख अपना ऊपर लऽ जहल चलि जाइत अछि जइठाम संग्रहणी सन बेमारीसँ ओकर मृत्यु भऽ गेल। बिसेखीक चरित्रक काल-क्रमानुसार परिवर्त्तन उपन्यासक सबल पक्ष मानल जाए। पहिने जखन चोर छल तँ ओकरा किछु नै भेल आ जखन किछु नै केलक तँ पुत्रमोह आ पारिवारिक मर्यादाक कारणेँ सजा भेटल। बी.सी. कैरेक्टरक चोरसँ मुक्ति पाबए लेल कलक्टरक आगाँ सप्पत खेने छल। ओइ सप्पत खेबामे घुरन दुसाध, मंडर पाण्डे, खख्खन जट्ट, रौदी खलीफा आ बुच्ची झा सन चोर सेहो छल। उपन्यासकार द्वारा चोरक नाम चयन करबामे ई स्पष्ट भऽ गेल चोरक कोनो जाति नै होइत छैक, समाजक अग्र आसन बैसैबला लोककेँ सेहो कुकर्मी समाजमे स्थान छन्हि। ई उपन्यासकारक समन्वयवादी सोच मानल जाए। आब बिसेखीक परिवारमे पुरुष पात्रक रूपमे बचैत अछि- सरूप। सरूपकेँ ललित पृथ्वीपुत्र बनेबाक कोनो अबसरि नै छोड़ैत छथि। ऐ उपन्यासक ओ वास्तविक नायक अछि। अपन पिताकेँ चोरि नै करबाक सप्पत खाइत काल लड़खड़ाइत देखि ओ क्रोधित भऽ जाइत अछि। ओकरा चोरि करब कथमपि पसिन्न नै। जंगबहादुरकेँ ललकारि जजाति काटि लेबाक उपक्रममे शोषित समाजक ओ “क्रांतिवीर” बनि जेबाक लेल उद्यत अछि। बहिनक आँचरपर दुर्योधन सिंह सन सिपाहीक हाथ देखि ओकर हत्या कऽ केलक। सरूप कर्मवादी सत्पुरुष अछि। जाधरि बेनीकेँ सरूपक माय एकर अंक नै लगलन्हि ताधरि ओइ भाउजमे सरूप मात्र श्रद्धापूर्वक मातृत्व रूप देखलक। ऐ दलित समाजक आदरणीय पात्रकेँ ललित एकठाम कलंकी चरित्र बना देलनि। कल्पनाथ मिसरक अनर्गल सिनेहसँ बँधलि बिजलीकेँ सरूप आत्मसात केना केलक। एकठाम भाउजिक विषक्त हँसी आ व्यंग्यवाणसँ आकुल भऽ सरूप बिजलीपर क्रोध तँ करैत अछि मुदा सम्पूर्ण उपन्यासमे कलपू मिसरक प्रसंगमे पृथ्वीपुत्र चुप्प रहि गेल। सिनेह कोनो अपराध नै, कियो केकरोसँ कऽ सकैत अछि, मुदा ऐ सिनेहक कोनो निष्कर्ष नै। सरूप सन सोझ मानसिकताक पुरुष ऐ अनर्गल सिनेहकेँ केना समर्थन देलक। बिजली ठाम-ठाम औचित्यहीन सिनेही जकाँ बेनीसँ अपन प्रेमकेँ सबलता प्रदान करबाक लेल निरर्थक संवाद करैत अछि। ऐसँ इहए प्रमाणित होइछ जे ऐ नारीकेँ अपन माता-पिता आ भाइक मर्यादाक कोनो बोध नै। तखन एकठाम महान दार्शनिक जकाँ बिजलीकेँ दृष्टि पटलपर राखब उपन्यासकारक अदूरदर्शिता छन्हि। जखन कलपू मिसर अपन माइक राखल अभरन बिजलीकेँ पहिरबाक अनुरोध करैत अछि तँ ओ बजैत अछि जे- “ओ गहना पहिरब तँ हम जरि जाएब। जखन बिजली एतेक बुद्धिमती महिला अछि तँ अपन मान-मर्यादा अपन बाप-पुरूखाक द्वारा बनाओल बेवस्था अर्थात् पाणिग्रहण संस्कार द्वारा वरणेय हीरालालकेँ किअए छोड़ि देलक। ई निश्चित रूपे जातीय संकीर्णतासँ बान्हल उपन्यासकारक व्यक्तिगत अनर्गल सोच छन्हि।” जौं ऐ उपन्यासमे वर्ग-संघर्ष देखाएब यथार्थबोध मानल जाए तैयो ऐमे कमजोरी अछि। वर्ग संघर्षमे हत्या आ ओइ हत्याक बाद केनिहारकेँ कोनो सजा नै, अत्यन्त िनर्बल पक्ष थिक। कलपू मिसर आ बिजलीक िसनेहमे बिसेखीक परिवारक कोनो तीक्ष्ण अवरोध नै देखाएब दलित समाजक चेतनापर आधात मानल जाए। समाजक कात लागल वर्ग सवर्ण आ सामन्तवादी लग अपन घरक गणिकाकेँ परसि सकैत अछि... सर्वथा असंभव। दलित समाजक नारीसँ सवर्ण समाजक पुरुष बेबाक गप्प तखने कऽ सकैत छथि जखन हुनक विचार आ चरित्र विश्वसनीय हुअए। भऽ सकैत अछि बिजली सन कोनो विशेष नारी एहेन मानसिकता रखैत छथि वा होथि मुदा परिवारक आन लोक ऐ तरहक िसनेहकेँ कथमपि नै स्वीकार करत। जौं एकर अंत दुनूक बिआह देखा कऽ कएल जइतए तँ ई उपन्यास अवश्य दूरगामी होइतए। अंर्तद्वन्द्वसँ भरल समाजसँ ललित कोनो अलग नै छथि तँए सभ सकारात्मकताक आश राखब उचित नै। एतेक तँ निश्चित जे पृथ्वीपुत्र शिल्पमे बड़ नीक स्थान रखैत अछि। विम्ब कोनो विशेष नै मुदा समाजक अंतिम वर्ग धरि पहुँचल तँए व्यापक मानल जाए। जितपुर मौजाक टोल बबुरबन्नाक गाथा, मुदा टोलमे खएरक बोन बबूरसँ बेसी मुदा नाओं बबुरबन्ना। वास्तविकता अछि सामर्थ्यवान लोक कम रहितौ पूजनीय होइत छथि, उपन्यासकारक दृष्टिकोण सम्यक् आ समन्वयवादी ऐठाम तँ अवश्य लगैत अछि। भाषा ओ शैली गतिमान आ खाँटी ग्रामीण आंचलिक मैथिलीमे लिखल गेल जे ललितक योग्यताक प्रत्यक्ष प्रमाण थिक। आाचार्य रमानाथ झाक ऐ मतसँ हम सहमति नै रखैत छी जे हास्य रसक अभावमे पृथ्वीपुत्र झुझुआन लगैत अछि। जखन स्थिति कनबाक हुअए तँ हास्य समागम संमव नै ऐ उपन्यासमे हास्य रसक समागम करब िनरर्थक होइतए। ऐ पोथीक सभसँ सकारात्मक पक्ष थिक समाजक यथार्थवादी बेवस्थाक मौलिक चित्रण। जाति-पातिमे टुटल समाजक सत्यकेँ स्पष्ट देखबैत उपन्यासकार एकठाम एहेन साहस कऽ देलनि जे संभवत: सबल समाजमे जनमल दोसर साहित्यकारसँ अवश्य असंभव होइतए। पृथ्वीपुत्र पलायनवादक विरोध करैत अछि। जमीन्दार कृषिकार्य स्वयं नै करताह, मुदा जमीनक सकल उत्पाद आ स्वामित्व हिनके भेटनि, ऐ कटु सत्यसँ ललित विलग छथि। हिनक लेखनीसँ क्रांतिक सुगंध पसरल जे जमीन ओकरे हएत जे एकरा जोतए। वास्तविकता सेहो छैक साम्यवादी बेवस्थामे कर्म पुरुषकेँ कर्मक फल अवश्य भेटबाक चाही। जे संतान माए-बापक प्रति अपन कर्त्तव्य पालन नै करए ओकरा मातृ-पितृ सिनेह मंगबाक कोनो अधिकार नै। अपन पसेनासँ माटि कोरि जे मजूर धरतीकेँ बाँझ होएबासँ बचाबथि हुनके ऐ माटिक स्वामित्व भेटबाक चाही। जौं ऐ प्रकारक सोचकेँ सबलता प्रदान कएल जाए तँ कृषि प्रधान देशमे अपन मौलिक कर्मसँ लोक विमुख भऽ पड़ाइन नै करताह। प्राकृतिक संतुलनकेँ जीवन्त राखब सभक मौलिक कर्त्तव्य थिक। ऐ तरहक साम्यवादी दृष्टिकोण मैथिली साहित्यकेँ अवश्य नव दिशा देलक। िनष्कर्षत: पृथ्वीपुत्र किछु अर्न्तद्वन्द्वसँ भरल रहलाक बादो मैथिली साहित्यमे नव चेतना भरबाक लेल अनुगामी उपन्यास मानल जाए। मैथिली कथा साहित्यक विकासमे राजकमलक योगदान सन् 1954 मे “अपराजिता” कथाक संग राजकमल जीक मैथिली कथा साहित्य जगतमे प्रवेश भेल। हिनक मूल नाओं मनीन्द्र नारायण चौधरी छन्हि। 1929मे जनमल ऐ साहित्यकारक लेखनीसँ मैथिली साहित्यकेँ लगभग 36 गोट कथा भेटल। मात्र 38 बरखक अपन जीवनकालमे राजकमल मैैथिली गद्य साहित्यकेँ किछु एहेन कृति दऽ देलनि जइसँ प्रयोगकेँ बादक धरातलपर प्रतिष्ठित करबाक श्रेय साहित्यक समालोचक लोकनि ऐ साहित्यकारकेँ िनर्विवाद रूपेँ दऽ रहल छथि। हिनक तीन गोट कथा संग्रह ललका पाग, एक आन्हर एक रोगाह आ “िनमोही बालम हम्मर” पुस्तकाकार प्रकाशित छन्हि। एकर अतिरिक्त हिनक एक गोट पोथी “कृति राजकमलक” मैथिली अकादेमीसँ प्रकाशित भेल अछि जइमे 13 गोट कथा आ एकटा उपन्यास आन्दोलन संकलित अछि। ओना कृतिराजकमलक छओ गोट कथा “ललका पाग”मे सेहो छपल अछि। रमानाथ झाक मतेँ राजकमलक कथा मूल उद्देश्य मनोविश्लेषणात्मक प्रणालीसँ आरोपित मर्यादा ओ आदर्शक पाछाँ नुकाएल आन्हरकेँ नाङट करब अछि। डॉ. डी.एन. झा सेहो ऐ मतसँ सहमत छथि। “ललका पाग” कथा हिनक लिखल कथा सभमे अपन विशिष्ट स्थान रखैत छन्हि। ऐ कथाकेँ मैथिली साहित्यक किछु श्रेष्ठ कथामे स्थान देब सर्वथा न्यायोचित अछि। कथाक आरंभमे मैथिली स्त्रीक चिन्हबाक विश्लेषणमे कोनो अचरज नै। त्रिपुराक तुलना जइ वर्गक मैथिल कन्याँसँ कएल गेल कथाक भूमिकामे ओइ वर्गक स्पष्ट उल्लेख तँ नै कएल गेल मुदा ओ ब्राह्मण परिवारक कन्या छथि। अल्पायुमे पण्डित पिताक मृत्युक पश्चात् तिरू अपन माइक संग गाममे रहैत छलीह। अग्रज झिंगुरनाथ बाहर धन उपार्जन लेल चलि गेलाह। किछुए वर्षमे तिरू युवती वयसमे प्रवेश कऽ गेलीह। दस-एगारह वर्षक बाद जखन झिंगुरनाथ अपन गाम घुरि अएलनि तँ मातृसिनेहक संग-संग तिरूक हाथ पीअर करबाक जिम्मेदारीक आभास भेलनि। वास्तविकतो छैक जे जखन ई कथा 1955मे विदेह विशेषांकमे देल गेल ओइ कालकेँ के कहए वर्तमान समैमे सेहो अपना सबहक समाजमे कन्याक जन्म कालहिसँ बियाहक चिन्ता अभिभावककेँ सतबए लगैत छन्हि। तिरू तँ माघमे 14मे वर्षमे प्रवेश कऽ जेतीह। उद्देश्य जौं सार्थक हुअए तँ सफलता निश्चित भेटबे करैत अछि। चण्डीपुरक राम सागर चौधरीक सुपुत्र राधाकान्तसँ स्व. पण्डित टेकनाथ झाक पुत्री त्रिपुराक बियाह सम्पन्न भेल। सासुर आबि तिरू कनेको स्तब्ध नै छथि किएक तँ जीवन शैलीक कोनो ज्ञाने नै छन्हि। अज्ञानतामे बाड़ीक पछुआरमे पोखरि देखि अपन बेमात्र सासुसँ हेलबाक कलाक जिज्ञासा कएलनि। यएह जिज्ञासा हुनक जीवनक लेल काल भऽ गेलनि। चननपुरवाली सासु भोरे-भोर समस्त गाममे अफवाह पसारि देलखिन जे रातिमे नवकी कनियाँ पोखरिमे चुभकि रहल छलीह। राधाकान्त ऐ घटनासँ मर्माहित भऽ गेलाह। आब प्रश्न उठैत अछि जे चननपुरवाली एना किअए कएलीह? ओ अपन पितिऔत भाय डाॅ. शंभूनाथ मिसरक सुपत्रीसँ राधाकान्तक बियाह करबए चाहैत छलीह। ऐठाम कथाकार कनेक चुकि गेल छथि। ऐ उद्देश्यकेँ कतौ स्पष्ट नै कएल गेल। माए जौं अपन बेटाक बियाह आनठाम करबए चाहैत छलीह तँ त्रिपुरासँ कोना भऽ गेलनि। जखन की चननपुरवाली परिवारक अभिभाविका छलखिन। हुनक पतिक हुनकापर कोनो विशेष अनुशासन सेहो नै छलनि आ ने राधाकान्त त्रिपुरासँ प्रेम बियाह केलखिन तँ कथानकमे एहेन परिवर्त्तनकेँ सोझे-सोझ आत्मसात् करब कनेक कठिन लागि रहल अछि। गाममे तँ कूटनीति चलिते अछि किएक तँ छद्म रोजी रोजगारपर बेरोजगारी भारी। तँए भोलामास्टर आ बंगट चौधरी सन परिवार विध्वंसक केँ राधाकान्त सन संवेदनशील लोककेँ दोसर बियाह करबाक प्रेरणा देबएमे यथार्थ बोध होइत अछि। ई सभ घटना चक्रसँ कथा रोचक होइत अछि। मुदा कथाकेँ आकर्षक बनेबाक क्रममे राजकमल बिसरि गेलाह जे त्रिपुरा मात्र 13-14 वर्षक बालिका छथि। जखन पोखरिमे चुभकबाक जिज्ञासा सासुरोमे छन्हि तखन सौतिन अएबाक संभावनाक मध्य अपन सकल गृहस्थ कार्यमे कोना लागल रहलीह? एक दिस चंचल रूपक उद्बोधन आ दोसरा रूपमे परिपक्व नारी, एकरा प्रयोगवाद तँ कहल जा सकैत अछि मुदा प्रयोगात्मक रूप वास्तविकतासँ बहुत दूर अछि। राधाकान्त सेहो शिक्षित छथि, मात्र अपन स्त्रीकेँ पोखरिमे स्नान करबाक सजाक रूपेँ दोसर बियाह। ओना मिथिलामे पहिने गप्पे-गप्पमे बियाह करबाक इतिहास रहल अछि परंच ऐ प्रकारक बियाहक कारण समीचीन नै लागल। अंतमे अपन बियाह कालक राखल ललका पाग जखन त्रिपुरा राधाकान्तकेँ दोसर बियाहक लेल प्रस्थानकालमे दैत छथिन तँ राधाकान्तक हृदए परिवर्तन भऽ जाइत अछि आ पहिलुक ललका पागक मर्यादा रखबाक लेल ओ चुप्प भऽ आंगनमे आबि कुर्सीपर बैस जाइत छथि। एहू घटनकाक्रममे कथा वास्तविकतासँ बेसी कल्पवृक्षक पुष्प प्रतीत होइत अछि। जे राधाकान्त मात्र पोखरि स्नानक दंडमे त्रिपुरासँ नारीक अधिकार छीनि लेबाक िनर्णए केलनि ओ अंगुलिमाल जकाँ क्षणहिमे कोना बदलि गेलाह। ई ध्रुव सत्य अछि जे मैथिल ब्राह्मण परिवारमे ललका पागक स्थान विशेष छैक आ ओइ पागकेँ सहेजि कऽ त्रिपुरा धएने छलीह। भगवत परीक्षा जकाँ सौतिन अनबाक लेल पतिक हाथमे पाग देबाक िनर्णएमे अंगुलिमाल रूपी राधाकान्तकेँ बुद्धसँ दर्शन भेलनि। जौं एकरा संभवो मानल जाए तैयो कनेक कमी ई जे राधाकान्त त्रिपुराक तुलनामे कामाख्या दाइक संस्कारकेँ सोचि-विचारि विशिष्ट मानि दोसर बियाह करबाक िनर्णए कएलनि। कोनो क्षणहिमे नै। ऐ बियाहक सूत्रधार हुनक बेमात्र माए छलथिन। चननपुरवालीकेँ अछैत राधाकान्त माथपर बिनु पाग धएने कोना विदा भऽ रहल छलाह, ई तँ सद्य: कथाक बहुत कमजोर पक्ष अछि। भाषा विज्ञानक आधारपर जौं मूल्यांकन कएल जाए तँ कथाकार परम्परावादी मैथिल साहित्यकार जकाँ गद्यकेँ अधोषित श्रृंगारक रूप देबाक प्रयास कएलनि। तिरूक तुलना वाण भट्टक श्यामांगी नायिकासँ करए काल ई उद्देश्य स्पष्ट भऽ जाइत अछि। मुदा जखन लिखैत छथि जे “मिथिलाक छौड़ी सभ अहिना कनैत अछि।” तँ स्पष्ट भऽ जाइत छन्हि आत्मिक रूपसँ किछु आर कहए चाहैत छथि। ऐठाम छौड़ीक स्थानपर ‘कन्या‘ शब्दक प्रयोग सेहो कएल जा सकैत छल जे बेसी नीक लगितए। कामाख्या दाइक विषयमे राधाकान्तक मौन सिनेहमे पिआ आ आ जाऽ....... लिखबाक उद्देश्य स्पष्ट नै भऽ सकल। ई सत्य अछि जे राजकमल मैथिलीक संग-संग हिन्दीमे सेहो लिखैत छलाह, मुदा हिन्दीक प्रति झॉपल सिनेह मैथिली कथामे परिलक्षित भऽ गेल। ई मैथिली साहित्यक लेल दुर्भाग्यक गप्प जे ऐ भाषाकेँ दुभाषी रचनाकार मात्र अपन नाओं-गाओंक लेल हथियार बनेलनि मातृभाषा सिनेहसँ साहित्यिक रचनाक कोनो संबंध नै। ओना ऐ प्रकारक कथ्य यात्री आ आरसीक रचनामे नै भेटैत अछि। कथोपकथनमे विरोधाभास देखलाक बादो एकरा नीक रचना मानल जा सकैछ किएक तँ कथा बड्ड आकर्षक छन्हि। जौं बिम्बक विश्लेषणकेँ शिल्पक रूपमे देखल जाए तँ राजकमलजी स्थापित शिल्पी छथि ई ललका पाग प्रकट भऽ गेल। दमयन्ती हरण- ‘दमयन्ती हरण’ भरल सभामे कोनो विवश नारीक चिर-हरणक वृत्ति चित्र नै। ई तँ समाजक पाग-चानन- ठोपधारी किछु कथाकथिक भलमानुषक वास्तविक झाॅपल चरित्रकेँ नाङट करबाक कथा थिक। कथा नायिका छथि तेइस-चौबीस बरखक- दमयन्ती दुलरैतिन दम्मो अथवा समाजक कोप भाजन बनलि दमिआँ। ऐ नायिकाकेँ गामक रक्षक लोकनि खलनायिका बना देलनि, जे दोसरक शोषण तँ नै करैत अछि मुदा अपन चरित्र हनन कऽ ग्राम्य समाजकेँ विगलित कऽ रहलीह जे कोनो अर्थमे उचित नै। ऐ लेल दोष ककरा देल जाए? सामर्थ्यहीन मायकेँ वा ओहि समाजकेँ जकर छाहरिमे नेनपनसँ सोझे अग्राह्य नारीक अवस्थामे प्रवेश कऽ गेली- दमियाँ। मिथिला समाजक वर्णन कोनो कवितामे जतेक घृतगन्धा हुअए मुदा ई अक्षरश: सत्य अछि जे जइ समैमे ई कथा लिखल गेल ओइ समैमे परीक्षा समाप्ति आ नव कक्षामे प्रवेशक मध्यक समय छात्रक लेल मस्ताएल साँढ़सँ बेशी किछु नै छल। जौं रहितए तँ फूलबाबू रामपुरमे किअए बौआइत रहितथि। “फूल भैया ओइपार जएबह?” वेदव्यासक मत्स्यगंधा इत्यादि संवादसँ नारी विमर्शक विह्वल रूप प्रदर्शित होइत छैक। कथाकार तँ कथाक प्रारंभेमे अवश्ये ई निश्चय केने हेताह की कथा नायिकाकेँ वैश्याक रूपमे प्रदर्शित कऽ कथाक इतिश्री कएल जाए। मुदा आदर्शवादी विचारधारासँ एकटा वैश्याक भूमिका वॉधव बड़ कठिन कार्य भेल हएत। शनै:-शनै: ‘गाड़ीमे भीख मांगैत छौड़ी’ सदृश दमयन्तीक रूपक विश्लेषणमे नारी जातिक अपमानसँ बेशी समाजक कटु सत्य इजोतमे आबि गेल। स्वेच्छासँ अमर्यादित आचरणक आवरणमे दमियाँ नै गेलीह। ‘हे महादेव, चारिदिनसँ हमरा ऑगनमे चूल्हा नहि जरल अछि’ सन संवादसँ ई परिलक्षित होइत छैक। गूढ़ मंथन कएलासँ कथामे किछु विशेष नै। अपन बेटीक भरण-पोषणक लेल देह व्यापारकेँ केन्द्र विन्दु बना कऽ लिखल गेल कथामे कोनो सम्यक समाज विमर्श नै। कोनो आदर्श पथ नै मात्र पथभ्रष्ट समाजकेँ पाठक धरि परसल गेल। यायावरी जीवन चक्रमे घुमैत जयद्रथ आ कथाकारक संवाद कोनो समाजक लेल आदर्श प्रस्तुत नै कएलाक। देलक तँ समाजकेँ ई संदेश जे जौं कोनो अवला मिथिलाक गाममे रामबाबू सन दु:खिता पतिताक कथाकथिक रक्षक लग अपन आत्मरक्षाक ऑचर पसारतीह तँ ओ ऑचर खींच लेबामे कोनो संकोच नै करतथि। ’मायसँ कोन काज अछि’- नायिका कथाकारकेँ देखि हुनको ग्राहके बुझली। ई कोनो भ्रम नै। अस्तित्व विहीन नारी लग देहलोलुपे मनुक्ख पहुँचैत छथि। ‘हम स्त्री नै छी, फूल भैया। हम तँ माटिक फूटलि हाँड़ी छी। हमरापर दया करबाक कोनो प्रयोजन नहि’- मर्माहित करबाक लेल चेतनाशील मनुक्खकेँ ई वाक्य भारी पड़त। छप्पन बरख पूर्व ई कथा लिखल गेल। ओइ समैमे समाजक ई दशा छल? तखन तँ वर्त्तमानकालक जीवन शैलीकेँ दोष देब उचित नै। जखन जड़िए पथभ्रष्ट तँ छीपक विषयमे नीक कल्पना करब सेहो भ्रामक अछि। सम्पूर्ण कथामे झाजी आ चौधरीजी, मात्र पंचैती कालमे स्कूलक प्रधानाध्यापक यादवजी आ एकठाम खबास कुंजा धानुक अन्य वर्गक पात्र छथि। तखन ‘ब्रह्मो जानति ब्राहण:’ कोना कलियुगमे प्रासंगिक मानल जाए। समाजमे नीति शिक्षाक आचार्य जौं कुनीतिक प्रधानाचार्य भऽ जाथि तँ व्यवस्थे चौपट्ट किएक नै हएत। बेर-बेर जखन-जखन नारी वा शूद्रक चर्च होइत अछि तँ तुलसीदासक ‘ढोल गॅवार शूद्र पशु नारीक’ उद्धरण देल जाइत अछि। महाकाव्यक रचनामे कोनो विशेष पात्रक मुखसँ निकसल ऐ वाणी द्वारा मानस पुरुषक चरित्र हनन कएल जाइत अछि। चौधरीजी बजलाह ‘घोर कलियुग आबि गेल अछि तुलसीदास ठीके लिखने छथि...’ ई उचित नै लागल। तुलसीदास तँ एकठाम लिखने छथि जे ‘धीरज धर्म मित्र अरू नारी, आफत काल परेखहुँ चारी’ एकर उल्लेख किएक नै कएल जाइत छैक? ओना ऐ कथामे नारी आ धर्ममे सहचरी बनेबाक कोनो गुंजाइश नै छल। मुदा तुलसीक विषयमे लिखबाक काल ई धियान रखबाक चाही जे रामचरित मानस जनभाषाक कृति अछि जइसँ सम्पूर्ण हिन्दू संस्कृति प्रभावित भऽ रहल, कोनो विशेष जातिक आधिकारिक भाषा संस्कृतिमे लिखल नै गेल। तँए बाल्मिकि रामायणसँ बेशी पाठक धरि एकर पहुँच रहल। कथाक बिम्ब विश्लेषण रूचिगर लागल, जे राजकमलक विशेष कथा लिखबाक कलाक परिणाम मानल जाए। हिनक कथामे कोनो हास्य समागम नै रहितहुँ जनप्रिय रहल। तकर मौलिक कारण थिक गद्य काव्यात्मक विश्लेषण। वाणिज्यक छात्र रहितहुँ राजकमल अंकगणितीय वा सांख्यिक लेखा जोखामे नै पड़लाह किएक तँ ‘आशुकथाकार’ छथि। कथाक अंतमे वएह पंचैतीक िनर्णए जे हमरा सबहक समाजक व्याधि छल। कानूनकेँ चुनौती देबाक लेल पंच परमेश्वर बनि किछु लोक पान चिबा कऽ इतिश्री कऽ रहल छलाह। वर्त्तमान समैमे ई संभव नै छैक किएक तँ मनुख सेहो ‘चेतनाशील भऽ रहल आ प्रजातंत्र दीर्घ सूत्री समाजक पागधारीसँ भरिगर भऽ गेल। मुदा अंतमे कथाकार बिसरि जाइत छथि आ मत्स्यगंधाक हँसी प्रश्ने रहि गेल। राजकमलक प्रश्नसँ कथाक इतिश्री करब पाठककेँ भ्रमित कऽ दैत अछि, मुदा रूचिपूर्ण। िनर्णए तँ हमरा सबहक समाजमे ओझराएले रहि गेल छल तँए संभवत: प्रश्नेसँ कथाक इतिश्री कएल गेल भऽ सकैत अछि कथाकार कथाकेँ रोचक बनेबाक लेल पाठक धरि प्रश्न छोड़ि कथाक इतिश्री करब उचित बुझैत होथि। जौं ई सत्य तँ एकरा मैथिली साहित्यक लेल दुर्भाग्यशाली मानल जाए, किएक तँ न्यायाधिशकेँ िनर्णए ओझरा क’ न्यायक कुर्सीपर सँ उतरलाक बाद बेवस्था चौपट हएब स्वभाविक छैक। अाकाश गंगा- मैथिली साहित्यक संग सदिखन ई भ्रांति रहल जे जौं कोनो साहित्यकारक एक गोट कृति साहित्यकेँ आर सुवासित कऽ देने अछि तँ आगाँक रचनामे कथ्य ओ शिल्पसँ बेशी कथाकारक नाओं मूल्यांकनक केन्द्र बिन्दु भऽ जाइछ। ऐ अर्न्तद्वन्द्वसँ राजकमल सेहो नै अछोप रहलाहेँ। ‘आकाश गंगा’ श्रैगांरिक बिन्दुकेँ स्पर्श करैत समाजक अर्न्तव्यथाक चित्रण करबामे सफल कथा थिक, ऐमे कोनो संदेह नै। मुदा जौं अंत:करणसँ अवलोकन कएल जाए तँ ‘बऽर दुआरिपर उतरल नहि की छींकक ध्वनि’ जकाँ कथाक प्रारंभे छायावादी शैलीमे कएल गेल। ‘विवेकानन्द चौधरी नहि मिथ्या कहलहुँ, आब जमीन्दार नहि साधारण नागरिक। नागरिको नहि साधारण ग्रामीण’ सन शब्दकोशसँ वाक्य बनाएब अप्रासंगिक मानल जाए। कथाकार स्वयं दृग्भ्रमित तँ नै छथि किएक तँ हिनक प्रतिभापर संदेह नै। तखन पाठककेँ दृग्भ्रमित करबाक उद्देश्य स्पष्ट नै। कथाकारकेँ एकबेर स्पष्ट कऽ देबाक चाही जे विवेकानंद की छथि? जौं ई काव्य रहितए तँ क्षम्य छल, मुदा कथाक ऐ रूपकेँ की मानल जाए? सचार तखने नीक लगैत छैक जखन मूल खाद्य पदार्थ अक्षत हुए। मड़ुआक संग गाही साग तरकारी परसबाक बादो भोजनमे विशेष स्वाद नै भेटत। कथोपकथनपर शिल्पक भार एक निश्चित सीमाने तक शोभायमान लगैछ। विवेकानंद चौधरीक अपन अर्द्धांगिनी मदालसासँ संबंध समाप्त भऽ गेलनि। विवेकानन्द अपन बेटी अन्नपूर्णा संग रहए लगलाह। एकटा जमीन्दारक बेटी अन्नपूर्णा पितृ आशाक विपरीत गरीब बालक राधाकान्तक संग विआह कऽ लैत छथि। बाप-बेटीक संबंध समाप्त भऽ गेलनि। कालान्तरमे बेटी अन्नपूर्णा एक बालक अशोकक माए भऽ गेलीह। पतिक देहावसानक बाद दरिद्रासँ लड़ैत माय अन्नपूर्णाक चरित्र चित्रणमे कथाकारक सबल दृष्टिकोण झलकैत अछि। नारी-विमर्शक दृष्टिसँ कथा रोचक मुदा नारीक जीवन दशा समाजमे उदासी छैक, ई प्रमाणित करब उचित मुदा अगिला पीढ़ीक लेल उदासीन तँए रचनाकारकेँ ऐमे परिवर्त्तन करबाक चाही छल। अंतमे विवेकानन्दक हृदए पझिजैत अछि आ ओ बेटीक विदागरीक लेल उद्यत भऽ जाइत छथि। ललका पाग जकाँ अहू कथामे परिणाम स्पष्ट नै भऽ सकल। श्रैंगारिक जीवनक परिधिमे घुमैत कथा परिणाम विहीन, एेसँ एकरा कथाकारक पलायनवादी वैरागी प्रवृत्तिक द्योतक मानल जा सकैत अछि। कादम्बरी उपकथा- वैधव्य जीवनक अविरल चित्रणसँ भरल ऐ कथामे नायिका ‘कादम्बरी’ विधवा छथि। पति विश्वनाथक मरलाक बाद नैहर चलि जाइत छथि। किछु दिनक बाद देओर दुखित भऽ गेलखिन तखन सासुर आबि गेलीह। सासुरक लोकक कल्पना छल जे कादम्बरी ब्राह्मण संस्कृतिक अनुकूल श्वेत वस्त्र धारिणी अवला बनि अएलीह। मुदा सौन्दर्य सुन्नरि कादम्बरी अंग-वस्त्रसँ विपदा-मारलि नै अएलीह। फेर धमगिज्जरि। अपन केओ नै किएक तँ जीवनक एक पहिया धसि गेल छलनि। तँए ने दोसरक नेनामे शिक्षाक दिव्य संस्कार जगएबाक क्रममे परिहासक पात्र भऽ गेलीह। गायत्री देवी छोट दिआदिनी छलीह। शिक्षित नारी कादम्बरीक महत नेना-सभक मध्य बेसी छल। किएक तँ हुनकामे संतानहीन रहितो मातृत्व छलनि। नेना आ मूक पालतू पशु सिनेहक भुक्खल होइत अछि। ई सभ गायत्रीकेँ सोहाइत नै छलनि। अपना तँ ऊक देबाक लेल एकटा अल्लुओ पेटसँ नै उखड़लनि’ गायत्रीक ऐ प्रतिघातसँ कादम्बरी पाषाण भऽ गेलीह। आङनक पाठशाला बन्न कऽ देलखिन किएक तँ गायत्रीक छोटकी बेटी निरमलाक मृत्यु भेलापर ‘डाइन’ शब्दसँ सेहो विभूषित कएल गेलीह। जखन की निरमला सर्प दंशसँ जहान छोड़ि विदा भेलीह। कथाक अंतिम चक्र बड़ नीक अछि। लुब्धा खबासक स्त्री प्रसव पीड़ासँ व्यथित कादम्बरीक आङनमे छटपटाइत छथि। एकटा गरीब समाजक कात लागल वर्गक नारीक व्यथा कादम्बरीकेँ कर्त्तव्य परायणताक भावुक प्रवाहमे लऽ गेलनि। हास-परिहास आ परितापक भयसँ मुक्त भऽ ओइ नारीक संग-संग संसारमे आबए बला नेनाक लेल भगवतीसँ छागर कबुला केलखिन। जखन ई गप्प बादमे गायत्री कादम्बरीक मुखसँ सुनलनि तँ प्रायश्चितमे अश्रुकण बाहर भऽ गेलनि। ग्लानि भरल समाजक वैधव्य जीवनक वृति चित्र अंतमे सिनेहसँ समाप्त भेल। आकर्षणमे कथा चुम्बकीय प्रभाव जकाँ पाठककेँ झपटि लैत अछि, मुदा की समाजक ऐ अनिश्चयवादी बेवस्थाकेँ ‘नारी-विमर्शक’ दृष्टिसँ उचित मानल जाए। जइ कालमे ई कथा लिखल गेल, भारतवर्षमे सेहो धर्म सुधार आन्दोलन भऽ रहल छल, मुदा मैथिल ब्राह्मण समाज ओहिकालकेँ के कहए एखन धरि ‘वैधव्य जीवन’सँ मुक्तिक आन्दोलनकेँ जाति-संस्कार विरोधी मानैत अछि। ऐ मतेँ ई कथा लिखब कोनो अनुचित नै। मुदा प्रयोगधर्मिताक रूपेँ जौं धियान देल जाए तँ राजकमल क्रांतिदूत भऽ सकैत छलाह। परिणाम मिश्रित देखा सकैत छलथि परंच ‘कादम्बरी’केँ रूढ़िवादितासँ मुक्ति करबाक प्रयास कथाकारकेँ ओइ शिखरपर स्थापित कऽ सकैत छल जतए धरि मैथिली साहित्य एखन तक नै पहुँचल अछि। निष्कर्षत: व्यवस्था फेर नाङट भेल से उचित किएक तँ संकीर्ण मानसिकताक समाजक मध्य ई कथा घुमैत अछि। घड़ी- कथा साहित्यमे रचनाकारक संग-संग समीक्षक लोकनि सेहो बिम्ब ओ शिल्पकेँ कथाक सचार मानैत छथिन। हमर मत ऐ रूपेँ कनेक विलग अछि। कोनो रचनाकेँ पढ़लाक बाद ओकर मूल्यांकन हेतु जे मौलिक तत्व होइछ ओ थिक रचनाकारक दृष्टिकोण। जेना स्वस्थ व्यक्तिक सम्मिलनसँ स्वस्थ परिवार आ समाजक िनर्माण होइत अछि ठीक ओहिना जौं रचनाकारक दृष्टिकोण समाजपयोगी हुअनि तँ रचनाक सार्थकता सत्य प्रमाणित भऽ जाइछ। ’घड़ी’ शीर्षक कथाक बिम्ब चलन्त जेकरा सामान्य शब्दमे चालू कहल जाइत अछि। शिल्प आवृतिसँ भरल अर्थात् परिवर्त्तनशील आ दृष्टिकोण आश्चर्यजनक रूपसँ समाजक लेल कलुष अछि। नाओंसँ प्रथम दृष्टिए बुझना जाइछ जे ‘घड़ी’ अर्थात् समाजमे कालक प्रहरी मुदा अन्तरावलोकनक बाद काल प्रहरी घड़ी समाजमे अकालक सार्थकता सिद्ध कऽ रहलैक। अकाल माने जे ने उचित मानल जाए तकर व्याख्या, ओहूमे अनैतिक संबंधक केन्द्र बिन्दु बना कऽ लिखल गेल कथामे कथाकार सेहो अनैतिक नायककेँ संग दैत छथिन। रजनीकान्त प्राध्यापक बनि पटनामे रहैत छथिन। पत्नी चन्द्रमुखी आ पाँच सन्तानक संग-संग एकटा विधवा शिक्षिका मौसी उर्मिला हिनक परिवारक सदस्या थिकीह। टकाक ओ ओछौनपर सूतनिहार रजनीकान्तकेँ ‘घड़ी’सँ कोनो प्रेम नै। ‘घड़ी’ नामक यंत्रसँ रजनीकान्त घृणा करैत छथि। ई बात पटना नगरमे मैथिल समाजक सभ लेाककेँ बुझल छैक। ई लिखबाक प्रयोजन आ प्रमाणिकतापर संदेह होइत अछि जौं शिल्पक आधारपर उचित मानलो जाए तँ एकर प्राथमिकता पूर्णत: असत्य हएत। काल्पनिक कथामे सेहो ऐ तरहक शब्द वा वाक्य नै लिखबाक चाही। “मैथिल समाजक सभ लोक”मे पटनामे रहनिहार सम्पूर्ण मैथिलकेँ केन्द्रित कऽ कऽ 1965 मे ई कथा लिखल गेल। रजनीकांत कोनो भारतीय सिनेमा जगतक प्रसिद्ध कलाकार नै छथि आ ने महात्मा गाँधी सन राष्ट्रक सेवक एकटा प्रोफेसरकेँ सभ लोक कोना जानि सकैत अछि? मैथिल समाजमे अमीरक संग-संग गरीब लोक सेहो छथि। तत्कालीन पटनामे समाजक किछु लोक मोटिया, रिक्शा चालक जूता पॉलिश केनिहार सेहो हेताह हुनका रजनीकान्तसँ केना परिचय? खैर प्रयोगवादी राजकमलक ऐ कृत्यकेँ मैथिली भाषामे क्षम्य कऽ देल गेल जे साहित्यक अदूरदर्शिताक परिचायक थिक। कथा कोनो विशेष बिम्ब नै रखने अछि। कथाकार स्वयं ऐमे सहनायक छथि। मैथिल समाजक मुसलमान जातिक पात्र अमजद मियाँ अपन नवयुवती पत्नी जहूरनक इलाजक लेल पटना अबैत छथि। चूड़ीक व्यापारी अमजद कथाकारपर विश्वसनीयता रखैत हिनकेसँ सहयोग लैत छथिन। “एक रिक्शापर हम आ जहूरनी आ दोसर रिक्शापर अमजद अली आ रत्नेश झा कम्पाउन्डर आ दुसधा खबास अस्पतालसँ घुरैत छलहुँ।” ऐ प्रकारक संवादमे कथाकारक दृष्टिकोण पूर्णत: स्पष्ट भऽ गेल अछि। कोनो पुरुष ओहिकालमे कथमपि नै स्वीकार कऽ सकैत छल जे अोकर कनियाँ पर-परुषक संग वैसए जौं एना कएलो गेल तँ एकर परिणाम अनर्गल साबित भेल। कालान्तरमे वएह जहूरन प्रो. रजनीकान्तक संग अबैत-अबैत हुनक प्रेमालाप मे ओझरा गेलीह। ओइ प्रेमालापकेँ कथाकार समर्थन तँ नै कएलनि मुदा गबाह अवश्य भऽ गेलखिन। अनर्गल प्रेमकेँ प्रकाशित कएलनि मुदा प्रो. साहेवक कनियाँसँ एकरा नुका कऽ रखलनि। मित्रक ई कर्त्तव्य होइत अछि जे अपन मित्रकेँ कुमार्गसँ रोकथि। जौं नै रोकि सकलाह तँ स्वयं संग छोड़ि देबाक चाहियनि छल। राजा बलि वचनक रक्षाक लेल जखन गुरुक संग छोड़ि देने छलथि तँ राजकमल एक कुकर्मी मित्रक कुकर्मक भागी कोना बनबाक लेल तैयार छथि? ई घटना मात्र कथाक, मुदा कथोमे ऐ प्रकारक भ्रांति उत्पन्न करब सर्वथा अनुचित मानल जाए। ‘दुसधा खबास’ लिखब उचित नै जौं हम दोसरकेँ इज्जति नै देब तँ ‘बाभन’ शब्द सुनबामे किएक क्षोभ होइत अछि? अंतमे रजनीकान्त अपन सत्य पथपर पुन: आबि जाइत छथि। ‘घड़ी’ तँ कीनि लेलथि मुदा ई घड़ी जहूरनीक चरित्र आ चन्द्रमुखीक विश्वासकेँ केना घुराएत? ब्रह्माण्डशास्त्री, दार्शनिकसँ लऽ कऽ भौतिकीय गणकक दृष्टिकोणमे चुम्बकीय आकर्षण विपरीत ध्रुवक मध्य होइत छैक। जीवन धर्ममे नर-नारी संग रहितो विपरीत किएक तँ शारीरिक संरचनासँ सृजनक माध्यममे अन्तर होइछ। स्वाभाविक छैक जे साहित्यकार ऐ गृहस्थ आश्रममे प्रवेश करैत रचनाक बिम्ब तैयार करैत अछि। तँए कोनो साहित्यक आदि कालमे मौलिक विमर्श भक्ति आ श्रृंगार रहल। राजकमल जीक पदार्पण मैथिली साहित्यक आधुनिक कालमे भेलनि मुदा ताधरिक कथा जगतमे अपन भाषाकेँ कृषकाय मानल जाए। अपेक्षाकृत राजकमल युवा सेहो रहथि तँए सौन्दर्य आकर्षण पनकब कोनो असहज नै। अपराजिता कथा हिनक पहिलुक रचना छन्हि जे वैदेहीक अक्टूवर 1954 अंकमे प्रकाशित भेल रहए। जेना नाओंसँ स्पष्ट अछि “अपराजिता” जे स्त्री पराजित नै भेल हुअए मुदा ऐठाम कोनो मण्डन मिश्रक भारतीक उल्लेख नै। कथाकारक मित्र नागदत्तक कनियाँ छथि- अपराजिता। एकर अर्थ कथमपि नै जे ओ नागदत्तपर विशेषाधिकार रखैत छलीह। सिनेहसँ राखल नाओं आ अधिकारक दृष्टकोणमे व्यापक अंतर होइत छैक। तँए कथाकारकेँ ई नाओं अनसोहाँत लगैत छन्हि। मिथिला क्षेत्र एखन धरि प्राकृतिक विपदा बाढ़िक कोपभाजिता बनैत रहलीह। सन् 1954मे स्थिति तँ आर फराक छल। “सरिपहुँ... बागमती, कमला, बलान, गण्डक आ खास कऽ कोसी तँ अपराजिता अछि ने। ककरो सामर्थ्य नै जे एकरा पराजित कऽ सकए” ....ऐ कथांशक द्वारा कथाकार कोनो बातसँ मुक्तिक आश नै रखने छथि, हिआसँ भऽ सकैछ जे रखने होिथ मुदा कथाक दृष्टिकोण बेछप्प मानल जाए। कथाकारकेँ कथामे तँ अवश्य पीड़ा भऽ रहलनि जे जे वेदमे नदीकेँ मनुक्खक सेविका कहलकैक अछि। मनुक्खक पत्नी कहलकैक अछि... मुदा, बहुओ भऽ कऽ कोसी आ वागमती अपराजिता छथि। एक दिस बाढ़िक उजैहियासँ पसरल अधोगतिकेँ देखि कथाकार व्यथित छथि तँ दोसर दिस मििथलाक परम सत्यकेँ उधार कऽ रहलाह। सम्पूर्ण भारत-वर्षक अधिकांश भूभागमे नारी-जीवन सोझ विचार रखनिहार लोकक लेल चिन्ताक विषय रहल। राजकमलक कथा सभमे सम्पूर्ण भारत वर्षक उल्लेख नै आ ने मिािलाक सम्पूर्ण समाजक िहनक कथा प्रतिनिधित्व करैत छन्हि। मूलत: मैथिल ब्राह्मण परिवारकेँ केन्द्र बिन्दु बना कऽ लिखल गेल हिनक “अपराजिता” शिक्षित मैथिल परिवारक नारी जकरा पति रहितौं अवला कहल जा सकैछ केर स्थितिक वास्तविक विवेचक थिक। ओना ऐ कथामे कतौ नारी शोषित अथवा दोहनक प्रत्यक्षत: उल्लेख नै। सम्पूर्ण कथा “द वनिर्ग ट्रेन” जकाँ रेलगाड़ीसँ प्रारंभ भऽ समस्तीपुर आ दड़िभंगाक बीच पटरीक मध्य झुलैत अछि। समस्तीपुरसँ मुक्तापुर होइत हायाधाट धरि बाढ़िक प्रकोपक मध्य प्रारंभ भेल कथामे रेल पटरीपर पानि आबि जयबाक कारण यात्री सबहक परेशानी कथा मूल बिम्ब थिक। बिम्ब कोनो विशेष अर्थक नै मुदा शिल्प जोरगर तँए कथा किछु हद धरि रोचक भऽ गेल। प्राय: मैथिली कथाकारक संग समस्या रहल जे कथा लिखबाक उद्देश्य बहुत ठाम स्पष्ट नै होइत अछि। राजकमलक अपराजिता सेहो इएह प्रकारक कथा मानल जाए। हमरा सबहक समाजक नकारात्मक स्वरूपकेँ ऐ कथामे नांगट तँ खूब नीक जकाँ कएल गेल मुदा की मात्र नांगट कएने समस्याक निदान संभव छैक? ऐ कथामे तँ ई प्रमाणित होइत छैक जे साहित्य समाजक दर्पण मुदा भांगल दर्पणमे कांति देखलासँ कांति सेहो स्पष्टत: नै देखाएत आ आँखिपर असर पड़ब सेहो अवश्यांभावी तँ कथाकार पाठककेँ ऐ कथासँ पूर्णत: प्रभावित कएलनि ई कहब सर्वथा अनुचित। “फुलपरास वाली” कथा नारी प्रधान कथा थिक जकर नायिका छथि। विलट भाय पटनामे रहि रिक्शा चलबैत छथिन्ह। एकटा पंडितक पुत्र भऽ रिक्शा हाँकब कथाकारक अर्द्धांगिनी शशिकेँ नीक नै लगैत छन्हि। शारीरिक श्रमक अभ्यास नै रहलासँ जीवन दुष्कर भ’ जाइछ छै। शशिकेँ ऐसँ बेसी खटकैत छन्हि जे विलट भाय हुनक भैंसुर छथि। पंडित चन्द्रकांत झा वेदान्तक पुत्र विलट झा रिक्शा चएलबाक कर्मकेँ अनुचित नै मानैत छथि। मनुक्ख कर्मशील भऽ अपन पेट पोसए तँ कोनो हर्ज नै। पैतृक ठाठ-बाठक घंटी डोलेलासँ पेट तँ नै भरि सकैत अछि। श्रमजीवी श्रमसँ पेट भरि सकैत अछि मुदा जौं शरीर अस्वस्थ भऽ जाए तँ जीवन चलाएब नितांत असहज भऽ जाइत छैक। विलट भाइ बेमार पड़ि जाइत छथि जिनका देखबाक लेल कनियाँ अर्थात् फुलपरास वाली पटना अबैत छथि। विलट भाइक ज्वर तँ शांत भऽ जाइत छन्हि मुदा एकटा ज्वार बढ़ि गेलनि ओ थिक सुरा पान। कहियो पीबि कऽ नाली खसैत छथि तँ कहियो घर आबि गुड़कैत छथि। कथाकार अर्थात मणि बाबू आ हुनक कनियाँ शशिकेँ ई सभ बड़ अनसोहाँत लगलनि। बिलट कर्मोपदेश दैत छलाह जे कोनो काज कऽ कऽ जीवन यापान करब अनुचित नै। मुदा आब ताड़ी-दारूपर उतरि गेल छथि। एतबे नै एक दिन अपन संग फुलपरास वालीकेँ सिनेमा देखबए लऽ जाइत छथि जइठाम मीनाक्षी अर्थात् फुलपरासवालीक हाथ विलट भाइक एकटा लुच्चा मिऋ पकड़ि लैत अछि। बादमे बिलट अपन अधलाह कर्मपर प्रयश्चित सेहो करैत छथि। ऐ बीच कथाकार कथानककेँ थोड़े मोरि दैत छथि। फुलपरास वाली जे मणि बाबूक भौजी थिकीह तिनकासँ प्रेम करबाक नाटक। अश्चर्य मानल जाए जे नारी विमर्शमे राजकमलक लेखनी कतए धरि भसिया जाइत छन्हि। ओना देओर अर्थात् मणिबाबू मीनाक्षीकेँ अपन पियासक शिकार नै बना सकलनि। किएक तँ पतिक देल पीड़ासँ मैथिल नारी आत्मासँ कानि तँ सकैत अछि मुदा अपन पतिकेँ छोड़ि अान पुरुषकेँ अपन सर्वस्व न्योछावर करबाक कल्पनो नै करत। एेठाम कथाकारक दृष्टिकोण साफ आ समाजक लेल आदर्श मानल जाए। जौं दोसर अर्थमे सोचल जाए तँ विजय कुकर्मी पुरुषेकेँ भेल। अपने कोनो कर्म करब, पथभ्रष्ट भऽ जाएब मुदा जीवन संगिनी सदिखन संग देत, संभवत: यएह कारण थिक जे पुरुष कोनो हद धरि खसि जएबामे संकोच नै करैत अछि आ तथापि ओकरा विश्वास रहैत छैक जे गृहिणी कदापि नै विमुख हएत। विहनि कथाक विकासमे राजकमलक सेहो किछु योगदान छन्हि। “किरतनियाँ” सर्वकालिक विहनि कथामे अपन विशेष महत रखैत अछि। एकर कारण जे राजकमल ऐ कथाक माध्यमसँ पहिलुक बेर मिथिलांक ब्राह्मण समाजसँ इतर भऽ कथा लिखैत छथि। किरतनियाँ कोनो भजन संकीर्तण मण्डलीक सदस्य नै एकटा भिखमंगनी बालिका अछि। जौं सवल परिवारमे जनमलि रहैत तँ उमेर पढ़ब लिखब आ नेनपनक भभटपन करबाक छल। मुदा गरीबक कोन शेखी। माए-बाप कहिया जहान छोड़ि देलक पता नै। 80-90 वर्षक बुढ़िया मइयाँक संग भीख मंगैत अछि। पूस मासक जाड़मे बुढ़िया लटुआ कऽ खसि पड़ल। ऐ घटनाक तीन दर्शक नांगड़ा, झपसुआ आ भिखमंगाक मेट चन्नरदास छल। नेंगरा कोनो नामकरण संस्कारसँ देल नाओं नै। नांगड़ तँए नगड़ा ओना भिखमंगाक नामे की...? कथाकारक दर्शन नीक लगैत अछि। झपसुआ नामधारी जीव आ चन्नरदास दिनमे निपट्ट अन्हारक भूमिकामे भीख मंगैत अछि आ रातिमे अपन वास्तविक रूपमे। कथाकार ऐ प्रसंगसँ प्रमाणित करबामे सफल होइत छथि जे जीवनक मंच आ रंगमंचमे भिन्नता छैक। बुढ़िया मरि गेल ओकर लहास लग बैसि किरतनिआँ चन्नरदास संग भीख मांगि लहास जरेबाक लेल नाटकीय क्रीड़ा करैत अछि। भीखक कैंचा गनि-गनि सवा तीन टका पूरा कएल गेल, मुदा लहास नै जराओल जाएत। किरतनिआँ बाजलि- “एह! तीन टकामे हम दुनू आठ दिन ताड़ी पी लेब।” चन्नरदास अपन उद्देश्यमे सफल होइत अछि। ओकर उद्देश्य छल बाल जीवनसँ युवती बनलि किरतनियाँक शारीरिक दोहन। आब किरतनिआँ सेहो निडर भऽ गेली। स्वाभाविक छैक जखन नारी कलंकिता बनि जाइत अछि तँ िनर्लज्ज होएब निश्चित भऽ जाइछ। कथाक गतिमे गेलासँ ई प्रमाणित होइत छैक जे ऐ तरहक स्थितिक लेल दोषी ई पुरुष प्रधान समाज रहल। बिम्ब आ शिल्प दुनूमे ई कथा राजकमलक सर्वश्रेष्ठ कथामे सँ एकटा मानल जाए। सबल पक्ष ई जे कथा समाजक सभसँ अंतिम वर्गक जीवन शैलीक कथा थिक। एकटा आन विहनि कथा पनिडुब्वी सेहो राजकमलक श्रेष्ठ कथामे स्थान रखैत अछि। हिनक अधिकांश कथा ब्राह्मण-परिवार विषयमूलक अछि मुदा एकटा कथा “मलाहक टोल : एक चित्र” समाजमे पिछड़ल वर्गक नारीकेँ केन्द्रित कऽ कऽ लिखल गेल तीन नायिका पिरितिआ कमली आ केतकीक कथा िथक। एे कथामे राजकमल मूलत: नारी विमर्शकेँ बिम्बित कएलनि मुदा ऐठाम ई अवश्य प्रमाणित भऽ गेल जे समाजक कात लागल वर्गक नारीमे साहस, चेतना आ दृढ़ निश्चय समाजक अधिष्ठाता वर्गक नारीसँ बेशी अछि। तँए ऐ वर्गक नारी अपन इच्छानुसार अधोगतिकेँ प्राप्त तँ कऽ सकैत अछि मुदा ओकरा संग कियो जबरदस्ती नै कऽ सकैछ। जौं कियो करबाक प्रयास करत तँ “कैतकी” जकाँ समाजक कात लागल र्वगक नारी रूद्रा बनि तिरपित मिसर सन चरित्र हीन व्यक्तिक हत्या तक कऽ सकैत अछि। ऐ प्रकारक घटना समाजमे होइत रहल तँए राजकमल जीक प्रयास ऐठाम उचित मानल जाए। प्रयोगकेँ बादक धरातलपर आनैबला राजकमल मैथिली साहित्यमे कथाकेँ विशेष स्थान दिऔलन्हि। हरिमोहन आ ललित जकाँ हिनक कथा पाठकमे प्रिय अछि। जौं अल्पायु (मात्र 39 बर्ख) मे कालकलवित नै भेल होइत अछि तँ भऽ सकैत छल जे आगाँ आर परिपक्व भऽ कथा जगतमे प्रवेश करितथि। मुदा हिनक कथाक सभसँ पैघ कमी रहल नारी सौन्दर्य आ अनैतिक संबंधकेँ मूल बना कऽ किछु कथा लिखि साहित्यमे अनैतिक संबंधकेँ बलशाली बनेबाक प्रयास कएलनि। ओना ऐ तरहक घटना समाजमे होइत रहल अछि मुदा सत्यकेँ नांगट कऽ कऽ छोड़ि देलासँ साहित्य सबल नै भऽ सकैछ। दोसर किछु कथाकेँ जौं छोड़ि देल जाए तँ कथाकार स्वयं फूलबाबू बनि कथा नायक बनल छथि मुदा सोचमे पारदर्शी नै। राजकमलकेँ सम्पूर्ण कथाकार तँ नै मानल जा सकैछ मुदा “शिल्पी”क रूपमे मैथिली कथा जगतक विशिष्ट कथाकार तँ अवश्य छथि। कृष्णजन्म :: कथाकाव्यक सूत्रपात मैथिली साहित्यमे महाकाव्यक पहिलुक छाँह रतिपति भगतक “गीत-गोविन्द”सँ सन 1723ई.क लगिचमे देखएमे आएल। जइ छाहरिकेँ स्पष्ट बिम्बक रूप मनवोध द्वारा 18म शताब्दीक मध्यमे “कृष्ण जन्म” स्वरूपे देल गेल। मनबोध मध्यकालीन मैथिलीक विशिष्ट रचनाकार मानल जाइत छथि। जौं पदावलीकेँ छोड़ि देल जाए तँ ज्योतिरीश्वर आ विद्यापतिक अधिकांश रचना तत्समसँ लीपित छल। मनबोधक प्रवेश मैथ्ज्ञिली काव्य जगतमे अत्यन्त महत्वपूर्ण किएक तँ “कृष्णजन्म” तत्सम परम्पराकेँ तोड़लक मात्र नै संग-संग चन्दा झा रचित मिथिला भाया रामायणसँ आधारशीला सेहो प्रदान कएलक। डाॅ. ग्रियर्सनक मते कृष्णजन्म महाकवि विद्यापति आ आधुनिक मैथिलीक हर्षनाथ झा आर तत्कालीन अन्य महाकाव्यक योजक कड़ी थिक। ई िनर्विवाद सत्य जे कृष्णजन्मक भाषा ओ शैली संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश ओ अवहट्ठसँ विलग जनभाषामे रचत पहिलुक काव्य थिक। रतिपति भगतक गीत-गोविन्दक विपरीत कृष्णजन्मक व्यापक प्रचार-प्रसार भेल किएक तँ कतौ भाषामे क्लिष्टता नै। तँए प्राय: सभ समालोचक एक मतेँ स्वीकार करैत छथि जे तुलसीकृत रामचरित मानस जकाँ “कृष्णजन्म” मैथिली साहित्यकेँ प्रबंध काव्यक पहिलुक सबल स्तंभ प्रदान कएलक। विद्यापतिक रचना रीतिकाव्यात्मक मुदा मनवोध ऐ परम्पराकेँ तोड़ि जे नवल बिम्ब ओ शैलीक सृजन कएलनि ओइसँ चन्दा झा अवश्य प्रेरित छथि। सुभाषचन्द्र यादव लिखैत छथि “मनवोध” कथाकाव्यक परम्पराक आरंभ कएलनि। श्रृंगारिक काव्य परम्पराकेँ विराम दऽ कऽ ओ वात्सल्य भावसँ युक्त रचनामे विशेष रूचि देखैलनि। मनवोध विषय आ शिल्प दुनू स्तरपर परम्पराक अतिक्रमण करैत छथि। विषयक स्तरपर कृष्णक नेनपन आ पराक्रम हुनका आकृष्ट करैत छन्हि तँ शिल्पक स्तरपर चौपाइ। लोक भाषासँ सम्पृक्ति सन विद्यापतिक परम्पराकेँ मनवोध अखुण्ण बनौने रखैत छथि। दुर्गानाथ झा श्रीशक शब्दमे “अठारहम शताब्दीक अंतिम चरणमे मनवोध अवश्य कृष्णजन्मक रचना कएलनि ओ अद्भुत लोक भाषात्मक प्रवाह ओ विलक्षण संक्षिप्त मुदा सजीव वर्णनक दृष्टिसँ लोकप्रिय सेहो भेल। परन्च कृष्णजन्मसँ प्रबंधकाव्यक विकास परम्परा स्थापित नै भेल। ई स्थापित भेल कवीश्वर चन्दा झाक मिथिला भाषा रामायण एवं लालदासक रमेश्वर चरित रामायणसँ। “कृष्णजन्म झुझुआन काव्य तँए महाकाव्य वा प्रबंध काव्यक श्री गणेश श्रीष एकरा नै मानैत छथि संग-संग महाकाव्यीय परम्पराक सर्ग विभाजन ऐमे नै भऽ कऽ अध्यायमे बिभक्त अछि। एकर एकटा आर िनर्वल पक्ष जे अठारह अध्यायमे विभक्त ऐ कृतिक पहिल दस अध्याय मात्र मौलिक आ खॉटी मैथिलीमे रचित अछि। अन्य आठ अध्याय जनभाषा ओ रचनाक दृष्टिऍं विवादित तँए श्रीश जीक मत अंशत: सत्य मानल जाए मुदा महाकाव्यीय मरम्पराक पहिलुक अनुपालन कृष्णजन्ममे भेल तकर प्रणाण एकर पहिल अध्यायक उल्लेखमे तँ मंगलाचनण नै थिक मुदा आर्यभाषाक महाकाव्यक मूल बिन्दु मंगलाचरणक छाँह ऐठाम अवश्य भेटैत अछि- प्रणमो गिरिवर कूमारि-चरण जे वल कवि सभ त्रिभुवन वरन हमहू कएल अछि मन मड़ गोट कृष्णजन्म परिणय नै छोट कोनपर होएत तकर निरवाह एखन लगै अछि अगम अथाह... मनबोध सोलह कलासँ निपुण कृष्णकेँ ऐमे कोनो अभिसार पथपर विहुँसैत राधाक सिनेही नै बनौने छथि। मनवोधक कृष्ण वास्तममे नायक छथि। ‘धर्म संस्थापनार्थाय सम्भामि युगे-युगे’क हुंकार भरैबला कृष्णक मात्र जन्म कथा नै, मात्र प्रीति गाथा नै हुनक समग्र जीवन दर्शनक अभिप्राय थिक ‘कृष्णजन्म’ भागवत ओ हरिवंश पुराणक कथापर आधारित ‘कृष्णजन्म‘क नायक कृष्ण राम जकाँ गंभीर, लक्ष्मण जकाँ मर्यादित सिनेही, स्वंय कृष्ण जकाँ वात्सल्य भावसँ भरल शिशु आ नरसिंह जकाँ आक्रोशित दुष्ट नाशक छथि। ऐमे पहिलुक क्रांति जे कृष्ण जीवन वृतांतक धार श्रृंगारसँ कर्त्तव्यवोध धरि चलि आएल। बाल मनोविज्ञानक विश्लेशणक दृष्टिऍं कृष्णजन्म पहिलुक वास्तविक वाल्य शैलीसँ भल महाकाव्य थिक- गुड़कल-गुड़कल भिडुकल जाए जतय अछल दुइ िवर्छ अकाय जमला अर्जुन कनला-नाथ जुगुति उपारल छुइल न हाथ खसल महातरू हँसल मुरारि भेल अघात जगतपर चारि.... डाॅ. चेतकर झाक शब्दमे वस्तुत: ई पौराणिक महाकाव्य मात्र थिक आकि महाकाव्य ई अखन चरि विद्वत समाजमे विवादक विषय बनल अछि। विवादक विषय ईहो अछि जे अठारह अध्यायमे विभक्त“ कृष्णजन्म” सम्पूर्ण रूपेँ मौलिक अछि आकि मात्र दस अध्याय धरि। समालोचकक मन्तव्य जे होन्हि मुदा ई अक्षरश: सत्य जे कृष्णजन्मक रीति नीति आधार-विचार, खान-पान, बात-विचारक संग-संग व्यवहार मिथिलाकसँ प्रभावित अछि। लगैछ जेना कृष्णक कथा गोकुलक कथा नै मिथिलाक कोनो भूभागक कथा थिक। गाम भरि हकार, चुमाओन, तेल-सेनूर, नाच-गान, भदवा, सोहर, वटगवनी, झटहा आ ठेंपा फेंकब, टेलवा टेलइक खेल खेलाएब सन खाँटी मैथिल परम्परा ऐ काव्यकेँ मिथिला धरापर जीवन्त कऽ देलक। म. म. डाॅ. उमेश मिश्रक अनुसार ई कथा दशम अध्याय धरि श्रीमद्भागवतक दशम स्कंधक पूर्वाधक आधारपर लिखल गेल अछि, एगारहमक अध्यायसँ अन्त धरि हरिवंश विष्णुपर्वक आधारपर लिखल गेल अछि। प्रो. रमानाथ झाक कहब छन्हि- “मनवोध पहिल कवि छलाह जे अपन कृष्णजन्ममे श्रृंगार रससँ शून्य भक्ति रसमय एकछन्द मे जे राग ताल प्रभृति गीतक विषयसँ रहित अछि अपन एक गोट नूतन शैलीमे काव्यक रचना कएलनि। ई छन्द आब चौपाइ कहल जाइत अछि परन्तु ताहि दिन ई गाहिक मेर बूझल जाइत छल।” राग-लय, गति, यति ओ नियतिक रचनात्मक मर्यादा जे हुअए अपितु ई अक्षरश: सत्य जे कृष्ण जन्मक महाकाव्यीय सृजनतामे वएह मौलिक स्थान जे स्थान संस्कृत साहित्यमे वेदव्यास ओ वाल्मीकिक अछि। अर्थातृ वेद व्यास ओ वाल्मीकि हदृश मनवोध मैथिली महाकाव्यक शलाका पुरुष छथि। सुमन जीक शब्दमे प्रकृति वर्णन, भने ओ जड़ प्रकृति होअ अथवा मानव प्रकृति मनवोधक रचनामे सहज, सुबोध एवं हृदयावर्जक बनल अछि। संज्ञा, क्रिया विशेषण, नामधातु ओ अनुध्वनिक विलक्षण प्रयोग ऐमे भेटैत अछि। मैथिली काव्यमे गीत-शिल्पक जे परम्परा छल तकरा लागि स्वतंत्र कथा-काव्यक पहिल प्रयोग “कृष्णजन्म”मे भेल। बाल साहित्यक दृष्टिसँ जौं देखल जाए तँ प्रयोगकेँ वादक धरातलपर आनि महाकाव्यक रूप रेखामे बाल मनोविज्ञानकेँ पूर्णत: स्पर्श मनबोधसँ पूर्व कियो नै कऽ सकलाह। शब्द-शब्दमे प्रवाह हास्य स्पर्शी ओ सजीव अछि। तँए दशम अध्याय धरि उत्तर आधुनिक काव्यक लेल सेहो अनुगामी तँ रचनाकालमे एकर महत्व की हएत ई मंथनक विषय थिक। तँए ई सत्य मानल जाए जे मात्र एक छन्दमे लिखल समस्त महाकाव्यक शैलीक ई मैथिलीक प्रयोग ग्रंथ थिक जे भाषा विन्यासक संग-संग बिम्बक मौलिक स्पर्श आ बाल साहित्यक लेल अखन धरि उपयोगी अछि। क्षणप्रभा “क्षणप्रभा”क अर्थ होइछ बिजरी जेकरा प्रबुद्ध जन तड़ित कहैत छथि। हम कोनो नैसर्गिक कवि नै, क्षणिक भावना कविताक रूपेँ अभिव्यक्त भेल जेकर प्रासंगिकताक िनर्णए पाठकगणपर छन्हि। हमर कहब मात्र इएह जेे हमर ई पहिलुक प्रयास थिक ऐमे काव्य लक्षणा ओ व्यंजनाक अनुपालन भेल वा नै ऐ विषयमे हम किछु नै कहि सकैत छी, मात्र इएह कहबाक लेल नीति संगत हएत जे जइ भाषाकेँ बाल कालहिंसँ िहआमे लगा कऽ रखलौं ओइ भाषामे अपन किछु अभिव्यक्ति पाठकगण लग परसि रहल छी। हमर जन्म अपन मातृक बेगूसराय जिलाक मालीपुर मोड़तर गाममे भेल। कहिओ ई भूमि मैथिलीक प्रांजल कवि फजलुर रहमान हासमी जीक कर्मभूमि छल। हमर पिता मैथिलीक चर्चित आशुकवि कालीकान्त झा ‘बूच’ आ हासमी जीमे बड़ आत्मीयता छलनि। माए चन्द्रकला देवी सेहो मैथिलीमे किछु पद्य लिखने छलीह। बालकाल मातृकमे बीतल, तकर बाद पैतृक गाम उदयनाचार्यक भूमि करियनक माटि-पानिमे रमि आगाँ बढ़ैत गेलौं। पिताक कवित्वक कारणेँ महाकवि आरसी, चन्द्रभानु सिंह, प्रवासी प्रो. नरेश कुमार विकल, प्रो. विद्यापति झा, प्रो. राम कृपाल चौ. राकेशसँ परिचय भेल। तकर परिणाम थिक ई छोट-छीन कृति। बहिरा नाचए अपने ताल प्रस्तुत शीर्षक हमर कोनो अपन रचनात्मक क्रियाशीलता नै बाल-कालमे “मिथिला मिहिर” पढ़ैत छलौं। साप्ताहिक मिहिरक सभ गोटे अंकमे ऐ शीर्षकसँ एकटा स्थायी स्तंभ छपैत छल। बड़ बेथा भऽ रहल अछि जे भारत वर्षक प्रमुख भाषा सभ उत्तर आधुनिक साहित्यक रूपेँ अपन-अपन संस्कृतिसँ भाषामे ओझाराएल छी। ई सर्वथा सत्यसँ बौद्धिक प्रभाव बेशी रहैत अछि, परंच एकटा आर गप्पपर जौं आत्मीय भऽ कऽ धियान देल जाए तँ सामाजिक स्ांरचनाक मध्य सामंजस्य होइछ। सनातन संस्कृतिमे “जाति”क विभेद बेशी रहल मुदा सभ वैदिक संस्कारमे अछोपक महतकेँ संहो नकारि नै सकैत छी। हमरे पूर्वज लिखने छथि “कर्म प्रधान विश्व करि राखा” प्राचीन भलमानुष शब्देटा मे सही एकरा स्वीकार तँ कएलनि। तँए सभकेँ जातिसँ अपन उठि कऽ सोचबाक चाही। आन जातिकेँ के कहए मिथिलामे तँ ब्राह्मणोक मध्य बड़का विदेह छैक, जौं ई विभेद मात्र वैवाहिक संस्कार धरि सीमित रहिते छल तँ येन-केन प्रकारेण स्वीकारर्य, मुदा “पिपरी” जे हमर भोज्य संस्कृति विशेष चिन्ह थिक ओकरो देबएमे बड़ भारी खाधि भऽ गेल छैक। अन्तद्वन्द्व मात्र एतबे धरि नै भलमानुष वर्गक कोनो कवि तँ एतए धरि लिखने छथि- अड़ड़िए कोदड़िए आ मुसवरय, ई मरय तँ मौथिलक पाप टरय अड़ड़िए मैथिल ब्राह्मणक एकटा मूल होइछ, ऐ श्रेणीक ब्राह्मण दड़िभंगा जिलाक “नेहरा” आ समस्तीपुरक भिड़हा गाममे भरल छथि। वएह नेहरा जकरा कहियो “मिथिलाक पोरिस” कहल गेल अछि। आब कहल जाए “मैथिल” ऐ दोहामे कवि ककरा मनने छथि? मात्र श्रोत्रिय, भलमानुष आ उच्चमूलक जयवार ब्राह्मण। जौं एहेन कवि लेल आन ब्राह्मणों अछोप तँ आन जातिकेँ की कहल जाए? विद्यापति स्मृति पर्व समारोह वा कोनो मंच हुअए हास्यपर थपड़ी बजएबाक लेल ऐ प्रकारक दोहा मिथिलाक पहिचान मानल जाइ रहल अछि- रैनी भैनी ओ रौतिनियाँ दीप गोधनपुर कैथिनियाँ पाँच गाम पचही परगन्ना उत्तम गाम ननौर तेली सूरी बसए मधेपुर लंठक ठठ्ठ लखनौर’ जौं मधुबनी जिलाक मात्र ऊपर िलखल किछुए गाम भलमानुषक गाम तँ गोपेश, सरस, गजेन्द्र वा आनंद भलमानुष्ज्ञ नै? समस्तीपुर जिलामे भलमानुषक तात्विक विवेचन तँ आर विचित्र ढंगे कएल गेल अछि- “श्रोत्रिय सलमपुर रानी टोल किछु घर टभका आर सभ चोर” धन्यवाद देबाक चाही एहेन प्रसंगक व्याख्या जे ई बिसरि गेल छथि जे “चोर”क कोनो जाति नै होइत छैक, ओ कथाकथिक भलमानुषक परिवारमे सेहो जन्म लऽ सकैत छथि वा लैत छथि। केओ नै सोचलथि जे हरिवंश तरूण सन प्रांजल साहित्यकार मात्र एक्केटा मैथिली रेडियो नाटक “उगना रे मोर कतए गेलैं” किएक लिखलथि? एकबेर समस्तीपुरक लब्धप्रतिष्ठ शैल्य चिक्ित्सक डॉ. आर.पी.मिश्रा हिन्दुस्तान दैनिकमे अपन आलेख लिखने छलाह जे अधिकार देबए काल हमरा सभकेँ दक्षिनाहा कहल जाइत अछि तखन मैथिलीकेँ आगाँ बढ़एबाक आशा हमरासँ किए करैत छथि? फनीश्वरनाथ रेणु, पोद्दार रामावतार अरूण सन रचनाकारक केओ मैथिलीमे लिखबाक प्रेरणा किएक नै देलकनि? गजेन्द्र ठाकुर, उमेश मण्डल आ शिवकुमार झा सन साधारण लोक समाजक सभ वर्गक रचनाकारकेँ प्रत्साहित कऽ सकैत छथि तँ प्रवीण साहित्यकारसँ की हमर आश रखनाइ अपराध? भुवनेश्वर सिंह भुवनकेँ अर्न्तमनसँ श्रद्धांजलि दैत छियनि जे एकटा हिन्दीक महाकवि आरसी प्रसाद सिंहकेँ मैथिलीमे लिखबाक प्रेरणा देलनि। जखन समस्तीपुरमे मैथिलीक अस्तित्वक रक्षार्थ आन्दोलन होइत अछि तँ डाॅ. नरेश कुमार विकल सभसँ आगाँ रहैत छथि। 1960-70मे हिनक कविता सभ मिथिला मिहिरमे छपैत छल तखन मैथिली साहित्यक इतिहासमे डॉ. दुर्गानाथ झा श्रीश हिनक नाओं किएक नै देलन्हि? हमर कहब ई नै जे सबहक दृष्टिमे सभलोक रहिते छथि, मुदा जौं आत्मीय भऽ कऽ सोचल जाए तँ सभ प्रश्नक समाधान छैक। “मिथिलामे रहनिहार सभ लोक मैथिल” ई उल्लेख सभ मंचपर कएल जाइत अछि। ऐ तरहक उल्लेखसँ भ्रम उत्पन्न भेनाइ स्वाभाविक। जेना अपना चारि बेटामे सँ कोनो बेटाकेँ बेर-बेर माए कहैत छथि जे “तौं हमरे बेटा छेँ।” तँ ओहि पुत्रक दिमागमे निश्चित उत्पन्न हएत जे शायद हम दोसर नारीक पुत्र छी। अंतमे, हमर आग्रह यएह जे सम्यक् दृष्टिकोण राखब अनिवार्य आ संस्कृतिक रक्षार्थ सबल तत्व मानल जाए, नै तँ समानांतर धार बहबे करतीह आ साहित्यक लेल ओ क्षण आत्मघाती सेहो हएत। मिथिलाक लोक देवता :: कोनो साहित्यक समृद्धिक आधार महाकाव्य, प्रवेध काव्य उपन्यास वा कथाक उत्तर आधुनिक विवेचनकेँ मानल जाइत अछि। ऐ दिशामे मैथिली एखन बड़ पाछू अछि किएक तँ समग्र साहित्य विधाक परम्परागत रूपसँ ई भाषा बाझल मानल जा सकैछ। साहित्यक विकास तखने संभव जखन भाषाक दीर्घकालीन संभावना परिलक्षित होएत। पुरना पिढ़ी झखड़ि रहल छथि आ नवका पिढ़ीमे शिक्षाक माध्यम अंग्रेजी तखन मैथिलीक अस्तित्वपर अपने आप प्रश्नचिन्ह लागब दर्शनीय। गाम-घरक नेना-भुटकाकेँ जौं छोड़ि देल जाए तँ मैथिल परिवारक शैशवक मातृभाषा निश्चित रूपेँ बदलि रहल। प्रारंभिक शिक्षाक माध्य अंग्रेजी आ हिन्दी थिक। ऐ दशामे साहित्यसँ बेशी आवश्यक अछि भाषाकेँ बचाएब। मैथिली तखने अपन आस्तित्वकेँ दृढ़ रूपेँ राखि सकतीह जखन नवका पिढ़ीमे मातृ आ वात्सल्य सिनेहक वेदना हुअए। एे लेल आवश्यक अछि बाल मनोविज्ञानकेँ स्पर्श करएबला बाल साहित्यक प्रोत्साहन। ऐ दिशामे कहबाक लेल तँ बहुत रास कार्य भेल अछि परंच वास्तविक बाल साहित्यमे आधुनिक पिढ़ीक रचनाकारक समूहमे अग्रगन्या छथि श्रीमती प्रीति ठाकुर। हिनक तेसर पोथी ‘मिथिलाक लोक देवता’ श्रुति प्रकाशनक सौजन्यसँ 2010ईं.मे बहार भेल। टी.एस. इलियटक Tradition and the individual talent (1917 AD) क अनुसार कोनो कवि, कथाकार वा कलाकार स्वयंमे पूर्ण अर्थ नै स्पष्ट करैत छथि। हुनक कलाक तुलना मृत कवि वा कलाकारक रचनासँ कएलाक बादे हुनक मूल्यांकन कएल जा सकैछ। जौं ऐ मतकेँ प्रासंगिक मानल जाए तैयो प्रीतिजी अतुलनीय छथि किएक तँ हिनकासँ पूर्व ऐ प्रकारक चित्रात्मक आ लयात्मक शैलीमे बाल गद्य पहिने मैथिलीमे लिखल नै गेल। ई अक्षरश: सत्यो थिक किएक तँ आदि पुरुषक माथपर पाग रखबाक साहस कियो नै कऽ सकल। संगहि ऐ तथ्यकेँ जानब सेहो आवश्यक जे अन्य भाषा समूहसँ तुलनाक बाद प्रीतिजी कतए छथि? ‘सामा चकेबा’ परम्परागत जनश्रुति आ पौराणिक कथाक आधारपर मिथिलाक गाम-गाममे प्रचलित कार्तिक पूर्णमासीक पावनि िथक। ऐ कथाकेँ ऐ पोथीमे सम्मिलित कऽ प्रीतिजी कोनो नव रचनात्मक कार्य नै कएलनि परंच अनचोकेमे नवका पिढ़ीकेँ अपन संस्कृतिसँ अवश्य अवगत करा देलखिन। अनचाेेके शब्दक प्रयोग ऐ दुआरे कएलौं किएक तँ बहुत रास गामसँ ई पावनि लुप्त भऽ रहल अछि शहरमे तँ एकर अस्तित्वक कल्पना करब सेहो असंभव। आन ठाम जकाँ मिथिलामे सेहो पलायनवाद हाबी भऽ गेल छैक। कोनो आवश्यक नै जे पलायनक बाद लोक अपन संस्कृितकेँ दड़भंगिया प्रभावमे झाँपि कऽ राखि सकथि। तँए एहेन पावनिक चर्च आधुनिक पिढ़ी लग आवश्यक। जखन चर्च हएत तँ भऽ सकैछ जे प्रवासी नेनामे ऐ प्रकारक संस्कृतिसँ जुड़ल रहबाक प्रेरणा जागए। मधुश्रावणी वा कोजगराक सदृश सामा चकेबा कोनो जाति विशेषक पावनि नै थिक वरन् ई सम्पूर्ण मिथिलाक प्रतिनिधित्व कएने अछि। साहित्यानुरागी लोकनि ऐ पोथीकेँ रचनात्मक कथा (creative story) नै मानताह ई ध्रुव सत्य किएक तँ एकर कथा सभा नूतन कल्पना नै भऽ कऽ परम्परागत शैली आ कथाक प्रतिरूप थिक। ऐ दुआरे रचनाकारक आलोचना सेहो संभव अछि। मुदा ई धियान राखब सेहो आवश्यक जे अबोध नेनाकेँ क्लिष्ट साहित्यसँ कोनो सिनेह नै होइछ। आे तँ महाकाव्यक पाँतिसँ बेसी ‘आनी-मूनी हम नै जानी’ सदृश अर्थहीन पाँतिसँ सिनेह रखैत अछि। तँ चालनि बाढ़नि डेढ़ बितना, जेहन करनी, चारि बटोही बगियाक गाछ आदि जनश्रुतिसँ संबंधित कथानककेँ बाल मनोविज्ञानसँ संबंधित माननाइ उचित हएत। लेखिका पहिनहि इमानदारीसँ ई स्वीकार कएने छथि जे बाल कालमे बूढ़-पुरानक मुखसँ जे सुनने छलीह तकरा अपन शब्दमे कथाक रूप दऽ देलखिन। ऐ पोथीक सबल पक्ष अछि कथा चित्रात्मक विवेचन। मोती सायर, लालवन बाबा, गरीबन बाबा, बिहुला, सीता आ सुग्गा, आयाची मिश्र, पक्षधर मिश्र आ उगना सन कथा चित्रकेँ तैयार करबामे कतेक मेहनति आ समए लागल हेतनि ओ तँ लेखिके कहि सकैत छथि। परंच ई चित्र अपन विविध मूक शैलीमे नेना-भुटकाक संग अवश्य वार्तालाप करत। आलोचनात्मक पक्षसँ जौं देखल जाए तँ एकरा आन भाषा साहित्यक कॉमिक्ससँ बेसी नै मानल जाएत। मुदा एहेन दीर्घसूत्री आलोचके कऽ सकै छथि। किएक तँ ई कोनो कम्प्यूटरक खेल नै अपन मस्तिष्कमे उपजल बालउद्वोधनक चित्रात्मक शैली थिक जे समालोचनाक भयसँ मुक्त रहैत लेखिका मात्र नेनाक लेल कएने छथि। रंग समंजन सेहो नीक लागल। अंतिम किछु चित्र श्वेत-स्याम रूपेँ देल गेल जइमे नेना स्वयं रंगरोगन कऽ सकैत छथि। ऐ पोथीक कथानक परम्परागत अछि मुदा शैली आ चित्रांकन नव तँए अपन उद्देश्यमे रचनाकार सफल छथि। दुर्बल पक्ष जे चित्रक संग जे किछु कथा देल गेल अछि ओकरा आर विस्तृत कएल जा सकैत छल। जेना मोती सायरसँ लऽ कऽ मीरा साहेब धरिक चित्रकथामे कथानक एकाएक बदलि जाइत अछि। जे सारंश जकाँ लगल। मुदा आशा करैत छी जे नेना सभकेँ नीक लागि रहल होएतनि। इन्द्रधनुषी अकासमे सामाजिक विमर्श :: “इंद्रधनुषी अकास” आधुनिक मैथिलीक चर्चित गद्यकार श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक पहिल पद्य संग्रह अछि। जगदीशजी सन् 2008सँ पूर्व मैथिली साहित्यक लेल अनचिन्ह नाओं छलाह, मुदा गत तीन-चारि बरखक भीतर हिनक विविध बिम्बक उपन्यास, कथा संग्रह, नाटक, बाल गद्य साहित्य आदिसँ मैथिली साहित्यकेँ उतर आधुनिक युगमे प्रवेशक अवसरि भेटि गेलनि। मूलत: कथाकार आ उपन्यासकार जगदीश प्रसाद मण्डल कोनो चन्दा झा सन प्राचीनता ओ नवीनताक सन्धिक कवि नै आ ने हिनक रचनामे परम्परावादी प्रीतिक कतहु दर्शन होइछ। भुवनेश्वर सिंह भुवन जकाँ ने जगदीश नवीन प्रगीत काव्यक व्याख्याता छथि आ ने आरसी प्रसाद सिंह जकाँ आशु कवि। 110 कविताक संग्रह “इंद्रधनुषी अकास”मे जे ई वैशिष्ट्यता प्रमाणित कएलनि ओ अछि सम्पूर्ण समाजक लेल समन्वयवादी दृष्टिकोणक दार्शनिक अवलोकन आ अर्थनीतिक सम्यक विश्लेषण। अनचोकेमे कविता सबहक रूपेँ हिनक विराट सरल जीवन दर्शन प्रदर्शित होइत अछि। “मणि” विषधर साँपकेँ सेहो मनोरम बना दैत जकर लोभमे सपेरा सबहक अंत भऽ जाइछ। ओ मणि तँ वैज्ञानिक दृष्टिकोणसँ काल्पनिक थिक, मुदा मणि कवितामे कवि अपन मनक मनोभावकेँ मढ़ि-मढ़ि मणि’क रूप रेखाक संदेश दैत छथि। भाववाचक संज्ञा थिक-मणि मुदा जाति आ व्यक्तिक रचनाक लेल भावक आवश्यकता प्रासांगिक होइछ। जखन अर्न्तमनमे दिव्य ज्योति जागत तँ तन अवश्य प्रज्जवलित हएत। लक्ष्मी तखने औतीह जखन कर्मपथ उज्ज्वल हएत। कर्मपथकेँ प्रकाशित करबाक लेल स्वस्थ मोनक आवश्यक्ता होइत छैक। पहिने ई अवधारना छल जे स्वस्थ शरीरमे स्वस्थ मनक निवास होइत छैक, मुदा आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टकोणे ई मिथ्या प्रमाणित भ्ाऽ रहलैक। व्यस्त जीवन शैलीमे मोन अस्थिर भऽ गेल छैक। बिनु कर्मक अधिक प्राप्तिक तृष्णासँ मनमे विचलन स्वाभाविक जइसँ मोन अस्वस्थ। जखन मोन अस्वस्थ तँ शरीरक अस्वस्थ हएब कोनो अजगुत नै। ‘चिन्ह बिना औषधि भारी’ वैज्ञानिक दृष्टिकोणसँ अक्षरश: सत्य मानल जाए। सोडियम कार्बोनेट धोविया सोडर थिक आ सोडियम बाइकार्वोनेट पेटक अम्लीयताकेँ दूर करैत अछि। मात्र ‘वाइ’ शब्द हटलासँ जौं उलटा सेवन हएत तँ जीवन वाइ-वाइ भऽ सकैत अछि। मुदा सामाजिक जीवनमे धोवियो सोडर अनिवार्य किएक तँ मात्र पेटक अम्लीयता दूर कएलासँ शरीरक मोइल नै धोअल जा सकैछ। तँए जीवनमे सबहक लेल समायुसार स्थान देल जाए। ‘श्रेष्ठ जीवन मानव कहबै छै मानवता उद्देश्य जकर’ ऐ पॉतिसँ रचनात्मक समन्वयवादी न्याय दर्शन प्रदर्शित होइत छैक। समाजक आगाँ पॉतिक लोक जखन कात लागल वर्गकेँ मर्मािहत करैत अछि, तखन कातक लोक सेहो उग्रता प्रदर्शित करैत अछि। ऐ प्रकारक अदला-बदलाक भाव जगदीश जीक ऐ कवितामे नै भेटल। ई तँ सकारात्मक सोचक आशावादी दार्शनिक जकाँ अपन कविताक इति श्री करैत छथि- ‘मनुखक भेद विभेद मेटबैक छी धर्म ओकर’ संभवत: ब्रह्माक वरद पूत सभकेँ आदर्शवादी बनबाक संदेश देलनि अछि। ओना अलंकार मिलएबाक क्रममे एकठाम चूकि गेल छथि जखने मन मणि बनत छिटकत ज्योति धरतीपर अपने बाट अपने देखब हँसैत चलब पृथ्वीपर ऐठाम पृथ्वी परक स्थानपर ‘परतीपर’ जौं लिखल रहितए तँ शब्द सामंजस्य भऽ सकैत छल। ओना कविक दृष्टिकोण भऽ सकैत छैक जे किछु आर होन्हि। गंभीर आशु काव्यक मान्यता समाप्त होइत मैथिली साहित्यमे विचार मूलक पद्य बिरले भेटैत अछि। जीवन आ आध्यात्मक संबंध चलन्त समाजक बीच देखैमे आबि रहल छैक। सभ दिश भागमभाग सोचबाक लेल फुरसत नै। मैथिली साहित्यमे छायावादक काल िनर्धारण तँ नै कएल गेल अछि, मुदा अनचोकेमे किछु साहित्यकार ऐ काव्य विधापर समए-समैपर रचना कऽ दैत छथि। ‘चल रे जीवन’ कविता आध्यात्मिक दर्शनसँ कर्मशील जीवनक संधि करबामे पूर्णत: सफल मानल जा सकैछ। महाकवि आरसीक कहब छलन्हि जे सभ लोकमे आशुत्व होइत छैक मुदा लेखनीसँ अभिव्यक्त करबाक लेल अर्न्तमन आ आत्माक मिलन जिनकामे हएत वएह ‘आशु कवि’ मानल जएताह। जगदीश तँ आशुकवि नै छथि, मुदा ‘चल रे जीवन’ हिनक क्षणिक अर्न्तमन आ आत्मीय मिलनक परिणामे आशु कविता अवश्य भऽ गेल। जीवनमे गति सर्वाधिक उपयोगी आ सम्प्रभु-सर्वशक्ति मान तत्व थिक। जइ वसुन्धराक माथपर हमर अस्तित्व अछि ओ कखनो ने रुकैत छथि। ग्रह-नक्षण सभ सदिखन गतिमान, अंतिम काल धरि जीवन गतिमान, मुइलापर प्राण गतिमान होइत अदृश्य चक्रमे प्रवेश कऽ जाइत अछि। “यात्रीकेँ आराम कहाँ छै यात्रा पथ विश्राम कहाँ छै।” जे अभागल छथि ओ सुतले रहथि मुदा हुनको शरीरमे क्षिति, जल, पावक, समीर, रुधिरक संग सभ अंग मौलिक रुपसँ गतिमान रहैत अछि। ‘सूर्य-तरेगन सेहो चलै छै’ वैज्ञानिक मान्यतासँ सर्वथा अनुचित मानल जाइत अछि। सूर्य नै तँ उगैत अछि आ ने डुमैत अछि। तँए कविक एक पाॅतिकेँ मात्र उत्साह वर्धनक लेल कवित्वक किछु मंद वात मानल जाए। वास्तविक रूपसँ ई असत्य मात्र कवितेमे क्षम्य जौं कथा रहितए तँ अप्रासंगिक मानल जा सकैत छल। जेना जगदीश कथामे शब्द समंजन कऽ लैत छथि ओना कवितामे कतहु-कतहु ओझरा जाइत छथिन्ह। “समए संग चल, ऋूतु संग चल गति संग चल मति संग चल।” सभठाम ‘संग’ उदेश्य आ कथोपकथनक लेल सर्वथा उचित, मुदा स्वरात्मक पद्यमे कथोपकथनक संग-संग अलंकार आ छंदक सम्मिलन सेहो आवश्यक होइत अछि। ई कविता कोनो अतुकांत कविता नै तँए छंदमे आबद्घ करबाक लेल कविकेँ विशेष धियान देबाक छलनि। जगदीशक शब्द-कोषमे मैथिलीक खॉटी शब्द सभ भरल छन्हि तँए हिनकासँ आर आशा कएल जा सकैत अछि। बाल मनोविज्ञानक दृष्टिसँ ई पद्य उपयुक्त मानल जाए। जे बाल आ युवावस्थाक संधि भऽ सकैत अछि किएक तँ ऐ अवधिमे जीवनक गति-चक्रकेँ बूझब विशेष अनिवार्य होइछ। ऐसँ भाषा-साहित्य विकास सेहो होइत छैक। आरसी प्रसाद सिंह, सोहन लाल द्विवेदी, सुमित्रा नंदन पंत आ हरिवंश राय बच्चन सन हिन्दी साहित्यक ‘आशुकवि’ लोकनिक ऐ प्रकारक पद्य प्रारंभिक आ माध्यमिक शिक्षामे विशेष लोकप्रियता प्राप्त कएने अछि। “टुटए ने कहियो सुर-तार हुअए ने कहियो जिनगी बेहाल।” जखने जीवनमे गति मति आ नियतिक त्रिवेणी अलग-अलग भऽ जाइत अछि तँ जीवन उदासीन आ परिणाम कष्टदायी, तँए कविक ऐ उक्तिकेँ विचारक संग-संग शिक्षा मूलक सेहो मानल जाए। गति बिनु पहिने जिनगी अक्रिय फेर अकर्मण्यता आ परिणाम जिनगी बेहाल, अंकगणितीय आधारपर दृष्टिकोणकेँ प्रमाणित कएल गेल जे सर्वथा उपयुक्त लगैत अछि। जीवन जीवाक कलासँ संबंध काव्यमे प्राय: कवि लोकनि स्वयंकेँ नायक बना कऽ कविता लिखैत छथि। हिन्दी साहित्यमे जानकी वल्लभ शास्त्री आध्यात्म दर्शनक सम्मिलन- “मेरे पथ में न विराम रहा” सँ कएलनि तँ मैथिली साहित्यमे कालीकान्त झा बूच- “मृगी जकाँ हम कॉपि रहल छी, झॉखुरसँ तन झॉपि रहल छी” रूपेँ समाजक रुग्न दशासँ बचि कऽ जीबए चाहैत छथि। मुदा जगदीश ऐ समाजक मैलकेँ साफ करबाक लेल उद्विग्न छथि। ‘धोब घाट’ कविता कोनो मैल वस्त्रक मूल नै, वरन समाजक कृत-कृत्यपर लागल कुचक्रकेँ साफ कऽ कऽ ऐ सँ वचबाक प्रेरणा थिक- “धोइब घाट ओ घाट छी, पाप धुआ पुन बनैत रहैत अज्ञान-ज्ञान राति दिन रगड़ि सान चढ़बैत रहैत” मैथिली साहित्यमे रीतिक त्रिभाषीय नाटक, प्रीतिक महाकाव्य अर्थहीन वैरागी काव्य शास्त्र कखनो विनोदी, कखनो चलन्त कविता आ कखनो नाम-गाम आ ठामक पद्यसँ भरल पद्य संग्रहक प्रधानता अछि किएक तँ भलमानुस जे लिखत वएह कोसक पाथर मानल जाएत। तँए अभावक ऐ साहित्यमे नीतिशास्त्रसँ सन्निहित पद्याभावकेँ ‘धोब घाट’ सन कविता पूरा करैत अछि- उला-पका रातिकेँ साले साल सूर्ज सुड़कैए सुख आरामक पहर छीिन हँसि-हँसि राति दिन झाड़ैए। कोनो आवश्यक नै जे जाज्वल्यमान नक्षत्रक कर्मसँ निकसैत प्रभावक सभटा परिणाम उत्तमे हएत। सूर्य ज्योतिक प्रतीक छथि, मुदा कखनो तँ हिनको किरण जीव-अजीवकेँ उला-पका दैत अछि तत्पश्चात् अन्हार। हिनक प्रतिभा आ कर्मपर कविकेँ कोनो संदेह नै तँए भलमानुसोक अधलाह कर्मक विरोध करबाक चाही। ऐसँ समाजमे दृष्टिकोणक विजय प्रासंगिक हएत। वृक्ष मात्र गगनगामी..... एकर एक दृष्टि एकटा उद्देश्य होइछ परंच शोर विचलनसँ भरल लक्षण रखैत अछि। एक ध्वनि अकास आ दोसर पताल प्रकृतिक रंग बॉसक गिरह जकाँ प्रत्येक दृश्यपर पटाक्षेप। नाटकक अंकमे एकसँ बेसी दृश्य होएबाक चाही, मुदा प्रकृति अर्थात् विधाता अपन प्रत्येक अंककेँ अलग-अलग दृष्यसँ आबद्घ कऽ विविध नाटकीय परिदृश्यक मंचन करैत अछि। ऐ पद्यक प्रत्येक छंदमे विशेष अर्थ झॉपल अछि जे पाठकक मस्तिष्कपर ज्यामितिक दबाब अवश्य बनाएत- जहिना डारि करोटन लीची खोंधिते खोंइचा पकड़ैए निच्चाँ-ऊपर ससरि-ससरि अपन-अपन बाट पबैए भारतीय संस्कृतिक संग ई दुर्भाग्य रहल जे परम्परावादी दृष्टिकोणक किछु अवांक्षित तत्वसँ लोक परेशान तँ छथि मुदा कियो ओकरा समाप्त होमए देबए नै चाहैत छथि। ‘काटर प्रथा’ ऐ रूपेमे सभसँ िनर्घिष्ठ मानल जाए। ‘सासु-पुतोहु वार्ता’मे कवि ओना स्पष्ट रूपेँ काटरक परिणाम स्वरूपक उद्वोधन नै कएने छथि, मुदा परक बेटीकेँ बेटीक रूपमे स्वीकार करब सुसंस्कृत समाजक नारी लेल असहज होइछ। ई विडंवना जे अपन संतानक संग जे सिनेह रहैछ ओ दोसराक संतान जे आब आत्मसात भऽ गेल छथि तिनका लेल असंभव। ओना एकरा स्वार्थ सेहो नै मानल जा सकैछ किएक तँ पुतोहुक आवश्यकता व्याहुत बेटीसँ बेसी होइत छैक। ऐमे प्रतिद्वन्द्वताक भाव रहैत अछि। मनुक्खकेँ अपन अधिकार तँ मोन रहैत अछि मुदा कर्त्तव्यवोधक ज्ञान जिनकामे नै रहत हुनका पारिवारिक शांतिक स्पप्न देखनाइ सर्वता अनुचित आ भ्रामक। प्रतिद्वन्द्विता ऐ खेलमे सासु-पुतोहु दुनू दोषी मुदा सासुक दोख बेसी किएक तँ आनक बेटी अपन घरमे अनलाक बाद हास-परिहास सासुएक मुखसँ पहिने निकलबाक संभावना रहैत छैक- ओसार पुवरिया बैस सासु पड़ल पुतोहुकेँ देल धाही अकड़ि कऽ मकड़ि बाजलि देहक पानि लऽ गेल हाही। ककरोपर जौं झूटका फेंकब तँ प्रत्युत्तरमे पाथर अवश्य भेटत, किएक तँ कियो-ककरोसँ कम नै। अधलाह देखौंस संस्कार मनुक्खमे पहिने अबैछ तँ नवकी कनियाँ कोना चुप रहतीह- पानिये तँ पसरि देहमे पीब गेल सभटा पाणि की करब, फुरिते कहाँ अछि कहाँ पड़ल छी जानि....। ऐ प्रकारक आरोप-प्रत्यारोप ग्रामीण समाजमे बरोबरि देखए मे अबैत अछि। परिणाम परिहासक संग-संग अपन दैनन्दिनीमे लागलि पुतोहु सासुरमे बसलि ननदिकेँ बीचमे सेहो लऽ अबैत छथि। कविक कहबाक उद्देश्य छन्हि जे स्वस्थ जड़िसँ स्वस्थ वृक्षक विकास हएब प्रासंगिक तँए सासुकेँ अपन मर्यादाक स्मरण राखि पुतोहुक संग ओहने बेबहार करबाक चाहियनि जेना बेटीक संग करैत छथि। पुतोहुकेँ सेहो सासुमे अपन माइक छबि देखबाक आवश्यकता छैक। प्रयोगात्मक रूपेँ आब ऐ प्रकारक अनटेटल क्रिया-कलापक संभावना क्षीण भऽ रहलैक किएक तँ पलायनवादी समाजमे सासु-पुतोहु एक संग रहतीह, बिरले अवसरि भेटैछ। जगदीशजी गाममे रहि कऽ साहित्य साधना कऽ रहल छथि तँए ऐ प्रकारक घटना गाम-घरमे घटित होइत देखानाइ कविक लेल कोनो अजगुत नै। कविताक बिम्ब आ शिल्पसँ बेसी महत्वपूर्ण अछि कविक उद्देश्य। एे दृष्टिसँ जौं देखल जाए तँ कविता नीक छैक। भाषा विज्ञानक रूपमे अद्भुत किएक तँ अपन गद्य जकाँ एेठाम जगदीश धाही, अकड़ि, मकड़ि, हाही, लसिया, निचेन सन लुप्त होइत शब्द सभसँ पद्यकेँ वांछित रूपेँ बोरि कविता श्रवणीय बना देलनि। “बौड़ाएल बटोही” शीर्षक कविता ऐ संग्रहक सभसँ नीक बिम्बकेँ केन्द्रित कऽ कऽ लिखल गेल अछि। जीवन दर्शन आ आध्यात्मक तात्विक विवेचन अत्यन्त विस्मयकारी छायावादसँ भरल मानल जा सकैछ। ‘परदा’मे ओझराएल जिनगी जकाँ वर्त्तमान मनुक्खक जीवन भऽ गेल अदि। प्रयोगात्मक रूपेँ आब कोवरक कनियाँक ओ रूप कतए जकर कल्पना कवि कएने छथि, मुदा गामक समाजमे एखनो कोवरमे नुकाएल कनियाँ भेटैत अछि। कोवरक कनियाँ तँ मर्यादाक अनुपालनक लेल नुकाएल छथि मुदा कर्म पथपर विचरण करैबला मनुक्ख कटि कऽ किएक रहि रहल अछि? जे किछु नै जानि रहल अर्थात् अशिक्षित मूक अनभुआरसँ सामर्थ्यशील मनुक्ख किएक तकरार कऽ रहल छथि? अपन-अपन कर्मक संग-संग माए-बापक कर्म ओ धर्म संतानक सफलताक बाट उज्ज्वल करैत अछि। ऐठाम धर्मक भाव संप्रदाय नै अपितु मानवीय मूल्यक सम्यक अनुपालन मानल जाए। विलगित पथपर जौं चरण राखल जाए तँ बुइध बिलेनाइ स्वाभाविक आ जखन बुइध बिला जाएत तँ बाट कलुष अवश्य भऽ जाएत- बाटे बिला वुइध बाटे बिसरि गेल जेम्हर जे चलल तेम्हरे पहुँचि गेल...। कर्मक बीआ जाैं सत्व तम ओ रज रस रससँ बोरल नै जाएत तँ ‘मनोकामना’ भ्रम बनि अपन सिद्धिक आशमे लुप्त अवश्य भऽ जाएत। कोनाे रचनाकार जौं स्वयं नायक बनि कविता लिखैत छथि तँ कोनो अचरज नै, मुदा बेसीठाम कवि स्वयंकेँ रीति ओ प्रीतिक नायक बना कऽ कविता लिखलाहेँ ई बरोबरि मैथिली साहित्यमे देखएमे अबैत अछि। अपन आलोचना करब सबहक लेल संभव नै, ओना कतौ-कतौ हास्य रसक कवितामे कवि लोकनि अपन मजाक अवश्य उड़बैत छथि मुदा एना करब कविताकेँ लोकप्रिय बनाएब मात्र मानल जाए। ‘अपनेपर हँसै छी’ शीर्षक कविता मूलत: वर्त्तमान शिक्षा प्रणालीपर कविक आलोचनात्मक काव्य शैलीमे प्रहार थिक। स्वयंकेँ नायक बना कऽ चोरिक डिग्रीक आधारपर ‘शिक्षा मित्र’क नौकरी प्राप्त करबामे हेर-फेर देखाओल गेल अछि। गाममे रहि कऽ बिहारक शैक्षणिक प्रणालीपर कटु टिप्पणी न्यायोचित। शासन तंत्र कतबो मजगूत मानल जाए मुदा जखन बेबस्थे भ्रष्ट, तखन इमानदारीक दाबा केनाइ भ्रामक सिद्ध होइत छैक। साम्यवादी विचारधाराक अक्षरश: सम्पोषक कवि कोनो राजनैतिक दल विशेषपर टिप्पणी नै केने छथि। अर्थनीति जौं भ्रामक हुअए तँ ऐ लेल सम्पूर्ण समाजकेँ दोख देल जाए। लोक जखन स्वयं भ्रष्ट भऽ गेल छथि तँ प्रजातंत्र वा शासन तंत्रपर दोख देब अनुचित- लाखे रूपैयामे दशो कट्ठा जमीन गमेलौं गुरु दक्षिना देने बिना गुरु भाइक भार उठेलौं....। ओना भारतीय परिदृश्यमे बिहारक राज्य बेबस्था भलहिं स्तरीय मानल जा रहल मुदा शैक्षणिक बहालीमे योग्यतमक उत्तरजीविकामे धन बल आ कुचक्रबल बेसी भारी पड़लैक, ज्ञानक मोजर एखनों नै भेटि रहल। पाँच हजारक नौकरीक लेल मूल्यवान वसुन्धराकेँ बेचि लोक लौटरी लगा रहल छथि। एकर दू गोट कुपरिणाम- पहिल कृषि कार्य जे हमरा समाजक रीढ थिक तकर महत्व समाप्त भऽ रहलैक आ दोसर प्रतिभाक पलायन अवश्यभावी किएक तँ साधनहीन प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति ऐ भ्रष्ट मंचपर कोना आसीन होथि- बिनु धनक धनिक जहिना ताम-झाम देखबैए देखि-देखि आँखि करूआए लाजे आँखि मुनै छी अपने पर हँसै छी.....। विचारमूलक पद्य देशकालक दशाक एक रूपेँ सत्यश: चित्रण करैत अछि। चारूकातक परिदृश्य हेहर भऽ गेलैक, ऐ दशामे सोझ बाट अकल्याणकारी लगनाइ कोनो अनुचित नै। चोटगर तीक्ष्ण वान चला कऽ भ्रष्ट लोक अपनाकेँ सत्य साबित करबामे कोनो अर्थे नै हुसैत अछि किएक तँ धनक संग गालक जमाना एक तँ चोरि आ दोसर सीना जोरि। ऐ कटु सत्यकेँ साहित्यमे कोना स्वीकार कएल जाए ई तँ भविष्यक गप्प मुदा यात्री आ आरसी जकाँ अपन लेखनीक संग जीवनमे सम्यक साम्यवादी जगदीशक ई कविता समाजक लेल दिशा िनर्देश कऽ रहलैक। ओना ई अलग बात जे वर्त्तमान परिदृश्य फ्रांसक राज्यक्रांति जकाँ नै जखन रूसो आ वाल्टेयरक आखर-आखरसँ समाजमे क्रांति आबि गेल छल। आशावादी दृष्टिसँ जौं सोचल जाए तँ साहित्य समाजक दर्पण अवश्य प्रतीत हएत, मुदा प्रत्येक पाठक एकर सम्यक् तत्वकेँ जौं अपन जीवनमे उतारि लेथि तखने ई संभव मानल जा सकैछ। समाजक माने सबहक दृष्टिकोण आ आचार-विचारक सभ गोट रूप व्यापक अर्थमे मंथन कएल जाए। जगदीशजी ‘धोब घाट’ कविताक बाद ‘धोबि घाट’ कविता सेहो लिखने छथि। ‘दर्शन’ कोनो पोथी पढ़ि नै उत्पन्न कएल जा सकैछ, ई तँ जीवनकेँ देखबाक अपन दृष्टकोण होइत अछि। उदयनाचार्य कोनो काशी आ प्रयागमे रहि ‘न्याय कुसुमांजलि’ सन पोथी नै लिखने रहथि। राजपूत कालक ‘करियन’ हुनक साहित्य सृज्नताक गहवर छलनि। तँए जगदीशसँ टेम्स नदीक सभ्यताक आधुनिक बिम्बक आश केनाइ सर्वथा अनुचित हएत किएक तँ मिथिलाक खॉटी गाम ‘बेरमा’ हिनक साहित्य साधनाक केन्द्र बिन्दु छन्हि। दर्शनक तीन वयस होइत अछि- नीति, श्रृंगार ओ वैराग्य। सामाजिक जीवनमे रहनिहार मनुक्खक लेल तीनूक सम्यक काल ओ भाव होइत छैक। जीवन क्रममे संतुलन बनएबाक लेल तीनू वयससँ अलग-अलग सत्व रज ओ तमो गुण टपकैछ। ‘सात्विक भाव’ कविता सत्व गुणकेँ आधार बना कऽ लिखल गेल अछि। सात्विक भाव विरासतपर आधारित होइत छैक। जाहि ठामक भूमि सात्विक, हवा पानि सात्विक माने नैसगिक संस्कार सात्वकतासँ भरल होइछ ओइठाम एकर प्रभाव अवश्यंभावी होइत छैक। लक्ष्य, संकल्प आ दृष्ता सेहो मनुक्खकेँ सम्यक शाश्वत कर्म दिश लऽ जाइछ, मुदा ऐ लेल संस्कार अनुवंशिकी आदिपर व्यक्तित्वक विचार िनर्भर होइछ। सुभाव-कुभाव आदि संगहि चलैत अछि मुदा ऐ लेल दृष्टिकोणकेँ जाहि रूपसँ देखल जाए वएह रूप दृष्टिगोचर हएत। कविताक भाव दर्शनपर आधारित सरल शब्दमे मुदा विचार बोधक लेल गूढ़ अछि तँए एकरा बेशी लोकप्रिय नै मानल जाए परंच साहित्यिक विकासक लेल आ जीवन-दर्शनक लेल युक्तिसंगत कविता थिक। दिव्य पुरुष ओ जे सोलह कलासँ परिपूर्ण होथि। ‘दिव्य शक्ति’ शीर्षक पद्य सरल रूपेँ पढ़लाक बाद किछु विशेष नै देखबामे अबैछ मुदा जेना कविक व्यक्तित्व अर्न्तमुखी तहिना पद्यमे गूढ़ रहस्य झॉपल छैक। दिव्य शक्तिसँ पूर्ण होएबाक बाद मनुजमे प्रखर ज्योतिक आवरण पनकि जाइत अछि। नीक-अधलाह विचार संस्कारसँ उत्पन्न होइत अछि मुदा गंगा माने पवित्रताक परिचायक संस्कृतिसँ आबद्घ् जलधाराक कोखिमे सबहक लेल समान स्थान। जइ भूमिपर वसुदेव विराजथि वएह वसुधा.......। नन्द आ वसुदेवक प्रसंग तँ वर्तमान सामाजिक परिदृश्यमे ‘उपहास’ जकाँ भऽ गेल अछि मुदा कवि आशावादी छथि..... पाँचम कला बनि जे बीआ मनुज मन विरजैए डेगे-डेगे डगरि-डगरि सोलहम कला पबैए... जगदीश जीक जे काव्य सृजनता ओ व्यंगनाक विशेषता छन्हि ओ थिक हिनक आशावादी सकारात्मक दृष्टिकोण। अपन पद्यमे कतौ कवि सामाजिक दशासँ निराश नै छथि। कालक अकालकेँ अपन पद्यमे देखबैत तँ छथि मुदा ओहिसँ उदिग्न नै। ‘उड़िआएल चिड़ै’ कवितामे वर्त्तमान मानवक मनोवृत्ति उझलि लेखनीसँ कविताक रूपेँ उद्धृत कऽ कवि पलायनवादपर तीक्ष्ण प्रहार कएलनि अछि। ऐ पलायनमे मात्र अपन मािटसँ पलायन नै अपितु संस्कार आ मानवीयमूल्यक पड़ाइन सेहो देखाएल गेल अछि। ‘चिड़ै’क उदाहरण मात्र कविक छायावादी दृष्टिकोण छन्हि, कचोट तँ संस्कृतिक पराभवकेँ मानल जाए। जे चिड़ै अपन डीहो-डबरकेँ बिसरि स्वार्थ आ कृत्रिमताक लहरिमे जतऽ घोघ भरतै ओतहि रास करत ओहि चिड़ैक मधुर स्वरसँ मूल समाजकेँ कोन काज- ओहन स्मृति स्मृते की जे मने मन घुरिआइत रहैत पसरि नै पबैत जे कहियो तरे-तर खिआइत रहैत....। कविसँ बेशी समाजक लेल विडंबना जे बाटसँ भटकल बाटोही अपन मूल बाटपर श्रद्धा तँ व्यक्त करैत अछि, मुदा जइ पथमे पहिल बेर उदयायल आदििलक दर्शन होइत अछि ओइ पथपर फेर धुरब पथ भ्रष्टक लेल असंभव जकाँ लगैत अछि। अपन मूल संस्कारक पराभव करब उचित नै मात्र स्मृतिसँ मूल माटिमे मातृत्व कोना उत्पन्न हएत। तँए ‘पलायन’ कोनो रूपेँ उचित नै। मिथिलाक माटि-पानिसँ फलैत-फूलैत हिन्दीक चर्चित उपन्यासकार फनीश्वर नाथ रेणु आंचलिक बनि गेलनि। जौं मैथिलीक गप्प करी तँ कथाकार तँ कथा जगतमे ललित, राजकमल, धूमकेतु, कुमार पवन आ कमला चौधरी सन प्रांजल आंचलिक कथाकार भेल छथि मुदा आंचलिक काव्य जगतमे समग्र सामाजिक दैनन्दिनीककेँ छूबैत कविमे यात्री (चित्रा) ओ आरसी प्रसाद सिंह (सूर्यमुखी)क पश्चात् जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ मानल जाए। ‘सान-धार-धारा’ कविता कोनो कैंचीक शानपर आधारित काव्य बून नहि ई तँ मानवीय मूल्य ओ संवेदनाक शानपर आधारित पद्य अछि- जे धारा सिरजए गंगा कमला कोशी ओ महानन्दा ओ धार कहिया धरि ठमकि मानैत रहत फंदा? गंगा, कमला आ कोसीक किछेरमे बसल गाम सभ मिथिलाक परिधिक भीतर अबैछ ऐ तरहक उल्लेख तँ बहुत रास कवितामे भेटैत अछि, मुदा ऐठाम ‘महानन्दा’क चर्च कऽ कवि पुबरिया बिहारक क्षेत्र किशनगंजसँ आगाँ धरिक लोककेँ आश्वस्त कऽ देलन्हि जे अहूँ मैथिले थिकौं? मात्र पद्यमे लयात्मकता भरबाक लेल एना नै कएल गेल। कवि मोन भावुक होइत छैक, भावमे बहनाइ कविक प्रवृत्ति मुदा मिथिलाक संस्कारसँ भरल रहलाक बादो ई क्षेत्र साहित्यमे अपच जकाँ छल, तँए कविक भावनाकेँ सम्मान करबाक चाही। ’जहाँ न जाए रवि वहाँ जाए कवि’- ई वाक्य जे कियो लिखने होथि मुदा ई सर्वथा विचारमूलक अछि। ऐ संग्रहक किछु पद्य जेना पपीहाक गीत, विखधरक बीख, नंगरकट घोड़ा आदि पढ़लासँ स्पष्टत: बुझना गेल जे छायावादी दृष्टिकोण रचनाकारकेँ छोड़ि सबहक लेल पूर्णत: बुझबामे नै अबैत छैक। ‘कोइली’ शीर्षक कवितामे कवि चन्द्रभानु सिंह ‘मैथिली’क सरसताकेँ स्पष्ट रूपेँ पाठक वा श्रोता लग परसि देने छथि मुदा पपीहा गीत शीर्षक पद्य कोनो चिड़ै-चुन्मुन्नीक स्वरपर आधारित संस्कृति गीत नै ई तँ सम्पूर्ण दर्शन थिक- जीवन-मरणक दर्शन। धरती अकाश, जल-थल कानि-अकानि सन सहचाी विपरीतार्थक जीवन दर्शन......... कथा किरणमे यथार्थवोध ओ नारी विमर्श मैथिली साहित्यमे समग्र विधाक रचनाक आधारपर डाॅ. ब्रज-किशोर वर्मा मणिपद्मकेँ पहिल सम्पूर्ण साहित्यकार मानल जाइत अछि। मुदा जौं जन्म क्रमांकक आधारपर िनर्णए कएल जाए तँ काॅचीनाथ झा ‘किरण’ पहिल सम्पूर्ण साहित्यकार छथि। मणिपद्म जकाँ किरणजी सेहो साहित्यक समग्र विधा उपन्यास, वालकथा, एकांकी, नाटक, कविता संग्रह, महाकाव्य, िनबंध संग्रह आ कथा संग्रहक रचना कएलनि। पराशर महाकाव्य लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार आ ‘कथा किरण’ कथा संग्रहक लेल वैदेही सम्मानसँ सम्मानित कएल गेलनि। मूलत: काव्यात्मक प्रवृति ओ अभिरूचि राखएबला ऐ साहित्यकारक पहिल कथा संग्रह ‘कथा किरण’ सन् 1988ईं.मे भाखा प्रकाशन द्वारा प्रकाशित भेल। सन् 1989ईं.मे किरण जीक देहावसान भऽ गेलनि। सन् 1991-92 ईं.मे बिहार सरकार द्वारा मैथिलीकेँ बिहार लोक सेवा आयोगसँ निकालि देल गेल। जइसँ ऐ भाषाक वाचक ओ पाठक लोकनिक मध्य अस्तित्व डगमगाए लागल। फलस्वरूप महाविद्यालय स्तरपर मैथिली पढ़एबला छात्रक कमी भऽ गेल। जकर परिणाम ई भेल जे ऐ अवधिक किछु आगाँ-पाछाँ प्रकाशित रचनाक ओ महत्व नै भेटल जकर ओ अधिकारी छल। ’कथा किरण’ सम्बन्धत: ऐ अर्न्तद्वन्द्वक सभसँ बेशी शिकार भेल। किएक तँ हिनक ऐ संग्रहसँ पहिने प्रकाशित किछु रचनाकेँ छोड़ि समाजक विभिन्न ऊँच-नीच, सिनेह-द्वेष आ समन्वयवादकेँ स्पर्श करएबला कथा साहित्य मैथिलीमे नै लिखल गेल छल। जौं किछु कथाकार ऐ परिधिसँ ऊपर उठबाक प्रयासमे सफल भेलथि तँ मात्र किछुए कथामे। सम्पूर्ण समाजक जर्जर व्यवस्था दिस किनको नजरि पड़बो केलनि तँ कतौ-कतौ। सम्पूर्ण कथा संग्रहमे मानवीय मूल्यक अवलोकन कथा िकरणसँ पहिने हरिमोहन झाक चर्चरी, मनमोहन झाक अश्रुकण, ललितक प्रतिनिधि, रामदेव झाक एक खीरा तीन फाँक, रमानन्द रेणुक कचोट, रमेश नारायणक पाथरक नाव, धूमकेतुक अगुरवान, शेफालिका वर्माक अर्थयुग आदिमे भेटैत अछि परंच ऐ सभ कथा संग्रहक सभटा कथाकेँ ऐ दृष्टिसँ सेहो प्रासंगिक नै मानल जाए। प्रयोगवादी कथाकार राजकमल जीक िकछु कथा जेना ललका पाग, सॉझक गाछ, उपराजिता आदि मैथिली साहित्यमे अपन बेछप्प आधुनिक रूप नेने प्रवेश तँ कएलक मुदा हुनको किछु कथा मैथ्ज्ञिली साहित्यकेँ शिल्प आ प्रयोगवादक विश्लेषणक क्रममे अन्हार घर नेने चलि गेल। कथा किरणमे 19 गोट कथा संकलित अछि, अलग-अलग कालमे िलखल गेल ऐ कथा सभकेँ शिवशंकर श्रीनिवासक प्रयाससँ 1988ईं.मे भाषा प्रकाशन द्वारा प्रकाशित कएल गेल अछि। आमुख शिवशंकरजी लिखने छथि, जइमे एकटा चर्चित समीक्ष समीक्षक द्वारा आमुखसँ बेसी किरण जीक मनोदशा आ रचना प्रकाशन करएबाक क्रममे कथाकारपर श्री निवास जीक उपकार परिलक्षित भेल। वास्तवमे समीक्षा वा आमुख ऐ रूपेँ नै लिखबाक चाही। आमुखमे एकटा कमी आर देखएमे आएल जे श्रीनिवास लिखैत छथि- “किरण जीक प्रारंभिक कथा कथ्यक स्तरपर जतेक धारदार ओतेक सुन्दर शिल्प नहि।” मैथिली साहित्यक संग ई दुर्भाग्यपूर्ण विडंम्बना रहल जे मानसिक विलासिताकेँ स्पर्श करएबला कथाकारकेँ अइठाम शिल्पी मानल जाइत छन्हि। वास्तवमे कथाक दू गोट प्रमुख तत्व िथक- बिम्ब आ शिल्प। बिम्बक अर्थ कोनो घरक नेआें आ शिल्पक अर्थ ओकर चार, कोरो आ श्रंृगार- चून पालिश। जौं बिम्ब काल्पनिक तँ शिल्प कल्पनाशील अवश्य हएत। जखन कल्पने करबाक हएत तँ गामक खोपड़ीक कल्पना नै कऽ कऽ आगराक ताजमहलक कल्पना कएल जाए। किरणजी मात्र यएह अपराध कएने छथि जे आगराक ताज महलकेँ छोड़ि मिथिलाक गामक मचानपर अपन रचनोमे जीवंत रहलाह, तँए ‘शिल्पी’ नै छथि। साहित्यकार कल्पनाशील होइत छैक, मुदा जौं कखनो मोनकेँ धरातलपर आनि कऽ लिखैत अछि तँ यथार्थवोधक बिम्ब समाजक सत्यकेँ वृतिचित्रक रूपमे देखैत अछि। किरणजी संभवत: वएह श्रेणीक ययार्थवोधी कथाकार छथि। पहिलुक कथा ‘करूणा’ करूणाक नैहरमे स्वच्छन्द जीवनसँ प्रारंभ होइत ओइठाम तक पहुँच जाइत अछि जतए धरि साधारण शिल्पी नै पहुँच सकैत छथि। यामिनीकान्त बाबूक सुकन्या करूणाक विवाह सुन्दरबाबू सँ भेल। नैहरक भगजोगिनी कर्त्तव्य पथपर भाटक संग सासुरमे आगाँ बढ़ैत छलि, वृद्ध पितामही सासु आ मातृ पितृ विहीन जाउत नरेन्द्रक संग....। तीन मासक भीतर अजिया सासुक देहावसान आ ओकर दू मास बाद श्वसन ज्वरसँ पतिक देहान्तक पश्चात करूणा टूटि गेलीह। प्राचीन आर्य संस्कृति जकरा जनभाषामे सनातन कहल जाइछ, रूढ़िवादिताक आवरणसँ अखन धरि ओझराएल अछि। जे लोक समाजक मुख्य धारासँ कात लागल छथि, ओ ऐ कथा कथित सनातन संस्कृतिक आधारपर संस्कार तँ करैत छथि, मुदा ओइमे ओझराएल नै। ऐ दृष्टिसँ समाजक पछातिक लोककेँ बेसी विचारवान मानल जाए। अगिला लोकमे बाहरी आडंवरकेँ मनवाक क्रममे किछु कुव्यवस्था उत्पन्न भऽ गेल। संभवत: ई कथा सनातनधर्मी ब्राह्मण परिवारकेँ धियानमे राखि कऽ लिखल गेल। भऽ सकैछ कथाकारक र्इ कल्पना हुअनि, मुदा ऐ प्रकारक घटना वास्तवमे एखन धरि होइत अछि जे सवर्ण परिवारक वाल विधवा सुकन्याकेँ सेहो पुनर्विवाह करबाक समाजमे मान्यता नै गेल, जइ समैमे ई कथा लिखल गेल ओइ समैमे स्थिति तँ आर दयनीय छल। ‘करूणा’ कथा विषम पिरस्थितिमे आगाँ बढ़ैत अछि। एकटा वालिका नरेन्द्रकेँ तकैत करूणा घर पहुँचलि। नरेन्द्र अपन मातृकमे छल। करूणा एकसरि छली। वालिका चकित होइत प्रश्न कएलनि, ‘एकसरि डऽर नहि लगैत अछि। अपन जीवनकेँ जीवन्त लहासक रूपमे करूणा वाजलि- ककर डऽर वास्तवमे भूत-परेत एकटा भावनात्मक रूपसँ शून्य प्रणीक लेल डरक साधन नै बनि सकैछ। की छन्हि जे चोर आओत? मुदा बालिका प्रश्न कएल जे जौं अपने उठा लिए? ऐ प्रकारक प्रश्नसँ करूणा स्तब्ध भऽ गेली। एकटा नारीक मर्यादा समाजक दृष्टिमे जे महत्व राखए, मुदा ओकरा लेल सर्वोपरि। समाजक उदाहरण यएह लेल जे ऐ समाजक नीच लोकसँ लऽ कऽ विचारवान वर्गक किछु लोक सेहो अवलाक चरित्र हननसँ वाज नै आएल अछि। करूणा भविष्यक डरसँ काँपि अपन सुन्नर रूपकेँ भयावह बनएबाक लेल उद्धत भऽ गेली। परिस्थिति सेहो संग देलकनि जे बच्चाबाबूक माथ परक चाम उज्जर देख करण पुछलनि तँ पता चललनि जे सल्फ्यूरिक एसिड अर्थात् तेजाप प्रयोगशालामे पड़ि गेल। बच्चाबाबूकेँ अपन घरसँ विदा करैत देरी तखापर राखल स्ल्फ्यूरिक एसिड अपन मुँहपर ठाढ़ि करूणा रूपवतीसँ जीवित पिचाशक रूपमे आबि गेलीह? आब प्रश्न उठैत अछि जे करूणाकेँ एना कएलासँ की भेटल? भेटबाक प्रश्न तँ नै मुदा हुनक चरित्रहरणक आशंका हुनका मोने समाप्त भऽ गेल। जौं एकटा मातृ-पितृ विहीन बालकक दायित्व नै रहतनि तँ आत्महत्या सेहो कऽ सकैत छलीह। यएह थिक देवी भक्तिक केन्द्र मिथिलामे देवीक दशा। नारी िवमर्शक एकरूपक यथार्थचित्रण किरणजी कएलनि। कनेक कमी जे कथाक प्रारम्भ सरल शब्दमे सेहो कएल जा सकैत छल मुदा साहित्यक पुरा रूपक शब्दमे कथाकेँ प्रवेश करा कऽ किरणजी ओइ विचारवान समीक्षकक दृष्टिमे अपन स्थान बनएलनि जनिक मान्यता छन्हि जे भाषा उच्च कोटिक हुअए, जकर अर्थ सभ मैथिल नै लगा सकथि ओ वास्तविक रचना थिक। भऽ सकैत अछि जे कथाकार ऐ प्रकारक शब्द सभसँ कथाक सहज रूपेँ कएने होथि, वा मूलत: कवि रहनिहार किरण अपन काव्यात्मक प्रवृतिकेँ नै झाँपि कविताक बिम्बकेँ कथाक रूप दऽ देने होथि। जौं ई कथा काव्य रहितए तँ मैथिली साहित्यक लेल विस्मयकारी क्षण होइतए जखन करूणा.... महाकाव्यक नायिका बनि मिथिलाक मानस पटलपर विचरण करितथि। दोसर जे कनेक नकारात्मक विन्दु भेटल ओ अछि करूणाक अपन आभा नष्ट करबाक दृष्टिकोण। यथार्थबोधी कथाकारकेँ अइठाम क्रांतिवादी दृष्टिकोण स्पष्ट करबाक चाहियनि, मुदा किरणजी सन सिद्धहस्त रचनाकारक सोच सेहो समाजमे क्रांति नै सोचि सकल। हम सम मिथिलामे रहैत छी, एकटा उतर आधुनिक सोच की कहल जाए आधुनिक दृष्टिकोणसँ दूर मिथिला.... जइठाम एखनो विधवाकेँ पुनर्विवाह की कहल जाए कोनो आन कन्याक विवाह संस्कारक ऐहब नै बनाओल जाइत अछि। फ्रांसक राज्यक्रांति हुअए वा यूरोपक धर्म सुधार आन्दोलन सभमे साहित्यक अपन महत्व अछि, मुदा ई आर्यावर्त्त थिक अइठाम साहित्य मनोरंजन मात्रक साधन मानल जाइत अछि, प्रेरणाक स्रोत नै। वास्तविकता सेहो छैक जे साहित्यकारकेँ अपन लेखनीक दृष्टिकोणकेँ अपन जीवनमे सेहो जोड़ि देवाक चाही, नै तँ समाज मान्यता कोना देतनि वा ओ साहित्य प्रेरक कोना हएत? किरणजी करूणा सन दृष्टिकोण रखैत हेताह किएक तँ हुनकाे जन्म अही समाजमे तँए क्रांतिवादी नै बनि ‘करूणा’क नाश देखा देलनि। ओइ प्रकारक नाश जे जइसँ नीक मृत्यु। मुदा सम्यक सोचबला किरणजी केँ अइठाम कनेक क्रांतिवादी बनि करूणाक पुनर्विवाह देखएबाक चाहियनि। यथर्थादोषी साहित्यकारकेँ सेहो समाजमे विचार उत्पन्न करएबाक लेल क्रांतिवादी बनब साहित्यक लेल अनिवार्य नै तँ आडंवरकेँ समर्थन करएबला ऐ प्रकारक साहित्यकेँ पढ़निहार लोक दोष साहित्यकारेपर देत। दोसर कथा ‘एहि चारि खूनक खोज केनिहार के?’ अर्थनीतिकेँ धियानमे राखि कऽ लिखल गेल। कथाक प्रारंभमे कथाकार ब्राह्मणवादी व्यवस्थापर कनेक कटाक्ष कएलनि, ‘पंडित जे कहथि से करी मुदा जे करथि से नहि करी’ अर्थात् अग्रसोची समाजक धर्मपालक जातिक कर्म आ कथनमे भिन्नता अछि। वास्तविकता सेहो अछि पंडित विद्याध्ययन आ नीति अध्ययनक आधारपर उचित वचन तँ अपन मुखसँ वजैत छथि, मुदा मात्र होसराक लेल अपन लेल नै। एे कथामे सेहो एकटा सत्कर्मी परेमा अपन स्वाभिमानक संग जीवन तँ प्रांरभ कएलक मुदा सम्पतियासँ विवाहक वाद साधनहीन परेमाक स्वाभिमान परिस्थितिवश डगमगा गेल। अपन नेनाकेँ जीवित रखबाक लेल हलुआइक दोकानमे किछु भोजन सामग्री तकैत पकड़ल गेल। पुलिस अपन काज कएलक एकटा भोजन चोरि करबाक प्रयास करैबला चोरकेँ डकैत बना कऽ सातवर्ष कठोर कारावास दिआ देलक। न्यायालयमे परेमाकेँ न्याय नै भेटल किएक तँ ओकर गप्प सुनत के? परेमा जहलसँ छूटल तँ अर्थहीन परिवारक सभ जन समाप्त......। अर्थनीतिक ई कथा समाजक अंतिम व्यक्तिपर प्रारंभ भऽ ओकर अंतसँ समाप्त भेल। किरण जीक ई कथा यथार्थबोधी मानल जा सकैत अछि। अइमे क्रांतिक कोनो गुंजाइश नै किएक तँ शिक्षा आ भौतिक साधनसँ विहीन मानब सरकारी तंत्रक विरूद्धमे कोना आन्दोलन करए, वादमे परेमा कतए जाए किएक तँ ओ विक्षिप्त भऽ गेल। ‘काल ककरो छोड़त’ एकटा राजपरिवारक कथा थिक। महाराज दीर्घवाहु अपन मृत्युकालमे अपन राज्य आ अपन पाँच वर्षक वालक सुन्दर अपन छोट भाए वीरवाहुकेँ सौंपि ऐ संसारसँ विदा भेलनि। कालान्तरमे वीरवाहु अपने वास्तविक राजा कहएबाक लेल अपन भातिजकेँ मारि देलनि। ई दृश्य वीरवाहुक पुत्र शंकर देखलक आ पितृहन्ता बनि गेल। शंकरक स्त्री राधा दोसर पड़ोसी युवक रमेशसँ प्रेम करैत छलि, ओ सेहो ‘महाजनोयेन गत: स पंथा’क आधारपर शंकरक हत्या कऽ देलथिन। अंतमे कथाकार ई प्रश्न छोड़ि कथाक इतिश्री कएलनि- ‘काल की राधाकेँ छोड़तनि? वास्तवमे एकरा कथा नै मानल जाए ई थिक कथाकारक विराट जीवन दर्शन ओ शैक्षणिक योग्यताक एकटा चित्र। इतिहास साक्षी अछि धनलोलुपता ओ राजपदक आशमे कतेक शासक संबंधक मर्यादाकेँ िवसरि गेल छलथि। लोभ पापक कारण होइछ। लोभ माली अपन फूलवारीक फूलसँ सेहो करैत अछि, एकटा पति अपन पत्नीक सौन्दर्यसँ सेहो करैत अछि मुदा ओ िथक मर्यादापूर्ण अधिकारक लोभ। अमर्यादित ओ अवांछित लोभक परिस्थितिमे लोक अपने नाश करैत अछि। प्रलाप, समाजक चित्र, धर्मरत्नाकर, चनटा, जाति पाँतिक जाड़ू आदि कथा सेहो समाजक अग्रआसनपर बैसल लोकक समाजक अंतिम व्यक्तक प्रति दृष्टिकोणकेँ स्पष्ट करबैत अछि। ऐ प्रकारक कथा जइमे सम्पूर्ण समाजक स्थितिक चर्च हुअए ललित आ जगदीश प्रसाद मंडलकेँ छोड़ि किरण जकाँ केओ नै कएलक। मुदा सभटा कथा यथार्थचित्रण तँए श्रीनिवासजी हिनका शिल्पीक संज्ञा दइमे संकोच कएलनि। वास्तविकता अर्थात् इजोतसँ डर कल्पना अर्थात अन्हारसँ प्रेम मैथिली साहित्यक प्रवृति रहल छैक तँए किरणकेँ ओ स्थान नै भेटल जकर ओ अधिकारी छथि। ऐ संग्रहक सभसँ विलक्षण कथा थिक- मधुरमनि। अपन साहित्यक िकछु चर्चित कथामे एकर स्थान अछि। एकटा निम्नवर्गीय समाजक मुँहजोरि मुदा स्वस्थ आ कर्मशील नारी मधुरमनि अपन शरीरसँ असमर्थ पतिक प्रतिदायित्व रखैत अछि। मधुरमनिक कठोरवाणीसँ उद्विग्न भऽ ओकर पति मोचन घरसँ पड़ा गेल। मधुरमनि पोटि कऽ फेर ओकरा घरमे आनि लेलक। सतना माय जखन मोचनक आलोचना मधुरमनि लग करैत अछि तँ मधुरमनि सतना मायपर तीक्ष्ण शब्दवाण चला कऽ ओकरा चुप करा दैत अछि। ‘पिट्ठा पहलमान लऽ कऽ हम की करब जे भरि दिन डेङविते रहत।’ वास्तवमे सतना मायक शरीरसँ मजगूत पति खूब पिटाइ करैत छल। यएह थिक हमरा सबहक समाजक नारीक पतिक प्रति सिनेह ओ अपन पतिकेँ किछु कहि सकैत छथि, मुदा दोसर किए कहत? अइमे अधिकार आ सिनेह दुनू भेटैत अछि। ऐ प्रकारे विहनि कथाक ऐ संग्रहकेँ युगान्तकारी तँ नै मानल जा सकैत अछि मुदा समाजक वास्तविक दशाक विवेचन आ तर्कपूर्ण शैलीसँ ई संग्रह अपन अलग स्थान रखैत अछि। पोथीक नाअाें- कथा किरण रचनाकार- डाॅ. कान्चीनाथ झा ‘किरण’ प्रकाशक- भाषा प्रकाषन पटना वर्ष- 1988ईं. आशु कवित्वक हृदयांतरिक किलोल- कलानिधि महााकवि विद्यापतिक वाद मैथिली साहित्यमे आशु कविक जे श्रृंखला काव्य साहित्यकेँ गतिमान केलक ओइमे विविध कारणसँ किछु काव्य प्रतिभा झाॅपले रहि गेल। ओहेन आशु कविमे कालीकान्त झा ‘बूच’ सेहो एकटा नाअों अछि। सन् 1934ईं.मे महान दार्शनिक उदयनाचार्यक जन्म ओ कर्मस्थली समस्तीपुर जिलाक करियन गाममे जन्म नेनिहार कवि कालीकान्त झा ‘बूच’ अपन काव्य साधनाक श्रीगणेश हिन्दी साहित्यसँ कएलनि, परंच किछुए हिन्दी कविताक रचनाक पश्श्चात अपन मातृभाषामे लिखए लगलथि, फेर हिन्दीमे लिखबाक कोनो जिज्ञासा नै, कोनो योजना नै। कवि आ पाठकक मध्य रचनाक अभिव्यक्तिक साधन मिथिला मिहिर, माटि-पानि आ मैथिली भाषा सन पत्रिका छल। ऐ पत्रिका सभकेँ बन्न भेलापर कविक कविता गामक किछु लोकक मध्य मनोरंजन मात्रक साधन रहि गेल, कविता पन्ना फाटल आ कविक रचना गुम्म। बहुत रास रचना अप्रकाशित रहि लुप्त भऽ गेलनि। जे किछु उपलब्ध भऽ सकल ओकरा विदेहक सौजन्यसँ श्रुति प्रकाशन द्वारा प्रकाशित कएल गेल। दुभाग्य अछि जे कविक मृत्यु 2009ईं.मे आ कविता संग्रह 2010ईं.मे। एकरा ककर दुर्भाग्य मानल जाए मैथिली साहित्य वा कविक एकर िनर्णए पाठक कऽ सकैत छथि। किएक तँ सन् 1970ईं.सँ 1984र्इं.क मध्य मिथिला मिहिरक लोक प्रिय कविमे जनिक गणना होइत छल ओकर रचनाक केतौ कोनो चर्च नै, कोनो प्रोत्साहन नै। एे सभ उपहासक दंशसँ आकुल भऽ कवि गंभीर आ विचारमूलक रचना लिखब छोड़ि भक्ति, हास्य आ चुटुक्काक संग-संग गामक वियाह सबहक अभिनंदन पत्र लिखए लगलथि। जइ कविकेँ कहिओ मधुपजी सन कवि चूड़ामणिक प्रशंसा पत्र भेटैत छल ओ मैथिलीक लेल अछोप बनि गेल। मात्र डाॅ. दुर्गानाथ झा श्रीश, डाॅ. विद्यापति झा, डाॅ. नरेश कुमार विकल सन किछु साहित्यकार कतौ-कतौ हिनक चर्च केने छथि, जइ लेल मैथिली साहित्य हिनका सभसँ कृतज्ञ रहत। श्री गजेन्द्र ठाकुरक विशेष प्रयाससँ जे हिनक कविता संग्रह प्रकाशित भेल, ओकर नाओं अछि- ‘कलानिधि’ कलानिधिक अर्थ होइछ चन्द्रमा, ऐ संसारकेँ छोड़ि देलाक बाद संग्रह आएल तँए अाकाशीय पिंड जकाँ मात्र दर्शनीय नाओं देल गेल। आशु कविक कोनो बंधन नै छैक आ ने ओ अतुकांत कविता जकाँ योजना बना कऽ कविता लिखैत अछि तँए समीक्षक लोकनिक दृष्टिमे किछु कविता अप्रासंगिक भऽ सकैत अछि। कवि ‘बूच’ कविताक रचना प्राय: गाबि कऽ करैत छलाह, जखन जे फुरेलनि गीत जकाँ लिखि देलनि। तँए गोष्ठीक मंचपर सेहो मात्र गबैए रहि गेला। श्रृंगार, हास्य, विरह, भक्ति ओ विचार मूलक कविता सभमे कोनो कालक बंधन नै अछि। भक्तिकाल, रीतिकालसँ लऽ कऽ उत्तर आधुनिक साहित्यकाल धरिक परिवेशकेँ बूच अपन कविता सभमे समेटने छथि। तँए किछु रचनाकेँ घसल-पिटल सेहो मानल जा सकैछ। अपन काव्य रचनाक श्री गणेश कवि गंभीर लेखनसँ कएने छलाह, मुदा ऐठाम ‘सरस्वती वंदना’सँ कएल गेल। भक्ति रसमे कवि बहुत रास कविता लिखने छथि। रामचरित मानसक हिनका विशेष ज्ञान छलनि तँए भक्ति मूलक कवितामे ओइ युगक घटना स्वभाविक अछि, मुदा मिथिलाक भक्ति शक्ति अराधना तँ मातृगीतकेँ विशेष महत्व देल गेल। भऽ सकैछ ऐ प्रकारक वकिता उत्तर आधुनिक मैथिली साहित्यक लेल विशेष महत्वपूर्ण नै हुअए मुदा जइठाम भाषा सुशुप्त भऽ गेल हो ओइठाम भक्ति मूलक गीत भाषाक समृद्धिक लेल अनिवार्य, किएक तँ आर्य परिवारक सभ लग्नमे स्त्रीगण देवोपराधनाकेँ विशेष महत्व दैत छथि। यएह कारण अछि जे मैथिली साहित्यमे सभसँ लोकप्रिय पद्य विद्यापतिक बाप प्रदीप मैथिली पुत्र जीक ‘जगदम्ब अहीं अवलम्ब हमर’ भेल अछि। कविश्चकेँ सीताराम झा वा प्रदीप मैथिलीपुत्र जकाँ लोकप्रियता नै भेटल मुदा हिनक भक्ति पद्य सभमे जे झंकार अछि ओकर अपन अलग अस्तित्व मानल जाए- “सद्य: सुधा सिन्धु स्नात, मॉजल गंगा जलसँ गात सेवक खातिर तजलनि नवरतनक रजधानी अय मणिद्वीपक महरानी अय ना.....।” जेना रवि भूषण जी आमुखमे लिखने छथि जे कवि रामकेँ प्रवासी कहलनि बनवसी नहि, ऐ प्रकारक दृष्टिकोण पितृ: आज्ञा पालनाय अर्थात पितृभक्ति आ संबंधक मर्यादामे क्रांतिकारी दृष्टिकोणकेँ विशेष महत्व देवाक लेल आदरनीय मानल जाए- भ्क्ति मूलक एकटा गजलमे राधा कृष्णक सिनेह केर अनुशासित चित्रण गजलमे भक्तिक बोर मैथिली साहित्यमे विरले भेटैछ- श्याम होइछ परक प्रेम अधलाह हे, तेँ विसरि जाह हमरा विसरि जाह हे। कविक श्रृंगार मूलक पद्यमे विचार, अनुशासित सिनेह, वैराग्य आ जीवन दर्शन मर्म स्पर्शी अछि। कतौ कोनो अवांछित प्रेमकेँ प्रोत्साहन नै, कतौ अशोभनीय शब्द नै। भाषा सरल आशुगीत मुदा लोकप्रियता लेल लिखल गेल चलन्त नै। अतुकांत कवितामे बिम्ब विश्लेषण करबाक लेल व्यवधान नै होइत छैक किएक तँ ताल-मात्राक बंधन नै। आशु कवितामे बंधन रहितो जौं बिम्ब विश्लेषण बोधगम्य आ हृदयान्तरिक स्पर्श करैत हुअए तँ कविता आर लोकप्रिय किएक नै मानल जाए- “जाहि बाटकेँ नित्य बहारी हम तीतल ऑचरसँ झारी जकरा अपनामे रखने अछि हमर आँखि ई कारी-कारी आइ ताहि पर किएक अलासित गतिसँ आबै छी रातु बीच चान पर तपि-तपि ध्यान लगाबै छी...।” दोसर पद्य ‘विरहिनी’मे कृष्णक अवाहनक आशमे अश्रुउच्छवाससँ आकुल राधाक “व्यथा रीति-प्रीतिक हिलकोरसँ भरल मानल जाए- अहँक रूप राखि नैन युग-युगसँ जागलि छी मुरलीक मधुर बैन गुनि-गुनि कऽ पागलि छी परकीया पतिता हम प्रेमक पुजारिनकेँ नहि चाही गीताक ज्ञान आऊ-आऊ रूसल हमर भगवान....।” एकदिश कवि ‘तोहर ठोर’ कविताक माध्यमसँ प्रेमिकाक सौन्दर्यक गुणगान ठोरकेँ केन्द्र बिन्दु बना कऽ करैत अछि। प्रेमी प्रेमिकाक ठोरकेँ स्पर्थ जौं नैतिक रूपसँ नै कऽ सकत तँ राहुक रूप धारण कऽ जबरदस्ती करत एहूमे जौं सफलता नै तँ भगवानसँ प्रार्थना कऽ कऽ पुर्नजन्ममे धान बनि प्रेमिका पातपर चिष्टान्न अर्थात् भात वा खीरक रूपेँ पड़त आ प्रेमिका स्वत: प्रेमी रूपी भातकेँ ठोरसँ सटा लेतीह- “बनव हम पुर्नजन्ममे धान, धानसँ भऽ जाएब चिष्टान्न पड़ब पुनि अहँक प्रतीक्षापात अछिंजलसँ सद्य: स्नात....।” दोसर दिस कवि समाजकेँ सिनेहमे मर्यादाक सीमा नै लंघबाक िनर्देश सेहो दैत छथि- “नहि श्रंृगार रौद्र हुंकारे हम एहि पार अहाँ ओहि पारे दुहूक बीच कठोर कर्तव्यक भरल अथाह भयंकार नाला सुरभित अहँक सिनेहक माला...।” विरह, श्रंृगारक स्पंदन होइत छैक, जौं विरह नै हुअए तँ मिलन आनंदक अनुभूित कोना कराएत। ऋृतु वर्णनकेँ मूलाधार बना कऽ कवि ‘वसन्ते-विरहिनी’ कविता लिखलक, अचल जीव अर्थात् गाछ-वृक्ष वसंतक नशामे मॉतलि छथि मुदा पतिसँ दूर विरहिनीक लेल वसंतक कोन प्रयोजन- “रहलहुँ शेष राति भरि जागलि, हुनक दोष की हम अभागलि रसक अथाह सिन्धु छल उछलल प्राण मुदा बुन्ने लय विह्वल घर-घर अकाशे चन्ना धरती अन्हार गय.....।” अर्न्तमनक जुआरिकेँ कियो झाँपि सकैत अछि, कविक दृष्टि भनहि रविक प्रकाशसँ दूर चालि जाए, मुदा कविता जौं शान्तचित्त भऽ कऽ पढ़ल जाए तँ अपन व्यक्तिगत जीवनकेँ कविसँ झाँपब असंभव। ‘उदासी’ शीर्षक कवितामे कवि किए उदास अछि, चानक मुख िकए मलीन भऽ गेल ई तँ नहि कहल जा सकैत मुदा ककरो देल व्यथासँ कविक मोन अवश्य हहरि गेल छन्हि- “ककरा पर रूपसि करी आश ई कल्पो विटप बबूर भेल रोपल अभिसिचिंत वर प्रवाल बढ़ि जेठक ठुट्ठ खजूर भेल...।” यात्री, आरसी आ चन्द्रभानु जकाँ कवि भौतिकतामे अपन समाजक मध्य शिखर स्थान नै रखलक, अर्थयुगक देल पीड़ा एकरा इमानदार साधारण कर्मचारी लेल असहनीय तँए ‘करूण गीत’ बनि उपटि गेल- “कटि रहल किए ई कला इन्दु घटि रहल किए जीवन प्रकाश रजनीक रूदन विगलित प्रभात कऽ रहल किए अतिशय उदास.....।” हिनक विचार मूलक कविता सभमे सेहो सिनेहसँ वेशी वैराग्यक बोध होइत अछि। जीवनक अंतिम अवस्था धरि कवि पारिवारिक र्धमे बान्हल रहल कोनो दबाबमे नै, अपन आत्मीयतासँ समाजकेँ सर्वे भवन्तु निरामया रूपेँ ेदेखलक मुदा व्यक्तिगत जीवनमे ‘ठोप-ठोप चारक चुआठकेँ ऑगुरसँ उपछैत रहल छी’ लिखबाक किए आवश्यकता पड़ल? हास्य कविता पाठ सुनि पाठक हँसैत छथि, वा मर्म स्पर्शी रचनापर कनैत छथि परंच कविसँ कियो नै पुछैत अछि जे ओ ऐ प्रकारक पद्य किए लिखलनि। बूचक व्यथा सेहो झॉपले चलि गेल मुदा एतेक तँ हम निश्चित रूपेँ कहि सकैत छी जे अपन जीवनक व्यक्तिगत संघर्षक संग-संग कवि साहित्यकार मंडलीमे अपन महत्व नै देख- ‘एकला चलो रे’क आधारपर अपन साहित्यिक कृतिकेँ सेहो एकात कऽ लेलक- “दुनिया हमर एकातक गहवर भेल जीअत मुरूतक स्थापना एहि जीवनमे...।” एकर परिणाम स्वरूप कवि मैथिलीक अस्तित्वपर सेाहे प्रश्नचिन्ह लगा देलक- “चन्दा सुमन यात्री मधुपक जुनि करू ओ आबि रहल अछि हेती मैथिली सभसँ कात......।” वास्तवमे कवि मिथिला-मैथिलीमे जाति, क्षेत्र आदिक आधारपर परसल भेदभावसँ आहत अछि, जातिवाद तँ सम्पूर्ण आर्यावत्तक अस्तत्वक कलंकित कएने अछि, मुदा कोनो भाषामे जौं जातिक आधारपर भेद हएत तँ एकरा की कहल जाए? मैथिली ऐ भंवरजालमे एना ओझरा गेल छथि जे ब्राह्मणोमे भलमानुष आ जयवारक मध्य अभिव्यक्तिक अंतर आन जातिकेँ रूढ़िवादी भाषाधिकारी लोकनि कोना मोजर देथि। कवि 1978ईं.मे जागरणगान लिख अपन वयनानुरागकेँ पसरबाक प्रयास कएलनि- “असम वंग पंजाव गुजरात जागल अहीं टा पड़ल छी उठू औ अभागल हरण भऽ रहल अछि हमर मीठ वयना कोना कऽ सिखत आन बोली ई मयना....।” स्वागत गानक विषयमे आमुखमे रिव भूषणजी आ गजेन्द्र ठाकुरजी विशेष चर्च केनहि छथि। संभवत: ऐ प्रकारक स्वागतगान जकरा व्यथागान सेहो कहल जा सकैत छैक मैथिलीमे तँ निश्चित नै लिखल गेल हएत। गजेन्द्रजी कवि बूचकेँ विद्यापतिक बाद सभसँ लयात्मक कवि मानलनि ऐ गप्पपर समालोचक लोकनि निश्चित प्रश्न ठाढ़ करताह मुदा एतेक तँ अवश्य सत्य अछि जे आरसी आ यात्रीक पश्चात एहेन समन्ववादी आशुकवि मैथिली साहित्यमे नै भेटत। एखन किछु लोक मिथिला राज्यक लेल पगहा तोड़ि कऽ चिचिआ रहल छथि। समाजक मध्य समन्वयवाद नै रहत तँ मिथिला राज्यक कल्पना करब सेहो असंभव। अगिला आसनपर बैसल लोककेँ समाजक कात लागल वर्ग जकर संख्या बारह आना अछि, मिथिला राज्यक पुरौधा कोना मानत, किएक तँ ऐ उपेक्षित लोक सभकेँ मैथिल मानले नै गेल। ऐ विषयपर कवि 30 वर्ष पहिनहि ‘मिथिला दु:दशा’ नाओंसँ कविता लिखलक- “राज्यक की बात कठिन पाॅचोटा गाॅव गय....।” कविक पोटरीमे पलायनवादक विरोध सेहो अछि। बाल साहित्य सन विषयपर ‘दीनक नेना’ सन मर्म स्पर्शी आ ‘पोताक अट्ठाहास’ सन हास्य कविता लिख कवि प्रमाणित केलक जे बाल साहित्य ओछ विषय बिम्ब नै थिक। भऽ सकैछ किछु हास्य कविताकेँ लोक मात्र मंचक गबैयाक गीत बुझथु मुदा ओहू सभमे गंभीर दृष्टिकोण झापल छैक- मात्र अपन संस्कृतिक विस्मयकारी विषय दृष्टिकोणपर कवि प्रहारेटा नै केलक आ मात्र काटर प्रथा सन कलंककेँ उघारे नै केलक संग-संग अपन संस्कृतिक सिक्कड़िकेँ सेहो ‘अप्पन मिथिला’ कवितामे पिजौलक, परंच ओइमे लागल जगपर कवि व्यथित सेहो भेल- “गंगो दीदी चाह बनावथि, कमला बेटी पान लगावथि कोशी वहिना धान कुटै छथि वागमती सिदहा फटकै छथि घऽरक लक्ष्मी विहुंसथि मॉझ ओसार अप्पन मिथिला.....।” ओना ई गप्प ओतबे सत्य सेहो अछि जे कवि किदु निरर्थक कविता सेहो लिखने छथि। जकर देशकालक दशासँ कोनो संबंध नै। जेना डहकन, हमर गाम अादि। ऐ प्रकारक कविताकेँ साहित्यक विकासमे कोनो योगदान नै, वरन् व्यर्थ अपन कवित्वकेँ नष्ट करब मानल जाए, मुदा इहो गप्प ओतबे सत्य जे आशु कविक कोनो सीमा नै होइत छैक। बहिर्मुखी व्यक्तित्वक बूच अपन रचनामे अर्न्तमुखी बनि विशेष अर्थ राखएबला कविता सभ लिखैत छलाह। मुदा हिनक अन्तर्तममे स्वांग नै अछि कतौ किलोल नै कएलनि जे हमहूँ कवि छी, मुदा अपन समन्वयवादी दृष्टिकोणकेँ अात्मामे नुका कऽ नै राखि सकलथि आ हृदयांतरिक किलोल कविताक माध्यमेँ बाहर निकलि गेल। विदेहक सम्पादक गजेन्द्र ठाकुर, सह सम्पादक उमेश मण्डल आ श्रुति प्रकाशन धन्यवादक पात्र छथि जे ऐ उपेक्षित अभिशप्त कविक बचल-खुचल रचनाकेँ प्रकाशमे अनलनि, नै तँ अगिला पीढ़ीक गप्प के कहए वर्तमान पीढ़ीक किछु लोकेँ छोड़ि ई कियो नै जनैत अछि जे ‘बूच’ मैथिलीक कवि छलाह। ऐ लेल ककरा दोष देल जाए कविक अथवा साहित्यक हथियार नेने मैथिलीक रथपर सवार महारथी लोकनिकेँ? एकर िनर्णय पाठक कऽ सकै छथि। पोथीक नाअों- कलानिधि रचनाकार- कालीकान्त झा ‘बूच’ प्रकाशक- श्रुति प्रकाशन प्रकाशन वर्ष- 2010 दाम- 150 टाका मात्र। िनश्तुकी निश्तुकीक अर्थ होइछ- “निश्चित”, निश्चित माने परम सत्य। कोनो साहित्यक कृतिक नाओं ओइमे निहित तत्वक विश्लेषणक हेतु मौलिक रूपरेखाक भान करबैत छैक। आधुनिक मैथिलीक नवतुरिया कवि श्री उमेश मण्डल रचित कविता संग्रह “निश्तुकी”केँ पढ़लाक बाद ई ज्ञात भेल जे ऐ छोट-छीन कृतिमे मिथिलाक सांस्कृतिक ओ समाजिक पराभव केर दशो दिशा निश्चित कएल गेल अछि। उमेशजी शिल्पी नै छथि आ ने हुनक कविता सभमे अलंकारक दर्शन होइत अछि कतौ कोनो भंगिमा नै, लयात्मक धार नै तखन ऐमे कोन प्रकारक “तात्विक विवेचन” अछि जकर समीक्षा कएल जाए? वास्तवमे मिथिलाक ग्राम्य जीवनमे रमि, ऊँच-नीचक अनुभव हिनक रचनामे अलग-अलग बिम्ब रूपेँ यथार्थक बोध करबैत अछि। विराट जीवन अनुभव नै रहलाक बादो नवतुरिया कवि अपन दैनन्दिनीकेँ काव्यात्मक रूप देलक, ऐ लेल कविक पहिल रचनामे कतौ अपन भाषा-संस्कृति ओ साहित्यसँ विश्वासघात नै देखएमे आएल। उपेक्षित समाजक मध्य जन्म नेनिहार कवि प्रांजल रूपेँ उपेक्षासँ आकुल छथि मुदा मात्र अपन नै, समाजमे व्याप्त विषय जीवन शैली ओ श्रमक संग-संग श्रमजीवीक अधोगति हिनक कविता सभमे नव रूपेँ परिलक्षित भेल। ऐ उपेक्षामे कोनो क्रांतिक वा उन्मादक आश नै, मात्र अधोगतिक पराभव चाहैत छथि। ऐ प्रकारक विषमता कोना दूर हएत ई तँ समाजपर िनर्भर करैत अछि। मूलत: अर्थनीतिक अपन दृष्टिकोण कविक महत्ता थिक। ऐमे सन्निहित साम्यवाद लेलिन ओ स्टालिनक साम्यवादी विचारधारा नै, हमर अपन मिथिलाक उमेश मण्डलक विचारधारा थिक, जे जगदीश प्रसाद मण्डलक अवतारवादसँ प्रभावित तँ छथि, मुदा कतौ-हुनक रचनाकेँ नै चोरौलनि। पहिल कविता “हँसैत लहास”मे कोनो लहासक वर्णन नै, जे मनुक्ख जीवित रहितो साधनहीन आ ग्लानिसँ भरल यायावरी जीवन िजबैत-जिबैत थाकि गेल अछि ओइ जीवित रहितौ लहास बनल मनुक्खमे आब ज्ञानेंद्रीय तन्त्र सक्रिय भऽ गेल आ ओ बजवाक लेल उद्यत अछि। वास्तवमे एकरा क्रांति मानल जाए। ऐ प्रकारक क्रांतिसँ हमरा देशमे विभिन्न प्रकारक आन्दोलन भेल, मुदा अइठाम ओ लहास कोनो आन्दोलन नै करत। आ ने नक्सलवादक जन्म हएत, ऐ लेल समाज निश्चिन्त रहि सकैत अछि, मुदा आन्दोलन हएत तँ वाह्य आडंवर ओ अपन संस्कृतिक विरूद्ध। परंच ओहूठाम लहास कोनो लाठी-गड़ाँस नै उठाएत, मात्र हँसत। दस पाँतीक ऐ लघुकवितामे सांस्कृतिक अधोगतिपर कवि तेज शब्दवाण चला कऽ मिथिलेटा नै, सम्पूर्ण आर्यावर्तमे व्याप्त समाजिक विषमताकेँ झकझोड़ि देलनि। कतेक समाजिक आन्दोलन भेल मुदा स्थिति यथावत्, नै जानि कहिया धरि ऐ प्रकारक विषमता हमरा सबहक समाजकेँ कोढ़ि बनि गलबैत रहत। एकटा कनेक कमी ऐ कवितामे देखएमे आएल ओ अछि पराभवसँ मुक्तिक उपाए, कवि नै प्रकट कऽ सकलनि जे लहासक हँसीक परिणाम की हएत। “फाँट” एकटा एहन शब्द थिक जे लोककेँ लोकसँ फराक कऽ रहल। श्राद्ध-कर्मक अंतिम दिन ज्येष्ठ संतानक माॅथमे पगड़ी बान्हि उतराधिकारी बनाएल जाइत अछि, मुदा क्षणहिमे मृतकक खड़ाम छोड़ि सभटा आन वस्तु लेल परिवारक आन लोक ओइ उतराधिकारीक आदेश केर प्रतीक्षा सेहो नै करैत अछि। वास्तवमे “फाँट” शब्द बौद्धिकतापर भारी पड़ि रहल, लोक अपन आचार-विचारकेँ ताखपर राखि देआद बनि गेल छथि, मात्र कुल-वंशक अधिकार लेल नै, जीवनक समस्त “कर्मस्थली”मे ऐ प्रकारक प्रवृति अछि। “कविता” शीर्षक कवितामे कवि देआदकेँ मित्र बनाबए चाहै छथि। “बाधा”गरीबक जीवनमे सहचरी बनि कऽ कखनो नै संग छोड़ए चाहै छथि। मंगला पूव भर जा तँ रहल अछि, नदी पार करबाक क्रममे प्रसन्नो भेल जे नदीमे पानि नै मात्र बालु तँए बिनु घटखेबा देने पार भऽ जाएब। मुदा......। ओतौ किछु लंठ लोक घटखेबा लऽ रहल, मंगलाक जेबीमे कैंचा नै वापस पश्चिमे रहि गेल। ऐ प्रकारक घटना पलायनवादकेँ रोकैत अछि। एकर शिकार मिथिलाक महान दार्शनिक उदयनाचार्य सेहो भेल छलाह जकर परिणाम भेल जे ओ गंडक पार नै कऽ सकलनि आ आपस अपन जन्मभूमि करियनमे आबि अपन नाओंक संग पूर्ण मैथिल लगा लेलनि। भोजपुरी साहित्यक आदि कवि भिखारी ठाकुर अर्थोपार्जनक लेल पलायन तँ केलनि मुदा कटुफल भेटलनि आ पुनि भोजपुर आबि गेलाह, जकर परिणाम सोझाँ अछि, भोजपुरी साहित्य आर्य परिवारक भाषा समूहमे अपन स्थान बना लेलक। ई तँ भेल “मंगला”केँ भेटल व्यथाकेँ रोकबाक प्रयास, मुदा जौं ओ पू-भर मात्र मिथिलेमे जाइत हएत तँ एकरा की मानबाक चाही, गरीबक बाटमे काँट रोपबाक प्रयास नै? सम्यक अर्थनीतिक आश धएने एकटा आर कविता लिखल गेल अछि- “भाेगी”। भाेगी आ योगी समाजिक जीवन रूपी नदीक दू कछेर थिक मुदा अइठाम योगीक अर्थ श्रमजीवी आ भोगीक अर्थ अनैतिक रूपसँ धनोपार्जन कऽ अंत धरि समाजपर अपन अधिकार रखनिहार मनुक्ख। अइठाम आबि कऽ कवि कालीकान्त झा बूचक उक्ति- “भोगीकेँ देहोक मोह नै, योगी तम कथि तुम्मा रहि-रहि...” उनटा पड़ि गेलनि। ओइकालसँ वर्त्तमान समए केर तुलनामे भोगी बेसी भारी पड़ि गेल छथि। “छठि” कविता सूर्यकेँ उपासनासँ बेसी कर्जक प्रति कृतज्ञताक बोध करबैत अछि। मुदा कोन प्रकारक कर्ज कवि स्पष्ट नै कऽ सकलनि। कविक फुलवारीमे फूलक डंटी वयस्क नै भेल छन्हि किएक तँ नवतुरिया छथि, एखन मात्र प्रांजल माली छथि, प्रवीण नै। तँए बेसी नकारात्मक अंश निकालब हतोत्साहित कऽ सकैत छन्हि। ऐ कविता संग्रहक आन कविता सभ सेहो बोधगम्य अछि मुदा एकटा आर कविता जे एे संग्रहकेँ वैशिष्ठ्यता प्रदान करैत अछि ओ थिक- “के मैथिल” वास्तवमे बेर-बेर समाजक कात लागल वर्गकेँ आगाँक लोक कहैत छथि- “अहूँ मैथिले थिकौं” ऐसँ कवि मर्माहित भऽ अपन तर्कसँ प्रमाणित करवाक प्रयास कएलनि जे मिथिलाक कात लागल वर्ग अान लोकसँ वेसी मैथिल कहेबाक योग्य छथि। कात कऽ देल गेल समाजक लोक जौं कवि भऽ जाइत छथि तँ लेखनीमे अपन व्यथाकेँ झाँपब असंभव। फजलुर रहमान हासमीक कविता- “हे भाई” जकाँ उमेश मण्डलक कविता- “के मैथिल” भविष्यमे मैथिली साहित्यकेँ क्रांतिवादी दृष्टिकोणसँ अवश्य प्रकाशित करत- “डोका काँकोर बीछ हम भैंटक लावा चिबाकऽ उफनैत शोणितकेँ जरा रहल छी मिथिलामे बैसल........। मुदा प्रश्न रहिये गेल के मैथिल?” कवि आशु कवि नै अछि, आ ने आत्मासँ कविता लिखलक, मुदा मिथिलाक समाजमे रमल कवि अपन जीवन दर्शनकेँ झाँपि नै सकल आ कविता सभक रूपेँ मिथिलामे परसि देलक। िनष्कर्षत: पहिल प्रयास सराहनीय मानल जाए। कोनो आन कविक कविता सभसँ एकर तुलना करब अनुचित हएत। किएक तँ ऐमे ने तँ श्रृंगार आ ने वैराग्य, ने कतौ भक्तिक हिलकोरि, कतौ हास्यक समागम नै परंच बिम्बित अर्थनीति ओ विचारमूलक कविताक आधुनिक श्रंृखला। धन्यवादक पात्र छथि विदेहक संपादक गजेन्द्र ठाकुर जे गामक वैध बनल उमेशमे कवित्व गुण देख आगाँ बढ़एलनि, ई मात्र उमेशपर उपकार नै सम्पूर्ण मिथिलाक प्रति गजेन्द्र जीक सिनेह थिक। ऐ लेल विदेह परिवारक संग-संग श्रुति प्रकाशन सेहो धन्यवादक पात्र छथि जे मात्र भाॅज पुड़एबाक लेल समाजक कात लागल वर्गक संग्रह प्रकाशित नै करै छथि, वरन् आत्मीय रूपेँ सम्पूर्ण मिथिला-मैथिलमे उपेक्षित नीक रचनाकेँ प्रकाशित करबाक योजना श्रुति प्रकाशनकेँ आधुनिक मैथिलीमे शीर्ष स्थानपर बैसा देलक। पोथीक नाओं- िनश्तुकी रचनाकार- उमेश मण्डल प्रकाशक- श्रुति प्रकाशन, दिल्ली दाम- १०० प्रकाशन वर्ष- २००९ समीक्षा- अम्बरा (राजदेव मण्डल) बक हॅसैत अछि कुटिल हॅसी, कलपै छथि लुब्ध मराल। जे कॅपैत छल डरसँ थरथर, आब ने तकरो लाज। पड़ल छथि बंधनमे मृगराज।। प्रस्तुत पद्यांश कवि सरोज भुवनेश्वर सिंहक कवितासँ लेल गेल अछि। ऐ कवितामे समाज विस्मयकारी अवस्थासँ कवि क्षुब्ध छथि। ऐमे देखाएल युगक विषमताक मार्मिक उद्वोधनसँ जौं अपन भाषा ओ साहित्य दु:दशाक तुलना कएल जाए तँ कोनो अतिशयोक्ति नै। किछु महान साहित्यकार विस्मृत रहि कालक गालमे समा गेलाह। लोक कहै छथि कवि कहियो नै मरैछ ओ तँ अपन रचनामे जीवंत रहै छथि मुदा जखन रचने मरि गेल तँ कवि कोना जीबथि। जे भेल से भ्ोल मुदा हमर दृष्टिकोण जे आबहु चिन्तन कएल जाए। एखनो किछु एहेन रचनाकार उदीयमान छथि वा उगवाक प्रयास कऽ रहल छथि जनिक लेखनीकेँ प्रोत्साहित नहियों तँ कमसँ कम किछु चर्च कएल जाए तँ ओहि रचनाकारक संग-संग भाषा-साहित्यकेँ अमरत्व अवश्य भेटत। एकटा परिपक्व मुदा साहित्यक भाषामे नवतुिरया कवि मैथिलीक पल्लवकेँ वसन्तक वातसँ हिलएवाक अपना भरि प्रयास कऽ रहल छथि श्री राजदेव मण्डल। हिनक पहिल कविता संग्रह- अम्बरा, श्रुति प्रकाशनक सौजन्यसँ पाठकलोकनि लग परसल गेल अछि। राजदेवजी परिपक्व ऐ दुआरे किएक तँ ओ नव रचनाकार नै छथि मैथिलीकेँ के कहए राजभाषा हिन्दीमे हिनक तीन गोट उपन्यास- पिंजरे के पंछी, दरका हुआ दरपन आ जिन्दगी और नाव छद्म नाओं राजदेव प्रियंकर'क नामें प्रकाशित अछि। बाहर सम्मान अपन घर अपमानसँ नै वॉिच सकलाह तँए कतेक बर्ख ठकाइते रहलाह। जखन आत्मीय लोक मैथिली अकादमीक अध्यक्ष बनाओल गेलाह तँ राजदेव जीकेँ आश जगलनि, जे समाजक कात लागल वर्गक लोक अकादमीमे अएलनि, रचना प्रकाशित होएत वा किछु मदति भेटत। अकादमीक अध्यक्षक संग-संग अकादमीक पत्रिकाक संपादक मण्डलमे सेहो अपनलोक देख दोहरि आश नेने येनकेन प्रकारेण संपर्क स्थापित कएलनि। करीब तीसटासँ उपरे कविता देबो केलखिन किन्तु मृग मरीचिका मात्र देखबैत रहलखिन। परिणाम निराशावादी रहल। विदेह' पत्रिकाक पदार्पणक पश्चात श्री उमेश मण्डल जीक माध्यमसँ संपादक श्री गजेन्द्र ठाकुर जी संग जुड़ि रचना पठाबए लगलाह। श्रुति प्रकाशनक अंतिम मुहर लगितहिं अम्बरा समान्य अर्थमे तँ छॉह मुदा नवल-धवल इजोत नेने पाठक धरि पहुँच गेल अछि। राजदेव जीकेँ नवतुरिया ऐ दुआरे कहल जाए किएक तँ पूर्वमे लिखल गेल कविता एखन धरि पाठकक लोचनसँ दूर छल। ऐ संग्रहमे 75 गोट कविता देल गेल अछि। आह'सँ श्री गणेश आ ऑखिक प्रतीक्षासँ इतिश्री। एकर तात्पर्य जे रसहीन जीवनसँ आकुल मनुक्ख कुपित अछि मुदा अंतिम स्वप्न वा कल्प आशक संग मूर्त्त रूपमे क्षणहिंमे परिवर्तित भऽ जाइछ। बाह्य रूपमे शीतलता अर्थात शांति देख'मे अबैत अछि परंच भीतरमे धाह.....। कोन प्रकारक धाह? एकरा अश्रु उच्छ्वास, आकुलता, संत्राह वा प्राप्तिक आश नै पूर्ण होएबाक क्रममे उद्विग्नताक नाआंे देल जाए। जै व्यक्तिक जीवनक चौमुख आह वा क्षोभसँ घेरल हुअए ओ जौं आकाशकेँ छूवाक कल्पना करए तँ ओकरा विक्षिप्त नै तँ कमसँ कम अतिविश्वासी अवश्य कहल जा सकैत छैक। कुरूक्षेत्रक युद्ध समाप्तिक पश्चात् गांधारीक मनोदश जकाँ अकाश स्पर्शक कल्पनामे अकाश तँ शून्य दृष्टिगोचर होइछ मुदा पाएरक नीचाँ असंख्य लहास आ बॉचल बन्धु बांधब केर कंठ दोहन कविक मोनकेँ अशांत कऽ देलकनि। भौतिकवादी युगक हीराक चमकिमे अपन साहसक रजत नेने नव मार्गकेँ ताकि रहल छथि- बिनु लेने आह कि भेटि सकत वाह-वाह परंच, नहि छी लापरवाह खोजब नवका राह। 'खोजव' शब्दक स्थानपर ताकब वा हेरब लिख रहितए तँ आर नीक लगितए। संग-संग छंद लेपनक क्रममे कतौ-कतौ अपन भावकेँ कवि व्यक्त नहि कऽ सकलाह। ज्ञानक झंडा' कवितामे ज्ञानक परिभाषा विज्ञानक अन्वेषणक रूपेँ कएल गेल। विज्ञानक विकास-क्रममे अन्ध विश्वास शनै: शनै समाप्त भऽ रहल अछि- आब नहि चलत अंध विश्वासक हथकंडा फहरा रहल विज्ञानक झंडा....। प्रयोग धर्मितामे ई गप्प तँ सत्य मुदा वास्तविकताक अवलोकन कएलापर स्थिति भिन्न होइ छैक। ऐ युगमे सेहो पितृ कर्म आ देवकर्ममे विश्वास जागले अछि जखन कि विज्ञानक शब्दकोषमे स्वर्ग-नर्कक परिभाषा असंभव। लोक एखनो श्राद्ध करै छथि, जीवनकालमे भरि पेट अन्न नै मुदा मुइलाक पश्चात सोहल अचार। मििथलामे जमीन बेच कऽ पितृ श्राद्ध कएल जाइत अछि। साधनविहिन मानव अपन जीवित संतानक प्रति अपन दायित्वक पालन कोना करथि, समाजकेँ एकर कोनो परवाहि नै ओ तँ मात्र पितृधर्म पालनक उपदेश दै छथि। तँए 'ज्ञानक झंडा'मे कविकेँ अनुकरणीय बिम्बक चित्रण करबाक चाही छल जे नै कएलनि। राजदेवजी शिल्पी नै छथि, किएक तँ कोनो शिल्पक कृत्रिम बिम्ब नै तैयार कएलनि, स्वाभाविक अछि जै व्यक्तिकेँ आरसी, यात्री, चन्द्रभानु, बहेड़ आ बूच जकाँ अपन गृहस्थ धर्मक पालन हेतु अभाव आ संत्रासक अनुभव नित्य-प्रति होइत हुअए ओइ व्यक्तिकेँ कल्पनाशीलताक शिल्प बिम्बित करबाक लेल समए कखन भेटए? ओ तँ जौं अपन जीवन दशासँ समाजक तुलना कर' लागए तँ सदिखन बिम्बे-बिम्ब। झाॅपल अस्तित्व'क शीर्षक कविता हृदेकेँ स्पर्श करैत अछि- भीतरमे ओ लगा रहल अछि फानी, सुनि रहल छी बक्रवाणी प्राप्त करबाक लेल उत्कर्ष करऽ पड़त आब संघर्ष....।। विरोध कोनो जीव ताधरि कऽ सकैत अछि जाधरि ओकरामे संघर्ष करबाक सार्मथ्य जीवित हुअए। पराजयक बेर-बेर िहलकोर लगलासँ आत्म समर्पणक संभावना प्रबल भऽ जाइछ। कखनो कखनो आसक्तिक कारणेँ लोक सेहो आत्मसमर्पण कऽ दै छथि। जेना कुरूक्षेत्रमे भीष्मपितामह अर्जुनकेँ चाहितथि तँ धाराशायी कऽ सकैत छलथि मुदा ओ तँ अर्जुनक विजय हृदेसँ चाहै छलाह। रहब अहींक सभक संग' कविता आसक्ति, मृगतृष्णा वा मजबूरी कोन रूपक समझौता थिक एकर विवेचन संभव नै, ई तँ कविक जीवनक अनुभवक सार अछि, ओ स्पष्ट रूपेँ बॉटए चाहै छथि- नहि करब आब नियम भंग नहि करब अहाँ सभकेँ तंग लिअ अपन राज, नहि चाही हमरा ताज....।। एकटा अर्न्तमुखी सोझ विचारक लोक जखन स्वयंसँ लड़ैत-लड़ैत थाकि जाइत अछि तखन एहने वेदना कृत्रिम हंसीक संग-संग निकसैत। फेरो अपन परिवारिक धर्म मोन पड़िते नदीक माछ बनि जाइछ। जीव जखन प्राणकेँ छोड़ि दैछ वा प्राण जीवकेँ छोड़ि दैछ तखन लहासक रूप.....ओहि प्रकारें कवि नदीक माछकेँ जलदुनियासँ बाहर निकलबाक प्रयास करै छथि। परिणाम हुनके मुखसँ सुनल जाए- सुनने छल ओ अपनहि कान कहने रहथिन बूढ़-पुरान कहियो नहि जाइहेँ ओहि दुनिया ओहिठाम भरल अछि खुनियाँ।'' सभ किछु रहितौं अर्थाभाव एखन समाजक सभसँ पैघ अभिशाप बनि गेल छथि समाजक मध्य जत' इमानदरी आन्हर जकाँ गांधारी बनि ठाढ़ छथि, तँए उद्विग्न भऽ जलदुनियासँ बाहर जएबाक प्रयास कएलनि परंच क्षणहिंमे अपन मातृभूमिक सिनेहक कड़ीमे फँसि फेर पानिमे कूदि गेलाह- मुदा ओ अछि अभागल जलबून्द कड़ी अछि लागल विफल भेल छल बलमे पुन: खसल ओहि नदीक जलमे जखन लोक अपनाकेँ पूर्णत: एकसरि मानि लैत अछि ओहि कालक मनोदशाक अभिव्यक्तिकेँ करए? नहि किओ दऽ रहल अछि साथ, पहाड़ीपर पटकब आब माथ हूबा देबैक हम खूनसँ अपना घामक बूनसँ.....। ऐ प्रकारक परिस्थितिजन्य पद्यक संग-संग सीमा परक झूला, कांध परक मुरदा, दीप, हित-अहित, प्रयास, ऑफिसक भूत, कठुआएल रूप, सुनगैत चिनगी, अहाँक अगवानीमे, लाल ज्योति, बीखक घैल, पत्रोतर, अन्हारक खेल, नाचक विखाह आदि-आदि विचारमूलक मर्मस्पर्शी पद्य ऐ संग्रहमे संकलित अछि। मुदा अंत धरि नव जीवनक आशमे कविक आँखि मात्र प्रतीक्षा कऽ रहल छन्हि- मन्द-मन्द सिहकैत बसात केना रहब अहाँसँ भऽ कात एको बेर तँ बोलू आबो आॅखि खोलू निकलए नेह वा धिक्कार हमरा दुनू अछि स्वीकार...।। सम्पूर्ण संग्रहमे अश्रुरोदनक बिम्बित चित्रमे नूतन आयामक संग-संग जीवनक नवल आश धएने कवि 'अम्बरा'सँ मुक्तिपर रहब चाहे चलैत, सूतल, ठार वा बैसल....। अम्बरा अर्थात् छायाकेँ लोक एकाकार तँ नै कऽ सकैत अछि परंच भगाएब सेहो असंभव। तँए दुनू रूपेँ कवि अपन जीवनक अम्बराकेँ स्वीकार कऽ लिअ चाहै छथि। रचनाक िनर्बल पक्ष जे कतौ आकर्षण नै, कतौ शिल्प नै, कतौ बिम्ब नै मुदा सभ छंद आयामक अभावक बादो राजदेवजी अनचोकेमे एहेन 'कविता संग्रह' लिख देलनि जकर तुलना दोसर कविसँ करब प्रासंगिक नै किएक तँ मैथिली भाषाक लेल एकटा नव प्रकारक प्रयोग ऐमे भेटल। मैथिली कविता संचयन- (संपादक- गंगेश गुंजन) स्वतंत्रतासँ पूर्व जन्म नेनिहार साहित्यकारक समूहमे एकटा नाओ अद्भुत मानल जा सकैत अछि, जनिक लेखनी सरस्वतीक वरद् पुत्र जकाँ एखनो मैथिली साहित्यकेँ अपन अर्चिससँ प्रकाशित कऽ रहल अछि। ओ छथि साहित्यक सभ विधाक पारखी रचनाकार- श्री गंगेश गुंजन। अरसैठम बरखमे अपन कोसक पाथर सदृश कृर्ति ‘राधा’सँ विदेहक संग-संग मिथिला-मैथिलीक ध्वजकेँ आरोहित करवाक हिनक प्रयाससँ एकैसम शताब्दीक प्रथम दशांश गमकैत विदा लऽ रहल छथि। समग्र साहित्यिक क्षेत्रकेँ ज्योर्तिमय बनएवाक संग-संग गुंजन जी संपादकक काज सेहो कएलनि। हिनक संपादकत्वमे नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडियाक सौजन्यसँ एकटा पोथी 2005ई.मे बहार भेल- ‘मैथिली कविता संचयन’। महाकवि विद्यापतिसँ लऽ कऽ तारानंद वियोगी धरिक सर्वकालीन कवि-कवयित्रीक रचनाकेँ एहि पोथीमे संकलित कएल गेल अछि। भूमिकामे गुंजन जी कवीश्वर चंदा झासँ लऽ कऽ संजय कुंदन धरिक चर्च कएने छथि, मुदा संजय कुंदन जीक रचना एहि पोथीमे प्रयागराजक सरस्वती नदी जकाँ विलोकित अछि, प्रत्यक्ष दर्शनीय नहि। जहिना आदि पुरूषक मात्र चरण स्पर्श कएल जा सकैछ, माॅथपर पाग नहि देल जा सकैत अछि, ठीक ओहिना महाकवि विद्यापतिक रचनापर कोनो प्रकारक प्रश्न चिन्ह ठाढ़ करव उचित नहि। हुनक फुलवारीमे सभटा फूल सुन्नर आ सुगंधित अछि। कोनो रचना एक-दोसरसँ कमजोर नहि। गुंजन जी जाहि रचना पुष्प सभकेँ चुनलनि ओ बड़ नीक लागल। एक दिश प्रथम रचनामे भावक संगम तँ दोसर ‘वसंत चुमाओन’मे प्रकृति वर्णनक बिम्बक मध्य राजधर्म आ देवक तुलना अनमोल लागल। ‘रूपक वर्णन’मे श्रैंगारिक धवल चित्रण कएल गेल अछि। अभिसारमे विरह समागमक झलकि मनोहारी तँ शांति पदमे विचार मूलक स्पष्ट परिदृश्य वातावरणकेँ भक्तिमयी बना दैत अछि। महाकविक पश्चात् गोविन्ददासक स्थान जेना मैथिली साहित्यमे विलक्षण अछि, ओहिना एहि पोथीमे हुनक छ: गोट कविताक चयन संपादक जीक प्रतिभाक संग-संग चयनक अद्वैत दृष्टिकेँ पारदर्शी बना देलक। मनबोधक एकमात्र कविता ‘शिशु’ मैथिली साहित्यमे बाल साहित्यक न्यूनताकेँ किछु दूर तक भरवाक प्रयास कऽ रहल अछि। कवीश्वर चंदा झाक तीनपद भक्तिसँ संबंधित मानल जा सकैत अछि। आशु कवित्वमे चंदा झाक स्थान मैथिली साहित्यमे सूर-तुलसी जकाँ प्रांजल, तँए तीनू पद गेय। शिव राग आ महेशवाणीमे भक्तिक आवाहन कएल गेल। ‘राधा िवरह’ भक्तिक आड़िमे वेदनाक भाव सरितासँ नयनकेँ सरावोरि करवाक लेल पर्याप्त बुझना जाइत अछि। कविवर सीताराम झाक पद्य सभमे झंकार अनायास भेट जाइत अछि। कवि चूड़ामणि काशीकांत मिश्र ‘मधुप’केँ जौं मैथिली साहित्यक आदि लोकगीतकार कहल जाए तँ कोनो अतिशयोक्ति नहि। विद्यापति जीक पश्चात् पद्य विधामे मधुप जी सभसँ जनप्रिय कवि मानल जाइत छथि। हुनक ‘पतित पीक’ आ ‘छुतहर’ कविताक संकलन एहि पोथीमे कएल गेल अछि। दुनू पद्यमे बिम्बक चयन आ विश्लेषण सरल मुदा अर्थपूर्ण लागल। कांचीनाथ झा ‘किरण’ जीक ‘मिथिलाक वसंत’ अपन माटि-पानिक तात्विक विवेचन करैत अिछ। साहित्य सरोज बाबू भुवनेश्वर सिंह भुवन, सरस कवि ईशनाथ झा, सुमन जी सबहक कविता सभक चयनमे संपादक जीक दीर्घ इच्छा शक्तिक संग-संग अध्ययनशीलताक दृष्टिकोण नीक मानल जा सकैछ। यात्री जी सर्वकालीन मैथिली कविमे अपन अलग स्थान रखैत छथि। हुनक लिखल पद्य सभ चित्रामे हुअए वा पत्रहीन नग्न गाछमे- सभटा एकपर एक अछि। संभवत: हुनक श्रेष्ठ छ: गोट कविताक चयनमे गुंजन जी किंकर्तव्यविमूढ़ भऽ गेल हेताह। मुदा जे पद्य सभ चुनल गेल सभ प्रासंगिक लागल। कनेक कमी यएह जे ‘मैथिले’ शीर्षक कविताक मात्र छ: पॉति देल गेल जखन की अखिल भारतीय मैथिली साहित्य परिषद् प्रयाससँ वहराएल ‘चित्रा’ पोथीक आधारपर ‘मिथिले’ शीर्षक कविता वियालिस पॉतिक अछि। हमरा मतेँ कोनो रचनाकारक अपूर्ण रचना संकलित करब उचित नहि। आरसी बावूक दुनू कविताक चयन शांतिभावसँ कएल गेल। आरसी बावू स्वयं अपन रचना ‘शेफालिका’केँ अपन सर्वश्रेष्ठ कविता मानैत छलाह। तेँ एहि कविताकेँ संकलित करबाक लेल गुंजन जी धन्यवादक पात्र छथि। साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित ‘समकालीन मैथिली कविता’मे संपादक द्वय डॉ. ब्रज किशोर वर्मा मणिपद्मकेँ बिसरि गेल छलाह, मुदा एहि पोथीमे हुनका ‘मृग मयूर आ कोकिल मन हे’ रूपमे स्मरण कएल गेल अछि। वास्तवमे मणिपद्म जी आधुनिक मैथिल साहित्यक पद्मनाभ छथि। गोविन्द झा, रामकृष्ण झा किसुन आ अमर जीक पद्यक चयन एहि पोथीकेँ नूतनता प्रदान कएलक। राजकमल चौधरी मूलत: कथाकार छथि। पद्यविधामे सेहो हिनक रचना नीक होइत अछि, तँए सर्वकालीन कविगणमे हिनक स्थानपर कोनो संदेह नहि। संगहि एकटा गप्प खटकि गेल जे राजकमल जीक आठ गोट कविताकेँ एहि पोथीमे समाबिष्ट एकल गेल आ समकालीन कवि गोपाल जी झा गोपेशक कतहु चर्च नहि। राजकमल जीक कविताक गणना कम कऽ गोपेश जीकेँ एहि पोथीमे जौं स्थान देल गेल रहितए तँ आर विलक्षण भऽ सकैत छल। मायाबाबू, सोमदेव, धीरेन्द्र हंसराज, रामदेव झा, गुंजन जी, धूमकेतु, कीर्ति नारायण मिश्र, जीवकान्त, रेणु जी, प्रवासी जी, मंत्रेश्वर झा, कुलानंद जी, विनोद जी, उपेन्द्र दोषी, रामलोचन ठाकुर, भीमनाथ झा, नचिकेता, महाप्रकाश, ललितेश मित्र, विभूति आनंद, केदार कानन, ज्योत्सना चंद्रम, देवशंकर नवीन, सुस्मिता पाठक जीक प्रतिभापर कनेको संदेह नहि। रामानुग्रह झा, सुकान्त सोम, पूर्णेन्दु चौधरी, महेन्द्र, रमेश, अग्निपुष्प, हरेकृष्ण झा आ नारायण जी सन रचनाकारक रचना जखन एहिमे देल गेल तँ तंत्रनाथ झा, उपेन्द्र ठाकुर मोहन, उपेन्द्र नाथ झा व्यास, राधवाचार्य, अणुजी, रमाकरजी, श्रीमतिश्यामा देवी, इन्द्रकान्त झा, हासमीजी, डॉ. शेफालिका वर्मा, रवीन्द्र नाथ ठाकुर, सियाराम झा ‘सरस’, इलारानी सिंह, डॉ. लाभ, डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र, नवल जी सन रचनाकारकेँ गुंजन जी कोना विसरि गेलनि। भऽ सकैत अछि जे हुनक तर्क हुअए जे स्थापित रचनाकारक संग-संग किछु विस्मृत आ नवतुरिया रचनाकारकेँ सेहो स्थान देल जाए। जौं एहेन गप्प तैयो स्तरीय संपादन नहि मानल जा सकैत अछि। विस्मृत आ नवतुरियो रचनाकार वर्गक किछु रचनाकार एहि पोथीमे छूटल छथि जनिक रचना एहिमे संकलित किछु रचनासँ वेशी महत्व रखैत अछि। श्री चन्द्रभानु सिंह जीक कविताक किछु पॉति एकर प्रमाण स्वरूप देखल जा सकैत अछि- तोरे स्वरक टघार सहारे रटय पपिहरा पी-पी ककरा ने ई छैक सेहन्ता तोहर बाजव टी-पी बेसुराह मनुखक समाजसँ तोहर फराके टोल छौ की कहियौ गे करिकी तोहर बाजव बड़ अनमोल छौ। (कोइली शीर्षक कवितासँ) एहि कविताक उत्तर देनिहार कवि प्रो. नरेश कुमार विकल जीक रचना सेहो एहि पोथीमे नहि देल गेल अछि- युग-गुग सँ चलि आवि रहल छौ वाजव मिसरीक घोल सन हमरा आव लगैए कोइली बाजव तोहर ओल सन.....। ई कविता ‘कोइली’ शीर्षक नाअोसँ विकल जीक कविता संग्रह ‘अरिपन’मे सन 1995ई.मे प्रकाशित भेल अछि। विलट पासवान विहंगम, रमाकांत राय ‘रमा’ कवि चंद्रेश जियाउर रहमान जाफरी सन आधुनिक कविक रचना एहि पोथीमे समाविष्ट कएल नहि गेल। आशु गीतमे काली कान्त झा ‘बूच’क रचनाकेँ समीक्षक वा संपादक विसरि सकैत छथि, मुदा जे पाठक पढ़लनि ओ कहियो नहि विसरताह। हुनक जागरण गान, माला, एक्केगीत, तोहर ठोर, उदासी, परिचय पात सन सभ विधासँ युक्त कविता मिथिला मिहिरमे प्रकाशित भेल छल। भूमिकामे गुंजन जी स्पष्ट कएने छथि जे एहिमे संकलित 51 गोट कविक संग-संग आर कवि छथि। हुनक रचना नहि देवाक पक्षमे पोथीक सीमित आकार आ कविपय रचनाकारक सहयोगक प्रति उदासीनताक तर्क देल गेल अछि। हमरा मतेँ एहि तर्कमे वास्तविकताक कमी बुझना गेल। पहिने मिथिला-मैथिलीक साहित्यकारक रचनाक प्रकाशन स्त्रोत मात्र किछु पत्र पत्रिका छल। गुंजन जीक रचना सभ सेहो निश्चित एहिमे छपैत छलनि, तखन असहयोगक गप्प कतऽ सँ आएल? विकल जी, बूच जी, शेफालिका जी, हासमी जी, चन्द्रभानु सिंह, चन्द्रेश सन कवि सत्तरिसँ अस्सी दशकमे मिथिला मिहिरक बहुत रास अंकमे कविक रूपेँ उपस्थित छलाह। हमर कहव ई नहि जे रमेश जी आ नारायण जी सन रचनाकारक रचना एहि पोथीमे किएक देल गेल? कहवाक तात्पर्य जे जनिक कविता वेसी देल गेल अछि हुनक कविताक गणना किछु कम कऽ छूटल कविकेँ सम्मलित कएल जा सकैत छल। महाकवि विद्यापति, गोविन्द दास, यात्री, राजकमल, कीर्ति नारायण मिश्र कोनो परिचयक मोहताज नहि छथि हुनक कविता जौं एक-एक टा कम्मे रहितए तँ कोनो हुनका लोकनिक प्रतिष्ठा कम नहि भऽ जेतनि छल? मुदा कोनो विषय वस्तुक मात्र नकारात्मक स्वर नहि देखवाक चाही। मैथिली साहित्यमे सर्वकालीन कविता सभक संकलन अत्यल्प अिछ, तेँ गुंजन जीक प्रयास सराहनीय लागल। पूर्णता कतहु नहि भऽ सकैत अछि। प्राचीन कविक रचना सभक चयनमे कोनो पूर्वाग्रह वा पक्षपात नहि देखएमे आएल। मात्र आधुनिक कालक किछु रचनाकारक महत्वपूर्ण रचना एहि पोथीमे नहि देल गेल। गुंजन जी धन्यवादक पात्र छथि जे असगरे अंशत: कुशल संपादन कएलनि। एहि तरहक अर्न्तद्वन्द्वसँ बचवाक लेल कोनो पोथीक संपादन एक व्यक्तिसँ नहि करवा कऽ तीन-चारि व्यक्तिक संपादक मंडल द्वारा करएवाक चाही। जौं एहि तरहक प्रयास कएल जाए तँ त्रुटिक संभावना क्षीण भऽ सकैत अछि। अंतमे स्वर्गीय रचनाकार सभकेँ पुष्पांजलि जीवित रचनाकार सभकेँ नमन संग-संग नेशनल वुक ट्रस्ट आ गंगेश गंुजन जीककेँ साधुवाद। पोथीक नाओ- मैथिली कविता संचयन संपादक- गंगेश गंुजन प्रकाशक- नेशनल वुक ट्रस्ट इंडिया प्रकाशन वर्ष- 2005 मूल्य- एक सय टका मात्र कुरूक्षेत्रम् अर्न्तमनक- (समीक्षा) किछु लोकक ई प्रवृति होइत अछि जे सदिखन अपन चल जीवनमे नव-नव प्रकारक प्रयोग करैत रहैत अछि। एहि नव प्रयोगक कारण जहानमे अपवर्गक विहान देखएमे अबैत अछि। प्रयोग धर्मिता व्यक्तिक इच्छासँ नहि जन्म लऽ सकैछ, ई तँ नैसर्गिक प्रतिभाक परिणाम थिक। मैथिली साहित्यमे प्रयोग धर्मी सरस्वती पुत्रक अभाव नहि परंच वर्तमान कालमे एकटा एहेन प्रयोगधर्मी मिथिला पुत्रकेँ मॉ मिथिले अपन ऑचरमे सक्रिय कएलनि, जे तत्कालिक मैथिलीक दशा वदलवाक प्रयास कऽ रहल छथि। क्रांतिवादी आ सम्यक विचार धाराक सम्पोषक ओ व्यक्ति केओ अनचिन्हार नहि- मैथिली साहित्यक प्रथम अंतर्जाल पाक्षिक पत्रिका विदेहक सम्पादक- श्री गजेन्द्र ठाकुर छथि। भऽ सकैत अछि जे किछु लोक मैथिली साहित्यकेँ अन्तर्जालसँ जोड़वाक प्रयास कए रहल हएताह परंच एकटा मूर्त्त रूप दऽ ६४ अंक धरि पहुँचेवाक कार्य गजेन्द्रे जी कएलन्हि। साहित्यक नव-नव विधा आ समाजक वेमात्र वर्गकेँ मैथिलीक आलिंगनमे आवद्ध कऽ साम्यवाद आ समाजवादकेँ वैदेहीक माटिपर आनि हमरा सबहक माथपर लागल अनसोहांत कलंककेँ धो देलनि। मात्र ६४ अंकमे जे कार्य भेल अछि ओ कतऽ-कतऽ पहिने भेल छल, आत्म अवलोकन करवाक पश्चात् जानल जा सकैत अछि। समाजक फूजल, बेछप्प आ उदासीन वर्गकेँ अपन वयनाक मानस पटलपर आच्छादित करवाक लेल साहस सभ केओ नहि जुटा सकैत अछि। मात्र भॉज पुरयवाक लेल मानस पुत्र एहेन कार्य नहि कएलनि, ओहि उपेक्षित वर्गक रचना कारक रचनामे विषए-वस्तुक गतिशीलता आ तादात्म्य वोध ककरोसँ कम नहि अछि। प्रयोगधर्मी गजेन्द्र जीक कर्मक दोसर आमुख थिक हिनक लेखनीक धारसँ निकलल इन्द्रधनुषक सतरंगी गुलालसँ भरल भावक आत्मउदवोधन- “कुरूक्षेत्रम अन्तर्मनक” एहि पोथीकेँ की कहल जाए उपन्यास, गल्प, बाल साहित्य, समालोचना, प्रवंध वा काव्य? साहित्यक सभ विधाक अमिर रसकेँ घोरि वंगोपखाड़ी वना देलनि जतए ई कहव असंभव अछि जे गंगा, कोशी, यमुना वा हुगली ककर नीर कतए अछि? शीर्षक देखि अकचका गेल छलहुँ, ई महाभारत मचौता की! मुदा अपन हृदएसँ सोचल जाए प्रत्येक मानवक हृदएक दूटा रूप होइत अछि, मुदा अन्तर्मन सदिखन सत्य बजैत अछि ओहिठॉ मिथ्याक स्थान नहि। कुरूक्षेत्र रणभूमि अवश्य छल परंच ओहिठॉ सत्यक विजयक लेल युद्ध भेल। ओहिठॉ धर्मसंस्थापनार्थ विनाश लीला मचल छल। हमरा सभकेँ अपन अन्तर्आत्मामे कुरूक्षेत्रक दर्शन करएवाक लेल दिशा निर्देशन कऽ रहल छथि गजेन्द्र जी। मैथिली साहित्यक कोन असत्यकेँ त्याग करवाक चाही? किअए सुमधुर वयनाक एहेन दशा भेल? नव पथक निर्माण नवल दृष्टिकोणसँ हएत। हमरा बुझने एहि पोथीमे साहित्य समागमक लेल दृष्टिकोणकेँ प्राथमिकता देल गेल अछि। एहेन विलक्षण साहित्यपर आलेख लिखव हमरा लेल आसान नहि अछि- मुदा दु:साहस कऽ रहल छी- भऽ रहल वर्ण-वर्ण नि:शेष शब्दसँ प्रकटल नहि उधेश्य मोनमे रहल मनक सभ वात अछिंजलसँ सध: स्नात सात खण्डमे विभक्त एहि पोथीकेँ सम्पूर्ण परिवारक लेल सनेश कहि सकैत छी। प्रवंध-निवंध-समालोचना:- एहि खण्डक आदि लोकगाथापर आधारित कथा सीत-वसंतसँ कएल गेल अछि। उत्तर मध्यकालीन इतिहासमे अल्हा-ऊदल, शीत वसंत सन कतेक कथा प्रचलित छल, जकर मंचन पद्यक रूपमे वर्तमानकालमे विहारक गाम-गाममे भऽ रहल अछि। एक राज परिवारक विषय-वस्तुक चित्रण करैत लेखक सतमाएक िसनेहपर प्रश्न चिन्ह लगैवाक प्रयास कएलनि अछि? कथाक आरंभसँ इति धरि मर्मस्पर्शक अनुभव होइत अछि। कथाक अंतमे विमाताकेँ ओहि पुत्रक छाया भेटलनि जकर पराभव ओ कऽ देने छलीह। श्री मायानन्द मिश्र मैथिली साहित्यक सभ विधाक मांजल साहित्य कार मानल जाइत छथि। हुनक इतिहास वोधक चारू प्रमुख स्तंभ प्रथमं शैलपुत्री च, मंत्रपुत्र, पुरोहित आ स्त्रीधनपर सम्यक आलेख प्रस्तुत कऽ गजेन्द्र जी पूर्वमे लिखल गेल प्रबंधक दृष्टकोणकेँ चुनौती दऽ रहल छथि। ऋृग्वैदिक कालीन इतिहासपर आधारित मंत्रपुत्र मायानन्द जीक प्रमुख कृति मानल जाइत अछि। एहि पोथीक लेल माया जीकेँ साहित्य अकादेमी पुरस्कार भेटल अछि। मंत्रपुत्र पाश्चात्य इतिहाससँ प्रभावित अछि। मंत्रपुत्रक संग-संग पुरोहितमे सेहो पाश्चात्य संस्कृितक झलकि देखए अबैत अछि। अपन समालोचनाकेँ गजेन्द्र जी अक्षरश: प्रमाणित कऽ देने छथि, मुदा मायाबावूक रचना संसारपर कोनो तरह प्रश्न चिन्ह नहि ठाढ़ कएलनि। समीक्षाक रूप एहने होएवाक चाही। समीक्षककेँ प्ूर्वाग्रह रहित रहलासँ साहित्यिक कृतिक मर्यादा भंग नहि होइत अछि। केदारनाथ चौधरी जीक दू गोट उपन्यास ‘चमेली रानी’ आ ‘माहुर’पर गजेन्द्र जीक समीक्षा पूर्णत: सत्य मानल जा सकैत अछि। मैथिली साहित्यमे बहुत रास रचनाक विक्री सम्पूर्ण मैथिल समाजमे जतेक नहि भऽ सकल, ‘चमेली रानी’क ओतेक विक्री मात्र जनकपुरमे भेल। एहिसँ एहि साहित्यक प्रति पाठकक श्रद्धाकेँ देखल जा सकैत अछि। ‘माहुर’ मैथिली साहित्यक लेल क्रांतिकारी उपन्यास थिक। अरविन्द अडिगक कृतिक चरित्रसँ एहि उपन्यासक एक पात्रक तुलना लेखकक भाषायी समृद्धताकेँ प्रदर्शित करैत अिछ। विदेह-सदेहक सौजन्यसँ श्रुति प्रकाशन द्वारा नचिकेता जीक एकटा नाटक ‘नो एण्ट्री मा प्रविश’ प्रकाशित भेल अछि। एहि नाटकक लेखनपर नचिकेता जीकेँ कीर्ति नारायण मिश्र सम्मान देल गेल अछि। नाटकक चारू कल्लोलक तर्क पूर्ण विश्लेषण कऽ गजेन्द्र जी समीक्षाक रूप बदलवाक प्रयास कएलनि अछि। एहि नाटकमे तार्किकता आ आधुनिकताक विषय वस्तु निष्ठताकेँ ठाम-ठाम नकारल गेल अछि। रचना लिखवासँ पहिने अध्यायमे गजेन्द्र जी मैथिली साहित्यमे भाषा सम्पादनपर विशेष ध्यान देवाक प्रयास कएलनि। अपन साहित्यमे भाषायी त्रुटिपर पूर्णरूपसँ ध्यान नहि देल जा रहल अछि। कविशेखर ज्योतिरीश्वर, विद्यापति शब्दावली, रसमय कवि चर्तुभूज शब्दावली आ बद्रीनाथ शब्दावली द्वारा मिथिला-मैथिलीक सर्वकालीन शब्द विन्यासक आ शब्द भंडारक विस्तृत वर्णन कएल गेल अछि। एहिसँ निश्चय भाषा सम्पादनमे सहायता भेटल। कतेक रास एहेन शब्द अछि जकर विषयमे हम की साहित्यक पैघ-पैघ वेत्ता पहिने नहि जनैत होएताह। निश्चित रूपसँ ई अध्याय पाठकक संग-संग साहित्यकार आ असैनिक सेवाक ओहि प्रतियोगीक लेल उपयोगी हएत जे मैथिलीकेँ मुख्य विषयक रूपे प्रतियोगितामे सम्मिलित होएवाक लेल प्रयत्नशील छथि। समीक्षक हमरा सबहक मध्य एकटा नव पद्य विधाक चर्च कऽ रहल छथि- हाइकू। एहि विधापर मैथिलीमे पहिनहुँ रचना होइत छल जेना- “ई अरदराक मेघ नहि मानता रहत बरसिकेँ। मुदा एहि विधाकेँ क्षणिका नाअोसँ जानल जाइत छल। जापानी साहित्यक द्वारा सृजित एहि पद्य रूपक वास्तविक चित्रण मैथिली साहित्यमे गजेन्द्र जी आ ज्योति झा चौधरी कएलनि अछि। मिथिलाक लेल प्रलय कहल जाए वा विभीषिका- ‘बाढ़ि’ ई शब्द सुनितहि कोशी, कमला, बलान, गंडकी, बागमती आ करेहक आंतसँ ओझराएल लोक सभ कॉपि जाइत छथि। एहि समस्याक स्थिति, सरकारी प्रयासक गति आ दिशाक संग-संग बचवाक उपाएपर लेखकक दृष्टिकोण नीक बुझना जाइत अछि। कोनो ठाम आ कोनो आन धाममे जौं हमरा लोकनिक विषयमे पता चलए-की मैथिल छथि, लोकक दृष्टकोण स्पष्ट भऽ जाइत अछि- हम सभ मछगिद्धा छी। एकर कारण जे धारक कातमे रहनिहार जीवक जीवन जलचरे जकाँ होइत अछि। जलीय जीवक भक्षण अधिकांश व्यक्ति करैत छथि। तेँ ने हमरा सभकेँ मॉछ आ मखानक प्रेमी बुझल जाइत अछि, आ वास्तवमे हम सभ मॉछक प्रेमी छी। अधिकांश मैथिल ब्राह्मण परिवारमे सोइरीसँ श्राद्ध धरि माॅछक भक्षण अनिवार्य अछि। अान जातिमे अनिवार्य तँ नहि अछि, मुदा ओहु वर्गक अधिकांश लोक मॉछक प्रेमी छथि। लेखक एहि लोकक भक्षण धारकेँ ध्यान धरैत कृषि मत्स्य शब्दावली लिखलन्हि अछि। एहिमे सभ प्रकार मॉछक आकार, रंग, रूपक विश्लेषण कएल गेल अछि। कृषिकार्यक लेल जोड़ा वरदक संग हर पालो इत्यादिक ज्वलन्त व्यवस्थापर लेखकक विचार नीक मानल जा सकैत अछि। करैल, तारवूज आ खीराक विविध प्रकारक नाओ सुनि गामक जिनगी स्मरण आवि जाइत अछि। एहि खण्डक सभसँ नीक विषय जे हमरा अन्तर्मनकेँ हिलकोरि देलक ओ अिछ विस्मृति कवि- पंडित राम जी चौधरीक रचना संसारपर प्रवाहमय आ विस्तृत प्रस्तुति। हमरा सबहक भाखाक संग िकछु विषमता रहल जे एहिमे कतेक रास एहेन रचनाकार भेल छथि जे अपने संग अपन रचनाकेँ गेंठ बन्हने विदा भऽ गेलाह। एकर कारण एहिमे सँ किछु रचनाकारक रचनाक संकलन नहि भऽ सकल वा भेवो कएल तँ पाठक धरि नहि पहुँचल। एहि लेल ककरा दोष देल जाए रचनाकारकेँ आ हमरा सबहक भाषाक तत्कालीन रक्षक लोकनिकेँ? एहि भीड़मे राम जी चौधरीक नाओ सेहो अछि। मैथिली साहित्यमे रागपर लिखल रचनामे राम जी बावूक रचना सेहो अछि। भक्तिमय राग विनय विहाग, महेशवाणी, ठुमरी तिरहुता, ध्रुपद, चैती आ समदाओनक रूपमे हुनक लेखनीसँ निकलैत गीत सभ अलम्य अछि। शास्त्रीय शैलीक मैथिली गायनमे वर्तमान पिरहीक लेल अत्यन्त उपयोगी रचना सभकेँ प्रकाशमे आनि गजेन्द्र जी मिथिला, मैथिली आ मैथिलपर पैघ उपकार कएलनि अछि। सत्यकेँ स्वीकार करवाक सामर्थ्य मात्र किछुए लोकमे होइत अछि। गजेन्द्र जी ओहि लोकक पातरिमे ठाढ़ एक व्यक्ति छथि परिणामत: मैथिली साहित्य भोजपुरीसँ आगाँ मानल जाइत अछि मुदा गुणवताक दृष्टिए भोजपुरी रास परिमार्जित अछि। भोजपुरी साहित्यक काल पुरूष भिखारी ठाकुरक मर्म स्पर्शी विदेशिया एहि भाषाक अलग पहिचान भेटल। मैथिली भाषामे विदेशियाक कमीक मुख्य कारण रहल-प्रवासक प्रति उदासीनता। जौं लिखलो गेल तँ महाकाव्यक रूप दऽ देल गेल। विदेशिया पद्य आ विधापतिक लिखल? हमरो विश्वास नहि भेल छल। विद्यापतिकेँ मुख्यत: श्रैंगारिक कवि मानल जाइत अछि। ओना हुनक रचनाकेँ भक्ति रससँ सेहो जोड़ल जाइत अछि। कुरूक्षेत्रम अन्तर्मनक पोथी पढ़लासँ नव सोच मोनमे आवि गेल। जकरा भोजपुरी साहित्यमे विदेशिया कहल गेल वास्तवमे मैथिलीमे ओ अछि- पिया देशान्तर। विद्यापतिक नेपाल पदावलीमे एहि प्रकार रचना सभ संकलित अछि, मुदा कहियो एहि रूपे महिमा मंडित नहि कएल गेल। कारण स्पष्ट अछि पिया देशान्तरक नाटय रूप मिथिलाक पिछड़ल जातिक मध्य प्रदर्शित कएल जाइत अछि। तेँ अग्रसोची लोकनि एकरासँ दूरे रहव उचित बुझैत छथि। एहिसँ मैथिलीक दशा-दिशाकेँ नव गति कोना भेटि सकैत अछि। मैथिली लोकभाषा अछि, लोक संस्कृतिकेँ बढ़यवाक प्रयास करवाक चाही। गजेन्द्र जीक सोझ दृष्टिकोणकेँ विम्वित करवाक चाही। “एतहि जानिअ सखि प्रियतम व्यथा” –श्रैंगारिक-विरह व्यथाक वर्णन मुदा अछि तँ पिया देशान्तर। श्री सुभाष चन्द्र यादव जीक कथा संग्रह ‘बनैत-विगड़ैत’पर गजेन्द्र जीक समीक्षा अपूर्व अछि। प्रवेशिकामे हुनक कथा ‘काठक बनल लोक’ पढ़ने छलहुँ। काठक बनल लोकक नायक वदरियाक मर्म देखि पाथरो पिघलि जा सकैत अछि। वास्तवमे सुभाष जी मैथिली साहित्यक फनीश्वर नाथ रेणु छथि। महिमा मंडनक कालमे मात्र भाँज पुरएवाक लेल हिनक कथा पाठ्यक्रममे दऽ देल जाइत अछि। आंचलिक रचनाकेँ कहिया धरि उपहासक पथियामे झाॅपि कऽ राखल जाएत? एक नहि एक दिन छीप उधिया जएत आ सत्यक सामना करए पड़त। लोक धर्मी साहित्यकार चाहे ओ धूमकेतु, कुमार पवन कमला चौधरी, सुभाष चन्द्र यादव, जगदीश प्रसाद मंडल वा कोनो आन होथु- हुनका सबहक रचनाक उपेक्षा नहि होएवाक चाही। सुभाष जीक कथा कनिया-पुतरा, बनैत-विगड़ैत आ दृष्टिक समीक्षा देखि समए-कालक दशाक अविरल द्वन्द्व उपस्थित भऽ जाइत अछि। ऋृणी छी जे गजेन्द्र बावू एहि पोथीपर समीक्षा लिखलन्हि। इंटरनेटक लेल अन्तर्जाल प्रयोग, नीक लागल। वेवसाइट बनएवाक तकनीकसँ गजेन्द्र जीक उद्वोधन आ नियमन नहि बुझि सकलहुँ। तीन वेरि पढ़लहुँ मुदा जेठक तेज विहारि जकाँ मॉथपरसँ उड़ि गेल। नव-नव नेना भुटका बुझि जएताह। तकनीकी युगक नेनाक स्मरण शक्तिक आॅगन पैघ होइत छथि तेँ हुनके सबहक लेल एहि अध्यायकेँ छोड़ि देलहुँ। लोरिक गाथा समाजक उपेक्षित वर्गक संस्कृतिपर आधारित अछि। सहरसा-सुपौलक वीर आदि पुरूष लोकिकक परिचए-पातमे पौराणिक मैथिल संस्कृतिक दर्शन होइत अछि। मिथिलाक खोजमे जनकपुर, सुग्गा धनुषा सन नेपालक स्थलसँ लऽ कऽ मधुबनी जिलाक कतेको उत्तर मैथिल गामसँ दक्षिणमे जयमंगलागढ़ (वेगूसराय)क चर्च कएल गेल अछि। पूवमे पूर्णिया किशन गंजक कतेक स्थलसँ लऽ पश्चिममे चामुण्डा (मुजफ्फरपुर)क मॉ दुर्गाक मंदिरक चर्च कएल गेल अछि। मिथिलाक िकछु स्थानक वर्णन एहि सुचीमे नहि भेटल जेना- सती स्थान (गाम-शासन प्रखंड-हसनपुर जिला- समस्तीपुर) आ उदयनाचार्यक जन्म स्थली (गाम-करियन जिला- समस्तीपुर)। एहि लेल लेखककेँ दोष नहि देल जा सकैत अछि, किएक तँ मिथिलाक खोज विदेहसँ लेल गेल अछि, जाहिमे गजेन्द्र जी अवाहन कएने छथि, जे जिनका लग कोनो प्रसिद्ध स्थलक विषएमे जानकारी हुअए जे एहिमे सम्मिलित नहि अछि तँ ओकर छाया चित्रक संग सूचना पठाओल जाए। किछु स्थल आर छूटल भऽ सकैत अछि, प्रवुद्ध पाठक एहि विषएपर कार्य कऽ सकैत छी। सहस्त्रवाढ़नि उपन्यास :- सहस्त्रवाढ़नि एकटा आकाशीय पिण्ड होइत अछि, जकर दर्शन आर्यक धार्मिक दृष्टिकोणमे अछोप बुझना जाइत अछि, मुदा उपन्यासकार एक अछोप पिण्डकेँ आत्मसात् करैत एकरा सावित्री बना देलनि। सावित्री अपन पातिब्रत्य आ दृढ़ निश्चयसँ सत्यवानक प्राण यमराजसँ छीनि लेने छलीह। एहि उपन्यासक दृष्टिकोण तँ एहन नहि अछि परंच उपन्यासक नायक आरूणिक मृत्युपर विजयमे सहस्त्रवाढ़निक उत्प्रेरणक उद्वोधन कएल गेल अिछ। कुरूक्षेत्रम अन्तर्मनक मूल पृष्ठपर सहस्त्रवाढ़निक चित्र देल गेल अछि। एहिसँ प्रमाणित होइत अछि रचनाकारक दृष्टिमे सम्पूर्ण पोथीक सातो खण्डमे एहि उपन्यासक विशेष महत्व अछि। सहस्त्रवाढ़निक अध्ययन कएलापर उन्नैसम शताब्दीक उतरांशसँ वर्तमानकाल धरिक वर्णन कएल गेल अछि। एक परिवारक एक सए पंद्रह बरखक कथाक वर्णनकेँ कल्प कथा मानव निश्चित रूपसँ रचनाकारक भावनापर कुठाराघात मानल जाएत। सध: ई कथा रचनाकारक पॉजड़िक कथा अछि। जौं एकरा गेजेन्द्र बावूक आत्मकथा मानल जाए तँ संभवत: अति शयोक्ति नहि हएत। उपन्यासक आदि पुरूष झिंगुर बावू एकटा किसान छथि। जनिक घरमे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसक स्थापना बर्ख सन् १८८५ई.मे एकटा बालक जन्म लेलन्हि- कलित। कलितक नेनपनसँ एहि उपन्यासक श्री गणेश कएल गेल। कलितकेँ ओहि कालमे वंगाली शिक्षकसँ अंग्रेजीक शिक्षण व्यवस्था दरिभंगामे कएल गेल। एहिसँ दू प्रकारक भावक वोध होइत अछि। पहिल जे झिंगुर बावू समृद्ध लोक छलाह। ओहि कालमे अवहट्ठक शिक्षा सेहो गनल गुथल परिवारमे देल जाइत छल, अंग्रेजीक कथा तँ अति विरल छल। देासर जे वंगाली लोक हमरा सभसँ शिक्षाक दृष्टिमे आगाँ छलाह। वंगाली जातिक अंग्रेजी शिक्षक, हम सभ कतेक पाछाँ छलहुँ जे हमरा सबहक संस्कृतिक राजधानी दरिभंगामे कोनो मैथिल अंग्रेजी शिक्षक झिंगुर बावूकेँ नहि भेटलन्हि। सौराठ आ ससौलाक सभा गाछीक चर्च तँ बेरि-बेरि कएल जाइत अछि, मुदा एहि पोथीमे विलुप्त सभा बलान कातक गाम परतापुरक सभा गाछीसँ कथाकेँ जोड़वाक दृष्टिकोण अलग मुदा नीक बुझना जाइत अछि। कलितक विवाहमे वर महफामे, बूढ़ वरियाती कटही गाड़ीमे आ जवान लोकक पैदल जाएव वर्तमान पीढ़ीक लेल अजगुत लागत मुदा अपन पुरातन संस्कृतिसँ नेना-भुटकाकेँ आत्मसात कराएव आवश्यक अछि। कलितक मृत्युक पश्चातक कथा हुनक छोट पुत्र- नंद-क परिधिमे धूमए लागल। नंदक पारदर्शी सोच, अपन कनियासँ प्रत्यक्षत: गप्प करव, तृतीय पुरूषक रूपे संवोधन नहि। मिथिलामे वर-कनिया, सासु-पुतोहु, साहु जमाएक गप्पमे तृतीय पुरूषक संवोधन अनिवार्य होइत अछि। एहि प्रकारक व्यवस्थाक विरूद्ध नंदजी अपन नवल सोचकेँ केन्द्रित कएलन्हि। वर-कनियाँक संवंध स्वाभाविक रूपेँ तँ समझौता मात्र होइत अछि परंच संसारक व्यवस्थामे सभसँ पवित्र आ अपूर्व संबंध यएह होइत अछि। जीवन भरि निर्वहन कोनो एक जनक संग छूटलापर दोसरमे व्यथा..... अकथ्य व्यथा। तेँ एहि संबंधमे प्रत्यक्ष संवोधन होएवाक चाही। हमर दृष्टिकोण ई नहि जे अपन संस्कृति पराभव कऽ देवाक चाही, मुदा संस्कृति आ व्यवस्थाकेँ सेहो कालक गतिमे परिवर्तनक अनिवार्यता प्रतीत होइत अछि। आर्यावर्त्त न्याय, कर्म, मीमांसा सन प्रांजल दर्शनक अार्विभाव भूमि मानल जाइत अछि। एहि खण्डमे एकटा नव दर्शनसँ मिथिलाक भूमिकेँ वैशिष्ट्ता प्रदान कएल गेल ओ अछि- इमान आ मर्मक विम्बमे संबंधक मर्यादा। नंद बावू इंजीनियर छलाह। जौं अपन धर्मकेँ किछु ढील कऽ दैतथि तँ भौतिकताक बाढ़िसँ परिवार ओत-प्रोत भऽ सकैत छल। मुदा एना नहि कऽ सतत अपन कर्मकेँ साकार सत्यसँ बान्हि लेलन्हि। स्वाभाविक अछि अर्थयुगमे इमानक प्रासंगिकता बड़ ओछ भऽ जाइत अछि। असमए मृत्युक पश्चात् परिवारक दशाक विवेचन मर्मस्पर्शी लागल। हुनक सत् कर्मक प्रभाव यएह भेल जे संतान सभ विशेषत: आरूणि भौतिक रूपसँ रास संपन्न तँ नहि भऽ सकलाह मुदा पिताक छत्र-छायाक आंगनमे मनुक्ख भऽ गेलाह। कर्मक गतिसँ लोक राज भोगकेँ प्राप्त तँ कए सकैत अछि, मुदा मनुक्ख बनवाक लेल नैसर्गिक संस्कार वेशी महत्वपूर्ण होइत अछि। तेँ कहलो गेल अछि- “बढ़ए पूत पिताक धर्मे।” कतहु-कतहु नीच विचारक मानवक संतान मनुसंतान भऽ जाइत अछि, एहिमे दैहिक संस्कार आ प्रकृतिक लीला होइत अछि। आरूणिक दृढ़ विश्वासपर केन्द्रित एहि उपन्यासक कथामे सतत प्रवाहक गंगधारा खहखह आ शीतल बुझना गेल। जँ कथाकेँ आत्मसात् कएल जाए तँ कोनो अर्थमे एकरा काल्पनिक नहि मानल जा सकैछ। आत्मकथा स्पष्टत: नहि मानि सकैत छी, किएक तँ उपन्यासकार कोनो रूपेँ एकर उद्वबोधन नहि कएलनि अछि। भऽ सकैत अछि समाजक अगल-बगलक रेखाचित्र हो, मुदा हमरा मतेँ ई कल्पना नहि, सत्य घटनापर आधारित अछि। उपन्यासमे एकटा कमी सेहो देखलहुँ। अंग्रेजी आखरक ठाम-ठाम प्रयोग कएल गेल जेना- एनेश्थेशिया, ओपिनियन, इम्प्रेशन आदि। एहि सभ शब्दक स्थानपर अपन शब्दक प्रयोग कएल जा सकैत छल, मुदा नहि कएल गेल। हमरा बुझने हम दोसर भाखाक ओहि शब्द सभकेँ मात्र आत्मसात करी जकर स्थानपर हमर अपन भाखामे शब्दक अभाव अछि। सहस्त्राब्दीक चौपड़पर :- कुरूक्षेत्रम अन्तर्मनकक तेसर खण्ड कविता संग्रहक रूपमे अछि, जकर शीर्षक ‘सहस्त्राब्दीक चौपड़पर’ देल गेल। मात्र तैंतालीस गोट कविताक सम्मिलनमे श्रंृगार, विरह हैकू, विचार मूलक कविताक संग-संग एकटा ध्वज गीत सेहो अछि। इन्द्रधनुषक आसमानी रंग जकाँ प्रथम कविता ‘शामिल वाजाक दुन्दभी वादक’मे क्षणिक प्रकृतिक आवरणमे स्वर-सरगमक भान होइत अछि, मुदा अन्तरक अवलोकनक पश्चात् दशा पूर्णत: विलग। राजस्थानक वाद्य संस्कृतिमे एकटा दर्शक वाद्य यंत्रक प्रासंगिकताक केन्द्रनमे कविक भाव अस्पष्ट लागल। सहज अछि ‘जतऽ‘ नहि पहुँचथि, अेातऽ गएलनि कवि’। कवि स्वयं दुन्दभी वादक छथि तेँ स्पष्ट दर्शन कोना हएत। हिन्दी साहित्यमे एकटा कविता पढ़ने छलहुँ ‘गोरैयो की मजलिसमे कोयल है मुजरिम’। संभवत: समाजक पथ प्रदर्शकक मूक दृष्टकोणकेँ कविताक केन्द्र विन्दु बनाओल गेल अछि। बहुआयामी व्यक्तित्वक धनी व्यक्ति सेहो जीवनक गतिमे दबावक अनुभव करैत कतहु-कतहु अपन संवेदनाकेँ दवा कऽ दुन्दभी बनवाक नाटक करैत छथि। केओ-केओ दोसरकेँ संतुष्ट करबाक लेल अपन विचारधारा वाह्य मनसँ बदैल दैत छथि। संतुष्टीकरण प्रवृति वा कोनो प्रकारक मजवूरी हो हमरा सभकेँ परिस्थितिसँ सामंजस करबाक बहाने अपन सम्यक विचारकेँ माटिक तरमे नहि झॅपवाक चाही। समाज जौं एकरा पूर्वाग्रह मानए तँ अपन पक्षक विवेचन कएल जाए, मुदा अनर्गल प्रलापकेँ मूक समर्थक नहि देवाक चाही। मोनक रंगक अदृश्य देवालमे परिस्थितिजन्य विषमताक विषय वस्तुक दर्शन आशातीत अछि। मन्दाकिनी.... आ पक्का जाठि शीर्षक कवितामे प्रकृति आ समाजक स्थितिक मध्य विगलित मानवतापर मूक प्रहारमे कविक नैसर्गिक मुदा अदृश्य सोच हमरा सन साधारण समीक्षक लेल अनुबूझ पहेली जकाँ अछि। अपन पुरातन इतिहासक ओहि दिवसकेँ लोक स्मरण नहि करए चाहैत छथि, जाहिसँ अतुल पीड़ाक अनुभव होइत अछि। त्रेता युगक घटना, कलियुग धरि पाछाँ धेने अछि। सीता जीक वियाह अगहन शुक्ल पक्ष पंचमीकेँ भेलनि, परिणाम सोझा अिछ। तखन शतानंद पुरोहित जी खरड़ख वाली काकीक विआह ओहि तिथिमे किएक करौलन्हि? भऽ सकैत अछि हुनक भाग्यमे सीताजी जकाँ गृहस्थ सुख नहि लिखल दुख मुदा कलंक तँ ‘वियाह पंचमी’ तिथिकेँ देल गेल। एहि कवितामे कविक दृष्टकोण तँ विधवा विआहक समर्थन करवाक अछि, मुदा सवर्ण मैथिल नहि स्वीकार कऽ रहल छथि। अपन पुरान सॉगह लऽ कऽ हम सभ हवड़ाक पुल बनाएवक कल्पनामे कहिया धरि ओझराएल रहव? एहि कविता संग्रहमे जे नव विषय बुझना गेल ओ अछि ‘बारह टा हैकू’। गिदरक निरैठ, राकश थान, शाहीक मौस आ बिधक लेल शब्द-शब्द बजैत अछि। हैकूक सार्थक अर्थ लगाएव अत्यन्त कठिन होइत अछि, मुदा हमरा बुझने जौं एहेन हैकू लिखल जाए तँ नेनो सभ जे मैथिलीमे माए परिवार कुटुम्वक संग बजैत छथि अवश्य बूझि जएताह। मिथिलाक ध्वज गीतमे मातृभूमिसँ कर्मक सार्थक गति मांगल गेल अछि। जेना गायत्री परिवारक प्रार्थना वह शक्ति हमे दो दयानिधि मे गाओत जाइत अछि। मातृ वंदनाकेँ कविता संग्रहमे देवाक हिनक दृष्टिकोण रचनाक्रममे उपयुक्त हो मुदा हमरा मते एकरा कुरूक्षेत्रम अन्तर्मनक प्रथम पृष्ठपर वंदनाक रूपमे देल गेल रहिते तँ बेसी सुन्नर होइतए। ‘बड़का सड़क छह लेन बला’मे मिथिलाक विकासक क्रमित स्थितिक वर्णन कएल गेल अछि। सम्पूर्ण कविता संग्रहक अवलोकनक वाद कोनो पद्य अकच्छ करैबला नहि लागल। ‘पुत्र प्राप्ति’ शीर्षक कवितामे लुधियानामे हमरा सबहक समूहक एकटा पंडितक ठकपचीसीक चर्च कएल गेल अछि। एहने ठकक कारण ‘विहारी’ व्यक्तिकेँ आठ ठाम लोक शंकाक दृष्टिसँ देखैत छथि। मुदा गजेन्द्रजी सँ हमर आग्रह जे एहि कविताक पंजावी भाषामे अनुवादक अनुमति नहि देल जाए नहि तँ कतेको भलमानुष बनल मैथिल घुरि कऽ गाम आवि जएताह आ हमरा सबहक समाजमे कुचक्र आरो बढ़ि जाएत। गल्प गुच्छ :: २३ गोट कथा-लघुकथाक सम्मिलन कऽ गल्प गुच्छक नाओ देल गेल। चौंसठि पृष्ठक एहि खण्डमे समए-सालक सभ रूपकेँ बिम्वित करैत कथाकार सािहत्यक समग्र विधापर लेखनक प्रयास कएलनि अछि। सर समाज कथामे अर्थनीतिक मौन प्रस्तुति नीक लागल मुदा कलात्मक शैलीक अभाव बुझना गेल। घरक मरम्मतिक बिम्वित खिस्सामे कनेक रस-प्रवाह रहितए तँ कथा आर नीक भऽ सकैत छल। हम नहि जाएव विदेशमे पलायनवादक विरोध कएल गेल अछि बिम्व तँ नीक अछि मुदा विश्लेषणमे अलंकारक तादात्म्य नहि भेटल। एहेन मार्मिक विषय-वस्तुक कथा तँ ओहि प्रकारक होएवाक चाही जाहिसँ हियमे हिलकोरि उत्पन्न भऽ जाए। राग भैरवी छोट मुदा संस्कृतिकेँ छूबैत अछि। काल स्थान विस्थापन आ वैशाखीपर जिनगीकेँ औसत मानल जा सकैत छैक। कोनो साहित्यकेँ ता धरि पूर्ण नहि मानल जा सकैछ जा धरि समाजक अंतिम व्यक्तिसँ संबंधत भाषा साहित्यकेँ जोड़ल नहि गेल हुअए। “सर्व शिक्षा अभियान” कथाकेँ पढ़़लाक वाद मैथिली साहित्यमे दलित, पिछड़ा आदि वर्गक प्रति सरकारी योजनाक िनष्फल होएबाक कारण केर स्पष्टीकरण वास्तविक लगैत अछि। पेटमे अन्नक फक्का नहि हो आ पोथी मुफ्तमे भेटए, एहेन शिक्षाक स्थितिपर प्रश्न चिन्ह ठाढ़ करव स्वाभाविक अछि। साम्यवादी सोच राखएबला कथाकार कथाक बहाने स्पष्ट करए चाहैत छथि जे गरीबक मध्य जातिक आधारपर विभाजन हमरा सबहक समाजक कलुष रूप थिक। छोट उद्येश्यपूर्ण कविताकेँ क्षणिका वा हाइकूक नाओ देल गेल मुदा लघुकथाकेँ की कहल जाए? लघुकथामे बिम्वक विश्लेषण अति क्लिष्ट होइत अछि मुदा “जातिवादी मराठी”मे मैथिली भाषाक अस्तित्वपर लागल जातिक कलंकक प्रस्तुति सराहनीय अछि। थेथर मनुक्ख, बहुपत्नी विवाह आ िहजड़ा, स्त्री-बेटी विआह आ गोरलगाइ, प्रतिभा, अनुकम्पाक नौकरीक सभक विषय-वस्तु छोट-छीन परंच सारगर्भित लागल। जेना हिन्दी साहित्यक पत्र-पत्रिकामे चर्चित लेखक खुशबन्त सिंह मात्र दू पॉतिमे बहुत-रास गप्प लिखि जाइत छथि ठीक ओहिना एहि सभ लघुकथाकेँ पढ़ि बुझना गेल। जाति-पाति लघुकथा तँ पूर्णत: बेच्छप लागल। एकटा डोम जातिक आइ.पी.एस. परिवीक्षाधीन अधिकारीमे जातिक गरानि कोनो आत्मीय मनुक्खकेँ मर्माहित कऽ सकैत अछि। मृत्युदंड आ वाणवीरक सामाजिक बिम्वक संग-संग सामन्तवादी, मीडियासँ संबंधित कथा सभकेँ वेजोड़ तँ नहि मुदा मैिथली साहित्यक लेल नूतन-धाराकेँ स्पर्श करैबला कथा जौं मानल जाए तँ कोनो दोख नहि। आव प्रश्न उठैत अछि जे गल्प-गुच्छकेँ कोन रूपक मानल जाए। हमरा सबहक भाषाक संग दुर्भाग्य रहल जे कथाक विषय वस्तुसँ वेशी भाषा विज्ञान, बिम्वक विश्लेसन आ शब्द विन्यासक कलाकारीपर विशेष ध्यान देल जाइत अछि। साहित्यक अधिकांश अधिष्ठाता एकटा गप्पपर नहि ध्यान देबए चाहैत छथि जे रचनासँ समाजक परिदृश्यमे सम्यक जीवनक सनेश जाएत वा नहि। जातिक संग-संग संतुष्टीकरण केर छद्मसँ ऊपर उठव अनिवार्य अछि नहि तँ मैथिलीक अस्तित्वपर प्रश्न चिन्ह ठाढ़ भऽ जएत। भौगोलिकीकरणक परिधिमे मैथिली सभसँ बेसी प्रभावित भेल छथि। सौतिन भाषाक संग-संग पाश्चात्य संस्कृतिक प्रभावसँ वैदेही टिम टिमा गेली। एहि भाषामे नवल अर्चिस जड़एबाक लेल वर्ग संघर्षक स्थितिसँ ऊपर उठि कऽ कार्य करवाक चाही। पागक अभिप्राय जौं मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थक संग-संग बहुल झॉपल मुदा जनभाषाक संरक्षक वर्ग धरि पहुँचवाक प्रयास कएल जाए तँ मैथिलीक दशामे फेरि चारि नहि आठ गोट चान लागि जाएत। एहि कथा सबहक कथाकार कथाक शैली ओ विवेचन जे हुअए एकर निर्णए पाठकपर छोड़ि देवाक चाही मुदा रचनाक उद्येश्य स्पष्ट अछि। गजेन्द्र जी निश्चित रूपेँ एहि कथा संग्रहक माध्यमसँ समाजमे अपन संस्कृतिक रक्षा करैत नूतन सम्यक ज्येाति जड़ाबए चाहैत छथि, जतऽ डोम, चमार, ब्राह्मण, राजपूत, मुसलमान ओ कायस्थ नहि मात्र “मैथिल” शब्दक व्योमक परिधिमे मिथिलाक चर्च कएल जाए। दुर्भाग्य अछि जे मैथिली पोथीक समीक्षा करवामे आलोचना-प्रत्यालोचनाकेँ मूल बिम्व मानल जाइत छैक जखन की आन भाषामे रचनाकारक मनोवृति आ दृष्टिकोणपर ध्यान देल जाइत अछि। नाटक- संकर्षण मात्र १६ पृष्ठक नाटक, सुनबामे कनेक अनसोहाँत जकाँ लगैत अछि मुदा जौं तन्मय भऽ कऽ पढ़ल जाए तँ स्पष्ट भऽ जाइत जे हिन्दी साहित्यमे मात्र किछु कथाक कथाकार श्री चन्द्रधर शर्मा गुलेरी जीकेँ कोना आ किए आत्मसात् कऽ लेल गेल? संकर्षण सन अभिनेता जाहि नाटकमे हुअए ओहिमे िवशेष भावक उपस्थिति स्वाभाविक अछि। अभिनेताक कोनो गुण नहि मुदा गजेन्द्र जी एकरा प्रधान नायक बना देलनि। समाजक कुहरैत अवस्थाक यएह सत्य रूप थिक एक िदश महीसक चरवाह आ दोसर दिशि कलक्टरक चाटुकार। मिथिलाक समाजिक बिम्वकेँ स्पर्श करैत छोट नाटक संकर्षणमे नुक्कड़ नाटकक रूप अछि। “हौ गोनर! पानि कोना लागए देबैक एकरा। पएरक चमड़ा सड़त तँ फेर नवका आबि जाएत। मुदा ई सड़ि जाएत तखन कतएसँ अएत।” कहवाक तात्पर्य जे जाहि व्यक्तिकेँ शरीरसँ बेसी किछु कैंचाक जुत्ता विशेष महत्वपूर्ण लगैत हुअए ओहि व्यक्तिमे जीवनक तादात्म्यक कोन प्रयोजन? धर्मनीतिसँ अर्थनीति वेसी महत्वपूर्ण अछि। कालक बदलैत स्वरूपक िचन्तन करवाक योग्य- संभवत: एहि नाटकक यएह उद्येश्य थिक। मंचन करवाक लेल एकरा कोनो अर्थमे उपयुक्त नहि मानल जा सकैछ। किएक तँ पर्दा उठत आ आधा धंटामे नाटक समाप्त। मुदा जीवनक नाटकमंडलीकेँ केन्द्रित करए बला संकर्षण चिन्तन करवाक योग्य अवश्य लागल। सभटा नाटकमे कोनो ने कोनो रूपेँ हास्य आ श्रंृगारक सम्मिलन होइत अछि मुदा एहि ठॉ अभाव किएक तँ समाजक मनोवृत्तिकेँ छुबैत एिह नाटककेँ पढ़ि कोनो कविक एकटा कविताक एक पाॅति मोन पड़ि गेल- “ठोप-ठोप चारक चुआठकेँ आॅगुरसँ उपछैत रहल छी” गजेन्द्र जीक प्रयास छोट परंच अनुकरणीय लागल। त्वन्चाहन्च आ असंजाति मन- जेना की नाअोसँ स्पष्ट भऽ जाइत अछि जे दुनू काव्य ऐतिहासिक धटनाकेँ बिम्वित कऽ लिखल गेल। धर्म आ कर्मक्षेत्रक परिधिमे आर्य संस्कृतिक विवेचन नीक लागल। एहि महाकाव्यक विषयमे मात्र यएह कहल जा सकैत अछि जे सुरेन्द्र झा सुमन, वैधनाथ मल्लिक विधु आ मार्कण्डेय प्रवासी जीक काव्य लेखन परम्पराकेँ जीवंत रखवाक प्रयास कएल गेल। बालमंडली आ किशोर जगत- हम सभ गौरवान्वित छी जे मैथिली भाषा समग्र आर्य परिवारक भाषा समूहमे सभसँ सरस भाषा मानल जाइत अछि। साहित्य चिन्तन सेहो पाठकक गणनाकेँ देखैत ककरोसँ कम नहि। मुदा एकटा पक्ष जे सभसँ कमजोर रहल ओ िथक मैथिली भाषा साहित्यमे “बाल साहित्यक दरिद्रता।” कहबाक लेल तँ बहुत रास लेखक वा कवि अपनाकेँ बाल साहित्यसँ जोड़वाक सतत् वाक् पटुता देखबैत छथि मुदा जौं पूर्ण रूपसँ बाल साहित्यक रचनाक गणना कएल जाए तँ जीवकांत जी सन मात्र किछु साहित्यकार छथि जिनक लेखनी एहि दिशामे क्रियाशील रहल। जखन की बाल साहित्य जौं परिमार्जित नहि हएत तँ िनकट भविष्यमे मातृभाषाक स्वरूप विगलित भऽ सकैत अछि। एहि दिशामे गजेन्द्र जीक प्रयाससँ कृतज्ञ होएबाक चाही जे कुरूक्षेत्रम अन्तर्मनक सातो खण्डमे सभसँ नीक खण्ड बाल मंडली। किशोर जगतपर अपन लेखनीकेँ हाथसँ नहि हृदयसँ लिखलन्हि। एहि खण्डमे दू गोट बाल नाटक तैइस गोट बाल कथा, वर्णमाला शिक्षा आ एक सएसँ ऊपर बाल कविता देल गेल अछि। सभ बिम्वकेँ केन्द्रित करैत लिखल गेल रचना सभक भाषा अत्यन्त सरल अछि। नेना-भुटकाकेँ एहने रचना चाही। जौं तत्सम मे बाल साहित्य लिखल जाए तँ ओकर कोन प्रयोजन? कविता सभ तँ खूब नीक मानल जा सकैत अछि- आइ छुट्टी काल्हि छुट्टी घूमब फिरब जाएब गाम......। बाल बोधक लेल अलंकारसँ बेसी मनक चंचलता उपयोगी होइत छैक तँए एहि खण्डकेँ आलोचनात्मक स्वरूपसँ देखब उचित नहि। निष्कर्ष- सात खण्डमे विभक्त एहि पोथीमे साहित्यक समग्र रसक स्वादन करएबाक प्रयास कएल गेल। मुदा एकर सभसँ पैघ नकारात्मक स्वरूप जे एकरा की मानल जाए? भऽ सकैत अछि सभ धाराकेँ छूबि गजेन्द्र जी मैथिली साहित्यमे एकटा नव रूपक धारा केन्द्रित करए चाहैत होथि। एकटा पोथीमे प्रबन्ध, समालोचना, उपन्यास, गल्प, कविता संग्रह, महाकाव्यक संग-संग बाल साहित्य पोथीकेँ विशाल बना देलक। भऽ सकैत अछि समीक्षक लोकनिक संग-संग िकछु पाठककेँ नीक नहि लागनि मुदा हम एहि प्रकारक प्रयोगक स्वागत करब उचित बूझैत छी। ओना पाठकक सुविधाक लेल अलग-अलग सेहो प्रकाशित कएल गेल अछि। सभसँ बेसी प्रकाशक धन्यवादक पात्र छथि जे एतेक विशाल पोथीक नीक रूपेँ आ सम्यक् मूल्यमे प्रकाशन कएलन्हि। भाषा सम्पादन सेहो नीक लागल, शाब्दिक आ व्याकरणीय अशुद्धता अत्यन्त न्यून अछि। पाेथीक नाओ- कुरूक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेखक- गजेन्द्र ठाकुर समीक्षा -गोनू झा आ आन मैथिली चित्रकथा किछु अर्थमे सन् 2008-2009केँ मैथिली साहित्यक विकासक लेल क्रांतिकाल मानल जा सकैत अछि। सन् 2008ई.मे मैथिली साहित्यमे एक गोट बाल साहित्यक रचना मैथिलीक प्रवीण समीक्षक श्री तारानंद वियोगी जी कएलनि पोथिक नाओ- ई भेटल तँ की भेटल। साहित्य अकादमी द्वारा नव सृजित बाल साहित्य पुरस्कारसँ एहि पोथीकेँ पुरस्कृत कएल गेल अछि। जौं किछु बर्ख पूर्वमे साहित्य अकादमी एहि पुरस्कारकेँ स्थापित करितए तँ भऽ सकैत छल जे मैथिलीक स्थान रिक्त रहिताए किएक तँ कोनो-कोनो वर्षमे मैथिली साहित्यमे बाल साहित्यक रचना भेले नहि छल। सन 2009ई.मे मैथिलीमे कोनो महिला रचनाकार द्वारा पहिल नाटक लिखल गेल। रचनाकार छथि मैथिलीक प्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती विभा रानी आ नाटकक नाओ- भाग रौ आ बलचन्दा। हर्खक गप्प जे एहि नाटकमे बाल आ नारी मनोविज्ञानकेँ बिम्वित कएल गेल अछि। ओना तँ श्रीमती इलारानी सिंह सेहो नाटक लिखने छथि मुदा ओ सृजनात्मक नहि भऽ कऽ अनुदित अछि। तँए श्रीमती विभारानीकेँ मैथिली साहित्यक पहिल महिला नाटककार मानल जा सकैत अछि। ओना श्रीमती उषा किरण खान लिखित भुसकौल वाला पहिने छपल। क्रांतिक दीप कोनो योजना बना कऽ नहि जाराओल सकैत अछि। एकर प्रत्यक्ष प्रमाण मैथिलीमे पहिल चित्रकथा- गोनू झा आ आन मैथिली चित्रकथा प्रस्तुत करैत अछि। एहि चित्रकथाक सृजन श्रीमती प्रीति ठाकुर कएलनि। प्रीति जीक नाओ एहि चित्रकथाक लेखनसँ पूर्व कोनो साहित्य वा चित्रांकनमे झॉपल जकाँ छल। पहिलुक रचना आ ओहो मैथिली साहित्यक लेल आदि विषय मूलक। भारतीय संविधानक आठम अनुसूचीमे रहितहुँ हम सभ कतहु-कतहु गुम्म छलहुँ। प्रवर भाषा समूहक भाषा मैथिलीमे किछु रचनाक वर्ग अछूत छल। आश्चर्य लागल संगे विस्मित भेलहुँ जे हमरा समाजक एकटा महिला एहि नवल विषयपर कोना केन्द्रित भऽ गेली? एहि चित्रकथामे सम्पूर्ण मिथिलाक संस्कृतिकेँ बिम्वित करैत जनश्रुित आ ऐतिहासिक कथाक 16गोट खंडपर चित्रकथा प्रस्तुत कएल गेल। पहिल नौ गोट कथा गोनू झाक करनीपर लिखल गेल अछि। गोनू झा कोनो अनचिनहार नाअेा नहि। मुगल दरवारमे जे स्थान वीरबलकेँ भेटल अछि मिथिलाक बाक्-पटुमे ओ स्थान गोनू झाकेँ देल गेल। गोनू विदूषक छलाह मुदा ककरो महिमामंडित मात्र करए बला विदूषक नहि। अपन बुद्धि आ चातुर्यसँ ककरो िवस्मित करबाक कारणेँ हिनक कोनो जोड़ नहि। दुर्भाग्य जे गोनू मैथिल छलाह जौं अंग्रेज वा कोनो आन पाश्चात्य देशक रहितथि तँ वीरबलसँ हिनक तुलना नहि भऽ कऽ बीरवलक तुलना हिनकासँ कएल जाइत। हिनक ई दुर्भाग्य हमरा सबहक लेल सौभाग्य भेल जे एहि मिथिलाक भूमिपर महाकवि विद्यापति, गोनू आ राजा सलहेस सन महामानवसँ हमरा सभकेँ आन लोक जनैत अछि। एहि पोथीमे संकलित पहिल चित्रकथा गोनूझा आ मॉ दुर्गाजीसँ गोनू झाक बौद्धिक साक्षात्कारक चर्च कएल गेल अिछ। एहि कथाकेँ तँ ऐतिहासिक मान्यता नहि देल जा सकैत अछि किएक तँ इतिहास आ विज्ञानमे भगवान मात्र प्रकृतिस्थ होइत छथि, कोनो वैधानिक नहि। मुदा जौं भावक शतदलक संग देखल जाए तँ नेना-भुटका लेल ई प्रश्नसँ भरल कथा जिज्ञासा अवश्य उत्पन्न कराएत जाहिसँ अंतत: मैथिली साहित्य आ भाखाक लेल लाभ स्वाभाविक मानल जा सकैछ। चित्रक स्तर तँ नीक, रंग-नीक प्रदर्शन नीक मुदा सिंहक चित्र विलाड़ि जकाँ लागल। कोनो राजदरबार हुअए वा कोनो पितृ आ देव कर्मक स्थल, ब्राह्मणक संग-संग ठाकुर अर्थात हजामक भूमिका आन लोकसँ बेसी मानल जाइत अिछ। “गोनू झा आ स्वर्गकथा”मे एकटा ठाकुर गोनूकेँ पछाड़ए चाहैत छथि मुदा स्वयं चित्त। छोट चित्रकथामे नीक चुटुक्का जकाँ प्रस्तुति। गोनू झासँ संबंधित आन सात गोट कथा सेहो चोहटगर देल गेल अछि। जनश्रुतिक आधारपर लिखल गेल कथा सभ मात्र बालमनोविज्ञानक सेहंतित छायाचित्र प्रस्तुत करैत अछि किएक तँ लिखलो मात्र नेना भुटकाक लेल गेल अिछ। रेशमा चूहड़मल कथा ऐतिहासिक कथा थिक। भऽ सकैत अछि आर्यावर्त्तक इतिहासकार एकरा मान्यता नहि देथु मुदा मिथिलाक गाम-गाममे चर्चित अछि। दूधवंशी जातिसँ यदुवंशक तादात्म्य होइत छैक मुदा एहि साहित्यक चूहड़मल दुग्धवंशी दुसाध छथि आ नायिका रेशमा भूमिहार ब्राह्मण। नीक लागल जे मोकामाघाटक कथाक सृजन करवामे पूर्णियाक वणिता आ मधुबनीक पुत्रवधूकेँ कोनो संकोच नहि भेलनि। सिनेहकेँ समाजक जातीय व्यवस्थामे पददलित करवाक दृष्टिकोणकेँ एहि चित्रकथामे तोड़ल गेल अिछ। नैका बनिजारा कथापर डॉ. मणिपद्म जीक लेखनी मैथिलीमे सन 1973ई.मे फुजि गेल अछि तँए एहि कथासँ लोकजन सभ निश्चित परिचित छथि। प्रवेशिका स्तरपर मणिपद्म जीक ई कथा मैथिलीमे देल गेल छल। एहि पोथीमे सरल भाषा आ बालोनुरागी चित्रांकन नीक लगैत अछि। भगता जोगिन पॅजियारक चित्रांकन सेहो नीक रूपेँ बिम्वित कएल गेल अछि। प्राचीन जनश्रुतिक लुप्त कथा महुआ घटवारिन आ छेछन महाराज पढ़ि आ एकर चित्रांकन देखि नवका पिरहीक नेना भुटका सभ निश्चित रूपसँ मिथिलाक संस्कृतिक कोखिमे प्रवेश करवाक प्रयास करतथि। राजा सलहेस सन चराचर चर्चित विषय वस्तुक छायांकन आ कालिदासकेँ मिथिलाक संस्कारसँ संबंधक प्रदर्शन मनोवांक्षित लागल। निष्कर्षत: प्रीति जीक नव प्रयास नवल सोच आ बहुआयामी विषय वस्तुक प्रस्तुति सराहनीय अछि। मैैथिली साहित्यमे नव प्रकारक रचना थिक गोनू आ आन चित्रकथा तँए सम्यक समीक्षा करब हम उचित बुझैत छी। श्रुति प्रकाशनक समग्र दल धन्यवादक पात्र छथि जे मैिथलीमे जौं पहिल चित्रकथाक नाअो- गोनू आ आन मैथिली चित्रकथा अछि तँ प्रकाशक श्रुति प्रकाशन। समीक्षा- तरेगन वर्त्तमान युगक मानव-जीवन “अर्थनीति”क उक्खड़िमे तेना कऽ पिसा रहल अछि जे गॉधी आ लेलिनक सिद्धान्त मटियामेट भऽ गेल। नीित आ धर्मक गप्प केनिहार लोक अतिवादी आ कर्महीन मानल जाइत छथि। एहि भागमभाग भरल जीवनमे “साहित्य” सन शब्द हास्यास्पद जकाँ बुझा रहल। स्वाभाविके छैक, बिनु दाम सभ सुन्न! एहि परिस्थितिमे साहित्यिक अवधारणा सेहो बदलि रहल अछि। आब महाकाव्य पढ़निहार लोक बड़ अल्प छथि किएक तँ सबहक जीवनमे समयाभाव छैक। हमहूँ एहि गप्पकेँ मध्यकालिक रातिमे लिख रहल छी, किएक तँ दिनमे लिखब तँ खाएव की? एहि सभ कारणसँ लघुकथा आ लघुकविताक अनिवार्यता प्रतीत भऽ रहल। साहित्य समागममे लघुकथाक स्थान बड़ महत्वपूर्ण मानल जाइछ। मैथिलीमे एखन धरि परंपरा जकाँ रहल जे छोट कथा चाहे ओ विम्वित हुअए वा नहि “लघुकथा” थिक। किछु साहित्यकार मात्र एहि दिशामे संकलन कऽ सकलाह। जाहिमे मनमोहन झा अग्रगन्य छथि। तारानंद वियोगी जीक लघुकथा संग्रह “शिलालेख” आ अमरनाथ रचित “क्षणिका” उत्तम श्रेणीक मैथिली लघुकथा संग्रह अछि। मुदा जौं साहित्यक सकल अवधारणा वा विधाक विम्वित छायाक चर्च कएल जाए तँ श्री जगदीश प्रसाद मंडल लिखित लघुकथा संग्रह “तरेगन” मैथिली साहित्यक प्रथम सम्पूर्ण लघुकथा मानल जाएत। एहि पोथीमे एक सय दस लघुकथा देल अछि। छोट-छोट ताराकेँ मैथिलीमे “तरेगन” कहल जाइत अछि। रातिमे चित भऽ कऽ वसुन्धरापर लेटि स्वतंत्र गगनकेँ दिव्यदर्शन कएलापर तरेगनक समूह सबहक मध्य स्थापित संबंधकेँ देखल जा सकैत छैक। लगैत अछि जे एक तरेगन दोसर तारासँ सटल छैक मुदा विज्ञानक अनुसंधानसँ ई स्पष्ट भऽ सकल जे अकाशक तरेगनक समूहक बीचक दूरी पृथ्वी आ अाकाशक बीचक दूरीसँ बेसी छै। ओहिना एहि कथा संग्रहमे लिखित सभटा कथा एक दोसरसँ सटल रहितहुँ एक-दोसरसँ बहुत दूर अछि। न्याय, कर्म, मीमांसा नीति आ वाल मनोविज्ञान सन बिम्वकेँ अनचोकेमे जगदीशजी एक संग बान्हि देलनि। मैथिलीमे नैतिक शिक्षाक अभावकेँ तरेगन बहुत हद धरि पूर्ण करवाक प्रयास कएलक। मूल रूपसँ ई संग्रह नेना सबहक लेल लिखल गेल अछि मुदा बयसो जौं एहि सिद्धान्तक अनुपालन करथि तँ समाजक विगलित मनोवृत्तिक रूपमे परिवर्त्तन अवश्यांभावित अछि। कोनो पोथीक समीक्षात्मक विवरणमे सम्पूर्ण रचनाक चित्रण करव अनिवार्य नहि मुदा रचनाक समाजमे प्रभावक दर्शन कराएब वांछित होइत छैक। सम्पूर्ण पोथीक अवलोकन कएलापर एकरा मात्र नेना-भुटकाक कथा संग्रह नहि मानल जा सकैछ। पहिल कथा -उत्थान पतन-मे नीति शिक्षा नेना भुटकाक संग-संग गृहस्थ धर्मी लोकक लेल प्रेरणादायी लागल। संयम जीवन जीबाक कलासँ धर्म, अर्थ, काम आ मोक्षक अवलंबन सहज होइत अछि। -प्रतिभा- लघुकथामे डॉ. राममनोहर लोहियाक माध्यमसँ जगदीश जी ज्ञान आ समयक मध्य तारतम्य स्थापित करवाक प्रयास कएलनि। एहि कथाकेँ मौलिक रचना (Creative writing) नहि मानल जा सकैत अछि, किएत तँ कोनो महापुरूषक जीवन शैलीक चर्च कोनो पोथी पढ़ि कऽ कएल गेल अछि। मुदा नीक लागल जे जगदीश बावू साम्यवादी प्रवृत्तिक मनुक्ख छथि आ लोहिया समाजवादी छलाह। ओना तँ समाजवादेसँ साम्यवादी धाराक परिकल्पना कएल जा सकैछ, परंच सैद्धान्तिक रूपसँ भारत वर्षमे दुहू राजनैतिक धारामे विलग नीति अछि। अपन अध्ययनशीलतासँ सम्पूर्ण मानव जातिकेँ एकसूत्रमे बँधवाक जगदीश जी प्रयास कऽ रहल छथि। मर्म कथाक बिम्व पढ़लासँ स्वामी विवेकानंदक सरल राजयोगक सिद्धान्तक दर्शन होइत अछि। हेलैक कलासँ सांसारिक जीवन जीवाक तुलना, वैभवक कुप्रावक छोट मुदा विशेषार्थ प्रस्तुति नीति अनुपालनमे सफल प्रयास कहल जाए। अज्ञ नीक नहि तँ खराब सेहो नहि, सर्वज्ञ किओ नहि भऽ सकैत अछि बहुज्ञ समाजक पथ प्रदर्शक परंच अल्पज्ञ जकरा देसिल वयनामे “अधखड़ुआ” कहल जाइत अछि ओ समाजक विकासमे वाधक होइत छथि। अंग्रेजी साहित्यक प्रखर हास्य रचनाकार सर एलेक्जेंडर पोप सेहो कहने छथि- little knowledge is a dangerous thing. अर्थात अर्द्धज्ञान बड़ खतरनाक वस्तु होइत छैक। -पहिने तप तखन ढलिहेँ- शीर्षक लघुकथामे कुम्हारक आचार्य रूपक आ माटिकेँ शिष्य मानि नैतिक विश्लेषण नीक लागल। नीति-धर्म आ शैक्षणिक दर्शनसँ भरल दोहासँ एहि कथाक तुलना अपेक्षित भऽ सकैछ- गुरूवार कुम्हार शिश कुम्ह है, गढ़ि-गढ़ि काढ़े खोट अंतर हाथ सहार दे, बाहर मारे चोट। एहि प्रसंगमे ज्ञानपीठ पुरस्कारसँ पुरस्कृत हिन्दी साहित्यक प्रांजल कवि श्री नरेश मेहताक कविता -मृत्तिका-क चर्च करव अनुकूल लागल। नरेश जीक रचनाक अनुसार माटि कहैत छथि- हम तँ मात्र माटि छी, जखन अहाँ अपन चरणसँ पददलित करैत छी आ हऽरक फाढ़सँ चीड़ दैत छी तखन हमरामे मातृत्वक वोध होइत अछि आ मातृत्वक प्रेरणा आ संसर्गसँ शस्य श्यामला धन धान्य अन्न हरियरीक रूपेँ संसारकेँ जीवन प्रदान करैत अछि।' कर्मपथपर क्रियाशील मनुक्खक लेल कालक आ प्रहरक कोनो बान्ह नहि होइत छैक। -जखने जागी तखने परात- शीर्षक लघुकथामे डॉ. क्रोनिनक जीवन दर्शनक माध्यमसँ रचनाकार नेना-भुटकामे काकचेष्टा आ श्वान निद्राक झॉपल दर्शन करएवाक लेल आतुर छथि। जे व्यक्ति सत्य कर्मी होइत छथि ओ सदिखन सत्यकेँ जितएबाक लेल प्रयास करैत छथि। महाभारतक कथाक गर्भसँ एहेन कालजयी बिम्वकेँ निकालि कऽ -उग्रधारा- कथाक रूप देवाक कलासँ जगदीश जीकेँ हंस मानल जा सकैत अछि। जेना हंस नीर दुग्ध मिश्रणमे सँ क्षीरकेँ सोंटि लैत अछि आ नीर पात्रेमे रहि जाइछ ठीक ओहिना महा भारतक सम्पूर्ण कथा बिम्वकेँ नीर, अमिय आ मधु मानल नहि जा सकैत अछि। अर्जुनकेँ विजयी बनएवाक लेल श्रीकृष्ण अपन पांजरपर हनुमानक अगम देह भारकेँ रोकि “भारत”केँ विजयी बनौलनि। ई कथा छात्रक संग-संग शिक्षकक लेल अनुकरणीय अछि। व्यवहारिक, समर्पण, देवता, पाप आ पुण्य शीर्षक कथामे उदयनाचार्यक न्याय कुसुमांजलिक क्षणिक स्पर्शक अनुभव बुझना गेल। अढ़ाइ आखरक शब्द प्रेमक रूप वास्तविक जीवनमे अर्थनीतिक आहिमे अप्रासंगिक भऽ गेल हुअए मुदा रचनामे एखन धरि जीवित अछि। हिन्दी साहित्यमे प्रेमचन्द्र रचित कथा ईदगाह, नागार्जुन रचित कविता गुलाबी चूड़ियाँ आ माखनलाल चतुर्वेदी रचित कविता प्रेमकेँ पढ़ि कऽ तिरपित होइत तँ छलहुँ परंच हरिवंश राय बच्चन जीक 'आ रहि रवि की सवारी' अंतिम पद्य मोन पड़िते क्षणहिंमे अकुला जाइत छलहुँ जे हिन्दी विजयी भऽ रहल छथि सूर्यक समान मुदा मैथिली उषाकालक चन्द्रमा सन झॅपा रहलीह। जगदीश जीक 'प्रेम' पढ़ि गुमानक अनुभव भऽ रहल अछि जे हमरा सभक भाषामे एहि बिम्वपर जे कथा लिखल गेल अछि ओ कतऽ कतऽ आन भाषामे भेटत, हेरबाक चाही? ओना ई कथा मौलिक रचना नहि भऽ कऽ अंग्रजीक प्रख्यात लेखक ओ.हेनरीक एकटा कथापर आधारित अछि। श्रमक सम्मान तखन भऽ सकैत अछि जखन श्रमजीवी सम्मानित कएल जाइथ। वंश, तियाग, सद्विचार, साहस, वरदास्त, भूल, धैर्य, मनुष्यक मूल्य, मेहनतक दरद सन भाववाचक संज्ञाक दर्शन मात्र दार्शनिके कऽ सकैत छथि मुदा एहि पोथीमे पाठक सेहो देखि सकैत छथि। एकाग्रता छात्र जीवनक धरोहरि होइत अछि। भाषण तँ सभ केओ दऽ सकैत छथि मुदा पाॅच पॉति लिखबाक कला कतेक लोकमे छनि। हमरा विश्वास अछि जे 'एकाग्रचित' बिम्वकेँ रचनाकार पढ़थु मतिभ्रम दूर भऽ जेतनि। अनुभव, सौन्दर्य, धर्म आत्मबल सन मौन विषयकेँ कथाक रूपमे बिम्वित करब असंभव तँ नहि मुदा अाश्चर्यजनक। समाजमे क्रांतिक दीप प्रज्वलित करवाक लेल नेना-भुटकामे क्रांतिदीप जराएब आवश्यक अछि। एहि लेल समाजक कुप्रथाक गर्भावलोकन करएवाक प्रयास प्रासंगिक मुदा कतेक रचनाकार मैथिली साहित्यमे ई काज कएलनि। विधवा विवाह, देश सेवाक ब्रत, नारीक सम्मान, सादा जीवन, पत्नीक अधिकार, जाति नहि पानि शीर्षक कथा सभकेँ वाल मनोविज्ञानक मौलिक कथा मानल जाए। निष्कर्षत: जीवनकेँ जीवन्त बनएवाक लेल जतेक प्रकारक तारत्म्य होएबाक चाही जगदीश जी ओहि सभ बिम्वकेँ बिम्वित कएलनि। एहि पोथीमे दर्शनक सभ विधाक सरल भाषामे चित्रण केलनि। खटकल तँ मात्र एक अर्थमे जे वाल मनोविज्ञानक विकास करवाक लेल जे सरस विश्लेषण होएवाक चाही ओ एहि पोथीमे नहि देल गेल। गरीबक दीनतामे हास्यक समागम सेहो होइत अछि। वाल साहित्यमे दर्शनक विश्लेषणमे कतहु कतहु रीति आ प्रीतिकेँ हास्य रससँ बोरबाक चाही। पंडित हरिमोहन झा तँ लघुकथा नहि लिखलनि मुदा हुनक जे गद्य साहित्य उपलब्ध अछि ओहि सभमे दर्शनक बिम्वपर हास्य आ श्रंृगारक माखन चढ़ल भेटैत अछि जगदीश जीक रचना तँ अनुशासित होइत छन्हि मुदा 'तरेगन'मे वाल मनोविज्ञानक सरल प्रस्तुति करितहुँ कनेक चूकि गेल छथि। एक अर्थमे ई पोथी मैथिली साहित्यक लेल पथ प्रदर्शक पोथी अछि, तँए जगदीश बावू प्रशंसाक पात्र छथि। सम्पूर्ण पोथीक अर्न्तदर्शनक लेल योग्य आचार्यक जिनकामे अनुशासनक संग-संग संतुलित अनुशीलन हुअए अनिवार्यता प्रतीत होइत अछि। निष्कर्ष रूपेँ मैथिली भाषा-साहित्यमे 'तरेगन'केँ बेछप्प नैतिक शिक्षाप्रद रचना मानल जाए। वालकथाक वास्तविक रूप अछि जे रचनाकारकेँ प्रश्नसँ वेसी समाधानपर ध्यान देबाक चाही। एहि पोथीमे सभसँ नीक लागल जे रचनाकार प्रश्न ठाढ़े नहि कएलनि। पोथीक नाओ- तरेगन विधा- बाल प्रेरक कथा संग्रह रचनाकार- जगदीश प्रसाद मंडल प्रकाशक- श्रुति प्रकाशन, दिल्ली पाेथी प्रप्ति स्थान- पल्लवी डिस्ट्रीब्यूटर्स, िनर्मली (सुपौल) प्रकाशन वर्ष- 2010 दाम- 100टाका मात्र समीक्षा- हम पुछैत छी- कविता संग्रह (विनित उत्पल) एक्ैसम शताब्दीक दशांशक परिसमाप्तिक अवलोकन कएलापर परिणाम भेटल जे ऐ अवधिमे किछु एहेन तरूण रचनाकारक पदार्पण मैथिली साहित्यमे भेल जनिक रचना सभसँ हमर साहित्य पुलकित भऽ रहल अछि। श्री गजेन्द्र ठाकुर ऐ अत्याधुनिक पिरहीक लेल पथ प्रदर्शक छथि, जनिक कुशल नेतृत्वमे श्री विनीत उत्पल, श्री उमेश मंडल, श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरी, श्रीमती प्रीति झा ठाकुर सन रचनाकारक मंडली मैथिलीकेँ नवल ज्योति प्रदान कऽ रहल। सन 2009ई.मे विनीत उत्पल जीक पहिल कविता संग्रह “हम पुछैत छी” श्रुति प्रकाशनक सौजन्यसँ प्रकाशित भेल। विनीत जीक जन्म मधेपुरा जिलाक आनंदपुरा गाममे भेल। प्रारंभिक शिक्षा दीक्षा मुंगेर आ स्नातक भागलपुरमे। व्यावसायिक पाठ्यक्रम नई लिल्लीसँ प्राप्त कऽ सम्प्रति राष्ट्रीय सहारा नोएठामे वरिष्ठ उपसंपादक छथि। मैथिली-मिथिलाक सांस्कृतिक गति विधि आ अभिव्यक्तिक समायोजनक आधारपर दरभंगा आ सहरसाकेँ मुख्य केन्द्र भमि मानल जाइत अछि। दरभंगा जिलासँ विभक्त भेलापर उपेक्षाक जे दंश समस्तीपुर जिला वासीकेँ भेटलनि, वएह दंश मधेपुराक लोक सेहो अनुभव कऽ रहल छथि। कविक जन्म मधेपुरामे आ प्रारंभिक शिक्षा अंग प्रदेशमे, परंच कविता सभ खॉटी मैथिलीमे, अजगुत तँ अवश्य लागल मुदा विनीत जीक मातृभाषानुरागसँ तीत-भीज गेलहुँ। ऐ कविता संग्रहक भूमिका सिद्धहस्त साहित्यकार श्री गंजेश गुंजनजी “कविक आत्मोक्ति : कविताक अएना” शीर्षक दऽ लिखने छथि। गुंजन जीक व्यक्तित्व आ कृतित्व मैथिली साहित्यक लेल कालजयी मुदा कविक आत्मोक्तिक विवेचनमे श्री गुंजनक लेखनी कनेक्शन कंजूस बनि कऽ रहि गेल। हमरा मतेँ कोनो नवतुिरया रचनाकारकेँ हृदएसँ प्रोत्साहित करबाक चाही। ओहूमे जै भाषामे पाठकक संख्या लगातार घटि रहल हुअए। पचास कविताक संग्रहमे पहिल कविता “ककर गलती” विधवाक अवस्थापर व्यथित कविक लेखनी मैथिली वर्गक कथाकथित आगाँक जातिक मध्य प्रश्न ठाढ़ करैत अछि। ठोप, चानन आ पाग मैथिलक सवर्ण समाजमे पुरूष कतेको बेर धारण कऽ सकैत छथि मुदा स्त्री तँ अवला....। विवाहक क्षणहिंमे जौं पतिक मृत्यु भऽ जाए तँ जीवन भरि सतीत्वक दंश झेलए पड़तनि। लार्ड विलियम बटिक केर सुधारवादी आन्दोलनमे बंगालक प्रह्मण सुधरि गेलाह मुदा मैथिल ब्राह्मण अपन सनातन संस्कृतिक रक्षक छथि, अवलाकेँ सबला बनेबामे धर्म नष्ट भऽ जेतनि। नाओं गौरी दाइ मुदा समाजक लेल डाकिनी भऽ गेली- की करती गौरी दाइ किओ हुनका देवी कहतन्हि तँ डाइन जोगिन कहवासँ लोक वेद पाछुओ नहि रहतन्हि। कहबाक लेल तँ हमरा सबहक संस्कृतिमे शक्तिक उपासना प्रासंगिक अछि मुदा हम सभ अपने घरक शक्तिकेँ अपमानित आ मर्दित कऽ रहल छी। “मनुक्खो नहि भेल” शीर्षक कवितामे भौतिकता आ बौद्धिकताक आड़िमे जीवन अवस्थाक अव्यवस्थित रूपक प्रदर्शन नीक लागल- राति मे घर मे नहि रहैत छी जखन कि चिड़ै चुनमुनी सेहो साँझ पड़ैत घर घुरैत अछि “की फर्क पड़ैत अछि” शीर्षक कविता बौद्ध संस्कृतिक केन्द्र वैशालीसँ तथागतक संदर्भमे लिखल गेल। विम्ब तँ नीक मुदा विश्लेषण स्पष्ट नहि भऽ सकल। सभ पाठक तँ इतिहास विद् आ दार्शनिक नहि छथि तँए कविताकेँ उपयुक्त आ पूर्ण नहि मानल जा सकैछ। िवनीत जीकेँ कनेक फरिछा कऽ लिखबाक चाही छल। पहिने समाज दाणवीर कर्णकेँ सुतपुत्र मानैत छल जखन महाबली भऽ गेलाह तँ सूर्यपुत्र मानल गेलाह। वास्तविकता जे हुअए मुदा अंग प्रदेशकेँ कर्णक कर्मभूमि मानल जाइत अछि। कविक प्रारंभिक शिक्षा मुंगेरमे भेलनि तँ अपन कर्मभूमिक वर्तमान अवस्तासँ मर्मािहत छथि- दल मलित होइ अछि अंग प्रदेशक आत्मा आ बजबैत अछि तारणहार केँ...। अपन संस्कृतिक रक्षाक तादात्म्यमे हम सभ अनसोहांत काज सेहो करैत छी। धार्मिक आडंम्बर एकटा प्रमाण अछि- मधुश्रावणी। कहबाक लेल तँ ऐ पर्वकेँ मिथिलाक संस्कार पर्व मानल जाइत अछि मुदा वास्तवमे मैथिल ब्राह्मण आ मैथिल कर्ण कायस्थक मध्य मधुश्रावणी पर्व मनाओल जाइत अछि। “परीक्षा” शीर्षक कविताक माध्यमसँ कवि ऐ पावनिमे पतिब्रताक प्रमाणपत्र- टेमी प्रथापर प्रहार केलनि। पुरूष भेलक पश्चात् सेहो कवि परीक्षासँ डेराइत छथि तखन नारीकेँ अहिल्या जकाँ बेर-बेर परीक्षा किए लेल जाइत अछि। “गाम डूबि गेल” शीर्षक कविता बाढ़िक विनाश लीलाक औसत प्रदर्शन मात्र मानल जा सकैछ। संग्रहक सभसँ कलात्मक आ प्रासंगिक कविता- हम पुछैत छीकेँ मानल जाए। वास्तविक सेहो जे जै कविताक शीर्षककेँ कविता संग्रहक शीर्षक दऽ देल गेल ओइ कवितामे कविक आंतरिक जुआरि अवश्य हेतनि। ऐ कविताक माध्यमसँ कवि समाजक समीक्षाक लेल दद्यत छथि। समाजक सभटा व्याधिपर कविक लेखनी स्वच्छन्द भऽ विचरण केलक। सरिपहुँ विनीत जी पत्रकार छथि देशकालक दशाक विवेचन नित्य करैत छथि तखन रचना झाँपल कोना रहत। “मनुख आ माल” एवं “समाजक ई रूप” वर्तमान मनुक्खक ओझराएल मानसिकताकेँ देखबैत अछि। अर्थनीति विलोकित भऽ गेल, भौतिकता समाजकेँ बॉटि रहल अछि, अधिक प्राप्तिक आशमे ककर्म बढ़ि रहल अछि। एवं प्रकारे ऐ दुनू कविताक दृष्टिकोण नीक लागल। “मारलाक बाद” शीर्षक कविता दर्शनशास्त्रक अनुभूित केलक। पुष्कर कवितामे भारतीय इतिहास आ अपन संस्कृति शीतल वातसँ गौरवान्वित भेलहुँ। ऐ कविता संग्रहक सबल पक्ष अछि विम्बक चयन आ िवश्लेषण। भाषा सेहो सरल आ मैथिलीक खाॅटी शब्दसँ ओत प्रोत अछि। मुदा दुर्बल पक्ष्ज्ञ भेटल प्रवाहक कमीक रूपमे। कविता आशु कविता हुअए वा अतुकांत- छंदक लेपन आवश्यक होइत छैक। ऐ कविता संग्रहमे छंदक समायोजन समुचित रूपेँ नै कएल गेल कोनो-कोनो कविता तँ गद्य जकाँ बुझना गेल। कविकेँ आगाँ एे विन्दुपर ध्याान राखए पड़तनि। निष्कर्षत: तरूण कविक प्रांजल प्रस्तुति, विनीत जीकेँ कोटि-कोटि साधुवाद.....। पोथीक नाओं- हम पुछैत छी प्रकाशक- श्रुति प्रकाशन मूल्य- 160 टाका मात्र वर्ष- 2009 मैथिलीक विकासमे बाल कविताक योगदान वाल्यावस्था जीवन रूपी नाटकक प्रथमांक होइत अछि। जौं कोनो नाटकक प्रथम अंक व्यवस्थित आ सरल हुअए तँ स्वत: आकर्षणक केन्द्र बनि जाइछ। कहलो गेल अछि “Morning shows the day” प्रभातसँ दिवसक पूर्व आभास स्वभाविक होइत छैक। हमरा सबहक लेल सौभाग्यक कथा जे मैथिली सत्व, तम आ रजो गुणसँ आेत प्रोत सरस भाषा मानल जाइत छथि। जीवनक प्रथम पाठशालाक छात्रमे एहि गुणक समावेश आवश्यक अछि। तँए एहेन पद्यक रचना अनिवार्य जे शैशवसँ नेनपनमे प्रवेश करएबला नेना-भुटकाकेँ मातृ सिनेहसँ तृप्ति कऽ दिए। नेना भुटकाक जीवनमे महाकाव्य, प्रवंधकाव्य वा उपन्यासक कोन प्रयोजन? ओ सभ तँ विनु अन्तर्मस्तिष्कपर दाब देने अपन संसारकेँ जीवन्त राखए चाहैत छथि। वर्त्तमान समएमे सभ्यता आ संस्कृतिक भूमंडलीकरणसँ आर्य परिवारक किछु भाषाक अस्तित्व संकटमे पड़ि गेल अछि। संभवत: एहि प्रभावसँ सभसँ वेसी मैथिली प्रभावित छथि। हमरा सबहक समाजक रूप ततेक इन्द्रजासँ आबद्घ भऽ गेल अछि जे दू गोट भाषाक प्रासंगिकतामे ओझरा रहल छी। गैर हिन्दी भाषा क्षेत्रक लोक तँ अपन मातृभाषाक संग-संग अंग्रेजीकेँ आत्मसात् कऽ रहल छथि। हमरा लोकनि किंकर्त्तव्यविमूढ़ छी जे अंग्रेजी तँ स्वीकार करैए पड़त मुदा हिन्दीकेँ छोड़ि मैथिली कोना पढ़ी? वर्तमान पीढ़ी तँ किछु-किछु मैथिलीक लाज रखने छथि मुदा एहि पिरहीक प्रांजल साहित्यकारक लोकनि अपन करेजपर हाथ राखि कऽ कहथु जे अपन-परिवारक नेना-भुटकामे देसिल वयनाक प्रति निष्ठासँ ज्योति प्रज्जवित करैत छथि? जखन साहित्यकारक परिवारक ई स्थिति तँ आम मैथिलीक स्थिति कोना कहव? दशा ततेक मर्मस्पर्शी भऽ गेल जे किछु पिरहीक बाद नेना-भुटका पूछत मैथिलीकेँ छलि? हमरा हिन्दीसँ कोनो पीड़ा नहि। बेर-बेर प्रश्न उठैत अछि आ उत्तर सेहो स्वत:स्फूर्त जे हिन्दी राजभाषा छथि मुदा मातृभाषा नहि। तखन मातृभाषक रूपमे एकर प्रयोग किए कएल जा रहल अछि। एहि दशाक लेल जौं अभिभावक सभ दोषी छथि तँ साहित्यकार सेहो कोनो कम नहि। मैथिली साहित्यमे बाल मनोविज्ञानकेँ स्पर्श करएबला रचना अत्यन्त न्यून। जौं नेना भुटका लेल साहित्य नहि तँ ओ साहित्यक मर्मकेँ कोना बूझथि? कहबाक लेल तँ एहि बिम्वपर बहुत रास कवि कविताक रचना कएने छथि मुदा प्रथमत: तत्सम् शब्दक रूपेँ बिम्व विश्लेषण। सभ नेना-भुटका तँ अयाची मिश्रक पुत्र शंकर नहि भऽ सकैत छथि जे बालोहं जगदानंद......क अर्थ बूझि जएताह। जौं तत्सम् नहिओ तँ एहेन रचना जे कवि स्वयं बुझताह, समीक्षक दिग्भ्रमित भऽ जाइत छथि तँ नेना ओहि रस सरितामे विचरण करथि प्रश्नवाचक अछि। मैथिलीमे बाल साहित्यक रचनाक न्यूनताकेँ भरवाक लेल समीक्षक वा साहित्यक अधिष्ठाता लोकनि नीति सम्वन्धी पद्य आ वंदना सभकेँ बाल साहित्यसँ जोड़ि दैत छथि। हम एहि दृष्टिकोणकेँ उचित नहि मानैत छी। बाल कविता तँ एहेन होएवाक चाही जाहिमे मिथिला-मैथिलीक खॉटी शब्दकेँ बिम्वित कएल गेल हुअए। कोनो आवश्यक नहि जे बिम्व साहित्य रसकेँ छूबैत तात्विक हो, जखन बाल मन चंचल तँ नीति आ वैराग्यक समावेश अनिवार्य नहि। एहि तरहक रचनामे बाल श्रंृगार अवश्यांभावी छैक। जेना कोनो कविक कविताक किछु पॉति- “आम छू अमरौरा छू/ बाबा गाछीक औड़ा छू/ नेनपन बीति गेलै/ ककरा कानमे कहबै कू/” वा “सूति रहेँ नूनू बिलैया एलौ/ रहू माछ लऽ तोहर भैया एलौ/” हमरा बुझने ई थिक बाल कविताक वास्तविक रूप मुदा एखन धरि कतए-कतए की-की लिखल गेल अोकर चर्च सेहो आवश्यक अछि। हमर अध्ययनशीलता व्यापक नहि, एखन धरि मैथिली कवि वा कवयित्री लोकनिक रचना सभ बहुत रास नहि पढ़ने छी तँए हमर विवेचनकेँ अन्यथा नहि लेल जाए। हम वएह कवि वा कवयित्री सबहक चर्च करब जनिक रचनासँ अवगत भेल छी। नीति संवंधी बाल साहित्यक अन्तर्गत कविवर सीता रामझाक शिक्षासुधा, जनसीदनजीक नीति पदावली, पंडित वेदानंद झाक रत्नवटुआ अछि प्रमुख अछि। शिक्षा प्रधान बाल साहित्यमे श्री गोविन्दक पाकल आम आ श्री कांचीनाथ झा किरण जीक “प्रभात” कविता महत्वपूर्ण अछि। ओना तँ सुमन जी बाल साहित्यमे किछु छिटफुट तत्सम मिश्रित कविताक रचना कएलनि मुदा शिशु मासिक पत्रिकाक प्रकाशनमे हुनक उल्लेखनीय योगदान अछि जाहिमे तन्त्रनाथ झाक वानर आ ईशनाथ झाक “वन्दना” कविता छपल छल। ओना तँ तन्त्रनाथ झा रचित “मुसरी झा” कविता तरूण पाठकक लेल लिखल गेल मुदा एहिसँ शिक्षाक मध्य पएर पसारैत नेना सेहो प्रभावित भेल छथि। कवि चूड़ामणि मधुप तँ श्रंृगार आ विचारमूलक भावनासँ भरल गीतक रचनाकार छथि मुदा हिनक किछु गीत बाल बिम्वसँ ओत-प्रोत नहि रहितहुँ ततेक लोकप्रिय भेल अछि जे मिथिलाक नेना-भुटका चाहे ओ शिक्षित परिवारसँ संबंध राखथु वा नहि स्वत: गबैत अपन कर्मपथपर मिथिलाक गाम-गाममे गतिमान एखनो रहैत छथि। “बटुक आ धीयापूता” सन पत्र-पत्रिका बाल साहित्यकेँ प्रोत्साहित अवश्य कएलक अछि जाहिमे सरस कवि ईशनाथ झा, सुमन, किरण, मणिपद्म, यात्री बुद्धिधारी सिंह रमाकर, चन्द्रनाथ मिश्र अमर, श्री धीरेन्द्र सन कविक कविता छपैत छल। मिथिला मिहिर निश्चित रूपेँ मैथिलीमे बाल साहित्यक धाराकेँ नवल गति देलक। एहि पत्रिकाक पैघ विशेषता छल जे नवतुरिया कवि वा कवयित्री सभकेँ सेहो एहि पत्रिकामे स्थान देल गेल। मिथिलाक गाम-गाममे एहि पत्रिकाक वितरण व्यवस्था छल जाहिसँ एहिमे छपल रचनाक व्यापक प्रचार-प्रसार भेल। राज दरभंगा द्वारा स्थापित एवं संरक्षित रहवाक कारणेँ रचनाकारकेँ उपहार वा पारिश्रमिक रूपेँ किछु कैंचा सेहो भेट जाइत छल जाहिसँ बाल साहित्यक कोन कथा मैथिली साहित्यक सभ विधाक विकासमे मिथिला-मिहिरक योगदान अविस्मरणीय अछि। बाल स्तंभमे अनेकानेक वालोपयोगी कविता संग्रहक दृष्टिऍ डॉ. श्रीकृष्ण मिश्रित अग्रदूत उल्लेखनीय अछि। मैथिली साहित्य मंजरी, मैथिली साहित्य बोध आदि साहित्यक पाठ्यपुस्तकमे सुमनजी, तंत्रनाथ झा, ईशनाथ झा, हरिमोहन झा, आरसी बाबू आ गोविन्द झा सन कविक बालोपयोगी रचना देल गेल अछि। बाल साहित्यमे व्यापक कवित्वक प्रदर्शन आधुनिक कालक कवि आ कवयित्री पूर्वकालक रचनाकारसँ वेसी कएलनि अछि। एहिमे जीवकान्तजी प्रमुख छथि। जीवकान्त जीक तीन गोट वाल कविता संग्रह छपल अछि जाहिमे गाछ झूल-झूल आ छॉव सोहावनि प्रमुख अछि। हिनक पश्चात् जे कवि एहि दिशामे क्रियाशील भेल छथि- ओहिमे श्रीचन्द्रभानु सिंह, मार्कण्डेय प्रवासी, डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, सियाराम झा सरस, मंत्रेश्वर झा, हंसराज, मायानंद िमश्र, रामलोचन ठाकुर, भीमनाथ झा, कालीकान्त झा बूच, गोपालजी झा गोपेश, डॉ. नरेश कुमार विकल, डॉ. केदारनाथ लाभ, डॉ. इन्द्रकांत झा, रमाकान्त राय रमा, उपेन्द्र ठाकुर मोहन सन स्थापित कविक नाओ प्रमुख अछि। दुर्भाग्य अछि जे एहि कवि लोकनिक बाल साहित्यपर कोनो संकलित कविता संग्रह नहि भऽ कऽ मात्र किछु छिट-फुट कविता वा गीत नेना भुटका लग परसल गेल अछि। कवयित्रीमे “शिशुकलकत्ता” शीर्षक कविताक रचनाकार इलारानी सिंह, डॉ. शेफालिका वर्मा, वाणी मिश्र, रोटी शीर्षक कविताक कवयित्री कामिनी, विभारानी, एकटा भीजल बगरा शीर्षकक कवयित्री ज्योति सुनीत चौधरी आदिक नाओ प्रमुख अछि मुदा हिनको लोकनिक वएह हाल कोनो संकलित कविता संग्रह नहि मात्र छिट-फुट कविता। सन् 2008ई.मे विदेह पत्रिकाक आगमनक संग-संग बाल साहित्यमे क्रांति आबि गेल। एहि पत्रिकाक संपादक श्री गजेन्द्र ठाकुर बाल साहित्यक उत्प्रेरणक लेल उद्यत छथि। हुनक सप्त विधामे लिखल रचना संग्रह कुरूक्षेत्रम अन्तर्मनक सातम खण्ड “बाल मंडली आ किशोर जगत” नेना भुटकाक लेल समर्पित अछि। एहि खण्डमे एक सयसँ ऊपर कविता देल गेल अछि। कविता सभ पढ़लाक बाद बाल साहित्यक तादात्मयकेँ निश्चित रूपेँ बूझल जा सकैत अछि। एहि संकलनमे वातानुकूलित महलमे रहनिहार नेना भुटकासँ लऽ कऽ गामक सोती-नदीक कातमे घोंघा बिछनिहार बाल-वालिकाक मनोदशाक विवेचन कएल गेल अछि। मैथिलीक संग ई विडम्बना रहल जे एहिमे अर्थनीति आ सामाजिक समरसताकेँ व्यापक रूपेँ बिम्वत नहि कएल गेल। सामंतवादी प्रवृतिक लोकसभ चाहे ओ कोनो जातिक होथु हुनके मानसिकताकेँ समाजक मानसिकता मानि लेल गेल। जगतजननी सीताक लेाकगााथापर तँ केओ बॉचि सकैत छथि मुदा सलहेस, बहुरा गोढ़िन आ नटुआ दलालक संग-संग मोती दाइक व्यथा ककरा मुखसँ सुनैत छी? यएह दशा बाल साहित्यमे सेहो भेल। हिन्दी भाषा साहित्यमे राष्ट्र कवि दिनकर “बच्चो का दूध” शीर्षक कवितामे समाजक अंतिम पॉतिक नेनाक भूखसँ कल्हाइत मर्मस्पर्शी दशाक चित्रण कएलनि मुदा मैथिलीमे एहि प्रकारक रचनाक अभाव खटकि रहल छल, किछु लिखलो गेल तँ ओकरा साहित्यिक मान्यता नहि भेटल। गजेन्द्र जी एहि भ्रमकेँ तोड़वाक प्रयास कएलनि अछि, जाहि लेल धन्यवादक पात्र छथि। गजेन्द्र जीक संग-संग बहुत रास तरूण कवि कवयित्री सबहक बाल रचना विदेहमे छपल अछि। वर्तमानकालक बाल रचनाकार कवि, कवयित्रीमे चन्द्रशेखर कामति, अनमोल झा, श्रीमति मृदुला प्रधान, डॉ. जया वर्मा, राजदेव मंडल, कुमार मनोज कश्यप, डॉ. शंभू कुमार सिंग, कामिनी कामयिनी, उपेन्द्र भगत नागवंशी, मनोज कुमार कर्ण उर्फ मुन्नाजी, धीरेन्द्र प्रेमर्षि, रूपा धीरू, हिमांशु चौधरी, रूपेश कुमार झा त्योंथ, विनीत उत्पल, श्रीमती कुसुम ठाकुर, अशोक दत्त, राजेश मोहन झा गुंजन, किशन कारीगर आ उमेश मंडल सन नव साहित्यकार प्रमुख छथि। ओना वर्तमान कालक परिधिमे किछु स्थापित रचनाकार जेना गंगेश गुंजन, विभूति आनंद, ज्योत्सना चंद्रम, जयप्रकाश जनक, रामसेवक ठाकुर, कमलाकान्त, अरविन्द अक्कू, परमानंद प्रभाकर, रामपुनीत ठाकुर तरूण, प्रो. रवीन्द्र कुमार चौधरी सन रचनाकारक लेखनी ऊपर वर्णित सभ रचनाकारक संग-संग एहि विधामे क्रियाशील अछि। सभसँ आश्चर्यक गप्प जे मात्र नौ गोट वसंत देखलि बालिका सुश्री संस्कृति वर्माक लेखनी प्रथमत: बाल साहित्येकेँ स्पर्श कएलक अछि। एहि प्रसंगमे किछु एहेन रचनाक उल्लेख करब आवश्यक बूझैत छी जे छेहा मैथिलीमे मात्र नेना-भुटका लेल लिखल गेल हुअए- (क) “खेत टी खरिहान टी/ आंगन टी दलान टी/ बाबा आब अहींक कानमे/ टिटही टहकय टी-टी-टी../” (ख) “बापे तोहर बनलौ परदेशी/ चिट्ठी ने एलौ भेलौ दिनवेसी/ मॉक निनायल व्यथा जगबै छौ/ सुनही रौ तोरे कुचरि सुनबै छौ/” (काली कांत झा बूच रचित- पोताक अट्ठास आ दिनक नेना कवितासँ) (क) “साले-साल किअए अबै छी/ झणे-झण अबैत रहू/ हर क्षण हर मनकेँ/ अमृतसँ भरैत रहू/ क्षणे-क्षण.../ नव शक्तिक नव उत्साह दऽ/ सृजन शक्ति भरैत रहू/ कर्म-ज्ञानकेँ घोड़ि-घोड़ि/ सिनेहसँ सिनेह सटैत रहू/ क्षणे-क्षन.../ जे हूसल से हम्मर हूसल/ तइले किअए छी कलहन्त/ सभ जागैए सभ सुतैए/ एक दिन हेतै सबहक अंत/ नजरि-उठा देखैत रहू/ क्षणे-क्षण.../ देवी अहाँ, मैया अहाँ/ भेदि कतौ अछि कहाँ/ जोड़ल आँखि उठा-उठा/ पले-पल देखैत रहू/ क्षणे-क्षण अबैत रहू।” (ख) “आँखि पुछलक/ दीदी, सभ किछु देखितो/ किछु ने देखै छी/ कलपैत मन देखि/ भरि-भरि दिन कनै छी/ नजरिक उत्तर/ सगतरि तँ फूल छिटाएल-ए/ गुणसँ भरल-पुरल/ रस चुसैक ज्योति बनाउ/ भेटत तखने मीठका फल।/ (जगदीश प्रसाद मंडल, “सरस्वती बंदना” आ “नजरि” कवितासँ) “बड़ जे जतनसँ हम पोसली पुताकेँ/ भुखे सुतली अपन घर मर ओकरा सुतौली खुआकेँ/ अपने हम मुरूख मुदा बौआकेँ पढ़ौली/ काटि कष्ट पोथी लेल ढौआ जुटौली/” (रूपेश कुमार झा त्योंथ) (क) “चारिटा छाैंड़ा छल गाछ तर फनैत/ जिद लगौने डरिकेँ गनैत/ पहुँचल पाँचम- हे रौ की गनै छेँ/ ई कथीक गाछ िछएे से जनै छेँ?। सभ भेल अवाक/ अपन जमौलक धाक। सुनने रहि ई गाछ िछऐ। अनचिन्हार......।/ (ख) “बच्चा जनमि गेल/ बेटा भेल/ सुनतहि घर खुशीसँ भरि गेल/ सौंसे टोल खबरि पसरि गेल। बढ़ए लगल उछाह। कहलक लोग-वाह-वाह। मुनियाँ अछि लछमिनियाँ/ तब ने एकरापर सँ जनमल छौंड़ा....। (राजदेव मंडल, कथीक गाछ अा मुनियाँक चिन्ता शीर्षक कवितासँ) “छुनछुन-छुनछुन बौवा हम्मर/ फुदकैत फुदही जकाँ रहैए/ कखनो मुस्की कखनो मटकी/ कखनो दिदीकेँ चुप्पी कहैए/” (अशोक दत्त) टुन्ना गेंग पसारै यै/ मुन्ना दॉत चियाड़ै यै/ गुड्डू-टिंकू-बबलू-सबलू/ मुइयो मोंछ उखारै यै/ आब की कहू भाय/ हुरपेट्टे लगै यै/ बाजै छी कोना....।/ (चन्द्रशेखर कामति) “एक दू तीन/ बौआ गेल सुनि/ चारि पॉच छह/ सुनि भेल भयावह..../” (गजेन्द्र ठाकुर) “नहला पर अछि दहला/ बौआ बाबू हमरा कहला/ पढ़ू जोरसँ..../” (डॉ. नरेश कुमार विकल) “कोन दिशासँ उतरि पपिहरा/ घैल पदक ढरकाबै छेँ/ बिजुवन केर पंछी तों हमरे/ जरल जिआ तरसावै छेँ..../” (चन्द्रभानु सिंह) “पोथी पढ़ि किछु हैत नहि/ तोड़ऽ चाही रोट/ जोड़ू नोट बकोिट कऽ/ भोट बटोरू मोट...../” (आरसी प्रसाद सिंह) “एकर चोरौलक ओकर हेरौलक/ बापो माइक नाम बुड़ौलक/ पोथी फाड़य थोथी झाड़य/ एकरा ओकरा झगड़ा लाड़य.../” (उदयनाथ झा अशोक) “चलू तिरंगा कने उड़ा ली हर्जे की/ आजादी केर रश्म पुरा ली हर्जे की..../” (रामलोचन ठाकुर) “देव पितर पातरि-खरना कहिया धरि?/ बैसल खैबें रे रमचरना कहिया धरि?/ पोथी पतरा गामक गाम उपासल अछि/ प्रवल धारमे बड़का-बड़का भासल अछि/” (डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र) “मातृभूमि केर करी बंदना/ ऋतुरानी गुनगान करी/ जननी जन्मभूमि केर खातिर/ अर्पण अप्पन प्राण करी.../” (अर्जुन लाल कर्ण) “तू लोरी गा हम सूति जाएव/ माए लोरी गा हम सूति जाएव..../” (डॉ. शंभू कुमार सिंह) “नेहरू चाचा, अहाँ कतऽ चलि गेलौं/ देख लिअ अहाॅ नेना सभकेँ की कऽ गेलौं/ हमर पीठ पर भारी बस्ता/ ओहि मे किताब कॉपीक ठेलमठेल देखू..../” (सुश्री संस्कृति वर्मा, वएस नौ बरख) “एक टोलमे बबलू अकलू/ दू नेना छल/ समतुरिया छल/ बबलूकेँ छल बन्तिक खुट्टी/ आमक तख्ता केर पिटना छल..../” (जीवकान्त) “नन्हें भाय खेलए चललनि/ हाथ नेने बंदूक/ लगलनि दनदन फायर करए/ ओ पक्षी देखि उलूक.../” (रमाकान्त राय रमा) “जाड़क रौदी सन वेटी/ गरमीक छाहरि सन वेटी/ जीवनक गीत-संगीत बसैत अछि/ ओहिमे/ नहि तँ रसहीन अछि जिनगी/” (डाॅ. जया वर्मा) “राम छू रहमान छू/ गीता आर कुरान छू/ मोल विकयबेँ नहि बजारमे/ पहिने बौआ कान छू..../” (डॉ. ब्रजकिशोर वर्मा मणिपद्म) “हे भाय हमरा जुनि मारह/ हम छी तोरे भ्राता/ अग्रज वा अवरज..../” (फजलुर रहमान हरसमी) “बालुक करेजपर बसा लेलहुँ गाम/ बेरि-बेरि ऑगुरसँ लिखलहुँ जे नाम..../” (विलट पासवान विहंगम) “कोंचा लेटाइत छनि केश फहराइत छनि/ मोछो हुनक कलकत्ते/ ईहो पुरूष अलबत्ते.../” (रवीन्द्र नाथ ठाकुर) “खेल खेल खेल/ खेल बौउआ खेल/ चोरा-नुकी खेल/ अज्ञानक अन्हारमे/ नुकाएल चोरबा/ ज्ञानक किरनसँ/ पकड़ल गेल/ खेल खेल खेल/ खेल दाय खेल/ कनियाँ-पुतरा खेल/ बेइमानक नगरीसँ/ नकलल बहुरिया/ शैतानक माफापर/ बैठा देल गेल/ इमानक चौबटियापर.../” (मनोज कुमार मंडल) “जगदंब अहीं अवलम्व हमर/ हे माय अहाँ बिनु आश ककर..../” (प्रदीप मैथिली पुत्र) “पढ़ि-लिख बनिहेँ एहन सिपाही/ सभ तरि लोक करौ वाहवाही/ एहन संतानक अलगे धाही/ खगता छै भगत सिंह चाही...../” (महाकांत ठाकुर) “माँ गै माँ/ घरक ऊपर/ चारक तर/ बगरा बनेलकऊ/ एकटा घर/ माँ गै माँ/ घरक पाछू/ बारीक बिच/ सुगा अनलकऊ/ एकटा फर/ माँ गै माँ/ गामक भीतर/ टोलाक बिच/ नटुआ नचलऊ/ एकटा नाच/ माँ गै माँ/ गामक बाहर/ पोखरिक बिच/ पुरैनिक पातपर/ झिलमिल जल/ माँ गै माँ/ आँगन कात/ ढेकी लग/ बिहरिमे छौ/ गहुमन साँप/ माँ गै माँ/ बस्तुनिया लय/ हम कहलियौ/ सब हाल-चाल/ जल्दीसँ दऽ दहीं/ बस्तुनिया हमर/ हम चललियऊ/ खेलय लेल.../ (पंकज कुमार झा) “दाइ गे दाइ तोँ बड़ हरजाइ/ भागेँ ओहि दिस देखए जत्तहि/ ढेपा गुड़क गुड़कल जाए...../” (राजेश मोहन झा गुंजन) ई लिखबाक हमर उद्देश्य अछि बाल कविताक किछु रूपक दर्शन मात्र। एहिसँ इतर सेहो अनेकानेक बालगीत आ कविता मिथिला गाम-गाममे लोरी आ रीति गीतक रूपमे चर्चित अछि। मैथिली साहित्यमे तँ साहित्यक कृतिक विविध विधाक संपादन वा चित्रण पहिनेसँ वेसी भऽ अछि मुदा मर्मस्पर्शी कथा जे पाठकक गणनामे लगातार कमी आबि रहल अछि। गोलमेज सम्मेलन कऽ कऽ तँ हम मैथिल अपन पाठक लोकनिक गणना चारि करोड़ धरि पहुँचा दैत छी मुदा सभ गोट मैथिल जौं मात्र अपन परिवारेक अवलोकन करथु तँ सत्यतासँ अवगत भऽ सकैत छथि मात्र माता-िपतासँ वैदेहीक अस्तित्व नहि बॉचत तँ....। जौं बाल भावनाकेँ देसिल वयनामे प्रचार-प्रसार नहि हएत तँ भऽ सकैत अछि जे कवि कालीकान्त झा बूच जीक कविता देसिल वयनाक अस्तित्वक बिम्व सत्य प्रमाणित भऽ जाए। एकर किछु पॉति- “चन्दा-सुमन-यात्री-मधुपक/ जुनि करू भावना पर आधात/ दिवस निकट ओ आवि रहल अछि/ हेती मैथिली सभसँ कात..../” नेना-भुटकामे देसिल वयनाक प्रति सिनेह जगाएव आवश्यक अछि। एहि लेल वाल साहित्यकेँ प्राथमिकता देब अति आवश्यक अछि। विशेष कऽ कऽ वर्त्तमान पिरहीक साहित्यकारकेँ एहि दिशामे सजग रहए पड़त। मैथिली उपन्यास साहित्यमे दलित पात्रक चित्रण उपन्यास कोनो गद्य साहित्य रूपी व्यष्टिक आत्मा मानल जाइत अछि। मैथिली साहित्यमे लगभग सए वर्ख पूर्व धरि उपन्यास विधाक रचना लगभग शून्य छल। एहि कारण ओहि अवधि धरि मैथिलीकेँ पूर्ण साहित्यिक भाषा नहि मानल जाइत छल। जनसीदन जी एहि भाषा साहित्यक पहिल मान्य उपन्यासकार छथि। हिनक पाँच गोट उपन्यासक पश्चात् एखन धरि देसिल वयनामे साहित्यक समग्र विधाक चित्रण करैत बहुत रास उपन्यास पाठक धरि पहुँचल अछि। परंच एहि साहित्यक संग सभसँ पैघ बिडम्वना रहल जे पछातिक समाज जकरा सामाजिक शब्दमे दलित कहल जाइत अछि, ओकर महिमामंडनक गप्प तँ दूर प्राय: एहि साहित्यमे अकस्मात् अवांछित अभ्यागत्तक रूपमे क्षणप्रभा जकाँ कतहु-कतहु चर्चित अछि। दलित वर्ग तँ सामाजिक, सांस्कृतिक आ शैक्षणिक रूपेँ सम्पूर्ण आर्यावर्त्तमे पिछड़ल छथि, मुदा मिथिला-मैथिलीमे हिनक स्थानक विवेचन हिनका सबहक जाति जकाँ अछोप अछि। एकर प्रमुख कारण मिथिलामे धर्मसुधार आन्दोलन, विधवा विवाहक सकारात्मक दृष्टकोण प्राय: मृतप्राय रहि गेल। दार्शनिक उदयानाचार्य, भारती-मंडन, आयाचीक एहि भूमिपर सनातन संस्कृतिक पुनरूद्वार तँ भेल, मुदा एहि पुनरूद्वारपर आडंवर धर्मी व्यवस्थाक अमरतत्ती मूल संस्कृतिक विम्वकेँ सुखा देलक। समाजक साम्यवादी सोच भगजोगिनी बनि सवर्ण-दलितक मध्य भिन्न सामाजिक दशाक मध्य मात्र टिमटिमाइत रहल। एहि कारण सम्यक दृष्टिकोण रहितहुँ मैथिली भाषाक स्थापित रचनाकारक लेखनी व्यथित आ शोषित दलितक मर्मस्पर्शी जीवन गाथाकेँ प्रकाशित नहि कऽ सकल। कथा-कविता आ गल्पमे तँ दलितक चित्रण भेटैत अिछ, मुदा उपन्यासमे अत्यल्प। अपन व्यथाक विवेचन दलित वर्गक साहित्यकार सेहो नहि कऽ सकलाह, किएक तँ हिनक संख्या एखन धरि नगन्य अछि। संभवत: दलित रचनाकारक उपन्यास अपन वयनामे मैथिलीकेँ एखन धरि नहि भेटलनि। सभसँ जनप्रिय उपन्यासकार हरिमोहन झाक साहित्यमे दलित वर्ग अनुपस्थित जकाँ छथि। यात्रीक बलचनमा ओना एहि वर्ग दिस संकेत करैत अछि ओहिना जेना ललितक पृथ्वीपूत्र, धूमकेतुक मोड़ पर आ रमानंद रेणुक दूध-फूल। यात्रीक पारो आ नवतुरिया विषयक चयनक कारण दलित वर्ग दिस ध्यान नहि दऽ सकल। धीरेश्वर झा ‘धीरेन्द्र’क ‘कादो ओ कोयला’ छोट लोकक विरनीक कथा कहैत अछि तँ हुनकर ‘ठुमकि बहू कमला’मे दलित वर्गक संघर्षक कथा ठीठर आ रामकिसुनक माध्यमसँ कहल गेल अछि। मणिपद्ममक उपन्यासक राजा सहलेस दलित दुसाधक नायक सहलेसक कथा कहैत अछि तँ ‘लोरिक विजय’ उपन्यासक नायक तँ यादव छथि मुदा हुनका मित्र वर्गमे बंठा चमार, वारू पासवान, राजल धोबी, ई सभ दलित वर्गक छथि- लोरिकक किछु विरोधी सेहो दलित वर्गक शासक छथि- मोचलि- गजभीमलि, हरवा आदि बंठाक संहार परिस्थितिवश करैत छथि आ ताहिसँ लोरिक विजयमे दलित कथाक ढेर रास प्रसंग आएल अछि। नैका बनिजारामे सेहो नैकाक पत्नी फुलेश्वरीकेँ किनवाक वर्णन अछि। हुनकर फुटपाथ भिखमंगा सबहक कथा कहैत अछि तँ लिलीरेक पटाक्षेप भूमिहीनक नक्सलवाड़ी आन्दोलनक कथा कहैत अछि। आधुनिक कालक प्रसिद्ध उपन्यासकार विद्यानाथ झा ‘विदित’जी एहि विषयपर अपन लेखनीकेँ कोशीक भदैया धार जकाँ झमाड़ि कऽ प्रयोग कएलनि। ओना तँ विदित जी एखन धरि आठ-नौ गोट उपन्यासक रचना कएलनि अछि, परंच हिनक तीन गोट उपन्यासमे दलितक दशाक चित्रण मैथिली साहित्यक लेल अपूर्व निधि मानल जा सकैछ। हिनक विप्लवी बेसराक कथामे आदिवासीक कथा धौना, टेकू सुफल, बांसुरी, मोहरीलाल, गौरी, मारसक संग सफलता पूर्वक कहल गेल अछि। ‘कौसिलिया’ उपन्यासमे तँ फुलिया चमैनक पात्रताक चित्रण अनुपमेय अछि। विदित जीक तेसर उपन्यास ‘मानव कल्प’मे मिथिला, अंग आ झारखंडक ऑचरमे बसल लगभग सम्पूर्ण दलित समाजक विवेचन कएल गेल। ओना तँ श्रीमती शेफालिका वर्मा जी मानव धर्मी रचनाकार छथि। हिनक समग्र साहित्यिक कृतिमे ‘जाति’ शब्द भूमंडलीकृत अछि। ‘नाग फांस’ उपन्यासमे जातिवादी व्यवस्थासँ शेफालिका जी बचबाक प्रयास कएलनि, परंच एहि उपन्यासक एकटा पात्र आकाशक पत्नी तरंगक प्रकृतिसँ बुझना जाइत अछि, जे ओ दलित छथि। कहबाक लेल तँ सभ साहित्यकार अपनाकेँ साम्यवादी कहैत छथि मुदा साम्यवादी जीवन शैलीक जौं चर्च कएल जाए तँ संभवत: मैथिलीक सर्वकालीन साहित्यमे ध्रुवताराक स्थान श्री जगदीश प्रसाद मंडल जीकेँ भेटबाक चाही। हिनक सभ उपन्यास (मौलाइल गाछक फूल, जिनगीक जीत, जीवन-मरण, जीवन-संघर्ष, उत्थान-पतन)मे दलितक चित्रण अनायास भेटि जाइत अछि। लिखवाक शैली ओ विम्वक चयन ततेक पारदर्शी जे सवर्ण- दलितक मध्य कोनो खाधि नहि। सम्पूर्ण समाजमे सकारात्मक तारतम्य स्थापित करवाक जगदीश जीक स्वप्न मात्र उपन्यासमे नहि रहत, एहिसँ मिथिलाक समाजिक परिस्थितिमे भविष्यमे ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:....। सिद्धान्तक स्थापना अवश्य हएत। हिनक अविरल मर्मस्पर्शी आ प्रयोगधर्मी कृति ‘मौलाइल गाछक फूल’मे दलित समाजक महादलित मुसहर जातिक रोगही, बेंगवा, कबुतरीक मनोदशा आ नित्यकर्मसँ समाजमे शांतिक ज्योति जगएबाक कल्पना अनमोल अछि। दड़िभंगाक प्लेटफार्मपर सँ भंगी डोमक मानवीय भावनाक मारीचिका एकठॉ भक्क दऽ उगि जाइत अछि। भजुआ, झोलिया आ कुसेसरी सभ सेहो डोम जातिक छथि जिनकर सहायता सम्यक सोचबला ब्राह्मण रमाकान्त जी करैत छथि। एहि कृतिक सभसँ अजगुत पात्र छथि रमाकान्त जी। हिनक छोट पुत्र कालक डाँगसँ अधमरू वनिता सुजाता जे धोविन छथि तिनकासँ विवाह कऽ लैत छथि। विवाहे टा नहि विवाहसँ शिक्षा ग्रहन करवाक लेल प्रेरणा आ अर्थ सेहो सुजाताकेँ भेटलनि जाहिसँ ओ डाॅ. सुजाता बनि गेली। गाममे रहनिहार आ अपन मातृभूमिक प्रति असीम श्रद्धा रखनिहार रमाकान्त बाबूकेँ अपन पुत्र महेन्द्रक एहि निर्णएसँ कोनो पीड़ा नहि भेलनि। हिनक सम्पूर्ण परिवार एहि निर्णएकेँ सहृदय स्वीकार कऽ लेलकनि। जगदीश बाबूक दोसर उपन्यास ‘जीवन-मरण’मे हेलन-गुदरी डोम दम्पतिक चर्च कएल गेल अछि। जीबछ, छीतन, रंगलाल चमार जातिसँ सम्बन्ध रखैत छथि। जिनगीक जीत उपन्यासमे पलहनिक नेपथ्यक पात्रता दर्शित अछि। गजेन्द्र ठाकुरक ‘सहस्त्रबाढ़नि’मे दम्माक जड़ी एकटा आदिवासी द्वारा आनव आ िकछु वर्ख वाद ओ जड़ी जंगलमे नै भेटब वोन कम होएवा दिस संकेत करैत अछि तँ हुनकर ‘सहस्त्रशीर्षा’ मिथिलाक लगभग सभ दलित जातिक विष्तृत विवेचना करैत अछि। तीनटा घरक रहलोपर धोविया टोली एकटा टोल बनि गेल अछि। झंझारपुर धरि मारवाड़ीक कपड़ा एतए साफ कएल जाइत अछि। महिसवार ब्रह्मण सभ जे बरियातीमे बेलवटम झाड़ि कऽ सीटि-सीटि कऽ निकलैत छथि से कोनो अपन कपड़ा पहिरि कऽ। बैह मंगनिया कपड़ा, महगौआ मारवाड़ी सभक। मारवाड़ी सभक ई कपड़ा रजक भाय दू दिन लेल भाड़ापर हिनका सभकेँ दैत छथिन्ह। कोरैल बुधन आ डोमी साफी, धोवि। डोमी साफी आब डोमी दास छथि, कारण कबीरपंथी जोतै छथि। फेर एकटा आर टोल, चमरटोली अछि। चमार- मुखदेब राम आ कपिलदेव राम। पहिने गामसँ बाहर रहए, बसबिट्टीक बाद। मुदा आब तँ सभ बाॅस काटि कऽ उपटाए देने अछि आ लोकक वसोबास बढ़ैत-बढ़ैत एहि चमरटोली धरि आबि गेल अछि। घरहट आ ईंटा-पजेबा सभ अगल-बगलमे खसिते रहैत अछि। ढोलहो देबासँ लऽ कऽ सिंगा बजेबा धरिमे हिनकर सबहक सहयोग अपेक्षित। गाए-माल मरलाक बाद जा धरि ई सभ उठा कऽ नहि लऽ जाइत छथि लोकक घरमे छुतका लागले रहैत अछि। भोला पासवान आ मुकेश पासवान, दुसाध। गेना हजारीक निचुलका खाड़ीक संबंधी। वएह गेना हजारी जे कुशेश्वर स्थानमे एकटा कुशपर गाए द्वरा आबि कऽ दूध दैत देखने रहथि तँ ओहि स्थानकेँ कोड़ए लगलाह, महादेव नीचाँ होइत गेलाह, सीतापुत्र कुश द्वारा स्थापित ई महादेव गेना हजारीक ताकल। मुकेश पासवानक बेटी मालती बैंक अधिकारी छथिन्ह आ जमाए मथुरानंद डी.पी.एस. स्कूलक प्रचार्य छथि, वसंत-कुंज लग फार्म हाउसमे रहै जाइ छथि। भोला पासवान आ मुकेश पासवान गामेमे रहै जाइ छथि। 1967ई.क अकालमे जखन सभटा पोखरि, गड़खै सुखा गेल मुदा डकही पोखरि नहि सुखाएल प्रधानमंत्री आएल रहथि तँ हुनका देखेने रहन्हि सभ जे कोना एतए सँ बिसॉढ़ कोड़ि कऽ मुसहर सभ खाइत छथि। चर्मकार मुखदेव रामक बेटा उमेश सेहो ओहि मुक्ताकाश सैलूनक बगलमे अपन असला-खसला खसा लेने अछि, रहैए मुदा किशनगढ़मे। चप्पल, जुताक मरो-म्मतिक अलावे तालाक डुप्लीकेट चाभी बनेबाक हुनर सेहो सीखि लेने अछि। कुंजी अछि तँ ओकर डुप्लीकेट पंद्रह टाकामे। कुंजी हेरा गेल अछि तँ तकर डुप्लीकेट सए टाकामे। आ जे घर लऽ जएवन्हि तँ तकर फीस दू सए टाका अतिरिक्त। मुसहर बिचकुन सदायक बेटा रघुवीर ड्राइवरी सीखि लेने अछि। वसंत कुंजक एकटा व्यवसायीक ओहिठाम ड्राइवरी करैए आ रहैत अछि किसनगढ़मे। डोमटोलीक बौधा मल्लिक बेटा श्रीमंत सेक्टरक मेन्टेन्सक ठेका लेने छथि। हुनका लग दू सए गोटे छन्हि जे सभ क्वार्टरक कूड़ा सभ दिन भोरमे उठेवाक संग रोड आ पार्किगक भोरे-भोर सफाइ करै छथि। एहिमे सँ किछु गोटे विशेष कऽ नेपालक भोरे-भोर लोकक शीसा महिनवारी दू सए टाकामे पोछै छथि आ अखबारक हॉकर बनल छथि। रहै छथि किशनगढ़मे मुदा अपन मकानमे- मुसहर बिचकुन सदाय। दलित संस्कृतिक प्रति उदासीनताक मुख्य कारण अछि समाजमे पसरल छूति व्यवस्था। ओना तँ एहि प्रकारक अवस्था प्राय: सम्पूर्ण आर्यावर्त्तमे रहल अछि, परंच आन ठामक जनभाषासँ दोसर धर्मक लोकक हृदयगत स्पर्शक कारण दलित संस्कारक चित्रण आन भाषामे मैथिलीसँ वेसी भेटैत अछि। मिथिलामे तँ इस्लाम धर्मी छथि, परंच मातृभाषा मैथिली रहलाक वादो हुनका सबहक मध्य साहित्यक सृजनशीलता उदासीन रहल। एकरा मैथिलीक दुर्भाग्य मानल जा सकैत अछि जे एखन धरि एहि भाषामे दलित वर्गसँ उपजल साहित्यकार उपन्यास नहि लिखि सकलनि। प्राय: यएह स्थिति इस्लाम धर्मी साहित्यकारक संग सेहो अछि। फजलुर रहमान हासमी, मंजर सुलेमान सन साहित्यकार तँ मैथिलीकेँ आत्मसात कएलनि परंच उपन्यासकार नहि बनि सकलाहेँ। ई लिखबाक तात्पर्य जे इस्लाममे जातिवादी व्यवस्था सनातन सांस्कृतिक अपेक्षाकृत न्यून अछि। दलित वर्गक संख्या मिथिलामे लगभग आठ आना अछि, संपूर्ण समाजक मातृभाषा मैथिली, मुदा शिक्षा-चेतनाक अभावक कारण एहि वर्गमे मैथिली साहित्यक प्रति सृजनात्मक दृष्टिकोण नहि पनपि सकल। आगॉक जातिमे सम्यक् िवचारक अभाव रहल अछि, किछु साहित्यकार एहि परिधिसँ तँ बाहर छथि परंच वर्गक बीचक खाधि लक्ष्मण रेखा बनि हुनको सभमे जनभाषा वाचकक प्रति सिनेह नहि आबए देलक। संभवत: मैथिली आर्यभाषा समूहक पहिल जनभाषा थिक जकरापर जातिवादी कलंक लागल अछि। संस्कृतक संग यएह विडंवना रहल परंच ओ कहिओ जनभाषा नहि रहल। जखन कि मैथिली वर्तमान कालमे सवर्णसँ बेसी दलित-पछातिक मातृभाषा अछि। पलायन तँ सभ जाति समूहमे भऽ रहल अछि परंच मजदूरी केनिहार दलित प्रवासमे सेहो मैथिलीकेँ आत्मसात कएने छथि। एकर विपरीत मिथिलामे रहनिहार सवर्ण परिवारक आधुनिक पिरहीक नेना वर्गमे मातृभाषाक स्थान हिन्दी लऽ रहल अछि। ‘ज्योतिक-कोखि अन्हार’ जकाँ मातृभाषाक वास्तविक संरक्षकक विवेचन एहि साहित्यक उन्नयनक नहि कऽ रहल छथि। उतर विहारक बेस रास स्थानमे पसरल मैथिली तँ कखनो-कखनो मात्र मधुबनी दड़िभंगाक मातृभाषा प्रमाणित कएल जाइत अछि। रचनाकारक दृष्टिकोण रचनामे किछु आर आ वास्तविक जीवनमे किछु आर रहल। साम्यवादी व्यवस्थापर सियाहीक प्रयोग केनिहार उपन्यासकारमे वास्तविकता जौं रूढ़िवादी रहत तँ सम्यक समाजक कल्पनो करब असंभव। व्यथा वएह बूझि सकैत अछि जकरामे जीवन्त अविरल हृदय हो वा स्वयं व्यथित हुअए। निष्कर्षत: आशक संग-संग विश्वास अछि जे वर्तमान युगक साहित्यकार समाजक कात लागल वर्गक प्रति सिनेही बनि मैथिली साहित्यकेँ गरिमामयी बनाबथु। पूर्वाग्रहकेँ अनुगृहीत करबाक पश्चात एहेन कल्पना-वास्तविक भऽ सकैत अछि। जौं अपमानित अछोपकेँ सम्मानित कएल जाए तँ मिथिला पुनि ओहि मिथिलामे परिणत भऽ सकैत अछि जतए राजा जनक परिवार, समाज आ राज्यहितमे धर्मक पालनक हेतु राजासँ हरबाह बनि गेलनि। पोथी- समीक्षा-भावांजलि नैसर्गिक आ आत्मिक भावसँ निकसैत कविताकेँ आशु कविता कहल जाइत अछि। एहि भावक सृष्टि आशुकवि वा आशु कवयित्री मानल जाइत छथि। आशु कवितामे मैथिली साहित्यक स्थान एकात परंच विलक्षण। कवि कोकिल विद्यापति, कविशेखर बदरीनाथ झा, कविवर सीताराम झा, सरस कवि ईशनाथ झा, कवीश्वर चन्दा झा, कवि चूड़ामणि मधुप, कवि सरोज भुवन, यात्री, आरसी, अणु, गोपेश, श्रीमति श्यामा देवी, चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’, रवीन्द्र, सरस, नवल, श्रीमति इलारानी, सुरेश सिंह स्नेही, प्रवासी, विभूति आनंद, प्रदीप मैथिली पुत्र, मणिपद्म, नचिकेता, डाॅ. बुद्धिनाथ मिश्र, राजदेव मंडल, श्रीमति ज्योति सुनीत चौधरी, विलट पासवान विहंगम, हासमी जी, मंत्रेश्वर झा, राजकमल, अशोक दत्त, रूपेश कुमार त्योंथ, जगदीश प्रसाद मंडल, चन्द्रशेखर कामति, उमेश मंडल, कीर्ति नारायण मिश्र, मायानंद मिश्र, कुमार पवन, डाॅ. शंभु कुमार सिंह, श्रीमती मृदुला प्रधान, श्रीमती कुसुम ठाकुर, विवेकानंद ठाकुर, चन्द्रभानु सिंह, कालीकान्त झा ‘बूच’, रमाकान्त राय रमा, डॉ. केदारनाथ लाभ, जय प्रकाश जनक, डॉ. नरेश कुमार विकल, गजेन्द्र ठाकुर प्रभृत आशु कवि आ कवयित्री सभसँ जगमगाइत मैथिली साहित्य सरितामे एकटा चंचला मुदा अर्न्तमुखी नक्षत्रक उदय मैथिली साहित्यकेँ घृतगंधा बनौने अछि- ओ छथि डॉ. शेफालिका वर्मा। हिनक तृण-तृणमे काव्य धारा अविरल गतिसँ गतिमान अछि। ओना तँ विप्रलब्धा आ मधुगंधी बसात सन कविता संग्रहक रचना कऽ अपन विशेष स्थान बनौने छथि शेफालिका जी। मुदा हिनका एकटा गद्य गीत संग्रह ‘भावंजलि’ मैथिली भाषा साहित्यमे कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोरक स्थान शून्यताकेँ भरबाक लेल पूर्णत: नहि तँ आंशिक रूपेँ अवश्य प्रतीत हएत। जीवनक वास्तविक संरचना, एति, उदेश्य, दुख-दुख, आश-छोहसँ एहि रचनाक कोनो संबंध नहि। ककरा प्रतीक्षा अनचिन्ह सिनेह, अकथ्य मर्मक अकुलाएल अनुभूतिकेँ एहि गद्य-गीतमे प्रदर्शित कएल गेल अछि- ई संभवत: त्रिवेणीक वाक् धारा जकाँ मात्र अनुभूति एकल जा सकैछ, प्रत्यक्ष दर्शन नहि। स्वभाविक अछि पुष्प, नीर, क्षीर आ अमिय-गुग्गुलक अंजलि तँ देखबाक योग्य होइत अछि, ‘भावांजलि’केँ कोना देखल जाए? हिन्दी काव्य गगनक आत्मा- ‘एक भारतीय आत्मा’क प्रेमक विवेचन असंभव तँ नहि मुदा अति क्लिष्ट- है कौन सा वह तत्व जो सारे भुवनमे व्याप्त है, ब्रह्माण्ड पूरा भी नहीं जिसके लिए पर्याप्त है? कवयित्रीक हंसिनी मोन विरहक शंकामे जरैत अछि तँ दोसर दिशि मिलनक उन्मादसँ दीिपत अछि। सिनेहिल स्पर्शक आश तँ करैत छथि, मुदा स्पर्शनक कल्पना मात्रसँ सिहरि जाइत छथि। समस्त तन सितारक तार जकाँ झंकृत भऽ जाइत छनि। एहि सिनेहक विम्व तँ अनमोल मुदा ककरासँ सिनेह? कतहु नाथक रूपेँ भगवान बुझना जाइत छथि तँ कतहु कंतक भान। कतहु स्पर्शनसँ वैराग्य भावक प्रदर्शन तँ कतहु स्पर्शनक आशमे नैका वनिजाराक नायिका जकाँ- ‘उत्ताप प्रेम तिल सुनगि रहल नहि आब ई यौवन अछि वशमे’ मात्र एकावन पृष्ठक पोथीमे राजा भर्तृहरिक नीति, श्रंृगार आ वैराग्य तीनू गोट शतकक दर्शन एहि गद्य गीतकेँ विलक्षण बना देलक। मृत्युसँ वएह प्रेम कऽ सकैत अछि जे जीवनसँ उवि गेल हो वा जीवनक पूर्णताकेँ देखि नेने हुअए। जाहि कालमे शेफालिका जी एहि पोथीक रचना कएलनि ओहि काल जीवनमे शून्यता तँ नहि छल। पूर्णता एहि दुआरे नहि कहि सकैत छी जे ओहि समएकेँ छोड़ल जाए हिनक लेखनी एखन धरि गतिशील अछि। आब प्रश्न उठैत अछि जे जीवनक गति आ नियतिमे जीवंत नारीक जीवनक कोन अकथ्य व्यथाक चित्रण एहि पोथीमे कएल गेल जे मृत्युक अवाहन कऽ लेली। एहिठाम तीर्थस्थानक बिम्बक विश्लेषणमे गृहस्थ जीवनकेँ परम तीर्थ स्थल बना देल गेल। कवयित्रीक लघुआत्मामे सभ देव-देवी समाएल अछि। अंितम पद्यमे संभवत: अपन पतिकेँ अपन इष्टदेवक संग-संग प्रेरणा स्त्रोत, रक्षक, पिता भाय सभ रूपमे मानने छथि। तखन अदृश्य मृगमारीचिका कतऽ सँ आएल? रचनाक सभटा पक्ष तँ बड़ नीक अछि मुदा दुर्बल पक्ष अछि अनुत्तरित प्रश्न पाठक धरि कोना परसल गेल? ई सत्य अछि जे आदित्यक अंशु सेहो कविताकेँ इजोरिया नहि दऽ सकैत अछि, मुदा एहेन कवित्वक प्रदर्शन समीचीन नहि लागल। भऽ सकैत अछि जे आशु कविताक नवल धारा कवयित्रीक गातसँ स्वत: स्फूर्त रूपेँ अंकुरित भेल हुअए। भौतिकता आ बौद्धिकतापर सिनेह भारी बुझना गेल। सिनेहक प्रकार भिन्न-अकथ्य सिनेह। स्व. मनमोहन झा’क ‘यात्राक स्मृति’क नायकक दृष्टिसँ सुमित्राक प्रति उपटल सिनेहो एहि काव्य गीतक आगाँ ओछ पड़ि जाइत अछि। अपराध कएलापर अपराधबोध प्रासंगिक, मुदा बिनु अपराध कएने अपराधक लेल क्षमायाचना, ककरासँ क्षमायाचना इहो स्पष्ट नहि। सम्पूर्ण रचनामे प्रश्न- नव-नव प्रश्न मुदा ककरो दोसर लेल प्रश्न नहि कवयित्री तँ अपन जीवनसँ प्रश्न पुछैत छथि। हमरा मतेँ देसिल वयनामे ‘भावांजलि’ नव प्रकारक रचना थिक। अपन आत्मासँ साक्षात्कार, निर्विकार ब्रह्माण्डसँ साक्षात्कार......। पोथीक नाओ- भावांजलि कवयित्री- डॉ. शेफालिका वर्मा प्रकाशन वर्ष- 1996 रमाजीक काव्य यात्रा मैथिली साहित्यक काव्य धरातलपर किछु एहेन कविक पदार्पण भेल अछि जनिक समर्पण आगाँ साक्षा्त सरस्वती मूक भेल छथि ओइ साहित्यिकारक समूहमे श्री रमाकान्त राय रमा'क नाओं सम्मानसँ लेल जाइत छन्हि। 5 जनवरी 1947 ई.केँ समस्तीपुर जिलाक विभूतिपुर प्रखण्डक मानाराय टोलमे रमाजीक जन्म भेलन्हि। म.वि. दलसिंहसरायमे शिक्षकक रूपेँ प्रथमत: योगदान देलन्हि आ अवकासग्रहण उ.वि. शिरोपट्टी खतुआहाक शिक्षकक रूपमे कएलनि। संस्कृत साहित्यमे आचार्य आ विशारद्सँ विभूषित रमाजी मैथिली आ हिन्दीमे कविता अपन छात्र कालहिंसँ लिख रहल छथि। कविताक संग-संग गद्य साहित्यमे सेहो हिनक किछु योगदान छन्हि। एकटा कथा संग्रह कटैत पाॅखि : हँसैत आॅखि तीनिटा बबाजी (अनुदित कथा)क संग संग विविध पत्र-पत्रिकामे हिनक कथा, निवंध आदिक प्रकाशन भेल। एकटा निवंध संकलन कूटल-छॉटल आ एकटा नाटक घर-छोड़ू िहनक अप्रकाशित कृति छन्हि। रमा जीक पहिल कविता 1964ई.मे मिथिला भूमिक प्रति समर्पण भावसँ मिथिला महान शीर्षक रूपेँ इलाहावादसँ प्रकाशित बटुक पत्रिकामे प्रकाशित भेल छल। लगभग एक सयसँ ऊपर कविता लिख रमाजी एखन धरि साहित्य धारामे गोंता लगा रहल छथि। ऐ यात्राक क्रममे मैथिलीक कोपभाजन सेहो भेलाह। सन् 2007ई.मे साहित्य अकादमी आ मैथिली साहित्य संस्कृति विकास परिषद् समस्तीपरुक संयुक्त तत्वावधानमे रमाजी अपन जन्मभूमि मानाराय टज्ञेलमे काव्य संध्या आयोजित करवाक रूोजना बना रहल छलाह। ऐ क्रममे मैथिली साहित्यक वयोवृद्ध साहित्यकार श्री चन्द्रनाथ मिश्र अमर जीसँ भेँट करबाक लेल दरिभंगा जा रहल छलाह। यात्राक क्रममे अपन गृह स्टेशन नरहनमे रेलगाड़ीसँ पिछड़ि गलथि आ हिनक दहिना पाएर नीचासँ कटि गेलनि। एहेन समर्पणसँ ककर हृदए नै पिघलि जाएत.....। अमरजी अपन आत्मकथा अतीत मंथन'मे ऐ घटनाक उल्लेख कएने छथि। अस्पतालसँ छुट्टी भेटलापर रमाबाबू चुप नै बैसलनि आ हिनक इच्छा पूर्ण भेल। 8 जून 2008केँ मनारय टोलमे काव्य संध्या'क आयोजन कएल गेल। श्री चन्द्रभानु सिंह कवि सम्मेलनक अध्यक्षता कएलनि। उद्घाटनकर्ताक रूपमे अमरजी आ साहित्य अकादमीक प्रतिनिधिक रूपमे मैथिली परामर्शदातृ समितिक अध्यक्ष श्री विद्यानाथ झा विदित जी उपस्थित भेल छलाह। मात्र एतबे नै विकलांग भऽ गेलाक पश्चात् रमा जीक इच्छा शक्ति आ समर्पणमे कोनो कमी नै आएल, एखनहुँ अपन अर्द्धांगिनीक संग सम्पूर्ण मिथिला क्षेत्रक काव्य गोष्ठी आ कथा गोष्ठीमे उपस्थित होइत छथि। एखन धरि हिनक दू गोट काव्य संकलन प्रकाशित भेल अछि- फूल पात आ भांगक गोला। फूलपात- 1978मे पल्लव प्रकाशन, मानारय टोलसँ प्रकाशित फूलपात'मे 15 गोट कविता संकलित अछि। यस्याप्रभावमतुलं भगवानन्तो'क नीतिक आधारपर पहिल कविता वंदना मातृभक्तिसँ ओतप्रोत अछि। देशज छेहा मैथिलीमे आवश्य तत्सम मिश्रित संस्कृतसँ बनाओल गेल। स्वाभाविक अछि साहित्यक ज्ञाताक शब्द तत्समसँ दूर कोना भऽ सकैछ? अथिर थिर नर-नारि उर जे प्रणय लय सिरजन मिथ्ज्ञिला वंदना मातृभक्तिक पश्चात् जन्मभूमिक प्रति निष्ठाकेँ देखबैत अछि। स्वागत सहर्ष हे जनक देश गौलनि गुण जकर रमा निवेश शंकर विमुग्ध सुनि शुकक गान हे धन्य-धन्य मिथिला महान....। 'जमकल रस सिंधु' कवितामे रीतिक दर्शन तँ भेल मुदा छन्द आ लयक प्रवाहमे कवि ई विसरि गेलनि जे कवितामे मैथिलीमे लिखने छथि आकि हिन्दीमे- मगन चलय मन्द मन्द मादक मधुमय मिलिन्द मंजु मुकुल मृदु मरन्द वासन्ती मलयानिल..... स्वाभाविके अछि जे मैथिली साहित्यकमे ई धारणा भऽ गेल अछि जे जै पद्यक अर्थ सामान्य पाठक नै लगा सकैत छथि ओ उत्तम पद्य मानल जाइत अछि, तँए संभवत: कवि ऐ कविताक रचना मात्र प्रबूद्ध रचनाकारकेँ अपन लेखनीक धारासँ मुग्ध करबाक लेल लिखलनि, सामान्य पाठक लेल ऐ रचनाकेँ कोनो रूपेँ उपयुक्त नै मानल जाए। बाजल प्रणय वेणु कविताकेँ सरस श्रंृगार पद्य मानल जा सकैछ। बसन्त गीत कविताकेँ आरसी प्रसाद सिंह जकाँ प्रकृतिक मनोरम चित्रण करबाक प्रयास तँ कएल गेल मुदा विश्लेषण औसत मात्र भेटल- मलयानिल नित भोरे सँ बहि भेल िवकल जगत भरि की कहि? सुनि-सुनि ऑचर ससरय कुसुमित कानन कण-कण विहुंसय।। हम अजेय सरल क्रांति गीत बुझना जाइत अछि। डूबैत तरेगन'मे पाक आ बांगला देशक प्रसंगक उल्लेख कएल गेल अछि। जौं ऐ बिम्वकेँ कविताक स्थानपर कथा रूपमे प्रदर्शित कएल गेल रहिताए तँ अवश्य नीक भऽ सकैत छल। शरद निशा' कविताक बिम्व आ विश्लेषण दुनू प्रासंगिक अछि। मुदा एकटा बात खटकि रहल अछि जे जखन ऐ कविताक प्रकाशन फूूलपातमे 1978ई.मे रमा जी कएलन्हि तँ पुन: कर्णामृत त्रैमासिक पत्रिकाक नयना जोगिनी अंक अक्टूबर-दिसंबर 2009मे िकए प्रकाशन हेतु पठा देलन्हि। ऐ सँ कविक अपन रचनाक प्रचार-प्रसारक प्रति अविश्वसनीयता झलकैत अछि। जौं एना कएलन्हि तँ संग्रहक प्रति साभार लिखि देबाक चाही। ओनी-मानी' कविता बालमनोविज्ञानकेँ नीक जकाँ देखबैत अछि- अएथुन तोहर बाबू बौआ कौआ बाजय कॉव-कॉव रूसि रहव जँ अखनहिसँ तऽ के देतन पीढ़ी खरॉव....। पीढ़ीक स्थानपर पिरही लिखवाक चाही छल। 'नहि आयल चिर चोर' कविता विद्यापतिक श्रृंगार रससँ ओत-प्रोत रचना जकाँ लिखवाक प्रयास कएल गेल मुदा रमाजी होथु वा केेओ आन महाकवि विद्यावतिक नकल करवाक प्रयास नहि करबाक चाही। ग्रीष्म ऋृतु आ पावस गीत सेहो सामान्य मानल जा सकैत अछि। भांगक गोला- भांगक गोला रमाजी हिन्दी साहित्यक महाकवि हरिवंश राय वच्चन जीक मधुशालासँ प्रेरित भऽ कऽ लिखने छथि। ऐ रचनाक प्रकाशन नवंवर 2004ई.मे भेल। चारि खण्डक ऐ रूबाई संग्रहमे पहिल खण्ड ओरिआओन, दोसर भांगक गोला तेसर धोनइ धांइन आ चारिम परिशिष्ट अछि। एे प्रकारक नूतन प्रयोगकेँ कोन रूपेँ देखल जाए एकर िनर्णए पाठकपर छन्हि मुदा अन्तर्मनसँ कएल गेल कविक प्रयासक हम सराहना करैत छी। ऐ संग्रहमे सभसँ नीक लागल अपन देसिल वयनामे कविक मनोवृत्तिक सहज प्रदर्शन- स्वीकार करू हम चढ़ा रहल छी अपन पहिल भांगक गोला। रमा जीक दुनू काव्य संकलनक दृष्टिकोण आ विश्लेषणसँ पाठककेँ की भेटल ऐसँ बेसी महत्वपूर्ण अछि हिनक साहित्य समर्पण। अपन रचनासँ पाठकक हृदएकेँ स्पर्श करथु वा नै मुदा साहित्यक दधीचि बनि रमाजी मैथिली आ मिथिलाक आत्मामे अवश्य प्रवेश कऽ गेल छथि। समीक्षा- अरिपन (कविता संकलन) मैथिली भाषा साहित्यमे किछु एहेन रचनाकारक पदार्पण भेल अछि जनिक रचना सभमे बिम्बक धरातल तँ हरियरीसँ पाटल अछि मुदा हुनक नाओ मिथिलाक साहित्यिक पृष्ठभूमिसँ कात लागल रहल। एहेन रचनाकारक समूहमे सँ एकटा नाअो डॉ. नरेश कुमार ‘विकल’ केर सेहो लेल जा सकैछ। विकल जीक शिक्षाक क्षेत्र मैथिली आ राष्ट्रभाषा हिन्दी, रहल मैथिलीक प्राध्यापक छथि, तँए रज-कणमे मातृभाषाक प्रति सिनेह स्वाभाविक। सन पचासमे जन्म नेनिहार विकल जी अपन गामसँ लऽ कऽ सम्पूर्ण समस्तीपुर जिलामे मिथिला मैथिलीक लेल संघर्षरत छथि। मंच उद्धोषक आ गायक रहबाक संग-संग आशु गीतकार बनि छात्र जीवनसँ लगातार लिख रहल छथि। सन् सत्तर-अस्सीक मध्य मिथिला मिहिरमे हिनक कतेक रास कविता प्रकाशित भेल अछि। हिनक लिखबाक कलाक सभसँ पैघ विशेषता रहल जे मिथिलाक माटि-पानिसँ संबंधित रचनाक संग-संग बाल साहित्यपर अपन लेखनीक खुलि कऽ प्रयोग कएलनि। ओना तँ मैथिलीक संग हिन्दीमे हिनक बहुत रास पोथीक प्रकाशन भेल अछि, मुदा 'अरिपन' हिनक प्रथम चर्चित काव्य संकलन थिक जाहिमे 1983ई.सँ पूर्व धरिक लिखल हिनक 45गोट पद्य संकलित अछि। एहि पोथीक प्रथम पद्य 'अर्चना'मे एकटा बालकक अपन मातृक प्रति सिनेहकेँ बिम्ब बनाओल गेल अछि। 'निष्ठुर करेज तोहर हमहुँ जनै छी'मे अवोधकेँ अपन माएसँ आक्रोश अछि। बिम्बक विश्लेषण सामान्य जनभाषामे कएल गेल। 'अपन पान आ मखान' कवितामे पाश्चात्य संस्कृतिसँ अपन गामक तुलना नीक बुझना जाइत अछि। 'वसल मिथिला छै सीताक परानमे' काव्यक विनोदी प्रवृति की अपन वास्तविक अवस्थाकेँ झॉपि सकत? एक दिश एहि कवितामे मातृभूमिकेँ सभसँ ऊँच देखएबाक प्रयास तँ दोसर दिश 'वसन्त उपहार कतऽ अछि'मे हृदयमे पछबाक तप्त वायुक समावेशमे बसन्तक प्रयोजनमे मर्मक दर्शन भेल। एक्के व्यक्तिमे क्षणहिंमे सिनेह आ क्षणहिंमे छोह? वास्तविक जीवनमे हुअए वा नहि परंच कविक चंचल मनमे एना सभ भऽ सकैत अछि। 'नहलापर अछि दहला' शीर्षक कविता बाल साहित्य आ बाल मनोविज्ञानक मनोहारी दृश्य प्रस्तुत करैत अछि। एहि कविताक आखर-आखरमे झाॅपल बिम्बकेँ नेना-भुटका बूझि सकैत छथि, किएक तँ भाषा अत्यन्त सरल। मुदा एहि कवितामे आशुत्वक प्रवेशक प्रयास आ स्वर सरगमकेँ साक्ष्य बनएबाक लेल बिम्बकेँ विस्मित कएल गेल अछि। जाहिसँ कविताक स्तर कमजोर भऽ गेल। संकलनमे एकटा देल गेल 'गजल' बड़ नीक लागल। गजलकेँ शीर्षकसँ नहि बान्हल जा सकैत। मुदा एहि गजलक विशेष मनोरम बिन्दु अछि जे कवि एकरा एक्के बिम्बमे बन्हबाक सफल प्रयास कएलनि। 'संग रहि कऽ ने अहाँ बजै छी किऐ प्राण वीणाकेँ तारे तोड़ै छी किऐ? मैथिलीमे ओहि काल धरि एहि प्रकारक गजलक अभाव जकाँ छल। देशज भाषामे लिखल गेल गजल खूब नीक लागल। 'तोरा लेल' शीर्षक गीतकेँ बाल साहित्यपर सामान्य प्रस्तुति मानल जा सकैत अछि किएक तँ स्वर आबद्घ करबाक क्रममे कवि बिम्बसँ भटकि गेल छथि। 'भागि गेल मिथिलासँ....' शीर्षक कवितामे अपन संस्कृतिपर पाश्चात्य सभ्यताक प्रभावक वर्णन कएल गेल अछि ओ नीक मानल जा सकैछ। ' चिहँुकल मन' सपनामे विरह वेदनाकेँ दर्शाबैत अछि। एहि संकलनमे देल गेल कवितामे सभसँ नीक कविता 'कोइली' शीर्षक कविताकेँ मानल जा सकैछ। ओना तँ 'कोइली'क मधुर स्वर कविकेँ कटाह लगैत छन्हि, मुदा वास्तवमे कोइलीक स्वर मिथिला-मैथिलीक दयनीय दशाक विवेचन मात्र थिक। सभ दिन सुखमे संग दैत छेँ दु:खमे खाली डोल सन हमरा आब लगैए कोइली बाजव तोहर ओल सन। 'बाजि उठल कंगना'मे श्रंृगारक सेज सुक्खल जकाँ बुझना गेल। 'धरतीपर उतरल चान'मे कवि चूड़ामणि मधुपक शब्दक झंकार स्पष्ट देखऽ मे अाएल। 'मलार' शीर्षक गीत मूलत: लोकगीक रूपक बुझना गेल। अभिसार पथपर कुपित वालाक पीड़ा हृदयकेँ झकझोरि दैत अछि- रूसलहुँ मलान मुँह भऽ गेलै चानकेँ पाथरसँ फोड़ू नहि फोंका मखानकेँ कोहबरक दृश्य प्रणय लीलाक द्योतक होइत अछि मुदा एहि संकलनमे समाहित कोवरक बिम्बपर लिखल दुनू कविता मर्मस्पर्शी अछि। ककरोसँ भेटल पीड़ामे कवि तपल छथि वा आनक व्यथाक उद्बोधन करैत छथि, ई स्पष्ट नहि भऽ सकैछ। एवं प्रकारे विकल जी एहि पोथीमे गीत गगनक सभ उल्का, सहस्त्रबाढ़नि आ तरेगनकेँ स्पर्श करवाक प्रयास कएलनि। जीवनक विविध विधामे पद्य लिखि कऽ गीतक रूप देबाक हिनक प्रयास बहुत हद धरि सफल मानल जा सकैत अछि। मैथिली साहित्यमे सभसँ बेसी दरिद्र विषय थिक बाल साहित्यक सृजनशीलता। ओना तँ बहुत रास कवि एहि विषयपर कविता लिखलनि, मुदा भाषा क्लिष्ट तॅँए बाल पद्य रहितहुँ नेना भुटकासँ दूर रहल। एहि पोथीमे जे बाल रचना देल गेल ओ सभ सरल आ सुगम्य अछि। तँए हिनक प्रयासकेँ सार्थक बुझबाक चाही। अपन संस्कृति, श्रंृगार आ किछु भक्ति पद्य सेहो नीक लागल। ओना तँ एहि संकलनकेँ विकल जी 'काव्य संकलन' घोषित कएने छथि, मुदा कविता कम आ गीत बेशी तँए 'गीत संग्रह' मानव प्रासंगिक हएत। राग आ लयमे आबद्घ करवाक प्रयासमे कतहु-कतहु बिम्बक समुचित विश्लेषण नहि भऽ सकल। गीतमे एना होइते अछि, ओना ई सभ गीत एक-कालक नहि भऽ कऽ विविध कालमे लिखल कविक रचनाक संकलन मात्र थिक तँए एकर महत्वकेँ कम नहि बूझवाक चाही। हिनक रचनाक वैशिष्ठ्यता अछि भाषा सम्पादनक आड़िमे देशज शब्दकेँ अवरोहित नहि कएल गेल। अधिकांश कवितामे मातृभाषाक लहरि जगमगाइत भेटल, जेना- पियास मिझा ने सकै छी ककरो सुखल सोतीक धारा छी नजरि उठा केओ देखि सकय नहि सांझक एकसर तारा छी' एहि प्रकारक रचनासँ साहित्यक सम्यक समृद्धि हुअए वा नहि मुदा भाषाक विकासमे एहि प्रकारक पोथीक महत्व अवश्य अछि। एहेन रचनासँ पाठक आ श्रोता नव रूपमे भेटत तँए एकरा प्रासंगिक मानल जा सकैछ। पोथीक नाओ- अरिपन रचनाकार- डॉ. नरेश कुमार विकल प्रकाशक- मिथिला भारती भगवानपुर देसुआ समस्तीपुर प्रकाशन वर्ष- 1994 दाम- 16 टका मात्र समीक्षा- बिन वाती दीप जरय साहित्यक विकास तँ काव्यक विविध श्रेणीक संग-संग गद्यक कांतिसँ होइत अछि मुदा भाषाक विकास तखने संभव भऽ सकैछ जखन ओहिमे रसक सेहंतित सुगंध हुअए। रसास्वादनक लेल वैरागी साहित्यकार सेहो कखनो-कखनो गीत लिखए लगैत छथि किएक तँ गीत मानवकेँ पारिवारिक जीवनमे समाहित विविध समस्यासँ क्षणिक मुक्तिक लेल तिलकोर नहि तँ चटनीक काज अवश्य करैत अछि। मैथिली साहित्यमे किछु गीतकार एहेन भेल छथि जनिक लेखन कलाक समुचित विवेचन नहि भऽ सकल, किएक तँ ओ सभ गीतकार संग-संग गायक वा मंच उद्धोषक सेहो रहलाह तँए समीक्षक लोकनिक दृष्टिमे हुनक प्रतिभा मात्र गबैया जकाँ रहि गेल। जखन की जे श्रोता वा पाठक हुनका सबहक गीतक आनंद उठौने छथि, वएह व्याख्या कऽ सकैत छथि जे हिनका लोकनिक गीतसँ मिथिला-मैथिलीकेँ की-की भेटल? एहि गीत गगनक चन्द्र-तरेगनक समूहमे रवीन्द्र नाथ ठाकुर, नवलजी, सियाराम झा सरस, चन्द्रभानु सिंह, कमलाकांत, कालीकान्त झा बूच'क संग-संग डॉ. नरेश कुमार विकल जीक नाओ देल जा सकैत अछि। आन ऊपर लिखित गीतकार जकाँ विकल जीक गीतमे कतहु फूहड़ वा अभद्र भाषाक प्रयोग नहि। श्रंृगार, विरह, हास्य, अर्थनीति, बाल साहित्य आ गजल सन बहुआयामी गीतक विधामे विकल जी सिद्धस्त छथि। शुद्ध देशज वा देसिल वयनामे लोकधुनकेँ स्पर्श करैत हिनक गीत संग्रह- बिन वाती दीप जरय- सन् 2001ई.मे प्रकाशन संस्थान नई दिल्लीसँ प्रकाशित भेल। ओना तँ एहि पोथीक आमुखमे डॉ. हरिवंश तरूण जी एकरा काव्य कृति लिखने छथि मुदा वास्तवमे ई गीत संग्रह थिक। सभ प्रकारक सुवासित गंधक संग-संग करूणा, वेदना, समाजक विषय दशाकेँ गीतक बिम्वमे सरिया कऽ विकल जी 51गोट गीतकेँ पोथीक रूप देने छथि। प्रथमं ग्रासे मक्षिका पात्रम' सभसँ पहिलुक गीत वेदनासँ ओत-प्रोत नीक लागल। पहिल पद्य 'चुमलहुँ सभ दिनकाँट'क बिम्व विचार मूलक अछि, छंद आरोही आ धुन लोक धुन संग-संग गेय। संग्रहक अंतिम पद्य वसंंत मुदा पहिल वेदना। भऽ सकैत अछि अपन व्यथित रूपकेँ प्रथमत: ज्वलित कऽ शनै-शनै: रसक क्षीर सागरमे पाठककेँ सरोबरि करवाक हिनक योजना हुअए मुदा हमरा मतेँ एहि गीत संग्रहक पहिल गीत आनंदित करैबला होएवाक चाही। दोसर गीत- सूखल स्नेहक स्त्रोत' सेहो करूण रससँ भल अछि। अन्तर्मन अतृप्त ज्वार सभ सरित स्त्रोत केर बात कहाँ श्याम सघन घन घुमड़ि रहल थिक, होइछ मुदा बरसात कहाँ! गीतकार कोन पीड़ासँ उद्वेलित मुदा गुम्म छथि? पद्यसँ स्पष्ट होइत अछि जे ओ अत्यन्त भावुक छथि। कहलो गेल अछि गद्यकार अपन जीवनक रूपकेँ झॉिप सकैत छथि मुदा कवि नहि। कविक कविता हुअए वा गीत प्रबुद्ध पाठक कविक मन उद्वेग आ हृदय जुआरिकेँ हुनक पद्यमे स्पष्ट ध्वनित सुनि सकैत छथि। झरकि रहल मन' आ उसठल फागमे सेहो वेदनाक ध्वनि मार्मिक अछि मुदा कलुषित नहि। दोहा गीत'मे गीतकारक वेदना स्वयंसँ उपटिकऽ समाजक आ देशक कालगतिक आड़िमे परिवर्तित मानसिकताकेँ स्पष्ट करैत अछि- उड़न खटोला खाट बनि, रहल भूमिपर सूति। सत्ते कहय जे कालपर, चलयने ककरो जूति। 'उनटा वसात' शीर्षक पद्यमे बिम्व विश्लेषण तँ नीक बुझना जाइछ मुदा शीर्षक कनेक अनसोहांत लागल। बसात कखनहुँ उनटा नहि बहैत अछि, मनुक्खक व्यक्तिगत जीवनमे सुख: दुखक उद्भव आ इतिश्री इहलौकिक होइछ मुदा बसात तँ शास्वत छथि तँए अपन व्यैक्तिक दु:खक दोष प्रकृतिपर नहि देवाक चाही मुदा कविक मन मार्मिक आ चंचल होइछ आ संग-संग विकल जी आशु कवि छथि तँए हिनक दोषारोपणक भाव क्षम्य। एहि पद्यक पाॅति-पॉतिमे स्वातीक बूनक आशमे िसतुआक टकटकी तृप्तिक ज्वार बड़ नीक लागल- पुरैनक पातपर छी ओंघराएल ने तन सुगबुगायल ने मन उजबुजाएल। 'अगिआयल सख सेहन्ता, मोनक पीर नीर बनि आएल, नोर सनल जिनगी सबहक बिम्व सामान्य लागल। अोना तँ गीत-गजलमे बिम्वक प्रधानता नहि होइत अछि किएक तँ ध्वनि, राग आ छन्दक समंजनमे रचनाकार बान्हल रहैत छथि तँए सुधि प्रभंजित होएबाक संभावना अधिक। एहि संग्रहमे दूटा बसंत गीत देल गेल मुदा दुनू नीक मानल जा सकैत अछि। पहिल बसंत गीतमे व्यथाक पराभवसँ सिनेह निकसैत अछि तँ दोसरमे सुखक दुग्धमे अमृतक बून्न स्वत: टपकि रहल। वास्तवमे पद्यक रूप एहि प्रकारक होएबाक चाही। एहि संग्रहमे जे सभसँ नीक गीत देल गेल अछि ओ थिक- प्रोषित पतिका'। दू तीन बेरि समस्तीपुरमे विविध काव्य संध्यामे विकलजीक मुखसँ एहि गीतक गायन सुनने छलहुँ। सन 2001ई.मे समस्तीपुरमे साहित्य अकादेमी द्वारा आयोजित- काव्यसंध्या'मे ई गीत बड़ लोकप्रिय भेल छल- पहुना कहुना कऽ चलि आउ अपन गाम। आव ने रहि गेलै तेहन आसाम। एहि गीतक माध्यमसँ गीतकार पलायनवादक प्रबल विरोध करैत छथि। अप्पन घरक नोन-रोटी आन ठामक मलपूआसँ बेसी नीक किएक तँ आन लोक हमरा सबहक व्यथाकेँ नहि बूझैत छथि। जाहि कालमे विकल जी एहि गीतक रचना कएने छलाह ओहि काल आसाममे बिहारी लोक सभकेँ बहुत पीड़ित कएल जाइत छल। ओना तँ एखनो स्थिति वएह आब तँ महाराष्ट्रमे सहो स्थिति भयावह भऽ गेल अछि। तँए एहि प्रसंगमे 'प्रोषित पतिका' गीतक महत्वकेँ नजरअंदाज नहि कएल जा सकैत अछि। समाजमे पसरल व्यभिचार, भ्रष्टाचारपर आशुगीतकारक लेखनी अनायास नहि टपकल, सहैत-सहैत देशकालक दशापर अंतत: 'छद्मबेशी' शीर्षक कविता लिखि अपन गीतकेँ नवल सोचसँ पुलकित कऽ देलनि- असल रूप परदा केर भीतर सभ परदा रंगीन छै देखबामे अछि चिक्कन चुनमुन करनी नम्वर तीन छै। देशकालक घोघटकेँ उघारैत समाजक कलुषित रूपपर किछु पद्य जेना अपन गणतंत्र, लतरि रहल विद्रोहक लत्ती, नव प्रभात, राखूबचा हिमालय, दिल्ली कने सुनू आ न्यूनतम मजदुरी पद्यक बिम्व आ विवेचन दुनू नीक मानल जा सकैछ। समाजक दशापर कविता लिखल जा सकैत अछि गीतक बिम्व दुष्कर तँए एहि सभ पद्यकेँ पूर्णत: गीत नहि मानल जाए। मुदा छंदक मात्रा संतुलित तँए गेय भऽ सकैछ। एहि पोथीमे चारि गोट गजल सेहो देल गेल अछि। मैथिली पद्य विधामे हैकू आ गजल लेखनक अभाव जकाँ अछि। तँए एहि सभ गजल केर महत्वकेँ नकारि नहि सकैत छी- पसारल छैक परतीमे हमर पथार सन जिनगी, कहू हम लऽ कऽ की करवै एहन उधार सन जिनगी... उपर्युक्त गजलक संग-संग आन दूटा गजलकेँ नीक कहल जा सकैछ। गजलक पॉति-पॉतिमे अलग-अलग बिम्व होइत अछि तँए एकरा शीर्षकसँ आबद्ध करव असंभव आ अनुपयुक्त। एकटा गजल मूलत: गीत मानल जा सकैत अछि किएक तँ एक्के पॉतिक बेर-बेरि प्रयोग कएल गेल। एकरा गजल नहि मानल जाए। िवकल जी गायक सेहो छथि, एहेन चूकि कोनो भऽ गेलनि। तन भिजा कऽ मन जराबय, आबि गेल साओन केर दिन विरह वेदन तान गाबय, आबि गेल साअोन केर दिन खोलि कऽ बरसात अप्पन वस्त्र फेंकल सूर्यपर चानकेँ सेहो लजाबय, आबि गेल साओन केर दिन....।। उपर्युक गीतकेँ गजलक रूप देबाक प्रयास कएल गेल मुदा सीमाक उल्लंघन कएल गेल तँए ई गीत अछि गजल नहि। 'व्यथित हृदय' पद्य, पोथीक शीर्षककेँ स्पर्श करैत अछि- बाती नेहक जरि ने पावय, खाहे तिल-तिल देह जरय व्यथा वेदना उर अंतरमे, दय उपकार करय। एहि प्रकारे सभटा पद्यक अपन-अपन महत्व अछि। कतहु-कतहु त्रुटि सेहो भेटल। गीतकेँ बिम्व आ स्वरसँ आबद्ध करवाक क्रममे एहेन त्रुटि स्वाभाविक होइत अछि। अपन तरूण जीवनकालसँ विकल जी गीत, कविताक रचना करैत छथि। धन्यवादक पात्र छथि जे एखन धरि नीतिक संग-संग श्रंृगार आ छोहसँ भीजल रचना पाठक धरि पसारैत रहलाह। पूर्ण तँ केओ नहि भऽ सकैत अछि, जखन पूनमक चानमे सेहो दाग तँ त्रुटि ककरोमे भऽ सकैत अछि। रचनाक बिम्वमे कतहु-कतहु कमी भेटल मुदा रचनाकार अपन भावकेँ मैथिलीक प्रति श्रद्धेय रखलनि तँए एहि त्रुटिक व्यापक विवेचन करब प्रासंगिक नहि। निश्चित रूपसँ एहि पद्य संग्रहमे मिथिला मैथिली संस्कृतिक ध्वनिक संग-संग लोकधुन दष्टव्य मानल जाए। पद्य संग्रहक शीर्षक- विनु वाती दीप जरय'मे रीतिकालक पद्यक रूप झलकैत अछि। वास्तवमे जेना िनर्वातमे ध्वनिक गमन संभव नहि तहिना बिनु वातीक दीपकक कल्पनो अवांछित मुदा कविक दृष्टकोण रीतिक प्रयोगात्मक अवलम्वन तँए एना संभव भऽ सकल। पोथीक नाओ- विनु वाती दीप जरय रचनाकार- डॉ. नरेश कुमार विकल प्रकाशक- प्रकाशन संस्थान नई दिल्ली मूल्य- 80टाका मात्र रमाकान्त राय ‘रमा’, श्री रामा निवास, मानाराय टाल, पोस्ट- नरहन जिला-समस्तीपुर ८४८२११ गामक जिनगी -कथा संग्रह- जगदीश प्रसाद मंडल- समीक्षा भारतीय भाषा साहित्यमे ग्राम्यांचलक उर्व्वर भूमिमे सभ किछु उपजैत अछि- अन-धन- लक्ष्मी। जँ आम सन अमृत फल होइत अछि तँ करैला सन तीत सोहो। जँ सभ रूपमे औषधि सन धातृफल तँ सभ तरहेँ अनिष्टकारक बरहर सेहो। कनकजीर आ तुलसी फूल स्वादिष्ट चाउर हम सभ उपजाबैत छी, कऽन-साग-मरूआ आ अकटा-मिसिया सन कुअन्न सेहो समए-कुसमए लोकक क्षुधा शांति कऽ गरिमा मण्डित होइत अछि। दोसर दिस भादो मासमे झहरैत वर्षामे भीज कऽ थाल-कादोमे खिल्ली छाबा डुबा कऽ जँ धान रोपैत अछि तँ चैत-बैसाखक बरकैत रौदमे गहुंम काटैत अछि, दाउन करैत अछि तथा माध मासक हारमे धुसिआइबला जाड़ आ जान मारूख शीतलहरीमे राति-राति भरि जागि कऽ लोक रवि-राइक पटौनी करैत अछि। अइठाम काजमे जँ कनिको उफाँटि भेल आिक पलमे प्रलए भऽ जाइत छै। लोकक जीवन अपटी खेतमे चलि जाइत छै मुदा जँ जीवित रहि लोक काज सम्पन्न कऽ लैत अछथ् तँ की की ने देखैत अछि- ताड़क गाछ तरेगन आ दिनोमे तरेगन। गाम उर्व्वर भूमि एकसँ एक विद्वान, वैज्ञानिक, राजनेता आदिकेँ अपना अंकमे पोषैत आबि रहल अछि तँ एकसँ एक कवि-कलाकार-साहित्यकारकेँ सेहो। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त, रामधारी सिंह “दिनकर” आ अमर कथाकार मुंशी प्रेमचंद गामेक उर्व्वर भूमिक पुत्र छलाह जे अपन-अपन क्षेत्रक शिखर पुरूष भेलाह। मिथिला मूलत: मैथिली भाषा भाषी ग्रामीण क्षेत्रक विशाल भूभागमे पसरल अछि। तँए अइठाम सेहो अधिकांश लेखक, कवि, कलाकार-साहित्यकार प्राय: गामेक मूल निवासी छथि। मुदा एकटा बात आन भाषासँ मैथिलीमे भिन्न ई अछि जे जतऽ आन भाषाक रचनाकार-कलाकार अपन कृतिमे गामकेँ विशेष जगजिआर करबाक चेष्टा केलनि अछि तेना मैथिलीमे नै। ओना राजकमल, यात्री, मायानन्द, ललित, धीरेन्द्र, धूमकेतू आदिक रचनामे गाम आएल अछि अवश्य मुदा ओकर मात्रा वर थोड़ अछि। जेना राजकमलक “ललका पाग” सन कथामे गामक नारीक निश्छल प्रेमक प्रवाह अछि तँ ललितक “रमजानी” पछड़ल अल्पसंख्यकक कथा नीक जकाँ बिकछा कऽ कहल गेल अछि। जहिना मायानन्द मिश्रक “खौंता आ चिड़ै” मे उच्च वर्ग आ पछड़लक वर्ग संघर्षक कथा नीक जकाँ स्थान पओलक अछि तहिना यात्रीक “बलचनमा” मे सेहो ऐ माैलिकताक स्पष्ट रेखांकन भेल अछि। आनो-आन नव-पुरान कथाकार मिथिलाक गामक कथा लिखलनि अछि मुदा खेतिहर-मजदूर, निम्नवर्गक बोनिहार, एक सांझ खा कऽ दोसर सांझक जोगारमे बेकल लोकक कथाक अभावे रहल अछि। श्री जगदीश प्रसाद मंडलक कथा संग्रह “गामक जिनगी” एहि प्रकार अभावक पूर्ति करैत अिछ। ऐमे ने केवल निम्न-मघ्यवित्त आ पछड़ल निम्नवर्गक कथा अछि प्रत्युत गामसँ बाहर रहि अयोध धामन-गहुमन साँप सन विषधरक कथा सेहो अछि जे अपन जीवनक सांन्ध्य बेलामे प्रदूषण मुक्त गामोकेँ अपन विषक धधकैत ज्वालमे भस्मसात करए चाहैत छथि। “गामक जिनगी” कथा संग्रहमे कुल उन्नैसटा कथा अछि जे समग्रतामे मूल रूपसँ गामक कथा अछि। ऐ सभ कथाक कोनो ने कोनो पात्र गामक अछि- व्याधि रोग-शोक, इर्ष्या-द्वेष, धृणा-सिनेहक शिकार कतहुँ ने कतहुँ अवश्य होइत अिछ। किछु कथामे तँ एना लगैत अछि जे कथा नायक वा उपनायाक जीवनसँ पूर्णत: निराश भऽ अनिश्चयक भ्रमरजालमे ओझरा जाइत मुदा तखनहिं आशाक सूर्यक किरिण हुनका जीवनमे एकटा नव उत्साह, उमंग भरि दैत छन्हि आ ओ पुन: विश्वाससँ भरि नव-जीवनक शुभारम्भ करबामे जुटि जाइत छथि। किछु कथामे एक क्षेत्रक लोककेँ दोसर क्षेत्रक भौगोलिक परिवर्तनजन्य किछु अनेरूआ फसलक विषएमे व्यवहारिक ज्ञानक अभाव रहैत अछि जैसँ दैवी प्रकोपक समए नीक जकाँ जीवन-यापन कएल जा सकैत अछि। कथाकार जगदीश प्रसाद मंडल जीवनक उतरार्द्धमे लिखब प्रारम्भ कएलनि अछि। ओना किछु पहिनहुँसँ लिखबाक अभ्यास छल होएतनि मुदा देखार रूपमे मात्र दू-अढ़ाइ वर्षक अवधिमे दर्जन भरिसँ अधिक पोथीक सृजन कऽ ई एकटा नव कीर्तिमान स्थापित कएलनि अछि। जैमे आधा दर्जनसँ अधिक पोथी प्रकाशित भऽ चूकल छन्हि। मनुष्यक जीवनमे नित्य अनेक घटना-दुर्घटना-संघर्षक संग हर्ष-विषादक अवसर अबैत अछि। ओइ महँक किछु सार्थक क्षणकेँ समेटि कऽ मानवोचित मर्यादा, दायित्वबोध, सुरक्षा, संरक्षा, सुविवेचन-रचनादि द्वारा मनुष्यमे जिजिवीषा उत्पन्न कऽ पुनस्थापित करब कथाकारक दायित्व अछि। जगदीश बाबू ऐमे पूर्ण सिद्धस्त छथि। जँए कि ई ग्रामीण अंचलमे एकटा राजनैतिक कार्यकर्ताक रूपमे समाजकेँ खूब नीक जकाँ चिन्हने छथि, जन-जनक, गरीब-अमीरक सुख-दु:खमे सहभागी रहल छथि तँए ओकर नोन-तेल-हरदिसँ लऽ कऽ जन्म-मरण धरिक साक्षी रहलाह अछि। ऐ अनुभव सभकेँ ओ नीक-जकाँ बिकछा-बिकछा कऽ अपन कथा सबहक तानी-भरनी बनौलनि अछि। तँए हुनक रचना मैथिली साहित्यकेँ एकदम बेछप बुझि पड़ैत अछि। डॉ. मेघन प्रसाद अपन पुस्तक “मैथिली कथा कोश” मे कथाक प्रसंग अपन विचार ऐ प्रकार व्यक्त कएलनि अछि- “कथा, जीवनक एकटा खण्ड चित्र अछि जे सम्पूर्ण जीवनक व्याख्या नै कऽ ओकर मात्र एकटा घनीभूत क्षणक उद्घाटन करैत अछि।” वस्तुत: कथा अपन आकारगत सीमाक कारणेँ एक्केटा घटनाक प्रभाशाली चित्रण कऽ सकैत अछि। ओइमे प्रासंगिक कथा अथवा विवरणक बेशी स्थान नै होइत अछि। दोसर शब्दमे कथा गद्यक एकटा छोट अत्यन्त सुघटित आओर अपनामे पूर्ण साहित्य रूप अछि। (भूमिका पूष्ठ-२) जगदीश प्रसाद मंडलक कथा ऐ दृष्टिसँ कनिको पथ-च्युत नै भेल अछि। हँ, हिनक कथा सभमे किछु विस्तार अवश्य अधिक अछि मुदा ओतेक विस्तार नै जे मात्र कथाक एक्केटा रूप, लघुकथा रहि जैताए जखन कि ओइमे घनीभूत क्षणक उद्घाटन करबाले किछु विस्तार प्रयोजन बांछनीय होइछ। एकटा बात आर, हिनक कोनो कथामे प्रासंगिक विवरण सेहो लघुरूप धारण कऽ घुसिआएल अवश्य भेटत। मुदा ओइसँ ने तँ कथाक मौलिकता प्रभावित बुझि पड़त आ ने ओकर औपन्यासिक विस्तार बुझाएत। भने कोनो-कोनो कथाकेँ लघुक स्थानपर दीर्घकथा कथा कहबे श्रेयस्कर होएत। सुप्रसिद्ध कथाकार डॉ. सुभाषचन्द्र यादव हिनक कथाक विशिष्टता मादे कहैत छथि जे हिनक कथामे औपन्यािसक विस्तार अछि। वर्तमान समएमे प्रचलित आ मान्य कथासँ हुनक कथा भिन्न अछि। हुनक कथा घटना बहुल आ ऋृजुसँ युक्त अछि। डॉ. मेघन प्रसादक विचार जतऽ आम कथाक विषएमे कहल गेल अछि ओतहि डॉ. यादवक विचार मात्र श्री जगदीश प्रसाद मंडलपर केन्द्रित अछि। मुदा शब्दक कनेक हेर-फेरसँ दुनू व्यक्तिक विचार जै विन्दुपर मिलैत अछि से अछि डा. यादव द्वारा प्रत्युत शब्द- “ऋृजु” अछि। ओ हिनका जीवन संघर्षक कथाकारक रूपमे स्थापित करैत जिजीविषा, मानवीयता आ आदर्शकेँ सुदृढ़ आ पुनप्रतिष्ठित करबाक उद्देश्यसँ अनुप्रमाणित मानैत छथि। एक्के संग अनेक नीक भावक संयोजनकेँ ऋृचा जकाँ बहुभावाभिव्यक्तिक संभावनाकेँ ऋृजु संज्ञा रूपमे डॉ. यादवक सोचक व्याख्या कएल जा सकैत अछि। जेना कि संग्रहक नाओंसँ स्पष्ट अछि- ऐ पुस्तकमे गामक जिनगीक कथा कहल गेल अिछ। मुदा आइ-काल्हि केहनो ठेठ गामक जीवनमे कतहुँ ने कतहुँ शहर आबिए जाइत अछि। तखन कथाकार ऐ हेतु सभठाम पूर्ण सचेष्ट छथि जे गाम आ शहरक ऐ दुरभिसंधिमे गामक मौलिकता भुतिआ नै जाए, हेरा नै जाए। हिनक कथा सभमे जँ कतहुँ गाम आ शहर मिझराएलो अछि तँ ओ ऐ दुनूक सूच्चा स्वरूपकेँ स्पष्ट रूपेँ रेखांकित कएलनि अछि आ शहरक नगर जिनगीपर गामक जिनगी सभठाम प्रभावी देखाओलनि अछि। “भैंटक लाबा, बिसाँढ़ आ पिरारक फड़” ई तीनू कथा एक्के भूमिपर प्रतिष्ठित अछि भैंट, बिसाँढ़ आ पिरारक उपयोगक विषएमे जइठामक लोक नै जनैत छथि हुनक पति (जँ ओइठाम ओ वस्तु प्रयुक्त होइत हो) किंवा पत्नीसँ ऐ विषएमे जानि-बुझि कऽ बाढ़ि, सुखारक समएमे ओकर सदुपयोग कऽ ओइसँ त्राण पएबाक ई एकटा सशक्त साधन होइत अछि। मुदा समाने भाव-भूमिक होइतो तीनू कथाक ई विशेषता अछि जे बिसाँढ़ जतऽ रौदीमे, सुखारमे गरीबक जीवन रक्षक होइत अछि, होतहिं भैंटक लाबा बाढ़िसँ बिलटल परिवारक रक्षक होइत अछि। मुदा पिरारक फड़ सामान्य समएहुँमे लोकक व्यंजनक बेगरता मेटबैत अछि। ऐ तीनू कथा गढ़बा काल लेखक ऐ हेतु पुर्ण साकांक्ष छथि ऐ स्थिति-परिस्थितमे गामक गिरहस्तकेँ लेल कोन-कोनटा उपकरणक उपयोग अपेक्षित अछि। ऐसँ ओहि अव्यपहृत वा कम व्यवहृत सरंजाम-उपकरणक ध्यान एकबेर ओहि सभ लोककेँ आबि जाइत छन्हि जे ग्राम्य संस्कृतिसँ बहुत दिनसँ सुदूर रहि रहल छथि। “अनेरूआ बेटा” केँ नि:संतान दम्पति अपन बना कऽ पोसैत अछि। पहिने चाहक दोकान कऽ कए ओ क्रमश: पढ़ब-लिखब सिखैत अछि। ओकर जिज्ञासु मन स्वाध्यायक बलपर साहित्य सृजन दिस उन्मुख होइत अछि आ क्रमश: ओहूमे सम्मान जनक स्थान प्राप्त करैत अछि। गामक वातावरणसँ सर्वथा असंपपृक्त, शहरी जीवनक अभ्यासी एकटा वकील साहेबक नवयुवती पुत्रीकेँ ओकर साहित्य अपना दिस आकृष्ट करैत अछि। ओ ओकरासँ भेँट कऽ ओकरे संग अपन जीवन व्यतीत करबाक स्वपन्न देखैत अछि। छह निश्चयी अपन स्वभाव-प्रभावसँ माए-बापकेँ मना कऽ ने केवल ओकरासँ विवाह करबामे सफल होइत अछि प्रत्युत, गृहस्थ जीवनक हेतु आवश्यक सभटा सरंजामो पितोसँ करवा लैत अछि। ठेला-वाला अा िरक्साबला दुनू करेज तोड़ मेहनतिबला लोक मुदा पहिल जँ अपन कमाइसँ अपन दुनू बेटाकेँ नीक जकाँ मैट्रीक पास करबा कऽ “शिक्षा-भिन्न” बना कऽ उपराग जिनगी जीवैत अछि तँ “रिक्साबला” जतऽ बैसारीमे रिक्शा चलबैत अछि तँ शेष समए एकटा चिमनीक मालिक संग पुरैत अछि। एकदिन मालिकक कनियाँक दिनचार्य ओकरे मुँहसँ सुनि कऽ ओकर भौतिक जीवनक लाचारीक लाचारी आ आखि महँक भूख देख कऽ अनठा कऽ अपन घर पराइत अछि। “डाॅ. हेमंत”केँ बढ़िग्रहस्त क्षेत्रक डयूटीपर जयबाक जे जेतेक संशय ग्रामीण वातावरण, सामन्यजस्यक समस्या आ ग्रामक अशिक्षित लोकक संग रहबाक हीन ग्रन्थि छलनि सभटा ग्रामीणक सद्व्यवहार, सहयोग आ निश्च्छल कार्यव्यापारसँ दूर भऽ जाइत छन्हि आ गाममे बिताओल क्षण हुनका जीवनक एकटा अनमोल स्मारक जकाँ मानस पटलपर अंकित भऽ जाइत छन्हि। बाहर रहि जीवन भरि भ्रष्ट्राचारमे आकंठ डूबल रहि दूटा पितिऔतक जीवनमे ऐ भौतिकवादी युगक उपादानो सभसँ जखन स्वाभिमानपर चोट पहुँचैत छन्हि तखन गामक जिनगीक मोह गछारैत छन्हि। मुदा गाममे पास करबासँ पहिनहि घरारीक बटबाराक क्रममे गामक शांत जिनगीमे ओ दुनू भाँइ उच्कोच आ छल-छद्वाक बलेँ जखन किछु अनुचित नै करा पबैत छथि तखन प्रेम चन्द्रक “पंचपरमेश्वर” सँ कोनो कम महत्पूर्ण अछि निश्च्छल ग्रामीण मिथिलाक ई कथा भैयारी। बोनिहार-मरनीक बातपर जँ ओकरासँ काम करौनिहार मदमस्त ठीकेदारक आँखि नोरा जाइत अछि तँ आनक कथे की? ऐ वैज्ञानिक युगमे श्रमक जतेक अबमूल्यन भेल अछि, भऽ रहल अछि ओतेक कोनो आन वस्तुक नै। ऐमे ग्लालाइजेशनक वर पैघ हाथ छैक। नै तँ एकटा कुम्हार जँ एकबेर कोशीक कटावसँ गाम छोड़ि परा कऽ दोसर गाममे बसैत अछि तँ दोसर बेर अपन वस्तु जातक, श्रमसँ उत्पादित वस्तुक ग्राहक अभावसँ गाम छोड़बाक निश्चय करैत अछि। मुदा संयोगसँ तै समए ओकर भुतिआएल बेटा प्रचुर टाका-पैस्यक संग आपस आबि जाइत छैक जे आब कुम्हारक नै, मूर्तिकार आ चित्रकारक रूपमे अपनाकेँ स्थापित कऽ लेने छल। तँए ओइ कुम्हारक हारि जीतिमे बदलि जाइत छैक। पुस्तकक भाषा ठेठ ग्रामीण अछि जैमे स्थानीय लोकोक्ति, मुहावरा आ सभसँ वेशी अप्रचलित ठेठ ग्रामीण शब्दक बाहुल्य पुस्तककेँ अत्यधिक महत्वर्ण तत्व कहल जा सकैत अछि। बहुत कथामे तँ जातिगत पेशामे उपयोगमे आबैबला सभटा सामग्रीक नाओं एवं उपयोगक उल्लेख अछि जे ओइ शब्दकेँ विस्मृतिक खाधिमे जएबासँ बचयबाक प्रयास कहल जा सकैछ। “डीहक बँटवारा” शीर्षक कथामे गुरूकाका गामक प्रसंग जे विचार रखलनि अछि से द्रष्टव्य अछि- “गाम तँ गामे छी। शुद्ध मिथिला। भारत। जे स्वर्गीसँ नीक अछि। मुदा सभ गामक अपन-अपन चरित्र आ प्रतिष्ठा छैक। जे चरित्र आ प्रतिष्ठा गामक कर्मठ, तियागी लोकनि बनौने छथि। अपन कठिन मेहनति आ कर्तव्यसँ सजौने छथि। ओकरा जीवित राखब तँ अखुनके लोकक कान्हपर भार अछि की ने?..... ई तँ निह जे गदहा गेल स्वर्ग तँ छान-पगहा लगले गेलै।” निट्ठठ गाममे इर्ष्या-द्वेष कम सिनेह भैयारी-यारी अधिक रहैत अछि। जतऽ अपन जन्मलि बेटी अपने धिया-पुतामे व्यस्त रहि माएक मृत्यु शय्यापर सुनि कऽ देखबाले सेवा करबाले नै आबि पाबैत अछि ओतहि विजातीय-नैहरक दूरक आन आन धर्मक “बहीन” ने केवल देखबा लेल आबैत अछि प्रत्युत बहीनकेँ जीवित रहबा धरि सेवाक करबाक उद्दात भावनसँ अभिभूत “हिन्दु-मुस्लिम एकटा” क बीहनि गाममे कतेक अधिक गहीर अछि- ई सिद्ध करबा लेल पर्याप्त अछि। आ यएह थिके गामक जिनगीक कथाक मूल तत्व। कथाकार लेखक संपादक श्री गजेन्द्रठाकुरक अनुसार जगदीश प्रसाद मंडलक कथा मैथिली साहित्यक पुनर्जागरणक प्रमाण उपलब्ध करबैत अछि तथा हिनक कथा मैथिली कथा धराकेँ एक भगाह होएबासँ बचा लैत अछि। उदाहरणमे ओ मात्र हिनक एक कथा बिसाँढ़केँ उपस्थापित करैत कहैत छथि जे १९६७ईं.क अकालमे देखाओल गेल छल जे मुसहर लोक बिसाँढ़ खा कऽ अकालसँ लड़ि रहल छथि मुदा ऐपर कथा लिखल गेल २००९ई.मे जगदीश प्रसाद मंडलजी द्वारा। हम “गामक जिनगी” कथा संग्रहक आधारपर ई कहए चाहब जे जहिना हिन्दीमे गाम्यांचलक कथाकारमे प्रेमचन्द असगरे छलाह, तहिना मैथिली कथाक ऐ पुनर्जागरण कालमे, मैथिली साहित्यमे जगदीश प्रसाद मंडल जीक कथा असगरे अछि- तोहर सरिस एक तोहे माधव! चर्चित पाेथी- गामक जिनगी प्रकाशन वर्ष- २००९ लेखक- श्री जगदीश प्रसाद मंडल प्रकाशक- श्रुति प्रकाशन पृष्ठ- १७६ मूल्य- २०० टाका मात्र मैथिल पत्र-पत्रिका : समस्या ओ समाधान : आचार्य दिव्यचक्षु “देशक स्वतंत्रताक 62-63 वर्षक बादो मैथिलीक माध्यमे प्राथमिक शिक्षाक व्यवस्था नै रहबाक कारणे मैथिली भाषा-भाषी अपन मातृभाषाक पत्र-पत्रिकासँ नै जुड़ि पबैत छथि, मैथिली पत्र-पत्रिका आ पुस्तक नै पढ़ि सकैत छथि। तँए यत्र-कुत्र मैथिली पत्र-पत्रिका देखियो कऽ ने तँ ओ कीबा लेल उत्सुक होइत छथि आने पढ़बा लेल। ई मैथिली पत्र-पत्रिका प्रकाशन सभसँ प्रमुख समस्या अछि।” ई विचार प्रो. शिवाकान्त पाठक गत 2अगस्तकेँ 'दूरदर्शन'क मुजफ्फरपुर केन्द्रसँ प्रसारित मैथिली दैनिक समाचार पत्र-पत्रिका : समस्या ओ समाधान' विषएपर आयोजित कएटा परिचर्यामे व्यक्त कएलनि। कार्यक्रमक संचालन करैत साहित्यकार श्री रमाकान्त राय 'रमा' कहलनि जे यावत् मैथिली पत्र-पत्रिकाकेँ व्यवसायिक दृष्टिकोणसँ सम्पादन, व्यवस्थापन, वितरण आ संयोजनक फराक-फराक कऽ एेपर एक समान ध्यान नै देल जाएत तावत् मैथिली पत्र-पत्रिका दीर्घायु नै भऽ सकैछ। वर्तमान समएमे प्रकाशित पूर्वोत्तर मैथिली, मिथिला दर्शन, मिथिला दर्पण आदि पत्र-पत्रिकाक चर्च करैत कहलनि जे ऐ सभ पत्रिकाक रचना, विज्ञापन आ वितरणक नीक समन्वय रहैत अछि जे नीक संयोजन-व्यवस्थापनक कारणे भऽ पबैत अछि आ पत्रिका दीर्घजीवी ऐछ आ रहत से विश्वास कएल जा सकैत अछि। मुजफ्फरपुर दूरदर्शन केन्द्र'क 'सृजन' कार्यक्रममे आयोजित ऐ मैथिली परिचार्यमे प्रो. शिवाकान्त पाठक, डॉ. नरेश कुमार 'विकल' आ डा. नारायण प्रतिभागी छलाह। कार्यक्रमक संचालन श्री रमाकान्त राय 'रमा' कऽ रहल छलाह। डॉ. नरेश कुमार 'विकल' मैैथिली पत्र-पत्रिकाक त्रुटिपूर्ण वितरण व्यवस्था आ ओकर आर्थिक आधारकेँ सुदृढ़ करबापर जोर दैत कहलनि जे यावत् मिथिलाक लक्ष्मीवान नीक पंूजी लगा कऽ सम्पूर्ण मिथिलांचलमे साइकिलपर घूमि-घूमि कऽ अखबार बेचनिहार भेंडरक साइकिलपर नै टहलौताह तावत् मैथिली पत्र-पत्रिकाकेँ अल्पायुए होएबाक सम्भावना अछि। आधा घंटाक ऐ परिचर्याक प्रस्तुति सहायक छलाह 'सृजन' कार्यक्रमक प्रभारी अधिकारी श्री मुकेश कुमार। परिचर्यामे अपन महत्वपूर्ण सहभागिता देखबैत डा. नारायण झा ई स्पष्ट कएलनि जे विज्ञापन आ वितरण ऐ दुनूमे अन्योन्याश्रय सम्बन्ध ऐछ। जँ मैथिली भाषा-भाषी अधिकाधिक समाचार पत्र कीनताह पढ़ताह तँ लोक अपन सामग्रीक प्रचार-प्रसार हेतु आखबामे विज्ञापन देबे करताह। आ जँ पत्र-पत्रिकाकेँ विज्ञापन भेटतैक तँ ओकर आधार अवश्य मजगूत होएतैक, जे ओकर दीर्घायु आधार होएतैक। नारायण बाबू एकटा आर महत्वपूर्ण गप्प कहलनि जे पाठकक रूचिक पाठ्य-सामग्री एवं रोचक-प्रेरक समाचारक संकलन िनश्चय समाचार पत्र आ पत्रिकाकेँ लोक प्रिय बनेबाक सामर्थ्य रखैत ऐछ। एे क्रममे डॉ. विकल जोड़लनि- “समसामयिक परिवेशकेँ प्रश्रय देब एवं नव लोकक लेखन-सम्पादनसँ जोड़ब सेहो मैथिली पत्र-पत्रिकाकेँ गतिशील बनाओत। शिवाकान्त बाबू पूर्वमे प्रकाशित अपन पत्रिका 'वागमतीक' अनुभवक आधारपर कहलनि जे हम जतेक दिन मासिक 'वागमती' पत्रिका सम्पादित प्रकाशित कएलहुँ हमरा ओहिसँ आर्थिक हािन नै भेल। मुदा वितरण व्यवस्थाक त्रुटि ओहो स्वीकार कएलनि। नारायण आ पत्रिका सभक फराक-फराक वर्तनीकेँ मैथिली भाषाक लेल घातक बतौलनि। वर्तनीक एकरूपता सम्पादक एवं भाषा विशेषज्ञकेँ ध्यान देबाक आह्वान कएलनि। रमाकान्त राय 'रमा' चारि बेर तीन ठामसँ तीनटा मैथिली दैनिक पत्राचार पत्रक प्रकाशन करैत जोड़लनि जे स्वदेश, मिथिला मिहिर आ मिथिला समादमे एखन मात्र एकटा दैनिक मिथिला समाद प्रकाशन चारि कोटि लोक दैनिक ऐछ। जे मैथिली भाषाक पाठकक दारिद्रय द्योतक ऐछ। परिचर्याक समापन करैत संचालक श्री रमाकान्त राय 'रमा' सभ प्रतिभागीकेँ हुनक पहत्वपूर्ण एवं मौखिक विचारक अभिव्यक्ति लेल धन्यवाद दैत कहलनि जे समग्रत: कहल जा सकैत अछि जे मैथिली माध्यमे प्राथमिक शिक्षा, सुदृढ़ आर्थिक आधार, समसामयिक प्रभावेत्पादक रचना, रोचक-प्रेरक समाचार, मानक मैथिली भाषाक वर्तन, विज्ञानपन जुटयबाक सर्थक प्रयास, सम्पादन, वितरण एवं व्यवस्था- पनक फराक-फराक नीक व्यवस्था इत्यादि प्रमुख बिन्दुपर जँ ध्यान देल जाय तँ मैथिली दैनिक समाचार पत्र ओ पत्रिका सभ निश्चित रूपसँ दीर्घायु होएत आ पाठक गणक संतुष्टक मिथिलाक जन-जन धरि पहुँचत। नव गीतक पुरोधा : महाकवि प्रवासी महाकवि मार्कण्डेय प्रवासी (01-07-1942—13-06-2010) पछिला शताब्दीक सातम दशकक प्राय: दोसर-तेसर वर्षसँ साहित्य जगतमे प्रवेश कएलनि। पहिने ओ राष्ट्रभाषा हिन्दीमे लिखैत छलाह। वादमे मातृभाषा मैथिली दिस उन्मुख भेलाह। हुनक प्रकाशित पहिल काव्य ग्रंथ ‘शंखध्वनि’ हिन्दीए कविताक संकलन अछि। जखन ओ आजीविका हेतु पटनासँ प्रकाशित सुप्रतिष्ठित दैनिक पत्र ‘आर्यावर्त’मे उपसंपादकक रूपमे सुव्यवस्थित भऽ गेलाह, तखन हुनक लेखनमे गत्वरता आ प्रौढ़ता आएल। स्फुट रचनाक अतिरिक्त ओ मैथिली अकादेमी, द्वारा देल गेल अनुबंधक अनुरूप अत्यल्प अवधिमे ‘अगस्त्यायनी’ महाकाव्य लिखि अपन अप्रतिम-प्रतिभाक प्रदर्शन कएने छलाह। महाकाव्यक लेखन लेल प्रौढ़ावस्था आ अधिक समएक अपेक्षा होइत छैक, जखन लोक जीवन उतार-चढ़ाव, हानि-लाभ, अिहत-हित, शभु-मित्र इत्यादिक संग-संग दुनियादारीक सभटा अनुभव प्राप्त कऽ चुकल रहैत अछि। मुदा प्रवासी जी मात्र 36-37क अल्प वएसमे ‘अगस्त्यायनी’ लिखि कऽ एकटा नव मान दण्ड स्थापित कएलनि जे एखन धरि विरले कोनो भाषामे भेल होएत! कालान्तरमे ई महाकाव्य भारतक राष्ट्रीय साहित्यिक संस्था साहित्य अकादेमी, नई दिल्लीसँ 1981ई.मे पुरस्कृत भेल। एहूठाम हिनक संग एकटा अजगूत भेल। साहित्य अकादेमी द्वारा बाइसटा भारतीय भाषाक सर्वश्रेष्ठ रचनाकेँ पुरस्कृत कएल जाइत अछि। सन् 1981ई.धरि अकादेमीक इतिहासमे प्रवासीजी पहिल पुरस्कृत साहित्यकार छलाह जे मात्र 39वर्षक अवस्थामे ई सम्मान प्राप्त कएने छलाह। प्रवासी जीमे अप्रतिम प्रतिभा छलनि। ओ गद्य, पद्य, कथा एवं निबंध सभ विधापर अपन लेखनीक तीर चलौलनि आ लक्ष्य बेधि कऽ लोककेँ चमत्कृत करैत रहलाह। ओ अभियान शीर्षक उपन्यास लिखलनि जे धारावाहिक रूपेँ साप्ताहिक ‘मिथिला मिहिर’मे छपलनि। एहि उपन्यासमे वर्तमान कालक देश आ राज्यक ज्वलंच समस्या भ्रष्टाचारकेँ जाहि कुशलताक संग उठा कऽ ओकर सर्वमान्य समाधान कएलनि अछि ओ उल्लेखनीय तँ अछिए, क्षण-प्रतिक्षण बदलैत परिवेशमे एहि प्रकारक रचनाक महत्व सेहो असंदिग्ध रूपेँ सिद्ध कएलनि। ‘हम कालिदास’ हुनक उत्तम पुरूषमे लिखल एकटा महत्वपूर्ण उपन्यास अछि इहो उपन्यास धारावाहिक रूपेँ ‘मिथिला मिहिर’मे छपल छलनि। एकटा महाकवि अपन अतिवृद्ध अग्रजक मन: स्थितिक नीक जकाँ अङेजि कऽ ओकर शब्दमे बान्हि जे मूर्तरूप देने छथि से तँ अछिए, मुदा एहि मध्यक समए-साल, स्थिति-परिस्थिति, शासन-प्रशासन, प्रकृति-पुरूष, रीति-रेवाज आदिक जे एकटा पैघ अंतराल प्रवासीजी आ कालिदासक मध्य रहल अछि, एकरा ओ जाहि मनोयोगसँ सूक्ष्मसँ अतिसूक्ष्म अनुभूतिक माध्यमे अभिव्यक्त कएने छथि जे लोककेँ दुनू महाकविक मध्य एहन कोनो अंतराल दृष्ट्रिगोचर नहि भऽ पबैछ। ओ दैनिक ‘आर्यावर्त’मे बहुत दिन धरि ‘चुटकुलानन्दजी की चिट्ठी’ आलेखमाला लिखलनि जे अत्यन्त लोक प्रिय होइत छल। हास्य-व्यंग्य प्रधान एहि आलेखक मध्यसँ ओ देश-विदेशक विभिन्न समस्यापर जे प्रहार करैत छलाह से पाठकक मोन-प्राणकेँ आह्लादित कऽ दैत छल। महाकवि मार्कण्डेय प्रवासीक अन्तिम प्रकाशित पुस्तक थिक- ‘हम भेँटब’ एकर प्रकाशन आइसँ 5-6वर्ष पूर्व 2004ई.मे भेल छल ‘अगस्त्यायनी’ आ एहि काव्य पोथीक प्रकाशन मध्य प्राय: 20-22वर्षक अवधिमे प्रवासीजी प्रणीत प्रमुख गीतमे ‘अगस्त्यायनी’ जकाँ जीवन अनुभूव सत्यक नीक जकाँ आरेखन भेल अछि। आ किएेक ने होऊक? प्रवासीजीक सन्यासी मन अपन रचना सभकेँ एकठाम लिपिबद्ध करब तथा उतारि कऽ सुरक्षित रखब सेहो छोड़ि देलक आ एकटा कठिन प्रयोग करैत रहल जे हमर कृति अपन सामर्थ्यक बलपर जीबैछ की अकाल मृत्युक शिकार भऽ जाइछ। (हम भेटब : भूमिका पृ.7) कोनो नव कवि, कलाकार जड़ि पकड़बा, स्थापित होएबासँ किछु पूर्व इतस्तत: करैत छथि। प्रवासीजी सेहो एकर अपवाद नहि छलाह। ओ किछु दिन धरि ‘तदर्थवाद’क कविक रूपमे अपनाक स्थापित करबाक प्रयत्न अवश्य कएने छलाह, मुदा अंतत: ओ अपनाकेँ गीतकार, नव गीतकारक रूपमे सुस्थापित कएलनि- ‘मिथिलामे आइयो कविक अर्थे होइछ गीतकार।’ (तभैव) एतबे नहि, ओ तँ कहैत छथि- ‘गीतेटा भारतीय काव्यक मूल प्रवृत्ति अछि। गीतक साफ अर्थ होइछ गेय कविता। अर्थात् श्रुित स्मृति योग्य कविता किंवा ऋचा। (तभैव) महाकवि प्रवासी जीक अपन एकटा आर नव आ मौलिक मान्यता छलनि। जे अरबी-फारसी उर्दूक गजलपर विद्यापतिक गीतक स्पष्ट प्रभाव परिलक्षित होइत अछि। हुनक दृढ़ विश्वास छलनि जे ‘ओ दिन शीघ्रे अयबाक चाही जहि या कोनो विश्वविद्यालयक मैथिली विभाव अरबी-फारसी-उर्दूक गजल छन्दपर विद्यापतिक गीतक प्रभाव विषयपर शोधकार्य पी.एच.डी. अथवा डी.लिट् केर उपाधिहेतु कराओत। (तभैव) प्रवासीजी सतत गीत काव्यक उन्नयन-संवर्द्धन हेतु तत्पर रहलाह अछि। ओ अपन महाकाव्य ‘अगस्त्यायनी’मे सेहो गीतकाव्यक मर्यादा सतत रक्षा कएलनि अछि। प्रवासी जीक गीत सभमे जीवनक विभिन्न आयामक एकटा नव रूप, नव छवि-छटा भेटैत अछि। जतऽ फूलक रूप-लावण्य सम्पूर्ण दुनियाँकेँ मोहित -आकर्षित- एवं मदमत्त करैत अछि ओतहिं ओ काँटोक चुभनमे पुष्प सुरभिक अनुभव करैत छथि- ‘सभठाँ छै कांट, खजूरबन्ना छै सभठाँ। तैयो हो चान, कतहु बिलम आ बैसऽ। (तभैव) नामपर अहाँक, बसातो किछु ठमकै छल। फूल तँ, काॅटो किछु गमकै छल।। (तभैव) मार्कण्डेय प्रवासी माने एहन गीतकार जे आपाद मस्तकेँ नहि, आधरती-आकाश गीतकार छलाह। गीते हुनक चास-बास, घर-दुआरि दशा-दिशा, स्थिति-परिस्थिति सभ किछु छलनि। तेँ निर्धोख भऽ घोषणा कएने छथि- ‘गीते अछि बासभूमि, चास भूमि हमर। शेष किछु अछिए नहि, लाथ की करब।। (तभैव) एम्हर आबि कऽ हुनका सम्पूर्ण संसारसँ वितृष्णा भऽ गेल छलनि। पग-पगपर अविश्वास, स्वार्थलिप्सा, मिथ्या भाषण इत्यादिसँ ओ त्रस्त छलाह। हुनका बुझाइत छलनि जेना कूपेमे भांग घोरा गेल होइक, दुनियाँक सम्पूर्ण वातावरण प्रदूषित भऽ गेल होइक। एहने कुसमयकेँ अकानि ओ अपनाकेँ अपने धरि सीमित राखऽ चाहैत छथि। मुदा जे सभ दिन दीन-दुनियाँकेँ अपन गीत लहरीसँ आप्लावित करैत रहलाह ओ चुप कोना रहि सकैत छथि। तेँ कुंठित भऽ कहैत छथि-‘की बाजू।’ ‘सौंसे गाम बताह लगैए की बाजू। ओझा-बैद कटाह लगैए की बाजू।। भऽ रहलैए अछि कदाचार सगरो बिजयी- हरल सन उत्साह लगैए की बाजू।। (तभैव) मुदा हुनकामे अदम्य जिजीविषा छलनि। हुनका अपन आत्मबल आ पौरूषपर दृढ़ विश्वास छलनि। हुनका दृढ़ आस्था छलनि अपन कर्मपर आ तेँ आत्म घट लबालब अमृतसँ भरल बुझाइत छलनि। आ तेँ ओ मृत्युओकेँ टिटकारी दैत खहेरि दैत छथि- ‘प्राण घटमे अछि अमृत रस शेष- मृत्यु। दूर-सुदूर रहिहेँ रे।। (तभैव) मुदा हा, हन्त! हन्त।। क्रुर काल हुनका आत्मविश्वासकेँ धोखा देलकनि। हुनक नियारल कर्म-धर्मक चास पूर्ण नहि होमऽ देलकनि।। 13मई 2010केँ ओ अकालहिंमे कालकवलित भऽ गेलाह।। मुदा नहि, नहि! ओ तँ स्वयं कहि गेल छथि- हम भेटब! मुदा ओ कतऽ भेटताह से के कहत? जे आजीवन प्रवासी रहलाह, हुनक पता ठेकान कोना ज्ञात होएत? आन के कहि सकैत अछि हुनका भेटबाक स्थान? तेँ ने ईसा मसीह जकाँ ओ पहिनहि टीपि गेल छथि- ‘हम भेटब तिलकोर जकाँ चतरल साहित्यक टाटपर! जे जिनगी भरि साहित्यक चास-बासकेँ तामैत-कोरैत रहलाह, अपन शोनितसँ गीतक फसिलकेँ पटबैत रहलाह, ओ आन ठाम कतऽ भेटताह।। ओ वर थोड़ शब्दमे अंतहीन व्यथाक अभिव्यक्ति दैत कहैत छथि- ‘जहिया-जहिया हृदयहीनता। खटकत मोलक बातपर।। हम भेटब इतिहास नदी केर- चिक्कन चुनमुन घाटपर।।’ महाकवि मार्कण्डेय प्रवासी आइ ‘इतिहास’ भऽ गेल छथि। तेँ ओ आब ओ नदी केर चिक्कन-चुनमुन घाटपर’क वासी छथि।। सादर श्रद्धाँजलि!! पोथी समीक्षा- प्रगतिशील एवं सनातन विचारधाराक समन्वयात्मक उपन्यास ‘मौलाइल गाछक फूल’ श्री जगदीश प्रसाद मंडलक सघ: प्रकाशित उपन्यास थिकनि जकर विमोचन ०३ अप्रैल २०१०केँ जनकपुरधाम (नेपाल)मे आयोजित ‘सगर राति दीप जरय’ कथा गोष्ठीक अवसरपर भेल छल। एहिमे प्रगतिशील जनवादी आ पौराणिक सनातनी विचारधाराक समन्वयक परिपाक नीक जकाँ वर्णन भेल अछि। जगदीश प्रसाद मंडलजी मैथिली साहित्यक लेल नव नहि रहलाह १.७.८ वर्षक रचना धर्मिता आ मात्र दू-तीन बर्षक प्रकाशन प्रसारसँ ई मैथिली जगतमे अपन एकटा नीक स्थान बना लेलनि। आे अस्थान सेहो आन-आन लेखकसँ फराक आ बेछप अछि। ओना साहित्यमे हिनक प्रवेश राजनीति पटलसँ भेल अछि। “पैंतीस साल समाज सेवा कऽ हहरैत शरीर देखि किछु लिखै-पढैक विचार भेल।” (भूमिका।) ओ अपन पहिल कथा ‘सगर राति दीप जरय’ कथा गोष्ठीमे पढ़ि प्रशंसा प्राप्त कएलनि। लिखवाक लति बढ़लनि आ ओ अनवरत लिखय लगलाह- कथा, उपन्यास, नाटक। जे लिखवाक रूचि भेलनि-दिल खोलि कऽ लिखलाह। प्रकाशनक कोनो चिंता नहि। ओ मैथिली साहित्यक प्रकाशनक रूढ़ प्रक्रिया दिस कहियो नहि सोचलनि आ रचना धर्मितासँ विमुख नहि भेलाह हुनका अपन रचनापर पूर्ण आस्था आ विश्वास छलनि। मधुबनी कथा गोष्ठीमे पठित हिनक कथा ‘बिसांढ़’ घर बाहरमे आ दोसर कथा ‘चूनवाली’ सन् २००९ उतरार्द्धमे ‘मिथिला दर्शन’मे छपल। एहि दुनू रचनाक कथानक, लिखबाक शैली ओहिमे व्यक्त विचारधारासँ लोक वेश प्रभावित भेल। लेखनमे नव रहितहुँ अनुभूतिक अभिव्यक्ति कौशलसँ लबालब भरल हिनक रचना सभ मिथिलांचलक आम जीवनकेँ नीक जकाँ प्रतिविम्बित करैत अछि जे पाठककेँ चुम्बक जकाँ अपना दिस आकृष्ट कऽ लैत अछि। मैिथलीक युवा लेखक एवं विदेह पत्रिकाक संपादक श्री गजेन्द्र ठाकुर मानैत छथि जे ‘जगदीश प्रसाद मंडल शिल्पी छथि, कथ्यकेँ तेना समेट लैत छथि जे पाठक विस्मित रहि जाइत अछि। समाजक सभ वर्ग हिनक कथ्यमे भेटैत अछि आ से आ से आलकारिक रूपमे नहि वरण् अनायास, जे मैथिली साहित्य लेल एकटा हिलकोर अएवाक समान अछि।’ यएह कारण अछि जे हिनक सात-आठटा पुस्तकक प्रकाशन दुइये कथा प्रकाशनक वाद दिल्लीक प्रतिष्ठत प्रकाशक ‘श्रुति प्रकाशन द्वारा वर्षाभ्यन्तरे भेल अछि। एहन मैथिली लेखक विरले छथि जे मात्र अपन लेखन क्षमताक बलपर कोनो प्रकाशककेँ एतेक अत्यल्प अवधिमे आकृष्ट कऽ अपन प्रारम्भिक रचनोक प्रकाशनक मार्ग प्रशस्त कएने होथि! ‘मौलाइल गाछक फूल’क कथानक तँ सोझ अछि। रमाकान्त गामक एकटा पैघ भूस्वामी प्राय: दू सए बीघाक भूमिक मािलक छथि। ओ कम पढ़ल-लिखल रहलाक वादो परोपकारक भावना, गाम-समाजक हितक चिंतासँ सदति चिंतित रहैत छलाह। घोर अकालमे अन्न बिन हकन्न कनैत लोक लेल ने केबल स्वयं अपन पोखरि उराहबाक काजसँ जन-गणक मन मोहि लैत छथि प्रत्युत, अड़ोसियो-पड़ोसियो गाममे श्री सम्पन सभकेँ एहन-काज करवा लेल उत्प्रेरितो करैत छथि। अपन विद्वान पिता द्वारा सम्पति आ हुनकेसँ प्राप्त ज्ञानक कारणे कालान्तरमे ओ अपन सभटा भूमि समाजक सभ वर्गक दीन-हीन लोकमे बॉटि कऽ स्वयं चैनक वंशी बजबैत छथि। हुनका अपन भरण पोषणक कनियो चिंता नहि छनि। किएक तँ हुनक दू-दूटा पुत्र मद्रासमे डाक्टरी पढ़ि ओहिठाम सरकारी सेवामे छनि। ओ दुनू अपन मनोनकूल मेहनतिसँ अर्जित कऽ नीक घर-द्वारि बना ओतहि रहैत छथि। ओ सभ यदा-कदा गाम आबि माता-पिता आ गामक लोकसँ भेँट-घाँट कऽ जाइत अछि। गाममे दूटा बस्तुक अभाव छैक- पहिल उच्च शिक्षा लेल विद्यालय आ दाेसर दुखित-पीड़ितक लेल चिकित्सालय। रमाकान्त सहयोगे पहिने एकटा पुरूष आ एकटा महिला प्राथमिक चिकित्साक ट्रेनिंग मद्राससँ कऽ अबैत छथि। पछाति जमीन्दारक डाक्टर पुत्र आ पुत्रवधू जखन गाम अबैत छथि तँ पिता आ समाजक समझौता बुझौला तथा परोपकार एवं जनसेवाक भावनासँ प्रेरित भऽ चारिम डाक्टरमे सँ एक एकटाकेँ क्रमश: गाममे रहि लोकक सेवा करबा लेल तैयार भऽ जाइत छथि आ गाममे चिकित्सा आरम्भ कऽ दैत छथि। एहिसँ मात्र ओहि गामक लोककेँ नहि प्रत्युत लग-पासक आनो-आन गामक मौलाइल गाछ, रोग व्याधि ग्रस्त लोक सभमे चिकित्सा सुविधा रूपी नव जीवनक फूल बिहँसि उठैत अछि। उपन्यास आ लघुकथाक कथानकमे अन्तर होइछ। कथा जीवनक कछु दिन, किछु क्षणक उतार-चढ़ाव, स्थिति-परिस्थितिक वर्णन होइत अछि, मुदा उपन्यासमे जीवनक प्राय: सम्पूर्ण नहि तँ अधिकसँ अधिक घटना, दुर्धटनाक आरोह-अवरोहक महत्वपूर्ण रोडपर रोकैत, विश्राम करैत, थाकैत, खसैत, पड़ैत, उठैत स्थिति निरपेक्ष लेखन अछि। कथाकेँ जलखैक भूजा किवां सातु मानल जाए तँ उपन्यासक विन्यास पूर्णत: भोजन अछि। ई उपन्यास आदर्श जनवादी धरातलपर ठाढ़ अछि। एहिठाम जनवादमे जे अादर्शक समन्वय भेल अछि, से प्रशस्त सनातन परम्परामे सेहो विधमान अछि। जेना एहि उपन्यासमे कएल गेल एकटा महत्वपूर्ण कार्य अछि परोपकार। महर्षि व्यास परोपकारकेँ पुण्यक एकमात्र कार्य मानैत छथि- “अष्ट्ादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्।’ परोपकार: पुण्याय पापाय पर पीड़नम्।।” दोसर शब्दमे हम कहि सकैत छी जे उपन्यासकार मार्क्सवादसँ नीक जकाँ प्रभावित छथि मुदा अपन सनातन परम्परा, धर्म-कर्म आ आचार-विचारक प्रति सेहो विशेष सहानुभूति रखैत छथि। एकरा देश-काल आ परिवेश प्रभाव सेहो कहल जा सकैछ। उपन्यासक भाषा ठेठ ग्रामीण भाषा अछि जे मधुबनी जिलाक पूर्वाचलमे बाजल जाइत अछि। हमरा उपन्यासक ई आंचलिक भाषा प्रभावित अवश्य करैत अछि मुदा कतहु-कतहु आंचलिकता आकि बोल-चालक भाषा मानक मैथिली भाषाकेँ काटैत जकाँ लगैत अछि किएक तँ एहिमे हमरा क्रिया पदक आपूर्ण प्रयोग जकाँ बुझाइत अछि। जेना- किछु फुरबे ने करैत।(पृ.५), बखारिक धान आ मड़ुआक हिसाब मिलबैत।, मुसनाक बोली साफ-साफ निकलबे ने करैत। एहिठाम एहि तीनू वाक्यक क्रिया पद अपूर्ण लगैत अछि। हमरा जनैत मानक मैथिलीमे क्रमश: किछु फुरबे करैक/करैत छलैक।, हिसाब मिलबैत छलाह आ निलकबे ने करैक/करैत छलैक एहि प्रकारे होएत। एहन क्रियापदक प्रयोग प्राय: सभ पृष्टपर अछि जाहिसँ हमरा बुझि पड़ैछ जे ई ओहि ग्राम्यांचलक विशेष प्रयोग होइक जकरा अंगीकार करब, लेखककेँ समुिचत बुझयलनि। कारण कोसे-कोसे पानी आ पॉच कोसपर वाणी तँ सुप्रसिद्धे अछि। मूल कथामे अनेक छोट-छोट उपकथा, सह कथा कथानककेँ अत्यधिक रोचक बनबैत अछि। तहिना कतेको ठाम लेखक अपन विचारक वीथी विभिन्न पात्रक मुखसँ कहबौने छथि जे नीक सूक्ति की सदुक्ति बनि कऽ पुस्तकसँ फराको रहि लोककेँ प्रेरणा दैत रहत। जेना- (क) जनकक राज मिथिला थिकैक तेँ मिथिलावासीकेँ जनकक कएल रस्ता पकड़ि कऽ चलक चाही। (ख) मनुखमे जन्म लेलापर क्यो माए-बापक सेवा नहि करै तँ ओ मनुखे की? (ग) मनुखकेँ कखनो निरास नहि हेबाक चािहएेक, जखने मनुखमे निराशा अबैत छैक तखने मृत्यु लग चल अबै छैक। तेँ सदिखन आशावान भऽ जिनगी वितेबाक चाहिएेक। कठिनसँ कठिन समए किएक ने आबए मुदा विवेकक सहारा लऽ आगु डेग बढ़ेबाक चाहिऐक। समग्रत: मौलाइल गाछक फूल ‘मार्क्सवादी विचारधारा आ भारतीय सनातन विचारधाराक समन्वयवादी एकटा एहन मौलिक कृति अछि जकरा मैथिली भाषाक पाठक पढ़वाक लेल सदति उत्सुक रहताह- ई हमर दृढ़ विश्वास अछि। चर्चित पोथी- मौलाइल गाछक फूल (उपन्यास) लेखक- श्री जगदीश प्रसाद मंडल प्रकाशक- श्रुति प्रकाशन, न्यू राजेन्द्र नगर दिल्ली-११००८ दाम- २५० टाका मात्र पृष्ठ संख्या- १२८ पोथी प्राप्तिक स्थान- पल्ल्वी डिस्ट्रीब्यूटर्स वार्ड नं.६, निर्मली (सुपौल) मोवाइल नं. ०९५७२४५०४०५ देवशंकर नवीन लघुकथा लेखनमे अवरोधक तत्व लघुकथा साहित्य-पदार्थक एहन परमाणु अछि, जाहिमे ओकर सभटा भौतिक आ रासायनिक गुण उपस्थित रहैत छै, आ परमाण्विक स्थितिमे ओकर रासायनिक प्रभाव तीक्ष्णतर भऽ जाइत छै। लघुकथा जादूक एहन औँठी अछि जे पाठकक मानस-पटलसँ टक्कर लैत देरी ओकर निश्चेष्ट मानसिकताकेँ क्रियाशील कऽ दैत अछि, भोथर सम्वेदनाकेँ सक्रिय बना दैत अछि। लघुकथा चरित्र-चित्रण, कथोपकथन, कथानक सन पूर्णाहारक बदलामे विटामिनक गोली अछि, जे सम्पूर्ण ऊर्जासँ युक्त होइत अछि। वास्तविकतामे शब्द स्वयं महत्वपूर्ण नै होइत अछि, महत्वपूर्ण अछि ओकर प्रयोग-प्रक्रिया। प्रयोगक आधारपर शब्द अपन अर्थ-ग्रहण करैत अछि। लघुकथा मूल रूपसँ व्यंग्य ध्वनित करैत अछि। अस्तु एकर वाक्यमे शब्दक प्रतीकात्मक प्रयोग विशिष्ट अस्मिता रखैत अछि। एहि अर्थमे एहिमे शब्द-विधान अहम् भऽ जाइत अछि, मुदा तकर कोनो मानक सीमा नै छै। रचनाकारक शब्द-विधाने एकर मानक सीमा अछि। ताहि द्वारे हम कहि सकै छी जे लघुकथा, कथाक अपेक्षा कवितासँ बेसी लग अछि। आकारमे लघु भेलाक बादो एकर व्यंजना विराट होइत अछि। गानल-गूथल शब्दमे जीवनक सभटा विद्रूपताक एहन प्रस्तुति लघुकथा अछि जकर रंग शीसापर सेहो जमल बिना नै रहि सकैत अछि। व्याकरण जौँ भाषा आ साहित्यक आचार-संहिता अछि, तँ लघुकथाक आचार-संहिता खाली ‘शब्द’ अछि। शब्दक सहयोगसँ रचल जीवनक विद्रूपताक प्रतीक चित्र, सएह लघुकथा अछि। लघुकथामे मूल रूपसँ ‘कथ्य’ आ ‘शब्द’ क बड़ महत्ता होइत अछि। एकर संहितामे भाषा-विधान लेल कोनो विशेष स्थान सुरक्षित नै छै। शास्त्र-पुराणादिमे एकर उत्स स्पष्ट देखाइत अछि मुदा तकर बादो लघुकथाक वर्तमान तेवर, विशुद्ध रूपसँ आधुनिक सभ्यता-संस्कृति आ बदलैत साहित्यिक प्रतिमानक प्रतिफल अछि। ओना तँ स्रोत ताकी तँ विष्णु शर्मा विरचित पंचतन्त्र वा फेर गुणाढ्यक बड्डकहा आकि आर पाछू जाइ तँ वेदमे वर्णित उपदेशपरक उपकथामे एकर सूत्र बड्ड सरलतासँ भेटैत अछि। काव्य-विषयक प्राचीनतम विधानमे एकरा लेल अलगसँ कोनो स्थान नै राखल गेल छल। ताहि कारणसँ ओहि सभ पारम्पारिक काव्य निकषपर एकर परीक्षण नै भऽ सकैत अछि, एकरा लेल नव समीक्षा शास्त्रक निर्माण अपेक्षित अछि। लघुकथा-लेखन एकटा खतरनाक वृत्ति अछि। ‘सतर्कता गेल आ दुर्घटना भेल’ क फार्मूला एहिपर पूर्णतः लागू होइत अछि। दुर्घटना माने असफलता आकि उत्थरपना। एकर बाद संयोजनमे सेहो पर्याप्त कलात्मकताक आवश्यकता होइत अछि। एहि कलात्मकताक कमजोरीसँ एकर प्रभावोत्पादकता चल जाइत अछि आ फेर लघुकथा अपन मूल उद्देश्यसँ भटकि जाइत अछि। लघुकथा-लेखनकेँ बहुत रास लोक द्वारा सिनेमामे आओल फैशनक रूपमे अपनाओल गेल अछि। औकाति होअए वा नै, जे ई युगक फैशन भऽ गेल अछि से लोक हास्य-कणिका लिखि कऽ सेहो ओकरा लघुकथा कहि दै छथि। आ से एहि अत्याधुनिक मुदा खतरनापूर्ण विधा लेल बड्ड मोश्किलक गप अछि। एकरासँ बचबाक बड्ड जरूरति अछि। लिखबाक कला नै होअए तँ ई काज नै करबाक चाही। नकलची लेखकसँ लघुकथाकेँ भयंकर नोकसान ई भेल जे ढेर रास लोक आइ हास्य-कणिका आ लुघकथामे अन्तर नै कऽ पबैत छथि। एत्ते धरि जे बहुत रास पाठक सेहो एहने सन मनःस्थिति बना लेने छथि, से लघुकथाक स्वर किछु रूपमे भटकि-सन गेल अछि। तैयो बहुत-रास नीक-नीक लघुकथा आबि रहल अछि। साओनक बेंग सन टर्रा कऽ बिलाइत लोकक संख्या कोनो विधामे कखनो कम नै रहल, से जौँ लघुकथा-लेखनमे सेहो एहने भऽ रहल अछि तँ कोनो आश्चर्य नै। नीक लघुकथाक पाठकीयता आ सम्प्रेषणीयता समएक संग गहींर होइत जाएत। साहित्यक कोनो अंशक मान्यता आ स्थापना ओकर ‘प्रकाशन’ आ ‘समीक्षा’ पर निर्भर अछि। लघुकथाक प्रकाशन तँ क्रमसँ खूब भऽ रहल अछि, मुदा एहिपर आलोचनाक साहित्यक अत्यन्त अभाव अछि। ओना तँ किछु साहित्यिक ठेकेदार एहिपर आलोचनाक कऽ अत्याचार सेहो केने छथि। एहन आलोचना लघुकथाक विस्तार लेल स्वास्थ्यकर नै अछि। मिला-जुला कऽ लघुकथाक सम्भावना, स्वरूप आ विस्तारसँ आश्वस्त भेल जा सकैत अछि। ई विधा क्रमसँ जड़ि धेने जा रहल अछि। बेंग सभक आ शौकिया आलोचकक संग एकर उपेक्षा सेहो आस्ते-आस्ते मेटाइत जाएत। निश्चयेन एहिपर नीक-नीक आलोचना सेहो लिखल जाएत। लघुकथा लेखन बीजगणितक हिसाब नै अछि जे हल कएल एकटा उदाहरण देखि कऽ दोसर सवाल बनि जाएत। अदद्दी पेनकें मजगुत करबाक आवश्यकता मिथिलाक सांस्कृतिक विरासत तकैत दूर धरि नजरि जाइत अछि, सबसँ पहिने देखाइत अछि जे उच्च शिक्षा प्राप्त करबाक, गम्भीर चिन्तन-मनन करबाक, छोट-सँ-छोट बात पर पर्याप्त विचार-विमर्श करैत निर्णय लेबाक प्रथा मिथिलामे पुरातन कालसँ अबैत रहैत रहल अछि। मुदा तकर अतिरिक्त ÷परसुख देबामे परमसुख'क आनन्द लेबाक आ जीवनक हरेक आचार एवं आचरणमे लयाश्रित रहबाक अभ्यास मैथिल जनकें निकेनाँ रहलनि अछि। स्वयं कष्ट सहिओ क', अपन सब किछु गमाइओ क', दोसरकें अधिकसँ अधिक प्रसन्नता देबाक आदति मिथिलामे बड़ पुरान अछि। प्रायः इएह कारण थिक जे अतिथि सत्कारमे मिथिलाक लोक अपना घरक थाड़ी-लोटा धरि बन्हकी राखि देलनि। दोसरकें सम्मान देबामे मैथिल नागरिक बढ़ि-चढ़ि कए आगू रहल अछि। भनसियाक काज कर'बला व्यक्तिकें महराज अथवा महराजिन, केस-नह-दाढ़ी-मोंछ साफ कर'बला व्यक्तिकें ठाकुर-ठकुराइन, घर-आँगनमे नौरी-बहिकिरनी आ सोइरी घ'रमे परसौतीक काज करबाब'वाली स्त्राीकें दाय कहि क' सम्बोधित करबाक प्रथा मिथिलामे एहने धारणासँ रहल होएत। ध्यान देबाक थिक जे मिथिलामे दादीकें, जेठ बहिनकें आ घ'रक अत्यधिक दुलारि बेटीकें दाय कहबाक परम्परा अछि। अध्ययन, चिन्तन, मननक प्रथा मिथिलामे बड़ पुरान अछि। मुदा ई सत्य थिक जे अशिक्षेक कारणें मिथिला एतेक पछुआएलो रहल। गनल गूथल जे व्यक्ति अध्ययनशील भेलाह, से अत्यधिक पढ़लनि, जे नहि पढ़ि सकल, से अपन रोजी-रोटीमे लागल रहल। रोजी-रोटीक एक मात्रा आधार कृषि छल। विद्वान लोकनिक गम्भीर बहसमे बैसबाक अथवा ओहिमे हिस्सा लेबाक तर्कशक्ति, बोध-सामर्थ्य, आ पलखति रहै नहि छलनि, तें जे उपदेश देल जाइन, तकरा आर्ष वाक्य मानि अपन जीवन-यापनमे मैथिल लोकनि तल्लीन रहै छलाह। ईश भक्तिक प्रथा अहू कारणें मिथिलामे दृढ़ भेल। मानव सभ्यताक इतिहास कहै'ए जे प्रकृति-पूजन, नदी-पहाड़-भूमि-वृक्ष-पशु आदिक पूजन एहि करणें शुरुह भेल जे प्रारम्भिक कालमे जीवन-रक्षाक आधार इएह होइत छल। लोक अनुमान लगौलक जे सृष्टिक कारण, स्त्राी-पुरुषक जननांग थिक, तें ओ लिंग पूजा आ योनि-पूजा शुरुह केलक, जे बादमे शिवलिंग आ कामयोनि पूजाक रूपमे प्रचलित भेल। बादमे औजार पूजन होअए लागल।... तें पूजा पाठमे लीन हेबाक प्रथा पुरान अछि। मिथिलामे ओहि समस्त पूजन-पद्धतिक अनुपालन तँ होइते रहल; पितर पूजा, ग्रामदेव पूजा, ऋतु पूजा, फसल पूजा, कुलदेव-देवी पूजा आदिक प्रथा बढ़ल। हमरा जनैत विद्वान लोकनि द्वारा ईश भक्तिक उपदेश एहि लेल देल जाइत रहल हएत जे ईश भक्तिमे लागल लोक धर्म-भयसँ सदाचार अनुपालनमे लागल रहत, सद्वृत्तिमे लीन रहत, सामाजिक मर्यादाक ध्यान राखत, भुजबल-धनबलक मदमे निर्बल-निर्धन पर अत्याचार नहि करत।...लक्ष्यपूर्ति त' नहिएँ भेल, उनटे लोक धर्मभीरु, पाखण्डी अन्धविश्वासी आ निरन्तर लोभी, स्वार्थी, अत्याचारी होइत गेल, परिणामस्वरूप आजुक मैथिल-प्रवृत्ति हमरा सभक सोझाँ अछि। कृषि जीवनसँ समाजक कौटुम्बिक बन्हन एते मजगुत छल, जे भूमिहीनो व्यक्ति सम्पूर्ण किसानक दर्जा पबै छल। हरेक गाममे सब वृत्तिक लोक रहै छल। डोम, चमार, नौआ, कुमार, गुआर, धोबि, कुम्हार, कोइरी, बाह्मण, क्षत्राी... आदि समस्त जातिक उपस्थितिसँ गाम पूरा होइ छल। जमीन्दार लोकनि समस्त भूमिहीनकें जागीर दै छलाह, बाह्मण पुरहिताइ करै छलाह, नौआ केश कटै छलाह; कुमार ह'र-फार, चौकी केबाड़ बनबै छलाह; धोबि कपड़ा-बस्तर धोइ छलाह...। सम्पूर्ण समाज एक परिवार जकाँ चलै छल। सब एक दोसरा लेल जीबै छलाह, सब गोटए किसान छलाह, कृषि-सभ्यतामे मस्त छलाह। सिरपंचमी दिनक ह'र-पूजा हो; दसमी, दीया-बाती, सामा-चकेबाक उत्सव हो; मूड़न-उपनयन-विवाह-श्राद्ध हो; छठि अथवा फगुआ हो... बिना सर्वजातीय, सर्ववृत्तीय लोकक सहभाग नेने कोनो काज पूर नहि होइ छल। एहिमेसँ बहुत बात तँ एखनहुँ बाँचल अछि, होइत अछि ओहिना, ओकर ध्येय कतहु लुप्त भ' गेल अछि। मिथिलाक विवाहमे एखनहुँ जा धरि नौआ ब'रक कानमे हुनकर खानदान लेल गारि नहि देताह (परिहास लेल); धोबिन अपना केस संगें कनियाँक केस धो क' सोहाग नहि देतीह, विवाह पूर्ण नहि मानल जाइत अछि। ध्यान देबाक थिक जे एहि तरहें ओहि नौआकें कन्याक पिता आ धोबिनकें कन्याक माइक ओहदा देल जाइत अछि। मिथिलाक छठि पाबनि तँ अद्भुत रूपें सम्पूर्ण विरासतक रक्षा क' रहल अछि। नदीमे ठाढ़ भ' कए सूर्यकें अर्घ देबाक ई प्रथा जाति-धर्म समभावक सुरक्षा एना केने अछि जे समाजक कोनहुँ वर्गक सहभागक बिना ई पाबनि पूर्ण नहि होएत। नेत अइ स'ब टामे एकता आ समानताक सूत्रा स्थापित रखबाक रहैत छल। ई कलंक स्वातन्त्रयोत्तरकालीन मिथिलाक स्वाधीन मानवक नाम अथवा वैज्ञानिक विकास, बौद्धिक उन्नति, औद्योगिक प्रगतिक माथ जाइत अछि, जे समस्त विकासक अछैत मानव-मनमे लोभ-द्रोह, अहंकार एहि तरहें भरलक छूआछूत, जाति-द्वेष, शोषण-उत्पीड़न बढ़ैत गेल; आ आइ मिथिला-समाज, जे त्याग, बलिदान, प्रेम, सौहार्द लेल ख्यात छल, सामाकि रूपें खण्ड-खण्ड भेल अछि। पैघसँ पैघ आपदा, विभीषिका ओकरा एक ठाँ आनि कए, एकमत नहि क' पबै'ए। मिथलाक उदारता आ सामाजिकता ई छल जे ककरो बाड़ी-झारीमे अथवा लत्ती-फत्तीमे अथवा कलम-गाछीमे नव साग-पात, तर-तरकारी, फूल-फल होइ छल तँ सभसँ पहिने ग्रामदेवक थान पर आ पड़ोसियाक आँगनमे पहुँचाओल जाइ छल; कोनो फसिल तैयार भेलाक बाद आगों-राशि कोनो परगोत्राीकें देल जाइ छल; खेतमे फसिल कटबा काल खेतक हरेक टुकड़ीमे एक अंश रखबारकें देल जाइ छल...ई समस्त बात सामाजिक सम्बन्ध-बन्धक मजगूतीक उदाहरण छल। कोनो स'र-कुटुमक ओतएसँ कोनो वस्तु सनेसमे आबए, तँ ओ सौंसे टोलमे लोक बिलहै छल।...कहबा लेल कहि सकै छी जे ई मैथिलजनक जीवनक नाटकीयता आ प्रशंसा हेतु लोलुपता रहल होएत... मुदा तकर अछैत एहि पद्धति आ परम्पराक श्रेष्ठता आ सामाजिक मूल्य हेतु एकर आवश्यकतासँ मुँह नहि मोड़ल जा सकैत अछि। गाममे कोनो बेटीक दुरागसनक दिन तय होइ छल, तँ बेटीक सासुरसँ आएल मिठाइ भरि गाममे बिलहल जाइ छल। तात्पर्य ई होइ छल जे भरि गामक लोक बूझि जाए, जे ई बेटी आब अइ गामसँ चल जाएत। ओहि बेटीकें भरि गामक लोक धन-वित्त-जातिसँ परे, ओहि बेटीकें अपना घ'रमे एक साँझ भोजन करबै छल। सब किछुक लक्ष्यार्थ गुप्त रहै छल। एकर अर्थ ई छल, जे सम्पूर्ण गाम अपन-अपन थाड़ी-पीढ़ी देखा कए ओहि बेटीक विवेककें उद्बुद्ध करै छल जे बेटी! आब तों ई गाम, ई कुल-वंश छोड़ि आन ठाम जा रहल छह, हमरा लोकनि अपन शील-संस्कृतिक ज्ञान तोरा देलियहु, सासुर जा कए, ओतुक्का शील-संस्कार देखि कए अपन विवेकसँ चलिह', आ अपन गाम, अपन कुल-शीलक प्रतिष्ठा बढ़बिह'। इएह कारण थिक जे पहिने कोनो बेटीक दुरागमनक दिन पैघ अन्तराल द' कए तय होइ छल। मुदा आब ई रिवाज एकटा औपचारिकता बनि कए रहि गेल अछि; गामक बेटीकें अपन बेटी मानिते के अछि? मिथिलामे कोनो स्त्राी संगें भैंसुर आ ममिया ससुरक वार्तालाप, भेंट-घाँट वर्जित रहल अछि, एते धरि जे दुनूमे छूआछूतक प्रथा अछि। आधुनिक सभ्यताक लोक एकरा पाखण्ड घोषित केलनि। परिस्थिति बदलै छै, त' मान्यताक सन्दर्भ बदलि जाइ छै, से भिन्न बात; मुदा एहि प्रथाकें पाखण्ड कहनिहार लोककें ई बुझबाक थिक जे ई प्रथा एहि लेल छल, जे एहि दुनू सम्बन्धमे समवयस्की हेबाक सम्भावना बेसी काल रहै छल। संयुक्त परिवारक प्रथा छल, कखनहुँ कोनो अघट घटि सकै छल। ई वर्जना एकटा शिष्टाचार निर्वहरण हेतु पैघ आधार छल। प्रायः इएह कारण थिक जे विवाह कालमे घोघट देबा लेल प्राथमिक अधिकार अही दुनू सम्बन्धीय व्यक्तिकें देल जाइ छनि। जाहि स्त्राीकें केओ भैंसुर अथवा ममिया ससुर नहि छनि, हुनकहि टा ससुर स्थानीय कोनो आन व्यक्ति घोघट दै छनि। घोघट देबाक प्रक्रियामे कतेक नैतिक बन्हन रहैत अछि, से देखू, जे सकल समाजक समक्ष भैंसुर, नव विवाहित भावहुक उघार माथकें नव नूआसँ झाँपै छथि आ बगलमे ठाढ़ ब'र ओहि नूआकें घीचिकए माथ उघारि दैत अछि, ई प्रक्रिया तीन बेर होइत अछि, अन्तिम बेर माथ झाँपले राखल जाइत अछि। अर्थात्, सकल समाजक सम्मुख ओ व्यक्ति प्रतिज्ञा करैत अछि--हे शुभे! हम, तोहर भैंसुर (ससुर) प्रण लैत छी, जे जीवन पर्यन्त तोहर लाजक रक्षा करब! एते धरि जे अग्नि, आकाश, धरती, पवनकें साक्षी राखि जे व्यक्ति तोरा संग विवाह केलकहु अछि, सेहो जखन तोहर लाज पर आक्रमण करतहु, हम तोहर रक्षा लेल तैयार रहब! अही तरहें उपनयनमे आचार्य, बह्मा, केस नेनिहारि, भीख देनिहारि, डोम, चमार, नौआ, धोबि, कमार, कुम्हार आदिक भागीदारी; आ एहने कोनो आन उत्सव, संस्कारमे सामूहिक भागीदारी सामाजिक अनुबन्धक तार्किक आधार देखबैत अछि। कहबी अछि जे मैथिल भोजन भट्ट होइ छथि। अइ कहबीक त'हमे जाइ तँ ओतहु एकर सांस्कृतिक, पारम्परकि सूत्रा भेटल। मिथिलाक स्त्राी, खाहे ओ कोनहु जाति-वर्गक होथि, तीक्ष्ण प्रतिभाक स्वामिनी होइत रहल छथि। मुदा परदा प्रथाक कारणें हुनकर पैर भनसा घरसँ ल' क' अँगनाक डेरही धरि बान्हल रहै छलनि। अधिकांश समय भनसे घरमे बितब' पड़नि। सृजनशील प्रतिभा निश्चिन्त बैस' नहि दैन। की करितथि! भोजनक विन्यासमे अपन समय आ प्रतिभा लगब' लगलथि। आइयो भोजनक जतेक विन्यास, तीमन-तरकारीक जतेक कोटि, चटनी आ अचारक जेतक विधान मिथिलामे अछि, हमरा जनैत देशक कोनहुँ आन भागमे नहि होएत। वनस्पतिजन्य औषधिकें सुस्वादु भोजन बनएबाक प्रथा सेहो मिथिलामे सर्वाधिक अछि।... आब जखन एते प्रकारक भोजन ओ बनौलनि, तँ उपयोग कतए हैत?... घरक पुरुष वर्गकें खोआओल जाएत। सर्वदा एहिना होइत रहल अछि, जे कोनो क्रियाक विकृति प्रचारित भ' जाइत अछि, मूल तत्व गौण रहि जाइत अछि। मैथिल पेटू होइत अछि, से सब जनै'ए, मुदा मिथिलाक स्त्राीमे विलक्षण सृजनशीलता रहलैक अछि, से बात कम प्रचारित अछि। जे स्त्राी कामकाजी होइ छलीह, खेत-पथार जा कए शरीर श्रम करै छलीह, गामक बाबू बबुआनक घर-आँगन नीपै, लेबै छलीह, तिनकहु कलात्मक कौशल हुनका लोकनिक काजमे देखाइ छल। स्त्राी जातिक कला-कौशलक मनोविज्ञानक उत्कर्ष तँ एना देखाइ अछि जे हुनका लोकनिक उछाह-उल्लास धरिमे जीवन-यापनक आधार आ घर-परिवारक मंगलकामना गुम्फित रहै छल। जट-जटिन लोक नाटिका विशुद्ध रूपसँ कृषि कर्मक आयोजन थिक, जे अनावृष्टिक आशंकामे मेघक आवाहन लेल होइ छल, होइत अछि; सामा भसेबा काल गाओल जाइबला गीतमे सब स्त्राी अपन पारिवारिक पुरुष पात्राक स्वास्थ्यक कामना करै छथि; विवाह उपनयनमे अपरिहार्य रूपें वृक्ष पूजा (आम, महु), नदी पूजा, प्रकृति पूजा आदि करै छथि। विभिन्न वृत्तिक लोकक अधिकार क्षेत्रा पर नजरि दी, तँ नौआ, कमार, कुम्हार, डोम, धोबि... सबहक स्वामित्व निर्धारित रहैत आएल अछि। जाहि गाम अथवा टोल पर जिनकर स्वामित्व छनि, हुनकर अनुमतिक बिना केओ दोसर प्रवेश नहि क' सकै छलाह। ई लोकनि आपसी समझौतासँ अथवा निलामीसँ गामक खरीद-बिक्री करै छलाह। एहि व्यवहारमे जजमानक कोनो भूमिका अथवा दखल नहि होइ छल। हस्तकलाक कुटीर उद्योग एतेक सम्पन्न छल, जे सामाजिक व्यवस्थामे सब एक दोसरा पर आश्रित छल। सूप, कोनियाँ, पथिया, बखाड़ी, घैल, छाँछी, सरबा, पुरहर, मौनी, पौती, जनौ, चरखा, लदहा, बरहा, गरदामी, मुखारी, उघैन, कराम, खाट, सीक, अरिपन... सब किछु लुप्तप्राय भ' गेल। एते धरि जे ई शब्द आ क्रिया अपरिचित भेल जा रहल अछि। ढोनि केनाइ, भौरी केनाइ, केन केनाइ, पस'र चरेनाइ, झिल्हैर खेलेनाइ सन क्रिया, आ सुठौरा, हरीस, लागन, बरेन, जोती, कनेल, पालो, चास, समार, फेरा, पचोटा, ढोसि, करीन सन शब्द आब आधुनिक साहित्योमे कमे काल अबै'ए। मिथिलाक एहेन विलक्षण विरासत--कला, संस्कृति आ जीवन-यापन पद्धतिक उत्कृष्ट उदाहरण सम्भावनाविहीन भविष्यक कारणें आ सामाजिक कटुताक कारणें हेराएल जा रहल अछि। नवीन शिक्षा पद्धतिसँ सामाजिक जागृति बढ़ल, मुदा ओहि जागृतिक समक्ष ठढ़ भेल वैज्ञानिक विकास आ आर्थिक उदारीकरणक प्रभावमे अहंकारग्रस्त समृद्ध लोकक लोलुपता आ क्षुद्र वृत्ति। संघर्ष जायज छल। अपन पारम्परिक वृत्ति आ हस्तकलामे, पुश्तैनी पेशामे लोककें अपन भविष्य सुरक्षित नहि देखेलै। ÷रंग उड़ल मुरूत' कथामे मायानन्द मिश्र आ ÷रमजानी' कथामे ललित मिथिलाक परम्परा पर आघात देखा चुकल छथि।... ख'ढ़क घर आब होइत नहि अछि, घरामीक वृत्ति एहिना चल गेल। सीक'क प्रयोजन, खाटक प्रयोजन समाप्त भ' गेल, बचल-खुचल माल-जाल लेल नाथ-गरदामी आब प्लास्टिकक बनल-बनाएल डोरिसँ होअए लागल, बच्चाक खेलौना प्लास्टिकक होअए लागल। नौआ, कमार, धोबि, डोमक जागीर आपस लेल जा लागल। ओ लोकनि अपन पुश्तैनी पेशा छोड़ि आन-आन नोकरी चाकरीमे जाए लगलाह। स्त्राी जाति आब भानस करबा लेल किताब पढ़ए लगलीह, फास्ट फूड खएबाक प्रथा विकसित भेल। मिथिला पेंटिंगकें आफसेट मशीन पर छपबा कए पूँजीपति लोकनि री-प्रोडक्शन बेच' लगलाह। जट-जटिन आ सामा-चकेबाक खेलक विडियोग्राफी देखाओल जाए लागल। गोनू झा, राजा सलहेस, नैका बनिजारा, कारू खिरहरि, लोरिकाइनि आदिक कथा छपा कए बिक्री होअए लागल, टेप पर रेकॉर्ड क' कए, अथवा सी.डी.मे तैयार क' कए, री-मिक्ससँ ओकर मौलिकतामे फेंट-फाँट क' कए लाक सुन' लागल, आ एकरा अपन बड़का उपलब्धि घोषित कर' लागल। ... अर्थात् जे लोककला लोकजीवनक संग विकसित आ परिवर्द्धित होइ छल, तकर अभिलेखनसँ (डकुमेण्टेशन) ओकरा स्थिर कएल जा लागल। लोकजीवनक संग अविरल प्रवाहित रहैबाली सांस्कृतिक-धारा आब अभिलेखागारमे बन्द रहत, ओकर विकासक सम्भावना स्थगित रहत। अइ समस्त वृत्तिमे जुड़ल लोककें सम्मानित जीवन जीबै जोगर वृत्ति द' कए एकर विकासमान प्रक्रियाकें आओर तीव्र करबाक आवश्यकता छलै, मुदा जखन मिथिलाक लोके ओ ÷लोक' नहि रहि गेल अछि, तखन लोक-संस्कृति आ लोक-परम्पराक रक्षा के करत? बटुआमे बिहाड़ि आ बिर्ड़ो- (राजकमल चौधरीक उपन्यास) ग'रसँ देखला पर बात तय होइत अछि जे उपन्यास भारतीय साहित्यक सबसँ गतिशील विधा थिक। भावककें एतए अपन तथा परिवेशक सम्यक् चित्रा सम्पूर्ण वैविध्यक संग भेटैत अछि। एहि तथ्यमे सेहो किनकहु कोनो संशय नहि छनि जे साहित्यमे उपन्यास विधाक आविर्भाव समाजमे आधुनिक सभ्यताक विकासक फलस्वरूप भेल। विज्ञान एवं तकनीकी विकासक फलस्वरूप यूरोपमे सतरहम शताब्दीमे पूंजीवादक पाँखि पसरल, सामाजिक परिवर्त्तनक झोंक आएल, आ साहित्यमे उपन्यास विधाक आविर्भाव भेल। मुदा से भारतीय साहित्यमे उपन्यासक उद्भवक स्रोत नहि थिक। विहंगम दृष्टिसँ देखी तँ भारतीय साहित्यमे उपन्यासक उद्भवक स्रोत सन् १८५७क प्रथम स्वाधीनता संग्राम, आ तकर निराशाक कारणें भारतीय बुद्धिजीवीक बीच जाग्रत चेतनाकें मानल जाएत। एकर सूत्रा उनैसम शताब्दीक प्रारम्भिक कालमे भारतीय बौद्धिक जन'क मोनमे उठल नव चेतनासँ सेहो जुड़ैत अछि, राजा राममोहन राय द्वारा समर्थित नवजागरणसँ सेहो जुड़ैत अछि, ÷बंगाल नवजागरण' आ ÷महाराष्ट्र प्रबोधन'सँ सेहो जुडै+त अछि। हिन्दी पट्टीमे अइ नवजागरणक हवा थोड़ेक देरीसँ आएल। मुदा भारतेन्दु मण्डलक बुद्धिजीवी वर्ग सम्पूर्ण तत्परता आ प्रतिबद्धताक संग एकर उद्घोष केलनि, परिणति धरि पहुँचौलनि। हिन्दीमे उपन्यास लेखन नवजागरण कालहिमे प्रारम्भ भेल। ÷परीक्षा गुरु'(१८८२) ÷त्रिावेणी'(१८९०) आदि औपन्यासिक कृतिसँ लाला श्रीनिवास दास आ किशोरी लाल गोस्वामी एहि विधाक शुभारम्भ केलनि। डेढ़-दू दशक बाद हिन्दी उपन्यास अपन पूर्ण ज्योतिक संग दैदीप्यमान होअए लागल। जयशंकर प्रसादक ÷कंकाल'(१९२९), ÷तितली'(१९३४); जैनेन्द्र कुमारक ÷परख'(१९२९), ÷सुनीता'(१९३५), ÷त्यागपत्रा'(१९३७); प्रेमचन्दक ÷सेवासदन'(१९१६), ÷प्रेमाश्रम'(१९१८), ÷रंगभूमि'(१९२६), ÷गोदान'(१९३७) आदि उपन्यासक प्रकाशन भ' चुकल छल। देवकी नन्दन खत्राीक ÷चन्द्रकान्ता'(१८८८) आ ÷चन्द्रकान्ता सन्तति'(१८९६) तँ एहि सबसँ पूर्वहि प्रकाशित भ' कए ख्याति अर्जित क' चुकल छल। जनतब अछि जे भारतीय भाषा सबमे सबसँ पहिने बंगलामे उपन्यास लेखन शुरुह भेल।...मैथिलीमे उपन्यास लेखनक प्रारम्भिक अवधि थिक सन् १९१४-१९३३, अर्थात् ÷निर्दयी सासु'सँ ÷कन्यादान'क रचनाकाल धरि। एहि मध्य कैक टा उपन्यास लिखल गेल, मुदा एहि समय धरि हिन्दी आ आन भारतीय भाषाक उपन्यासक प्रगति देखैत विषयक विस्तार आ शिल्प-शैलीक नूतनताक दृष्टिएँ उल्लेखनीय उपन्यास थिक--निर्दयी सासु(जनार्दन झा ÷जनसीदन')१९१४, रामेश्वर(जीवछ मिश्र)१९१६, सुमति(रासबिहारी लाल दास)१९१८, मनुष्यक मोल(कुमार गंगानन्द सिंह)१९२४, मिथिला दर्पण(पुण्यानन्द झा)१९२५, पुनर्विवाह(जनार्दन झा ÷जनसीदन')१९२६, चन्द्रग्रहण(कांचीनाथ झा ÷किरण')१९३२, कन्यादान(हरिमोहन झा)१९३३ आदि। एहि आँकड़ाकें देखैत ई लगैत अछि जे मैथिली उपन्यासक मूल लेखन नहि किछु तँ दू-अढ़ाइ दशक पाछू आबि कए प्रारम्भ भेल, आ शीघ्रे माटि पकड़ि लेलक। ध्यान रखबाक थिक जे पहिने बिहार आ बंगाल एकहि प्रान्त छल, कलकत्ता तकर प्रशासन केन्द्र छल। सन् १९१२मे बिहार-बंगाल विभाजित भेल मुदा मिथिलाक लोकक सम्पर्क कलकत्तासँ बनले रहल। उल्लेखनीय अछि जे स्वातन्त्रयोत्तर काल, अथवा ताहूसँ आगू, आपातकालक बाद धरि रोजगारक टोहमे विभिन्न आयुवर्गक मैथिल दिल्ली, पंजाब, गुजरात महाराष्ट्र दिश अपन रुखि केलनि, मुदा एखनहुँ धरि कलकत्ता-प्रेमसँ मैथिल लोकनि पूर्णतया मुक्त नहि भेल छथि।... मैथिली उपन्यासक उद्भवक स्रोत बौद्धिक जन'क स्वानुभूति, अंतःप्रेरणा, मिथिलाक समकालीन परिवेश, मानव जीवनक विसंगति, फिरंगी शासकक अत्याचार...जे रहल हो; मुदा सम्भव ईहो अछि जे बौद्धिक जनकें एहि विभाजनसँ ÷निज भाषा' अर्थात् ÷मातृभाषा'क उन्नति लेल; सर्वथा नव विधा उपन्यासक लेखन लेल प्रेरणा जागल होइन। मैथिलीमे उपन्यास लिखाएल तँ जाए लागल खूब, मुदा तदनुसार सर्वविधि विकास नहि भेल--एहि तथ्यकें स्वीकार'मे संकोच नहि कर'क चाही। मिथिलाक नव बौद्धिक वर्गक मध्य सब तरहक जागरूकता आ चेतनाक अछैत मैथिलीक उपन्यास लेखन मिथिलामे स्त्राीक दयनीयता पर कनैत रहल। एते धरि जे वैद्यनाथ मिश्र ÷यात्राी' धरिकें सन् १९४६ मे ÷पारो'क परिस्थिति पर कान' पड़लनि, जे सन् १९१६सँ १९३७ धरिक अन्तरालक दुनियाँ भरिक औपन्यासिक उत्थान देख चुकल छलाह। जँ पहिनेक उपन्यासकार कनेको साहस केने रहितथि, तँ सम्भव छल, जे ÷नवतुरिया'मे जे डेग यात्राी उठौलनि, से डेग ÷पारो'एमे उठि जइतए। चेतना आ बौद्धिकताक दृष्टिएँ मिथिला क्षेत्रा सदासँ आगू रहल अछि, तथापि उपन्यास लेखनक विकासोन्मुख धारामे मैथिली एहि तरहें पछुआएल रहल, तकर मूल कारण रचनाकारक जीवनानुभूति आ रचना-दृष्टिक कमजोरी नहि छल; मूल कारण छल मिथिलाक जनपदीय परिस्थिति आ आम नागरिकक मानस लोक। भारतीय स्वाधीनताक दशक भरि बाद सन् १९५८मे राजकमल चौधरीक पहिल मैथिली उपन्यास ÷आदिकथा' प्रकाशित भेल। एहि समय धरि मैथिली उपन्यासक भण्डार कोनो तेहेन झुझुआनो नहि छल। ÷चन्द्रग्रहण', ÷पारो' आ ÷नवतुरिया' सनक विशिष्ट उपन्यास सब प्रकाशित भ' चुकल छल। ÷पारो' क कथावस्तु आ घटनाक्रम पर मिथिलाक कट्टरपन्थी लोकनि वितण्डा ठाढ़ क' चुकल छलाह। असलमे मिथिला क्षेत्राक सामान्य जनजीवनक समस्या ओहि समय धरि विकराल छल। पंजी-प्रथा आ जमीन्दारी संस्कारसँ मिथिलाक जे वर्ग आक्रान्त छल, ओएह वर्ग सामाजिक व्यवस्थाक नीति-निर्धारक होइ छल। पंजी-प्रथाक कारणें मिथिलामे स्त्राी जातिक स्थिति दयनीय छल। बाल विवाह, बेमेल विवाह, बहु-विवाह, वृद्ध विवाह सन कुरीति पंजीए प्रथाक परिणति छल। तथाकथित उच्च कुलशीलक पुरुष अनेक बेर विवाह क' लै छलाह। कतोक किशोरी अथवा युवतीक विवाह, पिता आ पिमामहक उम्रक लोकसँ भ' जाइ छल। अइ किशोरी आ युवतीक पितावर्ग ओइ जमीन्दार लोकनिकें अपन उद्धारक बूझै छलाह आ तृप्त भेल घोषित करै छलाह जे बेटी आब रानी बनि राज करतीह, बेटीक मोन आ मनोभावकें बूझब ओ अपन दायित्व नहि मानै छलाह। जाहि समाजमे वैज्ञानिक विकासक कोनो टोप-टहंकार पहुँचि नहि सकल छल, ओतएक लोक अपन जीवन व्यवस्थाकें एतेक यान्त्रिाक बना नेने छल, जे ओहि बेटीक बाप-माइकें ई नहि बुझाइन जे एकटा स्त्राी लेल अन्न-पानि, जमीन-जथा, गहना-जेबरे टा सब किछु नहि होइ छै; कोनो स्त्राीक मनोवेगक उत्ताप-अनुताप, युवावस्थाक दैहिक भार सेहो बड़ अर्थ रखै छै। स्त्राी मनोवेगक अइ दशाक बोध ओहि उच्च कुल-वंशीय जमीन्दारकें सेहो नहि होइ छलनि। अइ तरहक विवाहक परिणति दू दिशामे होइ छल -- की तँ जवानीक उमेर अबैब-अबैत किशोरी विधवा भ' जाइथ, आ कि वृद्ध पति संग जवान पत्नीक रति-विलास सुखकर नहि पाबि कुण्ठित होइत रहथि। दुनू परिस्थितिमे देहक भार कोनो जवान पुरुखकें सौंप देबा लेल ओ युवती विधवा, अथवा अतृप्त सधवा ललायित रहै छलीह। राजकमल चौधरीक ÷आदिकथा' उपन्यास एहने अतृप्त सधवा अथवा कामातुर विधवाक कथा थिक जे अभिलाषा आ मर्यादाक दू छोरसँ तानल-छानल छथि। ÷आदिकथा'क नायिका सुशीलाक विवाह वृद्ध जमीन्दार अनिरुद्ध बाबूसँ भेलनि। दुनूक वयसमे एक पीढ़ीक अन्तर छलनि। सुशीलाक उमेर अपन सतौत बेटा कुलानन्दसँ मेल-जोल खाइ छलनि। पहाड़ी नदी, अथवा कोशीक बाढ़ि, अथवा समुद्रक ज्वारि सन सनकी सुशीलाक जवानी आ देह-तन्त्रा कोनो मर्यादाक बन्हन मान' लेल तैयार नहि छलनि, मुदा घून खाएल चौकठि-केबाड़ सन मिथिलाक कौलिक मर्यादामे तकरा छेक क' रखबाक प्रयास कएल जाइ छल। अइ जर्जर मर्यादाक पुल पर सम्हरि-सम्हरि क' पैर राखि जीवन पार कर' चाहै छलीह, मुदा बीचहिमे अनिरुद्ध बाबूक भागिन देवकान्तक कान्तिमय रूप, चट्टान सन काया-काठी देखि सुशीला, अर्थात सोना मामीक मोन सम्हरि नहि सकलनि, ओ बहकि जेबाक उद्यम नहि केलनि, मुदा बहकि जएबासँ अपनाकें रोकि राखब एते आसानो नहि छलनि। सुशीलाक अतृप्त वासना आ दमित अभिलाषाक संकेत देवकान्तकें लागि जाइ छनि। अइ दुनू चरित्राक मनोविश्लेषण अइ उपन्यासमे बेस सूक्ष्मतासँ भेल अछि। बीचमे आओरो कतोक घटना-उपघटनाक माध्यमे मूल कथाकें माँसल आ प्रभावकारी बनाओल गेल। मामि-भागिनक कामातुर अनुराग सामाजिक रूपें स्वीकार्य नहि अछि, तें एहि उपन्यासक कथानक मिथिलाक पुरातन विचारक लोककें पसिन नहि पड़लनि। कहल गेल जे ई कथा सत्य नहि सत्यानुरूप अछि, एहिमे अमर्यादित सत्यक वर्णन अछि, नायक-नायिकाक मनोवृत्ति अथवा मानसिक उद्वेलनक चर्चा करै काल लेखककें उचितानुचितक ध्यान रखबाक चाही, सामाजिक बन्धक अवहेलना क' कए कथामे विश्वसनीयता अनबाक आग्रह नहि हएबाक चाही, मामि-भागिनक कामजनित आकर्षण मर्यादाक उल्लंघन थिक।... हमरा जनैत ई समस्त धारणा पाखण्ड थिक। वस्तुतः उपन्यासकार कोनो अखबारक सम्वाददाता नहि होइत छथि जे ओ सत्य घटनाक रिपोर्ट लिखता। कथा आ कि उपन्यास सम्भाव्यक संकेत, वर्त्तमानक विश्लेषण आ अतीतक अनुस्मरण करैत अछि; घटितक सूचना द' देब मात्रा ओ अपन दायित्व नहि बूझै छथि। आदर्श स्थितिसँ कथा, उपन्यासकें परहेज नहि होइत अछि, ओ तँ आदर्शेक अनुसन्धानमे लिप्त रहैत अछि; मुदा अयथार्थ आदर्श ओकरा लेल उपेक्षणीय अवश्य होइत अछि। अही उपन्यासक प्रसंग राजकमल चौधरीक कहब छनि-- सोनामामीक प्रति देवकान्तक प्रेम बड्ड आदर्श थिक। आ, अही आदर्शक रक्षाक कारणें देवक जीवन स्वाहा भ' गेल छइन। आब अहीं कहू; जे भस्म करए, आगि लेसने रहए, से आदर्श कोना, अनुकरणीय कोन तरहें? हम सामाजिक मर्यादाक पूजा करइ छी, आ (अयथार्थ) आदर्शवादिताक घोर विरोध। आदिकथा उपन्यास पर जे लोकनि मर्यादाक उल्लंघनक दोहाइ देलनि, ओ लोकनि अनिरुद्ध बाबूकें अमर्यादित पुरुष नहि कहलनि, जे अपन अशक्य अवस्थामे सन्तानहुँसँ छोट वयसक युवतीकें पत्नीक रूपमे वरन् केलनि। सुशीलाकें जखन अतृप्त मनोवेगक दौरा पड़लनि तखन श्वसुर स्थानीय जोतखी जी आडम्बर पसारलनि जे हुनका पर प्रेतनी सवार भ' गेलखिनहें। आ, भूत झारबाक बहन्नें वधू-स्थानीय सुशीलाक बाँहि, पाँजर पकड़बाक आचरण गामक लोककें अमर्यादित नहि लगलनि। किऐक तँ अइ समस्त आचरणक फैंटेसीमे मिथिलाक समाज प्रारम्भहिसँ जीबैत आएल छल। मनुष्य जें कि एकटा जटिल प्राणी थिक, तें मनुष्यक समस्त मानसिक प्रक्रिया विचित्रा जटिलतासँ आबद्ध रहैत अछि। हजारह बर्खक विकास-यात्राामे मनुष्यक सभ्यता आइ जाहि स्थिति धरि पहुँचल अछि, ताहिमे विवेक धारणक विराट भूमिका अछि। मर्यादाक रक्षा विवेकहीन आचरणसँ नहि भ' सकैत अछि। मर्यादाक निर्वाहमे एक ठाम देखाओल गेल विवेकहीनता अनेक अमर्यादाक जननी होइत अछि, एहि सत्यक उपेक्षा केनिहार लोक पारो, आकि आदिकथा सन उपन्यासक कथा पर अँगुरी उठबैत छथि। मैथिलीमे लिखल राजकमल चौधरीक तीन गोट उपन्यास उपलब्ध अछि --आदिकथा, आन्दोलन आ पाथर-फूल। एकर अलावा हंसराजक नामे १९.११.१९५९ सँ ०६.०१.१९६०क बीच एक पत्रामे राजकमल चौधरी लिखने छथि... जनवरीमे एकटा मैथिली उपन्यास लिखब हम -- बटगमनी। एकटा एहन युवती पर जे भरि निजगी विभिन्न लोकक संगें पड़ाएल घुरइ'ए। कथाक विस्तार जनकपुरसँ पूर्णियाँ धरि रहत।-- कहि नहि ई उपन्यास लिखल गेल अथवा नहि। आदिकथा आ आन्दोलन तँ पहिनहिसँ पाठक लोकनिकें उपलब्ध छलनि। पाथर-फूल उपन्यास हेबनि धरि अनुपलब्ध छल। आखर (राजकमल विशेषांक)मे जीवकान्त अपन निबन्धमे राजकमल चौधरीक पंक्ति उद्धृत कएने छथि -- एक गोट उत्साही युवक ओकरा (÷पाथर-फूल' उपन्यासकें) प्रकाशित करौलनि, मुदा ककरो कहला पर जे उपन्यासक अश्लीलताक कारणें प्रकाशक बन्हा जेताह, प्रकाशित मैटर ओ (प्रकाशक) डैमेज करबा देलनि। -- मुदा सुकर भेल जे दू बर्ख पूर्व तारानन्द वियोगी ओहि उपन्यासक एकमात्रा प्रति कतहुसँ नष्ट-भ्रष्ट स्थितिमे उपलब्ध केलनि। सम्पूर्ण पोथीमे दीवार महाशय आर-पार एकटा भोकाँड़ क' देलखिन। ओही स्थितिमे ओकर छाया प्रति करवा कए बीचसँ पंक्तिकें जोड़ल गेल अछि। जोड़ल शब्दावलीमे राजकमलक शैली आ गरिमा अक्षुण्ण रहि सकल -- से कहब कठिन अछि, मुदा एते तय अछि जे उपन्यासक रसबोधमे कोनो बाधा उपस्थित नहि होइत अछि। एकर अलावा आओरो एकाध उपन्यासक चर्चा अछि, मुदा तकर कोनो सूत्रा एखन धरि उपलब्ध नहि भेल अछि। कहल जा चुकल अछि ÷आदिकथा'क समय धरि सेहो मैथिलीक पाठक समाजक बोध-शीर्ष आ विचार-फलक उर्ध्वमुखी नहि भेल छलनि, एकदम सपाट भूमि पर जर्जर परम्पराक खुट्टीसँ बन्हाएल घूमि रहल छलनि। पूर्ववर्ती रचनाकार सेहो कम प्रयास नहि केलनि। कविताक क्षेत्रामे कतोक गोटए अपन योगदान देलनि। कथा आ उपन्यासक क्षेत्रामे कांचीनाथ झा ÷किरण' आ हरिमोहन झा स्त्राी आ विवाहसँ सम्बन्धित मिथिलाक जड़ियाएल समस्या पर नजरि द' चुकल छलाह। वैद्यनाथ मिश्र ÷यात्राी', ÷पारो' आ ÷नवतुरिया'मे एहि गन्हाएल वैवाहिक पद्धति पर समधानि क' चोट क' चुकल छलाह। तथापि समाज व्यवस्थाक पाखण्ड आ अयथार्थ आदर्शक चाँगुर एहि समाजकें जकड़ने छल, स्वाधीनता प्राप्तिक दशक भरि बादहु मिथिलाक लोक एहि वैवाहिक पद्धतिक प्रति घृणा आ विरोधक भाव नहि अवधारलनि। चुतुर्थिएक राति ÷पारो' सन बालिकाक संग पति स्थानीय वृद्ध राक्षस द्वारा बलात्कार अथवा ÷सुशीला' सन उद्दाम यौवनसँ भरल सुकामिनीक यौन-प्रताड़णाक प्रति किनकहु मोन खिन्न नहि भेलनि। पंजी प्रथाक विकृतिक रूपमे भेल एहेन बेमेल विवाह, बाल-वृद्ध विवाह आ बहु-विवाहक कारणें वृद्ध अथवा स्वर्गवासी जमीन्दारक कठमस्त जवान स्त्राीक संग रमणेच्छा सबकें रहै छलनि, गाछमे पाकल लताम देखि कौआ जकाँ दू लेल मारि अएबाक लालसा सबकें होइ छलनि, मुदा ओहि युवतीक मोन आ सम्वेदनासँ किनकहु कोनो मतलब नहि छलनि। छद्म आ अतिशयोक्तिसँ भरल मिथिलाक जीवन-पद्धतिक इएह विडम्बना छल। विवाहेतर सम्बन्ध रखबासँ परहेज नहि छलनि, भेद खुजि जएबाक डरें आतंकित रहै छलाह। एहेन समाजमे सुशीला आ देवकान्त अपन मोनक समर्थन कोना करितथि -- उपन्यासकारक सोझाँ ई पैघ समस्या छल। आदर्श आ मर्यादाक जर्जरतासँ आच्छन्न अइ प्रवृत्तिक कारणें उपन्यासकार ÷आदिकथा'कें सुखान्त नहि बना सकलाह। सम्भवतः इएह कारण थिक जे बाबा यात्राी ÷पारो'क दुर्दशासँ व्यथित भेलाह, उग्र नहि। रचनाकारक व्यथासँ पाठककें सामान्यतया उग्र हेबाक चाही, मुदा यात्राी देखलनि जे समाज एखनहुँ उग्र नहि भेल। आठ बर्खक बाद फेरसँ यात्राी ÷नवतुरिया'कें ठाढ़ केलनि। मिथिला क्षेत्राक एहेन जड़ मन स्थितिक समाजमे कोनो प्रगति चेतनासँ सम्पन्न रचनाधर्मी लोकक मानसिक उद्वेलनक कल्पना कएल जा सकैत अछि। निर्दयी सासु, सुमति, मनुष्यक मोल, पुनर्विवाह, चन्द्रग्रहण, कन्यादान आदि पूर्ववर्ती उपन्यासमे मिथिलाक स्त्राीक दुर्दशाक चित्राण भेल, मुदा चित्राणक स्वरूपसँ स्त्राी-चेतना आ स्त्राीक दुर्दशाक प्रति पुरुषक वैचारिक उद्वेलनक कोनो उद्यम एहि जनपदमे नहि देखल गेल। स्पष्टतः ई दोष रचनाकारक नहि, रूढ़िग्रस्त मैथिल समाजक धर्मान्धताक छल। ÷पारो'आ ÷आदिकथा'मे सेहो स्पष्ट विरोध अइ कुरीतिक प्रति नहि देखाइत अछि, मुदा ÷पारो'क यौन उत्पीड़न और ÷सुशीलाक यौन प्रताड़णसँ पाठकक मोन खिन्न होइत अछि। संख्यामे थोड़े सही, मुदा ÷बिरजू'क क्रोध आ ÷देवकान्त'क व्यथाक सहयात्राी अवस्से बनैत अछि। ई समय समाजक बदलैत मनस्थितिक छल। उपन्यासकार अपन मोनक नहि क' सकलाह, मुदा संकेत देलनि -- समाजक बदलइत धार्मिक नैतिक मान्यतादिक एहि संक्रमित कालमे (आदिकथा)÷कॉमेडी' नइं बनि सकल, मात्रा एक अपूर्ण ÷टे्रजेडी' रहि गेल। इएह समकालिक यथार्थ थिक। लोक प्रेम करइए, प्रेमपात्राक लेल बेकल रहइए, मुदा, संस्कारक ससरफानी तोड़ि नइं पबइए। इएह आदि-आदिसँ चल अबइत कथा थिक, आदिकथा थिक।... मिथिला क्षेत्रा भारतक एकटा एहेन भूखण्ड थिक जतए परस्पर विरोधी आचरण आ व्यवस्था निःशंक भ' कए विकसित भ' रहल अछि, होइत रहल अछि। पर्याप्त संख्यामे उद्दाम प्रवाहक नदी अछि, बाढ़िक कारण ओकर प्रवाहमे उद्दाम गत्यात्मकता अबैत अछि, प्रति वर्ष कोसीक बाढ़ि, गंगाक बाढ़ि, बागमती, कमला आदि नदी सभक बाढ़िक कारण तीव्रतासँ नदी-नालाक दिशा, स्थान परिवर्तित होइत रहल, जमीनक तल परिवर्तन होइत रहल... मुदा एहि प्रबल प्रभावकारी प्राकृतिक परिदृश्यक प्रतिकूल एतएक जीवन-यापन आ आचरण शिथिल, सुस्त, आ आरामपसन्द बनल रहल। गत्यामकतासँ निर्लिप्त, यथास्थिति पर अतीव आग्रह।... विद्वताक लेल मिथिला क्षेत्रा पुरातन कालहिसँ नामी-गिरामी रहल अछि। विद्वता आ प्रगतिशीलता आपसमे सहयात्राी होइत अछि, अर्थ-धर्म-काम-मोक्षक परिभाषा बुझितहि मनुष्यमे उदारताक प'ट खुजैत अछि, आ कलुष मेटाइत अछि। मुदा, मिथिलामे सब कथूक अछैतो एहि समस्त सद्वृत्तिक लोपे लोप रहल, उनटे रूढि, पाखण्ड, धर्मान्धता, अस्पृश्यता आदि भावना जड़िआएल रहल। जीवन विरोधी जर्जर व्यवस्थाक अनुपालनमे अपन इच्छा आ नैतिकताकें मारैत रहल, फोंक मर्यादाक प्रदर्शन हेतु छद्म जीवन प्रक्रिया चलैत रहल। अइ छद्मक प्रति जड़िआएल आग्रह एतेक बढ़ल छल, जे छद्मे वास्तविकता लगैत रहल। छद्मक आँचर हटएबाक अर्थ मर्यादाक अतिक्रमण बूझल जाए लागल। राजकमल चौधरीक समस्त रचना संसार अइ छद्मेक अनावरणमे लागल रहल। आदिकथा उपन्यास सेहो, तकरे प्रमाण थिक। समाज ओहिसँ पहिने कनेको प्रगति-बोधसँ युक्त भेल रहितए, तँ सम्भव छल जे सुशीला आ देवकान्तक आदिकथा दुखान्त नहि भ' कए सुखान्त भ' जइतए। ÷आदिकथा' उपन्यासक अप्रतिम प्रभावोत्पादकताक मुख्य कारण ओहिमे प्रयुक्त गद्य सेहो थिक। राजकमल चौधरीक गद्य रचनामे एकटा खास बात रहैत अछि, जे ओ अपन मन्तव्य राख' लेल घटनावलीक कोनो श्रृंखला नहि तकै छथि; छोट सन कोनो प्रसंगक चारू भर एकटा परिवार, समाज अथवा मण्डली ठाढ़ करै छथि; ओकर आचरणकें ओकर मानसिक व्यापारसँ जोड़ैत जाइ छथि; अन्ततः अइ तरहक चरित्रा-चित्राणे हुनकर मन्तव्यकें आकार, रचनाकें पूर्णता, अभिप्रायकें सफलता, आ प्रभावकें उत्कर्ष दैत अछि। आदिकथा उपन्यासमे मोटा मोटी घटना तँ एतबे अछि जे कोनो विपत्ति-यात्राामे सुशीला आ देवकान्तक भेंट होइ छनि, बीचमे सब तरहक राग अनुराग चलैत अछि, आ अन्ततः ओ भेंट, ओ अनुरक्ति एकटा अयथार्थ आदर्शक रक्षामे पानि पर लिखल आखर जकाँ मेटा जाइत अछि। मुदा ई सम्पूर्ण ताना-बाना किछु खास-खास तरहक चरित्रासँ बुनल गेल अछि, ओहि चरित्रोक माध्यमसँ राजकमल चौधरी अइ उपन्यासकें अपन समयक एकटा महत्वपूर्ण उपन्यासक रूप देलनि अछि। आदिकथा, एकटा दुखान्त प्रेमकथाक प्रमाण होइतहु समकालीन समाजक मार्मिक आ बेधक दृश्यक कोलाज थिक, जाहिमे पंजी प्रथा, सामन्ती संस्कार आ सामाजिक पाखण्ड पर चोट अछि; जमीन्दारिएक जड़िसँ निकलि कए जमीन्दारी प्रथाक विरोध परिवर्त्तन-चक्रक सार्थकता साबित केलक अछि। समस्त पद-प्रतिष्ठा-सम्पन्नताक अछैत मिथिलामे स्त्राी लेल कोन तरहक सोच-पद्धति अपनाओल जाइत रहल अछि, तकर स्पष्ट चित्रा बनि सकल अछि। आदिकथाक मुख्य पुरुष चरित्रा छथि -- अनिरुद्ध बाबू, कुलानन्द, महानन्द, ज्योतिषी लघुकान्त, आ देवकान्त। किछु गौण पात्रा सेहो छथि -- डाक्टर वैद्यनाथ, धर्मशालाक मैनेजर, खबास इत्यादि। मुदा हिनका लोकनिक कोनो चारित्रिाक विकास उपन्यासक कथाभूमिमे नहि भेल अछि। लघुकान्त ज्योतिषीक अवतारणा सेहो सामाजिक धर्मान्धता, पाखण्ड, भीरुता, छद्म आ निर्लज्जता देखएबा लेल भेल अछि। धरमपुरवाली, अर्थात् सुशीला, अर्थात् देवकान्तक सोनामामी, अर्थात कुलानन्द, महानन्दक सबसँ छोट सतमाइ कामोत्तेजनामे, अथवा कोनो मादक पदार्थक सेवनसँ बेहोश छथि। प्रयोजन छलै हुनकर सेवा-परिचर्या अथवा चिकित्साक, मुदा ज्योतिषी जी एकटा जवान स्त्राीक कामोत्तेजक बाँहि-पाँजरक स्पर्श पएबा लेल, कुत्सित लिप्सा तृप्त करबा लेल, अपन फोंक अस्मिता समाजमे ऊँच करबा लेल, आ लोक पर अपन पाखण्डक मनोवैज्ञानिक दबाब बढ़एबा लेल घोषित करै छथि, जे सुशीला पर ओएह प्रेतनी सवार छनि, जे तीन बर्ख पहिने हुनका हरिद्वारमे भेटल रहनि -- ई बात, ज्योतिषीकें भगवती कहि देने छनि...। मुदा उपन्यास मध्य राजकमल चौधरी एहेन एकहु छद्म चरित्राकें क्षमादान नहि देलनि अछि।... जे प्रेतनी छलहे नहि, तकरासँ मान-मनुहार ज्योतिषी करैत रहलाह, श्वसुर स्थानीय होइतहुँ, नजरिए आ स्पर्शे टासँ सही, सुशीला सन रसवन्तीक रसपान करैत रहलाह, एही बीच हुनकर पोल खुजि गेल, ओ नाँगरि सुटका क' पड़एलाह। अइ चरित्राक प्रवेश उपन्यासक कथाभूमिमे अचानक भेल अछि। हिनकर अवतारणा नहियों होइतए तँ मूल कथा पर एकर कोनो असरि नहि होइतए। मुदा जें कि उपन्यासक गति एकरैखिक नहि होइत अछि, बहुत रास साँगह-पाती संग नेने चलैत अछि, कही तँ उपन्यास कम्प्यूटरक नॉर्टन एण्टी वायरस होइत अछि, अथवा मलाहक महजाल होइत अछि, जे सौंसे समाज व्याधि, अथवा सौंसे पोखरिक माछ, काछु, साँप, सनगोहि, सोंसि, नकार समेटने चलैत अछि। अही प्रक्रियामे राजकमल चौधरी ÷आदिकथा'मे कथा तँ कहलनि अछि मामि-भागिनक अनुक्तिक; मुदा बीच-बीचमे समस्त सामाजिक व्याधिक इलाज करैत गेलाह अछि। ज्योतिषी लघुकान्तक पाखण्ड उजागर करब आ समाजकें अन्धविश्वाससँ मुक्त करब आवश्यक छल, तें लघुकान्तक अवतरण भेल। एहि अवतारणा लेल कोनो संयोग-कथा नहि गढ़ल गेल, सहजतासँ ओ मूलकथाक अंश बनि गेल अछि -- से उपन्यासकारक विशिष्ट कौशल थिक। महानन्द सामन्ती खानदानक नव उम्रक युवक छथि। अनिरुद्ध बाबूक छोट बेटा, सुशीला सन सुकामाक सतौत बेटा, कुलाकानन्दक सहोदर आ देवकान्तक ममियौत। छूआ-छूत, वर्ग संघर्ष समाजसँ मेटा देबाक आग्रही आ सामाजिक कुरीतिक उन्मूलनक श्रेय लेब' लेल तत्पर अपरिपक्व विद्रोही। हिनकर परिचय लेल उपन्यासकारक पंक्तिक उपयोग करी तँ -- ÷महानन्दक शरीरमे एखन समाज-सुधारक रक्त-प्रवाह दौड़ि रहल छइन। उर्दू-भाषामे एकटा कड़बी छइ -- नब मुसलमान सतरह बेर नामज पढ़इए -- से महानन्द सतरह बेर नामज पढ़ए चाहइ छथि। चाहइ छथि जे युग-युगान्तरक धार्म्मिक संस्कारकें विद्रोहक एक्के धक्कासँ तोड़ि दी।' -- महानन्द जमीन्दारी संस्कारसँ उबिया तँ गेलाह अछि अवस्से, परिवर्त्तन चाहै छथि, ताहि लेल उद्यमो करए चाहै छथि, मुदा चेतना जाग्रत नहि छनि। महानन्द समकालीन मिथिलाक प्रतिक्रियावादी नौजवानक प्रतिनिधि जकाँ एहि उपन्यासमे ठाढ़ छथि, जे लक्ष्य निर्धारण आ संधान-समायोजन कएनहि बिना व्यवस्था विरोधमे लागि जाइ छथि। परिवर्तनक एतब टा बाट बूझल छनि जे आँगनमे तथाकथित निम्नजातीय लोक पात ओछा कए खा लिअए।... नितान्त अपरिपक्व आ क्षणोन्मादी लोक छथि महानन्द। अवज्ञा आ चिन्तनविहीन विरोधक संग परिवारसँ भिन्न भ' जएबाक बात सोचै छथि। महानन्दक आचरणक चित्रा एक दिश मिथिलाक युवा वृन्दक वास्तविक मानस लोकक परिचय दैत अछि, तँ दोसर दिश ओहि वर्गकें सुचिन्तित विरोधक प्रेरणा आ ललकार सेहो। अनिरुद्ध बाबू रामपुर गामक सामन्ती संस्कारक उच्च कुल-वंश, जाति-पाँजिक विशिष्ट लोक छथि। चारिम पनमे प्रगल्भा, कामातुरा स्त्राीक पति भेलाह। एक पुत्रावती पत्नीक स्वर्गवास, आ दोसर पत्नीसँ एक पुत्रा तथा एक पुत्राीक प्राप्तिक पश्चातहु तेसर विवाहक लोभ सम्वरण नहि क' सकलाह, अधेर होएबा धरि ओहि पत्नीकें पुष्पवती नहि क' सकलाह। स्वयं साठि पार क' कए मामिला मोकदमामे तल्लीन रहै छथि। खाएब-पीब, रास-विहार, ज'र-जमीन, म'र-मोकदमाक बाद समय बचै छनि तँ सर-कुटुमक आदर आ नवोढ़ा पत्नीक आज्ञा-पालनमे लगबै छथि। अपन कौलिक संस्कार आ पूर्वजक अकबालक गर्वसँ फूलल रहै छथि। एहिसँ बेसी हुनकर कोनहुँ आचरणकें उपन्यासकार महत्व नहि देलनि अछि। जमीन्दारी सन रुग्ण व्यवस्थाक एक वृद्ध या रुग्ण व्यक्तिकें एही तरहें कोनो नव चेतनाक कथामे उपेक्षा कएल जेबाक चाही छल। ÷गहरी मार कबीर की, दिल से दिया निकाल।' अतीत-व्यतीतक फेण्टेसीमे भोतिआइत आत्महीन लोककें वस्तुतः एहिसँ बेसी महत्व नहि देल जेबाक चाही। अन्ततः उपन्यासक पाठककें अनुमान तँ होउ, जे मानवेच्छाक प्रति अनुदार आ सम्वेदनहीन लोकक इएह दुर्गति होइत अछि। भौतिक सुखमे मुग्ध रहताह, मुदा पहाड़ी नदीक जीवन्त धारकें, कामेच्छाक ज्वालामुखीकें बान्हि क' रखताह। धिक्कार ... कुलानन्द अनिरुद्ध बाबूक पहिल स्वर्गीया पत्नीक एकमात्रा पुत्रा छथि। वयस करीब-करीब अपन छोटकी सतमाइक बराबर छनि। मूल कथाक विस्तारमे हिनकर उपस्थिति थोड़ेक सहायक भेल अछि। अपना समयक मेधाहीन छात्रा आ नाटक-नौटंकी कम्पनीक कलाकार-कलारिनीक संग बौआ कए ऊर्जस्वित जीवन समाप्त केलनि, आब गाममे पैतृक सम्पति कूटि कए भाँग आ विलासमे जीवन बितबै छथि। कायर, क्रोधी, आ अय्याशी प्रवृत्तिक पात्रा छथि। द्रौपदी सन सुशील स्त्राीक देवता छथि। स्त्राी जातिकें पुरुषक आश्रित आ गुलाम बुझै छथि। पत्नी तवाह रहै छनि। खून-खुनामय धरिक स्थितिमे पहुँचि जाइवला तामसी छथि। क्रोधमे किछु क' लेताह। नाच-नटुआमे लिप्त रहताह। देवकान्तक प्रति अपन सतमाइक अनुरक्ति नीक नइं लगै छनि। समाजक लोक तँ इहो कहबामे संकोच नहि करै छनि जे कुलानन्द अपन स्त्राीकें नैहर पठा क' सतमाइ संग रहै छथि। पिताक मृत्युक तत्काल बाद ओ सुशीलाकें अपन आश्रित बूझए लगलाह, हुनकर गहना जेबर बेचि कए अय्याशी करब हुनकर स्वभाव भ' गेलनि, मुदा सतमाइक उचितो खर्च पर आँकुश लगएबाक प्रवृत्ति आओर उग्र भ' गेलनि। लम्पट एहेन जे सुशीला संग तीर्थ कर' गेलाह तँ हुनकर आचरण देखि धर्मशालाक मैनेजर धरि सुशीलाकें कुलानन्दक लम्पटपनीक कथा कह' अएलनि। एकटा सामन्ती संस्कारक व्यक्तिक कुलमे आओर केहेन सन्तान होइतए! सम्पत्ति छलनि तँ पिता सामाजिक स्वीकृतिक संग लम्पटपनी केलकनि, समय बदलल तँ कुलानन्द ओकरा आओर विकृति धरि पहुँचौलनि। अइ उपन्यासमे राजकमल चौधरी जमीन्दार परिवारक सदस्य लोकनिकें ज्यामितीय आकृति पर ठाढ़ क' कए सामन्ती संस्कार, पंजी-प्रथा आ मिथिलाक स्थगित चिन्तन प्रणालीक धज्जी उड़ा रहल छथि। एहेन विकृत, वीभत्स रूप भरिसके कतहु भेटए। महानन्द, कुलानन्द, सुशीला--तीनू त्रिाभुजक तीन कोण पर ठाढ़ छथि। केन्द्रमे बैसल छथि स्वयं अनिरुद्ध बाबू, बेबस, लाचार, खानदानी पराक्रम आ कौलिक मर्यादाक गोबर गीजैत। आ बाहरमे ठाढ़ छथि देवकान्त। त्रिाभुज आ त्रिाकोण--दुनूसँ सम्वेदना, एक कोन पर अनुरक्ति, मुदा प्रवेश वर्जित, अमर्यादित...। विचित्रा हाल छल मिथिलाक! अशक्य अनिरुद्ध बाबू केन्द्रमे रहितहु, कतहु नहि रहलाह। अनिरुद्ध बाबूक देहावसान होइतहि जमीन्दारी पालो थमै लेल कुलानन्द केन्द्र दिश लपकै छथि। त्रिाभुज टूटि जाइत अछि, मुदा देवकान्त तथापि बहरइए रहि जाइ छथि। एकटा क्रोधी, नशेरी आ लम्पट पतिक पत्नी द्रौपदी कतहु नहि छथि, किछु नहि छथि। ई मिथिलाक आदर्श आ मर्यादा छल, जकरा, राजकमल चौधरी जीवन लेल अयथार्थ मर्यादा साबित केलनि। नायक देवकान्त सुशिक्षित, निविष्ट, कर्मनिष्ठ आ ज्ञानी युवक छथि। हाइ कोर्टमे कार्यरत विशिष्ट व्यक्तिक पुत्रा आ प्रतापी रईसक पौत्रा छथि। कलाप्रेमी, कलाकार, प्रतिष्ठित, साहसी, उदार आ परोपकारी। सुशीलाक रुग्न पति अनिरुद्ध बाबूक टूटल गाड़ी कमलदहमे फँसल छलनि, ओ लोकनि के छथि, तकर सूचना देवकान्तकें नहि छलनि, तथापि हुनका सहयोग देब; सुलतानगंजमे नाहसँ डूबैत दम्पतिकें बचाएब; कुलानन्दक संग सुशीलाक प्रवासक जानकारी रहितहु, हुनका आर्थिक सहयोग देब -- ई सब आचरण देवकान्त उदारता आ मनुष्यताक परिचायक थिक। एकर अलावा देवकान्तक गम्भीर आ जिद्दी स्वभावक चित्राण सेहो भेल अछि। मुदा देवकान्तक जिदसँ हुनकर अपन जे किछु बिगड़ि गेल हो, आनक किछु नहि बिगड़लनि। परंच मूल बात अछि सुशीला आ देवकान्तक अनुरक्तावस्थाक मनोविश्लेषण। अइ विश्लेषणमे उपन्यासकार सहजहिं चमत्कृत करै छथि। अइ अनुरक्तिक कथाकें माँसल आ उन्मादक बना क' पाठकक कामेच्छा आ कुत्सा बढ़बै लेल नहि; समाज व्यवस्थामे चलैत अयथार्थ आदर्श आ मर्यादाक प्रति पाठक/भावककें उद्वेलित करै लेल। एहि चित्राणमे राजकमल चौधरीक मनोविश्लेषणात्मक शिल्प अत्यन्त प्रभावकारी साबित भेलनि अछि। उपन्यासतँ मानव जीवनक यथार्थक आख्यान होइत अछि, जाहिमे घटना चक्र आ स्थान-काल-पात्राक आश्रय लेल जाइत अछि। मूल कथाक संग-संग कतोक आनुषंगिक कथा अबैत अछि आ अइ सब क्रियामे चरित्रा-चित्राणक अमूल्य योगदान होइत अछि। चरित्रा-चित्राणेक माध्यमे कथानकमे प्रवाह अबैत अछि आ लक्ष्य प्राप्तिक बाट सोझराइत अछि। उपन्यासक पात्राक चारित्रिाक फलक जतेक सोझराएल रहत, ओकर अभिक्रिया आ आन पात्राक संग कथोपकथन स्पष्ट आ गत्यात्मक हैत। जें कि कोनो व्यक्तिक एक-एक आचरण ओकर मानसिक हैसियतक परिचायक होइत अछि, चरित्रा चित्राणमे मनोविश्लेषणक महत्व सर्वोपरि होइत अछि। स्वातन्त्रयोत्तर कालक भारतीय साहित्यमे एहेन देखल गेल अछि जे रचनाकार लोकनि अपन हरेक पात्राक आचरण ओकर मनोविश्लेषण करैत अंकित केलनि अछि, राजकमल चौधरी अइ काजमे सर्वाधिक अग्रगामी, प्रयोगधर्मी आ नवतामूलक साबित भेलाह अछि। चरित्रा चित्राणक प्रसंग प्रेमचन्द सेहो एहि तथ्यक समर्थन दै छथि जे चरित्रा चित्राण जतेक स्पष्ट, गतिशील आ विकासमान रहत, उपन्यास ओतबे बेसी प्रभावकारी हैत। प्रेमचन्द इहो स्वीकारलनि जे मनोवैज्ञानिक सत्यक आधार पर कथा उत्तम कोटिक हैत। राजकमल चौधरीक सम्पूर्ण कथा संसार तँ मनोविश्लेषणसँ भरल अछि, आलोच्य उपन्यास ÷आदिकथा'क तँ मूल आधारे मनोविश्लेषण अछि। कहै लेल ई कथा सुशीला आ देवकान्तक प्रेम कथा थिक, मुदा दू मेसँ एको कखनहुँ किनकहु मुँह फोड़ि कए नहि कहलखिन जे हम अहाँसँ प्रेम करै छी। सौंसे समाजमे केओ ई नाहि घोषित केलनि जे दुनूमे प्रेम अछि। समाज, आ कि कुलानन्द, आ कि हरिनगर वाली (अनिरुद्ध बाबूक दोसर पत्नी, सुशीलाक माँझिल सौतिन, महानन्दक माइ, कुलानन्दक सतमाइ) अइ अनुरक्तिकें मोने मोन छिनरपन मानलनि। मुदा, ई कथा एकटा दुखान्त प्रेम-कथा थिक। सम्पूर्ण कथा सबहक मोनेमे बनैत, बढ़ैत रहल। पात्राक व्यक्तित्व, प्रवृत्ति, क्रिया-कलाप, रागात्मक मनोवेग आदिक चित्राणसँ घटना चक्र, परिस्थिति आ परिवेश सुगठित आ प्रभावकारी भेल अछि। पात्राक इच्छा-अनिच्छा, पसिन-नापसिन, क्रोध-घृणा-प्रेम, राग-अनुराग, भोगेच्छा आदिसँ कथानकमे स्वाभाविकता आ विश्वसनीयता आएल अछि। कोनो मनुष्य प्रेम करए, घृणा करए, मारि करए, समर्थन आ विरोध करए, पूजा करए, व्याभिचार करए--ई सबो टा आचरण ओकर जीवन दर्शनसँ निर्धारित होइत अछि, जकर जानकारी ओकर मनोविश्लेषणसँ भेटैत अछि। परिवेश, प्रशिक्षण, संस्कार, प्रतिभा, अनुभव आदिक समन्वित प्रभावमे कोनो व्यक्तित्व अपन जीवन दर्शन दिढ़ करैत अछि; मुदा मनुष्य जाति जें कि सामाजिक पशु थिक, कतोक परिस्थितिमे ओकर समस्त जीवन-दर्शन विवश भ' जाइत अछि। मनोविज्ञान कहैत अछि जे कोनहुँ क्रियाकें निष्पादित करबामे कर्त्ताक धारणा महत्वपूर्ण होइत अछि। मनुष्यक आजन्मक संस्कार, अतीतक समस्त बिसरल घटना, जीवन भरिक अनुभूति ओकर अवचेतनमे विराजमान रहैत अछि, समय पाबि कए ओएह सब बात ओकर प्रवृत्ति, आचरण आ धारणाकें निर्देशित करए लगैत अछि। आदिकथा उपन्यासक विभिन्न चरित्राक मनोविश्लेषणमे ई समस्त तत्व प्रभावी अछि। एहि उपन्यासक रचनाकाल धरि भारतीय स्वाधीनताक एक दशक बीत चुकल छल। मुदा मिथिलाक लोक--की पण्डित, की मूर्ख; की सामन्त, की मजूर...आदिम सभ्यताक मानसिकतामे जी रहल छल। पुरुषवादी अहंकारक एहेन फोंक प्रदर्शन तँ आदिमो युगमे नहि छल, जतए स्त्राीकें बच्चाक जन्म देब' बला मशीन; पुरुषक कामेच्छा अथवा कुत्सा शान्त कर' बाला यन्त्रा; घर-अंगना सम्हार' वाली परिचारिका; आ पुरुषक मुँहें प्रशंसा सूनि पुलकित रह' वाली पोसुआ पशुक अलावा आओर किछु नहि बूझल जाइत हो। आसुरी भोग-विलास आ ढोंग-पाखण्ड-अन्धविश्वास-धर्मभीरुताक प्रवंचनामे सौंसे मिथिला डूबल छल। जखन कि सौंसे देशक प्रगतिशील समाजमे जीवनक जटिलता, विचित्राता पर चिन्तन-मनन फैलसँ भ' रहल छल। लोक आधुनिक भावबोधसँ जीवनकें देखए लागल छल। मानव जीवनक उज्ज्वल आ कलुष भाव पर तुलनात्मक चिन्तन होअए लागल छल। एहना समयमे मैथिलीमे प्रभावकारी उपन्यास लिखबाक एकहि टा शिल्प भ' सकै छल--से छल मनोविश्लेषणात्मक चरित्राांकनसँ वस्तु स्थितिकें नाँगट करबाक कौशल। हमरा मनोविश्लेषण केने हरिमोहन झा ÷कन्यादान'मे मैथिलक विदूषकीय आचरणक धज्जी उड़ा देलनि, मुदा मैथिल लोकनिकें ओहेन प्रहारक व्यंग्य, हास्य बुझेलनि। आचार्य प्रवर लोकनि उदारतापूर्वक हुनका हास्य सम्राटक उपाधि द' देलखिन। वस्तुतः ÷आदिकथा'क कथ्यो एहने अछि जे मनोविश्लेषणक अलावा दोसर कोनो सरिआएल बाट ताकलो नहि जा सकै छल। यौवनक अटट दुपहरियामे कोनो स्त्राीकें निश्चित रूपें कोनो सम्पूर्ण पुरुषक छाहरि चाही; पुष्पवती-फलवती हेबा लेल आतुर अथवा मुदित-पुलकित हेबा लेल उत्सुक-उत्फुल्ल कोनो हरियर लताकें कोनो मजगूत डारिक आसरा चाही। सुशीला एहने उत्तप्त स्त्राी आ एहने अलसाएल लता छथि; हुनका देवकान्त चाही छलनि मुदा अनिरुद्ध भेटलखिन; चाननक गाछ चाही छलनि, मुदा भाँटि-भँगरैया भेटलखिन। स्त्राीक जीवनमे अर्थसँ बेसी सार्थक बहुत किछु होइत अछि, से बात मैथिल प्रतिनिधि अनिरुद्ध, हुनकर स'र-कुटुम, सम्बन्धी-सरोकारी नहि बूझि रहल छलखिन; एते धरि जे कुलानन्दोकें तकर खाहिस नहि भेलनि। गम्भीरतापूर्वक देखल जाए तँ अइ उपन्यासक अधिकांश घटनाचक्र चरित्राक मोनहिमे घटित भेल अछि। सभ क्यो अपन मन्तव्य संकेतहिमे व्यक्त केलनि अछि, किनकहु धारणा स्पष्ट बोलीमे स्पष्ट नहि भेल अदि। अनिरुद्ध बाबू सन अशक्य आ वृद्ध जमीन्दारक भौतिक सम्पदा, सांसारिक असार-पसार, सतौत सन्तानक कारणें बेटा, पुतोह, धी, जमाइ, नाति-पोतासँ भरल-पुरल घर पाबियो कए कामदग्धा सुशीला अतृप्त छथि। अतृप्त कामेच्छाक दमन हेतु हफीमक सेवन करए लगै छथि। उत्तेजनामे कएल आचरणक सूचना पाबि लजा जाइ छथि, कामातुरा प्रवृत्तिक होइतहु सामाजिक आदर्श आ कौलिक मर्यादाक पालनमे अपनाकें ध्वस्त करैत रहै छथि, नहुँ-नहुँ जरबैत रहै छथि। रुग्ण पति संग यात्राा करैत अचानक देवकान्तसँ भेंट होइ छनि। देवकान्तक यौवन, स्वास्थ्य, पराक्रम, कला प्रेम, उदारता आ सौहार्द देखि हुनकासँ मोने प्रेम करए लगै छथि। परम शिष्ट, धीर, प्रशान्त सुशिक्षित, उदार आ दृढ़ प्रतिज्ञ देवकान्त मोनमे सेहो प्रेमक तरंग अहिना उठैत अछि। आ, दुनूक प्रेमांकुर तीव्र गतिसँ पसर' लगैत अछि। मुदा जहिना दुनूक मामि-भागिनक सम्बन्ध-कथा सुनिश्चित होइत अछि। प्रेमक उद्वेग भीतरे-भीतर सुनग' लगैत अछि। किन्तु प्रेम होइत अछि आगि, ओकरा पर काँच-कोचिल जते झाँपन देल जाए ओ आओर तीव्रतासँ, अधिकाधिक उत्तापसँ प्रज्ज्वलित होइत अछि। पे्रमक ई तीव्र उत्ताप सामाजिक मर्यादाक जर्जर सूत्राक कारणें अन्नतः सुखान्त परिणति धरि नहिएँ पहुँचैत अछि। मुँह फोरि कए अइ प्रेमाभिव्यक्तिक अवसर धरि दुनूकें हाथ नहि अबै छनि। दुनू भीतरे-भीतर सुनगैत रहै छथि। मनोविश्लेषणक आधार पर दुनूक आचरणमे देखल जा सकैत अछि जे दुनूक मोनमे आगि कोन गतिसँ धधकि रहल अछि। सौन्दर्यक प्रति आकर्षण मनुष्यक स्वाभाविक आचरण होइत अछि। चाहिओ क' कोनो व्यक्ति सौन्दर्यक उपेक्षा नहि क' सकैत अछि। सौन्दर्य बोध, आ अनुरक्ति कर्मक अपन शास्त्रा आ विधान होइत अछि, जे अलग-अलग प्राणीक आन्तरिक-बाह्य परिस्थिति आ मनोदशासँ निर्देशित होइत अछि। भूखसँ व्याकुल कोनो बरदकें लहलहाइत घास, आ कि सूखल नार-पुआरमे सौन्दर्य भेटतै, अनुरक्ति हेतै। मुदा घास अथवा नार-पुआरक घेराव, आ कि बरदक गरदनिक पगहा, आ कि मुँहमे लागल जाबी...अइ भोगक बाधक बनि सकैत अछि।...सुशीला परम सुन्दरी छथि। वयस, तदनुकूल सौन्दर्य, यौवन, आचरण, ओज, भाव आदि भादबक बाढ़ि जकाँ, उमड़ैत मेघ जकाँ उपरौंझ क' रहल छनि। ब्राह्म मूहूर्त्तमे निश्चिन्त निद्रा आ अलस मुद्रामे हुनका सूतल देखि देवकान्त दिव्य-दर्शनक अनुभव केलनि। नारी-सौन्दर्यक एहन दिव्य-दर्शन हुनका जीवनक पहिल अवसर छल, एकटा सुमधुर स्वप्न छल। वस्तुतः --हृदय कोनो सीमा-बन्धन नहि मानै'ए। कहियो नहि मानि आएल अछि।-- देवकान्तक मोनमे प्रेमक लहरि उमड़ैत रहै छनि। सुशीला मामीसँ भेंट करबाक इच्छा होइत रहै छनि, तै ले' मातृक (रामपुर) जाए पड़तनि। मुदा रामपुर नहि जेताह। इच्छा होइ छनि, मुदा अपनहि इच्छासँ भय होइ छनि। मातृक-पैतृक मर्यादा पर, अथवा सुशीला मामीक शील पर, अथवा अपन व्यक्तित्व पर आँच लागि जेबाक भय होइ छनि। मोने-मोन सुनगैत रहै छथि, मुदा मातृक जा क' सोझाँ-सोझी सुशीलाकें कहि नहि अबै छथि--मामी, सोना मामी, हमरा अहाँसँ प्रेम भ' गेल अछि। हम अहाँ बिना नहि रहि सकब। अहाँ सन ऊर्वर ऊर्जस्वित, उत्तेजनामयी, कामातुरा रूपवतीक वेगमय ज्वारकें हमर वृद्ध, अशक्य मामा नहि थाम्हि सकताह, हम थाम्हि लेब। अहाँ हमरा संग चलू। संग-संग रहब। जीवनकें जराएब नहि, स्वाहा नहि करब, जीब...। भय होइ छनि। मर्यादा आ सामाजिक आदर्शक। आदर्श आ मर्यादा रक्षाक चपेटमे जरैत रहबाक ई उत्कट विवरण वस्तुतः पाठकक मोनमे अइ अयथार्थ आ फोंक परम्पराक प्रति घृणा उत्पन्न करैत अछि।...तुलना करैत देखी तँ अइ मामिलामे सुशीला मुखर छथि, देवकान्त परम लजकोटर, संकोची आ डरपोक छथि, सुलतानगंजमे अजगैबीनाथ मन्दिरक सीढ़ी चढ़ैत एकहि संग सुशीला सोचै छथि कहुना पण्डाक मँुहसँ बहराए जे ÷पति-पत्नीक ई जुगल जोड़ी अमर हो', मुदा देवकान्त भयभीत छथि जे जँ पण्डा एहेन बात कहि देलक तँ लाजें मारि जाएब।... सम्पूर्ण उपन्यासमे एहेन प्रसंग कतोक बेर आएल अछि, जतए देवकान्त संकोची आ सुशीला मुखर बुझाइ छथि। उपन्यासकारेक पंक्तिमे कही तँ वस्तुतः --सुशीलाक जीवन भेलइन, समुद्रक मिलनाकांक्षामे मग्न तीव्रगामिनी गंगाक जीवन। देवकान्तक जीवन भेल, अशान्त चिरप्रतीक्षा विमग्न, तरंगायित किन्तु बाह्यरूपें परम अचंचल समुद्रक जीवन। दुन्नू जीवन एक अबहू आशाक पातर तागसँ बान्हल...उपमा देबाक ई कौशल परम व्याख्येय आ परम प्रशंसनीय अछि। दरअसल अइ कथामे पात्रो टा नहि, प्रेम शास्त्राक सूक्ष्मतम मनोविज्ञानक चित्राण सेहो अत्यन्त व्यापक, चमत्कृत आ प्रभावकारी रूपें भेल अछि। देवकान्त सोना मामीसँ तते बेसी प्रेम करए लागल छथि, जे आओर ठाम ओ जते बेसी व्यावहारिक आ बुद्धिमान होथु, अइ प्रेम-कथामे अत्यन्त डरपोक, तर्कवादी आ संशयवादी भ' गेल छथि। सौंसे कथामे सुशीलाक समर्पण, सुशीला पर अपन अधिकार, समर्पणक संकेत आ आदर्श-मर्यादाक गुणा-भाग करैत रहि जाइ छथि। खन सोचै छथि जे सुशीला पर हुनकर की अधिकार छनि? फेर सोचै छथि, अधिकार नहि छनि तँ अपन बीमार पतिकें छोड़ि, हुनकर सेवा-सुश्रूषा लेल ओ किऐ पहुँचि गेलीह? खन सोचै छथि--नारी कोनो पुरुखसँ प्रेम नइं क' सकइए? एक पुरुख पर विश्वास नइं क' सकइए? की नारी मात्रा छलना थीक?--ओना विरह आ व्यथाक उद्रेकमे एहि तरहक बात कोनो व्यक्ति जँ सोचि लिअए तँ तकरा स्त्राीक प्रति अमर्यादित धारणा नहि बुझबाक थिक। ओ स्वयं एकर उत्तर दै छथि जे सोना मामीक आचरण मिथिलाक ÷सभ्यता, संस्कृति, परम्परा आ धर्मक एकटा परम उदाहरणक अभिव्यक्ति' थिक। ÷सोना मामी पूर्णतः भारतीय सम्पूर्णतः मैथिल नारी छलीह... जे अपने टूटि जाएत, मुदा, परम्पराक पातर सँ पातर तागकें नइं तोड़त...।' अलगसँ कहबाक प्रयोजन नहि जे कोनो प्रवृत्ति, आचरण आदिकें राजकमल चौधरी जातिवादी, सम्प्रदायवादी अथवा लिंगवादी नहि मानै छथि। एक दिश सोना मामीक प्रति एतेक उच्च धारणा रखै छथि दोसर दिश अपन मामक दोसर स्त्राी हरिनगरवालीक कनबाक कला देखि सोचै छथि--कहब असम्भव अछि जे हरिनगरवाली कानि रहल छलीह, अथवा अभिनय कए रहल छलीह, नाटक पसारि रहल छलीह। प्रत्येक मैथिल-स्त्राी जकाँ इहो कानब-शास्त्रामे पूर्ण सुरक्षा, पारंगता छथि। ओहुनाँ कानब-खीजब, घाना पसारब, नाटक करबाक अभ्यास सभ स्त्राीकें रहइ छइ। स्त्राी चाहे इन्द्रजीत मेघनादक, शव लग विलाप करइत दानव कन्या सुलोचना सुन्दरी हो, अथवा अर्जुन पुत्रा अभिमन्युक शव लग विलाप करइत पाण्डव कुलवधू उत्तरा-सुन्दरी, सभ स्त्राीकें कानब अबइ छइ, कलात्मक ढंगसँ रुदन करए अबइ छइ। अइ उपन्यासमे जतबे विविधता पुरुष पात्रामे अछि, ताहिसँ कनेको कम स्त्राी-पात्रामे नहि अछि। मुख्य स्त्राी पात्रा सब छथि -- सुशीला, हरिनगरबाली (अनिरुद्ध बाबूक तृतीया आ द्वितीया), द्रौपदी (कुलानन्दक पत्नी)। हरिनगर वालीक उपस्थिति सौंसे उपन्यासमे ओहने कुटिल आ नाटकीय अछि, जकर चर्चा उक्त उद्धरणमे अछि। मैथिल स्त्राीक समस्त दुर्गुण हिनकर आचरणमे भरल छनि। फूटल ढोल, बिन पेनीक लोटा, चुगलखोरनी, भाभट पसारैमे दक्ष, सौतिनकें दुष्चरित्राा साबित करबामे तल्लीन स्त्राी छथि, हरिनगरवाली। सौतिया डाह, दुष्ट स्त्राीक आचरण, दोसरकें बदनाम करबाक नेतसँ एकसँ एक दुर्वृत्तिक कल्पना आ आरोपन मिथिलाक कतोक स्त्राीमे पाओल जाइत अछि, सौतिया डाहमे तँ ई कला आओर निखरि उठैत अछि। हरिनगरवाली सुशीला पर कलंक मढ़ै छथि--धरमपुरवाली त डाइन अछि, डाइन! गाछ हँकइए!...दुइयो दिन भिन्न भेनाँ नइं भेल छलइ आ स्वामीकें खा गेल...आब सुतन्त्रा भए गेल अछि...खूब छिड़हड़ा खेलाएत... भागिनक संगे पटना-दिल्ली करत...के रोकइबला छइ...कुलानन्दो त' तेहने छथि। अपन स्त्राीकें नैहर पठा देलइन...आब सतमाइक सेवामे रहइ छथि।--एहेन अश्रद्ध आ अवांछित गारि बर्दाश्त कइयो क' सुशीला कोनो तरहें विचलित नहि होइ छथि। विपरीत परिस्थिति अएला पर मिथिलाक बुझनुक स्त्राी सागर सन गहींर आ गम्भीर भ' जाइ छथि। सुशीला बड्ड गहींर आ बड्ड गम्भीर स्त्राी छथि। समयक उतार-चढ़ाव आ हवा-पानिक रुखि निके ना बुझै छथि। उपन्यासकार अइ उपन्यासमे हुनकर इएह छवि प्रस्तुत कएने छथि। सामाजिक बन्धन आ वैयक्तिक क्रूरता वस्तुतः एते कठोर होइत अछि, जे बिना कोनो दया-धर्मक ओ फूल सन कोमल इच्छाकें मोचारि क' राखि दैत अछि। कुटिल आदर्शसँ भरल सामाजिकता इएह थिक, जाहिमे मानवीय सम्वेदनाकें अक्षुण्ण रखबाक तर्क ताकब व्यर्थ थिक। आदि कथाक इतिवृत्ति एकर उदाहरण थिक। सुशीला अइ कथाक आधार चरित्रा थिकीह। कथाक आरम्भमे जखन देवकान्त आदर्श, मर्यादा, प्रतिष्ठा, पाप-पुण्य, नेत-नियम सभसँ डेराएल मामि संगें प्रेम निवेदनमे संकोच करै छलाह; समस्त उत्कट आकांक्षाक अछैत इत-उतमे फँसल छलाह; सुशीला चारि डेग आगू बढ़ि कए मुखर भेलीह; आ अपन कतोक आचरणसँ पूर्ण समर्पणक कतोक संकेत स्पष्ट रूपें देलनि। मुदा विधवा भेलाक बाद कौलिक परम्पराक अनुकूल हुनकर सतौत बेटा कुलानन्द हुनक रक्षक, प्रतिपालक भेलखिन; आ सुशीलाक भावना, मनोवेग, आन्तरिक इच्छा, साहस सब पर सामाजिक अयथार्थ आदर्शक बन्धन विजय प्राप्त क' लेलक; ओ कुलानन्द संग रहि कए अपने टुटैत रहलीह, जर्जर मर्यादाक पातर सूतकें नहि तोड़ि सकलीह। वृद्ध, अशक्य जमीन्दार अनिरुद्ध बाबूक तेसर पत्नी सुशीला अनिन्द्य सुन्दरी छथि; आ दावानलक ज्वाला सन, अथवा समुद्री तूफान सन, अथवा भदबरिया कोसीक प्रवाह सन वेगमय यौवनक स्वामिनी छथि; अइ वेगकें सम्हारि सकबाक सामर्थ्य हुनका पतिमे नहि छनि। देवकान्तक यौवन, शिष्टता, सौन्दर्य आदि देखि ओ हुनका दिश अनुरक्त भेलीह। एहि अनुरक्तिमे अभिलाषा दैहिके टा नहि, प्रेमक आदर्श स्वरूप सेहो अर्थवन्त छलनि। इमानदारीसँ देखी तँ एहि उपन्यासमे राजकमल चौधरी द्वारा सृजित कथाक नायिका सोना मामी, अर्थात् सुशीला सन स्त्राी; कोनो कल्पना-लोकक स्त्राी नहि छथि, समाजमे एहेन कैकटा सोना मामी ओहि समयमे अही विवरणक संग भेटि सकै छलीह; एहेन स्त्राीक मनोविश्लेषण कोन मनोवैज्ञानिक करत? सुशीलाक जीवन की छल? सुन्दरि, स्वस्थ, जवान, साहसी, बुझनुक, सच्चरित ... की छथि सुशीला? एक दिश देवकान्त सन समुद्रमे मिलनक आकांक्षामे मग्न तीव्रगामिनी गंगा छथि; देवकान्तकें पैघ-पैघ प्रेमाभिसिक्त पत्रा लिखै छथि; अपन अनेक आरचरणमे अनुरक्तिक संकेतो दै छथि; रुग्ण पतिकें अस्पतालमे छोड़ि देवकान्तक परिचर्यामे पहुँचि जाइ छथि; हफीम खएलासँ अथवा कामोन्मादसँ बेहोश हएबाक कथा अपन प्रेमी देवकान्तसँ नुकएबाक प्रयास करै छथि। वृद्ध पति अनिरुद्ध बाबूक प्रति पूर्ण समर्पणक भाव स्पष्ट करै छथि। हुनका रुग्णावस्थामे देखि गाड़ी-बरद पर लादि अस्पताल ल' जाइ छथि; पति जखन अपना लेल वृद्ध वयसक चर्चा करै छथिन तँ विरोध करै छथि-- ÷सै बेर अहाँकें कहि देलऊँए, हमरा सोझाँमे अपनाकें वृद्ध नइं कहल करू...।' अर्थात अपन जवानी पर एतेक आत्मगर्विता जे वृद्ध पतिक पत्नी नहि कहाबए चाहै छथि। वैधव्य प्राप्तिक पश्चात जखन सतबेटा कुलानन्द संग तीर्थवासमे जाइ छथि, तँ धर्मशालाक मैनेजरक मुँहें अपन उच्छृंखल सतबेटाक अनाचारक कथा सुनि कुपित होइ छथि आ मैनेजरकें धोपि कए विदा करै छथि। देवकान्त जखन बलजोरी अपन बासा पर आनि लै छथिन, तँ एकहि संग प्रतिवाद आ विलाप करै छथि।... एकटा सच्चरित्रा स्त्राीकें मर्यादा आ मनोवेगमे; जीवनक सार्थकता आ सामाजिक आदर्शमे तालमेल बैसब'मे कोन-कोन यातना भोगए पड़ै छनि -- एकट अनुमान कते कठिन अछि! सुशीलाक जीवनक पर्यवस्थिति पर उपन्यासकार नशेरी, विलासी, कुलानन्दक विचार व्यवस्था अत्यन्त सटीक आँकने छथि। सुशीला जखन बेहोश भेलीह, आ लोक हल्ला केलक जे ओ आत्महत्याक निमित्त माहुर खा नेने छथि, तखन सद्पात्राक कोटिमे नहि रहलाक अछैतो भाँगक निशाँमे भसिआएल सुशीलाक सतौत बेटा कुलानन्द, जे हुनकर समवयसी छथिन, सोचै छथि--किअए नइं सुशीलाकें मरि जाए दिअनि? जीबिए कए ओ कोन सुख काटि रहल छथि? जीवनक कोन आशा, कोन इच्छा कोन आवश्यकता आइ धरि हुनका पूर भेल छनि? आबे कोन पूर हेतइन? एहेन अपूर्व सुन्दरी छथि, जेना साक्षाते सरस्वती अथवा लक्ष्मी रहथि। मुदा, भाग्य केहेन दैबक मारल। एकटा बेटा-बेटी नइं छनि, जे तकरे मूँह देख कए जीबि लितथि।... सतमाय बाँचि कए की करती...? कुलानन्द सन कुपात्राक मोनमे जाहि स्त्राीक प्रति एते व्यथा छनि, तिनका मादे ओहि कालक समाजकें आ सामाजिक मर्यादाकें कोनो दरेग नहि भेलनि। जेना कि पहिनहुँ कहल गेल, एहि पाछू मिथिलाक सामाजिक पर्यवस्थितिक पैघ योगदान छल। राजकमल चौधरी सेहो कथाक पृष्ठभूमिक संकेत दैत सूचना देने छथि जे मिथिलाक लोककें कथा एखनहुँ मोन छै जे एक दिश बंगालक तुर्क नवाब आ दोसर दिश दिल्लीक फिरोजशाह तुगलकक सेना मिथिलाकें घेरि कए सब वस्तु अपहृत, बलत्कृत करै छल। दिल्लीक सेनाक, बंगाल-आसाम-जएबाक बाट आजुक सहरसा-पूर्णियाँ छलै। बंगालक नवाबी पलटन बिहार, अवध आ दिल्ली दिश धावा देबा लेल अही बाटें जाए। अइ इलाकामे कोनो पैघ युद्ध कहियो नहि भेल मुदा बंगालक नवाबी सल्तनत आ दिल्ली शासनक संघर्षसँ सर्वाधिक हानि अही क्षेत्राकें भेलै। जीतल सिपाही प्रसन्नताक आवेगमे इनार पर पानि भरैत ग्रामवधूकें उठाकए घोड़ा पर चढ़ा लिअए; हारल सिपाही दुखक उद्वेगमे खरिहानमे काज करैत किसानकें तरुआरिसँ छपाठि दिअए। पराजयक पीड़ा आ विजयक उल्लास अइ क्षेत्राक जनताकें बिना कोनो युद्धमे गेनहि भेटल छै। अइ क्षेत्रामे यायावरी संस्कृति, बताह निश्चिन्तता, ग्राम देवी पर अथाह भरोस, जीवनक प्रति उन्मुक्त आलस्य भाव अही कारणें विकसित भेल; आ से उत्तरोत्तर एक पीढ़ीसँ दोसर पीढ़ीमे अबैत गेल। घनघोर आपद स्थितियहुमे अथाह निश्चिन्तता, धार्मिक आ ईश्वरीय शक्ति पर निश्चेष्ट मुदा दिढ़ आस्था, उत्कट आलस्य, भोजन-मैथुन-दरबारी वृत्ति दिश आसक्ति, चुगलखोरी, चाटुकारिता, दमित वासनाक विकृति, दुष्टाचारसँ भरल मनोवृत्ति, स्त्राी-जातिकें भोगक यन्त्रा बुझबाक प्रवृत्ति, शिथिल चरित्रा...सबो टा आचार मैथिल लोकनिकें अपन अही इतिहाससँ भेटल हो--से बहुत सम्भव अछि। सुशीला सन स्त्राीक कमी ओहि समय धरि नहि छल मिथिलामे। मुदा पर्यवस्थितिक की कएल जाए! प्रेमातुर सुशीला, देवकान्तक प्रति प्रेम निवेदनक कतोक संकेत भरि उपन्यासमे दैत रहलीह अछि। देवकान्त जखन मातृक अबै छथि, तँ घर-आँगनमे सभक समक्षे दुनूक सम्भाषण आ कथोपकथनमे ई स्पष्ट होइत अछि। देवकान्त बड़े चतुराइसँ ठोकि बजा क' अपन वक्तव्य दै छथि, मुदा सुशीलाक वाक्चातुर्य देवकान्तकें अनुत्तरित क' दै छनि। जखन देवकान्त कहै छथि -- ÷आब मामी जतबा दिन कहतीह, रामपुर रहि जाएब।' तँ सुशीला तत्काल देवकान्तक आँखिमे अपन दून्नू आँखि रखैत जवाब दै छनि--÷हम कहब जे भरि जन्म अही ठाम रहि जाउ त रहि हएत?' देवकान्त निरुत्तर भ' जाइ छथि। एक उखराहा बितलाक बाद हुनका जवाब सूझै छनि, आ तखन साँझमे आबि क' कहै छथिन -- ÷सत्त मोनसँ किओ ककरो राखए चाहत त' ओ कहिओ भागि नइं सकइ छइ।' अइ सम्भाषण पर सोना मामी लजाइ छथि; अपन समस्त जमा-पँूजी भागिनकें अर्पित करैत रहै छथि। ई समर्पण वस्तुतः महादेवक प्रति पार्वतीक सर्वस्वार्पणसँ कम प्रशस्त, कम पवित्रा, कम मूल्यवान नहि अछि। मुदा समाजक नजरिमे ई परकीया समर्पण थिक, अनाचार आ व्यभिचारक समर्पण थिक। समाजक नजरिमे सुशीला आ अनिरुद्ध बाबूक विवाह बर्बरता, अनाचार आ व्यभिचार नहि थिक। हाय रे मिथिला, हाइ रे मैथिल! मुदा समस्त चातुर्य, समस्त धैर्य, समस्त शीलक अछैत सोना मामी अपन मान-सम्मानक प्रति सावधान आ कतोक बेर उग्र सेहो देखाइ छथि। हफीम खएबाक हिनकर कथा जखन हरिनगरवाली देवकान्तकें सुनबए लगै छथिन, तँ सुशीला तामसें तरंगि उठै छथि, ज्वालामुखी जकाँ आगि-अंगोरा मुँहसँ निकल' लगै छनि; मुदा क्रोधमे प्रेमाधारकें कोनो तरहें आहत नहि करै छथि। शरबत पीबाक हिनकर आग्रह जखन देवकान्त नहि मानै छथिन, तँ ई अपमानित होइ छथि। चोटाएल नागिन सन उधिआइ छथि, मुदा देवकान्तकें आहत नइं करै छथि, लोटा गिलास फेकि कए क्रोध शान्त क' लै छथि। मिथिलाक स्त्राी जीवनक जतेक सूक्ष्म अध्ययन राजकमल चौधरीकें छलनि, आ हिनकर रचना संसारमे जतेक सूक्ष्म विवरण उपस्थिति अछि, हमरा जनैत कोनो स्त्रिायो एते सूक्ष्मतासँ ओहि मनोविज्ञानकें नहि पकड़ि सकल हेतीह। सुशीलाक विवरणमे तँ लगैत अछि लेखक अपन सम्पूर्ण कला लगा देने छथि। सम्पूर्ण कथामे सुशीलाक चरित्राक बहुमुख अंकित करैत कतहु एकटा खोंच-नोछाड़ नहि लागए देने छथि। जे सुशीला भागिनक प्रति एहि तरहें समर्पित छलीह जे पति-पत्नीक रूपमे अमर हएबाक आशीर्वाद चाहै छलीह, से पतिक देहावसानक पश्चात, कुलानन्दक आश्रित भ' गेलीह। कुलानन्दक कोनो बात पर ÷नइं' कहब बिसरि गेलीह। स्वामीक मुँहें कहियो वर्जना नइं सुननिहारि सुशीला, कुलानन्दक समस्त वर्जनाक पालन करए लगलीह।... सोनामामी संग देवकान्तक वार्तालाप, मानवीय मनोवेग, प्रेमपाशमे बान्हल दू व्यक्ति, आ सामाजिक मर्यादा, पारम्परिक सम्बन्धक खुट्टीमे जकड़ल मानवक मोनक उद्वेगकें रेखांकित करैत अछि। व्यवस्था आ मर्यादाक बन्धन आ मनोवेगक स्वच्छन्द-कामनामे कतहु एक आरि-खेत नहि होइत अछि। एहि दृश्यकें ÷आदिकथा'क घटना-सूत्रा रेखांकित करैत अछि। सुशीलाक एहेन चरित्राांकन मिथिलाक अयथार्थ आदर्श आ अव्यावहारिक मर्यादाकें नाँगट केलक अछि, एहिसँ रूढ़ि-पोषक लोकनि व्यथित जते भेल होथि, मुदा मैथिलीमे नव-चिन्तन पद्धतिसँ उपन्यास-कथा लिखबाक परम्पराक नव सूत्रापात भेल आ नव पीढ़ीक, नव दृष्टिक उद्योगसँ मिथिलाक ई बर्बरता समाप्त भेल--से प्रसन्नताक बात थिक। राजकमल चौधरीक दोसर उपन्यास थिक -- आन्दोलन। एहिमे नाटकीय शैली पर विशेष जोर अछि। मुदा उपन्यास इहो मनोविश्लेषणात्मके अछि। नाटकीय शैलीक गद्यमे मनोविश्लेषणक सुविधा ताकब आसान नहि होइत अछि, मुदा राजकमल चौधरीक कथा-कौशलकें ई सब सुविधा तकबामे कोनो तरद्दुत्त नहि होइ छनि। सुगठित शिल्पमे सामाजिक यथार्थक मौलिक चित्रा अंकित करब हिनकर रचनाक मूल स्वभाव थिक। व्यतीत आ वर्त्तमानक घटना-चक्रक आश्रयसँ सम्भाव्य दिश इशारा एहेन कौशलसँ करै छथि जे ओ रचना एकदम सहज आ नागरिक जीवनक दैनिक व्यवस्था जकाँ लगैत अछि। कथानक एकटा बेरोजगार युवक ÷कमल'क कलकत्ता महानगरमे रोजगार प्राप्ति हेतु प्रवेश आ कलकत्ता प्रवासक क्रममे उपस्थित विभिन्न दृश्यावलोकनक क्रमबद्ध नियोजन पर आधारित अछि। मूल कथा भाषा-प्रेमसँ ओत-प्रोत मैथिली आन्दोलनक विविध चरणकें रूपायित करैत अछि। विवरण-विस्तारमे एहि आन्दोलनक नग्न स्वरूप सोझाँ अबैत अछि। मैथिल जातिक मत-भिन्नता, ईर्ष्या-द्वेष, धोखाधरी इत्यादि अपूर्व कलात्मकतासँ चित्रिात भेल अछि। कथा-सूत्राक विस्तारमे पात्राक अवतारणा आ उपकथाक समावेश परम विश्वसनीय आ सहज यथार्थक संग भेल अछि। उपन्यासकारक कहब छनि जे आजुक मनुक्खमे तीन प्रवृत्ति मुख्यतः देखल जाइ'ए-- क्षुधा, आत्मरक्षा आ यौनपिपासा। एहन तीन प्रवृत्तिक चित्राांकन लेखकक प्रधान प्रयत्न रहल अछि। -- वस्तुतः एहि उपन्यासमे ई तीनू प्रवृत्ति बेस फरिच्छ भेल अछि। उपन्यासक पात्राकें जाहि जीवन्त रूपें रचनाकार एतए ठाढ़ कएने छथि, ताहिमे मैथिल चरित्रा आ मिथिलाक परिदृश्य पूर्ण विवरणक संग उपस्थित भ' जाइत अछि। राजकमल चौधरीक सृजन-कर्मक ई खास विशेषता थिक जे हुनका ओतए व्यक्ति आ व्यक्तित्व बड़े महत्त्वपूर्ण भ' उठैत अछि। व्यक्तिक जीवन-लीला, रहन-सहन, सोच-विचार, आहार-व्यवहारकें अंकित करैत ओ सम्पूर्ण परिदृश्य गढ़ि दै छथि। तें राजकमल चौधरी द्वारा सृजित चरित्राक मानसिक उद्वेग आ भौतिक करतब पर विवेकपूर्ण दृष्टि राखि ली, तँ हुनकर सम्पूर्ण रचनाक समालोचना भ' जाएत। हिनकर सकल पात्राक आचरण आ मनोवेग, ओकर आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, शैक्षिक, मानसिक हैसियतक परिचायक होइत अछि। कोन परिस्थितिक कोन मनोवेगमे मनुष्य कोन आचरण करै'ए--से पूरापूरी एतए व्यक्त होइत अछि। एहि तरहें चारित्रिाक विश्लेषण करैत उपन्यासक मर्मकें बेसी नीक जकाँ बूझल जा सकैत अछि। राजकमल चौधरीक सगरो रचना-विधानमे पात्राक सृजन आ चरित्राांकन स्पष्ट आ विलक्षण अछि, मनोविश्लेषण आधारित क्रिया-कलाप आ आहार-व्यवहार तार्किक आ समीचीन अछि। समस्त पात्राक जीवन-प्रक्रिया आ रहन-सहनमे मनोविश्लेषणक सुविधा छिड़िआएल रहैत अछि, जकर आधार पर ओकर अर्जित जीवन-दृष्टिक सूक्ष्म अध्ययन कएल जा सकैत अछि। कोनो व्यक्तिक चिन्तन-व्यवस्था कोन विवशता आ व्यवस्थामे निर्मित भेल; कोन क्रिया-कलाप ओ कोन परिस्थितिमे पूर्ण केलक-- से जानि सकबाक सुविधा मनोवैज्ञानिके धरातल पर स्पष्ट होइत अछि। चरित्राांकनक इएह उत्कर्ष आ इएह कौशल एहि उपन्यासक प्रभावकें वैराट्य दैत अछि। भाषा, विषय, विवरण, शिल्प...सब किछु मानवीय, सहज, सामाजिक, जीवन्त, प्रामाणिक आ विश्वसनीय! आन्दोलन उपन्यासक नायक ÷कमल' मिथिलाक सुशिक्षित, परम विवेकशील आ प्रतिभावान युवक छथि। आत्म-स्थापनक उद्देश्यें कलकत्ताक महानगरीय परिवेशमे बौआ रहल छथि। नीलू सन अल्प वयस किशोरी अथवा नवयुवतीक उन्मादित समर्पण अथवा अल्हड़ आमन्त्राण नकारि देलनि; मुदा वासनाक राक्षससँ मुक्ति पाब' लेल अन्हार आ बदनाम गली धरि चल गेलाह। आदर्श आ सद्पात्राताक प्रतिमूर्ति भुवनजी मातृभाषा आ मातृभूमिक प्रसार-प्रगतिमे तल्लीन छथि, मुदा कोनो खास कारणें हुनकहुमे विचलन आबि गेल छनि। निर्मला सन अत्याधुनिक सुकामा, सुवर्णा स्त्राी भुवनोजीकें हिला दै छनि। भुवनजीक पत्नी निरक्षरा आ कुरूपा छनि। निर्मला जी सन सुकामा स्त्राीक यौवन, रूप लावण्य, आधुनिक चटक-मटक पर हुनकर लहालोट हैब स्वाभाविक आ यथार्थ थिक। मानव सभ्यताक इतिहासक कहै'ए जे मनुष्य अपन विराट छवि ठाढ़ कर'मे तल्लीन रहै'ए, विराट भ' जाइ'ए, मुदा मानवीय कमजोरी ओकरा संग रहै छै। अइ उपन्यासमे उपन्यासकार भुवनजीक छवि अति विशिष्ट आ निविष्ट रूपमे ठाढ़ कएने छथि। मुदा जँ सएह टा रहितए, तँ भुवनजी कोनो दन्तकथाक नायक बनि जैतथि। समस्त वैशिष्ट्यक अछैत मानवोचित दुर्बलता रेखांकित क' कए उपन्यासकार वस्तुतः भुवनजी आ कमलजी--दुनूकें यथार्थसँ जोड़लनि अछि। सुशीला बहुगामिनी स्त्राी छथि, नित्य प्रति नव-नव पुरुखक बाँहिमे झूलए चाहै छथि। दोसर स्त्राी छथि सुशीला, ओहो अनेक पुरुखक संगें समागम करै छथि। मुदा तें, दुनू स्त्राी समान नहि छथि। पर-पुरुख समागम सुशीलाक विवशता छनि, अर्थोपार्जनक आधार छनि, जीवन-यापनक ठहार छनि, माइ-बाप संग अपन भरण-पोषण हेतु अन्न-वस्त्रा चाही। देहे टा पूँजी छनि, तकरहि भेजबै छथि, कूटि-पीसि गुजर करै छथि। मुदा निर्मलाक विवशता अर्थाभाव नहि छनि। ओ कामातुरा छथि। यौन-पिपासासँ व्याकुल रहै छथि। कोनो सम्पूर्ण पुरुखक सम्पूर्ण भोग लेल तत्पर रहै छथि। ... एकटा देह बेचै छथि, एकटा देह बिलहै छथि। एकटा आत्मबुभुक्षाक तृप्तिमे कोनो नैतिक-अनैतिक काज लेल तत्पर छथि, दोसर यौनपिपासा शान्त करबा लेल उताहुल। आन्दोलन उपन्यासक केन्द्र-बिन्दु थिक आत्मबुभुक्षा, यौनपिपासा, आत्मसुरक्षा। सत्य थिक, आ राजकमल चौधरीक मान्यता छनि, जे मानव जीवनक आदिम आवश्यकता इएह तीन होइत अछि। ओना मनुष्य की, प्राणी मात्राक आदिम प्रवृत्ति इएह तीन टा होइत अछि। शेष सभ प्रवृत्ति--ईर्ष्या, द्वेष, राग-विराग, लोभ-लालच, पक्ष-विपक्ष, झंझट-फसाद, खून-खुनामय... सब किछु लोक एतए आबि कए, जीवन जीबाक क्रममे विकसित करै'ए; उल्लिखित तीनू प्रवृत्ति मनुष्य जन्महिसँ संग नेने अबैत अछि। अही तीनू प्रवृत्तिक निपटानमे किओ अपन छवि कुतुबमीनार सन ऊँच क' लैत अछि, किओ अपन कुतुबमीनार सन छविकें सड़ल पानिक नाली बना लैत अछि। आन्दोलन उपन्यासकें अइ आलोकमे देखब समीचीन थिक। उपन्यास उत्तम पुरुषमे लिखल गेल अछि। कथानायक कमलजी जीवन-संग्राममे जुटल छथि, आत्म-स्थापनमे लागल छथि; भाषाई आन्दोलनमे अपनाकें बलिदानी घोषित केनिहार मैथिल लोकनिक समस्त र्छंिकें प्राथमिक आ मौलिक अनुभव जकाँ देखि-भोगि रहल छथि। मैथिल जातिक र्छंि-पाखण्ड, राग-द्वेष, वासना आ नपुंसकताकें, आ एहि वृत्तिकें छपा रखबाक मनुष्यक कौशलकें निकेनाँ चीन्हि रहल छथि; इएह कथानायक अइ उपन्यासक कथावाचक छथि। कलकत्ता महानगरमे जीवन-यापन करैत विभिन्न आय-वित्त आ बुद्धि-वित्तक प्रवासी मैथिलक क्रिया-कलापसँ परिचित छथि। निर्मलाजी आ सुशीलाजी जाहि वर्गक मैथिल स्त्राीक प्रतिनिधि छथि, ताहि दुनू वर्गकें निकटसँ देखने छथि। कमलजीक नजरिमे निर्मलाजी छथि क्लयोपैट्रा, रूपोद्धता, प्रति निशि नव प्रेमीकें साँपसँ कटबा क' मरबा दै वाली विकटकामा। सुशीला छथि निश्छल, निस्पन्द, क्रिया-शून्य, सभ किछु हेरएने बिसरएने रस्ता पर ठाढ़ि, जे केओ पुरुख आबए आ किछु टाका द' जाए! सुशीला छथि ओ नारी, जे नुका-चोरा क' नहि, धोखा-धड़ीसँ नहि, एकदम सफा-सफी अपन अस्तित्वकें बेचि रहल छथि! श्यामा नयनाभिरामा कुसुम-सुषमा-रंजिता सौख्यधामा नहि, देह पर मैल, फाटल साड़ी, ओछान पर पुरान, मँहकैत चद्दरि, आँखिमे निर्लज्जता, भाव-शून्य, निष्काम, पाथर बनि गेल पुतली। छिः छिः, सुशीला आ निर्मलाजीमे कोनो तुलना भ' सकैछ (आन्दोलन/पृ०. ३९)! राजकमल चौधरीक रचना संसार पर बहुतो गोटए बहुत तरहक बात कहलनि अछि। हिनकर औपन्यासिक-कौशल पर कतोक गोटएकें एकसूत्राताक अभाव देखेलनि।... समग्रतामे देखी तँ भारतीय नागरिक, अथवा मैथिल नागरिकक सम्पूर्ण जीवन परिदृश्य हिनका नजरिमे कौड़ी जकाँ जगजिआर अछि। सामाजिक जीवन व्यतीत करबा लेल संस्थापित समाज-व्यवस्था, भारतीय लोकतन्त्रा, मानवीय जीवन-पद्धति, जीवन-यापनक बुनियादी सीमा-शर्त, जिजीविषाक अपरिहार्य वृत्ति, मानवीय मनोवेग, मनुष्यक अभिलाषा, अस्तित्वक अविचल यथार्थ... सब बिन्दु, पर विरोधाभास आ विडम्बनाक जुलूस देखाइत अछि। राजकमल चौधरी अही जुलूसमे देखलनि जे सिद्धान्त आ व्यवहार, वचन आ आचरण, जीवन आ लेखनमे कोनो तरहक पारस्परिक सम्बन्ध-बन्ध, स्थापित नहि अछि। लोकतान्त्रिाक व्यवस्थामे मानवीय सम्वेदनाक रक्षा हेतु जे आचार संहिता घोषित भेल अछि; अथवा मिथिलाक नैतिक शिक्षामे जे पाठ पढ़ाओल गेल अछि; तकर अनुपालन अइ भाग्य विधाता वर्गक कोनहु टा आचरणमे नहि भ' रहल अछि; आ व्यावहारिक स्तर पर जे भ' रहल अछि, से मानवीय जीवन पद्धति लेल कोनो अर्थें उपयोगी नहि अछि। एहि विचित्रा विडम्बनाकें राजकमल चौधरी उठबैत रहलाह आ जस के तस रखैत गेलाह; अही कारणें हिनकर उपन्यास विडम्बनासँ भरल, परस्पर विरोधाभासी आचरणसँ भरल समाज-व्यवस्थाक चित्रा-खण्डक कोलाज लगैत अछि। पारम्परिक पद्धतिसँ शिक्षित-दीक्षित समीक्षक लोकनिकें जें कि राजकमल चौधरीक उपन्यास अथवा कथामे कथासार अथवा कथानक नहि भेटै छनि, तें हुनका लगै छनि, जे एहि रचनामे एकसूत्राताक अभाव अछि। एहेन समीक्षक लोकनिकें प्रौढ़ शिक्षा निदेशालय द्वारा नवसाक्षर लेल प्रकाशित कहानीक पोथी पढ़बाक चाही, जाहिमे समस्या, समस्याक कारण आ समस्याक समाधान खोंसैत कहानी लिखल जाइत अछि आ अन्तमे पूछल जाइत अछि--त' अहाँकें एहि कहानीसँ की शिक्षा भेटल? सत्य थिक जे वस्त्राक भीतर हरेक मनुष्य नाँगट होइत अछि। वस्त्रा पहिरैत अछि परदा लेल। ओना तँ सबहक सब बात लोककें बुझले रहै छै। हरेक सन्तानकें बूझल रहै जे हम अइ दुनियाँमे कोना एलहुँ आ हरेक माइ-बापकें बूझल रहै छै जे ओ अपन सन्तानक विवाह किऐ करौलनि अछि। मुदा एकटा मर्यादाक खुट्टी छै, जाहिमे सामाजिक पशु बान्हल रहैत अछि। स्वातन्त्रयोत्तर कालमे, आ एम्हर आबि कए त' आओर बेसी, ई बात लागू भ' गेल अछि। मनुष्यक भौतिक नग्नता पर नहि, मानसिक आ वैचारिक नग्नता पर। सब व्यक्तिक स'ब बात स'ब कियो जनैत अछि, मुदा स'ब व्यक्ति अपन ओहि समस्त आचरण पर, वृत्ति पर परदा देबा लेल कोनो ने कोनो नैतिक बातक परदा देब' चाहै छथि। कहि नहि, मनुष्य स्वयंकें ठकबा लेल एते बेसी बिर्त्त किऐ रहै छथि! दुनियाँक लोक तँ सबटा बात बुझिते रहै छै। मैथिली तँ आब संविधान स्वीकृत भाषा भ' गेल अछि, सन् १९५७मे, जहिआ ई उपन्यास लिखल गेल छल, से बात नहि छलै; मैथिली भाषाक अधिकार लेल खूब-बर्चा होइ छलै। प्रवासी मैथिल लोकनि शहर-शहरमे भाषाई समिति बनबै छलाह। ओही समितिक माध्यमे किछु गोटए अस्तित्व रक्षा करै छलाह, किछु अस्मिता निर्माण; किओ अपन राजनीतिक उत्थान करै छलाह, किओ अकादमीक उन्नति; किओ कुण्ठा मेटबै छलाह, किओ रास-विलास; मुदा थोड़े लोक लेल धन्न सन। किऐ तँ ओ भूखसँ व्याकुल रहै छल। कहाँ दन कुरुक्षेत्रामे भूख लगला पर गान्धारी अपन बेटा सभक लहासक ढेरी पर चढ़ि फल तोड़ए लागल छलीह। भूख, मनुष्यक विवेक आ सम्वेदनाकें एहि तरहें आन्हर करैत अछि। एहना स्थितिमे भाषाक लड़ाइ लड़' लेल के जाएत? सोलह आना सत्य वचन थिक जे हरेक एहि तरहक आन्दोलनमे मुख्य रूपें लोक अपन-अपन लड़ाइ लड़ैत रहल अछि। संयोग थिक जे ई भाषाई आन्दोलन छल। जँ नहिओ रहितए तँ लोक कोनो आओर बाट ताकि लितए, जेना एखन लोक ताकि रहल अछि। भारतीय स्वाधीनताक बाद भारतीय नागरिकक विवेक एते बेसी आत्मकेन्द्रित भ' गेल, जे ओ समस्त आन्दोलनमे अपनाकें जोड़ि कए अपन लिप्सा आ कुण्ठामे तल्लीन भ' गेल। अपन स्थान तकबामे आ सुरक्षित करबामे लीन भ' गेल। स्वातन्त्रयोत्तरकालीन भारतीय लेखक मनुष्य जातिक अही वृत्तिकें उजागर करबामे लागल रहलाह अछि। कलकत्ताक मैथिल समितिक भाषाई आन्दोलन, एहने आन्दोलन थिक, जाहिमे भुवनजी सगरो समाजमे बेस प्रतिष्ठित आ निविष्ट मानल जाइ छथि; मैथिल, मैथिली, आ मिथिलाक हित लेल बेस उदारतासँ काज करै छथि; लोक सब खूब मान-आदर करै छनि। मुदा ओएह लोक सभ जहिना सभा सोसाइटीक प्रेमिका, उदात-यौवना निर्मलाजीकें भुवनजी संग उठैत बैसैत देखै छथि कि सगरो मैथिल समाज चर्चा कर' लगैत अछि जे हुनकर अपन स्त्राी महान कुरूपा छथिन तें निर्मलाजीक आँचर कसि क' धएने छथि। नीलू, विष्णुदेव ठाकुर संग सिनेमा देखब पसिन नहि करै छथि, मुदा अन्हार रातिमे जखन देह व्याकुल करै छनि, तँ निर्वस्त्रा भेल कमलजीक अन्हार कोठलीमे पहुँचि जाइ छथि। सामाजिक यथार्थ आ दैहिक यथार्थक एहि तरहक निरूपण आन्दोलन उपन्यासकें ठोस, आ महत्त्वपूर्ण साबित करैत अछि। उपन्यासक कथाभूमि कलकत्ता थिक, मुदा कथाक जीवन पूर्ण रूपें मैथिल थिक। जीवन-यापन आ आत्म-स्थापन हेतु कलकत्ता शहरमे संघर्षरत मैथिलक स्वभाव, जागरूकता, आलस्य, उदारता, राग-द्वेष, मनोवेग, उन्माद, भाषा-प्रेम, स्वार्थ-सिद्धि हेतु चलाओल भाषाई आन्दोलनक र्छंि, आत्मविज्ञापन हेतु यत्रा-कुत्रा पाँखि पसारबाक ललक, फैंटेसी... समस्त स्थितिकें सूक्ष्मता आ मार्मिकतासँ एतए रेखांकित कएल गेल अछि। मैथिलीमे एहि कृतिकें पहिल राजनीतिक उपन्यास घोषित करबामे कोनो कोताही नहि हेबाक चाही। उपन्यासकार स्वयं एकरा प्रथम राजनीतिक उपन्यास अथवा राजनीतिक पर्यवस्थितिमे लिखल गेल प्रथम वृतान्तक उपन्यास' कहलनि अछि। समाज-व्यवस्थाक नियम अछि जे मनुष्य ÷प्रभुत्व' आ ÷प्रतिष्ठा' अर्जित करए चाहैत अछि। अही दुनूमे कतहु ÷चरित्रा' सेहो नुकाएल अछि। ÷प्रभुत्व', ÷प्रतिष्ठा' आ ÷चरित्रा'--ई तीनू पद व्यावहारिक जीवनमे बड़ अमूर्त्त सन अछि। ई तीनू वस्तुतः की थिक? केहन चरित्राक मनुष्यकें केहन प्रतिष्ठा भेटतनि? कतेक प्रतिष्ठा अर्जित केलासँ मनुष्यकें कतेक प्रभुत्व हएत? कतेक प्रभुत्व आ प्रतिष्ठाधारी व्यक्तिक चरित्रा केहन हएबाक चाही?--अइ प्रश्नावलीक उत्तर कोनो समाजक आचार संहितामे स्पष्ट नहि अछि। मुदा लोक निरन्तर फिल्मिस्तानक ÷मुन्ना भाइ' जकाँ लागल रहै'ए। अपन आचरणक श्रेष्ठताक व्याख्या अपना तरहें करैत रहै'ए। आन्दोलन उपन्यासक कमलजी, भुवनजी, निर्मलाजी, सुशीला, नीलू, हेम बाबू... सबहक आचरण देखि उपन्यासकार राजकमल चौधरीक मोनमे जे ओझराहटि उपजै छनि, तकरे उघार करबाक प्रयास एहि उपन्यासमे कएल गेल अछि। धन्य छथि ओ समीक्षक, जिनका अइ उपन्यासमे एकसूत्राताक अभाव बुझाइ छनि।...वस्तुतः मनुष्यक मूल प्रवृत्ति थिक जिजीविषा; आ तकर प्राथमिक शर्त थिक--रोटी, सेक्स, सुरक्षा। एहि तीनू आश्यकताक पूर्ति हेतु दुनियाँक प्रत्येक प्राणी चुट्टीसँ बाघ, बाघसँ नढ़िया, नढ़ियासँ मनुक्ख भ' जाइए। जीवनक समस्त छल, र्छंि, ईर्ष्या, द्वेष, उदारता, ईमानदारी, त्याग, तल्लीनता, भय, साहस, स्पष्टता, प्रवंचना, खोशामद, ललकार, टोप-टहंकार, धर्म-पाखण्ड, नीति-विचार, दान-दक्षिणा, लूट-बटमार... आदिक स्वांग अही निमित्त करै'ए; सफल-असफल होइ'ए। सफलताक अहंकारमे उन्मादित रहै'ए, असफलताक कुण्ठामे गन्हाइत रहै'ए। बिसरि जाइ'ए जे अइ सफलातक मार्गमे ओ कतेक हीन भेल अछि, अथवा असफल होइत केतक नमहर भेल अछि। सम्पूर्ण ÷आन्दोलन' उपन्यास मानव जीवनक अही जटिल-गुत्थीक गाथा थिक। हमरा जनैत अइ उपन्यासक आश्रय-वृक्ष ÷मैथिल समिति' टा नहि रहितए तँ भाषा परिवर्त्तन क' कए एकरा सम्पूर्ण संसारक अथवा सम्पूर्ण मानवीय वृत्तिक कोनहुँ भाषाक उपन्यास कहल जा सकै छल। मैथिलीमे तँ निश्चिते आन्दोलन उपन्यास एकटा नव शुरुआत थिक। आत्मकथात्मक शैलीमे लिखल जएबाक अछैत एहिमे कतहु आत्मश्लाघा अथवा आत्मसंकोचक स्वाभाविक त्राुटि नहि आएल अछि। कथावाचक कमलजी कलकत्ता महानगरमे आत्म-स्थापनरत छथि, भाषाई आन्दोलनमे सहभाग-सहकार द' रहल छथि, आन्दोलनी परिवारक हरेक व्यक्ति लेल तटस्थ आ ईमानदार आचरण रखै छथि। सम्पूर्ण उपन्यासमे कतहु स्पष्ट नहि होअए दै छथि जे ओ स्वयं किनका पक्षमे छथि। जे भुवनजी हुनका कलकत्ता महानगरमे पैर रोपबाक आधार देलकनि, नैतिक समर्थन देलकनि, स्नेह-प्रेम देलकनि, मान-सम्मानक मार्ग प्रशस्त केलकनि, तिनकहु लेल ओ कतहु पक्षपातक स्थिति अपन कथावाचनमे नहि आबए देलनि। नीलू, निर्मला, सुशीला... तीनू तीन आचणक स्त्राी छथि; तीनूक खोंइचा छोड़ा क' राखि देलनि, मुदा किनकहु पर अपन निर्णायक वक्तव्य नहि देलनि। स्वयं बदनाम गली धरि गेलाह, तकरहु उजागर करबामे संकोच नहि केलनि। लक्ष्य संधान छलनि मानवीय वृत्तिक स्पष्ट नक्शा उतारबाक, से अइ तटस्थ भावे टासँ सम्भव छल। इएह कारणो थिक जे आइ आ आइसँ पहिनहुँ अइ उपन्यासमे मूल मानवीय वृत्तिक एते रास छवि देखाइत अछि, देखाइ छल। महानगरीय परिवेशक प्रवासी मैथिल द्वारा चलाओल जा रहल भाषाई आन्दोलन एहि उपन्यासक आश्रय-वृक्ष भने रहल हो, मुदा सम्पूर्णतामे ई मिश्रित चित्रा खण्डक कथ्य-बहुल उपन्यास थिक, जाहिमे क्षुधा, आत्म-सुरक्षा आ यौन-पिपासाक चारू भर चित्राखण्डक समायोजन भेल अछि। तथापि कथ्य एकटा सुगठित कौशलसँ रचल यथार्थ उद्बोधित, समाज सम्मत, विश्वसनीय वृत्तान्तक रूपमे सोझाँ आएल अछि। रचनाकालक दृष्टिएँ ÷आन्दोलन' ÷आदिकथा'सँ पूर्वक उपन्यास थिक, मुदा विषय आ शिल्पक दृष्टिएँ ई बेसी प्रगतिशील, आधुनिक, आ ऊर्ध्वोन्मुखी अछि। कोनो उपन्यास मनुष्य, मानवीय जीवन, जनजीवनक सामाजिक व्यवस्था आ ओकर वातावरणक कथा कहैत अछि। एहि अर्थमे उपन्यासमे ठाढ़ मनुष्यक क्रिया-कलापहिसँ उपन्यासक गरिमाकें चीन्हल-बूझल जा सकैत अछि आ उपन्यासकारक रचना-दृष्टिक मूल्यांकन कएल जा सकैत अछि। अर्थात् चरित्रा-चित्राण जाहि कृतिमे जतेक सन्तुलित आ स्पष्ट हएत ओहि कृतिक उद्देश्य आ वातावरणकें ओतेक स्पष्टतासँ बूझल जा सकत। सामान्यतया रचनाकार लोकनि अपन सृजित पात्राक चरित्रा पर समग्रतामे अपन टीका दै छथि। केहन लोक छथि, कते पढ़ल छथि, कोना कमाइ छथि, कोना खाइ छथि, की करै छथि...। चाही तँ सुविधा लेल एकरा व्याख्यापरक चरित्रा-चित्राण कहल जा सकैत अछि, मुदा एहिसँ बेसी सुविधा होइत अछि, पात्राक आचरण आ कथोकथनक आधार पर ओकर चरित्रा बुझबामे। एहिमे भावक लोकनि पात्राकें अपना नजरिएँ चिन्हबाक चेष्टा करै छथि। प्रायः इएह कारण थिक जे नाटक, अथवा नाटकीय शैलीक कृतिमे चरित्रा चित्राणक सुविधा बेसी भेटैत अछि। खास क' कए मनोविश्लेषणात्मक चरित्रा-चित्राण करबाक पर्याप्त सम्भावना रहैत अछि। इहो कहब समीचीन होएत जे राजकमल चौधरीक रचनामे अकारणे एते कथोपकथन नहि रहैत अछि। नाटकीय शैलीक एहि उपन्यासमे पात्राक मनोविश्लेषणक प्रभूत व्यवस्था अछि। रचनाक नायक-नायिका आ सहयोगी लोकनि पारस्परिक वार्तालाप आ अपन क्रिया-कलापसँ जते तरहें अपन चारित्रिाक सीमा अंकित करैत'छि रचनाकार स्वयं टीका द' कए ओते विस्तारसँ कहिओ नहि कहि सकै छथि। एहिसँ कृति संक्षिप्त, दीप्त आ प्रभावकारी सेहो होइत अछि। सम्भवतः इएह कारण थिक जे राजकमल चौधरीक उपन्यास आकारमे एते छोट होइत अछि आ प्रभावमे एते विराट। वार्तालापसँ मनुष्यक सम्पूर्ण व्यक्तित्व ठाढ़ भ' जाइत अछि। शिल्प, शैली, वाक्य-संरचना, शब्द-चयन, सम्बोधन-अभिवादन, विषय आ विषयानुरक्तिसँ कोनहुँ व्यक्ति अपन सम्पूर्ण सोच-समझ-आचरण, कौलिक आ व्यावहारिक संस्कार, आर्थिक-शैक्षिक-सामाजिक पृष्ठभूमि स्पष्ट करैत अछि। जेना आन्दोलन उपन्यासक पात्रा सब कएने छथि। भाँगक निशाँमे मातल कमलजीक कोठलीमे अल्पवयस नीलू अर्धनग्न अवस्थामे पहुँच जाइत अछि। ओहि अन्हार गुज्ज रातिमे बन्द कोठलीमे नीलू, कमलजीकें ÷भैया' कहैत अछि, मुदा सर्वस्व अर्पित करए चाहैत अछि। स्पष्ट अछि, जे किशोर वयक उन्माद आ उत्तेजनामे नीलू ÷सम्बोधन' आ ÷क्रिया'क बीचक समन्वय बिसरि गेल अछि। जे कमलजी यौन पिपासा मेटएबा लेल देह-व्यापारमे लिप्त स्त्राीक खोली धरि पहुँचि जाइ छथि, से कमलजी भाँगक घनघोर निशाँमे मातल छथि, आ अन्हार गुज्ज रातिमे बन्द कोठलीमे समर्पित नीलूकें बुझा-सुझा क' आपस क' दै छथि (आन्दोलन/पृ. ५०-५१)। मैथिलानी वेश्याक ताकमे जखन कमलजी बनगामबालीक खोलीमे पहुँचै छथि तँ सम्पूर्ण नक्शा उनटि जाइत अछि, हुनक विषय-वासना करपूर जकाँ बिला जाइत अछि (पृ. ३५-३७)। अइ वार्तालापमे आ एहने कतोक वार्तालापमे व्यक्ति, समाज, व्यवस्था, वातावरण आ मनोवेगक जतेक स्पष्ट छवि अंकित भेल अछि, ततेक स्पष्ट करब आन कोनो माध्यमे असम्भव छल। एतए नीलूक किशोरावस्था आ काम-पिपासा नीलूकें आन्हर क' देने अछि। ÷भैया' सम्बोधनक बादहु यौनाचार प्रतिवेदन अनर्गल थिक, मुदा एतए नीलूक वयसोचित उन्माद आ अपरिक्वतामे उचितानुचितक विवेक नुका गेल अछि, जे सहज अछि, सम्भाव्य अछि। मुदा तें, नीलूक चरित्रा घृणित नहि कहल जा सकैत अछि। अपरिपक्व रहितहुँ ओ सर्वस्व-अर्पण हेतु पात्रा-चयनमे असावधान नहि अछि, भुवनजीक आवासीय परिसरमे आओर कतोक पुरुख, मैथिल पुरुख बिलमल छथि, तिनका संग ओ एना नहि केलनि; महानगरीय वातावरणक विकृतिमे ओ निर्मलाजी अथवा सुशीला नहि बनि गेलीह। नीलूक समर्पणकें अस्वीकार करबाक अर्थ कमलजीक नपुंसकता अथवा निष्काम वृत्ति नहि थिक। से रहितथि तँ कमलजी वेश्यालय नहि जैतथि। मुदा कमलजी कामातुर राक्षस नहि छथि। से रहितथि तँ ओ सुशीलाक राति किनलनि, हुनका संग सब किछु कइए क' आपस होइतथि। समस्त मानवीय दुर्बलताक अछैत मनुष्यक विवेक ओकरा नैतिक रूपें विराट बनबैत अछि। समस्त दुर्बलता आ सबलताक सीमा बूझब समयक नायककें वास्तविक स्वरूप दैत अछि आ ओकर चारित्रिाक वैशिष्ट्य समकालीन समाजकें जीवन जीबाक दृष्टि आ नैतिक बल अनुसंधानक बाट देखबैत अछि। आन्दोलन उपन्यासक चरित्रा चित्राण तकरहि उदाहरण थिक। वस्तुतः अपन रचनामे कोनो पात्राक सृजन केलाक बाद जँ रचनाकार ओकर स्वामी बनि जाइ छथि, चरित्राक सहज विकास नहि होअए दै छथि, तँ ओ रचना सामान्यतया असफल भ' जाइत अछि, अपना समयक यथार्थसँ पृथक रहि जाइत अछि, रचनाक सत्य आ नायकक आचरण समाज सापेक्ष नहि भ' पबैत अछि। मुदा राजकमल चौधरीक रचनाक नायक-नायिका आ तकर सहयोगी पूर्ण रूपें स्वतन्त्रा रहैत अछि, स्वेच्छाचारी नहि। ओकर चारित्रिाक विकासमे राजकमल चौधरीक नियन्त्राण ओतबे रहैत अछि, जतबा घूमैत चाक पर राखल माटि पर कुम्हार नियन्त्राण रखैत अछि। अपन ब्रह्माक मात्रा एतबहि टा नियन्त्राण पाबि ओ पात्रा आ रचना महान भ' जाइत अछि। जेना आदिकथा आ आन्दोलन महान भेल अछि; आदिकथाक देवकान्त आ सोना मामी; आन्दोलनक कमलजी, भुवनजी, नीलू, निर्मला, सुशीला महान भेल छथि। आन्दोलनक प्रमुख पुरुष पात्रा छथि--विष्णुदेव ठाकुर, मोदनारायण जी, नरेन्द्र झा, चन्द्रशेखर बाबू, हेम बाबू, सुदर्शन जी, भुवनजी, कमलजी आदि। किछु अनाम-सुनाम सामूहिक पात्रा सेहो छथि, जे अवसर-बेअवसर अपन वक्तव्यसँ, आ अपन क्रिया-कलापसँ अपन चरित्रा आ मानसिक स्तरक परिचय दै छथि। विष्णुदेव ठाकुर, मोदनारायण जी आ चन्द्रशेखर बाबूक उपस्थिति कथा विस्तारमे ठाम-ठीम होइ छनि, मैथिलोचित प्रवृत्ति आ दुष्टतासँ परिपूर्ण छथि, एकर अलावा कोनो विशेष उल्लेखनीय योगदान हिनका लोकनिक नहि छनि। हेम बाबू सेहो तेहने प्रासंगिक पात्रा छथि, मुदा निर्मला सन उद्धत यौवना बेटीक पिता छथि, विधुर छथि। आत्म-प्रशंसासँ ग्रस्त छथि, अपन बौद्विकता पर अपनहि गर्वित रहै छथि, बेटीक उग्र-आधुनिकाक छवि कोनो बेजाए नहि लगै छनि, दोसरक नीको काल अधलाह लगै छनि, सुझाव आ उपदेश देबामे अपनाकें दक्ष बुझै छथि, छिद्रान्वेषी छथि। मैथिल समितिक आयोजनमे पचीस टाका चन्दा द' कए एना मोन बनबै छथि, जेना भुवनजीकें कीनि लेलनि (पृष्ठ-३४)। नरेन्द्र झा मैथिल समितिक सक्रिय कार्यकर्त्ता छथि, भुवनजीक संग रहै छथि, मुदा परोक्षमे निन्दा करब स्वभाव छनि। निर्मलाक बासा पर जएबामे मोन लगै छनि, मुदा हुनका दुष्चरित्रा कहबामे रस लगै छनि (पृ. ३९-४०)। मैथिल जातिक आम वृत्ति--चुगलखोरी आ दुष्टाचरण पर एहि उपन्यासमे पर्याप्त दृष्टि देल गेल अछि (पृ.१७)। पात्राक वक्तव्य आ आचरणसँ चरित्राक सम्पूर्ण छवि अंकित करबाक महारत राजकमल चौधरीक लेखनमे सगरो देखाइत रहैत अछि। सुदर्शनजी सन मातृभाषानुरागीक अवतारणा उपन्यासमे थोड़बे काल लेल भेल, मुदा ओतबहि कालमे उपन्यासकार हुनकर विराट छवि ठाढ़ क' देलनि। परम उत्साही, क्रियाशील आ विद्रोही व्यक्तित्वक एहि युवक द्वारा स्कूलमे भाषा सम्बन्धी रीति पर वक्तव्य जारी करब, प्रतिक्रिया देखाएब, एकटा विराट परिदृश्य दिश इशारा करब थिक। स्कूली शिक्षाक भाषा माध्यम आ शिक्षक-शिक्षार्थीक वार्तालापक भाषा माध्यम बड़ पैघ महत्व रखैत अछि। स्कूलमे शिक्षक लोकनि जखन मैथिलीमे गप करनि, तँ हुनका ओ अपन पिता, पितृव्य, भाइ सन लगैत रहनि। मुदा जखनहि आन बोली-बानीक लोक अध्यापक बनि स्कूल अएलनि आ ओ हिन्दीमे गप करए लगलनि, हठात् ओ अदना बुझाए लगलनि, मातृभाषा विरोधी लागए लगलनि (पृ. ५४-५५)। मातृभाषा लेल बुनियादी क्रान्तिक संकेत एहि अंशमे देल गेल अछि। सुदर्शनजीक हृदयमे क्रान्तिक आगिएना धधकै छनि जे बीचहि सभामे निर्मलाजीसँ बहस क' लेलनि--नइं निरमल दीदी!...शान्तिक कविता नइं, मात्रा क्रान्ति हमरा सभकें चाही, आन्दोलन चाही(पृ. ५३)।... एहि छोट सन उपन्यासमे ततेक बातक संकेत देल गेल अछि, जे सूइक नोक बराबरि फाँक कतहु नहि देखाइत अछि। वस्तुतः सन् १९४७सँ १९६७ धरिक समय मिथिला लेल विचित्रा सन छल। स्वातन्त्रयोत्तर कालक भारतीय परिदृश्यमे मैथिल, मैथिली आ मिथिला ठकमूड़ी लगा क' बैसल छल। मिथिलाक जे सेनानी, सब किछु छोड़ि संग्रामक सिपाही बनल छल, तकरा पमरियाक तेसर बूझल जाए लागल, ओकर कोनो मानि-मोजर नहि देल जाइ छल। मिथिलाक जे व्यक्ति शासनमे गेल, से नंगरडोलाओन धन भ' गेल। ओकरा लेल मातृभाषा मैथिलीक उपेक्षा कोनो अर्थें उद्वेलनक विषय नहि छल। भाषाक महत्वसँ ओ परिचित नहि छल। ओहेन आत्मकेन्द्रित जन प्रतिनिधि मातृभाषा आ जनपदीय संस्कृति लेल कोन संघर्ष करितए?... स्वातन्त्रयोत्तर कालीन तीन दशकक मैथिली रचनाकारकें ई सब किछु भारी बोझ जकाँ निमाहए आ सँवारए पड़लनि। स्थानीय रूढ़ि निपटानक जटिल दायित्वसँ संघर्ष करैत भाषाई जागरूकता उत्पन्न करबामे, आ आन्दोलनक छद्मसँ सर्वसाधारणकें सावधान करबामे...तल्लीन रहब बड़ दुर्वह काज छल। आन्दोलन उपन्यास ताहि क्रममे महत्वपूर्ण भूमिका निमाहने अछि। भुवनजी एहि उपन्यासक अत्यन्त उदार, निविष्ट आ सहज चरित्राक पात्रा छथि। उपन्यासक मुखर पक्ष थिक आन्दोलन, तकर नायक इएह छथि। मुदा, जें कि आत्मकथात्मक शैलीमे ई उपन्यास लिखल गेल आ कथावाचक कमलजी भ' गेलाह, भुवनजी गौण पड़ि गेल छथि। बहुत रोचक ढंगें उपन्यासकार भुवनजीक चरित्रा ठाढ़ केने छथि--धीर, गम्भीर, शान्त, उदार।... कलकत्ताक पैघ कम्पनीमे कानूनी सहायक आ व्यापार संचालक छथि। मुदा मातृभाषाक प्रति प्रबल अनुराग छनि। मैथिल समिति आ मैथिली पत्रिाका लेल समर्पित व्यक्ति छथि, परोपकारी छथि, मैथिल लोकनि लेल बेस सहायक लोक छथि। ट्राम, बस, फैक्ट्रीमे सय-दू सय मैथिलकें नौकरी दिऔने छथि (पृ. ३४)। नीलू सन अनाथ बालिकाकें बेटी जकाँ रखने छथि (पृ. १४)। बेस बुझनुक, चिन्तनशील, युगीन परिस्थितिसँ आ परिस्थितिजन्य क्रिया-कलापसँ नीक जकाँ परिचित छथि। कमलजी जखन कोनो बात पर प्रतिवाद करै छथिन, तँ भुवन जी कहै छथि -- ई राजनीति थिकै कमलजी, एहिमे उचित-अनुचितक कोनो गप नहि कएल जा सकइए। मिथिला-आन्दोलनक लेल एखन एकटा नेता हमरा सबकें चाही, नामक नेता। जे सभामे गरजि सकए, शासक वर्गक आगाँ धुरझाड़ अंग्रेजी, हिन्दी, बंग्ला, फारसी चिकरि सकए। लोककें आतंकित क' सकए, एकटा बिहाड़ि सौंसे देशमे उठा सकए।... असली काज त' हम सब करबइ।... बिहाड़िमे उड़ैत ख'ढ़मे चिनगी त' हम सब लगेबइ (पृ. १५)। मातृभाषा आ जन्मभूमिक प्रति एहि तरहें समर्पित लोक, आन्दोलनकें सफल करबा लेल सफल मार्गक ज्ञाता, नीति-कुशल लोक, भुवनजीक नजरिमे कोनो पैघ काज लेल योजनापूर्वक काज करबाक परिदृश्य एना रचल जाइत अछि। एहेन निविष्ट आ नीतिज्ञ पुरुषक पत्नी महान कुरूपा, नितान्त अव्यवहारिक छथिन। समस्त भव्य छविक अछैत जीवन-परिदृश्यक एक खण्ड बेरंग छनि, मलीन छनि, श्रीहीन छनि। एहेन पत्नी संग कोनो सभा सोसाइटीमे नहि जा सकै छथि। कोनो सभ्य व्यक्तिक चौपालमे नहि बैसि सकै छथि...। भुवनजी सन विशिष्ट आ विराट व्यक्तित्व संग उठबा-बैसबाक लिलसा निर्मला सन सुशिक्षित, सुदर्शन, उद्धत यौवना स्त्रीकें होइ छनि। एहेन उदार देह आ उदार मोनक जवान स्त्रीक प्रति जँ भुवनजी सन परिस्थितिक लोक अनुरक्त होइ छथि, तँ से सहज सम्भाव्य थिक। मुदा अही बीच निर्मलाजीक परिचय कमलजीसँ होइ छनि आ निर्मला आब पुरान गाछक डारिसँ उड़ि कए नव डारि पर बैसए चाहै छथि, कमलजी दिश हुनकर अनुरक्ति बढ़ि जाइ छनि। भुवनजीकें ई बात पसिन नहि छनि, मुदा से व्यक्त नहि करए चाहै छथि। नहि चाहै छथि, मुदा व्यक्त भ' जाइ छनि (पृ. ४५)। वार्तालापक ई चमत्कार रोचक अछि।... वस्तुतः प्रेम, प्रतिष्ठा, ऐश्वर्यक मार्गमे प्रतिद्वन्द्वी ठाढ़ हैब बड़ दुखदायी होइत अछि। एहि दृश्यक विकट-जटिल मनोविज्ञानक ओझराहटिकें जाहि सहजतासँ राजकमल चौधरी टिपने छथि, से रोमांचक अछि। सकल मैथिल समाजमे चर्चा अछि, जे निर्मलाजी भुवनजीक प्रेयसी छथिन, ताही आकर्षणमे भुवनजी हुनकर बासा पर जाएब आएब करै छथि। मुदा भुवनजी ई व्यक्त नहि होअए देताह, प्रतिष्ठाक प्रश्न अछि। लोकक मुँह बन्द करबा लेल भुवनजी निर्मलासँ दूरी बढ़ा लेताह, से नहि हेतनि। स्त्री देहक उदार छाहरिक प्रश्न अछि। कोनो आन पुरुखक संगति निर्मलाकें भेटनि, से भुवनजीकें पसिन नहि, मुदा कोना रोकथिन, ओ हुनकर पत्नी नहि छथिन, घोषित प्रेमिको नहि। कमलजीक सोझाँ, जे हुनकर बड़ सम्मान करै छथिन, नांगट कोना हेताह? अइ उपन्यासमे सर्वाधिक जटिल व्यवस्था हिनकहि चरित्रा-चित्राणमे अछि। विवाद, तनाव, दाम्पत्य, प्रतिष्ठा, प्रभुत्व, भय, उदारता, वैराट्य... सब किछु मिला कए विचित्रा सन स्थिति बनैत अछि। एक दिशा पकड़ि कए जाइत रहू, हुनका नीक आ कि बेजाए साबित करैत रहू, जाइत-जाइत ओहिमे दोसर दृश्य आबि कए पहिलुक सूत्रा ओकरा देत। आन पात्राक संग से स्थिति नहि होइत अछि। कने-मने नीलूक चरित्रा-चित्राणमे सेहो इएह बात अछि। कमलजी अइ उपन्यासक नस-नसमे समाएल छथि। कथावाचक हेबाक कारणें आन पात्रा लोकनिक चरित्रा पर टिप्पणियो करैत गेलाह अछि, मुदा हिनका सम्बन्धमे हिनकर टिप्पणी, उद्घोषणा, वक्तव्य, वार्तालाप आ आचरणे टा विश्लेषण आ मूल्यांकनक आधार बनि सकैत अछि। बेस पढ़ल-लिखल, आधुनिक विचारधारा, स्वच्छन्द चिन्तन पद्धति, प्रचुर प्रतिभा सम्पन्न बेरोजगार मैथिल युवक छथि। साहित्यिक संस्कारक सृजनशील आ सांसारिक युग चक्रक सूक्ष्मतासँ परिचित व्यक्ति छथि। छद्म, पाखण्ड, द्वेष-दुविधासँ परहेज छनि। क्षुधा, यौन-पिपासा आ आत्मसुरक्षाकें मनुष्यक मूल प्रवृत्ति मानै छथि। बुझनुक, वाक्चतुर आ जिम्मेदार लोक छथि। ट्यूशन क' कए भाउज, भतीजीक जीवन-यापन, लालन-पालनक चिन्ता रखै छथि। सामाजिक रीति-कुरीति, द्वेष-दुविधा, लोभ-ईर्ष्या, जीह-जाँघ-पेटक कामनासँ परिचित छथि। प्रतिभा आ वाक्चातुर्यक बलें महानगरमे अधिकांश लोकक नजरिमे सम्मानपूर्वक बसल छथि। निर्मला सन कामातुरा युवती हुनका पर लहालोट होइ छथि, नीलू सन किशोरी समर्पित हेबा लेल तत्पर छनि, मुदा उचितानुचितक ज्ञानसँ परिपूर्ण कमलजी नीलूक कौमार्य भंग नहि करै छथि। स्त्री-पुरुषक अतिरिक्त निकटता कखनहुँ कोनो परिस्थितिमे परिणत भ' जा सकैत अछि--ताहि अन्देशासँ कमलजी परिचित छथि, तें नीलू आ अपना बीच भाइ-बहिनक लक्ष्मण रेखा घीचि दै छथि। नारी शोषणक प्रति रोष छनि, स्त्री दमनक प्रति आक्रोश छनि, देह व्यापार क' कए गुजर-बसर करै वाली सुशीला सन स्त्रीक अन्तर्कथा सुनि कए मोन घोर भ' जाइ छनि। कामेच्छा तृप्त करबा लेल अनेक पुरुख कोरमे नांगट होइत अर्थ-सम्पन्न स्त्री निर्मला, आ पारिवारिक भरण-पोषण हेतु असंख्य कामुक राक्षसक उत्तेजना शान्त करैवाली विपन्न स्त्री सुशीलाक तुलनात्मक विश्लेषण करए लगै छथि (पृ. ३७-३९)। छोट वयसमे, जखन विवाहक अर्थो नहि बूझै छलाह, स्त्री पुरुष सम्बन्धक ज्ञानो नहि छलनि, तखनहि अपन भाउजक बहिन गुलाबसँ विवाह करबाक इच्छा व्यक्त केलनि (पृ २८); सम्पूर्ण उपन्यासक जीवनमे भुवनजी सन निविष्ट, प्रतिष्ठित आ गम्भीर लोकक प्रति कोनहु आक्षेप अथवा आधार नहिओ रहैत, निर्मलाजी सन पथभ्रमित स्त्रीक प्रति हुनकर अनुरक्ति (पृ. ४५); स्वकीया होइतहु अनेक परिस्थितिवश निर्मलाजी परकीया बनि जएबाक घटना (पृ. ३८-४०), नीलू पर विष्णुदेव ठाकुरक वासनात्मक दृष्टि (पृ. १६)...अइ तरहक कतोक प्रकरणसँ उपन्यासमे कथावाचक स्पष्ट करै छथि जे भूख, वासना आ सुरक्षाभाव मानव जीवनक अपरिहार्य आवश्यकता थिक, अइ अपरिहार्यताक अपवाद कमलजी स्वयं सेहो नहि छथि, जकर संकेत अपन वक्तव्य आ आचरणसँ दैत रहलाह। ई परिदृश्य एक दिश उपन्यासक आधार कथ्यकें मजगुत करैत अछि तँ दोसर दिश कमलजीक वैचारिक दुनियाँ आ दृढ़ मान्यताक प्रमाण दैत अछि। आन्दोलनक स्त्री पात्राक कैक कोटि अछि-- समय-चक्र आ समाज व्यवस्थाक चाँगुरमे विवश; कामोन्मादमे मातल, मदोन्मत्त; किशोरकालीन उद्वेगमे बहकल, मुदा किछु-किछु सावधान। एहिमे एक वर्गक स्त्री छथि बनगाम वाली आ सुशीला। बनगामवाली जीवन संग्रामसँ लड़बा लेल स्त्री देहक सौदा करै छथि, सौदाक प्रबन्धन, दलाली; दस पाँच स्त्री रखै छथि, अपना घरमे जगह, सुविधा, सुरक्षा दै छथिन, व्यापार चलै छनि, तकर कमीशनसँ हुनकर जीवन-यापन होइ छनि; दुनियाँक आन कोनहुँ परिस्थिति, परिवेश, आर्थिक-सामजिक-राजनीतिक-नैतिक घटना-कुघटनासँ हुनका कोनहुँ सरोकार नहि छनि। गँहिकी अबैत रहए, पाइ लेल परपुरुष गमन हेतु सहर्ष तैयार स्त्रीक संख्या हुनका ओतए बढ़ैत रहए, एहिसँ पैघ बात, प्रसन्नताक बात हुनका लेल किछु नहि थिक। सुशीला रोजगारक अनुसन्धानमे बौआइत पिताक सन्तान थिकीह, जिनका अपन माइए अइ काज लेल प्रेरित केलकनि आ माइ संगे ओ विभिन्न वेश्यालयमे जाए लगलीह। जीवन-यापन हेतु आओर कोनो आधार बचल नहि छलनि (पृ. ३६-३९)। दोसर वर्गक प्रतिनिधित्व करै छथि-- निर्मलाजी। जेना कि कहल भेल जे कोनहु व्यक्तिक आचारण, ओकर मनोवेगसँ संचालित होइत अछि, आ मनोवेगक मानसिक अवस्थिति व्यक्तिकें प्रदत्त सर्वांगीण वातावरणमे निर्मित आ निर्देशित होइत अछि। निर्मला, हेम बाबूक पुत्री छथि, हेम बाबू कमाऊ लोक छथि, महिनबारी दरमाहा अबै छनि, ओहि दरमाहाक लार-चार, संचय-निस्तार करबाक दायित्व अथवा अधिकार निर्मलाजीकें छनि--कोनो तरहक सामाजिक आँकुश अथवा आर्थिक दबावमे नहि रहै छथि। अन्न-वस्त्रा आ सामाजिक सुरक्षाक कोनो समस्या नहि छनि। मुदा दैहिक उत्ताप छनि, जगजियार बनल रहबाक आकांक्षा छनि, सबहक आँखिमे बसल रहबाक लिप्सा छनि। विधुर पिताक दरमाहा, आ परदेशी पति द्वारा पठाओल मनीयाडरक महाबलसँ निर्मलाजी मैथिल समिति द्वारा आयोजित जनसभामे अपनाकें शो-केसक मूर्त्ति जकाँ सजा क' प्रस्तुत करै छथि। अपन भाषण, भू्र-विलास, अधरक लाली, कुटिल कटाक्ष, रति-सुरति, अंग-संचालनसँ लोकक मोन मोहैत रहै छथि आ लोकक प्रशंसाक पात्रा बनल रहै छथि। हिनका सुशीला जकाँ बनगाम बालीक खोलीमे खाट नहि ओछब' पडै छनि, नित्य प्रति आ अनेक बेर अनेक कामुक पुरुष संग व्याभिचार नहि करए पड़ै छनि। काज दुनू एके रंग करै छथि, मुदा, जें कि सुशीला लेल देह पूँजी छनि, तें हुनकर करतब व्यभिचार कहल गेल आ जें कि निर्मला लेल देह प्रसाद छनि, तें हुनकर करतब आचार भेल। सुशीला जकाँ जँ निर्मलोजी बेरोजगार पिताक बेटी रहितथि, दायित्वक बोझ तर दाबल रहितथि, दू साँझक नोन रोटी जुटएबा लेल, दू बीत वस्त्राखण्ड अनबा लेल देहक अलावा आन कोनो बाट नहि रहितनि, तँ निर्मला जीक चटक-मटक कतए जइतनि?... ओना आजुक स्त्री विमर्शमे छान-पगहा तोड़निहार वक्तव्यवीर लोकनि एहि चरित्राक प्रति, आ तकर एहि तरहक मूल्यांकनक प्रति अनघोल अवश्य करताह, जे स्त्री, देहसँ बाहरो बहुत किछु होइत अछि।...अवश्य होइत अछि, मुदा कोनो मादक संगीत सुनि पोन पर तबला बजाएब, आ तबला पर तबला बजाएब, दुनू दू बात होइत अछि। निर्मलाजी आ सुशीला जीक चारित्रिाक विश्लेषणमे एहि उपन्यासमे कामुकताक इएह विरोधी स्वरूप, वासनाक इएह विरोधाभास, नारी समुदायक इएह रूप वैविध्य आन्दोलन उपन्यासमे भावककें आन्दोलित करैत अछि। सुशीलाजी जें कि आर्थिक रूपें समृद्ध आ निश्चिन्त छथि, आकर्षक परिधान पहिरबाक क्षमता आ उन्मादक देहक स्वामिनी छथि, आइ भुवनजी, काल्हि कमलजी, परसू केओ आओर... रंग-विरंगक स्वादमे मस्त रहै छथि। सभा-सोसाइटीमे, बुद्धिजीवी लोकनिक बीचमे अपन उपस्थिति बनौने राखए चाहै छथि, प्रतिष्ठित आ विद्वान लोकनिक नयनतारा बनल रहए चाहै छथि, तें ज्ञान नहिओ रहैत साहित्य, कला, संस्कृति आ मिथिला-मैथिलीक प्रगतिगामी आन्दोलनसँ जुड़ल रहए चाहै छथि; स्वस्थ आ सम्पूर्ण पुरुषक सान्निध्य हुनका लेल बड़ पैघ बात थिक। मदिरतम मुस्कान, भू्र-भंगिमा, रति-सुरतिक प्रभावें विद्वत जनक आँखिमे बसल रहब हुनकर नेत छनि (पृ. 39-40)। सुशीलाक राति आ निर्मलाक राितमे इएह अन्तर अछि आ इएह समानता।...वस्तुतः सुशीला आ निर्मला, दुनू दू वर्ग स्त्राी छथि। एक गोटे प्राण रक्षा लेल, नोन-रोटी लेल, अपन आ परिवारक क्षुधा मेटएबा लेल, स्वयं निष्काम बनि दोसरक कामोत्तेजना शान्त करबाक साधन बनै छथि; दोसरक यौन-पिपासाक शमन करै छथि; तँ दोसर यौन-पिपासासँ व्याकुल भेल दोसराकें पीबि जएबा लेल उताहुल रहै छथि; नित नव-नव माछ पर जाल फेकै छथि।--निर्मला जी छथि सभा-सोसाइटीक प्रेमिका। पुरुख-समाजमे गेला बिना नीक नहि लगै छनि। मैथिल समितिक द्वारा ई भुवनजीक सम्पर्कमे अएलीह, आ भुवनजीक द्वारा मैथिल समितिक सम्पर्कमे। आ भुवनजी हिनका अपनामे लपेट लेलथिन। निर्मलाजीकें ई गप्प अध्ालाह नहि लगलनि। आब त’ सौंसे समाजकें बूझल छै जो ओ भुवन जीक प्रेयसी छथि। हेम बाबूकें सेहो बूझल छनि। हेम बाबूक जमायकें सेहो खबरि छनि। ओ बेचारा तँ लाजें कलकत्ता अबितो नहिएँ...(आन्दोलन/पृ. 39)। विचारणीय विषय इहो थिक जे अर्थाभावे टा मानव जीवनक मूल समस्या नहि होइत अछि। यौन-तृप्ति लेल विवाहेटासँ निश्चिन्त नहि भेल जा सकैत अछि। निर्मलाजी तकरहि उदाहरण थिकीह, हुनका सन बिआहलि स्त्राी; विधुर पिता आ परदेशी पतिक संयुक्त कमाइ पर एकछत्रा अधिकार रखनिहारि स्त्राीक ई आचरण कथी लेल? नीलूक चरित्रा अपेक्षाकृत बेसी व्याख्येय आ विश्लेषणपरक अछि। ओ अनाथ छथि, मुदा भुवनजी सन निविष्ट व्यक्तिक छत्राछायामे लालन-पालन भेलनि। जन्महिसँ महानगरमे छथि, मुदा महानगरीय अपसंस्कृतिक असरि हुनकर आचरण पर नहि छनि। मैथिल संस्कार आ सभ्यतासँ परिपूर्ण छथि। वाक्चातुर्य, साहस, शालीनता, प्रगतिकामना, रूढ़ि द्रोहसँ सम्पन्न तेरह-चैदह बर्खक किशोरी छथि। अतिथि सत्कारमे पटु, काँचहि उम्रमे लोक-समाज आ देश-दुनियाँकें चिन्हबाक क्षमतासँ परिपूर्ण, कोनहुँ परिस्थितिमे कोनहुँ व्यक्तिक समक्ष अपन बात निडरतासँ रखबाक स्पष्टता छनि। विष्णुदेव ठाकुरकें ठाँय-पठाँय लोफर कहि देलनि (पृ. 16)। नीलू भावुक छथि, कमलजीकें कमल भैया एहि लेल नहि कहती जे हुनकर एकटा कमल भैया टी.बी. रोगसँ मरि गेलनि (पृ. 22-33)। कमलजीक जेबी आ मनीबेग टेबैत रहै छथि, छोट हेबाक अधिकार मँगै छथि (पृ. 32)। घरमे एकाकी जीवन व्यतीत करैत अकच्छ छथि आ कमलजीकें कहै छथि जे अहाँकें तँ हमरा दिश तकबाक पलखति नहि होइए (पृ. 47-48)। निर्मलासँ कमलजीक हेम-क्षेम नीलूकें नीक नइं लगै छनि (पृ. 48)। कमलजीसँ नीलूक हेम-क्षेम भुवनजीकें सन्देहास्पद लगै छनि (पृ. 49)। कमलजी नीलूक करतब पर संशकित रहै छथि (पृ. 48)। नीलूकें होइत रहै छनि जे ओ दिन राति कमलजी लग बैसल रहथि। राति कए अर्द्धनग्न अवस्थामे कमलजीक ओछाओन धरि पहुँच जाइ छथि (पृ. 50-51)। सम्पूर्ण कथामे नीलूक करतबकें एकटा ‘पाठ’ बूझि जँ एहि पर विचार-विमर्श हो, तँ सब किछु झलफल बुझाइत अछि। कमलजी आ भुवनजीक शंका, नीलूक ईष्र्या, बहिन-भाइक सम्बोधन, यौन-पिपासाक दैहिक आवश्यकता अथवा मनोवेग-उद्वेग अथवा काम-युद्ध लेल उन्मादित योद्धा, आन्हर राक्षस...सब किछु गड्ड मड्ड भ’ जाइत अछि। कखनहुँ त’ मानवीय मनोवेगक सहजात चरित्रा लगैत अछि कखनहुँ घनघोर रहस्यमय। सर्वगुण सम्पन्न किशोरी नीलूक यौनोन्माद हुनका समस्त नैतिकता, मर्यादा, वर्जना आ सम्बन्ध-सम्बोधनक सीमासँ मुक्त क’ दै छनि। मनौन लेल घिघियाइत कमलजीक समस्त प्रस्तावकें नकारैत साफे-साफ कहै छथि जे लोक किछु कहए, हमरा नइं रहल जाइए, अहाँ हमरासँ विवाह क’ लिअ’ (पृ. 51)। मनोवेग आ कामोत्तेजनाक खौंतकें एहि उपन्यासमे मानवीय प्रवृत्तिक रूपमे जतेक स्पष्टता आ वैविध्यसँ व्याख्यातित कएल गेल अछि, ताहिसँ प्रमाणित होइत अछि जे सत्तेयौनोन्मादमे गाय धरि बाघिन भ’ जाइत अछि। स्थापित मर्यादाक अधीन तृप्तिक बाट साफ भेल तँ भेल, नहि भेल तँ उद्वेग लेल कोनहुँ सीमा, कोनहुँ मर्यादाक अनुपालन काम्य नहि थिक। समस्त नायक-नायिका एवं सहयोगी पात्राक जीवन-प्रक्रिया, रहन-सहन आदिक वर्णन एतए अत्यन्त स्वाभाविक ढंगें भेल अछि। एकटा गौण स्त्राी पात्रा छथि कमलजीक भौजी। कमलजी अपन प्रवासक श्रेय हिनके दै छथि। भौजी कहलकनि--गामक जीवन अहाँकें सहल नहि जाएत। सहलो जाएत तँ... गामक लोक निन्दा करत। कहत, घरमे विधवा भौजी छथिन, तें ई नौकरी छोड़ि गाममे बैसल अछि...(पृ. 13)। अइ वक्तव्यमे सेहो मानवीय वृत्तिक सहज आशंका अछि--समाजक मोनमे संशय हेबाक आशंका, अपने मोनक सम्भावना पर आशंका, कमलजीक धारणा पर आशंका...। आगि आ ख’ढ़ एक ठाँ रहत, जानि नहि कहिआ की भ’ जाएत! ‘भौजी’ मैथिल समाजक अथवा मैथिल नारीक विचित्रा उदाहरण थिकीह। जीवनक भार, सन्तानक भार, मर्यादाक भार, देहक भार, समाजवृन्दक मोनमे उठैत कल्पनाक भार... मिथिलाक कोनो विधवा स्त्राीक जीवन कोन तरहें, तरुआरिक धार पर चलबा लेल विवश रहैत अछि, तकरा उपन्यासकार मात्रा एक वक्तव्यमे स्पष्ट क’ देने छथि। सम्पूर्ण सृष्टिमे दू टा अभिकरण महत्वपूर्ण अछि -- एकटा समाज व्यवस्था, जाहिमे राजनीति, समाजनीति, अर्थनीति, मूल्यनीति आदिक मर्यादा, कानून-कायदा आ सीमा शर्त अबैत अछि; आ जकर प्रतिनिधित्व अइ उपन्यासमे मैथिल समिति द्वारा चलाओल आन्दोलन थिक। एहि आन्दोलनमे सब किओ अपन-अपन पैरुख-प्रतिभाक अनुकूल अपन-अपन महत्व साबित करए चाहै छथि, स’क भरि जे क’ पबै छथि, करै छथि, तृप्त अथवा कुण्ठित होइ छथि; निन्दा-शिकायत, च’र-चुगलखोरी, ईष्र्या-द्वेषमे लिप्त रहै छथि। अपन हैसियत लेल हरदम अत्यानुमान आ अदना लेल न्यूनानुमानक धारणासँ ग्रस्त रहै छथि। मैथिल समितिक क्रिया-कलापकें जँ प्रतीक अर्थमे ली तँ सम्पूर्ण भारतीय समाज व्यवस्थाक गुण-सूत्रा एहिमे भेटि सकैत अछि। दोसर अभिकरण थिक मानवीय मनोवेगक सन्धान व्यवस्था। सत्य तँ ई थिक जे एकर कोनो व्यवस्था नहि होइत अछि, कोनो स्थापित आ शाश्वत व्यवस्थासँ ई संचालित नहि होइत अछि। व्यक्ति-व्यक्तिक क्षण विशेषक मनोवेग अलग-अलग व्यवस्था विधान निर्मित करैत अछि। रोटी, सेक्स, सुरक्षाक आवश्यकता पूर कर’ लेल कखन कोन व्यक्ति की करत, तकर पूर्वानुमान असम्भव अछि। कैक कोटिक स्त्राी पुरुषक मनोवेगक विश्लेषण आ चित्राणसँ एहि उपन्यासकें जाहि तरहें समृद्ध कएल गेल अछि; से विवेकशील रचना पाठ प्रक्रियाक माँग करैत अछि। ताहि आधार पर ई कहबामे कोनो संकोच नहि हेबाक चाही जे भारतीय नागरिकक जीवन-व्यवस्थाकें गम्भीरतासँ रेखांकित करबा लेल ई छोट सन वृतान्तक कथा, भारतीय साहित्यक अपूर्व निधि थिक, निदर्शिका थिक। तुलनात्मक रूपें देखी तँ आदिकथाक देवकान्त आ आन्दोलनक कमलजीमे विराट अन्तर अछि। देवकान्त मर्यादा आ मनोवेगमे सामंजस्य स्थापित नहि क’ पबै छथि। दुनू स्थितिक संघर्षक ज्वालामे स्वयंकें भस्म करैत रहै छथि। मुदा कमलजी बेसी सहज छथि। नैतिकता आ मर्यादाक रक्षा करबामे कतहु कोनो हूसल डेग नहि उठबै छथि; काम-तृप्ति हेतु समर्पित नीलूकें अपना कोठलीसँ आपस तँ क’ दै छथि, मुदा मनोवेगकें मारि कए अपनाकें प्रतारित नहि करै छथि। चल जाइ छथि राति बेच’बाली सुशीला नामधारी स्त्राीक खाट पर। ई दीगर बात थिक जे ओतएसँ दोसर मनोवेग बेसाहि अनै छथि।... दुनू नायकक दू परिदृश्य, दू जीवन, दू बाट, दू सीमा अछि। आन्दोलन, जीवन-संग्राममे तल्लीन मैथिल नागरिकक चारित्रिक विश्लेषण, सामाजिक-राजनीतिक पर्यवस्थितिक कोलाज थिक, वृत्तान्त थिक; तँ आदिकथा सामन्ती संस्कारक कोखिमे पुष्पित-विकसित विकृति आ मानवेतर भाषा, व्यवहार, व्यवस्थादिक कुत्सित स्वरूपक गाथा। आन्दोलनक नीलूक उन्माद वयसोचित आचरण थिक, अजोह वयसक एकटा कन्याक क्षणिक उद्वेग थिक; ओहिमे ने तँ दुतरफा प्रेमादर्शक कोनो रूपाकृति अछि, ने वासनात्मक भूखक कोनो नियोजित अवधारणा। ओहिमे कोनो स्वस्थ, सुविचारित सोच आ दूरगामी चिन्तनशीलताक कोनो आशा नहि कएल जा सकै अछि; सम्भवतः तें ओकरा बुझ-सुझा क’ बाट धराएब आसान छल। मुदा आदिकथाक सुशीला परिपक्व, प्रौढ़ आ प्रगल्भ स्त्राी छथि। कुलीन घरानाक एहि विवाहित आ अतृप्तकामा नायिकासँ हिनकर स्वस्थ मानसिकता, तीव्र मनोवेग आ ठोस निर्णयक उमेद कएल जा सकैत अछि। हिनकर प्रेम निवेदनकें नकारल जा सकै अछि, तिरस्कृत कएल जा सकै अछि, हिनका बुझाओल नहि जा सकै अछि। नीलूक उन्माद भेल लुत्ती, जकरा सुनगैसँ पूर्वहि मिझाओल गेल; मुदा सुशीलाक उन्माद भेल दावानल, ओकर मिझाएब असम्भव अछि, ओकर तृप्ति आवश्यक अछि, ओहिसँ धाह उठब उचित अछि। दोसर बात ई जे नीलूक उद्वेग एसगर उठल दोसर मिझौलक; मुदा सुशीलाक उद्वेग जखनहि उठल, देवकान्तक उद्वेगसँ घी-बसात पबैत गेल। दावानल बनि गेल...। दुनू उपन्यासक दू परिदृश्य अछि, दू पर्यवस्थिति अछि...। तथापि लेखकक जीवन-दृष्टिक अन्तर्धारा सब ठाँ व्याप्त अछि। दू उपन्यासक दू परिदृश्य आ दू पर्यवस्थितिक नायक छथि—कमलजी आ देवकान्त। मुदा सब किछु भिन्न रहलाक बादहु नायकक स्वभावमे एतबा साम्य छनि जे कमलजीक नजरिमे चाह-काॅफीमे दूध, चीनी मिलाएब ओकर कौमार्य नष्ट करब थिक (आन्दोलन/पृ. 43) दोसर दिश बिना दूध-चीनीक चाह पीब देवकान्तक प्रवृत्ति भ’ गेल छनि (आदिकथा/पृ. 37)। सामान्य अर्थमे त’ ई अत्यन्त सरलीकृत आ चलताउ वाक्य लगैत अछि, मुदा गम्भीरतापूर्वक विचार कएला पर, प्रतीक अर्थमे वस्तु आ विचारक मौलिकता बनौने रखबाक, ओकर दोषादोष संग ओकरा ग्रहण करबाक ईमानदारी थिक। विद्वान लोकनि तँ मानिते छथि, पाठकीय दृष्टिकोणसँ सेहो ई प्रमाणित भ’ चुकल अछि, जे कथोकथन आ वार्तालापसँ कोनहुँ कथाकृतिमे नाटकीयता आ जीवन्तता अबैत अछि। उपन्यासक स्थितिमे तँ ई सर्वाधिक प्रभावी होइत अछि। कथा विस्तार आ घटना विकासमे कथोकथन जते बेसी हो, उपन्यास ओतबे जीवन्त हएत। एतबा धरि अवश्य जे कथोपकथनक सम्वाद, भाषण नहि भ’ जाए, से भेलासँ उपन्यासक रोचकता आ प्रभाव आहत होइत अछि। हमरा जनैत ओ उपन्यास सर्वाधिक रोचक आ प्रभावकारी होइत अछि, जकर पात्रा आपसमे बेसी काल गप-शप करैत कथाकें गति दैत अछि। उपन्यासकारकें कथाभूमिमे जते कम जाए पड़नि, प्रभाव तते बेसी प्रबल हएत। मुदा ई गप-शप लद्धर नहि हो, से ध्यान राख’क थिक। सम्वादमे पात्राक मनोभाव आ आचरणक संकेत हो। अर्थात् नाटकीय शैलीक उपन्यास लिखब एकटा पैघ जोखिमक काज थिक, जे उपन्यासकें संक्षिप्त, दीप्त, रोचक आ प्रभावकारी बनबैत अछि। ओना एकटा विकराल जोखिम संग लागल रहैत अछि --कौशलमे कनेको चूक भेल तँ सब गुर गोबर। एहि मामिलामे राजकमल चैधरीक दुनू उपन्यास--आन्दोलन, आदिकथा-- प्रभूत सफल उपन्यास थिक। दू भिन्न विषय, दू भिन्न मनोभावक उपन्यासमे कथानककें विस्तार दैत कथोपकथन, घटना विशेषक परिस्थिति आ वातावरण निर्माणमे अपूर्व सफलता प्राप्त केलक अछि। पात्राक आवेग, प्रेरणा, भावना, घटना विशेष पर ओकर प्रतिक्रिया आ पारस्परिक प्रभावक झाँकी दुनू उपन्यासक कथोपकथनमे हरदम देखाइत रहैत अछि। छोट-छोट वाक्य आ कथन खण्डक कारणें ई प्रभाव आओर रोचक भेल अछि आ उपन्यासमे निखार आएल अछि। आन्दोलनमे सुशीला सन वेश्यासँ कमलजीक वार्तालाप(पृ. 38-39), निर्मलाजीसँ भेंट-घाँटक मादे कमलजी आ नीलूक वार्तालाप(पृ. 48), भाषणक रूपमे देल गेल वक्तव्यक अछैत सुदर्शनजीक स्थिति-चित्रा विवरण(पृ. 51-53), अइ बातक प्रमाण थिक जे छोट-छोट वार्तालापसँ कोना एकटा वेश्याक दारुण कथा, अथवा कोनो पुरुष दिश अनुरक्त एकटा युवतीक दोसर स्त्राीसँ ईष्र्याभाव, अथवा कोनो अनैतिक-अवांछित घटनासँ कोनो युवकक आक्रोशक उद्वेग स्पष्ट होइत अछि; आ कोन वैशिष्ट्यक संग तकर प्रभाव पडै़त अछि। आदिकथा यद्यपि वर्णनात्मक शैलीमे लिखल गेल उपन्यास थिक तथापि वार्तालाप द्वारा पात्राक मनोभाव आ चारित्रिक वैशिष्ट्य एतए अंकित अछि। राजकमल चैधरीक कथालेखनक ई खास विशिष्टता थिक, जकर समावेश अइ उपन्यासमे नीक जकाँ भेल अछि। वार्तालापक पश्चात एहि उपन्यासमे कतोक ठाम उपन्यासकार पात्राक क्रिया, आवेग, मनोदशा आदि पर अपन टिप्पणी दैत आगू बढ़ै छथि; मुदा से टिप्पणी अपन गसावक कारणें वार्तालापक संयोजक बिन्दु साबित होइत अछि। प्रथम भेंटक प्रारम्भिक सम्वादमे सुशीला, देवकान्तसँ पूछब शुरुह करै छथि जे--अहाँ जमीन्दार छी?... आ अन्त करै छथि जे -- अप्पन घर त’ अहाँ हमरा सबकें द’ देलऊँ, अपने कतए सूतब?...(पृ.34-35)। अइ वार्तालापमे दुनूक अनुरक्तिक सूक्ष्म विश्लेषण होइत नजरि अबैत अछि। कोनो स्त्राी-पुरुष एक दोसरा दिश कोना अनुरक्त होइ छथि, अनुरक्तिक उद्भव कोना होइत अछि, संकेत कोना होइत अछि, दू अपरिचित व्यक्तिक अपरिचित संकेतक जाँच परताल कोना होइत अछि, दुनू आपसमे कोना खुजैत जाइत अछि... आदिकथाक कथोपकथन एहि समस्त मनोभाव आ परिस्थितिक वार्तालापक विशिष्ट उदाहरण थिक। विश्लेषणात्मक शैलीमे लिखल गेल उपन्यासमे, पात्राक मनोविश्लेषणकंे रेखांकित करैबला कथोपकथन, अक्सर उपन्यासक प्रभावकें उत्कर्ष दैत अछि आ उपन्यासकारक विश्लेषणात्मकताकें गति आ आलन दैत अछि, से एतए भेल अछि। जखन देवकान्तक माम अनिरुद्ध बाबू देवकान्तकें मातृकमे किछु दिन आओर रहि जेबाक आग्रह करै छथि, तखन सुशीला आ देवकान्तक प्रेमाभिव्यक्ति स्पष्ट शब्दमे होइत रहैत अछि, प्रेमिकाक पतिकें सेहो अर्थ स्पष्ट लगैत रहै छनि, मुदा प्रेमक नहि, मामि-भागिनक मर्यादापूर्ण स्नेहक (पृ.67-68)। बहुअर्थक कथोपकथनक ई कौशल चमत्कृत करैत अछि। दैनन्दिनक बोली-बानी, भाषा-संस्कारकें तरासि कए रोचक कथोपकथन बनाएब पैघ कौशलक बात थिक। राजकमल चैधरीकें भाषा संरचनामे एहि तरहक चमत्कार उत्पन्न करबाक महारत प्राप्त छनि। कोनहुँ उपन्यासक कथाक्रम, पात्राक आचरण आ करतब, क्रिया-कलापक परिणति तथा सामाजिक प्रतिक्रिया आदिक प्रभाव भावक पर तखनहि फलित होइत अछि, जखन ओकर विश्वसनीयता कायम भ’ सकए। विश्वसनीयता स्थापित नहि भेला पर कतोक बेर सत्यकथा, फूसि लगैत रहैत अछि, आ तखन पाठक ओकरा खिस्सा-पिहानी बूझि बहटारि दैत अछि। एहना स्थितिमे साहित्य-सृजनक मूल लक्ष्य --सामाजिक परिदृश्य संशोधन अथवा मानवीय व्यवस्थाक संस्थापनक पूर्ति नहि भ’ पबैत अछि, ओहेन साहित्य मात्रा मनोरंजन बनि कए रहि जाइत अछि। मनोरंजन कथा साहित्य लेल आवश्यक अवश्य अछि, मुदा ओ साधन थिक, साध्य नहि। कोनहुँ कथा साहित्य लेल मनोरंजन एतबे अर्थ रखैत अछि, जे पाठक ओकरा आश्रयमे रचनासँ आद्योपान्त जुड़ल रहए। कथा साहित्यक असल उद्देश्य समाप्तिक पश्चात शुरुह होइत अछि, जखन ओकर प्रभाव भावकक मोनमे चलैत रहैत अछि।. ..एहि स्थिति लेल कथाक्रमक विश्वसनीयता प्रमुख तत्व थिक। अविश्वसनीय कथासूत्रा कोनहुँ पाठकक चेतनाकें झकझोड़ि नहि सकैत अछि। तें हरेक घटनाक्रम लेल, चरित्रा चित्राण लेल, देश-काल-वातावरणक व्यवस्थित स्वरूपक निरूपण आवश्यक अछि। कोनहुँ पात्राक आचरण, करतब, मनोवेग, क्रिया-कलाप, कथोपकथन आदिक स्वाभाविकता सुनिश्चित करबा लेल वातावरण, देश, काल आदिक औचित्यक सूचना आवश्यक होइत अछि। निर्मलाजीक कामोन्माद, अनेक पुरुष संग घुमबा-फिरबाक प्रवृत्ति कलकत्ताक परिवेशमे मात्रा चर्चाक विषय थिक, मिथिलाक कोनो गाममे ई घटना होइत, तँ आगि लागि जइतए। मुदा इंगलैण्ड-अमेरिकामे एहेन किछु नहि होइतए। ठीक तहिना, नीलूक विवाह लेल हुनकर आश्रयदाता ब’र तकै छथि, कमलजी संगे हेम-क्षेम देखि चिन्तित होइ छथि; मुदा पाश्चात्य देशमे ई बात अप्रासंगिक होइतए। एम.ए. पास युवक कमलजी मिथिलाक कोनो गाम, कोनो टोलमे ट्यूशनकें अपन जीविका नहि बना सकितथि। कतबो पढ़ल-लिखल होथु, कोनो युवती ग्रामीण परिवेशमे सभा-सोसाइटीमे उठब-बैसब नहि क’ सकितए। पाश्चात्य संस्कृतिमे अनिरुद्ध बाबू कतबो उच्च कुलशीलक होइतथि, कतबो सम्पत्तिशाली होइतथि, सुशीला सन उद्दाम जवानीक स्त्राी बियाहि क’ घर नहि अनितथि; कदाचित अबियो जैतनि तँ ओ कुलानन्द सन समवस्की युवकक मातृत्व नहि स्वीकारितथि, अपन यौन तुष्टि लेल कखनहुँ कोनो देवकान्त, अथवा कुलानन्दक बाँहि ध’ लितथि। कुलानन्दक स्त्राी हुनकर अत्याचार नहि सहितनि; हरिनगरबालीक चैताली नहि चलितनि...। वातावरण निर्माण लेल सेहो आलोच्य समाजक सभ्यता, संस्कृति, आचार-विचार, व्यवहार, रीति-रिवाज, वेश-भूषा, सामाजिक परिवेश भौगोलिक आबोहवा, प्राकृतिक परिस्थिति...सब किछु उत्तरदायी होइत अछि। कोन परिवेश, कोन वातावरणसँ प्रभावित भ’ कए कोन कालमे आदिकथाक सोना मामी देवकान्त पर अनुरक्त होइ छथि, रुष्ट होइ छथि; कोन रीति रिवाजक कारणें कुलानन्द संगे रहबा लेल विवश होइ छथि, कोन कारणें हुनकासँ घृणा होइ छनि, कखन आ किऐ हफीम खा लै छथि, हरिनगरवाली पर किऐ तामस उठै छनि; आन्दोलनक नीलू कोन संस्कार आ सास्कृतिक अनदानक कारणें कोन समयमे कमलजीक स्वागत करै छथि, आदर करै छथि, प्रेम करए लगै छथि, सर्वस्व अर्पित करए चल जाइ छथि; कोन समयमे निर्मलाक शांतिगीतक प्रस्ताव अनर्गल साबित होइत अछि; कोन परिस्थितिमे आन्दोलनक सुशीला बनगाम बालीक शरणमे जाइ छथि; निर्मला भुवनजीक संग छोड़ि कमलजी दिश लपकै छथि... एहि समस्त प्रश्नक उत्तर देश-काल-वातावरणसँ देल जाइत अछि। कोनो घटना खास भौगोलिक परिवेशक खास परिस्थिति आ खास समयमे घटित भ’ कए अर्थवान अथवा अर्थहीन होइत अछि। कोनहुँ पात्राक मनोदशा अथवा क्रिया-कलाप स्थान-काल-पात्रा आ वातावरणक अनुसार स्थिर आ परिवत्र्तनशील होइत अछि। उपन्यासक कथाक्रममे एकर बड़ महत्व होइत अछि। से राजकमल चैधरीक एहि दुनू उपन्यासमे सहजतासँ रूपायित अछि। चित्राकलासँ राजकमल चैधरीकें बड़ बेसी अनुराग रहलनि अछि। कतोक बेर मित्रा लोकनिकें पत्रा लिखैत अपन किछु धारणा चित्रामे अभिव्यक्त केलनि अछि, किछु कविता, चित्राक संग लिखने छथि। इएह कारण थिक जे हुनकर कथा, कविता, उपन्यासमे कतोक ठाम पढ़बासँ बेसी कोनो मनोरम अथवा मार्मिक अथवा हृदय विदारक पेंटिंग देखबाक अनुभव होइत रहैत अछि, अर्थबहुल आ संकेतबहुल पेंटिंग देखबाक अनुभव -- शरदक पवित्रा आकाशमे श्वेत तनु चन्द्रमा उगल छल। कती राति बीतल होएत, किछु ज्ञात नहि। हमर मोन अपन गाम दिश भागि चलल। चरखा काटि कए गुजर करैबाली माइ, बदरिकाश्रम-केदारनाथ-अमरनाथ जएबाक मनोरथ जकर पूर नइं भ’ सकलइ... आ हम दू बेर सुमेरु पर्वत आ तिब्बतक अन्तिम सिमान धरि भ’ आएल छी। हमर अग्रज गामक हाई स्कूलमे गणितक अध्यापक छलाह... अपन पेट काटि कए हमरा एम.ए. पास करौलनि... गाममे महामारीक उत्पात भेल, टन्नसँ रहि गेलाह। आब विधवा भौजी छथि, सोन-सन हुनकर कन्या छनि आ चारू कात भूख, दरिद्रता, संक्रामक बीमारी सभक जाल पसरल अछि... भौजी हमरा संगें नइं रहै छथि, समाजक भयसँ... आ हम बिआह नइं करै छी... (आन्दोलन/पृ. 21)। एहि छोट सन स्थिति-चित्रामे उपन्यासकार कैक बर्खक समय, कैक मनोभाव आ स्वप्नखण्डक वितान, कैक मनोवृत्ति आ व्यवस्था-मर्यादा-दायित्वक बन्धन आ कैक विवशताक दारुण विडम्बनाकें जीवन्त क’ देने छथि। एतेक छोट चित्रामे विराट परिदृश्यक समावेश कोनो कलाकारक श्रेष्ठ कौशल आ गम्भीर जीवन-दृष्टिक परिचायक थिक। अहिना आदिकथा उपन्यासमे--अहाँ देवबाबूक संगें सुलतानगंजक जल-मन्दिर देख आउ। हम नइं जा सकब। कैकटा मोकदमाक कागज-पत्रा तैयार करबाक अछि...।...सुलतानगंजमे गंगाक बीच धारामे अछि प्रसिद्ध अजगैबीनाथ महादेवक प्राचीनतम मन्दिर।...भागिन आ मामी नाह किराया क’ कए मन्दिर पर अएलाह। भोरक आठ-नौ बजल हएत। सूर्यक किरण जाद्दवीक जल पर सतरंग चित्रा बना रहल छल।...अकारणे खिलखिलाइत, सुशीला पुछलथिन—महादेवसँ की वरदान मँगबैन?...की कहबैन? लाज किऐ होइ’ए...?...तावत तीन-चारि टा पण्डा हिनका सबकें धनीक कुलशीलक दम्पति बूझि कए संग भ’ गेलनि...(आदिकथा पृ. 44-46) ...स्थिति चित्राक एहि तरहक उत्कर्ष चमत्कृत करैत अछि। शब्द, कथन, आ वाक्यांशक अर्थ कैक परतमे कैक तरहक व्यंजना दैत रहैत अछि। सन्तुलित आ संयमित कौशलसँ देश-काल-वातावरणक चित्रांकन सर्वथा, सर्वदा कोनो रचनाकें विराट आ शाश्वत साबित करैत रहल अछि, से राजकमल चैधरीक हरेक रचनामे भेटैत अछि। वस्तुतः राजकमल चैधरी बहुविधावादी रचनाकार छथि। अंग्रेजी आ बांग्लामे त’ सब विधामे रचना नहि केलनि मुदा मैथिली आ हिन्दीमे ओ सब विध्ाामे रचना केलनि। विवेचक लोकनिमे बड़ बेसी विवाद अछि, किओ हुनका सफलतम कवि, किओ कथाकार, किओ उपन्यासकार, किओ निबन्धकार मानै छथि। हमरा जनैत, राजकमल चैधरीकें मूलतः कवि माननिहार लोकक धारणा ई रहैत हेतनि, जे हुनकर भाषा-शिल्प मूलतः कविताक शिल्प थिकनि। सम्पूर्ण गद्य, एते धरि जे डायरी आ पत्रा धरिमे कविताक लय भरल रहैत अछि। ई बात उल्लिखित समस्त उदाहरणहुँसँ प्रमाणित कएल जा सकैत अछि। छोट सन वाक्य खण्ड लिखि कए विराट व्यंजना दिश संकेत क’ दै छथि, आ तखनहिसँ पाठक/भावक दोहरी विचार-व्यवस्था संग वेगमयी जलधारामे बहैत चल जाइत अछि। जखनहि पाठक--भौजी (विधवा) हमरासंगें नहि रहै छथि, समाजक भयसँ...अथवा...महादेवसँ की...कहबैन?लाज किऐ होइए...? ... सन उद्धरण देखै छथि, एक टा कथा ओ पढ़ैत रहै छथि, आ एक टा कथा हुनका भीतर सेहो जनमैत जाइत अछि। दू कथाधाराक विकास एक संग होइत जाइत अछि, कखनहुँ समानान्तर, कखनहुँ ओझराइत, कखनहुँ स्पष्ट होइ...राजकमल चैधरीक गद्यक ई विशेष छटा थिक। मानव जीवनक पारस्परिक सम्बन्धक विचार, भावना, आवेग, प्रेरणा आदिकें अभिव्यक्ति दै वला महत्वपूर्ण विधा, आ महत्वपूर्ण रचनामे तकर उपयोग करैत गेल छथि। मुन्नी कामत कतऽ जा रहल छी हम! कतऽ जा रहल छी हम! कतौै तपि रहल अछि, कतौै गलि रहल अछि, कतौै धँसि रहल अछि, तँ, कतौ उठि रहल अछि आइ धरती! तपा रहल अछि अकरा मनुखक बढ़ैत भूख, जे दिन-प्रतिदिन गाछ-वृक्ष काटि अकरा छत्रहीन बनबैत अछि। समाजक कुरीति अकरा गला रहल अछि। अपन बेटी पर देख अत्याचार ई बेबस भऽ धँसि रहल अछि। देख ई सभ विडम्बना मॉं धरती क्रोधसँ पहाड़ बनि संकल्प करैत अछि कि सम्पूर्ण जहाँक अइ विशाल चोटीसँ झाँपि अकर सर्वनाश कैर दी। मुदा ओ कुछ नै करै लेल मजबूर अछि। जेना आइ धरती बेबस लाचार आ कड़ीसँ बानहल देखाइत अछि ओहिना हमरा समाजमे नारीक स्थिति अछि। आइ भाइ जल्लाद बनल अछि आ बाप पापक रूप लेने अछि। प्राचीन कालसँ जइ रिश्ताकेँ भगवानसँ पहिल जगह मिलल अछि आइ ओकर नामो लइ सँ घृणाक बोध होइए। आइ हमरा समाजमे सभसँ अधिक नजाइज सम्बन्ध गुरू आ शिष्याक बीच अछि। हम एगो अरमान मनमे बसा अपन बच्चामे अच्छा संस्कार आ उच्च शिक्षाक अभिलाषा लेने गुरू लग जाइ छी मुदा वएह गुरू हमर आत्मसम्मान केँ ठेस पहुँचाबैत हमर बच्चाक साथ शोषण करैत अछि। भाइ शब्द अतेक पावन, अतेक पवित्र अछि कि सभ बहिन भाइ शब्दकेँ सम्बोघित करैत ई सोचैत अछि कि ई हमर केवल भाई नइ कृष्णक रूप अछि जे युग-युग तक हमर आबरू आ सम्मानक रक्षा करत। चाहे ओ चचेरा ममेरा फुफेरा भाइ किएक नइ हुअए। पर वएह भाइ जब अपन बहिनक विश्वास तार-तार करैत ओकरा संगे बलात्काकार करैए तँ ओकरा की नाम देल जाएत। जन्म देनहार बाप जकरा पिता परमेश्वर कहल जाइत अछि वएह बाप अपन जनमल बेटी संग पाप करैत अछि यएह समाजमे। आखिर कतऽ खडा छी हम, कतऽ जाइले डेग बढ़ा रहल छी एक पलक लेल, सोचलेसँ अहि गंदा पैर सँ चलि हम अपन स्वच्छ आ पवित्र समाजक निर्माण कऽ सकैत छी? केवल सादा कागज पर कलम दौड़ेनाइ सिखनेसँ संस्कार आ सोच नइ बदलैत अछि। अपन जमीर आ अपन आत्माक अवाज सुनु आ कहू कि बेटी कलंकक पुरिया अछि कि हमर समाज ओकरा कलंकित करैत अछि। जगदानन्द झा 'मनु', ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीह्टोंल, मधुबनी करुण हृदयक मालिक महाराज रणजीत सिंह पंजाब प्रान्तक राजा महाराजामे सँ महाराज रणजीत सिंहक नाम हुनक न्यायप्रियता एवं सुशासनक लेल पसिद्ध छनि| एक समयक गप अछि, महाराज रणजीत सिंहजी अपन प्रजाक सुख दुख देखै लेल घोड़ापर सबार अपन सिपाही संगे राज भ्रमणपर निकलल रहथि | महाराज सेना सहित रस्तापर आगू बढ़ैत रहथि की कतौसँ एकटा पाथर उड़ि कs आबि महाराजकेँ बिच्चे माथपर लगलनि| पाथर लगिते हुनकर माथसँ सोनितक टघार बहए लगलनि| महाराज अपन एक हाथसँ घोड़ाक लगाम पकड़ने, दोसर हाथे चट कपारकेँ दाबि लेलनि | सिपाही सभ पाथरक दिसामे दौड़ल| किछु घड़ी बाद ओ सभ एकटा नअ-दस बरखक फाटल चेथड़ी पहिरने, गरीब नेनाकेँ लेने आएल| महाराजकेँ पुछला उत्तर एकटा सिपाही बाजल जे ई नेना पाथर मारि-मारि कए आम तोड़ै छल, ओहे पाथर आबि कs महाराजक माथपर लागल | महाराज रणजीत सिंह ओइ डरैत नेनाकेँ अपना लग बजा, स्नेहसँ ओकर माथपर हाथ फेरैत एगो सिपाहीकेँ आज्ञा देलनि - "पाँच पथिया आम, दू जोड़ी नव कपड़ा आ सएटा असरफी लए कs ऐ नेनाकेँ आदर सहित एकर घर छोड़ि आएल जाए| महाराजक आज्ञाक तुरंत पालन भेल | मुदा महाराजक निर्णयकेँ नै बुझि सेनापति, सहास कए कs ऐ तरहक फैसलाक कारण पुछिए लेलक| सेनापतिक प्रश्नक उत्तर दैत महाराज बजलाह -"जखन एक गोट निरीह गाछ पाथर मारला उत्तर फल दs रहल छै तखन हम तँ ऐ प्रान्तक राजा छी| हमर प्रजा हमर पुत्र तुल्य अछि, एहन ठाम हम कोना फल देबऽसँ वंचित रहि जाइ | गाछ अपन सामर्थे फल दै छै, हम अपन सामर्थे, ऐमे अजगुतक कोन गप| एहन उदार, न्यायप्रिय, वात्सल्य आ करुण ह्रदयक मालिक छलाह महाराज रणजीत सिंह | संकल्पक धनी विल्मा रुडोंल्फ बिल्मा रुडोंल्फक जन्म तेनेसेस शहरकेँ एक गोट गरीब परिवारमे भएलैंह | चारि बरखक अबस्थामे डबल निमोनियाँ आओर कालाजारक प्रकोपक संगे-संगे ओ पोलियोसँ ग्रस्त भs गेलिह | ओ अपन दुनू पएरकेँ सहारा देबैक लेल ब्रैस पहिरैत छलिह | डाक्टर तँ एते तक कहि देलकैन्ह जे ओ जीवन भरि अपन पएर सँ चलि फिर नहि सकतिह, मुदा हुनकर माए हुनका हिम्मत बढ़ेलखिन्ह आ कहलखिन्ह -"दृढ़ शंकल्प, लगन, आ कठिन मेहनत सँ जे कोनो काज कएल जाए भगवान ओकरा अवश्य पूरा करैत छथिन्ह |'' इ गप्प सुनि विल्मा निश्चय कएलैन्ह जे ओ दुनियाँकेँ सभसँ तेज धाविका बनतिह | नअ बरखक अबस्थामे डाक्टरक मना कएला बादो ओ अपन पएरक ब्रैस उतारि कs अपन पहील डेग जमीनपर बढ़ेलीह | १३ बरखक अबस्थामे अपन पहील दौड़ प्रतियोगतामे भाग लेलैन्ह आ सभसँ पाछू रहलीह | ओकर बाद दोसर, तेसर, चारिम, पाँचम प्रतियोगता सभमे भाग लैत रहलीह आओर सभसँ अन्तिम स्थानपर आबैत रहलीह | आ इ प्रयास ताबत तक रहलैन्ह जाबत कि ओ दिन नहि आबि गएल जहिया ओ प्रथम एलीह | १५ बरखक अबस्थामे विल्मा टेनिसी स्टेट यूनिवर्सिटी गएलीह, जाहि ठाम हुनक भेट एडटेम्पल नामक एकटा कोचसँ भेलैन्ह | हुनका ओ अपन मोनक इच्छा बतेलीह, जे ओ दुनियाँकेँ सभसँ तेज धाबिका बनऐ चाहैत छथि | हुनक दृढ़ इच्छा शक्तिकेँ देखैत टेम्पल हुनक कोच बनब स्वीकार कएलैन्ह | अंतमे ओ शुभ दिन आएल जहिया विल्मा ओलम्पिकमे भाग लs रहल छलीह | ओलम्पिकमे दुनियाँकेँ सभसँ तेज दौड़ए बला सभसँ मुकाबला रहैत छैक | विल्माक मुकाबला जुताहैनसँ छलैन्ह जिनका कियो नहि हरा पएने छल | पहील दौड़ १०० मीटरकेँ छल जाहिमे बिल्मा जुताहैन केँ हरा कs पहील स्वर्णपदक जितलीह | दोसर दौड़ २०० मीटरकेँ एहुमे विल्मा, जूताकेँ दोसर बेर हराकए अपन दोसर स्वर्णपदक जितलीह | तेसर आ अन्तिम दौड़ ४०० मीटर रिले रेस छल आ विल्माक सामना एकबेर फेरसँ जुतासँ छलैन्ह | एहि अन्तिम आ निर्णायक दौड़मे टीमक सभसँ तेज धाबिकाकेँ बिच सामना छल | दुनू टीमसँ चारि चारिटा सर्बश्रेष्ठ धाविका, करू अथवा मरुक मुकाबला | विल्माक टीमकेँ तीनटा धाविका रिले रेसकेँ शुरूआती तिन हिस्सामे दौड़लीह अ आसानीसँ बेटन बदललीह | जखन विल्माकेँ दौड़क बेर एलैन्ह तँ हुनकासँ बेटन छूटि गएलैन्ह मुदा ओ अपनाकेँ सम्हारैत, खसल बेटन शिर्घतासँ उठाबैत मशीन जकाँ तेजीसँ दौडैत जुताकेँ तेसरो बेर हरा कs तेसर गोल्ड मेडलक संगे-संगे दुनियाँकेँ नम्बरएक धाविका बनि अपन सपना पूरा करैत इतिहासक पन्नामे अपन नाम स्वर्ण अक्षरसँ लिखेलथि | ई अमीट इतिहास १९६० कए ओलम्पिककेँ अछि जाहिमे एकटा लकबाग्रस्त महिला दुनियाकेँ सर्वश्रेष्ठ धाविका बनल छली | एहेन सफल व्यक्तिक खिस्सासँ अपनों सभकेँ मोनमे सफलता प्राप्तिक लालसा अबस्य जगल होएत | कठिनाई सफलताक पहील सीढ़ी छैक, दृढ़ शंकल्प आ विश्वासक संग डेग आगु तँ बढ़ाऊ सफलता अहाँक चरण चूमत | बाल गजलक अवधारणा बाल गजलक अवधारणा कोनो बेसी पुरान नहि अछि | आँखिक देखले- देखले चारि महिना भेल होएत | मुदा जेना कहल जाई छैक, कोनो कार्यक अथबा अबधारनाक सुरुवात कतौ नहि कतौ सँ होएते छैक | आ हम सब एखुनका समकालीन गजलकार (विशेष कए विदेह आ अनचिन्हार आखर सँ जुरल ) शोभाग्यशाली छी जे एहि महान घटनाक्रम केँ परोक्ष अपन आँखि सँ देख रहल छी आ इतिहास में धारनाक गवाह बनि कए आएब | ओना कोनो कार्य केँ हरदम दूगोट पक्ष होएत छैक एकटा पक्ष में तँ दोसर बिपक्ष में | बहुत रास बिपक्षक लोक केँ एखन तक मैथिली में गजल, सेहो नहि पचि रहल छैन आ अगुलका पीढी हुनका सब केँ सामने मैथिली में बाल गजल लए कँ उपस्थित भए गेल | ई हुनका सब केँ लेल अविश्वसनीय आ अपच भेनाई तँ स्वभाबिक छनि | किएक तँ बाल गजलक अब्धारनाक उत्पति एखन तक उर्दू आ हिंदीयो में चुप्पे अछि, ओहि ठाम मैथिली में गजल नहि पचबै बला सब केँ सोँझां में करीब चारि महिना में लगभग सय सँ बेसी सुन्नर-सुन्नर नेनपन सँ भरल बाल गजल हुनका सब लेल आश्चर्ज मुदा हमरा सबहक लेल प्रश्नताक विषय अछि | किछु लोक साँप केँ गेलाक बाद लाठी पितै में लागल रहैत छथि तँ किछु लोक एकटा सार्थक श्रीजन में, मुदा इतिहास बनाबै बला में नाम सदिखन श्रीजनकर्ता केँ अबैत छैक | हम सब केँ सब एखनका समय केँ श्रीजनकर्ता छी | बाल गजलक अबधारना कोना सम्भब भेलै आ कोन-कोन महिना में एकर पूर्ण जानकारी चन्दन झा जीक आलेख में नीक सँ अछि मुदा हम एतेक जरुर कहब जें एहि अबधारनाक जन्म आशीष अनचिन्हार जीक मोन सँ भेलैंह आ बहुत जल्दीए ई अपन स्वतंत्र छाप जन-जन केँ मोन पर छोरत | बाल मोनक कल्पना केँ कोनो सीमा नहि छैक, बस ओ कल्पना ओ चरित्र जे जीवनक भागमभाग में कतौ हमरा सब सँ हरा गेल, कनी काल केँ लेल सब किछ बिसरि कए बच्चा बनि कलम चलेने बाल गजल | एहि सन्दर्भ में गजेन्द्र ठाकुर जीक ई उक्ति सय टका ठीक छैन -"जे जतेक बच्चा बनि जेता ओ ओतेक नीक बाल गजल कहता " | बिनु पानिक नाउ चलाएब हम बिनु चक्काक गाडी बनाएब हम नहि बिना पानिक नाऊक कोनो प्रयोजन आ नहि बिनु चक्काक गाड़ीक कोनो प्रयोजन मुदा उपरका शेर में बाल मोनक परिकल्पना अछि आ ओ बाल मोन किछो कए सकैत अछि | बिनु पानिक नाऊ चला सकैत अछि, बिनु चाक्कक गाड़ी बना सकैत अछि, बाबा केँ घोरा बना सकैत अछि | ओहे बाल मोन जखन गंभीर होएत अछि तँ परदेश में बसल काका बाबु केँ बजाबैक हेतु चीत्कार करैत अछि - 'मनु' दै सपत घर घुरि आउ काका बाबु नेन्ना केँ कखन तक कोँढ ठोराएब चंदन कुमार झा, सररा, मदनेश्वर स्थान, मधुबनी, बिहार मैथिली बाल-साहित्य आ' बाल-गजल मैथिली साहित्यक इतिहास करीब ८०० बरख पुरान छैक आ' से एकर समृद्धि विश्व-साहित्य जगत मे अपन फराक आ' बेछप स्थान बनौने अछि ताहि मे कोनो दू मत नहि.मुदा, जखन मैथिली साहित्यक एहि समृद्धि केँ ध्यान मे रखैत मैथिली बाल-साहित्य पर दृष्टिपात करैत छी वा' आन-आन भाषाक बाल-साहित्य सँ एकर तुलना करैत छी तऽ फेर ई नगण्यप्राय बुझना जाइत अछि.मैथिली भाषा मे बाल-साहित्य बहुत कम लिखल गेलैए एखनधरि. लेकिन, एकटा बात जरूर छैक जे मिथिला क्षेत्र मे घरक बुढ़-पुरान द्वारा धिया-पुता सभकेँ विभिन्न तरहक प्रेरणादायी खिस्सा पिहानी सुनयबाक प्रचलन बहुत पुरान छैक मुदा, एकरा बाल-साहित्य केऽ अंतरगत मान्यता नहि देल जायत किएक तऽ ई लिखित रूप मे नहि उपलब्ध अछि. बिभिन्न जगह पर एकर विभिन्न स्वरूप मे कथानक बदलैत रहैत छैक.लिखित रूप मे नहि हेबाक कारणेँ ई खिस्सा-पिहानी सुनब आ' सुनेबाक परंपरा सेहो विलुप्त भेल जाऽ रहल छैक. मैथिली बाल साहित्यक प्रादुर्भावकाल प्रायः बीसम शताब्दीक उत्तरार्ध केँ मानल जायत.ओना हमरा लग एखनधरि एकर कोनो प्रामाणिक तारीख तऽ उपलब्ध नहि अछि मुदा, बाल-साहित्य लिखनिहार पुरान साहित्यकार सभक रचनाकाल केँ धेयान मे रखैत हम ई बात अपन अनुमानक आधार पर कहि रहल छी.एहि समय मे पं.चंन्द्रनाथ मिश्र "अमर", पं. गोविन्द झा, मुरलीधर झा,कालीकान्त झा "बुच", रामलोचन ठाकुर सदृश मुर्धन्य विद्वान, स्थापित साहित्यकार आ' मैथिलीसेवी सभ अपन कलमक मोसि पिया मैथिली बाल-साहित्य केँ पोसलनि.फेर जीवकांत, सियाराम झा "सरस", सन लोकप्रिय साहित्यकार एकरा अपन आंगुर धरा डेगा-डेगी चलौलनि.एकैसम सदीक शुरुआत मे तारानन्द वियोगी,ले.क. मयानाथ झा, जगदीश प्रसाद मण्डल,गजेन्द्र ठाकुर आ' प्रिती ठाकुर, ईत्यादि सँ मैथिली बाल-साहित्य केँ बेश दुलार-मलार भेटि रहल छैक.वर्तमान मे ऋषि वशिष्ठ आ' डा. शशिधर कुमरक बाल-साहित्यक लेल कयल जा रहल अवदान सेहो उल्लेखनीय अछि.तखन आब ई आशा निश्चित रुपेँ कयल जाऽ सकैत अछि जे मैथिली बाल-साहित्य सेहो क्रमशः जवानी आ' प्रौढ़ावस्था केँ प्राप्त करत आ' चिरंजीवि बनत.एकर एहने उज्जवल भविष्य केँ देखैत साहित्य अकादमी दिल्ली सेहो मैथिली बाल-साहित्य केँ मान्यता दैत एकरा लेल पुरस्कारक प्रावधान कयलक अछि.अस्तु. मैथिली साहित्य जगत मे गजल सेहो कमोवेश नवके विधा कहल जायत.ओना एकर उद्भव मैथिली मे करीब सय बरख पूर्व भेल रहैक आ' फेर कहियो गजल तऽ कहियो गीतल के रुप मे ई अड़ल रहल मुदा, एहि गीतल-गजल सभ मे गजलक व्याकरण केँ कमोवेश एकात कऽ देल गेलैक.परिणामस्वरूप, मैथिली गजल आ' गजलकार मैथिली काव्यधारा सँ सभदिन कतिआएले रहल आ गजल सेहो सभदिन अपन अस्तित्वक लड़ाई लड़ैत रहल अछि. एकैसम सदीक एखनधरिक बारह बरख मैथिली गजलक इतिहास मे अन्यतम स्थान रखैत अछि. एहि समयावधि मे श्री गजेन्द्र ठाकुर आ' आशीष अनचिन्हारक अवदान अविस्मरणीय अछि. गजेन्द्र जी गजल व्याकरणकेँ पुष्ट करैत नहि खाली गजल लिखलाह अपितु सरल वर्णिक आ' सरल मात्रिक बहरक रूप मे मैथिली गजल संसार केँ दूटा अनमोल बहर वा गजल-छंदक ढाँचा देलखिन्ह जे हमरा सन-सन कतेको नवतुरिया आ' नवसिखुआ केs लेल गजल लिखबा हेतु सहायक सिद्ध भेल अछि.एहि सँ मैथिली गजल केँ अभूतपूर्व समृद्धि भेटि रहल छैक. वर्तमान मे मैथिली गजलक लेल आशीष अनचिन्हारक समर्पण वर्णनातीत अछि. आशीष जी उर्दू आ' अरबीक समृद्ध गजल व्याकरण केँ मैथिली भाषाक आवश्यकतानुसार जाहि तरहेँ सरलीकरण केलथि आ' फेर अनचिन्हार आखरक माध्यम सँ आम जनमानस मे बहर आधारित गजल कहबाक (लिखबाक) लेल रुचि जगा रहल छथि से जा'धरि मैथिली गजल इतिहास रहत ता' धरि हिनकर एहि अवदानक चर्चा अवस्से कयल जायत. मैथिली मे बाल-गजल एकदम टटका परिकल्पना अछि.आन भाषाक बाल-साहित्य सभ मे सेहो बाल-गजल किन्साइते हेतैक.उर्दू मे गजल माने प्रेमालापे बुझल जाइत छलैक पहिने मुदा, फेर गजलकार सभ एकरा विस्तार दैत एहि मे सामाजिक सरोकार केs सेहो समावेशित कयलनि लेकिन बाल-गजल ओत्तहु जनमल हेतैक ताहि मे हमरा शंके बुझना जाइत अछि. मैथिली मे बाल-गजलक परिकल्पना सर्वप्रथम २४ मार्च २०१२ केs आशीष अनचिन्हार द्वारा कयल गेल आ' फेर २७ मार्च केs आशीष जी सूचना देलनि जे २५ वा २६ मार्च केs मैथिलीक पुरान आ' स्थापित गजलकार मुन्ना जी द्वारा एकटा बाल-गजल लिखल गेल अछि.एहि तरहेँ मुन्नाजीक ई बाल-गजल मैथिली बाल-गजलक इतिहास मे प्रथम होयबाक गौरव पौने अछि.आशा करैत छी जे विदेहक एहि बाल-गजल विशेषांक मे ई बाल-गजल प्रकाशित होयत. बाल-साहित्य सृजनकाल मे बाल मनोविज्ञान केँ धेयान मे राखब परमावश्यक.एकटा उत्कृष्ट साहित्य लेल जरुरी छैक जे ओ' सरल, बोधगम्य आ' प्रेरणास्पद हो.जखन बाल-गजलक परिकल्पना मैथिली गजलकार सभक सोझाँ एलनि तऽ स्वाभाविक रुपेँ हुनका सभक मोन मे ई प्रश्न उठलनि जे एकर रुपरेखा केहन हेतइ.....एकर व्याकरण आ' भावपक्ष केहन हेबाक चाही...ईत्यादि.हुनकर सभक एहि जिज्ञासा केs शांत करैत गजेन्द्रजी कहलखिन्ह जे कायदा-कानून तऽ सामान्ये गजल जेकाँ रहतैक मुदा भावपक्ष एहन हेबाक चाही जे छोट-छोट धिया-पुता के रुचई.ओकर सभक मन-मस्तिष्क केँ पचई आ' तइँ जे गजलकार जतेक बच्चा बनि बाल-गजल कहताह(लिखताह) ओ' ओतेक सफल हेताह. उत्साह आ प्रतिभा सँ भरल अमित मिश्र,पंकज चौधरी "नवलश्री",जगदानन्द झा "मनु",रुबी झा, मिहिर झा,ईत्यादि सन नवगजलकार सभ गजेन्द्रजीक उपरोक्त कहल बात के पुर्णतः आत्मसात कयलनि.फलस्वरुप, २४ सँ ३१ मार्च २०१२ अबैत-अबैत, एक्के सप्ताह के भीतर गोट दसेक सँ बेशी बाल-गजल हमरा सभक सोझाँ आयल.एहि क्रम मे हमहू एक-दूटा बाल-गजल लिखबाक प्रयास कयलहुँ.मुदा,एहिठाम उल्लेखनीय बात ई जे मैथिली बाल-गजल प्रायः सोइरीये सँ अपन रूप आ भाव सँ आम जनमानस के आकर्षित-प्रभावित करय लागल.बहर आ'व्याकरणक मापदण्ड पर सोंटल आ' बिम्ब आ' भावसँ ओत-प्रोत मैथिली बाल-गजल अपन जन्महि कालसँ संकेत देमय लागल जे मैथिली बाल-साहित्य मे ओकर भविष्य बेश उज्जवल छैक आ'से लगभग चारिए मासक अल्पावधि मे एकसय सँ बेशी बाल-गजल एहि बातक प्रत्यक्ष प्रमाण अछि. अमित मिश्र एखन जीवनक छात्रावस्था मे छथि आ'से एखन हिनकर एकटा पएर नेनपन तऽ दोसर जुआनीक सोपान पर छन्हि आ' तकरे प्रतिफल छैक जे हिनका बाल मनोभावक सागर मे डूबकी लगबैत देरी नहि लगैत छन्हि.यैह कारण छैक जे ई बाल-गजलकारक पाँति मे सभसँ आगू ठाढ़ भेटैत छथि.एखनधरि गोट तीसेक सँ बेशीए बाल-गजल रचि चूकल छथि आ तइमे अधिकांश अरबी बहर पर आधारित अछि जे हिनकर गजलकारक रूप मे प्रतिभाक परिचायक अछि.ई दरभंगा मे रहैत छथि से हिनकर बाल-गजल सभ मे शहरी आ' ग्राम्य परिवेश मे बच्चा सभक मनोभावक अद्भुत चित्रण-वर्णन भेटैत अछि.ई कतहु- माटिक चाउर पानिक दूध पातक थारी बनेबै माटिक चुल्हा पर खीर रान्हि,तरकारी बनेबै आ' बालुक चिन्नी कादो के दही गेना फूलक चूडा़ हेतै घैलक (खपटा) चकला संठी के बेलना से पूड़ी बनेबै ....कहैत भेटताह त' कतहुः- पीठ पर छै बैग बौआ चलल इस्कुल लाल पियर ड्रेस चमके भरल इस्कुल नै पहाड़ा पढ़ब नै सीखब ककहरा आब छै कंपुटर सिखा रहल इस्कुल....आ' फेर व्यस्त माय-बाप आ' एकाकी होइत बचपन दिशि इशारा करैत कहैत छथि - नै जो पढ़ाबै के लेल इस्कुल माँ तू जाइ छैँ बदलै घर त' वनवास मे पंकज चौधरी "नवलश्री" सेहो प्रवासी छथि आ' गाम सँ दूर हिनका बेर-बेर नेना मे बितायल दिन इयाद अबैत छन्हि.तैँ सहजहि कहैत भेटताहः- देखि भूख सँ लोहछल नेन्ना दुख-सुख सभटा लोप भेलै भंसा घर मे घाम सँ भीजल काज करै सभ चुट-चुट माँ होय कहाँ अनका देखबैलै "नवल" ई मायक माया-तृष्णा भेर निन्न तइयो कहि खिस्से दूध पियाबय घुट-घुट माँ.....आगाँ कहैत भेटताह... मोन पड़ल ई किये अनेरे बात पुरनगर बचपन के आँखि नोरेलै मोन जड़ेलक याद रमनगर बचपन के बाबुक कनहा मायक कोरा अनुपम झूला सन घुआ-मुआँ ता-ता-ता थैया आर ठेहुनिया खेल छमसगर बचपन केँ. रूबी झा एकटा गजलकारि हेबाक संग-संग माय सेहो छथि से हिनकर बाल-गजल मे मायक ममता स्पष्ट दृष्टिगोचर होइत अछि.जेनाः- रुसिये गेल बौआ मनाएब कोना कए निर्धन माय बौआ बुझाएब कोना कए...फेर आगाँ कहैत भेटतीहः- चलल ठुमकि बौआ कते सोहावन लागै छै बाजल बौआ तोतल माँ मनभावन लागै छै. मनुजी बेशीकाल बालमन के अपन प्रेरक बाल-गजल सभक माध्यम सँ प्रेरित करैत भेटताह से अहूँ सभ देखू:- मुठ्ठी भरि बिया भागक अपन हम रोपि अपने माटि में हँसि हँसि कँ गौराएब आ' फेर... हमरा कहैत अछि "मनु" मूर्ख चरबाहा पढ़ि कए सभ चरबाहा के पढ़ेबौ हम माय नहि चरबै लेल गाय जेबौ हम पठा हमरा इस्कुल कॉपी पेन लेबौ हम. उपरोक्त शेर वा गजलांश सभ तऽ एकटा बानगी मात्र अछि.एखनधरिक बाल-गजल शतक पर यदि दृष्टिपात करब तऽ माय-बापक दुलार-मलार,भाय-बहिनक झगड़ा-झाँटी सँ लऽ के लक्ष्यप्राप्ति हेतु प्रेरणा आ संकल्प सभ किछु भेटि जायत. आ' फेर ई कहबा मे कोनो अतिशयोक्ति नहि रहत जे मैथिली बाल-गजल अपन छठिहारे सँ जीवकांत,सरसजी सन-सन निसन्न कवि सभक बाल-कविताक समकक्षी बनि गेल अछि अछि. अंत मे कहय चाहब जे विदेह जे ई बाल-गजल विशेषांक बहार करबाक नेयार केलक अछि से निःसंदेह मैथिली बाल-गजल आ' बाल-साहित्य इतिहासक विकास मार्गपर एकटा माइलक पाथर साबित होयत.एकरा आरो ठोस रूप देबाक मादेँ हमर सुझाव रहत जे एहि अंक मे सम्मिलित बाल-गजल आ' बाल-गजल सँ संबंधित आलेख केँ संग-संग एखनधरिक किछु उल्लेखनीय बाल-गजल सभकेँ एकठ्ठा कऽ एकटा छोट-छीन पोथीक रूप मे विदेह परिवार प्रकाशित कराबय आ' संपूर्ण मिथिला क्षेत्रक विद्यालय आ' पुस्तकालय सभमें उपलब्ध कराबय जाहि सँ बाल-गजलक परिकल्पना अपन उद्देश्य के प्राप्त करत.गाम-घरक नेना-भुटका बाल-गजल सँ परिचित हेताह आ' हुनका सभ मे मैथिली बाल-साहित्य पढ़बाक प्रति रुचि जगतैन संगहि मैथिली बाल-साहित्यक गजलकार सभक मेहनति सोकाज लगतनि.एहिठाम हम मिथिला क्षेत्रक ओहन विद्यालय,सामाजिक आ' शैक्षणिक संस्था,गायक,संगीतकार,ईत्यादि, सभ जे आर्थिक रुपेँ सबल छथि,सँ नेहोरा करब जे ओ बाल-गजल के ऑडियो-विडियो कैसेट,सीडी,डीविडी बना गामघरक अंगना-घर मे पहुँचेबाक प्रयास करथि.मैथिली बाल-गजलक भविष्यमे विकासक मादेँ हमर मनोरथ अछि जे ई धिया-पुताक ठोर पर ओहिना सजय जेना मैथिलानीक ठोर पर गोसाउनिक गीत,सोहर,चौमासा,बारहमासा,समदाउन बसल छैक.अस्तु. मिथिला-मैथिली आंदोलन मिथिला मे मिथिला-मैथिली-मैथिल के लेल जे कोनो संघर्ष एखनधरि भेल अछि ओहि मे सभसे बेशी साहित्यकारेक भागीदारी देखल गेल अछि. लोकनेता आ'कि आम जनता कहियो मूल आंदोलन वा संघर्ष (किएक तऽ आंदोलन शाइद भेबे नहि केलैए एखनधरि कोनो) से नहि जोड़ल गेल जकर नतीजा छैक जे आइधरि अधिकतर मांग के सत्ता द्वारा ठोकराओल गेलै, संघर्ष अपन मूल उद्देश्य सँ भटकैत रहल आ' संस्था सभ पारिवारिक बनि के रहि गेल अछि. दुष्प्रभाव एहन पड़ल छैक समाज पर जे आमजन आंदोलनकारी सभकेँ चाटुकार सँ बेशी किछु नहि बुझैत छथि. जँ कियो कत्तौ मैथिल अस्मिताक रक्षार्थ कोनो तरहक नव कार्यक्रम ठनैत छथि तऽ ओहि मे लोक के व्यवसाय सँ बेशी किछु नहि देखाय छैक.एहि दुर्गति के लेल मूल रूप से दू टा बात जिम्मेदार छैक. पहिल जे जखन सत्ता समाजक उच्चवर्गक हाथ मे रहै तखन ओ कतिआएल आ' पछुआएल वर्गक लोक के उत्थानक लेल कोनो उल्लेखनीय काज नहि केलक.सभदिन ओहि उपेक्षित वर्ग के जोन-चाकर बना खटबैत रहल.ओकर शोषण करैत रहल.एहि समय मे मिथिला मे सामंतवादी सोचक प्रसार तेहन ने भेल जे एखनोधरि ई अधिकांश लोकक पछोड़ नहि छोड़लक अछि.स्पष्ट छैक जे एहि सँ मिथिलाक विकास अवरोधित भेलै.लोक मे वैमनस्यता बढ़लैक आ क्रमशः उपेक्षित वर्ग मे प्रतिशोधक बीजारोपण केलक. फेरो जखन ई उपेक्षित समाज एकत्रित भेलै आ' सत्ता हाथ लगलै तऽ एहू समयक राजनेता सभ लऽग प्रायः आमजनताक दुख-दर्द सँ कोनो सरोकारे नहि रहलै.कमोबेश ओहो सभ अपन पूर्ववर्तीक नकले केलक आ' समाज के विभिन्न वर्ग मे बाँटि सत्तासीन रहबाक जोगार करैत रहल अछि.ओम्हर सत्ताच्यूत भेल सामंतवादी लोकक जुन्ना तऽ जड़ि गेलै मुदा ऐँठन एखनो नहि गलैए.एहना मे फाँक-फाँक मे बँटल समाज ककरो आश्चर्यचकित नहि करैत अछि आब, हँ एहि बाँटल समाज के चुचकारि-पुचकारि सभ अपन-अपन स्वार्थ सिद्धि मे लागि गेल चाहे ओ अगरा वर्गक प्रतिनीधि हो किंवा पिछड़ा वर्गक. शासन-प्रशासनक सहयोग सँ निराश आमजन सेहो एहना मे उदासीन भऽ अपन-अपन रोजी-रोजगार के ईष्ट बुझि दहोदिश छिड़िआय लागल.फलस्वरूप,खण्ड-खण्ड भेल मैथिल समाज दिनानुदिन कमजोर होइत जा रहल अछि.एखनहुँ मैथिली आंदोलनक सरन अधिकांशतः साहित्यकारे वर्ग टेकने छथि वा कियो एनाहियो कहि सकैत अछि जे सरन टेकबाक भौन केने छथि.मैथिली साहित्यकारक विपन्नता आ गुटबाजी क्रमशः हुनकर सभक संघर्षक विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगबैत रहल अछि. आ' जखने अपने घर मे ककरो मोजन नहि रहतै तखन दुनियाक लोक कतऽ से ओकरा मोजर देतै. तइँ ई साहित्यकार आंदोलनकारी सभ सभदिन अपन प्रयास मे विफल होइत रहलाह अछि. आंदोलन सभक दुर्गतिक दोसर कारण अछि जे एखनधरि जे कोनो आंदोलन चलाओल गेल अछि ओकर मूल उद्देश्य, ओहि सँ समाज के होइ बला फायदा आ' नहि भेलापर होइबला नोकसान, आ आंदोलन विस्तृत रूपरेखा आइधरि कहियो आमजनताक सोँझा नहि राखल गेल वा बेशी काल एहि सभ पर समग्र रुपे आपस मे चर्चा-परिचर्चा नहि कराओल गेल आ' बेशीकाल हरबड़िए मे निर्णय लऽ किछु दसेक लोक आंदोलन ठानि दैत छथि.फेर यदि सामान्य नागरिक अपना के एकात बुझैत अछि तऽ ताहि मे ओकर कोन दोष छैक. जहिना कारणसभ स्पष्ट छैक तहिना एकर समाधानो एकदम स्पष्ट छैक.कोनो आंदोलन तखने सफल होयत जखन नेतृत्वकर्ता सभ अपन सामंती सोच, आपसी द्वेशक त्याग करताह, समाजक सभवर्गक लोक के ओहि आंदोलन सँ जोड़ताह आ' आंदोलन मूल उद्देश्यक प्राप्ति हेतु ठोस नीति बना ओकरा आमजनक सरोकार सँ जोड़ताह. उमेश मण्डल मैथिली युवा रचना-धर्मिता :: परंपरा परिवर्त्तन आ भविष्य “रचनाक धर्मिता, साहित्य सृजनक धर्म एवं ओकर भविष्य” कतेक महत्वपूर्ण विषय अछि। प्रतिपाद्य विषयपर जतबा रचना पढ़ल गेल संभव, विचारणीय अछि। सन्दर्भक मूल अछि इमानदारीसँ, निष्पक्ष भऽ रचना करब, रचना एवं रचनाकारक धर्म-कर्म यएह थिक। धर्म-कर्म, काम-धाम दुनूक प्रयोग अपना सबहक बीच होइत आएल अछि, सभ बजैत आएल छी, रहै छी। विचारणीय अछि जे जहिना कर्म-धर्म, ओहन काजकेँ कहल जाइत जे धर्मक रास्तासँ चलैत अछि। आ कर्मक अर्थ काम सेहो होइत अछि। जेकरा संग धाम शब्दक प्रयोग होइत अछि- काम-धाम। धाम अलंकार रूपमे प्रयोग होइत अछि जेकर तात्पर्य स्थानसँ होइत अछि जेना वैद्यनाथ धाम। स्पष्ट अछि अपना सबहक धाम मिथिला थिक, मिथिला धाम। आ मिथिलाक विकास उद्देश्य। जइ देशमे अनेको भाषा, अनेको जाति-सम्प्रदय एक संग डेग-मे-डेग मिला चलैत आबि रहल अछि। हमरा सभकेँ ओइ शक्तिकेँ चिन्हबाक अछि, पकड़बाक अछि एवं मजगूतीसँ पकड़ि रखबाक अछि। जे एतेक पैघ देशकेँ एक तागमे बान्हि कऽ रखने अछि। आ ई चीज कोनो आइये नै भेल, अदौसँ आबि रहल अछि। उदाहरण लेल अहाँ कोनो गामकेँ लऽ लिअ। गामक श्रेष्टता ओइ गामकेँ होइ छैक जइ गाममे छत्तिसो वर्णक बास अछि। ऐ छत्तिसो वर्णकेँ आर्थिक आ वौद्धिक रूपमे देखल जाए तँ गरीबसँ गरीब (भिखमंगा) आ अमीरसँ अमीर छथि। जहिना निम्नसँ निम्न जाति एवं उच्चसँ उच्च जाति सेहो गाममे समाजमे बसै छथि। मुदा सामाजिक बंधन ओहन अछि जे सभ अपना-अपना सीमामे स्वतंत्र रूपसँ जीब रहल छथि। देखि सकै छी, सोचि सकै छी जे एक्के गामक एक धरतीपर भिन्न-भिन्न सम्प्रदायक उत्सव-समारोह साले-साल होइत आएल अछि, होइत रहैए। हमरा सभकेँ ऐ सभ महत्वपूर्ण विन्दुपर विचार कऽ ओइ शक्तिकेँ अक्षुण्न रखबाक दायित्व बनैत अछि। जइसँ मात्र वर्त्तमाने नै भविष्य सेहो सशक्त रहत एवं दुनियाँक समक्ष जइ विशेषताक लेल अपन सबहक पहिचान अछि सेहो बनल रहत। समस्या जटील जरूर बूझि पड़ैए मुदा समाधानक उपाय सेहो समाजेमे अछि। समाजेक भीतर अछि। जे सनातनी पद्धति माने परिवत्तनीय पद्धतिसँ समाधान कएल जा सकैए। हँ एहेन जरूर भऽ गेल अछि जे आकाश-पातालक दूरी बीचमे बनि गेल अछि। मुदा की हम सभ हाथ-पएर समेटि थुसुकुनिया मारि ली? सीरा नै भट्ठा दिसि दहाइत रही? अपना महत्वकेँ बिसरि जाय? नै। बल्कि, कान ठाढ़ कऽ सुनबाक, बुझबाक एवं किछु करबाक लेल अपनाकेँ तैयार करबाक चाही। अपन मिथिलाक वैदिक पद्धतिपर नजरि लऽ जाए इमानदारीसँ बुझबाक अछि। भारतीय चिन्तनधारामे पातालोसँ आकाश आ आकाशोसँ पाताल आबि जाए तकर संवाद परिचालन होइत रहल अछि। दृढ़ता अनबाक लेल ऐठाम एकटा कहावत मोन पड़ि रहल अछि जे कहबी छै ‘बिना कारणे टिटही नै लगै छै।’ मूल प्रश्न अछि- समाज केना सशक्त बनए, देश केना सशक्त बनए। ऐ दायित्वकेँ बूझि रचनाक सृजन हेबाक चाही। तँए साहित्य की? साहित्य दर्पण आकि दर्शन? साहित्य दर्पण थिक, मात्र कहने व्यापकताक अभाव बनल रहि जाइत अछि। दर्पणक शीशाक एक भागमे पॉलिश कएल रहैत अछि। जेकर परिणाम होइत अछि जे ओ एकभगाह भऽ जाइए। युवा साहित्य सृजक भाय-बहिन, अपना सभकेँ विचार करबाक आवश्यकता अछि जे साहित्य आखिर छी की? दर्पण आकि दर्शन? जइमे चारू दिशा देखल जाइत अछि। भौगोलिक भाषामे दिशा िनर्धारित अछि, पूब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण, ऊपर-नीचा इत्यादि। मुदा दर्शानिक भाषामे वएह चीज विचारधारा कहबैत अछि। जे परिवक्व भेलापर दर्शनसँ दिग्दर्शन बनि जाइत अछि। आ वएह विचारधार रूपमे आगू सेहो बढ़ैत अछि। अहीठाम हम सभ विचार करी जे हमरा सबहक लक्ष्य केहेन हेबाक चाही ओइ पॉलिश कएल एकभग्गु शीशा सन जे मात्र एक दिशा देखि एकभग्गु भेल रहत? नै। बल्कि ई सोचबाक अछि जे चारू दिशा केना देखब, चौमुखी एवं सर्वांगिन विकास केना होएत। तइ लेल ओहन दर्शन, ओहन दृष्टिकोण या फेर ओहन विचारधारकेँ पकड़ि चलबाक अछि आ रचना करबाक अछि। जइमे हमर सबहक विविधता, व्यापकताक रक्षा भऽ सकए। साहित्य समाज वा देशक ओहन सम्पति छी जे कठीन-सँ-कठीन परिस्थितिक रस्तो बतबैत अछि आ आगू बढ़ैक उपाए सेहो करैत अछि। मुदा तइ लेल समाज आ देश-दुनियाँक गहन अध्ययन, चिन्तन-मननक संग रचनाक जरूरति अछि। भारतीय चिन्तनधारा ओहन िचन्तनधारा थिक जेकरा समुचित ढंगसँ रखलापर केहनो अन्हर-तुफान किएक ने उठौ मुदा ओहन डोलान नै डोलत जेहन डोलैत रहैए या फेर डोलबाक भय बनि गेल अछि। मुदा तइ लेल हमरा सभकेँ थोड़ेक व्यापकता दिसि बढ़ए पड़त, समाज दिशि बढ़ए पड़त। व्यक्तिवादी आ जातिवादी सोचसँ ऊपर उठि सामाजवादी एवं साम्यवादी सोचक पूजारी बनबाक खगता अछि। हमरा अहाँक मात्र नै जन-जनक दायित्व अछि जे संग-संग चलि दुनियाँक बीच अपन मातृभूमि, मातृभाषा, साहित्य, संस्कृतिकेँ ओइ रूपेँ जीवित बना कऽ राखी जे समृद्धशाली देशक मुख्य पहिचान अछि। आब अपन वक्तव्यमे विराम दैत एक फराक प्रसंगपर विचार करब आवश्यक बूझि आदेश लिअए चाहब आ कहब चाहब जे आजुक ऐ संगोष्ठिक आयोजक साहित्य अकादेमी अछि। जे प्राय: साहित्य समृद्धि लेल गोष्ठी-संगोष्ठि करबैत रहल अछि। किछु दिन पूर्व कोलकातामे सेहो भेल छल। आ होइते रहैत अछि। से प्राय: राजधानी, नगर-महानगरमे होइत रहैए। ओना प्रवासी मैथिली सेवी लेल हेबाको चाही। जे सभ जनै छी। मुदा गोष्ठी गामो-घरक शहर-कसबामे हुअए जेना झंझारपुर, मधेपुर, सकरी, धनश्यामपुर, मधुबनी, जयनगर, लोकहा, फुलपरास, िनर्मली, कुनौली, भपटियाही, सरायगढ़, या फेर पूर्णिया-समस्तीपुरक गामक कसबामे। ई सभ मैथिलीक नेटिव स्पीकर क्षेत्र छी। ऐ सभ क्षेत्रमे सेहो गोष्ठी-संगोष्ठी हेबाक चाही। ऐसँ आरो साहित्यकार सभ सोझा औताह। संभव, जे दिल्ली-मुम्बइ, कोलकाता आ पांडीचेरीक गोष्ठीसँ बेसी लाभदायक सिद्ध हुअए। खरचो कम आ लाभो बेसी, जइसँ एकान्त बासक साहित्य सृजक लोकनि मात्र नै अपितु पाठाकोक संख्यामे अप्रत्याशित वृद्धि होएत। जन-जनमे उत्साह सेहो जगत जइसँ हम सभ मजगूत हएब। काल्हियो कवि गोष्ठीक आयोजन हुअएबला अछि संभत: अही परिसरमे। ओइमे एकैसम शताब्दीक पहिल दसकक सर्वश्रेष्ठ कवि राजदेव मण्डल आ आन-आन कतेको कविकेँ कोनो सूचना नै छन्हि। जे दुखत अछि। आ ऐ तरहक सूची बनौनिहार लोकनिक सोचमे कि छन्हि से वएह सभ बता सकताह। ओ लोकनि गामक माटि-पानिमे लटा कऽ जीवकोपार्जनक संग साहित्य सृजन करैत रहलाहेँ। हुनको सभकेँ सूचना हेबाक चाहैत छल। ओतबे नै, अझुको गोष्ठीमे बहुतो युवा रचनाकार जेना उमेश पासवान, आशीष अनचिन्हार, चन्दन झा, संजीव साफी, विनीत उत्पल, संजय कुमार मण्डल, ज्योति सुनीत चौधरी, मुन्नी कामत, अमित मिश्र, अखिलेश कुमार मण्डल, सुमित आनन्द आ मनोज कुमार आदिकेँ कोनो सूचना नै देल गेलनि। अंतमे, प्रसंगसँ हटि चरचा कएल जे आवश्यक छल। जौं ऐसँ किनको दुख पहुँचल हेतनि तइ लेल क्षमा मंगैत एकबेर फेर साहित्य अकादेमीक संग अपने लोकनिक प्रति सादर आभार व्यक्त करैत अपन वाणीकेँ विराम दैत छी। श्री राज यात्राीक कवितामे गाम स्थानीयतासँ सार्वभौमिकता तकक निरंतर कविता-यात्रा केनिहार, लेखन आ देखनमे अति साधरण लगनिहार अति विशिष्ट, असाधारण आ अप्रतिरूत कविक नाम-ए यात्री। श्रेष्ठतम रचनाकारे नै श्रेष्ठ नवमानवतावादी युगक उन्नायक, उद्गाता आ शलाका पुरूष। यात्रीक कविता गम्हारिक शील भेल करैए जे देखबामे तँ सभसँ अनुपयोगी लकड़ी पिट्ठाक समतूल लगैए मगर उपयोगितामे एके ठाम विविध काठक गुण आ वैशिष्ट्य उपलब्ध करा दैए। कोनो अतिरिक्त मानस संवेदनक बिना। हुनकर कविता सभक लेल भेल करैए। जत्ते आ जतबे जकर ग्राह्यता आकि अभिरूचि। जै तीमनमे अपने स्वाद गुण छै, ओइमे बेसी मर-मसल्लाक कोन खाँहिंस। जे वास्तविक रूपमे बिना अतिरंजनक ‘सत्यम्’ छै ओ अनारोपित ‘सुन्दरम’ हेबे करतै। ज्ञान आ अनुभवक काशीमे लोक अस्सी बरिस सोझे बिताइयो लेत तैयो कि दूनूमे सँ किछु बिना प्रयासक थोड़बे भेट सकतै। तैं बहुतो भौतिक प्राप्तिक भट्टीमे भँाडे़टा झोंकैत रहि जाइ-ए। बर्तज बाबा यात्रीयेक ‘चानन बुझि देहमे किदन लेपैत रहि जाइए’ आकि कथीदन पर फूल-घी चढ़ा-औंसि पुण्य लाभक दुराशा आ भ्रमक परसादी लेने घुमि-फिरि अबैए। यात्राी बाबा अपन कथ्यकेँ कोनो सँाचमे गढ़ि कऽ पाठकक आगू नै राखि सोझ-सोझ बिना कोनो रंग-टीप क उपस्थित कऽ दै छथि, तैं पाठक हुनकर कविताक कथ्यसँ सोझे जुटि जाइ छथि। आलंकारिकता आकि कल्पनाशीलतामे बोरिया पाठक बाम-बूच नै जा सकैए। यात्री अपन कवितासँ सम्पूर्ण रूपसँ मिथिलांचलक किसान आ गमैया मजदूर आ मुख्यतः ओही नजैर सँ पूरा भारतीय समाज केँ ओकर प्रबलता आ दुर्बलता संग देखैत उजागर करै छथि। तैं हुनक कवितामे वर्णित सामग्री सोझे समाजसँ ओतऽ गेल रहैए आ हमरे बात कहैए। अपन परिवेश आ अपन संवेदना द्वारा यथार्थकेँ टोहियेबाक एगो चेष्टा यात्राीक कवितामे सभतैर भेटैए। जिनगीक यथार्थ सँ सरोकार रखनिहार एगो खँाटी रचनाकार मात्रा ऐन्द्रिक सुन्नरते केँ नै चित्रित करैए अपितु ओ जिनगीक कुरूपताकेँ सेहो अँाकैए। ओजह ई छै जे जिनगीमे सभ किछु सुढब-सुन्नरे नै छै। ओइ जघ सुन्नरताक पीठ-पाछू कुढब, चँाछल आ धोखाधरियोक अस्तित्व छै। यदि एक दिस गामक अपार आ असीमित सुन्नरता छै तँ दोसर दिस गाममे बसनिहार लोक टोला-परोसक उधेसल- पुधेसल, उजरल-अपटल जिनगीक दर्दनाक कुरूपता सेहो। एतेक थाकल-हारल आ थकुचल जिनगी कि सुखक सभ बात गामक रहरहँा लोकक लेल रूप कथे बुझाइत रहै छै। फेर मुट्ठी-दू मुट्ठी भात आकि किछु टुक्का-साबुत सोहारी आ दालि कि तीमनक झोर जुमि गेलापर ओ दिल्लीक दरबार आकि रंगमहलक सुध किए लेत? यएह तँ अछि ऐ जिनगीक असीमित विरोधभास। यात्री अपन कविताकेँ ग्रामीण परिवेश आ अपन संवेदना द्वारा यथार्थ केँ देखैक प्रयास निरंतर करै छथि। सभसँ खास बात तँ यात्राीक कविता मे ई ऐ जे ओ कविकर्म केँ प्रतिष्ठामूलक नै, अपन विशिष्ट संवेदनशीलताक दायित्व पूर्वक व्यवहार करब मानैत रहल छथि। यात्री जेहन काव्य युगक निर्माण केलनि, ओकर तरूमे नै जा बेसी रचनाकार ओकर आकृतिकेँ स्वीकार आकि खारिज करैत रहलाह। ऐ फाँटक रचनाकार लग गामक अति जरूरी मुदा उपेक्षित थीतिक खबैर तँ रहै छनि बलू गोबर केँ गणेश आकि पाथर केँ भगवान बनेबाक मुद्रा आ चेष्टामे। यात्रीक कवितामे पाथर बनि गेल लोकक सुधि आ संधान भेटैए। गाम घुरू (भुसपुतरा) आकि ठठरीक ‘फोटो’ जेकँा हुनकर कविता मे नै अबैए। जेतऽ यथार्थ युग-सत्य बनि जेबाक ओजह सँ विज्ञापनी मंडीमे थोक रूपसँ उतरैए जरूर, बलू ओइमे नै तँ गामक आम जनक थीते उजागर भऽ पबैए, आने खास लोकक चरित्रो उघारल-उधेसल जा सकैए। जहिना वर्तमान समयमे वैश्विकता सुनबामे तँ वसुध्ैव कुटुम्बकम् अथवा मार्क्सक दुनिया भरिक मजदूरक एकताक आह्वान सन उदात्त बूझि पडै़ए बलू क्रिया आ असैर मे एकर विपरीत एक छत्रा साम्राज्यवादिक सूत्र सौन्दर्यवादी सुकुमार कविक गाम सँ फराक यात्रीक गाम तखने ऐ जे मूल रूप सँ किसान आ खेत-मजदूरक पक्षधरता हिनकर कविताक गामक प्रतिबद्धता ऐ, कोनो ‘फैशन’ नै। आ अही ओजह सँ अपन जिनगीक सभसँ कम, जटिल आ आरंभिके काल खंड अपन जनमथान तरौनी मे बितबितो हुनक कवि ओकर गुरूत्त्वाकर्षण सँ मुक्त नै भऽ पबैए। देश-विदेश सभतरि सर्वाधिक रहनिहार ई यात्री कवि कोनो शहरी उद्यान; पार्कमे ब्योंतल आ करतब, ड्रिल कराओल मौसमी फूल आकि पत्ताबहार, क्रोटन क चाक-चिकपर आकृष्ट नै होइ छथि बलू ओत्तौ गामक चर-चाँचरमे अगराइत भेंट-कुमुदिन, माछ-मखान, लीची आ आम सभ कथूक नैसर्गिक सुन्दरता केँ नै बिसरि पबै छथि- कत्ते दीब लगैए हमरा अपन ओ तरौनी गाम। मोन पड़ैए लीची आ आम। मोन पडै़ए कुमुदिनी आ ताल मखान। गाम सँ दूर रहबाक कचोट स्पष्ट रूप सँ व्यक्त करैत अपन विवशताकेँ फरिछाकऽ रखै छथि यात्री अपन कवितामे। खाहें तन सँ कतौ रहथु बलू मोन मैथिल जातीय भारतीयता सँ हेंठ नै भऽ पबैए। होइ कोनहुँ ठाम। किछु भै जाइ। रही बहुतो दूर वा लगीच। बंधुगण बरू दुरदुराबथु किंतु। जननि राखब भाव अँह जननीक। एकरा आर फरिछाबैत एक ठाम ओ कहै छथि- किंतु की हम बिसैर पाएब। तरौनी सन गाम? गड़हरा सन आम? दीदिक इनारक पानि। अपन पोखरिक ओ ठुट्ठ पातर जाठिं।... धनरूर बाध कोसक कोस। हुनकर अनुराग सिन्दूर तिलकित भाल पर केन्द्रिते रहैए। आकृष्ट करैए कवि केँ नेनाक थोंथ हँसी, जेकरामे महज सुन्नरते नै, संजीवनी शक्तिक संचारक छेमता ओ पबै छथि। अहल भोरे जाड़ मासमे गाममे ओरियाओल छूराकेँ तपैत, जिनगीक सुख-दुःख मादे निष्कपट बतियैत, घूराक सोन्हगर गमैया गंधक पता ओहन आत्मीय भाव सँ कोनो यात्राीये सन माटि-पानिक कवि केँ भऽ सकै छै। आंचलिक बोलीक मिज्झरक, मिक्सचर अर्थात् संकीर्णता सँ हेंठ अनगढ़ बोली कोनो कवि यात्राीयेक कान जुरा सकै छै। जूता-मोजाक टीप-टाप पर नै ठेला आ बेमाय फाटल गोर पर कोनो कवि यात्राीयेक नजैर जा सकै छै। दू-गो बिम्ब जे खँाटी गमैया ऐ, आम लोकक आशा-आकंाक्षाक प्रतीक ऐ- दूधिया शीश आकि बालि ओ श्रमक फलाफल सोनिम पाकल शीश अधिक ठाम श्रमक गायक ऐ कविक कविता मे अबैत रहै-ए। वर्तमान व्यवस्थापक प्रतीक ध्ूरू (भुस्सा भरल झामलाल बिजुका) क माध्यम सँ तँ कवि पूरा व्यवस्थापक चरित्र ओ थीत केँ बेपर्द करै छथि। चेतना हीन जनतंत्रक मालिक जनता साकांक्ष नै भऽ गफलैत मे पड़ल रहैए आ ओकर ओगरबारू प्रतिनिधि अपनेमे टर्र भाँजटा पूरैत रहै-ए। उपरका जँ सरङमे बिचरैत रहैए तँ निचलका दिन-दिन पताले धँसल जा रहल-ए। दूनू फँाट अपचक शिकार। बेसी कदन्न सँ तँ कम अधिक पौष्टिकता सँ। प्रतिनिधिक मगज आ करेज मे भुस्सा भरल बुझा पडै़-ए जै पर खद्धर, स्वदेशीक आङरक्षक खाल चढ़ल ऐ। अकालक ओजह सँ स्वतंत्र गामक अस्सी प्रतिशत लोकक त्रासदीक केहन सजीव चित्र यात्राीक कवितामे संभव भेल ऐ-’ बिना पजारक मन्हुवाएल चूल्हि, कामहि जँात-चकरी, अन्नदाताक संग समान जिनगी बसर तै त- बरतैत आश्रिता कनही पिलिया, लाभर-जीभर अहरा प्राप्त केनिहार गिरगिट, मूसआ कौवा सभक उदासी, हतासी आ फेर आंशिक जरूरैत पूर्ति सँ टुकटुकाएल ओकर सभक चेष्टा आ चुहुल केँ भला कोन ‘फेन्सी’ कवि एते कममे एते विराटताक संग प्रस्तुत करबाक सामरथ राखि सकैए। भाखा केँ हम अभिव्यक्तिक माध्यम टा मानैत रहल छी तैं यात्राी आ नागा जनमे अंतर करबामे असोकर्जक अनुभव करैत छी। मूल वस्तु तँ छिऐ कथ्य। गोल कऽ दियौ तँ लालमोहन, नाम तँ गुलाबजामुन। हलवाइ तँ एकेगो- यात्री कहियौ कि नागार्जुन। गरीब-गुरबा, किसान आ मजूरक आत्मीय समाङ। कतौ पं वैद्यनाथ मिश्र नै कलगणारक रूप मे। मनुख तँ वास्तविक रूपमे अगबे मनुखेटा रहै छै। दोखी तँ भेल करै छै कोनो व्यवस्था माने संचालन तंत्र। जँातक काज छिऐ पिसनाइ। अखियासबाक तँ एतबे छै कि ओइमे ढारल की जा रहल छै- कोदो-मरूवा आकि चाउर-गहूम। सद्यः व्यवस्थाकेँ खेलौड़िया मुद्रामे लुल्हुवा देखेबामे बाबा यात्राी-नार्गाजुन हिन्दीक माध्यमसँ भाव व्यक्त्त केनिहार किसान कवि त्रिलोचन आ केदारनाथ अग्रवालो सँ सहज आ पटु देखनामे अबै छथि। जनसंकुल टीसनो पर कवि गामेक अँाखिक प्रयोग करैत देखल जाइ छथि। ओइ लोक वरक अपार भीड़ोमे लोक-मन अर्थात निम्नवर्गीय ग्रामीणे परिवेशक दुरगमनियँा कनियँा-बरे पर कविक अँाखि जाइए। पारंपरिक रङल-टीपल बाकस पर ओङठलि घोघ-मरद काढ़ने नवकनियँा आ ओकर रछिया लेल बहाल लोकनियाँ चानीक टकहीक हर पहिरने, माङुर माछ सन काठी आ सिमरताइवाली आँखिसँ गामेक अनगढ़ सुन्नरताक पारखी कोनो कविक अँाखिटा देखि सकैए। तेज सबारीक बिरड़ो आ घटाटोपक अछैतो भदबारिक भीजल घोंघा सन (सूक्ष्म गमै उपमा) मंद ससरैत ट्रामे पर कविक अँाखि जाइ छनि। गामक हरेक मोर्चा पर यात्राीक कवि साकंक्ष ठाढ़ भेटैए। माटिक सभ स्पंदन हुनकर कवितामे निनादित होइए। तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक सभ प्रकारक विद्रूपताक खबैर यात्री लैत चलैत छथि, संगे गामक सम्पूर्ण जिनगीकेँ रूपायित सेहो करै छथि। गामक लोकक सभ आशा-आकांक्षा, दुःख दरेग, हँसी-खुशी, सौन्दर्य-कुरूपता, जय-पराजय, उत्थान-पतन, कमजोरी-मजगूती, समटा समभाव सँ हुनकर कविता-यात्रा मे सरीक रहैए। कविकर्म हुनकर धर्म छनि, जिनगीक मर्म छनि। कतौ लौल, सौख आकि प्रदर्शनकामिता नै। यएह ओजह ऐ जे प्रगतिशीलताक प्रर्दशन मे ओ अपन मैथिल समाजक ;स्थानीयताक सभसँ ज्वलंत आ अपरिहार्य समस्या वैवाहिक दुर्गुण सभसँ सेहो मुँह नै मोडै़ छथि। ‘यत्-यत् पिण्डे, तत् ब्रह्माण्डे, स्थानीयता सँ सार्वभौमिकता हुनक आदर्श बुझा पडै़ए। सरजमीन सँ कटि अकासक गप्प कखनौं नै। तैं मिथिलांचलमे व्याप्त बेमेल बियाह, बहु बियाह आदि दुर्गुण सार्वभौमिकताक हुनक विशद दृष्टिक अछैतो ओत नै भेल ऐ। तत्कालीन मैथिल समाजक खाहें बेमेल बियाहक स्पष्ट चित्रण हो आकि चरित्रक उद्घाटनक संग तहियाक पेशेवर घटकक सजीव आकलन जेना यात्रीक कवि कऽ सकल ऐ, निस्संदेह मिथिला केन्द्रित आन कोनो कवि सँ संभव नै भऽ सकल। संस्कृतिक एहन सम्यक आ निठुर व्याख्याक संयम अंतऽ कतौ भेटब दुर्लभ। गामक-घर, माटि-पानि सँ केहन संव्यक्त्त छला ओ एकर परिचय तँ सुगमताक संग जेतऽ–तेतऽ भेटते ऐ, तैयो बानगी सरूप किछु पतियानी उदघृत करबाक इच्छा केँ नै रोकि सकबाक विवशताक संग एतऽ राखऽ चाहै छी जे बाल-विधवाक दुःख दैन्यकेँ सूक्ष्मताक संग उजागर करैए ‘‘भुस्साक आगि जेकँा नहूँ-नहूँ। जरै छी मने-मने हमहूँ। फटै छी कुसियारक पोर जेकँा। चैतक पछबा मे ठोर जेकँा। काते रहै छी जनु घैल छुतहर.....।’’ यात्राी अपना केँ कतौ विशिष्ट नै, अपन कवित्त्व केँ सामान्ये मानैत रहल छथि। जहनि कि सभ मतक माननिहार सारस्वत चेतनाक सर्वोपरि सिद्धि मानैत रहल छथि, तेनाहितियो मे यात्री अवसरक अनुकूलते केँ आने सफलता जेकँा सर्वोपरि मानै छथिथ। परम मेधवी कते बालक जेतऽ। मूर्ख रहि गायटा चरबैत छथि। .......कालिदास कते। विद्यापति कते। छथि हेरायल महिंसबारक हेंड़मे। यात्राीक शिल्पी गामक ‘कमर्शियल’ सौन्दर्य केँ प्रस्तुत करब मात्र अपन अभिष्ट किन्नौं ने रखने ऐ। ओ यथार्थक एहन समतल भूमि तैयार करैत चलै छथि कि ओ अनायास ‘सुन्दरम्’ भऽ कवितामे प्रकट भऽ जाइए, वनफूलक महमही जेकँा। जौं एक दिस हुनका फसिलक मंजरीक दुर्लभ महमही अभिभूत करै छनि तँ दोसर दिस जेठक तिक्ख आतप केँ सहैत कृषि कर्म मे साधनारत बीया बाउग केनिहार हाथ ओ मुँहक दूरीक सुरता सेहो सतबैत रहल छनि। ग्रामीण क्षेत्र दऽ’ बुलैतहैत तीरभुक्त्तिक माला हुनका नै सिहाबै छनि। थलहा कृषि –कर्मसँ लऽ जल-कृषक मलाहक जिनगी तकक शैली ओ संास्कृतिक चेतनाक सूक्ष्म ज्ञान बाबाक ओतऽ जतबा ऐ, आनठाम एहन आ एते दुर्लभ ऐ। एकर संगे नदी सभक प्रलयंकारी ताण्डव आ ओइसँ उपजल ओबा-टुनकी, मरकी-फौती सँ सेहो छगाइत छथि बाबा यात्री। एकर विभीषिका सँ कोन फाँट पर कोन असैर पडै़ छै नीमन जगती बूझल छनि कवि यात्राीकेँ। एकेगो थीत केना ककरो गोटी लाल करैए, ककरो उफँाटि तँ ककरो पबन्नी लगबैए आ ककरो खेले उसरि दैए। सहज सपर्द भाखामे विराट शब्द अभिव्यंजना जे यात्राीक ओतऽ भेटैए ओ कोनो खँाटी ग्रामीणे संस्कारक कवि ओतऽ संभव छै। नव निर्मित मुलकी व्यवस्थाक प्रति मोह- भंगक मादे स्पष्ट आ संधानल कसगर चोट करितो फूलगेना सँ प्रहारक मुद्रा ऐ महान कविक अपन विशेषता रहल-ऐ। यात्री अपन लोकदृष्टिकेँ गमैया संस्कारक ओजहसँ घोघटामे बादरिक चान सन भँापि, अपवाद थीतिकेँ छोड़ि, प्रस्तुत करैत रहल छथि जे निश्चित रूपसँ ग्राम्य संस्कारेक असरि ऐ। स्वदेशी त्रुुटिपूर्ण आ जंगलशाही वर्त्तमान व्यवस्थापक प्रति मोहभंग केँ यात्री सोझ-सहज हाड़ तक छूबऽ बला शुरमे व्यक्त्त करबाक सामरथ रखै छथि तै पर थोड़ेक दीठि देल जाय - चानन बुझि हम किदन लेपल देह मे। वाहरे ! महान कविक शब्द अभिव्यंजना। आम लोक केँ उमेद रहै चाननक शीतलताक, बलू भेटलै वएह निर्घिन अवशिष्ट-नव व्यवस्थाक चरित्र केँ केहन मर्यादित गमइ संस्कारक संग उधेसबामे सफल होइ छथि- पूँछ उठाकर नाच रहे हैं ‘पार्लिया-मेन्ट्री मोर’। बिखिन-बिखिन बिम्बक प्रयोगक अनिवार्यताक अछैतो भारतीय ग्राम्य संस्कारक केहन निर्वहन। अखारा पर दम प्रदर्शन सँ बेसी दम पचेबाक प्रक्रिया बेसी कुशलताक मानल जाइ छै। ई बात भिन्न जे ऐ ग्राम्य सहज चेतना केँ गरियेबाक उदेस सँ गमार आकि भदेसी विशेषण सँ अभिहीत किए ने कएल जाउक। यात्री नव मानवताकेँ आकृतिक आधार पर छोट-पैघ आङुरक छपाटि हाथकेँ सुरुब बनेबाक दलील देनिहार मिथ्याकार सभक फाँटक नै भऽ सकै छथि, ओजह जे हाथ ‘स्वस्ति-स्वाहा’ सभ कथूमे सक्षम आ मूल भेल करैए जहनि कि सुरूब अनुकृति मात्र। ओ कोनो प्रणालीक संचालनक सामरथ नै राखि चमचा चालन मात्र कऽ सकैए। साम्यक अर्थ युगकवि यात्री सभंजन जेकि भारतीय दर्शनोक मूलाधार ऐ, सएहटा लगबैत रहल छथि। कोनो वायवीय अर्थक आधारपर सत्यकेँ खारिज करबाक कुप्रयास ओहन महामना कवि भला किए करत? एतावता जनवादी चेतना आ ग्रामीण सौंदर्य-बोध महान कवि यात्राीक जिनगीक सहज उच्छवास आ ऊर्जा, करेजक ध्ुकध्ुकी आ धमनीक प्रवाहित रक्त्त रहल ऐ। मिहिर झा बाल गजल कसीदा केर एक हिस्सा होएत छैक "नसीब" | "नसीब" मे कवि के केन्द्रविंदु ओकर अदम्य चाह, ओकर अपन प्रेमिका सों अगाध प्रेम, अपन प्रेमिका सों विरह आ ओहि विरह सों उत्पन्न असह्य विरह पीडा | एहि "नसीब" से जन्म भेल गजल के | गजल शुरुआत मे आ बहुत दिन धरी एहि विषयवस्तु (सृंगार, प्रेम,विरह आदि) पर आधारित छल | भौतिक रूप से छोट रहबाक कारण आ मनुखक सब सों आकर्षणक विषय वस्तु रहबाक कारण गजल सब से लोकप्रिय भ गेल आ धीरे धीरे कसीदा मृतप्राय भ गेल | गजल जखन विकसित भेल, सृंगार, प्रेम आ विरह के अलावा अपना मे नव नव आयाम जोडैत चल गेल | सामाजिक, भक्ति, राजनीतिक, व्यंग्य एकर अंग बनैत चल गेल | एतबहि ने, ई फ़ारसी, अरबी, उर्दू होइत अँग्रेज़ी आ आन पश्चिमी भाषाक संग हिन्दी, मराठी, गुजराती आ मैथिली मे अपन आत्मा के अक्षुण्ण रखने अपन रूप परिवर्तित करैत चल गेल |गजल के प्रभाव एतेक तीक्ष्ण रहल जे भाषा कोनो होउक, लोकक करेज मे ई सीधा स्थान बना लेलक | मैथिली गजल मे किछु मास पूर्व ग़जालकार लोकनि एक टा नव प्रयोग शुरू केलन्हि - "बाल गजल" | हमरा ज्ञातव्य मे एखन धरी कोनो भाषा मे बाल विषय वस्तु पर गजल नहि लिखल गेल अछि | शायद ई प्रयोग मात्र मैथिली गजल मे पहिल बेर शुरू भेल आ विदेह पर बहुत रास बाल गजल लिखल आ सराहल गेल | ई बाल गजल सब सरल वार्णिक बहर आ अरबी बहर दुनु मे समान मात्रा मे लिखल गेल | किछु बाल गजल बच्चा लोकनि के एतेक प्रिय लगलन्हि जे ओ सब अपन धुन मे ओहि गजल के घर पर गुनगुनाबय लगलाह | गजल के कोनो भाषा मे प्रवेश कय अपन स्थान बनेनाइ आब बहुत महत्वपूर्ण घटना नहि रहि गेल | लेकिन गजल विधा मे नया आयाम देनाइ एखनहु महत्वपूर्ण घटना छैक आ मैथिली और विशेष कय विदेह लेल ई सम्मान के वस्तु छैक जे ई गजल मे ई नव आयाम अनलक | सब बाल गजलकार के हार्दिक अभिनंदन आ धन्यवाद विदेह के जे बाल गजल विशेषांक निकाललथि | अमित मिश्र बाल गजल: कोमल करेजक आखर आइ समाज के भेद-भाव ,ऊँच -नीच . जाति-पाति गसिया क' पकड़ने अछि । सब काज मे छल-कपट भ' रहल अछि मुदा इ जातिसँ अलग एकटा और जाति अछि । जहिना गाछमे अरहुल-गेँदा -गुलाब आकर्षित करैत अछि ओहिना इ जाति समाजक सब वर्ग के चुटकी मे अपन बना लैत अछि । इ ओ जाति अछि जै सँ जँ लोकक वश चलत त' कहियो बाहर नै हएत । इ जाति अछि "बाल जाति" । एहि दुनियासँ फराक बाल-मोनक एकटा अलगे दुनियाँ अछि । एत' ए .सी बला कार त' नै मुदा घुरकुन्ना अछि , एत' पुआ -पकवानसँ बेसी स्वादिष्ट तिलकोर पातक पूरी . जनेरक कुट्टी के तरकारी आ बालुक चिन्नी अछि । एहि दुनियाँ मे खेलक अंदाज अजुबा अछि , खेल बेसी अछि आ सबसँ बेसी अछि आपसी प्रेम । कोनो खेल होइ मिल-जुलि क' खेलै छथि । कखनो बाबा जकाँ खैनी चुनाबै छथि त' कखनो मास्टर जीक नकल करै छथि । कखनो हँसैत ,रूसैत छथि त' कखनो रूसल मे हँसै छथि । हिनकर हँसनाइ , कननाइ ,रूसनाइ , खेलनाइ सब नीक लागै छै आ इएह कारण छै जे लोक एहि दुनियाँ मे बेर-बेर आब' चाहै छथि । आखिर किएक नै औता , कहल गेलै यै ,"बच्चा भगवानक रूप होइ छथि ।" जहिना भगवानक महिमा अपार छै तहिना बाल मोन के कोनो सीमासँ नै बान्हल जा सकै यै । बाल मोन के शब्द मे बन्हनाइ जतबे आसान छै ओतबे कठीन सेहो छै ।बच्चाक करेज बड कोमल होइ छै तेँए एहन बात लिखबाक चाही जैसँ हुनक मोन प्रसन्न होइ , जे ओ सब दिन अपन दैनिक जीवन मे करै छथि । दोसर बात हम कह' चाहब जे बाल-विधा के सदिखन आशावादी हेबाक चाही । किएक त' जँ नेनपन सँ आशा लागल रहतै त' जीवनक सब वाधा के हँसैत-खेलैत पार कएल जा सकै यै । बाल विधाक शब्द सदिखन सरल हेबाक चाही । एहन पाँति जे सरल होइ आ जल्दीए भाव समझ मे आबि जाई . बाल मोन के क्षण मे प्रसन्न क' दै अछि । संगे जँ राइम्स मे लिखल गेल होइ त' नेनाक जीभ पर एहन चढ़त जे वयस्क भेलोपर नै उतरत । ऐ के लेल गजल उपयुक्त विधा अछि किएक त' गजल मूल रूपसँ राइम्से के खेला अछि । काफिया , रदीफ सब तुकान्ते के पालन करैत अछि । हरेक दोसर पाँति एहि नियम के पालन करैत अछि । कविता मे पाँतिक संख्याँ निश्चित नै अछि मुदा गजल मे कमसँ कम दस टा पाँति हेबाक चाही आ एते पाँति के इयाद करब कठीन नै अछि । एकटा बात और मोन राखू जे बाल-गजल मे गजलक व्याकरण मे कोनो परिवर्तन नै होइ छै । बाल-गजल मे मतल , मकता , काफिया , रदीफ आ बहर ओनाहिते रहतै जेना वयस्क गजल मे रहैत अछि । बाल मोनक सटीक आखर लिखबाक लेल , आँखि मुनि अपन नेनपन इयाद करू , इयाद करू जँ अहाँ की सब करै छलियै नेनपन मे , आ जे दृश्य देखाइ पड़ैए ओकर गजलक रूप मे शब्दबद्ध क' लिअ , नै त' अपन आस-पड़ोसक नेनाक आचरण देखू हुनक दैनिक क्रिया देखू , ओ की करै छथि देखू आ ओकरा शब्दसँ बान्हि लिअ । बाल मोनक कोनो सीमा नै अछि तेँए जे मोन अछि से लिखू मुदा शब्द सरल राखू । अपन रचना मे ग्यान-विग्यानक तड़का लगाबैत रहू आ कोमल करेजक आखर रचैत रहू । कतिआएल आखर बात चारि बर्ष पहिलुक अछि हमरा संगे एकटा संगी हमरे रूम मे रहैत छल । पढ़ैमे कने कमजोर छलै मुदा कंपटीसनमे हमरासँ 2-3 घंटा बेसीए राति कऽ जागै छल आ एकर फलस्वरूप 10 टा मे 4 टा सबाल जरूर हल कऽ लै छलै ।ओना तऽ हमरासँ बेशी बात नै करैत छल मुदा भोर होइते बाँकी बचल सबालक लेल हमरा लऽग जरूर आबि जाइत छल आ एखन ओ मित्र बी .टेक कऽ रहल अछि ।इ घटना चारि सालक बाद मोन पड़ल मुन्ना जीक एकटा शेर पढ़िकऽ डाहसँ पहुँचब कोस-दू कोस आगू बढ़बा लेल तँ प्रेम चाही पिछला डेढ़ महिनासँ मुन्नाजीक गजल संग्रह "माँझ आँगनमे कतिआएल छी " थोड़े-थोड़े पढ़ै छलौँह मुदा काल्हि भरि राति एकर गहन अध्ययन केलौँ ।कुल 50 टा गजल आ 10 टा रूबाइ के संग्रह अछि "माँझ आँगन मे कतिआएल छी" ।पोथीक नाम पढ़ि मोनमे किदन-कहाँदन बात सब उठऽ लागल ।कतिआएल उहो माँझ आँगनमे बिचित्र सन लागल मुदा पढ़लाक बाद हमरा लागैत अछि जे शाइर एहि समाजके आँगन आ एहि समाज रुपि आँगनक माँझ मे अपन बैसार बनेने छथि ।इ भऽ सकैए जे समाजक किछु भागसँ इ कतिआएल हेताह मुदा पूरा समाजसँ किन्नौह कतिआएल नै लागै छथि । हमर इ कथनक सत्यता एहि संग्रह के पढ़लाक बाद बुझा जाएत । इ तऽ प्रेमो केलनि तऽ समाजके ध्यान मे राकि तेँए तँ कहै छथि सब उमरि वर्ग के प्रेम चाही मरितो दम धरि कुशल छेम चाही आशा आ निराशाके फरिछाबैत कहलनि निराशा संग आशापर टिकल छै दुनियाँ जँ देखलँहुँ भगजोगनी तँ दिबाली बुझू बिहारक ताकत आ कमजोरी के समेटने इ शेर बिहारक सिरखारी बदलि गेल सन लगैए आब श्रमिक घटलासँ कंपनी मालिक लगै बिहारी जकाँ एहन-एहन कतेको दमदार शेर सबसँ सजल इ गजल संग्रह अपना-आप मे अलग पहचान बनबैत अछि । पहिले गजल के देखलापर एकटा बात हमरा खटकल जे छल मात्र चारि टा शेर । गजलमे कमसँ-कम पाँच टा शेर रहबाक चाही मुदा एहि संग्रहक गजल संख्याँ 1,2,7,10,11,19,22,23,24,25,27,28,32,34,35,37,39,42,43,44,47,48 मे मात्र चारिए टा शेर अछि जे की गलत अछि ।ओना शाइर आमुखक अंतीममे इ गलती स्वीकार करै छथि आ एकर जिम्मेदार अपना के मानैत भविष्यमे एकर सुधारक वादा करैत छथि मुदा हुनक शब्दक पकड़ आ भावक अध्ययन केला के बाद हमरा लागैत अछि जे शाइरक लेल उपरोक्त गजलमे एक-एक टा शेर बढ़ेनाइ कोनो भारी बात नै छलै तेँए हम एकरा आलस मानै छी। आब चलु काफियापर । एहि संग्रहक किछु गजलमे एकै काफियाक प्रयोग भेल अछि जेना 26म गजल मे तीन ठाम काफिया "चाहैए" अछि ।29मे पाँच ठाम "एखनो" 31मे पाँच ठाम "उघारू" 46म मे पाँच ठाम"केकरो-केकरो" अछि ।किछु और गजलमे इ बात अछि ।ओना काफियाक दोहरेलासँ गजल गलत नै होइ छै । तेसर गजलमे मतला नै अछि किएक तँ इ गजलक पहिल शेर अछि फाटैत छल जतए मेघ आ जमीन पहुँचल पहिने ओतहि अभागल बचल चारिटा शेरमे "अभागल" के काफिया मानि क्रमश: "राँगल ,भाँजल , माँजल आ साधल लिखल अछि ।4म गजलक मतलामे "करैए" आ राखैए" "ऐए" तुकान्त संग अछि मुदा पाँचम शेर मे काफिया "होइए" अछि । छठम गजलक अंतीम शेरमे"कहाइ" के बदला गलत काफिया "कहाइत" लिखा गेल । 32म गजलक मतला अछि हमरा तँ सुख भेटैए गजलक गाँतीमे ओहिना जेना जाड़ मे गर्मी भेटैए गाँतीमे एहिठाम "गाँतीमे" रदीफ भेल आ काफियाक अता-पता- नै अछि ।ओना आन शेरमे काफिया "आतीमे" तुकान्त संग अछि । 41म गजलक मतलामे काफिया "झमका आ चमका " तुकान्त "मका" संग अछि मुदा दोसर शेरमे काफिया "उठा" अछि । 44म गजल मे काफियाक तुकान्त "एल" अछि मुदा दोसर शेरमे काफिया "रखैल" "ऐल" तुकान्त अछि । 17म गजलमे अंग्रेजी शब्दक काफिया "गेम" आ "ब्लेम" लिखल अछि । एहि संग्रहक सबटा गजल सरल वार्णिक बहरमे अछि ।ओना तँ इ बहर गजलक सबसँ हल्लुक बहर अछि मुदा शाइर इहो बहरमे बहुते बेर धोखा खाइत छथि । हमरा जानैत 26टा गजल गजलक कोनो शेरमे एक-दू टा वर्ण बढ़ा देलनि तँ कोनो मे घटा देलनि ।जेना दोसर गजलक अंतीम शेरमे 15 के बदले 16 वर्ण अछि ।7म गजलक तेसर शेरमे 18 के बदले 19 वर्ण अछि । 9म मे दोसर शेरमे 11 के बदले 10 वर्ण अछि । 11म गजलक अंतीम शेरक अंतीम पाँतिमे 18 के बदले 17 वर्ण अछि ।एहन गजती गजल संख्याँ 12,14,15,18,19,20,22,24,26,28,29,30,31,32,34,35,38,42,43,46,47आ 48 मे सोहो भेल अछि । ओना जँ भावक बात करी तँ एहि गजल संग्रहके ऊँचाइ पर पहुँचा देने अछि एकर भाव । सबटा गजल हृदय के छू लैत अछि आ सोचबाक लेल मजबूर करैत अछि तेँए इ आन संग्रह सबसँ बिल्कुल अलग अछि आ एकर आखर आन संग्रहक आखरसँ कतिआएल अछि । भावक कारणे इ संग्रहक "कतिआएल आखर" पढ़बाक योग्य अछि ।हमर सलाह अछि जे एकबेर एकरा अजमा कऽ जरूर देखू । बेस तँ अहूँ सब पढ़ू आ हम जाइ छी दोसर गजलक खोजमे . . . (ऐ आलोचनाक आलोकमे मुन्नाजी सभटा देखायल व्याकरणगत त्रुटि दूर कऽ लेलन्हि- सम्पादक।) आशीष अनचिन्हार आधुनिकताक समस्या (आलोचना) जागरण, पुनर्जागरण वा नवजागरण दुनियाँक हरेक हिस्सामे अपना समय पर होइत एलैए मुदा ओकर व्याख्या हरेक समयमे अलग-अलग ढ़गसँ होइत छै। एकटा घटना जकरा पहिल लोक जागरण मानैत अछि तँ दोसर ओकरा पुनर्जागरण मानैत अछि तँ तेसर नवजागरण। आ एही तीनूक दृष्टिकोणक व्याख्यासँ आधुनिकताक सूत्रपात होइत छै। पश्चिमक पुनर्जागरणसँ प्रभावित मनुख सभ सुविधाकेँ अपना नाम कए लेलक। ई पुनर्जागरण मात्र सुविधा नै बल्कि हमर सभहँक मान्यता, भावना, विचार, आचरण, व्यवस्था आदिमे सेहो परिवर्तन केलक। एही पुनर्जागरणक कारण परस्पर विरोधी संस्था आ व्यवस्थाक जन्म भेल। राष्ट्रीय आ अंतरराष्ट्रीय सत्ता एवं नियंत्रणक चालि-चलन आएल। आ एही कारणें परंपरागत आस्था आ प्रेर मूल्यमे कमी आएल।साहित्य आ कलाक क्षेत्रमे अतियथार्थवादक जन्म भेल, साझी आश्रमक विघटन भेल आ मनुख एकौर भए गेल जाहि कारणें मनुखक विवेक आ आत्मनियंत्रणमे कमी आएल। महानगरसँ होइत नग्र आ गामक संबंध जटिल बनि गेल छै। जीबनमे नीरसता, असुरक्षा, दुश्चिन्ता, विक्षिप्ता आदि बढ़ि गेल छै। नव-नव बेमारी उपकि रहल छै खास कए हृद्य रोग,बल्डप्रेसर आ अनिन्द्रा। तहिना लोकक रुचि सेहो बदलि गेल छै। जतेक तेज गीत-संगीत बाजत ओतेक नीक मानल जाइत अछि। तेनाहिते साहित्यमे सेहो अभूतपूर्व परिवर्तन भेल अछि। अपराध कथा, सत्यकथा, आ मनोहर कहानी सन साहित्य केर डिमांड जोर पर अछि। आ ऐ तरहें मनुखक जीवन शैलीमे सेहो परिवर्तन भए रहल अछि। संगे संग मनोवृतिमे बहुत बेसी। आजुक समयमे मनुख लग ने सहनशीलता छै आ ने बात बुझबाक समय। आ एही दुआरे आब लोक बात-बात पर हतोत्साहित भए जाइत अछि। आशा,उम्मेद जाहि कौआ केर नाम छै से आब केकरो टाट पर नै कुचरैए। एखन हम साल 2006मे बनल आ मे गिब्सन द्वारा निर्देशित फिल्म एपोक्लिप्टो बाइसम बेर देखि कए उठलहुँ अछि। ई फिल्म मेक्सिको केर भाषामे जकर नाम Yucatec छै आ "माया" सभ्यता पर आधारित छै। ऐ फिल्मक शुरुआतमे एकटा कबीला अपना गाममे शांतिपूर्वक खा-पीक आनंद मना रहल अछि। तखने दोसर कबीला दिससँ हमला भेलै। पहिल कबीला हारि गेल आ ओकर गामकेँ जरा देल गेलै। नायक सहित अधिकांश आदमीकेँ बन्ही बना लेल गेलै। मुदा गर्भवती नायिका अपन एक मात्र बच्चाक संग बचि निकलैत अछि आ सुरक्षा लेल गँहीर खत्तामे शरण लैत अछि। बंदी बनेलाक बाद विजेता बंदी सभकेँ अपना कबीला लए जाइत अछि। भाट भरि नायक अपनाकेँ आ अपन संगीकेँ बचेबाक प्रयास करैत अछि मुदा से सफल नै होइ छै। एम्हर नायिका जे खत्तामे छै से नाना प्रकारक कष्ट सहैत बच्चा संग समय बितबैत अछि। एकाएक बर्खा अबैत छै आ सेहो झमटगर। नहुँ-नहुँ खत्ता भरए लागैत छै। पानि जखन डाँड़ भरि भए जाइत छै तखन नायिकाकेँ प्रसव पीड़ा होइत छै....................आ ओही पानिमे बच्चाक जन्म होइत छै। नायक अपन संगी सभहँक संग विजेताक राज्यमे आबि गेल अछि। राज्यक हाटमे किछु बंदीकेँ बेचल जाइत अछि आ किछुकेँ राजाक सामने देल जाइत अछि। राजाक सामने उपस्थित भेला पर राजपुरोहित द्वारा पर सूर्यपूजा केला बाद बलि लेल अयोग्य बंदी सभकेँ छाँटि योग्य बंदीकेँ नायकक सामने बलि चढ़ा देल जाइत छै। अंतमे नायककेँ वेदी पर सुताएल जाइत छै कि तखने...........................मेघ झाँपि लेलकै। आ तखने राजपुरोहित सूर्यकोप मानि ओहि दिन लेल बंद करबा देलक। आ नायक बलिसँ एना बाँचि गेल। मुदा मृत्यु एखनो लीखल छलै। नायक सहित सभ बाँचल अयोग्य बंदीकेँ एकटा मैदानमे आनल गेलै आ सभकेँ भागए कहलकै। आ भागैत बंदी सभकेँ निशाना साधि-साधि मारकल। मुदा नायक एतहुँ बाँचल आ भागि पड़ाएल। विजेता सभ ओकर पाँछा केलक आ करैत रहल मुदा नायक भागैत आ बाँचैत रहल। आ भागैत-भागैत नायक समुद्रक कछेरमे पहुँचैत अछि आ देखैत अछि जे ओम्हरसँ एकटा जहाज आबि रहल छै। नायक फेर पाछू तकलक, ओकरा पकड़बाक लेल विजेता तैयार मुदा ओहो सभ जहाजकेँ देखि सहमि गेल छल आ पाछू हटए लागल छल। आ एना नायक बाँचि गेल आ अपन परिवार लग पहुँचल। ऐ फिल्ममे हमरा सभसँ नीक गप्प लागैए जे हरेक सीन, हरेक कथन आशासँ भरल छै। खास कए तीन ठाम पहिल- जखन खत्ताक पानिमे बच्चाक जन्म होइत छै, दोसर--जखन नायककेँ बलिवेदी पर सुताएल जाइत छै आ तेसर-- जखन नायक जहाज आ अपन दुश्मन बीचमे रहैत अछि। ई कथानक पढ़लासँ आशाक कनेकबे दर्शन भेल हएत। फिल्म देखू हरेक शाट आशामे भीजल छै। ई फिल्म आधुनिक कालक थिक मुदा जखन कालिदास मेघदूत लिखला तखन की सोचि यक्ष द्वारा मेघकेँ दूत बनेलाह। मेघ निर्जीव छै ई बात कालिदासकेँ पता छलन्हि आ नायक यक्षकेँ सेहो। की ई आशावादक चरम नै थिक। आ जा धरि मेघ यक्षणी लग समाद लए पहुँचैत अछि ता धरि श्रापक समय खत्म। बात जखन मैथिल कोकिल विद्यापतिकेँ ( ओ विद्यापति जे की गीत लिखला) तखन हुनक गीतमे भक्ति आ श्रृंगार जतेक रहैए ताहिसँ बेसी आशा रहैत अछि। किछु भए जाए विद्यापति अपन आशाकेँ नै छोड़ै छथि। चाहे पति परदेशमे होथिन्ह मुदा ओ नायिकाकेँ जरूर कहै छथिन्ह जे चिन्ता नै करह तोहर प्रिय जरूर अबिते हेतह। एहन बहुत उदाहरण अछि, किछु देखल जाए---- 1 लोचन धाय फोघायल हरि नहिं आयल रे ! सिव-सिव जिव नहिं जाय आस अरुझायल रे !१! …....................................... सुकवि विद्यापति गओल धनि धइरज धरु रे ! अचिरे मिलत तोर बालमु पुरत मनोरथ रे !४! 2 कान्ह हेरल छल मन बड़ साध ! कान्ह हेरइत भेलएत परमाद !१! …................... विद्यापति कह सुनु बर नारि ! धैरज धरु चित मिलब मुरारि !७! 3 के पतिआ लय जायत रे, मोरा पिअतम पास ! हिय नहि सहय असह दुखरे, भेल माओन मास !१! …........................ विद्यापति कवि गाओल रे, धनि धरु मन मास ! आओत तोर मन भावन रे, एहि कातिक मास !४! ई मात्र किछु उदाहरण अछि। उपर जतेक गीत हम देलहुँ ताहिमे गौर कए देखू भक्ति आ श्रृगांर तँ मात्र बहन्ना छै। मूल बात तँ छै आशा देब, केकरो नोर पोछब। भक्ति आ श्रृगांर विद्यापतिक गीतमे मात्र साधन अछि साध्य नै। साध्य तँ छै निराशाकेँ हटाएब। विद्यापतिक गीतकेँ बहुत आलोचना भेलभक्ति आ श्रृगांरक चश्मा लगा मुदा आशावादक दृष्टिकोणसँ संभवतः ई पहिल आलोचना अछि ( जँ पहिले केओ केने हेताह आ प्रकाशित हेतै तँ एकरा हमर अज्ञानता बूझल जाए)। आ तँए विद्यापति हमर प्रिय कवि छथि। बात जखन लोकगीतक करी तँ एही आशा केर कारण " सोहर " हमर प्रिय गीत अछि। आ जखन हमरा लग किछु नै बचैत अछि तखन बेर-बेर हम विद्यापति गीत पढ़ैत-सुनैत छी। सोहर सुनैत छी, मेघदूतक यक्ष बनि जेबाक प्रयास करैत छी आ एपोक्लिप्टो देखैत छी। आइसँ तीन साल पहिने हमरा गामक जिनगी पढ़बाक मौका भेटल छल। लेखक छथि जगदीश प्रसाद मंडल आ ऐमे कुल 19टा कथा अछि। ऐ पोथीकेँ जाहि तरीकासँ हम पढ़लहुँ से रोचक प्रसंग अछि। भए सकैए जे ई प्रसंग अहाँ सभ लेल नीरस हो आ एकरा आलोचनाकेँ कमजोर कड़ी सेहो मानी मुदा हमरा बुझने आलोचना तखने सार्थक होइत छै जखन की कोनो पोथी मात्र " पाठक "क दृष्टिकोणसँ पढ़ला बाद आलोचकीय विवेकसँ लिखाइत हो। ऐठाम तँ किछु समीक्षक पोथीक नाम लिखै छथि, कथा पात्रक नाम आ घटना लीखै छथि आ अंतमे प्रकाशक नाम, पोथीक दाम आदि लीखि आपना आपकेँ समीक्षक मानि लै छथि। वस्तुतः ऐ प्रकारक आलेखकेँ पोथी परिचय तँ मानल जा सकैए मुदा समीक्षा वा आलोचना नै। तँ आबी कने अपन प्रसंग पर। अपान कम्पनीक टेन्डर भरबाक लेल हरिद्वार गेल छलहु भेल( BHEL ) मे। मात्र भरबाके नै छल बल्कि पूरा रेट हमरे तय करबाक छल। हम अपन बुद्धि हिसाबें रेट तय कए टेन्डर जमा कए देलिऐ। लगभग दस बजे रातिमे जखन टेन्डर खुजलै तखन पता लागल जे ओ हमरा हाथसँ निकलि चुकल अछि। हमर कम्पटीटर हमरासँ पाँच लाख कम रेट देने रहै। कुल मिला ओहि समयमे हम हतोत्साहित भए गेल छलहुँ। ई अलग बात जे तखनसँ एखन धरि हम 118टा टेन्डर जमा कए चुकल छी आ ओहिमेसँ 44टामे सफल सेहो भेलहुँ। मुदा हरिद्वारमे हम असफल भेल छलहुँ। मोन दुखी छल। मुदा ऐ घटना पर हमर कोनो वश नै छल। कुल मिला दू बजे रातिमे बस पकड़लहुँ। निन्न हेबाक प्रश्ने नै। हारि-थाकि कए ई पोथी निकाललहुँ ( हमर बैगमे हरदम किताब, हाजमोला आ मंच नामक चाकलेट रहैए ) आ सोझे-सोझ बीचक कथा " चूनबाली"क अंतिक पन्ना नजरि पर पड़ल आ ताहूमे अंतिमे पाँति सभ पर............................" फुलियोक नजरि मटकुरियाकेँ मुसकियाइत देखलक। एकटकसँ एक दोसराक आँखि गरौने अपन जिनगी देखए लगल" आ कि हमरो अपन जिनगी देखाए लागल। पूरा कता पढ़ि गेलहुँ। आ तकरा बाद पलथी ( बसक सीट पर पलथी मारि बैसब खतरनाक होइ छै ) मारि शुरू केलहुँ आ गुड़गाम अबैत-अबैत खत्म। सभ कथा पढी गेलहुँ। एक-एक पाँति पढ़ि गेलहुँ। मुदा हरेक कथाक अंतिम दू-तीन पाँति बहुत नीक लागल। कारण ई पाँति सभ हमर नोर पोछबाक काज केने रहए। ओहन समयमे जखन की हम अपन असफलता पर दोसर नग्रमे कनैत रही तखन " बिसाँढ़"क पाँति आएल " सुगिया दिस.........................परानी विदा भेल "। जखन हम दोसरक आशा चाहैत रही तखन " पछताबा " केर पाँति आबि गेल " पतिक............. गिनगी देखए लगलीह"। जखन हम ई सोचैत रही जे आब हम अपन सीनीयर लग की कहबै तखन हमरा लग " भेंटक लावा " केर पाँति आएल " मुँहसँ ठहाका............कैंचा गनए लगल"। मतलब जे हरेक कथा हमर नोरकेँ पोछबाक काज केलक। हमर हाथ पकड़ि उठेबाक काज केलक। आ तँए हमरा ई पोथी मेघदूत, पदावली, सोहर आ एपोक्लिप्टो नाकम फिल्मक आधुनिक स्वरूप लगैए। अर्थात कहबाक ई मतलब अछि जे जगदीश प्र.मंडल कालिदास, विद्यापति, सोहर पदक अज्ञात रचनाकार आ मेल गिब्सनक आधुनिक अवतार छथि। ऐठाम प्रस्तुत पोथीक आर बहुत रास विशेषता छै। जँ अहाँ महात्मा गाँधीक स्वराज दर्शन बूझए चाहैत छी तँ " गामक जिनगी " पढ़ू। जँ राजाराम मोहन रायक कुरीति भगेबाक अवधारणा चाही तँ " गामक जिनगी " पढ़ू। जेना सरदार पटेल राज्यसँ राज्यकेँ जोड़लाह तेनाहिते जगदीश जी गामकेँ गामसँ जोड़लाह आ ताहूसँ बेसी ओ लोककेँ लोकसँ जोड़बाक पक्षमे छथि। जँ गीताक कर्तव्य चाही तैयो " गामक जिनगी " पढ़ू आ जँ सन्यासक क्रम बुझबाक हो तैयो " गामक जिनगी " पढ़ू। कुल मिला कए ई पोथी हमरा हिसाबें डिप्रेस्ड आदमीकेँ समान्य करबाक क्षमता रखैए। आधुनिकतासँ जन्मल जते समस्या छै ताहिमे ई डिप्रेशन सभसँ बेसी खतरनाक छै ( कारण चाहे जे हो )। एहन समयमे जँ " गामक जिनगी " पढ़ल जाए तँ अपेक्षित लाभ भेटतै। ओना ई आशावादी दृष्टिकोण जगदीश जीक हरेक रचनामे भेटत आ ताहिमे एकटा प्रमुख नाम थिक हुनक उपन्यास " उत्थान-पतन "। तँए हम पाठक सभसँ ई अपेक्षा रखैत छी जे जगदीश जीक हरेक रचनाकेँ ऐ दृष्टिकोणसँ पढ़थि...... एना केलासँ निश्चित रूपें समाजक भलाइ हेतै। गजलक साक्ष्य- समालोचना हमरा आगूमे पसरल अछि “अपन युद्धक साक्ष्य” तारानंद िवयोगीक गजल संग्रह। चालीस गोट गजलकेँ समेटने। लोककेँ छगुन्ता लागि सकैत छैक जे मैथिलीमे गजलक आलोचना कहिआसँ शुरू भए गेलैक। ऐ छगुन्ताक कारण मुख्यत: हम दू रूपेँ देखैत छी पहिल तँ ई जे गजल कहिओ मैथिली साहित्यक मुख्यधारामे नै आएल दोसर-मैथिल-जन एखनो गजलक समान्य निअम आ ओकर बनोत्तरीसँ परिचित नै छथि। समान्ये किएक अपने-आपकेँ गजल बुझनिहारक सेहो हाल एहने छन्हि। बेसी दूर नै जाए पड़त। “घर-बाहर” जुलाइ-सितम्बर 2008ई.मे प्रकाशित अजित आजादक लेल “कलानंद भट्टक बहन्ने मैथिली गजलपर चर्च” पढ़ि लिअ मामिला बुझबामे आबि जाएत। जँ विष्यान्तर नै बुझाए तँ थोड़ेक देरले तारानंद वियोगीक पोथीसँ हटि अजाद जीक लेखक चर्च करी। ऐ लेखक पहिले पाँति थिक- मैथिलीमे गजल लिखबाक सुदीर्ध परम्परा रहल अछि.....। मुदा कतेक सुर्ढीध तकर कोनो ठेकाना अजादजी नै देने छथिन्ह। फेर एही लेखक दोसर पैरामे अजित जी दूमरजामे फँसल छथि। ओ मैथिल द्वारा समान्य गप-सप्पमे गजलक पाँति नै जोड़बाक प्रथम कारण मानैत छथि। जे मैथिलीमे शेर एकदम्मे नै लिखल गेल। आब पाठकगण कने घियान देल जाए। लेखक पहिल पाँति तँ अपनेकेँ धियान हेबोटा करत जे मैथिलीमे गजलक सुर्दीध....।” सभसँ पहिल गप्प जे गजल किछु शेरक संग्रह होइत छैक आ दोसर गप्प ई जे जँ अजाद जीक मोताबिक शेर लिखले नै गेलैक तँ फेर कोन प्रकारक सुर्दीध परंपराकेँ मोन पाड़ि रहल छथि अजादजी। एेठाम गलती अजाद जीक नै मैथिलीक ओहि गजलकार सभक छन्हि जे गजल तँ लिखैत छथि मुदा पाठककेँ ओकर परिचए, गठन, निअम आदि देबासँ परहेज करैत छथि। ओना प्रसंगवश ई कहबामे कोनो संकोच नै जे गजल कखनो लिखल नै जाइत छैक। मुदा मैथिलीक धुरंधर सभ गजल लिखैत छथि। मूल रूपसँ अरबी-फारसी-उर्दूमे गजल कहल जाइत छैक लिखल नै। पाठकगण गजलक ई निअम भेल। आब फेरो अजित जीक लेखकेँ आगू पठू आ अपन कपार पीट अपनाकेँ खुने-खूनामे कए लिअ। अजित जी अपन संपूर्ण लेखमे जै शेर सभ मक्ता कहलखिन्ह अछि वस्तुत: ओ मक्ता छैके नै। पाठकगण मोन राखू, मक्ता गजलक ओहि अंतिम शेरकेँ कहल जाइत छैक जैमे गजलकार (एकरा बाद हम शाइर शब्द प्रयुक्त करब, अहूठाम मोन राखू शायर गलत उच्चारण थिक।) अपन नाम वा उपनामक प्रयोग करैत छथि। (अहूठाम मोन राखू हरेक गजलमे नाम वा उपनामक समान प्रयोग होएबाक चाही ई नै जे एकरा गजलक मक्ता तारानंदसँ होअए आ दोसर गजलक मक्ता वियोगीक नामसँ नामसँ।) मुदा आश्चर्य रूपेण अजादजी जै शेर सभकेँ मक्ता कहलखिन्ह अछि ओइमे कोनो शाइरक नाम- उपनाम नै भेटत। ओना अजितजी हिन्दीक सुप्रसिद्ध शाइर छथि तकर प्रमाण ओ लेखक प्रारंभेमे दए देने छथि। हँ तँ ऐ लेखक संक्षिप्त अवलोकनक पछाति फेरसँ वियोगी जीक गजल संग्रहपर चली। तँ शुरूआत करी स्पष्टीकरणसँ, हमर नै वियोगी जीक। सभसँ पहिने ई जे अन्य मैथिली शाइर जकाँ वियोगीओ जी मानैत छथि जे गजल लिखल जाइत छैक। देासर गप्प जे वियोगीजी द्वारा देल अपन भाषा संबंधी विचारसँ लगैत अछि जे भनहिं िवयोगी जी उर्दु सीख उर्दूक पोथी पढ़ैत हेताह मुदा गजल तँ किन्नहुँ नै लिखैत हेताह, कारण, पाठकगण धियान देल जाए। अरबी-फारसी-उर्दू तीनू भाषाक छंद शास्त्र एकमतसँ कहैए जे दोसर भाषाकेँ तँ छोड़ू अपनो भाषाक कठिन शब्दक प्रयोग गजलमे नै हेबाक चाही। ठीक उपरोक्त भाषाक निअम जकाँ मैथिलीओ मे निअम छैक। तँए महाकवि विद्यापति अपन कोनहुँ गीतमे कृष्ण, विष्णु आदिक प्रयोग नै केने छथि। मुदा वियोगी जी अपन पोथीक नाम रखने छथि “अपन युद्धक साक्ष्य”। जनसमान्य युद्ध तँ कहुना बुझि जेतैक मुदा साक्ष्य....। ऐठाम प्रसंगवश ई कहब बेजाए नै जे वियोगीजी अपनाकेँ अभिजात शब्दक प्रयोग मानैत छथि। आब हमरा लोकनि ऐ पाेथीमे प्रस्तुत चालीसो गजलक चर्च करी। पहिले भाषाकेँ देखी। ओना वियोगीजी भाषा संबंधी गलती जानि बूझि कए लौल-वश ततेक ने कएल गेल छैक जकरा अनठा कए आँगा बढ़ब संभब नै। एकर किछु उदाहरण प्रस्तुत अछि- दोसर गजलक मतलाक दोसर पाँतिमे दुखक बदला यातना। अही गजलक दोसर शेरक पहिल पाँतिमे नाराक बदला जुमला। तेसर गजलक दोसर गजलक दोसर शेरक दोसर पाँति धधराक बदला ज्वलन। अही गजलक अंतिम शेरमे प्रयुक्त तन्वंग, आब एकर अर्थ जनताकेँ बुझबिऔ। फेर आगू गजलक दोसर शेरमे नजरि केर बदला दृष्टि, दसम गजलक दोसर शेरमे उन्यक जगह विपरीत। एगारहम गजलक मतलामे दुबिधाक जगह द्धैध। तेरहम गजलक तेसर शेरमे नेकदिली आ बदीक प्रयोग। तइसम गजलक अंतिम शेरमे भटरंगक बदला बदरंग। पचीसम गजलक तेसर शेरमे इजोरिआक बदला ज्योतसना। चौतीसम गजलक मतलामे दुख केर बदलामे पीड़-इत्यादि। ओना ऐ उदाहरणक अतिरिक्त हरेक गजलमे हिन्दी, उर्दू, संस्कृत आदि भाषाक तत्सम बहुल शब्दक ततेक ने प्रयोग भेल छैक जे गजलक मूल स्वर, भाव-भंगिमा, रसकेँ भरिगर बना देने छैक। तैपर वियोगीजी गर्व पूर्वक घोषण केने छथि जे ओ ओइ परिवारक नै छथि जिनका संस्कारमे अभिजात शब्द भेटल हो। बिडंबना छोड़ि एकरा किछु नै कहल जा सकैए। जँए चालीसो गजलक भाषाकेँ धियानसँ देखल जाए तँ हमरा हिसाबें वियोगीजी ऐ गजल सबहक मैथिली अनुवाद कए देथिन्ह तँ वेसी नीक हेतैक। भाषासँ उतरि आब गजलक विचारपर आएल जाए। बेसी दूर नै जाए पड़त-तेसर गजलक अंतिम शेरसँ मामिला बुझबामे आबि जाएत। सोझे-सोझ ई शेर कहैए जे- लोककेँ अपन जयघोष करबामे देरी नै करबाक चाही आ काज केहनो करी चान-सुरूजक पाँतिमे अएबाक जोगाड़ बैसाबी। ओना हम एतए अवश्य कहब जे ई कोनो राजनीतिक विचार नै छैक जकर स्पष्टीकरण दए-वियोगीजी अपन पतिआ छोड़ा लेताह। ई विशुद्ध रूपे समाजिक विचार छैक आ ऐ विचारसँ समाजपर की नकारात्मक प्रभाव पड़लैक वा पड़तैक तकर अध्ययन अवश्य कएल जेबाक चाही। मुदा एहन नकारत्मक विचार ऐ संग्रहमे कम्मे अछि। संग्रहक किछु सकारात्मक िवचार प्रस्तुत अछि। दसम गजल केर अवलोकन कएल जाउ। निश्चित रूपसँ वियाेगीजी एकरा परिर्वतनीय विचार रखलाह अछि ई कहि जे- देस हमर जागत अच्रक एना चलि ने सकत हारि लिखब झण्डा के आदमीक जीत लिखब। पाठकगण आजुक समएमे झण्डाक विपरीत गेनाइ सहज गप्प नै। तहिना चारिम गजलक तेसर शेरक पहिल पाँति- राम राज्यक स्थापना लेल भरत-लक्ष्मण झगड़ि रहला। कतेक सटीक व्यंग अछि से सभ गोटे बुझैत हेबैक। ओतै आजुक भ्रमोत्पादक सरकारपर तै दिनमे लिखल अड़तीसम गजलक मतलाक पहिल पाँति देखू- राजनीति भटकल तँ डूबल मझधार जकाँ। विचार संबंधी प्रस्तुत उदाहरणसँ स्पष्ट अछि जे सकारात्मक विचार बेसी अछि। मुदा कहबी तँ सुननहि हेबैक अपने जे एकैटा सड़ल माछ.....। अस्तु आब ऐ गजल संग्रहक व्याकरण पक्षकेँ देखल जाए। ऐठाम ई स्पष्ट करब आवश्यक जे मैथिली गजल अखनो फरिच्छ भए कए नै आएल अछि जैसँ हम बहर (छंद) आदिपर विचार करब। तँए ऐठाम हम मात्र रदीफ आ काफियाक प्रयोगपर विचार करब। पाठकगण गजलमे रदीफ ओइ शब्द अथवा शब्द समूहकेँ कहल जाइ छैक जे गजलक मतलाक (गजलक पहिल शेरकेँ मतला कहल जाइत छैक।) दुनू पाँतिमे समान रूपसँ आबए आ तकरा बाद हरेक शेरक अंतिम पाँतिमे सेहो समान यपे रहए। तहिना काफिया ओइ वर्ण अथवा मात्राकेँ कहल जाइत जे रदीफसँ तुरंत पहिने आबैत हो जेना एकटा उदाहरण देखू- दूटा शब्द लिअ, पहिल भेल अनचिन्हार ओ दोसरमे अन्हार। आब मानि लिअ जे ई दुनू शब्द कोनो गजलक मतलामे रदीफक तुरंत बादमे अछि। आब जँ गौरसँ देखबै तँ भेटत जे दुनू शब्दक तुकान्त “र” छैक। तँ एकर मतलब जे “र” भेल काफिया (काफिया मतलब तुकान्त बूझू) तेनाहिते मात्राक काफिया सेहो होइतैक जेनाकि- राधा आ बाधा दुनू शब्द आ'क मात्रासँ खत्म होइत अछि तँए ऐमे आ'क मात्रा काफिया अछि। “एहि” आ “रहि” दुनूमे इ'क मात्राक काफिया अछि। अन्य मात्राक हाल एहने सन बूझू। तँ फेर चली ऐ संग्रहक व्याकरण पक्षपर- एे संग्रहक किछु गजलमे काफियाक गलत प्रयोग भेल छैक- उदाहरण लेल सातम गजलकेँ देखू। मतलाक शेरमे काफिया अछि “न” (भगवान आ सन्तान)। मुदा वियोगीजी आगू देासर शेरमे काफिया “म” (गुमनाम) केँ लेलखिन्ह अछि जे सर्वथा अनुचित। तेनाहिते सताइसम गजलक उपरोक्त “म” काफिया बदलामे “न” काफियाक प्रयोग। कुल मिला कए ई गजल संग्रह ओतेक प्रभावी नै अछि जतेक की शाइर कहैत छथि। हँ एतेक स्वीकार करबामे हमरा कोनो संकोच नै जे ई गजल संग्रह ओइ समएमे आएल जै समएमे गजलक मात्रा कम्मे छल। आ शाइर आ गजल संग्रह सेहो कम्मे जकाँ छल। की थिक बाल गजलः किछु लोक "बाल गजल"क नामसँ तेनाहिते चौंकि उठल छथि जेना केओ हुनका अनचोकेमे हुड़पेटि देने हो। जँ एहन बात मात्र मैथिलिए टामे रहितै तँ कोनो बात नै, मुदा ई चौंकब हिन्दी आ उर्दूमे सेहो भए रहल छै। कारण ई अवधारणा मात्र मैथिलिए टामे छै आर कोनो भारतीय भाषामे नै। जँ हम कोनो हिन्दी-उर्दू भाषी गजलकार मित्रसँ "बाल गजल"क चर्च करैत छी तँ चोट्टे कहैत छथि जे उर्दूक बहुत गजलकार सभ बहुत शेरमे बाल मनोविज्ञानक वर्णन केने छथि खास कए ओ सुदर्शन फाकिर द्वारा कहल आ जगजीत सिंह द्वारा गाओल गजल----- "ये कागज की कश्ती वो बारिस का पानी" बला संदर्भ दै छथि आ ई बात ओना सत्य छै मुदा " बाल गजल"केँ फुटका कए ओकरा लेल अलग स्थान मात्र मैथिलिए टामे देल गेलैए। आ ई मैथिलीक सौभाग्य थिक जे ओ "बाल गजल"क अगुआ बनि गेल अछि भारतीय भाषा मध्य। आ विदेह एकर विशेषांक निकालल ताहि लेल हम एकरा धन्यवाद नै दए सकैत छीऐ कारण विदेह हमहूँ छी आ लोक अपना आपकेँ धन्यवाद कोना देत। जहाँ धरि बाल गजलक विषय चयन केर बात थिक तँ नामेसँ बुझा जाइत अछि ऐ गजलमे बाल मनोविज्ञान केर वर्णन रहैत छै। तथापि एकटा परिभाषा हमरा दिससँ ----" एकटा एहन गजल जाहि महँक हरेक शेर बाल मनोविज्ञानसँ बनल हो आ गजलक हरेक नियमकेँ पूर्ववत् पालन करैत हो ओ बाल गजल कहेबाक अधिकारी अछि"। जँ एकरा दोसर शब्दमे कही तँ ई कहि सकैत छी जे बाल गजल लेल नियम सभ वएह रहतै जे गजल लेल होइत छै बस खाली विषय बदलि जेतै। आब आबी बाल गजलक अस्तित्व पर। किछु लोक कहता जे गजल दार्शानिकतासँ भरल रहै छै तँए बाल गजल भैए ने सकैए। मुदा ओहन-ओहन लोक विदेहक ई अंक जे बाल गजल विशेषांक अछि तकर हरेक बाल गजल पढ़थि हुनका उत्तर भेटि जेतन्हि। ओना दोसर बात ई जे कविता-कथा आदि सभ सेहो पहिने गंभीर होइत छल मुदा जखन ओहिमे बाल साहित्य भए सकैए तँ बाल गजल किएक नै ? ओनाहुतो मैथिलीमे गजल विधाकेँ बहुत दिन धरि सायास ( खास कए गजलकारे सभ द्वारा ) अवडेरि देल गेल छलै तँए बहुत लोककेँ बाल गजलसँ कष्ट भेनाइ स्वाभाविक छै। की बाल गजल लेल नियम बदलि जेतैः जेना की उपरमे कहल गेल अछि जे बाल गजल लेल सभ नियम गजले बला रहतै बस खाली एकटा नियमसँ समझौता करए पड़त। माने जे बहर-काफिया-रदीफ आ आर-आर नियम सभ तँ गजले जकाँ रहतै मुदा गजलमे जेना हरेक शेर अलग-अलग भावकेँ रहैत अछि तेना बाल गजलमे कठिन बुझाइए। तँए हमरा हिसाबेँ ऐठाम ई नियम टूटत मुदा तैओ कोनो दिक्कत नै कारण मुस्लसल गजल तँ होइते छै। अर्थात बाल गजल एक तरहेँ " मुस्लसल गजल " भेल। बाल गजलक पूर्व भूमिकाः तारीखक हिसाबें बाल गजलक उत्पति २४.०३.२०१२ केँ मानल जाएत मुदा ओकर स्वरूप मैथिलीमे पहिनेहें फड़िच्छ भए चुकल छल। ०९ दिसम्बर २०११ केँ अनचिन्हार आखर पर प्रकाशित श्रीमती शांति लक्ष्मी चौधरी जीक ई गजल देखल जाए ( बादमे ई गजल मिथिला दर्शनक अंक मइ-जून २०१२मे सेहो प्रकाशित भेलै) आ सोचल जाए जे बिना कोनो घोषणाकेँ एतेक नीक बाल गजल कोना लिखल गेलै------------ शिशु सिया उपमा उपमान छियै हमर आयुष्मति बेटी मैत्रेयी गार्गीक कोमल प्राण छियै हमर आयुष्मति बेटी टिमकैत कमलनयन, धव-धव माखन सन कपोल पुर्णमासीक चमकैत चान छियै हमर आयुष्मति बेटी बिहुसैत ठोर मे अमृतधारा बिलखैत ठोर सोमरस शिशु स्वरुपक श्रीभगवान छियै हमर आयुष्मति बेटी नौनिहाल किहकारी सरस मिश्रीघोरल मनोहर पोथी दा-दा-ना-ना-माँ सारेगामा गान छियै हमर आयुष्मति बेटी सकल पलिवारक अलखतारा जन्मपत्रीक सरस्वती अपन मैया-पिताश्रीक जान छियै हमर आयुष्मति बेटी ज्ञानपीठक बेटी छियै सुभविष्णु मिथिलाक दीप्त नक्षत्र मातृ पितृ कुलक अरमान छियै हमर आयुष्मति बेटी "शांतिलक्ष्मी" विदेहक घर-घर देखय इयह शिशुलक्ष्मी बेटीजातिक भविष्णु गुमान छियै हमर आयुष्मति बेटी ..................वर्ण २२................ तेनाहिते एकटा हमर बिना छंद बहरक गजल अनचिन्हार आखर आ विदेहक फेसबुक वर्सन पर 6/6/2011केँ आएल छल से देखू-------------- होइत छैक बरखा आ रे बौआ कागतक नाह बना रे बौआ देखिहें घुसौ ने चोरबा घर मे हाथमे ठेंगा उठा रे बौआ तोरे पर सभटा मान-गुमान माएक मान बढ़ा रे बौआ छैक गड़ल काँट घृणाक करेजमे प्रेमसँ ओकरा हटा रे बौआ नहि झुकौ माथ तोहर दुशमन लग देशक लेल माथ कटा रे बौआ तेनाहिते ४ अक्टूबर २०१०केँ अनचिन्हार आखर पर प्रकाशित गजेन्द्र ठाकुर जीक ऐ गजलकेँ देखल जाए----- जे शब्दावलीक आधार पर बाल गजल अछि मुदा अर्थ विस्तारक कारणें बाल आ बूढ़ दूनू लेल अछि----- बानर पट लैले अछि तैयार बिरनल सभ करू ने उद्धार गाएक अर्र-बों सुनि अनठेने दुहै समऐँ जनताक कपार पुल बनेबाक समचा छैक नै अर्थशास्त्र-पोथीक छलै भण्डार कोरो बाती उबही देबाक लेल आउ बजाउ बुढ़ानुस - भजार डरक घाट नहाएल छी हम से सहब दहोदिश अत्याचार ऐरावत अछि देखा - देखा कए सभटा देखैत अछि ओ व्यापार ऐ तीनटा गजलक आधार पर ई कहब बेसी उचित जे बाल गजलक भूमिका बहुत पहिने बनि गेल छल मुदा विस्फोट 24/3/2012केँ भेलै। आ ऐ विस्फोटमे जतेक हमर भूमिका अछि ततबए हिनका सभकेँ सेहो छन्हि। 1 बाल गजल ई छौंड़ी थिक बिढ़नी सन सौंसे नाचै घिरनी सन बदमाशीकेँ तगमा छै मूँहक लागै हिरणी सन बैसल भूतक नानी बनि लागै छै मुँहचिरनी सन बच्चा लग बच्चा लागै बुढ़िया लग बततिरनी सन ई दुनियाँ झाँपै तैओ बेटी चमकै किरणी सन हरेक पाँतिमे दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ 2 बाल गजल भोरे उठि मैदान गेलै बौआ ओम्हरहिसँ दतमनि तँ लेतै बौआ पोखरिमे नीकसँ नहेतै धोतै चिक्कन चुनमुन बनि क' एतै बौआ सरिएतै पोथी पहिरतै अंगा इस्कूलो खुब्बे तँ जेतै बौआ नै रखतै दोस्ती खरापक संगे पढ़ि बड़का डाक्टर तँ बनतै बौआ सभहँक करतै मदति सोना बेटा सदिखन नीके बाट चलतै बौआ हरेक पाँतिमे दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ अन्हार पर इजोतक कहिऒ विजय नहि (आलोचना) शीर्षक पढैते देरी पाठक लोकनि एकर रचियता के निराशावादी घोषित कए देताह आ फतवा देताह जे समाज के एहन -एहन वकतव्य सँ दूर रहबाक चाही।मुदा हमरा बुझने पाठक लोकनि अगुता गेल छथि,आ हम कहबनि जे अगुताथि जुनि। मुदा इहो एकटा सुपरिचित तथ्य थिक जे लोक के जतेक उपदेश दिऔक ओ ओतबे तागति सँ ओकर उन्टा काज करत।मुदा तैओ हम कहबनि जे अगुताथि जुनि आ ता धरि नहि अगुताथि जा धरि शीर्षक पूर्ण वाक्य नहि भए जाए।आब अहाँ सभ टाँग अड़ाएब जे शीर्षक त अपना आप मे पूर्ण छैहे तखन अहाँ एकरा अपूर्ण कोना कहैत छिऐक ? मुदा नहि, कोनो वस्तु बाहर सँ पूर्ण होइतो भीतर सँ अपूर्ण होइत छैक। इहए गप्प एहि शीर्षकक संग छैक। अच्छा आब हम अपन विद्वताक दाबी छोड़ी आ आ अहाँ सभ के पूर्ण वाक्य के दर्शन कराबी - "अन्हार पर इजोतक कहिऒ विजय नहि, सरकार पर जनताक कोनो धाख नहि"। मैथिली साहित्य मे बहुत रास बिडंबना छैक, प्रवंचना छैक, वंदना छैक अर्थात सभ किछु छैक मुदा तीन गोट वस्तु के छोड़ि-- १) मैथिली मे व्यंग प्रचुर मात्रा (गुण एवं परिमाण) मे नहि लिखाइत अछि, २) जँ झोंक- झाँक मे लिखाइतो छैक त स्तरीय आलोचना नहि होइत छैक , ३) आ जँ भगवान भरोसे स्तरीय आलोचना अबितो छैक त हरिमोहन झा के शिखर मानि सभ के भुट्टा बना देल जाइत छैक । एहि तीन टा के छोड़ि एकटा आर महान बिडंबना छैक जे आलोचक आलोचना करताह फल्लाँ बाबूक अथवा हुनक कृति के मुदा समुच्चा मैथिली अलोचना मे हरिमोहन बाबू तेना ने घोसिआएल रहता जे पाठक एहन आलोचना के हरिमोहने बाबूक आलोचना बूझैत छथि। आलोचनाक स्तर पर मैथिली व्यंग मे रुपकांत ठाकुर एकटा बिसरल नाम थिक। एकर पुष्टि 2003 मे साहित्य अकादेमी द्वारा प्रकाशित पोथी "ली कथाक विकास" मे प्रो. विद्यापति झा द्वारा लिखित लेख "मैथिली कथा साहित्य मे हास्य-व्यंग" पढ़ि होइत अछि। प्रो.झा पृष्ठ 168 पर 1963 सँ 1967क मध्य प्रकाशित हास्य-व्यंगक व्यौरा दैत रुपकांत ठाकुरक मात्र 6 गोट कथाक चर्च कएलथि अछि ( किछु आलोचक मात्र इएह लीखि कात भए गेलाह जे रुपकांत ठाकुर सेहो नीक व्यंग लिखैत छथि ) ।एहि के अतिरिक्त ने 1963 सँ पहिनेक मे हुनक व्यौरा मे हुनक नाम छन्हि ने 1967क पछाति। अर्थात रुपकांत ठाकुर मात्र 6 गोट हास्य-व्यंगक रचना कए सकलाह। जखन की वास्तविकता अछि जे रुपकांत ठाकुर 1930 मे जन्म-ग्रहण कए 1960क लगीच रचनारत भेलाह एवं 1972 मे मृत्यु के प्राप्त भेलाह। कुल मिला कए ठाकुरजी मात्र बारह बर्ख मे अनेक असंकलित कथा एवं लेख के छोड़ि हुनक पाँच गोट पोथी प्रकाशित छन्हि--1) मोमक नाक (कथा संग्रह) 2) धूकल केरा (कथा संग्रह) 3) लगाम (नाटक) 4) वचन वैष्णव (नाटक) 5) नहला पर दहला (उपन्यास)। मात्र बारह बर्ख मे एतेक रचना आ उल्लेख मात्र 6 गोट कथाक। आब अहाँ सभ के थोड़ेक-थोड़ शीर्षकक अर्थ लागए लागल हएत। मुदा अहाँ सभ घबराउ जुनि । इ शीर्षक ठाकुरेजीक रचना सँ लेल गेल अछि। मतलब जे भविष्यक संकेत कए गेल छथि। आब किछु गप्प करी मैथली व्यंग मे राजनीतिक व्यंग पर। कोन चिड़ियाक नाम छैक राजनीतिक व्यंगइ हमरा जनैत मैथिली व्यंगकार नहि जनैत छथि। ओना व्यंग केकरा कहल जाइत छैक सेहो बूझब कठिन। हमरा जनैत मैथिली मे 93% व्यंग लिखल जाइत छैक मुदा 93% आलोचक ओकरा हास्य मानि आलोचना करैत छथि। सभ व्यंगकार ओहीक मारल छथि, चाहे शिखर-पुरुष हरिमोहन बाबू होथि वा रुपकांत ठाकुर। सुच्चा व्यंग लिखला पछातिओ हरिमोहन बाबू कहेलाह हास्य-व्यंग सम्राट। अर्थात हास्यकार पहिने आ व्यंगकार बाद मे। बाद बाँकी 7% हास्य लिखाइत अछि जकर प्रतिनिधि छथि पं. चन्द्रनाथ मिश्र "अमर" । हँ त फेर आबी हम राजनीतिक व्यंग पर। हमरा जनैत जाहि व्यंग मे अपन समकालीन अथवा पूर्वकालिक राजनीति, शासन-व्यवस्था, ओकर संचालक आदि पर निशाना साधल गेल हो ओकरा राजनीतिक व्यंग कहाल जाइए। ओना इ अकादमिक परिभाषा नहि अछि। त फेर हम अहाँ सभ के रुपकांत ठाकुर लग लए चली, आ हुनक एक गोट पोथीक परिचय करा हुनक राजनीतिक चेतना के देखाबी। जाहि पोथी सँ हम अहाँ के परिचय कराएब ओकर नाम छैक "मोमक नाक"। एहि व्यंग-संग्रह मे नौ गोट कथा थिक। परिचय शुरु करेबा सँ पहिनहि कहि दी जे इ कोनो जरुरी नहि छैक जे हम अहाँ के नओ कथा कहब आ ने जरूरी छैक जे संग्रहक पहिल कथा सँ हम शुरू करी। इ निर्णय हमर व्यत्तिगत अछि आ अहाँ एहि सँ सहमत भइओ सकैत छी आ नहिओ भए सकैत छी। हँ त हम शुरू करी संग्रहक अंतिम कथा "मर्द माने की" सँ। जेना की शीर्षके सँ बुझाइत छैक लेखक अवस्स एहि मे मर्दक परिभाषा देने हेथिन्ह। से सत्ते, लेखक जखन शुरुए मे कहैत छथिन्ह जे " लोटा ल' क' घरवालीक लहटगर देह पर गदागद ढोल बजौनिहार एहन सुपुरुष कत' भेटत?"। त सभ अर्थ स्पष्ट भए जाइत छैक। मुदा लेखक एतबे सँ संतुष्ट नहि भए आगू कहैत छथि " मर्द माने कमौआ, आ कमौआ माने वियाहल,आ वियाहल माने बुड़िबक आ बुड़िबक माने बड़द"। सुच्चा मैथिल अभिव्यत्ति। एखनो अर्थात 2009 धरि मैथिल समाजक इ धारणा छैक जे कमौए मर्द होइत अछि, आ जहाँ कहीं कोनो मर्द देखाइ पड़ल लोक ओकर विआह करबाइए कए छोरैए। आ जहाँ धरि गप्प रहल बियाहल माने बुड़िबक से त हम नहि कहब मुदा बुड़िबक माने बड़द अवश्य होइत छैक। खाली खटनाइ सँ मतलब। अधिकारक प्रति निरपेक्ष। आब हम एहि सँ बेसी नहि कहब एहि कथाक प्रसंग। बस एतबे सँ लेखकक चेतनाक अनुमान कए लिअ। "ठोकल ठक्क" मे लेखक ओहन भातिज आ जमाएक दर्शन कराबैत छथि जनिकर काजे छन्हि कमीशन खाएब आ एहि लेल ओ अपन पित्ती एवं ससुरो के नहि छोड़ैत छथिन्ह। आ जँ एही कथाक माध्यमे अहाँ तात्कालीन रजनीतिक देखए चाहब त रुपकांत एना देखेताह-"सरकार पर जनताक कोनो धाख नहि"। अर्थात बेशर्म, निर्लज्ज, हेहर,थेथर सरकार। भारतक समकालीन विकास जँ अहाँ देखबाक इच्छा होइत हो त रुपकांत ओहो देखेताह। कनेक पढ़ू "जय गंगा जी" जतए रेलगाड़ी के बढैत देखि लेखक टिप्पणी करैत छथि-"कांग्रेसी नेता जकाँ लोक के अपन पेट मे राखि क' ओकर सुख-दुख अथवा उन्नति-अवनति के बिसरि गाड़ी मात्र आगू बढब जनैत छल। अपना बले नहि कोइला आ पानिक बलें। परन्तु पवदान पर चढ़ल यात्री कतऽ छलाह?" ई सवाल जतेक भयावह लेखकक समय मे छल ततबे भयावह एखनो अछि। लेखक सरकारक डपोरशंखी योजनाक लतखुर्दन एही कथा मे करैत छथि-" कोन टीसन केखन बितलैक से मोन राखब पंचवर्षीय योजना सभ मे उन्नतिक कागजी आकड़ा मोन राखब थिक"। बेसी प्रशंसात्मक उद्धरण देब हमरा अभीष्ट नहि मुदा तैओ एकटा उद्धरण देबा सँ हम अपना के रोकि नहि पाबि रहल छी। एही संग्रहक दोसर कथा थिक "फूजल ऊक"।बेसी अपन वक्तव्य नहि कहि उद्धरण सुनाबी-"मात्र सुधारवादी दृष्टि रखला मात्र सँ सुधार कथमपि नहि भए सकैछ"। जँ लेखकक भावना के बचबैत हम लिखी जे "प्रगतिशील विचार लिखला मात्र सँ प्रगतिशीलता कथमपि नहि आबि सकैछ" त इ स्पष्ट भए जाएत जे रुपकांत कतए व्यंग कए रहल छथिन्ह आ केकरा पर कए रहल छथिन्ह। ठाकुर जी एकपक्षीय व्यंगकार नहि छथि। ओ दूनू पक्ष के हूट सँ मानसिक आ बूट सँ शारिरिक प्रताड़ाना दैत छथिन्ह। तकर प्रमाण ओ एहि संग्रहक पहिल कथा जे पोथीक नामो छैक अर्थात " मोमक नाक" मे देखेलैन्ह अछि। हुनकहिं शब्द मे " आजुक युग मे भला आदमीक परिभाषा उनटि गेल छैक। जनता जनता अछि जे से सभ मोमक नाक जकाँ लुजबुज। जखन जाहि दिस नफगर रहै छैक तिम्हरे लोक घूमि जाइछ" स्वतंत्रे भारत नहि हमरा विचारे जम्बूदीपक जनता सँ लए कए एखुनका भारतीय जनताक चारित्रिक विशेषता ई उद्धरण देखबैत अछि। आ एतेक देखेलाक पछातिओ आलोचक रुपकांतक नाम बिसरि गेल छथि। भने आलोचक नाम बिसरि गेलखिन्ह मुदा पाठकक मोन मे एखनो धरि रुपकांत ठाकुरक रचना खचित छैन्ह। हमरा जनैत कोनो प्रथम आ अंतिम सफलता इएह छैक। आ रुपकांत इ सफलता अपन रचनाक माध्यमें प्राप्त केलन्हि ताहि मे संदेह नहि। बेचन ठाकुरजीक नाटक छीनरदेवी- बेचन ठाकुरजीक नाटक- बेटीक अपमान ऐ नाटकक मादें किछु कहबासँ पहिने ओ गप्प कही जे प्रायः-प्रायः अंतमे कहल जाइत छैक। श्रुति प्रकाशन एकटा बड़का काज ठानि लेने अछि- हीरा-मोती-माणिककेँ चुनबाक। आ ऐ मे ई कतेक सफल भेल तकर निर्धारण भविष्य करत, वर्तमान नै कारण वर्तमान समयक नीति-निर्धारकक इमान शून्य स्तरपर पहुँचि गेल अछि। मुदा एहन-एहन समस्याक अछैतो हमर शुभकामना ऐ प्रकाशनक संग अछि आ विश्वास अछि जे जेना ई धारक दूरी पार केलक अछि तेनाहिते आब ई समुद्रक दूरी पार करत। आ संगहि-संग ऐ नाटककेँ उपर अनबामे जनिकर कनेकबो योगदान छन्हि से अशेष धन्यवादक पात्र छथि। जहिआ सनातन धर्ममे पुराण-उपनिषद् के आगमन भेल रहैक, तहिआ देवी-देवताक संख्या ३३ करोड़ रहैक। आजुक समयमे जखन कि पौराणिक समय बितला बहुत दिन भए गेल तखन देवी देवताक संख्या कतेक हएत ? हमरा बुझने ३३ करोड़सँ बेसिए। तथापि सुविधाक लेल एकरा यथावत् मानू। आ एतेक देवी-देवताक अछैतो छीनरदेवीक आविर्भाव किएक? उत्तर हम नै देब कारण ई गप्प सभ जनैत छथि मुदा लोक ऐ उत्तरकेँ नुका कऽ रखैत अछि। आ संभवतः छीनरदेवीक ऐ रूपकेँ छिनरधत्त कहल जाइत छैक। ओना एकरा बादमे हम निरुपित करब। ओइसँ पहिने एकटा आरो महत्वपूर्ण प्रश्नपर चली। जँ अहाँ श्री बेचन ठाकुर कृत ऐ नाटककेँ नीकसँ पढ़ब तँ ई बुझबामे कोनो भाँगठ नै रहत जे ऐ नाटकक मूल स्वर अंधविश्वासपर चोट करब छैक। आ जखने अहाँ ऐ निषकर्षपर पहुँचब, अहाँकेँ तुरंते प्रो. हरिमोहन झा मोन पड़ि जेताह से उम्मेद अछि। आ जखने अहाँकेँ प्रो. झा मोन पड़ताह तखने हमरा मोनमे ई प्रश्न उठत जे प्रो. झा जइ प्रबलतासँ अंधविश्वासपर कलम चलेने छलाह तकरा बाबजूदो ६०-७० साल बाद बेचन जीकेँ ऐ पर कलम चलेबाक जरूरति किएक पड़लनि ? एकर दूटा कारण भऽ सकैत अछि पहिल जे प्रो. झाक प्रहारक बाबजूदो अंधविश्वास मेटाएल नै ( हम ई नै कहि रहल छी जे ई प्रो. झाक हारि थिक कारण हरेक लेखकक एकटा सीमा होइत छैक) आ दोसर कारण भऽ सकैत अछि जे बेचन जीकेँ कोनो बिषए नै भेटल होइन्ह आ मजबूरीमे ओ ऐ पर कलम उठेने होथि। मुदा आइ बर्ख २०-११ मे जखन गामे-गाम घूमै छी आ ओकर आंतरिक स्थितिकेँ परखैत छी तँ दोसर कारण अपने-आप खत्म भऽ जाइत अछि। आइयो गाम आ अर्धशहरी इलाकामे एलोपैथीक संगे-संग भस्म-विभूति आ ब्रम्हथानक माटि उपचारमे लाएल जाइत अछि। आ एकरा संगे ईहो स्पष्ट भऽ जाइत अछि जे प्रो. झाक बादो ई अंधविश्वास मरल नै। आ एहने समयमे हमरा लग ई प्रश्न बिकराल रूप धऽ आबि जाइत अछि जे प्रो. झाक बाद जे नाटककार भेलाह ( चूँकि बेचन ठाकुर जीक विधा नाटक छन्हि तँए हम नाटकेक दृष्टिसँ गप्प करब) से एतेक दिन धरि की करैत छलाह ? आब हम ऐ प्रश्न सबहक उत्तर ऐ ठाम नै लिखब। एकर कारण अछि जे हमरा सदासँ विश्वास रहल अछि जे साहित्यिक संदर्भमे वर्तमान समयक उत्तर जँ भविष्यमे प्राप्त हुअए तँ ओ बेसी सटीक आ सार्थक होइत छैक।अस्तु श्री बेचन ठाकुर जीसँ मैथिली मंचकेँ बड्ड आस छैक आ तइ आसकेँ पूरा करबाक तागति भगवान हुनका देथिन्ह तइ आसाक संग चली हम प्रेक्षक समूहमे। कोनो नाटक पहिने लिखल जाइए आ तकर बाद ओ टाइप होइए वा सोझे टाइप कएल जाइए आ तकर बाद कखन छपैए, मंचनक बाद वा मंचनक पहिने; ऐ सभमे आब कोनो अन्तर नै रहलै। जॉर्ज बर्नार्ड सॉ शॉर्टहैण्डमे लिखै छलाह आ हुनकर स्टेनो ओकरा लौंगहैण्डमे टाइप करै छलीह। बिनु छपने मैथिली धूर्तसमागम मैथिलीक पहिल पोस्ट मॉडर्न अबसर्ड नाटक अछि। ई तर्क जे छपलाक पहिने मंचन भेलासँ बहुत रास कमी दूर भऽ जाइए, ऐ सन्दर्भमे मलयालम कथाकार बशीरक उदाहरण अछि जे सभ नव छपल संस्करणमे अपन कथामे नीक तत्व अनबाक दृष्टिसँ संशोधन करै छलाह, ई कथामे सम्भव तँ नाटकमे तँ आर सम्भव। तँ सिद्ध भेल जे लिखल जेबाक वा छपि गेलाक बादे नाटकक मंचन हएत आ मंचनक बाद लिखल वा छपल दुनूमे सुधार सम्भव। बेचन ठाकुरजी रंगमंच निर्देशक सेहो छथि आ विगत २५ बर्खसँ अपन गाममे मैथिली रंगमंचकेँ जियेने छथि बिना कोनो संस्थागत (सरकारी वा गएर सरकारी) सहयोगक। हिनकर रंगमंचपर हिनकर दर्जनसँ बेसी नाटकक अतिरिक्त गजेन्द्र ठाकुर आ जगदीश प्रसाद मण्डलक नाटक, एकांकी आ बाल नाटकक मंचन सेहो भेल अछि। हम व्यत्तिगत रुपेँ हरियाणाक प्रायः-प्रायः प्रत्येक कोणमे रहल-बसल छी आ तँए स्थानीय जनताक रुपमे हरियाणामे कत्तौ घुसि जाइत छी। एकर हानि हमरा जे भेल हुअए मुदा लाभ एतेक तँ जरुर भेल जे हम स्थानीय परेशानी बुझए लागल छिऐक। ओना हरियाणाक नाम सुनिते मोनमे समृद्धिक नजारा देखाए लगैत छैक। भरल-पुरल खेत सुझाए लगैत छैक। मुदा एहिठामक स्थानीय समस्या बहरिआ लोककेँ नै बुझल छैक। ऐठाम हरेक साल १००-१५० लड़काक बिआह दोसर राज्यक लड़कीसँ होइत छैक। जँ सोझ ढ़ंगे कही तँ हरियाणाक सेक्स रेशिओ (लिंगानुपात) असमान अछि। अर्थात १००० लड़कापर ८५०-९०० लड़की। आब अहाँ सभ हमरा हूट करबाक सोचि रहल हएब। प्रस्तुत पोथी मैथिलीक अछि आ हम हरियाणाक गप्प कऽ रहल छी से अहाँ सभकेँ उन्टा लागि रहल हएत। मुदा ऐठाम हम ई कहए चाहब जे मात्र स्थान आ मनुख बदलि जाइत छैक, मनोवृति आ समस्या वएह रहैत छैक। आब हम अही समस्याकेँ मिथिलाक परिप्रेक्ष्यमे सोची। बेसी अंतर नै भेटत आ से ऐ द्वारे जे नेपालमे सेहो मिथिला छैक। आ भारतक मिथिला आ नेपालक मिथिला दुनूमे बिआह प्रचलित छैक। तथापि जँ भारतक हिसाबे सोची तँ बिहारमे १००० लड़कापर ९२१ लड़की छैक ( ओना जँ २०११ क जनगणनाक प्रोविजनल रिपोर्ट देखब तँ संपूर्ण भारतमे १००० लड़कापर ९४० लड़की छैक)। आ जँ ऐ समस्याक परिप्रेक्ष्यमे विकसित हरियाणा आ अविकसित मिथिलाकेँ देखी तँ कोनो बेसी अंतर नै बुझाएत। अर्थात ऐ समस्यासँ दुनू क्षेत्र ग्रसित अछि। मुदा ई आब बिचारए पड़त जे ई समस्या कहाँसँ निकलैत छैक? कोन मनोवृतिसँ ई समस्या परचालित होइत छैक ? आखिर ई कोन दृष्टिकोण छैक जइ तहत लोक बेटी नै चाहैत अछि आ ऐ लेल भ्रूण हत्या सन पाप करबासँ सेहो नै हिचकैत अछि ? मिथिलाक हिसाबे गप्प करी तँ दहेज प्रथाकेँ एकर जिम्मेदार ठहराओल जा सकैए मुदा हरियाणाक हिसाबें ई कारण ओतेक प्रभावी नै कारण हरियाणामे दहेज प्रथा नै कऽ बराबर छैक। तँए हम दहेजकेँ भ्रूण हत्याक एकटा कारण मानैत छी मुदा प्रमुख कारण नै। हमरा हिसाबे ऐ समस्याक प्रमुख कारण एखनो आधुनिक कालमे बेटाकेँ अनिवार्य मानब अछि। एकर समाजिक आ आर्थिक, दुनू पक्षमे बाँटए पड़त। समस्या आ साहित्य दुनू एकै चीजक अलग-अलग नाम थिक। बिना समस्या कोनो साहित्य नै भऽ सकैत छैक। आ अंततः साहित्ये कोनो समस्याक समाधान तकैत छैक। मुदा मैथिली साहित्य एकर अपवाद अछि। ऊपर हम देखिए चुकल छी जे कोना मिथिला भ्रूण हत्याक समस्यासँ ग्रसित अछि। तथापि ऐठामक साहित्यकार ऐपर कलम नै चलौलन्हि। घोर आशचर्यक बिषए। आशचर्यक बिषए ईहो जे एहने-एहने समस्यासँ कतिआएल साहित्यकारकेँ आलोचक आ मठाधीश सभ बढ़ाबा देलथि। कोनो समाज कोनो समस्यासँ कतिआ कऽ बेसी दिन नै रहि सकैत अछि। एकर अनुभव हमरा श्री बेचन ठाकुर लिखित नाटक " बेटीक अपमान" पढ़लापर बुझाएल। आ संगहि-संग ईहो बुझाएल जे आब बेसी दिन मिथिला सूतल नै रहत आ ने बेटीकेँ खराप बुझल जाएत । काफिया काफिया मने तुकान्त। आ तुकान्त मने स्वर-साम्यक तुकान्त चाहे ओ वर्णक स्वर-साम्य हो की मात्राक स्वर-साम्य। रदीफसँ पहिने जे तुकान्त होइत छैक तकरा काफिया कहल जाइत छैक। आ ई रदीफे जकाँ गजलक हरेक शेरक (मतला बला शेरकेँ छोड़ि) दोसर पाँतिमे रदीफसँ पहिने अनिवार्य रुपें अएबाक चाही। काफिया दू प्रकारक होइत छैक (क) वर्णक स्वर-साम्य आ (ख) मात्राक स्वर-साम्य। वर्णक काफिया लेल शेरक हरेक पाँतिमे रदीफसँ पहिने समान वर्ण आ तकरासँ पहिने समान स्वर-साम्य होएबाक चाही। एकटा गप्प आर, बहुतों शाइर खाली रदीफक बाद बला वर्ण वा मात्राकँे काफिया बूझि लैत छथि से गलत। काफियाक निर्धारण काफिया लेल प्रयुक्त शब्दकेँ अंतसँ बीच वा शुरू धरि कएल जा सकैए। उदाहरण देखू--------- करेज घसैसँ साजक राग निखरै छै बिना धुनने तुरक नै ताग निखरै छै एहि शेरक पहिल पाँतिमे रदीफ "निखरै छै" छैक। आ रदीफसँ ठीक पहिने "राग" शब्द छैक। जँ अहाँ "राग" शब्द पर धेआन देबै तँ पता लागत जे ऐ शब्दक अंतिम वर्ण "ग" छैक मुदा ऐ "ग" संग "आ" ध्वनि (रा) सेहो छैक। तहिना दोसर पाँतिमे रदीफ "निखरै छै"सँ पहिने "ताग" शब्द अछि। आब फेर अहाँ सभ "ताग" शब्दकेँ देखू। ऐमेे अंतिम वर्ण "ग" तँ छैके संगहि-संग "आ" ध्वनि (ता) सेहो छैक। मतलब जे उपरक शेरक दुनू पाँतिमे रदीफ "निखरै छै" सँ पहिने "ग"वर्ण अछि, "आ" स्वर (ध्वनि)क संग। अर्थात "आ" ध्वनि संगे "ग" वर्ण ऐ शेरक काफिया भेल। आब ऐठाम ई मोन राखू जे जँ उपरक ई दुनू शेर कोनो गजलक मतला छैक तँ ओइ गजलक हरेक शेरक कफिया "ग" वर्णक संग "आ" ध्वनि होएबाक चाही। अन्यथा ओ गजल गलत भए जाएत। आब ऐ गजलक दोसर शेरकेँ देखू-- इ दुनिया मेहनतिक गुलाम छै सदिखन बहै घाम तखन सुतल भाग निखरै छै ऐ शेरमे पहिल पाँतिमे ने रदीफ छैक आ ने काफिया मुदा दोसर पाँतिमे रदीफ सेहो छैक आ रदीफसँ पहिने शब्द "भाग" अछि। ऐ शब्दक अंतमे "ग" वर्ण तँ छैके संगहि-संग "ग"सँ पहिने "आ" ध्वनि सेहो छैक। ऐ गजलक आन काफिया सभ अछि "लाग", "बाग", "पाग"। एकटा आर दोसर उदाहरण देखू-- कहू की, कियो बूझि नै सकल हमरा हँसी सभक लागल बहुत ठरल हमरा ऐ मतलाक शेरमे "हमरा" रदीफ अछि। आ रदीफसँ पहिने पहिल पाँतिमे "सकल" शब्द अछि। संगहि-संग दोसर पाँतिमे "ठरल" शब्द अछि। आब हमरा लोकनि जँ एहिमे काफिया निर्धारण करी। दुनू शब्दकेँ नीक जकाँ देखू। दुनू शब्दक अंतिम वर्ण "ल" अछि मुदा पहिल पाँतिमे "ल"सँ पहिने "अ" ध्वनि अछि (क) आ दोसरो पाँतिमे "ल"सँ पहिने "अ" ध्वनि अछि (र)। तँ एहि दुनू शब्दक मिलानके बाद हमरा लोकनि देखै छी जे दुनूमे "ल" वर्ण समान अछि। संगहि-संग वर्ण "ल" सँ पहिने "अ" स्वर अछि। आब सभ व्यंजन हलन्तमे अ लगिते छै तखने ओ गुणिताक्षर बनै छै (कचटतप, य-ह) तँए ऐ गजलक काफिया कोनो कचटतप वर्ग(कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग, पवर्ग) वा य-ह संग "ल" वर्ण भेल। आब शाइरकेँ बाँकी शेरमे काफियाक रूपमे एहन शब्द चुनए पड़तन्हि जकर अंतमे "ल" वर्ण अबैत हुअए एवं तइसँ पहिने कोनो "कचटतप, य-ह" भऽ सकैए। ऐ गजलमे प्रयुक्त भेल आन काफिया अछि-"जरल ", "खसल", "रहल" "कहल"| तेसर उदाहरण सेहो देखू- रानी मेघ सगरो जल पटाएत ना बौआ हमर खेलत आ नहाएत ना ऐ मतलामे "ना" रदीफ अछि। आ रदीफसँ पहिल पाँतिमे "पटाएत" शब्द अछि आ दोसर पाँतिमे "नहाएत"। जँ दुनू शब्दमे मिलान करबै तँ "एत" दुनू पाँतिक काफियामे कामन छै आ "एत" सँ पहिने "आ" स्वरक मात्रा छै (पहिल पाँतिमे "टा" आ दोसर पाँतिमे "हा"। ऐ मतलामे काफिया हएत "आ" मात्राक संग "एत" वर्ण समूह। ऐ गजलमे लेल गेल आन काफिया अछि बहाएत, बनाएत, चलाएत आ खाएत। जँ मतलाक दुनू पाँतिक काफियामे किछु वर्ण समूह कामन रहै छै तँ ओकरा तहलीली रदीफ कहल जाइत छै। उपरका मतलामे "एत"केँ तहलीली रदीफ कहल जाइत छै। काफियाक ऐ विवरणकेँ एना बूझी तँ नीक रहत- १) जँ कोनो मतलामे "छन" आ "दन" काफिया छै तँ ऐमे "न" वर्ण मूल वर्ण भेलै (काफियाक मिलान सदिखन अंतसँ कएल जाइत छै) आ ओइसँ पहिलुक वर्णक स्वर सेहो बराबर हेबाक चाही। उपरका उदाहरणमे "न" वर्णक बाद क्रमशः "छ" आ "द" वर्ण बचै छै आ दुनूक स्वर "अ" छै मने अकारान्त छै तँए कोनो मतलामे ई काफिया सही हएत। आब ऐ गजलमे आन शेर सभमे एहने काफिया हेतै जेना- "हन", "मन", "जीबन" आदि। ऐठाम ई बात बुझबाक अछि जे जँ मतलामे "छन" आ "धुन" रहितै तँ काफिया गलत भऽ जेतै कारण मूल वर्ण "न" केर बादक स्वरक मात्रा सेहो अनिवार्य रूपें मिलबाक चाही मुदा ऐ उदारहरणक एकटा काफियामे "न" केर बाद "अ" स्वरक गुणिताक्षर छै तँ दोसरमे मूल वर्ण "न" केर बाद "उ" स्वर छै, तँए ई गलत भेल। ऐठाम ईहो मोन राखू जे "छन" आ "दन" केर बाद कोनो आन शेरमे "धुन", "आन", "निन" आदि काफियाकेँ नै लऽ सकैत छी। ईहो मोन राखू जे एकै गजलक आन-आन शेरमे मूल वर्ण एकै रहतै। जेना उपरका उदाहरणमे "छन" आ "दन" काफिया छै तँ आन शेरक काफियाक अंतमे "न" वर्ण अनिवार्य रूपसँ रहतै। २) जँ कोनो मतलामे "जीवन" आ "तीमन" छै तँ काफिया "अ" स्वरक संग "न" मूल वर्ण हएत। आ तँए आन शेरक काफिया लेल "धूमन", "केहन", "पावन" एहन शब्द उपयुक्त रहत। ३) जँ कोनो मतलामे काफिया "तीमन" आ "नीमन" शब्द छै तखन कने धेआन राखए पड़त। दुनू शब्दकेँ धेआनसँ देखू, अंतमे "मन" वर्ण समूह उभयनिष्ठ छै तँ एहन काफियामे "मन" मूल वर्ण समूह भेल आ तइसँ पहिने दुनूमे "ई" स्वरक मात्रा छै (ती, नी) तँए एकर काफिया भेल "ई" स्वरक मात्राक संग "मन" वर्णक समूह। जँ कोनो शाइर "तीमन" आ "नीमन" केर बाद कोनो आन शेरमे "जीबन", "धूमन", "केहन", "पावन" काफिया लेताह तँ गलत हएत। सही काफिया हेत- "परिसीमन" आदि। ऐठाम ईहो मोन राखू जे जँ कोनो मतलामे "तीमन" आ "धूमन" काफिया छै तँ ओ गलत हएत कारण "मन" वर्ण समूहसँ पहिने एकटामे "ई" स्वरक मात्रा छै तँ दोसरमे "उ" स्वरक मात्रा। तेनाहिते "खाएत" एवं "आएत" काफियामे अंतसँ "एत" उभयनिष्ठ छै एवं तइसँ पहिने "आ" स्वरक मात्रा छै, तकर बाद आन शेरमे "जाएत", "नहाएत", "पाएत", "बुड़िआएत" आदि काफिया सही हेतै। ४) कोनो मतलामे "खौंझाएत" आ "बुझाएत" शब्दक काफिया नै भए सकैए से आब अहाँ सभ नीक जकाँ बुझि गेल हेबै। जँ कोनो शाइर एहन काफिया लै छथि तँ काफियामे "सिनाद दोष" आबि जाइत छै। ५) केखनो काल किछु एहन शब्द आबि जाइत छै काफियामे, जे अधिकांशतः एकसमान रहैत छै जेना- "पसार" एवं "सार"। ऐ दूटा शब्दमे अंतसँ "सार" उभयनिष्ठ छै आ केओ कहता जे "सार" सँ पहिने बला स्वरक मात्रा सेहो मिलबाक चाही। मने "पसार" एवं "सार" मे "प" अनकामन छै तँए " सार" सँ पहिने "अ" स्वर हेबाक चाही, मुदा शाइरीक निअमक हिसाबेँ मतलामे एहन काफियाक प्रयोग गलत होइत छै। अर्थात कोनो मतलामे अहाँ "पसार" एवं "सार", तेनाहिते "विचार" क संग "चार" आदि काफिया नै लऽ सकैत छी। ६) आब कने संयुक्ताक्षर बला काफियाकेँ देखी। किछु आर विवरणसँ पहिने किछु संयुक्त शब्द सभकेँ देखल जाए। प्रस्थान, चुस्त, दुरुस्त, किस्मत। आब ई देखू जे संयुक्त वर्ण अंतसँ कोन स्थानपर पड़ैत अछि। जँ ई अंतसँ तेसर आ ओकर बाद मने चारिम या पाँचम स्थानपर अबैत हो तँ काफियाक निअम पहिने जकाँ हएत। मुदा जँ इएह संयुक्त वर्ण काफिया बला शब्दक अंतसँ दोसर स्थान पर अबैत हो तँ कने धेआन देबए पड़त। मानि लिअ जे मतलाक पहिल पाँतिमे "मस्त" काफिया छैक। तँ आब हरेक काफियाक अंतमे "स्त" रहबाक चाही। उदाहरण लेल "मस्त" क काफिया "दस्त", "पस्त", "हरस्त" आदि भऽ सकैए। उदाहरण रूपमे एकटा शेरकेँ देखल जाए-- हएत कोना गुदस्त जीबन भेल चिन्तासँ हरस्त जीबन आब ऐ शेरमे रदीफ "जीबन" भेल आ पहिल पाँतिमे काफिया "गुदस्त" अछि, आब संयुक्ताक्षर बला निअमक हिसाबें काफिया बला शब्दमे अंतसँ दोसर वर्ण "स्त" होएबाक चाही। आब दोसर पाँतिके देखू रदीफसँ पहिने काफियाक रूपमे "हरस्त" अछि जकर अंतसँ "स्त" संगे-संग "अ" वर्णक स्वर साम्य सेहो छै जे निअमक मोताबिक सही अछि। ऐ गजलमे आन काफिया सभ एना अछि- "व्यस्त", "मदमस्त", "मस्त", "सस्त" आदि। उपरके निअम जकाँ मतलाक पहिल पाँतिमे जँ "मस्त" काफिया छै तँ ओकर बाद आन शेरमे "चुस्त" "सुस्त" आदि काफिया नै आबि सकैए। संयुक्ताक्षरक ई निअम मात्रा बला काफिया लेल कने अलग ढ़ंगसँ छैक। ७) तँ आब आबी कने "ए" आ "य" बला प्रसंगपर। ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। मुदा "ए" केर प्रयोग प्राचीन मैथिलीए सँ अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नै करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली " य "क अपेक्षा "ए"सँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। एतेक जनलाक बाद आबी "ए" वा "य" केर ध्वनि लोप पर। ओना "ए" वा "य" क संगे-संग आन ध्वनि लोप सेहो होइत छै मुदा ओकर चर्चा एतए आवश्यक नै। तँ देखी ध्वनि लोपक निअम- ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ "ए" वा "य" केर ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओइ सँ पहिने अंक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नै लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। आब एक बेर फेर घुरि जाइ उच्चारण पर। उच्चारणमे लोप-सूचक चिह्न ( ' ) वा विकारी (ऽ) केर कोनो महत्व नै होइत छैक। मने लोप सूचक चिन्ह वा विकारीसँ पहिने जे वर्ण छै तकरे पूरा-पूरी उच्चारण हेतै कनेक नमहर उच्चारणक संग ( मुदा ऐ कने नमहर उच्चारणक कारण ओ वर्ण दीर्घ नै मानल जाएत। डा. रामावतार यादव ऐ नमहर उच्चारणकेँ दीर्घ तँ मानै छथि मुदा गनतीमे शब्दकेँ लघु मानै छथि )। जेना "लए" शब्दमे ल केर बाद ए केर उच्चारण होइत अछि मुदा जखन ओही "लए" शब्दकेँ "ल'" वा "लऽ" लिखबै तखन ओकर उच्चारण बदलि जाएत आ एकर उच्चारण "ल" केर बराबर हएत। मतलब जे "ल'" वा "लऽ" केर उच्चारण "लए" वा "लय" शब्दसँ बिल्कुल अलग अछि। तेनाहिते "खस'" वा "खसऽ" केर उच्चारण "खसए" वा "खसय" शब्दसँ अलग अछि। एहन-एहन शब्द जकर अंतमे "ए" वा "य" लोप होइत होइ तकरा लेल एहने सन निअम हेतै। जँ कोनो शाइर ध्वनि लोपक चिन्ह वा विकारी बला शब्दक काफिया बनबै छथि तँ ओ धेआन राखथि जे हरेक काफियामे लोप-सूचक चिह्न ( ' ) वा विकारी ( ऽ) सँ पहिनुक वर्ण एकसमान राखथि। जेना "ल'" वा "लऽ" केर काफियाक बाद शाइर एहन शब्द चुनथि जकर अंतमे लोप-सूचक चिह्न ( ' ) वा विकारी ( ऽ) लागल हो तकरा बाद वर्ण "ल" हो जेना "चल'" वा "चलऽ"। जँ कोनो शाइर "राख'" वा "राखऽ" केर काफिया "बाज'" या "बाजऽ" रखताह तँ ओ गलत हेतै। "बाज'" या "बाजऽ" केर बाद "साज'" वा "साजऽ" काफिया हेतै। संगे-संग काफियाक उपरका बला निअम सभ पहिनेहें जकाँ अहूमे लागू रहत। जँ कोनो एहन शब्द जकर अंतमे "ए" वा "य" केर लोप भेल छै आ तइसँ पहिने कोनो मात्रा छै तँ ओकर काफिया लेल मात्राक काफिया बला निअम लागत जकर विवरण आगू देल जा रहल अछि। आब अहाँ सभ ई बूझि सकैत छिऐ जे -- लए---- ह्रस्व-दीर्घ लs------ह्रस्व ल'------ह्रस्व लय----- ह्रस्व- ह्रस्व वा दीर्घ आ दए, कए आदि लेल एहने सन निअम रहत। आशा अछि जे एतेक उदाहरणसँ ई निअम सभ बुझबामे आएल हएत। ८) पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जइ वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक ऐ बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ ऐ मे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नै भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ क सँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नै देखल जाइछ। आब कने आबी काफिया पर (ऐठाम हमर आग्रह जे पंचमाक्षरक प्रयोग कएल जाए। ओना पहिने हम अपने अनुस्वारक प्रयोग करैत छलौं मुदा आब पंचमाक्षरक प्रयोग करैत छी आ ईएह मैथिलीक हितमे छै) जँ मतलाक कोनो काफिया मे पंचमाक्षर वा अनुस्वारक प्रयोग छैक तँ हरेक शेरक काफियामे अनुस्वार वा पंचमाक्षर हेबाक चाही ओहो ठीक ओही स्थान पर जइ पर पहिल काफियामे छैक। जेना मानि लिअ कोनो मतलाक पहिल पाँतिक काफिया "बसंत" छैक, तँ आब अहाँकेँ ओहन शब्द काफियामे देबए पड़त जकर अंतसँ दोसर वर्ण पर अनुस्वार वा पंचमाक्षर अबैत होइक जेना की "अनंत", "दिगंत" इत्यादि। आ एहने सन निअम चंद्रबिंदु लेल सेहो छैक। एकटा बात आर जँ कोनो मतलाक दुनू पाँतिमे अनुस्वार बला काफिया छै तँ ओकर बाद बला शेरक काफिया लेल पंचमाक्षर बला शब्द सेहो लए सकैत छी जेना--- जँ मतलामे की "बसंत" आ "अनंत" छै तँ बाद बला शेरक काफिया लेल "दिगन्त" सेहो लए सकैत छी। आन सभ पंचमाक्षर लेल एहने निअम बुझू। मुदा एहन ठाम ई मोन राखू जे पंचमाक्षर अपने वर्गक हेबाक चाही। मात्रा बला काफिया पर विचार करबासँ पहिने कनेक फेरसँ तहलीली रदीफ आ मैथिली विभक्ति पर विचार करी। कारण जे मैथिली विभक्ति मूल शब्दमे सटि जाइत छैक। आ तँए ओ केखन काफियाक रूप लेत आ केखन रदीफक से बुझनाइ परम जरूरी। विभक्ति------ मैथिलीमे विभक्ति चिन्ह समान्यतः पाँच गोट अछि। कर्म---- केँ करण--- एँ /सँ अपादान-- सँ सम्बन्ध---क अधिकरण--मे /पर ऐकेँ अतिरिक्त विद्वान लोकनि कर्ताक चिन्हकेँ सुन्नाक रूपमे लैत छथि। ई पाँचो चिन्ह मूल शब्दमे सटि जाइत छैक। आ ऐ पाँचोमेसँ "एँ" चिन्ह मूल शब्दक ध्वनि बदलि दैत छैक। उदाहरण लेल देखू-- "बाट" शब्दमे "एँ" चिन्ह सटने " बाटेँ" होइत छैक। "हाथ" शब्दमे सटने "हाथेँ" इत्यादि। आब कने ई विचारी जे जँ कोनो शाइर एहन शब्द, जइमे विभक्ति सटल होइक जँ ओकर काफिया बनेता तँ की हेतै। ऐ लेल किछु एहन शब्द ली जइमे विभक्ति सटल होइक। उदाहरण लेल-- मूल शब्द-------------- विभक्तिसँ सटल शब्द हाथ------------------- हाथक /हाथेँ/ हाथसँ/ हाथमे/ हाथकेँ फूल-------------------- फूलक /फूलसँ /फूलेँ संग-------------------- संगमे /संगेँ राति------------------- रातिएँ/ रातिसँ /रातिमे ऐ विवरणकेँ हमरा लोकनि दू भागमे बाँटि सकै छी------ १) एहन मूल शब्द जे अंतसँ अकारान्त हुअए, आ २) एहन मूल शब्द जकर अंतमे मात्राक प्रयोग होइक १) आब जँ कोनो शाइर एहन मूल शब्द जे अकारान्त छैक आ ओइमे विभक्ति लागल छैक तकरा काफिया बनबै छथि तँ हुनका ई मोन राखए पड़तन्हि जे बादमे आबए बला हरेक आन-आन काफियामे वएह विभक्ति कोनो आन मूल शब्दमे आबै जे अकारान्त होइक संगहि-संग स्वर-साम्य सेहो रखैत हो। उदाहरण लेल----- मानू जे केओ मूल "हाथ" शब्दमे "क" विभक्ति जोड़ि "हाथक" काफिया बनेलक। दोसर आन-आन काफिया लेल ई मोन राखू जे आबए बला ओइ काफियाक अंतमे "क" विभक्ति तँ एबै करतै, मुदा विभक्ति "क"सँ ठीक पहिने अकारान्त वर्ण एवं स्वर-साम्य होएबाक चाही जेना की मानू "बात" शब्दमे विभक्ति "क"जुटला पर "बातक" शब्द बनैत अछि। आब पहिल काफिया "हाथक" आ दोसर काफिया "बातक" मिलान करु (काफियाक मिलान सदिखन शब्दक अंतसँ कएल जाइत छैक)। देखू पहिल काफिया "हाथक" आ दोसर काफिया "बातक" दुनूक अंतमे विभक्ति "क" अछि संगहि-संग विभक्ति "क" केर बाद दुनू काफियाक शब्द "थ" आ "त" अकारान्त अछि, संगहि-संग "हा" केर स्वर-साम्य "बा" सँ छैक। आब फेर तेसर शब्द "पात" लिअ आ जँ ओइमे "क" विभक्ति जोड़बै तँ "पातक" शब्द बनतै। आब पहिल काफिया "हाथक" आ दोसर काफिया "पातक" मिलान करु। देखू अंतसँ दुनू शब्दमे "क" विभक्ति छैक आ ठीक ओइसँ पहिने दुनू शब्द अकारान्त छैक आ संगहि-संग "हा" क स्वर-साम्य "पा"सँ छैक। एनाहिते दोसर उदाहरण देखू- मूल शब्द "पात" विभक्ति "मे" जुटला पर "पातमे" शब्द बनैत अछि। फेर दोसर शब्द "बाट" विभक्ति "मे" जुटला पर "बाटमे"। आब फेरसँ मिलान करु- दुनू शब्दक अंतमे विभक्ति "मे" लागल छैक। विभक्ति "मे" सँ ठीक पहिने अकारान्त वर्ण सेहो छैक संगहि-संग "पा" केर स्वर-साम्य "बा"सँ छैक। किछु आर उदाहरण लिअ- "कलमसँ", "पतनसँ", "बापकेँ", "आबकेँ" इत्यादि। मुदा ऐठाम ई बात एकदम धेआन राखू जे जँ कोनो शाइर लेखनमे हिन्दीक प्रभावसँ मूल शब्दमे विभक्ति नै सटबै छथि तैओ उच्चारणमे मूल शब्द आ विभक्ति स्वतः सटि जाइत छै तँए विभक्ति सटा कऽ लिखू वा हटा कए बिना रदीफक गजल हेबे करत। एकरा एना बूझी--- कोनो मतलामे " कलमसँ " आ " पतनसँ " काफिया बनि सकैए आ संगे-संग मतलामे " कलम सँ " आ " पतन सँ " सेहो काफिया बनि सकैए आ एकरा बिना रदीफक गजल कहल जाएत तेनाहिते "आँखिसँ" आ चाँकिसँ " काफिया सेहो ठीक रहत आ "आँखि सँ" आ चाँकि सँ " सेहो । ओना जँ कोनो उर्दू-हिन्दीक शाइर कोनो गजलमे " कलमसँ " आ " पतनसँ " वा " कलम सँ " आ " पतन सँ " काफिया देखताह तँ ओकरा गलत कहि देताह, मुदा ई बात सदिखन मोन राखू जे उर्दू-हिन्दी भाषा अलग छै आ मैथिली भाषा अलग छै, एकर व्याकरण आ उच्चारण पद्धति अलग छै तँए अरबीमे पारित पूरा-पूरी निअम मैथिलीमे लागू नै भऽ सकैए। २) एहन मूल शब्द जकर अंतमे मात्रा होइक ओकर काफिया लेल धेआन राखू जे विभक्तिक बाद ठीक वएह मात्रा स्वर-साम्यक संग एबाक चाही। उदारहरण लेल- आँखिसँ----चाँकिसँ----बाँहिसँ, इत्यादि रातिमे----जातिमे--- जाठिमे, इत्यादि घुटठीकेँ---गुड्डीकेँ---चुट्टीकेँ, इत्यादि पानिक--आनिक, इत्यादि केखनो काल दूटा विभक्ति एकै संग जुटि जाइत छैक जेना "रातिएँसँ" एहन समयमे अहाँकेँ दोसरो काफिया ओहने लेबए पड़त जइमे दुनू विभक्त समान होइक स्वर-साम्यक संगे। उदाहरण लेल " रातिएँसँ" केर काफिया "छातिएँसँ" "हाथिएँसँ" "बाटिएँसँ" आदि-आदि भऽ सकैत अछि। विभक्ति बला काफियाक संबंधमे एकटा आर खास गप्प। कोनो एहन मूल शब्द जकर अंत कोनो एकटा खास विभक्तिसँ साम्य रखैत हुअए, विभक्तिसँ पहिने बला वर्ण अकारान्त वा मात्रा युक्त (जेहन स्थिति) हुअए संगहि-संग ओइसँ पहिने स्वर-साम्य हुअए तँ ओ दुनू काफियाक रूपमे लेल जा सकैए। उदाहरण लेल एकटा विभक्ति बला शब्द "पातक" वा "बाटक" लिअ। आ आब एहन मूल शब्द ताकू जकर अंतमे "क" होइ, "क" सँ पहिने अकारान्त वर्ण होइक (जँ अकारान्त वर्णसँ पहिने स्वर-साम्य होइ तँ आरो नीक) तँ ओ दुनू (एकटा विभक्ति युक्त आ दोसर मूल) शब्द काफिया भऽ सकैत अछि। उदाहरण लेल उपर लेल दुनू विभक्त युक्त शब्द "पातक" आ "बाटक"क मूल शब्द "बालक" पालक" वा "चालक"सँ मिलाउ। जँ गौरसँ देखबै तँ पता लागत जे ई शब्द सभ काफिया लेल एकदम्म उपयुक्त अछि। तेनाहिते मात्रा बला शब्द जइमे विभक्ति सटल हुअए आ ओहन मूल शब्द जे ओकरासँ मिलैत हुअए एकदोसराक काफिया बनि सकैत अछि। जँ कोनो मतलाक अंत मूल शब्दसँ सटल विभक्तिसँ होइक तँ ओकरा बिना रदीफक गजल मानू। उदाहरण लेल- पसरल छै शोणित सगरो बाटपर घर-आँगन-बाड़ी-झाड़ी घाटपर ऐ गजलक आन अंतिम शब्द अछि---- "हाटपर", "खाटपर", "टाटपर"। देखू ऐ सभमे अंतसँ " पर " सेहो छै एवं " आ " स्वरक संग " ट " वर्ण सेहो छै। मुदा तैओ एकरा बिना रदीफक गजल मानल जाएत। आब कने मात्रा बला काफिया पर विचार करी। मैथिली वर्णमालामे १६ गोट स्वर देखाओल गेल अछि। अ, आ, इ, ई उ, ऋ, ॠ, लृ,( आ लृक आर एकटा दीर्घ रूप) ऊ, ए, ऐ. ओ. औ, अं एवं अः। जइमे "अ" तँ हरेक वर्णक (जइमे हलन्त् नै लागल होइक)मे अंतमे अबिते छैक। अन्य छह गोट स्वर ( ऋ,ॠ, लृ आ लृक आर एकटा दीर्घ रूप, अं एवं अः) खाली तत्सम शब्दमे अबैत छैक। बचल नओ गोट स्वर आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, एवं औ (एकर लेख रूप क्रमशः--ा, ि, ी, ु, ू, े, ै, ो एवं ौ अछि)। संगे-संग हम मैथिलीमे रेफ बला काफिया पर सेहो बिचार करब। मतलब जे ऐठाम हम कुल दस गोट मात्रा पर बिचार करब। मुदा ऐ दसोमे "इ", "उ" आ रेफ पर बिचार हम बादमे करब। एकर कारण जे मैथिलीमे ऐ तीनूक उच्चारण कने अलग ढंगसँ होइत अछि। तँ चली मात्रा बला काफिया पर। मतलामे रदीफसँ पहिने जँ वर्णमे कोनो मात्रा छैक तँ गजलक हरेक शेरक काफिया मे वएह मात्रा अएबाक चाही चाहे ओइ मात्राक संग बला वर्ण दोसरे किएक ने हो। पूब मे उगल ललका थारी त' देखू दूइभक घर चमा चम मोती त' देखू (अमित मिश्र) ऐ गजलमे लेल गेल आन काफिया सभ अछि- किलकारी, बेमारी, पारी, साड़ी आ तरकारी। ऐठाम ई धेआन देबए बला बात अछि जे मतलामे जे काफिया प्रयोग भेल छै तकर अंतमे " ई " केर मात्रा छै वर्ण मुदा अलग-अलग छै मुदा ओइसँ पहिने बला स्वर नै मीलि रहल छै एकर मतलब ई भेल जे मात्रा बला काफिया लेल शब्दक अंतमे जे मात्रा छै सएह आन शब्दक अंतमे अएबाक चाही बशर्ते कि वर्ण अलग-अलग हुअए। आब ऐठाम ई देखू जे जँ मतलामे " थारी " क संग साड़ी रहितै तखन आन काफियामे "ड़ी" वा " री" कामन रहितै आ तइसँ पहिने " आ" केर स्वर साम्य रहितै। जेना " बाड़ी ", उधारी, अधकपारी इत्यादि। जँ " थारी " आ " बाड़ी" केर बाद "मोती" शब्दक काफिया लै छी तँ सिनाद दोष आबि जाएत आ काफिया गलत भऽ जाएत। तेनाहिते जँ कोनो मतलामे " मोती " आ कोठी" काफिया लेबै तखन साड़ी, उधारी आदि काफिया भऽ सकैए। कोना से आब अहाँ सभ नीक जकाँ बुझि गेल हेबै। ऐ निअमक अधार पर हमर प्रकाशित पोथी " अनचिन्हार आखर " केर बहुत रास काफिया गलत अछि। मुदा ओइ समय हमरा लग काफिया जतेक समझ छल ओइ हिसाबसँ ओकर प्रयोग कएल। आ तँए ओइ पोथी महँक किछु काफियाक निअम आब पूर्णतः बेकार भऽ चुकल अछि। संगे संग ईहो धेआन राखू जे आन मात्रा बला कफिया लेल एहने निअम रहत। एकटा गलत उदाहरण देबासँ हम अपनाकेँ रोकि नै रहल छी। ई शेर हमरे थिक---- एनाइ जँ अहाँक सूनी हम नहुँएसँ सपना बूनी हम" (काफिया "ई"क मात्रा) गजलक अन्य काफिया अछि---- "चूमी", "पूछी", "बूझी", "खूनी", ,"लूटी", "सूती" आदि। आब ऐ शेरमे देखू दुनू पाँतिक काफियामे " नी " कामन छै आ तइ हिसाबसँ हमरा एहन काफिया चुनबाक छल जकर अंतमे " नी " अबैत हो आ तइसँ पहिने " ऊ " केर मात्रा हुअए। ऐ शेरमे " ऊ " केर मात्रा तँ लेल गेल अछि मुदा " नी " केर पालन नै भेल अछि तँए ऐ गजल महँक एकटा काफिया " खूनी " छोड़ि आन सभ ( जेना चूमी", "पूछी", "बूझी ""लूटी", "सूती" ) आदि गलत अछि| अन्य बचल मात्राक लेल एहने समान निअम अछि आ हरेक मात्राक एक-एकटा उदाहरण देल जा रहल अछि। १) छोड़ि कऽ जे बिनु बजने जा रहल अछि हृदै चिरैत आगि सुनगा रहल अछि ( काफिया " आ " केर मात्रा) ( गजेन्द्र ठाकुर ) ऐ गजल आन काफिया सभ अछि------कना, भसिया, जा, खा इत्यादि। २) "जँ तोड़ब सप्पत तँ जानू अहाँ फाँसिए लगा मरब मानू अहाँ" (काफिया "ऊ" क मात्रा) (आशीष अनचिन्हार, सरल वार्णिक) ऐ गजलमे लेल गेल अन्य कफिया- "गानू", "आनू", "टानू" आदि। ३) "मोन तंग करबे करतै देह भाषा पढबे करतै" (काफिया "ए"क मात्रा) ऐ गजलमे लेल गेल अन्य कफिया ---"खुजबे", "उड़बे", "सटबे" आदि अछि। ४) भोरे उठि मैदान गेलै बौआ ओम्हरहिसँ दतमनि तँ लेतै बौआ (आशीष अनचिन्हार ) (काफिया "ऐ"क मात्रा) ऐ गजलक आन काफिया सभ अछि- एतै, जेतै, बनतै, चलतै आदि-आदि। ऐ केर मात्राक एकटा आर उदाहरण देखू---- करबा नै मजूरी माँ पढबै हमहूँ नै रहबै कतौ पाछू बढबै हमहूँ (ओमप्रकाश ) ऐ गजलमे लेल गेल आन काफिया अछि------चढ़बै, मढ़बै, गढ़बै आदि-आदि। केखनो काल "ऐ" केर उच्चारण "अइ" जकाँ होइत अछि। जेना "सैतान" बदलामे सइतान, बैमानक बदलामे "बइमान" इत्यादि। ५) आब हरजाइकेँ तों बिसरि जो रे बौआ मोन ने पड़ौ एहन सप्पत खो रे बौआ (काफिया "ओ"क मात्रा) (आशीष अनचिन्हार, सरल वार्णिक) ऐ गजलमे लेल गेल अन्य कफिया------ओ, खसो, पड़ो इत्यादि अछि। ६) एक बेर फेर हँसिऔ कनेक ओही नजरि सँ देखिऔ कनेक (काफिया "औ"क मात्रा) (आशीष अनचिन्हार, सरल वार्णिक) ऐ गजलमे लेल गेल अन्य कफिया ---"रहिऔ", "चलिऔ", "बुझबिऔ" आदि अछि। **** केखनो काल "औ" केर उच्चारण "अउ" जकाँ होइत अछि। आब हमरा लोकनि फेरसँ एकबेर संयुक्ताक्षर बला शब्दपर चली। मात्रा बला संयुक्ताक्षर लेल पहिनेसँ कने अलग ढङसँ देखू। ई गप्प उदाहरणसँ बेसी फड़िच्छ हएत। मानू जे मतलाक पहिल पाँतिमे काफियाक रूपमे "चुट्टी" शब्द लेल गेल। आब दोसर काफिया लेल मोन राखू जे "ई" मात्रा युक्त कोनो शब्द भऽ सकैत अछि। उदाहरण लेल "चिन्नी", "बुच्ची", "खटनी" आदि "चुट्टी"क काफिया भऽ सकैत अछि। मुदा जँ मतलाक काफिया "मुट्ठी" आ "घुट्ठी" छैक तखन आन शेरक काफिया "चिन्नी" या "बुच्ची" नै भऽ सकैत अछि। कारण तँ अहाँ सभ बुझिए गेल हेबै। उम्मेद अछि जे उपर देल गेल मात्रा बला उदाहरणसँ काफिया संबंधी निअम बेसी फड़िच्छ भेल हएत। तँ आब चली "इ", "उ" आ रेफ पर। मैथिलीमे "इ" आ "उ" लेख आ उच्चारण दुनू पहिने लिखल आ कएल जाइत छैक। एकरा हम उदाहरणसँ देखाएब, तँ पहिने "इ" केर उदाहरणसँ शुरु करी। शब्द "राति" मुदा ओकर उच्चारण भेल "राइत", लिखल जाइए "गानि" मुदा बाजल जाइए "गाइन", तेनाहिते "पानि" केर उच्चारण "पाइन" भऽ गेल। मैथिलीमे वर्ण "इ" तेहन उत्फाल मचेलक जे बहुत आन शब्द सभ "इ" वर्णक संग लिखल जाए लागल जेना की "जाइत", "खाइत" आदि। एकटा आर महत्वपूर्ण गप्प, मैथिलीमे "इ"कार दू रूपमे प्रयोग होइत अछि- पहिल रूप भेल जइमे मात्रा अबैत अछि आ दोसर रूपमे "इ"कार वर्णक रूपमे अबैत अछि। पहिल रूपक उदाहरण "राति", "जाति" सभ भेल आ दोसर रूपक उदाहरण "जाइत", खाइत" सभ भेल। आब कने हमरा लोकनि काफिया पर आबी। जँ अहाँ कोनो एहन शब्दक काफिया बना रहल छी जकर अंतिम वर्ण "इ"कार युक्त अछि तँ अहाँकेँ आन-आन काफिया लेल "इ" कार युक्त वएह वर्ण लेबए पड़त जे पहिल काफियामे अछि। उदाहरण लेल जँ अहाँ "राति" शब्द काफिया लेल लेलौं तँ आब अहाँकेँ दोसर काफिया लेल "त" वर्ण "इ"कार युक्त हेबाक चाही। जेना कि "पाँति", "जाति", आदि अथवा एहन शब्द लिअ जकर अंतमे "त" होइक आ तइसँ पहिने "इ" वर्णक रूपमे रहए जेना की "जाइत"। एकर मतलब जे "राति" शब्दक काफिया लेल "जाति", "पाँति" क संगे "जाइत", "खाइत", "नहाइत" सेहो आबि सकैत अछि। आ हमरा जनैत ऐठाम मैथिली गजल उर्दू गजलसँ पूर्णतः अलग भऽ जाइत अछि। आ संगहि-संग ई विशेषता मैथिली गजलक एकटा अपन अलग छवि बनैैत अछि। आ ई विशेषता ह्रस्व "उ", "ऐ, "औ", आ रेफ बलामे सेहो अबैत अछि। आब कने ह्रस्व "उ" पर धेआन दी। मैथिलीमे जँ शब्दक अंतमे "उ" अबैत हो आ ठीक ओइसँ पहिने अकारान्त वर्ण हुअए तखन "उ" केर उच्चारण प्रायः औ/ अउ जकाँ होइत अछि। उदाहरण लेल मधु शब्दक उच्चारण मौध/ मउध होइत अछि। आ जँ "उ"सँ पहिने आकारान्त वर्ण हो तखन "इ"ए जकाँ "उ" केर उच्चारण पहिने होइत अछि। उदाहरण लेल "साधु" केर उच्चारण "साउध", "बालु" केर उच्चारण "बाउल" इत्यादि। ओना उच्चारण लेल आनो शब्द लेल जा सकैए। आब ई देखी जे ऐ प्रकारक शब्दक काफिया कोना बनतै। जँ अहाँ "उ" सँ पहिने अकारान्त बला वर्णसँ बनल शब्द काफिया लेल लैत छी तँ धेआन राखू जे आन-आन काफियाक उच्चारण "कोनो वर्ण( एक वा एकसँ बेसी) + औ/अउ + अंतिम निश्चित वर्ण" आबै। आब उपरकेँ बला शब्द "मधु"केँ लिअ। एकर उच्चारण "म + औ/अउ + ध" अछि, तँए एकर दोसर काफिया "कोनो वर्ण( एक वा एकसँ बेसी) + औ/अउ + ध" हेतै। आब जँ अहाँ दोसर शब्द "पौध" लेलहुँ, तँ एकर उच्चारण "प + औ/अउ + ध " अछि। अर्थात "मधु" केर उच्चारण "पौध" केर बराबर अछि। तँए "मधु" केर काफिया "पौध" हएत। एनाहिते आन-आन शब्द सभ काफियाक लेल ताकल जा सकैए। आब आबी ओहन शब्दपर जकर अंत "उ" होइक आ ठीक ओइसँ पहिने आकारान्त वर्ण होइक (जेना कि उपरमे एकर उच्चारण पद्धित देखा देल गेल अछि, तँए सोझे काफिया पर चली)। ठीक ह्रस्व "उ" जकाँ निअम छैक एकरो। मानि लिअ जँ अहाँ "बालु" शब्द लेलहुँ, तँ मोन राखू दोसर काफियाक उच्चारण "आकारान्त कोनो वर्ण + उ + ल" होइक जेना की "भालु" इत्यादि। संगहि-संग ह्रस्व "इ"ए जकाँ "चाउर" केर काफिया "चारु" एवं "बालु" केर काफिया "आउल" ( owl) भए सकैत अछि। मैथिलीमे बहुत काल "उ" आ चन्द्रबिंदु एकै संग अबैत अछि। जेना "कहलहुँ" ,"सुनलहुँ", "रहलहुँ" आदि। मानि लिअ जँ ई शब्द सभ जँ काफियाक रूपमे आबि रहल अछि तँ एहन समयमे धेआन राखू जे काफियामे ठीक वएह वर्ण "उ" आ चन्द्रबिंदुक संग आबए। से नै भेला पर काफिया गलत भऽ जाएत। उपरमे देल तीनू शब्दकेँ देखू । तीनू शब्दक अंत "ह" सँ अछि, ओहो "उ" आ चन्द्रबिंदुक संग। मने ई तीनू काफिया लेल उपयुक्त अछि। आघात बला शब्दक काफिया------- मैथिलीमे दू प्रकारक आघात अछि मात्रात्मक आ बलाघात। मुदा मात्रात्मक आघात ओतेक महत्व नै रखैत अछि, तँए हम एतए खाली बलाघात पर बिचार करब। मैथिलीमे कोन शब्दमे कतए आघात पड़त तकरा देखल जाए- १) दू वर्ण धरि बला एहन शब्द जइमे एकौटा गुरू वर्ण नै हुअए- एहन शब्दमे अंतसँ दोसर शब्द पर आघात पड़ैत छैक। जेना "घर", "बर"। एकर उच्चारण "घऽर", "बऽर" आदि होइत अछि। मतलब "घ" आ "ब" पर आघात पड़ल छैक। जँ एक या एकसँ बेसी दीर्घ हुअए तँ पहिल दीर्घ पर आघात पड़ैत छैक। जेना "हाथ", "खत्ता" आदि। मतलब "हा" आ "त्ता" पर आघात छैक। "हाथी" "माछी" । ऐ शब्द सभमे पहिल गुरू "हा" एवं "मा" पर आघात छैक। २) तीन वर्ण बला एहन शब्द जइमे तीनू लघु वर्ण हो- एहन शब्दमे अंतसँ दोसर वर्ण पर आघात पड़ैत छैक। जेना "तखन", अगहन" । ऐमेे "ख" आ "ह" पर आघात छैक। जँ एक या एकसँ बेसी दीर्घ हुअए तँ पहिल दीर्घ पर आघात पड़ैत छैक। जेना "ओसारा"मे "ओ" पर आघात छैक। "बतासा" मे "ता" पर आघात छैक। ३) चारि वर्ण बला शब्दमे अंतसँ दोसर वर्ण पर आघात पड़ैत छैक। उदाहरण लेल "भिनसर" मे "स" पर आघात छैक, "अगहन" मे "ह" वर्ण पर छैक। जँ चारि वर्ण बला ओहन शब्द जइमे दीर्घ सेहो छैक तकर आघात उपरमे देल गेल आने निअम जकाँ अछि। जेना "उच्चारण" मे च्चा पर आघात छैक। कुल मिला कऽ एकसँ चारि वर्ण धरिक शब्द लेल एकै रंगक निअम अछि। ३) पाँच वर्ण बला शब्दमे अंतसँ तेसर वर्ण पर होइत छैक चाहे ओ लघु हो की दीर्घ। मने पाँच वर्णमे आघात सदिखन बीच बला वर्ण पर पड़ैत छैक। उदाहरण लेल "देखलहक" मे अंतसँ तेसर वर्ण "ल" पर आघात छैक, तेनाहिते "कमरसारि" मे "र" पर आघात छैक, "कनपातर" मे "पा" पर आघात छैक। ४) छह आ छहसँ बेसी वर्ण बला शब्दमे दू ठाम आघात पड़ैत छैक। शब्दक अंतसँ दोसर वर्ण पर आ अंतेसँ चारिम वर्ण पर चाहे ओ लघु हुअए की दीर्घ। ऐठाम इहो मोन राखू जे शब्दक अंतसँ दोसर वर्ण पर पड़ल आघात बेसी कठोर मुदा चारिम स्थान पर पड़ल आघात मन्द होइत अछि। * विभक्ति बला शब्दमे आघात निर्धारित करबाक लेल विभक्तिकेँ हटा कऽ गणना करु। जेना की "पातक" शब्दमे आघात गणना "त" वर्णसँ शुरु हएत ने कि अंतिम वर्ण "क" सँ। सभ विभक्ति जुटल शब्द लेल इएह मोन राखू। आब कने आघात बला शब्दक काफिया देखी। एहन ठाम ई मोन राखू जे आघात बला स्थान आ वर्णक मात्रा समान रहए। उदाहरण लेल "घर" आ "मजूर" दुनूमे दोसर स्थान पर आघात छैक मुदा मात्रा अलग-अलग छैक, तँए ई दुनू एक-दोसराक काफिया नै बनि सकैए। तँ "घर" शब्दक काफिया लेल "बर", "तर", " हर", “भिनसर" आदि उपयुक्त रहत । आ "मजूर" लेल "मयूर", "हजूर" आदि उपयुक्त रहत। आनो-आन आघात बला शब्दक काफिया लेल ईएह निअम बुझू। ऐठाम हम फेर मोन पाड़ी जे काफियाक निर्धारण खाली मतलामे होइत छैक आ बाँकी शेरमे ओकर पालन। तँए जँ केओ मतलामे विभक्ति बला शब्दकेँ "फूलक" आ हाथक" काफिया लेताह तँ सही हएत आ बादबाँकी शेरमे "अक" काफियाक प्रयोग हेतैक। मुदा जँ केओ गोटे मतलामे "फूलक" आ "अड़हूलक" लेलक आ तकरा बादक शेरमे "हाथक" प्रयोग करत तँ ओ बिल्कुल गलत हएत। "फूलक" आ "अड़हूलक" बाद आन शेर लेल काफिया "ूलक" होएबाक चाही। आब कने "रेफ" बला काफिया पर बिचार करी। रेफ "र" वर्णक एकटा रूप अछि जे "र्" मने आधा "र्" मानल जाइत अछि। मैथिलीमे रेफ आ ओकर पूर्ण रूप ( र वर्ण ) दुनू चलैत अछि। जेना- मर्द------ मरद बर्खा-----बरखा बर्ख-----बरख चर्चा----चरचा उपरका चारिटा शब्द देखलासँ ई बुझाइत अछि जे रेफक पूर्ण रूप आ रेफ बला शब्दक उच्चारणमे कनेक अंतर भऽ जाइत छै। संगे-संग किछुए शब्द अपन रेफकेँ छोड़ि पूर्ण र केर स्वरूपमे अबैत अछि। तँए काफियाक संबंधमे हमर ई विचार अछि जे जँ शब्द रेफ युक्त हुअए मुदा बिना मात्राक हुअए तँ समान स्वर आ उच्चारणक प्रयोग करी। जेना मानि लिअ अहाँ मतलामे " सर्द " आ "पर्द" काफिया लेलहुँ आ तकरा बादक शेरमे " मरद" काफियाक प्रयोग हमरा हिसाबें गलत हएत कारण स्पष्ट रूपेँ "गर्द" आ "पर्द" शब्दक उच्चारण "मरद" शब्दसँ अलग अछि। तेनाहिते मतलामे "सर्द" आ "मरद" शब्दक काफिया गलत हएत। "मरद" शब्दक बाद "बड़द", "शरद", "दरद" आदि काफिया ठीक रहत। मुदा जँ कोनो एहन शब्द जकर अन्तमे रेफ हुअए आ संगे-संग ओ शब्द मात्रा बला हुअए तँ निअम बदलि जेतै। मतलब जे शाइर तखन बिना कोनो दिक्कतक काफिया बना सकैत छथि। कहबाक मतलब जे जँ अहाँ मतलाक पहिल पाँतिमे काफिया "गर्दा" लेलहुँ आ तकरा बाद आन काफिया बर्खा या बरखा लेलहुँ तँ बिलकुल सही हएत। आब अहाँ सभ बुझि सकैत छिऐ जे कोनो मतलामे "बर्खी" आ "करची" बनि सकैत अछि। स्वर साम्य, सिनाद दोष आ ईता दोष बला प्रसंग सभ आने काफिया जकाँ अहूमे लागू हएत। तेनाहिते ई मोन राखू जे जँ रेफ शब्दकेँ अंत छोड़ि (शुरूमे वा बीचमे कतौ) छैक तँ संस्कृतक शब्दमे तँ रेफे रहत मुदा विदेशज खास कऽ अरबी-फारसी आ उर्दू बला शब्दमे "र" भऽ जाइत अछि। जेना कि पर्वतकेँ " परवत" नै लिखल जा सकैए मुदा शर्बतकेँ "शरबत" जरूर लीखि सकैत छी। ऐठाम ई मोन राखू पर्वत आ शरबत दुनू एक दोसराक काफिया भऽ सकैए। काफियाक संबंधमे एकटा गप्प आर- काफियामे वर्ण "र" केर उच्चारण "ड़" क बराबर मानू संगहि-संग "स", "श" आ "ष" केर उच्चारण सेहो समान मानू। जइठाम "ष"क उच्चारण "ख" जकाँ हएत ततए पूर्ण "ख" काफियाक रूपमे आबि सकैत अछि। जँ "ढ" अक्षर शब्दक शुरूमे छैक तँ ओकर उच्चारण "ढ" जकाँ होइत छैक मुदा तकरा बाद ओकर उच्चारण "रह्" जकाँ छैक। आ हमरा विचारे काफियामे "ढ", "र" एवं "ड़" समान अछि। उदाहरण लेल "ठाढ़"क काफिया "विचार", "हुराड़" आदि भऽ सकैत अछि। केखनो काल "त्र" केर लेख रूप "तर्" आ "क्ष" केर लेख रूप "च्छ" अबैत अछि। शाइर उपरके निअमक हिसाबे एकर काफिया बनाबथि। आब कने शुरुआत बला प्रश्न पर चली। पहिल प्रश्न छल जे जँ कोनो मतलामे "छोड़ए" आ "फोड़ए" काफिया हुअए तँ बाद बला शेरमे काफिया की हेतै। उत्तर स्पष्ट अछि बाद बाँकी शेरमे काफिया "ओड़ए" वा "ओरए" हेबाक चाही। नै तँ गजल गलत भऽ जाएत। संगहि-संग दोसर प्रश्न छल जे जँ "छोड़ए" आ "फोड़ए" क बाद "जाए" हुअए तँ सही हएत की गलत। एकरो उत्तर स्पष्ट अछि- जाए क उच्चारण "ओड़ए" वा "ओरए" सँ नै मिलैत अछि तँए "जाए" काफिया "छोड़ए" आ "फोड़ए" क बाद गलत हएत। आब कने एक बेर काफियामे ईता दोष देखल जाए--- ईता दोष काफियामे बहुत बड़का दोष मानल जाइत छै। ऐपर कने विचार कऽ ली। एकरा चारि भागमे देखू---- १) ईता दोष मात्र मतलामे होइत छै। २) जँ मतलाक दुनू काफिया मात्रा युक्त हुअए वा प्रत्ययसँ बनल हो वा सन्धिसँ बनल शब्द तँ दुनू काफियाक मात्रा हटा दिऔ, वा प्रत्यय हटा दिऔ वा सन्धि विच्छेद कऽ दिऔ। आब ई देखू जे मात्रा, प्रत्यय वा विच्छेदक बाद जे पहिल शब्द बचल शब्द छै से सार्थक छै की निरर्थक। जँ दुनूमेसँ एकौटा निरर्थक अछि तँ चिन्ता करबाक गप्प नै कारण एहन स्थितिमे ईता दोष नै रहत। ३) जँ दुनू शब्द (मात्रा, प्रत्यय हटेलाक बाद वा विच्छेदक बाद) सार्थक छै आ ओइ बचल पहिल सार्थक शब्दक आपसमे काफिया बनि रहल छै तखन मात्रा वा प्रत्यय वा सन्धिबला शब्द सेहो काफिया बनत आ ऐमे ईता दोष नै हएत। ४) मुदा जँ दुनू शब्द (मात्रा, प्रत्यय हटेलाक बाद वा विच्छेदक बाद) सार्थक छै आ ओइ बचल पहिल सार्थक शब्दक आपसमे काफिया नै बनि रहल छै तखन मात्रा वा प्रत्यय वा सन्धि बला शब्द सेहो काफिया नै बनत आ ऐमे ईता दोष हएत। आब कने उदाहरणसँ देखी ऐ प्रकरणक- मानू जे मतलामे "बिमारी" आ "आदमी" काफिया छै। तँ आब जँ दुनूक मात्रा हटेबै तँ क्रमशः " बिमार " आ " आदम " शब्द बचै छै जे की सार्थक छै। मुदा "बिमार" आ " आदम" एक दोसराक काफिया नै बनि सकैए। तँए मतलामे "बिमारी" एवं " आदमी" काफिया नै बनत। उर्दूमे जँ केओ एहन काफिया बनबै छथि तँ ओकरा ईता दोषसँ ग्रस्त मानल जाइत छै। एकटा दोसर उदाहरण लिअ-- दोस्ती आ दुश्मनी मतलामे काफिया नै बनि सकैए। कारण वएह मात्रा हटेलाक बाद दोस्त आ दुश्मन शब्द बचै छै जे की दुनू सार्थक छै आ दुनू एक दोसराक काफिया नै बनै छै तँए दोस्ती आ दुश्मनी मतलामे काफिया नै बनि सकैए। मैथिलीमे प्रत्यय बला शब्द संग सेहो एना कएल जा सकैत अछि। प्रत्यय बला शब्दक किछु उदाहरण देखू- धान शब्दमे गर प्रत्यय लगेलासँ नव शब्द बनै छै "धनगर"। तेनाहिते मोन शब्दमे गर प्रत्यय लगेलासँ "मनगर" शब्द बनै छै (किछु गोटेँ मोनगर सेहो लिखै छथि)। एनाहिते आन प्रत्ययसँ बहुत रास नव शब्द बनै छै। आब कने ऐ नव शब्दक काफियापर आउ- जँ धनगर शब्दक काफिया मनगर बनेबै तँ ईता दोष नै रहतै। कारण जँ ऐ दुनू नव शब्दमे सँ गर प्रत्यय हटेबै तँ क्रमशः धन आ मन बचै छै आ दुनूमे काफिया सेहो बनि रहल छै (ऐठाम ई मोन राखू जे प्रत्यय हटलाक बाद धन शब्द मिलाएल जेतै ने की धान, तेनाहिते मन मिलाएल जेतै ने की मोन)। आब जँ मतलामे धनगर संगे दुधगर आबै तँ देखू की हेतै। प्रत्यय हटलाक बाद क्रमशः धन आ दुध बचै छै मुदा दुनू एक-दोसराक काफिया नै बनि रहल छै तँए धनगर आ दुधगर एक-दोसराक काफिया नै बनि रहल अछि। आन-आन प्रत्यय वा सन्धि वा मात्रा लेल एहने सन बुझल जाए। आब जँ बिमारी संग उधारी आबै तँ देखू की हेतै। बिमार एवं उधार दुनू शब्द (मात्रा, प्रत्यय हटेलाक बाद वा विच्छेदक बाद) सार्थक छै आ संगे संग दुनू एक दोसरक काफिया बनि रहल छै तँए बिमारी आ उधारी सेहो एक दोसरक काफिया बनत आ ऐमे ईता दोष नै रहतै। आब जँ बिमारी संग जिनगी लेबै तँ देखू की हेतै। बिमार एवं जिनग (मात्रा, प्रत्यय हटेलाक बाद वा विच्छेदक बाद) बिमार शब्द सार्थक छै मुदा जिनग शब्द निरर्थक तँए बिमारी आ जिनगी सेहो एक दोसरक काफिया बनि सकैए। किछु शब्द एहन होइत छै जकरा पर मात्रा रहैत छै तखन अलग मतलब होइत छै आ मात्रा हटलाक बाद दोसरे मतलब बनि जाइत छै जेना "कारी" तँ एकर मतलब भेलै रंग कारी। मुदा जँ एकर मात्रा हटा देबै तँ बचतै "कार" जे की गाड़ीक संदर्भमे सार्थक शब्द तँ छै मुदा मतलब दोसर छै। तँए अहूँ काफियामे ईता दोष नै रहत। आन शब्द एनाहिते ताकल जा सकैए। आब केओ कहि सकै छथि जे बिमार आ बिमारी शब्द अलग-अलग छै मुदा हमर कहब जे बिमार आ बिमारी दुनूक अर्थ एकदोसरामे निहित छै मुदा कारी आ कार शब्दमे से नै छै। अस्तु ई भेल ईता दोष प्रकारण। काफिया आ बहर तँ आब आबी कने काफियाक दोसर प्रसंगपर--------- मैथिली आ उर्दू वर्णमालामे अंतर जखन मैथिली गजलमे निअम सभ लागू होमए लागल तखन बहुत लोक सभकेँ कष्ट शुरु भेलन्हि। जिनका सभकेँ कष्ट एखनो छन्हि ओहिमे दू तरहँक आदमी छथि। पहिल तरहँक तँ ओ भेलाह जे पहिनेसँ गजल लिखै छथि मुदा बिना कोनो निअमक आ निअम लागू भेलासँ हुनक सभ रचनापर प्रश्न चिन्ह लागि गेल तँए ओ सभ निअमक विरोध करए लगलाह। दोसर तरहँक आदमी ओ छथि जे गजल तँ नै लिखै छथि मुदा गजल विधाक विकास नै सोहेलन्हि तँए ओहो विरोध करए लगलाह। तँ हमरा लग एकटा एहन आदमी छथि जे अपने गजल तँ नै लिखै छथि मुदा निअमक विरोध करै छथि। पेशासँ ओ राज्य सरकारक उच्चस्थ पदाधिकारी छथि। एक दिन ओ कतहुँसँ उर्दूक एकटा नीक शाइर केर गजल पोथी किनलन्हि जे की देवनागरीमे लिप्यंतरण भेल रहै। आब भाइ मैथिली आ उर्दू तँ अलग भाषा छै से ओ पदाधिकारी नै बूझि सकलाह आ हमरासँ प्रश्न पूछि देलाह जे ई महान उर्दू शाइर फल्लाँ केर पोथी थिक आ ऐमे " त " अक्षर केर काफिया " थ " अक्षर छै मुदा अहाँ मैथिलीमे तँ " त" आ "थ" केर अलग निअम बना देने छिऐ। जे निअम उर्दूमे नै चललै से मैथिलीमे कोना चलत आदि-आदि। हम तँ गुम्म रहि गेलहुँ। बहुत हिम्मति कए हम हुनकासँ पुछलिअन्हि जे श्रीमान् अपने पढ़ि कए पास केने छिऐ की पाइ दए क'। आब तँ ओहि सरकारी पदाधिकारीकेँ तामस जे चढ़लन्हि से की कहू---| ई एकटा खिस्सा अछि मुदा एहन घटना अहाँ संग सेहो भए सकैत अछि। मानि लिअ जे अहूँ कोनो उर्दू गजलक देवनागरी लिप्यंतरण भेल पोथी किनलहुँ आ पढ़लापर देखलहुँ जे " भ " केर काफिया " ब" भेल छै तँ अहूँ भ्रममे पड़ि जाएब। मुदा ऐठाम मोन राखू जे उर्दू आ मैथिली भाषा अलग छै आ ओकर लिपि सेहो अलग-अलग छै तँए काफियाक निअम दूनू भाषामे थोड़े अलग रहतै। इहो मोन राखू जे उर्दू केर जन्म भारतमे भेलै मुदा लालन-पालन अरबी-फारसी बला सभ केलकै। फलस्वरूप उर्दू भाषामे भारतीय भाषाक संगे-संग अरबी-फारसीक निअम चलैत अछि।आ तँए हम अतए देवनागरी ( संगे संग मिथिलाक्षर सेहो ) आ उर्दू लिपिमे अंतर दए रहल छी जाहिसँ अहाँ सभ ओहि पदाधिकारी जकाँ भ्रमित नै हएब।---- देवनागरी ( संगे-संग मिथिलाक्षरमे सेहो ) कुल 16टा स्वर आ 36टा व्यंजन अछि मतलब जे हरेक ध्वनि लेल अलग-अलग अक्षर बनाएल गेल छै मुदा उर्दूमे किछुए अक्षर छै आ तकरामे नुक्ता लगा वा " ह" ध्वनिक प्रयोग कए नव शब्द बनाएल जाइत छै।नुक्ता लगा वा " ह ' मिला कए जे नव शब्द बनैत छै तकरा उच्चारणक हिसाबसँ चारि भागमे बाँटि सकैत छी-------------- a) जे लिखलो जाइत छै आ तकरा उच्चारणों कएल जाइत छै ( हर्फे मक्तूबा मलफूजा )------ई सरल बात छै आशा अछि जे एकरा बुझि गेल हेबै। b) जे लिखल तँ जाइ छै मुदा ओकर उच्चारण नै कएल जाइत छै ( हर्फे मक्तूबा गैर मलफूजा )------उर्दूमे बहुत रास एहन शब्द छै जाहिमे किछु अक्षर लिखल तँ जाइ छै मुदा ओकर उच्चारण नै होइत छै आ मात्रा गनबा काल सेहो ओकरा नै गनल जाइत छै जेना---- "तुम अपनी" ऐकेँ आवश्यकता पड़लापर "तुमपनी" सेहो उच्चारित कएल जाइत छै। आब देखू जे "तुम अपनी"मे अ लिखल छै मुदा ओकर उच्चारण नै भए रहल छै ( आवश्यकता पड़लापर ) । शब्दकेँ ऐ तरीकासँ मिलेनाइकेँ " अलिफ वस्ल'क निअम कहल जाइत छै। जे लिखल तँ नै जाइ छै मुदा ओकर उच्चारण नै कएल जाइत छै ( हर्फे मलफूज गैर मक्तूबा )----जेना पढ़ल तँ बिल्कुल जाइ छै मुदा लिखल बालेकुल जाइ छै। आ चूँकि उच्चारणमे आबि रहल छै तँए मात्रा सेहो गनल जाइत छै। एहन-एहन आर उदाहरण सभ अछि। एहन अक्षर जकर अंतमे " ह" केर उच्चारण होइक ( हाए मख्तूली )------------लगभग कुल चौदहटा अक्षर उर्दू वर्णमालामे संस्कृत वर्णमालासँ लेल गेल छै। ई अक्षर सभ अछि-----------ख, घ, ङ, छ, झ,ठ,ढ,थ, ध,फ,भ, ल्ह,म्ह आ न्ह। उर्दूमे ऐ शब्द सभकेँ एना लिखल जाइत छै------ क संग ह जोड़लापर ख ग संग ह जोड़लापर घ च संग ह जोड़लापर छ ज संग ह जोड़लापर झ ट संग ह जोड़लापर ठ ड संग ह जोड़लापर ढ़ त संग ह जोड़लापर थ द संग ह जोड़लापर ध प संग ह जोड़लापर फ ब संग ह जोड़लापर भ ङ, ल्ह, म्ह आ न्ह स्वतंत्र रूपेँ लिखल जाइत छै। आब अहाँ सभ देखि सकै छी जे देवनागरीमे तँ ख,घ इत्यादि लेल स्वतंत्र अक्षर आ तकर ध्वनि छै मुदा उर्दूमे एकरा लेल " ह' मिलाबए पड़ैत छै संगे संग ङ आदिक उच्चारणमे तँ " ह " छैके।आब जँ कोनो उर्दू शाइर " ह " फेंटाएल अक्षरक काफिया बनबै छथि तँ ओ उर्दूक उच्चारण परंपराक अनुसार " ह " केर उच्चारण नै करै छथि। तँए उर्दूमे " बात " शब्दक काफिया " साथ " बनि सकै छै। कारण " साथ "मे जे "थ" छै तकर "ह" निकालि देल जाइत छै। आन-आन " ह " मिश्रित शब्दक काफिया लेल एनाहिते बुझू। ऐठाँ ईहो मोन राखू जे मात्रा सेहो उच्चारणक हिसाबसँ गानल जाइत छै उर्दूमे तँए जँ कोनो देवनागरी लिप्यंतरण बला पोथी केर अधार पर मात्रा निकालि रहल छी तँ गड़बड़ भए सकैए। मूल उर्दू लिपि सीखू आ तकर उच्चारण सेहो तखने अहाँ उर्दू गजलक सही मात्रा पकड़ि सकै छी। 2) वर्तमान सभ भारतीय भाषा लिपि बामसँ दहिन लिखल जाइत अछि मुदा उर्दू दहिनासँ बाम। तेनाहिते देवनागरीमे शब्द रचना काल अक्षरक स्वरूप नै बदलै छै मुदा उर्दूमे बदलि जाइत छै। ऐकेँ अतिरिक्तो आन-आन अंतर छै जे व्यवहारिक स्तरपर बूझल जा सकैए। आब हमरा पूरा विश्वास अछि जे अहाँ सभ ओहि पदाधिकारी जकाँ भ्रमित नै हएब। एक बेर फेर मोन राखू जे देवनागरीक अलग-अलग ध्वनि लेल अलग-अलग अक्षर छै ( गाम घरक उच्चारणमे स, श आदि एसमान उच्चारण होइत छै जकर विवरण आगू देल जाएत ) मुदा उर्दूमे नै तँए देवनागरी ( मिथिलाक्षर )मे " त " केर काफिया " थ " नै बनि सकैए वा " प " केर काफिया " फ " नै बनि सकैए। ऐ विवरणक बाद आबी बहरपर---- बहर ---- गजल सदिखन कोने ने कोने बहरमे होइत छैक। बिना बहरक गजलक कल्पना असंभव। जेना छन्दक आधार लय होइत छैक तेनाहिते बहरक आधार अऱूज वा अऱूद होइत छैक। अऱूज वा अऱूद मने शेर मे निहित मात्रा-क्रम होइत छैक। अऱूज वा अऱूदके वज़न सेहो कहल जाइत छैक। बहरक चर्च आगाँ बढ़एबासँ पहिने एकटा गप्प आर| एहिठाम हम उर्दू बहर केर वर्णन कए रहल छी। आ मैथिली गजलमे इ बहर सभक प्रयोग मैथिली गजलक 100सालक इतिहासमे कहिओ नहि भेल | मैथिलीमे बहर नै छल मतलब कृत्रिम रूपेँ बहर नै छल। योगानंद हीरा जी बहुत पहिनेसँ अरबी बहरमे मैथिली गजल लिखैत छलाह, मुदा मैथिलीक बहर-अज्ञानी संपादक सभ हुनका कात कए देलक जाहिकेँ फलस्वरूप मैथिली गजलमे बहरक चर्चा नै भए सकल। मुदा हालहिमे गजेन्द्र ठाकुर द्वारा बहरे-मुतकारिबमे सफलतापूर्वक गजल लिखल गेल। तँए आब एकर चर्चा आवश्यक। ओना मैथिलीमे वार्णिक बहरक खोज सेहो गजेन्द्र ठाकुर द्वारा भेल अछि जकर अनुकरण प्रायः हरेक नव गजलकार कए रहल छथि। एहि लेखमे जतेक उदाहरण देल गेल अछि से वार्णिक बहर पर आधारित अछि। ओना एहि बहरक चर्चा हम बादमे सेहो करब। तँ पहिने उर्दूक बहर देखी। अऱूज वा अऱूदक अविष्कार हिजरीक दोसर सदीमे खलीले इब्ने अहमद बसरी केने छलाह। हुनका इ विचार मक्काक ठठेरा बजारमे बर्तन बनेबाक अवाज सूनि अएलन्हि। प्राचीन कालमे मक्काके अऱूज वा अऱूद सेहो कहल जाइत छलैक तँए बसरी ओहि मात्रा क्रमके अऱूज वा अऱूदक नाम देलथि। अरबी साहित्यमे 16 बहरक प्रयोग भेल। बादमे इरानमे तीन टा बहरक अविष्कार भेल। आब हम एहिठाम बहरक संक्षिप्त परिचय दए रहल छी। अरबी साहित्यमे बहर तीन खंडमे बाँटल गेल अछि 1) सालिम मने मूल बहर, 2 ) मुरक्कब मने मिश्रित बहर आ 3) मुदाइफ मने परिवर्तित बहर। एहि तीनूमेसँ मुदाइफ बहरके चर्चा हम बादमे करब| अरबीमे सालिम मने मूल बहर मे सात टा बहर अबैत अछि। आ मुरक्कबमे बारह टा। बादमे एही बारहके उलट-फेर करैत आठ टा आर बहर बनाएल गेल। कुल मिला कए मुरक्कब बहर बीस टा भेल। हम अपना सुविधा लेल मुरक्कब बहरकेँ दू खंडमे बाँटि देने छी। संगहि-संग सालिम बहरके हम "समान बहर" नाम देने छिऐक। आ मुरक्कब बहरक पहिल खंड (जाहिमे कुल सात टा बहर अछि) तकरा अर्धसमान बहर नाम देलिऐक आ मुरक्कब बहरक दोसर खंड जाहिमे तेरह टा बहर अछि तकर नाम "असमान बहर" देलिऐ। तँ आब एकर विवरण निच्चा देखू।। बहरसँ पहिने रुक्नकेँ बूझी। संस्कृतक गण जकाँ अरबी मे सेहो होइत छैक जकरा "रुक्न" कहल जाइत छैक। इ रुक्न आठ प्रकारके होइत अछि। जकर विवरण एना अछि------- रुक्नक स्वरूप मात्रा रुक्नक नाम मात्रा क्रम खमासी रुक्न 5 फऊलुन ( फ/ऊ/लुन) ISS (I/S/S) खमासी रुक्न 5 फाइलुन (फा/इ/लुन) SIS (S/I/S) सुबाई रुक्न 7 फाइलातुन (फा/इ/ला/तुन) SISS ( S/I/S/S ) सुबाई रुक्न 7 मफाईलुन (म/फा/ई/लुन) ISSS ( I/S/S/S ) सुबाई रुक्न 7 मुस्तफइलुन (मुस्/तफ/इ/लुन SSIS ( S/S/I/S ) सुबाई रुक्न 7 मुफाइलतुन (मु/फा/इ/ल/तुन ) ISIIS ( I/S/I/I/S ) सुबाई रुक्न 7 मुतफाइलुन (मु/त/फा/इ/लुन IISIS ( I/I/S/I/S ) सुबाई रुक्न 7 मफऊलातु (मफ/ऊ/ला/तु SSSI ( S/S/S/I ) ****** एहिठाम I मने 1 मने हस्व आ S मने 2 मने दीर्घ भेल संगे-संग खमासी मने पाँच मात्राक आ सुबाई मने सात मात्राक रुक्न भेल | एहि रुक्न सभकेँ इयाद रखबाक लेल गणितीय रूपसँ एना बुझू--------- a) एकटा लघुकेँ बाद जँ दूटा दीर्घ हो तँ ओकरा "फऊलुन" कहल जाइत छैक। b) एकटा लघुकेँ बाद जँ तीनटा दीर्घ हो तँ ओकरा "मफाईलुन" कहल जाइत छैक। c) जँ "मफाईलुन" केँ उल्टा करबै तँ "मफऊलात" बनि जाएत मने तीनटा दीर्घकेँ बाद एकटा लघु। d) दूटा दीर्घकेँ बीचमे जँ एकटा लघु रहए तखन ओकरा "फाइलुन" कहल जाइत छैक। e) "फाइलुन" केर अंतमे जँ एकटा आर दीर्घ जोडबै तँ ओ "फाइलातुन" बनि जाएत। f) "फाइलातुन" केर उल्टा रूप "मुस्तफइलुन" होइत छैक। g) शुरुमे एकटा लघु तकरा बाद एकटा दीर्घ तकरा बाद फेर दूटा लघु आ तकरा अंतमे एकटा दीर्घ हो तँ "मुफाइलतुन" कहल जाइत छैक h) "मुफाइलुन" केर अंतसँ तेसर या दोसर लघु हटा कए पहिल लघु लग बैसा देबै तँ "मुतफाइलुन" बनि जाएत। मने शुरुमे टूटा लघु तकरा बाद एकटा दीर्घ तकरा बाद फेर एकटा लघु आ तकरा बाद अंतमे एकटा दीर्घ। 1) समान ध्वनि---------एहि खंडमे कुल सात गोट बहर राखल जाइत अछि। जकर विवरण एना अछि-------- क) बहरे-हज़ज---------- एकर मूल ध्वनि अछि "मफाईलुन" मतलब I-S-S-S (1-2-2-2) मने हस्व् -दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ| इ ध्वनि शाइर अपना सुविधानुसार प्रयोग कए सकैत छथि। मतलब कोनो शाइर एक पाँतिमे एक बेर, वा दू बेर वा ...... कतेको बेर ( बेसीसँ बेसी सोलह बेर ) प्रयोग कए सकैत छथि, मुदा मात्रा-क्रम नहि टुटबाक चाही।आ जँ एहि ध्वनि के शेर के रुप मे देबै तँ एना हेतैक------ I-S-S-S I-S-S-S I-S-S-S + I-S-S-S I-S-S-S + I-S-S-S I-S-S-S + I-S-S-S + I-S-S-S I-S-S-S + I-S-S-S + I-S-S-S I-S-S-S + I-S-S-S + I-S-S-S + I-S-S-S I-S-S-S + I-S-S-S + I-S-S-S + I-S-S-S....................................... तँ इ भेल बहरे-हज़ज केर ढ़ाँचा। एहिठाम फेर एक बेर गौरसँ देखू। उपरका ढ़ाँचा सभमे दूनू पाँतिमे मात्रा क्रम एकै छैक। अर्थात ह्रस्व के निच्चा ह्रस्व आ दीर्घ। आ मोन राखू जँ अहाँ बहरे-हज़जमे गजल लीखि रहल छी तँ हरेक शेरक मात्रा क्रम इएह देबए पड़त। नहि तँ गजल बे-बहर कहाओत। श्री गजेन्द्र ठाकुर द्वारा लिखित बहरे हजज केर एकटा उदाहरण देखू--------------------- महामाला महाडाला करै स्वाहा लगैए ई अकासी आस छै सोझाँ झझा देतै लगैए ई कहैए ई मिलेबै आइ नोरोमे कने गोला जँ भांगे पीबि एतै, भावना पीतै लगैए ई जहाँ ताकी लगैए प्रेम बाझै छै सरैलामे खने भोकारि पाड़ैए हँसै नै छै लगैए ई टिपौड़ी छै बुझेबै बात की, धाही कनी देखू कटैया पानि जेना ओ, नचै नै छै लगैए ई गजेन्द्र पूब सुरुजक रहत देतै सूर्यकेँ झाँखी चढ़त आकास देखै बानसब्बरै लगैए ई अमित मिश्र द्वारा लिखल बहरे हज़ज केर उदाहरण देखू---------- उड़ल सबटा चिड़ैयाँ गाछपर फुर्रसँ जँ बैसल चारपर चारो खसल चुर्रसँ हमर गाड़ी लतामक डाढ़ि आ सनठी चलै छै तेज अपने मुँह करै हुर्रसँ गिलासक दूध मिसियो नीक नै लागै भरल तौला दही आँङुर लगा सुर्रसँ अपन बाछी अपन गैया त ता थैया अपन झबरा करै अपनपर नै गुर्रसँ फटक्का फूटलै ब्राम ब्रम ब्रूमसँ जड़ै छै छूरछूरी छूर्र छू छुर्रसँ मफाईलुन 1222 तीन बेर बहरे हजज ख) बहरे-रमल------- एकर मूल ध्वनि एना अछि--- फाइलातुन मने ----- S-I-S-S,अर्थात दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ। आब जँ एहि ध्वनि के शेर मे प्रयोग करबै तँ एना हेतैक--- S-I-S-S + S-I-S-S + S-I-S-S + S-I-S-S S-I-S-S + S-I-S-S + S-I-S-S + S-I-S-S (एहिठाम हम खाली चारि-चारि ध्वनिके उदाहरण देलहुँ अछि, मुदा शाइर एकसँ लए कए कतेको बेर ( बेसीसँ बेसी सोलह बेर ) ध्वनिके प्रयोग कए सकैत छथि।) इ भेल बहरे-रमल। अमित मिश्र द्वारा लिखल बहरे रमल केर उदाहरण देखू---------- घोघ हुनकर उतरि गेलै पवन संगे ससरि गेलै आँखि रहि गेलै खुजल यौ रूप यौवन निखरि गेलै टोह मे छल मोन बगुला राशि सुन्नर उचरि गेलै चउरचन मे चान पूजब पावइन सब बिसरि गेलै जेठ मे मधुमास एलै गाछ नव दिल मजरि गेलै मधुप केलक आक्रमण बड काम मे सब लचरि गेलै अंशु आशक झाँपि लेलनि कुकुर पर जे नजरि गेलै पाप भेलै ,घोघ ससरल अमितके मन हहरि गेलै फाइलातुन ( I-U-U-U ) बहरे-रमल ग) बहरे-कामिल----- एकर मूल ध्वनि अछि "मुतफाइलुन" मने I-I-S-I-S मने ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ। शेरमे एकर ढ़ाँचा एना छैक------ I-I-S-I-S + I-I-S-I-S + I-I-S-I-S + I-I-S-I-S + I-I-S-I-S I-I-S-I-S + I-I-S-I-S + I-I-S-I-S + I-I-S-I-S + I-I-S-I-S (एहिठाम हम खाली चारि-चारि ध्वनिके उदाहरण देलहुँ अछि, मुदा शाइर एकसँ लए कए कतेको बेर ( बेसीसँ बेसी सोलह बेर ) ध्वनिके प्रयोग कए सकैत छथि।) इ भेल बहरे-कामिल|अमित मिश्र द्वारा लिखल बहरे कामिल केर उदाहरण देखू---------- किछु बात एहन भेल छै घर घर त' रावण भेल छै बम फोड़ि छाउर देश छै जड़ि देह जाड़न भेल छै प्रिय नै विरह जनमै बहुत सजि दर्द गायन भेल छै जिनगी भ' गेल महग कते झड़कैत सावन भेल छै दस बात सूनब की "अमित" सब ठाम गंजन भेल छै मुतफाइलुन 11212 दू बेर बहरे -कामिल घ) बहरे-मुतकारिब-------- एकर मूल ध्वनि फऊलुन अछि मने I-S-S मने ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ। एकर ढ़ाँचा देखू------- I-S-S + I-S-S + I-S-S + I-S-S + I-S-S I-S-S + I-S-S + I-S-S + I-S-S + I-S-S (एहिठाम हम खाली चारि-चारि ध्वनिके उदाहरण देलहुँ अछि, मुदा शाइर एकसँ लए कए कतेको बेर ( बेसीसँ बेसी सोलह बेर ) ध्वनिके प्रयोग कए सकैत छथि।) इ भेल बहरे-मुतकारिब| अमित मिश्र द्वारा लिखल बहरे मुतकारिब केर उदाहरण देखू---------- जखन राति आएल कारी पिया यौ अहाँ मोन पड़लौ जखन होइ घर मोर खाली पिया यौ अहाँ मोन पड़लौ अहाँ दूर बैसल सताबैत छी साँझ-भोरे सदिखने सनेसोँ जँ आएल देरी पिया यौ अहाँ मोन पड़लौ बरसलै प्रथम बूँद वर्षा मिलन यादि आबै तखन यौ विरह केर तानल दुनाली पिया यौ अहाँ मोन पड़लौँ पिया जी जखन बहल पवना मधुर गीत गाबैत कोयल जखन काँट मे फसल साड़ी पिया यौ अहाँ मोन पड़लौँ जँ देखब कतौ छिपकली डर सँ बोली फुटै नै हमर यौ जँ धड़कै हमर सून छाती पिया यौ अहाँ मोन पड़लौँ कने आबि नेहक जड़ल भाग फेरो सँ चमका दिऔ यौ अमित आश देखैत रानी पिया यौ अहाँ मोन पड़लौ बहरे -मुतकारिब {ह्रस्व-दीर्ध-दीर्ध 6बेर सब पाँतिमे } बहरे मुतकारिब बहुत लोकप्रिय आ संगीतमय बहर छै। आदि शंकराचार्य आ गोस्वामी तुलसी दास सेहो ऐ बहरक प्रयोग केने छथि। पहिने आदि शंकराचार्यक ई निर्वाण षट्कम देखू----------- मनो बुद्ध्यहंकारचित्तानि नाहम् न च श्रोत्र जिह्वे न च घ्राण नेत्रे न च व्योम भूमिर् न तेजॊ न वायु: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् न च प्राण संज्ञो न वै पञ्चवायु: न वा सप्तधातुर् न वा पञ्चकोश: न वाक्पाणिपादौ न चोपस्थपायू चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् न मे द्वेष रागौ न मे लोभ मोहौ मदो नैव मे नैव मात्सर्य भाव: न धर्मो न चार्थो न कामो ना मोक्ष: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दु:खम् न मन्त्रो न तीर्थं न वेदा: न यज्ञा: अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् न मृत्युर् न शंका न मे जातिभेद: पिता नैव मे नैव माता न जन्म न बन्धुर् न मित्रं गुरुर्नैव शिष्य: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् अहं निर्विकल्पॊ निराकार रूपॊ विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम् न चासंगतं नैव मुक्तिर् न मेय: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् आब देखू तुलसी दास जी द्वारा लिखल ई स्त्रोत------------- नमामी शमीशान निर्वाण रूपं विभू व्यापकम् ब्रम्ह वेदः स्वरूपं पहिल पाँतिकेँ मात्रा क्रम अछि---- ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घदोसरो पाँतिकेँ मात्रा क्रम अछि-----ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ नोट--- दोसर पाँतिमे ब्रम्हकेँ गेबा कालमे बर् = दीर्घकएल जाइत छै। ङ) बहरे-मुतदारिक--------एकर मूल ध्वनि अछि "फाइलुन" मने S-I-S मने दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ अछि। एकर ढ़ाँचा एना अछि------ S-I-S + S-I-S + S-I-S + S-I-S S-I-S + S-I-S + S-I-S + S-I-S (एहिठाम हम खाली चारि-चारि ध्वनिके उदाहरण देलहुँ अछि, मुदा शाइर एकसँ लए कए कतेको बेर ( बेसीसँ बेसी सोलह बेर ) ध्वनिके प्रयोग कए सकैत छथि)| इ भेल बहरे-मुतदारिक। अमित मिश्र द्वारा लिखल बहरे मुतदारिक केर उदाहरण देखू कुकुर उनटल पड़ल लार पर बंदरो बैसलै चार पर मूस दौगै गहुँम भरल घर कोइली तन दै तार पर नादि पर गाय दै दूध छै नजर देने श्रवन ढार पर स्वागत लेल बौआ कए फूल मुस्कै गुथल हार पर भोर भेलै उठल राजा यौ अमित बौआ चढ़ल कार पर दीर्घ- हर्स्व -दीर्घ 3 बेर च) बहरे-रजज------ एकर मूल ध्वनि "मुस्तफइलुन" छैक। मने S-S-I-S मने दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ। एकर ढ़ाँचा एना हेतैक------ S-S-I-S + S-S-I-S + S-S-I-S + S-S-I-S S-S-I-S + S-S-I-S + S-S-I-S + S-S-I-S (एहिठाम हम खाली चारि-चारि ध्वनिके उदाहरण देलहुँ अछि, मुदा शाइर एकसँ लए कए कतेको बेर ( बेसीसँ बेसी सोलह बेर ) ध्वनिके प्रयोग कए सकैत छथि।) इ भेल बहरे-रजज |अमित मिश्र द्वारा लिखल बहरे रजज केर उदाहरण देखू---------- बाल गजल कारी महिस के दूध उज्जर छै कते भरि मोन पारी पीबि दुब्बर छै कते रसगर जिलेबी गरम नरमे नरम छै लड्डू बनल बेसनक बज्जर छै कते छै पात हरियर फूल शोभित गाछ छै जामुन लिची आमक इ मज्जर छै कते दू एक दू आ चारि दूनी आठ छै अस्सी कते नै जानि सत्तर छै कते भालू बला देखाब' सबके नाँच हौ झट आगि छड़पै दौड़ चक्कर छै कते मुस्तफइलुन 2212 तीन बेर बहरे रजज छ) बहरे-वाफिर------------ एकर मूल ध्वनि "मुफाइलतुन" छैक मने I-S-I-I-S मने ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ। एकर ढ़ाँचा देखू------ I-S-I-I-S + I-S-I-I-S + I-S-I-I-S + I-S-I-I-S I-S-I-I-S + I-S-I-I-S + I-S-I-I-S + I-S-I-I-S (एहिठाम हम खाली चारि-चारि ध्वनिके उदाहरण देलहुँ अछि, मुदा शाइर एकसँ लए कए कतेको बेर ( बेसीसँ बेसी सोलह बेर ) ध्वनिके प्रयोग कए सकैत छथि। इ भेल बहरे-वाफिर | अमित मिश्र द्वारा लिखल बहरे वाफिर केर उदाहरण देखू---------- खतम सब काज भेल हमर स्वतंत्र मिजाज भेल हमर कतौ जिनगी छलै धधकै खुशी पर राज भेल हमर पुरान जँ गाछ , मज्जर नव अपन त' अवाज भेल हमर सरस पल भेल बड दिनपर सदेह इलाज भेल हमर सदिखन गजल लिखैत रहब अमित नव साज भेल हमर बहरे-वाफिर मुफाइलतुन U-I-U-U-I 2 बेर सब पाँतिमे 2) अर्धसमान बहर-------- एहि खंडमे कुल 56 बहर अछि मुदा मात्र 7 टा प्रचलित अछि। एकरा हम अर्धसमान बहर एहि द्वारे कहैत छिऐक जे एहिमे हरेक पाँतिमे कमसँ-कम अनिवार्य रुपसँ दूटा ध्वनिके समान रुपमे प्रयोग करए पड़ैत छैक। आब शाइर एहि दूनू ध्वनिके एक पाँतिमे जाए बेर ( बेसीसँ बेसी सोलह बेर ) प्रयोग कए सकथि ओ हुनका ऊपर छन्हि। आ एहि खंडक सभ बहर लेल एहने सन बूझू।। एकर विवरण निच्चा देल जा रहल अछि। 1) फऊलुन + फाइलुन ( एकर उल्टा रूप सेहो छै.....) फाइलुन + फऊलुन 2) फऊलुन + फाइलातुन ( एकर उल्टा रूप सेहो छै.....) फाइलातुन + फऊलुन आ निच्चाक सभ बाँचल 26 टा बहरक लेल एनाहिते नियम छै। आ ऐ तरहें ऐ खंडमे कुल 56 टा बहर भेल। 3) फऊलुन + मफाईलुन 4) फऊलुन + मुस्तफइलुन 5) फऊलुन + मुफाइलतुन 6) फऊलुन + मुतफाइलुन 7) फऊलुन + मफऊलातु 8) फाइलुन + फाइलातुन 9) फाइलुन + मफाईलुन 10) फाइलुन+ मुस्तफइलुन 11) फाइलुन + मुफाइलतुन 12) फाइलुन + मुतफाइलुन 13) फाइलुन + मफऊलातु 14)फाइलातुन + मफाईलुन 15) फाइलातुन + मुस्तफइलुन 16) फाइलातुन + मुफाइलतुन 17) फाइलातुन + मुतफाइलुन 18) फाइलातुन + मफऊलातु 19) मफाईलुन + मुस्तफइलुन 20) मफाईलुन + मुफाइलतुन 21) मफाईलुन + मुतफाइलुन 22) मफाईलुन + मफऊलातु 23) मुस्तफइलुन + मुफाइलुन 24) मुस्तफइलुन + मुतफाइलुन 25) मुस्तफइलुन + मफऊलातु 26) मुफाइलतुन + मुतफाइलुन 27) मुफाइलतुन + मफऊलातु 28) मुतफाइलुन + मफऊलातु आब अहाँ सभ जरूर कहब जे जखन मात्र साते टा बहर प्रचलित छै तखन एतेक देबाक कोन काज। मुदा बेसी प्रचलित नै हेबाक मतलब ई नै छै जे ई गलत छै। वस्तुतः बहरक प्रयोग अभ्यास पर निर्भर छै आ हरेक शाइर अपना हिसाबसँ बहरक चुनाब करैत छथि। भए सकैए जे जाहि बहरकेँ अरबी जीह पर कठिनाह लागल हो से मैथिलीमे सहज लागए तँए ई सभ देल गेल अछि। तँ देखी ई सात टा बहु-प्रचलित बहर आ ओकर नामकेँ। क) बहरे-तवील--------- एकर मूल ध्वनि छैक " फऊलुन-मफाईलुन"। एकर ढ़ाँचा देखू------- I-S-S + I-S-S-S I-S-S + I-S-S-S I-S-S + I-S-S-S + I-S-S + I-S-S-S I-S-S + I-S-S-S + I-S-S + I-S-S-S I-S-S + I-S-S-S + I-S-S + I-S-S-S + I-S-S + I-S-S-S I-S-S + I-S-S-S + I-S-S + I-S-S-S + I-S-S + I-S-S-S........................... एहि बहर आ एहि खंडक बाँकी अन्य छहो बहरक लेल एकटा आर बात मोन राखू जे ध्वनि जाहि क्रममे देल गेल अछि ताही क्रममे रहबाक चाही। जेना की बहरे-तवीलमे अहाँ देखलहुँ जे एकर ध्वनि एना छैक " फऊलुन-मफाईलुन" मुदा जँ अहाँ एकरा " मफाईलुन- फऊलुन" बला क्रममे रखबै तँ इ बहरे-तवील नहि हएत। अमित मिश्र जीक लिखल बहरे तवील देखल जाए------------ पुन: जोडि लेबै नेहकेँ डोर राजा जी कनेको बहै नै जानकेँ नोर राजा जी कने आउ राजा जानि नै की भ' जेतै यौ कनेको नचाबू प्रेमकेँ मोर राजा जी किए सुन्न भेलौं आइ बेमौत मारै छी कने आइ मस्तीमे करू शोर राजा जी जमाना मिलेतै नै सुनू बैलगा देतै अनाड़ी बुझै छै प्रेम छै चोर राजा जी चटा देब संगे प्यार के चाशनी हमरा अमीतो बुझू भेलै सराबोर राजा जी हरेक पाँतिमे "फऊलुन-मफाईलुन" अर्थात ( ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ + ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ सँ बनल बहरे तवील ) ख) बहरे-मदीद-----------एकर मूल ध्वनि अछि "फाइलातुन-फाइलुन"। एकर ढ़ाँचा एना छैक-------- S-I-S-S + S-I-S अमित मिश्र जीक लिखल बहरे मदीद देखल जाए------------ कोन टोना केलकै जोगिया सदिखन करेजा हमर जरिते रहल चोरि केने चैन होशो हमर सदिखन अनेरे उड़िते रहल नै छलै डर एत' मरबाक आ नै मोन मे दर्द अंदेशा छलै देख नवका एत' बहिते हवा से आब नेहक गजल मरिते रहल भागि गेलै कोन नगरक गली मे आइ देखा क' सतरंगी सपन बाट जोहैते भ' जेतै कखन की आँखिमे नोर बड भरिते रहल उजरि गेलै जखन कोनो उपवनक कोनटा परक गाछक फूल यौ तखन सबटा कोयलक मधुर बोली संग दर्दक हवा उड़िते रहल आइ खोजै छी अपन ओहि जादूगर कए फेर खेला खेलबै अमित केने आश नेहक सदिखने भीतरे-भीतर जरिते रहल बहरे मदीद फाइलातुन-फाइलुन ( I-U-I-I+ I-U-I ) 3 बेर ग) बहरे बसीत----- एकर मूल ध्वनि " मुस्तफइलुन-फाइलुन" छैक। एकर ढ़ाँचा एना हएत------------------ S-S-I-S + S-I-S देखू अमित मिश्र द्वारा लिखल ई गजल जे की बहरे बसीतमे अछि----- बेटा अपन मुर्खके सोटासँ हम अकछ छी बाबाक फूटलहबा लोटासँ हम अकछ छी पेट्रोल कखनो त' कखनो गैस सब्जी महग काला बजारी करै कोटासँ हम अकछ छी बेटी कपारपर छै चिन्ता इ सदिखन बनल कनियाक नेहक भरल मोटासँ हम अकछ छी छै आगि धरती बनल नै पानि आकाश मे पीबैत कारी धुआँ मोटासँ हम अकछ छी दै यै भगा काज छोड़ा जीब कोना बचब छै खसल टाकाक लंगोटासँ हम अकछ छी रचना करै छी त' खर्चा होइ यै नै मुदा अतिथी अमित एत' दस गोटासँ हम अकछ छी मुस्तफइलुन-फाइलुन दू बेर बहरे-बसीत घ) बहरे-मुजस्सम वा मुजास----------------------------- एकर मूल ध्वनि " मुस्तफइलुन-फाइलातुन" छैक। एकर ढ़ाँचा एहन छैक--------- S-S-I-S + S-I-S-S अमित मिश्र जीक लिखल बहरे मुजास देखल जाए------------ बसलौँ अहाँ जखन मनमे हमरा चमकि गेल जिनगी अनमोल नेहक उड़ल खुशबूमे गमकि गेल जिनगी माधुर्य माँखैत खुजलै जखने कमल ठोर रानी लवणी सँ छलकैत ताड़ी बूझू छलकि गेल जिनगी गाबी अहाँ गीत मोने मोने जँ तैयौ गजब धुन मुस्की द' देलौँ चहटगर अमृत झमकि गेल जिनगी नीरीह जानबर बनि नैनक मारि खेलौँ सदिखने फूले छलै बाण नैनक तेँए धड़कि गेल जिनगी सगरो अहाँ के लिखल छवि डूबल कलम नेहमे यै गाबै अमित गजल लिखलक देखू दमकि गेल जिनगी बहरे मुजास ङ) बहरे- मुन्सरह----------- एकर मूल ध्वनि "मुस्तफइलुन-मफऊलात"। एकर ढ़ाँचा छैक--------------- S-S-I-S + S-S-S-I अमित मिश्र जीक लिखल बहरे मुन्सरह देखल जाए------------ आखर जखन रूपक लिखल उपमा सजल फूलक लिखल आदर्श छी रूपक बनल काजर नयन कातक लिखल सरगम अहाँक स्वर सजल मुस्की नगर तानक लिखल कहलौँ करेजक सब कहल किछु बात हम राजक लिखल चमकैत नभ मे छी चान तारा गजल हाटक लिखल मुस्तफइलुन-मफऊलातु च) बहरे-मजरिअ-------------- एकर मूल ध्वनि छैक "मफाईलुन-फाइलातुन" एकर ढ़ाँचा एना छैक-------- I-S-S-S+S-I-S-S छ) बहरे-मुक्तजिब------- एकर मूल ध्वनि छैक " मफऊलात-मुस्तफइलुन"। एकर ढ़ाँचा छैक----------- S-S-S-I +S-S-I-S ओम प्रकाश जीक लिखल बहरे मुक्तजिबमे लिखल ई गजल देखल जाए------------------- धारक कात रहितो पियासल रहि गेल जिनगी हमर मोनक बात मोनहि रहल, दुख सहि गेल जिनगी हमर मुस्की हमर घर आस लेने आओत नै आब यौ पूरै छै कहाँ आस सबहक, कहि गेल जिनगी हमर सीखेलक इ दुनिया किला बचबै केर ढंगो मुदा बचबै मे किला अनकरे टा ढहि गेल जिनगी हमर पाथर बाट पर छी पडल, हमरा पूछलक नै कियो कोनो बन्न नाला जकाँ चुप बहि गेल जिनगी हमर जिनगी "ओम" बीतेलकै बीचहि धार औनाइते भेंटल नै कछेरो कतौ, बस दहि गेल जिनगी हमर (बहरे मुक्तजिब) 49टा बाँचल बहरक नाम हमरो एखन धरि नै पता लागल अछि। पता लगिते जरूर कहब। 3) असमान बहर--------- एहि खंडमे कुल 213 गोट बहर अछि मुदा मात्र 13 टा प्रचलित अछि। एकरा हम असमान बहर एहि द्वारे कहैत छिऐक जे एहिमे हरेक पाँतिमे कमसँ-कम अनिवार्य रुपसँ तीनटा ध्वनिके समान रुपमे प्रयोग करए पड़ैत छैक।आब शाइर एहि तीनू ध्वनिके एक पाँतिमे जाए बेर ( बेसीसँ बेसी सोलह बेर ) प्रयोग कए सकथि ओ हुनका ऊपर छन्हि। आ एहि खंडक आर अन्य बहर लेल एहने सन बूझू। एकर विवरण निच्चा देल जा रहल अछि। ऐ असमान बहरक दू भागकेँ हमरा लोकनि देखी। पहिल भाग ओ भेल जाहिमे तीनटा अलग-अलग रुक्नकेँ एक पाँतिमे एक बेरमे प्रयोग कए जाइत छै। आ दोसर भाग ओ भेल जाहिमे दूटा एक समान रुक्न आ एकटा दोसर रुक्न लेल जाइत छै। तँ पहिने देखी ओ बहर जाहिमे तीनटा अलग-अलग रुक्नकेँ एक पाँतिमे एक बेरमे प्रयोग कए जाइत छै। 1) फऊलुन + फाइलुन + फाइलातुन ( एकर दूटा आर रूप हेतै) a) फाइलुन + फाइलातुन+फऊलुन b) फाइलातुन + फऊलुन + फाइलुन एनाहिते निच्चो बला सभक दू-दूटा आर रूप हेतै। कुल मिला ऐ खंडमे 45टा बहर प्राप्त भेल। 2) फऊलुन + मफाईलुन + मुस्तफइलुन 3) फऊलुन + मुफाइलतुन + मुतफाइलुन 4) फाइलुन + फाइलातुन + मफाईलुन 5) फाइलुन + मुस्तफइलुन + मुफाइलतुन 6) फाइलुन + मुतफाइलुन + मफऊलातु 7) फाइलातुन + मफाईलुन + मुस्तफइलुन 8) फाइलातुन + मुफाइलतुन + मुतफाइलुन 9) मफाईलुन + मुस्तफइलुन + मुफाइलतुन 10) मफाईलुन + मुतफाइलुन + मफऊलातु 11) मुस्तफइलुन + मुफाइलतुन + मुतफाइलुन 12) मुफाइलतुन + मुतफाइलुन + मफऊलातु 13) मफऊलातु + मुतफाइलुन + मुफाइलतुन 14) मफऊलातु + मुस्तफइलुन + मफाईलुन 15) मफऊलातु + फाइलातुन + फाइलुन आब आबी दोसर भागमे जाहिमे दूटा एक समान रुक्न आ एकटा दोसर रुक्न लेल जाइत छै........... हरेक पाँतिमे फाइलातुन केर दू बेर प्रयोग आ मफाईलुन केर एक बेर प्रयोग ( एकर तीन रूप हेतै ) फाइलातुन+ फाइलातुन+ मफाईलुन ( मने-----दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ+ दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ+ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ- दीर्घ) मफाईलुन+फाइलातुन+ फाइलातुन फाइलातुन+मफाईलुन+फाइलातुन आ) हरेक पाँतिमे मफाईलुन केर दू बेर प्रयोग आ फाइलातुन केर एक बेर प्रयोग ( एकरो तीन रूप हेतै ) मफाईलुन+ मफाईलुन+फाइलातुन फाइलातुन+मफाईलुन+ मफाईलुन मफाईलुन+फाइलातुन+मफाईलुन इ) हरेक पाँतिमे फाइलातुन केर दू बेर प्रयोग आ मुस्तफइलुन केर एक बेर प्रयोग ( एकरो तीन रूप हेतै) फाइलातुन+ फाइलातुन+ मुस्तफइलुन मुस्तफइलुन+फाइलातुन+ फाइलातुन फाइलातुन+ मुस्तफइलुन+फाइलातुन ई) हरेक पाँतिमे मुस्तफइलुन केर दू बेर प्रयोग आ फाइलातुन केर एक बेर प्रयोग (एकरो तीन रूप हेतै) मुस्तफइलुन +मुस्तफइलुन + फाइलातुन फाइलातुन+मुस्तफइलुन +मुस्तफइलुन मुस्तफइलुन +फाइलातुन+मुस्तफइलुन उ) हरेक पाँतिमे फाइलातुन केर दू बेर प्रयोग आ मुफाइलतुन केर एक बेर प्रयोग (एकरो तीन रूप हेतै) फाइलातुन +फाइलातुन + मुफाइलतुन मुफाइलतुन+फाइलातुन +फाइलातुन फाइलातुन +मुफाइलतुन+ फाइलातुन ऊ) हरेक पाँतिमे मुफाइलतुन केर दू बेर प्रयोग आ फाइलातुन केर एक बेर प्रयोग (एकरो तीन रूप हेतै) मुफाइलतुन+ मुफाइलतुन+फाइलातुन फाइलातुन +मुफाइलतुन+ मुफाइलतुन मुफाइलतुन+ फाइलातुन+मुफाइलतुन ए) हरेक पाँतिमे फाइलातुन केर दू बेर प्रयोग आ मुतफाइलुन केर एक बेर प्रयोग (एकरो तीन रूप हेतै) फाइलातुन+ फाइलातुन+मुतफाइलुन मुतफाइलुन +फाइलातुन+ फाइलातुन फाइलातुन+ मुतफाइलुन+फाइलातुन ऐ) हरेक पाँतिमे मुतफाइलुन केर दू बेर प्रयोग आ फाइलातुन केर एक बेर प्रयोग (एकरो तीन रूप हेतै) मुतफाइलुन +मुतफाइलुन + फाइलातुन फाइलातुन+मुतफाइलुन +मुतफाइलुन मुतफाइलुन +फाइलातुन+मुतफाइलुन ओ) हरेक पाँतिमे फाइलातुन केर दू बेर प्रयोग आ मफऊलात केर एक बेर प्रयोग (एकरो तीन रूप हेतै) फाइलातुन+ फाइलातुन+मफऊलात मफऊलात +फाइलातुन+ फाइलातुन फाइलातुन+ मफऊलात +फाइलातुन औ) हरेक पाँतिमे मफऊलात केर दू बेर प्रयोग आ फाइलातुन केर एक बेर प्रयोग (एकरो तीन रूप हेतै) मफऊलात +मफऊलात + फाइलातुन फाइलातुन+मफऊलात +मफऊलात मफऊलात +फाइलातुन+मफऊलात अं) हरेक पाँतिमे मफाईलुन केर दू बेर प्रयोग आ मुस्तफइलुन केर एक बेर प्रयोग ( एकरो तीन रूप हेतै) मफाईलुन +मफाईलुन + मुस्तफइलुन मुस्तफइलुन+मफाईलुन +मफाईलुन मफाईलुन +मफाईलुन+मफाईलुन अः) हरेक पाँतिमे मुस्तफइलुन केर दू बेर प्रयोग आ मुफाईलुन केर एक बेर प्रयोग (एकरो तीन रूप हेतै) मुस्तफइलुन+ मुस्तफइलुन+ मुफाईलुन मुफाईलुन+मुस्तफइलुन+ मुस्तफइलुन मुस्तफइलुन+मुफाईलुन+ मुस्तफइलुन क) हरेक पाँतिमे मफाईलुन केर दू बेर प्रयोग आ मुफाइलतुन केर एक बेर प्रयोग ( एकरो तीन रूप हेतै) मफाईलुन+ मफाईलुन+ मुफाइलतुन मुफाइलतुन+मफाईलुन+ मफाईलुन मफाईलुन+ मुफाइलतुन + मफाईलुन ख) हरेक पाँतिमे मुफाइलतुन केर दू बेर प्रयोग आ मफाईलुन केर एक बेर प्रयोग (एकरो तीन रूप हेतै) मुफाइलतुन +मुफाइलतुन +मफाईलुन मफाईलुन +मुफाइलतुन +मुफाइलतुन मुफाइलतुन +मफाईलुन+मुफाइलतुन आब आगूक हरेक वर्ग लेल एनाहिते तीन-तीनटा बहर बनैत रहत। हम समयक अबाभकेँ कारणै नै दए रहल छी। अहाँ सभ समय-समय पर एकरा बनबैत रहब। आब ऐठाम देखू जे कुल मिला कए ऐ विवरणमे 56टा वर्ग अछि आ हरेक वर्गमे तीन-तीन टा बहर अछि मने ऐ खंडमे कुल 168टा बहर भेल। ग) हरेक पाँतिमे मफाईलुन केर दू बेर प्रयोग आ मुतफाइलुन केर एक बेर प्रयोग( एकरो तीन रूप हेतै) घ) हरेक पाँतिमे मुतफाइलुन केर दू बेर प्रयोग आ मफाईलुन केर एक बेर प्रयोग ( एकरो तीन रूप हेतै) ङ) हरेक पाँतिमे मफाईलुन केर दू बेर प्रयोग आ मफऊलात केर एक बेर प्रयोग ( एकरो तीन रूप हेतै) च) हरेक पाँतिमे मफऊलात केर दू बेर प्रयोग आ मफाईलुन केर एक बेर प्रयोग ( एकरो तीन रूप हेतै) छ) हरेक पाँतिमे मुस्तफइलुन केर दू बेर प्रयोग आ मुफाइलतुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) ज) हरेक पाँतिमे मुफाइलतुन केर दू बेर प्रयोग आ मुस्तफइलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) झ) हरेक पाँतिमे मुस्तफइलुन केर दू बेर प्रयोग आ मुफाइलतुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) ञ) हरेक पाँतिमे मुफाइलतुन केर दू बेर प्रयोग आ मुस्तफइलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) ट) हरेक पाँतिमे मुस्तफइलुन केर दू बेर प्रयोग आ मफऊलात केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) ठ) हरेक पाँतिमे मफऊलात केर दू बेर प्रयोग आ मुस्तफइलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) ड) हरेक पाँतिमे मुफाइलतुन केर दू बेर प्रयोग आ मुतफाइलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) ढ़) हरेक पाँतिमे मुतफाइलुन केर दू बेर प्रयोग आ मुफाइलतुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) ण) हरेक पाँतिमे मुफाइलतुन केर दू बेर प्रयोग आ मफऊलात केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) त) हरेक पाँतिमे मफऊलात केर एक बेर प्रयोग आ मुफाइलतुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) थ) हरेक पाँतिमे मुतफाइलुन केर एक बेर प्रयोग आ मफऊलात केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) द) हरेक पाँतिमे मफऊलात केर दू बेर प्रयोग आ मफऊलात केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) ध) हरेक पाँतिमे फऊलुन केर दू बेर प्रयोग आ फाइलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) न) हरेक पाँतिमे फाइलुन केर दू बेर प्रयोग आ फऊलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) प) हरेक पाँतिमे फऊलुन केर एक बेर प्रयोग आ फाइलातुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) फ) हरेक पाँतिमे फाइलातुन केर दू बेर प्रयोग आ फऊलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) ब) हरेक पाँतिमे फऊलुन केर दू बेर प्रयोग आ मफाईलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) भ) हरेक पाँतिमे मफाईलुन केर दू बेर प्रयोग आ फऊलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) म) हरेक पाँतिमे फऊलुन केर दू बेर प्रयोग आ मुस्तफइलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) य) हरेक पाँतिमे मुस्तफइलुन केर दू बेर प्रयोग आ फऊलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) र) हरेक पाँतिमे फऊलुन केर दू बेर प्रयोग आ मुफाइलतुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) ल) हरेक पाँतिमे मुफाइलतुन केर दू बेर प्रयोग आ फऊलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) व) हरेक पाँतिमे फऊलुन केर दू बेर प्रयोग आ मुतफाइलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) श) हरेक पाँतिमे मुतफाइलुन केर दू बेर प्रयोग आ फऊलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) ष) हरेक पाँतिमे फऊलुन केर दू बेर प्रयोग आ मफऊलात केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) स) हरेक पाँतिमे मफऊलात केर दू बेर प्रयोग आ फऊलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) ह) हरेक पाँतिमे फाइलुन केर दू बेर प्रयोग आ फाइलातुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) क्ष) हरेक पाँतिमे फाइलातुन केर दू बेर प्रयोग आ फाइलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) त्र) हरेक पाँतिमे फाइलुन केर दू बेर प्रयोग आ मफाईलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) ज्ञ) हरेक पाँतिमे मफाईलुन केर दू बेर प्रयोग आ फाइलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) ऋ) हरेक पाँतिमे फाइलुन केर दू बेर प्रयोग आ मुस्तफइलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) लृ) हरेक पाँतिमे मुस्तफइलुन केर दू बेर प्रयोग आ फाइलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) कृ) हरेक पाँतिमे फाइलुन केर दू बेर आ मुफाइलतुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) खृ) हरेक पाँतिमे मुफाइलतुन केर दू बेर प्रयोग आ फाइलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) गृ) हरेक पाँतिमे फाइलुन केर दू बेर प्रयोग आ मुतफाइलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) घृ) हरेक पाँतिमे मुतफाइलुन केर दू बेर प्रयोग आ फाइलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) चृ) हरेक पाँतिमे फाइलुन केर दू बेर प्रयोग आ मफऊलात केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) छृ) हरेक पाँतिमे मफऊलात केर दू बेर प्रयोग आ फाइलुन केर एक बेर प्रयोग(एकरो तीन रूप हेतै) मुदा ऐ 213 बहरमेसँ मात्र तेरहे टा बहुप्रचलित छै। आ बाद बाँकी केर उपयोग मुजाइफ रूपमे होइत छै। आब अहाँ सभ जरूर कहब जे जखन मात्र तेरहे टा बहर प्रचलित छै तखन एतेक देबाक कोन काज। मुदा बेसी प्रचलित नै हेबाक मतलब ई नै छै जे ई गलत छै। वस्तुतः बहरक प्रयोग अभ्यास पर निर्भर छै आ हरेक शाइर अपना हिसाबसँ बहरक चुनाब करैत छथि। भए सकैए जे जाहि बहरकेँ अरबी जीह पर कठिनाह लागल हो से मैथिलीमे सहज लागए तँए ई सभ देल गेल अछि। तँ देखी ई तेरह टा बहु-प्रचलित बहर आ ओकर नामकेँ। ई तेरहटा बहर एना अछि-------- क) बहरे-खफीफ------एकर मूल ध्वनि छैक "फाइलातुन-मुस्तफइलुन-फाइलातुन"| एकर ढ़ाँचा छैक------ S-I-S-S + S-S-I-S + S-I-S-S ख) बहरे-जदीद----- एकर मूल ध्वनि छैक "फाइलातुन- फाइलातुन-मुस्तफइलुन"| एकर ढ़ाँचा छैक---------- S-I-S-S + S-I-S-S + S-S-I-S देखू अमित मिश्र द्वारा लिखल ई गजल जे की बहरे जदीदमे अछि- चादरो फाटल सड़ल बड उठबै कखन बाढ़ि एलै भासलै घर बनतै कखन कोन कोना नाह भेटत मजधार मे राति दिनकर दिन क' चन्ना बूझै कखन चोरि भेलै चैन आ चाहो के अमल देह टूटै दोष अनका देबै कखन डाँग लागै दैब के अधगेरे जखन पानि मानव एक बूँदो माँगै कखन बेचबै बेटा जँ जिनगी बचतै तखन अमित कह ने पानि सगरो घटतै कखन फाइलातुन-फाइलातुन-मुस्तफइलुन { I-U-I-I-I-U-I-I-I-I-U-I} एक बेर सब पाँति मे बहरे-जदीद ग) बहरे-सरीअ----- एकर मूल ध्वनि छैक " मुस्तफइलुन- मुस्तफइलुन-मफऊलात" | एकर ढ़ाँचा छैक------- S-S-I-S + S-S-I-S + SSSI देखू अमित मिश्र द्वारा लिखल ई गजल जे की बहरे सरीअमे अछि----- भेटल अहाँके संग हमरा जहियेसँ जिनगी हमर लेलक करोटो तहियेसँ हम एकरा की कहब छल एहन भाग बैसल छलौँ हम बाटमे दुपहरियेसँ गेलौँ शिखरपर भेल जे एगो स्पर्श जुड़ि गेल श्वास प्राण संगे तहियेसँ छी ग्यानके पेटी अहाँ जादू गजल शाइरक कोनो कलम लागै हँसियेसँ हम भेल नतमस्तक लिखब कोना शब्द शाइर अमित छी संग हमरा जहियेसँ मुस्तफइलुन-मुस्फइलुन-मफऊलात ( I-I-U-I +I-I-U-I + I-I-I-U ) बहरे-सरीअ घ) बहरे-करीब------ एकर मूल ध्वनि छैक " मफाईलुन- मफाईलुन- फाइलातुन"| एकर ढ़ाँचा छैक---- I-S-S-S + ISSS + S-I-S-S देखू अमित मिश्र द्वारा लिखल ई गजल जे की बहरे करीबमे अछि---- बिसरलौँ जग पिबै छी बोतल शराबक मनक मारल चुमै छी बोतल शराबक हमर छै जीत तड़िखानामे पियाबू अपन नामे लिखै छी बोतल शराबक हमर छै जान ई अंगुरक पानि नै छै बनै शोणित किनै छी बोतल शराबक शहर के कोन मैखान जत' पिलौँ नै जहर दर्दक कहै छी बोतल शराबक गिलाससँ आब पल भरि दोस्ती क' देखू घर स्वर्गक रहै छी बोतल शराबक जनम भेलै इयादक तहियेसँ झूमैँ अमित संगे रखै छी बोतल शराबक मफाईलुन-मफाईलुन-फाइलातुन बहरे-करीब ङ) बहरे-मुशाकिल------- एकर मूल ध्वनि छैक " फाइलातुन- मफाईलुन- मफाईलुन | एकर ढ़ाँचा छैक---- S-I-S-S + I-S-S-S + I-S-S-S देखू अमित मिश्र द्वारा लिखल ई गजल जे की बहरे मुशाकिलमे अछि— हमर नेहक सजा जिनगी जड़ा देलक गीत दर्दक बना जिनगी कना देलक छै अनचिन्हार अपने नाम एखन यौ खेल झूठक जमा जिनगी हरा देलक नोर बहतै त' हमरे पर हँसत दुनियाँ कसम झूठे गना जिनगी लिखा देलक जहर के प्रेम मे खूनो जहर भेलै दाँत विरहक गड़ा जिनगी विषा देलक गाम उजड़ल शहर कानल हँसल जत' ओ भवर एहन फँसा जिनगी बझा देलक नै मवाली अहाँ हमरा कहू देखिक' नेह पागल बना जिनगी डरा देलक जीब कोना बचल जिनगी कहू एखन अमित मौतसँ सटा जिनगी मुआ देलक फाइलातुन-मफाईलुन-मफाईलुन बहरे-मुशाकिल च) बहरे-कलीब-------- एकर मूल ध्वनि छैक "फाइलातुन—फाइलातुन--- मफाईलुन" | एकर ढ़ाँचा छैक--- SISS--- SISS---- ISSS देखू अमित मिश्र द्वारा लिखल ई गजल जे की बहरे कलीबमे अछि----- युग विज्ञानक शोध एखन क' देखै छी अपन मन परबोध एखन क' देखै छी रहत जगमे अमर मानव मरत दानव नव मशीनक रोध एखन क' देखै छी भाग बनतै मात्र दस खा क' रसगुल्ला शक्ति के हम बोध एखन क' देखै छी सत्त सी ओ टू बनल झूठ आँक्सीजन कार्बनक अबरोध एखन क' देखै छी डाहि हम संस्कार संस्कृति मुस्कै छी मान लेल क्रोध एखन क' देखै छी देश चलबै छी त' सब राज के देखू जोड़ि कर अनुरोध एखन क' देखै छी बहरे-कलीब छ) बहरे असम------- एकर मूल ध्वनि छैक फाइलातुन--- मफाईलुन--- फाइलातुन | एकर ढ़ाँचा छैक---SISS---- ISSS--- SISS देखू अमित मिश्र द्वारा लिखल ई गजल जे की बहरे असममे अछि— आब आगिक पता पुछतै पानि ऐठाँ नै जड़त यौ कतौ घर लिअ जानि ऐठाँ कखन धरि लोक जड़तै चुप जानवर बनि तोड़बै जउर से लेतै ठानि ऐठाँ छै दहेजो त' महगाई कम कहाँ छै ओझरी सोझरेतै लिअ मानि ऐठाँ बदलतै समय सगरो नवका जमाना नै जँ बदलत त' ओ मरतै कानि ऐठाँ जे जनम देलकै हुनका बिसरलै सब माँथ पर जनकके रखतै फानि ऐठाँ भाइ मे उठम-बजड़ा नै आब हेतै आइ त' स्वर्ग के देबै आनि ऐठाँ आगि पर पानि नेहक हँसि ढ़ारि दिअ ने अमित सब के मिला सुख लिअ सानि ऐठाँ फाइलातुन-मफाईलुन-फाइलातुन ( I-U-I-I + U-I-I-I + I-U-I-I ) बहर-असम ज) बहरे कबीर----- एकर मूल ध्वनि छैक मफऊलातु--- मफऊलातु--- मुस्तफइलुन| एकर ढ़ाँचा छैक ---SSSI--- SSSI--- SSIS देखू अमित मिश्र द्वारा लिखल ई गजल जे की बहरे कबीरमे अछि----- असगर जनम लेलहुँ असगरे जी रहल अपने भाग अपनेपर भरोसा बचल मोनक खेतपर बजड़ा अपन खाइ छी गलती अपन तेँए बाट काँटसँ भरल मोजर नै सिनेहक भेल कहियो हमर अपने तोड़ि नाता शहर मे जी रमल दै छी दोष नेताके किए आब यौ अपने भोट दै छी घेँट अपने कटल लोभी छी अधम छी अमित भटकै सगर पक्षक नै अपक्षक मोन अपने बनल मफऊलातु-मफऊलातु-मुस्तफइलुन ( दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व+ दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व +दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ सँ बनल बहरे-कबीर ) झ) बहरे सगीर----- एकर मूल ध्वनि छैक मुस्तफइलुन--- फाइलातुन---- मुस्तफइलुन| एकर ढ़ाँचा छैक --SSIS--- SISS--- SSIS देखू अमित मिश्र द्वारा लिखल ई गजल जे की बहरे सगीरमे अछि----- ञ) बहरे-सरीम----- एकर मूल ध्वनि छैक मफाईलुन--- फाइलातुन--- फाइलातुन | एकर ढ़ाँचा छैक------- ISSS + SISS + SISS देखू अमित मिश्र द्वारा लिखल ई गजल जे की बहरे सरीममे अछि-किए एखन मोन हमर शाइर बनल छै लिखल जेकर नाम ओ एखन कटल छै बनाबी हम रूप जे शब्दक नगरमे नगर ओकर नैनके लागै जहल छै गजल जेहन हम लिखै सबदिन छलौँ से कहाँ हमरा मोनमे ओहन गजल छै दिनक काटै रौद रातिक चान धधकै बहर मारै जान पथ काँटक बनल छै कखन हारब जीवनक अनमोल पारी अमित जा धरि छी करै शेरक कहल छै मफाईलुन-फइलातुन-फइलातुन बहरे -सरीम ट) बहरे सलीम----- एकर मूल ध्वनि छैक --- "मुस्तफइलुन-- मफऊलातु---मफऊलातु"| एकर ढ़ाँचा छैक---- SSIS + SSSI + SSSI देखू अमित मिश्र द्वारा लिखल ई गजल जे की बहरे सलीममे अछि-- खिड़कीसँ सीधे देखै छलौँ हम चान घन तिमिर मोनक छाँटै छलौँ हम चान हेतै अपन फेरो भेँट ओतै जा क' तेँ जागि आशा लगबै छलौँ हम चान दिन भरि समाजक पहरा कतेको नयन छवि संग तोहर भटकै छलौँ हम चान लागै तरेगण लोचन पलक झपकैत बनि मेघ घोघट लागै छलौँ हम चान शुभ राति फेरो भेटब अमिय नेहक ल' सब दिन अमित नव आबै छलौँ हम चान मुस्तफइलुन-मफऊलातु-मफऊलातु {दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व} बहरे-सलीम ठ)बहरे हमीद----- एकर मूल ध्वनि छैक--- "मफऊलातु----मुस्तफइलुन----मफऊलातु"| एकर ढ़ाँचा छैक--- SSSI + SSIS + SSSI देखू अमित मिश्र द्वारा लिखल ई गजल जे की बहरे हमीदमे अछि— नै जीयत शराबक नशा लागल लोक कोना हँसत कोनो दुखक खेहारल लोक काठी फेकबै आगि उठतै बोतलसँ नै रहतै जवानी अपन जाड़ल लोक के कानत कतौ आन लेए क'ह एत' नै छै समय ककरो अपन भागल लोक दै छै साँस कखनो अपन धोखा आब एहन नेहमे छै किए पागल लोक जड़तै एक दोसर सँ जिनगी मे जखन कटतै घेँट अपने सबर हारल लोक क्षण भरि के नवल दोस्त नै चाही आब हमरा अमित चाही अपन झाड़ल लोक मफऊलातु-मुस्तफइलुन-मफऊलातु बहरे-हमीद ड) बहरे हमीम--- एकर मूल ध्वनि छैक-- "फाइलातुन--- मुस्तफइलुन--- मुस्तफइलुन" |एकर ढ़ाँचा छैक-- SISS + SSIS + SSIS देखू अमित मिश्र द्वारा लिखल ई गजल जे की बहरे हमीममे अछि- आइ नौला* मे माछ चल मारब कने जाल मच्छरदानी वला फेकब कने बहुत टिकुला छै खसल गाछी भरल छै ओकरो झोरी भरि क' चल आनब कने माछ चटनी खाएब रोटी भात रौ डोलपाती चल संग मे खेलब कने छोट बौआ छी पैघ सन छै सोच रौ आब कखनो संसार नै बाँटब कने एक छी हम सब एक थारी मे रहब अमित नवका मिथिला अपन माँगब कने फाइलातुन-मुस्तफइलुन-मुस्तफइलुन बहरे-हमीम ऐकेँ अतिरिक्त केओ चारि-चारिटा रुक्नक समूह सेहो बना सकैत छथि। मुदा ऐठाम ई मोन राखू जे गजल पूरा-पूरी उच्चारण आ संगीतक नियम पर आधारित छै तँए बड़का-बड़का पाँति गेबामे नै बनतै तँए ई चारि आ ओहिसँ बेसी रुक्न बला गजलक सफलता बहुत कम्म भेटतै। आ जखन देखिए रहल छिऐ जे जखन 213 मे टा मात्र तेरहे टा प्रचलित छै जे की तीन रुक्नक समूह थिक। तखन चारि आ ओहिसँ बेसी बलाक सफलता कतेक हेतै से अंदाजा लगा सकैत छी अहाँ। आब हमरा लोकनि इ जानी जे अरबीक एहि आठो रुक्नकेँ मैथिलीमे केना बदलि सकैत छी। मैथिलीमे दू प्रकारक छंद पद्धति अछि-----मात्रिक आ वार्णिक | A) मात्रिक------ एहिमे दू, तीन, चारि, पाँच आ छह मात्रा खंडके जोड़ि कए अक्षर विन्यास कएल जाइत छैक। आ एहि अक्षर विन्यासकेँ गण कहल जाइत छैक। मात्रिक छंदमे पाँच टा गण होइत अछि----- क) ण (णगण) = द्विकल मने दू मात्राक खंड ख) ढ ( ढगण) = त्रिकल मने तीन मात्राक खंड ग) ड ( डगण) = चतुष्कल मने चारि मात्राक खंड घ) ठ ( ठगण) = पंचकल मने पाँच मात्राक खंड ङ) ट ( टगण) = षटकल मने छह मात्राक खंड एहि गणकेँ अतिरिक्त मैथिलीमे एक मात्रा, सात मात्रा आ आठ मात्राक वर्ण विन्यास सेहो होइत छैक। मुदा ओकरा गण नहि मानल जाइत छैक। कारण एक मात्रा अपूर्ण भेल। तेनाहिते सात वा आठ मात्रा बला विन्यास कोनो ने कोनो रुपेँ उपरक पाँचो गणसँ मिलैत अछि। उदाहरण लेल सात मात्राक वर्ण विन्यास देखू---" पहिराओल" = IISSI । आब एहिमे देखू पहिल तीन मात्रा मने ( IIS) चतुष्कलक रुप थिक आ अंतिम दूनू मात्रा मने ( SI ) त्रिकलक रुप थिक। आठ मात्राक लेल एहने सन गप्प। उपरक पाँचो मात्रा विन्यासकेँ अलग-अलग रुपेँ लिखल जा सकैए आ एहि हिसाबें ------ द्विकल- दू रूप मे लिखल जाइत अछि----- 1) घर = II 2) ओ = S त्रिकल- तीन रूप मे लिखल जाइत अछि----- 1) भिजा = IS 2) अपन = III 3) आब = SI चतुष्कल- पाँच रूप मे लिखल जाइत अछि----- 1) छौंड़ी = SS 2) तकरा = IIS 3) चुमान = ISI 4) फेकल = SII 5) सदिखन = IIII पंचकल- आठ रूप मे लिखल जाइत अछि----- 1) लड़ाकू = ISS 2) तिलकोर = IISI 3) हौहत्ती = SIS 4) तरेगन = ISII 5) सरधुआ = IIIS 6) जागरण = SIII 7) अंगूर = SSI 8) चहटगरि = IIIII षटकल - तेरह रूप मे लिखल जाइत अछि-- 1) सोहारी = SSS 2) बपखौकी = IISS 3) सुधामयी = ISIS 4) मादकता = SIIS 5) असगरुआ = IIIIS 6) सिताएल = ISSI 7) लालटेन = SISI 8) खटखटाह = IIISI 9) मोताबिक = SSII 10) अधमौगति = IISII 11) सुरेबगर = ISIII 12) राजभवन = SIIII 13) चपलचरण = IIIIII तँ चलू आब एहि पाँचो गणसँ अरबी रुक्न बनाबी। इ अरबी रुक्न आठ अछि । तँ देखू एकर नियम----- 1) जँ द्विकलक (णगनक) एहन रूप जाहिमे एकसरें दीर्घ मने--SS (जेना-जे, गे, खो, जो आदि) रहए आ तकरा बाद पंचकल (ठगण)क ओ रूप रहए जाहिमे पहिल वर्ण लघु आ तकरा बाद दूनू दीर्घ (ISS) हो तँ जे रूप बनत से उर्दू मे "फाइलातुन" कहबैत छैक। एकटा उदारहरण लिअ " गे सुशीला" एकर मात्रा क्रम अछि (SISS) ---- आब एकरा "फाइलातुन" (SISS) सँ मिलाउ| एकरा एना देखू------ S + ISS = SISS 2) जँ पंचकल (ठगण)क ओ रूप जाहिमे पहिने दूटा दीर्घ आ तकरा बाद एकटा लघु हो (SSI) तकरा द्विकल (णगन)क ओहन रूपसँ जोड़ू जाहिमे एकसरें दीर्घ (S) हो। तँ ओ "मुस्तफइलुन" ( SSIS) बनत। एकरा एना देखू---------SSI + S = SSIS 3) जँ त्रिकल (ढगण)क ओहन रूप जाहिमे पहिल लघु आ दोसर दीर्घ (IS) हो तकरा चतुष्कल (डगण)क ओहन रूपसँ जोड़ू जाहिमे दूनू दीर्घ (SS) छैक। तखन जे बनत तकरा "मफाईलुन" (ISSS) बनत मने। उदाहरण लेल---निशा एलै (ISSS)। एकरा एना देखू-----IS + SS = ISSS 4) जँ चतुष्कल (डगण)क ओहन रूप जकर शुरूआतमे दूटा लघु आ अंतमे एकटा दीर्घ होइ मने (IIS) तकरा त्रिकल (ढगण)क ओहन रूपसँ जोड़ू जाहिमे पहिल लघु आ अंतिम दीर्घ मने (IS) तँ "मुतफाइलुन" (IISIS) बनि जाएत। एकरा एना देखू-------IIS + IS = IISIS 5) जँ पंचकल (ठगण)क ओहन रूप जाहिमे पहिल लघु दोसर दीर्घ आ तकरा बाद अंतिम दूनू लघु मने (ISII) हो तकरा द्विकल (णगण)क ओहन रूपसँ जोड़बै जाहिमे एकटा दीर्घ होइक मने (S) तँ मफाइलतुन बनि जाएत। एकरा एना देखू------ISII + S = ISIIS 6) जँ चतुष्कल (डगण)क ओहन रूप जाहिमे दूनू दीर्घ हो (SS) मने तकरा त्रिकल (ढगण)क ओहन रूपसँ जाहिमे पहिल दीर्घ आ अंतिम लघु (IS) मने हो तँ "मफऊलात" (SSIS) बनत। एकरा एना देखू-----SS + IS = SSIS 7) पंचकल (ठगण)क ओहन रूप जाहिमे पहिल लघु आ तकरा बाद दूनू दीर्घ हो मने (ISS) से "फऊलुन" कहाइत अछि। एकरा एना देखू------ ISS 8) पंचकल (ठगण)क ओहन रूप जाहिमे पहिल दीर्घ आ तकरा बाद लघु तकरा बाद फेर दीर्घ हो मने (SIS) से "फाइलुन" कहल जाइत अछि। एकरा एना देखू------SIS *****मात्रा गनबाक लेल मोन राखू जाहि अक्षरमे "अ", "इ", "उ", "ऋ" एवं "लृ" नुकाएल हो तकरा लघु मानू आ तकरा बाद सभकेँ दीर्घ। संगहि संग अनुस्वार तँ दीर्घ अछि मुदा चन्द्रबिंदु लघु।संगहि-संग जँ कोनो शब्दमे संयुक्ताक्षर हुअए तँ ताहिसँ पहिलेक अक्षर दीर्घ भए जाइत छैक चाहे ओ लघु किएक ने हुअए। उदाहरण लेल--प्रत्यक्ष शब्दमे दूटा संयुक्ताक्षर अछि पहिल त्य एवं क्ष। आब एहिमे देखू "त्य" सँ पहिने "प्र" अछि तँए ई दीर्घ भेल आ "क्ष" सँ पहिने "त्य" अछि तँए इहो दीर्घ भेल। ई नियम जँ दू टा अलग-अलग शब्द हो तैयो लागू हएत जेना उदाहरण लेल--- हमर प्रेम छी अहाँ... ऐमे "प्रे" संयुक्ताक्षर भेल आ ताहिसँ पहिने बला शब्द " र" दीर्घ भए जाएत। मतलब जे "हमर" शब्दक अंतिम अक्षर "र" दीर्घ भए जाएत । मुदा इ मोन राखू "न्ह" आ "म्ह" संयुक्ताक्षरसँ पहिने बला शब्दमे लघु दीर्घ नहि होइत छैक। जेना की "कुम्हार" मे "म्ह" सँ पहिने "कु" दीर्घ नहि भेल तेनाहिते "कन्हाइ" शब्दमे सेहो "न्ह"सँ पहिने "क" वर्ण दीर्घ नहि भेल। क्ष, त्र आ ज्ञ संयुक्ताक्षर अछि।तेनाहिते.... प्र, र्व, आदि सेहो संयुक्ताक्षर अछि। बहुत गोटेंकेँ समस्या होइत छन्हि जे इ लघु-दीर्घ कोना होइत छै। प्रस्तुत अछि किछु उदाहरण--- बिगड़ि-----------एहि शब्दकेँ ह्रस्व-दीर्घ मानू वा दीर्घ-ह्रस्व मानू। बहरक जेहन जरूरति हो। अरबी बहरमे तीन टा लघु सँ कोनो बहर नै छै तँए लघु-लघु-लघु मानबाक कोनो जरूरति नै। हुनकर---------- एहि शब्दकेँ दीर्घ-दीर्घ मानू वा दीर्घ-लघु-लघु मानू वा लघु-लघु-दीर्घ दीर्घ मानू जेहन जरूरति हो। अरबी बहरमे चारिटा लघु सँ कोनो बहर नै छै तँए लघु-लघु-लघु-लघु मानबाक कोनो जरूरति नै। घर------- एहि शब्दकेँ दीर्घ मानू वा लघु-लघु बहरक जेहन जरूरति हो। चोर------ इ साफे तौर पर दीर्घ-लघु अछि। जँ कोनो शेरमे एना पाँति छै--- बिगड़ि चलै । आब एहि दू शब्दकेँ बान्हू। या तँ अहाँ " बिग" मने एकटा दीर्घ मानू आ "ड़ि" मने एकटा लघु फेर "च" एकटा लघू भेल आ "लै" एकटा दीर्घ। एकर मतलब जे " बिगड़ि चलै" केर संभावित बहर भेल--दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ। एहि शब्दकेँ एकटा आर रूप दए सकैत छी जेना की---- "बि" के लघु मानू "गड़ि"केँ दीर्घ मानू आ फेर "च" एकटा लघू भेल आ "लै" एकटा दीर्घ। एकर मतलब जे " बिगड़ि चलै" केर संभावित बहर भेल--- लघु-दीर्घ-लघु-दीर्घ। आब एहि दू रूपकेँ अहाँ बहरक हिसाबें प्रयोग करू। कतेको आदमी " बिग" केँ दीर्घ मानताह फेर "ड़ि" "च" केँ मिला दीर्घ मानताह आ "लै" भेल दीर्घ मने दीर्घ-दीर्घ -दीर्घ मुदा इ रूप गलत भेल। किछु दिन पहिने हम ओम प्रकाश आ अमित जीकेँ कहने छलिअन्हि जे एना कए सकैत छी। मुदा तखन हमर ज्ञान कम्म छल। हुनका दूनू गोटेँकेँ अलावे सभ गोटेसँ आग्रह जे ओ आब एना नै करथि। मैथिलीमे वर्तनीकेँ हिसाबेँ ई उदाहरण देखू---- लए---- ह्रस्व-दीर्घ लs------ह्रस्व ल'------ह्रस्व लय--- ह्रस्व-ह्रस्व वा दीर्घ इएह निअम कए, कs वा स', भए भs वा भ' लेल छै आन प्रारूप लेल एहने बात बूझल जाए। B) वार्णिक छंदमे तीन-तीन मात्रा खंडक आठ विन्यास कएल जाइत अछि। एहि तीन-तीन खंडक गनणा "दशाक्षरी" पद्धतिसँ कएल जाइत अछि। इ एक प्रकारक सूत्र अछि। इ सूत्र अछि-----"यमाताराजभानसलगा"। एहि दसो अक्षरमेसँ पहिल आठ अक्षर आठो गणक नामक पहिल अक्षर थिक। आ इ आठ गण अछि----- य = यगण मा = मगण ता = तगण रा = रगण ज = जगण भा = भगण न = नगण स = सगण आ अंतिम दूटा अक्षर "लगा" कोनो गण नहि अछि। कारण इ जे वार्णिक छंदमे तीन-तीन मात्रा होइत छैक। मुदा "लगा" केर बाद कोनो अक्षर नहि अछि। तँए "स" के बाद कोनो गण नहि बनि सकैत अछि। आब गण बनेबाक तरीका देखू---- अहाँ जे गण बनबए चाहैत छी तकर पहिल अक्षर आ तकरा बादक दू अक्षर आरो लिअ। जे अक्षर क्रम आएत तकर मात्रा गणक मात्रा कहाएत। उदाहरण लेल मानू हमरा "मगण" बनेबाक अछि तँ सभसँ पहिने "मा" लिअ तकरा बादक दूशब्द अछि "तारा"। आब एकरा एकठाम लेने "मातारा" बनत। आब एकर मात्रा अछि---SSS | तँ इ भेल "मगण"। एकटा आर उदाहरण लिअ मानू हमरा जगण बनेबाक अछि तँ ज लिअ आ तकरा बाद दू शब्द अछि "भान"। तँ दूनू मिला कए "जभान" बनत मने "जगण" केर मात्रा क्रम ISIअछि। एनाहिते आठो गण बनैत अछि। आठो गणक रुप देल जा रहल अछि----- गणक नाम दशाक्षरी खंड मात्रा क्रम यगण यमाता ISS मगण मातारा SSS तगण ताराज SSI रगण राजभा SIS जगण जभान ISI भगण भानस SII नगण नसल III सगण सलगा IIS तँ चलू आब एहि आठो गणसँ अरबी रुक्न बनाबी। इ अरबी रुक्न आठ अछि । तँ देखू एकर नियम---- 1) यगण (ISS)सँ पहिने एकटा दीर्घ लगेने " फाइलातुन" बनत। मने S + यमाता = SISS = फाइलातुन ( वैकल्पिक रुपें एनाहुतो कए सकैत छी------- रगण मने (SIS) केँ बाद एकटा आर दीर्घ लगेने "फाइलातुन" बनत।मने SIS + S = SISS 2) रगण (SIS)सँ पहिने एकटा दीर्घ लगेने " मुस्तफइलुन " बनत। मने S + रगण = SSIS = मुस्तफइलुन (वैकल्पिक रुपें एनाहुतो कए सकैत छी----- तगण मने (SSI) केँ बाद एकटा आर दीर्घ लगेने "मुस्तफइलुन" बनत। मने SSI + S = SSIS) 3) यगण (ISS)केँ बाद एकटा दीर्घ लगेने "मफाईलुन" बनत। मने ISS + यगण = ISSS = मफाईलुन (वैकल्पिक रुपें एनाहुतो कए सकैत छी---- मगण मने (SSS) सँ पहिने एकटा लघु लगेने "मफाईलुन" बनत। मने I+SSS = ISSS 4) रगण (SIS) सँ पहिने दूटा लघु लगेने "मुतफाइलुन" बनत। मने II + रगण = IISIS = मुतफाइलुन ( वैकल्पिक रुपें एनाहुतो कए सकैत छी--- सगण मने (IIS) केँ बाद एकटा लघु आ तकरा बाद एकटा दीर्घ लगेने "मुतफाइलुन" बनत। मने IIS + I + S = IISIS = 5) जगण मने (ISI) केँ बाद एकटा लघु आ तकरा बाद एकटा दीर्घ लगेने "मुफाइलतुन" बनत। मने ISI + I + S = ISIIS 6) मगण मने (SSS) के बाद एकटा लघु लगेने "मफऊलात" बनत। मने SSS + I = SSSI = मफऊलात ( वैकल्पिक रुपें एनाहुतो कए सकैत छी----- तगण मने (SSI)सँ पहिने एकटा दीर्घ लगेने “मफऊलात” बनत। मने S + SSI = SSSI 7) यगण मने (ISS) पूरा-पूरी "फऊलुन" केँ बराबर अछि। 8) रगण मने (SIS) पूरा-पूरी "फाइलुन" केँ बराबर अछि। तँ दूनू प्रकारक छंद आ तकरा रुक्नमे बदलनाइ हमरा लोकनि सेहो देखलहुँ। तँ आब चलू तैआर भए जाउ गजल लिखए आ पढ़ए लेल। एहि लेखक सहायतासँ खाली मैथिलीए नहि कोनो आन भाषामे सेहो सही गजल लीखि सकैत छी, खाली काफियाकेँ नियम बदलि जेतै भाषाकेँ हिसाबें। मैथिलीमे बहर उपरमे हमरा लोकनि जतेक बहर देखलहुँ ताहि उपर मैथिलीमे आइ धरि गजल कहले नहि गेल। अर्थात जीवन झासँ लए कए 2008 धरि मैथिलीमे बहर नहि छल। बहर नै छल मतलब कृत्रिम रूपेँ बहर नै छल। योगानंद हीरा जी बहुत पहिनेसँ अरबी बहरमे मैथिली गजल लिखैत छलाह, मुदा मैथिलीक बहर-अज्ञानी संपादक सभ हुनका कात कए देलक जाहिकेँ फलस्वरूप मैथिली गजलमे बहरक चर्चा नै भए सकल। 2008क बाद गजेन्द्र ठाकुर उपरका बहरमे गजल तँ कहबे केलाह संगहि-संग मैथिली लेल एकटा अन्य बहर सेहो तकलाह जकर नाम देल गेल---वार्णिक बहर। एहि बहरक मतलब छैक मतलाक पहिल पाँतिमे जतेक वर्ण छैक ओहि गजलक आन हरेक शेरक पाँतिमे ओतबए वर्ण हेबाक चाही। उपरमे उदाहरण लेल हम अपन जतेक शेर देने छी ओ सभ सरल वार्णिक बहरमे अछि।तथापि एकटा उदाहरण आर----- जहिआ धरि हमरा श्वास रहत तहिआ धरि हुनक आस रहत आब एकरा गानू। एहि दूनू पाँतिमे 13-13 वर्ण अछि। इ भेल सरल वार्णिक बहर। वर्ण कोना गानल जाए ताहि लेल इ धेआन राखू----- हलंत बला अक्षरकेँ 0 मानू संयुक्ताक्षरमे संयुक्त अक्षरके 1 मानू। जेना की "हरस्त" मे स्त=1 भेल। तकरा बाद सभ अक्षरकेँ 1 मानू चाहे ओकर मात्रा लघु हो की दीर्घ। वार्णिक बहर दू तरहक अछि--- सरल वार्णिक बहर, आ वार्णिक 1) सरल वार्णिक बहर----- उपरका सभ उदाहरण सरल वार्णिकक अछि। 2) वार्णिक-------- एहिमे वर्णक संग-संग मात्राक सेहो धेआन राखए पड़ैत छैक। मने वर्णक संख्या तँ निश्चित हेबाके चाही संगहि-संग ह्रस्व के निच्चा ह्रस्व आ दीर्घ के निच्चा दीर्घ हेबाके चाही। उदाहरण लेल----- नचनी नाच नचा गेल प्रेम हुनकर जिनगी बाँझ बना गेल प्रेम हुनकर आब एहि शेरके देखू दूनू पाँतिमे 15 वर्ण तँ छैके संगे-संग पहिल पाँतिमे जाहि ठाम जे मात्रा छैक वएह मात्रा दोसरो पाँतिमे ओही ठाम छैक। तँ इ भेल वार्णिक बहर| जँ अहाँ एकरा मात्रा क्रम देबै तँ पता चलत जे एकर रुप एना छैक---- SSSI-ISSS-SISS आब कने इ विचारी जे मैथिलीमे कोन बहरके प्रधानता दी। जेना की हमरा लोकनि जनैत छी "सरल वार्णिक बहर" सभसँ बेसी हल्लुक अछि तँए गजलगो ( शाइर) शुरुआतमे एही बहर मे गजल लिखैत तँ नीक। तकरा बाद अभ्याससँ दोसर बहर (वार्णिक बहर) पर आबथि आ तकरा बाद उर्दू बला बहर पर हाथ अजमाबथि। एखन मैथिलीमे दोसर बहर अर्थात वार्णिक बहरक प्रारंभिक चरण चलि रहल अछि। अंतमे सबसँ खास गप्प गजल चाहे अहाँ कोनो बहर मे किएक ने लिखब रदीफ आ काफियाक नियम सभ लेल एकै रंग रहत। (ई आलेख शब्द साधक श्री जगदीश प्रसाद मंडल जीकेँ समर्पित छन्हि।) बलराम साहु विस्मित होइत हमर लोक संस्कृति काठक खराम, मुजक चटकुनी, हाथसँ लिखल कोहवर, बिआहक गीत, सोहर-समदाउन, फगुआक जोगीरा, भोरका पराती, बटलगनी, डोमकच, जट-जटीन, शामा-चकेबा, भगैत, नचारी, अल्हा–ऊदल, ब्रजभान, सीत-बसंत, राजा-सल्हेशक अमर गाथाक नौटंकी, विभिन्न अध्यात्मिक-समाजिक घटनाक्रमपर आधारित नाटक आ नौटंकी, गामक घूर आ घूर लग होइत पंचपती, पचमेड़क जलखै, ताबापर तरल तिलकोरक तरूआ, कोजगराक मखान, चूड़ा-मुरहीक सनेश, पुरनीक पात, ओहार लागल बैलगाड़ी, जवारी भोज, ससूर-भैंसूरक धाक, पैघक पएर छूबि लेल असीरवाद यएह सभ तँ मिथिलाक अद्वितीय संस्कार आ संस्कृति अछि। मुदा अत्याधुनिक भौतिकवाद आ अधकचरा पश्चिमी संस्कृतिक समागमक कारणें उपरोक्त विशुद्ध देशी शब्दक अनेकानेक शब्द नवका पीठीक लेल अनभुआर भऽ गेल। नवतुरिया लोकनि ऐ शब्दकेँ विदेशज बूूझि रहल छथि। जौं किछु परम्परागत संस्कृति अवशेषक रूपमे बँचलो अछि तँ नव पीढ़ी ओकरा ओछ, घटिया आ हीनताक प्रतीक मानैत छथि। दोसर दिस किछु परम्परागत लोक संस्कृति आजुक भौतिकवादी व्यवस्थाक प्रभावमे अपन स्वरूप बदलि नव नाम आ स्वरूपसँ प्रचलित भऽ स्वयंकेँ विकसित कहेबाक प्रयास कए रहल छथि। सोहर-समदाउन, जट-जटीन, पराती, भगैत, अल्हाक स्थान आॅरकेस्ट्रा आ फुहर भोजपूरी गीत तँ अल्हा-ऊदल, दीनाभद्री, राजा सल्हेसक अमर गाथा नंग-धरंग अपसंस्कृतिक परिचायक थियेटरसँ विस्थापित भऽ गेल, भाँगक गोली विदेशी शराब आ देशी पाउचमे हेरा गेल, गामक पंचायत इतिहासक हिस्सा बनि गेल, फगुआक जोगीरा आ जूरशीतलक नचारीपर बैशाखीक भाँगड़ा भारी पड़ि गेल, गामक मेला, हाट-बाजारक मौल संस्कृतिमे पूर्ण रूपेण समावेसित भऽ अपन अस्तित्व मेटा देलक अछि। हमर समाज विभिन्न अवसरपर अल्हा-ऊदल, कुमर व्रजभान, दीना भद्री, सीत-बसंतक अमरगाथा देखि आ सूनि स्वयंकेँ गौरवान्वित बुझैत राजा हरिश्चन्द्रक सत्यवादी स्वरूपसँ प्रेरणा लैत छल तँ श्रवणकुमारक नाटकसँ मातृ-पितृ भक्तिक ज्ञान प्राप्त करैत स्वयंकेँ श्रवण कुमार बनबाक प्रयाश करैत छल। शत्रुधन प्रसाद साह मैथिली महिला आ जिद्दी मैथिली भाषामे पुस्तक प्रकाशनक अभाब रहल समयमे युवा पत्रकार सुजीत कुमार झा मैथिली साहित्यक क्षेत्रमे एकटा नव आयामक रुपमे स्थापित भऽ रहल छथि । पत्रकारिता सन व्यस्त पेशा सँ जुड़ल अवस्थामे सेहो साहित्यक क्षेत्रमे सेहो डेग राखव अपने आपमे कम भारी बात नहि रहल अछि । ओतबे नहि तीन–तीन महिनामे पुस्तक प्रकाशन करवाक उद्घोष करव आ सफलता सेहो प्राप्त करब आजीगुजी बात नहि अछि । पहिल कथा संग्रह ‘चिडै’क माध्यम सँ मैथिली साहित्यमे प्रवेश कएने सुजीतक दोसर कृति ‘रिपोर्टर डायरी’ आ एकर किछुए दिनमे प्रकाशित भेल कथा संग्रह ‘जिद्दी’ सेहो ओतबे लोकप्रिय रहल अछि । जिद्दीक पहिल कथा “फुल फुलाइए कऽ रहल” कथामे मैथिली नारी संग भऽ रहल व्यवहारकँे प्रष्ट रुपमे देखाओल गेल अछि । एहि कथामे महिला संग हुनक पति झुठक नाटक कऽ विवाह करैत छथि मुदा पतिक वास्तविक अवस्था आ हैसियत देखलाक बाद कथाकँे नायिका अन्तरद्वन्द्वमे परैत अछि मुदा अन्तमे गम्भीर भऽ सोँचलाक बाद महत्वपुर्ण निर्णय लऽ हुनक पतिद्वारा देखल गेल सपनाकँे पुरा करय ओ सफल भेल छथि । ई कथा पढलाक बाद हमरा काली दास स्मरण आबि जाइत छथि । हुनको जीवनकेँ महत्वपूर्ण बनाबएमे हुनक पत्नीक महत्वपूर्ण भूमिका रहल अछि । मिथिलाञ्चलक कतेको व्यक्तिकेँ काली दास वनाबएमे एखनो हुनकर कनिया सहायक भऽ रहल अछि । तहिना ‘नव व्यापार’ कथामे रोगी पात्र जितेन्द्र प्रसाद आ आधुनिकताक फैशनमे डुबल कनिया बीचक अवस्थाकँे स्पष्ट चित्रण अछि । एहि कथाक माध्यम सँ परिवारिक कलह आ कथित आधुनिकता परिवारकेँ तहसनहस कऽ सकैत अछि तएँ परिवारमे मेलमिलापक वाताबरण होबए पर जोड देल गेल अछि । तेसर कथा ‘खाली घर’ परिवारिक जीवनमे होबयबला उतार चढाब आ उथल पुथलकेँ देखाओल गेल अछि । खाली घर कथामे परिवारिक जीवनक महत्व नीक जेकाँ कथाकार देखाबए सफल भेल छथि । जोशमे होस नहि गुमाबक चाही एहि कथाक संदेश अछि । ‘लाल किताव’ कथामे समाजक पुरान सोच आ भुतप्रेत प्रतिकँे विश्वासकँे सेहो देखौने छथि । मुदा सुजीतक कहबाक अन्दाज गजब अछि । जिद्दी कथामे एकटा महिलाक महत्वकाँक्षा आ ओहि सँ उत्पन्न होबयबला परिस्थितिक देखौने अछि । तएँ ओहिठाम हुनक माए अपन ईच्छाकेँ पुरा करय लेल बेटीकेँ आगा बढबैत छथि । अभिभावककेँ धियापुतापर नियन्त्रण आवश्यक अछि ई संदेश करिव करिव एहि कथापर लागु होइत अछि । मुदा कथाकार ई स्थिति महिलेपर किए चुनलथि से नहि बुझिसकलहुँ । ओ महिलाकेँ बेटाकेँ सेहो एहि घटनामे सहभागि करा सकैत छलथि । ‘निष्ठा की देखाबा’ कथा समाजमे आधुनिकताक नाममे पसरल विकृतिकँे नीक जेकाँ प्रस्तुत करय सफल भेल छथि । एहि ठाम महिलाक अपन पतिक मृत्यु सँ बेसी पतिक मृत्युक बाद कोना सुरक्षित आ नीक जेकाँ रहब ताही बातक चिन्ता रहैत छन्हि । तहिना ‘केहन सजाय’ कथा सेहो बहुत नीक अछि । एहि कथामे समाजमे रहल अपराधी सभ उपर होबए बला सजाय आ देशक कानुनी व्यवस्थाके देखावय खोजने अछि । तहिना ‘मेनका’ आ अन्य कथासभ सेहो एक पर एक रहल अछि । कोनो कथा आलोचना करय जेहन नहि अछि । सुजीतक कथा संग्रहमे रहल भाषा शैली, कथाक बनाबट बहुत नीक अछि आ आम मैथिली प्रेमी सभक लेल बहुत बेसी लोकप्रिय कथा संग्रह बनए से आशा करैत छी । ओना हमरा विश्वास तऽ अछिए । मैथिली भाषाक कितावक अभाब रहल समयमे आबि रहल सुजीतक कथा संग्रह सभ अहिना लोकप्रिय बनैत रहत से कामना अछि । एहि सँ मैथिली साहित्यप्रति युवा सभ प्रेरित तऽ हेबे करत संगहि मैथिली पाठककेँ संख्यामे सेहो बढोत्तरी हएत । सुजीतक चारिम कृतिक प्रतिक्षामे हमरा तऽ रहबे करत । लेखक खोज पत्रकारिता केन्द्र काठमाण्डू सँ आवद्ध छथि । विजय मस्त सुजीतक सम्पूर्ण कथा एकटा नया स्वाद देलक की भेलै, मम्मी ? कोनो पहाड़ टूटि गेलै, कथिलाए दुखित छेँ । ककरो मृत्यु भऽ गेल छै । हम डाक्टर लग जाइत छी, एक घण्टाक बात अछि, बस्स सभ किछु नरमल । जिद्दी कथाक नायिका गिन्नीद्वारा वाजल गेल ई वाक्य आजुक आधुनिकताक नामपर सिगरेट, दारु आ यौन सम्बन्धके फैशन रुपमे अपना रहल मैथिल समाजक युवा युवतीक कथा व्यथाके कथाकार सुजीत कुमार झा वहुत सरल तरीकासँ प्रस्तुत कएने छथि । २०६९ साउनक अन्तिम सप्ताहमे बिमोचित पत्रकार आ साहित्यकार सुजीत झाजीक तेसर कृति जिद्दी कथा संग्रहक १२ गोट कथा हम बहुत रोचक आ जिज्ञासु भऽ पढलहुँ । ओना हुनक पहिल कृति चिडैं सेहो पढवाक अवसर भेटल छल, वहुत रोमान्चित लागल रहए । एकटा साहित्यके विद्यार्थीक नजरिसँ सुजीत जी मिथिला समाजमे व्याप्त पौराणिक परम्परासँ लऽकऽ आधुनिकताक छोट—छोट विषयसभके अपन कलमक माध्यमसँ सुसज्जित करयमे सफल छथि । यदि सुजीतजी अपन पाठकक विचारके सम्बोधन करैथि तऽ हमर ईच्छा अछि जे ओ अपन तेसर कृतिक लाल डायरी आ जिद्दी कथाके उपन्यासक रुपमे आगामी दिनमे रचना करथि । लाल डायरी आ जिद्दी पढैत काल हम कथामे एनाक डुवलहुँ जे एकर कथाक रुपमे अन्त हमरा दुःखीत कऽ देलक । ताहि कारणे ई प्रतिक्रिया लिखवाक लेल हम विवश भऽ गेलहूँ । ओ दूनु कथाक कथ्य गजब छल आ तहिना शिल्प । जिद्दी कथा संग्रहक पहिल कथा “फूल फुलाइएकऽ रहल” मे जाहि तरिकासँ नायिका अपना आगु आएल समस्याके समाधान कयलक अछि एहि समाजक महिलासभक लेल एकटा उपदेश अछि । दोसर कथा “नव व्यापार”क महिला क्लब आ साधनाके अपना परिवार मे रहिकऽ एतेक वेशी स्वतन्त्रता मैथिल समाजमे जूनि भेटैय । तहिना तेसर कथा “खाली घर” आई काल्हि अपनाके आधुनिक बुझनिहार महिला जिनका अपने निर्णयसँ पाछतावा हुए, ताहिके कथाकार चित्रण करएमे सफल भेल छथि । चारिम कथा “लाल डायरी” । मुदा जतेक सत्य अछि यादवजीकें मृत्यु १७ गते भेल अछि, ओतवे निर्र्विवाद सत्य अछि फागुन १८ गते सांझ हमरा घरपर यादवजीके आएब जेकर प्रमाण लाल डायरी अछि । वाक्य हमरा झकझोरि देलक आ लागल वास्तवमे आदमीके शरीरे मरैत अछि आत्मा नहि । विज्ञान युगमे सेहो एहिबात के एहसास कराओल गेल अछि । एकर प्रस्तुति एहिमे सजिवता आनि देने अछि । तहिना पांचम कथा जिद्दी प्रत्येक परिवारक माता पिताके अपना धियापुताक देलजाएवला स्वतन्त्रताके सँग—सँग हुनका प्रति आओर जिम्मेवारीक उपदेश दैत अछि । सुुजीतक जादूक ओ सामान बेचनिहार युवती वास्तवमे हमरो सम्मोहित कऽ देलक । सातम कथा आदर्श हमरा कोनो खासे प्रभावित नई कऽ सकल । मुदा अर्थहीन यात्रामे नेहा, जिनकर व्यक्तित्व एक चुम्बक जेका छलैन्हि कोनो पुरुष स्वयं खिचाक चलि अबैत छल ताहिके ओ मात्रै नहि समाजक बहुतो नेहा सभ दुरुपयोग करैत छथि । जाहिके कारण हुनक वैवाहिक जीवन अस्वस्थ रहल । ई कथा मात्र नई समाजक ऐना अछि । व्यर्थक उडानक सम्बन्धमे एक्कहिटा बात कहब कि सुजीत जी मानव जातिक ओ उड़ान जे बहुत कम समयमे बहुत बड़का होइत छैक, जे बहुत थोर लोक बुझि सकैया ताहिके अत्याधिक चतुरताक संग प्रस्तुत कएने छथि । नवम कथामे नीमाद्वारा अपना पति सोहनक लेल कएल गेल व्यवहार पर जेना श्रीनाथ चिन्तित छलथि, हमरो मोनमे स्याह प्रश्न आएल कि सोहनक पत्नीक व्यवहार निष्ठा छल कि देखावा ? सङ्गग्रह एगारहम कथा केहन सजायक चमेलीक प्रश्न — कोन अधिकारसं ओ हमरा पोसलन्हि आ फेर हमरा जनसागरमे भंसा देलन्हि, हम जन्मसँ अनाथ छी , ओतही पलितहुँ एहि गन्दा वातावरणक असरि तऽ नहि पडितए । हमर विश्वास किए तोड़ल गेल ? प्रश्न मात्रे चमेलीक नै भऽ समाजक प्रत्येक बच्चाक अछि, जे पोसपुत वा सतवा माता पिताकसंग रहैथ छथि आ दुःख भोगैत छथि । अन्तिम कथा मेनकाके हमर ह्ृदयसं धन्यवाद अछि । की आब तऽ अहँु नीना बनि गेल छीक जवाफ नहि ओ चिचएलहि आ एकटा सुखी परिवार विध्वंश होबए सँं बचि गेल । ई कृतिक रचनाकारक विषयमे कहलजाए त हमरा चिन्हल जानलमे सुजीतजी सन बहुत कम छथि जिनका मुहसँं कहियो अपशब्द नहि सुुनलहुँ आ सदिखनी हँसैंत रहैत छथि । समग्रमे जिद्दी कथा संग्रह एकबेर सभके पढबाक चाही हमर तऽ इहे सल्लाह अछि । किताबक प्रिन्टिङ्ग, डिजाइन सेहो बढिया अछि । प्रकाशकके सेहो धन्यवाद देब जे बढिया किताब पढबाक अवसर देलन्हि । कैलास दास, पत्रकार, जनकपुर महिलाक प्रेरक कथा संग्रह ‘जिद्दी’ समाजके परिपक्व, विकृति आ विसंगति रहित वातारणक निर्माणमे साहित्यके महत्वपूर्ण योगदान होइत अछि । हमरा एतेक भूमिका लिखएके पाछु मैथिली भाषाक युवा साहित्यकार एवं पत्रकार सुजीत कुमार झा तेसर कृति कथा संग्रह ‘जिद्दी’ पढ़लाक बाद लागल । हुनकाद्वारा लिखित कथा संग्रह ‘जिद्दी’मे १२ टा कथा राखल गेल अछि । ओना कथा लिखबाक काज गहन अध्ययन चिन्तन आ लम्बा समयक साधना बिना सम्भव नहि होइत अछि । मुदा कथा लिखैतकाल लेखककेँ लेखन समय सन्दर्भ, सामाजिक वातावरण आदी इत्यादिसभकेँ ध्यान देबए पड़ैत अछि । ताहिमे युवा पत्रकार तथा कथाकार सुजीतकुमार झा लगभग सफल देखल गेल छथि । ओ एकटा कथाकार मात्र नहि छथि, विभिन्न सञ्चारमाध्यममे काज कऽ कऽ अनुभव प्राप्त करवाक गन्ध एहि कथा संग्रहमे देखल गेल अछि । कथा संग्रह ‘जिद्दी’ मनोवैज्ञानिकढ़ङ्ग सँ सत्यक खोजी करैत अछि । प्रत्येक कथाकेँ एहिना बढाओल गेल अछि जे पाठक पढैत—पढैत आब आगा कि हएत कहैत आश्चर्यमे पड़ि जाइत अछि आ कथाक अन्त होइत अछि । डा. राजेन्द्र विमलक शब्दमे सुजीतक कथाक घटना परिघटना ज्यामितिय चित्र जेकाँ एक दोसरकेँ कटैत, ओझरबैत सोझरबैत आगा बढैत रहैत अछि । कथाक तीर सनसनाइत जाइत अछि आ अर्जूनक लक्ष्य भेद जेकाँ सुगाक आँखिमे मात्र भेदन करैत अछि । ‘फूल फुलाइए कऽ रहल’ कथा उच्च कुलशील, सुशिक्षिता नायिका पिंकी अन्तरद्वन्दमे फसल रहैत अछि । पिंकी एमए पास कएने अछि । बेटी कतबो पढल लिखल किए नहि होइक दोसरकेँ घरमे जाए पड़ैत छैक वएह बुझि बेटी बेसी पढाबएकेँ आवश्यकता ई समाज नहि बुझैत अछि । मुदा पिंकीक मायबाबु बेटा बेटी समान होइत अछि कहि एहि प्रथाकेँ तोडवाक प्रयास कऽ अपन बेटी पिंकीकेँ एमए धरि पढबैत अछि । जखन पिंकीक मायबाबु विवाहक लेल समतुल्य बरक खोजी करैत छथि तऽ लडका पक्षक अभिभावकसभ पिंकीक पढाइक महत्व नहि बुझि दहेज मांगैत अछि । पिंकीक मायबाबु मांग अनुसार दहेज नहि दऽ सकलापर पिंकीक विवाहक उमेर वितैत जाइत अछि । एक दिन पिंकीक बाबु रेल यात्रा कएने रहथि । ओहि क्रममे स्वजाति युवा सँ भेटघाट होइत अछि आ ओ लडका अपने सहायक स्टेशन मास्टर रहल परिचय दैत अछि । पिंकीक माय बाबु पिंकीक सम्बन्धक चर्चा ओ लडका सँग करैत अछि आ सहायक स्टेशन मास्टर रहल लडका ओ कथा स्वीकार करैत अछि । इम्हर पिंकी सेहो सहायक स्टेशन मास्टर सुनिकऽ अपने भाग्यमानी छी समझि हर्षित रहैत अछि आ विवाह सेहो होइत अछि । किछु महिनामे पिंकीकेँ सभ यथार्थ जानकारी भऽ जाइत अछि । जे लडका हुनका सँ सहायक स्टेशन मास्टर कहि कऽ विवाह कएने रहैत अछि अपन सम्पूर्ण समर्पण कएने रहैत अछि ओ लडका स्टेशन मास्टर नहि एकटा साधारण पैटमैन रहैत अछि । सुनलाक बाद पिंकी किछु समयक लेल क्षतविक्षत भऽ पागल जेकाँ करय लगैत अछि । ओकरा आँखि सँ निन्न गाएब भऽ जाइत अछि आ रात भरि सोचिते रहि जाइत अछि । पिंकी अपन मोनमे ठानि लैत अछि जे धोखेबाज लडका संग नहि रहब ? व्याकुल भऽ जाइत अछि । रातभरि ओ नहि सुतैत अछि । फेर भोर होइते सोचैत अछि आब हम कि करु ? सम्बन्ध विच्छेद कएलाक बाद कतए जाउ ? घरक लोकसभ कि कहत ? एहिमे मायबाबुक कि दोष ? धीरे–धीरे हिम्मत जुटा संकल्प लैत अछि केहनो भेलाक बादो अपन श्रीमानकेँ स्टेशन मास्टर बनाए कऽ छोडब । हुनक श्रीमान् एसएलसी धरि मात्र पढल रहैत अछि । हुनका क्याम्पसमे नाम एडमिशन करा अपनो एकटा बोर्डिङ्ग स्कुलमे नोकरी करय लगैत छथि । सात वर्षमे ओ श्रीमानकेँ एमए पास करबैत अछि तकरबाद हुनका स्टेशन मास्टरमे नियुक्त होइत अछि । सात वर्षमे हुनकासभकेँ एकटा बेटा सेहो होइत अछि । ई कथा पढलाक बाद काली दासक घटना स्मरण अबैत अछि । काली दासक सेहो प्रेरणाक स्रोत कनिए छल ।एहि कथामे सेहो करीब—करीब एहने संदेश रहल अछि । ‘नयाँ व्यापार’ कथामे रोगग्रस्त नायक जितेन्द्र प्रसाद आ महत्वकाँक्षी हुनक श्रीमती बीचक अवस्थाकेँ चित्रण कएल गेल अछि । अतिमहत्वाकाँक्षाक कारण लोक कतए चलि जाइत अछि से एहि कथामे देखाओल गेल अछि । तहिना तेसर कथा ‘खाली घर’मे परिवारिक जीवनमे होबएबला उथल—पुथलकेँ बढिया सँ चित्रण कएल गेल अछि । संगहि एकर निष्कर्ष परिवार संस्थाकेँ बढाओल गेल अछि । एहन कथा ‘आर्दश’मे सेहो अछि । विवाह संस्थाकेँ तोडला पर अन्ततः पछताए पडैत अछि । दुनू कथाक निष्कर्ष रहल अछि । ‘लाल किताब’ कथाक माध्यम सँ भुतप्रेतक बातकेँ देखाओल गेल अछि । विज्ञान कतए सँ कतए पहुँच गेलाक बादो भूतप्रेतक कथासभ आबि रहल अछि । ‘जिद्दी’ कथा एकटा महिलाक महत्वकांक्षा आ ओतए सँ उत्पन्न परिस्थितिकेँ देखाओल गेल अछि । अपने नहि कऽ सकल काज बेटीक माध्यम सँ कएल जा रहल अछि । एहि कारण माय बेटीकेँ हरेक इच्छा पुरा करैत अछि । ई हरेक इच्छा बेटी व्याभिचारिणी आ दुव्र्यसनी भऽ जाइत अछि । ‘निष्ठा की देखावा’ कथा आधुनिकताक नाममे देखल गेल बिकृति दिस संकेत कएने अछि । एक गोटे महिलाकेँ पति सँ बेसी पतिक मृत्युक बाद अपने कोना सुरक्षित रहब तकर चिन्ता रहैत अछि । वर्तमान समयमे समाज कतए चलि गेल आ ओकर नहि नीक अवस्थाकँे चित्रण कएल गेल अछि । ‘केहन सजाय’ कथा संग्रहक सभ सँ बढिया आ कमजोर दुनू अछि । जे कथ्य एहिमे उठाओल गेल अछि ओ गजबकँे अछि । मुदा एकर अन्तिम निष्कर्षकेँ कथाकार सुजीत सुकान्त बनेबाक प्रयासमे आगिकेँ ठण्डा कऽ देने छथि । ‘मेनका’ आ ‘जादु’ कथा सेहो बढिया अछि । समग्रमे कहल जाए तऽ सुजीत कुमार झाक कथाक विषय चयन, बनावट तथा भाषा शैली बढिया अछि । हुनक पहिल कथा संग्रह चिडैÞ सँ शुरु भेल यात्रा उडान भड़ि रहल संकेत दऽ रहल अछि । मुदा साहित्य साधनाक विषय अछि । जतेक साधना कएल जाए फल ओतक बढिया प्राप्त होइत अछि । तएँ साधनाकेँ निरन्तरता देबए पड़तन्हि । 'अंगना सुखल घरमे पानि' 'अंगना सुखल, घरमे पानि, भरि बर्खा उपछु पानि ।' एकर मतलव स्पष्ट रुपे सभ किओ बुझि गेल होएब जे वर्षा होइते नगरमे रहयवाला सभकेँ कतेक सुख आ कतेक आनन्द अबैत अछि । आनन्दक मतलब सडक पर गंगा जमुना जेकाँ पानिक धार बहैत रहैत अछि आ लोक सभ मोटरसाइकिल, साइकिल, जीपकार चला-चला कऽ आनन्द लैत रहैत अछि । ओतबे नै, बौआ बुच्ची सभ पानिक आनन्द अओर बेसीए लैत रहैत अछि। ओ सभ अपन दुर्दशा बिसरि जाइत अछि, पानिमे खेलबाक क्षणमे । ओतबे कहाँ, बुद्धिजीवी सभ सडकक दुनू कात बड आनन्द पूर्वक ठाढ. पानिक आनन्द उठबैत रहैत अछि । देखबामे अबैत अछि, सडक कातमे रहल दोकान सभमे पानि घुसल अछि । कोनो दोकानदार समान सभ निचाँ-उपर करएमे व्यस्त नजरि अबैत छथि तँ कोनो पानि उपछैत-उपछैत अपसिहात भेल रहैत छथि । ओइ समयमे ओ दृश्यकेँ कतेको गोटे मनोरञ्जनकेँ रुपमे लैति छथि तँ कतेको गोटे दु:ख व्यक्त करैत छथि। ओना वर्षा बन्द भेलाक बाद दू-चारि घण्टामे सडकक पानि बहि नदीमे चलिए जाइत अछि। मुदा घरमे पैसल पानि एकटा पोखरिक आकार लऽ कऽ दू चारि दिन धरि घर विहीन कऽ दैत अछि । जिनकर बीस/पच्चीस वर्ष पुरान घर अछि, हुनका घर रहितो गाम घरसँ बेकार जीवन रहय लेल बाध्य कऽ दैत अछि। उपरसँ वर्षा आ निचा घरमे पोखरि जकाँ पानि । आखिर सोचियौ एकर दोषी के छथि? नगरमे रहयवाला लोक वा नगर विकासक सम्बन्धमे सोचएवाला बुद्धिजीवी, कर्मचारी अथवा नेपाल सरकार? कोनो नगर विकासक लेल एकटा कानून होइत अछि । आ ओइ कानूनक दायरामे रहि कऽ विकास करबाक दायित्व सभ गोटेकेँ होइत अछि । मुदा एहेन प्रावधान जनकपुरमे नै अछि । नहिये अखन धरि छलै । एकर नतीजा अछि 'अंगना सुखल घरमे पानि' । प्रत्येक वर्ष नयाँ घर बनैत अछि । पुरनका घर सँ दू चारि फिट उपर । नयाँ सडक बनैत अछि एक दू फिट उपर । एहने यदि बेरबेर होइत रहलैक तँ नगर भितर रहएबला कहियो शहरक अनुभूति नहिए कऽ सकैत अछि। घर निर्माणक लेल घरक ऊँचाइ, सड़क उचाइक मापदण्ड लाबही टा पड़तै । ओतबे नै आब बनयवाला घर शहरक अनुरुप होएबाक चाही तइपर सभ गोटेकेँ विचार करए पड़तैक । नै तँ जहिनाक तहिना। ई तँ वर्षाक समस्या भेल। गर्मीक समस्या सेहो किछु कम नै अछि। सड़कसँ आगि उगलैत रहैत अछि । बाटमे चलबाक ककरो हिम्मत नै होइत अछि । ओतबे कहाँ जनकपुरक प्राय: सभ कलक पानि सेहो सुखा जाइत अछि । जनकपुर धार्मिक पर्यटकीय स्थल मात्र नै अछि, र्इ एकटा मिथिलाक राजधानी सेहो अछि । धर्म संस्कृति, कला, भेषभूषा आ माता जानकीक जन्म स्थल। किन्तु शहरक जे संरचना होएबाक चाही, विकासक गति आ सोच होएबाक चाही से कोशो दूर पाछु अछि। जनकपुरमे आबि कऽ माता जानकीक दर्शन कएला सँ पर्यटक मात्र धन्य-धन्य नै हएत । पर्यटक लेल पर्यटकीय वातारणकेँ बनाबए पड़तै। पर्यटकक लेल मनोरञ्जनात्क, दार्शनिक, घुमफिर करयवाला शुद्ध वातावरण होएबाक चाही। पर्यटक सभ कोनो समय, मौसम, दिन, महिनामे आबि सकैत छथि । मुदा सोचियौ यदि पर्यटक चैत बैशाखक कडा धूपमे आबि जाए तँ हुनका सभक लेल कोनो पार्किङ्ग, आनन्द करयवाला स्थल, घुमफिर करयवाला बाटघाट नै अछि। कडा धूपमे एक ठाम सँ दोसर ठाम नै आबि जा सकैत छी । सडकपर नाक मुँह कपडासँ झाँपि कऽ चलए पडैत छैक । साउन भादबमे पर्यटक आएल तँ नै नाला आ नै सडकक पता लगा सकैत अछि । सभ गोटेकेँ जनकपुरक बात बुझल अछि मुदा सभक चुप्पी प्रश्न चिन्ह ठाढ. कऽ दैत अछि। जनकपुरक बुद्धिजीवी सभ जनकपुरक शहरीकरण आ धार्मिक पर्यटकीय स्थल बनेबाक लेल कतए हेरा गेल छथि। विचार विमर्श आ विकास दिस अग्रसर होबए लेल हुनका सभकेँ कोन गेठरीमे बान्हि देल गेल अछि से नै खुलि रहल अछि । एकटा कहावत छैक 'आवश्यकता अविष्कारक देन होइत अछि ।' तँए यदि जनकपुरक विकासक आवश्यकता बुझाइत अछि तँ जनताकेँ सडकपर आबहे पडतै । नै तँ 'अंगना सुखल, घरमे पानि, भरि बरखा उपछु पानि ।' खोजय पड़त मातृत्व बालगीत हमरा अखनो स्मरण अछि बाल्यकालमे हमरा सभक खेलय वाला एकटा समूह छल । ओहिमे लडका–लडकी के अछि कोनो मतलव नहि । एकटा हाफ पैन्ट आ गँजी लगा कऽ कोनो आम गाछ होए वा घरक दलान चाहे कोनो सार्वजनिक स्थल किए नहि होएँ । झुण्ड बना कऽ कबड्डी, आम गाछी, गोटी गोटी सँगहि खपडाके फुटलहवा लऽकऽ जमिनमे चिर पारि ‘रेङ्ग, रेङ्ग ’खेलतहुँ त कखनो विद्यालय के घर या अपने दलाने मे जा कऽ पाच गोटे मिलकऽ ‘झिझिर कोनो झिझिर कोना कोन, कोन कोना जाउँ । साउस मारलक ठुमका पुतौहुँ कोना जाउँ’ स्मरण अबय त मनेमन अखनो मुस्की सेहो होबय लगय । ओहि समय केँ बहुत किछु याद त नहि अछि मुदा एकटा हाँस्य व्यँङ्ग हम सभ एहनो करैत छली । ‘अण्टा रे भण्टा हम दू भाई पटना जाई झुमका लाई सासु के पहिनाई तऽ पुतहुँ झुमकाई ।’ लेकिन आई हम सभ फेर सँ ओहि बाल अवस्था सभक बीच जाएबाक मौका मिलैत अछि तऽ आश्चर्य लगैत अछि । ओना तऽ पहिले जाका बच्चा सभक झुण्डो नहि अछि । आ एछियो तऽ ओकरा सभक बीचमे एहन गीत सुनवाक अवसर मिलैत अछि– ‘परदेशी, परदेशी, जाना नही मुझे छोडके, मुझे छोड्के ।’ ‘चलि आना तू...तू.. पान की दूकान पे साढे तीन साढे तीन बजे ...।’ गाम ओहे छैक मुदा दलान नहि अछि । बच्चा बुच्ची ओहने अछि मुदा वातारण नहि । गाछवृक्ष छैक लेकिन ओ समूह आब नहि । मातृत्व बाल गीत (फकरा) के स्थान मे हिन्दी, अँग्रेजी,भोजपुरी वातावरण सभ ठाममे छा गेल छैक । कखनो काल हमरा सभक बीच झगडो होइत छल मुदा मुडही, लाई, चाउरक रोटी, भूजा खाएक लेल मुदा अखन देखैत छी सिंगरेट, दारु, गुटका पान परागके लेल आई हमर भाज त काल्हि तू नहि खुवाएबे त देखैबो कहि क झगडा करैत अछि । वास्तव मे कखनो काल बडा आश्चर्य होइत अछि कि देखते–देखते ऐहन परिवर्तन कोना भऽ गेलय । एकटा हम सभ रही जे गुरु जी के देखते नुका जाई । मायबाबु आ अपना से बडका से हरदम डर लगाय । आई परिवर्तन सँगहि बच्चामे शिष्टाचार, आदर स्वभाव किछुओ नहि अछि । कोन बुढ, कोन जवान सभलगय एक समान । तखन एकर दोषी के त ? अवसय एहन वातावरण बनाबयमे हमरे सभक दोष अछि । जाधरि हम कमजोर नहि भेली त हिन्दी, अँग्रेजी आ भोजपुरी वातावरण हमरा उपर कोना चढि गेल । एकर खोजी करबाक अखनो आवश्यकता अछि । जाधरि मैथिली मातृत्व बाल साहित्य के अगाडि नहि लाएब तऽ दोसरक कला संस्कृति भेषभूष आ वातावरण एहने हमरा सभक उपर लदाइत रहत । ऐकर परिणाम भेटत भूखमरि, लुटपाट, धोखाधरी एतबे नहि अपन बालबच्चा अपने माय बाबु के भुला कऽ कखन की करत नहि कहि सकैत छी । तँ एकरा सभक दूर करबाक लेल मैथिली मातृत्व बाल साहित्यके अगाडि बढाबही पडत । ओना तऽ गैर सरकारी संस्था आसमान नेपाल बालबालिकाक लिखल ‘बाल शक्ति पत्रिका’ तीन महिना पर प्रकाशित कय रहल अछि । एहि सँ ओकर समाधान नहि अछि । ओहि मे एकदूगो बाल कविता सँ मात्र मैथिली मातृत्व के नहि बचा सकैत छी । ऐकरा लेल एखनो बुढ पुरानक बात विचार आ ओहिक समय वातावरण के ब्यख्या करही टा पडत । म्याराथन दौड़ आ जनकपुर जनकपुरक रंगभूमी मैदानमे शनिदिन भेल म्याराथन दौड़ प्रतियोगिता एखन धरिक ऐतिहासिक आ प्रथम रहल अछि । आयोजकक अनुसार एहि प्रतियोगितामे २० देशक सहभागीक आमन्त्रण कएल गेल छल । मुदा १८ देशक खेलाडी सभक भीसा पास नहि भेलाक कारण भारत आ नेपालक ७५ जिल्लाक एहि प्रतियोगितामे मात्र सहभागी भऽ सकल । ओना जनकपुरक लेल बहुत पैघ प्रतियोगिता छल । आयोजकक अनुसार चारि महिना पहिले सँ एकर तैयारी भऽ रहल छल । मुदा शनिदिन प्रतियोगिताक सफलता भेटल । स्थानीयवासीसभ म्याराथनक खेलाडी सभकँे सडक पर दौड़ देखि कऽ ताली बजा स्वागत कएने छलथि । भोरे सँ नगरक सफाई सँगहि पुुलिस, ट्राफिक आ एहिमे खटल स्वयं सेवक सभ व्यवस्थित करएमे जुटल छल । म्याराथन प्रतियोगिता तीन चरणमे बाटल गेल छल । फुल म्यराथन, मिनी म्याराथन आ भेन्ट्रान्स म्याराथन । मिनी म्यराथनमे खास कऽ जनकपुरक स्कुल सभक धियापुता सभक सहभागीता छल । भेन्ट्रान्स प्रतियोगितामे ४० वर्ष उमेरक व्यक्ति सभक सहभागिता छल आ फुल म्याराथनमे नेपाल भारत सँ आएल खेलाडी सभक सहभागिता छल । फुल म्याराथन प्रतियोगिता ४२ किलोमिटरक धरि छल । जनकपुरक रंगभूमि मैदान सँ प्रारम्भ भेल दौड़ ढल्केवर पहुँच कऽ फेर सँ जनकपुर आएल छल । मिनी म्यराथन प्रतियोगिता जनकपुरक रिङ्ग रोड कायम कएने छल । ई दौड देखबाक लेल नगर भितर स्थानीयवासी सभक भीड छल तऽ जनकपुर ढल्केवर सडकखण्डमे पुलिस स्वयं सवेक मात्र नहि एहि क्षेत्रक ग्रामीण जनता सभ उत्साह पूर्वक सडकक कातमे ठाढ़ भऽ खेलाडी सभकेँ ताली बजा कऽ स्वगत कएने छल । बीच बीचमे खेलाडी सभक लेल पानिकँे सेहो व्यवस्था छल । फुल म्याराथनमे प्रथम होबएवलाकँे ५० हजार, दोसर होबएवला २५ हजार आ तेसर होबएवला १० हजार पुरस्कार देल गेल अछि । तहिना मिनी म्याराथनमे प्रथम होबएवलाके १० हजार, दोसर होबएवलाके ५ हजार आ तेसर होबएवलाके ३ हजारक पुरस्कार देल गेल अछि । भेन्ट्रान्स म्याराथन विजेताक लेल प्रमाणपत्र देल गेल अछि । कोनो खेलाडीक लेल पुरस्कार सँ महत्वपूर्ण हुनक प्रतिभा पर देश आ समाज गौरवान्वित होइत अछि । शनिदिन भारत आ नेपाल बीच भेल खेलमे नेपाली खेलाडी मात्र विजयी भऽ सकल अछि । एहि सँ अनुमान लगाओल जा सकैया जे एखनो नेपालक मधेशमे भावी खेलाडी सभ अछि । मुदा हुनका सभक अवसर नहि भेटलाक कारण ओ सभ अपन प्रतिभा देखाबए सँ वञ्चित होइत आएल छथि । स्वास्थ्यए जीवन अछि आ स्वस्थ्य रहबाक लेल खेलकुदक विकास आवश्यक अछि । एकटा कहावत अछि जे जतए कला सँस्कृति आ खेलक विकास होइत अछि ओतए पूर्ण स्वास्थ्य वातावरणक विकास होइत अछि । तएँ कहल जाए तऽ म्याराथन प्रतियोगिता सँ एतुका धियापुताकँे मात्र नहि सम्पूर्ण नगरवासीक लेल गौरवक विषय छल । एहिमे सहयोग करएवला सभक धन्यवाद आवश्य देबहेटा पड़त । म्याराथन प्रतियोगिता जाहि रुप सँ व्यवस्थित होएवाक चाहि ओ तऽ नहि भेल मुदा आयोजकक प्रयासकँे सेहो धन्यवाद देबहे पड़त । शनिदिन ऐतिहासिक धरोहर रंगभूमि मैदानमे खेलाडी सभक उत्साह आ उमंग सँ खचाखच भडल छल । खास कऽ कहल जाए तऽ स्थानीय बालबालिका जखन दौड रहल छल ओकरा पाछू हुनक अभिभावक सेहो देखिकऽ बड खुशी व्यक्त करैत छल कि जीत मात्र सफलता नहि होइत अछि । कम्तिमे एहि प्रतियोगितामे भाग लेबाक लेल अवसर तऽ भेटल । मिनी म्याराथन प्रतियोगिताक सहभागी विद्यार्थी सभक अखन धरि किताब आ टिवीमे मात्र देखि कऽ कल्पना कएने होइतो मुदा शनिदिन जखन स्वयं सहभागी भेल तऽ हुनका सभक एकटा सिख भेटलन्हि जे हमहँु सभ आबएवला दिनमे जीतक सफलताक प्रयास करी । ई प्रतियोगिता सँ जनकपुर धार्मिक पर्यटकीय सँगहि खेलकुदक एकटा भूमि सेहो अछि सन्देश दऽ रहल अछि । ओना एहि प्रतियोगिताक सफलतामे साथ देने सम्पूर्ण युवा क्लव, संघ संस्था सहितक व्यक्ति सभक धन्यवाद नहि एहि सँ पैघ काज करवाक उम्मिद रखवाक अपेक्षा करैत छी । डॉ प्रफुल्ल कुमार सिंह “मौन” पंचदेवोपासक भूमि मिथिला हिमालयक पादप्रदेशमे गंगासँ उत्तर, कोशीसँ पश्चिम एवं गण्डकसँ पूर्वक भूभाग सांस्कृतिक मिथिलांचलक नामे ख्यात अछि। मिथिलांचलक ई सीमा लोकमान्य, शास्त्रसम्म्त ओऽ परम्परित अछि। सत्पथब्राह्मणक अंतःसाक्ष्यक अनुसारे आर्यलोकनिक एक पूर्वाभिमुखी शाखा विदेह माथवक नेतृत्वमे सदानीरा (गण्डक) पार कऽ एहि भूमिक अग्नि संस्कार कऽ बसिवास कएलनि, जे विदेहक नामे प्रतिष्ठित भेल। कालान्तरमे एकर विस्तार सुविदेह, पूर्व विदेह, ओऽ अपर विदेहक रूपेँ अभिज्ञात अछि। विदेहक ओऽ प्राथमिक स्थलक रूपमे पश्चिम चम्पारणक लौरियानन्दनगढ़क पहिचान सुनिश्चित भेल अछि। आजुक लौरियानन्दनगढ़ प्राचीन आर्य राजा लोकनि एवं बौद्धलोकनिक स्तूपाकार समाधिस्थल सभक संगम बनल अछि। कालक्रमे अहि इक्षवाकु आर्यवंशक निमि पुत्र मिथि मिथिलापुत्रक स्थापना कयलनि। प्राचीन बौद्धसाहित्यमे विदेहकेँ राष्ट्र (देश) ओऽ मिथिलाकेँ राजधानीनगर कहल गेल अछि। अर्थात् मिथिला विदेहक राजधानी छल। मुदा ओहि भव्य मिथिलापुरीक अभिज्ञान एखन धरि सुनिश्चित नहि भेल अछि। तथापि प्राचीन विदेहक सम्पूर्ण जनपदकेँ आइ मिथिलांचल कहल जाइछ। ओऽ मिथिलांचलक भूमि महान अछि, जकर माथेपर तपस्वी हिमालयक सतत वरदहस्त हो, पादप्रदेशमे पुण्यतोया गंगा, पार्श्ववाहिनी अमृत कलश धारिणी गंडक ओऽ कलकल निनादिनी कौशिकीक धारसँ प्रक्षालित हो। एहि नदी मातृक जनपदकेँ पूर्व मध्यकालीन ऐतिहासिक परिवेशमे तीरभुक्ति अर्थात् तिरहुत कहल गेल, जकर सांस्कितिक मूलमे धर्म ओऽ दर्शनक गांभीर्य, कलासभक रागात्मक उत्कर्ष, ज्ञान-विज्ञानक गरिमा ओऽ भाषा-साहित्यक समृद्ध परम्पराक अंतः सलिला अंतर्प्रवाहित अछि। एहि सभक साक्षात् मिथिलाक शैव-शाक्त, वैष्णव, गाणपत्य, सौर (सूर्य) ओऽ बौद्ध-जैनक आस्था केन्द्र एवं ऋषि-मुनिक साधना परम्परामे उपलभ्य अछि। प्रकारान्तरसँ ओहि स्थल सभकेँ सांस्कृतिक चेतनाक ऐतिहासिक स्थलक संज्ञा देल जाऽ सकैछ, जकर आइ-काल्हि पर्यटनक दृष्टिसँ महत्व बढ़ि गेल अछि। मिथिलाक प्रसिद्धि ओकर पाण्डित्य परम्परा, दार्शनिक-नैयायिक चिन्तन, साहित्य-संगीतक रागात्मक परिवेश, लोकचित्रक बहुआयामी विस्तार, धार्मिक आस्थाक स्थल, ऐतिहासिक धरोहर आदिक कारणे विशेष अनुशीलनीय अछि। जनक-याज्ञवल्क्य, कपिल, गौतम, कणाद, मंडन, उदयन, वाचस्पति, कुमारिल आदि सदृष विभूति, गार्गी, मैत्रेयी, भारती, लखिमा आदि सन आदर्श नारी चरित, ज्योतिरीश्वर, विद्यापति, विनयश्री, चन्दा झा, लाल दास आदि सन आलोकवाही साधक लोकनिक प्रसादे एहि ठामक जीवन-जगतमे आध्यात्मिक सुखानुभूति ओऽ सारस्वत चेतनादिक मणिकांचन संयोग देखना जाइछ। मिथिला आध्यात्म विद्याक केन्द्र मानल जाइछ। आजुक मिथिलांचलक संस्कृति उत्तर बिहारमे अवस्थित वाल्मीकिनगर (भैँसालोटन, पश्चिम चम्पारण) सँ मंदार (बाँका, भागलपुर) धरि, चतरा-वाराह क्षेत्र (कोशी-अंचल, नेपाल) सँ जनकपुर-धनुषा (नेपाल) धरि ओऽ कटरा (चामुण्डा, मुजफ्फरपुर), वनगाँव-महिषी, जयमंगला (बेगूसराय), वारी-बसुदेवा (समस्तीपुर), कपिलेश्वर-कुशेश्वर-तिलकेश्वर (दरभंगा), अहियारी-अकौर-कोर्थु(मधुबनी), आमी(अम्बिकास्थान, सारण), हरिहरक्षेत्र (सोनपुर, सारण) वैशाली आदि धरि सूत्रबद्ध अछि। एहि सभ धार्मिक तीर्थस्थल सभक परिवेक्षणसँ प्रमाणित होइछ जे मिथिलांचल पंचदेवोपासक क्षेत्र अछि। कालान्तरमे एहिसँ बौद्ध ओऽ जैन स्थल सभ सेहो अंतर्मुक्त भऽ आलोच्य भूभागकेँ गौर्वान्वित कयलनि। पंचदेवोपासक क्षेत्रक अर्थ भेल- गणेश, विष्णु, सूर्य, शिव ओऽ भगवतीक क्षेत्र। एहिमे सूर्य सर्वप्राचीन देव छथि एवं शिव सर्वप्राचीन ऐतिहासिक देवता छथि। विघ्नांतक गणेशक पूजन प्राथमिक रूपेँ कयल जाइछ एवं मातृपूजनक संदर्भमे भगवती अपन तीनू रूपमे लोकपूजित छथि अर्थात् दुर्गा, काली, महालक्ष्मी एवं सरस्वती। भगवती शक्तिक आदि श्रोत छथि, जनिकामे सृष्टि, पोषण ओऽ संहार (लय) तीनू शक्ति निहित अछि। मुदा लोकक लेल ओऽ कल्याणकारिणी छथि। धनदेवी लक्ष्मीक परिकल्पना वैष्णव धर्मक उत्कर्ष कालमे भेल छल एवं ओऽ विष्णुक सेविका (अनंतशायी विष्णु), विष्णुक शक्ति (लक्ष्मी नारायण) एवं देवाभिषिक्त (गजलक्ष्मी) भगवतीक रूपमे अपन स्वरूपक विस्तार कयलनि। ओना तँ लक्ष्मी ओऽ सरस्वतीकेँ विष्णुक पर्श्वदेवीक रूपमे परिकल्पना सर्वव्यापक अछि। लक्ष्मी ओऽ गणेशक पूजन सुख-समृद्धिक लेल कयल जाइछ। प्राचीन राजकीय स्थापत्यक सोहावटीमे प्रायः गणेश अथवा लक्ष्मीक मूर्ति उत्कीर्ण अछि। पंचदेवोपासना वस्तुतः धार्मिक सद्भावक प्रतीक अछि। मिथिलांचलमे एहि पाँचो देवी-देवताक स्वतंत्र विग्रह सेहो प्राप्त होइछ। भारतीय देवभावनाक विस्तारक मूलमे भगवती छथि, जे कतहु सप्तमातृकाक रूपमे पूजित छथि तँ कतहु दशमहाविद्याक रूपमे। सप्तमातृका वस्तुतः सात देवता सभक शक्ति छथि- ब्रह्माणी (ब्रह्मा), वैष्णवी (विष्णु), माहेश्वरी (महेश), इन्द्राणी (इन्द्र), कौमारी (कुमार कार्तिकेय), वाराही (विष्णु-वाराह) ओऽ चामुण्डा (शिव)। एहि सप्तमातृकाक अवधारणा दानव-संहारक लेल संयुक्त शक्तिक रूपमे कयल गेल छल, जे आइ धरि पिण्ड रूपेँ लोकपूजित छथि। मुदा एक फलक पर सप्तमातृकाक शिल्पांकनक आरम्भ कुषाणकालमे भऽ गेल छल। चामुण्डाकेँ छोड़ि सभटा देवी द्विभुजी छथि। सभक एक हाथमे अम्तकलश एवं दोसर अभयमुद्रामे उत्कीर्ण अछि। मिथिलांचलक लोकजीवनमे जनपदीय अवधारणाक अनुसार सप्त मातृकाक नामावली भिन्न अछि। मुदा बिढ्क्षिया माइ (ज्येष्ठा, आदिमाता, मातृब्रह्म) सभमे समान रूपेँ प्रतिष्ठित छथि। यद्य सप्तमातृकाक ऐतिहासिक प्रस्तर शिल्पांकन एहि भूभागसँ अप्राप्य अछि, मुदा दशमहाविद्याक ऐतिहासिक मूर्ति सभ भीठभगवानपुर (मधुबनी) एवं गढ़-बरुआरी (सहरसा)मे उपलभ्य अछि। पंचदेवोपासक भूमि मिथिला भारतीय देवभावनाक उद्भव एवं विकासक अनुक्रम शास्त्र-पुराणमे अभिव्यंजित अछि, जकर प्रत्यक्ष दर्शन मिथिलांचलमे प्राप्य देवी-देवताक ऐतिहासिक मूर्ति सभमे होइछ। एकटा ब्रह्म (आदिब्रह्म, परब्रह्म)क परिकल्पनासँ सृष्टि संभव नहि। अतः मातृब्रह्मक अवधारणाक जन्म भेल, मुदा ओऽ संयुक्त अर्थात् अर्धनारीश्वरक रूपमे पैकल्पित भेलाह।, जे कुर्सी नदियामी (बेनीपुर, दरभंगा/ राजनगर, मधुबनी) गामक अघोषित प्राचीन मूर्ति संग्रहालयमे संरक्षित अछि। एहि षटभुजी प्रस्तर मूर्तिक वाम भाग नारीक एवं दहिन भाग पुरुषक अछि। एहि षटभुजी प्रस्तर मूर्तिक वाम भाग नारीक एवं दहिन भाग पुरुषक अछि। हिनक हाथ सभमे त्रिदेव (ब्रह्मा-विष्णु-महेश)क आयुध व उपकरण सभ शोभित अछि- अक्षमाला, त्रिशल ओ वरमुदा एवं पोथी, गदा ओ भयमुद्रा। मुदा सृष्टिक लेल पार्थक्यक आवश्यकता अनुभूत कएल गेल। फलतः देवस्वरूप ब्रह्मा-विष्णु-महेश (त्रिदेव)क परिकल्पना मूर्त कयल गेल। भच्छी (बहेड़ी, दरभंगा)क त्रिमूर्ति एकर उत्कृष्ट उदाहरण अछि। आलोच्य त्रिमूर्तिक मुख्य रूप ब्रह्माक थिक। रूपविन्यासमे दाढ़ी, हाथमे अक्षमाला ओ कमण्डलु, यज्ञोपवीत, मुकुट ओ वाहनक रूपमे हंस उत्कीर्ण अछि। मूर्ति चतुर्भुजी अछि। भच्छीक शिवमन्दिरमे पूजित आलोच्य मूर्ति यद्यपि मूलरूपमे ब्रह्माक अलावा शिव ओ विष्णुक प्रतीकसँ अलंकृत अछि। मिथिलांचलमे ब्रह्माक पूजा प्रायः वर्जित मानल गेल अछि, तथापि ब्रह्मा भच्छी (दरभंगा) ओ विथान (समस्तीपुर)मे अवशिष्ट छथि। भारतीय प्रतिमा विज्ञानमे कल्याणसुन्दर (शिवपार्वती परिणय)क मूर्तिमे ब्रह्मा पुरोहितक रूपमे उत्कीर्ण छथि। संयुक्त मूर्तिक एहि परम्परामे हरिहर (विष्णु-शिव)क उल्लेख आवश्यक अछि। मूर्तिक दहिन भागमे शिव ओ वाम भागमे विष्णु उत्कीर्ण भेल छथि। शिवक अर्द्धाङ्गक सूचक अछि जटा, त्रिशूल ओ नाग एवं अर्द्धाङ्ग विष्णु बोधक किरीट, चक्र ओ शंख अछि। हरिहरक सर्वांग सुन्दर ओ अक्षत पालकालीन प्रस्तर प्रतिमा वाल्मीकिनगर (नेपाल दिस) एवं हरिहरक्षेत्र (सारण)मे संरक्षित अछि। शैव ओ वैष्णव सम्प्रदाय मध्य समन्वयक एकटा उपक्रम बनि गेल हरिहरक परिकल्पना। हरि ओ हर वस्तुतः एके छथि- “भल हर, भल हरि, भल तुअ कला। खनहि पीतवसन, खनहि बघछला”। हरिहर क्षेत्र संगम तीर्थ बनल अछि। एहि ठाम प्रतिवर्ष कार्तिक पूर्णिमाक अवसरपर विशाल मेला लगैत अछि। पौराणिक कथाक अनुसार एहिठाम गज-ग्राहक संघर्षक अंत विष्णुक हाथे भेल छल। एवं प्रकारे त्रिमूर्तिक परिकल्पनामे प्रतीकात्मक तत्व निहित अछि- सृजन, पालन ओ संहारक शक्ति। ब्रह्मचार्य, गार्हस्थ्य ओ संन्यासक संग-संग सात्विक राजसी ओ तामसी वृत्तिक समन्वय। तहिना हरिहरक परिकल्पनाक पृष्ठभूमिमे अन्तर्निहित अछि साम्प्रदायिक सद्भाव, जे ओहि युगक लेल अनिवार्य बनि गेल छल। साम्प्रदायिक विखण्डनसँ सामाजिक एकता खण्डित होइत अछि। आलोच्य त्रिदेवमे देवाधिदेव महादेव शिवक स्थान सर्वोच्च अछि। शिवक पुरातात्विक सर्वप्राचीन अवशेषक रूपमे मोहनजोदड़ोक पशुपति शिव अछि, जे समस्त जीव-जन्तुक अधिपति बनल छथि। शिवकेँ गार्हस्थ जीवनक अधिष्ठाता मानल गेल अछि, फलतः ओ समस्त गृहस्थ लोकनिक पूज्य बनल छथि। हिनक लीला विस्तार पुराण-साहित्यक अतिरिक्त भारतीय मूर्तिकलामे सेहो देखना जाइछ। शैव परिवारमे शिवक अलावा पार्वती, गणेश ओ कार्तिकेय सेहो शास्त्र ओ लोकपूजित बनल छथि। त्रिदेवमे मात्र शिवक गार्हस्थ्य जीवनक एकटा विलक्षण अवधारणा बनल अछि। शिव औघरदानी छथि, कल्याणकारी देवता छथि एवं कालानुसार प्रलयंकर शिव अत्यंत प्राचीन एवं मिथिलांचलक सर्वप्रिय देवता छथि। ओना तँ शिवक परिकल्पना वैदिक थिक तथापि शिव-शक्तिक गौरवगान शैव पुराण सभमे विशेष रूपेँ भेल अछि। तदनुसार शिव स्वरूपक परिकल्पना प्राचीन मुदा अहिमे प्रत्यक्ष रूपे अंकित अछि। कुषाणराज वसुदेवक मुद्रापर शिव ओ हुनक वाहन वृषभ उत्कीर्ण अछि। हिनक सौम्य ओ रौद्ररूप दुनू प्रत्यंकित अछि। माथपर चन्द्रमा, हाथमे त्रिशूल, पिनाक व डमरू, त्रिनेत्र, बघछला, रुद्राक्ष, नागभूषण, वृषभ वाहन आदि विशिष्ट पहिचान बनल अछि। हुनक सौम्य रूप कल्याणसुन्दर, ललितरूप उमामाहेश्वर ओ रौद्ररूप महाकालमे अभिव्यंजित अछि। शिव नृत्य देवता नरेशक रूपमे सेहो विन्यस्त छथि। नटराज शिवक एकटा विलक्षण पालकालीन प्रस्तर मूर्ति तारालाही (दरभंगा)मे पूजित अछि। एहि मूर्तिमे नटराज शिव दैत्यपुत्र अपस्मारक कान्हपर ठाढ़ भऽ नृत्यरत छथि। चतुर्भुजी शिवक उपरका दुनू हाथमे गजासुरक वध निर्दिष्ट अछि। गजक पीठपर गणेश आसीन छथि। शेष चारिटा हाथमे त्रिशूल, डमरू ओ नृत्यमुद्रा सूचित अछि। एहि तरहक एकटा पालयुगीन प्रस्तर मूर्ति पपौर(सिवान)मे सेहो हम देखने छलहुँ। मूर्ति साढ़े चारि फीटक अछि। मध्यकालीन परिवेशमे शैव प्रतिमामे सर्वाधिक लोकप्रियता उमा-माहेश्वरकेँ प्राप्त भेलैक। एहि तरहक मूर्ति सभ मिथिलांचलक भीठ-भगवानपुर, रक्सौल राजेश्वर, बाथे, महादेवमठ, तिरहुता, सौराठ, भोजपरौल, वनवारी, गाण्डीवेश्वर, कोर्थ, सिमरिया-भिण्डी, डोकहर, मंगरौनी ओ वसुदेवामे प्राप्त अछि। एहि मूर्तिमे उमा(पार्वती) शिवक वाम जांघपर बैसल छथि। शिव वाम हाथसँ उमाक आलिंगन कऽ रहल छथि। शिवक दहिन हाथमे त्रिशूल ओ वामहाथसँ देवीक वाम अंगक स्पर्श कऽ रहल छथि। पाठपीठमे शिव-पार्वतीक वाहन क्रमशः वृषभ ओ सिंह विश्रामक स्थितिमे उत्कीर्ण अछि। संभवतः एहि मूर्तिक परिकल्पना शंकराचार्यक सन्यासक विपरीत गृहस्थाश्रम दिस उत्प्रेरित करैत अछि। पार्वतीक अभिशिल्पन स्वतँत्र रूपेँ सेहो भेल अछि। फुलहर (गिरिजा स्थान, मधुबनी), मिरजापुर (दरभंगा) ओ भरवारी (समस्तीपुर) क मन्दिर सभमे स्थापित ओ पूजित गिरिजा वस्तुतः पार्वतीक प्रतिरोप छथि, जाहिमे फुलहर ओ मिरजापुरक गिरीजाक मध्यकालीन प्रस्तर प्रतिमा सभक पार्श्वमे गणेश ओ कार्तिकेय सेहो प्रतिष्ठित छथि। दर्पण गिरिजाक विशिष्ट पहचान बनल अछि। किछु उमा-माहेश्वरक प्राचीन प्रतिमामे सेहो पार्वतीक हाथमे दर्पण सुशोभित छनि। दर्पण श्रृंगार सूचक प्रतीक अछि। सभटा मूर्ति स्थानक मुद्रामे बनल अछि एवं नख-शिख विभिन्न आभूषणसभसँ अलंकृत अछि। मूर्तिमे गणेश ओ कार्तिकेयक उपस्थिति हुनक वात्सल्य बोधक अछि। दरभंगाक मिरजापुर मोहल्लामे अवस्थित एवं म्लेच्छमर्दनीक रूपे लोकख्यात ई , मूर्ति सर्वांग सुन्दर ओ कलात्मक अछि। फुलहरक गिरीजा रूपेँ पूजित पार्वतीक विशेष पूजा जानकी करैत छलीह। ’रामचरित मानस’क फुलवारी प्रसंगक अनुरूपेँ गिरीजा आइयो कुमारी कन्या लोकनिक अभीष्ट बनल छथि। शिव-पार्वतीक प्रतीकपूजन जलढरीमे अवस्थित शिवलिंगक रूपमे सेहो लोकप्रचलित अछि। मुदा शिवलिंगमे पार्वतीमुखक अभिशिल्पन एकमुखी शिवलिंग अथवा गौरीशंकरक रूपेँ अभिज्ञात अछि। एकमुखी शिवलिंगक सर्वप्राचीन प्रस्तर मूर्ति (कुषाणकालीन) चण्डीस्थान (अरेराज, प. चम्पारण) मे हम देखने छलहुँ। एकमुखी शिवलिंग जमथरि (मधुबनी), हाजीपुर (वैशाली), आदिक अतिरिक्त चतुर्मुखी शिवलिंगक गुप्तकालीन प्रतिमा कम्मन छपरा ( अभिलेखयुक्त, वैशाली)क अलावा बनियाँ (वैशाली)क पालयुगीन चतुर्मुखी शिवलिंगक परम्परामे अरेराज (प.चम्पारण)क शिवमन्दिरमे चतुर्मुखी पशुपति शिवलिंग संपूजित अछि। एम्हर गढपुरा (बेगुसराय)क मंदिरमे एकटा प्राचीन चौमुखी महादेवक लोकपूजन परम्परीत अछि। शिवलिंगक परिकल्पना ज्योतिलिंग (द्वादश ज्योतिर्लिंग), एकादशरुद्र (मंगरौनी), सहस्रमुखलिंग (कटहरिया, वैशाली/ वारी, समस्तीपुर)क अतिरिक्त विशाल शिवलिंग (तिलकेश्वर, दरभंगा/ चेचर, वैशाली), घूर्णित, शिवलिंग (जमथरि, मधुबनी) आदि सूचित अछि। कुशध्वज जनक द्वारा स्थापित कुशेश्वर, सीरध्वज जनक द्वारा प्रतिष्ठापित तिलकेश्वर, कपिल द्वारा स्थापित कपिलेश्वर, विदेश्वरक अंकुरित शिवलिंग, अरेराजक सोमेश्वरनाथ, कलनाक कल्याणेश्वर शिव, ऋषिशृंग द्वारा स्थापित सिंहेश्वरनाथ, नेपाल तराइक जलेश्वर आदि प्रसिद्ध शिवतीर्थ अछि, जाहिठाम प्रायः प्रत्येक रविवार शिवरात्रि आदिक अलावा सावनमे भरि मास शिवक जलाभिषेक होइछ। परिसरमे शिवभक्तक बोलबमक जयघोष, कांवरिया सभक तीर्थवास, मेलादि लगैत अछि। शिवरात्रिक मेला विशेष महत्वक होइछ। सद्योजात (अलौलीगढ़, बेगुसराय/ जनकपुर, नेपाल) मे शिव शिशु रूपमे ओ पार्वती माता रूपमे उत्कीर्ण अछि, तांत्रिक मूर्ति। गणेश यद्यपि शिवपुत्र छथि, मुदा पंचदेवोपासनामे ओ प्रथम छथि। कोनो शुभ कार्यक आरम्भमे गणेश पूजन कयल जाइछ। कियेक तँ ओ विघ्ननाशक ओ सिद्धि दाता देव मानल जाइत छथि। मुख्य लक्षण मानल जाइछ-ठिगना कद, लम्बोदर, सूढ़, हाथमे अंकुश (परशु), कलम एवं लड्डू। हाथ सभक संख्या चारिसँ बारह धरि मानल जाइछ। ओ स्थानक ललितासनमे बैसल अथवा नृत्य मुद्रामे निर्मित पाओल जाइछ। मन्दिरक प्रवेश द्वारपर गणेशक प्रतिष्ठा देल जाइछ। गणेशक स्वतंत्र प्रतिमा कोर्थू, हावीडीह, भीठ-भगवानपुर, सौराठ, देकुली, फुलहर, करियन, भोज परौल, बहेड़ा, भच्छी, विष्णु बरुआर, लहेरियासराय, रतनपुर आदि स्थान सभमे पूजल जाइत छथि। माता शिशुक रूपमे पार्वतीक गोदमे शिशु गणेशक अलावा गणेशक मूर्ति लक्ष्मी (लक्ष्मी गणेश, दिपावली)क संग ओ महिषासुरमर्दिनी दुर्गा (पार्वती रूपा)क पर्श्व देवताक रूपमे संरचनाक लोकपरम्परा अछि। विजयादश्मीक अवसरपर परम्परासँ बनैत महिषासुरमर्दिनी दुर्गाक पार्श्वदेवता गणेश ओ कार्तिकेय मानल जाइत छथि। कार्तिकेयक स्वतंत्र प्रस्तर प्रतिमा सभ (पालयुगीन) बसाढ़ (वैशाली) एवं वसुआरा (मधुबनी)क मन्दिरसभमे प्रतिष्ठित एवं पूजित अछि। कार्तिकेय युद्धक देवता मानल जाइत छथि। हिनका स्कन्द ओ महासेनक रूपमे सेहो जानल जाइत छनि। कार्तिकेयक मूर्तिमे मोरक वाहन एवं हाथमे बरछी (शूल)क विधान अभिहित अछि। दुनू प्रस्तर प्रतिमा पाल कलाक कलात्मक प्रतिमान अछि। पुण्ड्रवर्धनमे कार्तिकेयक मन्दिरक उल्लेख सेहो प्राप्त होइछ। पुण्ड्रवर्धनक भौगोलिक पहिचान पूर्णियाँक(जनपदक)सँ कयल गेल अछि। शिव परिवारक एकटा विशाल संगमर्मर मूर्ति लालगंज (वैशाली)क शिवमन्दिरमे स्थापित एवं पूजित अछि। वृषभक पीठपर शिव-पार्वती आसीन छथि। गणेश ओ कार्तिकेय अपन माता-पिता (शिव-पार्वती)क गोदीमे बैसल छथि। शिल्प ओ शैलीमे आलोच्य मूर्ति विलक्षण अछि। शिव परिवारक एकटा आर देवता छथि भैरव, जनिक आकृति भयानक, बढ़ल पेट, गरामे मुण्डमाल, नागाभूषण, हाथमे त्रिशूल आदि शोभित अछि। भैरवक विशाल प्रस्तर मूर्ति वठिया (भैरव बलिया, सकरी, दरभंगा)मे पूजित अछि। भैरव ज्वालमुकुट पहिरने छथि। एहि भैरव मूर्तिक दोसर प्रति भमरलपुर संग्रहालयसँ प्राप्त भेल अछि। भैरवकेँ शिवक रौद्ररूप कहल गेल अछि। नेपाल उपत्यका (काठमाण्डू)मे भैरवक मूर्तिसभक अनेक प्रकार देखने छलहुँ- आकाश-भैरव, पाताल भैरव, काल भैरव, उन्मत्त भैरव आदि। कुमारी कन्या लोकनिक हेतु उन्मत्त भैरवक पूजन वर्जित अछि। शिवक काशीमे वर्चस्व छनि (विश्वनाथ) तँ भैरवक वर्चस्व तिरहुतमे मानल गेल अछि। काशीकेँ शिव अपने रखलनि, भैरव तिरहुत देल। मिथिलांचलमे शिव भक्तिक रूपमे नचारी गान ओ नर्त्तनक विधान अछि। मैथिलीमे बहुतरास नचारी रचल गेल। आइने अकबरीमे नचारी गानक उल्लेख प्राप्त होइछ। नचारीक एकटा अर्थ भेल- लचारी, अर्थात् नचारी गीतसभमे दुख-दैन्यक भाव अभिव्यंजित अछि। दोसर अर्थ भेल नृत्यक आचारसँ संवलित गीत अनुष्ठान। नचारी गयनिहार डमरूक संगे नाचि-नाचि कए गबैत छथि। गीत ओ नृत्य एकटा आनुष्ठानिक कृत्य थिक। भक्तिपरक गीतसभमे नचारीक स्थान विशिष्ट अछि। “संगीत भाष्कर”क अनुसार “गीतं वाद्यं तथा नृत्यं त्रयं संगीतमुच्यते” अर्थात् गीत, नृत्य ओ वाद्य मिलकए संगीत सृजित होइछ। जँ एहिमे नाट्यक समावेश कए देल जाय तँ एहि प्रकारक सांगीतिक रचना कीर्तनियाँ बनि जाइछ। “हरगौरी विवाह” (जगज्योतिर्मल्ल) शिव-भक्ति विषयक एकटा सांगतिक रचना थिक जाहिमे नचारी गीत सेहो प्रतिध्वनित अछि। भारतीय देवभावनाक उद्भव एवं विकासक अनुक्रम शास्त्र-पुराणमे अभिव्यंजित अछि, जकर प्रत्यक्ष दर्शन मिथिलांचलमे प्राप्य देवी-देवताक ऐतिहासिक मूर्ति सभमे होइछ। एकटा ब्रह्म (आदिब्रह्म, परब्रह्म)क परिकल्पनासँ सृष्टि संभव नहि। अतः मातृब्रह्मक अवधारणाक जन्म भेल, मुदा ओऽ संयुक्त अर्थात् अर्धनारीश्वरक रूपमे पैकल्पित भेलाह।, जे कुर्सी नदियामी (बेनीपुर, दरभंगा/ राजनगर, मधुबनी) गामक अघोषित प्राचीन मूर्ति संग्रहालयमे संरक्षित अछि। एहि षटभुजी प्रस्तर मूर्तिक वाम भाग नारीक एवं दहिन भाग पुरुषक अछि। एहि षटभुजी प्रस्तर मूर्तिक वाम भाग नारीक एवं दहिन भाग पुरुषक अछि। हिनक हाथ सभमे त्रिदेव (ब्रह्मा-विष्णु-महेश)क आयुध व उपकरण सभ शोभित अछि- अक्षमाला, त्रिशल ओ वरमुदा एवं पोथी, गदा ओ भयमुद्रा। मुदा सृष्टिक लेल पार्थक्यक आवश्यकता अनुभूत कएल गेल। फलतः देवस्वरूप ब्रह्मा-विष्णु-महेश (त्रिदेव)क परिकल्पना मूर्त कयल गेल। भच्छी (बहेड़ी, दरभंगा)क त्रिमूर्ति एकर उत्कृष्ट उदाहरण अछि। आलोच्य त्रिमूर्तिक मुख्य रूप ब्रह्माक थिक। रूपविन्यासमे दाढ़ी, हाथमे अक्षमाला ओ कमण्डलु, यज्ञोपवीत, मुकुट ओ वाहनक रूपमे हंस उत्कीर्ण अछि। मूर्ति चतुर्भुजी अछि। भच्छीक शिवमन्दिरमे पूजित आलोच्य मूर्ति यद्यपि मूलरूपमे ब्रह्माक अलावा शिव ओ विष्णुक प्रतीकसँ अलंकृत अछि। मिथिलांचलमे ब्रह्माक पूजा प्रायः वर्जित मानल गेल अछि, तथापि ब्रह्मा भच्छी (दरभंगा) ओ विथान (समस्तीपुर)मे अवशिष्ट छथि। भारतीय प्रतिमा विज्ञानमे कल्याणसुन्दर (शिवपार्वती परिणय)क मूर्तिमे ब्रह्मा पुरोहितक रूपमे उत्कीर्ण छथि। संयुक्त मूर्तिक एहि परम्परामे हरिहर (विष्णु-शिव)क उल्लेख आवश्यक अछि। मूर्तिक दहिन भागमे शिव ओ वाम भागमे विष्णु उत्कीर्ण भेल छथि। शिवक अर्द्धाङ्गक सूचक अछि जटा, त्रिशूल ओ नाग एवं अर्द्धाङ्ग विष्णु बोधक किरीट, चक्र ओ शंख अछि। हरिहरक सर्वांग सुन्दर ओ अक्षत पालकालीन प्रस्तर प्रतिमा वाल्मीकिनगर (नेपाल दिस) एवं हरिहरक्षेत्र (सारण)मे संरक्षित अछि। शैव ओ वैष्णव सम्प्रदाय मध्य समन्वयक एकटा उपक्रम बनि गेल हरिहरक परिकल्पना। हरि ओ हर वस्तुतः एके छथि- “भल हर, भल हरि, भल तुअ कला। खनहि पीतवसन, खनहि बघछला”। हरिहर क्षेत्र संगम तीर्थ बनल अछि। एहि ठाम प्रतिवर्ष कार्तिक पूर्णिमाक अवसरपर विशाल मेला लगैत अछि। पौराणिक कथाक अनुसार एहिठाम गज-ग्राहक संघर्षक अंत विष्णुक हाथे भेल छल। एवं प्रकारे त्रिमूर्तिक परिकल्पनामे प्रतीकात्मक तत्व निहित अछि- सृजन, पालन ओ संहारक शक्ति। ब्रह्मचार्य, गार्हस्थ्य ओ संन्यासक संग-संग सात्विक राजसी ओ तामसी वृत्तिक समन्वय। तहिना हरिहरक परिकल्पनाक पृष्ठभूमिमे अन्तर्निहित अछि साम्प्रदायिक सद्भाव, जे ओहि युगक लेल अनिवार्य बनि गेल छल। साम्प्रदायिक विखण्डनसँ सामाजिक एकता खण्डित होइत अछि। आलोच्य त्रिदेवमे देवाधिदेव महादेव शिवक स्थान सर्वोच्च अछि। शिवक पुरातात्विक सर्वप्राचीन अवशेषक रूपमे मोहनजोदड़ोक पशुपति शिव अछि, जे समस्त जीव-जन्तुक अधिपति बनल छथि। शिवकेँ गार्हस्थ जीवनक अधिष्ठाता मानल गेल अछि, फलतः ओ समस्त गृहस्थ लोकनिक पूज्य बनल छथि। हिनक लीला विस्तार पुराण-साहित्यक अतिरिक्त भारतीय मूर्तिकलामे सेहो देखना जाइछ। शैव परिवारमे शिवक अलावा पार्वती, गणेश ओ कार्तिकेय सेहो शास्त्र ओ लोकपूजित बनल छथि। त्रिदेवमे मात्र शिवक गार्हस्थ्य जीवनक एकटा विलक्षण अवधारणा बनल अछि। शिव औघरदानी छथि, कल्याणकारी देवता छथि एवं कालानुसार प्रलयंकर शिव अत्यंत प्राचीन एवं मिथिलांचलक सर्वप्रिय देवता छथि। ओना तँ शिवक परिकल्पना वैदिक थिक तथापि शिव-शक्तिक गौरवगान शैव पुराण सभमे विशेष रूपेँ भेल अछि। तदनुसार शिव स्वरूपक परिकल्पना प्राचीन मुदा अहिमे प्रत्यक्ष रूपे अंकित अछि। कुषाणराज वसुदेवक मुद्रापर शिव ओ हुनक वाहन वृषभ उत्कीर्ण अछि। हिनक सौम्य ओ रौद्ररूप दुनू प्रत्यंकित अछि। माथपर चन्द्रमा, हाथमे त्रिशूल, पिनाक व डमरू, त्रिनेत्र, बघछला, रुद्राक्ष, नागभूषण, वृषभ वाहन आदि विशिष्ट पहिचान बनल अछि। हुनक सौम्य रूप कल्याणसुन्दर, ललितरूप उमामाहेश्वर ओ रौद्ररूप महाकालमे अभिव्यंजित अछि। शिव नृत्य देवता नरेशक रूपमे सेहो विन्यस्त छथि। नटराज शिवक एकटा विलक्षण पालकालीन प्रस्तर मूर्ति तारालाही (दरभंगा)मे पूजित अछि। एहि मूर्तिमे नटराज शिव दैत्यपुत्र अपस्मारक कान्हपर ठाढ़ भऽ नृत्यरत छथि। चतुर्भुजी शिवक उपरका दुनू हाथमे गजासुरक वध निर्दिष्ट अछि। गजक पीठपर गणेश आसीन छथि। शेष चारिटा हाथमे त्रिशूल, डमरू ओ नृत्यमुद्रा सूचित अछि। एहि तरहक एकटा पालयुगीन प्रस्तर मूर्ति पपौर(सिवान)मे सेहो हम देखने छलहुँ। मूर्ति साढ़े चारि फीटक अछि। मध्यकालीन परिवेशमे शैव प्रतिमामे सर्वाधिक लोकप्रियता उमा-माहेश्वरकेँ प्राप्त भेलैक। एहि तरहक मूर्ति सभ मिथिलांचलक भीठ-भगवानपुर, रक्सौल राजेश्वर, बाथे, महादेवमठ, तिरहुता, सौराठ, भोजपरौल, वनवारी, गाण्डीवेश्वर, कोर्थ, सिमरिया-भिण्डी, डोकहर, मंगरौनी ओ वसुदेवामे प्राप्त अछि। एहि मूर्तिमे उमा(पार्वती) शिवक वाम जांघपर बैसल छथि। शिव वाम हाथसँ उमाक आलिंगन कऽ रहल छथि। शिवक दहिन हाथमे त्रिशूल ओ वामहाथसँ देवीक वाम अंगक स्पर्श कऽ रहल छथि। पाठपीठमे शिव-पार्वतीक वाहन क्रमशः वृषभ ओ सिंह विश्रामक स्थितिमे उत्कीर्ण अछि। संभवतः एहि मूर्तिक परिकल्पना शंकराचार्यक सन्यासक विपरीत गृहस्थाश्रम दिस उत्प्रेरित करैत अछि। पार्वतीक अभिशिल्पन स्वतँत्र रूपेँ सेहो भेल अछि। फुलहर (गिरिजा स्थान, मधुबनी), मिरजापुर (दरभंगा) ओ भरवारी (समस्तीपुर) क मन्दिर सभमे स्थापित ओ पूजित गिरिजा वस्तुतः पार्वतीक प्रतिरोप छथि, जाहिमे फुलहर ओ मिरजापुरक गिरीजाक मध्यकालीन प्रस्तर प्रतिमा सभक पार्श्वमे गणेश ओ कार्तिकेय सेहो प्रतिष्ठित छथि। दर्पण गिरिजाक विशिष्ट पहचान बनल अछि। किछु उमा-माहेश्वरक प्राचीन प्रतिमामे सेहो पार्वतीक हाथमे दर्पण सुशोभित छनि। दर्पण श्रृंगार सूचक प्रतीक अछि। सभटा मूर्ति स्थानक मुद्रामे बनल अछि एवं नख-शिख विभिन्न आभूषणसभसँ अलंकृत अछि। मूर्तिमे गणेश ओ कार्तिकेयक उपस्थिति हुनक वात्सल्य बोधक अछि। दरभंगाक मिरजापुर मोहल्लामे अवस्थित एवं म्लेच्छमर्दनीक रूपे लोकख्यात ई , मूर्ति सर्वांग सुन्दर ओ कलात्मक अछि। फुलहरक गिरीजा रूपेँ पूजित पार्वतीक विशेष पूजा जानकी करैत छलीह। ’रामचरित मानस’क फुलवारी प्रसंगक अनुरूपेँ गिरीजा आइयो कुमारी कन्या लोकनिक अभीष्ट बनल छथि। शिव-पार्वतीक प्रतीकपूजन जलढरीमे अवस्थित शिवलिंगक रूपमे सेहो लोकप्रचलित अछि। मुदा शिवलिंगमे पार्वतीमुखक अभिशिल्पन एकमुखी शिवलिंग अथवा गौरीशंकरक रूपेँ अभिज्ञात अछि। एकमुखी शिवलिंगक सर्वप्राचीन प्रस्तर मूर्ति (कुषाणकालीन) चण्डीस्थान (अरेराज, प. चम्पारण) मे हम देखने छलहुँ। एकमुखी शिवलिंग जमथरि (मधुबनी), हाजीपुर (वैशाली), आदिक अतिरिक्त चतुर्मुखी शिवलिंगक गुप्तकालीन प्रतिमा कम्मन छपरा ( अभिलेखयुक्त, वैशाली)क अलावा बनियाँ (वैशाली)क पालयुगीन चतुर्मुखी शिवलिंगक परम्परामे अरेराज (प.चम्पारण)क शिवमन्दिरमे चतुर्मुखी पशुपति शिवलिंग संपूजित अछि। एम्हर गढपुरा (बेगुसराय)क मंदिरमे एकटा प्राचीन चौमुखी महादेवक लोकपूजन परम्परीत अछि। शिवलिंगक परिकल्पना ज्योतिलिंग (द्वादश ज्योतिर्लिंग), एकादशरुद्र (मंगरौनी), सहस्रमुखलिंग (कटहरिया, वैशाली/ वारी, समस्तीपुर)क अतिरिक्त विशाल शिवलिंग (तिलकेश्वर, दरभंगा/ चेचर, वैशाली), घूर्णित, शिवलिंग (जमथरि, मधुबनी) आदि सूचित अछि। कुशध्वज जनक द्वारा स्थापित कुशेश्वर, सीरध्वज जनक द्वारा प्रतिष्ठापित तिलकेश्वर, कपिल द्वारा स्थापित कपिलेश्वर, विदेश्वरक अंकुरित शिवलिंग, अरेराजक सोमेश्वरनाथ, कलनाक कल्याणेश्वर शिव, ऋषिशृंग द्वारा स्थापित सिंहेश्वरनाथ, नेपाल तराइक जलेश्वर आदि प्रसिद्ध शिवतीर्थ अछि, जाहिठाम प्रायः प्रत्येक रविवार शिवरात्रि आदिक अलावा सावनमे भरि मास शिवक जलाभिषेक होइछ। परिसरमे शिवभक्तक बोलबमक जयघोष, कांवरिया सभक तीर्थवास, मेलादि लगैत अछि। शिवरात्रिक मेला विशेष महत्वक होइछ। सद्योजात (अलौलीगढ़, बेगुसराय/ जनकपुर, नेपाल) मे शिव शिशु रूपमे ओ पार्वती माता रूपमे उत्कीर्ण अछि, तांत्रिक मूर्ति। गणेश यद्यपि शिवपुत्र छथि, मुदा पंचदेवोपासनामे ओ प्रथम छथि। कोनो शुभ कार्यक आरम्भमे गणेश पूजन कयल जाइछ। कियेक तँ ओ विघ्ननाशक ओ सिद्धि दाता देव मानल जाइत छथि। मुख्य लक्षण मानल जाइछ-ठिगना कद, लम्बोदर, सूढ़, हाथमे अंकुश (परशु), कलम एवं लड्डू। हाथ सभक संख्या चारिसँ बारह धरि मानल जाइछ। ओ स्थानक ललितासनमे बैसल अथवा नृत्य मुद्रामे निर्मित पाओल जाइछ। मन्दिरक प्रवेश द्वारपर गणेशक प्रतिष्ठा देल जाइछ। गणेशक स्वतंत्र प्रतिमा कोर्थू, हावीडीह, भीठ-भगवानपुर, सौराठ, देकुली, फुलहर, करियन, भोज परौल, बहेड़ा, भच्छी, विष्णु बरुआर, लहेरियासराय, रतनपुर आदि स्थान सभमे पूजल जाइत छथि। माता शिशुक रूपमे पार्वतीक गोदमे शिशु गणेशक अलावा गणेशक मूर्ति लक्ष्मी (लक्ष्मी गणेश, दिपावली)क संग ओ महिषासुरमर्दिनी दुर्गा (पार्वती रूपा)क पर्श्व देवताक रूपमे संरचनाक लोकपरम्परा अछि। विजयादश्मीक अवसरपर परम्परासँ बनैत महिषासुरमर्दिनी दुर्गाक पार्श्वदेवता गणेश ओ कार्तिकेय मानल जाइत छथि। कार्तिकेयक स्वतंत्र प्रस्तर प्रतिमा सभ (पालयुगीन) बसाढ़ (वैशाली) एवं वसुआरा (मधुबनी)क मन्दिरसभमे प्रतिष्ठित एवं पूजित अछि। कार्तिकेय युद्धक देवता मानल जाइत छथि। हिनका स्कन्द ओ महासेनक रूपमे सेहो जानल जाइत छनि। कार्तिकेयक मूर्तिमे मोरक वाहन एवं हाथमे बरछी (शूल)क विधान अभिहित अछि। दुनू प्रस्तर प्रतिमा पाल कलाक कलात्मक प्रतिमान अछि। पुण्ड्रवर्धनमे कार्तिकेयक मन्दिरक उल्लेख सेहो प्राप्त होइछ। पुण्ड्रवर्धनक भौगोलिक पहिचान पूर्णियाँक(जनपदक)सँ कयल गेल अछि। शिव परिवारक एकटा विशाल संगमर्मर मूर्ति लालगंज (वैशाली)क शिवमन्दिरमे स्थापित एवं पूजित अछि। वृषभक पीठपर शिव-पार्वती आसीन छथि। गणेश ओ कार्तिकेय अपन माता-पिता (शिव-पार्वती)क गोदीमे बैसल छथि। शिल्प ओ शैलीमे आलोच्य मूर्ति विलक्षण अछि। शिव परिवारक एकटा आर देवता छथि भैरव, जनिक आकृति भयानक, बढ़ल पेट, गरामे मुण्डमाल, नागाभूषण, हाथमे त्रिशूल आदि शोभित अछि। भैरवक विशाल प्रस्तर मूर्ति वठिया (भैरव बलिया, सकरी, दरभंगा)मे पूजित अछि। भैरव ज्वालमुकुट पहिरने छथि। एहि भैरव मूर्तिक दोसर प्रति भमरलपुर संग्रहालयसँ प्राप्त भेल अछि। भैरवकेँ शिवक रौद्ररूप कहल गेल अछि। नेपाल उपत्यका (काठमाण्डू)मे भैरवक मूर्तिसभक अनेक प्रकार देखने छलहुँ- आकाश-भैरव, पाताल भैरव, काल भैरव, उन्मत्त भैरव आदि। कुमारी कन्या लोकनिक हेतु उन्मत्त भैरवक पूजन वर्जित अछि। शिवक काशीमे वर्चस्व छनि (विश्वनाथ) तँ भैरवक वर्चस्व तिरहुतमे मानल गेल अछि। काशीकेँ शिव अपने रखलनि, भैरव तिरहुत देल। मिथिलांचलमे शिव भक्तिक रूपमे नचारी गान ओ नर्त्तनक विधान अछि। मैथिलीमे बहुतरास नचारी रचल गेल। आइने अकबरीमे नचारी गानक उल्लेख प्राप्त होइछ। नचारीक एकटा अर्थ भेल- लचारी, अर्थात् नचारी गीतसभमे दुख-दैन्यक भाव अभिव्यंजित अछि। दोसर अर्थ भेल नृत्यक आचारसँ संवलित गीत अनुष्ठान। नचारी गयनिहार डमरूक संगे नाचि-नाचि कए गबैत छथि। गीत ओ नृत्य एकटा आनुष्ठानिक कृत्य थिक। भक्तिपरक गीतसभमे नचारीक स्थान विशिष्ट अछि। “संगीत भाष्कर”क अनुसार “गीतं वाद्यं तथा नृत्यं त्रयं संगीतमुच्यते” अर्थात् गीत, नृत्य ओ वाद्य मिलकए संगीत सृजित होइछ। जँ एहिमे नाट्यक समावेश कए देल जाय तँ एहि प्रकारक सांगीतिक रचना कीर्तनियाँ बनि जाइछ। “हरगौरी विवाह” (जगज्योतिर्मल्ल) शिव-भक्ति विषयक एकटा सांगतिक रचना थिक जाहिमे नचारी गीत सेहो प्रतिध्वनित अछि। अनुश्रुतिक अनुसार शिव मिथिलांचलक सर्वलोकप्रिय देवता छथि। गामे-गाम शिवक पूजन होइत अछि। ओ प्रागेतिहासिक, पौराणिक ओ लोकदेवता छथि। शास्त्र, पुराण, तंत्र, योग आदि ग्रंथसभमे हिनक माहात्म्य ओ दर्शन पाओल जाइछ। शंकराचार्य द्वारा स्थापित ज्योतिलिंगसभक विशाल भारतक धार्मिक एकताकेँ रेखांकित करैत अछि, तहिना काशी ओ मिथिलाक परिकल्पित परिक्रमाक अवधारणा आलोच्य शिवक्षेत्रकेँ महिमामंडन करैत अछि। शिवक पश्चात् विष्णुपूजनक प्रधानता मिथिलांचलमे अछि। तद्विषयक पुरातात्विक प्रमाणस्वरूप स्थापत्य (मंदिर) ओ मूर्तिसभ एहि विशाल भूभागमे उपलभ्य अछि। एहिठामक जनजीवनमे वैष्णवधर्मिताक साक्षात् दर्शन पंचदेवोपासनामे विष्णुपूजन भस्मी त्रिपुण्डक संगे चन्दन तिलक, रामनवमी, विवाह-पंचमी, जन्माष्टमी, सत्यनारायणपूजा आदि वैष्णवधर्मी अनुष्ठान, चतुःशंख अरिपन, अष्टदल अरिपनक विन्यास, वैष्णवधर्मी कीर्तनिया नाच आदिमे होइत अछि। गुप्तकालमे वैष्णव धर्मकेँ राजकीय संरक्षण प्राप्त भेने ओ अपन उत्कर्षपर छल। तत्युगीन वैष्णवधर्मी पुराणसभमे हिनक महिमा मंडन भेल अछि। विष्णु द्विभुजीसँ चतुर्भुजी भेलाह। समुद्रमंथनसँ प्राप्त लक्ष्मीकेँ हुनक सेवामे लगाओल गेलनि। लक्ष्मीनारायणक परिकल्पना कयल गेल। शेषशायी विष्णुक परिकल्पनाकेँ प्रस्तर शिल्पमे उत्कीर्ण कयल गेल। दशावतारक महिमा मंडनक क्रममे वराह अवतार ओ नरसिंह अवतारक मूर्तिसभ अपेक्षाकृत बेसी पाओल जाइछ। गुप्त राजा लोकनि वराह अवतारक माध्यमे पृथ्वी (साम्राज्य) उद्धारक रूपेँ प्रतीकित कयलनि। मिथिलांचलमे वराह अवतारक एकटा मध्यकालीन सुन्दर प्रस्तर मूर्ति तिलकेश्वरगढ़ (दरभंगा)सँ प्राप्त भेल अछि, जे सम्प्रति चन्द्रधारी राजकीय संग्रहालय (दरभंगा)मे संरक्षित अछि। तहिना नरसिंह अवतारक अभिशिल्पन दुष्टदलनक संदर्भमे कयल गेल, मुदा मिथिलांचलसँ एहि तरहक मूर्ति अप्राप्त अछि। मिथिलांचलमे गुप्त शासनकालसँ पाल-सेन ओ कर्णाट काल धरि वैष्णवधर्मी मूर्ति सभक निर्माण ओ प्रतिष्ठा व्यापक रूपेँ कयल गेल। पालवंशी राजा लोकनिक शासनकालमे यद्यपि सर्वधर्म समभावक (बौद्धमूर्ति अभिशिल्पनक कारणे) प्रधानता छल, मुदा सेन ओ कर्णाट शासन कालमे वैष्णव धर्मकेँ धार्मिक नवजागरणक रूपमे स्वीकार कयल गेल अछि। जयदेव, चैतन्य, विद्यापति, चण्डीदास, शंकरदेव आदि एहि सांस्कृतिक युगक साक्षात् वैष्णवधर्मी चेतना पुरुष छलाह, जनिका माध्यमे जनजीवन धरि आन्दोलित भेल। विष्णुक उल्लेख वेदमे पाओल जाइछ। मुदा पहिने ओ सूर्यक एकटा रूप छलाह। पाछाँ चलि कए एकटा प्रमुख देवता बनि गेलाह। बसाढ़ (वैशाली)क पुरातात्विक उत्खननसँ प्राप्त एकटा माटिक मोहरपर उत्कीर्ण त्रिशूलक अगल-बगलमे शंख ओ चक्र उत्कीर्ण अछि, ई निसंदेह विष्णु प्रतीक थिक। सम्भवतः ओ शिव ओ विष्णुक साहचर्यक सद्भाव प्रतीक अछि। एकटा दोसर मोहरपर उत्कीर्ण वेदीपर राखल चक्रक दुनूदिस शंख उत्कीर्ण अछि, जे निसंदेह वैष्णवधर्मी प्रतीक अछि। ई सभ गुप्तकालीन पुरावशेष अछि। विष्णुक मूर्ति विभिन्न आकार-प्रकारमे बनल मिथिलांचलमे प्राप्त होइछ।, जाहिमे द्विभुजी विष्णुक एक हाथमे शंख ओ दोसर वर मुद्रामे अछि। एहि रूपमे लोकपाल कहल जाइछ। एहितरहक एकटा विशाल विष्णुमूर्ति तिरहुतक कर्णाटकालीन राजधानी सिमरौनगढ़ (नेपाल तराइ)मे प्राप्त अछि। सिमरौनागढ़मे विष्णुक बहुतरास आदमकद चतुर्भुजी प्रतिमा सभ कंकाली मन्दिरक परिसरमे राखल अछि। विष्णुक माथपर किरीट ओ हाथसभमे शंख, चक्र, गदा ओ पद्म छाजीत छनि। मिथिलांचलमे चतुर्भुजी विष्णुक पाल, सेन ओ कर्णाटकालीन पाठरक मूर्तिसभ हुलासपट्टी, भीठभगवानपुर, अन्धरा ठाढ़ी, बिदेश्वर, भवानीपुर, जितवारपुर, जयनगर, नरार, अकौर, हावी भौआर, हावीडीह, पोखराम, लदहो, रखवारी, कनहई, कोर्थ, सोनहद, वोरवा, तुमौल, नेहरा, कुर्सो नदियामी, मदरीया, केवटी, भैरव बलिया, बसुदेवा, हाजीपुर, सोनपुर, सेहान आदिक अतिरिक्त सांस्कृतिक मिथिलांचलक सीमान्त क्षेत्र वाल्मीकिनगर (नेपाल तराइ) मे बहुतरास आदमकद विष्णु मूर्ति सभ प्राप्त भेल अछि। संख्यात्मक ओ गुणात्मक दृष्टिसँ विष्णुक सर्वाधिक प्राचीन प्रस्तर मूर्ति सभ मिथिलांचलक अकौर नेपाल तराइक समरौनागढ़ ओ वाल्मीकिनगरमे प्राप्त अछि, जाहिसँ ई निष्कर्ष निकालल जा सकैछ जे ओ सभ वैष्णवधर्मक क्षेत्रमे प्रमुख स्थल छल। अकौर गाममे विष्णुक छहटा प्राचीन प्रस्तर प्रतिमा सभ सहजेँ उत्खनित भए प्राप्त भेल अछि। डॉ. सत्येन्द्र कुमार झा डुमरा परसा (मधुबनी)क एकटा विलक्षण विष्णु मूर्तिक उल्लेख कयने छथि। चारि फीटक एहि मूर्तिक माथपर किरीटक स्थानपर नागफण (सत्ताइस)क अलंकरण कयल गेल अछि, जे शेषनागक प्रतीक अछि। एहि मूर्तिक रचनाकाल तेरहम चौदहम शताब्दी आंकल गेल अछि। सभटा प्रतिमामे विष्णु स्थानक मुद्रामे बनल छथि ओ हुनक पार्श्ववाहिनी रूपेँ चँवरधारिणी लक्ष्मी ओ वीणाधारिणी सरस्वती उत्कीर्ण छथि। पूर्व मध्यकालमे वैष्णव धर्म एहि क्षेत्रक एकटा लोकप्रिय सम्प्रदाय छल। विष्णुक एहि परम्परित स्वरूपक क्रममे किछु ऐतिहासिक विशिष्ट मूर्ति शिल्प प्राप्त भेल अछि। पहिल वसुदेवा (सिंगिया, समस्तीपुर)सँ प्राप्त विष्णुक वासुदेव रूप। चतुर्भुजी वासुदेवक हाथसभमे अग्निपुराण (अध्याय चौवालिस)क अनुसार उपरक हाथसभमे शंख-चक्र ओ निचलकामे गदा-कमल बनल अछि। माथपर किरीट ओ गलामे ठेहुन धरि वनमालाक अलंकरण। मुख्य मूर्तिक पार्श्व भागमे अनेक देवी-देवता सभ उत्कीर्ण छथि। दोसर अछि अवाम (उजान लग, दरभंगा)क शेषशायी विष्णु (४७” * २६”)। एहिमे शेषशय्यापर विश्राम करैत विष्णुक पैर दाबि रहल छथिन लक्ष्मी। नाभिसँ निकलल नाल कमलपर बैसल छथि ब्रह्मा। तेसर प्रतिमा अछि तिलकेश्वर ( दरभंगा)सँ प्राप्त वराह विष्णु (३४”)। वीर भावमे ठाढ़ एहि चतुर्भुजी मूर्तिक चारूहाथमे शंख, चक्र, गदा ओ पद्मक अतिरिक्त वाम स्कंधपर पृथ्वी बैसल छथि, जनिक उद्धार विष्णु वराह अवतारक रूपेँ कयलनि। वराहविष्णुक पादभागमे नागदेवी सभ हाथमे क्षत्र ओ कमल धयने छथि। वराह अवतारक एकमात्र स्वतंत्र प्रतिमा एकटा दुर्लभ ओ ऐतिहासिक उपलब्धि मानल जाइछ। तिलकेश्वर महादेव मन्दिरक द्वारखण्डपर कर्मादित्यक शिलालेख तिरहुतामे उत्कीर्ण अछि। संगमपर स्थापित एहि महादेवस्थानमे शिवरात्रिक मेला लगैत अछि। चारिम विष्णु-मूर्तिक एकटा ऐतिहासिक स्वरूप सेहान (वैशाली)सँ प्राप्त अछि, जे मध्यकालीन तिरहुत शैलीमे निर्मित मंदिरमे स्थापित ओ पूजित अछि। सेहानक विष्णु श्रीरामक रूपमे पूजित छथि। रामनवमीक अवसरपर एकटा विशाल मेला लगैत अछि। मूर्ति पालकालीन अछि। जनश्रुतिक अनुसार नरसिंह अवतारक एकटा स्थान पूर्णियाँ जिलाक मानिकथंभ (माणिक स्तंभ) नामक ग्राममे प्राप्त अछि, मुदा मूर्ति नहि अछि। मुदा कटिहार जिलाक वेलंदाक प्राचीन विष्णु मंदिर अपन जर्जर अवस्थामे प्राप्त अछि। एहि तरहेँ वैष्णव धर्मक व्याप्ति वाल्मीकि नगरीसँ लऽ कऽ कटिहार धरि देखना जाइछ। एहि क्रमे पाँचम उपलब्धि सोनपुर (सारण)क कालीमन्दिरक भीतमे अवस्थित एकटा मूर्ति फलक गरुड़वाही विष्णुक अछि, जाहिमे भगवान विष्णु गरुड़पर आरुढ़ भए हरिहरक्षेत्रक गजग्राह युद्धक समापनक लेल गजक आर्तपुकारपर आयल छलाह। सोनपुर हरि (विष्णु) हर (शिव)क नामित क्षेत्र मानल जाइछ। एवं प्रकारे मिथिलांचलमे विष्णुपूजन अनेक रूपमे उपलब्ध अछि। सूर्य वैदिक देवता ओ विष्णुक एकटा प्रतिरूप जकाँ पूजित छथि, मुदा ओ पंचदेवोपासनामे विशेष रूपमे प्रतिष्ठित छथि। मिथिलांचलमे सूर्यक वैदिक, पौराणिक ओ लौकिक तीनोक समन्वित रूप जनमानसपर अंकित अछि। सूर्यक स्थानक रूपक परिकल्पना मुख्यतः कुषाणकालमे मूर्त भेल। तदनुसार रथारूढ़ सूर्यक माथपर किरीट, दुनू हाथमे कमल-पुष्प, वाम भागक कमरसँ लटकैत तलवार हुनक मुख्य रूप छनि। कालान्तरमे पार्श्वदेवी देवताक अलंकरण सेहो विन्यस्त छल। पार्श्व देवताक रूपमे एक दिस दवात लेने पिंगल ओ दोसर दिस दण्ड लेने दण्डी। पैरमे लम्बा बूट ओ देह रक्षार्थ कवच, पैरक आगाँ बैसल रथवाहक अरुण। पार्श्वदेवीक रूपमे उषा ओ प्रत्यूषा उत्कीर्ण अछि। मिथिलंचलमे अनेक मध्यकालीन सूर्य मूर्ति सभ बरौनी जयमंगलगढ़ (बेगुसराय) भीठ भगवानपुर (मधुबनी), अन्धरा-ठाढ़ी (कमलादित्य, मधुबनी), देकुली, असगाँव-धर्मपुर (दरभंगा), कुर्सो नदियामी, रखबारी, परसा, भोज परौल, रतनपुर, विष्णु बरुआर, गाण्डीवेश्वर स्थान, सवास, छर्रापट्टी, अरई, कोर्थ, हावीडीह, डिलाही, नाहर भगवतीपुर, राजनगर, पस्टन, पटला, जगदीशपुर, देवपुरा आदिक अलावा चकवेदौलिया (बेगुसराय), तैयबपुर (वैशाली) आदि स्थान सभमे पाओल गेल एवं ओ प्रतिष्ठित-पूजित छथि। एहि ऐतिहासिक सूर्य प्रतिमा सभमे विशेष उल्लेखनीय अछि- परसा (झंझारपुर, मधुबनी)क सूर्य मूर्ति (४८*२४ सेमी.) जे प्रायः तेरहम सदीक कलाकृति अछि। ओ पालकालीन अलंकरणसँ बनल अछि। दोसर विशिष्ट सूर्यमूर्ति विष्णु बरुआर (मधुबनी)क अछि, जकरा द्वादश आदित्यक संज्ञा देल जाइछ। एहि मूर्तिमे द्वादश आदित्य उत्कीर्ण छथि। तेसर विशिष्ट सूर्यमूर्ति अछि, देवपुरा (बेनीपट्टी, मधुबनी) ओ रघेपुरा (दरभंगा)क जाहिमे देवपुराक मूर्तिमे उषा-प्रत्यूषा, दण्ड-पिंगलसँ अलंकृत तथा रघेपुराक सूर्यमूर्ति पालमूर्ति कलासँ भिन्न मिथिला शैलीमे निर्मित अछि। ई सभटा सूर्यमूर्ति पंच्देवोपासनाक एकटा प्रतीक रूपमे पोजित छथि, यद्यपि जनजीवनमे सूर्य पूजा छठीमइयाक रूपमे परम्परीत अछि। मिथिलांचलक चक वेदौलिया (बेगुसराय)मे एकटा प्राचीन सूर्यमन्दिरक प्राप्तिसँ ई धारणा बनैत अछि, जे ओ स्वतंत्र रूपेँ सेहो पूजित होइत छलाह। कन्दाहा सहरसा)मे सेहो एकटा स्वतंत्र ऐतिहासिक सूर्य मन्दिर अवशिष्ट अछि। सूर्य मूर्तिक प्रभावलीमे उत्कीर्ण अभिलेख स्वयं अपन ऐतिहासिक अस्तित्वक चर्च करैत अछि। अभिलेख नरसिंहदेवक अछि। ओऽ ओइनवार वंशीय छलाह। पंचदेवोपासनाक मूलमे भगवती केन्द्रित छथि आर मिथिलांचल शाक्तभूमि अथवा शाक्तपीठक रूपमे साधनाभूमि शताब्दियहुसँ बनल अछि। मिथिलांचलमे भगवती अपन अनेक रूपमे मूर्त भए पूजित छथि। वनगाँव-महिषीक उग्रतारा, विराटपुरक चण्डी, धमदाहाक कात्यानी (सहरसा जिलान्तर्गत) क अतिरिक्त उच्चैठ, फुलहर (मधुबनी), करियन समस्तीपुरक गिरीजा, मिरजापुर-दरभंगाक म्लेच्छमर्दिनी, कोइलखक भद्रकाली भगवती, वारी(समस्तीपुर)क भगवती तारा, अन्दामा (दरभंगा)क म्लेच्छमर्दिनी, जरैल-परसौन, कोइलख, भवानीपुर, भण्डारिसम (दरभंगा), भोजपरौल (मधुबनी), कोर्थ (दरभंगा)क काली, देकुली (दरभंगा)क भगवती, बहेड़ी ओ नाहरक महिषासुर मर्दिनी, कटरा (मुजफ्फरपुर) ओ कोइलख (महुबनी)क चामुण्डा, सिमरौनगढ़ (नेपाल तराइ) ओ वीरपुर (सहरसा)क कंकाली, सखड़ाक (नेपाल तराइ) छिन्नमस्ता एवं गढ़बरुआरी (सहरसा) ओ भीठभगवानपुर (मधुबनी)क दशमहाविद्यामे परिगणित देवी सभ प्रतिष्ठित ओ पूजित छथि। हम पुनामा-प्रतापनगर (नवगछिया)मे वाराहीक एकटा भव्य, विशाल ओ स्वतंत्र मध्यकालीन प्रस्तर मूर्ति देखने छलहुँ। भीठ-भगवानपुर ओ गढ़ बरुआरीक दशमहाविद्या कर्णाटकालीन कलाकृति थिक। भीठ-भगवानपुर कर्णाटराजा मल्लदेवक राजधानीनगर छल एवं गढ़वरुआरी कर्णाटवंशीय गन्धवरिया परमार राजपूत सभक क्षेत्र अछि। डॉ. हीरानन्द आचार्य राजनगर (मधुबनी)मे सेहो दशमहाविद्या भगवतीक मन्दिरक सूचना देने छथि। दशमहाविद्याक पूजोपासना तांत्रिक विधियेँ कयल जाइछ। जयनगरक मन्दिरक ऊपरी भागमे श्रीयन्त्र राखल छल। ध्यातव्य अछि जे खण्डवला कुलक राजा लोकनि शाक्तधर्मी छलाह। दरभंगा राज परिसरक श्यामा मन्दिर “मिथिलेश रमेशस्य चितायां सुप्रतिष्ठा’ चर्चिता साधना पीठ बनल अछि। मिथिलांचलक शाक्त साधनाक्षेत्रमे पूजित एवं प्रतिष्ठित अन्यान्य देवी सभमे गंगा-यमुनाक मध्यकालीन प्रस्तर मूर्तिसभ सेहो उपलभ्य अछि। ओना तँ गंगा-यमुनाक मूर्ति प्रायः राजकीय स्थापत्यमे निर्मित होयबाक परम्परा रहल अछि, अन्धराठाढ़ीक कमलादित्य स्थानमे राखल भग्न लक्ष्मीनारायणक अभिलिखित कर्णाट कालीन प्रस्तर मोर्तिक पार्श्वमे गंगा ओ यमुनाक उत्कीर्ण मूर्ति अवशिष्ट अछि। अभिलेखमे कर्णाट वंशक संस्थापक जेना राजा नान्यदेवक प्रशस्ति श्रीधर लिखने छथि। ठाढ़ीक प्रसिद्धि परमेश्वरी भगवतीक लेल सेहो अछि। गंगा ओ यमुनाक स्वतंत्र प्रस्तर मूर्ति नगर डीह (दरभंगा) ओ बरसाम (मधुबनी)मे प्राप्य अछि। गंगा मकरवाहिनी ओ यमुना कच्छप वाहिनी रूपेँ निर्मित छथि। वाम हाथमे कलश छनि एवं नाना आभूषणसँ अलंकृत अछि। शाक्त भूमि मिथिलांचलसँ भगवतीक प्रस्तर मूर्तिसभ उच्चैठ (मधुबनी), भोज परौल (मधुबनी), भंडारिसम (दरभंगा) ओ वारी (समस्तीपुर)सँ प्राप्त भेल अछि। उच्चैठक भगवतीक एकान्त साधक कालिदास छलाह। मूर्ति (३३”) चतुर्भुजी अछि। वाम हाथ सभमे त्रिशूल ओ अमृतकलश एवं दहिन हाथमे दर्पण (कमल पुष्पाकार) ओ लघुपात्र अछि। सिर, गला, कान, बाँहि, कलाइ, कमर ओ पैर आदि आभूषण सभसँ अलंकृत अछि। देहमे यज्ञोपवीत ओ वाहनक रूपमे सिंह उत्कीर्ण अछि। भगवती कमलासनपर आसीन छथि। भोज परौलक भगवतीमूर्ति (३५”) उच्चैठक भगवतीक समतुल्य अछि। भगवतीक तेसर प्रस्तर मूर्ति भंडारिसम (दरभंगा)क मन्दिरमे प्रतिष्ठित अछि। एहि चतुर्भुजी मूर्तिक (४८”) दहिन हाथमे खड्ग अछि। भगवती कमलपुष्पपर ललितासनमे बैसल छथि। पादपीठमे सिंह उत्कीर्ण अछि। आर सभटा विन्यास पूर्वत अछि। हिनका भगवती वाणेश्वरी सेहो कहल जाइछ। चारिम मूर्ति वारीर (समस्तीपुर)मे स्थापित ओ पूजित अछि। मुदा भगवती षटभुजी छथि (३४”)। वाम हाथमे ढाल, छतरी ओ अज्ञात पदार्थ एवं दहिन हाथसभमे अक्षमाला, खड्ग ओ अभय मुद्रामे अछि। शेष विन्यास पूर्ववत अछि। पंचम षटभुजी मूर्ति देकुली (दरभंगा)मे स्थापित अछि। एहि भगवती सभमे उच्चैठक भगवतीक स्थान सर्वोपरि अछि। भगवतीक सौम्य रूप गिरीजाक मूर्तिसभ फुलहर (गिरीजास्थान, मधुबनी, ३७”), मिर्जापुर (दरभंगा, ३२”) ओ कुर्सो नदियामी (दरभंगा)क मन्दिरसभमे संपूजित अछि। पुलहर ओ मिरजापुरक गिरीजाक पार्श्वमे गणेश एवं कार्तिकेय उत्कीर्ण अछि। दुनू चतुर्भुजी एवं स्थानक मुद्रामे निर्मित अछि। सत्यार्थीक अवलोकनक अनुसार आलोच्य मोतिमे गिरीजा, राधा ओ लक्ष्मी समन्वित छथि। गिरीजाक मुरलीक अंकन विशिष्ट अछि। हिनक ख्याति म्लेच्छमर्दनीक रूपमे विशेष अछि। भगवतीक महिषासुर मर्दनीक रूप सर्वाधिक लोकप्रिय अछि। मिथिलांचलक मध्यकालीन परिवेशमे महिषासुरमर्सिनी वनाम म्लेच्छमर्दिनीक परिकल्पित शिल्पांकन बेस उपयुक्त छल। मध्यकाल संघर्षक काल छल। एहि परिस्थितिमे महिषासुर मर्दिनी उत्प्रेरक भेलीह। एहि तरहक मूर्तिसभ बरसाम, कुर्सोनदियामी, नाहर, अन्दामा, वैद्यनाथपुर, उजान, बुढेव, पोखराम, नेहरा, हावीडीह, बहेड़ी, सिमरिया भिण्डी, जरैल-परसौन, चौगाम, लावापुर आदि स्थानसभसँ प्राप्त भेल अछि। नवरात्रक अवसरपर प्रायः गामसभमे महिषासुर मर्दिनी दुर्गाक लोकपरिकल्पित मूर्तिसभ प्रतिवर्ष बनैत अछि, पूजित होइत छथि एवं विसर्जित होइत अछि। मूर्तिक परिकल्पना “दानवत्वपर देवत्वक विजय” केन्द्रित अछि। भगवतीक अन्यान्य रूप सभमे नागदेवी मनसा (भैरव स्थान, मुजफ्फरपुर), विषहरी (नाथनगर, भागलपुर), वशिष्टाराधिता तारा (महिषी, सहरसा), सरस्वती (जयनगर, मधुबनी), काली (कोर्थ, दरभंगा), गजलक्ष्मी (भीठभगवानपुर, मधुबनी), तारा (बौद्धदेवी, वारी,समस्तीपुर) जगतपुर वरुआरी (सहरसा), जयमंगला (बेगूसराय), सहोदरा(नरकटयागंज, प. चम्पारण), पार्वती (करियन, समस्तीपुर), भरवारी, समस्तीपुर आदिक प्राचीन ओ ऐतिहासिक पाथरक मूर्तिसभ मिथिलांचलसँ प्राप्त भेल एवं ओऽ सभ पूजित अछि। मिथिलाक मध्यकालीन सांस्कृतिक इतिहासक परिप्रेक्ष्यमे पंचदेवोपासनाक परिकल्पना विभिन्न साम्प्रदायिक सद्भावक अनुक्रममे कयल गेल छल, ओ बहुत किछु सामाजिक एवं सांस्कृतिक धरातलपर फलीभूत भेल। बहुतरास मन्दिरसभ एकर उदाहरण बनल अछि। मिथिलांचलक शाक्त क्षेत्र सृष्टि रहस्यावृत्त अछि आर ’धर्मस्य तत्वं निहितं गुहायां’ , मुदा सृष्टिक मूलमे पृथ्वी (क्षिति), जल, अग्नि (पावक), आकाश (अंतरिक्ष) एवं वायुक तात्विक अवस्थिति सर्वमान्य अछि। वैदिक साहित्यमे पृथ्वीकेँ माता ओऽ मनुष्यकेँ पृथ्वीपुत्र कहल गेल अछि। ऋगवेदक “पृथ्वी सूक्त” ओ “नदी सूक्त” मे हुनक देवीत्वक स्तुतिगान भेल अछि। पृथ्वी ओ जलक प्रजनन शक्ति अर्थात् ओहिसँ उद्भूत चेतनशील जीवन जगत मनुष्यक लेल कौतुहलक विषय छल, श्रद्धा ओ भक्तिक विषय छल। अहिठामसँ शक्तिक प्रति निरन्तर चिन्तनक परिणामस्वरूप हुनकासँ आरोग्य, संतति, सुख-समृद्धि एवं संरक्षणक कामना कयल जाइछ। मातृदेवीक रूपमे पृथ्वी (भूदेवी)क परिकल्पना सर्वप्राचीन अछि। विश्वक प्रायः समस्त प्राचीन सभ्यता ओ संस्कृतिक उद्गम नदी-धारी मानल गेल अछि, मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, काली-बंगा, मिश्र, मेसोपोटामिया आदिसँ प्राप्त मातृदेवीक प्राक् ऐतिहासिक मृणमूर्तिसभक पुरावशेष एकर ज्वलंत उदाहरण अछि। एवं प्रकारे पृथ्वी ओ जलमे देवत्वक अवधारणा पूर्व वैदिक युगक आर्येतर अवधारणा थिक। आर्य लोकनिकेँ अपन प्रभुत्व विस्तारक क्रमे अनेक युद्ध (देवासुर संग्राम अर्थात् इन्द्र-वृत्रासुर, महिषासुर वध, कालिय-दमन, राम-रावण युद्ध, गजासुर वध आदिक परम्परित श्रुति ओ साहित्यिक अंतः साक्ष्य उपलभ्य अछि। तदनुसार आर्यलोकनि आर्येतरक शाक्त अवधारणाकेँ समूल नष्ट नहि कऽ ओकरा परिष्कृत कऽ अंगीकार कयलनि। पृथ्वी ओ नदी (गंगा, यमुना, सरस्वतीक समानान्तर मिथिलांचलक कमला, कोशी, जीबछ) मे देवीत्व एवं अग्नि ओ वायुमे देवत्वक प्रतिष्ठापन कयल गेल। आकाश (अंतरिक्ष) तँ अहि देवी-देवताक विहार क्षेत्र अछि। आजुक वैज्ञानिक लोकनिक लेल अंतरिक्ष शोध-बोधक विहार क्षेत्र बनि गेल अछि। शतपथ ब्राह्मणक अंतः साक्ष्यक अनुसार वैदिक आर्यलोकनि अग्निपूजक छलाह। आध्यात्मिक चेतनाक विकासक क्रममे शक्तिक विकास एवं विस्तार सप्तमातृका, दशमहाविद्या, चौसठ योगिनी आदिक रूपमे भेल देखना जाइछ। भारतीय मूर्तिकलाक इतिहासमे एक फलकपर सप्त मातृकाक शिल्पांकन कुषाणकालमे आरम्भ भऽ गेल छल- ब्रह्माणी, वैष्णवी, माहेश्वरी, वाराही, कौमारी, इन्द्राणी ओ चामुण्डा। एकर समानान्तर मिथिलांचलक जन-जीवनमे पूजित सप्तमातृकाक नामावली भिन्न छैक एवं हुनक लोकोपासना सातटा पिण्डक आदिम रूपमे प्रचलित अछि, जे सप्तपिण्डी अथवा सप्तवेदीक रूपमे अभिज्ञात अछि। दोसर विकासक्रममे अबैत अछि दशमहाविद्या अर्थात् काली, तारा, षोड़सी (त्रिपुर सुन्दरी), छिन्नमस्ता, बगला, कमला (लक्ष्मी), मातंगी, भुवनेश्वरी, भैरवी ओ धूमावती- काली तारा छिन्नमस्ता सुन्दरी बगला रमा। मातङ्गी भुवनेश्वरी सिद्धविद्या च भैरवी। धूमावती च दशमी महाविद्या दशस्मृता॥–पुरश्चर्यार्णव शाक्त सम्प्रदायमे जाहि दस प्रधान रूपक ब्रह्मक उपासना होइछ, ओकरा महाविद्या कहल जाइछ। अहि विद्याक दू टा प्रधान मार्ग अछि, योग एवं तंत्र। तेसर विकासक्रममे अबैत अछि चौसठ योगिनी। चौंसठ योगिनीक मध्यकालीन मन्दिर वाराणसी (उत्तर प्रदेश), भेड़ाघाट (मध्य-प्रदेश), हीरापुर (उड़ीसा) आदि स्थानसभमे पाओल जाइछ। मिथिलांचलक सहरसाक (मत्स्यगंधा परिसर) पिरामिडनुमा स्थापत्य (मन्दिर)मे निम्नलिखित चौंसठ योगिनीक संग बटुक भैरवक मूर्तिसभ प्रतिष्ठापित अछि- माया, कुष्माण्डा, नर्मदा, यमुना, क्रान्ति, वृद्धि, गौरी, ऐन्द्री, वाराही, रणवीरा, मूरति, वैष्णवी, ज्वालामुखी, अजिता, चर्चिका, मार्जारी, डाकिनी, घण्टकर्णा, घटवरा, विकराली, जयन्ती, सरस्वती, कावेरी, मालुका, नारसिंही, श्री, विकटा, व्रजेश्वरी, कौमारी, महामाया, सुरपूजिता, ईश्वरी, सर्पस्या, यशा, वैवस्वती, रुद्रकाली, मातंगी, जयावती, अभया, माहेश्वरी, कामाक्षी, मयूरी, कपालिनी, तुष्टि, काली, उमा, रौद्री, अम्बिका, ब्रह्माणी, अश्वमुखी, आग्नेयी, अग्निहोत्री, अदिति, चन्द्रकान्ता, चामुण्डा, गंगा, मारुति, धूमावती, गान्धारी, अपराजिता, विमोहिनी, सूर्यपुत्री एवं वायुवेगा। कालिकापुराणक अनुसार भगवती स्वेच्छया भिन्न-भिन्न उद्देश्यसँ विभिन्न अवसरपर चौंसठ रूपमे अवतरित भऽ योगिनीक रूपमे पूजित भेलीह। सृष्टिक सृजन, पालन एवं संहार हेतु त्रिधारूपमे अवधारित महालक्ष्मी, महासरस्वती एवं महाकालीसँ उद्भूत नाना शक्तिरूपा योगिनी सभ धन, यश, विद्या, बुद्धि, शौर्य-पराक्रम, आरोग्य ओ मोक्षदायिनी मानल जाइत छथि। उपरोक्त नामावलीमे ऐन्द्री, वाराही, वैष्णवी, माहेश्वरी, ब्रह्माणी ओ चामुण्डा, दशमहाविद्यामे एवं किछु सप्तमातृकामे सेहो परिगणित छथि। गंगा, यमुना, सरस्वती ओ कावेरी मूलतः नदी देवी छथि। कामाक्षीक स्वतंत्र तांत्रिक पूजोपासना कामरूप (असम)क कामाख्या एवं नेपाल उपत्यकाक गुह्येश्वरीमे परम्परित अछि। कुष्माण्डा, नवदुर्गाक एकटा रूप थिक मुदा योगिनीरूपेँ प्रतिष्ठित वराहविष्णुक शक्ति वाराहीक स्वतंत्र पालकालीन प्रस्तर मूर्ति पुनामा प्रतापनगर (नौगछिया, भागलपुर), ज्वालामुखी बनाम जालपाक मूर्ति लगुराँव (महुआ, वैशाली), डाकिनीक पूजन खुरहान (आलमनगर, मधेपुरा) आदि माता अम्बा बनाम अम्बिकाक पूजन आमी (दिघवारा, सारण), चामुण्डा पूजन कटरा (मुजफ्फरपुर), पचही, वरैपुरा, पचम्बा (बेगुसराय) आदिक प्राचीन प्रस्तर प्रतिमा सभमे उपलभ्य अछि। जयावतीक पूजा नाग देवी जयाक रूपमे एवं नदी देवीक रूपमे गंगा ओ यमुनाक स्वतंत्र पूजन परम्परा, बरसाम (मधुबनी), नगरडीह (दरभंगा), मंझौल (बेगुसराय) आदिक अलावा अन्धराठाढ़ी (मधुबनी) ओ महिषी (सहरसा)क मन्दिर स्थापत्यक एवं अलंकरणक रूपमे प्राप्य अछि। स्थापत्य अलंकरणक रूपमे गंगा-यमुनाक प्राचीनतम मूर्ति अवशेष भरहुत ओ सांची (मध्य-प्रदेश)सँ प्राप्त अछि, जकर शिल्पांकन ई.पू. दोसर-तेसर शताब्दीमे भेल छल। कौमारी कुमार कार्तिकेय शक्ति छथि। सभटा शक्ति स्वरूपा देवी अपन-अपन देवताक वाहन ओ आयुध धारित कयने छथि। ध्यातव्य अछि जे आलोच्य शक्ति स्वरूपाक उद्भावना उद्देश्य विशेषक कारणेँ भेल छल। असुर शक्तिक संहारक हेतु सप्तमातृकाक संयुक्त शक्ति प्रतिकार हेतु प्रत्यक्ष भेल छल। दशमहाविद्याक प्रत्येक देवी शक्ति-सम्पन्न, मोक्षदायिनी, कल्याणकारिणी एवं स्वयंमे नानारूपा छथि। शक्तिहीन ब्रह्म शव ओ शक्तियुक्त भेलासँ शिव छथि। दोसर शब्दावलीमे शक्तिहीन शिव शव समान छथि अर्थात् निष्क्रिय ब्रह्मक सक्रिय, चेतन ओ जाग्रत स्वरूप काली छथि- “महाकालक शक्ति महाकाली”- परमात्मा कालश्च परः संविदि वर्तते। काली नाम पराशक्तिः सैव देवस्य गीयते”।– तंत्रलोक (बम्बई, १९२० ई.)। मिथिलांचलमे दस महाविद्याक पूजोपासना गढ़-बरुआरी (सहरसा), भीठ भगवानपुर ओ राजनगर (मधुबनी)मे होइछ। कर्णाटकालीन मूर्तिकलामे ओ सभ विन्यस्त छथि। पं राजेश्वर झ मिथिलांचलक शक्ति-साधनाक एकटा उपक्रम मालिन कल्टक उल्लेख कएने छथि, जे लौकिक धरातलपर परम्परित अछि। मिथिलांचलमे भगवतीक तांत्रिक पूजा योगिनी ओ मालिनीक रूपमे होइछ। तांत्रिक साधनामे हिनक भूमिका महत्वपूर्ण मानल गेल अछि। तांत्रिक प्रक्रियामे ओ मार्गदर्शनक काज करैत छथि। कालान्तरमे योगिन ओ मालिन एकार्थक भऽ गेलीह। चौसठ योगिनीमे “मालिन” सेहो प्रतिष्ठित छथि। कल्याण, गोरखपुर, शक्ति उपासना अंक, जनवरी १९८७ ई. पृ.२३६)। ओऽ सिद्धिदायिनी, मोक्षदा एवं वरदायिनी मानल जाइत छथि। लौकिक अवधारणाक अनुसार मालिन भगवतीक प्रिय सेविकाक संगे तंत्र-मंत्र, योग-टोम, चमत्कारादिक माध्यमे अभीष्ट साधनमे निपुण होइत छथि। डॉ प्रफुल्ल कुमार सिंह ’मौन’ मिथिलाक लोकप्रसिद्ध मालिनसभमे कुसुमा मालिन, दौना मालिन, कोसा मालिन, रूपना मालिन, रमण अभिनन्दन ग्रन्थ, खुटौना, मधुबनी, २००४ ई. पृ.२२६-२३४)। मिथिलांचलक झिझिया नृत्य वस्तुतः तांत्रिक नृत्य थिक। वैदिक एवं औपनिषदिक साहित्यमे अन्तर्निहित आद्याशक्तिक आश्रय लऽ पुराणसभमे शक्ति (देवी)क स्वरूप, महिमा ओ पूजोपासना-प्रक्रियाक विस्तृत वर्णन उपलभ्य अछि। शाक्त उपासनाक दृष्टिसँ पुराणकाल एवं शक्ति सभक भव्य शिल्पांकन दृष्टिसँ गुप्तकालकेँ स्वर्णयुग कहल जाइछ। पुराणसभक व्यापक प्रसारसँ शक्ति उपासनाकेँ एतेक बल भेटलैक जे जनजीवनमे ब्रह्मक पूजोपासना परब्रह्म एवं मातृब्रह्म दुनू रूपमे होमऽ लागल। देवी भागवत (३.६.२) क अनुसार मातृब्रह्म समस्त दैवीशक्तिक मूलमे छथि। मध्यकालमे आबि शक्तिक तंत्रोपासना बेस लोकप्रिय भऽ गेल। फलतः आभिजात्य स्तरपर कंकाली (भारदह, भीमनगर बराज, नेपाल, राजपरिसर, दरभंगा आदि) छिन्नमस्ता (सखरा, राजविराज, नेपाल; खुरहान, मधेपुरा; रजरप्पा, झारखंड आदि), तुलजा (नेपाल उपत्यका, राजा हरिसिंहदेव द्वारा स्थापित), हैहट्ट देवी (हावी डीह, कर्मादित्य द्वारा स्थापित), वाणेश्वरी (भंडाअरिसम, दरभंगा), त्रैलोक्य विजय (मंगरौनी, मधुबनी), उग्रतारा (महिषी, सहरसा) आदिक अतिरिक्त लोकस्तरपर बामती, गहिल, रक्तमाला, चम्पा डमौनी, नयना योगिन, गढ़ीमाइ, लुकेसरी (लोकेश्वरी) आदि देवी सभक प्रादुर्भाव भेल देखना जाइछ (हमारे लोक देवी-देवता, डॉ मौन, मुजफ्फरपुर, १९९९ ई.)। हिन्दू धर्मक अन्तर्गत तंत्रयानक विकास बज्रयानी परम्परासँ प्रभावित अछि। अधिकांश बौद्ध देवी हिन्दू देवीक प्रतिरूप अथवा समानान्तर विकसित छथि। बौद्ध देवी तारा दशमहाविद्याक द्वितीया तारा छथि। वनगाँव (सहरसाक) भगवती ओ महिषीक उग्रतारा, एवं वारी (सिंधिया, समस्तीपुर)क भगवती ओ तारा समानान्तर विकसित छथि। मंगरौनी (मधुबनी)क त्रैलोक्यविजय अष्टभुजी शक्तिरूपा छथि, मुदा शिव ओ पार्वती हुनक पैरक तर मर्दित छथि। आलोच्य मूर्तिमे बौद्धदेवीक श्रेष्ठता प्रदर्शित अछि। मुदा बौद्धदेवी प्रज्ञापारमिता हिन्दू देवी सरस्वतीक प्रतिरूप थिकीह। मिथिला बंगाल ओ असम शक्ति साधनाक एकटा सशक्त त्रिकोण अछि। मिथिलाक धरतीपर एहि त्रिकोणकेँ महिषी (तारा), विराटपुर (चण्डी) ओ बदलाधमहारा (कात्यायनी)मे देखि सकैत छी। अधोमुखी त्रिकोण शाक्त ओ उर्ध्वमुखी त्रिकोण शैव लोकनिक साधना प्रतीक थिक। जखन विपरीत स्थितिमे आबि षटकोषक सृजन होइत अछि तखन ओ महाकाली ओ महाकालक संयुक्त भेने कामकलाक रूप होइत अछि। ब्रह्मक कामशक्ति द्वारा कलाक सृष्टिक नाम कामकला थिक। (प्रतीक विद्या, डॉ जनार्दन मिश्र, पटना, १९५९ ई., पृ.१९८) अर्थात् सदाशिवक ऊपर रहि (मर्दिनी काली) शक्ति ब्रह्माण्डक सृजन करैत अछि- “सदाशिवोपरि स्थिरवा ब्रह्माण्डं क्षोभमानयेत” कालीविलासतंत्र, लंडन, १९१७ ई. २४.२३)। त्रिकोण त्रिशक्तिक रूपमे चेतनाक आत्मप्रसार थिक। उर्ध्वमुखी त्रिकोण शिव, अधोमुखी त्रिकोण शक्ति (शिवा) एवं षटकोणीय त्रिकोणकेँ शिव-शक्त्यात्मक त्रिकोण कहल जाइछ। त्रिकोणक केन्द्रमे विन्दु सृष्टिक मूल थिक। तंत्रमूलक यंत्रक संरचनाक क्रमे ई आधार मानल जाइछ। मिथिलांचलमे मंगरौनी (मधुबनी) एवं हरौली (वैशाली) आद्याशक्ति (मातृब्रह्म)क साधना पीठ थिक। देवताक भेदें आगमक वर्गीकरण निम्नरूपेँ भेल अछि- शैवागम, शाक्तागम, वैष्णवागम एवं बौद्धागम। महाकालसंहिताक अनुसार शाक्तागमक चारिटा उपभेद अछि- कापालिक, मौलेय, दिगम्बर एवं भाण्डिकेर। कापालिक डामरतंत्रक, मौलेय यामल तंत्रक, दिगम्बर भैरव-भैरवी तंत्रक एवं भाण्डिकेर क्षावरतंत्रक अनुसरण करैत अछि। मिथिलामे वेदहि जकाँ तंत्रोकेँ अपौरुषेय कहल गेल अछि।(मिथिलामे तंत्र, डॉ त्रिलोकनाथ झा श्रीअमर अर्चना; दरभंगा,२००१ ई.पृ.२९५)। तांत्रिक पद्धतिसँ उपासना सरल होइछ। प्रागैतिहासिक कालसँ पूर्वी भारतक असम, बंगाल, मिथिला ओ नेपालमे शाक्ततंत्रक प्रचार-प्रसार रहल अछि। असमक कामाख्या, बंगालक दक्षिणकाली, नेपालक गुह्येश्वरी एवं मिथिलांचलक उग्रतारा (महिषी)सहरसा। बरांटपुरक चण्डी, कटरागढ़ (मुजफ्फरपुर)क चामुण्डा, सिमरौनगढ़ (नेपाल)क कंकाली, आमी (सारण)क अम्बिका स्थान, उच्चैठ (मधुबनी)क भगवतीथान, थावे (गोपालगंजक)क भगवती मन्दिर आदिक अतिरिक्त बेतियाराज, दरभंगाराज ओ राजनगरक भगवती मन्दिर आदि। तंत्रोपासनाक उद्भव बंगालमे भेल छल मुदा ओ साधना बलेँ मिथिलामे प्रवलीकृत भेल- “गौड़े प्रकाशित विद्या मिथिले प्रवलीकृता”। कलियुगमे संसार सागरसँ पार उतारनिहार एवं जन्म-मरणक बंधनसँ मुक्ति दियौनिहार मात्र दू टा आराध्य छथि- शिव ओ शक्ति। मिथिलांचलमे शिवक अपेक्षा शक्तिक महत्व अधिक अछि। मैथिल लोकनिकेँ कहल गेल अछि- “अन्तः शक्ताः”। शक्ति उपासनाक दू टा मार्ग- वाम एवं दक्षिण- दुनू पक्ष सैद्धांतिक ओ प्रायोगिक अपन उत्कर्षकेँ प्राप्त कयलनि। दरभंगाक खण्डवलाकुलक राजालोकनि शाक्तधर्मी ओ तंत्रोपासक छलाह। सामान्यतः वैदिक अवधारणाक अनुसार जतऽ भोग छैक ततऽ मोक्ष नहि आर जतऽ मोक्ष छैक ओतऽ भोग नहि। मुदा दश-महाविद्याक अन्तर्गत पूजिता त्रिपुरसुन्दरीक पूजनसँ भोग एवं मोक्ष दुनू प्राप्त भऽ जाइछ। एहि तरहेँ नानारूपधारिणी शक्तिक पूजोपासना शास्त्रीय एवं लौकिक दुनू रूपेँ सम्पूर्ण मिथिलांचलमे परिव्याप्त अछि। एहिठाम आध्यात्मिक ऊर्जासँ उर्जस्वित अनेक सिद्ध शक्तिपीठ ऐतिहासिक साक्ष्यसँ प्रमाणित, पौराणिक कथासँ समन्वित एवं लोक-आस्थासँ सूत्रबद्ध अछि। गोसाउन घरसँ लऽ कऽ शक्ति (भगवती) कतहु पिण्डरूपमे, कतहु पाथरक मूर्ति रूपमे तँ कतहु तांत्रिक चक्र रूपमे पुजाइत छथि। नवरात्रक अवसरपर सम्पूर्ण मिथिला शाक्तमय भऽ जाइछ। अतः मिथिलाक सुदूर ग्रामांचलमे विशृंखलित शक्ति साधनाक किछु प्रतिनिधि स्थलसभकेँ बानगीक रूपमे “हेरिटेज मिथिला”क अन्तर्गत प्रकाशमे आनब एकटा धार्मिक कृत्य थिक। उच्चैठक भगवती: मधुबनी जिलाक बेनीपट्टी अनुमंडल मुख्यालयसँ प्रायः पाँच किलोमीटर दिशामे अवस्थित उच्चैठक (उच्चैःस्थ) भगवती स्थान सुप्रसिद्ध शक्ति साधना स्थल अछि। मिथिलामे प्रत्येक देवीकेँ भगवती कहल जाइछ। श्रुति-परम्पराक अनुसार उच्चैठक भगवतीक सम्बन्ध कालिदाससँ सूत्रबद्ध अछि। भगवती स्थानक लगपासमे कालिदासक डीह कहल जाइछ। मुदा उच्चैठक भगवती कालिदास कालीन (गुप्तकाल) नहि अछि। मंदिरमे स्थापित भगवतीक कारी पाथरक मूर्ति तैंतीस ईंच नमहर अछि। भगवतीक चतुर्भुजी मूर्ति दोहरा कमलासनपर ललितासनमे निर्मित अछि। भगवतीक सिरोभाग ओ वाम भुजा खण्डित अछि। एकटा समकालीन भगवती मूर्तिक वाम हाथ (निम्न)मे कलश ओ ऊपरी हाथमे त्रिशूल एवं दहिन हाथ (निम्न)मे फल ओ ऊपरी हाथमे दर्पण उत्कीर्ण अछि। शिरोभूषण, कर्णफूल, गृमहार, यज्ञोपवीत, वाजुवन्द, कंगन, कटिबन्ध ओ पायल आदिक संग कंचुकी ओ अधोवस्त्रसँ सुसज्जित अछि। पादपीठमे वाहन सिंह उत्कीर्ण अछि। रूप विन्यासक दृष्टिसँ उच्चैठक भगवती सिद्धेश्वरी पार्वती छथि। अहि तरहक भगवतीक दोसर प्रस्तर मूर्ति मधुबनी जिलान्तर्गत कपिलेश्वरस्थानसँ पाँच किलोमीटर पश्चिम-दक्षिणमे अवस्थित भोजपरौलसँ (पैंतीस ईंच नमहर) प्राप्त अछि, जे पूर्णतः अक्षत अछि। रूप ओ भंगिमा सादृश्यक अलावा उच्चैठ भगवतीक मुखाकृति आर्यत अछि तँ भंडारिसमक भगवतीक मुखाकृति गोल अर्थात् मंगोलन अछि। मुदा अमृतकलश, त्रिशूल, फल ओ दर्पण समान अछि। सत्यनारायण झा सत्यार्थीक (मिथिलाक पुरातात्विक सम्पदा, दरभंगा, २००३ ई.) संकेतानुसार एहि वर्गक एकटा भगवती मूर्ति वनगाँव (सहरसा)मे सेहो पूजित अछि। भगवतीक तीनू मूर्ति पालकालीन कलाकृति मध्ययुगीन सांस्कृतिक दर्पण बनि गेल अछि। अमृतकलश हुनक मातृदेवीत्वक एवं दर्पण पार्वतीक प्रतीक थिक। आलोच्य भगवती-मन्दिर सभ प्राचीन भवनावशेष क्षेत्रमे बनल अछि। स्पूनर सूबेगढ़क (मुजफ्फरपुर) भगवती मंदिरकेँ तिरहुत शैलीमे बनल कहने छथि।एहि कड़ीक एकटा षटभुजी भगवती समस्तीपुर जिलान्तर्गत सिंघिया प्रखण्ड मुख्यालयसँ आठ किलोमीटर उत्तर वारीक भगवतीस्थानमे पूजित अछि। कारी पाथरक ई आलोच्य भगवती मूर्ति चौंतीस ईंच नमहर कर्णाटकालीन कलाकृति थिक। भगवतीक वाम हाथ सभमे क्रमशः नीचासँ ऊपर कलश, घण्टा, ढाल ओ दहिन हाथसभमे क्रमशः अभयमुद्रा, खड्ग ओ अक्षमाला सुशोभित अछि। भगवती कमलासनपर ललितासनमे प्रतिष्ठित छथि। पादपीठमे सिंह वाहनक रूपमे उत्कीर्ण अछि। वारी ऋषि-मुनि एवं तपसी-साधक लोकनिक साधना-स्थल छल मध्यकालमे। उच्चैठ, भोजपरौल, वनगाँव ऊ वारीक अतिरिक्त ओ भंडारि सभ (दरभंगा)मे सेहो परम्परासँ पूजित छथि। भोजपरौल एवं भंडारिसभक भगवती चतुर्भुजी छथि। भंडारिसभक भगवतीक वाम (निम्न) हाथमे त्रिशूल ओ पद्म पुष्प एवं दहिन हाथमे फल ओ खड्ग अछि। भगवती वाणेश्वरीक नामे विशेष प्रसिद्ध छथि। मूर्ति अड़तालीस ईंच नमहर अछि, नदी अवशेषक पश्चिमी तटपर अवस्थित एकटा मंदिरमे पूजित छथि। भंडारिसम दरभंगा जिलाक मनीगाछी प्रखण्डसँ तीन कि.मी. दक्षिणमे अछि। देकुलीक अष्टभुजी भगवती कर्णाटकालीन छथि। अध्यात्मिक चेतना ओ कलात्मक भव्यतासँ समन्वित ई मध्यकालीन भगवती मूर्तिसभ अपन युगक सांस्कृतिक दर्पणे नहि अपितु तत्युगीन जीवनक धार्मिक आस्था, आध्यात्मिक चेतना, कलात्मक सोच, सामाजिक ओ आर्थिक अवस्थितिकेँ प्रतिबिम्बित करैछ। मूर्ति विज्ञानक अनुसार भगवतीक शास्त्रीय स्वरूप निर्धारित अछि, मुदा एकहि युगक बनल भगवतीक मूर्ति सभमे शैलीगत भिन्नता पाओल जाइछ। पाल साम्राज्यक पतनोन्मुख अवस्थामे राजकीय संरक्षण ओ निर्देशक अभावक कारणे शैलीगत शैथिल्य स्वाभाविक अछि। मूर्तिशिल्पक शास्त्रीयतासँ बन्हल रहितो मूर्तिकार स्वतंत्र चेता सेहो होइत छथि। फुलहरक भगवती गिरिजा: मधुबनी जिलान्तर्गत हरलाखी प्रखण्ड मुख्यालयसँ पश्चिम-दक्षिण दिशामे अवस्थित फुलहर गाममे प्राचीन भग्नावशेषपर बनल नवनिर्मित मंदिरमे स्थापित एवं पूजित भगवती गिरिजाक भव्य प्राचीन प्रतिमा सैंतीस ईंच नमहर अछि। जनश्रुतिक अनुसार रामचरितमानसक गिरिजास्थान यैह थिक, जे जानकीक आराध्या छलीह आर आइयो कुमारि कन्या लोकनिक आराध्या बनल छथि। गिरिजाक चतुर्भुजी प्रतिमा कमलासनपर स्थानक मुद्रामे बनल अछि। वाम हाथमे केराक हत्था ओ गदा एवं दहिन हाथमे दर्पण ओ सनाल कमलपुष्प सुशोभित छनि। माथपर मुकुट, कानमे कुण्डल, गरामे हार, कान्हसँ लटकैत यज्ञोपवीत, बाँहिमे बाजूवन्द, कलाइमे आभूषण, डाँरमे अधोवस्त्रकेँ कसैत कटिभूषण ओ पैरसभमे पादाभूषण। भगवतीक वाम पार्श्वमे कार्तिकेय एवं दहिनमे गणेश कमलासनपर ठाढ़ छथि। भगवतीक प्रतिमा वात्सल्यक भावात्मक परिवेशमे निर्मित अछि। पार्वती जगन्माता छथि। गिरिजा वस्तुतः पर्वतकन्या पार्वती छथि। विवाह पंचमीक अवसरपर एहिठाम विशाल मेला लगैत अछि। नवरात्रमे तांत्रिक साधना सेहो प्रचलित अछि। भगवती गिरिजा अर्थात् पार्वतीक दोसर भव्य कर्णाटकालीन (१२-१३म सदी) मूर्ति दरभंगाक मिरजापुर मोहल्लाक देवी मन्दिरमे प्रतिष्ठापित अछि। दरभंगाक सांस्कृतिक क्षितिजपर उद्भासित भगवती पार्वतीक (बत्तेस इंच नमहर) कर्णाट (पालोत्तर) शैलीमे निर्मित छथि। मूर्तिक प्रभावली बेस अलंकृत अछि। भगवती कमलासनपर वस्त्राभूषणसँ विन्यस्त स्थानक मुद्रामे ठाढ़ छथि। वाम पार्श्वमे कार्तिक ओ दहिनमे गणेश ठाढ़ छथि। दुनूकेँ भगवतीक अभय प्राप्त छनि। भगवतीक दहिन हाथ (उपरका) मे बाँसुरी उत्कीर्ण भेने सत्यार्थी एहि प्रतिमामे गिरिजा, राधा एवं लक्ष्मीक समाहार देखने छथि। मुदा बाँसुरी शब्द ब्रह्मक प्रतीक अछि, शिवक डमरू जकाँ। मिर्जापुरक भगवती म्लेच्छमर्दिनीक नामे लोकख्यात छथि। श्रुति साक्ष्यक अनुसारे भगवती जाहि पोखरिक जीर्णोद्धारक क्रमे उत्खनित भऽ प्रकट भेलीह, ओऽ कब्रगाह छल। मुजफ्फरपुर कोर्टक फैसलाक अनुसार ओहि भूभागक स्वामित्व हिन्दू लोकनिकेँ भेटलनि। ओहि स्थानपर आइ भगवतीक एकटा भव्य ओ दर्शनीय मंदिर शक्ति-साधना ओ लोक आस्थाक केन्द्र बनि गेल अछि। सत्यार्थी (मिथिलाक पुरातात्विक संपदा, २००३ ई.) अपन सर्वेक्षणमे अन्धराठाढ़ी (मधुबनी), देकुली, कुर्सी नदियामी (दरभंगा), करियन (समस्तीपुर) ओ फुलहर (दरभंगा)क भगवती पार्वतीक उल्लेख कएने छथि। भगवतीक रूप कमनीय, वस्त्राभूषण ललित एवं देहयष्ठि आनुपातिक बनल अछि। फलतः भगवती पार्वतीक प्रतिमा प्राणवंत भऽ गेल अछि। नाहरक महिषासुर मर्दिनी: मधुबनी जिला मुख्यालयसँ बारह कि.मी. पूर्व दिशामे अवस्थित भगवतीपुरक मंदिरमे महिषासुर मर्दिनीक पाथरक मूर्ति (२५”*१२”आकार) स्थापित एवं पूजित अछि। दसभुजी भगवती त्रिभंगी एवं स्थानक मुद्रामे कमलफूलक दोहरा आसनपर महिषासुरकेँ शूल (बरछी)सँ बेधैत बनल अछि। वस्त्राभूषणसँ सुसज्जित भगवतीक हाथसभमे दश दिक् पालक अस्त्रसभ शोभित छनि। इन्द्रक बज्र, अग्निक शक्ति, यमक दण्ड, नैऋतक खड्ग, वरुणक पाश, ईशानक शूल, वायुक अंकुश, कुबेरक गदा, विष्णुक चक्र ओ ब्रह्माक पद्म। महिषासुर महामोह अथवा अविद्याक प्रतीक अछि, जकर बध लोककल्याणार्थ भगवतीक हाथेँ भेल छल। दश भुजा भगवतीक दिग-दिगंत परिव्याप्त शक्तिक प्रतीकाभिव्यक्ति थिक। भगवतीक मूर्ति कर्णाटकालीन कलाशैलीमे निर्मित अछि। मुखाकृति आर्यन, देहयष्ठि संतुलित ओ आनुपातिक बनल अछि। नाहरक भगवतीक प्रसिद्धिक कारणेँ शक्ति-साधना स्थल नाहर भगवतीपुरक नामे लोक प्रसिद्ध अछि। एहि ठामक पार्श्ववर्ती मंदिरसभमे सूर्य ओ विष्णुक प्रस्तर मूर्ति पूजित अछि मुदा नाहरक प्रसिद्धि महिषासुर मर्दिनीक कारणे अधिक अछि। मूर्तिक पादपीठमे भक्तगणक छोट-छोट मूर्तिसभ विनीत मुद्रामे उत्कीर्ण अछि। हावीडीहक भगवती: दरभंगा जिलान्तर्गत बहेड़ा प्रखण्ड मुख्यालयसँ पाँच कि.मी. पूर्व-दक्षिण दिशामे अवस्थित हावीडीहक प्रसिद्धि यद्यपि महारानी सौभाग्यवतीदेवी (सुहब देवी)क आज्ञासँ प्रतापी मंत्री कर्मादित्य द्वारा स्थापित हैहट्ट देवी भगवती पार्वतीक कारणे अधिक अछि (१३म शती), मुदा देवी मंदिरक गर्भगृहमे स्थापित महिषासुर मर्दिनीक महत्व कम नहि होइछ। श्रुति अछि जे भगवतीक मूर्तिक पादपीठ नवादा (दरभंगा) मे पूजित अछि, मुदा यत्र-तत्र उद्धृत अभिलेख कतहु नहि अछि। हाबीडीहक महिषासुर मर्दिनी अष्टभुजी छथि। हैहट्ट देवीक नामे पूजित पार्वती ललितासनमे एवं महिषासुरमर्दिनी स्थानुक मुद्रामे निर्मित अछि। कर्मादित्यक काल १२२५-७५ ई. मानल जाइछ। हावीडीह पंचदेवोपासक भूमि अछि मुदा प्रभुत्व भगवतीक छनि। महिषासुरमर्दिनीक तेसर साधना केन्द्र दरभंगासँ नौ कि.मी. पूर्व-दक्षिण दिशामे अवस्थित अन्दामामे (२२”) प्राची नदी अवशेषक पश्चिमीतटपर बनल मन्दिरमे स्थापित भगवती ओ पूजित अछि। अष्टभुजी भगवतीक हाथसभमे नाग, धनुष, ढाल, शूल, चक्र ओ खड्ग धारित अछि। नाना वस्त्रालंकारसँ सुशोभित भगवती दोहरा कमलासनपर ठाढ़ छथि। भगवतीक दहिन पार्श्वमे एकटा ढाल खड्ग धारिणी सहदेवीक मूर्ति उत्कीर्ण अछि। भगवतीक मूर्ति संरचना मैथिल अवधारणाक अनुसार भेल अछि। मिथिलांचलमे भगवतीक महिषासुर मर्दिनी रूप समसामयिक परिवेशमे बेस लोकप्रिय छल। महिषासुर मर्दिनीक प्राचीन ऐतिहासिक मूर्तिसभ वैद्यनाथपुर (चतुर्भुजी), उजान (मधुबनी). डोकहर, जरैल-परसौन, देवपुरा (मधुबनी), कुर्सो-नदियामी, बरसाम, पोखराम (अष्टभुजी), नेहरा, बहेड़ी (अष्टभुजी), चौगामा (दरभंगा), मदरिया, बुढेव (७२*३०” अष्टभुजी), भवानीपुर, सहमौरा, नया नगर (कोशी प्रमण्डल), खोजपुर (दरभंगा) आदिक अतिरिक्त भजनाहा (मधुबनी) ओ गन्धवारि (दरभंगा)सँ प्राप्त सिंहवाहिनी अष्टभुजी दुर्गाक प्राचीन, पूजनीय एवं ऐतिहासिक मूर्तिसभ पहाड़ी शैलीमे निर्मित अछि। मिथिलांचलमे अनेक नामधारिणी भगवतीक मूर्तिसभ राजेश्वरी, परमेश्वरी, सिद्धेश्वरी, भुवनेश्वरी वाणेश्वरी, गुह्येश्वरी जयमंगला आदिक नामे पूजित अछि। सिमरिया भिण्डी (समस्तीपुर)मे सेहो महिषासुरमर्दिनीक प्राचीन पाथरक मूर्ति प्राप्त भेल अछि। नदियामीक चतुर्भुजी मूर्ति पार्वती (गिरिजा)क थिक, जनिक पार्श्वमे कार्तिक ओ गणेश उत्कीर्ण छथि। पार्वतीक एकटा विलक्षण प्राचीन प्रस्तर प्रतिमा (पाली) निसंदेह अद्वितीय अछि। पार्वतीक गोदमे शिशु गणेशक संगे बैसल छथि। गुप्तकालक ई मूर्ति भगवतीक वात्सल्य भावक अभिव्यंजक अछि। पार्वतीक एकटा चतुर्भुजीमूर्ति करियन (समस्तीपुर)सँ सेहो प्राप्त अछि। मिथिलाक इतिहास पुरातत्व ओ सांस्कृतिक क्षेत्रमे विजयकान्त मिश्र- मिथिला आर्ट एण्ड आर्किटेक्चर- एवं सत्येन्द्र कुमार झा (मिथिला की पाल प्रतिमाएँ) डॉ प्रफुल्ल कुमार सिंह मौन (कर्णाटकालीन मूर्तिकला), सत्यनारायण झा सत्यार्थी (दर्शनीय मिथिला, १-१०), डॉ नरेन्द्र नारायण सिंह निराला- मधुबनी अंचलक मूर्ति-, डॉ हीरानन्द आचार्य (राजनगरक ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्व) आदिक सर्वेक्षणात्मक अध्ययन-अनुशीलन उल्लेखनीय अछि। मिथिलांचलक नवरात्रमे महिषासुर मर्दिनीक लोकपूजन सर्वाधिक लोकप्रिय एवं परम्परित अछि। आलोच्य प्रतिमा एकटा सामाजिक प्रतिक्रियाक धार्मिक अभिव्यंजना थिक। मिथिलाक मध्यकालीन इतिहास आक्रमण-प्रत्याक्रमण एवं संघर्षपूर्ण स्थितिसँ भरल अछि। विशेष कऽ मुस्लिम आक्रमण ओ घात-प्रतिघातसँ मिथिला आक्रान्त छल। एहि स्थितिमे म्लेच्छमर्दिनी दुर्गाक रूपगत संरचनाक अर्थवत्ता बढ़ि जाइछ। म्लेच्छ असुरक पर्याय अछि। देव लोकनि असुरक वध कयलनि मुदा म्लेच्छ सभक वध भगवतीक हाथे भेल आर हुनक एहि रूपकेँ म्लेच्छमर्दिनी मानल गेल, जे शक्ति-साधनाक एकटा प्रतीक बनल अछि। मिथिलाक मध्यकालीन इतिहासक पृष्ठभूमिमे हिन्दू धर्मक अन्तर्गत धार्मिक सद्भावक विकास भेल। पाल राजालोकनि यद्यपि बौद्धधर्मी छलाह, मुदा ओ हिन्दू धर्मक देवी-देवता सभक सेहो उदारतापूर्वक संरक्षण देलनि। एहि संक्रमणकालमे बौद्ध लोकनि हिन्दू देवी-देवता एवं हिन्दू लोकनि बौद्ध देवी-देवताकेँ अंगीकार कएलनि। तारा, छिन्नमस्ता, मनसा आदि हिन्दू जगतमे ओ तारा, चण्डी, कंकाली, डाकिनी, वज्र-वाराही, वज्रतारा आदि बौद्ध जगतमे प्रतिष्ठा पौलनि। भिन्न साधना प्रक्रिया एवं रूपविन्यासक अलावा बलि निषेध छल बौद्ध-साधक लोकनिमे। मुदा विक्रमशिलाक सिद्ध-साधनामे पंचमकारक समावेशसँ मिथिलांचलक शक्ति-साधना प्रभावित अवश्य भेल। एहि भूभागमे हिन्दू ओ बौद्ध धर्म संगे-संग विकसित भेल। उदाहरणार्थ वनगाँव महिषी (सहरसा) एवं वारीक (समस्तीपुर) हिन्दू ओ बौद्ध ताराक पूजोपासनाकेँ राखल जाऽ सकैछ। कोर्थक काली: दरभंगा जिलाक घनश्यामपुर प्रखण्डक अन्तर्गत सांस्कृतिक कोर्थ (पौराणिक कोर्थ, सत्यनारायण झा सत्यार्थी, लहेरियासराय, दरभंगा)क गोसाउनिक स्थानमे स्थापित एवं पूजित पाथरक काली मूर्ति (३ फीट ६ इंच) चतुर्भुजी अछि। आद्याशक्ति काली दशमहाविद्यामे प्रथमा एवं महाकाल (शिव)क शक्ति छथि। कला (साकार जगत)कें आत्मसात करऽबाली काली दिग्वस्त्र छथि। हुनक वाम हाथ (निम्न)मे छिन्नमस्तक ओ खड्ग एवं दहिन हाथमे पोथी (शास्त्र) ओ वरमुद्रा बनल अछि। मुण्डमालिनी काली शवरूप शिवक हृदय स्थलपर ठाढ़ छथि। शक्तिहीन ब्रह्म शव अछि आर शक्तियुक्त भऽ ओ शिव कहबैत अछि। कालीक माथपर मुकुट, डाँर ओ हाथ-पैर सभ आभूषण मंडित अछि, कालीक जिह्वा बाहर निकलल छनि। कोर्थक एहि कालीक पूजामंत्र अछि- “हंसौः सदाशिव महाप्रेतपद्मासनाय नमः”।– तारा रहस्य, १८९६ ई., पृ.४१. “पुरश्चर्यार्णव” (बनारस, १९०१ ई.-पृ.१७)क अनुसार कालीक नौटा भेद अछि- दक्षिणकाली (कलकत्ता), भद्रकाली (कोइलख), श्मसानकाली (दरभंगा), कालकाली, गुह्यकाली (काठमाण्डू), कामकलाकाली (कामरूप), धनकाली, सिद्धिकाली ओऽ चण्डकाली (बिराटपुर)। लक्ष्मीतंत्रक अनुसार मित्र व शत्रुक सत-असत रूपक विभुकेँ मायागुणयुक्त भेलाक कारणे ओ भद्रकाली कहबैत छथि। ओ कल्याणरूपा छथि। मिथिलांचलमे भद्रकालीक पूजोपासना कोइलख (मधुबनी) मे होइछ। “मिथिला तत्व विमर्श” (परमेश्वर झा) मे कोइलखक भगवतीकेँ भद्रकाली ओऽ काकिलाक्षी कहल गेल अछि। भगवती मधुबनीसँ तेरह कि.मी. पूर्व दिशामे स्थित कोइलखक भव्य मन्दिरमे पूजित छथि। एकर अतिरिक्त सहरसाक मत्स्यगंधा परिसरक पगोडा शैलीमे बनल मंदिरमे रक्तकालीक भव्य ओऽ आकर्षक मूर्ति स्थापित ओ पूजित अछि। त्रिभंगी नृत्य मुद्रामे निर्मित द्विभुजी मुण्डमालिनी रक्तकालीक वाम हाथमे कपाल ओ दहिनमे खड्ग धारित छनि। रक्तकालीक एहि नृत्यमे असत तत्वादिक दमन ओ कपालमे सृष्टि बीजक संरक्षणक भाव अन्तर्निहित अछि। राजनगर (मधुबनी)क राजपरिसरक काली मन्दिरमे स्थापित कालीक सौम्य मूर्ति, मधुबनीक भओरागढ़मे महाराज रामेश्वर सिंह द्वारा स्थापित काली, राजदरभंगाक श्यामा, दरभंगाक बागमती तटक शसान काली, चैनपुर (कोशी अंचल)क महाकाली, धरान (नेपाल)क दंतकाली, बेतिया राजक काली आदि विभिन्न रूपेँ पूजित छथि। जनपदक ग्रामांचलमे वनकाली, रणकाली आदिक लोकपूजन सेहो परम्परित अछि। दशमहाविद्याक अन्तर्गत द्वितीया महाविद्याक रूपमे प्रतिपादित भगवती तारा ब्राह्मण धर्मक वैदिक परम्परा ओ बौद्धिक धर्मक तांत्रिक परम्परामे वनगाँव-महिषी ओ वारीमे स्थापित एवं पूजित छथि। डॉ जनार्दन मिश्र (भारतीय प्रतीक विद्या, पटना, १९५९ ई. पृ.२०७)क अनुसार सनातनी तारा एवं बौद्ध ओ जैन तारामे स्वरूपगत आर सिद्धान्ततः कोनो भेद नहि अछि। मुदा बौद्ध देवी ताराक रूपगत विस्तार देखना जाइछ- उग्रतारा, नीलतारा, पीततारा, हरिततारा, धनद तारा, महाचीन तारा, बज्रतारा, वरद तारा, श्वेत तारा आदि। वारी (सिंघिया समस्तीपुर) क रामजानकी मन्दिरमे रक्षित द्विभुजी बौद्धदेवी तारा (३१ इन्च)क पालयुगीन प्रस्तर मूर्तिमे मुख्य तारक अतिरिक्त सम्पूर्ण प्रभावलीमे एगारह टा विभिन्न तारा सभक मूर्ति अभिशिल्पित अछि। भगवती तारा कमलासनपर ललितासनमे बैसल छथि। दहिन हाथ वाममुद्रामे बनल अछि। भगवतीक प्रतिमा वस्त्राभूषणसँ अलंकृत अछि। हम प्रायः तीन दशक पूर्व बहेड़ा (दरभंगा)क एकटा व्यक्तिगत पूजागृहमे नीलतारा (सरस्वतीक प्रतिरूप)क पालयुगीन प्रस्तर मूर्ति देखने छलहुँ। सत्यार्थी वनगाँव महिषीक तारामूर्तिकेँ पूर्णतः (मुखाकृतिकेँ छोड़ि) वस्त्राच्छादित पोटरी कहने छथि। महिषीक वर्तमान तारामन्दिरक निर्माण नरेन्द्र ठाकुर (१७४३-६०)क रानी पद्मावती करौने छलीह। ओ महिषीक छलीह। प्रत्यक्षदर्शीक अनुसार उग्रताराक पार्श्वदेवक रूपमे नीलतारा ओ एक जटा मूर्तित अछि। महिषीक उग्रताराकेँ वशिष्टाराधितारा कहल जाइत छनि। एहि क्षेत्रक धर्ममूला (धेमुरा) नदीक तटवर्ती क्षेत्रसँ प्राप्त बौद्धदेवी ताराक एकटा प्रस्तर मूर्ति सम्प्रति पटना संग्रहालयमे संरक्षित अछि। वैशालीक नीरभुक्तौ ताराः चर्चित अछि। जगतपुर बरारी क्षेत्रसँ प्राप्त ताराक द्विभुजी स्थानक मूर्ति दशम-एगारहम शताब्दीक थिक। ताराक पार्श्वमे दू टा देवी मूर्ति त्रिभंगी मुद्रामे अंकित अछि। एहिसँ ई ज्ञात होइछ जे मिथिला सतत ब्राह्मण धर्मक प्रवर्तक छल, सेहो बौद्ध धर्मक देवी-देवताक प्रभावसँ वंचित नहि रहि सकल। (मिथिला भारती, पटना, मार्च-जून १९६९ ई.)। मूर्ति २ फीट चारि इन्च गुणा १ फीट ३ इन्च आकारमे बनल अछि। मूर्ति अभिलिखित अछि- “यं धर्मा हेतु प्रभवा...”। महायानमे देवी तत्वक प्रधानता छल- तारा, चण्डी, हारीति आदि। भगवती ताराक एकटा प्राचीन मन्दिर तिलकेश्वर (दरभंगा)मे अछि। स्मरणीय अछि वनगाँव-महिषीक पहिचान बुद्धकालीन आपण निगमसँ भेल अछि। कटराक चामुण्डा: गुप्तकालीन इतिहासमे कटरा तीरभुक्तिक चामुण्डा एकटा “विषय” छल आर कटरागढ़ (वर्तमान मुजफ्फरपुर जिला अन्तर्गत)क चामुण्डा एहि तांत्रिक शक्तिपीठक अधिष्ठात्री देवीक रूपमे पूजित छथि- विदेह नगरी स्थित्वा सर्वशक्ति समन्विता चामुण्डेति ततो ख्याता लक्ष्मणातर वासिनी। कटराक प्राचीन ऐतिहासिक गढ़क भग्नावशेषपर चामुण्डाक नवनिर्मित मन्दिर लखनदेड़ (लक्ष्मणा) तटपर अवस्थित अछि। चामुण्डा क्षेत्रक कटैयाक कटीश्वरी ओ चकौतीक चक्रेश्वरी उपशक्ति पीठ अछि। चामुण्डा तांत्रिक पूजावशेष वीरपुर, पचम्बा(बेगुसराय), पचही (मधुबनी) आदि स्थान सभसँ प्राप्य अछि। विराटपुरक चण्डी: सहरसा जिलाक सोनवर्षा प्रखण्डक अंतर्गत जिला मुख्यालयसँ पैंतीस कि.मी. पूर्वमे स्थित विराटपुर गामक शक्तिपीठ चण्डीस्थानक नामसँ लोकख्यात अछि। विराटपुरक चण्डी, धमहारा (धर्मधारा)क कत्यायिनी एवं महिषीक उग्रतारा स्थान एकटा तांत्रिक त्रिकोणपर अवस्थित अछि। चण्डी मन्दिर अष्टकोणीय आधारपर बनल मन्दिरक गर्भगृहमे भगवती चण्डीक मूर्ति, मन्दिरक प्रवेश द्वारपर बुद्धक मूर्ति (बुधाय स्वामी), शिल्पांकित तांत्रिक चक्र, प्रांगणमे तिरहुतामे अभिलेखादि शक्तिपीठक ऐतिहासिकताक प्रमाण अछि। चण्डी दुर्गाक एकटा रूप थिक। हिन्दू प्रतिमा विज्ञानक अनुसार ओऽ दसभुजी एवं सिंह अथवा बाघपर आरुढ़ रहैत छथि। ओऽ महिषासुर मर्दिनी जकाँ उग्ररूपा छथि। चण्डीक एकटा गुप्तकालीन मन्दिर गाजीपैता (कोशी क्षेत्र) गाममे अवस्थित अछि। मन्दिरक पाथरक चौखटिमे एकटा अस्पष्ट अभिलेख उत्कीर्ण अछि (बिहार की नदियाँ, हवलदार प्रसाद त्रिपाठी, पटना, १९७७ ई., पृ.४१०)। बेहट ओ लक्ष्मीपुरमे सेहो चण्डीमन्दिर शक्ति-साधनाक केन्द्र बनल अछि। जयमंगलागढ़ (बेगुसराय)क भगवती मंगलाकेँ “मंगल चण्डी” (देवी भागवत) कहल गेल अछि। एवं प्रकारे चण्डीक पूजन परम्पराक अवशेष विराटपुर (वीरहट्ट), गाजीपैता, लक्ष्मीपुर (कोशी क्षेत्र), बेहट, जयमंगलागढ़ एवं अरेराज (प.चम्पारण) क्षेत्रक चण्डीस्थानमे उपलभ्य अछि। सिमरौनगढ़क कंकाली: तिरहुतक कर्णाटवंशीय राजा नान्यदेवक राजधानीनगर सिमरौनगढ़ (सम्प्रति नेपाल तराइमे अवस्थित)क कुलदेवी कंकालीक प्राचीन प्रस्तर मूर्ति (खण्डित) एकटा मन्दिरक गर्भगृहमे स्थापित ओ पूजित अछि। मन्दिरक प्रांगणमे विष्णु, उमामाहेश्वर सूर्य आदिक विशाल- पाथरक कलात्मक मूर्तिसभ कर्णाटशैलीमे निर्मित एवं लोकपूजित अछि। कर्णाट राजा लोकनि पंचदेवोपासक रहितो शक्तिक उपासक छलाह। कर्णाट राजा शक्र सिंह द्वारा स्थापित सखराक भगवतीक शक्रेश्वरी एवं राजा हरिसिंहदेवक कुलदेवी तुलजा भवानीक (नेपाल उपत्यकाक तीनू राजधानी नगरमे स्थापित एवं पूजित मूर्ति सभ शक्ति उपासनाक उदाहरण बनि गेल अछि। कंकालीक एकटा मन्दिर राजपरिसर, दरभंगामे अछि। कंकालीक तेसर सांस्कृतिक मिथिलांचलक भारदह (भीमनगर बराजसँ पश्चिम, वर्तमान नेपाल तराइ)क मन्दिरमे एकटा तेजस्विनी पाथरक मूर्ति स्थापित अछि। कंकाली भगवती चतुर्भुजी छथि, जे निसंदेह कर्णाटकालीन (१२-१३म सदी) थिक। कंकालीक पार्श्वमे अष्टभुजी दक्षिणकाली, वाम दिस चतुर्भुजी विष्णु आदि प्राचीन प्रस्तर मूर्ति सभक ऐतिहासिक महत्व अछि। कंकालीक उदर भाग गहीर धरि तराशल अछि आर हाथसभमे दण्ड ओ पाश बाँचल अछि। शेष खण्डित अछि। आमीक अम्बिका स्थान: हाजीपुर-सोनपुरसँ छपरा मार्गमे दिघवारा (सारण) लग गंगाक वाम तटपर आमीमे अम्बिका भगवतीक एकटा प्राचीन मूर्ति स्थापित ओ पूजित अछि। आमी मही ओ गंगाक संगम क्षेत्र अछि। एहि भूभागकेँ संगमतीर्थ सेहो कहल जाऽ सकैछ। श्रुति अछि एहिठाम दक्ष प्रजापतिक यज्ञमे शिवा अपन प्राणाहुति देने छलीह। राजा सुरथ एहिठाम भगवतीक उपासना कयने छलाह। दुर्गा-सप्तशतीक अंतः साक्ष्यक अनुसार ओ एहिठाम भगवतीक मंदिरक मूर्ति बनाकऽ पूजने छलाह। आमी जाग्रत शक्तिपीठ अछि। अम्बिकाक रूप विन्यासमे कहल गेल अछि जे ओ कमलासनपर आसीन छथि। हुनक हाथमे पाश, अंकुश आदि छनि एवं वाहन सिंह छनि। अम्बिकाक पूजोपासना समान रूपसँ शैव, शाक्त, बौद्ध, जैन आदि लोकनि करैत छथि। जैन सन्दर्भमे ओ नेमिनाथक यक्षिणी ओ शासनदेवी सेहो छथि। सखराक छिन्नमस्ता: कुनौलीसँ (निर्मली, सहरसा) मात्र दू मील पश्चिमोत्तर दिशामे अवस्थित सखरामे छिन्नमस्ताक प्रसिद्ध मन्दिर अछि। मन्दिरक गर्भगृहमे कर्णाट राजा शक्रसिंह (१२८५-९५) भगवतीक मूर्तिक स्थापना कयने छलाह। फलतः सखराक छिन्नमस्ताकेँ शक्रेश्वरी सेहो कहल जाइत अछि। ओऽ तांत्रिक पूज्या भगवती छथि, मन्दिरक गर्भगृहमे स्थापित पंचदेवीमे छिन्नमस्ता प्रमुख छथि। सखरा सांस्कृतिक मिथिलांचलक नेपाल तराइ राजबिराज, सप्तरीमे पड़ैत अछि। भगवती छिन्नमस्ता द्विभुजी रूपमे रति-कामक युगनद्ध आसनपर ठाढ़ छथि। दहिन हाथमे काता एवं वाम हाथमे स्वहस्ते मुण्डित मस्तक छनि। ओ दिगवस्त्रा छथि, मुक्तकेशा छथि। हुनक दुनू पार्श्वमे योगिनी ओ भोगिनी (डाकिनी) योनिमुद्रामे ठाढ़ भगवतीक कण्ठसँ निःसृत रक्तक धारकेँ पीबैत छथि। रक्तक पहिल धार भगवतीक अपने मुँहमे जाइत छनि। यैह सृष्टिक जीवनचक्र थिक। योगिनी ओ डाकिनीक हाथ सभमे कपाल ओ काता छनि। रजरप्पा (झारखण्ड) मे भगवतीक भव्य मन्दिर दर्शनीय अछि। भगवतीक शास्त्रविहित एवं लोकविहित रूपसाधनाक सन्दर्भमे निम्नलिखित स्वरूपक प्रसिद्धि उल्लेखनीय अछि- लक्ष्मी (अन्धराठाढ़ी, मधुबनी; परानपुर, कटिहार), गजलक्ष्मी (भीठ-भगवानपुर, मधुबनी; रोसड़ा, समस्तीपुर आदि), सहोदरा माई (नरकटियागंज, प.चम्पारण), गढ़ी माइ (नेपाल तराइ), बुढ़िया माइ ( मंगरौनी, मधुबनी;कन्हौली, वैशाली आदि) आदिक अतिरिक्त परमेश्वरी (अन्धराठाढ़ी), वाणेश्वरी (मकरन्दा), भुवनेश्वरी (भवानीपुर), राजेश्वरी (डोकहर), सिद्धेश्वरी (सरिसव), जटेश्वरी (लोहट), विषहरी (दियारीथान, सहरसा) आदि। मिथिलांचलक गाम-गाममे पसरल पिण्डस्वरूपा सप्तमातृका एवं घर-घरमे पिण्डित गोसाउनि भगवतीक रूप विस्तारक सांस्कृतिक सर्वेक्षण ओ अनुशीलन आवश्यक अछि। एकर अतिरिक्त जलशक्ति पूरित नदी देवी सभमे गंगा, यमुना, कोशी, कमला ओ जीवछक शक्ति स्वरूपक पूजोपासना सेहो विशिष्ट अछि। मिथिलांचलक गाणपत्य क्षेत्र धार्मिक ओ सांस्कारिक अनुष्ठानसँ पूर्व गणेशक पूजनक विधान अछि कियेक तँ ओ विघ्नांतक छथि, विद्या-बुद्धिक देवता छथि, सिद्धि दाता छथि एवं पंचदेवोपासनामे परिगणित छथि। गणेशक स्वरूपक परिकल्पना देवत्व संपोषित मानव देहधारी किन्तु मस्तक एकदंत गजक अछि। मनुष्य देहधारी किन्तु पशु-पक्षी मुखी मस्तकधारी देवता सभमे वराह विष्णु, नरसिंह अवतार, अश्वमुखी अश्विनीकुमार, पक्षीमुखी गरुड़, कपिमुखी हनुमान आदि स्वयंमे एकटा अद्भुत परिकल्पना अछि। बौद्धकलामे गज, अश्व ओ सिंह धर्मक प्रतीक मानल गेल अछि, जे अशोक स्तंभ (धर्मध्वज)क रूपेँ मूर्त भेल अछि। मिथिलांचलमे हाथी (हस्तिमुख) शुभप्रद मानल जाइछ। एहि ठामक सांस्कारिक अनुष्ठान (विवाह संस्कार)मे गौड़ी पूजन ओ कोहबड़ भित्तिचित्रमे हाथीक अंकन एवं छठि ओ विवाह मण्डपपर हस्तिकलश पूजनक विधान विहित अछि। देवराज इन्द्रक वाहन ऐरावत हाथी छनि। अतः गजमुखी गणपति गणेशक स्वरूपगत परिकल्पनामे मनुष्य ओ पशुक शक्ति-सामर्थ्य विशेषक समाहारसँ एकटा नवकल्पक स्थापना भेल। वराहक (विष्णु) कर्म माँटि कोरब एवं (नर) सिंहक स्वरूप हंता (संहारक)क अछि। अतः देवस्वरूपक संरचना उद्देश्य विशेषक कारणेँ होइछ आर सभक विशद व्याख्या पुराण साहित्यमे कथाक माध्यमे भेल अछि। गणपति गणेशक मुख्य लक्षण अछि- लम्बोदर, एकदन्त, सूढ़, स्थूलकाय, भुट्ट नाटखुट एवं हाथमे परशु, पाश, अंकुश ओ कमल। मुदा ओ मोदक प्रिय छथि। वाहन मूषक छनि। गणेशकेँ चारि, आठ अथवा दस-बारह भुजी मूर्त्ति सभ भेटाइत अछि। हिनक हाथमे राखल आयुध एवं प्रतीकित वस्तु सभक आधारपर ओ भिन्न नामसँ अभिज्ञात होइत छथि- लक्ष्मी गणपति, वक्रतुण्ड गणेश, शक्ति गणेश, हेरम्ब, महागणपति आदि। मुदा मिथिलांचलक विभिन्न ऐतिहासिक स्थल सभसँ प्राप्त गणेशक स्वरूप एहि रूपेँ मूर्त भेल अछि। कोर्थक (दरभंगा) अष्टभुजी नृत्य गणेश (आकार २४”*१०”) कमलासनपर नृत्य भंगिमामे भक्त सभक वरदायी बनल छथि। व्क्रतुण्ड गणेशक हाथ सभमे अक्षमाल, अंकुश सहित परशु, पाश, मोदक पात्र आदि धारित अछि। भोजपरौल (मधुबनी)क चतुर्भुजी गणेश कमलासनपर ललितासन मुद्रामे प्रतिष्ठित छथि। पादपीठमे मूषक वाहनक रूपेँ उत्कीर्ण अछि। साहोपररी (दरभंगा)क अष्टभुजी नृत्यगणेशक भव्य प्रस्तर मूर्ति पूजित अछि। दुनू पार्श्वमे संभवतः ऋद्धि-सिद्धि विनीत भावेँ बनल छथि। पादपीठमे भक्तजन निवेदित छथि। अहिना गणेशक मध्यकालीन प्रस्तर मूर्ति सभ हावीडीह, नेहरा, बहेड़ा, देकुली, लहेरियासराय, हिरणी, रतनपुर (दरभंगा), विष्णु बरुआर, भच्छी, भीठभगवानपुर, भगवतीपुर (मधुबनी), महादेवाडीह (दरभंगा), करियन (समस्तीपुर), वीरपुर (बेगुसराय), तिरौता (शिवहर) आदि धार्मिक एवं ऐतिहासिक स्थल सभसँ उपलभ्य एवं पूजित छथि। एकर अलावा मिथिलांचलक बेगुसराय, दरभंगा, मुजफ्फरपुर आदि संग्रहालय सभमे ओ संरक्षित अछि। सामान्य गणेश ललितासनमे वरमुद्राक संगे निर्मित अछि। मध्यकालीन राजकीय संरक्षणमे बनल मंदिरक पाथरक कलात्मक चौखटक सोहावटीक मध्यमे गणेश अथवा गजलक्ष्मी बनयबाक चलन छल। गणेश ओ लक्ष्मी शुभसूचक देव छथि। अन्दामा (दरभंगा)क महादेवस्थानमे राखल मंदिर स्थापत्यक प्राचीन पाथरक सोहावटीमे पद्मासीन गणेशक मूर्ति एवं कोर्थ (दरभंगा)क मंदिर सोहावटीमे गजलक्ष्मी उत्कीर्ण अछि। प्रवेश द्वारक सोहावटीमे उत्कीर्ण गणेश वा गजलक्ष्मीसँ ध्वस्त मंदिरक गर्भगृहमे स्थापित मूल देव प्रतिमाक सूचक होइत अछि ओ शिवमंदिर वा विष्णुमंदिर संभावित अछि। गणेश शिव ओ पार्वतीक पुत्र छथि, शिवगणक अधिपति गणपति छथि एवं पार्वतीक गोदमे वात्सल्यपूरित बाल गणेश छथि। पाली (दरभंगा) मे पद्मासनमे बैसल पार्वतीक गोदमे बालगणेशक एकटा गुप्तकालीन पाथरक मूर्ति मंदिरमे पूजित अछि। एहि तरहक एकटा दोसर प्राचीन कांस्य मूर्ति हाजीपुर (वैशाली)क मठसँ प्राप्त भेल अछि, जाहिमे शिव ओ पार्वती स्थानुक मुद्रामे ठाढ़ छथि। द्विभुजी शिव ओ पार्वतीक दहिन हाथ वर मुद्रामे एवं पार्वती वाम हाथे बालगणेशकेँ गोदमे समेटने छथि। एहि क्रममे सिंहपर ललितासनमे बैसल चतुर्भुजी पार्वतीक वाम गोदमे बैसल बाल कार्तिकेयक एकटा पाथरक प्राचीन मूर्तिक उल्लेख आवश्यक बुझना जाइछ (भारतीय कला को बिहार की देन, पटना, १९५८ ई. चित्र सं.१००)। एहि मूर्ति सभमे भगवतीक वात्सल्य भावक सुन्दर अभिव्यक्ति भेल अछि। भारतीय मूर्तिकलाक परम्परामे मिथिलांचलसँ प्राप्त गिरिजाक प्राचीन पाथरक मूर्ति सभमे भगवतीक वात्सल्य भावसँ स्नात गणेश ओ कार्तिकेय पार्श्व देवपुत्रक रूपेँ उत्कीर्ण छथि। भगवती गिरिजा (मिरजापुर, दरभंगा) कुर्सोनदियामी (दरभंगा) एवं फुलहरक गिरिजास्थानक दहिन पार्श्वमे गणेश ओ वाम पार्श्वमे कार्तिकेय ठाढ़ छथि। गणेशक हाथमे मोदक एवं कार्तिकेयक हाथमे मूसल शोभित छनि। ओ द्विभुजी छथि। गणेश ओ कार्तिकेयक स्वतंत्र मूर्ति सेहो परिकल्पित एवं मूर्त भेल अछि। ओ प्रायः शिवमंदिरमे स्थापित एवं पूजित छथि। मयूरपर आरूढ़ कार्तिकेय युद्धक देवता छथि। पुण्ड्रवर्धन (पूर्णिया क्षेत्र)मे हिनक एकटा मंदिरक उल्लेख प्राप्त अछि। मुदा वैशालीक हरि कटोरा मन्दिरमे मयूरागढ़ कार्तिकेय स्थापित एवं पूजित छथि। एहि तरहक एकटा पालकालीन पाथरक कार्तिकेयक मूर्ति बसुआरा (मधुबनी)क मठमे सेहो संरक्षित अछि। कार्तिकेयक हाथमे बरछी छनि। आइ काल्हि नवरात्रक अवसरपर भगवती दुर्गाक पार्श्वमे सामान्यतः गणेश ओ कार्तिकेयक शिल्पांकन कयल जाइछ। तहिना दीपावलीक मांगलिक बेलामे गणेशक संग लक्ष्मीक सामंजस्य (लक्ष्मी-गणेश) श्री समृद्धि ओ सुख सौभाग्यक सूचक मानल जाइछ। मिथिलांचलमे गणेश चौठ (भाद्र शुक्ल चतुर्थी) एवं महाराष्ट्रमे गणेशोत्सव व्यापक रूपेँ मनाओल जाइछ। डॉ. जनार्दन मिश्र (भारतीय प्रतीक विद्या, पटना, १९५९ ई.) मातृरूपमे ब्रह्म विनायकक मनोरम मूर्ति सभक (चित्र सं.९ च एवं छ) उल्लेख कयने छथि ओ गणेशक शक्ति छथि। भारतीय परिप्रेक्ष्यमे प्रत्येक देवताक लेल हुनक शक्तिक परिकल्पना कयल गेल- शिव-पार्वती (उमा-माहेश्वर), विष्णु-लक्ष्मी (लक्ष्मी-नारायण), इन्द्र-इन्द्राणी आदि। सप्तमातृकाक परिकल्पना एकटा उदाहरण अछि। एहि ब्रह्म विनायककेँ शक्तिगणेश सेहो कहल जा सकैछ। एहि तरहक प्राचीन मूर्ति सभ भारतक अलावा जापान (जापान का मूर्ति तात्विक अध्ययन, बक्शी) मे सेहो पाओल जाइछ। ओना प्राचीन भारतीय साहित्यमे ऋद्धि एवं सिद्धिकेँ हुनक पत्नी कहल गेल छनि। ओ दुनू गणेशक मूल मूर्तिक संगे उत्कीर्णो भेल छथि, पार्श्वदेवीक रूपमे। गणेशक स्वतंत्र पूजोपासना कहियासँ आरम्भ भेल, तकर निश्चित जनतबक अभाव अछि, तथापि पंचदेवोपासनाक क्रममे हिनक पूजन प्रबल भेल। गणेशक स्वतंत्र मूर्तिक दूटा रूप मिथिलांचलमे सर्वाधिक लोकप्रिय अछि- (क) पद्नासीन गणेश एवं (ख) नृत्य गणेश। भोजपरौल (मधुबनी)क पद्मासनपर ललितासनमे बैसल चतुर्भुजी वक्रतुण्ड गणेशक पादपीठमे वाहन मूषक बनल अछि। कमलासन विशाल उदर ब्रह्माण्डक सृष्टिबोधक, मूषक विघ्नक द्योतक, हाथक मोदक सृष्टिक संकेत बिन्दु, पाश-अंकुश शक्ति बोधक, वाम स्कंधसँ लटकैत यज्ञोपवीत यज्ञसूत्रधारी गणेश पूर्णब्रह्मक प्रतीक बनि गेल छथि। दहिन हाथ अभय मुद्रामे बनल अछि। नृत्य गणेश अथवा नटेश गणेशक मूर्तरूप अपेक्षाकृत अधिक लोकग्राह्य भेल। मूर्तिकारकेँ सेहो विन्यासक नीक अवसर भेटलनि। नटराज शिवक उत्तराधिकार पुत्र गणेशकेँ प्राप्त होयब स्वभाविके। एहि दृष्टिसँ कोर्थक अष्टभुजी नृत्यगणेशक मूर्तिकेँ आदर्श मानल जा सकैछ। जकर साक्षात दर्शन कऽ मनक मयूर स्वतः नाचि उठैत अछि। ब्रह्मक निरन्तर गति ओ स्पंदनक नाम थिक नृत्य आर ब्रह्मक नृत्य भेल लीला। नृत्य गणेश त्रिभंगी मुद्रामे बनल छथि। हिनक पैरक नुपूरक ललित छन्द ओ नृत्यभंगिमायुक्त हाथ सभमे पाश, मोदक पात्र, परशुयुक्त अंकुश एवं अक्षमाला प्रमुख अछि। दहिन हाथ वरमुद्रामे बनल छनि। ठेहुन धरि अधोवस्त्र, डाँरमे कटि भूषण, कान्हसँ लटकैत यज्ञसूत्र, गरामे कष्ठाभूषण, माथपर गजमुक्ताक झालरिक संग शिखराकार मुकुट एवं हाथ सभमे कंगन सुशोभित छनि। नृत्यरत गणेश एकदंत छथि। ब्रह्मस्वरूप प्रायः देवी-देवता सभक नृत्यमयी मूर्ति निर्मित होइत छल। सप्त मातृकाक नृत्यरतमूर्ति सभक संग शिव परिवारक नृत्य गणेश अथवा नृत्य वटुक भैरवक रूपांकन सेहो भेल अछि। करियन (रोसड़ा, समस्तीपुर)क भगवती मंदिरमे स्थापित एवं पूजित पार्वतीक अगल-बगलमे द्विभुजी गणेश एवं कार्तिकेयक पाथरक मूर्तिसभ पालकालीन थिक (करियन एक्सकेवेशन- डॉ.सीताराम राय, पटना)। गणेशक आठ इंच बलुआही पाथरक बनल मूर्तिक दुनू हाथमे मोदक छनि। लम्बोदर नृत्य गणेशक हाथ ओ पैर सभमे आभूषण एवं देहपर यज्ञोपवीत शोभित छनि। करियनकेँ वैदिक धर्मक न्यायविद् आचार्य उदयनक जन्मभूमि एवं ब्राह्मण देवी-देवता सभक सिद्ध भूमि मानल जाइछ। सत्येन्द्र नारायण झा (मिथिला की पाल प्रतिमाएँ, मिथिला संस्कृति एवं परम्परा पृ.२५८) क सर्वेक्षणक अनुसार भगवतीपुर (मधुबनीसँ) गणेशक दूटा पाथरक मूर्तिक अलावा भगवानपुरसँ नृत्य गणेश, महदेवाडीह (गोरहट्टा, दरभंगा) एवं तिरौता (शिवहर)सँ गणेशक पालकालीन मूर्ति प्राप्त भेल अछि, जे ब्राह्मण धर्मक पुनरुत्थान एवं पंच देवोपासनाक लोकप्रियताक कारणे पालकला शैलीक विकास ओ विस्तारक क्रम बनल रहल। शिल्पक दृष्टिसँ किछु महत्वपूर्ण प्रयोग रेखांकन योग्य अछि। सत्यनारायण झा सत्यार्थी मिथिलांचलक एकटा विलक्षण गणेशमूर्तिक सचित्र सूचना देने छथि। तदनुसार एकहि प्रस्तर खण्डमे गणेशक तीन टा मूर्ति ऊपर-नीचाक क्रममे उत्कीर्ण अछि। प्रत्येकक भंगिमा भिन्न अछि। सत्येन्द्र कुमार झा (मिथिला की लोक संस्कृति विशेषांक, दरभंगा, २००६ ई. पृ. २४९) क्षेत्रीय सर्वेक्षणक क्रममे करियन (समस्तीपुर), बरेपुरा (बेगुसराय), मुक्तेश्वर स्थान, देवहर, मधुबनी), भगवतीपुर नाहर, विष्णु बरुआर, भोजपरौल (मधुबनी)क अतिरिक्त चन्द्रधारी संग्रहालय, दरभंगाक नृत्यगणेशक प्रतिमाकेँ विशेष महत्वपूर्ण मानलनि अछि। एहिमे करियन, मुक्तेश्वर ओ हिरौताक गणेशमूर्तिकेँ ओ प्रारम्भिक पालसेन कालीन कहने छथि। सत्यनारायण झा सत्यार्थीक सर्वेक्षणक (मिथिलाक पुरातात्विक सम्पदा, दरभंगा, २००३ ई.) सूचनानुसार कोर्थ, हाबीडीह, भीठ भगवानपुर, सौराठ, देकुली, फुलहर, बहेड़ा, भच्छी, लहेरियासराय, रतनपुर आदि स्थल सभपर विघ्नांतक गणेशक ऐतिहासिक मूर्ति सभ उपलभ्य एवं पूजित अछि। हिरणी-बड़गाँव (कुशेश्वर क्षेत्र)मे सेहो गणेशक भव्य मूर्तिक जनतब अछि। भगवतीपुरमे गणेशक दू टा प्राचीन मूर्ति स्थापित ओ पूजित अछि। विजयकान्त मिश्र (मिथिला आर्ट एण्ड आर्किटेक्चर, इलाहाबाद, १९७८ ई., प्लेट xii/ २१-२२) भगवानपुरक नृत्यगणेशक मूर्तिक उल्लेख कयने छथि। एकर अतिरिक्त तिरौताक (शिवहर) गणेश विशिष्ट अछि, अत्यल्प अलंकरण ओ पादपीठक बनावटक आधारपर गुप्तोत्तर कालक संभावित लगैत अछि। हम सकरा (मुजफ्फरपुर)मे बलुआ पाथरक एकटा गुप्तकालीन गणेशमूर्ति देखने छलहुँ। शैलीगत विशिष्टताक आधारपर मौर्यकालमे सिर्फ मूर्ति बनैत छल। गुप्त कालमे मूर्तिक संग प्रभावली जोड़ल गेल। मुदा ग्यारहवी-बारहवी सदीमे मूर्तिकार मुख्य मूर्तिक अपेक्षा प्रभावली, सिंहासन, वस्त्राभूषण आदिक सौन्दर्याभिव्यक्तिमे विशेष कौशल देखौलनि। मिथिलांचलसँ प्राप्त पाल-सेन ओ कर्णाटकालीन गणेशमूर्ति सभ अलंकृत पाल शैलीक परम्परामे निर्मित अछि। गणेश पूजन विशेष लोकप्रिय छल, पालकालमे। एक दिस नालंदा, ओदंतपुरी ओ विक्रमशिला बौद्ध विहारक ध्वंसाविशेषसँ ब्राह्मण ओ बौद्धधर्मी मूर्तिसभ प्राप्त भेल अछि। गणेश दुनू संदर्भमे एक समान विघ्नांतक ओ सिद्धिदाता देवताक रूपमे मान्य छथि; मुदा किछु बौद्ध मूर्तिमे बौद्ध प्रभुत्वक क्रमे बौद्धदेवी अपराजिता (देवी) द्वारा गणेशकेँ मर्दित देखाओल गेल अछि। क्रद्धा देवीक वाम पैर गणेशक दहिन पैरकेँ मर्दित कयने अछि। त्रैलोक्य विजयक मूर्तिमे शिव ओ पार्वतीकेँ मर्दित देखाओल गेल अछि। मुदा ओदंतपुरी (बिहारशरीफ, नालंदा) सँ प्राप्त एकटा ऐतिहासिक शिवलिंग (चतुर्मुखी)मे एक दिस गणेश एवं दोसर दिस विष्णु मूर्तित छथि अर्थात् पंचदेवोपासनाक माध्यमसँ विभिन्न सम्प्रदायकेँ एक छत्रक (शिव) अन्तर्गत आनल गेल एकटा समन्वयात्मक चेष्टा छल। मुदा आश्चर्य, मंगरौनीक त्रैलोक्य विजयक मूर्तिमे बौद्धदेवी अपराजिताक पैरतर गणेश नहि छथि। बौद्ध लोकनि मिथिलाक ब्राह्मणत्वसँ आतंकित छल। मिथिलांचलक लोकजीवनमे कोनो शुभ ओ सांस्कारिक अनुष्ठानमे गणेश पूजनक विधान अछि। गाथारम्भ, नाट्यारम्भ, कीर्तनारम्भ आदिमे गणेशक वन्दना प्रथमे कयल जाइत अछि- “आदित्यं गणनाथं च देवी रुद्रं च केशवम्। पञ्चदैवत्य मित्युक्तं सर्वकर्मसु पूजयेत”।– मत्स्यपुराण। मिथिलाक चौथचन, गौड़ी-गणेश, लक्ष्मी गणेश आदि प्रकारान्तरसँ गणेश-पूजन थिक”। शिवमंदिरमे पार्वती, गणेश, कार्तिकेय, नन्दी ओ प्रायः भैरवक मूर्तिक स्थापन ओ पूजनक विधान अछि। मुदा कौटिल्यक अर्थशास्त्र (३५० ई.पू.) कालमे दुर्गक अन्दर दुर्गा, विष्णु, कार्तिकेय (जयन्त), इन्द्र (वैजयन्त), कुबेर (वैश्रवण) आदिक स्वतंत्र मंदिरक प्रावधान अछि, “राजतरंगिणी”क अंतः साक्ष्यक अनुसार पुण्ड्रवर्धन (पूर्णिया)मे कार्तिकेयक मंदिरक उल्लेख प्राप्त होइछ। रजौनाक एकटा गुप्तकालीन स्तंभावशेषमे गंगाधर शिवक एवं गणेश कार्तिकेयक मूर्ति उत्कीर्ण अछि (सम्प्रति कलकत्ता संग्रहालयमे)। गरुड़ पुराण एवं करतोया माहात्म्यमे कार्तिकेयक पवित्र मंदिरक साक्ष्य स्रोत उपलब्ध अछि। गणेश पुराणक क्रीड़ा खण्ड (श्लोक १३८-१४८)क श्री गणेशगीतामे गणेश राजा वरेण्यकेँ योगसाधनाक शिक्षा देने छथि। देकुलीक (दरभंगा)क मंदिरालयमे गणेशक मूर्ति ऐतिहासिक ओ पूजनीय अछि। डॉ. वी.पी.सिन्हा (भारतीय कला को बिहार की देन, पटना) मे शाहावाद जिलासँ प्राप्त एकटा कार्तिकेयक प्राचीन मूर्तिक उल्लेख कयने छथि। एकटा हाथमे बरछी ओ दोसर वरमुद्रामे उत्कीर्ण अछि। ओ विवाह नहि कयलनि, तँ कुमार कहबैत छथि। मुदा हुनक शक्ति देवसेनाक परिकल्पना कयल गेल अछि जे सप्तमातृकामे कौमारीक रूपमे प्रतिष्ठित छथि। एहि शक्तिक चित्र (सं.१०१) आलोच्य पोथीमे प्रकाशित अछि। तदनुसार द्विभुजी कार्तिकेयक शक्ति स्थानक मुद्रामे ठाढ़ छथि। वरमुद्रामे एवं पार्श्वमे मयूरी विनीत भावमे ठाढ़ अछि। डॉ कंचन सिन्हाक एहि सम्बन्धमे शोध ग्रंथ प्रकाशित अछि- कार्तिकेय इन इण्डियन आर्ट एण्ड लिटरेचर (दिल्ली १९७९ ई.)। तहिना मिथिलांचलक किछु गणेश मूर्तिक अनुशीलन डॉ चितरंजन प्र. सिन्हा (मिथिला भारती, अंक-१, भाग-२) प्रकाशित अछि। पाली (दरभंगा)क गुप्तकालीन पार्वतीक गोदमे गणेश मातृस्नेहक सुख पावि रहल छथि, तहिना भागलपुर जनपदसँ प्राप्त एकटा ऐतिहासिक, प्रस्तरमूर्तिमे चतुर्भुजी पार्वतीक गोदमे कार्तिकेय शोभित छथि (सम्प्रति पटना संग्रहालयमे संरक्षित)। मुदा लालगंज (वैशाली)क शिवपरिवारक एकटा विशाल मूर्तिमे बसहाक पीठपर शिव-पार्वती ओ गणेश-कार्तिकेय सभ केओ संगे अभिशिल्पित छथि। मिथिलांचलमे कार्तिकेयक स्वतंत्र प्रतिमा गणेशक अपेक्षा कम भेटाएल अछि मुदा बसाढ़ (वैशाली) ओ बसुआरा (मधुबनी)क कार्तिकेयक पालकालीन प्रस्तर मोर्ति ऐतिहासिक एवं दुर्लभ कलाकृति थिक। दक्षिण भारतमे हिनक पूजा-अर्चना विशेष होइछ। आजुक सांस्कृतिक परिवेशमे नवरात्रक अवसरपर प्रतिवर्ष निर्मित दुर्गाक मूर्तिक पार्श्वमे गणेश-लक्ष्मी ओ कार्तिकेय-सरस्वतीक मूर्तिक लोकप्रियता विशेष अछि। एक दिस गणपति गणेश नटराज शिवक परम्परामे नृत्यनाथक रूपेँ मल्लकालीन मैथिली नाटकसभ (नेपालक मैथिली साहित्यक इतिहास, प्रफुल्ल कुमार सिंह “मौन”, विराटनगर, नेपाल, १९७२ ई.)मे संपूजित छथि तँ दोसर दिस ओ मैथिली लोकगाथा गायनसँ पूर्व हिनक भक्तिपूर्ण स्मरण कयल जाइछ। एवं प्रकारेँ मिथिलांचलक प्रायः समस्त जनजीवनमे कोनो न कोनो रूपेँ ओ लोकक श्रद्धापूर्वक निवेदित अछि। मिथिलांचलक शैव क्षेत्र देवाधिदेव शिव सर्वव्यापी पूर्ण ब्रह्म छथि। आदिदेव महादेव छथि। प्राचीनतम देवता पशुपति छथि। वैदिक साहित्य (यजुर्वेद, अध्याय-१६)क शतरुद्रिय सूक्त तथा पौराणिक साहित्य (वायुपुराण)मे हिनक पूजोपासनाक विस्तृत सिद्धांत विवेचित अछि। सूर्य, चन्द्र आओर अग्निक त्रिनेत्रधारी शिवकेँ प्रणाम- चन्द्रार्क- “वैश्वानर लोचनाय नमः शिवाय”। शिवक हाथ सभमे त्रिशूल, डमरू, मृग ओ परशु शोभित छनि। ज्ञान, इच्छा ओ क्रिया शक्तिक क्रियाशील रूप त्रिशूल थिक। डमरु शब्द ब्रह्मक प्रतीक अछि। शिवकेँ मृगधर कहल गेल अछि। मृग वस्तुतः वेद अछि- “अत्र वेदो मृगः”। परशु संहार सूचक अछि। पशुपति शिवक प्रत्यक्ष रूप थिक। वेद, उपनिषद एवं पुराण साहित्यमे प्राणिमात्रकेँ पशु कहल गेल अछि। अतः शिवक पशुपति नाम सार्थक अछि। पशुपति शिवक प्राचीनतम मूर्ति (मृ.मोहर) मोहनजोदड़ो-हड़प्पा संस्कृतिमे प्राप्त भेल अछि। द्विभुजी पशुपति योगासीन छथि। हुनक मूर्तिक चारू दिस अनेक पशु चित्रित अछि। हुनक माथपर दू टा सिंगवला सिराभूषण शोभित छनि। आलोच्य पशुपतिक रूपांकन एखन धरि अद्वितीय अछि। शैव क्षेत्रमे नेपाल उपत्यका (काठमाण्डू) क विख्यत पशुपति चतुर्मुखी शिवलिंगक रूपमे विख्यात अछि। एहि पशुपति शिवलिंगक एकटा मध्यकालीन प्रतिमूर्ति अरेराज (प.चम्पारण)क सोमेश्वरनाथ महादेवक मन्दिर परिसरमे दर्शनीय अछि। नटराज सहस्रनाम भाष्य (मद्रास १९५१ ई.) क अनुसार द्विपद एवं चतुष्पद प्राणिमात्रक देवता पशुपति छथि। वराहपुराण एवं विष्णुपुराणक अंतः साक्ष्यक अनुसार शिव हिरण्याक्षपुत्र अन्धकासुरक बध काशीमे कयने छलाह। ओ त्रिपुरासुर ओ गजासुरक बध सेहो कयने छलाह। ओ सभ महामोह (अविद्या)क प्रतिरूप छल। भारतीय मूर्तिकलामे गजासुर बधक प्रस्तर मूर्ति मिथिलांचलमे प्राप्य अछि। शिव संहारक देवता छथि। ओ अविनाशी सर्वात्मा छथि। शिव लीलाधर छथि। ओहि लीलाधर शिवक एकटा स्वरूप नटराजक थिक।शिवक नृत्य सृष्टि विधान थिक एवं निवृत्तिकेँ प्रलय मानल जाइछ। जगतक रक्षा हेतु ओ नित्य सायंकाल नृत्य करैत छथि। ओहि समय देवादि उपस्थित रहैत छथि। जगतक सृष्टि प्रवर्तनक लेल शिव लास्य ओ संहारक लेल शिव ताण्डव करैत छथि। “ताल”क शाब्दिक रचना “ता” ओ “ल” सँ भेल अछि। अतः शिव ओ शिवा नृत्यमय छथि, संगीत-नाट्यादिक आदि प्रवर्तक छथि, डमरू ध्वनिसँ निनादित माहेश्वर सूत्र अर्थात् शब्दशास्त्रक निर्माता छथि। शिवकेँ नटराज, नटेश नृत्यनाथ अथवा नटेश्वर सेहो कहल जाइछ। चिदम्बरमक नटराज मूर्ति सर्वप्रसिद्ध अछि। मिथिलांचलसँ नटराज शिवक मध्यकालीन प्रस्तरमूर्ति प्राप्त अछि जाहिमे ओ अपस्मारक कान्हपर आरुढ़ भऽ नचैत छथि। नटराजक जटामे अमृतक प्रतीक चन्द्रमा अछि। प्रभावली सहित अथवा प्रभावली रहित नटराजक मूर्तिक विधान अछि मुदा ओ स्फुलिंगमयी ज्वालसँ घेरायल रहैत छथि। मिथिलांचलक प्रसिद्ध शिवमन्दिर सभमे लोक रुद्राक्ष ओ त्रिशूल धारण कऽ डमरुक संग नचैत छथि। मैथिलीक प्राचीन नाटक सभ एहि नृत्यनाथक नामे समर्पित अछि। मिथिलांचलमे शिवभक्तिक लेल नचारी, महेशवाणी, हरगौरी सम्मरि, हरगौरी विवाह आदि संगीत-नाट्यादि बेस लोकप्रिय एवं परम्परित अछि। तारालाही (दरभंगा) एवं मखनाहा (तराई)क अष्टभुजी नटेशक मूर्ति कर्णाटयुगीन अछि। शिवक तीनटा रूप विशिष्ट अछि- अर्धनारीश्वर, हरिहर ओ त्रिमूर्ति। त्रिमूर्ति शिव वस्तुतः ब्रह्मा, विष्णु, महेशक शक्तिक समाहार अछि- ब्रह्मविष्णुशिवा ब्रह्मन् प्रधाना ब्रह्मशक्तयः।– विष्णुपुराण। एहिमे सृष्टि (ब्रह्मा), स्थिति (विष्णु) ओ विनाश (शिव)क तत्व सभ निहित अछि। सृष्टि, स्थिति ओ प्रलयक कारक शिवे छथि। त्रिमूर्तिक विशाल गुप्तकालीन प्रतिमाक साक्षात एलफेण्टामे कयने छलहुँ। मिथिलांचलक भच्छी (दरभंगा)मे त्रिमूर्तिक अभिलेखांकित मध्यकालीन प्रस्तरमूर्ति भद्रेश्वर महादेव मन्दिर (बहेड़ी प्रखण्ड)मे पूजित अछि। त्रिमूर्ति सत्, रज ओ तमोगुणक प्रतिनिधित्व करैत अछि। सिद्धांततः हरि (विष्णु) ओ हर (शिव) अभेद छथि अर्थात् संयुक्त रूपेँ हरिहर छथि। विद्यापतिक निम्नलिखित पदसँ स्थिति आर स्पष्ट भऽ जाइछ- खन हरि खन हर भल तुअ कला। खन पित वसन खनहि बघछला॥... एक शरीरे लेल दुइ बास। खन बैकुण्ठ खनहि कैलास॥ हरिहरक मूर्तिक अर्द्धांगमे व्याघ्रचर्म, त्रिशूल, जटामुकुटादि एवं अर्द्धांगमे पीताम्बर, शंख-चक्र, किरीट मुकुटादि शोभित छनि। हरिहरक विशाल प्रस्तर प्रतिमा गंगा-गंडक-संगमपर अवस्थित हरिहरनाथ मंदिरमे स्थापित अछि। हरिहरक एकटा पालकालीन भव्य प्रस्तर (कसौटी पाथर) मूर्ति हम वाल्मीकिनगर (भैंसालोटन) मे देखने छलहुँ। ओ ओहिठाम अन्यान्य मूर्ति सभक संगे संरक्षित अछि। हरिहरक दहिन भागमे शिव ओ वाम भागमे विष्णु उत्कीर्ण छथि। शिवक तेसर स्वरूप अछि अर्धनारीश्वर अर्थात् आधा देह शिवक ओ आधा पार्वतीक। शिवक जटापर चन्द्रमा ओ हाथमे त्रिशूल शोभित अछि एवं आर्धांगिनी पार्वतीक हाथद्वयमे दर्पण ओ कमल पुष्प। अर्धनारीश्वरक परिकल्पना सृष्टि बोधक अछि। लिंग ओ वेदीक एकस्थ भेने अर्धनारीश्वरक रूप प्रत्यक्ष होइछ। “लिंगवेदी समायोगादर्धनारीश्वरो भवेत”।–लिंगपुराण.९९.८.१. मिथिलांचलक कुर्सो नदियामी (दरभंगा)सँ अर्धनारीश्वरक मध्यकालीन प्रस्तरमूर्ति पाओल गेल अछि। मूर्ति षटभुजी अछि। शिव गृहस्थ देव छथि। हुनक अर्द्धांगिनी ओ शक्ति शिवा एवं गणेश ओ कार्तिकेय पुत्र छनि। वृषभ शिवक एवं सिंह पार्वतीक वाहन छनि। हुनक परिणयक परिकल्पना “कल्याण सुन्दर” मे कयल गेल अछि। पौरोहित्यक काज ब्रह्मा करैत छथि एवं साक्षीत्व अग्निक छनि। ब्रह्मा यज्ञ ओ वेदक देवता सेहो छथि। कल्याणसुन्दरक मूर्तिक परिकल्पना स्थानुक रूपमे कयल गेल अछि। वस्त्राभूषणसँ अलंकृत शिव-पार्वती पाणिग्रहण कयने त्रिभंगी मुद्रामे ठाढ़ छथि। शिव-पार्वतीक बीचमे चतुर्भुज ब्रह्मा पुरोहित रूपेँ बैसल छथि। पूरा भावात्मक परिवेश गतिमय ओ मंगलमय अछि। कल्याणसुन्दरक मूर्ति मिथिलांचलसँ अप्राप्य अछि मुदा मिथिलांचलक कोहबर चित्रमे आदर्श वर-वधूक रूपमे ओ परम्परासँ चित्रित छथि। शिव-पार्वतीक दाम्पत्य जीवनक सुखद, रसमय एवं कलात्मक परिकल्पना। उमा-माहेश्वरक अभिशिल्पनमे भेल अछि- शिव ओ पार्वती ललितासनमे आसीन छथि। पादपीठमे शिवक वाहन वृषभ ओ पार्वतीक वाहन सिंह उत्कीर्ण अछि। शिव चतुर्भुजी छथि। तन्वंगी पार्वती शिवक वाम जंघापर बैसल छथि। शिवक दहिन हाथमे त्रिशूल ओ वाम हाथ पार्वतीक वक्षस्थलपर स्थित अछि। शिव वाम हाथे एवं पार्वती दहिन हाथे एक दोसराकेँ आलिंगबद्ध कयने छथि। पार्वतीक दहिन हाथमे दर्पण छनि। शिव दहिन हाथसँ पार्वतीक लज्जावनत मुखकेँ उठा रहल छथि। मिथिलांचलमे उमामाहेश्वरक पाथरक मूर्तिसभ भीठभगवानपुर, डोकहर (मधुबनी), सिमरिया भिण्डी, करियन (समस्तीपुर), नावकोठी (बेगूसराय), बाथे, राजेश्वरस्थान (मधुबनी) तिरहुता, बेलामोड़, वनवारी, कोर्थ, भोजपरौल, सौराठ, मंगरौनी, महादेवमठ, बसुदेवा, गाण्डवीकेश्वर, परानपुर (कटिहार) सिमरौनागढ़ (वारा, नेपाल) आदि ऐतिहासिक स्थलसभसँ प्राप्त अछि एवं ओहिठामक मंदिरसभमे संरक्षित ओ पूजित अछि। एहिसँ स्पष्ट अछि जे मिथिलांचलक मध्यकालीन परिवेशमे उमा-माहेश्वरक ललित मूर्तिक परिकल्पना सुखद दाम्पत्य दिस उत्प्रेरित करवामे सक्षम अछि। दाम्पत्यक सुखद परिणति संततिक रूपेँ फलित होइछ। शिवक पुत्र गणेश कार्तिकेयक अपेक्षा अधिक लोकप्रिय एवं पंचदेवोपासकमे परिगणित छथि। पाली (दरभंगा)क एकटा मंदिरमे पार्वतीक गोदमे शिशु गणेश (बाल गणेश) वात्सल्य पूरित छथि। मुदा हाजीपुर (वैशाली)क एकटा मठसँ जब्त शिव-पार्वतीक कांस्य मूर्तिमे बालगणेश पार्वतीक गोदमे छथि। कांस्य प्रतिमा स्थानुक मुद्रामे बनल अछि। पार्वतीपुत्र कार्तिकेयक एकटा स्वतंत्र पालकालीन पाथरक प्रतिमा वैशालीगढ़ एवं दोसर बसुआरा (मधुबनी) सँ प्राप्त अछि। पालीक पार्वती-गणेश गुप्तकालीन थिक मुदा अन्यान्य सभ पाल-पालोत्तरकालीन थिक। पुण्ड्रवर्धन (पूर्णियाँ) मे कार्तिकेयक एकटा मन्दिर छल (राजतरंगिणी)। लिंग ओंकार ब्रह्मक स्थूल रूप थिक। शिवलिंग ब्रह्मबोधक थिक। ओ पद्मपीठ (वेदी) पर स्थापित रहैत अछि। शिवलिंगक निम्न भाग भूमिस्थ, मध्य भाग वेदीमे एवं तृतीय भाग पूज्य मानल जाइछ। शास्त्रानुसार लिंगक अनेक प्रकार अछि जाहिमे शिव लिंगक पूजोपासना सर्वाधिक लोकप्रिय धार्मिक कृत्य मानल जाइछ। ज्योतिर्मय शिवलिंगक महत्ता विशिष्ट अछि जे भौगोलिक दृष्टिसँ राष्ट्रिय एकताकेँ सूत्रबद्ध करैत अछि। तहिना मिथिलाक सांस्कृतिक दिग्सूचक शिव (मंदिर) छथि। मिथिला परिक्रमामे एहि शिवमंदिर सभक धार्मिक महत्व बढ़ि जाइछ। कल्याणेश्वर, जलेश्वर, क्षीरेश्वर एवं सप्तरेश्वर। जनकपुरक उत्तरमे अवस्थित क्षीरेश्वर शिवक वृहदविष्णु पुराण (मिथिला माहात्म्य)मे एवं दक्षिणमे स्थित जलेश्वर शिवक स्कन्दपुराणमे (नेपाल माहात्म्य) विस्तृत वर्णन उपलभ्य अछि (जनकपुरधाम, भ्रमर, जनकपुरधाम, नेपाल, १९९९ ई.)। शिवलिंगोक अनेक प्रकार अछि- एकमुखी, चतुर्मुखी, पंचमुखी एवं सहस्रमुखी। एकमुखी शिवलिंगक परिकल्पना सर्वप्राचीन अछि। चण्डीस्थान (अरेराज, प.चम्पारण)सँ प्राप्त कुषाणकालीन एकमुखी शिवलिंगमे शिवक मुखाकृति उत्कीर्ण अछि। हुनक जटाजूटसँ गंगा प्रवाहित अछि। शिवलिंग अद्भुत ओ अद्वितीय अछि। सर्वेक्षण क्रममे देखने छलहुँ। छायाचित्र उपलब्ध अछि। मुदा सामान्यतः एकमुखी शिवलिंगमे पार्वतीक मुखाकृति उत्कीर्ण होइछ, जकरा गौरीशंकर सेहो कहल जाइछ। लिंग भावनाक आधार शैव ओ शाक्त दर्शन अछि। एलफेंटाक त्रिमूर्तिक मध्यमुख शिव, वाममुख पार्वती एवं दहिन मुख रौद्र रूप शिव अर्थात् भैरवक थिक। अर्थात् त्रिमुखी शिव (गुप्तकालीन) शिवत्वक विस्तार अछि। मुदा चतुर्मुखी शिव शिवशक्तिक दिग् दिगन्त व्यापकताक सूचक थिक। पशुपतिनाथ (नेपाल) ओ अरेराजक (चम्पारण) चतुर्मुखी शिवलिंगमे कतहु श्रीराम, बुद्ध, शक्ति (पार्वती), सूर्य आदिक मुखाकृति जनपदीय मान्यतानुसार उत्कीर्ण अछि। बसाढ़ (वैशाली)क गुप्तकालीन चतुर्मुखी शिवलिंग अभिलेखांकित अछि। वैशालीमे कैकटा पालकालीन चतुर्मुखी शिवलिंग सेहो मंदिरसभमे स्थापित अछि, चौगामा (दरभंगा), शाहपुर (सहरसा) एवं गढ़पुरा (बेगुसराय)क शिवमन्दिरमे सेहो चतुर्मुखी शिवलिंग स्थापित अछि। पंचमुखी शिवलिंगमे एकटा आकाशतत्व बढ़ि जाइछ। मिथिलांचलमे एकादश रुद्रक पूजन परम्परा मंगरौनी (मधुबनी) ओ बगहा (प.चम्पारण) मे अवशिष्ट अछि। मुदा सहस्रमुखी शिव लिंगक पूजनक प्राचीन उदाहरण वारी (समस्तीपुर), कटहरिया (विदुपुर, वैशाली), हजारीनाथ (वागमती तटीय दरभंगा) आदिमे प्रत्यक्ष अछि। वरुआरी (सहरसा), हाजीपुर (वैशाली), जमथरि (मधुबनी) आदिक ऐतिहासिक शिवलिंग अभिलेखांकित अछि। हिमालयसँ गंगाधरि पसरल मिथिलांचल प्रकारान्तरसँ शिवलोक बनल अछि। भागलपुर ताम्रपत्र (सेलेक्टेड इंस्क्रिपशंस आफ बिहार, प्रो. आर.के.चौधरी)क अनुसार ओहि समय (पाल युग) तिरहुतमे हजारटा शिव मन्दिर छल। अधिकांशशिव मन्दिर आइ भग्नावशिष्ट अछि। पुरातात्विक उत्खननसँ प्राचीन शिवमंदिर सभक भग्नावशेष भगीरथपुर, चौगामा, करियन आदि ऐतिहासिक स्थल सभसँ प्राप्त भेल अछि। तिलकेश्वर शिवमंदिरक ऐतिहासिकता कर्मादित्य प्रस्तर अभिलेखसँ भऽ जाइछ। एकर अलावा ऋषि-मुनि द्वारा स्थापित शिवलिंग लोकख्यात अछि- श्रृंग ऋषि द्वारा स्थापित सिंघेश्वर शिव (सहरसा), कपिल मुनि द्वारा स्थापित कपिलेश्वर (मधुबनी), शुकदेव मुनि द्वारा स्थापित शुकेश्वरनाथ (सीतामढ़ी), कुश ऋषि द्वारा स्थापित कुशेश्वर (दरभंगा) आदि। आब प्रश्न उठैत अछि जे कि ओ ऋषि-मुनि लोकनि शिवभक्त छलाह? अथवा शिव हुनक आराध्य छलनि? मिथिलांचलमे एक विशिष्ट प्रकारक घुर्णित (घुमैत) शिवलिंगक प्राप्ति अद्भुत ओ अद्वितीय अछि। जमथरि (मधुबनी)क शिवमंदिरमे एकटा अभिलेखांकित किन्तु घुमइवला शिवलिंग स्थापित अछि। बाइस ईंच नमगर शिवलिंगक वामपार्श्वमे शिवगायत्री ओ दहिन पार्श्वमे रामगायत्री उत्कीर्ण अछि। एहि तरहक एकटा आर घूर्णित शिवलिंग हैठीवालीक शिवमंदिर (मधुबनी) मे सेहो स्थापित अछि। तांत्रिक उपासनाक दृष्टिएँ ई शिवलिंग स्थापित अछि। कथित अछि जे तांत्रिक विधिसँ सिद्धि प्राप्ति होइछ कलियुगमे। शिवपार्वतीक एकटा आर तांत्रिक मूर्ति (कर्णाटकालीन) शैवजगतमे विशिष्ट अछि- सद्योजात। एहिमे पार्वती माताक रूपमे एवं शिव शिशुक रूपमे बनल अछि। पार्वती वाम करोटे लेटल छथि। एहि तरहक मध्यकालीन मूर्ति सभ अलौली (खगड़िया), जनकपुरक राममंदिर (नेपाल) आदिमे प्रत्यक्ष उदाहृत अछि। मिथिलांचलमे ऐतिहासिक, पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक महत्वक अनेक शिवालय प्राचीन साहित्य, अभिलेख ओ लोक आस्थामे युग-युगसँ प्रतिस्थापित अछि। शिवालय निर्माण एवं ओहिमे शिवक स्थापना प्रथमतः व्यक्तिपरक उद्देश्यसँ कयल गेल, मुदा कालांतरमे ओ लोक कल्याण मूलक प्रमाणित भेल। आइ ओ शिवालय लोक आस्थाक आध्यात्मिक ऊर्जाक केन्द्र बनि गेल अछि। शिवरात्रिक अवसर हो अथवा श्रावण मास प्रायः प्रत्येक महत्वपूर्ण शिवालय धार्मिक लोकोत्सवसँ स्फुरित भऽ जाइछ। शिवरात्रिक परिकल्पनाक कलात्मक अभिव्यक्ति “कल्याणसुन्दर” (शिव-पार्वती परिणय) मे उत्कीर्ण भेल अछि। मुदा मास भरि शिवक जलाभिषेक एकटा धार्मिक कृत्य रूपेँ मान्य अछि। एकर मूलमे यद्यपि देवघरक वैद्यनाथ (ज्योतिर्लिंग) छथि, मुदा मिथिलांचलोक अपन सोमेश्वरनाथ (अरेराज), गरीबनाथ (मुजफ्फरपुर), सिंहेश्वर (सहर्षा), कपिलेश्वर (मधुबनी), कुशेश्वर (दरभंगा), हलेश्वर, शुकेश्वर (सीतामढ़ी), भुवनेश्वर (शिवहर), माधवेश्वर, वर्धमानेश्वर (दरभंगा) आदि शैव तीर्थ प्रत्यक्ष रूपेँ सुलभ अछि। मिथिलांचलक सूर्य पूजन स्थल भारतीय सनातन समाजमे प्रत्येक आनुष्ठानिक सत्कर्मक आरम्भ पंचदेवताक पूजनसँ होइछ। ओ पंचदेव छथि- दुर्गा (शक्ति), शिव, विष्णु, सूर्य एवं गणेश। पंचदेवताभ्यो नमः। परब्रह्म परमात्माक प्रत्यक्ष पूजोपासना सूर्यसँ होइछ। श्रुति, स्मृति, पुराणादि सम्मत सूर्यसँ जीव सभ उत्पन्न होइछ। हिनकेसँ यज्ञ, मेघ, अन्न ओ आत्मा अछि। अतः हे आदित्य, अहाँकेँ नमस्कार! आदित्ये प्रत्यक्ष ब्रह्म छथि, साक्षात् विष्णु छथि, प्रत्यक्ष रुद्र छथि। हिनकेसँ भूमि, जल, ज्योति, आकाश, दिक्, देवगण एवं वेद उत्पन्न होइछ। अतः आदित्य ब्रह्म छथि (वृहदारण्यकोपनिषत् ३.७९)। “आदित्य हृदय” (श्लोक ३६, ४४-५३) मे सूर्यकेँ सर्वयज्ञ स्वरूप, ऋक्, यजु एवं सामवेद, चन्द्र-सूर्य-अग्नि नेत्रधारी, ओ सर्वतंत्रमय कहल गेल अछि। “आदित्य हृदय” (श्लोक ५९-६१) मे द्वादश आदित्यक उल्लेख भेल अछि- विष्णु, शिव, ब्रह्मा, प्रजापति, महेन्द्र, काल, यम, वरुण, वायु, अग्नि, कुबेर एवं तत्वादिक स्रष्टा ओ स्वतः सिद्ध अधीश्वर। उदयकालमे ओ ब्रह्मा, मध्याह्नमे महेश एवं अस्तवेलामे विष्णु स्वरूप सूर्य त्रिमूर्ति छथि। जेना शिवस्वरूप त्रिमूर्तिमे सदाशिवक संगे सौम्य ओ रौद्र रूप (भैरव) उत्कीर्ण होइत छथि। शिवलिंग ओ विष्णुलिंग जकाँ सूर्यक पूजोपासना ब्रह्म लिंगक रूपमे कयल जाइछ। सूर्यकेँ गगनलिंग सेहो कहल जाइत छनि। सूर्यमण्डलमे गायत्रीक ध्यानक विधान अछि। विष्णु सेहो एकटा आदित्य छथि- भगवत आदितश्च। सूर्यक लाक्षण (चक्र) विष्णुक सुदर्शन चक्र बनि गेल। प्राचीन सिक्का (वृष्णि ओ गणराज्यक) पर अंकित चक्रक अभिप्राय सूर्यसँ अछि। प्रायः देवी-देवताक प्राथमिक लक्षण प्रतीक रूपेँ अभिव्यंजित भेल। कालान्तरमे बोधगम्यताक दृष्टिसँ हुनक स्वरूपक विधान कयल गेल। तदनुसार सूर्य सप्ताश्वक रथपर ठाढ़ छथि। आगाँमे सारथि अरुण बैसल छथि। माथपर उन्नत किरीट (मुकुट) शोभित छनि। दुनू हाथमे कमल पुष्प अछि। डाँरमे तरुआरि लटकल छनि। पार्श्वदेवीक रूपमे उषा ओ प्रत्युषा उत्कीर्ण छथि। सूर्यक देह जिरह बख्तरसँ अलंकृत अछि। कोनो कोनो मूर्तिमे पार्श्वदेवताक रूपमे कलम लेने पिंगल ओ दण्ड लेने दण्डी सेहो ठाढ़ छथि। सूर्य पैरमे नमहर बूट पहिरने छथि। ई सभ शक-ईरानी लक्षण मानल जाइछ। भारतीय सूर्य मूर्ति विज्ञानपर कुषाण कालमे इरानी प्रभाव बढ़ि गेल छल। बोधगयाक पाथरक बेष्टन वेदिका (रेलिंग) पर एवं कुम्हरार (पटना) क माँटिक पट्टी (मृण्फलक) पर सूर्यक सबसँ प्राचीन प्रतिमांकन भेल अछि। बोधगया रेलिंगपर उत्कीर्ण सूर्य चारो दिशा सभक सूचक चारिटा अश्वक रथपर आरुढ़ छथि। सूर्यक दुनूकालमे उषा ओ प्रत्युषा हाथमे धनुष-वाण लेने अंधकारक बेधन करैत छथि। आलोच्य सूर्यक प्राचीनतम मूर्ति “अंधकार पर सूर्यक विजय” सूचक अछि। सूर्यक पाछाँ वृत्ताकार आभामंडल बनल अछि। एहिसँ संकेत प्राप्त होइछ जे सूर्यक पूजा शकस्थानसँ भारतमे आयल। मुदा बोधगया रेलिंगपर उत्कीर्ण उदीच्य वेषधारी सूर्य मूर्ति विदेशी परम्परासँ भिन्न ओ प्राचीन (शुंगकालीन) अछि। इरानी प्रभावसँ पहिने एहि ठाम सूर्य मूर्तिक भारतीय अवधारणा सुनिश्चित छल (भारतीय कला को बिहार की देन, बी.पी.सिन्हा, पटना, १९५८, पृ.८१-८३)। कुम्हरार (पटना) क सूर्य (मूर्ति) चारिटा घोड़ाक रथपर आरुढ़ छथि। माटिक गोल पट्टीपर बनल एहि सूर्यकेँ भारतीय सूर्य मूर्ति परम्परामे सर्वप्राचीन मानल जाऽ सकैछ। शाहाबाद एवं मुंगेरसँ प्राप्त सूर्य उदीच्य वेषधारी छथि। पार्श्वदेवता कलमधारी पिंगल त्रिभंग मुद्रामे ठाढ़ मनुष्यक सुकृत्य ओ कुकृत्यक लेखन कऽ रहल छथि एवं दहिन दिस विधर्मी सभकेँ दण्डित करबाक लेल हाथमे दण्ड लेने दण्डी तत्पर छथि। वाम भागमे सूर्यक पत्नी उषा ओ दहिनमे प्रत्युषा अंधकारक बेधन कऽ रहल छथि। शाहाबाद जिलासँ प्राप्त सूर्यमूर्ति संभवतः गुप्तकालीन कलाकृति थिक। गरामे एकावली (माला) शोभित छनि एवं कृपाण वाम भागमे लटकल छनि। दक्षिण बिहारमे सूर्य मन्दिर, सूर्यमूर्ति ओ सूर्योपासनाक केन्द्र उत्तर बिहारक अपेक्षा अधिक अछि। सत्यार्थीक सर्वेक्षणक अनुसार सांस्कृतिक मिथिलांचलमे सूर्योपासनाक प्राचीन ऐतिहासिक केन्द्रक रूपमे विष्णु बरुआर (मधुबनी) क द्वादश आदित्यक रूपेँ पूजित पालकालीन सूर्यमूर्ति अछि। मूल सूर्यमूर्तिक प्रभावलीमे बारहटा आदित्यक स्वरूप उत्कीर्ण अछि। मिथिलांचलक अन्यान्य सूर्यमूर्ति जकाँ सूर्यक देहपर जिरह-बख्तरादि नहि छनि। ओ भारतीय भेषभूषा ओ आभूषणसँ विन्यस्त छथि। यद्यपि स्थलक नाम विष्णु बोधक अछि। एहि ठाम सूर्य विष्णु रूपेँ पूजित छथि। सत्येन्द्र कुमार झाक अनुशीलन (मिथिला की पाल प्रतिमाएँ) क अनुसार मधुबनीक झंझारपुर-मधेपुर पट्टीक कोशी-बलानक पुरान प्रवाह क्षेत्रक सूर्य नाहर-भगवतीपुर ओ भीठ भगवानपुरक अतिरिक्त राजनगर, पस्टन एवं पटलामे प्राप्त अछि। एहि पट्टीसँ कनेक हटिकऽ एकटा सूर्यमूर्ति जगदीशपुर (मनीगाछी प्रखण्ड, दरभंगा)सँ सेहो उपलब्ध भेल अछि। एहि सूर्य पूजन पट्टीक सर्वाधिक आकर्षक ओ प्रभावशाली सूर्य मूर्ति (आकार ४८ इन्च गुणा २४ से.मी.) परसा (झंझारपुर, मधुबनी) क अछि। तेरहम सदीक बनल ई मूर्ति सूक्ष्म अलंकरणसँ भरल अछि। एहिसँ एकटा धारणा ई बनैत अछि जे सूर्य मूर्तिक पूजन एकटा सीमित क्षेत्र धरि छल। मुदा हिनक अवधारणाक खंडन देवपुरा (बेनीपट्टी प्रखण्ड, मधुबनी), रघेपुरा (असगाँव-धरमपुर), डिलाही, कोर्थ, देकुली, अरई, रतनपुर, छर्रापट्टी, कुर्सो-नदियामी, हाबीडीह (दरभंगा), भोज परौल, भीठ भगवानपुर, अकौर, अन्धराठाढ़ी, रखवारी, गाण्डीवेश्वर, झंझारपुर (मधुबनी) एवं वीरपुर, बरौनी, नौलागढ़ (बेगुसराय), सवास (मुजफ्फरपुर), कन्दाहा (सहरसा), बड़ीजान (किशनगंज) आदि ऐतिहासिक ओ धार्मिक स्थल सभसँ सूर्य मूर्तिक प्राप्तिसँ भऽ जाइछ। लौकिक स्तरपर सूर्योपासनाक परिदृश्य गाम-गाममे पसरल छठ पर्व सर्वाधिक लोकप्रियताक उदाहरण अछि। अजय कुमार सिन्हा (बड़ीजान का पुरातात्विक महत्व, कोशी महोत्सव २००३ ई.) किशनगंज जिला मुख्यालयसँ प्रायः पचीस कि.मी.उत्तर-पश्चिम दिशामे अवस्थित बड़ीजान दुर्गापुरक विशाल सूर्यमूर्ति (५फीट ७ इन्च गुणा २ फीट ११ इन्च) क अपन शोधपत्रमे उल्लेख कयने छथि। बड़ी जान दुर्गापुर पुरातात्विक भग्नावशेषसँ भरल अछि, जाहिमे दसम शताब्दीक भव्य मन्दिरक स्थापत्य प्रमुख अछि- सूर्यक विशाल दू खण्डित पाथरक मूर्ति, मन्दिरक अलंकृत चौखट, बहुतरास शिवलिंग, पाथरक एकटा सोहावटी (लिन्टेल) मध्य गणेश एवं दोसरक केन्द्रमे उत्कीर्ण त्रिशूल। दुर्गापुर नामक संलग्नता आदिकेँ देखैत बड़ीजान पंचदेवोपासक क्षेत्र छल। बहुतरास मन्दिर सभ भग्नावशिष्ट अछि। मूर्ति विज्ञानक दृष्टिसँ एहि ठामक सूर्य मूर्तिकेँ अजय कुमार सिन्हा एगारहम सदीक कहने छथि। एहि क्षेत्रमे शैवमतक प्रधानता छल। मुदा सीमान्त क्षेत्रमे अवस्थित भेलाक कारणे एहिठाम सूर्य मन्दिरक होएब स्वाभाविक अछि। कोशी क्षेत्रक (सुविदेह, अंगुत्तर आदिक रूपेँ ख्यात) दोसर सूर्य मन्दिरक साक्षात कन्दाहा (सहरसा) मे कयल जाऽ सकैछ। कन्दाहाक सूर्यमन्दिर सहरसा जिला मुख्यालयसँ चौदह कि.मी. पश्चिम वनगाँव-महिषी क्षेत्रमे अवस्थित अछि। वनगाँव, महिषी एवं कन्दाहाकेँ जँ त्रिभुज बनाओल जाय तँ ओऽ सभ स्थल समकोणपर अवस्थित अछि। हवलदार त्रिपाठी सहृदय (बिहार की नदियाँ)क मतेँ एहि ठामक बुद्धक समकालीन कोणियवाहक जटिल ब्राह्मण छल। कन्दाहाक सूर्यमन्दिरक गर्भगृहमे स्थापित भगवान सूर्यक मूर्तिकेँ भवादित्य (द्वादश आदित्यक एकटा प्रकार) कहल गेल अछि। सूर्यक संग उषा एवं प्रत्युषा सेहो उत्कीर्ण छथि। मन्दिरक द्वार स्तंभ (चौखट) पर उत्कीर्ण शिलालेखक अनुसार (१४५३ ई.) वर्तमान सूर्यमन्दिरक निर्माता ओइनवार वंशीय हरसिंहदेवक पुत्र नरसिंहदेव छलाह। शिलालेखक प्रशस्तिमे नरसिंहदेवकेँ भूपतिलक, महादानी, धीरवीर आदि कहल गेल छनि। विद्यापतिक पदावलीक भणिता (सुभद्र झा द्वारा सम्पादित पदांक ४४-४५)सँ नरसिंहदेवक ऐतिहासिक अवस्थितिक सेहो पुष्टि होइछ। सूर्यमन्दिर लगक कूपजलक सेवनसँ चर्मरोग समाप्त भऽ जाइछ। सूर्योपासनासँ चर्मरोग, कुष्टादि रोगसँ मुक्तिक अनेक पौराणिक अनुश्रुति अछि। एहि तरहेँ कन्दाहाक सूर्य मन्दिर सूर्योपासनाक प्रसिद्ध केन्द्र बनल अछि। नाहर भगवतीपुर (मधुबनी)क प्रसिद्धि जतेक महिषासुर मर्दिनी भगवतीक तेजस्विताक कारणे अछि ओतबे ख्याति पाथरक अनेक सूर्यमूर्ति (मध्यकालीन)क कारणे अछि। मूर्ति सभमे धनुष धारिणी पार्श्वदेवीक अपेक्षा पैघ पार्श्वदेवक रूपेँ पिंगल ओ दण्डी उत्कीर्ण अछि। सिरोभूषणक स्थान सिमरौनगढ़ (घोड़ासाहन, चम्पारणसँ उत्तर नेपालक तराइक सीमान्त क्षेत्र) क सूर्यमूर्ति जकाँ अलगसँ मुकुट लगयबाक स्थान खाली छोड़ल गेल अछि। नाहर भगवतीपुरक सूर्यमूर्ति कर्णाटकालीन थिक। सिमरौनगढ़सँ प्राप्त एवं काठमाण्डूक राष्ट्रिय संग्रहालयमे संरक्षित एकटा अभिलेखांकित कर्णाटकालीन सूर्यमूर्तिक सूचना तारानन्द मिश्र (प्राचीन नेपाल -२४- काठमाण्डौ, नेपाल) देने छथि। एहि सभसँ किंचित भिन्न ओ विशिष्ट सूर्यमूर्ति सवास, गायघाट प्रखण्ड (मुजफ्फरपुर)सँ प्राप्त अछि। सूर्यमूर्ति पाँच फीट नमहर अछि, जे ओहिठामक एकटा मन्दिरमे स्थापित एवं लक्ष्मीनारायणक नामे पूजित छथि। सूर्यक प्रतिरूप विष्णुकेँ मानल गेल अछि। सूर्य सप्ताश्वक रथपर स्थानुक मुद्रामे ठाढ़ छथि। ठेहुनधारी अधोवस्त्र ओ वामकंधसँ आवक्ष बन्हैत उत्तरीय एवं वस्त्राभूषणसँ सूर्य आच्छादित छथि। कान्हपर यज्ञोपवीत एवं डाँरमे कटार छनि। कर्णाटवंशी राजा लोकनि सूर्यवंशी क्षत्रिय छलाह। अतः पंचदेवोपासक भूमि मिथिलाक अनेक कर्णाट शासित क्षेत्रसँ सूर्य मूर्तिक प्राप्ति स्वाभाविके मानल जायत। कर्णाटकालीन तिरहुतक राजधानी सिमरौनगढ़ (सिमरौनगढ़ को इतिहास, मोहन प्रसाद खनाल, काठमांडौ, नेपाल, २०५६ वि.), अन्धराठाढ़ीक कमलादित्य स्थान (मधुबनी), भीठ भगवानपुर (मधुबनी) मूर्तिया (नेपाल तराइ), कुर्सो नदियामी (दरभंगा), कोर्थ (दरभंगा) आदि ऐतिहासिक ओ धार्मिक स्थान सभसँ प्राप्त अछि। सिमरौनगढ़क सूर्य मूर्तिक निर्माण याज्ञिक श्रीपतिक लेल हरसिंहदेवक मंत्री गणेशक आदेशपर कयल गेल छल (प्राचीन नेपाल-२४)। कर्णाटवंशी राजालोकनि पंचदेवोपासक छलाह। मिथिलांचलक बरौनी-बेगुसराय क्षेत्रमे सूर्योपासनाक ऐतिहासिक अवशेष सभ उपलभ्य अछि। वीरपुर-वरियारपुर ओ कैथसँ सूर्यक अलावा हुनक पुत्र रेवन्तक पाथरक प्राचीन मूर्ति प्राप्त भेल अछि। बरौनी ओ चकबेदौलियाक सूर्य मन्दिर दर्शनीय अछि। एहि भूभागक किछु सूर्यमूर्ति जी.डी.कॉलेज, बेगुसरायक संग्रहालयमे संरक्षित अछि। डॉ. सत्यनारायण ठाकुर ( मिथिला में मंदिरों का प्रादुर्भाव एवं स्वरूप, मिथिला की लोकसंस्कृति विशेषांक, दरभंगा, २००६ ई.) मिथिलांचलक अकौर, झंझारपुर, राजनगर ओ कंदर्पीघाटक सूर्य मन्दिर सभक उल्लेख कयने छथि। मुदा सत्येन्द्र कुमार झाक अनुसार नाहर भगवतीपुर सूर्योपासनाक पैघ केन्द्र छल जाहि ठाम चारिटा महत्वपूर्ण सूर्य मूर्ति उपलभ्य ओ पूजित अछि। उपर्युक्त सर्वेक्षणात्मक अनुशीलनसँ स्पष्ट भऽ जाइछ जे सांस्कृतिक मिथिलांचलक पूर्वी छोड़ बड़ीजान दुर्गापुर (किशनगंज)सँ पश्चिममे अकौर (मधुबनी), उत्तरमे सिमरौनागढ़ (मिथिला नेपाल सीमान्त) एवं दक्षिणमे बरौनी-बेगुसराय धरि सूर्यमन्दिर ओ सूर्योपासनाक क्षेत्र विस्तृत छल। ओकरा राजकीय संरक्षण एवं लोकाश्रय प्राप्त छल। आर्य सूर्यप्रतिबद्ध लोक छलाह। मिथिलांचलक दक्षिणी सीमान्तक गंगातटवर्ती क्षेत्र (जढुआ, हाजीपुर, वैशाली)क सूर्योपासना यदुवंशी लोकनिक सुरजाहा सम्प्रदाय अवशिष्ट अछि। एहि जनपदक ज्योति एवं कारिख पंजियार सन लोकदेवता सूर्योपासक छलाह। हुनक स्वरूप वेदनिष्ठ ब्राह्मणक अछि। हुनक पैरमे खराम, अधोवस्त्रमे धोती, कान्हपर जनेउ, माथपर तिलक, हाथमे पोथी-पतरा एवं सोनाक चाभुक (किरणक प्रतीक) शोभित छनि- पैर खरमुआ हो दिनानाथ, हाथ सटकुन। देह जनेउआ हो दिनानाथ, तिलक लिलार॥– मैथिली प्रकाश, (शोध विशेषांक, मैथिली लोकसाहित्यक भूमिका, प्रो. मौन, कलकत्ता, जनवरी-फरवरी १९७६)। मैथिली लोकसाहित्यक संदर्भमे सूर्य पूर्वदिशाक अधिपति छथि। बिहारक धरतीपर सूर्यक प्राचीनतम स्वरूप कुम्हरार (पटना) सँ प्राप्य अछि जाहिमे सूर्य एकचक्रीय अश्वरथपर सवार (ई.पू. पहिल सदी) छथि। एकर विकास बोधगया रेलिंग (शुंगकालीन) पर उत्कीर्ण चारि घोड़ावाला रथपर आरुढ़ सूर्य मूर्तिमे भेल अछि, जाहिमे पार्श्वदेवी उषा ओ प्रत्युषा सेहो अभिशिल्पित छथि। कुषाणकालक सूर्य मूर्तिक विशिष्ट पहचान पैरमे इरानी बूट, देहमे जिरह-बख्तर ओ माथपर किरीट बनि गेल। एहिमे सूर्य सप्त अश्व रथी छथि। मुदा गुप्तकालमे सूर्यक स्वरूप क्रमशः भारतीय वस्त्राभूषणमे बदलैत गेल। मिथिलांचलक पाल, कर्णाट ओ ओइनवार कालीन शासनकालमे समानरूपेँ सूर्यमूर्ति ओ मन्दिरक निर्माण होइत रहल। सूर्य मूलतः अश्वारोही देव छथि, जनिक प्रभुत्वसूचक रथक चारिटा अश्व दिक् दिगन्त बोधक अछि त सप्ताश्व सप्तलोकक विस्तारकेँ प्रतिबिम्बित करैत अछि। एतबे नहि सप्ताश्व सप्तरंगी किरणक द्योतक सेहो बनि गेल अछि। सूर्य आर्य लोकनिक वैद्इक देवता छथि। अतः मिथिलांचलमे निर्मित सूर्यमूर्ति भारतीय परम्परा (वस्त्राभूषण) मे अछि। ओ वैष्णव धर्मी तिलक मण्डित छथि, अर्थात् आदित्य ब्रह्म ओ वेदज्ञ ब्राह्मणक प्रतीक बनि गेल छथि। हुनक हाथक कमल सृष्टि मूलक थिक। कमल फूल सूर्योदयक संग प्रस्फुटित होइत अछि एवं सूर्यास्तक संग सम्पुटित होइत अछि। दुनू हाथक कमल सूर्योदय एवं सूर्यास्तक प्रतीक अछि। मिथिलांचलमे नवोदित सूर्य ओ अस्ताचलगामी सूर्यदेवकेँ अर्घ्य देल जयबाक परम्परा अछि। एवं प्रकारें मध्यकालीन मिथिलामे सूर्य पूजन एकटा प्रबल धार्मिक प्रवृत्ति छल। कमल सभ देवी देवताक आसन बनल अछि। भारतीय मूर्तिकला परम्परामे सूर्य अपन शक्तिद्वय उषा एवं प्रत्युषा, पार्श्वदेवता पिंगल एवं दण्डीक अतिरिक्त सूर्यपुत्र रेवंतक एकटा मूर्ति पचम्बा (बेगुसराय) एवं देवपुरा (मधुबनी) सँ प्राप्त भेल अछि। मिथिलांचलमे सूर्य मूर्तिक निर्माणक्रममे शास्त्रीयतासँ किंचित् भिन्न अभिनव प्रयोग सेहो देखना जाइछ, जकरा जनपदीय आस्थाक अभिव्यक्ति कहल जाऽ सकैछ। उदाहरणार्थ विष्णु बरुआरक द्वादश आदित्य (सूर्य)क मूर्तिक पाछाँ अग्नि शिखा सभक प्रत्यंकनकेँ देखल जाऽ सकैछ। सूर्य अग्निक प्रत्यक्ष प्रतिरूप छथि। सूर्यक गणना नवग्रहमे होइत अछि। दिकपालमे ओ पूर्वक दिग्पति छथि। भारतीय मूर्तिकलामे नवग्रहक अवधारणा गुप्तकालीन परिवेशमे मूर्त भेल मुदा मिथिलांचलक धरतीपर हुनक पूजन परम्पराक पुरातात्विक अवशेष पाल ओ सेनकालमे विशेष देखना जाइछ। मध्यकालीन शिवमन्दिरमे प्रायः नवग्रहक मूर्ति अवशेष प्राप्त होइछ। वीरपुर (बेगुसराय) एवं चेचर (वैशाली)सँ नवग्रहक पालकालीन प्रस्तर पैनेल प्राप्त भेल अछि जाहिमे सूर्य प्रथम अनुक्रममे छथि। हुनक दुनू हाथमे कमल पुष्प शोभित छनि। मुदा लखीसरायक अष्टग्रह पैनेलमे सूर्य कमलासनपर प्रतिष्ठित छथि। बिहारशरीफ, नालन्दाक नवग्रह पैनेलमे सूर्य दण्ड ओ पिंगलक संगे उत्कीर्ण छथि। अंतीचक (विक्रमशिला, भागलपुर)क नवग्रह पैनल सबसँ पैघ (११८*६२ से.मी.) अछि। नवग्रह क्रम एवं प्रकारेँ निर्मित होइछ- सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, राहु एवं केतु। कोनो कोनो पैनेलक आरम्भ उलटाक्रम (केतु, राहु...)सँ होइछ। मिथिला लोकचित्रकलामे नवग्रहक प्रतीकांकन हरिशयन एकादशीक अरिपनमे देखना जाइछ। मांगलिक अनुष्ठानमे नवग्रहक पूजन आवश्यक मानल जाइछ। शिवलिंगमे सूर्य: कन्दाहा (सहरसा)क चतुर्मुखी शिवलिंग सूर्य प्रमुख छथि एवं अन्यान्यमे ब्रह्मा, विष्णु ओ शिव छथि। तहिना रानीघाट (पटना)क दुधेश्वर मन्दिर (शिव) क पंचमुखी शिवलिंगमे ब्रह्मा, सरस्वती, सूर्य ओ गणेशक अलावा शीर्षपर नृत्यमूर्ति उत्कीर्ण (नवम-दसम सदी) अछि। अरेराज (प.चम्पारण)क सोमेश्वर शिव मन्दिरक प्रांगणमे स्थापित चतुर्मुखी शिवलिंगमे एकटा सूर्यक मुखाकृति उत्कीर्ण अछि। सर्वेक्षणात्मक अनुशीलनसँ ई स्पष्ट होइछ जे प्रत्येक शिवलिंगमे देवस्थानक मुख्य मूर्तिक अनुरूप एकटा देवता प्रमुख होइछ। उदाहरणार्थ कन्दाहाक शिवलिंगमे सूर्यक, भच्छीमे ब्रह्माक (त्रिमूर्ति)क इत्यादि। एहि तरहेँ कन्दाहा (सहरसा), बड़ी जान दुर्गापुर (किशनगंज), बरौनी (बेगुसराय), झंझारपुर, कंदर्पीघाट, अकौर, चकबेदौलिया, परसा, अन्धराठाढ़ी, राजनगर (मधुबनी) आदिक सूर्य मन्दिर एवं अन्यान्य स्थल सभसँ प्राप्त प्राचीन सूर्यमूर्ति सभक उपलब्धता मिथिलांचलमे सूर्योपासनाक महत्ताकेँ रेखांकित करैत अछि। आर्य लोकनिक अभिजात्य संस्कृतिक समानान्तर लोकक अपन सम्प्रदाय अछि, अपन देवी-देवता, पूजोपासना पद्धति, पावनि-तिहार आदि छैक। आभीर लोकनिक सुरजाहा सम्प्रदायक सूर्योपासक लोकदेवता ज्योति ओ कारिख, उषा-प्रत्युषाक समानान्तर गहिल षष्ठी आदिक पूजोपासना प्रकारान्तरसँ सूर्योपासना थिक। सौर संस्कृतिक केन्द्रीय देवता सूर्य छथि। आर्यलोकनिक सूर्य प्रतिबद्धताक उदाहरण अछि सूर्यक वाहन सप्ताश्व रथ। आर्य अश्वप्रिय छलाह आर अश्व हिनक संस्कृतिक संवाहक देवी-देवताक वाहन बनल अछि। छठि व्रतक परम्परा पुराणयुगसँ पहिनेक थिक। सुकन्या एहि कठिन व्रत साधनासँ अपन पति च्यवन ऋषिक नेत्रक ज्योति घुरौने छलीह। षष्ठी वा छठी मइया लोकजीवनक आंचरमे संतति, आरोग्य व सुख-समृद्धि देइत छथि। सूर्यक सम्बन्ध ऋतुचक्रसँ अछि। बारह मास (द्वादश आदित्य), छह टा ऋतु (षष्ठी माता) एवं सात दिन (सप्ताश्व रथ) सभटा सूर्यसँ सम्बद्ध। हिनक गति प्रक्रिया अयन (गति क्रिया) मे विभाजित अछि- उत्तरायण एवं दक्षिणायन। सूर्यक दुनू अयनमे अर्थात् कार्तिक एवं चैत्रमे छठि मइयाक पूजोपासना कयल जाइछ। अश्वारोही सूर्यकेँ जलाशयक तटपर हस्तिकलश, चौमुख दीप, मौसमी फल-फूल, मेवा-मिष्टान्न आदिसँ अर्घ्य देल जाइछ (लोकायत और लोकदेवता, डॉ. रामप्रवेश सिंह, मुजफ्फरपुर, १९८६ ई.)। हिनक पूजोपासनाक लेल लोक श्रद्धावनत भऽ ठाढ़ रहैत अछि- ब्राह्मण बेटी जनेऊ, अहीर बेटी गायक दूध, कुम्हार बेटी हस्तिकलश आदि, तेली बेटी तेल, माली बेटी फूल-पात आदि लऽ कऽ उदयाचल दिस सूर्योन्मुख भऽ अर्घ्य देइत छनि। जापानकेँ सूर्योदयक देश ओ अरुणाचलकेँ उदयाचलक प्रदेश कहल जाइत अछि। मिथिलांचलमे उगैत एवं डुबैत (अस्ताचलगामी) सूर्यकेँ लोकपूजन परम्परित अछि। सूर्यक छठी व्रतानुष्ठान बहुत कठिन मानल जाइछ। एहि ठामक स्त्रीगण सूर्यक अर्घ्यक केराक रक्षाक लेल ब्रह्मास्त्र धरि उठयबाक लेल कृतसंकल्पित रहैत अछि- “मारवउ रे सुगवा धनुष से, ई घउर, रौना माइ के जाए”। छठी माइकेँ मिथिलांचलमे रौना माइ सेहो कहल जाइछ। षष्ठी लोकायत संस्कृतिक देन थिक मुदा सूर्य वैदिक संस्कृतिक। अतः रौनामाइ सूर्यक सतरंगी अश्वरथपर सवार भऽ कऽ मिथिलांचलक धरतीपर अबैत छथि एवं लोकजीवनक दुख-दारिद्र्यक हरण कऽ अपन “लोक”मे घुरि जाइत छथि। एवं प्रकारेँ सूर्योपासना सम्पूर्ण लोकजीवनकेँ श्रद्धाभिभूत कयने अछि। वैदिक एवं लोकायत संस्कृतिक समाहार एहि ठाम प्रत्यक्ष देखना जाइछ। मनोज मुक्ति त्रिभुवन विश्वविद्यालयद्धारा मिथिलाक्षर फन्टक विकास मैथिली लेखक एवं अन्य मैथिली भाषी लोकनिक भावनाकेँ सम्मान करैत त्रिभुवन विश्वविद्यालय भाषाविज्ञान केन्द्रिय विभाग तथा मदन पुरस्कार पुस्तकालय भाषा सञ्चार परियोजना अन्तर्गत यूनिकोड पर आधारित जानकी नामक मिथिलाक्षर(तिरहुता) फन्टक विकास कयलक अछि । एहि फन्टक मादे आब सँसार भरि इमेल मिथिलाक्षरमे पढल जा सकैत अछि । सँगहि, वेबसाइट पर मिथिलाक्षरमे पाठ्यसामग्री साखल जा सकैत अछि । मुद्रणक कठिनाई सँ मैथिली भाषा देवनागरी लिपिमे सामान्य रुपसँ लिखल जाइत अछि आ मिथिलाक्षरक प्रयोग बहुत सीमित क्षेत्रमे होइत जाऽ रहल अछि । यूनिकोडमे आधारित जानकी फन्टक आगमन सँ मिथिलाक्षरक प्रयोगक विस्तार होयबाक सँभावना बढल अछि । ओना दू वर्ष पहिनहिँ निजी स्तरपर श्रविण झा आ गँगेश गुञ्जन मिथिलाक्षर फन्टक निर्माण कयने रहथि । मकर सँक्रान्ति अर्थात तीला सकराँइत मकर सँक्रान्ति अर्थात तीला सकराइँत माघ महिनाक पहिल दिन, प्रायः माघ मासक १ गतेके मनाओल जाइत अछि । मकर सँक्रान्ति माघभरि लोक भोरमे स्नान करैत अछि । माघ मासक सँक्रान्तिक दिन लोक उडीदक दालि, चाउर,तिलबा, चुल्लौर आदि दान करैत अछि । धनवान लोकसब गोदान, उनीवस्त्र, कम्बल, सोन आदि सेहो दान कायल करैछथि । एहि दिनमे खिच्चरि खएबाक चलन चलि आएल अछि । आजुक दिन भगवान भगवतीके चुल्लौर, तिलबा चढाओल आइत अछि । बहुतो ठाम दिनमें चूडा,दही,चुल्लौर आ रातिमे भोजन काएल जाइत अछि । आ किछु ठाम चुल्लौर, तिलबा, चूडा,दही जलपान कऽ दूपहरक भोजन खिच्चरि सँ सँम्पन्न होइत अछि । मिथिलाञ्चलमे भेरे स्नान कऽ कऽ तीलक डाँठ अर्थात तीलाठीक आगि तापल करैत छथि । जौं तीलक डाँठ उपलब्ध नई होमय सकल त आगिमे तीलक किछु दाना धऽ आगि तापि परम्पराके निर्वाह कायल करैछथि । ताइकेबाद अपना सँ पैघ या कहु श्रेष्ठद्धारा चाउर, तील आ गुँड मिलाबिकऽ बनाओलगेल तील खुवाबिक अपना प्रतिके कर्तव्यबोध कराओल जाइत अछि, जकरा “तील बहव” कहल जाइत अछि । ई पावनि सँ आयु, आरोग्य, सम्पति, रुप, गुणक प्राप्ति होएबाक सँगहि सब तरहक पापसँ मुक्ति भेटबाक विश्वास कायल जाइत अछि । माघ स्नानके बृहत मन्त्र सेहो होइत अछि जे एहि प्रकारक अछि ॐ माघमासमिमं पुण्यं स्नाम्यहं देव माधव । तीर्थस्यास्थ जले नित्यं प्रदीदा भगवन हरे । दु ःख दरिद्रयनाशाय श्रीविष्णोस्तोषणय च । प्रातः स्नानं करोम्यद्य माघे पाप प्रणाशनम् । मकरस्थे रवौ माघे गोविन्दाच्युत । स्नानेनानेन मे देव यथोक्त फदो भव । दिवाकर जगन्नथ प्रभाकर नमोऽस्तुते । परिपूर्ण कुरुष्वेदं माघस्नानं महाव्रतम् । ओना वैज्ञानिक दृष्टिकोणे गुँड खएला सँ शरीरमे गर्मी अएबाक कारणे जाढ मासमे एही पर्वके अति उपयोगी मानल जाइत अछि । जितिया पावनि मिथिलामे बहुतो पावनि बड श्रद्धापूर्वक मनाओल जाइत अछि । मिथिलाके साँस्कृतिक रुपसँ धन्निक कहऽजायबामे एहि पावनितिहार सबहक बहुत पैघ महत्व रहल अछि । ओना सब पावनि सबहक अपन हटले महत्व रहल करैत अछि, सब पावनिके अपन अपन प्रयोजन सेहो ओतबे विशेष भेल करैत छैक । मिथिलामे मनाओल जाएबला एकगोट महत्वपूर्ण पावनि सबमे सँ जितिया पर्वके अपने तरहक महत्व रहल अछि । मिथिलाञ्चलमे प्रचलित अछि जे केओ पुरुष कोनहुँ दूर्घटनासँ बाँचिगेल त कहल जाइत अछि,माय षडजितिया केने छलै ताहिसँ बाँचि गेलै । ई वाक्य स्पष्ट करैत अछि जे जितिया पावनि एकटा बेटाकेलेल हूनक मायद्धारा कायल जाइत अछि । भविष्य पुराणमे सेहो उल्लेख अछि जे पुत्रक दिर्घायुक कामनासँ ई व्रत कायल जाइत अछि । जितिया पावनि, कृष्ण अष्टमीक दुनू साँझ उपवास कऽ भोरमे तिथि बदललापर पारणा करबाक विधान रहल अछि । मिथिलाञ्चलमे जितिया व्रतसँ एक दिन पूर्व अहिवात स्त्रिसब माछ मरुआ अरबधिकऽ खाएल करैत छथि । तहिना पावनि केनिहार विधवा लाकनि अर्वा अर्वाइन खाइत छथि । भिनसरमे जौं अष्टमी नहि पडल रहैत छैक त चूडा दही ल ओंगठन करैत छथि । ताएँ बुझाइया ई कहबी बनल छई, जितिया पाबनि बड ध्यान रखैत छथि । एहि तिथिमे योग विशेष भेलापर षडजितिया मनाओल जाइत अछि, जकरा बहुत पैघ मानल जाइत अछि । जाहि दिनमे प्रदोष कालमे अष्टमी पडैत छैक ओह दिन व्रत होइत अछि, जौं दू दिन प्रदोष कालमे अष्टमी पडैत अछि त खोसर दिन जितिया पावनि व्रत करबाक लोकाचार व्याप्त अछि । जाहिबेर उदय कालमे अष्टमी पडैत अछि तहिया व्रत काएल जाइत अछि आ नवमीमे दोसर दिन पारणा कएल जाइत अछि । अष्टमी जाहि दिन पडैत अछि ताहिदिन व्रत कयनिहार जाहि ठाम स्नान करैत छथि( पोखरि,नदी या इनारपर ) ओकर प्राँगणमे पूवमुँहे ठाढ भऽ तामक अर्घामे मन्त्र पढिकऽ सूर्य भगवानके अर्घ दैत छथि, एवं व्रतक सँकल्प लइछथि । सँकल्प कऽ भरिदिन व्रत रहि साँझमे गायक गोबर सँ नीपि आँगनकेँ शुद्ध कऽ एकटा खधिया खुनि पोखरीक निर्माण कायल जाइत अछि । पोखरीक मोहारपर एकटा पाकडिक ठाढि आनि गारि देल जाइत अछि, गाछक डाढिपर गोबर माटिक चिल्ह राखिदेल जाइत अछि । गिदरनीक आकृति बनाबिकऽ डाढिक नीचामे राखि देल जाइत अछि । तकरा लगेमे जलसँ भरल कलश राखल जाइत अछि ।कलशमे कुशक जिमूतवाहनक मूर्तिक निर्माण कऽ राखल जाइत अछि । ताइकेवाद समय अनुसारक फलफूलके नैवेद्यक व्यवस्था ककऽ राखल जाइत अछि । नैवेद्यमे केरावक आकुरी आ खीराके राखब आवश्यक मानल जाइत अछि । सब सामग्रीक ओरियाओन केलाकबाद व्रति महिला सब पूजा करैत छथि । जितिया पावनिके बहुत कठीन पावनि मानलगेल अछि । ई पावनि केनिहार व्रति महिलासब पानि त नहिंए पिवैत छथि, एतऽधरि कि ओसब खढोधरि नई खोंटैत छथि । मनोज मुक्ति संग अन्तर्वार्ता- डा. राम दयाल राकेश ( सँस्कृति विद) सरकारके ध्यान छठि पावनिपर देवाक चाही..... छठि पावनि मधेसके संस्कृति कियाक मानल जाईत अछि ? –छठि पावनके अपने मौलिक विशेषता छइ,, ई पावनि शुरु होबऽ सँ एकमहिना पहिने सँ पावनि कयनिहार सब तैयारी मे लाईग जाईत छथि । एकर तैयारी आ पुजाके जौं देखल जाय त अईमे विशुद्ध मधेसी संस्कृति पाउल जाईत अछि । पावनि केनहार सँ लक ओईके तैयारीमे लागल हरेक व्यक्ति ओ संस्कृतिमे भिजल रहल पाओल जाइत अछि । ओकर प्रसाद सँ लऽक हरेक सामगी्रमे मधेसक संस्कृति देखल जाईत छक, ओ पावनिके अवसरमे गावै वाला विभिन्न धुन तथा गीत सब मैथिल संस्कृतिमे गाओल जाईत अछि । ई पावनि कियाक मनाओल जाईत अछि ? –एकर अपने पहिचान आ विशेषता छैक । सब पावनि सँ अई पावनिके अपने इतिहास छैक किया त कोनो पावनि एसगरे अपना घर परिवार मे रहिकऽ मनाओल जाइत अछि मुदा ई एकटा एहन पावनि अछि जे खुला जगहमे सामूहिक रुप सँ मनाओल जाइत अछि । अई पावन के मात्रे लोकतान्त्रीक पावनि कहल जा सकैय कियाक त अई पावनि मे कोनो भेदभाव उच्च नीच, जात भात नई देखल जाइत अछि । अई पावनिमे सूर्यके पुजा भेलाके कारण आओर एकर गरीमा के उच्च देखल जा सकैय । सूर्य जहिना ककरो पर भेदभाव नई क कऽ सम्पूर्ण जगतके रोशनी प्रदान करैत अछि, तहिना छठि पावनि सब के एक समान रुप सँ देखैत आईव रहल छैक । ई पावनि अपना परीवार के सुख समृद्धिके लेल तथा कोनेा रोग व्यधा नई लागै से मनोकामना सँ मनाओल जाइत अछि । भोर आ साँझक सूर्यके किरणमे एक प्रकारके गरीमा होईत अछि जकरा रोशनी सँ शरीरमे रहल विभिन्न विमारी फैलाब वाला किटाणु सबके नष्ट सेहो करैत चर्मरोग सँ बचाबैत अछि । चर्म रोगके अचुक दवाई मानल जाईत अछि छठि पावनि । छठि पर्व मे महिला सब अपना आचरा पर नटुवा कियाक नचवैत छैथ ? –एकरा एकटा श्रद्धाके रुपमे लेल जा सकैय, छठि माताके ध्यानमे राखि क कोनो किसीमके मनोकमना केला सँ जौं ओ पुरा भ जाईछै त ओई देवता पर आरो श्रद्धा बैढ जाईछै आ ओहि किसीमके कौबुला क क अपना आँचर पर नटुवा नचवैत छैथ । छठिक घाट पर चमार जाईत सब ढोल( डुगडुगीया) बजावैत छथि, ओकर कि विशेषता अछि ? –ओकरो जातिय तथा संस्कृति परिचयके रुपमे लेल जा सकैय, ओ जाईत सब अपन संस्कृति आ संस्कारके बचएबाक लेल ओ काज क रहल अछि । ओ ढोल बजला सँ घाट पर कतेक मधुरता आ रौनक महशुस होईत रहैत अछि, ओना त कते लोक सब अग्रेजी वाजा बाजा क पावैन मानावैत छैथ मुदा जतेक ढोल पीपही के आवाजमे संस्कृति के झलक भेटैत अछि ओते कोनो बाजामे नई । अई पावनि मे सूर्यके पुजा होईतो पर छठि माता या छईठ परमेश्वरीके नाम सँ कियाक जानल जाईत अछि ? –सूर्यके अर्थ उषा होईत अछि, उषा भगवतिके रुपमे पुजलाके कारण एकरा छठी माताके रुपमे सम्बोधन कायल जाइत छैक । ओना त स्पष्ट रुपमे कतौ ने अई विषयमे चर्चा भेल अछि लेकीन किछ शास्त्रमे महाभारत के कुन्ति शुरुमे छठि पावनि केनेे रहैथ ओही दिन सँ छठि पावनि शुरु भेल अछि से कतौ कतौ उल्लेख पाएल जाईत अछि । दिनकर के आ जलके कि सम्बन्ध अछि ? –जल के आ दिनानाथके बहुत गहिर सम्बन्ध अछि, बिना जलके दिनकरके पुजे नई भऽ सकैय हुनका खुश करबाक लेल जल चाहबेटा करी । छठिएके उदाहरणके रुपमे लऽ लिय, ओ पावनि बिना जल के नई भऽ सकैय कोनो जलासय नई भेला पर अपना घरमे खधिया खनि क ओइमे जल राईख क पावनि सम्पन्न करैत अछि, कियाक त दिनानाथे सूर्य छथि । एकटा एहो कहि सकै छि कि सूर्य मे बहूत गर्मी भेला के कारण जल के अर्घ देला सँ ओ किछ ठन्ढा होइत छैथ । लोकतान्त्रिक गणतन्त्रमे छठि पावनिके संस्कृतिके बारे मे अपने कि कहब अछि ? – हम गणतन्त्र नई कहिक लोकतन्त्रके चर्चा करैत ई कहव कि छठि एकटा विशुद्ध लोकतान्त्रिक पावन अछि, समानुपातिक ढगं सँ एकरा मनाओल जाइत अछि । सामूहिक रुपमे मनबाक सँगहि अई मे कोनो भेद भाव नई होइत अछि । गरीब सँ लक धनीक तक सब एकरा समान ढगं मनावैत अछि । जनता गणतन्त्रके रस्ता चलनाई शूरु कदेलक मुदा सरकार अखुनोे पाछा परल अछि । अखनोे मधेसी पहाडी बीच , दलित गैर दलित बीच, गरीब धनीकके बीच भेदभाव अछि, कि एकरे गणतन्त्र कहबै ? नवका नेपाल बनाबऽ लागल नेेतागण सबके छठि पावनि सँ किछ सिखवाक चाहि । डा.रमानन्द झा ‘रमण‘ शब्द विभक्ति सम्वाद शब्द - आउ, लग आउ, एना छिटकल किए छी ? अहाँ लगमे रहैत छी तँ दस गोटे पूछै अछि। नहि रहब तँ हमरा के पूछत? विभक्ति - ई हमर सौभाग्य भेल। अहाँक बिना हमर कोन ठेकान ? मुदा की कहू ? अपन मैथिल समाज केहन कुचेष्टी आ झगड़ लगाओन अछि, से जनतहि होएब? नहि सोहाइत छैक जे लोक मिलि के ँ रहए। घर फुटौअलिमे मजा अबैत छनि। फेर किछु भाषाशास्त्री छथि, किछु उत्साही लेखक छथि जे अहाँसँ फराके रहबाक लेल हमरा उसकबैत रहैत छथि। कहल कोना टालबनि, भय होइत अछि, कहीं गोलैसीमे ने फँसा देथि। शब्द - धुत्! भाषाशास्त्री! वैयाकरण! से कतय पाबी? अल्पज्ञानी लेखकक अभाव सेहो नहि ने अछि, यै? ई अल्पज्ञानीए ने कहत, हम जे बजैत छी सएह शुद्ध अछि, हम जे लिखैत छी, सएह ठीेक अछि। कहू तँ एहन कोनो भाषामे भेलैक अछि? विभक्ति - से हम की जानए गेलिऐ। हमरा अहाँक संग नीक लगैए, सएह टा हम कहि सकैत छी। शब्द - स े तँ मानलहँ।ु मुदा बरजबाक कारण की छनि? कहे न लाभ दिआबए चाहैत छथि आ े सभ? आ कि हम नहि सोहाइत छीअनि? ते ँ ? विभक्ति - अहाँ नहि सेाहेबनि, से की बनतनि? तखन की मंसा छनि, से तँ ओएह लोकनि जानथि। मुदा हमरा मोनमे किछु खुटकैत अछि, से कहि दैत छी। अहाँ भेलहुँ पुरुष आ हम भेलहुँ स्त्री। अहाँ छी अनन्त पुरुष आ हम अहाँक भक्तिक आकांक्षी, विभक्ति। हमरा अहाँके ँ एकठाम आ सेहो एक पाँतीमे सटि बैसब कथमपि उचित नहि अछि। किनसाइत जँ इएह हुनकालोकनिक नहि पचैत होनि? शब्द - से, हम नहि जानी। मुदा हम जे अनुभव करैत छी आ किछु विश्वासो अछि, से कहैत छी। ओ सब ई बिसरि जाइत छथि जे संस्कृत भाषाक साम्राज्यमे अहाँ हमर संगिनी बनल रहलहुँ। कोनो विद्वानके ँभ्रम नहि भेलनि। असमंजस्यमे नहि पड़लाह। मुदा मैथिलीक नवका विद्वान आ नवसिखुआ लेखकके ँ भ्रम होइत छनि। भ्रमाह लोकक परामर्श मानि अवसर अबितहि हमरा लगसँ अहाँ छिटकि जाइत छी। दूनू गोटेक कतेक दिनक साहचर्य अछि, एहन कोनो घटना मोन अछि जखन हम कोनो प्रकारक अत्याचार अहाँ पर कएने होइ? सुनू, अहाँ असगर रही वा दू गोटे मिलि के ँ रही, विश्वास राखू अहाँक धर्म पर कनिको आघात नहि लागत। अहाँ सन उपकारी लोकके ँहम बारि रखने रही, कोना छजत हमरा? कोना उचित होएत? हमर आत्मा कलपत नहि? विभक्ति - से तँ बुझलहुँ, मुदा जँ हम अहाँक लग नहि आबि अहाँक सहयोगी बनल रही तँ एहिमे कोनो हर्ज? ओना हमरा अहाँक संग रहबामे कोनो आपत्ति नहि अछि। अहीं ने हमर धर्मपिता आ अवलम्ब छी, तखन कोन आपत्ति! मुदा जे स्त्रीक स्वतन्त्रताक विरोधी छथि आ जे स्त्री एवं पुरुषके ँ फराक-फराक रखबामे अपन चातुर्यक परिचय देमए चाहैत छथि, से नहि ने चाहताह जे हम आ अहाँ एक पाँतीमे बैसी। सन्निकट आबी। ओना कौखन ई हमरा उचितो लगैत अछि। शब्द - अहाँ अपन इच्छासँ वा अपन प्रकृतिक कारणे ँ भलहिं हमरासँ हटल रहबाक विचार करी। मुदा हम ई कहिओ नहि चाहब जे एहि लेल अहाँके ँकेओ संकपंज कर्रिथ वा बहकाबथि। आ स्वतन्त्र भए अहाँ जतए-ततए असगर बैसल करी। सोचिऔ, एहिसँ समाजक कोन उपकार होएतैक? विभक्ति - हम फराको रहि अहाँक नजरिसँ किन्नहुँ कात नहि भए सकैत छी। यदि अहाँक कृपा-दृष्टि बनल रहए। शब्द - यदि अहाँ फराके रहबाक ठानि लेने होए तँ हमर कृपा-दृष्टि कतेक दिन बनल रहत? प्रबुद्ध पाठकक कृपा-दृष्टि रहबाक चाहिअनि। अन्यथा हमर अहाँक जे सम्बन्ध अदौसँ अछि, से भंगे बूझू। विभक्ति - नहि, नहि। से नहि करू। एहि लेल यदि अहाँ सम्बन्ध-विच्छेद करए चाहैत छी तँ हम वचन दैत छी ककरो कहलमे हम नहि आएब। कहिओ अहाँक संग नहि छोड़ब। मुदा एक टा शर्त अछि। शब्द - शर्त? कहू कोन शर्त अछि। विभक्ति - अहाँ बहुरूपिया छी, कौखन संज्ञा रूपमे रहैत छी, कौखन सर्वनाम रूपमे, कौखन विशेषण रूपमे, कौखन क्रिया रूपमे। एहिना आनो-आनो रूपसभ अहाँक अछि। ई रूप-परिवर्तन हमरा पसीन नहि अछि। शब्द - सभटा छी तँ हमरे रूप। जखन जेहन प्रयोजन भेल, तखन तेहन रूप धारण कए लैत छी। से नहि करब तँ सम्प्रेषण-व्यापार सार्थक नहि होएतैक। विभक्ति - तखन तँ अहाँ मैथिलीक कतेको साहित्यकार जकाँ बहुविधावादी भेलहुँ। सगर रातिक आयोजनमे जएबाक अछि तँ कथा लिखि लेल, मंच भेटल तँ पांती जोड़ि कवि भए गेलहुँ आ समांग संयोजक भेलाह तँ संगोष्ठी लेल एमहर-ओमहरसँ आलेख तैआर कए लेल। एहन मंचलुब्धक पाछू-पाछू चलैत रहब, हमरासँ पार नहि लागत। अहाँक कोन रूपक हम सहगामी होउ, अहीें निर्णय करू। शब्द - अहाँक आरोप अयुक्तपूर्ण एवं अयथार्थ नहि अछि। अहाँ जनैत छी हम सामाजिक लोक छी। लोक हमरा अपन अव्यक्त भावक अभिव्यक्तिक माध्यम बनबैत अछि। हम लोकक ई उपकार आवश्यकतानुसार अपन रूप बदलि-बदलि करैत रहैत छी। व्याकरणक योगबलसँ अपन रूप बदलब हमरा लेल कोनो कठिन नहि अछि। अहाँ बिसरल नहि होएब ‘परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीडन’। से परोपकार छोड़ि परपीड़क हम कोना बनि जाउ? विभक्ति - से हम कहाँ कहैत छी। मुदा अहाँ भेलहुँ पुरुष आ हम भेलहुँ स्त्री। व्याकरणिक योगबलसँ अहाँ रूप बदलैत रही आ हम अहाँक संग रासलीला रचबैत रही, से देखि लोक की कहत? लोक-लाजो तँ कोनो वस्तु थिकैक? अहाँक सान्निध्य हम चाहैत छी, तखन कोन उपाय अछि? शब्द - अहीं कहू हमर कोन रूप अहाँके ँ पसीन अछि। ई कहि शब्द चट अपन रूप देखबए लगलाह। खन सर्वनाम रूप, खन क्रिया रूप, खन विशेषण रूप, खन क्रियाविशेषण रूप, खन अव्यय रूप, आदि। शब्दक रूप परिवर्तन शक्तिपर अचम्भित विभक्तिक आँखि ओकर संज्ञा रूप पर आबि अंटकि गेलैक आ ओ शब्दक संज्ञा रूपमे जाए सटि गेल (जेना, गामके ँ- द्वितीया, गामसँ - तृतीया, गामके ँ-चतुर्थी, गामसँ - पंचमी, गामक - षष्ठी, गाममे - सप्तमी)। ई देखि शब्दक संज्ञा रूप विभक्तिसँ अपन प्रतिरूप सर्वनामक स्थिति स्पष्ट कएलक। ओ विभक्तिके ँबुझओलक जे प्रयोग सौष्ठव लेल लोक हमर एहि रूपक प्रयोग अनवरत करैत अछि। ई नहि मानि लेब जे ई हमर अपांक्तेय रूप थिक। सहमतिमे विभक्तिक मूरी डोलल। विभक्तिक मोनसँ फराक रहबाक विचार निपत्ता भए गेलैक। कोनो विवाद नहि रहल। ई निर्णय भेलैक जे विभक्तिक उच्चारण वा लेख सदा शब्दक संज्ञा रूपक मूलमे सटाए कएल जाए। विभक्ति ओ संज्ञाक बीचमे ने कोनो विच्छेद कएल जाए आ ने कोनो आन पद ओकर बीचमे राखल जाए तथा शब्दक गणनामे सदा एक शब्द मानल जाए। ओहि दिनसँ विभक्ति-संयोजन संज्ञा आ सर्वनाममे होअए लागल। अनुवाद 1 21 फरबरी - अन्तरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस। एही दिन पूर्वी पाकिस्तानमे लादल गेल उर्दूक विरोधमे बंगलाभाषी विशाल प्रदर्शन कएने छलाह। पाकिस्तानी पुलिस गोली चलौलक। दू बंगलाभाषी नवयुवकक प्राण तत्काल चल गेलनि। तेसर नवयुवकक देहान्त 22 फरबरी, 1952 के ँ भेल। ओहि तीनू बलिदानीक स्मृतिमे तात्कालीन पूर्वी पाकिस्तान आ’ आब बंगलादेश 21 फरबरीरके ँ प्रतिवर्ष मातृभाषा दिवस मनबए लागल। हुनका लोकनिक सारासँ तेहन ने धधरा उठल जे इतिहास साक्षी अछि, बंागलादेश बनि गेल। देशक राजनीतिक स्वतन्त्राताक लेल विश्वक राजनीतिक इतिहासमे अपन प्राणक आहूति देनिहार अनगिनित स्वाधीनताकामी छथि, किन्तु अपन भाषाक नामपर प्राणक आहूति देबाक विश्वमे ई पहिल घटना छलैक। स्वतन्त्राता सेनानीक स्मृतिमे दिल्लीमे इंडिया गेट अछि, आ’ पटनामे शहीद स्मारक। मुदा ढा़कामे शहीदमीनार अछि, जतय प्रतिवर्ष 21 फरबरीके ँ मातृभाषाक अस्मिताक रक्षाक लेल प्राणक आहूति देनिहार ओहि तीनू नवयुवकके ँ लोक श्रद्धांजलि अर्पित करैत अछि। भाषाक संरक्षणक लेल शपथ लैत छथि। बंगलादेशक सरकारक आवेदनपर, विश्वक कतेको देशक समर्थनसँ, जाहिमे भारत प्रमुख छल, 1999 मे यूनेस्को 21 फरबरीके ँ अन्तरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस घोषित कएलक। आब समस्त विश्व 2000 सँ 21 फरबरीके ँ अन्तरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाए रहल अछि। एहन महत्त्वपूर्ण तिथिके ँ मैथिलीक विकासक लेल कार्यक्रमक शुभारम्भ निश्चिते अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अछि। नेशनल अनुवाद मिशन, मैसूर मिथिला भाषाक विकास एवं संरक्षणक लेल कतेक सतर्क अछि, तकर ई उदाहरण थिक। नेशनल अनुवाद मिशनक अधिकारीलोकनि धन्यवादक पात्र छथि। 2 हमरालोकनि अपन मातृभाषाक लेल लिखैत रहबाक अतिरिक्त जनजागरण अभियान नहि चलौलहुँ। आन्दोलन नहि कएलहुँ। आन्दोलनक लेल जे संघनित भाषाचेतना अपेक्षित छैक, तकर सभ दिनसँ अभाव रहल। ऐतिहासिक, राजनीतिक वा सामाजिक कारणसँ दूभाषिआ भए गेलहुँ, जाहि गतिसँ पड़ैनी लागल अछि, जाहि तन्मयतासँ बजार आ’ संचार माध्यमक चाक पर नंचैत जाइत छी, आ’ जेना हरिअरी दिस लपकि रहल छी, ओहिसँ जे गढाइत अछि वा गढ़ाएत, स्पष्ट संकेत अछि, अगिला पीढ़ी एक भाषिआ भएके ँ रहत। भाषा वैज्ञानिकक निष्कर्ष अछि, दोसर पीढी दू भाषिआ होइत अछि आ’ तेसर पीढ़ी एक भाषिया। परिणाम होइछ, भाषाक विलुप्ति।1 दोसर भाषा वैज्ञानिक जे.ए. फिशमैनक सेहो शोधनिष्कर्ष एहने अछि, ‘जाहि मातृभाषाक आनुवंशिक संक्रमण नहि होइछ, से भाषा टीकैत नहि अछि।2 एहन सामाजिक स्थितिमे अपन मातृभाषाक रक्षाक लेल संवैधानिक कबच-कुण्डल भेटि गेल अछि। एहिसँ मैथिली प्रयोगक प्रक्षेत्रमे विकासक संग वैविध्य आएल अछि। पहिने कविता कथा लिखि, पढ़ि वा वांचि गदगद होइत छलहुँ। अपना अपनीके ँमग्न रहैत छलहुँ। ओना ई प्रवृत्ति गेल नहि अछि। मैथिलीक सभ छारभार, यश अपयश एही वर्ग पर छलनि। मुदा, संवैधानिक मान्यताक उपरान्त अन्यहु क्षेत्र आ’ शास्त्रक विज्ञजनके ँ गौरवक बोध भेलनि अछि। अपन मातृभाषाके ँ सम्बृद्ध करबाक इच्छा जगलनि अछि। मौलिक आ’ अनुवाद दूनू क्षेत्रामे सक्रिय भेलाह अछि। एहिसँ आनो आनो शास्त्राक रचना मैथिलीमे आबए लागल अछि। साहित्येतर विषयक पोथी मैथिलीमे छपय लागल अछि। मैथिलीक विस्तार एवं संरक्षणक हेतु ई शुभ लक्षण थिक। मैथिलीमे लेखनक दृष्टिसँ समाजमे दू कोटिक शिक्षित मैथिल छथि - 1. मैथिलीक दृष्टिसँ शिक्षित मैथिल एवं, 2. मैथिलीक दृष्टिसँ अशिक्षित मैथिल। 1. When a language surrenders itself to foreign idiom and when all its speakers become bilingual, the penalty is death." -T.F.O' Rahilly- Irish dialects past and present: With chapters on Scottish and Manx. Dublin Institute of Advanced Studies.) 2.Without intergenarational mother tounge transmission - no language maintenace is possible.That which is not transmitted can not be maintained) मैथिलीक दृष्टिसँ शिक्षित मैथिल ओ भेलाह जे विधिवत मैथिली पढ़ने छथि, मैथिलीमे लिखैत रहबाक अभ्यास छनि एवं पारिवारिक सम्भाषणक भाषा मैथिली छनि। मैथिलीक दृष्टिसँ अशिक्षित मैथिलक कोटिमे ओ अबैत छथि जे मातृभाषा मैथिली रहितहु हुनक अध्ययन वा लेखनक माध्यम हिन्दी वा अङरेजी रहैत अछि, पारिवारिक वा सामाजिक सम्भाषणक भाषा मैथिली नहि रहि गेल छनि वा अत्यल्प रूपमे छनि। किन्तु, साहित्य सर्जना वा अन्ये विषयक रचनासँ अपन मातृभाषाक सम्बर्द्धनक प्रबल आकांक्षा छनि। ई आकांक्षा अवश्य स्वागत योग्य अछि। मुदा, ओ ई मानबाक लेल तैआर नहि रहैत छथि जे मैथिली सेहो सीखबाक वस्तु थिकैक, मात्रा बाजब अबैत रहब, साहित्य सर्जनाक लेल पर्याप्त नहि होइत छैक। मातृभाषा थिक, ते ँ जे लिखब, जहिना लिखब, सभटा ठीके होएत, शुद्धे होएत। एहि भ्रान्त धारणाक कारण मैथिली लेखनमे अव्यवस्था बढ़ि गेल अछि। एक टा समाचार पढ़ने छलहुँ, बिलेंतक अधिकांश अन्डर ग्रेजुएट अङरेज, शुद्ध अङरेजी नहि लिखि पबैत र्छिथ। ई मैथिली भाषी पर सेहो लागू होइत अछि। अन्यथा रमानाथ झा नहि लिखने रहितथि - ‘हम ई नहि मानैत छी जे जँ मैथिली हमर मातृभाष थिक, हम मैथिली अहोरात्रा बजैत छी ते ँ जे लिखब, जेना लिखब सएह मैथिली होएत। जे कहैत छथि, जे जहिना बजैत छी तहिना लिखब, तँ मैथिलीक स्वरूप अनन्त भए जाएत।’ एहि प्रसंग भाषावैज्ञानिक डा. रामावतार यादव मैथिली लेखनमे आएल अस्तव्यस्तताक कारणक अन्वष्ेाण कए, भाषावैज्ञानिक तथ्यक आधारपर ओकर परीक्षण कए एहि निष्कर्षपर छथि जे ‘हिन्दी भाषाक माध्यमे ँ शिक्षा ग्रहण कएनिहार एवं हिन्दी भाषाक लैखिक परिपाटीसँ अत्यधिक प्रभावित होमएबाला मैथिलीक लेखक लोकनि हिन्दी जकाँ मैथिली सेहो लिखए चाहैत छथि एवं मैथिलीक प्रत्येक शब्द, रूपिम एवं रचनांग आदिके over differentiate करए चाहैत छथि’। ओ मानैत छथि जे एहि प्रभावक कारणे ँ मैथिलीक ऐतिहासिकताक रक्षा नहि होइत अछि, ओ मैथिलीक निजत्वक परिचायक नहि बनि, मैथिलीके ँ कुरूप कए दैत अछि। एहि देखौंसक परिणामजनित किछु उदाहरण प्रस्तुत कए रहल छी - 1. अहाँ सँ के बहस करत? 2. पूजा करथु, आ कनियो के आबय कहथुन।- मधुकान्त झा, क्रान्तिरथी, पृ.सं.14/66 3. आइ फेर सँ नारायण जी क े डेरा खाली करबाक नोटिस जारी भ’ गेलनि।-ऋषि बशिष्ट, मांटि परक लोक,सुफांटि जतरा, पृ. सं.10 4. एकटा के बजाउ त’ दोसर पार। - ऋषि बशिष्ट, पहिल वाक्यमे ‘के’ सर्वनाम अछि एवं दोसर, तेसर एवं चारिम वाक्यमे ‘के’ कारक चिह्न थिक। मुदा, मैथिलीक लेखक महोदय सभठाम ‘के’क प्रयोग कए देलनि अछि। साहित्य अकादेमीसँ पुरस्कृत मैथिलीक एक लेखकक प्रकाशित नब पोथीपर चर्चाक क्रममे एहि विषयक हमर विचार सुनि ओ तमसा गेलाह आ’ कहलनि ‘अर्थात हमरा मैथिली नहि लिखए अबैत अछि।’ मिथिला भाषाक अपन निजी विशेषता, सानुनासिक स्वरध्वनिक प्रसंग डा. रामावतार यादवक अभिमत अछि जे सानुनासिक स्वर ध्वनिक लेल अर्थात् एहन स्वर ध्वनिक लेल जे कोनहु नासिक्य व्यंजनक सामीप्यक अभावहुमे स्वतः स्वनिमिक भए सानुनासिक रूपे ँ उच्चरित होइत अछि एवं जकरा spontaneous nasalization कहल जाइत अछि, मैथिली वर्तनीमे अद्वयार्थक रूपे ँचन्द्रबिन्दु द्वारा, जेना सँ, तँ, हँ, अहाँ प्रतिबिम्बित होइत आएल अछि एवं सएह उचित अछि। अनुस्वार द्वारा यथा सं, तं, हं, अहां ओ प्रतिनिधित्व नहि होइत अछि। मुदा, कतेको व्यक्ति चन्द्रबिन्दुक कोन कथा, अनुस्वारहुके ँ छोड़ि स’ एवं त’ लिखैत छथि। जेना उदाहरण 4 (‘एकटा के बजाउ त’ दोसर पार’) मे अछि। मैथिलीक गम्भीर अध्येता पं. गोविन्द झा स्पष्टतः लिखने छथि जे मैथिलीक अपन स्वन-व्यवस्थामे अनुस्वारक कतहु स्थान नहि अछि, किन्तु हिन्दीक प्रभावसँ एकर प्रयोग जोर पर अछि, जखन कि बंगलामे अद्यावधि अनुस्वार नहि चलैछ। निश्चित रूपसँ ई बंगलाभाषीक अपन भाषाक निजताक रक्षाक प्रति सचेत एवं साकांक्ष रहबाक परिचायक थिक। अङरेजी शब्द Marriageक संगे कतय जव आ’ कतय ूपजी लागए, से घोखैत जाइत छी, किन्तु, मैथिली अपन मातृभाषा थिक, व्याकरणक नियमक पालनक कोन चिन्ता, जे लिखब, शुद्धे होएत। के काटत? ई मानसिकता पराकाष्ठापर अछि। ई ध्यान देबाक थिक थिक जे पैघ लेखकक भाषा सेहो पैघ होइत छैक, अन्यथा अभिप्रेतक अभिव्यंजना लटपटा जएतैक। राजनीतिक उपनिवेशवाद समाप्त भए गेल। मुदा, उपनिवेशवाद नवरूप धारण कए लेलक अछि। ओ अपन अकादारुण मुह बाबि इनफौरमेशन टेकनौलेजीक रथपर सबार भए, द्रुत गतिसँ आबि रहल अछि। ओ सभटा गीरि जएबाक लेल आतुर अछि। मैथिलीपर दू तरफा मारि पड़ि रहल छैक। ओहि प्रहारसँ मैथिलीके ँसुरक्षित रखबाक अछि। तखनहि, मैथिलीक अपन निजता रहतैक, नहि तँ एकटार भए जाएत। एहि लेल आवश्यक अछि जे मैथिलीक स्वन विशेषताके ँ, ओकर ध्वनि परम्पराके ँ लेखनमे सुरक्षित राखल जाए। डारामावतार यादवक परामर्श अत्यन्त उपयोगी अछि जे मैथिलीक आत्मरक्षार्थ ई परमावश्यक जे ओ हिन्दीसँ भिन्न देखि पड़ए। हम लक्ष्मीपति सिंहक उक्तिके ँ दोहरबैत एहि प्रसंग अपन वक्तव्यके ँ विराम दैत छी। ओ लिखल अछि - ‘जेना बजै छी, तहिना लिखी, जे सर्वसाधारण बूझि जाए, सएह लिखी वा जे किछु शुद्ध-अषुद्ध अपन मन मानि जाए, तकरे सर्वांग सुन्दर काव्य मानि लिपिबद्ध कए ली, तथा व्याकरणादि ग्रन्थ पढ़बाक डरे ँअपन-अपन पारिवारिक वा ग्रामीण स्वर-प्रक्रियाक अनुव्रजन करैत अपनहि इच्छे साहित्यिक मैथिलीक स्तर निर्धारित कए ली, आदि दुराग्रह आइ-काल्हि मैथिली संसारमे संक्रामक रोग जकाँ पसरि रहल अछि। ककर कथा मानओ, के ककर पथ-प्रदर्शक बनथि’। 3 हमर विचारक तेसर बिन्दु भए सकैत छल, अनुवाद सिद्धान्तक प्रसंग किछु बाजब। मुदा, अनुवादक तीनू स्थिति - 1. सिद्धान्त ; (Theory), 2. अभ्यास ; (Practice), एवं. 3. मूल्यंाकन ; (Evaluation)के ँ ध्यानमे राखि बहुत नीक जकाँ कार्यक्रम निर्धारित अछि तथा अध्यापन कार्यमे निष्णात विद्वान सब अग्रिम सत्रासभमे विभिन्न विषयपर अपन-अपन विद्वतापूर्ण व्याख्यानक लेल आमन्त्रिात छथि। ओहि शास्त्राीय विषय पर हम किछु कहबाक साहस नहि कए सकैत छी। तथापि, ई कहब जे अनुवाद, आब एक भाषासँ दोसर भाषामे मात्रा उल्था करब नहि रहि गेल, एकरा शास्त्राीयता प्राप्त भए गेल छैक एवं अनुवादशास्त्राक अध्ययन-अध्यापन अनुवाद विज्ञानक ; ( Translatology) रूपमे होअए लागल अछि। पहिने अनुवाद द्विकर्णी (Binary) मानल जाइत छल, किन्तु आब बहुआयामी ; (Multidimensional) भए गेल अछि। पहिने एक शास्त्राीय छल आ’ किन्तु आब अनुवाद विज्ञानक बहुशास्त्राीयताक ; (Interdisciplinarity of Translatology)परिप्रेक्ष्यमे अनुवाद कार्य होइत अछि। पहिने स्रोत भाषा (Source Language) एवं लक्ष्य भाषाक ; (Target Language) जनतब आवश्यक छलैक, मुदा आब अनुवादकक लेल भाषाक संगहि संग, स्रोत संस्कृति (Source Culture)एवं लक्ष्य संस्कृतिक ; (Target Culture )जनतब सेहो आवश्यक मानल जाइत अछि। पहिने एक विषय, जेना समाजशास्त्र होइत छल, किन्तु आब अनुवादक एवं पाठक/स्रोताक बीचक सम्बन्धक लेल Sociology of Translation पर विचार होइत अछि। नॉलेज टेक्स्टक अनुवादसँ अनुवाद शास्त्रामे आओरो विस्तार आबि गेल अछि। आब अनुवादकार्यक स्वरूप, विषय एवं उद्देश्यक आधारपर निर्धारित होइत अछि। अनुवादकक लेल सर्वथा आवश्यक अछि जे हुनका स्रोतसंस्कृति एवं लक्ष्यसंस्कृतिक जनतबहि नहि हो, अपितु विषयक Comman Background Knowledge सेहो रहबाक चाहिअनि। अनुवाद विज्ञानक क्षेत्रामे बी. फॉलकार्टक प्रतिक्रमण (Reversibility) पर आधारित नवीनतम सिद्धान्त(1989) अछि ठंबा.ज्तंदेसंजपवद क सिद्धान्त। एहिमे स्रोतक अनुरूप चारि टा कोटि अछि - 1. गणितीय स्रोत ; ( mathematical text), एहिमे सबसँ बेसी प्रतिक्रमण सम्भव अछि, 2. तकनीकी स्रोत ; (technical text), 3. साधित स्रोत ; ( constrained text) तथा, 4. सामान्य एवं साहित्यिक स्रोत ; ( general and literary text)। नेशनल अनुवाद मिशनक जे लक्ष्य छैक, अनुवादकक लेल Comman Background Knowledge आवश्यक अछि। संगहि, लक्ष्यभाषामे बाजबे टाक अभ्यास पर्याप्त नहि अछि, मैथिलीमे लिखैत रहबाक अभ्यासक संग, मैथिलीक भाषागत विशेषताक ज्ञान सेहो चाहिअनि, तखनहि Sociology of Translation स्थापित भए सकत आ’ अनुवाद हास्यास्पद होएबासँ बंचि सकैछ। विषयक जनतबक अभावमे अनुवाद केहन भए जाइछ, तकर उदाहरण प्रस्तुत अछि। रिजर्व बैक द्वारा सूचीबद्ध वस्तुक आयातक लेल Blanket Permit देल जाइत छलैक आ’ आयातकक लेल आवश्यक नहि छलैक जे प्रत्येक खेपक समय ओ अनुमति प्राप्त करथि। एहि काजसँ अनभिज्ञ अनुवादक Blanket Permitक अनुवाद कंबल परमिट कए देलनि। ओहिना छपिके ँआएल विभिन्न प्रकार बॉण्डक हिसाब जाहि रजिस्टरमे राखल जाइत अछि, तकरा नाम थिक Skelton Register मुदा काजसँ अनभिज्ञ व्यक्ति अनुवाद कए देलनि कंकाल रजिस्टर। ओहिना स्रोत संस्कृति (Source Culture) एवं लक्ष्य संस्कृतिक ; (Target Culture )सँ अनजान अनुवादक की कए सकैत छथि, तकर उदाहरण प्रस्तुत अछि - 'The young daughter kissed her father and bade adieu.' एकर अनुवाद जँ मैथिलीमे कए देबैक ‘जुआन बेटी बापके ँचुम्मा लेलक तँ अनर्थे ने भए जाएत। कलकत्ता विश्वविद्यालयमे मैथिली- राजा टंकनाथ चौधरी कलकत्ता विश्वविद्यालयमे मैथिलीक अध्यापनक प्रारम्भक होएबाक सदर्न्भमे डा. जयकान्त मिश्र (मैथिली साहित्यक इतिहास, साहित्य अकादेमी ) लिखने छथि - स्वर्गीय सर आशुतोष मुखर्जी कलकत्तामे मैथिलीक महान सम्पोषक कहल जाए सकैत छथि। कुमार गंगाानन्द सिंह, बाबू गङ्गापति सिंह, ब्रजमोहन ठाकुर, विद्यानन्द ठाकुर आदि महानुभाव लोकनिक प्रयाससँ तथा दुर्गागंज पुरनियाँक राजा टंकनाथ चौधरीक उदार वित्तीय सहायतासँ 1917 ई. मे कलकत्ता विश्वविद्यालयमे मैथिली चेयर स्थापित भेल। डा. सुभद्र झा (मैथिली: वृत्त ओ परिधि, चेतना समिति) तात्कालिक स्थिति आ सहयोगकेँ स्पष्ट करैत लिखल अछि जे मैथिलीक अध्यापनक हेतु दू टा प्राध्यापक नियुक्त भेल छलाह। एहिमे एक गोटेक वेतन रजौरक राजा स्व. टंकनाथ चौधरी द्वारा देल द्रव्य राशिसँ तथा दोसर गोटेक वेतनक राशि बनैलीक स्व. राजा कीर्त्यानन्द सिंह प्रभृति द्वारा देल द्रव्यसँ देल जाइत छल तथा ई लोकनि क्रमशः रजौर तथा बनैली व्याख्याता कहल जाथि। एहि प्रसंग ब्रजमोहन ठाकुर (विश्वविद्यालयमे मैथिलीक प्रवेश, चेतना समिति) लिखल अछि- जखन हम पूर्णियाँसँ घूरि के ँकलकत्ता पहुँचलहुँ तखन ज्ञात भेल जे राजा श्रीटंकनाथ चौधरी सेहो उदारदातापूर्वक साढ़े तीन हजार टाका देबाक सूचना सर मुखर्जीके ँ देलथिन्ह अछि। ओ ‘टंकनाथ चौधरी चेयर’ स्थापित करबाक अनुरोध कएलन्हि अछि। एहि तरहे ँ दूनू (राजाबहादुर कीर्त्यानन्द सिंह) मिलाके ँ एगारह हजार टाका तात्कालिक कार्य चलएबाक हेतु संगृहीत भए गेल। अर्थात् विश्वविद्यालयमे मैथिलीक अध्यापन कार्य प्रारम्भ होएबाक निमित्त आवश्यक निधि उपलब्ध करेबाक हेतु जे दू उदारमना मातृभाषा अनुरागी आर्थिक सहयोग कएल आ कलकत्ता विश्वविद्यालयमे सर्वप्रथम मैथिलीक अध्यापन कार्य प्रारम्भ भए सकल एवं जाहिसँ मैथिली शिक्षणक बाट खूजल, ओहिमे एक छथि राजा टंकनानाथ चौधरी। राजा टंकनाथ चौधरी राजा बुद्धिनाथ चौधरीक पुत्र छलाह। हिनक जन्म 11 नवम्बर 1884 ई. के ँदुर्गागंज, कटिहारमे भेलनि। ओ अपन बेमात्रोय भाए कुमार छत्रानाथ चौधरीसँ मात्रा छओ मास छोट छलाह। हिनक पिता राजा बुद्धिनाथ चौधरीक देहान्त जेष्ठ 1885 ई. मे भए गेलनि। ओहि समयमे दूनू भाए नावालिग छलाह। जेना महाराज महेश्वर सिंहक देहावसानक उपरान्त हुनक दूनू पुत्रा महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह एवं महाराज रमेश्वर सिंहक अल्पवयस्कताक कारणे ँ दरभंगा राज ‘कोर्ट ऑफ वार्ड्सक अन्तर्गत चल गेल छल, ओहिना राजा बुद्धिनाथ चौधरीक जमीनदारी कोरट लागि गेलनि। राजा टंकनाथ चौधरीक प्रारम्भिक शिक्षा नवद्विप जिलाक कृष्णनगरमे भेलनि। 15 वर्षक अवस्थामे ओ कलकत्ता विश्वविद्यालयसँ प्रथम श्रेणीमे इंटर पास कएल। प्रेसिडेंसी कालेजसँ अङरेजी तथा दर्शन विषयक संग स्नातक भेलाह। अग्रिम शिक्षाक हेतु दर्शनशास्त्रा लए एम. ए. मे नाम लिखाओल। किन्तु 1904 ई.मे जखन जमीनदारी कोरट मुक्त भेलनि तँ औपचारिक शिक्षा समाप्त कए जमीनदारीक प्रबन्धक दायित्व सम्हारि लेल। राजा बुद्धिनाथ चौधरीक जमीनदारी बिहार आ बंगााल- दूनू राज्यमे छलनि। ओकर सुप्रबन्धक हेतु बिहार क्षेत्रक प्रबन्ध कुमार छत्रनाथ चौधरी तथा बंगााल क्षेत्रक प्रबन्ध राजा टंकनाथ चौधरी सम्हारल। राजा टंकनाथ चौधरीक विवाह कोइलख, मधुबनी ग्राम निवासी पण्डित जानकीनाथ झाक कन्यामे छलनि। राजा साहबके ँ तीन पुत्र एवं तीन कन्या भेलथिन। हिनक परिवारमे कतेको खाढ़ीसँ पिताके ँ कन्यादानक सौभाग्य नहि होइत छलनि। राजा साहबके ँ ई सौभाग्य भेटलनि। राजा टंकनाथ चौधरी यद्यपि स्वयं उच्चशिक्षा प्राप्त नहि कए सकल छलाह मुदा, समाजमे शिक्षाक व्यापक प्रचार हो, तदर्थ आजीवन प्रयत्नशील छलाह। एहि हेतु 1915 ई. मे अपन पिताक नाम पर रामनगरमे स्कूल स्थापित कएल। शिक्षाक क्षेत्रामे हिनक अवदानक उल्लेख करैत मिथिला मिहिर (16 जून, सन 1928 ई.) लिखैत अछि- ‘शिक्षा प्रचार में आप सदा आगे रहते थे। अपनी राजधानी रामगञ्ज में अपने स्वर्गीय पिता के स्मारक में बुद्धिनाथ इन्सटिच्यूशन नाम से एक हाईस्कूल स्थापित कर उसमें अनेको विद्यार्थियों को अपनी ओर से सब खर्च देते थे।’ ओहि स्कूलमे मैथिल छात्रक निःशुल्क शिक्षाक व्यवस्था छलैक। खगल आ मेधावी छात्रक आवास आदिक प्रबन्ध राजक दिशिसँ होइत छल। बंगालमे रहितो हुनक समस्त पारिवारिक सम्बन्ध आ सरोकार मिथिलासँ छल। ते ँ ओतय मैथिल छात्रक संख्या पर्याप्त रहैत छल। ओ मैथिल छात्र संघक स्थापना कएल जकर नियमित बैसार होइत छलैक। ओहि बैसारमे मैथिली निबन्ध तथा कविता पाठ होइत छल। मिथिलासँ गेल ओहने एक छात्रमे छलाह काशीनाथ झा जे पछाति मैथिलीक कवि कथाकारक रूपमे ख्यात भेलाह। पं. काशीनाथ झा जखन मैट्रिक पास कए लेलनि तँ ओही स्कूलमे हुनक नियुक्ति एक शिक्षक रूपमे भए गेलनि। तदुपरान्त, ओ अपन अनुज काञ्चीनाथ झा (डा. काञ्चीनाथ झा ‘किरण’) के ँ गामसँ आनि लेलनि। किरणजी ओतहिसँ मएट्रिक एवं राजा टंकनाथ चौधरीक आर्थिक सहयोग पाबि कलकत्ता विश्वविद्यालयसँ इण्ट्रेंस पास कएलनि। एहि तथ्यके ँ स्पष्ट करैत राजा टंकनाथ चौधरीक पुत्र रुद्रनाथ चौधरी (देहावसान, 2004 ई.) लिखैत छथि- At Ramganj, he established a High School in 1915, in the memory of their father. The Maithil Students from Mithila area were taught free of tuition fee, they were allowed free food and seats in the Maithil Hostel of the school. Poor students of the area were also allowed teaching free of fees. A Maithil Chhatra Sangha was established in which essays and verses were read. Late Pandit Kashinath Jha, who passed Matriculation from there was appointed as a teacher of the school. Pt. Kashinath Jha was the elder brother of Mithila's eminent writer and thinker, Dr. Kanchinath Jha "Kiran", took great interest in Maithili literature. The students were encouraged to write more and more and read them in the weekly gathering. Movements for Mithilakshar type was done. (चेतना समिति स्मारिका, 1988)। राजा टंकनाथ चौधरीक व्यक्तित्व सहज छल। ओ मिलनसार छलाह। पैघ-छोटक भेदभाव मनमे बिना अनने लोकसँ भेंट करैत छलाह। हिनक व्यक्तित्वक एहि विशेषताक प्रसंग ‘मिथिला मिहिर’ लिखने अछि - ‘हमारे राजा साहब बी.ए. होने के अतिरिक्त सुवक्ता, कार्यकुशल, अथक परिश्रमी, निरभिमानी, शिक्षाप्रेमी, तथा मिलनसार थे। आप बड़े से बड़े और छोटे से छोटे तक में दिल खोलकर बातें करते थे।’ हुनक पुत्र रुद्रनाथ चौधरीक निम्नलिखित कथनसँ सेहो एहि बातक पुष्टि होइत अछि। ओ लिखैत छथि - When at Ramnagar, he used to sit in the maidan in front of the palace for about one and half hour with some officials and relations. where the general public and tenants were free to talk to him about their grievances, if any, which were noted down and redressed as far as possible. (चेतना समिति स्मारिका, 1988 ई.)। राजा टंकनाथ चौधरी उदार प्रवृतिक लोक छलाह। मिथिला मिहिरसँ स्पष्ट होइछ हिनक एहि उदारताक प्रतिकूल प्रभाव पड़ैत छलैक तथा ओ कर्जमे भए गेल छलाह। तथापि सामाजिक कार्यसँ किंचितो विमुख नहि भेलाह। राजा साहबक उदारताक एक ज्वलन्त उदाहरण अछि जे 1926 ईमे सितावगञ्ज आ ठाकुरगाँव बाटे दिनाजपुरसँ रूहिया धरि जखन रेललाइन बनय लागल, जे हुनक जमीन बाटे जाइत छल, तँ राजा टंकनाथ चौधरी रेलवेके ँनिःशुल्क जमीन दए देलथिन। राजा टंकनाथ चौधरी दिनाजपुर जिला वोर्डक गैर-पदाधिकारी अध्यक्ष तथा दिनाजपुर म्युनिसिपल बोर्डक 15 वर्ष धरि अध्यक्ष रहलाह। बंगाल लेजिस्लेटिव काउंसिलक गठन भेला पर ओकर सदस्य निर्वाचित भेलाह। हिनक अवदानक प्रसंग मिथिला मिहिर लिखैत अछि - ‘बहुत दिनों तक आप दिनाजपुर डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के चेयरमैन रहे और इस अवधि में आपने अच्छे-अच्छे काम किये जिनके लिये दिनाजपुर जिला बोर्ड में आज भी आप का नाम आदर के साथ लिये जाते हैं। आजकल आप कदमा थाना की ओर से पूर्णिया जिला बोर्ड में मेम्बर थे। और बंगाल कौंसिल का भी मेम्बर थे। बंगाल के भूतपूर्व गवर्नर ने आपकी उदारता और शिक्षा-प्रेम की कई वार प्रशंसा की थी। और ‘राजा साहब’ की उपाधि से सम्मानित किया। रुद्रनाथ चौधरी लिखल अछि - Being pleased at his devotion for public welfare the British Government honoured him with the title of Raja on Nov. 25, 1925 in a Durbar held by the Governor of Bengal. राजा टंकनाथ चौधरी नित्यपूजा आ देवीभागवत पाठ कएल करथि। किन्तु दोसर धर्मक प्रति असहिष्णु नहि छलाह। 1926 ई.मे कलकत्ताक संगहि आनोठाम जखन साम्प्रदायिक दंगा पसरि गेलैक एवं ओकर पसार दिनाजपुर धरि होअए लागल तँ राजा साहेब तत्काल पण्डित एवं मौलवीकेँ आमन्त्रित कएल। दूनू गोटाके ँ एकठाम बैसाय धर्मशास्त्र पर प्रवचन दिआओल। ई कायक्रम एक मास धरि चलल छल। राजा साहबक एहि प्रयाससँ धार्मिक साहिष्णुता बढ़ल एवं शान्ति व्यवस्था भंग नहि भेलैक। ओतय कटिहार हाट लगाओल, जे अद्यावधि लागि रहल अछि। रामगञ्जमे ओ भगवतीक एक मन्दिरक निर्माण कएल। भारत विभाजनक उपरान्त 1951 ई. मे राजा टंकनाथ चौधरीक पुत्र आदि पूर्वी पाकिस्तानसँ जान बचाए पडे़लाह, ताधरि ओतय दुर्गापूजा खूब धूमधामसँ होइत छल। राजा टंकनाथ चौधरी दुर्लभ पुस्तक तथा पाण्डुलिपिक संग्रह कए विशाल पुस्तकालयक स्थापना कएने छलाह। जखन हुनक एक प्राध्यापक सेवानिवृतिक उपरान्त बिलेंत जाए लगलथिन तँ हुनक समस्त संग्रह राजा साहेब कीनि लेल। रुद्रनाथ चौधरी लिखल अछि - Huge collections of manuscripts on Talpatra, Bhojapatra and thick papers on different subjects, collected by his ancestors were being transcribed by eminent pandits for years. He spent hours in reading books in night. राजा साहब संगीतक बड़ प्रेमी छलाह। बेतिआक संगीतकार मल्लिक लोकनि हुनक दरवारमे अबैत रहैत छलथिन। शतरंज एवं फोटोग्राफी हुनक हॉबी छल। छात्र जीवनमे फुटबाल, हेलब एवं घोड़सबारी प्रिय छलनि। ओ एक कुशल शिकारी सेहो छलाह। जखन कोनो सरकारी अमला अथवा बंगालक गर्वनर अबैत छलथिन तँ हुनक सम्मानमे विशेष शिकार अभियान होइत छलैक। एहि लेल हुनका अपन जमीनदारीसँ बाहर नहि जाए पड़ैत छलनि। मिथिला मिहिर एवं मिथिलामोदक ‘मैथिल महासभा’ विषयक रिपोर्ट एवं समाचारमे राजा टंकनाथ चौधरीक उल्लेख निश्चित रूपसँ भेटैत अछि। एहिसँ स्पष्ट होइछ जे ओ मैथिल महासभाक अधिवेशनमे नियमित रूपसँ सम्मिलित होइत छलाह। ईहो स्पष्ट होइछ जे ओ समाजोपकारी, सुधारात्मक प्रयास एवं प्रस्तावक समर्थक छलाह। ओ एक नीक वक्ता छलाह जे मिथिला मोद (उद्गार, 61 1911 ई.) मे मैथिल महासभाक तेसर अधिवेशनक (3-5 नवम्वर 1911 ई. दरभंगा)क प्रकाशित निम्नविवरणसँ स्पष्ट होइत। ओ लिखैत अछि - द्वितीय दिन (4 नवम्बर 1911 ई.) 2 बजे श्रीमान कनिष्ठ रजौराधीश टंकनाथ चौधरी (B.A.) महोदयक सुन्दर वक्तृता भेल। सर्वज्ञात अछि जे राजा टंकनाथ चौधरी कलकत्ता विश्वविद्यालयमे मैथिलीक प्रवेशक लेल उदारतापूर्वक दान देल। किन्तु मैथिली भाषा-साहित्य एवं संस्कृतिक विकास एवं संरक्षणक क्षेत्रमे हुनक इएह टा अवदान नहि अछि। जखन ओ अपन पिताक नामपर स्कूल स्थापित कएल तँ ओहिमे मैथिल छात्रक लेल विशेष व्यवस्था छल। मैथिल छात्र संघक तत्त्वावधानमे रचनाक पाठ कराए ओ सर्जनात्मक प्रतिभाकेँ प्रोत्साहित करैत छलाह। मिथिलाक्षरक संरक्षणक लेल प्रशिक्षण अभियान चलौने छलाह। ओहिना जखन मैथिल महासभामे वा ओकर बाहर समुद्र यात्रा पर घर्मथन होइत छल तँ एहि विषयक निबन्ध लेखन प्रतियोगिता आयोजित कराओल। एहि सम्बन्धमे पण्डित जानकीनाथ झा, व्याकरणतीर्थक नामसँ एक निवेदन मिथिलामोद, उद्गार - 61, शाके 1833, सन 1319 सालमे प्रकाशित अछि। निवेदन अछि - 50 टाका पुरस्कार श्रीमान रजौराधीशसँ - आधुनिक कालमे मैथिल ब्राह्मणके ँ उन्नत्यर्थ विलायत जाएब अनुचित - एतद्विषयमे मिथिला भाषा मध्य जे मैथिल ब्राह्मण विद्वज्जन प्रमाण सहित सर्वोत्तम लेख लिखताह, तनिका 50 टाका मूल्यक पदक (मेडल) देल जैतन्हि।’ लेख 15 दिसम्बर 1911 ई. सँ पूर्व निवेदकके ँपठा देबाक अनुरोध अछि। समुद्र यात्राक पक्ष-विपक्षमे मिथिलामोद(1911ई.) मे अनेक लेख प्रकाशित भेटैत अछि। सम्भव थिक जे ओही प्रतियोगिता हेतु लिखल गेल हो। समाज सुधारक संग मातृभाषा मैथिलीक विकासक प्रति राजा साहब कतेक साकांक्ष छलाह, से एहि निबन्ध प्रतियोगिताक आयोजनसँ स्पष्ट होइत अछि। समस्यापूर्ति प्रतियोगिता तँ होइत छल, मुदा मैथिलीमे निबन्ध लेखन प्रतियोगिताक आयोजन प्रायः सर्वप्रथम राजा टंकनाथ चौधरी, सएह आरम्भ कराओल। राजा टंकनाथ चौधरी महाराज रमेश्वर सिंहक प्रियपात्र छलाह। ओ समय-समय पर मिथिला, मैथिल एवं जमीनदारीक समस्यापर विचार करैत रहैत छलाह। ओ जखन कोनो गम्भीर समस्याक समाधानक लेल गवर्नर वा वायसरायसँ भेंट करबाक हेतु जाइत छलाह, तँ राजा टंकनाथ चौधरी हुनक संगमे रहैत छलथिन। आर जखन हुनक देहावसान भेलनि तँ महाराज रमेश्वर सिंह राजा टंकनाथ चौधरीके ँ Mouthpicee of North Bengal कहि अपन शोक संवेदना व्यक्त कएल। एहन मातृभाषा अनुरागी राजा टंकनाथ चौधरीक, मात्रा 44 वर्षक अवस्थामे जेठ पूर्णिमा रवि, प्रातः काल 3 जून 1928 केँ देहान्त भए गेलनि। राजा साहबक रोग आ देहावसानक प्रसंग मिथिला मिहिर, लिखैत अछि - ‘बहुमूत्र रोग से ग्रस्त रहने पर भी स्वास्थ्य, सबल और प्रभावशाली जान पड़ते थे। मृत्यु से कई दिन पहले उसी के उपसर्ग से कुछ अस्वस्थ्य हो गये, जिसके निवारणार्थ दिनाजपुर में ‘इन्जकशन’ कराये! काल बली था, बुरा होने वाला था; इन्जकशन से फायदा नहीं पहुँचा, उलटे बाँह फूल गया, चित्त विकल हुआ, दिनाजपुर से कलकत्ते आये, बड़े-बड़े डाक्टरों ने देखा, दबा की; परन्तु निष्ठुर काल के आगे किसका चलता है, उसका दबा कौन कर सकता है? गत रविवार ता. 3 जून, 1928 ई. के भोर में दुखी परिवारों को रोते हुये छोड़ कर इस संसार से सदा के लिये चल बसे!’ राजा साहब पुत्रा नवालिग छलथिन। परिणामतः फेर हुनक जमीनदारी कोर्टस आफ वार्डक अन्तर्गत चल गेल। मैथिलक एक केन्द्र समाप्त भए गेलैक। एहि प्रसंग रुद्रनाथ चौधरी लिखने छथि - With his passing away hundreds of relations, employees and dependents became unsettled, and the Estate being taken over by the court of wards, they all went away to other places or their home. The family shifted to Calcutta for the education of the children. बंगलादेश निर्माणक बाद बनल सौहार्दपूर्ण वातावरणमे रजौरक एक विश्वासपात्र दुर्गागंज आबि राजा साहेबक पुत्र (देहावसान 2004 ई.)सँ घूमि चलबाक अनुरोध कएने छलनि जे बंगबन्धु मुजिवुर रहमानक हत्याक उपरान्त भारत विरोधी वातावरणमे विलीन भए गेल। राजा साहेबक पुत्रबधु जे हुनक नवजात पौत्र (प्रो. जी.एन. चौधरी, पूर्व अध्यक्ष, स्नातकोत्तर समाजशास्त्रा विभाग, ल.ना.मि.वि.वि. दरभंगा) के ँ अपन आंचरमे नुकाके ँ पड़ाएल छलीह, अपन आँखिमे मैथिली भाषा-साहित्य एवं संस्कृतिक प्रभावशाली केन्द्रक उत्कर्ष आ त्रासदीक चित्रके ँ आँखिमे जीवन भरि (देहावसान 2009 ई.) जोगौने रहलीह। एहि संग राजा साहेबक परिवारक भावात्मक सूत्रा रामगञ्जसँ भङ्ग भए गेलैक। जेना रुद्रनाथ चौधरी लिखल अछि जे राजा साहबक देहावसानक बाद कतेको मैथिल परिवार आश्रय विहीन भए गाम वा अन्यत्र चल गेलाह, ओहिमे काशीनाथ झा वा कांचीनाथ झा ‘किरणे’ टा नहि छलाह, कोइलख ग्रामवासी पण्डित गोवर्द्धन झा, प्रसिद्ध गोनू बाबू सेहो छलाह। गोनू बाबू पुत्र श्री सुधीर कुमार झा, आइ.पी.एस. (सेवानिवृत्त) जखन 2006 ई. मे अपन पिताक आश्रय स्थलक अन्वेषणमे रामगञ्ज बंग्लादेश अपन पुत्रक संग पहुँचलाह तँ ओतय मन्दिर देखल। हुनक कलमबाग देखल। खेत-पथार देखल, जाहि पर हुनक मैनेजरक सन्तानक गौर-कानूनी अधिकार छैक। आ बिना केबार-खिड़कीक ठाढ़ लूटाएल एवं खण्डहर बनल राजा साहबक महल देखल। राजा साहबक लुटाएल एवं खण्डहर भेल महल प्रत्येक अनुरागीके ँ मैथिली भाषा साहित्यक विकास-गाथा ठोहि पारि कहैत रहैत अछि। राजा साहबक देहवसान पर शोक व्यक्त करैत मिथिला मिहिर लिखैत अछि - ‘आँखें भर आती है, कलेजा फटा जाता है, लेखनी थर्रा रही है। न रोये बिना कलेजा हल्का नहीं होता, इसलिये मेरा लिखना रोना समझिये। काल! तूँ सचमुच काल ही नहीं, क्रूर और निष्ठुर भी हो। अभी पण्डित राधाकृष्ण झा की मृत्यु शोक जरा भी मलिन होने नहीं पाया था कि हमारे समाज गगन के ज्वलन्त नक्षत्रा राजा टंकनाथ चौधरी बी.ए. को उठा ले गया।’ किन्तु जाधरि मैथिली भाषा साहित्य रहत एवं विश्वविद्यालयमे मैथिलीक प्रवेशक सन्दर्भ जखन-जखन आओत, राजा टंकनाथ चौधरीक नाम पहिल श्रेणीक मातृभाषा अनुरागीक रूपमे आदरक संग स्मरण कएल जाइत रहत। सगर राति दीप जरय मिथिलाक ग्रामांचल मे बहुत दिनक बाद मिथिलाक ग्रामांचल मे सगर राति दीप जरयक आयोजन भेल अछि। ओना एहिसँ पूर्व हटनी (19.05.2001) आ ओहूसँ पहिने घोघरडीआ ( 22.10.1994) आ’ डयैाढ ़(29.04.1990)मे आयोजित भेल छल। शहरे शहरे बौआए सगर राति गाम दिस एक बेर आएल अछि। एहि लेलडा. अषोक कुमार झा ‘अविचल’धन्यवादक पात्र तँ छथिहे। हुनक गौंआँ लोकनि सेहो ओहिना धन्यवादक पात्र छथि। मुजफ्फरपुरसँ रहुआ-संग्राम धरिक सगर रातिक यात्रामे कतेको बेर निराशाजनक स्थिति आएल। कतेको गोटय एहि रतिजग्गापिकनीकके बन्द करबाक परामर्श देल, मुदा काठमाण्डूसँ कोलकाता, विराटनगरसँ वनारस जनकपुरसँ राँची, देवघरसँ पूर्णियाँ, सुपौलसँ जमशेदपुर धरि सगर रातिक दीप जरैत रहल। नव नव कथाकार अपन नवनव कथाक संग अपनाकेँ जोडै़त गेलाह। विभिन्न स्थानक मातृभाषा अनुरागीक स्नेह आ सहयोग एकरा भेटैत गेलैक। सगर रातिक दीप अवाधित रूपे जरैत रखबा लेल ओ ओलोकनि टेमी बातीक ओरिआओन सुरुचिपूर्वक करैत रहलाह। जे सबएकरा अजगू त बुझैत छलाह, सहटि लग आबि अपने आॅंखिए देखल, विश्वास भेलनि। सगर राति दीप जरय कोन पृष्ठभूमिमे आ प्रयोजनवश शुरू भेल छल, आयोजन हेतु कोन कोन शर्त आवश्यक छलैक, तकरा स्पष्ट करबाक हेतु हम प्रथम तीन संयोजक द्वारा प्रेषित आमंत्रण पत्रक सारांश प्रस्तुत करब।सगर राति दीप जरयक अवधारणाक जन्म किरण जयन्तीक अवसर पर 01 दिसम्बर,1989के ँ लोहनामे साहित्यकार लोकनिक बीच भेल। मुदा साकार भेल प्रभास कुमार चैधरीक माध्यमसँ। ओहि अवधारणा केँ साकारकरबाक उद्देश्यसँ प्रभास कुमार चैधरी साहित्यकार लोकनिकेँ आमन्त्रित करैत छओ जनवरी 1990क पत्र द्वारा अनुरोध कएने छलाह-आदरणीय, अपने केँ विदित होएत जे किरण जयन्तीक अवसरपर लोहनामे एकत्रित साहित्यकार लोकनि निर्णय लेलनि जे पंजाबी साहित्यकार लोकनि द्वारा आयोजित ‘दीवा जले सारी रात‘ जकाँ भरि राति कथा पाठक आयोजन घूमि-घूमि कए विभिन्न स्थान पर साहित्यकार लोकनिकआवास पर होअय। पहिल आयोजन 24 दिसम्वर,1989 के ँ कटिहारमेअशोकक डेरा पर राखल गेल छल जेस्थगित भए गेल एक दुखद घटनाक कारणेँ। आगू ओ लिखैत छथि-हमरा पत्र द्वारा ई समाचार भेटल आ एहिआयोजनक प्रारम्भ मुजफ्फरपुरमे करबाक आग्रह सेहो। हम एहि निर्णयकस्वागत करैत दिन राति कथा पाठ आ परिचर्चाक अष्टयामक आयोजन 21 जनवरी 1990, रविदिन राखल अछि। सादर आमंत्रित छी। अपनेक उपस्थितिये पर आयोजनक सफलता निर्भर अछि। अपने 21 तारीखकेँ भोरे दस बजे पहुँचि जाए हमर कार्यालय जकर पाछाँ हमर निवास सेहो अछि। ई स्थान मुजफ्फरपुरक प्रसिद्ध देवी स्थानक सामने अछि। कोनो तरहकअसुविधा नहि होएत। 21 तारीखके ँ दिनुका भोजनोपरान्त कार्यक्रम शुरु होएत, जे प्रातधरि चलत। कथापाठ (नव लिखल कथा ) ओ ओहिपर विशेष चर्चा होएत।अपन अएबाक सूचना पत्र द्वारा पहिनहि दए दी तँ विशेष सुविधा रहत। अगिला कार्यक्रमक स्थान आ तिथिक निर्णय एहीठाम कार्यक्रममे लेल जाएत। डेओढ, कटिहार, दरभंगा,पटना आ जनकपुरमे कार्यक्रम करबाक विचार अछि। अहाँक आगमुनक प्रतीक्षा मे‘‘- प्रभास कमार चैधरी। एही प्रकारेँ सगर रातिक अवधारणाकेँ प्रभास कुमार चैधरी साकार कएल। हुनक पत्नी ज्योत्सना चैधरी करतेबताक आंगनक गृहपत्नी जकाआगत साहित्यकारक स्वागत करैत भरि राति टेमी उसकबैत रहलीह। पति द्वारा आयोजित साहित्यिक कार्यक्रममे पत्नी द्वारा भरि राति टेमी उसकाएब आ अतिथिक स्वागतमे तत्पर रहबाक दोसर आ सेहो दू बेर उदाहरण प्रस्तुत कएलनि अछि काठमाण्डूक दूनू आयोजनमे श्रीमती रूपा धीरू। पहिल सगर रातिक आयोजनमे रमेश (थाक), शिवशंकर श्रीनिवास (बसात मे बहैत लोक),विभूति आनन्द (अन्यपुरुष), अशोक (पिशाच),सियाराम झा ‘सरस‘ (ओहिसाँझक नाम), प्रभास कुमार चैधरी (खूनी) रवीन्द्र चैधरी, आदि कथा पढल। डा.नन्दकिशोर हिन्दी कथाक पाठ कएने छलाह। अध्यक्षता कएल रमानन्द रेणु। कथाकार लोकनिक अतिरिक्त कथाचर्चामे भाग लेलनि जीवकान्त, भीमनाथ झा, मोहन भारद्वाज, डा. रमानन्द झा ‘रमण‘। पठित कथापर चर्चाक उपरान्त डा.रमण अपन कथा विषयक आलेख शैलेन्द्र आनन्दक कथा यात्राक पाठ कएल।साहित्यकारकस्वाभिमानक रक्षाक हेतु चर्चाक क्रममे निर्णय भेल जेसमाद पर सगर रातिक आयोजनक भार लेबाक अनुरोध स्वीकार नहि कएलजाएत। आमंत्रित कएनिहार लेल स्वयं उपस्थित भए सहभागी बनब आवश्यककए देल गेल।एकर निर्वाह अद्यावधि भए रहल अछि। एक शब्दमे कहि सकैत छी, इएह शर्त सगर रातिक प्राण थिकैक। जीवकान्तक अनुरोध पर दोसर सगर राति डेओढमे तीन मासक बाद करबाक निर्णय भेल। एहिठाम हम दोसर (डेओढ) आ तेसर (दरभंगा)क संयोजक द्वाराप्रेषित पत्रक अंश प्रस्तुत करब जाहिसँ सगर रातिक लक्ष्य तँ स्पष्ट होएबे करत पत्र लिखबाक क्रम कोन स्थितिमे सम्प्रति अछि, सेहो बुझा जाएत।डेओढ आयोजनक संयोजक जीवकान्त लिखैत छथि-मैथिली भाषाककथाकार लोकनि एकठाम बैसथि अपन नव रचना पढथि आ ओहि पर टीकाविश्लेषण करथि कथाक गति देबामे सामूहिक प्रयन्त करथि। एहि उद्देश्यसँकथा रैलीक आयोजन डेओढमे कएल जाइछ-सृजनात्मक उपलब्धि लेल एकरा स्मरणीय बनेबा मे अपन योगदान करी।दोसर आयोजनमे प्रो.रमाकान्त मिश्र, कीर्तिनारायण मिश्र, डातारानन्द वियोगी, नवीन चैधरी आदि संग भए गेलाह। डा.भीमनाथ झा आ प्रदीप मैथिलीपुत्र दूनू गोटे संयुक्तरूपेँ आयोजनक भार लेल जे श्री विजयकान्त ठाकुरक सौजन्यसँ चिनगी मंच द्वारा दरभंगामे सम्पन्न भए सकल। तेसर सगर रातिक संयोजक डा.भीमनाथ झा लिखैत छथि-पत्र पत्रिकाक एहि संक्रान्ति कालमे साहित्यमे संवादहीनताक स्थिति आबि गेलअछि, कथाक स्थिति तँ आर दयनीय। स्पष्टतः कथा लेखनमे गतिरोध देखलजा रहल अछि। एकरे दूर करबाक इच्छुक किछु युवा साहित्यकर्मी कथा संवाद लेल गोष्ठीक आयोजनक निर्णय लेलनि। दरभंगाक आयेजनमे एकटा नव अध्याय लिखाएल। से थिक एहि अवसर पर पोथीक लोकार्पण। सगर रातिक अवसर पर लोकार्पित पोथीक नामावली विवरण मे देल गेल अछि। तथापि ई उल्लेखनीय अछि जे एहिअवसर पर लोकार्पित होअए बला पहिल पोथी थिक पण्डित श्री गोविन्द झाक कथा संग्रह सामाक पौतीं। प्रभास कुमार चैधरी, जीवकान्त आ भीमनाथ झाक पत्रसँ सगर रातिक आयोजनक, लक्ष्य आ कोन परिस्थितिमे सगर राति दीप जरय सनकार्यक्रम शुरू भेल छल, स्पष्ट अछि। सगर रातिक नियमक अनुसारदरभंगाक आयोजनमे चारिम सगर राति तीन मासक बाद जनकपुरमे डा धीरेन्द्रक अनुरोध पर आयोजित करबाक निर्णय भेल। मुदा कोनो कारणवशआयोजनमे विलम्ब होइत देखि पण्डित दमनकान्त झाक पटना आवास पर पण्डित श्रीगोविन्द झाक संयोजकत्वमे चारिम आयोजन भेल। प्रसिद्ध कथाकार उपेन्द्रनाथ झा ‘व्यास‘ अध्यक्षता कएल आ कथा पाठ कएल। निशा भाग रातिमे व्यासजी अध्यक्षताक भार राजमोहन झाकेँ सौपि देने छलाह। प्रदीप बिहारी पहिल बेर एहीठाम सम्मिलित भए अगिला आयोजन बेगूसरायमे करबाक भार लए लेलनि । दमन बाबू आ व्यासजी नहि छथि। दूनू गोटे मोन पड़ि रहल छथि। प्रभास कुमार चैधरीक अन्तिम सहभागिता बेगूसरायमे सम्पन्न उनतीसम सगर रातिमे छल। डा. धीरेन्द्र अन्तिम बेर बिट्ठो मे कथा पढ़ने छलाह। वनारसमे सगर रातिक उदघाटन कएने छलाह हिन्दीक प्रख्यात साहित्यकार ठाकुर प्रसाद सिंह। एहिठाम हमर आँखिक समक्ष हुनका लोकनिक स्मृति साकार भए गेल अछि। ओना मजफ्फरपुरसँ प्रभास कुमार चैधरीक संशेजकत्वमे सगर रातिक यात्रा आरम्भ भेल छल । मुदा केन्द्र रहल पटने। पटनामे सात खेप सगर राति अयोजित भेल अछि। सगर रातिक यात्राक विस्तृत वर्णन आ खण्ड खण्डमे विश्लेषण प्रस्तुत अछि। ओकर संक्षिप्त उल्लेख प्रस्तुत अछि। कटिहार सगर रातिमे नवानीमे आयोजनक निर्णय भेल छल।संयोजक मोहन भारद्वाज प्रो. सुरेश्वर झाकेँकथाकार रूपमे प्रस्तुत कएल। ओतय श्यामानन्दचैधरी आ झंझारपुरक तात्कालीन डी.एस.पी. सरदार मनमोहन सिंह सम्मिलित भेलाह। ओ बरोबरि सम्मिलित होइत रहलाह। पंजाबक कलमकेँ मिथिलाक फूलबाड़ीमे चतरल देखि प्रमुदित होइत छलाह। सुरेश्वर झा डाराम बाबूक सौजन्यसँ सकरीमे आयोजन कएल। सकरीमे ए.सी.दीपक अएलाह। नेहरामे आयोजन भेल। नेहरामे मन्त्रेश्वर झा सम्मिलित भेलाह। विराटनगरसँ जीतेन्द्र जीत अएलाह। नेहरामे सगर रातिक अवसरपर पठित कथाक एक प्रतिनिधि संग्रह प्रकाशित करबाक निर्णय भेल। डा.तारानन्द वियोगी एवं रमेश सहर्ष दायित्व ग्रहण कएल। कथा संग्रह श्वेत पत्र प्रकाशित भेल। श्वेत पत्रमे पैटघाट धरि पठित कथासँ बीछल कथा संगृहीत अछि। सगर राति दीप जरय कार्यक्रमकेँजीतेन्द्र जीत नेहरासँ विराटनगर,नेपाल पहुंचाओल। विराटनगरसँ बनारस आ बनारससँ पटना। पटनामे बुद्धिनाथ झा, अर्धनारीश्वर, रा.ना.सुधाकर केदार कानन, अरविन्द ठाकुर संग भेलाह तॅं सगर राति सुपौल पहुंचि गेल। सुपौलसँ बोकारो,ओतयसँ पैटघाट आ पैटघाटसँ रमेश रंजन जनकपुरधाम लए गेलाह।जनकपुरधामसँ इसहपुर। इसहपुरसँ श्यामानन्द चैधरी झंझारपुर आनल। ओतयसँ घोघरडीहा, बहेरा सुपौल आ फेर सुपौल सँ धीरेन्द्र प्रेमर्षि काठमाण्डू लए गेलाह।काठमाण्डूसँ रामनारायण देव राजविराज आ ओतयसँ कोलकातामे प्रभास कुमार चैधरी सगर रातिक रजत जयन्ती आयोजित कएल। कहबाक तात्पर्य जे नव-नव लोकक अबैत रहलासँ सगर रातिक आयोजन बढैत गेल । किन्तु जतय कतहु अग्रिम प्रस्तावक संकट होइत छलैक प्रभास जी आ फेर कमलेश जी ठाढ़ छलाह। किछु आयोजकक अनुरोध बरोबरि अशोकजीक पाकेटमे पेंडिंग रहैत छलनि। बेगूसरायसँ श्याम दरिहरे संग भेलाह अछि।ओहो कौखन आ कतहु आयोजन लेल तत्पर छथि।जेना जेना किछु लोक संग होइत गेलाह अछि, ओहिना किछु गोटेअपनाकेँ असम्वद्ध सेहो करैत गेलाह अछि। एकर मुख्यतः तीनि टा कारण अछि- 1.अस्वास्थ्य, 2.पठित कथाक प्रतिक्रिया पर खौझा कए असंगत प्रहार, आ‘ 3.प्रतिक्रिया सूनि हतोत्साहित होएब, एवं 4.कार्यालयीन व्यस्तता। एहि बीच नियमित एवं सक्रिय रूपसँ सहभागी बनैत कतेको साहित्यकार अस्वास्थ्य अथवा वार्धक्यक कारणेँ आब सम्मिमलित नहि भए पाबि रहल छथि। जाहि मे प्रमुख छथि पण्डित श्री गोविन्द झा, रमानन्द रेणु, सोमदेव, जीवकान्त, मोहन भारद्वाज आदि। पठित कथा पर अपन स्पष्ट मंतव्यसँ चर्चाकेँ जीवन्त बनौनिहार प्रो. रमाकान्त मिश्र कथाकार शिवशंकर श्रीनिवासक प्रतिक्रियासँ आहत भेला पर सकरीक बाद अपनाकेँ पूर्णतःसमेटि लेलनि। विविधा पर साहित्य अकादमीक पुरस्कारक विरोधमे केदार काननक नेतृत्वमे कलमल सुपौलक साहित्यकारक प्रतिक्रियाक कारणेँ डा.भीमनाथ झा जाएब छोड़ि देलनि। जे प्रभास जीक मनौअलि पर पण्डित गोविन्द झाक गाम इसहपुर जएबाक लेल तैआर भेल छलाह। तकर बाद कमे ठाम गेलाह अछि। श्वेतपत्र मे अपन कपचल कथासँ आहत जीतेन्द्र जीत अपन बाट काटि लेलनि। किछु गोटे एहि आशाक संग संवद्ध भेल छलाह जे लोक प्रशंसाक महल ठाढ कए देत, तकर पूर्ति नहि भेला पर उत्साह कमि गेलनि। किछु गोटेक मास्टरी नव आगन्तुक लेल आतंककारी एवं अनुत्पादक भए गेल अछि। सगर रातिक प्राण थिक अप्रकाशित आ अपठित कथाक पाठ। ओहि पर श्रोता अपन प्रतिक्रिया व्यक्त करैत छथि। ई प्रतिक्रिया तात्कालिक होइछतेँ सम्भव रहैत छैक जे पुनः सुनला वा पढला पर भिन्न प्रतिक्रिया हो। एहि सक्रियताक तीन प्रकारक सकारात्मक प्रभाव अछि- 1.रचनात्मक सक्रियतामे वृद्धि, 2.कथाक शिल्पमे सुधारक अवसर आ‘ 3.व्यक्तित्वमे सहनशीलताक गुण बढेबाक अवसर। पहिल सगर रातिमे प्रायः आठ टा कथाक पाठ भेल छल। कथाकसंख्या क्रमशः बढैत गेल। सबसँ बेसी कथाकारक सहभगिता महिषीमे भेल छल। एहि बीच जतेक कथा संग्रह छपल अछि, अधिकांश कथा सगर रातिक अवसर पर पठित आ चर्चित अछि। वयोवृद्ध साहित्यकार श्यामानन्द ठाकुर बहेरामे संग भेलाह।ओहिठामसँ संग छथि। हुनक सक्रियताक अनुमान एहीसँकए सकैत छी जे ओ प्रत्येक आयोजन लेल दू टा कथा लिखैत छथि। एमहर आबि पठित कथाक चर्चाक स्वरूप बदलि गेल अछि। पहिने पठित कथाधरि अपन प्रतिक्रिया सीमित राखल जाइत छल। मुदा आब व्यक्त विचारकेँ कटबा पर विशेष ध्यान रहैत अछि। एहिसँ पक्ष विपक्षक स्थिति बनि जाइछ। कतेकोठाम अप्रीतिकर स्थिति उत्पन्न भए गेल अछि । चर्चाबहकय नहि एहि लेल प्रभासजी पूर्ण सतर्क रहैत छलाह। हुनक अभाव खूब खटकैत रहैत अछि।कवि सम्मेलन मनोरंजनक हेतु आयोजित होअय लागल अछि।रचनात्मक स्पर्धा अथवा सक्रियताक महत्व गाण छक। तेँ कवि लोकनि गओले गीत गबैत छथि। मुदा सगर रातिक अवसर पर अप्रकाशित एवंअपठित कथा पढबाक वाध्यताक कारणेँ रचनात्मक सक्रियता बढल अछि। एक बेर व्यासजी गोविन्द बाबूकेँ परामर्श दैत कहने छलथिन्ह जे धूमि घूमि भरि राति जागब अहाँक स्वास्थ्य लेल ठीक नहि अछि। गोविन्द बाबूक उत्तर छल जे हमरा एहिसँ उर्जा प्राप्त होइत अछि। आंकडा़ कहैत अछि ओ सबसँ बेसी भरि राति ओएह बैसलाह अछि तथा सबसँ बेसी हुनके व्यक्तिगतपोथीक लोकार्पण एहि अवधिमे भेल अछि। ई थिक सगर रातिक रचनात्मक प्रभाव। रचनाकारकेँ उर्जस्वित रखबाक महान अवसर। कवि सम्मेलनमे आयोजककेँ विदाइक व्यवस्था करय पडै़त छनि । सगर राति एहि व्याधिसँ मुक्त अछि। सहभागी सत्यनारायणक पूजाक हकारजकाँ अबैत छथि आ भोर होइते घूमि जाइत छथि। एहिमे व्यावसायिकता नहि अछि, ई मातृभाषा प्रेमक सन्देश दैत अछि।सगर रातिक आयोजन विभिन्न स्थान पर भेलासँ स्थानीय विद्वत समाज आकर्षित होइत छथि। एकर प्रभाव ओहि स्थानक मैथिलीक सक्रियता पर पड़ैत अनुभव कएल गेल अछि। सगर राति दीप जरय समानधर्माकेँ भरि राति एकठाम रहबाक अवसर दैत अछि। विचारक आदन प्रदानक केन्द्र स्वतः मैथिली भाषा आ साहित्य भए जाइत अछि। एहिसँ परिचय आ अनुभवक क्षेत्रक विस्तार होइछ। मैथिलीक रचनाकारमे भावात्मक संवद्धता बढैत अछि।सगर राति दीप जरयक निरन्तर आयोजनसँ मैथिली कथा लेखनक क्षेत्रमे शान्तिपूर्ण क्रान्ति आबि गेल अछि। आन भाषाभाषी आ सात्यिकारकबीच मैथिलीक कथाकारक प्रतिष्ठा बढ़ल अछि। विशेषतः एहि हेतु जे मैथिलीक कथाकार दूर-दूरसँ अपन पाइ खर्च कए पहुचैत छथि। कथा पढैत आ सुनैत छथि। अपन कथा पर लोकक प्रतिक्रिया धैर्यपूर्वक सुनैत छथि। आ फेर अग्रिम आयोजनमे सम्मिलित होएबाक संकल्पक संग घूमि जाइत छथि। जे सगर राति कथाकार लेल कल्पित भेल छल,समाजक सुधी समाजक अन्तःकरण मे प्रवेश कए मैथिली भाषा साहित्यक पक्षमे अनुकूल वातावरणबनेबामे सार्थक भूमिकाक निर्वाह कए रहल अछि। जहिआ सगर राति प्रारम्भ भेल छल आ एखनुक जे स्थिति अछि ओहि मे गुणात्मक आ परिमाणात्मक दूनू प्रकारक परिवर्तन स्पष्ट अछि। विकासक ई दिशा आ गति निश्चिते शुभलक्षण थिक। एहि शुभ लक्षणक उदाहरण तँ इएह थिक जे दरभंगाक पहिल आयोजनमे पहिले पहिल दू टा पोथीक लोकार्पण भेल छल आ स्वर्ण जयन्तीक अवसर पर 36 टा पोथी लोकार्पित भेल। विद्वानलोकनि कहि सकैत छथि कोन भाषाक मंच पर एकबेर 36 टा पोथीक लोकार्पण भेल अछि।दरभंगामे एकटा अमेरिकन नागरिक मैथिलीमे कथाक पाठ कएने छलाह। सगर राति दीप जरयक दृष्टिसँ बोकरो उर्वर छल, एम्हर आबि राँची, जमदेशपुर देवघर पूर्णियां आदि स्थान मैथिली लेल जगरना कएलक अछि,इहो शुभ लक्षण थिक।मुदा, सगर रातिक लोकप्रियता आ बिना वर.विदाइक साहित्यकार एवं साहित्यानुरागीक उपस्थितिक उपयोग कतहु कतहु कथा पाठ एवं ओहि पर चर्चासँ भिन्न प्रयोजन सिद्धि लेल सेहो भए गेल अछि। जे सगर रातिक मूल अवधारणाक अनुकूल नहि अछि। ओहिसँ बचबाक चाही। सहरसामे दोसर खेप सगर रातिक आयेजन 21 जुलाई, 2007 केँ भेल छल। सगर राति आयोजनक एक प्रमुख आकर्षण अछि भेटघाँट। ओहिसँ बाहरक साहित्यकार वंचित रहलाह। उपस्थितिक प्रसंग सूनि जीवकान्त जी 22 जुलाई, 2007क अपन पोस्ट कार्डमे लिखलनि अछि- ‘सहरसा कथा गोष्ठीक खबरि भेल। कथा गोष्ठी भूतकालक वस्तु भेल। लेखन काज लेखक सभ छोड़ने जाइत छथि। सेमिनार, तकर प्रचलनबढ़ल अछि। टी.ए./डी.ए./भेटघाँट ई सभ भए गेँबुू जे लेखकीय ल तझअस्मिताक अहंकार पुष्ट भेल आ‘ एक दोसराकेँ बल देल। सरकारी मान्यताक बाद भाषामे अनेक राजरोग उत्पन्न होइत छैक।मैथिली निरपवाद रूपे पहिनेसँ बेसी रोगाहि भेल छथि। जिबैत रहओ।‘हमरा विश्वास अछि सगर रातिक नियमित आयोजन मैथिलीके राजरोगसँ मुक्त रखबामे सफल होएत। साहित्य अकादेमी सँ वर्ष 2007 लेल पुरस्कृत प्रहरी प्रदीप बिहारीक कथा संग्रह सरोकारक प्रायः समस्त कथा सगर राति दीप जरयक अवसर पर लोक सुनने अछि। आ‘ ओहि पर अपन-अपन प्रतिक्रिया व्यक्त कएने अछि। सगर रातिक ई पहिल उपलब्धि थिकैक। एहि उपलब्धि पर मैथिली एहि शान्ति क्रान्तिक एक प्रतिभागीक रूपमे गर्व अनुभव करैत छी आ‘कामना करैत छी इतिहास दोहराइत रहय। मिथिलांचलक दलित समाजमे लोकगाथा :मैथिली लोकगाथामे दीनाभद्री (01 एवं 02 मार्च, 2009, भागलपुर- राष्ट्रीय संगोष्ठी-मिथिलांचलक दलित समाजमे लोकगाथा) हमर प्रतिपाद्य अछि-मैथिली लोकगाथामे दीनाभद्री । राष्ट्रीय संगोष्ठीक विषयक मूल शीर्षकमे दू टा महत्त्वपूर्ण पद,मिथिलाक स्थान पर मिथिलांचल तथा समाजक स्थान पर दलित समाज अछि। मिथिला अथवा समाजसँ सम्पूर्णताक जे बोध होइत रहल अछि, से एहिसँ नहि होइत छैक। किन्तु ई दूनू शब्द सम्प्रति नव अथर्वत्ता प्राप्त कए लेलक अछि। ई अर्थवत्ता थिक निर्वाचनीय लाभक हेतु मिथिलांचल एवं दलित समाजक नामक उदघोषपूर्वक प्रयोगक चालि । आब तँ दलितमे महा शब्द जोड़ि महादलितक उत्थानक गप्प किछु राजनीतिक दल करय लागल अछि। वस्तुतः इहो फुटाएबे थिक। आ’’ प्रायः एही हेतु दलितक पक्षधर नेतालोकनि महादलितक विरोध कए रहल छथि। किन्तु जे हो, एहिना जँ क्रम चलैत रहल तँ मिथिलांचलमे महादलित समाजक लोक गाथाक पर संगोष्ठी सेहो आवश्यक भए जाएत। ई लोकतन्त्रक युग थिक। लोकतन्त्रक सुदृढ़ताक हेतु जाहि कोनो तत्त्वक सभसँ अधिक महत्त्व अछि, से थिक लोकशक्तिक गरिमामय प्रतिष्ठापन। लोकशक्तिक गरिमाक प्रतिष्ठापन लेल समाजक प्रत्येक सदस्यके ँअपन गौरवमयइतिहासक परिचय कराएब आवश्यक अछि। संगठित लोकशक्तिक उदय आ‘ विस्तारक ओहि परिचयसँ सम्भावना बढ़ि जाइत छैक। प्रतिफल होएत विकासक बाटक प्रशस्त होएब। विकाससँ सुख समृद्धि अबैत अछि। लोकक क्लान्त मुखमण्डल पर सुख समृद्धिक फूही निरन्तर होइत रहैत छैक। सुख समृद्धिक निरन्तर फूहीसँ सन्तोषक हरितिमाक स्थायी विस्तार भए जाइत अछि।जागरण, संगठन, सामाजिक दायित्वबोध आ’ समन्वित राष्ट्रीय दृष्टिक विकासक अनेक बाट अछि। ओहि बाटमे प्रमुख अछि, स्वर्णिम अतीतक पराक्रमी व्यक्तिक अवदानक परिचय द्वारा लोकके ँउत्प्रेरित करब। मिथिलाक सांस्कृतिक इतिहास पराक्रमी महापुरुषक गौरव गाथासँ परिपूर्ण अछि। गाथा पुरुषक विषयमे जनबाक अनेक स्रोत अछि। ओ स्रोत सभ लिखित आ’ अलिखित दूनू अछि। जे लिखित अछि पढ़ल-लिखल लोक तकरा पढ़ि पढ़ि सामाजिक बोधसँ अभिभूत होइत रहलाह अछि आ’ जे लिखल नहि जा सकल, से लोक कंठहिक माध्यमे आइ धरि सुरक्षित रहि प्रेरणाक अजस्र स्रोत प्रवाहित करैत आबि रहल अछि। एहिठाम चर्चाक विषय समाजक ओहने पराक्रमी लोकक प्रेरणादायी व्यक्तित्व अछि जनिकर गौरव गाथा अलिखित रहल। एम्हर आबि किछु तँ लिपिबद्ध भेल वा भए रहल अछि। किछु काज असम्बद्ध वर्गक लोक द्वारा भेल अछि तथा शिक्षाक विकासक उपरान्त सम्बद्ध वर्गक लोकहुक द्वारा प्रारम्भ कएल गेल अछि। ओहीमे सँ एक अछि दीनाभद्री लोकगाथा। जकर पराक्रमी नायक छथि भ्रातृद्वय दीना आ’ भद्री।डा. वीरेन्द्रनाथ झा (मैथिली लोक महाकाव्यक आलोचनात्मक अध्ययन,शोधप्रबन्ध,1987, ल.ना.मिथिला विश्वविद्यालय ,अप्रकाशित) मैथिलीक जाहि नओ गोट लोकमहाकाव्यक उल्लेख कएल अछि, ओहिमे अछि-1.दीनाभद्री,2.दुलरादयाल,3.नइका बनिजारा,4.विहुला,5.रूइया रणपाल, 6.लवहरि कुशहरि,7.लोरिक,8.विजयमल्ल एवं 9.सलहेस। किन्तु एहिमे विजयमल्ल मैथिलीक लोकगाथा नहि थिक, ओ भोजपुरीक लोकगाथा थिक। एकर प्रकाशन जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन (जॉर्नल आफ दि एसियाटिक सोसाइटी आफ बंेगाल, 1889-ै1889&Songs of Bijai Mal) कएने छथि। एकरा स्पष्ट करैत डा. आशा गुप्त (जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन और बिहारी भाषा साहित्य, 1970)े लिखने छथि जे भौगोलिक दृष्टिसँ अवश्य विजै मलक कथा पटना-गयाक सीमापर स्थित दायापुर पारवती नामक स्थानसँ सम्पृक्त एवं तेली जातिमे बहुप्रचलित कहल गेल अछि।उपर्युक्त लोकगाथा सभमे मिथिलाक विभिन्न जातिक उत्पीड़न एवं ओहि उत्पीड़नसँ त्राणकर्ताक पराक्रमक जयघोष अछि। ओ नायक सभ पराक्रमी जातीय नेताक रूपमे मान्यता पाबि स्मरणीय एवं पूज्य भए गेल छथि। ई लोकगाथा सभ कहिआसँ अस्तित्वमे अछि, एकर रचना के कएलनि, हुनक काल की थिक, से सभटा तँ अज्ञात एवं अस्पष्ट अछि, परंच एहि लोक गाथा सभसँ ई तथ्य अवश्य फरिछाइत अछि जे समाजमे विषमता छलैक, शोषण आ’ उत्पीड़नक उजाहि निरन्तर उठैत रहैत छल। वैयक्तिक भावना एवं मानवीय मूल्यक महत्त्व छलैक। बाहुबलक समक्ष आन सभ बल महत्त्वहीन भए जाइत छल। आ’ ओही बीचसँ एक जातीय बाहुबलीक जन्म होइत छलैक जे अपन पराक्रमक बल पर जातीय अस्मिताक अनादरकार्ता एवं शोषक वर्गक विरोधमे तनि कए ठाढ़ भए जाइत छलाह।ओ सभ अपन-अपन जातिक प्रतिष्ठा आ’ जातीय व्यवस्थाके ँ अक्षुण्ण रखबाक हेतु आजीवन सक्रिय एवं सतर्क रहैत छलाह एवं जातिक प्रतिष्ठा, उन्नति एवं अवनति आदिक सभ छारभार ओही नेता सभ पर निर्भर छलैक। एहि प्रकारक जातीय भावनाक विकास एकपक्षीय नहि छल। जातीय नेता जेना अपन जातिक हितचिन्ता सदिखन करैत रहैत छलाह, ओहिना हुनक जातिक समस्त सदस्य ओहि नेताके ँअपन उद्धारक एवं संरक्षक मानैत आदर एवं सम्मानक पद दैत रहल।हुनक शौर्य एवं पराक्रमके ँ गाबि-गाबि प्रेरणा ग्रहण करैत रहल। जे ँ कि एकर संक्रमण मौखिक होइत छलैक, जातीय नेताक गौरवगाथा, लोकगाथाक प्रतिष्ठा पाबि गेल । जेना कि लोकगाथाक विषयवस्तुसँ स्पष्ट अछि, दीनाभद्रीमे मुसहर, दुलरा दयालमे गो ँढ़ि, नइका बनिजारामे वैश्य, लोरिकमे अहीर, सलहेसमे दुसाध, बिहुलामे बनिआँ जातिक गौरव गाथा अछि। आनहु लोकगाथामे जातीय नायकेक गाथा अछि। सभ लोकगाथाक विषयवस्तु जाति आधारित अछि। मुदा लवहरि कुशहरिके ँ कोनो जातिक जातीय लोकगाथा मानब उपयुक्त नहि होएत। तखन ई अवश्य जे मलाह जातिक कंठमे सुरक्षित लवहरि कुशहरिक रचयिता मलाह जातिक प्रतिभा सम्पन्न कोना व्यक्ति अवश्य छल होएताह। उपर जाहि लोक गाथाक नामोल्लेख कएल अछि एवं जाहि-जाहि जातिक नेताक पराक्रमक गाथा ओ सभ थिक, से जाति सभ आजुक लोकतन्त्रक शासन व्यवस्थामे दलित समाजक आख्या पाबि गेल छथि। दोसर जे बिन्दु एहि लोक गाथा सभक सन्दर्भमे महत्त्वपूर्ण अछि, से थिक दैविक शक्तिक स्थान पर लोकशक्तिक प्रतिष्ठापन। एहि लोकगाथाक नायकक प्रेम पराक्रम, एवं शौर्यक उदघोष अलौकिकताक संग भेल अछि। किछुमे देवत्वक प्रतिष्ठा सेहो भए गेल छैक। दुलरा दयालक मानसिंहक राजगद्दी प्राप्त करबाक कथा, बिहुलाक द्वारा अपन पतिके ँ जिअएबाक कथा, लोरिक द्वारा हरबा बरबाक पराजयक कथा तथा सलहेस एवं दौना मालिनक प्रेम कथामे अलौकिकताक अंश पर्याप्त अछि। देवत्व प्राप्त करबाक दृष्टिसँ सलहेस, दीनाभद्री आ’बिहुलाक गाथा विश्ेाष उल्लेखनीय अछि। दुसाध द्वारा सलहेस, मुसहर द्वारा दीनाभद्री एवं बनियाँ द्वारा बिहुला लोकगाथाक नायकके ँ देवत्व प्राप्त छनि। ध्यान देबाक थिक जे बिहुलाके ँ छोड़ि समस्त लोकगाथा नायक प्रधान अछि। केवल बिहुला लोकगाथा नायिका प्रधान छैक। एहि तीनू लोकगाथामे सलहेस एवं दीनाभद्रीक अपेक्षा बिहुलाक क्षेत्र सीमित अछि। मुदा व्यापक क्षेत्र एवं उपलब्ध लोकगाथामे विशाल आकारक होइतो लोरिकके ँ अहीर जातिमे देवत्व प्राप्त नहि छनि। मैथिलीक एहि लोकगाथा सभमे कतेको प्रकारक साम्य भेटैत अछि। ओ साम्य सभ थिक घटना साम्य, कथानक साम्य, नाम साम्य आ’ लोक नायकक दृष्टि एवं पराक्रमकमे साम्य। कतेको लोकगाथामे सलहेस एवं बाघेसरी छथि। दूनूमे पहिने विरोध आ’ पछाति मेलसँ आततायीक विनाश होइत अछि। एकरा शैव( शैलेश) एवं शाक्त( बाघेश्वरी@सिंहवाहिनी)क मतवादीक विवाद एवं वर्चस्वक सन्दर्भमे सेहो देखल जा सकैछ। साम्यक किछु उदाहरण प्रस्तुत अछि। दीनाभद्री जोरावर सिंहके ँ परास्त कए चैन होइत अछि तँ लोरिक हरबा बरबाके ँ पराजित कए। हिरया तमोलिन आ’ जिरिया लोहारिन जहिना दीना भद्रीक परकिया नायिका थिक तहिना लोरिकमे चनैन अछि। फोटरा नामक गीदर जेना दीनाभद्रीमे अपन करामात देखबैत अछि, ओहिना नइका बनिजारामे तिलंगा बाछा। लोरिकमे जेना सनिका मनिका भागिनक मदति लेल जाइछ ओहिना सलहेसमे कारीकान्तक। अंकक समानता तँ सभ लोकगाथामे भेटत। रचनात्मक स्तर पर सुमिरन ओ बन्हन सेहो प्रायः सभ लोक गाथामे अछिए। आखिर दीनाभद्री लोकगाथामे एहन कोन बात छैक जे एक पुश्तसँ दोसर पुश्तमे अदौकालसँ संक्रमित होइत आइ धरि लोकक कंठमे सुरक्षित अछि। की ई आजुक राजनीतिक शब्दावलीमे एक दलित जातिक नायकक गाथा थिक, ते ँ ? की ई लोकगाथा हमरालोकनिक मातृभाषा मैथिलीमे अछि, ते ँ? की एकर संकलन एवं प्रकाशन जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन सन विश्वविश्रुत विद्वान कएलनि,ते ँ? हमरा जनैत दीनाभद्री सन लोकगाथाक महत्त्व एवं युग-युगसँ लोक कंठमे सुरक्षित रहि प्रेरणाक स्रोत बनल रहबाक मूल कारण थिक, एहि लोकगाथामे अनुस्यूत ओ जीवनमूल्य जे लोकके ँ अन्याय, अत्याचार, शोषण आदि सामाजिक दुर्गुण एवं विकृतिसँ संघर्ष करबाक प्रेरणा दैत अछि। एहिमे अभिव्यक्त ओ जीवनमूल्य जे लोकक स्वाभिमान एवं प्रतिष्ठा पर आघातकर्ताक आचरणक विरुद्ध ठाढ़ होएबाक शक्ति आ’ साहसक स्रोत भरैत रहैछ । एहिमे अभिव्यक्ति हो जीवनमूल्य जे व्यक्तिगत लाभहानि, एवं सुख-सुविधाक त्याग एवं सामाजिक प्रतिष्ठा, आदर सम्मान हेतु संघर्षक लेल लोकके ँ तैआर करैत अछि। वैदिक ऋषिक वचनक अनुसार ओहि जीवन मूल्यक महत्त्व छैक जे कुलक लेल शरीर, गामक लेल कुल, जनपदक लेल गाम एवं आत्माक लेल पृथ्वी त्याग करबाक प्रेरणा दैत हो। दीनाभद्री लोकगाथाक नायक दीनाराम आ’ भद्रीक चरित्र एहि लोकोपकारिताक एक सर्वोत्तम उदाहरण थिक। दीनाभद्री लोकगाथाक नायक द्वयक लोककामी आचरण एवं संघर्षक किछु उदाहरण प्रस्तुत अछि। दीनाभद्री निर्धन अछि, भैातिक सुख-सुविधा प्राप्त नहि छैक। अपन बाहुबल पर विश्वास कएनिहार दीनाभद्रीमे स्वाभिमान कूटि-कूटि कए भरल अछि। जखन गामक शक्तिसम्पन्न व्यक्ति धामी ई कहैछ जे परोपट्टाक आन-आन लोक ओकर खेतमे काज करब गछि लेलक आ’ ओहो दूनू भाइ ओकर जन भए खेतमे काज करौक तँ दीनाभद्री साहसपूर्वक एवं स्पष्टताक संग अस्वीकार करैत कहि दैत अछि- कबहु नऽ कैल खुरपी कोदारक बोनि, कहियो नऽ जानिऔ हो धामी, पँचा उधार। हरिन सूगर मारि जोगिया कैल गुजरान। ( पृ.सं.637) समाजमे शोषण व्याप्त छलैक। शोषक आ’ अत्याचारीक नजरिमे गरीबक मान मर्यादाक कोनो मोल नहि छल। प्रभुत्व सम्पन्न लोक ककरो घर आङनमे घूसि गरीबक बहु बेटीक मानमर्दन कए सकैत छल। प्रायः एहनहि सामाजिक स्थितिमे कहबी बनि गेल होएत, गरीबक बहु सबहक भौजी। दीनाभद्री धामीक आतंककारी व्यवहारपर आक्रोश प्रकट करैत कहैत अछि- कौन गरू परलौं हो धामी, बड़ भोरे छे ँकल दुआर अपन बहु बेटीपु रखलन्हि घर सुताय हमर बेटी पुतहु देखलन्हि नाँगट उघार। ( पृ.सं.636) धामी, जे समाजक प्रभुत्वशाली वर्गक प्रतिनिधित्व करैत अछि, तकर निर्भीक विरोध समाजक एक दबल कुचल वर्गक सदस्य द्वारा होएब, एक महत्त्वपूर्ण घटना थिक एवं दीनाभद्रीक चरित्रक ई विश्ेाषता नैसर्गिक एवं प्रेरणादायी गरिमा प्राप्त कए लेलक अछि। दीनाभद्री अपन यात्राक क्रममे ताहिर मियाँक हबेलीक पुछारी करैत अछि। ताहिर मियाँ केहन एकवाली आ’आतंकी छल,जे ओकर नामेसँ धीयापूता सेहो डराइत छलैक। ओसभ दीनाभद्री के ँ चेतबैत अछि- रे बटोहिया, ताहिर मियाँ गामक गुमस्ता छैक, ओकर नाम केओ ने बाट बटोही धरैत अछि। ( पृ.सं.650) ओही ताहिर मियॉँक नोकर छी गुलामी जट। गुलामी जट अपन मालिकक सह पर समाजक निर्बल लोकके ँ उत्पीड़ित करैत अछि। अपमानित करैत अछि। लोकके ँ अपमानित करबाक अभ्यासी गुलामी जट दीनाभद्रीक अपमान सेहो कए दैत अछि। मुदा तकर फल ओ तुरत्ते पाबि जाइत अछि। गुलामी जट दीनाभद्रीक पराक्रमक समक्ष ठठि नहि सकल, पराजित भए गेल। तेसर उदाहरण अछि जोराबर सिंह सन दुराचारी, समाज विरोधी एवं शोषकक प्रतिकार एवं अन्त करब। एहि प्रसंग डा.जयकान्त मिश्र विस्तारसँ लिखल अछि। (In the last chapter Gulami Jata helps them to conquer Jorabar Singh, a Rajput, who used to enjoy all new brides first when he dares to attack the marriage march of the spirits of Dina and bhadri (The Folk Literature of Mithila) एहिठाम देखबाक थिक जे दीनाभद्री समाजविरोधी, अत्याचारी आ’ दुराचारीक विरोध एवं प्रतिकार कोना करैत अछि।तेसर बेर जखन फोटरा गीदर दीनारामके ँ पटकि हत्या कए दैत अछि आ’ अलक्षित रूपे ँ सलहेस भद्रीके ँगाम घूमि जएबाक परामर्श दैत छथिन्ह तँ भद्री हुनक परामर्शके ँ अस्वीकारि, कहैत अछि, जेना जेठ भाइ मुइलाह तहिना हमहु मरब। अर्थात अन्यायीक समक्ष आत्मसमर्पण नहि करब भनहिँ प्राणक आहुति देमय पड़ैक। मरब दूनू भाइ कटैया जाहि मँुहेंँ धैलक फोटरा गीदर जेठ भाइ के ताहि मुँहेँं धरौ हमरा के । ( पृ.सं.641) इएह एकजुटता एवं भ्रातृप्रेम दीनाभद्रीके ँ समाजमे दीन दुखीजनक विरुद्ध व्याप्त शोषण, अत्याचार, दुराचारक प्रतिकारक शक्ति प्रदान करैत अछि। कहि सकैत छी दुराचारीके ँ पराजित करबाक रणनीतिक सफलताक कारण इएह भ्रातृ प्रेम आ’ एकजुटता थिक। एकटा आओरो बिन्दु एहिठाम विचारणीय अछि। जेना नामहिसँ स्पष्ट अछि, गुलामी जट गुलाम थिक ताहिर मियाँक। ताहिर मियाँ सेहो ककरो गोमास्ता अछि। ओ गुलामी जटके ँ पोसि रखने अछि। ताहिर मियाँ ओकर माध्यमसँ आतंकक जाल पसारि रखने अछि। किन्तु जखनहि गुलामी जटके ँज्ञात भए जाइत छैक जे दीनाभद्री ओकरहि समाजक लोक थिकैक एवं ओ दीनदुखी एवं पीड़ितक सहायता एवं रक्षा लेल अपना के ँ सदिखन तैआर रखैत अछि, तथा दलित-पीड़ित वर्गक सम्मान एवं प्रतिष्ठाक रक्षा करब ओकर जीवनक मूल उद्देश्य थिकैक तँ गुलामी जट दीनाभद्रीक सहयोगी भए जाइत अछि एवं जोरावर सिंह सन दुराचारीक संहारमे बढ़ि चढ़ि भाग लैत अछि। मिथिलाक सांस्कृतिक उत्कर्ष एवं विशिष्टताके ँ रेखांकित करैत रमानाथ झाक कहब अछि जे मिथिला-जनपद -भाषामे संगीतक परम्परा अत्यन्त प्राचीन कालहिसँ आबि रहल अछि। मिथिला जनजीवनक एक गोट अभिन्न अंग रहल छैक ओकर संगीत। मिथिलाक संस्कृति संगीतमय अछि। ओ एही गीत सबहिक द्वारा मैथिल जातिक भावाभिव्यक्ति आदिअहिसँ होइत आएल, जहिना विद्यापतिक पश्चात तहिना ओहिसँ पूर्वहु मिथिलाक देशी साहित्य गीतमय छैक। (विविध प्रबन्ध)। रमानाथ झा मिथिलाक समान भाषा, समान संस्कृति ओ समान भौगोलिक क्षेत्रक निवासीके ँ मैथिल जातिक संज्ञा देल अछि। जकर साहित्यक एक महत्त्वपूर्ण विशेषता छैक गीतात्मकता। ओना, प्रारम्भहिमे कहल अछि जे मैथिल जातिअहुसँ एक दलित समाजके ँ बिलगाओल गेल अछि, जे वर्तमान युगमे राजनीतिक लाभजनित ध्रुबीकरणक मैथिली साहित्यमे अनुगुंज एवं साहित्यिक राजनीतिक क्षेत्र (पेालिटिकल स्पेस) निर्धारणक प्रयास थिक तथापि ओहि लोकगाथा सभमे जे वैशिष्ठय छैक, मैथिल संस्कृतिक विशेषता तँ थिके। जेना कि नामहिसँ गाओल जएबाक स्पष्ट बोध भए जाइत छैक, मैथिलीक अन्य लोकगाथा जकाँ दीनाभद्री सेहो मैथिल संस्कृतिक अनुरूप गीतात्मक अछि, ओ मैथिल संस्कृतिके ँ प्रतिनिधित्व करैत अछि एवं मैथिल संस्कृतिक अभिन्न धरोहरि थिक। लिखित रूपमे सुरक्षित साहित्यक पाठक शिक्षित वर्गहि टा भए सकैत अछि। एहन लोकक संख्या कम छलैक, तेँओसभ समाजक शेष वर्गक पाठक@श्रोतासँ अपनाके ँ कात रखबा लेल लिखित साहित्यके ँ शिष्ट साहित्यक रूपमे अभिधान कएल। शिष्टक विलोम होइत अछि, अशिष्ट। शुकुर भेल जे शिष्ट साहित्यक विलोमके ँ अशिष्ट साहित्य नहि कहि, लोक कंठमे सुरक्षित साहित्यके ँ लोक साहित्यक गरिमा प्रदान कए देलनि। स्पष्ट अछि जे शिष्ट साहित्यक सर्जक शिष्ट वर्गहिक लोक होइत छलाह। हुनक अनुभव क्षेत्र सीमित छलनि। अपन शिष्टत्व प्रमाणित करबाक हेतु ओ सभ जाहि साहित्य सिद्धान्तक निरूपण कएलनि, ताहिमे नायकत्व लेल राजकुल सम्भूत होएब आवश्यक भए गेलैक। इएह कारण थिक जे तथाकथित .शिष्ट साहित्यक कोनो नायक तथाकथित दलित समाजसँ लेल गेल होथि, तकर उदाहरण भेटब दुर्लभ अवश्य अछि। आ’ ई परम्परा लोकशक्तिक उदय धरि कोना मैथिली साहित्यके ँ आच्छन्न कएने रहल, तकर उदाहरण प्रो.हरिमोहन झा सदृश मैथिलीक महान साहित्यकारक विपुल साहित्य अछि। किन्तु सम्प्रति जे राजनीतिक एवं सामाजिक परिदृश्य छैक आ’ जाहि प्रकारक चेतनाक बसात बहि रहल अछि, ओहिमे एकर महत्त्व नहि छैक जे दलित-महादलित जातिसँ भिन्न जाति-वर्गक साहित्यकार दलित-महादलित जातिक संवेदना एवं भूख, अभाव, असन्तोष आ’ पीड़ाक चित्रण कतेक प्रखरतासँ करैत छथि वा तथाकथित उच्चवर्गक सामान्तवादी एवं शोषणोन्मुखी मनोवृत्ति पर ओ कतेक निर्मम प्रहार करैत छथि, किन्तु प्रश्न छैक आ’ वास्तविकता अछि जे दलित-महादलित समाजक लोक अपन कथा-व्यथा स्वयं कहबा लेल एवं नायक महानायक गढ़बा लेल तैआर अछि। संगहिं ओ आयोजित साहित्यिक चर्चा वा लेखनमे अपन सहभागिता सेहो सुनिश्चित करय चाहैत अछि। (My point is that literary theorists and cultural historians need to pay attention to the way Dalits are trying to argue their case for writing about Dalits. In this sense, whether you have written supporting or reforming or attacking Brahmins, dalits now want dalit characters and dalit life to be portrayed. It does matter how secular you are, the place now has to go to dalits and just as there must be place for dalit characters, there must also be place for dalit writers.They would not like the upper caste writers to write about dalits and about literature today. Even if you write a critique of upper class/caste life, dalits are not bothered about that. I think, these questions ( like whose work should now gain a place and be discussed in public) seem to be more the issue than which upper caste writer wrote about or for dalits.- Dalitism: A Critique of Telugu Literature, K.Satyanarayan, Re-figuring Culture,2005, Sahitya Akademi ) एहि सन्दर्भमे लोकगाथा एवं लोकगाथाक महानायक एक आदर्श रूपमे भासमान भेटैत छनि। कारण जे लोकसाहित्यक नायक वा महानायक दलित,पीड़ित एवं शोषित समाजक छथि। दलित समाजक ओहि पात्रहुमे नायक वा महानायक बनबाक लेल जे चारित्रिक गुण चाही, जे पात्रता चाही, जे शौर्य चाही, जे पराक्रम चाही, सभटा विशेषता दलित समाजक लोकहुमे वर्तमान छैक। एकर उदाहरण थिक दीनाभद्री लोकगाथाक महानायक एवं देवत्व प्राप्त दीनाराम आ’ भद्री।दीनाभद्रीक आधार स्रोत दीनाभद्रीक अध्ययन विवेचनक सम्प्रति दू टा स्रोत सुलभ अछि। पहिल आधार स्रोत थिक जार्ज अब्राहम ग्रियर्सनक संकलन एवं प्रकाशन।एकर प्रकाशन1885 ई.र्मे Z.D.M.G.(Zeischrift der Deutschen Morgen lamdischen Gescllschaft) नामक प्रत्रिकामे भेल अछि । ओकर बादहि मैथिलीक एहि लोक गाथाक परिचय अक्षर जगतके ँ भेलैक एवं दीनाभद्रीक अध्ययन विवेचनक मार्ग प्रशस्त भेल। राष्ट्रीय वा अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर जतय कतहु दीनाभद्रीक अध्ययन विवेचन भेल अछि तकर आधारभूत सामग्री ग्रियर्सन संकलित इएह पाठ थिक। एहिमे डा.जयकान्त मिश्र (Folk Literature of Mithila,1951) डा. आशा गुप्त (जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन और बिहारी भाषा साहित्य, 1970)ेक अध्ययन सेहो अछि। एहि विषय पर राजेश्वर झा (मिथिला मिहिर, 22. सितम्बर, 1974) डा. विश्वेश्वर मिश्र,डा. वीरेन्द्रनाथ झा (मैथिली लोक महाकाव्यक आलोचनात्मक अध्ययन, शोध प्रबन्ध,1987,ल.ना.मिथिला वि.वि.), डा. रामदेव झा ( मैथिली लोक साहित्यः स्वरूप ओ सौन्दर्य, 2002 ), डा.योगानन्द झा (लोक साहित्य ओ शब्द सम्पदा, 2007) आदि सेहो छिटफुट लिखल अछि। मुदा ओ सभ अपन लेखनक आधार स्रोत व्यक्तिगत संकलन कहैत छथि जे अद्यावधि गुरुमन्त्र जकाँ गुप्त अछि। एहि बिन्दु पर सभ केओ मौन छथि जे जार्ज ग्रियर्सनक पाठ आ’ हुनक संकलित पाठमे की अन्तर छैक। एम्हर महेन्द्रनारायण राम एवं फूलो पासवानक संयुक्त सम्पादनमे साहित्य अकादमीसँ ‘दीनाभद्री लोक गाथा साहित्य (2007) प्रकाशित भेल अछि। सम्पादकद्वय आँखि मूनि लिखि देलनि अछि-दीनाभद्री लोक गाथा पर बहुत गोटे विद्वान काज केलनि अछि, मुदा आइ धरि एकर मूल गाथा संग्रह नहि प्रकाशित भए सकल अछि।’ परंच ई कथन इतिहास सम्मत नहि अछि। ग्रियर्सनक अवदानके ँ बिसरि गेलाह अछि। जार्ज ग्रियर्सनक अवदानके ँ रेखांकित करैत प्रोराध्ााकृष्ण चैधरी लिखने छथि- NfFk&Dr.Grierson was the pioneer in bringing to light the folk literature of Mithila through his publications, viz. Bihar Peasant Life, Maithili Chrestomathy. Dinabhadrik Gita and Nebarak Gita etc.-(A Study of the Maithili Folk Literature पूर्वांचलीय लोक साहित्य,पृ.131, चेतना समिति,1973) ग्रियर्सनक गीत दीनाभद्री एवं दीनाभद्री लोक गाथा साहित्यमे अनेकहु बिन्दु पर अन्तर अछि। दूनूक विषय वस्तुमे अन्तर अछि, गाथा संयोजनमे अन्तर अछि, प्रयुक्त शब्दावलीमे अन्तर अछि तथा पात्रक काज आ’ प्रभावमे अन्तर अछि। जे ँ कि दूनू गोटेक स्रोत कथावाचक छथिन्ह एवं दूनूक कथावाचकमे कमसँ कम सवा सए वर्षक जेठाए-छोटाए छैक, अपन संकलनक प्रसंग गियर्सन लिखने छथि- ; (The following two songs are published exactly as they were taken down from the mouths of two itinerant singers in the Nepal Tarai about six years ago.They are very popular throughout nothern Mithila and are excellent examples of the spoken dialect of that portion of the country.-Selected Specimen of the Bihari Language, ZDMG. Vol. 39, page No. 617,1885) अतएव ई अन्तर अस्वाभाविक नहि कहल जा सकैछ। कारण जे लोचकता लोकगाथाक विशेषता थिकैक। जा धरि ओ लोक कंठमे रहैत अछि, वाचकक पात्रता, स्थान, काल एवं प्रस्तुतिक ढ़ंग एवं श्रोता समुदायके ँ बान्हि रखबाक हेतु ओहिमे किछु किछु परिवर्तन होइत रहैत छैक। आ’ जँ संयोगवश कोनो लोकगाथामे लोचकता समाप्त भए जाइत छैक, आन्तरिक क्षमता नहि रहैत छैक तँ कालक्रमे ओहि लोकगाथाक प्रासंगिकता समाप्त भए जाइत अछि। (They (oral tales) change their contours so much that their social relevance is ever alive. If the grid of an oral tale does not have the capacity to sustain or imbide the new, then it meets its death without leaving any trace--Tales : Oral Tales, Komal Kothari, Narrative : A Seminar, Sahitya Akademi,1990) कृतिक समीक्षा लिखित पाठक आधार पर होइत अछि एवं आबयबाला समयमे ओ विवेचनक सामग्री बनैत रहैत अछि। अतएव, प्रकाशनसँ पहिने आवश्यक छलैक जे पूर्व प्रकाशित पाठक संग मिलान कए पाठ वा अन्ये प्रकारक जे कोनो अन्तर छैक, तकरा दर्शबैत सम्पादक अपन बात कहितथि। से नहि भेल अछि। एकर अभावमे ‘दीनाभद्री लोकगाथा साहित्य’ एक महत्त्वपूर्ण आधार-स्रोत होएबासँ रहि गेल अछि। एहिठाम जार्ज ग्रियर्सनक ‘गीत दीनाभद्री’ (Selected Specimen of the Bihari Language) ‘दीनाभद्री लोक गाथा साहित्य’मे भेटल किछु अन्तरक दिश सुधी पाठकक ध्यान आकृष्ट करए चाहब। ‘गीत दीनाभद्री’मे सात टा अध्याय अछि एवं ‘दीनाभद्री लोक गाथा साहित्य’मे तेरह टा अध्याय अछि। ‘गीत दीनाभद्री’मे फोटरा गीदरक हाथे ँ दीनाभद्री मारल जाइत छथि तँ दोसरमे बाघेसरी मारैत छथिन्ह। ‘गीत दीनाभद्री’मे बगहाक ताहिर मियाँक कथा अछि। गुलामी जट ताहिर मियाँक लोक अछि। अपमानित भेला पर फोटरा गीदरक रूप धारण कए के ँ दीनाभद्री गुलामी जटके ँ परास्त करैत छथि। गुलामी जट जखन दीनाभद्रीके ँचिन्हि जाइत अछि, क्षमाप्रार्थी होइत अछि एवं प्रयोजन भेला पर सहयोगक वचन दीनाभद्रीके ँ दैत छनि। लिखल अछि- ‘छरपिकै ँ फोटरा गीदर गुलामी जट कै धैलक चटि धैलक पटि दे मारलक, बान्हलक पछुआड़ि धै कै गोड़ लगैत छी, पै ँयाँ परैत छी, एहि नहि ँ जनली अहाँ भद्री छी।’( पृ.सं.651) ‘दीनाभद्री लोक गाथा साहित्य’मे गुलामी जट मक्का मदीनाक वासी थिक एवं दीनाभद्री मकेश्वरनाथक पूजा अर्चना करैत छथि। एकर अतिरिक्त हिन्दू एवं इस्लाम धर्मक चर्चा सेहो होइत अछि। पहिल संकलनमे दीनाभद्रीके ँ सलहेसक सहायता प्राप्त होइत छनि तँ दोसरमे योगमल किरातीके ँ ओ सहायता लेल आह्वान करैत छथि। पहिल संकलनमे दीनाभद्रीक परकिया नायिका हिरिया तमोलिन एवं जिरिया लोहारिन दोसर संकलनमे नहि अछि। ग्रियर्सनक संकलनक अन्त जोरावर सिंहक मृत्युक संग होइत अछि तँ दोसरमे दीनाभद्री स्वयं घूमि घूमि अपन पराक्रमक प्रसंग लोकसँ जिज्ञासा करैत छथि एवं गहवर बना कए पूजा करबाक आदेश दैत छथिन्ह। ओ इहो आदेश दैत छथिन्ह जे गहवरमे हुनक एक कात बाघेसरी आ’ दोसर कात योगमल किरातक स्थापना कए पूजा कएल जाए। पहिलमे महफा पर जाइत हिरिया तमोलिन एवं जिरिया लोहारिनक डोलीके ँ जोरावर सिंह छेकि लैत अछि तँ गुलामी जट एवं जोरावर सिंहक बीच कुश्ती होइत अछि। दीनाभद्रीक कहला पर ओ जोरावर सिंहके ँ पटकि दैत छथि आ’ जोरावर सिंह मारल जाइत अछि- जोरावर सिङ्घ देलक गुलामी जट के उनटाय नहि खलिफा एक बेरि ठाढ़ भै के कुस्ती लिअऽ। जोरावर सिङ्घ के गुलामी जट मारलक बाँसक ओधि लगाय। चटि दै भद्री देलक बान्हि कनौली गरद उठि गेल। कनौली मे ँ जोरावर सिङ्घ राजपूत मारल गेल, दीनाभद्री बैरी भेल कनौली मे ँ जोरावर सिङ्घ राजपूत मारल गेल दीनाभद्री सौ ँ। पृ..653 मुदा दोसरमे कहलो पर दीनाभद्री जोरावर सिंहक अखारा लगसँ नहि हटैत छथि तँ मल्लयुद्ध होइत अछि। दीनाभद्रीक आह्वान पर हुनक कायामे योगमल किराती प्रवेश कए जाइत छथिन्ह तँ ओ जोरावर सिंहके ँ पटकि हत्या करबामे समर्थ होइत छथि। आश्चर्यक गप्प जे ‘दीनाभद्री लोकगाथा साहित्य’मे दीनाभद्री के ँ अङरेजी भाषाक ज्ञान सेहो छनि। भद्री कहैत अछि- भैया से हम आर्डर नेने रहीतियै तऽ एकरा मारि के हम सारा बना दीतीये (76) डा.योगानन्द झाक निबन्धमे मगहक हंसराज एवं वंशराजक उल्लेख अछि। दीनाभद्री ओहि दूनू के ँमल्लयुद्धमे पराजित करैत छथि। अन्तमे दूनू भाइ जगन्नाथपुरी जाइत छथि। जगन्नाथजीक कृपासँ प्रेत योनिसँ मुक्त भए तिरहुत घूमि अबैत छथि, जतय भुइयाँ बाबाक रूपमे हुनक पूजा होअए लगैत अछि।पाठभेद सम्बन्धी एहि विवृत्तिक तात्पर्य जे दीनाभद्रीक अध्ययन कोन पाठक आधार लोक करए। ककरा दीनाभद्री लोकगाथाक प्रमाणिक पाठ मानल जाए। एक संकलनकर्ता दोसर संकलनकर्ताक काजके ँ मोजर देनिहार नहि, सभ केओ सभटा श्रेय स्वयं हपसि लेअय चाहैत छथि। ओ ई जनबय चाहैत छथि जे एहिसँ पहिने ककरो किछु ज्ञात नहि छलैक, सभटा हमही धरतीके ँ खोधि बाहर आनल अछि। ई साहित्यिक अराजकाता थिकैक। एहि अराजकताक दू टा कारण अछि-सम्पूर्ण श्रेय स्वयं लेबाक आतुरता तथा सम्पादक वा लेखकक अल्पज्ञता। दूनू स्थिति भाषा साहित्यक स्वस्थ विवेचन लेल बाधके अछि। ओहुना विद्वत्जन एहि बात पर एकमत होएताह जे सुनि उतारि लेब, गीत गायब एवं सम्पादन करब, एक नहि, दू प्रकारक प्रतिभाक अपेक्षा रखैत अछि। दीनाभद्री सन महत्त्वपूर्ण लोकगाथाक सम्यक अध्ययन-विवेचन लेल सर्वथा आवश्यक अछि जे उपलब्ध विभिन्न पाठ एवं पूर्व प्रकाशित पाठक आधार पर एक प्रामाणिक पाठ तैआर कएल जाए एवं संकलनकर्ताके ँ ई छूट नहि भेटनि जे अपन अल्पज्ञता एवं पूर्वाग्रहक कारणे ँ मैथिलीक सांस्कृतिक सम्पदा पर आघात करथि। अन्तमे हम लक्ष्मीपति सिंहक (मिथिलाक लोक संस्कृति एवं लोकजीवन, चेतना समिति, स्मारिका,1973 ई.) क मन्तव्य उधृत करए चाहब-‘कहि नहि, एहन एहन कतेको संग्रह कतेको ठाम ‘अग्नये स्वाहा’ तथा ‘कीटाय स्वाहा’ भए गेल होएत, वा भए रहल होएत। अस्तु, एहि सम्बन्धमे क्रियाशील मैथिली संस्था सभसँ हमर इएह अनुरोध जे सूठी कुमर, शशिया, बिहुला, कमला, जट जटिन, दीनाभद्री, विषहरा, आदिक सम्बन्घमे मिथिलाक बहुमुखी लोकसाहित्यक संकलन एवं प्रकाशन कार्यमे सक्रिय भए जाए। हमरा जनैत,जखन मैथिल मात्रके ँ अपन प्राचीन लोक जीवन पद्धतिक ज्ञान भए जएतन्हि, आओर ई विश्वास भए जएतन्हि कि धार्मिक सहिष्णुता, सामाजिक समन्वय एवं सामुदायिक उत्तरदायित्वक प्रसादात एक समय मिथिला कतेक भरल पुरल छल तँ अगत्या वर्णद्वेष, धार्मिक कटुता तथा राजनीतिक छल-छद्मसँ मिथिलाक पिण्ड स्वतः छुटि जाए सकैछ। सार्वभौम मानवाधिकार घोषणा : मैथिली अनुवाद रमानन्द झा 'रमण' : भाषा सम्पादन गोविन्द झा UNIVERSAL DECLARATION OF HUMAN RIGHTS MAITHILI TRANSLATION (राष्ट्रसंघक साधारण सभा 10 दिसम्बर, 1948 के ँ एक सार्वभौम मानवाधिकार घोषणा स्वीकृत आ‘ उद्घोषित कएलक जकर पूर्णपाठ आगाँ देल गेल अछि। एहि ऐतिहासिक घोषणाक उपरान्त साधारण सभा समस्त सदस्य देशसँ अनुरोध कएलक जे ओ एहि घोषणाक प्रचार करए तथा मुख्यतः, अपन देश आ‘ प्रदेशक राजनैतिक स्थितिक अनुरूप बिनु भेदभावक, स्कूल आ‘ अन्य शिक्षण संस्था सभमे एकर प्रदर्शन, पठन-पाठन आ‘ अनुबोधनक व्यवस्था करए।) एहि घोषणाक आधिकारिक पाठ राष्ट्रसंघक पाँच भाषामे उपलब्ध अछि-अंग्रेजी, चीनी, फ्रांसीसी, रूसी आ, स्पेनिश। एहिठाम एहि घोषणाक मैथिली रूपान्तरण प्रस्तुत अछि।) उद्देश्यिका जे ँ कि मानव परिवारक सकल सदस्यक जन्मजात गरिमा आओर समान एवं अविच्छेद्य अधिकारके ँ स्वीकृति देब स्वतन्त्रता, न्याय आ‘ विश्वशान्तिक मूलाधार थिक, जे ँ कि मानवाधिकारक अवहेलना आ‘ अवमाननाक परिणाम होइछ एहन नृशंस आचरण जाहिसँ मानवक अन्तःकरण मर्माहत होइत अछि आओर अवरुद्ध होइत अछि एक एहन विश्वक अवतरण जाहिमे अभिव्यक्ति आ‘ विश्वासक स्वतन्त्रता तथा भय आ‘ अकिंचनतासँ मुक्ति जनसामान्यक सर्वोच्च आकंाक्षा घोषित हो; जे ँ कि विधिसम्मत शासन द्वारा मानवाधिकारक रक्षा एहि हेतु परमावश्यक अछि जे केओ व्यक्ति अत्याचार आ‘ दमनसँ बँचबाक कोनो आन उपाय नहि पाबि, शासनक विरुद्ध बागी नहि भए जाए; जे ँ कि राष्ट्रसभक बीच मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बढ़ाएब परमावश्यक अछि; जे ँ कि राष्ट्रसंघक लोक अपन चार्टर मध्य मौलिक मानवाधिकारमे, मानवक गरिमा आ‘ मूल्यमे तथा स्त्री आ‘ पुरुषक बीच समान अधिकारमे अपन निष्ठा पुनः परिपुष्ट कएलक अछि आओर व्यापक स्वतन्त्रताक संग सामाजिक प्रगति आ‘ जीवन स्तरक समुन्नयन हेतु कृत संकल्पित अछि; जे ँ कि सदस्य राष्ट्रसभ राष्ट्रसंघक सहयोगसँ मानवाधिकार आ‘ मौलिक स्वतन्त्रताक सार्वभौम आदर तथा अनुपालन करबाक हेतु प्रतिबद्ध अछि; जे ँ कि एहि प्रतिबद्धताक पूर्ति हेतु उक्त अधिकार आ स्वतन्त्रताक सामान्य बोध परम महत्त्वपूर्ण अछि, ते ँ आब, साधारण सभा निम्नलिखित सार्वभौम मानवाधिकार घोषणाके ँ सभ जनता आ‘ सभ राष्ट्रक हेतु उपलब्धिक सामान्य मानदण्डक रूपमे, एहि उद्देश्यसँ उद्घोषित करैत अछि जे प्रत्येक व्यक्ति आ‘ प्रत्येक सामाजिक एकक एहि घोषणाके ँ निरन्तर ध्यानमे रखैत शिक्षा आ‘ उपदेश द्वारा एहि अधिकार आ‘ स्वतन्त्रताक प्रति सम्मान भावना जगाबए तथा उत्तरोत्तर एहन उपाय-राष्ट्रीय आ अन्तरराष्ट्रीय-करए जाहिसँ सदस्य राष्ट्रसभक लोक बीच तथा अपन अधीनस्थ अधिक्षेत्रहुक लोक बीच एहि अधिकार आ‘ स्वतन्त्रताके ँ सार्वभौम आ‘ प्रभावकारी स्वीकृति प्राप्त भए सकैक। ष् अनुच्छेद 1 सभ मानव जन्मतः स्वतन्त्र अछि तथा गरिमा आ‘ अधिकारमे समान अछि। सभके ँ अपन-अपन बुद्धि आ‘ विवेक छैक आओर सभके ँ एक दोसराक प्रति सौहार्दपूर्ण व्यवहार करबाक चाही। अनुच्छेद 2 प्रत्येक व्यक्ति एहि घोषणामे निहित सभ अधिकार आ‘ स्वतन्त्रताक हकदार थिक आओर एहिमे नस्ल, लिंग, भाषा, धर्म, राजनैतिक वा अन्य मत, राष्ट्रीय वा सामाजिक उद्भव, सम्पत्ति, जन्म अथवा अन्य स्थितिक आधार पर कोनहु प्रकारक भेदभाव नहि कएल जाएत। आओर ओ व्यक्ति जाहि देशक थिक तकर राजनैतिक अधिकारितामूलक वा अन्तरराष्ट्रीय आस्थितिक आधार पर कोनो भेदभाव नहि कएल जाएत-भनहि ओ देश स्वाधीन हो, ट्रस्ट हो, परशासित हो वा सम्प्रभुताक कोनो अन्य परिसीमाक अधीन हो। अनुच्छेद 3 सभके ँ जीवन-धारण, स्वातन्त्र्य आ‘ व्यक्तिगत ़सुरक्षाक अधिकार छैक। अनुच्छेद 4 केओ व्यक्ति दासता वा बेगारीमे नहि रहत आओर सभ प्रकारक दासप्रथा आ‘ दासक खरीद-बिकरी वर्जित होएत। अनुच्छेद 5 ककरहु क्रूर, अमानुषिक वा अपमानजनक दण्ड नहि देल जाएत आ‘ ककरोसँ एहन व्यवहार नहि कएल जाएत। अनुच्छेद 6 प्रत्येक व्यक्तिके ँ सभठाम कानूनक समक्ष एक मानव रूपमे अपन मान्यताक अधिकार छैक। अनुच्छेद 7 सभ केओ कानूनक समक्ष समान अछि आ‘ बिना कोनो भेदभावक कानूनक संरक्षणक हकदार अछि। अनुच्छेद 8 सभके ँ एहन कार्यक विरुद्ध जे संविधान वा विधि द्वारा प्रदत्त ओकर मौलिक अधिकारक हनन करैत हो सक्षम राष्ट्रीय न्यायालयसँ उचित उपचार (न्याय) पएबाक हक छैक। अनुच्छेद 9 केओ स्वेच्छासँ ककरो गिरफ्तार, नजरबन्द वा देश निर्वासित नहि करत । अनुच्छेद 10 सभ व्यक्तिके ँ अपन अधिकार आ‘ दायित्वक अवधारणार्थ तथा अपना पर लगाओल गेल कोनो आपराधिक आरोपक अवधारणार्थ कोनो स्वतन्त्र आ‘ निष्पक्ष न्यायालय द्वारा पूर्ण समानताक संग उचित आ‘ सार्वजनिक विचारणक हक छैक। अनुच्छेद 11 1. दण्डनीय अपराधक आरोपी प्रत्येक व्यक्ति ताधरि निर्दोष मानल जएबाक हकदार अछि जाधरि कोनो सार्वजनिक विचारणमे, जाहिमे ओकरा अपन समुचित सफाइ देबाक सभ गारंटी प्राप्त होइक, विधिवत् दोषी सिद्ध नहि कए देल जाए। 2. जँ केओ व्यक्ति एहन कोनो दण्डनीय कार्य वा लोप करए जे घटनाक कालमे प्रचलित कोनो राष्ट्रीय वा अन्तरराष्ट्रीय कानूनक दृष्टिमे दण्डनीय अपराध नहि थिक तँ ओ व्यक्ति एहि हेतु दण्डनीय अपराधक दोषी नहि मानल जाएत। अनुच्छेद 12 केओ व्यक्ति कोनो आन व्यक्तिक एकान्तता, परिवार, निवास वा संलाप (पत्राचारादि) मे स्वेच्छया हस्तक्षेप नहि करत आ‘ ने ओकर प्रतिष्ठा आ‘ ख्याति पर प्रहार करत। प्रत्येक व्यक्तिके ँ एहन हस्तक्षेप वा प्रहारसँ कानूनी रक्षा पएबाक अधिकार छैक। अनुच्छेद 13 1. प्रत्येक व्यक्तिके ँ अपन राष्ट्रक सीमाक भीतर भ्रमण आ‘ निवास करबाक स्वतन्त्रता छैक। 2. प्रत्येक व्यक्तिके ँ अपन देश वा आनो कोनो देश त्यागबाक आ‘ अपना देश घूरि अएबाक अधिकार छैक। अनुच्छेद 14 1. प्रत्येक व्यक्तिके ँ उत्पीड़नसँ बँचवाक हेतु दोसर देशमे शरण मङबाक अधिकार छैक। 2. एहि अधिकारक उपयोग ओहि स्थितिमे नहि कएल जाए सकत जखन ओ उत्पीड़न वस्तुतः अराजनैतिक अपराधक कारणे ँ भेल हो अथवा राष्ट्रसंधक उद्देश्य आ‘ सिद्धान्तक विरुद्ध कोनो काज करबाक कारणे ँ े। अनुच्छेद 15 1. प्रत्येक व्यक्तिके ँ राष्ट्रीयताक अधिकार छैक। 2. कोनो व्यक्तिके ँ राष्ट्रीयताक अधिकारसँ अथवा राष्ट्रीयता -परिवर्तनक अधिकारसँ अकारण वंचित नहि कएल जा सकत। अनुच्छेद 16 1. सभ वयस्क स्त्री आ‘ पुरुषके ँ नस्ल, राष्ट्रीयता वा सम्प्रदायमूलक केानो प्रतिबन्धक बिना, विवाह करबाक आ‘‘ परिवार बनएबाक अधिकार छैक। स्त्री आ पुरुष दूनूके ँ विवाह, दाम्पत्य-जीवन तथा विवाह-विच्छेदक समान अधिकार छैक। 2. विवाह, तखनहि होएत जखन इच्छुक पति आ‘पत्नीक स्वच्छन्न आ पूर्ण‘ सहमति हो। 3. परिवार समाजक एक सहज आ‘ मौलिक एकक थिक आओर एकरा समाजक आ‘ राज्यक संरक्षण पएबाक अधिकार छैक। अनुच्छेद 17 1. प्रत्येक व्यक्तिके ँ एकसरे आ‘ दोसराक संग मिलि सम्पत्ति रखबाक अधिकार छैक। 2. केओ स्वेच्छया ककरहु सम्पत्तिसँ वंचित नहि करत। अनुच्छेद 18 प्रत्येक व्यक्तिके ँ विचार, विवेक आ धर्म रखबाक अधिकार छैक। एहि अधिकारमे समाविष्ट अछि धर्म आ विश्वासक परिर्वतनक स्वतन्त्रता, एकसर वा दोसराक संग मिलि प्रकटतः वा एकान्तमे शिक्षण, अभ्यास, प्रार्थना आ अनुष्ठानक स्वतन्त्रता। अनुच्छेद 19 प्रत्येक व्यक्तिके ँ अभिमत एवं अभिव्यक्तिक स्वतन्त्रताक अधिकार छैक, जाहिमे समाविष्ट अछि बिना हस्तक्षेपक अभिमत धारण करब, जाहि कोनहु क्षेत्रसँ कोनहु माध्यमे ँ सूचना आ‘ विचारक याचना, आदान प्रदान करब। अनुच्छेद 20 1. प्रत्येक व्यक्तिके ँशान्तिपूर्ण सम्मिलन आ संगठनक स्वतन्त्रताक अधिकार छैक। 2. कोनहु व्यक्तिके ँ संगठन विशेषसँ सम्बद्ध होएबाक लेल विवश नहि कएल जाए सकैछ। अनुच्छेद 21 1. प्रत्येक व्यक्तिके ँ अपन देशक शासनमे प्रत्यक्षतः भाग लेबाक अथवा स्वतन्त्र रूपे ँ निर्वाचित अपन प्रतिनिधि द्वारा भाग लेबाक अधिकार छैक। 2. प्रत्येक व्यक्तिके ँ अपना देशक लोक-सेवामे समान अवसर पएबाक अधिकार छैक। 3. जनताक इच्छा शासकीय प्राधिकारक आधार होएत। ई इच्छा आवधिक आ‘ निर्बाध निर्वाचनमे व्यक्त कएल जाएत आओर ई निर्वाचन सार्वभौम एवं समान मताधिकार द्वारा गुप्त मतदानसँ होएत अथवा समतुल्य मुक्त मतदान प्रक्रियासँ। अनुच्छेद 22 प्रत्येक व्यक्तिके ँ समाजक एक सदस्यक रूपमे सामाजिक सुरक्षाक अधिकार छैक आओर प्रत्येक व्यक्तिके ँ अपन गरिमा आ‘ व्यक्तित्वक निर्बाध विकासक हेतु अनिवार्य आर्थिक, सामाजिक आ‘ सांस्कृतिक अधिकार-राष्ट्रीय प्रयास आओर अन्तरराष्ट्रीय सहयोगसँ तथा प्रत्येक राज्यक संघठन आ‘ संसाधनक अनुरूप-प्राप्त करबाक हक छैक। अनुच्छेद 23 1. प्रत्येक व्यक्तिके ँ काज करबाक, निर्बाध इच्छाक अनुरूप नियोजन चुनबाक, कार्यक उचित आ‘ अनुकूल स्थिति प्राप्त करबाक आ‘ बेकारीसँ बँचबाक अधिकार छैक। 2. प्रत्येक व्यक्तिके ँ समान काजक लेल बिना भेदभावक समान पारिश्रमिक पएबाक अधिकार छैक। 3. काजमे लगाओल गेल प्रत्येक व्यक्तिके ँ उचित आ‘ अनुरूप पारिश्रमिक ततबा पएबाक अधिकार छैक जतबासँ ओ अपन आ‘ अपन परिवारक मानवोचित भरण-पोषण कए सकए आओर प्रयोजन पड़ला पर तकर अनुपूरण अन्य प्रकारक सामाजिक संरक्षणसँ भए सकैक। 4. प्रत्येक व्यक्तिके ँ अपन हितक रक्षाक हेतु मजदूरसंघ बनएबाक आ‘ ओहिमे भाग लेबाक अधिकार छैक। अनुच्छेद 24 प्रत्येक व्यक्तिके ँ विश्राम आ‘ अवकाशक अधिकार छैक जकर अन्तर्गत अछि कार्य-कालक उचित सीमा आ समय-समय पर वेतन सहित छुट्टी। अनुच्छेद 25 1. प्रत्येक व्यक्तिके ँ एहन जीवन-स्तर प्राप्त करबाक अधिकार छैक जे ओकर अपन आ‘ अपना परिवारक स्वास्थ्य एवं कल्याण हेतु पर्याप्त हो। एहिमे समाविष्ट अछि भोजन, वस्त्र, आवास आ चिकित्सा तथा आवश्यक सामाजिक सेवाक अधिकार आओर जँ अपरिहार्य कारणवश बेकारी, बीमारी, अपंगता, वैधव्य, वृद्धावस्था अथवा अन्य प्रकारक दुरस्था उपस्थित हो तँ, ओहिसँ सुरक्षाक अधिकार । 2. परसौती आ‘ चिल्हकाके ँ विशेष परिचर्या आ सहायताक अधिकार छैक। प्रत्येक बच्चाके ँ, चाहे ओ विवाहावधिमे जनमल हो वा ताहिसँ बाहर, समान सामाजिक संरक्षणक अधिकार छैक। अनुच्छेद 26 1. प्रत्येक व्यक्तिके ँ शिक्षा प्राप्तिक अधिकार छैक। शिक्षा कमसँ कम आरम्भिक आ‘ मौलिक अवस्थामे निःशुल्क होएत। आरम्भिक शिक्षा अनिवार्य होएत। तकनीकी आ व्यावसायिक शिक्षा सामान्यतया उपलभ्य होएत तथा उच्चतर शिक्षा सेहो सभके ँ योग्यताक आधार पर भेटतैक। 2. शिक्षाक लक्ष्य होएत मानव व्यक्तित्वक पूर्ण विकास आओर मानवाधिकार आ‘ मौलिक स्वतन्त्रताक प्रति आदरभाव बढ़ाएब। शिक्षा राष्ट्रसभक बीच तथा जातीय वा धार्मिक समुदायसभक बीच पारस्परिक सद्भावना, सहिष्णुता आ‘ मैत्री बढ़ाओत तथा शान्तिक हेतु राष्ट्रसंधक प्रयासके ँ गति देत। 3. माता पिताके ँ ई चुनबाक तार्किक अधिकार छैक जे ओकर सन्तानके ँ कोन प्रकारक शिक्षा देल जाए। अनुच्छेद 27 1. प्रत्येक व्यक्तिके ँ समाजक सांस्कृतिक जीवनमे अबाध रूपे ँ भाग लेबाक, कलाक आनन्द लेबाक तथा वैज्ञानिक विकासमे आ‘ तकर लाभमे अंश पएबाक अधिकार छैक। 2. प्रत्येक व्यक्तिके ँ अपन सृजित कोनहु वैज्ञानिक, साहित्यिक अथवा कलात्मक कृतिसँ उत्पन्न, भावनात्मक वा भौतिक हितक रक्षाक अधिकार छैक। अनुच्छेद 28 प्रत्येक व्यक्तिके ँ एहन सामाजिक आ अन्तरराष्ट्रीय आस्पद प्राप्त करबाक अधिकार छैक जाहिसँ एहि घोषणामे उल्लिखित अधिकार आ‘ स्वतन्त्रता प्राप्त कएल जाए सकए। अनुच्छेद 29 1. प्रत्येक व्यक्ति ओहि समुदायक प्रति कत्र्तव्यबद्ध अछि जाहिमे रहिए कए ओ अपन व्यक्तित्वक अबाध आ‘ पूर्ण विकास कए सकैत अछि। 2. प्रत्येक व्यक्ति अपन अधिकार आ‘ स्वतन्त्रताक उपयोग ओहि सीमाक अभ्यन्तरे करत जकर अवधारण दोसराक अधिकार आ‘ स्वतन्त्रताक आदर आ‘ समुचित स्वीकृतिके ँ सुनिश्चित करबाक उद्देश्यसँ तथा नैतिकता, विधिव्यवस्था आ जनतान्त्रिक समाजमे सामान्य जनकल्याणक अपेक्षाक पूर्तिक उद्देश्यसँ कानून द्वारा कएल जाएत। 3. एहि स्वतन्त्रता आ‘ अधिकारक प्रयोग कोनहु दशामे राष्ट्रसंधक सिद्धान्त आ‘ उद्देश्यक प्रतिकूल नहि कएल जाएत। अनुच्छेद 30 एहि घोषणामे उल्लिखित कोनो बातक निर्वचन तेना नहि कएल जाए जाहिसँ ई घ्वनित हो जे कोनो राज्यके ँ वा जनगणके ँ एहन गतिविधिमे संलग्न होएबाक वा कोनो एहन काज करबाक अधिकार छैक जकर लक्ष्य एहि घोषणाक अन्तर्गत कोनो अधिकार वा स्वतन्त्रताके ँ बाधित करब हो। हृदय नारायण झा, आकाशवाणीक बी हाइग्रेड कलाकार। परम्परागत योगक शिक्षा प्राप्त। लुप्तप्राय मैथिली लोकगीत प्राती ,गोसाउनिक गीत भगवतीगीत झूमरा,सोहर,खेलउना, कुमार,परिछन ,चुमान, डहकन ,बिषहारा गीत , झूमरि ,बटगमनी,मलार चैमासा ,लगनी ,समदाउन आ एकर अतिरिक्त नदी संस्कृति मे कोशी गीत आदि कतेको मैथिली लोकगीत लुप्तप्राय अछि । जतए कतहु एखनहु लोककण्ठ मे ई गीत सभ बाचल अछि तकरा संग्रहित कऽ ओहि गीतक प्रकाशन आ ओहि धुन कें सुरक्षित रखबाक लेल ओकर आॅडियो वीडियो रूप मे दस्तावेजीकरण करबाक आवश्यकता विचारणीय अछि । संवैधानिक मान्यता प्राप्त भारतीय भाषा बनलाक बाद मैथिलीक संस्कार ,रीति रिवाज , पर्व त्योहार ओ )तु पर आधारित गीतक समृ( परंपरा वर्तमान आ भविष्यक पीढ़ी लेल कोना सुरक्षित कएल जाय ई संपूर्ण मैथिली जगतक लेल चिन्ताक विषय बनल अछि । मिथिला महान रहल अछि अपन विशेषताक कारणें। मिथिलाक प्रशंसा में वृहद्विष्णुपुराणक उक्ति अछि धन्यास्ते ये प्रयत्नेन निवसन्ति महात्मुने । विचरेन्मिथिला मध्ये ग्रामे ग्रामे विचक्षणः ।। सदाम्रवन सम्पन्ना नदीतीरेषु संस्थिता । तीरेषुभुक्तियोगेन तैरभुक्ति रितिस्मृता ।। अर्थात् हे मुनीश्वर ! ओ धन्य छथि जे मिथिला में यत्नपूर्वक निवास करइ छथि आ मिथिलाक गामे गाम घूमइ छथि । ई मिथिला सदैव आमक वन सॅ सम्पन्न नदीक तट पर स्थित अछि आ तीर में भोगक लेल प्रसि( अछि । ते तीरभुक्ति अर्थात् तिरहुत नाम सॅ सेहो जानल जाइत अछि मिथिलांचल । पुराणोक्त कपिलेश्वर, हरिलाखी , पिप्पलीवन , फुलहर ,गिरिजास्थान , विलावती , हरित्वेकी , कूपेश्वर ;कुशेश्वरस्थान द्ध , सिंहेश्वर , जनकपुर ,वनग्राम ,सिन्दूरेश्वर , त्रपनायनवन , विषहर , मंगला, मंगलवती विरजा , पापहारिणी , सुखेलीवन आदि तीर्थ सॅ पावन मिथिलाक महिमा वृहद्विष्णुपुराणक मिथिला माहात्म्य में वर्णन कएल गेल अछि । मिथिलाक लोकगीत में धर्म आ लोक बेवहारक प्रधानता अछि । ब्राह्मवेलाक, पराती , श्रमगीत;लगनीद्ध ,गोदना , भगवतीक आवाहन गीत ;गहबर मे प्रचलित गीत झूमराद्ध , कोशी संस्कृति में विकसित गीत सहित परंपरागत संस्कार गीतक कतेको प्रकार मिथिलाक नव पीढ़ीक बीच लुप्तप्राय अछि । ओहि लुप्तप्राय गीत सभक शब्द रचना ,धुन ,स्वर ,लय आ भाव एखनहुॅ सबकें आकर्षित करइत अछि । सब तरहें ज्ञान कें बढ्ऱाब बला , संस्कारक संग रीति नीतिक बोध कराब बला आ सुनबा मे मनोरंजक अछि ओ गीत सभ । एखनहुॅ जतए कतहु परातीक स्वर कान में पड़ैछ मन भाव विभोर भ जाइत अछि । प्रस्तुत अछि साहेबदासक लिखल पराती मौलिक पारंपरिक भास में - अजहुॅ भजन चित चेत मुगुध मन अजहु भजन चित चेत ।। बालापन तरूणापन बीतल , केस भये सभ सेत मुगुध मन । अजहुॅ ।। जा मुख राम नाम ने आबत , मानहु सो जन प्रेत मुगुध मन । अजहुॅ ।। हरि विमुखी सुख लहत न कबहुॅ , परए नरक के रेत मुगुध मन । अजहुॅ ।। साहेबदास तोहि क्या लागत , राम नाम मुख लेत मुगुध मन अजहुॅ भजन चित चेत ।। परातीक संबंध में श्रेष्ठ जन कहइ छथि - जखन पराती गाओल जाइ छल त एक कोस धरि ओर ध्वनि पहुॅचइत छल । परातीक भास आ भाव लोकसभ के जगा क मंगल विहानक आनन्द दैत छल । ओहि भासक पराती केहन होइत अछि ,देखल जाय - प्राण रहत नहि मोर श्याम बिनु प्राण रहत नहि मोर ।। काहि पुछओ कोई मोहि ने बताबए , कहाॅ गेल नन्द किशोर । श्याम बिनु ।। छल कए गेल छलिक नन्दनन्दन , नैन झझाइछ नोर । श्याम बिनु ।। साध्यौ मौन कानन पशु पंछी , कतहु ने कुहुकए मोर । श्याम बिनु ।। हमहुॅ मरब हुनि बहुरि न आएब , साहेब जीवन दि न थोर । श्याम बिनु प्राण रहत नहि मोर ।। मधुबनी में श्री दुर्गास्थान ,कोइलख में भद्रकाली,श्री दुर्गाशक्तिपीठ , मंगरौनी में बूढ़ी माई, डोकहर मे राजराजेश्वरी ,जितवारपुर मे सि(काली पीठ ,ठाढ़ी मे परमेश्वरी स्थान , खोजपुर में तारामंदिर , सहरसा के वनगाॅव मे उग्रतारा , विराटपुर मे चण्डिका ,बदलाघाट मे कात्यायनी , पचगछिया मे श्री कंकाली , पटोरी आ गढ़बरूआरी मे दशमहाविद्या ,देवनाडीह मे वनदुर्गा , दरभंगा मे श्यामामंदिर , म्लेच्छमर्दिनी , गलमा मे तारास्थान ,पचही मे चामुण्डा , अहल्यास्थान ,ककरौल मे शीतला स्थान , पूर्णियां मे पूरनदेवी , अररिया मे दक्षिण कालिका मंदिर , मुजफ्फरपुर मे त्रिपुरसुन्दरी , सखरा मे सखलेश्वरी , उच्चैठ मे छिन्नमस्तिका , चम्पारन मे वैराटी देवी , चण्डी स्थान , सहोदरा स्थान सन कतेको देवी तीर्थ सॅ सम्पन्न मिथिलाक जन जन मे देवी शक्तिक उपासनाक परंपरा समृ( अछि । मिथिलाक घर घर मे कुलदेवी रूप मे पूजित हेबाक कारणेॅ विविध भावक देवीगीतक परंपरा विकसित भेल। संपूर्ण भारत वर्ष मे मिथिला एकमात्र क्षेत्र अछि जतए भगवती गीतक सर्वाधिक धुन पाओल जाइछ । कोनो मंगल कार्यक आरंभ में गोसाउनिक गीत गेबाक जे परंपरा अछि ओहि मे प्रचलित अधिकांश गीत आ धुन लुप्तप्राय अछि । लोककंठ में एखनहुॅ कतहुॅ कतहुॅ सूनल जा सकैछ एहन किछु गीत । यथा 1पारंपरिक जय वर जय वर दिअ हे गोसाउनि हे मा तारिणी त्रिभुवन देवी । सिंह चढल मैया फिरथि गोसाउनि हे मा अतिबल भगवती चण्डी ।। कट कट कट मैया दन्त शबद कएलि हे मा गट गट गिरलनि काॅचे । घट घट घट मैया शोणित पिबलनि हे मा मातलि योगिन संगे ।। 2 म0म0मदन उपाध्याय जय जय तारिणी भव भय हारिणी दुरित निवारिणी वर माले । परम स्वरूपिणी उग्र विभूषिणी दनुज विदूषिणी अहिमाले । । पितृवन वासिनि खल खल हासिनि भूत निवासिनि सुविशाले । त्रिभुवन तारिणि त्रिपुर विदारिणि वदन करालिनि अहिमाले ।। शतभख फल दे दिविशत शुभ दे अरिकुल भय दे धननिले । अति धन धन दे हरि हर जय दे अनुपम वर दे वर शिले ।। मदन विलासिनी विदित विकासिनि कर कृतपाशिनि जगदीशे । हरिकर चक्रिणि हरिकर वज्रिणि हरिकर शूलिनि परिमिशे ।। रवि शशि लोचिनि कलुष विलोचिनि वर सुख कारिणि शिव संगे । श्रुति पथ चारिणि महिष विदारिनि क्षितिज विपोथिनि रण संगे ।। अतिशय हासिनि कमल विलासिनि तिमिर विनासिनि वर सारे । हर हृदि हर्षिणि रिपुकुल घर्षिणि धन रव वरसिनि हे तारे ।। जय जय तारिणि भव भव हारिणि दुरित निवारिनि वर माले ।। 3 पारंपरिक करू भव सागर पार हे जननी करू भवसागर पार । के मोरा नैया के मोर खेबैया के मोरा उतारत पार हे जननी ।। अहीं मोर नैया अहीं मोर खेबइया अहीं उतारब पार हे जननी ।। के मोरा माता पिता मोर के छथि के मोर सहोदर भाई हे जननी ।। अहीं मोर माता अहीं मोर पिता छी अहीं सहोदर भाई हे जननी ।। 4 कालिकान्त अखिल विश्व के नैन तारा अहीं छी हे जगदम्ब हम्मर सहारा अहीं छी ।। अनल वायु शशि सूर्य सभ मे अहीं मा , नदी के विमल मंजुधारा अहीं छी ।। रज सत्व तम केर उदभव अहीं मा , प्रगट मे तदपि शंभुधारा अहीं छी ।। विपत धार मे सुत जौं डुबि रहल हो तकर हेतु निकटक किनारा अहीं छी ।। विनय कालिकान्तक सुनत आन के मा दया के सकल सृष्टि सारा अहीं छी ।। 5 पारंपरिक सुर नर मुनि जन जगतक जननी हमरो पर होइयौ ने सहाय हे मा ।। जनम जनम सॅओ मुरूख बनल छी , आबहु देहु किछु ज्ञान हे मा ।। केओ ने जगत बीच अपन लखित भेल , हमहुॅ अहींक सन्तान हे मा ।। दुखिया के जिनगी माता देखलो ने जाइए , सुखमय जग करू दान हे मा ।। काम क्रोध लोभ मोह माया जाल बाझलहुॅ , मुक्तिक देहु वरदान हे मा ।। 6 पारंपरिक हे जगदम्ब जगत माता काली प्रथम प्रणाम करै छी हे ।। प्रथम प्रणाम करै छी हे जननी हम त किछु ने जनै छी हे ।। नहि जानी हम पूजा जप तप अटपट गीत गबइ छी हे । अटपट गीत गबई छी हे जननी हम त किछु ने जनै छी हे ।। विपतिक हाल कहू की अहाॅ के सबटा अहाॅ जनै छी हे । सबटा अहाॅ जनै छी हे माता ,हम त किछु ने जनै छी हे ।। मात पिता हित मित कुल परिजन माया जाल बझल छी हे । जगतारिणी जगदम्ब अहीें केॅ गहि गहि चरन कहै छी हे ।। 7 पारंपरिक हे अम्बे माता हमरो पर होइयौ सहाय ।। हमार जगजननी हमरो पर होइयौ सहाय ।। युग युग सॅ भटकल छी जीवन भॅवर मे आबहुॅ उबारू हे माय।। दुःखहि जनम बाल यौवन मे पाओल सुख के ने भेटल उपाय ।। अज्ञानी शक्तिहीन लोभी बनल छी ,एहन ने जिनगी सोहाय ।। 8 महाकवि विद्यापति आदि भवानी विनय तुअ पाय ,तुअ सुमिरइत दुरत दूर जाय ।। सिंह चढ़ल देवि देल परवेश बघछाल पहिरन जोगिन भेष ।। बाम लेल खपर दहिन लेल काति , असुर के बधए चललि निशि राति ।। आदि भवानी विनय तुअ पाय ,तुअ सुमिरइत दुरत दूर जाय ।। तुअ भल छाज देवि मुण्डहार , नूपूर शबद करए छनकार ।। भनई विद्यापति कालीकेलि सदा ए रहू मैया दहिन भेलि ।। आदि भवानी 9 कवीश्वर चन्दा झा तुअ बिनु आज भवन भेल रे घन विपिन समान ।। जनु रिधि सिधिक गरूअ गेल रे मन होइछ भान ।। परमेश्वरी महिमा तुअ रे जग के नहि जान । मोर अपराध छेमब सब रे नहि याचब आन ।। जगत जननी काॅ जग कह रे जन जानकि नाम । नहर नेह नियत नित रे रह मिथिला धाम ।। शुभमयी शुभ शुभ सब दिन रे थिर पति अनुराग । तुअ सेवि पूरल मनोरथ रे हम सुलित सभाग ।। इ नवो गीत नौ धुन मे अछि । एकर अतिरिक्त कतोक गीत अछि मुदा आबक नब पीढ़ीक बीच एकर परंपरागत शिक्षाक बेवहार नहि देखल जाइछ । परिणामतः फिल्मी गीतक धुन मे भगवती गीत सभक चलन मैथिली परंपरागत गोसाउनिक गीत भगवती गीतक परंपराक समक्ष अस्तित्वक संकट अछि । एकर अतिरिक्त गाम गाम मे गहबर बीच भगतक मंडली मे झूमरा गाबक समृ( परंपरा रहल अछि । मुदा कालक्रमे इहो परंपरा अस्तित्वक संकट झेलि रहल अछि । नौ सदस्यक समवेत स्वर मे झालि आ माॅडर के संगति मे प्रस्तुत झूमरा गायन सॅ भगवतीक आवाहन होइत अछि आ भगतक शरीर मे देवी प्रगट होइत छथि । बीज रूप में एखनहुॅ बचल अछि ई परंपरा मुदा लुप्तप्राय अछि । बतहू यादव सन भगत चिन्तित छथि जे हुनक बाद इ परंपरा कोना बाॅचत ? हुनकहि सॅ सूनल अछि इ झूमरा गीत अरही जे वन से मइया खरही कटओलियइ हे मइया खरही कटओलियइ हे । मइया जी हे बिजुबन कटओलियइ बिट बाॅस जगदम्बा रचि रचि महल बनओलियई हे ।। गोड़लागूॅ पैयाॅ पड़ूॅ मइया जगदम्बा आइ मइया गहबर अबियउ हे । मइया जी हे राखि लिअउ भगत केर लाज जगदम्बा कलजोरि पैयाॅ पड़इ छी हे ।। जहिना बलकबा खेलइ माता के गोदिया हे , भवानी माता के गोदिया हे । मइया जी हे तहिना खेलाबहु जग बीच जगदम्बा आब मइया गहबर अबियउ हे ।। नामो ने जनइ छी मइया पदो ने बूझै छी हे मइया पदो ने बूझै छी हे । मइया जी हे सेवक बीच कण्ठ लियउ बास जगदम्बा आब मइया लाज रखियौ हे ।। गोड़ लागूॅ पइयाॅ परूॅ आद्या जलामुखी हे मइया अद्या जलामुखी हे । मइयाजी हे राखि लिअउ अरज केर लाज जगदम्बा सेवक कलजोड़इए हे।। मिथिलाक लुप्तप्राय गीत- गर्भ सॅ छठिहार धरि सोहर आ खेलउना पर आधारित संस्कार गीतक बानगी मिथिलाक गौरवमयी श्रेष्ठ संस्कृति एवं परम्परा केॅ सुरक्षित रखबाक श्रेय मैथिली लोकगीत कें अछि। परम्पराक सूत्रधार पूर्वजलोकनि मैथिल समाजक जन सामान्य कें अपन मूल संस्कृति ओ परंपराक प्रति उदार बनाबए लेल तदनुकूल लोकगीतक परंपरा विकसित कएलनि । कालान्तर में अनेकों विद्वान गीतकार ने अपन कृति मे मैथिली लोकगीतक भण्डार के अत्यन्त समृ( बनओलनि । देश ,काल और परिस्थिति में परिवर्तनक संग संग लोकगीतक रचना में सेहो विविधता आएल । मुदा आदर्श आचार पर आधारित लोकगीतक परंपरा लोककण्ठ में स्थान पबइत रहल जे आइयो मिथिलाक आचार आदर्श सॅ परिचय करबइत अछि । सर्वविदित अछि जेे लोकगीतों में कृत्रिमतानहि होइत अछि । समाज मे प्रचलित सामान्य बेवहारक अभिव्यक्ति होइत अछि । मैथिली लोकगीतक अवलोकन सॅ मिथिलाक सभ्यता ,संस्कृति , रीति रिवाज ,पर्वत्योहार ,कला ,साहित्य सामाजिक उन्नति आ मानवीय आकांक्षाक यथार्थ रूप आइयो अनुभव करबा योग्य अछि । मिथिला में जन्म सॅ लऽ कऽ विवाह धरि सब बिध बेवहार गीतक संग सम्पन्न होइत अछि । बारहो मास मे प्रचलित पर्व त्योहार व्रत पूजन आदि परंपराक लेल अलग अलग गीत अछि । )तुक अनुसार मैथिली लोकगीतक अपन विशेषता रहल अछि मिथिला में । विवाह ओ उपनयन आदि संस्कारक गीत में खास प्रकार के रागक प्रयोग भेल अछि जे अन्य़त्र नहि देखल जाइछ । धर्म प्रधान क्षेत्र हेबाक कारणें मिथिला में प्रातः जागरण सेहो पराती लोकगीत सॅ होइत रहल अछि । जहॉ तक मैथिली लोकगीतक प्रकारक प्रश्न अछि अनेकों प्रकारक लोकगीत आइयो लोककंठ में रचल बसलन अछि। पुत्रकामना ,जन्म सॅ संबंधित सामान्य व्यवहार एवं लोकाचारक सहज अभिव्यक्ति सोहर , खेलउना , छठिहार , पीपर पिलाई , आॅख अॅजाई , बधैया , आदि नाम सॅ प्रचलित लोकगीत सभ मे अछि । एहि मे लौकिक एवं भक्ति प्रधान विषय पर आधारित गीतक समावेश अछि । एक भक्त हृदय स्त्रीक पुत्रकामना व्यक्त करइत सोहर अछि - पॉच गाछ रोपल आप पॉचे गाछे इमली रे । ललना तइयो ने सोभय बगीचबा एकहि चनन बिनु रे ।। नहिरा में छथि पॉच भइया आओर पॉच भातिज रे । ललना तइयो ने भावए नइहरबा एकहि अमा बिनु रे ।। ससुरा में छथि पॉच जाउत आओर पॉच जइधी रे । ललना एक नहि भाबए सासुरबा अपन होरिला बिनु रे ।। गंगा पइसी नहइतहुॅ हरिवंश सुनितहुॅ रे । ललना सूति उठि लगितहुॅ गोर कि दैव सहाय हएत रे ।। ललना एकहि पुत्र दैव दीतथि जिउरा जुड़बितहुॅ रे ।। बच्चा जन्मक समय प्रसव पीड़ा सॅ विह्वल स्त्रीक मनोदशाक वर्णन सेहो स्वाभाविक लगइत अछि । एहि प्रसंगक सोहर अछि है इस प्रसंग के सोहर गीत में । प्रसव पीड़ाक वेदना मे स्त्री अपन सासु ,जेठानी आ ननदियो कें स्वार्थी आ कठोर बूझऽ लगैत अछि आओर पुत्र प्राप्तिक बाद सभ कष्ट कंे बिसरि जाइत अछि । पुत्र जन्मक खुशी मे ओकरा सभक बेवहार नीक लगइत अछि । एहि भाव कें व्यक्त करइत सोहर अछि - अपन माए मोरा रहितइ , मुुंहवां निहारितइ ,दरद बॉटि लीतइ हो । ललना पिया जी के माए निरमोहिया होरिला होरिला करइ हो ।। अपन भाउज मोरा रहितथि डॉड़ लागि बइसतथि हो । ललना पिया जी के भाउज निरमोहिया भानस भानस करइ हो ।। आधा राति बीतल पहर राति आरो भिनसर राति हो । ललना होइते भिनसर पह फाटल होरिला जनम लेल रे ।। ललना पुत्र फल पाओल से देखि सब दुःख बिसरल रे ।। मिथिला मे जन्मक प्रथम उत्सव छठिहार होइत अछि । एहि उत्सव मे ननदि आ भाउजक बीच हास परिहासक जे स्वाभाविक रूप मिथिला मे अछि तकर अभिव्यक्ति खेलउना और बधइया गीत मे अछि । ननदि आ भाउजक बीच मधुर संबंध कें व्यक्त करइत एक खेलउना मे छठिहारक अवसर पर ननदि कंे बजाबऽ लेल पति सॅ आग्रह करइत भावव्यक्त होइत अछि - पिया तोर गोर लागूॅ ननदी मॅगा दे । जब रे ननदिया नगर बीच आएल । पूरी मिठाई बड्र्र्र्ऱा मीठ लागे ।। पिया तोर गोर लागूॅ जब रे ननदिया दुअरे बीच आएल । बिछिया बाजे बड़ा मीठ लागे ।। पिया तोर गोर लागूॅ जब रे ननदिया आॅगन बीच आएल । ननदी के बोली बड़ा मीठ लागे ।। पिया तोर गोर लागूॅ जब रे ननदिया सोइरी बीच आएल । बेसरि मॉगे बड़ा तीत लागे ।। पिया तोर गोर लागूॅ ननदी मॅगा दे ।। आओर भाउज आ ननदिक बीच हास परिहास एहनो होइत अछि जाहि मे ननदि इनामक मांग करइत अछि आ भाउज ओहि मांग के अपना तर्क सॅ टारबाक कोशिश करइत अछि । ननदि- सब गहना में नथिया बड़ा महराजा हो राज ।। भाउज- नथिया ने लेइ ननदिया हो महराजा हो राज ।। ;ननदि बच्चा कंे उठाकऽ चलि दैत अछि । तखन भाउज कहइत अछि द्ध लय गेलइ बबुआ उठाय हो महराजा हो राज । दए जाहु ननदी बउआ हमार महराजा हो राज ।। लए जाहु भइया उठाय हो महाराजा हो राज । ननदि- हम लेबइ भइया के राज हो महाराजा हो राज ।। भाउज- जौं तोहें लेब ननदी भइया के राज महाराजा हो राज । की लेतइ बउआ हमार हो महाराजा हो राज ।। भाउजक तर्कक समक्ष ननदि हारि जाइत अछि तखन ननदि बधैया गबइत अधिकार पूर्वक भाउज सॅ कहैत अछि - बधइया हम लेबउ भउजी हे ।। अॅउठी आ मुनरी हम नहि लेबइ। जड़ाउदार कंगना भउजी हे ।। बधइया बाली आ कनफूल हम नहि लेबइ । मीनादार नथिया भउजी हे ।। बधइया बाजू बिजउठा हम नहि लेबइ । घॅुघरूदार पायल भउजी हे ।। बधइया रेसम के सरिया हम नहि लेबइ । लहरदार चुनरी भउजी हे ।। बधइया हम लेबइ भउजी हे ।। मुदा आब एहि सब तरहक गीतक परंपरा लुप्त प्राय अछि तें इ गीत सभ सेहो लुप्त भऽ रहल अछि । एहि सभ गीतक परंपरा लुप्त भेला सॅ लौकिक परंपरागत संबंधक मधुरता कोन रूप मे प्रभावित भऽ रहल अछि विचारणीय अछि संगहि इहो विचारणीय अछि जे ओहि आदर्श कें बचाबऽ के विकल्प कोना खोजल जाय । मिथिलाक लुप्तप्राय गीत- विवाह संस्कारक लुप्तप्राय गीत मिथिला मे अत्यंत व्यापक रहल अछि विवाह संस्कार गीतक परंपरा । विवाहपूर्वहि सॅ गीतक रीत अछि मिथिलाक लोक जीवन मे । विवाह योग्य कन्याक हेतु जखन सुयोग्य वर खोजऽ लेल पिता आ अन्य संबंधी लोकनि जाइत छथि तखन जे गीत गाओल जाइत अछि से सम्मर ,कुमार ,लगन आदि गीतक नाम सॅ जानल जाइत अछि । एहने एकटा सम्मर के बानगी अछि जकर विषय सीता स्वयंवर सॅ संबंधित अछि । मिथिलाक बेटी रूप मे सर्वमान्य सीताक विवाहक ओ सम्मर एखनहुॅ बीज रूप मे ,लोककण्ठ मे सुरक्षित किन्तु लुप्तप्राय अछि । से गीत अछि - जानकि अंगना बहारल धनुखा उठाओल हे । आहे पड़ल पिता मुख दृष्टि पिता प्रण ठानल हे ।। राजा राज ने भावय भाखथि रानी हे । आहे बेटी बियाहन जोग सुजोग वर खोजह हे ।। जे इहो धनुखा कॅे तोड़त देव लोक साक्षी हे। आहे राजा हो आ कि रंक ताहि देव जानकि हे ।। देश हि विदेश केर भूप स्वयंवर आयल हे । आहे धनुखा तोड़ल सीरी राम मंगल धुनि बाजल हे ।। विवाह सुनिश्चित भेला पर आंगन मे लगनक गीत गेबाक परंपरा रहल अछि । विवाह सॅ पूर्व कन्या क जे कोनो विध बेवहार होइत अछि ताहि मे लगनक गीत स्त्रीगण लोकनि द्वारा समूह मे गाओल जाइत अछि । एहन पारंपरिक गीतक पद आ धुन आबक विवाह संस्कार मे लुप्तप्राय अछि । लोककण्ठ सॅ प्राप्त एहने एकटा गीत अछि - राजा जनक जी कठिन प्रण ठानल आहो राम रामा । दुअरहि राखल धनुखिया हो राम रामा ।। जे इहो धनुखा केॅ तोड़ि नराओत आहो राम रामा । सीता केॅ व्याहि लय जाएत आहो राम रामा ।। देश हि विदेश केर भूप सब आएल आहो राम रामा । धनुखा केॅ छुबि छुबि जाय आहो राम रामा ।। लंकाधिपति राजा रावण आएल आहो राम रामा । ओ हो रे घुमल आधि बटिया हो राम रामा ।। मुनि जी के संग दुई बालक आएल आहो राम रामा । धनुखा तोड़ल सीरी राम आहो राम रामा।। विवाहक संबंध निश्चित कऽ बाबा अबै छथि आ विवाहक दहेज आ अन्य अनुष्ठान सभक चिन्ता मे सोचैत आॅखि मूनि बिछान पर पड़ि रहै छथि । आंगन मे सभक मोन मे विवाह सुनिश्चित हेबाक आनन्द आ उत्साह अछि । इ देखि बेटी केॅ जिज्ञासा होइ छै ओ बाबा सॅ हुनक एहि भावक कारण पुछैत अछि । एहि भावक एकटा ‘ कुमार ‘गीत अछि जाहि मे बाबा आ बेटी विवाहक संबंध मे परस्पर जिज्ञासाक समाधान अछि। पारंपरिक कुमार गीतक से पद आ धुन लुप्तप्राय अछि । ओहने एकटा गीत अछि - बेटी- नदिया के तीरे तीरे बाजन बाजल किए बाबा सूतह निचिन्त हे । बाबा- किछु बाबा सूतल किछु बाबा जागल किछु रे बियाहक सोच हे ।। के हे सम्हारत एते बरियात , के हे करत कन्यादान हे । बेटी -भइया सम्हारत एते बरियात , बाबा करता कन्यादान हे ।। कथिए बिना बाबा खीरीयो ने होअए ,कथी बिनु होम ने होय हे । कथिए बिना इहो सइरा अन्हार भेल , कथी बिनु होमा ने होए हे ।। बाबा-दूध बिना बेटी खिरीयो ने होअए , घीउ बिनु होम ने होय हे । बेटा बिना इहो सइरा अन्हार भेल , धिया बिनु धर्म ने होय हे।। मिथिलाक विवाह संस्कार मे परिछन गीतक बहुतो पारंपरिक गीत आ धुन लुप्तप्राय अछि। ओहेन किछु धुनक परिछन गीतक उदाहरण एहि रूपेॅ देखल जा सकइछ । बेटी के लछमी आ जमाय के विष्णु रूप मे व्यक्त करैत पारंपरिक परिछन अछि - सखी हे लछमी के दुलहा लगइ छनि कोना ? जेना विष्णु उतरि अएला अंगना ।। सखी हे दुलहा के चानन लगइ छनि कोना ? जेना बिजुरि तरंग छिटकु नभ ना ।। सखी हे दुलहा के केस लगइ छनि कोना ? जेना साओनक श्याम घटा घन ना ।। सखी हे दुलहा के हाथ सोभय कंगना । जेना हरि केर हाथ सुदर्शन ना ।। सखी हे नहूॅ नहॅू दुलहा चलइ छथि कोना । जेना सिंह चलय निरभय वन ना ।। परिछनक बिध जखन आरंभ होइत अछि तॅ सबसॅ पहिल बिछ होइछ धुरछक अर्थात् दुलहाक स्वागतगीत । एहि मे एक सोहागिन स्त्री माथ पर कलश लऽ कऽ दुलहाक समक्ष ठाढ होइत अछि आ परिछनक डाला सजओने विधकरीक सॅग स्त्रीगण लोकनिक समूह धुरछक के गीत गबइत अछि । ओहि गीत मे दुलहा सॅ जलपूर्ण घट मे द्रव्य अर्पित करबाक संकेत होइत अछि । एहन एक गीत अछि - सुन्दरि नवेली ठाढ़ि धुरछक गाबथि हे सोहाओन लागे । सोना के कलसिया नेने माथ हे सोहाओन लागे ।। आनन्द बधावा बाजे नृप जनवासा हे सोहाओन लागे । दशरथ बिराजथि सुत के साथ हे सोहावन लागे।। सुनल अवधपति दुलहा के स्वागत सोहाओन लागे । कलशा मे देल मानिक सात हे सोहाओन लागे ।। तखन वशिष्ठ मुनि देल अनुशासन हे सोहाओन लागे । करू जाय सिया के सनाथ हे सोहाओन लागे ।। धुरछक के बाद जे परिछनक बिध होइत अछि ताहि मे अरवा चाउरक पीसल चानन ,सिन्दुर , काजर , ठऽक ,बऽक , बेसन , भालरि ,राई ,लवण आदि विविध उपचार सॅ सजाओल डाला होइत अछि बिध बेबहारक रीत परिछन गीत में व्यक्त होइत अछि । एहने एक परिछन अछि - सखिया परीछू दुलहा हरषि अपार हे । जेहने सलोनी धीया तेहने कुमार हे ।। चानन सजाउ सखि ऊॅचे रे लिलार हे । काजर लगाउ सखी नयना किनार हे ।। निहुछू लवण राई टोनमा जे टार हे । बिहुॅसब चोराबे चित दिअ पान डार हे ।। लखिये हरैये सुधि बुधियो हमार हे । कनक परीछू खोलि अन्तर दुआर हे ।। एहन गीत गबइत दुलहा केॅ परीछि क आॅगन विवाहक वेदीक समीप ल जेबाक परंपरा अछि । दुआर सॅ आॅगन में प्रवेश भेला पर दुलहाक आॅगन मे स्वागत होइत अछि शुभकामनाक परिछन गीत सॅ । एहि भावक शुभकामना सॅ भरल परिछन गाबि गाइनि लोकनि दुलहा दुलहिन लेल शुभ शुभ कामना गीत मे व्यक्त करैत छथि । एहन एक गीत अछि - परीछि लिअ वर केॅ शुभे हो शुभे दूभि अक्षत निछारू शुभे हो शुभे ।। दधि केसर सम्हारू शुभे हो शुभे लगाउ निल दिठौना शुभे हो शुभे ।। लागे जइ सॅ नइ टोना शुभे हो शुभे नीहछू लौन राई शुभे हो शुभे ।। नैन करू आॅजनाइ शुभे हो शुभे फूल माला सजाउ शुभे हो शुभे ।।े पान बीड़ा पवाउ शुभे हो शुभे घ्राण बासू अतर दय शुभे हो शुभे ।। गाल सेदू शिला दय शुभे हो शुभे मूज लए मूजिआऊ शुभे हो शुभे ।। रही लऽ रहियाऊ शुभे हो शुभे धन्य सीता सहेली शुभे हो शुभे ।। ब्रह्म पाओल घरहि मे शुभे हो शुभे राखु हिय कोबरहि मे शुभे हो शुभे ।। आब आगॉ लऽ चलियनु शुभे हो शुभे बिध आगॉ करबियनु शुभे हो शुभे ।। मिथिला मे पर्वतराज हिमालय केॅ राजा , गौरी आ भगवान शिव केॅ जमाय रूप मानि कऽ बेटीक विवाह मे शिव विवाहक परिछन गीतक परंपरा समृ( रहल अछि । शिव विवाहक एक परिछन अछि - शुभ दिन लगन बियाहन गौरी बनि ठनि दुलहा अएला हे । कंठ गरल नर उर सिर माला कंठ नाग लपटएला हे ।। शुभ दिन लगन ..... भाल तिलक शशिपाल लगैला जटा मे गंग बहएला हे । बूढ़ बड़द असवार सदासिब डमरू डिमिक बजएला हे ।। शुभ दिन लगन ..... भूत परेत डाकिन साकिन संग जोगिन नाच नचएला हे । अन्हरा लुलहा बहिरा लंगरा अगनित भेस सोभएला हे ।। शुभ दिन लगन ...... स्वान सुगर सिर जाल मुखर तन संग बरियतिया लएला हे । नगरक लोक सब सुनि सुनि बाजनि कोठा चढ़ि कऽदेखएला हे ।। शुभ दिन लगन ..... बजर परौ बरियात भयंकर सब कोई देखि पड़ैला हे । साहस करि सब सखियन संग भए परिछन मैना कएला हे ।। शुभ दिन लगन ..... नाग छोड़ति फुफुकार डेरएला खसति पड़ति घर अएला हे । सब बरियतिया हुलसति छतिया सब जन बासा गएला हे ।। शुभ दिन लगन..... कन्यादानक वैदिक कर्मकाण्डीय विधिक बीच कन्यादानक गीतक परंपरा सेहो नवतुरिया पीढ़ीक बीच लुप्तप्राय अछि । एहन गीत मे शिव पार्वतीक विवाहक कन्यादान गीत गेबाक परंपरा अछि । एहन एक गीत अछि - देखियनु देखियनु हे बहिना जनक सुनयना मणिमंडप पर सुता दान दए ना ।। जनु मएना हिमगिरि पुनि अएला पुण्य सुकृत अयना । देखु दुलह दुलहिन के जोड़ी चारू रती मएना ।। पुलकित तन हुलसैछ मगन मन फूटनि नहि बएना । कर पर करतै पर फल अक्षत शंख सुसोहय ना ।। सदानंद मृदु मंत्र पढ़ावथि करथि लोक विधि ना । सियाराम वात्सल्य भाव रस हिय मे उमड़य ना ।। देखियनु देखियनु हे बहिना ।। सीता राम विवाहक जे कन्यादान गीत अछि ताहि मे बेटीक वियोगक करूणा भाव व्यक्त अछि । बेटीक प्रति माएक भाव एहन गीत मे व्यक्त होइत अछि । मुदा आबक विवाह मे ई गीत सभ लुप्तप्राय अछि । कन्यादानक एहन एक गीत अछि - जॅघिया चढ़ाए बाबा बैसला मण्डप पर बाबा करू ने धीया दान हे । वर कर कंजतर ललीकर ऊपर ताही मे सोहत फल पान हे ।। गुरू वशिष्ठ जी मंत्र उचारथि मंत्र पढ़थि सीरी राम हे । सब सखियन मिलि मंगल गाबथि फुलबरिसत वहु वार हे ।। सिसकि सिसकि कानथि मातु हे सुनैना आब बेटी भेल वीरान हे । जाहि बेटी लेल हम नटुआ नचओलहुॅ सेहो बेटी भेल मोर वीरान हे ।। चुपे रहू चुपे रहू मातु हे सुनयना ई थिक जग बेवहार हे ।। बरियातीक भोजनक समय मे प्रचलित ‘जेवनार ‘ गीत सेहो लुप्तप्राय अछि । परंपरा सॅ ई प्रचलन रहल जे जखन बरियाती भोजन जेमय बैसथि तॅ हुनक स्वागत जेवनार गीत सॅ कएल जाए । एहि गीत मे हास्य विनोदक शब्द ,स्वर आ प्रस्तुति सॅ परिपूर्ण बरियातक भोजन सेहो देखऽ जोग होइत छल । आब ओहन पद सभक गायन लुप्तप्राय अछि । ओहने एकटा ‘जेवनार‘ गीत अछि - भोर भए मिथिलापति मंदिर समधी जेमन आयो जी ।। खोआ के गिलाबा बना के बरफी के इटावा जोरायो जी । इमरती जिलेबी के जॅगला लगायो गुलजामुन के खंभा लगायो जी ।। भोर भए.... पापड़ के सखी छवनी छवायो निमकी के फाटक बनायो जी । दही चीनी के चूना पोतायो रचि रचि महल बनायो जी ।। भोर भए ...... पूड़ी कचैड़ी बिछौना बिछायो मलपूआ के चनमा टॅगायो जी । लड्डू के लटकन लटकायो खाजा के झाड़ लगायो जी ।। भोर भए .... मंदिर मे बइसल समधी जन बाजे आनन्द बधाबा जी । छप्पन भोग बत्तीसो बेअंजन भरि भरि सोने के थारी जी ।। भोर भए मिथिलापति मंदिर समधी जेमन आयो जी ।। दुलहा मे धैर्य ,विनम्रता आ सहिष्णुताक भाव जगाबऽ लेल ‘डहकन ‘गीतक परंपरा रहल अछि । मान्यता अछि जे मिथिला मे भगवान श्रीराम सेहो विवाह मे मैथिलानीक गारि सुनि कऽ प्रसन्न भेल छलाह तेॅ ई परंपरा निर्बाध प्रचलित रहल । श्री राम लला केॅ जे गारि डहकन मे सूनऽ पड़लनि तकर पद अछि - राम लला सन सुन्दर वर केॅ जुनि पढ़ियनु कियो गारि हे ।। केवल हास विनोदक पुछियनु उचित कथा दुई चारि हे ।। राम लला .... प्रथम कथा ई पुछियनु सजनी गे कहता कनेक विचारि हे । गोरे दशरथ गोरे कोशिल्या राम भरत किए कारी हे । । राम लला .... सुनु सखी एक अनुपम घटना अचरज लागत भारी हे । खीर खाय बेटा जनमओलनि अवधपुरी के नारी हे ।। राम लला .... अकथ कथा की बाजू सजनी हे रघुकुल के गति न्यारी हे । साठि हजार पु़त्र जनमओलनि सगरक नारि छिनारी हे ।। राम लला ..... मिथिला मे दुलहा सॅ हॅसी मजाकक परंपरा सेहो डहकन गीत मे अछि । दुलहाक समक्ष विवाहक विविध विध बेवहार सम्पन्न कराबऽ लेल उपस्थित गाइनि लोकनि डहकन गाबि कऽ दुलहा सॅ मजाक करैत छथि आ सब लोक हठाका लगाकऽ एकर आनंद लैत अछि । एहने एक गीत मे दुलहा के संबोधित गाइनि लोकनिक भाव अछि - दुलहा गारि ने हम दइ छी बेवहार करइ छी । हम्मर बाबा छथि कुमार अहॉ के दाई मॉगइ छी ।। दुलहा गारि ने हम दइ छी एकटा बात कहइ छी । हम्मर बाबू छथि कुमार अहॉ के माई मॉॅगै छी ।। दुलहा गारि ने हम दइ छी एक विचार पूछै छी । हम्मर भइया छथि कुमार अहॉ के बहिन मॉगै छी ।। विवाहक पश्चात् दुलहा दुलहिनक शयन कक्ष कोहबर मे चारि दिन तक रहबाक जे परंपरा अछि तकर पोषण करैत अछि कोहबर गीत । एहि तरहक गीत मेे कोहबरक बिलक्षण वर्णन होइत अछि जे दुलहा दुलहिन मे परस्पर प्रेम भाव केॅ बढ़ाबऽ बला भाव जगबइत अछि । सीता रामक कोहबर गीत मिथिलाक विवाह संस्कार गीत मे विशेष प्रसि( रहल अछि । मुदा आब ई गीत आ धुन लुप्तप्राय अछि । एहने एक गीत अछि - कंचन महल मणिन के दियरा कंचन लागल केबाड़ रे बने बॉस के कोहबर ।। गज दन्त सेज आ फूलक बिछौना । रतन के बनल श्रृंगार रे बने बॉस के कोहबर ।। ताहि पर सूतथि रघुवर दुलहा । सीता दुलहिन संग बाम रे बने बॉस के कोहबर ।। यों मुख फेरि सोवे रघुवर दुलहा । दुलहिन सोवे करि मान रे बने बॉस के कोहबर ।। दुलहा दुलहिन अंग परसि परस्पर । हरषि नयन जल छाय रे बने बॉस के कोहबर ।। मिथिला मे विवाह संस्कारक अभिन्न अंग अछि मधुश्रावणी । एहि पर्व मे नवविवाहिता तेरह दिनक व्रत अनुष्ठान एकभुक्त पूर्वक करैत छथि । नित्य दिन अपराह्ण मे फूल लोढ़ि कऽआनबाब परंपरा अछि । एहि परंपरा मे गाम भरिक नवविवाहिताक टोली फूल लोढ़बाक गीत गावि मनोरंजनपूर्वक व्रत निष्ठाक पालन करैत अछि । नाग नागिनक पूजा कएल जाइत अछि ताहि बीच बिसहाराक गीत गाओल जाइत अछि । ई दूनू तरहक गीत आब लुप्तप्राय अछि । फूल लोढ़ऽ सॅ संबंधित गीत अछि - दुई चारि सखी सब सामर गोरिया कुसुम लोढै़ लेै चललि मालिन फुलवरिया कुसुम लोढ़ै लए चलली मालिन फुलबरिया ।। मॉग मे सिन्दुर सोभे माथे पे टिकुलिया पोरिया पोरिया ना सोभे अॅउठी मुनरिया पोरिया पोरिया ना । हाथ मे लेल सखी फूल के चॅगेरिया से रहिया चलइ ना ताके तिरछी नजरिया रहिया चलै ना ।। फूल लोढ़ऽ के गौरीगीत विशेष प्रचलित रहल अछि । इ गीत परंपरा सॅ आबि रहल अछि आ वर्तमानहु मे प्रचलित अछि मुदा नवतुरिया पीढ़ीक बीच लुप्तप्राय अछि । एहन एक गीत अछि - गौरी फूल लोढ़ऽ गेली फुलबरिया संग मे सहेलिया ना ।। केओ सखी आगॉ आगॉ चलली केओ सखी पाछॉ पाछॉ चलली । केओ सखी बीचे बीचे गेली फुलबरिया संग मे सहेलिया ना ।। राधा आगॉ आगॉ चलली सीता पाछॉ पाछॉ चलली । गउरी बीचे बीचे चलली फुलबरिया ।। संग मे... केओ सखी डाली भरि लोढ़लनि केओ फुलडाली भरि लोढ़लनि केओ सखी लोढ़ि लेलनि भरि फूल डलिया ।। संग मे..... राधा डाली भरि लोढ़लनि सीता फुलडाली भरि लोढ़लनि गउरी लोढ़ि लेलनि भरि फूल डलिया ।।संग में..... केओ सखी कृष्ण वर मॉगलनि केओ सखी राम वर मॉगलनि केओ सखी मॉगि लेलनि तपसी भिखरिया ।। संग मे..... राधा कृष्ण वर मॉगलनि सीता राम वर मॉगलनि गउरी मॉगि लेलनि तपसी भिखरिया संग में सहेलिया ना ।। मधुश्रावणी पूजा मे पवनइतिन जखन नाग नागिनक पूजा करइ छथि तखन हुनक सुहागक शुभकामना व्यक्त करइत बिषहारा गीत गेबाक परंपरा अछि । विषहारा गीत कथी के घइला बिषहरि कथीके गेरूलि राम कथी केर डोरी सॅ भरब निरमल जल ।। सोना के घइला विषहरि रूपा के गेरूलि राम रेशमक डोरी सॅ भरब निरमल जल ।। घइला भरि भरि बिषहरि असरा पुराएब राम एहि पर नाग बाबूू करथि असनान ।। ओहि पार बिषहरि माइ रोदन पसार राम छोरू छोरू आहे नाग आॅचर हमार ।। राम रोबइत होयतीह सेवक हमार ।। लबे लब नबेरिया भइया लबे बॉस खेब राम कोने भइया खेबनहार किये होयती पर ।। लबे लब नबेरिया भइया लबे बॉस खेब हे भैरव भइयार खेबनहार बिसहरि होयती पार।। जहिना जुड़ाएलि सुहबे तहिना जुड़ाउ राम तोरो कन्त जीबउ गेे सुहबे लाख बरिस ।। लुप्तप्राय अछि विवाह संस्कारक समदाउन । समदाउनक गायन बेटीक द्विरागमनक अवसर पर स्त्रीगण लोकनिक समवेत स्वर मे होइत अछि । नवतुरिया पीढ़ीक बीच करूणा प्रधान उदासी ओ समदाउन गीतक पद आ भास प्रायः लुप्तप्राय अछि । दू विभिन्न भासक गीत उल्लेखनीय अछि - गोर लागूूॅ पैयॉ परूॅ सुरूज गोसइयॉ बेटी केे जनम जुनि देब ।। बेटी के जनम जुनि देब हे विधाता निरधन कोखि जन्म जुनि देब ।। निरधन कोखि जन्म जॅओ देब हे विधाता रूप अनूप जुनि देब ।। रूप अनूप जॅओ देब हे विधाता पुरूख मुरूख जुनि देब ।। कहरिया भासक एक समदाउन मे सीताक नहिरा सॅ बिछोहक करूणा भाव व्यक्त अछि - सुभग पवित्र भूमि मिथिला नगरिया । हमरा केॅ कहॉ नेने जाइ छेॅ रे कहरिया । बेला ओ चमेली चम्पा मालती कुसुम गाछ । आब कहॉ देखबई हाय रे कहरिया।। सुन्दर सुन्दर वन सुन्दर सुन्दर घन सुन्दर सुन्दर सब बाट रे कहरिया । केरा ओ कदम्ब आम पीपर पलास गाछ । आब कहॉ देखबइ हाय रे कहरिया ।। किनकर नयना सॅ गंगा नीर बहि गेल किनकर हृदय कठोर रे कहरिया । माएक नयना सॅ गंगा नीर बहि गेल बाबू के हृदय कठोर रे कहरिया ।। केहि मोरा सॉठल पउती पेटरिया । केहि मोरा देल धेनु गाय रे कहरिया । माए मोरा सॉठल पउती पेटरिया । बाबू मोरा देल धेनु गाय रे कहरिया ।। बाबा के मुॅह हम देखबइ कोना आब काकी कोना बिसरब हाय रे कहरिया । भाइ भतीजा आओर सखिया सलेहर आब कहॉ देखबई हाय रे कहरिया ।। आगॉ आगॉ रामचन्द्र पाछॉ भाइ लछुमन पहुॅचि गेल झटपट अवध नगरिया। महल मे कोसिला रानी आरती उतारए लगली अयोध्या बाजए बधाई रे कहरिया।। मिथिला के व्यावहारिक लोकगीत मे परस्पर सहयोग एवं श्रम प्रधान गीत ‘लगनी ‘;जॅतसार द्ध गृहस्थीक अभिन्न अंग रहल अछि । ई गीत जॉत चलबइत दू स्त्रीक स्वर मे गायनक परंपरा रहल अछि । लगनी गीत भक्तिभाव ,करूणा आ व्यवहार प्रधान हेबाक कारणेॅ परस्पर संबंध के समृ( बनेबा मे सहायक अछि । मशीनीकरणक युग मे जॉतक चलन प्रायः बन्द भऽ गेल ,मुदा दूर देहात मे एखनहुॅ कतहुॅ कतहुॅ लोक कण्ठ मे सुरक्षित अछि लगनीक गीत आ एकर भास । राधाकृष्ण भक्ति पर आधारित किछु लगनी गीत साहेबदास पदावली सॅ संकलित कए प्रस्तुत अछि । ;1द्ध बसहुॅ वृन्दावन मोर जीवन धन आ रे कान्हा सुनि सुनि छतिया मोरा सालय रे की ।। जौं तोहें जएबह हरि जियबइ ने एको घड़ी । आ रे कान्हा हमर सपथ तोहि माधव रे की ।। जाहु जुनि मधुबन तेजि कहुॅ मोहन । आ रे कान्हा हमर सपथ तोहि माधव रे की ।। कंस के जान हॅति दइए अधम गति । आ हे राधा साहेब आओत कृष्ण माधव रे की ।। ;2द्ध काहि कहब दुःख वचन ने आबए मुख । आ रे उधो धइरज धएलो नहि जाइछ रे की ।। किए तेजि हरि गेल कुबुजी अधीन भेल । आ रे उधो केओ ने कहए एहि गोकुल रे की ।। शरण धएल जन्हि दुःख न पाओल तनि । आ रे उधो सत्य निगम गुण गाओल रे की ।। कत गुण गएबउ कत नित हम रोएबउ । आ रे उधो कओन साहेब हरि आनब रे की ।। ;3 कत दूर मधुपुर जतए बसए माधव । आ रे सजनी वन वन माधव मुरली टेरए रे की ।। अनबो मे चनन काठी लिखबो मे भाति भाति । आ रे सजनी दुख सुख लिखियो बनाइए रे की ।। एक अंधियारी राति हरि बिन फाटय छाती । आ रे सजनी कोइली शबदे हिया मोरा सालय रे की ।। साहेब गुनि गुनि बैसलहुॅ सिर धुनि । आ रे सजनी जगत जीवन नियरायल रे की ।। मिथिला मे प्रचलित )तुप्रधान गीत मे मलार गीत आ धुन सेहो लुप्तप्राय अछि । मिथिला मे मलार गीतक परंपरा समृ( रहल अछि । वर्तमान मे मलारक ओ गीत आ धुन लुप्तप्राय अछि । मलार गीतक किछु पद साहेबदास पदावली सॅ संकलित प्रस्तुत अछि । ;1द्ध अली रे प्रीतम बड़ निरमोहिया ।। आतुर वचन हमर नहि मानए । परम विषम भेल रतिया ।। कॉपत देह घाम घमि आवत । ससरि खसत नव सरिया ।। आवत वचन थिर नहि आनन । बहत नीर दुहू अॅखिया ।। रमानन्द भामिनि रहूॅ थिर भए । सुख बीच कहू दुःख बतिया ।। ;2द्ध हे उधो लिखब कओने विधि पाती ।। अंचल पत्र नयन जल काजर । नख लिखि नहि थिर छाती ।। चन्द्र किरण बध करत एतय पिय । ओतय रहहु दिन राति ।। रेशम वसन कनक तन भूषण तेसर पवन जिबघाती ।। कहथि रमानन्द सुनु विरहिनि तोहे । आओत श्याम विरहाती ।। हे उधो लिखब कओने विधि पाती ।। ;3द्ध हे उधो बड़ रे चतुर घटबरबा ।। दूर सॅ बजओलनि नाव चढ़ओलनि । खेबि लए गेल मॅझधरबा ।। नाव हिलओलनि मोहि डेरओलनि । कएलनि अजब खियलबा ।। आॅचर धएलनि मोहि झिकझोरलनि । तोड़लनि गजमोति हरबा।। सुकविदास कह तुम्हरे दरस को । जुग जुग जीबए घटबरबा ।। प्रेम ,श्रृंगार आ रति भावक अभिव्यक्ति सॅ परिपूर्ण बटगमनी गीतक परंपरा सेहो लुप्त प्राय अछि । ओना एखनहु मांगलिक अनुष्ठान मे जखन स्त्री गण लोकनिक समूह ग्राम देवता डिहबार,ब्रह्मस्थान , माटिमंगल , आम महु बियाह आदि विधि लेल ढोल पिपही बाजा के संग निकलैत छथि तॅ बाट मे बटगमनी गीत गबइ छथि । मुदा नब पीढ़ीक मैथिल ललनाक बीच ओहि उमंग उत्साह आ प्रगल्भताक अभाव तॅॅॅ अछिए ,ओहन गीतक प्रति उदासीनताक कारणेॅ ओ बटगमनी गीत सभ लुप्त प्राय अछि । ओहने किछु संग्रहित बटगमनी प्रस्तुत अछि । स्नेहन , चुम्बन , आलिंगन ,राग आ अनुराग युक्त संभोगक वर्णन नायिकाक उक्ति मे प्रस्तुत बटगमनी अछि - कॉच कली पहु तोड़थि सजनी गे , लए कोरा बैसाए सजनी गे ।। अधर सुधा सम पीबथि सजनी गे , यौवन देखि लोभाय सजगी गे ।। लए भुजपाश बान्हि दुनू सजनी गे, जखन करथि बरजोरि सजनी गे ।। तखनुक गति की कहिए सजनी गे, पहु भेल कठिन कठोर सजनी गे ।। नहि नहि जौं हम भाखब सजनी गे , तौ राखिए मन रोख सजनी गे ।। पति जखन बहुतो दिन पत्नी केॅ विरह मे व्याकुल केलाक बाद अबैत अछि तॅ पति सॅ मिलनक उत्साह केहन भऽसकैत अछि ? बहुत दिनक बाद परदेश सॅ आएल पति सॅ मिलन हेतु की की तैयारी आ साज श्रृंगार करबाक उत्कंठा होइत अछि , तकर वर्णन करैत बटगमनी अछि - कतेक दिवस पर प्रीतम सजनी गे आएल छथि पहु मोर सजनी गे ।। मन दए नेह लगाएब सजनी गे , रचि रचि अंक लगाएब सजनी गे ।। पहु थिक चतुर सयानहि सजनी गे , हम धनि अंक लगाएब सजनी गे ।। ई दिन जौं हम काटब सजनी गे , तखन करब बर गान सजनी गे ।। गाबि सुनेबनि हुनकहुॅ सजनी गे , पहु करता बड़ मान सजनी गे ।। कृपानन्द झा (1970- ), जन्म- समौल, मधुबनी, मिथिला। गणितमे स्नातकोत्तर (एल.एन.एम.यू, दरभंगा), बी.लिब. (जामिया मिलिया इस्लामिया) आऽ सोचाना विज्ञानमे एसोसिएटशिप, आइ.एन.एस.डी.ओ.सी., नई दिल्ली। कृपानन्द जी मीरा बाइ पोलीटेकनिक, महारानी बाग, नई दिल्लीमे व्याखाता छथि। कृपानन्दजी यूथ ऑफ मिथिलाक अध्यक्ष छलाह आऽ एखन अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली परिषदक जेनरल सेक्रेटरी छथि। हिनकर ६ टा शोध पेपर सूचना प्रबन्धनक क्षेत्रमे प्रकाशित छन्हि, संगहि हिन्दी आऽ अग्रेजीमे एक-एकटा कविता सेहो प्रकाशित छन्हि। मैथिलक जन नायक चुनचुन मिश्र (25/10/1942—16/11/2010) चुनचुन मिश्र ओ मुखियाजी जीक 25/10/1942 केँ भारतक आजादीक सन्घर्षक गर्भसँ जन्म भेलनि। हुनकर जन्मक वर्ष हुनकर सम्पूर्ण जिनगीमे झलकैत रहल। ओ आजन्म मिथिला ओ मैथिलीक लेल संघर्षरत रहलाह। अपन जीवनक अन्तिम क्षण धरि ओ मिथिला राज्यक लेल संघर्ष करैत रहलाह। 16-11-2010 केँ 2 बजे प्रात: काल मिथिला राज्यक सपना लेने चुनचुन बाबू एहि दुनियाकेँ छोड़ि चलि गेलाह। चुनचुन बाबूक जन्म रहिका गाम, तहिया दरिभंगा जिला आ आब मधुबनी जिलामे भेलनि। हुनकर प्रारम्भिक शिक्षा रहिका एवं वाटशन स्कूल, मधुबनीमे भेलनि। ओ 1960 ई वाटशन स्कूल, मधुबनीसँ मेट्रिक पास केलनि। ओकरा बाद आर. के. कॉलेजसँ 1966 मे स्नातक कएलनि। चुनचुन बाबूक विवाह 1960 ई मे श्रीमति प्रेमलता मिश्रक संग भेलनि। हुनका 4 पुत्र आ 3 पुत्री छथिन। सब पुत्र आ पुत्रीक विवाह दान भय गेल छनि। भरिघर नैत, नातिन, पोता आ पोती सब छैनि। निवर्तमान हुनक पत्नी रहिका मे परिवरक सन्ग रहिरहल छथि। समाजिक ओ राजननीतिक जीवन 1966 मे मिथिलाक महन सोसलीष्ट नेता बाबू सूर्य नरायण सिन्ह के सम्पर्क मे आबि सोसलीष्ट पर्टी के समर्पित कर्यकर्ता भय गेल छलाह्। 1978 ई मे ओ रहिका पन्चायत के मुखिया चुनल गेलाह्। पुन: ओकरा बाद 2001 में मुखियाक चुनाव भेल जाहि में पुन: ओ मुखिया चुनल गेलाह्। 1980 ई में जखन मैथिली के दरकिनार करैत बिहार मे उर्दु के बढावा देल गेल त चुनचुन बबू मैथिली अन्दोलन में कुदि गेलाह्। 1992 मे जहन श्री लालू प्रसाद मैथिली के बी पी एस सी स निकालि देलखिन तखन मैथिली सेवी सब उग्र अन्दोलन कैलनि। ओहि में चुनचुन बाबू दिल्ली में आमरण अनसन पर बैसि गेलाह्। 2000 में मधुबनी में मैथिली के अष्टम शूची मे सामिल करवाक लेल आमरण अनशन पर पर 12 दिन तक रहलाह्। 1994 मे मिथिला राज्य सन्घर्ष समिति के उपाध्यक्ष मनोनीत भेलाह जकर अध्यक्ष डा जय कन्त मिश्र छलाह्। एहि संस्थाक संस्थापक सेहो डा जय कन्त मिश्र के नेत्रित्व मे अन्तरराष्ट्रिय मैथिली परिषदक अन्तर्गत भेल छल्। जय कन्त बाबुक निधन के बाद राज्य सन्घर्ष समिति के अध्यक्षक भार चुनचुन मिश्र के फ़रवरी 2010 में देल गेलनि। हुनकर नेत्रृत्व में मधुबनी, दरिभंगा, मुजफ़्फ़रपुर, समसतीपुर, पटना आदि कतेको जगह मिथिला रज्यक निर्माणक लेल धरना प्रदर्शन भेल्। एकरा अलावा ओ नेपालक मैथिल मे सेहो क्रियासील रहलाह्। चुनचुन बबू जनकपुर, सिरहा, राजविराज, आदि मे सेहो मैथिली अन्दोलनकारी के मर्गदर्शक छलाह्। नेपाल मे हुनकर लोकप्रीयताक पता तखन चलल जखन हमरा ईमेल पर नेपालक 4-5 टा मुख्या अखबार मे छपल श्रद्दान्जलीक कटिंग आयल्। विचारधारा चुनचुन बबू के जीवन, सन्घर्ष करवाक तरिका ओ जुझारूपन में सोसलीज्म झलकैत रहल। एकटा आधा बाहि वाला कुर्ता, दू टा कपरा वाल गन्जी, एकटा गमछा आ एकटा धोती बस, सबटा एकटा झोरा मे। कोनो लाम काफ नहि। कोनो रिजर्वेशन के चिन्ता नहि। जेबी में पाई अछि की नहि तकरो चिन्ता नहि। कहब छलनि जहन समाजक काज कारैत छी त समाजे ने पूरा कर्तैक सबटा! ककरो डर नहिं। मधुबनी, दरिभंगा, मुजफ़्फ़रपुर बेगूसराय, भागलपुर, देवघर, जनकपुर, सिरहा, सुरसरि, कानपुर, बम्बई, दिल्ली, हैदराबाद आ कतय नहि, चुनचुन बाबू सबठाम्। आन्दोलन मैथिली के अष्ट्म सुचीक लेल हो, मिथिला राज्य के लेल हो, या सैराठ सभाक उत्थान के लेल चुनचुन बाबू के अगुआ बिना एखन धरि कोनो कार्य सम्भव नहि भेल छल्। दिल्ली मे हुनका देखितहि Intelligence ओ दिल्ली पुलीस सब कहनि, “आ गये मिथिला राज्य वाले”। 22-12-2009 क जन्त्तर मन्तर पर एकटा पुलीस कहलकनि “बाबा आप चौरहे से पीछे जा कर धरना पर बैठिये, यहाँ जाम लग जयेगा” चुनचुन बाबू कहल्थिन “कोनो हम पहुनाई करय आयल छियैक, हम त धरना पर आयल छियौक, बैसबौ त एहिठाम, हिम्मत छौ त पकरि क हमरा जहल में दय दे। ओहि समय मात्र 15-20 आदमी जमा भेल छलाह्। चुनचुन बाबू के 27/11/2010 के अन्तरराष्ट्रि मैथिली परिषद मैथिलक जन नायक के उपाधि स सम्मानित केलक्। हमर परिचय चुनचुन बाबू स हमर पहिल भेंट 2005 के अन्तरराष्ट्रि मैथिली परिषदक, जयपुर सम्मेलन में भेल छल्। तहिया स ओ हमरा लेल ओ आदर्नीय आ अनुकर्नीय मैथिली सेवी रहलाह्। आब ओ किछु दिन स अस्वस्थ रहैत छलाह्। 16-10-2010 क बेनीपट्टी क्षेत्र जयबा काल हुनकर अन्तिम दर्शण भेल आ तखनहु ओ स्वस्थ नहि छलाह मुदा कहलनि जे 2012 मे मिथिला राज्यक लेल पूरा दरभंगा मधुबनी जाम कय देबैक। ओ कहलनि जे दिसम्बर मे जन्त्तर मन्त्तर पर धरना पर बैसवाक लेल आबि रहल छी। पुन: भेंट होयत। हमरा नहि बूझल छल जे चुनचुन बाबू स पुन: भेंट नहि होयत। परन्तु एहि मैथिलीक सपूत के हम आजन्म नमन करैत रहब आ हुनकर मिथिला रज्याक सपना पुरा करब। माँ मैथिली अहाँके शान्ति दैथि चुनचुन बाबू। चौकपर आणविक समझौता साँझ काल गामक चौकपर गहमा-गहमी छलैक। टोनुआँक दोकानपर चाहक गिलास खनखना रहल छलैक मंडलजी पान लगेवमे व्यस्त छलाह। कनीक दूरपर दुर्गा मन्दिरक पुवरिया कात बनल चबुतरापर दस-बारह युवा आ वृद्ध सम सामयिक चर्चामे मग्न छलाह। बीचमे मन्नू भाइक आवाज जोड़सँ आयल। “हौ! एहन कोन आफद आबि गेलैक अपन देशपर जे प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंहजी अपन देशक वैज्ञानिकक लगभग पछिला पचास वर्षक तपस्या आ अनुसंधान तथा भविष्यक आणविक सामरिक अनुसंधानकेँ अमेरिकाक हाथ बंधकी रखबापर उतारु भय गेल छथि। गगनजी चबुतरापर सँ उचकि पानक पीक कातमे फेकैत कहि उठलाह, “कक्का! एहन बात नहि छैक। ई समझौता मात्र अपन देशक महज ऊर्जा आवश्यकताकेँ ध्यानमे राखि कएल गेल-हँ!.. मन्नू भाई तम्बाकू ठोढ़मे दैत कहलखिन, “है। ई ऊर्जा आवश्यकता महज बहाना छैक। अमेरिका एहि बहाने अपन देशक स्वतन्त्र आणविक कार्यक्रममे टाँग अड़ेबाक फिराकमे बहुत दिनसँ छल। आब ओ अपन मनशामे १२३ समझौता आ ओहिमे हाइड एक्टक प्रावधान सौँ सफल भय रहल अछि”। गगन जी थोड़ेक चिन्तित मुद्रामे कहलखिन- “देखियौ कक्का, जहाँ तक १२३ समझौता आ भारतक आणविक सामरिक कार्यक्रमक प्रश्न छैक तँ मात्र ओ सब रियेक्टर अंतर्राष्ट्रीय एजेन्सीक देखरेखमे आनल जेतैक, जे सब रियैक्टर, भारत सरकार चाहतैक। तेँ बाकी कार्यक्रमपर एकर असर नहि परतैक”। “हाँ हौ! लेकिन ई अनबाक कोन जरूरी छैक?” मन्नू भाई आवेशमे बजलाह। ताधरि बैंकर सैहैब सेहो सहटि कय चबुतरा दिश आबि गेल छलाह। गम्भीर आवाजमे मन्नू भाईकेँ सम्बोधित कय कहलथिन- “भाई, किछु एहन प्रावधान सभ जरूरी छैक एहि समझौतामे, परन्तु ई सभ निर्भर करैत छैक जे भविष्यमे भारतक स्थिति अंतर्राष्ट्रीय स्तरपर कतेक मजबूत रहैत छैक आ हमर राजनीतिज्ञ सब परिस्थितिसँ कतेक फायदा उठबैत छथि। कारण जे ड्राफ्ट एखन प्रस्तुत कएल गेल छैक ताहिमे कोनो कन्फ्लिक्टक स्थितिमे की कदम उठायल जायत आ ओ भारतक फायदामे होयत वा नुकसानमे से ओहि समयक देशक कूटनीतिज्ञ एवं अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितिपर निर्भर करत। परंच, वर्तमान परिस्थितिकेँ अगर देखल जाय तँ हमर देशक आणविक विद्युत उत्पादनक वर्तमान क्षमता मात्र ४०-५०% उत्पादन भय रहल अछि बाँकी आगू जे योजना छैक ओकरो अगर ध्यानमे राखल जाय तँ कहल जा सकैत अछि जे आणविक इन्धन एवं शान्तिपूर्व आणविकौपयोगसँ जुड़ल किछु तकनीककेँ यथाशीघ्र आवश्यकता छैक। “हौ बैंकर! ई पक्ष तँ छैक परंच एखनहु अगर सरकार आंतरिक संसाधनकेँ सही ढंगसँ दोहन करय तँ ई आणविक इंधनक समस्या अल्पकालिक साबित होयत”। मन्नू भाई किछु शान्त मुद्रामे बजलाह। अपन बातकेँ आगू बढ़बैत कहलखिन जे – “हौ, एखनहु जे योजना सब झाड़खण्डक (जादूगुड़ा, बन्दूहुरंग, तुरमडीह) आन्ध्र प्रदेशक (तुम्मालापल्ली) कर्णाटक, मेघालय आ राजस्थान आदि राज्यमे चलि रहल छैक ओ अगर सही ढंगसँ कार्यान्वित कयल जाय तँ आणविक इन्धनक ई वर्तमान समस्याक समाधान आसानीसँ कयल जा सकैछ”। चबुतराक उतरवरिया-पछवरिया कोनापर बैसल टुन्ना बाजि उठल, “यौ कक्का, मंडलजी पानक दोकान आब बन्द करताह! ८ बाजि रहल छैक”। बैंकर सैहैब जोड़सँ कहलखिन- “यौ मंडलजी! आठटा पान लगाकऽ एमहर पठाऊ”। चबुतराक पछवरिया कातमे मजहर सोचपूर्ण मुद्रामे साँझेसँ बैसल सबहक गप सुनि रहल छलाह। बैंकर सैहैब मजहरकेँ कहलखिन- “हौ मजहर! तूँ तँ एखन कम्पीटिशन सबहक तैयारी कए रहल छह। तूँ एहि सम्पूर्ण प्रकरण पर बहुत मंथन कयने हेब। आखिर तोहर सोच की छह”? खखसि गरदनि साफ कय खखाड़ कातमे फेकैत बजलाह- “भाईजी! अंतर्राष्ट्रीय आ आर्थिक नीति काफी संकीर्ण विषय छैक। पहिल बात अछि जे हमरा लोकनि एन.पी.टी.पर हस्ताक्षर केने बिना अंतर्राष्ट्रीय आणविक बाजारमे सेंह मारवाक कोशिश कय रहल छी। एहि हालतमे किछु ने किछु अंतर्राष्ट्रीय बंधन तँ स्वीकार करहिये परत। परन्तु हम एकरा एकटा अवसरक रूपमे देख रहल छियैक। आणविक क्षेत्रक किछु एहन पक्ष छैक जाहिमे हमर देशक अनुसंधान शायद अमेरिकोसँ ऊपर अछि। हालमे एकटा रिपोर्ट पढ़ने रही, जाहिमे कहल गेल छैक जे भारतक वैज्ञानिक २००५ आ २००६ मे प्रकाशित अनुसंधान रिपोर्टक आधारपर तकनीकी रूपसँ समृद्ध देश सबकेँ सेहो पाछू छोड़ि आगू बढ़ि गेल अछि। एहि स्थितिमे आणविक इन्धन आ किछु तकनीकक आयात तँ महज अल्पकालिक छैक। दीर्घकालिक असर हमरा जनैत ई हेतैक जे भारत किछु दिनका बाद आणविक क्षेत्रमे एकटा पैघ निर्यातक भऽ कऽ उभरत। एकरामे तकनीकी क्षमता छैक आ अन्तरि आणविक साधन, जे किछु काल पहिने चर्चा भेल जेना, झारखण्ड, आन्ध्रप्रदेश, मेघालय आदिमे उपलब्ध छैक तथा अंतर्राष्ट्रीय आणविक सहयोगक माध्यमसँ एकटा पैघ निर्यातक भेनाइ सम्भव छैक। तेँ हेतु हमर तँ एतबय कहब अछि जे जौँ एहि समझौताकेँ सही ढंगसँ उपयोग कयल जाय तँ ई अपन देशक लेल वरदान साबित होयत”। महेन्द्र मलंगिया : मूर्दाः श्रृंगार संघर्ष आ द्वन्द्व ई सर्वविदित अछि — काव्येषु नाटकं रम्यम् । अर्थात काव्यमे नाटक सभसँ आनन्दप्रद अछि । एहिसँ दू टा बात अभरिकऽ हमरा लोकनिक सोझामे अबैत अछि — पहिल तँ ई जे नाटक एक प्रकारक काव्य अछि आ दोसर, ओहि काव्यमे सभसँ बेसी आनन्दप्रद । एहि दुनूमेसँ दोसर बातपर कोनो आंगुर नइ उठल अछि । एकरा ध्वनि मतसँ सभ स्वीकार कएलक अछि , मुदा पहिल बातपर आंगुर उठव शुरू भऽ गेल । सभसँ पहिने पंडित जगन्नाथ एहिपर आपत्ति उठौलन्हि । ओ कहलन्हि जँ रसव्यंजककेँ काव्य मानल जाए तँ नाटकीय अंग अभिनय आदिकेँ रसव्यंजक भेलासँ निश्चिित रूपेण एकरा काव्य कहबामे आपत्ति होयत । एहिना अलंकार चिन्तामणिक पंचम परिच्छेदमे जिनसेनाचार्य द्वारा – काव्यादौ नाटकादौ कहिकऽ अलग– अलग सत्ता स्वीकारल गेल अछि । ओेहूना जँ देखल जाए तँ काव्य काविक कर्म छियै आ नाट्य नटक । संगहि नाट्य खेल अछि जकरा देखल आ सुनल जा सकैछ । एहिमे आँखि आ कान दुनू व्यस्त रहैछ, मुदा काव्यमे काने टा । आचार्य भरत नाटक सम्बन्धमे सेहो कहने छथि व्रक्रीडनीयकममिच्छामो दृश्यं श्रव्यं च यद्भवेत । अर्थात नाटक खेल अछि, देखबाक चीज अछि आ ओ श्रव्य सेहो अछि । एतदर्थ एकरा मंचक विभिन्न प्रक्रियासँ गुजरऽ पड़ैत छैक । एहना स्थितिमे कोनो कवि वा उपन्यासकार वा कथाकार जखन एहि साहित्यिक विधासँ टपिकऽ नाट्य साहित्यक क्षेत्रमे अबैत छथि आ एकर मूल्यांकन करऽ लगैत छथि तँ ओतेक सटीक नइ भऽ पबैत छथि । लेखन आ सम्पादनसँ ल’ क’ समीक्षा धरि कतेको एहन स्थल हमरा भेटल अछि जतऽ ओ चुकल बुझना जाइत छथि । एहिसभक जँ उदाहरण देबऽ लागब तँ एकटा पोथा तैयार भऽ जाएत तथापि हम एक–आध टा उदाहरण अवश्य देबऽ चाहब । यथा—जीवन झाक नाटक ‘सुन्दर संयोग’ मे चतुर्थ अंकक पर्दा खसैत अछि । मंचपर कोनो पात्र प्रवेश नहि करैत अछि, मुदा सात–सात टा गीत नेपथ्यसँ चलैत रहैत अछि । एकर बाद रथोद्धतामे दू पाँती गबैछ, मुदा कादम्बरीक प्रवेश नहि देखाओल गेल अछि । पुनः जे नवम गीत अछि ओ नेपथ्यसँ अछि कि मंचसँ तकर उल्लेख सेहो नहि अछि । एकर मतलब जे नाट्यकारकेँ रंगमंचक जानकारीक अभाव छन्हि । एहिना मिथिला मिहिर, १३–०५–१९६२ ई. मे प्रकाशित राधाकृष्ण चौधरीक नाटक ‘राज्याभिषेक’ मे राजधर कहैत अछि – चलू, आइ संध्याकाल कोनो गाछी दिस घूमि आबी । पुनः कोष्ठमे देल गेल अछि — साँझुक पहर, तीनू गोटए गाछीमे पहुँचलाह आ देखलनि ओतऽ हाँजक— हाँज छौड़ीसभ विद्यापतिक गीत गाबि रहल अछि । ई लोकनि कातमे बैसि मजा लैत रहलाह ।’ आब साँझुक पहर, गाछीमे पहुँचब आ हाँजक–हाँज छौड़ीसभके विद्यापति गीत गबैतक जानकारी प्रेक्षककेँ कोना भेटतैक ? ने दृश्य परिवर्तन, ने चलबाक माइम, ने कोनो संवाद आ ने दृश्य निर्माण । जखन कि नाट्यकार आ संपादक जानल–मानल विद्वान छलाह । आब जँ समीक्षाक बात करी तँ ओकरा हास्यास्पद छोड़िकऽ आओर नहि किछु कहल जा सकैए । एहि बातक पुष्टिक दू–तीन वर्षक भीतर प्रकाशित किछु समीक्षासँ कएल जा सकैछ । हमरा नइ लगैए जे नाट्यकर्मक एकोरत्ती छूति हुनका लोकनिमे छन्हि । उपर्युक्त बात सभकेँ देखैत आब हम नाट्यकार रमेश रञ्जनपर अबैत छी । ई एकटा सफल अभिनेता रहलाह अछि । तें रंगमंचक जे तकनिक छैक ओकरा हिनका पूर्ण ज्ञान छन्हि । अतः एकर उपयोग अपना नाटकमे सफल ढंगसँ कएलनि अछि । एकर प्रमाण एहि नाटकक संवाद अछि जे अपना लयमे चलैत अछि । संगहि प्रत्येक संवादकेँ बजबामे ओष्ठकेँ सुलभताक अनुभव होइत छैक । किएक तँ संवाद छोट–छोट अछि । एकर जड़िमे हिनक अभिनेताबला गुण काज कएलक अछि । आखिर मंचपर संवाद अभिनेते बजैत छैक । तें ओ एहन संवादकेँ किन्नहुँ समावेश नहि करत जाहिमे ओष्ठ सुलभता नहि होइक । एतबए नहि, एकटा सफल निर्देशक सेहो रहबाक कारणेँ पात्रसभ सेहो मंचपर सक्रिय रहैछ । मंच निर्देश सेहो उचित ढंगसँ कएल गेल अछि । एमहर आबिकऽ किछु गोटे ‘पुरुष एक– पुरुष दू’ अथवा ‘युवक एक एक–युवती’ एक कहिकऽ जे नाटकमे पात्र रखैत छथि ताहिपर आपत्ति उठौलनि अछि । मुदा हम कहब जे एहन आपत्तिमे कोनो जान नहि अछि । आओर ई आपत्ति परोक्ष रूपसँ पाठ्य नाटकक ओकालत करैत अछि, मंचीय नाटकक नहि । किएक तँ नाटक पाठक वस्तु नहि, ओ तँ प्रेक्षकक वस्तु छियैक । आओर प्रेक्षकक हेतु नाटकमे युवक, पुरुष, स्त्री तथा युवतीक हेतु नाम दऽ देल गेल रहैत छैक । संवादमे पुरुष, स्त्री, युवक, युवती आदि कहिकऽ नहि अबैत छैक । मंचक आगाँ बैसल प्रेक्षककेँ केओ नहि कहैत छैक जे ई पुरुष एक वा दू छियैक । एहना स्थितिमे पुरुष एक वा दू पर आपत्ति उठाएब बिल्कुल असंगत लगैत अछि । एहि नाटकपर दुरुहताक चार्ज लगाओल गेल अछि । मुदा एहि मादे अपन विचार व्यक्त करबासँ पहिने हम प्रेक्षकक सम्बन्धमे किछु विचारणीय तथ्य दिस जाए चाहब – प्रेक्षक विभिन्न प्रकारक होइत अछि । आओर ई विभिन्नता वयस, शिक्षा, पेशा आदि पर निर्भर करैत छैक । बच्चा सभक वास्ते ओहन नाटक चाही जाहिसँ ओकर बालसुलभ जिज्ञासाक पूर्ति होइक । मुखौटा लागल पात्र आ अवस्थाक अनुकूल संवाद ओ सभ बेसी पसिन करत । तहिना निरक्षर आ अखरकट्टू प्रेक्षक ग्रामीण कलाकारद्वारा प्रस्तुत लोकनाट्यकेँ बेसी पसिन करत । किएक तँ एकरा बुझबाक लेल ओकरा बेसी मानसिक श्रम नहि करऽ पड़ैत छैक । इएह कारण अछि जे कोनो लोकनाट्यक पाछाँ निरक्षर आ अखरकट्टू जनसमुदाय ढंगरि जाइत अछि । ओहीठाम पढ़ल—लीखल लोक एहिमे नगण्येक बराबर रहैत अछि । एकरा लोकनिक हेतु ओहिसँ इतर नाटक चाही । एकटा बात आओर—देश, काल आ परिस्थिति नाटकक मीटर होइत छैक जाहिपर नाटक अपने आप बाजऽ लगैत अछि । तें जँ हमरा रेडियो नेपाल सुनबाक अछि तँ मीटरकेँ ओहिपर घुसकाकऽ आनऽ पड़त । हमरा नीक जकाँ मोन अछि जे एकटा मित्रकेँ सैमुअल बैकेटक नाटक ‘इण्ड गेम’ पढ़ऽ लेल देने रहियनि । एक मासक बाद हुनका कहलियनि जे नाटक पढ़ल भऽ गेल तँ दऽ दिय । एहिपर ओ जवाब देलनि जे ‘पढ़ल तँ नइ भेल अछि , मुदा लेब तँ लऽ लिय । कारण, हम बुझबे नइ करै छियै ।’ बैकेटक ओ नीक नाटक अछि जे द्वितीय विश्व युद्धक बाद लिखल गेल छल । एकरा हिटलरक पराजय आ वर्लिन पतनसँ जोड़ल जाए तँ सभ मिलि जएतै । एहिना ई नाटक ‘मुर्दा’ अछि । ओहि कालखण्डमे नेपालक शासन राजाक अधीन छलैक । यमराज एहिठाम राजाक प्रतीक अछि । चित्रगुप्त प्रधान दरबारी अछि जे राजाक छत्रछायामे विभिन्न कुकृत्य करैत अछि । देखल ने जाए—चित्रगुप्तः हँ सरकार, असलमे मृत्युभुवनकेँ स्वच्छ रखबाक दायित्व तँ हमर अछि । अपने तँ निमित्त पात्र मात्र छी । एहि संवादसँ ई बात साफ भऽ जाइत अछि जे मृत्युभुवन अर्थात नेपालकेँ केहन साफ करैत होएतैक । संगहि ई सफाइ ककरा नामपर होइत छैक तकरा लेल तँ निमित्त पात्र अछिए । एहि नाटकक केन्द्र विन्दु मुर्दा अछि जे सत्ताद्वारा बनाओल जाइत अछि । किएक तँ ओ मुर्दा मात्र पर शासन कऽ सकैत अछि, जागरुक लोकपर नहि । तें सत्ता चाहैत रहैत अछि जे सभकेँ मुर्दा बना दी । एहिव्रmममे सत्ता दू टा हथियार अपनबैत अछि – पहिल तँ ई जे ओ सुख–सुविधाक जाल फेकैत अछि । आइ — काल्हुक पूजीपतिसभ पूर्वक पूजीपतिकेँ गारि पढ़ैत छैक जे जखन बुझलकै जे मार्क्स एतेक प्रखर बुद्धिक अछि तँ ओकरा सभ सुख–सुविधा जुटाकऽ बेकार किएक ने कऽ देलक । एहि बातक चरितार्थ ई नाटक करैत अछि । देखल ने जाए— बूढ़ा ः ओ दूर होइत गेल हमरा सभसँ आ शासनक नजदिक होइत गेल । शासन ओकरा गुड़क ढेप बुझाइक । ओ बुझऽ लागल रहय जे एहिमे सटल रहलासँ हमरा स्वर्गी आनन्द भेटत । शासनक आनन्द अर्थात स्वर्गक आनन्द लेल जीवनकेँ छोड़ि देलक । आब तेसर मार्ग छैक दमन । एकर आगाँ लोक मुह नहि खोलि पबैत अछि । एहि बातक पुष्टि निम्नांकित संवाद करैत अछि — बूढ़ा ः एहि सभक बलपर अपना भीतरमे अद्भुत क्षमताक विकास कएनाइ एखन दुलर्भ छै । हवाक गतिक विरुद्ध के ठाढ़ हैत ? उफनैैत नदीक विपरीत दिशामे आगू बढ़बाक के दुस्साहस करत ? शासनक विरुद्ध स्वर निकालबाक इच्छा–शक्ति के देखाओत ? एहि तरहें नाट्यकार दमन आ पोषण सत्ताक दूू टा आँखि मानैत छथि जे अक्षरशः सत्य अछि । देखल जाए ई संवाद — युवक २ ः शासनक आँखिसँ दू टा रोशनी निकलै छै । एकटा जरबऽबला आ एकटा बढ़बऽबला । जे जिन्दा रहल तकरा जरौलक आ जे मुर्दा भऽ गेल ओकरा बढ़ौलक । एहिठाम जिन्दाक तात्पर्य ओहि व्यक्तिसँ अछि जे सत्ताक विरुद्ध किछु बजबालए तैयार होइत अछि । एहन व्यक्तिकेँ जराओल जाइत छैक अर्थात नाना प्रकारक कष्ट देल जाइत छैक । एकर विपरीत जे मौन भऽ गेल अर्थात मुर्दा भऽ गेल ओ विभिन्न तरहक सुख भोगैत अछि । उपर्युक्त हथकण्डा अपनौलाक बादो विद्रोहक ज्वाला फुटबे करैत छैक । आओर ओहि ज्वालामे केहनो तानाशाह भस्म भऽ जाइत अछि । एहन उदाहरणसँ इतिहास भरल पड़ल अछि । तें नाट्यकार हतोत्साह नहि होइत छथि । ओ एकटा बूढ़ पात्र गढ़ैत छथि जे समयकेँ घीचिकऽ अपना संग लऽ अनैत अछि । एहने वयक्तिपर तँ लोक विश्वास करैत अछि । एही विश्वासक प्रतिफल छैक जे पुरुष एक, दू, तीन आ चारि बूढ़ाक इर्द–गिर्द जमा भऽ जाइत अछि । ओ सभ चित्रगुप्त आ ओकर सहयोगीकेँ अपना घेरामे लऽ लैत अछि । एहना स्थितिमे यमराज सत्तासँ कोना अलग–थलग भऽ जाइत अछि तकर अनुमान सहजहिं लगाओल जा सकैछ । नाटकक महत्वपूर्ण श्रृंगार संघर्ष तथा द्वन्द्व अछि । ई संघर्ष तथा द्वन्द्व स्वीकृत यथार्थ आ अस्वीकृत यथार्थक बीच उत्पन्न होइत अछि । एहि स्वीकृत तथा अस्वीकृत यथार्थक संवाहक क्रमशः खलनायक तथा नायक होइत छैक । एहि दुनूक बीच घात–प्रतिघात चलैत रहैत अछि । नायक चाहैत अछि जे स्वीवृmत यथार्थक स्थानपर अस्वीकृत यथार्थकेँ स्थापित करी । अतः नायक आ खलनायकक बीच संघर्ष होइत छैक । एहन संघर्ष एहि नाटकमे भरपूर देखल जाइछ । यमराज अ चित्रगुप्त सभकेँ मुर्दा बनबऽ चाहैत अछि जकर प्रतिकार बूढ़ा करैत अछि । आ, जतऽ प्रतिकार होएतैक ओतऽ संघर्ष नहि होएबाक कोनो प्रश्ने नहि उठैत छैक । तहिना प्रस्तुत नाटकमे द्वन्द्व सेहो प्रचुर देखल जाइछ । नाट्यकार देखबैत छथि जे सत्ता लोककेँ मुर्दा बनबैत छैक आ से गुड़क ढेप देखाकऽ अथवा डंटा देखाकऽ । मुदा किछु लोक सोचैत अछि जे एहि दुनूक विरुद्ध ठाढ़ भेल जाए । एहना स्थितिमे युवक आ पुरुष लोकनिमे भयंकर द्वन्द्व उत्पन्न होइत छैक जे नाट्यकारक सफलताक द्योतक अछि । कोनो रचनाक वास्ते शीर्षक एकटा महत्वपूर्ण स्थान रखैत अछि । किएक तँ शीर्षक कोनो रचनाक विषयमे बहुत किछु कहैत छैक एहि दृष्टिएँ प्रस्तुत नाटकक शीर्षक ‘मुर्दा’ बहुत उपयुक्त अछि । किएक तँ मुर्दाक चर्चा प्रस्तुत नाटकमे बेर–बेर आएल अछि । अन्तमे हम इएह कहब जे प्रबुद्ध प्रेक्षकक बीच एहि नाटकक आदर हेतै से हमरा पूर्ण विश्वास अछि । नाट्य क्षेत्रमे नाट्यकारक भविष्य उजज्वल छन्हि से हम मानैत छी । प्रकाश चन्द्र झा : मैथिली रंगकर्ममे थ्री-इन-वन १९७५ ई. मे हम जुआयल कनकनी नामक एकटा नाटक लिखने रही, जे ओही साल प्रकाशित भेल रहय । एहि नाटकक प्रसंगमे मैथिलीक सुप्रसिद्ध साहित्यकार जीवकांतजी अपन प्रतिक्रिया व्यक्त करैत लिखने रहथि – मलंगियाजी, मिथिलांचलमे एखन ओहन अभिनेता नहि जन्म लेलक अछि, जे एकर तेजकेँ सम्हारि सकत । ई बात हम अपनहुँ महसूस कएने रही आ तहिए सँ हमर आँखि एहि बातक खोज करैत रहल, जे ओहि नाटकक अनुरूप कोनो अभिनेता भेटितए । ओना मिथिलांचलमे अभिनेताक कमी नहि रहलैक अछि, मुदा सभक जिनगी अल्पकालीन । किएक तँ एहिठाम एकरा टाइमपासक रूपमे देखैत अछि । तेँ जहाँ कतहु नोकरी भेटि गेलैक कि ओ रंगकर्म केँ तिलांजली द’ दैत अछि । दोसर कोनो गार्जियन ई नहि चाहैत छैक, जे हमर बेटा रंगमंचसँ जुड़ल रहय । किएक तँ मैथिली रंगमंच केँ ओ सामर्थ्य नहि छैक जे ओकरा रोजी – रोटी द’ सकतै । तेँ रंगमंच के छोड़’ बाला नाम अनगिनत अछि आ जुटल रह’ बाला नाम आँगुरे पर गनल । एहन आँगुरेपर गन’ बाला नाम अछि – अभिषेक, चन्द्रशेखर, मुकुल, संतोष ( मधुबनीसँ ), रवीन्द्र, ओमप्रकाश, रंजू, प्रियंका ( जनकपुरसँ ), संजीव, किशोर केशव, गुड़िया, स्वाति, जितेन्द्रनाथ, प्रियंका ( पटनासँ ), मुकेश, उत्पल, प्रकाश, ज्योति, जीतू, कमल, दुर्गेश, भास्करानंद ( दिल्लीसँ ) आदि । एहि सभमे प्रकाश कहिया हमरा भेटल - स्मरण नहि अछि, मुदा एतेक धरि अवश्य स्मरण अछि, जे ओ कहने रहय- “सर, हमर घर घोंघौर अछि आ हम आर. के. कॉलेज मधुबनी में पढैत छी” । “ कोन कक्षामे ?” “ बी.एस सी.क फर्स्ट पार्टमे ” । हमरा दिससँ कोनो प्रतिक्रिया नहि अएबाक कारणें किछु कालक बाद पुन: बाजल – “ हम नाटकसँ सेहो जुड़ल छी ” । “ कोन संस्थासँ ?” “ मधुबनी इप्टासँ ” “ बहुत खुशीक बात ” प्रकाश कोन अपेक्षा ल’ क’ हमरा लग आएल रहय से ओ ने कहि पओलक आ ने हम बूझि सकलिऎ । मुदा, एतेक अवश्य जानकारी भेटैत रहल जे नुक्कड़ नाटककेँ मधुबनी जिलामे बहुत लोकप्रिय बना देलक अछि । एक्केटा बिजुलिया भौजीक पचासटा शो कएलक अछि आ सभमे एकर अनिवार्य सहभागिता छैक । मुदा, ई हमर दुर्भाग्य रहल जे एकर एकोटा शो हम नइ देख सकलिऎ । तथापि एतेक विश्वास भैए गेल जे नाटकक प्रति एकर लगन बेजोड़ छैक । हमहूँ रहबे कएलहुँ आ इहो नाटक करिते रहल आ तखन जँ मंच पर भेट नइ होइतए तँ इहो असंभवे बाला बात भ’ जइतै । से भेलैक नहि, एकरासँ मंचपर भेट भैए गेल, मुदा कहिया से स्मरण नहि अछि । हँ, एतेक अवश्य स्मरण अछि जे प्राय: 1995 ई. मे मिथिला सांस्कृतिक पर्व समारोहक अवसर पर हमरे नाटक ओरिजनल कामक मंचन नगर भवन, मधुबनीमे होइत रहय । हमहूँ आमंत्रित रही । जाहि मे दरोगाक भूमिका प्रकाशे केने छल । ओहि नाटकमे ई प्रशंसाक पात्र बनल रहय जकर उल्लेख दैनिक जागरण आ दैनिक हिन्दुस्तान सेहो कएने रहैक । किछु दिनक बाद गाम नइ सुतैए’क मंचन देखलियैक ओहो मे गामक तीनटा बिगड़ल युवकमे सँ एकटा बिगड़ल युवकक भूमिका यैह कएने छल । ओही दुनू मे कयलगेल अभिनयक बदैलत ई हमरो मोन मे बैसि गेल । बादमे बिहार सरकार युवा मंत्रालय, पटना दिस सँ आयोजित कार्यक्रम मे एक बेर फेर हमरे लिखल नाटक हमरो जे साम भैयाक मंचन नगर भवन, मधुबनीमे होइत रहय । हमहूँ आमंत्रित रही । जाहि मे चारुवक्य के भूमिका मे प्रकाश रहै । मंचपर एकरा देखलाक बाद हमरा बड़ अपसोच भेल रहय जे जीवकांतजी एहिठाम नइ छथि । ओ जँ आइ एहिठाम रहितथि तँ एकर अभिनय देखिक’ निश्चित अपन बात घुरा लितथि जे ‘मिथिलांचलमे एखन ओहन अभिनेता नहि जन्म लेलक अछि’ । बहुत विलक्षण आ मुग्ध कर’ बाला अभिनय कएने रहएअ । तेँ हमरा कह’ पड़ल जे चारुवक्य के भूमिका एहन दोसर नइ क’ सकैए । एकर बाद करगिल समस्यापर आधारित नाटक दुलहा पागल भ’ गैलै मे सेहो अभिनय कएलक जे हम नइ देख सकलिऎक । हँ, मधुबनीक डिप्टी कलक्टर श्री दीपनारायण सिंह जी सँ जखन बात भेल तँ कहलनि जे खासक’ प्रकाशचन्द्र बड्ड नीक अभिनय कएने छल । ओना एहि बातक घमर्थन कखनो-कखनो उठिए जाइत अछि जे अभिनेता तँ निर्देशकक हाथक कठपुतली होइत अछि । ओकरा जेना-जेना निर्देशक कहैत छैक तेना-तेना ओ मंचपर करैत अछि । जँ इएह बात सत्य छैक तँ एक्केटा भूमिका जखन दू आदमी करैत अछि तखन किएक ककरो नीक आ ककरो बेजाए भ’ जाइत छैक ? एहि आधार पर तँ सृजनात्मक प्रतिभा अपन होइत छैक से मानहिटा पड़त । आ तेँ ओ ओहन चारुवक्य क सृजन कएने रहय । फेर 2005 ई. मे रामाननद युवा क्लब, जनकपुर धाम ( नेपाल ) द्वारा आयोजित नाट्य समारोह मे नेपालक अतिरिक्त कोलकाता , दिल्ली, दरभंगा आ मधुबनीक टीमसभ भाग लेने छल । मधुबनीक यात्री संस्था , दिल्लीक यात्री संस्थाक रूप मे प्रवेश पओने छल । कारण , ओहि समयमे अधिकांश यात्रीक अभिनेतासभ दिल्लीए मे रहैत छल तेँ किछुए नवकेँ समावेश कर’ पड़लै आ काश्यप कमलक नाटक गोरखधंधा तैयार भ’ गेलै । एहि नाटक मे ओ सूत्रधारक भूमिका कएने रहय जे काफी चर्चित रहलै । मैथिली रंग जगतमे नव पीढीक कतेको लोक छथि, जे लगातार काज क’ रहल छथि मुदा, ओहि जमातमे प्रकाश कतेको कारणे सभहक ध्यान अपना दिस खींचैत अछि । एक त’ अपन रंग कालमे , प्रकाशक रंग प्रवाह बड्ड महत्वपूर्ण छैक । दोसर ई जे – प्रकाशक द्वारा जराओल गेल सर्वरंग अभियानक दीपक जे प्रभाव मैथिली रंग जगत पर पड़ल अछि ओ आरो बेसी प्रशंसाक पात्र छैक । प्रकाशक रंग प्रवाहक शुरुआत मिथिलाक एकटा छोट छीन गाम घोंघौर स’ शुरु होइत छैक । अपन नेनपने सँ गामक रंगमंच सँ जुड़ैत, अपन जिला मधुबनीक नगर इप्टाक कार्यालय सचिव बनल आ इप्टा मे एकर पाँच सालक कार्यकाल अखन तक के ओकर स्वर्णकाल कहल जा सकैत छैक । ओत’ सँ निकलिक’ विश्वविद्यालय स्तर पर अभिनय मे प्रथम सम्मान सँ सम्मानित होइत राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, दिल्ली मे प्रवेशक चयन प्रक्रियाक अंतिम प्रक्रिया तक शामिल भेल । ओहो कोनो नामी-गिरामी निर्देशकक संग कार्य करबाक अनुभवक बिना । फेर संगीत नाटक अकादेमी, नई दिल्ली द्वारा प्रशिक्षण ल’क’ ओकरे बाकी कार्यशाला मे कार्यशाला सहायकक रूप मे कतेको राज्य मे अपन ज़िम्मेदारी केँ सफलतापूर्वक निभाबैत, साहित्य कला परिषद, दिल्लीक रंगमण्डल सँ गुजरैत, सॉग एण्ड ड्रामा डिविजन, नई दिल्ली मे कैजुअल आर्टिस्टक रूप मे चुनबैत आई राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नाई दिल्ली द्वारा अखिल भारतीय स्तरक श्रेष्ठतम रंगशोध पत्रिका रंग प्रसंगक संपादन सहयोगीक रूपमे अपन महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी निभा रहल अछि । ई त’ छल प्रकाशक अपन रंगपक्ष , जे कि हमरा सभ केँ सीधे-सीधे देखाइत अछि । जे दोसर रूप छै ओ ई जे मधुबनी सन छोट जगह मे प्रकाश जे रंगदीप जरौलक अछिओकर परिणाम ई छैक जे आई एहि छोट शहर मे सात-सात टा रंगकर्मी रंगकर्म मे प्रशिक्षणक लेल राष्ट्रीय प्रतिभा छात्रवृत्ति ल’ चुकल अछि । कतेको रंगकर्मी राष्ट्रीय स्तरक रंगप्रशिक्षण संस्थान सँ प्रशिक्षण प्राप्त केलन्हि अछि । 2006 ई. मे मैथिली लोक रंग, दिल्ली ( मैलोरंग ) त्रिदिवसीय नाट्य सहोत्सवक आयोजन कएने रहय जाहिमे सहरसा, पटना आ दिल्लीक टीम ( मैथिली लोक रंग ) भाग लेने रहैक । ई तीनू टीम क्रमश: कनियाँ-पुतरा, पारिजात हरण आ काठक लोक क्रमश: उत्पल झा, कुणाल तथा प्रकाश झा क निर्देशनमे प्रस्तुत कएने रहय । उत्पल झा राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली सँ उत्तीर्ण छात्र, कुणाल केँ दस-पन्द्रह नाटकक निर्देशनक अनुभव आ प्रकाश झा केँ अभिनय छोड़ि निर्देशनक कोनो अनुभव नहि । तेँ लागल जे एहि दुनू निर्देशकक बीचमे प्रकाश ओहिना दरड़ा जाएत जहिना जाँतक दुनू पट्टाक बीचमे दालि । मुदा से भेलैक नहि, प्रकाश झा आँकड़ जकाँ अड़ले रहि गेल । प्रेक्षक गुम्मी लाधिक’ नाटक देखैत रहलाह । मुदा, जत’ हँस’क अवसर छलैक ओत’ हँसबो कएलाह । नाटक समाप्त भेलाक बाद प्रकाश दू शब्द कहबाक हेतु हमरा मंच पर बजा लेलक । ओ किएक हमरा बजौलक तकर अनुमान एहि रूपमे लगौलिऎक – प्राय: नाटक मे कएल गेल किछु फेर-बदलक मादे किछु कहताह । मुदा ताहि प्रसंगमे हम किछु कहि नइ सकलिऎक । कारण, प्रेक्षक हमर मुँह बन्द क’ देने छल । तेँ हम ई बात कहबाक लेल बाध्य भ’ गेल छलहुँ जे दुलहन वही जो पिया मन भाए अर्थात नाटक वएह नीक वा निर्देशक वएह नीक जकरा प्रेक्षक गम्भीरता सँ देखलक आ बुझलक । एतेक कहलाक बाद ओ राम गोपाल बजाज जी केँ बजा लेलकनि । हुनका मंचपर बजएबाक दूटा कारण भ’ सकैत अछि – पहिल, ओ भारतीय रंगमंचक एकटा दिग्गज रंगकर्मी छथि जे मिथिलांचलक सपूत छथि आ दोसर, पहिल बेर निर्देशनक क्षेत्रमे आयल छल तेँ हुनक आशीर्वाद प्रकाशक लेल आवश्यक छलैक । तेँ बजाजजी मंचपर अएलाह आ हमर बातक समर्थन करैत कहलथिन – मलंगियाजी जे बात कहलनि अछि ताहिसँ हम सहमत छी । प्रकाश केँ जखन दर्शके सर्टिफिकेट प्रदान क’ देलकै तखन हम ओहिपर हस्ताक्षर नइ करिऎ से उचित नइ होएत । एहि प्रस्तुति के देखलाक बाद हिन्दीक युवा आ संवेदनशील रंगदृष्टि रखनिहार रंग समीक्षक संगम पाण्डे जनसत्ता में लिखने रहथि - ... मंच पर ये सभी पात्र चरित्र के कई बारीक विन्यासों के साथ दिखाई देते हैं । उनके भदेस में कहीं भी कुछ बनाबटी नहीं लगता । और यही वजह है कि कथावस्तु में स्थितियाँ कई बार दोहराई जाकर भी अपनी रोचकता नहीं खोतीं । मंच पर पीछे की ओर दाएँ मंदिर का चबूतरा है । बाईं ओर एक पूरा का पूरा वृक्ष, और चबूतरा एक पूरा परिवेश बनाते हैं । इस परिवेश में साधु की पीतांबरी वेशभूषा एक दिलचस्प कंट्रास्ट बनाती है” । संगम पाण्डेक उपर्युक्त कथन निश्चित रूपे प्रकाशक नाट्य निर्देशक संग ओकर मंच परिकल्पना आ वस्त्र विन्यासक दृष्टिक सेहो मजबूती प्रदान करैत छैक । 2005 ई. मे स्वास्ति फाउण्डेशन, दिल्ली हमरा प्रबोध साहित्य सम्मान देने छल, जे कलकत्तामे प्रदान कएल गेल । उक्त सम्मानक अवसर पर डॉ. उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’ द्वारा रचित एक छ्ल राजा नामक नाटकक मंचन कोकिल मंच, कोलकाता द्वारा कएल गेल छल । हमरा बगलमे बैसलि हमर पत्नी जिनका साक्षर मात्र कहल जा सकैए पूछि बैसलीह “कखन नाटक समाप्त होएतैक” ? एहिपर हम कहलिएनि जे एक चौथाई बाँकी अछि । अवलोकनजन्य थकान सँ ओ अपने-अपने बाजि उठलीह “एह, तखन तँ आधा घंटा सँ बेसिए बैस’ पड़त” । आब कोनो प्रेक्षकक मुँहसँ निकलल “बैस’ पड़त” शब्द नाटक प्रदर्शनपर एकटा पैघ प्रश्नचिन्ह लगबैत अछि । इएह सम्मान 2007 मे मयानन्द मिश्र केँ भेटलनि । ओहि सम्मानक अवसरपर डॉ. नचिकेता द्वारा रचित नायकक नाम जीवन, एक छल राजा , रामलीला, प्रत्यावर्तन आदिमे सँ कोनो एकटा नाटकक मंचन होएबाक चाही से विचार कएल गेल छल । संगहि स्थान बदलिक’ दिल्ली पर मोहर लागि गेल छल । उक्त आयोजनक सम्पूर्ण अभिभारा प्रकाश चन्द्र झा केँ भेटल छलैक । तेँ ओ नचिकेताक सभ नाटक मंगौलक । गम्भीरता सँ पढलक आ अंतमे एक छल राजापर आबिक’ केन्द्रित भ’ गेल । नचिकेताक जतेक नाटक छैक ओहिमे सँ सभसँ नीक नाटक एक छल राजा अछि जे प्राय: 1970 क दसकमे प्रकाशित भेल रहैक । एकरा जँ एना बूझी तँ कहि सकैत छी जे जहिया प्रकाश जन्मों नहि लेने होयत तहिए ई नाटक प्रकाशित भेल रहैक । तेँ जतेक जे एहि नाटकक मादे प्रकाशित भेल छल होएतैक ताहिसँ ओ परिचित नहि छल । तथापि ओहिमे सँ एक छल राजा केँ चूनि लेलक से ओकर निर्देशकीय दृष्टिक प्रमाण दैत छैक । कारण, निर्देशक वास्ते नाटक चयन एकटा अहम मुद्दा रखैत छैक । जँ सत्य पुछल जाए तँ ओ नाटक प्रकाश चन्द्र झाक हेतु एकटा चुनौती भरल काज छलैक । एखन धरि जतेक निर्देशक ओकरा प्रस्तुत कएने छल ओकरा कओमा आ पूर्णविराम सहित मंचपर उतारि दैत छल तेँ प्रेक्षककेँ पुछ’ पड़ैत छलैक जे आब कतेक नाटक बाँकी अछि । एहन स्थिति उत्पन्न होएबाक कारणपर विचार करबासँ पहिने हमरा नाटक कथानकपर विचार सेहो कर’ पड़त । एहि नाटकमे राजा साहेब नामक एकटा जमीन्दार अछि जकर जमीन्दारी पुर्खेक समयसँ धीरे-धीरे कमल जाइत छै । राजा साहेब लग आबिक’ विपन्नता पराकाष्ठापर पहुँच जाइत छै । कर्जक बोझ ततेक ने बढि जाइत छै जकरा सधाएब मश्किल भ’ जाइत छैक । फजूल खर्ची आ विलासिताक कारणेँ एहि स्थितिमे पहुँचब एकटा नियति छैक । फेर ओही जमीन्दारीमे पलल राजा साहेबक पिताक अवैध संतान धनिकलाल शहर जाइत अछि । ओहिठाम अपन लगन आ परिश्रमसँ काफी धनोपार्जन करैत अछि आ राजा साहेबक हवेली कीनैत अछि । फेर ओहो वएह काजसभ कर’ लगैत अछि जे राजा साहेब करैत छलाह । आब प्रश्न ई उठैत अछि जे एकटा जमीन्दारकेँ तोड़िक’ दोसर जमीन्दारकेँ ठाढ करबाक की औचित्य छैक ? जँ ठाढ भइए जाइत छैक तँ दरबारमे राजा साहेब जकाँ हवेलीमे मोजराक आयोजन करबाक की प्रयोजन छैक ? जखन ई बात स्पष्ट भ’ जाइत छैक जे राजा साहेब अपन बेटी मोहिनीक विवाह आर्थिक तंगीक कारणेँ नइ करा रहल छथि तखन ओकर प्रेम प्रसंगक एतेक दृश्यसभ रखबाक कोन प्रयोजन छैक आ अंतमे ओकरा प्रेमीकेँ खलपात्र बनएबाक कोन औचित्य छैक ? कोनो नियतिक विरुद्ध बेर-बेर धनिक लालक मुँह सँ प्रतिशोध लेब कहयबाक कोन जरूरी छैक ? राजा साहेब तँ अपन करनीक फल पाबिए गेल छलाह जे हवेली बेचिक’ सड़कपर आबि गेल छलाह । उपर्युक्त सभ प्रश्नपर प्रकाश नीक जकाँ विचार कएने छल । ओकर प्रदर्शन स्क्रिप्ट देखिक’ हमरा लागल जे ओकरामे नाटक प्रदर्शनक समझदारी छैक । नाटकसँ एक दिन पहिने हमरा डेरापर एकटा कार्ड आएल रहय । ओहिपर सपरिवार लिखल रहैक । तेँ हम पत्नीसँ पुछलियनि - “नाटक देख’ जएबैक” ? “कोन नाटक छै” ? प्रश्नपर प्रश्न ओ रखलनि । “एक छल राजा” “नइ जाएब”। “किएक”? “कलकत्ता मे देखने छी । हमरा नइ नीक लागल रहय” । “चलू ने, निर्देशक बदलल छै, अभिनेता बदलल छै” । “मुदा नाटक तँ वएह रहतै ने” । “तैयो देखि लियौ ने” । नाटक भेलैक । नाटक समाप्त भेलाक बाद नचिकेताजी केँ काफी खुश देखलियनि । एकर मतलब छलैक जे नाटक अपन ऊँचाई पाबि गेल छल । वस्तुत: हमरो बड्ड नीक लागल रहय ई प्रस्तुति । हमर मोन मानि गेल छल जे एकरा नीक निर्देशकक पाँतीमे राखल जा सकैए । जँसे बात नइ रहितै तँ नाटक एहि रूपमे नइ चमकितै । रास्तामे हम पत्नीसँ पुछ्लियनि - “केहन लागल नाटक” ? “बहुत बढियाँ” “तखन कहै छलिऎ जे नइ जाएब” । “हमरा थोड़बे बुझल छल जे एहन नाटक हेतै” । ई छलैक एकटा साक्षर मात्र लोकक मूल्यांकन । श्री मायानंद मिश्र, डॉ. गंगेश गुंजन, डॉ. देवशंकर नवीन, डॉ. ओमप्रकाश भारती आदि दिग्गज विद्वान लोकनि एहि प्रस्तुतिक प्रशंसा कएलथिन । ओना दशरथ जखन भार जनकपुर पठौलथिन तँ जनकपुरबासी मेसँ क्यो बाजि ऊठल— भार तँ बहुत बढियाँ छनि, मुदा अंकुरीक अखुआ टेढ छनि । एहन अखुआ टेढबाला लोक प्रेक्षकक प्रतिक्रिया देखिक’ अपनाकेँ चुप्पे राखब उचित बुझलक । एहि ठाम एकटा बात कह’ चाहब—आदमीक क्षमताक स्थानांतरण दोसर क्षेत्रमे सेहो होइत छैक । यदि हम दहिना हाथसँ ‘अ’ लिखैत छी तँ बामा हाथसँ ‘अ’ सेहो लिखि सकैत छी । कारण, दहिना हाथक क्षमता बामा हाथमे स्थानांतरित भ’ जाइत छैक । एही अवधारणापर लोक कहैत छैक जे बी.ए. भ’ क’ घास छिलतै तँ मूर्खसँ बढिए जकाँ छिलतै किएक तँ ओ अपन पढ’–लिख’ बाला क्षमता घास छील’ मे लगा देतैक । एहि मनोवैज्ञानिक तथ्यक सत्यापन प्रकाश चन्द्र झाक अभिनयात्मक एवं निर्देशकीय क्षमतासँ जोड़िक’ संगठनात्मक क्षमताकेँ सेहो देखल जा सकैए । ओ जतबए नीक अभिनेता तथा निर्देशक अछि ओतबए एकटा सफल संगठनकर्ता सेहो । आ हम सभ कियो जनैत छी जे रंगकर्म मे संगठनात्मक क्षमताक विशेष महत्व छैक । एहिठाम संगठनात्मक क्षमताकेँ रंगकर्मसँ जोड़िएक’ देखल जा सकैत अछि कारण, भरतक नाट्यशास्त्रक पैंतिसम अध्यायमे नाट्यदलक चर्चा आएल अछि जाहिमे सूत्रधार, अभिनेता, काष्ठकार, माली(माल्यकार), स्वर्णकार(मुकुट एवं गहना बनब’बाला), सूचिकार(दर्जी), चित्रकार आदिक चर्चा अछि । हमरा जनैत एहि सभ केँ मिलाक’ राख’बाला सूत्रधार छल होएतैक । ईसभ अपन-अपन योगदान नाट्य प्रदर्शनमे दैत छलैक । जँ एकरा सभकेँ मिलाक’ नहि राखल जैतैक तँ नाट्यप्रदर्शन असंभव भ’ जइतैक । अत: एकटा सम्पूर्ण रंगकर्मीक हेतु संगठनात्मक क्षमता आवश्यक भ’ जाइछ । 2005 ई. मे जनकपुर नाट्य महोत्सवक आयोजन कएल गेल रहैक । एहि आयोजन मे यात्री टीम भाग लिअय से हमर हार्दिक इच्छा रहय । मुदा कलाकारसभ बिखरल रहैक । सभ एकठाम जमा होएत आ नाटक करत से संभव नहि बुझाय । तथापि एकबेर जानकारी देब आवश्यक छल । एतदर्थ बीस-बाइसटा मेम्बरमे सँ प्रकाश केँ टेलीफोन कएलिऎक । कारण, ओकर संगठनात्मक क्षमतासँ हम परिचित छलहुँ । दोसर जँ गछियो लितएअ तँ संगठनात्मक क्षमताक अभावमे जएबो करितएअ कि नहि ताहिपर हमर विश्वास नहि छल । खैर, ओ हमर इच्छाकेँ सहर्ष स्वीकार क’ लेलक आ पन्द्रह-सत्रह आदमीक टीम ल’ क’( दिल्ली सँ ) जनकपुरधाम (नेपाल) पहुँच गेल । सम्प्रति प्रकाश दिल्लीमे मैथिली लोक रंग (मैलोरंग) नामक संस्था चला रहल अछि । एहि संस्थाक एकटा सदस्य दिल्ली रहैत अछि तँ दोसर देवगिरी मे, माने एकटा उत्तरी दिल्ली तँ दोसर दक्षिणी दिल्ली । एहना स्थिति मे मैथिली रंगकर्म केँ जियाक’ राखब एकटा कठिन काज भ’ जाइत छैक । तथापि ओ एकरा जिआए क’ नहि, बल्कि जगजियार क’ क’ रखने अछि । इम्हर, जहिया सँ प्रकाश रंग प्रसंग सँ जुड़ल अछि आ डॉ. ओमप्रकाश भारती, स्व. जे.एन. कौशल, महेश आनंद, देवेन्द्र राज अंकुर, प्रतिभा अग्रवाल आदि सन शोधकर्ताक सानिद्ध पौलक अछि ओकर रंग-दृष्टि आरो खुजलैक अछि । मैथिली लोकनाट्य आ रंगमंच पर ओकर शोध आलेख उल्लेखनीय होइत छैक । बाल रंगमंच पर भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय फैलोशिप प्राप्त करनिहार प्रकाश कहियो कहियो कथा सेहो लिखैत अछि । एकरा द्वारा लिखल कथा पाथर बेस चर्चा मे छल । ई कथा बुच्चीक मनोरथ नाम सँ अंतिका मे आ पाथर नाम सँ हिन्दी मे समकालीन भारतीय साहित्य मे प्रकाशित भेल रहै । हमरा जनैत कर्मठ आ सफल व्यक्ति ओ नहि होइत अछि जे समयक पाछाँ-पाछाँ चलैत अछि, सफल व्यक्ति तँ ओ होइत अछि जे अपन कर्मठतासँ समय केँ अपना लग खींच लैत अछि । इएह गुण हम मृदुभाषी आ मिलनसार प्रकाश मे पबैत छी । किएक तँ एकरासँ पहिने मिथिलांचल सँ कतेको मैथिलीक विद्वानलोकनि दिल्ली अएलाह, मुदा मैथिली रंगकर्मक जड़ि एना भ’ क’ रोपल नहि भेलनि । प्रकाशक लेल दिल्ली मे हिन्दी रंगमंच मे काज करनाइ बहुत आसान छल मुदा ओ मैथिली रंगकर्म के अपनैलक ई बेसी महत्वपूर्ण अछि । हमरा तँ ओहो दिन देखल अछि जहिया मैथिली रंगकर्म कलकत्तामे बहुत जगजियार छलैक, एकरा बाद ई जगजियारी ऊठिक’ पटना आ जनकपुर अएलैक सेहो देखलहुँ आ आइ लगैत अछि जे एहि जगजियारीक एकटा प्रबल दावेदारक रूपमे दिल्ली सेहो ठाढ़ भ’ गेल अछि जकर श्रेय निश्चित रूपे प्रकाश चन्द्र झा केँ जाइत छैक । आइ पटना हो, चाहे जनकपुर, चाहे सहरसा, सभकेँ अपन-अपन क्षमता देखएबाक हेतु दिल्लीमे प्लेटफार्म मैथिली लोक रंग (मैलोरंग) प्रदान कएअलक अछि जकर संचालन प्रकाश चन्द्र झा क’ रहल अछि । हम मैथिली रंगकर्मक हेतु ओकर दीर्घायु आ सफलताक कामना करैत छी । धीरेन्द्र प्रेमर्षि (१९६७- ) मैथिलीमे गजल आ एकर संरचना रूप-रङ्ग एवं चालि-प्रकृति देखलापर गीत आ गजल दुनू सहोदरे बुझाइत छैक। मुदा मैथिलीमे गीत अति प्राचीन काव्यशैलीक रूपमे चलैत आएल अछि, जखन कि गजल अपेक्षाकृत अत्यन्त नवीन रूपमे। एखन दुनूकेँ एकठाम देखलापर एना लगैत छैक जेना गीत-गजल कोनो कुम्भक मेलामे एक-दोसरासँ बिछुड़ि गेल छल। मेलामे भोतिआइत-भासैत गजल अरबदिस पहुँचि गेल। गजल ओम्हरे पलल-बढ़ल आ जखन बेस जुआन भऽ गेल तँ अपन बिछुड़ल सहोदरकेँ तकैत गीतक गाम मिथिलाधरि सेहो पहुँचि गेल। जखन दुनूक भेट भेलैक तँ किछु समय दुनूमे अपरिचयक अवस्था बनल रहलैक। मिथिलाक माटिमे पोसाएल गीत एकरा अपन जगह कब्जा करऽ आएल प्रतिद्वन्दीक रूपमे सेहो देखलक। मुदा जखन दुनू एक-दोसराकेँ लगसँ हियाकऽ देखलक तखन बुझबामे अएलैक-आहि रे बा, हमरासभमे एना बैर किएक, हम दुनू तँ सहोदरे छी! तकरा बाद मिथिलाक धरतीपर डेगसँ डेग मिला दुनू पूर्ण भ्रातृत्व भावेँ निरन्तर आगाँ बढ़ैत रहल अछि। गीत आ गजलक स्वरूप देखलापर दुनूक स्वभावमे अपन पोसुआ जगहक स्थानीयताक असरि पूरापूर देखबामे अबैत अछि। गीत एना लगैत छैक जेना रङ्गबिरङ्गी फूलकेँ सैँतिकऽ सजाओल सेजौट हो। मिथिलाक गीतमे काँटोसन बात जँ कहल जाइछ तँ फूलेसन मोलायम भावमे। एकरा हम एहू तरहेँ कहि सकैत छी जे गीत फूलक लतमारापर चलबैत लोककेँ भावक ऊँचाइधरि पहुँचबैत अछि। एहिमे मिथिलाक लोकव्यवहार एवं मानवीय भाव प्रमुख भूमिका निर्वाह करैत आएल अछि। जाहि भाषाक गारियोमे रिदम आ मधुरता होइत छैक, ओहि भूमिपर पोसाएल गीतक स्वरूप कटाह-धराह भइए नहि सकैत अछि। कही जे गीतमे तँ लालीगुराँसक फूलजकाँ ओ ताकत विद्यमान छैक जे माछ खाइत काल जँ गऽरमे काँट अटकि गेल तँ तकरो गलाकऽ समाप्त कऽ दैत छैक। गजलक बगय-बानि देखबामे भलहि गीतेजकाँ सुरेबगर लगैक, एहिमे गीतसन नरमाहटि नहि होइत छैक। उसराह मरुभूमिमे पोसाएल भेलाक कारणे गजलक स्वभाव किछु उस्सठ होइत छैक। ई कट्टर इस्लामीसभक सङ्गतिमे बेसी रहल अछि, तेँ एकर स्वभावमे “जब कुछ न चलेगी तो ये तलवार चलेगा” सन तेज तेवरबेसी देखबामे अबैत छैक। यद्यपि गजलकेँ प्रेमक अभिव्यक्तिक सशक्त माध्यम मानल जाइत छैक। गजल कहितहिँदेरी लोकक मन-मस्तिष्कमे प्रेममय माहौल नाचि उठैत छैक, एहि बातसँ हम कतहु असहमत नहि छी। मुदा गजलमे प्रेमक बात सेहो बेस धरगर अन्दाजमे कहल जाइत छैक। कहबाक तात्पर्य जे गजल तरुआरिजकाँ सीधे बेध दैत छैक लक्ष्यकेँ। लाइलपटमे बेसी नहि रहैत छैक गजल। मिथिलाक सन्दर्भमे गीत आ गजलक एक्कहि तरहेँ जँ अन्तर देखबऽ चाही तँ ई कहल जा सकैत अछि जे गजल फूलक प्रक्षेपणपर्यन्त तरुआरिजकाँ करैत अछि, जखन कि गीत तरुआरि सेहो फूलजकाँ भँजैत अछि। मैथिलीमे संख्यात्मक रूपेँ गजल आनहि विधाजकाँ भलहि कम लिखल जाइत रहल हो, मुदा गुणवत्ताक दृष्टिएँ ई हिन्दी वा नेपाली गजलसँ कतहु कनेको झूस नहि देखबामे अबैत अछि। एकर कारण इहो भऽ सकैत छैक जे हिन्दी, नेपाली आ मैथिली तीनू भाषामे गजलक प्रवेश एक्कहि मुहूर्त्तमे भेल छैक। गजलक श्रीगणेश करौनिहार हिन्दीक भारतेन्दु, नेपालीक मोतीराम भट्ट आ मैथिलीक पं. जीवन झा एक्कहि कालखण्डक स्रष्टासभ छथि। मैथिलीयोमे गजल आब एतबा लिखल जा चुकल अछि जे एकर संरचनाक मादे किछु कहनाइ दिनहिमे डिबिया बारबजकाँ लगैत अछि। एहनोमे यदाकदा गजलक नामपर किछु एहनो पाँतिसभ पत्रपत्रिकामे अभरि जाइत अछि, जकरा देखलापर मोन किछु झुझुआन भइए जाइत छैक। कतेकोगोटेक रचना देखलापर एहनो बुझाइत अछि, जेना ओलोकनि दू-दू पाँतिवला तुकबन्दीक एकटा समूहकेँ गजल बूझैत छथि। हमरा जनैत ओलोकनि गजलकेँ दूरेसँ देखिकऽ ओहिमे अपन पाण्डित्य छाँटब शुरू कऽ दैत छथि। जँ मैथिली साहित्यक गुणधर्मकेँ आत्मसात कऽ चलैत कोनो व्यक्ति एकबेर दू-चारिटा गजल ढङ्गसँ देखि लिअए, तँ हमरा जनैत ओकरामे गजलक संरचनाप्रति कोनो तरहक द्विविधा नहि रहि जएतैक। तेँ सामान्यतः गजलक सम्बन्धमे नव जिज्ञासुक लेल जँ किछु कहल जाए तँ विना कोनो पारिभाषिक शब्दक प्रयोग कएने हम एहि तरहेँ अपन विचार राखऽ चाहैत छी- गजलक पहिल दू पाँतिक अन्त्यानुप्रास मिलल रहैत छैक। अन्तिम एक, दू वा अधिक शब्द सभ पाँतिमे सझिया रहलहुपर साझी शब्दसँ पहिनुक शब्दमेअनुप्रास वा कही तुकबन्दी मिलल रहबाक चाही। अन्य दू-दू पाँतिमे पहिल पाँति अनुप्रासक दृष्टिएँ स्वच्छन्द रहैत अछि। मुदा दोसर पाँति वा कही जे पछिला पाँति स्थायीवला अनुप्रासकेँ पछुअबैत चलैत छैक। ई तँ भेल गजलक मुह-कानक संरचनासम्बन्धी बात। मुदा खालि मुहे-कानपर ध्यान देल जाए आ ओकर कथ्य जँ गोङिआइत वा बौआइत रहि जाए तँ देखबामे गजल लगितो यथार्थमे ओ गीजल भऽ जाइत अछि। तेँ प्रस्तुतिकरणमे किछु रहस्य, किछु रोमाञ्चक सङ्ग समधानल चोटजकाँ गजलक शब्दसभ ताल-मात्राक प्रवाहमय साँचमे खचाखच बैसैत चलि जएबाक चाही। गजलक पाँतिकेँ अर्थवत्ताक हिसाबेँ जँ देखल जाए तँ कहि सकैत छी जे हऽरक सिराउरजकाँ ई चलैत चलि जाइत छैक। हऽरक पहिल सिराउर जाहि तरहेँ धरतीक छाती चीरिकऽ ओहिमे कोनो चीज जनमाओल जा सकबाक आधार प्रदान करैत छैक, तहिना गजलक पहिल पाँति कल्पना वा विषयवस्तुक उठान करैत अछि, दोसर पाँति हऽरक दोसर सिराउरक कार्यशैलीक अनुकरण करैत पहिलमे खसाओल बीजकेँ आवश्यक मात्रमे तोपन दऽकऽ पुनः आगू बढ़बाक मार्ग प्रशस्त्र करैत अछि। गजलक प्रत्येक दू-पाँति अपनहुमे स्वतन्त्र रहैत अछि आ एक-दोसराक सङ्ग तादात्म्य स्थापित करैत समग्रमे सेहो एकटा विशिष्ट अर्थ दैत अछि। एकरा दोसर तरहेँ एहुना कहल जा सकैत अछि जे गजलक पहिल पाँति कनसारसँ निकालल लालोलाल लोह रहैत अछि, दोसर पाँति ओकरा निर्दिष्ट आकारदिस बढ़एबाक लेल पड़ऽ वला घनक समधानल चोट भेल करैत अछि। गीतक सृजनमे सिद्धहस्त मैथिलसभ थोड़े बगय-बानि बुझितहिँ आसानीसँ गजलक सृजन करऽ लगैत छथि। सम्भवतः तेँ आरसीप्रसाद सिंह, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, डॉ महेन्द्र, मार्कण्डेय प्रवासी, डॉ. गङ्गेश गुञ्जन, डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र आदि मूलतः गीत क्षेत्रक व्यक्तित्व रहितहु गजलमे सेहो कलम चलौलनि। ओहन सिद्धहस्त व्यक्तिसभक लेल हमर ई गजल लिखबाक तौर-तरिकाक मादे किछु कहब हास्यास्पद भऽ सकैत अछि, मुदा नवसिखुआसभकेँ भरिसक ई किछु सहज बुझाइक। मैथिलीमेकलम चलौनिहारसभमध्य प्रायः सभ एक-आध हाथ गजलोमे अजमबैत पाओल गेलाह अछि। जनकवि वैद्यनाथ मिश्र “यात्री” सेहो “भगवान हमर ई मिथिला” शीर्षक कविता पूर्णतः गजलक संरचनामे लिखने छथि। मुदा सियाराम झा “सरस”, स्व. कलानन्द भट्ट, डॉ.राजेन्द्र विमल सन किछु साहित्यकार खाँटी गजलकारक रूपमे चिन्हल जाइत छथि। ओना सोमदेव, डॉ.केदारनाथ लाभ, डॉ.तारानन्द वियोगी, डॉ.रामचैतन्य धीरज, बाबा वैद्यनाथ, डॉ. विभूति आनन्द, डा.धीरेन्द्र धीर, फजलुर्रहमान हाशमी, रमेश, बैकुण्ठ विदेह, डा.रामदेव झा, रोशन जनकपुरी, पं. नित्यानन्द मिश्र, देवशङ्कर नवीन, श्यामसुन्दर शशि, जनार्दन ललन, जियाउर्ररहमान जाफरी, अजितकुमार आजाद, अशोक दत्त आदिसमेत कतेको स्रष्टाक गजल मैथिली गजल-संसारकेँ विस्तृति दैत आएल अछि। गजलमे महिला हस्ताक्षर बहुत कम देखल जाइत अछि। मैथिली विकास मञ्चद्वारा बहराइत पल्लवक पूर्णाङ्क १५, २०५१ चैतक अङ्क गजल अङ्कक रूपमे बहराएल अछि। सम्भवतः ३४ गोट अलग-अलग गजलकारक एकठाम भेल समायोजनक ई पहिल वानगी हएत। एहि अङ्कमे डा. शेफालिका वर्मा एक मात्र महिला हस्ताक्षरक रूपमे गजलक सङ्ग प्रस्तुत भेलीह अछि। एही अङ्कक आधारपर नेपालीमे मैथिली गजल सम्बन्धी दूगोट समालोचनात्मक आलेख सेहो लिखाएल अछि। पहिल मनु ब्राजाकीद्वारा कान्तिपुर २०५२ जेठ २७ गतेक अङ्कमे आ दोसर डा. रामदयाल राकेशद्वारा गोरखापत्र २०५२ फागुन २६ गतेक अङ्कमे। छिटफुट आनहु गजल सङ्कलन बहराएल होएत, मुदा तकर जानकारी एहि लेखककेँ नहि छैक। हँ, सियाराम झा “सरस”क सम्पादनमे बहराएल “लोकवेद आ लालकिला” मैथिली गजलक गन्तव्य आ स्वरूप दऽ बहुत किछु फरिछाकऽ कहैत पाओल गेल अछि। एहिमे सरससहित तारानन्द वियोगी आ देवशङ्कर नवीनद्वारा प्रस्तुत गजलसम्बन्धी आलेख सेहो मैथिली गजलक तत्कालीन अवस्थाधरिक साङ्गोपाङ्ग चित्र प्रस्तुत करबामे सफल भेल अछि। समग्रमे मैथिली गजलक विषयमे ई कहि सकैत छी जे मैथिली गीतक खेतसँ प्राप्त हलगर माटिमे गुणवत्ताक दृष्टिएँ मैथिली गजल निरन्तर बढ़िरहल अछि, बढ़िएरहल अछि। गजल १ झुट्ठो जे नहि डाइन नचौलक ओ भगता ओ धामी की एको गाम जँ डाहि ने सकलहुँ तँ ओढ़ने रमनामी की अक्षत-चानन धूप-दीपसँ जतऽ यज्ञ सम्पूर्ण हुअए- ततऽ जँ क्यो हड्डी रगड़ैए, ओ कामी ओ कलामी की बाप-माएपर्यन्त परोसै स्नेह जखन बटखारासँ- नकली सभक दुलार लगैए, से काकी, से मामी की सोनित सेहो शराब बनै छै शासनकेर सनकी भट्ठी दियौ घटाघटि जे भेटए से, फुसियाही की दामी की पोखरिक रखबारी पएबालए कण्ठी खालि बान्हि लिअ फेर गटागटि घोँटने चलियौ, से पोठिया से बामी की पाग उतारिकऽ कूदि गेल “प्रेमर्षि” सेहो अखाड़ामे ढाहि सकल ने जुल्म-इमारत करतै ओहन सुनामी की (वि.२०६२/०५/३०) गजल २ मोन जँ कारी अछि तँ चमड़ी गोरे की करतै? ममते जँ अरुआएल तँ माएक कोरे की करतै? गगनसँ उतरै मेघ नयनमे जखन साँचिकऽ शङ्का केहनो अन्हार चीरिकऽ जनमल भोरे की करतै? नीम पीबिकऽ माहुर सेहो पचाबैत आएल छी तँ काँटकेँ धाङैत डेगकेँ थोड़े अङोरे की करतै? घामक सिँचल धरती छोड़ि ने जकरा कतौ भरोसा तकरा लेल बनसीक सुअदगर बोरे की करतै? आगि पीबिकऽ बज्र बनौने छै जे अप्पन छाती तकरा आगाँ गोहिया आँखिक नोरे की करतै? तैयो लागल “प्रेमर्षि” अछि बस प्रेमक खेतीमे प्रेमक धन भेल घरमे जाबिड़ चोरे की करतै? (वि.२०६२/०५/२०) नव भोर जोहैत मिथिला राज्य पुनर्संरचनाक लेल भऽ रहल अभ्यासक असरि देशक समग्र क्षेत्रक सङहि मिथिलामे सेहो व्यापक देखल जा रहल अछि । जनता जागरुक आ उत्सुक अछि— नेपालक नव–निर्माणमे मिथिला क्षेत्रकेँ अपन पृथक आ विशेष पहिचानक सङ्ग देखबाक लेल । सौँसे देशमे गणतन्त्र आ सङ्घीय व्यवस्थाक माङ जोर पकड़िरहल अछि । एहनमे मिथिलावासीमे सेहो एहन भावना जागब आ तकराप्रति सक्रियता देखल जाएब जतबए स्वाभाविक अछि, ततबए उत्साहवर्द्धक सेहो । उत्साह देशक स्वत्व आ स्वतन्त्रताप्रेमी ओहन नागरिकक लेल जे अपन माटिपानिक प्रति इमान्दार छथि, अपन राष्ट्रिय स्वाभिमानपर गर्व करैत छथि, जे मिथिलाक स्वर्णिम इतिहासकेँ वर्तमान बनएबाक आकांक्षी छथि, आ जे यथार्थमे नेपाली जनताक सर्वतोमुखी विकास आ उन्नतिक पक्षपाती छथि । भूगोलसँ मिथिलाक अलोपित होएबाक पीड़ा हमसभ शताब्दियोसँ भोगैत आबिरहल छी । खास कऽ कर्णाटवंशीय मिथिला राज्यक पतनक बाद विभिन्न कालखण्डमे हमसभ यवन, अङरेज, गोर्खाली आदिक प्रहार निरन्तर सहैत आएल अछि । एतबा उत्पीड़नक बाद जँ कोनो आन सभ्यता वा संस्कृति रहितए आ कि कोनो आनठामक लोक रहितए तँ आइधरि छिन्नभिन्न होइत नेस्तनाबूद भऽ गेल रहितए । मुदा मिथिला, मैथिल आ मैथिलीक अस्तित्व निरन्तर सात सए वर्षसँ चलैत आएल अनेको तरहक कुचक्रक मारि सहितो जीवन्त अछि । एकरा पाछाँ निश्चित रूपेँ मैथिल सभ्यता–संस्कृतिक सर्वाधिक योगदान रहलैक अछि । साँस लेबामे पर्यन्त अशौकर्य भऽ रहल आइधरिक अवस्थामे सेहो अपनाकेँ जियाकऽ रखनिहार मैथिलीक एहि गौरवशाली आधारसभक प्रति नतमस्तक होइत हम किछु पाँति गढ़ने छी— मानैत छी जे आब रहल नइ दुनियाकेर भूगोलमे तैयो हमसभ बचाकऽ रखलौँ जकरा माइक बोलमे सोहर, लगनी, जटाजटिन कि झिझिया–साँझ–परातीमे एकहकटा मिथिला जीबैए एकहक मैथिल छातीमे उपर्युक्त काव्यांश भूगोलविहीनताक घाओमे मलहम लगएबाक आभास दऽ सकैत अछि, मुदा मात्र छातीमे जीवैत भूगोल हमरासभकेँ सम्पूर्णता नहि दिआ सकैत अछि । एहन–एहन कविता गढ़िकऽ असलमे कही तँ हमसभ अपनाकेँ परतारल करैत छी । एहि तरहेँ अपनाकेँ परतारिकऽ नहि राखल जाए वा जाहि बातपर हमसभ गौरव करैत छी तकरा युग–युगन्तधरिक लेल जँ चिरस्थायी करबाक हो तँ आवश्यक अछि जे खालि छातीमे सैँतल मिथिलाकेँ हमसभ जमीनपर उतारी आ मैथिल भूगोलकेँ पुनः नामकरण करैत उर्वर बनाबी । एकरा लेल देशक एखनुक राजनीतिक वातावरण हमरासभकेँ सर्वोत्तम अवसर प्रदान कएने अछि । मुदा देशमे जाहि तरहक क्रियाकलापसभ देखल जा रहल अछि ताहिसँ ई नहि बुझाइत अछि जे हमसभ एहि अवसरक सदुपयोग करबाक दिशामे पर्याप्त सचेत आ गम्भीर छी । सर्वप्रथम तँ ई बात अबैत अछि जे एखनधरिक सरकारसभ वास्तविक रूपमे सत्ताधारी वर्गसँ बाहरक लोकक लेल सेहो लोकतन्त्र आएल छैक से मानैत–सन अपन चरित्र देखबिते नहि अछि । ई कटुसत्य हमरासभक सोझाँ अछिए । वस्तुतः देशमे अखनो ओहने राजनीतिक दलक दबदबा अछि जे माघ १९ सँ पहिने संविधानसभाक नामे सुनैतदेरी कोनो बिगड़ैल साँढ़जकाँ भड़कि उठैत छल । वि.सं. २०४७ सालक संविधानमे कऽमा–फुलस्टाॅपधरिमे परिवर्तन करबाक आवश्यकता नहि देखनिहारसभ आइ नव संविधान बनएबाक बीड़ा उठौने छथि । एहनमे ओहि व्यक्तिसभक मानसिकता कतेक बदलल होएतैक से सहजहिँ अनुमान लगाओल जा सकैत अछि । जँ माओवादी जनयुद्ध नहि शुरू भेल रहितैक आ एखन जे मुद्दासभ उठल अछि से नहि उठाओल जइतैक तँ निश्चित अछि जे हमसभ आजुक ई स्वर्णिम वातावरण नहि पबितहुँ । मुदा जनयुद्धक मार्फत मैथिलीसभमे अधिकारक भूख तँ माओवादी जगा देलकैक, मुदा भुखाएलसभकेँ अन्न देखैतदेरी जाहि तरहक कछमछी भऽ सकैत छैक, तकरा व्यवस्थित करबा हेतु कोनो ठोस प्रयत्न कऽ सकबाक अवस्था माओवादीक सेहो नहि छैक । मिथिलामे भेल पहिचानक आन्दोलनक क्रममे आयोजित एकटा पत्रकार–सम्मेलनमे माओवादी नेता बाबुराम भट्टराई बाजल छलाह— ‘मधेशमे जे चेतना जागल छैक तकर वीजारोपण वा गर्भाधान के कएलक ? मधेश आन्दोलनक बाप के ?’ खास कऽकऽ २०४६ सालक परिवर्तनक बादक अवस्थाकेँ देखलापर हमरा जवाबक रूपमे ई कहबामे कनेको द्विविधा नहि होइत अछि जे माओवादी । मुदा एहिठाम ध्यान देबायोग्य बात ई अछि जे कोनो योग्य नागरिकक सम्पूर्ण निर्माणमे बापक वीर्यक भूमिका अत्यन्त न्यून होइत छैक । मुख्य भूमिका रहैत छैक— नओ मासधरि गर्भमे राखिकऽ जन्म देनिहारि आ लालन–पालन कएनिहारि माएक । मुदा दुर्भाग्य, मिथिलासहित देशक अनेको क्षेत्र, जाति, समुदायमे जागल चेतनाक बाप तँ माओवादी बनल, मुदा आब जखन माए बनबाक समय आएल अछि तँ देखा चाही जे ई भूमिका ओ कतेक कुशलतासँ निर्वाह करैत अछि । एहिसँ पहिने मधेशक पार्टी वा सङ्गठनसभ ओहोसभ खालि बाप बनबाक दम्भ मात्र देखा सकल । ई बात खास कऽ मिथिलाक भाषा–संस्कृतिजन्य भावनापर बेरबेर कुठाराघात करैत ओसभ देखा चुकल अछि । जँ मधेशी आन्दोलन/विद्रोह बाप बनबाक अहङ्कारमे मोँछक लड़ाइ नहि बनितए, एकरा समटिकऽ–सहेजिकऽ चलनिहार एकटा माए भेटितैक, तँ आइ अवस्था किछु भिन्न रहितैक । अवस्था तैयो बिगड़ल नहि छैक । सम्पूर्ण मिथिलावासीक मनोबल अखनो ओतबए उच्च छैक । एहि मनोबलकेँ सकारात्मक आ सार्थक परिणामपर अवतरण करएबाक लेल क्रियाशील होएबाक जिम्मेदारी हमरेसभपर अछि । संसद आ सड़कसँ जनआवाज बुलन्द कएनिहारसभ बेर–बेर ई बात दोहराओल करैत छथि जे संविधानसभा सभसँ बेसी मधेशी, दलित एवं जनजातिएक लेल आवश्यक अछि । ओहि आवश्यक संविधानसभा आ तकरा बाद बनल सरकारमे मैथिलसभक उल्लेख्य सहभागिता अछि । तेँ संविधानसभाकेँ अपन हकमे उपयोग करबाक दिशामे सभक क्रियाशीलता आवश्यक अछि । रहि गेल बात सशस्त्र आन्दोलन कएनिहार जनतान्त्रिक तराई मुक्ति मोर्चासभक, हमर विचारमे ओहोसभ राज्यसत्ताकेँ समदर्शीए बनएबाक लेल ई मार्ग अपनौने छथि । जनभावसँ निरपेक्ष राजनीति हुनकोसभक नहि भऽ सकैत छनि । सुदीर्घ राजनीतिक इतिहास समटिकऽ बैसल व्यक्तिसभ एखन क्रियाशील मोर्चासभमे छथि । हुनकासभक आगाँ इहो चुनौती छनि जे हुनकेसभक देखासिखी कतेको अवाञ्छित तत्वसभ मिथिलामे पएर पसारिरहल अछि । ओ तत्वसभ हमरासभक मूल मुद्दाकेँ दरकिनार करबाक लेल जी–जानसँ लागल अछि । एहन अवस्थाकेँ विचारैत सेहो अपनाकेँ जनताप्रति उत्तरदायी बुझनिहारसभकेँ अपना–अपना दिससँ सेहो सहमतिक विन्दु तलाशैत रहबाक चाही । एम्हर अन्य पक्ष सेहो जँ व्यक्तिगत ईर्ष्या–द्वेषसँ उपर उठि जनताक प्रति इमान्दार भऽकऽ आगाँ आबए तँ निश्चित अछि जे सशस्त्र समूहसभ सेहो आमिल पीबिकऽ नहि बैसल रहत । एहि काजमे सरकार आ विशेष कऽ माओवादीक भूमिका विशेष महत्वपूर्ण भऽ सकैत अछि । किएक तँ जेसभ अलग बाट धएने छथि सेसभ अधिकांश माओवादीएसँ बहराएल छथि । जँ माओवादीसभ गम्भीरतासँ ई सोचथि जे जेसभ ओहन विकट–विकराल समयमे सङ्ग छल से आइ किएक अलग भऽ गेल तँ ई समस्या जल्दीए सलटि जाएत । ई विशुद्ध रूपसँ दियाद–वादमे होबऽ वला भावनात्मक प्रहारक कारणे उत्पन्न मतभिन्नता भऽ सकैत अछि । एहिमे अलग विचार रखनिहार दियादक बात सुनिकऽ ओकर सम्मान मात्र कऽ देल जाए तँ जतऽ कतौ ककरो अहंकेँ ठेस लागल होएतैक, से शान्त भऽ जएतैक । शान्तिक जोरक आगाँ केहनो कड़गर हथियारकेँ घमऽ पड़तैक आ घमि जएतैक से हमर दृढ विश्वास अछि । रहल मिथिलाकेँ साकार रूप देबाक बात, तँ एहिमे एतबए कहब— जखन जनजन ई मिथिलाक जागि जेतै भाइ हेतै सोन मढ़ल भोर, राति भागि जेतै भाइ । मधुश्रावणी : मिथिलाक पारम्परिक हनिमून भूगोलसँ विलुप्त भऽ चुकल मिथिला जँ एखनोधरि अस्तित्वमे अछि तँ एकरा पाछाँ एक्कहिटा कारण छैक— एहिठामक लोकवेदमे रहल बौद्धिक ऊर्जा आ मैथिल संस्कृतिमे रहल विलक्षणता एवं वैज्ञानिकता। मिथिलामे जीवनक विविध रोमाञ्चक घड़ि एवं महत्त्वपूर्ण क्रियाकलापकेँ सांस्कृतिक आवरण ओढ़ाकऽ धार्मिकता एवं सामाजिकतासँ आवद्ध कएल गेल छैक। लोकव्यवहारमे प्रचलित क्रियाकलापसभसँ मात्र सेहो ई स्पष्ट भऽ जाइत अछि जे एकर गर्भमे एखनो बहुतो बहुमूल्य रत्न नुकाएल छैक। एहीसभ कारणे एखनोधरि मैथिल संस्कृति जीवन्त अछि आ मिथिला अस्तित्वमे अछि। आजुक सन्दर्भमे तँ इहो कहब अतिशयोक्ति नहि बुझाइत अछि जे नेपालमे मिथिले एकटा एहन सांस्कृतिक सम्पदा अछि, जकर आङुर धऽकऽ मधेश नामक राजनीतिक क्षेत्र डेगाडेगी दऽ रहल अछि। भारतदिस सेहो कमसँ कम बिहारक जँ बात कएल जाए तँ ओहि७म मिथिला छोडि आन कोनो उल्लेख्य सांस्कृतिक सम्पदाक सर्वथा अभावे देखल जाइत अछि। आइकाल्हि मात्र धार्मिकता आ परम्परागत संस्कारक रूपमे अधिकांश पावनि–तिहार वा सांस्कृतिक कर्म सीमित होइत गेल पाओल जाइत अछि। मुदा मिथिलाक पावनि–तिहारसभकेँ जँ सूक्ष्मतापूर्वक देखल जाए तँ एहिसभक पाछाँ कोनो ने कोनो उद्देश्य निहित रहल स्पष्ट देखबामे आबि जाइत छैक। एकरासभकेँ आओर बेकछाकऽ देखलापर आजुक समयमे सेहो ई पावनि–तिहार ओतबए सान्दर्भिक आ उपयोगी बुझाइत छैक। साओन मासमे मिथिलाक किछु जातिमे नवविवाहित दम्पतिसभक लेल आयोजन होबऽ वला मधुश्रावणी पावनिकेँ सेहो एही रूपमे लेल जा सकैत अछि। मधुश्रावणी विशेषतः नवविवाहिता स्त्रीसभक लेल आयोजित भेनिहार एकटा एहन धार्मिक अनुष्ठान छियैक, जाहिमे ओसभ धार्मिक रूपेँ तँ विषहरा आ महादेव–पार्वतीक पूजा करैत छथि, मुदा एकर गहिराइमे जा देखलापर स्पष्ट भऽ जाइत अछि जे मधुश्रावणी मिथिलामे मनाओल जाएवला एकटा परम्परागत प्रकृतिक ‘मधुचन्द्रिका’ अर्थात ‘हनिमून’ छियैक। मधुश्रावणी मिथिलाक ब्राह्मण, कायस्थ, देव, स्वर्णकार आदि जातिमे विशेष रूपसँ मनाओल जाइत अछि। आधुनिक यौनशास्त्रीलोकनि हनिमूनकेँ वैवाहिक सम्बन्ध सुदृढीकरणक प्रमुख आधार मानैत छथि। तत्कालीन मैथिल विद्वानसभक सेहो एहि पावनिक परम्परा आरम्भ करैत काल इएह मानसिकता रहल होएतनि। प्रायः इएह कारण भऽ सकैत अछि जे मिथिला क्षेत्रमे परम्परागत रूपेँ मधुश्रावणी मनाओल जाएवला ब्राह्मण, कायस्थ, देव आदि जातिमे वैवाहिक सम्बन्ध–विच्छेदक घटना अपेक्षाकृत कम देखबामे अबैत अछि। जाहिरसन बात अछि— जेँ विवाहक बन्धन सक्कत रहैत छैक, तेँ एहिमे आगाँ चलिकऽ दुर्घटना कम होइत छैक। लोक–लाजक भय वा स्त्री जातिक लेल डेग–डेगपर लगाओल जाएवला वर्जना मात्र जँ ‘जबर्दस्ती दाम्पत्यक गाड़ी’ घिचबाक कारण रहितैक तँ मिथिलाक आनो जातिमे वैवाहिक सम्बन्ध ओतबए सुदृढ रहितैक, जतेक मधुश्रावणी मनौनिहार जातिमे। तहिया एखनजकाँ ‘हनिमून’ क लेल बाहर जएबाक अवस्था नहि छलैक। भऽ सकैत छैक जे यातायातक असुविधा एकर प्रमुख कारण रहल हो। मुदा नवविवाहित दम्पतिकेँ किछु उत्फुल्लता, किछु उन्मुक्तता भेटबाक चाही— एहि बातक निष्कर्ष तत्कालीन विद्वानलोकनि निकालने होएताह। एकरा लेल ओलोकनि कामोद्दीपनक दृष्टिएँ सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मानल जाएवला बरसाती महिना साओनक चयन कएने होएताह। धार्मिकताक सङ्ग आबद्ध कऽ एकरा व्यापकता देल गेल होएतैक। साओनक मधुरताक आभास करएबाक सन्दर्भमे तथा यौन–सम्बन्ध सुदृढीकरणक दृष्टिएँ आवश्यक तत्त्वसभ समाहित कऽ एकरा एकटा परम्परा बना देल गेल होएतैक। एहि नान्हिटा लेखमे वैज्ञानिक दृष्टिएँ मैथिल संस्कृतिमे पाओल जाएवला सम्पूर्ण सार्थक पक्षसभक विस्तृत चर्चा करब सम्भव नहि अछि। मुदा एतबा अवश्य कहल जा सकैत अछि जे मैथिलीक अधिकांश संस्कार, आचार–विचार एवं व्यवहारमे डेग–डेगपर वैज्ञानिक आधारसभक प्रचुरता पाओल जाइत अछि। यौनविज्ञानक दृष्टिएँ जँ देखल जाए तँ मधुश्रावणी पावनिक अत्यन्त विशिष्ट महत्त्व अछि। सामान्यतया ई पावनि मनाओल जाएवला जातिसभमे विवाहक बाद लड़का सासुरमे रहैत अछि। परम्पराक जँ बात करी तँ चारि दिनक बाद ओकरासभक ‘चतुर्थी’ अर्थात प्रथम मिलन होइत छैक। एहि चारि दिनधरि वर–कनियाँ दुनूकेँ नोन नहि खाए देल जाइत छैक। चारिम दिन भोजनमे माछ–मासुसन सुरुचिकर एवं तामसी खाद्यवस्तु समाविष्ट रहैत छैक, जे कामोद्दीपनक दृष्टिएँ सेहो विशेष महत्त्व रखैत अछि। एहिठाम संस्कृतिक अन्तर्वस्तुक रूपमे नुकाएल मनोविज्ञान दऽ विचार कएल जा सकैत अछि। वस्तुतः ई चारि दिन वर–कनियाँक रूपमे दू अपरिचित प्राणीकेँ भावनात्मक रूपेँ लग अएबाक लेल देल गेल विशेष अवसर छियैक। कारण, यौनशास्त्रीलोकनिक कहब छनि जे जाधरि स्त्री–पुरुष दुनू भावनात्मक रूपेँ निकट नहि होएत, ताधरि सफल यौन–सम्बन्धक स्थापना नहि भऽ सकैत छैक। समाजमे जहिया प्रेम–विवाहक सम्भावना नहिजकाँ छलैक, तहिया एही भावनात्मक निकटताक लेल ई चारि दिन देल जाइत छलैक। जँ एना नहि रहितैक तँ सामान्यतया आन जातिमे विवाहक प्रातेभने मनाओल जाएवला सुहाग–रातिक लेल ब्राह्मण–कायस्थ–देव आदि जाति किएक चारि दिनधरि उपास रखितथि! शिक्षा–दीक्षाक मामलामे तत्कालीन समयक सर्वाधिक अग्रणी मानल जाएवला एहि जातिसभमे कोनो रूढ़िक कारणे तँ एहन बात नहिएँटा भऽ सकैत छलैक! अस्तु। विवाहसँ चतुर्थीधरि भावनात्मक रूपेँ लग अएबाक लेल चारि दिनक समय तँ देल जाइत छैक। मुदा अवस्थाजन्य कारणकेँ देखैत एकटा खतरा बनले रहैत छैक। खतरा ई जे आगि आ खढ़क बीच निकटता भेलापर धधरा ने पजरि जाए वा कही युवा मोन बहकि ने जाए! तकरे सावधानीस्वरूप ओकरासभकेँ नोन नहि खाए देल जाइत छैक। नोन नहि खाएल अवस्थामे ओहुना लोक शारीरिक आ मानसिक रूपेँ शिथिल भऽ जाइत अछि। निश्चित रूपेँ अनोनाक अभीष्ट इएहटा भऽ सकैत छैक जे नवविवाहित वर–कनियाँमे आवश्यक तैयारीसँ पूर्वहिँ काम–भावना नहि भड़कि जाइक। चारिम दिनक मधुर–मिलनक लेल फेर नोनक सङ्ग–सङ्ग भोजनमे सेहो विशेष रूपसँ नीक–निकुतक ओरिआओन कएल जाइत छैक। ई भोजन सामग्री शारीरिक रूपसँ वर–कनियाँकेँ तैयार करैत छैक। जखन कि मानसिक रूपेँ उद्वेलित करबाक काज करैत रहैत छैक— साँझ–कोवर आदि गीतमे व्यक्त भेनिहार प्रेम–प्रसङ्ग। समग्र रूपमे बढ़ैत मानसिक–शारीरिक उद्वेलनक भावमे चुहलवाजीक छौँक लगएबाक काज करैत छैक— डहकनक झँसगर पाँतिसभ। एहि तरहेँ चतुर्थीमे भावनात्मक रूपेँ शारीरिक सम्बन्धकेँ सुदृढ बनएबाक प्रयत्न कएल जाइत छैक। एहिठाम फेर जँ परम्पराक गप्प करी तँ ई देखल जाइत अछि जे पहिने एहि जातिसभमे विवाहक बाद सासुरसँ विदाह भऽकऽ अएलाक बाद वर एक्कहिबेर मधुश्रावणीएमे पुनः सासुर जाइत छल। तेँ विश्वास कएल जा सकैत अछि जे कनियाँ–वरक एहि दोसर मिलनकेँ पुनः शारीरिक सम्बन्धक प्रगाढ़तासँ भावनात्मक सम्बन्ध सुदृढ करबाक सांस्कारिक संयन्त्रक रूपमे विकसित कएल गेल हो। एहि पावनिमे नवविवाहिता तेरहसँ लऽ पन्द्रह दिनधरि विषहरा आ गौरीक पूजा करैत छथि। एहि पूजाक लेल फूल लोढ़ऽ ओ स्वयं गेल करैत छथि आ सङ्गमे रहैत छनि हुनक सखी–बहिनपासभ। फूल लोढ़ब मूलतः बहाना होइत अछि। असली काज रहैत छैक घुमफिर आ गप्पसप्प। जखने कोनो नवविवाहिता अपन सखी–बहिनपासभक सङ्ग घुमफिर करऽ कतहु जाएत तँ ओकरासभक बीच गप्पक विषय की भऽ सकैत अछि, से सहजहिँ अनुमान लगाओल जा सकैत अछि। निश्चित रूपेँ गप्पक विषय ओकर पति, ओकरासमभक अनुभव आदि–इत्यादि रहैत होएतैक। ई बातचीत यौन–भावनाकेँ तीव्र करबामे आ यौनसम्बन्धी विविध जिज्ञासासभक समाधानमे सेहो सहायक होइत छैक। बादमे पूजा–कालमे वर–कनियाँ दुनूकेँ संगहि राखिकऽ शिव–पार्वतीक विभिन्न प्रसङ्गक बखान करैत यौनसम्बन्धी खिस्सासभ प्रतीकात्मक रूपेँ सुनाओल जाइत छैक। दुनू युवा–मनकेँ प्रेम आ काम–भावना बढ़एबामे ई खिस्सासभ उपयोगी भेल करैत छैक। एकरा बाद फेर विवाह–कालमे बनल कोहबर तँ वर–कनियाँ लेल अजबारले रहैत छैक। आ, ई क्रम निरन्तर तेरहसँ लऽ पन्द्रह दिनधरि चलैत रहैत छैक। निश्चित छैक जे एतबा अवधिमे वर–कनियाँ एक–दोसराक सङ्ग शारीरिक आ मानसिक दुनू दृष्टिएँ बेस लग आबि जाइत छैक, जे कि आजुक आधुनिक वैज्ञानिक समाजक हनिमून आ तत्कालीन परम्परागत मैथिल समाजक मधुश्रावणीक अभीष्ट सेहो छियैक। मिथिलाक संस्कृतिमे यौनकेँ बड़ बेसी महत्त्व देल गेल छैक। मुदा कतेको लोक एकरा धर्मक ससरफानीमे तेना ने गछाड़िकऽ राखि देने छथिन जे आमलोक आगाँ–पाछाँ किछु सोचिए नहि सकैत अछि। तेँ जखन ई कहल जाइत अछि जे मधुश्रावणी यौनविज्ञानक अभिमञ्चनसम्बन्धी पावनि अछि तँ कतेको मैथिल महामनासभ बमकि उठैत छथि। किएक तँ ओ एहिमे महादेव–पार्वतीसँ बेसी किछु देखिए नहि सकैत छथि। मधुश्रावणीमे पूजित विषहरा (नाग) दू रूपेँ महत्त्व रखैत छथि। साहित्य वा ललितकलामे जे प्रतीकसभ प्रयोग कएल जाइत अछि, ताहिमे माछकेँ स्त्री जननेन्द्रिय, साँपकेँ पुरुष जननेन्द्रिय, काछुकेँ सम्भोग, बाँसकेँ वंश आदि मानल जाइत अछि। नवविवाहिता प्रतीकात्मक रूपेँ विषहराक पूजा करैत पुरुष जननेन्द्रियक महत्त्व बूझैत छथि। दोसरदिस प्रकृति संरक्षणक लेल सेहो साँप महत्त्वपूर्ण अछि। तेँ भलहि ओ विषधर अछि, मुदा ओकर संरक्षण होएबाक चाही, से सन्देश एहिसँ जाइत अछि। मधुश्रावणीक खिस्सामे सेहो तेहने बातसभ बेसी अबैत छैक। जेना विषहराक जन्मेक सम्बन्धमे उल्लेख अछि— ‘एकबेर महादेव आ पार्वती जलक्रिडा करैत सम्भोग कऽ रहल छलाह। तेहनेमे महादेवक वीर्य स्खलन भऽ गेलनि। ओहिसँ विषहराक जन्म भेल।’ तहिना गौरीकेँ छिनारि बनएबाक प्रसङ्ग सेहो मधुश्रावणीक खिस्सामे आएल अछि। किछु फकड़ामे सेहो एहि तरहक बातसभ आएल अछि। जेना बैरसी आ युवतीबीचक संवादमे कहल गेल अछि— ‘ऊँचे आरि ऊँचे धूर ऊँचे त खरिहान रे, ताहूसँ जे ऊँच देखल गौरीके भथियान रे।’ एही तरहेँ गौरीक ‘आङ’, गौरीक स्तन आदिक वर्णन सेहो बड़ रसगर अन्दाजमे कएल गेल अछि। मैथिल संस्कृतिमे यौनकेँ कतेक महत्त्व देल गेल छैक, तकर अनुमान अहिबक फड़ नामक पकवानक रूप–रंग आ नामसँ सेहो स्पष्ट भऽ जाइत अछि। तेँ निःशङ्क भऽकऽ कहि सकैत छी जे मधुश्रावणी यौनभावना आ यौनशिक्षाक महापर्व छियैक। साओन मासमे पड़लासँ ई अपन सार्थकताकेँ आओर बेसी पुष्टि करैत अछि। कारण हम एकटा एहन जोड़ीकेँ जनैत छी जे विवाहक डेढ़ दशक गुजरि गेलाक बादो जखन वर्षा होबऽ लगैत छैक तँ कलेजमे पढौनाइ छोड़िकऽ दौड़ल–दौड़ल डेरा पहुँचि जाइत छथि। एहिमे ओहि मित्र दम्पतिसँ बेसी कारगर साओनक मादकता करैत छैक। आखिर एकरे ने मैथिल संस्कृति सहेजने अछि। आइकाल्हि मात्र सतही दृष्टिएँ देखनिहार किछु तथाकथित महिला अधिकारवादीसभ मधुश्रावणीक क्रममे कनियाँकेँ ‘टेमी’ देल जाएवला रीतिकेँ महिला–हिंसाक एकटा रूप मानैत एकर विरोधो करैत देखल जाइत छथि। एहि विरोधक पाछाँ हमरा एक्कहिटा कारण नजरि अबैत अछि— हुनकासभमे मैथिल संस्कृतिक विशिष्टताक सन्दर्भमे रहल अज्ञानता। टेमी देबाक विधिमे कनियाँक ठेहुनमे पानक पात राखि उपरसँ जरैत टेमीसँ छुआओल जाइत छैक। निश्चित रूपेँ ई सामान्य पीड़ादायक सेहो होइते होएतैक। मुदा की स्त्री जातिकेँ प्रथम संसर्गमे ओ सामान्य पीड़ा नहि होइत छैक? वस्तुतः ई ओकरे एकटा कड़ी छैक, जाहिमे ई सङ्केत देल जाइत छैक जे यौनसम्बन्ध जँ बड़ आनन्ददायक होइत छैक तँ ओहिमे स्त्रीकेँ पीड़ासँ सेहो साक्षात्कार करऽ पड़ैत छैक। एकर पृष्ठभूमिमे एकटा एहू पक्षकेँ लेल जा सकैत छैक जे भऽ सकैछ, पहिने–पहिने मधुश्रावणीएक समयमे वर–कनियाँबीच प्रथम शारीरिक मिलन होइत रहल होइक आ तकरे आभास करएबाक लेल ई प्रथा चलाओल गेल हो। एकटा दोसर कारण इहो मानल जाइत अछि जे मिथिलामे यवनसभक आक्रमण भेलाक बाद ओकरासभक कुदृष्टि नवकनियाँसभपर बेसी पड़ैत रहैक। ओकरासभसँ बचएबाक लेल कनियाँकेँ कनेक आगिसँ जरा देल जाइक, जाहिसँ ओसभ ओकरादिस ध्यान नहि दिअए। कारण मुसलमानसभ जरनाइकेँ बहुत खराब मानैत अछि। पं. सूर्यकान्त झा ई तर्क आगाँ बढ़बैत कहैत छथि— ‘एही कारणे मुइलाक बादो ओकरासभकेँ जराओल नहि जाइत छैक, गाड़ल जाइत छैक।’ संस्कृतिविद स्व. प्रो. नमोनारायण झाक एहि विषयमे तर्क छनि जे ठेहुनपर कोनो नस एहन रहैत होएतैक, जकरा प्रभावित कएलापर यौनसम्बन्धी ग्रन्थीसभमे सकारात्मक असर पड़ैत होइक आ ताहीक अन्तर्गत ई प्रक्रिया शुरू कएल गेल हो। स्वास्थ्योपचारक चीनी पद्धति अक्यूपङ्चर, अक्यूप्रेसर आदिपर ध्यान देलापर एहू बातमे विश्वास करबाक यथेष्ट आधारसभ बनैत छैक। टेमीक एकटा बातकेँ लऽकऽ नेपालक मिडिया आ मिथिलाक यथार्थसँ दूर–दूरधरिक कोनो सम्बन्ध नहि रखनिहारि किछु महिलावादीसभ किछु सालपूर्व एक्के टाङपर खूब नाचल रहथि। एहि नामपर ओसभ मधुश्रावणीकेँ मात्र नहि, सम्पूर्ण मैथिल विवाह पद्धतिकेँ बदनाम करबापर लागल छथि। एना देखलापर ओ व्यक्तिसभ हमरा ओहने कोनो अज्ञान नेनाजकाँ लगैत अछि, जे दूटा साँपकेँ आपसमे जोड़ लगैत देखलापर बाप–बाप चिचिया उठैत अछि जे साँपक झगड़ा भऽ रहल छैक। पीड़ा टेमीएटामे नहि होइत छैक। रोग निवारणक लेल लगबाओल जाएवला सुइयामे सेहो पीड़ा होइत छैक। मूह–कानक सिंगार लेल नाक–कान छेदएबामे सेहो पीड़ा होइत छैक। सुन्दर आ हाथ लागल चूड़ी पहिरबामे पर्यन्त पीड़ा होइत छैक। तखन बुझबाक जरूरति ई रहैत छैक जे पीडाक प्रयोजन की? नाक–कानमे भूर कऽकऽ शरीरकेँ खण्डित कएनाइ आ कि नाक–कानमे लटकऽ वला गर–गहनाक सौन्दर्यसँ आनन्दित भेनाइ? टेमीक सन्दर्भमे सेहो इएह बात लागू होइत छैक। ओहुना टेमी यौनशिक्षाक पावनि मधुश्रावणीक एकटा अङ्ग छियैक। यौनक्रियाक आरम्भ तँ पीड़ासँ होइतहिँ छैक, वात्सायनक कामसूत्रकेँ जँ आधार मानल जाए तँ नखक्षत, दन्तक्षत आदि विधिक चर्चा सेहो अबैत छैक जे नारीक उद्दीपनमे सहयोगी मानल जाइत अछि। एतबए नहि, नारीकेँ जीवनक सर्वाधिक सुखकारी प्रक्रिया सन्तानोत्पादनमे सेहो असह्य पीड़ासँ गुजरऽ पड़ैत छैक। यावत पक्षसभपर विचार करैत गेलापर मधुश्रावणीमे देल जाएवला टेमी पीड़ा पहुँचएबाक उद्देश्यसँ नहि, अपितु स्वस्थकर यौनजीवनक लेल आरम्भहिमे लगाओल गेल टीकाकरणक एकटा प्रक्रिया छियैक। एकरा एहू लेल हिंसा वा प्रताड़नाक रूपमे नहि देखल जा सकैत अछि, किएक तँ ई प्रक्रिया प्रायः नवकनियाँक नैहरमे भेल करैत छैक। नैहरमे कनियाँक काकी, दिदी आदिसँ ओकरा पीडा पहुँचएबाक हिसाबेँ कोनो काज निश्चिते नहि भऽ सकैत छैक। हँ, टेमीक सङ्ग जोड़िकऽ किछु अनर्गल बातसभक प्रचार अवश्य भऽ रहल छैक। जेना टेमी देल जगहपर जँ फोका भेल तँ पति बेसी मानत। वा ई सतीत्वक अग्निपरीक्षा छियैक। जकरा फोका नहि भेलैक से दुश्चरित्र अछि, आदि–आदि। मुदा ईसभ समयक्रममे जुटैत गेल बकबाससभ छियैक। भऽ सकैछ जे कहियो ककरो टेमी दैत काल बेसी पाकि गेल हेतैक आ फोँका भऽ गेल हेतैक तँ टेमी देबऽ वाली ओकरा भरोस देबऽ दुआरे कहि देने हेतैक जे जकरा जतेक पैघ फोका होइत छैक, तकरा घरवला ततेक बेसी मानैत छैक। टेमी तहियाक प्रचलन छैक, जहिया मिथिलामे आधुनिक शिक्षाक प्रसार नहि भेल छलैक। ओहि समयमे वर–वधुकेँ यौनशिक्षा देबाक कोनो भरोसगर माध्यम सेहो उपलब्ध नहि छलैक। मुदा आइ युवायुवतीसभ अपन पाठ्यपुस्तकसँ लऽकऽ अन्य अनेको माध्यमसँ सेहो ई शिक्षा आसानीसँ प्राप्त कऽ सकैत छथि। तेँ उपयोगिताक दृष्टिएँ मधुश्रावणी आ मधुश्रावणीक टेमी किछु आवश्यक नहि रहि गेलैक अछि। मुदा हमरासभक संस्कृति लोककल्याणक पक्षकेँ एतेक गहियाकऽ धएने अछि, से बात विश्व समुदायकेँ कहबाक लेल मात्र सेहो एहि तरहक संस्कृतिक संरक्षण आवश्यक छैक। हँ, एहिमे जतऽ कतहु विकृति नजरि आबए, ओहिमे सुधार वा परिमार्जन आवश्यक भऽ जाइत छैक। जेना कि राजविराजमे मैथिल महिला परिषदक अगुआइमे टेमी बन्द करएबाक अभियान चलाओल गेल अछि। ई सर्वथा उचित बात अछि। किएक तँ मिथिलामे कोन चीज कतबाधरि पाच्य अछि आ कतबा अपाच्य अछि, तकर निर्णय करबाक अधिकारी मिथिलेवासीसभ भऽ सकैत छथि। मैथिल नारीकेँ जँ कतहु प्रताडित भेलसन बुझाइत छनि तँ एकरो आवाज मैथिले नारीकेँ उठएबाक चाहियनि। आनकेँ तँ की छैक, कोनो मैथिल महिलाक सीँथमे लागल सिन्दुर देखिकऽ कहि सकैत अछि, ‘बाफ रे बाफ, मिथिलाक नारीपर बड़ अत्याचार होइत छैक। ओकरा पुरुषसभ एतेक प्रताड़ित करैत छैक जे सभ दिन ओकर माथ फुटले रहैत छैक।’ आइकाल्हि आधुनिक विचारधाराक लोकसभ परम्परागत अधिकांश पक्षकेँ अन्धविश्वास वा कुरीतिक रूपमे व्याख्या करैत छथि। मुदा मैथिल संस्कृतिमे बेसी एहने पक्षसभ अछि, जे निरर्थक नहि अछि, पूर्णतः सार्थक अछि। आजुक आधुनिक समाजपर्यन्त एहि संस्कृतिसँ बहुतो कल्याणकारी तत्त्वसभ ग्रहण कऽ सकैत अछि। एहन स्थितिमे संस्कृतिकेँ एक्कहि झटकामे तोड़ि फेकबाक धारणा रखनिहार लोकसभकेँ चाहियनि जे ओ एकबेर अपन ज्ञानचक्षु उघारिकऽ अपन संस्कृतिक सिंहावलोकन करथि, तकरा बादहि एकरा विषयमे कोनो मत बनाबथि। आ, हम तँ ई कहऽ चाहब जे वर्तमान समयमे भयानक आर्थिक तङ्गीसँ गुजरि रहल सम्पूर्ण मिथिलावासीकेँ चाही जे ओ मधुश्रावणीसन जीवन्त पावनिकेँ अङ्गीकार कऽ घरहि बैसल अपन बेटा–पुतहुकेँ, बेटी–जमाएकेँ हनिमूनक मौका उपलब्ध कराबथि, मिथिलाक सांस्कृतिक विशिष्टताक संरक्षण–सम्बर्द्धन करथि। अमरनाथ झा,दिल्ली वि.वि. हाँ ई तँ कहियो नहि देखने रही हाँ ई तँ कहियो नहि देखने रही .... " हमरा मोन नहि पड़ि रहल अछि जे एतेक रुचि कोनो पछुलका चुनावमे लोकक रहल अछि”। ई शब्द अछि हिन्दुस्ताम समाचार पत्रमे खुशवन्त सिंह जीक आइ काल्हिक चुनावपर। अनायास एहन लागल जेना क्यो एहि परिस्थितिकेँ बुझबाक लेल एकटा पुरान चित्र राखि देने होअए। आइ.बी.एन ७ केर प्रबन्ध सम्पादक आशुतोषक निबन्धक पक्तिकेँ एहि सन्दर्भमे एतए राखि रहल छी: "ई कहल जा सकैत अछि जे जखन देशक राजनीतिक दिशा बदलि रहल अछि आ वोटर बुधियार भऽ रहल छथि, एकटा नव सिविल सोसाइटी ठाढ़ भऽ रहल अछि जे नेता लोकनिक लेल एकटा जिम्मेदारी तैयार कए रहल अछि। ..." । माने आब चुनावक परिदृश्य बदलि रहल अछि, एहि गपमे किछु सत्यता अछि। हमरा १९७४ केर पछुलका दौराक स्मृति नहि अछि। १९७१ क भारत-पाक युद्धक कालमे गामक चौबटिया पर ठरल साँझमे घूर तापैत किछु बूढ़-पुरान लोककक गर्वित ललाटक छाहक स्मृति अछि जे भारतीय सैनिकपर गर्व कए रहल रहथि। फेर १९७४ क आसपासक जे.पी.आन्दोलनक मोन पड़ैत अछि जे कोना सभ युवा न्यायवादी-आन्दोलनकारी भए गेल रहथि। हमर पैघ भाए आ छोट बहनोइ दुमकामे प्रदर्शनमे भाग लेने रहथि आ पुलिस द्वारा पकड़ल जएबापर बाबूजीक नाम लए कऽ अपन जान बचेने रहथि। हमर पितियौत भाए आ हुनकर तीन टा संगीक मैट्रिकक परीक्षा बड्ड खराप गेल छलन्हि से ओ आन्दोलनकारी बनि गेल रहथि आ जेल गेल रहथि। एहिमेसँ एक गोटे कहियो कांग्रेस तँ कहियो बी.जे.पी.क शरणमे जाइत छथि मुदा हाथ कतहु नहि मारि पबैत छथि, दोसर शुरूसँ कांग्रेसी रहलथि आ चौअनिया नेता बनि जिनगी गुजारि देलन्हि तँ तेसर राजनीतिसँ हाथ जोड़ि अलग भए गेल छथि। मुदा कहियो हिनको चलती रहन्हि। हमरा सन छठम-सातम कक्षाक लोक सेहो आन्दोलित होइत रहथि आ इन्कलाब-जिन्दाबादक नारा लगबैत रहथि। १९७५-७६ मे तँ हमहूँ अपनाकेँ पैघ क्रान्तिकारी बुझए लागल छलहुँ ओना तहिया हम कक्षा ७-८ मे पढ़ित रही। आपात कालक विरोधमे हम अपन पहिल कविता सेहो लिखने रही। जकरा हमर माझिल भाए हँसीमे फाड़ि कए उड़ा देलन्हि। फेर १९७७ क चुनावमे किछुकेँ छोड़ि सभ गोटे जनता पार्टीक संग देलन्हि। एतए धरि जे हमर परिवारक कुलगुरु सेहो आएल रहथि आ कहए लगलाह जे एहि बेर जनते पार्टीकेँ भोट देल जाए। नारा लागए लागल अन्न खाऊ कौरवक ,गुण गाऊ पांडवक। हमर १४ वर्षीय किशोर मन तँ पूर्ण क्रांतिकारी भऽ गेल रहए। हँ ई नहि बिसरब जे हम आइक झारखण्डक संताल परगनाक एक गामक खिस्सा कहि रहल छी। हम ओहि हाई स्कूलक गप कहि रहल छी जकर माटिक धरतीकेँ गोबरसँ निपबाक हेतु हमरा सभकेँ १ किलोमीटर सँ पानि आनए पड़ैत छल आ लग-पासक जंगलसँ २-३ किलोमीटरसँ गोबर आनए पड़ैत छल।तँ अहाँ आब बुझि गेल होएब जे हम ओहि ठामक आ ओहि समयक गप कहि रहल छी जतुक्का विषयमे अहाँ आइयो कहब जे ओहि ठाम तँ भूखाएल-आ नंगटे रहनिहार निवास करैत छथि। पहिने ओतए रोटी दियौक आ तखन फेर राजनीतिक गप करब। तखन ओहू समयमे जनसाधारण मात्र नहि वरन् धर्मगुरु धरि हस्तक्षेप कएने रहथि(आइ-काल्हि बला धर्मगुरु नहि बुझि लेब)। आ ओहि समएक राजनीतिक अर्थ ओ नहि छल जे आइ भए गेल अछि। आशुतोषक प्रारम्भिक पंक्ति शाइत परिस्थितिक स्वाभाविक अभिव्यक्ति अछि जखन ओ कहैत छथि जे गरि-गूरिक बीच ई धारणा बनैत अछि जे राजनीति अपन योग्य नहि अछि... आ जनधारणा सएह तँ सामाजिक सत्य अछि। तखन हम की करी? हम तँ विशिष्ट लोक छी ने। ई कोन गप भेल जे हम करोड़ो खरचि कए टिकट नहि कीनि सकैत छी आ पढ़ाईमे भुसकौल भए नेता नहि बनि सकैत छी? तेँ की? छी तँ हम कलमक जादूगर। हमर कलमसँ जादू चलि रहल अछि आ दुनियाँ बदलि रहल अछि। पटना, भोपाल आ रायपुर सभ बदलि रहल अछि। हिन्दुस्तान पत्रक संपादिकाक भावुकता पूर्ण ललित निबंध होअए वा अहाँक-हमर एहन स्वयम्भू चिंतकक लेख ,हम सभ बदलि रहल छी। अरे भाइ ककरा बुरबक बना रहल छी। टी.वी.मे आबि गेल छी आ जे मोन से करबाक अनुमति भेटि गेल अछि। अखबार हाथमे आबि गेल अछि ,लिखबाक-छापबाक छूट भेटि गेल अछि तखन विचारक बनबामे की हरज? कहियो लिखब तखन अपन मालिकक विरुद्ध..... विष्णु प्रभाकर जी सादगीक प्रतिमूर्ति छलाह। . १९९० क वर्ष हमरा लेल आब एहन लगैत अछि काफी महत्वूर्ण छल। ओहि समय हमरामे सकारातमक उर्जाक प्रबल आवेग हिलोर ल’ रहल छल. हम जे किछु समाजकेँ देलहुँ या सामजिक ऋण सँ उरिण होएबाक लेल जाहि कार्यकेँ सम्पन्न कएल ओहिमे बहुतोक शुरुआत ९० सँ भेल।ठीकसँ मोन नहि आबि रहल अछि जे की हम कोना आ ककरा संग सबसँ पहिने मोहन पैलेसक छत पर चलए वाला काफी हाउस मे पहुँचलहुँ .शाइत प्रो. राजकुमार जैन जीक संग गेल रही। ओ शनिक दिन रहए. ओतहि दिल्लीक चर्चित लेखक आ कलाकार-मंडली लागल छल. ओहि उस मंडलीक मध्य वयोवृद्ध खादी धरी,गाँधी टोपी पहिरने विष्णु प्रभाकर जी सुशोभित भ’ रहल छलाह। ओहि वातावरणमे हमरापर गजबक असर भेल.फेर हम सभ साँझ शनिकेँ ओहि शनिवारी गोष्ठीमे बैस’लगलहुँ। ई सिलसिला १९९५ तक चलल,जखन विश्वविद्यालय परिसरका रीड्स लाइन हमर निवास रहल. एहि वर्षो मे नहि जानि कतेक नामी -गिरामी लेखक,कवि,कलाकार आ पत्रकारक साहचर्य रहल.पता नहि कतेक साहित्यिक गोष्ठिमे समीक्षक या वक्ताक हैसियतसँ शामिल भेलहुँ.ओहि समयमे हम दाढी रखैत छलहुँ आ पाईप पीबैत छलहुँ। ओहि समयमे उप-कुलपति प्रो.उपेन्द्र बक्षी साहब सेहो पाईप पीबैत रहथि। अतः लोक हमरापर कखनो-कखनो व्यंग्य सेहो करैत रहथि। “एक बक्षी साहब हैं की एक झा साहब हैं-दूर से पहचाने जाते हैं”. हमहुँ खादीक कुर्ता पायजामा पहिरैत छलहुँ। से हमर कोनो बैठकमे उपस्थिति अलग अंदाजमे होइत रहए। पढबैत इतिहास छी ,परन्तु ओहि दिनमे सेहो लोक हमरा हिन्दीक शिक्षक बुझैत रहथि। काफी हाउस सेहो एकर अपवाद नहि छल। हमर कॉलेजक डॉक्टर हेमचंद जैन अक्सर हमरा कहैत रहथि –अहाँ अपन बौद्धिक लुकसँ आतंकित करैत छी .देव राज शर्मा पथिक सेहो कहैत रहथि- “झा साहब आपमे स्पार्क है” .खैर हम एहि सभ गपक आदी भेल जा रहल छलहुँ.लेकिन काफी हाउस हम बस साहित्यिक मंडलीक साहचर्य सुख लेबा लेल जाइत रही। ओतए हमर एहन अदना सन व्यक्ति बड्ड बजैत रहए परन्तु वाह रे विष्णुजीक महानता , हमरा हमर छोटपनक कखनो अहसास तक नहि होमए देलन्हि । वल्कि हमरा लगैत रहए जे हमरा काफ़ी गंभीरतासँ ओ सुनैत रहथि.बहुत गर्वोन्नत महसूस करैत छलहुँ हम। हम एक-दू बेर हाथ पकड़ि कए भीड़ भरल सड़क पार करेबाक बहने हुनकर स्नेहिल स्पर्श आ सान्निद्ध्य प्राप्त करबाक अवसर प्राप्त केलहुँ। एकर संतोष अछि .१९९४ मे भारतीय भाषा लेल संघर्ष करबाक क्रम मे संघ लोक सेवा क बाहर धरना-स्थल सँ पुष्पेन्द्र चौहान समेत कतेको साथीक संग हमरो पुलिस गिरफ्तार कए तिहाड़ जेल भेज देलक .ज्ञानी जेल सिंह,अटल बिहारी वाजपेयी विशानाथ प्रताप सिंह,मुलायम सिंह यादव आर अन्य कतेक पैघ नेता आ साहित्यकार-पत्रकार,समाज सेवि एवं आन्दोलनकारिक दबाब मे एक सप्ताहक बाद हमारासभ उपर लादल सभ केस हटा हमरासभकेँ बिना शर्त रिहा कएल गेल। एकर बाद तँ काफी हाउसमे सेहो हमरासभ प्रति साथिसभक आदर भाव बढ़ि गेलन्हि। मुदा अपन आवारा स्वाभावक कारण हम १९९५ क बाद काफी हाउस जएबाक सिलसिला चालू नहि राखि सकलहुँ. एकर हमरा आइयो अफ़सोस अछि .आवारा मसीहाक लेखक केँ एकर भान धरि नहि भेल होएतन्हि जे एक यायावरी आवारा कोनो दोसर धुन मे उलझि रहल हएत। आइ हमर बीच नहि रहबाक बादो हुनकर स्मृति एतेक मृदुल अछि जे लगैत अछि कि विष्णु जी अखनो काफी हाउसक मंडलीक बनेने छथि .हुनकर स्मृतिकेँ कोटि-कोटि प्रणाम। पूर्वजक जन्मभूमिकेँ शत-शत प्रणाम ३५० बरस पहिल हमर पूर्वज मिथिला जरूर छोड़ने छला किंतु मैथिल होबाक गर्व हम सब सब दिन महसूस केने छि.हम सब ओतने गर्वोन्नत मैथिल छि जेतना कौनो दोसर मैथिल होता।लगभग ३५० बरस स हमर परिवार आधुनिक झारखण्ड क देवघर जिला अंतर्गत सारथ थाना के खैरबनी ग्राम मे रही रहल छे ३०० साल पहिने एक सिद्ध ज्योतिषी मिथिला सँ चलि आज के देवघरजिलाक सारथ,जकरा पहिने सरहद कहल जाइत छल ,क राजदरबारमे राज ज्योतिषीक स्थान ग्रहण केलन्हि .ध्यान देबा योग्य बात ई अछि जे राज दरबार मुस्लिम नबाबक रहए आ राज ज्योतिषी मैथिलब्राह्मण बनलाह.तखनसँ आइ धरि ओ परिवार ओतहि रहि गेल जेना आइ हम दिल्लीक भेल जा रहल छी। मुदा ई तँ एक सामजिक आरऐतिहासिक प्रक्रिया अछि .विस्थापन तथा परिभ्रमण इतिहासकअति महत्त्वपूर्ण घटना रहल अछि .लेकिन अपन धरती अपन देश--देसिल बयना ,सब जन मिट्ठा--क स्मृति हमरा आइयो मैथिलबनेने अछि .हमसभ अपन इलाकामे अपनाकेँ मैथिल ब्राह्मण कहैत छी मुदा एहिमे ब्राह्मण गौण रहैत अछि मैथिल प्रमुख भ' जाइत अछि। दोसर लोक हमरा सभक लेल मैथिल शब्दक प्रयोग करैत छथि। माने मैथिल शब्द हमर अस्मिता हमर अस्तित्वक द्योतकअछि . आचार्य पंकज पंकज जी हम अमरनाथ झा,दिल्ली विश्वविद्यालयक स्वामी श्रद्धानंद कॉलेज मे इतिहास विभाग मे अससोसिएत प्रोफ़ेसर छी । हम अहाँकेँ संताल परगना (झारखण्ड) मे हिंदी साहित्य आ हिंदी कविताक अलख जगेनिहार सैकड़ामे साहित्यकार पैदा करएवला ओहि महान साहित्यकार एवं हुनकर रचनासँ अवगत कराबए चाहैत छी जे अपन बहुमुखी प्रतिभाक बलपर समस्त संताल परगनाकेँ शिक्षाक लौ सँ रौशन केलन्हि। १९१९ मे जन्म लेल श्री ज्योतींद्र प्रसाद झा "पंकज" नामक एहि महामना द्वारा १९३४ मे देवघरक हिंदी विद्यापीठमे अध्यापनक कार्य शुरू कएल गेल आ अपन प्रकांड विद्वताक बलपर तत्कालीन हिंदी जगतक धुरंधरक ध्यान अपन दिस खिचलन्हि। १९४२ क भारत छोड़ो आन्दोलनक कमान एक शिक्षकक हैसियतसँ सम्हारलन्हि १९५४ मे ओ संताल परगना महाविद्यालय दुमका (ओहि समय भागलपुर विश्वविद्यालयक अंतर्गत )क संस्थापक शिक्षक एवं हिंदी विभागक अध्यक्ष बनि गेलाह। एहि बीच तत्कालीन पत्र-पत्रिकामे ओ "पंकज" क उपनामसँ कविता ,समीक्षा आ एकांकी लिखैत रहलाह ,जकर चर्चा होइत रहल। १९५८ मे हुनकर कविता संग्रह "स्नेहदीप" क नाम सँ छपल। १९६४ मे हुनकर दोसर कविता संग्रह"उदगार" क नामसँ छपल। १९६५ मे संताल परगनाक साहित्यकार सभ मिलि क’ एक बहुत पैघ साहित्यिक संगठनक निर्माण कएलन्हि जकर अध्यक्ष "पंकज"जी केँ बनाओल गेल आ एहि संगठनक नाम सेहो हुनके नाम पर "पंकज-गोष्ठी" राखल गेल। १९६५ सँ १९७५ धरि पंकज गोष्ठी संपूर्ण संताल परगनाक असगर आ सबसँ पैघ साहित्यिक आन्दोलन छल। सत्य तँ ई अछि जे ओहि दौर मे ओतए पंकज गोष्ठीक मान्यताक बिना कोनो साहित्यकारहि नहि कहाइत रहथि। पंकज गोष्ठी द्वारा प्रकाशित कविता संकलनक नाम छल "अर्पण" तथा एकांकी संकलनक नाम छल "साहित्यकार"। लक्ष्मी नारण "सुधांशु ",जनार्धन प्रसाद मिश्र "परमेश",बुद्धिनाथ झा"कैरव" क समकालीन एहि महान विभूति--प्रोफ़ेसर ज्योतींद्र प्रसाद झा "पंकज' क विद्वता,रचनाधर्मिता एवं क्रांतिकारिता सँ तत्कालीन महत्त्वपूर्ण हिंदी रचनाकार जेना--रामधारी सिंह"दिनकर",द्विजेन्द्र नाथ झा "द्विज",हंस कुमार तिवारी,सुमित्रानंदन"पन्त',जानकी वल्लभ शास्त्री नलिन विलोचन शर्मा आदि भली भांति परिचित छलाह । आत्मप्रचारसँ कोसो दूर रहए वाला "पंकज"जी केँ भले आइ हिंदी जगत बिसारि देलक अछि परन्तु ५८ साल कि अल्पायु मे १९७७ मे दिवंगत एहि आचार्य कविकेँ मृत्यक ३२ वर्षो बादो संताल परगनाक साहित्यकारे टा नहि वरन लाखों लोक अपन स्मृतिमे आइयो महान विभूतिक रूपमे जिन्दा रखने छथि। संताल परगनाक एहन कोनो गाम या शहर नहि अछि जतए "पंकज"जी सँ सम्बंधित किम्वदंति नहि प्रचलित होअए। की अहाँ हुन्अका आ हुनकर कृतिक ब्रिहद्तर हिन्दी जगतक समक्ष प्रस्तुत करबामे हमर सहायता करब ? लगभग ३५० बरस स हमर परिवार आधुनिक झारखण्ड क देवघर जिला अंतर्गत सारथ थाना के खैरबनी ग्राम मे रही रहल छी.परिणाम स्वरुप हम सब घर म मैथिलि नै बजे छी.हम सब विशुद्ध अंगिका सेहो ने बजे छी.हमर बोली मे किछु मैथिली आर किछु अंगिका के सम्मिश्रण छे.ते दुआरे मैथिलि लिखे मे जे किछु त्रुटी होए ओकरा क्षमा करू। आशा छे ई सम्बन्ध समय क संग आर प्रगाढ़ होयत। उदय नारायण सिंह "नचिकेता" गजेन्द्र ठाकुरक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डमे विभाजित कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एकहि संग कठिनसँ कठिन विषयपर सुचिन्तित विश्लेषण भेटत आ उपन्यासक जटिल कथा केर गुत्थी सेहो भेटत सुलझाएल आ संगहि प्रेमक कविता आ प्रकृतिक गीत सेहो । सात खण्ड एहि प्रकार छन्हि- खण्ड-१ प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना खण्ड-२ उपन्यास-सहस्रबाढ़नि खण्ड-३ पद्य-संग्रह-सहस्त्राब्दीक चौपड़पर खण्ड-४ कथा-गल्प सग्रह-गल्प गुच्छ खण्ड-५ नाटक-संकर्षण खण्ड-६ महाकाव्य- १.त्वञ्चाहञ्च आ २.असञ्जाति मन खण्ड-७ बालमंडली /किशोर जगत सभसँ महत्त्वपूर्ण बात ई जे सभ विषयक पाठकक आ पाठिकाक लेल एतए किछु ने किछु भेटबे करत । पुछलियन्हि जे एहन संरचना किएक तँ जे किछु कहलन्हि ताहिसँ लागल जे ई हिन्दी केर तार-सप्तक आ तमिलक कुरुक्षेत्रम् केर बीच मे कतहु अपन जगह बनेबाक प्रयास कऽ रहल छथि । फराक एतबे जे हिन्दी आ तमिल मे कएक गोटे मिलि कए सन्कलित भेल छथि एकटा जिल्दमे, आ एतए कएक लेखकक द्वारा विभिन्न विधा केर रचना नहि रहि हिनके अपन रचना पोथीमे उपलब्ध कराओल गेल अछि । कतेको पंक्ति भरिसक पाठकक मोनमे ग्रंथित-मुद्रित भऽ जएतन्हि , जेना कि – “ढहैत भावनाक देबाल खाम्ह अदृढ़ताक ठाढ़ आकांक्षाक बखारी अछि भरल प्रतीक बनि ठाढ़”। अथवा , निम्नोक्त पंक्ति-येकेँ लऽ लिअ : “सुनैत शून्यक दृश्य प्रकृतिक कैनवासक हहाइत समुद्रक चित्र अन्हार खोहक चित्रकलाक पात्रक शब्द क्यो नहि देखत हमर ई चित्र अन्हार मे...” मिथिलेक नहि अपितु भारतक कतेको संस्कृतिक प्रभाव देखल जा सकैछ हिनक कथा कवितामे । एहिसँ मैथिली क्रियाशील रचनाक परिदृश्य आर बढ़ि जाइछ , आ नव-नव चित्र , ध्वनि आ कथानक सामने आबि जाइत अछि । कवि कोन मन्दाकिनी केर खोजमे छथि जे कहैत छथि- “मन्दाकिनी जे आकाश मध्य देखल आइ पृथ्वीक ऊपर...” अपन विशाल भ्रमणक छाप लगैछ रचनामे नीक जकाँ प्रतीत होइत अछि । आ आर एकटा बात स्पष्ट अछि – कोषकार गजेन्द्र ठाकुर आ रचनाकार गजेन्द्र ठाकुर भिन्न व्यक्ति छथि , व्यक्तित्त्वमे सेहो फराक... जतए कोशकारितामे सम्पादकत्व तथा टेक्नोलोजी –सँ सम्बन्धित व्यक्तिक छाया भेटिते अछि , मुदा सृजनक मुहुर्तमे से सभटा हेरा जाइत छथि । एहिमे सँ कतेको टेक्स्ट ओ रखने छथि इन्टरनेटमे मैथिलीक बढ़ैत पाठककेँ ध्यानमे राखए , जेना कि विदेह-सदेह अछि http://videha123.wordpress.com/- मे , आ देवनागरी आ तिरहुता – दुन्नु लिपिमे । जे क्यो मिथिलाक्षरक प्रेमी छथि तनिका सब लेखेँ तँ ई विरल उपहारे रहत । अनेको रचनामे मात्र गोल-मटोल कथे नहि , राजनीतिक भाष्य सेहो लखा दैत अछि । ताहिमे हिनका कोनो हिचकिचाहटि नहि छन्हि । ओना देखल जाए तँ कुरुक्षेत्र क कतेको महारथी छलाह = प्रत्येक वीर-योद्धा अपन-अपन क्षेत्र आ विधाक प्रसिद्ध पारंगद व्यक्ति छलाह – क्यो कतेको अक्षौहिणी सेनाक संचालनमे , तँ क्यो तीरन्दाजीमे , आदि आदि । सभ जनैत छलाह जे धर्म आ अधर्मक भेद की होइछ मुदा तैयो सभ क्यो जेना आसन्न विपर्यायक सामने निरुपाय भऽ गेल छलाह । आजुक सन्दर्भमे सेहो कथा मे तथा व्याख्यामे एहन परिस्थितिक झलक देखल जाइत अछि । सैह एहि महा-पाठ– क (मेटाटेक्सट) खूबी कहब । नहि तँ ओ कियेक लिखताह – “देखैत देशवासीकेँ पछाड़ैत मन्त्रतंत्रयुक्त दुपहरियामे जागल, गुनधुनी बला स्वप्न बनैत अछि सभसँ तीव्र धावक, अखरहाक सभसँ फुर्तिगर पहलमान दमसैत मालिकक स्वर तोड़ैत छैक ओकर एकान्त कारिख-चित्रित रातिक निन्न, टुटैत-अबैत-टूटैत निन्न आ स्वप्नक तारतम्य...” एहि महापाठकेँ एकटा एक्सपेरीमेन्ट केर रूपमे देखी तँ सेहो ठीक , आ सप्तर्षि-मंडलक निचोड़ अथवा सप्त-काण्डमे विभाजित आधुनिक महा काव्य रूपमे देखी तँ सेहो ठीक हएत। जेना पढ़ी , सामग्री एहिमे भरपूर अछि, भरिसक किछु अतिउच्च मानक लागत, आ किछु किनको तत्तेक नहि पसिन्न परतन्हि । मुदा एहि ग्रन्थ निचयकेँ पाठक अवश्य स्वागत करताह , आ नवीन लेखक वर्गकेँ एकटा नव दिशा सेहो भेटतन्हि । गजेन्द्र ठाकुरक मैथिली-अंग्रेजी शब्दकोशपर जखन सैमुअल जॉनसनक अ डिक्शनरी ऑफ द इंग्लिश लैंगुएज (१७५५) प्रकाशित भेल तखन जाऽ कऽ अंग्रेजी विद्वान आ विद्यार्थीकेँ यथार्थमे अपन भाषामे एकटा विश्वसनीय आ परिष्कृत कोश भेटलन्हि। अंग्रेजीक अधिकांश पहिलुका प्रयास गंभीरतासँ रहित छल। १६०४ ई.क रॉबर्ट काउड्रेक कोश जकर नाम अ टेबल अल्फाबेटिकल आ कतेक आन कृति आ तकर अनुकरण केनिहार आन कृति सभ ओहि मानदण्डक अनुरूप नहि छल जे शेष यूरोपमे कोश निर्माणक परम्पराक अनुरूप होअए। मुदा पहिलुका द्विभाषी कोश सभ जाहिमे विदेशज फ्रेंच, इटालवी वा लैटिन शब्द सभ अंग्रेजीमे परिभाषाक संग सम्मिलित छल एहि सभसँ नीक छल आ ताहिमे १५९२क रिचर्ड मुलकास्टरक ग्लॉसरी एकर एकटा उदाहरणक रूपमे राखल जा सकैत अछि। ई सभ तखनहु अरबी कोश सभक समकक्ष नहि छल जे ८म् आ १४म शताब्दीक बीचमे संग्रहित भेल विशेषतः सामान्य काजक लेल रचित कोश सभ जेना लिसान अल अरब (तेरहम शताब्दी)। अंग्रेजी जेना एकरा हम आइ देखैत छी, भाषाक वैश्विक इतिहासमे एकटा सापेक्षतया नूतन घटना अछि संभवतः मैथिलीसँ किछुए पुरान। ई एहि लेल किएक तँ जखन मैथिलीक सभसँ पुरान उपलब्ध ग्रन्थ ज्योतिरीश्वर द्वारा लिखल जा रहल छल ओ समय रहए अंग्रेजीमे चौसरक। पाश्चात्य कोशमे सभसँ पुरान कोश तखुनका अक्कादी साम्राज्यमे रचित भेल जाहिमे सुमेरी-अक्कादी शब्द सूची रहए (आधुनिक सीरियाक एबलामे प्राप्त) आ एकर समय छल लगभग २३०० ई.पू.। मुदा सभसँ प्राचीन ग्रीक कोश एपोलोनियश द सोफिस्ट प्रथम स्शताब्दीक, ई होमरयुगीन शब्दपरिभाषा आ अर्थ सूचीबद्ध करैत अछि आ एकटा उदाहरण प्रस्तुत करैत अछि। द्वितीय सहस्राब्दी ई.पू. उर्रा= हुबुल्लु शब्दार्थसूची जे एहने द्विभाषी शब्द सूचीक संग पुरान कोशीय लेखाक उदाहरण एकटा आर उदाहरण अछि जेकर तुलना तेसर शताब्दीक चीनी परम्परे सँ कएल जा सकैत अछि। प्रारम्भिक जापानी प्रयास ६८२ ई.क चीनी अक्षरक नीना ग्लॉसरी आ सभसँ पुरान उपलब्ध जापानी कोश तेनरेइ बान्शो मैगी (८३५ ई.) सेहो महत्त्वपूर्ण प्रयास छल। भारतमे वैदिक साहित्यक संरक्षण व्याकरण आ कोशीय रचनाक लेल सभसँ पैघ उत्प्रेरक छल। संस्कृतक पाणिनीय आ दोसर वैयाकरणिक परम्परामे ई एकटा सामान्य आ पूर्णतः आधारभूत कार्य रहए- वैदिक वाक्यकेँ शब्दमे खण्ड-खण्ड करब आ शब्दकेँ खण्ड करब धातु-प्रत्ययगघतकमे। एहि क्रममे शाब्दिक संरचना, भाषायी ध्वनि तन्त्रक संग संरचनात्मक-ध्वन्यात्मक सिद्धांत सभ सेहो विकसित भेल। ई विश्वास कएल जाइत अछि जे निघण्टु (७०० ई.पू.) पर यास्क एकटा निरुक्त नाम्ना भाष्य लिखलन्हि जे आइ सभसँ पुरान ज्ञात कृति अछि आ ई परम्परा सेहो पाली परम्परा धरि चलल। ओ सभटा कोशीय सामग्रीकेँ समानार्थी आ समानह्रिजए-ध्वनि अनुसार सजेलन्हि। शास्त्रीय संस्कृतमे सभसँ लोकप्रिय कृति अछि अमरसिंहक अमरकोष (६ठम धताब्दी)। कटालोगस कैटालोगोरम मात्र अमरकोषपर कमसँ कम ४० टा भाष्यक सूची दैत अछि जे प्राचीन भारतमे एहि समानार्थी कोशक महत्व आ लोकप्रियता देखबैत अछि। एहि तरहक आर कोश जे कम-बेशी अमरकोषक आधारपर रचित भेल आ एहिमे सम्मिलित अछि (संदर्भ मल्हार कुलकर्णी- TDIL अन्तर्जालपर):- १. भोजक कृत नाममालिका (११म शताब्दी) २. सहजकीर्तिक सिद्धशब्दार्नव (१७म शताब्दी) ३. हर्षकीर्तिक शारदीयाख्यानाममाला (१७म शताब्दी) ४. धनन्जय भट्टक पर्यायशब्दरत्न ५. कोशकल्पतरु ६. नानार्थरत्नमाला- इरुगप दण्डाधिनाथ (१४म शताब्दी) ७. राघवक नानार्थमञ्जरी ८. धरनीदासक धरणीकोश (१२म शताब्दी) ९. शिवदत्त मिश्रक शिवकोश १०. सौभरीक एकार्थनाममाला-द्वक्षारनभमाला ११. मकरन्ददासक परमानन्दीयनाममाला पहिल अधुनातन युगक संस्कृत कोश जे पाश्चात्य सिद्धांतकेँ प्रयुक्त कए बनाओल गेल से अछि प्रोफेसर एच.एच.विल्सन द्वारा संगृहीत आ १८१३ ई. मे प्रकाशित संस्कृत-अंग्रेजी कोश। दू टा भारतीय कोश तकर बाद आएल पं. सर राजा राधाकान्त देवक शब्दकल्पद्रुम आ पं. ताराकान्त तर्कवाचस्पतिक वाचस्पत्यम् । हमर विचारमे प्रयुक्त शब्दकोशशास्त्र आकि कोश संग्रहक विज्ञान वा कला जे अछि कोश सभकेँ विभिन्न कार्यक लेल लिखब आ संपादन करब आ ई सेहो ततबे महत्वपूर्ण अछि जतेक सैद्धांतिक कोशशास्त्र महत्वपूर्ण अछि। शब्दकोशशास्त्र शब्द एकटा कथ्यक रूपमे १६८० ई.मे आबि कए प्रयुक्त भेल जखन कि कोश शब्द अंग्रेजी भाषामे १५२६ ई. मे आबि कए प्रयुक्त भेल जेनाकि मेरिअम-वेब्सटर कोश कहैत अछि। हमरा सभकेँ कहल जाइत अछि जे कोशमे ई सभ सम्मिलित होएबाक चाही:- १. प्रिंत वा इलेक्ट्रॉनिक रूपमे संदर्भ स्रोत जाहिमे वर्णमालाक आधारपर सजाओल शब्द रहए, जाहिमे ओकर रूप, उच्चारण, कार्य, व्युत्पत्ति, अर्थ आ वाक्य रचना आ कहबी युक्त प्रयोग होअए। २. एकटा संदर्भ ग्रंथ जाहिमे संबंधित कार्य-विषयक महत्त्वपूर्ण पदबंध आ नामक वर्णानुसार सूची होअए- संगमे ओकर अर्थ आ अनुप्रयोगक चर्चा सेहो रहए। ३. एकटा संदर्भ ग्रंथ जाहिमे एक भाषाक शब्दक लेल दोसर भाषामे समानार्थ देल रहए। ४. एकटा संगणकीय संशोधित सूची (दत्तांशशब्द वा शब्द पदक) जे सूचना प्राप्ति वा शब्द संसाधकक लेल संदर्भक रूप उपयोग कएल जा सकए। एहि असाधारण आ समय साध्य कलाक अनुप्रयोगमे सम्मिलित कार्य सभमे ई सभ आवश्यक रूपमे सम्मिलित अछि:- *प्रयोक्ताक निर्धारण आ ओकर आवश्यकताक निर्धारण *सामान्यजनक शब्दशक्तिक आधारपर भाषिक शब्दक संख्याक निर्धारण आ एकटा निश्चित सीमित परिधिमे ओकर निर्णय *परिभाषा आ विवरणक सज्जाक विषयमे निर्णय *कोशक संदर्भमे सूचना संचरण आ विचार-क्रियाक निर्धारण *कोशक विभिन्न अंगक निर्धारण दत्तांशक संग्रह आ प्रदर्शनक लेल उचित संरचनाक चयन (जेना आवरण-संरचना, संवर्गीकरण, वर्गीकरण, प्रसारण आ एकसँ दोसर अंशमे सन्दर्भ-संकेत) *प्रधान शब्द आ जोड़एवला शब्दक चयन- पारिभाषिक शब्द बनएबाक लेल *समानधर्मिता आ संधिकेँ चिन्हित करब *अन्तर्राष्ट्रीय ध्वन्यात्मक वर्णमाला (आइ.पी.ए.) आ ब्लॉच एण्ड ट्रैगर चिन्हक प्रयोगसँ शब्द उच्चारणक निर्देश *सुरुचिपूर्ण आ वर्ग-स्थान-विशेष बोली स्वरूपक योग *बहुभाषिक कोशक लक्ष्य भाषाक लेल समानार्थी शब्दक चयन *छपल आ इलेक्ट्रॉनिक दुनू तरहक कोशमे उपयोक्ताक लेल प्रवेशमार्ग बटन आ आन सुविधा बिहारक गंगाक मैदान आ नेपालमे हिमालयक निचुलका पहाड़ीक तराइ क्षेत्र मिलि कऽ मैथिली आ मिथिलाक सांस्कृतिक क्षेत्रक निर्धारण करैत अछि, जे बहुत पहिने १९०८ ई. मे जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन द्वारा चर्चित भेल, ओना ओ मुख्यतः भारतमे स्थित मिथिला क्षेत्रपर केन्द्रित रहल। एहि क्षेत्रमे बहुत रास परिवर्तन आ सीमाक पुनर्निर्धारण भेल। २०म शताब्दीक प्रारम्भमे ग्रियर्सन मैथिली भाषाक क्षेत्र सम्पूर्ण दरभंगा आ भागलपुर जिलाकेँ मानलन्हि। एकर अतिरिक्त ओ मैथिलीकेँ मुजफ्फरपुर, मुंगेर, पूर्णियाँ आ संथाल परगनाक बहुसंख्यक लोक द्वारा बाजल जाएवला भाषाक रूपमे चिन्हित कएलन्हि। मुदा आइ-काल्हि एहिमे सँ किछु अंश झारखण्ड राज्यक अंग भऽ गेल अछि। एतए ई तथ्य आनब सेहो समीचीन होएत जे एहि बीच राज्यक मान्यताक क्रममे मात्र १७ मे सँ ५ जिला (ई अछि भागलपुर, पूर्णियाँ, सहरसा, दरभंगा आ मुजफ्फरपुर) बिहारक मैथिली भाषी क्षेत्रक रूपमे सामान्य रूपमे अभिहित भेल। पॉल ब्रास (१९७४) मैथिली आन्दोलनक अपन वृहत् अध्ययन उत्तर भारतमे भाषा,धर्म आ राजनीति मे एकरा सामान्य रूपमे परिभाषित भौगोलिक क्षेत्रक रूपमे लेलन्हि। १९८० क दशकमे बिहारक ३१ जिलामे भेल विभाजनक बाद एकटा प्रोजेक्ट रिपोर्टमे (द मैथिली लैंगुएज मूवमेन्ट इन नॉर्थ बिहार: अ सोशियो लिंगुइस्टिक इन्वेस्टीगेशन नामसँ) संयुक्त रूपसँ हमरा आ एन.राजाराम आ प्रदीप कुमार बोस बनाओल गेल, हम सभ एहि निर्णयपर पहुँचल छलहुँ जे ३१ मे सँ ई सभ १० जिलाकेँ मैथिली भाषी क्षेत्र मानल जएबाक चाही: भागलपुर, कटिहार, पूर्णियाँ, सहरसा, मधुबनी, दरभंगा, समस्तीपुर, सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर आ वैशाली। से एहि भौगोलिक सीमाक परिवर्तन प्राकृतिक परिवर्तन (कोशी धार २०० बरखमे सात बेर अपन दिशा बदलने अछि) आ जिलाक पुनर्गठनक परिणामस्वरूप भेल अछि। ई ककरो लेल एकटा पैघ चुनौती होएत जे मैथिलीक एकटा भीमकाय कोश बनेबाक प्रयास करताह जेना गजेन्द्र ठाकुर कएने छथि। ई परिस्थिति आर ओझरा जाइत अछि कारण मैथिलीक शब्द चयन अंशतः वा अधिकांशतः एहि सांस्कृतिक क्षेत्रमे बाजल जाएवला १२ टा आन भाषासँ संभवतः प्रभावित होइत अछि। एतए एहि लगभग १२ टा दोसर भाषाक वर्णन सेहो वर्णन योग्य अछि। मैथिलीक आस-पड़ोसमे भोजपुरी आ मगही अछि आ हिन्दी एहि सभपर ऊपरसँ आच्छादित अछि जे एहि तीनू भाषा समूहक लोक द्वारा बाजल जाइत अछि। मुदा बिहार एकटा बहु-भाषी राज्य अछि आ नेपाली आ बांग्ला भाषी सेहो एतए प्रचुर मात्रामे देखल जा सकैत छथि। एकर अतिरिक्त किएक तँ मैथिली भाषी झारखण्ड क्षेत्रमे सेहो पर्याप्त मात्रामे छथि, ई बुझबाक थिक जे ओराँव, मुण्डारी, हो, बिरहोर, धांगर, संथाली आ संख्यामे कम ऑस्ट्रिक भाषा समूहक वक्ता सेहो हुनका संग निवास करैत छथि। ओना तँ मिथिला क्षेत्रक बहुत रास मुस्लिम अपन मातृभाषा मैथिली देखबैत छथि मुदा बहुत रास एहनो छथि जे अपनाकेँ उर्दूभाषी घोषित करैत छथि। एहि सभ भाषामे मात्र चारि टा केँ सांवैधानिक मान्यता भेटल अछि- हिन्दी, उर्दू, बांग्ला आ नेपाली (पछाति संथालीकेँ सेहो)। हमरा विचारेँ मैथिलीक वाक्य-रचनापर ऑस्ट्रिक भाषा समूह सहित विभिन्न कोणसँ प्रभाव पड़ल अछि। मुदा कोशीय स्तरपर योग आ अनुकूलन सीमित स्रोतसँ भेल अछि जेना उर्दू, हिन्दी, भोजपुरी आ मगहीसँ। कोश आत्मसात करैत अछि देशी शब्दावलीकेँ देशज शब्दावलीक संग। ई एहि कारणसँ कारण हमरा विचारेँ बेशीसँ बेशी २५-३०% वक्ता मैथिलीकेँ एकभाषीय रूपमे बजैत छथि। कारण शेष दोसर भाषामे सेहो नीक पइठ रखैत छथि। ओ मथिली भाषी जे बिहारक पश्चिमी सिमानपर रहैत छथि, भोजपुरी सेहो बजैत छथि आ पटना-राँची-गया-मुंगेर-क्षेत्रमे रहनिहार मगही जनैत छथि आ सेहो हिन्दीक अतिरिक्त। मुदा एकटा अत्यल्प प्रतिशत कहू जे ३-५ % सँ कम्मे, एहन मैथिल छथि जे अंग्रेजीमे सेहो प्रभावी रूपमे बाजि सकैत छथि। मुदा अंग्रेजीसँ मैथिलीमे शब्दक आगम ततबे वृहत अछि जेना ई कोनो दोसर नव भारतीय भाषा (न.भा.भा.) सभमे अछि। बहुत गोटे ई शंका व्यक्त कऽ सकैत छथि जे कतेक गोटे एहन होएताह जिनका गजेन्द्र जी सनक प्रयाससँ लाभ भेटतन्हि ? ओना तँ मैथिली भाषीक संख्याक आधिकारिक आँकड़ा स्थिर नहि रहल अछि मुदा एहि तथ्यक विस्तारसँ वर्णन आवश्यक अछि। जनसंख्याक आँकड़ा वास्तविक नहि अछि जेना २००१ ई.क जनसंख्याक ई आँकड़ा: १,२१,७९,१२२. एकरापर अविश्वास पक्का अछि। जखन हम देखैत छी जे मैथिली भाषीक संख्याक संदर्भमे दस बरखक अंतरालमे लेल जनसँख्या आँकड़ामे बहुत बेशी परिवर्तन अछि। ई १८९१ सँ दस बरखक अंतरालमे जनसंख्याक आँकड़ामे बढ़ल आ घटल संख्याक तुलनासँ स्पष्ट अछि: १९०१-११: +३.१२% १९११-२१: -०.७७% १९२१-३१: +७.६८% १९३१-४१: +९.१३% १९४१-५१: गणना नहि भेल १९५१-६१: +२२.३५% १९६१-७१: +२०.८९% १९७१-८१: +२४.१९% तार्किक रूपेँ वास्तवमे मैथिली वक्ताक संख्या स्थिर रूपेँ बढ़ल अछि। हमर अनुमानसँ किछु संकेत देल जा सकैत अछि जे अनिमानित ४ करोड़ धरि पहुँचैत अछि। १८९११ मे ग्रियर्सन (१९०८) अनुमान कएलन्हि जे मैथिली भाषीक संख्या ९२,८९,३७६ अछि। एकर विरुद्ध १९६१क जनसंख्या आँकड़ा एकरा ४९,८२,६१५ कऽ दैत अछि। निश्चयरूपेण १९६१ क जनसंख्या आँकड़ा वास्तविक नहि अछि। ओना ग्रियर्सनक (१९०९) जनसंख्या आकलन जे हुनकर १८९१ ई. मे कएल सर्वेक्षणपर आधारित अछि, सभक द्वारा सम्मति प्राप्त नहि अछि। वर्तमान शताब्दीक प्रारम्भमे मैथिली निम्न क्षेत्रमे बाजल जाइत छल:- (i) सम्पूर्ण दरभंगा आ भागलपुर (ii) मुजफ्फरपुरक ६/७ भाग (iii) मुंगेरक १/२ भाग (iv) पूर्णियाँक २/३ भाग (v) संथाल परगनाक ४/५ भाग जे जनगणना आँकड़ामे वर्णित हिन्दी भाषी छथि। १८१६ ई. मे उत्तर दिसुका भाषायी क्षेत्र नेपाल राजशाही द्वारा स्थायी रूपसँ नेपालमे सम्मिलित कए लेल गेल। ताहि द्वारे भाषा बजनिहारक संख्या पर पहुँचबाक लेल नेपालक जनसंख्याक १४% हिस्सा आर जोड़ए पड़त। पॉल ब्रास (१९७४:६४-६) गेटक गणना (जनसंख्या वर्ष १९०१ ई.) १८८५ ई.सँ उपलब्ध विभिन्न दस्तावेजक आधारपर करैत छथि आ १,६५,६५,४७७ संख्यापर पहुँचैत छथि। ई गणना ग्रियर्सनक आकलनकेँ आधार लए आ तकर बादक ८ दशकमे बिहारमे जनसंख्या वृद्धिकेँ आधार लए कएल गेल अछि। १९८१ क जनसंख्या आँकड़ाक आधारपर आ मिथिला क्षेत्रक बाहर पसरल मैथिलक संख्याकेँ जोड़ि कऽ आ १० जिलाक जनसंख्याकेँ (३१ जिलामेसँ) ध्यानमे राखि हम आ हमर सहयोगी १९८० क दशकक मध्यमे २,२९,७२,८०७ (सिंह, राजाराम आ बोस १९८५) क संख्यापर पहुँचलहुँ। ई संख्या हमर विचारमे जनसंख्याक दसवर्षीय वृद्धिकेँ ध्यानमे रखैत ४ करोड़ धरि पहुँचल अछि आ ताहि द्वारे बहुत रास लोक कोशक एहि भीमकाय प्रयाससँ लाभान्वित होएताह। ई सामान्यतः मानल जाइत अछि जे मैथिली मिथिला क्षेत्रक ब्राह्मण द्वारा बाजल जाइत अछि। ई एकटा पहिलुका कुप्रचार छल जे एकरा हिन्दीक बोलीक रूपमे सिद्ध कए चाहैत रहथि मुख्यतः हिन्दी भाषीक आधिकारिक संख्यामे वृद्धिक उद्देश्यसँ। मुदा उत्तरी बिहारक जाति संरचनाकेँ देखैत मैथिलीक जनसंख्या संबंधी आँकड़ा एकर सत्य कथा कहत। सापेक्षतया मैथिलीक बेस संख्या जे जनगणना रिपोर्टमे आएल, केँ एहि तथ्य मात्रसँ व्याख्यायित कएल जा सकैत अछि जे ओना तँ मैथिली भाषी जिलाक कतोक क्षेत्रमे ४६.८४% धरि मुस्लिम आ ३१.०६% धरि हिन्दू निवास करैत छथि, मैथिलीक लेल जे सहयोग आएल अछि से एहिमे सँ एकटा पैघ संख्या द्वारा मैथिलीकेँ अपन मातृभाषा घोषित कएने बिना संभव नहि छल। मिथिलामे भाषा प्रयोगक एकटा सर्वेक्षण ई देखा सकैत अछि जे ओना तँ भाषाक औपचारिक क्षेत्र सभमे प्रयोग कम भेल अछि मुदा ई सेहो सत्य अछि जे एकर साहित्यिक उत्पादकता आ उपलब्धि आइ अखिल भारतीय स्तरपर बेशी नीक जकाँ सोझाँ आबि रहल अछि तुलनात्मक रूपेँ जतेक ई आइसँ २० बरख पूर्व अबैत छल। मधुबनी चित्रकला वा मिथिला कला आइ भरि भारतमे सुप्रसिद्ध भऽ गेल अछि आ विश्व-बजार धरि पहुँचि गेल अछि। मात्र तखने जखन मैथिली भाषी नव-पीढ़ी अपन सांस्कृतिक भाषायी बोधसँ हटबाक निर्णय करताह तखने एकरा कोनो खतरा सोझाँ अएतैक। हमरा विचारेँ सांवैधानिक अधिकार नहि भेटनाइ अप्रत्यक्ष रूपमे मैथिलीक लेल वरदान साबित भेल कारण ई साहित्यिक सांस्कृतिक गतिविधिकेँ बल देलक। ई पहिनहियेँ बहुत रास सांवैधानिक मान्यता प्राप्त भाषा सभकेँ पाछाँ छोड़ि देलक, जेना मणीपुरी, कोंकणी, नेपाली आ सिन्धी सेहो। आ आब जखन की ई अष्टम सूचीमे अछि एकरा सभटा आधिकारिक आ आन तरहक संरक्षण भेटबाक चाही जकर ई अधिकारी अछि। एकरा एकर उपयोगकर्ताक सहयोग सेहो भेटबाक चाही जे आब आधुनिक अओजार सभक ताकिमे छथि जेना ऑनलाइन पत्रिका, ई-कोश, सुविधाजनक जंगम परिभाषा-कोश सभ आ स्वचालित प्रश्नोत्तर प्रणाली इत्यादि। ताहि स्तरपर ई मैथिली कोश जे अन्तर्जाल आ छपल दुनू संस्करणमे उपलब्ध होएत, से संग्रहकर्त्ता द्वारा एकटा महत्वपूर्ण योगदान होएत। मैथिली भाषी समुदाय आ आन भाषाक अनुवादक-विद्वान द्वारा गजेन्द्र ठाकुर आ प्रकाशक विशेष प्रशंसाक पात्र छथि। ई सत्य अछि जे मैथिली कोश-विज्ञान बहुत बादमे विकसित भेल, म.म. दीनबन्धु झाक प्रयासक बहुत बाद आ आब जा कए हमरा सभक सोझाँ महत्त्वपूर्ण कार्य सभ आएल अछि जेना पं गोविन्द झा द्वारा कल्याणी कोश वा जयकान्त मिश्रक वृहत् मैथिली शब्दकोश, मतिनाथ मिश्र ‘मतंग’ क मिथिला शब्द प्रकाश वा अलाइस डेविसक बेसिक कलोक्विअल मैथिली : अ मैथिली-नेपाली-अंग्रेजी वोकाबुलरी। संक्षिप्त मैथिली शब्दकोश आ द्विभाषी मैथिली शब्दकोश जे मैथिली अकादमी द्वारा संकल्पित अछि, अयनाइ एखन बाकी अछि। राष्ट्रीय अनुवाद मिशन द्वारा संकल्पित (देखू www.ntm.org.in) लांगमैन- सी.आइ.आइ.एल. बेसिक इंगलिश- इंगलिश- मैथिली जे कॉर्पोरापर आधारित अछिसेहो एकटा रुचिगर उत्पाद होएत। मुदा सभटा कहला आ केलाक बाद एहि कार्यक महत्त्व समय बितलाक संगे अनुभूत कएल जाएत। विनीत उत्पल आजुक कालमे बाबा आइ जखन देशमे भ्रष्टाचारक विरोधमे आवाज बुलंद भऽ रहल अछि तइसँ बाबा मने नागार्जुन केर कविताक मोन पड़ि रहल अछि। ओ जहिना अप्पन कालमे प्रासंगिक रहथि तहिना आइयो छथि। मैथिली साहित्य सँ लऽ कऽ भारतीय साहित्य, संस्कृति, राजनीतिक आ सामाजिक परिदृश्य केँ देखैत ई कहैमे कोनो शंका नै अछि जे बाबा आधुनिक आ गहींर संवेदनासँ जुडल रहथि। ओ अप्पन कविता तखन लिखने रहथि जखन राजनीतिक- संवैधानिक हालातकेँ लऽ कऽ गम्भीर प्रश्न लागि रहल छल। जहिना ओ मैथिलीमे लिखने छलाह तहिना हुनकर हिन्दी कविता सेहो एक अलग रंगमे रंगल अछि। एखन धरि मैथिली साहित्यमे हुनकर मैथिली कविताकेँ देखल गेल अछि आ हिन्दी साहित्यमे हिन्दी कविताकेँ। मुदा दुनू भाषामे लिखने तँ वएह रहथिन। एनामे ई आवश्यक अछि जे हुनकर हिन्दी कविता दिस ध्यान देल जाए, ओना ई अलग अध्ययनक गप अछि जे दुनू भाषामे लिखल कवितामे कतेक तारतम्य अछि। देशक स्थितिकेँ लऽ कऽ हुनकर चिंता हिन्दीमे कोना छल, एकरे अध्ययन एतऽ हम कऽ रहल छी। जखन पूरा देश इमरजेंसीसँ त्रस्त छल, तइ कालमे ओ अप्पन प्रतिबद्धताक घोषणा करैत छथि - 'प्रतिबद्ध हूं, जी हां, प्रतिबद्ध हूं- बहुजन समाज की अनुपल प्रगति के निमित्त- संकुचित 'स्व' की आपाधापी के निषेधार्थ अविवेकी भीड़ की 'भेड़िया-धसान' के खिलाफ अंध-बधिर 'व्यक्तियों' को सही रास्ता बतलाने के लिए अपने आपको भी 'व्यामोह' से बारम्बार उबारने की खातिर प्रतिबद्ध हूं; जी हां, शतधा प्रतिबद्ध हूं!' जहिना लोकपालक नामपर अन्नाक आन्दोलनमे नवजुबक सभ आगू आएल, तखन ई लागैत अछि जे खाली ठाम बदलि गेल अछि। इमरजेंसी कालमे जगह पटनाक गाँधी मैदान छल आ आजुक मैदान दिल्ली केर राम लीला मैदान बनि गेल छल। ताहि सँ बाबा कहैत अछि- 'बार-बार खचाखच भरा गांधी मैदान बार-बार प्रदर्शन में आए लाखों-लाख नौजवान बार-बार वापस गए हवा में भर उठी इंकलाब के कपूर की खुशबू बार-बार गूंजा आसमान बार-बार उमड़ आए नौजवान बार-बार लौट आए नौजवान..।' ताहि सँ बाबा गर्जित अछि- 'जनता तुझसे पूछ रही है, क्या बतलाऊं जनकवि हूं मैं साफ कहूंगा, क्यों हकलाऊं?' बिना लटपटाएल बाबा जे गप तहिया कहलखिन, की ओकरामे आइ कोनो अंतर भेलो अछि, ई सवाल अछि। ओ नीक जना नेता आ नौकरशाही पर चोट करै छथि, ‘आज की तारीख वाले पन्ने पर मैं लिखूँगा एक कविता कुछ इस तरह कि मैं पहुँच जाऊँगा वहाँ जहाँ तुमने एक कुर्सी के बराबर जगह छोड़ रखी है।’ हुनका आगू कतेक रास प्रश्न अछि जे सैद्धांतिक आ व्यवहारिक रूपमे लोकक दिमागमे बड़कैत रहैत अछि आ ऐमे नागार्जुनक स्थिति स्पष्ट भऽ जाइत अछि। हुनकर एक-एक कविता आ एक-एक शब्द क्रांतिक अलख जगबैत अछि, कामन वेल्थी दुनियां क्या है, बूचड़ का बाजार है, प्रजातन्त्र पर्दा है लेकिन खूनी कारोबार है। भुखमरी आ तंगहाली से परेशान भ के 1961 में जखन जमीनक बंटवाराक लेल किसानक अन्दोलन चलल, तखन नागार्जुन ‘करोड़ों हाथों’ के फेर सें ख्याल करलक, नभ से संघ बद्ध जनता का गूँज उठा हुँकार। बाबाक कवितामे यथार्थक वर्तमान रहल अछि आ गप-सपमे बड़का गप कहि दैत छथि। हुनकर हिन्दी कवितामे तात्कालिकता तँ अछि मुदा व्यंग्यक विदग्धता हुनकर शब्दकेँ कालजयी बना देने अछि। भूख, बेरोजगारी, अकाल सन विषयपर लिखल हुनकर कविता जते संवेदनासँ भरल अछि, ओतए नीतिक व्यंग्य कतेक रास मारक क्षमता राखैत अछि। आइ कतेक रास घोटालाक खबर आबि रहल अछि, लोक-वेद त्रस्त अछि, रामराज्यक परिकल्पना कतेक लोक कऽ रहल अछि, लोक पाइ आ सत्ताक पाछू भागि रहल अछि, एनामे नागार्जुनक ई गप याद अबैत अछि, 'रामराज्य में अब की रावण नंगा होकर नाचा है सूरत शकल वही है भइया, बदला केवल ढांचा है लाज- शर्म रह गई है बाकी, गांधीजी के चेलों में फूल नहीं लाठियां बरसती रामराज्य के जेलों में।' नागार्जुन हुअए वा हुनकर कविता, आम लोक सभ लेल ओ सहज अछि। राजनीतिक उत्थर स्वाद हुनकर कवितामे जइ तरहेँ भेटैत अछि, हिन्दी हुअए वा मैथिली, एहन स्वाद आन ठाम नै भेटैत अछि- नागार्जुन, 'सियासत में न अड़ाओं अपनी ये कांपतीं टांगें हां, महाराज राजनीतिक फतवेबाजी से अलग ही रक्खो अपने को माला तो है ही तुम्हारे पास नाम-वाम जपने का भूख जाओ पुराने सपने को'. ओ एहन लोक अछि जे अप्पन तँ एहन-ओहेन करैत अछि, आगूसँ बैसल रहैत अछि, तकरो नै छोडैत अछि। 'जपाकर' कविता मे संविधानक सेहो एहन मजाक बनाबैत अछि, जे आइयो धरगर अछि- 'जपाकर दिन-रात जै जै जै संविधान मूं द ले आंख- कान उनका ही दर ध्यान मान ले अध्यादेश मूंद ले आंख-कान सफल होगी मेधा खिचेंगे अनुदान उनके माथे पर छींटा कर दूब-धान करता जा पूजा-पाठ उनका ही धर ध्यान जै जै जै छिन्नमस्ता जै जै जै कृपाण सध गया शवासन मिलेगा सिंहासन।' एहन गप नै अछि जे नागार्जुनक सोचक सीमा एक्कै दिस अछि। हुनकासँ कियो नै छुटल अछि, वोटकेँ लऽ कऽ जे राजनीति भऽ रहल अछि, ओकर चिंता हुनका सेहो छल- 'बेच-बेचकर गांधीजी का नाम बटोरो वोट बैंक बैलेंस बढ़ाओ राजघाट पर बापू की वेदी के आगे अश्रु बहाओ।' आइ जहिना सड़कपर उतरल लोक सत्ताक मदहोशमे डूबल लोकपर व्यंग कऽ रहल छै, कहियो एकरासँ नागार्जुन पाछुओ नै छल। नेताकेँ लऽ कऽ ओ कहै छथिन, 'कुर्सी-कुर्सी गद्दी-गद्दे खेल रहे हैं घटक तंत्र का भ्रूणपात ही खेल रहे हैं जोड़-तोड़ के सौ-सौ पापड़ बेल रहे हैं भारत माता को खादी में ठेल रहे हैं।' सत्तासँ डरब तँ ओ सिखने नै छथिन, तइ सँ इंदिरा गांधी केँ ओ सोझे कहि देलखिन, 'इन्दुजी, इन्दुजी, क्या हुआ आपको? सत्ता की मस्ती में, भूल गई बाप को? बेटे को तार दिया, बोर दिया बाप को! क्या हुआ आपको? क्या हुआ आपको?' ऐना कहै बला आजुक काल मे कियो अछि, ई सोचबाक विषय अछि. नागार्जुनक कविता आ हुनकर फक्कड़नुमा अंदाजकेँ आजुक जुगमे अलग नजरिमे देखबाक आवश्यकता अछि। ओ राजनीति संदर्भमे भऽ सकैत अछि, सामाजिक संदर्भमे भऽ सकैत अछि तँ आर्थिक संदर्भमे सेहो। क्रांति आ एकर विचारधाराक गहींर प्रभाव बाबाक लेखनीमे छल। एकटा कविता नक्सल आन्दोलनक छाहमे ओ लिखने छल जे आजुक हालतपर सटीक अछि, 'बुद्ध का दिल तो कहता है अबकी भारी गहन लगेगा बुद्ध का दिल तो कहता है अबके संसद भवन ढहेगा बुद्ध का दिल तो कहता है बच्चा-बच्चा अस्त्र गहेगा बुद्ध का तो दिल कहता है कोई अब न तटस्थ रहेगा।' बाबा नागार्जुन सामाजिक, राजनीतिक विद्रूपतापर वार करैत आगू निकलि जाइत अछि। ताहिसँ ओ कहैत अछि, 'ऊपर-ऊपर मूक क्रांति, विचार क्रांति, संपूर्ण क्रांति कंचन क्रांति, मंचन क्रांति, वंचन क्रांति, किंचन क्रांति फल्गु सी प्रवाहित होगी, भीतर-भीतर तरल क्रांति. एनामे जाहिर सन गप अछि जे बाबा नागार्जुन कहै लेल कवि टा नहि छल, हुनकर सोच आ शब्दमे एकटा धार अछि। हुनकर एक-एकटा शब्द एहन अछि जे सुतल मुर्दाकेँ जगाबैक क्षमता राखैत अछि। लोकतंत्र मे हुनकर सहमति अछि मुदा छल-प्रपंच आ आडम्बरसँ ओ दूर रहै बला लोक छला। कतय गेल फिल्मक बाल कलाकार कहियो समय रहै जे बाल कलाकार आओर बाल गीत हिन्दी सिनेमा देखै बला लोकक मनमे उतरि जाइत छल। मुदा आजुक समयमे नहि तँ एहन बाल कलाकार अछि आओर नहि ओहन डायरेक्टर अछि जे बच्चाकेँ लऽ कऽ फिल्म बनौलथि जे दिल कऽ छू लय। 1954 मे एकटा फिल्म रिलीज भेल छल 'जागृति"। कहल जाइत अछि जे ई फिल्म पहिल फिल्म छल जहि मे बच्चाकेँ लऽ कऽ नीक गीत छल। गीत कवि प्रदीप लिखलैन । 'आओ बच्चो, तुम्हें दिखाएं, झांकी हिन्दुस्तान की" एखनो लोक सभ गाबैत अछि। अहि फिल्मक एकटा गीत आओर अछि जे मोहम्मद रफीक गायल छल 'हम लाए हैं तूफान से कश्ती निकाल के...।" समय बदलैत गेल, कएक टा गीत लिखल गेल। 'बूट पालिस" मे 'नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुटठी मे क्या है", 'श्री 420" मे 'इचक दाना बिचक दाना",'धूल का फूल" मे 'तू हिन्दु बनेगा न मुसलमान बनेगा", 'गंगा जमुना" मे 'इंसाफ की डगर पे बच्चो दिखाओ चल के", 'सन ऑफ इंडिया" मे 'नन्हा मुन्ना राही हूं', 'ब्रह्मचारी" मे 'चक्के पे चक्का", 'दो कलियां" मे 'बच्चे मन के सच्चे" सभटा गीत बच्चा सभकेँ खूब नीक लागल। आओर तँ आओर, फिल्म अराधनाक गीत 'चंदा है तू मेरा सूरज है तू' आइ धरि लोक अप्पन सोना बेटाकेँ सुताबैक कालमे गाबैत अछि, जखन खेलाबै लागत तखन आशीर्वाद फिल्मक गीत "रेलगाड़ी, रेलगाड़ी...' गाबैत छल जकरा अशोक कुमार गयने छल। जखन घरमे मामा आबै छथिन या राति मे आंगन मे सुतल लोरी जना लोग सुनाबैत अछि 'चंदा मामा दूर के.." गीत सुनहि मे खूब नीक लागैत अछि। ओहिनो फिल्म अपना देशक गीत 'रोना कभी नहीं रोना", कालीचरणक गीत 'एक बटा दो", मिस्टर नटवरलालक गीत 'आओ बच्चों मैं तुम्हें कहानी सुनाता हूं", अंधाकानूनक गीत 'रोते-रोते हंसना सीखो" खूब सुनल आओर गाओल जाइत अछि। मासूम फिल्मक गीत 'छोटा बच्चा जानकर" कोनो काल मे सभक मुंह मे रहैत छल। हिन्दी फिल्मी दुनिया मे एहनो काल छल जहिया बेबी तबस्सुम, बेबी गायत्री, मास्टर रतन, हनी इरानी, पल्लवी जोशी, नीतू सिंह, मास्टर मयूर केँ देखहि लेल लोक सिनेमा हॉल जाइत छल। मुदा अहि गपसँ इनकार नहि कएल जा सकैत अछि जे आब फिल्म मे अलग तरहक स्वादक लेल बाल कलाकारक अभिनय देखल जाइत अछि। कहियो दू टा प्रेमीक मिलाबैक लेल बाल कलाकारकेँ फिल्म मे लेल जाइत छल जे आबक फिल्म मे नहि अछि। किएकि मोबाइल, इंटरनेटक दुनिया आबि गेलासं नहि कबूतर, तोता अछि आओर नहि कोनो बच्चा, जकरा सं प्रेमपत्र भेजबा मे मजा आबैत छल। एकटा फिल्म आयल छल 'ब्लैक"। ओ संजय लीला भंसाली बनौने छल। आयशा कपूर एहिमे अभिनय केने छल जाहि सं खूब फिल्म देखल गेल आ सर्वश्रेष्ठ फिल्म बनि गेल छल। अमोल गुप्तेक तारीफ कएल जा सकैत अछि, किएकि आमिर खानक संग डिसलेक्सियासँ पीड़ित बच्चा पर 'तारे जमीं पर" बनौलनि। खूब नीक अभिनय करैक लेल दर्शील सफारी केँ घर-घर मे लोक चिन्है लागल। अहि मे अमिताभ बच्चन कोना ककरो से पाछाँ रहितथि। भूतनाथ मे अभिनय कऽ लोकक दिल जीत लेलखिन। अमन सिद्दकी एकरामे बंकूक भूमिका केलनि। डॉ. गंगेश गुंजन कविक आत्मोक्तिःकविताक अयना -विनीत उत्पलक कविता संग्रहपर विश्व बजारी एहि समाज मे, भाषा-साहित्य सभक संसार मे सेहो बजारे जकां मंदी पसरल अछि। लगभग इएह परिस्थिति बेसी कला-विधाक बुझाइछ। साहित्यमे किछु आर विशेषे। ताहू मे कविताक विधा आओरो अनठिआएल अछि, किछु स्वयं कात करोट भेल आ किछु कएल जा रहल अछि। प्रकाशके टा द्वारा नहि, स्वयं संबंधित भाखा-भाखी अधिसंख्य लोक समाज द्वारा सेहो। जतए स्वयं कविक द्वारा, से अवश्य खेद करवाक विषय। कविता व्यक्ति कें अपन समाज मे एकटा आओर प्रतिष्ठा मात्र दिअयबाक मूल्य पर बेशी दिन जीवित नहि रहि सकैत अछि। अर्थात् कोनो सम्भ्रान्त व्यक्तिक भव्य ड्र्ाइंग रूम मे एक टा आओर इम्पोर्टेड दामी वस्तुक प्रदर्शनीय नमूनाक माल कविता नहि बनाओल जा सकैत अछि, जे कि दुर्भाग्य सं भ’ रहल अछि। भाषा वैह टा ओतबे जीवित अछि वा रह’वाली बुझा रहल अछि जे मात्र अपन भाषिक उपयोगिता बा कही अपन क्रय-विक्रय-मूल्यक बलें जीवित रहि सकय। ग्लोबल बजार मे भाषा अपन प्रवेश- जतेक दूर आओर गंहीर धरि करवाक क्षमता रखने अछि, ताही सामर्थ्यक उपयोगिते पर, ओतवे दुआरे जीवित राखल जा रहल अछि, कोनो अपन काव्य-सम्पत्ति, सांस्कृतिक अस्मिता आ भाषाक प्राचीनता बा महानताक जातीय स्वाभिमानक आधार पर नहि। तें दुर्भाग्यवश ई समय अपन-अपन भाषाक महानता ल’ क’ आत्म गौरव सं भरब तं फराक, जे मुग्ध पर्यन्त होयबाक समय नहि बांचि गेल अछि। हॅं, भाषाक ‘दाम’ ल’ क’ निश्चिन्त रहवाक बा कम बिकाएब ल’ क’ चिन्तित होयबाक समय अछि। मुदा कविता मे भाषाक आशय आ अस्तित्व कें एहन तात्क्षणिक बूझि लेब कोनो भाषा-साहित्यक मूल सं छूटि क’ आगां बढ़वाक बुद्धि कें अवसरवाद छोड़ि, दोसर किछु ने मानल जा सकैत अछि। समकालीन समस्त कवि कें, नवागन्तुक के तं अनिवार्यतः बजार आ कविता भाषाक बीचक एहि भेद कें नैतिक बुद्धियें बूझि’ए क’ एकर बाट चलवाक प्रयोजन । अन्यथा ई कविता सेहो एक टा नव पैकेटक नव उत्पाद बनि क’ दोकान मे रहत। पोथीक दोकान मे नहि। साज-शृंगारक कोनो मॉल मे, जत’ जनसाधारण लोकक पहुंचबो दुर्लभ! आब से बजार आ कविताक भाषाक एहि द्वन्द्व सं निकलैत भाषाक ई यात्रा कोन नीति-बुद्धि सं कएल जयवाक प्रयोजन ताहि विषय पर गंभीरता सं मंथन कर’ पड़त। स्वविवेक। ई त्वरित चाही। उत्पल जीक एहि कविता-पाण्डुलिपिक लाथें, ई चर्चा हमरा अभीष्ट भेल आ संभव, एकर श्रेय तें हम हिनके दैत छियनि। कारण बतौर काव्य-प्रवेशार्थी भाषा-व्यवहारक ई दायित्व हिनको वास्ते प्राथमिकताक डेग छनि। कविता भाषाहिक सवारी पर लोक धरिक अपन यात्रा करैत छैक। जेहन सवारी, जेहन सवार तेहन यात्रा। ताही मे गन्तव्य, काव्यबोध, युग आ जीवन-दर्शन समेत बहलमानी कही, कोचमानी कही, बा ड्र्ाइभरी-पॉयलटी तकर कर्म कुशलता, ई सभ तत्व अंतर्निहित छैक। बल्कि कएटा अन्यान्यहुं विषय जे कोनो कवि अपना साधनाक प्रक्रिया आ स्वविवेक सं निरन्तर अपने विकसित करैत जाइत अछि। मुदा तकरा यथावत “शब्द मे कहि सकब, प्रायः एखनो हमरा बुतें संभव नहि। कए दशक सं कविता लिखि रहल छी। हिन्दी सन व्यापक भाषाक स्थापित नीक-नीक स्वनामधन्य कवि पर्यन्त अपन कविता-पोथी अपने छपा रहल छथि। बिकाइ छनि तं बेचि रहल छथि। कोनो ब्रांड प्रकाशक सं खामखा छपवहि चाहैत छथि तं ओकरा पुष्ट मात्रा मे धन दैत छथिन। सरकारी पुस्तकालय सभ मे थोक मात्रा मे ‘खपबा’ देबाक वचन दैत छथिन, तखन अपन गुडविल दैत छनि। वा अपने अर्थ सक्षम कवि-लेखक अपना पुस्तकक संपूर्ण प्रकाशन-व्यय स्वयं करैत छथि। तें पाठक आइ धनिके कवि टा कें, ब्रांड प्रकाशन सभ मे पढ़ि सकवाक सौभाग्य पबैत अछि । मैथिलीक स्थान निरूपण तं सहजहिं कएल जा सकैए। मैथिली मे तं ओहिना प्रायः सभ टा साहित्ये लेखक-कवि कें अपना अपनी क’ अपने छपबाव’ पड़ैत छैक। महाकवि यात्रीजी पर्यन्त विशय आबहु जीवित अति पुरना किछु लोक आ यात्रीजीक स्नेही-श्रद्धालु पाठक समेत हमरा खाढ़ीक हुनक स्नेह-समीपी किछु रचनाकार कें बिसरल नहि हेतनि। पोथीक प्रसार आ विक्रय सं मैथिल लेखकक केहन उद्यम जुड़ल रहलैक अछि! प्रकाशक कत’? अर्थात् कविता आ साहित्य कवि आ साहित्यकारहिक संसार मे जीवित अन्यथा मृत नहियों तं अनुपस्थित तं अनुभव कएले जा रहल अछि। ई युग यथार्थ एकदम देखार अछि। एहना मे क्यो एक टा मैथिल युवक अपन समस्त ऊर्जा-उत्साहक संग दिल्ली मे कोनो संध्या बा प्रात अपन मैथिली कविताक पाण्डुलिपि दैत अपने कें ‘भूमिका’ लिखि देवाक आग्रह करथि तं केहन लागत? मतलब जे प्रथम दृष्टया केहन अनुभव हएत? हमरा तं युवक दुस्साहसी आ किंचित गै़रजवाबदेह बुझयलाह। ओना जकरा साहस नहि हेतैक से कविताक बाट धइयो कोना सकैये ! अपन कुल अड़तालीस पृष्ठक अड़तीस कविताक पाण्डुलिपि दैत श्री उत्पल विनीत जखन से कहलनि तं किंचित असमंजस तं भेवे कएल। भूमिका-लेखन-काज सेहो एहि युग मे अपन धर्मान्तरण कए लेलक अछि। हमर प्राथमिकता सं तें बाहरे अछि। तथापि यदि कोनो मैथिली कविताक भविष्य एना सोझां उपस्थित हो तं स्वागत कोना नहि हो ! ताहू मे भागलपुरक नवतूर ! पाण्डुलिपि पढ़वाक क्रम मे हमरा कचकोही कविता ;मैथिली कवि विनोद जीक “शब्द मे कंचकूहद्धहोयवाक अनुभव भेलाक बादहु-कवि प्रतिभाक छिटकैत सूक्ष्म किरणक सेहो अनुभव, प्रिय आ आश्वस्तिकारक बुझाएल। स्वागत तें कहल अछि। उत्पलजीक प्रतियें उद्गार मे। कविक प्रस्तावना हिनक कविताक संसार कें बुझबा मे विशेष सहायक अछि जे ई बड़ स्पष्ट बुद्धियें आ पूर्ण मनोयोग सं लिखलनिहें। हिनकर रचनाक बुनियादी वर्तमान आ सरोकारक उद्घोश जकां छनि। से मात्र वयसोचित उच्छ्वास नहि, बल्कि अपन वचनबद्धताक स्वरूप मे कहल गेल छनि। सभ समयक नवीन पीढ़ी रचनाकारक सम्मुख अपन वर्तमाने प्रायः सब सं प्रखर चुनौती रहैत छैक। अतीत आ भविष्य तं अ’ढ़ मे रहैत छैक। रचनाकारक रूप मे अतीतक वास्ते ओकर नीक-बेजायक वास्ते ओकरा उत्तरदायी नहि बनाओल जा सकैए। यद्यपि ताही तर्क सं भविष्यक लेल ओकरा छोड़ि सेहो नहि देल जा सकैए। कारण समाजक भविष्य निर्माणक प्रक्रिया मे अन्य सभ सामाजिक कारण आ प्रेरक परिस्थिति सभ समेत, समकालीन रचनाकारहुक परोक्ष मुदा प्रमुख भूमिका रहबे करैत छैक। तें कविक दायित्व ल’ द’ क’ अपन समकालीनताक ज्ञान आओर अनुभव के विवेक सम्मत सम्वेदनाक रूप मे विकसित करैत अग्रसारितो कर’ पड़ैत छैक। जाहि सघनता आ व्यापकता सं कवि युगक “अतीत-ताप अर्थात् जीवनक दुःख-द्वन्द्व आ यथार्थ कें बूझि-पकड़ि पबैत अछि आ तकरा अपन रचना मे दूरगामी प्राणवत्ताक कलात्मक शिल्प द’ पबैत अछि, सैह ओकर प्रतिभाक सामर्थ्यक रूप मे दर्ज कएल जाइत छैक। कोनो रचनाकार अपना कृति मे बहुत युग धरि रहवाक सहज आकांक्षी होइतहिं अछि। तें हमरा जनैत मनुक्खक जिजीविशा आओर कविताक जिजीविशा मे तात्विक किछु भेद नहि। कवि जे अंततः मनुक्खे होइत अछि। तें दुनूक “आशक्ति अन्योनाश्रित होइछ। विनीतजीक कविता मोटामोटी हमरा तीन अर्थछाया सं वेष्ठित अनुभव भेल। कविता मे अपन कथनक कोटि, तकर पकड़ आ प्रयोगक विधि। कएटा रचना तें कंचकोह जे कहल, से छैक एखन। कएटा भावानुभूति मे संवेदनशील मुदा कथन मे अपेक्षाकृत बेजगह। “कविताक विषय कथात्मक सांच मे कहि देल गेलैक अछि, जे स्वाभाविके, ओ कविता विशेष अपन जाहि अनुभव-निष्पत्तिक योग्य सक्षम रहैक आ उपयुक्तो, से नहि भ’ सकलैक अछि। से आगां सकुशल सफलता पाबि जाइक तकर सामर्थ्य कविता मे अवश्ये झलकैत छैक। से साफ-साफ। तें ओतहु निराशा नहि, आस्वस्ति छैक। कवि आ कविता दुनू अपना प्रकृतियें बनिते-बनिते बनैत छैक। तेसर जे अति ज्वलंत अतः कविताक प्राणानुभूति वला अनुभव कें पर्यन्त कवि किछु तेहन अंदाज मे कहि जाइत छथि जे ओकर वांछित प्रभाव पाठकक मन पर ओएह नहि पड़ैत छैक जे स्वयं कविक अभीष्ट छनि। अगुताइ मे कहल गेल सन आभास होइत छैक। कारण जे कविता मात्र कन्टेंटे नहि, कहवाक छटा आ व्यंजनाक कलात्मक स्तर पर काज करवाक कविक समुचित भाषिक क्षमता सेहो थिक। बहुत सोचला उतर आधार भेटल जे, तकर यदि कोनो एकटा कारण देखल जाय, तं भाषाक अवरोध बुझाएल। कोनो भाषा स्वयं मे मात्र ओ भाषा टा नहि अपितु पूरा संस्कृति होइत छैक। भाषा मात्र ओकर बोध बा ज्ञाने नहि, ओकर संवेदना सेहो होइत अछि। अर्थात कोनो प्राचीन समृद्ध संस्कृतिक अभिव्यंजना लेल ओहि संस्कृतिक भाषाहुक प्रवाह मे प्रवेश चाही। से प्रवेश हमरा बुद्धियें भाषाक नाव टा सं संभव होइत छैक। नाव एकहि संग खेबैया सं ओकर स्वस्थ बल समेत कएटा अन्यान्य कुशलताक मांग करैत छैक। कवि सं कविता-विषय, तहिना। तें भाषाक साधना, कोनो कविक काव्य-यात्रा कें सुगम बनवैत छैक।सुचारु करैत छैक। दोसर जे, जेना जीवन आओर युग यथार्थ परिवर्तनशील होइत अछि , तहिना भाषाक भूमिका सेहो बदलैत छैक। अर्थात् भाषाक मिज़ाज। उत्पल विनीतजी कें भाषाक रूप मे एखन मैथिलीक संग बहुत बेशी आयन-गेन करवाक प्रयोजन। तखनहि मैथिलीक सहज स्वाभाविक “शक्ति सं आत्मीयता आ परिचय विकसित भ’ सकतनि। भाषा कें अपन काव्य प्रयोगी अभियान मे विश्वसनीय संगी बनब’ पड़तनि। सभ कें बनब’ पड़ैत छैक। मातृ भाषा हएब, कविक सामर्थ्य तं होइछ मुदा काव्य सामर्थ्यो सेहो भ‘ जाइक, से आवश्यक नहि। तें कोनो कविक वास्ते काव्यभाषाक सिद्धि अभीष्ट।अनुभव तं जीवनक निरंतर अंतरंगता आओर सरोकार सं अपना स्वभावें चेतनाक अंग बनैत चलैत छैक। सैह रचनाकार कें श्रेय तथा प्रेयक विवेक भरैत रहैत छैक। एहि टटका, उूर्जावान-संवेदनशील कविक पथ प्रशस्त हेतनि से विश्वास अछि। बहुत-बहुत स्नेह-“शुभाशंसाक संग, कालजयी कविताक आशा मे। रामभरोस कापडि ‘भ्रमर’, अध्यक्षः साझाप्रकाशन, ललितपुर यात्रा प्रसंग- ह्वेन सांगसं चीनमे भेंटघांट हमसभ हाइस्कूलक पाठ्यक्रममे ह्वेनसांगकेँ सम्बन्धमे पढैत छलहुँ । चिनी यात्रीसभ भारतधरि पहुँचि बौद्धधर्मक ग्रन्थसभकेँ संकलन कऽ चीन लऽ गेल छल । विकट वाट–अथक यात्री । महिनोक सफर । हमसभ चीनक सांस्कृतिक राजधानी सियानमे आबि गेल छी । विजिंगसं दूघंटाक उडानक बाद काल्हिए एत्त आएल रही । आसीन ७ गतेसं नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानक नौ सदस्यीय प्रतिनिधि मण्डल सात दिनक चीन भ्रमणमे अछि । सात गते काठमाडौसं चायना ईस्टर्न एयरलायन्ससं हमसभ कुनमिंग आयल रहीआ ओत्तसं ओही दिन विजिंग पहुंचल रही राति ११ बजे करिब । विजिंगमे तीन दिन रहि क काल्हि चीनक सांस्कृतिक राजधानी सियान आयल रही । आ आई सियानक बासी रहल ह्वेन सांगक विशिष्ट कृतित्वक अध्ययनमे लागल छी । सरिपहुं आइ एकटा विशिष्ट व्यत्तित्वक कृतित्वसँ साक्षात्कारक समय छल । हमर चुलबुले गाइड मोनिका (पश्चिमी नाम) हमरासभकेँ डा.सीन टेम्पलमे लऽ जा रहल छली । एतय ओकरे शब्दमे सियान जौैंग अर्थात हमसभ जकरा ह्वेन सांग कहैत छिएै,क बासस्थान, कृतिसभसँ परिचय कराबय लेल ओ बेसब्र छलीह, मन्दिर बनौल गेल जत्त ओ बौद्ध कृतिसभक चिनी अनुवाद कएलन्हि । हुनक अनुवाद कएल किछु कृति ओतहि राखल अछि । भारतसँ घुरलाक बाद तत्काले सम्राटद्वारा कएल गेल स्वागत आ अन्य क्रियाकलापसभ देवालपर लिखल भव्य चित्रसभ बताबि रहल छल । प्रकोष्ट भितर ह्वेन सांगकेँ भव्य प्रतिमा सेहो स्थापित अछि । तहिना बाहर कम्पाउण्डमे सेहो हुनक विशाल प्रतिमा राखल गेल अछि । ओ सियानके बासी छलाह । तएँ सियानवासी हुनका बहुत बेसी सम्मान करैत अछि आ हुनका स्मृतिकेँ सम्बद्र्धन करएमे दत्तचित्त भऽ लागल अछि । ११९ ई सन पूर्व सियानमे बेस्टर्न हान डाइनेस्टी समय दिस सिल्क कारोबार ओतय होइत छल । पाछु इएह सिल्क व्यापार सियान होइत समुद्रतट धरि पसरल । ई व्यापारिक बाट पाछु सिल्करोडक नामसँ प्रसिद्ध भऽ गेल । जखन चीनमे सन २५ दिस इस्टर्न हान पिरियडक समयमे भारतीय बुद्धिज्म चीनमे प्रवेश पौलक , सम्भवतः ओकर बाट सेहो इएह सिल्करोडे छल । तांग राजवंशक प्रारम्भिक समय ६२९ सन दिस ह्वेन सांग ओएह सिल्करोड होइत भारतधरिक यात्रा कएने छलाह —बुद्ध साहित्य,दर्शन प्राप्त करबा लेल ।ओ सन ६४५ मे सियान घुरलाह आ बडका ध्ष्मि नययकभ एबनयमब या म्ब ऋष्भल त्झउभि कँ निर्माण भेल । ह्वेनसांग सन ६०० मे जन्मल छलथि , ६१३मे बौद्ध भिक्षु बनलान्ह, ६२९ सँ ६४५ धरि भारत भ्रमण कएलन्हि, ६४५ सँ ६६४ धरि बौद्ध साहित्यक अनुवाद कएलन्हि , सन ६६४ मे हुनक देहाबसान भ गेलन्हि । हमरासभकेँ विस्तारपूर्वक ओहि पैगोडाकेँ जानकारी प्राप्त भेल । मनमे उठल अनेको जिज्ञाशाकेँ सेहो शान्त करबाक अवसर पौलहुँ । चीनमे देखय लायक बहुत चीज अछि । आठ हजार ई.पूर्वधरिक अवशेषसभ संग्रहालयमे देखलहुँ तऽ ३००० सँ ५००० हजारधरि ई पूर्वक साबूत आ विकसित सामग्रीसभ देखलाक बाद सभ्यता आ संस्कृतिक विकासमे चिनियां भूमि अन्य क्षेत्रसँ आगां आ बेसी सम्पन्न किए अछि से आभास होइत अछि । आव विश्वास होइत अछि जे लिपिक विकास किया चीनेमे भेल छल । चीन भ्रमणक एहि प्रसंगमे अनेकौं ऐतिहासिक तथ्यसभसं साक्षात्कार करबाक अवसर भेटल । तखन लागल चीन मात्र सातम् आश्चर्यक लेल मात्र नहि, अपना भितर अनेकौ आश्चर्यसं भरल सामग्रीसभ संरक्षित क रखने अछि, जकरा देखा क एखन आर्थिक उपार्जन मात्रे नहि अपन परम्परा आ सांस्कृतिक सम्पदाकें विश्वकें अगाडी समधानि क प्रस्तुत करबाक पैघ काजसेहो क रहल अछि । चीनक विकासक गति ठीके प्रशंशायोग्य मानल जएबाक चाही । यात्रा प्रसंग- हमर कल्पनाक सेती..... बहैत..... अविचल ! बहुत पहिने डा. धीरेन्द्र एकटा कथा लिखने रहथि – हिचुकैत बहैत सेती । कोनो सन्दर्भमे पोखरा अएलाक बाद हुनका सेती मनकें छुने रहनि आ तखन ई कथा आएल रहय । जनकपुरमे रहनिहार डा. धीरेन्द्रकें हृदयके झकझोड़ि देब बाली नदी सेतीमे आखिर की विशेषता रहल हयतैक – हम तहिया खूब सोचने रही । हमरा मोनमे सेती तहिए बसल – नहि, देखबाक चाही सेतीकें । समय एम्हर काफी ससरि गेल अछि । डा. धीरेन्द्र सेहो आब नहि छथि । जहिया ओ पोखरा गेल छलाह से पोखरा आब नहि अछि । नीक विकास भेलैए एकरा । विगतक चारि दशकमे ई पर्यटकीय गन्तव्यक आकर्षक ठाम भऽ गेल अछि । वहुत किछु बदलि गेलैए । जं नहि बदलल अछि तं सेती । लगैए एकर व्यथा–कथा सुननिहार केओ नहि भेलै । सेतीक किन्हेर पर बसल पहाडी गाम सभमे गाओल जाइत लोकगीत सभमे सेतीक कथा अवस्से आएल हयत । हमरा एम्हरका लोक संस्कृतिक अध्ययन नहि अछि । मुदा नदी सभक प्रभाव जेना लोकगीत सभमे अबैत रहल अछि,एहि क्षेत्रक प्रसिद्ध नदी सेती अवस्य सौनायल हयत । पोखरामे देखबा लायक बहुत किछु छैक । घुमबाक हेतु जे केओ काठमाण्डू अबैत अछि पांच–छव घंटाक वस यात्रासं पोखरा अवश्य आबि जाइत अछि । एत्त देखबा योग बहुत किछु छैक – अन्नपूर्णहिमाल श्रृंखला, माछापुच्छ्रे (माछक नांगरि सन) हिमाल, चर्चित फेवा ताल, महेन्द्र गुफा, डेविड्स फौल, संग्रहालय सभक संग बराही, विन्ध्यवासिनी, भद्रकाली मंदिर, विश्वशांतिस्तूप, तीव्वतीय गाम, पुरना बाजार आदि । पाइ हय तं छोटकी हवाई जहाज जे उडन खटोला वेसी लगैत अछि, मे चहरि पोखरा नगर, फेवा ताल, हिमाली श्रृंखला सभकें आनन्द लऽ सकैत छी । साइकिलसं पहाड़ पर चलि सकैत छी । वर्फमे चलबाक आनन्द लऽ सकैछी । वहुत किछु भऽ सकैछ मुदा से डलरमे । दिनहुं विदेशी पर्यटक दर्जनोंक संख्यामे अबैत अछि । वर्षाती मौसम सभसं नीक होइछ अकासमे उडबाक लेल ओना जनबरीसं जून उत्तम मानल जाइछ । मुदा हमरा लेल पता नहि किए पोखराक प्रथम दृश्यावलोकन सेती नदीक हेतु निर्धारित छल । डा. धीरेन्द्रक सेतीक खासियत खोजबाक लेल मनमे अनेकों तरंग उठैत रहल अछि । सेती माने नेपालीमे होइछ उज्जर । उज्जर धप–धप नदी । हं,ठीके सेती उज्जरे पानिक संग बहैत अछि । पोखराक हृदय प्रदेश भऽ कऽ बहैत सेती,अपना भितर अनेकों स्ुन्दर, कुरुप प्रसंग सभक एकांत साक्ष्ँ।ी । कर्णाली प्रदेशमे बहऽ बाली प्रसिद्ध हिमाली नदी सेती जे बझाङ, डोटी, डडेलधुरा धनगढी होइत भारतके उत्तर प्रदेशमे सन्हिया जाइत अछि, जे माछापुच्छ्रे हिमाल सं निःसृत होइत अपना संगे चूना लेने पोखरा उपत्यकामे प्रवेश करैत दक्षिणमे त्रिशूली आ नारायणी मे मीलि जाइत अछि । तीन दिनक हेतु मात्र हम पोखरामे छी । साझा प्रकाशनक कार्यालय निरिक्षणक क्रममे एत्त आएल होइतो हमर प्राथमिकता सेती दर्शन अछि । क्षे.शा. प्रवन्धक रिलामीक संग हम महेन्द्रपुल पहुंचैत छी । पुलक उत्तर आ दक्षिण दुनू कात भयंकर झारपात, गाछक विच निरिह, असमर्थ, प्रताडित सेती.....। लगभग ४० मिटर निचां कोनो विधवाक सुन्न, उज्जर सिउंथ जका वहैत सेती.....। दुनूकातक किन्हेरपर घर सभ बनल आ तकर शौचालयक नालीक दुर्गन्ध आ गन्दगी उद्यैत सेती....। नगरक गन्दगीकें आंचरमे सहेजवा पर विवश सेती । अपराधी सभक कुकृत्यकें सेहो अपन छातीपर लोकबालेऽ बाध्य सेती । निचां, भयानक, डेराओन, देखिते देहमे सिहकी पसरि जएबाधरिक कुरुप सेती....आ डा. धीरेन्द्रक सपनाक सेती ! नहि, हमरा नहि लगैत अछि डा. धीरेन्द्र तहिया एहि सेतीकें देखने होथिन्ह । मधेशमे रहनिहार, नदीक संस्कारकें अपन जीवन पद्धतिमे अंगेजनिहार व्यक्तित्व एहन कुरुप सेतीकें कोना सहि सकैत छलाह होइत । हम त पुरे निराश भऽ जाइत छी । हमर मान्यता आ धारणा सभ खण्डित होइत जा रहल अछि । हम अगुता कऽ रिलामी जी कें पुछैत छिऐक – की इएह रुप छै सेतीकें ? ओ हमर आसय वुझैत अछि आ हडबडा कऽ बजैत अछि हैन, सर ! नहि,हजूर ! नगरमे प्रवेश करैत काल आ निकलैत काल ई अपन स्वभाविक रुपमे रहैत अछि । हमरा कनेक ठाढ़स होइत अछि । दक्षिण दिशसे स्वच्छ, उज्जर पानि देखने छी । मुंगलीन–काठमाण्डू बाटमे निचां बहैत उज्जर सेती तनहु मे त्रिशुलीमे मिलैत अछि । राफ्टींग कएनिहार सभ एही स्वच्छ पानिमे रमल रहैत अछि । नदीक बहैत क्रम सेती– त्रिशूली–नारायणी । हम एकर प्रवेश दिश बढैत छी । बगरमे ई गहिराईमे चल जाइत अछि । पोखरा नगरके उत्तर पश्चिम भाग जत्त शहरक अन्त होइत अछि ओत्त के आई सिंह पुलसं सेती नदीक सुन्दर, कलकल, स्वच्छ, उज्जर स्वरुप देखल जा सकैछ । ई फेर नगरक विचमे अवस्थित रामघाट पर देखार होइत अछि । फैलगर मुदा पानिक मात्रा कम । ओत्त स नगरमे वालुक आपूर्ति कएल जाइछ । ठिकेदार सभक भीड़ । एकटा राम मंदिर अछि आ वगलमे श्मशान घाट । नगरसं निचां नदी दिश प्रवेश करैत काल एकटा द्वार बनल छैक – वैकुण्ठद्वार । नदी आगां जा फेरसं उएह सय मिटर गहिंराई बला स्वरुपमे बदलि जाइत अछि, जकरा पृथ्वी चौक स नीक जकां देखल जा सकैछ । तकरा कनेके दक्षिण गेला पर नगर समाप्त भऽ जाइछ आ सेती जेना सभ पीड़ासं मुक्त भऽ स्वच्छन्द, अपन स्वरुप आ गतिमे आबि जाइत अछि । सेती एखन पर्यटन व्यवसायी सभक दूधगरि गाइ भऽ गेल अछि । रफ्टिंग सं लाखो कमाइ अछि । मुदा नगर भितरमे भयावह आ कुरुप रुपमे वहैत सेतीकें स्वच्छ,आकर्षक आ सुरिक्ष्ँत बनएबाक प्रयास होइत कहां देखल गेल अछि । ने सरकार ने व्यवसायी सभ आ ने उपमहानगरपालिका । कएलहु हयतैक त हमरा ज्ञात नहि अछि । ओना हम एत्त तकर रत्तियो भरि छाप नहि देखि पौलहुं अछि । हम सेतीक नगर प्रवेश स्थल पर छी.....मंत्रमुग्ध, स्तव्ध आ रोमांचित सेहो । वास्तविक सेती अपन सम्पूर्ण सौन्दर्यसं एत्त उपस्थित छथि । वर्फक पानिसं बनल उज्जर सेती कल–कल निनादक संग गन्तव्य दिश बहैत । अपना भितर रहल सभ गन्दगी, पीड़ा, प्रेम, स्नेह, मिलन आ विछोडक सभकथा सभकें समेटने बहैत । सेतीक एहि स्वच्छन्द, शांत बहाबमे कतहु उपेक्षा, तिरस्कार आ शोषणक पीड़ा सेहो हम महशूस करैत छी । आ तखन कतौ ने कतौ डा. धीरेन्द्रक हिचुकैत बहैत सेतीपूर्ण आकारमे हमरा सोझां ठाढ भऽ जाइत अछि । संसारक हेतु अपन सेवा देनिहारि सेती जखन ताही संसारी सभसं उपेक्षा पबैत अछि, शोषणमे पड़ैत अछि त आत्मा छहोछित हयबे करतै । सम्भवतः सेतीक इएह पीड़ा चारि दशक पूर्व डा. धीरेन्द्र महुशूस कएन छल हयताह..... । तए हमरा आब नगरमे पैसबामे डर लगैत अछि । अपन कल्पनाक स्वच्छ,सुन्दर सफा आ स्वेत नदी सेतीक अगिला विकृत रुप देखबाक साहस हमरामे नहि अछि । हम त एत्तहि बैसि अपन कल्पनाक, अपन चिंतनक, अपन रुचिक सेतीकें निद्वंद, साफ, प्रफुल्लित बहैत देख चाहैत छी । वस. एत्तहि बैसि... ! संचार एवं साहित्य क्षेत्रमे समावेशी स्वरुपक अपेक्षा वि.स. १९५८ मे प्रारंभ भेल गोरखापत्र समाचारपत्रक प्रकाशनसं नेपाली पत्रकारिताक विधिवत शुरुआत मानल जएबाक चाही । मुदा इहो समाचारपत्र मात्र नेपाली भाषा आ नेपाली भाषी सभक हेतु पृष्टपोषणक काज करैत आएल अछि । ई एक सय आठ वर्षक नेपाली पत्रकारिताक इतिहासेमे नुकाएल अछि समस्त नेपालक पत्रकारिताक व्यथा कथा । राजनीतिकर्मी लोकनि भले दू सय चालिस वर्षक गोरखासं ल’ नेपालक शाह वंशीय राजघराना धरिक समय कालमे मधेशवासीक शोषणक बात करैत हो, सत्य तं ई अछि एहि समस्त अवधिसं ल’ एखन धरिक गणतंत्र नेपालमे समेत अवस्था उएह छैक आ ओ चाहे राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक हुअए अथवा साहित्य एवं संस्कृति क्षेत्र हुअए । मधेश आन्दोलनक बाद जे किछु आंगुर पर गन’ बला परिवर्तनक संकेत आएल अछि से धन सन । हम पहिने संचार क्षेत्रक बात करी । गोरखापत्रक सय वर्षसं उपरक इतिहासमे पहिल बेर कोनो मधेशी किंवा मैथिल नि.प्रधान सम्पादकक जवावदेह पद पर जा सकलाह अछि । एहिस पूर्व सम्पादक आ काका अध्यक्षक वाते नहि आने महाप्रबन्धक । नीति निर्माणक तहमे मैथिल किंवा मधेशीक पहुंच शून्य रहल अछि । गणतन्त्रो नेपालक संचार कर्मी सभक हेंजमे जवावदेह पदपर मधेशी आबि पओताह–तकर आशा कम्मे अछि । नेपाल टेलिभिजनक महाप्रबन्धक भले नोकरीक वरिष्ठताक कारणें कोनो मधेशी तपानाथ शुक्ला भ’ जाथु । एखनो सरकारक मनोनयनमे सरकारी संचार क्षेत्र मधेशी विहिन अछि । कहियो काल देखएबालेल सचिवक अध्यक्षता बला संचालक समितिक सदस्यक रुपमे रेडियो नेपालमे कोनो मंगल झा किंवा रोशन जनकपुरी भले नियुक्त क’ देल जाइत हो । ने अवधि पूर्ण ने नितिनिर्माणमे कोनो अहमियत । नेपाल टेलिभिजनक हालति सएह छैक । संचालक धरिमे कोनो मधेशी नहि । बड कठिनसं आ प्रायः घनघोर प्रसव वेदनाक संग राससक उचिते प्राप्तकर्ता महाप्रबन्धक पद पर महतोजी वैसाओल गेलाह अछि, मुदा का.मु.क संग । राससक अध्यक्षक कुर्सि सदैब मधेशी सभक हेतु आकासक तरेगन भ’क’ रहि गेल अछि । प्रेस काउन्सिलक अध्यक्ष धरि मधेशीक पहुंच एखन धरि भ’ नहि सकल अछि । ४१ वर्ष पूर्व गठन भेल प्रेस काउन्सिल तहियासं आइधरि उएह नेपाली भाषी सभक हाथमे राखल गेल आ वात कएल गेल काठमाण्डू आ तराईक पत्र–पत्रिका विकासक । परिणाम भेलै एखनो धरि प्रेस काउन्सिल मधेशक पत्र–पत्रिकाकें पक्षपातपूर्ण आ द्वैध चरित्र देखा दबबैत रहलैक अछि, सतबैत रहलैक अछि । प्रत्येक नियुक्तिमे एक–आध गोटे मधेशी सदस्य बना देल जाइत छथि, जनिका सम्भवतः चलितो किछु नहि छन्हि । सरकारी संचार क्षेत्र जाहिने नेपालक आनोक्षेत्र खास क’ मधेशीक कर आ मालपोतक रकम लागल छैकमे कोनो समावेशी स्वरुपक अवधारणा शासक लोकनि किएक ने राखि सकलाह । गणतन्त्र नेपालक संचार मंत्री द्वारा गठित प्रेस काउन्सिल लगायत आन संचार क्षेत्र मधेशी पदाधिकारीसं किए शून्य भ’ गेल अछि । नहि लगैए ? – समावेशी मात्र नारा आ सहमति–समझौताक विषय भ’क’ रहि गेल अछि । तकरा कार्यरुपमे परिणत करबाक कोनो प्रयोजन सत्तापक्ष नहि वुझैत अछि । सरकार सूचना आयोग बनौलक, एक्कोटा मघेशी किएक राखत । सरकारी संचार माध्यम जाहिपर सभक अधिकार मानल जाइत अछि, तकर ई हालति अछि तं निजी क्षेत्रक वाते करब की । एत्त तं आर दुर्गति छैक । मधेश, मधेशी, मैथिल, मिथिला आ मैथिलीक चर्च एहि निजी पत्र–पत्रिका आ संचार माध्यमक हेतु कुनैनक गोली जकां गलामे अरघैत नहि छैक । तखन व्यवसायिक बाध्यतावश किछु मधेशी, मैथिल लोकनि किछु संचार माध्यमक महत्वपूर्ण पद पर आसीन राखल गेलाह अछि । नेपाली भाषी सभक नियंत्रणक ओहि प्रतिष्ठान सभमे हिनका सभकें की चलैत हयतनि–अनुमान कएल जा सकैछ । आब आबी साहित्य दिश । नेपालमे तत्कालीन प्रधानमंत्री चन्द्रशमशेर ज.व.रा. (१९०१–१९२९, प्रधानमंत्रीत्व काल) जखन नेपालमे राणाशासन विरुद्ध सुगबुगाहट देखलनि आ चोरानुकी राणा विरोधी साहित्य प्रकाशनक बात महशूस कएलनि तं १९१३ ई. मे ‘गोरखा भाषा प्रकाशिनी समिति’ नामक संस्थाक गठन कएलनि । फरमान जारी कएलनि–कोनो साहित्य वा रचना एहि समितिक स्वीकृति विना प्रकाशित नहि हयत । एहि तरहें राणा प्रधानमंत्री जे अपन गद्यी बचएबालेल समिति बना नियम चलौलनि ओ आइधरि परिवर्तित रुपमे अर्थात् पहिने गद्यी बचएबा लेल आब मात्र नेपाली भाषा बचएबा लेल तेहने जालसभ विनल गेल अछि । ओ चाहे तत्कालीन राजा महेन्द्रक कृपासं गठन भेल नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान होए आ अथवा २०२१ सालमे गठन भेल साझा प्रकाशन होअए । नेपालक जनसंख्या अनुसार मैथिली भाषीक संख्या १३ प्रतिशत अछि २०५८ सालक तथ्यांक अनुसार । दोसर भाषा अछि नेपालीक बाद । मुदा सरकारी संरक्षण विहिन अवस्था छैक । तहिना भोजपुरी, अबधी, थारु आदि भाषा छैक, जकरा प्रारंभ सं उपेक्षाक शिकार होब’ पडल छैक । साहित्यक रक्षामे लागल प्रतिष्ठान सभ मे समेत ई अवस्था शाहीकाल सं एखन धरि छैक जे दुखद मानल जएबाक चाही । मधेशी सेहो संचारमंत्री भेल छथि, मुदा की कएलनि ! शुरुमे हम संचारक्षेत्रक बात कएल अछि । सरकारी संचार क्षेत्रक गोरखापात्र, रेडियो नेपाल, नेपाल टेलिभिजन आदिमे नियमित साहित्यिक प्काशन व प्रसारण होइत अछि । कतेक स्थान नेपाली इतर भाषा, साहित्यक छैक । गोरखापत्र एम्हर ‘नयां नेपाल’ परिशिष्टमे देशक विभिन्न भाषाक पृस्ट देब’ लागल अछि । नीक प्रयास थिक । मुदा दू पृस्ट सं एक क’ देल भाषाक ओ पृस्ट भाषाक विशिष्टताक आधार पर नहि समावेशीक नामपर हक अधिकारकें कटौती क’क’ देल जा रहलैक अछि । आनो पृस्टपर छापबला रचना सभमे नेपाली भाषाक लेखकक अतिरिक्त आन भाषा–भाषी लेखक किंवा उक्त भाषाक साहित्य सम्वन्धी आलेख छापबामे परहेज कएल जाइत रहल अछि । गोरखापत्रक शनिवारीय परिशिस्टांक आ मधुपर्क साहित्यिक रचनाक प्रकाशन अछि । जं नियमित पाठक छी तं महिनौंक वाद किछु मैथिल किंवा मधेशी लेखकक रचना अति उपेक्षित रुपें कोनो कोनमे अभरत । वस, तकरा बाद उएह देखले–पढले नाम आ भाषा–रचना सभ । कतबो समावेशीक बात केओ क’ लिअए–मजाल अछि एहि पत्रिका सभमे मैथिली, भोजपुरी, अबधी, थारु भाषा साहित्यक रचना व विकास यात्रा सम्वन्धी आलेख छापालेब । कहियो काल ‘भनसुन’ कएला पर भले अपवादमे देखि पडए । नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानक गप त आर निराला अछि । नेपाली भाषा वाहेक आन भाषामे काज नहि करबाक जेना सप्पत खएने होए एकर पदाधिकारी लोकनि । एकतं एहिमे पहिने तीसटामे एक मधेशी सदस्य आ उएह कार्यसमिति अर्थात् परिषद्मे राखल जाइत छलाह । से भाषा, संस्कृति, साहित्य आदि विधाक अन्तरगत । ताही महक किछु पाइ कबारि एक आधटा पुस्तक मैथिलीयोमे बहार भ’ गेल अछि तं ई महान कृपा भेल छैक मैथिली पर । एकरालेल कोना विभाग छुटिआओल नहि गेल अछि । हालेमे गठित आ भंगठित प्रज्ञा–प्रतिष्ठानसं पूर्वक गठनमे एकमात्र मधेशी मैथिली साहित्यकार अवसर पबितो परिषद्मे राखल नहि गेलाह । तथापि प्रज्ञाप्रतिष्ठानक इतिहासमे पहिल बेर ‘आंगन’ गतगर पत्रिका मैथिलीमे निकलल । किछु काज आगां बढल रहय, परिषद् भंग आ दीर्घअन्तरालक बाद जं गठनो भेल तं एहन जे शपथग्रहण लेवासं पूर्वे तहस–नहस भ’ गेल । अदालत आ जनता दुनू द्वारा वहिष्कृत भ’ क’ रहि गेल अछि । तए“ एकरा सं ने पहिने आशा छल, आ ने आब करी से तकर वातावरण बनैत देखल जा रहल अछि । कोना डा. योगेन्द्र प्र. यादव जहिया एकर सदस्य रहथि तहियासं ‘सयपत्री’ पत्रिकाक प्रकाशन शुरु भेल रहय जे वास्तविक रुपमे समावेशी स्वरुप रहैक । आब साझा प्रकाशनक गप करी । पहिने चर्च भ’ आएल अछि राणा प्रधान मंत्री अपना विरुद्धक साहित्यकें प्रकाशनसं रोकबाक हेतु १९१३ ई. मे जे गोरखा भाषा प्रकाशिनी समिति (नेपालके समीक्षात्मक इतिहास–डा. श्री रामप्रसाद उपाध्याय, (२०५५), पृ–३१७ साझा प्रकाशन)क गठन भेल उएह समिति तत्कालीन राणा प्रधानमंत्री जुद्धशमशेर द्वारा नेपाली भाषा प्रकाशन समिति (वि.स. १९९०)क रुपमे परिणत क’ देल गेल तकरे उत्तराधिकारीक रुपमे २०२१ साल अगहन १७ गते साझा प्रकाशनक स्थापना भेल । एकरो संचालक लोकनि नेपाली वाहेक आन भाषामे प्रकाशन करब सोचने ने छलाह आ साझा प्रकाशन विगत ४५ वर्षसं नेपाली साहित्यक भण्डारकें विना कोनो सरकारी अनुदान, अपनेसं कमा क’ अथवा घाटा सहि क भरैत रहल अछि । जं कि एहि संस्थामे सरकारक लगानी ६० प्रतिशत अछि तए“ एकर अध्यक्ष लगायत तीन संचालक सरकार दिशसं मनोनित होइत रहलाह अछि । मुदा केओ एकरा नेपाली भाषा सं आगां लाबि नेपाली जनताक करक अंशसं चलैत एहि संस्थाकें समावेशी नहि बना सकल । सहकारीक कारणें ई कृषि मंत्रालय अन्तरगत अछि आ एहिसं पूर्वो वहुतो मधेशी कृषि मंत्री होइत रहलाक अछि । मुदा आय, लाभ शून्य साझा अध्यक्षक पद पर धरि कोनो मधेशीकें लएबाक जरुरति महशूस नहि कएल गेल । ४५ वर्षक बाद एहिबेर पहिल मधेशी एकर अध्यक्ष पदपर आएल अछि । साझाक नेपाली भाषा मुखी सम्पूर्ण क्रियाकलापकें समावेशी बनएबाक प्रयास जारी अछि । किछु प्रकाशनक तैयारी चलि रहल अछि । मैथिली व्याकरण, मैथिली वालकथा, मैथिली कथा संग्रह आदिक प्रकाशन प्रगति पर अछि तं महाकवि विद्यापतिक चित्र प्रकाशित भ’ चुकल अछि । भोजपुरी, अवधी, थारु, नेपाल भाषा, तमाङ आदि भाषामे काज करबाक गृहकार्य चलि रहल अछि । मुदा ई सभ काज नगण्य स्तपरपर अछि – नेपाली भाषाक काजक आगां ओत्त नेपाली मानसिकतासं उबरि सकबामे जे कठिनाइ लगबाक चाही, लागि रहल अछि । तथापि किछु साहित्यिक संचालक लोकनि समावेशीक वर्तमान रुपान्तरण मे साझाकें मात्र नेपालीक घेरामे राखब उचित नहि, कहि उदारता देखा रहलाह अछि । परिणाम दूर तं अछि मुदा पहुंचसं ततेक दुरो नहि । साझाक पत्रिका ‘गरिमा’ एखन नेपालसं, प्रकाशित साहित्यक पत्रिकामे अग्रणी रखैत अछि । ओकरो समावेशी स्वरुपमे लाओल जा रहल अछि । लेखकीय घेराकें तोडैत मधेशक लेखक लोकनि द्वारा मैथिली, भोजपुरी, अवधी, थारु आदि साहित्य सम्वन्धी आलेख प्रकाशन प्रारंभ भ’ चुकल अछि, आहवान कएल जा रहल अछि । एकर अतिरिक्त निजी क्षेत्रक पत्र–पत्रिकामे समावेशी रचना सभक उपस्थापन कमजोर अछि । रचना’, ‘अभिव्यक्ति’, शारदा’ ‘मिर्मिरे,’ ‘नेपाल’ लगायतक पत्र–पत्रिका सभमे नियमित रुपमे भाषान्तरक रचना, साहित्यक समीक्षा समालोचना, अनुवाद, मौलिक आदि प्रकाशित होइत रहबाक चाही । एहि सम्वन्धमे उक्त पत्र–पत्रिका द्वारा प्रयास कएल गेल हो से हमरा ज्ञात नहि अछि । एहि तरहें देखलापर स्पष्ट रुपें देखि पडैछ जे राजनीतिए जकां भाषा, साहित्य किंवा संचारक क्षेत्रमे मधेशी उपेक्षित रहल अछि । ओ राज्य द्वारा तं सभसं बेसी अछिए, निजी क्षेत्र द्वारा सेहो कम अबडेरल नहि गेल अछि । परिणाम छैक मैथिलीभाषा, साहित्यमे विभिन्न विधा आ धाराक गतिविधि चरम पर होइतो नेपाली संसार ताहिसं अनभिज्ञ अछि आ समकालीन साहित्य यात्राक उपलव्धि अपने धरि सिमित भ’ क’ रहि गेल अछि । तहिना संचारक्षेत्र एतेक आगां बढि गेल अछि, मुदा एहि क्षेत्रमे अपन योग्यता, क्षमता प्रदर्शित क’ सकबाक अवसर कोनो ‘ज्ञानी’ मधेशी पाबि नहि रहलाह अछि । ई व्यक्तिक मात्रे नहि राष्ट्रकें क्षति सेहो भ’ रहलैक अछि । आ तए“ राष्ट्रियताक सूत्र कहियोकाल ढील पडैत वूझि पडैत छैक । आबो समावेशी नहि त फेर कहिया !!! कमलानन्द झा,हिन्दी विभाग,सी.एम. कॉलेज,दरभंगा मैथिली समस्याक टोह लैत कथा-संकलन : उदाहरण उदाहरण पुस्तकक नाम - उदाहरण सम्पादक - देवशंकर नवीन प्रकाशक - प्रकाशन विभाग सूचना और प्रसारण मन्त्राालय भारत सरकार पृष्ठ - २७४ मूल्य - २०० टाका मात्रा पछिला चारि बर्खमे कोनो पैघ आ महत्वपूर्ण प्रकाशनसँ मैथिलीक तीन गोट कथा-संकलनक प्रकाशन मैथिली भाषा लेल एकटा शुभ-संकेत मानल जा सकै'छ। नेशनल बुक ट्रस्टसँ प्रकाशित शिवशंकर श्रीनिवास द्वारा सम्पादित मैथिली कथा संचयन(सन् २००५) आ सन् २००७मे तारानन्द वियोगी द्वारा सम्पादित देसिल बयना(सन् २००७) पाठकक बीच लोकप्रिय भ'ए रहल छल कि प्रकाशन विभागसँ देवशंकर नवीन द्वारा सम्पादित टटका मैथिली कथा-संग्रह उदाहरण छपि क' आबि गेल। प्रसन्नताक बात थिक जे उदाहरणक प्रकाशनसँ प्रकाशन विभागमे साहित्यिक रचनाक प्रकाशनक बाट फूजल, जे स्वागत योग्य अछि। उदाहरणमे ललितसँ सियाराम सरस धरिकक कुल छत्तीस गोट कथा संकलित अछि। एहि संकलनसँ मैथिली कथा-संसारक परिदृश्य स्पष्ट होइत अछि। संकलनक कतोक कथा समस्त भारतीय भाषासँ कान्ही मिलान लेल तत्पर अछि, जे संकलनकर्त्ताक चयनकौशलक सूचक थिक। श्रेष्ठ कथाकार राजकमल चौधरीक कथा ÷एकटा चम्पाकली एकटा विषधर' घाघ मैथिल समाजक टोप-टहंकारकें अद्भुत रूपें अनावृत्त करैत अछि। सवर्ण मैथिलक गरीबी, ओहि गरीबीसँ उत्पन्न दयनीयता, आ तकर खोलमे दुबकल बेटीक शातिर माइ-बापक घिनौन आचरण घनघोर तनावक संग पाठककें झकझोरैत अछि। दशरथ झा आ हुनकर घरबाली अपन तेरह बर्खक बेटी चम्पाक विवाह बासैठ बर्खक वृद्ध शशि बाबू संग करेबाक षड्यंत्रापूर्ण योजना बनबैत अछि। दुनू प्राणीक गिद्ध दृष्टि शशि बाबूक सम्पति पर टिकल छनि, जकर मलिकाइन विवाहोपरान्त हुनक तेरह वर्षीया चम्पा बनैबाली छनि। अतिशयोक्ति सन लगैबला एहि घटनाक मर्मकें ओएह बूझि सकत जे मिथिलांचलक बहुविवाह प्रथासँ नीक जकाँ परिचित छथि। बीसम-एकैसम विवाहक बाद पति अपन पूर्व पत्नी सभक मुँहो बिसरि जाइ छलाह। पत्राकारिता दुनियाक महत्वपूर्ण आ सम्वेदनशील पक्षसँ मायानन्द मिश्रक कथा ÷भए प्रकट कृपाला' साक्षात्कार करबैत अछि। मीडिया-तन्त्रा पर बनल सार्थक हिन्दी सिनेमा ÷पेज थ्री' जे किओ देखने छथि, से एहि कथाक मर्मकें बेसी नीक जकाँ बुझि सकै छथि। शीघ्रतासँ नामी पत्राकार बनि जाएबाक हड़बड़ीकें कथामे कलात्मक ढंगसँ एकेरल गेल अछि। कॉरपोरेट दुनियाँक बादशाह श्याम बोगलाक मृत्युक खबरि सबसँ पहिने देबाक होड़ लागल अछि। पत्राकार लोकनिक नजरिमे ओएह सभसँ पैघ खबर अछि, दुनियामे किछु भ' जाउ। लिलीरे मैथिलीक सशक्त कथालेखिक छथि। हुनकर कथा ÷विधिक विधान'मे कामकाजी स्त्राीक संघर्षकें यथार्थतः देखबाक, आ यथार्थक मर्मकें कलात्मक कौंध संग उभारबाक सफल चेष्टा अछि। उषाकिरण खान अपन कथा ÷त्यागपत्रा'मे ग्रामीण युवतीक अदम्य जिजीविषाकें व्यक्त करबामे पूर्ण सफल नहि भ' सकलीह। घोर आदर्शवादी आ कठोर अनुशासित परिवारमे पालित-पोषित चम्पा कॉलेजमे पढ़' चाहैत अछि, अपन मर्जीसँ विवाह कर' चाहैत अछि। मुदा आजीवन विवाह नहि करबाक घोषणा करैत चम्पा स्वयंकें ओही परंपराक केंचुलमे समेटि लैत अछि। चम्पा विवाहक लक्ष्मण रेखा पार करैत ÷और भी ग़म हैं' कें आधार मानि अपन व्यक्तित्वकें विस्तृत आयाम नहि द' पबैत अछि। मनमोहन झाक कया ÷फयदा'मे स्त्राी जातिक मोलभाव बला प्रवृत्तिक रेखांकन खूब जमल अछि, मुदा वो एहि प्रवृत्तिक वर्णन क' स्त्राी जाति कोन पक्षक उद्घाटन करै छथि, से बूझब कठिन। कोनो व्यक्तिक स्वभावमे नीक आ खराब दूनू भाव रहैत अछि। कथाक हेतु कोन तरहक भावक चुनाव कयल जाए, ई महत्वपूर्ण अछि। इएह चुनाव मैथिली कथामे स्त्राी चेतनाक दर्शन करा सकैत अछि। स्त्राी चेतनाक दृष्टिएं प्रदीप बिहारीक कथा ÷मकड़ी' अपेक्षाकृत मेच्योर्ड आ बोल्ड कथा कहल जा सकैछ। बेराबेरी कथानायिका सुनीता दू बेर विवाह करैत अछि, दुनू बेर ओकर पति मरि जाइछ, मुदा ओ जिनगीसँ हारि नहि मानैत अछि। सिलाई मशीन चला क' ओ गुजर-बसर करैत अछि। एतबे नहि, ओ एकटा अनाथ आ बौक बच्चाक लालन-पालनक दायित्व ल' क' अपन व्यक्तित्वकें विस्तार दैत अछि। कथामे मोड़ तखन अबैत अछि जखन ओ बौका समर्थ भेला पर सुनीताक स्वीकृतियेसँ सही, ओकरा गर्भाधान क' क' भागि जाइत अछि। सुनीताकें एहि बातक अपराधबोध नहि छै, जे ओ बौका संग किऐ ई कृत्य केलक, ओ देहक विवशतासँ परिचित अछि, मुदा बौकाक भागि जेबाक दंश ओकरा व्यथित करै छै। देवशंकर नवीनक कथा ÷पेंपी' पति-पत्नीक सम्बन्ध विच्छेदक परिणामस्वरूप बेटीक मनोमस्तिष्क आ व्यक्तित्व पर पड़ैबला कुप्रभाव आ बेहिसाब उपेक्षाभावकें करुणापूर्ण ढंगसँ व्यक्त करैत अछि। मुदा एहिमे सभटा दोष स्त्राी पर फेकि देब पूर्वाग्रह मानल जा सकैछ। ई सामाजिक सत्य नहि भ' सकैत अछि। वरिष्ठ कथाकार राजमोहन झा अत्यंत कुशलतापूर्वक ÷भोजन' कथाक बहन्ने स्त्राीक बाहर काज करबाक विरोध क' जाइत छथि। राजमोहनजीक दक्षता इएह छन्हि जे ई सभ बात कहिओ क' ओ प्रगतिशील बनल रहै छथि। राजकमल चौधरीक ÷एकटा चम्पाकली एकटा विषधर', धूमकेतुक ÷भरदुतिया', गंगेश गुंजनक ÷अपन समांग'(ई कथा देसिल बयनामे सेहो संकलित अछि), तारानन्द वियोगीक ÷पन्द्रह अगस्त सन्तानबे' आ अशोकक ÷तानपूरा' एहि संग्रहक श्रेष्ठ कथा मानल जा सकैछ। धूमकेतुक कथा ÷भरदुतिया' व्यक्ति स्वार्थ हेतु भाई-बहिनक पावन पाबनिक दुरुपयोग करबैत देखबैत अछि। आजुक मनुख अहू पाबनिकें नहि छोड़लक। ÷पन्द्रह अगस्त सन्तानबे' वियोगीक सफल राजनीतिक कथा कहल जा सकैछ। कथाक ई निष्पति एकदम ठीक लगैत अछि जे सवर्णक पार्टी एहि दुआरे जीतैत रहल जे निम्नजातिक आर्थिक स्थित बहुत खराब छल। स्वामीक पार्टी दासोक पार्टी होइछ। दोसर पार्टीक मादे सोचब मृत्युकें आमन्त्राण देब छल। आओर नइं किछु त' आवास आ रोजगार छीनि बेलल्ला बना देब उच्चवर्गक हेतु बाम हाथक काज छल। दिल्ली-पंजाब प्रवासँ निम्नवर्गक आर्थिक, सामाजिक स्थितिमे सुधार भेल। परिणामस्वरूप ओहि वर्गमे आत्मसम्मान आ राजनीतिक चेतनाक अंकुरण भेल। भक्तिकाव्यक उन्मेष आ ओहिमे निम्नजातिक कविक बाहुल्यक पृष्ठभूमिमे सुप्रसिद्ध इतिहाकार इरफमान हबीब मुगलकालीन विकास कार्यकें लक्षित केलनि अछि। ÷पन्द्रह अगस्त सन्तानबे' कथाक विलक्षणता बिहारमे बनल निम्नजातिक पार्टीक आत्मालोचन थिक। कहबा लेल त' ई पार्टी निम्नजातिक-निम्नवर्गक छल, मुदा अइ पार्टीमे छल, प्रपंच, भ्रष्टाचार, अपराध आओर पाखण्ड पहिनहुँसँ तेजगर और धारदार भ' गेल छल। कथाकारक इएह द्वन्द्व कथाकें गरिमा प्रदान करैछ। चाहक दोकान चलबैबला मुदा बहुत प्रारम्भहिसँ सक्रिय मूल्यपरक राजनीति करैबला हीरा महतोक धैर्य जखन संग छोड़ि दै छनि त' ओ पार्टी प्रमुख बासुदेव महतो पर बिफरैत कहै छथि-- रे निर्लज्जा, एतबो सरम कर! जे कुकर्म करै छैं से अपन करैत रह, लेकिन एना समाजमे नइं कहिए जे कुकर्मे करब ठीक छिऐ। एतबो रहम कर बहिं...।'' अशोकक कथा ÷तानपूरा' मध्यवर्गीय हिप्पोक्रेसीक घटाटोपकें तार-तार क' देबामे पूर्ण सफल भेल अछि। बिना कोनो उपदेश आ नैतिक आग्रहक कथा मध्यवर्गीय कुत्सित मानसिकताक दुर्ग भेदन करैत अछि। कथानायक विनोद बाबूक संगीत-प्रेमकें हुनक पिता घोर अभाव आ द्ररिद््रयक बीच जेना-तेना पूरा करैत छथि, मुदा जखन विनोद बाबूक पुत्रा संगीत सिखबाक इच्छा प्रकट करै छनि त' दुनू प्राणीकें साँप सूँघि जाइत छनि। एहि दुआरे नहि, जे हुनका कोनो तरहक अभाव छनि। बल्कि एहि दुआरे जे संगीतक स'ख हुनक बेटाकें रुपैया कमबैबला मशीन नहि बना सकत। जे दम्पति कोनो विषय पर कहियो एकमत नहि भेल, एहि विषय पर एकमत भ' पुत्राक एहि अव्यावहारिक स'ख'क केठ मोंकबाक साजिशपूर्ण योजना बनबए लगै छथि। संग्रहक किछु कथा जेना अवकाश, अयना, खान साहेब, जंगलक हरीन आदि यथार्थक मोहमे शुष्क गद्य बनि क' रहि गेल अछि। एहिमे किछु कथा ततेक सरलीकृत भ' गेल अछि जे ओ नवसाक्षर हेतु लिखल कथा बुझि पडै+छ। एहन कथा सभक मूल संरचना इतिवृत्तात्मक अछि। यद्यपि इतिवृत्त कोनो कथाक सीमा नहि होइछ, मुदा जखन कोनो कथा घटनाक स्थूल आ तथ्यात्मक विवरण टा दैछ, कथामे समय वा क्षणक मर्म नहि आबि पबैछ, त' एहन इतिवृत्त निपट गद्य बनि क' रहि जाइछ। यथार्थ कोनो कथाकें विश्वसनीयता देबाक बदलामे ओकरा भीतरसँ संवेदना निचोड़ि अनैत अछि, कथाकें प्रमाणिक बनेबाक फेरमे पड़ल नहि रहैत अछि। कथाकार रमेश अपन कथा ÷नागदेसमे अयनाक व्यवसाय'मे अतियथार्थ आ इतिवृत्तक फ्रेमकें तोड़ि प्रतीक वा फैंटेसीक प्रयोगसँ कथा बुनबाक प्रयास त' केलनि, मुदा कथाक विन्यासमे एकरसता आबि गेल। एहि फ्रेम हेतु हमरा लोकनिकें राजस्थानी कथाकार विजयदान देथा(दुविधा) आ हिन्दी कथाकार उदय प्रकाश (वारेन हेस्टिंग्स का सांढ़) आदिकें पढ़बाक चाही। हिनका लोकनिक कथा यथार्थक फ्रेमकें तोड़ियो क' यथार्थ बनल रहल अछि। मैथिलीमे प्रकाशित उक्त तीनूँ कथा संकलनसँ मैथिली कथाक प्रसार राष्ट्रीय स्तर पर भ' रहल अछि, एहिमे दू मत नहि। मुदा उक्त संकलनकें पढ़ि आम पाठकक राय इएह बनत जे मैथिलीमे कुल इएह तीस-चालीस गोट कथाकार आइ तक भेलाहे। कारण तीनूँ संग्रहमे कथाकारक सूचीमे अद्भुत साम्य अछि। कथा पढ़ि बुझना जाइछ जे कथा चयनमे कथाक अपेक्षा कथाकारकें महत्व देल गेल अदि। ई कहब सर्वथा अनुचित जे संकलनक कथाकार महत्वपूर्ण नहि छथि, मुदा अन्य श्रेष्ठ कथाकें सेहो प्रकाशमे अएबाक प्रयास हेबाक चाही। हमरा लोकनि ई नीक जकाँ जनै छी जे मैथिलीमे श्रेष्ठ कथाक अभाव नहि अछि। किन्तु प्रकाशनक अभावमे पत्रा-पत्रिाकाकें छानि मारब कठिनाहे नहि समय-साध्य कार्य थिक। वैद्यनाथ मिश्र यात्राीक पहिचान भने श्रेष्ठ कविक रूपमे छनि, मुदा हुनकर मैथिली कथा ÷चितकबड़ी इजोरिया' आ ÷रूपांतर' कतोक दृष्टिएं महत्वपूर्ण अछि। रेणुजी सेहो मैथिली कथा लिखलनि अछि। ई दीगर बात थिक जे बादमे ओ हिन्दिए टामे लिखए लगलाह। ÷नेपथ्य अभिनेता' आ ÷जहां पमन को गमन नहीं' आदि लीकसँ हटि क' लिखल गेल कथा थिक। ÷उदाहरण'मे कथाक प्रकाशन वर्ष आ सन्दर्भक अनुपस्थिति खटकैत अछि। समय-सीमा जनने बिना कोनो कथाक सम्यक मूल्यांकन सम्भव नहि। नवीनजी सदृश दक्ष आ अनुभवी सम्पादकसँ ई आशा नहि कएल जा सकै छल। एहि कमीकें पूरा करैत अछि हुनकर चौदह पृष्ठीय भूमिका। सम्पादक मैथिली कथाक सीमा आ सम्भावनाक विस्तृत पड़ताल अपन एहि भूमिकामे केलनि अछि। मैथिली कथाक इतिहासकें बुझबा लेल ई भूमिका निश्चित रूपें रेखांकन योग्य अछि। डॉ पालन झा , ग्राम-हरौली, कुशेश्वरस्थान। एम. ए. ( मैथिली ), सन्त साहेब रामदास पर डॉ दुर्गानाथ झा ’श्रीश’ केर निर्देशनमे पी.एच.डी.। संप्रति बी. डी. जे. कॉलेज, गढ़बनैलीमे मैथिली विभागाध्यक्ष। सन्त साहेब रामदास साम्प्रदायिक अर्थें मैथिली साहित्यमे सन्त कविक रूपमे साहेब रामदासक प्रमुख स्थान अछि। पचाढ़ी स्थानक महंथ बंशीदासजीक सानिध्यमे कवीश्वर चन्दा झा हिनक पदावलीक संकलन कए १९०१ ई. मे प्रकाशित कएने छथि। एहि पदावलीमे परिचयक क्रममे कवीश्वर चन्दा झा लिखैत छथि: “शिवलोचन मुख शिव सन जखन, साहेब रामदास तिथि तखन। प्रबल नरेन्द्र सिंह मिथिलेश, शासित छल भल तिर्हुत देश॥“ अर्थात् ११५३ साल (१७४६ ई.) मध्य महाराज नरेन्द्र सिंहक राज्यकालमे ई रहथि। छादनसँ न्याय-तत्त्व-चिन्तामणि कर्ता गंगेश उपाध्याय वंश कुलोद्भव साहेब रामदास “कुसुमौल” ग्रामक ( जरैल परगना, जिला- मधुबनी ) एक मैथिल ब्राह्मण छलाह।हिनक छोट भाइक नाम कुनाराम ओऽ एकमात्र प्राणसमप्रिय पुत्र ’प्रीतम’ छलनि। हिनक पूरानाम साहेब राम झा छलनि, मुदा अन्य सन्त कवि जकाँ ईहो अपन नामक आगाँ भक्ति-भावनासँ ’दास’ शब्द जोड़ि लेलनि। साहेब रामदासक पदावलीमे लगभग ४७८ टा पद संकलित अछि। एहि कविता मध्य ई अपन नाम साहेबराम, साहेबदास, साहेब, साहेबजन सेहो रखने छथि। साहेब रामदास आरम्भहिसँ भक्ति-प्रवण विचारक लोक छलाह। ई सदिखन ईश्वरहिक ध्यान-चिन्तनमे लीन रहैत छलाह। सन्यास ई बादमे ग्रहण कएलनि। एहि पाछाँ एकटा दुखद घटना घटित भेल- हिनका एकमात्र पुत्र ’प्रीतम’ छलनि। ओऽ अधिक समय दुखित रहए लगलाह। उवावस्था छलनि। एकबेर प्रीतम अधिक दुखित भए गेल छलाह। हिनक जीवनक अन्तिम कालक भान भए जएबाक कारणेँ साहेबरामदासविकल भए कानए लगलाह। मरण शय्या पर रहितहुँ प्रीतमकेँ एहन दुःखद दृश्य देखि नहि रहल गेलनि आऽ ओऽ अपन पितासँ पुछैत छथिन, “बाबूजी! अपने एतेक विकल किएक भए रहल छी? पिता उत्तर दैत छथिन “पुत्रक आवश्यकता एहि चतुर्थ अवस्थामे होइत छैक, से तँ अपने हमरा पहिने छोड़ि कए जाए रहल छी, तैँ ई सोचि-सोचि खिन्न चित्त भए व्याकुल भए रहल छी”। पुत्र प्रीतम प्रत्युत्तर दैत कहैत छथिन, “ई संसार असार थिक, क्षणभंगुर थिक, एहिमे स्त्री-पुत्र-पुत्री केओ अपन नहि थिक, ई सभटा अनित्य थिक, माया-मोह थिक। सभटा स्वार्थमूलक थिक तेँ एहि सभसँ माया-मोह रखनाइ अनुचित थिक। हम तँ अपनेक भगवन्-भजनमे विघ्न मात्र छलहुँ, आब अपने निर्विघ्नपूर्वक भगवन्-भजनमे लागि जाऊ”। एतेक बात कहैत देरी प्रीतमक प्राण-पखेरू उड़ि गेलनि। साहेब रामदास विकल भए कानि-कानि कए गाबए लगलाह- “प्रीतम प्रीति तेजि भेल परदेसिआ हो” साहेब रामदासकेँ प्रीतमक देहावसानसँ बड़ आघात लगलनि, प्रीतमक उपदेशकेँ धारण कए परिवार-समाजकेँ तिलाञ्जलि दए सन्यास ग्रहण कए लेलनि। पुत्र-वियोगक कारणेँ ई पक्का बैरागी भए गेलाह। गामसँ बाहर भए जंगले-जंगल एकान्तमे वास कए भजन-कीर्तन करए लगलाह। गामक लोकसभ बहुत दिन धरि पाछाँ कएलकनि जे अपने घुरि जाऊ, हमहु सभ अपनेक पुत्रक समान छी, अपनेकेँ कोनो कष्ट नै होएत। मुदा साहेब रामदास पर तकर कोनो प्रभाव नहि पड़लनि, उनटे जतए लोकक आवागमन देखथिन्ह, स्थानकेँ बदलि पुनः निर्जनस्थानमे चलि जाइत छलाह। लोकसभ किछु दिन धरि पाछाँ तँ केलकनि, मुदा अन्तमे हरि-थाकि कए जे ई आब पक्का बैरागी भए गेल छथि, तेँ हिनका आब तंग नहि कएल जाए, विचारि कए पाछाँ करब छोड़ि देलकनि। बैरागी भेलाक बाद ई देशक बहुतो भागमे भ्रमण कएलनि। भजन-कीर्तनक संग योग-साधनामे सेहो लीन भए गेलाह। योग-साधनामे सिद्धि प्राप्त कएलाक पश्चात् केओटीक निवासी बलिरामदासजीसँ दीक्षा ग्रहण कएलनि। दीक्षा ग्रहण कएलाक पश्चातो ई अनेक धर्म स्थानक भ्रमण करैत रहलाह। कहल जाइत अछि जे साहेबरामदास दण्ड-प्रणाम करैत-करैत जगन्नाथपुरी तक गेलाह। बाटमे बड़ कष्ट सहए पड़लनि, घाओ भए गेलनि, घाओमे पीब आबि गेलनि, मुदा दण्ड-प्रणाम ओऽ नहि छोड़लनि। दण्ड-प्रणाम करैत-करैत जगन्नाथपुरी तक गेलाह। जकर प्रमाण हुनकहि एक कवितासँ भेटैत अछि- साधुके संगत धरि गुरुक चरण धरि, आहे सजनी हमहु जाएब जगरनाथहि रेकी। नहि केओ अन्नदाता संग नहि सहोदर भ्राता, आहे सजनी माँगि भीखि दिवस गमाएब रे की। सभ जग भेल भाला गुरुआ अठारह नाला, आहे सजनी ओहिठाम केओ नहि छोड़ाओल रे की। सिंह दरबाजा देखि मन मोर लुबधल, आहे सजनी ओहिठाम पंडा पंडा बेंत बजारल रे की। साहेब जे गुनि धुनि बैसलहुँ सिर धुनि, आहे सजनी जगत जीवन निअराएल रे की। गुरु बलिरामदास मुरिया रामपुरक एक महात्मा शिष्य छलाह तथा अपन गाम केओटा (केओटी)क घनघोर जंगलमे योग साधना करैत छलाह। ई योग साधनामे निष्णात् छलाह। कहल जाइत अछि जे गुरुक बिना वास्तविक ज्ञान असम्भव अछि आऽ तेँ साहेबरामदास एक योग्य गुरुसँ दीक्षा लए, योग-साधनामे सिद्धि प्राप्त कए लेलनि। योग क्रिया पर सिद्धि प्राप्त कए लेलाक बाद जन्म-मरणसँ छुटकारा पाबि जेबाक पूर्ण विश्वास भए गेलनि, से गुरुक प्रसादहिसँ। मोक्ष प्राप्तिमे आब कोनो सन्देह नहि रहि गेलनि, जे जीवनक चरम लक्ष्य थिक। बलिरामदास हिनक दीक्षा गुरु छलथिन, तकर प्रमाण हिनकहि एक कवितासँ भेटैछ- “गुरु बलिराम चरण धरि माथे, साहेब हरि अपनाया है। अब तौ जरा-मरण छुटि जैहे, संशय सकल मेटाया है”। कृष्णक ई अनन्य भक्त छलाह। जगन्नाथपुरीक यात्राक क्रममे बाटहिमे हिनका स्वयं भगवान श्री कृष्ण दर्शन देने छलथिन। आब तँ ई कृष्णक ध्यानमे दिन-राति लागल रहैत छलाह। समाधिस्थ कालमे तँ दुनियाँक कोनो वस्तुक ध्यान नहि रहैत छलनि, ध्यान रहैत छलनि तँ एक मात्र भगवान श्री कृष्ण। जन-श्रुति तँ ईहो अछि जे भगवानक भजनक कालमे जखन ई नाच करैत छलाह तँ स्वयं भगवान श्री कृष्ण सेहो उपस्थित भए संग दैत छलथिन। साहेब रामदास अनेक तीर्थ-स्थलक दर्शन कएलनि। सांसारिक मोह-मायाकेँ त्यागि वैरागी भए गेलाह, मुदा मिथिला भूमिकेँ नहि त्यागि सकलाह। एक पदमे ओऽ लिखैत छथि, “मिथिला नगरी तोर दान बिनु साहेब होइछ बेहाल” तथा दोसर पदमे “साहेब करुणा करए शीश धुनि मिथिला होइछ अन्धेरि”। एहि पद सभसँ मिथिलाक प्रति हुनक प्रेमक सहज अनुमान लगाओल जाए सकैत अछि। धन्य ई मिथिला भूमि ओऽ धन्य महात्मा साहेब रामदास। पहिने कहि चुकल छी जे ई जंगलमे एकान्त वास कए भजन-कीर्तन कएल करथि। जतए-जतए ई जाथि ताहि-ताहि ठाम ई अपन खन्ती गारि कुटियाक निर्माण कए एक पाकड़िक गाछ अवश्य रोपि दैत छलाह। हिनक अनेक जगह पर योगमढ़ी छल आऽ सबहि ठाम ई पाकड़िक गाछ अवश्य रोपि दैत छलाह। हिनक अन्तिम योगमढ़ी दरभंगा जिलाक ’पचाढ़ी’ गाममे अछि, जे पूर्वमे बूढ़वनक नामे विख्यात छल। एहू ठाम पाकड़िक गाछ रोपने छलाह, जे अद्यावधि वर्तमान अछि। पल्लवित एहि गाछक शोध मानवशास्त्री लोकनि एखनहु कए रहल छथि। कमलाक तट पर स्थित पचाढ़ी गामक वन आऽ वृन्दावनक तुलना करब कठिन भए जाइत छल। वृन्दावनसँ एको रत्ती कम शोभा पचाढ़ी (बूढ़वनक) नहि छल। मोरक नाच, सुगाक गान, नाना प्रकारक वन्यजीव प्राणीक निर्भय विचरण करब, भिन्न-भिन्न लता-पुष्पसँ शोभित वनक दृश्य लोककेँ सहजहि आकृष्ट कए लैत छल। एहि स्थानक प्रशंसामे कवीश्वर चन्दा झा लिखैत छथि— “पाकड़ि वृक्ष सएह कमला तट जएह भजन कुटी विश्राम। चन्द्र सुकवि मन धरम परमधन धन्य पचाढ़ी ग्राम”॥ पचाढ़ी स्थानक शोभा आब नहि रहि सकल, जे पहिने एक निर्जन स्थान छल, ताहि ठाम आब ग्राम अछि, खेती-पथारी कएल जाइत अछि। वनक तँ आब निशानो नहि रहि गेल अछि, तथापि साहेब रामदासजीक समाधि-स्थलक चारूकात मन्दिर सेहो एक-दू नहि छओ-सातटा अछि। सभमे भोग-रागक व्यवस्था, पुजेगरीक संग-संग सहायकक व्यवस्था सभ मन्दिरमे फराक-फराक अछि। लगभग पाँच कट्ठा जमीनमे फुलबारी अछि। आगत-अतिथिक स्वागत यथासाध्य एखनहु कएल जाइत अछि। साहेब रामदासक नाम पर एकटा संस्कृत महाविद्यालय अछि, जाहिमे निर्धन छात्रकेँ स्थान दिससँ रहबाक व्यवस्था ओ मुफ्त भोजनक व्यवस्था कएल जाइत अछि। पचाढ़ीस्थान मिथिलाक वैभवशाली स्थानमेसँ सर्वप्रमुख अछि। एकर वैभवशालीक पाछाँ राजदरभंगाक महत्वपूर्ण योगदान अछि। तत्कालीन दरभंगा मिथिलेश नरेन्द्रसिंह निःसन्तान छलाह। हुनक पत्नी रानी पद्मावती अतिथि-सत्कार, पूजा-पाठक निमित्त ३०० (तीन सए) बीघा जमीन पचाढ़ी स्थानकेँ दानस्वरूप देने छलथिन। मुदा कहल जाइत अछि जे साहेब रामदास ओहि जमीनक दान-पत्रकेँ प्रज्वलित अग्निमे फेकि देलखिन। शिष्य लोकनिकेँ भिक्षाटन वृत्तिसँ आगत-अतिथिक सेवा सत्कार करए पड़ैत छलनि, जाहिसँ ओ लोकनि तंग आबि गेलाह आऽ फलस्वरूप ओऽ दान-पत्र पुनः महारानीसँ प्राप्त कए चुप-चाप राखि लेलनि, जे एखनहु धरि सम्पत्तिक रूपमे विद्यमान अछि। किछु जमीन भक्त लोकनि वेतियामे सेहो देने छथि। योग्य शिष्य सभ एहि सम्पत्तिकेँ बढ़ाए लगभग हजार बीघा बनाए देलनि। सरकार किछु जमीनपर सिलिंग लगाए देलक, मुदा व्यवस्थापक लोकनि अधिकांश जमीनकेँ वन-विभागकेँ दए गाछ-वृक्ष लगवाए देलनि। अपेक्षाकृत एखनहु ई स्थान समृद्ध अछि। साहेबरामदास एक सिद्ध पुरुष छलाह आऽ तेँ हिनकामे चमत्कारिक गुण स्वाभाविक अछि। चमत्कारसँ सम्बन्धित अनेक कथा हिनकासँ जुड़ल अछि, जाहिमे एक चमत्कारक उल्लेख करब हम उचित बुझैत छी, जे हिनक अन्तः साक्ष्यसँ जुड़ल अछि। राजा नरेन्द्र सिंहक समयमे पटनाक कोनो मुसलमान नवाब मिथिलापर आक्रमण कए देलक। राजा नरेन्द्र सिंहक सेना ओ नवाबक सेनाक बीच घोर संग्राम भेल, जाहिमे अपार धन-जनक क्षति भेल छल, मुदा राजा नरेन्द्र सिंह ओहिमे स्वयं वीरतापूर्वक युद्ध कएलनि आऽ शत्रु सेनाकेँ पराजित कएल। ओहि समयमे महात्मा साहेब रामदास नरेन्द्र सिंहक विजयी होएबाक कामना स्वरूप श्रीकृष्णसँ प्रार्थना कएलनि- “साहेब गिरधर हरहु नरेन्द्र दुःख, करहु सुखित मिथिलेशहि रे की”। एहिपर क्रुद्ध भए नवाब हिनका बन्दी बनाए पटनाक कारागारमे बन्द कए देलनि। साहेब रामदास योगबलेँ सभ दिन गंगा-स्नान, संध्या-तर्पण, पूजा-पाठ आदि गंगहि तटपर कएल करथि। कारागारमे रहितहुँ ई क्रम हिनक निरन्तर चलैत रहलनि। लोक सभ हिनका गंगा तटपर सभ दिन देखैत छलनि। नवाबकेँ कोना ने कोना एहि बातक जानकारी भेट गेलनि। नवाबकेँ तँ विश्वास नहि भेलनि तथापि हुनका अपन कर्मचारी सभपर संदेह भेलनि आऽ ओऽ अपनेसँ कारागारमे ताला लगाए देलनि। तथापि साहेब रामदासक गंगा-स्नानक क्रम नहि टुटलनि। अन्तमे नवाब साहेबरामदासक पएरमे बेड़ी बान्हि कारागारमे ताला लगाए देलनि। साहेबरामदास तत्क्षणहि करुणाद्र भए अपन आराध्य देव श्री कृष्णकेँ पुकारलनि- “अब न चाहिए अति देर प्रभुजी, अब न चाहिए अति देर। विप्र-धेनु-महि विकल सन्त जन, लियो है असुरगण घेरि”। गविते छलाह की पएरक बेड़ी ओ फाटकक ताला आदि सभ टूटिकए खसि पड़ल। नवाब आश्चर्य चकित भए गेल। ओ महात्माजीक पएरपर खसि पड़ल। साहेबरामदाससँ क्षमा माँगलक आऽ बादमे ससम्मान स्वागत कए मिथिला पहुँचाए देल। एहि तरहक कएक गोट चमत्कार अछि, जेना राजा राघव सिंहक समयमे राजदरभंगामे प्रेत-बाधाकेँ शान्त करब, माटिक भीतकेँ हाँकब। कृष्णाष्टमी, जन्माष्टमी आदि उत्सवक अवसरपर अधिक साधु-सन्तक भीड़ जुटलाक बादो थोड़बहु सामग्रीमे भोजनक अवसरपर भण्डारामे कोनो कमी नहि होएब आदि कतोक चमत्कारिक घटना सभ अछि, जे हिनकासँ जुड़ल अछि। एहि सिद्ध पुरुषक चमत्कारिक घटनासभसँ लोकक हिनका प्रति कतेक श्रद्धा छल से सहजहि अनुमान कएल जाए सकैत अछि। साहेबरामदास वैरागी वैष्णव-भक्त-कवि छलाह। पदक रचना करब हिनक साधन छल मुदा साध्य तँ एकमात्र छल भगवान विष्णुक भजन-कीर्तन करब। कहल जाइत अछि जे ओऽ अपनहि पदक रचना कए सभ दिन भगवानक भजन-कीर्तन कएल करथि। ओऽ भक्तिमार्गी छलाह आऽ तेँ भक्ति-मार्गक सिद्धांतक अनुरूप पदक रचना कएल करथि। भक्ति मार्गक सभ रसक पदरूपमे रचना कएलनि, मुदा प्रधान रस “मधुरं” रस सएह अछि। भगवानक कोनो एक रूपक ओऽ आग्रही नहि, सगुण-निर्गुण दुनू रूपमे मानैत छलाह, जे अपन मनोगत भाव कवितामध्य व्यक्त कएने छथि। “निर्गुण सगुण पुरुष भगवान, बुझि कहु साहेब धरइछ ध्यान”। “धैरज धरिअ मिलत तोर कन्त, साहेब ओ प्रभु पुरुष अनन्त”। साहेब रामदासक यद्यपि एकमात्र पदावली उपलब्ध अछि, जाहिमे ४७८ टा पद संकलित अछि। मुदा ईएह पदावली हुनक यशकेँ अक्षुण्ण बनाए रखबामे सभ तरहेँ समर्थ अछि। भक्तिक प्रायः सभ विषयपर पदक रचना कएने छथि, यथा- कृष्ण-जन्म, वात्सल्य, वंशीवादन, संयोग-श्रृंगार, रास-लीला, झुलोत्सव आदि। रासलीला परक जेहन पद सभक ई रचना कएने छथि से प्रायः मैथिलीमे आन केओ कवि नहि कएने छथि। हिनक रास-लीला परक पदक विवेचन स्वतंत्र रूपेँ कएल जाए सकैत अछि। कृष्ण-प्रेमक अनन्यता, भक्ति प्रवणता ओ प्रसाद गुण हिनक काव्यक मुख्य गुण कहल जाए सकैत अछि। ऋतुगीत, दिन-रातिक भिन्न-भिन्न समयोपयोगी पदक रचना, जेना-प्राती, सारंग, ललित, विहाग आदिक रचना कएल करथि। मिथिला पञ्चदेवोपासक सभ दिनसँ रहल अछि। साहेब रामदासक रचनामे सेहो भक्तिक विविध-रूपक दर्शन होइत अछि। कृष्णक तँ ई अनन्य भक्त छलाह मुदा आनो-आन देवी-देवता परक पदक रचना कएने छथि। हिनक हनुमानक फागु परक कविता देखल जाए सकैत अछि। एकरा सन्त लोकनिक फागु सेहो कहल जाए सकैछ- “प्रवल अनिल कपि कौतुक साजल लंका कएल प्रयाण। कनक अटारी कए असवारी छाड़थि अगनिक वाण॥ जरए लंक कपि खेलए फगुआ, उड़ए गगन अंगार। धुँआ वाढ़ि अकासहि लागल दिवसहि भेल अन्धार”। हिनक रचित एकटा महादेवक गीत सेहो अछि, जकर उल्लेख डॉ. रामदेव झा अपन “शैव साहित्यक भूमिका” नामक ग्रन्थमे कएने छथि- “ पुछइत फिरइत गौरा वटिया हे राम। कहु हे माइ, जाइत देखल मोर भंगिया हे राम॥ हाथ भसम केर गोला हे राम। वरद रे चढ़ि कोन नगर गेल भोला हे राम”॥ विरहिणी व्रजाङ्गनाक मनोदशाक एक विलक्षण रूप एहि ठाम सेहो देखल जाए सकैत अछि: “कमल नयन मनमोहन रे कहि गेल अनेक। कतेक दिवस भए राखब रे हुनि वचनक टेक॥ के पतिआ लए जाएत रे जहँ वसु नन्दलाल। लोचन हमर सतओलनि रे छतिआ दए शाल॥ जहँ-जहँ हरिक सिंहासन आसन जेहिठाम। हमहु मरब हरि-हरि कै मेटि जाएत पीर॥ आदि” मिथिलाक सन्गीत परम्परा अति प्राचीन ओ समृद्ध अछि। संगीतक रचना तँ विद्यापति ओ हुनकहुँसँ पूर्व होइत आएल अछि, मुदा रहस्यवादी संगीत-काव्य-रचना नवीन रूपमे आएल अछि, जकर प्रवर्तक साधु-सन्त लोकनि भेलाह। जाहिमे सन्त साहेब रामदासक स्थान अग्रगण्य अछि। हिनका लोकनिक रचनाक प्रभाव प्रायः सभ वर्गपर पड़ल। हिनक प्रायः सभ कवितामे रागक उल्लेख अछि। अतः एहिपर संगीत-शास्त्रक अनुकूल शोध-कार्य कएल जएबाक आवश्यकता अछि। साहेब रामदास परम वैरागी सुच्चा साधु छलाह, भक्त छलाह आऽ तेँ हिनक भाषापर सधुक्करी ओ तत्काल प्रचलित व्रजभाषाक किछु प्रभाव सेहो पड़ल अछि, तथापि हुनक जे पदावली उपलब्ध अछि से मैथिली साहित्यकेँ समृद्ध बनएबामे अपन महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त कएने अछि। भक्ति-भावनाक सरलता ओ सहजताक दृष्टिएँ हिनक भाषा सरल ओ सहज अछि। भक्ति-भावना परक एहन कविता मैथिली-साहित्यमे प्रायः दुर्लभ अछि। हिनक भक्ति परक गीत एखनहु मिथिलाक गाम-घरमे बुढ़-बुढ़ानुसक ठोरपर अनुवर्तमान अछि, जकर संकलन करब परम आवश्यक अछि। सुशांत झा, ग्राम+पत्रालय- खोजपुर, मधुबनी (बिहार), हिनकर पिता श्री पद्मनारायण झा 'विरंचि' ताहि समयक मिथिला मिहिर आऽ आर्यावर्तक प्रसिद्ध स्थाई स्तंभकार। पठन-लेखन विरासतमे भेटल छन्हि सुशान्तजीकेँ। सम्प्रति सुशांत जी इंडिया न्यूजमे कॉपी राईटर छथि,-मिथिला विश्वविद्यालयसँ स्नातक(इतिहास), तकर बाद आईआईएमसी(भारतीय जनसंचार संस्थान) जेएनयू कैम्पससँ टेलिविजन पत्रकारितामे डिप्लोमा(2004-05) ओकरबाद किछु पत्र-पत्रिका आऽ न्यूज वेबसाईटमे काज,दूरदर्शनमे लगभग साल भरि काज। संप्रति इंडिया न्यूजसँ जुड़ल| की बलिराज गढ़ मिथिलाक प्राचीन राजधानी अछि? हमर गाम खोजपुरसँ करीब एक किलोमीटर दक्षिण दिस बलिराजपुर नामक एकटा गाम छैक। ई गाम मुधुबनी जिला मुख्यालयसँ करीब 34 किलोमीटर उत्तर-पूब दिसामे छैक। एतय एक टा प्राचीन किला छैक जे 365 बिगहामे पसरल छैक आऽ एकर देखभाल भारत सरकारक पुरातत्व विभाग कऽ रहल अछि। किलाक खुदाई भेलापर एहिमे सँ मृदभांड आऽ विभिन्न तरहक बस्तु निकललए आऽ सोनाक सिक्का सेहो भेटलैक। किलाक बाहर जे बोर्ड लागल छैक ताहि के मुताबिक ई किला मौर्यकालीन हुअक चाही। किला के कात करोटमे जे गाम छैक ओहिमे भांति-भांतिक किंवदन्ति पसरल छैक, किलाक विषयमे। जतेक लोक, ततेक तरहक बात। किछु लोकक कथन छन्हि जे ई किला राक्षस राज बलिक राजधानी छलै -आऽ किछु गोटा तँ राजा बलिकेँ देखबाक सेहो दावा केलन्हि अछि। साँझ भेलाक बाद लोक सभ किला दिस जाइसँ बचए चाहैत छथि। भऽ सकैत अछि जे ई अफवाह सरकारी कर्मचारी लोकन्हि फैलेने हुए-कारण जे ओकरा सभकेँ ड्यूटी करएमे कनी आराम भऽ जाइत छैक। लोक सभ राजा बलिक डरे किछु चोरबऽ नञि चाहए छैक। किला अद्भुत छैक। किलाक देबार भग्नावस्थामे रहितहु अपन यौवनक याद दिआ रहल अछि। किलाक देबार एतेक चाकर छैक जे ओहपर तँ आसानी सँ एकटा रथ निकलिये जाइत हेतैक। देबारमे लागल ईंटा दू-दू फीट नमहर आऽ लगभग गोटेक फुट चाकर छैक। चीनक देबारसँ कम मोट नहि हेतैक ई अपन यौवन कालमे। किलामे एकटा पोखरि छैक, ककरो नहि बूझल छैक, जे कहिया खुनेलय ई पोखरि। बूढ़-पुरानक कहब छन्हि जे ई पोखरि राक्षसक कोरल अछि। किछु लोकनिक तँ ई मत छन्हि जे एहिमे एकटा सुरंग सेहो छैक-जकर रस्ता कतओ आर निकलैत छैक। सुनैत छियैक जे राज-परिवारक सदस्यकेँ आपतकालमे बाहर निकालैक लेल एहन सुरंग बनायल जाति छलैक। किलाक कात-करोटमे जे गाम छैक तकर नाम सेहो ऐतिहासिक। किलाक पूब दिस छैक फुलबरिया नामक गाम आऽ ओकर बगलमे सटल छैक गढ़ी गाम..जे आब अप्रभंश भऽ कऽ गरही भऽ गेलैए। किलाक पच्छीम दिस छैक रमणी पट्टी नामक गाम आऽ ओहिसँ सटल छैक भुपट्टी। किलाक दक्षिणमे छैक बिक्रमशेर, जतय प्राचीन सूर्य मंदिरक अवशेष भेटलैए। ई बात ध्यान देबाक जोग जे सूर्य मंदिर देशमे बड्ड कम जगह छैक। बलिराज गढ़क खुदाई पहिल बेर 1976 मे भेलैक, जखन केन्द्रमे साइत डॉ कर्ण सिंह एहि बिभागक मंत्री छलाह। गढ़क उद्धारक लेल मधुबनीक पूर्व सांसद भोगेन्द्र झा आऽ कुदाल सेनाक अध्यक्ष सीताराम झाक बड्ड योगदान छन्हि। किछु इतिहासकार लोकनिक कहब छन्हि, जे ई किला बंगालक पालवंशीय राजा लोकनिक किला भऽ सकैत अछि वा फेर मौर्य सम्राटक उत्तरी सुरक्षा किला भऽ सकैत अछि। ओना किछु गोटेक कहब छन्हि जे एकर बड्ड संभावना- जे ई किला मिथिलाक प्राचीन राजधानी सेहो भऽ सकैत अछि। एकर पाछू ओऽ ई तर्क दैत छथिन्ह, जे एखुनका जे जनकपुर अछि, ओऽ नव जगह अछि आऽ ओतुक्का मंदिर १८हम शताव्दीमे इंदौरक महाराणी दुर्गावतीक द्वारा बनबाएल गेल अछि। विद्वान लोकनि जनकपुरक ऐतिहासिकताक संदिग्ध मानैत छथि। हमरा एहि संबंधमे एकटा घटना मोन पड़ि रहल अछि। १० साल पहिने पटनामे वैशालीक एकटा सज्जन हमरा भेटलाह आऽ कहलन्हि जे बलिराज गढ़ वास्तबमे मिथिलाक प्राचीन राजधानी अछि। हुनकर कहब छलन्हि जे ह्वेनसांगक एकटा विवरणक मुताबिक पाटलिपुत्रँस एकटा खास दूरी पर वैशाली अछि, वैशालीसँ एतेक दूरीपर कांठमांडू (काष्ठमंडप) अछि आऽ काठमांडूक दच्छिन आऽ पूब दिशामे मिथिलाक प्राचीन राजधानी छैक। एखुनका जनकपुर ओहि मापदंडपर सही नञि उतरि रहल अछि। पता नञि एहि बातमे कतेक सत्यता छैक। एकर अलावा, रामायणमे सेहो मिथिलाक प्राचीन राजधानीक संदर्भमे किछु संकेत छैक। रामायणक संकेत सेहो बलिराजपुरकेँ मिथिलाक राजधानी होएबाक संकेत कय रहल अछि। सांसद भोगेन्द्र झाक मुताबिक, राजा बलिक राजधानी महाबलीपुरम भय सकैत अछि, जे दच्छिन भारतमे छैक। सभसँ पैघ बात ई जे पूरा मिथिलामे बलिराजपुरसँ पुरान कोनो किला नहि अछि, जे मिथिलाक प्राचीन राजधानी होएबाक दावा कय सकए। किलाक भीतर उबड़-खाबड़ मैदान छैक, जे राजमहलक जमीनक भीतक धँसि जएबाक प्रमाण अछि। एतय एकाध जगह खुदाई भेलैए आऽ ओहीमे काफी कीमती धातु आऽ समान भेटलैक अछि। अगर एकर ढ़ंगसँ खुदाई कएल जाय तँ नञि जानि कतेक रहस्य परसँ आवरण उठि जायत। एखन धरि सरकारक तरफसँ कोनो ठोस प्रयास नहि भऽ पाओल अछि, जञिसँ बलिराज गढ़क प्राचीनताकेँ दुनियाक सोझाँ रखबाक कोसीस कएल जाय। बस एकटा कामचलाऊ सड़कसँ एकरा बगलक गाम खोजपुरसँ जोड़ि देल गेलैक आऽ इतिश्री कय देल गेलैक। यदि बलिराज गढ़क खुदाई ढ़ंगसँ कएल जाय आऽ एतय एकटा नीक संग्रहालय बना देल जाय तँ बढ़िया काज होयत। मिथिलांचलक हृदयस्थलीमे रहबाक कारणेँ एतय मिथिला पेंटिंगक कोनो संस्थान वा आर्ट गैलरी सेहो खोलल जाऽ सकैत अछि। एकटा नीक(चाकर आऽ चिक्कन हाईवे) क संग नीक विज्ञापन बलिराजगढ़क पर्यटक सभकेँ निगाहमे आनि सकैत अछि। एहिसँ इलाकाक गरीबी दूर करबामे सेहो मदद भेटत। यदि एकरा बुद्धा सर्किट वा रामायण सर्किटक अंग बना लेल जाय तँ आर उत्तम। मैथिली, मैथिल संस्कृति आ मिथिला राज्य समाद पर मिथिला आ बिहार सं संबंधित लेख पढि कय ओतय चलै बला विकासपरक गतिविधि के अंदाज लागि पाबैये। इम्हर हमर एहेन मैथिल मित्र के संख्या मे बड तेजी सं बृद्धि भेलय जे बिहार या मिथिला के विकास के बारे मे जानय त चाहैत छथि लेकिन जखन समाद पर मैथिली मे लेख पढ़य कहबनि त दिक्कत भय जाय छन्हि। हुनका मैथिली बाजय त अबै छन्हि लेकिन पढ़य नहि आबै छन्हि। ओ हिंदी बड आराम सं पढ़ लैत छथि लेकिन मैथिली पढ़य मे दिक्कत के वजह सं ओ मैथिली साईट पढ़िते नहि छथि। ई बड्ड पैघ समस्या अछि। देखल जाय त अमूमन जे कोनो भाषा के अपन लिपि जीवित छैक ओकरा पढ़ैबला के कोनो दिक्कत नहि होईत छैक-कारण जे ओ बच्चे सं ओहि भाषा के ओहि लिपि मे पढ़ै के अभ्यस्त होईत अछि। जेना तमिल, तमिल मे लिखल जाईत अछि, त एकटा औसत अंग्रेजीदां तमिलभाषीयो के ओकरा पढ़ै मे कोनो दिक्कत नहि होईत छैक। लेकिन कल्पना करु कि अगर तमिल के देवनागरी मे लिखल जाई त की होयत ? ओ आदमी तमिल त बाजि लेत-चूंकि ओ ओकरा अपन माय या परिवार के अन्य सदस्य के मुंह सं सूनि क सिखलक अछि-लेकिनि ओकरा पढ़ै मे बड्ड दिक्कत हेतैक। ओकरा देवनागरी लिपि सेहो सिखय पड़तै। हमर भाषा संगे येह दिक्कत अछि। मैथिली के अपन लिपि त छैक, लेकिन ओ देवनागरी मे लिखल जा रहल अछि-जाहि लिपि मे हम सब सिर्फ हिंदी पढ़ै के आदी छी। अधिकांश मैथिली बजै बला के मैथिली त आबै छन्हि-कियेक त ओ सुनि कय सिखने छथि लेकिन ओ पढ़ि नै सकै छथि, कियेक त पढ़ैके आदत हुनका हिंदी के छन्हि। ई बात स्वीकार करय मे हमरा कोनो संकोच नहि जे हमर भाषा हिंदी के भाषाई साम्राज्यवाद के शिकार भेल अछि। ई संकट मैथिलिये टा संग नहि, बल्कि हिंदी क्षेत्र के तमाम भाषा जेना अवधी, भोजपुरी, ब्रज, राजस्थानी सबके संगे छै। देखल जाय त भोजपुरी कनी नीक अवस्था मे अछि कारण जे एकरा बाजार सेहो सहयता कय रहल छैक। लेकिन जेना-जेना शहरीकरण बढ़ि रहल अछि देश मे छोट-छोट भाषा आ बोली के स्पेश खत्म भय रहल अछि। देश के एकात्मक स्वरुप के विकास के लेल हिंदी आ अंग्रेजी अनिवार्य बनल जा रहल अछि। हलांकि दक्षिण के प्रांत आ उत्तर मे बंगाल या उड़ीसा अहि स बहुत हद तक मुक्त अछि-ओना संकट ओतहु कम नहि। हमर भाषा मैथिली जनसंख्या के आकार, भौगोलिक स्थिति, प्राचीनता आ व्याकरण के दृष्टिकोण सं कोनो भाषा सं कम नहि लेकिन तैयो हम सब असहाय किये छी-ई एकटा विचारणीय प्रश्न अछि। हमर दोस्त सब जिनकर जन्म पटना या दिल्ली मे भेलन्हि ओ हिंदी मे बात करैत छथि। हलांकि ओ अपन मां-बाबूजी सं मैथिली बाजि लैत छथि लेकिन अन्य मैथिल भाषी सं ओ हिंदीये मे संवाद करैत छथि। एकर पाछू कोन मानसिकता अछि, कोन कारक एकरा प्रभावित कय रहल अछि, ताहि पर विवेचना आवश्यक। दोसर बात हीन मानसिकता के सेहो। हम सब अपन संस्कृति के जेना बिसरि गेलहुं अछि। हमरा सब ज्ञान के मतलब अंग्रेजी के जानकारी मानि लेने छी, आ संस्कारित होई के मतलब हिंदी के नीक ज्ञान यानी खड़ी हिंदी के दिल्ली या टीवी के टोन मे बाजै के ज्ञान मानि लेने छी। हमरा अपन प्राचीन परंपरा के ज्ञान सं या त वंचित कयल जा रहल अछि या हम सब खुद अनभिज्ञ भेल जा रहल छी या केयक टा आर्थिक वजह हमरा सबसं अमूल्य समय छीन रहल अछि जे हम सब अपन भाषा या संस्कृति के बारे मे सोची। हमर कैयकटा मैथिल मित्र के ई ज्ञान नहि छन्हि जे सर गंगानाथ झा या अमर नाथ झा के छलाह। हुनका उमेश मिश्र के बारे मे नहि बूझल छन्हि। हुनका सरिसव पाही या बनगाम महिसी के भौगोलिक जानकारी तक नहि छन्हि। हुनका मंडन मिश्र या जनक या मिथिला के प्राचीन विद्रोही विद्रोही परंपरा के बारे मे बिल्कुले पता नहि छन्हि। लोरिक या सलहेस एखन तक यादवे या दुसाध के देवता कियेक छथि ? आ मैथिल के मतलब मैथिल ब्राह्मणे कियेक होईत छैक ? की हम एकात्म मैथिल के रुप मे कोनो प्रश्न के सोचैत छी? अहू सवाल सं टकरेनाई आवश्यक। इंटरनेट अहि दिसा मे नीक काज कय रहल अछि। एम्हर कयकटा वेबसाईट पर मैथिली या मिथिला के बारे मे नीक जानकारी आबि रहल अछि। लेकिन की एतब काफी अछि ? एकटा प्रश्न मिथिला राज्य के निर्माण सं सेहो जुड़ल अछि। मिथिला के इलाका अप्पन दरिद्रता, विशालता, भाषाई विशिष्टता के वजह सं राज्य के दर्जा पाबै के पूरा हकदार अछि, लेकिन की सिर्फ मिथिला राज्य बनि गेला सं हमर भाषा के पूरा विकास भय पाओत? हम एतय राज्य बनि गेला के बाद आर्थिक विकास के उम्मीद त कय सकै छी लेकिन की भाषाई आ सांस्कृतिक विकास भय पाओत ? उत्तराखंड या छत्तीसगढ़ बनि गेला के बादो ओतय के स्थानीय भाषा के की हाल अछि, ई एकटा शोध के विषय भय सकैत अछि। दोसक गप्प, मैथिली के एकरुपता सं जुड़ल अछि। एतय मैथिल भाषी आ ओकर साहित्यकार खुद एकर जिम्मेवार छथि। दरभंगा-मधुबनी के मैथिली के मानक बना कय हम केना पूरा मिथिला के ठीका उठबै के दावा कय सकैत छी ? एखनो दरभंगा-मधुबनी के भाषाई अहं, सहरसा-पूर्णिया आ मधेपुरा बला के अहि आन्दोलन के शंका के दृष्टि सं देखै पर मजबूर कय रहल अछि। हमर ई माननाई अछि जे मैथिली कतौ के हुए, ओकर मूल रुप मे जाबे तक ओकरा स्वीकार नहि कयल जाओत, मिथिला आ मैथिली आन्दोलन के बहुत फायदा नहि हुअ बला। दोसर बात फेर लिपि के अछि। की हम मिथिला राज्य बनि गेला के बादो मैथिली के मिथिलाक्षर मे लिखि सकब ? की हम देवनागरी सं मुक्त भय सकब ? की हम राष्ट्र के मुख्यधारा सं टकराई के साहस कय सकब...आ दरभंगा-सहरसा के शहरी वर्ग के मैथिली बाजै आ लिखै के लेल मना या प्रेरित कय सकब-ई लाख टका के प्रश्न। देखल जाए त सांस्कृतिक रुप सं हमर मिथिला, बंगाल के बेसी नजदीक अछि, लेकिन हमर राजनीतीक जुड़ाव हिंदी पट्टी सं स्थापित कय देल गेल अछि। इतिहास के अहि आघात सं मुक्ति कोना भेटत, राज्य निर्माण एकटा कदम त भय सकैत अछि, लेकिन हिंदी के इन्फ्रास्ट्रक्चर हमर जनता के मजबूर कय देने अछि जे हम अपन लेखन या पाठन हिंदी मे करी। हमरा ओकर लत लागि गेल अछि आ हमर भाषा सिर्फ बाजै के भाषा बनि कय रहि गेल अछि। तखन उपाय की अछि ? मैथिली के बारे मे किछु विज्ञ लोक सं जखन चर्चा होईत अछि त कहैत छथि जे 50 या 60 के दशक मे जते मैथिली के आन्दोलन मजबूत छल ओते आब नहि। सर गंगानाथ झा, या अमरनाथ झा या उमेश मिश्र या हरिमोहन बाबू घनघोर मैथिलवादी छलाह। ओ या त अंग्रेजी मे संवाद करैत छलाह या फेर मैथिली मे। ओ हिंदी के भाषाई साम्राज्यवाद के चीन्ह गेल छलाह- ओ उर्जा एखन कहां देखि रहल छी ? हमर बहिन कैलिफोर्निया मे रहैत अछि। ओकरा ओतय कयकटा मैथिल टकराईत छथिन्ह जे मैथिलीये मे गप्प करैत छथि। लेकिन ई चेतना भारत मे कहां अछि ? एतय ओ हिंदी कियेक बाजय लगैत छथि ? जे अपनापन ओ अमेरिका मे ताकय चाहैत छथि ओ भारत मे कियेक नहि करैत छथि-एकर कोनो जवाब हमरा नहि सुझाईत अछि। एम्हर किछु लोग बहुत एलीट भेला के बाद फेर सं अपन रुट सं जुड़ै के कोशिश कय रहल छथि। शायद ओ हॉलीवुड स्टार सबसं प्रेरणा ल रहल होईथि। ओरकुट या फेसबुक पर मिथिला के गामक तस्वीर फेर सं जागि रहल अछि। एकटा महत्वपूर्ण भूमिका मिथिला पेंटिंग के सेहो अछि। लेकिन लेखन या पठन के स्तर पर एखनो लोग मैथिली सं कहां जुड़ि पेला अछि? जाहि भाषा-भाषी के जनसंख्या 2 करोड़ सं ऊपर हुए ओतय कोनो नीक अखबार या पत्रिका कहां देखि रहल छी। तखन त इंटरनेट के धन्यवाद देबाक चाही जे ओ एहि दिसा मे नीक काज कय रहल अछि-कारण जे अहि मे पूंजी कम लगैत छैक। एकटा उम्मीद ऑडियो-विजुअल माध्म सं अछि लेकिन हमर भाषा ओहू मोर्चा पर भोजपुरी जकां प्रदर्शन नहि कय रहल अछि। हलांकि भोजपुरी के विशाल आबादी आ अंतराष्ट्रीय बाजार ओकरा सहयोग कय रहल छैक लेकिन ओहू सं बेसी महत्वपूर्ण हमरा जनैत ई जे हमर भाषा बेसी क्लासिकल होई के वजह सं अहि मोर्चा पर पिछड़ि रहल अछि। मैथिली भाषा लेखन के परंपरा सं विकसित भेल अछि आ बेसी मर्यादित अछि, जखन की भोजपुरी मे लेखन के परंपरा सं बेसी बाचन के परंपरा छैक। ई क्लासिकल भेनाई हमर भाषा के पोपुलर कल्चर सं काटि कय राखि देने अछि। मिथिला मे संभ्रान्त वर्ग के मैथिली अलग आ आम जन के मैथिली अलग भय गेल छैक। एकर अलावा लेखन के परंपरा होईके कारण एकर लोकगीत आ नाट्य मे एक प्रकारक अश्लीलता या बेवाकपन के बड्ड कमी छैक जे भोजपुरी मे प्रचुर रुप सं छै। ताहि कारणें हमर भाषा मे हाहाकारी रुप सं हिट लोकगीत के कैसेट या फिल्म नहि बनि पबैत अछि। परिणाम ई जे मैथिलियों के दर्शक भोजपुरिये गीत या फिल्म के आनंद बेसी लैत छथि-जे बाजार द्वारा हुनकर बेडरुम तक पहुंचा देल गेल अछि। लोक ‘महुआ’ चैनल त देखैत छथि लेकिन ‘सौभाग्य मिथिला’ के बारे मे कतेक लोक के पता छन्हि ? मैथिली के बाजार नहि बनि पायल अछि। इहो प्रश्न विचारणीय। तखन हमर भाषा के उम्मीद कतय अछि ? की सिर्फ ‘विल पावर’ आ गार्जियन सबके अतिशय जागरुकताये हमर उम्मीद अछि जे ओ अप्पन बच्चा सबके कम सं मैथिली जरुर सिखाबथु या आओर किछु ? लगैये हम बेसी निराश भय रहल छी। शायद हमरा एतेक निराश नहि हुअक चाही। जे भाषा हजार साल सं लेखन आ वाचिक परंपरा सं जीवित अछि ओ आगूओ जीवैत रहत। एकर त्राता ओ किछु हजार या लाख लोग नहि छथि जे दरभंगा-पटना या दिल्ली मे आबि क कॉरपोरेट भय गेल छथि-बल्कि ई भाषा करोड़क करोड़ मैथिल भाषी के हृदय मे जीवित अछि जे एखनो कोसी के बाढ़ि आ जयनगर रेलवे लाईन के कात मे पसरल हजारो गाम मे रहैत छथि। हमर ई विवशता अछि जे हमर युवा आबादी, जवान होईते देरी दिल्ली-बंबै भागि जाईत अछि। अबै बला समय मे जखन आर्थिक गतिविधि हमरा इलाका मे पसरत त लोक के पलायन नहि हेतै, लोक अप्पन भाषा मे संवाद करैत रहत। अहि शुभेच्छा के जियबैक लेल हमरा आर्थिक लड़ाई लड़य पड़त। दिल्ली आ पटना के सरकार सं अप्पन हक मांगय पड़त, इन्फ्रास्ट्रक्चर मजबूत करय पड़त। शायद मिथिला राज्य ओहि दिसा मे एकटा पैघ कदम साबित हुए। कमसं कम मिथिला राज्य के निर्माण के अहि आधार पर जरुर समर्थन करक चाही। आ मैथिल बुद्धिजीवी सबके के अहि आन्दोलन मे अहम भूमिका के निर्वाह करैय पड़तन्हि। विकास के तेजी मे कहीं छुटि नै जाय मिथिला… बिहार विकास के चर्चा जोरशोर सं आबि रहल अछि। जीडीपी विकास दर मे बिहार गुजरात सं कनिए पाछू आयल अछि-ओहो तखन जखन कि राज्य मे कोनो तरहक उद्योग धंधा या व्यवसाय के विकास नहि भेल अछि। साफ अछि जे ई विकास कृषि क्षेत्र आ सरकारी योजना सबके लगभग सही ढ़ंग सं लागू करैके बदौलत भेल अछि। एम्हर केंद्र सरकार के कतिपय योजना-जेना नेरेगा, मध्यान्ह भोजन, सर्वशिक्षा अभियान, राजीव गांधी विद्युतीकरण आ पंचायत पर बेसी ध्यान दै के कारणे सेहो ई विकास देखा रहल अछि। ओना नीतीश कुमार सरकार के तारीफ ई जे ओ अहि योजना सबके सही तरीका सं बिहार मे लागू कयलक। अगर आंकड़ा पर गौर करु त पायब जे बिहार के अर्थव्यवस्था पिछला चारि साल मे लगभग 11 प्रतिशत के दर सं आगू बढ़ल। लेकिन, दोसर दिस अगर राजधानी पटना मे संपत्ति के मूल्य पर गौर करी त आंखि फाटि जायत। पटना मे पिछला 2-3 साल मे रीयल स्टेट के मूल्य मे लगभग 100 सं लय क 300 प्रतिशत तक बढ़ोत्तरी भेल अछि। जहि फ्लैट के दाम पटना मे 2 साल पहिने तक 12 लाख रुपया छल ओ आब 25 सं लय क 40 लाख तक भेटि रहल अछि। पटना देश के ओहि किछु गिनल चुनल शहर के श्रेणी मे पहुंचि गेल जतय हवाई यात्रा करैबला के संख्या मे सबसं बेसी बढ़ोत्तरी भेल अछि। साफ अछि जे पटना के विकास या पटना मे धन के उपलब्धता बिहार के आम लोग के आमदनी सं बहुत बेसी अछि। ई बात एकटा खतरनाक संकेत के दिस इशारा कय रहल अछि जे बिहार के तमाम विकास राजधानी मे सिमटि रहल अछि या फेर बिहार मे धन के संकेंद्रण राजधानी मे अश्लील रुप लय लेलक अछि। एकरा दोसर तरीका स एना बूझि सकैय छी जे बिहार मे धन के केंद्रीकरण किछ खास हाथ मे बेसी भेल आ ओ आम जनता के हाथ कम पहुंचल। प्रतिशत मे बृद्धि के दर कयकटा दोसर फैक्टर सं ध्यान हटा दैत अछि, ई विकास के पूरा तस्वीर नहि कहैत अछि। विकास त भेले लेकिन ओहि विकास मे सम्पूर्ण जनता के भागीदारी संदेह के घेरा मे अछि। लेकिन चिंता के बात सिर्फ एतबे नहि। मुख्य बात ई जे बिहार के अपेक्षाकृत विकास त भेले आ यदि स्थिति ठीक-ठाक रहल त आबै बला दिन मे औरो तेजी सं विकास हेत-लेकिन विकास के चरित्र जे संकेत दय रहल अछि ओ मिथिला के लेल शुभ नहि बुझा रहल अछि। बिहार के नक्शा के गौर सं देखू-अंदाज लागि जायत जे आबै बला बिहार- गंगा के उत्तर आ गंगा के दक्षिण- एकटा भयंकट आर्थिक विषमता के बाट जोहि रहल अछि। बिहार के उत्तरी भाग-खास कय मिथिला क्षेत्र ऐतिहासिक रुप सं बाढ़ग्रस्त अछि, आ एतय बहुत कम सरकारी निवेश भेल अछि। आधारभूत संरचना, प्रतिवर्ष बाढ़ि के भेंट चढ़ि जायत अछि। एहन मे गंगा के दक्षिण के इलाका के भौगोलिक बढ़ित हासिल अछि। बिहार मे हुअय बला वर्तमान निवेश आ अबैबला निवेश के जिनका अंदाज छन्हि ओ जनैत छथि जे सबटा मोट निवेश गंगा सं दक्षिण खासकय मगध आ भोजपुर मे जा रहल अछि। चाहे नालंदा विश्वविद्यालय हुए या गया के निकट निजी क्षेत्र मे लागय बला बिजली घर। दोसर गप्प ई जे ई इलाका पहिने सं संपर्क मार्ग पर अछि-चाहे ओ जीटी रोड हुए या दिल्ली-कलक्तता रेल मार्ग। अहि इलाका मे बाढ़ि नहि अबैत छै आ पटना एहेन नगर अही इलाका मे छै। बिहार के आमदनी दै बला मुख्य पर्यटन क्षेत्र गया-राजगीर अही इलाका मे अछि। ई इलाका स्वाभाविक लाभ के स्थिति मे अछि। लेकिन ओहू सं बेसी बिहार सरकारक मौजूदा चरित्र अहि हालत के और प्रोत्साहित कय रहल अछि। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राजगीर, नालंदा आ गया के विकास के लेल बेसी उत्साहित छथि। नीतीश जहन, केंद्र मे मंत्री छलाह तखनो ओ बाढ़ मे एनटीपीसी आ नालंदा मे आयुध कारखाना(जार्ज के तत्कालीन संसदीय क्षेत्र आ नीतीश के प्रभावक्षेत्र) लगबौने छलाह। एमहर केंद्रीय योजना के बात चलल त बिहार के भेटय बला एकमात्र केंद्रीय विश्वविद्यालय मोतिहारी चलि गेल-सिर्फ हाथ आयल किशनगंज या कटिहार मे प्रस्तावित अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के कैम्पस। मिथिला के जे मूल समस्या अछि ओहि दिस नीतीश सरकार के कम ध्यान अछि। मिथिलांचल, जकर आबादी बिहार मे कोनो दोसर क्षेत्र सं बेसी अछि ओतय के लेल बहुत कम पैघ सरकारी प्रोजेक्ट प्रस्तावित अछि। एकर मूल मे अछि एहि इलाका के बाढ़िग्रस्त भेनाई, तखन फेर नीतीश सरकार बाढ़ि के निदान के लेल किएक नहि उत्साहित अछि? अहि इलाका मे साक्षरता के दर कम अछि, स्वास्थ्य के हालत ठीक नहि। तैयो सरकार के एजेंडा पर अहि इलाका मे एकोटा विश्विविद्यालय खोलनाई नहि छैक। नहिए, सरकार अहि इलाका मे एकोटा मेडिकल या इंजिनियरिंग कालेज खोलैके दिशा मे उत्साहित अछि। ओनहियो, अगर ई मानि लेल जाई जे बाढ़ि के वजह सं अहि इलाका मे कोनो बड़का प्रोजेक्ट नहि लागि सकैये, आ एकर निदान केंद्र के हाथ मे छैक, तैयो की नितीश सरकार के ई दायित्व नहि जे ओ केंद्र पर दवाब डाले? पिछला साल कोसी के बाढ़ि के बादों हमसब एकर पूर्णकालिक निदान के कोनो संकेत नहि पाबि रहल छी। हमरा सबके विकास के अहि रफ्तार सं चेति जाय के चाही। समय आबि गेल अछि जे हम सब अपन मांग जोरशोर सं उठाबी-नहि त अबैबला बिहार मे तमाम निवेश गंगा सं दक्षिण होयत आ मिथिला के लोग सिर्फ ओतय चाकरी करय ले जेता। हमर-अहांके हालत वैह भ सकैत अछि जेना पंजाब मे एखन बिहारी के छैक। हमर सपना केर मिथिला हमर सपना के मिथिला केहन अछि...हम भविष्य के दीस टकटकी लगा कय देखि रहल छी आ एकटा सुन्दर आ समृद्ध इलाका के तस्वीर मोने मोन बना रहल छी। हमर सपना के मिथिला में एखनतक किछुए रंग भरल गेल अछि-जेना दरभंगा में एकटा यूनिवर्सिटी आ मेडिकल कालेज, जयनगर तक बड़ी लाईन आ नेशनल हाईवे के तहत बनय बला चारि लेनवला सड़क जे मिथिला के हृदयस्थली बाटे गुजरत। हम कल्पना कय रहल छी जे एहि हाईवे के किनार में दर्जनों इंजिनीयरिंग आ मेडिकल कालेज खुजि जायत। हम ई सोचिं रहल छी जे झंझारपुर के बायोट्कनालाजी के कालेज में केरल के बच्चा सब जखन एडमिशन लेत त कतेक नीक हेतै। हम ओहि दिन के कल्पना कय रहल छी जखन नार्थ-इस्ट आ दक्षिण भारत के बच्चा सब गाड़ी रिजर्व कय काठमांडू के टूर पर निकलत तखन लौकहा-जयनगर के नजदीक कोनो ढ़ावा पर ओकरा सबके डोसा खाइके सीन केहेन हेतैक। एखन जकरा हमसब कस्बा कहैत छियैक से झंझारपुर, निर्मली, सकरी, सुपौल आ उदाकिसुनगंज में ढे़र रास उद्योग धंधा खुजि जायत।हम सोचि रहल छी जे ओ दिन केहन हेतैक जखन मिथिला के इलाका में अपन घर लग सबके रोजगार भेटि जेतै, ,सबके अपने घर लग इंजिनीयरिंग आ एमबीए कालेज में एडमिशन भेटि जयतैक आ बड़का बड़का कंपनी अपन कार्यालय दरभंगा आ पूर्णिया में खोलत। हम ई सोचि रहल छी जे हमर मखान के दुनिया भरि में ब्रांडिग भय जेतैक आ ओकरा ईस्ट-वेस्ट कारिडोर बला हाईवे के द्वारा गोवाहाटी आ ओतय सं इंडोनेशिया तक भेजल जा सकैछ। कखनो ई सोचैंत छी जे हाईवे बनि गेलाक के बाद सिक्किम आ दार्जिलिंग तक 3-4 घंटा के रास्ता भ जेतैक। तखन मिथिला के बच्चा सब सेहो दार्जिलिंग पढ़य जा सकत, आ युगल लोकनि हनीमून मनबय के लेल सिक्किम। हमर मिथिला में मानव श्रम के कोनो कमी नहि, पानि के कोनो कमी नहि, मेधा के कोनो कमी नहि-कमी अछि त नियोजन के। अगर हम अपन मानवशक्ति के रोजगार प्रदान क दी त हमरा सं बेसी विकसित कियो नहि भ सकैत अछि। कोसी पर रेलवे पुल सेहो बनि रहल अछि, आ हाईवे के तहत सड़क पुल सेहो बनबे करत। एहि तरहे ई दुनू पुल फेर सं मिथिला के जोड़ै बला साबित होयत-कोसी नदी मिथिला के दू फांक में बांटि कय राखि देने छल। हम ई सोंचैत छी जे एही तरहक एक टा फोर लेन हाईवे अगर मोकामा सं जयनगर तक भाया समस्तीपुर बनि जयतैक त केहेन बढ़िया होयतैक। सरकार के चाही जे मुजफ्फरपुर सं बरौनी आ आगू गोहाटी जायबला हाईवे नंबर 28 के सेहो फोर लेन बना दैक-ताकि अहि इलाका के समग्र विकास संभव भ जाईक। हम ईहो कल्पना क रहल छी जे नेपाल में जल्दीए शांति आ सुव्यवस्था कायम भ जेतैक आ नेपाल सं प्रचुर मात्रा में बिजली मिथिला के इलाका के जगमगैत। नेपाल आबैबला अंतराष्ट्रीय टूरिस्ट लोकनि सेहो मिथिला के रुखि करताह। लेकिन हुनका सबके आकर्षित करैक लेल हमरालोकनि के अपन पर्यटन स्थल के विकास करय पड़त। मिथिला में बहुत रास ऐतिहासिक स्थल नहि छैक-लेकिन हमसब अपन संस्कृति के नीक पैकेजिंग कय क टूरिस्ट लोकनि के आकर्षित कय सकैत छी। सीता के जन्मस्थान आ मिथिला के प्राचीन राजधानी जनकपुर, वैशाली आ पाटलिपुत्र-बोधगया-नालंदा के जोड़यबला सर्किट के ढ़ंग सं विकास कयल जाय त झुंड के झुंड टूरिस्ट सबके आकर्षित कयल जा सकैत अछि। मिथिला के लोककला, गीत आ पेंटिंग पर आधारित कार्यशाला आ म्यूजियम बनबैके आवश्यकता छैक। हमरा इलाका में पोखरि के कोनो कमी नहि। हम अगर एकरा ढ़ंग सं व्यवस्थित करी त ई माछ-मखान के उत्पादन के पैघ आधार त भइये सकैये, संगहि एकरा सौन्दर्यीकरण कय हम कय तरहक आर्थिक गतिविधि के सेहो बढ़ावा दय सकैत छी। हम इहो कल्पना कय रहल छी जे दरभंगा आ पूर्णिया मेडिकल हब के रुप में उभरत आ मुजफ्फरपुर निर्णाण आ मोटर उद्योग के केंद्र के रुप में। भागलपुर फेर सं सिल्क आ हस्तकला के क्षेत्र में ख्याति अर्जित करत आ मधुबनी में कला पर आधारित पैघ-पैघ अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार होयत। कखनो क हम सोचैत छी जे अगर कोसी के बाढ़ि पर काबू भय जयतैक त केहेन बढ़िया सोलो भरि कोसी में स्टीमर चलैल जा सकैत छलैक-एकटा एहने स्टीमर में हम अपन सबस प्रिय मित्र के संगे कलकत्ता तक के यात्रा करितहुं। भारत-आ नेपाल के बीच ओहने संबंध भ जयतैक जेहेन अमेरिका आ कनाडा के बीच छैक-आ दूनू देश के संसाधन के उपयोग इलाका के विकास में कयल जयतैक। मैथिली के ल क किछु असुविधाजनक प्रश्न.. कखनो क सोचैंत छी जे मैथिली भाषा और मिथिलांचलक विकास ओहि रुप मे किएक नहि भ सकलै जेना दोसर प्रान्त आ आन भाषा सब तरक्की क गैलै। एखुनका परिदृश्य अगर देखी त बुझाइत अछि जे मैथिली साहित्य के विकास आ एतुक्का विकास के ल क चिंता सिर्फ किछु मुट्ठी भरि लोक के दिमागी कसरत छैक-आम मैथिल के एहि स कोनो सरोकार नहि। हालत त ई अछि जे मैथिल लोकनिके धियापुता दरभंगो मधुबनी मे मैथिली नहि ,हिंदी मे बात करैत छथि। एकर की कारण छैक आ एना किएक भैलैक। अगर एकर तह मे जाई त एहि भाषाके संग सबसं पैघ अन्याय ई भेलैक जे एकरा किछु खास इलाका के मैथिली बनयबा के आ किछु खास लोकक भाषा बनयबाके प्रयास कयल गैलैक। मैथिली के दरभंगा मधुबनी आ खासक ओतुक्का ब्राह्मण के भाषा बनाक राखि देल गेलैक। मधेपुरा-पूर्णिया के बात त दूर दरभंगो मधुबनी के विशाल जनसमुदाय ओ भाषा नहि बजैत अछि जे किताबी मैथिली के रुप मे दर्ज छैक। ओना ई बात दोसरो भाषा के संगे सत्य छैक लेकिन कमसं कम ओतय ओहि भाषा के स्थानीय रुप के हिकारत या हेय दृष्टि सं नहिं देखल जाई छैक। मैथिली मे एहि तरहक कोनो प्रयोग के बर्जित कय देल गेलैक। मिथिला के खेतिहर,मजूर, मुसलमान आ निम्नवर्ग ओहि भाषा मे तस्वीर कहियो नहि देखि सकल। जखन मिथिला राज्य के मांग उठल त हमसब मुंगेर तक के अपना मे गनि लैत छी, लेकिन जखन भाषा के बात हेतैक त ओ सिर्फ मधुबनी के पंचकोसी या मधुबनी झंझारपुर तक सिमटि कय रहि जाईछ। हमरा याद अछि जे कोना सहरसा या पूर्णिया के लोकके भाषा के मधुबनी के इलाका मे एकटा अलग दृष्टि स देखल जाई छैक। इलाकाई भिन्नता कोनो भाषा मे स्वभाविक छैक लेकिन यदि ओ अहंकारवोध सं ग्रस्त भ जाई त ओहि भाषा के भगवाने मालिक। फलस्वरुप जखन भाषाई आधार पर राज्यके मांग उठलैक त मिथिलांचलक विराट जनसमुदाय ओहि स अपना के नहि जोड़ि सकल आ ओ आन्दोलन लाख संभावना के बावजूद नहि उठि सकल। रहल सहल कसरि राज्यसरकार क मैथिली विरोधी रवैया पूरा कय देलक। मैथिली के बीपीएससी स हटा देल गैलैक, आ मैथिली अकादमी के निर्जीवप्राय कय देल गेलैक। लेकिन एहि के लेल सत्ता के दोष कियेक देबै, जखन जनता के दिस सं कोनो प्रवल प्रतिरोध नहि छलैक त सत्ता त अपन खेल करबे करत। ओना त ई कहिनाई मुनासिब नहि जे मैथिली मे आम जनता के लेल या प्रगतिशील चेतना के स्वर नहि मुखरित भेलैक लेकिन ओ ओहि तरीका सं व्यापक नहि भ सकलै जेना आन भाषा मे भेलैक। मैथिली के रचना मे ओ मुख्यधारा नहि भ सकलै। दोसरबात ई जे कहियो मिथिला मे कोनो समाजसुधार के आंदोलन नहि भेलैक जेना बंगाल वा महाराष्ट्र मे देखल गेलैक। तखन ई कोना भ सकैछ जे सिर्फ भाषा के त विकास भय जाय लेकिन समाज के दोसर क्षेत्र मे ओहिना जड़ता पसरल रहैक। मिथिला के इतिहास के देखियौक त एतय येह भेलैक। दोसर बात ई जे मिथिला या मैथिली के लेल जे संस्था सब बनल ओकर कामकाज के समीक्षा सेहो परम आवश्यक। मैथिली के विकास के लेल दर्जनों संस्था बनल जाहि मे चेतना समिति के नाम अग्रगण्य अछि। लेकिन ओ चेतना समिति की कय रहल अछि आ जनता सं कतेक जुड़ल अछि एकर विशद विवेचना हुअक चाही। सालाना जलसा आ सेमिनार के अलावा एकर मैथिली भाषा के लेल की योगदान छैक तकर विशद समीक्षा हुअके चाही। मैथिली के बजनिहार भारते मे नहि नेपालों मे छथि, लेकिन दूनू दिसके भाषाभाषी के जोड़य के कोनो ठोस उपाय एखन तक दृष्टिगोचर नहि। एखन जहिया सं मैथिली के संविधान मे मान्यता भेटलैक अछि तहिया सं साहित्य अकादमी के किछु बेसी गतिविधि देखय मे आबि रहल अछि। लेकिन मैथिली के जखन तक आम जनता आ ओकर सरोकार सं नहि जोड़ल जायत एकर आन्दोलन धार नहि पकड़ि सकैत अछि। एकर सबसं पैघ जिम्मेवारी ओहि बुद्धिजीवी लोकनि पर छन्हि जे मैथिली के पुरोधा कहबै छथि। हुनका सं ई उम्मीद त जरुर कयल जा सकैछ जे ओ एकर ठोस, सर्वग्राही आ समीचीन समाधान सामने लाबथु आ ओहि पर समग्र रुपे चर्चा हो। बिहार मे प्रलय, लेकिन की छैक निदान ? बिहार मे एहिबेर बाढ़ि प्रलय बनि कऽ आयल अछि। ई ओऽ बाढ़ि नहि छी जे पहिनउ अबैत छल आऽ दस-पांच दिन रहि कऽ चलि जाइत छल। अहि विभिषिका के तँ ककरो उम्मीदो नहि छलैक। ऐहेन आपदा तँ हजार दू हजार सालमे एक बेर अबैत छैक। लेकिन पैघ सवाल ई जे कि एकर कोनो निदान छैक या बिहार के एकटा हिस्सा एहिना बीरान भय जेतै? इतिहासकार सभक मत छन्हि जे दुनिया के कय टा सभ्यता एहिना बाढ़ि वा भुकंप के कारणे खत्म भऽ गेलैक। किछु लोक केँ इहो कहब छन्हि जे सिंधु घाटी सभ्यता सेहो एहने कोनो बाढ़िक कारणेँ खत्म भऽ गेलैक। बहुत दिन पहिने प्रख्यात नदी विशेषज्ञ अनुपम मिश्रक लेख पढ़ने रही जाहिमे ओऽ कहने रहथि जे विशाल बांध बनाकऽ बाढिक जबर्दस्ती निदान नहि कयल जा सकैत अछि। हमरा लोकनि केँ नदीक संग जिनाई सीखय पड़त।ओकर पानि केँ बिना कोनो छेड़छाड़ के समुद्र तक जाई के रास्ता देबय पड़त।अगर एहिमे कोनो रुकाबट हेतई तँ प्रकृतिक कोप हमरा सबके झेलय-ए पड़त। आऽ अगर ध्यान सँ देखल जाय तँ पिछला सय सालमे यैह भेलैक अछि। बाढ़िक सबसँ पैघ कारण छैक नदीक सिल्टींग। जाबेकाल तक एहि सिल्टींग के दूर नहि कयल जायत ताबेकाल तक बाढ़ि पर प्रभावी ढ़ंग सँ रोक नहि लगायल जाऽ सकैत अछि। पानि केँ जखन-जखन समुद्रमे जाईमे अवरोध हेतई- ओकर पानि किनारमे पसरि जायत। गौरसँ देखल जाए तँ सिल्टिंग हटेनाई कोनो बड्ड मुश्किल नहि। खास कऽ बिहार एहेन प्रान्तमे तँ एहिसँ कतेक रास रोजगार सेहो सृजन कयल जा सकैत अछि। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना केँ पाई सेहो अहि मे लगायल जाऽ सकैत अछि। दोसर बात ई जे नदीक कछेरमे सिल्ट सँ ऊंच तटबंध आऽ सड़क बनायल जाऽ सकैत अछि, पर्यटन आऽ दोसर कतेको काज कायल जाऽ सकैत अछि। बिहारमे बहय बला नदीक स्रोत नेपालमे छैक। ओहि पानिपर हमरा लोकनिक कोनो बस नहि आऽ ने ओहि पानिकेँ नेपालमे रोकल जाऽ सकैत छैक। पुरना जमानामे नेपालक तराईमे आऽ पहाड़क ढ़लानपर खूब बोन छलै- जे पिछला सय-दू सय सालमे खत्म भय गेलै। आब पहाड़मे कनियो पानि होई छै कि मैदानमे पसरि जाई छैक। पहिने ओऽ जंगलक कारणे आस्ते-आस्ते मैदानमे अबैत छलै। बिहार सरकार अहि मामलामे किछु नहि कऽ सकैत अछि, सिवाय केंद्र पर दबाव दै के। हँ, भारत सरकार चाहे तँ नेपालक संग मिल कय बाढिकेँ रोकय के लेल छोट-छोट बांध आऽ वनीकरणक एकटा दीर्घकालीन नीति बना सकैत अछि । एहि के लेल हजारो करोड़ रुपैया के निवेश के जरुरत छैक आऽ ई काज दूनू देशक आपसी सहयोगसँ कयल जाऽ सकैत अछि। दोसर बात ई जे हमरा सबके अपन गलती के सेहो ध्यान में राखय चाही। छोट-2 धार जे कमला-बलान में मिल जाईत छलैक ओकरा पिछला शताब्दी में भरि कय़ खेत आ घराड़ी बना लेल गेलै।जे जमीन, सरकारी मानल जाईत छलैक ओकर बड़ पैघ पैमाना पर लूट भेलैक।एकरा कड़ा कानून बना कय रोक पड़त। पानि के संग छेड़छाड़ के जघन्य अपराध घोषित कर पड़त।इम्हर जे विकास के योजना बनलैक ओहो बाढ़ के बढ़ावा दै में कोनो कसर नहि छोड़लकै।उदाहरणार्थ, उत्तर बिहार में जमीन के ढ़लान उत्तर सं दक्षिण दीस आ दक्षिण बिहार में दक्षिण सं उत्तर दीस छैक। लेकिन के टा एहन हाईवे आ रेलवे बनलैक जे पानि के प्राकृतिक बहाव में अवरोध भय गेलैक। जेना, दरभंगा-मुजफ्फरपुर हाईवे आ दरभंगा-निर्मली रेलवे लाईन।एतय कहैक ई मतलब नहि जे विकास नहि हुअक चाही-लेकिन विकास आ प्रकृति के बीच में पूरा सामंजस्य हुआ के चाही। दोसर बात ई जे बिहार में जे नदी परियोजना सब में पिछला पचास साल सं लूट भेलैक ओहिलेल सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के अध्यक्षता में एकटा आयोग बनय के चाही।पूरा देश में हमरा हिसाब सं बिहार में जतेक लूट भेलैक ओते कतौ नहि। कोसिये के बात कयल जाय त -पश्चिम कोसी नहरि जे हमरा गांव के बीच सं निकलैत अछि ओकरा सरकारी घोषणा के हिसाब सं 1983 में बनि जाय के चाही छलैक।लेकिन एखन पचीस साल बीतला के बादों कोनो उम्मीद नहि। हमरा जनैत जे यदि नदी परियोजने सब के ढ़ंग सं लागू कयल जैयतैक त बाढ़ि के पूरा नहि त आधा समाधान त जरुर निकलि जयतैक। शायदि एखनो पूरा तबाही नहि भेल अछि,एहि बेरक जलप्रलय़ हमरा सबके सूतल सं जगेलक अछि। कुल मिलाकय जाबेतक बाढ़ि जनता आ राजनेता सबके एजेंडा में शामिल नहि होयत ताबेत तक एकर समाधान संभव नहि अछि। मिथिला मंथन १. मिथिलांचल क्षेत्र बिहार मे सबस पिछड़ल मानल जाइत अछि, अगर प्रतिव्यक्ति आय , साक्षरता और प्रसवकाल मे जच्चा-बच्चा के मृत्यु के मापदंड बनायल जाय तो मिथिलांचल देश के सबस गरीब आ पिछड़ल इलाका अछि। एकर किछु कारण त अहि इलाका के भौगोलिक बनावट अछि लेकिन ओहियो स पैघ कारण एहि इलाका के मे कोनो नीक नेतृत्व के आगू नै एनाई अछि। आजादी के लगभग 60 वर्ष बीत गेलाक के बाद देश में जहि हिसाब स आर्थिक असमानता बढ़ि गेलैक अछि ओहि में बिहार आ खासक मिथिला के सामने एकटा बड्ड पैघ संकट छैक जे ई और पाछू नै फेका जाय। उदाहरण के लेल ई आंकड़ा आंखि खोलि दै बला अछि जे एकटा गोआ मे रहय बला औसत आदमी के प्रतिव्यक्ति आमदमी एकटा औसत बिहारी सं सात गुना बेसी छैक आ एकटा पंजबी के आमदनी पांच गुना बेसी छैक। बिहारो मे अगर क्षेत्रबार आंकड़ा निकालल जाय त बिहार के दक्षिणी( एखुनका गंगा पार मगध आ अंग) एवम पश्चिमी ईलाका बेसी सुखी अछि, आ ओकर जीवनशैली सेहो दू पाई नीक छैक। त एहन में सवाल ई जे फेर रस्ता की छैक। की मिथिलांचल के लोक एहिना दर-दर के ठोकर खाईके लेल दुनियां में बौआईत रहता अथवा हुनको एक दिनि विकास के दर्शन हेतन्हि। मिथिलांचलक ई दुर्भाग्य छैक जे एकर एकट पैघ हमरा हिसाब सं आधा से बेसी इलाका बाढ़ि में डूबल रहैत छैक। बाढ़ि के समस्या के निदान सिर्फ राज्य सरकार के मर्जी सं नहि भ सकैत बल्कि अहि में केंद्रसरकार के सहयोग चाही। पिछला साठि साल मे बिहार के नेतागण अहिपर कोनो गंभीर ध्यान नहि देलन्हि जकर नतीजा अछि जे बाढ़ एखन तक काबू मे नहि आबि रहल अछि। पिछला कोसी के आपदा एकर पैघ उदाहरण अछि, आब नेतासब के आंखि कनी खुललन्हि अछि, लेकिन एखन सं मेहनत केल जायत त अहि मे कमस कम 20 साल लागत। बाढ़ि सिर्फ संपत्ति के नाश नहि करैत छैक, बल्कि आधारभूत ढ़ांचा जेना सड़क, रलेवे आ पुल के खत्म क दैत छैक। एहन हालत मे कोनो उद्योग के लगनाई सिर्फ दिन मे सपना देखैक बराबर अछि। किछु गोटाके कहब छन्हे जे बिहार मे उद्योग धंधा के जाल बिछाक एकर विकास केल जा सकैछ। लेकिन जखन सड़क आ विजलिये नहि अछि त केना उद्योग आओत। दोसर बात ई जे पिछला अविकासके चक्रक फलस्वरुप आबादीके बोझ एतेक बढ़िगेल अछि जे पूरा इलाका मे कोनो खाली जमीन नहि अछि जतय पैघ उद्योग लगायल जा सकय। सिंगूर के उदाहरण सामने अछि। महाशक्तिशाली वाममोर्चा के सरकार के जखन बंगाल मे 1000 एकड़ जमीन नै खोजल भेलैक त एकर कल्पना व्यर्थ जे दरभंगा आ मधुबनी मे सरकार कोनो पैघ उद्योग के जमीन दै। दोसर बात इहो जे पूरा मिथिला के पट्टी मे, मुजफ्फरपुर सं ल क कटिहार तक कोनो पैघ संस्था-चाहे ओ शैक्षणिक होई या औद्योगिक- नै छै जे एकमुश्त 3-4 हजार लोग के रोजगार द सकै। हमरा इलाका मे शहरीकरण के घनघोर अभाव अछि। जतेक शहर अछि ओ एकटा पैघ चौक या एकटा विकसित गांव स बेसी नहि।एकटा ढंग के इंजिनियरिंग या मेडिकल कालेज नहि, एकटा यूनिवर्सिटी नहि। कालेज सब केहन जे 4 साल में डिग्री द रहल अछि। एक जमाना मे प्रसिद्ध दरभंगा मेडिकल कालेज मे टीचर के अभाव छैक आ कालेज जंग खा रहल अछि। हम सब एहन अकर्मण्य समाज छी जे कोसी पर एकटा पुल बनबैक मांग तक नै केलहुं,हमर नेता हमरा ठेंगा देखबैत रहला। आब जा क रेलवे आ रोड पुल के बात भ रहल अछि।कुल मिलाकर इलाका मे सिर्फ 8-10 प्रतिशत लोक शहर में रहैत छथि, ई ओ लोक छथि जिनका सरकारी नौकरी छन्हि। ई शहर कोनो उद्योग के बल पर नहि विकसित भेल। बाकी आबादी-लगभग 40 प्रतिशत दिल्ली आ पंजाब मे अपन कीमती श्रम औने-पौने दाम मे बेच रहल अछि। मिथिला के श्रम पंजाब मे फ्लाईओवर आ शापिंग माल बनाब मे खर्च भ रहल अछि, कारण कि हमसब एहेन माहौल नहि बनौलिएकि जे ओ श्रम अपन घर मे नहर या सड़क बनब मे खर्च हुए। तखन सवाल ई जे फेर उपाय की अछि। हमरा ओतय पैघ उद्योग नहि लागि सकैछ, रोड नहि अछि बाढ़ि के समस्या विकराल अछि, त हमसब की करी। लेकिन नहि, मिथिला के विकास एतेक पाछू भ गेलाक बाद एखनों कयल जा सकैछ। आ अहि विषय मे कय टा विचार छैक। किछु गोटा के कहब छन्हि जे एखुनका बिहारक सरकार मगध आ भोजपुर के विकास पर बेसी ध्यान द रहल छैक। एकर वजह जे सत्ता मे पैघ नेता ओही इलाका के छथि, लेकिन दोसर कारण इहो जे ओ इलाका बाढ़िग्रस्त नहि छैक। पैघ प्रोजेक्ट के लेल ओ इलाका उपयुक्त छैक। उदाहरणस्वरुप-एनटीपीसी, नालंदा यूनिवर्सिटी आ आयुध फैक्ट्री-ई तमाम चीज मगध मे अछि। दोसर बात ई जे नीक कनेक्टिविटी भेला के कारणे भविष्य मे जे कोनो निवेश बिहार मे हेतैक ओ सीधे एही इलाका मे जेतैक। कुलमिलाक आबै बला समय मे बिहार मे क्षेत्रीय असमानता बढ़य बला अछि। एहि हालत मे किछु गोटा अलग मिथिला राज्यक मांग क रहल छथि, आ हमरा जनैत संस्कृति स बेसी -अपन आर्थिक विकास के लेल ई मांग उचित अछि। मिथिला के विकास के माडेल की हुअके चाही।मिथिला के जमीन दुनिया के सबस बेसी उपजाऊ जमीन अछि। हमसब पूरा भारत के सागसब्जी आ अनाज सप्लाई क सकैत छी। लेकिन ओ सब्जी दरभंगा सं दिल्ली कोना जायत। एहिलेल फोरलेन हाईवे आ रेलवे के रेफ्रजेरेटर डिब्बा चाही। दोसर गप्प हमर इलाका के एकटा पैघ रकम दोसर राज्य मे इंजिनियरिंग आ मेडिकल कालेज चल जाईत अछि। हमरा इलाका मे 50 टा इंजिनीयरिंग कालेज आ 10 टा मेडिकल कालेज चाही। ई कालेज भविष्य में विकास के रीढ़ साबित होयत। हमरा इलाका मे छोट-छोट उद्योग जेना स़ाफ्टवेयर डेवलपमेंट या पार्टपुर्जा बनबै बला फैक्ट्री चाही जहि मे 100-200 आदमी के रोजगार भेटि जाय। लेकिन एहिलेल 24 घंटा विजली चाही। ई कतेक दुर्भाग्य के बात जे बगल के झारखंडक कोयला के उपयोग त पंजाब में बिजली बनबैक लेल भ जाय छैक लेकिन हमसब एकर कोनो उपयोग नहि क रहल छी। आई अगर हमरा अपन इलाका मे 24 घंटा बिजली भेटि जाय़ त पंजाब जाय बला मजदूर के संख्या में कम सं कम आधा कमी त पहिले साल भ जायत। भारत के दोसर राज्य सिर्फ आ सिर्फ अही इलाका के सस्ता श्रम के बले तरक्की क रहल अछि। हमसब ई जनतौ किछु नहि क रहल छी, ई दुर्भाग्य के गप्प। मिथिला मे पढ़ाई लिखाई के प्राचीन परंपरा रहलैक अछि लेकिन सुविधा के अभाव मे ई धारा हाल मे कमजोर भेल अछि। खासकर महिला शिक्षा के दशा-दिशा त आर खराब अछि। एकटा लड़की कतेको तेज कियेक ने रहे ओ 10 सं बेसी नहि पढ़ि सकैत अछि कारण घर के पास कालेज नहि छैक। हमरा अगर तरक्की करय के अछि त इलाका मे एकटा महिला यूनिवर्सिटी त अवश्ये हुअके चाही, संगहि सरकार के ईहो दायित्व छैक जे हरेक ब्लाक में कमस कम एकटा डिग्री कालेज के स्थापना हुए। देश के विकास मे अहि इलाका के संग कतेक भेदभाव केल गेलैक आ हमर नेतागण कतेक निकम्मा छथि-एकर पैघ उदाहरण त ई जे इलाका मे एकहुटा केंद्रीय संस्थान नहि छैक। एकटा यूनिवर्सिटी नहि, एकटा कारखाना नहि। आब जा क कटिहार मे अलीगढ यूनिवर्सिटी, दरभंगा में आईआईआईटी आ बरौनी मे फेर सं खाद कारखाना के पुनर्जीवित करैक बात कयल जा रहल अछि। हमरा याद अछि जे साल 1996 तक दरभंगा तक मे बड़ी लाईन नहि छलैक। हमसब कुलमिलाकर कोनो तरहक संपत्ति के निर्माण नहि करैत छी। हमसब अपन आमदनी दोसर राज्य भेज दै छियैक-बेटा के बंगलोर मे इंजिनीयरिंग करबै सं ल क दियासलाई तक खरीदै मे। हमर पूंजी अपन राज्य, अपन इलाका के विकास में नहि लागि रहल अछि। एहि स्थिति के जाबत काल तक नहि बदलल जायत हम किछु नहि क सकैत छी। २. प्रवीण आई अमेरिका चलि गेल। ओकरा एल एंड टी के प्रोजेक्ट पर शिकागो पठा देल गेलै। लेकिन ओकरा संग पढ़ैवाली पूनम के भाग्य ओहन नहि छलैक। ओ दू बच्चा के मां बनि अपन स्वामी के सेवा में अपन जिंदगी बिता रहल अछि। बितला समय याद करैत छी त लगैत अछि जे पूनम के संग बड़्ड अन्याय भेलैक। बात सन् 95 के हतैक, हमर बोर्ड के रिजल्ट आबि गेल छल। ओहि समय पूनम आ प्रवीण छट्ठा में पढैत छल। जाहि स्कूल में पढ़ैत छल ओहि में चारि टा मास्टर छलैक जे बेसीकाल खेतिए बारी में लागल रहैत छलैक। पूनम क्लास में फर्स्ट अबैत छल आ प्रवीण सेकेंड...लेकिन छट्ठा के बाद प्रवीण के बाबू जी ओकरा ल क कटक चलि गेलखिन्ह जतय ओ एकटा दुकान में काज करैत छलखिन्ह। पूनम के घरक हालत अपेक्षाकृत ठीक छलैक, ओकर बाबूजी सरकारी सेवा में छलखिन्ह, लेकिन पूनम दसवीं से आगू नहि पढि सकल। ओकरा इंटर में मधुबनी के झुमकलाल महिला कालेज में नामो लिखा देल गेलैक लेकिन बाद में ओ आगू नै पढ़ि सकल। लेकिन प्रवीण राउरकेला सं इंजीनरिंग केलाक बाद एल एंड टी में प्लेस्ड भ गेल आ कंपनी ओकरा शिकागो पठा देलकै। एक दिन हमर दीदी पूनम के पूछवो केलकैक जे ओ कियेक ने बीए में नाम लिखेलक, त पूनम के जवाब छलैक जे ओकर मां-पप्पा के बीच ओकर पढ़ाई के ल क नित दिन घोंघाउज होइक। ओकर बेसी पढ़नाई पूनम के विवाह में बाधा बनि रहल छलैक। तीन बहिन में सबस पैघ पूनम के दहेज एकटा बड्ड पैघ समस्या छलैक। दू साल के बाद पूनम के विवाह भ गैलैक आ जे पूनम क्लास में फर्स्ट अबैत छल ओ जीवन के दौड़ में सदा के लेल सेकेंड भ गेल। पूनम के तमाम टैलेंट आब सिलाई-कढ़ाई आ स्वेटर के नब डिजाइन सीख में खप लगलैक। आई हमरा गाम में प्रवीण के टैलेंट के धूम मचल छैक। मिथिला के तमाम दहेजदाता ओकर दरवाजा पर आबि चुकल छथि, लेकिन सवाल ई जे कि पूनम के आगू नै पढ़ि पबै में कि सिर्फ दहेज टा एकटा कारण छलैक या किछू आउर...? मानि लिय जे दहेज नहियों रहितैक त की पूनम के अपन घर लग नीक कालेज भटि जयतैक ? हम सोचैत छी जे यदि पूनम के जन्म कर्नाटक या केरल में भेल रहितैक त भ सकैछ ओ इंजिनीयर बनि जाईत आ एल एंड टी ओकरो शिकागो भेजि दैतैक। लेकिन ई सवाल एखनो नीतीश कुमार अतबा अर्जुन सिंह के एजेंडा में नहि छन्हि। नै जानि कतेको लाख पूनम आई चिचिया-चिचिया क ई सवाल अहि व्यवस्था सं पूछि रहल अछि। हमर ई पोस्ट हिंदी के हमर ब्लाग आम्रपाली(amrapaali.blogspot.com)...ओहि पर एकटा टिप्पणी अछि जे सब साधन सबके नहि देल जा सकैत छैक, आगू बढ़य बला के खुदे के जिजीविषा हुअके चाही। लेकिन हमर कथन ई अछि जे प्रवीण के संग कोनो जीजिविषा नहि छलैक-ई पुरुष प्रधान समाज के एकटा दुखद अध्याय छैक जे हजारो प्रवीण के त कोटा स ल क बंगलोर तक डोनेशन पर भेज देल जाइत छैक लेकिन लाखों पूनम एखनों आशाके बाट जोहि रहल अछि। की ई सरकार के कर्तव्य नहि छैक जे ओ पूनम सब के उचित पढ़ाई के व्यवस्था करैक..?. ई कतेक दुर्भाग्य केर बात अछि जे बिहार में एखन हाईस्कूल खोलै पर प्रतिबंध लागल छैक। एखन 5 किलोमीटर के दायरा में बिहार में एकटा हाईस्कूल छैक। कोनो लड़की के लेल ई कोना संभव छैक जे ओ पांच किलोमीटर पढ़य लेल हाईस्कूल जाय। आब बिहार सरकार हाईस्कूल में लड़की सबके साइकिल द रहल छैक लेकिन की सिर्फ हाईस्कूल तक के पढ़ाई उपयुक्त छैक..? दोसर बात ई जे बिहार सनहक राज्य में जतेक सामान्य ग्रेजुएशन के सीट नै छैक, कर्नाटक आ महाराष्ट्र में ओहि स बेसी इंजिनीयरिंग के सीट छैक। एखन तक राज्य में एकोटा महिला विश्वविद्यालय आ तकनीकी विश्वविद्यालय नै छैक। हुअके ती ई चाही छल जे बिहारल में 20-25 साल पहिनहि हर जिला- आ ब्लाक में एकटा कालेज खोलि देबाक चाही छलैक। आब के जमाना त इंजिनीयरिंग आ एमबीए कालेज खोलक छैक। एहन हालत में ओहि खाई के के भरत जे बिहार आ दोसर राज्य के बीच में बनि गेलैक अछि। फेर वेह सवाल सामने अछि- की अबैयो बला समय में पूनम इंजिनीयरिंग कालेज में जेती....? मैथिली भाषा- संस्कृति के रक्षाक लेल एकटा संस्था जरुरी अछि यूट्यूव पर भटकि रहल छलहूं। नौकरी के व्यस्तता के वजह सं एतेक फुरसति नहि भेटति अछि जे यूट्यूब पर अपन मनपसंद गीत सुनि सकी। कोशिश रहैत अछि जे फुरसति भेटय त मैथिली गीत सुनी। मैथिली गीत जे सब यूट्यूब पर उपलब्ध अछि ओहि में बेसीतर बियाहक गीत आ भक्ति गीत सब अछि। मैथिली के विराट संसार में जे छिडियाल लोकगीत सब अछि तकरा सब के एकठाम पौनाई मुश्किल अछि। दोसर बात ई जे सब गीत के रिर्काडिंग सेहो नहि भेल छैक, भेलो छैक त ओकरा संकलन के काज बड्ड कठिन। गीत सब सुनिक मन नास्टेल्जिक भ गेल...कमला-बलान के धार आ राजनगर के मंदिर यादि आबय लागल। गजेंद्रजी के फोन केलियन्हि। हम जानय चाहै छलहुं जे की समस्त लोकप्रिय मैथिली गीत के वेबसाईट पर डालल जा सकैत छौ की। लेकिन पता चलल जे अहि में कापीराईट के संकट छैक। एखन अगर कियो मैथिली गीत संगती सुनय चाहैत अछि त किछ वेबसाईट पर 10-20 टा गीत छैक या नहि त यूट्यूब पर ओकरा गीत खंगालय पड़तै। हम ई खोजै छलहु जे कोनो एकटा वेबसाईट होइत जतय दिल्ली बंबई स ल क अमेरिका तक में रहय बला मैथिल अपन भाषा में गीतसंगीत के आनॆंद ल सकितथि। दुनिया जहि हिसाब स बदलि रहल अछि ओहि में अंग्रेजी आ हिंदी के भाषाई साम्राज्यवाद स बचनाई बड्ड मुश्किल बुझना जाईत अछि। लेकिन अगर सतर्कता स नब तकनीक के उपयोग कयल जे त मैथिली गीतसंगीत के विराट संसार के मैथिल भाषी तक आसानी स पहुंचायल जाय सकैछ। मैथिली लोकगीत, नाटक, लोककथा आ आख्यान हमर बडड् पैघ धरोहर अछि। आ एकर सॆयोजन के जरुरत छैक। अगर अहि स हम सब आम मैथिल के जोड़ सकी त एखनो बडड् उम्मीद अछि। लेकिन अहिलेल हमरा सबके मैथिली के सब रुप के दिल खोलि क अपनाबय पड़त अ पंचकोसी के ग्रंथि स बाहर आब पडत। अहि मुद्दा पर हम पहिनौ लिखि चुकल छी। दोसर बात जे आब बला जमाना आडियो विजुअल के छैक। पूरा दुनिया में लोक पढ़ै में दुर्भाग्यजनक रुप सं रुचि घटि रहल छैक। लोक आडियो आ विजुअल बेसी देखय चाहैत अछि। ई आब बला जमाना में आर बढ़त। अहि स इंकार नै। एखनो जे मैथिल कहिय़ो अपन जिनगी में एकटा मैथिली पोथी नै पढ़लन्हि ओ मैथिली के गीत सुनि क विभोर भय जाय छथि। आवश्यकता अहि बात के अछि हम सब कोन प्रकारे अहि विशाल समुदाय के अपन संस्कृति के अहि मजबूत उपकरण स जोड़ि क राखी। छिटपुट स्तर पर मैथिली में गीत संगती के कैसेट बनैत अछि, फिल्मों बनि रहल अछि आ आब एकटा टीवी चैनल के सेहो सुनगुनी अछि। लेकिन एकर कोनो संस्थागत प्रयास नहि भ रहल अछि। संविधान में भाषा के स्थान भेट गेलाके बादो हम सब सरकार स बड्ड उम्मीद नहि क सकैत छी। लेकिन अगर अहि दिशा में कोनो गैरसरकारी प्रयास इमानदारी स कयल जाई त एखनों बहुत काज कयल जा सकैत अछि। अहि दिशा में गजेंद्रजी के प्रयास वास्तव में स्तुत्य छन्हि जे बुहत मेहनत क क अहि दिशा में काज क रहल छथि। मैथिल बुद्धीजीवी सबके अहि पर विचार करय के चाहियनि आ कोनो तरीका खोजय के चाहियनि। अहि में बाद में सरकारी अनुदान आ विदेशी अनुदान स ल क वैयक्तिक अनुदान के कमी नहि रहत-ई हमर दृढ़ निश्चय अछि। कोनो ट्रस्ट या सोसाईटी के अधीन अगर ई काज कयल जाय आ नया विचार सामने आबय त ओ स्वागतयोग्य कदम होयत। शक्ति शेखर, पिता-श्री शुभनाथ झा, गाम- मोहनपुर, भाया-हरलाखी, जिला-मधुबनी। कखन बदलब हम बहुत तामस होइए भगवानक एहि कृत्यसँ जे ओऽ अपन उपस्थिति मिथिलांचलमे दर्ज केनाय शायदे कोनो साल बिसरै छथि। मुदा हमरा सबकेँ एहि भयावह स्थितिसँ लड़बाक अलावा आओर कोनो रस्तो तँ नहि अछि। जी, हम बात कऽ रहल छी, एखन बिहारमे आयल बाढिक संदर्भमे। अनुमान लगायल जाऽ रहल अछि, जे अहि बाढिक चपेटमे करीब 50 लाख लोक आयल छथि। सभ साल जुलाई-अगस्तक मास अबिते बिहारक लोक आतंकित भऽ जाइत छथि।सबहक मोनमे ई डर रहै छनि, जे एहि बेर केकर घर उजरतौ। लोकसब भरि साल दिन राति मेहनत कऽ एकटा घर बनाबैत छथि, किछु पूंजी जमा करैत छथि,मुदा की होइए एहि सभसँ? ई बाढि तँ कोनो आतंकवादीसँ बेसी भयावह होइत अछि जे हर बेर कतेको गामकेँ, कतेको बिगहा जमीनकेँ अपन अंदर समेट लैत अछि। संबधित विभाग बाढिकेँ लऽ कऽ सब जानकारी राखितो कोनो तरहक कदम नहि उठाबैत अछि। शायद ई बाढि हुनका सभक लेल आमदनीक एकटा श्रोत जे होइ-ए। पछुलका बाढि सभक राहत-अनुदानपर नजर दौड़ाबी तँ निधोक एक बात कहनाइ अनुचित नहि होयत, जे बाढिसँ कतेको लोक करोड़पति सेहो भऽ गेलाह। ईश्र्वरक लीला देखियौक, जे एक दिस एहि बाढिसँ सभ बेर कतेको लोक (शायद अनुमान लगेनाय असंभव अछि) केर सब चीज लुइटे जाय छनि, तँ दोसर दिस बाढि घोटालाक अभियुक्त आओर कतेको लोक करोड़पतिक गिनतीमे आबि गेलाह। ओहि दृश्यक बारेमे सोचल जाय, जे पूर्णियामे बाढिक डरे अपन छत पर बैसल चारि सालक बच्चा भूखसँ अपन दम तोड़ि देलक, ओहि लोकक बारेमे सोचि, जिनका खेनाय तँ दूर पिबऽ के लेल पानि तक नहि भेटि रहल छनि। लोकक चापाकल बाढिक पानिमे डुबि गेल छनि। हिनका सभ लग किएक नहि पहुंचि पाबि रहल छनि राहत सामाग्री। कहिं एहन तँ नहि जे फ़ेर सँ कतेको लोक एहि बाढिमे करोड़पति बनए वला छथि। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बिहारक बाढिकेँ राष्ट्रीय आपदा घोषित तँ कऽ देलन्हि मुदा पीड़ितक लेल ई सांत्वना मात्र अछि। केन्द्र सरकार दिससँ बिहारक बाढि पीड़ितक लेल 1000 करोड़ रुपया अनुदानक राशि देल गेल अछि। मुदा एहि अनुदानक राशिक विषयमे अखनो कतेको बाढि पीड़ित केँ मालूम नहि चलि सकल अछि। जिनका अहि बारेमे जानकारी भेटबो कैल तँ निश्चित ओऽ सोचने हेताह कि शायदे एहि राशिमे सँ हुनका सभकेँ किछु भेटत। केन्द्र सरकार ई राशि तँ दऽ कऽ अपन बाढि पीड़ितसँ तँ अपन पल्ला झाड़ि लेलाह, मुदा बाढि पीड़ित तक ई राशि कोना पहुंचि सकत, एहि बारेमे हुनकर ध्यान नहि गेल अछि। एक बेर फ़ेरसँ कहब जे ई अनुदानक राशि सब विभाग तक बटैत बटैत दस प्रतिशतो बाढि पीड़ित तक नहि पहुंचि सकत। आओर हँ, बाढिक दोगमे जे सभसँ पैघ चीज होइत अछि ओऽ अछि राजनीति। कतेको नेता सभ एहि बाढि पीड़ितक लेल आगिमे घी देनाय जेहेन काज करैत छथि। राज्य सरकार केँ दोषी ठहराबैत नेता सब ओहि जगह अपन सीट सुनिश्चित करबाक फ़िराकमे रहैत छथि। हेलीकाप्टरसँ बाढि क्षेत्रक सर्वेक्षण करैत बहुतो नेतासभकेँ अतबो जानकारी नहि रहैत छनि जे ओऽ कोन क्षेत्रक दौड़ा कऽ रहल छथि। पता एहि बातसँ लगायल जाऽ सकैत अछि जे नेतासभ ओहि क्षेत्रक कतेक ज्ञान रखने छथि। इमहर राज्य सरकार सेहो कहां चुप रहए वला। ओऽ केन्द्रपर निशाना साधैत छथि तँ केन्द्र राज्य सरकार पर। एहि राजनीतिमे पिसाइत तँ बाढि पीड़ित छथि। कोनो बात नहि, समय आबि गेल अछि एकजुटता देखाबएबाक आऽ मदति करबाक....बाढि पीड़ितक संग, बाढि पीड़ितक लेल। तखने हम स्वतंत्र भारतक कर्तव्यनिष्ठ नागरिक भऽ सकए छी। ओमप्रकाश झा, गाम, विजइ, जिला-मधुबनी। मिथिले तक नहि छथि मैथिल गप्प अछि नवंबर 2007 केर, एहि समयमे हम गोवा न्यूज (जे कि गोवा अवस्थित अंग्रेजी क्षेत्रीय न्यूज चैनल छ्ल) मे काज करैत रही। गोवामे सोलहम अंतराष्ट्रीय मैथिली परिषदक सम्मेलन भेल छ्ल, जकर अध्यक्षता श्री विनय कुमार झा ,चीफ़ विजिलेंस,गोवा स्टेट केलथि। एहि कांफ़रेंसक एकटा छोट सनक अंश यू-टयूब साइट पर सेहो उपलब्ध अछि। एहि कार्यक्रमकेँ कवर करबाक भार अपन संस्थासँ हमरे भेटल छ्ल। एहि कार्यक्रमक दौरान बहुत रास चित्र जे स्पष्ट भऽ कऽ सोझाँ आयल ओऽ ई सभ छल....... 1.बहुत रास मैथिल छतीसगढ आऽ मध्य प्रदेशमे बसल छथि। हालांकि आब हुनका सबहक मातृभाषा मैथिली नहि रहि गेल अछि। यदि आओर तहमे जाई तँ ओऽ लोकनि मैथिली भाषा बिसरि चुकल छथि, तथापि मिथिलासँ ओतबेक स्नेह आऽ लगाव छन्हि, जतबाक हमरा सबकेँ अछि। हुनकर सबहक पुस्त बहुत पहिने ओतए चलि गेल रहथिन्ह। गप्प करीब 4-5 पुस्त पहिनेक अछि। 2. दिल्लीक नांगलोई इलाकामे सेहो किछु रास मैथिल छथि, जे कि अपन जीवन-यापनक क्रममे कतेक रास आन आन व्यवसाय सब अपना लेने छथि। संगहि देशक भिन्न- भिन्न भागमे कतेको ठाम मैथिल लोकनि वृहद समुदायक संग रहि रहल छथि। ओना भाषा एहिमे सँ बहुतो गोटेक हरा गेल अछि। 3. एकटा आरो गप्प जे कि सामने आयल ओऽ छल, जे कि गोवाकेँ मैथिले ब्राहम्ण सब बसेने छथि आऽ एकर प्रमाण स्कन्द पुराणमे भेटैत अछि। हम अहाँ केँ ई बात कहि दी, जे कि गोवन (गोवाक वासी) सबहक मातृभाषा कोंकणी अछि मुदा एहि भाषाक बहुतो रास शब्द मैथिली भाषाक अछि। किछु शब्दक बारेमे हम अहाँ सबकेँ कहि रहल छी, जेना कि अदहन (भातक लेल गरम कएल गेल पानि), पाहुन (गेस्ट), मधुर आदि। ओहो सब कोजगरा दिन लक्ष्मी पूजा करैत छथि। रहन-सहनक स्तर अपना सबसँ बहुत हद तक मिलैत अछि। आओर तहमे गेनाय अखन उचित नहि अछि। कार्यक्रममे कतेको मिथिला-विभूति सब उपस्थित छलाह। वर्तमानमे दिल्ली पुलिसमे वरिष्ठ अधिकारी श्री उज्जवल मिश्र ओहि ठाम तत्कालीन डी.आइ.जी. छलाह। भारतक विभिन्न भागक संगे नेपालक किछु रास प्रतिनिधि सब सेहो पहुंचल छलाह। एहि कार्यक्रमक कवर करबाक लेल गोवा न्यूज आऽ नेपाल टीवी (नेपालक) चैनल पहुंचल छल, जखन कि बड़का-बड़का मैथिल पुरोधा सब गोवामे विभिन्न मीडिया लेल काज करैत छथि। बादमे जहन हुनका सबसँ जिज्ञासा बस पुछलियन्हि तँ कुनू ने कुनू ओहने बहाना बना लेलाह, जेना कि जखन प्रधानमंत्री स्व० राजीव गांधीक समयमे मधुबनी के एम०पी० हनान अंसारी लोक सभामे मैथिली केँ अष्टम सूचीमे जोरबाक लेल आवाज बुलंद केलथि तँ श्री भोगेन्द्र झा जी जे कुनू बहान्ना बनेने रहथि। हम एकर तहमे नहि जाय चाहब, सब गोटे बुझि रहल छी। अल्पज्ञ कहु वा किशोर हमरा मोनमे कतेको प्रश्न उठए लागल जे एनामे मैथिली कोना बचल रहत। हयऔ, हमर भाषा कुनू अन्य भाषा सँ कनिको कमजोर नहि अछि। हमरा लोकनि अंग्रेजी बाजैत छी, आधुनिक परिधान पहिरैत छी, सबटा बड्ड नीक बात अछि। मुदा एहि तमाम चीजक मूल्यक रुपमे अपन भाषा आऽ संस्कृति केँ उत्सर्ग केनाय हमरा नहि पचि रहल अछि। ई तँ ओहने गप्प भेल जेना किछु रास लोककेँ आर्थिक तंगी नहि रहलाक बादो दोसरसँ कर्ज लेबाक प्रवृति होय छन्हि। परिवर्तनक फ़ेज सँ गुजरि रहल अपन समाज कहीं त्रिशंकु तँ नहि बनि रहल अछि।एखन बस एतबे। बी.के कर्ण(1963-),पिता श्री निर्भय नारायण दास गाम- बलौर, भाया- मनीगाछी, जिला-दरभंगा। पैकेजिंग टेक्नोलोजीमे स्नातकोत्तर आऽ यू.एन.डी.पी. जर्मनी आऽ इग्लैण्डक कार्यक्रमक फेलोशिप, २२ वर्षक पेशेवर अनुभव आऽ २७ टा पत्र प्रकाशित। डायगनोस्टिक मिथिला पेंटिंग आऽ मिथिलाक सामाजिक-आर्थिक समस्यापर चिन्तन। सम्प्रति इन्डियन इन्स्टीट्यूट ऑफ पैकेजिंग, हैदराबादमे उपनिदेशक (क्षेत्रीय प्रमुख)। संकट गुणक (रिस्क फैक्टर) आ मैथिल- मिथिलाक विकास क़ेना आ कखन विकासक बिना जिनगी बड कठिन। विकासक रस्ता बड उबड ख़ाबड । संघर्ष सदिखन। डेग डेगपर। बिना संघर्षक विकासो संभव नहि। सर्वांगीन विकासक हेतु़ व्यक्तिगत विकासे आधार होइछ । बहुत किछु गमेलहुँ मुदा आब नहि। मैथिल युवा मोर्चा तैयार भए रहल अछि। विकसित वा अविकसितक बिच-बिचवामे छी।एतवा तॅ तए अछि जे आर्थिक विकासक लेल सुर सार भए रहल अछि। आर्थिक विकास एकटा गति होइछ जे कखनो कम वा बेशी। आर्थिक उपार्जनक लेल़ हम सब सकारात्मक प्रयासमे सुतल छी। जहिया उठब़ तहिया सिंह जकां दहारब वा सांप जकां फूफकारब। जय श्री हनुमानजी एक समयमे अपन शक्ति बिसरि गेल छलाह, तहिना हम सब मैथिल अपन शक्ति बिसरौने छी। बहुतो मैथिल प्रवाशी जीवनमे़ अपन आर्थिक सक्षमता मे वृद्धि केलाह, परञ्च हुनक धिया पूता मिथिला मैथिल सॅं कोसो दुर !!! पैघ संकट। ग्रेट रिस्क!!! मैथिलक सम्मान मैथिली थीक आओर एकर अपमान मैथिले कऽ रहल छथि। अपने परिवारमे मैथिलीपर मतांतर। मैथिली घरेमे टूअर। मैथिल पलायनसॅं मैथिलीक आकस्मिक अन्त। केऽ विलाप कडत। पलायन दुइ स्थितिमे- १. जीवन भरण पोषणक लेल २. व्यक्तिगत उद्देश्यक पूर्तिक लेल मिथिलामे की कमी डेग डेग पर पोखरि घर घरमे पतरा-पोथी। गाम गाममे जाति पॉति छोटका पॉति लैऽ कऽ एके परिवारमे शानक घमासान। मैथिली संकटमे, आवश्यकत अछि कोमल स्पर्शक। कतेको बेर बिहार सरकार द्वारा मैथिली भाषापर सीधा प्रहार भेल। परम दुखक बात ई अछि जे किछु मैथिल मैथिलीकेँ तोड़यमे लागल रहल छथि। परञ्च चिंताक कोनो बात नहि़। मैथिली अछि अटल़-अविचल। मैथिलीक जड़ बड़ मजगूत। हम मैथिलसब अपन मौलिक कर्तव्य बूझि आऽ अपन भाषा सॅं अथाह लगन लगावी। बंगाली-पंजाबी-मराठी केँ देखु जे अपन मातृभाषाक प्राणोंसॅं ऊपर स्थान देने छथि। एतबाऽ नहि हर मंचपर अपन भाषाक प्रति स्नेह तथा सम्मान कन्निको कट्टौती नहि करैत छथि। परञ्च़ हम मैथिल कतेक निष्ठा रखैत छी। एहन किछुए मैथिलके देखल जा सकैछ। बंगालमे बंगाली, पंजाबमे पंजाबी। एहिना बहुतो प्रादेशिक राज्यमे़ अपन-अपन भाषाकेँ अपन जीऽ जान सॅं पैध लगाव रखने छथि। बंगालीक भाषा बंगाली पंजाबीक भाषा पंजाबी मराठीक भाषा मराठी बिहारीक भाषा की? हिन्दी़-भोजपुरी आऽ मैथिली हिन्दी़ तॅं राष्ट्रभाषाक अस्तित्वमे अछि। भोजपुरी काफी लोकप्रियता हासिल कय रहल अछि। भोजपुरी सिनेमा उद्योगकेँ काफी सफलता भेटल। मुदा मैथिलीक स्थिति बिहारमे केहन अछि से की कहल जा्इछ। मैथिलीक स्थिति मिथिलामे बड़ कमजोर। गैरमैथिल बिहारी कतेक प्रतिशत मैथिलीक इज्जत करैत छी।अनुमानित प्रतिशत बड़ कम होयत। मैथिल अपनाकेँ गोद लेल मैथिल जेकाँ आचरित कहिआ धरि करताह? मैथिली सशक्त भाषा अछि। एकर अपन इतिहास अछि। परञ्च हम सब मैथिली बाजय वालाकेँ आऽ लिखय वालाकेँ पिछड़ल बुझैत छी।अनेक भाषा सीखू़ बाजू़ मुदा मैथिलीकेँ छोड़ि कऽ नहि। मैथिलीकेँ बोझ नहि बुझियौक। मैथिल जे कहियो मैथिली छोड़ि लन्हि़ ओ मानसिक रूपसं गरीब भए गेलाह। आर्थिक विकास भेलाक तदुपरान्तों अपन मनसॅं बहुत गरीब। अमेरिकामे जे भारतीय मुलक स्थिति पर जे एकटा अमेरिकन पत्रकार अध्ययन केलाह जरूर देखल जाए। Family Ties and the Entanglements of Caste http://www.nytimes.com/2004/10/24/nyregion/24caste.html अमेरिकन क़ी मिथिलामे रहि सकैत अछि नहि़ कथमपि नहि़। की अमेरिकन आ कोनो विकसित देश व राज्य के एकोटा लोग अपन मैथिली भाषा अपनायत़ नहि़ कथमपि नहि़। बेसी मैथिले भेटताह जे़ मिथिला आ मैथिली छोड़ि ताहिमे सबसॅं आगू । मैथिल मिथिलाक सीमाक बाहर बड मेहनती परञ्च मिथिलाक सीमाक अन्दर बड आलसी। मेहनती मैथिल कतौऽ रहथि धाक जमौने छथि परञ्च मैथिली पर जेना मतसुन। एको रति रू चि नहि रखैत छथि, हुनकर धिया पुताक बाते छोड़ु। गिर्यसन जकॉं खोजी़ एहि पर अलग विचार रखैत छथि। मैथिलीके बोझ बुझय वाला मैथिल सोचि विचारमे बड़ गरीब। गरीबी झेलबाक मानसिकता मैथिल मे कियाक बेसी। मिथिलामे मौलिक सुख सुविधाक कमी कोन कारणे। बहूतो कारण भए सकैछ। गरीबीमे ककरा नेऽ इ कष्ट झेल्ऽ पऽडै़त। मैथिल मेहनती तॅं मिथिलामे गरीबी कियाक गरीबी झेलबाक मानसिकता कियाक !!!ग्रेट रिस्क !!! कतेक मैथिल कहताह जे भाग्यक लिखल कष्ट अछि। एहि प्रश्नक जबाब खोजि रहल छी जे पॉंच करोड़क मैथिलक एके रंग भाग्य कियाक। गरीबीक झेलबाक मानसिकता कतेक दिन तक। हम मैथिल सब वाक विवादमे बड प्रखंड छी। हरएक बातपर अपनाक अनुभवी प्रमाण दैत छी। मनसॅं वाक पटूतामे धनी। जीवनक मौलिक आवश्यकताक पूर्तिकक लेल हम सब मैथिल बड़ गरीब। गरीब मानसिकता गरीबी झेलबाक लेल सदिखन तैयार। स्वस्थ नेताविहीन मैथिल समाज अपन मौलिक हक सॅं दूर कोसो दूर अछि। जड़ जड़ हालतमे मैथिल समाज अपन देशक आजादीक बाद मिथिलामे आधारभूत ढॉंचाक शूरूआतोऽ तॅं नहि भेल। खकरा कहबैऽ केऽ सूनत के सुधि लेत। रिस्क आ मैथिल मुद्दा व्यवसाय विकसित देश वा विकसित राज्यक पाछु यदि सुक्ष्म रूपसॅं देखु तॅं भेटत जे ओहि क्षेत्रक व्यवसाय विकासक मुल कारण अछि। मिथिलामे विद्वान वा ज्ञानी मैथिलक कमी नहि। व्यापारी वर्ग नोइसो बराबरि नहि। मैथिल व्यापारो करताह ? सिन्धी़ माड़वारी आ पंजाबी समाज मिथिलामे अपन व्यवसायमे मैथिल जकॉं संस्कार अपनोने के साथ केवल ५० सालमे बढ़िया धाक जमा लेलाह, परन्तु हम मैथिल जे छी जे डींग हकैसॅं फुर्सतेऽ नहि भेट रहल अछि। मैथिल मिथिलामे की करताह ? मिथिलामे किछु मैथिलके देखबाऽ मे आयत जे़ मिथिलाक सिन्धी़ माड़वारी आ पंजाबी के व्यवसायमे नौकरी करताह। हिन्दी अखबार मॉंगि कए पढ़ताह़ परञ्च मिथिलाक विद्वान वा ज्ञानी अखबार प्रिन्ट आ बाजार मे आनबाक जोखिम नहि ऊठैऽताह। मिथिलामे चाहक दुकान पर प्रतिदिनक दिनचर्यामे लालु के लालूवाणी पर अखण्ड बहस करताह। मिथिलामे सुइदसॅं किछु मैथिल सुइदखोर व्यवसायमे वृद्धि केलाह हऽ। कोनो नियमके पालण नहि़ कए रहल छथि। अपन नियम बना कऽ अपराध मे रमल छथि। मिथिला बैंकक शुरआत होए अपराधी सुइदखोर मैथिल के झेलनाइ एकटा बढ़ पैघ अपराध अछि। !!!!Great Risk !!!! मुदा बहुतो अछि़ पर रिक्सो सॅं ज्यादा भयावह। सन २००१क जनगणणा के अनुसाऱ मिथिलाक आबादी करीब ६ करोड़ छल। जाहिमे़ व्यवसायिक वर्ग २ प्रतिशतो कम। बहुतोसॅं पुछलहु़ जे एतबा प्रतिशत कियाक कम अछि़ परञ्च एकर कारण की से नहि जानि सकलहुं। मिथिलासॅं आयात आ निर्यातक बातेऽ छोड़ू, व्यापार तॅं बद सँ बदतर मिथिलाक पाँच जिलाक केस स्टडी: पांचो जिलाक कुल आबादी सन २००१ जनगणनामे करीब एक करोड़ अठाइस लाख छल। जनसंख्या अनुमानित ५ वा ७ प्रतिशतसॅं प्रतिसाले वृद्धि भऽ रहल अछि। एकटा बात महसूस भऽ रहल अछि जे मिथिलामे गरीबी कम भेल अछि। यदि़ सन १९८० सॅं पहिने हरेक गॉवमे हरेक दिन ४ या ५ घरमे उपवास रहैत छलैक़ परञ्च से उपवास आब गरीबीक उपवास पुजा पाठक उपवास होइत अछि। मुदा भौतिक सुविधाक पिछड़ापन तॅ पारकाष्ठा पर अछि। जिनगी भगवानक भरोसे। पांचो जिलाक मैथिल पर यदि ध्यान देल जाए तॅं एकटाक सदस्य परिवारमे नौकरी करयबाला बॉकी आश्रित सदस्य किछु नहि करयबाला बल्कि गप छटय बाला आ शान बघारय वाला। पर आश्रित भेनाए अपनेमे एकटा रिक्स एहन जे भावुक जरूरतसॅं ज्यादा आ कर्मठहीन ज्यादा बनाबैत अछि। !!!!ग्रेट रिस्क !!!! जनसंख्याक वृद्धि मानु जे कष्टक पहाड़। हर क्षण हरेक दिस स्थिति दयनीय हेबे कड़त। मिथिलामे मैथिल रिक्स लेताह ? मिथिलामे मैथिल तॅं अपन जिनगीक रिक्स लेबाऽमे सर्वोपरि छथि। जेना की़ सोचु ऩदि के ऊपर जड़ जड़ हालमे पुल ओहि पर खचाखच बस़ आ रेल गाड़ी जाहिमे छत सेहो भड़ल। फोटो देखल जाए। सोचु कनिऽ जे जिनगी आओर मौत के बीच केवल एकटा रिक्स फैक्टर अछि। मैथिल जिनगीक रिक्स हर क्षण। मिथिलामे जिनगीक रिक्स बड़ आसान पऱ व्यापारक रिक्स बड़ कठिन अछि। जितेन्द्र झा स्वरक माला गँथती अंशु हम सभ अपने भाषाकेँ हेय दॄष्टिसँ देखैत छी तें हमर भाषासाहित्य, गीतसंगीत आ संस्कृति पछुआ रहल अछि । ई कहब छन्हि अंशुमालाक । अंशु दिल्ली विश्र्वविद्यालयमे संगीतमे एम फ़िल कऽ रहल छथि। मैथिली गीत संगीतकेँ गुणस्तरीय बनएबाक लक्ष्य रखनिहारि अंशु मैथिलकेँ अपन भाषा-संगीत प्रतिक दृष्टिकोण बदलबापर जोड दैत छथि। अंशुमाला संगीतक विद्यार्थी छथि । दिल्ली विश्र्वविद्यालयमे एम. फ़िल.मे अध्ययनरत अंशुक माय हिनक पहिल गुरु छथिन्ह। ई माय शशि किरण झासँ मैथिली लोक संगीतक शिक्षा लेने छथि । तहिना एखन किछु बर्षसं ई रेडियो कलाकार हॄदय नारायण झासँ संगीत शिक्षा ल' रहल छथि । बाल कलाकारक रुपमे सीतायण एलबममे गाबि चुकल अंशु बिभिन्न रेडियो कार्यक्रम आ स्टेज प्रोग्राममे सहभागी भ' क' मैथिली गीत गाबि अपन स्वरसं प्रशंसा बटोरने छथि । एखन दिल्लीमे रहिकऽ संगीत साधनामे जुटल अंशु दिल्लीमे आयोजित विभिन्न कार्यक्रममे मैथिली गीत संगीत परसल करैत छथि । मैथिली भाषीमे अन्य भाषाक गीत संगीतक प्रति बढैत रुचि मैथिली गीतसंगीत लेल हितकर नञि रहल हिनक कहब छन्हि । दिल्लीमे आयोजित एकटा कार्यक्रमकेँ याद करैत ई कहैत छथि जे जाहि कार्यक्रममे लगभग ८ हजार मैथिल रहथि ताहि कार्यक्रममे चाहियोकऽ मैथिली गीत नहि गाबि सकलहुं । ओहि कार्यक्रममे भोजपुरीक डिमाण्ड पुरा करैत अंशुके मैथिली डहकन गेबाक लेल मोन मसोसिक' रह' पडलनि । मुदा अंशु स्वीकारैत छथि जे गायक स्रोताक रुचिक आगु विवश होइत अछि, 'जनता जे सुनऽ' चाहत हमरा सएह गाबऽ पडत अंशु कहलनि । पटनामे मैथिली गीत गाबिक स्रोताक तालिक गडगडाटिसं खुश हएबाक आदति पडि चुकल अंशुकेँ दिल्लीमे आबिकऽ मैथिल भाषीक बदलल सांगीतिक स्वादसं अकच्छ लागि गेल रहनि । मैथिलीमे लोकप्रिय धुनक अभाव रहबाक बात अंशु किन्नहु मान' लेल तैयार नहि छथि । धुन वा लयक अभाव नहि, स्रोता एहिसं अनभिज्ञ रहल हिनक दाबी छन्हि। मैथिली संगीतकर्मी एखनो आर्थिक समस्यासँ लडि रहल छथि, अंशु कहैत छथि । एहिक अभावक कारण प्यारोडी गीतक सहारा लेबालेल संगीतकर्मी बाध्य बनल अछि । मौलिक गीत,संगीतमे लगानीकर्ताक अभाव रहलासं सेहो प्यारोडी संगीत लोकप्रिय भऽ रहल अछि, हिनक कहब छनि । 'सभसँ पैघ कमजोरी स्रोतामे छै कलाकार तँ सभ ठाम हारल रहैया' प्यारोडी प्रेमीपर रोष प्रकट करैत अंशु कहैत छथि । मुदा मैथिलीमे स्तरीय गीत संगीत स्रोताकेँ भेटक चाही से अंशुक विचार छन्हि । मैथिली लोकरंग मन्चद्वारा दिल्लीमे आयोजित कार्यक्रममे स्रोतासँ भेटल वाहवाहीक उदाहरण दैत अंशु कहैत छथि जे स्रोताक मनोरन्जनक लेल स्तरीय कार्यक्रम सेहो हएबाक चाही । मैथिली रंगकर्ममे लगनिहारकेँ उचित सम्मान तक नञि भेटि सकल, अंशुमालाक अनुभव छन्हि । मैथिली कलाकारकेँ आब' बला दिनमे बहुत मान सम्मान भेटक चाहि, हम इएह चाहैत छी अंशु कहैत छथि। मैथिली संगीतकेँ एकटा ऊँचाई पर पंहुचएबाक लक्ष्य रखनिहारि अंशु मैथिली रंगकर्ममे एखनो लडकी लेल बहुतो कठिनाई रहल बतबैत छथि । अंशु आगु कहलनि-मैथिल समाजसँ जाधरि कलाकारकेँ सम्मान नञि भेटतै ताऽ धरि एहि क्षेत्रमे लडकी अपन प्रतिभा देखाब' लेल आगु नञि आओत। प्रिय पाहुन पारम्परिक मैथिली विवाह गीत समेटल एक गोट मैथिली क्यासेट आएल अछि प्रिय पाहुन । एहि क्यासेटमे मैथिलीक विवाहक परिछनसं विदाई धरिक गीत सभ संग्रहित अछि । अंशुमालाक एकल प्रस्तुति रहल इ क्यासेट मैथिली विवाह परम्पराक किछु खास वस्तुपर केन्द्रित अछि । एहिके विशेषता जयमाल गीत जे कि मिथिलाक मौलिक गीत अछि रहल गायिका अंशुमाला कहैत छैथ । जीमनार(वरियाती खएबाक काल गाआàल जाएबला गीत) आब बहुतोक ठोरपर नर्इं छढैत छन्हि, एहि क्यासेटमे एकरा महत्व देल गेल अछि । प्रिय पाहुन क्यासेट नव पुरान दुनू पीढीक लोक पसन्द क'रहल अंशुक कहब छन्हि । कन्या लगन गीत, परिछन गीत,देखु रसे रसे दुलहा, चाल कटाक्ष, देहरि छेकाओन, सिन्दुरदान आ समदाओनक गीत एहि क्यासेटमे संकलित अछि । एहि क्यासेटमे सीमाक भितर कएल जाएबल हंसी मजाक आ ताहिभितर नुकाएल प्रेमके देखएबाक प्रयास कएल गेल अछि । गंगा क्यासेटक प्रस्तुति रहल इ क्यासेट एखन मात्र अडियोक रुपमे अछि । क्यासेटमे गीत संकलन ह्मदय नारायण झा आ शशि किरण झा, संगीत कमल मोहन चुन्नुक छन्हि । गायिका अंशुमालाके एहि क्यासेटसं बहुत बेशी आशा छन्हि । एना आधुनिक गीतक बजारमे ई विवाह गीत अलग स्थान बनाओत से आशा कएल जा सकैया । महाप्रकाश (१९४६- ), जन्म वनगाँव, सहरसा। १९७२ ई. मे पहिल कविता संकलन "कविता संभवा"। सुभाष चन्द्र यादव आधुनिक मैथिली कथा-साहित्यमे एकटा नाम जे सर्वाधिक स्वीकृत आ प्रसिद्धि पौलक अछि, ओ थिक- सुभाष चन्द्र यादव। सुभाषक कथा-यात्रा पर दृष्टिपात करैत ई लगैत अछि जे ओ कथाक अन्वेषण कयलनि अछि। प्रायः लेखनक आरम्भ करिते ओ अनेक स्थान आ अनेक भाषाक यात्रा शुरू कयलनि। ई यात्रा वा भटकाव, जे हुनक नियति सेहो रहल अछि, हुनका अनुभव सँ लैस कयलक, तीक्ष्ण दृष्टि देलक आ अपन समकालीन सँ अलग विशिष्ट सांचामे ढालि देलक। ओ एकटा अलग भाषा-संस्कार, शब्द-संस्कार ग्रहण कयलनि जे अपन स्वरूप मे व्यासजन्य अछि। लेकिन ई स्वरूप कतहु सँ ओझराबैत नहि अछि, अपितु कलाक सहजता आ सहजताक कला केँ विलक्षण ढंगेँ उद्घाटित करैत अछि। ओ अपन कथा मे परिवेशक कोनो पैघ आयोजन कि पसारमे नहि फँसैत छथि; हुनक अनुभवसिद्ध भाषा, अविकल्प शब्द सहजहि अपेक्षित परिवेश आ यथार्थ केँ एकटा पैघ फलक दऽ दैत अछि। सुभाष कोनो राग-विरागक उत्तेजनामे जतेक लिप्त छथि, ओतबे निर्लिप्तो। सुभाषक जीवन आ साहित्य ऊपर सँ जतेक शांत आ स्थिर बुझाइत हो, भीतर सँ ओतबे अशांत आ अस्थिर अछि। हुनक अन्तर्दृष्टि स्याह आ सफेदकेँ निर्ममता सँ उद्घाटित करैत अछि। हुनक रचनाकार समयक समुद्र मे डूबि-डूबि मोती-माणिक ताकि अनैत अछि। एहि तरहेँ सुभाषक लेखन यथार्थक अमूल्य दस्तावेज बनि जाइत अछि। ज्योति प्रकाश लाल, ग्राम-जगतपुर, सुपौल, बिहार (भारत)। ज्योतिप्रकाश लाल विप्रो टेक्नोलोजी, हैदराबादमे सॉफ्टवेअर अभियन्ता छथि, स्पेन आऽ यू.एस.ए.मे पहिने काज कए चुकल छथि। एप्लिकेशन आऽ वेब आधारित सॉफ्टवेअरक निर्माणमे संलग्न। माइक्रोसॉफ्ट कॉरपोरेशन, वाशिंगटनमे विन्डोज ऑपेरेटिंग सिस्टमपर शोध आऽ विकासमे योगदान। स्कूल, कम्प्य़ुटर इंस्टीट्यूट आऽ सरकारी पोलीटेकनिकमे शिक्षणक पूर्व अनुभव। वर्तमानमे साक्षातकार आऽ व्यक्तित्व विकासपर पोथी लिखबामे व्यस्त। श्री लालमे संगठनात्मक शक्ति छन्हि आऽ ओऽ विभिन्न ग्रुप आऽ फोरमसँ जुड़ल छथि। किछु आर अनुभवी सहयोगीक संग ओऽ www.jyoticonsultant.com द्वारा मुफ्त कैरिअर सुझाव दए रहल छथि। आजुक समय मे कम्प्युटर शिक्षाक महत्व (Importance of Computer Education in Modern Days) कम्प्युटर: कि आ किएक? आजुक दिन मड कम्प्युटर शब्द किनको सँ बाँचल नहि अछि। ओना तँ हिन्दी वा मैथिली मँ कम्प्युटरक नामि अछि “संगणक” मुदा ऍहि नामि सँ बहुतो लोकनि अनभिञ होयब आओर ई शब्द किछ अनगराईल बुझायल जायति। खैर…. अपन मातृभाषा मैथिली मे एहेन ढेर अंग्रेजी शब्दक प्रयोग करैत छी जे विशुद्ध मैथिली मे विचित्र बुझाएल जायति छैक। आइ केँ दिन मे सभ केँ ‘कम्प्युटर साक्षर‘ (Computer Literate) होवाक चाही। ‘कम्प्युटर साक्षरता‘ (Computer Literacy) सँ मतलब जेँ कोनो भी आदमी ‘कम्प्युटर अनुप्रयोग‘ (Computer Applications) कँ प्रयोग मे लाबि सकैथि। दोसर तरहेँ यदि इ बात केँ कही तँ एकटा ऐहेन आदमी जेँ कम्प्युटर कँ प्रयोग कड केँ कोनो काम कड सकैथि। कम्प्युटर सँ लगभग सभ काम भड सकैति अछि। जाहि कारणे वर्तमान समय मे कम्प्युटर एकटा महत्वपुर्ण अंग बैनि गेइल छैक। आजुक छोट – मोट व्यापारीयो एकटा कम्प्युटर खरीदबाक आ कम्प्युटर ऑपरेटर रखवाक हिम्मत करैत छैथि। एकर लोकप्रियता आ माँगक पाँछा ढेर कारण अछि। उदाहरणक तौर पर देखि तड: जेना कोनो दरख्वास्त वा चिठ्ठी कोनो ओफिस मे देबाक जरुरत होयत अछि तड दरख्वास्त कँ टाइपराइटर (Typewriter) पर टाइप करा कँ देति छी, मुदा इ टाइप करायल दरख्वास्त मे बहुतो कमी आ अपुर्णताक संभावना रहैति छैक, जेना Spelling Mistakes के संभावना, पाराग्राफक Alignment मे समस्या, पृष्टक Margins मे समस्या, इत्यादि। इ सभटा समस्याक समाधान अपने कम्प्युटर सँ बिना बहुत कठिनाई सँ कँ सकैति छी। कम्प्युटर मे Spelling Checking केँ सुबिधा अछि जेँ अपने – आप बता दैति जेँ कोन – कोन शब्द्क हिज्जै (Spelling) गलत अछि। एकर अलावा कम्प्युटर Grammatical Errors सेहो पकैर सकैति अछि। इ सब सुविधा (Facilities) सँ लिखल दरख्वास्त वा चिठ्ठी मे कोनो Spelling Mistakes आ Grammatical Errors केँ संवाभना कम अछि। पाराग्राफक Alignment आ Margins केँ तरीका बहुत ही सुविधाजनक अछि। एकर अलावे एकटा दरख्वास्त वा चिठ्ठी लिखवाक आ ओकर छायाप्रति (Printouts) निकलवाक तक जेँ – जेँ सुविधा (Facilities) होवाक चाहि वो सभटा कम्प्युटरक सोफ़्ट्वेयर पैकेज (Software Package) मे छैक। वर्तमान समय मे कम्प्युटर बहुत आँगा बढि गेल अछि। Banking Sector मे जहिना धुम – धडाका सँ प्रयोग मे अछि तहिना Medical केँ क्षैत्र मे। जहिना रेलक सवारी केँ आरक्षण मेँ कम्प्युटरक Whistle बाजि रहल अछि तहिना हवाई जहाज केँ सेहो उड़ा रहल अछि। मोटा – मोटी यदि एक लाईन मे कही तँ नवयुग मे कम्प्युटर ओहिना सब क्षैत्र मे जरुरी अछि जहिना तरकारी मे नोन। वर्तमान समय मे कम्प्युटरक आवश्यकता केँ आधार पर इ कहल जा सकैति अछि जेँ यदि अहाँ कम्प्युटर नहि जानैत छी तँ अहाँ निरकक्षर छी। अंग्रेजी मे सेहो मुहावरा (Proverb) बनि गेल अछि – “If you are not a computer literate it means you are illiterate.” आइ केर समय मे जिनका पास Internet केँ सुविधा उपलव्ध अछि तँ हुनका लेल बहुतो चीज बदैलि गेल छैकि। यदि आइ केँ समय सँ दस – बारह साल पाँछा केँ समय मे जाई आ पत्राचारक माध्यम केँ बारे मे सोची तँ पहिले स्मृति-पट्ल पर थोक मे पोस्टकार्ड, अन्तरदेशी आ लिफाफाक खरीदवाक बात आबि जायति। एकर पाँछा एकटा कारण अछि जेँ ओहि समय मे पत्राचारक माध्यम लेल पोस्ट – ऒफिश केँ प्रखर भुमिका छलि। आओर सबहक लेल डाकक माध्यमे सुगम आ सरल छलि। पत्र कें अलावे गाम – गाम मे मनीओडर पहुँचेबाक मे सेहो डाक अग्रणी छळि। एवम प्रकारे डाक पत्राचारक आ मनीओडर वास्ते एक मात्र साधन बुझला जायति छलि। मुदा नहुँए – नहुँए समय आ दुनिया मे परिवर्तनक लीला जारी रहैत अछि। ई पत्राचारक परिवर्तनक लीला मे कुरियर (Courier) आ ई-मेल (E – mail / Electronic - Mail) आयलि आ धुम – धड़ाका सँ पत्राचारक माध्यम पर कब्जा कँ लेलक। आजुक दिन मे जिनका कुरियर वा ई – मेलक सुविधा अछि वो सब पोस्ट – ऒफिश केर रास्ता – पेरा बिसरि गेल छैथि। सब लोकनि जेँ प्रत्येक दिन डाकिया केर इंतजार मे दरवाजा पर एकटक लगा केँ बैठल रहैति छलाह वो सब आई डाकिया केँ चिन्हेतो नहि छैथि। कारण बहुतो पत्राचार ई – मेल सँ ही सम्भव भड जायति अछि, खास कड केँ शहरी परिवेश मे। किएक?? आ ई – मेल केँ प्रखर जगह बनेवाक कारण की? एकर कारण तँ बहुत अछि आ ताहि मे सब सँ पैघ कारण अछि जेँ ई – मेल बहुत ही सस्ता आ तेज अछि। सस्ता सँ मतलब अछि जेँ यदि हम एकटा दस पन्ना केँ पत्र कतोँ डाक सँ भेजब तँ जेँ भेजबा मे पाय लागत वो पाय ई – मेल भेजबा मे लागल पाय सँ बहुत ही ज्यादा होयत। आओर तेज सँ मतलब जेँ डाक सँ भेजल पत्र यदि गन्तव्य स्थान पर चारि दिन मे पहुँचत तँ ई – मेल कयलि पत्र दुइ मिनट मे गन्तव्य स्थान पर पहुँचि जायति। एकर अलावा डाक सँ भेजल पत्र कँ गन्तव्य स्थान सँ ही पावि सकैति छी मुदा ई – मेल केँ कोनो स्थान पर पावि सकैत छी। मतलब डाक सँ भेजल पत्र यदि कोलकत्ताक केँ अछि तँ वो पत्र कोलकत्ता मे ही प्राप्त भड सकैत अछि, मुदा ई – मेल मे वो बात नहि अछि; ई – मेल कँ विश्व केँ कोनो जगह मे पावि सकैत छी। आइ यदि कोनो शहर मे नौकरी खोजवा लेल जाइ तँ साक्षात्कार (Interview) लेबे बलाक पहिल प्रश्न यैहि होयत जेँ “कम्प्युटर केँ जानकारी अछि? ” वा “Do you know computers?”. आइ छोट – मोट अस्पतालो मे बिल वा रसीद कम्प्युटर सँ निकालल जायति अछि। यैहि काम पहिल समय मे बिना कम्प्युटर सँ होयति छलि। यदि विकसित शहर केँ किराना दुकान कँ देखि तँ वो दुकान सँ भी कोनो समान खरीदवाक वाद कम्प्युटर सँ ही निकलल रसीद भेटत। दैखि तँ कम्प्युटर पुरा दुनिया मे छा रहल अछि चाहे वो दवाई केँ दुकान मे हो वा बैक मे। कम्प्युटर प्रयोग करवा सँ मुख्य लाभ: (अ) समयक बचत (Saving of Time): कम्प्युटर प्रयोग करवा सँ समयक बहुत बचत होयति अछि। जेँ कोनो हिसाब – किताब करवा मे ७ – ८ घंटा लगैति अछि, ओहि काम कड कम्प्युटर ७ – ८ मिनट मे कड सकैति अछि। (ब) एकदम सही परिणाम (Accuracy in Results):कम्प्युटर कोनो भी हिसाब – किताबक परिणाम सही दैति अछि। कोनो तरह केँ हिसाब मे गलती नहि करैत अछि। (स) दुबारा काम करवाक जरुरत नहि (Elimination of Repeatitive Tasks): कोनो काम एक बेर जँ कम्प्युटर सँ भड गेल अछि तँ ओहि काम केँ Save कड केँ रखवाक बाद दुबारा ओहि काम केँ बिना करनाय परिणाम पावि सकैति छी। (द) आदमी केँ मेहनतक बचत (Saving of Man Powers): यदि एक आदमी सँ कम्प्युटर प्रयोगक उपरांत आठ घंटा मे सँ छः घंटाक बचि जायति अछि तँ वो छः घंटाक उपयोग कोनो दोसर काम मे भड सकैति अछि जाहि सँ उत्पादन (Production) बढ़ि सकैति अछि। (म) थकावटक संभावना नहि (Lack of Tiredness or Always attentive): आदमी लगातार ४ – ५ घंटा काम करत तँ छःटम घंटा मे काम करवाक रफ्तार आ फुर्ती कम भड जायति अछि। मतलब आदमी मे थकान महसुस करवाक अवगुण वा गुण अछि मुदा कम्प्युटर एक मशीन रुप मे थकान अनुभव नहि कड सकैति अछि। कम्प्युटर आठ घंटा लगातार काम करक उपरांतो नंवम घंटा मे काम ओहिने रफ्तार आ फुर्ती सँ करैत अछि जाहि रफ्तार आ फुर्ती सँ वो पहिल घंटा मे करल छलि। कना पाबि कम्प्युटरक शिक्षा: सब नौकरी करैय बला दुइ तरहेँ कम्प्युटरक शिक्षा पावैति अछि। पहिल, रोजगार करैय बला केँ अपन कम्पनी सँ खुद कोनो – कोनो कम्प्युटर साक्षरता योजना केँ अन्तरगर्त्त शिक्षा वा ट्रेनिंग (Training) मिल जायति अछि। दोसर, नौकरी खोजनिहार केँ नौकरी ढुढ़वा सँ पहिले कोनो डिपलोमा (Diploma) केँ कोर्स (Course) करै परैति छैक। कम्प्युटर शिक्षा (Computer Education) आजुक दिनक जरुरत बनि गेइल छैक। जिनका – जिनका नौकरी लेवाक अछि हुनका सभकेँ प्रारंभिक जानकारी (Fundamental Knowledge of Basic Computer Operation) चाहवे करी। कम्प्युटर शिक्षित (Computer Literate) होवाक लेल अनेको साघन अछि, जेना: (अ) Short - term Computer Course or Diploma: आजुक दिन शहर – शहर मे अनेको कम्प्युटर सँस्थान खुजलि अछि। जाहि सँ तीन, छः वा बारह महीना केँ कोर्स (Course) कड सकैति छी। कुछ कोचिंग सँस्थान (Coaching Institute) वगैरह सेहो खुजलि अछि जाहि जगह सँ जरुरतक क्रैश कोर्स (Crash Course) सेहो कड सकैति छी। (ब) कोनो कम्प्युटर कोच (Computer Coach) सँ: अगर सुविधा भड सकै तँ कोनो कम्प्युटर जानिहार कड पकैर सकैति छी। जेना घर मे केओ भाई, कोनो चाची वा कोनो दोस्त, तँ हुनका सँ सेहो कम्प्युटर सीख सकैति छी। Privite Jobs मे तत्कालिक रुप सँ कोनो सर्टिफिकेटक (Certificate) केँ जरुरत नहि होयत। बाद मे मँगला पर कम्प्युटर कोर्स कड केँ सर्टिफिकेट द्ड देबैकि। (स) किताबक मदद सँ: अगर घर मे कम्प्युटर अछि तँ, जे विषय वा सोफ्ट्वेयर पैकेज (Software Package) सिखवाक अछि, वो किताव बाजार सँ खरीद केँ कम्प्युटर सीख सकैति छी। (द) CD - Rom केँ सहायता सँ: बाजार मे बहुतो CD – ROM (Compact Disk – Read Only Memory) वा CD बहुतो कम्प्युटरक Basic Courses वा Operations केँ लेल मिलैत अछि। जाहि सँ लगभग सभटा Basic Computer Operations सीखल जा सकैति अछि। गाँव – देहहात मे कम्प्युटरक उपयोग आजुक समय मे ओरगेनिक खेती (Organic Farming) केँ बहुत बोल – बाला अछि। आओर ढ़ेर Software Packages कृषि केँ लेल Applied Computer Science केँ आधार पर उपल्ब्ध अछि जाहि सँ धान, गेहुँ इत्यादि फसल सभ केँ उत्पादन मे नया रुप देल जा सकैत अछि। साथे – साथ Pest Control, Weed Control, Plant diseases इत्यादि के सेहो पह्चानि सकै छी। इ सभक वास्ते Multi - Media (जेँही सँ फोटो देखल जा सकैति अछि आ सँगे – सँग आवाजो सुनल जा सकैत अछि) आधारित Software Package (Software Application) बनल अछि आओर सुबिधापुर्वक देखल आ सुनल जा सकैति अछि। एकर अलावा इ Software केँ मदद सँ भिन्न प्रकारक कृषि – संबंधी Decision - Making सेहो भड सकैति अछि। यदि कम्प्युटर शिक्षित छी तँ आइ केँ दिन मे बैंकिग ए.टी. एम (ATM), जेँ छोट – छोट शहर आ बाजार मे उपलब्ध अछि, कँ ओपेरेट करवा मे आसानी होयत। पैसा निकाल – बाहर करैय मे कोनो दिक्कत नहि होयति। एकर अलावे लगभग सभ बैंक मे Internet Banking केँ सुबिधा उपलब्ध अछि। इ सुबिधाक उपयोग वो व्यक्ति कँ सकैति छैथि जिनका Computer Operation बुझल होय। आइ केँ समय मे ए.टी. एम (ATM) आकारक रेलवे आरक्षण मशीन लगभग प्रत्येक रेलवे स्टेशन पर मिल जायति। आ ओकर Operation कम्प्युटर जँका होयति छैक। कम्पुटर सिखला उपराँत आरक्षण करवा मे सुविधा होयति। इ एकटा कम्पुटर सीखल व्यक्ति कँ Indirect फायदा होयत। आजुक दिन मे गाँव – देहहात मे Teachers Training मे काफी दिक्कत आ Staff केँ कमी होयति अछि। यदि कम्पुटर सँ Training देल जाय तँ Training ज्यादा प्रभावी आ सफल होयति। कम्पुटर सँ Video - Conferencing भ सकैति अछि। Video - Conferencing सभ क्षैत्र मे बढ़िया भुमिका निभायत, चाहे Pest Control वा Teachers Training होय। कम्पुटर शिक्षित व्यक्ति यदि कोनो बाहरक यात्रा (Tour and Travels) करवा लेल सोचेत छैथि तँ हुनका इन्टरनेट सँ सभटा Tourism Department केँ जानकारी प्राप्त भ सकैति अछि। वो Online Hotel Booking, Ticket Booking इत्यादि कँ सकैति छैथि। गाँव मे कियो Printing Press स्थापित करवा लेल सक्रिय छैथि तँ हुनक बढ़िया Publishing केँ लेल कम्पुटर आ Publishing Software के व्यवस्था करैक चाही। गृहणी / अवकाश – प्राप्त व्यक्ति के लेल कम्प्युटर शिक्षा हम एक बेर गाम पर एकटा एम. ए. (M. A.) पास भौजी, जेँ पटना मे रहैति छथिन्ह, सँ पुछ्लहु, ’ये भौजी, ये भौजी, अहाँ पटना मे रहैत छी, खाली समय मे जखन बच्चा सब स्कूल मे रहैत अछि, कम्पुटर किएक नहि सीख लैत छी, आगु काम दैति’। जबाब मे भौजी बाजलिह, ’धोड़ि जाउ, हम की करब कम्पुटर – फम्प्युटर सीख कैय’। मुदा आइ छोट – छोट शहरक नजरिया बदलि गेल छैकि। छोट – छोट शहर मे कौल – सेन्टर (Call - Centre), डाटा – ईन्ट्री (Data - Entry) इत्यादि खुजि गेल छैक आ ओकर काम मिलैत छैक। कौल – सेन्टर मे अँग्रेजी के अलावा हिन्दी मे सेहो Customer Handling होयत छैक। डाटा – ईन्ट्री जेँ एकटा पढ़्ल – लिखल औरत भि अपन ४ – ५ घंटा समय द्ड कड पुरा कड सकैति छैथि। इ काम एकटा अवकाश – प्राप्त व्यक्ति भि कड सकैति छैथि। छोट – मोट जगह पर DTP, Accounting Package वा Graphics Designing जानकार आदमी केँ जरुरत होयति छैक आ इ कोर्स करवा मे कोनो ज्यादा समय नहि लागैति छैक। ३ – ६ महिना मे कियो आदमी इक बढ़िया Trainer केँ Guidance मे Expert भड सकैति छैथि। कोन कम्प्युटर खरीदी? Branded वा Assembled Computer? पहिल चीज जेँ अहाँक जरुरत आ बजट केहेन अछि? Branded कम्प्युटर मे fixed type केँ Machinery रहैति छैक आ Assembled मे अपन जरुरतक मुताबिक Machinery लगवा सकैति छी। तुल्नात्मक ढ़ंग सँ देखि तँ Assembled कम्प्युटर सस्ता परत। मुदा जखन कम्प्युटर Assemble कराबी तँ जान-पह्चान बला दुकान वा आदमी सँ करायब तँ बढ़िया रहत। कोन Type केँ कम्प्युटर खरीदी? Laptop वा Desktop कम्प्युटर खरीदी? Laptop ऐहेन कम्प्युटर अछि जकरा अहाँ कतों आराम सँ Move कड सकैति छी, सुतैत – बैठेति काम कड सकैति छी। मोटा – मोटी कही तँ Laptop वो व्यक्ति कड बढ़िया सँ Suit करैति छैक जेँ व्यक्ति कड सदिखन Mobile रहै पड़ेति छैक। विद्दार्थी लोकनि लड Desktop Computer हि बढ़िया होयति छैक। कुर्सी पर बैठ कड केँ काम करवा मे आलस आ सुस्ती ऐवाक संभावना कम रहैति छैक। विद्दार्थी लोकनि केँ आलस कम होयतैन तड पढ़वा मे ज्यादा मन लागतैन। केहेन Configuration केँ कम्प्युटर खरीदी? जखन कम्प्युटर खरीदवाक हुए तँ इ बात ध्यान मे राखल जाय जेँ कम्प्युटर लेबे केँ कि उद्देश्य अछि? आ कम्प्युटर सँ कि काम करवाक अछि? कोनो सामान्य Data Entry आ Composing केँ वास्ते Hi - Fi कम्प्युटर केँ जरुरत नहि अछि। हाँ, जेँ केयो D.T.P. (Desk Top Publishing) वा Publisher केँ कामक लेल कम्प्युटर खरीदवाक इच्छुक छैथि तँ हुनका लेल उत्तम कम्प्युटर होवाक चाहि। ओना एकटा बात इलेक्ट्रोनिक सामान (Electronic Goods) मे सदिखन ध्यान मे राखि जेँ आइ जेँ समान केयो खरीद कड रहल छैथि, छः मासक उपरांत ओहि समान सँ उत्कृष्ट समान आ सस्ता सेहो बाजार मे उपलब्ध भड जायति। ताहि कारणे कम्प्युटर जखन खरीदी तँ Advanced वा Latest Configuration केँ साथ खरीदी। जाहि कारणे भविष्य मे २ - ३ सालक उपरांत Compatibility बनल रहत। कम्प्युटर खरीदवा मे मुख्यतः CPU आ ओकर Speed, RAM केँ क्षमता (Capacity), Hard Disk केँ Storage Capacity आ Monitor केँ ध्यान मे राखवाक प्रयास होयवाक चाहि। Hardware Recommendation for a new computer(एकटा सलाह) CPU:2.0/ 2.6 GHz Pentium IV RAM: 512 MB/ 1 GB Warranty: सब Hardware पर १ – ५ सालक वारंटी मिलत, इ लेल दुकानदार सँ खुलाशा कड केँ बात कड लेबा सँ बढ़िया रहत। सँगे – सँगे कम्प्युटर पर जेँ भि Software Package वा Operating System चाहैत छी वोहि लेल सेहो दुकानदार के पहिले बता देला सँ ठीक रह्त। कम्प्युटर बना रहल अछि आदमी केँ जीवन सरल: पहिले हि ढ़ेर गप – शप कम्प्युटर केँ उपयोगिता आ लाभ पर भड चुकल अछि, जाहि मे देखल गेल जेँ कम्प्युटरक सहयोग सँ शीघ्रता, सही आ संगठित रुपेन काम सम्भव अछि। मुदा किछ बात और अछि जेँ सभ व्यक्ति केँ लेल उपयोगी अछि। जेना ई-मेल एकटा ऐहेन बढ़िया सुविधा अछि जकरा सँग सुबह, दुपहरिया, साँझ वा राति, सदिखन उपयोग मे ला सकैति छी। विद्दार्थी लोकनि खातिर बढ़िया – बढ़िया पुस्तक CD केँ रुप मे उपलब्ध अछि जाहि सँ सभ विषयक तैयारी आ Exercise इक सही (Systematic) रुपेन सम्भव अछि। बहुतो संख्या मे इन्टरनेट पर Online Books आ Exercise सेहो उपलब्ध अछि। जाहि सँ विद्दार्थी लोकनि केँ पढ़ाई – लिखाई सुगम भड सकैति अछि। अखबार घर पर मँगावी वा नहि मँगावी, सँगे – सँगे घर पर अखबार पढ़वाक मौका लागे वा नहि लागे, मुदा इन्टरनेट केँ द्वारा सभटा अखबार, चाहे हिन्दी मे हो वा अंग्रेजी मे, पढ़ि सकैति छी। मतलब अनेको अखबार आ E-Journels इक कम्प्युटरक माउस (Mouse) केँ Click सँ पाबि सकैति छी। एकर अलावे सभटा टी.वीक (TeleVision) News Channels केँ Website सेहो उपलब्ध अछि, वो Website सँ Audio आ Video दुनु तरहक समाचारक आनंद लड सकैति छी। ऐतवे नहि Online Channels सेहो उपलब्ध अछि, जे ठीक TV केँ प्रतिरुप अछि। बाजार मे TV Tunner Card सेहो उपलब्ध छैक। इ Card कम्प्युटर मे लगा कड TV केँ आनंद कम्प्युटर सँ हि भेट सकैति अछि। मनोरंजन केँ बहुतो साधन मे कम्प्युटर सँ FM Radio वगैरह सेहो सुनल जा सकैति छैक। आइ – कालि बहुतो Online Games आ Games CD बाजार मे उपलब्ध छैक जाहि सँ बच्चा लोकनि सहित सभ समुह केँ व्यक्ति बढ़िया मनोरंजन कड सकैति छैथि। एकर अलावा अनेका – नेक सुविधा अछि जाहि केँ विवरण इ Article केँ Coverage सँ बाहरि अछि। आशा अछि अपनेक लोकनि कड इ लेख उपयोगी होयति। एकर अतिरिक्त हम इक मैथिल होवाक नाते अहाँ केँ कोन तरहेँ, कोनो सहायता वा दिशा – निर्देश कम्प्युटरक क्षैत्र मे कड सकैति छी? हमर शोभाग्य होयति अपनेक कोनो सहायता करवा मे। जिनको कोनो जानकारी लेवाक हुए तँ हमर E-Mail (JYOTIPRAKASH.LAL@GMAIL.COM) पर संपर्क कड सकैति छी। हमर नि:स्वार्थ इच्छा अछि जेँ मिथिलाक घरे – घरे कम्प्युटर जानिहार हुए। आशा अछि जल्द हि अपनेक लोकनिक समच्छ हमर लिखल एकटा किताब, जकर नामि अछि “HOW TO GET A JOB”, प्रस्तुत होयति आ जाहि सँ सब लोकनि (रोजगार वा वेरोजगार) केँ इक बढ़िया नौकरी (Job) पाबि मे मार्गदर्शन करत। अंत मे कहल जा सकैति अछि जेँ कम्प्युटर केवल उपयोगी नहि अछि साथे – साथे नौकरी पावैक लेल एकटा साधनो बनि गेल अछि। जितमोहन झा वृद्ध-बुजुर्गक सामाजिक स्थितिपर- थम्हने राखू ई डोरी (वृद्ध-बुजुर्ग समस्यापर लेख) टूटल ऐनक (चश्मा), फाटल-पुरान किताब आर कपड़ा की इएह अछि बुजुर्गक पहचान? काल्हि तक हमर आँगुर थाम्हि कए हमरा चलब सिखाबएबला हमर माँ- बाबूजी आइ अपन लरखड़ाबैत कदमसँ बेर-बेर खसि कए सम्हरि कए चलब सीखि रहल छथि ! बुढापा जिनगीक एक एहन कटु सत्य अछि जकरा ज़हरक घूँट बूझि कए आजुक बुजुर्ग पीबि रहल छथि! अपनेक अनदेखीसँ परेशान बुजुर्ग आइ तिरस्कृत आऽ अपमानित भए जीबाक लेल विवश छथि ! घरसँ वृधाश्रमक दिस पलायन करैत बुजुर्ग जिंदगीक एक कड़वा सत्यकेँ उजागर करैत छथि! कहल गेल अछि "जे माँ हमरा जन्म देलखिन हुनकर दिल (आत्मा) नञि दुखेबाक चाही ........” मुदा ई बात आइ खाली खिस्से-पिहानी धरि सीमित अछि! छोट बच्चाक डरलापर तुरंत झटसँ अपन हृदयसँ लगाबएबला, अपन आँचलसँ हुनकर आँखि पोछए वाला, स्वयं भूखल-प्यासल रहि कए अपन बच्चाकेँ पेट पालए वाला बुजुर्ग आइ अपने घरमे अपन पहचान खोजैत नज़रि अबैत छथि! एक निरीक्षणसँ पता चलल की अपन देशमे १२ व्यस्कक पाछाँ एक बुजुर्ग छथि! जाहिमे ७ करोड़क उम्र ६० सालसँ बेशी छनि! हुनकामे सँ २.७ करोड़क अनुपातमे बुजुर्ग कुनू ने कुनू बीमारीसँ ग्रसित छथि! बुजुर्ग लोकनिक ई अनदेखी युवा वर्गक भविष्यकेँ कतेक अंधकारमय बनेतनि, ई हम सभ निक जेकाँ जनैत छी ! कनी सोचू जे काल्हि तक जिनकर एक आवाज़ पर घरक सदस्य काँपि उठैत रहथि ! आइ हुनका "पागल" कहि कए संबोधित कएल जाइत छनि! आब हुनकर आवाज़ घरक सदस्य तँ दूर वरन सून दिवार, खिड़की आर दरवाजासँ टकरा कए स्वयं हुनके तक पहुँचैत छनि ! हमर कहबाक मतलब ई जे हमरा सभ केँ किछु एहन करबाक चाही जाहिसँ वर्तमान आकि भविष्य सुधरए नञि की ऐहेन करी जाहिसँ आगा चलिकए हमरा सभकेँ अपन भविष्यसँ मुँह नुकाबए पड़ए! बुजुर्ग माँ-बाबूजी कुनू कूड़ा-करकट नञि बल्कि हमर घर-आँगनक शोभा छथि! जिनका हमर प्यार, देखभाल आकि अपनापनक जरुरत छनि, ओतय आँगनक घन गाछ (पेड़) छथि, हमसभ ओई गाछक टहनी -पत्ता छी, जखन ओऽ गाछ मजबूत रहत तखने हम सब हरल-भरल रहब ......... बुजुर्ग माँ-बाबूजी रिश्ताक मजबूत डोरी छथि, हुनका थम्हने रहू। ....... कन्या भ्रूण हत्या, प्रकृति के साथ खिलवार पिछला छुट्टीमे एक सालपर हम गाम गेल छलहुँ। जहिया गाम पहुँचलहुँ ओकर दोसरे दिन पता चलल की हमर बचपनक दोस्तक बहुत जोर मोन ख़राब छनि ! आर ओ अस्पतालमे भरती छथि ! खबर जहिना हम सुनलहुँ अस्पतालक लेल चलि देलहुँ ! हमरा संग हमर पत्नी सेहो चलि देलीह, अस्पताल पहुंचला पर पता चलल जे कुनू चिंताक बात नै सब ठीक ठाक अछि ! एक घंटाक बाद हुनका (हमर दोस्तकेँ) छुट्टी मिल जेतनि, बहुत दिनक बाद अस्पताल आयल छलहुँ, इच्छा भेल कनी चारू दिस घुमि - फिरि ली। मनमे अस्पतालक लेल बहुत जिज्ञासा छलए ! हम आर हमर पत्नी जहिना दोस्तक वार्डसँ बाहर निकललहुँ, हमर नज़रि अपन चचेरा भैया - भाभी पर पड़ल, अचानक हुनका सभकेँ अस्पतालमे देखिकेँ हम चौक गेलहुँ ! हमर नज़र एकाएक भाभीक उदास, कनमुँह चेहरा पर परल .....पुछलियनि की बात ... मुदा ओ किछु जबाब नञि देलीह। हमर पत्नी कातमे बजा कए हुनकर पीड़ा सुनलन्हि ! दुबारा पुछलासँ भाभी अपन पीड़ा नञि रोकि सकलीह, हुनकर पीड़ा हुनकर आँखिसँ छलकि उठलनि, पता चलल जे दू गोट कन्याक जन्मक बाद आब तेसर बेर फेरसँ कन्याकेँ नञि बर्दाश्त करैक चेतावनी भैया हुनका पहिने द् चुकलकिन-ए ....पता चलल गर्भ परिक्षण लेल भैया भाभीकेँ अस्पताल अनने छथि ! गर्भमे पोसा रहल बच्चाक प्रति पिताक खौफनाक इरादासँ उपजल भयक भाव भाभीक चेहरा पर साफ - साफ देख्अलहुँ ! बादमे हमरा आर हमर पत्नी केँ कतेक बुझेलापर भैया भाभीकेँ वापस घर लए गेलखिन ! संयोगवश अगला संतानक रूपमे हुनका बालकक प्राप्ति भेलनि .... ओना भ्रूण परिक्षण प्रतिबंधित अछि आर सरकार एकरा लेल बाकायदा कानूनो बनेने छथि ! मुदा ई की ? लागैत अछि पिछला दरवाजाक संस्कृति अस्पतालों के नञि छोड़ने अछि, तखने तँ भैया बहुत आसानीसँ भाभीकेँ गर्भ परीक्षण करबाबए लेल चलि देने छलथि। हम तँ कहए छी चाहे सरकार लाखो कानून बनबथि, लाखो कड़ासँ कड़ा सजा तय करथि लेकिन जा तक हम सब स्वयं अपना तरफसँ कुनू कदम नञि उठायब ई कानूनक हेब नञि हएबक समान अछि ! आइ तक भ्रष्ट्राचार, बालश्रम, शोषणक विरुधो सरकार बहुत कानून लागू केलथि मुदा कि समाजमे एकर रोकथाम भs सकल ? नञि ! आर यदि अपने ई नञि हेबाक कारणक पता करब तँ पायब कि शायद हम खुद कतहु ने कतहु कुनू न कुनू प्रकारे एकर दोषी छी ! हम सब परिस्थितिक संग कुनू तरहक समझौता करबाक वजाय ओकरा सदा बदलबाक फेरमे नए रहैत छलहुँ चाहे ओकरा लेल हमरा सभ के कुनू तरहक हथकंडा कियेक नञि अपनाबए परए .... हम सब चुकय नञि छी ! हम तँ पूछे छी जे कि कारण अछि जे लड़कीक जन्म भेला पर आइयो मूह सिकोरल जाइत अछि ? शायद हुनकर परवरिश, शिक्षा, विवाह आदिमे आबै वाला तमाम मुश्किलक कारण एहि तरहक व्यवहार कएल जाइत अछि ! मुदा कि लड़काक जन्म भेनेसँ ई तमाम समस्या समाप्त भs जाइत अछि ? लड़कोकेँ तँ परवरिश करए परए-ए ? हुनकरो शिक्षा,नौकरीक लेल दर-दर भटकए पड़ैत अछि ! आर विवाह ........! यदि एहि गतिसँ कन्या भ्रूण हत्या होइत रहत तँ बूझि लिअ जे सब लड़काकेँ कुंआरे रहए पड़त ! उदाहरण स्वरूप अपने हरियाणामे लड़कीक संख्यामे लगातार दर्ज कएल गेल कमी देख सकैत छी, हरियाणामे विवाह लेल लड़की नञि भेटए छनि। ओहि ठामक लोकनीकेँ दोसर राज्यमे लड़कीक तलाश करए पड़ैत छनि ..... कनी सोचु अगर पूरा देशमे ईएह स्थिति भs जाएत तँ की होएत ? हम नीक जेकाँ जनैत छी जे अपने एहि बातकेँ ध्यानमे नञि राखब आर यदि राखबो करब तँ दोसर केँ उदाहरण देबाक लेल ! लेकिन कि अपने स्वयं कन्या भ्रूण हत्या रोकएमे दोसरकेँ जागरूक करब ? अपनेकेँ नञि लागैत अछि जे प्रकृति द्वारा निर्धारित जीवनकेँ सुचारू रूपसँ चलबै लेल एहि गाड़ीक दुनु पहियाक समान रूपसँ आवश्यक अछि ! आर कन्या भ्रूण हत्या यानी कि प्रकृतिक संग खिलवाड़ अछि ! एहि खिलवाड़केँ रोकए लेल हमरा सभकेँ एकजुट हेबए परत आर एतबे नञि एहि मानसिकतोकेँ बदलए पड़त कि वंशबेल खाली आर खाली लड़के चलेता, तखने हम सही रूपामे आधुनिक कहाएब .... हम लड़की वला छी जनाब ... आजुक परिवेशमे बेटी सर्वगुण संपन्न आर आत्मनिर्भर अछि ! हुनकर विवाहके जखन बात आबैत छलए ताँ दुनु पक्ष (वर - वधु) क भावनाकेँ महत्त्व देवक चाही ! हम तँ कहब आब खाली लड़किये टा नञि लड़को सभ मानसिक रूपसँ अइ बातक लेल तैयार रहथि कि शायद शिक्षा, पसंद - नापसंद, व्यवहार के लऽ कऽ ओहो कुनू लड़की द्वारा नकारल जाऽ सकैत छथि ! ई सुनि कऽ किछ अटपटा जेकाँ जरुर लागल हैत किये कि एहि तरहक भाषा तँ हमेशा लड़का (वर पक्ष) वला करैत छथि ! मुदा आब जमाना बदलि गेल यs ओ समय बीत गेल अछि जै समयमे बेटी वला अपन बेटीक लेल एक योग्य वरक तलाशमे भूख, प्यास तक बिसरि जाइत रहथि ! अपन बेटी के हाथ पियर करब ओ सब अपन जीवनक सभसँ पैघ परीक्षा बुझैत रहथिन ! आब सभ जगहक बाद अपनों मिथिलामे ई सभ परिभाषाकेँ एक नया सिरासँ गढल जाऽ रहल अछि ! आब हर माँ-बाबूजी अपन बेटीकेँ ससुराल भेजब दोसर क्रम आर बेटीक आकांक्षा हुनकर स्वतंत्र विचार राखएकेँ पहिल क्रममे राखए के प्रयास कऽ रहल छथि ! आइ के माता - पिता अपन बेटीक भविष्यसँ आशान्वित छथि, चिंतित नञि ! आइ बेटीपर कुनू तरहक दबाब नञि रहल ! आइ हुनको अपन भावी पति (वर) केहेन होइन ई तय करऽ के अधिकार छनि ! कुनू बात के लेल आइ ओऽ वाध्य नञि छथि ... ओना आइयो अपन मिथिलामे शादी - विवाह बुजुर्गे तय करैत छथि मुदा रिश्तामे लड़की के दखल एक सुखद बदलाव अछि, अपन समाजमे आइयो लड़का वला होई के झूठा अकड़क चलन पूर्ण रूपसँ नञि मिटल अछि ! कतो नञि कतो अपनेकेँ लड़का वला दोहरी मानसिकताक चेहरा लऽ कए घुमैत नजर परले हेता ! पछिले सालक बात छी हम एक परिचितक बेटीक रिश्ताक संदर्भमे बहुत परिवारसँ मिललहुँ ! जै मे किछ अनुभव बहुत कटु रहल ! तिरस्कृत सन् बर्ताव देखलासँ मोन बहुत आहत भेल ! हम सब परिवार के आबैत घरी अपन नाराजगीयो अप्रत्यक्ष रूपसँ व्यक्तो केलियनि ! दुखक बात अछि की ऐहेन शुष्क आर रुखल व्यवहार करएसँ लोक शर्मावैतो नञि छथि ! समाजमे नज़र दौरेलासँ देखब की हर जगह लड़की वालाकेँ आत्मसम्मानक साथ खिलवार भऽ रहल अछि ! एक बेर हमर पड़ोसीक बेटीक विवाह तय भेल, वर पक्ष वाला लड़कीयो देखि कऽ गेलथि लड़की हुनको सभकेँ पसंद भेलनि। सभ बात बिचार सेहो तय भऽ गेलनि। लड़की पक्षकेँ लड़का पक्ष वालाक फोनक इंतजार रहनि। दुइ दिनक बाद लड़का वला फ़ोन केलखिन कि हमरा सोचक लेल समय चाही हमर बेटाक लेल पाँच गोट रिश्ता आयल छल। अपने के लेल विचार करब ! आब अहीं कहू, ई सब की भऽ रहल अछि ? एकर मतलब साफ छलए, की लड़कीक भावनाकेँ बूझए वाला कियो नञि छथि ! हमरा हँसीक संगे संग दुखो होइत छल जे हर बेर रिश्ता तय करबाक हक सिर्फ लड़के वाला कऽ होइ छनि ! लड़की वालाकेँ पूछए वाला कियो नञि छथि ओ एक कठपुतलीक समान कियो हुनका हाँ कहनि तय्योमे खुश नञि कहनि तय नया सिरासँ रिश्ताक तलाशमे लागि जाइत छथि ! हुनकर दुःख दर्द कियो नञि बूझक प्रयास करए छथिन .... हम तँ कहब ई लड़का वालाक ढकोसला आब बेसी दिन नञि चलत। आइ सभ क्षेत्रमे लड़की मौजूद छथि, सर्वगुण संपन्न छथि, संगे आत्मनिर्भर सेहो छथि ! आब खाली लड़किये नञि लड़कोक मानसिक रूपसँ अइ बातक लेल तैयार रहए पड़तनि की शायद शिक्षा, पसंद - नापसंद, व्यवहारकेँ लऽ कऽ ओहो एक लड़की द्वारा नकारल जाऽ सकैत छथि ! विवाहक समय लड़का वाला उर्फ़ बरियातीगन स्व्यंकेँ बढ़ि-चढि कऽ देखाबए लेल बहुत तरहक हरकत करैत छथि, भद्दा मजाक, तरह - तरहक फरमाइश, लड़की वालाक द्वारा कएल गेल व्यवस्थापर बेवजह नाराजगी या भोजन पसंद नञि आबय के शिकायत ! लड़की वाला अपन हैसियतक अनुसार या ओइसँ बेसी निक आवभगत आर व्यवस्था राखैत छथि ! मुदा एहि तरहक बर्ताव हुनकर सब कएल गेलपर पानि फेर दैत छनि ! बेटीक विवाह शुभ - शुभ पूर्ण होइन अइ दबाबमे ओऽ चाहियो कऽ किछु नञि बाजि पावैत छथि ! सभ लड़कीक माँ - बाबूजीक फर्ज बनैत छनि कि ओऽ अपन कर्तव्यक प्रति जागरूक रहथि, संगे ओऽ अपन बेटीक भावनाक सम्मान सेहो करथि ! यदि कुनू लड़का वाला रिश्ताक लेल हँ कहैत छथि तँ ओकरा अपन भाग्य मानि कऽ अपन बेटीक हँ या नञि केँ नज़र अंदाज नञि करी, हुनकर राय जरुर ली .... विवाहक अइ पवित्र बंधनकेँ बेरीसँ मुक्त राखी ! लड़का वाला अहं आर लड़की वाला बेचारगीकेँ बिसरि जाओ ! बेटेक जेकाँ बेटियोक जन्म सुखद अछि। हर माता - पिता गर्वसँ कहू ...... हम लड़की वला छी जनाब........... नारीक प्रति दोहरा दृष्टिकोण कियेक ....? नारी अपन संस्कारसँ परिवार, समाज आर राष्ट्र कए एक नव दिशा प्रदान करैत छलीह ! अपन मिथिला आर भारतीय संस्कृतिमे नारीकेँ देवीक स्वरुप मानल गेल छलनि ! मुदा दोसर तरफसँ ओइ देवीक संग पशुवत व्यवहार कएल जाइत छनि! हुनका खाली जिम्मेदारी आऽ उत्तरादायित्व ढोबए बला साधन मानल जाइत छनि! वर्तमान समयमे नारीकेँ दोहरी भूमिकाक निर्वाह करए पड़ैत छनि! यदि आइ कोनो महिला उच्च पदपर आसीन छलीह तँ हमर पुरुष प्रधान समाज हुनकासँ ईहो अपेक्षा राखैत छल की ओ रुढिवादी, नियम परंपराक पालन करैत.....अहीँ कहू ई कोना संभव अछि ? घर होए वा बाहर सभ ठाम नारी (औरत) क शोषण देखल गेल अछि, चाहे ओ मानसिक रूप सँ होए वा शारीरिक रूपसँ ! विकट परिस्थितिसँ गुजरबाक कारण वर्तमान समाजमे नारीक जीवन जटिलसँ जटिलतम भs रहल छनि! आजुक भागदौड़ भरल जिंदगीमे उच्च पदपर आसीन नारी कs जते काजक दबाब निरंतर बनल रहए छनि ओतहि दोसर तरफ हुनका परिवारक जिम्मेदारी बखूबी एहि तरहेँ निभाबए पड़ए छनि, की कतहु कोनो कमी नञि रहनि, हुनकर एहि तरहक जिंदगी हुनका खाली मशीनक एक कलपुर्जा बना कs राखि देने छनि! परिवार आर अपन कर्मक्षेत्रमे सामंजस्य बैसाबएमे नारी स्वयंकेँ असमंजसमे पबैत छलीह ! ई सब उत्तरादायित्वकेँ निभावैतो यदि हुनकामे कोनो कमी रहि जाय छनि तँ हम सब हुनका अपराधीक भांति समाज व परिवार कट्घारामे ठाढ़ कऽ दैत छी ! अइ सभक बिच ओ अपन स्वयंक इच्छा, कल्पना आर ख़ुशीकेँ अपन मनेमे दफन कऽ दैत छथि ! एतेक सभ जिम्मेदारीक निर्वाह करब बादो हुनका नञि तँ घरमे नञि कार्यक्षेत्रमे काजक प्रति संतोषजनक स्थिति प्राप्त होइत छनि!! दोसर तरफ जे नारी नौकरी नञि करैत छथि हुनकर स्थिति तँ कोल्हूक बरदक समान छनि ! परिवारक सभ सदस्य अपन इच्छाकेँ हुनकापर थोपि दए छनि, तकर बावजूदो हुनका सभकेँ ताना सुनए पड़ए छनि ! एक आज्ञाकारी वधु, पत्नी, माँ बनि अपन पूरा जीवन समर्पित कऽ देब हुनकर अभीष्ट छनि ! एहि तरहक दावा कएल जाइत अछि की नारीकेँ लऽ कऽ समाजक दृष्टिकोणमे बदलाव आयल अछि, मुदा रुढिवादी परंपरावादी वर्जना तँ आइयो विद्यमान अछि ! हमसब जते दुई कदम आधुनिक समाजक दिस बढेने छी ओतबे दस कदम पीछाँ लौटल छी, तँ आखिर हम सब कतए छी ? संघर्ष आर सामंजस्यक पाटमे नारीक जीवन पूर्ण रूपेँ पिसि गेल अछि ! बाहरी आवरणमे बदलाव जरुर भेल छल मुदा आंतरिक आवरण जहिनाक तहिना अछि ! समाज आर परिवारक कठोर व्यवहारक कारण नारीक संवेदना भीतरे-भीतर दफन नञि होइन, ताहि हेतु हमरा सभकेँ चाही की समाज आऽ परिवारक नियम, अनुशासन केँ कड़ा बंधनमे नञि जकड़ि कऽ हुनका प्रति सहयोगात्मक रवैया अपनाबी ....... नवेन्दु कुमार झा समाचार वाचक सह अनुवादक (मैथिली), प्रादेशिक समाचार एकांश, आकाशवाणी, पटना बिहारक लोक पर्व-छठि पावनि-तिहार हमर सभक सभ्यता-संस्कृतिक परिचायक अछि। हिन्दू धर्ममे पाबनिक विशेष महत्व अछि। हिन्दू धर्मावलम्बी सभक कतेको पाबनिमे छठिक विशेष महत्व अछि। ई पाबनि बिहारक लोक पाबनिक संग महापाबनि सेहो अछि। ई सम्पूर्ण बिहारक संग पूर्वी उत्तर प्रदेश आ महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान आ दिल्लीक बिहारी बहुल क्षेत्र सभमे श्रद्धाक संग मनाओल जाइत अछि। पड़ोसी देश नेपालक मैथिली बहुल क्षेत्रमे सेहो एहि पाबनिक आयोजन कएल जाइत अछि। अगाध श्रद्धा, कड़गर व्रत साधना, एकान्त निष्ठा आ आत्म संयम बाला एहि पाबनिक बिहारमे ओतबे महत्व अछि जतेक महाराष्ट्रमे गणपति महोत्सव, पश्चिम बंगालमे दुर्गापूजा तथा पंजाबमे वैशाखीक अछि। बिहारक किछु क्षेत्रमे एहि पाबनिकेँ “डाला छठि” सेहो कहल जाइत अछि। ई पाबनि सूर्योपासना आ साधनाक महापाबनि अछि। शक्तिक देवी दुर्गाक आराधनाक समाप्तिक बाद प्रदेशमे छठि पाबनिक आगमनक अभास होमए लगैत अछि आ प्रकाशक पाबनि दीया बातीक समाप्तिक बाद लोक एकर तैयारीमे लागि जाइत छथि। एहि पाबनिमे भगवान सूर्य देव आऽ षष्ठी माय (छठि माता)क आराधना एक संग कएल जाइत अछि। ओना तँ सूर्य देवक पूजाक परम्परा अति प्राचीन अछि आऽ कतेको हजार वर्षसँ हमर सभक सांस्कृतिक विरासत अछि मुदा सूर्य देवक संगहि षष्ठी मायक पूजा एक संग कहियासँ शुरू भेल से एखनो रहस्य बनल अछि। छठि पाबनिक आयोजन वर्षमे दू बेर होइत अछि। पहिल बेर चैत मासमे आ दोसर बेर कार्तिक मासमे छठिक पाबनि होइत अछि। कार्तिक मासमे एहि पाबनिक आयोजन विस्तृत रूपमे होइत अछि। एहि अवसरपर प्रवासी बिहारी आवश्यक रूपसँ अपन प्रदेश आऽ गाम अबैत छथि आऽ अपन घरपर रहि सम्पूर्ण परिवारक संग एहि पाबनिकेँ मनबैत छथि। श्रद्धा आऽ आस्थाक संग एहि पाबनिकेँ कएलासँ मनोबांक्षित फलक प्राप्ति होइत अछि। धार्मिक ग्रन्थ सभमे ई जनतब देल गेल अछि जे सूर्य देवक पूजा प्राचीन कालसँ प्रसिद्ध अछि आऽ बिहारमे एकर प्रसिद्धि सहज रूपमे देखल जाऽ सकैत अछि। चारि दिन धरि चलै बाला ई धार्मिक अनुष्ठान कार्तिक शुक्ल चतुर्थीसँ शुरु होइत अछि आऽ सप्तमीकेँ समाप्त होइत अछि। पहिल दिन “नहाय-खाय” होइत अछि। एहि दिन पबनैतिन सुविधानुसार नदी, पोखरि आऽ इनार आदिमे स्नान कऽ अरबा चाउरक भात, बुटक दालि आऽ सजिमनिक तरकारी भोजन करैत छथि। पबनैतिनक भोजन कएलाक बाद घरक आन सदस्य भोजन ग्रहण करैत छथि। एहि दिन छठि पाबनि करबाक संकल्प लेल जाइत अछि। दोसर दिन पंचमीकेँ खरना होइत अछि जाहिमे पबनैतिन भरि दिन उपास रहि नदी, पोखरि आ इनारसँ पानि आनि पीतल, ताम्बा अथवा माटिक बर्तनमे खीर, चाउरक आटाक गुलगुला बनबैत छथि आऽ सांसमे नव वस्त्र पहिर चाँद देखि बनल सामग्री, केरा आऽ दूध सूर्य भगवानकेँ समर्पित कऽ शान्त-चित्त भऽ प्रसाद ग्रहण करैत छथि। खरनाक समय कोनो आबाज नहि होमए क चाही। खरनाक विधि विभिन्न स्थानपर बदलैत अछि मुदा मूल रूपमे कोनो परिवर्तन नहि होइत अछि। एकरा बादसँ पबनैतिन उपासमे रहैत छथि आऽ चारिम दिन उगैत सूर्यकेँ अर्घ्य दऽ प्रसाद ग्रहण कऽ उपास तोड़ैत छथि। खरनाकेँ किछु क्षेत्रमे “लोहंडा” सेहो कहल जाइत अछि। तेसर दिन षष्ठीकेँ पबनैतिन नदी, पोखरि आ इनारमे पानिमे ठाढ़ भऽ कतेको तरहक पकबान, फल-फूल, सुपारी, पान आदिकेँ कांच बासक बनल सूपमे सजा ओहिमे दीप जड़ा डुबैत सूर्य दिस मूँह कऽ भगवान सूर्यकेँ अर्घ्य चढ़बैत छथि। परिवारक आन सदस्य सेहो सूपक आगाँ पानि अथवा दूध ढ़ारि अर्घ्य दैत छथि। षष्ठी दिन भगवान सूर्यकेँ अर्घ्य देलाक बाद प्रदेशक किछु क्षेत्रमे “कोसी भरबाक” परम्परा सेहो अछि। एहि दिन अर्घ्य देलाक बाद स्त्रीगण अपन अंगनाकेँ गोबरसँ निपैत छथि आ ओहिपर अरिपन दैत छथि। एकर बाद चारि टा पैघ कुसियारसँ मंडप बना एकर बीचमे माटिक बनल हाथी रखैत छथि जकर चारु कात दीप बनल रहैत अछि। सभ दीपकेँ मालासँ सजा ओहिमे घी ढ़ारि जड़ाओल जाइत अछि। हाथीक ऊपरमे भगवान भाष्करकेँ अर्पित कएल जाए बाला प्रसाद, ठकुआ, केरा आऽ आन फलकेँ माटिक बर्तनमे राखल जाइत अछि। दीप राति भरि जड़ैत रहैत अछि आ स्त्रीगण मंडपक चारूकात बैसि भरि राति जागल रहि छठि माइक गीत गबैत छथि। भरि राति दीप जड़बऽ आऽ गीत गाबएमे बितैत अछि। षष्ठी जकाँ चारिम दिन सप्तमीकेँ उगैत सूर्यक भिनसरमे समर्पित कएल जाइत अछि। एकर बाद कोसी उठा लेल जाइत अछि। अर्घ्य देलाक बाद सभ लोक पबनैतिनकेँ प्रणाम कऽ आशीर्वाद लैत छथि। लोक पबनैतिनक आशीर्वादकेँ सूर्यदेवक आशीर्वाद मानैत छथि। अमीर-गरीब, बूढ़-जवान, मालिक-नोकर, स्त्री-पुरुष सभ भेदभाव बिसरि पबनैतिनसँ आशीर्वाद लैत छथि। तेजीसँ बदलैत परिवेशक बावजूद ई परम्परा निरन्तर चलि रहल अछि। सप्तमी अर्घ्यक बाद छठि मायक प्रसाद ग्रहण कऽ पबनैतिन अपन उपास समाप्त करैत छथि आ भोजन ग्रहण करैत छथि। एहिक संग चारि दिनक ई धार्मिक अनुष्ठान समाप्त होइत अछि। अन्तिम दिनकेँ पारन सेहो कहल जाइत अछि। बिहारमे ई पाबनि हिन्दूक संगहि मुसलमान आ सिख सेहो मनबैत अछि। कटिहार जिलाक लक्ष्मीपुर आऽ भोजपुर जिलाक कोइलवर गाममे तीनू धर्मक लोक एहि पाबनिकें मनबैत छथि। लक्ष्मीपुर गामक पश्चिम स्थित नदीक किनारमे तीनू समुदायक श्रद्धालु एकट्ठा होइत छथि आऽ एक संग सूर्यदेवकेँ अर्घ्य दैत छथि, ओतहि, कोइलवर गाममे हिन्दू रोजा रखैत छथि तऽ मुसलमान छठिक पाबनिमे हिन्दू सभक घरमे सूप पठा कऽ एहि पाबनिकेँ मनबैत छथि। प्रदेशक सांस्कृतिक सम्पन्नताक उदाहरण प्रस्तुत करैत एहि पाबनिमे उपयोगमे आबए बाला वस्तु सभ खेतीक व्यवस्थाक अर्थशास्त्रीय स्वरूप प्रस्तुत करैत अछि। ई एकमात्र एहन धार्मिक अनुष्ठान अछि जाहिमे पंडितक कोनो हस्तक्षेप नहि होइत अछि। बिना पंडितक सम्पन्न होमएबाला एहि पाबनिमे भगवान आऽ भक्तक संग सीधा सम्पर्क होइत अछि। एहि पाबनिमे स्त्रीगणक महत्वपूर्ण भूमिका होइत अछि जे अपन शरीरकेँ तपा कऽ पूरा भक्तिक संग नियम-निष्ठा आऽ पवित्रताकेँ बनाएल रखबाक प्रति विशेष रूपसँ सतर्क रखैत छथि। एहन धारणा अछि जे एहि पाबनिकेँ नियम निष्ठा आऽ पवित्रताक संग नहि कएलासँ एकर विपरीत असरि पबनैतिन आऽ ओकर निकट सम्बन्धी आऽ परिवारपर तुरत पड़ैत अछि। ई मान्यता अछि जेऽ पवित्रताक संग ई पाबनि नहि कएलासँ असाध्य रोग उत्पन्न होएबाक संभावना रहैत अछि। दोसर दिस ईहोमानब अछि जे एहि पाबनिकेँ नियमित रूपेँ कएलासँ सफेद दाग जेहन रोगसँ मुक्ति सेहो भेटैत अछि। एहि पाबनिक बढ़ैत लोकप्रियताकेँ देखि आब पुरुष सेहो ई पाबनि करए लगलाह अछि। भगवान सूर्यक पूजा भारतक संगहि इन्डोनेशिया, जावा, सुमात्रा आदि कतेको देशमे कएल जाइत अछि, मुदा अन्तर अतबा अछि जे स्थानक परिवर्तनक संग एकर स्वरूप बदलि जाइत अछि। सूर्योपासनाक चरचा विश्वक प्रायः सभ प्राचीन साहित्यमे अलग-अलग रूपमे कएल गेल अछि। एकर चर्चा वेदमे तँ अछिए संगहि सूर्योपनिषद, चाक्षुपोपनिषद, अक्ष्युपनिषद आदिमे सेहो अछि मुदा सूर्य देवक संग सूर्य देवक संग षष्ठी देवी पूजा एक संग कहियासँ कएल जाऽ रहल अछि एकर प्रमान एखन धरि अनुपलब्ध अछि। कार्तिक मासक षष्ठी तिथि षष्ठी देवी कऽ अछि जे भगवान कार्तिकेयक पत्नी छथि। ई पाबनि सूर्य देव आ षष्ठी देवी एक संग करबाक पाबनि अछि जे पूरा भक्तिक भावक संग मनाओल जाइत अछि। छठिक गीतमे सेहो सूर्य देव आऽ षष्ठी मायक स्तुति एक संग कएल गेल अछि। सूर्योपासनाक संग एहि धार्मिक अनुष्ठानक संबंधमे कतेको कथा प्रचलित अछि। एकटा मान्यता ई अछि जे मधुश्रवामे च्यवन ऋषिक आश्रम छल। ऋषिक पत्नी सुकन्याक पिता जंगलमे शिकार खेलऽ गेलाह तँ हुनका द्वारा छोड़ल गेल तीर च्यवन ऋषिक एकटा आँखिमे लागि गेल जाहिसँ हुनक एकटा आँखि चलि गेल। एहि घटनासँ सुकन्या व्याकुल भऽ गेलीह आऽ जंगलक भ्रमण करए लगलीह। जंगलमे एक दिन एकाएक सूर्य देवक पूजामे लागल एकटा नाग कन्यासँ हुनक भेँट भेल। ओ एहि सम्बन्धमे नागकन्यासँ जनतब लेलनि तँ नागकन्या जनौलक जे षष्ठी आऽ सप्तमीकेँ सूर्य देवक पूजा कएलासँ भक्तक सभ मनोकामना पूरा होइत अछि। एहन चरचा होइत अछि जे च्यवन ऋषि आऽ सुकन्या सूर्य देवक पूजा कएलनि आऽ हुनक आँखि ठीक भऽ गेल। प्राचीन साहित्यसँ ईहो जनतब होइत अछि जे औरंगजेब सेहो औरंगाबाद स्थिति देवक प्रसिद्ध सूर्य मन्दिरमे १६७७ सँ १७०७ ई. धरि नियमित रूपसँ छठिक अवसरपर सूर्य देवक आराधनामे लागि जाइत छल। एहनो चरचा भेटैत अछि जे महाभारतक समय पांडव जखन सभ किछु हारि गेलाह आऽ जंगलमे घुमैत छलाह जखन विपत्ति एहि समयमे द्रौपदी सूर्यदेवक १०८ नामसँ सूर्यक पूजा कएलनि आऽ छठिक व्रत कएलाक बाद पांडवकेँ अपन राज-पाट वापस भेटि गेल। एहि घटनाक बाद लोक सभ एकटा “महाभारत पर्व” सेहो कहए लगलाह। आम जन समूहक मध्य ई धारणा अछि जे एहि धार्मिक अनुष्ठानकेँ निष्ठाक संग कएलासँ मनोवांक्षित फलक प्राप्ति तँ होइते अछि संगहि संतानोत्पत्ति आऽ पारिवारिक शान्ति आऽ चैनक संग असाध्य रोगक निवारण सेहो होइत अछि। सम्पूर्ण बिहारमे पूरा उत्साह आऽ भक्तिभावक संग मनाओल जाएबाला एहि पाबनिक अतेक महत्व अछि जे गरीब सेहो भीख माँगि कऽ ई पाबनि करैत अछि। कतेको लोक आऽ संगठन एहि अवसरपर फल-फूल आऽ पूजाक सामान बाँटि पुण्यक भागी बनैत छथि। खरना आऽ सप्तमीक दिन लोकसभ माँगियो कऽ प्रसाद जरूर ग्रहण करैत छथि। पबनैतिन सेहो बिना कोनो भेदभावक प्रसाद बँटैत छथि। एहि अवसरपर पूरा प्रदेशमे नदी, पोखरि, कुआ आदिक सफाई कएल जाइत अछि। सम्पूर्ण प्रदेशक शहर गामक सड़क, गली, मोहल्लामे अद्भुत सफाई आऽ प्रकाशक व्यवस्था कएल जाइत अछि। शहर सभमे नदी-पोखरिपर बढ़ैत भीड़ देखि आब लोक सभ अपन मोहल्ला आऽ घरक छत अथवा लग पासमे खाली स्थानपर पोखरि जकाँ संरचना बना ओहिमे पानि जमा दैत छथि आऽ पबनैतिन ओहिमे ठाढ़ भऽ सूर्यदेवकेँ अर्घ्य समर्पित करैत छथि। ई एकमात्र अवसर अछि जखन लोक सभ साक्षात अराध्य देवक पूजा करैत छथि। एहि अवसरपर सम्पूर्ण बिहारमे अमीर-गरीब, ऊँच-नीच आऽ मालिक-मजूरक बीच दूरी समाप्त भऽ जाइत अछि। सभ केओ तन, मन, धनसँ एहि पाबनिमे लागि जाइत अछि आऽ सम्पूर्ण वातावरण छठिमय भऽ जाइत अछि। बिहारमे सूर्योपासनाक प्रमुख केन्द्र समाचार वाचक सह अनुवादक (मैथिली), प्रादेशिक समाचार एकांश, आकाशवाणी, पटना छठि पाबनि बिहारक एकटा लोक पर्व अछि जे प्रायः सभ घरमे मनाओल जाइत अछि। पूरा प्रदेशमे आस्था आऽ श्रद्धाक संग ई चारि दिवसीय अनुष्ठान सम्पन्न होइत अछि। बिहारमे सूर्योपासनाक कतेको केन्द्र अछि। बिहारमे स्थित कतेको सूर्य मन्दिर श्रद्धालु सभकेँ भगवान सूर्यक अर्घ्य देबाक लेल आकर्षित करैत अछि। प्रदेशक संगहि देशक कतेको आन क्षेत्रसँ श्रद्धालु एहि मन्दिर सभमे आबि सूर्य देवक आराधना करैत छथि:- देवक सूर्य मन्दिर:- औरंगाबाद जिला मुख्यालयसँ बीस किलोमीटरपर देवमे स्थित सूर्य मन्दिर मगध विशिष्ट संस्कृति, आस्था आऽ विश्वासक सर्वाधिक सशक्त आऽ विराट प्रतीक अछि। ई प्राचीन सूर्य मन्दिर अपन शिल्प आऽ स्थापत्यक प्रभावशाली सौम्यक अभिव्यक्त करैत अछि। सूर्य देवक ई विशाल मन्दिर पूर्वाभि,उख नहि भऽ पश्चिमाभिमुख अछि। बिना सिमेन्ट या गार चूनाक आयताकार, वर्गाकार, अर्द्धवृत्ताकार, गोलाकार आऽ त्रिभुजाकार आदि कतेको रूप आऽ आकारमे काटल पत्थरकेँ जोड़िकऽ बनाओल गेल अछि। गोटेक सौ फीट ऊँच एहि सूर्य मन्दिरमे सूर्य देवक तीन रूपक उदयाचल, मध्यांचल तथा अस्ताचलमे विद्यमान छथि। एहि मन्दिरक कारी पाथरिक नक्कासी, अभिषेक करैत अस्ताचलगामी सूर्यक किरण आऽ एहि मन्दिरक महिमाक कारण लोक सभमे अटूट श्रद्धा अछि। एहि कारण प्रति वर्ष चैत आऽ कातिक मासमे देशक कतेको क्षेत्रसँ पबनैतिन एहि ठाम आबि सूर्यदेवकेँ अर्घ्य दैत छथि। पोखरामाक सूर्य मन्दिर- लखीसराय जिला सूर्यगढ़ा प्रखण्डक पोखरामा गाममे स्थापित सूर्य मन्दिर सूर्य पंचायतन मन्दिर अछि जतए पाँचो देवता शिव, गणेश, विष्णु आऽ देवी दुर्गाक संग सूर्यदेव विराजमान छथि। एहि तरहक प्रदेशक ई पहिल मन्दिर अछि। एकर निर्माण सूर्य देवक प्रेरणासँ भेल अछि। १२०० फीटमे बनल एहि मन्दिरक बगलमे एकटा पोखरि सेहो अछि जतए भगवान सूर्यकेँ अर्घ्य देल जाइत अछि। लोक सभक मान्यता अछि जे सच हृदय, स्वच्छ भाव आऽ पवित्र मनसँ एहि मन्दिरमे छठिक पूजा कएलासँ दैहिक, दैविक आऽ भौतिक पापसँ मुक्ति तँ भेटैते अछि, सूर्य नारायण मनोनुकूल फल सेहो दैत छथि। पोखरामा गाम किउल-भागलपुर रेल खण्डपर कजरा स्टेशनसँ पाँच किलोमीटर उत्तर पश्चिममे तथा सड़क मार्गसँ ई गाम लखीसराय –मुँगेर पथपर लखीसरायसँ पन्द्रह किलोमीटर आऽ अलीनगरसँ चारि किलोमीटरपर अवस्थित अछि। उलारक सूर्य मन्दिर- राजधानी पटनासँ पचास किलोमीटर दूर दुल्हिन बाजार आऽ पालीगंजक मध्य उलार मोड़सँ एक किलोमीटर दूर अवस्थित उलारक सूर्य मन्दिर अपन विशिष्ट पहचानक कारण प्रसिद्ध अछि। द्वापर कालमे भगवान श्रीकृष्णक वंशक राजा एहि मन्दिरक निर्माण करौने छलाह। गोटेक तीस फीट ऊँच एहि मन्दिरक इतिहास आऽ महत्वक कारण आइयो सभ रवि दिन कतेको हजार श्रद्धालु पैदल चलि कऽ एहि ठाम पूजा-अर्चना करैत छथि। छठिक अवसरपर एहि ठाम पैघ संख्यामे लोक छठि करऽ अबैत छथि। मधुश्रवाक सूर्य मन्दिर- राजधानी पटनासँ सटल अरवल जिलाक मधुश्रवामे सेहो एकटा प्राचीन सूर्य मन्दिर अछि। कहल जाइत अछि जे मधुश्रवामे च्यवन ऋषिक आश्रम छल। पौराणिक कथाक अनुसार सुकन्या आऽ च्यवन ऋषिक देवार लागल शरीर एहि ठाम ठीक भऽ गेल छल आऽ हुनक फूटल आँखि पूर्ववत भऽ गेल। सुवासक सूर्य मूर्ति- मुजफ्फरपुर जिलाक गायघाट प्रखण्ड अन्तर्गत दरभंगा-मुजफ्फरपुर राष्ट्रीय उच्च पथपर लढ़ौर पंचायतक सुवास गाममे सेहो भगवान सूर्यक एकटा प्राचीन मूर्ति अछि। एहि गामक लोक एकर पूजा अपन ग्राम देवताक रूपमे करैत छथि। जानकारीक अभावमे ई मूर्ति एकटा छोट मन्दिरमे एखनो स्थापित अछि। हालाँकि एखन धरि प्रदेशक सूर्योपासनाक केन्द्रमे एकर पहचान नहि बनि सकल अछि। उमगाक सूर्य मन्दिर- औरंगाबाद जिलाक मदनपुर उमगा पर्वत श्रृंखलापर चौदह सौ वर्ष पूर्व एकटा सूर्य मन्दिरक निर्माण कराओल गेल छल जकर शिल्प देवक सूर्य मन्दिरसँ मिलैत अछि। गोटेक साठि फीट ऊँच ई मन्दिर बिना सिमेन्टक प्राचीन पाथरसँ बनल अछि। एहि ठाम सात टा घोड़ापर सवार भगवान सूर्यक प्रतिमा स्थापित अछि। देवसँ गोटेक बारह किलोमीटरपर ई मन्दिर अवस्थित अछि। बेलाउरक सूर्य मन्दिर- भोजपुर जिलाक उदवन्तनगर प्रखण्डक दक्षिण-पूर्व कोनपर आरा-सहार सड़कपर स्थित बेलाउर सूर्य मन्दिरक लेल प्रसिद्ध अछि। बेलाउरक नयनाभिराम एहि मन्दिरमे सूर्य देवक भव्य प्रतिमा प्रतिष्ठित कएल गेल अछि। एहि ठाम प्रदेशक कोन-कोनसँ लोक सभ मनता मानए अबैत छथि। औंगारीक सूर्य मन्दिर- नालन्दा जिलाक एकंगरसराय प्रखण्डक एकंगरडीह बजारसँ गोटेक पाँच किलोमीटर दक्षिण ऐतिहासिक औगारी गाममे बनल सूर्य मन्दिरमे सूर्य देव आऽ भगवान विष्णुक उनीस टा प्राचीन प्रतिमा अछि। भगवान सूर्यक बारह टा राशि अछि। एहि सभ राशिक प्रतीक देश भरिक बारह टा सूर्य मन्दिरमे सँ एकटा औंगारीक सूर्य मन्दिर अछि। मन्दिरक लग एकटा विशाल पोखरि सेहो अछि। एहि पोखरिमे स्नान कऽ सूर्य देवकेँ एहि ठाम अर्घ्य देबाक विशेष महत्व अछि। छठिक अवसरपर औंगारीमे पैघ मेला सेहो लगैत अछि। हवेली खड़गपुरक सूर्य मन्दिर- मुंगेर जिलाक हवेली खड़गपुर मुख्यालयसँ गोटेक तीन किलोमीटर उत्तर पश्चिम जमुई-मुंगेर रोडपर अवस्थित सूर्य मन्दिरक निर्माण पाँच दशक पूर्व छात्र सभक पूजा-अर्चनाक लेल बनाओल गेल छल। एकर निर्माण पंडित देवदत्त शर्मा छात्र-छात्रा सभक लेल कएने छलाह जाहिसँ छात्र सभ भगवानक सजीव रूपकेँ महसूस करथि। हालाँकि आब ई मन्दिर भक्त सभक लेल आराधनाक प्रमुख केन्द्र बनि गेल अछि। ई मन्दिरक बाहरी भाग एखनो अर्द्धनिर्मित अछि आऽ स्थानीय जनताक अपेक्षाक शिकार अछि तथापि छठिक अवसरपर पैघ भीड़ एहि ठाम लगैत अछि आऽ चारि दिवसीय एहि अनुष्ठानक अन्तिम दिन “पारण” केँ भगवान सूर्यक प्रतिमापर अर्घ्य चढ़ैबाक लेल होड़ लागल रहैत अछि। बड़ीजानक सूर्य मन्दिर- किशनगंज जिलाक अररिया-बहादुरगंज रोडसँ दक्षिण बड़ीजानमे भगवान सूर्यक भव्य पुरान मन्दिर अछि। एहि मन्दिरक गर्भ गृहमे उत्तर पालकालीन छओ फीटक सूर्यदेवक प्रतिमा स्थापित अछि। बड़गावक सूर्य मन्दिर- नालन्दा जिलाक प्राचीन नालन्दा विश्वविद्यालयक खंडहरसँ गोटेक दू किलोमीटर उत्तर-पश्चिममे स्थित बड़गाव नामक स्थानपर भगवान सूर्यक प्राचीन आऽ भव्य मन्दिर अछि। मन्दिरसँ सटल सूर्य तालाब सेहो अछि। मान्यता अछि जे एहि तालाबमे स्नान कएलासँ कुष्ट रोगक निवारण होइत अछि। बेशी संख्यामे लोक एहि ठाम छठि करैत छथि। देव कुण्डक सूर्य मन्दिर- औरंगाबाद जिलाक पंचरुखिया मोड़सँ पाँच किलोमीटर उत्तर हंसपुरा नामक गामसँ तीन किलोमीटर पूरबमे स्थित अछि देवकुण्डक सूर्य मन्दिर। एहि मन्दिरक दरबाजा पूर्व दिस अछि। चैत आऽ कातिक दुनू मासक छठिमे एहि ठाम भव्य मेला लगैत अछि। पंडारक सूर्य मन्दिर- पटना जिलाक बाढ़ अनुमंडलसँ गोटेक दस किलोमीटर दूर पंडारक गामक पश्चिम भागमे गंगा नदीक कातमे सूर्य देवक मन्दिर स्थित अछि। एहि मन्दिरक निर्माण द्वापर युगमे श्री कृष्णक अष्ट महिषिमे सँ एक सभसँ सुन्दरी जावन्तीक पुत्र साम्बा करौने छलाह। मन्दिरक गर्भगृहमे कारी पाथरपर पुरान शैलीमे सूर्य देवक सम्मोहक आऽ दुर्लभ प्रतिमा अछि। देशक बारह टा प्रमुख सूर्य मन्दिरमे सँ ईहो एकटा सूर्य मन्दिर अछि। विद्यापति स्मृति दिवस (११ नवम्बर २००८) पर विशेष-यशस्वी कवि छलाह महाकवि विद्यापति मिथिलांचलक पावन भूमि कतेको महापुरुषकेँ जन्म देलक अछि जकर यश अपना देशक अलावा विदेशमे सेहो पसरल। एहने महान विभूतिमे सऽ एक छलाह “महाकवि विद्यापति” जिनक रचनामे कल्पनाक बदला यथार्थक दर्शन होइत अछि। ओ ओहि गीतकारमे सऽ एकटा छलाह जिनक रचित गीतकेँ मिथिलांचलेमे नहि अपितु बंगाल, आसाम, उत्तर प्रदेश आदिक संगहि सम्पूर्ण विश्वक रसिक मंडली सम्मान देलक अछि। उत्तर भारतमे प्रचलित आर्यभाषा क्षेत्रमे विद्यापति सनक सम्मान प्रायः ककरो नहि भेटल अछि। असमिया, हिन्दी, बंग्ला आ मैथिली एहि चारि टा भाषाकेँ हिनक गीत एकटा नव प्रेरणा देलक अछि। महाकवि विद्यापति एकटा सुयोग्य कवि, लेखक, भक्त, राजनयिक, समाज सुधारक, स्मृतिकार, संगीतज्ञ आ ज्योतिषविद् छलाह। एहि सभ गुणक कारण आइयो हुनक नाम एहि तरहे लेल जाइत अछि जेना ओ आईयो हमरा सभक मध्य उपस्थित छथि। छह सहस्त्राब्दीक बादो आईयो हुनक विद्वता आ गुणक प्रसिद्धि मिथिलांचलक संगहि सम्पूर्ण भारत आ विश्वमे पसरल अछि। महाकविक जन्म दरभंगा जिलान्तर्गत बिस्फी गाममे भेल छल। ओ सम्पन्न परिवारक छलाह। हुनक जन्मक सम्बन्धमे विद्वान सभक मध्य मत भिन्नता अछि। विभिन्न उपलब्ध सामग्रीक आधारपर विद्वान लोकनि हुनक जन्मक संबंधमे अनुमान लगबैत छथि। स्व. नागेन्द्रनाथ गुप्तक अनुसार महाकविक जन्म १३५७ ई. मे भेल छल। जखन कि स्व. हर प्रसाद शास्त्री हुनक जन्म १३५० ई. मानैत छथि। मुदा मिथिलांचलक विद्वान् महाकविक जन्म अनुसंधानक आधारपर १३६० ई. मानैत छथि तथापि बहुमत अछि जे महाकवि १३६० ई. सँ १४४८ ई. क मध्य विराजमान छलाह। कहल जाइत अछि जे ओ पैघ आयु पएने छलाह। कतेको राजघरानाक उतार-चढ़ावकेँ ओ अपना आँखिसँ देखने छलाह। बुढ़ राजा-रानीसँ लऽ कऽ राजकुमार-राजकुमारी सभक संग हुनक निकटवर्ती संबंध रहल। हुनक पिता गणपति ठाकुर दरभंगा राजक राज मंत्री छलाह। हुनक पितामह जयदत्त पैघ विद्वान आ उच्च कोटिक संत छलाह। स्वयं विद्यापति सेहो जन्महिसँ ओइनवार वंशक राजा सभपर आश्रित छलाह। ओ महाराजा शिव सिंहक प्रधान पार्षद आ विश्वसनीय अमात्य छलाह। महाराज शिव सिंह अपन राज्याभिषेकक समय हुनक जन्मभूमि “बिस्फी” गाम हुनका दानमे दऽ देने छलाह। शिव सिंहक बाद सेहो विद्यापति, महारानी विश्वास देवी, महाराजा नरसिंह तथा महाराजा धीर सिंहक दरबारमे प्रधान राज पण्डितक रूपमे छलाह। अपन दीर्घकालिक जीवनमे महाकवि कतेको ग्रन्थक रचना कएलनि। हुनक एहि ग्रन्थ सभक अध्ययन कएलासँ हुनक बहुमुखी प्रतिभा स्पष्ट होइत अछि। हुनक समयमे आबा जाहीक अतेक सुविधा नहि छल एकर बावजूद ओहि समयक मिथिलांचलक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल सभक विवरण “भू परिक्रमा” नामक ग्रन्थमे प्रस्तुत कऽ आबए बाला पीढ़ीक लेल पैघ उपकार कएलनि। संस्कृत भाषामे सेहो हुनक लेखनी चलल जाहिमे “शैव सर्वस्वसार”, “शैव सर्वस्वसार प्रमाण”, “पुराण संग्रह”, “दान वाक्यावली” आ “वर्षकृत्य” आदि प्रमुख अछि। संस्कृतमे ओ “मणिमञ्जरी” नामक नाटक सेहो ओ लिखलनि। “गोरक्ष विजय” नामक दोसर नाटक जे नेपालसँ भेटल अछि, ओहिमे संस्कृतसँ अलग मैथिली भाषामे सेहो गीत अछि। एकर अलावा अपभ्रंशमे ओ “कीर्तिलता” आ “कीर्ति पताका” नामक ग्रन्थक रचना कएलनि। कीर्तिलता हुनक पहिल रचना मानल जाइत अछि। अपभ्रंश आ संस्कृतक अतिरिक्त हुनक काव्यक विशाल भण्डार मैथिली भाषामे सेहो विद्यमान अछि। हुनक यश मुक्त रचनामे सुरक्षित अछि, जकर प्रचार-प्रसार हुनक मरलाक बाद आइयो घरे-घर अछि। हुनक मृत्युक संबंधमे सेहो विद्वान सभ एकमत नहि छथि। जनश्रुति ई अछि जे हुनक मृत्यु १४५० ई. मे भेल मुदा नेपालक दरबार पुस्तकालयमे उपलब्ध “ब्राह्मण सर्वस्व” नामक ग्रन्थक आधारपर हुनक मृत्यु १४६० ई. मानल जाइत अछि। ओना सम्पूर्ण मिथिलांचलमे ई कहबी प्रचलित अछि जे- “विद्यापतिक आयु अवसान कार्तिक धवल त्रयोदशी जान” उपेक्षित अछि सोनपुर आ हरिहर क्षेत्र मेला अन्तर्राष्ट्रीय स्तरपर बिहारक पहचान देएबामे सोनपुर प्रसिद्ध हरिहर क्षेत्र मेलाक महत्वपूर्ण स्थान अछि। प्रति वर्ष कार्तिक पूर्णिमासँ शुरू भऽ ई मेला एक मास धरि चलैत अछि। ई मेला देशमे जानवरक सभसँ पैघ मेला अछि। एहि ठाम जानवरक अलावा दैनिक उपयोगी वस्तुक बिक्री सेहो होइत अछि। मेलामे मनोरंजनक विशेष व्यवस्था सेहो रहैत अछि। चारूकात नदी आ जलाशयसँ वेष्ठित एहि ठामक बाबा हरिहर नाथक मंदिरक सभसँ पैघ विशेषता ई अछि जे हरि आ हरक एक संग पुण्य दर्शन भक्त सभकेँ होइत अछि। ई क्षेत्र पौराणिक आ धार्मिक महत्व बाला होएबाक संगहि ऐतिहासिक सेहो अछि। एहि ठामक माटिमे संगम आ समन्वयक भावना सेहो अछि। हरिहर क्षेत्रक स्वर्णिम इतिहास आइयो पूर्ण रूपेण जन साधारणक सोंझा नहि आबि सकल अछि। आइयो ई शोध आ अनुसंधानक अभावमे भूगर्भमे पड़ल अछि। एकर उज्जवल भविष्यक स्मृति चिन्ह आइयो एहि ठाम जमानासँ गौरव स्तम्भ आ प्रकाश कुंजक रूपमे विद्यमान अछि। कतेको ऋषि-महर्षिक साधनाक ई भूमि ज्ञानक तपोभूमि अछि। एकर पौराणिक गौरव गाथा पद्मपुराण सहित आन ग्रन्थमे सेहो सगौरव वर्णित अछि। बाबा हरिहरनाथक मन्दिर अति प्राचीन अछि जकर स्थापना स्वयं ब्रह्माजी अपना हाथे हरि आ हरक एकीकार लिंगक रूपमे एहि ठाम स्थापित कएने छलाह। हरि आ हरक एहन एकाकार संगम भारतवर्षमे कतहु नहि भेटैत अछि। एहि ठाम गंगा आ गंडक नदीक अभूतपूर्व संगम सेहो अछि। हरिहर क्षेत्रक महातम्यक संदर्भमे कतेको कथा लिखल गेल अछि। पुराणक अनुसार एक बेर ब्रह्मा जीक पुरोहितीमे देवता सभ एकटा यज्ञक आयोजन कएलनि। कतेको कारणसँ ई यज्ञक विध्वंश भेल, तखन देवता सभ “हर”क स्थापना कएलनि आ यज्ञकेँ सफल बनौलनि। तखनसँ हरिहर क्षेत्र लोक विश्रुत भेल। पद्म पुराणमे व्व्हो वर्णन अछि जे शालग्रामीसँ उत्तर हिमालयसँ दक्षिण पृथ्वी महाक्षेत्र अछि। एहि ठाम बाबा हरिहरनाथक मंदिर अछि। ओहि स्थानपर भगवती शालिग्रामीक पतित-पावनि गंगामे आबिकऽ मिलन भेल अछि। संगम क्षेत्र होएबाक कारण एहि क्षेत्रक माहात्म्य बहुत बढ़ि गेल अछि। इहो कथा अछि जे शालिग्रामी तथा गंगाक संगम होएब आ महाक्षेत्रक अंतिम भाग होएबाक कारण एहि ठाम “हरि” आ “हर”क स्थापना भेल। सोनपुरमे एहि स्थानपर कतेको मठ आ मन्दिर अछि जे स्थानीय प्रशासन आ सरकारक उफॆख्षाक शिकार बनल अछि। गंडक नदीक किनारपर ठीक सामने अछि गोटेक अढ़ाई सौ गज पश्चिम बाबा हरिहरनाथक मुख्य मन्दिर। कार्तिक पूर्णिमाक अवसरपर कतेको लाख श्रद्धालु प्रति वर्ष संगम स्नान कऽ बाबाकेँ जल चढ़ा श्रद्धा सुमन अर्पित करैत छथि। मन्दिरक प्रांगणमे कतेको आन छोट-छोट मन्दिर सेहो अछि जाहिमे विभिन्न देवी-देवता सभक मूर्ति स्थापित अछि। एहि मन्दिरक ठीक सोझाँ अछि एकटा महावीर मन्दिर जाहिमे उज्जर संगमरमरक गोटेक दस फीटक विशाल राम भक्त हनुमानक मूर्ति स्थापित अछि। हरिहरनाथ मन्दिरक पाछाँ मुगल बाड़ी अछि जाहिमे सेहो मन्दिर बनल अछि। मंदिरसँ सटल दक्षिण भागमे पुरान ठाकुरबाड़ी मन्दिर अछि, जखन कि मुख्य मन्दिरक सोझाँ पूरब दिश एकटा ऐतिहासिक तालाब अछि जकर निर्माण च्यवन ऋषि कुष्ठ रोगक निवारण लेल करबैत छलाह, मुदा किछु बाधा आबि गेलासँ एकर निर्माण नहि भऽ सकल। एकरा च्यवन ऋषिक तपस्थल अथवा च्यवन तालाबक नामसँ जानल जाइत अछि। मन्दिरसँ भरल एहि क्षेत्रमे गंडक किनारमे अछि प्रसिद्ध ऐतिहासिक मन्दिरमे दक्षिणमुखी माँ कालीक प्रचण्ड रूप वाला दुर्लभ मूर्ति। एहि मूर्तिक ठीक सोझाँ सत्ताइस हाथपर शिवलिंग विराजमान अछि। मन्दिरक दक्षिणमे श्मसान अछि। मान्यता अछि जे ई काली मन्दिर सिद्धपीठ अछि जतए पहिने तंत्र-मंत्रक सिद्धि कएल जाइत छल। एहि काली मन्दिरक पाछाँ एकटा पुरान मन्दिर अछि जाहिमे कतेको मूर्ति विराजमान अछि। मन्दिरक प्रांगणमे पाल कालक कतेको महत्वपूर्ण अवशेष देखल जाऽ सकैत अछि। गीता बाबाक एहि मन्दिरमे हुनक जीवन कालमे रौनक रहैत छल, परञ्च बाबाक मृत्युक बाद सभ परम्परा ध्वस्त भऽ गेल। काली मन्दिरक उत्तर दिस अति प्राचीन गौरी शंकर मन्दिर अछि जाहिमे भगवान शिव आ माँ पार्वतीक सुन्दर आ ऐतिहासिक दक्षिण रुखक मूर्ति अछि। तंत्र साधक सभक मानब छनि जे एहि ठाम लागल मूर्ति काम विजय मुद्रामे अछि। एहि मन्दिरक प्रांगणमे एकटा विष्णु मन्दिर सेहो अछि जकर गुम्बदपर पाल काल आ मौर्य कालक कलाकृति उत्कीर्ण अछि। हरिहर नाथक मुख्य मन्दिरसँ पश्चिम गोटे दू सौ गजक दूरीपर विशालनाथ आ बालनाथक समाधि स्थल अछि जकर भीतरक भागमे अद्भुत कलाकृति अंकित अछि। महान तपस्वी स्वामी त्रिदण्डीजी महाराज द्वारा गजेन्द्र मोक्ष देव स्थानपर आकर्षण मन्दिरक नव निर्माण कराओल गेल अछि। भगवान विष्णुक ई मन्दिर हरिहर क्षेत्रक अद्भुत नमूना अछि। ऐतिहासिक हरिहर क्षेत्र आ ओकर लगपास स्थित मन्दिर आ मठ लोक सभक आस्थाक केन्द्र अछि मुदा देखभाल उचित रख-रखावक अभावमे जीर्ण-शीर्ण भऽ रहल अछि। सभ साल हरिहर क्षेत्र मेलाक अवसरपर किछु साफ सफाई होइत अछि आ स्थानीय प्रशासन आ लोक सभ सेहो सक्रिय होइत छथि, मुदा एकर बाद ई अपेक्षित रहैत अछि। प्रतिवर्ष एहि मेलाक घटैत स्वरूप आ लोकक घटैत आकर्षणसँ एहि क्षेत्रक ऐतिहासिक आ पौराणिक स्वरूप संकटमे पड़ल जाऽ रहल अछि। एहि मेलाक विकासक लेल सरकार द्वारा मेला प्राधिकरणक घोषणा मात्र बयानबाजी साबित भेल अछि। पछिला वर्षसँ एहि मेलामे खरीदल जानवर सभक प्रदेशक बाहर लऽ जयबासँ प्रतिबन्धक कारण व्यापारपर असरि पड़ल अछि। सभ वर्ष उद्घाटन आ समापनपर मेलाक विकासक लेल भाषण होइत अछि जे मेलाक समाप्तिक बाद बिसारि देल जाइत अछि। औद्योगिक रूपसँ पिछड़ल बिहारमे आय अर्जित करबाक लेल पर्यटन उद्योग संभावनासँ भरल अछि। एहि ठाम कतेको ऐतिहासिक, पौराणिक आ प्राकृतिक स्थल अछि जे पर्यटककेँ अपना दिस खिचि सकैत अछि। एहिमेसँ सोनपुर आ हरिहर क्षेत्र मेला सेहो एकटा अछि। जरूरत अछि जे एकर योजनाबद्ध विकास कऽ एकरा देशक पर्यटनक मानचित्रपर आनल जाए आ ई भाषण आ घोषणासँ नहि होएत एहि वास्ते सरकार, स्थानीय प्रशासन आ स्थानीय जनताकेँ एक संग प्रयास करक होएत। प्रदेशमे नहि थमि रहल जातीय हिंसाक दौर प्रदेशमे एक बेर फेर जातीय हिंसाक विभत्स रूप सोझा आयल। एक अक्टूबर दू हजार नौ के खगडि़या जिलाक अमौसी गाम मे जमीनक विवाद मे सोलह गोटेक भेल सामुहिक हत्याक बाद पुरा क्षेत्र मे डर पसरि गेल। प्रदेश मे जातीय हिंसाक कोनो ई पहिल घटना नहि छल आ ई अंतिम घटना होयत सेहो कहब उचित नहि होयत। आजादीक बाद सँ एखन धरि प्रदेश मे छोट–पैघ गोटेक एक सौ सँ बेसी घटना भऽ चूकल अछि जकर शिकार छोट किसान आ मजूर बनल छथि। बाईस नवम्बर उन्नैस सौ एकहत्तर मे पूर्णियाँ जिलाक रूपसपुर–चंदवा सँ प्रारंभ भेल हत्याक ई सिलसिला गोटेक चारि दशक सँ चलि रहल अछि आ शासक वर्ग लहास क दाम लगा (मोआबजाक घोषणा) अपन काज समाप्त बुझैत अछि। जतय हिंसाक घटना होईत अछि ओतय सुरक्षाक नाम पर सरकार पैघ-पैघ घोषणा होईत अछि। एहि घोषणा पर किछु दिन अमल सेहो होईत अछि मुदा समय बितलाक संगहि ओ कमजोर पडि़ जाइत अछि आ समयक प्रतिक्षा मे लागल समाज विरोधी तत्व जमीनक बहाने जातीय हत्याक एकटा आर घटना के मूर्त रूप दऽ प्रशासनिक व्यवस्थाक पोल खोलि दैत छथि। मध्य बिहारक एकटा पैघ क्षेत्रमे किछु दिन पहिने धरि जमीनक विवाद क लऽ कऽ संघर्ष होयबाक संवाद भेटैत रहल अछि। दरअसल एहि क्षेत्रमे जमीन किछु लोकक मध्य अछि। ई पैघ जोतदार अपन बाहुबलक सहारा लऽ मजूर सँ काज करबैत छलाह। समय बितलाक संगहि मजूर वर्ग मे आयल चेतनाक बाद जमीन मालिक आ मजूर क मध्य संघर्ष प्रारंभ भेल। एकर परिणाम स्वरूप जमीन मालिक आ मजूर क मध्य एहि संघर्ष के लड़बाक लेल अघोषित सेना अस्तित्व मे आयल। रणवीर सेना, लोरिक सेना, ब्रह्मर्षि सेना, सनलाइट सेना, भूमि संघर्ष समिति, एम सी सी आदि कतेको मजूर आ जमीन मालिकक समर्थन बाला सेना आपस मे टकरायल। सत्त तऽ ई अछि जे एहि टकराहटक शिकार बनल छोट किसान आ रोज-रोज खेत मे काज कऽ अपन पेट पालऽ बाला मजूर आ कतेको जान गेल, कतेको स्त्रीक सेनूर धोआ गेल, कतेको नेना अनाथ भऽ गेल। तथापि समाज विरोधी असामाजिक तत्व क हृदय पाथरि नहि पिघलल आ ओ खून सऽ लाल होईत घरती आ जमीन पर पड़ल लहास के देखि अपन बहादूरी बुझैत छथि। हिंसा कोनो सभ्य समाजक लेल नीक चीज नहि अछि आ एहि सँ कोनो समस्याक समाधान सेहो नहि भऽ सकैत अछि। ई हिंसा जमीन मालिक दिस सँ हो कि मजूर दिस सँ एकर जतेक निन्दा कयल जा कम होयत। दुर्भाग्य तऽ ई अछि जे सामूहिक हत्या सन घटना क बाद एकरा राजनीतिक चश्मा सँ देखल जाईत अछि। हत्याक बाद जमीन पर बहल खून चाहे ओ जमीन क मालिक क हो कि मजूर के एकर रंग लाल रहैत अछि मुदा राजनीतिक चश्मा मे एकर रंग अलग-अलग रहैत अछि। जाहि जातिक हत्या होईत अछि ओहि जातिक नेता अथवा जे राजनीतिक दल एकरा अपन समर्थक मानैत अछि ओहि घटना स्थल पर जा ऐना नोड़ चुअबैत छथि जेना कि घटना स्थल पयर्टन स्थल हो। शासक वर्ग हो कि विपक्ष एहि तरहक घटना के अपन चश्मा सँ एक रंग देखि इमानदारी सँ प्रयास करथि तऽ संभव अछि जे प्रदेश मे चलि रहल जातीय हिंसाक दौर समाप्त भऽ सकैत अछि। सरकार चाहे जाहि दल अथवा जातिक हो हत्या करय बालाके हत्यारा बुझि ओकरा सजा देयबाक प्रयास करय अन्यथा एहि तरह घटना पर रोक लगायब सपना मात्र होयत। प्रमुख नरसंहार पर एक नजरि – वर्ष स्थान मृतकक संख्या 1971- रूपसपुर–चंदवा (पूर्णियाँ) -14 1975- डेरभरथा (नालन्दा) -24 1976- अकोढ़ी -03 1977- बेलछी (नालन्दा) -14 1980- पिपरा कल्याण चक (पटना) -14 1981- पारस बिगहा -11 1984- दनबार बिहटा (भोजपुर) -22 1986- गैनी (औंरगाबाद) -24 1986- अरवल -24 1986- डरमैन (औंरगाबाद) -11 1986- कंसारा (जहानाबाद) -11 1986- दरमिया (औंरगाबाद) -11 1987- दलेल चक बघौरा (औंरगाबाद) -56 1988- नोनही नगवां (जहानाबाद) -18 1989- माली बिगहा–खिंदपुरा (जहानाबाद) -10 1989- दनबार बिहटा (भोजपुर) -27 1991- देव सहियारा (भोजपुर) -14 1991- तिसखोरा (पटना) -15 1992- बारा (गया) -39 1996- बथानी टोला (भोजपुर) -22 1997- लक्ष्मणपुर बाथे (जहानाबाद) -58 1998- नगरी -10 1999- सुजातपुर (बक्सर) -16 1999- शंकर बिगहा (जहानाबाद) -23 1999- सेनारी (जहानाबाद) -35 1999- सेन्दानी -12 2000- जढ़पुर (बक्सर) -16 2000- लखीसराय -11 2000- मियांपुर (औरंगाबाद) -35 2007- ढेलफोरबा (वैशाली) -10 2007- मणिपुर (शेखपुरा) -09 2009- अमौसी (खगडि़या) -16 राजगीरमे सम्पन्न भेल संघ क तीन दिवसीय बैसक गामे-गामे सक्रिय होयत संघ राष्ट्रवादी सांस्कृतिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघक अखिल भारतीय कार्यकारी मंडलक तीन दिवसीय बैसक देशक वर्तमान परिस्थिति पर चर्चाक संगहि संगठनात्मक स्थिति पर चर्चा कयल गेल। एहि बैसक मे संघ अपन काजक विस्तार करैत पर्यावरण के अपन कार्य क्षेत्र मे सम्मिलित कयला संघक सर संघ चालक मोहन भागवतक उपस्थिति मे संघक वरिष्ठ नेता तीन दिन धरि चिन्तन मनन कयलनि आ चारि टा प्रस्ताव सेहो पारित कयल गेल। एहि अवसर पर संघ अपन राजनौतिक इकाई भारतीय जनता पार्टीक दशा- दिशा पर विचार कयलक आ पी एम इन वेटिंग लाल कृष्ण आडवाणी आ वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह के भविष्यक अएना सेहो देखा देलनि। दूनू नेताक भविष्यक लऽ कऽ चलि रहल चर्चा क संदर्भ मे निर्णय जल्दीए अयबाक संभावना अछि। बैसकमे संघक सभ अनुषांगिक संगठनक प्रमुख नेता सर संघचालक अपन उपलब्धि रिपोर्टकोर्ड रखलनि आ भविष्य क योजनाक जनतब देलनि। बिहारक पर्यटन स्थल राजगृह (राजगीर) मे संघक राष्ट्रीय स्तरक ई पहिल आयोजन प्रदेशमे भेल छल। एहि बैसकमे संघ महत्वपूर्ण निर्णय लैत गाम दिस अपन डेग बढौलक अछि आ गो-रक्षा अभियानक माध्यम सँ जन जन धरि अपन पकड़ बनैबाक लेल ध्यान केन्द्रित करबाक संकेत देलक। एहि वास्ते रोजगारक अवसर आ खेतीक विकास मे योगदान देबय बाला सक्रिय संगठन सभके मददि करबाक रणनीति से हो संघ बनौलक अछि। कौग्रेसक युवा चेहरा राजीव गाँघी द्वारा राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रमक माध्यम सँ ग्राम मे भेल सक्रियता क जबाब देबाक लेल संघ विश्व मंगल गो ग्राम यात्रा सेहो प्रांरभ कयलक अछि। पहिल चरण मे एहि यात्राक लेल एक सौ पचास गाम के चूनल गेल अछि। एहि माध्यम सँ संघ काँग्रेसक अपन वैचारिक लड़ाई गाम सँ लड़ब प्रारंभ कऽ देलक अछि। संघ आ काँग्रेस वैचारिक रूप सँ दू ध्रूव पर अछि। तथापि गामक विकासक मामिला संघ राहुल गाँघीक बाट पर चलबाक जे निर्णय लेलक अछि देशक भविष्य लेल नीक संकेत अछि। देशक पैघ आबादी एखनो गाम मे अछि जकरा विकासक रोशनीक आवश्यकता अछि। श्री गाँधीक गाममे सक्रियता पर संघक प्रचार प्रमुख मनमोहन वैघ क प्रतिक्रिया ‘जे केओ गामक बात करय नीक बात अछि’ स्वागत योग्य अछि। वैचारिक रूप सँ एक दोसरक विरोधी राजनीतिक क्षेत्र मे सक्रिय राहुल गाँघी आ सामाजिक क्षेत्र मे सक्रिय राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघक इमानदारी सँ गाम दिस अपन ध्यान देलनि तऽ संभव अछि जे ग्रामीण क्षेत्र मे विकास क नव रोशनी पसरत आ गामे-गामे खुशहाली पसरत। अपन भविष्य क चिन्ता आ पेटक आगि के शांत करबाक लेल महानगर दिस अपन डेग बढ़ा रहल ग्रामीण जनता गामे मे रखि अपन भविष्य क खोज करत। गाम मे विज्ञान केँ लोकप्रिय बनबऽ मे लागल छथि मानस बिहारी मिथिलांचलक पिछड़ल क्षेत्र मे नेना सभक मध्य विज्ञानक प्रति जागरूक करबाक लेल अभियान चलाओल जा रहल अछि। ऐ अभियानक अंतर्गत नेना सभ खेल-खेल मे विज्ञान केँ समझि-बुझि रहल छथि। महत्वबला ऐ अभियानक नेतृत्व पूर्व राष्ट्रपति डा. ए.पी.जे. अब्दुल कलामक सहयोगी रहल भारत सरकारक पूर्व वैज्ञानिक मानस बिहारी वर्मा कऽ रहल छथि। बाढ़ि प्रभावित दरभंगा जिला मे ऐ अभियानक सफलताक बाद आब एकरा पूरा प्रदेशमे चलेबाक योजना अछि। दरभंगा जिलाक घनश्यामपुर प्रखंडक छपेर गाम भोउरक निवासी श्री वर्माक मोबाइल विज्ञान प्रयोगशाला (एमएसएल)क प्रशंसा पूर्व राष्ट्रपति डाक्टर कलाम तँ करबे कएलनि संगहि बिहारमे एकरा लोकप्रिय बना ओ नेना आ शिक्षक सभक आँखिक तारा सेहो बनि गेल छथि। वैज्ञानिक आ बुद्धिजीवी सभक संस्था विकसित भारत फाउंडेंशनक नींव रखनाहार श्री वर्मा वर्ष 2010 मे बाढ़ि प्रभावित कमला बलान क्षेत्र सँ मोबाइल विज्ञान प्रयोगशाला प्रारंभ कएने छलाह। बाढ़ि प्रभावित दरभंगा, मधुबनी आ सुपौल जिलाक मे ई प्रयोगशाला चौबीस हजार छात्रक मध्य विज्ञानकेँ लोकप्रिय बनौलक अछि आ 758 शिक्षक केँ प्रशिक्षित सेहो कएलक अछि। ई प्रयोगशाला 2100 गामक दौरा सेहो कएलक अछि। अगिला वर्ष प्रयोगशालाक संख्या तीन सँ बढ़ा कऽ दस करबाक योजना अछि। श्री वर्माक अनुसार 1990 मे आन्ध्र प्रदेशक कुप्पम मे विज्ञान केन्द्रक मे गुड़ीबंका गामसँ प्रारंभक बाद मोबाइल प्रयोगशाला महत्वपूर्ण काज कएलक अछि। एखन धरि गोटेक 30 लाख छात्र ऐ मोबाइल प्रयोगशालासँ विज्ञानसँ संबंधित संवाद स्थापित कएलनि अछि। अगस्त्य फाउंडेंशन आ विकसित भारत फाउन्डेशन बिहार द्वारा प्रदेशमे मोबाइल प्रयोगशालाक कारण नेना सभ विज्ञानक प्रति जागरूक भेलाह अछि। जइ विद्यालय मे ऐ प्रयोगशालाक दौरा भेल अछि ओतए छात्र सभक उपस्थिति बेसी बढ़ल अछि। श्री वर्मा जनौलनि जे एक विद्यालयमे छओसँ सात बेर एम एम एल केँ लऽ जएबाक लक्ष्य अछि। एखन धरि तीन-चारि बेर एक विद्यालयक दौरा भेल अछि। प्रारंभिक अनुभव जनतब दैत अछि जे छात्र सभमे विज्ञानक प्रति आ ऐ विषयक प्रति सोच बदलल अछि। छात्र सभ मे प्रश्न पूछब, विश्लेषणात्मक सोच अपन सहपाठीसँ विचार-विमर्श करबाक क्षमता बढ़ल अछि, एम एस एल मे कक्षा छओ सँ बारह धरिक छात्र केँ ध्यान मे राखि विज्ञान मॉडल तैयार कएल गेल अछि। एन सी ई आर टी क पाठ्यक्रम पर आधारित एकर एक सय साठि विज्ञान मॉडल विषय केँ बुझबाक अंतर दृष्टि पैदा कऽ रहल अछि। ऐ अभियानक उद्देश्य बिहारमे बेसी नेना केँ वैज्ञानिक बनाएब अछि। ऐ सँ छात्र सभमे विज्ञानक प्रति रूचि बढ़ल अछि। शिक्षक सभ सेहो मांग करैत छथि जे बेसीसँ बेसी बेर प्रयोगशाला हुनक विद्यालय मे आबए जइसँ विद्यालय मे विज्ञानक शिक्षकक जे कमी अछि ओकरा दूर कएल जा सकए। लाइट कांबेट एयरक्राफ्ट परियोजनाक सुपरसोनिक जहाज तेजसक सफलताक संग तैयार करबा मे प्रोजेक्ट डायरेक्टर (जेनरल सिस्टम)क पद पर काज कऽ चुकल 69 वर्षक श्री वर्मा जनौलनि जे बिहार प्रतिभाक जमीन अछि। विज्ञानक प्रति नेना सभ मे रूचि जगेबाक अछि। विद्यालय सभ मे जमीनक स्तर पर संरचनाक अभाव मे ई एकटा चुनौतीबला काज अछि मुदा इमानदारीसँ प्रयास कएल जाए तँ ऐ मे सफलता अवश्य भेटत। श्री वर्मा विज्ञानकेँ लोकप्रिय बनेबाक संगहि उतर बिहारमे कोसी आ ओकर सहायक नदी सभक आबएबला बाढ़िक समस्याक क्षेत्रमे जियोमार्फो डायनेमिज्मक अध्ययन कऽ रहल छथि। हुनक उद्देश्य बिहारमे बाढ़िक समस्याक वैज्ञानिक अध्ययन करबाक अछि। श्री वर्मा मानैत छथि जे केन्द्र आ राज्य सरकार द्वारा बाढ़ि प्रभावित क्षेत्र मे नदी सभक हाइड्रोलॉजिकल विशेषताक अनदेखी कऽ पुल आ बान्ह आदि बनाएब भूल अछि। भारत सरकारक पूर्व वैज्ञानिक मानस बिहारी वर्मा दरभंगा जिला मे प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण कएलाक बाद मधुबनीक जिला मधेपुरक जवाहर उच्च विद्यालय सॅ मैट्रिक परीक्षा पास कयलनि। पटना अभियंत्रण महाविद्यालयसॅ मैकेनिकल इंजीनियरिंगक पढ़ाइ पूरा कएलनि। पूर्व राष्ट्रपति डाक्टर कलामसँ हुनक पहिल भेँट इंटीग्रेटेड मिसाइल प्रोग्रामक सिलसिलामे रक्षा अनुसंधान विकास संगठनमे कार्यरत रहलाक दरमियान भेल छल। दरभंगा मे बिहार सरकार द्वारा स्थापित वीमेन्स इंस्टीच्यूट ऑफ टेक्नोलॉजीक संचालन मे सेहो हुनक महत्वपूर्ण योगदान अछि। दिसम्बर मास मे दरभंगा मे आयोजित विज्ञान मेला मे पूर्व राष्ट्रपति डा. कलाम उपस्थित भऽ श्री वर्माक लगन आ योगदानक प्रशंसा सेहो कएने छलाह। मोबाइल विज्ञान प्रयोगशाला बिहारक संगहि आन्ध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, उड़ीसा आ महाराष्ट्र मे सफलताक संग काज कऽ चुकल अछि। सुजीत कुमार झा सुनिल मल्लिक- सफल व्यक्ति- आब मिथिला ग्रामक तैयारी समय २०३६ सालक एक राति के । जनकपुरक प्रसिद्ध जानकी मन्दिरक प्राङ्गणमे मिथिला नाट्य कला परिषदक एकटा सांस्कृतिक कार्यक्रम भऽ रहल । दर्शक दीर्घा सँ एकटा बालक हमहुँ गायब कहि उदघोषक भोला दासके चिट पर चिट दऽ रहल । मुदा भोलाक मन नहि डोलि रहल । दर्शकसभ उठय लागल छल। इम्हर ओ बालक दशम वेर हमहुँ गायव कहि चिट पठौलन्हि । उदघोषकके मन डोलि गेल । वालक मञ्चपर ऐलाह आ अपन गीत सुरु कएलन्हि । अपन अपन घर जा रहल दर्शकसभ फिर्ता आबय लागल आ मञ्चक आगामे बैसि गेल । ई कोनो उपन्यास आ कथाक अंश नहि अछि । ओ बालक रहथि सुनिल मल्लिक । हुनके सँग ई घटना भेल अछि । कहियो मिनापक मञ्चपर चढयक लेल चिट पर चिट देवयबला व्यक्ति आई मिनापक अध्यक्ष छथि । फेर एकटा चर्चित गायक , संगीतकार, सफल कर्मचारी, व्यवसायी आदि विशेषण सँ युक्त छथि । आइ जँ सफल व्यक्तिक खोजी कएल जाए तँ ओ अग्रणीमे अवैत छथि । कहियो एक समय छल जे ओ दुर सँ दुरक यात्रा साइकल सँ करथि मुदा स्थिति बदैल गेल अछि । हुनका घरमे चारि टा मोटरसाइकल , एकटा जिप सहितक साधन छन्हि । आई अफिसो चढय लेल गाडी देने छन्हि । सुनिलक प्रगतिमे हुनक पिता कामेश्वर मल्लिककँे मार्ग दर्शन आ हुनक अपन लगन दूनु ओतवे काम कएने सुनिल नजदिकक व्यक्तिसभ कहैत छथि । कहियो वडका गीतकार आ संगीतकार बनब सपना देखयबला सुनिल ओहि क्षेत्रमे बहुत बडका स्थानपर तऽ नहि गेला मुदा अपन भाई सभके ओहि लाइनमे देलन्हि । सुनिलक छोट भाई प्रवेश संगीतक दुनियामे अपन स्थान खोजयमे लागि गेल अछि । कहल जाइत छैक प्रवेशके ओहि लाइनमे पठाबयमे सुनिलक बहुत योगदान अछि । २०२४ आसिन १० गते भारतक खजौलीमे माता सुशिला मल्लिक आ पिता कामेश्वर मल्लिकके जेष्ठ पुत्रक रुपमे जन्म लेनिहार सुनिल एमएससी , पिजिडी इन साइन्सक अध्ययन कएने छथि । सुनिलक विषयमे कहल जाइत छैक ओ सात कक्षामे पढैत रहथि तहिए म्युजिकक धुन बनौने रहथि । एकदम कम उमेरमे ओ मञ्चसभ पर गाबय लागल रहथि । महोत्तरीक सुगा में कृष्णाष्टमीमे हिनका स्पेशली बजाओल जाइत छल । एक बेर ओहि गाममे मञ्चपर गीत गएलाक बाद दर्शकसभ हिनका पर पैसाक वर्षा कऽ देने छल । सुनिलक अनुसार ३० वर्ष पूर्व तेह्र सय रुपैया भेल छल । ओ मञ्चपर गावयके एतेक क्रेजी रहथि जे छोकरवाजी नाचपाटी होइ वा कोनो कार्यक्रम ओ कपडा पहिर बिदा भऽ जाइत छलाह । पैसा के देत के नहि हुनका अहि सँ सरोकार नहि छल । मैथिलीक चर्चित गीतकार सियाराम झा सरसक शब्दमे मिथिलाञ्चलमे म्युजिकके जे सेन्स सुनिलमे अछि बहुतो में नहि अछि । कहल जाइत छैक सुनिलक पिता एकटा बढीया गायक रहथि तहिना हुनक बाबा मुसद्दी लाल मल्लिक चर्चित तबला बादक । फेर हुनक दू पुत्री आ एक पुत्र सेहो गीत गबैत छन्हि । चर्चित गायिका नेहा प्रियदर्शनीक पिता होवयके सेहो सुनिलके गौरब प्राप्त छन्हि । सुनिल छौडा तोरा बज्जर खसतौ , गीत घर घर के, हमर धकधकी बढैय, लेहुएल आँचर, खोता सिंगार, आर्शिवाद, मुटुभरी माया सहितक एलबममे संगीत देने छथि । गायनक अतिरिक्त किछ एलबममे हुनक लिखल गीत सेहो अछि । एक दिस गीत संगीत क्षेत्रमे ओतेक आगा छथि तऽ दोसर दिस शैक्षिक तालिम उपकेन्द्र धनुषाक प्रमुख छथि । ओ तालिम केन्द्र धनुषा , महोत्तरी, सिरहा, सर्लाही, सिन्धुली, जिल्लाक शिक्षकसभकँे तालिम दैत अछि । किछ वर्ष पूर्व ओ शिक्षक सेहो रहथि । ओहि क्रममे ट्युशनिया सभके हुनका घरमे भिड लागल रहैत छल । सुनिल व्यवसायी सेहो छथि जनकपुरक क्याम्पस चौकपर विज्ञानक समान विक्री केन्द्र सेहो हिनके छन्हि । विज्ञान सामग्री विक्री केन्द्र जनकपुरमे नयाँ व्यवसाय छल । नयाँ व्यवसायकेँ चुनौती स्वीकार कएलन्हि आ ओ व्यवसाय एखन नीक अवस्थामे अछि । गीत रेकर्डिङ्ग स्टुडियोके सेहो हुनक सोच छन्हि । जकर तैयारी ओसुरु कऽ देने छथि । फेर मिनापक वात करी तऽ प्रमुख प्रोजेक्टसभकेँ मिनाप सँ जोडयमे हुनक महत्वपूर्ण योगदान अछि । अखन ओ नाटकघर निर्माणमे लागल छथि । फेर मिथिला ग्रामक परिकल्पना सेहो हुनक छन्हि । ओ कहैत छथि– ‘एकटा एहन स्थान होए जतय नाटकघर हुए, मिथिलाक संग्रालय हुए मिथिलाक प्रमुख भोजनसभ ओतए भेटए , एहन चिजक आवश्यकता छैक ।’ मिथिला ग्रामक लेल विभिन्न क्षेत्रक व्यक्तिसभ सँगे परामर्श सुरु कऽ देने प्रसंगक क्रममे सुनिल कहलन्हि । एकटा लाजवाव कलाकार मदन ठाकुर बुध दिन भोरमे पूजाक लेल घरे लग रहल कल पर सँ मदन ठाकुर पानि आइन रहल छलथि की पाछु सँ तीन चारि गोटे पुलिस हिनका सँ पुछि बैसलनि अहि तऽ मदन ठाकुर नहि छियैक । पाछु घुमि कऽ ओ हँ हु मे किछ उत्तर दितैथ ओहि सँ पूर्वे ओ सभ कहय लगलन्हि अपने तऽ बेजोड अभिनय करैत छी । मिथिलाञ्चलक सुपर स्टार मदन संग दर्जनो एहन घटना भेल अछि जे हुनका बिना कहने लोक चिन्ह गेल छलन्हि । आ एक दम आदर सम्मान करैन । एक बेर तऽ सीमाबर्ती मधुवनी जिल्लामे मदनक प्रसंशकसभ जबरदस्ती हुनका घेर कऽ जलपान सेहो करौने रहैन । शिक्षा सँ एसएलसी सेहो नहि कएने मदनक प्रसंशक मे बहुत पढल लिखल विद्वानसभक लम्बा सुची अछि । मिथिला नाट्य कला परिषदक पूर्व अध्यक्ष सुनिल मिश्र कहैत छथि –‘विद्यालयीय शिक्षामे भलेहि मदन कम हुए मुदा अपना क्षेत्रमे केहन केहन मास्टर डिग्री बलाकेँ हराबयकेँ क्षमता रखैत छथि ।’ एक बेर बरिष्ठ नाटक कार महेन्द्र मलंगिया सँ पुछल गेल छल मिथिलाञ्चलक सफल कलाकार के सभ छथि ताहि पर ओ बाजल रहथि –‘ सफलकेँ मापदण्ड की अछि हमरा नहि बुझल अछि , मुदा जनकपुरक पाँच टा कलाकार एहन छथि जिनकर प्रतिभाक जबाब नहि अछि ।’ पाँच टा कलाकारक नाम जोडाबय काल सभ सँ पहिने ओ कोनो कलाकारक नाम लेने रहथि तऽ ओ छलथि मदन ठाकुर । मदन सहीमे लाजवाव कलाकार छथि । सहकर्मी सभक अनुसार जखन ओ अभिनय करय लगैत छथि ओ ओहिमे डुबि जाइत छथि । यैह हुनक प्रमुख विशेषता अछि । २०३३ साल सँ अभिनय सुरु कएने मदन एखनो निरन्तर अहि क्षेत्रमे लागल छथि । जखन मञ्च पर चढैत छथि तऽ १६/१७ वर्षक कलाकार सभ सँ कम चमक हुनकामे नहि रहैत छन्हि । फेर अभिनयकेँ तऽ ओ बादशाहे छथि । मिनापक संस्थापक योगेन्द्र साह नेपालीक प्रेरणा सँ अभिनय क्षेत्रमे आएल मदन मैथिलीक अतिरिक्त नेपाली सिनेमामे सेहो अभिनय कएने छथि । नेपाली सिनेमा सीता , सिमाना आ बीर गणेशमान मे हुनक कम दृश्य अछि मुदा अपन अभिनयकेँ बल पर दर्शक पर अलग छाप छोडय सफल भेल छथि । ओना मैथिली टेलि सिरियल काठक लोक , हंसा चलल परदेश , मिथिलाक व्यथा, कनियाँ, चमेली, परिणाम सहितमे तऽ बहुत महत्वपूर्ण पात्रमे छथि । रंङ्ग मञ्चमे तऽ ओ ककरो सँ पछे नहि छथि । फेर मिथिलाञ्चलक मात्र नहि नेपाल भारतक बहुत रास रङ्ग मञ्च पर अभिनय सेहो कएने छथि । मुदा जे मज्जा काठक लोकक कम्पनीक रोलमे आएल ओतेक कहियो नहि । ओ कहैत छथि –‘ मलंगिया सर सम्भवतः कम्पनीक रोल हमरे लेल लिखने रहथि की ?’ दर्जनो पुरस्कार अपन नाम कऽ चुकल मदन कहैत छथि–‘ओहिना अभिनय करी आ उद्देश्य लऽ कऽ कएनाइमे सम्मान अलग होइत छैक ।’ कला क्षेत्रक स्थिति सेहो आब बढिया भऽ रहल ओ स्वीकारैत छथि । अपने घर सँ आटा गील करय पडैत छल मुदा आव से स्थिति नहि अछि हुनक कथन छन्हि । ओना जनकपुरमे एकटा नाट्य शाला भऽ जाइक तऽ आओर किछ होइतै एकरा विषयमे सभक चिन्तन अपरिहार्य अछि ओ आगा कहैत छथि । कहियो काल देखा सिकीमे कविताक सेहो रचना करएबला मदन कहियो काल मञ्च पर गीत सेहो गबैत छथि । साथी कलाकार राम नारायण ठाकुर संग मरुआक रोटी खेसारीक दालि ..... गाएल गीत एक समयमे एतेक लोकप्रिय भेल छल की गाम गाममे नटुवा सभ सेहो मञ्च पर , राम नारायण आ मदन अपनाकेँ बना कऽ हिनकर गीत गाबय लागल छल । जनकपुरक शिव चौक पर चर्चित कलाकार राम अशिष ठाकुर संग मदन हेयर ड्रेसर सञ्चालन करैत आएल मदनकेँ हजामी पेशामे सेहो जवाव नहि अछि । एक बेर मदन संग केश आ दाढी मोछ जे कियो बना लेलन्हि दोबारा ओ व्यक्ति दोसर ठाम बनाबयकेँ सोचयो नहि सकैत छथि । अन्य क्षेत्रक सुपर स्टारकेँ चौक चौराहापर नहि देखल जा सकैत अछि मुदा मिथिलाञ्चलक सुपर स्टार एखनो अपन परम्परागत पेशा नहि छोडने छथि । जखन नाटक नहि रहल तखन शिव चौक पर लोक सँ हमरा भेट भऽ जाइत अछि मदन कहैत छथि । थाल माटिक पावनि मिथिलाञ्चल पावनि तिहारक हिसाव सँ धनी क्षेत्र मानल जाइत अछि । कोनो महिना एहन नहि होइत अछि जइमे प्रमुख पावनि सभ नहि हुए । फेर लोक ओतवे उत्साहकेँ संग मनबैत अछि । अहिक्रममे थाल माटिक पावनि किछुए दिन पूर्व मिथिलाञ्चलमे सम्पन्न भेल अछि । जुडशीतल पावनिकेँ रुपमे मनाओल जायबला पावनिमे एक दोसरकेँ थाल माटि लगाओल गेल । होरी पावनिमे जेना एक दोसरके रङ्गअविर लगाओल जाइत अछि , तहिना जुडशीतलमे थालमाटि लगाओल जाइत अछि । जनकपुरमे विशेष आकर्षण थाल माटिक पावनि मिथिलाञ्चलक हरेक स्थान पर ओतवे उत्साह के सँग मनाओल जाइत अछि । मुदा मिथिलाक राजधानी जनकपुरमे किछ विशेषे देखल गेल । जनकपुरक समाजिक क्षेत्रमे लम्बा समयसँ काज करैत आएल राम युवा कमिटी आ रामजानकी युवा कमिटी अलग अलग स्थान पर थाल माटिक उत्सव मनौलक । ओ उत्सवमे सैयकडो व्यक्तिक सहभागिता छल । राम युवा कमिटी जनकपुरक अध्यक्ष सोहन ठाकुर कहलन्हि — जुडशीतल जाहि उत्साहके सँग पहिले मनाओल जाइत छल ओहिमे किछ वर्ष सँ कमी बुझा रहल छल । ओ कमी दुर करबाक लेल उत्वसके रुपमे जुडशीतल मनेलौ । उत्सवक बाद पुरे जनकपुर थाल माटि सँ भरि गेल छल । संचारकर्मी रामअशीष यादव कहलन्हि ‘बहुत दिनक बाद जुडशीतलक अनुभव अहिवेर भेल ।’ गाममे सेहो गाममे कोनो उत्सव हुए वा सत्यनारायण भगवानक पूजा एकटा अलग होइत अछि । लोकके कसि कऽ सहभागिता रहैत अछि । फेर थाल माटिक बात करी तऽ गाममे अहिरुप सँ थालमाटि खेलल जाइत अछि की कतेको दिन तक गाममे थाले माटि नहि रहैत अछि। धनुषा जिल्लाक गंगुलीक गुड्डु गंगुली कहैत छथि — ‘गंगुली गाममे थालमाटि खेलबाक लेल बाहर कमायबला युवासभ जुमि जाइत छी। पावनि सेहो मनालैत छी आ युवा सभ बीच भेटघाट सेहो भऽ जाइत अछि ।’ मैथिली रङ्गमञ्चक कलाकार सेहो रहल गंगुली होरी सँ कम मज्जा जुडशीतलमे सेहो नहि होइत अछि दावी कएलन्हि । किछ विकृती सेहो होरीमे जहिना जिनका पेलौ रङ्ग अविर लगा देलौ तहिना अहु पावनिमे कतौ कतौ देखल गेल । सडक पर चलयबला बाट बटोही सभके सेहो थालमाटि सँ भिजा देल जाइत अछि । जनकपुर मे सेहो कतेको ठाम लोकके थाल माटि सँ पोतल गेल छल। साहित्यकार डा. रेवती रमण लाल कहैत छथि ‘पावनिके बढिया बनाबयकेँ लेल विकृती सभकेँ समाप्त करय परत । ओ अहिमे युवा सभकेँ आगा आगबयकेँ सल्लाह दैत छथि । जनकपुर अञ्चल अस्पतालक स्कीन विभागक चिकित्सक डा. रामचरित्र साहक अनुसार चिकनी माटि स्वास्थ्यक लेल खराब नहि होइत अछि मुदा नालाक पानि राखि देल जाइत अछि ओ लोकके लम्बा समयधरि परेशान कऽ सकैत अछि । अहिके लेल बचब आवश्यक अछि । डॉ. उमेश मंडल मैथिली उपन्यास साहित्यमे संवेदनाक स्वर वाक् कलाक बाद संवेदनाक उद्बोधन दोसर गुण थिक जे मनुष्यकेँ आन जीवसँ अलग करैत अछि। ओना तँ संवेदना दुनियाँ-जहानमे उपस्थित सकल-सजीवक वृत्ति चित्र मानल जाइत अछि मुदा दोसर जीवमे प्रत्यक्ष संवादक अभावक कारणे एकर प्रासंगिकताक व्याख्या असहज भऽ जाइत अछि। साहित्यिक अवधारणामे संवेदनाक स्वर मूलत: कवितामे भेटैत अछि मुदा आशु कविताक गणना सभ भाषामे अति-अल्प तँए भावक प्रवाह एहिठाम (कवितामे) समुचित नहि कएल जा सकैत अछि। उपन्यासक हृदयांन्तिक मर्मक छाया चित्र थिक तँए एहिमे रचनाकारकेँ विम्ब विश्लेषणमे कोनो बाधा नहि होइत अछि। उपन्यासमे ताल-मात्राक कोनो बंधन नहि। विषए-वस्तुक कोनो सीमा नहि, मात्र बिम्बक सूक्ष्मताक उद्बोधन आवश्यक तँए उपन्यासमे संवेदनाक स्वरक प्रदर्शन सभसँ बेसी भऽ सकैत अछि। उपन्यासकेँ कोनो साहित्यक आत्मा मानल गेल। जँ आत्मामे मर्म नहि हुअए तँ संसारमे संबंधक मर्यादा अप्रासंगिक भऽ जाएत तँए संवेदनाक स्वर समाजकेँ नव गति वा नव यति दैत अछि। मैथिली भाषाक अवस्था जे हुअए मुदा एकर साहित्य काेनो आन भारतीय भाषासँ कमजोर नहि। अपन दैनिक जीवनक आयामक अनुकूल मिथिला मैथिलीमे वेदना मर्मक हिमगंगे बड़ व्यापक छथि। पंडित जनार्दन झा जनसीदनक उपन्यास ‘निर्दयी सासु’सँ प्रथमत: संवेदनाक स्वर फूटि श्री जगदीश प्रसाद मंडलक उपन्यास ‘जीवन-संघर्ष’ धरि पहुँचि गेल अछि आ अनंत दिशामे गतिमान भऽ रहल अछि। आब प्रश्न उठैत अछि संवेदनामे दृष्टिकोणक बिन्दु, जे समाजमे दर्शन दऽ सकैछ, पाठक धरि ओहि स्वरकेँ पहुँचेबाक चाही। मिथिलामे समाजिक क्षेत्र आ आर्थिक विषमता अन्य भाषा परिधि क्षेत्रसँ बेसी रहल तँए हम ओहि स्वर मात्रक वर्णन करब आवश्यक बुझैत छी। जाहिमे सम्पूर्ण मिथिलाक चित्रण भेटैत अछि। मैथिली दर्शनमे मर्मक अंकुर हरिमोहन झाक लिखल उपन्यास द्वय- कन्यादान आ द्वरागमनमे सभसँ पहिले भेटल। हास्य-रसक वसुंधरापर दर्शन रूपी साङहकेँ गाड़ि कऽ संवेदनाक पलान चढ़ा कऽ सामाजिक रूढ़ितापर हरिमोन बाबू प्रहार केलनि मुदा की एहि प्रकारक संवेदना सम्पूर्ण मैथिलीक प्रतिनिधित्व करैत अछि? हरिमोहन बाबू सन प्रांजल उपन्यासकार पछातिक लोक धरि नहि पहुँचि सकलाह एहिमे हुनकासँ बेसी समाजक आडंबर धर्मी व्यवस्था दोषी मानल जा सकैत अछि, दीन-साधक, ऊँच-नीच, सवर्ण-अवर्णक बीचक खाधि मिथिलाक सनातन लोकपर चमौकनि जकाँ सिहरि कऽ मैथिली संस्कृतिकेँ लाजवन्तिक पात जकाँ जड़िमे सटा देलक। मैथिलीक तथा-कथित िकछु समीक्षकगण सेहो समन्वयवादी दृष्टिकोण मात्र मंचेटा पर रखैत छथि, नेपथ्य वा लेखनीमे एहि बिन्दुक हुनका सबहक लेल कोनो प्रयोजन नहि देखबामे अबैत अछि। संवेदनाक स्वर जँ अर्थनीतिक मूलसँ निकसि आबद्ध हुअए तँ एकर बिम्ब समाजमे क्रांतिक हिलकोरि उत्पन्न कऽ सकैत अछि। एक दिस आगाँक पाँतिमे बैसल रचनाकार साधन विहीन उपेक्षितक भावनापर एक्को आखर 1925ई. धरि उपन्यासक रूपमे नहि लिखलनि तँ दोसर दिस मैथिली साहित्यक क्रांति पुरूष बैद्यनाथ मिश्र यात्री अपन आंचलिक उपन्यास गाथा सभमे मात्र उपेक्षित व्यक्ति सभकेँ केन्द्रित केलनि। अो वास्तवमे साम्यवादी छलाह। हुनक रचना संसारक वैशिष्टता अछि जतए ऊँच-नीचक व्याख्या बड्ड व्यापक अछि। मार्क्सवादक मूल सिद्धान्त शोषित व्यक्तिक भावनाकेँ केन्द्र-बिन्दु बना कऽ यात्री जी मिथिलामे साम्यवादी साहित्यकारक रूपमे समाजमे क्रांतिक ज्योति जरौलनि। हिनक बलचनमा उपन्यासमे आत्मकथाक शैलीमे लिखल एकटा यादव बच्चाक खिस्सा आएल अछि। फूल बाबूक संग ओकर गामसँ प्रस्थान आ विभिन्न पार्टीसँ मोहभंग भेलाक बाद कम्युनिस्ट पार्टीपर विश्वास स्थापित कएल गेल। खिस्साक अंतमे बलचनमाकेँ मारि कऽ पारि देल जाइत छैक। पारो उपन्यासमे- बाल विवाहपर दारूण प्रहार कएल गेल अछि। जाहिमे मर्मक संग संवेदनापूर्ण चित्र अाएल अछि। बाल विवाहपर आक्रामक प्रहार नवतुरियामे आएल अछि। डॉ. योगानन्द झाक लिखल भलमानुष उपन्यासमे बिकौआ प्रथाक फलस्वरूप वधूक नर्क होइत जीवनक विवेचन कएल गेल अछि, एहिमे मर्म ओ संवेदनाक स्वरक हिलकोर शुरूसँ अंत धरि देखबामे अबैत अछि। तहिना सुधांशु शेखर चौधरीक उपन्यास- ’तऽर पट्टा ऊपर पट्टा’मे बहिन गंगाक प्रेरणासँ भाइ परमा द्वारा गामक राजनीतिमे प्रवेश होइत अछि जाहिसँ किछु विरोध आ अपमानक बाद विजय प्रदर्शित भेल अछि। हिनक उपन्यास -दरिद्र छिम्मरिमे- अमलाक माने दरिद्र छिम्मरिक आत्मा कथा संवेदनपूर्ण अछि। ‘ई बतहा संसार’ मे प्रेमक एकटा गाथा कहल गेल अछि जाहिमे संवेदनाक स्वर तँ सहजे अपन विशेष रूप लऽ आएल अछि। सोमदेवक ‘चानो दाइ’ मे नारी सशक्तिकरणपर आधारित विषए-वस्तु व्यापक रूपेँ आएल अछि। मायानंद मिश्रक ‘बिहाड़ि, पात आ पाथर’ बेटी बेचबाक प्रथापर लिखल गेल समकालीन समस्याक संवेदनयुक्त बिम्बकेँ उजागर करैत अछि। व्यास जीक ‘दू पत्र’मे कथा भारतीय आ यूरोपीय संदर्भमे नारीक यथास्थितिकेँ उजागर करैत आगाँ बढ़ल अछि। जाहि ऊपर नि:संकोच नारी संवेदनाक प्रदर्शन स्वभाविक ढंगे आएल अछि। प्रभास कुमार चौधरीक ‘नवारम्भ’ हवेली मोहनपुर, लंकामोहनपुर आ नवारम्भ नामसँ तीन खण्डमे क्रमश: उत्थान, पतन आ पुनर्जागरणक कथा कहैत अछि। तेसर खण्डमे दलितक मर्म आ संवेदना स्वत: उभरि कऽ आएल अछि। हुनक ‘राजा पोखरिमे कतेक मछरी’ उपन्यास शोषण आ प्रतिरोधक कथा कहैत अछि जे मार्मिक तँ अछिए संगे संवेदनपूर्ण आ स्वभाविक सेहो अछि। गंगेश गुंजनक- ‘पहिल लोक’मे विवश राजूक कथा संवेदनाक संग कहल गेल अछि। लिली रे क ‘पटाक्षेप’ उपन्यासमे शिवनारायण नक्सली आन्दोलनकारीक आ आन्दोलनक दमनक कथा मार्मिक रूप लऽ आगाँ बढ़ल अछि। जगदीश प्रसाद मंडलक उपन्यास- ‘मौलाइल गाछक फूल’मे समाजक अंतिम व्यक्ति वौएलाल लगसँ खिस्सा प्रारम्भ भऽ साम्यवादी विचार धारासँ ओतप्रोत रामाकान्तक आदर्श सोचक चित्र खिचैत गामक मौलाइल गाछ सदृश्य रूप-रेखाक वर्णन भेटैत अछि, संगहि मौलाइल गाछकेँ गंगाजल सन पवित्र पानिसँ समाजकेँ पुर्नप्रतिष्ठित करबाक संवेदना मार्मिक ढंगे उपस्थित भेल अछि। तहिना हिनक दोसर उपन्यास- ‘जिनगीक जीत’मे िन:सहाय देवन जे अपना जिनगीसँ ऊपर उठि समाजक जिनगीमे जा मिलैत अछि आ से ठीक ओहिना जेना धार अपन उद्धार करबा लेल समुद्रमे मिलैत अछि। एही ताना-बानाकेँ प्रस्तुत करैत एहि उपन्यासमे संवेदनाक हिलकोरि उझमि आएल अछि। तेसर उपन्यास ‘उत्थान-पतन’मे सामंती व्यवस्थाक वातावरणक उल्लेख करैत विच्छिन्न होइत गाम-घर आ टूटैत बेकती सबहक समस्याक संवेदनपूृर्ण मार्मिक चित्र आएल अछि। समाजक यथार्थक दर्शन स्वत: आबि अपन गुण-अवगुणक छाप छोड़ि दैत अछि, जाहिमे संवेदना स्वभाविक रूपेँ अपन डीहपर नृत्य करैत नजरि अबैत अछि जेना एहि कथोपकथनपर दृष्टिपात कएल जा सकैत अछि- “हँ, उपाय अछि। हम अहाँकेँ रास्ता बता दइ छी। अहाँ बंगाली छी जहिसँ जाति आ धर्म- दुनू छपाएल अछि। एहिठाम मोटा-मोटी हिन्दूमे तीन वर्ग अछि। पहिल अगुआएल जाति, जेना सोति, ब्राह्मण, राजपूत, भुमिहार इत्यादि। दोसर पनिचल्ला जाति- जेना यादव, धानुक, कियोट, अमात, बरैइ, कोइर इत्यादि आ तेसर अछि हरिजन। जकरा समाजमे अछोप जाति कहल जाइ छैक। एहि जातिक पानि उच्च जातिक लोक नहि पीबैत छथि। ने पानि पीबैत छथि आ ने छुअल अन्न खाइ छथि।” “अरे, बाप रे, तब तँ समाज टुकड़ी-टुकड़ीमे बँटल अछि?” “यएह अहिठामक -मिथिलाक- विशेषता छैक जे सभ जाति आ धर्मसँ बँटल अछि मुदा सामाजिक संबंध सेहो मजबूत अछि। जखन कखनो कोनो आफद-असमानी होइत तखन सभ एकजुट भऽ सहयोग करैत। ततबे नहि, जखन कोनो धरमिक काज होइत तखन सभ एकजुट भऽ सहयोग करैत।” चारिम उपन्यास- ‘जीवन-मरण’मे मनुक्खक जिनगीक दू भागक वर्णन भेटैत अछि- एक जे जीवन कालक होइत अा दोसर जे मुइला पछाति। जीवन कालक कृत मनुष्यक अगिला जीवन माने मुइला पछाति सेहो प्राभावकारी होइत अछि। यएह चित्रण एहि उपन्यासमे प्रस्तुत भेल अछि। हिनक पाँचम उपन्यास- ‘जीवन-संघर्ष’मे चित्रित जीवनेक दोसर नाओ संघर्ष थिकैक। जेहन जिनगी ओहेन संघर्ष। एही ताना-बानाकेँ देखाओल जिनगीमे सामाजिक, आर्थिक आ भौगोलिक समस्याक चित्रण अनायास भेटैत अछि। जाहिमे अमर-संवेदन अपन अस्तित्व बचाबए लेल समन्वयवादिताक सहारा लऽ फूटि बहराएल अछि, जेना एहि विषय-बस्तुपर नजरि देला उत्तर सहज लगैत अछि- - “(१) गामेक कारीगर माने मुर्ति बनौनिहार मुरती बनावे। ओना एकपर एक कारीगर दुनियाँमे अछि मुदा, पूजाक मुरतीमे कला नहि देवी-देवताक स्वरूप देखल जाइत अछि। दोसर जँ हम अपन बनौल मूर्तिकेँ अपने अधलाह कहब तँ गामक कलाकार आगू कोना ससरत। तेँ जे गामक कला अछि ओकरा सभ िमलि प्रोत्साहित करी। (२) काली मंडप गामेक घरहटिया बनावथि। जिनका घर बनवैक लूरि छन्हि ओ मंडप िकएक नहि बना सकैत छथि। संगे इहो हएत जे गामक अधिकसँ अधिक लोकक सहयोग सेहो होएत। (३) मनोरंजनक लेल गामोक कलाकारकेँ अवसर भेटनि। संगे बाहरोक ओहन-ओहन तमाशा आनल जाए जेहन एिह परोपट्टामे नहि आएल हुअए। (४) पूजाक लेल, परम्परासँ अबैत ओहनो पुजेगरीकेँ अवसर भेटनि जे पूजाक प्रेमी छथि। (५) गामक जते गोटे काज करथि ओहिमे नीक केनिहारकेँ पुरस्कृत आ अधला केनिहारकेँ आगू मौका नहि देल जाइन।” श्रीमती वीणा ठाकुर लिखित ‘भारती’ उपन्यासकेँ नियोजित उपन्यास ग्रथ तँ नहि कहल जा सकैत अछि मुदा एहि ऐतिहासिक विषए-बिम्बक चित्रणमे मैथिली संस्कृतिक समस्त भारतीय दर्शनपर विजयश्री मे मर्म स्पर्शक टीस अनायास देखल जा सकैत अछि। गजेन्द्र ठाकुर जीक लिखल ‘सहस्त्रवाढ़नि’ उपन्यासक आखर-आखरमे संवेदनाक स्वर झलकैत अछि। संवेदनाक बिम्ब उद्दाध आ सम्यक अर्थनीतिसँ भरल मार्मिक चित्रण- जाहिमे एकटा कर्तव्यनिष्ट आ इमानदार व्यक्ति नन्दकेँ गृहस्त धर्मक संग-संग सामाजिक दायित्वक पालन करवाक क्रममे उद्वेलित व्यथा प्रस्तुत कएल गेल अछि। ओना तँ एहि साहित्कि परिधिसँ बाहर बहुत ठाम संवेदना-स्वरक दर्शन भेल हएत मुदा हमर अध्ययन संसार रास पघि नहि तँए एकरा उपेक्षा वा तिरस्कार नहि मानल जाए। ई अलग बात जे शब्दक सीमा रेखा सेहो अछि। कबिलपुरक कथा गाेष्ठी मैथिली भाषा विकासक एक सशक्त माध्यम्- “सगर राति दीप जरय”क ७०म कथा गोष्ठि गत १२जून २०१०केँ डॉं योगा नन्द झाक संयोजकत्वमे रमा िनवास -कबिलपुर- मे सम्पन्न भेल। पं चन्दकान्त मिश्र “अमर” दीप प्रज्वलित कए संघ्या ७ बजे सुभारम्भ केलनि। कार्यक्रम आगॉं बढ़ौल गेल उद्घाटन सत्रसँ जेकर अध्यक्षता डॉं रामदेव झा आ मंच संचालन डाॅ मुरलीधर झा केलनि। मुख्य अतिथि डॉ सुरेश्वर झा मैथिली भाषाक भविष्य आ आवश्यकतापर प्रकाश देलनि। लोकार्पण सत्रक संचालन डॉ विभूति आनन्द केलनि। डेढ़ दर्जन पोथीक लोकार्पण क्रमश: भारती (उपन्यास), विधकरी (उपन्यास), उचाट (बाल उपन्यास), उत्थान-पतन (उपन्यास), जिनगीक जीत (उपन्यास), गामक जिनगी (कथा संग्रह), मैथिली चित्रकथा (चित्रकथा संग्रह), गोनू झा आ आन मैथिली चित्रकथा (चित्रकथा संग्रह), पक्षधर (पत्रिका), हमरो लेने चलू- (कथा संग्रह), पिलपिलहा गाछ- (बाल कथा), अमर जीक साहित्यमे हास्य-व्यंग (समालोचना), समाचार कथा (कथा संग्रह), कथा-लोककथा (कथा संग्रह), खिस्सा (कथा संग्रह), मिथिलाक पंजी प्रबंध (तारपत्र आदिक डिजिटल इमेजिंग, डी.भी.डी), मैथिली भाषा साहित्य: बीसम शताब्दी (अलोचनात्मक निबंध संग्रह) आ जमीनेमे फुटे छै अंकुर (कविता संग्रह), भेल। डॉ रामदेव झा, डॉ सुरेश्वर झा, पं. चन्द्रनाथ िमश्र “अमर”, डॉ भीमनाथ झा, डॉ रामानन्द झा “रमण”, मैथिली पुत्र प्रदीप, डॉ. मोहन मिश्र, डॉ वीणा ठाकुर, डॉ कमला चौधरी, डॉ आशा मिश्र आ ज्योत्स्ना चंद्रम द्वारा लोकार्पण कराओल गेल। सभ रचनाकार/लेखक/लेखिका स्वयं सेहो उपस्थित रहथि। कथा सत्रक अध्यक्षता डॉ श्रीशंकर झा आ संचालन अजीत आजाद जी केलनि। कथाकार- चण्डेश्वर खॉं, मुन्ना जी, उमेश नारायण कर्ण, रमाकान्त राय “रमा”, ऋृषि बशिष्ठ, राजाराम सिंह “राठौड़”, ज्योत्स्ना चन्द्रम, कमला चौधरी, विनय विश्व बंधु, चन्द्र मोहन झा “पड़वा”, नन्द विलास राय, बिरेन्द्र कुमार मिश्र, जगदीश प्रसाद मंडल, कपिलेश्वर राउत, उमेश मंडल, दुर्गा नन्द मंडल, संजय कुमार मंडल, मनोज कुमार मंडल, निखिल कुमार झा, बेचन ठाकुर, देवकान्त मिश्र, महेन्द्र नारायण राम, मैथिली पुत्र प्रदीप, गजेन्द्र ठाकुर, लालपरी देवी, राजाराम प्रसाद, आनन्द कुमार झा, सतेन्द्र कुमार झा, उषा चौधरी आ नीता झा अपन-अपन नूतन कथा पाठ कए गोष्ठिक गरिमाकेँ बढ़ौलनि। संगहि अनेको साहित्य प्रेमी सबहक उपस्थिति सेहो गोष्ठिक महत्व बनल रहलाह। पठित एहि कथा सभपर समिक्षा केलनि- हिरेन्द्र कुमार झा, कमल मोहन चुन्नू, रमानन्द झा रमण, गजेन्द्र ठाकुर, कमलेश झा, जगदीश प्रसाद मंडल, अमलेन्दु शेखर पाठक, देवकान्त मिश्र, फूलचन्द्र मिझ आ नीता झा। भरि राति कथापर कथा, चारि कथाक एक पाली तेकर समिक्षा होइत रहल। ई सिलसिला कोनो एक-आध-दू घंटाक मात्र नहि रहल वरण् भिनसर छह बजे धरिक। बारह घंटाक एहि अल्प समएमे उपस्थित ४५सो कथाकारक कथापाठ नहि भऽ सकलनि। ३० गोट कथाक पाठ भेल। बॉचल १५ गोट कथाकारकेँ (जिनकर कथा पाठ नहि भऽ सकलनि) अगिला गोष्ठीमे शुरूहेमे अवसर देल जेतनि से निर्णए भेल। अग्रिम ७१म आयोजन २ अक्टूवर २०१०केँ संध्या ६:३० बजेसँ श्री जगदीश प्रसाद मंडल, बेरमा, मधुबनी (बिहार)क आयोजकत्वमे बुढ़िया गाछी दुर्गा स्थान स्थित मध्य विद्यालय परिसारमे सम्पन्न होएवाक संकल्प लेल गेल अछि जाहिमे समस्त “सगर राति दीप जरय”क प्रेमी आ कथाकार लोकनि आमंत्रित छथि। स्थानपर पहुँचवाक लेल ट्रेनसँ तमुरिया आ बससँ चनौरागंज आबि बेरमाक लेल मात्र तीन किलोमीटर दूरी तँइ कएल जाए। टेम्पू,रिक्सा,टमटम इत्यादिक सुविधा दुनूठाम (तमुरिया आ चनौरागंज) प्राय: उपलब्ध रहैत अछि। प्रा परमेश्वर कापड़ि मानकताक बात विखपाद अछि ! टिप्पणीमे दम आ सोंच सहितक पकिया ओजह अछि । बहुत बढ़ियाँँ लागल आ एहिस’ मैथिली मुर्दा हअ’स’ बँचत । हम नेपालक छी तएँ नेपालक बात करब आ कहब जे नेपाल नव निमार्ण आ संघीय संरचना विकासक क्रममे अछि । एहि ठामक लोक अपन संघीय राज भाषा,संस्कृति, जातीयता, क्षेत्रीयता, सांीकृतिकता आ एतिहासिकौराणिकताक बाहुल्य एवं प्रभुत्वक प्रभावपर चाहैत अछि । सौंच छै जे एहिस’ हमर अस्मिताक पहचान बनत आ स्वायतताक वोध होएत । ई बाएहिलोकलेखेप्रजातन्त्र आगणतन्त्रोस’ पहिनेक चाहना अछि । हमरासबके भाषा संस्कृतिक बाहुल्यता संघीयराज, सांस्कृतिक पहचान आ राजनीतिक पहुच दिअएतै आ दिअबितो छै! हमरासबकेभाषिाक सांस्कृतिक चेतना अस्मीता आ स्वाततावोधस’ आवद्ध रहनेएहिपर राजनीतियो खूब भ’ रहल छैआ आरो होएतै । एहनमे ईमानकताक बात पद बराइ विद्वताक बात अछि आ एहिस’एहि सालक नेपालक जनगणनामे कैथिलीके बडघाटा भेल छै । छेंट ध’क’ घेंट काट’बलासबके कहब छै जेहमसब अछि, छथि, छथिनबला नै छी। हए हब हैहुइ बजैछी तै बजिका बजैछी । बजिका कहि भाषिक लाभ लभगरस’ होएतै आ एकर राजनैतिक सन्दर्भ अलगे छै । पूर्वीतराइमे थारुभाषा अपन अलगेपहचान आ संस्कार बना लेने अछि सेहे नइ,हमरा सबकेसर्लाही, बाड़ा पर्सा जिलासबकेलोक जैंकि छथि अछि नइ बजैत अछि तैंअपनाके मैथिलीभाषी नहि कहि पाबि रहल अछि । जेकोइ मानकताक हुड़फेर फेर’ चाहैत छथि से ई बात किए ने बूझैत छथिन जेमैथिली भाषा असलमे लोकभाषा अछि, मैथिली संस्कृति लोकसंस्कृति अछि । ईएह हाल लोककला, लोकसंगीत लोकसाहित्य, लोकगीत, लोकगाथा लोकचित्रकलाक अछि । जे सुधार विकास आ निखार आएल अछि ओबहुत एक्हर आबिक’ सेहोहफनियाब’ दफनियाब’ आ भाषा–संस्ककृतिपर राज कर’ वास्ते। मिथिलेमे रहिक’ ब्राह्मण–कायस्थेतर लोक अपनाके मैथिल आ अपना भाषाके मैथिली भाषा नै कहि सकल अछि । आनक भाषाके सम्पर्कमे अएलास’ आनो लोक ओ भाषा सिखि जाइए। हमरा जनितेएकहि गाम समाजमे रहियोक’ तथाकथित सोलकन आ छोटवर्णाअछि छथि छथिन नै बजलखिन्ह आ जत’ कतौ बजलोहोतै त’ सेबहिया खबास, नोकरनी बहिकिरनीसब । मनोविज्ञान देखल जाय जेविरुद्धमेजा’क’ लोक वहिष्कार केना करैछै। वाभन पहचानक अछि छथि,छलह आ जनौकेब्राह्मणेतरवर्गभूलियोक लवजपर नइ लएलखिन्ह ! परिणाम भेलै जे अपने मिथिलामेमैथिलीकेप्रचारमे कह’ जाय पड़लै जे अहूँ मैथिल छी आ अहाँक भाषा मैीथली भाषा अछि, अहाँक संस्कृति मैथिली संस्कृति अछि । आइ किछु लोक कत्त’ कहाँकेधोती–कुत्र्ता आ बभनौटी पागकेमैथिली संस्कृतिक पहचानसङे जोड़के घृस्टता कए रहलाह अछि । हमरा जनिते सय बरख त’ बहुत भ’ गेल, भल पचास वर्ष पहिने धरि अपनासबके पुरुख मानुष विद्यापतिसनके चौन्ही पेन्हैत छलाह । चौवन्ही पेन्हनिहारकेएखन तेसर पुस्ता ठीकस’ अएबो नै कएलैए आ समाजमेबाभन छोड़ि आन केओपाग पहिरते नै छै। जे जाति विशेषस’ आवद्ध अछि सेपाग जँ मैथिली संस्कृतिक प्रतीक बनत त’ नै लगैए जे ई बात फेरु हमरेबाभनके थीक से भ’ जएतै? कोनो भाषा समाज आ संस्कृतिस’ जुड़ले रहैत अछि । हमसब ब्राह्मणेतर छी तै हमरासबके बाउ माइ रहे, माताजी पिताजी नै रहथि ! बाउए सब दिन हर जोतलकै, कोदारि पाड़लकै, करीन पटएलकै घर बन्हलकैखेती गिरहस्तीके सब काज कएलकै। जैंपिताजी वाभनके छलनि तैं ओअएलाह गेलाह पुरहिती पण्डितारेकएलन्हि लौटा सेहो चलौलन्हि । हमरासबके घरमे तिमना बनल , हुनकासबके घरमेभोजन आ तरकारी बनलनि । ई लोक नुआ घोती, आ–जमा पेन्हलक ओ लोकनि संस्कृतक वस्त्र पहिरलथि । संस्कृतेमेकाल्हिघरि पतर–पाँति भेजबलाके मैथिली दांवे–घावे ने अप्पन रहनि ? हमरासबमेबाउ हरजोतैहै। भात खाइ है माइ धास छिलै है उसुन बनिहारी खबासी करै हैसे जे कहै छै त’ ओकर सम्प्रेषणमे,कोनोमानकताक गैंची–मोड़ आदर्थीअनादर्थीकेमान÷अपमान लगिते नै छै त’ आनलोक टिप ध’क’ ऐमे भाषिक विष किए पादत ? फेरु नेपालक सन्दर्भमे कहब जे एखुनका समय सन्दर्भमे मानकताक नइ सबकेसमेटबाक आवश्यकता छै सेहोपोल्हा पनियाँक’ ! जनगणनामे एहि विषयलक’ हमरासबकेबहुते पापड़ बेल’ पड़ल अछि आ धन्यवाद एतिुका राजनैतिक दल आ कार्यकत्र्तासबके जे ओहोलोकनि जे जेहन मार्तभाषा बजैत होथि अपन मार्तभाषा लखा मैथिलीक हकमै बड़ पैघ योगदान देलन्हि अछि । मानकता वर्गभेद, जातिभेद भाषाक राजनीति आ संस्कृतिकेहिसाबे विखण्डनक काज करैत अछि । एहिस’ मैथिलीक विशाल बड़गदकेसोझे पाङि दकड़िठुठ एकपोड़िया बनाएब त’ अछिए, लोकगीत, लोककथा ,लोकगाथा आलोकभाषा–संस्कृतिपर सोझे लात मारि कात करब अछि । छठिमाइके आसि आ लोकजीवनमे हिनक महत्व व्रत उपवास आ पावनि –तिहारस’ लोकक जीवनमे आनन्द–उत्साह एवं आस्था–निष्ठाक बाढ़ि–बड़कैतस’ जीवन आनद्यमय बनि जाइत अछि । मिथिलाक अप्पन पावनि–तिहारस’ लोकक जीवनधारा राग–रंगस’ भरि जाइते अछि । एतुका परम्परागत पावनि सबमे छैठक आसि आ महिमा सर्वोपरि रहने आ एकर विध–विधानमे, ओरिआओन बस्तु–जुटानमे स्वच्छता आ शूद्धतापर अधिक ध्यान देने ई पावनि सबस’ बढ़का अछि । परम ईश्वरके शास्त्रे–पुराण आ ज्ञानीए–धर्मी लोक अधिकतर चिन्हैत जनैत अछि, आम अछरकटू लोक छैठपरमेश्वरीएके अधिक जनैत छथिन आ ईह्े ममतामयी एहि लोकके लेल सबकिछु छथिन, सर्वोपरि छथिन । छैठपावनि किथिलामे लोकपूजाक रुपमे विख्यात अछि सेहो मुख्यतः स्त्रीगणद्वारा कएल जाइत अछि आ हिनकास’ सम्वन्धित अनेको राग–भावक गीतसब अछि जे लोकमन्त्रक रुपमे प्रयुक्त होइत रहल अछि । छैठक लोकगीत छठिक अर्ध जकाँ निछुन आ अपरिवत्र्तनीयसनके अछि, परम्परागत अछि आ एहिमे रिमिक्स वा प्रयोगधर्मिता आँकड़ बातर जकाँ छँटा, थुकड़िक’ अलग कए देल जाइत अछि । एकर पाछू एकर सबस’ कहत्वपूर्ण आ मूल कारण ई लगैत अछि जे ई लोकगीत परम्परा सिद्ध अछि आ आधुनिकगीत जा धरि एहन सिद्धिप्राप्त नहि कएल लेत तावत ई प्रचलनके मूलधारमे समाहित भइए ने सकैछ । छैठपावनिमे आदिेदेव भगवान सूर्य आ छैठपरमेश्वरीक पूजा एकहि दिन– षष्ठी–तिथिके, एकहि ठाम, एकहि अर्ध आ एकहि विधि–विधानस’ भेने ईपूजा छैठपूजा, त’ कहबैत अछि मुदा बहुतोलोक भगवती छैठमाइस’ अनभिज्ञ रहने, एहन बूझि भूूूूलियो क’ लैत अछि । एहि लोकपूजामे दिनस’ अधिक सन्ध्या आ रात्रिक महत्व अधिक अछि आ तएँ किछु लोक एकरा डुबैत सूर्य तथा विहान भेने उगैत सूर्यक अर्धस’ जोड़िक’ देखैत छथिन । सूर्यके जलक अर्ध बड़ पसिन्न छैन आ सबस’ बेसी प्रसन्न जलार्ध देनिहारस’ होइत छथिन्ह तथापि छैठदिन जे हिनक पूजा विभिन्न पकवानसबस’ होइत छन् िताहिस’ ई अछिक तिरपित होइत लोकके लहदह बरदान दैत छथिन्ह एहन शास्त्र वचन आ लोक मान्यता रहल अछि । सूर्यके एक दिन सासुरमे यन्त्र–छापस’ साँचल ठकुआ तान्त्रिक रहस्यस’ भरÞल भुसबा खिअएलकनि आ ई पकवान आ विन्यास हिनका बड़ पियरगर लगलनि आ तएँ हिनका ईहे पकवान अरवसिक’ चढ़ाओले जाइत छनि । छैठपावनि मिथिलामे लोकपरम्पराक पूजा रहल होइतोमे एकर प्रचलनक पौराणिक महत्वक अछि आ ब्रह्मवैवर्तपुराणक प्रकृति खण्डमे बहुत विस्तृत रुपमे वर्णन कएल गेल अछि । भगवती षष्ठीदेवीके शिशुसबक अधिष्ठात्री देवी निरुपित कएल गेल अछि । धीयापूताके दीर्घायु बनाएब, हुनक रक्षण एवं भरण–पोषण कएनाइ षष्ठीक स्वाभाविक गुण अछि । पुराणसबमे षष्ठी देवीके बहुत महिमा–मण्डित कएल गेल अछि । मूल प्रकृतिक छठम् अंशस’ प्रकट भेनेस’ हिनक ’षष्ठी’ पड़ल छन्हि । संस्कृतक षष्ठ शब्द मैथिली छठम् अर्थमे प्रयुक्त अछि आ तए हिनका छैठ, छठि मैया कहल जाइत अछि । बढ़का पौराणिक घर–परिवारक ई भगवती छथिन्ह । ई ब्रह्माक मानसपुत्री एवं शिव–पार्वतीक जेठकी पुतौह आ स्कन्दक प्राणप्रिया छथिन्ह । हिनका देवसेना सेहो कहल जाइत छन्हि, सएह नहि विष्णुमाया आ बालदा से कहल जाइत छन्हि । ई माता भगवतीक सोलह मातृका सबमे परिगणित छथि आ अपना समाजमे ई लड़िकोड़ी माताक रुपमे सेहो चिन्हल जाइत छथिन्ह । ई अपन योगक प्रभावस’ शिशुक सङे सदैव बुढ़ियामाइके रुपमे विद्यमान रहैत छथिन्ह आ हुनक रक्षा एवं भरण–पोषण करैत रहैत छथिन्ह । धीयापूताजे सपनामे खियबैत, दुलारैत, हँसबैत एवं अभूतपूर्व वात्सल्य प्रदान करैत रहैत छथिन्ह । ईएह कारण अछि जे सबशिशु अधिकांश समय सुतनाइए पसिन करैत अछि । निन्ह टुटिते बालकक नजरि भगवति परस’ हटने आ हुनकाकोरास’ अलग लगने ओ कान–खिज लगैत अछि । र्ईएह भगवती निनियाँरानी, निन्नवाली बुढ़िया छथिन्ह आ लोरीस’ पड़िकल धीयापूता जावत निनियाँगीत गाबिक’ बजाओल नहि जाइत अछि तावत सुतिते नहि अछि । लोरीक लरमे सुखनिनियाँक अपूर्व स्वर राग आ वात्सल्य भावसहित निनियाँ बुढ़ियाक उपस्थित रहैत अछि । मैथिलीमे निनियाँगीत सुताब’लेल आ घुघुआ झुलुआ गीत हँसाब’–खेलाब’ आ भुलाब’ लेल प्रयुक्त होइत अछि । एहि शिशुगीतके बाल–मन्त्र सेहो अछि, कहल जा’सकैछ । एकर प्रचलन अत्यन्त प्राचिन आ अटुट रुपस’ अछि । —आगे निनियाँ आ’ । बौआके सुतो सात बड़दके निनला’ आगे निनियाँ जनकपुरस’ खटिया मङा देवौ पटनास’ आगे निनियाँ खजन चिड़ैया अण्डा पारि–पारि जो तोरा अण्डाके आगि लगतौ बौआ सुतो । ००० —आगे निनियाँ कटबोै कान बौआला’ लबिहे फोंका मखान आगे निनियाँ कटबौ कान बौआला’ अबिहे पीरे लताम आगे निनियाँ, अबैछी ! बौआला’ निन लबैछी ।। निनवाली बुढ़ियाके अर्थात छठि मैयाके अनेको तरहे अरोधिक’ बजाक’ बौआ–बुच्ची सबके सुतएबाक अनुरोध कएल जाइत अछि । लोरी आ सुखनिनियाँबीचमे इएह निनबाली बुढ़िया आ लोरी गीतक मधुर रस–भावरहने एकर प्रभाव उत्तम संस्कार सनके जीवनपर गम्भीर रुपस’ पड़ैत अछि । वैदिक विधि अनुसार भगवती षष्ठीक ध्यान एना कएल जाइछ— —देवी मञ्जनसङकाशा चन्द्राधकृतशेखराम् । सिंहारुढां जगद्धात्रीं कौमारीं भक्तवत्सलाम् ।। खड़गं खेतं च विभ्राणाममयं वरदां तथा । तारकाहार भूषाढयां चिन्तयामि नवांशुकाम् ।। ध्यान अराधनामे हिनका इहो कहल गेल छन्हि जे सुन्दर पुत्र, कल्याण तथा दया–प्रदान करएबाली ई प्रकृतिक छठम् अंशस’ उत्पन्न जगत्माता छथि । श्वेत चम्पक–पुष्पक समान हिनक वर्ण अछि । ई रत्नमय आभूषणस’ अलंकृत छथि । एहि परम चित्स्वरुपपिणी भगवती देवसेना षष्ठी देवीके आराधना करैत छी— —षष्ठांशा प्रकृतेः शुद्धां सुप्रातिष्ठाश्च सुव्रताम् । सुपुत्रदाञ्च शुभदां दयारुपां जगतप्रसून ।। श्वेत चम्पक वर्णाभां रत्नभूषणभूषिताम् । पवित्ररुपां परमां देवसेनां परां भजे ।। —व्रह्मवैवत्र्तपुराण, प्रकृतिखण्ड ४३÷४९ पृ. षष्ठी मैयाक पूजा छठियारी पूजा दिन होइत अछि आ ई पूजा प्रत्येक बच्चाक जन्मक छठम्दिनमे विध्नेश, जीवन्तिको देवीक संगहि कएले जाइत अछि । जन्मौटी धीयापूताक भाग्य, आरोग्य आ औरदादि लेख ओहि दिन लिखाइत होइतोमे चैती छैठ आ कैतकी छैठके परम्परा बहुत प्रचलित अछि । हिनक महिमाके गुणगाण ऋषिमुनि एहि मन्त्रमय शब्द–भावमे कएने अछि– — नमो देव्यै महादेव्यै सिद्धियै शान्त्यै नमो नमः शुभायै देवसेनायै षष्ठीदेव्यै नमो नमः देवरक्षणकारिण्यै षष्ठी देव्यै नमो नमः शुद्धस्त्वस्वरुपायै वन्दितायै नृणं सदा ।। — ब्रह्म.प्र.ख.— ४३÷५७–६६ भगवती सिद्धि एवं शान्तिके नमस्कार अछि ! शुभा, देवसेना एवं भगवती षष्ठीके बेर–बेर नमस्कार । वरदान देनिहारि, पुत्र देनिहारि, धन देनिहारि, सुख–प्रदान कएनिहार एवं मोक्षदात्री भगवती षष्ठीके बेर–बेर नमस्कार । मूलप्रकृतिक छठम् अंशस’ प्रकट शक्तिस्वरुपां भगवती सिद्धिके नमस्कार । माया, सिद्धि योगिनी, स्वयं मुक्त एवं मुक्तिदात्री, सारा, शारदा आ परादेवी नामस’ शोभा पौनिहारि भगवतीके नमस्कार अछि । बालकक अधिष्ठात्री, कल्याणदात्री, कल्याण स्वरुपिणी एवं कर्मक फल देनिहारि देवी षष्ठीके नमस्कार अछि । अपन भक्तके प्रत्यक्ष दर्शन देनिहारि तथा सबकेलेल सम्पूर्ण कार्यमे पूजा प्राप्त करबाक अधिकारिणी स्वामी कात्र्तिकेयक प्राणप्रिया देवी षष्ठीके बेर–बेर नमस्कार अछि । मनुष्य जिनकर नित्य वन्दना करैत अछि आ देवतालोकनिके रक्षामे जे तत्पर रहैत छथि ओहि शुद्धसत्व स्वरुपा देवी षष्ठीके नमस्कार अछि । हिंसा आ क्रोधस’ रहित देवी षष्ठीके नमस्कार ! हे सुरेश्वरी ! अपने हमरा धन दिअ, प्रिय पत्नी दिअ, पुत दिअ, धर्म दिअ, यश दिअ । हे सुपूजिते ! अपने हमरा भूमि दिअ, प्रजा दिअ, विद्या दिअ आ कल्याण एवं जय प्रदान करु । सोइरीघरमे निवास कएनिहारि षष्ठीदेवी ! परम भक्तिस’ पूजित हुअ’बाली अपने हमरा दीर्धायु प्रदान करु । अपने जन्मसम्बन्धी सुखके जननी छी ! धन–सम्पत्तिके वृद्धि कएनिहारि छी, सब प्राणीके उत्पत्ति स्वरुपा छी ! भगवती षष्ठीदेवीक वात्सल्य–महिमा एवं असीम अनुकम्पाक ई विलक्षण कथा सर्वप्रथक नारदजी, भगवान नारायणस’ सूनने रहथि, जकर विस्तृत वर्णन ब्रह्मवैवर्तपुराण, प्रकृति–खण्डक ४३म् अध्यायमे तथा श्रीमद्देवीभागवतक नवम् स्कन्धमे उलेख अछि । अतुलेश्वर सोचब आवश्यक जे...... ‘मिथिला’ शब्द ककरो लेल अपरिचित नहि, अपने देश वा विदेशक कोनो कोनमे चलि जाउ मात्र ‘मिथिलाक छी’ कहब तँ ओ अहाँक परिचय बुझि जएताह। सभक मोनमे स्वत: आबि जएतनि जतए राजा जनकक राज-दरबार छल, जतए जनकनन्दनी सीताक जन्म भेल छल, जे महाकवि विद्यापतिक जन्मस्थान थिक। हमरा मोन अछि हम जखन बहुत छोट रही तँ जनकपुरमे एक बेर कोनो धार्मिक समारोह भेल रहए, जाहिमे एक दिस जतए साधुलोकनि जुटल छलाह तँ दोसर दिस बहुतो विद्वान लोकनि सेहो। ओहि मध्य एकगोट विद्वान कहलथिन्ह जे ओ जखन मास्को गेल छलाह तँ ओतए रामायण, महाभारतक सङ-सङ विद्यापतिक पदावली सेहो भेटल छलनि। सभास्थ ओ कहलथिन्ह जे –ओतए एकटा पाठक ओहि पदावलीक विषयमे अपन टिप्पणी देने रहथिन्ह जे मैथिली मधुर भाषा नहि अछि। हुनक ओ उक्ति सुनि हमर बालमोनकेँ बड़का झटका लागल, कारण हमर घर मिथिला-मैथिल-मैथिलीक लेल पूर्ण रुपेँ समर्पित छल, जतए आन-आन भाषा मात्र पाहुन भए अबैत छल, ओहि परिवेशमे बहैत बसात सभ किछु मैथिलीक लेल छल आ तेँ हमरा ओ उक्ति सुनि बड़ चोट लागल छल। मुदा किछु क्षणक विरामक बाद ओ विद्वान आगाँ बजलाह जे मैथिली मधुर नहि, सुमधुर भाषा थिक आ हम आइ ओहि धरती पर आयल छी जतुक्का भाषा सुमधुर अछि जे माँ सीताक पर्यायवाची शब्द थिक। हुनक ओ कहब हमर बालमनमे पैसि गेल आ हम निश्चय कए लेल जे आबसँ हम अपन परिचय मिथिलाबासीक रुपमे देब। ओ क्षण आयल, जखन हम पहिल बेर मिथिला सँ बाहर पूर्वोत्तरक राज्य असम पहुँचलहुँ। हमरासँ पूछल गेल ओएह प्रश्न आ हमर उत्तरो पूर्व सोचक अनुसारहिँ निकलल। हमर उत्तर सूनि ओ लोकनि सहजहिँ चर्च प्रारम्भ कए देलनि राजा जनक ओ हुनक जगत्जननी सुपुत्री सीताक, अद्वितीय महाकवि विद्यापतिक आ बहुतो मनीषीलोकनिक। हमर छाती गौरवसँ तनि गेल। हमरहि सङ रहथि एकगोट बिहारी मित्र, जे परिचयमे बिहारी शब्द जोड़लन्हि आ विभिन्न तरहक तानासँ ग्रस्त भए गेलाह। केओ चारा घोटालाक विषयमे जिज्ञासु भए गेलाह तँ केओ लालू माहात्म्यमे, केओ दरिद्रताक विषयमे सोचब प्रारम्भ कएलनि तँ केओ ट्रेनक चोड़ीक खिस्सा, जतेक मूह ततेक खिस्सा। एहि प्रसङकेँ उठएबाक कारण अछि हमर-अहाँक सोचक विषयमे किछु सोचब। मिथिलाकेँ बिहारीपनसँ तँ जुझए पड़ैत छैक, मुदा जखन खोआ-राबड़ी-अमिरतीक गप्प अबैत अछि तँ मिथिलाकेँ ताहूसँ वंचिते रहए पड़ैत छैक, ई किएक? की! मैथिलमे पौरुषक कमी आबि गेल अछि वा हमसभ एखन धरि अपन अधिकारक महत्तेकेँ चीन्हि नहि सकलहुँ अछि? वा आने कोनो गप्प, मुदा एतबा अवश्य जे हमसभ एखनहुँ दही-चूड़ा-चीनीमे लटपटाएल छी। मिथिलाक स्वर्णीम इतिहास, ओहि ठामक अद्वितीय बौद्धिक प्रकाश, मिथिलाक सांस्कृतिक प्रवासमे आबि आन सभ केओ अपनाकेँ भाग्यशाली बुझैत छथि, मुदा ई क्षेत्र सब दिनसँ अपनहिँ द्वारा ठकल गेल अछि, अपनहिँ द्वारा साधल गेल अछि, ई किऐक? एकरहि फरिछएबाक हेतु जखन एहि ठामक मिथिला राज्य आन्दोलनक अभिप्राय विषय पर विषय-वस्तु ताकब प्रारम्भ कएल तँ एकटा आलेख भेटल- ‘हिन्दी भाषा मे अलग राज्य की माँग क्यों सन्दर्भ मिथिला’ ओहि मे बिहारक प्रशासन आ मीडियाक मानसिकताक पर संजय मिश्र लिखने छथि- “सन्दर्भ की बात चली तो थोड़ी बात बिहार की कर लें .......मिथिला के मानस के उद्वेग की। आपके जेहन में उमड़ रहे कई सवालों के जवाब शायद आप तलाश पायें। मिथिला इसी राज्य बिहार का एक अंग है। पौराणिक-एतिहासिक मिथिला का दो-तिहाई हिस्सा बिहार में और शेष नेपाल में पड़ता है। कभी मौक़ा मिले और समय हो तो बिहार के हुक्मरानों के भाषण सुने। इन्हें ही क्यों ....बिहार की मीडिया पर भी नजर गड़ाएं । बिहार की महिमा का जब ये बखान करते तो भगवान् बुध ही इन्हें नजर आते। भगवान् महावीर कभी-कभार याद आते....पर जनक नहीं...माता सीता नहीं। मिथिला का स्मरण करा दें तो इनकी भावें तन जाती। इस इलाके की मिटटी, पानी, हवा...ये सब बिहार की संपदा हुई पर ' मिथिला' शब्द और यहाँ के लोगों से परहेज। यहाँ की विरासत पर गर्व करने की बजाए इन्हें शर्म का अनुभव क्यों ? आगू लिखने छथि जे - सूना होगा आपने की मैथिली भाषा संविधान की आठवीं सूची में दर्ज है...वो साहित्य अकादमी में भी है। यानि इन जगहों पर बिहार का मान बढ़ा रही । पर क्या राज्य के शाषकों को इस पर नाज है ? हर सेन्सस रिपोर्ट में मैथिली भाषियों की संख्या कम बताने की इनकी साजिस क्या किसी से छुपी रह गई है ? थोड़ा पीछे जाएं...शिव पूजन सहाए जैसे ख्यातिलब्ध साहित्यकारों ने मैथिली की परिचिति खत्म करने का बीड़ा क्यों उठाया था ? पाठ्यक्रमों से मैथिली को बार-बार हटाने के कुचक्र क्या राजकीय गर्व का अहसास हैं? मैथिली जब आठवीं अनुसूची में शामिल की गई तो राष्ट्रीय टीवी चैनलों ने भी इसे प्रमुखता से दिखाया। संविधान संशोधन करना पडा था...लिहाजा ये न्यूज़ थी। लेकिन बिहार के सर्वाधिक लोकप्रिय चैनल ने इस खबर को दिखाने की जहमत नहीं उठाई। इस चैनल को बिहार की स्वर कोकिला शारदा सिन्हा की आवाज नहीं सुहाती...क्योंकि वो मिथिला क्षेत्र से आती हैं...जबकि मनोज तिवारी ' अप्पन ' बने हुए हैं। देश के किसी कोने में चले जाएं...गैर बिहारियों से बात करें। बिहार का नाम लेते ही वो भोजपुरी का जिक्र करेंगे। यही हाल इन जगहों के समझदार समझे जाने वाले पत्रकारों का है। अधिकाँश को पता नहीं की मैथिली बिहार की ही भाषा है। बिहार सरकार की गर्व की अनुभूति और काबिलियत ( ? ) का ये जीता जागता नतीजा है। पटना से छपने वाले हिन्दी के अखबारों को पलट कर देखें। हेडिंग्स और कार्टून के टेक्स्ट आपको भोजपुरी में मिलेंगे। इन अखबारों की ये किर्दानी सालों से है....अछा है...पर मैथिली में क्यों नहीं। इन्हें मिथिला का पाठक/ खरीदार चाहिए पर मैथिली नहीं चाहिए...बिलकुल वैसे ही जैसे राज्यके नेताओं को मिथिला के ' लोग ' चाहिए जिन पर सत्ता की धौंस जमाएं पर इन " लोग ' के हित की परवाह नहीं।” एहि ठाम उपर्युक्त उक्ति रखबाक पाछाँ हमर ध्येय ई अछि जे हमसभ किछुओ काल लेल एहि दिशामे सोची। सोची जे, आखिर एहन मानसिकताक जन्म किएक होइत छैक? की! एकर पाछाँ मात्र एतबहि सिद्ध करब अछि जे मिथिला आ मैथिलीकेँ उचित अधिकार निरर्थक छी? की! एखनहु एकर विरोधीलोकनि इएह सोचि रहल छथि जे मैथिल मात्र चूड़ा-दहीमे विश्वास करैत छथि? की! मैथिल एखनहुँ ‘सूतल छी, बिआह होइत अछि’मे विश्वास करैत छथि? नहि तँ एहन मानसिकता किऐक? हमरा लगैत अछि जे एहि मानसिकताक पोषण भेल आर-आर तत्वक सङ दरभंगा राजालोकनिक शासनक समयमे। यदि ओ हिन्दी, देवनागरी, उर्दू, फारसी आ अंग्रेजीकेँ सम्पोषित नहि कएने रहतथि तँ आइ मिथिला-मैथिलीक ई दशा नहि भेल रहितैक। एहि प्रकारक उक्ति देबाक पाछाँ ध्येय अछि ओहि कारणकेँ ताकब, जाहि बलेँ मिथिला-मैथिल-मैथिलीकेँ उचित अधिकारसँ वंचित रखबाक साहस प्राप्त कएल जाए रहल अछि, दरभंगा राजक दूरदृष्टिक अभाव आइ धरि मिथिलाकेँ सता रहल छैक। ओना कारण मात्र ओतबे नहि अछि। हम मैथिल जन सेहो एको पाइ कम दोषी नहि छी, एकर पाछाँ। हमसब आइओ अपन क्षेत्र-अपन मातृभाषाक प्रति सजग-सतर्क नहि भए सकलहुँ अछि, प्राय: एखनहुँ एकर महत्ताकेँ नहि आँकि सकलहुँ अछि। मिथिलाक हृदयस्थली मधुबनी जिलाक झंझारपुर विधानसभाक सदस्य श्री नीतिश मिश्र अपन क्षेत्रमे साधारणो जनसँ मैथिलीमे नहि बाजि पबैत छथि, प्राय: प्रयासो नहि करैत छथि। जँ कदाचित् केओ मैथिल एहि पर टिप्पणी करितो छथि तँ नेताजीक चमचासभ आ मिथिलाक तथाकथित बुद्धिजीवी लोकनिक उक्ति होइत छनि- ‘आह, डाक्टर साहबेक बेटा ने छथिन, सभ दिन बाहरे पढ़लनि, तेँ ई क्षम्य अछि।’ औजी, मिथिलासँ बाहर पढ़बाक परम्परा मात्र मिश्रेजीक परिवारमे छनि कि आओरो लोक पढ़ि रहल छैक। जँ बाहरे पढ़ि ओहि बुद्धिकेँ प्रयोग करब छल तँ ओहि हेतु आन कतेको माध्यम छैक। मुदा, ई जननेता बनबाक लेल जनसँ जूड़ब आवश्यक आ जनसँ जुड़बाक हेतु जन-जनकेर भाषासँ जूड़ब परम आवश्यक, जन-जनकेर मातृभाषाकेँ पूरब आवश्यक। यद्यपि एहनो राजनेताक अभाव नहि जे मैथिल जनक सङ सभ दिशामे पूरि रहल छथि, नहि तँ मैथिलीक उपर उठब असम्भव छल। मुदा, एहि ठाम ई कहबामे कोनो असौकर्यक गप्प नहि जे मिथिलामे नेतृत्त्वक पूर्व अभाव अछि। केओ राजनेता एहि हेतु कृतसंकल्पितो नहि बुझाइत छथि। परञ्च, एकबेर फेर समस्या आबि ठाढ़ भए जाइत अछि हम-अहाँ साधारण मैथिलक लग। जँ सम्पूर्ण मैथिलबासी एहि हेतु कृत-संकल्पित भए उठथि तँ ककर मजाल जे मिथिला-मैथिल-मैथिलीकेँ उचित अधिकार नहि देत। मुदा, की हमसभ एहि दिशामे साकांक्ष भए सकलहुँ अछि? हमरा तँ नहि लगैत अछि, ओना अहाँ सभक जे विचार हो। एहि बीच दरभंगा गेल रही, ओतहि रहनिहार एकटा हमर मित्रक पारिवारिक भाषा हिन्दी सुनि चकबिदोर लागि गेल। ओ अपन मैथिल पत्नीसँ हमर परिचय हिन्दीमे करौलनि आ हम हुनक मूह तकैत रहि गेलहुँ। अपनाकेँ सम्हारैत-सम्हारैत अपन परिचय मैथिलीमे देल। जँ दरभंगामे ई परिस्थिति तँ बाहरक गप्पे करब व्यर्थ। एकरा कि कहब? की, ई अपनाकेँ साधारण मैथिलसँ एक ईंच उपर देखएबाक प्रवृत्ति थिक? आ कि आने किछु। मुदा विषय अवश्य विचारणीय अछि, सोचनीय अछि। एकर पाछाँ फेर कारण तकला पर जेना बुझबामे अबैत अछि जे साधारण मैथिल अपनाकेँ मुख्य धारासँ कटैत गेलाह। एतए द्रष्टव्य थिक एकटा उक्ति, जाहिमे डा.तारानन्द वियोगी रमेश रञ्जनक कविता संग्रह रक्त क आमुख मध्य लिखने छथि – भाषाशास्त्रीलोकनि जनैत छथि जे मैथिलीक जन्म जन-बोनिहार गरीब-गुरवा द्वारा अपन सांस्कृतिक तत्वसभक अभिव्यक्ति हेतु, संस्कृतक विरोधमे भेल छल। आ वैह मैथिली आगू चलिकऽ तेहन सम्भ्रान्त आ संस्कृतिनिष्ठ बना देल गेल जे आम लोक अपन भाषा आ भावके लेल ओहिठाम कोनो जगह नहि पौलनि। मुदा, यैह मैथिली जँ संस्कृतक स्थानापन्न भऽ जइतै, एहिमे धर्म-कर्म पूजा-पाठ होबऽ लगितै, शास्त्र-चर्चा होब’ लागितै तँ एक बात छल। मुदा से किए? संस्कृत अपन बादशाहत तँ कायम कयनहि रहल, एम्हर मैथिली रजनी-सजनीक भाषाटा बनिकऽ रहि गेल।- एहि उक्तिसँ आन जे किछु हो, एतबा तँ अवश्य कहल जाए सकैत अछि जे मैथिली साधारणजनसँ दूर होइत गेलीह, गुटबाजीक प्रवृत्तिसँ आहत होइत गेलीह आ तेँ अपन उचितो अधिकार प्राप्त करबासँ वंचित होइत रहलीह। अपनेसभ देखि सकैत छी जे किछु मैथिल अपनहिँ पएर पर अपनहिँ कुड़हरि भाँजि हिन्दीक सेवा लेल नाङरि ढ़ोलौने फिरैत छथि, सोच ई जे साहित्यिक प्रभाव एकहि बेरमे हिमालय पहाड़ पर चढ़ि जाएत। ई सभ यथार्थकेँ बिसरि जाइत छथि जे हिन्दीक समृद्धिमे अछि मैथिलीक भूमिका। जँ आइ मैथिली हिन्दीक उपेक्षा करए लागय तँ हिन्दीक स्थिति मिथिलामे सेहो पूर्वोत्तर आ दक्षिण जकाँ भए जाएत, जतए हिन्दी प्रसार समिति आ कि-कि ने खोलए पड़ि रहल छैक। मुदा हमरा लोकनि तँ अपन अस्मिताकेँ ताक पर राखि दोसराकेँ सहेजबामे विश्वास करैत छी, अपन सबकिछु न्योछावर कए दोसराकेँ जीवन दए गर्वक अनुभव करैत छी। स्मरण अबैछ सद्य: बीतल ओ दिन, जनकपुर मे मिथिला संघर्ष समिति लेल आन्दोलनक समय बम बिस्फोटमे पांच गोटए शहीद भेल, जाहिमे एकटा मिथिलाक रंगकर्मी रञ्जु झा सेहो छलीह। ओ आइ धरि बिना कोनो स्वार्थकें मैथिली आ मिथिलाक लेल लड़ैत रहलीह आ अन्तमे मिथिलाक लेल अपन बलिदान तक दए देलन्हि, मुदा नेपाली मिडिया खास कए कान्तीपुर मात्र, हुनका प्रति श्रद्धाञ्जलि अर्पित करब अपन कर्त्तव्य बुझलक। एहन बलिदानीक हेतु नेपाल आ भारतक कोनो वरिष्ठ साहित्यकार किछु नहि बजलाह। कोन कारण छल जे भारतीय साहित्यकारलोकनिक सङ नेपालक साहित्यकारलोकनिमे सँ डा.राजेन्द्र प्रसाद विमल, प्राज्ञ रामभरोस कापड़ि भ्रमर, श्री अयोध्या नाथ चौधरी आ महेन्द्र मलंगिया आदिक कोनो वक्तव्य प्रकाशमे नहि आएल? आइ काल्हि छोट सँ छोट खबरि मीडिया मे रहैत अछि, मुदा हिनकालोकनिक संवेदनायुक्त कोनो समाद कतहु देखबामे नहि आएल। पता नहि एकर पाछाँ कोन असंमजसता छलनि। किछु व्यक्तिक सोच छनि जे हमरासभकेँ राजनीतिक सहयोगक आवश्यकता अछि। मुदा, वाह रे ! अपनेक मानसिकता। जाहि राजनेताकेँ हम-अहाँ बनबैत छी ओ सहायता करताह तखन हम डेग उठायब, की उचित? हमरातँ बुझबामे आबि रहल अछि जे किछु एहि प्रकारक लेखक आ साहित्यकार मैथिलीक प्रतिनिधित्व क रहल अछि जनिक मानसिकतामे मिथिला आ मैथिली सँ बेसी अपन हित छनि, अपन अस्तित्वक चिन्ता छनि। मुदा एहन-एहन व्यक्तिक चर्चासँ घबड़एबाक गप्प नहि छैक, कारण आइओ धीरेन्द्र प्रेमर्षि, श्याम सुन्दर शशि, का. रामचन्द्र झा, प्रा. परमेश्वर कापड़ि, गायक सुनील मल्लिक, प्राज्ञ रमेश रञ्जन, का. रोश जनकपुरी सनक लोक नेपालमे सक्रिय छथि जनिक कृतित्त्व आ व्यक्तित्वसँ मिथिलाकेँ गर्व करबाक अवसर बेर-बेर भेटैत रहैत अछि, मुदा प्रश्न ठाढ़क ठाढ़े अछि जे की हमसभ अपन मातृभाषाक लेल कृतसंकल्पित छी? मातृभाषा दिवस क बहन्ने हेमनिमे मातृभाषा दिवस छल, विभिन्न भाषा भाषी लोकनि अपन मातृभाषाक प्रति अनुराग ओकर विकास , अपेक्षा आ उपेक्षा पर चिंतन कयने होयताह। हमहुँ संयोग सं जनकपुर ( नेपाल) गेल रही । जानकी मंदिरक परिसरमे मैथिली भाषी लोकनि मातृभाषा दिवस मना रहल छलाह , सभामे नाटककार महेन्द्र मलंगिया, का. शितल झा, प्रा. परमेश्वर कापड़ि , प्रा. श्याम सुन्दर शशि आदि मैथिलीक विद्वान आ चिंतक लोकनि उपस्थिति छलाह। कार्यक्रमक रूप एकदम जनतंत्रीय छल कारण कार्यक्रम कोनो सभागार मे नहि भ’ जानकी मंदिरक प्रांगण मे भ’ रहल छल , जेकर कारण जनमानसक संख्या अधिक सँ अधिक छल , मोनमे जनमानसक उत्साहकेँ देखि उत्साह भेल । कारण देखल जाइत अछि जे बहुतों खर्च होएबाक पश्चातों जनमानसक सहभागिता कम देखल जाइत अछि, मुदा एतए एहन स्थिति नहि छल। कारण मातृभाषा दिवस क महत्व भाषा धरि सीमित नहि अछि ओकर महत्वक एकटा व्यापकताक अछि। विभिन्न वक्ताक भाषण सुनलाक पश्चात किछु सोचबाक लेल बाध्य कयलक आखिर कियो ई कियाक नहि कहि सकलाह जे एकटा भाषिक आन्दोलनक होयबाक चाहि मात्र एतबहिं कहि रहल छलाह जे हमरा सभकें अधिकार भेटबाक चाहि आखिर हुनका ई कियाक नहि बूझय मे आबि रहल छल जे अखनि धरि मैथिलीक लेल कोनो भाषिक आन्दोलन नहि भेल अछि आ जे भेल अछि ओ जनमानस सँ कटि क । कारण अखनि धरि हम सभ मानकीकरण आ मैथिली ब्राह्मण आ कायस्थ शुद्ध बजैत छथि एहिक लड़ाइ मे लागल छी, जेकर कारण भ रहल अछि मैथिली आइ अपन क्षेत्र धरि नहि बचा पाबि रहल अछि , जाहि जिलाक मैथिलीकें मानक मैथिली कहैत छियैक ओतुक्का जनता मे ई भ्रम छैक जे हम सभ जे मैथिली बजैत छी ई अशुद्ध अछि। एहि विषय पर कियो नहि सोचि रहल छथि जे आखिर ई धारणाक जन्म कोना भेल यदि भेल हम सभ ओकरा निरूपण करबाक लेल कि कहि रहल छी। मैथिलीक प्रति अपने सोचि सकैत छी जे हेमनिमे जाबत धरि साहित्य अकादमी पुरस्कारक घोषणा विलम्ब सँ भेल एहि स्थितिक लेल मैथिलीक चिंतक बुझनिहार लोकनि किछु नहि बाजि सकलाह सभ कियो एहि दुआरे चुप्प रहलाह जे कहि ई पूआ हमरे भेटि जाय। एहि ठाम ई तथ्य उठयबाक हमर मात्र ई नियति छल जे हमर सभक मानसिकता केहन अछि। भाषाक लेल सभ कियो कहताह जे हम ई क रहल छी मुदा हुनका भाषाक सेवा लेल जे पारिश्रामिकों भेटैत छनि ओहि संस्थाक ई स्थिति अछि जे ओतय गेलाक बाद अपनेक बुझायत जे हम कि सोचि आयल छलहुँ हम कि देखि रहल छी । आखिर कियाक? अपने देखि सकैत छी मैथिली साहित्यकार आ चिंतक लोकनि एतेक निम्न स्तरक चरित्रक छथि जे एक दिश कहताह जे फलां महाशय मैथिली आ मैथिलीक साहित्यकारमे भेदभावक स्थापना क रहल छथि आ हम एहि धारणाकें मेटेबाक प्रयास क रहल छी आ जखनि अहाँ हुनक धारणा देखब तँ ओ उन्नैस छलाह आ ई बीस भ गेल छथि , हम नाम लेबए एहि दुआरे नहि चाहैत छी जे बेकार कें ओ लोकनि प्रसिद्ध पाबि जेताह मुदा बुझबाक हेतनि बुझि जयताह । तैँए एहि बीच एकटा मित्र साहित्यकार कहलनि जे मैथिली आ मिथिला मे सभ नागनाथ आ साँपनाथें छथि तैँए किनको बारे बेसी निक वा बेजायक प्रमाण नहि द सकैत छी । बहुत उहापोहक स्थितिक बीच , साहित्य अकादेमी अपन चोर पोटरी खोललक। आदरणीय उदय चन्द्र झा विनोद कें हुनक कविता संग्रह अक्षप आ डा. खुशीलाल झाकें हुनका अनुवाद पुरस्कार सँ सम्मानित कयल गेल दुनू महानुभाव कें शुभकामना । ओना विनोद जीकें मैथिल चिन्हैत छन्हि कारण ओ मैथिली आ मिथिलाक मुद्दा सं जुड़ल छथि मुदा प्रश्न ठाढ़ भ गेल विनोद जीक पुरस्कार सम्मान सँ नहि इ विलम्बसँ । आखिर ई कोन दबाब छल जे पुरस्कार मे देरी भेल । वा पुनः उएह खिस्सा दोहराओल गेल जे एहि बेर विनोद जीकें द दियौन्ह बहुत आश कयने छथि कि कोनो दोसर फार्मूला ।आनन्द कुमार झाजी जिनका युवा साहित्य अकादेमी पुरस्कार भेटल , ओ उचितों जे पहिल बेर मैथिली मे कोनो युवा लेल पुरस्कार भेटल आ ओ हुनका भेटलन्हि एहि लेल हुनका शुभकामना। ओना हमरा जनैत हुनका सँ निक –निक लिखनिहार मैथिलीमे युवा साहित्यकार छथि नाम लेब उचित नहि मुदा प्रश्न उठल जे कोन कारण अछि एहि बेर सभ पुरस्कार एकटा वर्ग मे सीमित रहि गेल कारण रचना स्तरीय अछि तँ कियाक मैथिली एकगोट प्रसिद्ध आलोचक सँ पूछल जे युवा पुरस्कार जिनका भेटलन्हि अछि ओहि पर कि कहब अछि ओ कहलनि जे ठीके छैक कम सँ कम पाइ तँ भेंटि गेलन्हि। आ हमरा लागल जे ठीके साहित्य सेहो आब बाजारक चिज बनय जा रहल अछि ओकर अर्थ , ओकर महत्ता ओकर सामर्थ्य क्षिण भऽ रहल अछि। एहि बीच होरी समाप्त भेल आब मिथिलाक गाम सभमे फागु नहि गायल जाइत अछि , गाम संवेदनहीन भ गेल अछि । सांस्कृतिक चिंतन पर असमक एकटा विद्वानक लेख मोन पड़ैत अछि हुनक नाम ओतेक मोन नहि अछि किन्तु ओ सांस्कृतिक परम्परा पर जे गप्प कहने छलाह से मोन अछि। हुनक चिंतन असमक परम्पराक विषय मे छल जे एक दिन असम मे एहन स्थिति आओत जे बिहु संग्रहालय आ मंचक वस्तु भ जायत । ओतुक्का कि स्थिति छैक से कहि नहि सकब कारण ओतय किछु सांस्कृतिक चेतना बाँकी छैक से हम देखल , मुदा मिथिलामे ओ ठीके रंगमंचक प्रेक्षा गृहक वस्तु भ गेल अछि संग्रहालय मे राखल जाए मुदा मिथिला मे अखनि धरि विस्तृत संग्रहालय नहि अछि। ई प्रश्न एहि दुआरे हम कहि रहल छी जे एकटा ईमेल हकार पाँति क आयल छल ओहि मे अपन सांस्कृतिक चेतनाकें बचयबाक लेल कहल गेल अछि आ जेकर कारण ओ लोकनि फागु महोत्सव मना रहल छथि , मुदा तँ जे करै छी से ठीके मुदा कि एकर दूरगामी प्रभाव होयत वा क्षणिक कारण रंगकर्मी ई तं नहि सोचि क जयताह जे निक तैयारी आ प्रस्तुति सँ पैघ पुरस्कार भेटि जाय ? अन्त मे वासंती नवरात्र आ रामनवमीकेँ सम्पूर्ण मिथिलावासीकेँ मंगलमय शुभकामना। गाम मे नहि फागु आ नहि भोरक पराती मामाजी हमर लगभग 90 वर्षक भ गेल छथि आ हुनकासँ भेंट लगभग एक दशकक बाद भेल छल। कारण मामाजी असर्मथताक कारण आब गाम नहि जा पबैत छथि ओ काशीमे रहि रहल छथि। एहि बेर काशी यात्राक क्रममे मामाजीसँ भेंट भेल, प्रणाम पातिक बाद घरक कुशल क्षेम, काजक विषयमे आ बहुत किछु पुछलनि किन्तु सभसँ बेशी पुछैत छलाह गामक विषयमे। मामाजी काशीमे निश्चित छथि मुदा हुनक आत्मा गाममे छनि। गामक घर, गामक लोक, गामक गाछी बिरछी आदि हुनक स्वप्नमे अबैत छनि। ओना सभक इच्छा रहैत छैक जे जीवन अन्तिम समयमे तीर्थ करी मुदा मामाजीक इच्छा छनि गाम देखि आ गामक लोकसँ भेट करी आ ई इच्छा ओ हमरा बेर-बेर गप्पक क्रममे कहैत छलाह । हमरासँ हुनका एतबहि आग्रह रहैत छलनि जे गप्प गामक कहु प्रदेशक नहि । कारण गाममे परिवर्तन भ रहल छैक कहाँदन बड़का राजपथ बनि गेलैक आब गाम जायब दुस्कर नहि। मामाजी जे गाम देखने छलाह ओ बहुत पिछड़ल। मुदा हम मामाजीक एहि भावावेशकें देखैत कहलियनि मामाजी अहाँ जे गाम ताकि रहल छी जे गामक स्मृति अहाँ रखने छी से गाम आब नहि छैक गाम बदलि गेल छैक सभ किछु गाममे ओहिना भ गेल छैक जहिना शहरमे । आब गामो मे सभ किछु बिकायत छैक ,आब ओ गाम नहि ओ तँ एकटा बाजार अछी जतए शहर लोक अपन गाम तकबाक लेल अबैत अछी ओ लोकनि गाममे अपन जीवन तकैत छथि मुदा गाममे हुनका संग ग्राहक जेकाँ व्यवहार कयल जाइत अछी जहिना भारतक संस्कृति देखबाक लेल आयल विदेशीक संग भारतीय लोकनि करैत छथि ओहि प्रकारें कतहु संवेदना नहि कतहु भावनाक भाव नहि। आ हमर ई गप्प सुनि मामाजीक आँखि नोरसँ भड़ि जाइत छनि मुदा हम सत्य कें कतेक नुका नहि सकैत छलहुँ। आ ओकर पश्चात मामाजी गामक खिस्सा हमरा सुनबय लगैत छथि । हुनका लग परतंत्र भारतक गामक खिस्सा छल तँ स्वतंत्र भारतक गामक खिस्सा ,बाढ़ि आ रौदीक खिस्सा छल तँ हरित क्रांतिक , गामक लोकक खिस्सा छल तँ गामक जीवनक सेहो मुदा मामाजी क कहल प्रत्येक गप्प हमरा आब खिस्सा लागि रहल छल। कारण जखनि गाम जाइत छी तं अपन हेरायल गामकें ताकैत छी मुदा गाम नहि भेटैत अछी ओ गाम जे पिताक उपन्यास , कथा आ कविताक गाम छल । विदेश्वर बाबा मंदिरक घंटी , दादीमाँ क पराती ।, ओना हमरा हुनक कहल गामक ओ यथार्थ आब खिस्सा लागि रहल छल कारण मामाजी अनुसार गाममे सभ कियो एक दोसराक लेल जीबैत छल मात्र अपने टा लेल नहि । ककरो सुख वा दुखकें अपन बुझैत छल, ककरो समांगक लेल खोजय नहि पड़ैत छलैक सभ कियो सभक समांग छलैक । सभक बच्चा काशी , इलाहाबाद ,दरभंगा आ पटनामे पढ़ैत छल मुदा सभक अभिभावक गामक एक गोटें होइत छलाह सभ बच्चा अपन खगता ,अपन आकांक्षा ओहि गामक अभिभावकसँ ओहि प्रदेशमे कहैत छलाह आ एकर अर्थ गामक संबंध प्रदेश धरि ओहिना छल ई एकर प्रमाण छल। हमरा हुनक गामक प्रति एहि अगाध विशेषता सुनि रहल नहि गेल आ हम मामाजी सँ पूछी बेसैत छीयन्हि - मामाजी अहाँ जे गामक गप्प कहैत छी ओ गाम हम सभ नहि देखि रहल छीयैक हम सभ जे गाम देखि रहल छी ओ हमरा शहरक संस्कारसँ लिप्त भेटैत अछी आ अहाँ सँ सुनल गाम तँ आब खिस्सा भ सकैत अछी यथार्थ नहि । कारण जहिना शहरमे ककरो एक दोसरा सँ कोनो सम्पर्क नहि उएह स्थिति गाम मे अछी आ गाम सभ्य रहल अछी , गाममे रहनिहार लोक कहैत छथि। कारण हुनका लोकनिक कहब अछी जे पहिने गामक लोक अनेरे घुर लग बैसि समय बर्बाद करैत छलाह आब देखियो सभ अपना मे मस्त अछी घुर कि बरंबडा पर एकठाम बैसल लोककें नहि देखि सकैत छी । मामाजी गामक अल्हुआ , मड़ुआ आ नवका अगहनी चाउरक भुझल भुझाक स्वाद मोन पाड़ि रहल छलाह आ हम हुनका गामक सिंघारा , चाउमीन आ चाटक स्वाद कहि रहल छलयन्हि । मामाजी कुँवरसिंह थानक कीर्त्तन मोन पाड़ि रहल छलाह आ हम हुनका नवका भजनक गप्प कहि रहल छलयन्हि , मामाजी पैटघाट चौकक यात्रा दिनक खिस्सा कहि रहल छलाह आ हम हुनका सभ बेर मारि भ जाइत अछी झिलहौरक लेल पानि कत जेना –तेना दुर्गाजीक प्रतिमा भसि जाइत अछी । आ हमरा लागल मामाजीकेँ हमर एहि गप्प पर मोन नहि मानि रहल छनि आ अन्तमे कहैत छथि छोटु ई कोना भ सकैत छैक कारण गामक अर्थ गामक गीत, प्रीत आ रीति होइत छैक । कि सभटा बिला गेल गामसँ । आ हम कि कहि सकैत छलयन्हि जे मामाजी आब नहि तँ गामक गीत , प्रीति आ रीति सभटा अहाँक सुनाओल गामक खिस्सा जेकाँ ओहो सभ आब एकटा अतीतक खिस्सा भ गेल छैक। नहि फागु छैक आ नहि भोरक पराती। अन्त मे पाठक लोकनि ई मात्र हमर मामाजी क स्वप्नक गामक खिस्सा नहि , ई प्रत्येक मिथिलाक गामक खिस्सा छी। कि हम असत्य कहि रहल छी कारण सभ गोटाकें गाम हमरे जेकां भेटत।हमर मामाजीक गाम आब नहि भेटत । कियाक ? ई एकटा सोचनीय प्रश्न अछि। तीन तिरहुतिया तेरह पाक मिथिला आ मैथिली भाषाक बाबा विश्वनाथक नगर काशीसँ पौराणिक संबंध रहल अछि। मिथिलाक लोक मोक्ष प्राप्तिक कामनाक लेल काशी वासक बड्ड बेशी महत्व दैत छलाह तँ दोसर दिशि एहिठामक लोकक उच्च शिक्षाक आकर्षणक केन्द्र छल काशी। एहि तरहेँ सोचल जाए सकैत अछि जे मैथिली भाषाक आधुनिक कालकेर विकास एहीठाम प्रारम्भ भए मैथिली भाषाक आधुनिकीकरणक निओँ पड़ल होएत। ई तँ सर्वविदित अछि जे मैथिलीक लेल आन्दोलनक प्रारम्भ आ आन्दोलनकें मिथिलाक लोकसँ जोड़बाक रणनीति काशीअहिसँ प्रारम्भ भेल । मुदा, हेमनिमे देखबामे आबि रहल अछि जे काशी मिथिलाक लोक-भावनासँ तँ निश्चित रुपेँ जुड़ल अछि, परञ्च लोकसँ नहि । मिथिलाक लोक आइ उच्च शिक्षाक हेतु जतए आन-आन ठाम जाइत छथि तँ तीर्थ करबाक लेल सेहो काशी सँ बेशी दक्षिण वा उत्तर दिशि। कहल जाइत छैक जे सामाजिक-धार्मिक वा अन्य भावना लोककें कोनो स्थान सँ जोड़ैत अछि। आइ काशीक प्रति मिथिलाक लोकक भावनामे ह्रास आयल अछि। काशी, जे कहिओ सभ मिथिलाबासीक हृदयमे बास करैत छल, आइ बहुतो दूर चलि गेल अछि। हेमनिमे हम काशी हिन्दू विश्वविद्यालयमे एकटा कार्यशालामे गेल रही, लगभग पन्द्रह दिन ओतय रहलहुँ, मुदा हमरा ओ काशी नहि भेटल, जतए कहियो मिथिलाक लेल जागरण कयल गेल छल। बहुतो प्रयास कएलाक बादो नहि तँ केओ जागरणक चर्चा कयनिहार आ नहि केओ जागरण कयनिहारक। लागल जेना हुनकासभकेँ एहि प्रकारक कोनो जागरणक ज्ञानो नहि छनि। कारण कार्यशालामध्य जखन हम चर्च कएल जे कहियो मैथिली भाषाक पढ़ाइ एहि विश्वविद्यालय मे होइत छल, तँ से सुनि ओतय उपस्थित मैथिल आ अमैथिल अकचका गेलाह। अत्यन्त दु:ख भेल ई सोचि जे हमसभ कतबा सुस्त भए गेलहुँ अछि अपन मातृभाषाक प्रतिऐँ। एक दिशि आन भाषाभाषी गर्भमे नुकाएल अपन इतिहास बहार करबामे व्यस्त छथि आ हमसभ अपन इतिहासकेँ बिसरबामे। मोन पड़ल जे कहियो हमर सभक बुद्धिजीवी वर्ग अपन भाषा आ माटिकें सम्मान देबाक लेल लड़ैत छलाह, मुदा आजुक बुद्धिजीवी वर्ग बसुलिऐ धारकेर प्रकृत्तिसँ आबद्ध भए अपन माटि आ भाषाक चिन्तन छोड़ि चुकल छथि। कहबाक अभिप्राय जे कतेको संघर्ष सँ हमर-अहाँक पूर्वजलोकनि मैथिलीकें अखिल भारतीय साहित्यिक मंच सँ जोड़लनि। हुनकासभक सोच छल जे मैथिलीकेँ विस्तृत परिवेश प्राप्त होएतैक, जाहिसँ साहित्यिक समृद्धि होएत। मुदा, अत्यन्त कष्टक अनुभूति होइछ, जखन आजुक कर्णधारलोकनिकेँ ‘स्व’केर फेरमे पड़ल देखैत छी। किछु एहने सोचनीय स्थितिमे अपन उद्वेग जखन एकटा मित्र लग राखल तँ हुनक कहब छल जे ई तँ अदौसँ होइत आबि रहल अछि। हमसभ अपनेँ जाँघ पर कुरहरि चलएबामे बड़ आगू छी, भने किछु कालक हेतु किछु सुविधा प्राप्त भए जाए। हुनक कहब छल जे अहाँक चिन्ता साहित्य अकादमी पुरस्कारक स्थिति देखि भए रहल अछि, मुदा ई तँ बहुतो दिनसँ होइत आबि रहल अछि। पुरस्कार प्राप्त करबाक हेतु गुटबाजी करए पड़त, नहि तँ चकोर बनि ओसक बुन्नकेर आशामे जीवन व्यतीत भए जाएत। मैथिली मे आई धरि जतेक अकादमी पुरस्कार भेटल अछि, ओकर जँ उचित मूल्यांकन कयल जाय तँ देखब जे बेशीतर मात्र गुटक प्रसंशक वा हुनक दया पात्रहि पुरस्कारसँ सिंचित भेलाह अछि, एहि हेतु चाहे केहनो साहित्यकार वा साहित्य होथु, हुनक बलिदान देल गेल। ओहि मित्रक एकटा आर बात बहुत दुखदायी छल जे मैथिलीक जाहि पुस्तककें साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटल अछि, ओहि मे किछु लेखकक पुस्तककेँ छोड़ि बाँकी पुस्तकक अनुवाद जखन दोसर भाषामे कयल जायत तँ दोसर भाषा-भाषी इएह सोचताह जे मैथिली मे अखनि लेखन आरम्भ भेल अछि, किएक तँ ओ पुस्तक रचनाकारक प्रारम्भिके चरणक होइत छनि। हुनक ई समालोचना सुनि हमरा भेल जे यदि ई भावना सत्य तँ कि मैथिली अपन परिवेशकेँ बढ़ा नहि सकत? सङहि सोचनीय विषय इहो जे एहि भाषाक प्रतिभा गुटबाजीक फेरासँ उबरबाक हेतु दोसर भाषाक दिस आकृष्ट नहि भए जाथि। हमरा जनैत एकर एकमात्र उपाय अछि जे माँ मैथिली एहि तथाकठित मठाधीशलोकनिकेँ सद्बुद्धि देथुन जे ओ सभ अपन व्यावहारिक पक्षमे पारदर्शिता आनथि, पहिनेँ माँ मैथिलीक हित देखथु, तखन अपन। ओना मैथिलक हेतु तँ कहले गेल अछि जे ‘तीन तिरहुतिया तेरह पाक’, जकरा साहित्य अकादमी पुरस्कारक चयन समितिक सदस्यलोकनिक मध्य चरितार्थ होइत देखि एतबा सोचबाक हेतु बाध्य कएलक। काशी मे घुमबाक समय जे मैथिल भेटैत छलाह आ जखनि हुनका लोकनिसँ मैथिली मे गप्प करैत छलहुँ तँ एकटा अलग आनन्द भेटैत छल(ओ मैथिल मात्र बुद्धिजीविए नहि अपितु साधारण मजदूर वर्गक सेहो होइत छलाह ), ओतेक आनन्द जे गंगा आ विश्वनाथ दर्शन सँ नहि भेटैत छल। एहीक्रममे मकर संक्रान्ति दिन अस्सी घाट पर रिक्शा चालक पासवान जीक गप्प मोन पड़ैत अछि, जनिक उक्ति छल जे हमर भाषा मैथिली बड़्ड मीठ छैक, मजबूरी आ पेटक कारणेँ मैथिली छोड़ि दोसर भाषा बजैत छी। हुनक एहन उक्ति सुनि हम पुन: सोचबाक हेतु बाध्य भेलहुँ जे जँ एहिना पढ़ल-लिखल व्यक्तिओ सोचथि, तँ माँ मैथिलीक केहन दिन होएतनि? अन्त मे आदरणीय साकेतानन्दजीक आकस्मिक देहावसान बड़ कष्टप्रद, काशीमे हुनका अवसानक मादे चर्चा करैत डा. अजय मिश्र कहलन्हि जे एकटा सहज लोक चलि गेलाह मैथिली संसारसँ। ठीके, राजशी ठाठ-बाट छोड़ि आमजनक जीवन व्यतीत करैत साकेतानन्दजीक सौम्य मुखमंडल आगाँ नाचि उठल। मुदा, ई तँ ईश्वरेच्छा। हुनकहि हाथ सद्गति, सद्बुद्धि आ सद्भावना, प्रार्थना जे मैथिलीक तथाकथित भाग्यनिर्मातालोकनिकेँ मुक्त हाथेँ बाँटथु सद्बुद्धि। समयलाई सलाम आ धीरेन्द्र प्रेमर्षिक अभिमत नेपालीय मैथिली साहित्यक एकटा सशक्त कड़ीक नाम थिक धीरेन्द्र प्रेमर्षि। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक रचनाक विशेषता छनि मिथिलाक संग जीयब। मैथिलीमे धीरेन्द्र प्रेमर्षि ‘कोन सुर सजाबी’ लिखलन्हि , आ नेपालीमे समयलाई सलाम। दुनू ठाम मिथिला अछि। दुनू ठाम मिथिलाक चिन्ता अछि। हुनक गजल संग्रह ‘ समयलाई सलाम’ क परिपेक्ष्यमे नेपालक राष्ट्र कवि ‘ माधव धिमिरे ’ कहैत छथि जे ‘ प्रेमर्षिको मातृभाषा मैथिली हो। उनी मैथिलीमा गीत पनि लेख्छन् र मैथिलीमा सपना पनि देख्छनृ। नेपाली भाषामा सपना देख्छन्, उनै जानुन, तर गीत चाहिं नेपालीमा व्यड़्ग्य कविता लेखन र वाचनाबाट नेपाली पाठक सामु परिचित भएका धीरेन्द्र राम्रो उद्धोश गर्ने व्यंितव पनि हुन्।’’ धीरेन्द्र प्रेमर्षिक भाषिक परिपेक्ष्यमे कहैत छथि- ‘‘ गजल सङ्ग्रहको महत्वपूर्ण पक्ष हो- भाषिक संयोजन, नेपाली र मैथिली भाषाका ठेट षब्दहरूको संयोजन अति राम्रोसंग अति राम्रोसंग भएको छ; जुन महत्वपूर्ण पक्ष हो ‘‘ माटोमा नै मन्दिर देख्ने ‘ चलित्तर ’ ले पनि अब बलि दिने ‘ गहबर’ मा रे , साढेसाती कटेपछि ’’ हमर प्रसंगक बीच धीरेन्द्र प्रेमर्षीक चर्च करबाक पाछू किछु अभिप्राय अछि जतऽ भारतीय युवा साहित्यकार (ओ लोकनि जे अपनाकें हिन्दीक साहित्यकार बुझैत छथि) लोकनि कतहु मैथिलीकें मान नै दऽ पबैत छथि, मात्र मैथिलीकेँ क्षीण करब हुनक मंशा रहैत अछि। पूछय चाहैत छी जे ई मानसिकता किएक? एक्के भाषाक लोक आ ई भिन्नता किएक? आ अन्तमे कवि धीरेन्द्र प्रेमर्षीक गजलक ई पाँति हमरा मोन पड़ैत अछि- ‘‘ जोर जुलुमसं जे ने झुकए से भाले लगए पिअरगर यौ इन्द्रधनुषी एहि दुनियामे लाले लगए पिअरगर यौ’’ यात्रीक प्रसंग ई साल यात्रीक जन्मशती वर्ष अछि मुदा मिथिला आ मैथिलीक कतेक लोक हुनका मोन पारि रहल छनि जे नै कहि। कारण यात्रीक जन्मदिन मनेबाक अर्थ ई नै अछि जे हमरा लोकनि हुनका नामपर समारोह केलहुँ कि नै ( ओना समारोहक आयोजन करब विशेषतः अपन स्वार्थ रहैत अछि)। यात्रीक विचार कतेक जीवित रखने छी हमरा लोकनि , कारण मैथिली साहित्यक स्थिति ई अछि जे बिसरब आ खिधांस करब मात्र हमरा लोकनिक कर्तव्य छी, तइपर विचारब आवश्यक। आशीष अनचिन्हार , जे हमरा जनैत यात्रीकें बुझबाक चेष्टा नै कएने हेताह यात्रीक ऊपर अंगुरी उठबए लगैत छथि। हमरा तँ आश्चर्य लगैत अछि जे हम सभ आखिर पुरखाकें सम्मान नै दऽ सकैत छियनि तँ कमसँ कम अपमान तँ नै करक चाही। यात्रीक साहित्य आ हुनक मैथिली सेवाक मूल्यांकन करबाक संग ,पहिनें ई सोचि ली जे यात्री मिथिला आ मैथिलक लेल की देलन्हि। विकृतिता आ संर्कीणतासँ भरल मिथिलामे सेहो यात्रीक जन्म भऽ सकैत छल। ऐ सौभाग्यपर सोचू। कारण यात्री सन व्यक्तिक जन्म बेर-बेर नै होइत अछि। अन्ततः , कहबाक - सोचबाक तात्पर्य ई जे हम सभ कतए जा रहल छी, की हमरा सभक मार्ग उचित अछि, एहिना किछु विन्दुपर पहिने सोची आ तखनहि अपन मुँह खोली। कहलो गेल छैक जे - ‘इएह मुँह पान खुआबए आ इएह....... ’ तें मत रखबासँ पूर्व पूर्ण सोचि-विचारि ली आ तखने मत लदबाक प्रयास करी। अहीमे निहित अछि अपन, समाजक आ साहित्यक हित। हिन्दीक दृष्टि आ मैथिली भाषा भारत आ नेपाल दुनू ठाम आइ काल्हि जनगणना भऽ रहल छैक जइ मध्य भाषाक सेहो गणना हएत । जइसँ ज्ञात हएत जे कोन भाषाक कतेक भाषा-भाषी अछि । आ ऐ समयमे हिन्दी भारतक राष्ट्रभाषा अछि ओना सत्य ई अछि जे ओ अखनि धरि अपन समांग बचेबाक लेल कुहि रहल अछि कारण भारतमे जे कोनो काज होइत अछि ओ अंग्रेजीमे। कारण सम्पूर्ण भारतक सम्पर्क भाषाक आधार हिन्दी नै अछि ओकर आधार अंग्रेजी अछि । भारतमे कहल जाइत छैक जे अंग्रेजीक प्रभुत्वक कारण हिन्दी पछुआएल अछि मुदा से सत्य नै थिक । हिन्दी भाषाक प्रति जे लोकक मानसिकता अछि ओ यदि हिन्दी स्वीकार करैत अछि तँ ओकर अपन मातृभाषाक अस्तित्व समाप्त भ सकैत अछि। कारण मैथिली भाषा ओकर प्रतिफल भोगि रहल अछि। हम कहि रहल छलहुँ जनगणनाक विषयमे। ऐ जनगणनामे हिन्दी पुनः मैथिलीक अस्तित्व समाप्त करबाक लेल अपन राजनीति खेल चलि रहल अछि जेकर प्रश्रय हमर सभक नेता लोकनि दऽ रहल छथि। ऐठाम मैथिलीक प्रति हिन्दीक दृष्टिक मादे नेपालक पत्रकार आ साहित्यकार अभि सुवेदी अपन आलेख ‘ समय रेखाः विद्यापति , प्रेमर्षि र हुसैन’ मध्य लिखने छथि- मैथिली भाषाले मिथिलामा हिन्दी भाषाबाट खेप्नुपरेको यातनाको कथा लामो छ । जनमत भएको बेला अंग्रेज र पछि भारतको कंग्रेस सरकारले मैथिली भाषीलाई हिन्दीभाषी हुँ भनेर परिचय दिने प्रचार आदेश अनि अरू कथाहरू स्व. रिचर्ड बर्गार्ट भन्ने बि्रटिस र एक मित्रको गम्भीर अध्ययनमा हामी राम्ररी पढन पाउँछौँ । नेपाली भाषाको कारणले र अहिले आएर फेरि राजनीतिमा हिन्दी बोल्न नजाने पनि हिन्दीलाई राजनीतिक आधार मानेर प्रचार गरिहिँड्ने नेताहरूका आँखामा मैथिली भाषा ओझेलमा पर्ने डर सिर्जना भएको छ ।’ ऐ उक्ति सँ ई निश्चित भऽ जाइत अछि जे हिन्दीकेँ अपन अस्तित्व रक्षामे सभसँ बेशी डर मैथिलीसँ छैक तँए तँ ओकर भाषाशास्त्री आ साहित्यक आलोचक लोकनि मैथिलीकेँ अपन बोली कहि कहि मैथिलीकेँ दबएबाक चेष्टा करैत छथि । कारण हिन्दी अपन बोलीक संख्या बढा चढाकेँ प्रस्तुत कएने अछि जइसँ लगैत अछि जे हिन्दी कतेक कमजोर अछि। हम भारतक भाषा विषयक एकगोट संस्थामे काज करैत छी आ ओतहि ऐ मुद्दापर चर्चा होइत छैक जे हिन्दी केकर मातृभाषा छी , हिन्दी कतऽ मुख्यतया बाजल जाइत अछि। कियो उत्तर नै दऽ पबैत छथि कारण जे हिन्दी क्षेत्र कहि रहल छथि ओइठामक भाषा हिन्दी नै अछि। हुनक मातृभाषा दोसर थिक हँ हिन्दी भारतीय राजनीतिसँ जुड़ल होएबाक कारण सम्पर्क भाषा थिक । तखन तँ एकर अर्थ भेल जे हिन्दीक निज साहित्य जेकर बलेँ ओ अपनाकेँ प्राचीन कहेबाक चेष्टा करैत अछि ओ सत्य नै थिक । हिन्दी आइ अपन अस्तित्वक लेल जे साम्राज्यवादी मानसिकता पोसने अछि ओ ओकरा लेल नीक नै छैक । तँए हम मिथिलाक लोककेँ हिन्दीक पट्टीक लोक नै कही। ओइ लेल भारत आ नेपालक दुनू मिथिलाक लोककेँ एकटा भाषा आन्दोलनक आवश्यकता छैक किएक तँ जावत धरि हिन्दीक पाँजसँ हमर भाषा, हमर लोकवेद आ हमर साहित्यकार नै मुक्त हेताह तावत धरि हम एहिना हिन्दीक माँझमे दबाएल रहब । वैश्विक सोच ? की, मैथिली साहित्यमे आइ काल्हि एकटा नव संस्कार वैश्विक सोच देखबामे आबि रहल अछि? प्रायः तकरहि सिद्ध करबाक लेल युवा रचनाकार धरि अपन भाषिक मर्यादाकें तोड़ि रहल छथि। सभसं बेसी दुखद पक्ष अछि जातिवादक नारा। हमरा सभकें ज्ञात अछि जे भारतीय राजनीतिमे एहन नारा राममनोहर लोहियाक देन थिक, खास कऽ उत्तर भारतमे। ठीक ओहने सन नारा मैथिली साहित्यमे तारानंद वियोगी लगाएब प्रारम्भ कएलनि अछि। एतय हुनक नाम उद्धृत करबाक प्रयोजन एहि कारणें भेल जे ओ अपनाकें ‘ नन मैथिल’ कहैत छथि। से कोन आधार पर? हमर एकटा मित्र छथि मणिपुरक, जे नेपाली भाषी छथि मुदा अपनाकें मणिपुरी कहाएब पसिन्न करैत छथि। ओ जखन वियोगीजीक उक्त अंश पढ़लनि तँ हमरासँ पूछि बैसलाह जे- अतुल यो लेखक मिथिलाको हो, हम कहलियनि- हो! ओ ई बुझि हँसय लगलाह। हमरा बड्ड खराब लागल। मुदा मोने मोन सोचलहुँ जे ई नव पंडित छथि, आधुनिक समयक नव वर्ग, नव सामंत। एहन वर्गमे अवसरवादिता चरम पर देखल जा सकैत अछि आ ओ सभ कखनो ओकर लाभ लेबासँ चुकए नै चाहैत छथि, ओइ लेल जतेक नीचाँ तक जाए पड़नि। तें एहन चरित्रबला साहित्यकार सभसँ मिथिलाक विषयमे एहिसँ नीक सोचब अकल्पनीय होएत, ठीक तहिना जेना एकटा अंग्रेज भारतक विषयमे सोचैछ। हमरा जनैत वियोगीजीकें ई बुझल छनि जे यदि ओ ई बात मैथिल समाजक विषयमे कहथि जे हम सभ मैथिल नहि छी ( जातिवादक सहारा बिना लेने ) तँ हमरा विश्वास अछि हुनका बड्ड फज्जति हेतनि। तें जातिवादक ढालपर अपनाकें मिथिलासँ दूर देखएबाक प्रयास करैत छथि। ठीक,एहिना मर्यादा तोड़ैत देखाइत छथि किछु नवतुरिया सेहो, जिनका नै तँ मैथिली साहित्यक गम्भीर अध्ययन छनि आ नहिये साहित्यिक मर्यादा बुझल छनि। कारण ई युवा लोकनि साहित्यिक आ मिथिलाक चिंतनसँ बेसी आरोप आ प्रत्यारोपमे समय आ शब्द बर्बाद करैत छथि। जेना आशीष अनचिन्हार अपन विकीलीक्सक खुलासामे शब्द सभक जे प्रयोग कएने छथि जे हुनक साहित्यिक अनुभवहीनताकें देखबैत अछि। हुनक आक्रोश सत्य ओ उचित भऽ सकैत अछि मुदा ओहनो स्थितिमे शब्दक प्रयोगक एकटा सीमा छैक, जकरा लांघब शिष्ट समाजक लेल उचित नै। बहुतो टिप्पणी पढ़बाक क्रममे सेहो किछु टिप्पणी पढ़ल, लागल जेना ई लोकनि मात्र मैथिली साहित्यक तथाकथित दुर्बल पक्ष पर टिप्पणी कऽ सकैत छथि, आर किछु नै। ओना हुनका लोकनिक टिप्पणीसँ मैथिली साहित्यकें कोनो प्रभाव नै पड़तैक से हुनका बुझक चाही। कारण किछु व्यक्तिक हो-हल्लासँ सार्थक काज रूकि नै सकैछ। ओ सभ एकटा वर्ग आ व्यक्ति धरि मैथिली साहित्यकें राखय चाहैत छथि, जे हुनक संर्कीणताक परिचय दैछ। यदि हुनका लोकनिसँ सार्थक काजक विषयमे पुछल जाएत तँ कहताह मैथिलीमे पाठक नै अछि। तँए ई रिस्क लेब निरर्थक। ओ लोकनि मात्र मैथिली साहित्यक खिधांस करताह, मैथिली साहित्यक सेवा नै। से किएक? ऐ बीच मैथिली साहित्यक लेल किछु सार्थक प्रसंग सेहो दृष्टिगोचर भेल अछि। से थिक विलक्षण दू टा पोथीक प्रकाशन। दुनू पोथी अपन बात रखबामे सफल भेल अछि। जीवकान्तक आत्मकथ्यात्मा पोथी नै मात्र गाम आ खेतीक महत्वकें जगजियार करैछ, अपितु अपन गाम आ धरतीक प्रति अनुराग सेहो उत्पन्न करैत अछि। जीवकान्तक लेखनीक अपन विशेषता छनि जइ कारणें हुनक लेखन सदैव एकटा नव भाव दैत आएल अछि। एहिना डॉ० वीणा ठाकुरक पहिल उपन्यास ‘ भारती’ मिथिलाक नारीक चेतनाक कथा तखन कहैत अछि जखन कि सम्पूर्ण भारतवर्षमे नारी चेतनाक विषयमे सोचलो नै जा रहल छल। ओइ समयमे ओ सम्पूर्ण भारत वर्षक विषयमे सोचि रहल छलीह। उपन्यासक कथा वस्तु नारी चेतना धरि सीमित नै रहि राष्ट्रीय जागरणसँ भरल अछि। अतिशयोक्ति नै हएत जे वर्तमान मिथिला आ भारत वर्षक परिस्थितिकें ई उपन्यास पूर्ण सार्थक आभास दैत अछि। हमर एकटा नेपाली भाषी कवि मित्र, जे दार्जिलिंगक थिकाह, देश, भाषा, समाज आ साहित्यपर चर्चाक क्रममे बहुत दुखी होइत कहैत छथि जे आदमी-आदमीक बीच एक दोसराक प्रति घृणाक भावनाक जन्म किएक भऽ रहल अछि आ ओ ऐपर घंटो अपन अभिमत दैत रहैत छथि, आ हमहूँ सभ हुनक ऐ चिन्तापर सहमत होइत रहैत छी। ई उद्धरण देबाक पाछाँ हमर ई अभिप्राय अछि जे हमरा सभकें जतेक सभ्य होएबाक चाही ओइसँ बेशी हमरा लोकनि असभ्य भऽ रहल छी आखिर किएक? की, एकर पाछाँ विश्व-मंच प्राप्त करबाक सपना अछि? एहन सपना तँ सभकें होएबाक चाही, मुदा सभ्यता-संस्कृतिक बलपर कतेक धरि उचित? लिखबा-पढ़बाक क्रममे सभसँ आगाँ अपन सभ्यता-संस्कृतिकें राखब बड़ आवश्यक ओ उचित सेहो। ..................................................................................... (अतुलेश्वरजी, तारानन्द जीक जातिवाद दोसरे तरहक छन्हि- ओ लिखै छथि- "एतए तं मैथिलीक दुर्बल काया पर कूडा-कचडाक पहाड ठाढ करबाक सुनियोजित अभियान चलि रहल छै। एकर सफाइ लेल मेहतरक फौज चाही। ठीके तं छै। पहिने कहल जाय जे मैथिली ब्राह्मणक भाषा छी, आगू कहल जाएत जे मैथिली मेहतरक भाषा छी।" ऐ लिंक https://sites.google.com/a/videha.com/videha-audio/ पर मिथिलाक विभिन्न जातिक ऑडियो आ ऐ लिंक https://sites.google.com/a/videha.com/videha-video/ पर वीडियो रेकॉर्डिंग ऑनलाइन उपलब्ध अछि जइमे डोम-मल्लिक (जकरा वियोगीजी मेहतर कहै छथि आ ओकरा आ ओकर भाषासँ घृणा करै छथि)क रेकॉर्डिंग सेहो श्री उमेश मंडल जीक सौजन्यसँ अछि। महेन्द्र मलंगियाक काठक लोक आ ओकर आंगनक बारहमासा जइ तरहेँ दलितक भाषाक कथित मैथिली (मलंगियाजीक सृजित कएल)क प्रति घृणा आ कुप्रचारक प्रारम्भ केलक तारानन्द वियोगी ओकरा आगाँ बढ़ेलन्हि। ई ऑडियो आ वीडियो रेकार्डिंग अन्तिम रूपसँ ऐ घृणा आ कुप्रचारकेँ खतम कऽ देने अछि आ विश्व ई सुनि आ देख रहल अछि जे जातिगत आधारपर मैथिली कोनो तरहेँ भिन्न नै अछि। वियोगीजी अपन ऊर्जा ऋणात्मक दिशामे लगबै छथि आ तकर कारण अछि हुनक दृष्टि आ आइडियोलोजीक फरिच्छ नै हएब आ तेँ दोसराक समालोचना ओ बर्दास्त नै कऽ सकै छथि। विदेहक सम्पादकीयपर हुनकर ओ टिप्पणी आएल छल जकर जवाब ओ अविनाश (आब अविनाश दास)क फेसबुक वॉलपर देने रहथिन्ह। एकर उत्तर पाठक सभ देने रहथिन्ह जे एतए नीचाँमे , हमर टिप्पणीक बाद) बिना काँट-छाँटक देल जा रहल अछि। ओही सम्पादकीयक रेस्पॉन्समे गंगेश गुंजन जी लिखने रहथि जे युवा सुभाष चन्द्रक ई गप जे "गंगेश गुंजन पाँच साल पहिने कमानी ऑडीटोरियममे कहने रहथि जे ओ हिन्दीमे लिखै छथि मुदा मैथिलीबला सभ हुनका पुरस्कृत कऽ देलकन्हि" सत नै अछि, ओ कहलन्हि जे ओ ई नै बाजल छथि, सुभाष चन्द्र एकर उत्तर नै देलथि से गुंजन जीक गप मानल जाएत। डॉ. धनाकर ठाकुर सेहो साहित्य अकादेमीपर आंगुर उठेबासँ दुखी रहथि आ विदेहक सह-सम्पादक श्री उमेश मण्डल जी केँ कएकटा मेल पठेलन्हि। ओ जगदीश प्रसाद मण्डल आ उमेश मण्डलक असली मानकीकृत भाषाक पक्षमे नै छथि, भाषा विज्ञानपर जखन उमेश मंडल बहसक प्रारम्भ केलन्हि तँ ओ अपनाकेँ डॉक्टर बना लेलन्हि आ बहसमे भाग नै लेलन्हि। मेलक अतिरिक्त हजारीबागक "सगर राति दीप जरय"मे ओ आ बहुतो गोटे कहैत सुनल गेलाह- एना नै लिखू, अशोक-श्रीनिवास आदि सन लिखू, पहिने पढ़ू तखन ओहने लिखू (ई मानि कऽ ओ सभ चलै छथि जे ओ सभ बिन पढ़ने लिखै छथि!)। बेनीपुरीक "अम्बापाली" नाटक हिन्दीमे छै, एन.सी.ई.आर.टी. ओकरा स्कूलक पाठ्यक्रममे लगेलक मुदा सम्पादक कहलन्हि जे "क्रिया ’है’ क अनुपस्थिति" जेना "वह जा रहा", बेनीपुरीपर स्थानीय क्षेत्रक प्रभावक परिणाम अछि आ तेँ सम्पादक मण्डल ओकर ऐतिहासिकताकेँ देखैत स्कूली पाठ्यक्रममे रहलाक बादो ओकरा सम्पादित नै कऽ रहल अछि। मुदा जखन उमेश मण्डल/ जगदीश प्रसाद मण्डल/ राम विलास साहू लिखै छथ,ि ओ जाइत, ओ खाइत, तँ "सगर राति"मे भाषा-विज्ञानसँ अनभिज्ञ विशेषज्ञ सभ किछु एहेन सलाह दऽ दै छथि जे मैथिलीक मूल विशेषते गौण पड़ि जाए, मैथिलीसँ प्रभावित बेनीपुरीक हिन्दी, एन.सी.ई.आर.टी.क सम्पादकसँ मैथिलीक नामपर बचि जाइत अछि, मुदा मैथिलीमे पसरल जातिवाद ओकरा नै छोड़बापर बिर्त अछि। से जातिवादी मानसिकता सी.आइ.आइ.एल.क अनुवाद मिशनक परिणामकेँ सेहो भयंकर रूपेँ प्रभावित करत, कारण ओइमे छद्म मानकीकरणक आधारपर अनुवाद कार्यशाला आयोजित भऽ रहल अछि। मैथिलीक तथाकथित स्थापित/ पुरस्कृत साहित्यकार यावत असल मानकीकरणकेँ नै पकड़ताह, हुनकर अस्तित्व उपरोक्त राक्षसी प्रतिभा (विषय-वस्तु आ भाषा दुनू दृष्टिकोणसँ) सभक सोझाँमे मलिछौने रहत। १.जातिवादी मानसिकता माने जे केलक से हमर आनुवंशिक जाति केलक, से ककरोमे भऽ सकैए। छद्म मानकीकरण: एकटा खास जातिवादी स्कूलक विचारकेँ प्रश्रय देलाक परिणाम, जे एकाध किताब सी.आइ.आइ.एल. मैथिलीमे निकाललक अछि आ जइ तरहेँ ओकर मानकीकरण प्रोजेक्ट सालक सालसँ बिना परिणामक चलि रहल छै। असल मानकीकरण: मिथिलाक सभ क्षेत्रक सभ जातिक बाजल जाएबला मैथिलीक आधारपर गहन विचार विमर्शसँ बनाओल मानकीकृत मैथिली। एकर बानगी ऐ लिंक https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर देल बेचन ठाकुर/ जगदीश प्रसाद मण्डल आदिक रचनामे भेटत। फील्डवर्क ऐ लिंक https://sites.google.com/a/videha.com/videha-audio/ पर देल -मिथिलाक सभ जाति आ धर्मक संस्कार, लोकगीत आ व्यवहार गीत (सौजन्य: उमेश मंडल)- ४६ टा ऑडियो फाइलमे भेटत आ ऐ लिंकक https://sites.google.com/a/videha.com/videha-video/ - मिथिलाक सभ जाति आ धर्मक संस्कार, लोकगीत आ व्यवहार गीत (सौजन्य: उमेश मंडल) - ४४ टा वीडियो फाइलमे भेटत तथा २००० पाठकक विचारपर आधारित सारांश ऐ लिंकपर http://www.videha.co.in/new_page_13.htm भेटत। ऑडियो आ वीडियो फाइल महेन्द्र मलंगिया द्वारा “काठक लोक” आ “ओकर आंगनक बारहमासा” द्वारा प्रचारित शोल्कन्हक कथित (इजाद कएल) मैथिलीपर अन्तिम प्रहार अछि। राक्षसी प्रतिभा: पूरा ब्राह्मणवादी मैथिली साहित्यकारक अपठित दुनियाँ एक दिस आ जगदीश प्रसाद मण्डल, राजदेव मण्डल, बेचन ठाकुरक पठित दुनियाँ दोसर दिस, जकरा ब्राह्मणवादी मैथिली साहित्यकार लोकनि “राक्षसी प्रतिभा” सम्भवतः आलोचनात्मक रूपमे कहताह/ कहै छथि मुदा हमरा मोने ओ हुनका सभक हारिक शुरुआत अछि। २. धनाकर जीक एकटा विचार छलन्हि (विचार नै निर्णय छलन्हि) जे रामनाथोक बदला रामनाथहुँ हेबाक चाही!! उमेश मण्डल आ धनाकर ठाकुरक पूर्ण बहस विदेहक ८४म अंकक सम्पादकीयमे आएल अछि। ३.विदेहक नूतन अंकमे जगदीश प्रसाद मण्डलक दीर्घ कथा शम्भूदास आएल अछि, ओकर दोसर पारा देखल जाए:- “जहिना बाध-वोनक ओहन परती जइपर कहियो हर-कोदारि नै चलल सुखि-सुखि गािछ-विरिछ खसि उसर भऽ जाइत, ओइ परतीपर या तँ चिड़ै-चुनमुनीक माध्यमसँ वा हवा-पानिक माध्यमसँ अनेरूआ फूल-फड़क गाछ जनमि रौद-वसात, पानि-पाथर, अन्हर-विहाड़ि सहि अपन जुआनी पाबि छाती खोलि बाट-बटोहीकेँ अपन मीठ सुआदसँ तृप्ति करैत तहिना जमुना नदीक तटपर शंभूदासक जन्म बटाइ-किसान परिवारमे भेलनि।” की एतए “जाइत” "करैत" क बाद अछि देब आवश्यक छैक? ४.किछु विचार टिप्पणी: मैथिली सम्बन्धी किछु समाचार / घटना/ प्रकाशन पर चारिटा विचार-टिप्पणी—ऐ सन्दर्भमे। सी.आइ.आइ.एल.क अनुवाद मिशनक आरम्भिक मेहनति अपठित मैथिली साहित्यक साहित्यकारक कार्यशाला अछि, ओकरा पाठकसँ कोनो मतलब नै छै आ ने असल पठित साहित्यकारक साहित्यसँ। से ओकर परिणाम वएह हेतै जे साहित्य अकादेमीक छै। अमरजी लिखै छथि- साहित्य अकादेमीक पोथी सभ गोदाममे सड़ि रहल छै। - गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक) भाषाक प्रति एक नव सोच हेमनिमे एकटा गोष्ठीमे गेल छलहुँ जाहि मध्य एक नव बात उड़ीसाक एकटा भाषावैज्ञानिक कहलैथ जे यदि हमर सभक भाषा सभमे कोनो प्रकारक नब शब्द अबैत अछि, तँ ओकर स्वागत होयबाक चाही। हुनक कहब छलन्हि जे कोनो विदेशी शब्द हमर भाषाक वाक्य संरचना मे कोनो प्रकारक परिवर्तन नहि आनि सकैत अछि। ई गप्प ठीक छैक जे वाक्य संरचनामे एहि सँ कोनो प्रभाव नहि पड़त, मुदा एहिसँ भाषाक विकास हमर होयत वा हुनकर? एहि ठाम ई प्रसंग हम एहि कारणेँ उठाओल अछि जे मैथिलक बहुतो पत्रिकामे कथाकारलोकनि एहि सिद्घान्तकें अपनौने छथि। हुनका लोकनिक कथा, जे मिथिलामे रहनिहार लोकक कथा कहैत अछि, मुदा ताहूमे मैथिलीसँ इतर शब्दक प्रयोग निधोख भए कएल जाए रहल अछि। ई किएक?उदाहरणक लेल किछु शब्द अछि जेना बेडरुम, किचेन आदि। आश्चर्यक गप्प ई जे जँ हमसभ ओहन शब्दकेँ आयातित करैत छी जे अपना घरमे नहि अछि तखनि तँ ठीक, मुदा अपन भण्डारमे रहैत अनका लग हाथ पसारब कतए धरि उचित? हमरा सभकेँ बुझल अछि जे उपर्युक्त शब्दक लेल मिथिला आ मैथिलीमे बहुत सहज शब्द भनसाघर, सुतबाक कोठरी उपलब्ध छैक। अपन शब्दक अछैत ई भीखमंगनी किएक? एहने स्थितिक हेतु आदरणीय गोविन्द बाबू कहने छथिन जे अपन कोठीमे धान रहैत पैंच लेब उचित नहि। की अहिना अपन भाषामे बाहरी शब्द अनैत रहब आ पछाति कहबैक जे भाषाक विकास नहि भ रहल अछि, ई कतय धरि उचित? अपन संस्कृति, अपन भाषाक छोट सँ छोट विषयकेँ अपनायब हमर अहाँक परम कर्त्तव्य बनैत अछि, भाषाक विकासकेर मतलब ई किन्नहुँ नहि थिक जे अपन विषय-वस्तुकेँ रहैत दोसरक वस्तुसँ अपन घर भरि ली। तेँ हम अपन क्षुद्र बुद्धियेँ आजुक सजग साहित्यकारलोकनिसँ आग्रह-अनुरोध करैत छियनि जे आवश्यकता रहले पर हाथ पसारब उचित अन्यथा अपना सङ्ग-सङ्ग भाषाक प्रति अन्याय होयत। भाषाक मानकीकरण आ साहित्यक राजनीति जखनि-जखनि साहित्यक स्तरीयताक विवेचना होइत अछि तखनि-तखनि भाषाक मानकीकरणक प्रश्न ठाढ़ क हौआ बना देल जाइछ। हेमनिमे एहि प्रकारक समस्या आयल अछि। विदेह इ पत्रिकाक सम्पादक आदरणीय गजेन्द्र ठाकुरजी सेहो किछु एहने परिदृश्यक निर्माण कएलनि अछि। प्रसंग छल कथाक स्तर पर आ प्रश्न उठाओल अछि भाषाक मानकीकरण पर। एही परिप्रेक्ष्यमे गजेन्द्रजी भारतीय भाषा संस्थानक द्वारा मैथिली काजक लेल अपनाओल गेल भाषीक स्तरीयता पर प्रश्न चिन्ह लगाओल अछि। ओना गजेन्द्रजीक मानकीकरणक पक्षधर हमहुँ छी मुदा मानकीकरणक नाम पर चलाओल जाएबला गोलैसी सँ आहत आ असहमत सेहो छी। कारण एहि सँ परिणाम तँ किछु नहि आओत मुदा भाषाक गति अवश्य बाधित होएत। मैथिली भाषाक मानकीकरण नहि भेल अछि ई कहब छनि भाषा वैज्ञानिकलोकनिक, तखन मानकीकरणक राजनीति किऐक? एखनुक जे मैथिलीक मानकीकरणक परिस्थिति अछि ओहिमे अहाँ जे लिखैत छी सेहो ठीक आ दोसर जे लिखि रहल छथि सेहो ठीक। तैँ हमर कहब अछि जे सम्प्रति एकरा मैथिली भाषाक विशेषते बुझल जाए आ ओकरा कोनो एक खुंटामे बान्हब ठीक नहि। कारण कोन-कोन परेशानीक बीच केओ बंधुआ मजदूर जेकाँ मैथिलीक काज कए रहल छथि से गजेन्द्रजीकें नीक जकाँ बुझल छनि, मैथिली भाषामे साहित्यकार तँ भरल छथि मुदा अपन रचनाकेँ प्रकाशित करबासँ पूर्व कतेक गोटए प्रकाशनसँ पूर्व ओकर उचित स्व-समीक्षा करैत छथि? अन्तमे जे मानकीकरणक प्रश्न अपने उठबैत छियैक ओ मात्र मैथिलीऐमे नहि, अपितु आनो भाषामे समाने रुपकेर छैक आ एकर समाधान जल्दी भए जाएत तकरो दूर-दूर तक सम्भावना नहि बनैत अछि। एही कारणें कहब जे मैथिली भाषाक मानकीकरणक लेल ठोस आ निरपेक्ष भावक आवश्यकता छैक, जाहि हेतु मैथिलकेँ बहुत बेसी संयमी बनबाक आवश्यकता छनि। अन्तत: कहबाक तात्त्पर्य जे भाषाक मानकीकरणक नाम पर राजनीति कएनिहार आ करौनिहार दुनू गोटे अपनाकेँ संयमित करथु, नहि तँ असली स्वर दबले रहि जाएत ठीक ओहिना जहिना बिनु बरखाक खेतक उर्वरता। मैथिली साहित्य आ मुसलमान भाई मैथिली भाषामध्य मुसलमान जातिक साहित्यकारक उपेक्षा मिथिला आ मैथिली लेल नीक नहि। हेमनिमे देखल जा रहल अछि जे मुसलमान भाई काल्हि धरि मैथिलीकें अपन मातृभाषा स्वीकार कएने रहथि ओ लोकनि शनैःशनैः मैथिलीसँ विमुख भ रहल छथि, तकर सोलहो आना कारण अछि हुनका लोकनिक उपेक्षा। एहि बीच साहित्यकार आ पत्रकार श्याम सुन्दर शशि कहलथि जे काल्हि धरि ओ लोकनि अपन मातृभाषा मैथिली लिखबैत छलाह, ओ लोकनि अपन उपेक्षाक कारणेँ आइ मैथिली भाषासँ मूँह मोड़ि रहल छथि। हुनका अनुसारेँ एकर मुख्य कारण अछि हुनकालोकनिक प्रति उपेक्षा-भाव। ठीक एहने चिन्ता आदरणीय नचिकेताजी सेहो उठौने छथि। हमरा एहि ठाम शशिजी आ नचिकेताजीक चिन्ता एक रंग लागल, कारण एक दिस हमरा लोकनि कहैत छिऐक जे मिथिलामे बसनिहार सभ जातिक भाषा मैथिली थिक आ दोसर दिस एहन उपेक्षा? ई दुनू गप्प कोना भ सकैत अछि। ई प्रसंग एहि कारणेँ उठाओल अछि जे मैथिलीमे के के मुसलमान भाई साहित्यकेर निर्माण कए रहल छथि से आंगुर पर गनल जाए सकैछ। हेमनिमे आदरणीय हाशमीजीक देहावसान भेल मुदा धीरेन्द्र प्रेमर्षि छोड़ि केओ हुनका प्रति लिखबाक घृष्टता नहि कयलनि। एकर कारण की? मैथिली साहित्य गुट-गोत्र-जाति मात्रक गोलैसी सँ जुड़ल अछि। एहना स्थितिमे आदरणीय नचिकेताजीक शब्द मोन पड़ैत अछि – प्रायः 51,229 मैथिली मुसलमान भाइ छथि जनिका मैथिली सांस्कृतिक आ साहित्यिक जगत मे हमरा सभकें स्थान देमै-टा पड़त, नहि तऽ इतिहास हमरा क्षमा नहि करत। ‘चिड़ै’ आ ओकरे लाथेँ नेपालीय मैथिली कथाक स्वर नेपालमध्य मैथिली साहित्यमे 1990 ई॰क बादक आयल पीढ़ीमे सँ ककरो कथा संग्रह प्रकाशित नहि भेल छल(ओना एकगोट कथा संग्रह संतोष मिश्रक प्रकाशित भेल छल मुदा ओ चर्चामे नहि आबि सकल, एकर कारण पता नहि)। हेमनिमे सुजीत कुमार झाक कथा संग्रह ‘चिड़ै’ प्रकाशित भेल अछि। जे एहि पीढ़ीक प्रथम कथा संग्रह थिक। सुजीत कुमार झाक कथा संग्रह तखनि प्रकाशित भेल अछि जखनि नेपालक जनता नव नेपालक निर्माणमे लागल छथि, आ एहि क्रममे नव-नव बातक स्थापना हएबाक संभावना अछि। मुदा जखनि ‘चिड़ै’ कथा संग्रह प्रकाशित भेल तँ मिडियामे जे प्रतिक्रियासभ आएल ताहिसँ ई स्पष्ट नहि भए सकल जे ‘चिड़ै’ कथा संग्रह नेपालक परिस्थितिक कथा कहैत अछि वा नहि, मुदा एकर चर्चा बहुत भेल। एहि परिप्रेक्ष्यमे देखला पर पता चलैत अछि जे हुनक कथा संग्रहक शीर्षक कथा ‘चिड़ै’ कथा, जे कथाकार दृष्टिमे एक नव विम्वक कथा थिक, क मूल उद्देश्य नेपालीय मैथिली कथा साहित्यक समकालीन स्वर परिभाषित करब थिक। एकरा पुष्ट करैत अछि नेपालसँ प्रकाशित कथा यात्रा नामक कथा संग्रहमे एकर प्रकाशन होएब। यदि सुजीत कुमार झाक आरो कथा एहि स्वरक अछि तँ ई कथा समकालीन स्वरक कथा नहि भए मात्र वर्त्तमान कालमे लिखल गेल कथामात्र भेल। कारण नेपालीय मैथिली कथामे समकालीन विम्ब आ नव शिल्पक कथा रमेश रंजन आ धीरेन्द्र प्रेमर्षिक कथामे मात्र देखल जाइत अछि। बाद बांकी कथाकारमे एकर अभाव देखल जाइछ कारण एहि पीढ़ीक सभसँ श्रेष्ठ कथाकार रहितहुँ श्याम सुन्दर शशि सेहो समकालीन स्वरमे पाछुऐ छथि, कारण ई कथाकार लोकनि नारी देह धरि अपनाकेँ सीमित कए कथाक शिल्प आ विम्बक निर्माण करैत छथि। तैँ आशा नहि क सकैत छी जे सुजीत कुमार झा एहि सँ फराक हेताह। ओना ‘चिड़ै’ कथा पढ़ि हुनक कथाक समीक्षा करब आसान नहि। तथापि प्रशंसाक पात्र अवश्य छथि अपन पीढ़ीक प्रथम कथा संग्रह प्रकाशित करबाक लेल। (बिन्दु २: अतुलेश्वरजी, अहाँक टिप्पणीपर हमर टिप्पणीपर एकटा मेलमे असहमति आएल छल। तकर जे जवाब हम देने रही से १/२/३/४ बिन्दुमे नीचाँमे जोड़ने रही, कारण ओ पत्र हमर ई-मेलपर आएल छल तेँ प्रश्नकर्ताक नाम आ प्रश्नावली हम सायास नै देने रही, तेँ प्रायः तारतम्य नै रहल हएत। मुख्य मुद्दा छै जे किछु गोटे सगर रातिसँ लऽ कऽ सभ ठाम जगदीश प्रसाद मण्डल जीक लेखन शैलीपर सवाल उठा रहल छथि, कथाक स्तरपर गप होइते कहाँ अछि, मात्र जे "करैत" आ "जाइत" क बाद अछि किए नै अछि; रामनाथहुँ किए नै अछि रामनाथो किए अछि, शब्द सभ ई कोड़ि कऽ अनै छथि (एकटा दोसर पाठकक पत्र छल!)। मुदा अहाँ सही कहलौं जे जतेक लेखक छथि ततेक मानकीकरण अछि तखन कथाक स्तरपर गप किए नै होइए? विषय-वस्तुपर गप किए नै होइए? जखन की हुनकर कथा विषय-वस्तु आ भाषा दुनू दृष्टिकोणसँ (मानकीकरण सेहो हुनकामे अछि) श्रेष्ठ अछि, सगर राति दीप जरए, सुपौलमे जे जातिवादी स्वर उठल आ पुरोधा सभ चुप रहलाह, मुन्नाजीक ऐ सम्बन्धमे प्रश्नावलीक अखन धरि पुरोधा लोकनि उत्तर नै देलन्हि, ओइसँ लगैए जे सभटा साजिशक तहत भऽ रहल अछि।सी.आइ.आइ.एल. कएक साल बितलोपर किए मानकीकरणक कोनो खाका नै दऽ सकल, कएकटा मीटिंग टा भेल। जखनकि ओकर कमेटी एकछाहा छै आ ओइमे वएह लोकनि छथि जे सभ सगर राति आदिमे सक्रिय छथि आ मानकीकरणक आधारपर जगदीश प्रसाद मण्डलक आलोचना हास्यास्पद रूपेँ करै छथि!--गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक बिन्दु-३: अतुलेश्वरजी, मैथिलीक पहिल दुर्भाग्य तखन देखा पड़ैत अछि जखन एतए गजलकेँ मुस्लिम धर्मसँ जोड़ि कऽ देखल जाए लगलै आ मुस्लिम धर्म आ ओकर साहित्यकेँ अछोप मानि लेल गेलै। आ तखन मुस्लिम अहाँसँ कोना जुड़त। मुदा आब जखन गजलक जीवन युगक समाप्ति भऽ गेल अछि (जीवन युग- ऐ युगक प्रारंभ हम जीवन झासँ केने छी जे आधुनिक मैथिली गजलक पिता मानल जाइ छथि मुदा ओ कम्मे गजल लीख सकला। मुदा हुनका बाद मायानंद, इन्दु, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, सरस, रमेश, नरेन्द्र, राजेन्द्र विमल, धीरेन्द्र प्रेमर्षि, रौशन जनकपुरी, अरविन्द ठाकुर, सुरेन्द्र नाथ, तारानंद वियोगी आदि गजलगो सभ भेलाह।) आ अनचिन्हार युगक प्रारम्भ भऽ गेल अछि, जइमे गजलक परिभाषिक शब्द आ बहरक निर्धारणक आधारपर सुनील कुमार झा, दीप नारायण "विद्यार्थी", रोशन झा, प्रवीन चौधरी "प्रतीक", त्रिपुरारी कुमार शर्मा, विकास झा "रंजन", सद्रे आलम गौहर, ओमप्रकाश झा, मिहिर झा, उमेश मंडल आदि गजलकार गजल लिख रहल छथि तखन मुस्लिमक प्रवेश मैथिलीमे हेबे करत। हम शेख मोहम्मद शरीफक तेलुगु कथाक अंग्रेजी माध्यमसँ मैथिलीमे अनुवाद केने रही (जुम्मा - कथा- विदेह:सदेह:१ मे सेहो प्रकाशित) आ विदेहमे सद्रे आलम गौहर आ मो. गुल हसन छपि रहल छथि। संगमे मैथिलीमे आब कसीदा, मसनवी, फर्द, बन्द, कता, रुबाइ, हम्त, नात, मनकबत, मर्सिया, मुस्तजात, नज्म, मुजरा, कौवाली आदिपर लेख (देखल जाए आशीष अनचिन्हार -http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/2011/10/blog-post_07.html)क बाद मुस्लिम लेखक मैथिलीसँ कतिआएल अनुभव नै कऽ रहल छथि। मिथिलाक खोजमे मुस्लिम आ क्रिश्चियन धार्मिक स्थलक वर्णन छै (देखू http://www.videha.co.in/favorite.htm ) आ मिथिला रत्नमे सेहो यथासम्भव उल्लेख भेट जाएत (देखू http://www.videha.co.in/photo.htm)। अहाँक टिप्पणी हरबड़ीमे लिखल आ चारि-साल पुरान बुझा रहल अछि । हाशमीजीक विषयमे अहाँक टिप्पणी ओइ गोलैसी, गोत्र, जातिकेँ बढ़ावा दैत लागि रहल अछि जकर अहाँ विरोध केने छी। हुनकरदेहावसानपर विदेहमे सम्पादकीय आएल छल, आ हुनकर देहावसानपर सैकड़ोक संख्यामे टिप्पणी/ श्रद्धांजलि आएल छल तकर किछु अंश एतए देल जा रहल अछि। आनो मैथिली पत्रिका सभ हुनका श्रद्धांजलि देलक (सरकारी तंत्र छोड़ि कऽ)। लोकमे आब गोलैसी नै छै, हमरा क्षेत्रक राजनेता सेहो आब जाति, गोत्रक आधारपर नै मुदा काजक आधारपर वोट माँगि रहल छै। मुदा ओइ युगक साहित्यकार/ नाटककार जिनका सी.आइ.आइ.एल., साहित्य अकादेमी, एन.एस.डी. आदिसँ मान्यता चाहियन्हि, तखने ओ साहित्यकार कहेताह- से गोलैसी नै करताह तखन हुनकर छद्म अस्तित्व कोना रहतन्हि, कारण जइ युगक ओ छथि से युग तँ कहिया ने खतम भऽ गेलै। फातमी वा कोनो कालजयी लेखकक अस्तित्व ऐ सरकारी संस्था सभक मोहताज नै अछि। -मुसलमानक मातृभाषा उर्दू किए भेलै, आ हिन्दूक मातृभाषा हिन्दी किए से प्रश्न मात्र मैथिलीक नै अछि। बांग्लाआ तमिलकेँ बंगाल आ तमिलनाडुक मुसलमान अपन मातृभाषा किए मानै छथि। मिथिलाक मुसलमानेकेँ मात्रकिए दोष देल जाए? मिथिलाक अधिकांश हिन्दू सेहो मैथिलीकेँ नै हिन्दीकेँ अपन मातृभाषा मानै छथि मुदा हुनकासाम्प्रदायिक नै देशभक्त मानल जाइए! दोसराकेँ छोड़ू, हम तँ दरभंगाक पोथी बेचनिहारसँ मैथिली बाजैत थाकिगेलौं मुदा ओ हिन्दीमे जवाब देलक! प्रश्न ओतेक सरल नै छै जतेक सरलतासँ अहाँ निर्णय दै छी। मिथिलाक तँछोड़ू कर्णाटक , जतए अहाँ रहि रहल छी, ओतुक्का मुसलमान किए कन्नडक बदला उर्दूकेँ अपन मातृभाषा मानिरहल अछि, जखनकि बगलमे तमिलनाडुक मुसलमान अपन मातृभाषा तमिल घोषित करैए (कन्नडकउपन्यासकार भैरप्पाक उपन्यासक संस्कृत अनुवाद "आवरणम" हम पढ़ने छी, ओइमे ऐपर सेहो चर्चा छै,कर्णाटकमे ऐ उपन्यासपर कतेक हंगामा भेल रहै अहाँकेँ बुझले हएत)। मण्डलजी वा मानकीकरणक लेल कोनो हल्ला नै छै, ई मात्र ओइ अपठित मैथिली साहित्यक साहित्यकारकहल्लाक उत्तर छै जिनका ई सफलता अबूझ बुझाइ छन्हि , जे वास्तविकतासँ दूर छथि आ जे मैथिलीक सरकारीकार्यक्रममे (छद्म धरातली कार्यक्रम!) एक दोसराक ढोल पीटै छथि। जगदीश प्रसाद मण्डलक १३ टा पोथी, मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ नाटककार बेचन ठाकुरक एक टा पोथी आ राजदेव मण्डलक अम्बरा (जकरा हम २१मशाताब्दीक पहिल दशकक सर्वश्रेष्ठ कविता संग्रह कहने छी) केँ मैथिली पाठक जे स्थान देबाक छलै इन्टरनेटेपर नैधरातलोपर दऽ देने छै। ई सभ पोथी सभ प्रिन्टक संग ऐ लिंकपर सेहो उपलब्ध छै, देखल जाएhttps://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ । ७४म सगर रातिमे १५ गोटेकथा पाठ भेलै जइमे जगदीश प्रसाद मण्लक नेतृत्वमे ९ गोटे गेल रहथि, आ शेष मात्र ६ गोटे रहथि, जेँ जगदीश प्रसाद मण्डल तेँ ई सगर राति आइयो चलि रहल छै। मुदा साहित्य अकादेमी आसी.आइ.आइ.एल.क प्रायोजित धरातली कार्यक्रममे से अनुपात नै छै , किएक? कारण ओ संस्था सभ जमीनीवास्तविकतासँ दूर अछि। -नेट मध्य एशियामे की केलकै अहाँकेँ बुझले हएत। जमीनी स्तरपर निर्मलीमे जे "विदेह समानान्तर साहित्यअकादेमी मैथिली कवि सम्मेलन" आयोजित भेल छलै ओकर सफलतासँ अहाँ भिज्ञ हएब, तहिना विदेह द्वारा जेसमानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कारक घोषणा भेलै से काल्हि धरि अपठित मैथिली साहित्यक साहित्यकारक मध्य जे अहलदिली अनने छै तहूसँ अहाँ भिज्ञ हएब। -मिथिलाक आ मैथिलीक विकासक जे वातावरण अखुनका सरकारमे छै की ओ दरभंगा आ आन जमीन्दारी राजवा मैथिल मुख्यमंत्रीक कालमे कहियो रहै? १४ अक्टूबर २०११ केँ मुख्यमंत्री नीतिश कुमारकेँ निर्मलीमे जगदीश प्रसाद मण्डलक ५ टा आ राजदेव मण्डलक एकटा पोथी देल गेलन्हि, मुदा जखन चेतना समितिक बैसकीमे श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल, पटनामे ओ मैथिलीक ऐ संस्थाकेँ मैथिल ब्राह्मणक संस्था बुझने रहथि आ बाजलो रहथि (बड़ाइयेमे सही, वोटक उद्देश्येसँ सही) तँ कियो सांकेतिको करेक्शन नै केने रहथि? १४ अक्टूबर २०११ धरि ओ मैथिलीकेँ मैथिल ब्राह्मणक भाषा बुझै छलाह!! -नवीनजीकेँ नवारम्भ पत्रिकामे चांग्ला कहल गेल छलन्हि, श्रीनिवासजी आ नवीनजीकेँ "हम पियाला हमनिवाला" आ आर की-की कहल गेल छलन्हि। की हुनका प्रत्युत्तर देबाक हक नै छन्हि? नवीन जीक कोन पाँतीमेगारि छै से बताएल जाए, तखन हम आर फरिछा कऽ ओकर सन्दर्भ दऽ सकब। -अहाँक ई कथन जे हम ए.सी.मे रहि कऽ मिथिलाकेँ नै बुझि पाबि रहल छी आदिपर हमर यएह उत्तर अछि जे ऐ सभसँ हम भविष्यमे "असत्यकेँ सत्य" कहनाइ नै शुरू कऽ देब। - सी.आइ.एल.एल.क सभ निअम वेबसाइटपर उपलब्ध छै, आ ओकर कोन प्रावधान लक्ष्मीनाथ झा द्वारालिखित हिन्दीक पोथी "बिहार की सांस्कृतिक चित्रकला"क निर्लज्ज चोरि कएल पोथी सुशीला झाक "अरिपन"केँपूर्वप्रकाशन ग्रान्ट दै छै से हमरा नै बुझल अछि। अहाँ तँ मुस्लिमक गप उठेने छी मुदा हिन्दूक मात्र एक जातिएकर सभ कार्यशालासँ लऽ कऽ सभ ग्रान्ट/ असाइनमेन्ट प्राप्त कऽ रहल छै, ओ कोन प्रावधानक अन्तर्गत छै?निअममे कोनो कमी नै होइ छै, यएह निअम तँ दोसरो भाषामे छै, ओतए किए एतेक समस्या नै छै? -गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक) ‘बदलैत स्वर’ आ मैथिली आलोचना हेमनिमे मैथिली कथाकार शिवशंकर श्रीनिवासक मैथिली कथा साहित्य पर केन्द्रित आलोचनाक पोथी ‘बदलैत स्वर’ पढ़ल। श्रीनिवासजीक कथा हमरेटा नीक नहि लगैत अछि अपितु सम्पूर्ण मैथिली पाठककें नीक लगैत छनि, जे हिनक कथाक वैशिष्टय परिचय दैछ। मुदा कोनो सफल कथाकार यदि सफल आलोचको होथि तँ ई आर बेशी नीक। श्रीनिवासजीक आलोचनाक पोथी एकर वानगी अछि, जहिना हुनक कथा पढ़ि पाठक मिथिला आ मैथिली कथा प्रति सोचबाक लेल विवश भए जाइत छथि, ठीक तहिना हुनक ई आलोचनाक पोथी सेहो बहुतो किछु सोचबाक हेतु वाध्य करैछ। प्रस्तुत पोथी, जे पूर्णरुपेँण मैथिली कथा साहित्यक विषयमे कहैत अछि, मात्र मैथिली अध्येतामात्रेक लेल नहि, अपितु साधारण पाठकधरि लेल सेहो लाभदायी अछि। कारण जे ई मनोरंजक कथाक विषयमे कहैत ओकर सामयिक सांदर्भिकता आ ओकर वैशिष्टय पर बड़ सहजता सँ बात रखलनि अछि, जे एकर विशिष्टताकेँ बढ़ा दैत अछि। मुदा एतेक सफल प्रस्तुतिक बादो एहिमे किछु त्रुटि रहि गेल छनि। एहि त्रुटिक अभावमे ई पोथी अद्यावधि मैथिली कथासाहित्य पर लिखल गेल आलोचनात्मक अध्ययनजन्य पोथी मध्य सर्वोपरि रहितए, जाहिसँ श्रीनिवासजी चुकि गेलाह अछि। हमरा अनुसारेँ कोनो साहित्यक समीक्षामे जँ मात्र अपन मनोनुकूल विषयमात्र लए प्रस्तुति हो तँ ओ सर्वाङ कहिओ नहि भए सकैछ, एहने किछु अभाव एहि पोथीमे दृष्टिगोचर भए रहल अछि। एहिमे देखल गेल अछि जे समीक्षक मैथिली कथा साहित्यक आलोचना करैत काल भारतमे आएल नक्सलवाड़ी आन्दोलनसँ प्रभावित कथाक चर्च नहि कएनेँ छथि, जे हुनक आलोचनाकें कमजोर कएने छनि। हँ, ई ठीक जे ओहि क्रियाकलापकेँ अहाँ जाहि दृष्टिएँ देखैत होइ, मुदा जखन सम्पूर्ण कथाक चर्च होएत, तखन ओहि कथासभकेँ छोड़ब कोनो हिसाबेँ उचित नहि। जहिना भारतमे मैथिली कथा साहित्य विकास भ रहल अछि, ठीक ओहिना नेपालोमे कथा साहित्य विकासोन्मुख छैक, जकर चर्च उक्त पोथीमे नहि कएल गेलैक। आशा नहि पूर्ण विश्वास जे आलोचक श्रीनिवासजी एहि विन्दु पर हमरासँ सहमत भए अपन अग्रिम कार्यमे एकरा ध्यानमे रखताह। अन्तमे, मैथिली कथा साहित्यक आलोचनाकेँ नव भाव बोधसँ भरि एहि सृजनक लेल श्रीनिवासजीकें कोटिशः धन्यवाद। मैथिली : पंडिताम वा आम? एकबेर फेर मैथिली साहित्यमे मानकीकरणक नारा जोर पकड़लक अछि, एहिक्रममे सोचल जाए रहल अछि जे मानकीकरणक कसौटी तथाकथित पंडितलोकनि तय करताह। हमर सोच अछि जे एकर अर्थ भेल मैथिलीकेँ आम लोकसँ कटबाक एकटा नव सुनियोजित षडयंत्र। हेमनिमे गजेन्द्र ठाकुरक एकटा पत्र आयल छल जे ई षडयंत्र नहि थिक जे कोनो गोष्ठी ( सगर राति दीप जरए, जे वर्तमानमे कथा गोष्ठी सँ बेशी अनर्गल गोष्ठी भ गेल अछि ) मे एहि तथ्य पर नहि आलोचना होइत अछि जे एहि कथामे कोन कमजोरी अछि वा कोन-कोन नव तथ्य आयल अछि, बल्कि जाइत, खाइतकेर सङ्ग रमानाथी-शैली पर चर्चा कएल जाइत अछि? मुदा ई संर्कीण मानसिकता कियाक? एकर दूटा कारण देखाइत अछि, पहिल जे अखनि धरि मैथिली जातिवादक धोधरि सँ नहि निकलि पओलक अछि आ दोसर जे मैथिलीमे कोनो नव नारा नहि भेटि रहल छैक। कियाक तँ मैथिली पंडितक भाषा नहि भए विशुद्ध कय आमलोकक भाषा थिक। कारण महाकवि विद्यापति आमलोकक लेल देसिल बयनामे लिखब प्रारम्भ केने छलाह, नहि कि पंडित वर्गक लेल। (एतय ई स्पष्ट क देब आवश्यक जे हमरा अनुसारेँ पंडित कोनो जाति विशेषसँ नहि भए, हुनका लेल उपयुक्त अछि जे अपन विचार दोसरो पर थोपए चाहैत छथि, से चाहे उचित हो वा अनुचित)। हमरा तँ आश्चर्य लगैत अछि जे ओहि तथाकथित गोष्ठीमे सहभागीलोकनिकेँ कि ई नहि बुझल छलनि जे मैथिलीक कतेको भाषा-भाषी जाइत-खाइत बजैत छथि, मैथिली भाषामे आदरसूचक आ अनादरसूचकक लेल पृथक्-पृथक् शब्द अछि? हम तँ संशकित छी जे जँ एहिना मैथिलीकेँ व्याकरणीय फंदामे लटपटाओल जाइत रहत तँ ओ दिन दूर नहि जे ओ साधारण जनसँ दूर होइत-होइत ओकर अस्तित्वे पर संकट आबि जाएत। आ नेपालक मैथिलीमे बहुत गति देखल जा रहल अछि, कारण छैक ओतुक्का मैथिली भाषामे आमलोक क धारणा आ भावनाकें राखब। नहि तँ एतेक दिन सँ प्रसारित भ रहल मैथिली कार्यक्रम ‘गामघर’ कियाक नहि सम्पूर्ण लोकक कार्यक्रम भ सकल, जखन कि धीरेन्द्र प्रेमर्षिक ‘हेलो मिथिला’ सम्पूर्ण मिथिलाक स्वर बनि प्रशंसित भए रहल अछि आ एकरहि प्रभावेँ मैथिली भाषाक अपन दर्जनों रेडियो एफ.एम. कार्य कए रहल छैक आ ओ आमलोकक वाणी भए प्रसारित भए रहल अछि। तखनि ई बखेरा कियाक? हमरसभक एहन कर्मसँ मैथिलीक कोनो तरहक लाभ संभव नहि, अपितु ओ आमलोकसँ कटि संस्कृतक संग धए लेत। तेँ यदि केओ एहि प्रकारक प्रश्न उठबैत छथि तँ बुझि लिय जे मैथिली क संग हित नहि अहित क रहल छथि। कारण तथाकथित भाषा क अध्ययन कएनिहार एकरा भाषाक विशेषता कहैत छथि आ ओ लोकनि एकरा सुधारबाक लेल जी-जान अरोपने छथि। की, ई मुर्खता छी कि षडयंत्र? ओना एकटा ईहो सत्य अछि जे लोकतंत्रमे बहुमतक सभ किछु मानल जाईत छैक, एतय प्रश्न उठैत छैक जे मैथिली क बहुमत कोन दिश- पंडितलोकनि द्वारा निर्धारित मैथिलीक वा आमलोकक मैथिलीक? उत्तर स्पष्ट अछि आमलोकक, तखनि ई प्रश्न उठएबाक औचित्य कतहु नहि बनैत अछि। कारण विद्यापतिक भाषा पंडितक विरुद्घ उठाओल आन्दोलन छल तेँ मैथिलीकें पंडितक राज नहि आमलोकक काज अछि। पंडित गोविन्द झा, मैथिली आ अध्ययन आम पाठककें गोविन्द झाक नाटक, कथा आ हुनक लिखल विद्यापतिक आत्मकथा आकर्षित करैत अछि। मैथिली भाषाक अध्ययन कएनिहारकें हुनक साहित्य तँ आकर्षित करितहिं अछि, सबसँ बेशी आकर्षित करैत अछि हुनक भाषा पर कयल कार्य। हुनक साहित्यिक रचना आ भाषा वैज्ञानिक कार्य दुनू एक्के गति सँ चलैत अछि निरंतर गतिशील आ चिंतनशील। हेमनिमे हुनक एक गोट पोथी आयल अछि, मैथिली व्याकरण(अंग्रेजी सँ मैथिलीमे अनुवाद), जकर मूल रचयिता छथि अंग्रेज लोकनिक ग्रिर्यसन साहेब, मैथिलक गिलेसन साहेब आ गोविन्द झाजीक अनुसार मैथिलीक पाणिनी। प.जीक मैथिली भाषाक प्रति ई काज हुनक जिजीविषाकें देखबैत अछि, कारण जे काज युवा वर्ग आ मैथिली अध्यापककें करबाक चाहिएनि ओ काज पंडित जी अपन नब्बे बरिसमे कतेक मनोयोगसँ कएलनि अछि, तकर अनुभव सभ सहृदयी कए सकैत छथि। हुनक एहि कार्यक हेतु हमरा लग कोनो शब्द नहि अछि, जाहिसँ हुनक अभिवादन-अभ्यर्थना कएल जाए सकए। कारण मैथिली भाषाक भाषावैज्ञानिक कार्य बहुत सीमित भेल अछि, जे भेल अछि ओ आंगुर पर गानल जा सकैछ, जखनि कि ओकर अध्ययन आ विवेचना स्वतंत्र भारत सँ पूर्व भ चुकल छल। एतए प्रश्न उठैत अछि जे आखिर एहि अन्तरक कोन कारण? एतेक दिन भेलाक बादो आइओ बहुतो तकला पर उचित मैथिली व्याकरण भेटब मोश्किल अछि, जाहिसँ सभ अध्यवसायीक शंकाक समाधान भए सकनि। आइ हमरासभकेँ छोट सँ छोटो व्याकरणीय समस्या लेल बहुत बेशी कसरत करए पड़ैत अछि। मैथिली भाषा वैज्ञानिक अध्ययनक शिथिलताक एकटा नमूना हम सद्य: देखल अछि। जखनि कतहु मैथिली भाषाक चर्चा होइछ तँ ओ कखनो एकरा बिहारी भाषा कहि तँ कखनहुँ हिन्दीक बोली कहि सोचल जाए रहल अछि। सोचबाक विषय अछि जे एहि भाषा क एहन गति कियाक? हमरा लोकनि मात्र शुद्ध आ अशुद्ध क झगड़ा मे लागल रहलहुँ। ई कखनो नहि सोचलहुँ जे भाषा क वैश्विक विकास लेल साहित्यक रचनाक संग-संग ओकर भाषा वैज्ञानिक अध्ययन सेहो होयबाक चाही , ओना किछु कार्य भेल, मुदा ओकर निरन्तरता नहि रहल जकर कारण भेल मैथिली भाषा हिन्दी क माँझमे दबाइत गेल। ओना ई अनुभव हमरा हेमनिमे आर बेशी भेल जखनि सम्पूर्ण भारतीय भाषा जे संविधानक अष्टम अनुसूची मे सम्मिलित अछि ओकर एकटा कार्यशाला छलैक आ कार्यशाला अपन-अपन क्षेत्र मे हेबाक चाही एहि प्रकारक निर्देश छलैक। मुदा मैथिली क कार्यशाला मिथिला कि बिहार तक मे नहि भेल, एकर एक मात्र कारण देखाओल गेल जे मैथिलीमे भाषाविज्ञ नहि छथि। किन्तु कारण किछु आन छलैक आ ओ कारण छलैक मैथिलीकेँ हिन्दी क बोलीक रूपमे स्थापित करबाक एकटा षडयंत्र। ई षडयंत्रमे जतेक दोषी ओ लोकनि नहि छलाह ओहि सँ बेशी हम मैथिल छी, कारण मैथिलीक नाम पर जे विज्ञ बजाओल जाइत छथि ओ बेर-बेर एतबहि कहताह जेना हिन्दी मे होइत छैक ओहिना मैथिलीमे सेहो होयत। आ मैथिली अपन स्वतंत्र अस्तित्वक लड़ाई लड़बा सँ पहिने हारि जाईत अछि। ई भ रहल अछि अक्षरकट्टु मैथिली विज्ञ लोकनिक कारणेँ। नाम लेब एहि कारणें उचित नहि जे ओ सभ बिन वजह कें प्रसिद्धि पाबि लेताह। हम एहि ठाम ई प्रसंग एहि कारणें देलहुँ अछि जे पंडितजी कें ई आभास छनि जे भाषाक लेल साहित्य जतेक आवश्यक छैक ओहिना ओकर भाषा वैज्ञानिक अध्ययन सेहो, जकर कारण छल ओ सुविधाक अभावों मे मैथिली भाषा क वैज्ञानिक अध्ययन करैत रहलाह अछि । मुदा ई एकटा प्रश्न उठैत अछि जे विश्वविद्यालय मे चाकरी कएनिहार आ मैथिली भाषाक विज्ञ कहौनिहार ई अध्यापक लोकनि कें कियाक नहि एहि विन्दु दिश ध्यान जाइत छनि, ओ सभ मात्र सुविधा पएबाक जोगाड़मे कियाक लागल रहलाह आ आइओ छथि। एतेक वर्ष मैथिलीक अध्ययनक आरम्भ भेलाक बादो ई महानुभाव लोकनिकें ई आवश्यकता कियाक नहि देखा पड़ि रहल छनि । एकर कारण अछि हुनका लग एतेक अथाह पानिकें उपछबाक समय नहि छनि, हुनका लग समय मात्र छनि अपन गोंटीके ब्योंत धरएबाक। पुस्तकक प्रकाशन करताह मात्र एहि लेल जे प्रोन्नतिक लाभ भेटतन्हि भलsहि ओ पुस्तक कोनो उपयोगी सिद्ध हुअए वा नहि । मुदा पंडित गोविन्द झाकें नहि तँ ओहि सँ प्रोन्नतिक लाभ होइत छनि आ आने कोनो आने लाभ। हँ, लाभ होइत छनि- यश लाभ, जे हुनक एहि काजक माध्यमेँ मैथिलीकें एकटा स्वतंत्र अस्तित्वक संग-संग मैथिली भाषा क विशेषता देखि आनो प्रबुद्ध वर्ग आकर्षित होएताह। यदि मैथिली भाषाकेँ पूर्ण देखय चाहैत छी तँ ओकरा लेल सर्वप्रथम हमरा लोकनिकें मैथिलीक अध्ययनक विस्तृतताकें बढ़बय पड़य नहि तँ हमरा लोकनि अपन भाषा क विशेषताकेँ प्रतिष्ठित नहि कए सकब। एकरहि परिणाम होएत जे हमर भाषाक विशेषता नुकायले रहि जायत आ दोसर जे केओ हमर भाषाक विषयमे कहत ओएह संसार मानत आ हम सभ ओहिना मूंह तकैत रहि जायब। उजरैत गाम बसैत शहर........ आइ काल्हि मैथिली साहित्यमे गामसँ जा रहल लोक , आ उजड़ैत गामक विषयमे बहुत चिन्तन कयल जाईत देखल जा रहल अछि । कतहु गामक बदलैत परिदृश्य तँ कतहु गामसँ पलायन करैत लोक। ओना ई चिन्तन सही अछि कहल तँ जा सकैछ जे ई चिन्तन बहुत पहिने सँ भऽ रहल अछि । कारण गामक बदलैत परिदृश्य गाम टाकें नहि अपितु गामसँ जुड़ल सभ किछु कें परिवर्तित कएने जा रहल अछि । काल्हि धरि गाममे ध्वनि प्रदुषण नहि छल आई ओ विकट रुप धारण कए चुकल अछि । एहि सँ बेशी गाममे अपन डारि पसारि रहल अछि शहरक संस्कार आ ताहूसँ बेशी संवेदनहीनताक स्थिति। गामक चिन्ता बहुत नीक जेकां अंतिकाक सम्पादकीयमे अनलकान्त जी केने छथि जे कोना क गाम मे परिवर्तन भ रहल अछि आ ई परिवर्तन मानवीयताक क्षरण दिश ल जा रहल अछि। ओ अपन सम्पादकीय मे कहने छथि जे ई परिदृश्य मात्र हमर गामक नहि छी सम्पूर्ण मिथिलाक गामक थिक । हुनक ई कहब सौ प्रतिशत सत्य अछि। रोजगार क शिलशिलामे घर सँ बाहर होइत मिथिलाक लोक बहुत दिन धरि अपन भीतर गामकें नहि राखि पबैत अछि , कारण जहिना-जहिना ओ गामसं दूर होइत जाइत अछि गामक प्रति ओकर मोह सेहो ओहिना दूर होइत जाइत छैक । हेमनिमे हम दुर्गा पूजा मे गाम जयबाक लेल सोचैत छलहुं कारण गाम मे मां छथि मुदा परिस्थिति गाम नहि जाए देलक । ई क्रम हमरा एहि बेर नहि कतेक बेर सँ भऽ रहल अछि मां छथि मुदा तइयो गाम नहि जा पबैत छी । आ गाम हमरा सँ अखैन मात्र दूर भेल जा रहल अछि, भए सकैछ जे काल्हि तक गाम हमर अतीत भ जाए। मां छथि तँ गाम बचल अछि आ माँक पश्चात गाम? कारण गामकें हम संजोगिकें राखब से भ नहि सकत आ संजोगिकें नहि रखैत छी तं ओ हमरा अपना सं दूर केने जा रहल अछि । दोसर आई गामक परिस्थिति सेहो ओहने छैक, अपन आलोचनाक पुस्तक ....मे शिवशंकर श्रीनिवास लिखने छथि जे गाम मे युवा नहि छैक मात्र बूढ़ बांचल छथि। से ठीके, जे बांचल छथि ओहि मे दू वर्ग अछि एकटा जे अपन परिवारक संग बाहर जा नहि पबैत छथि, दोसर किछु गोटें शहर सं उबियाक गाममे रहि रहल छथि । ओ गाममे रहैत तं छथि मुदा गामकें शहर मे बदलि क । हमर एकटा मित्र छथि जिनकर पिता अपन शेष जीवन गाममे बितबय चाहैत छथिन , मुदा जीवनक महत्वपूर्ण क्षण ओ शहरमे बितौने रहबाक कारणेँ गाम मे हुनका बहुत असकौर्य देखबामे अबैत छनि, तैं ओ गाममे एकटा छोट छीन शहरक निर्माण करैत छथि । एहि सं हुनका तँ सहज होइत छन्हि मुदा गामक अर्थ समाप्त भ जाइत छैक । आ किछु दिनक पश्चात गाम मात्र ओ सरकारी फाईल मे नामकें रुपमे रहि जायत एकर आशंका बढ़ैत अछि । कारण गामक अर्थ छल कम सेँ कम सुविधामे रहब मुदा आई ओकर अभाव देखल जा रहल अछि। एकर कारण अछि गाममे शहर जेकां अपना-अपना मे जीबाक संस्कार नहि छलैक मुदा आई ओतहु ई संस्कार द्रुतगति सँ बढ़ि रहल अछि । काल्हि धरि सभ सभक कुशल क्षेम, ओकर खोज खबरि लैत छलैक मुदा आई ओ समाप्त भ रहल छैक। सभ अपनामे सीमित। जे गामक परिदृश्यकें बदलि देलक। हमरा कखनो कखनो होइत अछि जे यदि गाममे ई स्थिति एहिना बढ़ैत गेल तं हमरा लोकनिकें अपन गामकेँ खिस्सा मे ताकय पड़त । हमरा जनैत हम सभ मात्र गामसं पलायन नहि भ रहल छी अपितु हमरालोकनि अपन गामकें उजारि रहल छी । तैं तं भोरे भोर जतऽ पराती सुनाईत छल आई हिन्दी क भजन लाउडीस्पीकर मे सुनाइछ जाहि सं कखनो ई नहि बुझाइत अछि जे ई हमर गामक आत्मा बाजि रहल अछि, लगैत अछि जेना ई गामक प्रेत बाजि रहल अछि जे अपन आत्माक शान्ति लेल गामक लोकसं अनुरोध क रहल अछि । अन्तमे मांक ई पांति जे मोबाइल पर कहने छलीह यात्रादिन जे जयन्ती तँ काटि लेलहुँ, गोसाउन के सेहो चढ़ा देलयन्हि मुदा एतय तँ केओ नहि अछि, कि करु? मुदा ई सोचिकें रखैत छी जे यदि अहां सभ गाम आयब तँ द देब । आ हम सोचय लगैत छी जे ई मात्र हमर माँक भावना नहि सम्पूर्ण मिथिलाक मायकें होइत हेतनि । विद्यापति समारोह, बिहार गीत आ मैथिल बाबा विद्यापतिक प्रति जे सहानुभूति छलन्हि ओ तं तीनदिनुका समारोहमे पूरा भ गेल। जिनकर मोनमे जे छल सभ किछु कहि देलन्हि अपन-अपन विद्वता आ योगदानक चर्चा जतेक करबाक छलन्हि से भ गेल। सभ अपन-अपन धारणा बाबा मिथिला आ मैथिलीक प्रति देखाओल,किछु गोटें बरसाती बेंग जेकां टरटरेलाह आ किछु गोटे बड्ड गम्भीर भ किछु बात उठाओल। ओना ओकर संख्या कम्मे अछि , ओना ई एकटा सत्य छैक जे उचित आ गम्भीर गप्प कहनिहार कम होइत छैक । एहि परिपेक्ष्यमे एक जन कहलन्हि जे चेतना समितिक कार्यक्रममे आमलोकक संख्या कम छल ओकर कारण अछि जे चेतना समिति आमलोकसँ जुड़ल नहि अछि । बात ठीकें,मैथिलीक सभसँ पैघ संस्था मुदा कार्य किछु लोकक हेतु। राजधानीमे संस्था मुदा राजधानी मे मैथिलीक विरूद्ध होइत कोनो षडयंत्र सँ अनभिज्ञ। ओना सभसं बेशी सकारात्मक चिन्तन आयल धीरेन्द्र प्रेमर्षिक जे विद्यापतिकें राष्ट्रीय विभूति घोषित कयल जाए तेकरा लेल माहौल आ जनसमर्थन पर काज कएल जाए, चिन्तन बड्ड नीक। हेमनिमे विद्यापति पर्व समारोहमे सत्ताशील पार्टीक नेताक लोकनि लेल नीक स्थिति नहि छल , कारण ओ लोकनि अपन पुरना राग जे हम सभ मैथिलीकें अष्टमअनुसूची मे स्थान देबाक लेल कोना कोना की की कएलहुं से बेशी जोर सँ नहि कहि सकलाह। कारण सुशासन बाबु तँ हुनकर लोकनिक एहि रागकें रोकि देलन्हि अपन कृति सँ । बिहार गीत मे मिथिलाक चर्च नहि। हम तँ कहब जे भेल से ठीके भेल । हमरा लोकनि हाथउठाइ ल ल ततेक ने ककरो गुणगान करए लगैत छी जे सभ किछु बिसरि जाइत छी। यदि एक दिश मिथिला राज्यक मांग क रहल छी तँ दोसर दिश मैथिली आ मिथिलाक संग अन्याय कएनिहारकें सम्मान।( कारण पूर्व मुख्यमंत्री डा. जगरनाथ मिश्र मिथिला राज्यक विरोध करैत छथि दोसर दिश मिथिलाक संस्था हुनका सम्मानित करैत अछि ) हमरा जनैत सुशासन बाबू हमरा सभकें जगबाक लेल कहि रहल छथि यौजी हाथउठाइ जूनि लिय , संघर्ष करू तखनि मेवा भेटत नहि तं इएह सत्यनारायण भगवानक प्रसाद। (ओना की भ रहल अछि आठम अनुसूची मे मैथिली अयला सँ एहि पर बड्ड नीक चिन्तन कएलन्हि अछि आदरणीय पं.गोविन्द झा जी मिथिला दर्शन मे समीपेषु मध्य ।) सुशासन बाबू बुझैत छथि जे मिथिला सँ आयल जनप्रतिनिधि मिथिला आ मैथिली लेल कतेक साकांक्ष छथि,यदि ओ सभ कहताह जे नहि हम सभ साकांक्ष छी तँ ई कोना भेल । कोन कारण सँ मिथिलाक संग अन्याय कयल गेल कि ओकर संस्कार , संस्कृति आ भाषा सुदृढ़ छैक तैंए , एकर एक मात्र कारण छल हमर सभक छोट मानसिकता । यदि अपन अस्मिता आ स्वायत्त चाहैत छी तँ लड़य पड़त , आ संगहि अपन चरित्रकें सेहो बदलय पड़त। कारण हमरा लोकनि घर मे खूब कूदब जखने बाहर जायब तँ समझौता परस्त भ जायब आ ई चरित्रकें बदललाक बादें हम सभ ओहि मिथिला आ मैथिलीक अस्मिताक विषयमे सोचि सकैत छी कहियो सम्पूर्ण भारतवर्षक मान छल मिथिला। हमरा लोकनि कखनो सोचलहुं जे हमर सभक सांस्कृतिक आ भाषाई संबंध हिन्दी पट्टी सँ नहि पूर्वोत्तर आ नेपाल सँ अछि तखनि हमरा लोकनि कियाक नहि हुनके लोकनि जेकां अपन भाषा , अपन अस्मिताक लड़ाई कोना लड़ल जाइत अछि एहि पर सोचि । ओना हमरा लोकनि हिन्दी दा कें नहि छोड़बन्हि आ तखनि भेटत कि से शब्द नहि लिखि सकैत छी हमरालोकनि स्वयं सोचि। हमर सभक मानसिकताक विषय मे यैह धारणा अछि जे हम सभ मैथिली बजबा सं कि मैथिली आ मिथिलाक कथा कहबा सं लाज करैत छी, हमर एकटा मित्र छथि हुनका हम कहलियनि जे अपने पोथी मैथिली भाषामे लिखु भाषाक सेहो सेवा होयत आ अहांक ई काज सं बहुत गोटा प्रभावित हेताह एहि सं मैथिली आ मिथिला के लाभ हेतैक,हुनका ग्लानि भेलन्हि,तखनि हमरालोकनि सोचि सकैत छी जे मिथिलामे केहन लोक छथि । विद्यापति समारोहक समाचार पढ़ल जाहि मध्य एकटा महानुभाव कहने छलाह जे मैथिली रोजी-रोटीक भाषा भ गेल अछि आब एकर विकास कियो नहि रोकि सकत । हमरा महाशय सं पूछियनि कत। विदेश मे कि देश मे। एतेक झूठ कियाक । जे भाषा अपन क्षेत्रमे शिक्षाक माध्यम वा कोनो संस्था मे कार्यालयक भाषाक धरि नहि भ सकल अछि ओ रोजी कत स देत। कारण मिथिलाक भाषा मैथिली भेल आ ओ मैथिलीक ई दशा छैक जे ओकर विकास लेल एकगोट संस्था धरि नहि छैक जखनि कि मिथिलाक अपन सम्पति छलैक अपन शासन छलैक । तखनि रोजी रोटीक सं एतेक जल्दी जोड़ब कनेक अनसोहांत लागल,एहिना कियो बजने छलाह जे हम सभ आन्दोलनक लेल तैयार छी,ई कथा हुनक हम प्रत्येक विद्यापति समारोह मे सुनैत छियैन्ह आ लगैत अछि भविष्यमे आरो सुनब। एहि परिपेक्ष्यमे बिहार गीतक हंगामा उठल बेचारे सत्यनारायण मिथिला नहि देखलन्हि आ एकटा बचकौन गीत लिखि बैसलाह आ तेकर विरोधमे स्वर उठल जे बिहार गीतमे मिथिलाक चर्च नहि करबाक लेल हमरा लोकनि विरोध क रहल छी औजी विरोध कत कोठरीमे ,कने आगू बढ़ू( ई टिप्पणी एकगोट यशस्वी साहित्यकारक संस्था देने छल हुनका लेल, कारण मिथिलाक जनता घर सं बाहर भेल टा नहि अछि ओ सब एकर प्रतिरोध क रहल अछि) । कारण किनको मोन मे मिथिला आ मैथिलीक प्रति सनेह रहतनि,तं मैथिली आ मिथिलाकें दुर्दशा कियाक केने रहितथि।सुकान्त सोम मिथिला दर्शन मे एकटा लेख लिखने छथि जे ‘मैथिली हाथउठाइ पर कते दिन’, जाहिमे जे-जे विन्दु पर ओ चर्च कएलन्हि से चिन्तनशील आ गम्भीर अछि । बांकी हम मैथिल , कि करैए छी से समय बताओत। पूर्वी भारतीय भाषाक सेमिनार क बहन्ने हेमनिमे गोहाटीमे एकटा सेमिनार आ कार्यशाला मे गेल छलहुं । सेमिनारक विषय छल लक्ष्मीनाथ बेजबरुआः- समकालीन पूर्वी भारतीय साहित्य आ कार्यशाला छल लक्ष्मीनाथ बेजबरुआक गल्पक पूर्वीय भारतीय भाषामे अनुवाद। ओतऽ जतेक लोक अपन-अपन आलेख पाठ कएलन्हि ओकर मध्य यैह देखबामे आयल जे सम्पूर्ण पूर्वी भाषा लक्ष्मीनाथ बेजबरुआक समयमे अपन-अपन अस्मिताक लेल लड़ाई लड़ि रहल छल जाहिमे असमिया आ उड़िया अपन स्वतंत्र स्थिति स्थापित क लेलक मुदा मैथिली हिन्दीक पाँजमे बहुत दिन धरि कि अखनो दबायल अछि आ ओ भाषाई स्वतंत्रता भेलाक पश्चातों अखनि धरि स्वतंत्र नहि भ सकल अछि ओकर कारण राजनीति,सामाजिक,आ आर्थिक अछि । हमरा लोकनिक राजनीति जातिगत सं भड़ल अछि राजनीति मिथिलाक अस्मिताक लेल नहि होइत अछि मात्र अपन स्वार्थक लेल। ओहिना सामाजिक स्थितिक अछि समाज जातिगत भेदभाव ,परम्परावादी मानसिकता आ एक दोसराक प्रति द्वैष सँ भड़ल अछि आ ताहू सँ बेशी स्थिति दयनीय अछि आर्थिक । स्वतंत्रता एतेक वर्ष भेलाक बावजूदो मिथिला भारतक अन्य प्रांत सँ पिछड़ल अछि लोकक खेती-बारी चौपट छैक तँ रोजी-रोटीक लेल अन्य प्रांत जयबाक लेल मजबूर होइत अछि आ पलायन ओकर संस्कृति , भाषा आ स्वतंत्रताकें छिनि रहल अछि ,जेकर कारण संस्कृति आ भाषा एक ठाम सँ दोसर ठाम जाइत आ दहशत मे रहैत जीवन जाहि कारण दबायल जा रहल अछि।जेकर कारण हम सभ मैथिली भाषी सं बेशी हिन्दी भाषीक रूप मे जानल जाइत छी आ हम सब अपन स्वतंत्र अस्तित्व नहि स्थापित क पबैत छी ।मुदा ई असम्भव नहि छैक एहि चेतनाक जगएबाक आवश्यकता छैक यदि अपन अस्तित्वक लेल चेतनशील रहब अपन स्वतंत्र अस्तित्व पाबि सकैत छी मुदा हमरा लोकनि मे एकर पूर्णतः अभाव अछि जेकर कारण हम सभ पिछड़ल छी। अपने देखि सकैत छी असमक चाह बगान मे काज करबाक लेल आनल गेल चाह बागानक मजूर अपन संस्कृति आ भाषाक आधार पर अपन स्वतंत्र अस्तित्वक निर्माण मे लागल छथि आ स्वतंत्र अस्तित्व स्थापित करबामे सफल सेहो भ रहल छथि कारण ओकर मूलमे अछि हुनक सांस्कृतिक एकजूटता आ भाषाई चेतना। मुदा हम सभ जातिगत संस्कृति , जातिगत भाषाक कारण एखनि धरि अपन स्वतंत्र अस्तित्वक नहि निर्माण क पाबि रहल छी ओकर मूल मे अछि हमर सभक एकजूटताक कमी। नहि तं मिथिलामे कोनो साहित्यकारक देहान्त होइत छनि तँ मिथिलामे किनको शोकाकुल नहि देखल जाइत अछि (जं किनको शोकाकुल देखल जाइत अछि ओ हुनक औपचारिकता छी) जखनि कि मैथिली साहित्यकारों मिथिलाक लोकक जीवनकें अपन लेखनीक माध्यम सं विश्व परिदृश्यकें परिचित करबैत छथि आ एहि साधना मे लिन रहैत छथि ताहि बावजूदो मैथिली साहित्यकारकें मिथिलाक समाज आ लोक अपनासं नहि जोड़ि पबैत अछि , मुदा 29 नवम्बरक भोर मे असमिया साहित्य आ ओतुक्का लोकक मामोनी बाईदेउ (डॉ. इन्दिरा गोस्वामीक) निधन हुनका प्रति संवेदना देखि लागि रहल छल जे असमिया लोकक परिवार अपन कियो हुनका सभकें छोड़िकें चल गेल होथि आ ई संवेदना देखि लोकक प्रति जे भावनाक संचार होइत अछि ओहि सँ बेशी अपना उपर लाज होइत अछि जे एक्के देह मुदा संवेदना आ भावनामे एतेक अन्तर कियाक। असमक धरती बाजारवाद सं बांचल अछि आ ज्ञानक धरती मिथिला संवेदनहीन भेल जा रहल अछि कियाक एहि विषय पर सोच पड़त । विश्वक डॉ. इन्दिरा गोस्वामी आ असमिया लोकक मामोनी बाइदेउ यथार्थ मे ई सत्य छैक जे संघर्ष एकटा नव जीवनक जन्म दैत छैक आ जे व्यक्ति संघर्षकें अपन भाग्यक दोष नहि मानि ओकरा कर्म पथक सारथी मानि लिअए तं बुझु ओ कतेक माननीय अछि । ई उदाहरण असमिया साहित्यक महिला लेखिका , समाजसेवी आ शान्तिक लेल लड़ैत डॉ. इन्दिरा गोस्वामीक मादे कहि रहल छी। असमिया भाषा साहित्य , असमिया समाज आ लोकसं हुनका जे लगाव आ स्नेह छलन्हि ओकर उदाहरण देखल जा सकैत अछि हुनका देहावसान आ हुनका प्रति लोकक लगाव। सम्पूर्ण शहरे टा नहि सम्पूर्ण असम अपन बाईदेउक निधन सं आहत। मुदा प्रश्न उठैत अछि ई आत्मीयता आ संवेदना कोना प्राप्त भेलन्हि एहि विदुषीकें। तं अपनेकें भेटत संघर्ष आ संघर्ष सं उपजल एक-एक टा बूंदकें अपन जीवनमे आत्मसात करब। कहल जाइत अछि जखनि बाइदेउक जन्म भेलनि तं ज्योतिषक अनुसार ई अभागली हेतीह आ हिनका मारि देल जाए मुदा से नहि भेल , मुदा ककरो अभाग्यक अन्त नहि होइत छैक ज्योतिष द्वारा मारि देबा सं बांचि जीवन तं भेटलन्हि मुदा दुर्भाग्य बाइदेउकें नहि छोड़लक पिता दुनिया सं छोड़ि देलन्हि आ ओकर पश्चात् पतिक सड़क दुर्घटनामे निधन। ई सभ घटना बाइदेउकें एक दिश असगर क रहल छल तं दोसर दिश संघर्षक जन्म द रहल छल। मुदा बाइदेउ हारैत नहि छथि जखनि कोनो पुरुषक जीवनक आरम्भ होइत छैक तखनि बाइदेउक जीवन अन्त होइत अछि मुदा बाइदेउक जीजिविषा एतेक मजगूत छल जे बाइदेउ एहि चुनौतीकें अपन जीवनसं आत्मसात् करैत छथि आ तेरह वर्षक अवस्था सं लेखनी प्रारम्भ कएनिहार बाइदेउ पुनः लेखनीसं जोड़ि लैत छथि । बाइदेउ मात्र अपन लेखनी मे नहि क्रान्ति नहि अनैत छथि ओ तं अपन जीवन मे सेहो क्रान्ति अनैत छथि। कहल जाइत अछि जीवनक एहि उकस-पाकसक क्षणमे बाइदेउ जखनि वृंदावन, काशी मे बास करैत छथि तं बाइदेउ अपन जीवनमे एक नव परिवर्तन अनैत छथि तं दोसर दिश बाइदेउ विधवाक जीवनकें अपन लेखनीसं कैनवास करैत छथि, कहल जाइत अछि बाइदेउ ओतऽ सं अयलाक बाद सधवाक रूपमे उपस्थित होइत छथि आ जीवनक अन्त धरि ओहिना रहैत छथि। बाइदेउक अपन जीवन मात्र लेखनी धरि सीमित नहि राखि ओ असमक शान्तिक लेल प्रयास करैत रहैत छलीह आ एहि कारण हुनका बहुत प्रकारक लांछना सेहो लगाओल गेल। मुदा जीवनक अन्त धरि ओ एहि लागल रहलीह किन्तु दुखद जे जखनि ओ असमक ओहि संत्रासकें कैनवास करबाक सोचलन्हि तावत धरि ओ दुनिया छोड़ि देलन्हि । एहि तरहें देखैत छी जे बाइदेउक जीवनमे जे जीजिविषा छल ओ मात्र असम आ असमिया साहित्य लेल नहि ओ सम्पूर्ण नारीक प्रतिक अछि जहिना मिथिलाक सीता सम्पूर्ण नारीक प्रतिक छथि ओहिना बाइदेउ सम्पूर्ण नारीक मार्गदर्शक । धीरेन्द्र, मैथिली आ शिष्य मैथिली साहित्यमे राजकमल, ललित, मायानन्द, धीरेन्द्र, रमानन्द रेणु आ सोमदेव क पदार्पण एकहि काल-अवधिमे भेल। राजकमल, ललित, धीरेन्द्र आ रेणु आब नहि छथि। मायानन्द आ सोमदेव मात्र अपन पीढ़ीक प्रतिनिधित्व करैत छथि, सेहो नाम मात्रकेर, कारण पीढ़ीक प्रति वर्तमानमे हुनका सभक कोनो ठोस काज नहि तँ देखल जा रहल अछि आ नहि तँ अपन पीढ़ीक संग भेल अन्याय प्रति कोनो ठोस प्रतिक्रिया देखबामे आएल अछि। ओना एहि पीढ़ीक एकटा विशेषता ई छल सभ केओ सर्वविधावादी छलाह, मूलतः कथाकार आ उपन्यासकार रहितो। समयक ज्ञान छलन्हि हिनका सभ गोटेंमे। ई निश्चित जे ओ लोकनि साहित्यकार तँ उच्चकोटिक छलाहें ओहिसँ बेशी मैथिली आन्दोलनकारी आ चिंतक छलाह। ओहि सम्बन्धमे किछुओ उद्धृत करबाक आवश्यकता नहि, कारण मैथिली साहित्यक विषयमे थोड़बो जानकारी रखनिहारकेँ हुनका लोकनिक विषयमे जरूर बुझल हेतनि। हम एतय चर्च मात्र डा.धीरेश्वर झा धीरेन्द्रक करए चाहैत छी, कारण अछि धीरेन्द्रक अवसान जनवरी मासक नओ तारीखकें भेल छलन्हि। दोसर धीरेन्द्रक कर्मभूमि नेपाल रहल आ ओतुक्का बहुतो साहित्यकार, बुद्धिजीवी आ आम लोकक अनुसारेँ आधुनिक नेपालक मैथिली साहित्यक जनक डा.धीरेन्द्र छथि। हमर कहब अछि जे यदि डा.धीरेन्द्र नेपालक आधुनिक साहित्यक निर्माता छथि तँ कोन कारणेँ धीरेन्द्रकेर उपेक्षा कएल जाए रहल अछि? हुनक दीर्घ शिष्य-मण्डली रहितो, जाहिमे सर्वश्री रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’,जे साझा प्रकाशन सँ ल क प्रज्ञा प्रतिष्ठान धरि प्रतिनिधित्व कयलन्हि अछि, धीरेन्द्रक कोनो अप्रकाशित पोथीक प्रकाशन नहि होएब, हुनका पर केन्द्रित कोनो संगोष्ठीक आयोजन नहि होएब, हुनक योगदानकेर विषयमे कोनो पोथी प्रकाशित नहि होयब आदि तँ हुनक उपेक्षे ने थिक। एकर जवाब हुनक शिष्य मण्डलिए दए सकैत छथि। हँ, एहि परिप्रेक्ष्यमे जँ केओ अपन उदारता आ धीरेन्द्रक प्रति सम्मान देखौलक तँ ओ थिक मिनाप, जनकपुर, जे विगत वर्ष हुनक कथा संग्रह प्रकाशित कएलक। धीरेन्द्रक शोणितसँ पोषित नेपालीय मैथिली फलि फूलि रहल अछि, मुदा पता नहि जे कोन कारणेँ नेपालीय मैथिली साहित्यक महलकें ठाढ़ कयनिहार एहि साहित्य-मनीषीकेँ विगतक कर्ता-धर्ता लोकनि बिसरि गेलाह अछि। धीरेन्द्रक विषयमे सम्पूर्ण नेपालक लोक इएह कहैत छथि जे ओ मैथिलीक लेल आ अपन जनकपुरक शिष्यक लेल जीबैत छलाह तैँ श्यामसुन्दर शशि हुनक विषय मे लिखने छथि जे आब जनकपुरमे गुरुकुलक परम्परा समाप्त भ गेल, मुदा ओहो फरिछा नहि सकलाह जे एहि गुरुकुलक परम्परा समाप्त होयबाक कारण कि छल। हमरा जनैत एकर कारण छल वा अछि लोककेँ चिन्हबाजन्य तीक्ष्ण दृष्टिक अभाव ओ ओहन त्यागी-तपस्वी-मनस्वी साहित्यकारसन योग्य गुरुक अनुपलब्धता। ओना एकटा प्रसन्नताक विषय अछि जे एहि गुरुकुल परम्पराक चिन्तनमे लेख लिखनिहार आ धीरेन्द्रक गुरुकुल परम्पराक शिष्य श्याम सुन्दर शशि नेपालीय मैथिली साहित्यक विकासक लेल स्थापित कयल गेल विद्यापति कोषक सचिव संग नेपालमे मैथिलीक अध्यापक भेलाह अछि आब देखबाक चाही जे ओ अपन गुरुकें मोन पाड़ैत छथि वा नहि, सङ्गहि इहो समयस सङ्ग अपेक्षित रहत जे ओहि गुरु-शिष्य परम्पराक रक्षा करताह वा नहि। ई तँ सर्वविदित अछि जे धीरेन्द्रक गुरुकुलक परम्परासँ मात्र नेपालक लोककें लाभ भेलन्हि, हुनक परिवार आ स्वयं धीरेन्द्रकेँ ओहि परम्पराकें निर्वाह करबामे दुख आ अपमान छोड़ि किछु नहि भेटलन्हि। धीरेन्द्रक विषयमे एकटा नेपाली भाषी शिष्य जगदीश धिमिरे अपन नेपाली भाषाक उपन्यास ‘अन्तर्मनको यात्रा’ मध्य लिखने छथि – भारतीय मिथिलाका डा.धीरेन्द्र , क्याम्पसमा मैथिलीका गुरु तथा हिन्दी र अङ्ग्रेजीका पनि विद्वान थिए। उनी साहित्यमनीषी थिए र थिए जनकपुरका आधुनिक मैथिली र नेपाली सिर्जनशील साहित्यका प्रेरणा। अरूका नभए पनि उनी मेरा प्रेरणा थिए। उनी साहित्य नै सास फेर्थे। उनको सपना-बिपना सबै साहित्य नै थियो। साहित्यचर्चामा डुबेर उनी अघाउँदैनथे, जसका सितन हुन्थे चिया र पान। पछि जर्दा थपियो। कृशकाय सी मैथिल पण्डित दिनभरि बोलेर र रातभरि लेखेर थाक्तैनथे। म सोच्थेँ – यी कहिले सुत्छन् होला? कहिले खान्छन् होला? आ आगू ओ लिखैत छथि जे डा.धीरेन्द्र मेरो साहित्यका मेन्टर हुन्, दृष्टिगुरु। साहित्य र जीवनदर्शनका मेरा जिज्ञासाका गाँठा फुकाउन उनी सधैं तत्पर हुन्थे। उनी उमेर पुगेरै बिते भन्दा हुन्छ। मैथिली साहित्यमा उनको निकै ठूलो स्थान छ। जस्तो कि साहित्यकारहरूको नियति हुन्छ, उनको वृद्धावस्था दुःखद थियो। आर्थिक र मानसिक रूपमा तनावग्रस्त थिए।” हमर एतय ई उक्तिक रखबाक दू टा कारण अछि, पहिल जे लेखक नेपाली भाषी छथि ओ दोसर ई जे ओ कोन कारणेँ ई लिखबाक लेल विवश भेलाह जे ‘आर गोटेंक प्रेरणा होथि वा नहि हमर प्रेरणा छलाह, दोसर कोन कारणें धीरेन्द्रक मानसिक रूपमे तनावग्रस्त छलाह’। एहि उक्तिक व्याख्या करब हमर नियति नहि अछि एतय मात्र हमर प्रश्न अछि एहन नियति डा.धीरेन्द्रक संग कियाक भेल जखनि कि ओ एतेक पैघ जमातिक गुरु छलाह। धीरेन्द्र प्रेमर्षि अपन आलेख मैथिलीक आकाशक भोरूकबाः डा.धीरेन्द्र मध्य लिखने छथि जे – “ यथार्थ कहल जाए तँ आइयो जँ नेपालक मैथिली साहित्यसँ डॉ. धीरेन्द्रक सक्रियताटाके कतिया देल जाए तँ ई छुछुन्न भऽ जाएत। कहबाक लेल कहल जाइत छैक जे नेपालमे मैथिलीक एना भेल-ओना, मुदा जे-जेना भेल मात्र डॉ. धीरेन्द्रकें लऽ कऽ भेल। जँ धीरेन्द्र आ हुनक कृतित्व नहि तँ नेपालक मैथिली साहित्य किछु नहि। ई यथार्थ अछि।” तखनि डॉ. धीरेन्द्रकें हुनक अवसानक एतेक वर्ष बितलाक पश्चातों अपन कृतित्वकें अपन हाल पर छोड़ि देबाक पाछु कोन मंशा तँ होयत नकारात्मक वा सकारात्मक ? किछु दिन पूर्व एकटा सेमिनारमे गौहाटी गेल छलहुँ, ओहि ठाम जखनि नेपाली भाषाक विकासक चर्चा हुअए लागल आ साहित्यक विकासमे नेपालक साहित्यकारक योगदानक चर्चा भेल तँ दार्जिलिंगक एकटा युवा शोघार्थी कहलनि जे नेपाली भारतीय साहित्यक विकासमे नेपालक साहित्यकारक नाम कियाक लेल जाइछ, ताहि पर एकगोटें प्रतिक्रिया व्यक्त करैत कहलनि जे यदि साहित्य रचनाक सेहो भोगौलिक सीमा हुअए लागल तँ ई साहित्य लिखबाक कोनो प्रयोजन नहि , कारण साहित्यकारक कोनो भोगौलिक सीमा नहि होइछ आ ओहिना भारतीय नेपाली साहित्यमे नेपालक साहित्यकारक योगदान चर्च करब ओहि सिद्घान्तक अन्तर्गत अछि यदि नेपालक साहित्यकार भारतमे रहि अपन साहित्य सेवा क रहल छलाह तखनि ओ नेपालक भेल कि भारतक। आ हमरा जनैत धीरेन्द्रकेँ अपन जन्मभूमि प्रति अगाध स्नेह छलन्हि तैँ ओ नेपालक नागरिकता नहि लेलन्हि मुदा अपन कर्मभूमि प्रति अगाध स्नेह छलन्हि तैँ ओ अपन सन्तानसँ बेशी नेपालीय मैथिलीकेँ स्नेह देलन्हि। मुदा कि! हुनक ई भावनाक रक्षा कयल गेलनि - उत्तर भेटत नहि। महाभारतमे गुरु द्रोणकेँ मात्र अपन आदर्श गुरु मानबाक कारणें एकलव्य अपन औंठा दान देने छलाह, मुदा धीरेन्द्रकें मात्र गुरु आ नेपालक मैथिली सेवा करबाक कारणें हुनका शिष्य लोकनि हुनक गर्दनि धरि काटि लेबाक षडयंत्र करैत छथि। समय-समय पर धीरेन्द्रक शिष्य लोकनि धीरेन्द्र भारतीय छथि एकर हौआ ठाढ़ कय धीरेन्द्रकें नेपालसँ कतिएबाक प्रयास कयलन्हि आ सफल सेहो भेलाह। मैथिली आकाशक भोरुकबाःडॉ. धीरेन्द्र मध्य धीरेन्द्र प्रेमर्षि हुनक शिष्य लोकनिक विषयमे लिखने छथि जे- “तहिया जहिया नेपाल राजकीय प्रज्ञा-प्रतिष्ठानक सदस्य हएब विशेष गौरवक विषय मानल जाइत छल, हिनका प्रज्ञा-प्रतिष्ठाने मनोनयन कएल गेल छलनि। मुदा हिनक अपने किछु तथा कथित शिष्यसभ, जिनका आङुर पकड़िकऽ लेखनक एकपेड़िया पर ई चलऽ सिखौने रहथिन, काठमाण्डू ठेकि गेल जे ई तँ भारतीय छथि, तें हिनका एहिमे नहि होएबाक चाहियनि।” आब एतय प्रश्न उठैत अछि जे जहिना धीरेन्द्रक प्रति हुनक किछु प्रिय शिष्य द्वारा ई विरोधक स्वर उठाओल गेल जे ओ भारतीय छथि तखनि तँ कहियो ईहो मिथिला आ मैथिली विरोधी (नेपालमे) उठा सकैत छथि जे विद्यापति सेहो भारतीय छथि ( कारण विद्यापतिक जन्म भारतक मधुबनी जिला मे भेल छनि) ओ कोना राष्ट्रीय विभूति होयताह? तखनि ओकर उत्तर की देबैक,कोनो उत्तर अछि? (कारण कहियो भारतक दार्जिलिंग मे एहि प्रकारक स्वर भानु भक्त प्रति आयल छल), कारण स्वार्थक कारण धीरेन्द्र वा महेन्द्र मलंगियाकेँ भारतीय कहि कात क दैत छियनि ( युवा वर्गकें छोड़ि) तखनि एहि प्रश्नक उत्तर देब सत्यमे असम्भव होयत। कारण काल्हि धरि अपन स्वार्थक लेल जे खाधि खुनने छी ओहि खाधिमे एक न एक दिन अपनो खसय पड़त। कारण साहित्यकार , विचारक आ ज्ञानीक नहि तँ सीमा रेखा सँ बान्हल जा सकैछ आ नहि अपन संकुचित विचारसँ, ओ तँ पानीक ओहन धार होइत छथि, जे जतए चाहथि बहैत अपन ज्ञानक सरितासँ समाज आ लोककें अभिभूत करैत अपन ज्ञान सँ समाजकेँ आलोकित करैत जाइत छथि। एहि तरहें कहि सकैत छी जे आधुनिक कालक पं.जीवनाथ झा, डा. धीरेन्द्र , प्रो.मौन, महेन्द्र मलंगिया , मध्यकालक मल्ल राजाक दरबारक नाटककार ,कवि आ प्राचीनकालक कोनो सिद्ध साहित्यकार होथु, हुनका भौगोलिक सीमासँ बांधि राखब अपन ज्ञानकेँ सीमामे बान्हब सदृश होएत। अन्तमे डा.धीरेन्द्रक प्रति आस्था व्यक्त करैत हुनक प्रकाशनाधीन मैथिली मुक्तक संग्रह ‘छिड़ियाएल फूल’ सँ एकटा मुक्तक उद्धित करैत अपन कथ्यकेँ दृढ़ता प्रदान करबाक प्रयास करैत छी- “जिनगी ने कनैए, ने नोर बहबैए; ओ तँ बीतैत क्षणक खेतमे बीया छीटैए।” डॉ॰ शशिधर कुमर, एम॰डी॰(आयु॰) – कायचिकित्सा, कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी – प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) – ४११०४४ पोथी समीक्षा : गामक जिनगी हम कोनो व्यावसायिक आलोचक, समालोचक वा समीक्षक नञि छी, पर मैथिली पढ़ब – लिखब नेनपने सँ नीक लगैत छल तेँ आइ एक गोट पोथीक समीक्षा लीखि रहल छी । पोथी थिक श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जी रचित कथा संग्रह “गामक जिनगी” - ओना कोनो पोथीक ई हमर पहिलहि समीक्षा छी । एहि पोथीक समिक्षा पहिनहु किछु जगह ब्लॉग वा पत्रिका आदि मे प्रकाशित भऽ चुकल अछि जे पढ़ि हम स्वयं पुर्ण रूपेण संतुष्ट नञि भऽ सकलहुँ आ पोथीक पुनर्समिक्षा करबाक इच्छा भेल । बहुधा देखल जाइत अछि कि कथा संग्रहक नाँव कोनो एक गोट महत्त्वपुर्ण कथा वा घटना वा अंश पर राखि देल जाइत अछि, पर एहि बेर से नहि । एहि संग्रह मे १९ गोट कथाक समावेश भेल अछि आ संग्रहक हरेक कथा स्वतंत्र रूपेँ व समग्र रूपेँ संग्रहक नाँव केँ प्रतिबिम्बित करैछ । हर कथा मे गामक जिनगीक एक अलगहि स्वरुप देखबा मे अबैछ । आमुख मे श्री सुभाष चन्द्र यादव जी बहुत सटीक लिखने छथि - "एहि संग्रहक कथा सभ मे औपन्यासिक विस्तार अछि । वर्त्तमान समए मे प्रचलित आ मान्य कथा सँ ई कथा सभ भिन्न अछि । हर कथा घटना बहुलता आ ऋजु सँ युक्त अछि ।" पर एहि औपन्यासिक विस्तार आ ऋजु सँ युक्त होयबाक बादो हरेक कथा रुचिकर, लयबद्ध आ सुसम्बद्ध अछि । आधुनिक टी॰भी॰ धारावाहिकक सदृश भँसियाइत नञि अछि, दिशाहीन सन नञि बूझि पड़ैत अछि । कथा केर प्रवाह दिग्भ्रमित नञि होइत अछि । कथाक हर घटना अप्पन ऋजु वा वक्रताक बावजूदो कथाक मुख्य भावनाक वा विषयवस्तुक अनुपूरक व सम्वाहक अछि । जेना कि “डाक्टर हेमन्त” नामक कथा मे गामक जमीनक दियादी बँटवाड़ा, सरकारी नोकरीक झंझटि आ क्लिनिकक झंझटि आ बाढ़िक संघर्ष चित्रित अछि पर तइयो कथा मे कोनो विरोधाभास नञि अबैछ, कथा एक लय मे शान्त अखण्ड प्रवाह जेना आगू बढ़ैत रहैत अछि । रौदी – दाही मिथिलाक सभ दिन सँ प्रमुख समस्या – तेँ गामक जिनगी मे ओ समाविष्ट नञि हो से कोना । कथा संग्रहक आरम्भ “भैँटक लावा” आ “बिसाँढ़” नामक कथा सभ सँ होइत अछि जाहि मे क्रमशः दाही (बाढ़ि) आ रौदी (अकाल) केर बहुतहि सटीक व सजीव वर्णन भेटैछ । ओना मिथिलाक अभिन्न अंग होयबाक कारणेँ एहि बिभीषिका सभक विभिन्न रूपक दर्शन आनो कथा सभ मे भेटैछ – पर हर बेर नऽव स्वरूप मे, पुनरुक्ति कतहु नहि । 1967 ई॰ केर अकाल मे भारतक तत्कालीन प्रधानमण्त्री केँ देखाओल गेल छल जे कोना मुसहर लोकनि बिसाँढ़ खा कऽ अपन जीवनक रक्षा कएलन्हि – तकरे अधार बना कऽ “बिसाँढ़” नामक कथा लिखल गेल अछि । यद्यपि ई एहि प्रकारक कथा मैथिली साहित्य मे बहुत पहिनहि अयबाक चाहैत छल – पर नहि आबि सकल, एखन आयल अछि – मैथिली साहित्यक धरोहड़ि कथा बनत । जिनगी वास्तव मे एकटा संघर्ष थिक, पर जे हिम्मत नञि हारैत अछि, परिस्थितिक सामना करैत अछि आ आगाँ बढ़ैत अछि सएह जीतैत अछि । ई एहि संग्रहक पुर्वार्धक हरेक कथाक मूल मण्त्र अछि तथापि पढ़बा मे उपदेशात्मक कथा सनि बोझिल कथमपि नञि बूझि पड़त । हर कथा मैथिल समाजक विभिन्न सामाजिक, आर्थिक वा व्यावसायिक वर्गक जीवन संघर्ष केँ सजीव रूपेँ चित्रित करैछ चाहे ओ बोनिहारिन “मरनी” हो, ठेलाबला हो, चूनवाली हो, दू पाइ कमयबाक इच्छा सँ दिल्ली जायबला “फेकुआ” हो, पीरारक फऽड़ बेचि गुजर कएनिहार “पिचकुन आ धनिया” हो वा जीविकाक लेल संघर्षरत “शोभाकान्त व उमाकान्त” हो । चाहे ओ जीवनक उत्तरार्ध मे गाम आयल “श्रीकान्त आ मुकुन्द” होथि, नऽव युगक जीवनक अभिलाषी “कुसुमलाल” हो, माए बाप केँ एकसरि छोड़ि अमेरिका बसनिहार “रघुनाथ” हो अथवा अप्पन निजि जिनगी आ ऑफिसक बीच ओझड़ायल “डॉक्टर हेमन्त” हो । किनको मोन मे भऽ सकैत छन्हि जे जिनगी तऽ ओहिना संघर्ष थिक - ओहि मे ई संघर्षक खिस्सा – पिहानी के पढ़त ? पर से नहि, लेखक केँ मनोविज्ञान पर एतेक जबर्दस्त पकड़ि छन्हि जे ओ जिनगीक संघर्षक एहि कथा सभ केँ सेहो अत्यन्त सहज ओ रुचिकर ढंग सँ प्रस्तुत करबा मे सक्षम भेलाह अछि । कोनो कथा कत्तहु निन्नक गोली सनि नञि बुझना जायत । पात्र सभक नाँव – गाँव भले जे हो पर कथा पढ़बाक काल हर वर्गक पाठक लोकनि केँ कथा अपनहि वा अपनहि कोनो सर – सम्बन्धीक बुझि पड़तन्हि । बहुतेक कथा जिनगीक संघर्ष वा दुख सँ प्रारम्भ होइत अछि पर सुखान्त अछि – ई पाठक केँ एक मनःस्फुर्ति दैछ । किछु कथा किछु वर्ग व ओहि वर्ग सँ जुड़ल व्यवसायक सैकड़ो वर्षक उतार चढ़ाव व संघर्ष केँ चित्रित करैछ, जेना कि कुम्हार (हारि – जीत) , चूनवाली आदि । वास्तव मे ठेलावला, रिक्सावला, चूनवाली, बोनिहारिन, कुम्हार आदि सभ तऽ अपनहि मैथिल समाजक अंग छथि पर मैथिली साहित्य शायदे कखनहु अपन एहि अभिन्न अंग सभक सुधि लेलक आ तेँ एहि वर्गक लोक सभ अपना केँ मिथिला - मैथिली सँ पृथक बुझैत रहलाह । ई कथा संग्रह हुनिका लोकनिक मन मे विश्वास आ ढाढ़स दैछ कि ओहो सभ एहि मैथिल समाजक अविभाज्य अंग छथि । यद्यपि पुर्व मे किछु साहित्यकार लोकनि एहि आर्थिक वा सामाजिक रूप सँ पिछड़ल , संघर्षरत समुदाय पर लिखबाक प्रयास कयलन्हि अछि पर या तऽ ओ कृत्रिम बुझाइत अछि अथवा यथार्थपरक रहितहु पाठकक लेल ओ बोझिल सन बुझना जाइछ । एहि विषय सभ पर यथार्थपरक नीक व रुचिकर कथा सभक मैथिली साहित्य मे बहुधा अभाव रहल अछि । हमरा विचारेँ एहि कथा संग्रह मे ई दोष नञि – कथा संग्रह केर हरेक कथा विभिन्न समाजिक वा आर्थिक वर्गक जीवन संघर्ष केँ चित्रित तऽ करैछ पर संगहि संग पढ़बा मे रुचिकर सेहो लगैछ । एकर अतिरिक्त किछु कथा – जेना कि “अनेरुआ बेटा” आ “कामिनी” - अन्त मे एक गोट प्रश्न छोड़ि समाप्त होइत अछि । कथा लेखनक ई शैली मैथिलीक प्रशिद्ध कथाकार स्व॰ राजकमल चौधरीजीक कथालेखनक शैली सँ साम्य रखैत अछि जखन कि आन कथा किछु हद तक स्व॰ हरिमोहन झाजीक कथाशैली सँ साम्य प्रदर्शित करैछ । पर शैली मे एहि प्रकारक साम्य कथमपि कोनो कथाक मौलिकता केँ प्रभावित नञि करैछ । किछु लोकनिक कहब छन्हि जे लेखकक कथा संघर्षपरक छन्हि , सौन्दर्यपरक नहि । पर हमरा जनैत लेखक जिनगीक संघर्षक संग – संग जिनगीक सौन्दर्यक सफल ओ सकारात्मक चित्रण कयलन्हि अछि । लेखकक सौन्दर्यबोध मात्र दैहिक नञि भऽ कऽ बहुत व्यापक अछि आ कायिक सौन्दर्यक अतिरिक्त जगह – जगह पर मानसिक ओ प्राकृतिक सौन्दर्यक अजगुत चित्रण भेटैछ । लेखक जहिना मैथिल समाजक विभिन्न सामाजिक, आर्थिक वा व्यावसायिक रूपेण दलित (पिछड़ल) वर्गक जीवन संघर्ष केँ अपन लेखनी मे उताड़बा मे सफल रहलाह अछि तहिना स्त्रिगणक मनोवैज्ञानिक चित्रण करबा मे सेहो । हरेक वयसक व वर्गक स्त्रीक मनोदशाक सजीव चित्रण एहि कथा संग्रह मे यत्र – तत्र भड़ल पड़ल अछि । चाहे ओ भैँटक लावा मे “जिबछी” हो, बिसाँढ़ मे “सुगिया” हो, पीरारक फऽड़ बेचनिहारि “धनिया” हो, फेकुआक माए “रामसुनरि” होथि, पजेबा फोड़निहारि वृद्धा “मरनी” होथि वा मरनीक संग लबलब कएनिहारि स्वच्छन्द बाला “सुगिया” । चाहे पति सँ दू घड़ी बात करबाक लेल तरसैत “रागिनी” हो, चून बेचनिहारि “मखनी”, ओकर पुतोहु “फुलिया” वा ओकर पोती “कबुतरी” हो, मसोमात “लुखिया” होथि, आधुनिक नऽव परिवेशक बाला “सुनएना” हो अथवा कोशी कछेड़क निश्छल बाला “सुलोचना” हो । एकर अतिरिक्त लेखक किछु आनो सामाजिक समस्या सभ दिशि इशारा कएलन्हि अछि यथा स्त्री – भ्रुण हत्या (ठेलाबला), शराबक समस्या व नऽव जीवन शैलीक लापरवाह अनुकरण (भैयारी), नऽव जीवन शैलीक महत्त्वाकांक्षा आ टूटैत सम्बन्ध (बहीन, पछताबा व कामिनी), प्रतिभा पलायन (पछताबा), साम्प्रदायिक हिंसा (बहीन) आ रुपैय्याक जोड़ेँ बेमेल बियाह (कामिनी) आदि । पोथीक भाषा शैली सर्वसामान्यक विशुद्ध मानक मैथिली थिक । ओना कतहु कतहु क्रिया आदिक प्रयोग मे मानक मैथिली सँ थोड़ेक फड़ाक बुझि पड़ैत अछि (यथा “लागल” केर स्थान पर “लगल”) परञ्च ओ कथाक पात्र आ परिवेशक अनुरूपहि थिक तेँ ओ मानक मैथिली सँ पृथक नञि थिक । भाषा विन्यास बहुतहि सहज व स्वभाविक अछि तेँ बुझबा मे दुरूह नञि । “किछु” केर जगह हमेशा “कुछ” वा “कछु” केर प्रयोग भेल अछि जे बहुशः कथानकक अनुरूप सही अछि पर कतहु - कतहु मानक मैथिली मे भऽ रहल सम्वाद मे अचानक “कुछ” या “अइठीन” केर प्रवेश अखरैत अछि । एक्कहि शब्द, पात्र व परिवेशक अनुसारेँ साहित्य मे एक स्थान पर मानक भऽ सकैछ तऽ दोसर स्थान पर नञि – यथा “कुछ” या “अइठीन” – जँ कथा मे कोनो गामक सर्वसामान्य लोकक वार्त्तालाप थिक तऽ ओहि ठाम मातृभाषा होयबाक कारणेँ ओ मानक मानल जायत, पर ओएह शब्द जँ कथा मे कोनो मैथिलीक विद्वान बजैत अछि वा आन लोक - जकर मातृभाषा मैथिली नञि थिक - से बजैत अछि तऽ ओहि ठाम ओ मानक सँ विचलित बूझल जायत । पोथी मे शब्दक वैविध्य आ खाँटी मैथिलीक विलोपित होइत शब्द सभक प्रयोग स्व॰ हरिमोहन झा जीक रचना सभक याद करा दैत अछि । खाँटी मैथिलीक विलोपित होइत शब्द सभक ई कथा सभ एक अनमोल संग्रह थिक । इतिहासक किछु एहनो बातक इशारा एहि कथा सभ मे भेटैछ जे शायद एखनुका पीढ़ीक धिया पुता केँ नञि बूझल होन्हि – यथा चून पहिने डोका सँ बनैत छल (चूनवाली) , कोना छतौनी सन सन मैथिल क्षेत्र मे अपनहि गलती सँ आन भाषा - भाषीक आधिपत्य भेल (बोनिहारिन मरनी) आदि । अन्त मे हम श्री गजेन्द्र जीक पाँती (पोथीक पश्च मुखपृष्ठ पर देल) केँ दोहड़ाबए चाहब जे श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जी केर कथा सभ मैथिली कथा धाराक यात्रा केँ एकभगाह होयबा सँ बचा लैत अछि । एहि संग्रहक सभटा कथा उत्कृष्ट अछि, मैथिली साहित्यक रिक्त स्थानक पुर्ति करैत अछि आ मैथिली साहित्यक पुनर्जागरणक प्रमाण उपलब्ध करबैत अछि । ओना तऽ कोनो पोथी केँ पाठ्यक्रम मे शामिल करबाक की प्रक्रिया छै से हमरा नञि बूझल पर अपन विषयवस्तु, मौलिकता आ भाषाविन्यासक आधार पर एहि कथा सभ केँ पाठ्यक्रम मे सम्मिलित करबाक चाही । केवल एक – आध कथा केँ नहि अपितु सम्पुर्ण कथा – संग्रह स्नातक वा उच्चतर मैथिलीक पाठ्यक्रम मे शामिल करबा जोग अछि । बहुत सम्भव अछि जे हमर ई बात आइ अतिशयोक्ति लागए पर भविष्य मे ई जरूर मैथिली पाठ्यक्रम मे अपन स्थान बनाओत । पोथीक नाँव – गामक जिनगी लेखक – श्री जगदीश प्रसाद मण्डल प्रकाशक – श्रुति प्रकाशन, 8/12, न्यू राजेन्द्र नगर, दिल्ली - 110008 दाम (अजिल्द / साधारण संस्करण) - भारतीय रु॰ 200/ मात्र, वा US $ 60 पोथी समीक्षा - अम्बरा कोनहु भाषाक जिबैत होयबाक प्रमाण की ? इएह जे जाहि क्षेत्र विशेष मे ओ भाषा बाजल जाइत अछि ओहि क्षेत्रविशेष केर हरेक व्यक्ति (वा अधिकांश व्यक्ति) ओहि भाषा केँ अपन मातृभाषाक रूप मे बजैत हो । “हरेक” मतलब हर वर्गविशेषक लोक – चाहे ओ कोनहु वयसमूहक हो, चाहे ओ कोनहु जातिक हो, चाहे ओ कोनहु धर्मक हो अथवा कोनहु व्यापार / व्यवसाय सँ जुड़ल हो । मात्र बजैत हो - सएह टा नञि, अपितु ओहि भाषाविशेष मे अपन रचनात्मक ओ सर्जनात्मक योगदान सेहो करैत हो । “मैथिली” केँ सम्पुर्ण रूपेँ ई सौभाग्य आइ धरि कहियो नञि भेँटि सकल । एक दिशि, कोनहु “एक समूह” कोनहु “दोसर समूह” केँ मैथिली नञि बाजय देलखिन्ह वा नञि पढ़ए - लिखए देलखिन्ह आ “मैथिली” केँ अपन बपौती सम्पत्ति बना कऽ रखलन्हि । दोसर दिशि, चुँकि “पहिल समूह” मैथिली केँ अपन बपौती सम्पत्ति कहि देलन्हि तेँ “दोसर समूह” सेहो मैथिली बाजब वा मैथिली पढ़ब – लिखब छाड़ि देलन्हि । मैथिलीक लेल ई परम दुर्भाग्यक गप्प रहल । घऽर - घरारी आ सम्पत्तिक बँटवारा भऽ सकैत छै, माएक नञि; मैथिल लोकनि केँ से बात बुझबा मे बहुत विलम्ब भेलन्हि । कारण जे हो, पर “माए मैथिली” केँ ई सौभाग्य आन समकक्ष भाषाक अपेक्षा बहुत काल धरि नञि भेँटि सकलन्हि । सम्प्रति खुशीक बात ई जे पछिला किछु वर्ष सञो समय बदलल अछि आ हरेक वर्गविशेषक लोक अपन रचनाशीलता सँ माए मैथिलीक आँचर भरि रहल छथि । शुरुआत मे गति बहुत सुस्त छल आ श्री विलट पासवान “विहंगम” वा स्व॰ फजलुर्रहमान हासमीजी सन एक – आधहि टा नऽव नाम देखबा मे अबैत छल पर आइ एहेन नाँव सभक संख्या बहुत तेजी सञो बढ़ल अछि । एहने एक गोट वरिष्ठ रचनाकार छथि श्री राजदेव मण्डलजी । आइ हुनिकहि लिखल एक गोट काव्य संग्रह “अम्बरा” केर समिक्षा लऽ कऽ हम अपनेक सोझाँ उपस्थित छी । “अम्बरा” - रचनाकारक गोटेक पचहत्तरि टा काव्य रचना केँ अपना मे समाहित कएने अछि । सभटा कविता “अमित्राक्षर छन्द” मे अछि । पर डेरएबाक काज नञि; “अमित्राक्षर छन्द” रहितहुँ “मित्राक्षर छन्द” केर रचना सन प्रतीत होयत आ पढ़बा मे ओहने लयबद्ध आ रुचिगर लागत । यथा :- अहाँ कहैत छी – कायर बनबसँ नीक हिंसक भऽ जाएब से अछि ठीक लोक कहत - वाह-वाह किन्तु हमरा लगैत अछि ई अधलाह ......................... “अहिंसक वीर” बिनु उचित शब्द केर भाव मरि जाइत अछि आ बिनु भावक शब्द तँ शब्दकोशहि बुझू । पर ई दोष एहि कविता संग्रह मे कतहु देखबा मे नहि आओत । उचित शब्द ओ समीचीन भाव केर अजगुत संगम देखबा मे अबैछ । जेना कि तप्त रेतपर फरफड़ाइत माछ कानि – कानि कऽ रहल नाच रेतापर फाड़ैत चीस उड़बाक लेल आसमान दिश अभागल देहसँ झड़ए लागल चाँदीकेँ कण झूमि उठल कतेको आँखिक मन जरि रहल माछक तन ........................ “बाउल परक माछ” सम्पुर्ण काव्य रचना विशुद्ध खाँटी मैथिली मे थिक; हँ कत्तहु – कत्तहु किछु हिन्दी शब्दावलीक प्रयोग ठीक सँ मेल नञि खाइत अछि, पर से अत्यल्प । भाषा बहुतहि सहज ओ स्वभाविक थिक आ ताहि कारणेँ पढ़बा काल घटनाक्रम वा वर्णित विषय पाठककेँ अपना समक्ष घटित होइत प्रतीत होएतन्हि । जेना कि देखल जाओ शब्द नहि रहल दिलक बोल तेँ नहि रहल ओकर मोल ......................... ................. बजैत रहैत छी अमरीत बोल भीतर रखने बीखक घोल ......................... “दिलक बोल” कोनहु साहित्य मे जँ विविधता नञि हो तँ ओ सम्पुर्ण नञि कहबैछ । जहिना भोजन मे षड्रस केँ भेनाइ आवश्यक तहिना साहित्य मे नवरस ओ तकर उपरस सभक समावेश परमावश्यक । मात्र शिंगार ओ भक्ति रसोपरस सँ साहित्य समग्र नञि भऽ सकैछ – एहि प्रकारक साहित्य श्रृजन एकभगाह ओ असन्तुलित कहबैछ । “अम्बरा” मे ई दोष नञि । एहि छोट – क्षिण काव्य संग्रह मे बहुत अधिक “विषय - वैविध्य” थिक । हरेक रचना भाव – स्वभाव मे एक दोसरा सँ भिन्न । आ इएह एकर सभसँ पैघ विशेषता थिक । एक दिशि “जाति” आ “हम फेर उठब” सन रचना जञो सामाजिक वैषम्य पर प्रहार करैछ तँ दोसर दिशि “ज्ञानक झण्डा” सन कविता समाज मे पसरल अंधविश्वास आ अशिक्षा पर । कमजोर वा दलित व्यक्तिक मनोदशाक केहेन मार्मिक चित्रण कएल गेल अछि से देखू टप – टप चुबैत खूनक बूनसँ धरती भऽ रहल स्नात पूछि रहल अछि चिड़ै अपना मन सँ ई बात आबऽ बाला ई कारी आ भारी राति कि नहि बाँचत हमर जाति ..... ? ......................... “चीड़ीक जाति” “हथियारक सभा” आ “अहिंसक वीर” सन रचना कोनहु समस्याक शान्तिपुर्ण समाधान करबा पर ओ अहिंसा पर जोर दैछ आ अनेरोक रक्तपात व नक्शलवादी प्रवृत्ति केँ विरोध करैत बुझना जाइछ । देखल जाओ सुनह लगाबह ध्यान खोलह अपन अपन कान तब भेटतह आजुक सम्मान बिनु देहसँ गिरौने रकत कऽ सकैत छह दोसर जुगत ................................................ ......... बिनु हिंसाकेँ जे कएने होयत हृदयपर राज ओकरे भेटत ई अमूल्य ताज ........................ “हथियारक सभा” एहि पोथी मे “मुनियाँक चिन्ता” आ “कथीक गाछ” नामक बालकविता सेहो अछि, जाहिमे बहुत सुन्नर ढंग सँ बाल मनोभाव केँ व्यक्त कयल गेल अछि । मुनियाँक छोट भाए केर जन्म भेलै, पूरा परिवार खुशी मना रहल छल आ मुनियाँ कानि रहलि छलि । पुछला पर की उत्तर भेटलैक से अपनहु सभ सुनू ई तँ छै खुशीक बात जनमल तोरा भाए कतेक खुशी छह तोहर माए दादी, सबटा जानै छी हम ओहि लए नहि कानैत छी चिन्ता अछि हमरा आब के कोराकेँ लेत दूधो माए पिबऽ नहि देत ........................ “मुनियाँक चिन्ता” “गाछक हिस्सा” आ “गाछक बलिदान” पर्यावरण असन्तुलन ओ तकर रक्षण दिशि ध्यानाकृष्ट करैछ जखन कि “मनोवाणछित चान” आ “परेमक अधिकार” किञ्चित् शिंगार रसक कविता थिक । “बाढ़िक चित्र” नामक कविता मे २००८ ई॰ मे कुसहा लऽग टुटल कोसीक बान्ह सँ आयल बाढ़िक बहुत मर्मस्पर्शी आ सजीव चित्रण कयल गेल अछि । किछु अंश द्रष्टव्य थिक एहसरि अर्धनग्न स्त्री परिश्रान्त मुख क्लान्त बैसल अछि धारक कात देह स्नात जिअत अछि कि मुइल साइत सोचि रहल अछि इएह बात एखनहि निकलल अछि संघर्ष कऽ बाढ़िक धारा सँ ........................ “बाढ़िक चित्र” सम्प्रति मैथिली साहित्यक दशा – दिशा, मैथिलीक प्रति कविक प्रतिबद्धता ओ ताहि सन्दर्भ मे देल गेल स्पष्टीकरण देखल जाओ दोसरोक माय अछि हमरे माय तँ कि यौ भाय अपना मायकेँ बिसरि जाइ .......................................... मैथिलीक अछि असीम भण्डार एहि बात केँ हम सोचि ली घर भरल हो जखन दोसरासँ किएक पैंच ली राखि संतोष करी उपाय की यौ भाय । ........................ “माय” ओना तँ हरेक कविता चर्चाक अपेक्षा रखैत अछि पर से सम्भव नञि । जहिना भात सीझलै कि नञि से ओहि मे सँ मात्र एक टा दाना केँ छूबि अन्दाज लगाओल जा सकैछ आ तहिना उपरोक्त किछु उदाहरण सभ सँ समग्र पोथीक अनुमान । व्याकरण केर दृष्टिकोन सँ एहि पोथीक एक गोट खास विशेषता अछि जे विभक्ति (कारक चिन्ह वा शब्द) प्राचीन मैथिली जेकाँ मूलशब्द केर संगहि लिखल गेल अछि ।* अन्त मे मैथिलीप्रेमी पाठक लोकनि सँ एतबहि कहए चाहबन्हि कि ई कविता संग्रह हुनिका आशा सञो बेसी रुचिगर लगतन्हि । पोथीक नाँव :– अम्बरा ( मैथिली कविता संग्रह) लेखक :– श्री राजदेव मंडल प्रकाशक :– श्रुति प्रकाशन ८/२१, भूतल, न्यू राजेन्द्र नगर, नई दिल्ली - ११०००८ दाम :– १०० टाका मात्र * प्राचीन मैथिली मे संस्कृतक प्रभावक कारणेँ कारक चिन्ह वा विभक्ति मूलशब्दक संगहि लिखल जाइत छल । आधुनिक मैथिली मे बहुधा फुटका कऽ लिखल जाइत अछि अथवा मिश्रित स्वरूप मे । मिश्रित स्वरूप - माने कि किछु कारक चिन्ह संग मे (यथा – कारणेँ) आ किछु फुटका कऽ (यथा – चौकी पर) । संस्कृत मे विभक्ति चिन्ह वा शब्द नञि होइत अछि अपितु मूल शब्द मे विकार उत्त्पन्न कए “शब्द वा धातु रूप” बनाओल जाइत अछि तेँ ओ हमेशा मूलशब्दक संगहि रहैछ । पर मैथिली समेत आन आधुनिक भारतीय आर्यभाषा सभ मे ई शब्दविकृति वा धातु विकृति नञि होइछ (अधिकांशतः) आ तेँ कारक केर विभक्ति निरूपनार्थ अलग आखर वा शब्द होइत अछि । सुमित आनन्द, मैनेजिंग एडीटर, सोसाइटी टुडे अक्षरपुरूष-विश्वनाथ समाजशास्त्रक लब्धप्रतिष्ठ विद्वान प्रोफेसर डॉ0 विश्वनाथ अपन अमर कृतिसँ मैथिली साहित्यमे जे स्थान प्राप्त कए चुकल अछि से वस्तुतः मैथिलीयोक विद्वान, प्राध्यापक सुभचिन्तक लोकनिक हेतु दुर्लभ अछि। ई अपन छात्रावस्थहिसँ प्रायः महाविद्यालयमे प्रवेष करितहि पठन-पाठनक विशय किछु रहनि मुदा मैथिलीक सेवामे संलग्न भए गेलाह। ओहि समयमे समाप्ताहिक मिथिला मिहिर सबसँ लोकप्रिय आ दीर्घजीबी पत्रिका छल जाहिमे हिनक रचना मासमे एक वा दूटा अवश्य छपैत छल। मैथिली साहित्यमे डॉ0 विश्वनाथ एकदिस जँ व्यंग्य कथाकारक रूपमे प्रतिष्ठित भेलाह तऽ दोसर दिस ई एकटा नव विद्या पर कलम उठओलनि जे थिक साक्षात्कार विद्या। एहि विद्यापर ओहि समयमे बहुत कमे लोक लिखने छलाह। डॉ0 विश्वनाथक तीन गोट प्रकाशित पोथी अछि अक्षर-अक्षर अमृत, युगान्तर एवं जुलुस रूकल अछि। एहिमेसँ पूर्वक दुनू साक्षात्कार विद्या पर अछि आ तेसर कथा पर आधारित। हिनक अक्षर-अक्षर अमृत जे जहिना वृत्यनुप्रास अछि तहिना ओहिमे संगृहीत सात गोट महापुरूषक अन्तर्वीक्षा वस्तुतः साहित्यक अलङकारे थिक। एहिमे जाहि वरेण्य साहित्यकारक साक्षात्कार प्रस्तुत कयल गेल अछि ओ थिकाह-मधुप, किरण, हरिमोहन झा, तन्त्रनाथ झा, सुमन यात्री एवं आरसी प्रसाद सिंह। डॉ0 साहेबक सर्वप्रथम अन्तर्वीक्षा 1976 मे छपल जे कवि चूड़ामणि ‘मधुप’ संग छल आ तकर बाद तऽ ओ गति पकड़ि लेलक। एहिमे जाहि सातगोट शीर्षस्थ साहित्यकार लोकनिक साक्षात्कार प्रस्तुत कयल गेल अछि तनिक जन्म 1906 सँ 1911 केर कालखण्डमे भेल छल। समाजशास्त्री डॉ0 विश्वनाथक दोसर साक्षात्कारक पोथी थिक युगान्तर जाहिमे 1912 सँ 1933 धरिक कालखण्डसँ नओ गोट मूर्धन्य साहित्यकारक अन्तर्वीक्षा प्रस्तुत कयल गेल। एहि पुस्तकमे जनिक अन्तरंग वार्ता संगृहित अछि ओ थिकाह - व्यास जयकान्त मिश्र, उमानाथ झा, जटाशंकर दास, गोविन्द झा अणिमा सिंह, आनन्द मिश्र एवं लिली रे। ई नवो व्यक्तित्व प्रातः स्मरणीय छथि। मैथिली साहित्यक रीढ़ छथि। डॉ0 विश्वनाथ जेहने आलोचक तेहने कथाकार जेहने कवि तेहने व्यंग्यकार जेहने भाषणकर्ता तेहने मंचसंचालक। हिनक कथा संग्रह ‘जुलुस रूकल अछि’ अत्यन्त रोचक ओत्सुक्सवर्धक आ शिक्षाप्रद अछि। मैथिली साहित्यमे हिनक कथा संग्रह-प्रर्याप्त लोकप्रियताकेँ प्राप्त कयलक। हमर विश्वास अछि जे डॉक्टर साहेब अपन एहने रचना सभसँ मैथिली साहित्यक उद्यानकेँ सुरभित करैत रहताह। डॉ. योगानन्द झा ग्रामजीवनक सत्यक संवाहक :: अर्द्धांगिनी श्री जगदीश प्रसाद मण्डल बहुआयामी रचनाकारक रूपमे मैथिली जगतमे प्रसिद्ध छथि। कथा-कविता-नाटक-उपन्यासादि विधाकेँ ई अपन स्वर्णलेखनीसँ सजबैत रहलाह अछि। हिनक समस्त रचना हिनका मिथिला-मैथिलक लोकजीवनक प्रत्यक्षदर्शी ओ व्याख्याताक रूपमे प्रस्तुत करैत रहलनि अछि। लोकजीवनक यथार्थकेँ यथावत् चित्रित कए मानवीय संवेदनाकेँ उद्बुद्ध करब हिनक रचना सबहक प्रधान विशष्टता रहलनि अछि। प्रतिभा, व्युत्पत्ति ओ अभ्यास ऐ तीनू कारकसँ सम्बलित हिनक रचनावलीमे मिथिला-मैथिलक समस्या ओ तकर समाधानक दिशा भेटैत अछि। वर्त्तमान जीवनमे होइत नित्य नूतन परिवर्त्तनक खण्ड चित्रकेँ यथावत् प्रस्तुत करब हिनक कथाक विषय-वस्तु रहलनि अछि जकरा ई सहज रीतियें प्रस्तुत करैत रहल छथि। मण्डलजीक कथा सभ मिथिलाक माटि-पानिक कथा थिक। हिनक कथा सभमे मिथिलाक ग्राम्य जीवनक आशा-निराशा, सुख-दु:ख, हर्ष-उल्लास आ जीवन-संघर्षक व्याख्या भेटैत अछि। मिथिलाक सामाजिक-आर्थिक ओ राजनीतिक जीवनमे होइत परिवर्त्तन सभकेँ सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक विश्लेषण द्वारा ई अपन कथा सभकेँ प्रवाहमयता, रोचकता ओ विश्वसनीयताक संग प्रस्तुत करबामे सिद्धहस्त कलाकारक रूपमे प्रतिष्ठित भेलाह अछि। हिनक कथासंग्रह अर्द्धांगिनी बीस गोट कथाक समुच्चय थिक। ऐ कथा सभमे नोकरिहाराक जीवनक संत्रास, परिश्रमी कृषकक उल्लास, सांस्कृतिक पावनि-तिहारमे पैसल अन्धविश्वासक प्रति जुगुप्सा, ग्राम्य जीवनमे जातीय व्यवसायक महत्व, क्रमश: टूटैत सम्बन्ध-बन्ध, सामाजिक जीवनक विभिन्न समस्या आदिक सूक्ष्म विश्लेषणपूर्वक लोकमंगलक कामना देखि पड़ैत अछि। युगीन समस्या ओ समस्याक कारण एवं तकर समाधानक प्रति चिन्तनशीलता हिनक वस्तु-विन्यासकेँ प्रेरक-प्रभावकारी बनौने रहलनि अछि जइमे परम्परित कथाधाराक आदर्शोन्मुख यथार्थवादी दृष्टिकोण स्पष्ट रूपेँ प्रस्फुटित देखि पड़ैछ। मिथिलाक लोकजीवनक उत्थानक प्रति सम्वेदनात्मक अभिव्यक्ति कौशलक कारणे मण्डलजीक कथा सभ हिनका आधुनिक कथाकार लोकनिक अग्रिम पंक्तिमे ठाढ़ कऽ देलकनि अछि। ऐ संग्रहक पहिल कथा थिक दोहरी मारि। ऐ कथामे पुरुष पात्र गुलाबक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण भेल अछि। अवकाश प्राप्त प्रोफेसर गुलाब कतोक वर्षसँ डाइबीटीज ओ ब्लड-प्रेसर सदृश बेमारी सभसँ ग्रसत् छथि। गामक घर-घराड़ी पर्यन्त बेचि शहरमे बनाओल मकानमे पति-पत्नी एकाकी रहैत छथि। बेटा-पुतोहु परदेशमे रहैत छन्हि तँए हिनकालोकनिक सुधि लेनिहार कियो नै छन्हि। नागर जीवनक चाकचिक्यसँ सम्मोहित भऽ ई शहरी जीवनमे बसि तँ गेल छथि, मुदा चोरी-डकैती, लूट-पाट, अपहरण, गंदगी आदि समस्यासँ ग्रस्त शहरी ग्राम्य जीवनक सौहार्दपूर्ण वातावरणक प्रति आकर्षण जगैत छन्हि। हद तँ तखन भऽ जाइत अछि जखन पुत्र द्वारा ई समाद भेटैत छन्हि जे पौत्रक मूड़न घरपर नै भऽ कऽ वैष्णो देवीमे होएतनि, जइ लेल हुनकोलोकनिकेँ ओहीठाम एबाक आमंत्रण भेटैत छन्हि आ ओ अपनाकेँ अशक्य बूझैत छथि। ऐ कथाक माध्यमे मण्डलजी साम्प्रतिक जीवनमे उपकल विस्थापनक समस्याक कारणे अवस्था दोषग्रस्त बुजुर्ग पीढ़ीक व्यथाकेँ अभिव्यक्ति प्रदान कएलनि अछि। ऐ समस्याक कारणे नोकरी-चाकरी भेला उत्तर लोक शहरमे बसि ग्राम्यजीवनक सौहार्दसँ तँ वञ्चित होइते छथि संगहि वृद्धावस्थामे जखन परिवारोक लोक हुनक संग छोड़ि दैत छथिन तँ अपनाकेँ वंचित अनुभव करए लगैत छथि। एही समस्याकेँ संग्रहक दोसर कथा “केना जीब” मे सेहो उठाओल गेल अछि। एकर पुरूष पात्र सेहो अवकाशप्राप्त प्रोफेसर छथि। ई बेटाकेँ पढ़ा-लिखा कऽ विदेश पठयबामे सफल तँ होइत छथि मुदा बेटा विदेशी सभ्यता ओ संस्कृतिक रंगमे रमि जाइत छन्हि आ हिनकालोकनिक खोजो-पुछारि नै कऽ पबैत छन्हि। परिणामत: दुनू परानी एकाकी जीवन बितएबाक हेतु बाध्य होइत छथि। एहन स्थितिमे हिनकालोकनिक लग एकमात्र अवलम्ब बचि जाइत छन्हि- जिजीविषा ओ संघर्ष। यएह जिजीविषा ओ संघर्ष करबाक मानसिकता ऐ कथाक युग जीवनक अनुकूल संदेश थिक जे एकरा पूर्व कथासँ भिन्न आ स्तरीय बनबैत अछि। ऐ कथाक वृद्ध दम्पत्ति कखनो हताश आ निराश नै देखि पड़ैत छथि। संग्रहक तेसर कथा ग्राम्य जीवनक परिश्रमी कृषकक गाथा थिक जे अपन परिश्रमक बलेँ अपन भाग्यविधाता बनल अछि। नवान शीर्षक ऐ कथामे मिथिलाक लोक जीवनक विभिन्न खण्डचित्र उपस्थित कएल गेल अछि यथा वृक्ष-लतादिक पहिल फड़ देवताकेँ चढ़ायब, गाए बिआएलापर महादेवकेँ दूधसँ अभिषेक करब आदि। ग्राम्य जीवनमे पसरैत जातीय ओ साम्प्रदायिक विद्वेष दिस सेहो ऐमे संकेत कएल गेल अछि। मुदा ऐ कथामे मिथिलाक लोकजीवनक आर्थिक स्थितिकेँ बदहाल करएबला जइ समस्यापर विशेष दृष्टिनिक्षेप कएल गेल अछि, से थिक बाढ़िक समस्या। ऐ समस्याक कारणे मिथिलाक ग्राम्य जीवनक आर्थिक व्यवस्था अस्त-व्यस्त भऽ जाइत अछि। तथापि ऐ कथाक नायक आधुनिक वैज्ञानिक पद्धति अपनाए नव किस्मक धान उगबय लगैत अछि, तीमन-तरकारीक नगदी फसिल उपजाबय लगैत अछि आ नूतन नस्लक माल-जाल पोसि अपन जीवनकेँ खुशहाल बना लैत अछि, वस्तुत: ऐ वैज्ञानिक पद्धति द्वारा मिथिलाक कृषक जीवनक समुन्नति भऽ सकैत अछि, से संदेश देब कथाकारक उद्देश्य छन्हि। संग्रहक चारिम कथा थिक “तिलासंक्रान्तिक लाइ” ऐ कथामे ग्राम्यजीवनमे पसरल अन्धविश्वासपर प्रहार कएल गेल अछि। तिलासंक्रान्तिक एकटा एहन पर्व थिक जे सोत्साह मिथिलाक घर-घरमे मनाओल जाइत अछि। ऐ दिनसँ सूर्य उत्तरायण भऽ जाइत छथि आ क्रमश: शीत ऋृतु वसन्त आ गृष्म दिस बढ़य लगैत अछि। मिथिलाक प्रशस्त भोजन चूड़ा-दही ऐ दिन गरीबो-गुरबा धरि खाइते अछि। चूड़ा ओ मुरहीक लाइ, तिलबा आदि देवताकेँ चढ़ाय प्रासाद रूपेमे ग्रहण करब ऐ पावनिक कृत्य होइत छैक। शीत ऋृतु रहलाक बादो मिथिलाक ग्राम्यजीवन ऐ पर्वक ओरिआओनमे मास दिन पूर्वहिसँ लागि जाइत अछि। मुदा ऐ पर्वक प्रसाद ग्रहण करबाक हेतु प्रात: स्नान जरूरी बूझल जाइत छैक। मिथिलामे ई अपवाद सेहो पसरल छैक जे ऐ दिन जे कियो भोरे नदी वा पोखरिमे डूब दैत छथि हुनका नदी-देवता तत्काले लाइ धरा दैत छथिन। एही अपवादपर विश्वास कऽ गोपाल नामक एकटा नेना बारहे बजे रातिमे नदीमे डूब देबए चल जाइत अछि आ ठंढसँ ग्रस्त भऽ जाइत अछि। ग्राम्यजीवनक अन्धविश्वासी समाजकेँ ऐ कथाक माध्यमसँ ई संदेश देल गेल अछि जे वस्तुत: ई पावनि प्रकृति-परिवर्त्तनपर आधारित अछि आ ऐमे बिनु पाखंड कएने लोककेँ अपन सामर्थ्यक अनुसार समैपर स्नान करबाक चाही, नै कि अन्धविष्वासमे पड़ि रोगग्रस्त भऽ जएबाक चाही। हरड़ीवालीक उक्ति- “अहाँ जकाँ रातिमे कुकुर घिसियौने छलौं जे भोरे नहा कऽ पाक हएब” अन्धविष्वासक प्रति बेस प्रहार कएलक अछि। कथामे ऐ पावनिक तैयारीमे जुटल लोकजीवन अत्यन्त सुन्दर चित्र भेटैत अछि। पाँचम कथा “भाइक सिनेह” भाइ-भैयारीक आपसी कलह ओ आर्त्यानक प्रेमक कथा थिक। शिष्टदेव आ विचारनाथ दुनू भँइ एक दोसराक प्रति अगाध श्रद्धा, भक्ति ओ बन्धुत्वक भाव रखैत छथि मुदा देयादिनी लोकनिक बीच खट-पटसँ परिवारमे भिन्न-भिनाउज भऽ जाइत छन्हि। भिन्न-भिनाउजक मूलमे अर्थसत्तापर कबजा रहैत अछि। मुदा जखन दुनूक मनमे परस्पर प्रेमक भाव जगैत छन्हि तँ दुनू एकदोसराक दु:ख बँटबाक हेतु तत्पर भऽ जाइत छथि। ऐ कथामे कृषक जीवनमे पारस्परिक सहयोग, सद्भाव ओ शक्तिक अनुकूल श्रमपर आधारित संयुक्त परिवारक उपयोगिताक परम्परित अनुगायन देखि पड़ैछ। संग्रहक छठम कथा “प्रेमी” वस्तुत: प्रेमकथाक रूपमे लिखल गेल अछि मुदा ऐ कथामे रचनाकारक उद्देश्य समाजिक जीवनमे व्याप्त दहेज प्रथाक कुरीतिकेँ समाप्त करबाक संदेश सएह अभिव्यक्त भेल अछि। पक्षधर आ ज्ञानचन्द दू गामक छथि। दुनूमे प्रगाढ़ दोस्ती छन्हि। ज्ञानचन्दक पौत्र परीक्षा देबाक हेतु पक्षधरक गाम अबैत छथिन जतए परीक्षावधि धरि ज्ञानचन्दक पौत्र लोचन आ पक्षधरक पौत्री सुकन्याक बीच संवाद होइत छन्हि आ दुनू परस्परानुरक्त भऽ जाइत छथि। लोचनकेँ विदा करबाक क्रममे सुकन्या ओकरे संग ओकरा घर धरि चलि जाइत अछि जे ओहि गाममे गुलञ्जरक वस्तु भऽ जाइत छैक। विजातीय रहलाक बादो पक्षधर आ ज्ञानचन्द पारस्परिक मैत्रीकेँ सम्बन्धमे बदलि एकटा आदर्शक स्थापना करैत छथि। पक्षधरक उक्ति- “जइ समाजमे मनुक्खक खरीद-बिकरी गाए-महींस, खेत-पथार जकाँ होइए ओइ समाजकेँ पञ्च तत्तवक बनल मनुक्ख कहल जा सकैत अछि? जँ से नै तँ हमर कियो मालिक नै छी। कियो अगुँरी देखाओत तँ ओकर अगुँरी काटि लेबै।” मे दहेज प्रथाक समर्थक ओ प्रेम-विवाह, विजातीय विवाहक अवरोधक तत्वपर प्रहार कएल गेलैक अछि। संग्रहक सातम कथा “बपौती सम्पत्ति” कृषक जीवनमे जातीय व्यवसायक महत्तवक अवधारणापर आधारित अछि। सम्प्रति कृषक-मजदूरक पलायनसँ जे गामक अर्थ-व्यवस्था चरमरा गेल अछि तकरा सुधारबाक हेतु ऐ कथामे चिन्तनक एकटा दिशा भेटैत अछि। कथानायक गुलटेन अपन पिताक सिखाओल व्यवसायसँ नीक जकाँ परिवारक परिपालन करबामे सक्षम अछि। तँए कथाकारक उद्देश्य ग्राम्य स्वावलम्बनकेँ पुन: स्थापित करबाक हेतु मार्गदर्शन करब बुझना जाइत अछि। आठम कथा “डंका” लोकजीवनक अवमूल्यनकेँ रेखांकित करैत अछि। एकर मुख्य पात्र भैयाकाका गामक रक्षा करबाक संकल्प लऽ अपनो गाममे अखड़ाहाक प्रचलन शुरू करैत छथि जइसँ पास-पड़ोसक गाम किंवा जमीन्दारक पहलमान हुनकालोकनिकेँ अबल बूझि प्रताड़ित नै कऽ सकनि। ऐ तरहेँ समस्त समाजक हितकामनाक प्रति हुनका व्यग्रता छन्हि मुदा साम्प्रतिक जीवनमे स्वार्थक प्रवेशसँ ओ ई जानि विचलित भऽ जाइत छथि जे आब गाम-घरक लोकक कल्याणक गप्प तँ दूर, लोक अपनो सर-सम्बन्धीक खोज-पुछारि करबासँ कतरयबाक मूल्यरहित संस्कार पालय लागल अछि। हिनक उक्ति- “माए-बाप, भाए-बहिन सबहक संबंध आ शिष्टाचार ऐ रूपे नष्ट भऽ रहल अछि जे साधनाभूमिकेँ मरूभूमि बनब अनिवार्य छै” मे समस्त कथासार अभिव्यक्त भऽ जाइत अछि। नवम कथा “संगी” शिक्षा जगतमे भेल अद्य:पतनक कथा थिक जइमे स्कूल-कओलेजमे शिक्षाक व्यवसायीकरणक फलस्वरूप सामान्य जनसँ छीनल जाइत शिक्षाक समस्यापर विमर्श भेल अछि, जकर समाधानक हेतु दूटा संगी पारस्परिक परिणयपूर्वक क्रान्तिक शंखनाद करैत देखि पड़ैत छथि। कथाक घटनाक्रम आकस्मिकताक दोषसँ ग्रस्त बुझना जाइछ, जे प्रभावान्वतिकेँ कमजोर करैत अछि। ठकहरबा पूर्णत: राजनीतिक कथा थिक। ऐमे स्वातंत्र्योत्तर भारतमे पुलिस ओ नेतालोकनिक भ्रष्ट चरित्र, मतदानमे गड़बड़ी आदिक चित्रण करैत लोकजगतमे क्रमश: पसरैत भ्रष्टाचारक अतिरेकक चित्रण भेल अछि जइसँ कोनो वस्तुक विश्वासनीयतापर प्रश्नचिन्ह लागि गेल अछि। ई कथा लोकतंत्रमे लोक आ तंत्र दुनूक स्खलनपर सोचबाक हेतु विवश करैत अछि। “अतहतह”मे मिथिलाक वैवाहिक प्रथामे बरियाती पक्ष द्वारा सरियाती पक्षकेँ देखार करबाक हेतु खाद्य वस्तुपर जोर देबाक परिष्कारक रूपमे सरियाती पक्ष द्वारा तकर बदला लेबाक कथा कहल गेल अछि। ऐ कथामे बरियाती पक्षकेँ पानिक संग दवाइ पिआय ओकरा सभकेँ देखार करबाक प्रयास कएल गेल अछि जे लोकसंस्कृतिक प्रतिकूल होएबाक कारणे प्रतीयमान नै भऽ सकल अछि। अवश्ये ऐमे वर पक्षमे शराब पीबि कऽ बरियाती जएबाक आधुनिक प्रचलनक विरुद्ध आक्रोशक अभव्यक्ति भेल अछि। मण्डलजीक ई कथा कन्यादान-वरदानमे दुहू पक्षक सम्मान रक्षाक पारस्परिक दायित्वक प्रति कान्तासम्मित उपदेश दैत अछि। बारहम कथा “अर्द्धांगिनी” ऐ पोथीक नामकरणक आधार बनल अछि। ऐ कथामे अवकाशप्राप्त शिक्षकक अत्यन्त सूक्ष्म मनोविश्लेषण भेल अछि। अपन कमाइक बलें ओ आजीवन अपन पत्नीक दासीसँ आगू बुझबाक हेतु तैयार नै होइत छथि मुदा जखन नोकरी समाप्त भऽ जाइत छन्हि तखन पत्नीक आवयकतापर धियान जाइत छन्हि आ अर्द्धांगिनीक महत्तव बूझि पबैत छथि। लेखक नारीक सेविका स्वरूपकेँ मर्यादित कए ओकरा पुरुषक समानान्तर मूल्य प्रदान करबाक पक्षपाती छथि, जकर अभिव्यक्ति ऐ कथाक लक्ष्य बुझना जाइत अछि। तेरहम कथा थिक “ऑपरेशन” ऐ कथामे मइटुग्गर नेनाक सामाजिक स्थितिपर विमर्श कएल गेल अछि। जखन कोनो नेनाक माय असमए कालकवलित भऽ जाइत छैक, तँ समाज ओकरा अलच्छ कऽ कऽ बूझय लगैत छैक आ ककरो ओकर शारीरिक ओ मानसिक वकासक चिन्ता नै रहैत छैक। मुदा जँ ओहि बच्चाक पिता दोसर विवाह कऽ ओकर प्रतिपालनक हेतु, स्थानापन्न माताक व्यवस्था करैत छथि तँ वएह समाज बेर-बेर ई जनबाक प्रयास करैत अछि जे सतमाय ओकर पालन नीक जकाँ कऽ रहल छैक वा नै। समाजक ई व्यवहार ओकर क्रूर मानसिकताक परिचय दैत अछि जइसँ नेना आ ओकर पिता आहत होएबाक लेल बाध्य होइत छथि। लेखक समाजक ऐ विरूपित मानसिकतापर व्यंग्य करब ऐ कथाक उद्देश्य रखलनि अछि। एही माध्यमसँ अस्पतालक दुर्व्यवस्था तथा प्राइवेट प्रैक्टिसक कारणपर सेहो विमर्श कएल गेल अछि। चौदहम कथा “धर्मनाथ” ढहैत जमींदार परिवारक गाथा थिक। ऐमे दहेज प्रथाक उन्मूलनक हेतु सामाजिक जागरण कथाकारक उद्देश्य बुझना जाइत अछि। एकर नायक धर्मनाथ जमीन्दार परिवारक छथि आ पिताक अमलदारीमे धरि हुनक परिवार देहेजक संतोषक रहल अछि आ खेत बेचि-बेचि कन्यादान करैत अपन कुलाभिमानक रक्षा करैत रहल अछि। मुदा ई मिथ्याभिमान जमीन्दारी उन्मूलनसँ क्षत-विक्षत भऽ गेल छैक आ धर्मनाथ ऐ स्थितिमे नै रहि पबैत छथि जे पुत्रीक विवाह जमीन्दारे परिवारमे करबाक हेतु धन जुटा पाबथि। अन्तत: ओ प्रो. रामरतन सन दहेजविरोधी व्यक्तिक सहायतासँ एकटा कर्मयोगी बालकसँ अपन बेटीक विवाह ठीक कऽ लैत छथि आ मिथ्या प्रतिष्ठाकेँ चुनौती दैत छथि। परिणामत: हुनक पिता अपन कुलाभिमानपर प्रहार होइत देखि मृत्युकेँ प्रात्र कऽ लैत छथि। धिया-पुताक थपड़ी बजा-बजा ई कहब जे- “बाबा मुइलाह- पूरी-जिलेबीक भोज खायब..” वस्तुत: परम्परा आ अन्धविश्वासँ जकड़ल सामाजिक व्यवस्थाक विनाशक प्रति उत्सव थिक जे दहेज प्रथाक उन्मूलनकेँ सकेतित करैत ई ईंगित करैत अछि जे जँ लोक मिथ्याभिमानक त्याग नै करताह आ दहेज देब-लेबकेँ सामाजिक प्रतिष्ठाक मानदंड बनौने रहताह तँ अद्य: पतन अवश्यम्भावी अछि। “सरोजिनी” प्रेमविवाहपर आधारित कथा थिक। नायिका सरोजिनी जमीन्दार घरक कन्या छथि। हिनक भाय हृदयनारायण बिलैतिन कन्यासँ प्रेमविवाह कऽ लेने छथिन। इहो अपन बालसखा रमेशक संग विवाह कऽ लैत छथि। रमेश हिनके नोकर घूरनक शिक्षित पुत्र छथि। आर्थिक ओ सामाजिक दुनू स्तरपर असमान लोकक विजातीय विवाहक समर्थनक ई आधार जे “अपन मालिक हम स्वयं छी। अखन धरि जातिक पहाड़ जे अपना समाजमे बनल अछि, ओकरा मेटाएब। जे समाज भूखलकेँ ने पेट भरैत अछि, ने नाङटकेँ वस्त्र दैत अछि, ने बेघरकेँ घरे। एतए धरि जे मूर्खकेँ पढ़ा नै सकैत अछि, लूटैत इज्जतकेँ बचा नै सकैत अछि, ओहि समाजकेँ विरोध करबाक कोन अधिकार?” उपदेशात्मक ओ असहज तथा सिने जगतक वस्तु जकाँ असहजतासँ प्रभावित बुझना जाइत अछि। तथापि कथाकार जातीय व्यवस्थापर आधारित वैवाहिक पद्धतिकेँ गुण ओ प्रेमपर आधारित करबाक समर्थन कऽ ऐ प्रथामे युगानुरूप परिवर्त्तनक आकांक्षी बुझना जाइत छथि। विश्रृंखलित होइत वैवाहिक व्यवस्थाक प्रति समाजक ध्यान आकृष्ट करब ऐ कथाक उद्देश्य बुझना जाइत अछि। संग्रहक सोलहम कथा सुभद्रा विधवा विवाहक समस्यापर आधारित अछि। दैवयोगसँ सुभद्राक पतिक देहान्त हवाइ दुर्घटनासँ भऽ जाइत छन्हि। ओ अभिशप्त जीवन बितएबाक हेतु बाध्य भऽ जाइत छथि। एकर कारण ई अछि जे ओ जइ जातिसँ अबैत छथि तइमे विधबा विवाहकेँ मान्यता नै छैक। कथाकार रूपलाल बाबा नामक एक गोट गाँधीवादी चरित्रक अवतारणा करैत छथि जे नारी समुत्थानक प्रति समर्पित छथि। हिनक मान्यता छन्हि जे जहिना पत्नीक मुइला उत्तर पतिकेँ दोसर विवाह करबाक अधिकार छैक तहिना पतिक मुइला उत्तर पत्नीयोकेँ दोसर विवाहक अधिकार भेटबाक चाही। रूपलाल बाबा सुभद्राक पिताकेँ मानाय सुशील नामक युवकसँ ओकर विवाह सम्पन्न करबैत छथि। ऐ तरहेँ समाजमे विधवाकेँ मान्यता भेटैत छैक। आदर्शवादी संकल्पनापर आधारित ई कथा वस्तुत: ऐ सामाजिक समस्याक प्रति कथाकारक प्रगतिवादी मूल्यकेँ उद्घाटित करैत अछि। “सोनमा काका” ऐ संग्रहक सतरहम कथा थिक। ई कथा मानव धर्मपर आधारित अछि। एकर प्रधान पात्र सोनमा काका स्वयं पत्नीक बीमारीसँ त्रस्त छथि। ओकर इलाज करा जखन गाम घूमैत छथि तँ रामकिसुन नामक एकटा बिगड़ैल व्यक्तिक मृत्युक समाचार भेटैत छन्हि। ओ व्यसनक चक्रमे पड़ि ततेक िनर्धन भऽ गेल छल जे ओकरा कफनो धरिक उपाय नै छलैक। सोनमा काका समाजक सहायतासँ ओकर संस्कार करबैत छथि आ ओकर अनाथ बालककेँ अपन बेटीक संग विवाह कराय ओकर जीवनकेँ सामान्य बनेबाक प्रयत्न करैत छथि। कथाकार ऐ आदर्श पुरूषक स्थापना कए ई सिद्ध’ करए चाहैत छथि जे जँ समाज चाहय तँ केहनो पैघ समस्याक निदान भऽ सकैत छैक। अठारहम कथा “दोती बियाह” परित्यक्ताक पुनर्विवाहपर आधारित अछि। एकर प्रमुख पुरुष पात्र उमाकान्त छथि जे पचास वर्षक आयुमे पत्नीक देहावसानक कारणे एकाकी जीवन जीबाक हेतु बाध्य छथि। जीवन संगिनीक अभावमे हिनक दिन काटब पहाड़ भऽ गेल छन्हि। दोसर दिस यशोदिया नामक एकटा युवती छथि जनिक पति दिल्लीमे नोकरी करैत छलथिन मुदा शहरी चाकचिक्यमे पड़ि यशोदियाकेँ परित्यक्त कऽ कतहु पड़ा जाइत छथि। निस्सहाय यशोदिया गाम घूरि अबैत अछि आ हरिनारायण नामक एक गोट सम्भ्रान्त व्यक्तिक आश्रममे रहि जीवन-यापन करए लगैत अछि। हरिनारायण उमाकान्तक स्थितिकेँ परखि हुनका यशोदिया संग विवाह करा दैत छथिन जइसँ दुनूकेँ अवलम्ब भेटैत छन्हि आ दूटा उजड़ल परिवार बसि पबैत अछि। ऐ कथाक माध्यमे कथाकारक ई उद्देश्य स्पष्ट होइत छन्हि जे मानव जीवनकेँ सन्तुलित रखबाक हेतु पति-पत्नीमे कियो जँ एकाकी जीवन जीबैत अछि, तँ ओ अनेक प्रकारक मानसिक व्यथामे पड़ल रहैत अछि जकर िनदानक हेतु समतूल युगल बनयबाक हेतु प्रयत्न होएबाक चाही। उनैसम कथा “पड़ाइन” ग्राम्य जीवने पसरल अराजकताक कथा थिक जकरा कारणे बलगर लोक िनर्बलकेँ सता कऽ ओकरा गामसँ उपटयबापर लागल रहैत अछि। ऐ कथाक पात्र चेथरू महाजनी अत्याचार, खेत-पथारमे बेइमानी-शैतानी, चाेरि, बलपूर्वक दोसरक जताति नष्ट करब आ माय-बहिनिक इज्जतक संग खेलवाड़ करब आदिसँ त्रस्त भऽ गाम छोड़ि दैत अछि आ नेपाल जा कऽ बसि जाइत अछि। ओतय परिश्रमपूर्वक अर्जित धनसँ सम्पत्तिशाली बनि नीक जकाँ गुजर करऽ लगैत अछि। ऐ कथामे कथाकारक उद्देश्य ग्राम जीवनक किछु समस्या सभकेँ इंगित करब बुझना जाइत अछि मुदा आधुनिक परिप्रेक्ष्यमे ऐमे स्वाभाविकताक अभाव बुझना जाइत अछि। “कतौ ने” कथा संग्रहक अन्तिम कथा थिक जे वस्तुत: यात्रा-वृत्तान्त थिक। ऐमे जनकपुर यात्राक वर्णन आएल अछि। गामक एकटा टोली जनकपुरमे विवाह पंचमीक मेला देखबाक हेतु प्रस्थान करैत अछि मुदा विवाह पंचमी दिन ई लोकनि धनुषा दर्शन करबाक हेतु जाइत छथि आ ओतए गाड़ी खराब भऽ जएबाक कारणे विवाह पंचमीक रातिमे पुन: जनकपुर घुमि नै पबैत छथि जइसँ हुनकालोकनिकेँ जनकपुरक कार्यक्रम देखबाक अवसर नै भेटि पबैत छन्हि। अन्तत: हारि-थाकि कऽ सभ सोचैत छथि जे कत्त एलौं तँ कत्तौ ने। दुर्योगवशात् मनोरथपूर्त्तिमे बाधा होएबाक ऐ कथामे वस्तुत: जनकपुर यात्राक एक गोट मनोरम वृत्तान्त भेटैत अछि। ऐ तरहेँ अर्द्धांगिनी कथा संग्रह मिथिलाक ग्राम्य जीवनक विभिन्न आयाम ओ समस्या तथा तकर समाधान सबहक आदर्शोन्मुख यथार्थवादी व्याख्या थिक। ऐ संग्रहक कथा सभ वर्णन-प्रधान देखि पड़ैत अछि। कथाकारक शैली एहन छन्हि जे ओ कोनो घटनाकेँ प्रस्तुत करबासँ पूर्व ओकर पूर्ववीठिकाकेँ ततेक सघन कऽ दैत छथि जे पाठक तइमे तल्लीन भऽ जाइत छथि। ऐ प्रकारक वर्णन-विन्यास हिनक औपन्यासिक वृत्तिकेँ स्पष्ट करैत अछि जइमे वर्णनक हेतु पयाप्त अवसर रहैत छैक। मनोविश्लेषण मण्डलजीक कथा सबहक अन्यतम विशिष्टता थिकनि। ई जइ कोनो पात्रकेँ प्रस्तुत करैत छथि तकर अन्तस्तलमे प्रेवेश कए ओकर भावराशिकेँ अभिव्यक्त कऽ दैत छथि जइसँ पात्रक चरित्र स्वत: स्फुट होमय लगैत अछि। उदाहरणार्थ “बपौती सम्पत्ति” कथामे गुलटेनक मानसिक स्थितिकेँ अभिव्यक्त करैत ई पाँती द्रष्टव्य अछि- “मनमे उठलै पुरने कपड़ा जकाँ परिवारो होइए। जहिना पुरना कपड़ाकेँ एकठाम फाटल सीने दोसरठाम मसकि जाइत अछि, तहिना परिवारोक काजक अछि। एकटा पुराउ दोसर आबि जाएत। मुदा चिन्ता आगू मुँहेँ नै ससरि रुकि गेलै। चिन्ताक अॅटकिते मनमे खुशी भेलै। अपनापर ग्लानि भेलै जे जइ धरतीपर बसल परिवारमे जन्म लेबाक सेहन्ता देवी-देवताकेँ होइत छन्हि ओकरा हम मायाजाल किअए बुझैत छी। ई दुनियाँ ककरा लेल छै? ककरो कहने दुनियाँ असत्य भऽ जाएत। ई दुनियाँ उपयोग करैक छैक नै कि उपभोग करैक।” मण्डलजी कथाक भाषामे मैथिलीक गमैया बोली-वाणीक सहज स्वरूप अभिव्यक्त भेल अछि। ई पात्रानुरूप भाषाक प्रयोग कएलनि अछि जइसँ प्रत्येक पात्रक बौद्धिक ओ सामाजिक स्थिति स्पष्ट होइत चल जाइत अछि। हिनक कथा सभमे कथाकारक भाषा सेहो मैथिलीक लोकजगतक भाषाहिक अनुगमन करैत अछि जइमे सहजता अछि। कनेको कृत्रिम प्रयोगसँ ई बचैत रहल छथि। हिनक भाषामे तद्भव ओ देशज शब्दक प्रचुर प्रयोग भेल अछि। युग्म शब्दक प्रयोग हिनक भाषाकेँ लालित्य प्रदान करबामे आ ओकर प्रवाहमयतामे सहायक रहलनि अछि। उदाहरणक हेतु माल-जाल, लेब-देब, दोकान-दौरी, चट्टी-बट्टी, ताड़ी-दारू, छहर-महर, चोरी-डकैती, बाल-बोध, बेटा-पुतोहु, भोज-काज, अन्हर-बिहाड़ि, दार-मदार, सुक-पाक, भुखल-दुखल, चीज-बौस, घुसका-फुसका आदिकेँ देखल जा सकैछ। मण्डलजी कथा भाषाक ई अन्यतम विशिष्टता थिक जे ई कोनो स्थितिकेँ पाठकक समक्ष अभिव्यक्त करबाक हेतु चमत्कारिक उपमानक प्रयोग करैत छथि जइसँ वस्तुस्थितिक स्पष्ट चित्र पाठकक सोझाँ आबि जाइत अछि यथा- “जहिना खढ़ाएल खेतमे हरबाहकेँ हर जोतब भरिगर बूझि पड़ैत छैक तहिना सुशीलक मन समस्याक बोनाएल रूप देखलक। जहिना पहाड़सँ निकलि अनवरत गतिसँ चलि नदी समुद्रमे जाय मिलैत अछि तहिना ने टटघरक ज्ञान उड़ि कऽ सर्वोच्च ज्ञानक समुद्रमे मिलत।” आदि। एतावता कहल जा सकैछ जे मण्डलजीक कथा वर्णनक दृष्टिञे मिथिलाक ग्रामजीवनक यथार्थवादी चित्र, घटनाक दृष्टिञे आदर्शक प्रति अभिभूत, सूक्ष्म मनोविश्लेषणक प्रति प्रतिबद्ध तथा उद्देश्यक दृष्टिञे लोक मंगलकारी अछि। मैथिलीक आधुनिक कथा लेखन हिनक रचना सभसँ सम्बलित भेल अछि आ एकर समाजोपयोगी तत्व सभ अनन्त काल धरि मिथिलाक लोकजीवनकेँ प्रेरित-प्रभावित करैत रहत। मैथिली बाललोककथा : स्थिति आ अपेक्षा मैथिली बाललोककथा मैथिली लोकसाहित्यक एक गोट विशिष्ट प्रभेद थिक। लोक साहित्यक अन्यान्ये विधा जकाँ इहो विधा अदौसँ लोककंठमे विराजमान रहला अछि। तथा पुस्त दर पुस्त कण्ठान्तरित होइत रहला अछि। एहेन लोककथा जेे अपन सहजता, सुबोधता ओ मनोरंजकताक संगहि नेनालोकनिक मनोमस्तिष्ककेँ प्रेरित-प्रभावित करबामे सक्षम होइछ, बाललोककथाक अन्तर्गत परिगणित कएल जा सकैछ। एहेन लोककथा सभ सामान्यत: नाति दीर्घ आकारक होइत अछि आ अपन रोचकताक कारणेँ सुननिहार नेनालोकनिमे उत्सुकता बनौने रहैत अछि। अपन बाल आ किशोरावस्थामे नेनालोकनि अपन दादी-नानी ओ परिवारक वएस्कलोकनिसँ एहेन कथाक श्रवण करैत रहलाह अछि जइसँ हुनकालोकनिक मनोरंजन तँ होइते रहल अछि, संगहि हुनकालोकनिमे बीरता, बुद्धिमत्ता, सांस्कृतिक चैतन्य आदिक प्रादुर्भावक संगहि सामािजक जगतक विधि-निषेधक ज्ञानक विकास होइत रहलनि अछि। पूणत: श्रुत साहित्य होएबाक कारणे मैथिली लोकसाहित्यक इहो विधा युगीन संक्रमणक प्रभावें क्रमश: विलुप्तप्राय भेल जा रहल अछि। आब ने धिया-पुतालोकनिकेँ मनोरंजनक लेल दादी-नानीक कोड़मे बैस कथा सुनबाक विवशता रहलनि अछि आ ने आधुनिक दादी-नानीये लोकनि ऐ विधाक प्रति आत्मीयता ओ प्रतिबद्धताकेँ जोगा कऽ राखि सकलीह अछि। तथापि किदु अग्रसोची विद्वानलोकनि अछि जइसँ एकरा सबहक नमूनाक निदर्शन भेट सकैत अछि। प्रसिद्ध साहित्येतिहासकार डाॅ. जयकान्त मिश्र “एन इन्ट्रोडक्सन टू द फॉक लिटरेचर आॅफ मिथिला” मे मिथिलाक लोककथाकेँ आठ श्रेणीमे विभाजित कएने छथि- (1) व्रत कथा (2) परी किंवा प्रेम कथा (3) भूत-प्रेत ओ डाइन-जोगिनिक कथा (4) उपदेशात्मक ओ तथ्यात्मक कथा (5) बुद्धि-विनोद कथा (6) बालकथा (7) उपासकलोकनिक कथा अेा (8) स्थान सम्बन्धी कथा। एेमे व्रत कथा महिलालोकनिक व्रतसँ सम्बन्धित कथा थिक जे मिथिल स्त्रीगणक सांस्कृतिक जीवनक प्रमुख अंग थिक यथा- जितिया व्रत कथा, कातिक व्रत कथा, छठिक कथा, हरिसों व्रत कथा, सपता-विपताक कथा, वट-साहित्री व्रत कथा, मधुश्रावणी व्रत कथा आदि। मुदा ई व्रत कथा सभ व्रत-विशेषक प्रति आस्था जगएबाक उद्देश्यपरक थिक एवं नेनालोकनिक हेतु उपादेय नै रहबाक कारणे एकरा सभकेँ बाललोककथा मध्य परिभाषित नै कएल जा सकैछ। परीकथा अो प्रेमकथामे अद्भुत चमत्कार, अलौकिकता, प्रबल पराक्रम, रहस्य-रोमांच आदिक वर्णन रहैत अछि तथा नायक-नायिकाक पारस्परिक राग ओ अन्तत: अनेक विध्न-बाधाकेँ पार करैत मिलनक वर्णन रहैत अछि। ऐ कोटिक कथा सभमे औत्सुक्यक िनर्वाह रहैत अछि आ ई सभ श्रोताकेँ बन्हने रहैत अछि। अद्भुत घटनासँ सम्बद्ध एहेन कथा सभ वयस्कलोकनिक संगहि बालवृन्दकेँ सेहो अह्लादक लगैत छन्हि। तँए ऐ कोटिक कथा सभ बाललोककथा मध्य परिगणित कएल जा सकैछ। भूत-प्रेत ओ डाइन-जाेगिनिक कथा सेहो अद्भुत चमत्कारसँ भल रहैत अछि जैमे भूत-प्रेतक विविध रूप-परिवर्त्तन तथा डाइन-जोगिनिक अपूर्व कृत्य सबहक वर्णन रहैत अछि। अहू कोटिक कथाकेँ शिशुलोकनि अत्यन्त तन्मयता पूर्वक सुनैत छथि मुदा अपन भ्यावहताक कारणे ऐ कोटिक कथा नेनाकेँ डेरबुक बना दैत छै। तथापि ऐ कोटिक कथाकेँ सेहो बाललोककथा मध्य परिगणित कएल जा सकैछ। उपदेशात्मक ओ तथ्यात्मक कथा सभमे दैन्दिन जीवनक साक्षात अनुभूत सत्यक वर्णन रहैछ जकर श्रवणसँ नेनालोकनिक ज्ञानक विस्तार होइत छन्हि। एहेन कथा सभकेँ नीति-कथा सेहो कहल जा सकैछ। ऐ कोटिक अनेक बाललोककथा मिथिलाक लोकजीवनमे प्रचलित रहल अछि। बुद्धि-िवनोदक कथा सभ बहुधा हास्य-विनोद ओ चातुर्यसँ सम्बद्ध रहैछ यथा-गोनू झाक कथा, अकबर-बीरबलक कथा आदि। एकरा सभकेँ बाललोककथा मध्य परिगणित कएल जा सकैछ। पशु-पक्षी, चिड़ै-चुनमुन्नी आदिकेँ पात्र बनाए नेना-भुटकाक मनोंरजन ओ ज्ञानवर्द्धनक उद्देश्यपरक बाललोकथा सभ वस्तुत: केवल शिशुएलोकनिक हेतु होइत अछि। एहन कथा सबहक विस्तार अपेक्षाकृत छोट रहैत छै। उपासकलोकनि ओ स्थान विशेषसँ सम्बद्ध दन्तकथा सभकेँ बाललोककथा मध्य परिगणित नै कएल जा सकैछ। डॉ. जयकान्त मिश्रक उक्त पोथीक मिथिलाक प्रत्येक कोटिक लोककथाक उदाहरण स्वरूप ओकरा सबहक संक्षिप्त कथासार कहल गेल अछि। ऐ क्रममे तिलमा जनि कुमारी, आबऽ आबऽ कचनारा, पनसज्जा कुमारि, हाहापुरक कोठा, सोने रूपे काँित, डाला सन पान कोहा सन सुपारी, बेलवती कुमरि, मिरचाइबत्ती कुमरि, हँसराजक घोड़ा, उड़नखटोला, गिरिमोहर बालाक कथा, मयूर बालक बालकक कथा : भैया हओ भैया! एभे माछ खाइहऽ ओही माछ जुनि खइह, हंसावती कुमरि, भाँकी कुकुर, फुलवन्ती कुमरि, विखलाहा मेटल नै जाय, घण्टीबला कथा, लालबला कथा, किछु करनी किछु कर्मफल, चन्दन गछियाक कथा, चारि इयारक कथा आदि प्रेम कथा िकंवा परी कथा तथा शिशु कथाक रूपमे मुसरियाक कथा, फुद्दीरानीक कथा, बित्तू मियाँक कथा, फोकचक कथा, ढिल्ली रानीक कथा, क्रौन्चक कथा, गिरगिटियाक कथा, की खाओं की लय परदेश जाओँ, बगियाबला कथा, दरिद्रछिम्मरिक कथा, हरमजदबाक कथा, पेटू खबासक कथा, ठेठपाल झाक कथा आदिक संक्षिप्त वस्तुपरक परिचए प्रस्तुत भेल अछि। ऐ प्रकारक वस्तुसँ मैथिली बाललोककथाक स्वरूपक अभिज्ञान तँ होइछ मुदा से मैथिली बाललोककथाक विवेचनक दृष्टिये भलहिं महत्वपूर्ण अछि, ओकर संकलन-प्रकाशनक दृष्टिये केबल मार्गप्रदर्शकेटा कहल जा सकैछ। ऐ प्रकारक स्थिति बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना द्वारा प्रकाशित लोककथा कोशक मैथिली भागमे प्रदत्त एकतीस गोट बाललोककथाक कथासारक सेहो अछि। मैथिली बाललोककथाक संकलन-प्रकाशनक दृष्टिये जे महत्वपूर्ण कार्य सभ होइत रहल अछि तकरा सबहक संक्षिप्त परिचए एतऽ प्रस्तुत कएल जाइछ। एगो रहथि राजा- मैथिली बाललोककथाक अकृत्रिम संग्रहक दृष्टिए निरक्षर किसुन कामति द्वारा कहल ओ प्रो. हंसराज द्वारा सम्पादित संग्रह 'एगो रहथि राजा' अत्यन्त महत्वपूर्ण अछि, कारण ऐमे खिस्सा कहनिहारक भाषाकेँ यथावत् रखबाक प्रयास भेल अछि। ऐ संग्रहमे तीन गोट कथा अन्तर्भुक्त अछि क्रमश: एक लालसँ सात लाल, तूरक घोड़ा आ दलिदरा जोग। एक लालसँ सात लाल दीर्घ कथा थिक जइमे चारि गोट उपकथा सेहो अन्तर्भुक्त अछि। संग्रहक तीनू कथा उत्सुकता अो कुतूहलसँ युक्त मनोरंजक ओ ज्ञानवर्द्धक प्रकृतिक बाललोककथा थिक। बाल- प्रसून किरणजीक बाल प्रसून कथासंग्रह यद्यपि नेना सभकेँ धियानमे राखि ऐतिहासिक महाभारतीय कथानकक पुन: व्याख्या थिक। शैली शास्त्रीय होइतो अपन उद्देश्यक कारणे एकरो बाललाेककथाक संग्रह मानल जा सकैछ। कथा-कहानी ई डाॅ. शैलेन्द्र माेहन झा द्वारा संग्रहीत चौदह गोट बाल-लोककथाक संग्रह थिक। एकर कथा सभ नातिदीर्घ आकारक अछि। अधिकांश कथामे पशु-पक्षीकेँ आधार बना कऽ कोनो ने कोनो नैतिक शिक्षा प्रदान करब कथा सबहक उद्देश्य अछि जे बालमनकेँ प्रभावित करैबला अछि। लोक जगतक सुख-दु:ख, आशा-निराशा, भावानुभाव, हर्ष-विषाद, आचार-व्यवहार आदिक सहज ओ अकृत्रिम अभिव्यंजनाक कारणे मैथिली बाल-लोककथाक संग्रहक दृष्टिए ई नियामक ओ मार्गदर्शी संग्रह सिद्ध भेल। ऐ संग्रहमे किछु कथा हास्य-विनोदपरक तँ किछु लोकजीवनक अकृत्रिम झाँकीसँ सम्बद्ध अछि। एकर भाषा सेहो नेना-भुटकाक हेतुओ सरल, सहज ओ औत्सुक्यकेँ जगबैबला अछि। मैथिली लोककथा मैथिली लोककथाक सर्वाधिक प्रशस्त प्रकाशित संचयनक दृष्टिए श्री रामलोचन ठाकुरक मैथिली लोककथा अद्वितीय अछि। एकर प्रथम प्रकाशित संस्करण 1983 ईं.मे भेल जाइमे अठारह गोट कथा मात्र संकलित छलैक मुदा 2006 मे भेल द्वितीय परिवर्द्धित संस्करणमे ठीक दुन्ना अर्थात छत्तीस गोट कथा संग्रहीत छैक। लेखकक कहब छन्हि जे ओ ई कथा सभ अपन नानी, माँ आ लालमामासँ सूनि क' संग्रहीत केने छलाह तँए एकर सबहक अकृत्रिमता असंदिग्ध छैक। लेखक कथाभाषाकेँ सेहो सहजता प्रदान केने छथि तथापि कतौ-कतौ शास्त्रीयताक प्रभाव अवश्ये गछारने छन्हि। एकर अधिकांश कथा अपन रोचकताक कारणें बाल-लोककथा मध्य परिगणित कएल जा सकैछ। अष्टदल मैिथली लोककथाक ऐ संग्रहक संग्रहकर्त्ता छथि डॉ. श्री अमरनाथ झा। ऐमे आठ गोट लोककथा क्रमश: नीक-बेजाए, पुनर्जन्मक कथा, चरबाहक न्याय, सन्तोषी ओ हाहुति, हंसराज, मोहन कमार, चक्रवर्ती राजा ओ झोड़ाक माहात्म्य संकलित अछि। कथा सभ पैघ-पैघ अछि तथा शिष्ट साहित्यिक भाषाक प्रयोगक कारणे कृत्रिम प्रकृतिक भ' गेल अछि। तथापि ऐ संग्रहक मोहन कमार ओ झोड़ाक माहात्म्य कथा बाल-लोककथा मध्य परिभाषित हेबाक योग्य नीक नमूना थिक। अवश्ये ई दुनू बाल-लोककथाक किंचित परिवर्त्तनक संग पूर्व वर्णित मैथिली लोककथामे सेहो अछि। एकटा छला गोनू झा- धूर्त्त शिरोमणि गोनू झा मिथिलाक हास्य-विनोदपरक कतोक लोक कथाक नायक छथि। हिनक चरित्रपर आधारित कथा सबहक संग्रह अनेक संकलनकर्त्ता लोकनि करैत ऐलाह अछि जइमे हिन्दीमे डॉ. वीरेन्द्र झाक संग्रह राजकमल प्रकाशन (पटना, नई दिल्ली) सँ प्रकाशित भ' बेस प्रचलित भेल। एहने चौबीस गोट कथा सभकेँ मैथिलीमे डाॅ. विभूति आनन्द ’एकटा छला गोनू झा' नामे प्रकाशित करौलनि। बुद्धि ओ विवेकक प्रयोग, मनोरंजकता ओ सहजताक कारणे ई सभ मिथिलाक बाललोककथाक उत्कृष्ट दृष्टान्त तँ अछि मुदा बालमनक निश्छलता एकर शिक्षण-पद्धतिसँ कालुष्ये दिस जा सकैत छैक। कृत्रिम भाषा-प्रयोगक कारणे एकटा छला गोनू झा लोककथाक मर्यादाक पालन नै क' सकल अछि, तेहन प्रतीत होइत अछि। मैथिलीमे ऐ कोटिक कथाक अन्य संग्रह थिक श्री गोपीकान्त झा 'उमापति' द्वारा सम्पादित संकलन 'गोनू झाक चटनी' जे लोक जगतमे मैथिलीक प्रसारक दृष्टये महत्वपूर्ण मानल जा सकैछ। प्रेत कथा- ई हंसराज रचित छओ गोट प्रेतकथा संग्रह थिक। एकर अधिकांश कथा शिष्ट साहित्यक भाषासँ सम्पन्न अछि तथापि प्रेत विवाह पद्धति आ यावत् पढ़बह रूद्रकेँ अवश्ये बाललोक कथा मध्य परिगणित कएल जा सकैछ। कुरूक्षेत्रम् अन्तर्मनक ई पोथी श्री गजेन्द्र ठाकुरक विभिन्न विधाक रचनाक संकलन थिक। एकर सातम खंडमे बालकथाक रूपमे तेइस गोट कथा संग्रहीत अछि। ऐ कथा सभमे अधिकांश मिथिलाक लोकनायक सबहक कथा िथक तथापि अाधा दर्जनक लगभग कथाकेँ बाल-लोककथा कहल जा सकैछ, यद्यपि ओकरो सबहक भाषा पूर्णत: शास्त्रीय प्रकृतिक अछि। बाललोक कथाक संकलनक क्षेत्रमे चलैत प्रयास सबहक नमूनाक रूपमे एकरा महत्वपूर्ण कहल जा सकैछ। क्षमाक जीत महिलालोकनि द्वारा बाललोकथाकेँ संरक्षित करबाक प्रयास क्रमश: कण्ठसँ अक्षर दिस प्रवहमान भ' रहल अछि, से ऐ पोथीसँ भान होइत अछि। एकर लेखिका थिकीह श्रीमती पुष्पा कुमारी। ऐमे कएकटा स्रोतसँ उपलब्ध पाँच गोट कथा संग्रहीत अछि जकरा सभकेँ बाललोककथा मध्य परिगणित कएल जा सकैछ। एकरो भाषापर शास्त्रीय भाषाक प्रभाव अत्यधिक देखि पड़ैछ। पिलपिलहा गाछ हालहिमे डॉ. श्री मुरलीधर झाक बाल कथा संग्रह पिलपिलहा गाछ प्रकाशित भेलनि अछि जइमे एक्कैस गोट कथा संग्रहीत कएल गेल अछि। ऐमे पशु-पक्षीक कृत्यपर आधारित दुष्ट खिखिर, सिनेहक सिन्दूर तथा धूर्त्ततापर आधारित ठक्क कथा बाललोककथाक दृष्टान्त स्वरूप अछि। एकरा सबहक कथाभाषा पूर्णत: परिमार्जित साहित्यिक भाषा थिक। बाललोक कथाक संकलन-प्रकाशनक दिशामे मैथिली साहित्यकार लोकनिक उपर्युक्त प्रयास सभ श्लाध्य अछि मुदा एतबे धरिकेँ संतोषप्रद नै मानल जा सकैछ। ऐ हेतु क्षेत्र-कार्य करबाक आवश्यकता छैक जै दिस अनुसंधित्सुलोकनि प्रयास क' सकैत छथि आ मैथिलीक ऐ विधाकेँ जिया क' राखि सकैत छथि, ओकर मौलिकताक क्षरणकेँ रोकि सकैत छथि। अन्यान्य भाषामे उपलब्ध लोककथा सबहक मैथिली रूपान्तरणक माध्यमे सेहो कतोक बाललोक कथा मैथिलीक ऐ विधाक अभिवृद्धिमे सहायक भेल अछि आ एकरो आयाम पर्याप्त छैक। ऐ दिशामे कृत प्रयास सभमे पं. श्री गोविन्द झाक 'अओ बाबा : की बौआ, डा. इन्द्रकान्त झाक िवश्व प्रसिद्ध मैिथली लोककथा, डॉ. योगानन्द झाक 'बिहारक लोककथा', विजयनाथ ठाकुरक लोककथा आदि लोककथा संग्रह उल्लेखनीय अछि। मैथिली पत्र-पत्रिका सेहो बाललोककथाक प्रकाशन यदा-कदा करैत रहला अछि। एम्हर ऋृषि वशिष्ठ कृत 'कोढ़िया घर स्वाहा' शीर्षकसँ मात्र एक गोट बाललोककथाक प्रकाशन पुस्तकाकार कराओल गेल अछि जइमे विद्यापतिक अलस कथाकेँ उत्सक रूपमे ल' बाललोक कथा शैलीक प्रति सचेष्टता देख पड़ैछ। ई ऐ दिशामे एकटा अभिनव प्रयास आ दूरदृष्टिपूर्ण संकेत बुझना जाइछ। नेनालोकनिमे अपन भाषाक प्रति अनुराग जगाएबाक दृष्टिये सम्प्रति बाललोककथाकेँ चित्रकथाक माध्यमे प्रस्तुत करबाक दिस किछु अग्रसोची साहित्यकारक धियान गेलनि अछि। ऐ दिशामे संभवत: पुस्तकाकार प्रथम प्रयास भेल अछि श्रीमती प्रीति ठाकुर द्वारा, जनिक 'गोनू झा आ आन मैथिली चित्रकथा', श्रुति प्रकाशन दिल्ली द्वारा भव्य साज-सज्जाक संग प्रकाशित भेल अछि। ऐमे गोनू झासँ सम्बद्ध नओ गोट हास्य-विनोदपरक कथा तथा मिथिलाक किछु लोककथा यथा रेशमा-चुहड़मल, नैका-बनिजारा, भगत ज्योति पँजियार, महुआ घटबािरन, राजा सलहेस, छैछन महाराज ओ कालिदासक कथाकेँ चित्रावली द्वारा प्रस्तुत कएल गेल अछि। मैथिली बाललोक कथा प्रकाशनकेँ युगानुरूप अग्रनीत करबाक दिशामे श्रीमती ठाकुरक ई प्रयास अन्यतम कहल जा सकैछ। आब मैथिली बाललोक कथाक किछु बैशिष्ट्यपर विचार कएल जाए। मैथिली बाललोककथामे राजा, राजकुमार, मंत्री, साधु, ब्राह्मण, नौका, सेठ, तेली, धोबि, मालिन, रानी आदि विभिन्न वर्गक पात्र, सियार, सपनौर, हाथी, धोड़ा, साप, गाए, बाध, सिंह, पशु पात्र, सुग्गा, कौआ, मैना, फुद्दी, मुर्गा आदि पक्षी पात्र, विध-िवधाता, शंकर-पार्वती, डाइन-जोगिन, परी, भूत-प्रेत, देवी-देवता आदि अलौकिक पात्र ओ हुनकालोकनिक कृत्य समाहित रहैत अछि। ओ लोकनि पारस्परिक ओ मनुष्यक संग व्यवहार ओहिना करैत छथि, बोलीयो तहिना बजैत छथि जेना मानव-मात्र। अतिमानवीय पात्रलोकनि असंभवो कार्यकेँ संभव करैत देख पड़ै छथि आ अलौकिक क्षमतासँ पूर्ण देखल जाइत छथि। हिनका लोकनिक कार्य-व्यापार नेनालोकनिकेँ चमत्कृत ओ आश्चर्यचकित क' दैत छन्हि। ऐसँ मनोरंजनक संगहि नेनालोकनिमे अद्भुत पराक्रम प्रदर्शित करबाक भावनाक उदय होइत छन्हि तथा कथाक प्रति हुनका लोकनिक उत्सुकता बनल रहैत छन्हि। मैथिली बाललोककथा सामान्यत: सुखान्त होइत अछि। ऐमे नायक बहुधा विभिन्न विघ्न-बाधाकेँ पार क' अपन अभीष्टक सिद्धिमे सफल देखाओल जाइत छथि जइसँ नेना लोकनिक मन उत्फुल्ल भ' उठैत छन्हि आ परिश्रम ओ प्रयास द्वारा कोनो प्रकारक अभीष्ट प्राप्त कएल जा सकैत अछि, से भावना हुनका लोकनिक मनमे जमैत जाइत छन्हि। मैथिली बाल लोककथा सभमे लोकमानसक उदार ओ व्यापक चित्र-वृत्तिक निदर्शन भेटैत अछि। परदु:ख कातरता ओ सहानुभूति, सहिष्णुता अेा वीरत्व तथा जीवमात्रक प्रति प्रेम भावना बाल लोककथाक अन्यतम विशिष्टता थिक जइमे नेनालोकनिक मनपर धनात्मक प्रभाव पड़ैत छन्हि। मैथिली बाल लोककथा सभमे धटनाक वर्णन अत्यन्त सहजताक संग कएल रहैत अछि। स्वभावत: कोनो घटनाकेँ बालमन स्वभाविक रूपसँ ग्रहण क' लैत अछि। ऐ प्रकारक लोककथा सभमे औत्सुक्य जगैबाक अद्भुत झमता रहैत छैक। जइसँ नेनालोकनि एहन कथा अत्यन्त मनोयोगसँ सुनैत छथि आ बेर-बेर सुनबाक हेतु लुसफुसाइत रहैत छथि। एतए धरि जे कथा श्रवणक क्रममे हुनकालोकनिक निन्नो अलोपित भ' जाइत छन्हि। ओ सभ ऐ प्रकारक कथामे तेना भ' क' रमि जाइत छथि जे हुनकालोकनिक सुधि-बुधि पर्यन्त हेरा जाइत छन्हि। मैथिली बाललोककथा वस्तुत: लोकमानसक अभिव्यक्ति थिक। तँए ऐमे उड़नखटोला ओ उड़ैबला घोड़ाक कल्पना कएल गेल अछि, पशु-पक्षीकेँ राजकुमारीक रूपमे परिवर्तित होइत देखाअोल गेल अछि, पक्षीकेँ मारि देलासँ राक्षसक मरि जाएबाक कल्पना कएल गेल अछि, देवनदी गंगा ओ अन्यान्यो देवता-पितरक प्रति आस्था देखाओल गेल अछि, विध-विधाता द्वारा ककरोपर असीम कृपा करबाक प्रवृत्तिक वर्णन भेल अछि, भूत-प्रेत अद्भुत कृत्यक कल्पना कएल गेल अछि। आधुनिकताक कसौटीपर एहन कथा सभमे अतिरंजनाक पराकाष्ठामे देख पड़ैछ मुदा लोकमानस एहन कथ्यक प्रति आस्थावान अछि आ एहन वर्णन सभसँ कनेको असहजताक अनुभव नै करैछ। आकारक दृष्टिये मैथिली बाललोककथाक दुइ गोट प्रकार देख पड़ैत अछि- दीर्घ आ लघु। दीर्घ कथा सभमे एके कथामे अनेक उपकथा सभ अन्तर्मुक्त रहैत अछि मुदा लघु आकारक बाल लोककथामे एकेटा छोट घटनापर आधारित विवरण रहैत अछि। मैथिली बाललोककथा सामान्यत: गद्यात्मक होइत अछि मुदा अनेक कथामे चम्पू शैलीक आश्रय लैत पद्योग समाहार बीच-बीचमे देख पड़ैत अछि यथा- एकटा बाललोककथामे जखन एकटा मृतक स्त्रीक सारापर गाछ जनमि जाइत छैक आ ओकर पुष्पपर मुग्ध भ' ओकर ससुर ओ फूल तोड़ए चाहैत छैक तँ गाछतरसँ आवाज अबैत छैक- “ससुरजी, ससुरजी डारि जुनि छूबू, पात जुनि छूबू भैया मारलनि, कूड़ खेत गाड़लनि चुनरी रंगौलनि, बहु पहिरौलनि हमरा देल वनवास डारि-पात लागू अकास।” एहिना अनेक मैथिली बाललोककथाक पद्य कथ्य दोसरो भाषामे यथा हिन्दी, भोजपुरी, बंगला आदिमे सेहो देख पड़ैछ, उदाहरणार्थ- “आजा माजा कान में समा जा।” “की खाओं की पियओँ, की लए परदेस जाओँ। आदि।” एेठाम ई तथ्य ज्ञातव्य अछि जे जै बाललोककथामे जतेक लहरदार भाषाक प्रयोग रहैत अछि, से ततबे आकर्षक होइत अछि। मैथिली बाललोककथाक भाषा अत्यन्त सरल, बोधगम्य ओ प्रवाहपूर्ण होइत अछि। एकर वाक्य संरचना अत्यन्त छोट-छोट रहैत छैक तँए जटिल ओ मिश्रवाक्यसँ ऐमे परहेज रहैत छैक। एकर पात्रक भाषा जकरा आलाप भाग कहल जा सकैछ सर्वथा लोकमुखी होइत अछि जइमे कर्तृवाच्य ओ वक्ताक अवक्र शब्दावलीक प्रयोग देख पड़ैछ। एकर कथातत्वकेँ आगू बढ़ौनिहार भाषाकेँ आख्यान भाषा कहल जा सकैछ। ई भाषा अत्यन्त परिवर्त्तनशील रहैत अछि। लोककथाक ऐ भाषापर कहनिहारक वएस, परिवेश, शिक्षा, लिंग आदिक प्रभाव देख पड़ैछ। लोककथा जखन श्रुत साहित्यसँ लिखित साहित्यमे परिणत होइछ, तखन एके कथाक रूप बहुलता, लिखित भाषाक रूप आदिमे संकलन कर्त्ताक भाषाक पर्याप्त प्रभाव पड़ैत छैक। यएह कारण थिकैक जे कथा समानो रहलापर ओकर स्वरूप विभिन्न लेखक-सम्पादक भिन्न रूपमे प्रस्तुत करैत देखल जाइत छथि। शास्त्रीयतासँ आछन्न लोककथाक क्रियापदमे छैक, छलाह, गोट, जाइत आदि पदक प्रयोग होइछ जखन कि रूपमे छै, छला, गो, जाइ आदि लघु स्वरूप देख पड़ैत अछि। ऐ विधामे भाववाचक संज्ञाक अत्यल्प प्रयोग भेल अछि आ तकर स्थानपर विशेषणे शब्दक प्रयोग वांछित बुझना जाइत रहलैक अछि। एतावता मैथिली बाललोककथा मैिथली लोकसाहित्यक अमूल्य निधि िथक जकर संकलन-प्रकाशन आे अध्ययनक आवश्यकता अछि जइसँ ई सम्पदा अन्यान्य भाषाक समक्ष आबि सकए आ अनन्तकाल धरि नेनालोकनिक मनाेरंजन कऽ सकए। वनदेवी आ नारी अस्मिताक गाथा कथा, उपन्यास, नाटक आदि विभिन्न विधामे गरिमामय लेखनक हेतु प्रख्यात, आधुनिक मैथिली महिला लेखनमे अग्रिम पाङक्तेय आ डा. श्रीमती उषा किरण खानक जाइ सँ पहिने एक गोट गद्यात्मक खण्डकाव्य थिक। ऐमे सीताक व्याथा-कथाकेँ उपजीव्य बनाए नारी-अस्मताक अन्वेषण कएल गेल अछि। स्वभावत: पौराणिक पात्रक आश्रए लऽ अत्याधुनिक सुगीन वृत्तिक प्रतीक्षा साकांक्ष दृष्टि ऐ काव्यक महत्वपूर्ण उपलब्धि थिक। मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम आ सती शिरोमणि सीताक कथा भारतीय जीवनादर्शनक प्रतीक बनल रहल अदि। सीता अदौसँ मिथिलाक पहचान बनलि रहलि छथि। मुदा भूमिजा सीताक उत्तरचरितमे ग्रथित सीता-वनवासक कथा मैथिल मानसकेँ सदति उद्वेलित कएने रहलैक अछि। एतऽ धरि जे सीताक विवाहक दिन विवाह पंचमीकेँ एखनो धरि लोक सरि भऽ कऽ अपन बेटीक विवाहक दिवसक रूपमे स्वीकार करबामे धखाइत रहल अछि। सीताक जन्म विरोगहि गेल लोककंठमे हुनका प्रतीक्षा सहानुभूतिक रूपमे विद्यमान अछि। ऐ ठामक सन्त परम्परामे एकटा समुदाय तँ एतबो धरि मानबाक लेल तत्पर नै जे सीता द्विरागमनक बाद अपन सासुर अयोध्यो गेलीह आ तत:पर कखनो राम वनवासक कारणे तँ कखनो अपन वनवासक कारणे दु:ख भरल जीवन बितबैत रहलीह। हिनकालोकनिक तँ ई मान्यता छन्हि। जे विवाहोपरान्त दुल्लह श्रीराम सभ दिनक हेतु मिथिलेक बनल रहि गेलाह आ मिथिलाक सखी-लोकनि हुनक दुलार-मलार करैत हुनका सासुरेमे छेकने रहि गेलखिन। सीताक दु:खक जीवन-प्रसंगकेँ ओलोकनि ऐ माध्यमे बिसरबाक आयोजन कएलनि। मैथिली दधीचि पं. सुरेन्द्र झा सुमन अपन सीतावन्दनामे अत्यन्त कटु शब्दें सीता वनवासक प्रति अपन आक्रोश प्रकट कएलनि- किए बनलि वनवासिनी पति-पद-रेणु सुता हमर। ज्वालामुखी न थीक ई ज्वलित प्रश्न धरणी उरक।। वस्तुत: पत्नीक रूपमे सीता पति-पद- अनुगमनक भारतीय आदर्श प्रस्तुत कएलनि तथापि राजधर्म हुनका वनवासक दण्ड दऽ प्रताड़ित कएने छल, जकरा हुनक माता पृथ्वी आइयो धरि पचा नै सकलीह अछि आ हुनक आक्राेश आइयो ज्वालामुखीक रूपमे प्रकट अछि। ई केवल कविकल्पने नै, मैथिल मानसक आक्रोशो थिक। सीता मिथिलाक बेटी छलीह। परवर्ती कालमे ओ अयोध्याक पुतहु बनलीह आ अपन कर्त्तव्य भावना ओ पतिव्रत्य द्वारा एहेन आदर्श उपस्थित कएलनि जे भातीय लोकजीवनक आदर्शक रूपमे आइयो प्रथित अछि। ओ नैहर आ सासुर दुनू कुलक मान रक्षाक हेतुक यज्ञमे िनरन्तर आहुति प्रदान करैत रहलीह। मुदा समाज हुनक चरित्रपर आशंका करैत रहलनि। ऐ आशंकाक निवारणर्थ हुनका सर्वसामान्यक बीच अग्नि परीक्षा देबए पड़लनि। अग्नि परीक्षाक बाद जखन ओ अयोध्या आपस आएलनि, तकर बादो पुनश्च हुनक चरित्रपर आक्षेप कएल गेलनि आ मर्यादापुरूषोत्तम राम राजधर्मक अनुदेशे हुनका वनवासक दण्ड प्रदान कऽ देलखिन सेहो एहन स्थितिमे जखन ओ दुजीवा छलीह। अग्नि परीक्षाक साक्षी राम, अक्षय अनुरागसँ संबलित पति राम हुनका प्रतीक्षा कएल गेल आक्षेपक कोनो प्रतिरोध नै कऽ सकलखिन। नारीक प्रति ई उपेक्षाभाव संभवत: सीताकेँ सहन नै भऽ सकलनि जकर परिणाम पाताल-प्रवेशक रूपमे आएल जे आइयो पुरूष समाजक नारीक प्रति हीन मनोभावनाक द्योतक थिक आ द्योतक थिक नारीक नारीक आक्रोश, विरोध आ विद्रोहक, जकरा श्रीमती खान अपन ऐ गद्य खण्डकाव्यमे रूपायित कएलनि अछि। श्रीराम अयोध्याधिपति छलाह। प्रजावत्सलता हुनक राजधर्म छलनि। ऐ राजधर्मक वशीभूत भऽ ओ धोबि द्वारा लांछित सीताकेँ, पूर्वहि अग्नि परीक्षिता सीताकेँ वनवास देबाक दण्ड सुनौलनि। रामक ई मानसिकता मर्यादापुरूषोत्तमत्वक प्रति हुनक भावनाक अतिरेकक प्रदर्शन छल। ओ प्रजासँ वाहवाही पएबाक फेरमे एकटा सती सावित्रीक आहिपर ध्यान नै दऽ सकल छलाह। हीरानन्द झा शास्त्री ऐ वाहवाहीक फेरमे पड़ल भीष्मक मानसिकताकेँ उजागर करैत अपन सोचो तो भीष्म दीर्धकवितामे कहने छथि- सुनते भी कैसे भीष्म तुम तो थे वाहवाही लूटने की धुन में बड़ा तेज होता है, यह वाहवाही लूटने का नशा इस नशे में तो मनुष्य सब कुछ भूल जाता है बहरे हो जाते हैं, उसके कान िसर्फ एक ही शब्द सुनाई देता है उसके कानों को और शायद उसी शब्द को वह सुनना भी चाहता है बार-बार जानते हो, क्या है वह शब्द वह शब्द है वाह वाह अहंभाव का ही शायद विकृत रूप है, यह जब मनुष्य अपने हर कार्य पर लोगों के मुँह से िसर्फ वाह-वाह ही सुनना चाहता है। भूमिजा, रामक ऐ अहंभावक परितुष्टिक यज्ञाग्निमे झोंकि देल गेल छलीह। मुदा हुनको दिन फिरलनि। लव-कुश सन सन्तानक माता भेलाक बाद सीताक आत्मगौरव उद्दीप्र भेलनि। श्रीमती खान सीताक ओइ स्वरूपक चित्रण करैत कहैत छथि- मंजरायिता गाछ गदरायल माछ बाधवाली गाय आ सन्तानवती माय के छथि? सभ सिया सुकुमारिये तँ छथि। आ सन्तानवती वनदेवीक पुत्र द्वय राजा रामक अश्वेमेध यज्ञक घोड़ाकेँ रोकि लैत छन्हि, हुनक सैन्य समूहकेँ पराजित कऽ दैत छन्हि। सीता हस्क्षेप कऽ कऽ यज्ञक ओइ घोड़ाकेँ िवमुक्त करबैत छथि। महर्षि वाल्मीकि द्वारा सीताक पातिव्रत्य अभ्यर्थनापर राम अपन कृत्यपर लज्जित होइत छथि आ सीताकेँ वाल्मीकि आश्रमसँ अयोध्या लऽ चलबाक हेतु तैयार भऽ जाइत छथि। रामक उक्ति श्रीमती खानक शब्दमे द्रष्टव्य अछि- बदलि देब सभटा जे हेबाक छैक से होएत जे नियत छैक से नहि विधिक विधान हम तहस नहस कए देब। मुदा सीता अयोध्या आपस होएब स्वीकार नै करैत छथि आ भूमि पुत्रीमे भूमिमे बिला जाइत छथि। हुनक भूमिमे जयबा सँ पहिने'क उद्घोष ऐ खण्डकाव्यक परिणति थिक आ नारी अस्मिमताक उत्कर्षक द्योतक सेहो- हम नहि छी पाषाणी अहल्या वातभक्षा निराहारा जनकर कयल प्रभू उद्धार मिलाओल स्वामी गौतक सँ हम छी सशक्त, स्वयंपूर्ण सीता श्रीमती खान ऐ खण्डकाव्यमे सीता धरितक अनुगायनक माध्यमे सासुरवास बेटीक मनोभावकेँ अत्यन्त मनोरम ढंगे प्रस्तुत करैत भाव व्यक्त कएने छथि- विआह होइत देरी नारीक स्तरीयतामे आकस्मिक परिवर्त्तन भऽ जाइत छैक। ओकर अस्मिताकेँ जेना बाकसमे बन्न कऽ देल जाइत छैक, ओकर स्वातंत्र्यकेँ बेढ़ि देल जाइत छैक। हुनकहि शब्दमे- बिसरलहुँ छल्हिगर दही, हरियर चूड़ा सपना भेल भुन्नाक पेटी, रहूक मूड़ा छूटल एकछिन्ना नूआ नौगज्जीमे हेरायल तनुक धूआ घरे-घर, गलिये गली, जतय मोन करय ततय चली एतय कनक मन्दिरक चतुष्कोण देहरि के कहय साधंस कतय कि कक्ष कौखन पार करी नारीकेँ पुरूषक समकक्ष किंवा पुरूषहुसँ अधिक सबला स्वरूपमे प्रस्तुत करबाक भावाभिव्यक्तिक कोनो अवसर श्रीमती खान ऐ खण्डकाव्यमे छोड़लनि नै अछि जे नारी अस्मिताक अन्वेषणक प्रति हिनक साकांछ दृष्टिक द्योतक अछि। ऐमे एक गोट प्रसंग अछि धनुष यज्ञक। धनुष वास्तवमे अनेकानेक बलशाली राजालोकनिक द्वारा टकसाओलो नै भेल छलनि तकरा राजा राम सहजहिं तोड़ि देलनि। मुदा तैसँ हुनक अपौरूषेय बलविक्रम बूझि पुरूष समाजकेँ गर्व करबाक कोनो कारण नै छल, कारण सीता अत्यन्त सहज रूपसँ ओकरा उठा कऽ प्रतिदिन ठाँव कऽ लेल करैत छलीह। श्रीमती खान कहने छथि- केहन केहन मोँछबला अयलाह अएलाह धोंछ भेल मुँह गेलाह एकहु रत्ती कहाँ टसकलनि धनुषा..... कमल नाल सन कोमल कान्त किशोर सहजहि उठाओल जनु फूल सिंगरहारक हो हल्लुक गे दाइ! ताहू सँ कोमल हमर सिया सुकुमारि उठबथि नित दिन ठाँव करैक काल जेना सिमरक फाहा होइक एही प्रकारक दोसर प्रसंग अछि सहस्रबाहु वधक जैमे अद्भुत रामायणक अनुरूप ई कथा आएल अछि जे सहस्रबाहु राजा रामकेँ अपन बलसँ परास्त करबामे सक्षम छल, युद्धभूमिमे राजा राम अचेत भऽ गेल छलाह। तखन सीता कालीक रूप धऽ सहस्रबाहुकेँ पराजित करबामे अपन सामर्थ्य देखैने छलीह। श्रीमती खान द्वारा अहू कथाक समावेशसँ हुनक काव्यमे अभिव्यक्त नारी-भावनाक परिचए भेटैत अिछ। श्रीमती खानक ऐ खण्डकाव्यमे वाल्मीकीय रामायणमे उद्धतृ ओहू अंशक सविशेष उल्लेख अछि जैमे राम द्वारा लंका विजयक उपरान्त सीताकेँ परित्याग कऽ देबाक कथा अनुस्यूत अछि आ जकर मार्जन अग्नि परीक्षासँ होइत अछि। ऐ सन्दर्भमे वाल्मीकिक किछु श्लोकक भावराशिकेँ श्रीमती खान यथावत् पिरगृहीत कऽ लेलनि अछि जे हुनक बहुश्रुतिक प्रतीक थिक यथा- िवदितश्चस्तु भद्रं ते योऽ यं रण परिश्चम:। सुतीर्ण: सुहृदां वीर्यान्न त्वदर्थ मया कृत:।। रक्षता तु मया वृत्तपवादं च सर्वत:। प्रख्यातस्यात्म वंशस् न्याङ्गं च परिमार्जिता:।। लक्ष्मणे वाथ भरते कुरू बुद्धि यथासुखम्।। शत्रुध्ने वाथ सुग्रीवे राक्षसे वा विभीषणे। निवेशय मन: सीते यथा वा सुखमात्मना।।6/115/। श्रीमती खानक शब्दमे ऐ भावकेँ ऐ रूपेँ उपस्थापित कएल गेल अिछ- सीत हम अहाँक लेल नहि कयलहुँ युद्ध रावण केँ करक परास्त देवसत्ता केँ स्थापित करक पत्नी जनिकर हरण भेल ताहि राजाक कलंक मेटब छल अभिष्ट से भेल सिद्ध तेँ कयल युद्ध हे सीते, आइ अहाँकेँ कएलहुँ मुक्त पत्नी धर्मसँ रहू लंका मे किंवा जाउ भारतवर्ष भरत किंवा शत्रुध्न आिक लक्ष्मण जकरा संग रहबाक हो रहू- रामक ई प्रसंग अत्यन्त कारूणिक अछि। अहूठाम िनर्दोष सीतापर रामक वचन वाणक प्रहार भेल अछि जकरा नारी अस्मितापर प्रहार कहल जा सकैछ। महात्मा तुलसीदासकेँ श्रीरामक ई कटूक्तिपूर्ण वचनसँ ततेक अप्रिय बुझना गेलनि जे ओ अपन रामकथामे वस्तुक आग्रहेँ ऐ घटनाक अल्पतम शब्दावलीमे उल्लेख कऽ कऽ आगू बढ़ि गेलाह- सीता प्रथम अनल मुह राखी। प्रकट कीन्ह चह अंतर साखी।। तेहि कारण करूणानिधि कहे कछुक दुर्बाद। युपत जातु धानी सब लागी करै विषाद।। मुदा ऐ प्रसंगमे वाल्मीकिक सीतामे जै अपार ऊर्जाक दर्शन होइत अछि, तकर श्रीमती खानक खण्डकाव्यमे अभाव देख पड़ैत अछि, जकरा आश्चर्यजनक कहल जा सकैछ। वाल्मीकिकि सीता अग्नि परीक्षासँ पूर्व प्रगल्यतार्वक अपनापर कएल गेल शंकाक प्रतिवाद करैत छथि जे नारी अस्मिताक प्रति हुनक दृढ़ भावनाक प्रतिक थिक यथा- किं माम सदृशं वाक्यमीदृशं शोकदारूणम्। रूक्षं प्रावयसे वीर प्रकृत: प्राकृतामिव।। पृथक्स्त्रीणां प्रचारेण जातित्वं परिशङ्कसे। परित्यजैनां शंङ्कं तु यदि तेऽहं परीक्षिता।। यदहं गात्रसंस्पर्शं गतास्मि विवशा प्रभो। कामकारो न मे तत्र दैवं दत्राापराध्यति।। सह संवृद्धभावेन संसर्गेण च मानद। यदि तेऽहं न विज्ञाता हता तेनास्मि शाश्वतम्।। त्वया तु नृपशार्द्ल शेषमेवानुवर्तता। लघुनेव मनुष्येण स्त्रीत्वमे पुरस्कृतम्।। न प्रमाणीकृत: पणिर्बाल्ये मम निपीडित:। मम भक्तिश्च शीलंच सर्वं ते पृष्टत: कृतम्।। इत्याति। तथापि श्रीमती खानक ऐ खण्डकाव्यक ई विशिष्टता थिक जे ऐमे मिथिलामे रामजानकी विषयक रूढ़ि सभकेँ सेहो महत्वपूर्ण स्थान देल गेल अछि। मिथिलामे प्रत्येक कन्याकेँ सीताक प्रतीक मानल जाइत छन्हि आ मिथिलाक लोकगीतमे सीता प्रत्येक जनकक पुत्रीक रूपमे गृहीत छथि। मैथिली लोकगीतमे सीताक वैवाहिक प्रसंगक बहुलय अछि आ लोक सीताक व्यथा-कथाकेँ जेना बिसरि गेल छथि। ऐ तथ्यकेँ श्रीमती खान ऐ शब्दें अभिव्यक्त कएने छथि- सीकी खोंटैत लिखिया करैत सुआसिम लोकनि गओतीह गीत ढौरतीह कोबर बिसरि जयतीह सायास सिया धियाक अनसोहाँत पीर। श्रीमती खान नारी ओ पुरूषक समकक्षता ओ सहभवहि केँ प्रेय रूपमे ऐ साहित्यिक कृतिमे प्रस्तुत कएलनि अछि जे ऐतिहासिक-पौराणिक कथावस्तुकेँ अधुनातन युगजीवनक परिप्रेक्ष्यमे देखबाक अन्वेषक दृष्टिक काणे हिनका साहित्यकार वरेण्य श्रेणीमे पाङ्केय सावित करै छन्हि। द्रष्टव्य अछि रामक प्रतीक्षा सीताक ई उक्ति- हमरा लेल अहाँ प्राणहरि छी राम ने छी साध्य, ने साधन अहाँ साक्षत विजय थिकहुँ हम मुदा पराजय नहि थिकहुँ नहि होइत छैक प्रत्येक प्रतिस्पर्द्धामे जय आ पराजय सहजता, सरलता ओ प्रसाद गुण सम्पन्नतासँ मण्डित तत्सम् ओ तद्भवबहुल श्रीमती खानक ऐ खण्डकाव्यमे उपमा, उत्प्रेक्षादि अलंकार सहजहिं आकृष्ट करैत अछि आ भवभूतिक एको रस: करूण एवं प्रतिध्वनित होइत देख पड़ैछ। ऐ पठनीय, मननीय ओ संग्रहणीय कृतिक हेतु श्रीमती खान साधुवादक पात्र छथि। मैथिली जगतक तँ सहजहिं, रामकथाक प्रत्येक अध्येताकेँ हिनक ई खण्डकाव्य आकर्षित करतनि, से अपेक्षा कएल जएबाक चाही। किछु परिमार्जनक संग ई कृति कालजयीक श्रेणीमे गण्य होएबाक योग्यता रखैछ। मैथिली रामकथाक आयामकेँ संवद्धित करैबला ऐ कृतिकेँ विभिन्न दृष्टिये समीक्षा-समालोचनाक विमर्श परक आयाम भेटक चाही। आदर्शक उपस्थापन : मौलाइल गाछक फूल श्री जगदीश प्रसाद मण्डल बहुआयामी रचनाकार छथि। कथा, उपन्यास, नाटक आदि विभिन्न विधामे प्रभूत रचना द्वारा ई आधुनिक मैथिली साहित्यमे बेछप स्थान बना चुकल छथि। ‘मौलाइल गाछक फूल’ हिनक औपन्यासिक कृति थिकनि। आदर्शवादी विचारधारासँ ओतप्रोत हिनक एहि उपन्यासमे मण्डलजीक उदात्त सामाजिक चिन्तनक प्रक्षेपण भेल अछि। एहि उपन्यासक अधिकांश चरित्र उदार ओ सज्जन प्रकृतिक छथि। हुनका लोकनिक हृदय पवित्र छनि आ स्वार्थ ओ वासनासँ फराक रहि समाज उत्थानक हेतु चिन्तन करैत देखि पड़ैत छथि। स्वभावत: एहन चरित्र सबहक अनुगुम्फनसँ ई उपन्यास एक गोट पिरष्कृत सामाजिक चिन्तनक मार्ग प्रशस्त करैत देखि पड़ैत अछि। एहि उपन्यासक केन्द्रीय पात्र छथि रमाकान्त। उपन्यासक अधिकांश घटना हिनके परित: आघूर्णित होइत अछि। ई जमीन्दार छथि आ सुभ्यस्त सेहो। उदार विचार, इमानमे गंभीरता, मनुक्खक प्रति सिनेह हिनक चारित्रिक विशिष्टता छनि। हिनकामे ने सूदिखोर महाजनक चालि छनि ने धन जमा कएनिहार लोकक अमानवीय व्यवहारे छनि। नीक समाजमे जेना धनकेँ जिनगी नहि अपितु जिनगीक साधन बुझल जाइत अछि, सएह रमाकान्तोक परिवारमे छनि। उपन्यासक आरम्भहिमे हिनक उदात्त चरित्रक परिचए भेटि जाइत अछि। गाममे अकाल पड़ि जाइत छैक। आ लोक सभ अन्न बेत्रेक मरब शुरू कऽ दैत अछि। मुदा रमाकान्त लग बखारीक बखारी अन्न पड़ल छनि। लोकक प्रति सहानुभूतिसँ द्रवित भऽ रमाकान्त अपन बखार फोलि दैत छथि आ काजक बदला अनाज कार्यक्रम शुरू कऽ अपन पोखड़िकेँ उरहबा लैत छथि। एहिसँ एक दिस जँ लोककेँ अकर्मण्यतापूर्वक खराती अन्न लेबासँ परहेज करबैत छथि तँ दोसर दिस अन्नाभावमे लोककेँ मरबासँ बचबैत छथि। रमाकान्तक ई अवधारणा छनि जे संसारक यावन्तो मनुक्ख अछि सभकेँ जीबाक अधिकार छैक। सभकेँ सभसँ सिनेह होएवाक चाहिऐक। मुदा जाहि परिवेशमे हमरालोकनि जीवि रहल छी, जाहिठाम व्यक्तिगत सम्पत्ति आ जबाबदेहीक बीच मनुक्ख चलि रहल अछि, ओहिठाम सिनेह खंडित होएबे करतैक आ सिनेह खंडित भेने पारस्परिक द्वेष ओ लड़ाइ-दंगाकेँ कोनो शक्ति रोकि नहि सकैत छैक। तेँ नूतन समाजक निर्माणक हेतु, सामाजिक समरसता हेतु त्याग भावनाक आवश्यकता छैक आ छैक पारस्परिक सहयोग भावनाक विस्तारक आवश्यकता। तेँ ओ अपन दू सए बीघा जमीन गामक भूमिहीन परिवार सबहक बीच वितरणक निर्णए लैत छथि जाहिसँ गामक सभ व्यक्ति सुखी आ सम्पन्न भऽ सकथि। यद्यपि रमाकान्तक एहि प्रकारक अतिशय उदारता जमीन्दारक प्रवृत्ति ओ समसामयिक यथार्थक दृष्टिये सर्वथा अविश्वसनीय प्रतीत होइत अछि, तथापि ई उदात्त लेखकिय कल्पना उपन्यासकारक एहि उद्देश्यकेँ प्रतिपादित करैत अछि जे यावत् समाजमे एक दिस अति विपन्न आ दोसर दिस अति सम्पन्न लोकक वास रहत, ताधरि सामाजिक समरसताक बात स्वप्ने बनल रहत। रमाकान्त उदारताक अतिरंजित वर्णन उपन्यासमे अनेक स्थलमे देखि पड़ैत अछि यथा ओ शशिशेखर नामक युवकक उच्च शिक्षाक हेतु सहायता प्रदान करैत छथि, गाममे स्कूल स्थापित होएबा काल शिक्षकक भोजनादिक व्यवस्थाक भार अपना ऊपर लऽ लैत छथि, टमटमबलाक दु:खिताहि घरवालीक ईलाजक हेतु ओकरा पर्याप्त टाका दऽ सहायता करैत छथि, आदि। एहि उपन्यासमे मण्डलजी मिथिलाक ग्राम्य जीवनमे पसरल धर्मभीरूताक समस्याक यथार्थवादी चित्रण कएलनि अछि। एहि समस्याक चित्रण हेतु ओ सोनेलाल नामक पात्रक अवतारणा करैत छथि। सोनेलालक पत्नी दु:खित पड़ि जाइत छथिन। ओ ओकरा अस्पतालमे देखएबाक हेतु अपन जमीन भरनापर दऽ दैत छथि। उपचार भेलापर हुनक पत्नी स्वस्थ भऽ जाइत छथिन। मुदा ताही क्रममे ओ साधु भण्डाराक कबुला कऽ लैत छथि। एहि कबुलाकेँ पूर करबाक हेतु साधुक दूटा दल निमंत्रित कएल जाइत छथि। हिनकालोकनिक हेतु सोनेलाल पर्याप्त भोज्य पदार्थ जुटबैत छथि। मुदा साधुक दुनू दलमे एकटा वैष्णव सम्प्रदायक तथा दोसर कबीरपन्थी सम्प्रदायक रहैत अछि आ दुनू दल अपन-अपन साम्प्रदायिक अभिवमानसँ ग्रस्त रहैत अछि जकर कारणे भण्डारामे अनेक विसंगति उत्पन्न होइ छैक। मुदा सर्वाधिक कष्टकर स्थिति तखन बनैत छैक जखन वैष्णव सम्प्रदायक महन्थ भण्डाराक बाद स्थानक हेतु एक सए एक, अपना हेतु एक सए एक, भजनिया सभक हेतु एकावन-एकावन आ भनसीयाक हेतु एकासी-एकासी टाका दक्षिणाक मांग कऽ बैसैत छथि। मराभवमे पड़ितहुँ धर्मभीरू सोनेलालकेँ ओ रकम चुकता कऽ देबऽ पड़ैत छनि। तत:पर दोसर दल सेहो हुनका ओतबे दक्षिणा देबाक हेतु दबाब दैत छनि आ सेहो हुनका चुकता करऽ पड़ैत छनि। एहि तरहेँ धर्मभीरू लोक पाखंडी साधु समाज द्वारा कोना लूटल जाइत छथि, तकर वर्णन कए उपन्यासकार एहि समस्याक प्रति लोकदृष्टिकेँ सचेत करबाक उपदेश दैत छथि। अवश्ये दोसर मंडली द्वारा दक्षिणाक रकम घुरा देलासँ सोनेलालकेँ थोड़ैक राहत भेटैत छनि आ ओहि मंडलीक प्रति लोक जगतमे सहानुभूति जगैत छैक। मिथिलाक अनेक लोकव्यवहार सेहो लोकजीवनक अभ्युन्नतिमे बाधक रहल अछि, ताहू दिस मण्डलजी संकेत कएलनि अछि। एहि हेतु ई शशिशेखर नामक पात्रक अवतारणा कएलनि अछि। शशिशेखर कृषि कओलेजमे प्रवेश पाबि जाइत अछि। ओ एहि प्रवेशसँ अपन भावी सुखी जीवनक परिकल्पना कऽ अत्यन्त आनन्दित होइत अछि। ओकर पिता सेहो खेत बेचियो कऽ ओकर पढ़ाइ पूरा करएबाक संकल्प लैत छथि। मुदा किछु दिनक बाद पिता बीमार पड़ि जाइत छथिन। शशिशेखर खेत बेचियो कऽ हुनक इलाज करबैत छनि मुदा ओ कालकवलित भऽ जाइत छथिन। तत:पर अपन बूढ़ि माताक सेवा करैत शशिशेखर अपन आगूक पढ़ाइ कोना जारी राखि सकत ताहिपर बिन्दु विचार कएने खेते बेिच कऽ पिताक श्राद्धो कऽ लैत अछि। परिणामत: ओकरा कओलेज छोड़बाक बाध्यता होइत छैक। एहि तरहेँ मण्डलजी लोकजगतमे व्याप्त अन्धविश्वास ओ लोकव्यवहारसँ बचले उत्तर समाजक कल्याणक दिशानिर्देश करबैत देखि पड़ैत छथि। अन्तत: रमाकान्तक सहायतासँ शशिशेखरकेँ अपन पढ़ाइ पूर करबाक संबल भेटि जाइत छैक मुदा श्राद्धादित लोकव्यवहारक समस्याक प्रति जुगुप्साक भाव अवश्य उत्पन्न भऽ जाइत छैक। अशिक्षा ग्राम्यजीवनक दैन्यक अन्यतम कारण अछि एखनो मिथिलाक निम्नवर्गीय समाजमे शिक्षाक सर्वथा अभाव छैक जकर कारणे सामाजिक अन्नति बाधिक छैक। मुदा अहू समस्याक समाधान सामाजिक लोकनिक जागरूकतासँ संभव छैक। मसोमातक दान कएल जमीनपर विद्यालयक स्थापना, हीरानन्द द्वारा बौएलाल ओ बौएलाल द्वारा सुमित्राकेँ शिक्षित कऽ ओकरा सबहक स्तरीय जीवनक चित्रण ‘मौलाइल गाछक फूल’ उपन्यासक एही उद्धेश्यपरक दृष्टिकोणक परिचायक थिक। आजुक ग्राम्य समाजक ई विडम्बना छैक जे पढ़ल-लिखल धियापुता पाइ कमएबाक अन्ध दौड़मे शामिल भऽ गेल छैक। तेँ ओ सभ अपन गाम-समाजकेँ छोड़ि हजारो मीलक दूरीपर नोकरी करऽ चलि जाइत छैक। परिणामत: बूढ़ माता-पिताक परिचर्या कएनिहार केओ रहि नहि पबैत छैक। पारिवारिक विघटनक फलस्वरूप सामाजिक जगतमे पसरल एहि विसंगतिक कथा रमाकान्त ओ हुनक डाक्टर पुत्र सबहक कथामे भेटैत अछि। मण्डलजी एहू विडम्बनासँ समाजकेँ बचबाक संकेत एहि उपन्यासक माध्यमे कएलनि अछि। हुनक भावना सुबुधक एहि उक्तिमे साकार भेल अछि- ‘आइक जे एकांगी परिवार अछि ओ कुम्हारक घराड़ी जकाँ बनि गेल अछि। बाप-माए कत्तौ, बेटा-पुतोहु कत्तौ आ धिया-पुता कत्तौ रहऽ लागल अछि। मानवीय सिनेह नष्ट भऽ रहल अछि।’ यद्यपि ई भावना कृषक युगीन होएबाक कारणे साम्प्रतिक यथार्थक दृष्टि जे पुरातन पद्धतिक अछि तथापि एकटा वैचारिक द्वन्द्वकेँ ठाढ़ करैत अछि। मण्डलजी रमाकान्तक दुनू डाक्टर पुत्रक मद्रासमे नोकरी करबाक लाथे किछु ग्रामेतर समस्या सबहक चित्रण सेहो कएलनि अछि। एहिमे सर्वाधिक प्रमुख अछि धनलिप्सामे व्यस्त समाजक बेचैनी। महेन्द्रक एहि कथनसँ ई प्रतिभासित होइत अछि जे ग्रामेतर समाजमे अत्यधिक सुविधा सम्पन्न लोकोक जीवन असामान्य भऽ गेल छैक- ‘अपनो सोचै छी जे एते कमाइ छी, मुदा िदन राति खटैत-खटैत चैन नहि भऽ पबैत अछि। कोन सुखक पाछू बेहाल छी से बुझिये ने रहल छी। टी.भी. घरमे अछि, मुदा देखैक समये ने भेटैत अछि। खाइले बैसै छी तँ चिड़ै जकाँ दू-चारि कौर खाइत-खाइत मन उड़ि जाइत अछि जे फल्लांकेँ समए देने छिऐक, नहि जाएब तँ आमदनी कमि जाएत। तहिना सुतइयोमे होइत अछि। मुदा एते फ्रीसानीक लाभ की भेटैत अछि? सिर्फ पाइ। की पाइये जिनगी छिऐक?’ एतावता मौलाइल गाछक फूलमे लोकजीवनक विविध समस्या ओ तकर समाधानक मार्ग तकबाक प्रयत्न भेल अछि। ‘अपन जिनगीकेँ जिनगी देखैत परिवार, समाजक जिनगी देखब जिनगी थिक।’ मण्डल जीक आदर्शवादी चिन्तनक रूपमे प्रतिफलित भेल अछि। प्राय: एही तथ्यकेँ ध्यानमे रखैत महेन्द्र द्वारा गामहिमे स्वास्थ्य केन्द्र स्थापना कऽ विचार अभिव्यक्त कराओल गेल अछि जतऽ ओकर परिवारक एकटा डाक्टर नित्य मरीजक सेवा, ग्रामवासीक सेवाक हेतु उपलब्ध रहितैक। सामाजिक समन्वयक प्रति पक्षधरता एहि उपन्यासमे भजुआक कथामे भेटैत अछि। जाति-पातिमे बँटल ग्राम्य समाजमे छूताछूत, ऊँच नीचक विचार अदौसँ रहलैक अछि। गाँधीजीक स्वतंत्रता आन्दोलनक समए अछूतोद्धारक प्रति हुनक चेष्टा ओ स्वातंत्र्योत्तर कालमे समाजक बदलैत रीति-नीतिक कारणे यद्यपि ग्रामो समाजमे अस्पृश्यताक प्रति भाव बदललैक अछि तथापि सहभोजनक दृष्टिये अखनो जाति-पातिक बीच दूरी बनले छैक। रमाकान्त द्वारा डोम भजुआक ओहिठाम जाए भोजन करबाक कथाक माध्यमे मण्डलजी समाजक एहि समस्याक आदर्शपूर्ण समाधान देखौलनि अछि। अवश्ये एहिमे इहो संकेत देल गेल अछि जे समरसताक बाधक तथाकथित अस्पृश्य लोकनिक शुचिताक प्रति प्रतबद्धताक अभाव रहलनि अछि। जे अशिक्षाजन्य अछि तथा शिक्षा द्वारा ओकरो बदलल जा सकैत छैक। मण्डलजीक एहि उपन्यासमे नारी विषयक चिन्तनमे प्राचीन भारतीय नारीलोकनिक आदर्शेक उपस्थापन भेल अछि। हिनक अधिकांश नारी पात्र यथा रधिया, श्यामा, सुगिया, सोनेलालक बहिन आदिमे पतिपरायणा भारतीय नारीक चित्रांकन भेल अछि। नारी-शिक्षाक प्रतिबद्धता सेहो मण्डलजीक एहि उपन्यासमे सुमित्राक माध्यमे अभिव्यक्र भेल अछि जे पढ़ि-लिखि कऽ नीक परिचारिकाक रूपमे गामक हेतु एकटा सम्पत्ति बनि जाइत अछि। सुजाता सेहो एहने नारी पात्र छथि जे श्रमिक परिवारमे जन्म लेलाक बादो महेन्द्रक सहायता पाबि डाक्टरनी बनि जाइत छथि आ महेन्द्रक भावहु सेहो भऽ जाइत छथि। मुदा शिक्षिताक संगहि मंडलजी जाहि नारीस्वरूपक परिकल्पना एहि उपन्यासमे रूपायित कएलनि अछि, से थिक नारीक सबला रूप। नारीक एहि स्वरूपक चित्रांकन सितियाक चरित्रमे भेल अछि। ओ नहि केवल अपन इज्जतिपर हाथ उठौनिहार ललबाकेँ थूरि कऽ राखि दैत अछि अपितु जखन ललबाक गामक लोक ओकरा गामपर आक्रमण कऽ दैत छैक, तँ नारीलोकनिक सेनानायिका बनि ओकरो सभकेँ परास्त कऽ दैत अछि। स्वातंत्र्योत्तर भारतमे भ्रष्टाचार एक गोट कोढ़क रूपमे देखि पड़ैत अछि जे राष्ट्रीय जीवनकेँ कुण्ठित जीवन जीबाक बाध्यता होइत छैक। मास्टरक बहालीमे हीरानन्दक आक्रोशक माध्यमे मण्डलजी सरकारी स्तरपर होइत भ्रष्टाचारक यथार्थकेँ अभिव्यक्ति प्रदान कएलनि अछि। मिथिलाक आर्थिक समृद्धिक हेतु एहिठाम जलकरक सदुपयोग करबाक चिन्तन सेहो एहि उपन्यासमे अभिव्यक्त भेल अछि। मौलाइल गाछक फूक’क भाषा अत्यन्त सरल, सहज ओ गमैया मैथिली थिक। मण्डलजी अपन कल्पित संसारकेँ मूर्त्त, विश्वसनीय ओ सजीव रूपमे प्रस्तुत करबाक हेतु लेखनक अनेक प्रविधिकेँ एहि उपन्यासमे समाहित कएने देखि पड़ैत छथि। अनेक ठाम हिनक नाटकीय भाषा प्रयोग अत्यन्त तीब्रता ओ सहजताक संग भेल अछि, यथा- ‘की कहैले ऐहल?’ ‘नत दैले एलौं।’ ‘कोन काज छिअह?’ ‘काज-ताज नै कोनो छी। ओहिना अहाँ चारू गोरेकेँ खुअबैक विचार भेल’ इत्यादि। अनेकठाम ई संस्मरणात्मक भाषाक सुष्ठु प्रयोग कएने छथि यथा- ‘एहि गाममे पहिने हम्मर जाति नै रहए। मुदा डोमक काज तँ सभ गामेमे जनमसँ मरन धरि रहै छै। हमरा पुरखाक घर गोनबा रहै। पूभरसँ कोशी अबैत-अबैत हमरो गाम लग चलि आएल। अखार चढ़िते कोसी फुलेलै। पहिलुके उझूममे तेहेन बाढ़ि चलि आएल जे बाधक कोन गप्प जे घरो सभमे पानि ढूकि गेल। तीन-दिन तक ने मालजाल घरसँ बहराएल आ ने लोके। पीह-पाह करैत सभ समए बितौलक। मगर पहिलुका बाढ़ि रहै, तेसरे दिन सटकि गेल।’ इत्यादि। परिवेश ओ वातावरणक निर्माणक हेतु मण्डलजी अभिधा शक्तिसँ संपुष्ट भाषाक प्रयोग द्वारा सटीक ओ विश्वसनीय बिम्ब ठाढ़ करबामे समर्थ देखि पड़ैत छथि यथा- ‘दू साल रौदीक उपरान्त अखाढ़। गारमीसँ जेहने दिन ओहने राति। भरि-भरि राति बीअनि हौँकि-हौँकि लोक सभ बितबैत। सुतली रातिमे उठि-उठि पानि पीबए पड़ैत। भोर होइते घाम उग्र रूप पकड़ि लैत। जहिना कियो ककरो मारैले लग पहुँचि जाइत, तहिना सुरूजो लग आबि गेलाह। रस्ता-पेराक माटि सिमेंट जकाँ सक्कत भऽ गेल अछि।’ इत्यादि। पात्रक परिचय दैत काल मण्डलजी ओकर रूपरेखा, वेश भूषा, आयु आदिक वर्णन अनेक ठाम ओहि पात्रक ठोस व्यक्तित्वकेँ अभिव्यक्त करबाक हेतु कएलनि अछि। मुदा एहि प्रकारक वर्णनक प्रति हुनका प्रतिबद्धता नहि देखि पड़ैछ। तथापि जतऽ कतहु ओ पात्रक मनोभावक वर्णन कएने छथि ओहिठाम हुनक भाषा विश्लेषणात्मक प्रकृतिक देखि पड़ैत अछि जाहिसँ पात्रक हृदयगत भावक प्रति पाठककेँ सुनिश्चित आकलनक अवसर भेटि जाइत छनि, यथा- ‘ब्रह्मचारी जीक बात सुनि रमाकान्तकेँ धनक प्रति मोहभंग हुअए लगलनि। सोचए लगलाह जे हमरो दू सए बीघा जमीन अछि, ओते जमीनक कोन प्रयोजन अछि। जँ ओहि जमीनकेँ निर्भूमिक बीच बाँटि दिऐक तँ कते परिवार आ कत्ते लोक सुख-चैनसँ जिनगी जीबै लागत। जकरा लेल जमीन रखने छी ओ तँ अपने तते कमाइ छथि जे ढेरिऔने छथि। अदौसँ मिथिलाक तियागी महापुरूषक राज रहल, किएक ने हमहूँ ओहि परम्पराकेँ अपना, परम्पराकेँ पुन:र्जीवित कऽ दिऐक।’ एहि तरहेँ ‘मौलाइल गाछक फूल’मे भाषाक कुशल ओ रचनात्मक प्रयोग भेल अछि जाहिसँ वर्णनमे सटीकता, सहजता, बिम्बधर्मिता, स्पष्टता ओ मनोवैज्ञानिक विश्लेषणक क्षमता प्रदर्शित होइत अछि। अपन गुणक कारणेँ मण्डलजीक कथासंसारमे विश्वसनीयता देखि पड़ैत अछि आ ओ अपन प्रौढ़ विचार ओ अनुभूतिकेँ पाठकीय मानसमे स्थानान्तरित करबामे सफल भेल छथि। अन्तत: महेन्द्रक उक्ति- ‘समाज रूपी गाछ मौला गेल अछि, ओहिमे तामि, कोड़ि, पटा नव जिनगी देबाक अछि जाहिसँ ओहिमे फूल लागत आ अनवरत फुलाइत रहत’मे उपन्यासक उद्धेश्य स्फुट भेल अछि। स्वभावत: मण्डलजी एहि कृतिक माध्यमे ग्राम ओ ग्रामेतर जीवनक संगहि व्यक्ति, परिवार, समाज ओ राष्ट्रक अभ्युन्नतिक हेतु एकर प्रत्येक इकाइकेँ त्याग ओ त्याग ओ समर्पणक भावनासँ ओत प्रोत रहबाक आदर्श जीवन पद्धति अपनयबाक संदेश देलनि अछि। हिनक ई संदेश ‘सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दु:खभाग भवेत्’क भावनाक पुन: उपस्थापन थिक। आस्था, जिजीविषा ओ संघर्षक प्रवाह श्री जगदीश प्रसाद मंडल कृत “गामक जिनगी” हिनक उन्नैस गोट कथाक संग्रह थिक। एहि कथा सभमे मिथिलाक ग्राम्य जीवनक मौलिक ओ अकृत्रिम छवि अभिव्यक्त भेल अछि। आजुक संक्रमणशील युगमे मिथिलाक गाम कोन तरहेँ अपन परम्परित जीवन पद्यति, आस्था ओ विश्वासक संग प्रबल जिजीविषाक बलेँ निरन्तर संघर्ष पथपर आरूढ़ संग रूपायित कएल गेल अछि। संग्रहक तीन गोट कथा क्रमश: ‘भैँटक लावा’, ‘बिसाँढ़’ ओ ‘पीराड़क फड़’ मिथिलामे उपलब्ध प्राकृतिक उपादानक उपयोगितापर विमर्श प्रस्तुत करैत अछि। बाढ़ि आ सुखारसँ पीड़ित मिथिलाक जनसमुदाय अपन जीवन रक्षाक हेतु कोन तरहेँ भैँट, विसाँढ़, पीरार आदिकेँ अपन मेहनतिक बलेँ साद्य पदार्थक रूपमे ग्रहन करैत रहल अछि तथा एहिठामक प्राकृतिक संसाधनक उपयोग द्वारा कोना मिथिलाक भूखमरी ओ बेरोजगारीकेँ दूर कएल जा सकैछ, एकर आर्थिक विकास कएल जा सकैछ तकर चित्र एहि तीनू कथामे भेटैत अछि। श्रमपर वश्वास, इमानदार प्रयास, कर्मण्यता ओ चातुर्यक संबलसँ विपन्नतापर विजयक ई गाथा सभ मिथिलाक लोकजीवनमे व्याप्त उत्साह ओ संघर्षक मर्मस्पर्शी चित्र प्रस्तुत करैत अछि। संग्रहक अन्यान्य कथा सभमे विभिन्न प्रकारक समस्या सभपर विमर्श प्रस्तुत भेल अछि आ एक गोट आदर्श ग्राम्य समाजक परिकल्पना प्रस्तुत भेल अछि। दहेजक सामाजिक समस्याक उन्मूलनक दृष्टिए ‘घरदेखिया’ कथा अत्यन्त हृदयस्पर्शी अछि। मिथिलाक उच्चवर्गीय समाजमे धनलोलुपताक कारणे उत्पन्न एहि समस्याक कुफल नारी प्रताड़नाक अतिरेकक रूपमे अत्यन्त गर्हित स्थिति प्राप्त कएने अछि जकर कारणे कन्याक विवाह एकटा पैघ समस्या बनल रहल अछि आ एकर कोनो ठोस समाधान अद्यावधि समक्ष नहि आबि सकल अछि। मण्डलजी एहि समस्याक समाधान लोकजीवनक वैचारिक परिवर्त्तनकेँ मानैत छथि आ सर्वहारा वर्गक अतिशय दीन पात्र लुखियासँ कहबैत छथि- “नै। हम ककरो बेटीकेँ पाइ लऽ कऽ अपना घर नै आनब।” लुखियाक एही वाक्यमे दहेज समस्याक प्रति समाधानक दिशा-बोध होइत अछि। आजुक युग तकनीकक युग थिकैक। नित्य नूतन तकनीकक विकासक कारणेँ जे केओ अपन तकनीकी ज्ञानमे अद्यतन बनल नहि रहि सकत, ओ जीवन-सघर्षमे पाछाँ धकेलि देल जाएत। एहि तथ्यसँ अवगत करएबाक उद्देश्य मण्डलजीक दुनू गोट कथा- ‘दूटा पाइ’ आ ‘हारि-जीत’मे अभिव्यक्त भेल अछि। ‘दूटा पाइ’क फेकुआ नूतन फैशनक अनुरूप सिआइक काज सिखबामे असमर्थ रहैत अछि तेँ ओकरा शहरो छोड़ए पड़ैत छैक आ जीविकासँ हाथो धो लैत अछि जखन कि ‘हारि-जीत’ कथाक रामदत्त कुम्हारक व्यवसायमे होइत नित्य परिवर्त्तनक अनुरूप अपन व्यवसायोमे परिवर्त्तन कऽ मूत्तिकार बनि जीविकोपार्जनमे समर्थ बनल रहि पबैत अछि। ओकरा जीविकापर एहि परिवर्त्तनक कोनो असरि नहि पड़ि पबैत छैक जे घरैया बासनमे माटिक बदला धातुक प्रयोग होमए लगैत छैक आ खपराक घरक स्थान एस्बेस्ट्स शीटक मकान लऽ लैत छैक। एहि तरहेँ ई दुनू कथा युग-परिवर्त्तनक संग चलबाक शिक्षा प्रदान करैत अछि। उपयोगितापर आधारित व्यवहारपरक एहि युगमे लोक स्वार्थ मात्र दिस ततेक झुकि गेल अछि जे वृद्ध माता-पिताक प्रति कुभेला एकटा सामान्य बात भऽ गेल अिछ। आइ ‘मातृ देवो भव’, पितृ देवो भव, लोक संस्कारसँ विलुप्त भेल जा रहल छैक। श्रवण कुमारक आदर्शसँ लोक बान्हल नहि रहि सकल अछि। जाहि भारतमे कृतज्ञता वशात् लोक गाछ पर्यन्तक पूजक अछि, ततहि पालि-पोसि, पढ़ा-लिखा कऽ समर्थ बनौरिहार माताे-पितोक प्रति कृतज्ञ रहबामे संकोच भऽ रहल छैक। समाजमे आएल एहि परिवर्त्तनकेँ रेखांकित कऽ मंडलजी दू गोट कथामे एहिपर विमर्श प्रस्तुत कएलनि अछि जकर नाम अछि क्रमश: ‘भैयारी’ आ ‘बहिन’। ‘भैयारी’क कुसुमलाल अपन जेठ भाय दीनानाथक परिश्रमक बलपर उपार्जित पाइसँ जखन पढ़ि-लिखि कऽ नोकरी करए लगैत अछि तँ गामक अपन हिस्साक सम्पत्ति बेचि शहरी जीवन व्यतीत करए लगैत अछि। ओकरा अपन लकवाग्रस्त पिता आ वृद्धा माताक कोनो ध्यान नहि रहैत छैक। तेँ जखन ओ दारूक सेवनक कारणेँ असमय कालकवलित होएबापर वृत्त भऽ जाइत अछि आ माएकेँ ई समाद भेटैत छनि जे ओ ओकर अन्तिम दर्शन कऽ लेथि तँ माएक एहि उक्तिमे वृद्धा माता-पिताक वैकल्य अभिशापक रूपमे प्रकट होइत अछि- “कुसुमा हमर बेटा थोड़े छी जे मुँह देखबै। उ तँ ओही दिन मरि गेल जइ दिन हमरा दुनू परानीकेँ छोड़ि चलि गेल। आइ बीस बर्खसँ अइ हाथ-पाएरक बलेँ बीमार पतिकेँ जीवित राखि अपन चूड़ी आ सिनूरक मान रखने छी।” ‘बहीन’ कथामे सरोजनी नामक वृद्धाक कथा अछि जनिक मृत्युक अवसरपर बजौलो उत्तर हुनक पुत्री रीता हुनक अन्तिम दर्शनक हेतु नहि अबैत छथि आ व्यस्त होएबाक लाथ लगा दैत छथि जखन कि परजातिक मुसलमानि बहिना शबाना हुनका देखबाक हेतु अबैत छथिन। राधेश्यामक एहि चिन्तनमे सम्बन्ध-बन्धक वास्तविकताकेँ उद्घाटित करैत कहल गेल अछि- “दुनियाँमे बहिनिक कमी नहि अछि। लोक अनेरे अप्पन आ वीरान बुझैत अछि। ई सभ मनक खेल थिक। हँसी-खुशीसँ जीवन बितबैमे जे संग रहए वएह अप्पन।” माता-पिताक प्रति धियापुताक कुभेलाक संगहि एहि कथामे मानवतावादक प्रतिपादन मंडल जीक लक्ष्य बुझना जाइत अछि। उच्च शिक्षा प्राप्त वर्गमे सम्प्रति विदेश गमनक लिलसा प्रबल देखल जाइत अछि। एहि प्रवृत्तिक कारणे ओ लोकनि स्वदेश सेवासँ तँ वंचित एहिये जाइत अछि, अपनो जीवनक परिवेश संकुचित बना लैत छथि। ‘पछतावा’ कथा शिक्षित वर्गक एही अध:पतनक कथा थिक। एकर प्रमुख पात्र रघुनाथक एहि पश्चात्तापपूर्ण उक्तिमे एहन लोकक मानसिकताक अभिव्यक्ति कएल गेल अछि- “हमरासँ सइओ गुना ओ नीक छथि जे अपना माथपर पानिक घैल उठा मातृभूमिक फुलवारीक फूलक गाछ सीचि रहल छथि। अपन माए-बाप, समाजक संग जिनगी बिता रहल छथि। जिनगीक अन्तिम पड़ावमे पहुँचि आइ बुझि रहल छी जे ने हमरा अपन परिवार चिन्हैक बुद्धि भेल आ ने गाम-समाजक।” एही तरहेँ ‘बोनिहारिन मरनी’मे सर्वहाराक प्रति करूणा, ठेलाबलामे सर्वहाराक संघर्ष, ‘जीिवका’मे जनवितरण प्रणालीमे व्याप्त भ्रष्टाचार, ‘रिक्शाबला’मे सर्वहाराक उन्मुक्त जीबन आ सम्पत्तिशाली वर्गक नारीक कुंठा, ‘चूनवाली’मे सर्वहारावर्गक स्नेह-सम्बन्ध आदिकेँ आधार बना कऽ कथा गढ़ल गेल अछि जे अत्यन्त रोचक भेल अछि। ‘अनेरूआ बेटा’ लोकजगतमे शिक्षाक आवश्यकतापर बल दैत अछि तँ ‘डाक्टर हेमन्त’ सुदूर देहातमे स्वास्थ्य सुविधाक व्यवस्थाकेँ रेखांकित करैत अछि। ‘बाबी’ कथाक माध्यमे मंडलजी हिन्दू-मुस्लिम एकताकेँ छठि पाबनिक आधारपर दृढ़ता प्रदान करबाक राष्ट्रीय दायित्वक प्रतीक्षा सतर्कता दर्शौलनि अछि। ‘डीहक बॅटबारा’ भ्रष्टाचार पूर्वक धन अर्जन कएनिहार समाजक अधोगतिक चित्रांकन करैछ। मंडलजीक अधिकांश कथा वर्णनात्मक शैलीमे लिखल गेल अछि। एहि शैलीक कारणें हिनक कथा सभमे उपन्यासिक आनन्द भेटैत अछि मुदा एके कथामे अनेक उपकथा सभक सम्मिश्रणक कारणें बहुधा लघुकथाक क्षिप्रता ओ सघनता बाधित देखि पड़ैत अछि। हिनक वर्णनमे अवश्ये चारूताक दर्शन होइत अछि आ पाठक समक्ष समग्र चित्र रूपायित भऽ जाइत अछि यथा- “पछिला चारि सालक रौदी भेने गामक सुरखिये बेदरंग भऽ गेल। जे गाम हरियर-हरियर गाछ-बिरीछ, अन्नसँ लहलहाइत खेत, पानिसँ भरल इनार-पोखरि, सैकड़ो रंगक चिड़ै-चुनमुनी, हजारो रंगक कीट-पतंगसँ लऽ कऽ गाए, महींस आ बकरीसँ भल रहैत छल ओ मरणासन्न भऽ गेल। सुन्न-मसान जेकाँ। वीरान। सबहक मनमे एक्केटा विचार अबैत जे आब ई गाम नै रहत। जँ रहबो करत तँ माटियेटा। किएक तँ जाहि गाममे खाइक लेल अन्न नहि उपजत, पीबैक लेल पानि नहि रहत, ताहि गामक लोक की हवा पीबि कऽ रहत।” इत्यादि। मंडलजीक हृदयमे ग्राम्य जीवनक प्रति अगाध निष्ठा छनि आ मिथिला ओ भारतक आदर्श ग्रामक परिकल्पना छन्हि। तेँ ओ ओहि सभटा परिस्थिति दिस नजरि खिरबैत देखि पड़ैत छथि जे ग्राम्य जीवनक सौन्दर्यक हेतु बाधक बनल अछि। एकटा पात्रक माध्यमे ओ कहैत छथि- “गाममे ने पानि पीबैक ओरियान छै, ने खाइक लेल सभकेँ संतुलित भोजन भेटै छै, ने भरि देह कपड़ा भेटै छै, ने रहैक लेल घर छै, ओहि देशकेँ मरल नै कहबै तँ की कहबै। एखनो लोक सड़ल पानि पीबैत अछि, कहुना कऽ किछु खा दिन कटैत अछि, गाछक निच्चांमे आगि तापि समए बितबैत अछि, हजारो रंगक रोग-व्याधिसँ घेरल अछि, ओहि देशकेँ की कहबै? हजारो वर्षक मनुक्खक इतिहासमे एखनो धरि सरस्वतीक आगमन सभ मनुक्ख धरि नै भेल अछि, ओहि देशकेँ की कहबै? आदि। अवश्ये हुनक आदर्श गामक परिकल्पना सर्वथा सुविधासम्पन्न, आर्थिक रूपेँ सबल आ सुशिक्षित गामक छनि। जकर चर्चा बेर-बेर हुनक कथा सभमे अनायास आएल अछि।” अपन कथा सभमे मंडलजी कतहु कृत्रिमताक प्रवेश नहि होमय देलनि अछि। स्वभावत: हिनक भाषा, संवाद, वर्णन, वस्तु, चरित्र आदि समरत्त उपादानमे सहजताक दर्शन होइत अछि। हिनक अधिकांश कथा ग्राम्य जीवनसँ सम्बद्ध अछि तेँ ई पात्रक नामावली सेहो ओही जीवनसँ लेने छथि यथा- फुलिया, दुखनी, बेचन, सुगिया, धनिया, पिचकुन, पिहुआ, भुलिया, फेकुआ, लुखिया, सोमन, मरनी, रघुनी, बुचाइ, बचनू आदि, मुदा जखन ई नागर पात्रकेँ अपन कथामे प्रवेश दैत छथि तँ वर्गीय नामोक प्रयोग करैत छथि यथा- मुकुन्द, शिवनाथ, रूक्मिणी, शोभाकान्त, रागिनी, सुनयना आदि। पात्रक रंखाचित्र पाठकक मानसमे उतारि देबाक हिनक झमता मरनीक एहि रूवरूप-वर्णनमे अत्यन्त उत्कृष्ट देखि पड़ैछ- “कारी झामर एकहड्डा देह, ताड़-खजूरपर बनाओल चिड़ैक खोंता जेकाँ केश, आंगुर भरि-भरिक पीअर दाँत, फुटल घैलिक कनखा जेकाँ नाक, गाइयक आँखि जेकाँ बड़का-बड़का आँखि, साइयो चेफड़ी लागल साड़ी, दुरगमनिया आँगि फटलाक बाद कहियो देहमे आंगीक नसीब नहि भेल, बिना साया-डेढ़ियाक साड़ी पहिरने। यएह छी मरनी।” मात्र ई वर्णन मरनीक प्रति करूणा उत्पन्न करबामे सक्षम सिद्ध अछि। ग्राम्य जीवनक वर्णन करैत काल ओकर श्याम पक्षकेँ सेहो मंडलजी यथावत् राखि कथाक सहजताकेँ अक्षुण्ण रखलनि अछि। ग्राम्य जीवनमे ताड़ी-दारू, गाँजा-भांग, बीड़ी-सलाइ आदिक प्रयोगकेँ ई विभिन्न कथामे सहजताक सृजनक हेतु प्रयुक्त कएलनि अछि। आस्था आ विश्वास ग्राम्य जीवनक अंग थिक। मंडल जीक कथा सभमे अनेक ठाम लोक जीवनक जीवन्त आस्थाक चित्रण भेल अछि यथा- “इन्द्र भगवानकेँ कोनो चीजक दुख भऽ गेल हेतनि। तेँ हुनका बौसब जरूरी अछि।” यएह सोचि कियो भूखल-दुखलकेँ अन्नदान तँ कियो कीर्तन-अष्टयाम-नवाह, तँ कियो यज्ञ-जप चंडी, विष्णु तँ कियो महादेव पूजा लिंग इत्यादि अनेको रंगक बौस’क ओरियान शुरू केलक। जनिजाति सभ कमला-कोशीकेँ छागर-पाठी कबुला सेहो करए लगलीह। इत्यादि। ग्राम्य जीवन लाख अभाव-अभियोगक अछैतो जािह उत्साह ओ उमंगकेँ अङेजने रहैत अछि, से एकर अपार जिजीविषाक प्रतीक थिक। मण्डल जीक कथा सभमे पात्रक चरित्रमे कुंठा ओ संत्रास पर जिजीविषाक विजय देखाओल गेल अछि जािहसँ हिनक कथा सभ नव आशाक संचार कय लोक जीवनक सोनहुल भविष्यक प्रति आश्वस्त करैत अछि। द्रष्टव्य अछि किछु पाँती- - “अपन धन हएत, तइपर सँ मेहनत करब तँ कोन दरीदराहा दुख आबि कऽ हम्मर सुख छीनि लेत।” - “एक्केटा बाढ़िमे एत्ते चिन्ता करै छथि काका, कनी नीक की कनी अधलाह, दिन तँ बितबे करतनि।” - “जकरा खाइ-पीबैक ओिरयान बूझल छैक ओ कथीक चिन्ता करत। इत्यादि।” एतवता मण्डल जीक ‘गामक जिनगी’ कथा संग्रहमे ग्राम्य शब्दावलीक माध्यमे ग्राम्य जीवनक सौन्दर्य ओ समस्या तथा तकरा सबहक विवेकपूर्ण निदान दिस इंगित करबाक प्रयास भेल अछि जे मैथिली कथा विधामे अन्यतम याेगदानक रूपमे चर्चित-अर्चित होएबाक सार्मथ्य रखैत अछि। पोथीक नाम- गामक जीनगी विधा- कथा संग्रह रचनाकार- जगदीश प्रसाद मंडल काँपी राइट- उमेश मंडल प्रकाशक- श्रुति प्रकाशन राजेन्द्र नगर दिल्ली मूल्य- २०० टाका मात्र प्रकाशन वर्ष- सन् २००९ पोथी पाप्तिक स्थान- पल्लवी डिस्ट्रीब्यूटर्स, वार्ड न.६, निर्मली, सुपौल इसवी सन 2010 : मैथिलीक गतिविधि वर्ष 2003क अन्तिम मासमे जखन मैथिली भाषाकेँ संविधानक अष्टम अनुसूचिमे स्थान प्राप्त भेलैक तँ आवासी-प्रवासी मैथिल जनसमुदाय तत्कालीन प्रधानमंत्री मान्यवार श्री अटल बिहारी बाजपेयी ओ गृहमंत्री मान्यवर श्री लालकृष्ण आडवाणीक प्रति अभिभूत भेल अपन चिर आकांक्षाक प्रतिपूर्तिसँ हर्षोल्लासमे निमग्न प्रतीत भेल। ज्योतिरीश्वर ओ विद्यापति ठाकुरक देसिल वयना, ब्रजकिशोर ठाकुर आ कर्पूरी ठाकुरक सत्यप्रयाससँ आ अन्तत: मान्यवर डा. श्री सी.पी. ठाकुरक प्रयत्ने राष्ट्रीय क्षितिजपर अपन उचित स्थान पओलक। सुमन, मधुप, किरण, मणिपद्म, प्रबोध, देवनारायण, यात्री आदिक आत्मा जुड़ा उठल हेतनि। सर्वश्री अमर, प्रदीप, वैद्यनाथ चौधरी आदि गोटाक एकटा यज्ञ पूर्णाहुति दिस अग्रसर भेलनि। हिनकालोकनिक संघर्ष सफलता प्राप्त कएलक आ एकबेर फेर नव स्पन्दन मैथिली जगतमे अएलैक। मैथिली पत्रकारिता जगतमे ई स्पन्दन मिथिला दर्शन, पूर्वोत्त मैथिल, विद्यापति टाइम्स, समय-साल, आँकुर, पक्षधर, पूर्वोत्तर मैथिल समाज, कर्णामृत, जखन-तखन, मिथिला-दर्पण, सांध्य गोष्ठी, मिथिलायतन, गामधर, आङन ओ ई-पत्रिका विदेह आदिक माध्यमे विगत वर्षमे मैथिली गतिविधिकेँ समंजित-संयोजि करैत रहल अछि। कलकत्तासँ प्रकाशित मैथिलीक एकमात्र दैनिक मिथिला समाद, स्वदेशक सरणिपर मैथली दैनिकक अवधारणाकेँ सम्पुष्ट करबामे लागल रहल अछि। पक्षधर (स. श्रीसीतांशु कश्यप, राँची) आ मिथिला सृजन (स. श्रीऋृषिवशिष्ठ, मधुबनी) एही वर्षक देन थिक। पोथी प्रणयन ओ प्रकाशनक दिशामे सेहो क्षिप्र गतित्व विगत 2010क उपलब्धि मानल जा सकैछ। प्रकाशक ओ वितरकक सर्वथा अभाव रहतौं मैथिली लेखकलोकनि ग्राहकक परवाहि बिनु केने स्वयं अपन-अपन रचनावलीक प्रकाशनसँ मैथिलीक समृद्धि हेतु प्रतिबद्ध देख पड़लाह। दिल्लीक श्रुति प्रकाशन, सरिसबक साहित्यिकी, दरभंगाक जखन-तखन, पटनाक चेतना समिति ओ शेखर प्रकाशन, एत' धरि जे विद्यापति टाइमसो प्रकाशन आ मिथिला रिसर्च सोसाइटी आदि ऐ यज्ञमे लेखकलोकनिक सहायता-संवर्द्धनामे जुटल देख पड़ल। प्रकाशनक दृष्टिये ऐ वर्षक महत्वपूर्ण प्रकाशन अछि पाँच खण्डमे प्रकाशित रमानाथझा समग्र जकर सम्पादन कएलनि अछि श्रीमोहन भारद्वाज। पाँच हजार मूल्य ई बेछप रचना संचयन मैथिलीक गौरव ग्रन्थ थिक। पूर्वमे श्री गजेन्द्र ठाकुर पाँच हजार टाका मूल्यक जीनोम मैपिंग एक्के खण्डमे प्रकाशित कएने छथि। एकरे सबहक परिणामस्वरूप मैथिली कथा आन्दोलनकेँ समर्पित सगर राति दीप जरय आन्दोलन वर्ष 2010क चारू किस्त, जकर आयोजन क्रमश: श्रीरमाकान्त राय रमा'क संयोजकत्वमे नरहन, समस्तीपुरमे, डा. योगानन्दझाक संयोजकत्वमे कबिलपुर, लहेरियासराय, दरभंगामे, श्री जगदीश प्रसाद मण्डल'क संयोजकत्वमे बेरमा झंझारपुर, मधुबनीमे आ श्रीअरविन्द ठाकुर'क संयोजकत्वमे सुपौल (कोशी क्षेत्र)मे सफलतापूर्वक सम्पन्न भेल आ ऐ अवसरपर पोथीक लोकार्पण-प्रक्रियामे निरन्तरता बनौने रहल जइमे कबिलपुरक मिथिला रिसर्च सोसाइटीक तत्वावधानमे सत्रह गोट पोथी आ एकटा सी.डी.क लोकार्पण कीर्तिमान स्थापित करबा योग्य ऐतिहासिक प्रकृतिक रहल। ऐ अवसरपर लोकार्पित पोथीमे श्रीमती प्रीति ठाकुरक- दू गोट चित्रकथा संग्रह, श्री जगदीश प्रसाद मण्डल'क दूटा उपन्यास (जिनगीक जीत आ उत्थान-पतन) आ एकटा कथा संग्रह गामक जिनगी, श्री गजेन्द्र ठाकुर कृत मिथिलाक पंजी प्रबंध (तारपत्र आदिक डिजिटल इमेजिंग, डी.भी.डी), डॉ. प्रेमशंकर सिंह'क मैथिली भाषा साहित्य: बीसम शताब्दी (अलोचनात्मक निबंध संग्रह) डा. वीणा ठाकुरक भारती उपन्यास, डॉ. मुरलीधर झाक पिलपिलहा गाछ बालकथा संग्रह, डॉ. धीरेन्द्रनाथ मिश्रक समाचार कथा कथा संग्रह, डॉ. अमरनाथ चौधरीक हमरो लेने चलू, कथा संग्रह, डॉ. योगानन्दझाक कथा-लोककथा कथा संग्रह आदि उल्लेखनीय अछि। तहिना बेरमाक 71म सगर राति दीप जरय'क आयोजनक अवसरपर छह गोट पोथी आ दू गोट सी.डी-डी.भी.डी.क लोकार्पण भेल। जइमे श्री जगदीश प्रसाद मंडलक तीन गोट पोथी- जीवन-मरण आ जीवन संघर्ष उपन्यास, बाल-किशोर प्रेरक कथा संग्रह तरेगन, कमलकान्त झा अलका, डाॅ. तारानन्द वियोगीक, प्रलय रहस्य (कविता संग्रह), श्रीपति सिंह निबंध-तरंग (निबंध संग्रह)क लोकार्पण भेल। स्वतंत्रो रूपेँ पोथीक लोकार्पण बरसात होइत रहल जइमे पं. श्रीचन्द्रनाथमिश्र अमर'क अतीत मन्थन ओ पं. श्रीगोविन्द्रझाक जनम अवधि हम आत्मसंस्मरण, डॉ. नीता झाक देश-काल कथा संग्रह, डॉ. महेन्द्र नारायण रामक लोकदर्शन आलोचना, स्व. गोविन्द चौधरीक गोविन्द रचनावली (रचना-संचय), प्रो. उमानाथझाक मैथिली नवीन साहित्य संग्रह, श्रीप्रदीप मैथिलीपुत्रक श्रीसीतावतरण महाकाव्य प्रबन्धक द्वितीय संस्करण, श्रीमकलाकान्त झाक फोँका कविता संग्रह, डाॅ. सुरेन्द्र कुमार सुमनक राधाकृष्ण चौधरीक व्यक्तित्व ओ कृतित्व शोध-ग्रंथ, प्रो. राजाराम प्रसादक मैथिली लोकनाट्य शोधग्रंथ, डॉ. देवकान्त मिश्रक बेनीपुर अनुमंडलमे मैथिली शोधग्रंथ आिदक संगहि अनेकानेक लेखकलोकनिक पोथिक आयोजनपरक लोकार्पण होइत रहल। हरिमोहन झाक सरणिपर गप्प श्रेणीक वस्तुिनर्माण कऽ डाॅ. राम किशोर झा 'विभाकर' एही वर्ष मनीषा मामाक मीमांसा नामक ग्रन्थ प्रकाशित करौलनि। नेपालमे श्रीराम भरेस कापड़ि 'भ्रमर' द्वारा सम्पादित मैथिली नाटक संग्रह ओ स्वरचित नओ गोट एकांकीक संग्रह भैया अएलै अपन सोराज मैथिली नाट्यविधाकेँ युगानुकूल प्रस्तुतिक दृष्टिऍं महत्वपूर्ण सावित भेल। सामान्य अनुवाद प्रणालीसँ हटि कऽ बिना कोनो अनुबन्धक अनुवादकारिताक दृष्टिऍं ऐ वर्षक उपलब्धिमे रेमिका थापा कृत कविता संग्रह देश र अन्य कविताहरूक मैथिली अनुवाद देश आ अन्य कविता सभ दृष्टिपथपर आबि सकल अछि जे श्रीमती मेनका मल्लिकक कृति थिक आ स्वतंत्र रूपेँ अनुवादकारिताक महत्वपूर्ण दिशाबोधक अछि। मैथिली लेखन-प्रकाशनकेँ सम्वर्द्धित करबामे श्री गजेन्द्र ठाकुर प्रयोजित ई-प्रत्रिका विदेह अन्यतम मानल जाए लागल अछि, जकर सदेह (हार्ड काँपी) अंक दू, तीन आ चारि पत्रिकाक चयनित रचना सभसँ कथा, कविता आ प्रबन्ध-समालोचनाकेँ पुस्तकाकार प्रकाशित कऽ ऐ वर्षक प्रारंभमे अपन सामार्थ्यक परिचय दऽ देने छल। महिला सशक्तिकरणक प्रतीक पत्रिका जानकी अपन अस्तित्व अहू वर्ष बनौने रहल। मिथिला दर्पण, बम्बइ, समय-साल ओ घर-बाहर, पटना तथा पक्षधर, राँची अपन अवधि सोपेक्षाताक िनर्वाह कएने रहल। मिथिला दर्पणकेँ श्री हीरेन्द्र कुमार झाक ऊर्जाक लाभ भेटलैक। ऐ वर्ष जे सर्वाधिक प्रशस्त सम्मान मैथिलीकेँ भेटलैक अछि से थिक मैथिलीक वरेण्य कवि ओ महारथी पं. श्रीचन्द्रनाथ मिश्र 'अमर'केँ साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली द्वारा फेलोशिप प्रदान करब। मैथिलीक पालामे ई सम्मान पहिले बेर आएल बूझल जएबाक चाही, जइसँ मिथिला-मैथिली गौवान्वित अनुभव कएलक। श्री अमरकेँ भेटल ई सम्मान हुनका हिन्दीक केदारनाथ सिंह आ अंग्रेजीक खुशवंत सिंहक संगे प्रदान कएल गेलनि अिछ जइसँ मैथिलीकेँ राष्ट्रीय क्षितिजपर आत्मतोषात्मक अनुभूति भेलैक। ओना ऐसँ पूर्व हिन्दी-मैथिलीक जनकवि नागार्जुन-यात्रीकेँ 1955मे ई सम्मान भेटल छलनि मुदा सुच्चा मैथिली लेखक ओ सेवककेँ प्राप्त ऐ बेरूक उपलब्धि मैथिली प्रेमीलोकनि द्वारा मानल गेल। ऐ वर्ष मैथिली-संस्कृतिक विद्वान ओ हिन्दी-मैथिलीक बहुआयामी लेखक डाॅ. तारानन्द वियोगीकेँ साहित्य अकादेमी द्वारा बाल साहित्य 'ई भेटल तँ की भेटल' पर पुरस्कृत कएल गेलनि। जइसँ अभिनव प्रकृति ओ अनुसन्धानात्मक बाल साहित्य लेखन दिस मैथिली साहित्यकारलोकनि प्रेरित भेलाह अछि आ युवा लेखन नव उत्साहक संचारसँ उत्फुलल अछि। हिनक प्रलय-रहस्य कविता संग्रह एही वर्ष प्रकाशित भेलनि। साहित्य अकादेमी द्वारा फूलचन्द्र मिश्र 'रमण' कृत मैथिली विनिबन्ध बुद्धिधारी सिंह 'रमाकर' एही वर्ष प्रकाशमे आबि सहल। डाॅ. रमानन्द झा रमण खोजी पत्रकार जकाँ जर्मन पत्रिकासँ ग्रियसर्न संकलित गीत दीनाभद्रीक ओ गीत नेवारककेँ ताकि-हेरि उद्धार कऽ पं. गोविन्दझाक सानुवाद प्रकाशित करौलनि। उक्त अकादेमी द्वारा तंत्रनाथ झा ओ सुभद्रझाक जन्मशताब्दी सरिसवमे इशनाथ झा, लक्ष्मीपति सिंह ओ भुवनेश्वर सिंह भुवनक जन्म शताब्दी मधुबनीमे तथा यात्री ओ आरसी प्रसाद सिंहक जन्म शताब्दीक अवसरपर राष्ट्रीय संगोष्ठीक आयोजन क्रमश: पटनाक चेतना समिति ओ मुजफ्फरपुरक स्नातकोत्तर मैथिली विभागक तत्वाधानमे सम्पन्न भेल। एही क्रममे प्रगतिशी लेखक संघ द्वारा नागार्जुन-यात्रीक जन्मशती समारोह उल्लेखनीय अछि। अकादेमीक वर्तमान मैथिली प्रतिनिधि डॉ. विद्यानाथ झा 'विदित' एही अवधिमे अपन औपन्यासिक कृति सभ करपुरिया, अनामिकाक चिट्ठी, मात्र तीन घंटाक समय आदिक निरन्तरता ओ विपुलता-बहुसंख्यकताक कारणे प्रतिष्ठापित भेलाह अछि। पूर्वमे पं. श्री गोविन्दझा, पं. श्रीचन्द्रनाथ मिश्र 'अमर' श्री मायानन्द मिश्र, डॉ. रामदेव झा एवं मार्कण्डेय प्रवासीकेँ प्रदत्त 'ऑथर ऐट रेसिडेन्स' सुनबामे आएल जे एही वर्ष डॉ. सुरेश्वर झाकेँ भेटलनि अछि। तुषारपात ई जे मार्कण्डेय प्रवासी सदृश मनीषी कवि, राष्ट्रीयता ओ गीतकाव्यक प्रति समर्पित व्यक्तित्व एही वर्षकेँ अपन महाप्रयाणक हेतु चुनि मैथिलीसँ एक गोट सशक्त रचनाकारकेँ छीन लेलखिन। डॉ. जयकान्त मिश्र ओ पं. जयमन्त मिश्रक निधन सेहो असह्य अशनिपात रहल। ऐ वर्षक अन्यतम उपलब्धि अछि गतिविधियेँ मृतप्राय मैथिली अकादमी, पटनाक पुनर्जागरण। बिहार सरकार ऐ संस्थाक पुनर्गठन कऽ एकर बहुत दिनसँ रिक्त अध्यक्ष पद एक गोट विशिष्ट सेवी श्री कमलाकान्त झाक सशक्त हाथमे प्रदान कएलनि जइसँ मैथिली जगत प्रफुल्लित अनुभव कएलक। श्री झाक अबिते मैथिली अकादमी कायाकल्पक अनुभव कएलक आ अनेको वर्षसँ दबल-पड़ल आधा दर्जन व्याख्यानमालाकेँ ओ पटना आ दरभंगामे आयोजित कए, पुस्तक प्रदर्शनी लगाए लोककेँ एकबेर फेर अकादमीक सुगबुगाहटिसँ परिचय करा देलखिन। अकादमीक खर्चपर चेतना परिसरमे 'पारिजातहरण' नाटकक मंचन एकटा अलगे संदेश दऽ सकल। मैथिली साहित्यक उत्कृष्ट सेवाक हेतु विद्वानलोकनिकेँ सम्मानित करबाक परम्पराकेँ जगजियार करैत अकादेमी एम.एल.एस.एम. काओलेजक मैथिली, ल.ना.मिथिला.विश्वविद्यालयक श्री विभूति आनन्दक हाथेँ सम्मानित कऽ नूतन अध्याय जोड़लक अछि। कीर्तिनारायण मिश्र पुरस्कार ऐबेर महाप्रकाशकेँ प्रदान कएल गेलनि अछि। भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर सेहो ऐ वर्ष मैथिलीक कार्यशालाक आयोजन कऽ मैथिली अनुवादक माध्यमे ऐ भाषाकेँ राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय क्षितिजपर प्रक्षेपित करबाक प्रयास कएलक अछि। एकरा द्वारा विभिन्न पत्रिकाक पोषण ओ अनेक पोथीक क्रय सेहो मैिथली क्षेत्रमे उत्साहक कारण बनल रहल अछि। ऐ वर्ष स्व. हरिवंश 'तरूण', समस्तीपुर संस्थापित ओ अखिल भारतीय साहित्य-सेवाकेँ समर्पित साहित्यक संस्था भारतीय साहित्यकार संसद जै मैथिली रचनाकार-पत्रकारकेँ सम्मानित करबाक िनर्णय लेलक अछि तइमे श्रीविजयनाथ झा, डाॅ. सुरेन्द्र कुमार 'सुमन' ओ िवद्यापति टाइम्सक सम्पादक आ अधिष्ठाता श्री विनोद कुमारक नाम उल्लेखनीय अछि। ज्ञातव्य जे श्री विजयनाथ झाकेँ ऐ वर्ष विहार राष्ट्रभाषा परिषद, पटना सात हजारक लोकभाषा पुरस्कारसँ सम्मानित कए मैथिलीक प्रति अपन आत्मीयताक परिचय अनेक वर्षोपरान्त सम्मानित कए मैथिलीक प्रति अपन आत्मीयताक परिचय अनेक वर्षोपरान्त प्रस्तुत कऽ सकल। विद्यापति सेवा संस्थान, दरभंगा ओ चेतना समिति, पटना अहू वर्ष परम्परिते रूपमे विद्यापति स्मृति-पर्वक आयोजन कऽ संतुष्ट देखल गेल। ऐ वर्ष श्री सोमदेवक रचनावलीपर डाॅ. सुधाकर चौधरीक 'बहुआयामी जनकवि सोमदेव' समालोचनात्मक ग्रन्थ प्रकाशित भेल जे जीवित रचनाकारर लिखल जाइत विरल पोथीक परम्परामे समादृत भेल आ सोमदेवजीकेँ स्वस्ति फाउण्डेशन, सहरसा लाइफ टाइम एचिभमेन्टक आधारपर प्रबोध साहित्य सम्मानक रूपमे एक लाख टाकाक पुरस्कारसँ सम्मानित करबाक हेतु चयनित केलकनि जकर मैथिली साहित्य जगतमे स्वागत भेल अछि। साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली ऐ वर्ष मैथिलीक हेतु मौलिक पुरस्कारक उद्घोषणा तकनीकी व्यवधानक कारणे नै कऽ सकल छल जे आब डॉ. श्रीमती उषा किरण खानकेँ हुनक पोथी भामती नामक उपन्यासपर प्राप्त होएबाक सूचना अछि। मैथिलीक गतिविधिक दृष्टिऍं ऐ वर्ष दिसम्बर बाइस-तेइसकेँ श्री रामभरोस कापड़ि 'भ्रमर'क संयोजकत्वमे काठमांडूमे आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली सम्मेलन सेहो ऐतिहासिक प्रकृतिक कहल जा रहल अछि जइमे नेपालक सम्पूर्ण सत्ता एतए धरि जे राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति सेहो समुपस्थित भऽ मैथिलीक उत्थान-मार्गकेँ प्रशस्त करबाक आश्वासन देलनि। ऐ सम्मेलनमे भारतीय साहित्यकार-कलाकारलोकनिक सेहो पर्याप्त सहभागिता रहल जइमे सर्वश्री वैद्यनाथ चौधरी 'बैजू' चन्द्रेश, कमलकान्त, फुलचन्द्र झा 'प्रवीण' नलिनी चौधरी, कुंजबिहारी िमश्र, रंजना झा, जय प्रकाश चौधरी 'जनक' उषा पासवान आदिक नाओं उल्लेखनीय अछि। नेपाल मैथिलीक तिरहुता लिपिकेँ यूनीकोडमे समाहित करेबाक हेतु दत्तचित अछि, से अलगे प्रसन्नताक विषय थिक। तथापि, भारतीय संविधान, बिहार लोक सेवा आयोग, भारतीय संघ लोकसेवा आयोग सदृश संस्थामे मान्यताप्राप्त मैथिली आइयो प्राथमिक शिक्षामे उपेक्षित अपन आयामक मौलिकता ओ व्यापकताक बाट ताकिये रहल छथि। तँए ने मैथिली-मनीषी पं. श्री अमरजीकेँ लिखए पड़ि रहलनि अछि- फुनगीये दिस ताकि रहल छथि मैथिलीक सभ प्रेमी। घरमे डिबिया मिझा रहल अछि के उकसाओत टेमी? राजेश्वर नेपाली कवि पं. प्रतापनारायण झा कें छठम पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धाञ्जलि पं. प्रताप नारायण झा एकटा उच्च कोटिक साहित्यकार रहथि । मूलतः अध्यापन पेशा मे जीवनक महत्वपूर्ण समय व्यतितकए चुकल ज्योतिषीजी के नाम सँ सुपरिचित ओ लागल यज्ञ आ सीता स्वयम्वर तथा सुकन्या च्यवन दूटा खण्ड काव्यक रचना संगहि अनेक कविता लिखलनि । साहित्यिक प्रतिभावान कवि प्रताप नारायण झा के कवित्वक परिचय हुनक कत्र्तव्य की अछि के जनैछी ? शीर्षक कविता सँ भेटैत अछि । २०५० साल जेष्ठ २८ गते जनकपुरधाम मे नेपाल राजकीय प्रज्ञा प्रतिष्ठान के उपकुलपतिक मदनमणि दीक्षितक प्रमुख आतिथ्य मे भेल वृहत कवि सम्मेलन मे पठित कविताक संग्रह लावाक धान मे ओहि कविता संदर्भ मे डा. रमानन्द झा रमण नेपाल मे मैथिली कविताक धार मे टिप्पणी करैत छथि ः– महेन्द्र विद्याभूषण पं. प्रताप नारायण झाक कविता मे विचारक गाम्भीर्यता आ दर्शक उच्चता स्पष्टतः भाषित होइत अछि ः– केहन ई संसार अछि की हम जनैछी ? के जनैछी ? मात्र स्वार्थे एक दोसर सँ जुटल अछि, सब जनैछी । किन्तु जैखन स्वार्थ मे धक्का लगै अछि खसि पडैछी तदपि बंचवाक आगा बंचना करिते रहैछी । टुटि परैछी लडि उठैछी, अपन आनकी नै बुझैछी तें कहल हम केहन ई संसार अछि से के जनैछी ? कविताक अंत मे कवि लिखै छथि ः– सब देखैछी सब करैछी बेस ततवे सब जनैछी फलक आशा त्याग कय संलग्न मे छी से जनैछी आर की चाही तकर चिन्ता कहां अछि से जनैछी मैथिली संसार अछि कत्र्तव्य की अछि के जनैछी तें कहल हम केहन ई संसार अछि से के जनैछी ? हुनक प्रथम खण्डकाव्य लागल यज्ञ आ सीता स्वयम्बर ऐतिहासिक खण्ड काव्य अछि । सात सर्गक एहिखण्ड काव्यक भूमिका मे त्रिभुवन विश्व विद्यालय केन्द्रीय मैथिली विभागक तत्कालिन अध्यक्ष डा. धीरेश्वर झा धीरेन्द्र लिखने छथि ः– ज्योतिषाचार्य पं. प्रताप नारायण झा जीक सीता स्वयम्बर खण्ड काव्यक अध्ययनक सौभाग्य हमरा प्राप्त भेल । मातृभाषा मैथिली मे रचित ई खण्ड काव्य हुनक प्रथम रचना रहितहुँ अपन प्रौढताक कारणे अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रतीत भेल । एकरा हम नेपाल खण्डक मैथिली साहित्याकाशर्क एक गोट दिव्य नक्षत्र मानैत छी । पण्डितजीक वर्णन तन्मयता तथा अभिव्यक्तिक प्रवाह सर्वज्ञा श्याघनीय अछि । प्रथम सर्ग मे ओ मिथिला वर्णन मे लिखै छथि हिम पहाड सँ दक्षिण भागक अड्ड कलिड्ड बंग सँ पर गंगा हरिहर क्षेत्र सँ उत्तर सदानिरा (नारायणी) सँ पूर्व सगर तँ सिमान्तर्गत क्षेत्रक अछि मिथिला नाम परल सुुन्दर शस्य श्यामला धरा जनकर छै उत्तर नगपति छै भूधर दोसर सर्ग मे राजर्षि जनकक वर्णन करैत ओ लिखै छथि ः– मिथिक मनोहर मिथिला मे पृथ्वी पति श्री राजर्षि जनक देश सुधारल प्रजा खुशाहल सुखमय जीवन छल सभहक त्रेता मे भेल भयंकर अनिकाल आ ओकर समाधान क हेतु यज्ञ करबाक निर्णय पर ओ लिखै छथि – अन्न पानि बिनु बांचि सकत के ऋषि मुनि श्रुति सम्मत वाणी जँ जल्दी वर्षा नहि होयत बांचि सकत नहि केओ प्राणी सभासदक सम्मति सँ पारित भेल यज्ञ होबक चाही लाड्डल यज्ञ करथु राजा, तैखन मेटल रौदिक धाही । तेसर सर्ग मे सीता स्वयक पूर्वक वर्णन करैत ओ लिखै छथि ः– मिथिला ग्न जनक अति प्रभुदित रानी के मन मे नहि चैन । सीता कोना खुशीभय रहती ताहि लेल सदिखन बेचैन ।। ओ आगु शिव धनुषक आसपाल निपल गेल संदर्भ मे लिखै छथिः– एक दिन माय सुनयना कहलिन पूजा घरक ठाँव कयलेव । शिवपिनाक घयल छै तकरो आस पास मे निपिओ देव ।। राजा जनक जखन पूजा ला ऐला देखलनि सकभारी । आई ठाँव के कैलक ऐ ठाँ ऐ तरहे अभिनव कारी ।। सुुनतहि आवि सुनयना बजली देखलनि काज चमत्कारी । जे धनु टस मस होय न कनिको कोना उठा सकली भारी ।। कारण तर मे निपल भूमि छै उपर सँ शिव धनु राखल । सीता केलनि ठाँव कहल हम हुनके ऐ ठाँ ठावक लेल ।। चारिम सर्ग मे धनुषयज्ञ क तयारी आ देश देशान्तरक राजकुमार सब आएल लिखै छथि ः– धनुष यज्ञक हेतु जिनका जाहि काजक भार छल । काज झन पट पूर्ण करवा लय सदा तैयार छल ।। ओहि मे स्वागत सत्कारक क्रममे आगू लिखै छथि ः– चहुदिस सँ लोक सब आ राज रजवारक कुंमर । अपन अपना ढंग के रथ तुरग गज बाहन सुधर ।। आवि रहला आवि गेल छथि वैसला स्वविवेक सँ । जनक सब ठाँ स्वागतारथ सेवको एक एक सँ ।। कथुक किनको त्रुटि नहि हो वस्तु नै छल कहथि के ओ । सब सतत् तैयार रहि घुमितो रहथु केओ कतहु केओ ।। पांचम सर्ग मे धनुष भंगक प्रसंग लिखैछथि ः– परशुराम आ लखन मे किछु काल अटपटभय रहल । तखन श्री रघुवंशमणि मुनि रुप देखैतई कहल ।। वीर हीना हो न बसुधा सत्य शिव सुन्दर सबला । गुरुक आज्ञा पावि शिव धनु सहज भावे कर गहल । भूमि सँ उपर उठवितँह टुटि कय धनु खसि परल ।। ओ आगू स्वयम्बरक क्रम मे लिखै छथि ः– तेहि समय सीता माला लय सखि संग ऐली झट तहाँ । श्री धनुषधारी नृपति मणि श्री राम डाढ तथि जहाँ ।। फूल वर्षा भेल नभ एँ मांगलिक बाजा बजल । दिग दिगन्तो धरि प्रवल जयकार ध्वनि गुन्जिते रहला ।। छठम सर्ग मे राम सीताक विवाहक प्रसंग लिखै छथि ः– हर्षमय वातावरण तेहि काल सँ सबठाँ रहला जनक विश्वमित्र सँ शुभ लग्न हेतुक जा पुछला ।। गाधि सुत तेहि काल से राजा जनक सँ कहि देला । अवधपति के नौत पोताक लिखि दिअनु वरियात ला ।। मास अगहन पंचमी तिथि शुक्ल पक्षक नीक छै । अवधपति के चारु पुत कें परिणयन होयवाक छै ।। ओ सर्गक अंत मे तैयारी के संदर्भ मे लिखै छथि ः– अपन काजक सब रखने छलै अपने उपर । देल काजक भार कब कत्त पूर्ण होवय बिना डर ।। ऐ प्रकारे जनकपुर नगरक सजायल वेश छल । प्रजा राजा सब जुटल सुरनर नाम किन्नर यक्ष सब । मैथिलीक परिणयन बुझि प्राकृतिक सौन्दयो कहबा ।। अंतिम सातम सर्ग मे कन्या दलक संदर्भ में लिखै छथि ः– गुरु बशिष्ठक कथन अनुकूले सकल पूर्वाड्ड सब । सदानन्द पुरोहितक आसन पकरि विधि करथि सब ।। कोनो वस्तुत कभी ककरो मैथिलीक दिस सँ ने भेल । समय जखनुक छलै तैखन सिन्दुरक शुभदान भेला गगन सँ सुरवालिका सब पुष्प वर्षा कय रहला मांगलिक सुरतान लय सँ गीत मंगल गा रहला ।। एहि तरहे सात सर्गक सीता स्वयम्बर खण्ड काव्य कविक मौलिक कृति छैन्हि । २०५२ साल मे कवि द्वारा प्रकाशित एहि खण्ड काव्यक लगले २०५३ साल वैशाख मे सुकन्या च्यपन दोसर खण्ड काव्य हुनक प्रकाशित भेल । सात सर्गक एहो खण्ड काव्य बहुत सुन्दर अछि महोत्तरी जिलाक सकरी ग्राम मे १९८० साल मार्ग शुक्ल दशमी १८ गते हुनक जन्म भेलनि आ ज्योतिष गणिताचार्य एवं फलित शास्त्री ज्योतिषी जी २००७ साल मे प्रजातन्त्र से पूर्वहि सप्तरी के एकटा संस्कृत विद्यालयक शिक्षक के रुप मे अध्यापन सेवा आरंभ कएलनि आ मटिहानीक श्रीराम माविक प्रधानाध्यापक पद स २०४३ साल मे सेवा निवृत भेल रहथि आ ओकर बाद २०६० साल पुस १५ गते निधन पर्यन्त जनकपुरधाम मे विश्वकर्मा चौक सँ दक्षिण मे अपन छोटछिन घर मे रहैत ज्योतिष कार्य तथा साहित्य साधना मे लागल रहलथि । अपन छत्तीस वर्षक अध्यापन सेवा मे रहैत ओ २०२३ साल मे जनसेवा पदक २०२५ मे महेन्द्र विद्याभूषण, २०३६ के शिक्षा दिवस पर पुरस्कृत भेल रहथि आ २०३७ मे दीर्घ सेवा पदक तथा २०३७ सँ २०४० धरि जिला शिक्षा समितिक सदस्य रहथि । पंडित जी मातृभाषा मैथिलीक संगहि हिन्दी मे दर्जनो भजन आ कविता लिखने छथि । उनकर छठम पुण्य तिथिक अवसर पर हुनक स्वर्गीय आत्मा के चिरशान्ति हेतु हार्दिक श्रद्धाञ्जलि अर्पण करैत छियन्हि । बिपिन झा ग्रन्थ समीक्षा- 'महाराज महेश ठाकुर ओ कंकाली भगवती' ग्रन्थक परिचय एवं विभाग- शीर्षक- 'महाराज महेश ठाकुर ओ कंकाली भगवती' लेखक- डा० शान्ति सिंह ठाकुर प्रकाशक- कंकाली संघ राजग्राम प्रकाशन वर्ष- २०१० विभाग- आशीर्वचन- श्री जगदीश मिश्र सम्मति- डा० किशोरनाथ झा पोथीक प्रसंग- लेखक स्वयं १. महाराज महेश ठाकुर ो हुनक गाम २. म.म. महेश ठाकुर क पारिवारिक ो शैक्षिक परुष्टभूमि ३. महेश ठाकुरक जीवन सं सम्बद्ध तथ्य ४. राज्यप्राप्तिक ेवं कंकाली भगवतीक ाविर्भाव ५. कंकाली माहात्म्य ६. राजग्रामस्थित कंकाली परिसर परिशिष्ट दरिभंगास्थ महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह स्मारक महाविद्यालयीय मैथिली समाराधनतत्पर खण्डवलाकुलसमुद्भूत डा० श्री शान्तिनाथ सिंह ठाकुर द्वारा निबद्धग्रन्थ अछि -'महाराज महेश्वर सिंह ओ कंकालीभगवती| ई ग्रन्थ वर्ष २०१० में कंकाली संघ राजग्राम द्वारा प्रकाशित एकटा ऐतिहासिक ग्रन्थ अछि जे स्वरूपतः त& 'भौर' ग्राम आ मैथिल राजवंश केर गौरवमयी आभाक परिचय दैत अछि प्रच्छन्नरूप स ई ग्रन्थ आस्था ओ तर्क केर मंजुल प्रयोगक दर्शन करवैत प्रातःकालीन भगवान भाष्कर समान मिथिलाराजवंश केर सांस्कृतिक स्वर्णिम युगक केर दर्शन करवैत नीतिशतक केर पद्य 'कालक्रमेण जगतः परिवर्तमाना...'' के चरितार्थ करवैत प्रत्यक्षानुलम्बी, इतरप्रमाणविस्मरुत मूल्यविहीन आधुनिक समाज सँऽ अस्ताचलरूपिणी संस्करुति कें नवजीवन प्रदान करवाक हेतु अनुनय करैत बुझना जाइत अछि जे चीत्कार कय ई कहि रहल अछि जे हे मनुज स्मरण करू ओहि कीर्तिस्तम्भ के जेकर समक्ष भारतवर्षक राष्ट्राधीश सेहो नतमस्तक रहल अछि, आगू बढाउ ओहि गरिमा के मिथिला के इतिहास लिखत | ई त ध्रुव सत्य अछि जे एक दिन सभकिछु काल केर गाल मे विलीन भय जायत | एहि भौतिक जगत मे कोनो वस्तु संस्था अथवा कोनो समाज शाश्वत नहिं कहल जा सकैत अछि। ओ डायनासोर हो अथवा हडप्पा, मेसोपोटामिया अथवा कोनो लुप्तप्राय सम्प्रदाय सभ एक न एक दिन कालक गाल मे विलीन भय जायत ई ध्रुव सत्य अछि। एहि प्रसंग मे यक्ष-युधिष्ठिर संवाद समीचीन प्रतीत होइत अछि- यक्ष-युधिष्ठिर सम्वाद मे कहल गेल अछि जे- प्रतिदिन जीव मृत्यु कॆं प्राप्त करैत अछि मुदा ओतहि अन्य लोक ई बुझितो एतहि रहबाक इच्छा करैत अछि। एहि सँऽ आश्चर्य की भय सकैत छैक? समीक्षा केर संकल्प, उद्देश्य आ विषयवस्तु- संकल्प- सतत अध्यवसायरत रहबाक क्रम में यदि कोनो नीक ग्रन्थ अनायास सुलभ भय जाय त& आनन्द स्वाभाविक छैक तहू में एहेन ग्रन्थ जे आस्था केर समक्ष तर्क के अथवा तर्कक समक्ष आस्था केर अवहेलना नहिं करैत हो| एहि ग्रन्थक प्रसंगशः उद्धरण, समुचित सन्दर्भ आदि एकर विश्वसनीयता केर प्रमाण अछि| ई सभ किछु कारण छल जे एहि ग्रन्थ दिस विशेष रुचि भेल| उद्देश्य- काव्यप्रकाश में कहल गेल अछि प्रयोजनमनुद्दिश्य मन्दो&पि न प्रवर्तते अस्तु समीक्षा केर उद्देश्य लिखब उचित बुझनाजाइत अछि- एकटा अभिनव ओ विश्वसनीय स्रोत केर जानकारी अधेyता केर समक्ष प्रस्तुत करब| आ संगहि अपन किछु मूल भूत प्रश्न केर उत्तर प्राप्त करबाक प्रयास[1]| विषयवस्तु- एहि समीक्षा में जेकर अंगीकार कयल जा रहल अछि ओ विषय वस्तु अछि- १.ग्रन्थक विभागश: संक्षिप्त परिचय २. ग्रन्थक वैशिष्ट्य २.१ ास्थागत - २.२ तर्कगत (शोध) - ३. ग्रन्थक न्यूनता ३.१ ास्थागत - ३.२ तर्कगत (शोध) - ४. ग्रन्थक ुपादेयता व्यावहारिक रूप में अन्य विविध पक्ष ५. दोषपरिहाराथ सम्भव ुपाय ा ौकित्यविमर्श| शुभमस्तु _______________________________________ [1] श्रोत्रिय समाजक आरम्भ के कयलथि? ई समाज कियाक अस्तित्व मे आयल? एकर संस्कृति की अछि? एकर विधि व्यवहार आदि शास्त्रसम्मत अछि अथवा मात्र परम्परा केर निर्वहण अभिप्राय रहि गेल? यदि शास्त्रसम्मत अछि तऽ कोन ग्रन्थ मे एकर चर्चा अछि? ओहि ग्रन्थ केर प्रामाणिकता निर्विवाद अछि अथवा नहिं? जाति, कुल, पाँजि, मूल, गोत्र की थीक? एकर की औचित्य छल? यदि औचित्य छल तऽ आब एकर अनौचित्य कोना निर्धारित भेल जा रहल अछि? श्रोत्रिय समाज सँ सन्दर्भित उक्त चर्चित किछु एहेन मूलभूत प्रश्न अछि जे आवश्यक अछि एहि समाजक Documentation हेतु।’सारस्वत-निकेतनम्’ जे कि संस्कृत आ अपन संस्कृतिक अभ्युत्थान हेतु सतत् समर्पित अछि, अपन श्रोत्रिय समाज सन्दर्भित मूल स्रोतक आ एकर अक्षुण्ण संस्कृति केर विविध पक्षक Documentation करय जा रहल अछि। एहि कार्य मे अपनें सभ सँऽ विशेषकर एहि समाजक इतिहासक ज्ञाता बुजुर्ग आ सक्रिय युवा कें सहयोगक सर्वथा अपेक्षा अछि। यदि उक्त सन्दर्भ मे कोनो जानकारी उपलब्ध करा (kumarvipin.jha@gmail.com) सकी तऽ एहि विशाल यज्ञ मे एकटा आहूति सदृश होयत। ग्रन्थ समीक्षा-प्रकृति परिक्रमा काव्यप्रकाशकार आचार्य मम्मट ’भारती कवेर्जयति’ क माध्यम सँ रचनाकारक प्रतिभा दिस जे अपन मन्तव्य इंगित कयने छथि ओ आचार्य पुण्यनाथ मिश्रक अनुपम कृति ’प्रकृति-परिक्रमा केर सन्दर्भ मे अक्षरशः चरितार्थ होइत अछि। ई ग्रन्थ ’मिश्रबन्धु प्रकाशन, मधुबनी’ सँ २००८ मे प्रकाशित भेल अछि एकर लेखक आचार्य पुण्यनाथ मिश्र आ सम्पादक डा० मोहनाथ मिश्र छथि। वर्तमान समय मे संचारक सुगमता अथवा अन्यान्य कारण सँ पुस्तकक प्रकाशन ’असंख्य’ परिमाण मे परिगणित कयल जा सकैत अछि; मुदा किछुए ग्रन्थ एहेन प्राप्त होइत अछि जे चिरंजीवित्वक प्राप्ति करैत अछि जेकर निकष ओहि ग्रन्थक गहन एवं परिपाक विषयवस्तुक समावेश आओर सहज प्रस्तुती करण प्रभृति स्वीकार कयल जाइत अछि। प्रकृत ग्रन्थ प्रकृतिक यथार्थरूप हमरालोकनिक समक्ष उपस्थापित करैत अछि। ग्रन्थक प्रथम तरंग मन तथा आत्मा केर सन्दर्भ ओ पारस्परिक सम्बन्धक निरूपण, द्वितीय तरंग प्रकृतिक ’आठ’ संख्यात्मक विविध अंगक मीमांसा, चतुर्थ तरंग गर्भ मे विद्यमान सन्तानक गुणादि अभिवृद्धि सन्दर्भ मे माता-पिताक कर्तव्यक चर्चा, पंचम तरंग नवजात, दोहदकर्मक मीमांसा, षष्ठम तरंग प्रकृतिक व्यापक रूप अर्थात ब्रह्माण्ड सन्दर्भ लैत सत्यम शिवम ओ सुन्दरमक विवेचना प्रस्तुत करैत अछि। एहि ग्रन्थक अवलोकन सँ पूर्व पारदशास्त्रक अध्ययन करबाक अवसर प्राप्त भेल छल संगहि श्रीलंकावासी मित्रक शोधग्रन्थ पढवाक जिज्ञासा आयुर्वेदक गूढ रहस्यक सन्दर्भ मे प्रवृत्त कयलक। ई संयोग कहल जा सकैत अछि जे प्रकृत ग्रन्थ हस्तगत भय सकल। श्रोत्रिय समाजमे रक्तबीजक जन्म श्रोत्रिय समाज कर्तव्यपरायणता, शुचिता आदि केर कारण विशेषरूप स मिथिला में सर्वथा आदरणीय एवं सिरमौर रहल अछि। किछु घर सँऽ प्रारंभ ई समाज यद्यपि आइयो उँगरी पर गिनल परिबार केर समूह अछि किन्तु ई समाज आनुपातिक दृष्टि स जतेक भारतीय ज्ञानपरम्परा के उत्कर्ष में योगदान देलक ओ अनुपमे अछि। संगहि ई समाज व्यावहारिक रूप सँ अपन शुचिता कायमे रखलक। काल सभ स पैघ होइत अछि। समाज केर निर्माण आ नाश दूनू ओहि समाजक सदस्ये द्वारा होइत छैक। जे समाज अखनहु आधुनिक आ वैश्विक धरातल सँऽ आ स्वयं के वैश्विक गतिविधि सँ समाजक उत्थान कय राष्ट्र केर उत्थान केर दिशा में अग्रसर रहल अछि ओतहि किछु अनचिनहार कारणवश ओ समाज अपन अस्तित्व मेटेबाक हेतु कटिबद्ध जकां बुझना जाइत अछि। हमेर एहि लेखन केर औचित्य ई अछि जे समाज के कोना बचायल जाय एहि पर लोकक ध्यानाकर्षित करब। ई एहेन समाज अछि जतय अखनहु बहुत रास कुरीति अन्य समाज सँ उधारी नहि लेल गेल अछि। मुदा समेसामेयिक परिप्रेक्ष्य में आनुपातिक दृष्टि सँऽ पारिवारिक विखण्डन आ अशान्ति एहि समाज में रक्तबीज तुल्य प्रसरित अछि!! कियाक??? कदाचित ई प्रश्न बुजुर्ग आ युवावर्ग दुनू कें कटूक्ति लगतन्हि मुदा समाजक उत्कर्ष हेतु दुनू के ध्यान देनाई आत्यावश्यक छन्हि। विवाह केर प्राचीन स्वरूप सामान्य रूप स 'पूर्वनियोजित ' छल कालान्तर में ई दूटा भय गेल 'पूर्वनियोजित' आ 'स्वैच्छिक’। समेस्या वाइरस जका दुनू में प्रवेश कय गेल अछि। कारण अछि मेहत्त्वाकांक्षा, संवादहीनता, संवेदनहीनता आ नैतिकता केर पतन आदि। १. स्वेच्छाचारिता- ई कोनो युवा/युवती द्वारा कियाक कयल जाइत अछि ई प्रश्न कठिन मुदा उत्तर सरल अछि- मेहत्त्वाकांक्षा, सामाजिकचेतना केर अभाव, संवेदनहीनता, आत्मेसुखक वरीयता, नैतिकता केर ह्रास। स्वेच्छाचारिता उचित अथवा अनुचित? जाहि समाज रूपी वृक्ष के हमेर पूर्वज संस्कार रूपी जल स अभिसिंचित कयलथि ओकरा अक्षुण्ण रखबाक हेतु ई अवश्य घातक अछि। मुदा जे व्यक्ति एहि तथाकथित संकुचित विचार सं ऊपर उठि चुकल छथि हुनका हेतु उचित। कियाक त ओहि सर्वोच्च स्तर पर नहि त कोनो विवाह रूपी संस्था के आवश्यकता छैक न देश काल पात्र के बन्धन। समेस्या कतय अछि? समेस्या अछि वैचारिक संकरता में। कोनो एक पक्ष स्वीकार करबाक चाही। सुर्सुर-मुरमुर दुनू त उचित नहि। यदि हमे एतेक तथाकथित सभ्य आ शिक्षित भय गेलहुं कि समाजक संस्कार संकीर्ण लगैत अछि त पूर्णतः पाश्चात्य विचार केर अनुगमेन करब उचित। एतय हमे बुजुर्ग के पूछय चाहैत छियन्हि जे सामान्यतया स्त्री के सन्दर्भ में अपन सामाजिक विवशता के दुहाई आ पुरुष के विषय में उदारवादी प्रवृत्ति कियाक?? एकदीस सोलहमे सदी दोसर दीस बाइसमे सदी कियाक? २. पूर्वनियोजित विवाह- सामान्यतया एहेन देखल जा रहल अछि जे पूर्वनियोजित विवाह पर सेहो प्रश्नचिह्न लागि जाइत अछि जेकर परिणति होइत अछि विच्छेद, विच्छेदक स्थिति अथवा आजन्मे केर लेल पश्चात्ताप आ समाज सँ शिकायत। कारण- बुजुर्ग द्वारा अपन सन्तान के व्यावहारिकतया नैतिकता ओकर पसन्द नापसन्द के प्रति अनवधानता।, वाल्यावस्था स बच्चा के समाज स दूर राखब।, नैतिकता केर व्यावहारिक प्रयोग नहिं होयब।, मेहत्त्वाकांक्षा आ वस्तुस्थिति में असामंजस्य होयब।, अनावश्यक प्रदर्शन अर्थात् बाह्याडम्बर।, अपन सामाजिक स्थिति के भावी दम्पति पर प्रक्षेपण।, समाज स दूर रहब फलतः समाजक मेहत्व के नहि बुझब अस्तु शारीरिक/आर्थिक/मेहत्वाकांक्षीय कारक के मेहत्व देब।, अपन पक्ष में रखबा में संकोच।, अपन अन्तर्मेनक अपेक्षा तथाकथित सभ्य समाजक गप्प सुनब।, दम्पतिक आपसी सम्बन्ध में अन्य/परिवारक हस्तक्षेप करब।, संवेदनशून्यता केर परिचय। ई लेख यद्यपि कोनो परिवर्तन नहिं आनत मुदा सूतल समाज के एकटा अलार्मे अवश्य देत ।जे ई अलार्मे सुनि उठब त ठीक नहि उठब त कोनो बात नहिं आठ बजे त उठबे करब। तावत धरि बहुत देरी भय चुकल रहत। (आलेखमेे देल विचार लेखकक निजी विचार छन्हि।- सम्पादक) जनमानस हेतु प्रत्यभिज्ञादर्शनक वैशिष्ट्य जा धरि भारतीय ज्ञान परम्पराक चर्चा नहि कयल जाइत अछि ता धरि ’ज्ञान’ पदक विवरण सम्पूर्ण नहिं होइत अछि। पुनश्च यदि भारतीय ज्ञानपरम्पराक चर्चा करी तऽ काश्मीर शैवदर्शनक चर्चाक बिना ई अधूरा रहत। तेरहम शताब्दीक बाद एकर परिगणना विद्वान सभ भारतीय दर्शन के अन्तर्गत केनाई बन्द कय देलथि कियाक तऽ सभक दृष्टि संकुचित भय मात्र छ टा दर्शन के आस्तीक आ तीन टा दर्शन के नास्तीक के रूप में प्रतिष्ठित करवा में व्यस्त भय गेलन्हि। वस्तुतः काश्मीर शैवदर्शन (एकरे अपरनाम प्रत्यभिज्ञादर्शन अछि) कऽ परम्परा एतेक समृद्ध अछि जे अभिनवगुप्त पाणिनि सदृश विद्वान के प्रतिष्ठित कयलक अछि। काश्मीर शैवदर्शनक विकास आठम सदी सँऽ बारहम सदी केर मध्य भेल। ई दर्श पूर्णतः व्यावहारिक पक्षपर बल दैत रहल अछि। एहि दर्शन में मूल तत्त्व के रूप में परमशिव कें स्वीकार कयल गेल अछि। सम्पूर्ण चराचरजगत शिवरूप अछि ई एहि दर्शनक मूल धारणा छैक। कुल ३२ तत्त्व के स्वीकृत भेटल अछि- · शिव · शक्ति · सद्विद्या · ईश्वर · मायाè कला, विद्या, राग, काल, नियति · पुरुष · प्रकृति è ( पंच तन्मात्रा, पंच ज्ञानेन्द्रिय, पंच कर्मेन्द्रिय, मन, पंच महाभूत) एहिठाम प्रश्न उठनाई स्वाभाविक छैक जे सम्पूर्ण चराचर जगत शिवरूप केना भय सकैत छैक जखनि कि व्यवहार में पार्थक्य स्पष्टतः दृष्टिगत होइत अछि। एकर समाधान एहि दर्शनक तत्त्वमीमांसा करैत अछि जे ई स्पष्ट करैत अछि जे जतेक मात्रा में वस्तु वा व्यक्ति मलाच्छादित होइछ तावत मात्रा में ओ न्यूनरूप में प्रकाशित होइछ। एहि क्रमक विवेचन हेतु विशद रूप सँ प्रकाश-विमर्श आ आणव कार्म तथा मायीय मल केर चर्चा कयल गेल अछि जे एहि दर्शनक अनुपम ग्रन्थ ’श्रीतन्त्रालोक’ में सुलभ अछि। एतय पुनः प्रश्न अछि जे जन सामान्य हेतु एहि दर्शनक की उपादेयता? एहि प्रश्नक समाधान करैत ई दर्शन कहैत अछि जे सर्वप्रथम तऽ आत्मविश्वास राखी जे हम स्वयं ओ परम सत्ता छी हमरा सँ कोनो कार्य असम्भव नहिं। अस्तु निराशा क कतहु स्थान नहि। अही संग दोसर संदेश ई छैक जे विभिन्न मल के दूर करवाक यत्न करी जाहि सँ शिवोऽहं केर भाव आवि सकय। अस्तु एहि तरहें ई कहल जा सकैत अछि जे ई दर्शन अपन दार्शनिक मर्यादा रखितो जनमानस केर व्यावहारिक समस्या दिस विशेष ध्यान दैत अछि। ॥ कथं ’संस्कृतं’ संस्कृतम् ॥ (विशिष्टभाषाक रूप मे संस्कृत:- एक विमर्श) संसारक प्राचीनतम उल्लिखित भाषाक रूप मे संस्कृत प्रथित अछि। संस्कृत शब्द दू शब्द “सम्” (अर्थात्, सम्पूर्ण) और “कृतम्” (अर्थात्, कयल गेल) (सम्+कृ+क्त) सऽ मिलकें बनल अछि| एहि शब्द कअर्थ होइत अछि- सम्पूर्ण, त्रुटिहीन| अन्यान्य भाषाक नामकरण क्षेत्रादिक नाम पर कयल गेल अछिमुदा संस्कृतक नामकरणक हेतु एकर संस्कारयुक्त होयब छैक। एतय संस्कारयुक्त होयबाक तात्पर्य एकरपरिष्कृत व्याकरण, सरलता एवं वैज्ञानिकता छैक। संस्कृत कें विशिष्ट स्थान प्रदान करय बला किछुअन्यान्य कारक सेहो छैक जेकरा अधोलिखित बिन्दुक माध्यम सऽ निर्दिष्ट कयल जा सकैत अछि- • भाषावैज्ञानिक अध्ययन मे एकर प्रभूत योगदान (सन्दर्भ हेतु ऋग्वेद १/१६४/४५, ४/५८/३,१०/७१/१-२-३, १०/११४/८, यजुर्वेद १९/७७, अथर्ववेद९/१०/२-२१ द्रष्टव्य)। • प्रमुख प्राचीन ज्ञान-विज्ञान, कला, पुराण, काव्य, नाटक आदिपरक ग्रन्थक संस्कृत मे निबद्धता। • हिन्दू धर्मक लगभग सबटा धर्मग्रन्थ संस्कृते मे निबद्ध अछि। • एकताकऽ शिक्षा देनाई। • संस्कृत भाषा क व्याकरण अत्यन्त परिमार्जित एवं वैज्ञानिक अछि। संस्कृत हेतु प्रथितव्याकरण अछि पाणिनि अष्टाध्यायी जे एकरा कम्प्यूटर फ्रेण्डली भाषा होयबा मे योगदानदेलकैक। संस्कृत भाषा कऽ वैशिष्ट्य- • अक्षर कऽ उच्चारण- संस्कृत मे प्रत्येकव्यंजनक उच्चारण हेतु स्वरक योग सर्वथा अपेक्षित रहैत छैक। संगहि उच्चारणकवैशिष्ट्य ई अछि जे कतहु व्यतिक्रम नहि होइत अछि। उदाहरण हेतु ’अ’ कऽ १८ भेद होइत अछि।व्यतिक्रम नहिं भेलाक कारणे उच्चारण वैषम्य नहिं दृष्टिगत होइत अछि। एहि भाषाक विपरीत आंग्लआदि मे ई व्यतिक्रम स्पष्टतः दष्टिगत होइत अछि। उदाहरणतः come (कम) और coma(कोमा) मे‘co’ क दू टा भिन्न भिन्न उच्चारण भेटैत अछि| • संस्कृत शब्दक निर्माण- संस्कृत मे धातु-रूप, शब्द-रूप, प्रत्यय, उपसर्ग, और सन्धि आदिक सहायता सँऽ नवीन शब्द कनिर्माण सरल अछि| संस्कृत मे शब्दो क निर्माण पूर्णतः वैज्ञानिक ढंग सँऽ कयल जाइत अछि|। • व्याकरण- एकर व्याकरण आओर वर्णमाला कऽ वैज्ञानिकता क कारण सर्वश्रेष्ठता स्वयंसिद्ध अछि। प्राचीनकाल हो या आधुनिक काल, उत्तर भारत हो या दक्षिण भारत, संस्कृत का व्याकरण अपरिवर्तित रहलअछि| • प्राचीनता वैदिक ग्रन्थक प्राचीनता निर्विवाद रूप सँ स्वीकृत अछि। अस्तु संस्कृत हजारो वर्ष पहिने सविद्यमान अछि। • संस्कारित भाषा- संस्कृत केवल स्वविकसित भाषा नहीं थीक, अपितु संस्कारित भाषा अछिएहि कारण एकर नामसंस्कृत अछि। संस्कृत कऽ संस्कारित करय बला छथि महर्षि पाणिनि; महर्षि कात्यायिनि और योगशास्त्र क प्रणेता महर्षि पतंजलि । • सरल भाषा- सामान्य रूप सँऽ संस्कृत वाक्य मे शब्द कें कोनो क्रम मे रखल जा सकैत छैक। जाहि सँऽ अर्थकअनर्थ नहिं होइत छैक। ई एहि कारण संभव छैक जे एतय प्रत्येक पद वैज्ञानिक तरीका (समुचितविभक्ति आदिक संग) सँ राखल गेल होइत छैक।उदाहरणतः – अहं गृहं गच्छामि या गच्छामि गृहंअहम् दुनू ठीक छैक। • त्रुटिहीन भाषा- ई भाषा संगणक आओर कृत्रिम बुद्धि क लेल सबसँऽ उपयुक्त भाषा मानल जाइत अछि। संस्कृतव्याकरण तर्कशास्त्रीय दृष्टि सँऽ उपयुक्त अछि अस्तु मशीनक भाषाक लेल पूर्णतः उपयुक्त अछि| Forbes magazine, (July, 1987) केर अनुसार “Sanskrit is the most convenient language for computer software programming.” [ref - http://www.stephen-knapp.com/indian_contributions_to_american_progress.htm] • मष्तिष्क विकास आधुनिक शोध सँऽ ई स्पष्ट अछि जे संस्कृतक अध्ययन स मानसिक दृढता और स्मरणशक्तिकविकास होइत अछि। [ref-http://www.galendobbs.com/theck/sanskrit.html] • एकताक निर्वाहक- संस्कृते एहेन भाषा अछि जे भाषाविवाद कें प्रश्रय नहिं दैत अछि। ई एकता केर गीत सुनवैत अछि। अस्तु उक्त विविध बिदुक माध्यम सँऽ एतेक निर्विवाद अछि जे संस्कृत विशिष्ट भाषाक रूप मे विद्यमान अछि। एकटा प्रवाद सतत सुनवा मे अबैत अछि जे संस्कृत आब मृतप्राय अछि; एहि सन्दर्भ मे विभिन्न सन्दर्भक संग भ्रान्ति दूर करबाक प्रयास करब हम आगामी लेख मे। ता धरि विभिन्न राजनेता द्वारा संस्कृत मे शपथग्रहण करब, संस्कृत लेल जनमानस द्वारा समस्त वसुधाक अखण्ड मानैत कयल जारहल प्रयास आदि अपनें लोकनि कें उक्त प्रवादक जाल मे फँसवा सऽ वारित करत संगहिhttp://sanskritam.ning.com/ ई अन्तर्जाल श्रोत संस्कृतक जीवन्तताक झांकी प्रस्तुत करत। बिपिनझाhttp://sites.google.com/site/bipinsnjha/home ये बान्धवाऽबान्धवा वा। दियाबाती दीपक पर्व थीक। बहुतो व्यक्ति एहेन हेतथि जे अपन गाम सँ दूर नगर आ महानगरमे आबि अपन कार्य मे व्यस्त भय गाम-घरक दियाबाती कऽ संवेदनात्मक स्मृतिमात्र अपन मन मेसंयोजित राखि सन्तोष कयलैत हेतथि। आखिर गाम क दियाबाती आ एहि महानगर कऽ दिवाली मेअन्तर की छैक जेकर भेदक अनुभूति होइत छैक? महानगर मे तऽ चहू दिस बिजली क सजावट आ पटाखा आदि उपलब्ध रहैत अछि जे सहजता सँ गाम मे अखनो धरि उपलब्ध भेनाइ कदाचित कठिने अछि। ताहू मे मूलतः बिजली कऽ सहजता सँ पर्याप्त उपलब्धता नहि भेलाक कारण गाम आ महानगरक तुलने करब अनुचित होयत। मुदा तइयो महानगरीय दिवाली क चमकदार उल्लास सँ अधिक आनन्द ओ मधिम इजोत बला गामक दियाबातीक स्मृति दैत अछि। यदि एकर कारण देखल जाय तऽ देखैत छी जे एक तऽ महानगरक यान्त्रिक जीवन एहि उल्लास कें न्यून कय दैत अछि आ दोसर मानवीयताक ह्रास अ ओ औपचारिकताक आधिक्य संवेदनात्मक अनुभूति करेवा मे असमर्थ सिद्ध होइत अछि। किन्तु आशय ई नहि जे ई समस्या गामक परिदृश्य मे सर्वथा नहि अछि वा महानगरीय जीवन सर्वथा त्याज्य अछि। कहबाक आशय मात्र एतेक अछि जे सापेक्ष दृष्टि सँ गाम तीव्रगति सँ बदलैत एहि समयचक्र मे संवेदनात्मक पक्ष कें रक्षा करवा मे अखनहुं समर्थ अछि। हम गामक दियाबाती आइयो ओहिना याद करैत छी। लक्ष्मी पूजा कऽ बाद ऊक प्रज्ज्वलन होइत छलैक। सामान्यतया ओहि राति कालीपूजनोत्सव सेहो होइत छैक अस्तु ओकरो आनन्द लैत छलहुं। ऊक प्रज्ज्वलन आदि न केवल परंपराक निर्वहण मात्र होइत छैक अपितु पारिवारिक सदस्यक मध्य हार्दिक सामीपता क कारण सेहो होइत छैक। दीप विशॆष रूप सँ कीटनाशक रूप मे प्रथित अछि। पटाखा आदिक आधिक्य तऽ गामो मे बढि रहल छैक मुदा अखनहुं सीमिते कहल जाय। हम गामक एकटा घटना कऽ स्मरण कय विशेष रूप सँ गामक दिवाली स्मरण करैत छी। घटना करीबन १३ साल पहिलका अछि। १ टा महिला अपन सभ सन्तानक निमित्त दीप दय रहल छलथि। १टा बच्चा पुछलकैन – काकी अहां ई दीप दियाबाती दिन अलग से किया दैत छियैक…….? महिला भावुक भय कहलथि- अपन बच्चा सभ लऽ। ओ बच्चा फेर बाजल- अहां के तऽ…आ ई चारिम केकरा लऽ? ओ और भावुक भय गेली किन्तु बच्चा के किछु नहिं कहलखिन। हम ओहि समय अपन काज सँ हुनका लग गेल रही। बच्चा क ओ अनुत्तरित प्रश्न हमरा जिज्ञासित करय लागल। किछु दिन बाद हम हुनका सँ एकर चर्चा केलियन्हि। ओ कहलथि- अपन बौआ कऽ लेल (हुनकर आठ बर्खक बेटा मरि गेल छलन्हि )। हम एहि सँ पहिने अनेको बेर अपन बाबा कऽ मुँह सँ तर्पण काल मे ई सुनने रही- ये बान्धवाऽबान्धवा वा….। अर्थात जे कोनो पितर एहेन होथि जिनका कोई जल देन्हार नहि छथीन्ह हुनको तृप्ति होन्हि, एहि निमित्त हम ई जल दय रहल छी। कहबाक भाव मात्र एतेक अछि जे गामक प्रत्येक परंपरा चाहे ओ दिवाली पर्व हो वा अन्य, मानव के स्नेहबन्ध मे रखबाक, आ पारस्परिक सौहार्द्रता एवं कर्तव्यबोध निमित्त होइत अछि। एहि के प्रत्युत महानगरीय परंपरा ’सेलिब्रेट’ करबाक बहाना मात्र दैत अछि। ओ महिला बहुत नीक जकां बुझैत हेथीन्ह जे ओ बेटा संग हुनक संबन्ध सर्वदा क लेल टुटि गेल छन्हि मुदा तखनो ओकर प्रसन्नता क कामना हेतु दिबारी जरबैत छलखीन्ह। संगहि ई आठ बर्ख धरि ओकरा द्वारा देल गेल स्नेह आ सम्मानक निमित्त हुनक कृतज्ञताक परिचायक छलन्हि। अस्तु ओ महिला क दीप देनाइ सम्वेदनात्मक स्मृतिक रक्षा सँ संदर्भित छल। तीव्र गति सं बदलैत एहि युग मे हम सब एहि संवेदनात्मक पक्ष कें रक्षा नहि कय पाबि रहल छी। यदि जीवन सँ संवेदात्मक पक्ष के निकालि देल जाइ तऽ वस्तुतः मनुष्यक जीवन शून्यक पर्याय बनि जायत। एहि निमित्त आवश्यक अछि जे एहि चकाचौन्ध कें संग ओ धूमिल टिम्टिमाइत दियाबाती दिन जरै बला दिबारी कऽ बाती नहिं खत्म हो, एकर सदिखन रक्षा कयल जाइ। चहकैत चौक आ कनैत दलान संक्रमण काल सँ गुजरैत अपन मिथिलांचल आइ अपन क्षीण होइत मर्यादा, सभ्यता एवं संस्कृति कऽ कारण चिन्ताग्रस्त अछि। समस्त विवेकशील बुद्धिजीवी स्तब्ध छथि। मैथिल संस्कार अन्दरे अन्दर विलाप कय रहल अछि! एकर पैघ उदाहरण थीक चहकैत चौक, हँसैत मधुशाला आ कनैत दलान। कहियो मिथिला कऽ गामक दलान प्रवुद्ध व अनुभवी बुजुर्ग, उद्यमशील आ विवेकी युवा, संस्कारी किशोर आ बच्चा सभ सँ शोभायमान रहैत छल। आँगन मँ गोसाउनिक घर एकटा तीर्थवत् होइत छल। चौक चौराहा सक्रियता एवं मेलमिलापक अड्डा होइत छलै मुदा आई ? नगर पलायन के कारण दलान सुन्न भय गेल। जे व्यक्ति वचलो छथि से दलान क वजाय अन्तःपुर में व्यस्त रहैत छथि। प्रवुद्ध व्यक्ति गाम में अल्पसंख्यक मय गेलाह। प्रत्येक चाँक पर एकटा विदेशी मधुशाला खूजि गेल जतय पैघघरक बच्चा व्यक्ति सम वच्चन साहेबक ग्रन्थक अनुकरण कय रहल छथि। संगहि इशारा में किछु पड़िया वला चीज संहो सूंघि रहल छथि। इ सर्वत्र व्याप्त वौद्धिक आचार संबंधी प्रदूषण ग्राम समाज के कलुषित करैत-करैत मिथिलाचलक आत्मा नष्ट करवाक उद्यत अछि। आई सबटा बौद्धिक व आचारवान व्यक्ति ग्राम समाज में घुटन महसूस कय रहल छथि एकर जिम्मेदार के छथि ? शायद समस्त समाज। एहि महामारी कऽ उन्मूलनार्थ समस्त मैथिल समाज के आगा आबय पड़त स्थिति अखनो नियंत्रण में अछि। यदि प्रयास कयल जाय तखनि सब किछु संभव अछि अन्यथा सब सत्यानाशक इंतजार में तैयार रही इ भविष्यक चेतावनी अछि। आशा अछि से समस्त बौद्धिक समाज एहि समस्या पर चिन्तन करताह आ किछु सामूहिक प्रयासो अवश्य होयत। आवश्यकता अछि सकारात्मक मौलिक चिन्तनक मानवमात्रक विकास हेतु मौलिक चिन्तन अत्यावश्यक अछि। संगहिं विज्ञान आ प्रौद्योगिकीकनिरन्तर विकासक मार्ग में मौलिक चिन्तनक उपेक्षा नहि कयल जासकैत अछि। कोनो राष्ट्र यदिविकसित राष्ट्र कऽ रूप में ख्यातिप्राप्त अछि तऽ एहि में मौलिक चिन्तक योगदान सहजतया इंगित कयलजा सकैत अछि। एतय ’सकारात्मक’ पद जोडबाक आशय मात्र एतवा अछि जे मौलिक चिन्तन यदि ध्वंसात्मकहो तऽ ओ सर्वनाशक कारण सेहो भय सकैत अछि। आब प्रश्न ई अछि जे एहि लेख कऽ औचित्य कीअछि? कियाक तऽ मनुक्ख जन्मजात विचारशील प्राणी होइत अछि। मौलिक चिन्तन ओकरस्वाभाविक गुण होइत छैक। मुदा… यदि वर्तमान परिप्रेक्ष्य कें ध्यान में राखल जाय तऽ व्यक्ति, चाहेओ जे कोनो कारण हो, मौलिक चिन्तन सऽ परहेज राखय चाहैत अछि। अपन गप्प कें हम आजुक शोधक सन्दर्भ कें विशेष रूप सऽ जोडय चाहैत छी कियाक तऽभारतवर्षक विभिन्न उच्च अध्ययन संस्थान द्वारा करायल जा रहल विभिन्न विषय में शोध (जेकराप्रचलित रूप मे M. Phil/ M. Tech, D. Phil Ph. D आदि कहैत छियैक), राष्ट्रक ज्ञानपरम्परा कसंवर्धक आओर राष्ट्रक विकास में सहायक होइत अछि। सामान्यतया आजुक स्थिति ई भय गेल अछि जे अधिकांश उच्च अध्ययन संस्थान द्वारा करायलजा रहल विभिन्न विषय में शोध, उपाधि प्राप्तिक हेतु मात्र भय जा रहल अछि। एहि विषय सऽ अपनेलोकनि सेहो अंशतः वा पूर्णतः सहमत होयब। सामान्यतः देखल जाइत अछि जे विबिध ग्रन्थगत तथ्यआओर अवधारणा क प्रस्तुति कय शोधग्रन्थ तैयार कय उपाधि प्राप्त कय लेल जाइत अछि। ओकरगुणवत्ता पर ध्यान नहि देल जाइत अछि। एतय हम एकटा महत्त्वपूर्ण संस्था मे जाहि विषय पर उपाधि देल गेल ओकर चर्चा करयचाहैत छी। विषय “Theory of false Cognition” (भ्रम सिद्धान्त) सँ संबन्धित छल। ओतय विभिन्नसिद्धान्त शोधकर्ता द्वारा प्रस्तुत कयल गेल। पूर्ववर्ती आचार्यक मत पर टिप्पणी हुनका आदर दैत नहिंकयल गेल। एतय हमर कथन जे- शोधकर्ता सँ अपेक्षित छल जे विभिन्न आचार्यक मत कें समीक्षाकरितथि। जतय कतहु ओहि में समस्या छैक ओकर यथासंभव समाधान प्रस्तुत करितथि। अन्यथा तऽओ शोध पुनर्प्रस्तुतीकरणमात्र अछि जे जनमानस हेतु मात्र भारस्वरूप कहल जासकैत अछि। एहि उदाहरणक माध्यम सँ हम मात्र एतेक कहय चाहैत छी जे केवल अन्धानुकरण कय अपनप्रतिभाक विकासक मार्ग अवरुद्ध नहिं करवाक चाही। एतय पूर्वाचार्यक प्रति अनादरक भाव नहिअभिप्रेत बुझी। प्रत्येक व्यक्ति के अपन मौलिक चिन्तन द्वारा ओ शोध हो अथवा व्यावहारिक जीवन,जनमानस कें नवीन दशा आओर दिशा देवा में सहयोग करैक चाही। अपन मिथिलाक संस्कृतिकप्रत्यभिज्ञा भेला सँ ई बात सहज रूप में स्पष्ट भय जाइत अछि जे ई माटि कखनहुं अन्धानुकरण के प्रश्रयनहिं देलकैक, अपन खण्डनमण्डानात्मक विधि द्वारा जनमानस के विकास में सहयोग दैत रहल अछि।एकरे परिणाम कहल जा सकैत अछि जे नव्यनाय क उत्पत्ति मिथिला में भय सकल जाहि कारणमिथिलाक संस्कृति आइयो समस्त विश्व में समादृत अछि। अस्तु आशा अछि जे एकर मर्यादा सततराखल जायत।http://sites.google.com/site/bipinsnjha/home स्वातन्त्रोत्तरयुगीन संस्कृत साहित्यक संवर्द्धन मे मिथिलाक भूमिका। भक्तत्राण परायणा भवभयाभावं समातन्वती, या देवीह सुदर्शनं नृपमणिं संरक्ष्य युद्दे खरे। या चास्मै समुदात् स्वराज्यमखिलं स्वीयं हृतं शत्रुभिः, पायात् सा भुवनेश्वरी भगवती मां सर्वदा शर्मदा। भारतीय ज्ञान परंपरा विचारक, ग्रन्थक आओर चिन्तकक निरन्तर अविच्छिन्न प्रवाहमयी धारा अछि जे दर्शन, साहित्य, तर्क, विज्ञान, धर्मशास्त्र आओर अन्यान्य ज्ञान-विधा से निर्मित होइत रहल अछि। एहि ज्ञान परंपरा कऽ समुन्नयन मे संस्कृत साहित्य आओर मैथिली साहित्य कऽ योगदान नितान्त महनीय अछि। एहि लेख मे संस्कृत साहित्यक संवर्द्धन मऽ मिथिलाक की भूमिका रहल अछि एकर दिग्दर्शन करबाक प्रयास कयल जा रहल अछि। तहू मे मूलतः स्वातंत्रोत्तर युगीन संस्कृत साहित्यक संवर्द्धन मऽ मिथिलाक की भूमिका रहल अछि एकर विश्लेषण कयल जा रहल अछि। वस्तुतः एकटा लेखक माध्यम सँ सम्पूर्ण तथ्यक प्राकाशन सर्वथा कठिन अछि, अस्तु प्रतिनिधि अंश द्वारा कथनक पुष्टि करवाक प्रयास रहत। संस्कृतक की स्थिति छल प्राचीन मिथिला म ई त्ऽ एकटा उद्धरण सँ स्पषट भय जाइत अछि- जगद्ध्रुवं स्याजगध्रुवं वा, कीडांगना यत्र गिरोगिरन्ति। द्वारस्थ नीडाग्ङ्गसन्निरुद्ध, यानीहि तं मण्डन मिश्र धाम॥ संस्कृत साहित्यक समुन्नयन मे प्राचीन काल सँ मिथिला कऽ सहस्रशः मनीषि समर्पित रहल छथि । एहि मे- व्याकरणक क्षेत्र मे वार्त्तिककार वरुरुचि, भाषाविद् आओर साक्षात शेषावतार भगवान पतंजलि, दर्शनक क्षेत्र मे गौतम, कपिल, वाचस्पति मिश्र, ईश्वरक अस्तित्त्वप्रतिष्ठापक रूप मे प्रथित उदयनाचार्य, नव्यन्यायक प्रतिष्ठापक गंगेश उपाध्याय, उद्योतकर, पक्षधर मिश्र, अद्वैत वेदान्ती मण्डन मिश्र, विदुषी गार्गी, मैत्रेयी, भारती, धर्मशास्त्रक क्षेत्र मे लक्ष्मीधर, श्रीकर, हलायुध, भवदेव, श्रीधर,अनिरुद्ध, हरिहर, चन्द्रशेखर प्रभृति विसेश रूप सँ प्रथित छथि। काव्यक क्षेत्र मे विद्यापति जयदेव,मुरारि, भानुदत्त, शकर महनीय छथि। अन्य विद्वान में महावैयाकरण पं० दीनबन्धु झा, पं० श्यामसुन्दर झा, पं० देवानन्द् झा, पं० तुलानन्द झा, पं०बुद्धिनाथ झा, पं०राधाकान्त झा, पं०वामदेव झा, पं० कामेश्वर झा, पं० वी० एन० झा, पं० शशिनाथ झा प्रभृति केँ नाम लेल जा सकैत अछि। स्वातन्त्रोत्तर युग मे अनेकशः कवि अपन कृतिक माध्यम स्ँ संस्कृत साहित्य सुषमाक संवर्द्धन कयलथि। कतिपय कवि आओर हुनक कृति द्रष्टव्य अछि- महाकाव्य :- • पं० भवानीदत्त शर्मा सुरथचरितम् • पं० रामचन्द्रमिश्र वैदेहीचरितम् • पं० पशुपति झा नेपालसाम्राज्योदयम् • पं० मतिनाथ मिश्र भार्गवविक्रमम् • पं० कृपाकान्त ठाकुर आंजनेयचरितम् • पं० रामकुमार सर्मा भरतचरितम् खण्डकाव्य :- • पं० जीवनाथ झा महेन्द्रप्रतापोदयम् • पं० श्यामसुन्दर झा राजलक्ष्मीचरितम् • पं० विष्णुकान्त झा राजेन्द्रवंशप्रशस्ति • पं० रामचन्द्र मिश्र याज्ञासेनी • पं० काशीनाथ मिश्र स्मरदहनमंजरी • पं० रामजी ठाकुर वैदेहीपदांकनम् • पं० हरिकान्त झा जम्मूकाश्मीरसुषमारत्नम् अन्य प्रमुख काव्य:- • पं० कविशेखर बद्रीनाथ झा काव्यकल्लोलिनी • पं० आनन्द झा आनन्दमधुमन्दाकिनी दृश्यकाव्य:- • पं० तेजनाथ झा अयाचीनाटक • पं० अच्युतानन्द झा विज्ञानमहिमा • डा० नोदनाथ मिश्र मधुमालती उक्त विवरण एकटा झलकमात्र अछि वस्तुतः तऽ एहि तरहें असंख्य रचना भेल अछि। अही संग संग ई कहब जरूरी अछि जे बहुतो विद्वान एहनो छलाह जे संस्कृत सं मैथिली पद्यानुवाद कय संस्कृतक संग संग मैथिली साहित्य कें समृद्द करबाक प्रयास मे आजीवन लागल रहला। अहे तरहक एकटा उदाहरण प्रस्तुत अछि पं० तुलानन्द झा कृत दुर्गासप्तशती चतुर्थ अध्यायक १ टा पद्या। इन्द्रादि देव सभ मिलि करैछ हर्षें, रोमांच सुन्दर शरीर नुतो स्ववाक्यें। दुर्गा प्रणाम-रत मस्तक नींक भावें, देवी कऽ मारल महिषासुर नाश भेनें॥ देवी जनीक सुबलें सभ व्याप्त विश्वे, सम्पूर्ण देवबल संघक कैल देहे। अम्बा थिकीह सब देव महर्षि पूज्ये, प्रेमे नमी, सुभद ओ हमरा सभैकेँ एवं प्रकारेण कहल जा सकैत अछि जे मिथिला सर्वथा सारस्वत साधना मे लीन रहैत संस्कृतक साहित्य सम्वर्द्धन में सतत योगदान दैत रहल अछि। डा. राजेन्द्र विमल साहित्य–सङ्गम- गीतकार धीरेन्द्र प्रेमर्षिक सुर–ताल गीतकार धीरेन्द्र प्रेमर्षि नेपालीय मैथिली गीत–संसारक प्रायः सभसँ मूल्यवान उपलब्धि थिकाह— विविधतामय विषयक दृष्टिएँ, संख्यात्मकताक दृष्टिएँ, उच्च काव्यमूल्यक दृष्टिएँ, विविध शिल्प–प्रयोगक दृष्टिएँ, विविध अलङ्कार, गुण, रस, भाषिक प्रयोगक दृष्टिएँ, शैलीगत विविधताक दृष्टिएँ, सामाजिक सचेतताक दृष्टिएँ आ सभसँ बढ़िकऽ मस्तिष्क आ हृदयक सुन्दर सहयात्राक दृष्टिएँ । हिनक गीतसङ्ग्रह ‘कोन सुर सजाबी ?’ क गीतसभमे प्रेमतत्व, व्यङ्ग्यतत्व, वेदनातत्व, नवरसतत्व, उद्बोधनतत्व, आख्यायिका–तत्व, सामाजिक–तत्व, धार्मिक–तत्व, राजनीतिक–तत्व, सांस्कृतिक–तत्व आदि विविध तत्व मिलाकऽ जे कलात्मक रूपाकृति गढ़ल गेल अछि से विलक्षण थिक । हमरा आन गीतकारक किछु गीतक किछु पंक्ति भीतरधरि छूबैत अछि, मुदा धीरेन्द्रक बहुतो गीतक प्रायः सभ पंक्ति मर्मकेँ बेधि जाइत अछि । जीवन–जगतक यथार्थ शक्ति आ सम्भावनाक प्रति अदम्य निष्ठा एवं सजगतासँ पोनगल आन्तरिक आ वाह्य सौन्दर्य जखन सुरमे सजैत अछि तँ जेना चेतनाक लहरिकेँ लयबद्ध कऽ लैत अछि । जीवनक कियारीमे फुलाइछ सत्य आ सौन्दर्यक फूल जे प्रत्येक रूप–रङ्गमे मङ्गलकारी थिक । परिवेशक यथार्थबोध हेतु आवश्यक वैज्ञानिक दृष्टिक विरोधमे ठाढ़ भेल कुण्ठित सौन्दर्यबोधसँ बेसी तकर साहचर्यमे परिमार्जित आ विकसित सौन्दर्य–चेतनाक कारणेँ गीतकारक सहज प्रेमोच्छ्वासो कोनो अदृश्य चन्द्रलोकसँ आएल नहि, हृदय किंवा धरतीसँ उपजल लगैछ । कविमे सौन्दर्य–चेतनाक इन्द्रधनुषी रङ्ग यत्र–तत्र–सर्वत्र छलकि उठल अछि से सत्य, मुदा सौन्दर्यक रसग्राह्यता मिथिलाक धरती आ संस्कृतिक प्रति सहज संस्कारक रूपमे विकसित मधुर अनुरागसँ अभिप्रेरित अछि । बहुजन–रञ्जनक सङ्ग बहुजन–मङ्गलक भाव हिनक अनेक गीतक संवेदनाकेँ समसामयिक आ सतत गतिशील सत्यक संवाहक बना देने अछि, मुदा तौँ ओ देश–कालक अन्तर्सत्यसँ आबद्ध अछि । स्पष्ट कही तँ हिनक समकालीनता परिवेशजन्य अन्तरङ्ग क्षणक अभिव्यक्ति थिक । हिनक भाषा, भङ्गिमा, भावबोध, छन्द, लयमे एतेक नवीनता आ ताजापन एहि दोआरे बूझि पड़ैछ जे ओ सद्यःजात कमलक फूलसन टटका अछि, जकर जड़ि भने परम्परामे होइक, मुदा प्रस्फुटन नितान्त मौलिक छैक । धीरेन्द्र प्रेमर्षिक गीतसभकेँ निम्नलिखित कोटिमे वर्गीकृत कएल जा सकैछ— १) श्रम, सङ्घर्ष, आस्थाक गीत २) मानवीय सम्बन्ध आ संवेदनाक गीत ३) सौन्दर्य–चेतना आ प्रीतिक गीत ४) चिन्तनपरक दार्शनिक गीत ५) माटिपानि आ सामाजिक राजनीतिक सचेतताक गीत । १. श्रम, सङ्घर्ष, आ आस्थाक गीत ः जीवनक अरण्यमे काँट छैक तँ फूलो छैक, पतझड़ छैक तँ बसन्तो छैक, ग्रीष्म–प्रदाह छैक तँ छाहरिक शीतलतो छैक । जीवनकेँ स्वीकार करबाक लेल ओकर सम्पूर्ण यथार्थकेँ स्वीकार कऽ उत्साहक सङ्ग जीबऽ पड़तैक । विडम्बनापूर्ण जीवनक ई स्वीकृति आ जिजीविषा गीतकारकेँ काँटक बीच फूल खोजबाक प्रेरणा आ उत्साह दैत छन्हि— चारि दिनक ई जीवन–धाम हरखक पल ताहूमे बाम कलिका खोँटिकऽ फेकैत हम ताकि रहल छी फूलक गाम ई धरती, एकर उत्सव आ शोक, स्मिति–अश्रु, जय–पराजय प्राणवन्तताक प्रमाण थिकै, तेँ कोनो कल्पना–कुहरमे भटकैत सत्य–सूर्यक खोज करब बतहपनी छैक । सृष्टिक गर्भसँ जनमल सत्य मात्र गीतकारकेँ स्वीकार छन्हि— सत्यक जननी सृष्टि तमाम कर्मक सिञ्चन हम्मर काम..... प्रेमर्षि श्रमहीन जीवनकेँ जिनगीक भ्रम मानैत छथि आ शोषणपर आधारित जीवन–व्यवस्थाक विरुद्ध छाती तानि ठाढ़ भऽ जाइत छथि । शोषणक विरुद्ध केहन घृणा छन्हि प्रेमर्षिक मोनमे— गामक गाम उजाड़ि बनाओल महल–अटारी नइ चाही देशक खून आ गरीबक आहसँ भरल बखाड़ी नइ चाही लाखोक धूर निलामीक जनमल एक जिमदारी नइ चाही.....” एहन अवस्थामे ओ कहैत छथि— हमरा अपन गरीबियो बरदान लगैए..... गरीबक जिनगीक केहन मार्मिक शब्दचित्र प्रस्तुत कएने छथि प्रेमर्षि— पीठकेँ झँपैत छी तँ माथा उघार माथकेँ झँपैत छी तँ पीठहि उघार चूनि–चूनि खढ़पात खोँता बनाबी चुबिते रहि जाए तैयो जिनगीक चार...... २. मानवीय सम्बन्ध आ संवेदनाक गीत ः मनुक्ख अनेक स्तरपर एक–दोसराक रागतन्तुसँ बन्हाएल अछि । नितान्त वैयक्तिक स्तरपर, पारिवारिक स्तरपर, सामाजिक स्तरपर, राष्ट्रिय स्तरपर, अन्तर्राष्ट्रिय स्तरपर, ब्रह्माण्डीय स्तरपर । राग–विरागक ई खेल चिरन्तन थिक, सार्वभौम थिक । जाधरि मनुक्ख जीवित अछि, नेह–छोहक एहि रेशमी बन्धनकेँ तोड़ि फेकब ओकरा हेतु दुःसाध्य थिकै । एहि रागात्मकताकेँ प्रेमर्षि जीवनक स्पन्दन, प्राणज्योति, अपरिहार्य अङ्ग–रङ्ग मानैत छथि— बीस बरखा टेरलिङिया कुरता तैपर साटल चेफरी छै शीतलहरीमे ओक्कर ओढ़ना पोतीक फेकल केथरी छै सोना गढ़िकऽ इएह फल पौलक अपने बनि गेल ताम–सन वाह बुढ़बा तैयो बाजैए हम्मर बेटा राम–सन.... अद्वितीय !! ई सम्बन्ध–बन्ध अपराजेय आ अमर रहए, भगवान !! ३. सौन्दर्य–चेतना आ प्रीतिक गीत ः कोनो राजनीतिक वादक झण्डातर बैसि गीतकेँ विज्ञापन वा प्रचारक माध्यम बनबैत अथवा अनुभवशून्य विषयपर शब्दक कलाबाजी देखबैत जीवानुभव वा जीवनसत्यक दिससँ शुतुरमुर्गी शैलीमे आँखि मुननिहार गीतकार नहि थिकाह प्रेमर्षि । तेँ ओजस्वी भावनाक हथौड़ासँ शब्दकेँ लोहारजकाँ पीटि–पीटि सङ्घर्षक हेतु फरसा आ गड़ाँस बनबैत प्रेमर्षि जखन छेनीसँ पदावलीकेँ तरासैत सोनारजकाँ रचि–रचिकऽ पे्रयसीक हेतु कोमल कण्ठहार बनबैत छथि तँ हमरा कृष्णक कुरुक्षेत्रक योद्धारूप आ वृन्दावनक रासलीला रचबैत प्रेमीरूप एक्कहिबेर मोन पड़ि जाइत अछि । श्रृङ्गारक दुनू भेद— संयोग आ विप्रलम्भक मोहक चित्रण हिनक गीतमे भेटैत अछि— प्रेमक घटसँ जते निकाली जलक हुअए ने अन्त हमर अहाँकेर प्रेमक चिड़िया भऽ गेल बेस उड़न्त....... ४. चिन्तनपरक किंवा दार्शनिक मुद्राक गीत ः चिन्तन जखन भावनाक तलपर आबि गाबऽ लगैछ तँ उच्च कोटिक गीतक जन्म होइत छैक । प्रेमर्षिक किछु गीतमे चिन्तनक जे चिनगी दहकैत अछि से जिनगीक चरम सत्यधरि लऽ जाइत अछि— जीवन थिक मेला दू दिनमा ई ईष्र्या–द्वेष किए प्राणी आखिरमे देह गलिए जएतह बस रहि जएतह अमृत वाणी..... वन–वन बौआइत अछि कस्तूरीक टोहमे मृग जहिना सदिखन औनाइत अछि माया आ मोहमे मन तहिना..... ५. माटि–पानि आ सामाजिक–राजनीतिक सचेतताक गीत ः धीरेन्द्र प्रेमर्षिक गीतमे जयदेवक कृत्रिम कलात्मकता नहि, विद्यापति गीतक सहज कलामय तन्मयता अछि । तेँ ई गीतसभ मिथिलाक सुगन्धसँ महमह करैत अछि । मिथिलाकेर व्यथा दहेज, नवका साल पुरने हाल, जनतन्त्रक बहाली, जय हो पेट धरमवीर, हे देखियौ हमर समाजमे, ओ बमभोला, सत्ताक माछ, देशी मुर्गा बिलाइती बोली, जागरण गीत एहि कोटिक गीत थिक । एहि गीतसभमे अत्यन्त तीक्ष्ण व्यङ्ग्य अछि— बम भोला छोडूÞ भङगोला जँ पियब अछि अति आवश्यक पीबू कोकाकोला..... मुर्गा देलक बाङ दुलरिया दारू ला...... पहिने डबरा–खत्ता घुमी भेटए बस गरचुन्नी बाँटैत–चुटैत पबैत छलियै एक्कहि–दूटा कुन्नी एहिबेर पोखरिक जीरा भेटल सटि गेल ठोरमे आब तँ मोन परकि गेल हम्मर माछक झोरमे........... दूर्गापूजा डी.पी. बनि गेल भरदुतिया राखीतर दबि गेल जुड़शीतल शीतलहरीक मारल हैप्पी न्यू इयर बस फबि गेल बम फटाक फुलझड़ीक बीचमे डूबि गेल हुक्का लोली देशी मुर्गा बिलायती बोली..... एहि सभ गीतक उचित मूल्याङ्कन मैथिल संस्कृतिक गवाक्षसँ निरखिकऽ करब बेसी उचित होएत । कारण हुनक गीत–संसार सोरसँ पोरधरि मैथिल संस्कृतिक रङ्गमे सराबोर अछि । एत्तऽ धरि जे उपमोसभ खाँटी मैथिल भूमि, जीवन, समाज वा संस्कृतिसँ लेल गेल अछि— भेल प्रेमक रौदी एहि जगमे तेँ धधकए सभतरि दावानल जुड़शीतलक जल–थपकीसन बरिसाउ प्रिये कने प्रेमक जल....... सुच्चा मैथिल गीत थिक— अछिञ्जल–सन पवित्र ! एकटा पाँती देखल जाए— भौजीकेँ बस कोबरे भाबनि मुदा दियरसभ आबि सताबनि भैया बहाने काल भगाबथि बारहमासा गाबि सुनाबथि......... गीतकार धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मादे टिप्पणी दैत नेपाल राजकीय प्रज्ञा–प्रतिष्ठानक उपकुलपति, नेपाली समीक्षाशास्त्रक युगपुरुष, प्रकाण्ड विद्वान प्रा.डा. वासुदेव त्रिपाठी उचिते लिखलैन्हि अछि— “करीब सैँतीसे वर्ष (तत्कालीन) क लहलहाइत उमेरमे अनेक विधा आ क्षेत्रमे रहल हुनक साधना आ तकर विस्तृत आयामक अवलोकन कएलापर हमरालोकनिक मोनमे सहजहिँ महान नेपाली साहित्य–स्रष्टा मोतीराम भट्टक स्मरण भऽ अबैछ ।” मैथिलीक एहि मोतीरामपर मिथिला–मैथिलीक इतिहास सर्वदा गर्व करत से हमर अटल धारणा थिक । ‘घरमुहाँ’ – प्रभाव आ प्रतिक्रिया कार्य–कारण–श्रृंखलामे सुगुम्फित ओहि गद्य कथानककेँ उपन्यास कहल जाइत अछि, जाहिमे अपेक्षाकृत अधिक विस्तारसं जीवने–जगतमे अनुभव कएल यथार्थकेँ कल्पनासँ रङि कए रसात्मक विचारोत्तेजक रुपमे प्रस्तुत कएल जाइछ । मैथिलीक ख्यातनामा आख्यानकरि श्री रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’क पहिल उपन्यास ‘घरमुहाँ’ नेपालक मधेस–आन्दोलनसँ उपजल उमड़ल जनआकांक्षा, मोहभंग, विकृति, पीड़ा, भावनात्मक उद्वेलन, विक्षोभ आ जटिलताकें घोर यथार्थपरक चित्रावली उरेहैत समन्वय दर्शनसंग मर्मस्मर्शी इति पबैत अछि । आन्दोलन जखन एक गोट ऐतिहासिक उँचाई ल’ रहल होइत अछि तँ ओहिमे आन्दोलनकारीक छदम श्वेत भेष द्वारा सामाजिक प्रतिष्ठाक नकली खोल ओढ़बामे सफल गुन्डाक सरदार कामेश्वर–सन आपराधिक मनोवृत्तिक व्यक्ति सचक निरन्तर प्रवेश होबए लगैत छैक । हत्या, अपहरण, आतंक आ डर–धमकी द्वारा ई वर्ग खास कए पहाड़ी समुदायसँ पैसाक उगाही करैत अछि । अपन अधिकार, पहिचान आ विकसित मुद्दाक एहि विराट जनक्रान्तिमे शहादत दैत युवकसभक प्रत्येक दिन लहासपर लहास खासि रहल छै आ ओहर ई लुटेरा–तत्व पहाड़ीक दोकान सभमे आगि लगा रहल अछि, सामान लूटि रहल अछि, ओकरा सभक घरपर पाथर फेकि–आतङ्क पसारि रहल अछि । आतङ्कभरल एहि वातावरणमे पहाड़ी होइतो धोतीकुर्ताधारी मास्टर रमेश उपाध्याय अपना घरमे डरे दबकल रहैत छथि । मोन तँ मास्टरो साहेबक होइ छैन्हि जे – अपन मधेसी मित्र जगमोहन अधिकारी जेकाँ जुलुसमे जा जोर–जोरसँ नारा लगा आन्दोलनकेँ समर्थन दिऐक, मुदा सोचै छथि –“जे उन्माद एखन युवा सभमे छै ओ की हमर (पहाड़ी) अनुहारकेँ पचा सकत ?” अदंकसँ भरल मास्टर साहेबकेँ अपन घर ल’ अनबाक विचार जगमोहनकेँ होइत छन्हि, मुदा मास्टर रमेश एहि दुआरेँ अपन मधेश–आन्दोलनक अगुआ मित्र जगमोहनक घर जाएसँ अस्वीकार कए दैत छथि जे कलहु आन्दोलन कमजोर ने पड़ि जाइक । १ जून २००७, २५ जुलाई २००७, २८ जुलाई २००७, ५ अगस्त २००७ क वार्ता असफल भेलाक बाद ३० अगस्त २००७क’ २६ बूँदापर सहमति होएब मुदा कायान्वयनमे आनाकानीसँ आन्दोलनक फेर उग्र लपट ऊठब – ऐतिहासिक दस्तावेज अछि, जे उपन्यासमे प्रस्तुत भेल अछि । मास्टर रमेश उपाध्यायक विपत्तिक तमिस्रा अओर सघन तखन अओर सघन भ’ जाइत छैन्हि जखन हुनका पता चलैत छैन्हि जे हुनकर बेटी किरण दछिनबरिया टोलक कामेश्वरक बेटा राजीवसँ पे्रम करैति अछि । ताबत ई ककरो ने बूझल छैक जे गामक सम्पन्न आ सम्भ्रान्त मानल जाएबला व्यक्तित्व कामेश्वर गाममे व्याप्त हत्या, अपहरण, चन्दा–आतंक आदिमे संलग्न गिरोहक मुख्य सूत्रधार आ खलनायक अछि । मास्टर महाविपत्तिक समुद्रमे उबडुब कैए रहल छथि कि बेटी किरणक अपहरण भए जाइ छैन्हि आ दश लाख टाका फिरौतीक लेल फोनसँ दिन–राति धमकी आबए लगैत छैन्हि । मास्टर अपन सम्पूर्ण सम्पत्ति बेचिकए विस्थापित होएबाक लेल बाध्य छथि ओमहर कामेश्वरक एकलौता बेटा राजीव अपन बापक कुकृत्यसँ परिचित भ’ जाइत अछि आ मायक माध्यमसँ किरणक मुक्तिक लेल दबाब बनबैत अछि । कामेश्वरकेँ ईं जानि ग्लानि होइत छैक जे ई उएह किरण थिक जकरा पुतहु बना घर अनबाक मोन हुनक परिवार बना चुकल अछि । बसमे चढ़ि चुकल मास्टर रमेश उपाध्यायक ओकर परम मित्र जगमोहन आ अपहरणकारी कामेश्वर गाम घुरा अनबामे सकल होइत छथि । आख्यानकार ‘भ्रमर’ अपना समयक प्रामाणिक खिस्सा आबएबला पीढ़ी–दर–पीढ़ीधरि सुनएबामे उत्सुक छथि । तेँ प्रस्तुत उपन्यास मूक इतिहासक मुखर सहोदर भए गेल अछि । राजनैतिक घटनाक्रमक धरातलपर कल्पनाक फट्ठा, मृत्तिका, सन्ढी, स’न आदिसँ समकालीन मधेसक जीवन्त मूर्ति तैयारक’ सामाजिक सम्बन्ध–बन्धक रागमयताक रंग ढ़ेउरल गेल अछि जे हृदयहारी अछि । उपन्यास ऐतिहासिक महत्वक दाबेदार एहू कारणें अछि जे ई पहिल नेपालीय मैथिली उपन्यास थिक जे समकालीन राजनैतिक घटनाक्रमपर आधारित अछि । रमेश उपाध्याय, जगमोहन, कामेश्वर, राजीव, किरण, बन्ठा, लुखिया आदि सभ वर्गीय प्रतिनिधि पात्र अछि । सम्बादमे स्वाभाविकता आ सजीवता छैक । भाषाशैलीक नाटकीयता आ चित्रात्मकताक कारण उपन्यास आदिसँ अन्तभरि सिनेमाक रीलजेकाँ चलैत अछि, जे पाठककेँ आरम्भसँ अन्तधरि बन्हने रहैत अछि । पहाड़ी–मधेसीक एकता संबर्धनक उद्देश्यसँ प्रणित एहि उपन्यासक यात्रा उबड़खाबड़, पहाड़–जंगल, खुरपेड़ियाक जटिल यात्रा नहि, सोझ–सपाट मैदानक सरल–सरस यात्रा थिक जे सरसराकए अपन गन्तव्यधरि पहुँचैत अछि । तेँ उपन्यासक संरचनामे पेँच–पाँच आ ओझराहटि नहि अछि । मधेस–मिथिलाक आम लोकक भाषामे प्रयुक्त ‘लल्हका’, ‘लभका’, ‘बढ़का’, ‘खुर्सीं’ आदि शब्दक सचेत उपयोग उपन्याक भाषाकेँ सहज स्वाभाविकता आ अभिनवता प्रदान करैत अछि । आख्यानकार श्री ‘भ्रमर’क ई सद्यःजात कृति नेपालीय मैथिली उपन्यास साहित्यक एक गोट उपलब्धि थिक, ताहिमे सन्देह नहि । नव–नव क्षितिजक सन्धान करैत सुजीतक जिद्दी साहचर्य–सम्भूत रसोद्भावनाक चतुर, युवा कथाकार सुजीत कुमार झाक कथा मिथिलाञ्चलक महानगरोन्मुख शहरक विविधतापूर्ण परिवेश आ पात्रक स्थिति–मनस्थितिक सूक्ष्म चित्राङ्कन प्रस्तुत करैत अछि । प्रत्येक कथा कोनो एक गोट एहने शहरी पात्रक जीवनमे झटका नेने आएल कोनो निर्णायक मोड़क नाटकीय रुपमे जखन प्रत्यक्षीकरण करबैछ तऽ पाठक चिहँुकि उठैत अछि । सामान्य घटनासभक श्रृङ्खलासँ आरम्भ भेल कथा मध्यधरि अबैत–अबैत सूच्याग्र भऽ जाइत अछि आ अन्तमे एकटा ‘करेण्ट’ जेकाँ लगबैत अछि । – जेना सामान्य यात्रामे चलैत–चलैत केओ आगाँमे फँेच कढ़ने, नाङरिपर ठाढ़ गहुमन देखि नेने हो ! शिल्पक ई वैशिष्ठ्य हिनका मैथिलीक अन्य कथाकारसँ अलगहे फराक कए दैत अछि । महानगरोन्मुख समाजक चित्राङ्कनक संगहि कथा एक गोट मनोवैज्ञानिक सत्यक उद्घाटन करैत अछि । कथामे एक गोट एहन स्थल अबैत अछि जखन आश्चर्यचकित भेल पाठक सोचैत अछि, ‘ अरे ! ई की भऽ गेलै ?’ – आ तखने कथाक अन्त भऽ जाइ छै । अमेरिकी कथाकार ओ. हेनरीक स्मरण भऽ अबैछ । अवग्रहमे पड़ल पात्रक प्राण जेना अकस्मात् मुक्ति–पथ पाबि लैछ ! कथाकार सुजीत कुमार झाक कथाकारिताक दोसर उल्लेखनीय निजत्व थिक – अनतिदीर्घता अर्थात् संक्षिप्तता । हिनक कथाक घटना–परिघटना ज्यामितीय चित्र जेकाँ एक–दोसरकेँ कटैत, ओझराइत–सोझराइत आगाँ नहि बढ़ैछ । कथाक तीर सनसनाइत जाइत अछि आ अर्जूनक लक्ष्य–भेद जेकाँ चिड़ैक आँखिटा देखैत ओकर भेदन करैत अछि आ कुशल धनुर्धरक धनुर्विद्याक सफलताक प्रमाणसँ धन्य भऽ जाइत अछि। तँए कथासभमे एकटा प्रभावान्वितियुक्त त्वरा छैक । हिनक सभ पात्र खाँटी मैथिल थिकाह – विभिन्न जाति, वर्गक मध्यवित्तीय मैथिल । सुजीत कुमार मध्यवित्तीय मैथिल जीवनक सफल कथाकार छथि । परम्परागत मूल्यक सिमेण्टसँ ठोस बनल संयुक्त परिवारमे देखल जाइत पारस्परिक स्नेह, विश्वास, वलिदान, सेवा, करुणा, अनुशासन आदि श्रेष्ठ मानवीय गुणमे लागल पश्चिमी सोचक नोनीसँ उत्पन्न दरार देखि कथाकारक हृदय दरकि जाइत छैन्हि आ हुनक लगभग प्रत्येक कथा खण्डित होइत एहि मूल्यकेँ पुनस्र्थापित करबाक कलात्मक चेष्टा बनि जाइत अछि । सहज–स्वभाविक कथोपकथनक मुक्तावलीसँ बनल–बूनल ई कथा सभक कथाकारक अपन परिवेशक भोगल यथार्थ सभक चित्रावलीसँ सजाओल सुन्दर ‘अलबम’ थिक । कथाकार सुजीत कुमारक कथाक सेहो एक गोट प्रमुख तत्व थिक सहज मानवीय राग–बन्ध । सुप्रसिद्ध आलोचक ई.एम.एलब्राइड लिखने छथि जे कथा–साहित्यक समस्त भावात्मक तत्वमे एकटा प्रेमे एहन थिक जकर सर्वाधिक प्रयोग भेल अछि, कारण प्रेम मानव–स्वभावक सर्वव्यापक तत्व थिक । ‘पूmल फुलाइएकऽ रहल’ कथाक उच्च कुलशीला, सुशिक्षिता नायिका पिंकी अन्तद्र्वन्द्वक भंवरमे फँसि उबडुब करैत मुक्तिक हेतु तखन हाथ पएर भाँजऽ लगैत छथि । जखन हुनका पता लगैत छैन्हि जे जाहि पुरुषकेँ सहायक स्टेशन मास्टर कहि हुनक विवाह रचाओल गेल छल आ जकरा अपन सम्पूर्ण संचेतना समर्पण दऽ ओ इन्द्रधनुषी कल्पनाक इन्द्रजालमे ओझराएलि अपन सुधिबुधि हेरा चुकलि छलीह से सहायक स्टेशन मास्टर नहि एकटा साधारण पैटमैन अछि जे वस्तुतः अपन मालिक स्टेशन मास्टर आ सहायक स्टेशन मास्टरक घरलए बजारसँ झोड़ाक भोड़ा तरकारी कीनिकऽ अनैत अछि तऽ ओ सातम आसमानसँ खसैत छथि । मुदा, ई स्वयंसिद्ध नायिका अग्निकेँ साक्षी राखि लेल गेल पतिब्रत्य संकल्पकेँ स्मरण कए एकटा नव अवतार लैत छथि – अपन चिताक छाउरसँ पुनः उड़ि आसमानकेँ छुबैत मिथकीय पन्छी ‘स्फिङ्स’ जेकाँ ! नायककेँ एम.ए.धरि पढ़बैत छथि । अन्ततः नायक सहायक स्टेशन मास्टरक पदपर प्रतिष्ठित होइत छथि । ‘नयाँ व्यपार’–क रोगग्रस्त नायक जितेन्द्र प्रसादक हँसैत–खेलैत गार्हस्थ जीवन महत्वकांक्षाक बबण्डरमे उधियाकऽ तहस–नहस भऽ गेल अछि । स्वयं रोगशैय्यापर पड़ल छथि, बच्चासभ अपन–अपन व्यवसाय–संसारमे हेराएल अछि आ पत्नी साधना सड़कपर चलैत लोकक आँखिमे गरदा झोंकैत, मिश्राजीक स्कूटरपर बैसि, अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवसमे सहभागी होएबाक लेल उड़ि जाइत छथि । कथा वर्तमान पारिवारिक जीवनक विद्रूपता आ विसङ्गतिकेँ रेखाङ्कित करैत अछि । ‘खाली घर’–क नायक जयचन्द्र आ नायिका जानकी रेलक पटरी जेकाँ जीवन पर्यन्त समानान्तर चलैत छथि, मुदा कहियो, कखनो मीलि ने पबैत छथि । तकर कारण छैक पतिकेँ आदेश–अनुवर्तिनी ‘रोवोट’ नारीक चाहिऐन्हि, सासु–ससुरकेँ पुतहुक पटमासि कएल बहिकिरनीक बेगरता छैन्हि । मुदा पति अपन ‘स्व’–क संग जीवाक आकांक्षिणी छथि । एकटा शीतयुद्धमे जीवन बीति जाइत अछि, रीति जाइत अछि । ‘लाल किताब’ परामनोविज्ञानपर आधारित रहस्य–रोमाञ्चसँ भड़ल कथा थिक । सेवक प्रसाद यादवजी १८ गतेकेँ अपन कक्षमे एकसरि बैसलि कथा नायिका मित्रपत्नीकेँ अत्यन्त अनुराग पूर्वक एक गोट लाल डायरी भेंट कऽ गेल रहै छथि । मित्रपत्नीकेँ जबर्दस्ती हाथ पकड़ि ओ अपना लग बैसबै छथि–हाथ अकल्पित रुपें सर्द–हेमाल किए लगै छल से ओ बूझि नहि पबैत छथि । मुदा जखन मित्रक मृत्युपर शोकविह्वल भेल नायिका पति बाहरसँ आबिकऽ सेवक प्रसादक मृत्यु सत्रहे गते भऽ गेल होएबाक सूचना दै छथिन्ह तऽ ओ काँपि उठैत छथि । मायक सह पाबि गिन्नी पढ़ाइ छोड़ि नृत्यमे प्रशिक्षित भऽ आय दिन नव–नव ‘पब्लिक शो’ करऽ लगलीह । बाप अपन बेटीकेँ ग्लैमर दिशि आकृष्ट देखि चिन्तामग्न रहै छथि, मुदा जिदाहि पत्नीक आगाँ विवश रहै छथि । परिणामतः जखन पता चलल जे गिन्नी व्यसनी, व्यभिचारिणी आ गर्भिणी भऽ गेलि छथि तऽ वातावरण हाक्रोशकऽ उठैत अछि । ताबत बहुत बिलम्ब भऽ गेल रहैत छैक । ‘जादू’ कथाक नायिका सिम्मी घरपर जा कम्पनीक उत्पाद बेचऽबाली सेल्सगर्ल छलीह, मुदा हुनक मधुरवाणी आ शिष्ट व्यवहारक जादू रेणु आ हुनकर पतिक दिमागपर एना ने चढ़ल जे रेणुक पति हुनका अपन कम्पनीक नीक पदक हेतु अफर दऽ देलथिन्ह । परम्परावादी मूल्यक खण्डहरपर ठाढ़ होइत बलुआही पारिवारिक संरचनापर कठोर प्रहार अछि कथा– ‘ आदर्श’ परम्परावादी पति आ सासुकेँ लात मारि घर छोड़ि चलि तऽ अबै छथि अद्र्धआधुनिका शिक्षिका नायिका, मुदा पन्द्रह वर्षक पश्चात् जखन अपन कक्षामे एक गोट भविष्णु युवकक नाम ‘ आदर्श’ सूनि ओ चिहुँकि उठै छथि जेना ककोड़विच्छा अनचोकेमे डंक मारि देने होइक । आदर्शक पिताक नाम छै – अरुण, जिला न्यायाधीश, अर्थात् ओकर पूर्वपति । स्टाफ रुममे आबिकऽ धम्म दऽ बैसि जाइत छथि, मस्तिष्कमे अन्हड़–विहाड़ि नेने । एहि स्थलपर आबि विखण्डनवादी मूल्य हारि जाइत अछि आ संयुक्त परिवारक परम्परावादी मूल्य विजय घोष करैत अछि । ‘अर्थहीन यात्रा’क नायिका नेहा अपन पति माधवसँ एहि दुआरे असन्तुष्ट रहैत छथि जे ओ महत्वकांक्षाक उन्मादसँ ग्रस्त नहि छथि, पार्टी–क्लवक सौखीन नहि छथि, भौतिक चमक दमकमे विश्वास नहि करैत छथि, नेहाक लेल ‘ गिप्mट’ नहि अनैत छथि आदि । तलकालए ओ जानकीरामसँ विवाह करैत छथि, बेटी तेजिकऽ । फेर ओ जानकी रामकेँ छोड़ि अन्य पुरुष संगे रहए लगैत छथि – पति पत्नीवत्, मुदा अविवाहित । पश्चिमसँ आएल ‘लिविङ्ग टूगेदर’–क चपेटिमे पड़लि नेहा अन्ततः अपनहि लेल निर्णायक कारण पश्चातापक आगिमे धू–धूकऽ जरऽ लगैत छथि । प्रस्तुत कथा सेहो पछबा हवाक विरोध आ पुरवाक समर्थनमे देवाल जेकाँ ठाढ़ अछि । नारी मनोविज्ञानक सुन्दर आ यर्थाथवादी विश्लेषण प्रस्तुत करैत कथा ‘व्यर्थक उड़ान’–क नायक कार्यालयक काजसँ जे विराटनगर गेलाह तऽ दू–चारि दिन विलम्ब की भेलैन्हि नायिका ऊनी स्वेटर जेकाँ मोनमे लहराइत भावक रंग–विरंगी लच्छाकेँ ओझरबैत–सोझरबैत जँ दुर्भाग्यसँ वैधव्यक पहाड़ टूटि पड़ल होइन्हि तऽ शेष यात्रा कमलसंग बितएबाक, ओकरा संग हनीमून मनएबाधरिक कल्पनामे डूबि जाइ छथि कि धम्म दऽ पति जूमि जाइत छथिन्ह । ओ पतिकेँ भरि पाँज पजियाकऽ हबोढ़कार भऽ कानऽ लगै छथि । ‘निष्ठा कि देखाबा’ एक गोट घोर यथार्थवादी मार्मिक कथा अछि । नीमाक पति सोहनक दुनू किडनी सड़ि गेल छैक जकर प्रत्यारोपण डाक्टरक सलाह अनुसार भेल्लोरमे जा करएबाक बदला ओ पतिकेँ जल्दीसँ जल्दी गाम एहि दुआरे लऽ जाइत छथि जे सम्पति सम्बन्धी कागजात सभपर हुनकर हस्ताक्षर लेल जा सकए । पतिकेँ मरबाक चिन्ता नहि, सम्पति डुबबाक चिन्ता बेसी घेरने छैन्हि । मुदा भाग्यक व्यंग्य ई थिक जे अन्तिम साँसधरि पति हुनका पतिपरायणा मानैत छथि । ‘केहन सजाय’ एक गोट टुग्गरि बालिका चमेलीक कथा अछि । जकरा कोनो सन्तानहीन सम्भ्रान्त दम्पती गोद नेने छल, मुदा जखन ओहि दम्पतीकेँ अपन औरसँ सन्तान जनमि जाइत छैक, चमेली ओहि घरमे नहि, ‘महिला सदन’मे पठा देल जाइत छथि । ओ तऽ धन्य कही संस्थाक नव अध्यक्षा आ पूर्व प्रधानाध्यापिका कामिनी मैडमकेँ जनिक करुणापूर्ण प्रयाससँ ओ रितेशक संग परिणय सूत्रमे बन्हा जीवनक भसिआइत नाओक लेल किनार पाबि लैत छथि । मेनकाक कोमल नारी हृदयकेँ हँथोड़ैथि ‘मेनका’ जीवन झँझावातक आघात–प्रतिघातसँ नारी हृदय समुद्रमे उठैत उत्ताल तरङ्गक विक्षोभकारी कथा थिक । मेनका परित्यक्ता थिकीह । हुनक पति चन्द्रभूषण सुन्दरी युवती नीनाक मोहपाशमे ओझरा हुनकर परित्यागकऽ देने छलथिन । नारी–अहंपर चोट लगैत अछि । मेनका प्राध्यापन सेवामे संलग्न छथि, जतऽ हिनक सम्पर्क विवाहित सहकर्मी राजीव सरसँ होइत छैन्हि । राजीव सरक व्यक्तित्वक चुम्बकीय प्रभावमे मेनकाक व्यक्तित्व लौहकण जेकाँ आकृष्ट होइत अछि, मुदा जखन ओ सोचै छथि जे राजीवपत्नी आरतीक हेतु हुनक प्रणय–लीला नीना–कर्मसँ कम हिंसक किंवा घृणित नहि होएत तऽ ओ अपनामे सिमटिकऽ कठोर लौहपिण्ड बनि जाइत छथि, जे चुम्बककेँ घीचि सकैत अछि, मुदा चुम्बकसँ घिचा नहि सकैत अछि । कथाकार सुजीत कुमार झाक कथाक विषय– चयन, बनाबट आ बुनाबट, भाषा शैली आ कलात्मक उच्चतामे उत्तरोत्तर प्रौढ़ता अबैत जाएत आ ओ मैथिली कथाक हेतु एहिना विषय आ शिल्पक नव–नव क्षितिजक सन्धान करैत नव प्रतिमानक स्थापनामे सफल होएताह, हमर विश्वास अछि । नीलिमा मखानक खीर सामग्री- दूध-१ १/२ किलो, चिन्नी-१०० ग्राम, मखान कुटल- १०० ग्राम, इलाइची पाउडर- स्वाद अनुसार, काजू- १० टा, किशमिश-२०टा बनेबाक विधि- मखानक पाउडर (कनी दरदरा)क पहिने १/२ किलो ठंढ़ा दूधमे घोरि लिअ, शेष दूध केँ खौला लिअ। आब गर्म दूधमे ई घोड़ल मखानक मिश्रण मिला दियौक आर करौछसँ लगातार चलबैत रहियौक जाहिसँ मिश्रण पेनीमे बैसय नहि। जखन खौलय लागय तँ ओहिमे चिन्नी, काजू, किशमिश सभ दऽ कय अन्तिममे इलाइची पाउडर खसाऽ कऽ मिलाऽ कऽ उताड़ि लिअ। मखानक खीर तैयार अछि। नोट:- मखानकेँ सुखलो भुजि कऽ कुटि सकैत छी वा घीमे सेहो भूजि कए कूटि कऽ पाउडर बना सकैत छी। मेथीक परोठा सामग्री:-आटा-२५० ग्राम, बेसन-१०० ग्राम, रिफाइन-२५० ग्राम, मेंथी साग-५०० ग्राम, हरिअर मेरचाइ-४टा, आदी- १ इन्चक टुकड़ा, धनी-पात आऽ नोन-अंदाजसँ। विधि- मेंथीकेँ साफ कऽ कए धोऽ लिअ। मेंहीसँ काटि कए लोहियामे कनी तेल दऽ कय मेंथी पात खसा दियौक। कनी भाप लागि जाय तँ ओहिमे काटल हरियर मेरचाइ, आदी घसल, धनी-पात काटि कय आऽ नून मिला कय एहि मिश्रणकेँ बेसन फेँटल आँटामे मिला दियौक। आँटाकेँ कनेक कड़ा कऽ सानि लिअ। पराठा बेल कए तवापर कम आँचपर रिफाइन लगा कए सेकि लिअ। खास्ता मेथीक पराठा तैयार भऽ गेल। नोट:- अहाँ काँच मेंथी पात कऽ मेंही काटि कऽ, पियाजु सभ मिला कऽ सेहो आँटा सानि सकैत छी। मुगलई कोबी सामग्री:-कोबीक टुकड़ा-१/२ किलो, पियाजु महीन काटल-१कप टमाटर, कद्दूकस कएल-१ कप, हरियर मेरचाइ-आदीक पेस्ट-१ चम्मच, नून स्वादानुसार, लाल मिरचाइक पाउडर-१/२ चम्मच, धनियाँ पाउडर-१ चम्मच, हरदि- १ चम्मच, गर्म मसल्ला-१/२ चम्मच, अमचूर-१/२ चम्मच, जीर-१/२ चम्मच, मलाई-१/२ चम्मच, टोमेटो सॉस- १ चम्मच, रिफाइन तेल-२ चम्मच। विधि:- कोबीक टुकड़ा धोऽ कऽ चालनिमे आधा घंटाक लेल राखि दियौक, जाहिसँ एकर पानि निकलि जाय। फेर लोहियामे तेल गर्म कऽ कोबीकेँ हल्का गुलाबी फ्राइ कऽ लिअ आर एकटा पेपरपर निकालि लिअ, जाहिसँ तेल निकलि जाय। एक पैनमे तेल ढारू। ओहिमे जीर दऽ कए पियाज आऽ आदीक पेस्ट दऽ कय भुजि दियौक। आब सभ टा मसल्ला दऽ कय कनी देरमे आर भुजियौक। मलाएकेँ मैश कऽ दऽ दियौक, सॉसकेँ सेहो दऽ दियौक आर नीकसँ मिला दियौक। आब एहिमे कोबीक टुकड़ा दऽ कय चम्मचसँ मिला दियौक। फेर एक बाउलमे ओकरा निकालि कऽ ऊपरसँ गरम मसल्ला आर धनियाँ (धनी) पात सजा दियौक आर पड़सि लिअ। केसर पुलाव सामग्री:- २ कप बासमती चावल, १ कप मटरक दाना, १ टुकड़ा दालचीनी, १ बड़ी इलायची, ४ टा लौंग, ४ कप पानि, २ टेबुल स्पून घी, १/२ केसर, २ टीस्पून गरम पानि, एकटा पियाजु लम्बा-लम्बा काटल, १ टी स्पून जीर, २ टी स्पून नून। विधि:-केसरक गरम पानिमे फुलइ लेल दऽ दियौक। चाउरकेँ नीकसँ धोऽ कए फुलइ लेल दऽ दियौक। चाउरकेँ नीकसँ धोऽ कऽ फुलय लेल दऽ दियौक। कुकरमे घी गरम कऽ कए ओहिमे प्याज दऽ कए ब्राउन होय धरि फ्राइ कऽ कए प्लेटमे निकालि लिअ। आब एहि गरम घीमे दालचीनी, जीर, इलाइची, लौंग आर नून दऽ दियौक। मटरकेँ दऽ कए कनी चलाऊ आर चाउरकेँ पानिसँ निकालि अहीमे दऽ दियौक। ऊपरसँ पियाजु आ केसर सेहो दऽ दियौक। ४ कप पानि दऽ कय एक सीटी आबए तक पकाऊ। गरम-गरम केसर पुलाव, रायता वा कोनो रसगर तरकारी संग खाऊ। मूरक परोठा सामग्री:- आँटा-२५० ग्राम, बेसन-१०० ग्राम, मूर-२५० ग्राम, रिफाइन तेल-१०० ग्राम, जमाइन-मंगरैल-अंदाजसँ। आदी-१ इन्च टुकड़ा, धनी-पात-दू डाँट, हरियर मेरचाइ ४ टा, नून- अंदाजसँ। विधि:- मूरकेँ धोऽ कऽ कद्दूकस कऽ लिअ। लोहियामे कनी तेल दऽ दियौक। गर्म भेलापर ओहिमे मूर आ सभ मसल्ला खसा दियौक आ ढ़क्कनसँ झाँपि दियौक। कनी भाप आबि जाएत, ओकरा निकालि कऽ ठंढ़ा हेबय दियौक। आब एहि मिश्रणमे नून मिला कय बेसन मिलल आँटामे मिला कऽ सानि लिअ। गोल-गोल पातर-पातर बेल कऽ ताबापर दुनू दिस रिफाइन लगा कए सेकि लिअ। मूली पराठा तैयार भऽ गेल। मूरक परोठा बनेबाक एकटा आर विधि अछि, अहाँ मूलीक कद्दूकस कऽ कए ओहिमे सभ मसल्ला मिला लिअ। आब ओकड़ा गाड़ि कए एक दिस राखि लिअ। आब आँटाक गोलीमे थोड़े मूलीक मिश्रण लऽ कऽ नून मिला कऽ भरि लिअ आ बेल कऽ ताबापर रिफाइन दऽ कऽ सेकि लिअ। नोट:-एहि तरहेँ काँच अनरनेबा आ बन्धा कोबीक परोठा सेहो बना सकैत छी। छवि झा/ कुमुद सिंह लेखिका छवि झा पिछला तीस वर्ष स मिथिला चित्रकला कए अर्थ पर काज कए रहल छथि। संप्रति ओ 'स्नेह छवि मिथिला स्कूल ऑफ आर्टÓ, दरभंगा क निदेशक छथि आ एकरा परिभाषित करबा मे लागल छथि। लेखिका कुमुद सिंह मैथिली इ-पेपर समादक संपादक छथि। मिथिला चित्रकला : अर्थक अधिकता आ सार्थकता 1960 क दशक मे मिथिला चित्रकला कए दीवार स कागज पर उतारबाक प्रयास शुरू भेल छल आ तहिए स शुरू भ गेल एहि चित्र मे नव-नव प्रयोग। तहिये स शुरू भेल एकर अर्थक नव संसार जे मिथिलाक सोच आ संस्कृति स पूरा भिन्न अछि। नव प्रयोग आ पुरान अर्थक एहन मिश्रण भेल जे कलाक पूरा स्वरूप आ अर्थ क औचित्य पर सवाल उठा देलक। सब कलाकृतिक एकटा अर्थ होइत छैक। जेकर कलाकृति स घनिष्टï संबंध होइत अछि। कलाकृति आ ओकर अर्थ ओ कृतिक सार्थकता कए सिद्घ करैत अछि। मिथिला चित्रकलाक संबंध मे जखन विचार करैत छी त कर्ठटा गप सामने अबैत अछि, मुदा एकटा गप स्पस्ट होइत अछि जे मिथिला आ भारतक विद्घान एहि कलाक प्रति आइ धरि अपन नजरिया नहि बना सकलथि अछि। पिछला पांच दशक मे विदेशी विद्वान जे एहि कलाक प्रति नजरिया स्थापित केलथि अछि, देशक विद्वान ओकरे आधार मानि कए आगू बढैत रहलथि अछि। च पूछु त देशी विद्वान कहियो अपन नजरिया प्रस्तुत करबाक प्रयास तक नहि केलथि। मिथिला चित्रकलाक एहि गुप्त आ जटिल वास्तविकता कए धुंध स निकालबाक पहिल प्रयास सेहो अमरीका मे कैल गेल। 1984 मे अमरीका स प्रकाशित मानव शास्त्र पर आधारित पत्रिका मे पहिल बेर एहि गप कए रोचक आ गंभीरतापूर्वक उठाउल गेल जे अर्थक अधिकता स केना एहि कलाक सार्थकता खत्म भ रहल अछि। उत्तर बिहार आ नेपालक तराई मे पसरल मिथिला क महिला द्वारा अपन घरक दीवार आ आंगना मे बनाउल जाइवाला एहि चित्रक संबंध मे एखन धरि कई बेर लिखन जा चुकल अछि आ कई ठाम कहल जा चुकल अछि। एतबे नहि कई टा अंतरराष्टï्र्रीय मंच पर एकर प्रस्तुति सेहो भ चुकल अछि। मुदा एकर संबंध मे लिखल साक्ष्य बेसी पुरान नहि अछि। 1949 मे पहिल बेर एहि पुरातन कलाक संबंध मे कागज पर किछु लिखल गेल। डब्ल्यू जी आरचर अपन किताब मे एहि चित्रकला कए अद्भुत आ आश्र्चयजनक कहने छथि। मुदा 1962 मे प्रकाशित लक्ष्मीनााि झाक पुस्तक मिथिला की सांस्कृतिक लोकचित्रकला सही मायने मे एहि चित्रकला पर पहिल आधिकारिक दस्तावेज अछि। देसी नजरियाक संग-संग एकर भाषा मे सेहो हिंदी आ मैथिलीक मिश्रण अछि, जाहि स अर्थक भाव अंगरेजी स बेसी साफ बुझबा मे अबैत अछि। देशी नजरियावाला एहन पुस्तक कए पाठक तक नहि पहुंचब एहि कलाक अर्थक अधिकताक मूल कारण कहल जा सकैत अछि। मिथिला चित्रकलाक अर्थक संबंध मे समय-समय पुस्तक क प्रकाशन होइत रहल अछि। 1952 मे ब्राउन आ लेन्यूइस, 1966 मे माथुर, 1977 मे इब्स विको (वैक्यूवाद) आ 1990 मे जयकर एहि कलाक अर्थक संबंध मे बहुत किछु लिखलथि। अविश्वसनीय मुदा सत्य अछि जे एहि किताब सब मे जे किछु लिखल गेल अछि ओ मिथिला मे प्रचलित अर्थक स सर्वथा भिन्न अछि। एहि संबंध मे अमरीकाक चीको विश्वविद्यालयक कैरोलिन ब्राउन लिखैत छथि जे मिथिला चित्रकलाक अर्थ कए हरदम गलत आ भ्रमक तरीका स विश्वक समक्ष राखल गेल अछि। एकर मुख्य कारण इ रहल जे एहि पर देशी खास कए मिथिलाक विद्वान गंभीर काज नहि केलथि, जे काज भेल ओ विदेशी विद्वानक शोध स भेल। मिथिलाक अंगना मे बनाउल गेल एहि चित्रक संबंध मे पुख्ता जानकारी लेब कोनो विदेशी लेल हरदम एकटा चुनौती रहल अछि। लोककला कए बुझलाक बाद ओकर सही अर्थ बुझब आ फेर ओकरा सही रूप मे परिभाषित करि अभिव्यक्त करब कोनो विदेशी शोधकर्ता लेल राई क पहाड़ सन काज अछि। 1986 मे एसैड, वैल, मारकस आ फिसर, 1988 मे क्लिवाड आ 1992 मे वूल्फ क आलेख स बुझबा मे अबैत अछि जे ओ किछु एहने सच्चाई स सामना केने हेताह। कैरोलिन ब्राउन एहि संबंध मे साफ तौर पर लिखैत छथि- हम पश्चिम कए लोक एहि चित्रकला कए परिभाषित नहि करि सकैत छी, ताहि कारण हम सब एहि अद्भुत विषय कए तोडि़-मरोड़ी कए पेश करैत रहलहुं अछि। हालांकि एहि मे कोनो संदेह नहि अछि जे एकटा समाज मे भिन्न-भिन्न लोकक अगल-अलग नजरिया भ सकैत अछि, ओ एकटा चित्रक भिन्न-भिन्न अर्थ कहि सकैत छथि, मुदा विभिन्न अर्थक बीच मे एकटा समानता होइत अछि, जे अर्थ कए कतहु ने कतहु जोड़ैत अछि। उदहारण लेल मिथिला मे पुरुख कर्मकांड, न्यायशास्त्र सन शास्त्रीय विधा मे नीक पकड़ रहैत छथि आ ओहि स जुड़ल पावैन-तिहार क व्याख्या नीक जेका करि लैत छथि, ओतहि मौगी घरेलू पावैन-तिहार पर नीक पकड़ी रखैत छथि आ ओकर अपन अनुसारे व्याख्या सेहो करैत छथि। एहि लेल कुलदेवीक पूजा या गौरी पूजा मे पुरुखक योगदान कम देखबा मे अबैत अछि। एकर पाछु कारण इ अछि जे अत्यंत गूढ़ संसार आ अत्यधिक विकसित समाजक सबटा गपक ज्ञान राखब असंभव अछि। ओना मिथिला समाज कए अत्यंत विकसित समाज बहुत कम विद्वान मानने छथि। जेना कि 1991 मे दरिदा आ 1994 मे वाल साफ तौर पर लिखने छथि जे एहि चित्रकलाक सही अर्थ मिथिला मे आब गिनल-चुनल लोक बता सकैत अछि। वेल क कहब अछि जे मिथिला मे जे चित्रक अर्थ कहि सकैत छथि ओ चुप रहय चाहैत छथि, जखन कि अर्थ नहि जननिहार लोक कए चुप राखब एकटा कठिन काज अछि। ओना एहि संबंध मे ब्राउनक मत किछु अलग अछि। ब्राउन कहैत छथि, 'इ सच अछि जे आम मैथिल एहि कलाक संबंध में कम जानकारी रखैत छथि, मुदा बहुत विद्वान लेल इ कोनो महत्व नहि रखैत अछि जे मैथिल एहि संबंध में कतेक बुझैत अछि आ की कहैत अछि। अधिकतर विद्वान मैथिलक भावना कए अपन शोध मे तोडि़-मरोडि़ कए प्रस्तुत करबा स पाछु नहि हटला अछि। दुर्भाग्य अछि जे एखन तक कोनो देशी विद्वान एहि तथ्य कए रेखांकित नहि केलाह अछि, मुदा ब्राउन अपन मिथिला प्रवासक दौरान किछु एहने महसूस केलीह। असल मे सबस पैघ गप इ अछि जे पाश्चात्य संस्कृति, व्यवहार आ शिक्षा हमरा लोकनि क सोच कए दबा देलक अछि या इ कहू जे सीमित करि देलक अछि। एकर अलावा हमरा लोकनि मे अनुवाद करबाक क्षमता सेहो कम भ चुकल अछि। आब सवाल उठैत अछि जे एतेक जटिल आ गुप्त तथ्यक कोनो एक व्यक्ति द्वारा कैल अनुवाद कए सर्वोच्च मानल जा सकैत अछि? एहि ठाम इ कहब जरूरी अछि जे एकटा चित्रक कई टा अर्थ भ सकैत अछि, मुदा ओकर सूत्र दूटा नहि भ सकैत अछि। वैह एकटा सूत्र ओकरा आन स भिन्न करैत अछि। एहि सूत्रक चारुआत ओकर अर्थ घुमैत रहैत छैक। एहन सूत्र मिथिला मे एखनो किछु महिला कए बुझल छैन, मुदा ओ निश्चित रूप स व्यावसायिक नहि छथि। ताहि लेल हुनका स ओ सूत्र बुझब कोनो देशी विद्वान लेल कठिन काज अछि, एहन मे विदेशी विद्वानक गप करब बेकार अछि। दरअसल मिथिलाक मौगी एहि सूत्र कए अपन शरीरआ आत्मा मे बसा रखने छथि आ नव पीड़ी कए थोड़े-थोड़े करि कए बुझाउल जाइत रहल अछि। एहन मे अल्प ज्ञानी स जानकारी लेलाक बाद विदेशी विद्वान मिथिलाक सूत्र जनिनिहार महिला कए नजरअंदाज करि दैत छथि। मिथिला चित्रकला क सबस प्रचलित चित्र कोहबरक पुरैन कए ल कए सबस बेसी भ्रमक स्थिति अछि। अधिकतर विद्वान एकरा कोहबर नाम स परिभाषित केलन्हि अछि, जखन कि पुरैन कोहबरक अनेक चित्रगुच्छक एकटा सदस्य मात्र अछि। आइ जे पुरैनक स्वरूप देखबा मे आबि रहल अछि, ओ जानकार महिला मे भ्रम पैदा करि रहल अछि। हालांकि एतबा अवश्य अछि जे एकटा गोलाकार आकृतिक चारुआत छह टा मौगिक मुंह बनाउल गेल अछि, जेकर बीच मे सातम मुंह सेहो अछि जे छह टा मुंह स कनि पैघ आकारक अछि। एहि चित्र कए रेखाचित्रक रूप मे बनाउल गेल अछि। पुरैनक सूत्र पर बनाउल गेल एहि रेखाचित्र स भ्रण हेबाक कईटा कारण अछि। मिथिला मे पुरैन रेखाचित्र नहि, बल्कि भित्तिचित्र अछि आ पांचटा रंग स बनाउल जाइत अछि। हालांकि आइ अधिकतर कागज पर एहन चित्र बनाउल जा रहल अछि, लेकिन एहि चित्रक विशेष मे साफ तौर पर कहल गेल अछि जे एकरा दीवार पर बनाउल जाइत अछि। मिथिला मे रेखाचित्र कए अरिपन कहल जाइत छैक आ ओ जमीन पर बनाउल जाइत अछि। ओनाओ मिथिला मे पुरैनक दू टा सूत्र अछि। एकटा ब्राह्मïण आ दोसर कर्णकायस्त लोकनिक पुरैन। दूनू मे सूत्रक अंतर अछि। मुदा एहि चित्र मे एकर प्रारूपक कोनो चर्च नहि अछि। सातटा मौगिक मुंहक संग सांप, कछुआ, माछ आदिक चित्रक औचित्य जखन मिथिलाक लोक लेल बुझब कठिन अछि तखन विदेशी की बुझत? विदेशी विद्वान लेल इ मात्र एकटा भीड़वाला चित्र अछि, जाहि मे संदेशक कोनो स्थान नहि अछि। बहुत रास विदेशी विद्वान त एकरा जादू-टोना आ भूत-प्रेत लेल बनाउल गेल चित्र कहलथि अछि। मुदा ब्राउनक कहब अछि जे इ पुरैनक नव रूप अछि आ कायस्त प्रारूप स मिलैत-जुलैत अछि। मिथिला मे पुरैन कमलक लत्ती कए कहल जाइत अछि। ब्राह्मïण प्रारूप मे नौ आ कायस्थ प्रारूप मे सातटा कमलक पात दर्शाउल जाइत अछि। चूंकि कमलक लत्ती पाइन मे होइत अछि, ताहि लेल एकर संग-संग पाइन मे रहैवाला वस्तु आ जीवक चित्र बनाउल जाइत अछि। लक्ष्मीनाथ झा एहि संबंध मे लिखैत छथि जे पुरैन मुख्य रूप स वंश वृद्घिक लेल नव दंपति स सांकेतिक अनुरोध अछि। जेना कमलक एकटा लत्ती पोखरि कए कहियो कमल विहीन नहि हुए दैत अछि, तहिना नव दंपति कए घर कए कहियो वंश विहीन नहि हुए देबाक कर्तव्य निभेबाक चाही। एतबा त जरूर अछि जे 20वीं शताब्दी मे पश्चिम मे पलल-बढ़ल कोनो व्यक्ति एहि स्त्रीत्व कए(स्त्री कए हृदय मे वास करैयवाला भावना) घेरा नहि बुझि पाउत। आइ जखन बियाह एकटा अलग अर्थ ल चुकल अछि, एहन मे पुरैनक औचित्य जरूर प्रासंगिक भ गेल अछि। 1960 क दशक मे एहि चित्र कए कागज पर उतारबाक प्रयास शुरू भेल छल आ तहिए स शुरू भेल एहि चित्र मे नव-नव प्रयोग। तहिये स शुरू भेल एकर अर्थक नव संसार जे मिथिलाक सोच आ संस्कृति स पूरा भिन्न अछि। नव प्रयोग आ पुरान अर्थक एहन मिश्रण भेल जे कलाक पूरा स्वरूप आ अर्थ क औचित्य पर सवाल उठा देलक। सच कहल जाए त मिथिलाक महिलाक एहि विलक्षण प्रतिभा कए परिभाषित करबा मे एखन धरि कोनो विद्वान सफलता नहि पाबि सकलथि अछि। समस्त मिथिला मे बनाउल जाइवाला एहि चित्र कए किछु चारि-पांच टा गाम मे समेट देबाक अलावा इ विद्वान लोकनि एहि चित्र कए कएटा अनपढ़-गवांर मौकी द्वारा बनाउल गेल चित्र स बेसी किछु नहि साबित कए सकलथि अछि। मिथिला मे एखनो कई टा महिला अपन फाटल पुरान कॉपी निकालि देखबैत छथि, जाहि मे कईटा विदेशी विद्वानक लिखल वाक्य अछि। दुख आ तामस तखन होइत अछि जखन कॉपी पर लिखल वाक्य पढ़ैत छी, जाहि मे लिखल रहैत छैक जे इ चित्र एकटा पिछड़ल समाजक गवांर, अनपढ़ आ मूर्ख महिला द्वारा बनाउल गेल अछि। विदेशी विद्वान मे इ सोच अचानक नहि आबि गेल अछि। हुनका कई प्रकार स इ बतेबाक बेर-बेर प्रयास भेल अछि। दुनिया मे इ धारण कए स्थापित करबाक श्रेय इब्स विको कए अछि। विको स बेसी शायद कोनो विद्वान एहि चित्रकला पर काज नहि केलथि अछि, मुदा ओ जतेक एहि चित्रक करीब अबैक कोशिश केलाह, एकर अर्थ स ओ ओतेक दूर होइत गेलाह। विको राय औवेन्स क संग एकटा फिल्म सेहो बनौलथि, जेकर नाम 'मुन्नीÓ अछि। ओ एकटा फ्रंच फिल्म सेहो बनउलथि, मुदा चित्रक अर्थ बुझबा आ बुझेबा मे सब बेर असफल भेलथि। विको तखनो हार नहि मानलथि, ओ 1994 मे एकटा विडियो फिल्म 'मिथिला पेंटरस...Ó बनौलथि, मुदा नव किछु नहि कहि पैउलथि। आइ स्थिति एहन भ चुकल अछि जे समाजक सब लोक इ बुझबा मे लागल अछि जे आखिर इ परंपराक कौन वस्तु बारे मे थिक। एहि चित्रकलाक संबंध मे सबसे लोकप्रिय स्रोत विकोक 1977 मे छपल किताब' द वीमेंस पेंटर ऑफ मिथिला...Ó अछि। जखन कियो एहि पुस्तकक एक-एक टा चित्र कए गौर स देखैत अछि आ ओकर रूपरेखा कए पढ़ैत अछि त ओकर सामना एकटा आश्र्चजनक, अद्भुत आओर लगभग असंभव सन प्रतीत होइवाला संसार स होइत अछि। विको लिखैत छथि जे मिथिला समाज मे मुख्यपात्र महिला छथि आ एहि ठाम पुरुषक भरमार अछि। एहि ठाम युवती हमउम्र युवक स विवाह करबा लेल तरह-तरह स प्रयास करैत छथि।(1977, पृष्ठ- 17)। विको एहि गप कए बाजारू आओर रोचक बनबैत आगू लिखने अछि जे मिथिला मे एकटा युवती अपना लेल सुयोग्य युवक कए चुनैत अछि आ विवाहक प्रस्ताव स्वरूप ओकर सामने कोहबर रखैत अछि ।(1977, पृष्ठ- 17)। ओ लोक जे मिथिला कए नीक जेका नहि चिन्हाल अछि, हुनको इ वाक्य पढ़लाक बाद आश्र्चय हेतेन जे विको केना मिथिला समाज कए अतेक चरित्रहीन बना देलथि। इ अद्भुत मुदा सत्य सन आलेख कए पढ़लाक बाद एहन प्रतीत होइत अछि जे विको कए एहन अनुवादक भेटलन्हि जेकरा मिथिला समाज, संस्कृति आ सभ्यता स कोनो वास्ता नहि रहैन, संगहि हुनका मिथिलाक रिति-रिवाज आ लोकाचार तक कए ज्ञान नहि रहैन। सच पूछु त अनुवादकलेल विको मात्र टका देनिहार विदेशी छलाह। ओना देखल जाए त विको क इ किताब एहि विषय पर लिखल गेल पहिल अथवा आखिरी किताब नहि थिक। इ पुस्तक एहि लेल महत्वपूर्ण भ गेल अछि, किया कि मिथिला चित्रकला पर शोध केनिहार अधिकतर विद्वान एहि पुस्तक स प्रभावित छथि। एतबा धरि कि भारतीय विद्वान उपेंद्र ठाकुर तक अपन किताब मे विको क नजरिया कए नजरअंदाज नहि केलथि अछि। विको क एहि किताब क महत्व पर ब्राउनक कहब अछि जे पश्चिमक विद्वान जखन कोनो विषय पर काज शुरू करैत छथि तखन ओहि विषय पर लिखल गेल पूर्वक किताब स काफी प्रभावित होइत छथि। मिथिला चित्रकलाक संग सेहो किछु एहने भेल। अधिकतर विद्वान विकोक रूप-रेखा स प्रेरणा लेलथि, किछु त हुनकर नकल तक कैलथि। ताहि लेल इ अन्य पुस्तक बेसी महत्वपूर्ण भ जाइत अछि। दोसर इ जे विको बहुत दिन धरि एहि विषय पर काज केलथि अछि आ कई प्रकार स एकरा दुनियाक समक्ष अनलथि अछि, एहन मे विदेशी विद्वान लेल हुनका नजरअंदाज करब कठिन रहल अछि। एहि प्रकारे विको भ्रमक आओर सर्वथा गलत तरीका स अनुवाद करि झूठ कए एकटा सत्य स बेसी सत्य रूप मे स्थापित केलथि अछि। ओना अधिकतर विदेशी विद्वानक कहब अछि जे मिथिला समाज विश्वक सबस चरित्रवान समाज मे स एक अछि। एकर संस्कृतिक संबंध मे प्राख्यात चिकित्सक डॉ कैमेल क कहब अछि जे आइ 'जीनÓ(अणु)क संबंध मे दुनिया भरि मे शोध भ रहल अछि, जखनकि मिथिला मे पंजी व्यवस्था ओकरे एकटा रूप अछि। मिथिलाक ब्राह्मïण आ कर्णकायस्थ लग एखनो बीस-बीस पीढिक़ जानकारी उपलब्ध अछि। विको कए शायद इ नहि बताउल गेल कि मिथिला मे युवतिक विवाह पंजीकारक राय स तय कैल जाइत अछि। युवतिक इच्छा एहि ठाम कोनो मायने नहि रखैत अछि। एहि तथ्य कए ब्राउन बहुत साफ तौर पर रखने छथि। ब्राउन कहैत छथि जे ओ मिथिला प्रवासक दौरान पंजीक विधिवत शिक्षा ल चुकल छथि। ओ एहि गप कए सेहो साफ करबाक प्रयास केलथि अछि जे मिथिला मे कहियो युवति कए पति चुनबाक अधिकार नहि रहल अछि। सीताक संबंध मे सेहो ब्राउनक मत स्पष्टï अछि। ओ कहैत छथि जे सीताक स्वयंवर नहि छल ओ एकटा सशर्त विवाह छल। इ सच अछि जे ओहि विवाह मे पंजीक कोनो व्यवस्था नहि छल, मुदा धणुष रामक बदला मे रावण उठा लैत त कि सीताक इच्छा रहितो राम स विवाह संभव छल? सीताक इच्छा हुनक विवाह मे कोनो मायने नहि रखैत छल। ब्राउल इ तर्क देलाक बाद आखिरी फैसला मिथिलाक लोक पर छोड़ैत कहैत छथि जे मेरे एहि मत स शायद मिथिलाक लोक सहमत नहि हेताह। वैकसेनेलक शब्द मे कहल जा सकैत अछि जे मिथिला चित्रकला एकटा आंखिक भांति अछि जे समयक संग-संग अपना कए बदलैत रहल अछि, मुदा अपन मूल सिद्घांत स कखनो समझौता नहि केलक अछि। इ कला जगतक एकटा अद्भुत औजार अछि जेकरा स कलाकार अपन समाजक संग-संग पूरा विश्वक गुढ़ गप आ रिति-रिवाज कए चित्रक माध्यम स प्रस्तुत करैत आइल अछि। (1972,पृष्ठ-38) जे किछु हुए एतबा त अवश्य भेल अछि जे मिथिलाक संस्कृति कए दुनियाक सामने सर्वथा गलत तरीका स परिभाषित केल गेल अछि। आइ मिथिला चित्रकला अधिकतर एहन चित्र बनाउल जा रहल अछि, जेकर एतुका संस्कृति स कोनो लेनादेना नहि अछि। आवश्यकता अछि एहि चित्र क गंभीरता स शोध करबाक आ एकर अर्थक अधिकता कए समाप्त करबाक, नहि त इ चित्र हरदम लेल हमरा लोकनिक अज्ञानताक द्योतक बनल रहत। नूतन झा; गाम : बेल्हवार, मधुबनी, बिहार; जन्म तिथि : ५ दिसम्बर १९७६; शिक्षा - बी एस सी, कल्याण कॉलेज, भिलाई; एम एस सी, कॉर्पोरेटिव कॉलेज, जमशेदपुर; फैशन डिजाइनिंग, निफ्ट, जमशेदपुर।“मैथिली भाषा आ' मैथिल संस्कृतिक प्रति आस्था आ' आदर हम्मर मोनमे बच्चेसॅं बसल अछि। इंटरनेट पर तिरहुताक्षर लिपिक उपयोग देखि हम मैथिल संस्कृतिक उज्ज्वल भविष्यक हेतु अति आशान्वित छी।” जानकी नवमी-13 मई 2008 पर विशेष जानकी-नवमी वैशाख मासक शुक्ल पक्षक नवमी तिथि केँ जानकी-नवमी मनाओल जाइत अछि। लोक ओहि दिन व्रत राखैत छथि आ' सीताजीक पूजा अर्चना करैत छथि। सीता माता लक्ष्मीजीक अवतार मानल गेल छथि, तैँ ई मान्यता अछि जे ई व्रत कएलासॅं सुख एवम् सम्पत्तिक प्राप्ति होइत अछि। एहि वर्ष ई पाबनि अंग्रेजी तारिख १३ मई, २००८ मंगलवार केँ अछि। कथा अछि जे राजर्षि जनकजी केँ सीताजी शैशवावस्थामे अही दिन प्राप्त भेल रहथिन्ह।राजा जनक जनकपुरक राजा छलाह आ' संतानहीन जाहिसँ एहि दु:ख सॅं पीड़ित छलाह।एक दिन कोनो शुभ कार्यक प्रयोजन सॅं ओ’ खेतमे हर जोतए गेलाह। ओही बीच हुनकर हरसॅं लागि एक स्वर्णक कलशमे सॅं एक दिव्य बालिका प्रकट भेलीह, जिनका राजा जनक आ' हुनकर पत्नी सुनयना गोद लऽ लेलखिन। बालिकाक नाम सीता राखल गेल जकर अर्थ होइत अछि हर। देवी सीताक जानकी नाम सेहो पड़ल अछि। किन्वदन्ति अछि जे सीताजी लक्ष्मी माताक अवतार देवी वेदवतीक पुनर्जन्म रूप छलीह। ऋषि कुषध्वजक पुत्री वेदवती परम सुन्दरी छलीह आ स्वयम् केँ विष्णु देव केँ प्रति अर्पित कएने छलीह। अनेको राजासॅं आयल विवाहक प्रस्ताव अस्वीकृत कऽ दैत छलीह। अहि कारणसँ ओ अहंकारी रावण के सेहो मना कऽ देलन्हि जाहि द्वारे हुनका रावणक अत्याचार सहऽ पड़लन्हि।दुःखी भय वेदवती प्रतिज्ञा लेलन्हि जे ओ अपन पुनर्जन्ममे रावणक विनाशक कारण बनतीह आ स्वयम्केँ अग्निमे भष्म क’ लेलन्हि।एहि बीच मन्दोदरि गर्भवती भेलीह। अपन पतिक कुकृत्य दऽ सुनलाक बाद ओ’ अपन भावी संतानकेँ लऽ कऽ आशंकित भऽ गेलीह।ओ’ अपन नइहर गेलीह आ’ अपन माता पिताक संग तीर्थ करय लगलीह। जन्मक समय नजदीक अएला पर ओ’ अपन संतानक लेल आश्रय ताकए लगलीह। तखने संजोगसॅं संतानहीन राज जनकक खिस्सा सुनलन्हि आ' समय पाबि अपन पुत्रीकँ राजाक पथमे नुकाबएमे सक्षम भऽ गेलीह।किछु लोक इहो कहैत छथि, जे संभवत: सीताजीक जन्मक बाद हुनका पानिमे बहा’ देल गेल छल आ’ संयोगसँ ओ’ जनकजीक खेत लग कात लगलीह। कथा इहो प्रचलित अछि जे राक्षसक अत्याचारसॅं हताहत ऋषि मुनिक शोणित एक कलशमे एकत्रित कऽ भूमिमे गाड़ि देल गेल छल। बादमे ओहि कलशसॅं सीताजीक जन्म भेल। जन्मक पाछाँ खिस्सा चाहे जे होए उद्देश्य तऽ रावणक नाशे रहए। एकर सांकेतिक अर्थ यैह अछि जे ‘यत्र नार्येस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’। अर्थात् जतए स्त्रीक आदर होइत अछि ततए देवताक निवास होइत अछि आ' ओकर विपरीत स्त्रीक अपमान करनिहार दुखद अंत पाबैत छथि। किछु लोक मानैत छथि जे सीताक जन्म फाल्गुन मासक कृष्ण पक्षक अष्टमी तिथिकेँ भेल छन्हि। वटसावित्री मिथिलांचल में वटसावित्री ज्येष्ठ मासक अमावस्या तिथि केर मनौल जाइत अछि।अहि पाबनि के अहिबाती स्त्री स्वयम् के वैधव्य सॅं मुक्त राख लेल मनाबैत छथि। अहि दिन नब वस्त्र , सामयिक फल, आम, अंकुरि, बड़क गाछ, बॉंसक बियनि आदिक बड़ महत्त्व अछि।सब सधवा स्त्री भोरे-भोर स्नानादि कऽ नव वस्त्र धारण कऽ फूल, नैवेद्य, बियनि, अछिंजल, सूत, धूप-दीप लऽ बड़क गाछ लग जाइत छथि।ओतऽ नियमपूर्वक पूजा करैत छथि। तदोपरान्त जल आ' अन्न ग्रहण करैत छथि। व्रत करनिहारि अहि दिन अनून खाइत छथि । नवव्याहता के लेल ई पाबनि विशिष्ट अछि। पहिल बेर पाबनि बड विस्तृत रूप सॅं मनाओल जाइत अछि। इक दिन पहिने पबनौतिन अड़बा अड़बाइन खाइथ छथि ।ओहि दिन राति कऽ भगवतीक गीत नाद संगे हड़दि के गौर आ' उड़दि के बड़ बनाक राखि लेल जाइत अछि।माटिक बिसहरा बना ओकरा चून सॅं ढौरकऽ रंग सॅं रॉंगि लेल जाइत अछि।पाबनि के दिन तीन पात अड़िपन पड़ैत छै। बिषहरा गौरी समेत सावित्रीक पूजा होति अछि।बड़क गाछ के त्रिपेक्षण कैल जाइत अछि जाहि में गाछक जड़ि में आम स लगाक जल ढारि सूत लपेट क बियनि डोलैल जाइत अछि।आरतीक बाद कथा कहल जाइत अछि आ पबनौतिन के हाथे पॉंच टा अइहब के अंकुरि आ नवेद पड़ोसाइल जाइत अछि। रक्षाबन्धन रक्षाबन्धन के पाबनि, जे भाई बहिनक पाबनि के रूपमे मानल गेल अछि, मिथिलामे मूलतथ अहि रूपमे नहि अछि लेकिन, देखा-देखीमे ई पाबनि मिथिलामे भाय- बहिनक पाबनिक रूपमे बहुप्रचलित भय गेल अछि।साओन पूर्णिमा दिन राखी भगवान-भगवती के अर्पित कऽ लोक में बान्हके प्रथा अपन सबहक राखी कहाइत अछि।स्त्री पुरुष के राखी बान्हैत छैथ आ' बदले में हुनका ओहि पुरुष सॅं संकटमे रक्षाक वचन भेटैत छनि। एक मैथिल पुस्तकक अनुसारे राखी बान्ह बेरमे निम्न मंत्र पढ़ल जाइत अछि- ''येन बद्धोबली राजा दानवेन्द्र महाबल:। तेनत्वां प्रातिबध्नामि रक्षे माचल माचल:॥ राखीक प्रथाके उत्पत्ति स सम्बन्धित अनेक कथा प्रचलित अछि।एक कथानुसार इन्द्रदेव वृत्र इन्द्र संग युद्ध केला जाहिसॅं हुनका किछु हानि भेलनि। तखन हुनकर पत्नी हुनका राखी बन्हलखिन जकर बाद हुनका विजय भेटलैन।दोसर कथा प्रसिद्ध अछि द्रौपदी आ' कृष्णक।शिशुपालक बद्ध केलाक बाद कृष्ण भगवानक हाथ सॅं रक्त बहय लगलैन त द्रौपदी के नहि रहल गेलैन ओ अपन ऑंचर सॅं कपड़ा फाड़िक हुनकर हाथमे बॉंधि देलखिन। भगवान हुन्कासॅं ई उधार चुकाबऽ के वचन देलखिन।बादमे जखन छलसॅं कौरव पॉंडवक राजपाट छीन द्रौपदीके अपमानित करऽ चाहल त कृष्ण भगवानक कृपा सॅं हुनकर सारी अनन्त भऽ गेल। तहिना जखन राक्षस राज बलि के भगवती लक्ष्मी राखी बान्हलाक बाद भगवान विष्णु के वापस मंगलखिन तऽ बलि के हुनकर आग्रह मानऽ पड़लैन। अहि वर्ष राखी अर्थात् साओन पूर्णिमा १६ अगस्त, शनिदिन कऽ अछि। कृष्णाष्टमी / जन्माष्टमी कंसक प्रकोपसँ मनुषक रक्षालेल द्वापरयुगमे स्वयं विष्णुदेव भगवान श्रीकृष्णक रूपलऽ मथुराक कारावासमे देवकीक कोखसँ जाहि दिन पृथ्वी पर अवतरित भेलाह, ताहि दिनकेँ कृष्णाष्टमीक रूपमे मनओल जाइत अछि। सावन मासक कृष्णपक्षक अष्टमीकेँ अर्धरात्रिकऽ भगवानक जन्म भेल छनि। जन्मक पहिल दिन कृष्णाष्टमी कहाइत छैक आऽ जन्मक बादक दिन जन्माष्टमी। ताहि कारणेँ व्रतो दू प्रकारक होइत अछि, कृष्णाष्टमी व्रत आऽ जन्माष्टमी वा जयन्ती व्रत। शास्त्रक अनुसारे एहि दिन पूजाक बेसी महत्व अछि व्रतसँ परन्तु मिथिलावासी दुनुकेँ बराबरे महत्व देने छथि। कृष्णाष्टमी व्रतसँ एक दिन पहिने अरबा-अरबाइन खाइत छथि आऽ व्रतक दिन निराहार रहि सॉंझमे फलाहार करैत छथि। कतेक लोक सेहो रातिकऽ जगरना करैत छथि। ठाम-ठाम बालकृष्णक प्रतिमाकेँ सुन्दर पीताम्बर पहिना पालनामे झुलायल जाइत अछि। तकर बाद भोरे पारणा करैत छथि। कतेक लोक कृष्णाष्टमी नहि कऽ जन्माष्टमी व्रत करैत छथि। स्कन्दपुराणमे जयन्तीव्रतक विशेषता मानल गेल अछि।सूर्योदयसॅं चन्द्रोदय तक अष्टमी रहए आऽ निशाभाग रातिमे रोहिणी नक्षत्रक योग होए तँ ई व्रत अवश्य करबाक चाही। यदि सोम वा बुद्ध दिनक पड़ैत अछि तथा नवमीयुक्त होए तँ बेसी प्रशस्त होइत अछि।जॅं रोहिणी नक्षत्रक योग नहि होए तँ जन्माष्टमी व्रतक संगे जयन्ती व्रत सेहो करबाक चाही नहि तँ जन्माष्टमी व्रतक महत्व नहि रहि जाएत ई धारणा अछि। एहि वर्ष कृष्णाष्टमी-जन्माष्टमी २३/२४ अगस्तकेँ अछि। महाराष्ट्रमे एहिदिन दही-हांडीक प्रथा बहुत प्रचलित अछि। कुशोत्पतन / कुशी अमावस्या भादवमासक अमावस्याकेँ कुशी अमावस्या कहल जाइत अछि। एहि दिनक विशिष्टता यैह अछि जे एहि दिनक उखाड़ल कुशक उपयोग वर्षपर्यन्त भऽ सकैत अछि। कुश मिथिलांचलमे प्रत्येक पूजा पाठमे काज आबैत अछि। ताहिलेल गृहस्थ सऽ लऽ कऽ साधु सभ कुश संजोगिकऽ राखए छथि। आन अमावस्याक उपाड़ल कुशक उपयोग मात्र एक मास तक भऽ सकैत अछि आऽ अनदिना कुश उपाड़ि कऽ दोसर सुर्योदय तक काज लेल जा सकैत अछि। श्मशान भूमि, बाटपरक यज्ञस्थली, पिण्डदानक स्थान वा अन्य कोनो अपवित्र भूमि परक कुश नहि उपर्युक्त होइत अछि। पितृजीवि बालक तथा पिताक अछैत बालक कुश उपाड़क काज नहि कऽ सकैत छैथ। कुश उपाड़क मंत्र निम्नलिखित अछि : ''ॐ कुशाग्रे वसते रुद्र: कुशमध्ये तु केशवः। कुशमूले वसेद् ब्रह्मा कुशान्मे देहि मेदिनि॥ ॐ कुशोऽसि कुशपुत्रोऽसि ब्रह्मणा निर्मित: पुरा। देव पितृ हितार्थाय त्वां समुत्पाट्याम्यहम्॥" एहि वर्ष कुशी अमावस्या ३० अगस्त, शनि दिनक पड़ल अछि। दुर्गा पूजा आश्विन मासक शुक्लपक्षकऽ प्रातिपदा तिथि सऽ नवरात्रीक आरम्भ होइत अछि। आन प्रदेश सऽ मिथिलांचलमे दुर्गापूजा कनिक भिन्न होइत अछि। मिंथिलांचलमे दुर्गापूजा मूलतथ्य पूजा एवम् आस्तिकताक पाबनि अछि कारण नाच गान ओतेक महत्त्वपूर्ण नहि होइत अछि। तैयो गाम सबमे मेला लागैत अछि आ नाटक- नौटंकी के आयोजन रहैत अछि। प्रतिमा पूजा होइत अछि जकर विसर्जन यात्रा दिन होइत अछि। घरे-घर अहि समय विधि-विधान सऽ पूजा होइत अछि। महाल्याक प्रात कलशकेँ स्थापित कैल जाइत अछि आ अहि के चारू कात जौ रोपल जायत अछि जाहिसॅं जयन्ती उगैत छै। भगवती दुर्गाक पूजाक ई दस दिन मिथिला प्रदेशके सबसऽ बेसी दिनतक चलैवला पूजा अछि। कतेक लोक नौ दिनका व्रत करैत छथि जाहिमे सुर्यास्तक बाद फलाहार करैत छथि। अष्टमी वा नवमी कऽ कुमारि भोजक प्रथा सेहो प्रचलित अछि। कतेक ठाम नौ दिनक सम्पूर्ण रामायणक पाठ होइत अछि तऽ कतेक लोक दसो दिन दुर्गा सप्तशतीक पाठ करैत छथि। भगवती दुर्गाक निम्नलिखित १०८ नामक प्रतिदिन जाप करनिहार के सर्वथा सिद्धि भेटैत छैन : 1 ॐ सती, २ साध्वी, ३ भवप्रीता, ४ भवानी, ५ भवमोचनी, ६ आर्या, ७ दुर्गा, ८ जया , ९ आद्या, १० त्रिनेत्रा, ११ शूलधारिणी, १२ पिनाकधारिणी, १३ चित्रा, १४ चण्डघण्टा, १५ महातपा: , १६ मन: , १७ बुद्धि: , १८ अहंकारा, १९ चित्तरूपा, २० चिता, २१ चिति:, २२ सर्वमन्त्रमयी, २३ सत्ता, २४ सत्यानन्दस्वरूपिणी, २५ अनन्ता, २६ भाविनी, २७भाव्या, २८ भव्या, २९ अभव्या, ३० सदागति: , ३१ शाम्भवी, ३२ देवमाता, ३३ चिन्ता, ३४रत्नप्रिया, ३५ सर्वविद्या, ३६ दक्षकन्या, ३७ दक्षयज्ञविनाशिनी, ३८ अपर्णा, ३९अनेकवर्णा, ४० पाटला, ४१ पाटलावती, ४२ पट्टाम्बरपरीधाना, ४३ कलमञ्जिनी, ४४ अमेयविक्रमा, ४५ क्रूरा, ४६ सुन्दरी, ४७ सुरसुन्दरी, ४८ वनदुर्गा, ४९ मातंगी, ५०मतंगमनपूजिता, ५१ ब्राह्मी, ५२ माहेश्वरी, ५३ ऐन्द्री, ५४ कौमारी, ५५ वैष्णवी, ५६चामुण्डा, ५७ वाराही, ५८ लक्ष्मी, ५९ पुर्उषाकृतिः , ६० विमला, ६१ उत्कर्षिणी, ६२ ज्ञाना, ६३ क्रिया,६४ नित्या, ६५ बुद्धिदा, ६६ बहुला, ६७ बहुलप्रेमा, ६८ सर्ववाहनवाहना, ६९ निशुम्भशुम्भहननी, ७० महिषासुरमर्दिनी, ७१ मधुकैटभहन्त्री, ७२ चण्डमुण्डविनाशिनी, ७३ सर्वासुरविनाशा, ७४ सर्वदानवघातिनी, ७५ सर्वशास्त्रमयी, ७६ सत्या, ७७ सर्वास्रधारिणी, ७८ अनेकशस्त्रहस्ता, ७९ अनेकास्रधारिणी, ८० कुमारी, ८१ एककन्या, ८२कैशोरी, ८३ युवती, ८४ यतिः , ८५ अप्रौढ़ा, ८६ प्रौढ़ा, ८७ वृद्धमाता, ८८ बलप्रदा, ८९ महोदरी, ९० मुक्तकेशी, ९१ घोररूपा, ९२ महाबला, ९३ अग्निज्वाला, ९४ रौद्रमुखी, ९५ कालरात्री: , ९६ तपस्विनी, ९७ नारायणी, ९८ भद्रकाली, ९९ विष्णुमाया, १००जलोदरी, १०१ शिवदूती, १०२ कराली, १०३ अनन्ता, १०४ परमेश्वरी, १०५कात्यायनी, १०६ सावित्री, १०७ प्रत्यक्षा, १०८ ब्रह्मवादिनी। शरत्पूर्णिमा / कोजगरा मिथिलांचलमे शरत्पूर्णिमा कऽ अपन कुलदेवी-देवता (गोसाउन) सहित भगवती लक्ष्मीक पूजन कैल जाइत छैन।अहि पूजाके पूर्णिमा तिथिक प्रदोश काल अर्थात् संध्याकाल कैल जाइत अछि। अहिमे पूजाक समय पूर्णिमा भेनाई आवश्यक छै।ओहि दिनक सुर्योदयक समय पूर्णिमा होई नहि होई तकर महत्व नहि रहै छै।पान, मखान, दही, केरा, नारिकेर संग विभिन्न पकवानक नैवेद्य चढ़ायल जाइत अछि। नवविवाहित के लेल ई पाबनि विशेष रूपसऽ महत्वपूर्ण होइत अछि।विवाहक पहिल वर्षमे पड़ैवला शरत्पूर्णिमाके कोजगराक रूपमे मनाओल जाइत अछि। अड़िपन क बड़के चुमाओन होइत अछि।ई पाबनि बड़क घर पर होइत अछि आ कनिया पक्ष सऽ बड़क कपड़ा, छत्ता, तथा मखान सहित पूरी पकवान आबैत अछि। तकर बाद पान मखान सहित पकवान बॉंटल जाइत अछि। अहि वर्ष कोजगरा १४अक्टूबर, २००८, मंगलदिन कऽ अछि। दीपावली:२८अक्टूबर२००८मंगलदिन दिवाली हिन्दू सिक्ख एवम् जैन सबहक बड़ महत्वपूर्ण पाबनि अछि।मिथिलांचलमे सेहो जगमगाएत दीप सऽ अहि पाबनि के मनाओल जाएत अछि।अहि पाबनिक पाछा अनेक कथा अछि।मानल गेल अछिजे विजयादशमी दिन रावणक अन्तक बाद आहिये दिन भगवान राम देवी सीता, भाय लक्ष्मण, हनुमान, सुग्रीव, अंगद आदि संगे अयोध्या लौटल रहथि।हुनक स्वागतमे अयोध्यावासी दिया बातीसऽ पूरा अयोध्या जगमगेने रहैथ।दोसर किस्सा अछि जे भगवान श्रीकृष्ण अहिये दिन नरकासुरके नरक धाम पहुंचेने रहैथ।अकर अतिरिक्त इहो कथा प्रचलित अछि जे राजा बलि अहि दिन भगवान विष्णुक आज्ञा पाबि अपन राज्य दिस विदा भेल रहथि।अहि तरहे अहि दिनके दुःख आऽ अज्ञानता अन्हार सऽ मुक्ति भेटक एवम समृद्धिक प्राप्तिक अभिलाषासऽ मनाओल जाएत अछि।कतौ-कतौ किछु विशेष पशुके भोजन कराबक नियम सेहो छै जेनाकि कौआ, कुक्कुर, गै आऽ बड़द। घरमे गोसाउनिक पूजा संगे लक्ष्मीजी एवम गणेशजीक पूजा होएत अछि। तकर बाद घरक सबसऽ बुजुर्ग दीप लऽ कऽ बाहर निकलैत छैथ। फेर सबतरि दीप लेशल जाएत अछि।अहिवर्ष दिवाली २८ अक्टूबर, २००८, मंगलदिन कऽ अछि। मिथिलांचलक भ्रातृद्वितीया भ्रातृद्वितीया हिन्दु समाज मे प्रचलित पाबनि अछि । मिथिलांचल मे सेहो अकर विशिष्ट महत्व अछि । कार्तिक मास मे शुक्ल पक्ष के द्वितीया तिथि क ई पाबनि मनाओल जाइत अछि । ई दिन भाय - बहिनक अटूट प्रेम के समर्पित होइत अछि । अहि पाबनि सऽ जुड़ल एक पौराणिक कथा अछि जाहि अनुसारे जमुना अप्पन भाय यम के अहि दिन नोतने रहैथ । बहिन सब अप्पन भाय के पूजा करैत छथि । बहिन अपन घरक ऑंगन नीप कऽपीठार सऽ षष्ठदलक अड़िपन बनाबैत छैथ । भाय के आसन अथवा पीढ़ी पर बैसाबैत छैथ । अड़िपन पर एक गोट बाटी राखै छैथ ।लोटा मे अछिंजल लैत छैथ । पूजा के लेल छह गोट कुम्हरक फूल, पिठार, सिन्दूर, छह गोट डॉंट सहित पानक पात, छह गोट सुपाड़ी, दुनु प्रकारक इलायची आर हरीर आवश्यक होइत अछि । कुम्हरक फूल नहिं भेटला पर गेंदाक फूल सऽ काज लेल जाईत अछि । बहिन अपन भाय के आसन पर बैसाकऽ पिठार आ सिन्दूर सऽ तिलक करैत छैथ । तकर बाद भाय दुनु कर पसारिकऽ बाटिक ऊपरि राखैत छैथ आ' बहिन भाय के हाथ मे पिठार सिन्दूर सहित पूजाक सब सामग्री राखैत छथि । पुन जलसॅं भायके हाथ धो दैत छैथ । जलसऽ हाथ धोईत काल बहिन निम्नलिखित फकरा गाबैत छथि ''यमुना नोतली यम के़ हम नोतै छी भाय के, जते दिन यमुनाक धार रहै तते दिन भाय के अरूदा रहै" तकर बाद बहिन अपन भाय के वैभवानुसार उपहार दैत छथि । मान्यता अछि जे ई पूजा करै वाली स्त्री वैधव्य एवम् अन्य क्लेश सऽ दूर रहैत छथि ।बचपन मे जतऽ ई पाबनि बहिन सभ लेल उपहारक लालसा आ' भाई सभ लेल पूजा कराबऽ के खुशी दैत अछि ओतई पैघ भेलापर ई पाबनि भाय बहिन के भेंट करबाक अवसर बनि जाईत अछि । बाराती-सत्कार आजुक आधुनिक परिवेशमे विवाहक पुरान मान्यता आर विधि विधान अपन प्रतीकात्मक स्वरूपमे शेष बचल अछि। दिन पर दिन ओकर स्थान अपव्यय सँ परिपूर्ण परिपाटी लऽ रहल अछि। हम सब पौराणिक आ’ तर्कसंगत विचारक अवशेष मात्र देखि रहल छी। आब निरंतर जीवनशैलीमे आधुनिकताक समावेष भऽ रहल अछि। एकर किछु प्रत्यक्ष लाभो अछि, जेनाकि बढ़ियाँ शिक्षा आ' स्वास्थ्य व्यवस्था। किन्तु आधुनिकताक दुष्परिणामक सूचि बनाबी तऽ ओ’ अनन्त रहत। विवाहादिमे जे आडंबर आ' विलासितापूर्ण प्रदर्शन होइत अछि ओकर निर्वाह सर्व साधारणक लेल काफी कठिन अछि।पालन-पोषण, शिक्षा-दीक्षा कएलाक बाद एक साधारण कन्यापक्ष विवाह समारोहक उच्चवर्गीय प्रदर्शनक आर्थिक आघात केँ कोना सहत? विभिन्न प्रकारक ताम-झाम युक्त महग व्यवस्थाक निर्वाह बहुत कष्टकारी होइत छैक। किछु घंटाक शोभा बढ़ाब’ लेल वा विवाह समारोह केँ कथित रूप सॅं अविश्वसनीय बनाबए केर दवाब सॅं लोग हजारों लाखों रूपैया पानिमे बहा दैत अछि। नब पीढ़ीक सुशिक्षित लोक केँ बुझबाक चाही जे विवाहकेँ अविस्मरणीय बनाबैत छैक दू परिवारक आपसी स्नेह आ' सम्बन्ध। विवाहकेँ अविस्मरणीय बनाबैत छैक ओकर सफलता जाहि लेल मात्र निष्ठा आ' विश्वासक प्रचुरता चाही, टेंट हाउस भोज व्यवस्था वा महग कपड़ा लत्ता आर गहना जेवर नञि। ई सभ कृत्रिम साधनक मॉँग मध्यम वर्गीय परिवारक लेल सीमित रहय तखने कल्याण अछि। अपव्यय सॅं बचि कऽ यदि नवयुगक वर कन्या अपन सूझ बूझ सॅं गरिमामय सम्बन्धक शुरूआत करथि तऽ ई सभक हितमे होयत।कन्यापक्ष पर वरपक्ष द्वारा बारातीक भव्य स्वागतक दबाब देखि बड़ा दुख होइत अछि। स्वागत तऽ हृदय सॅं हुअक चाही रूपैया पैसा सॅं नहिं। एकटा गरीब परिवारक व्यथा संवेदनशील व्यक्तिकेँ आडंबरक प्रति आर कठोर बनाबए लेल पर्याप्त अछि। एक कविक कविताक किछु पंक्ति उल्लेखित अछि : ''कोना करू बरियाती जी अहॉंक सत्कार यौ । धानो नहि भेल हमरा रब्बियो के नञि आस यौ ॥ कठिन समय छैक सुनियउ भारी परिवार यौ। रूख सुख जे भेटए कऽ लियउ स्वीकार यौ॥ सम्बन्ध बनाबऽ एलहुँ अहॉं राखू हमरो लाज यौ। घर द्वारो टूटल फाटल दलान पर नहि खाट यौ॥ दिन राति पेट भरय लय करि कऽ रोजगार यौ। खानपियनि दऽ नहि सकलहुँ छी बहुत लाचार यौ॥” आउ हम सब अहि आडंबरक समूल नाश कऽ मिथिलाक गरिमा बढ़ाबी। चौठचन्द्र पूजा भादवमासक शुक्लपक्षक चतुर्थी तिथिकऽ ई पूजा होइत अछि।मनोकामना पूर्ण भेलापर ई पाबनि कैल जाइत अछि। अहि दिन चन्द्रमाक पूजा भॉंति प््राकारक पकवानक नैवेद्यसॅ कैल जाइत अछि।मिंथिलानरेश हेमांगद ठाकुर जे कि ज्योतिषी सेहो छलाह अपन कोनो मनोकामना पूर्ण भेलापर अहि पूजाक आरम्भ केने छलाह।अहि पाबनिमे दिन भरि निराहार रहिकऽ सॉंझमे विभिन्न प््राकारक पूरी पकवान सहित दहीक मटकुरी के अड़िपन पर उचित स्थान पर राखि पूजा प््राारम्भ कैल जाइत अछि।गणपत्यादि पंच देवता सहित गौरीजीक पूजा पहिने होइत अछि। जे विधवा स्त्री होइत छथि से गौरीक स्थानपर विष्णुक पूजा करैत छैथ।तकर बाद चतुर्थीचन्द्रक पूजा चानन, रक्त चानन, सिन्दुर, यज्ञोपवीत, अक्षत, फूल, फूलमाला, दूबि, बेलपात, जल, अर्घ्य इत्यादि लऽ पूजा कैल जाइत अछि।तकर बाद डाली लऽ तथा दही मटकुरी लऽ कऽ चन्द्रमाक दर्शन कैल जाइत अछि। डालीलऽ दर्शन करैके मन्त्र - नमो सिंह: प््रासेनमवधीतसिंहो जाम्बवताहत: । सुकुमारक मारोदीपस्तेह्यषव स्यमन्तक:॥ दही मटकुरी लऽ दर्शन करक मन्त्र - नमो दधि शंखातुषाराभम् क्षीरोदार्णव सम्भवम्। नमामिशशिनं भक्त्या शंभोर्मुकुट भूषणम्॥ अर्धपात्रमे सब वस्तु राखि अन्तमे ''ब्रह्मणे नम:”। तकर बाद कथा सुनि विसर्जन कैल जाइत अछि।कथा सुनैत काल हाथमे जे फूल रहैत अछि तकरा निम्न मंत्र पढै़त विसर्जित कैल जाइत अछि। ''रूपं देहि जयं देहि भाग्यं भगवान देहिमे। धर्मान देहि धनं देहि सर्वान् कामान प््रादेहिमे॥ च्च् तकर बाद दक्षिणा दऽ प््रासाद वितरण कैल जाइत अछि। विद्यानन्द झा पञीकार ‘मोहनजी’ जन्म-09.04.1957,पण्डुआ, ततैल, ककरौड़(मधुबनी), रशाढ़य(पूर्णिया), शिवनगर (अररिया) आ’ सम्प्रति पूर्णिया। पिता लब्ध धौत पञ्जीशास्त्र मार्त्तण्ड पञ्जीकार मोदानन्द झा, शिवनगर, अररिया, पूर्णिया|पितामह-स्व. श्री भिखिया झा, पञ्जीशास्त्रक दस वर्ष धरि 1970 ई.सँ 1979 ई. धरि अध्ययन,32 वर्षक वयससँ पञ्जी-प्रबंधक संवर्द्धन आ' संरक्षणमे संल्गन। कृति- पञ्जी शाखा पुस्तकक लिप्यांतरण आ' संवर्द्धन- 800 पृष्ठसँ अधिक अंकन सहित। पञ्जी नगरमिक लिप्यान्तरण ओ' संवर्द्धन- लगभग 600 पृष्ठसँ ऊपर(तिरहुता लिपिसँ देवनागरी लिपिमे)। गुरु- पञ्जीकार मोदानन्द झा। गुरुक गुरु- पञ्जीकार भिखिया झा, पञ्जीकार निरसू झा प्रसिद्ध विश्वनाथ झा- सौराठ, पञ्जीकार लूटन झा, सौराठ। गुरुक शास्त्रार्थ परीक्षा- दरभंगा महाराज कुमार जीवेश्वर सिंहक यज्ञोपवीत संस्कारक अवसर पर महाराजाधिराज(दरभंगा) कामेश्वर सिंह द्वारा आयोजित परीक्षा-1937 ई. जाहिमे मौखिक परीक्षाक मुख्य परीक्षक म.म. डॉ. सर गंगानाथ झा छलाह। पंजी प्रबंध भारतीय इतिहासक वेत्ता ओ’ जातीय व्यवस्थाक मर्मज्ञ लोकनि जनैत छथि, जे भारतवर्षक ब्राह्मण लोकनि सर्वप्रथम वेदक आधार पर विभिन्न वर्गमे विभाजित रहथि। जेना- सामवेदी, यजुर्वेदी, आदि कहाबथि। मुदा समयक प्रभावमे भिन्न क्षेत्र-प्रक्षेत्रमे रहनिहार ब्राह्मण लोकनि भिन्न-भिन्न संस्कृतिसँ प्रभावित भए गेलाह। क्षेत्रीय संस्कृतिसँ प्रभावित होएबाक मुख्य कारण छल विशिष्ट क्षेत्रक विशिष्ट जलवायु, क्षेत्र विशेषक भाषा-विशेष, भिन्न-भिन्न क्षेत्रक भिन्न-भिन्न आहार एवम भेष-भूषा आ’ एक क्षेत्र सँ दोसर क्षेत्र जयबाक हेतु आवागमनक असुविधा आदि। फलतः क्षेत्र-विशेषक ब्राह्मण समुदाय, क्षेत्र विशेषक आचार-विचार, खान-पान,वेश-भूषा ,भाव-भाषा ओ’ सभ्यता संस्कृतिसँ प्रभवित भय गेलाह। उपरोक्त कारणे पुरानक युग अबैत0-अबैत भारत वर्षक ब्राह्मण समाज भिन्न-भिन्न क्षेत्रक आधार पर विभिन्न वर्गमे विभाजित भए गेलाह। पुरानक सम्मतिये भारत-वर्षक समस्त ब्राह्मण समाजकेँ दस(10) वर्गमे विभाजित कएल गेल रहय। ब्राह्मणक ई दसो वर्ग थीक-उत्कल,कान्यकुब्ज,गौड़,मैथिल,सारस्वत, कार्णाट,गुर्जर, तैलंग,द्रविड़ ओ’ महाराष्ट्रीय। स्थूल रूपेँ पूर्वोक्त पाँच केँ पञ्च गौड़ आ’ अपर पाँचकेँ पञ्च द्रविड़ कहल जाइत अछि। एकर सीमांकन भेल विन्ध्याचल पर्वतक उत्तर पञ्च गौड़ ओ विन्ध्याचल पर्वतक दक्षिण पञ्च द्रविड़। मैथिल ब्राह्मण पञ्च गौड़ वर्गक मैथिल ब्राहमण लोकनि पुस्ति-दर-पुस्त सँ मिथिलामे रहबाक कारणेँ मिथिलाक विशिष्ट संस्कृतिसँ प्रभावित भए गेलाह, तँय अहि कारणेँ पुराणक युगमे मैथिल ब्राह्मण कहाए सुप्रसिद्ध भेलाह। मिथिला वस्तुतः प्राचीन राहवंशक राजधानी रहए। मुदा पश्चातक युगमे विदेह राजवंशक समस्त प्रशासित क्षेत्र अथवा जनपद मिथिला कहाए सुप्रसिद्ध भेल आ’ एहि जनपदक रहनिहार ब्राह्मण लोकनि मैथिल ब्राह्मण कओलन्हि। ई मिथिला आइ नेपाल ओ’ बंगलादेशक सीमा सँ सटैत अनुवर्त्तमान अछि, जे राजनीतिक एवं सांस्कृतिक दृष्टिसँ अपन एक विशिष्ट स्थान रखैत अछि। मैथिल ब्राह्मण लोकनि मूलतः दुइए गोट वेदक अनुयायी थिकाह। एक वर्गक यजुर्वेदक माध्यान्दिन शाखाक अनुयायी थिकाह तँ दोसर सामवेदक कौथुम शाखाक अनुगमन करैत छथि। यजुर्वेदक माध्यन्दिन शाखाक अनुयायी”वाजसनेयी” कहबैत छथि, एहिना सामवेद्क कौथुम शाखाक अनुयायी छन्दोग कहबैत छथि।दुहुक संस्कारमे किछु स्थूलो अन्तर अछि। छन्दोग उपनयनमे चारि गोट संस्कार- नामकरण, चूड़ाकरण, उपनयन ओ समावर्त्तन मुदा वाजसनेयीक ई चारू संस्कार थिक, चूड़ाकरण, उपनयन, वेदारम्भ ओ समावर्त्तन। एहिना छन्दोग विवाह मुख्यतः दू खण्डमे सम्पन्न होइत अछि, पूर्व विवाह आओर उत्तर विवाह। उत्तर विवाह सूर्यास्तक बाद तारा देखि कए होइत अछि। मुदा वाजसनेयी विवाहमे एहन कोनो विभाजन नहि अछि। एकहि क्रममे दिन अथवा रातिमे कखनहुँ भए सकैत अछि। वाजसनेयी ओ’ छन्दोगक धार्मिक संस्कारमे तँ सूक्ष्म अंतर कतौक अछि। अतः विवाहक पहिल चरण अधिकारक निर्णय रहल होयत। वर पक्ष ओ’ कन्या पक्षक लोक परस्पर बैसि अपन-अपन परिचयक आधार पर निर्णय करैत छल होएताह, जे ‘अमुक’ कन्यासँ ‘अमुक’ वरक विवाह हो वा नहि। मुदा परिचय रखबाक प्रवृत्तिक ह्रासक कारणेँ अधिकार-निर्णयक हेतु प्रत्येक परिवारक सुयोग्य ओ’ आस्थावान व्यक्ति अपन यावतो परिचय(32 मूलक उल्लेख) लिखि कए राखय लगलाह। सातम शाब्दीसँ पूर्वहि ए लिखित कौलिक परिचय ‘समूह लेख्य’ क उल्लेख सर्वप्रथम विद्वद्वैरैण्य कुमारिल भट्ट रचित ‘तंत्र वार्त्तिक’मे भेल अछि, जे मीमांसा दर्शनक जैमिनी सूत्रक शबर द्वारा कएल भाष्यक ग्द्यात्मक ‘वार्त्तिक’ थीक। तंत्रवार्त्तिक दर्शनक ग्रंथ थीक जाहिमे यथार्थ वस्तुस्थितिक वर्णनसँ जातिक विशुद्धि सिद्ध कएल गेल अछि। जाहि आधार पर धर्मक निरूपण भए सकैत। कुमारिल भट्टक कहब छलन्हि जे “ बड़का कुलीन लोक बड़ विशेष प्रयत्नसँ अपन जातिक रक्षा करैत छथि। तैहि त’ क्षत्रिय ओ’ ब्राह्मण अपन पिता-पितामहादिक परम्परा बिसरि नहि जाए तेँ समूह-लेख्य चलौलन्हि। ओ’ प्रत्येक कुलमे गुण आ’ दोष देखि ओहि अनुरूप सम्बंध करबामे प्रवृत्त होइत छथि। “विशिष्टेनैव हि प्रयत्नेन महाकुलीनाः परिक्षन्ति आत्मानम् अनेनैव हि हेतुना राजाभिब्रह्मिणैश्च स्व पितृ-पितामहादि पारम्पर्यो विस्मणार्थं समूहलेख्यानिप्रवर्तितानि तथा च प्रतिकुलं गुण-दोष स्मर्णांतदनुरूपाः प्रभृति-निवृतयो दृश्यंते”। (तंत्रवार्त्तिक, अध्याय 1, पाद-2, सूत्र-2क वार्त्तिक) मुदा तेरहम शताब्दीक उत्तरार्ध होइत-होइत साधारण लोकक कोन कथा पण्डित लोकनि समेत समूह लेख्य राखब छोड़ि देलन्हि। एकर परिणाम ई भेल जे पं हरिनाथ उपाध्याय(धर्म-शास्त्रक महान ज्ञाता) “स्मृतिसार” सन धर्मशास्त्रक विषयक ग्रंथकर्त्ता ओ’ महापंडित परिचयक अभावमे विवाह कए लेल, स्वजनमे अनधिकारमे अपन साक्षात पितयौत भाइक दौहित्रीमे। फलतः चौदहम शताब्दीक तृतीय दशक होइत-होइत एहि कौलिक परिचयकेँ विशिष्ट पण्डितक अधीन कए देबाक आवश्यकताक अनुभव कएल जे विवाहक समय अधिकारक निर्णय कए सकथि। मिथिलाक तत्कालीन शासक राजा हरिसिंहदेवक प्रेरणासँ मिथिलाक पण्डित लोकनि शाके 1248 तदनुसार 1326 ई. मे निर्णय कएलन्हि, जे “ परिचय राखब लोककेँ अपना पर नहि छोड़ल जाय, प्रत्युत ओकरा संगृहित कए विशिष्ट पण्डितजनक जिम्मा कए देल जाए, ओ’ ई राजकीय एक गोट विभाग बना देल जाए जाहिसँ पण्डित राजाज्ञासँ नियुक्त होथि सैह संगृहित परिचय राखथि। प्रत्येक विवाह तखनहि स्थिर हो जखन नियुक्त पंडित(पञ्जीकार) अधिकार जाँचि कए लिखिके देथि, जे अमुक कन्या ओ’ अमुक वर ‘स्वजना’ नहि छथि। अर्थात् शास्त्रीयनियमानुसार कन्याक संग वरकेँ वैवाहिक अधिकार छन्हि। इयैह पत्र ‘अस्वजन पत्र’ वा ‘सिद्धांत पत्र’ कहौलक। आइयो कन्या वरक विवाह पूर्व अधिकार जँचाए सिद्धांत पत्र लेल आवश्यक बूझल जाइत अछि। पञ्जी-प्रबंधमे इएह सभसँ प्रधान नियम भेल जे बिनु सिद्धांत भेने विवाह अशास्त्रीय मानल जायत। ‘अस्वजन पत्र’ देनिहार राजाज्ञासँ नियुक्त इएह पण्डित पञ्जीकार कहओलाह। संगृहित परिचय जाहिमे प्रत्येक नव जन्म ओ विवाह जोड़ल जाय लागल से भेल पञ्जी। जिनकर पञ्जीमे आएल से भेलाह पञ्जीबद्ध। महाराज हरिसिंहदेव ओ’ तत्कालीन पण्डितक संयुक्त निर्णय अनुसार परिचेता लोकनिक नियुक्त्ति कए समस्त मैथिल ब्राह्मणक सम्पूर्ण परिचय संगृहित कएल गेल। परिचेता लोकनि घुमि-घुमि प्रत्येक परिवारक मुख्य व्यक्तिसँ हुनक परिचय पुछि लिखि लेल करथि। सामान्य रूँपे छओ पुरुषक परिचय सभ जनैत रहथि। किछु गोटा एहिसँ बहुतो अधिक परिचय जनैत रहथि। एहिना किछु गोटए मात्र दू वा तीन पुरुषाक ज्ञान रखैत छलाह। जे जतबा जनैत रहथि हुनकासँ ओतबहि संग्रह कए हुनकर पूरवजक वास-स्थान, गोत्र, प्रवर तथा हुनक वेद ओ’ शाखाक सूचना लिखि लेल जाइत रहैए। एहि संग्रहसँ एकहि कुलक अनेक शाखा जे विभिन्ना ग्राममे बसैत छलाह, तकर परिचय एकत्र भए गेल। एहि रूपे गोत्रक अनुसार भिन्न-भिन्न कुलक सम्पूर्ण परिचय प्राप्त भए गेल। एहि परिचय संकलनक समय सभसँ प्रमुख मानल गेल बीजी पुरुष ओ मूल ग्रामकेँ। कारण कौलिक परिचयक हेतु सर्वाधिक उपयोगी इयैह सूत्र भेल। विभिन्न गाममे बसैत एकहि कुलक विभिन्न व्यक्तिक कौलिक परिचय एहि मूल ग्रामक आधार पर संगृहित कएल गेल रहए। एहि कारणे पञ्जीमे अनिवार्य रूपसँ मूल ग्रामक उल्लेख भेल अछि। पञ्जी-प्रबंधक समय जे व्यक्ति जतए बसैत रहथि से हुनक भावी संतानक ग्राम कहओलक ओ परिचय लिखौनिहार अपन पूर्वजक प्राचीनतम वास स्थानक जे नाम कहल से ओहि व्यक्तिक मूल भेल। एहिना प्रत्येक कुलक प्राचीनतम ज्ञात पूर्वज ओहि कुलक बीजी पुरुष कहाओल। एकर प्रमाणमे एक गोट उदाहरण देखल जाए सकैत अछि। काश्यप गोत्रीय एक महाकुल जकर शतावधि शाखा मिथिलामे अनुवर्त्तमान रहए, संगृहित परिचयक आधार पर मूलतः माण्डर ग्रामक वासी सिद्ध भेलाह। मुदा पञ्जी-प्रबंधसँ बहुत पहिनहि, एकर दू गोट शाखा स्पष्टतः प्रमाणित भए गेल। एक मँगरौनी गामक आ’ दोसर गढ़-गामक। अतः पञ्जीमे आदिअहिसँ मण्डरक संग-संग गढ़ ओ मँगरौनी विशेषण जोड़ल जाए लागल। मुदा उपलब्ध परिचयक आधार पर दुनू एकहि कुलक दू शाखा सिद्ध भेल। तैय दुनू कुलक मूल एकहि भेल ओ बीजी पुरुष सेहो एकहि भेलाह। गोत्र- कहल जाइत अछि जे सकल गोत्रक समस्त जन समुदाय एकहि प्राचीनतम ज्ञात महापुरुषक वंशज थिकाह। ईएह प्राचीनतम ज्ञात महापुरुष गोत्र कहाए सुविख्यात छथि। श्री एम.पी. चिंतालाल राव महोदय चारि हजार गोत्रक सूची तैयार कएने छथि। “ अमरकोष”मे गोत्रक हेतु तीन अर्थ देल गेल अछि- पर्वत, वंश आ’ नाम। “वाचस्पत्य” कोषमे गोत्रक एगारह अर्थ देल गेल अछि- पर्वत, नाम ,ज्ञान, जंगल,खेत,क्षत्र,संघ,धन, मार्ग, वृद्धि आ’ मुनि लोकनिक वंश। प्राचीन संस्कृत साहित्यमे गोत्र शब्दक प्रयोग प्रायः वंश वा पिताक नामक लेल भेल अछि। छान्दोग्य उपनिषद (4/4) मे जीवन गुरु सत्यकामसँ गोत्र पुछैत छथिन्ह तँ हुनक अभिप्राय सत्यकामक कुल अथ्वा पिताक नामसँ छन्हि, मुदा ऋगवेदमे गोत्रक उल्लेख चारि ठाम मेघ अथवा पहाड़क लेल आ’ दू ठाम पशु समूह अथवा जनसमुदाय अथवा पशु रक्षक रूपमे भेल अछि। अंततः वंश अथवा परिवरक अर्थमे गोत्र शब्दक प्रयोग पश्चातक प्रयोग थिक। वंश अथवा परिवारक अर्थमे गोत्रक प्रयोग सर्वप्रथम छान्दोग्य उपनिषदमे भेल अछि। मैथिल ब्राह्मण समाजमे गोत्र वंशा-बोधक थीक। मैथिल ब्राह्मणक समस्त गोत्र पितृ प्रधान थीक- अर्थात् प्रत्येक गोत्र अपन-अपन वंशक प्राचीनतम ज्ञात महापुरुषक नाम थीक। मैथिल ब्राह्मणमे सभ मिलाए 20 गोट गोत्र अछि। मैथिल ब्राह्मणमे सात गोट गोत्रक कुल व्यवस्थित, सुपरिचित ओ बहुसंख्यक अछि। ई सात गोट गोत्र थीक- 1.शाण्डिल्य 2.वत्स 3.काश्यप 4.सावर्ण 5.पराशर 6.भारद्वाज 7.कात्यायन। शेष 13 गोट गोत्र थीक- 1.गर्ग 2.कौशिक 3.अलाम्बुकाक्ष 4.कृष्णात्रेय 5.गौतम 6.मौद्गल्य 7.वशिष्ठ 8.कौण्डिन्य 9.उपमन्यु 10.कपिल 11.विष्णुवृद्धि 12.तण्डि 13.जातिकर्ण। प्रत्येक गोत्रमे कतौक मूल्य अछि। मिथिलामे 153 मूलक ब्राह्मणक परिच्अय प्राप्त होइत अछि। कतैक मूल एहन अछि, जे एकसँ अधिक गोत्रमे पाओल जाइत अछि।‘ब्रह्मपुरा’ एकटा एहने मूल थिक। एहि मूलक ब्राह्मण- शाण्डिल्य,वत्स,काश्यप,अलाम्बुकाक्ष,गौतम ओ गर्ग गोत्रमे पाओल जाइत छथि। प्रवर- प्रवरक उल्लेख वैदिक युगमे दर्श ओ पौर्णमास नामक इष्टिमे भेटैत अछि। इ इष्टि सभ आन सभ प्रकारक यज्ञक आधार थीक। अतः एहिमे प्रवरक पाठ होइत अछि। एहि पाठक प्रयोजन तखनहि होइत अछि जाहि क्षण यज्ञाग्नि उद्दिप्त करएबाली(सामधेनी) ऋचाक पाठक अनंतर अध्वर्यु ओहि अग्नि पर आज्य(घृत) दैत छथिन्ह। एकर निहितार्थ अछि जे प्रवर, यज्ञमे अग्निकेँ बजएबाक प्रार्थना थीक। प्रवरकेँ बादमे ‘आर्षेय’ सेहो कहल गेल अछि- जकर अर्थ थिक ऋषिसँ संबंधराखए बला(ऋग्वेद-09/97/51)। शोनक ऋषिक सुविख्यात पूर्वज लोकनि मैथिल ब्राह्मण मध्य प्रवर कहबैत छथि अर्थात् ऋगवेदक ऋचाक प्रणेता लोकनि प्रवर थिकाह। मैथिल ब्राह्मणक मध्य 2 वर्गक प्रवर परिवार होइत अछि- त्रिप्रवर आ’ पाँच प्रवर। जाहि गोत्रक तीन गोट पूर्वज ऋगवेदक सूक्तिक रचना कएल से त्रिप्रवर आ’ जाहि गोत्रक पाँच गोट पूर्वज लोकनि ऋगवेदक सूक्तक रचना कएल से पाँच प्रवर कहबैत छथि। 1. शाण्डिल्य- शाण्डिल्य, असित आ’ देवल. 2. वत्स---] ओर्व, च्यवन,भार्गव,जामदगन्य आ’ आप्लावन। 3. सावर्ण--] ओर्व, च्यवन,भार्गव,जामदगन्य आ’ आप्लावन। 4. काश्यप-काश्यप, अवत्सार आ’ नैघ्रूव. 5. पराशर-शक्ति, वशिष्ठ आ’ पराशर. 6. भारद्वाज-भारद्वाज, आंगिरस आ’ बार्ह्स्पत्य. 7. कात्यायन-कात्यायन, विष्णु आ’ आंगिरस. 8. गर्ग-गार्ग्य, घृत, वैशम्पायन, कौशिक आ’ माण्डव्याथर्वन। 9. कौशिक- कौशिक, अत्रि आ’ जमदग्नि. 10. अलाम्बुकाक्ष-गर्ग, गौतम आ’ वशिष्ठ. 11. कृष्णात्रेय-कृष्णात्रेय, आप्ल्वान आ’ सारस्वत. 12. गौतम-अंगिरा, वशिष्ठ आ’ बार्हस्पत. 13. मौदगल्य-मौदगल्य, आंगिरस आ’ बार्हस्पत्य. 14. वशिष्ठ-वशिष्ठ,अत्रि आ’ सांकृति. 15. कौण्डिन्य-आस्तिक,कौशिक आ कौण्डिन्य. 16. उपमन्यु-उपमन्यु, आंगिरस आ’ बार्हस्पत्य। 17. कपिल-शातातप, कौण्डिल्यआ’ कपिल. 18. विष्णुवृद्धि-विष्णुवृद्धि, कौरपुच्छ आ’ त्रसदस्य 19. तण्डी-तण्डी, सांख्य आ’ अंगीरस. गोत्र आ’ मूल शाण्डिल्य- दिर्धोष(दिघवे), सरिसब, महुआ, पर्वपल्ली(पवौली),खण्डबला, गंगोली, यमुशाम, करिअन, मोहरी, सझुआल, मड़ार, पण्डोली, जजिवाल, दहिसत, तिलय, माहब, सिम्मुआल, सिंहाश्रम, सोदरपुर, कड़रिया, अल्लारि, होइयार,तल्हनपुर,परिसरा,परसड़ा,वीरनाम, उत्तमपुर, कोदरिया, छतिमन, वरेवा, मधुआल, गंगौर, भटोर, बुधौरा, ब्रह्मपुरा, कोइआर, केटहिवार, गंगुआल, घोषियाम, छतौनी, भिगुआल, ननौती, तपनपुर। वत्स- पल्ली(पाली), हरिअम्ब, तिसुरी, राउढ़, टकवाल, घुसौत, जजिवाल, पहद्दी, जल्लकी(जालय), भन्दवाल, कोइयार, केरहिवार, ननौर, डढ़ार, करमहा, बुधवाल, मड़ार, लाही, सौनी, सकौना, फनन्दह, मोहरी, वंठवाल, तिसउँत, बरुआली, पण्डौली, बहेटाढ़ी, बरैवा, अलय, भाप्रारिसमथ, बभनियाम, उचति, तपनपुर, विठुआल, नरवाल, चित्रपल्ली, जरहटिया, ब्रह्मपुरा,सरौनी। काश्यप- ओइनि, खौआल, संकराढ़ी, जगति, दरिहरा, माण्डर, वलियास, पचाउर, कटाइ, सतलखा, पण्डुआ, मालिछ, मेरन्दी, नदुआल, पकलिया, बुधवाल, दिभू, मौरी, भूतहरी, छादन, विस्फी, थरिया, दोस्ती, भरेहा, कुसुम्बाल, नरवाल, लगुरदह। सावर्ण- सोन्दपुर, पनिचोभ, बरेबा, नन्दोर, मेरन्दी। पराशर- नरौन, सुरगन, सकुरी, सुइरी, सम्मूआल, दिहवाल, नदाम, महेशारि, सकरहोन, सोइनि, तिलय, बरेबा। भारद्वाज- एकहरा, विल्वपञ्चक(बेलौँच), देयाम, कलिगाम, भूतहरी, गोढ़ार, गोधूलि। कात्यायन- कुजौली, ननौती, जल्लकी, वतिगाम। अलाम्बुकाक्ष- बसाम,कटाइ, ब्रह्मपुरा। गार्ग्य – बसहा, बसाम, ब्रह्मपुरा, सुरौर, विधौर, उरौर। कौशिक- निटेरति कृष्नात्रेय- लोहना, बुसवन, पोदौनी। मौद्गल्य- रतवाल, मालिछ, दिघौष, कपिञ्जल, जल्लकी। गौतम- ब्रह्मपुरा, उंतिमपुर, कोइयार। वशिष्ठ- कोथुआ। कौंडिल्य- एकहरा, परौन। जातुकर्ण- देवहार। तण्डि- कटाई। मिथिलाधीश कार्णाट वंशीय क्षत्रिय महाराज हरिसिंहदेव जीक सभामे उपस्थित सभ्य लोकनि महिन्द्रपुर पण्डुआ मूलक सदुपाध्याय गुणाकर झाकेँ मैथिल ब्राह्मणक पञ्जी प्रबन्धक भार देलन्हि नन्देहु शुन्यं शशि शाक वर्षे (1099 शाके) तच्छ्रावणस्य धवले मुनितिथ्यधस्तात। स्वाती शनैश्चर दिने सुपूजित लग्ने श्री नान्यदेव नृपतिढ़र्यधीत वास्तं॥1॥ शास्तानान्द पतिर्व्वभूव नृपतिः श्री गंगदेवो नृपस्तत् सूनू(पुत्र) नरसिंहदेव विजयी श्री शक्ति सिंह सुतः तत् सूनू खलू राम सिंह विजयी भूपालवंत सुतो जातः श्री हरिसिंह देव नृपतिः कार्णाट चूड़ामणि ॥2॥ श्रीमंतं गुणवन्त मुत्तम कुलस्नाया विशुद्धाशयँ सञ्जातानु गवेषणोत्सुक यातः सर्वानुव्यक्तिक्षमां चातुर्यश्चतुराननः प्रतिनिधिंकृत्वा च्च्तुर्द्धाकिमां पंचादित्यकुलांविता विवजया दित्यै ददौ पञ्जिकाम्॥3॥ भूपालवनि मौलि रत्न मुकुटोलंकार हिरांकुर ज्योत्सोज्वाल यटाल माल शशिनिः लीलञ्च चञ्चलम्तावः शोभा भाजि गुणाकरे गुणवतां मानन्द कन्दोदरे दृष्ट्वात्मा हरिसिंह देव नृपतिः पाणौ ददौ पञ्जिकाम॥4॥ दृष्ट्वा सभां श्री हरिसिंहदेव विचार्य चिंते गुणिणी सहिष्णौ॥ गुणाकरे मैथिल वंश जाते पञ्जी ददौ धर्म विवेचणार्थम॥ श्रोत्रिय ब्राह्मण सात श्रेणीमे क्रमबद्ध छथि, आ’ योग्य एवम् वंशज पन्द्रह श्रेणीमे। पञ्जीक संख्या 209 अछि, जाहिमे 56 पंजी श्रोत्रिय आ’ 153 पंजी योग्य आ’ वंशजक अछि। पंजी-प्रबन्धक प्रारम्भ राजा हरसिंहदेवक कालमे शुरू भेल। ज्योतिरीश्वर ठाकुरक वर्ण-रत्नाकरमे हरसिंहदेव नायक आकि राजा छलाह। आइ काल्हि पञ्जी-प्रबंध मात्र मैथिल ब्राह्मण आ’ कर्ण-कायस्थक मध्य विद्यमान अछि। मुदा प्रारम्भमे ई क्षत्रिय(प्रयः गंधवरिया राजपूत)केर मध्य सेहो छल। वर्णरत्नाकरमे 72 राजपूत कुलक मध्य 64 केर वर्णन अछि, जाहिमे बएस आ’ पमार दोहराओल अछि। दोसर ठाम 36 राजपूत कुलक वर्णन अछि। 20 टा नामक पूर्वहुमे चर्च अछि। विद्यापतिक लिखनावलीमे, जे प्रायः हुनकर नेपाल प्रवासक क्रममे लिखल गेल छल, चन्देल आ’ चौहानक वर्णन अछि। गाहनवार वा मिथिलाक गंधवरिया राजपूतक दू टा शखा मिथिलामे छल, भीठ भगवानपुर आ’ पंचमहला(सहर्सा, पूर्णियाँ)। गंधवरिया,पमार,विशेवार,कंचिवाल, चौहान आदि मिथिलाक महत्त्वपूर्ण राजपूत छथि।मुदा गंधवरिया मिथिलामे महत्त्वपूर्ण छथि आ’ एखनहु मधुबनीसँ सहरसा-पूर्णियाँ धरि छथि। वर्णरत्नाकरक राजपूत कुलवर्णनक निम्न लगभग 62 टा कुल अछि। सोमवंश,सूर्यवंश, डोडा, चौसी, चोला, सेन, पाल, यादव, पामार, नन्द, निकुम्भ, पुष्पभूति, श्रिंगार, अरहान, गुपझरझार, सुरुकि, शिखर, बायेकवार, गान्हवार,सुरवार, मेदा, महार, वात, कूल, कछवाह, वायेश, करम्बा, हेयाना, छेवारक, छुरियिज, भोन्ड, भीम, विन्हा, पुन्डीरयन, चौहान, छिन्द, छिकोर, चन्देल, चनुकी, कंचिवाल, रान्चकान्ट, मुंडौट, बिकौत, गुलहौत, चांगल, छहेला, भाटी, मनदत्ता, सिंहवीरभाह्मा, खाती,रघुवंश, पनिहार, सुरभांच, गुमात, गांधार, वर्धन, वह्होम, विशिश्ठ, गुटिया, भाद्र, खुरसाम, वहत्तरी आदि। एखनो गंगा दियारामे राजपूत आ’ यादव दुनूक मध्य ‘बनौत’ होइत छथि, आ’ दुनूमे बहुत घनिष्ठता अछि। पर्वतमे रहनिहार आ’ वनमे रहनिहारक वर्णन सेहो अछि वर्ण रत्नाकरमे। जनक राजाक विरुद ज(कबीला) सँ बनल प्रतीत होइत अछि। पछिला अंकमे देल गेल श्रोत्रियक सातक बदलामे आठ श्रेणीमे ओ लोकनि क्रमबद्ध छथि- आ’ पञ्जीक कुल संख्या 185 अछि, जाहिमे 32 टा श्रोत्रिय आ’ 153 टा आन ब्राह्मणक श्रेणी अछि। जातुकर्ण गोत्र त्रिप्रवर जातुकर्ण/आंगीरस/भारद्वाज छथि। पहिने सभ क्यो अपन-अपन पुरखाक, आ’ वैवाहिक संबंधक लेखा स्वयं रखैत रहथि। हरसिंहदेवजी एहि हेतु एक गोट संस्थाक प्रारम्भ कलन्हि। मैथिल ब्राह्मणक हेतु गुणाकर झा, कर्ण कायस्थक लेल शंकरदत्त, आ’ क्षत्रियक हेतु विजयदत्त एहि हेतु प्रथमतया नियुक्त्त भेलाह। हरसिंहदेवक पंजी वैज्ञानिक आधार बला छल आ’ शुद्ध रूपेँ वंशावली परिचय छल। सभ ब्राह्मण कायस्थ आ’ क्षत्रिय एहिमे बराबर छलाह। मुदा महाराज माधव सिंहक समयमे शाखा पञ्जीक प्रारम्भ भेल आ’ श्रोत्रिय आदि विभाजन आ’ क्रमानुसारे छोट-पैघक आ’ ओहिसँ उपजल सामाजिक कुरीतिक प्रारम्भ भेल। कर्ण कायस्थमे एकेटा गोत्र काश्यप अछि। मात्र मूलक अनुसारेँ उतेढ़ होइत अछि, मझौला दर्जाक गृहस्थ कहल जाइत अछि। मूलसँ गोत्र सामान्यतः पता चलि जाइत अछि। किछु अपवादो छैक। जेना: ब्रह्मपुरा मूल, काश्यप/गौतम/वत्स/वशिष्ठ।(7टा) करमहा- शाण्डिल्य (गौल शाखा)/ बाकी सभ वत्स गोत्री। दुनू करमहामे विवाह संभव। चैतन्य महाप्रभु: रमापति उपाध्याय करमहे तरौनी मूलक छलाह। ओ’ बंगाल चलि गेलाह, हुकर शिष्य रहथि चैतन्य महाप्रभु। श्रोत्रियकेँ पुबारिपार आ’ शेषकेँ पछ्बारिपार सेहो कहल जाइत अछि।श्रोत्रियक पाँजिकेँ चौगाला(श्रेणी) मे विभक्त्त अछि। श्रोत्रिय पंञ्जीकेँ लौकित कहल जाइत अछि। कुल 8 टा चौगोल श्रेणी अछि।32 टा पञ्जी अछि। पञ्जी आ’ पानि अधोगामी होइत अछि। विवाह संबंधक कारणे समय बीतला पर उच्च श्रेणी समाप्त होइत जाइत अछि। प्रथम श्रेणी ताहि कारणसँ समाप्त भ’ गेल अछि। शेष ब्राह्मण पछ्बारिपार कहबैत छथि। एहि मे 15 गोट श्रेणी अछि।153 टा पञ्जी अछि। एकरा नामसँ जेना महादेव झा पाँजि इत्यादि संबोधित कएल जाइत अछि। कालक प्रभावे अत्रिय लोकनिमे पञ्जी समाप्त भए गेल आऽ ताहि द्वारे हुनका लोकनिमे पूरा गामेकेँ छोड़ि देल जाइत अछि, जाहिसँ सिद्धांतमे भाङठ नहि होए। पञ्जी-पुस्तकक हेतु एकटा श्लोक अछि- जलात् रक्ष तैलात् रक्ष रक्ष स्थूल बन्धनात् माने पुस्तककेँ जलसँ तेलसँ आऽ स्थूल बन्धनसँ बचाऊ।संगहि सूर्य जखन सिंह राशिमे (मोटा-मोटी १६ अगस्त सँ १६ सितम्बर धरि) रहए तखन एकरा सुखाऊ- एहि समयमे सभसँ बेशी कड़गर रौद रहैत अछि। उतेढ- सिद्धांत लिखबासँ पहिने वर ओऽ कन्या पक्षक अधिकार ताकल जाइत अछि।कन्याक विवाहक ५-१० वर्ष पूर्व कन्याक पिता पञ्जीकारसँ अधिकार माला बनबैत छथि, जाहिमे संभावित आऽ उपलब्ध वरक सूची रहैत छैक। पञ्जीकार एहि एतु उतेढ बनबैत छथि।वर कन्या दुनू पक्षक पितृ कुलक ६ पुस्त आऽ मातृकुलक ५ पुरखाक यावेता परिचय देल जाइत अछि।यावेता परिचयक अर्थ भेल ३२ मूलक उतेढ़ जे अधिकार तकबामे प्रयोजनीय थीक। कोनो कन्या मातृ वा पितृ पुरखा कुलमे १६ व्यक्त्तिसँ छठम स्थानमे रहैत छथि। एहि १६ मे सँ १६ वा एको व्यक्त्ति वरक पितृपक्षमे अओथिन्ह तँ ओहि कन्या वरक मध्य वैवाहिक अधिकार नहि होएत।जौँ ओऽ १६ व्यक्त्ति वा एको व्यक्त्ति मातृ पक्ष (वरक) मे अओथिन्ह तँ अधिकार भए जायत। मुदा एहिमे ई सेहो देखबाक थीक जे वर कन्या समान गोत्र आऽ समान प्रवरक नहि होथि।संगहि ई सेहो देखबाक थीक जे वरक मातामह आऽ कन्याक मूल ओऽ मूलग्राम सहित एक होए तँ सात पुस्त धरि मातृसापिण्डयक कारणेँ अधिकार नहि होएत। ई सेहो देखए पड़त जे कन्या वरक विमाताक भाइक सन्तान नहि होए। पञ्जी सात प्रकारक होइत आछि-मूल,शाखा,गोत्र,पत्र,दूषण उतेढ़ आऽ एकटा आर। पञ्जीक प्रारम्भसँ पहिने सभ क्यो अपन-अपन वंशावली स्वयं राखैत छलाह। हरसिंह देव ताहि हेतु एकटा संस्थाक निर्माण कएलन्हि। मैथिल ब्राह्मणक हेतु गुणाकर झा, कर्ण कायस्थक हेतु शंकरदत्त आऽ क्षत्रियक हेतु विजयदत्त पञ्जीकार नियुक्त्त भेलाह। दरभंगा नरेश माधव सिंह शाखा प्रणयन पुस्तकक आदेश देलन्हि।एहिसँ पहिने मूल पञ्जी सभक समान रूपेँ बनैत छल। आब सोति, जोग आऽ पञ्जीबद्धक हेतु फराक शाखा पञ्जी बनाओल जाए लागल। गोत्र पञ्जीमे सभ गोत्र आऽ तकर प्राचीन मूल रहैत अछि। पत्र पञ्जी लगभग ३०० वर्ष पूर्वसँ प्रचलनमे अछि। एहिमे मूलग्रामक उल्लेख रहए लागल। दूषण पञ्जीमे वंशमे आएल क्षरणक उल्लेख रहैत अछि। ई गोपनीय पञ्जी थीक आऽ एकरा सार्वजनिक नहि कएल जाइत अछि। बहुत बादमे एकर चर्च संभव होइत अछि। उतेढ़ पञ्जीमे सपिण्डक निवृत्ति होइत अछि- छह पुरखक प्राप्त होइत अछि। मात्र रसाढ़-अररियाक पञ्जीमे महिलाक पञ्जी भेटैत अछि। महाराजाधिराज ५ मान् मिथिलेशक आज्ञानुसार पछबारिपारक लौकिक आऽ श्रेणिक व्यवस्था पञ्जीकार लोकनि जे स्थिर कएलन्हि से प्रकाशित भेल छल आऽ ईहो प्रार्थना छल जे ताहि मध्य जनिका किछु वक्त्तव्य होइन्ह से प्रार्थना पत्र द्वारा श्री ५ मान् मध्य निवेदन करथि, ततः निदान विशिष्ट सभा मध्य एकर परामर्श कए पुनः प्रकाशित कएल जायत। एतएसँ १ सँ १५ धरि श्रेणी बना देल गेल। ढेर विवाद उठल जे पाइ लए कए उच्च श्रेणी देल गेल। पछबारिपारक लौकिक नाममे कतहु लौकिक तँ कतहु असल नाम छल। किछु उदाहरण अछि- १. सिंहवाड़-मथुरेश ठाकुर २. मनियारी- मधुपति मिश्र ३. अमौन-बालकराम पाठक ४. भराम- धीतरी ५. बसन्तपुर- माधव मिश्र ६. कोकडीही- रामेश्वर मिश्र ७. नित्यानन्द चौधरी- पिण्डारुछ ८. एडु- भैय्यो मिश्र ९. खुटौनियाँ- भवानीदत्त झा १०. लक्षमीपति मिश्र- धगजरी ११. कन्त झा- चानपुरा १२. टङ्कवाल महिधर झा-पेकपाड़ १३. विष्णुदत्तपुरचिकनौट (मुजफ्फरपुर) १४. चान पाठक- गजहरा १५. काकठाकुर- धमदाहा १६. खाशी ध्यामी- रंगपुरा(पूर्णियाँ) शाखा पञ्जीक विशेषता शाखा पञ्जी एक अभूतपूर्व पुस्तक छी। एहि तरहक पुस्तक हमरा बुझने संसारक कोनो देश कोनो सम्प्रदाय वा कोनो वर्गमे नहि पाओल गेल अछि। यद्यपि ई वर्ग विशेषक पुस्तक थिक, परञ्च एहि प्रकारक पुस्तक कोनो सम्प्रदाय वा कोनो वर्गक लेल शुरू कएल जाऽ सकैत छैक। मिथिलाक ई अद्वितीय देन सिद्ध भऽ सकैछ, जाहिमे १००० वर्षसँ परिचयक जाल जकाँ निर्मित कएल गेल अछि। जेना कवि कोकिल विद्यापति ठाकुरक परिचय हुनक पुरुषाक उल्लेख ७ पीढ़ी पहिनेसँ लऽकेँ विद्यापतिक वंशधर वर्तमान धरि, सभक साङ्गोपाङ्ग (विद्या, उपाधि, विशिष्टता, कार्य परिवर्तन, मातृकुलक परिचय) परिचय भेटत। एहन परिचय मात्र विद्यापतिये नहि समस्त मैथिल ब्राह्मणक भेटत, एहि प्रकारक आधारपर विभिन्न विद्वान ब्राह्मणक काल निर्धारण सेहो कएल जाऽ सकैछ। शाखा पञ्जीक मादे: हम पञ्जीकारक वंशज थिकहुँ। संगहि ग्यारह वर्ष धरि मैथिल पञ्जी प्रबंधक साङ्गोपाङ्ग अध्ययन कएलहुँ। गुरु छलाह स्वयं हमर पिता पञ्जीशास्त्र मार्त्तण्ड धौत परीक्षामे प्रथम श्रेणीमे प्रथम स्थान पाबि महाराजाधिराज कामेश्वर सिंहक हाथें दोशाला पओनिहार स्वनाम धन्य पञ्जीकार मोदानन्द झा- हुनक मौखिक परीक्षाक मुख्य परीक्षक छलाह महामहोपाध्याय डॉ सर गङ्गानाथ झा। पञ्जी प्र्बन्धक जे इतिहास अछि ताहिमे वर्णित अछि जे पञ्जी प्रबंधक वर्तमान स्वरूपक प्रणेता छलाह सदुपाध्याय गुणाकर झा, जनिक हम उन्नैसम पीढ़ीमे छी। आइसँ उन्नैस पुस्त पहिने जे मैथिलक वंशावलीक संकलन संवर्द्धन ओऽ संरक्षणक व्रत दृढ़ निष्ठासँ सदुपाध्याय गुणाकर झा लेलन्हि वा तत्कालीन विद्वत वर्ग द्वारा विश्वासपूर्वक देल गेलन्हि, से अद्यावधि निष्ठापूर्वक हमरा धरि सुरक्षित ओ संवर्द्धित अछि। पञ्जीक समस्त पुस्तक मिथिलाक लिपि तिरहुतामे लिखित अछि/ लिखल जाऽ रहल अछि। आऽ बुझू तँ तिरहुता लिपिक प्राणाधार थिक पञ्जी प्रबन्ध। परन्तु वर्तमान पञ्जीक कार्य करैत अनुभव कएल जे एहि शास्त्रसँ सम्बद्ध पक्ष एहि लिपिक ज्ञानक अभावमे सामने बैसियौकऽ विषय वस्तुसँ अनभिज्ञ रहि जाइत छथि। फलस्वरूप एकर संरक्षणक प्रति सहयोग घटल जाऽ रहल छैक। एहिना स्थितिमे भेल जे कियैक नहि देवनागरीमे अनुवाद कएल जाए। सोचि तँ लेलहुँ मुदा कार्य बड्ड दुरूह। संगहि आबादीक विस्तार संग शाखाक विस्तार सेहो आवश्यक तँय ई एकटा पूर्णकालिक कार्य भेल लगभग ६-७ वर्ष धरि एहिना स्थितिमे पारिवारिक दायित्वक निर्वहन करैत एहि गुरुतर कार्यक सम्पादन करब एकटा असाध्य साधने भेल एहि युगमे। परञ्च उत्साही युवक लोकनिक श्रीमान् गजेन्द्र ठाकुर, मेहथ, मधुबनीक आऽ श्री नागेन्द्र कुमार झाक सहयोग एहि कार्यमे भेटल। धर्मपत्नी श्रीमति गीता झा द्वारा देल गेल मानसिक संवलक कारणेँ हम यथा संभव एहि कार्यकेँ सम्पन्न कऽ सकलहुँ। सुधीजन त्रूटिक हेतु क्षमा करताह एहि आशाक संगे। शाखा पुस्तक देखबाक अवगति शाखा पुस्तकमे सभसँ पहिने -वर्णाक्रमसँ अ सँ ऐ धरिक पातमे पत्र पञ्जी अछि। जकर विषय थिक कतेक गोत्र- गोत्रक अधीन कतेक मूल, मूलक विभेद मूलग्राम ओ तकर- ताहि मूलग्रामक अछि पुरुष। पृ. १ सँ ३३८ धरि शाखाक विस्तार अछि, प्रारम्भ भेल अछि शाण्डिल्य गोत्रक गंगोली मूलसँ आऽ जकर आदि पुरुष थिकाह गंगाधर। अगलहि पीढीमे हुनक एक विवाहक दू संतान १.वीर झा आऽ २.नारायण। वीरक सन्तान पर्व पल्ली/ पवौली मूलक बीजी। आऽ नारायणक संतान आगाँ संकर्षणसँ खण्डवला (खडौरे) मूलक संस्थापक भेलाह। एहिना क्रमे प्रायः प्रल्लित मूलक बीजी पुरुष ठाम-ठाम भेटताह- यथा पृष्ठ-संख्या १/३- गंगोली बीजी गंगाधर पृ.सं. १/१२- एकमा वलियारु वीजी धरनीधर पृ.सं. १/१४- वरुआली मराढ़ वीजी- दिवाकर पृ.सं.- १/१७- मंगरौनी माण्डर वीजी त्रिनयन भट्ट इत्यादि। शाखा पुस्तकक मुख्य विशेषता अछि- प्रयोजनक अनुसार विस्तार, पूर्वापरक ज्ञान हेतु अंकनक व्यवस्था कएल गेल अछि। यथा पृष्ठ संख्या- ८३/०६ (पंजीकार वाला अंक) १८१-६ (श्री ठाकुरजी वाला अंक) मे कमल मणि ठाकुरक विवाहक उल्लेख अछि- हुनका एक बालक- कुलमणि प्रसिद्ध फेकन ठाकुर। कमलमणि ठाकुरक विवाह दरिहरा मूलक रतौली शाखामे अभयनाथ झाक बालक भीखर झाक पुत्रीसँ। आब पढ़निहारकेँ समस्या हेतन्हि जे ई अभयनाथ सुत भीखरक पूर्व परिचय की छन्हि तँ हम देखैत छी जे भीखरक आगाँ मे ३८/५ लिखिकऽ हरिनन्दन झाक पिता रामचन्द्र झा छथि, जिनकर विवाहक उल्लेख ३८ पत्रक पहिल पारमे ५म पंक्ति रामचन्द्र झाक विवाह लिखल छन्हि। रामचन्द्र झाक दू गोट बालक रघुनन्दन आऽ दोसर हरिनन्दन। ई दुनू भाय खण्डबला मूलक रतिनाथ ठाकुरक दौहित्र छथि। एहि रतिनाथक परिचयक हेतु ३३॥२ अर्थात् पात संख्या ३३क दोसर पृष्ठ पर तेसर पंक्तिमे जीवे छथि खण्डबला मूलक। एहि जीवेकेँ उठाकऽ ३८ पातक पहिल पारक पाँचम पंक्तिमे अनैत छियन्हि। एहि ठाम देखैत छी जे जीवेक बालक छथि रामनाथ आऽ पाँथू। एहि पाँथूक बालक छथि रतिनाथ। एहि रतिनाथक विवाह छन्हि महिषी बुधवाल मूलक डालूक पौत्री ओऽ श्रीदत्तक पुत्रीमे। रतिनाथक विवाहक वर्णन एहि ३८ पातक पहिल पारक आठम पंक्तिमे। अस्तु एहि प्रकारेँ सभटा अंकक सहारासँ परिचय आगाँ बढ़ैत अछि। जाहि ठामसँ उद्धरण लेल जाइत छथि। ताहि ठाम नामक ऊपरमे माथपर अंक लिखल जाइत अछि। ई अंक थिक, जतऽ नाम लए जएबाक अछि ओहि पातक संख्या ओऽ पंक्ति जतऽ नाम आनल जाएत अछि। ओहि ठाम नामसँ पहिने जतऽ सँ नाम आनल गेल ओहि पत्रक संख्या ओ पंक्ति। यदि परिचय् पूर्ण अछि तऽ नाम अनबाक प्रयोजन नहि, मात्र जतऽ पूर्व परिचय लिखल अछि, ओहि पातक संख्या ओ पंक्तिक अंक मात्र लिखि देल जाइत अछि। जेना ११४ पातक पहिल पृष्ठपर चारिम पंक्तिमे अर्थात् ११४/४ मे वलियास मूलक राव शंकरक विवाहक उल्लेख भेल अछि। हुनक विवाह छल पवौली मूलक प्रितिनाथक कन्यामे। प्रितिनाथक विवाहक वर्णन १०३/२ मे भऽ चुकल अछि। हुनक विवाह छल कुजौली मूलक गोपीनाथक कन्यामे तँ मात्र १०३/०२ लिखि परिचय पूरा कऽ देल गेल, आब जिनका परिचय बुझबाक होएतन्हि तँ ओ १०३/०२ मे जाऽ कऽ देख लेताह, अस्तु। बहुत ठाम पूर्ण परिचय नहि रहलासँ अंकक उपयोग नहि कएल गेल अछि। एहि प्रकारेँ अंक लिखबाक प्रयोजन सिद्ध होएत अछि। किछि सांकेतिक शब्द: दौ- अर्थात् मातामह (नानाक नाम) सँ- मूलक परिचायक दौहित्र दौ (द्दौ.) माइक (मायक) नाना मातृ मातामह सदु.- सदुपाध्याय म.म.उ.- महामहोपाध्याय वैया.- वैयाकरण वै.- वैदिक ज्यो.- ज्योतिष शास्त्रक ज्ञाता बीजी- अर्थात् कोनो मूलक प्रारम्भिक ज्ञात पुरुष हरिनाथ (१३००-१४०० ई.) हरिनाथ गंगौर मूलक मैथिल ब्राह्मणक छलाह आऽ हुनकर पौत्र शिवनाथक विवाह पाली मूलक ज्योतिरीश्वर ठाकुरक पुत्रीसँ भेल छलन्हि। हिनकर विवाह गलतीसँ अपन पुरखाक वंशजसँ भऽ गेलन्हि, ताहि द्वारे हरसिंहदेव पञ्जी व्यवस्थाक प्रारम्भ केलन्हि। हरिनाथ स्मृतिसार लिखलन्हि, जे धर्मशास्त्रक विभिन्न अध्यायपर आधारित छल। हरिनाथ संस्कारक ८ भेद करैत छथि। आचार खण्डमे संस्कारक अतिरिक्त आह्निका- द्विजक नित्यकर्म, श्राद्ध आऽ प्रायश्चितक विवरण अछि। विवाद, व्यवहार आऽ उत्तराधिकारपर सेहो हरिनाथ लिखने छथि। ज्येष्ठ पुत्रकेँ जेठांश, स्त्रीधन, पुत्रक विभिन्न प्रकार, विभिन्न प्रकारक दण्ड इत्यादिक वर्णन हरिनाथ कएने छथि। विधिमे कोना कम्प्लेन फाइल करी, ओकर उत्तर, न्याय आऽ न्यायक आधार आऽ न्यायक पुनरीक्षण, एहि सभक चरचा अछि। विवादक १८ टा प्रकार आऽ सिविल आऽ आपराधिक विधि जे न्यायालयमे अपनाओल जाइत अछि, तकर विवरण हरिनाथ देने छथि। वैवाहिक अधिकार निर्णय नियम १. कोनो कन्या अपन १६ पुरुषा (पितृकुल आऽ मातृकुल मिलाकेँ) सँ छठम स्थानमे रहैत छथि- जिनका छठि कहल जाइत छन्हि। एहि छठिक निर्धारण निम्न प्रकारसँ होइत अछि। १.क्न्याक प्रपितामहक पितामह प्रथम छठि २.कन्याक प्रपितामहक मातामह द्वितीय छठि ३.कन्याक पितामहक मातामह तृतीय छठि ४.कन्याक प्रपितामहीक मातामह चतुर्थ छठि ५.कन्याक पितामहीक प्रपितामह पञ्चम छठि ६.कन्याक पिताक मातामहक मातामह छठम छठि ७.कन्याक पितामहीक प्रमातामह सातम छठि ८.कन्याक पितामहीक मातृमातामह आठम छठि ९.कन्याक मातामहक प्रपितामह नवम छठि १०.कन्याक प्रमातामहक मातामह दसम छठि ११.कन्याक मातामहक प्रमातामह एगारहम छठि १२.कन्याक मातामहीक मातृमातामह बारहम छठि १३. कन्याक मातामहीक प्रपितामह तेरहम छठि १४.कन्याक मातामहीक पितृ मातामह चौदहम छठि १५.कन्याक मातामहीक प्रमातामह पन्द्रहम छठि १६.कन्याक मातामहीक मातृ मातामह सोलहम छठि उपरोक्त्त समस्त छठिक समान महत्त्व अछि। एहिमे सँ कोनो छठि वरक पितृ पक्षमे अएला पर उक्त्त वर कन्याक मध्य वैवाहिक अधिकार नहि होएत। ओऽ छठि यदि वरक मातृकुलमे अबैत छथि तँ अधिकार होएत। नियम२. वर कन्याक गोत्र एक नहि होए। नियम ३. वर कन्याक प्रवर एक नहि होए। नियम ४. वरक मातामह ओऽ कन्याक मूल ओऽ मूलग्राम सहित एक होए तँ सात पुस्त धरि मातृ सापिण्ड्यक कारणेँ अधिकार नहि होएत। नियम५.वरक विमाताक भायक सन्तान कन्या नहि होए। मातृतः पञ्चमी त्यक्त्तवा पितृतः सप्तमीं भजेत्- मनुस्मृति असपिण्डाय या मातुः असपिण्डा च या पितुः सा प्रशस्ता द्विजातीनां दार कर्मणि मैथुने। पञ्चमात् सप्तमात् सप्तमात् उर्ढ्वं मात्रूतः पित्रूतस्थत। सपिण्डा निवर्तेत कर्तुम् व्यतितिसम्। संस्कृत श्लोकक अर्थ एवं प्रकारे अछि- *वरक मातृकुलक पुरुषसँ कन्या पाँचम पीढ़ी धरिक सन्तान नहि होथि।वरक पितृकुलक छठम पीढ़ी धरिक सन्तान नहि होथि। *जे कन्या वरक मातृ कुल ओऽ पितृकुलक सपिण्ड अहि होथि से द्विजाति वरक हेतु उद्वाह कर्मक लेल प्रशस्त। *मातृकुलमे पाँच आऽ पितृकुलमे सात पीढ़ी धरि सपिण्ड रहैछ। कोनो कन्याक छठिक अन्वेषण हेतु ३२ मूलक उतेढ बनाबए पड़ैत छैक। ताहिमे सर्वप्रथम उतेढ़क वाम भागमे कन्याक ग्राम, मूल ग्राम लिखल जाइत छैक। तहिसँ अव्यवहित दहिन भागमे मूल आऽ तकर नीचाँ कन्याक अति वृद्ध प्रपितामह, वृद्ध प्रपितामह, वृद्ध पितामह, प्रपितामह, पितामह आऽ तखन पिताक नामोल्लेख अवरोही क्रमसँ लिखल जाइत छैक। एहि मध्य वृद्ध प्रपितामह पहिल छठि कहओताह, जनिकासँ कन्या छठम स्थानमे पड़ैत छैक। प्रस्तुत उदाहरणमे करमहा मूलक बेहट मूलग्रामक विट्ठो ग्रामवासी (दरभंगा) पीताम्बर झाक पौत्री श्री शशिनाथ झाक पुत्री भौर ग्रामवासी खण्डबला मूलक भौर मूलग्रामक नारायणदत्त ठाकुरक दौहित्री- धरमपुर दरभंगा- क अधिकार दरिहरा मूलक रतौली मूलग्रामक लोहनावासी गोपीनन्द झाक पौत्र श्री कृष्णानन्द झाक बालक करमहा मूलक बेहट मूल ग्रामक बिट्ठो निवासी कन्हैय्या झाक दौहित्रसँ जँचबाक अछि। द्वितीय छठि- वृद्ध पितामह राधानाथ झाक श्वसुर माड़रि वलियास मूलक इन्द्रपति झाक बालक धनपति झा होएताह से एहि प्रकारे गणना – धनपति-=१, जमाय=राधानाथ= २, तनिक बालक कंटीर=पीताम्बर=४, शशिनाथ-कन्या=६ तृतीय छठि कन्याक प्रपितामहक श्वसुरक – जेना माण्डर मूलक सिहौली मूलग्रामक १.रघुबर झा पुत्र २.फेकू झा तनिक जमाए ३.कंटीर झा, तनिक पुत्र ४.पीताम्बर झा तनिक पुत्र ५.शशिनाथ झा ६.कन्या। एहि मध्य माण्डर सिहौली रघुवर झासँ कन्या छठि छथि चारिम छठि- फेकू झाक श्वसुर- पाली महिषी मूलक हर्षी झा, यथा (१) हर्षी झा- (२)जामाता-फेकू झा (३) जामाता कंटीर झा (४)पुत्र-पीताम्बर (५) शशिनाथ (६) कन्या. एहि तरहेँ कन्या हर्षी झासँ छठम स्थानमे छथि तैय हेतु ई चारिम छठि भेल। पाँचम छठि- कन्याक पितामहक श्वसुरक पितामहसँ कन्या छठम स्थान-जेना सकराढ़ी मूलक परहट मूलग्रामवाला (१) ब्रजनाथ झा (२) हुनक बालक हर्षनाथ झा (३) हिनक बालक सिद्धिनाथ झा (४) हिनक जमाय पीताम्बर झा (५) तनिक बालक शशिनाथ झा (६) हिनक कन्या- अस्तु, सकराढ़ी परहट ब्रजनाथ झा पाँचम छठि कहौताह। ६म छठि – परहट सकराढ़ी मूलक हर्षनाथ झाक श्वसुर खण्डबला भौर मूलक श्यामनाथ ठाकुरक बालक महेश्वर ठाकुरसँ कन्दा छठम स्थानमे छथि- तँ (१) महेश्वर ठाकुर (२) हर्षनाथ झा (३) सिद्धिनाथ झा (४) पीताम्बर झा (५) शशिनाथ झा (६) कन्या- एहि तरहेँ खण्डबला भौर मूलक महेश्वर ठाकुर छठम छठि कहौताह। ७म छठि- कन्याक पिताक मातामहीक पितामह- यथा हरिअम मूलक बलिराजपुर मूल ग्रामक सेवानाथ मिश्रक पौत्री, बालमुकुन्द मिश्रक पुत्री कन्याक पिता शशिनाथ झाक मातामही छथि, तँय (१) सेवानाथ मिश्र-पुत्र(२)बालमुकुन्द मिश्र (३)जामाता-सिद्धिनाथ झा (४) जामाता-पीताम्बर झा (५) पुत्र शशिनाथ झा (६) पुत्री-कन्या, अस्तु, हरिअम बलिराजपुर सेवानाथ मिश्र ७म छठि भेलाह। ८म छठि- कन्याक पितामहीक मातृ मातामह-यथा- सोदरपुर मूलक सरिसब मूल ग्राम वाला (१) गदाधर मिश्र-जामाता (२) बालमुकुन्द मिश्र-जामाता (३)सिद्धिनाथ झा(४)जामाता पीताम्बर झा- पुत्र(५) शशिनाथ झा (६) कन्या। ताहि हेतु सोदरपुर सरिसव गदाधर मिश्र आठम छठि छथि। ९म छठि- कन्याक मातामहक प्रपितामह- खण्डबला मूलक भौर मूलग्राम (१)धर्मनाथ ठाकुर-पुत्र (२) योगनाथ ठाकुर-पुत्र (३)दुर्गानाथ ठाकुर-पुत्र (४) नारायणदत्त ठाकुर-जामाता (५) शशिनाथ झा-तनिक (६) कन्या- अर्थात् धर्मनाथ ठाकुरसँ कन्या- ६म स्थानमे छथि। तँय धर्मनाथ ठाकुर नवम् छठि भेलाह। १०म छठि- कन्याक प्रमातामह (दुर्गानाथ ठाकुरक) मातामह- बभनियाम मूलक कड़राइन मूलग्रामक सन्तलाल झासँ कन्या छठम स्थानमे छथि- यथा (१) सन्तलाल झा- हिनक जमाय, (२)योगनाथ ठाकुर (३)पुत्र दुर्गानाथ ठाकुर पुत्र(४) नारायणदत्त (५) जमाय- शशिनाथ झा तनिक पुत्री (६) कन्या। एहि हेतुए बभनियाम मूलक सन्तलाल झा १०म छठि। ११म छठि करमहा मूलक नड़ुआर मूलग्रामक बछरण झासँ कन्या- छठम् स्थानमे छथि- यथा (१)बछरण- पुत्र (२)खेली- जमाय-(३)दुर्गानाथ ठाकुर (४)तनिक पुत्र- नारायणदत्त ठाकुर- जमाय (५)शशिनाथ (६) पुत्री-कन्या- अस्तु बछरण झा ११म छठि। १२म छठि- कन्याक मातामहक मातृमातामह खण्डवला मूलक भौर मूलग्रामक जीख्खन ठाकुर-सँ कन्या छठम स्थानपर, क्रम- (१)जीख्खन ठाकुर (२) खेली झा जमाय (३) दुर्गानाथ ठाकुर (४) पुत्र- नारायणदत्त- जमाय (५) शशिनाथ-पुत्री (६) कन्या। १३म छठि- कन्याक मातामहीक प्रपितामह हरिअम मूलक बलिराजपुर मूलग्रामक योगीलाल मिश्र। यथा- (१)योगीलाल –पुत्र (२) कमलनाथ मिश्र (३) पुत्र- शक्तिनाथ मिश्र (४) जमाय- नारायणदत्त ठाकुर- जमाय (५) शशिनाथ-पुत्रे (६)कन्या। १४म छठि- कन्याक मातामहीक पितृमातामह अर्थात् सोदापुर मूलक दिगउन्ध मूलग्रामक कौशिल्यानन्द मिश्र- यथा- (१) कौशिल्यानन्द मिश्र- तनिक जमाय (२) कमलनाथ मिश्र तनिक (३)पुत्र शक्तिनाथ मिश्र, तनिक जमाय (४) नारायण दत्त ठाकुर तनिक (५) जमाय शशिनाथ झा- तनिक पुत्री (६) कन्या। १५म छठि- कन्याक मातामहीक प्रमातामह अर्थात् खण्डवला मूलक भौर मूलग्रामक महाराज कुमार बाबू गुणेश्वर सिंह यथा- (१) बाबू गुणेश्वर सिंह- पुत्र (२) बाबू ललितेश्वर सिंह (३) जमाय- शक्तिनाथ मिश्र- तनिक जमाय (४) नारायणदत्त ठाकुर (५) तनिक जमाय- शशिनाथ झा- तनिक पुत्री (६) कन्या। १६म छठि- कन्याक मातामहीक मातृमहीक मातृमातामह अर्थात् खौआल मूलक सिमरवाड़ मूलग्रामक- पद्मनाथ झासँ कन्या छठम् स्थानमे छथि- यथा- (१) पद्मनाथ-जमाय (२)बाबू ललितेश्वर सिंह (३)जमाय शक्तिनाथ (४) जमाय-नारायणदत्त (५) जमाय-शशिनाथ, (६) पुत्री-कन्या। उपरोक्त प्रकारे कन्याक सोलह छठि प्राप्त भेल। वरपक्ष: कन्यहिँ सदृश वरहुकेँ उत्तेढ़ (बत्तीस) मूलक बनाओल जाइत छैक। एहि मध्य दू-प्रकारक परिचय रहैत छैक- (१)वरक पिता-पितामहादि तथा हुनका लोकनिक मातृकुलक जे वरक हेतु पितृकुल भेल, दोसर दिस वरक मायक पितृकुलक जाहि मध्य वरक मातामहादि तथा हुनका लोकनिक मातृकुलक परिचय। कोनहु कथा जँचबाक हेतु पञ्जीकार सभसँ पहिने कन्याक छठिक निर्धारण कए लैत छथि। ततःपर वरक उतेढ बनबैत छथि। तखन देखबाक रहैत छन्हि जे कन्या जिनकासँ छठि छथि से तऽ वरक परिचयमे नहि पवैत छथि। जँ से कोनो छठि भेट गेलाह, तँ देखबाक रहैछ जे वरक कोन पक्ष (पितृ-मातृ)के अएलाह। मातृ-पक्ष रहने अधिकार हो आओर पितृ-पक्षमे रहने नहि हो, से वचन पूर्वमे कहि आएल छी। राजेन्द्र कुमार प्रधान, जन्म- 03/09/1970, पिता स्व. बैद्यनाथ प्रधान, गाम- मरूकिया, पोस्ट अन्धड़ाठाढ़ी, जिला-मधुबनी। पिन- 847401,योग्यता- एम.ए. पटना विश्वविद्यालय, पटना, शोधरत्त (पीएच.डी) ल.ना.मि.वि.वि. दरभंगा, अन्य योग्यता- संगीत गायणमे जेड.एल. कम्युनिकेशन द्वारा आयोजित ऑल बिहार फिल्म संगीत प्रतियोगितामे प्रथम स्थान प्राप्त। रिसर्च स्कॉलर, ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय- दरभंगा। २१म शताब्दीक पहिल दशकक मैथिली उपन्यासमे राजनीतिक चेतना उपरोक्त शीर्षक 21म शताब्दीक पहिल दशकक उपन्यासमे राजनीतिक चेतना- कोनाे सामाजिक उपन्यासमे प्रस्तुत विषय-वस्तुक हएब प्राय: स्वभाविक अछि। उपन्यास एक एहन विधा थिक जइमे सम्पूर्ण जिनगीक वर्णन रहैत छैक। जिनगीक एकटा अहम अंग राजनीति होइछ। जाहिसँ उपन्यासमे मोड़ आनल जाइत अछि आ दिशाकेँ बदलि दैत छैक। व्यक्ति भलहिं व्यक्तिगत स्थितिकेँ द्योतक हुअए मुदा जिनगी एकटा एहन विशाल परिक्षेत्रक नाओं थिक जे समाजक बीच पसरि जाइत अछि। मनुख जखने समाजसँ जुड़त तँ ओइमे राजनीति स्वत: एक अंग बनि जाएब स्वभाविक अछि। पहिल दशकमे प्रकाशित उपन्यास तँ बहुतो होएत मुदा हम जेतबा पढ़ि वा देखि सकल छी मात्र तेकरे वर्णन एे आलेखमे कऽ रहलौं अछि। जगदीश प्रसाद मण्डल- जीक उपन्यासकेँ मैथिली साहित्यमे सार्थक राजनैतिक चेतना जगेबाक प्रारम्भक रूपमे देखि सकै छी, मौलाइल गाछक फूल उपन्यासमे राजनीतिक चेतना ओत-प्रोत अछि। जाहिमे ग्रामीण जीवनमे पसरल समस्याक यर्थाथ चित्रण केलनि अछि। प्रस्तुत उपन्यासमे सुबुध नामक एकटा पात्र जे शिक्षक छथि ओ अध्यापन कार्यमे लागल रहैत छलाह। गाम-समाजक चिन्तासँ मुक्त छलाह। जखन रमाकान्त बाबू मद्राससँ घुरि अपन गाम एलाह आ हुनकामे ई चेतना भेलनि जे अनेरे जमीन हम किअए रखने छी तखन अपन 2 सए बीघा जमीन समुच्चा ग्रामीणमे बाॅटि समाजकेँ परिवार रूपमे देखए केर नजरिक पता शिखक सुबुधकेँ लगलनि तखन हुनकामे सेहो चेतना एलनि आ अपन नौकरीसँ तियाग पत्र द’ पुन: आपस आबि जाइ छथि। गाम-समाजक बीच ऐबाक लक्षण एकटा राजनीतिक चेतनाक अपूर्व कृतिमान उपस्थित करैत अछि। तहिना जिनगीक जीत उपन्यामे समाज दशा-दिशाक यर्थाथ चित्रण करैत अर्थनीति केर मूल रहस्यकेँ उद्घाटित करबाक जे प्रयास मंडलजी केलनि अछि ओ एक अद्भुत राजनीतिक प्रमाण उपलब्ध करबैत अछि। जगदीश प्रसाद मंडलक अगिला उपन्यास उत्थान-पतन एहि उपन्यासक माध्यमे सामंती सोचकबला समाज आ समाजिक सोचक समाज बीच आधुनिक वैज्ञानिक समन्वयवादी सोचक यर्थाथ चित्रण तेहन मार्मिक आ इमानदारीसँ मंडलजी केलनि अछि जे एक तेहन राजनीतिक चेतनाक संवाहक बनैए जे प्रत्येक मनुखकेँ उत्थान आ पतनक मार्ग दर्शन रूपमे सिद्ध करैत अछि। ‘जीबन-मरन’ उपन्यासक लेखक जगदीश प्रसाद मंडल जी छथि- एहि उपन्यासक मूल पात्र छथि रघुनंदन। रघुनंदनक मृत्यु जइ दिन भेलनि ओही दिनसँ उपन्यासक प्रारम्भ होइत अछि। मिथिलाक समस्यामे बाढ़ि, रौदी आदि प्राकृतक समस्या केर अलाबे आर बहुत रास समस्या छैक जे मानव द्वारा अक्तियार क’ समाजकेँ जकरने छैक। प्रस्तुत विषय केर चित्रण ताहि रूपे मंडलजी अपन जीबन-मरन उपन्यासमे केलनि अछि जे एक खास राजनीतिक चेतनाक जन्म दैत अछि। हिनक अगिला उपन्यास अछि ‘जीवन-संघर्ष’ अध्यात्मक मूल उद्देश्य थिक मानव-मानवक बीच अगाध प्रेमक जन्म देनाइ जइसँ सभ कियो सहमत छी। प्रस्तुत उपन्यास जीवन-संघर्ष केर माध्यमसँ मंडलजी सम्प्रदाय आ धर्म कोना व्यक्तिसँ समाज धरिकेँ तोड़ैए आ कोना लोक अपनाकेँ महामानवक वाटपर चलि सकैए ताहि परिपेक्ष्यमे चित्रण भेल अछि ओ एक अद्भुत राजनीतिक चेतनाक द्योतक अछि। निष्कर्षत: ऐ सभ उपन्यासमे जीवन आ राजनैतिक चेतना समाहित अछि। लोकक कार्यक प्रति मण्डल जीक विश्वास जिनगीक प्रति विश्वास बिनु राजनैतिक चेतनाक सम्भव नै। श्री गजेन्द्र ठाकुर जीक उपन्यास- सहस्रबाढ़नि ढेर रास रजनैतिक आ ब्यूरियोक्रेटिक उथाल-पुथलक गबाह अछि, तँ हुनकर सहस्रशीर्षा दलित गबैय्या मोहनक भारतक स्वतंत्रतासँ सूचनाक अधिकार धरि गीतक माध्यमसँ राजनैतिक चेतना पसारबाक अद्भुत सफल प्रयास अछि, तँ एकर बीचमे सन्हिआएल गामक आ बाढ़िक राजनीति गामसँ दिल्ली धरि पसरल अछि। राजदेव मण्डल जीक ‘हमर टोल’ धारावाहिक रूपेँ विदेहमे ई-प्रकाशित भऽ रहल अछि आ ई मैथिलीक सभसँ बेसी पठित उपन्यासक रूपमे उभरि रहल अछि। ओना तँ ई उपन्यास अखन छपिये रहल अछि मुदा घृणा आ प्रेम दुनूसँ सराबोर राजनैतिक घटनाक्रमक लेखक द्वारा जे प्रस्तुतीकरण भऽ रहल अछि से अतुलनीय अछि। केदारनाथ चौधरी- जीक चमेलीरानी आ एकर सेक्वेल माहुर वर्तमान राजनैतिक स्थितिक सुन्दर प्रस्तुतिकरण अछि आ अपराधीक राजनीतिमे प्रवेशक सुन्दर विवरण अछि, जतए पाठक चमेलीरानीसँ प्रेम करए लगैए आ ओकर अपराधकेँ स्वीकृति करबा लेल विवश भऽ जाइए। आशा मिश्रक- उचाट आ अशोक कुमार ठाकुरक निशांत आ वसुधाक संसार सेहो ठाम-ठीम एकर विवरण करैत अछि। श्याम चन्द्रक "रूपा दीदी" लेखकक कलाक प्रति उदासीनतासँ ओतेक निस्सन प्रभाव उत्पन्न नै करैए मुदा विषय-वस्तुक दृष्टिए ई राजनैतिक चेतनाकेँ आधार लऽ लिखल गेल अछि। साकेतानन्दक सर्वस्वान्त बाढ़ि आ राहतक राजनीतिक डोक्यूमेन्ट्री फिक्शन अछि। अनिलचन्द्र ठाकुरक “आब मानि जाउ” उपन्यासमे एक एहन युवतीक संघर्ष-गाथा अंकित अछि जे अपन लगनसँ जीवन बदलैत अछि। असंख्य गामक ई कथा कुलीनताक अधःपतनक कथा, संस्कार विहीनताक उद्घाटन आ भविष्यक पीढ़ीकेँ बचएबाक चेतौनी छी। वीणा ठाकुरक ‘भारती’ उपन्यासमे सेहो राजनीतिक चेतना झलकैत अछि। खुशबू झा हमरा नजरिमे सुजीतक रिपोर्टर डायरी संस्मरणक किताब हम कएटा पढने छलहुँ मुदा रिपोर्टर डायरी पढयके हमर पहिल अनुभव रहल । रिपोर्टर डायरीमे कीसभ हेतैक एकर उत्सुक्ता छल ।एकरे कारण जखन हमरा रिपोर्टर डायरी भेटल हम दु बैसानमे पढि लेलहुँ । पत्रकार सुजीतकुमार झाक पहिल कृती चिडै हम पढने छलहुँ सँगहि हुनक एभि न्यूज टिभी, रेडियो मिथिला आ मिथिला डटकमक रिपोर्टिङ्ग सँ सेहो परिचित छी । मुदा जे चीज रिपोर्टर डायरीमे भेटल एहि सँ पहिने हमरा हुनकामे देखबामे नहि आएल छल । ४७ टा डायरी अर्थात लेखमे कोन बढियाँ वा कमजोर छुटियाब कठिन अछि । सभ एक पर एक । फेर एहिमे सभ चीज भेटैत अछि । संस्मरण, रिपोर्टाज आ अहुँ सँ बेसी सभ स्टोरीके हम कथे कहैत छीयैक । ला जबाब पिक्चराईज अछि । रिपोर्टर डायरी पढलाक बाद लोक जनकपुर बुझि सकैत अछि । फेर पत्रकारक नजरिमे केहन जनकपुर अछि एकर स्पष्ट झलक एहिमे भेटैत अछि । फेर बहुत रास समस्या सभ सेहो उठल अछि । जेना रस नहि गुल्लाक रेकर्डमे बरियाती आ बेटी बलाक अवस्थाक बहुत बढियाँ जाका चित्रण भेल अछि । तहिना साज विहीन स्वरसम्राट बेचनमे बेचनक अवस्था आ बेचनक मित्र उदित नारायण झा बिचक विकासक्रम बढियाँ सँ कम शब्दमे कहल गेल अछि । बिबाह कार्डमे मैथिली भाषा आ ओ तऽ मैथिली बिटक समाचारदाता छला ओहो लाजबाब अछि । जनकपुरक बिबाह कार्डसभमे कोना मैथिली लिखायके क्रम शुरु भेल तहिना रहिकाक चुनचुन मिश्रक मैथिली प्रतिक समर्पण सेहो गजब सँ लिखाएल अछि । चुनावक नाम पर पैसाक बहस नाम सँ चुनावमे भ्रष्टाचार कोन रुप सँ बढल अछि अहि सँ बढियाँ चित्रण नहि भऽ सकैत अछि । एकटा पत्रकार कोन अवस्था सँ अपन पत्रकारीताक क्रममे गुजरैत अछि तेकर गजब एहिठाम बानगी भेटैत अछि । घडीक सुइके केउ पकरि लेने छल ताहिमे महिला पत्रकार उमा सिहंक हत्या दिनक लेख अछि । एहिमे लेखकके रेडियोमे कार्यक्रम चलाबय जाइतकाल एकटा टेलिफोन अबैत अछि पत्रकार उमासिहंके आक्रमण भेलैक एहनमे ओ उमा सिहंके सहयोग करय जाइथ वा कार्यक्रम चलाबय ओहि समयक द्वन्द बेजोर आएल अछि । तहिना महासंघक चुनाव आ सुन्धराक आनन्दमे नेपालमे पत्रकारितामे पैसाक खेल कतेक बढिगेल अछि तेकर सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत कएलगेल अछि । नेपालक पत्रकारितामे कतेक रास बिकृती आएल अछि तेकरा रखैत एकटा निकास देबाक सेहो प्रयास कएलगेल अछि । सरल भाषामे लिखल सुजीतक रिपोर्टर डायरी पढयमे आम पाठकके बहुत आसान हैत । फेर किताबक प्रिन्टीङ्ग तऽ एहन अछि जे एक बेर देखिते रही लगैत अछि । किताबक प्रकाशक आफन्त नेपाल अहिके लेल धन्यबादक पात्र छथि । सुजीत जी किताबमे लिखने छथि पहिल पुस्तक जँका अर्थात चिडै कथासंग्रह जँका एकरा स्निेह भेटतैक आशा रखने छथि । पढलाक बाद हम ई कहि सकैत छी स्नेहके आबश्यकता नहि छैक । नीक चीज छैक लोक पसिन कऽ रहल अछि । हमरा तऽ बहुत बेजोड लागल । मैथिली संसारमे एहन रचनासभक आबश्यकता अछि । खाली कथे कबिता नहि सभ तरहक चीज आबक चाही । नयाँ चीज पाठकके नयाँ आनन्द दैत अछि । मैथिली कथा संग्रह जिद्दी पढलापर साहित्यमे किछु पढबाक मोन भेल तऽ हम कथे पढैत छी । कखनो काल समाचार बनबैत–बनबैत थाकि गेलहुँ तऽ नेटपर कोनो कथा खोजए लगैत छी । युवा पत्रकार सुजीत कुमार झाक कथा संग्रह जिद्दी जखन हमरा भेटल एमएकेँ परीक्षा चलैत समयमे पढि लेलहुँ । सुजीतक पहिल कथा संग्रह चिड़ै आ दोसर कृति रिपोर्टर डायरी हम एहि सँ पहिने पढि लेने छी । कथ्यक हिसाव सँ चिडै आ जिद्दीमे खासे अन्तर नहि लागल । मुदा क्रमशः उचाई धऽ रहल छथि से पढबाक क्रममे हमरा भेटल । कोनो व्यक्तिकेँ एक वर्षमे ३ टा पुस्तक आएब साहित्यकेँ प्रति सुजीत कतेक समर्पित छथि तकर एहि सँ बडका उदाहरण दोसर नहि भऽ सकैत अछि । फेर जाहि रुप सँ हिनकर पुस्तक चर्चामे आबि रहल अछि हिनका लेल मात्र नहि मैथिली साहित्यक लेल सेहो उपलब्धीक बात अछि । जिद्दी एहि पुस्तककेँ नाम एकटा कथाक कारण पड़ल से हमरा नहि लगैत अछि । जिद्दीक वारहो कथामे जिद्द भडल अछि । जँ ओ जिद्दी नाम सँ कथा नहि लिख कितावक नाम मात्र लिख देने रहितथि तैयो फरक नहि पडैत । १ सय १४ पृष्ठक एहि कथा संग्रहमे १२ टा कथा अछि । पहिल कथा ‘फूल फुलाइएकऽ रहल’ संग्रहक नाम सँग पुरा वष्तुनिष्ट बुझाइत अछि । अहुँमे जिद्द अछि । कथामे पिंकी अपन अधुरा सपनाके टुटैत नहि छोडि एकटा दृढ विश्वासक सँग पुरा कऽ एकटा सच्चा आ कर्तव्यनिष्ट पत्निक रुपमे ठाढ़ भेल छथि । तहिना ‘नव व्यपारमे’ साधना उपर आधुनिकताक प्रभाव देखाओल गेल अछि जे अपन पति आ घर दुआरक जिम्मेवारीकँे बिसरि क्लब आ राजनीतिक हिस्सा बनल छथि । ‘खाली घर’, ‘लाल डायरी’, ‘जिद्दी’, ‘जादु’, ‘आदर्श’, ‘अर्थहिन यात्रा’ आ ‘व्यर्थक उडान’ ई सभ कथामे महिलाक मनोविज्ञानके चित्रण बहुत सुन्दर ढंग सँ कएल गेल अछि । तहिना ‘निष्ठा कि देखावा’ मे अपन कर्तव्यके समाजक लेल मात्र निर्वाह करय बला औपचारिकता बुझि पतिक सेवा करय बाली नकारात्मक विचारधाराक महिलाक चित्रण कएल गेल अछि । ‘केहन सजाय ?’ नामक कथामे कामनी मैडम जेहन जुझारु महिला जे अवलाके सवला बनैत देखि खुश होइत छली । ओहन सकारात्मक विचारधाराक महिलाक प्रस्तुत कएल गेल अछि तऽ ओ कथामे पुत्र भेलापर गोद लेल वच्चाकेँ छोड़ि देबएबला घटना पढि रोइया ठाढ कऽ दैत अछि । ‘मेनका’मे एकटा एहन महिलाक चित्रण अछि जे एकटा बेरंगक जीवन बिता रहल छली मुदा जखन रंग भड़य बला भेटल तऽ ओ अपन रंग उजारय बाली जेहन नहि बनबाक प्रण कएलन्हि आ अपन बेरंग जिनगीक दोसर यात्रा तय कएलन्हि । अर्थात महिलाद्वारा पीडित महिला दोसरकँे पीडा नहि देबए चाहलथि । अर्थात पुरा कथा संग्रह महिला आ महिलाक आचरण पर केन्द्रीत अछि जे एहि समाजक सत्यताक उजागर करैत अछि । एहिमे प्रस्तुत सभ महिलाक मोनमे एकटा अलग द्वन्द्व प्रस्तुत कएल गेल जे एहि पुरुषबादी समाजक देन अछि । आ ई काल्पनिक कथा होइतो एकटा कटु सत्य बातक पोल खोलि दैत अछि । एहि संग्रहक मोलिकते इएह अछि । हम चाहब सुजीतक नयाँ पुस्तक जल्दि आबए । खास कऽ महिला सँ जुड़ल समस्यासभकेँ आओर गम्भीरता संग उठैक एकर अपेक्षा हमरा तऽ अछिए । मैथिलीके पुस्तक प्रकाशन काज दुरुह भेलाक बादो आफन्त नेपाल जिद्दी पुस्तक छापयके प्रयत्न कएलक अछि । एहिके लेल आफन्तोके धन्यबाद देबहे पडत । चन्द्रकिशोर, वरिष्ठ पत्रकार, वीरगंज, नेपाल समयक साक्षी सुजीतक रिपोर्टर डायरी नेपालीय मिथिला क्षेत्रक सक्रिय एवं सशक्त पत्रकार सुजीत कुमार झाक कथा संग्रह ‘चिड़ै’ किछु मास पहिने पढने छलहुँ । एहि बीच में हुनकर पत्रकारिता सँ जुड़ल पुस्तक रिपोर्टर डायरी सेहो प्राप्त भेल । । एहिमे दूटा प्रक्रिया देखाई पड़ैया । पहिल सुजीतजी साहित्य आ पत्रकारिता दूनु मोर्चा पर ओतवे समर्पित आ सक्रिय देखाई पडैÞत छथि । हुनकामे पत्रकारिता आ साहित्य दूनुक प्रति स्वभाविक आकर्षण छन्हि, ओ दूनु क्षेत्रमे समान एवं सहज रुपमे आगा बढि रहल छथि । इएह हुनक विशेषता छन्हि । बहुत कम लोक दूनु क्षेत्रमे समान रुप सँ न्याय करबाक स्थिति मे रहैत अछि । सुजीत जीक इएह विशेषता हुनका समकालिन आओर संगी सभ सँ फरक व्यक्तित्व दैत छन्हि । दोसर मैथिलीमे पुस्तक प्रकाशनक क्रम बढि रहल सेहो देखबैया । सुजीतजी जनकपुरक प्रतिष्ठित पत्रिका ‘मिथिला डटकम’क सम्पादक छथि । पत्रकारितामे अखवार सँ लऽ कऽ रेडियो आ टेलिभिजनमे पर्यन्त एकसंग क्रियाशील रहैत छथि । ई पुस्तक हुनकर ‘रिपोर्टर डायरी’ नाम सँ प्रकाशित स्तम्भ लेखन आ किछु फुटकर आलेख सभक संग्रह अछि । ओ स्तम्भकार के रुपमे सेहो परिचय बनौने छथि । ई निक गप्प छैक कि एकटा पत्रकार सम सामयिक विषय पर अप्पन अभिमत सेहो रखैत अछि । रिपोटिङ्ग सँ कनिक फरक स्तम्भ लेखनक शिल्प अछि । जे समसामयिक घटनाक तथ्य सँ परिचित नहि रहता से सटिक टिप्पणी सेहो नहि कऽ सकैत छथि । अपन परिवेशक बारेमे जिनका बढिया सँ बुझल छन्हि, ओहिमे रुचि छन्हि, सएह स्तम्भ मार्फत टिप्पणी कऽ सकैत छथि । सुजीतजीक नाम सँ ई विशेषता सेहो जुडि गेल अछि । हिनकर ‘रिपोर्टर डायरी’ क संकलन मे स्तम्भ लेख, राष्ट्रीय पत्रिका मे बहराएल आलेखसभ आ सम्पूर्ण मे सामयिक टिप्पणी – रिपोर्ताज आ विश्लेषणक संग्रहक रुप में देखल जा सकैया । ‘मिथिला डटकम’ मैथिली दैनिक पत्रिकामे पत्रिकाके कलेवर अनुसार एहि स्तम्भक लेल निर्धारित स्थानक परिधि मे रहि कऽ अपन बात कहय पडैत छैक, मुदा ओतबे स्थान मे अपन बात सटिक सँ कहि सकब सुजीत जीक लेखकीय सामथ्र्य देखबैत अछि । कालगणना मे दिनक पुनरावृति होइत रहैत अछि, घटना सभ दोहराइत रहैत छैक, मुदा विषयक नव तरिका सँ उठान करब, संग संगे साथी भाइ सभक चर्चा सेहो करब आ लोक के अपन बात सुना देब, ई रिपोर्टर डायरीक विशेषता अछि । लेखक स्वयं सक्रिय पत्रकार छथि, सम्पादक छथि, सदिखन सूचनाकेँ बाढी मे डुबल रहैत छथि, एहि सभमे सँ स्तम्भक लेल विषयवस्तुक छनोट करब, ओकरा पाठकीय रुप देब, ई कम चुनौतीपूर्ण काज नहि छैक । ताहि लऽ कऽ ‘रिपोर्टर डायरी’ एकटा बढिया प्रयास मानल जा सकैया । तथ्य सभक पोखरी मे सँ विषयक छनौट करब आ सूचना सभक सार्थक प्रस्तुति करबाक जिम्मेवारी – ई एकटा नयाँ जिम्मेवारी आ भूमिकामे सुजीत जीक सफलता सेहो देखबैया । तथ्य सभक सही तरिका सँ आ सही परिप्रेक्ष्य मे प्रस्तुत करवाक खुबी सेहो देखल जा सकैया । जर्मन समाज शास्त्री मैक्स वेबर एकटा पैघ परामर्श देने छथि । हुनका सँ पुछल गेल छलैक, ‘कि कोनो मनुष्यक लेखन मूल्य निरपेक्ष भऽ सकैया ?’ ओ बजला, ‘मनुष्य होएवाक अर्थे अछि कि मूल्य मान्यता सँ बान्हल रहब, हमसभ कहियो धरि मूल्य मान्यता सँ अलग नहि रहि सकैत छी ।’ मुदा हमसभ अपन मूल्यक प्रति सचेत रहब, तकरा लेल परिस्थितिक प्रष्टता सँ बुझब आ तथ्यक विकृत नहि होबए देब से चेष्टा तऽ कऽ सकैत छी ।’ रिपोर्टर डायरी बेवरक मान्यताक कसौटी पर सेहो देखय पडत । संस्कृत मे एकटा पंक्ति छैक, ‘कस्मै देवाय हविषा विधेम’ ई हवि, ई आहुति हम कोन देवताक अर्पित करु ? यानि हमर देवता कोन छथि ? एहि प्रश्नक जवाव महात्मा गान्धीक सूत्र सँ खोजल जा सकैया अर्थात ओ सदिखन अन्तिम मनुष्य (द लास्ट पर्सन)क बात कएलथि । ओ कहलन्हि, ‘जहिया कहियो अहाँ संशय मे पड़ी तऽ ओही समयमे एकटा उपाय करु, गरीब सँ गरीब मनुष्यक चेहरा मोन पारु जकरा कहियो अहाँ देखने होइ आ अपने आप सँ प्रश्न पुछु कि जे कदम अहाँ उठाबय चाहैत छी ओही आदमीकेँ की लाभ पहँुचतै ? ओहि सँ ओकरा की भेटतैक ? एहि सँ ओकर जीवन आ भाग्यमे कोन सहायता भेटतैक ? अहाँ देखब की अहाँक संशय दुर भऽ जाएत ।’ अर्थात कोनो स्तम्भकारक प्रथम दायित्व ‘आम पाठक’ क प्रति छैक । अहाँक लेखन सँ आम पाठककेँ की फाइदा पहुँचलै ? आम लोककेँ सरोकारक विषय समेटलै की नहि ? अहाँ ककरा स्तुतिमे लिखि रहल छी ? सुजीत जीक लेखन कार्य सेहो, आम पाठककेँ सरोकार केन्द्रित बुझना जाइछ । कुशल पत्रकारक पहिचान इएह छैक की ओ ‘समाचार सूंघा’ हुए । अंग्रेजी मे एकरा कहल जाइत छैक – ‘तय जबखभ ब लयकभ ायच तजभ लभधक’ पत्रकारकेँ समाचार सूंघा होएबाक चाही । पत्रकार जनैया ओकर पाठककेँ की सरोकार छैक, ओकरा कोन तरहे प्रस्तुत कएल जा सकैया ? सुजीतजी मिथिला डट कमक पाठक क स्वाद बुझैत छथि तएँ सरल भाषामे टिप्पणी सभ करैत छथि । एहि मे गम्भीर विषय सभ सेहो जुडल रहैत छैक, मुदा बडा रसगर अन्दाज मे । साहित्यिक धरातल सँ पत्रकारिता क्षेत्रमे नव उचाई प्राप्त कऽ रहल सुजीतजीक लेल साहित्यिक रचना हिनकर लेखकीय कौशलक चमत्कृत कऽ दैया कखनो काल । रिपोर्टर डायरी जनकपुरक मिठगर आम अछि, स्वदगर माछ अछि, ग्रहण योग्य पाग अछि, निकगर पावनि तिहार अछि, पुरान मुदा आकर्षक जनकपुरक रेल अछि, सजा कऽ रखयबला न्योतक पत्र अछि, ई कहब अतिसयोक्ति नहि । एकर पन्ना–पन्नामे पछिलका तीन÷चारि वर्षक जनकपुरक टटका इतिहास छिरियाएल अछि, जनकपुरक नवका इतिहास सजाओल भार अछि ई पुस्तक । सुजीतजीक उचाई ग्रहण करैत व्यक्तित्वके स्वीकार करही टा पडत, नवतुरिया जमातक रुपमे मात्रेटा मूल्यांकन करब कथमपि न्याय नहि । एकटा लोकप्रिय मैथिली दैनिक पत्रिकाकेँ नम्हर समय सँ सम्पादन कऽ कऽ आ ओ पत्रिकाक लोकप्रिय बनावि अपन सफलताक सामथ्र्य रेखा खिंच चुकल छथि आ स्तम्भ लेखन कऽ कऽ सेहो कीर्तिमान स्थापना कएलन्हि तएँ सुजीतजीक पत्रकारिताक चिडै फुनगी पर चढि रहल अछि । मैथिली दैनिक पत्र निकालब कम कठिन नहि । प्रायः मैथिली पत्र पत्रिका बसिया निकलैया ओहन परिप्रेक्ष्यमे एक भिनसरे जनकपुर बासीक हाथ–हाथ मे पहुँचब आ चाहक चुस्कीकँे संगे मैथिली पत्रिकाक आनन्द ग्रहण करेबाक चलन चलाबयकेँ पाछुक संघर्ष बुझब कम कठिन नहि । एकटा दोसर सन्दर्भ मे अकबर इलाहावादी कहने छथि – नही शेख साहिब की वह आदत वजू की और मुनाजाते सहर की मगर वो चाय पीकर हस्बेदस्तुर तिलावत करते है वह ‘पाएनियर’ की अर्थात पत्रिका पढबाक सौख एतेक बढि गेल अछि कि बुजुर्ग लोकसभ सेहो प्रातः कालमे भजन – पूजा छोडि कऽ अखवारक पाठ करैत छथि, जनकपुरक सन्दर्भमे अकवर इलाहावादीक काव्योक्ति कनि सुधार कऽ कऽ कहल जाय तऽ, जानकी मन्दिरक दर्शन कऽ कऽ लौटनिहार जनक चौकक पत्रिका दोकानमे एक बेर पहुँचबेटा करैत छथि, वा घर पहँुचि कऽ मिथिला डटकम खोजैत छथि । ई कहल जा सकैया पछिलका समयमे जनकपुरमे मैथिली अखवार पढव रुचि विस्तार भऽ रहल छैक । मिथिला डटकम मे ‘रिपोर्टर डायरी’ आ ‘विगुल’ स्तम्भ तहत ई संकलनक बहुत रास सामग्री प्रस्तुत भऽ चुकल अछि । संचारमाध्यमक समाजक प्रति की दायित्व छैक ? संचारमाध्यमक कर्तव्यक सम्बन्ध मे पहिल प्रश्न ई पुछल जाइत छैक की मिडियाक कर्तव्य केवल जनमतक प्रकाशन÷प्रसारण अछि की जनमतक मार्गदर्शन ? साँच पुछल जाए तऽ संचारमाध्यमक तीन प्रधान कर्तव्य अछि – पहिला तऽ जनमतकँे प्रदर्शित करब, दोसर जनमत तैयार करब, तेसर जनमतक मार्गदर्शन करब । मिडियाक काज इतिहासकेँ बतवैत चलब सेहो अछि । छोट–छोट बात सभ सेहो इतिहास बनवैया । स्वयं जनतामे, जनप्रतिनिधि सभमे, आ सरकारी संस्थासभमे घुसल बिसंगति सभक विरुद्ध जनमत तैयार कएनाई सेहो मिडियाक कर्तव्य अछि । मानहानिक कानून सँ बँचि कऽ जहाँधरि अभिव्यक्त कएनाइ सम्भव भऽ सकैया पत्रकारकेँ जएबाक चाही । सरकार आ मिडिया दूनुक काज जन–रंजन, राष्ट्र निर्माण, विश्व कल्याण अछि । लोकतन्त्रक पृष्ठभूमिमे जे दायित्व सरकारक छैक वएह प्रेसोकेँ छैक । प्रेसकेँ इहो कारण सरकार सँ बेसी जिम्मेवारी भऽ सकैया की सरकार तऽ बदलैत रहैत छैक, मुदा पे्रस तऽ निरन्तर सक्रिय रहैया । जेहन जनता होइत छैक तेहने सरकार बनैत छैक । ई सच्चाई प्रेस पर सेहो चरितार्थ होइया, किएक कि नागरिकक नैतिक एवं मानसिक स्तरक अनुरुपहि ओहि देशक प्रेस रहैत अछि । मुदा ई बात ओहि देश मे पाओल जाइया जतय केँ व्यक्तिगत स्वतन्त्रताक आधार पर लोकतन्त्र स्थापित अछि । जतय राजनीति वा अर्थनीति नियोजित रहैत अछि, ओतय सरकार वा समाचार पत्र सेहो पूर्व नियोजित चलैत अछि । सार्वजनिक विषय पर सार्वजनिक रुप सँ चर्चा करए लेल प्रत्येक नागरिककेँ अवसर भेटबाक चाही । ई चर्चा मात्र एकहि माध्यमकेँ द्वारा निर्भिकता पूर्वक भऽ सकैया ओ अछि संचारमाध्यम । ताहि लेल तऽ कहल गेल अछि कि संचारमाध्यमक स्वतन्त्रता केवल पत्रकारिता सँ जुडल लोकक लेल मात्रेटा सरोकारक विषय नहि छैक । अपन विचार प्रकट करबाक स्वतन्त्रता कोनो व्यक्तिक स्वतन्त्रता सँ जुडल विषय छैक । प्रत्येक व्यक्तिक संचार माध्यममे अपन मत प्रकाशित– प्रसारित करवाक स्वतन्त्रता होएबाक चाही मुदा ई अधिकार पूर्णतया निरपेक्ष नहि छैक । वास्तवमे सभ अधिकार सापेक्ष होइत छैक आ ओकरा प्राप्तिक लेल कतेको मर्यादा सभक पालना करय पडैत छैक । रिपोर्टर डायरी लिखनीहार सदैव अप्पन मर्यादाक लक्ष्मण रेखा बीच रहि कऽ कलम चलौने छथि । पत्रकारक लेल विश्वसनीयता सभ सँ पैघ पूँजी छैक । कोन बात कोन पत्रकार कहलकै, ई सभ सँ बेसी महत्व रखैत अछि । विश्वसनियता कोनो लौटरी जकाँ नही प्राप्त भऽ जाइत छैक । ई रातारात होवयबाला चीजो नहि छैक । एकटा नम्हर समयमे पत्रकार विशेषक सम्बन्धमे एकटा छवि जनमानस मे उभरैत छैक तकरा लेल पत्रकारकेँ तऽ बहुत नम्हर परीक्षा सँ बहराय पडैत छैक । तखन जा कऽ विश्वसनियता प्राप्त होइत छैक । जे पत्रकार तथ्यक पाछु रहैया, विभिन्न तथ्य सभक आलोक मे सत्यक खोजी करैया आ ओकरा जनताके बीचमे प्रस्तुत करैया सएह पत्रकार जनताक अभिन्न मित्र कहबैया । ‘लोकमित्र’ पत्रकार बनवाक लेल जनताक मन जीतय पडैत छैक । ई काज पूर्वाग्रही आ स्वार्थी लेखन सँ सम्भव नही छैक । एडी उठा कऽ कोनो नम्हर बनक कोशिश करे तऽ ओ टिकाउ नहि होइत छैक । दुनिया बहुत छोट छिन भऽ गेल छैक । अहाँके हातमे जौं कलम अछि तऽ जनताक हात मे मूल्यांकन करबाक स्वतन्त्रता छैक, मूल्यांकन करबाक अधिकारकेँ अहाँ हरण नहि कऽ सकैत छी । संकलित विषयवस्तुसभमे बहुत रास जनकपुर आ पासपडोसमे केन्द्रित अछि । एकर वावजुद एहि आलेखसभ मे जाहि विषयवस्तुक चर्च कएल गेल अछि, ओहिमे किछु राष्ट्रिय अछि । जनकपुरमे उठि रहल लोक हिलोरक कम्पनक रेखाचित्र अछि, रिपोर्टर डायरी । एखनुका समयमे पत्रकार विशेष अप्पना क्षेत्रमे काज करैत–करैत, जौं ओकरा मे जिज्ञासु भाव छैक, विश्लेषण करवाक क्षमता छैक, समयकेँ चिन्हि सकैया तखन ओ अप्पना क्षेत्र विशेषक मामिलामे दक्षता सेहो प्राप्त करैया । एहन अवस्थामे एकटा निक रिपोर्टर आ सम्पादक अप्पन रुचीक विषयमे निपुणता प्राप्त करैया, जकर उपयोग पुस्तक लेखनमे सेहो करैया । एहि प्रवृतिक पदयात्री एखन सुजीतजी देखल गेला । रिपोर्टर डायरी प्रकाशन सँ जनकपुर आ मैथिली पत्रकारितामे एकटा नयाँ इतिहास जुड़त । लेखकक निजत्व देखय बला बहुत रास प्रसंगक बीच विभिन्न क्षेत्रक आ स्तरक लोकक मनोभाव पढल जा सकैया । एकटा पत्रकारकेँ कोन तरहे घटना सभ प्रभावित करैत छैक, से देखल जा सकैया । ‘महासंघक चुनाव आ सुनधाराक आनन्द’ शीर्षक लेखमे पत्रकारिता आ एकर संगठनमे पनपैत विसंगति सभक प्रति कठाक्ष करैत ओ लिखैत छथि, ‘काश हमहुँ सभ दारु पिवैत रहितहुँ, तऽ कतेक पिबतहुँ कतेक पिवतहुँ ............... ’ किए एतेक महंग भऽ रहल अछि पत्रकारक चुनाव ? सभ्य समाजक कल्पना करयवला कलमजीविसभ स्वयं विकृति बढावयमे तऽ नहि लागल अछि । ई संग्रह ओही समयमे प्रकाशित भऽ रहल अछि जखन मिथिला पैघ संक्रमण सँ गुजरि रहल अछि । कतेको समय एहन देखल गेल जखन राजनीतिक दल, नागरिक समाज, गैससकर्मी, मिडिया आ राष्ट्रसेवक वर्गक भूमिका पर आओर पक्ष द्वारा अांगुर ठाढ़ कएल गेल । सभ क्षेत्र मे अप्पन भूमिका आ महत्व पर मन्थन होएबाक चाहि उपदेश आएल । सुजीतजी वार्तमानक जनकपुरिया पत्रकारिता मादे नेपालीय पत्रकारिताक विसंगति सभकेँ पूर्ण इमान्दारीक संग चित्रित कएने छथि, एहि सँ हुनकर उठान कएल गेल विषयवस्तुक विश्वसनियता बढाओत । केवल उपदेश देल सामग्री लोक नहि रुचिवैया, जौं अपना सँ जुडल आलोचना स्वयं कएल जाइया तखन लोकविश्वास बढैत छैक । सल्लाह आवि सकैया, एहन लिखबाक चाहि, एहन रहितै तऽ नीक, ई छुटि गेल, संकलन बहरयवाक समय नहि भेल छलैक आदि । किछु लोक कहि सकैत छथि, एहि मे कोनो नव विषयवस्तु नहि छैक जे संकलन रुप मे निकालल जाय । मुदा हम जोड सँ कहब, सुजीतजी निक कऽ रहल छथि, निक कएलाह, जनकपुरिया पत्रिकारिताक एहि सँ निक खुराक भेटतै, मैथिली पत्रकारितामे नव इतिहास जुटतै । जखन किछु काज हेतै, तखन नहि विमर्श हेतैक, लेखा जोखा हेतैक, प्रभाव आ परिणामक आकलन कएल जेतैक । सु्जीतजी एकटा लकिर खिचलाह अछि, एहि सँ पैघ खिचि कऽ आगु बढी से नीक कि ‘ई – ओ’ कहि–कहि आत्मरति कएल जाए से निक । अहि प्रयासक बाद ऐहन प्रयासक क्रम बढे, निक समालोचना आवय से आवश्यक अछि, एहि सँ मैथिली आ पत्रकारिता दूनुकेँ लाभ पहुँचतै । किछु मामिला मे सुजीतजी आगा बढि गेला । नेपालमे नम्हर समय धरि मैथिली दैनिक पत्रक सम्पादन करबाक इतिहास बनौलन्हि । मिडिया सँ सम्बद्ध पुस्तक बहरौलन्हि । बहुत खुब । जनकपुर नगरक अप्पन विशिष्ट पहिचान छैक । एहि ठामक पत्रकारिताक अप्पन ऐतिहासिकता छैक, एहि ठामक पत्रकारितामे प्रतिष्पर्धा सेहो बेसिगर छैक, एहि सभक बीच अप्पन मौलिक व्यक्तित्व आर्जन करब कम कठिन नहि । सुजीतजी निक दिशामे बढि रहल छथि, हिनकर पत्रकारिताक भविष्य सुदीर्घ छन्हि । आनो ठामक पत्रकारसभकेँ सेहो एहि मार्ग पर चलबाक लेल प्रेरित करतैक से हमर विश्वास अछि । पत्रकारिता जनभावनाक अभिव्यक्ति, सद्भावक उद्भूति आ नैतिकताक पीठिका अछि । संस्कृति, सभ्यता आ स्वतन्त्रताक वाणीक संगहि ई जीवन मे अभूतपूर्व क्रान्तिक अग्रदुतिका सेहो छैक । एखन मिथिला मे प्रतिवद्ध आ जिम्मेवार पत्रकारिताक आवश्यकता अछि । एहि पुस्तकक बहाने जवावदेह पत्रकारिता पर बहस चलैक आ जनकपुर परिवृतक सरोकारसभ पर खुला एवं स्वस्थ विमर्श भऽ सकैया, एहि मे ई पुस्तकक प्रकाशनक सफलता अछि । अन्ततः हम इएह कहब , ‘सुजीतजीक पत्रकारिता आओर विश्वसनीय हुएँ आ प्रसिद्धिक फुनगी पर चढैत चलि जाइक । ’ सुदीप झा सामाजिक मूल्य मान्यताकें चोच मारैत ‘चिड़ै’ सुजीतक प्रायः कथासभ भावनाक धरातलपर बनल मानवीय सम्बन्ध आ सम्बेदनाकेँ कुरेदवाक प्रयास करैत अछि । प्रायः कथासभ स्त्री पुरुष सम्बन्धपर केन्द्रित अछि । ओना किछु कथा सभ पितापुत्र सम्बन्ध, बाबा पौत्रीक सम्बन्धपर सेहो आधारित अछि । सुजीत जी अहि अर्थमे धन्यवादक पात्र छथि जे ओ समाजिक धरातल सँ उपर उठि मानवीय भावना आ सम्बेदनाकेँ धरातलपर सम्बन्धकेँ समझबाक आ समझेबाक प्रयास करैत छथि । एकरा की कहल जाए जँ कोनो पति अपन पत्निकेँ मृत शरीर ओकर प्रेमीकेँ सोपि दैक ? किछु एहने सन कथावस्तु छैक ‘एकटा अधिकार’केँ जाहिमे एकटा पति एरोप्लेन एक्सीडेन्टममे छतविछत भेल अपन पत्निकेँ मृत शरीर उपरक अपन अधिकार अपन पत्निक प्रेमीकेँ हस्तान्तरण कऽ दैत अछि । निश्चित रुप सँ अहि कथाक पति मानविय भावनाकेँ सम्मान करैत छैक । ‘भौजी’ कथामे नायक राजन एकटा विधवा सँ प्रेम करैत अछि आ ओहि विधवा सँ विवाह सेहो करय चाहैत अछि । तहिना ‘चिडै’ कथामे अन्तर वैवाहिक सम्बन्धक कटु यर्थाथकेँ उजागर कएल गेल अछि । कथाकेँ नायिका उषा जखन ओकर विवाहित प्रेमी मनोज ओकरा गुण्डासभकेँ बीच छोडि लोक लाजककेँ कारणे परा जाइत छैक । सुजीतजीक कथासभ किछु एहन सम्बन्ध जकर अनुमति प्रायः मैथिल समाज नहि दैत छैक तकर विभिन्न पक्षकेँ देखार करैत अछि । निश्चित रुप सँ अन्तर वैवाहिक प्रेम आ सम्बन्ध आ विधवा विवाह एकटा समाजिक अपराध मानल जाइत छैक , मैथिल समाजमे । हुनक बहुत रास कथासभ समाजिक मूल्यमान्यताकेँ चाइलेन्ज करैत अछि । एहन बात नहि छैक जे कथाकार समाजिक व्यवस्था सँ बाहर वनल सम्बन्धक अध्ययन मात्र करैत छथि । ‘बाबाजी’ कथामे एकटा बृद्ध व्यक्तिक अन्तिम अवस्थाक कारुणीक विवरण अछि आ स्वार्थपर ठाढ सम्बन्धक यर्थाथ परक विश्लेषण सेहो कएने छथि । ‘वनैत विगरैत ’ कथा एकटा रिटाइर्ड व्यक्तिक व्यथा छैेक । पिताकेँ ठेस जखन लगैत छन्हि जखन हुनका बुझवामे अवैत छन्हि जे हुनक पुत्र नागेश्वर अपन पिता सँ बेसी सम्पति प्रति चिन्तित छथि । तहिना ‘ढोल’ कथा पति प्रेमक लेल व्याकुल पत्नीक मनोदशाक विश्लेषण अछि । हुनक प्राय कथा सँ सम्बन्धक बनैत बिगरैत अवस्थाकेँ विश्लेषण करैछ । समाजिक व्यवस्थाकेँ भितर होइक या वाहर सुजीतजीकेँ कथासभ सभ अर्थमे मानविय सम्वेदनाकेँ कुरेदैत अछि । समाज अपन मुल्य मान्यताक आधारपर नैतिकताक आ अनैतिकताक तराजु बनबैत अछि । समाजिक मुल्यकेँ अनुकूल कार्यकेँ नैतिकताक संज्ञा देल जाइत अछि आ प्रतिकूल कार्यकेँ अनैतिकताक । मुदा सूजीतजी समाजिक मूल्य सँ उपर उठि मानवीय मुल्यकेँ धरातलपर नैतिकताक परिभाषित करैत छथि । उषा एकटा विवाहित पुरुष सँ प्रेम करैत अछि , ओकरा सँ सम्बन्ध स्थापित करैत अछि । उषा अपन प्रेमीकेँ भावनाकेँ कदर करैत अछि । कथामे कतहुँ ओकर नैतिकतापर प्रश्न चिन्ह ठाड़ नहि कएल गेल अछि । मुदा मनोजक नैतिकतापर अवश्य प्रश्न चिन्ह ठाढ़ भऽ जाइत छैक । जखन ओ अपन प्रेमिका नलिनीकेँ गुण्डासभक बीच छोरि परा जाइत अछि आ घायल नलिनी होस्पीटलाइज भऽ जाइत अछि । सुजीतजीक कथासभ बदलैत मानविय सम्बन्धकेँ उजागर तऽ करैत अछि मुदा ओकर पाछा वदलैत राजनीतिक आर्थिक आ सामाजिक परिवेशकेँ समेटवाममे असफल देखल जाइत छथि । मुनष्यक मनोदशा ओकर बनैत बिगरैत सम्बन्ध बहुत हदधरि समाजिक राजनीतिक आ आर्थिक परिवेशद्वारा निर्धारित होइत अछि । अहि पक्षसभदिस कोनो साहित्यकारकेँ अपन कला मार्फत इंगित करब ओतबे जरुरी होइत अछि । कथामे पात्रसभ एकटा खास परिवेशमे क्रिया आ प्रतिक्रिया करैत अछि । सुजीतजी ओहि प्रवेशकेँ नहि राखि पाएल छथि । हम अपन बात एकटा उदाहरणक माध्यम सँ प्रष्ट करय चाहैत छी ‘प्रियंका’ कथामे कथा वाचककेँ नायिका प्रियंका बसमे भेटलन्हि । बसमे तऽ आर लडकीसभ छल हैत । जखन बसपर सँ उतरलै तखनुका परिवेश केहन छलै ? की बस प्रियंकाकेँ ओकर मन्जिलधरि पहुँचेलकैक ? ओकर मोनमे सेहो बस चलैत छल हैतै ? ंिप्रयंका निश्चित रुप सँ अपन मन्जिलधरि नहि पहुँच पबैत अछि । ओना ओकर वेग बड तेज छैक । बस, बसक वेग , वस स्टेण्ड, जीवन गाडी, वाट, सहयात्री आ जीवन लक्ष्य ई सभ चिजकेँ जँ कथाकार समायोजन कऽ पवितथि तऽ प्रियंका कथा आर मुखर भऽ अवितैक । वास्तवममे देखल जाए तऽ कथाकार प्राय कथासभमे बिम्बकेँ सही समायोजन नहि कऽ पाएल छथि । एकठाम मात्र हमरा भेटल जतय ठण्ढा हवा आ धुनि पिता आ पुत्रकेँ ठण्डाइत सम्बन्धकेँ प्रतिबिम्बित करैत अछि । ‘धधकैत आगि आ फुटैत कनोजरि’ कथामे कथाकार खण्डित करैत नजरि अबैत छथि । स्वप्नमे स्वयंकेँ उपस्थिति अनिवार्य रहैत छैक । सम्पूर्ण कथाकेँ घटनाक्रम कथाक नायिका जयन्तिक सपनामे घटैत देखाओल गेल अछि । तखन कथाकेँ सुरुवात ड्राइवर आ खलाासी बीचक वार्तालाप सँ कोना भऽ सकैत अछि । ततबे नहि कथामे किछुदेरक बाद नायिकाकेँ प्रवेश कराएब की उचित अछि ? की सपनाक यर्थाथकेँ खण्डित नहि करैत अछि ? कथा सेहो मानव जीवनककेँ कलात्मक अभिव्यक्ति छैक । कोनो कलामे ओकर गढनी महत्वपूर्ण बनि जाइत छै । शब्द, विम्ब, पात्र आ कथावस्तुकेँ सही संयोजन सँ मात्र कथा जिवन्त भऽ सकैत अछि । कथा एकटा मौलिक अभिव्यक्ति सेहो होइत अछि । कथाकार जीवन जगतकेँ एकटा नयाँ ढंग सँ देखबाक प्रयास करैत छथि । सुजीतजीक अहि दूनु अर्थमे आशिंक सफलता भेटल छन्हि । राजेश कुमार कर्ण चिरबिर–चिरबिर करैत उडि रहल चिडै बुंद–बुंद टपकैत पानिसँ प्यासल पंक्षीकँे प्यास नहि बुझि सकैत अछि । हमरो तहिना भेल अछि । बहुत दिनसँ मैथिली किताब सभ पढबाक प्यास हमरा छल आ एखनो अछि मुदा बहुत कम किताब पढि पौने छी । ताहिसँ सुजीत कुमार झाक लिखित चिड़ै कथा संग्रहसँ मात्र सेहो हमर प्यास नहि बुझि सकैत अछि । मुदा पानिक ई ११ टा बुंद हमर करेजकेँ ठण्डक नहि द सकल लेकिन एकटा बात तऽ अवश्य भेल अछि कि एहि पानिक बुंदसँ हमर जीव आ कण्ठमे ठण्डक अवश्य प्राप्त भेल अछि । मैथिली साहित्यकँे कखरा तक नहि जानएवाला व्यक्ति ककरो कथा संग्रहक बारेमे किछु समीक्षा, समालोचना आ टिप्पणी कि करताह । मुदा सुजीत जी हमर मित्र भेलाक कारणे आ कथा संग्रह चिडैÞ कँे बारेमे अपन विचार लिख देबाक लेल कहलाक कारणे अहि कथा संग्रहक बारेमे हम किछु प्रस्तुत करबाक चेष्टा कऽ रहल छी । मैथिली भाषामे सुजीतक ई प्रथम कृति चिड़ै कथा संग्रह हमरा बड निक लागल । एकर मुख्य पृष्ठ आर्कषक अछि आ किताबक बाहर आ भितरकँे प्रिन्ट सेहो स्पष्ट अछि । ७८ पृष्ठमे समेटल गेल ११ टा कथाकेँ संग्रह अलमी पाठक एकहि बैठानमे पढि सकैत अछि तऽ बेफुसर्दी लोकसभ सेहो ११ बैठानमे तऽ अवश्य पढि लेताह । ताहि दृष्टि सँ सेहो निकेँ कह पड़त नहि बेसी पैघ आ नहि छोट । सुजीतक कथा संग्रह चिडैÞ कँे ११ टा कथामे सँ ९ टा कथाकँे प्रमुख पात्र महिला छथि । जाहिमे हमरा अहाँक समाजमे महिलाकँे विभिन्न चरित्र आ रुपकँे चर्चा कायल गेल अछि । महिलावादी पहिल कथा “एकटा अधिकार”मे विमान दुर्घटना सँ सुरुवात कऽ एहिमे मृत भेल लोकसभकँे खोजबाक उपक्रमकेँ वर्णन करैत एकटा विवाहित महिला सँ एकटा नवयुवककेँ प्रेमक बारेमे जिज्ञासा आ उत्सुकता सँ भड़ल बातचीतकेँ प्रस्तुत कायल गेल अछि । जाहिमे महिलाक पतिसंग ओ अपरिचित युवक अपन प्रेमक बारेमे बखान करैत अछि आ ओकर प्रेमकँे देखि ओ महिलाक पति दुर्घटनामे मृत भेल अपन पत्नीकेँ दाहसंस्कारक जिम्मा ओहि नवयुवक प्रेमीकेँ दऽ दैत अछि । अहि कथामे महिलाक बारेमे मात्रे वार्तालाप भेलाक कारणे एकटा मृत महिला एकर प्रमुख भऽ गेली अछि । दोसर कथा “धधकैत आगि आ फुटैत कन्जोरि” मे सेहो एकटा नवयुवती बलत्कारक अनुभव पएबाक लेल कऽ रहल विभिन्न प्रयासक बारेमे लिखल गेल अछि तऽ तेसर कथा “भौजी”मे नन्द आ विधवा भौजीकेँ एकहिटा युवकसंगक प्रेम प्रसंगक बारेमे चर्चा कायल गेल अछि तऽ चारिम कथा “चिडैÞ” मे दू टा महिला पत्नी आ प्रेमिकाक बारेमे केन्द्रित अछि । अपन पत्नीसँ असन्तुष्ट एकटा पुरुष कोना दोसर महिलाप्रति आर्कषित होइत अछि आ महिलाकेँ कोन रुपमे उपयोग करैत छथि ताहिकँे वर्णन अछि । पाँचम कथा “प्रियन्का” मे एकटा एहन बचियाकँे बारेमे चर्चा कायल गेल अछि जे जीवनमे किछु विशेष करबाक लेल गामसँ भागि शहर जाइत छथि ओतए ओ अपन उद्देश्य प्राप्त करितो सभक खेलौना भऽ कऽ रहि जाइत छथि । ताहि प्रकारे सातम कथा “वंश” मे सेहो एकटा एहन बचियाकँे चर्चा अछि जे डाक्टर बनि अपन माई बाबुकेँ नाम मात्रे नहि रोशन करैत छथि कि लडकीसभक बारेमे समाजमे व्याप्त गलत धारणाकँे सेहो तोड़ि दैत अछि । आठम कथा “बाबाजी” मे हमरा अहाँक समाजमे साउस ससुरके कोन प्रकारे पुतहुसभ दुख दैत अछि ताहिक वर्णन कायल गेल अछि । तहिना दशम कथा “ढोल” मे सेहो एकटा नवयुवतीकँे विवाहक बाद पुरुषकँे पत्नीक रुपमे नहि भऽ ढोलकँे रुपमे कोना भऽ जाइत अछि ताहि कँे देखाओल गेल अछि । तऽ अन्तिम कथा “शुन्यताक प्रवेश” मे सेहो एकटा महिला जे ककरो माइ छथि तऽ ककरो पत्नी ओकर पीडा देखाओल गेल अछि । एहि प्रकारे देखल जाइ तऽ ११ टा कथामे सँ ९ टा कथाक प्रमुख पात्र महिला छथि । ताहिसँ सुजीतक ई कथा संग्रह महिलावादी कथा संग्रहके रुपमे चित्रित कायल जा सकैत अछि । दोसर दिस सातम कथा वर्खीक भोजमे भिखमंगोसं बेसी दुर्दशा आ आर्थिक दरिद्रता मध्यम वर्गीय परिवारके व्यक्तिसभमे रहल बातके बहुत चतुराईपूर्ण ढंगसं प्रस्तुत कायल गेल अछि त ९ अम् कथा “बनैत बिगरैत” मे हमरा अहांक समाजमे भइयारीक अंश आ पुर्खाक सम्पति पर सन्तान सभक कुदृष्टिक बारेमे चर्चा अछि । ताहि सं महिलावादी कथा संग्रह भेलाक बावजूदो अहि कथामे समाजक जनजीवनके सूक्ष्म चर्चा सेहो अछि । जाहि कारणे समाजके दर्पणके रुपमे सेहो अहि कथा संग्रहके लेल जा सकैत अछि । त दोसर दिस कथा “धधकैत आगि आ फुटैत कनोजरि” मे एकटा एहन नवयुवती जे एकटा बलात्कारके अनभुव प्राप्त करबाक लेल स्वयंके बलात्कृत करबाक लेल सेहो तैयार छथि आ एहिके लेल बसक ड्राइभर खलासी, पुलिस आ विभिन्न युवकसभक बीचमे जाइ छथि । नव श्रृजना परम्परागत कथासं हटि क ई एकटा अलग कथा अछि जाहिमे समाजक बहुत विषय वस्तुक बारेमे व्यक्तिक जिज्ञासा कोन प्रकारे उधेलित होइत अछि तकर वर्णन अछि । ताहिसं नवखोजी आ श्रृजक व्यक्तिके रुपमे सेहो लेखकके देखल जा सकैत अछि । एहि कथामे एतबहि मात्र नहि सपनाक बारेमे किछु दार्शनिक बातके चर्चा करबाक प्रयास सेहो कायल गेल अछि ताहिसं भविष्यमे जौं लेखक चिन्तन निरन्तर रखताह त ओ विशेष दर्शनयुक्त कथा सेहो लिखए सकैत अछि । ताहिके संकेत सेहो एहि कथा मादे प्रष्ट होइत अछि । विभेद पर प्रहार तहिना भौजी कथामे प्रेमक द्वन्दबीच विधवा महिलाक प्रेम प्रस्तुतिसं लेखक समाजमे महिलाक अधिकारके लेल सेहो वकालत कयने अछि । जौ विदुर पुरुष दोसर विवाह कऽ सकैत अछि तऽ विधवा महिला किया नहि ? तहिना प्रियन्कामे निक करबाक आ जीवनमे समाजक लेल किछु विशेष करबाक उत्साहसं आगू बढल बचियासभके कोन प्रकारे समाजक विकृतिके चक्र घेर लैत अछि ताहिके प्रस्तुत क हमरा आहांक समाज पर व्ययंग सेहो लेखक कथा मादे कयने छथि । बेटा मात्र नहि बेटियो मायबापके नामके रौशन कऽ सकैत अछि ताहि बातके वंश कथा मादे प्रस्तुत कऽ बेटा आ बेटी बीचक भेद हटेबाक लेल जोडदार ढंगसँ अपन बात के लेखक प्रस्तुत करबामे सक्षम भेल अछि । एहि प्रकारे देखल जाइ तऽ सुजीतक कथा संग्रह चिड़ै समाजक विभिन्न पक्षके वर्णन करएमे सर्मथ अछि आ ई चिड़ै समाजक विभिन्न पक्ष पर उड़ि रहल अछि । चन्द्रेश, मनमीत कुटीर/राजपूत कालोनी, मौलागंज/दरभंगा–८४६०४, बिहार/भारत! रचनात्मक बिमर्शक अयनामे ‘चिड़ै’ सुजीत कुमार झाक कथा संग्रह ‘चिड़ै’ पढलहुँ । जुआनीक उन्मादमे भावुक रोमानीपनक गन्ध नेने कतिपय कथा आएल अछि । अल्हड़ जुआनी आ प्रेमक उन्मादमे लिखल गेल कथा अबस्से युवा मोनकेँ गुदगुदी लगबैत छुवैत अछि, तन–मनकेँ झंकृत करैत अछि । सहज सहानुभूतिमे उपजैत हृदयक टीस मोनमे उभरि अवैत अछि । एक दिस व्यथा–कथाक उपजामे टीसैत करुणा अछि तँ दोसर दिस पीड़ित ताप । खौंझाइत मोनक बौद्धिक चेतना जाग्रतावस्थामे अपन दम–खम रखैत अछि । मानबीय मूल्य बोधक प्रति कथाकार सतर्क, सचढ ओ सम्वेदनशील छथि । निस्सन्देह कथाक दुआरि पर सुजीतकुमार झा क ‘चिड़ै’ कथा–संग्रहक स्वागत अछि । स्वागत एहि द्वारे नहि जे ओ भावुक मोनक कथाकार छथि । ओ अवस्से भावुक मोनक कथाकार छथि । भावुकतामे प्रवहित होइत हिनक कथा आवेशी स्वर नेने अछि । मुदा, जतेक दूर धरि ओ भाव प्रवणतामे संवेदनशील मोनक संवेदनाकेँ छुवैत छथि से हमरा नीक लगैत अछि । संगहि, सरलता ओ सहजतामे वैचारिक भाव–भूमि पर उतरैत स्त्री–पुरुष दूनु वर्गक संकुचित दृष्टिकोणकेँ बेरबैत छथि से विशेष कऽ आह्लादित करैत अछि । भनहि हिनक अजोह मोनमे भोगबादी दृष्टिकोणक प्रति आक्रोशक ज्वारि किएक नेँ वेसिए छिटकैत होअय । ओ लिखैत छथि सिखवाक चाही । अहिमे परिपक्वता चाहवे करी । जेना जेना लेखन–संसारमे ओ कलम चलओताह तेना–तेना शिल्प आ कथ्यमे तालमेल होयवे करत, ठोस बैचारिकतामे सूक्ष्मताक संगे नव दृष्टि प्रदान करवे करत । सुप्रसिद्ध साहित्यकार डा. धीरेन्द्र सँ प्रभावित भऽ नेपालक आधुनिक मैथिली साहित्य अवश्य भरखार भऽ रहल अछि । अहिमे निर्विवाद रुपे कथाक क्षेत्रमे सर्वश्री रामभरोस कापडि ‘भ्रमर’, डा. रेवती रमण लाल, डा. राजेन्द्र प्रसाद ‘बिमल’, अयोध्यानाथ चौधरी, भुवनेश्वर पाथेय आदि अपन औकादि देखा चुकल छथि । इ हम गछि ली जे डा. धीरेन्द्रक दू कोटिक रचना अछि । उत्मकोटी आ निम्न कोटीक । ओ जँ निम्नकोटीक रचना करवो कएलन्हि तँ ओहनो रचना आइ रचनाकारक हेतु चुनौती थिक । डा धीरेन्द्रक रचना संसारकेँ कखनो अवडेरल नहि जा सकैत अछि । जेकी सुजीत कुमार झाक कथाकार विशेषतः प्रेम ओ काम वासना विषयक कथावस्तुकँे आधार बनौलन्हि अछि से हिनक डा. धीरेन्द्र ओ हुनक परवर्ती कथाकार भ्रमर, विमल आ थोड़ अंशमे रेवती रमण लालक परम्परामे लऽ अवैत अछि । ओना सुजीत कुमार झा सँ पूर्वक पीढीक कथाकार यथा सुरेन्द्र लाभ, श्यामसुन्दर कामति ‘शशि’ रमेश रञ्जन आदिक रचनात्मक धारा निर्विवाद रुपे डा. धीरेन्द्रक परम्परा सँ प्रभावित होइतो अछिए किछ हटि कऽ अपन विषय बस्तुकेँ प्रतिपादित करैत अछि जे भरिसक भुवनेश्वर पाथेयक परम्परामे कहि सकैत छी जे अनैत अछि । जेकी सुजीत कुमार झा संघर्षरत कथाकार छथि । तएँ हिनक ठोस आ सूक्ष्म दृष्टिक प्रतीक्षा अछि जे कोन धार लऽ भविष्यमे अपनाकेँ प्रतिष्ठापित करताह । ओना परम्परा सँ उद्धृत भऽ आधुनिकताक संग नव दिशा दृष्टि सँ कऽ आयव अवश्य स्वागत योग्य थिक । आजुक युगमे कथा वेस पढल जाइत अछि । कथा लिखब ततेक सहज ओ सरल नहि अछि । आर किछु नहि तँ कथाकारकेँ एतेक ध्यान रखैये पडैत अछि जे कथा मूल्यबोध बनय । मुदा, देखवाक थिक जे मूल्य सोझे कथ्य पर ने हावी भऽ जाय । तएँ परिवेश ओ वातावरणक माध्यमे कालगत चेतनाक संग जँ मूल्यबोध कथ्यमे रचि–पचि कऽ आवय तँ निश्चिते कथाक चमक किछ खास होयत अछि । एकर अर्थ ईहो नहि लेवाक अछि जे परिवेश ओ वातावरणक धोन्हि लगा कऽ तेनाकऽ बोझिल बनाओल जाय जे ओहि तरमे कथ्य दवि कऽ रहि जाय अर्थात खुजि ने पावय । प्रेम जीवनक अहम हिस्सा थिक जकरा नकारब सरासर बेइमानी होयत । प्रेमक दंश ततेक मारुक होयत अछि जे आत्महत्या धरि करबाक लेल लोक उद्यत भऽ जाइत अछि, करितो अछि । अर्थात अहि दंशमे पीड़ित लोककेँ एको घोंट जलो पीबक सुअवसर नहि भेटैत अछि । कतिपय प्रेम परक कथा उदाहरण परक थिक । तएँ प्रेम अमर थिक । प्रेमक अनुभूति स्वतः होइत अछि । प्रेम ओ बासना दूनु दू बस्तु थिक, एक दोसर सँ अलगहे फराक । एहि बातकेँ सुजीत कुमार झाक कथाकार नीक जकाँ जनैत–बुझैत अछि । ओ ‘चिड़ै’ कथामे प्रेमक सार्थक अनुभूति करवैत अछि । एहिमे त्रिशंकु बनल ‘मनोज’ क चित्रण कऽ प्रेमक रुपकेँ बासना सँ फुटकाओल अछि । मोनकेँ बहटारबाक हेतु मोन मिलानी करब फरक बात थिक तएँ सिद्धान्तकेँ व्यावहारिकतामे उतारब दोसर बात । कारण, सामाजिक मर्यादा ओ व्यवस्थाक अंकुश लगले रहैत अछि । तएँ तऽ उषाक कामुकताकेँ अनदेख कऽ ‘नलिनी’ क मर्यादित छविमे अपनाकेँ समंजस्य स्थापित कऽ मनोजक व्यवहारिक वुद्धि जे अपन असली छवि प्रकट कयलक अछि से अवस्से उषा सन नारीक लेल सबक थिक । ‘प्रियंका’ मे दैहिक भोग आ नाम ओ यशक लेल ‘प्रियंका’क मृग मरीचिकामे बौआइत – भटकैत रहब अवस्से नारीक चरित्रगत सामाजिक पतन थिक । ‘बरखीक भोज’ मे माधुरीक अपन पिता सदृश बुढकेँ खुआयव से पिताक बरखी पर आत्मतृप्ति मूलक थिक । ‘बाबाजी’ मे अपन माय–बापक जीवैतमे तिरस्कार आ मृत्योपरान्त बेटा–पुतहुक नोर चुआवय आम बात थिक । एकरे कथाकार आधार बना कऽ ‘रुवी’ अर्थात पोतीक सूक्ष्म दृष्टि ओ बुद्धिक माध्यमे अपन बातकेँ आगा रखलन्हि अछि । रुवी सभ किछ जनै बुझैत अछि तएँ बजैत अछि जे ‘बेकारमे सभ गोटे अपन नोर बरवाद कऽ रहल अछि ’ । ‘बंश’ मे बेटीक महत्ता पर जोर दऽ चरित्रगत संस्कार पर विशेष बल देलगेल अछि । एहिमे कथाकार ओहि बनल–बनाओल धारणाकेँ तोड़ल अछि जे आजुक समाजमे जतय बेटी आभिशाप बनल अछि से बात शत–प्रतिशत असत्य थिक । नारीक चेतनापरक कथाकेँ उभारल गेल अछि । ‘बनैत–बिगरैत’ मे शिक्षक ‘महेन्द्र बाबु’ क माध्यमे हिनक स्थिति–परिस्थितिगत चित्रण कऽ मानसिक ऊहा पोहकेँ उभारल गेल अछि । हिनक दूनु पुत्र ‘नागेश्वर’ आ ‘सुरेश्वर’क बीचक भैयारीगत मनोमालिन्यकेँ उभारैत बीचक सम्वन्ध देखाओल गेल अछि । जेठ पुत्र ‘नागेश्वर’ केँ महत्वकाँक्षा कहैत छैक तँ सुरेश्वरक व्यवहारिक वुद्धि फलित होइत छैक तकर चित्रण भेल अछि । नागेश्वरक स्त्री ‘हिरा’ केँ तीक्ष्ण बुद्धि ओ चातुरीक कुशलताक संग चित्रित कऽ कथाकार कोनो परिवारमे सामंजस्य राखवामे नारीक वुद्धि ओ कौशलक महता प्रतिपादित कयल अछि । ‘ढोल’ मे तएँ नारी व्यथाक चिक्कन–चुनमुन चित्रण भेल अछि । इज्जतिक खातिर डलीक स्थानपर ‘प्रतिमा’ कनियाँ बनलि ओहि कर्नलक जे जीवन भरि पतिक गारि–मारि सहैत रहलि । नारीक विवशताकेँ उदघाटिक कऽ ओकर औनाइत–छटपटाइत मोनक भावकेँ प्रकट कएल अछि । ‘शुन्यताक प्रवेश’ मे आत्मग्लानिवोध देखाओल गेल अछि । ‘भौजी’ मे नारी मोनक पीडा उभरि कऽ ओकर मोनक सार्थक परिणिति देखाओल गेल अछि । ‘धधकैत आगि ः फुटैत कनोजरि’ मे बलात्कारक रंगीन सपना देखव–देखयवाक माध्ययमे सपनाक सत्यता पर प्रश्न चिन्ह लगवैत सपनाकेँ पूmसि मानल गेल अछि । ‘एकटा अधिकार’ मे प्रेमक महता देखा कऽ ओहि अनुभूतिक आँच सँ जीबन आ संघर्षकेँ देखाओल गेल अछि । खास कऽ अन्तिम परिणतिमे देहक रोइया भुटका की दैत अछि जे स्वभाव, बुद्धि आ ऐन्द्रिकताक संगम धरि पहुँचा कऽ अमिट प्रभाव छोडि जाइत अछि । जँ कथाकार कनेक साकांक्ष रहितथि आ साधल कलम सँ लिखल जाइत तँ निश्चिते इ कथा रोमानीयपन चेतनाक उदाहरण बनि अपन स्वरुप महत्तम ऊँचाइ धरि अनबामे सफल होइतय जकर बीज तत्व अहिमे सन्निहित अछि । तैयो ई कथा अबस्से अपन दम–खमक बुत्ता पर फराक स्थान ठमिअवैत अछि । इहो कहि सकैत छी जे हमरा जनैत संग्रहक ई नीक कथा थिक जे नेपालीय मैथिली कथा–साहित्यमे अपन भूमिका निःसन्देह निमाहत । आइ जखन की नेपालमे राजनीतिक उथल–पाथल मचल अछि, हिसां ओ जनक्रान्तिक इतिहास रचल गेल अछि ताहि संकटापन्न विषम परिस्थितिमे सुजीत कुमार झाक कथाकार जे पे्रम ओ सिनेहकेँ जोगा कऽ रखवाक प्रयास भेल अछि से प्रशंसनीय थिक । कारण स्थिति–परिस्थिगत विषम दुःस्थितिमे एहि परिवेशक साहित्यकार क्रान्ति विशेष कऽ रचनामे तल्लीन भऽ एकरे मुख्य धाराक विषय बनयबामे सक्रिय छथि ततय हिनक कथाकार मानवीय प्रेमकेँ बचयबाक प्रयासमे समानान्तर धारा रचवामे तल्लीन भऽ ‘चिड़ै’ कथा संग्रह सृजित कयल अछि । मात्र आशा नहि विश्वास अछि जे सुजीत कुमार झा नेपालक आधुनिक मौथिली साहित्यक एकटा एहन युवा हस्ताक्षर छथि जे समयक संग अनुभवक परिपथ्तामे निश्चिते जटिल यथार्थकेँ आरो गतिशील बना कऽ पाठकक सोझामे प्रस्तुत करताह । निश्चिते भविष्य हिनक छन्हि आ कथाक कुन्जी हाथहिमे छन्हि । हमरा तँ सुजीत कुमार झाक कथाकार पर खौँझी उठैत अछि जे ‘एकटा अधिकार’ सन कथा लिख कऽ कनेक हडवडी किएक केलन्हि ? एहन कथा कहियो काल लिखाइत अछि जे नेपालीय मैथिली कथा साहित्यमे प्रेम जगतक निम्मन उदाहरण बनितय आ बनिते अछि । हमरा जनैत एही एक कथाक बुता पर सुजीत कुमार झा कथाकारक रुपमे जानल –पहचानल जयताह । जखन की हिनकामे जे ऊर्जा छन्हि से आरो कथा लिखवाक उत्स जोगाओले छन्हि । तैयो जाहिया कहियो वा जखन कखनो नेपाली मैथिली कथा साहित्यक चर्चा होयत, कथा जगतक विमर्श होयत, हठात् सुजीत कुमार झाक कथा कोनो ने कोनो रुपमे चर्चाक केन्द्र विन्दु बनवे करत । ओ अपन संगतुरिया कथाकारक रुपमे तँ सहजहि जे अग्रिम पीढीक कथाकारक रुपमे भनहि आइ अचर्चित छथि से अहि पोथी ‘चिड़ै’ केँ लऽ कऽ अपन सार्थक भूमिका निमाहवे करताह । अहि आशा ओ विश्वासक संग हम एतेक अवश्य कहबन्हि जे सीमित अनुभव क्षेत्रकेँ विस्तृत बना कऽ युगक आहटिमे बेस परिपक्वता ओ सन्तुलित ढङ्गे कथा–सृजन करथि । कथा लिखायत, चर्च होयवे करत आ दोसर पोथी नीक, आरो नीक भऽ प्रकाशित होयत । एखन तँ जीरा खसवे कएल अछि, हिलकोर उठवे कएल अछि आ विस्तृत आकाशकेँ हिलोरित करवाक अछिए तँ किएक ने जटिल यथार्थक युगमे नव सनेष लेने सत्यताक दस्तावेज प्रस्तुत कऽ कथा साहित्यक दस्तावेजी साक्ष्य बनी ? यैह बनवाक जे सम्भावना एहि संग्रहमे आएल अछि तएँ हमरा विशेष आह्लादित करैत अछि । संवेनशील मोनकेँ छुबैत हुगली ऊपर बहैत गंगा रामभरोस कापडि भ्रमरक ३२ गोट कथाक संग्रह थिक हुगली ऊपर बहैत गंगा । एहि संग्रहक नामक अन्तिम कथा थिक । हीरा आ सोना बाईक माध्यमे कथाकार नारी मोनक संवेदनाकेँ उभारिक भविष्यक सृजन दिस डेग उठाओल अछि । ई सत्य थिक जे नारीक देहक अवयवकेँ कामुक पुरुष अपन धन–सम्पत्ति बुझि ओएह व्यवहार करैत अछि जे नारीक मोनकेँ दुःख ओ पीडामे भरिक कुण्ठित करैत अछि । नारी मात्र देह नहि थिक । नारी आ पुरुषक साहचर्य अबस्से सृष्टिक निरन्तरता थिक । एकर अर्थ ई नहि जे नारीक देहकेँ खेलौना बूझिक खेलायल जाय । ओकर अंग–प्रत्यंगकेँ तोडि–मरोडि अर्थात् अत्याचार क प्रेम ओ विश्वासके तोडल जाय । ई सत्य अछि जे आजुक भौतिकबादी युगमे धनक अतिशय लिप्सा अबस्से मानवीय मूल्यबोधकेँ गिडने जा रहल अछि । जेँ कि मानवीय चेतना आ मनुष्यता कुण्ठित क देल गेल अछि तेँ अनैतिकताक अढमे छिडहरा खेलाओल जाइत अछि । धन–मदक एंठी पर नग्न कामुकताक ताण्डव मचल अछि । दैहिक जरुरतिसँ बेसिए काम क्रीडामे भोग आ लिप्सा नयन रंजन भ गेल अछि । तेँ विभिन्न मुद्रा अख्तियार क आवेग आ उच्छ्छासमे अमानवीयताक – क्रूर आ पैशाचिक रुपक दिग्दर्शन होइत अछि । लाचार मे विचार कतय ? फलतः वासनाक भ्रमजालमे ओझरा क नैतिकता ओ मर्यादाकेँ अतिक्रमण क कुत्सित मानसिकताक – क्रूर रुप झलकि अबैत अछि । एहि शीर्षक कथामे हीरा असन्तोष आ खौंझीकेँ मेटयबाक लेल सोनाबाइक ओहिठाम अबैत अछि । ओकर एकमात्र उद्देश्य रहैत छैक जे मोनकेँ बहटारि लेब । सोनाबाइ अपन पेशामे कतहु कोनो कोताही नै करैत अछि । ओ आवेशक स्नेहिल स्वरमे लगीच अयबाक आमंत्रण अपन परिधान खोलि क दैत अछि । हीराकेँ ठकमुहरी लागि जाइत छैक । ओकर हृदयमे नारीक प्रति सम्मान– भाव जागि जाइत छैक । ओकर मनोभावमे स्त्री संवेदना अस्मिताक पर्याय बनि उभरि अबैत छैक । सोनाकेँ हडबडी छैक जे एकटा ग्राहकसँ निपटत तँ दोसरक आश ? ओ बजैत अछि जे आउ ने,आनो ग्राहक खोज पडत ने (१४४) । हीरा हारल जुआडी सन मनोव्यथा की कहि दैत अछि जे सोनाक आँखि चमकि उठैत अछि । ओकर सबल मानवीय संवेदना उभरि अबैत छैक – हम आइ पहिल बेर कोनो सुच्चा मनुक्खक दर्शन कयलहुँ अछि (१४६) । परिणतिमे दुनूक सुरक्षा भावमे अपनत्वबोध जागि जाइत छैक । तात्पर्य जे दैहिक भोगसँ बेसी–मोनक राग जे हल्लुको आँच पर बरकैत रहैत छैक वा बेसिए आँच पर किएक ने, मुदा दुनू स्थितिमे अनुशासित रहैत छैक । यैह कारण थिक जे जीवनकेँ गति आ उष्मा देबामे स्त्री–पुरुषक साहचर्य दोसरक पूरक बनैत अछि । आजुक समाजमे अमानवीयताक यैह स्थिति अछि जे स्त्रीकेँ चीरीचोँत क अपन पुरुषत्व देखयबाक दम्भ भरैत अछि ततय सोना आ हीराक बीचक घटित घटना कनेक अविश्वसनीयताकेँ पनुगबैत अछि । जतय सोनाक संग भेल अत्याचार स्वतः उघरैत व्यथा–कथा कहैत अछि ततय ई पंक्ति–सोना आन बाइ जकाँ तोडल–मचोडल नहि गेलि रहय, बाँचल छलीह (१४४) सेहो अविश्वसनीय बुझाइत अछि । शिल्पक दृष्टिएँ अवस्से ई कथा कनेक कमजोर अछि, मुदा कथ्यक दृष्टिएँ रक्त आ स्नेहसँ जे अपनत्व बोध जगाओल गेल अछि से अबस्से मनुष्यक मनुष्यताक स्वाद चीखबैत अछि । आब ई प्रश्न उठब स्वाभाविके जे मनुष्यक मनुष्यताकेँ अमानवीय बनयबाक दोषी के ? की जन समाज ? समाज तँ लोकेक थिक । ई सत्य अछि जे आइयो हीरा सन गनल–गूंथल लोक अछि । तथापि कामोत्तेजक भाव–भंगिमा नेने दैहिक जरुरति बुझि वा फैशनपरस्त भ कुटिल पुरुषक अहं अबस्से स्त्रीकेँ भोगक सामग्री बुझि पबैत अछि जे मोनक तुष्टि हेतु कुविचारेँ पाश्विक आचरण करैत अछि । जं हीरा आ सोना बाइसन एक दोसरक प्रति समर्पण आ निष्ठा–भावमे राग उभरय तँ निश्चिते अनैतिकताक अढमे होयत विकृतिक विषाक्त चद्दरि फाटत आ असली छवि जगजियार होयत । एतेक तँ निश्चिते जे विश्वास आ हार्दिकतामे स्त्री–पुरुषक आकर्षण अबस्से जीवन–सत्यक अढमे मानवीय आकांक्षाक पूर्तिमे सबल ओ सहायक सिद्ध होयत । हीरा आ सोनाक हृदयमे वास्तविक प्रेम–भाव की अंकुरित होइत अछि जे सहजता ओ सरलतामे आन्तरिक जटिलताकेँ आरो सघन बनबैत अछि । नारी पूरक बनैत अछि । जेंकि अभिजातीय संस्कृतिक विरोध स्वरुप सामाजिक अस्मिताक व्यापक बोध अर्थात् स्त्री पुरुषक सहज आकर्षणमे आत्मिक स्वर उभरिक आत्मस्फुलिंग छिटकबैत अछि तेँ दुनूक संघर्षमे सामाजिक जीवनक यथार्थ झलकि उठैत अछि । आधुनिक चकचोन्हीमे अन्हरायलि भगजोगनी कथामे रेखाक भोगबादी लिप्सा ततेक आगाँ बढि जाइत अछि जे अपन बसल–बसाओल घर उजारबासँ बाज नहि अबैत अछि । ओ बिसरि जाइत अछि जे अर्थलिप्सा सम्बन्धकेँ गीडि जाइत अछि । फल भेटैत छैक जे जखन जीवनक बोध होयत छैक तँ गत कर्मक तर्पण करैत अछि । ओ भ्रमजालमे जे अहुरिया कटैत छल से तोडि फेकैत अछि । यौन रुपमे उन्मत्त प्रेम आ घृणाक ढहैत देबालक बीच समाज आ सत्यसँ जे साक्षात् कराओल गेल अछि से अबस्से वैयक्तिक चेतनाकेँ धार दैत दाम्पत्य जीवनकेँ सफल बनबैत अछि । एहिमे प्रेम आ यौन सम्वन्धी गेंठकेँ फोलैत कथाकार उपसंस्कृति पर जमिक प्रहार कयल अछि । ई सत्य थिक जे दैहिक भूख लोककेँ कामुकतामे जकडि अबस्से देह मैथुनकेँ प्रश्रय दैत अछि । एतेक दूर धरि जे आवेगमे मनोविकार अपन ठोस रुप तत्क्षण प्रभाव जनबैत अछि । मुदा, काम–भावक भूख सम्वन्धकेँ स्थायित्व नहि प्रदान करैत अछि तेँ असन्तोष पनुगैत अछि । सामाजिक दायित्व बोधक ई कथा थिक । ॅअन्हारमे भोतिआयल एकटा सिपाही गणेशक संस्मरण थिक । ई संस्मरणात्मक रिपोर्ताज थिक । कारण गणेशक संस्मरण उपस्थापितक ओकरे गुण–गौरवकेँ परोसल गेल अछि । तें कथा–सूत्रक निर्माण तेना भऽकऽ नहि भेल अछि जेना कि पात्रक परिप्रेक्ष्यमे घटना आ स्थितिक विवरणात्मक प्रस्तुति भेल अछि । साम्यबादी विचारधाराकेँ लऽकऽ कामरेड कथाक सृष्टि भेल अछि– गरीब गरीब सभ एक हो । अर्थात् धनी–गरीबक बीच जे असमानताक खधिया अछि से आरो चकरगर भेल जाइत अछि तकरे भरबाक भरपूर प्रयासमे ई कथा सृजित भेल अछि । सुपत–कुपत आब हमहु सब कहबै (३७) । आत्मचेतना जगयबाक उद्देश्येँ ई कथा सृजित भेल अछि । पाइक आगाँ बेइज्जति आ गारि कथीक एहि पृष्ठभूमि पर उडान-कथा सृजित भेल अछि । कतार दिस उडान भरबाक लोभेँ आ ढेर पाइ अर्जित करबाक सपना संजोगने रजिन्दर कापरकेँ पहिलु एजेन्ट दस हजार टाका, दोसर अस्सी हजार आ तेसर खेप पन्चान्वे हजारक कर्जा पर लेल टाका बोहाइत छैक । ओ ठकाइत अछि तैयो ओकरा उडान भरबाक आशा छैक । ओ हृदयक कोनो कोनमे दमित इच्छाकेँ संयोगने रहैत अछि जे कोना उडान भरी । जहिना धनक लेल जेबाक हाहुती तहिना एजेन्टकेँ चाही लाभ । माने ई उडान की, दस हजारसँ पच्चीस हजार धरिक चोखे नफा । तात्पर्य जे दुनू गर भिडौने । तेँ बेर बेर ठकाइतो लोक पुनि ठकाइत अछि । एहिमे पाखण्डी चरित्रक पर्दाफाशक संग केवल जीवन जीनाइयेक मात्र लुतुक नहि होयबाक प्रत्युत जीवन मूल्यबोधक लेल जीवाक ओकालति संकेत मात्रमे कयल गेल अछि । जय मधेशमे एक मधेश, एक प्रदेश लऽकऽ आन्दोलन अछि । मधेशी आ पहाडीक बीचक खधिया समानतामे पटि जाय । अयोधी मास्टरके जीवन कोहुनाक मास्टरीमे खेपायल आ एकमात्र बेटा अशोक केँ नोकरी नहि भेटब । तात्पर्य जे अपेक्षित योग्यता अछैतो व्यवस्थे तेहन वनल छैक जे मधेशकेँ के पूछओ ? तेँ आन्दोलनी जुलुसमे ओकर बुढायल देहक जोश की हिलोर मारय लगलैक जे ओहो कूदि पडल । ओकर अस्मिता की जागि उठलैक जे मधेशक लेल ओ किछुओ क सकैत अछि । राष्ट्रियताक परिप्रेक्ष्यमे अपन विचार, भावना आ समयके सत्य केँ उद्भासित कयल गेल अछि । जखन लोकक अस्मिता पर चोट लगैत छैक तँ ओकर मोन कचोटय की लगैत छैक जे स्वतंत्रताक हनन मंजूर नहि होइत छैक । मधेशी होयबा पर जे गौरवबोध होइत छैक से जखन एके देशमे विषमताक बोध होइत छैक तँ पीडाइत मोनमे आक्रोश पनुगैत छैक । एहिमे मानवीय जीवनक संवेदना झलकि उठैत अछि । गहनतम प्रश्नानुकूलतामे भहरैत नेओक जोड कथाक सृस्टि भेल अछि । एहिमे निरसन बाबूक पुत्री सरोजाक दुःस्थितिमे अन्त ओ रानीक संग छलाइत जीवनके कथाकार ओकर मार्मिक पीडाके उभारिक सामाजिक परिवर्तन दिस ध्यान आकृष्ट कराओल अछि । एतेक दूर धरि जे एकर जिम्मेवार के ? स्त्रीक त्रासक मार्मिक उद्घाटनक फलस्वरुप ई कथा फोकिला मानसिकताक दम्भकेँ आरो उघार करैत अछि । ओढल अभिभावकत्वक नीतिकेँ सरेआम चौबटिया पर नग्न क मानवीय जीवनक अनुभवसँ सम्पृक्त क निजी संवेदनाकेँ सार्वभौमिक बना देल गेल अछि । एहि प्रकारेँ एक दिस हृदयहीनता आ मूल्यहीनताकेँ देखार कयल गेल अछि तँ दोसर दिस परिवर्तनक सुगबुगीमे मानवीय सोच आ संवेदनाकें आजुक परिस्थितमे ठोस दृष्टि द अमानवीयताक खोलकें चीटीचोंत करबाक सनेस बिलहल अछि । अन्ततः मे किसुनमाक ऊहमपोहक स्थितिमे जतय पत्नी उत्तीमपुरवालीक प्रति अनुराग–भाव अछि से पंजाबमे कमाइत मनसूबा पोसने घर अबैत अछि तँ एकटा नेना? मासक फरक । आन बापक बच्चा अर्थात् अनकर जनमल बेटा । रहि रहिक ओकर हृदयकेँ ई बात टीसैत की छैक जे सभटा मनोरथ भग्न भ जाइत छैक आ अन्तिम परिणतिमे नेनाक मूडी छपाक् क दैत अछि । निर्दोष आ अबोध बच्चाक हत्या । ई सत्य थिक जे निशंस हत्याक फलस्वरुप हृदय भावमे परिवर्तन आयब स्वाभाविक थिक । मुदा, अबोध वच्चाक हत्या ? तकर परिनति ? कथा जाहि विन्दु पर आबिक छोडि देल गेल अछि से आगाँक अपेक्षा रखैत अछि । तैयो, एकटा प्रश्न पनुगबैत सोचबाक लेल वाध्य करैत अछि । अमरलत्ती कथामे रेखाक माध्यमे ओकर बहसलि उद्दाम छविक वीभत्स रुप देखार कयल गेल अछि । ओ अमरलती बनि चतरैत की अछि जे सहारा बनैत आनक बसल–बसाओल घरकेँ उजारि–पुजारि दैत अछि । अपन बनल घर तँ उपटाइये दैत अछि जे आनोक घरमे वास क ओकर सोनहल दुनियामे आगि पजारि दैत अछि । एहिमे रमेशक कामलोलुपताक रेखाक काम–भाव जाग्रत भ मायाजाल की पसारैत अछि जे आरो अहिमे ओझराइत जाइत अछि । एहि प्रकारें वासनाकेँ उभारिक पुरुष आ स्त्री वर्गक कुत्सित मानसिकताकें देखार कयल गेल अछि । सामाजिक कुव्यवस्था ओ एहिसं उपजल मानवीय व्यथाकें अवस्से कथाकार उभारल अछि । सम्बन्धक पीडामे आशाक हृदयमे बरकैत हृदयक उफान जे प्रेमक उपजामे मानसिक पीडा प्रतिफलित अछि तकर सशक्त चित्रण भेल अछि । प्रेम कहि–सुनिक नहि होइत छैक आ ने कीनल बेसाहल जाइत छैक । जखन दूटा हृदय मिलैत छैक वा मोन मिलानी भ जाइत छैक तँ बाटमे केहनो रोडा अटकाओल किएक ने जाउक तैयो दुनू–प्रेमी –प्रेमिका हँसैत–कनैत, संघर्ष पथ पर टकराइतो, खसितो–उठितो पार–घाट उतरिए जाइत छैक । सैह स्थिति आशा ओ संदीपक मोन–मिलानीमे भेलैक । फल भेटलैक जे आशाक माय–बापक हृदयमे उठैत विरक्ति भाव सम्बन्ध–सूत्रकें खण्डित क देलकैक । आ आशा प्रेमक पणिामसँ उपजल मानसिक पीडाकेँ सहबाक क्षमता अपनामे विकसित करबाक प्रयास क रहलीह अछि (१३८) । सामाजिक यथार्थक रुप झलकाक कथाकार सामाजिक व्यवस्थाकेँ उघेसिक आत्मीयता ढंगसं लोकजीवनक चित्र उभारबाक प्रयास कयल अछि । बालमोनक सुलभ चंचलता ओ नेनपनक निश्चछलताकेँ स्मरण करैत नरेशक मोनमे स्मृतिक तरंग की प्रवहित भ अबैत छैक जे होयत छैक जे हमही किए ने अपनाकेँ नेना बनाली (१४२) । फ्लैश बैक कथाक माध्यमे कथाकार बालपनक अढमे निडरता, निश्च्छलता आ सौहार्द्र भावमे वचपनक प्रेमक अनुभूति जगाओल अछि तँ उमेरक चारिम प्रहरक पनुगैत भय, सुरक्षा, षडयन्त्र, सामाजिक विद्रूपता आदिसँ अपनाकें बँचबा–बचयबाक प्रयासकेँ रेखाङ्कित करबाक । ई सत्य थिक जे नेनपनक बिताओल क्षणक मधुर स्मृतिमे लोकजीवन चाहैये, मुदा संघर्षमे सेहो जीवनकेँ फूट आनन्द अबैत अछि । सामाजिक व्यक्तित्वक दोगला मुंह अर्थात् सभ्य समाजक अंग बनबाक लेल लोक जे छल–क्षुद्रमक खोल ओढने रहैत अछि । से अवस्से मानसिक बुद्धिकें कुण्ठित करैत अछि, सामाजिक समरसताकें खण्डित करैत अछि । नेपालीय मैथिली कथा–साहित्यमे निस्सन्देह कथाकार भ्रमरक कथामे जीवनक राग अछि आ अछि नव युगक नारीक प्रति विशेष श्रद्धा–भाव । तेँ हिनक बेसिए कथामे नारी जीवनक संघर्ष अछि । युग यथार्थक त्रासदी जे सामाजिक विडम्बनामे उपजैत अछि आ एकर कारक थिक सामाजिक व्यवस्था । तेँ कथाकारक छटपटाइत मोन मे अबला नारीक चीख अछि आ परिवेशक दंशमे पीडाइत मानसिक व्यथा–कथा । देह–भोगमे टीसैत दर्द उभरि की अबैत अछि जे सामाजिक सत्यकेँ देखार करैत यथातथ्यक मोनक पीडाकेँ उगलि दैत अछि । टूटैत सम्बन्ध, छुटैत लोक, अर्थ लिप्साक मोह ओ दैहिक भोगमे पीडाइत कामुकता आ रोटीक समस्या नेने कथाकारक मोनमे कतेको प्रश्न छटपटी मचौने अछि तकरे सार्थक अभिव्यक्ति द सहज ओ सरल भाषा मे पाठकक सोझाँ परोसि देलनि अछि । कोनो सभ्यता–संस्कृतिकेँ गतिशील बनाक राखब समाजक लोक दायित्व थिक । से ताधरि जाधरि ओ सामाजिक जीवनमे सार्थक भूमिका निमाहय । ई नहि जे सडल गलल परम्पराकेँ उघने व्यवस्थाक तरमे पीसाइत जीवनसँ कटल व्यवस्थाकेँ सत्य मानि फोकिला मानसिकताकेँ उघैत रही । जे सभ्यता संस्कृति जीवनमे नहि उतरि सकय तकर परित्याग करब उचित–विहित थिक । ओ जीवनक अर्थक खोजमे प्रेमक आसरा लैत समयक परिवर्तनकेँ युगक अनुकूलेँ टांकिक नव समाज बनयबाक आकांक्षा रखैत छथि । तें कथाकार सामाजिक विसंगतिसं उत्पन्न विषमता ओ आर्थिक स्थितिक संग सांस्कृतिक आयाम पर जमिक विमर्श करबाक लेल प्रश्नकेँ पनुगबैत छथि । एहिमे हिनक परिवर्तनकारी सोच अबस्से उत्प्रेरक बनि नव सामाजिक मूल्यबोधक संवाहक बनैत अछि । हिनक लेखनी अबस्से शोषित–पीडितक अस्मिता–अधिकारक बात उठबैत अछि । ओ दबल–कुचलल लोकक पक्षमे भ जाय । ई सत्य अछि जे हिनक प्रेममूलक धारणामे वासना जन्य उभार कनेक बेसिए उभरि आयल अछि से सत्ते कामुक पुरुषक दम्भोचित उपजा थिक । किएक तँ पुरुषक पौरुषत्व वासनामे विशेषे केन्द्रित भ आयल अछि । कथाकारक बेचैन मोनमे समतामूलक ओ प्रेममूलक धारा रसप्लावित अछि तेँ अभावजन्य पीडामे पीडाइत शोषित वर्गक समस्या उभरि आयल अछि । स्त्री वर्गक प्रति जहिना पुरुष वर्गक दम्भ, क्रूर मानसिकता ओ व्यवस्थाकेँ उजागर करैत अछि तहिना सम–सामयिक प्रश्नक झडीमे रोटीक औकाति देखबैत अछि । एहि प्रकारेँ कथाकारक हृदयके व्यथासँ उपजैत अकूलाइत मोनक छटपटाहटिमे सुखाइत प्रेम भावनाकेँ खींचबाक आकांक्षा अछि तँ मूल्यहीनताबोधक प्रति तिक्ख आक्रोश । जीवनक व्यावहारिकता सँ सामाजिक मुद्दाकेँ उठबैत छथि । हँ, प्रश्नक झडीमे किछुक समाहार करैत छथि तँ यथातथ्य उपस्थापन सेहो । ओना, कथाक मूल स्वर हस्तक्षेप करिते अछि । ईहो सत्य अछि जे नारी अनुभूतिक रिक्त क्षणमे कथाकारकेँ रहि–रहिक’ नारीक मानसिकताक भूख दैहिक काम–क्रीडामे ओझरा जाइत अछि । मुदा, ईहो सत्य थिक नारीक अन्तरमोनमे पैसिक जे मानसिक विकारकेँ स्वच्छ करबाक प्रयास भेल अछि से मात्र कामुकतामे नहि भऽकऽ सामाजिक मूल्यबोधक संवाहक बनिक उभरि अबैत अछि । उपसंस्कृतिक प्रति हिनक हृदयमे खोंझी आ असंतोष भाव अछि तं सामाजिक नैतिकता आ धार्मिकताक अढमे छिडहरा खेलाइत साम्राज्यवादी संस्कृति प्रति विद्रोह भाव मुखरित भेल अछि । मुदा, इहो देखल जाइत अछि जे भ्रमरक कथाकार कथा साहित्यमे जतेक कथ्यक प्रति सजग रहि पबैत अछि ततेक शिल्पक प्रति नहि । शैलिक दृष्टिएँ अवस्से हिनक कथाकार सजग नहि रहि पबैत अछि जे कथा–सौन्दर्यकेँ बाधित करैत अछि । तें की ? भ्रमरक अनुभववादी दृष्टि सतत चौकन्न रहैत अछि जे अपन गाम–घर, अडोसिया–पडोसियाक देखल भोगल यथार्थक चिक्कन–चुनमुन चित्रण करैत अछि । हिनकामे कहबाक क्षमता अछि जे शिल्पक विकासमे आरो सौन्दर्य आनि निखरत । जेँकि कथाकार भ्रमरक चौकन्न दृष्टि समाजक प्रति सजग अछि । तेँ जीवन मूल्यक संवाहक बनैत ओ ओहि पात्रक सृष्टि करैत छथि जे समाजमे आइयो निरीह अछि । खासक नारी पात्र हिनक संवेदनशील मोनकेँ छुबैत अछि । ओ नारीक अधिकार ओ चेतनाबोधक पक्षधर छथि । ओ कखनो नारीक पक्षमे छाती तानिक ठाढ होइत छथि । मुदा, उपसंस्कृतिमे घेरायल नारीक वीभत्स छवि अबस्से हिनक हृदयकें पीडित–सीदित करेत अछि । ओ कोनो परिस्थितिमे स्वाभाविक यथार्थक तहकें फोलिते छथि । तेँ शोषणक विरोधमे झंडा उठबिते छथि । हिनक संवेदनशील मोनमे जीवनक प्रति रागात्मक बोध अछि । हं, हिनक कथाकार यथातथ्यकेँ हू–बहू प्रस्तुति क दैत अछि से कैक स्तर पर । तें पात्रक चरित्र तेना भऽकऽ ठाढ नहि भऽ पबैत अछि जे होयबाक चाही । जाहि ठाम हिनक पात्रक चरित्र–चित्रण सजीव भऽ उठल अछि ताहि ठाम कथाक सौन्दर्य अपन अपूर्व छवि–छटा लऽ मुखरित भेल अछि । नेपालीय मैथिली कथा साहित्यमे भ्रमरक कथा मात्रात्यक ओ गुणात्मक दुनू दृष्टिएँ अपन प्रभाव छोडैत एकदिस जँ कथा–साहित्यक भण्डारकेँ भरैत अछि तँ दोसर दिस कथा दृष्टिमे मूल्यबोधक संवाहक बनैत अछि । तेँ मानवीय मूल्य बोधक जीवन–दृष्टि नेने भ्रमरक कथा सामाजिक परिवर्तनमे अपन औकाति सिद्ध करबे करत आ भविष्यमे ऐतिहासिक मूल्यक वस्तु बनबे करत से आशा ओ विश्वास जगबिते अछि । ई संग्रह छपाइ–सफाइक दृष्टिएँ देखनुक आ मनमोहक रहल अछि खासकऽ पोथीक आवरण विशेष आकर्षित करैत अछि । यर्थाथक अनुभुतिमे ऐतिहासिक दिनः झिझिया नृत्य महोत्सव २०६८ साल आसीन १४ गते , नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान आ जनचेतना अभियान नेपालक संयुक्त अभियानमे झिझिया महोत्सव मनाओल गेल । एहि कार्यक्रमक सभापति रहथि श्री रामभरोस कापडि भ्रमर, उद्घाटक श्री विमलेन्द्र निधि, नेपाली कांग्रेसक केन्द्रिय सदस्य एवं सभासद आ मंच संचालक श्रीअशोक दत्त । उद्घाटन भाषण करैत प्रमुख अतिथि श्रीविमलेन्द्र निधि कहलनि जे डाइन जोगिन प्रथा पर आधारित झिझिया मुख्यत ः महिला लोकनिक थिक । मैथिली भाषा ओ साहित्यमे संस्कृतिक संरक्षण आवश्यक अछि । एहिसं सामाजिक समरसत्ता बढैत अछि । आइ जे झिझिया नृत्य संस्कृति विलुप्तक कगार पर अछि तकरा बचयबाक ओ अस्मिताके ई जगयबाक सार्थक प्रयास थिक । ओ एहि कार्यक्रमक उद्घाटन दीप प्रज्वलित क कयलनि । विषय प्रवर्तनक क्रममे स्वागत भाषण करैत श्रीराम भरोस कापडि भ्रमर , नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानक परिषद सदस्य, प्राज्ञ कहलनि जे झिझिया नृत्य आइ सं बारह–तेरह सय वर्ष पहिने शुरु भेल होयत । डाइन जोगिनसं बच्चा बुतरुके बचयबाक हेतु मिथिलाक महिला लोकनि द्धारा ई नृत्य होइत छल । जेकि ई हमरा लोकनिक सभ्यता संस्कृतिक अंग थिक तें आइ एकरा बचयबाक बेगरता अछि । नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानद्धारा आयोजित ई कार्यक्रम वस्तुतः अपन संस्कृतिके बचयबाक ओरियाओन थिक । आई सात गोट टीम झिझिया नृत्य प्रस्तुत करत आ एहि सभ संस्थाके कोनो ने कोनो रुपमे प्रोत्साहित करबाक एवं सम्मानार्थ पुरस्कृत करबाक अछि । विभिन्न स्थानक पुरस्कार राशि भिन्न भिन्न अछि । अंक पत्रक आधार पर क्रमश ः प्रथम, द्धितीय ओ तृतीय श्रेणीक बिजेता टीम घोषीत कयल जायत । निर्णायक मण्डलमे तीन गोट व्यक्तित्वक चयन कयल अछि –सर्वश्री डा. प्रफुल्ल कुमारसिंह मौन, डा. रेवती रमणलाल आ अयोध्यानाथ चौधरी । अंक पत्रमे पचास अंक विभिन्न क्षेत्र–वेश–भुषा मौलिक नृत्य, मौलिक गीत, घैलक बनावटि आ समग्र । जनकपुरमे एहि तरहक आयोजन पहिल थिक । ओ नेपाल प्रज्ञा प्रष्ठिानद्धारा कयल गेल काजके सविस्तार उल्लेख कयलनि । डा. राजेन्द्र प्रसाद विमल जनाओल जे तन्त्र मन्त्रक परम्परा वैदिक कालसं अछि । ई झिझिया नृत्य वैदिक ऋचासं लेल गेल अछि । ई एकटा आनुष्ठानिक यज्ञ बुझी तं थिक । एक तरहे लोक जागरणक प्रभाव थिक । डाइनक विभिन्न मुद्रा आ क्रिया–कलाप होइत अछि । मुइल बच्चाके जिया क नंगटे नाचब, नगर कोतबालके देखब अर्थात तन्त्र मन्त्रक प्रभाव कोनो ने कोनो रुपमे पड्तिे अछि । एहिसं लोक मुक्ति चाहैत अछि । समष्टि चेतनाक अन्तर्गत व्यक्ति चेतना समाहित भ जाइत अछि । शिव स्वयं अनादिक देवता छथि । परम्पराक निरंतरता तंत्र थिक । पितृपक्षमे पितरक बौआइत आत्मा सभ अबैत रहैत छथि ताहि क्षुधित आत्माक तृप्ति एहि झिझिया नृत्यमे होइत अछि । वैदिक परम्पराक निरंतरता घट नृत्यमे होइत अछि । इन्द्रियक ओ भाग जे पकडमे नहि अबैक से चेतना आ चेतनाक ओ भाग जे पकड्मे नहि अबैक से देव आ एहि दुनुक मध्य थिक तन्त्र । चेतनाक उध्र्वीकरणक लेल समाजक आवश्यकता छैक । झिझिया नृत्य बुझी त वैदिक, तान्त्रिक आ लौकिक परम्पराक समन्वित रुप थिक । एहिमे समयक अनुकुल परिष्कार आ भविष्यके देखैत वर्तमान स्तर पर विकासक रुप देबाक थिक । प्रो. परमेश्वर कापडिक कथन छल जे झिझिया मात्र नृत्येटामे नहि अछि आ ने गीत मे । ई जीवन सं जुडल बात थिक । तें मनुख्खक जीवन केन्द्रित ई नृत्य अक्षुण्ण रहबाक चाही । मंच संचालक अशोक दत्त जनाओल जे ई नृत्य महिला सशक्तिकरणक घोतक थिक । विशिष्ट अतिथि डा. प्रफुल्ल कुमारसिंह अपन आलेख प्रस्तुत करैत झिझिया नृत्यक परम्परा, विकास ओ सम्भावना पर अपन विचार प्रस्तुत करैत अतीतक कथा उदाहरणक रुपमे प्रकट कयलनि । ओ जनौलनि जे एहिमे दू तरहक भावना प्रकट होइत अछि – पहिल जे डानिके डानिपनक विरोधस्वरुप गारि पढब आ दोसर डाइनपनसं मुक्तिक बाट । सहस्र छेदबला घैलके लऽ कऽ नृत्य करव जाहिमे दीप बरैत होअय । ओ इहो स्पष्ट कयलनि जे बखरीक बकरियो डाइन होइत अछि । बाल रुच कथा ( चित्र सेन महाराजक भागिन ) माध्यमे ओ अपन बातके सिद्ध करैत एहि अनुष्ठानिक यज्ञके सामाजिक समरसताक आधार पर सिद्ध कयलनि । ओ व्यक्त कयलनि जे आलेखमे बहुत किछ झिझियाक विषयक विचारक उल्लेख अछि जे पढित भेला पर बहुत किछु शंकाक समाधान होयत । डा.रेवती रमणलाल जनाओल जे झिझिया नृत्य लोक पारम्परिक थिक । एहिमे महिला वर्गक सक्रियता होइत अछि । ई महिला जागरणक प्रतीक थिक आ संस्कृतिक आस्था पर्व । तदुपरान्त झिझिया नृत्य हेतु सात गोट टीमक प्रदर्शन भेल जाहिमे छल १. मां जानकी झिझिया टीम २. भैरव झिझिया टीम ३. जन चेतना अभियान झिझिया टीम ४.मिथिला मीडिया हाउस झिझिया टीम ५. नारी विकास केन्द्र झिझिया टीम ६.मां जानकी झिझिया टीम जानकी नगर ७. ज्वालामुखी झिझिया टीम सिनुरजोडा । निर्णायक मंडलद्धारा निर्णीत परिणामके घोषित कयलनि श्री रामभरोस कापडि भ्रमर सभापति जे प्रथम स्थान जन चेतना अभियान झिझिया टीम, द्धितीय भैरव झिझिया टीम आ तृतीय मिथिला मिडिया हाउस आ क्रमशः प्राप्त अंक छल १०१, ९९ एवं ९४ आ चारिटा टीमके सान्त्वना पुरस्कार सं पुरस्कृत कयल गेल । प्रथम पुरस्कार ३००० टाका, द्धितीय २००० टाका एवं तृतीय १००० टाका आ सान्त्वना पुरस्कार ५०० टाकाक छल । तदुपरान्त श्री रामभरोस कापडि भ्रमर लिखित भैया अएलै अपन सोराज नाटक जनचेतना अभियान मुजेलियाद्धारा मंचित भेल । एहिमे भाग लेलनि सर्वश्री राम विहारी राय–दीना, नरेश मण्डल– भद्री, सुनिल कुमार यादव–जोरावर सिंह, हरबाह–मिथुन यादव, रेविया–सुनिल राउत, लठैत–भोला मण्डल आ जयकरन, बुढी–पुष्पा यादव, कहार–सुरज मण्डल, महेश धनकार, पाश्र्व गायक–रामदेव सदा, बेचन सदा, भोला मण्डल, प्रकाश–नरेश मण्डल, ध्वनि विस्तार– संजय झा, रुप–सज्जा–भोला मण्डल, निर्देशक सुनिल कुमार यादव अछि । एकि कायक्रम पर टिप्पणी करैत राजेश्वर नेपाली कहलनि जे कार्यक्रमक जतेक प्रशंसा कयल जायत थोड होयत । ई बहुत पैघ काज भेल अछि । संस्कृतिके बचयबाक प्रयास भेल अछि । नाटकक सफल मंचन भेल अछि जे हृदयके छुलक अछि । सामाजिक जागरण होयत से विश्वास झलकैत अछि । समग्रतामे टिप्पणी करैत चन्द्रेश स्पष्ट कयल जे धर्म–अधर्म ओ अन्ध विश्वाससं जुडल तन्त्र मन्त्र पर आधारित ई झिझिया नृत्य महिला चेतनाक प्रतीक थिक । एहिमे शारीरिक ओ मानसिक स्तर पर विकास होइत अछि । ई गतिशील मुद्रामे होइत अछि । देहक नसमे शोणितक प्रवाह आ एकाग्रतामे ध्यान केन्द्रित कऽ ई नृत्य अवस्से मानसिक चेतनाके जगबैत अछि आ स्नायुतन्त्रके झंकृत कऽ स्वस्थ्य मानसिकताक विकास करैत अछि । ओ नाटक पर विचार केन्द्रित करैत जनाओल जे सामन्ती शोषणक विरोध स्वरुप ई नाटक सामाजिक–राजनैतिक चेतनाक संग लोक चेतनाके जगबैत अछि । वस्तुतः ई नाटक ओ लुत्ती थिक जकर पसाहीमे धु–धु जरैत सामन्ती मनोवृतिक नाश होयत आ नव उमंगमे लोक जीवनक नव संस्कार होयत । खासकऽ अभिनयकर्ता लोकनि अपन–अपन स्वभाविक ओ यथार्थ अभिनयमे रंगमंचक सार्थकता सिद्ध कयल अछि से एहि नाटकक सफलता ओ सबलता थिक । हमरा विशेषकऽ मिथुन यादव, हरबाहक अभिनय ततेक निक लागल अछि जे आनो आन कलाकार गणसं एहिसं सीखबाक थिक जे अभिनयक सजीवता मर्म स्थल धरि उतरि सकय । ओना कोनो पात्रक अभिनय ककरो सं कम नहि, सभ उपरा–उपरी । मुदा बुढी–पुष्पा यादवक अभिनयमे आरो निखार होयबाक थिक । श्री अयोध्यानाथ चौधरी कहलनि जे स्वाभाविकतामे पनुगैत ई नाटक वस्तुतः समाजमे लोकजागरण आनत । डा.रेवती रमणलाल एहि नाटकक भरपुर प्रशंसा कयलनि । ओ एहन–एहन नाटक खेलयबा पर जोड देलनि । डा. प्रफुल्ल कुमारसिंह मौन कहलनि जे भैया अएलै अपन सोराज नाटकक कथानक ओ उदेश्य पूर्णतः जीवन्त अछि । अभिनयकर्ताक अभिनयमे बुझायल जे सभ केओ स्वयं भोक्ता छथि । एहिमे सामन्तवादक प्रखर विरोध भेल अछि । डा. राजेन्द्र प्रसाद विमलक कथन जे ई नाटक दलित चेतनाक प्रतीक थिक । अन्र्राष्ट्रिय जगतमे एहन नाटकक मांग अछि तें एकरा अंग्रेजीमे अनुदित होयबाक चाही । संगहि ओ एहि नाटकके काठमाण्डुक गुरुकुलमे प्रदर्शन पर जोड देलनि । नाटकमे किछ एहन दृश्यक संयोजन अछि जे जीवन्तताक प्रतीक थिक आ हम ई नाटक देखि भाव विभोर भऽ गेलहु । अन्तमे सभापति भ्रमर जनाओल जे एहि कार्यक्रमके सम्पादित कऽ आ दर्शकक उत्साह देखि हम गौरवान्वित बोध करैत छी आ नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानसं आरो काज करबाक लेल हम संकल्पित छी । निष्कर्ष – १. कार्यक्रम पूर्ण रुपेण सफल रहल । २.सयोसं बेसी महिलाक उपस्थिति दर्शक वृन्दमे महिला जागरणक प्रतीक बनि उभरिकऽ आयल । ३. झिझिया नृत्यक संयोजन पहिल बेर जनकपुर की नेपाल परिसरमे भेल खासकऽ नृत्य प्रतिगागिताक रुपमे सम्पादित । ४.ई एतिहासिक महत्वक दिन कहल जायत जे अपन अस्मिता ओ संस्कृतिक उत्थानक लेल भेल । ५. सात गोट झिझिया टीमक उपस्थितिबोध अवस्से महिला वर्गके पहिल खेप मंचपर आयब आ अपन नृत्य प्रस्तुत करब अबस्से महिला वर्गक प्रतिनिधित्वक सुूचक बनल । खासकऽ निम्नेतर महिला वर्गक प्रतिनिधित्व होयब समाजमे नारी जागरणक प्रतीक थिक । ६. उद्योग वाणिज्य संघक हाँल खचाखच भरल रहल । झिझिया नृत्य आ नाटक होयबा धरि दर्शकगण नहि हिलल–डोलल । ७. भैया अएलै अपन सोराजक प्रस्तुत कैक ठाम भेल अछि । मुदा एहि ठामक प्रस्तुतिमे सजीवता ओ जीवन्तता प्रदर्शित भेल । ८. सभ वयसक लोकके ई कार्यक्रम प्रभावित कयलक । ९. एहिमे निम्नेतर वर्गक प्रतिनिधित्व त भेवे कयल आ विशेष कऽ ओहि वर्गक लोकके अपन समारोह जे बुझायल से सभक मोनके जीति लेलक । खासकऽ बुढ पुराणक संगहि बूढि महिला सभ सेहो खुशीमे उठि बैसल । १०. नाटकमे किछु विसंगति अबस्से खटकल खासकऽ संगीत पक्षक क्रमबद्धतामे, मुदा अभिनय पक्ष ओ गीतक माधुर्यमे सभटा बिला गेल । ११. अभिनयकर्ताके आरो अभिनयके उचाई पर कलात्मकतामे लऽ जायब आवश्यक । मुदा प्रस्तुतिक सफलता निस्सन्देह सफल थिक । १२. कार्यक्रम सुस्थिर, सुनियोजित आ व्यावहारिक रहल । १३. ई सत्य थिक जे एहि नाटकक गमैया परिवेशमे जे अभिनयकर्ताद्धारा सजीवता प्रस्तुत कयल गेल अछि से प्रशंसनीय थिक । १४. झिझिया नृत्यमे महिला वर्ग प्रदर्शित कऽ अपन उद्गार व्यक्त कयलनि से देखिते बनैत छल । कारण नृत्यकर्मी वर्गक मनुहार स्पष्ट झलकि उठल । खासकऽ पुरस्कृत होयबाक काल महिला वर्गक उत्साह देखवायोग्य छल । १५. जे महिला वर्ग भाग नहि लेलनि से अगिला महोत्सवमे भाग लेबाक हेतु उत्साहित भाव प्रकट कयलनि । १६. समग्रतामे लोक कल्याणपरक कार्यक्रम उध्र्वमुखी भेल आ अपन विशिष्टतामे अमिट तिथि साबित केलक । प्रकाश झा, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, भगवान दास रोड, नई दिल्ली-०१ नचिकेताक ‘प्रियंवदा’ : एक विश्लेषण प्रियंवदा उदय नारायण सिंह नचिकेता द्वारा लिखित एकांकी आछि । एकरा सम्पूर्ण नाटकक रूप द’ क’ मनोज मनुज मंचित केलथि । एहि प्रस्तुति के देखबाक सौभाग्य हमरा नहि प्राप्त भेल, मुदा प्रस्तुति आलेख हमरा उपलब्ध भेल । ओही नाट्यालेख के अध्ययन केलाक बाद हमर निम्न अनुभव अछि । जेना कि नाम स’ लगैत अछि जे प्रियंवदा कोनो ऎतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित नाटक होयत मुदा से अछि नइ । ई मात्र नाटकक एकटा केन्द्रित पात्रक नाम अछि जिनका इर्द-गीर्द नाटकक कथानक घुमैत अछि । नाटकक कथ्य एना अछि जे प्रियंवदा नामक एकटा लड़की कोनो शहर में एसगर रहि रहल छथि आ कोनो कम्पनीक लेल मार्केटिंग सर्वे करैत छथि । ओही शहर मे शर्व नामक एकटा युवक सेहो रहैत छथि । शर्व के कविता लिखब खूब पसिन छनि आ प्रियंवदा के कविता सूनब नीक लगैत छनि । शर्वक कविता स’ प्रभावित भ’ प्रियंवदा शर्व संग प्रेम विवाह क’ लैत छथि । बाद मे किछु घटना घटैत अछि । सर्व प्रियंवदा के छोड़ि कतौ चलि जाइत छथि । नाटक मे प्रियंवदाक भैया आ भौजी छथिन संगहि किछु कोरस पात्रक प्रयोग सेहो कयल गेल अछि । एहि तरहे नाटक मे कुल जमा दस गोटे छथि । नाटक प्रियंवदा छ: दृश्य मे बाँटल गेल अछि । पहिल मे प्रियंवदा आ हुनकर भौजीक संवाद छनि । दोसर दृश्य मे कोरस, प्रेमी-प्रेमिका, प्रियंवदा आ शर्व छथि । तेसर दृश्य मे कोरस, शर्व आ प्रियंवदा तथा चरिम दृश्य मे शर्व, प्रियंवदा, भैया आ भौजी छथि । पाँचम दृश्य मे एक बेर फेर शर्व, प्रियंवदा, भैया आ भौजी तथा छठम दृश्य मे शर्व आ प्रियंवदा दुनू मात्र छथि । ई नाटक दूटा स्थान पर घटित होएत अछि – पहिल शर्व के घर में आ दोसर सार्वजनिक पार्क मे । शर्व के घर मे चरिटा दृश्य होइत अछि – पहिल, चरिम, पाँचिम आ छठम तथा पार्क में दोसर आ तेसर दृश्य होइत अछि । घरक दृश्य मे कुर्सी, किताब, काग़ज़, लैम्प होइत अछि आ पार्क मे संबंधित सामान राखल जा सकैत छैक । प्रियंवदा नाटक फ्लैस बैक मे चलैत अछि । उदय नारायण सिंह नचिकेताक ई प्रिय शैली छनि । एकर प्रयोग नचिकेता जी एक छल राजा मे सेहो केने छथि । नाटकक मे एहन तरहक शैली प्राय: नाटक के कमजोर करैत अछि । हँ ! ज’ नाटकक बीच मे किछु कालक लेल वा कोनो एकटा दृश्य फ्लैस बैक मे अबैत हो तखन त’ कोनो विशेष नहि मुदा, नाटकक पहिल दृश्यक बाद सम्पूर्ण नाटक एहि फ्लैस बैक शैली मे चलय त’ निश्चित नाटकक लेल ओतेक प्रभावी नहि भ’ सकैत अछि । कारण, कोनो नाटक एकटा लय मे चलैत अछि, जकर ग्राफ शून्य स’ आगू उठैत छै । दर्शक मे हरदम ई उत्सुकता बनल रहैत छनि जे आब की हेतैक । जखने ई उत्सुकता समाप्त भ’ जाइत अछि नाटक अपना संग दर्शक के बन्हबा मे कमजोर पर’ लगैत अछि । प्रियंवदाक अंतिम पड़ाव जे कि पहिले दृश्य मे अछि कोनो ओतेक प्रभाव नहि छोड़ैत अछि । खैर ... आब एहि नाटकक कथ्य पर विचार करबाक चाही । नाटकक शुरुआत कथ्यक समापन स’ होइत अछि । तात्पर्य ई जे शर्व अपन प्रियंवदा के छोड़ि क’ चलि जाइत छथि जिनका स’ किछुए पहिने ओ प्रेम विवाह केने रहथि । प्रियंवदा वियोग मे रहैत छथि आ हुनकर भौजी हुनका समझा-बुझा रहल छथिन । मुदा, ओ अपना आप मे रहनाइ बेसी उचित बुझैत छथि । हुनकर एकटा संवाद बुझू नाटकक मूल अछि : “सेल्स गर्लक काज करैत – करैत हम स्वयं मार्केट पोडक्ट बनि गेल रही ” । आब प्रियंवदा अपन जीवनक कथा दोहरबैत छथि । कोना ओ अपना नौकरी स’ जुड़ल छलीह, कोना हुनका शर्व भेटलखिन, कोना एक दोसर स’ प्रेम भेलन्हि जे विवाह मे परिणत भेल, कोना दुनूक जीवन चलैत रहैन, कोना शर्व पर हुनक पिछला जीवन हॉबी भ’ जाइत रहनि, कोना शर्व कविता लिखनाई स’ प्रेम करैत छलाह, कोना एक दिन भैया भौजी अकस्मात घर अयलखिन, कोना हुनका सभ संग शर्वक व्यवहार बदललनि, कोना शर्व अपन प्रिय प्रियंवदा संग दुरव्यवहार क’ र’ लगलाह, कोना शर्वक दिमाग बदलि गेलनि आ ओ प्रियंवदा के छोड़ि घर स’ कतौ चलि गेलाह । आब प्रियंवदा हुनकर वियोग मे आइयो ओहिना ठाढ़ छथि । एहि नाटक मे कथ्यक दूटा धारा अछि । एकटा त’ बिलकुल सामान्य जे तुरत नाटकक नामे स’ देखाइत अछि जे स्त्रीक सामाजिक स्थिति केहन अछि । आइ नै आदि काल स’ स्त्रीक सामाजिक स्थिति मे कोनो परिवर्तन नै एलैन्ह अछि । हँ ! एकर रूप जरूर बदल अछि । आदि काल मे नल अपन दमयंती के सुनसान जंगल मे छोड़ि क’ चलि गेल छलाह, दुश्यंत त्यागि देलनि शकुंतला के । आइयो शर्व अपन प्रिय प्रियंवदा के आदमी रूपी जंगल मे छोड़िक’ चलि गेलाह । प्रेमक परिणति, वियोग मे - ओहू समय आ आइयो । नाटकक कथ्यक दोसर धारा सेहो अछि जे पहिलुक कथ्य स’ अति महत्वपूर्ण आ सारगर्भित सेहो छैक । शर्व एकटा कवि छथि हुनका पर हुनकर अतीत हरदम सबार रहैत छनि । एहि ठाम शर्व एहि नाटक पात्र मात्र नहि छथि बल्कि आजुक मानव समाजक प्रतिनिधित्व क’ रहल छथि । लोक चाहे जे किछु भ’ जाइछ या बनि जाइछ हुनकर अतीत हरदम हुनका पर छाया जेना मँडराइत रहैत छनि । एहि अतीत स’ किछु समर्थ व्यक्ति अपना आप के बचा लैत छथि आ ओहने व्यक्ति महान होइत छथि । मुदा अधिकांश व्यक्ति ओकर प्रभाव मे आबि जन सामान्यक जीवन जीबैत छथि या शर्व जेना अमानवीय व्यवहार क’र’ लगैत छथि । ई अति महत्वपूर्ण अछि आ एतबे नहि एखुनका सन्दर्भ मे ई विश्व स्तर पर गम्भीर प्रश्न बनल अछि । मुदा प्रियंवदा नाटक मे एहि गम्भीर मुद्दा के दाबि क’ स्त्रीक सामाजिक स्थिति सन सार्वजनित मुद्दा के प्रमुखता स’ प्रभावी बना देल गेल अछि । जँ एहि नाटकक नाम प्रियंवदा क’ बदला किछु आर होइत त’ ई निर्देशकक मोनक विचार आ कुशलता भ’ सकैत छल जे ओ कोन पक्ष केँ बेसी उभारैत छथि । पात्रक चुनाव उदय नारायण सिंह नचिकेताक नाटकक अत्यंत प्रभावी अंग थिक । कारण, सभ पात्र गठल आ कथ्यक माँगानुसार होइत छनि । एहू नाटक मे पात्रक संख्या आ ओकर विस्तार कथ्यक अनुसार उचित अछि । संगहि कोरसक प्रयोग क’ क’ आरो आसान बनाओल गेल अछि । कोनो छोट स’ छोट संस्था एहि नाटक केँ आसानी स’ प्रस्तुत क’ सकैत अछि । नाटक मे प्रियंवदा सबस’ महत्वपूर्ण चरित्र छथि आ ओहि के बाद शर्व । मुदा एकटा अभिनेताक लेल सबस’ महत्वपूर्ण आ चुनौतीपूर्ण चरित्र छथि शर्व । ई पात्र जतेक साधारण देखाइत अछि कविक रूपमे ओतबे जटिल अछि आंतरिक रूपे । अभिनयक जे सबस’ महत्वपूर्ण अंग अछि अंतरद्वन्द से एहि पात्र में दुनू तरह स’ भरल अछि – बाहरी आ आंतरिक सेहो । बाहरी मे अपन प्रियंवदा आ समाज सँ, आ आंतरिक मे हुनक अपन अतीत स’ । एहि तरहक चरित्र कोनो अभिनेता लेल पसंदिदा चरित्र होइत अछि । तेँ हम शर्व के एहि नाटक मे महत्वपूर्ण चरित्र मानैत छी । भैया आ भौजीक रूप मे दूटा पात्र आरो छथि । नाटक लेल ई दुनू सहयोगी पात्र छथि । अहू मे भौजी कनी बेसी महत्वपूर्ण । पहिने कहने छी जे कोरस के प्रयोग नीक अछि । तेँ प्रियंवदा पात्रक अनुसार एकटा महत्वपूर्ण नाट्य रचना थिक । नाटक मे नाटकीय भाषाक जे प्रयोग भेल अछि से शास्त्रीय थिक । चुँकी नचिकेता जी स्वयं नीक कवि सेहो छथि तेँ हिनक कविता बेसी प्रमुखता संग नाटक मे रहैत छनि । यैह कारण अछि जे बहुत बात ओ बहुत कम्मे शब्द आ सुगठित भाषा मे कहि लैत छथि । मुदा प्रियंवदा मे कविताक प्रयोग किछु विशेष भ’ गेल अछि । ओना शर्व कवि छथि तेँ कविता अधिक - सेहो कोनो उचित तर्क नहि बुझना जाइत अछि । आ एहन तरहक भाषाक प्रयोग नाटक के भ्रमित करैत अछि ओ एना कि भाषाक आधार पर प्रियंवदा के की कहल जाय शास्त्रीय नाटक, ऎतिहासिक नाटक, यथार्थवादी नाटक या आर कोनो । हाँ, भाषा आ कथ्यक आधार पर ई यथार्थवादी नाटकक वैचारिक नाटकक श्रेणी मे राखल जा सकैत अछि । मुदा, कोरसक भाषा नाटकक संग नहि जाएत अछि । संगहि किछु आर मुद्दा सेहो कोरस के माध्यम स’ सामने राखल गेल अछि ओ कनि आरो मूल कथ्य के भ्रमित करैत छै जेना प्रेमी-प्रेमिका मे विवाहेत्तर संबंधक मुद्दा उठायब । ई मुद्दा कमजोर या अप्रासांगिक अछि से हम नहि कहि रहल छी मुदा एहि ठाम एकरा उठायब नाटकक मूल कथ्य के कमजोर करब अछि । रंगमंचीय दृष्टि सँ प्रियंवदा एकटा सामान्य कृति अछि । ने कोनो अतिमहत्वपूर्ण आ ने निराशाजनक । एहन कोनो खास नै छै जे किनो निर्देशक वा संस्था एक बेर पढ़िते एकरा मंचनक परिकल्पना क’ र’ लागथि आ इहो नहि कहल जा सकैत अछि जे कोनो निर्देशक एकरा मंचित क’ र’ चाहथि त’ प्रभावी नहि बना सकैत छथि कनि फेर बदल क’ क’ । ‘प्रयोग’ एकांकीक रंगमंचीय दृष्टि मैथिली नाट्य जगत मे ‘प्रयोग’ एकटा सशक्त एकांकी अछि, जाहि मे मात्र तीनटा पात्र नवीन मिसर, अमृत आ श्रुति छथि । ई तीनू गोटे कोनो नाट्य संस्थाक नाट्यकार / निर्देशक / अभिनेता / अभिनेत्री कोनो नाटक करबाक युक्ति मे लागल छथि । नाटककार या निर्देशक (जे कहि लियनु) नवीन अपन एहि दुनू पात्र के प्रेमक मादे किछु प्रयोग करबाक लेल कहैत छथि । तीनू पात्र प्रेमक विभिन्न आयमक कतेको प्रयोग करैत छथि । अंतत: ई प्रेम हिनका सबहक नाटकीय जीवन स’ निकलि व्यक्तिगत जीवन स’ नीक जेना ओझरा जाइत छथि । किछु ओहिना जेना विजय तेंडुलकरक चर्चित नाटक ‘खामोश अदालत जारी है’ मे घटैत अछि जे सभपात्र ग्रीन रूम मे किछु ओहिना अदालतक स्वांग रचैत छथि आ ओ धीरे धीरे ततेक ने बढ़ि जाइत अछि जे सभ पात्रक व्यक्तिगत जीवन सामने आबि जाइत छै । खैर ! एहि एकांकी मे नाटककार नचिकेता जी सेहो नवीनक माध्यमे स्वयं बजैत बुझाइत छथि । एक ठाम नावीनक संवाद छनि : “आइ-काल्हि जेहन नाटक होइत अछि ओ लोक घर जाक’ सपनेक संग बहा दैत अछि । एकर कोनो प्रक्रिया मोन नहि रहैत छैक । तेँ कोनो स्थायी वस्तु नहि द’ पबैत अछि आजुक नाटक । नाट्यकार लोकनि किछु टाइपमे बन्हा गेल छथि । अपन-अपन शिविरक । मुदा, ओ बात कहबाक लेल लिखैत छथि । केओ लाल छथि तँ केओ पीयर, केओ पूर्वी हावाक शौखीन छथि तँ केओ पश्चिमि हावाक । मुदा नवीन प्रयोग हुनका लोकनिक नाटकमे किन्नहुँ नहि भेटत ।” नवीन नामक एहि पात्रक कथन के आगू बढ़बैत लेखक कहैत छथिन “हमरा मोनमे भेल जे एकटा ओहन नाटक लिखी जाहि सँ नाटकक व्याकरणक सूते कटि जाए ।” – आ से एहि ‘प्रयोग’ मे भेबे कयल अछि । ‘प्रयोग’ नामक ई एकांकी ओहिना भ’ गेल जेना उड़ैत गुड्डीक तागा टुटि गेल हो । ओ क’ त’ जाएत से कोनो थाहे नै रहैत छै । ‘प्रयोग’ एकांकी स’ की भेलै, एकर कथ्य स्थापित भेलै, अभिनेता-अभिनेत्री स्थापित भेलाह, प्रकाश संयोजन स्थापित भेल, मंच व्यवस्था स्थापित भेल वा कि नै भेल से देखब जरूरी अछि । ओना आइ-काल्हि एहन प्रथा खूब चलल अछि जे कोनो एकटा शव्द वा परिस्थिति के पकड़िक सभ अभिनेता मंच पर अपन परिकल्पना स’ कथा के आगू बढ़्बैत छथि । तय मात्र एतबे रहैत अछि जे ई क्रिया कतबा समय तक होयत, आधा घंटा, एक घंटा वा जतेक हो । मुदा, एकरा सम्पूर्ण नाटकक संज्ञा नहि देल जा सकैत अछि । हँ, ई क्रिया कोनो अभिनेता अभिनेत्रीक प्रशिक्षणक रचना प्रक्रियाक लेल उत्तम भ’ सकैत अछि । एहि स’ हुनक निर्णयक क्षमता बढ़तनि, हुनका भीतर अपना आप मे विश्वास जगतनि, ओ अपन सहकर्मीक लेल कोना सहायक भ’ सकताह से अनुभव हेतनि, एकटा कथा के दोसर कथा सँ कोना जोड़ताह आदि आदि । ‘प्रयोग’ मे तीनटा दृश्य राखल गेल अछि । पहिल दृश्यक अंत तक पात्र नवीन यैहटा कहि पबैत छथि जे ओ एहि प्रयोग मे की करताह । तय होएत अछि जे नाटक विषय वस्तु भेल – प्रेम आ कथाक रूप रेखा मे पहिने मिलन ओकर बाद विरह आ अंत मे फेरो मिलन । एहि स’ इहो एही दृश्य मे दर्शक के जानकारी द’ देल जाइत छनि जे नाटक सुखांत अछि । एहि स’ इहो अनुमान लगाओल जा सकै छै जे दर्शक वाकि प्रेक्षक केँ जे कोनो उत्सुक्ता हेतनि एहि प्रयोग के ल’ क’ ओ निश्चित आधा भ’ गेल हेतनि । आब ओ मात्र उपर्युक्त रूप रेखाक प्रक्रिया देखबा लेल रहताह । मुदा एहन कोनो स्थिति नहि अबैत छै । अंत एकटा प्रेमिकाक हत्या स’ होइत अछि । नाटकक दोसर दृश्यमे अमृत आ श्रुतिक बीच प्रेम के केन्द्र मे राखि संवाद शुरु होएत छनि । मुदा पहिने तय कयल गेल रूप रेखाक क्रम बाधित होइत अछि आ अकस्मात निर्देशक नवीन प्रवेश करैत छथि । एहि तरहे दोसर दृश्यक अंत तक निर्देशक नवीन मिसरक अनुसार नाटक शुरू भेले नहि रहैत अछि । ओ फेर स’ प्रयोग आरम्भ करबाक आदेश दैत छथि । आब नाटकक तेसर यानी अंतिम दृश्य शुरू होइत अछि । एहि दृश्यमे तीनू पात्र पर हुनकर सभहक व्यक्तिगत जीवन बेसी प्रभाव मे आबि जाइत छनि । श्रुति अत्यधिक आवेशित भ’ जाइत छथि । अमृत सेहो अपना आ श्रुतिक बीच नवीन के बाधा रूप मे बूझैत छथि आ हुनका पर अन्हार मे हमला क’ दैत छथि । एक बेर फेर श्रुति अमृत पर आवेशित होइत छथि । अमृत पर कतेको तरहक आरोप लगबैत छथि । अमृत स’ सहन नहि होइत छनि आ ओ श्रुतिक गरदनि दबाक’ हत्या क’ दैत छथि । आब शुरू मे निर्देशक नवीन जीक संवाद कतेक कारगर भेलन्हि आ ओ प्रेक्षक पर कतेक प्रभावी भेल, नाटक देखला बाद दर्शक ‘प्रयोग’ के आने नाटक जेना सपना मे बहा देलन्हि , एकर कोनो प्रक्रिया मोन रखलाह कि नै रखलाह से अंवेषणक विषय थिक । एकांकी मे पात्रक संख्या सेहो तदनुसारे अछि ; ने बेसी आ ने कम, तीनटा । गम्भीरता स’ देखल जाय त’ नाटकक पात्र नवीन मिसर दू तरहे मंच पर अबैत छथि – पहिल त’ निर्देशक रूप मे (जिनकर सोच अछि प्रेम ल’ क’ किछु प्रयोग करबाक) आ दोसर प्रेम के ल’ क’ चलि रहल प्रयोग मे एकटा पात्रक रूप मे सेहो । पहिल दृश्य मे जे स्थापना निर्देशक नवीन मिसर करैत छथि ओ अंत मे जाक’ कोनो निष्कर्ष पर नहि ल’ जा पबैत छथि, ने प्रेक्षक के आ ने अपना आप के । पात्र अमृत हरदम अपने मे छथि । ओ पूरा नाटक मे अपन व्यक्तिगत जीवन जिबैत छथि । अंतिम दृश्यक परिणिति सेहो हुनक व्यक्तिगते होइत अछि तेँ ई पात्र नीक जेना स्थापित होएत छथि । श्रुति नामक महिला पात्र मंच पर निर्देशक नवीन मिसरक निर्देशानुसार चलैत छथि मुदा अपन पिछला आ वर्तमान व्यक्तिगत जीवन दुनू के मंच पर अनैत छथि । ओ ‘कि करू... कि नै करू’ के स्थिति मे किछु निर्णय नै ल’ पबैत छथि । लेखक श्रुति केँ एकटा अस्थिर पात्र गढ़ने छथि । परिणाम होइत अछि जे एकांकीक अंत तक जाइत जाइत हिनकर हत्या भ’ जाइत छन्हि । एहि तरहेँ ‘प्रयोग’ मे तीनटा पात्र छथि जाहि मे नवीन मिसर छोड़ि दुनू पात्र नीक जेना स्थापित होइत छथि । नाटक मे मंच परिकल्पना संग प्रकाश प्ररिकल्पना सेहो लेखक अपना हिसाबे केने छथि । जाहि मे मंच के तीन हिस्सा मे बाँटल गेल अछि आ समयानुसार ओकर प्रयोग सेहो कयल गेल छै । एक कात एकटा कुर्सी अछि आ एकटा काठक बक्सा सेहो उनटल छै , बीच मे सीढ़ीक तीनटा चरण आ एकटा काठक फ्रेम आ दोसर कात मे फूल-पात युक्त एकटा ठाढ़ि लटकल अछि । एहिना प्रकाशक सेहो तीन का क्षेत्र बनाओल गेल छैक एकटा मे कुर्सी+बक्सा+सीढ़ी अछि । दोसर मे सीढ़ी आ मंचक सामनेक हिस्सा । तेसर मे सीढ़ी आ ठाढ़ि अछि । एहि तरहक प्रयोग मैथिली नाटकक लेल पहिल नै अछि तखन एहि एकांकीक मंचनक सन्दर्भ मे ई अति महत्वपूर्ण सुझाव अछि कोनो निर्देशक लेल । एहि मे कोनो शक नहि जे नाटककार नचिकेताजी नाटकक लगभग सभ विधा मे नीक हस्तक्षेप रखैत छथि । एहि तरहेँ निष्कर्ष यैह जे ई ‘प्रयोग’ एकांकी मात्र एकटा विचार बनि क’ रहि लेल अछि मैथिली रंगमंचक लेल । ओना नाटक मे द्वन्दक प्रयोग खूब नीक जेना बनल रहैत अछि । नाटक अपन ग्राफ के शुरू स’ बरकरार रखैत अछि । रंगमंचीय दृष्टि स’ ‘प्रयोग’ एकांकीक कथ्य स’ बेसी ओकर मंच परिकल्पना आ प्रकाश परिकल्पना बेसी महत्वपूर्ण अछि । ओना ‘प्रयोग’क मादे हमर ई विचार मात्र एकर एकटा पाठक रूपे राखल जाय । हँ ! एकर प्रस्तुति देखला वा मंचित केला बाद किछु आरो सार्थक तथ्य निकलि सकैत अछि । तखन ई निश्चित जे मैथिली नाट्य साहित्य मे ई अपना तरहक पहिल कृति मानल जयबाक चही, जे रंगमंच स’ जूड़ल प्राय: सभ रंगकर्मी केँ किछु सोचबाक लेल प्रेरित करैत अछि। प्रयोग एकांकीक रंगमंचीय प्रयोग फरवरी 2010के 14 तारिख क’ दरभंगाक ललितनारायण मिथिला विश्वविद्यालयक नाटक एवं संगीत विभागक प्रेक्षागृहमे सांझक 4 बजे स’ आयोजित छल प्रबोध साहित्य सम्मान – 2010 । एहि आयोजनमे स्वस्ति फाउण्डेशन द्वारा कुणाल जीक निर्देशनमे नचिकेता जीक लिखल प्रयोग एकांकीक मंचन सेहो राखल गेल छलैक । संयोग स’ हमहू मधुबनीमे रही तेँ एहि सूअवसर केँ लाभ उठयबाक हेतु एहि आयोजनमे उपस्थित भेनाइ जरूरी लागल । एक संग कतेको लाभ छल । एहि स’ पहिने सेहो कुणालजी प्रयोग के मंचित क’ चुकल छ्लाह । ई हुनकर दोसर प्रस्तुति छल, तेँ कनि आरो महत्वपूर्ण । कहल जाइत अछि जे कोनो नाटक बेर बेर मंचित भेलाक बाद आरो निखरैत अछि संगहि ओ अपन कथ्य आ मंचनमे परिपक्वता सेहो ग्रहण करैत अछि । सात बजे साँझमे प्रयोग एकांकीक मंचन शुरू भेल । लगभग 45 मिनटक एहि एकांकीक शुरुआत अन्हार स’ छल जाहिमे कोनो महिलाक आवाजमे काव्य पाठ भ’ रहल छल । धीरे धीरे प्रकाश अबैत अछि आ मंचपर एकटा लकड़ीक गेट देखाइत छै । नाटककार एकरा फ्रेम कहलथि अछि मुदा मंचपर हमरा ई गेटक अनुभूति देलक । ई गेट कनी उँचाई ग्रहण केने अछि आ ओहि तक पहुँचबाक लेल तीन-चारिटा स्टेप बनल अछि जाहि स’ ई कोनो कोठरीक प्रेवेश द्वार प्रतीत होएत छैक । मुदा, नाटककार एहि स्टेपके सीढ़ी कहने छथि । आब ई कहनाइ कनी कठिन अछि जे नाटककार नचिकेता जीक सीढ़ी आ निर्देशक कुणाल जीक ई स्टेपमे कतेक समानता छनि । मुदा नाटककारक फ्रेम आ निर्देशकक गेट त’ जरूरे भिन्न अछि । नाटकक अनुसारे सीढ़ी आ फ्रेममे कोनो संबंध नहि देखाओल गेल अछि । मुदा, एहि ठाम स्टेप आ फ्रेमके एना संयोजित कयल गेल अछि जे ई कोनो कोठरीक प्रवेश द्वार बुझना जाइत छैक । एही स्टेपपर ठाढ़ रहैत छथि नाटकक मुख्य कलाकार नवीन मिश्र । मंचक बामा कात (दर्शक दिस स’) एकटा कुर्सी अछि जे दर्शक दिस पीठ क’ क’ राखल रहैछ । संगहि एकटा बक्सा सेहो एकर बगलमे राखल गेल अछि । हाँ, नाटकक अनुसार ई लकड़ीक अछि आ उलटा राखल गेल अछि मुदा एखन मंचपर ई चदराक आ ओहिना राखल अछि जेना कोनो ब्लॉक राखल जाइत अछि । दाहिना कात (दर्शक दिस स’) एकटा गाछक किछु डारि देखार परैत अछि । कुर्सीक बेसी उपयोग अमृत करैत छथि आ गाछक डारिक तरमे प्राय: नाटकक एक मात्र महिला पात्र श्रुति रहैत छथि । बस । हाँ ! ई कहि दी जे ई मंच विन्यास एहि नाटकक निर्देशक कुणाल जीक मानल जेबाक चाही । कारण, प्रयोग नाटकमे एकर लेखक नचिकेताजी स्वयं मंच विन्यासक निर्देश देने छथि, जकरा थोड़ बहुत बदलल गेल अछि । आजुक एहि मंचनक लेल तैयार मंच विन्यास कनि कंफ्यूज करैत अछि । कुर्सी आ बक्सा स’ लगैत अछि जे ई कोनो नाट्य संस्थाक पूर्वाभ्यासक कक्ष अछि मुदा गाछक डारि आ गेटक आगू बनाओल गेल स्टेप स’ लगैत अछि जे ई कोनो कोठरीक आगूक भाग थिक । तेँ एहि तरहक मंच विन्यासपर गंभीरता स’ विचार करबाक आवश्यकता छल नाटकक कथ्यके स्थापित करबाक लेल । आब नाटकमे अभिनेताक वस्त्र विन्यास दिस सेहो ध्यान देल जाय । मुख्य अभिनेता नवीन मिश्रकेँ निर्देशक रूपमे टोपी, सीटी, कुर्ता, पेंट आ पैरमे जूता ठीक अछि मुदा बाकी दुनू पात्र खाली पैरे छथि से कियेक ? पैरक पहिरनमे भिन्नता भ’ सकैत अछि मुदा कियो पहिरने आ कियो खाली पैरे कनि त्रुटि पूर्ण लगैत अछि । श्रुतिके सेहो साड़ी स’ बेसी नीक हुनका सलबार फ्राक होइतनि जाहि स’ ओ अभिनय करबा काल मूवमेंट करबामे फ्री महसूस करितथि । नाटकमे सेहो ई नहि पता चलैत अछि जे श्रुति विवाहल छथि वा कुमारि । एहना स्थितिमे हुनका कुमारि मानल जेबाक चाही छल । हुनका कांख तर लटकल पर्स नीक अनुभूत दैत अछि । मुदा प्रियंका नीक जेना अपन अभिनयमे पर्सक उपयोग नहि क’ सकलीह । अमृतक ड्रेस सेहो कोनो बेसी आकर्षक नहि मानल जयबाक चाही । कारण, मंच पर कतेको तरहक प्रकाश अबैत जाएत रहैत छै आ तेँ प्राय: कारी आ उज्जर रंगक उपयोग कोनो विशेषे परिस्थितिमे करबाक चाही । एहि ठाम अमृत नामक कलाकार कारी पेंट आ उज्जर शर्ट पहिरने छथि । कारी पेंट होबाक कारण अमृत जखन ओहि स्टेपपर बैसैत छथि कि स्टेप पर परल सभटा गर्दा हुनका पेंटमे लागि जाइत छनि जे नीक नहि लगैत अछि । हाँ ! एहन स्थितिक जँ माँग करैत अछि नाटकक कथ्य तखन त’ नीक, मुदा प्रयोगक संदर्भमे ई कहनाइ उचित नहि होयत । एहि तरहें मात्र नवीन मिश्र जीक वस्त्र सज्जा नाटकक तदनुरूप मानल जायत । एहि प्रस्तुतिमे प्रकाश व्यवस्थाके नीक मानल जयबाक चाही । प्रकाश परिकल्पना चन्द्रभूषण झाक छनि आ संचालनो स्वयं क’रहल छथि । नाटकक शुरुआत अन्हारमे होइत अछि आ धीरे धीरे प्रकाश नवीन मिश्रपर परैत छनि । एहि प्रेक्षागृहमे कोनो तरहक सूनियोजित प्रकाश व्यवस्था नहि अछि, तैयो प्रकाशक एतेक विभिन्न सेड उत्पन्न केनाई प्रशंसनीय अछि । हाँ ! कलाकार आ प्रकाशपुँज दुनूक बीच तदात्मक अभाव देखाइत अछि । कखनो कखनो कलाकार प्रकाश स’ दूर भ’ जाइत छथि त’ कखनो कखनो प्रकाश कनि देरी स’ प्रकट होइत अछि । मंच छोट हेबाक कारण प्रकाश बिम्बमे ऑभरलेपिंग भेनाइ निश्चित छल से भेबे कयल । अंतिम दृश्यक प्रकाश संयोजन अति सुन्दर बनल अछि । एहि दृश्यमे नाटकक कथ्यक अनुसार दृश्य आ ओकरा उभारैत प्रकाश संयोजन जबरदस्त बनल अछि । अभिनेताक मुख्य सज्जा पूर्ण रूपेण यथार्थवादी राखल गेल छैक । कोनो तरहक बदलाव नहि । नाटकक अनुरूपे ई बेसी नीक । मेक-अप मात्र मंचक अनुसार कयल गेल अछि । मिथिलाक कोनो एहन प्रेक्षागृह नहि अछि जाहिमे ध्वनि व्यवस्था रंगमंचक अनुरूप हो । मिथिले कियेक बिहारमे आरा स्थित रेनेशांक प्रेक्षागृह छोड़ि कोनो प्रेक्षागृह एहन नहि अछि । तेँ सभ प्रस्तुतिकर्ताके स्वयं ध्वनि व्यवस्था क’र’ पड़ैत छनि । एहू ठाम एहने व्यवस्था छल । मुदा, मंच पर ततेक नीक जेना माइक संयोजन कयल गेल जे अभिनेता कोनो कोन स’ बजथि हुनकर आवाज सम्पूर्ण प्रेक्षागृहमे नीक जेना सुनाइ पड़ैत छलनि । नाटकमे संगीत सेहो पर्याप्त राखल गेल अछि ओहो पहिने स’ रिकार्डिंगके रूपमे । संगीतक संयोजन सीताराम सिंह जीक छन्हि । संगीतक संग अनेको तरह ध्वनिक प्रयोग सेहो कयल गेल अछि । संगीत प्राय: सभटा अत्याधुनिक अछि । ओना नाटकमे एहि तरहक संगीतक प्रयोग निर्देशकक अप्पन छनि । ई संगीत नाटकके प्रभावी बनेबामे सहयोग करैत अछि । संगीत संचालन संजीव पांडेक’ रहल छलाह, मुदा संगीतक संचालन कनी आर पूर्वाभ्यास माँगैत अछि । प्रयोग एकांकीक मुख्य अभिनेता छथि नवीन मिश्र । एहि पात्रके कुमार गगन जीव रहल छथि । कुमार गगन बहुत साल स’ मैथिली रंगमंच पर छथि । शुरूए स’ भंगिमा, पटना स’ जुड़ल छथि । कुणाल जीक निर्देशनमे कतेको नाटकमे अभिनय क’ चुकलाह अछि आ कुणालजी द्वारा पहिल बेर निर्देशित प्रयोग नाटकमे सेहो गगनजी एहि भूमिकाके क’ चुकल छथि । एहि प्रस्तुतिमे गगनजी नवीन जीक रूपमे अपन सोलो लॉगी संग अबैत छथि । मुदा पूराके पूरा वक्तव्यमे कोनो विशेष आकर्षण नहि छोड़ि पबैत छथि । मंचपर नवीन मिश्र कम आ गगनजी बेसी देखाइत छथि । सम्पूर्ण प्रस्तुतिक अंत तक जाइत जाइत गगनजी एकटा पारसी रंगमंचक कलाकारक रूपमे अपन प्रभाव बना पबैत छथि । संवादक बीच उतार चढ़ाव, शब्दक संप्रेषण स्वाभाविक नहि बनि परल अछि । संगहि हिनकर मंच पर गति आ बैसबाक स्थान सेहो उचित नहि । कियेक त’ जखन जखन ई मंचपर अपन अभिनेताके आदेश दैत छथि प्रयोग करबाक लेल आ पाछू जा क’ बैसैत छथि त’ श्रुति स’ झँपा जाइत छथि तेँ प्रेक्षक हिनकर अभिव्यक्ति देखबा स’ बंचित रहि जाइत छथि । अपन दुनू अभिनेताके प्रयोग करबाक आदेश देलाक बाद कखनोक’ हुनका दुनू के अपन दुनू हाथस’ एकटा फ्रेम बनाक’ देखनाइ अत्यंत अनर्गल मुद्रा मानल जायत । कारण, ई नवीन मिश्र एकटा नाटक मंडलीक निर्देशक छथि नै कि कोनो फिल्म कम्पनीक निर्देशक । गगनजी मैथिली रंगमंचक वरीष्ठ अभिनेता छथि आ अनुभवी सेहो तेँ हिनका स’अपेक्षो हमरा सभकेँ कनी बेसी अछि । कनी आरो पूर्वाभ्यास आ विमर्श कयल गेल रहितै त’ बेसी नीक परिणाम अबैत । श्रुति नामक भूमिका निभेनिहारि प्रियंका सेहो आब मैथिली रंगमंचक परिचित अभिनेत्री भ’ चुकल छथि । प्रियंका नीक अभिनेत्री छथि तकर प्रमाण ओ पिछला कतेको प्रस्तुतिमे द’ चुकल छथि । इहो भंगिमा, पटना स’ जूड़ल छथि आ वरीष्ठ रंग निर्देशक कुणाल जीक संग कतेको नाटक केलीह अछि । एहि प्रयोग प्रस्तुतिमे हिनकर आत्मविश्वास अति प्रसंसनीय अछि । मंचपर हिनकर गति आ अपन स्थानक लेल सचेतताक संग दर्शक आ अपन सहयोगी अभिनेताक बीच आँखिक मिलान (आइ कंटेक्ट) नीक प्रभाव देलक अछि । मुदा प्रियंकाके सेहो अपन मुखाभिनय (फेस एक्टिंग) पर कनी आरो काज क’र’ पड़तनि । एहि नाटकमे हिनका द्वारा कयल गेल संवाद अदायगी खासक’ जे कविताक अंश अछि ओहिमे दू शब्दक बीच काफी समय लेल गेल अछि जकरा निर्देशकके कनि कम क’र’ पड़तनि । ई कहबामे कनियो संदेह नहि जे एहि तीनू अभिनेतामे प्रियंका सब स’ बेसी प्रभाव छोड़लीह अपन अभिनयमे । अमृत नामक पात्रके अभिनय क’ रहल छलाह आशुतोष अनभिज्ञ । आशुतोष मैथिली रंगमंच स’ अनभिज्ञ नहि छथि । मुदा, अभिनय दृष्टिए हिनका अखन काफी मेहनत करबाक आवश्यकता छनि । हिनक कोनो अभिव्यक्ति पात्रक अनुरूप नहि छनि । हिनका पर प्रियंका काफी भारी परि रहल छथि । हिनकर अभिनयमे एखन हेजिटेशन बहुत अधिक छनि । प्रस्तुतिक अति महत्वपूर्ण अंग थिक मंच । एहि प्रेक्षागृहक मंच कोनो कोण स’ एहि नाटकक अनुरूप नहि अछि । अभिनेता, मंच संयोजन, प्रकाश संयोजन, ध्वनि संयोजन, प्रेक्षकक बैसबाक स्थिति आदि सभमे समझौता क’र’ पड़ल अछिसे ओहिना देखार होइत छै । प्रेक्षागृहमे दर्शक अति प्रबुद्ध वर्गक छलाह । मुदा, नाटक देखबाक लेल जे अनुशासन दर्शकमे होबाक चाहियनि से अत्यंत कम छल । बिना मतलबे थोपड़ी पीटब, मोबाइल मौन करब त’ दूर, बीच नाटकमे मोबाइल पर गप्प करब, नाटकक ऑनलाइन समीक्षा देब, बीच बीचमे जोर स’ आपसी गप्प क’ लेब, बीच बीचमे उठिक’ बाहर भीतर करब आदि कार्यकलाप स’ बंचित नहि छल प्रेक्षागृह । एहि कारण नीक प्रेक्षक के अत्यंत परेशानी भेल हेतनि एहन कठिन नाटकके देखबामे से निश्चित । हमर दर्शक वर्ग के ई बूझक चाहियनि जे नाटकक दर्शक भेनाई कोनो दोसर विधाक दर्शक स’ अत्यंत फराक होइत अछि । हम प्रयोग पढ़ने छी । एक बेर नहि कतेको बेर । एहि पर हमर आलेख “प्रयोग एकांकीक रंगमंचीय दृष्टि” सेहो प्रकाशित अछि विदेह ई पत्रिकाक अंक 51 (01 फरवरी 2010 ; पृष्ट सं. 112)मे । तेँ हमरा एकर मंचन देखब अति महत्वपूर्ण छल । मुदा पढ़लाक बाद जे कोनो बिम्ब हमरा दिमागमे उचरैत अछि एहि प्रस्तुतिके ल’क’ तकर लगभग पच्चीस प्रतिशत मात्र एहि प्रस्तुतिमे हमरा भेटल । एहि प्रस्तुतिक अंतिम दृश्यक अंतिम भाग नीक परिकल्पित भेल अछि जे बेर बेर हमरा दिमागमे आबि जाइत अछि । कुणालजी हमर सभहक श्रेष्ठ निर्देशक छथि । सीतायन, कुसमा सलहेस, पारिजात हरण आदि प्रस्तुति हुनकर नाम लैत देरी मोनमे घुमर’ लगैत अछि । हुनका स’ हमरा सभके हरदम किछु विशेषक अपेक्षा अछि । संगहि ओ अपन प्रस्तुतिमे नव नव प्रयोगक लेल विख्यात सेहो छथि । हुनक एहि प्रस्तुतिमे पूर्वाभ्यासक अभाव नीक जेना खटकैत छल आ कोनो तरहक निर्देशकीय कुशलताक प्रयोग सेहो नहि देखायल । आदरणीय कुणालजी आजुक समयमे हम सभ रंगकर्मीक लेल पथ प्रदर्शक व्यक्तित्व छथि आब हुनका स’ एहन अपरिपक्व प्रोजेक्टक आशा नहि अछि । पोथी-समीक्षा- पुरुष परीक्षा जहिना विद्यापतिक बिना मिथिलाक परिकल्पना केनाई असभंव भ’ गेल अछि ओहिना विद्यापतिक रचना संसार हुनक श्रेष्ठ गद्य रचना पुरुष परीक्षा क बिना हुनकर अधूरा अछि । एहि सँ पहिने एक बेर हम मलंगिया जीक संग मैथिली अकादेमी, पटना गेल रही आ ओही ठाम पुरुष परीक्षा किनलहु । मुदा, ओहि समय भाषाक जटिलता आ एकर गद्य रूप बेसी आकर्षित नए केलक । बाद मे पढल जायत ई सोचि किताबक रैक मे सजि गेल । लगभग पाँच साल बाद एहि बेर फेर मधुबनी भ्रमणक समय मलंगिया सर संग योगानंद सुधीर स’ भेंट होबाक मौका भेटल । परिचय पात भेलाक तुरत बाद योगानंद जी पुरुष परीक्षा हाथ मे थमौलनि । ई पोथी विद्यापति लिखल पुरुष परीक्षाक नाट्य रूप अछि । एक त’ ई दोसर मौका छल जे पुरुष परीक्षा हमरा हाथ मे आयल आ ओहो नाट्य रूप मे । अति प्रसन्नता भेल । दिल्लीक लेल गरीब रथ मे बैसल रही । गाड़ी नौ घंटा लेट । फाइदा ई जे एहि पार स’ ओहि पार पुरुष परीक्षा समाप्त । घर अयला बाद, फेर स’ निकाललहु राखल किताब ( विद्यापति कृत पुरुष परीक्षा; सम्पादक : श्री सुरेन्द्र झा ‘सुमन’) ओकरो समाप्त केलहु एक्के दिन मे । सुमन जीक संपादकत्व मे प्रकाशित पुस्तकक भूमिका अति सारगर्भित अछि । एहि मे सुमन जी लिखैत छथि – “विद्यापतिक धारणा छनि जे पुरुषक आकार धारण कयनिहार तँ बहुतो भेटताह किंतु वास्तव मे ओ पुरुष नहि पुरुषाभासे थिकाह । पुरुष तँ ओ थिकथि जनिकामे पुरुष लक्षण होनि । अर्थात जनिका मे वीरता, बुद्धि ओ विद्या होनि जे धर्म, अर्थ, काम ओ मोक्ष ई चारू पुरुषार्थ केँ सिद्ध कयनिहार होथि । एहि सँ आन जे छथि से पुरुष रूपमे जेना पुच्छहीन पशुए ।” विद्यापतिक पुरुष परीक्षा चारि परिच्छेद मे विभाजित अछि । पुरुष लक्षणक अनुसार प्रथम मे – वीरक, दोसर मे सुवुद्धिक, तेसर मे सविधक ओ चारिम परिच्छेद मे चारू पुरुषार्थक प्रतिपादक कथा अछि । सुरेन्द्र झा सुमन जीक भूमिका सँ बहुत रास तथ्य ओहिना एहि नाट्य रुपांतरण मे राखल गेल अछि । एहि नाट्य रूपक प्रकाशकीय मे लिखने छथि जगदीश मिश्र : पुरुष परीक्षाक सबस’ पहिने बँगला अनुवाद 1815 ई. मे पं. हर प्रसाद राय द्वारा कयल गेल । वर्ष 1830 मे एकर अंग्रेज़ी अनुवाद राजा कालीकृष्ण बहादुर द्वारा कयल गेल । आगू जाक’ एक बेर फेर अँग्रेज़ी मे जॉर्ज अब्राहम ग्रिअर्सन पुरुष परीक्षाक अनुवाद अँग्रेज़ी मे केलनि । संस्कृत मे लिखल पुरुष परीक्षाक मैथिली भाषा मे पहिल अनुवाद कवीश्वर चन्दा झा 1888 ई. मे केलनि । एकर बाद त’ कतेको बेर एकर संस्करण आ मैथिली करण होइत रहल अछि । एहि पुस्तक में प्रकाशकीय, अवतरणिका, पुरोवाक चरिटा परिच्छेद अछि । चरिटा परिच्छेद में बाँटल गेल अछि । एहि अनुक्रमणिकाक प्रथम परिच्छेद मे नौ, द्वितीय परिच्छेद में सात, तृतीय परिच्छेद में चौदह तथा पन्द्रहटा पाठ अछि । कुल मिला क’ पैंतालीस । अपन पुरोवाक में योगानंद जी सूचना दैत छथि जे ई रूपांतरण वर्ष 1990-95 के बीच कयल गेल आ 2005 ई. क अप्रैल स’ सप्ताहिक प्रसारण प्रसार भारती, पटना सँ भ’ चुकल अछि । एहि पुस्तक लेल ई महत्वपूर्ण अछि जे एकर नाट्य रूपांतरण रेडियो विधा में अति सुन्दर तरीका सँ प्रस्तुत होयत कारण एकर प्राय: सभ कथाक नाट्य मंचन 20-30 मिनटक होयत आ संगहि सभ कथा अपना आम में सम्पूर्णता लेने अछि । रेडियो नाटकक लेल जतेक तत्वक आवश्यकता होइछ से सब रूपांतरण में विद्यमान अछि । एहि ठाम हम विद्यापति लिखल पुरुष-परीक्षा का सन्दर्भक विशेष चर्चा नहि क’ क’ योगानंद सुधीर द्वारा कयल गेल एकर नाट्य रूपांतरणक चर्चा करब । ई निश्चित जे एहि तरहक काज करबा स’ विद्वतजन प्राय: कतराइत रहैत छथि । तकर कतेको कारण अछि – पहिल त’ एहन काज करबा लेल एक संग मूल पाठ आ नाट्य विधाक सेहो पूर्व जानकारी होयब जरूर होइछ । जकर प्राय: अभाव छै । दोसर ई जे एहन काज करबा लेल असीम धैर्यक आवश्यकता होइछ तकरो अभाव अछि । एहि संग आरो कतेको कारण अछि । पुरुष परीक्षाक सभ कथा के अध्ययन क’ओकर नाट्य रूपातरण करब अति कठिन काज छल । मूल पुस्तक मे प्राय: सभ कथा एक दोसर स’ जुड़ल अछि । एहि ठाम योगानन्द जी अत्यंत गंभीरता संग दुनू बातक ध्यान रखलनि अछि । पहिल त’ जे सभ नाट्यरूप एक दोसर स’ जूड़ल होयबाक चाही दोसर इहो जे सभ अपना आप मे स्वतंत्रो ओतबे होइ आ एहि दुनू सीमा पर योगानंद जी नीक जेना ठाढ़ भेलैत छथि । एहन ऎतिहासिक पुस्तक के नाट्यरुप मे सुगम संवादक संग प्रस्तुत करबा स’ मैथिली संसार समृद्ध भेल अछि । कोनो साहित्य नाट्यरूप मे संवाद प्रति संवाद मे पाठक के बेसी आकर्षित करैत छै तेँ एहि पुस्तकक इहो महत्वपूर्ण विशेषता भेल । कथाक नाट्यरूप बनेबाक लेल लेखक कतेको ठाम अपना दिस स’ पात्र गढ़लनि अछि से आरो कठिन काज छल । हँ ! कतौ कतौ पात्रक बीच संवादक बटबारा मे असंतुलन भ’ गेल अछि । कोनो कोनो पात्र के संवाद अत्यधिक लम्बा भ’ गेल अछि जेना – दयावीर-2 मे अल्लावद्दीन आ हम्मीरदेवक संवाद, चोर-5 मे विक्रमक संवाद, सुबुद्धि-॥ मे गणेश्वर आ वामदेवक संवाद आदि । कोनो नाट्यरूप बहुत छोट भ’ गेल अछि जेना तमोगुणी धार्मिक-31 । अंत मे हम ई त’ नहि कहि सकब जे एहि पुस्तकक कतेक नाट्य रूपक मंचन कयल जायत मुदा ई त’ निश्चित जे मैथिली नाट्य साहित्य के योगानंद सुधीर जी अति महत्वपूर्न पुस्तक प्रदान केलैथ अछि । एहि लेल हमरा सभकेँ हुनकर आभारी होमक चाही । ई पुरुष परीक्षाक नाट्य रूपांतरण साहित्यिकी प्रकाशन, सरिसब पाही, मधुबनी सँ प्रकाशित कयल गेल अछि । पुस्तकक मूल्य 200 टाका आ कुल पृष्ठ सं. 318 अछि । पुस्तक प्राप्ति स्थान – प्रो. योगानन्द सिंह झा, वार्ड नं.- 06, विनोदानंद झा कॉलोनी, मधुबनी- 847211 (बिहार) । रंगदृष्टि बांग्ला नाटक लेल कोलकाता आ मराठीक लेल मुम्बई, तहिना पहिने मात्र हिन्दीक लेल दिल्ली जानल जाइत छल । मुदा आब सम्पूर्ण भारतवर्षमे विविधतापूर्ण नाटक मंचनक लेल दिल्ली केन्द्रमे आबि चुकल अछि, ताहिमे कोनो शंखा नहि । दिल्लीक मंडी हाउस स्थित विभिन्न प्रेक्षागृहमे नित्य कोनो-ने-कोनो भाषाक नाटक मंचित होइते रहैत अछि । एहि ठाम हिन्दी, मराठी, बंगाली मात्र नहि बल्कि मणि पुरी, असमिया, उर्दू, पंजाबी,मैथिली, कन्नड़, मलयालम आदि भाषाक नाटक देखबाक मौक़ा प्राय: भेटैत रहैत छैक । एहि बीच दिल्लीक प्रेक्षक केँ एकटा अत्यंत सुखद अनुभव भेलनि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालयक प्रांगणमे । मराठी नाटककार विजय तेंडुलकर लिखित प्रसिद्ध नाटक जात ही पूछो साधु की आ बांग्ला लेखक रवीन्द्रनाथ ठाकुर लिखित अचलायतन; दुनूक मंचन हिन्दीमे, जेना तीनू रंगमंचक संगम भ’ रहल हो । जात ही पूछो साधु की राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडलक कलाकारक संग प्रसिद्ध नाट्य निर्देशक राजिन्दर नाथ आ अचलायतन राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय द्वितीय वर्ष छात्रक संग युवा निर्देशक शांतनु बोस कयने छलाह । नाटक जात जी पूछो साधु की एकटा स्वस्थ हास्य-व्यंग नाटक अछि । एहिमे महीपत नामक व्यक्ति कहुना क’ एम.ए. पास करैत अछि - थर्ड डिविजन सँ । बहुत दिन बेरोज़गार रहला बाद सिफारिशिज़्मक टेकनिक सीख कोनो कॉलेजमे लेक्चरार बनैत अछि आ नाटकक अंतमे कतेको उथल-पुथलक बाद एक बेर फेर बेरोजगार भ’जाइत अछि । एहि सोझा-सोझी कथ्यक लेल नाटकक संवादमे नाटककार ततेक ने द्वन्द ओ उत्सुकता भरि देने छथि, जे प्रेक्षक एकाग्र भ’ महीपतक सोलो लौगीमे हेरायल रहैत छथि । ई नाटककारक विशेषते ने जे आई सँ 40 वर्ष पहिने लिखल कथ्य आजुक संदर्भ सेहो समकालीने बुझना जाइछ । संवाद सेहो तेहेन ने चोटगर आ तीक्ष्ण छैक जे प्रेक्षागृहमे बैसल दर्शक केँ बेधैत अछि । हास्यक पुट द’ नाटककार अपन सभ गप्प कहि दैत छथि आ दर्शक ओकरा सहर्ष ग्रहण करैत छथि । एकत’ सबस’ बेसी तेण्डुलकरजीक नाटकक मंचन सम्पूर्ण भारतमे भेलन्हि अछि ताहुमे जात ही पूछो साधु की नाटकक मंचन सबस’ बेसी भेल अछि । निर्देशकक रूपमे राजिन्दर नाथ जीक नाम हिन्दी रंगमंचक सुपरिचित नाम अछि । विजय तेण्डुलकरक प्राय: सभ नाटकक हिन्दीमे मंचन राजेन्दरजी कतेको बेर कयलथि अछि । एहि नाटक लेल मंच पर नाटकक संप्रेषणक जे विधि राजिन्दर नाथ अपनेने छथि ओ अति सरल अछि । मुदा, अभिनेताक अभिव्यक्ति पर अत्यंत बारीकी सँ कार्य कयल गेल अछि । मंच पर तीनू कात तीनटा दरवाज़ा, आधा मंच पर मात्र एक फूट ऊँच प्लेटफॉर्म आ सात-आठ टा ब्लॉक मात्र सँ एतेक जीवंत प्रस्तुति निर्देशकक दूर दृष्टिक परिणाम थिक । प्रस्तुतिमे प्रकाश परिकल्पना गोविन्द यादवक छनि । गोविन्दजी सेहो राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय स’ प्रशिक्षित छथि । महीपत बनल अम्बरीश मात्र दू कदम चलि जखने दोसर प्रकाश बिम्बमे प्रवेश करैत छथि कि समुच्चा परिदृश्ये बदलि जाइत छैक । मात्र प्रकाशक प्रभाव सँ मंच कखनो समाचार पत्रिकाक दफ्तर, कखनो निछछ देहात त’कखनो गामक कॉलेज वाकि पिकनिक स्थलमे परिवर्तित होइत रहैत अछि । एहिना वस्त्राभूषण सभ सेहो तर्क संगत अछि । जेँ सभ किछु संतुलित अछि तेँ नाटक देख सभ दर्शक भरपूर पूर्णताक संग प्रेक्षागृह सँ बहराइत छथि । आब दोसर प्रस्तुति : अचलायतन । ई प्रस्तुति छात्रक प्रशिक्षणक हिस्सा अछि तेँ प्रस्तुतिमे तकनीकी पक्ष पर बेसी ध्यान गेल । भ’ सकैत अछि बहुतो दर्शक केँ ई प्रस्तुति बहुत बेसी आकर्षित नै केने होइन, मुदा ई प्रस्तुति तकनीकी दृष्टिए उत्कृष्ठ त’अछिए । नाटक देखबाकाल अभिनेता-अभिनेत्रीक शारीरिक शक्तिक क्षमता, देह गति,आवाज़ संतुलन आ पात्रक मानसिक अभिव्यक्ति रोमांचित करैत छल । रवीन्द्रनाथ जीक लिखल एतेक पुराण कथा केँ आजुक संदर्भमे प्रस्तुत केनाइ अति कठिन कार्य छल, जकरा निर्देशक अपन दृष्टि सँ समकलीन बनेबाक भरपूर कोशिश केलनि अछि । अचलायतन के कथा सार ई जे एहि नामक एकटा शिक्षा संस्था अछि जत’ शिक्षाक रूपमे सालों-साल पुरान रुढ़िकेँ जीवित रखनाए मात्र अछि । मुदा किछु नव सोचक विद्यार्थी आ गुरुक प्रयास स’ एहि परम्पराकेँ तोड़ि देल जाइत छै आ एकबेर फेर स’अचलायतन के पुन: स्थापित करैत अछि । नाटक जे प्राय: कंभेंशनल फॉर्ममे कयल जाइत अछि तकरा तोड़बाक पूरा-पूरा कोशिश केलनि अछि शांतनु बोस । शांतनु बोस लगातार एहि विधामे कार्य क’ रहल छथि । मुदा एखन एहि फॉर्म केँ सामान्य दर्शक स्वीकारबाक लेल तैयार नै छथि । नाटक जात ही पूछो साधु की अत्यधिक यथार्थवादी अछि जाहिमे समाजक जे रूप आइ जै स्थितिमे अछि ओकरा ओही रूपमे लेखक रखलन्हि अछि आ ओकरा हम सभ सहर्ष स्वीकरलहुँ अछि जाहिमे समजाक सभरूप एक्केठाम देखबामे अबैत अछि । तथाकथित सभ्य समाज आ निरक्षर समाज दुनूक वार्तालापमे आकाश-पतालक अंतर । नाटककार आ समीक्षक आ दर्शक; सभकेँ यथार्थवादक रूपमे एकरा स्वीकार करबाक चाही । हँ ! मिथिलाक लोक जीवन एकरा कहिया ने स्वीकारि चुकल अछि । एहि फॉर्ममे मैथिलीमे सेहो कतेको रचना भेल जेँ उत्कृष्ठ अछि मुदा एखनो तक मैथिल तथाकथित सभ्य साहित्यकार ओकरा स्वीकारबाक लेल तैयार नहि भेलखिन्ह । एहना स्थिति के की कहल जा सकैत अछि ? एहिना दोसर रूप ई जे अपन रचनाकेँ कोनो काल मात्र केँ लक्ष्मण रेखा सँ मुक्त करबाक चाही । तखने ओ कालजयी भ’ पाओत । आ रचनाकेँ सेहो समकालीन परिप्रेक्ष्यमे देखबाक चाही । ओकरामे जँ कनी फेर-बदल कयला सँ आजुक’ पीढ़ीक लेल सार्थक बनि जायत त’ ई कोन बेजाय बात हेतैक ? मिथिला मे रंगकलाक समकालीन दृष्टि सब कला मे श्रेष्ठतम कला मानल गेल अछि रंगकर्म के । से आइ नै, प्राचीने काल स’। इहो कोनो खास सभ्यता मे नै बल्कि विश्वक सब सभ्यता मे । जँ रंगकर्म केँ कला सँ संज्ञापित कयल जाय त’ सिवाय रंगकला के दोसर कोनो कला - चाहे ओ चित्रकला होइ वा संगीतकला वा नृत्यकला; अपना छोड़ि दोसर कोनो प्रोफेशन मे (आजुक समय मे सेहो ) सपोर्टिभ नहि होइत छैक । सभ कला मात्र सीमित क्षेत्रक लेल उपयुक्त होइछ संगहि व्यक्तिगत बेसी । मुदा रंगकर्म व्यक्तिगत स’ बेसी सामाजिक होइछ, तेँ रंगकर्म के आन कोनो दोसर कला मे श्रेष्ठ कला मानल गेल अछि । हमरा समाजक समाजशास्त्रीक ई अंभिज्ञता या अज्ञानता बूझी, जे सर्व साधारण तक एहि कलाक विशेषता केँ नहि प्रचारित क’ एकर विपरित प्रचार प्रसार कयल गेल । परिणाम हमरा सभहक समक्ष अछि, जे आइ विश्व के एक्कैसम शताब्दी मे होबाक बाबजूद,सूचना तंत्रक क्रांतिक होबाक बादो हमर समाज रंगकला सँ जीविकाक प्रश्न करैत अछि वा एहि क्षेत्रक जानकारी मे अपन असमर्थता देखबैत अछि । आखिर एहन स्थितिकिएक ? ई सवाल हमर अपन समाजशास्त्री आ समाजक अगुवा माननिहार लोकनि स’ अछि । नाटक वा रंगमंचक संदर्भ मे मिथिला समाजक अधिकांश व्यक्ति अखनहु तक अत्यंत असमनजस मे छथि । ई विधा कतेको रास तर्क कुतर्क स’ घेरल अछि । जिनका जतेक कम ज्ञान छनि ओ ओतेक ज्ञानिक अभिनय क’ एहि विधा के अपना हिसाबे तोड़ि-मड़ोरि क’ समाजक आगू प्रस्तुत करैत छथि । एहि रंग विधाक प्रकृति की अछि, ई कोन व्याकरणक आधार पर चलैत अछि एहि स’ संबंधित बहुत थोड़ तथ्य उजागर भेल अछि वा ई कही जे ओहि दिस कम्मे लोकनि के ध्यान गेलन्हि अछि । रंगमंच के आइयो गम्भीरता स’ नहि लेल जा रहल अछि । जे किछु लिखल वा कहल गेल सेहो ततेक ने शास्त्रीय भ’ क’ जे ओ आरो बुझौबलि बनि समाजक बीच व्याप्त रहि गेल । एहि सँ कनी आरो आगू बढ़ी । जँ रंगमंच के मैथिली साहित्यकार लोकनि साहित्यक कोनो विधा हेबाक प्रमाणपत्र दैत छथिन त’ ओहू सभ विधा मे नाट्यकर्म अन्य दोसरा सँ बेसी फलदायी अछि । तकर सबूत देबाक आवश्यकता हमरा नहि बुझना जाइत अछि । एहि एक्कैसम शताब्दी मे होमाक बादो जँ किछु तथा कथित गणमान्य व्यक्ति मे शंकाव्याप्त छनि तँ हुनका समक्ष हम किछु तथ्य, किछु उदाहरण आ किछु प्रश्न प्रस्तुतकरबाक प्रयास करैत छियनि, जाहि सँ हुनका सभहक बीच नाट्यविधाक लेल व्याप्त भ्रम दूर भ’ सकनि । किनको द्वारा ई कहि हीन देखायब जे रंगमंच मे कोनो तरहक जॉब नहि छैक, नाट्यकला केँ पेट भरबाक सामर्थ्य नहि छैक आदि आदि । ई एहि क्षेत्र के गंभीरता सँ अध्ययन नहि होबाक परिणाम थिक । हम आइ एतेक तक कहि सकैत छी, जे एहि तरहक भ्रम केँ मिथिला समाज मे प्रचारित करब एकटा सोचल समझल रणनीति मानल जयबाक चाही । मिथिला मे एहन तरहक काज बेसी संख्या मे ओहन व्यक्ति द्वारा भ’रहल अछि जे अपना आप केँ साहित्यकार घोषित केने छथि । आजुक समय मे कियो सज्जन पूर्णरूपेण ई दावा नहि क’ सकैत छथि जे ओ अपने (वा कोनो फलां धारे बाबू) मात्र कविता वा कथा वा उपन्यास लिखी क’ अपन आ अपन परिवारक भरन-पोषण करैत छथि । अहाँ सभ हमरा जनतब केँ कनि फरिछा सकैत छी त’ कहू जे कवि / कथाकार / उपन्यासकार / नाटककार / शिल्पकार / चित्रकार आदि लोकक अपन एहि कला मे महारथ हेबाक केहन प्रभाव हुनकर समसामयिक काज पर पड़ैत छनि ? की एकटा नीक कवि नीक शिक्षक भ’ सकैत छथि तकर कोन गारंटी अछि । एकटा नीक कथाकार नीक अधिकारी हेबे करताह से के कहि सकैत अछि ? एकटा नीक शिल्पकार वा की चित्रकार नीक वक्ता, प्रवक्ता, अधिवक्ता वाकि नेता हेताह से के दाबा संग कहि सकैत छथि ? प्राय: ई देखल गेलैक अछि ओ मैथिलीए मे नहि दोसरो-दोसरो भाषा मे जे एकटा शिक्षक जँ कविता लिखता त’ नीके लिखताह, एकटा प्रवक्ता कथा लिख देलाह त’ ओ नीके होयत, एकटा अधिकारी कोनो फोटो बनेलाह त’ सभ स’ पैघ चित्रकार कहाब’ लगताह । आ मैथिली मे प्रोफेसर साहेब (जे किनको प्रासाद स’ एहि पद पर आसीन छथि, कोनो प्रतियोगिता परीक्षा वा की यू.जी.सी. आदि स’ चयनित नहि भेल छथि ) त’ सफेद कागज पर किछु घँसियो देताह त’ समीक्षक वा हुनके समगोत्री लोकनिकेँ ओहि मे आर्ट / कविक प्रखरता / कथाक गंभीर कथ्य / उपन्यासक जटिलता / नाटक मे प्रयोगात्मक्ता देखा जाइत छनि । एकर ठीक विपरीत अछि रंगविधा । एकटा व्यक्ति जँ रंगकर्मी छथि वा कि कहियो कम-सँ-कम एक्को महीनाक लेल सघन रूप सँ रंगकर्म केने छथि त’ हुनकर जीवनकप्राय: सभ क्षेत्र मे एकर प्रभाव देखार भ’ जाइत अछि । ई हुनकर जीवनक अंतिम क्षण तक संग रहैत अछि । जँ ओ रंगकर्मी छलथि / छथि त’ ओ छात्रक नजरि मे एकटा नीक शिक्षको हेताह से गारंटी अछि । ओ एकटा अनुशासित अधिकारी, नीक वक्ता, नीक प्रवक्ता, नीक अधिवक्ता वाकि नीक नेता हेताह से कहल जा सकैत अछि । एकटा शिक्षक जँ अभिनय करताह त’ ओ नीके करताह से किन्नौ नहि मानल जा सकैत अछि । एकटा अधिकारी वा प्रोफेसर नीके नाटक लिखताह / नीके अभिनय करताह / नीके निर्देशन करताह तकर संभावना नगन्ये मात्र होयत । उपर्युक्त तथ्य जँ कनियो सत्य लगैत अछि त’ कहल जाओ जे कोन विधा महत्वपूर्णअछि जीवनक लेल; रंगकर्म वा कि कोनो दोसर ? हँ रंगकर्म ततेक ने अनुशासनसिखबैत छैक जे ओ रंगकर्मी अपन जीवनो मे आवश्यक्ता स’ बेसी अनुशासित भ’जाएत अछि । तकर प्रभाव अखन तक मिथिला मे साफ उल्टा भेलैक अछि । कियो किम्हरो स’ अबैत अछि आ एक सिंह नाट्यकर्म केँ मारि चलि जाएत अछि । ई कतौ स’ उचित नहि । बिडम्बना त’ ई अछि जे जाहि विधा पर ई लोकनि अपन अपन तर्क-वितर्क वाकि कुतर्क करैत छथि ओहि समूह मे पहिने सँ रंगकर्म सँ जूड़ल व्यक्ति केँ बजायब आ हुनकर सहमति वा अहमति लेबाक कोनो प्रयोजनो नै महसूस करैत छथि । बंद कोठली मे निर्णय लैत छथि आ सम्पूर्ण समाजक पाई सँ बनल संस्था सभ सँ मोटगर-मोटगर ग्रंथ छापि नुका रहैत छथि । एहन लोकनि केँ लेशमात्र ग्लानि नहि होइत छनि जे नबका पीढ़ी के ओ की द’ रहल छथिन वा जहिया कहियो नवका सभहक समक्ष सत्य ओतैत तखन एहि सभ ग्रंथ पर छपल नामक प्रति ओ सभ की प्रतिक्रिया करतैक । ओ पीढ़ी आजुक पीढ़ी सँ बेसी प्रतिक्रियावादी हेतैक से हमरा सभ के मोन राखक चाही । रंगकर्म एकटा एहन कला अछि जाहिमे सबस’ बेसी जोर होइत अछि ई जे ‘अपना आप के चिनहू/बूझू/जानू’ । जीवनोक यैह मूल मंत्र अछि । अहाँ अपना आप केँ, अपन सामर्थ्य केँ जतेक नीक जेना बूझब अहाँ ओतेक सफल होयब अपन जीवनमे । तेँ अति आवश्यक अहि जे सभ व्यक्तिकेँ एहि बिधा सँ जूड़ि लाभ उठाबय चाहियनि । मिथिला समाज मे रंगकर्मक महत्ता के प्रचारित प्रसारित करबाक अति आवश्यकताअछि । एहि दिस सभ विद्वान केँ आगू अएबाक चाहियनि । गोपाल प्रसाद (लेखक "मिशन मिथिला " केर संयोजक आ ऑनलाइन हिंदी मासिक पत्रिका "समय दर्पण " केर संपादक छथि) मिथिला कवि कोकिल विद्यापति मिथिलाक भूमि अत्यंत प्राचीन कालसँ बौद्धिक क्रियाकलाप आ विवेचन (तर्क-वितर्क) लेल विख्यात अछि । एहि ठामक मैथिली भाषा बड्ड ललितगर अछि सम्प्रति सभ भाषामे अनेकानेक विधाक अन्तर्गत प्रचुर विकास भ’ रहल अछि । मैछिली एहि दौड़ में पछुआएल नहि अछि । पद्यक क्षेत्र मे महाकवि विद्यापति अमर छथि एहि आलेख मेम साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित विद्यापतिक जीवनी केँ संक्षिप्त अंश पाठक लोकनिक लेल प्रस्तुत अछि- “विद्यापति भारतीय साहित्यक एकटा अत्यंत उत्कृष्ट निर्माता छलाह । जाहि कालमे संस्कृत समस्त आर्यावर्त्तक सांस्कृतिक भाषा छलि, ओ अपन क्षेत्रीय बोली केँ मधुर आ मनोरम काव्यक माध्यम बनौलनि आ साहित्यक भाषा जेकाँ ओहिमे अभिव्यक्तिक क्षमता जगा देलनि । ओ एकटा नव ढ़ंगक काव्य-परंपराक आरंभ कयलनि जे उनका लेल अनुकरणीय भेल आ आर्यावर्त्तक एहि भागक एहन कोनो साहित्य नहि अछि जे हुनक प्रतिभा आ रचना कौशलक गंभीर प्रभाव क्षेत्रमे नाहि अबैत हो । ओ उचिते मैथिल कोकिल अथवा मिथिलाक कोयल कहल गेलाह अछि कारण जे हुनक कल-कूजन सँ आधुनिक पूर्वोत्तर भारतीय भाषा सभक काव्यमे वसंतक आगमन भेल । विद्यापति, जिनक आनुवंशिक उपनाम ‘ठाकुर’ सँ घोतित होइत अछि जे ओ अचल सम्पत्तिक स्वामी रहथि, शुक्ल यजुर्वेदक माध्यन्दिन शाखाक काश्यप गोत्रीय मैथिल ब्राह्यण परिवार में जन्म लेने रहथि । दरभंगा सँ लगभग १६ मील उत्तर-पश्चिममे अखनो स्थित समृद्ध गाम विसफी मे एहि परिवारक जड़ि रहैक आ विद्यापतिक जन्मक समयमे ई परिवार ओही गाममे रहैत छल जाही लेल ई परिवार आ वंश विसईवार विसफीक नामसँ जानल जाइत अछि । ई एहन विद्वान राजपुरूष लोकनिक परिवार छल जे मिथिलामे अपन धर्मशास्त्रीय ज्ञानक लेल प्रसिद्ध छलाह आ कर्णाट वंशीय राजा लोकनिक दरबारमे विश्वासयोग्य ओ उत्तरदायित्व पद पर आसीन रहथि । विद्यापति एकटा दुर्लभ प्रतिभा रहथि जे शाश्वत प्रेमक गायकक रूपमे अमर छथि, मुदा संगाहि मनुक्ख आ राजपुरूषक रूपमे अपन व्यक्तित्वक सम्पूर्णताक कारणो ओ कम स्मरण नहि कयल जाइत छथि । जहिया विद्यापतिक जन्म भेलनि ताहि समयमे मिथिलामे एकटा पैघ सामाजिक आ बौद्धिक पुनुरूत्थानक नायक लोकनिक अही तरहक परिवार रहनि, जकर ओ एकटा समर्थ अंकुर रहथि । विद्यापतिक जन्म विसफी नामक गाममे भेल रहानि जे कि हुनक परिवारक वंशधर लोकनिक स्मरणक अनुसार हुनका लोकनिक पूर्वजक डीह ग्राम छलनि फलतः समाजक नव गठनक कालमे बिसफीकेँ एहि परिवारक मूलग्राम मानि लेल गेल आ एअहि तरहेँ ई सभ विसईवार कहयलाह । विद्यापति जीवन भरि विसफीमे रहलाह आ जखन शिवसिंह गद्दी पर बैसलाह तखन राजा शिवसिंह राज्यक प्रति महत्वपूर्ण सेवाक लेले कबि केँ इएह ग्राम (बिसफी) दानमे द देलाखिन । एहि (खैरातक) उपहारक उपयोग करैत विद्यापतिक वंशज बसफिए में ओहि समय धरि रहलाह, जखन कि ३०० बरख पूर्व ओ लोकनि मधुबनीक निकटस्थ गाम सौराठ जाकर बसि गेलाह,जतऽ ओ सभ अखनो विद्यमान छथि । अंग्रेज सभक आगमन धरि ई गाम एहि परिवारक कब्जा में रहल । मैथिलीक महानतम कवि विद्यापति ठाकुर ई. सन १३५० सँ १४० ई. क बेच भेल रहथि ओ पश्चिम बंगालक सीमावर्त्ती बिहार प्रदेशक पूर्वी भूभागमे रहनिहार पचास लाख सँ अधिक लोक द्वारा बाजल जाइत मैथिली भाषा में रचना कयलनि । विद्यापति अपन ८०० वैष्णव आ शैव पदसभ किंवा गीत सभक लेल विख्यात छथि, जकर उद्धार तड़िपत्रक भिन्न-भिन्न पांडुलिपि सभसँ कयल गेल ओ संस्कृत, अवहट्ट (अपभ्रंश) आ मैथिलीक विद्वान रहथि । हुनक गीत सभ रमणीक चारूता आ शालीनताक ललित अंकन आ लद्यु चित्र-रूपक वर्णनसँ परिपूर्ण अछि । रविन्द्रनाथ ठाकुर कहब छनि जे“विद्यापति आनन्दक कवि रहथि आ प्रेमे हुनका लेल जगतक सारतत्व रहनि ।” ओ अपन गीत सभके संगीतवद्धो कयने रहथि, कारण जे ओ शिवसिंह राज्यकालमे ३६ वर्ष धरि राजकवि रहथि । अपन गूजैत आ प्रभावशाली गीत सभक अतिरिक्त ओ ‘पुरूष परीक्षा’, कीर्तिलता, गोरक्ष प्रकाश’, मणिमंजरी नाटिका’, ‘लिखननावली’, ‘दानवाक्यावली,’ ‘गंगा वाक्यावली’, ‘दुर्गाभक्ति तरंगिणी’, ‘विभासागर’, भूपरिक्रमा’, ‘शैवसर्वस्वार’ सन कृतियों केर रचना कयलनि । विद्यापति मैथिलीमे जाहि नवीन धारक सूत्रपात कएलन्हि तकरा समाज आदरक दृष्टिएँ अपनौलक । हुनक रचनाक मिथिलाक संग-संग ओकर समीपर्वर्त्ती प्रान्तहुँमे आदर भेलैक । फल इ भेल जे विद्यापतिक कवि लोकनि हुनक रचनाक आधार पर साहित्य भंडारक श्रीवृद्धिमे योगदान देलन्हि । विषयवस्तु प्रायः सएह रहि गेल जे विद्यापतिक समयमे छल मुदा ओकर चित्रण भिन्न-भिन्न कवि लोकनि भिन्न-भिन्न दृष्टिएँ कयलन्हि । यद्यपि विद्यापतिक किछु समय बाद किछु दिन धरि हमरा लोकनिकेँ मैथिली साहित्यिक सामग्रीक अभाव भेटैत अछि । ओहि समयक लिखल ग्रन्थ उपलब्ध नहि अछि किन्तु साहित्यक स्त्रोत एकदम सुखा नहि गेलैक । साहित्यक धारा कोहुना चलैत रहलैक । तकर प्रमाण हमरा लोकनिकेँ नेपाल एवं आसाममे उपलब्ध नाटक सभसँ होइत अछि । विद्यापतिक पश्चात् नेपालमे अनेक नाटकक रचना भेल जकर लेखक लोकनिमे किछु मैथिल कवि तथा नेपालक राजा लोकनि छलाह । ओहि नाटक सभक भाषा पूर्णतः मैथिली छैक, हँ कतहु-कतहु ओहिमे नेपालमे प्रचलित नेवारी भाषाक प्रयोग भेटैत अछि । विद्यापतिक अनुकरण पर हुनकहि शैली पर हुनकहि भाषामे गीतक रचना होमय लागल तथ अई अनुकरण ततेक व्यापक भेल जे विश्वकवि पर्यन्त एहि अनुकरणमे रचना कयलन्हि मुदा अनुकरण तँ अनुकरण थिक । भाषान्तर भाषी जखन विद्यापतिक भाषाक अनुकरण प्रारंभ कयलन्हि तँ ने ओ विद्यापतिक भाषा रहि गेल आने अनुकरणकर्त्ता लोकनिक भाषा । दुनू मीलि एकटा कृत्रिम भाषाक जन्म देलनि । ओहि परम्पराक अनुयायी छथि जाहि मे कविता केँ मानव-जीवनक सार्वजनीय तत्वक अभिव्यक्ति मानल गेल अछि । प्रकारान्तर सँ कहि सकैत छी जे ई मानवीय जीवनक आदर्श रूप थिक । मनुष्यक चरित्र, भावना आ कार्यक इन्द्रियगम्य आदर्शबिम्ब थिक,आ ई सब ‘मिथ्या’ थिक । श्रृंगार रसक गीत हो वा करूण ओ शांतरसक, विद्यापति वस्तुनिष्ठ छथि आ कखनो अपन व्यक्तिगत अनुभवक आधार नहि लैत छथि । परकीयाक प्रेमक गीतक संग हम नचारीक कोन तरहेँ सामंजस्य कऽ सकैत छी?विद्यापतिक गीत मे एहि तथ्य केँ स्पष्ट करयवला एहेन किछू नहि अछि जे हुनक बीएतल जीवन केँ रेखांकित करैत हो, मुदा हुनक प्रेमगीत कँ हम सभ एहि रूप मे नहि लैत छी । शांत रसक दृष्टिकोण सँ ई मानव-जीवनक सामान्य चित्र थिक । विद्यापतिक गीत विशिष्ट मनोदशाक सृष्टि थिक । कविक रूप मे ओ अपन रूचिक कोनो विषय पर अनुभूतिक तीव्रताक संग लिखि सकैत छलाह । ओ हार्दिकताक अतल तल मे डुबि कऽ लिखैत छलाह । हुनक हदय जाहि रस मे डूबल रहैत छल तेहने गीत ओहि सँ अनुस्यूत होइत छल । हुनक गीत मे व्यक्त भावना संसारक औसत आदमीक सामान्य अनुभव पर आश्रित अछि । तें ई कहब अतिशयोक्ति होयत जे ई कविक जीवनानुभवक परिणाम थिक जे ओ वृद्धवस्था मे पछता रहल छथि । विद्यापतिक सदृश प्रतिहावान कवि मनुष्यक एहि सामान्य दुर्बलता केँ देखि-बुझि सकैत छल जाहि सँ एकर व्यापक प्रभाव पड़ैक । पश्चात्तापक भावना, ग्लानि, जीवनक निःसारता - ई सब शांत रस में अंतर्निहित रूप सँ विद्यापति अपन काव्य मे कयने छलाह, आ हुनक जीवनक ज्ञात तथ्यक आधार पह हम ई विश्वास नहि करैत छी जे ई गीत सब विद्यापतिक जीवनगत वा आत्मनिष्ठ अनुभवक देन छल । अपन श्रृंगार-गीत मे ओ तटस्थ वा वस्तुनिष्ठ छलाह । एहि गीत सब में शांत रसक ओतबे परिपाक भेल अछि जतेक प्रेम-गीत मे श्रृंगार रसक । विद्यापति मानव जीवनक निःसारता आ क्षुद्रताक समान रूप सँ दर्शन आ गहन अनुभव कयने छलाह । एहि गीत सब मे अपना प्रति एक प्रकारक उपेक्षाभावक जे दर्शन होइत अछि से ओहिना कविक वैयक्तिक नहि अछि जेना नायिकाक लेल नायकक प्रेमावेग । विशिष्टक माध्यम सँ सामान्यक चित्रण काव्यक उच्चतम लक्ष्य रहल अछि आ विद्यापति ओकरा विदग्धतापूर्वह प्राप्त कऽ सकलाह ओ यौन-प्रेम हो वा आध्याय्म प्रेम, जीवनक आनन्दक हो वा निःसारता,चंचलता, क्षुद्रता आ निराशा सँ उत्पन्न वैराग्य । संस्कृ काव्यक समग्र सौन्दर्य सँ सम्पृक्त मधुर आ लयबद्ध गीतक रचयिताक रूप मे विद्यापतिक कीर्ति आश्चर्यजनक रूप सँ यत्र-तत्र पसरि गेल । जे केओ एहि गीत केँ सुनलक ओ एकर लयतान सँ मोहित भ गेल । एहि मे व्यक्त भावना एतेक सर्वसाधारण छल जे ओ सौन्दर्यानुभूतिजनित आनन्द सँ अपरिचित सामान्य स्त्री-पुरूष केँ सेहो ओकर अनुभूति प्रदान कऽसकल । एहेन समय मे जखन संस्कृते सुसंस्कृत लोकक भाषा छल आ मिथिला सन क्षेत्र जतऽ संस्कृतक अतिरिक्त अतिरिक्त अन्य कोनो भाषा मे लिखब पवित्रताहरणक सदृश छल, विद्यापतिक ओहि प्रदेशक लोक द्वारा बाजल जायवला भाषा मे लिखबाक साहस आ आत्मविश्वास देखौलनि । ओहि समयक पुराणपंथी पंडित द्वारा लोक-भाषा में लिखबाक कारणें विद्यापतिक तिरस्कार कयल गेल,किन्तु जखन ओ देखलनि जे ओएह काव्य विद्यापति केँ अद्वितीय लोकप्रियता आ अभूतपूर्व कीर्ति प्रदान कयलक अछि तखन उदात्त मस्तिष्कक अन्तिम दुर्बलता’ हुनका विद्यापतिक पदचिन्हक अनुसरण करबाक लेल प्रेरित कयलक । विद्यापतिक नमूना पर गीतक रचना करब मिथिलाक प्रतिभाशाली पंडितक लेल सेहो एकटा ‘फैशन’ बनि गेल । ई सत्य जे ओ विद्यापतिक अनुकृति सँ बहुत आगू नहि बढि सकलाह, मुदा ई प्रक्रिया अखंडित रूप सँ आगू बढ़ैत रहल आ विद्यापति द्वारा स्थापित परंपरा आ बाट पर मैथिली साहित्य विकसित भेल । मिथिलाक बाहर मैथिली साहित्य नेपाल मे लगभग तीन शताब्दी धरि विद्यापति सँ प्रभावित होइत आगू बड़ैत रहल । मिथिलाक कर्णाट राजा सँ अपन वंशक उत्पत्ति मानयवला भातगाँव आ काठमांडुक मल्ल राजा मैथिली साहित्य कें संरक्षण प्रदान कयलनि । ओइनबारक पतनक उपरांत मिथिलाक राजनीतिक अवस्था मैथिलीक विद्वान आ कवि केँ पड़ोसी नेपालक मल्ल राजा सँ संरक्षण मड.बाक हेतु बाध्य कयलक । विद्यापतिक अनुकरण करैत ओ सभ एकटा विशाल साहित्यक निर्माण कयलनि, जाहि मे सब सँ महत्वपूर्ण शुद्ध मैथिली मे लिखल गेल अनेको नाटक अछि । ओ नाटक सभ ओतय नियमित रूप सँ खेलायल जाइत छल । ओ कोनो आधुनिक भारतीय भाषाअ में लिखल गेल प्राचीनतम नाटक थिक अठारहम शताब्दीक मध्य धरि, जखन कि मल्ल शासक केँ हँटाओल गेल छल, मैथिली नेपाल दरबारक साहित्यिक भाषा बनल रहल आ विद्यापति प्रेरणाक एकटा स्रोत । एहि मे सँ अधिकांश साहित्य मे नहि आयल अछि से खेदजनक विषय अछि । आ तेँ ओकरा बारे मे बहुत कम जानकारी अछि,यद्यपि ओ ओतुक्का ग्रंथालय सब मे सुरक्षित अछि । मुदा विद्यापतिक सब सँ सशक्त प्रभाव बंगालक महान कवि सब केँ प्रेरित कयलक आ बंगला साहित्य केँ ओकर प्रारंभिक अवस्था मे संबर्धन कयलक । बंगाल मे विद्यापतिक कथा वस्तुतः बहुत रमनगर अछि । बहुत समय सँ बंगाल आ मिथिला मे सांस्कृतिक संबंध छल आ ताहि समय मे बंगालक पंडित अपन ज्ञान परिष्कृत करबाक हेतु तथा मिथिलाक महान शिक्षक सब सँ ओकरा आधुनिकतम बनयबाक हेतु मिथिला में अबैत छलाह । तखन जखन ओ फेर अपन घर घुरैत छलाह तखन हुनक ठेर पर विद्यापतिक मोहक गीत रहैत छल । चैतन्यदेव आ हुनक संगीत हेतु ई गीत विचित्र रूप सँ प्रभावशाली सिद्ध भेल किएक तऽ सहजिया संप्रदाय सँ प्रभावित भऽ कऽ ओ यौनाचारक माध्यम सँ दिव्य प्रेमक अनुभव करैत छलाह । विद्यापतिक प्रेम-गीत चैतन्य-संप्रदायक भक्ति-गीत बनि गेल आ विद्यापति भऽ गेलाह वैष्णव महाजन । बंगाली वैष्णव मतक एकटा महान प्रवर्त्तक । कीर्त्तन एहि नव संप्रदायक एकटा प्रमुख अंग छल आ विद्यापति सँ पूर्णतः प्रभावित भऽ कऽ अनेक प्रतिभाशाली कवि गीत रचय लगलाह । विद्यापतिक अनुसरण करैत काल ओ विद्यापतिक भाषाक अनुसरण सेहो कैरत छलाह । जेँ कि ओ शुद्ध मैथिली नहि लिखि सकैत छलाह तें हुनक भाषा मैथिली आ बंगलाक एकटा अद्भुत मिश्रण छल जे बाद मे ब्रहबोली कहाबय लागल । चैतन्यदेवक हेतु विद्यापति-एकटा आदर्श बनि गेलाह आ ब्रजबोली काव्य-रचनाक भाषा बनि गेल । जेना-जेना चैतन्यदेवक नवीन संप्रदाय व्यापक होइत गेल तहिना-तहिना विद्यापतिक गीत सेहो ओही संग पसरैत गेल आ उड़ीसा ओ असम तक तथा सुदूर ब्रजभूमि तक विद्यापतिक दिव्य-प्रेमक एकटा महान प्रवर्त्तक मानल जाय लगलाह । गीत भक्तिगीतक प्रतिरूप बनि गेल । बंगाल मे सेहो विद्यापति एहि संप्रदायक एकटा नेताक रूप मे सम्मानित होइत रहलाह आ लोक हुनका बंगाल मे जनमल बंगाली बुझैत रहल । सम्मान प्राप्त करबाक दृष्टि सँ कवि अपन गीतक अंत मे विद्यापतिक भनिता लगबैत रहलाह । कम-सँ-कम एकटा कवि ऐहन छलाह जे अपन सबटा कविता विद्यापतिएक नाम सँ रचलनि । ब्रजबोली मे विशाल साहित्य उपलब्ध अछि जे भारतीय साहित्यक गौरव थिक । जखन हम मोन पाड़ैत छी जे ब्रजबोली मिथिलाक एकटा भाषा छि, जे ओतय जनमल लोक सभक द्वारा प्रयोग मे आनल गेल छल आ तकर प्रेरणा विद्यापतिक प्रेमगीत देने छल, तखन हम एहि अद्वितीय घटना पर आश्चर्य व्यक्त करैत छी आ विद्यापतिक प्रतिभा सँ मुग्ध भऽ जाइत छी । एहि संबंध मे ई उल्लेखनीय अछि जे रवीन्द्रनाथ केँ सेहो हुनक काव्यजीवनक देहरि पर विद्यापति प्रभावित कयने छलाह । ओ ‘भानुसिंहेर’ पदावली लिखलनि जकरा ओ स्वयं मैथिलीक अनुकृति कहैत छथि । एहि तरहें विद्यापतिक युग मिथिला जेकाँ बंगाल मे सेहो १९म शताब्दीक अंत धरि रहल । असमक स्वनामधन्य शंकरदेव आ हुनक शिष्य माधव्देव विद्यापतिक प्रत्यक्ष प्रभाव मे आबि कऽ मैथिली मे लिखलनि । यद्यपि हुनक रचना मनोरंजन नाटकक माध्यम सँ वैष्णवमतक प्रचार करबाक हेतु लिखल गेल छल ; तथापि हुनका प्रेरणा विद्यापति सँ भेटल छलनि, जे लोकक हेतु लिखल गेल रचना मे लोकक द्वारा बाजल जायबला भाषाक प्रयोग कयने छलाह । लोकक द्वारा बाजय्जायबला भाषा मे काव्यानंद केँ व्यक्त आ संचारित करबाक प्रतिभा एतेक लोकप्रिय भेल, काव्याभिव्यक्तिक रूप मे मोहक गीतक उपयोग करबाक रचना-चातुर्य एतेक आकर्षक सिद्ध भेल जे विद्यापति द्वारा स्थापित परंपराक अनुगमन अधिकांश महान कवि कालांतर मे कयलनि । अन्य कविक तऽ कथे कोन, सूरदास,मीरा, तुलसीदास, कबीर सेहो विद्यापति सँ प्रभावित भेलाह भने ओ प्रभाव परोक्षेरूप मे किएक ने पड़ल हो । विद्यापति मैथिल पुनर्जागरणक दीप्ततम देन छलाह । ओ व्यवसाय सँ कवि नहि छलाह । हुनका कतेक प्रकारक रूचि छलनि । हुनक दृष्टिकोण अत्यंत उदार छल । हुनक विचार समय सँ बहुत आगाँ छल । अत्यंत खेदजनक विषय थिक जे हुनक बाद मिथिलाक सांस्कृतिक अधःपतन होइत गेल । परिणाम भेल जे व्यक्तिक रूप मे विद्यापति केँ द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त केँ बिसरि देल गेल आ ओ एकटा पुराण कथा,एकटा उपाख्यान मात्र बनि कऽ रहि गेलाह । मुदा जहिया सँ ओ अपन चारूकातक लोकक लेल मधुर गीत रचलनि, तहिया सँ कविक रूप मे हुनक यश कहियो कम नहि भेलनि । विद्यापति एखनो एकटा कविक रूप मे जीवत छथि आ जीवित रहताह । ओ भारतीय साहित्यक अत्युत्कृष्ट निर्माता रहलाह अछि आ भारतीय साहित्यक इतिहास मे ओहिना अमर रहताह । हिंदी, मैथिली, मिथिला, बिहार ओ मैथिल लोकनि सं अपेक्षा हिंदी केर प्रचार - प्रसार ओ विकासक लेल केंद्रीय हिन्दी निदेशालय निरंतर प्रयासरत अछि| अपन विभिन्न महत्वपूर्ण योजना सभ आ कार्यक्रम सं हिन्दी कें वैश्विक धरातल पर प्रतिष्ठा दिलयबाक दिशामे सार्थक प्रयास क रहल अछि| निदेशालय द्वारा द्विभाषी,त्रिभाषी आ बहुभाषी कोष आ वार्तालाप पुस्तिका सभकें सीडी रूपमे पाठक लोकनि कें उपलब्ध कराओल गेल अछि | अष्टम अनुसूचीमे शामिल प्रमुख भारतीय भाषा मैथिली सं सम्बंधित कोनो कार्यक्रम , मैथिली भाषी लोकनि कें हिन्दी सं जोड़वाक प्रक्रिया ,हिन्दी-मैथिली-अंग्रेजी कोष वा हिन्दी मैथिली वार्तालाप पुस्तिका केर प्रकाशनक हमारा एखन धरि जानकारी नहि अछि| केंद्रीय हिन्दी निदेशालय द्वारा कोनो संविधान प्रदत्त भारतीय भाषाक प्रति सौतेला व्यवहार की न्यायोचित अछि? हम माय सीताक जन्मभूमि मिथिला क्षेत्रक दरभंगा जिलाक निवासी छी| दिल्ली मे विगत १२ वर्ष सं बेसी काल सं पत्रकारिता ओ साहित्य सृजनक संगहि संग एकटा आईटी कम्पनी ''नर्मदा क्रिएटिव प्रा. लि. द्वारा प्रकाशित ऑनलाइन हिन्दी मासिक पत्रिका "समय दर्पण " केर संपादकक रूपमे कार्यरत छी|पटना सं प्रकाशित मैथिली त्रैमासिक पत्रिका ' मिथिला महान " केर प्रबंध संपादकक रूप में सेहो योगदान देने छलहुँ | ओहि कालक्रम में प्रमुख लेखक/ कवि लोकनिक रचनाक संग -संग भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद् सं प्रकाशित पत्रिका " गगनांचल" केर छ्टा आलेखक मैथिली अनुवाद सेहो कयलहुं | " मिशन मिथिला " केर संयोजक केर रूप मे मिथिलाक सांस्कृतिक विरासतक संरक्षण -संवर्धन ओ मैथिली अस्मिताक भान करेनाई ओ जागरूकताक अभियान में प्रयासरत छी| किछु काल पूर्व मिशन मिथिलाक दिस सं केंद्रीय हिन्दी निदेशालय (दिल्ली ) , भारतीय भाषा संस्थान ( मैसूर), साहित्य अकादेमी आ मैथिली -भोजपुरी अकादेमी कें कएकटा मांग पत्र पठाओल गेल | मीडिया में सेहो काले काल मैथिली ओ मिथिलाक विकासक लेल प्रखर स्वर अनुगूंजित कयल गेल | बिहार सरकार मैथिली क विकासमे बाधा उत्पन्न क रहल अछि | इंटरमीडीएटमे पहिने अनिवार्य भाषा क रूप मे मैथिली कें स्थान नहि भेटल मुदा बाद मे ऐच्छिक बिषय केर रूप मे शामिलकय एकर महत्त्व के समाप्त करबाक कुचक्र रचल गेल, जाहि सं अधिकांश छात्र मैथिली क पढाई सं बिमुख भ गेल| ग्याराहमक लेल सरकार द्वारा निर्धारित पोथीक जे नाम देल गेल ओकर प्रकाशन परीक्षा होयबाक मात्र तीन दिन पहिने बाजार मे उपलब्ध भेल जाहि सं बेसी कठिनाई भेल आ मैथिली विषय के घोर आघात लागल | बारहवीं क लेल "तिलकोर भाग-२" केर प्रकाशन सेहो बड्ड बाद मे भेल |इ पोथी नहि त छात्र लोकनि देखलक आ नहि त शिक्षक लोकनि देखलनि कियक त पोथी छपले नहि छल | फरवरी मे एकर परीक्षा भेल आ तखन इ पोथी बाजार मे उपलब्ध भेल | सम्पूर्ण बर्ष बीत गेल , फॉर्म भरल जा चुकल छल मुदा पोथी नहि रहबाक कारणे महाविद्यालय मे एकर पढौनी नहि भेल| एकरा संगे दोसरो पोथी जुडल अछि | बी. पी. एस. सी. पाठ्यक्रम सेहो मैथिलीक लेल उपयुक्त नहि अछि, जाहि मादे प्रश्नकर्ता आ छात्र दुनू के असुविधा भ रहल अछि | राजकमल चौधरी क " ललका पाग " छात्र लोकनि मात्र एकटा कथा ललका पाग पढ़य वा सम्पूर्ण पोथी पढ़य , एकर जिक्र कतहु नहि अछि | पोथीक उपलब्धताक कमी पूर्ण करबामे मैथिली अकादेमी ,साहित्य अकादेमी सक्षम नहि अछि | यू. पी. एस . सी सेहो उटपटंगे अछि | महाकाव्य सम्पूर्ण होयबाक चाही | मात्र दत्तवती क दू टा सर्ग देबाक की तुक अछि ? जखन की एकर पाठ्यक्रम स्नातकोत्तर स्तरक होयबाक चाही , तीन चारिटा महाकाव्यक नाम होयबाक चाही , जाहि सं विद्यार्थी लोकनि कें छूट भेटय| बड्ड रास उच्च स्तरीय रचनाकार लोकनि कें स्थान नहि भेटल अछि , जकर पुर्नावलोकन अत्यावश्यक अछि | यू.जी.सी., यू.पी.एस.सी. कें चाही जे सभ विश्वविद्यालय सभ सं मैथिली क शिक्षकक सूची उपलब्ध होबय जाहि सं बिषय सं सम्बंधित समस्या सभक त्वरित निदान भ सकय | स्नातक प्रथम सत्र मे कला, विज्ञान, वाणिज्य संकाय मे नीता झा केर कथा "बाय -बाय अंकल " कें स्थान द क देवशंकर नवीनक संपादकत्व मे एन.बी.टी. द्वारा प्रकाशित एक सय पचीस टाकाक दू टा पोथी पचास अंकक पढाई लेल बोझ डालल गेल एकर कियो विकल्प नहि देल गेल| प्रतिष्ठाक स्तर पर स्नातकोत्तर स्तरक पोथी राखल गेल अछि जखन की अन्य लेखक लोकनिक उच्च कोटिक पोथी उपलब्ध छल | इग्नू, बी.पी.एस.सी., यू.पी.एस.सी., साहित्य अकादेमी , भारतीय भाषा संस्थान आ यू.जी.सी. केर मैथिलीक कमिटीमे एकटा विशेष कॉकस हाबी अछि | नाम गिनल चुनल अछि - भीमनाथ झा ,नीता झा , अमरजी, रामदेव झा , विद्यानाथ झा विदित,वीणा ठाकुर, अमरनाथ, विभूति आनंद, रमण झा | की ब्रह्मण वर्ग के अतिरिक्त मैथिली मे विद्वान् नहि अछि? दिल्ली केर मैथिली - भोजपुरी अकादेमी सेहो काईस्तवाद मे जकरल अछि| की ऐना मे मैथिली केर सर्वांगीण विकास होयत? प्रश्न इ अछि जे एकरामे कालक्रम अनुसार परिवर्तन कियक नहीं होयत अछि ? एहि लेल मैथिली सं जुडल सभ लोकनि कें जागय पडत |सभ सं नीक होयत जे मैथिलीक शिक्षा देनिहार वा जुडल सभ टा सरकारी वा गैरसरकारी संस्था ऑनलाइन भ जाय , कियक त जखन धरि मैथिली ,नव तकनीक इन्टरनेट सं नहीं जुड़त ओकर चुनौती बढ़बे करत |एहि लेल मैथिल संस्था सभ कें पुरान शैलीक स्थान पर नव राह पर चलय पडत| सामाजिक परिवर्तनक संदर्भमे मैथिलीक दशा ओ दिशा साहित्यिक काज समाजक यथार्थ चित्रण होयत अछि । हमरा बुझवामे मैथिली साहित्य एकरासँ वंचित अछि । मैथिली साहित्यमे सामाजिक परिवर्तनक स्वर किछु आलेखमे भेटैत अछि मुदा एहि तरहेँ साहित्यिक चित्रण पुरातनवादी रचाकार लोकनिकेँ नहि पचैत अछि । वैश्वीकरणक प्रभाव मैथिली साहित्य पर सेहो पड़ैत अछि । मैथिली पत्रकारिताक सिद्धान्तक निर्वहनकेँ फूसि दंभ भरयवला जे कहबालेल सबहक बात करैत अछि एहि सिद्धान्त पर चलबाक साहक किनकोमे नहि छैन्ह । पटना सँ प्रकाशित समय-साल नामक मैथिली द्वैमासिक पत्रिकाक अस्तित्व दीर्घजीविताक लेल मसाला पर टिकल अछि । एहि तरहक साहित्य सृजन दुकानदाररिएटा मात्र अछि । दलविशेषसँ प्रभावित रचनाकार ओ संपादकक लेखनी एखनहुँ ओकर चक्रव्यूहकें तोड़वामे समर्थ नहि अछि । हिन्दीमे दलित साहित्यिक सॄजन नीक जकाँ भऽ रहल अछि मुदा मैथिली साहित्य एखनहुँ एकरासँ परिपूर्ण नहि भऽ सकल अछि जखन एहि वर्गकचर्चा मैथिलीमे नहि हेतैक तखन एहि उपेक्षिक वर्गक समर्थक भाषायी समृद्धिक लेल कोना जुड़त ? गामघरमे सर्वहारा मजदूर लोकनि ओ कथित छोटका जातिक प्राणिये एहि भाषाके वास्तवमे जियाकऽ रखने अछि । मैथिली अकादमीसँ प्रकाशित ओ डॉ. मंत्रेश्वर झा द्वारा रचित कविता संग्रह अनचिन्हार गाम मे एकर झलक दृष्टिगोचर भेल मुदा एकर बादक रचनामे एहि दृष्टिकोणक सर्वथा अभाव भऽ गेल अछि । समाजमे आइ मैथिलीक संदर्भमे प्रचलित अछि जे इ ब्राह्मणक भाषा थिक मुद्दा ओ गप्प दुष्प्रचारटा मात्र अछि । एकटा गंभीर पाठकक रूपमे हम जनैत छी जे जियाउर रहमान जाफरी कैसर रजा, मंजर सुलैमान, मेघन प्रसाद, महेन्द्रनारायण राम, देवनारायण साह,अच्छेलाल महतो, सुभाषचन्द्र यादव, महाकांत मंडल, अभय कुमार यादव, बुचरू पासवान,हीरामंडल, सुरेन्द्र यादव शिवकुमार यादव, बिलट पासवान विहंगम आदि अपन साहित्य सृजनतासँ मैथिली साहित्यके समृद्धि प्रदान करबा लेल सक्रिय छथि । पटनामे मैथिलीक समर्पित संस्था चेतनासमितिकेँ दलित महिला अमेरिका देवी ओ तिलिया देवीक सम्मानक माने की अछि ? वास्तवमे मैथिली भाषायी क्षेत्रक दलित महिलाक सम्मानसँ दलित दर्गक भाषा-भाषी लोकनिक समर्थन अवश्ये भेटत । एहि प्रयासकें अन्य संस्थाकें अपनैबाक आवश्यकता अछि । कतेक आश्चर्यक गप थिक जे नोबेल पुरस्कारक चयन समितिकें एहि वर्गक कृतित्व ओ व्यक्तित्व पर खुजल नजर अछि मुदा मिथिलाओ मैथिलीक संस्था एहि विषय पर आँखि मुनने अछि । बिहार राज्य धार्मिक न्यास परिषदक अध्यक्ष डॉ. किशोर कुणाल एहि विंदु पर केन्द्रित भक दलित देवो भव पुस्तकक रचना कयलनि जकर मैथिली अनुवाद होयबाक चाही । मैथिली साहित्यक बहुआयामी प्रतिभाक उपन्यासकार, कवि, नाटककार आ एहि साहित्यकेँ अपन अपरिमित साहित्यिक रचनाएँ उर्वर बनौनिहर डॉ. ब्रजकिशोर वर्मा मणिपद्म अपन विविध रचना ओ स्वभावगत विशिष्टताक कारणे अत्यंत लोकप्रिय भेलाह । हुनक लोकगाथात्मक उपन्यास मिथिलाक लोकसंस्कृतिकेँ समेटने अछि । लोरिक विजय, नैका बनिजारा, रायराणपाल, राजा सलहेस, लवहरि-कुशहरि, दुलरा दयालक रचना कय मैथिलीक सर्वाणीण विकास, भाषायी समृद्धता ओ लोकप्रियताके बढ़यबामे अपन अविस्मरणीय योगदान देलनि । हुनक उपन्यासक वातावरण किंवा विषयवस्तुमे ओ एहन पात्रक जीवन परिचायक प्रदर्शन कएलन्हि जे अपन-अपन वर्ग समुदाय ओ वर्ण व्यवस्थाक अंतर्गत जीवनयापन करबामे महत्वपूर्ण स्थान रखैत अछि । नैका बनिजारामे वर्णिक समाजक व्यापकतातँ अछिए संगहि धोबी, हजाम, ब्रह्मण, क्षत्रिय आदिक उल्लेख सेहो भेल अछि । राजा सलहेसमे दुसाघक शौर्यगाथाक वर्णन कएने छथि । लवहरि-कुशहरिमे ब्राह्मण द्वारा पूजा-पाठक विधा ओ मील-मलाह आदिक चर्चा सेहो भेल अछि । वीर क्षत्रिय राय रणपालक कथासँ सम परिचिते छी । समाजमे धनी ओ गरीबमे की अंतर अछि, तकर सूक्ष्म परण मणिपद्मजीकेँ छलन्हि । ग्रामीण जीवनयापनकेँ कारणे हुनक लेखनीमे ग्राम्यसमाजक मर्मज्ञता दृष्टिगत होयत अछि । अट्टालिकामे रहनिहार झुग्गी-झोपड़ीमे रहि कए जे चित्रण झोपड़ीक करताह ताहिमे अंतर निश्चित होयत मणिपद्मक रचनाक पात्र यादव, दुसाघ, मलाह, चमार, धोबी,वाणिक आदि चुनलैन्हि तकर कारण सामन्ती शोषणक धोर विरोधी हुनक मानसिकता ओ स्वातंत्र्य प्रेम छल । सामाजिक संरचनाकेँ दृष्टिमे राखि मैथिलीक अपूर्ण भंडारकेँ पूर्ण करबाक सफल प्रयास कयनिहार मणिपद्मक बाद के छथि ? वर्त्तमानमे मैथिलीमे हुनक विलक्षण लेखनशैली, कथामे पात्रक सार्थक निर्वहन ओ भाषाक व्यवस्थित रूप किंचित नहि भेटैत अछि । आइ हुनक शैलीकेँ प्रेरणाश्रोत मानि लेखनी उठयबाक पहलक आवश्यकता अछि । वर्त्तमानमे मणिपद्मक नुकायल, बिसरायल कृतिक पुर्नप्रकाशनक लेल कर्मगोष्ठी, कोलकाताकेँ योगदान प्रशंसनीय अछि । मैथिली प्रकाशकक जिम्मेवारी छनि जे एहि विषयवस्तुकेँ ध्यान राखि ओहन विधाक प्रकाशन करय जकर अभाव थिक । आजुक मैथिलीप्रेमी लोकनिक ध्यान सरगर गीत, नाटक, व्यंग्य ओ शोधपूर्ण आलोचना विधाकेँ प्रति बेसी आकृष्ट भऽ रहल अछि । मैथिलीके लोकप्रिय बनयबाक अभियानमे किछु रचनाकार लागि गेल छथि । आजुक युवावर्गक नब्जकेँ चिन्हबाक उपरान्त हालहिमे मधुकान्त झाक लटलीला बहराएल अछि । निश्चित रूपे एहि कदमसँ मैथिलीक पाठकमे वृद्धि हेतैक । वास्तवमे आइ दूएटा वस्तुक बिक्री बेसी अछि- धर्म ओ काम । धर्मपर मैथिलीमे बेसी रचना भऽ रहल अछि मुदा काम पर एखन धरि दुःसाहस कियो रचनाकार नहि कयलनि । आजुक सन्दर्भमे समाजक सही चित्रण वार्त्तालापकें रुपमे लटलीलामे कयल गेल अछि । हालाँकि एकर सभ रचना पटनासँ प्रकाशित समय साल पत्रिकामे लतिकाक छद्म नामसँ पूर्वहिमे छवि चुकल अछि । एहि आलेखक प्रसंगमे पं. चन्द्रनाथमिश्र अमरक कहब उल्लेखनीय अछि- एहि माध्यमसँ बहुतोक सड़ल अंतरीक दुर्गन्ध बाहर आबि गेल अछि । यथार्थ नामपर नग्नताकें हम पचा नहि पबैत छी । रूढ़िवादिता, अंधविश्वास, छूआछूत ओ संकीर्ण मानसिकताकें विरूद्ध ध्यानमे रखैत आइ मैथिलीमे लेखन होयबाक चाही । स्व. राजकमल चौधरी ओ स्व. प्रभास चौधरीक कृतिकें प्रतिबिम्ब नहि भेटैत अछि । व्यवस्थाक प्रति विद्रोहक स्वर जाहि लेखनमे होयत ओकर स्वागत होयबे करत । आजुक पाठकक मानसिकता बदलैत समयकेँ अनुसारे बदलि रहल अछि । एकर मूल कारण सामाजिक परिवर्तन अछि । एहि परिवतनकेँ दृष्टिमे रखैत जे लेखन नहि होयत ओकरा आजुक पाठक नकारि देत । स्व. हरिमोहनझाक कृति एकर सबसँ पैघ उदाहरण अछि । रसगर, चहटगर, हास्य-व्यंग्य ओ उपेक्षित वर्गक स्वर मैथिली साहित्यमे अनुगूंजित होयत त ओकर लोकप्रियता आ माँग दुनू उत्तरोत्तर बढत. पुरान भाषायी शैलीक स्थान पर नवतुरिया रचनाकारक आलोचनात्मक लेखनकेँ प्रोत्साहन भेटबाक आवश्यकता थिक । गौरीनाथ, अविनाश, पंकज पराशर, श्रीधरम, विमूति आनंद,अमरनाथ, देवशंकर नवीन, मंत्रेश्वर झा, प्रदीप बिहारी आदिक रचना एहि वर्गक प्रतिनिधित्व करैत अछि । संक्षेपमे कहल जायतँ मैथिलीक सर्वागीण विकास तखने होयत जखन एकर सभविद्या पर रचना होयत । एखन धरि किछु विद्या पर बेसी रचना भऽ रहल अछि मुदा दोसर विधा पर अत्यंत उल्प । एहि तरहे मैथिलेक व्यापकता ओ लोकप्रियता स्वप्नहि बुझना जाइत अछि । मैथिलीमे स्वादक अनुसारे रचनाक ढ़ालय पड़तनि तखने ओकरा सही दिशा भेटत ओ दशा सुघरत । वर्त्तमानमे एहि लेल सबसँ बेसी सक्रिय संस्था भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर ओ साहित्य अकादमी दिली तथा स्वाति फाउंडेशन (प्रबोध-साहित्य सम्मान) आदिक मैथिलीक संवर्धन हेतु प्रयास सराहनीय अछि । पंचानन मिश्र मऊ वाजितपुर सँ विद्यापतिनगर परिवर्त्तन-यात्रा- विद्यापति जयन्ती (31 अक्टूबर 09) क अवसर पर मऊ वाजितपुर गाम समस्तीपुर जिलाक अन्तर्गत सुदूर दच्छिन भाग मे बसल अछि। एकर लगीचहि दक्खिनवरिया कोन पर कहियो गंगाक अविरल धार बहैत रहल होएत। आजुक तिथि मे नदीक छारनिटाए बाँचि गेल अछि। गंगाक इएह दियारा क्षेत्र मे इतिहास प्रसिद्ध गाम थिक चौथम। सामाजिक संरचनाक दृष्टिऐ सम्प्रति राजपूत ओ यादव बहुल जाति चौथमक ‘माइनजन’ थिकाह मुदा अत्यन्त पिछड़ल समुदाय मे परिगणित 261 अत्यन्त पिछड़ल समुदाय मे कैक जातिक अवस्थिति सेहो अछिये। अनुसूचित जाति क सदस्यहुँ सँ गाम निमुन्न नहिये अछि। तैयो चोथमक प्रसिद्धि आ ऐतिहासिक महत्त्व रहल अछि महाकवि विद्या-पतिके लऽ कए। किंवदन्ती अछि जे महाकवि अपन निम्न रचनाक उपरान्ते गंगालाभक सद्इच्छा व्यक्त कयने रहथि- सपन देखल हम शिव सिंह भूप बतीस बरख पर सामर रूप। बहुत देखल हम गुरूजन प्राचीन आब भेलहुँ हम आयु विहीन। आओर लोकमान्यताक जनतब कहैछ जे बिस्फी सँ जीवनक महाप्रयाणक चलल महफा एही चौथमे गाम मे महाकविक आदेश सँ राखल गेल छल जतए गंगा अपन मुख्य धार सँ बहराए हिनक नश्वर शरीर के जल स्पर्शक अवसर प्रदान करैत लगले अपन मुख्य धार मे घुरि गेल छलीह। चमथाक निकटस्थ मऊ वाजिदपुर गाम आजुहुँ ओही स्थान पर स्थित अछि। पूर्व मध्य रेलवेक सोनपुर मण्डलक हाजीपुर-बछवाड़ा स्टेशनक पतियानी मे विद्यापतिनगर स्टेशन सँ चौथम बड़ लगीचहि अछि। एहि स्थान के पथ निर्माण विभाग चारि दिस सँ पक्की सड़क सँ जोड़ने अछि। एक सड़क बछवाड़ा मे जा कए राष्ट्रीय उच्च पथ सँ जा मिलैत अछि। दोसर मोहिउद्दीननगर होइत महनार-विदुपुर सँ हाजीपुर धरि गेल अछि। तेसर दलसिंहसराय-नरहन रोसड़ा-बहैड़ी क मार्ग सँ लहेरियासराय के जोड़ैत अछि आ चारिम सड़क सरायरंजन-समस्तीपुर दुनू स्थान केँ छूबैत अछि। मऊ वाजिदपुर गामक एक पैघ भू-खण्ड आब विद्यापतिनगर नाम सँ बूझल जाइछ। तैयो बूढ़-पुरान लोक द्वारा विद्यापतिनगर के ‘वाजिदपुर बाबाधाम’ कहि सम्बोधन कएनिहारक संख्या तऽ अछिये। महाकविक समाधि भूमि होएबाक करणे बरोबर लोकक आबाजाही लागल रहैत अछि तँ विद्यापतिनगर केँ प्रखण्डक स्तर प्रदान कएल गेल अछि जे समस्तीपुर जिलान्तर्गत थिक। एतय ‘विद्यापति भवन’ नामक सामुदाथिक भवन निर्मित अछि। बिहार सरकारक पर्यटन विभाग स्थानक ऐतिहासिकता मे देखैत‘पर्यटन सूचना’ केन्द्र तऽ वनौने अछि मुदा सँ मात्र औपचारिकतावश। राजस्व ग्राम मऊ वाजिदपुर इएह विद्यापतिनगर क्षेत्र मे महाकविक समाधि भूमि अछि। एहि स्थानक विडम्बना रहल अछि जे एकर इतिहासपरक अनुसंधान अन्वेषण आ विवेचन करबाक प्रयोजन कहियो-कोनहुँ स्तर पर नहि भऽ पाओल अछि। हम सभ बिस्फी आ एखनुक विद्यापतिनगरक महाकविक कालजयी व्यक्तित्वक संदर्भ मे स्थानीयताक दृष्टि सँ भौगोलिक परिवेशक संदर्भ मे तखनुक सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य मे अध्ययन करब आवश्यक नहि बूझि सकलहुँ अछि। ते विद्यापति सँ जुड़ल स्थान ‘स्ट्रेफोर्ड ओवेन आन’ नहि बनि सकल अछि। वर्ड्सवर्थ सँ सम्बद्ध स्थान पर कैक तथ्यात्मक आलेख अभाव हम सभ आइ धरि किंवदन्ती लोककथन आ परम्परागत आस्था के स्वीकार करैत रहलहुँ अछि जे तथ्यक निष्पक्षता पर प्रश्न ठाढ़ करैत रहल अछि, लोकमान्यताक विसंगाति के देखार करैत रहल अछि इतिहासक मापदण्ड के आघार भूमि नहि प्रदान कऽ सकल अछि। ते आइ चौथम आ विद्यापतिनगर प्रसंग मे जतेक मुंह ततेक वाणी। विद्यापतिनगर मे महाकविक समाधि भूमि अछि। तकर समीपहिं पीपरक एवं अजोध गाछ एखनहुँ अछि। कहल जाइछ जे चमथा अएला उत्तर ओ एही गाछक नीचां विश्राम कएने रहथि। क्यो ईहो कहैछ जे इएह बुढ़वा पीपर हुनक समाधिस्थक साक्ष्य अछि। जे-सँ। आजहुँ एहि गाछ के महाकवि सँ जुड़ल रहबाक आस्था अछि। ते लोक अपन संतान के संस्कार वृद्धि लेल ताविज एहि मे बन्हैत अछि। जतय महाकवि समाधिस्थ भेल छलाह आ मां गंगा अपन अमोध सलिला मे हुनका जलमग्न कऽ देने रहथिन ततय आइ एक विशाल प्रस्तर मन्दिर अछि। लाल रंगक मंदिर एहि मंदिरक गर्भ गृह मे महाकवि विद्यापति ओ महादेवक प्रस्तर प्रतिमा छेन्हि । दुनू प्रतिमा कारी पाथरक अछि। कहल जाइछ जे ई दुनू प्रतिमा स्वत: स्फुट अछि। एकरा महाकविक महाप्रयाणक दोसर दिन देखल गेल छल। महाकविक एहि विशाल मंदिरक पूर्व भाग मे उत्तर सँ दच्छिन भाग मे चारि छोट-छोट मंदिर अछि। मुख्य मंदिरक वहिर्गमन द्वार सँ बहरएला उत्तर पार्वती मंदिर अछि। श्वेत प्रतिमा मे पार्वती ठाढ़ मुद्रा मे छथि। एकर वाम भाग मे श्वेत पाथरक महावीरजीक विशाल मूर्त्ति अछि। तकर बाद बसहा आ अंतिम काल भैरव क मूर्ति जे कारी पाथरक विचित्र ओ भयावह लगैछ। कला सौष्ठव ओ धार्मिक अनुष्ठानक दृष्टि सँ ई मंदिर एवं एतूका प्रतिमा सभ मूर्तिकला ओ वास्तुकलाक अनुपम उदाहरण अछि। सामने एक नौलखा प्रवेश अछि जे गाम मलकलीपुरक सम्पन्न लोक द्वारा बनाओल गेल अछि। वर्त्तमान विद्यापति मंदिरक संग कैक सत्य कथा संलग्न अछि। कहल जाइछ जे महाकविक महाप्रयाणक बाद पाथरक दू प्रतिमा विद्यापति ओ शिवलिंग स्वत: स्फुट भैल छल। एकर सटले पीपरक नव अंकुर कोपरि सेहो निकलि आयल छल। पछाति एतय धार्मिक कृत्य होमय लागल। तखन दुलारपुर महन्थक तखनुक मैनेजर दिस सँ टीनक छोट-छीन मंदिर बनबौलनि। बाद मे बछवाड़ाक कोनो व्यक्ति ई मंदिर क निर्माण करौलनि। एहि समय दलसिंहसराय थानाक केवटा गामक भेषधारी चौधरी केँ पचहत्तरि वर्षक अवस्था मे मंदिरक कृपा सँ पुत्र भेल छलन्हि। एक बेर तखनुक नोर्थ बंगाल रेलवे एहि मंदिर ओ पीपर गाछ के ध्वस्त करबाक प्रयास कएने छल मुदा ओहि अंग्रेज अफसर के काल कवलित होमय पड़ल छल। मंदिरक निकट एक ब्रजगिरा टीला अछि। कहल जाइछ कोनो मुगलकालीन बादशाह महाकविक समाधिक पशास्ति सुनि क्रोधित भऽ गेल छलाह। मंदिरक प्रशस्ति गाथा सुनि कए एकरा ध्वंस करवाक नीयत सँ ओ हजारक संख्या मे सैनिक पठौलनि। सैनिक सभ पड़ाव दए रहल छल कि भयंकर वर्षाक संग ठनका खसल आ सौनिक विजय नहि भऽ सकल। एहि मन्दिरक परिसरमे शिवराति ओ वसन्त पंचमी क अवसर पर पैघ मेलाक आयोजन होइछ। हमर जनैत विद्यापति सँ जुड़ल स्थान के पर्यटन क दृष्टिऐ विकसित करबाक योजना आइ धरि राज्य सरकार किंवा मैथिली सेवी संस्थाक स्तर पर नहि बनाओल गेल अछि। आइ ‘बुद्धिष्ट सर्किट’ क माध्यम सँ राज्य मे भगवान बुद्ध सँ जुड़ल प्रमुख स्थान के चिन्हित कएल गेल अछि। ‘विद्यापति सर्किट’ मे बिस्फी उगना स्थान आ विद्यापति नगर के जोडि़ पर्यटनक संभावना ताकल जा सकैछ। मिथिलाक कतिआएल सिद्धपीठ आसिनक शारदीय नवरात्र मिथिलाक सामाजिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक अस्मिताक विशिष्टता के जोगाए रखने रहल अछि। अदौ मे ई प्रधानत: घरैया-पूजाक स्वरूप ग्रहण कएने छल तहुखनहो एकरा मे एकात्मकता, संस्कारात्मकता ओ अंश धरि सामाजिकता विद्यमान छल। आब त’ डेगे-डेग ई सार्वजनिक स्थापन भऽ दुर्गा मूर्त्ति पूजाक प्रवर्त्तक मिथिला भूपति राजा कंसनारायणक स्मृति के जग जियार कए रहल अछि। अभिप्राय जे सम्पूर्ण मिथिलांचल मे मूर्त्ति स्थापित कए किंवा प्रस्तर प्रतिमाक पूजाक माघ्यम सँ जीवन के क्रियाशील रखवाक परम्परा रहल अछि। राजेश्वरी (दोखर मधुबनी), गिरिजास्थान (फुलहट मधुबनी), भुवनेश्वरी (भगवतीपुर मधुबनी), भद्र कालिका (कोइलख मधुबनी), चामुण्डा स्थान (पचही मधुबनी), सोनामाइ (जनकपुर नेपाल), योगमित्रा (जनकपुर नेपाल), कालिका देवी (जनकपुर नेपाल), राजेश्वरी देवी (जनकपुर नेपाल), छिन्नमस्तिका (उजान आ मिर्जापुर दरभंगा), वनदुर्गा (खरड़क मधुबनी), सिंधेश्वरी देवी (सरिसव मधुबनी), देवी स्थान (अंधराठाती मधुबनी), कंकाली देवी (रामबागपैलेस दरभंगा), उग्रतारा (महिषी सहरसा), दुर्गास्थान (उच्चैठ मधुबनी), जयमंगला स्थान (मुँगेर), पूरन देवी (पूर्णियाँ), काली स्थान (हाजमा चौराहा दरभंगा), कात्यायणी स्थान (वदलाघाट सहरसा), बासठि योगिनी (सहरसा) आदि (स्त्रोत कुरूक्षेत्रम् अन्तर्मनक: गजेन्द्र ठाकुर) स्थान पर आसिन आ अन्यहुँ समयावधि मे भेल आयोजन भनहि प्रसिद्धि पओने रहल अछि मुदा अन्यहुँ कैक स्थान जतय शताब्दीयों सँ पूजाक आयोजन सेहो इतिहासक अंशहि बूझल जएबाक चाही। एहि संक्षिप्त आलेख मे मेन स्ट्रीम सँ विलग किछु स्थानहिंक चर्च भेल अछि जकर स्थापत्यक महत्ता अछि, लोक परम्परा अलग छवि बनौने रहल अछि, सांस्कृतिक प्रतिमानक गढ़नि कैक रूप मे गढ़ल जाइत रहल अछि। मधुबनी जिलाक फुलपरास अनुमंडलक न्योर गाम सँ डेढ़ किलोमीटर उत्तर सखड़ा मे सखड़ेश्वरी भगवतीक भव्य मन्दिर अछि। ई मन्दिर धार्मिक, सांस्कृतिक ओ सामाजिक एकताक जाग्रत प्रतीक थिक। एकर प्राचीनताक प्रसंग कहल जाइछ जे मिथिलाक कर्णाटवंशीय राजा नान्यदेव जखन शासनाच्युत भऽ गेलाह तऽ अपन कुलदेवी कुर्जा भवानी सँ रक्षार्थ प्रार्थना कयलनि। मां कुर्जा स्वप्न मे हुनका आदेश देलीह जे प्रात: स्नान करैत काल नदी मे जे कोनहुँ वस्तु भेटय ओ उठा कए चोट्टे पड़ा जायब आओर जाहि स्थान पर ई वस्तु खसि पड़य ततहि अपन शासन स्थापित करी। ताहि अनुसारेँ जनकपुर सँ सोलह माइल पश्चिम सिमरौनगढ़ मे कर्णाट वंशक राज्य पुन: स्थापित भेल जे पांच खाढ़ी धरि शासक रहैत गेलाह अन्तिम शासक सक्रदेव सिंह एहि भगवती के यंत्रक सिंहासन पर मन्दिर बनाए स्थापित कएलनि। 1934 ई. क भूकम्प मे मूल मन्दिर त’ खसि पड़ल मुदा अलौकिक शक्तियुक्त सिंहासन आजहुँ विद्यमान अछि। सखड़ेश्वरी वा सक्रेश्वरी भगवती राजा सक्रदेव सिंहक स्मृति मे नामित अछि। मुजफ्फरपुर जिलाक मीनापुर प्रखण्डक पश्चिम छोर पर गण्डकी नदीक कतबइमे पानापुर गाम मे विख्यात भष्मी देवीक मन्दिर अछि। भगवती भष्मीक मूर्त्ति एकहि पाथर सँ तराशि बनाओल गेल अछि जकर दिप्ती आइयो मंद नहि भेल अछि। साइत मिथिलांचल मे इएह एक भगवती थिकीह जनिक सोझाँ पड़वा के पूजोपरान्त मुक्ताकाश मे विचरण करबाक लेल छोडि देल जाइछ। एतूका हवन कुंड् सँ प्राप्त भभूत मे चर्म रोग सँ मुक्तिक विश्वास पाओल जाइछ। पुरातात्विक दृष्टि सँ पूर्णत: उपेक्षित ऐतिहासिक - सांस्कृतिक धरोहर के सुरक्षित रखने दरभंगा जिलाक मनीगाछी प्रखंडक मकरन्दा-भंडारिसम गाम स्थित मां वाणेश्वरी एखनहुँ आस्था एवं विश्वासक केन्द्र थिकीह। मनीगाछी प्रखण्ड मुख्यालय सँ 5 किलोमीटर दक्खिन-पश्चिम कोन मे डीह पर स्थित ई तांत्रिक साधना स्थल सामान्य धरातल सँ अनुमानत: 10 फीट ऊँच अछि। किछु अन्वेषक एहि डीह के कर्णाटवंशीय शासकक प्रशासकीय स्थल मानैत छथि तँ किछु राजा शिव सिंहक गढ़। जे-से। मां वाणेश्वरीक प्रार्दुभावक सम्बन्ध मे कैक मान्यता थिक। कहल जाइछ जे वाण नामक भगवतीक एक उपासकक घर पुत्रीक जन्म भेल। जनिक रूप-गुणक प्रशंसा सुनि तखनुक यवन राजा बलजोडि वाणक पुत्री के अंगीकार करबाक लेल दूत पठौलनि जकर प्रतिक्रिया स्वरूप वाण-पुत्री स्वयं के प्रस्तर मे परिवर्त्तित कए जल समाधि लए लेने छलीह। आजहुँ एहि परिसर मे ओ ‘परसाइन पोखरि’ अवस्थित अछि जाहि मे सँ पाथरक मूर्ति निकालि पूजा-अर्चना आरम्भ भेल छल। एखनुक मंदिर निर्माणक सम्बन्ध मे कहल जाइछ जे महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह पत्नी रानी लक्ष्मीवती द्वारा एहि भगवतीक पूजोपरान्त अपन भाए श्रीनाथ मिश्रक घर पुत्र होएबाक याचना कयने छलीह जे फलीभूत भेल छल आ 1916 ईo मे मन्दिर बनवाओल गेल। पश्चिम चम्पारण जिलाक रामनगर प्रखंडान्तर्गत सोमेश्वर मे मां कालिका देवीक प्राचीन मंदिर अछि। हेवनि मे मंदिरक ऊपर नेपाली झंडा आ मंदिरक प्रवेश द्वार पर नेपाली भाषामे ‘हाम्रो अमर’ शिलापट्ट देखि विवाद उत्पन्न भऽ गेल छल। दरभंगाक बेनीपुर अनुमण्डल मुख्यालय सँ पांच किलोमीटर उत्तर-पश्चिम अवस्थित नवादा गाम मे हयहट्ट देवी दुर्गाधाम सिद्धपीठ मानल जाइछ। एहि पीठक उत्पत्ति शिव प्रिया सती सँ जुड़ल थिक। तंत्र चूडामणि मे सतीक अंग सँ संबंधित कुल 52 शक्तिपीठक चर्च अछि। जाहि मे ईहो परिगणित अछि। देवी भागवत पुराण एवं मत्स्य पुराणक अनुसार सती केर वाम स्कन्ध एतहि खसल छल। कहल जाइछ जे लगभग 600 वर्ष पूर्व राजा हयहट्ट द्वारा एतय जगदम्बाक मूर्ति स्थापित भेल। बहेड़ी प्रखंडक हावीडीह गामक एक साधक प्रतिदिन देवीक साधना-आराधना लेल अबैत छलाह। पछाति वृद्धावस्था मे दुर्बल कायाक कारण भगवतीक प्रेरणा सँ सिंहासन सँ मूर्त्ति उठाकए हावीडीह चलि गेलाह जतय आइयो ओहि मूर्तिक पूजा कएल जाइछ। पछाति हावीडीह सँ नवादा मूर्ति अनबाक लेल संघर्षक स्थिति बनि गेल। अन्तत: नवादाक सिद्धपीठ मे अगवे सिंहासन शेष रहल जकरहि पूजा होइत रहल अछि। दरभंगाक घनश्यामपुर प्रखंड मुख्यालय सँ 8 किलोमीटर पर मां ज्वालामुखीक भव्य मंदिर एहि क्षेत्र मे भगवती डीहक नाम सँ प्रसिद्ध थिक। एतय मांक पिंडीक पूजा कएल जाइछ। कसरौर गामक पनचोभ मूलक ब्राह्मण परिवारक घर केर कुल देवी एकहि ठाम भगवती डीह मे विराजमान थिकीह। कहल जाइछ जे 600 वर्ष पूर्व उफरौल गाम वासी स्वo लखनराज पाण्डेय के हिमाचल प्रदेशक भिंडी जिलाक नगरकोट सँ दैवीय दर्शन भेल छलन्हि। काल क्रमें कसरौर मे पिण्ड बना पूजा होमय लागल । जकरा स्वoपाण्डेयक स्थापना मानल जाहछ। मां ज्वालामुखीक दर्शन सँ रोग निवारणक आस्था व्यक्त कएल जाइछ। मधुबनी जिलाक जयनगर अनुमण्डल मुख्यालय मे प्रान्तक सभ सँ ऊँच दुर्गा मन्दिर अछि। एतय दुर्गा पूजाक अवसर पर जमीनक भीतर रहि कए साधना करबाक परिपाटी अछि। सुपौल बजारक रामनगर दुर्गास्थान मे आब बलि नहि, छागरक परीक्षा लेल जाइछ। जौं छागर परीक्षाक क्रम मे दुर्गा कबूला स्वीकार करैत छथि तखनहि बलि प्रदान होइछ। स्नानोपरान्त छागर के कान पकडि उपर दिस उठा कए पुन: जमीन पर राखि देल जाइछ । छागर सिरा के हिला दैछ तखनहि बलि देल जाइछ अन्यथा नहि। बेगूसराय जिलाक मंझौल अनुमण्डलक विक्रमपुर गाम मे पछिला 400 वर्ष सँ फूल, वेलपात ओ कलशक सहायता सँ माता जयमंगला देवीक प्रतिकृति बना कए दुर्गा पूजा करैत जाइत छथि । लगभग छ:(ह) हजारक आबादीवला एहि गाम मे रोस्टर सिस्टम सँ फूल एवं वेलपात जमा कएल जाइछ। कहल जाइछ जे एतूका लोक जयमंगलागढ़ मे दवीक रूप मे दुर्गाक समक्ष बलि प्रदान करैत छलाह। पहसाराक ग्रामीण मे सर्वप्रथम बलि प्रदान देबाक प्रश्न पर विवाद भऽ गेल। राति मे माता जयमंगलाक स्वप्न भेल। विक्रमपुरहिमे वेलपात-फूल सँ हमर आकृति बना कए पूजा करैत जाइ। चम्पारण जिलाक सेमरा रेलवे स्टेशन सँ 2 किलोमीटर पश्चिमोत्तर एक विशेष देवी शक्तिपीठ, जकरा वनसती देवी स्थान कहल जाइछ। सहरसाक सोनबरसा प्रखण्ड मे वराँटपुर मे चण्डीमाताक मंदिर थिक। मंदिर पर सर्वसिंहदेवक नाम अंकित अछि। चण्डीपूजा सँ पूर्व लोक ‘बुधाँई’क पूजा करैछ। ओ दुसाध जातिक देवांशी पुरुष छल। एहि स्थल के राजा विराटक स्थान मानल जाइछ। मानसी-सहरसा रेलवे खण्डक बीच धमहारा घाट स्टेशनक निकट हरौ कतानेथान शक्तिपीठ अछि जकरा कात्यायनी थान सेहो कहल जाइछ। कहल जाइछ जे महादेवक भार्या सती जखन राजा दक्षक यज्ञ मे जरि गेल छलीह त’ हुनक अधजरुआ लाश अधि महादेव हरिद्वार सँ कामाख्या जाइत काल सती (कात्यायनी) क ‘कत्ता’ एतहिये खसि पड़ल छल जाहि कारणेँ एकर नामकरण ‘कतानेथान’ पड़ल। मधुबनी जिला मुख्यालय सँ 14 कि.मी. पर स्थित कोइलख गाम मे भद्रकाली कोकिलाक्षीक मन्दिर अछि जे हिनक मंदिर सँ पश्चिम प्रवाहित कमला नदी सँ बहराएल छलीह। हिनकहिं नाम सँ गामक नामकरण भेल अछि। मिथिलाक संथाली लोकनि दशहरा मे इरा केर पूजा करैत जाइत छथि। इरा संथालक देवी थिकीह। प्रतिदिन एक-एक इराक अलग-अलग स्वरूप क आराधना दस दिन कएल जाइछ। विष्णु पुराणक अनुसार सँ महर्षि कश्यपक एक पत्नी इरा छलीह जनिका संथाली देवीक रूप मे अदौ सँ पूजैत रहलाह अछि। सम्पूर्ण मिथिलांचल मे भगवती वाराही देवीक मूर्त्ति मात्र बहेड़ामे अछि। जतय आसिन मासमे बेस जमघट रहैछ । दुर्गा पूजाक अवसर पर अन्य उद्देश्यक संगहि ओकर स्थानीय माहात्म्य परम्परागत स्वरूप स्थापत्य विवेचन आदि जौं हमर एजेंडा मे होइ त’ एक सकारात्मक प्रयास मानल जाएत। भीमनाथ झा चन्दा झा, हरिमोहन झा मिलिकऽ कवीशवर चन्दा झा महाप्रयाण कयलनि 1907मे तथा संसारमे हरिमोहनझाक आगमन भेलनि 1908मे। आधुनिक युगक प्रवर्तक अपन काज सम्पन कऽ लेलनि तँ ओहि काजकेँ आर विस्तार देबा लेल मानू ओहि लोक जाकऽ हरिमोहन झाकेँ एहि लोकमे पठा देलनि। कवीश्वर मैथिली साहित्य लेल बहुत-किछु कयलनि, की-की कयलनि तकरा दोहरयबाक प्रयोजन नहि। किन्तु, ई कहब एतऽ प्रासंगिक अछि जे ओ साहित्यकेँ जनताक बीच पसारि देलनि। पसारलनि तँ सभसँ अधिक विद्यापति, तकर दिनक बाद मनबोध सेहो, मुदा चन्दाझा तकरा ओलि-फटीक कऽचुनौटा बना देलनि। झाक समयमे मिथिलामे लेखनक भाषा बड़ अव्यवस्थित भऽगेल छल । एक दिस संस्कृत ह्रासोन्मख भऽ रहल छलैक। एहनामे मिथिलाक जे अपन भाषा छलेक मैथिली, तकरापर भारी आबऽ लगलैक। चन्दाझाक सोझाँ अपन मातृभाषाक सुच्चापनकेँ बचाकऽ राखब सभसँ बड़का चुनौती बनिकऽ ठाढ़ भऽ गेलनि। अपन भाषापर एहन विकट संकटक सामना हुनक पूर्ववतीकेँ नहि करऽ पड़ल छलनि जेहन कवीश्वरकेँ करऽ पड़लनि। जँ अपन भाषे नष्ट भऽ जायत तँ साहित्यक मोल भेनहि को? तेँ ओ मैथिली लेखनमे साहित्यिक मूल्यवत्तासँ कनेको कम नहि, कतहु-कतहु तँ अधिके भाषाक शुद्धतापर सावधान देखबामे अबैत छथि। ताहूसँ आगाँ बढि़कऽ ओ ईहो प्रमाणित करऽ चाहैत छलाह जे मैथिलीमे से सामर्थ्य छैक जे केहनो जटिल भावकेँ मौलिक भंगिमामे सहजेँ अभिव्यक्त कऽ सकैछ। यैह कारण थिक जे ओ स्थानीय लोकोक्ति-कहबी आ देशज शब्दक सौन्दर्य भरि मैथिली भाषाकेँ आर मोहक बना देलनि। सर्वथा विपरीत परिस्थितिमे मैथिलीमे से सामर्थ्य लोकोक्ति-कहबी आ देशज शब्दक सौन्दर्य भरि मैथिली भाषाकेँ आर मोहक बना देलनि। सर्वथा विपरीत परिस्थितिमे मैथिलीकेँ माजि-चमकायस, ओकरा आर क्षिप्र बनाया एक दिस जनसामान्यसँ जोड़बाक आ दोसर दिस अन्य रचनाकारक समक्ष भाषाक आदर्श नमूना प्रस्तुत कऽ लेखन दिस प्रवृत्त करबाक काजक कारणहुँ, केवल ओहू टाक कारणहुँ, ओ युगप्रवर्तकक आसनक अधिकारी छथि। किन्तु से कयलनि पद्यक माध्यमे। ओ समये तेहन छलैक जे जनता गद्य दिस कनडेरियो नहि तकितैक। से ओ भाँफि लेलनि। साहित्यक माने होइक पद्य, जे बहुधा गीतक रूपमे अभिव्यक्त होइक। से गीत गहना बनि गेलैक, ओहन गहना, जकरा काजे-तिहारमे पहिरल जाइक। अनदिना कन्तोड़ीमे बन्द रहैक। चन्दाझा पद्यकेँ ‘गुआ-पन’बनौलनि, जे लोकक अमलमे आबि गेलैक। विषय चुनलनि समसामयिक। लोक-आस्थाक अनुकूल रामायण लिखलनि। रामचरितमानसक प्रचार तहिया मिथिलामे ओतेक छलैक नहि। संस्कृत जनसामान्यसँ दूरे भऽ गेलैक। अंगरेजक दु:शासनसँ सीदित लोककेँ परितोष सेहो ओ देलथिन, महगीक मारिसँ पीडि़तक प्रति सहानुभूतियो देखौलथिन, धर्मक हानि दिस संकेतो कयलथिन। एतावता अपन समाजकेँ भगवत् भजनमे लागल रहि आस्त्कि जीवन जीवाक सन्देश देब ओ अपन कविकर्मक उद्देश्य बनौलनि। मुदा, हुनक कविता काज ओहिसँ बहुत बेसी कऽ गेल,मैथिली साहित्यकेँ नव दिशा दऽ गेल, नवयुगक आगमनक शंखनाद कऽ गेल। ई सभटा भेल काव्यक माध्यमे- पद्यमे, गीतमे। गद्यकेँ ओ छूलनि टा, तकर छविकेँ निखारितथि, लोककेँ गद्योन्मुख करितथि- ततबा पलखति नहि भेटि सकलनि। हुनका जाय पड़लनि। ओ संसार छोडि़ चल गेलाह। आ, अपन ताही छूटल काजकेँ सम्हारबा ले’ लगले हरिमोहनझाकेँ पठा देलनि। 1929मे हरिमोहनझा ‘मिथिला’क माध्यमे मैथिलीमे उतरलाह आ मैथिलीकेँ साक्षर-निरक्षरक जीहपर चढ़ा देलनि, मिथिलाक घर-घरमे पहुँचा देलनि, ततबे नहि, एकर सौरभकेँ भारत भरिमे पसारि देलनि। ई चमत्कार कयलनि ओ गद्यक माध्यमे। लिखिकऽ टाल नहि लगौलनि ओ, मुदा लोकप्रियताक हिमालय ठाढ़ कऽ देलनि। अपन आ मैथिली-दुनूक लोकप्रियताक। चमत्कार भऽ गेल। एहन चमत्कार पूर्वमे कहियो ने भेल छल। विद्यापतिक चमत्कार लोक बुझैत-बुझैत बुझलका, हुनक गेलाक सय-सय वर्षक बाद बुझलक, मुदा हरिमोहनझाक चमत्कार तँ हिनक प्रवेश करितहिँ बुझऽ लागल। हिनक साहित्य समाजमे पसरल दू तरहेँ—एक तँ पाठकक व्यापक समर्थनसँ, दोसर तीव्र विरोधसँ। विरोध कयनिहार मिथिलाक सनातनी पण्डित रहथि, कर्मकाण्डी रहथि, जे हनिमोहनझा द्वारा अपन अन्धविश्वासपर होइत प्रहारसँ तिलमिला उठथि आ ओकर घनघोर विरोध करथि। विरोधक कारणेँ आर ई पढ़ल जाथि । आइ ओ विरोध कालक गालमे समा गेल अछि, आ हिनक साहित्य कालातीत मानल जाय लागल अछि। मुदा एकटा बात एखनो, किछु गोटे छथि जनिका कचोटैत छनि जे हरिमोहनझा अंगरेजी पढ़लनि तँ अंगरेजक समर्थक भऽगेलाह, ओकर सभ बात-विचार प्रिय भऽ गेलनि आ अपना लोकनिक सभ शास्त्र-पुराण फूसिक पुलिंदा बुझाय लगलनि। हुनका लोकनिकेँ दुख बातक छनि जे जतेक ई अपन ‘थाती’क खिधांस कयने छथि ततेक भरिसक कोनो साहित्यमे ओकर अपन साहित्यकार नहि कयने होयतैक। तहिना, जतेक ई देशक दुश्मन अंगरेजक बात-विचारक गुणगान कयने छथि ततेक क्यो अपन दुश्मनक रीति-रेबाजक प्रशंसा नहि कयने होयत। सभसँ पहिने तँ ई जे अंगरेजी पढि़योकऽ ओ अंगरेज नहि भेलाह, अंगरेजक रहल-सहन नहि अपनौलनि। सूट नहि पहिरलनि, सिगरेट-चुरुअ नहि पीलनि, शराब नहि छूलनि, घरमे गंगरेजी नहि चलौलनि। धोती-कुर्त्ता पहिरैत रहलाह, माछ-भात खाइत रहलाह, हास्य-विनोदक गप करैत रहलाह। दोसर, ओ मानैत छलहा जे अंगरेज तावते धरि हमर शत्रु छल जाधरि हमरापर शासन करैत छल। ओ भारत छोडि़कऽ चल गेल, अध्याय लागि गेलैक। शास्त्र, साहित्य, वैज्ञानिक बोध, प्रगतिक ललक-ककरो शत्रु नहि होइत छैक। ओ जँ शत्रुदेशोक छैक ओ नीक छैक तँ तकर प्रशंसा होयबाक चाही, तकर अनुकरण होयबाक चाही। ई नहि जे शत्रुदेशक थिक तँ केहनो नीक थिक, तकरा दिस ताकी नहि, ओकरा छूबी नहि। ओहि दिस नहि ताकब, ओकरा नहि छूअब तँ प्रगति कोना कऽ सकब, संसारक संग डेगमे डेग मिलाकऽ चलि कोना सकब? तहिना, अपन जे वस्तु अछि, शास्त्र-पुराण अछि, तकरा समयक निकणपर रगड़ब नहि, समकालीन सन्दर्भमे तकर पुनर्मूल्यांकन नहि करब तँ की होयत? ओहीमे ओझराकऽ खपि जायब, आगाँ बढि़ नहि सकब। अपन वस्तु खराप अछि, से के कहैत अछि? ओ तँ बहुमूल्य गहना थिक, ओकरा कन्तोड़मे जोगाकऽ राखू। सौंसे देहमे ओकरा छाडि़ लेब तँ अकार्यक भऽ जायब। आन दूसत। हँसत। हरिमोहनझा बस एतबे कहलनि अछि, आ सभसँ स्पष्टतासँ‘खट्टर ककाक तरंग’मे कहलनि अछि। ओहिमे अपन किछु अन्धपरम्पराकेँ उघारिकऽ राखि देलनि अछि आ तकरासभकेँ आजुक सन्दर्भमे अनुपयोगी सिद्ध कयलनि अछि। मुदा, एहि पाछाँ अपन शास्त्र-पुराणपर अनास्था कि अपन संस्कारक प्रति अवहेलना-भाव नहि छनि। एहि बातक छनि- ‘’खट्टर ककाक तरंग’क द्वितीय संस्करणक भूमिकामे कऽ देलनि अछि। जखन पुछल जाइत छनि- ‘’खट्टर कका, एकटा बात कहू? अहाँ ई सभ भितरिया मनसँ करैत छिऐक कि केवल लोककेँ हँसाबक हेतु? ‘’ ताहिपर ओ कहैत छथिन- ‘’आब तोँ हमर सभटा भेद एक्के दिनमे बुझि लेबह? ’’हुनक मुँहसँ बहरायल ई ‘भेद’ शब्दे कहैत अछि जे हुनका ‘वेद’सँ विरोध नहि छलनि। तहिना, पश्चिमक आचार-व्यवहार सभटा नीके थिक-सेहो ई नहि मानैत रहथि। ओकरो खिल्ली उड़ौने छथि। पाशचात्य सभ्यता नीत अनेको व्यवहारपर कते तीक्ष्यण कटाक्ष ई कयने छथि, तकरो प्रमाण ‘खट्टर ककाक तरंग‘मे भेटि जाइत अछि। ‘खट्टर ककाक टटका गप्प’सँ निम्नलिखित उद्धरण प्रस्तुत कयल जा रहल अछि- ‘’खट्टर कका-भोजक अर्थ होइ छल ‘भरि पेट’। पार्टीक अर्थ‘भरि प्लेट’। अर्थात् एक फक्का दालमोट ओ एकटा सिंहारा। ई सिंहारा आबिकऽ सोहारी-तरकारीक संहार कऽ देलक। पहिने अढ़ेयामे चरण अखरिकऽ एक अढ़ैया मधुर आगाँ राखि दैत छल। आब अढ़ाइ चम्मच चीनी एक चुकरीमे दय ऊपरसँ गोमूत्र-रंगक काढ़ा चुआ दैत अछि। हम-हँ, आब तँ सभ ठाम ‘टी’..... खट्टर कका-हौ, यैह टी तँ सभक टीक काटि लेलक। पहिने सौजन्यक अर्थ छलैक अट्ठारहटा बाटी। आब केवल ‘टी’टा रहि गेलैक। आधुनिक सभ्यतामे ठोर दागि दैत छैक, भफाइत इन्होर लऽ कऽ। आचमनीयम् क स्थानमे चायमानेयम्। पहिने विवाहमे टाका भेटैत छलै। आब भेटे छैक ‘टा टा’। टी पियाकऽ टा टा कऽदेतौह। अर्थात् टिटकारी दऽ देतह। आइकाल्हुक सभ्यता बूझह तऽ ट अक्षरपर चलैत अछि। टोस्ट, टी, टेरेलिन, ट्रैंजिस्टर ओ टा टा। स्वाइत लोक टिटिया रहल अछि। हम-धन्य छी, खट्टर कका। अहाँकेँ तँ सभ बातमे विनोदे सुझैत अछि। उनटे गंगा बहा दैत छिऐक। खट्टर कका-हम बहबैत छिऐक कि आधुनिक महर्षि फ्रायडक चेला लोकनि बहबैत छथुन्ह? हुनका लोकनिक सिद्धान्त छैन्ह जे चोला छूटय, लेकिन चोली नहि छूटय। कदम्बसँ कदीमा धरि, सभ प्रतीके सुझैत छैन्ह। इन्द्रियनिरोधक स्थानमे गर्भनिरोध करै छथि। ‘मेन लाइन’ छोडि़ तेहन ‘लूप लाइन’ धैलन्हि अछि जे भावी पीढ़ी कूपमे जा रहल अछि। हम-वास्तवमे आब सभ बात उनटि रहल छैक। खट्टर कका-ताहिमे कोन संदेह। पहिने पुत्रजन्मक उत्सव होइत छलैक, आब जन्मनिरोधक उत्सव होइत अछि। आधुनिक नारी ‘पुत्रवती भाव’क स्थानमे ‘रूपवती भव, लूपवती भव’ आशीर्वाद चाहैत छथि। पहिने स्वामी स्त्रीक माँग भरैत छलाह। आब स्त्री स्वामीक माँग पुरैत छथिन्ह। स्वयं कमाकऽ। कतिपय ‘पति’ मे ‘तँ’ अक्षरक योग सेहो भऽ जाइत छन्हि। पहिलुक चेला चैला चिरैत छल, आब छैला बनल फिरैत अछि। छौँड़ा सभ छीट पहिरय लागल अछि, छौँड़ी सभ सूट कसय लागल अछि। चित्त-पटपर चित्रपट अंकित रहैत छैक। रानी सभ लीडरानी बनि गेलीह। राजनेत्री लोकनि अभिनेत्रीक कान काटि रहल छथि। पहिने अप्सरा होइ छलीह, आब अफसरा होइ छथि। ‘फैशन’ ओ ‘पैशन’ दिनदिन बढ़ल जाइत अछि। ..... तहिना, ‘अंगरेजिया बाबू’ नामक कथामे अंगरेजियतक भद्दा नकलपर जबर्दस्त उपहास कयल गेल अछि। अतएव ई कहब जे हरिमोहन झा अंगरेजी पढि़कऽ अंगरेजी सभ्यतापर लट्टू भऽ गेलाह आ अपन संस्कृतिकेँ निखट्टू मानि लेलनि-सत्यसँ दूर होयत। ई विशेषत: ध्यान देबाक बात थिक जे कवीश्वर भाषाकेँ मजबाक महत् काज जे पद्यक माध्यमसँ कयलनि, तकरा हरिमोहनझा अपन गद्य द्वारा आश्चर्यजनक रूपसँ आकाश ठेका देलनि। मखान खानि ई मिथिला मिथिलाक लोक एतेक सरस, मैथिली भाषा एते मृदुल, एहि ठामक भूमि एते उर्वर, उपवन एते सघन आ हरियर कंचन अछि- तकर कारण की? की ई नहि जे एतऽ जलाशयक आगार अछि, नदी पोखरि डबरा अपार अछि? मिथिलामे समुद्र नहि छै, तेँ एहि भूमिक वासीक स्वभाव नोनछराइन नहि लागत, लोक “अथाह” नहि भेटत। मिथिलामे गंगा बहै छथि,तेँ समाज पवित्र अछि; मधुर जलक प्रवाह चलै छै, तेँ लोकोमे मधुरताक तरंग उछलैत देखब। पानिक एतऽ कमी नहि, लोकक आँखियोमे “पानि” भेटि जायत। कवीश्वर चन्दा झा मिथिलाकेँ नदी-मातृक देश ओहिना नहि कहने छथि- नदी-मातृक क्षेत्र सुन्दर शस्य सौं सम्पन्न समय सिर पर होय वर्षा बहुत संचित अन्न दयायुत नर सकल सुन्दर स्वच्छ सभ व्यवहार सकल विद्या-उदधि मिथिला विदित भरि संसार नदिए नहि, पोखरियोक प्रधानता अछि एतऽ। एहन कोनो गाम नहि, जतऽ दू-चारि दस-बीस छोट-पैघ पोखरि नहि हो। सैकड़ो वर्ष पुरान एहन-एहन सयक धक पोखरि एखनो एतऽ अछि जकरा “दैता पोखरि” कहल जाइछ, माने कोनो दैत्य आबिकऽ ओकरा खुनने छल! मनुक्ख बुते कतहु ओते टा पोखरि खूनल होइ! तहिना, बड़का पोखरिमे “महराजी पोखरि” सभ अछि। छोट-मोट तँ कैयन हजार होयत। तेँ, मिथिलामे जलकरक चलनि बेसी। जलक सर्वप्रधान फसिल थिक- मखान। मखान- ई शब्द ध्यानमे अबितहिँ मिथिलाक अनुपम व्यक्तित्व साकार भऽ उठैछ। एहन व्यक्तित्व जकर जोड़ नहि- अद्वितीय। मखान, कहल जाइछ, स्वर्गोमे नहि भेटैछ। देवतासभकेँ मखानक तस्मै लेऽ, पाग कयल मखानक फोँका लेऽ मन जखन ललचाय लगै छनि तँ मिथिलामे जन्म लै छथि आ जीहकेँ जुड़बै छथि। मिथिलाक एक खास पाबनि थिक कोजगरा- उल्लासक पाबनि, उमंगक पाबनि, लक्ष्मीक आराधनाक पाबनि। ओहि दिन मखान परसबाक प्रथा अछि। से मिथिलेमे अछि। मखान मिथिलाक खास वैशिष्ट्य बनि गेल अछि। तेँ, एहि ठामक साहित्योमे मखान प्रवेश कऽ गेल अछि। अनेक साहित्यकार कोनो-ने-कोनो प्रसंगमे एकर नाम लेने छथि। जाहि रचनामे मखान शब्द आबि गेल अछि, ओ रचना ओहने ललितगर-देखनगर, ओहने कोमल-निर्मल, ओहने हुलसगर-सुअदगर भऽ गेल अछि। कविवर सीतारामझाकेँ भगवानस रामक सुयशक निर्मलता आ महिमाक व्यापकता देखयबाक भेलनि तँ कहि उठला- आश्विनीक चान जकाँ दही ओ मखान जकाँ राम-यश प्रान जकाँ विश्वमे पसरि गेल। कविवर सीतारामझा एक आनो प्रसंगमे, लक्ष्मी-पूजाक नैवेद्यक अंग-रूपमे, मखानक नाम लेने छथि- पूजथि लक्ष्मी-पद नबेद दय मधुर मखानक। अपनहुँ खाथि प्रसाद भाग धनि ताहि किसानक॥ मखानक उल्लेख कयनिहार मैथिली साहित्यकारक कमी नहि अछि, किन्तु एतऽ तीन कविक मात्र चर्चा करऽ चाहब। पहिल छथि कविचूड़ामणि मधुप, जनिक अविस्मरणीय कविता “कोजगराक मखान” अछि। दोसर छथि मंत्रेश्वर झा, जनिक गीतपोथीक नाम थिकनि- “पान एतैए मखान एलैए”। तेसर थिका गोपालजी झा “गोपेश” जे अपन पोथी “मखानक पात” सँ कतेको गोटेक मुहँ पोछऽ चाहलनि। मधुपक “कोजगराक मखान”क विषयवस्तु उच्च वर्ग द्वारा दलितपर कयल गेल अत्याचारपर आधृत अछि। ई कविता वर्ग-वैषम्यकेँ उघारिकऽ राखि देने अछि। मधुप करुणरसक महान कवि थिका। एतऽ एक फोँका मखानसँ कवि करुणाक निर्झरिणी बहा देने छथि। किन्तु, ताहिसँ पहिने उत्सवक जीवन्तता देखल जाय- आबालवृद्ध जुटि रहल- आसमर्दे विदीर्ण जनु युग्म कान मिलि हमहुँ ताहि मानव-निधिमे बहि गेलहुँ न गुनि अपमान-मान, कहुँ दू फोँका, कहुँ एक कतहु नहि सेहो तेहन महगिक विधान, किछु हो, आजुक निशिमे कहुना निश्चय थिक खाइ मखान पान। ता कि ओही भीड़मे एक अवांछित छौँड़ा सन्हिया गेलै। चीन्हि गेलापर छ्रपिटा देल गेलै। कविक नजरि पड़लनि- जाकऽ समीप देखल निगाहि, देखितहिँ हिय कहलक आहि! आहि! गोविन्द त्राहि! ई आबि मखानक हेतु, गेल, नहि पाबि सकल एको फोँका, सौँसे शरीरमे छैक किन्तु ककरो कुकृत्य-निर्मित फोँका! एहि करुण प्रसंगक बाद उल्लासक चर्चा उचित थिक। सर्वाधिक मखानक बखान गीतकाव्यमे भेल अछि। मंत्रेश्वरझाक मखान-प्रेम तँ हुनक गीतपोथीक नामेसँ झलकैत अछि- “पान एलैए मखान एलैए”। कोनो करतेबताक अवसरपर ग्रामवासिनी मिथिलाक मध्यवर्गीय परिवारमे रहरहाँ देखब ई हूलिमालि- बड़की पिसिया कुम्हरौड़ी अँचार बनाबथि बैसल बुढ़बा काका दरबज्जापर पान चिबाबथि ओङठल लछमन एलैए कि राम एलैए टोल-पड़ोसक घर-घर के समाङ एलैए पान एलैए मखान एलैए धीया के बियाहके सामान एलैए। मखान जहिना स्वच्छ कोमल चिक्कन होइछ, मखानक पात तहिना कँटाह खड़खड़ आ मैलमुँह। एहिपर कहबियो प्रसिद्ध भऽ गेल- मखानक पातसँ मुँह पोछब। एकक आकांक्षा जखन दोसराकेँ सोहाइ नहि छै तँ अपन खौँझ एहू तरहेँ व्यक्त करैछ। अर्थात, बड़ नीक-निकुत चाहै छथि तँ बुझथु, तेहन उपाय करबनि जे नोचैत रहिहथि अपन मुँह! एहि कहबीक प्रयोग व्यंग्योमे होइ अछि। शीर्षक- कवितामे कवि तिलक-दहेज लेनिहार बाप, समाजक चरित्रहीन मुँहपुरुष, स्वार्थी नेता, छद्मवेशी भद्रजन एवं समाजकेँ गर्तमे ठेलनिहार जते तत्व अछि, सभकेँ मखानक पातसँ मुँह पोछि देबऽ चाहै छथि। आइ प्रयोजन अछि- जे ओहन-ओहन शिखण्डीक मुँह मखानक पातसँ पोछि दी जे बेटाकेँ विक्रीक वस्तु बूझि कए तिलक-दहेजकेँ बढ़बइत अछि कन्यागत करेज खखोरि कए अपन इष्टदेवताक अर्घ्य चढ़बइत अछि। ................... बन्धु! तेँ आइ प्रयोजन अछि जे समग्र परिवर्तन आनब सर्जन लेल कोनो अवरोधक तत्त्वक मुख मखानक पातसँ पोछि दी जे कार्यपालिका, न्यायपालिका आ विधायिकाक गरिमाकेँ भंग करैछ आ विधि-व्यवस्थामे आस्था रखनिहार शान्तिप्रिय लोककेँ अकारणहुँ तंग करैछ। मखान जे जलतलमे, पंकक परिसरमे जन्म लै अछि, से अपन गुणसँ भगवानपर माला बनि चढ़ै अछि, भोग बनि अर्पित होइ अछि, श्रेष्ठ पदार्थक मापदण्ड बूझल जाइ अछि, ततबे नहि, मुहाबिरा बनिकऽ दुर्जनकेँ चेतौनियो दै अछि, अपन “पात”सँ कुत्सित तत्त्वक मुहोँ पोछै अछि। संसारक एहन दुर्लभ पदार्थ, जे मिथिलामे सुलभ अछि, तकर “मान” कतौ मैथिल साहित्यकार लोकनि नहि देथि! डॉ. बी.झाक धुनपर गुनगुनयबाक हेतु ककर मन नहि मचलि उठैत होयत?— चन्द्रमा उतरल गगनसँ चांदनीसँ नहाउ औ! धान-पान-मखान-पूजित मैथिलीकेँ जगाउ औ! कुमार राधारमण पाकिस्तान मे सेक्स-विचार "बीमार" एन डी तिवारी सं फेर प्रमाणित भेल जे सेक्सवृत्ति नहिं जाइत छैक। स्वर्गीय एन.टी.रामाराव के मुइला पर बड्ड खिस्सा सभ बहरायल छलैक जे कोना ओ प्रतिमाह कतेक हजार टका उत्तेजक दबाई सभ कीनबालेल खर्च करैत छलाह। सुनबा में आयल अछि जे ओही रामाराव पर रामगोपाल वर्मा एकटा फिल्म सेहो बना रहल छथि जहि में अपन बिहारी बाबू मुख्य भूमिका में छथि। देखा चाही जे ओहि फिल्म में एहि एंगल सं किछु नव तथ्य प्रकाश में अबैत अछि कि नहिं ।एम्हर खुशवंतो सिंह अपन बहुचर्चित कॉलम बुरा मानो या भला में स्वीकार कएलन्हि जे ओ एतेक बूढ भेलहु पर एखनो रूमानी कल्पना करैत छथि। सेक्स देया इएह धारणा छैक जे करू आ बुझू खूब मुदा बाजू किछु नहिं। सकदम भेल रहू । ओशो जहिना बजलाह कि आध्यात्मिक सं हटा,सेक्सगुरू के टैग द देल गेलनि। आब ई गप्प दोसर छैक जे आइयो हुनकर संभोग से समाधि की ओरसभसं बेसी पढल गेल भारतीय पुस्तक छैक। कखनो पढबा में अबैत छैक जे सऊदी अरब में सेक्स चर्चा पर आधारित एक कार्यक्रम में शामिल हेबाक कारणें,एंकर के 60 कोड़ा लगएबाक सजा स्थानीय अदालत सुनओलक । सूडान में स्कर्ट पहिरला पर एक टा किशोरी के 50 कोड़ा लगलैक। ईरान में जनानी सभ में मेकअप क कए टीवी पर अएबाक मनाही छैक । देवबंद दारुल उलूम के कहब छैक जे कंडोम के इस्तेमाल उचित नहिं छैक। आओर त आओर,इंडोनेशिया में बनल एक ताजा कानूनक मोताबिक,अगिला साल जं कोनो जनानी के टाइट जींस में देखल जेतैक,त ओकरा ओही ठाम,तुरंत स्कर्ट पहिरएबाक बंदोबस्त कएल जेतैक।एना में के बाजत सेक्स पर। थोड़ बहुत जं बजितो छथि त पुरुखे सभ। मुदा एम्हर एकटा तथ्य प्रकाश में आएल छैक जे जहि पाकिस्तान में तालिबान द्वारा महिला सभहक लेल बुर्का केर अनिवार्यता अथवा एक लिमिट सं बेसी नहिं पढबाक तालिबानी फरमान जखन-तखन जारी होइत रहैत छैक,ओही पाकिस्तान में सेक्स विषयक(यद्यपि एहि में राजनीति पर सामग्री सेहो रहैत छैक) एकटा पत्रिका धमगिज्जर मचा देने अछि। एहि पत्रिक के रूप में पाकिस्तानी महिलालोकनि कें एकटा एहन मंच भेट गेल छन्हि जहि में ओ सेक्स पर खुलि क चर्चा क सकैत छथि। एहिमैगजीन कें प्रबंधक लोकनिक लेल, पत्रिकाक वेबसाइट पर पाठकीय प्रतिक्रिया के सम्हारभ मोसकिल भ रहल छैक। पछिला साल ई मैगजीन लाहौर के दू कन्या- कैला पाशा आ साराह सुहैल द्वारा शुरू कएल गेल छल। नाम छैक- 'चे मैगजीन'। पाकिस्तान में "चे" ओहिना छैक जेना हिंदी में 'च' । 'च' सं बिखिन-बिखन गारि सभ शुरू होईत छैक आ मैगजीन एही 'च' अक्षर सं जुड़ल विडंबना के देखाबए चाहैत छैक। वेबसाइट के कहब छैक जे सेक्स पर बाजब बेजाए बूझल जाइत छैक,तें दैनिक जीवन के अप्रसन्नता, हिंसा, शर्म, तनाव आ सामाजिक कष्ट कें जाहिर करबाक लेल ई मैगजीन शुरू कएल गेल छैक। ओना,मैथिलीयो साहित्य में सेक्स कोनो नव विषय नहिं छैक। कविकोकिल विद्यापति एहन कतेको रचना क गेल छथि जनिका देया महिला प्रोफेसर लोकनि के ऩहिं बुझबा में अबैत छन्हि जे ओ कोना पढाओल जाए। वामरति पर अभिनव जयदेव लिखै छथिः- "किंकिनि किनि-किनि कंकन कन-कन घन-घन नूपुर बाजे रतिरणे मदन पराभव मानल जयजय डिंडिम बाजे" चंदा झा एहि तरहक रचना सभ पर खिसिआएल छलाह आ ओ एहन रचनाकार लोकनिकें "बोतुक" कहबा में संकोच नहिं केलनि। बोतुक अर्थात् एहन जीव जकर दाढी त पाकल जा रहल छैक मुदा उमर के ख्याल नहिं कए संभोगवृतांत में व्यस्त अछि। मुदा सेक्स विषय के लोकप्रियता में संदेह नहिं । ई एकटा तथ्य छैक जे इंटरनेट पर सभसं बेसी सर्च सेक्स विषय पर भ रहल छैक। मोहल्ला ब्लॉग पर सविता भाभी के ल कए बड्ड हो-हल्ला मचलैक। हालहि में कनाडा में भेल एकटा सर्वेक्षण के निष्कर्ष (http://krraman.blogspot.com/2009/12/blog-post_03.html) छैक जे पोर्न सं केओ नहिं बांचल अछि। बाहर गुरू-गंभीर बनला सं की,सभ केओ कखनहु ने कखनहुं कंप्यूटर पर पोर्न देखनहिं छथि। सेक्स संबंधी आलेखक प्रतिक्रिया में कतेको पाठक लिखैत छथि जे पूरा आलेख पढि गेलहुं मुदा कोनो "ठोस" सेक्स-चर्चा नहिं पाबि निराश भेलहुं;समय "खराब" भ गेल। मिथिलो में,एखन कंप्यूटर के पसार ओतेक नहिं भेल छैक,तें किछु गोटे बांचल छथि। पाठकलोकनिक रुचि जं नहिं रहितनि,तं सभ अखबार में किएक रंगीन तस्वीर समेत रोज़ कोनो ने कोनो सेक्स संबंधी खबरि छपितैक?आइयो,समय-साल पत्रिका में जे लतिका जी के लेख छपैत छनि,तेकर पाठकीयता बड्ड छैक। शारदा सिन्हा कतबो कहथु जे अश्लीलता लोकगीतक आत्मा के मारि दैत छैक,मुदा लोकगीत में प्रारम्भहिं सं अश्लीलता केर पुट रहल छैक। विवाहो-दान में जे गीतनाद होइत छैक,तहि में बड़का गामबला सभ त किछु मर्यादा रखैत छथि मुदा कनेक कम परिचय बला गामक अथवा आन जातिक बियाह में गीत-नाद सुनि कए देखियउ। गहे-गहे सेक्स भरल छैक। संसदीय समिति भने कहने हुअए कि स्कूल में सेक्स-शिक्षा उचित नहिं हएत,मुदा कोलकाता विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रोफेसर श्री जगदीश्वर चतुर्वेदी के कहब छन्हि जे "सेक्स" इच्छा के सघनीकरण,रूपान्तरण आ संशोधन करैत छैक। एहि सं सेक्स के दायरा बढ़ैत छैक। सेक्स ,विमर्श के दायरा सं बाहर नहिं हेबाक चाही। एकर गोपनीयता भंग भेलहि सं चुप्पी के कम कएल जा सकैत छैक। फूको के कहब रहनि जे सेक्स कोनो एहन चीज नहिं छैक जकर अहां मूल्यांकन क सकैत छी। बल्कि, सेक्स एहन चीज छैक जकरा निगमित करए पड़ैत छैक । ओकर क्षमता सार्वजनिक होइत छैक। एकरा लेल प्रबंधन प्रक्रिया के जरूरत होइत छैक। सेक्स पर पुलिसिया पहरा ओकरा "टैबू" बना दैत छैक। सम्पूर्ण नेटवर्क सेक्स के इर्द-गिर्द घूमि रहल छैक । कोनो ने कोनो रूप में, थोड़- बहुत फर्क के साथ समस्त किस्म के विमर्श पर ओकरा थोपि देल जाइत छैक। सेक्स के नव दृष्टि सं देखब जरूरी भ गेल छैक । हम सभ अहू तथ्य सं परिचित छीहे जे खासकए मुस्लिम महिलालोकनिक ई समस्या गंभीर छनि जे हुनकर पति खाड़ी आ अरब देश में कतेको साल धरि बीवी-बच्चा सभ के छोड़िकए नौकरी करैत छथि जखन कि इस्लाम में कहल गेल छैक जे पति के अपन पत्नी सं,चारि महीना सं बेसी अलग नहिं रहबाक चाही।सेक्स देया जत्तेक बात हेतैक,ओकर ओतबे स्वत:-स्फूर्त्त उपकरण आगू आओत। एतबा जरूर जे ई काज सीमित आ सतर्क ढंग सं संहिताबद्ध हेबाक चाही। डा. शंकरदेवझा, कबिलपुर, लहेरियासराय, दरभंगा- ८४६००१ मिथिलाक विस्मृत राजधनी देवकुली मध्यकालमे मिथिलामे बहुतो नगरक स्थापना भेल तँ बहुतो नगर विभिन्न कारणसँ उजड़ैत चल गेल । तथापि एहि नगर सभक ध्वंशावशेष आइयो मिथिलाक ताहि दिनुक समृ(कि गौरव-गाथाक गान क रहल अछि । ओइनिवार राजवंशक शासन कालमे एहि वंशक राजा लोकनि अपन अन्य कतोक महत्त्वपूर्ण कार्य ओ उपलब्ध्कि संग-संग कतेको नगरहुक स्थापना कयलनि । प्रशासनिक दृष्टिकोण ओ सुरक्षाके ँ ध्यानमे राखि क एहि वंशक राजा लोकनिक बसाओल अनेकशः नगर आइयो अवशिष्ट रूपमे वर्त्तमान अछि । एही कोटिक एकटा प्राचीन नगर अछिµ देकुली । ई देकुली दरभंगा जिला मुखयालय लहेरियासरायसँ मुश्किलसँ तीन-चारि किलोमीटर दच्छिन-पूब दिसामे लहेरियासराय-हथौड़ी सड़कक पूबमे स्थित अछि । ¯कवदन्ती ओ पुरातात्त्विक महत्त्वक वस्तुसँ युक्त ई गाम कहियो मिथिलाक राजधनी छल जकर स्थापना ओइनिवार वंशीय नरेश देवसिंह तेरहम-चौदहम शताब्दीक संगम कालमे कयने छलाह । ओइनिवार राजवंशक पूर्व राजधनी ओइनीमे छल । मुदा ओइनिवार वंशमे अपनामे मिथिला राज्यक बँटवारा दू भागमे भेलाक कारणे राजधनी ओइनीमे दूनू शाखाक एके संगे रहब सम्भव नहि रहि गेल ते ँ ओइनिवार वंशक संस्थापक कामेश्वरठाकुरक जेठ पुत्रा भोगीश्वरक राजधनी ओइनियेमे रहलनि । मुदा दोसर पुत्रा भवेश्वर प्रसि( भवसिंह अपन राजधानी दरभंगासँ दच्छिन बागमती नदीक तटपर स्थिर कयलनि ।१ भवसिंहक पुत्रा ओ हुनक उत्तराधिकारी देवसिंह जखन राजा भेलाह तखन ओ अपन राजधानी एहि ठामसँ किछु पूब हटि क बसौलनि जकर नामकरण ओ देवकुली कयलनि ।२ देवसिंहके ँ अपन पितासँ उत्तराध्किारमे समस्त मिथिला राज्य प्राप्त भेलनि । किएक तँ ओइनी स्थित भोगीश्वरक पौत्रा राजा कीर्त्तिसिंह निःसन्तान भेलथिन । अतः हुनको हिंस्साक राज्य भवसिंहके ँ भेटलनि । अतएव देवसिंहके ँ समग्र मिथिलाक शासनसूत्रा सम्हारबाक सौभाग्य प्राप्त भेलनि । देवसिंहक विरुद 'गरुड़नारायण' छलनि ।३ देवसिंह सम्भवतः देवकुली राजधनीक अतिरिक्तो अपना नामपर तीन गोट औरो देवकुली नामसँ उपनगरी बसौलनि । बिरौल प्रखंड अन्तर्गत बहेड़ी-सिंघिया मुखयपथपर एकटा हाँसी देकुली अछि जे 'धम' नामसँ प्रसि( अछि ।४ ध्यातव्य अछि जे देवसिंहक पत्नीक नाम हाँसिनी वा हंसिनी छलनि । हाँसी विशेषण वस्तुतः हुनके नामक कारणे अछि । दोसर, दरभंगा-बहेड़ा मुखयपथमे दच्छिन दिस कमला नदीक पश्चिमी तटपर अवस्थित अछि से सम्प्रति देकुली चट्टी नामसँ खयात अछि ।५ तेसर देकुली सीतामढ़ी जिलामे अवस्थित अछि जत भुवनेश्वरनाथ महादेवक प्राचीन मन्दिर छनि । एकर अतिरिक्त एत एकटा प्राचीन गढ़ीक अवशेष अछि जकरा सम्बन्ध्मे किंवदन्ती छैक जे ई महाभारतकालीन राजा द्रुपदक गढ़ थिकनि ।६ अस्तु मिथिलामे देकुली नामक एखन ध्रि जे कोनो स्थान दृष्टिपथपर आयल अछि ताहिठाम प्राचीन नगर, भवन, मन्दिर आदिक प्रचुर अवशेष विद्यमान अछि । उनैसम शताब्दीक उत्तरार्(मे लिखित आइना-ए-तिरहुतमे सेहो तीन गोट देकुलीक उल्लेख भेल अछि जकर प्रसि(ि शिवतीर्थस्थानक रूपमे कहल गेलैक अछि । एहि पोथीक अनुसार एकटा देकुली, विवरा परगनामे अछि जाहिठाम एकटा महादेवक मन्दिर अछि । दोसर देकुली, परगना जखलपुरक अन्तर्गत अछि जाहिठाम द्रव्येश्वरनाथ महादेवक मन्दिर छलनि जे ध्वस्त भ गेल छल । तथापि मन्दिरक खंडहर विद्यमाने छलैक । लेखकक अनुसारे ँ एहि मन्दिरक चौखटिमे एकटा अभिलेख उत्कीर्ण छल जाहिमे एकर निर्माताक नाम सुखदेव साहु अंकित छल संगहि एकर निर्माता द्वारा तेरह बीघा जमीन शिवोत्तरक रूपमे मौजा पिपरामे देल जयबाक सूचना सेहो अंकित छल । आइना-ए-तिरहुतक अनुसार तेसर देकुलीक अवस्थिति परगना-बसारामे छैक जाहि ठाम वृ( वाणेश्वर महादेवक मन्दिर छनि । लेखकक अनुसार वाचस्पतिमिश्र नामक एकटा मैथिल ब्राह्मणक भाय भालिवाणमिश्र एहि महादेवक स्थापना कयने रहथि । हुनका अनुसारे ँ मन्दिर चारि सय वर्ष पुरान अछि । संक्रान्तिक अवसरपर एत बड़ पैघ मेला लगैत छैक ।७ आइना-ए-तिरहुतमे देल गेल उपर्युक्त तीनू देकुलीमे दूटा देकुली कोन अछि से अनुसन्धनक विषय थिक, मुदा तेसर देकुली जाहिठाम वृ( वाणेश्वर महादेव स्थान होयबाक उल्लेख भेल अछि से सम्भवतः आलोच्य देकुलीसँ सन्दर्भित लगैत अछि । यद्यपि एकर लेखकके ँ महादेवक नाम ओ परगना आदिक सम्बन्ध्मे पूर्ण सूचना नहि भेटि सकलनि ते ँ भ्रमवश एकर परिचय देबामे गलती भेलनि । किएक तँ एहू देकुलीक प्रसि(ि एकटा शिवतीर्थक रूपमे अछि । एहि ठाम अभिनव वर्(मान उपाध्याय द्वारा स्थापित एकटा शिवलिंग अछि जे हुनकहि नामपर वर्(मानेश्वर स्थानक नामसँ खयात अछि । सम्भवतः एकरे आइना-ए-तिरहुतमे वृ( वाणेश्वर कहि देल गेल अछि । दरभंगा जिलामे परगना पूरब भीगोक अन्तर्गत मौजा ओ गाम दुहू नामसँ देकुली अछि जकर रकबा ५२५ बीघाक कहल जाइत छैक । ब्राह्मण सहित विभिन्न जातिक लगभग छओ हजार आबादीवला ई गाम कतेक प्राचीन अछि से देखलहिसँ ज्ञात होइत अछि । लहेरियासराय-बहेड़ी सड़कक पूब दिस अवस्थित एहि गाममे प्रवेश करितहिँ प्रतीत होअ लगैत अछि जे कोनो प्राचीन नगरमे प्रवेश क रहल होइ । सम्पूर्ण गाम कोनो पुरान डीहपर अवस्थित बुझाइत अछि । गाममे देकुलीक प्राचीनता ओ ओइनिवार राजवंशकालीन घटनासँ सम्ब( कतोक ¯कवदन्ती सब प्रचलित अछि जकर सम्पुष्टि गाममे यत्रा-तत्रा छिड़िआयल प्राचीन राजचिर् ओ पुरावशेष सबसँ होइत अछि । देकुली ओइनिवार वंशक राजधनी छल जकरा देवसिंह बसौने रहथि एहि बातक समर्थन मिथिला इतिहासक आद्य संग्राहक चन्दाझा ;१८३१-१९०७द्ध८, म.म. परमेश्वरझा ;१८५६-१९२४द्ध९, म.म. मुकुन्दझा बखशी ;१८६९-१९०७द्ध१०, रायबहादुर श्यामनारायणसिंह११, पी.सी. रायचौध्ुरी१२, डा. उपेन्द्रठाकुर१३ प्रभृति इतिहासकारलोकनि कयलनि अछि । स्वभावतः ई जिज्ञासा भ सकैत अछि जे राजधनीक हेतु देवसिंह एहि परिसरक चुनाव किएक कयलनि । एहि जिज्ञासाक उत्तर एहि परिसरक भौगोलिक बनाबट दैत अछि । पूर्वमे एहि गामक उत्तर, पच्छिम ओ दच्छिन होइत एकटा नदी बहैत छल जकरा सम्प्रतिमे कृष्णमंगला कहल जाइत छैक । एहि नामक नदीक सम्भवतः एखन ध्रि कतहु उल्लेख नहि भेटैत अछि । नदी आब मृत भ चुकल अछि, मुदा एकर सिरखार एखनहुँ विद्यमाने छैक । ई नदी एहि परिसरके ँ तीन दिससँ प्रायद्वीप जकाँ घेरने छैक । सम्भवतः ई नदी बागमतीक पुरान धर छल जकर चिर् लहेरियासराय शहरमे एखनहुँ छैके जे कबिलपुर ओ डरहार होइत आगाँ जा क दच्छिन मुहे ँ घुमि गेल आ ओहिठामसँ देकुलीक सीमामे पहूँचि पुनः पच्छिम दिस घुमैत आगू जाय दच्छिन-पूब मुँहे घुमैत कमलामे जा क मिलि जाइत अछि । देवकुली नगरक सुरक्षाक लेल एहि नदीक उपयोगिता ओ नदी तटवर्त्ती परिसर देखिए क देवसिंह एकरा राजधनी बनौने होयताह । ओना देकुलीसँ पूब एकटा प्राचीन स्थान अछि जे सकरी डीहक नामसँ जानल जाइत अछि । झिटुका, ईंट आदिसँ भरल एहि डीहक सम्बन्ध्मे कहल जाइछ जे ई ओइनिवारसँ पूर्व मिथिलापर शासन कयनिहार कर्णाटवंशीय राजा शक्तिसिंह ¯कबा शक्रसिंहक डीह छलनि । तात्पर्य यैह जे देकुली परिसर पूर्वहिसँ निवास स्थानक योग्य बुझल जाइत रहल अछि । देकुलीक उत्तरमे कृष्णमंगला नदीक कछेड़पर एकटा ऊँचगर डीह सन जमीन अछि जकरा स्थानीय लोक नरेना बाध् कहैत छैक । ई नरेना शब्द कदाचित् ओइनिवारवंशीय राजा लोकनिक विरुद नारायणक विकृत रूप हो तँ कोनो आश्चर्य नहि । नरेना पर सघन खड़होरि अछि । गामक लोकक कहब छनि जे देकुलीमे जे मुखय डीह अछि ताहिमेसँ अनेक बेर पाथरक जाँत, उक्खरि आदि बहरायल । पुरान ईंटक देवालक अवशेष सभ छल जकरा लोक नष्ट क देलक । डीहक एकटा अंशके ँ हथिसार कहल जाइत अछि । गाममे कतोक प्रस्तर स्तम्भ खण्ड सब यत्रा-तत्रा पड़ल अछि । सम्भवतः एकर उपयोग भवन निर्माणमे कयल गेल होयत । गामक उत्तरपूर्व अर्थात् ईशान कोणमे जे प्राचीन वर्(मानेश्वर स्थान अछि ताहिमे दूटा कारी रंगक शिल्पित खण्डित प्रस्तर स्तम्भ पड़ल अछि । एकटा एहने तरासल, खत बनायल प्रस्तर खण्ड रामललाझा अधिवक्ताक बारीमे आ दोसर पूर्व मुखिया राजाबलीझाक घरमे बन्द राखल अछि । गाममे कमसँ कम सातटा पोखरि अछि जाहिमे सबसँ पुरान ओ गहींर पोखरि गामक दच्छिनमे अछि जकरा पतोरिया पोखरि कहल जाइत छैक । गामक लोकक अनुसार एहि पोखरिमे एक बेर पानि कम भेला उत्तर एकटा विशाल शिलाखंड देखल गेल छलैक जकरा कतबो प्रयास कयलोपर बहार नहि कयल जा सकल । पहिने एहि पोखरिक मोहार ततेक ऊँच छलैक जे नीचाँसँ पोखरि नहि देखाइत छलैक । वर्त्तमानमे मोहारक माटि काटि क हटा देल गेलैक अछि । ¯कवदन्ती अछि जे देकुली डीह नामसँ बीच गाममे जे स्थान खयात अछि ओत पहिने राजभवन छलैक आ राजभवनसँ पतोरिया पोखरि ध्रि एकटा सुरंग बनल छल । राजपरिवारक महिला लोकनि ओही सुरंग होइत पोखरिमे स्नान करबाक हेतु अबैत छलीह । निश्चित रूपसँ देकुलीमे प्राचीनताक बहुतो चिर् विद्यमान अछि । देवसिंहक राजधनी होयबाक कारणे ई मानल जयबाक चाही जे एही नगरमे ओ स्वर्णतुला महादान ओ गजरथ महादान सन प्रसि( अनुष्ठानक आयोजन कयने होयताह ।१४ ईहो मानल जयबाक चाही जे शिवसिंहक राज्यारोहण एही नगरीमे भेल होयतनि । संगहि ईहो कहबामे तारतम्य नहि जे महाकवि विद्यापतिक चरण एहि नगरीमे पड़ले होयतनि । एहि नगरीमे रहि विद्यापति अपन कोमलकान्त पदावलीक बहुतो अंशक रचना कयने होयताह । शिवसिंहसँ पहिने देवसिंहक आश्रयमे रहल विद्यापति अपन कतोक पदमे देवसिंहहुक नाम लेने छथि । प्रमाणस्वरूप देखल जा सकैत अछि विद्यापतिक किछु पदक भनिता अंशµ भने कवि विद्यापति, अरे वर जउवति मध्ुकरे ँ पाउलि मालति पुफलली । हासिनि देवि पति देवसिंह नरपति गरुड नरा×ोन रघर्ैें भुलली ॥१५ विद्यापति भूपरिक्रमा नामक ग्रन्थ देवसिंहहिक आगासँ लिखने छलाह ।१६ देवसिंहक राजत्वकालक समयमे तिरहुतपर दिल्ली ओ बंगालक मुसलमान शासक द्वारा संयुक्त रूपसँ हमला कयल गेल छल । एहि यु(क नेतृत्व शिवसिंह कयने रहथि, से विवरण विद्यापति रचित कीर्त्तिपताकासँ प्राप्त होएत अछि । एहि आकमर्णसँ देकुली राजधनी पर कोन तरहक प्रभाव पड़ल ¯कवा ई यु( कत लड़ल गेल से सूचना नहि भेटैत अछि । मुदा ओ यु( कतेक भीषण छथि ओ देवसिंहक सैन्य शक्ति कतेक सबल ओ संगठित छलनि तकर विस्तृत वर्णन कीर्त्तिपताकामे भेल अछि ।१७ कीर्त्तिपताकामे पक्ष-विपक्षक कुल एकासी गोट ऐतिहासिक व्यक्तिक नामोल्लेख भेल अछि । जाहिसँ समकालीन राजनीतिमे ओइनिवार राजवंशक पराक्रम ओ ओकर राजनधनी देवकुलीक गरिमापर प्रकाश पड़ैत अछि । संगहि ओहि यु(मे तिरहुतक विजय भेल छल । ओ दिल्ली तथा बंगालक सेना अपन समस्त शक्ति गमा पीठ देखा मैदानसँ भागि गेल छल । अपना समयमे अपराजेय बूझल जायवला दिल्लीक सुल्तान ओ ओकर सहयोगी बंगालक शासक अपमानजनक पराजय एकटा आश्चर्यजनक घटनाक रूपमे इतिहासक पृष्ठमे अंकित भ गेल । विद्वालपतिक पुरुष परीक्षाक अन्तमे तथा विद्यापतिके ँ देल गेल विस्पफी ताम्रपत्रामे गजनी ओ गौड़ ;बंगालद्धक शासकके ँ परास्त कयनिहार विजेताक रूपमे शिवसिंहक प्रशस्ति कयल गेल अछि ।१८ निश्चित रूपसँ एहि ऐतिहासिक तथ्य सबसँ जानल जा सकैछ जे अपना समयमे मिथिलाक राजधनी देवकुली कतेक उतार-चढ़ावके ँ देखलक, कतेक घटनाक ओ साक्षी बनल । देकुलीक ऐतिहासिक महत्त्व तँ अछिहे संगहि एकर महत्त्व धर्मिक दृष्टिएँ सेहो अछि । तकर कारण अछि एहि गामक उत्तर-पूर्वमे अवस्थित प्रसि( वर्(मानेश्वर स्थान । गामक लोकमे ¯कवदन्ती प्रचलित अछि जे ई वर्(मानेश्वर महादेव अंकुरित शिवलिंग थिकाह । ओइनिवार राजवंशक आश्रित एकटा वर्(मान नामक राजपंडितके ँ एहि शिवलिंगक दर्शन भेलनि । ते ँ हुनके नामपर एकर वर्(मानेश्वर नामकरण भेल । के छलाह ई वर्(मान ? ई जिज्ञासा स्वाभाविक रूपसँ होइत अछि । मिथिलामे दूटा वर्(मान भेल छथि । पहिल जनिका वृ( वर्(मान कहल जाइत छनि से सरिसबे छाजन मूलक गंगेश उपाध्यायक पुत्रा ओ प्रसि( नैयायिक रहथि । हिनक स्थिति काल तेरहम शताब्दी मानल जाइत छनि ।१९ दोसर वर्(मान उपाध्याय छलाह बेलौ ँचय मूलक ब्राह्मण जनिक पिताक नाम भवेश ओ माताक नाम गौरी छलनि । र्ध्मशास्त्राक पंडित एहि वर्(मानक विशेषण अभिनव छनि ।२० अभिनव वर्(मान र्ध्मशास्त्रा विषयक अनेक ग्रन्थक रचना कयलनि जाहिमे गंगाकृत्य विवेक, गया प(ति, दण्ड विवेक, द्वैत विवेक, परिभाषा विवेक, श्रा( प्रदीप, स्मृति तत्वामृत अथवा स्मृति तत्त्व विवेक, स्मृति तत्त्वामृत सारो(ार, स्मृति परिभाषा, जलाशयादि वस्तुविध्ि इत्यादि प्रसि( छनि ।२१ अभिनव वर्(मान विद्यापतिये जकाँ दीर्घजीवी भेलाह । ओइनिवार वंशक राजादेवसिंहसँ लक भैरवसिंह पर्यन्त ध्रि ई र्ध्माध्किरणिक ;न्यायाध्किारीद्ध पदके ँ सुशोभित कयलनि ।२२ यैह अभिनव वर्(मान उपाध्याय राजधानीक रूपमे देवकुली नगरी बसलाक बाद वर्(मानेश्वर महादेवक स्थापना कयलनि । सम्भव थिक जे वर्(मान एही देवकुली राजधनीमे रहि अपन धर्मशास्त्रा विषयक कतोक ग्रन्थक रचना कयने होथि । एहि वर्(मानक खुनाओल एकटा पोखरि नारी-भदौन गाममे एखनहुँ विद्यमान अछि । मठियाही नामसँ प्रसि( एहि पोखरिक पनिझाओ तेरह बीघामे छल । पोखरिक संग वर्(मान एकटा विष्णुक मन्दिर सेहो बनबौलनि जे कालान्तरमे ध्वस्त भ गेल ।२३ ओहि मन्दिरक एकटा प्रस्तर स्तम्भ पूर्वमे हाटी कोठीमे राखल छल जकरा पछाति उठा क लक्ष्मीश्वर सिंह संग्रहालय, दरभंगामे आनि क राखल गेलैक । एहि स्तम्भमे तिरहुतामे दू पाँतीमे एकटा अभिलेख उत्कीर्ण अछिµ जातो वंशे विल्वप×चाभिधने धर्म्माध्यक्षो वर्(मानो भवेशात् । देवस्याग्रे देवयष्टि ध्वजाग्रारूढ़ं कृत्या स्थापयद्वैनतेयम् ॥ पन्द्रहम शताब्दीमे मिथिलाक राजधनी देवकुलीमे स्थापित वर्(मानेश्वर महादेवक मन्दिर कोन रूपक बनल छल होयतनि तकर कोनो प्रमाण नहि अछि । मुदा उनैसम-बीसम शताब्दीक सन्ध्किालमे देकुली ओ वर्(मानेश्वर स्थानक स्थिति कोन तरहक छल तकर विवरण म.म. परमेश्वरझा निम्नरूपक देने छथिµ देवसिंह अपना समयमे...दड़िभंगा कोटसँ दक्षिण एक कोशसँ किच्छु उपर देवकुली ;देकुलीद्ध नामक राजधनी बसौलन्हि ओहिठाम एखन पर्यन्त अत्यन्त उच्च डीह अछि जाहिपर साध्रण बस्ती सम्प्रति बसल अछि । ओह बस्तीक ईशानकोण स्थानमे स्मार्त्त निबन्ध्कर्त्ता र्ध्माध्किारी अभिनव वर्(मान उपाध्यायक स्थापित महादेव 'वर्(मानेश्वर' नामक छथि हुनक मन्दिरमे प्राचीन समयक जे एक-दुइटा पाथरक खण्ड पड़ल अछि से देखैक योग्य अछि यद्यपि प्राचीन मन्दिर तँ भग्न भय गेल परन्तु अपरपर केओ धर्मिक ओकर जीर्णो(ार करौलन्हि अछि । एहि स्थानमे मकर ओ शिवरात्रिामे मेला होइत अछि ।२४ परमेश्वरझा मन्दिरक जे विवरण देलनि अछि से मन्दिर आब नहि अछि । तिरहुत स्थापत्य शैलीमे गुम्बदाकार गर्भगृह ओ गजपीठाकार बरामदावला मन्दिर १९८८क भूकम्पमे क्षतिग्रस्त भ गेल । पश्चात् ओहि मन्दिरके ँ तोड़ि ओहि स्थानपर वर्त्तमानमे नवीन मन्दिर बनाओल गेल अछि जे १२८ पफीट ऊँच अछि तथापि ओहिमे स्थापत्यक ने तँ कोनो चमत्कारे अछि आ ने देशज शिल्प आ सौन्दर्ये । जेना परमेश्वरझा अपन विवरणमे एहि मन्दिरमे एक-दूटा पाथरक खण्ड राखल होयब लिखलनि अछि से औखन पर्यन्त मन्दिरमे विद्यमान अछि । एकटा शिल्पित पाथर खण्ड मन्दिरक भीतरमे अछि जकर पूजा कयल जाइत अछि । दोसर एकटा नमहर स्तम्भ खण्ड मन्दिरक पूब दिस परिक्रमामे राखल अछि । मन्दिरमे मध्यमे जलढरी सहित कारी पाथरक एकटा शिवलिंग स्थापित अछि जे पफर्शसँ लगभग डेढ़ पफीट नीचाँ कुण्डमे अछि । शिवलिंगक शीर्ष भाग खण्डित अछि । बुझना जाइत अछि जे एहिपर कहियो कोनो धरदार अश्त्रासँ प्रहार क एकरा विकृत क देल गेल हो । मन्दिरमे दू गोट औरो शिवलिंग बिना जलढरीक स्थपित अछि जे रंग ओ आकार-प्रकारमे प्रधन शिवलिंगक सदृशहि अछि । मन्दिरक भीतर पुबरिया देबालसँ सटा क पाथरक नन्दी समेत कतोक टूटल-भाघल मूर्त्ति सभ पतियानीसँ राखल अछि । मन्दिरक उतरवरिया देवालमे तीनटा खाना बनल अछि आ तीनूमे तीनटा प्रस्तर मूर्त्ति जड़ल अछि । कारी पाथरसँ बनल एहि तीनू मूर्त्तिक अवलोकन कयला उत्तर देखल जाइछ जे पहिल मूर्त्ति गणेशक थिकनि जकर आकार तीन ग डेढ़ पफीट अछि । प्रतिमा अलंकृत ओ समानुपतिक अछि । गणेशक आयुध् ओ वाहन इत्यादि स्पष्ट छनि । मूर्त्तिक सूँढ़ खण्डित अछि । दोसर मूर्त्ति भगवतीक थिकनि जकर आकार अढ़ाइ ग डेढ़ पफीट छैक । इहो मूर्त्ति आकर्षक अछि, तथापि एकरहु अंग-भंग भेल छैक । तेसर मूर्त्ति सूर्यक थिकनि जकर आकार दू ग सवा पफीट छैक । ई मूर्त्ति अभग्न अछि । सात घोड़ासँ युक्त रथपर ठाढ़ सूर्य, पैरमे बूटदार जूता, माथपर ईरानी टाइपक टोपनुमा मुकुट, सारथी अरुण, उषा ओ प्रत्युषा आदि अपन समस्त सहयोगी, आयुध् ओ उपकरणसँ सुसज्जित । एहि तीनू मूर्त्तिक गढ़नि ओ शिल्प पाल ओ कर्णाट शैलीसँ किछु भिन्न देखना जाइछ जकरा ओइनिवार शैलीक नाम देल जाय तँ कोनो अनुचित नहि होयत । उपरिवर्णित तीनू मूर्त्ति एहि शिव मन्दिरमे कोना आ कतसँ आयल तँ एहि सम्बन्ध्मे देकुली ग्रामवासीक कहब छनि जे एक बेरक बड़का रौदीमे गामक सबटा पोखरि सुखा गेल रहैक । ताही क्रममे गामसँ दच्छिन स्थित पतरिया पोखरिक उड़ाहीक क्रममे गणेश, भगवती, सूर्यक प्रतिमाक संग-संग बहुतो टूटल-भाँगल मूर्त्ति सब बहरायल छल जकरा सबके ँ आनि क वर्(मानेश्वर स्थानमे राखि देल गेलैक । विभिन्न देवी-देवताक एहि मूर्त्ति सबके ँ देखलासँ मिथिलाक पऋचदेवोपासनाक परम्पराक स्मरण होइत अछि । मिथिलामे कोनो यज्ञकर्मक आरम्भमे पऋचदेवताक पूजा कयल जाइत छनि । ई पऋचदेवता छथिμ गणेश, सूर्य, भगवती, विष्णु ओ महादेव । दिनमे जँ पूजा भेल तँ सूर्यादि पऋचदेवता कहि सूर्यक प्रतिमा भगवतीक प्रतिमा गणेशक प्रतिमा वऋक आ रातिमे गणपत्यादि प×चदेवता कहि क । मिथिलाक अपन एही समन्वयवादी परम्पराक अनुसार एहि क्षेत्रामे प×चायतन मन्दिरक प्रचलन रहलैक अछि । अर्थात् उपर्युक्त पाँचो देवताक मूर्त्तिक स्थापना कयल जाइत रहलैक अछि । निश्चित रूपसँ देवकुली राजधनीमे कहियो प×चायतन मन्दिर रहल होयत जाहिमेसँ चारिटाक मूर्त्ति तँ भेटैत अछि, पाँचम देवता विष्णुक मूर्त्ति सेहो रहले होयत । वर्(मानेश्वर मन्दिरक पूब भागमे परिक्रमामे राखल पाथरक ढेरमे तकला पर विष्णु मूर्त्तिक पाद खण्ड भेटैत अछि, जाहिसँ एहू समस्याक समाधन भ जाइत अछि । विष्णु मूर्त्तिक ध्ड़ ¯कवा शिरोभाग एखनहुँ पतरिया पोखरिमे वा कतहु अन्यत्रो दबल पड़ल होयत । ग्रामीण लोकक कथन छनि जे जँ एहि अथाह पोखरिमे नीक जकाँ ताकल जाय तँ ओहि समयक औरो बहुमूल्य सामग्री सभ प्राप्त भ सकैत अछि । निश्चित रूपसँ एहि गाममे जत-तत शिल्पित प्रस्तर खण्ड सभ जे पड़ल अछि ताहिसँ अनुमान कयल जा सकैत अछि जे पूर्वमे एहि गाममे उपर्युक्त प×चदेवतालोकनिक भव्य मन्दिर रहल होयतनि । मन्दिरसँ सम्ब( कोनो अभिलेख होयबाक सम्भावनाके ँ सेहो नकारल नहि जा सकैत अछि । ओ मन्दिर सब कोना ध्वस्त भ गेल, वर्(मानेश्वर समेत अन्य देवमूर्त्ति सभके ँ के खण्डित कयलक, ओकरा सबके ँ पोखरिमे के पफेकलक- एहि सब प्रश्नक उत्तर इतिहासहिमे तकलासँ भेटि जा सकैत अछि । देवसिंह अपन राजधनी देवकुलीमे स्थिर कयलनि । देकुलीसँ दक्षिण ओ चन्दनपट्टीसँ पूब एकटा महदइ नामक विशाल सरोवर अछि । म.म. परमेश्वरझाक अनुसार ई देवसिंहक बहिन महादेवीक खुनाओल थिकनि ।२५ देवसिंहक पुत्रा शिवसिंह जखन स्वयं राजा भेलाह तँ देवकुलीके ँ विस्तारित करैत एहिसँ औरो दच्छिन हटि गजरथपुर नामक नगर बसौलनि । म.म. परमेश्वरझाक अनुसार वर्त्तमान समयमे जत लक्ष्मीपुर-आनन्दपुर डेउढ़ी अछि ततहि पूर्वमे गजरथपुर छल । यद्यपि ई शिवसिंहपुर नामसँ सेहो जानल जाइत छल, किन्तु शिवसिंह द्वारा अपन पराक्रमके ँ वृ(ि करैत जखन एहि स्थानके ँ सैन्य छावनीक रूप देल गेल, गजरथक स्थान एतहि नियत कयल गेल ते ँ ई नगर शिवसिंहपुरक संग-संग गजरथपुर नामसँ सेहो प्रसि( भेल ।२६ प्रत्युत् एहि गजरथपुरक उल्लेख कतिपय तत्कालीन ग्रन्थक पाण्डुलिपि सबमे भेल अछि । लक्ष्मण संवत् २९१मे विद्यापतिक आज्ञासँ खौआल मूलक देवशर्मा ओ बलिआसय मूलक प्रभाकर श्रीध्र रचित काव्यप्रकाश विवेक नामक पोथीक टीका ओ प्रतिलिपि एहि गजरथपुर नगरमे रहि क कयने छलाह । एहि पोथीक पुष्पिका वाक्य निम्न प्रकारक अछिµ समस्त विरुदावली विराजमान महाराजाध्रिाज श्रीमत् शिवसिंहदेवसंभुज्यमान तीरभूक्तौ श्रीगजरथपुरनगरे सत्प्रक्रियसदुपाध्याय श्रीविद्यापतीनामज्ञया खौआलसं, श्रीदेवशर्म बलियास सं. श्रीप्रभाकराभ्यां लिखितैषा पुस्तो ल.स. २९१ कार्त्तिक वदि १० ।२७ एहि गजरथपुरसँ ल.स. २९३मे महाराजाध्रिाज शिवसिंह द्वारा अपन प्रिय सखा विद्यापतिक नामसँ विस्पफी ताम्रपत्रा जारी कयल गेल छल । एहि ताम्रपत्रामे बागमती नदीक तटपर गजरथ आखयासँ प्रसि( पुरीक अवस्थितिक उल्लेख भेल अछिµ वागवत्याः सरितस्टते गजरथेत्याखयाप्रसि(ेपुरे दित्सोत्साह विबृ(वाहुपुलकः सभ्याय मध्येसभम् ।२८ निश्चित रूपसँ उपर्युक्त अभिलेख ई साबित करैत अछि जे शिवसिंहक समयमे देवकुली राजधानीक विस्तार औरो दक्षिण ध्रि भेल । डा. रामदेवझाक मत छनि जे पश्चिममे बागमती नदीक पश्चिमी तटपर स्थित थलवार गामसँ लक पूबमे रामभद्रपुर ध्रि तथा उत्तरमे सिनुआरसँ लक दच्छिनमे सिधौली-सुरहाचट्टी ध्रिक परिसर शिवसिंहक समयमे राजधानी छल । एहि परिसरमे यद्यपि अनेक गाम अछि जकरा समेकित रूपसँ एकटा गजरथपुरक अभिधन देल गेल ।२९ वस्तुतः ई सम्पूर्ण परिसर पुरातात्त्विक सामग्री, प्राचीन मूर्त्ति, सरोवर, इनार आदि सबसँ परिपूर्ण अछि । एहि गजरथपुर राजधानीसँ शिवसिंह मिथिलाक स्वतन्त्राताक घोषणा कयलनि अपितु अपन मुद्रा सेहो चलौलनि ।३० दिल्लीक सुल्तान भारी पफौजक संग गजरथपुर राजधनीपर हमला कयलक । ओही हमलामे गजरथपुर उजड़ि गेल, ओकर ऐश्वर्य विलुप्त भ गेलैक । कालक प्रवाहमे गजरथपुर नाम सेहो विलुप्त भ गेल । पछाति केवल एहि राजधनीक अन्तर्गत बसल गाम सब अपन पूर्व नामक संग शेष रहि गेल । एही मुसलमानी आक्रमणक आघात देवकुलीके ँ सेहो सह पड़ल होयतैक । वर्(मानेश्वर समेत सब देव मन्दिर ध्वस्त कयल गेल होयत जकर प्रमाण अछि देकुलीक भग्न मूर्त्ति ओ प्रस्तर खण्ड सभ । शिवसिंहक तिरोधनक बाद हुनक उत्तराध्किारी लोकनि हुनक उजड़ल राजधनीके ँ पफेरसँ बसयबाक प्रयास नहि कयलनि । सम्भवतः सुल्तानक संग आयल मुस्लिम सैनिक सब एतहि बसि गेल । एखनहुँ चन्दनपट्टी, बाँकीपुर, जीवर आदिमे मुसलमानक सघन आबादी अछि । विर्ध्मी शत्राु सेनाक निवास भेलाक कारणे शिवसिंहक बादक ओइनिवार राजा लोकनि गजरथपुर छोड़ि अपन राजधानी मिथिलाक उत्तर भागमे स्थिर करैत रहलाह ।३१ सम्भवतः देवकुली गाम बहुतो दिन ध्रि उजड़ले-उपटल रहल । एहि गामक वर्(मानेश्वर महादेव जनविहीन परिसरमे एकाकी रहबाक हेतु विवश भेलाह । पुनः ई गाम कहिया आबाद भेल से तँ निश्चित रूपसँ नहि कहल जा सकैत अछि मुदा कोना आबाद भेल से मौखिक स्रोतसँ बूझल होइत अछि । गामक एकटा वृ( पुरुष तृप्तिनारायणझा जे विवरण देलनि तदनुसार उजड़लाक बहुतो दिन बाद देकुली गाम एहिसँ उत्तर स्थित डरहारक कलिगामे-कलिगाम मूलक चौध्री उपनामधरी ब्राह्मण लोकनिक अध्ीन भ गेलनि । देकुली डरहारक संग जुड़ि गेल आ एहि मौजाक नवीन नाम पड़ल विसनपुर-महादेव । एहि नामकरणक पाछाँ कारण भेल देकुलीक प्रसि( वर्(मानेश्वर महादेव स्थान तँ दोसर दिस डरहार गामे एहने प्राचीन विष्णु मन्दिरक अवस्थिति । ई विष्णु मन्दिर एखनहुँ डरहारक पूर्वमे अछि । प्रायः एही कारणे ँ गामक नाम सेहो विष्णुपुर वा विसनपुर पड़ल । मुदा विसनपुर नाम अभिलेखे सबमे भेटैत अछि । एकर प्रचलित नाम डरहार छैक । एहि डरहार शब्दक की व्युत्पत्ति ओ एकर पाछाँ की इतिहास से अनुसन्ध्ेय अछि, मुदा डरहार एकटा मूलग्राम सेहो अछि । प×जीमे एकहरे डरहार नामक एकटा मूलक उल्लेख अछि ।३२ अस्तु, पुनः अपन विषयपर आबी । विद्यापतिक जन्मभूमि बिस्पफी लग उसौत नामक कोनो गाम अछि । ओहि गाममे वत्स गोत्राीय, परिवारे उसौत मूलक ब्राह्मणक निवास छलनि । ओही गामक एकटा पंडित युवक रहथि कामदेवझा । हुनक विद्वत्तासँ प्रभावित भ क डरहारक एकटा चौध्री जमिन्दार अपन कन्यासँ हुनक विवाह करौलथिन । तथाकथित अपनासँ छोट कुलक कन्यासँ विवाह करबाक कारणे ँ कामदेवझाके ँ अपन परिवारसँ बहिष्कृत क देल गेलनि । तखन कामदेवझाक ससुर अपन बेटी-जमायके ँ ५२५ बीघाक रकबावला सौंसे देकुली मौजा दक एही गाममे हुनका लोकनिके ँ बसौलथिन । अपितु बेटी-जमायक राजपाट सम्हारबाक हेतु आवश्यक जन-वरजन्ना, पौनी-पसारीक रूपमे पन्द्रहटा आनो-आन जातिक परिवारके ँ बजाय क बसौलथिन । वर्(मानेश्वर महादेवक सेवा-पूजा हेतु महिसी ;सहरसाद्धसँ पंडा ब्राह्मणके ँ बजाय ओकरो बसौलथिन । एतावता देकुली मैथिल ब्राह्मणक बिकौआ ओ कन्यादानी व्यवस्थाक अन्तर्गत पफेरसँ बसल । ओही परिवारे उसौत मूलक कामदेवझाक वंशज लोकनि आब एक-सँ एकैस भ चुकल छथि । देकुली गाममे परिवार ;पल्लिवारद्ध मूलक ब्राह्मणक आगमन ओ निवासक सम्बन्ध्मे मौखिक स्रोत भने जे कहैत हो, विद्यापति रचित कीर्त्तिपताकासँ सेहो एहि सन्दर्भमे एकटा महत्त्वपूर्ण सूचना भेटैत अछि । देवसिंहक समयमे गजनी ओ गौड़क जे संयुक्त आक्रमण मिथिलापर भेल छल । तकर सामना देवसिंहक पुत्रा शिवसिंह अपन सैन्यबलक संग कयने छलाह । देवसिंहक सेनामे ब्राह्मण ओ क्षत्रिाय दुहू जातिक यो(ा छलनि ताही क्रममे पल्लिवार वंशक सेनाक सेहो उल्लेख भेल अछिµ तह पल्लिवार धेरनि गरिट्ठ । सरजाले मारि कर समरध्टि्ठ ॥३३ अर्थात् पल्लिवारक वंशक सूरवीर लोकनि यु(भूमिमे डटल छथि । दृढ़तापूर्वक यु( करैत ओ लोकनि वाणक जालसँ समरभूमिके ँ आच्छादिक क देने छथि । वस्तुतः देवसिंहक सेनाक पल्ल्विार वंशीय सैनिक ओ हुनक राजधानी देवकुलीमे वसल परिवारे उसौत मूलक ब्राह्मणक निवासक बीच कोनो ऐतिहासिक सम्बन्ध् तँ ने अछि, एहू दिशामे अनुसन्धानक प्रयोजन अछि । मौखिक स्रोतक अनुसार १८९६मे जखन दरभंगा जिलाक कैडेस्ट्रल सर्वे सुरू भेल ताहिमे देकुलीके ँ बिसनपुर-महादेव मौजासँ पफराक क पुनः एकटा स्वतन्त्रा मौजाक रूप देल गेलैक । पुरना सर्वे-खतियान ओ नक्शामे एहि मौजाक नाम देवकली लिखल भेटैत अछि । नक्शामे वर्(मानेश्वर स्थानक जगह काटल अछि जाहिपर मन्दिरक रेखाचित्रा अंकित क शिवाला लिखल अछि । यैह वर्(मानेश्वर शिवालय एहि गामक प्राचीन गौरव-गाथाके ँ अक्षुण्ण रखने अछि । ¯कवदन्तीक अनुसार पहिने ई महादेव खढ़क खोपड़ीमे छलाह । प्रति वर्ष गाममे आगि लगैत छलैक । पछाति ईंटाक पक्का मन्दिर बनाओल गेलैक । वर्(मानेश्वर परिसरक अवलोकनसँ प्रतीत होइछ जेना एकर निर्माण ओ स्थापना कोनो तन्त्रा प(तिसँ भेल होइक । परिसरक आकार त्रिाभुज जकाँ छैक । परिसरक पूब ओ पच्छिम भुजामे दूटा सरोवर एखनहु विद्यमान छैक । सम्भवतः परिसरक दच्छिनवला भुजा दिससँ सेहो पूर्वमे कोनो सरोवर छल जे भथि गेल । किए तँ मन्दिरक सामने दच्छिनमे सड़कक कातवला जमीन एखनहुँ डोभी सन लगैत अछि । वर्(मानेश्वर महादेवक खयाति जागन्त शिव-स्थानक रूपमे रहल अछि । अदौसँ माघी कमरथुआ लोकनिक विश्राम स्थलक रूपमे ई मान्य रहल अछि । पफागुन मासक मकर ओ शिवरात्रिाके ँ एत बड़ पैघ मेला लगैत अछि से आइयो चलि रहल अछि । वर्त्तमानमे एहि मन्दिरके ँ औरो बेसी जागृत करबाक प्रयासमे ग्रामीण लोकनि लागल छथि । नवीन मन्दिरक निर्माण कयल गेल अछि । शिवरात्रिाक अवसरपर पछिला किछु वर्षसँ भव्य आयोजन कयल जाय लागल अछि । तथापि आइ आवश्यकता अछि जे मिथिलाक एहि विस्मृत राजधनी देकुलीक ऐतिहासिक ओ पुरातात्त्विक गरिमाक रक्षा करैत एहि दिस अध्येता लोकनिक ध्यान आकृष्ट कयल जाय । एहि गामक गर्भमे दबल पड़ल इतिहासके ँ वैज्ञानिक ढंगसँ उत्खनन क सामने आनल जाय । यदा-कदा जे पुरातात्त्विक सामग्री सब भेटैत रहल अछि तकरा एकटा संग्रहालय बना क संरक्षित कयल जाय । महाकवि विद्यापतिक कर्मभूमिक रूपमे एहि गामके ँ चिन्हित कयल जाय । संगहि एहि गामक पुरातत्त्वक तुलना मिथिलाक अन्यान्य देकुली नामधरी गामक संग करैत नामक समरूपताक इतिहासक अन्वेषण कयल जाय । वर्(मानेश्वर स्थानक खयाति ओ प्राचीनताके ँ इतिहास ओ आध्यात्मिकताक मानचित्रापर स्थापित कयल जाय । ई दायित्व देकुली ग्रामवासी लोकनिक संग-संग मिथिला निवासी समस्त प्रबु( जनक थिकनि । सन्दर्भ एवं टिप्पणीµ १. परमेश्वरझा, मिथिला तत्त्व विमर्श ;पूर्वार्(द्ध, तरौनी, दरभंगा, १९४९, पृ.- १५२ २. चन्दाझा, पुरुष परीक्षा ;अनुवादद्ध, राज दरभंगा यन्त्राालय, शाके १८१०, पृ.- २५९ ३. उपेन्द्रठाकुर, मिथिलाक इतिहास, मैथिली अकादमी, पटना, १९८०, पृ.- १९० ४. रामदेवझा, विद्यापतिसँ सम्ब( स्थान आ गजरथपुरक सन्धन, मंजुषा-२, विद्यापति सेवा संस्थान, आनन्दपुर, दरभंगा, २००९, पृ.- १४ ५. एस.एन. सत्यार्थी, दर्शनीय मिथिला-९, विस्मृत मिथिला प्रकाशन, दरभंगा- २००३, पृ.- ४१३-४२० ६. रामप्रकाशशर्मा, मिथिला का इतिहास, के.एस.डी.एस.यू., दरभंगा, १९७९, पृ.- ४६३-४६४ ७. बिहारीलाल पिफतरत, आईना-ए-तिरहुत ;द्वि.सं.द्ध, महाराजाध्रिाज कामेश्वरसिंह कल्याणी पफांउडेशन, दरभंगा, २००१, पृ.- १२५-१२७ ८. चन्दाझा ;पूर्वोक्त-२द्ध, पृ.- २५९ ९. परमेश्वरझा ;पूर्वोक्त-१द्ध, पृ.- १५२ १०. मुकुन्दझा बखशी, मिथिला भाषामय इतिहास, विद्याविलास प्रेस, बनारस सीटी, पृ.- ५१६ ११. श्यामनारायणसिंह, हिस्ट्री ऑपफ तिरहुत, बैप्टिस्ट मिशन प्रेस, कलकत्ता, १९२२, पृ.- ७२ १२. पी.सी. रायचौध्री, बिहार डिस्ट्रिक्ट गजेटियर दरभंगा, सेक्रेटेरियट प्रेस, पटना, १९६४, पृ.- ३४ १३. उपेन्द्रठाकुर ;पूर्वोक्त-३द्ध, पृ.- १९१ १४. परमेश्वरझा ;पूर्वोक्त-१द्ध, पृ.- १५५ १५. विद्यापति गीत संचय, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली, १९९९, ;भूमिका- रामदेवझाद्ध, पृ. २१, पद सं.- ४३ १६. विद्यापति पदावली ;प्रथम भागद्ध, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, १९६१, भूमिका, पृ.- ७७ भूपरिक्रमाक आरम्भमे निम्न श्लोक अछिµ नत्वां गणपतिं साम्बं श्रीविष्णुं रविमम्बिकाम् । भूपरिक्रमणग्रन्थं लिखयते भुवि नैमिषे ॥ देवसिंहनिदेशाच्च नैमिषारण्यवासिनिः । शिवसिंहस्य च पितुः सूनपीठनिवासिनः ॥ १७. कीर्त्तिपताका, शशिनाथझा ;अनु.द्ध नाग प्रकाशक, दिल्ली, १९९२, पृ.- २८-७१ १८. चन्दाझा ;पूर्वोक्त-२द्ध, पृ.- २५१ एवं २५३ १९. परमेश्वरझा ;पूर्वोक्त-१द्ध, पृ.- १५१-१५२ २०. चन्दाझा ;पूर्वोक्त-२द्ध, पृ.- २५९ २१. श्यामनारायणसिंह ;पूर्वोक्त-११द्ध, पृ.- १७७-१७८ २२. उपेन्द्रठाकुर ;पूर्वोक्त-३द्ध, पृ.- १९२ ओ २०७ २३. चन्दाझा ;पूर्वोक्त-२द्ध, पृ.- २५९ २४. परमेश्वरझा ;पूर्वोक्स-१द्ध, पृ.- १५२-१५३ २५. उपर्युक्त, पृ.- १५४ २६. उपर्युक्त, पृ.- १५८ २७. उपर्युक्त, पृ.- १५८ २८. चन्दाझा ;पूर्वोक्त-२द्ध, पृ.- २५३ २९. रामदेवझा ;पूर्वोक्त-४द्ध, पृ.- १३-१४ ३०. उपेन्द्रठाकुर ;पूर्वोक्त-३द्ध, पृ.- १९७ ३१. विद्यापति पदावली ;पूर्वोक्त-१६द्ध, पृ.- २७ ३२. रमानाथझा, मैथिल ब्राह्मणों की पंजी व्यवस्था, दरभंगा- पृ.- ११ ३३. कीर्त्तिपताका ;पूर्वोक्त-१७द्ध, पृ.- ४७ राजदेव मंडल जगदीश प्रसाद मण्डलक कविता संग्रह- राति-दिन मैथिलीक नव कविताक निरन्तर विकास भऽ रहल अछि। श्री जगदीश प्रसाद मण्डल पूर्ण निष्ठा आ तल्लीनताक संग ऐ विकास कर्ममे संलग्न छथि। आ तेकर प्रतिफल सम्मुख अछि- कविता पोथी- राति-दिन। ऐ पोथीमे 52 गोट कविता संकलित अछि। कविता भाव, बुधि कल्पना आर शैलीक समन्वित परिणाम थीक। ऐ गुण आदिसँ अलंकृत मानस सृजनक गम्भीर, सचेत प्रक्रियासँ संचालित भऽ सकैत अछि। तइ कारणे कवि अत्यधिक सवेंदनशील होइत अछि। हरेक कालावधिमे मनुखक अन्तसमे अभीप्सा पालित-पोषित होइत रहै छै आ ओइपर जखन तुषारापात होइ छै तँ जन मानस आन्तरिक वेदनासँ भरि जाइत छै। मोह भंग भऽ जाइत छै। बेकतीक अन्तसँ उपजै छै। विद्रोह, कंुठा, आक्रोश, संत्रास, क्षुब्धता, आत्म रक्षाक सबालादि। अही सबहक अभिव्यक्ति मैथिलीक नव कविता थीक। मण्डलजी सन सवेंदनशील कवि जे ऐ यथार्थकेँ भोगने छथि से केना चुप्प रहि सकैत छथि। हुनका लेखनीसँ तँ संघर्षक स्वर निकलबे करतैक। “जिनगीक होइत संघर्ष। सीमा बीच जखन अबैत मचबए लगैत दुर-घर्ष। घर्ष-दुरघर्ष बीच जखन जिनगी करए रस्सा-कस्सी। बीच समुद्र सिरजि मथान पकड़ए लगैत अपन-अपन रस्सी।” (संघर्ष) कवि अखण्ड राज भोगी सभपर व्यंग्य प्रहार करैत कहैत छथि- “मुसक खुनल बील पकड़ि नाग-नागिन कहबए लगैए। नागे तँ धरती टेकने छै अखण्ड राज भोगै छै।” (मानव गुण) किछु लोक बहुरूपिया बनल अछि। हरेक क्षण गिरगिट जकाँ रंग बदलैत रहैत अछि। समाजकेँ दिशा भ्रमित करैत अछि। ऐ सम्बन्धमे कविक उक्ति अछि- “गिरगिटिया मनुक्खो तहिना दिन-राति बदलैत चलैए गीरगिटेक जहर सिरजि-सिरजि बीख उगलैत चलैए। भेद-कुभेद मर्म बिनु बुझने देखा-देखी ओढ़ैत चलैए ओढ़ि-ओढ़ि ओझरा-पोझरा डुबकुनिया काटि मरैए।” (घोड़ मन, भाग-२) मनुखक रीत-नीत आ बेवहारमे कतेक परिवर्त्तन भऽ गेलैक अछि। बदलैत जुग-जमानापर हिनकर कहब छन्हि- “जुग बदलल जमाना बदलल बदलि गेल सभ रीति-बेवहार। चालि-ढालि सेहो बदलि गेल बदलि गेल सभ आचार-विचार। मुदा, राति-दिन एको ने बदलल नै बदलल चान, सूर्ज, अकास। पूरबा-पछबा सेहो ने बदलल नै बदलल जिनगीक बिसवास।” (जुग बदलल जमाना बदलल) अंग्रेजी भाषापर शब्दक प्रहार करैत कहैत छथि- “अंग्रेजी पढ़ि अंग्रेजिया बनि-बनि पप्पा-मम्मी आनत घर। बाप-दादाक कि भेद ओ बुझत अड़ि-अड़ि बाजत निडर।” (घरक लोटिया बुड़ले अछि) समाजक रूप वर्णन ऐ पाँतिसँ लक्षित भऽ रहल अछि- “अगम-अथाह रूप समाजक असथिर भऽ सागर कहबैए। बर्खा बुन्नी बीच-बीच ओला-पाथर बरिसा दइए। पबिते पाबि पृथ्वी पसरि धरिया-चालि धड़ए लगैए। उट्ठी-बैसी खेल खेलैत मोइन-धार बनबए लगैए। टूक सुपारी समाज कटि-कटि टुकड़ी जाति बनल छै।” (अपनेपर) नव बिम्वक प्रयोग संवेदनशीलता आ मार्मिकताकेँ संगे होएबाक चाही। आ से मण्डल जीक कवितामे विषयक अनुरूप बिम्बक प्रयोग भेल अछि। “झिलहोरि झील खेलाइत रश्मि आकर्षित-आकर्षण करैए। प्रेमास्पद पबिते पाबि प्रेम-प्रेमी कहबए लगैए। पाबि प्रेमी प्रेमी जखन सागर गंगा मिलए चाहैए। बॉसक पुल बना समुद्र गंगा-सागर स्नान करैए।” (शील) “अजस्र धार भवसार सजल छै। नाओं एक खाली पड़ल छै।” (संघर्ष) स्थितिक अनुकूल बिम्ब, नव उपमान, प्रतीक नव कविताक लेल साधन मानल गेल अछि। आ से ऐ संग्रहक सभ कवितामे परिलक्षित भऽ रहल अछि। “जहिना धरती अकास बीच गाछ-विरीछ लहलह करैत। तहिना विवेक विचार संग सदि हँसि-गाबि कहैत।” (प्रिय) मण्डलजी प्रिय कवितामे शैली आ भाषाक सम्बन्धमे कहने छथि- “सम्पन्न शब्द, शैली सम्पन्न शब्द कोष सिरजए लगै छै। जड़ि-छीप पकड़ि भाषाक संसार-साहित्य गढ़ए लगै छै।” रातिक अवसान भेलापर दिनक आगमन निश्चिते होइत अछि। जे कटुसत्य अछि। राति-दिन सर्वजन परिचित शब्द अछि। शब्दमे व्यापकता सेहो अछि। राति-दिन कविता संग्रहक शीर्षक अनुकूल अछि। कविता सबहक भाव, विषय, उद्देश्य इत्यादि ऐ शीर्षकमे छिपल अछि। साँझ-भोर कवितामे कविक कथन उजागर भेल अछि- “केकरो साँझ केकरो भाेर छी केकरो उदय केकरो अस्त छी। दिनक अस्त साँझ अगर छी राइतिक तँ उदये छी। बारहे घंटा दिनो चलै छै ततबे टा ने राइतियो होइ छै।” पुरान ठाठ आ खूँटा विछिन्न भऽ रहल छै। नवका-नवका जिनगीक खूँटा आ घर ठाठ करए पड़तै। तँए कवि “चेतन चाचा” कविताक माध्यमे कहने छथि जे ई काल चेतबाक थिक- “चेत-चेत चलू चेतन चाचा सरसड़ाइत समए ससरैए। समए छोड़ि कतबाहि जखने ठहकि-ठहकि नक्षत्र कहैए। आगू डेग उठबैसँ पहिने चारू दिशा देखैत चलू। चारू कोण ठेकना-ठेकना आगू डेग बढ़बैत चलू।” तँए जिनगीमे सीखबाक उपक्रम होएबाक चाही। बिनु सीखने किछु नै भऽ सकैत अछि। “जिनगीमे किछु करब सीखू जिनगीमे किछु लड़ब सीखू। सभ जनै छी, सभ देखै छी अज्ञान-अबोध बनि-बनि अबै छी। सज्ञान-सुबोध तखने बनब संघर्षक बाट जिनगी धड़ब।” (किछु सीखू किछु करू) “मुँहक झालि” कवितामे कवि ललकारि कऽ कहि रहल छथि- “मुँहक झालि बजौने कि हएत, काजक झालि बजबए पड़त। फोकला-खाख अन्ने की सुभर दाना उपजबए पड़त।” कहबाक तातपर्य ई अछि जे सिरिफ गाल बजौने किछु नै होएत। कर्म करै पड़त। जइसँ देस-दुनियाँक कल्याण संभव भऽ सकत। तँए कर्मशील होएब परमावश्यक अछि। तखने अपन इतिहास लिखि सकैत छी। “कर्मक स्वरलहरी सीखू अपन इतिहास अपने हाथसँ स्वार्णाक्षरमे लिखनाइ सीखू।” अपन इतिहास अपनेसँ सृजन करब बहुत कठिन कर्म अछि। ऐ लेल सतत कर्म आ वश्वास चाही तखनहि संभव भऽ सकैत अछि। हम अज्ञ छी तथापि एतबा धरि जरूर कहब जे प्रस्तुत “राति-दिन” पोथीमे बोधक अनुकूल नव बिम्ब, प्रतीक, नव उपमान इत्यादिक प्रयोग भेल अछि। भाषा-शैलीमे आंचलिकता अछि। मिथिलांचलक गंध समाहित अछि। सुधी पाठकगण स्वागत करताह। आ संगहि नवाकुंरक लेल पाथेय बनत। जगदीश प्रसाद मंडलक उपन्यास उत्थान-पतनपर नाटककार, कथाकार आ उपन्यासकारक रुपमे श्री जगदीश प्रसाद मंडलजी मैथिली साहित्यमे नूतन उर्जाक संग उपस्थित भेल छथि। हिनक जन्म १९५७ ई. मे भेल। विभिन्न पत्र-पत्रिकामे हिनक कथा, प्रेरक कथा उपन्यास सेहो प्रकाशित भऽ चुकल अछि। एहि उपन्यास ‘उत्थान-पतन’ क माध्यमसँ लेखक गामक जिनगीकेँ यथार्थ आ नव रुपमे उपस्थित करबाक चेष्टा कएने छथि। गामक जड़ता, रीति-रिवाज, पावनि-तिहार, मूर्खता, विद्वता, अड़ि जाएबला भाव आ सहज स्वभाव आदि सहज रुपमे आबि गेल अछि। तत्वक दृष्टिसँ देखल जाए तँ सर्वप्रथम कथावस्तु घ्यानकेँ आकृष्ट करैत अछि। कथावस्तु तँ सशक्त आधार अछि जाहिपर उपन्यासक कतेक रंगक प्रसाद ठाढ़ होइत अछि। जाहिमे जिनगीक श्वास रहब आवश्यक। उत्थान-पतनमे गंगानंद, यमुनानंद, पंडित शंकर, सुधिया, ज्ञानचंद, भोलिया, विसेसर, भोलानाथ, सुकल, निलमणि, मोहिनी, रीता, महंथ रघुनाथ दास, लीला, दीनानाथ, गुलाब आदि अनेक पात्रसँ सज्जित भऽ अंचलक मार्मिक चित्र उपस्थित भेल अछि। कथावस्तुमे बिच्छिन्न होइत गाम-घर आ टूटैत बेकती सबहक समस्याकेँ मार्मिक ढंगसँ अभिव्यक्ति कएल गेल अछि। उपन्यासक प्रारम्भ होइत अछि- ‘‘गामे-गाम, कतौ अष्टयाम-कीर्तन तँ कतौ नवाह, कतौ चण्डी यज्ञ तँ कतौ सहस्त्र चण्डी यज्ञ होइत। किएक तँ एगारहटा ग्रह एकत्रित भऽ गेल अछि। की हएत की नै हएत कहब कठिन। एकटा बालग्रह बच्चाकेँ भेने तँ सुखौनी लगि जाइत आ जहिठाम एगारह ग्रह एकत्रित अछि तइठाम तँ अनुमानो कम्मे हएत। परोपट्टा भगवानक नामसँ गदमिसान होइत।........ जाधरि लोक कीर्तन मंडलीक संग मंडपमे कीर्तन करैत ताधरि घरक सभ सुधि-बुधि बिसरि मस्त भऽ रहैत। मुदा घरपर अबितहि.......... बच्चाकेँ बाइस-बेरहट लेल ठुनकब सुनि। व्यथाककेँ दबैत सभ आँखिक नोर होइत बहबैत।’’ सामाजिक उत्थान करऽ बला बेकतीकेँ गामक एहि परम्परा आ धार्मिक आडम्बरसँ संधर्ष करऽ पड़ैत अछि। लेखक अपना पात्रक द्वारा अंधविश्वासकेँ तोड़ि परिवर्तन अनबाक प्रयास कएने छथि। साहित्यक भाषा होएबाक चाही जन-भाषा। जेकरा साधारण जन सहज रुपसँ पचा सकए। एहि उपन्यासक भाषा गाम-घरक बोलचालक भाषा अछि। जेकरा प्रयोग करैत काल सहजहि नव-नव शब्दक निर्माण भऽ गेल अछि। साधारण जनक बोली आ नूतन शब्दक प्रयोग एहि उपन्यासमे प्रचुरताक संग देखल जा सकैत अछि। कथोपकथनमे सहजता संक्षिप्तता आओर स्वभाविकता अछि। जेना एहि कथोपकथनपर दृष्टिपात कएल जा सकैत अछि- ‘‘अगर दसखत कएल नइ होइत होअए तब?’’ ‘‘तब की? औंठा निशान दऽ देतइ।’’ ‘‘भाय दूटा समांग आएल अछि। दुनूकेँ काज कऽ दहक।’’ ‘‘अच्छा थमहह। किरानी बाबूसँ गप्प केने अबै छी।’’ कथोपकथन उपन्यासमे वर्णित जिनगीक अनुकूल अछि। दौड़ैत-पड़ाइत संसारमे बृहताकार उपन्यास पढ़बाक लेल समएक अभाव रहैत अछि। किन्तु भाषा आ शौलीमे जँ आकर्षणक गुण रहैत अछि तँ ओ जनमानसकेँ पढ़बाक लेल अपना दिशि घिचि लैत अछि। ताहि गुणसँ भरल-पूरल एहि उपन्यासक चित्रात्मक शैलीक एकटा उदाहरण देखल जा सकैत अछि। ‘‘गौर वर्ण, रिष्ट-पुष्ट शरीर, घनगर मोंछ, बड़दक आँखि सन नम्हर-नम्हर आँखि सुकलक रहै। कोठीक गेटपर कान्हमे बन्दूक लटका ठाढ़ ड्यूटी सुकल सेठक करैत।’’ एकहि वाक्यमे बहुत बात कहि देब लेखकक बिशेषता अछि। जेना- ‘‘माथपर छिट्टा, दुनू हाथसँ दुनू भाग छिट्टाकेँ पकड़ने, दुलकी डेग बढ़बैत गुलाब, सैंया भेल किसनमा घुनघुनाइत आंगन दिशि लफड़ल चललीह।’’ केहनो अकर्मण्य बेकती जँ पूर्ण मनोयोगक संग आर्थिक उन्नतिमे दत्तचित भऽ जाए तँ हुनक प्रगति होएब निश्चित भऽ जाइत अछि। एहि दर्शनकेँ देखेबाक प्रयत्न लेखक पात्र श्यामानन्द द्वारा कएलनि अछि। परिवर्तनशीलता संसारक निअम थीक। परिवर्तनशीलता संसारक निअम थीक। सामन्तवादसँ पूँजीवाद आ पूँजीवादक गर्भहिसँ समाजवादक जन्म सेहो होइत अछि। ई अलग बात जे पूँजीवादसँ साम्राज्यवाद सेहो पनपैत अछि। सामाजिक उत्थान समितिक निर्माण कऽ लेखक ई देखबए चाहैत छथि जे टूटैत गामक लेल एकता आवश्यक भऽ गेल अछि। जाहिसँ एक-दोसराक सहयोग भेटतैक आ गामक सम्पूर्ण विकास होएतैक। सबहक संगे सामाजिक न्याय होएतैक। श्यामानन्द द्वारा आधुनिक यंत्रसँ कृषि कार्य होइत अछि। जाहिसँ ओ सम्पन्न किसान बनि जाइत अछि। एहि माध्यमसँ लेखक देखाबए चाहैत छथि जे अपनहुँ गाम-घरमे जँ बेकती विवेक आ कर्म निष्ठासँ काज करए तँ ओकरा अर्जन करबाक लेल दोसर प्रदेश नहि जाए पड़तैक आ पलायन रुकि जएतैक। एखनहुँ गाम-घरमे पूर्ण ज्ञानक किरिण नहि पहुँचि सकल अछि। ताहि कारणे एक गाम दोसर गामसँ लड़ैत-झगड़ैत अपना विकासकेँ अवरुद्ध कएने रहैत अछि। बेमारीकेँ डाइन-जोगिन आ भूत-प्रेतक प्रकोप मानैत अछि। ई समस्या सभ सहजहि एहि उपन्यासमे उपस्थित भऽ गेल अछि। एहि तरहेँ देखैत छी जे लेखक गामक यथार्थ जिनगीक चित्र उपस्थित कएने छथि, संगहि आदर्श रुप सेहो दृष्टिगत भऽ रहल अछि। कुरूक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल पत्र (पत्रोत्तर शैलीक समीक्षा) प्रिय बन्धु, अहॉंक दीर्धकाय ग्रंथ “कुरूक्षेत्रम् अन्तर्मनक” पढ़बाक सुयोग प्राप्त भेल। कतेको साहित्यिक कृति (उपन्यास, कविता, कथा-गल्प संग्रह, नाटक, महाकाव्य, बाल नाटक, बाल कथा, बाल कविता, प्रबन्ध-निबन्ध समालोचना आदि)केँ एकहिं पुस्तकमे संग्रहित कए अहॉं पाठकक लेल एकटा तेहेन पुष्पमाला बना देलिएक जाहिमे लगैत अछि जे विभिन्न रंगक पुष्प एकहिं जगह गॉंथल हो। आ पाठक वृन्द साहित्यक कोनहु स्वाद एहि दीर्घ पोथीसँ प्राप्त कए सकैत छथि। निश्चय अपनेक ई प्रयास साहित्यक लेल नवीन अछि संगहि कर्मठताक साक्ष्य....। हम कोनहु पैघ समीक्षक नहि छी तेँ समीक्षा करबाक दायित्वपूर्ण कार्यक लेल अक्षम छी। तथापि अहॉंक पुस्तक पढ़लाक उपरान्त मनमे जे विचारक उद्भव होएत ताहिसँ अवगत करा देब एकटा दायित्व सन बुझैत छी। तेँ किछु अपन विचार पठा रहल छी। बन्धु, प्रथमत: ई कहबामे हमरा कनियो संकोच नहि होएत अछि जे मैथिली साहित्यक लेल जे अपने साहित्य आन्दोलनक कार्य कऽ रहल छी से साहित्यक लेल तँ एतिहासिक अछिए। संगहि मैथिली प्रेमी, मिथिलावासी सेहो अहॉंक एहि सुकार्यकेँ कहियो नहि भूलत-बिसरत। बालकथा- अहॉं मिथिलांचलमे पसरल छोट-पैघ कथा सभकेँ नवीन रूपेँ संग्रहित कएने छी। अहाँक एहि प्रयाससँ विलुप्त होइत कथा सभ पुन: जीवन्त भऽ उठल अछि। बगियाक गाछ बचपनावस्थामे दादीक मुँहसँ सुनने रही। आइ पुन: पढ़बाक अवसर भेटल। राजा सलहेस, महुआ घटवारिन, नैका-बनिजारा, जट-जटिन इत्यादि कथ्ाा सभ पढ़लासँ लगैत अछि जे एतिहासिक बहुत गूढ़, तथ्यपूर्ण बात सभ सोझा अाएल अछि। क्षिप्रताक साथ अग्रसर होइतो सब बातक संकेत धरि आबि गेल अछि आ ओहि प्राचीण समएक दशा आ दिशाक ज्ञान सहजहिं परिलक्षित भऽ रहल अछि। सामाजिक जिनगीक क्रिया-कलापक वर्णन करैत अहॉं जे चित्र उपस्थित कएने छी। ताहिमे ओहि काल विशेषक प्रेम-घृणा, संयोग-वियोग, उन्नति-अवनति, बैर-प्रीत, शांित-अशांति, वीरता-कायरता, मुर्खता-विद्वता सबटा भिन्न-भिन्न रूपेँ प्रगट भेल अछि। पढ़ैत काल लगैत अछि जे हम दोसर संसारमे प्रवेश कएने छी। ओहि समएकेँ जँ एखुनका समएसँ तुलना करैत छी तँ बुझि पड़ैत अछि जे विकास कते तीब्र गतिसँ भऽ रहल अछि। आ एहि पुरान भेल जिनगीक कथापर कलम चलौनाइ कोनो साधारण गप्प नहि अछि। विषए-वस्तु सभपर जे अहॉं संतुलन बनौने छी से समए आ परिस्थितिक अनुकूल अछि। संकर्षण-नाटक- अपाला आत्रेयी-दानवीर दधीची अपाला आत्रेयी आर दानवीर दधीची-एहि दुनू बाल नाटकमे आहॉं कथा किछु नव रूपे प्रकट कएने छी। से पात्रकेँ अनुरूपे अछि। कथोप-कथनमे प्रवाह अछि आर छोट-छोट वाक्यक प्रयोग अछि। जे नाटकीयतामे प्रभाव उत्पन्न करैत अछि। जेना दानवीर दधीचिक एकटा कथोपकथन : “दधीची- इन्द्र। कुरूक्षेत्र लग एकटा जलाशय अछि जकर नाम अछि, शर्यणा। अहॉं ओतय जाउ। ओतय घोड़ाक मुड़ी राखल अछि.....। ओहिसँ नाना प्रकारक शस्त्र बनाउ।” बाल नाटक- बालकेँ ज्ञान बृद्धिक लेल सेहो उपयोगी अछि। संकर्षण- नाटक एकटा नवीन चरित्रसँ परिचित करबैत अछि। जे गामक लोककेँ ठकनाइकेँ नीक बुझैत अछि। एिह अवगुणकेँ प्रतिभा बुझैत रहैत अछि। अवगुणक प्रतिफलपर कनेको विचार नहि करैत अछि। वएह बेकती जखन दिल्ली सन महानगर जाइत अछि तँ रास्तामे स्वगं ठका जाइत अछि। लालकिलामे जूता किनबा काल ओकरा पता चलि जाइत अछि जे ओ ठक विद्यामे कतेक पाछू अछि, उदाहरण रूपेँ एकटा कथोपकथन : “गोनर- अहॉंकेँ ठकि लेलक। अहॉंक नाम तँ बुझनुक लोकमे अबैत अछि। संकर्षण- मित्र की कहू?......। एहि लालकिलाक चोर बजारक लोक सभ तँ कतेको महोमहापाध्यायक बुद्धिकेँ गरदामे मिला देतन्हि।” छोट छीन कथोपकथन द्वारा व्यंग्य, हंसी आ गम्भीर बातकेँ सहज ढंगसँ कहि देब अहॉं लेखनीक विशेषता थीक। नाटककेँ आकार लघु अछि जे नवीनताक सूचक अछि। तथा मिथिलामे पसरल बहुत रास बातकेँ समटबाक प्रयास निश्चय सराहनीय अछि। मंचित करबाक लेल दिशा निर्देश नीक ढँगे कएल गेल अछि। नाटक पठनीयता संगे नाटकीयतासँ परिपूर्ण अछि। आर संकर्षण आकर्षणसँ भरल अछि।। कथा गुच्छ- (कथा संग्रह) कथा सभकेँ पढ़लहुँ जे गल्प गुच्छमे संग्रहित अछि। पढ़ैत काल स्मरण भेल- एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका किछु शब्द- कथा स्वतंत्र विधा अछि। एहिमे संक्षिप्ताक संगहि अत्यधिक संगठित तथा पूर्ण कथा रूप हेबाक चाही। ओना जिनगी कथा अछि आ कथा जीनगी अछि। आ जीनगी जे निरन्तर नवीनताकेँ प्राप्त कऽ रहल अछि। गप्ल गुच्छ पढ़ैत काल जे कथा वा पाँति बेसी प्रभावित कएलक ओहि सबहक विषयमे कहब आवश्यक बुझाइत अछि। नीक-अधलाह कहबाक अधिकार तँ पाठककेँ होइते अछि। नव सामन्त- आब सामन्तबादी युग नहि रहल। किन्तु सामन्ती प्रवृति एखनो जीअते अछि। हँ, ओकरा रूपमे परिर्वन भऽ गेल अछि। आ ओ भिन्न-भिन्न रूपे समाजमे आइयो दृष्टिगोचर भऽ गेल अछि। एहि कथामे एकटा नव सामन्तक नवीन रूप लक्षित भऽ रहल अछि। सर्वशिक्षा अभियान- कथाक माध्यमसँ दलित आ गरीबक धीया-पुताकेँ पढ़ेबाक लेल उदासीनताक भावना व्यक्त भेल अछि। सरकार द्वारा मुफ्तमे देल गेल पोथी अदहरमे बेचि लैत अछि। कथाक पाँति- “आ दुसाधटोली, चमरटोली आ धोवियाटोलीसँ सभटा किताव सहटि कऽ निकलि गेल।” थेथर मनुक्ख- एहि कथासँ स्पष्ट होइत अछि जे मनुक्खक पूर्ण अद्य:पतन भऽ गेल अछि। एतेक जे मनुक्ख चिड़ई-चुनमुनी, परबा पौरकी धरिसँ नीचा उतरि थेथर भऽ गेल अछि। स्त्री-बेटा- एहिमे समाजमे स्त्रीगणक महत्वहीनता आ संगहि करवट लैत सामाजिक स्थिति-परिस्थिति चित्रण भेल अछि। विआह आ गोरलागइ- झण-झणमे मनुक्खक बदलैत रँग गिरगिटा जकाँ...... आ दहेजक लोभी बेकती संतोषी सन बेवहार देखा कऽ स्वयं लज्जित होइत छथि। आइयो कोन कोन रूपेँ दहेज लोभी दबकल अछि समाजमे आ कोन-कोन प्रपंची चालि चलि रहल अछि। से एहि कथासँ बुझाइत अछि। नीक चित्रण भेल अछि। प्रतिभा- चालाकी आ प्रतिभा दुनू अलग-अलग बात छैक। प्राप्तिक लेल दुनूमे सँ कोन महत्वपूर्ण सएह देखेबाक यत्न भेल अछि। मिथिला उद्योग- किछु कथाक कोनो गप्प पाठककेँ दीर्घकाल तक झंकृत कएने रहैत अछि। एहि कथामे गदहापर लादल जे संदेश भेटि रहल अिछ से बहुत दिन धरि पाठककेँ स्मरणमे रहत। रकटल छलहुँ कोहबर लय- स्त्री-पुरूषक बीच बनैत-बिगड़ैत सम्बन्ध आ छल-प्रपंच अपने-आपकेँ ठकइ आ ठकाइबला गप्पक मार्मिक विश्लेषण एहि कथा द्वारा भेल। हम नहि जाएव विदेश- कोन बेकतीकेँ हृदयमे कतेक कष्ट-पीड़ा आ हँसी-खुशी भरल अछि। ओकरा पूर्णतया उत्खनन करनाइ सम्भवो नहि अछि तथापि कथाकार तँ प्रयास करबे करता। एहि कथामे द्विजेन्द्रक मोनक व्यथाकेँ कथा पूर्णरूपेण उजागर भेल अछि। एकटा पाँति- “कोन सरोकार माएसँ पैघ छल यौ लाल। जे अहाँ कहैत छी जे हम ककरोसँ सरोकार नहि रखने छी।” राग बैदेही भेरवी- एहि कथामे एकटा कलाकारक जीनगीपर रोशनी देल गेल अछि। कोना एकटा साधारण गामक गबैया सुख-दुख, सफलता आ विफलतासँ लड़ैत उच्चताकेँ प्राप्त कएलक तकर विशद वर्णन भेटैत अछि। बाढ़ि भूख आ प्रवास- हास्य-व्यंग्यसँ पूर्ण कथा अछि। लघु आकारक रहितहुँ ई कथा बहुत रास गप्पकेँ समेटने अछि। भूख आ भूखक कारणे उठैत मनक तरंग आ ओहि कारणे बेकती कतऽ सँ कतए प्रवास करैले जाइत अछि। आ ओहो स्थानपर कोना आशापर तुषारपात होइत अछि। एहि पाँतिकेँ पढ़लासँ स्वत: हास्य उपस्थित भऽ जाइत अछि। “सरकार हम तँ ट्रेनसँ आएल छी मुदा अहाँ कोन सवारीसँ अएलहुँ जे हमरासँ पहिनहिसँ विराजमान छी।”- बैदिक जी अल्हुआसँ हाथ जोड़ि कहैत अछि। नूतन मिडिया- आधुनिक मिडिया कोन तरहेँ चलि रहल अिछ। से उजागर भेल अछि। जाति-पाति- एहि कथाकेँ पढ़लाक बाद पाँति याद अबैत अछि- “देखनमे छोटन लागै जाति पातिक दंश” बहुपत्नी वियाह आ हिजड़ा- एहि कथामे एकसँ अधिक पत्नी कएलासँ जे समाजमे सड़ांध पैदा भऽ रहल अछि। कोन-कोन रूपेँ ओकर बिकार निकलैत अछि तकर वर्णन भेल अछि। किछु पाँति- “...भातिज सभकेँ नहि मानैत छिऐक तैं भगवान बच्चा नहि देलन्हि।” बाणवीर- एहि कथामे बाणवीरक मनोिवश्लेषण नीक जकाँ भेल अछि। समूहसँ कटल बाणवीर कतेक अथाह पीड़ामे संघर्ष करैत जीनगीक एक-एक पल कटैत रहैत अछि से कथासँ स्पष्ट भऽ जाइत अछि। बाणवीरक एहि कथनमे कतेक मर्म छिपल अछि- “माए बाबू! हमरा बुझल अछि जे हमर बियाह दान नहि होएत। मुदा अपन पेट तँ कोहुना हम गाममे भरिए लैत छी। गुजर तँ कइए लैत छी। लोक सभ कहैत रहए जे तोहर माए-बाप तोरा बेचि देलकउ। से ठीके अछि की?”....कन्नारोहट उठि गेल। अनुकप्पाक नोकरी- लोककेँ बाप मरलापर नोकरी भेटैत छैक। हुनका भाएक मरलापर भेटलन्हि। एहि कथाक सार अछि। मृत्युदंड- कथाक द्वारा देखाओल गेल अछि जे कोना बालिका आर्याकेँ मृत्युदंड मिल जाइत अछि जेकर कोनो दोष नहि छल। बेगुनाहकेँ दण्ड। सेहो मृत्युदंड। एहेन अछि एहिठामक समाज। जेकरा सहजताक संग स्वीकारो कऽ लेल जाइत अछि। एखनुक समाजक दरपन जकाँ कथा लगैत अछि। एहि तरहेँ गल्प गुच्छक कथा सभकेँ बाद बुझाइत अछि जे वर्तमान समस्याकेँ यर्थाथ रूप प्रगट भेल अछि। छोट-छोट दृश्य खंड काव्यात्मक रूपसँ सोझा आएल अछि। कथावस्तुमे मिथिलाक माट-पानिक गंध अछि। किछु कथा अत्यन्त लघु तथापि उदेश्य प्रकट भऽ गेल अछि जे सम्पूर्ण देशक यथार्थनाकेँ समेटने अछि। सहस्त्रबाढ़नि (उपन्यास)- प्राचीनकालहिसँ सहस्त्रबाढ़निक विषयमे उत्सुकताक संगहि अनुमान कएल जाइत रहल अछि। अनुमानित व्याख्या आ समीक्षा होइत रहल अछि। विज्ञान द्वारा अलग ढंगसँ आ साहित्य तथा अध्यात्म द्वारा अलग-अलग ढंगसँ। अहाँक उपन्यासक पात्र एहि सम्बन्धमे कहैत अछि- “खसैत लहास, कनैत हुनकर सबहक परिवार। सपनामे अबैत रहल ई सभ सहस्त्रबाढ़निक रूप बनि कए। हमरे सन कोनो शापित आत्मा अछि ओ सहस्त्रबाढ़नि जे अपन संघर्ष अधखिज्जू छोड़ि मरि गेल होएत आ आब ब्रहमाण्डमे घुरिया रहल अछि। आब देखू तीनू बच्चाक परीक्षा परिणाम सभदिन प्रथम करैत अबैत रहथि, आब की भऽ गेलन्हि। हम जे संघर्ष बीचमे छोड़लहुँ तकर छी ई परिणाम।” नन्द हबोढ़कार भऽ कानए लगलाह। एहि पाँतिकेँ जँ गम्भीरतासँ आत्मसात करए लगलहुँ तँ मात्र नामेटा नहि संगहि उपन्यासक सारतत्व एवं उदेश्यो प्रगट भऽ गेल। नन्दक चरित्र आर हुनका द्वारा कएल गेल संघर्षक रूप तथा मनक मनोविज्ञान स्पष्ट भऽ जाइत अछि। उपन्यासक भाषा शैली नवीन ढंगक अछि। वर्णात्मक शैलीमे आरम्भ भेल अछि। भाषामे चित्रात्मकताक एकटा उदाहरण- “एकदिन कलितकेँ देखलहुँ जे ठेहुनियाँ दैत आगू जा रहल छथि। आंगनसँ बाहर भेलापर जतए आँकर-पाथर देखलन्हि ततए ठेहुन उठा कऽ मात्र हाथ आ पाएरपर आगू बढ़ए लगलाह।” किछु एहि तरहक शब्दक प्रयोगसँ भाषामे आकर्षण आबि गेल अछि। जेना थाम्ह-थोम्ह, कानब-खीजब, काज-उद्यम, जान-पहचान, बूढ़-पुरान, घुमब-फिरब, टोका-टोकी, संगी-साथी, झगड़ा-झाँटी, तंत्र-मंत्र, पढ़ाइ-लिखाइ इत्यादि। उपन्यासक भाषा मैथिली पाठककेँ अनुकूल अछि जहिना लोक बजैत छथि तहिना सहज ढंगसँ वर्णित अछि। झिंगूर बाबू, नन्द आ नन्दक भैया, भातिज, बेटा, नवल जी झा, आरूणि आ हुनक माए-बाबू, बहिन, कलित आ हुनक पत्नी, शशांक, मणीन्द, भौजी, शौभा बाबू बुचिया इत्यादि पात्रक माध्यमसँ कथावस्तु संगहि चरित्रक विकास भेल अछि। जाहिमे मौलिकताक संगहि स्वाभाविकता अछि। नव दृष्टिकोणसँ सहजताक संग चरित्र सबहक विकास भेल अछि। जे उपन्यासक अनुकूल अछि। मिथिलाक नदी-कमला, कोशी, बलान अादिक वर्णन भेल अछि। संगहि एहिठामक गाम घर- झंझारपुर, मेहथ, गढ़िया, कनकुआर, कछवी आदि वर्णनसँ सहजहि कथामे मिथिलाक माटि-पानिक गंध आबि गेल अछि। कथोपकथनमे संक्षिप्ता आ सहजता अछि। उदाहरण स्वरूप किछु अंश देखल जा सकैत अछि। आरूणि दू-तीन कौर खा कऽ उठि गेलहा। हुनकर संगी करण पुछलखिन्ह- “पता नहि। घबराहटि भऽ रहल अछि।” “काल्हि ट्रेनिंगपर जएबाक अछि ने। ताहि द्वारे।” “पता नहि।” ताबत भीतरसँ अबाज आएल। सभ क्यो दौगलाह। कथोपकथन जीनगी आ पात्रानुकूल अछि। “की बजलहुँ बेटा”- माए पुछलखिन्ह। “नहि। ई कॉलोनी देखि कऽ किछु मोन पड़ि गेल।” “नहि देखू ई पपियाह कॉलोनीकेँ।” उपन्यास मनोविश्लेषणक संगहि दर्शनसँ सेहो पुष्ट अछि। “पृथ्वी विशाल अछि आ काल निस्सीम, अनंत। एहि हेतु विश्वास अछि जे आइ नहि तँ काल्हि क्यो न क्यो हमर प्रयासकेँ सार्थक बनाएत।” आशाक संचार करएबला ई वाक्य बारम्वार मनमे उठैत अछि। जीनगीक संचालित करबाक लेल तँ आवश्यक अछि जीनगीक रस। वएह रस थिक- आशा। जँ जीनगीमे आशा, अभीप्सा नहि होइ तँ जीवन निरर्थक। “आरूणिकेँ लगलन्हि जे ओ झोंटाबला सहस्त्रबाढ़नि झमारि कए एहि विश्वमे फेक दैत छन्हि हुनक।” कथीले किछु किएक से प्रश्न उठैत अछि मनमे। यएह प्रश्न पाठककेँ बेर-बेर सोचैले मजबूर करैत अछि- बहुत रास गप्प। आ एक प्रश्नसँ जन्मैत अछि बहुत प्रश्न जे पाठककेँ एकटा अलग संसारमे लऽ जाइत अछि। मनुष्यक प्रवृतिकेँ सम्बन्धमे ई पाँति देखल जा सकैत अछि- “मनुष्यक प्रवृतिये होइछ, समानता आ तुलना करबाक साम्य आ वैषम्यक समालोचना आ विवेचनामे कतेक गोटे अपन जीनगी बिता दैत छथि। आरूणि आ नन्दक बीच सेहो अनायासहिं साम्य देखल जा सकैत अछि।” उपरसँ मानव भिन्न-भिन्न प्रवृतिकेँ होइत अछि। किन्तु मूलमे गहराइसँ अन्वेषण कएल जाए तँ किछु तलप सभ मनुष्य लगभग साम्य होइत अछि। अन्त:मे वएह रस नि:सृत होइत रहैत अछि। किन्तु ओतेक शान्त भाव आ ओतेक गम्भीरतासँ स्वंयकेँ देखनाइ सहज गप्प तँ नहि थिक। उपन्यासक आकार लघु रहितहुँ कथा वस्तुक पूर्ण विकास भेल अछि। कथाक अनुकूल अछि भाषाक संतुलित ढंगसँ प्रयोग भेल अछि। नव वस्तुक नवीन दृष्टिकोणसँ अभिव्यक्ति भेल अछि। मौलिकतासँ पूर्ण अछि। वर्तमानमे मैथिली साहित्यक प्रगतिक लेल अहाँ सन बेकतीकेँ आवश्यकता अछि। जे एकभगाह होइत मैथिलीकेँ संंतुलित करता आ संगहि स्वयं तँ अग्रसर होएबे करताह दोसरोकेँ आगू बढ़बाक सुअवसर देताह। एहि दृष्टिकोणसँ अहाँक प्रयास अवर्ण्य अछि। एकटा पाँति स्मरण भऽ गेल- अहीं सन मैिथली सेवकपर अछि हमरा सबहक आस भरब भण्डार मैथिलीक अछि पूर्ण विश्वास। सहस्त्राब्दीक चौपड़पर- सहस्त्राब्दीक चौपड़पर बैसल अहाँ जिनगीक खेल देख रहल अछि। गहन अन्वेषण करैत एक-एकटा चित्रक रचना कऽ रहल छी आ ओइ उमंगमे डूबि रहल छी। “असीम समुद्रक कातक दृश्य हृदय भेल उमंगसँ पूरित....।” अहाँक अन्तरक कवि रविक चित्र उपस्थित करैत कहैत अछि- “सूर्य किरण पसरि छल गेल कतेक रहस्य बिलाएल तिमिरक धुँध भेल अछि कातर मुदा ई की.......।” संग्रहमे किछु हैकू पढ़बाक सुअवसर भेटल। किछु सुआद बदलबाक लेल....। मिथिलांचलक गमकसँ अहाँक कविता हमरा सबहक मोनकेँ गमका रहल अछि : “मोन पाड़ैत छी धानक खेत झिल्ली कचौड़ी लोढ़ैत काटल धानक झट्टा ओहि बीछल शीसक पाइसँ कीनल लालझड़ी जेकरे नाओं लाल छड़ी आ सत धरिआ खेल....।” प्रवासमे रहैत स्मरण होइत गाम घर। ऐ पाँतिमे वियोगक ओइ व्याथाक वर्णन भेटैत अछि। एकटा नवीन लयक संग- “पता नहि घुरि कऽ जाएब आकि एतहि मरि-खपि बिलाएब.....।” ऐ व्यंग्यमे स्पष्ट दृष्टिगोचर भऽ रहल अछि। “लाठी मारबामे कोनो देरी नहि बाछी भेलापर शोको थोड़ नहि परन्तु छी पूजनीया अहाँ....।” बाढ़सँ उत्पन्न भेल समस्या आ ओकरा छोट-छीन पाँतिमे समेटनाइ गागरमे सागर भरबाक प्रयास ऐ पाँतिमे परिलक्षित भऽ रहल अछि- “ठाम-ठाम कटल छल हठहर ऊपरसँ बुन्नी पड़ि रहल सभटा धान चाउर भीतक कोठी टटि खसल पानिक भेल ग्रास...।” नव-नव बिम्बसँ कविता सभ पूरित अछि- “सहस्त्रबाढ़नि जकाँ दानवाकार घटनाक्रमक जंजाल फूलि गेल साँस हड़बड़ा कऽ उठलहुँ हम....।” हड़बड़ा कऽ नै बल्कि अहाँ सचेत भऽ कऽ उठलहुँ। नव-नव चित्र ध्वनि लऽ कऽ नवीन दृष्टिक संगे। पता नै कतऽ धरि जाएब। कतऽ गन्तव्य अछि अहाँक। “विश्वक मंथनमे होएत किछु बहार आब.... पथक पथ ताकब..... प्रयाण दीर्घ भेल आब....।” प्रबन्ध-निबन्ध समालोचना :- प्रारंम्भमे फल्ड वर्कपर आधारित खिस्सा सीत-बसंत अछि। ई लोक कथा मार्मिक अछि संगहि शिक्षा आ उपदेशसँ भरल। सतमाएक चरित्र केहेन होइत अछि आ केहेन होएबाक चाही से स्पष्ट भेल अछि। समाज द्वारा बिसरल जा रहल ऐ कथाकेँ अहाँ पुन: जीअत करबाक कएने छी जैमे माए-बाप बेटा आ सतमाएक मर्मस्पर्शी वर्णन भेल अछि। वर्तमानमे सीत-बसंत नाच बिहारक गाम-गाममे लोक मानसकेँ आनन्दित कऽ रहल अछि। दोसर अछि- मायानन्द मिश्रक प्रथमं शैल पुत्री च, मंत्रपुत्र, पुरोहित आ स्त्रीधन। जे वेदकालीन इितहासपर आधारित अछि। जेकर समीक्षा इतिहास आ साहित्य दुनू आधार लऽ अहाँ नीक जकाँ प्रस्तुत कएने छी। एकर बाद अछि केदान नाथ चौधरी जीक दूटा उपन्यास- चमेली रानी आ माहुर ई पाठक द्वारा आढ़ृत उपन्यास अछि। एकर समीक्षा अहाँ नीक तरहेँ कएने छी। अहा कहने छी जे- नव समीक्षावाद कृतिक विस्तृत विवरणपर आधारित अछि। नो एंट्री : मा प्रविश नचिकेता जीक नाटक अछि। जेकरा अहाँ किछु नव तरहेँ समीक्षा करबाक प्रयत्न कएने छी। कविशेखर ज्योतिरीश्वर शब्दावली- विद्यापति शब्दली, कवि चतुर्भुज शब्दावली आ बद्रीनाथ झा शब्दावली द्वारा मैथिली शब्द भंडारकेँ विशद वर्णन कएल गेल अछि। मैथिली हैकू आ क्षणिका पढ़बाक अवसर भेटल। श्रीमती ज्योति झा चौधरीक इंग्लिश हैकू अहाँक मैथिली अनुवाद सहित। मिथिलाक बाढ़ि- जे एतुक्का रहनिहारक लेल प्रलय बनि आबैत अछि। ऐ समस्या आ सरकारी प्रयासक वर्णन नीक जकाँ भेल अछि। विस्मृत कवि पं. रामजी चौधरीक रचनाकेँ पठकक सोझा रखबाक प्रयास। वास्तवमे ई अहाँक अविस्मरणीय कार्य अछि। विद्यापतिक बिदेशिया- पिआ देसाँतर- ऐमे किछु नव तथ्य सभ सोझा आएल अछि। बनैत-बिगड़ैत सुभाष चन्द्र यादवक कथा संग्रहक समीक्षामे अहाँ द्वारा सार्थक प्रयास भेल अछि। ई कथन जे “ओ कथाक माध्यमसँ जीवनकेँ रूप दैत अछि। शिल्प आ कथ्य दुनूसँ कथाकेँ अलंकृत कए कथाकेँ सार्थक बनबैत छथि।” ऐ कथा संग्रहक अहाँ विशद रूपेँ समीक्षा कएने छी। अन्तर्जालपर मैथिली- ऐमे नवीन एवं ज्ञानवर्द्धक तथ्य सभ पाठकक लेल परोसने छी। आजुक समएमे एकर ज्ञान आ अनुभव बड्ड आवश्यक भऽ गेल अछि। लोरिकक गाथामे समाज ओ संस्कृति- ऐ गाथामे ओइकालक समाज ओ संस्कृति एवं राजनीतिक पक्षकेँ अहाँ उजागर कएने छी। मिथिलाक खोज- अहाँ करैत रहलहुँ गाम-गाम। संगहि पाठककेँ स्थान सभसँ परिचित करबैत सराहनीय कार्य कएलहुँ। त्वन्चाहन्च आ असन्जाति मन (महाकाव्य)- महाकाव्यमे जीवनक अत्यन्त व्यापक चित्रण उदात मानवीय अनुभूतिक रूपमे प्रगत कएल जाइत अछि। अहाँ प्रारम्भमे लिखने छी- “ई भारत ग्रंथ जयक जाहिमे गान तखन कहिया सँ भेलाह एतुक्का लोक कर्महीन, संकीर्ण.....।” अहाँ अन्त ऐ पाँतिसँ कएने छी- “असन्जाति मनक ई सम्बल देलहुँ अहाँ हे बुद्ध हे बुद्ध- हे बुद्ध।” ओना आब महाकाव्य कम लिखल जा रहल अछि। किन्तु साहित्यक सभ विधा जीअत रहबाक चाही। ऐ परम्पराकेँ अहाँक द्वारा आगू बढ़ेबाक प्रयास भेल अछि। धर्म-उपदेशपर आधारित पौराणिक कथाकेँ अहाँ कथावस्तुक रूपेँ किछु नूतन तरहेँ सजेबाक प्रयास कएने छी। अभिव्यक्ति लेल तत्सम शब्दावलीक प्रयोग भेल अछि। ओना पात्रानुकूल ओहन शब्द आनब आवश्यके छल। शीर्षक कहबामे काठिन्य सन अनुभव भेल। ताद्यपि रचना आदर करबाक योग्य अछि। बाल कविता- ऐमे उपदेशक संगहि मनकेँ रंजित करबाक क्षमता होएबाक चाही। जे उत्सुकता बनौने रहए। नव-नव मोहक दृश्य देखबैत अहाँ बच्चा सभकेँ नव संसारसँ परिचित करबाक प्रयास कएने छी। जेना- “मेहनति अहाँ करू फल हमरा दिअ.....।” दोसर पाँति- “मुइलपर भाबहु की भैंसुर केलहुँ अततह समए बदलल नहि बदलल ई गाम हमर।।” निश्चय एतेक रास बाल कविता रचि अहाँ बाल सािहत्यक भण्डार भरबाक सराहनीय प्रयास कएने छी। अन्तमे, यएह जे साहित्यक सभ विधाकेँ एक्केठाम संग्रहित करबाक एकटा नव प्रयोग भेल अछि। व्याकरण आ भाषाक शुद्धता अछि। श्रुति प्रकाशन धन्यवादक पात्र छथि जे नीक जकाँ एतेक पैघ पोथीक प्रकाशन कएलनि। दीर्घकाय पोथीक मूल्य कम अछि। जैसँ पाठककेँ क्रय करबामे सुविधा हेतैक। पोथिक लेल यएह कहब जे- अहाँ भिन्न-भिन्न प्रकारक पुष्पसँ सुसज्जित एहेन पुष्पबाटिका बनेलहुँ जैमे प्रवेश कऽ पाठक जेहने आकांक्षा करत तेहने रूप, गंध प्राप्त करत आ हमरे जकाँ आनन्दित भऽ कहत- “धन्यवाद।” डॉ. मेघन प्रसाद मैथिलीमे अनुवाद-कलाक शास्त्रीयकरणक इतिहास हम पहिनहि कहि दी जे हम अनुवाद कलाक ने तँ मर्मज्ञ छी आ ने कहियो अनुवादक काज कयलहुँ अछि। तथापि राष्ट्रीय अनुवाद मिशन योजना क तहत केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान क अध्किारी लोकनि पूर्ण विश्वसनीयताक संग अनुवादक शास्त्रीय विषयपर आयोजित राष्ट्रीय सेमिनारमे मंचसँ हमरा किछु कहबाक दायित्वपूर्णं ई भार देलनि तकरा लेल हम संस्थाक अध्किारी लोकनि खासक ऽ डॉ0 अजित मिश्रजीक प्रति कोटिशः आभार प्रकट करै छी। अनुवादक काज करबाक उत्कट इच्छा तँ छल मुदा साहित्य अकादेमीक प्रतिनिध् ितथा सदस्य लोकनि तकरा आइ ध्रि पूर्ण नहि होमय देलनि। पता नहि हमरा प्रति कोन प्रकारक दुराग्रह पोसने छथि। एकाध् बेर साहित्य अकादेमीक प्रतिनिध्/िपदाध्किारीसँ पत्राचारो कयलहुँ मुदा सेहो निरर्थके गेल। ई जरुर कहि दी जे मैथिलीसँ जुरल रहबाक कारणेँ मैथिलीमे अनुदित रचना बेस संख्यामे पढ़बाक अवसर प्राप्त भेल अछि तेँ ओहि अनुभवक आधर पर मैथिलीमे अनुवाद-कलाक इतिहासपर किछु कहबाक हिम्मति जुटा सकलहुँ अछि। अनुवाद-कलाक अर्थ - अनुवाद-कलाक मादेँ मैथिलीक अनुभवी आ सफल अनुवादक पण्डित श्री गोबिन्द झाजीक कहब बेसी उपयुक्त बूझि पडै¬़ अछि - एहेन कोनो रहस्य एहेन कोनो सूत्रा नहि वा एहेन कोनो मन्त्रा नहि छैक जे कानमे ढारि देने केओ सफल अनुवादक भ ऽ जाए। हमरा जनैत अनुवाद थिक कोदरबाहि जाहिमे शिक्षण-प्रशिक्षण नहि केवल अभ्यास अपेक्षित होइत छैक। 1 स्वतन्त्राताक सन्दर्भमे अनुवाद जे थिक से एक प्रकारक व्याख्या थिक। प्रायः 1915 ई0मे भाषा वैज्ञानिक Saussure छलाह जे कॉलेज नोट (College Note) लिखलनि तकरा बादमे अनुवाद कहि क ऽ प्रकाशित कराओल गेल। ओ अपन नोटक व्याख्या क ऽ क ऽ प्रकाशित करौलनि जे हुनक मृन्युपरान्त अनुवाद कहि क ऽ प्रकाशित भेलैक। अनुदित रचना लोक सभ मनोरंजन लेल कम्मे ज्ञान लेल बेसी पढ़ैए। तेँ ओकर मूल बिन्दु आ तकनीकि अर्थ बला शब्दक उपयोग कर ऽकाल पूर्ण सावधनीक आवश्यकता अछि। विषयवर्गानुसार अनुवाद तीन प्रकारक मानल गेल अछि - शास्त्रीय व्यावहारिक आ साहित्यिक। अनुवाद शास्त्रीय कम व्यावहारिक बेसी होयबाक चाही। शास्त्रीय आ व्याव- हारिक अनुवादमे मुख्यतः अर्थ अर्थात् Suface Meaning आ भाव अर्थात् Intended Meaning इएह दूनू पकड़बाक प्रयोजन होइत छैक। मुदा साहित्यिक अनुवादमे मूलक अभिव्यजना सेहो सुरक्षित राखबाक अपरिहार्यता रहैत छैक। अभिव्यजनाकेँ पकड़ि पयबाक हेतु विद्वता नहि भावुकता चाही। एहि अभिव्यजनामूलक विशिष्टताकेँ देखैत विभिन्न विद्वान् साहित्यिक अनुवादकेँ अनुवाद नहि कहि Transereation, Recreation पुनःसर्जन प्रतिरूपण आदि नानाविध् नाम दैत छथि। परोक्षानुवाद - भारतीय भाषा सभमे खास क ऽ मैथिलीमे अनुवादक एक विकृत अर्थात् अवाछनीय परम्परा चलि पड़ल अछि। ई थिक परोक्षानुवाद। अर्थात् अनुवादसँ अनुवाद। एहि प्रकारक परोक्षानुवादमे बहुत-रास विकृति आबि जाइत छैक। विकृति कोना आ कतेक अबैत छैक एक बेर तकर परीक्षण यूरोपक कोनो संस्था करौने छल। लेखक जेन आस्टिन केर प्रसि( उपन्यास प्राइड एण्ड प्रीजूडिस केर एक अध्यायक अनुवाद चीनक मण्डेरिन भाषामे भेल छलैक ताहिसँ अरबीमे आ ताहिसँ फेर अंग्रेजीमे कयल गेलैक। बादमे ज्ञात भेलैक जे एहि अनुवाद-श्रंृखलामे मूल पाठक अध्कितर भाग आमसँ कटहर भ ऽ गेलैक। एहि प्रकारक अनुवादक Channel Distortion निश्चय परोक्षानुवादक श्रेणीमे अबैत अछि। परोक्षानुवादक मादेँ एक बात आओर कहल जा सकैत अछि- जँ अनुवादक मूल भाषा चीनी वा अरबी सदृश विदेशी हुअए तखन तँ मैथिली अनुवादमे मूल भाषाक कोनो खास कुप्रभाव नहि पड़तैक किएक तँ दूनू मैथिलीसँ बहुत दूरक भाषा छैक। मुदा मूल भाषा हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद होयत तँ मूल भाषाक बेसी कुप्रभाव पड़तैक आ ओ मैथिलीक स्वरुपकेँ किछु-ने-किछु अवश्ये बिगाड़ि देतैक। हिन्दीक मूल ग्रन्थ वा अनुदित ग्रन्थसँ जतेक मैथिली अनुवाद हमरालोकनि देखि सकलहुँ अछि सभटा लगैत अछि जे मैथिलीक परिधनमे साक्षात् हिन्दीए ठाढ़ हुअय। संगोष्ठीमे विचारणीय अछि जे एहि प्रवृत्तिक विरोध् कोना आ कतेक दूर ध्रि हुअय। सफल अनुवादकक प्रवीणता - सफल अनुवादककेँ तीन क्षेत्रामे प्रवीणता रहबाक चाहीऋ मूल भाषामे प्रवीणता लक्ष्य भाषामे प्रवीणता आ अनूद्य सामग्रीक विषयक्षेत्रामे प्रवीणता। जेना मूल सन्दर्भ गणितक हो तँ गणित-शाड्डमे प्रवीणता वा कमसँ कम प्रवेश तँ अवश्ये चाही। मैथिलीमे वास्तविक स्थिति तँ ई अछि जे जेना आजुक मन्त्राी सर्वज्ञ बूझल जाइत छथि तहिना आजुक मैथिली अनुवादक सेहो सौभाग्य वा दुर्भाग्यवश सर्वज्ञ मानि लेल जाइत छथि। आदर्श अनुवाद तँ ओ होयबाक चाही जे विषय-विज्ञ मूलभाषा-विज्ञ आ लक्ष्यभाषा-विज्ञ लोकनिक सहयोगसँ प्रस्तुत होयत। उपयुक्त पर्यायक चयन - अनुवादमे भनहि भावक उपदेश देल जाय उपयुक्त पर्यायकचयनकेँ सभसँ पहिने आ सभसँ उच्च स्थान दिअ ऽ पड़त। उपयुक्त पर्यायकेँ चुनबाक हेतु अनुवादकर्त्ता पहिने अपन हृदयकेँ नहि द्विभाषिक शब्द-कोशकेँ ढूँढ़ ऽ लगैत छथि। अनुवादकर्त्ता पहिने अपन हृदयमेसँ उपयुक्त पर्याय ताकथु आ अपन आत्मविश्वास बढ़ाबथु आ तकरा बाद द्विभाषिक वा बहुभाषिक शब्द-कोशमे ढूँढ़थु तँ नीक अनुवाद प्रस्तुत भ ऽ सकैछ। मैथिलीमे नीक अनुवादक लेल बहुभाषिक व्याकरण रहब आवश्यक अछि जकर अभाव मैथिलीमे सभसँ बेसी अखरैत अछि। एखन एहि दिशामे डॉ0 राम नारायण सिंहजी एकटा नीक काज क ऽ रहल छथि। डॉ0 राम नारायण सिंहजी व्यावसायसँ संस्कृतक शिक्षक छथि मुदा मैथिलीसँ नीक जकाँ जुड़ल छथि। मैथिली-मलयालम-संस्कृत- अंग्रेजी क्रिया-कोश (Multi Langual Verbal Dictionary)क निर्माणमे लागल छथि। प्रायः पूर्ण भ ऽ गेल छनि। आब छपबाक स्थितिमे अछि। ज्ञातव्य जे साहित्य अकादेमीसँ पुरस्कृत मलयालम भाषाक लेखक श्री तकष़ी शिवशंकर पिळैक एकटा उपन्यास चेम्मीन् साहित्य अकादेमीसँ पुरस्कृत आ विश्वक अनेक भाषामे अनूदित उपन्यासक मैथिली अनुवाद मलाहिन साहित्य अकादेमीसँ शीघ्र प्रकाश्य छनि। हिन्दीक लेखिका डॉ0 मिथिलेश कुमारी मिश्रक छटता कोहरा लघुकथा-संग्रहक मलयालममे जाग्रता शीर्षकसँ अनुवाद प्रकाशित भ ऽ चुकल छनि। मलयालम भाषाक प्रसि( लेखक श्री जी0 शंकर पिळैक तीनटा मलयालम नाटक पूजा मुरि करुत्त दैवत्ते तेडि स्नेहदूतन् केर हिन्दी अनुवाद पूजा घर काले देव की खोज स्नेहदूत शीर्षकसँ नेशनल बुक ट्र्रस्ट ऑफ इन्डियासँ शीघ्र प्रकाश्य छनि। मैथिली भाषामे शब्दकोषक परम्परा:- अनुवादक लेल आवश्यक सामग्री यथा शब्दकोषक परम्परा मैथिलामे आरम्भ भेल बहुत बादमे जा ऽ क ऽ 1951 ई0मे। एहिसँ पहिने बहुतो मैथिली शब्दक प्रयोग/समावेश आन-आन भाषाक कोश तथा शब्दावली सभमे कयल गेल छल। मैथिलीमे एखन ध्रि प्रकाशित 11 गोट कोश उपलब्ध् अछि- 1 मिथिला शब्द प्रकाश 3 2 मिथिलाभाषाकोष 4 3 धतुपाठ 5 4 बृहद् मैथिली शब्दकोश 6 5 पर्यायवाची शब्दकोश 7 6 मैथिली शब्दकोश 8 7 मैथिली शब्दकल्पद्रुम 9 8 अंगिका हिन्दी शब्दकोश 10 9 कल्याणी-कोश: मैथिली अंग्रेजी शब्दकोश 11 10 चातुर्भाषिक शब्दकोश 12 एवं 11 मैथिली अंग्रेजी शब्दकोश 13। मैथिली मे प्रकाशित उपर्युक्त शब्दकोश सभक तुलना जँ आन भारतीय भाषा सभसँ करी तँ निश्चये मन खिन्न भ ऽ जायत। मैथिलीक नवीनतम कोश थिक श्री गजेन्द्र ठाकुरक मैथिली-अंग्रेजी-शब्दकोश जे प्रायः प्रकाशनक क्रममे अछि। एकर अतिरिक्त न्यू हिन्दुस्तानी इंग्लिश डिक्शनरी ऐन इन्ट्रोडक्शन टु द मैथिली लैंगुएज ऑफ बिहार भाग-2 क्रैस्टोमैथी एण्ड भोकेब्युलरी ट्रान्सलेशन ऑफ मनबोध् स हरिवंश एण्ड इन्डेक्स टु मनबोध् स हरिवंश बिहार पीजेन्ट लाइफ ए कम्पैरेटिभ डिक्शनरी ऑफ द बिहारी लैंगुएज भाग-1 बंगीय शब्दकोश ए कम्पैरेटिभ एण्ड ईटीमोलोजिकल डिक्शनरी ऑफ नेपाली लैंगुएज अमरकोशविवशति वर्णरत्नाकर विद्यापतिर पदावली कृषि कोश बेसिक कलोक्विअल मैथिली आदि कृति सभकेँ शब्दसूची शब्दानुक्रमणी वा पारिभाषिक पदावली कहल जा सकैत अछि जकरासँ मैथिलीक कोश सभ बनल आ अनवादक काज लेल गेल अछि। अनुवाद भाषाक नहि भावक होयबाक चाही। अनुवादककेँ भाषाक फेरमे नहि पड़ि पूर्णतः भावग्राही होयबाक चाही। भाव प्रसंगसँ पकड़ल जाइत अछि। प्रसंग शब्दक अर्थ बड़ व्यापक अछि। एहिमे देश काल पात्रा प्रकरण घटनाक्रम विषय आदि पारिवेशिक तत्त्व समाहित रहैछ। अनुवादमे प्रसंगसँ बेसी महत्त्व अछि संगतिक। अनुवादककेँ संगति पर सतत् ध्यान रखबाक चाही। अनुवादकक श्रेणीकरण - अनुवादककेँ शब्दग्राही वाक्यग्राही आ भावग्राही आदि तीन श्रेणीमे विभक्त कयल जा सकैत अछि। जेना साइकिल सिखनिहार खसबाक डरेँ साइकिलकेँ कसिक ऽ पकड़ने रहैत अछि। तहिना नवसिखुआ अनुवादक अशु( भ ऽ जयबाक डरेँ मूल भाषाक शब्द आ वाक्य-विन्यासकेँ ध्यने रहैत छथि। हुनका डर होइत छनि जे मूल भाषासँ कनेको विचलित होयब तँ अनुवाद अशु( भ ऽ जायत।परिणाम उनटा भ ऽ जाइत छै। कहबाक तात्पर्य जे मूल भाषाक सतर्क अनुसरणक फेरमे हुनक लक्ष्य भाषाक सहज प्रवाह बिगड़ि जाइत छनि। तेँ अनुवादककेँ भाषाक फेरमे नहि पड़ि पूर्णतः भावग्राही होयबाक चाही। एकटा टंकक उदाहरण द ऽ अनुवादक पण्डित श्री गोबिन्द झा अनुवादकक एहि श्रेणीकरण - शब्दग्राही वाक्यग्राही आ भावग्राही आदिक पुष्टि कयने छथि।2 भाषाक प्रभाव अनेक प्रक्रममे प्रतिफलित होइत अदि। भारतीय शब्दशाड्डमे एकर चारि प्रक्रम वखणत अछि - परा पश्यन्ती मध्यमा आ बैखरी । बैखरी थिक भाषाक ध्वन्यात्मक स्वरुप। इएह एक भाषाकेँ दोसर भाषासँ फराक करैत अछि। प्रक्रमक विभिन्न ध्वन्यात्मक प्रतीकसँ जे प्रतीत होइत अछि से थिक अर्थ। एकरे कहल जाइत छै मध्यमा किएक तँ ई प्रक्रम ध्वनि आ भाव दूनूक मध्यमे पड़ैत अछि। पश्यन्ती केवल ध्यान-चक्षुसँ देखल जाइत अछि। एही ध्यान-चक्षुसँ भाषाक अर्थात्मक स्वरुप देखाइत अछि। प्रक्रममे आगाँ जा ऽक ऽ पश्यन्ती लुप्त भ ऽ जाइत छैक सकल भाव मिलि एक अखण्ड महाभाव भ ऽ जाइत छैक तखन भावना परा पर पहुँचि जाइत छैक। ई परा योगशाड्ड वा दर्शनशाड्डक विषय थिक। परा छोड़ि शेष तीनू प्रक्रमक बोध् नीक अनुवादककेँ होयबाक चाही -1 पहिने मूल भाषाक बैखरीकेँ पकड़ूऋ 2 तकरा द्वारा मूल भाषाक मध्यमाकेँ पकड़ूऋ 3 पुनः तकरा द्वारा मूल भाषाक पश्यन्तीकेँ पकड़ूऋ 4 आब ओहि पश्यन्तीक आधरपर लक्ष्य भाषाक मध्यमाकेँ पकड़ू आ 5 ताहि आधरपर लक्ष्य भाषाक बैखरीकेँ पकड़ू। एकरे नाम थिक अनुवाद। ई प्रक्रिया मूल भाषाक ध्वन्यात्मक प्रतीकक decoding सँ आरम्भ होइत अछि आओर भावक प्रक्रम पर आबि encoded होइत-होइत लक्ष्य भाषाक ध्वन्यात्मक प्रतीकक रुपमे परिणत भ ऽ जाइत छैक। सरलता - अनुवादक भाषा एहेन हुअय जे जनसामान्य आसानीसँ बूझि सकय। एहिसँ अनुवाद बेसी लोकप्रिय होयत आ अनुवादकक कार्य-प्रगति प्रभावित होयत। एहि सन्दर्भमे अंग्रेज लेखक ग्रियर्सनक अनुसन्धनात्मक पोथीक मैथिली अनुवाद बिहारक ग्राम्य-जीवन निःसंदेह अनुकरणीय एवं सराहनीय अनुवाद-कार्य मानल जा सकैत अछि। बहुभाषिक व्याकरण वा क्रिया-कोश (Multi Langual Verbal Dictionary)क निर्माण-कालमे एहि बिन्दुपर बेसी ध्यान देल जयबाक चाही जाहिसँ कि आगाँक अनुवादककेँ अनुवाद-कार्य करबामे सुविध हुअय। अनुवादक शास्त्रीयता नीचाँसँ उपर जयबाक चाही - आम लोकक ज्ञान यथा- लोकशब्दाबलीक उपयोग कृषकक ज्ञान यथा- कृषकक जीवन-यापनमे दैनिक व्यवहारमे आबयबला शब्दाबलीक उपयोग जेना उपर उल्लिखित चेम्मीन् क मैथिली अनुवाद मलाहिन उपन्यासमे कयल गेल अछि तेहेन उपयोग आनो अनूदित पोथीमे कयल जयबाक चाही। तकनीकि शब्द यथा- मेडिकल साइन्सक अनुवादमे गामक पशुरोग व्याध्कि नामादिक उपयोग अनुवादमे होयबाक चाही। तहिना मानवजनित रोगहुमे ग्रामीण लोकक देहाती रोगक नामावलीक उपयोग मैथिली अनुवाद लेल कयल जा सकैत अछि। संक्षिप्तता आ स्पष्टता - अनुवाद सरल संक्षिप्त आ एकदम स्पष्ट हुअय ताहि लेल आवश्यक अछि जे बेसीसँ बेसी तकनीकि (Technical Meaning) शब्दाबलीक उपयोग करैत अर्थगूढार्थकेँ Foot Notes वा Bracket मे ओतहि बुझा दी तँ से नीक रहत। अनुवादक शास्त्रीय सामग्रीक उपलब्ध्ता (History of knowledge:Text Translation in Maithili)-आब लिखित सामग्री खास क ऽ अंग्रेजी (English)मे कम्प्यूटर (Computer) इन्टरनेट (Internet) ई-मेगजिन (e-magazines) ई-कोश (e-dictionary) ब्लॉग्स (Blogs) आदिपर उपलब्ध् होइ छै। मुदा बिडम्बना अछि जे आजुक मैथिलीक लेखक-अनुवादक अंग्रेजी आ आध्ुनिक तकनीकि ज्ञानसँ अलगे पड़ाइत रहैत छथि। मैथिलीमे अथवा मैथिलीसँ आन भाषामे नीक अनुवाद लेल अंग्रेजी भाषाक संग-संग आन भारतीय भाषाक खास क ऽ दक्षिण भारतीय भाषाक ज्ञान राखब आ तकनीकि उपकरण यथा-कम्प्यूटर (Computer) एल सी डी प्रोजेक्टर (LCD Projector) कैमरा (Camera) सी डी /डी वी डी (Compact Disk/Digital Video Disk) पेन ड्राइव (Pen Drive) आदि संचालित करबाक योग्ता एवं इन्टरनेट (Internet) ई-कोश (e-dictionary) ई-मेगजिनम (e-magazines) ब्लॉग्स (Blogs) आदिक उपयोग करबाक दक्षता रहब अत्याावश्यक भ ऽ गेल अछि। एकर अतिरिक्त अनुुवादककेँ कतेक स्वतन्त्राता भेंटबाक चाही ? अनुवादक कतेक स्वतन्त्राता चाहैत छथि ? संस्था कतेक स्वतन्त्राता देब ऽ चाहैए ? आदि-आदि नीति आ सि(ान्त आओर व्यावहारिक सम्बन्ध्पर अनुवादक स्तरीयता पठनीयता उपयेगिता उपादेयता तथा अनुवादकक कुशलता आ प्रवीणता एवं अनुवाद-कार्यक सफलता निर्भर करैत छैक। अनुवादपर केन्द्रित एहि राष्ट्रीय सेमिनारमे एहू मूल बिन्दू सभपर विमर्श होयब आवश्यक अछि। ध्न्यवाद। जय मिथिला। जय मैथिली। सन्दर्भ संकेतः- 1 अनुचिन्तन: पण्डित गोबिन्द झा: नवारम्भ प्रकाशन पटना: 2010: पृ0- 113 2 अनुचिन्तन: पण्डित गोबिन्द झा: नवारम्भ प्रकाशन पटना: 2010: पृ0- 115 3 पं0 भवनाथ मिश्र प्रकाशक स्वयं ग्राम-हटाढ-रुपौली पो0- झंझारपुर जि0- मध्ुबनी प्र0 खण्ड 1951 4 पं0 दीनबन्ध्ु झा प्रकाशक स्वयं ग्राम-इसहपुर पो0- मनीगाछी जि0- दरभंगामध्ुबनी 1950 5 पं0 दीनबन्ध्ु झा प्रकाशक- मैथिली साहित्य परिषद् दरभंगा 1950 6 सम्पा0 डॉ0 जयकान्त मिश्र प्रकाशक- इन्डियन काउन्सिल ऑफ एडभान्स्ड स्टडीज शिमला 1973 7 प्रकाशक- प्रज्ञा प्रतिष्ठान काठमाण्डु नेपाल 1974 8 सम्पा0 गोबिन्द झा प्रकाशक- मैथिली अकादमी पटना 1992 9 पं0 मतिनाथ झा प्रकाशक- मिश्र बन्ध्ु प्रकाशन जमुथरि जि0- मध्ुबनी 1997 10 डोमन साहु समीर प्रकाशक- विनोद कुमार चतुर्वेदी सिकन्द्राबाद आन्ध््रप्रदेश 1997 11 सम्पा0 गोबिन्द झा प्रकाशक- महाराजाध्रिाज कामेश्वर सिंह कल्याणी पफाउन्डशन दरभंगा 1999 12 उमेश चन्द्र झा प्रकाशक- सुमित्रा प्रकाशन दरभंगा 2007 13 सम्पा0 गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा तथा विद्यानन्द झा प्रकाशक- श्रुति प्रकाशन दिल्ली 2009 डॉ. इन्दुधर झा, मैथिली विभाग, ल.ना.ति. महाविद्यालय, मुजफ्फरपुर। दू-पत्र : एक विश्लेषण दू-पत्र वस्तुत: पत्रात्मक शैलीमे लिखल मैथिलीक पहिल उपन्यास थिक। मात्र दू गोट पत्रमे समाएल समग्र कथानक। मात्र दू गोट पत्रमे भारतीय नारीक निश्छल, िनर्मल, शालीन ओ प्रौढ़ चित्रांकन। पहिल पत्र अपन स्वामी सुरेन्द्रकेँ लिखने छथि श्रीमती इन्दू देवी आ दोसर पत्र एक अमेरिकन महिला जेसिका द्वारा अपन भारतीय मित्र रमेशक नामे लिखल गेल अछि। मात्र चारि गोट पात्रक प्रयोग ऐ उपन्यासक एक अलग विशेषता अछि। सुरेन्द्र िनर्विवाद रूपेँ ऐ उपन्यासक नायक छथि, आ नायिका भारतीय नारी श्रीमती इन्दू देवीकेँ सेहो कहि सकैत छी आ एक अमेरिकन महिला जेसिकाकेँ सेहो। रमेश छथि मुख्य सह-नायक। इन्दग देवीक दूर-दराजे सम्बन्धी भाए आ सुरेन्द्रक सार। कथानक दू गोट पत्रक माध्यमसँ जे मुख्य कथानक पाठकक मन:चेतनापर चित्र उकेरैत अछि से ई जे सुरेन्द्र अपन बाइसम वर्षक अवस्थामे पन्द्रह वर्षीय इन्दूसँ अपन पूर्ण सहमतिसँ विवाह कएने छथि, जकर माध्यस्थता आंशिक रूपेँ कएने छथि रमेश। रौराठ-सभासँ विआह निश्चित भेल छल। सुरेन्द्र इन्जीनियरिंगक चारिम वर्षक छात्र रहथि आ इन्दू नवम वर्गक छात्रा। ओना इन्दू दू वर्ष पहिनहि गामक स्त्रीगण समालक मध्य अजग्नि सन भऽ गेल रहथि मुदा ओइ सभामे दुनू भाँइ मीलि कथा स्थिर कऽ लेने रहथि। सुरेन्द्रक बिआह पूर्ण मैथिल रीतिऍं इन्दूसँ भेलनि। इन्दू, माने श्रीमती इन्दू देवी, आब दू बच्चाक माए छथि आ सुरेन्द्र अमेरिकामे रमि गेल छथि। आब तँ नअ वर्षसँ कोनो सम्पर्क नै रहि गेल छन्हि, मात्र दू-आखर चिट्ठीक सम्पर्क छोड़ि कऽ। असह्य पीड़ासँ झामरि भऽ गेलीह अछि। बिआहक बाद दू-चारि वर्ष धरि तँ सुरेन्द्रकेँ इन्दूसँ दाम्पत्य प्रेम छलनि आ तकरहि परिणाम भेल रहनि दू गोट सखा-सन्तान मुदा तँए कि आब तँ अमेरिकाक एक गौरांगी रमणीक रंग तेनामे तेना ओझराएल छथि जे सम्बन्ध-विच्छेदक प्रस्ताव इन्दू देवीकेँ पठओने छथि। असलमे पहिल पत्र सुरेन्द्रक सम्बन्ध-विच्छेदक प्रस्तावक जबाब अछि। अपन लोक-वेद, घर आंगन, इष्ट-परिजनसँ निस्पृह भेल नअ वर्षसँ अमेरिकामे रहैत अपन जीवन, इच्छा-आकांक्षाक एकमात्र आधार, सोहाग-भागक अधिष्ठाता, सुख साम्राज्यक स्वामी, अग्नि-साक्षित पति सुरेन्द्रकेँ लिखल हुनक प्रत्यागमनक बाट तकैत, पलकक सेज सजौने, विरहाग्निमे तड़पैत श्रीमती इन्दू देवीक पत्र। ओना जेसिका प्रभावित छथि सुरेन्द्रसँ। तहूसँ पहिने रमेशसं भेँट पहिने हुनका सुरेन्द्रसँ होइत छन्हि आ प्रभावित जे होइत छथि सेहो सुरेन्द्रहिसँ मुदा अचानक जे रमेश इण्डिया अबैत छथि तँ रमेशसँ सेाहे प्रभावित भऽ जाइत छथि। मुदा रमेशमे भारतीयता ततेक ने वेशी देखैत छथि जेसिका जे क्रमश: भारतीयतासँ प्रभावित होइत गेलीह आ रमेशसँ दूरी बनैत गेलनि। मुदा इन्द्र देवीकेँ विच्छेदक प्रस्ताव पठौलाक उपरान्त सुरेन्द्र जेसिकाक समक्ष अपन मोनक बात स्पष्ट कऽ देलनि। जेसिकासँ पहिल भेँट सुरेन्द्रकेँ जर्मन क्लासमे भेल रहनि। दुनूक आवासमे मात्र चारि ब्लाकक अन्तर रहनि। दुनू असगर रहथि। मोन मनएबाक हेतु एक-दोसराक घर आबए-जाए लागल रहथि। जेसिका सुरेन्द्रक ओहिठाम जाए भानस भात सेहो करथि, कारण, सुरेन्द्रकेँ तकर अवगति नै रहनि आ ऐ बातसँ जेसिका मिश्र रहथि। संग उठनाइ-बैसनाइ, पार्क घुमनाइ, सिनेमा देखनाइ आदि बात तँ सहजे होमए लगलनि। सुरेन्द्रक संग जीवन बितएबामे जेसिकाकेँ कोनो तरहक आपत्ति नै रहनि, से ओ मोने-मोन जनैत रहथि आ तँए जे सुरेन्द्र इन्दू देवीसँ विच्छेद आ हुनका संग सम्पर्कक प्रस्ताव स्पष्ट कऽ देने रहथिन आ संगहि हुनक सम्मति मंगने रहथिन से जेसिकाकेँ अस्वाभाविक नै लागल नहनि। जेसिका ई जनैत रहथि जे सुरेन्द्र पहिनौं भारतमे बिआह कएने छथि, संगहि सुरेन्द्रक ऐ तर्कसँ, जे आब विगत नअ वर्षसँ हुनका अपन पत्नीसँ कोनो संपर्क नै छन्हि सेहो सहमत रहथि आ सुरेन्द्रसँ सम्बन्ध स्थापित करबामे एकरा कोनोटा बाधा नै बुझैत रहथि, कारण अमेरिकी संस्कृतिमे एकर कोनो मूल्य नै छैक। मुदा रमेश जे अपन छोट-छीन पत्रक संग सुरेन्द्रक नामे लिखल इन्दू देवीक विस्तृत पत्रक अंग्रेजी अनुवाद जेसिकाकेँ पठओने रहथिन तकरा पढ़ि जेसिका किंकर्त्तव्यविमूढ़ रहथि। एखन इन्दू देवीक अंग्रेजी अनुवाद हाथमे अएलनि तँ भारतीयताक असली स्वरूपसँ अवगत भेलीह। ओहुना भारतीय आचार-बेवहार, रीति-रेवाज, धर्म-कर्म आदिसँ प्रभावित रहबे करथि। रामलोचन ठाकुर • समकालीन मैथिली-कथाक यथार्थ-उर्फ यथार्थक-कथा • • आयू प्राय: समस्त समीक्षक- समालोचक लोकनि कहैत छथि, आ ऐ उचिते कहैत छथि, जे समकालीन मैथिली कथा-भारतक जे कोनो भाषाक समकालीन कथाक’समकक्ष अछि। अपन गुणवत्ताए नहि गुणालाकताक आधाऐ पर समकालीन मैथिली कथा आ कविता अन्यान्य विघासँ आगू अछि ताहिमे संदेहक कोनो अवकाश नहि। आ ई गुणवत्ता थिक’’ ओकर यथार्थपरकता जे आजुक मिथिलाक यथार्थ थिक। एहिठाम’’स्पष्ट’’ कऽ दी जे मिथिलाक यथार्थसँ हमर तात्पर्य मात्र भौगोलिक मिथिलाक (जे वर्तमानमे अछिए नहि) रौदी–दाही, पाबनि–तिहार, भोज–भात, वर्ण–विद्वेष, अभाव–अभियोग, इच्छा–आकांक्षा, धरि–सीमित, नहि अछि अपितु राज्य-केन्द्रसरकार द्वारा वंचित-अवहेलिब मिथिलाक जलबल, जे अपन उदर पूर्ति आ परिवारक भारण–पोषण हेतु प्रवास पलयिन लेल बाध्य अछि, असम पंजाब, मुम्बई, मध्यप्रदेशसँ भारतक राजधानी दिल्ली धरि अवांक्षित- उपेहित गारि-मारि खाइत- जीवन व्यतीत–करबा लेल बाध्य अछि, तकरो–यथार्थ अछि; यद्यपि समकालीन कथा-साहित्यमे ई विषय-बात तेना भऽकेँ देखभगर रूपमे नहि आयल बुझना जाइछ। • मैथिलीमे कथा-लेखन” बेस विलंबसँ प्रारंभ भेल। डॉ. जयकान्त मिश्रक अनुसार 1920 ई. धरि लोककेँ ई बोधे नहि छलैक जे कथा की थिक, वा कथा ककरा कही? डॉ रमानन्द झा ‘रमण’क अनुसार मैथिलीक प्रथम कथा थिक श्री कृष्ण ठाकुर ‘चन्द्र प्रभा’जकर’ रचनाकाल 1880 ई.सँ पूर्वक थिक। डॉ. जयकान्त मिश्रक अनुसार ‘चन्द्रप्रभा’1885ई.क रचना थिक जकर रचनाकार छथि-श्रीकृष्ण सिंह ठाकुर। मोहन भारद्वाज जनार्दन झा ‘जनसीदत्तक ‘ताराक वैधव्य’केँ प्रथम मौलिक कथा होएबाक ज्ञात कहैत छथि ई विडम्णना थिक मैथिली साहित्यक इतिहासक। • विमर्शसँ ज्ञात होइछ जे विगत शतीक चारिम दसकसँ कथा-लेखन गति पकड़लक। मुदा ताहि कथा सभमे मिथिला नहि छल, मिथिलाक यथार्थ नहि छल। एहिमे संदेह नहि जे मैथिल समाज खंड-खंडमे विभक्त छल, प्रारंभसँ रहितो वृहत्तर मैथिल समाजक यथार्थमे साम्य तँ छलैके, जे विषय-बात मात्र कथा नहि, हमर समस्त साहित्यसँ असंभव रूपेँ अनुपस्थित छल। हमर समस्त साहित्य एक विशेष वर्गक, जकर संख्या दस शतांशसँ वेशी नहि छल, घुरखुर ओगरते रहल। एकर विडम्बला नहि तँ आर की कहल जाएत जे हमर लोकजीवनक यथार्थ हमर साहित्य-संस्कृति हमर कला-कौशल बाहरक लोककेँ आकर्षित- उद्वेलित करैत छैक, प्रेरित-प्रभावित करैत छैक, मुदा हमरा लोकति लेखे धनसन। हमर लोक साहित्य देखि ग्रियर्सन मुग्ध भेल छलाह, हमर चित्रकला देखि विलियम आर्चर आभिभूत भेल छलाह, हमर लोक जीवनक यथार्थ बंगला साहित्यकार सतीनाथ भादुरीसँ विभूतिभूषण मुखो पाध्याय धरिकेँ पेरित-प्रभावित कएने छल, परंच हमर सर्जक प्रतिभा एहि सभसँ विमुख साँफ पराती भोर बिहाग राग ढ़ेरबामे व्यस्त आ मस्त छलाह। • कोनो विषय-वस्तु पर लिखबाक लेल ई आवश्यके नहि अनिवार्य थिक जे ताहि विषय-वस्तुक बोध हो! आ से होएब निर्भर-करैछ लेखकक स्थिति अवस्थान पर ओकर सामाजिक सरोकार आ संवदेना पर। कपोल कल्पित कथाक तँ तथाकथित यथार्थ पाठकीय विश्वसनीयता अर्जित कऽ पाओत ओकरा प्रभावित कऽ पाओत ताहिमे संदेह। एहि दृष्टिमे विचार कएने पबैत छी जे मैथिलीक आरंभिक कथाकार लोकनिक अपन सीमा सरहद छलति जकर अतिक्रमण कऽ पाएब हुनका लोकनिक लेल संभव नहि छल। एहि सीमाक अतिक्रमण कएने छलाह काञ्चीनाथ झा ‘किरण’। वस्तुतः किरण जीक कोनो सीमा छलहे नहि, ओ सीमातीत छलाह। हिनक समाज छल वृहत्तर मैथिल समाज जाहिमे सभ जाति, सभ धर्मक लोक छल आ सभक संग हिनक सामाजिक सरोकार छलनि। 1941 ई.कऽ हिनक ‘धर्मरत्नाकर कथा’ केँ एहि सन्दर्भमे बानगीक रूपमे देखल जा सकैछ। किरण जीक प्राय: समस्त कथा तत्कालीन मिथिलाक लोकजीवनक यथार्थक बानगी थिक। हिनक सर्वाधिक चर्चित-परिचित कथा थिक–मधुरमतिद्ध एक चित्रक चर्च विरले देखल-सुनल जाइछ। मुदार एहिमे लोक-जीवनक यथार्थ जाहि तरहेँ प्रखर मुखर भेल देखल जाइछ से अदभुते अछि। वस्तुतः किरण जी दस प्रतिशत उच्च वर्गीय अकर्मण्य लोकक विकृत विलास बहुल जीवन चरित नहि नब्बे प्रतिशत लोकक जीवनेच्छा–जिजीविषा, श्रम- संधर्षक कथा-गाथा लिखवाकेँ श्रेयष्कर बुझैत छलाह। जेना कि डॉ रमानन्द झा ‘रमण’ लिखैत छथि‘किरणक सम्पूर्ण कथा साहित्य यथार्थक धरती पर सुदृढ़ अछि। फलतः अपन चारूकात पसरल दीन दुखीक समस्याकेँ, जन-बोनिहारक समस्याकेँ, ओकर अन्तरक हाहाकारकेँ आशा-निराशाकेँ आ संघर्षशीलताकेँ अपन साहित्यक प्रेरणा स्रोत बनाओल अछि। चारुकात पसरल कथ्यकेँ अपन विशिष्ट शैलीमे दारल अछि। एहि लेल कल्पनाक उड़ान झा विजातीय परिवेशक संस्कार हिनक-कथामे नहि भेटैछ। अपितु भेटैछ सदिखन अपने टोल-पड़ोसक मानवीय समस्याक प्रभाव शाली अभिव्यक्ति आ अपने धरतीक सोहनगर महमही आ ओकरे आशा-आकांक्षाक संतुलित टिपकारी’। वस्तुत- किरण जी-मैथिलीक प्रथम कथाकार छथि जिनकर कथामे लोक जीवनक यथार्थ जकरा प्रकारान्तरसँ समाजिक यथार्थ सेहो कहल जा सकैछ, एते, प्रखर प्रगाढ़ रूपें चित्रित भेल अछि। एहिठाम लिखब प्रायः अनर्गल नहि होएत कि हिनक कथा ते मात्र सामाजिक यथार्थक कथा थिक अपितु सामाजिक चेतना सेहो अप्रतीम उदाहरण थिक जकर ई प्रयोक्ता–प्रवक्ता छथि, रूपकार छथि। विगत शतीक उत्तारार्धमे एहन प्रचुर कथा लिखल गेल अछि जाहिमे मिथिलाक लोकजीवनक यथार्थ अपन समग्रता–सम्पूर्णतामे चित्रित भेल अछि। अपवाहकेँ छोड़ि दी तँ प्राय: समस्त चर्चित प्रतिष्ठित कथाकारक एहिमे थोड़-बहुत योगदान-अवदान अछि। मोहन-भारद्वाज अपन-आलेख मैथिली कथामे सामाजिक चेतनामे एक सूची देने छथि। हम एहिठाम कथा वा कथाकार सूची दए आलेखकेँ दीर्घायित नहि कए वर्तमान शतीक किछु टटका प्रकाशनसँ बानगी प्रस्तुत कऽ रहल छी जाहि- सँ विषय सुस्पष्ट भऽ पाबए । • 2009 ई.मे प्रकाशित भेलए सुभाष चन्द्र यादवक कथा संग्रह ‘बनैत बिगड़ैत’। एहिमे एक कथा अछि ‘हमर गाम’। ई गाम लेखकेक नहि ई मिथिलाक कोसी अंचलक एक गाम थिक जे हमरो भऽ सकैए, अहुँक भऽ सकैए। एहि गामक एक घरक चित्र देखल जाए- घरक एककात दूटा चौकी लागल छै। चौकी पर मेल खट-खट भोटिया बिछा ओल छै। चौकीसँ सटले दच्छिन गाय, भैंस, बकरी सब रहैत छै। नाकमे निरंतर गोबर आ गोंतक दुर्गन्ध अबैत रहैत अछि। कोसिकन्हाक अधिकांश लोक एहिना रहैत अछि। जानवरक संग। जानवरक समान। जानवरक हालत मे। आ ई कोनो नव बात नहि थिक। साठि वर्ष भारतकेँ स्वाधीन भेलाक पश्चातो जखन कि नितहु लाख-लाख टाका खर्च कए सरकारी, अर्ध सरकारी प्रचारतंत्र देशक बहुमुखी विकासक इन्द्रधनुषी छवि देखबैत अछि, हमर मिथिलाक स्थिति आर बदतर भेलए। ‘बहुत-पहिने जहिया कौआ, कास आ पटेरक जंगल रहै, तहिया अनेक तरहक जल आ थल चिड़ै अबैत रहै। पूर्णियाक शिकारी चिड़ै बझबैत रहै आ सुपौलमे बेचैत रहै। आब कौआ उकनि गेल छै आ कास-पटेर उकनल जा रहल छै। पहिने लोक कौआ, कास-पटेर बेचि कऽ किछु कमा लैत छ्ल। जंगलमे झुंडक झुंड गाय-महींस पोसि कऽ जीविका चलबैत छल। खढि़या हरिन माछ, काछु आ डोका मारि कऽ खाइत छल। आब सब किछु खतम भऽ गेल छै आ जीबाक साधन दुर्लभ भऽ गेल छै। मुदा एहि आभाव अभियोग यंत्रणा वंचनाक अवस्थाओमे मानवीय संवेदना, सामाजिक सरोकार अनामति छैक ‘डोम चमार मुसहर दुसाध तेली, यादव सब एके कलसँ पानि भरैत अछि एके पटिया पर बैसैत अछि’। आ जूड़शीतल दिन जेठ श्रोण्डजत चानि पर पानि दैत जुड़ाएल रहबाक आशीष देब नहि विसरल छथि। समकालीन कथाक विरल विलक्षण हस्ताक्षर सुभाषक मादे महाप्रकाश उचिते कहैत छथि- ‘हुनक रचनाकार समयक समुद्रमे डूबि-डूबि मोती माणिक ताकि अनैत अछि। एहि तरहेँ सुभाषक लेखन यथार्थक अमूल्य दस्तावेज बनि जाइत अछि’। • आइ समय बड़ तेजीसँ बढ़ि-बदलि रहल अछि। महानगरीय प्रदूषन आ वैश्वीकरणक प्रभावमे ग्राम्य परिवेश प्रदूषित भऽ रहल अछि। सरकारी बयना-अवहेलनाक शिकार मिथिलाक प्रतिभा आ श्रम पलायन लेल वाध्य अछि, आ जखन ओ गाम अवैए, अपना संग विजातीय विकृत संस्कृर्ति नेने अबैह। प्रदीप बिहारीक ‘उग्रास’ कथा एहि विकृतिक स्पष्ट चित्रांकन थिक जे समकालीन लोकजीवनक यथार्थ बनल जा रहल अछि वा बनि चुकल अछि। शिक्षितो वर्गक धर्मभीकता अंधविश्वास आ कुसंस्कार तथा पाछूकेँ प्रतिष्ठाक मानक बूझि तकर प्रदर्शन जतबा चिन्तनीय किएक ने हो मुदा आजुक सत्य होइत देखल जा रहल अछि। राम भूषक बाबू अपन फुतहु आ पोताकेँ घरमे कते दिन राखि पओत। • मिथिला-गामक देश थिक। सहजता-सरलता आ सामाजिकता गामक विशेषता रहलैए। मुदा आइ गर्मेया वा ग्रामीण जीवनक ई विशेषता विल्पुप्त भेल जा रहलए। नव खाढ़ीमे ई परिवर्त्तन बेस तीव्र आ त्वरित भेल देखल जाइछ। • औदार्यक अभाव ओ स्वार्थपरता संक्रामक व्याधिक रूप लेने जा रहल अछि। तेँ कोनो पुतहु अपन वृद्ध ससुरक मादे निधोख बाजि सकैछ अइ कमासुतकेँ सखमे देखै जाही। ओइ दिनमे कहलिऐ जे बियाह कए लैह तँ नहि केलक। आब जे अइ उमरमे रंडीबाजी करत तँ से हम चलए देबै? बेचारा घूरन बुढ़बाकेँ बेकल भऽ गेनाइ स्वाभाविक छैक। फलतः ओ अपन गरीब विधवा भाउजकेँ अंग झँपबाक लेल नुआ की देत, भाउजोकेँ त्यागि दैछ। तारानन्द वियोगीक एहि त्याग कथाक भयावहता चरम पर तँ तखन पहुँचैए जखन घूरन मझिली पुतहु कहैत छैक ‘बेसी लबर लबर करबह तँ तते चप्पल मारबह जे चानि परहक सबटा केश खहरि जेतह....’। अपन ससुरक खुलेआम एहन अवज्ञा अपमान चौंक। बयवला बात रहितो आजुक यथार्थ थिक जे वैश्वीकरणक प्रभावें हमर सांस्कृतिक क्षरणक प्रतीक थिक। • एहिठाम हम एक गोट आर कथाक चर्च करए चाहब। से थिक विभूति आनन्दक‘संक्रान्ति’ कथा। मन पड़ैए सकल विधा उदधि मिथिला विदित भरि संसार। आ ताहि मिथिलामे शिक्षाक की स्थिति अछि तकर जीवंत छवि थिक ई कथा एक तँ शिक्षक लोकनि पढ़बए नहि चाहेत छथि, मुदा जँ केओ चाहितो छथि तँ ताहि लेल मच औनाइते रहि जाइत छनि, छात्रक दर्शन नहि होइत छनि, जखन कि रजिस्टरमे छात्रक अभाव नहि। प्रधानाचार्यक कक्षमे गिलास आ बोतलक हल्लुक सन संगीतक भयावहता भावानात्मक स्तरहिसँ बुझल जा सकैछ शब्दमे व्याख्याचित करब सहज संभव नहि। • एहि कथाक दोसर पक्ष तँ आर हृदय-द्रावक अछि। प्रवासी बालक पिताकेँ कम्प्यूटर सीखबा लेल कहैत छथि जे पितासँ संभव नहि भऽ पबैत छनि बचसाहु लोकक लेल ई तवे सहज छैको नहि जतबा किशोर युवा बच लेल। मुदा बालकक तर्क तऽ देखू- • ’....अरे कम्प्यूटर, नेट आदिक जानकारी रहत तऽ दिन-दुनिया सऽ जुड़ल रहब....हमरो सभ-सऽ सम्बन्ध बनल रहत। • ‘अएँ! की कहलह? • ‘ठीके तऽ कहलौ! ककरा एते समय छै जे....। तँ ई थिक आजुक सत्य! आइ फलकेँ अपन पितासँ बात करबाक पलखति नहि छैक! हमरा लोकनि सरोकारक बाट करै छी, संवेदनाक बात करै छी • कथाक सत्य ओकर आत्मा होइछ कथावस्तु। शिल्पक स्थान तकर बादे छैक जे कथावस्तुक प्रयोजनानुसार सहज स्वाभाविक रूपेँ अबैछ। बलात्कार शिल्पक व्यामोह जे बाह्य आवरण–आभूषण मात्र थिक, कथाक सत्यकेँ ओकर आत्माकेँ आंवष्ठित आच्छन्न कऽ लैछ आ अकसर पाठक लोकनि शिल्पक चाकचिक्यमे ओझरा मूलधरि पहुँचबासँ वंचित रहि जाइत छथि। • साहित्यक अर्थ होइछ सहित, सभक संग, संभक हित अर्थात समाजक हित आ इएह समाजक हित-साधन साहित्यक उद्येश्यो थिक। ई भनहि कहियो ‘टाइम पास’ करबाक लेल विनोद सामग्रीक रूपमे रचल जाइत रहल हो। आजुक साहित्यकार अपन कर्त्तव्यक प्रति पूर्ण सचेत आ सचेष्ट छथि, उद्येश्य साधनक प्रति प्रतिबद्ध छथि। एक दिस अपन सामाजिक स्थिति अवस्थानक सम्यक ज्ञान आ दोसर दिस विभिन्न भाषाक समकालीन साहित्यक अध्ययन अनुशीलन हुनक दृष्टिबोधकेँ रचनाशीलताकेँ प्रेरित प्रभावित करैछ। • निष्कर्षतः कही जे समकालीन मैथिली कथाक यथार्थ आजुक मिथिलाक यथार्थ थिक। एकरा दोसर तरहे हम यथार्थक कथा सेहो कहि सकैत छी। आयामक विस्तार सामाजिक सरोकार आ संवेदनाक निखार एकरा महत आ महत्त्वपूर्ण बनबैछ। • सहायक ग्रंथ- • 1. अखियासल\डॉ. रमानन्द झा ‘रमन’ • 2. मैथिली साहित्यक इतिहास (सा. अकादेमी) डॉ. जयकान्त मिश्र • 3. एकल पाठ/मोहन भारद्वाज • 4. बाङला कथा साहित्ये बिहारेर लोक जीवन/बारिद बरन चक्रवर्ती • 5. कथा किरण/डॉ. कांचीनाथ झा ‘किरण’ 6. बनैत बिगड़ैत/सुभाष चन्द्र यादव 7. सरोकार/प्रदीप बिहारी 8. मिथिला दर्शन, जुला.-दि. 2005, संपा.-रामलोचन ठाकुर 9. मिथिला दर्शन, जुला.-अग.2009 संपा.-रामलोचन ठाकुर केदार कानन जगदीश प्रसाद मंडलक पछताबा पर एक दृष्टि गंभीर साम्यवादी दृष्टि, रचल पचल जीवानानुभव आ ताहि अनुभवक सहज मुदा परिपक्व अभिव्यक्ति, अभिव्यक्तिमे कहबाक अपन ढ़ंग, मैथिल जीवन आ परम्पराक श्रेष्ठ अंकन-चित्रण कथाकार जगदीश प्रसाद मंडलक निजी पहचान थिक। एक बएसपर आबि गेलाक बाद ई लेखनक शुरुआत कएलनि अछि मुदा से हिनक कृतिक परायणसँ बुझाइत नहि अछि। तकर कारण ई रहल अछि जे हिनक मानसमे ई सभ वस्तु कागतपर उतरबासँ पहिनहि रचित-खचित रहल अछि। जीवनक सघन-बीहड़ झंझावात सहि-अंगेजि लेखनक क्षेत्रमे उतरय बला जगदीश जी सनक श्रेष्ठ शिल्पीक स्वागत करैत प्रसन्नता होइत अछि। हिनक पछताबा कथा हमर टेबुलपर राखल अछि। सुपौलमे आयोजित कथा गोष्ठीमे ई कथा पढ़ल गेल छल। एकटा स्वतंत्रता सेनानीक घरसँ बहराएल रघुनाथ अपन इंजीनियरिंगक पढ़ाइक पछाति नोकरी लेल पत्नीक संग अमेरिका चलि जाइत अछि, अपन माता-पिता, परिवारक, सर-सम्बन्धी, समाज सभकेँ छोड़ि। ओहिठामक चाक-चिक्य आ भोगवादी समाजमे रचल-पचल रधुनाथ लेल पाइ कमएबाक अतिरिक्त कथूक चिन्ता नहि छनि। एम्हर शिवनाथ आ हुनक पत्नी, रघुनाथक माता-पिता गामपर रहि जाइत अछि। थोड़ेक दिन पुत्रक वियोगमे मालिन रहि ई दुनू परानी ढ़ंगसँ अपन जीवन जीबैत छथि आ सुखसँ रहैत छथि। फ्लैश बैंकमे ई कथा चलैत अछि आ अनेक-अनेक उपकथा कथा सभ उदघाटित होइत अछि। अमेरिकाक जीवनसँ पहिने उबैत अछि रघुनाथक पत्नी। ने क्यो संगी ने क्यो गप कएनिहार। एक दिन यैह पश्चाताप रघुनाथोकेँ होइत छनि। मगर ओ अपन ओछाइनपर छटपटाइत टा रहि जाइत अछि। गाम अएबाक कार्यरुप अथवा कोनो आन परिणति नहि देखाबऽ दैत अछि। कथा मोनलग्गू अछि। पढ़बामे क्रम भंग कतहु नहि होइत अछि। कथामे मैथिल अभिव्यक्तिक निम्नांकित रुप नीक लगैत अछि - जहिना पाकल आम तोड़ै लेल कियो गाछ पर चढ़ैत अछि आ आम तोड़ैसँ पहिनहि खसि पड़ैत अछि, तहिना शिवनाथोकेँ भेलनि। दुनूक मन एहिरुपेँ चूर-चूर भऽ गेलनि, जहिना अएनापर पाथरक लोढ़ी खसलासँ होइत अछि। दुनूक मनमे पैघ-पैघ अरमान पैघ-पैघ सपना छलनि जे एकाएक फूटल फुकना बैलूनक हवा जेकाँ वायु मंडलमे मिलि गेलनि। पाकल आमक आँठी जेकाँ करेज आरो सक्कत भऽ गेलनि। अंडीक तेलमे जरैत डिबियाक इजोत जेकाँ। जगदीश प्रसाद मंडलकेँ हम व्यक्तिगत रूपेँ बधाइ दैत छियनि आ आशा करैत छी जे ओ अपन अनुभवकेँ आरो व्यापकता प्रदान करैत नव-नव कृतमे हमरा सभकेँ परिचित करौताह। श्यामसुन्दर शशि साहित्यकार डा़. धीरेश्वर झा धिरेन्द्रक ६ अम वार्षिकीपर विशेष- नमन गुरुदेव जनकपुरधाम नेपालीय मैथिली साहित्यक जनक एवं जनकपुरक चटिसारके अन्तिम प्राचार्य गुरुदेव डा़धीरेश्वर झा ‘धिरेन्द्र’क छठम् स्मृतिसभा पुस २७ गते सम्पन्न भेल अछि । हुनकर वरदहस्त प्राप्त क एखन धुरन्धर खेलाडी बनल साहित्यकारलोकनि हुनका स्मरण कएलनि कि नहि से ओएह जानथि मुदा हुनके प्रेरणासँ जन्मग्रहण कएने मिथिला नाट्यकला परिषदधरि हुनका अवश्य स्मरण कएने छल । एहि अवसरपर भाषण भुषण आ किछु घोषणा सेहो भेल । सभके बुझल अछि जे नेतासभक भाषण निष्प्रभावी भ रहल आजुक युगमे भाषणप्रतिक आमजनके विश्वास घटि रहल छनि । ओना हुनका कोनो मन्चपर चढिक स्मरण करी वा मोने मोन, कोनो अन्तर नहि छैक । कारण देवताक पूजा मोने मोन सेहो कएल जा सकैए । आ असली पूजा त देवताक देखाओल बाटपर चलब थिक । हुनकर आदर्शके पालना करब थिक । हँ जहाँधरि घोषणा करबाक गप्प अछि त एतुका वहुत संस्था आ व्यक्ति बहुत किछु घोषणा क चुकल छथि । आव देखवाक अछि जे ई घोषणासभ कार्यरुपमे आएल कि नहि ? हम जहन गुरुदेवके जनकपुरक चटिसारके अन्तिम प्राचार्य लिखए लागल छलहुँ त मोनमे नानाप्रकारक चिन्ता व्याप्त छल । कारण जनकपुरमे सम्प्रति जे कलमजिवीसभ सकृय अछि ,ओहोसभ कोनो हिसावसँ कम नहि छथि । सभक संग नाम,दाम आ मुकाम छनि । एहना अवस्थामे केओ कहि सकैत छथि जे ‘ओ अन्तिम प्राचार्य कोना भ गेलाह ।’ मुदा एहि वास्ते हम मैथिली एमएक पहिल बैचक जमावडाक दृश्य उदघाटन करए चाहव । ओना उमेरक कारणे हमरा एहि भितरके तिरीभिटीक जानकारी नहि अछि मुदा हम जे देखल से कहए चाहव । गुरुदेवके भागिरथी प्रयाससँ राराव क्याम्पसमे मैथिलीमे एमएक पढाई सुरु भेल छल । मैथिलीक बादे राजनिती शास्त्र,अर्थशास्त्र किंवा अन्य विषयमे स्नातकोत्तरके पढाई सुरु भेल । सभके सुखद आश्चर्य लागि सकैए जे मैथिलीक एमएक पहिल बैचक विद्यार्थीसभ छलाह सर्वश्री डा़राजेन्द्रप्रसाद विमल,जानकी रमण लाल,रामभरोस कापडि‘भ्रमर’डा़पशुपतिनाथ झा,डा़रेवतीरमण लाल, रुद्रकान्त झा ‘मडई’,प्रो़परमेश्वर कापडि,नमोनाथ ठाकुर,नागेश्वर सिंह आदि आदि । ताहु समयमे सभके सभ अपन अपन मुकामपर छलाह । चुकी अधिकांश विद्यार्थी नोकरियाहा छलाह ते कक्षा भोरमे संचालित होईक आ अधिकाश कक्षा गुरुदेवके घरेपर संचालित होईक । चाह पानक दौर चलैक आ पढाई लिखाई सेहो । हम,घुटुल आ पुटुल चाह पान लावएमे परेसान रही । हँसीक पमारा छुटैक ,विभिन्न विषयपर गंथन मंथन होईक आ गुरुदेव डिक्टेशन लिखवथिन । हमरा मोन अछि भाषा विज्ञानके कापी तैयार करैत काल गुरुदेव जानकी बाबू आ विमलसरसँ बेर बेर राय सल्लाह कएल करथि । यदि अधलाह नहि लागय त स्वीकार करए पडत जे ओएह कापीक आधारपर एखनो मैथिलीक एमएक विद्यार्थीसभ परीक्षामे पास करैत छथि । एखनो जनकपुरमे मैथिली विद्वानक कमी नहि अछि । मैथिलीक प्राध्यापकके सख्या सेहो पहिनेसँ बेसी अछि । कि एखन गुरुदेवद्वारा चलाओल गेल चटिसार चलैत अछि ?यदि नहि त हुनका जनकपुरक चटिसारक अन्तिम प्राचार्य कहवामे कि हर्ज ? गुरुदेवके स्मरण करैत काल एकगोट आओर विषय मोन परैत अछि । ओ ई जे ओ मैथिली भाषाक साहित्यकारटा नहि छलाह । साहित्यकार श्रृजना करएवला ब्रम्हा सेहो छलाह । केओ मानथि वा नहि मानथु ओ महेन्द्र मलंगियाके नाटक लिखवाक प्रेरणा आ सिख दुनू देलथिन । रेवती रमणलालके रिपोर्ताज लिखवाक आदेश देलथिन । रामभरोस कापडिके कविता आ गीत एवं भुवनेश्वर पाथेयके कविता आ कथा लिखवाक जिम्मेवारी देलथिन । प्रतिभा आ रुचिक अनुसार गुरुदेवद्वारा कएल गेल ई जिम्मेवारी विभाजनके पाछा बहुत पैघ उद्येश्य छल हेतनि । ओ चाहने हेताह जे नेपालीय मैथिलीमे सेहो सभ विधामे रचना हो । पाछा जा से भेवो कएल । भलेहि भारतीय हुनके किछु शिष्यद्वारा षडयन्त्र कएल गेल हो मुदा ‘नेपालीय मैथिली साहित्य’क नामाकरण ओएह कएने छलाह । हे गुरुदेव । अहाँ प्रेरणा दियौ जे जनकपुरमे फेरसँ गुरुकुल परम्परा चलि सकए । चुकी एखन साहित्य श्रृजनसँ बेसी मैथिलसभके अधिकारक आवश्यकता छैक । मैथिलके अपन राजपाट होईक आ अपन भाषामे काज क सकए । ओना हमरा मोन अछि अपनेक ओ जीद्द नोरक टघारेसँ जिनगी जँ निर्मित आशाकेर कमल अछि हृदयकेर दहमे कठिन युद्ध अछि ई त लडिए रहल छी हारब ने किन्नहु ,हमर जीत निश्चित ।। अपनेक अनुचरलोकनि अपनेक ईक्षाके अवश्य पूरा करत । फूल चन्द्र झा ‘प्रवीण’ मैथिली शिशु साहित्य लोक मैथिली लोक साहित्यमे शिशु लोक साहित्यक अम्बार लागल अछि। किछु लिपिबद्ध आ बेसी मौखिक। शिशु लोक साहित्य अज्ञात समयमे, अज्ञात लोक रचनाकारक द्वारा भेल होयत। जहियासँ एकर रचना भेल तहियासँ ई वेदक रचना जकाँ हजारो वर्ष धरि मौखिक परम्परामे जीबैत रहल। तकर बाद किचु तँ लिपिबद्ध कयल जयबाक प्रयास भेल आ बेसी एखनो धरि लोकक कंठमे अपन स्थान बना कऽ रखने अछि। प्रत्येक पीढ़ीक लोक अपन पछिला पीढ़ीक लोकसँ एकरा सुनैत आ सीखैत आबि रहल अछि। मौखिक परम्परामे जीबाक कारणेँ एकर मौलिकता दिनानुदिन नष्ट भेल जा रहल अछि। लोक–विशेष, वर्ग–विशेष आ क्षेत्र–विशेषक कारणेँ एकर शब्द आ उच्चारणमे अंतर पाओल जाइत अछि। मैथिली शिशु लोक साहित्य प्रायः सब विधामे उपलब्ध अछि, मुदा एहि आलेखमे पद्य विधाकेँ केन्द्रमे राखि थोड़ बहुत आनो विधा सब पर विचार कयल गेल अछि। एखनधरि जे मैथिली शिशु लोक साहित्यकेँ लिपिबद्ध रूपमे संकलित करबाक प्रयास भेल अछि ताहिमे प्रो. प्रफुल्ल कुमार सिंह “मौन”क मैथिलीक नेना गीत डा. अणिमा सिंहक “शिशु गीत आ खेल” तथा एहि सम्पूर्ण बाल साहित्यकार डा. दमन कुमार झाक एकटा समालोचनात्मक ग्रंथ “मैथिली बाल साहित्य”क प्रकाशन बहुत हद धरि उपयोगी सिद्ध भेल अछि। मैथिली शिशु लोक साहित्यकेँ निम्नलिखित भागमे बाँटल जा सकैत अछिः- 1. लालन–पालनसँ सम्बद्ध। 2. खेल आ मनोरंजनसँ सम्बद्ध। 3. ज्ञानोपयोगी। लालन–पालनसँ सम्बद्ध शिशु लोक साहित्य एहि प्रकारक लोक साहित्यक परिवेश पैघ नहि होइछ। ई घर–आँगनसँ दलान धरि सीमित रहैत अछि। नेनाकेँ जन्म लितहि ‘सोहर’ ओकरा कानमे पड़ैत छैक आ जेना–जेना नेनाक अवस्था बढ़ैत छैक, बदलैत छैक तेना–तेना शिशु लोक साहित्य परिवर्त्तित होइत जाइत अछि। जन्मक बाद ओकरा दिन–राति मिला कऽ कतेको बेर कड़ूतेलसँ जाँतल–पीचल जाइत छैक आ जतनिहारिक ठोर पर अनायास चल अबैत अछि– चैं–चैं–चैं बौआ सूतभैं बौआ मत्था पच्चनि तेल मुद्दै मत्था फुट्टनि बेल। चानि पर तेल पचाय, अपन दुनू टाँगपर नेनाकेँ पारि, देह उँगारैत कहैत छथि बौआ ईलसन, कील सन धोबियाक पाट सन कुम्हराक पाठ सन अद्दै–मुद्दैक छाती पर लात दिअऽ पृथ्वी पर भऽर दिअऽ। तकर बाद नेनाकेँ हाथसँ लोकैत छथि। नेना डरे कानए लगैत अछि। पुनः कहैत छथि–बौआ आम तोड़ू/बौआ जाम तोड़ू। तकर बाद टाँग पकड़िकऽ, उनटाकऽ झुलबैत कहैत छथि– बौआ मामा गाम देखू बौआ नाना गाम देखू बौआ अपन गाम देखू। एहिमे एकटा बात देखयमे अबैत अछि–जँ नेना मामा गाममे रहल तँ ओकर दादा–दादीक, जँ अपन गाममे रहल तँ नाना–नानीक चौल कयल जाइत अछि। पहिल साँझ दीप लेसलाक बाद छोट–छोट नेनाक रक्षार्थ संझा–मैयासँ प्रार्थना कयल जाइत अछि। आको मैया चाको, संझा मैया राको पहरा मैया हेरणी, सब दुःख फेरनी जे बौआकेँ दिअय दृष्टि, तकरा बान्हू गोला विष्ठी काल–भैरव रक्षा करय, सोनक दीप, पाटक बाती बौआ सूतय सुखक राती दुःख–दरिद्र पाछू जाउ, सुख–श्रृंगार आगू आउ। तहिना बेसी देखनुहुक नेनाकेँ क्यौ नजरि–गुजरि ने लगा दिअय, एहि क्रममे ई पाँती द्रष्टव्य– हँसनी–खिलनी गेल बजार/हँसनी चल आयल खिजनी रहि गेल/जहिना हस्से राजा धनपाल तहिना हस्से बालक/दोहाइ राजा धनपाल दोहाइ मौरगनी माए। दीपक इजोत पर नेना अपन दृष्टिकेँ केन्द्रित कऽ डिम्हा घुमबैत, आनन्द लैत रहैत अछि। जनश्रुति अछि, प्राचीन कालमे छठिहारक रातिक दीप मिझाकऽ लोक राखि लैत छल तथा छः वर्ष धरि बेटाकेँ आ तीन वर्श धरि बेटीकेँ एहि दीपसँ ई टोटमा करैत छल, मुदा वर्त्तमानमे एहन कम देखबामे अबैत अछि। जखन नेना बैसऽ लगैत अछि, संकेत पर आँगुर पकड़ब सीखि लैत अछि तखन लोक कोनो बातक जिज्ञासाक क्रममे, बालबोध बुझि अपन बिचला दू गोट आँगूरकेँ नेनाक कपारपर घुमबैत कहैत छथि–आनी–मानी हम जानी/खारा रोटी खाए नहि जानी आए–बापकेर ना नहि जानी/सत्त छोड़ि असत्त नहि बाजी। तकर बाद नेनाकेँ आँगुर देखबैत पकड़बाक लेल कहल जाइत अछि। जँ नेना बिचला आँगुर पकड़ि लैत अछि तँ जिज्ञासा पूरा होयबाक सम्बावना प्रबल मानल जाइछ। जखन नेना ठाढ़ होयब आरम्भ करैत अछि तखन बेर–बेर खसि पड़ैत अछि। घर–परिवारक लोक ओकरा बेर–बेर आँगुरक भऽर दैतठाढ़ होयबाक लेल आ डेग उठएबाक लेल प्रोत्साहित करैत कहैत छथि– था.....था.....दिग्–दिग् था था.....था.....थैया.....था डेग बढ़ैया.....हम्मर बाबू.....हम्मर भैया। एहि संग नेना डैग उठबैत अछि, बेर–बेर खसैत अछि आ ई सुनि–सुनि पुनः ठाढ़ होएबाक आ डेग उठएबाक प्रयास करैत अछि। एहि पदक माध्यमसँ नेनाकेँ बूलब सिखाएल जाइत अछि। झौलाएत नेनाकेँ कोरामे लऽ घुमयबाक क्रममे कथा–गीतक परम्परा रहल अछि। एकर स्वरूप पैघ आ छोट दुनू प्रकारक देखबामे अबैत अछि। जेना चन्नामामाकेँ देखबैत नेनाकेँ कहल जाइत अछि– चन्ना मामा आ रे आ, पारे आ/नदियाकेँ किनारे आ सोनाकेँ कटोरामे/दुध–भात नेने आ/बौआक मुँअमे घुटुक सन। दोसरः- चन्नामामा आरे आ पारे आ/केराक भार ला पूड़ी–पकमान ला/फोका मखान ला/बौआ मुँहमे ठुस। एतेक कहैत अपन हाथसँ नेनाकेँ खोअएबाक अभिनय करैत छथि। तहिना तरेगण दिस तकबैत– एक तारा दू तारा/तारा बेटी बड़ बुधियारि गंगाकातसँ बालु अनलक/सेहो बालु कनुनियाँ लेलक सेहो कनुनियाँ फुटहा देलक/सेहो फुटहा चरबहबा लेलक सेहो चरबहबा घस्सा देलक/सेहो घस्सा गैया खेलक सेहो गैया दूध देलक/सेहो दूध बिलैया पीलक सेहो बिलैया मूसा देलक/सेहो मूसा चिलहोरबा खेलक सेहो चिलहोरबा पंखा देलक/सेहो पंखा राजा लेलक सेहो राजा हाथी देलक/सेहो हाथी मामा लेलक सेहो मामा गिलास देलक सुतयबाक काल नेनाकेँ जाँघपर लऽ, बेर–बेर ओकर कनपट्टी आ माथकेँ सोहरबैत, जाँघकेँ नीचा–उपर करैत, अपनो देहके डोलबैत, ई लोरीक परम्परा एखनो धरि मिथिलाक सब घरमे देखबा सुनबामे अबैत अछि–आगे निनियाँ आ आ/बौआ लए निन ला ला निनियाँ एलै बिढ़िनियाँसँ/बौआ एलै मातृकसँ बौआक मामा गामकी–की बिकाय। अंगा बिकाय, टोपी बिकाय/सेहो अंगाकेँ पहिरय/बौआ पहिरय एकरा कत्तौ–कत्तौ दोसर प्रकारेँ एना सुनबामे अबैत अछि– निनियाँ अयलै बिरहिनियाँसँ/बौआ अयलै ममहरसँ ममहरमे बौआ की–के खाए/आरब चाउरक भात सोरहिया गायक दूध/हाली–हाली खो रे बौआ जयबेँ बड़ी दूर हुअमाकेँ पियासल बौआ गेल पोखरि पोखरिक टेंगस लेल टेंगराय बोनक बगुला देल छोड़ाय/ऐहेँ रे बगुला खेत–खरिहान एक सूप देबौ देसरिया धान/तेकरे कुटिहे नाम–नाम चूड़ा बैसि जिमबिहेँ ब्राह्मण पूरा देल आसीस जिबिहेँ सै बौआ लाख बरीस। एहि लोरी सभक माध्यमसँ नेनाकेँ सुतयबाक संग–संग ओकर दीर्घायु होएबाक कामना सेहो कएल जाइछ। नेनाक सुति रहला पर माए, निश्चिंत भऽ अपन घरक काज–रोजगारमे लागि जाइत छथि। नेनाक संग अपनो मनोरंजन करबाक क्रममे लोक अपने उतान भऽ पड़ि रहैत अछि आ नेनाकेँ पैरपर बैसाय, बेर–बेर पैर उपर–नीचा करैत एहि पालन गीतक आनन्द अपनो लैत छथि आ नेनोकेँ सेहो दैत छथिन। एकरा कत्तौ–कत्तौ “घुघुआ–मना” आ कत्तौ–कत्तौ “धुआँ–चुआँ” नामसँ सेहो जानल जाइत अछि। घुआँ घूँ लल्ले छूँ लल्ले मनसा नाम की सोनमन झा, टीक पकड़ि ला, पोखरि खुना पोखरिक कात–कात चम्पा लगा/चम्पा फूल उधिआयल जाए परती फुलायल जाए/सीकीक डगमग कोकाक फूल चकमक देवता चल बड़ी दूर/कत्ते दूर/मधेपुर मधेपुरमे की सब, तार छै बेतार छै काजर–बीजर कएल छै/टीकुली बैसाएल छै मामा गेलै पटना/मामी सुतलै अंगना मामा घरमे चोर पैसल/दोड़ऽ हो भगिनमा तकर बाद “नव घर उठे” कहि पैर उठाएल जाइत अछि आ “पुरान घर खसे” कहि पैर नीचाँ खसाएल जाइत अछि। ई खेल नेना सब बेर–बेर खेलएबाक लेल कहैत अछि आ आनन्द विभोर होइत रहैत अछि। जावतकाल घरि नेना जागल रहैत अछि, ओकरा एक ने एकटा लोकक सानिध्य चाही, नहि तँ ओ कानय लगैत अछि। एहना स्थितिमे गायक अतिरिक्त नानी, दादी, दीदी आदि ओकर मोनकेँ बहटारबाक लेल रंग–बिरंगक पद्य, भास लगाकऽ गाबऽ लगैत छथि– अलिया गै, मलिया गै/गोला बड़द खेत खाइ छौ गै कत्तऽ गै, डीहपर गै/डीहपर रखबार के गै/बाबा गै सासुकेँ नहि देतौ गै/सिरमातरमे रखतौ गै अपने सबटा खयतौ गै। दोसरः- लाल गाछी गेली, लाला आम पेली बाबाक देली, बाबा हौ/आब नहि जाएब मकैया खेत। बाघ छै, बघिनियाँ छै, कोठीपर हरमुनियाँ छै बाबा आँगनमे चूड़ा कुटाय/पड़बा बीछि–बीछि खाइ छै कोन बेटखउकी नजरि लगौलक/पड़बा रूसल जाइ छै। नेनाक लालन–पालनमे माए, दादी, नानीक संग–संग दीदी अर्थात पिउसिक सेहो बड़ महत्वपूर्ण योगदान रहलैक अछि। तेँ किछु दीदीपरक द्रष्टव्यः- लाल दीदी गे/की दीदी गे/डलिया दे मिरचाइ तोड़ए लेल ककरामे/पुलिसबामे/सबे पुलिसबा हुलिसन आएल ककरा घर नुकाएब गे/बाबा घर नुकाएब गे बीचे बाट पर खसली गे/सब बरियतिया हँसली गे दोसरः- लाल दीदी गे/की दीदी गे/बेटा कनै छी खोपड़ीमे कानय दहिन पुतखौकाकेँ/नाचय दहिन पमरियाकेँ खाइ लेल देलहुँ दालि भात/खाए लेलक सोहारी सुतइ लेल देलहुँ अलंग–पलंग/सूति रहल गोरथारी गेलहुँ मोँछ पकड़ि कऽ उठबए/फोलि देलक केबाड़ी। तेसरः- लाल दीदी गे/की दीदी गे/एक रत्ती छाल्ही चटलियौ गे तै लेल बाबा मारलकौ गे/बाबा बड़ चण्डलबा गे। अपना ओहिठामक बेटीकेँ जखन संतानक योग्यता होइत छनि तखन प्रायः नैहर आनि लेबाक परम्परा एखनो धरि बाँचल अछि। एहना स्थितिमे नेनाकेँ मामा, मामी, नाना, नानीक बेसी दुलार–मलार भेटैत रहलैक अछि, तेँ किछु मामा–मामीसँ जुड़ल पालन–पद्य द्रष्टव्य– मामा हौ पोखरी भीड़पर जइहऽ चिक्कन पड़बा मारिकऽ आनिहऽ मामी हाथकेँ दीहऽ/तेल फोरन मिलाकऽ करिहऽ अपने खइहऽ लाल–लाल कुटिया/हमरा दीहऽ झोर ई सब देखिकऽ बहि रहलैए/हमरा आँखि सँ लोर। दोसरः- मामी यै भात उधिआए/मामी यै दालि उधिआए कोठी पर सुग्गा स्नान करैए। तेसरः- आब नहि जएबै मामाक अँगना अपने खाइ छै लाल–लाल कुटिया/हमरा दै छै झोर। खेल आ मनोरंजनसँ सम्बद्ध शिशु–लोक साहित्य एहिसँ सम्बद्ध शिशु लोक साहित्यक परिवेश बेसी विस्तृत अछि। रस्ता–पेरा, परती–पराँत, विद्यालय–परिसर, खेलक मैदान आदि ठाम नेनाक झुण्ड भोर साँझ जमा होइत अछि आ रंग बिरंगक खेल खेलाइत अछि। छोट–छोट नेना, जे खेल, बेसीकाल खेलाइत अछि, ताहिमेसँ किछु द्रष्टव्य– अटकन–मटकन दहिया चटकन/पूस महागर पुरनी पत्ता हिल्लय–डोल्लय/माघ मास करैला फरए/तै करैलाक नाम की आम गोटी, जाम गोटी, तेतरी सोहाग गोटी। सिंगही लेबै की मुँगरी जँ उत्तरमे नेना ‘सिंगही’ कहैत अछि तँ ओकरा बिट्ठू काटल जाइत अछि आ जँ ‘मुँगरी’ कहैत अछि तँ मुक्कासँ मारल जाइत अछि। एकरा दोसर प्रकारेँ सेहो सुनबामे अबैत अछि– अटकन मटकन दहिया चटकन/केरा कूस महागर जागर पुरनिक पत्ता हिल्लै–डोल्लै/माघ मास करैला फूलै आमुन गोटी, जामुन गोटी/तेतरी सोहाग गोटी सिंगही लेबेँ की मुँगरी? दोसरः- गाछ करै ठाँए–ठाँए, नदी गौंगिआए कमलक फूल दुनू अलगल जाए/सीकीक डाली चमेलीक फूल चकमक देवता चलबड़ी दूर/हाथीपर हथबरबा भैया घोड़ापर रजपूत सब रजपूतनी खोपा गुहने/बंका छै मजबूर बंका बिकाइए तीन–तीन बंका/बाजूकेँ गरदाग रामजीकेर सुतल पुतहुआ/कूटैत रहए धान। बाल मनोविज्ञानकेँ ध्यानमेँ राखि, नेनाक समुचित विकासक, उल्लासक लेल मैथिली शिशु लोक साहित्य थोड़ नहि प्रतीत होइछ। खेलसँ सम्बद्ध एकटा बाल–कथा काव्य द्रष्टव्य– एकटा छलै फुद्दी, ओ बैसल कुसपर कुस ओकर पेट चीरि देलक ओहिसँ निकलल तीनटा धार दूटा सुखले–सुखले छल, एकटामे पानिएँ नहि जाहिमे पानिएँ नहि, ताहिमे पैसल तीनटा हेलबार दूटा डुबिए–डुबिए गेल, एकटाक पते नहि जकर पते नहि,से नोतलक तीनटा ब्राह्मण दूटा भुखले–भुखले रहल, एकटा खएबे नहि कएलक जे खएबे नहि कएलक, तकरा भेल तीन मुक्का दण्ड दूटा हुसिए–हुसिए गेल, एकटा लगबे नहि कएल एहि प्रकारक लोक साहित्य नेना सब बड़ मनोयोगसँ सुनैत अछि। कखनोकाल नेना–भुटका झुण्ड एक–दोसरक डाँर पकड़िकऽ रेलगाड़ी बनबैत अछि। एहिमे एक गोटा इंजिन आर सब नेना डिब्बा बनैत अछि आ घुमि–घुमिकऽ कहैत अछि। रेलगाड़ी झकमक/पहिया लोहारकेर, बेल सरकारकेर कुँइआमे पानी, मकोलामे तेल/आ गेलि मइयाँ, पी गेलि तेल भैया रे भैया, कुटुम्ब कहाँ गेल/एक सय हाथी बान्ह पर गेल। मिथिलाक खेलमे कबड्डीक बड्ड पुरान परम्परा रहल अछि। एहिपर आधारित किछु पद्य देखल जाए– कबड्डी–कबड्डीकार/मैना बच्चा अण्डापार दोसरः- चेत कबड्डी आबऽ दे/तबला बजाबऽ दे तबलामे पइसा/बाग–बगइचा। तेसरः- कबड्डी खेलऽ गेलहुँ कपार फुटि गेल रेशमकेर डोरामे हाथ कटि गेल श्रवणकेम देखिकऽ पियास लागि गेल हाथीक देखिकऽ हदास उड़ि गेल/आम चकलेट चीनी प्लेट एकटा खेल अछि गिरगिटरानी ई खेल मिथिलाक कन्या लोकनिक मध्य खेलाएल जाइत रहल अछि। एहिमे एकटा कन्या गिरगिट बनैत अछि आ दूटा, ओकर दुनू जाँघ पकड़िकऽ ठाढ़ भऽ जाइत अछि आ एकटा कन्या ओकर दुनू पैर पकड़िकऽ, ओहि पर बैसि जाइत अछि आ कहैत अछि– गिरगिटमाला–गिरगिटमाला/कहाँ–कहाँसँ आएल छी बौआ लाला–बौआ लाला/देस–देससँ आएल छी। की सब लाएल छी। आम छोड़ि गुद्दा/ककरा देलहुँ राजाक बेटीक हाथमे/राजाक बेटी कत्तऽ अछि मजे कोठलिया/मजे कोठलिया की सब साँप छै, बाघ छै। एहि कथा–काव्यकेँ दोसर तरहेँ सेहो कहल जाइछ– हे गिरगिटियाँ रानी! तोँ कतएसँ अएलह हमरा लेल की–की अनलह कान खोड़ि गुजुआ/सेहो गुजुआ ककरा लेल राजा बेटी हाथक लेल/राजा बेटी की सब देल हाथी छोड़ि घोड़ा देल/सेहो घोड़ा कहाँ गेल विरदावनमे चरए गेल/विरदावनमे की–की देखल साँप देखल, बाघ देखल/नाचे गिरगिटिया। जे कन्या गिरगिट बनल रहैत अछि ओ अपन मूड़ी उठा आ हाथ पसारिकऽ उत्तर दैत रहैत अछि आ ओ तीनू सहयोगी कन्या ओकरा घुमबैत रहैत अछि। एकटा खेल अछि–कटहरक गाछ बला एहिमे एकटा नेना ठाढ़ भऽ गाछक अभिनय करैत अछि तथा आओर नेना सब ओकर पैर पकड़ि, मूड़ी गोंतिकऽ, बैसि रहैत अछि आ कटहर फलक अभिनय करैत कहैत अछि– हमरा बाड़ी–हमरा बाड़ीकेँ हुहुआए राज कोतवाल/की–की मँगैए आरब चौरा, नव ढ़कना तकर बाद कोतवाल, फलक अभिनय करैत नेना सबकेँ, हाथसँ टेबैत अछि तखन गाछ कहैत अछि– काँच छै तऽ छोड़ि दू/पाकल छै तऽ लऽ लू। एकटा खेल अछि– “झिझिर कोना”। ई खेल पाँचगोट नेना द्वारा कोनो खाली घरमे खेलाएल जाइत अछि, जाहिमे चारिटा कोन होइ। ई खेल बेसीकाल नेना खाली दलानक कोठली वा विद्यालयमे खेलाइत अछि। एहि खेलमे प्रयुक्त लोक साहित्यकेँ देखल जाए– झिझिर कोना–झिझिर कोना कोन कोना जैब एहि कोना जैब, ओहि कोना जैब। एकटा खेल अछि– “साँप डिग–डिग”। ई एकटा सामुहिक खेल थिक, जाहिमे बहुत नेना एक संग हत्था – जोड़ि कऽ केँ सोझ पाँतीमे ठाढ़ होइत अछि। एकटा कहैत अछि – की रे बकरिया की रे छकरिया/बकरी कत्तऽ खेतमे/धान किएक खेलकौ खेत्तौ/रोज लेब्बौ नहि देब्बौ। तखन दू हाथक बीच दऽ नेनासब बन्हएबाक अभिनय करैत अछि आ बजैत अछि– साँप–डिगडिग/साँप–डिगडिग जेना पशु–पक्षी सब अपन अबोध नेनाकेँ आत्मरक्षाक उपाय दौड़िकऽ बाजिकऽ, खेलाएकऽ सिखबैत रहैत अछि, तहिना शिशु लोक साहित्यमे सेहो आत्म–रक्षार्थ अनेक प्रकारक खिस्सा–पिहानी गद्य आ पद्य दुनूमे पर्याप्त मात्रामे उपलब्ध अछि। उदाहरणस्वरूप–बगिया गाछक खिस्सा, गोनू झाक खिस्सा एहिमे सबसँ बेसी लोकप्रियता पौलक अछि। ओना आरो कतेक अछि। जेना–ननदि–भाउजसँ जुरल आँझुलक खिस्सा ‘सातो भाइ परदेस गेल आँझुलकँ दुःख देने गेल’। तहिना झाँझी कुकुरक सौतिनक खिस्सा– मोर मन मोर मन नहि पतिआइ सौतिनक टाँग दुनू झुलिते जाइ। किछु एहेन लोक–साहित्य देखबामे अबैत अछि जाहिमे निरर्थक शब्द सभक प्रयोग बुझना जाइछ। जेना– औका–बौका, तीन तरौका/लौआ–लाठी, चानन काठी चाननकेँ बागमे इजय–विजय/गल–गल पुअबा–पचक। दोसरः- ईटा–माटी सोनेक टाट/आठम लड़की भागल जाइ आलू बम बेटा बम/भौजी नाचए छमाछम। ज्ञानोपयोगी शिशु लोक साहित्य “परिवारकेँ सामाजिक जीवनक पहिल पाठशाला” कहल गेल अछि। मैथिली शिशु लोक साहित्यक माध्यमेँ नेनाकेँ अनेक प्रकारक शिक्षा देल जाइत रहल अछि। किछु उदाहरण द्रष्टव्य– अंक ज्ञानक लेल एकटा खेल अछि– “अट्टा–पट्टा” एहिमे नेनाक दहिना हाथपर अपन दहिना हाथसँ थापर मारल जाइत अछि आ बेरा–बेरी आँगुर पकड़ि कहल जाइत अछि– अट्टा–पट्टा बौआकेँ पाँचगो बेट्टा एगो गेल गायमे, दोसर महींसमे तेसर बड़दमे–चारिम गेल बकरीमे/पाँचम गेल छकरीमे। तकर बाद तरहत्थीपर, अपन आँगुर रखैत– एतऽ बुढ़िया स्नहलक, पकौलक, खएलक, पीलक ई कहैत अपन आँगुरकेँ डेगा–डेगी बढ़वैत ओकर हाथसँ काँख धरि लऽ जाएल जाइत अछि आ कहल जाइत अछि– एतऽ सँ जे चलल बुढ़िया..../गुद्दू गैयाँ। नेना गुदगुदी लगलापर जोर–जोरसँ हँसैत–हँसैत लोट–पोट भऽ जाइत अछि। एहि प्रकारेँ नेनाकेँ एकसँ पाँच धरि अंकक ज्ञान कराओल जाइत अछि। तहिना दोसर खेल अछि जाहिमे दू आ दूसँ अधिक नेना ठाढ़ भऽ आँगुरसँ संकेत करैत खेलाइत अछि– दस, बीस तीस, चालीस, पचास/साठि, सत्तरि, अस्सी, नब्बे, सौ सौमे लागल धागा, चोर निकलिकऽ भागा रानी बेटी सोइती, फूलकेँ माला गोइती मेम खाए बिस्कुट/साहेब बाजए भेरी गुड। एहि खेलक माध्यम सँ नेनाकेँ दहाइ आ सैकड़ा धरिक अंकक ज्ञान कराओल जाइत अछि। एकटा खेल अछि– “घो–घो रानी”। एहि खेलमे एकटा नेना बीचमे ठाढ़ होइत अछि आ चारूकात नेनासब हत्था जोड़ी कऽ केँ वृत्ताकार ठाढ़ होइत कहैत अछि– घो–घो रानी कत्ते पानी–एड़ी धरि घो–घो रानी कत्ते पानी–ठेहुन धरि घो–घो रानी कत्ते पानी–जाँघ धरि घो–घो रानी कत्ते पानी–डाँढ़ धरि घो–घो रानी कत्ते पानी–ढ़ोढ़ी धरि घो–घो रानी कत्ते पानी–पेट धरि घो–घो रानी कत्ते पानी–छाती धरि घो–घो रानी कत्ते पानी–गरदनि धरि घो–घो रानी कत्ते पानी–मुँह धरि घो–घो रानी कत्ते पानी–नाक धरि घो–घो रानी कत्ते पानी–आँखि धरि घो–घो रानी कत्ते पानी–माँथ धरि अंतमे ‘चुभुक’ कहि सब नेना डूबिकऽ नहयबाक अभिनय करैत अछि। एहिमे माध्यमसँ नेना सबकेँ अंगक ज्ञान कराओल जाइत अछि। एकटा खेल नेना सब एहि प्रकारेँ खेलाइत अछि–एकटा नेना अपन दुनू हाथकेँ उठाकऽ पैघ आकार बनबैत अछि आ तकर बाद क्रमशः छोट करैत जाइत अछि आ कहैत अछि– एतेक टा की–छिट्टा/एतेक टा की–पथिया एतेक टा की–मउनी/एतेक टा की–चुक्का चुक्कामे की–अण्डा/के फोरए–कउआ के गीजए–हमसब। ई कहि– ती–ती–ती–ती....कहैत सब नेना कूदऽ लगैत अछि। एहि लोक साहित्यक माध्यमसँ छिट्टा, पथिया, मउनी, चुक्का सभक आकारक ज्ञान कराओल जाइत अछि। तहिना एकटा खेल अछि जकरा माध्यमसँ किछु वस्तुक उपयोगक ज्ञान कराओल जाइत अछि– खेलए–धूपए गेलिऐ/एगो लोहा पेलिऐ सेहो लोहा कथी लेल/हाँसू गढ़ाबऽ लेल सेहो हाँसू कथी लेल/खड़ही कटाबऽ लेल सेहो खड़ही कथी लेल/बंगला छराबऽ लेल सेहो बंगला कथी लेल/भैसी बन्हाबऽ लेल सेहो भैसी कथी लेल/चोतबा पड़ाबऽ लेल सेहो चोतबा कथी लेल/अंगना निपाबऽ लेल सेहो अंगना कथी लेल/गहूँम सुखाबऽ लेल सेहो गहूँम कथी लेल/आटा पिसाबऽ लेल सेहो आटा कथी लेल/पूरी पकाबऽ लेल सेहो पूरी कथी लेल/भौजीकेँ मँगाबऽ लेल सेहो भौजी कथी लेल/बेटा जनमाबऽ लेल सेहो बेटा कथी लेल/कोरामे खेलाबऽ लेल अंतमे–टाइल–गुल्ली टूटि गेल/बौआ रूसि गेल। उपरोक्त विवेचनसँ लगैत अछि जे मैथिली शिशु लोकसाहित्य नेनाक प्रत्येक पक्षसँ जुड़ल रहल अछि। लालन–पालन आ खेल मनोरंजनसँ सम्बद्ध लोक साहित्यक अधिकता पाओल गेल अछि। खेलक मध्यमसँ मनोरंजनक संग–संग नेना भुटकामे एकता, सहयोग, सहानुभूति आ प्रेमक भावना जगैत अछि। एकर अतिरिक्त अभिनय, नृत्य, गीत आदिक ज्ञान सेहो आरम्भहिसँ होमए लगैत अछि। एखन हमरा सबकेँ मैथिली शिशु लोक साहित्य सन अमूल्य धरोहरकेँ सहेजिकऽ समेटबाक प्रयोजन अछि कारण दिनानुदिन ई अपन मौलिकताकेँ त्यागि विकृत रूप अपनौने जा रहल अछि। जँ एहि दिशामे हमरा सभ सचेष्ट नहि होएब तँ एहि धरोहरक मूल्यवान वस्तु नष्ट भऽ जयबाक प्रबल सम्भावना लगैत अछि। ओना हम आरम्भेमे कहि चुकल छी जे एहि विषयपर पहिनो बहुत गोटा काज कयलनि अछि आ प्रायः एखनो कऽ रहलाह अछि, मुदा एकर फलक ततेक विस्तृत अछि जे उपलब्ध संकलन यथेष्ट नहि मानल जा सकैत अछि। कारण संकलित शिशु लोक साहित्यसँ कैक बड़ बेसी लोक साहित्य एखनो धरि लोकक ठोरपर छिड़िआएल अछि। रमेश बहस- पंकज पराशरक साहित्यिक चोरि मैथिली साहित्यक कारी अध्याय थिक विदेह-सदेह २ (२००९-१०) सँ पंकज पराशरक साहित्यिक चोरि आ साइबर अपराधक पापक घैलक महा-विस्फोट भेल अछि। ई पैघ श्रेय पत्रिकाक सम्पादक श्री गजेन्द्र ठाकुरकेँ जाइत छनि। हुनकर अपराध पकड़बाक चेतना केर जतेक प्रशंसा कयल जाय, कम होयत। “विदेह”क मैथिली प्रबन्ध-समालोचना- अंक, अइ पोल-खोल लेल कएक युग धरि विलम्बित भऽ कऽ निबद्ध रहत, से “समय केँ अकानैत” कहब कठिन अछि। साहित्योमे चौर्यकलाक उदाहरण पहिनहुँ अबैत रहल अछि गोटपगरा। मुदा एक बेरक चोरि पकड़ा गेलाक बाद प्रायः चोरिक आरोपी साहित्यकार मौन-व्रत धारण करैत रहलाह अछि आ मामिला ठंढ़ाइत रहल अछि। मुदा ताहि परम्पराक विपरीत अइ बेरक चोर ’सिन्हा चोर’ निकलल अछि आ विगत एक दशकसँ निरन्तर चोरि करैत जा रहल अछि- सेन्ह काटिकऽ। आ तेहेन महाचोरकेँ मैथिलीक साहित्यकार आ संस्था सभ तरहत्थीपर उठा-उठा कऽ पुरस्कृत केलक अछि आ समीक्षाक चासनीमे चोरायल कविता सबकेँ बोरि देल गेल अछि। विदेह-सदेह-२ प्रमाण-पुरस्सर अभियोगे टा नहि लगौलक, अपितु एहेन महत्वाकांक्षी असामाजिक तत्वक विरुद्ध साहित्यिक दण्ड आरोपित कऽ अपन “बोल्डनेस” सेहो प्रदर्शित केलक अछि। एक दशकमे तीन बेर पकड़ायल चोर प्रायः “डेयर डेभिल” होइत अछि आ अपन अनुचित। सीमाहीन महत्वाकांक्षाक पूर्ति लेल अपन वरीय संवर्गीय व्यक्तिकेँ सीढ़ीक रूपमे उपयोग करैत अछि आ स्वार्थ-सिद्धिक उपरान्त अपन पयर सँ ओही सीढ़ीकेँ निचाँ खसा दैत अछि। फेर ओकरा अपन ट्विटर-फेसबुक-नेट वा पत्रिकामे गारिक निकृष्टतम स्तरपर उतरऽ मे कनियों देरी नहि होइत छै। ओ नाम बदलि-बदलि कऽ गारि पढ़ैत अछि आ अपन प्रशंसामे जे.एन.यू.क छात्र-छात्राक पोस्टकार्ड लिखेबामे अपस्याँत भऽ जाइत अछि। ओ हिन्दीक कोनो बड़का साहित्यकारक बेटीक संग अपन नाम जोड़ि विवाहक वा प्रेम-प्रसंगक खिस्सा रस लऽ लऽ कऽ प्रचारित करैत अछि। एहेन प्रवृत्ति कएटा आओर तिकड़मबाजमे देखल गेल अछि जे हिन्दीक पैघ-पैघ नामक माला जपि कऽ मठोमाठ होअय चाहैत अछि। वस्तुतः ई चिन्ताजनक तथ्य थिक जे मैथिलीक नव-तूरकेँ हिन्दीक पैघ-पैघ नामक वैशाखीक एतेक जरुरति किऐक होइत छनि? “विदेहक” “इनक्वायरीक विवरण” पढ़ि कऽ रोइयाँ ठाढ़ भऽ जाइत अछि। पहल-८६ आ आरम्भ-२३ मे जे पोल खूजल छल, अइ तथाकथित साहित्यकारक, तकरा बादे मैथिली साहित्यसँ बारि देल जेवाक चाहैत छल। मुदा विडम्बना देखू जे चेतना समिति सम्मानित कऽ देलक। “मैथिल ब्राह्मण समाज”, रहिका (मधुबनी) सन अँखिगर संस्थाकेँ चकचोन्ही लागि गेल, जखनकि संस्थामे विख्यात साहित्यकार उदयचन्द्र झा “विनोद” आ पढ़ाकू प्रोफेसरगण छथि। ई संशयविहीन अछि जे पुरस्कृत करेबामे विनोदजीक महत्वपूर्ण भूमिका रहल हैत। “विदेह” द्वारा रहस्योद्घाटन केलाक बावजूद एखन धरि चेतना समिति अथवा मैथिल ब्राह्मण समाज, रहिकाकेँ अपन पुरस्कार आपस करेवाक वा आने कोनोटा कार्रवाई करवाक बेगरता नहि बुझा रहल छै आ सर्द गुम्मी लधने अछि। एहेन “जड़-संस्था” सभ मैथिली साहित्यक उपकार करैत अछि वा अपकार? ई केना मानल जाय जे पहल-८६ वा आरम्भ-२३ अइ दुनू संस्थाक कोनो अधिकारी वा साहित्यकारकेँ पढ़ल नहि छलनि? ई आश्चर्यजनक सत्य थिक जे मैथिलीक कएटा पैघ साहित्यकार पंकज पराशरक कृत्रिम काव्य आ आयातित शब्दावलीमे फँसि गेलाह अछि। “विलम्बित कएक युग मे निबद्ध” क भूमिकामे अनेरो विदेशी साहित्यकारगणक तीस-चालिस टा नाम ओहिना नहि गनाओल गेल अछि, अपन कविता केँ विश्वस्तरीय प्रमाणित करबाक लेल अँखिगर चोरे एना कऽ सकैत अछि। सम्भावना बनैत अछि जे डगलस केलनर जकाँ ओहू सभ कविक रचनाक भावभूमिक वा शब्दावलीक चोरिक प्रमाण एही काव्य-पोथीमे भेटि जाय। अंततः मि. हाइडक कोन ठेकान? मैथिलीमे तँ लोक विश्व-साहित्य कम पढ़ैत अछि। तकर नाजायज फायदा कोनो ब्लैकमेलर किऐक नहि उठाओत? आखिर टेक्नो-पोलिटिक्स की थिक- टेकनिकल पोलिटिक्स थिक, सैह किने? एकरा बदौलत झाँसा दऽ कऽ पाकिस्तानोक यात्रा कयल जा सकैत अछि। “टेक्नो-पोलिटिक्सक” बदौलत किरण-यात्री पुरस्कार, वैदेही-माहेश्वरी सिंह “महेश” पुरस्कार, एतेक धरि जे विदितजीक अकादमीयोक पुरस्कार लेल जा सकैत अछि। प्रदीप बिहारीक सुपुत्रक भातिज-कका सम्बन्धक मर्यादाक अतिक्रमण कयल जा सकैत अछि। प्रो. अरुण कमलक “नये इलाके में” सेंधमारी कऽ कऽ “समय केँ अकानल” जा सकैत अछि। आर तँ आर, अइ टेकनिकल पॉलिटिक्सक बदौलत जीवकान्तजी सन महारथी साहित्यकारसँ “विलम्बित कएक युग...” पोथीक समीक्षा लिखबा कऽ “मिथिला दर्शन” (५) सन पत्रिकामे छपवा कऽ स्थापित आ अमर भेल जा सकैत चछि। मैथिली साहित्यक सभसँ पैघ सफल औजार थिक “टेक्नो पोलिटिक्स”! ई मानल जा सकैत अछि जे मिथिला दर्शनक सम्पादककेँ आरम्भ-२३ आ पहल-८६ कोलकातामे नहि भेटल होइन्हि। मुदा जीवकान्तजी नहि पढ़ने हेताह से मानबामे असौकर्य भऽ रहल अछि। जीवकान्त जी तँ प्रयाग शुक्लक “चन्द्रभागा में सूर्योदय” आ एही शीर्षकक नारायणजीक कविता (चन्द्रभागामे सूर्योदय) सेहो पढ़ने हेताह जे छपल अछि मैथिलीमे। तखन पंकज पराशरक समुद्रसँ असंख्य प्रश्न पूछऽवला कविताक भावार्थ किऐक नहि लगलनि जे समीक्षामे कलम तोड़ि प्रशंसा करऽ पड़लनि वा करा गेलनि? एकरा “प्रायोजित समीक्षा” किऐक नहि मानल जाय? की प्रयाग शुक्ल वा नारायणजीक समुद्र विषयक कवितासँ वेशी मौलिकता पंकज पराशरक कवितामे भेटलनि जीवकान्तजीकेँ? ओइ सभ कविताक कनियोँ “छाया”क शंको नहि भेलनि समीक्षककेँ? “सभ्यताक सभटा मर्मान्तक पुकार”क नोटिस लेबऽवला समीक्षककेँ साहित्यिक चोरि असभ्य आ मर्मान्तक पीड़ादायक नहि लगलनि? आब जीवकान्तजी सन समीक्षकक “पोजीशन फॉल्स” भऽ जेतनि से अन्दाज तँ मिथिला दर्शनक सम्पादककेँ नहियें रहनि, उदय चन्द्र झा “विनोद” केँ सेहो नहि रहनि। ई अभिज्ञान तँ पंकजे पराशर टाकेँ रहल हेतनि? बेचारे “पराशर” मुनिक आत्मा स्वर्गमे कनैत हेतनि आ पंकसँ जनमल जतेक कमल अछि सब अविश्वसनीय यथार्थक सामना करैत हेताह। पराशर गोत्री भऽ कऽ तीन बेर चोरि केनाइ “पराशर” महाकाव्यक रचयिता स्व. किरणजीकेँ सेहो कनबैत हेतनि। आखिर जीवकान्तजी साहित्यिक चोरिक नोटिस किए ने लेलनि, जखनकि हुनका विचारेँ “मैथिलीक समीक्षक प्रायः मूर्खता पीबिकऽ विषवमन करैत अछि”(विदेह-सदेह-२-२००९-१०)/ विनीत उत्पल-साक्षात्कार आ जीवकान्तजी स्वयं पंकज पराशरक चोरिवला कविता-पोथीक समीक्षक छथि, अपितु चौर्यकला प्रवीण कविक घोर प्रशंसक छथि। तखन अइ समीक्षा-आलेखमे अन्तर्निहित असीम-प्रशंसा साकांक्ष-पाठककेँ “विष-वमन” कोना ने लगौक? हुनका सन “पढ़ाकू” समीक्षक-पाठककेँ “फॉल्स पोजीशन”मे अननिहार “एक्सपर्ट आ हैबिचुएटेड” साहित्य-चोरसँ प्रशंसा आ पुरस्कार दुनू पाबि जाय तँ मैथिली-काव्यक ई उत्कर्ष थिक वा दुर्भाग्य? अंततः विदेह-सदेह टा किऐक निन्दा केलक एहि घटनाक? आन कोनो पत्रिका किऐक नहि केलक? डॉ. रमानन्द झा “रमण” इन्टरनेटपर निन्दा करैत छथि तँ घर-बाहर पत्रिकामे किऐक नहि जकर ओ सम्पादक छथि? चेतना समिति, पटना सम्मानित करैत अछि एहने-एहने साहित्यकारकेँ तखन अपने पत्रिकामे कोना निन्दा करत, जखनकि पुरस्कार आपसो नहि लैत अछि, जानकारी भेलाक वा साकांक्ष साहित्यकारक अनुरोध प्राप्त भेलाक बादो? नचिकेताजी नेटपर निन्दा करताह आ “विदेह”मे छपत तँ “मिथिला दर्शन”मे किऐक नहि निन्दा वा सूचना छपल? कारण स्पष्ट अछि- जीवकान्तक समीक्षा पंकज पराशरक काव्य-पोथीपर छपत, तखन ओही पोथीक चोरि कयल कविताक निन्दा कोना छपत? चारु भाग साहित्यिक आदर्श, मर्यादा आ नैतिकताक धज्जी उड़ि रहल अछि- पितामह आ आचार्यगणक समक्ष आ (अनजाने मे सही) हुनको लोकनिक द्वारा। मैथिल ब्राह्मण समाज, रहिका; चेतना समिति, पटना आ साहित्य अकादेमी, नई दिल्लीमे अन्ततः कोन अन्तर अछि वा रहल? एहेन नामी पुरस्कारक संचालन आ चयनकर्ता महारथी सभकेँ नव लोककेँ पढ़बाक बेगरता किऐक नहि बुझाइत छनि? बिना पढ़ने पुरस्कारक निर्णय वा समीक्षाक निर्णय कतेक उचित, जखन कि ई चोरि तेसर बेरक चोरि थिक आ से छपि-कऽ भण्डाफोड़ भेल अछि। एकरा वरेण्य आ वरीय साहित्यकारगण द्वारा काव्य-चोरि, आलेख-चोरिकेँ प्रश्रय देल जायब किऐक नहि मानल जाय, जखनकि आरम्भ, मैथिल-जन, पहल आ विदेह-सदेह पहिनहि छापि चुकल छल? की साहित्यिक चोरिकेँ प्रश्रय देब, दलाल वर्गकेँ प्रश्रय देब नहि थिक? एहेन सम्भावनायुक्त नव कविकेँ प्रश्रय देब मैथिली साहित्य लेल घातक अछि वा कल्याणकारी, जकरा मौलिकतापर तीन बेर प्रश्न चेन्ह लागल होइक? की पोथीक आकर्षक गत्ता देखि वा विदेशी कविगणक नामावली (भूमिकामे) पढ़ि कऽ समीक्षा लिखल जाइत अछि वा पुरस्कारक निर्णय लेल जाइत अछि? जँ से भेल हो तँ सब किछु “ठिक्के छै भाइ”? अइ सबसँ तँ जीवकान्तजीक बात सत्य बुझाइत अछि जे समीक्षकगण दारू पीबि कऽ वा पैसा पीबि कऽ वा मूर्खता पीबि कऽ समीक्षा लिखैत छथि। डगलस केलनरक “टेक्नोपोलिटिक्स” तँ छपि गेल “पहल”मे चोरा कऽ। आब जीवकान्तजी, ज्ञान रंजनजी अथवा हिन्दी जगतक आन साहित्यकार-सम्पादकसँ पूछथु जे नोम चोम्स्कीवला रचना कतय गेल, की भेल, कोन नामें छपल? पंकज पराशरक नामें कि पदीप बिहारीजीक सुपुत्रक नामेँ (अनुवाद रूपमे)। ई रिसर्च एखन नहि भेल तँ भविष्यमे पुनः एकटा साहित्यिक चोरिक पोल खूजत? अंततः एकटा माँछकेँ कएटा पोखरिकेँ प्रदूषित करए देल जाय आ से कए बेर? उदय-कान्त बनि कऽ गारि पढ़वाक आदति तँ पुरान छनि डॉ. महाचोर केँ। ककरो “सरीसृप” कहि सकैत छथि (मैथिल-जन) आ कोनो परिवारमे घोंसिया कऽ विष वमन कऽ सकैत छथि। ऑक्टोपसक सभ गुणसँ परिपूर्ण डॉ. पॉल बाबाकेँ चोरिक भविष्यवाणी करवाक बड़का गुण छनि तेँ हिनका नामी फुटबॉल टीम द्वारा पोसल जाइत अछि, जाहिसँ “विश्व-कप”केँ दौरान अइ “अमोघ अस्त्रक” उपयोग अपना हिसाबेँ कयल जा सकय। सहरसा-कथागोष्ठीमे पठित हिनकर पहिल कथाक शीर्षक छल- हम पागल नहि छी। ई उद्घोषणा करवाक की बेगरता रहैक- से आइ लोककेँ बुझा रहल छैक। अविनाश आ पंकज पराशरक मामाजी तहिया हिनकर कथाकेँ “टिप्पणीक”क्रममे मैथिली-कथाक “टर्निंग प्वाइन्ट” मानने छलाह। आइ ओ “टर्निंग प्वाइन्ट” ठीके एक हिसाबेँ “टर्निंग प्वाइन्ट” प्रमाणित भेल, कारण कथाक ओहि शीर्षकमे सँ “नहि” हटि गेल अछि, हिनकर तेबारा चोरिसँ। हिनकर पहिल चोरि (अरुण कमलक कविता- नए इलाके में) क निन्दा प्रस्तावमे “मामाजी” आ डॉ. महेन्द्रकेँ छोड़ि, सहरसाक शेष सभ साहित्यकार हस्ताक्षर कऽ “आरम्भ”केँ पठौने छलाह। आइ ओ हस्ताक्षर नहि केनिहार सभ कन्छी काटि कऽ वाम-दहिन ताक-झाँक करवाक लेल बाध्य छथि। द्वैध-चरित्र आ दोहरा मानदण्डक परिणाम सैह होइत अछि। अविनाश तखन तँ देखार भऽ जाइत छथि जखन ओ विदेह-सदेह-२ मे लिखैत छथि जे “एकरा सार्वजनिक नहि करबै”। नुका कऽ सूचना देवाक कोन बेगरता? पंकज पराशरसँ सम्बन्ध खराब हेवाक डर वा कोनो “टेक्नोपोलिटिक्स”(?) केर चिन्ता? विदेह-सदेह-२ क पाठकक संदेश तँ कएटा साहित्यकारकेँ देखार कऽ दैत अछि। जतय राजीव कुमार वर्मा, श्रीधरम, सुनील मल्लिक, श्यामानन्द चौधरी, गंगेश गुंजन, पी.के.चौधरी, सुभाष चन्द्र यादव, शम्भु कुमार सिंह, विजयदेव झा, भालचन्द झा, अजित मिश्र, के.एन.झा, प्रो.नचिकेता, बुद्धिनाथ मिश्र, शिव कुमार झा, प्रकाश चन्द्र झा, कामिनी, मनोज पाठक आदि अपन मुखर भाषामे प्रखरतापूर्वक निन्दनीय घटनाक निन्दा केलनि अछि, ततहि अविनाश, डॉ. रमानन्द झा “रमण”, विभारानीक झाँपल-तोपल शब्द आश्चर्य-भावक उद्रेक करैत अछि। मुदा संतोषक बात ई अछि जे पाठकक “प्रबल भाव-भंगिमा” साहित्यकारोक “मेंहायल आवाज”क कोनो चिन्ता नहि करैत अछि। विभारानी तँ कमाले कऽ देलनि। एहि ठाम मैथिली भाषा-साहित्यक एक सय समस्या गनेवाक उचित स्थान नहि छल। ई ओनाठ काल खोनाठ आ महादेवक विवाह कालक लगनी भऽ गेल। कोनो चोर बेर-बेर अपन कु-कृत्यक परिचय दऽ रहल अछि आ हुनका समय नष्ट करब बुझा रहल छनि आ चोरकेँ देखार केलासँ दुःख भऽ रहल छनि? ओ अपन प्रतिक्रियामे कतेक आत्म श्लाघा आ हीन-भावना व्यक्त केलनि अछि से अपने पत्र अपने ठंढ़ा भऽ कऽ पढ़ि कऽ बूझि सकैत छथि। हिन्दीयोमे एहिना भऽ रहल अछि, तेँ मैथिलीमे माफ कऽ देल जाय? आब हिन्दीसँ पूछि-पूछि कऽ मैथिलीमे कोनो काज होयत? विभारानी ज्योत्सना चन्द्रमकेँ ज्योत्सना मिलन केना कहैत छथि? हुनकर उपेक्षा कोना मानल जाय? ओ सभ साहित्यिक कार्यक्रममे नोतल जाइत छथि, सम्मान आ पुरस्कार पबैत छथि, पाठक द्वारा पठित आ चर्चित होइत छथि। समीक्षाक शिकाइत की उच्चवर्णीय (?) साहित्यकारकेँ मैथिलीमे नहि छनि? समीक्षाक दुःस्थिति सभ जातिक मैथिली साहित्यकार लेल एके रंग विषम अछि। ओइ मे जातिगत विभेद एना भेलए जे ब्राह्मण-समीक्षक, आरक्षणक दृष्टिकोणेँ निम्न जाति (?)क साहित्यकारक किछु बेशीए समीक्षा (सेहो सकारात्मक रूपेँ) केलनि अछि। समीक्षा आ आलोचनाक विषम स्थितिक कारणें जँ नैराश्यक शिकार भऽ जाय लेखक, तँ लेखकीय प्रतिबद्धताक की अर्थ रहि जायत? विभाजीकेँ बुझले नहि छनि जे हुनका लोकनिक बाद मैथिली महिला लेखनमे कामिनी, नूतन चन्द्र झा, वन्दना झा, माला झा आदि अपन तेवरक संग पदार्पण कऽ चुकल छथि। हुनका ने कामिनीक कविता संग्रह पढ़ल छनि आ ने “इजोड़ियाक अङैठी मोड़”। हुनका अपन गुरुदेवक बात मानि हिन्दीमे जाइसँ के कहिया रोकलकनि? ओ गेलो छथि हिन्दीमे। मातृभाषाक प्रेरणा अद्वितीय होइत छै। मैथिलीक जड़ संस्था अथवा समीक्षक सभपर प्रहार करबामे हमरा कोनो आपत्ति नहि, मुदा अर्थालाभ तँ एतय नगण्य अछिए। सामाजिक सम्मान विभाजीकेँ अवश्य भेटलनि अछि। समाजमे “जड़”लोक छै तँ “चेतन” लोक सेहो छैक। हुनकासँ मैथिली भाषा-साहित्य आ मिथिला-समाजकेँ पैघ आशा छै, हीनभाव वा आत्मश्लाघासँ ऊपर उठि काज करवाक बेगरता छैक। सक्षम छथि ओ। हुनका श्रेय लेवाक होड़सँ बँचवाक चाही। अन्यथा साहित्य अकादेमी प्रतिनिधि, दिवालियापन केर शिकार जूरीगण आ मैथिलीक सक्षम साहित्यकारमे की की अन्तर रहि जायत? विभारानीक विचलनक दिशा हमरा चिन्तित आ व्यथित करैत अछि। ओ दमगर लेखिका छथि, सशक्त रचना केलनि अछि, आइ ने काल्हि समीक्षकगण कलम उठेबापर बाध्य हेबे करताह। समीक्षकक कर्तव्यहीनतासँ कतौ लेखक निराश हो? पंकज पराशरक श्रृंखलाबद्ध साहित्यिक चोरिपर सार्थक प्रतिक्रिया देब कोनो साहित्यकार लेल अनुचित नहि अछि कतहुसँ। साहित्यकार लेल साहित्यिक मूल्यक प्रति ओकर प्रतिबद्धता मुख्य कारक होइत अछि आ हेवाको चाही आ तकरा देखार करवाक “बोल्डनेसो” हेवाक चाही। “चाही”वला पक्ष साहित्यमे बेशीए होइत अछि। एहेन-एहेन गम्भीर विषयपर साहित्य आ समाजक “चुप्पी” एहेन घटनाकेँ प्रोत्साहित करैत अछि आ जबदाह जड़ताकेँ बढ़बैत अछि, भाषा-साहित्यकेँ बदनाम तँ करिते अछि। जाधरि पंकज पराशरक चोरि-काव्यक समीक्षा लिखल जाइत रहत, विभारानीक मूल-रचनाक समीक्षा के लिखत? ककरा जरूरी बुझेतैक? विभारानी अपने तँ समीक्षा प्रायोजित नहि करओती? सक्षम लेखकक व्यवहारोक अपन स्तर होइत छै। तेँ संगठित भऽ चोरिक भर्त्सना हेवाक चाही। प्रो. मायानन्द मिश्रक रमनगर कथामे लागल “मुदा”... माया बाबूक कथा-संसारक फलक व्यापक अछि। ओ कथाक “प्लॉट” क चयनमे माहिर आ आधुनिक छथि। ओ पैघ आ छोट सभ आकारक कथा लिखलनि अछि। कथा लेखनक क्रममे ओ पैघ कालखण्ड देखलनि आ भोगलनि अछि। ओ कएटा प्रसिद्ध कथाक यशभागी बनलाह अछि। ओ कए पीढ़ीक जीवनकेँ देखलनि आ लिखलनि अछि। हुनकर लेखनमे लक्षित वर्ग थिक मध्य वर्ग आ निम्न-मध्य वर्ग आ कौखन कऽ राजनीतिक आ पूँजीपति-वर्ग सेहो। ओ नव पीढ़ीक “अंडा प्रेम”, आधुनिकताक प्रति अति-उत्साह आ पुरान पीढ़ी (पिता)क पुरातनपंथी-नक-घोंकची, दुनूपर व्यंग्य केलनि अछि आ अपना हिसाबे देखार करबाक कोशिश केलनि अछि। दुनू पीढ़ीक सोचमे विकृतिकेँ बीछि-बीछि कऽ देखार करितो, प्राचीन शिक्षक पिताक प्रति सहानुभूति रखितो, नव पीढ़ीक दिक्कत बुझितो, आधुनिक आ प्रगतिशील सोचकेँ आत्मसात नै कऽ सकलाह अछि। बेटाक नोकरीक लिलसामे मंत्रीक “अभिनन्दन” लिखएबला प्रोफेसरक दुर्दशाक खिस्सा मायानन्द मिश्रेटा लिखि सकैत छलाह। लक्ष्मीक आगू सरस्वतीक नतमस्तक हैब आ राजनीतिक समक्ष योग्यता, कला-संस्कृतिक पराजयक बोध माया बाबू करौलनि। मुदा प्रोफेसरक विवशताक आगूक च्रण छल- प्रोफेसरक विद्रोह- भाव आ संघर्षशीलता जे गुरु भइयो कऽ शिष्यक समक्ष प्रदर्शित नै कऽ पबैत छथि। पाठककेँ ई कथाकारोक वैचारिक सीमा बुझा सकैत अछि। अपन “भैरव” कथामे एकटा युवा कविकेँ एकटा एम.एल.ए.क “उप-ग्रह” (ओकर नारा सर्जकक रूपमे) चित्रित केलनि अछि माया बाबू आ ओकरा विकृत यथार्थक स्थितिमे, ओही रूपमे छोड़ि, दुनूकेँ देखार करितो, यथास्थितिवाद लग ठमकि जाइत छथि। यएह “भैरव” “माध्यम” नामक कथामे “बीडिओक भैरव” (महादेवक भैरव) बनि कऽ अबैत अछि। “भैरव”मे युवा-कवि “माध्यम” बनि कऽ अबैत अछि आ “माध्यम”मे बीडिओ सैहेबक चम्मच (भैरव) बनि कऽ अबैत अछि। दुनू कथा, खलनायकगण (मुख्य, गौण आ बिचौलिया)केँ देखार करितो “जनहितमे उपयोगी नै भऽ कऽ मात्र “साहित्य-हित”मे उपयोगी भऽ पबैत अछि, जे कला, मात्र कलाक लेल भऽ कऽ रहि जाइत अछि। कथाक उद्देश्य मात्र विकृतिक वा संस्कृतिक चित्रण टा नै होइत अछि। चित्रणकेँ समाधान-संकेतक चासनीसँ बोरबाक कला चाही। जै कथाकेँ कथाकार जनमानसक संग जोड़ि पबैत अछि, से कथा चिरायु भऽ पबैत अछि। “नमकहराम” (जे कि “निमकहराम” हेबाक चाहैत छल)मे चौठियाकेँ “अगुरवान” बना कऽ सफलतापूर्वक परसल गेल अछि। माया बाबूक शिल्प-शैली तँ कमाले अछि। ओ व्यंग्यात्मक शीर्षक चुनैत छथि आ ताही भाषा-शैलीक उपयोग करैत छथि। व्यापारी वर्ग द्वारा आम जनताक प्रति कएल गेल निमकहरामीक चित्रण नीक जकाँ करैत सभ प्रकारक दुरभिसन्धिकेँ देखार करैत छथि। ई व्यापार तकनीक, व्यापार-समझौता, कालाबजारीक बीजमंत्र पाठक “भये प्रकट कृपाला”मे खूबे पढ़ैत अछि। बोगलाजीक मृत्यु-महत्ताक सजीव वर्णन करितो कथाकार बोगलाजीक शार्टकट रस्तासँ महा-उत्थानक जे अन्तर्कथा कहैत छथि- सएह कथाक प्राण थिक। व्यंग्यात्मक टोन पाठककेँ “बोर” हेबासँ बचबैत अछि। तहिना “दीन दयाला” राजनैतिक कुचक्र, मंत्री-मुख्यमंत्री, एम.एल.ए.-हाकिमक दुरभि संधि, भ्रष्टाचार-आवरण, योजना, ड्राइंग रूम मैनेजमेंट, पी.ए. टाइप लोकक पी.ए. गीरी आदि नव मुदा घृणित दुनियाँसँ मैथिली साहित्यकेँ परिचित करबितो, ओइ दुनियाँक प्रखर विरोध कथाकारसँ नै भऽ पबैत अछि। फेर “कौशल्या हितकारी” बनितो स्वास्थ्य-मंत्रीक “इस्तीफा” मात्र मूक-विरोध संकेतित कऽ पबैत अछि आ एकटा पलायन-भावक प्रदर्शन कथान्तमे होइत अछि। कौशल्याक शील-हरण स्थायी-विद्रोहक सृष्टि नै कऽ पबैत अछि आ कएटा गर्भपाती क्रान्ति जकाँ शिथिल इतिहास दोहरा जाइत अछि। उपर्युक्त कथा सबहक प्रकाशन-कालो आ आइयो, संक्रान्तियेकाल थिक। भारतीय सामाजिक आ राजनैतिक-व्यवस्था विकृतिक पराकाष्ठापर अछि आ समाज लहालोट भऽ रहल अछि। मुदा संगहि-संग विकृत-चेतना, सु-संस्कृत चेतना, विकृतिक प्रति जनमानसमे घृणा-भाव आ चेतन-लोकमे विद्रोह-भाव, सभ किछु एकहि संग अस्तित्वमे अछि आ विचारधाराक संघर्षक श्रृंखला सु-स्पष्ट अछि। एहना स्थितिमे कला-चातुर्यसँ परिपूर्ण सक्षम कथाकारक दायित्व थिक जे यथास्थितिपर आनि कऽ कथा, पात्र वा पाठककेँ नै छोड़थि। हुनका नकारात्मक विकृतिक चित्रणमे अपन ऊर्जा नै खपा कऽ सकारात्मक बाट, नकारात्मक विकृतिक लहासक बीचसँ निकालबाक इमानदार आ श्रमपूर्ण प्रयास करबाक छलनि। सकारात्मक चेतनाकेँ ऑक्सीजन देबाक काज साहित्यकारे टा करैत छथि। शेष संवर्गकेँ विधात्मक सीमा होइत छनि। माया बाबूकेँ समस्त सामाजिक आ राजनैतिक विकृति बूझल छनि। हुनका पैघ दुनियासँ परिचय छनि। ओ अपना-आपकेँ मैथिली कथा-साहित्यक “त्रिपुण्डक” एकटा “पुण्ड” मानलनि अछि। मुदा ललित-राजकमलक विद्रोह-चेतना वा समकालीन सोचक टन-टन आवाज हिनका कथा साहित्यसँ लुप्तप्राय अछि। से आश्चर्यजनक आ सत्य सेहो अछि। अपन कथा सभमे प्लॉटक स्तरपर नव आ आधुनिक लगितो, कथ्य (थीम)क स्तरपर माया बाबू कोनो तेहेन सन आगू नै जा पबैत छथि। मनोरम शिल्प, सुन्दर “ट्रीटमेन्ट” आ भाषाधिकार, कथा-कलाक मेंही-मेंही तत्वसँ सराबोर माया बाबूक आकर्षक कथा-संसार, मिथिलाक नव पीढ़ीकेँ मात्र सुधारवादी-संशोधनवादी संदेश दऽ पबैत अछि आ कोनो नव रस्ता नै देखा पबैत अछि, जखनकि समकालीन वैचारिक मुख्यधारा मायाबाबूक पाठक आ नव-पीढ़ीकेँ पहिनहिसँ बूझल छैक। माया बाबूक कथामे तथाकथित “हरिजन नेता” वा एमेले, बड़जन-मुख्यमंत्रीक नाङरि बनि कऽ पाछू-पाछू चलैत अछि- “हा हुसैनक” मुद्रामे। ई बिहारक कांग्रेसी मंत्रीमण्डलमे होइते छल। डॉ. जगन्नाथ मिश्र अपना मंत्रीमण्डलमे कोनो-ने-कोनो बिलट पासवानकेँ रखिते छलाह।माया बाबूक कथा-संसारमे नारी आ दलित-वर्गक मात्र दुर्दशेटा आएल अछि, से ओइ दिनक समय आ मायाबाबू दुनूक सीमा थिक। सेहो दुर्दशा-वर्णन गरिमायुक्त भऽ कऽ नै आएल अछि। माया बाबूक कथा-कला प्रभासेजी जकाँ “धनीक” अछि। सेहो राजमोहन झाक “नागर-भाषा”मे नै, अपितु खाँटी “भाखा”मे। हिनकर कथा-लोक रमणीक आ रसगर चित्रणसँ भरल-पुरल अछि। वर्णन कखनो उस्सठ नै होइत अछि हिनकर। मिथिलाक पारिवारिक आ सामाजिक सम्बन्धक हिनका गहींर अवधारणा छनि- से कएटा कथा साबित करैत अछि। उपन्यासोमे से आएल अछि। हिनकर बहुआयामी व्यक्तित्व मिथिला-मैथिलीकेँ अत्यंत समृद्ध केलक अछि आ मैथिली-कथामे हिनकर अवदानकेँ कमजोर केलक अछि। हिनकर मंचीय व्यक्तित्व, गरिमाक प्रति तृष्णा, भोगक प्रति लालसा- हिनक कथाक प्रति परिश्रम, समर्पण आ अन्ततः कथाक धारकेँ भोथ केलक अछि। मैथिली आन्दोलनमे हिनकर संघर्षशीलता जेहेन रहल तेहेन संघर्षशीलता कथा लेखनमे द्रष्टव्य नै अछि, यद्यपि जै कालखण्डमे ई कथा सभ लिखल गेल छल, “नवीन” मानल गेल छल। मुदा आइ नवीन तत्व सभक परीक्षण केलापर कथा सभ “रमणीक” बुझाइतो ततेक नव आ धरगर नै बुझाइत अछि। तहिना अभिव्यंजनाक काव्य-श्रृंखलाक कविता सभ खूबे “नवीन” मानल गेल छल। मुदा आधुनिकताक टन-टनाटन ध्वनि जे यात्री-राजकमलक काव्यमे आएल- से हिनक काव्यमे विलुप्तप्राये रहल। कथे जकाँ हिनकर उपन्यासोमे आधुनिकता आ पात्रक संघर्षशीलता कोनो तेहन जगजियार नै भऽ सकल। फेर हिनकर गीत, गीतल आ मंच-संचालनमे खूबे रस आ नवीनता अछि, मुदा सेहो मात्र शिल्प आ प्रयोगेक स्तरपर। वस्तुतः संघर्षशीलता आ जिजीविषा प्रायः सभ विधामे विलुप्तप्राय अछि। मायाबाबू अपना जीवनमे खूब सार्थक काज सभ केलनि अछि। हिनकर जीवनक उपलब्धिक प्रशंसनीय पथार लागल अछि। मुदा अपना समयक सीमाकेँ उपन्यास-कथा अथवा कवितोमे नै तोड़ि सकल छथि। ऐतिहासिक उपन्यासकेँ प्राचीने राष्ट्रवादी-गौरववादी दृष्टिकोणसँ लिखलनि अछि। कोनो आधुनिक संदर्भमे वैज्ञानिक मार्क्सवादी दृष्टिकोणसँ नहिए लिखि सकल छथि। मंत्रपुत्र, स्त्रीधन वा पुरोहितमे प्राचीन इतिहासक पुराने व्याख्या प्रस्तुत केलनिहेँ। प्राचीन भारत, प्राचीन समाज, पुरातन आ सनातन-व्यवस्थाक प्रति हिनकर “नजरिया” पारम्परिक राष्ट्रवादी-गौरववादी-स्कूल जकाँ अछि, जै स्कूलक यू.एन. घोषाल, के.पी.जायसवाल, आर.सी. मजूमदार, हेमचन्द्र रायचौधुरी, के.के.दत्त, राधाकृष्ण चौधरी, बाल गंगाधर तिलक आदि छलाह। ई लोकनि प्राचीन भारतक गौरव-बोधसँ ब्रिटिश साम्राज्यवादकेँ चकचोन्ही लगा कऽ निचैनसँ सूति रहैत छलाह आ इतिहासकेँ वैज्ञानिक पद्धतिसँ दूर कऽ मात्र “ब्रिटिश विरोधक औजार” मानैत छलाह। तकर बाद ऐतिहासिक यथार्थ सभ उपेक्षित भऽ जाइत छल। राजसत्ता आ प्राचीन-व्यवस्थाक यशोगानक अलावे प्रजाक दुःख-दर्द इतिहास-लेखनक ऐ तंत्रमे नै छल। एहने पुनरुत्थानवादी जीर्ण-शीर्ण अवधारणा, जकरा रामचैतन्य धीरज “वैज्ञानिक ब्राह्मणवाद कहैत छथि, जकाँ, जँ उपन्यास-कथा लेखन हो तँ प्राचीन समाजकेँ नव सन्दर्भमे देखब असम्भव जकाँ भऽ जाइत अछि। इतिहासक घटना सबहक अध्ययन वा पात्र आ परिवेशक मनोरम चित्रण एक बात थिक आ वैज्ञानिक इतिहास दृष्टिसँ निष्कर्ष बहार कऽ समाजकेँ चेतना-सम्पृक्त करब दोसर बात थिक। इतिहास दृष्टिक विकास पाछू मुँहे नै होइत अछि आ ने हेबाक चाही। आगू मुँहे विकास ओ थिक जे रोमिला थापर, राम शरण शर्मा, डी.डी. कोशाम्बी, इरफान हबीब, डी.एन.झा, सतीश चन्द्रा, आदि इतिहासकारगण अपन-अपन कृति सभमे केलनि अछि। ओ लोकनि राजसत्ताक गौरव गाथाक उपेक्षा कऽ तत्कालीन समाजक अभगदशाकेँ देखार कऽ नव, जनवादी दृष्टिसँ ऐतिहासिक तथ्य सबहक परीक्षण आ तर्कसंगत व्याख्या केलनि आ प्राचीन इतिहासकेँ निस्सन वैज्ञानिकताक आधार देलनि। हिन्दी साहित्यमे इतिहास दृष्टि आधारित उपन्यास सभ बहुत प्रासंगिक बनल मुदा मैथिलीक ऐतिहासिक चेतना-सम्पृक्त उपन्यास पछुआएल विचारधारा आधारित भऽ गेल। ऐतिहासिक घटना सबहक नीक संयोजन, तथ्य, पात्र, संस्कृति-तत्व सभसँ परिपूर्ण रहितो, उपन्यास-तत्व आ कला-चातुर्यसँ धनीक रहितो, वैचारिक स्तरपर प्रगतिशील नै हेबाक कारणेँ “मंत्रपुत्र” अपन महत्वकेँ घटा लैत अछि, जखनकि एस.ए. डांगे “साधु समाजवाद”केँ तत्कालीन समाजक एक “यथार्थ” मानने छथि। ओना ई तथ्य माया बाबूक पक्षमे जाइत अछि जे ऐतिहासिक उपन्यासक मामिलामे दरिद्र मैथिलीक भण्डारक श्रीवृद्धि ई उपन्यास करैत अछि। आब आगरिमो हमरा कोनो आशा नै अछि जे प्राचीन इतिहास आधारित अपन अन्य उपन्यासमे माया बाबूक पात्र सभ प्राचीन व्यवस्था विद्रोह धर्मक निर्वाह करत। आ ऐ बातक ग्लानि तँ अछिए जे “पुरोहित” आ “स्त्रीधन” मैथिलीक भण्डारसँ बाहरे रहल। वैदिक कालीन दासत्वपर मणिपद्मजी “आदिम गुलाम” ले लेखकीय नजरिया आ माटिक प्रति प्रतिबद्धता प्रस्तुत केलक, से मंत्रपुत्रक “शास्त्रीय-एप्रोच” प्रस्तुत नै कऽ सकल। माया बाबूक अपन कथा सभमे ऊपरी स्तरमे जे आधुनिक बुझाइत छथि, तेहेन वैचारिकताक स्तरपर प्रगतिकामी नै बुझाइत छथि। हुनकर वैचारिकता जहिना उपन्यासमे रहल तहिना कथोमे रहल, से स्वाभाविके छल। कोनो रचनाकार दू विधामे अलग-अलग विचारक हो, से ने तँ संभव अछि आ ने उचिते। व्यक्ति अपन जीवन, साहित्य आ सभ क्षेत्रमे प्रायः एकहि विचारधाराक रहए, सएह नीक आ सएह रहितो अछि। आ से नै रहलापर पकड़ाइयो जाइत अछि। मायाबाबू जे छथि से सभठाँ छथि- एक्के रंग। जीवनोमे रसगर, मंचोपर रसगर, उपन्यास-कथा-गीत-काव्य, सभठाँ “रसगर”। सभठाँ रमनगर वर्णन, सभ विधामे शिल्प-शैलीमे महारत प्राप्त। कला-चातुरी-युक्त सक्षम खेलाड़ी। सफलता प्राप्त करबाक बीज मंत्रक विशेषज्ञ। मुदा जीवनदर्शन आ वैचारिकतामे मयूरक पएर जकाँ सुखाएल। पुरान वैचारिकता, नृत्य-कौशल-प्रेमी दर्शककेँ, मयूरक पैर देखिते झूड़-झमान बना दैत अछि। माया बाबू यात्री-राजकमल-ललित-किसुनजीकेँ देखने-पढ़ने छलाह। किरणजीक परम्परा हुनका बूझल छलनि। तेँ किछु बेशी अहू बिनू पर छल। हिनका “सोनाक नैया” रचए अबैत छलनि। “माटिक लोक”क सेहो हिनका परिचय छलनि। तेँ माटिपर ठाढ़ लोकक जनवादी आ प्रगतिशील आँखिकेँ चीन्हि कऽ पात्र आ परिवेशक रचना करब अपेक्षित छल। कोनो साहित्यकारसँ आजुक लोक, समाज आ समय- ई आशा रखैत अछि। मुदा सर्वतोभावेन साहित्यिक सक्षमताक बावजूद “दरभंगिया इसकूलक” तेजगर छात्र बनबाक “दुर्घटना” हिनको संग भइये टा गेल। से मात्र वैचारिकताक कारणेँ। अन्यथा, “दड़िभंगा”क कएटा “गुरु-घंटाल”सँ कतओक आगू जएबाक प्रतिभा हिनकामे छल। मात्र अहीटा बातकेँ छोड़ि कऽ माया बाबू अपना कालखण्डक एकटा अत्यंत सक्षम बहुआयामी साहित्यकार छथि आ अपन समयक मिथिला-मैथिल-मैथिलीकेँ अपन असंख्य योगदानसँ परिपूरित केलनि अछि आ कऽ रहल छथि। हुनकर ऊर्जा स्तुत्य अछि। मुदा ऊर्जाक “आउटपुट” कलाक चरमोत्कर्षपर होइतो, वैचारिक रूपेँ आलोच्य अछि। मंत्रेश्वर झा चरित्र चित्रणक वाजीगर- जगदीश प्रसाद मंडल पछिला किछु वर्षमे मैथिली साहित्यक इतिहासमे जगदीश प्रसाद मंडल धूमकेतु जकाँ उगल आ चमकल छथि। संप्रति हुनकर दू उपन्यास जिनगीक जीत आ मौलाइल गाछक फूल हमरा समक्ष अछि। दुनू उपन्यासकेँ मनोयोगसँ पढ़ि चुकल छी। रोचक भाषा आ शैलीमे लिखल हिनकर दुनू उपन्यास ग्रामीण जीवनक चिन्तन आ ऊहापोहकेँ सजीव चित्रण करैत अछि। जै गाम घरक कथा सभ मंडलजी उठाए ओकरा परिणति तक पहुँचओने छथि तै गाम घरक एतेक सूक्ष्म आ विस्तृत विवरण मैथिली साहित्यमे ऐसँ पूर्व कमे भेल अछि। जिनगीक जीत उपन्यासमे कतेको एहन चरित्र उभरल अछि जे कोनो पाठककेँ प्रभावित केने बिना नै रहत। उदाहरण स्वरूप बचेलाल आ सुमित्राक चरित्र देखल जाए, “शिवकुमारकेँ नोकरी होइते बचेलाल इस्कूलमे त्याग-पत्र दऽ देलक। बचेलालक त्यागपत्रसँ सौंसे गाम टिका-टिप्पणी चलए लागल। किछु गोटेकेँ दुख एहि दुआरे होइत जे बेर-बेगरतामे पाइसँ मदति भऽ जाइत। किछु गोटेकेँ खुशियो होइत किएक तँ भने आमदनी बन्न भऽ गेलनि। मुदा सुमित्राकेँ ने हरख आ ने विस्मय। किएक तँ ओ नीक नहाँति बुझैत जे जत्ते मनुक्खक भीतर कमाइक शक्ति होइत छै, ओते तँ नोकरीमे नहिये होइत छैक।” एे उपन्यासमे महन्थी कोनो चलैत अछि, महन्थ कोन-कोन कारनामा करैत अछि तकरो अद्भुत चित्रण भेल अछि। “ऊपरका हन्नामे आठ गो कोठली छै। आठो कोठली असगरे रखने अछि।... पूताक बाद सभ अपन-अपन ठरपर चल जाइए। तकर बाद लीला शुरू होइ छै। मुदा बेसी नइ कहबह।” ऐ प्रकारे बेसी नै कहबह कहि कऽ महन्थक चरित्रक पूरा वर्णन स्पष्ट भऽ जाइत अछि। दू-तीन दशक पूर्व उच्चतम न्यायालय पटना उच्च न्यायालयक कोनो भ्रष्ट आदेशकेँ निरस्त करैत बारंबार यएह टिप्पणी केने छल, “We say no more”। मौलाइल गाछक फूल उपन्यास सेहो ओहिना उद्देश्यपूर्ण अछि जेना जिनगीक जीत। मुदा ऐ उपन्यासमे आदर्शवाद कने बेसी प्रकट भेल अछि। रमाकान्तक जे चरित्र प्रस्तुत भेल अछि तकर उदाहरण भेटब ओतेक सुलभ नै। चाह पीब रमाकान्त कहलखिन, “दूखू हम अप्पन सभ खेत समाजकेँ दऽ देलिऐक। आब हमरा कोनो मतलब ओहि खेतसँ नहि अछि।” दोसर दिस सुबुधक चरित्र अछि जे नोकरी छोड़ि गामक छोट-पैघ सबहक धीयापूताकेँ पढ़ेबा लेल त्यागक आदर्श प्रस्तुत करैत अछि। एहेन चरित्र सभ निस्संदेह गामकेँ पुनर्जीवित आ पुनर्गठित करबामे प्रेरणाक काज करत। दुनू उपन्यास सभ दृष्टियें उत्कृष्ठ अछि आ मैथिली उपन्यास लेखनमे नव आयाम गढ़ैत अछि। मंडल जीक कथा संग्रह गामक जिनगी आओरो बेसी श्रेष्ठ रचना अछि। ऐ संग्रहमे कुल उनैस कथा संकलित अछि। ऐ संग्रहक लगभग सभ कथा प्रकाशनसँ पूर्व मंडलजी हमरा पठौने रहथि। तहिया हम िदल्लीमे रही। हुनकर आग्रह रहनि जे हम कथाक पांडुलिपिकेँ शुद्ध कऽ के हुनका पठा दिअनि। हमरा आश्चर्य भेल छल जे हमरा कोना ओ ऐ लेल उपयुक्त बुझलनि। मंडल जीक कथा सभ पढ़ि हम ततेक प्रभावित भेल रही जे हमरा पांड़लिपिमे कतहुँ कोनो चेन्ह लगाएब उपयुक्त नै लागल। हम दूरभाषपर जगदीश मंडलजी आ हुनक सुपुत्र उमेश मंडलकेँ कहलिएनि जे जखन हम पटना आपस आएब तखन स्वयं हुनकासँ भेँट कए अपन सुक्षाव देबनि। कोनो रचनात्मक लेखनकेँ आलोचना तँ भऽ सकैत अछि, ओकर गुण-दोषकेँ विवेचन तँ भऽ सकैत अछि, ओकर हठात् काटल-छाँटल नै जा सकैत अछि। से कएलो नै जेबाक चाही। संयोगसँ ऐ बीच गजेन्द्र ठाकुर जीकेँ मंडल जीक पांड़लिपि प्राप्त भेलनि आ ओ सफल जौहरी जकाँ मंडल जीक कथा, उपन्यास, नाटक आदि कतोक विधाक रचनाकेँ विविध रूपमे प्रकाशमे अनलखिन। ऐ लेल ओ अशेष धन्यवादक पात्र छथि। गामक जिनगीक सभ कथा ग्राम्य जीवनकेँ किछु अनटुअल प्रसंगकेँ मार्मिक चित्रण करैत अछि। भैंटक लावा, बिसाँढ़, अनेरूआ बेटा, डीहक बटबारा, घरदेखिया, बाबी, ठेलाबला, बोनिहारिन मरनी, इत्यादि ऐ संग्रहक उत्कृष्ठ कथा सभ छन्हि। अपन उपन्यासे जकाँ मंडल जीक कथा सभ जिजीविषा आ व्यावहारिक आदर्शक उत्कंठासँ भरल अछि। मंडलजी जै तरहे निरंतरतामे विविध विधाक रचना कऽ रहल छथि से भविष्यमे हुनकर विशेष अवदान लेल विश्वास जगबैत अछि। सुभाष चन्द्र यादव रचनाक पाठ आ लेखक (मैथिली लेखक संघ द्वारा पटनामे आयोजित परिचर्चामे सुभाष चन्द्र यादवक वक्तव्य) कोनो लेखक सँ ई अपेक्षा केनाइ जे ओ अपन रचनाक स्पष्टीकरण आ व्याख्या करए–एकटा अनुचित अपेक्षा होएत। ई काज लेखकक नहीं थिकैक। रचना चाहे कतबो दुर्बौध्य आ विवादास्पद हो, लेखक ओहि लेल जिम्मेदार तऽ होइत अछि, मुदा ओकर भाष्यकार हेबाक लेल बाध्य नहि। लेखक ककरा–ककरा अपन रचना बुझेने फिरत आ किएक? की ई सम्भव छैक? लेखक जँ चाहए तऽ अपन जीवन–काल मे रचनाक संदर्भमे किछु सम्वाद स्थापित कऽ सकैत अछि, मुदा मृत्योपरांत? होक पाठक अपन बोध आ विवेकक अनुसार रचनाक पाठ करैत अछि। हरेक युगक सेहो अपन भिन्न बोध होइत छैक। तँ ई पाथ भिन्नता आ परिवर्त्तनशीलता हरेक समर्थ रचनाक आनिवार्य गुण होइत अछि। समय के संग–संग रचनाक संवेदनात्मक अभिप्राय बदलैत रहैत छैक। तँ इ युग बदलला पर रचनाक व्याख्या सेहो बदलि हाइत छैक। एहि तरहेँ कोनो एकटा रचना के एक्के टा आ समान पाठ नहीं होइत अछि; मूल्यवान रचनाक पाठ अनंत होइत अछि। पाठ पर लेखकक नियंत्रण नहीं होइत छैक। तँ इ पाठ–भिन्नताक लेल ओकरा सफाइ आ स्पष्टीकरण देबाक कोनो बेगरता नहि हेबाक चाही। हमर अपन अनुभव तऽ इ अछि जे जाधरि कोनो घटना कलात्मक विजनसँ दीप्त नहि होएत ताधरि ओ रचनामे रूपांतरित नहि भऽ सकत। ओहि आरंभिक विजनकेँ पाठक भिन्न–भिन्न रूपेँ पकड़ैत अछि आ अलग–अलग व्याख्या करैत अछि। हमरा लगैत अछि जे कोनो रचनाक विजन आ दर्शनकेँ पाठक भले नहि बुझि पबैत हो, ओकर मर्मकेँ जरूर पकड़ि लैत अछि; ओकर संवेदनात्मक तत्वकेँ हृदयंगम कऽ लैत अछि। लोक–कथा सँ उदाहरण ली तऽ बात बेशी स्पष्ट होएत। एकटा चिनमा खेलिऐ रओ भइया तइ ले पकड़ने जाइ–ए’- एहि उक्तिमे न्याय आ समानताकेँ जे विमर्श आ दर्शन छैक, तकरा पाठक भले नहि बूझि पबैत हो, मुदा स्वतंत्रताक लेल जे फुद्दीक आर्तनाद छैक तकर अनुभव पाठक अवश्य कऽ लैत अछि। तहिना हमर कथा ‘नदी’ आ ‘कनियाँ–पुतरा’मे जीवनदायिनी शक्तिक रूपमे प्रेमकेँ जे विजन (दर्शन) छैक तकरा बूझब ओतेक आसान जँ नहियो होइ, तैयो नेहक अनुभूति तऽ पाठक करिते अछि। साहित्यमे असली चीज इएह संवेदना या मर्म होइत छैक। कोनो विचार (या दर्शन) संवेदनेक माध्यमसँ पाठक धरि पहुँचबाक चाही; कोनो नीरस विमर्श या नाराबाजीक रूपमे नहि। हमरा बुझने धर्म आ संस्कृतिक भित्ति प्रेमे थिक। प्रेमसँ बढ़ि कऽ एहि संसारमे कोनो दोसर भाव नहि अछि। हमर कथा सभ कोनो विचारधारात्मक या आचारशास्त्रीय आग्रह लऽ कऽ नहि चलैत अछि। ओ अपन समयकेँ आचार–विचारकेँ व्यक्त तऽ करैत अछि, मुदा ओहि सँ बद्ध नहि अछि। हमर धारणा अछि जे कलाकृति कोनो क्रांति नहि अनैत अछि। ओ मनुक्खक भावात्मक अभिवृत्ति आ दृष्टिकेँ बहुत सूक्ष्म ढ़ंगसँ बदलैत अछि आ दीर्घकालिक सामाजिक परिवर्त्तनक घटक होइत अछि। एकर अतिरिक्त आ किछु नहि। जे आलोचक एहिसँ इतर कोनो अपेक्षा आ आग्रह (जेना मैथिलीक चेतनावादी हठ) लऽ कऽ साहित्य लग जाएत, से अपनोकेँ ठकत आ दोसरोकेँ धोखा देत। जगदीश प्रसाद मंडल मैथिली साहित्यमे जगदीश प्रसाद मंडलक पदार्पण किछु-किछु ओहिना भेल अछि जेना कहियो विवेकानन्द ठाकुरक भेल छल। जहिना विवेकानन्द ठाकुर अपन जीवनक उत्तरार्धमे बहुत बहुत आकस्मिक ढ़ंगे मैथिलीमे प्रगट भेलाह, तहिना जगदीश प्रसाद मंडल एकबैग अपन अनेक कथा आ उपन्यास लऽ कऽ उपस्थित भेल छथि। विवेकानन्द ठाकुरक काव्यमे पाठककेँ ग्रामीण परिवेशक जेहन टटका बिम्ब आ नव सुआद भेटल छलनि, जगदीश प्रसाद मंडलक कथामे ओहने टटका चित्र आ नव आस्वाद भेटतनि। दुनू रचनाकार मिथिलाक ग्राम्य-जीवन संस्कृतिसँ मोहाविष्ट छथि। दुनुक शैली वर्णनात्मक अछि। लेकिन आगमन, विषयवस्तु, दृष्टि आ शैलीमे समानता होइतहु दुनूमे क्यो ने तँ ककरो अनुकरण कएने छथि ने एक दोसरासँ प्रभाव ग्रहण कएने छथि। दुनुक अपन स्वतंत्र लेखकीय व्यक्तित्व छनि। ठेलाबला, रिक्शाबला, चूनवाली, इन्जीनीयर, डॉक्टर इत्यादि शीर्षकसँ लागत जेना जगदीश प्रसाद मंडल वर्ग संघर्षक कथाकार हेताह। लेकिन ओ जनवादी या प्रकृतिवादी कथाकार नहि छथि, जीवन-संघर्षक कथाकार छथि। हुनक कथाक सन्दर्भमे जे सर्वाधिक उल्लेखनीय बात अछि से ई जे हुनक सभ कथामे औपन्यासिक विस्तार अछि। वर्तमान समएमे प्रचलित आ मान्य कथासँ हुनक कथा भिन्न अछि। हुनक कथा घटना बहुलता आ ऋजुसँ युक्त अछि। जगदीश प्रसाद मंडल जीवनमे प्राप्य जिजीविषा, मानवीयता एवं आदर्शकेँ सुदृढ़ आ पुनर्प्रतिष्ठित करबाक उद्देश्यसँ अनुप्राणित छथि। मैथिली लोक-कथा मैथिली मे लोक-कथा पर बड़ कम काज भेल अछि। लोक-कथाक किहुए संकलन उपलब्ध अछि आ से स्मृतिक आधार पर लिपिबद्ध् कयल गेल अछि, फील्ड वर्कक आधार पर नहि । लोक-साहित्यक कोनो इकाइ हो, ओकर एक सँ अधिक रूप विद्यमान रहैत छैक , जे फील्ड वर्क कयले सँ प्राप्त भऽ सकैत अछि । स्मृति मे ओकर मात्र एकटा रूप रहैत छैक, जकरा सर्वोत्तम रूप मानि लेब आनक भऽ सकैत अछि । लोक-कथा क जतेक संकलन अखनधरि भेल अछि, से अपूर्ण अछि । मैथिली मे लोक-गीत, लोक – गाथा आ लोक – देवता क लेल तऽ किछु फील्ड वर्क कयलो गेल, लोक – कथाक लेल भरिसक्के कोनो फील्ड वर्क भेल अछि । आब जखन एक युश्त सँ दोसर पुश्त मे लोक – साहित्यक अंतरण दिनोदिन संकटग्रस्त भेल जा रहल अछि, तैं एकर संश्क्षण जरूरी अछि । लोक – साहित्यक संश्क्षण मात्र एहि लेल जरूरी नहि अछि जे ओ अतीतक एकटा वस्तु थिक; ओ अपन समयक विमर्श आ आत्मवाचन सेहो होइत अछि आ एकटा प्रतिमान उपस्थित करैत अछि । ओकर रूपक, प्रतीक , भाव आ शिल्पक उपयोग लिखित साहित्य मे हम सभ अपन-अपन ढंग सँ करैत रहैत छी । तहिना लिखित साहित्य सेहो लोक-साहित्य केँ प्रभावित करैत रहैत अछि । लोक-साहित्य संबंधी अध्ययन मुख्यत: स्थान आ कालक निर्धारण पर केन्द्रित रहल अछि । ओकर कार्य, अभिप्राय आ अर्थ सँ संबंधित प्रश्न अखनो उपेक्षित अछि । मैथिली मे तऽ लोक-साहित्य संबंधी अध्ययन अखन ठीक सँ शुरुओ नहि भेल अछि । जे पोथी अछि, ताहि मे लोक-साहित्यक परिभाषा आ सूची उअपस्थित कयल गेल अछि । लोक-कथाक उपलब्ध संकलन सभ मे ओहन कथाक संख्या बेसी अछि जे देशांतरणक कारणेँ मैथिली मे आयल अछि। मैथिलीक अपन लोक – कथा, जकरा खाँटी मैथिल कहि सकैत छिऐक , से कम आयल अछि । रामलोचन ठाकुर द्वारा संकलित मैथिली लोक-कथा, जकरा हम अपन एहि अत्यंत संक्षिप्त अध्ययनक आधार बनौने छी, ताहू मे खाँटी मैथिली लोक-कथा कम्मे अछि । लोक-कथाक अभिप्राय आ अर्थ संबंधी अपन बात कहबाक लेल जाहि दूटा कथाक चयन हम कयने छी, से अछि — ‘एकटा बुढ़िया रहय ‘ आ ‘ एकटा चिनता खेलिऐ रओ भैया ‘। एहि दुनू कथाक वातावरण विशुद्ध मैथिल अछि । दुनू क विमर्श , आत्मवाचन आ प्रतिमान मैथिल-मानसक अनुरूप अछि । दुनू कथाक विमर्श न्याय पर केंद्रित अछि । पहिल कथाक बुढ़िया दालिक एकटा फाँक लेल बरही, राजा , रानी , आगि, पानि आ हाथी केँ न्याय पयबाक खातिर ललकारैत अछि, किएक तऽ खुट्टी ओकर दालि नुका लेने छैक आ दऽ नहि रहल छैक । कथाक विमर्श पद्यात्मक रूप मे एना व्यक्त भेल अछि – हाथी – हाथी – हाथी ! समुद्र सोखू समुद्र । समुद्र ने अगिन मिझाबय , अगिन । अगिन ने रानी डेराबय , रानी । रानी ने राजा बुझाबथि , राजा । राजा ने बरही डाँड़थि , बरही । बरही ने खुट्टी चीड़य , खुट्टी। खुट्टी ने दालि डिअय , दालि । की खाउ , की पीबू , की लऽ परदेस जाउ। जाइत अछि । चुट्टी तैयार भऽ जाइत छैक । फेर तऽ चुट्टीक डरँ हाथी , हाथीक डरँ समुद्र , समुद्रक डरँ आगि , आगिक डरँ रानी , रानीक डरँ राजा , राजाक डरँ बरही न्याय करक लेल तैयार भऽ जाइत छैक आ खुट्टी बुढ़िया केँ दालि दऽ दैत छैक । ई कथा रामलोचन अपन माय सँ सुनन छलाह । ओ कहलनि जे माय वला वृत्तांत मे बुढ़िया हाथिए लग सँ घूरि जाइत छैक । लिपिबद्ध करैत काल ओ एकर पुनर्सृजन कयलनि । हुनक लिपिबद्ध कयल वृत्तांत मे बुढ़िया हाथियो सँ आगू चुट्टी धरि जाइत अछि । बुढ़िया केँ चुट्टी धरि लऽ गेनाइ कथाक व्यंजना मे विस्तार अनैत छैक । लेकिन लोक – कथाक एहन प्रलेखन कतेक उचित अछि ? एहि कथाक आत्म वाचन बुढ़ियाक माध्यमे प्रकट भेल अछि । अपन स्थितिक प्रति बुढ़िया जे प्रतिक्रिया करैत अछि , सएह एहि कथाक आत्म – वाचन थिक । एकटा दालिक बल पर बुढ़िया परदेस जेबाक नेयार करैत अछि । राजा- रानीक सेर भरि दालि देबाक प्रस्ताव केँ तिरस्कृत करैत अछि । समुद्र सँ हीरा – मोतीक दान नहि लैत अछि । दालि पर अपन अधिकार लेल लड़ैत रहैत अछि । तात्पर्य ई जे सपना देखबाक चाही । भीख आ दयाक पात्र नहि हेबाक चाही । दान लेब नीक नहि । स्वाभिमानी हेबाक चाही आ अपन हक लेल लड़बाक चाही । कथा ई प्रतिमान उपस्थित करैत अछि जे न्याय संघर्षे कयला सँ भेटैत छैक । ’एकटा चिनमा खेलिऐ रओ भइया ’ न्यायक विवेकशीलता पर विमर्श करैत अछि । मुनिया (चिड़ै) केँ एकटा चीन खेबाक अपराध मे प्राणदंड भेटै वला छैक । ई विमर्श पद्यात्मक रूपमे चलैत छैक , जाहि मे ओकर दारुण अवस्था सेहो चित्रित भेल छैक । बरदवला भाइ ! परबत पहाड़ पर खोता रे खोंता भुखै मरै छै बच्चा एकटा चिनमा खेलिऐ रओ भइया तइलएपकड़ने जाइए । फेर घोड़ावला अबै छै , हाथीवला अबै छै , खुद्दी-वला अबै छै । मुनिया सभ सँ मिनती करैत अछि ।ओहो सभ खेतवला केँ पोल्हबैत छैक;=छोड़बाक बदला मे बरद , घोड़ा , हाथी देबऽ लेल तैयार छैक ,लेकिन खेतवला टस सँ मस नहि होइत अछि । जखन भूखे-प्यासे जान जाय लगै छैक , तखन खुद्दीक बदला मे मुनिया केँ छोड़ि दैत अछि । मुनिया करुणा आ मानवीयताक आवाहन करैत अछि । मनुस्मृति मे कहल गेल छैक जे चुपचाप ककरो फूल तोड़ि लेब चोरि नहि होइत छैक ; तहिना ककरो एकटा चीन खा लेब कोनो अपराध नहि भेल । इएह कथाक आत्मवाचन थिक । कथा ई प्रतिमान उप़स्थित करैत अछि जे सभक जीवक मोल बराबर होइत छैक । असहाय आ निर्धनो केँ जीबाक अधिकार छैक । एहि संसार मे ओकरो लेल एकटा स्पेस (जगह) हेबाक चाही। अच्छेलाल शास्त्री (१९५६- ), गाम- सोनवर्षा, पोस्ट- करहरी, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी, (बिहार) रणभूमि आ कविता नामक शीर्षक कवितापर दू शब्द “रणभूमि” कविता पढ़ि कविक भावसँ हृदए विभोर भऽ उठल। काव्यक गहराइमे गोंता लगेलासँ देखबामे बहुत किछु आएल। श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक काव्य भू-मंडलकेँ प्रभावित करैत अछि। संसारक रणभूमिमे मनुष्यक जिनगीकेँ राखि भौतिक, अध्यात्मिक अर्थ ज्ञानसँ कर्म वा धर्मपर ध्यानाकर्षण करबैत अछि। विवेकसँ संसार समरमे सामर्थवान योद्धा बनबाक प्रेरण देल अछि। मातृभूमिक समस्याकेँ समूल निदानक लेल कर्मवाण चला भंग संग गमक उपमा दऽ असत्यपर सत्यक विजयक महाभारतक उदाहरण दिएलन्हि अछि। मनुष्यक लेल शकल वसुधाकेँ सुख भोग क्राति लेल, सतत् सचेष्ट भऽ जग रणमे, कर्मवीर बनबाक प्रेरणा देलन्हि अछि। तन-मन वतन केर पवित्रतापर जोड़ दैत विष अमृत पहिचानि विवेकसँ समए धरातलपर उतरल समस्याकपर सचेष्ट करौलनि अछि। “कविता” शीर्षक कवितापर- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जी सम्पूर्ण कविवृन्दकेँ अपन मनोभावनासँ चिताकर्षण करौलन्हि अछि। काव्यक सृजनात्मक विधाक दिशा िनर्देश कएलनि अछि। मन स्थिति भावनाक प्रवाहमे ित्रवेणी संगममे पाठक संग रचनाकारकेँ गोंता लगौलन्हि अछि। छंद अलंकार वाणी आनन्द युक्त कवितापर जोर देलन्हि अछि। दुर्गानन्द मंडल, निर्मली शिव कुमार झा टिल्लू जीक लिखल खोंइछक लेल साड़ी- कथापर दू शब्द- कथा पढ़ल िचन्तन कएल, बुझना गेल कथा यथार्त परख अछि जेना कथाकार अपनहि एहि स्थितिसँ गुजरल होनि। यदि अनुभव हमर सत्य तँ सार्थकता शत्-प्रतिशत। एक कात कथाकार विद्यापतिक भूमिकामे छथि मनमे सिनेह छन्हि जे माए कने ओ भूमिका देख लेती तँ हमरा नीक लागत। एम्हर माए ओलतीमे गुम-सुम बैसल छलीह कारण महाअष्टमीक राति एक टूक अखड़ साड़ी नहि रहलाक कारणे ओ भगवतीक खोंइछ काेना भरती? ई जािन बालक मातृत्व प्रेमवश बावूजीक साखपर कपड़ाबला महाजनक दोकानसँ एकटूक साड़ीक पन्नी माएक हाथमे थमा दैत छथिन। माएक टूटैत विश्वास मायक रूपमे नहि अपितु बेगुसरायक बेटी रूपमे स्पष्ट होइत अछि। हाथक चुड़ी टूटव, काँचक किछु कण माएक हाथमे गड़ब आ टप-टप शोनितक आपादान- कविजीक साखपर दाग सदृश्य बुझना गेल। मुदा सत्य जानि अपन अपराध बोधक अनुभव कऽ माए बैस बालककेँ कोरामे लऽ कऽ सिनेह सागर अविरल धारा प्रवाहित केलनि। सारत्व स्वरूप स्वामीक अर्थात कथाकारक बावूजीक आनल लाल रंगक सिफनक सोहनगर साड़ी नहि पहिर बालकक आनल सुती साड़ीसँ भगवतीक ख्ाोंइछ भरब, प्रभु प्रेमक एकटा अलग पराकास्ठाक परिचएकेँ पाठक बन्धु नहि बिसरि सकताह। कथाक सार्थकतापर इजोत छोड़ैत अछि। जे निश्तुकी एकटा माजल कथाकारक कथा बुझना जाइछ। मुदा जँ मॉं.... क जगह कोनो आन उपयुक्त, समुचित शब्दसँ सजवितथि तँ कथामे मैथिली समृद्धता आरो स्पष्ट होइत। शेष सभ चिकनहि चिक्कन। धन्यवाद- । नाटक बेटीक अपमानपर एक नजरि मैथिली साहित्यक एकटा विधा नाटक अछि, जे विधा सभ दिन रौदियाहे सन रहल। गिनल-चुनल नाटककारक किछु नाटक जे आंगुरपर गनल जा सकैत अछि, दोगा-दोगी कोनो पुस्तकालयक शोभा मात्र बढ़ौलक। एकटा समए छल जइमे नाटककार जे नाटक लिखलनि तइमे वाक्-पटुता नै रहबाक कारणे वा शुद्ध-अशुद्ध उच्चारण नै भेने वा समुचित वाद-संवादक संग समदियाक अभाव सभ दिन देखल गेल। चूँकि ओना हम जत्ते-जे ढकि ली मुदा एकटा सत्यकेँ स्वीकार करए पड़त जे हम मैथिल छी। हमरा लोकनिक मातृभाषा मैथिली भेल। मुदा माएकेँ माँ कहैत कनेको लाज विचार नै होइए। जेना कि आँखिसँ लाजक पानि खसि पड़ल। तात्पर्य, मैथिल होइतो दोसर भाषाक दासताक शिकार भेल छी आ ओकर भोग भोगि रहल छी, बुझाइत अछि जेना मैथिलीक लेल एेठामक माइटिये उसाह भऽ गेल अछि, जइपर गदपुरनि मात्र उपजि सकैए। मुदा ओहेन उसाह माटिपर “बेटीक अपमान आ छीनरदेवी” लिखि नाटकार बेचन ठाकुर, चनौरागंज, मधुबनी, मैथिली नाट्य जगतमे एकर सफल मंचन कऽ महावीरी झंडा गाड़ि समस्त मैथिली, मैथिल आ मिथिलाक मान-सानकेँ मात्र बढ़ेबे टा नै कलनि अपितु चारि-चाँद लगा देलनि। ऐ लेल ठाकुर जीकेँ समस्त मैथिल भाषी आ नाट्य प्रेमीक तरफसँ हम कोटिश: धन्यैवाद दैत अपार हर्ष महसूस कऽ रहल छी। हमरा विश्वास अछि जे अपने ई दुनू रचना जेकर मंचन अपने अपनहि कोचिंग संस्थानक छात्र-छात्रा लोकनिसँ करा, ई साबित कऽ देलौं जे मिथिलाक माटिमे अखनो ओतेक शक्ति बचल अछि जइपर केसरो उपजि सकैत अछि। नाटककारक नाटकक विषय अति उत्तम छन्हि। वर्त्तमान शताब्दीक सभ मनुख ऐ बातसँ भिज्ञ अछि, सरकारी सर्वेक्षणसँ सेहो स्पष्टत अछि जे दिनानुदिन लिंगानुपात बढ़ि रहल अछि। सभ राज्यक अनुपात थोड़े ऊपर-नीचाँ भऽ सकैए मुदा कियो ऐ बातसँ मुँह नै मोड़ि सकै छथि जे प्रति हजार लड़िका-लड़िकीक बीच एकटा बड़का खाधि बढ़ैत जा रहल अछि, जइ खाधिमे लड़िकीक अनुपात निरंतर नीचाँ मुँहेँ गिड़ैत जा रहल अछि आ हमरा लोकनि कानमे तूर-तेल दऽ निचेनसँ सूतल छी। जौं ई क्रम जारी रहल तँ आगू की हएत से तँ सोचू!! ई एकटा प्रश्नवाचक चिन्ह छोड़बामे नाटककार एकदम सफल रहला अछि। एतबे नै, आजुक वैज्ञानिक युगमे यंत्रादिक सहायतासँ ई जानि जे माइक गर्भमे पलैत बच्चाक, बेटा नै बेटी छी.... िनर्मम हत्या करबामे कनिक्को कलेजा नै कँपैए!! जेकर कोनो कसूर नै ओकरा कुट्टी-कुट्टी काटि खुने-खुनामे कऽ माइक गर्भसँ बहार कऽ दै छिऐ। जइ बेथे ओइ बच्चाक माए पनरह दिन धरि बिछौन धेने रहैत अछि। ऐठाम एकटा गप हम फरिछा कऽ कहि दिअ चाहै छी, ओ बेथा हुनकर ओइ बेटीक प्रतिये नै जेकर ओ हत्या करौलनि अछि, अपितु शारीरिक बेथा छन्हि जइ लेल एत्ते आ एहेन कुकर्म करै छथि। ओइ िनर्दोष बच्चाक माए-बाप दुनू ततबाए दोषी छथि। ओ ई नै बूझि रहल छथि जे जइ बेटीक ओ हत्याए करौलनि जौं ओ बेटी आइ नै रहैत तँ की अपने रहितौं? जौं बेटी नै हएत तँ सृष्टिक रचना संभव अछि? जौं हँ तँ केना वा नै तँ एहेन अपराध कऽ स्वयं किएक एतेक पैघ हत्यारा साबित भऽ रहल छी। रानी झांसी, लक्ष्मीबाई, सावित्री, अहिल्या, सती अनुसुइया, इन्दिरा गांधी, मैडम क्यूरी, मदर टेरेसा..., ईहो सभ तँ बेटीये छलीह। जौं हिनको हत्या पूर्वहिमे कऽ देल गेल रहैत तँ आइ.....। तखन आँखि रहैत एना हम सभ आन्हर किएक? बुइध रहैत मुर्खाहा जकाँ काज किए करै छी? मनुक्ख तँ मनुक्ख छी ने, छागर-पाठी आकि गाए-महिंस तँ नै जे कतौ कोनो.....। तहूमे साढ़े-पारा अधिक भऽ जाए, गाए-महिंस कम, तखन की हएत? जौं हम-अहाँ ई नै सोचबै तँ के सोचताह? ऐ हत्याक पाछाँ एकटा अओर कारण अछि जेकर नाओं थिक दहेज। मुदा उहो तँ हमहीं अहाँ लेबाल आ देबालो छिऐ। अखनो समाजमे आ प्राय: गाम पाछाँ एक-आध गोटे जरूर छथि जे अपन बालकक बिआह एकटा नीक कुल-कनियाँ ताकि आदर्श बिअाह कऽ उदाहरण बनै छथि। ऐ काजक दोषीकेँ सजा नै दऽ िनर्दोषकेँ जानेसँ मारि दुनू परानी ऐ पापक भागीदारी छी। छीह.......। शास्त्रो एकटा बात बतबैत अछि जे “यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमन्ते तत्र देवता।” मुदा ओकर पूजा की करबै, ओइ देवीक संसारमे एबाक अधिकारे छीनि होइए, जे बड़का काज केलौं। जतए समस्त विश्व ऐ समस्यासँ जरि रहल अछि ओतए नाटककार अपना नाटकक माध्यमे एकटा साधारणो लेखक सदृश अपन लेखनीक माध्यमे समाजमे ई संदेश देबामे पूर्णत: सफल छथि जे समए रहैत जौं नै चेतब तँ नाटकक मुख्य पात्र दीपक सदृश हाल हएत। जे अंतमे कनियाँक मुइला पछाति अपनेसँ भात पसाबथि, किएक तँ हुनक कनियाँ बरोबरि गर्भपात करेबाक कारणे शोनितक कमीसँ उड़ीस भऽ मुइलीह। एतबे नै, बेटीक अभावमे नगद गीनि आ तखन पुतोहु घर अनलाह। तखन हुनका कबीर साहैबक ई पाँति मोन पड़ैत छन्हि, “सन्तोक सभ दिन होत एक समाना।” आबो जौं नै चेतब तँ अहिना टाका दऽ बेटी बेसाहऽ पड़त। निरंतर चीज-बौस जकाँ बेटियोक दाम बढ़ैत जाएत, जेकरा किनैत-किनैत अहाँक प्राण निकलि जाएत। किएक तँ अपना समाजमे एकटा नै कएक टा मरूकियाबला अखनो जीविेते अछि, जे चारि लाख एकावन हजार टाका नगद आ सभ सरंजाम संगहि बरिआती ऊपरसँ। चेतु हे मैथिल आबो चेतु। नै तँ आब ओ दिन दूर नै जे गाड़ीपर नाव रहत। आब बेटी अपन अपमान बरदास नै कऽ सकैए। ऐ प्रकारे नाटककार समाजक लेल एकटा पैघ संदेश दऽ रहल छथि जे गर्भपातसँ पैघ कोनो पाप नै होइत अछि। तँए ऐ पापसँ बची आ बेटीक बाप बनी। अहुना बेटा आ बेटी दुनू कोइखिक श्रृंगार होइए। ऐ तरहेँ श्री बेचन ठाकुर जी हमरा लोकनिक नीन तोड़ैमे सफल रहला। जे श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जीक प्रेरणापूर्ण आदर्शवादी व्यक्तिक हाथ हुनका माथपर छन्हि, हम सेहो बिनु मंगने शुभकामना दैत छियनि, रहबनि, जे अहिना नाटक लिखैत रहथु, मंचन करबैत रहथु। धन्यवादक पात्र श्रुति प्रकाशनक श्रीमती नीतू कुमारी आ नागेन्द्र झाजी केँ जे प्रकाशनक समस्त भार उठा कृतज्ञ हेबाक मौका देलखिन। जौं विदेह प्रथम पाक्षिक ई-पत्रिकाक सह सम्पादक उमेश मण्डल एवं सम्पादक गजेन्द्र बाबूकेँ, जिनक अथक सहयोगक प्रसादे प्रकाशनक रास्ता सुगम आ प्रकाशन सफल भेल, तँए नै लिखब-कहब तँ अनुचित। जीवन-मरण जीवन-मरण उपन्यास, एकटा लब्ध प्रतिष्ठित उपन्यासकार श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जीक अनुपम कृति अइ। हुनक लिखल अनेको उपन्यास, जे एक-सँ-बढ़ि-कऽ–एक अछि। जइमे उपन्यासकार द्वारा उठाओल गेल विभिन्न प्रकारक सामाजिक रूढ़िवादिताक ज्वलंत उदाहरण प्रस्तुत कएल गेल अछि। मात्र प्रस्तुतिकरण धरि कथा नै अपितु ओकर सामाधान तकबामे सेहो उपन्यासकार सतत् सफल रहला अछि। प्रस्तुत उपन्यासमे मनुखक जे अपन जिनगी छै, ओकर जे अपन समाज छै, समाजक प्रति व्यक्ति विशेषक उत्तरदायित्व होइत अछि से, आ नवका पीढ़ी जे पश्चिमी सभ्यताक असभ्यतासँ ग्रसित भऽ असभ्य बनि गेला अछि तइपर उपन्यासक आरंम्भमे एकटा कसगर चोट देलनि अछि। देवनन्दन जे बेवसायसँ डाॅक्टर छथि, पत्नी शीला द्वारा जनलनि जे पिताक मृत्यु भऽ गेल तैयो घबरेला नै सोचलनि पिताक अपन समाज छन्हि जइ बीच ओ अपन जिनगी बितौलनि। तँए उचित हएत जे हुनका अपना समाजमे पहुँचा दियनि आ मृत्युक सभ कर्म सामाजेक अनुकूल बढ़ियासँ करी िनर्णए लेलनि। मोबाइलसँ नम्बर निकालि, टिपि अपन जेठ बेटा दयानन्दकेँ जनौलनि- “बच्चा, बाबू मरि गेलाह, तँए दुनू भाँइ गाम आऊ।” मुदा वाह रे पश्चिमी सभ्यता! देखू हमरा लोकनिकेँ केना ग्रसित केने अछि, दयानन्द बाजि उठलाह- “बाबू, ऐ लेल गाम किअए जाएब? आब तँ बिजलीबला शबदाहमे आसानीसँ काज सम्पन्न भऽ जाइत अछि” दयानन्दक विचार सुनि देवनन्दन कहलकनि- “बच्चा, सभ जीव-जन्तुकेँ अपन-अपन जिनगी होइत अछि। आ जे जेहने जिनगीमे जीबैत अछि ओकरा लेल वएह जिनगी आनन्ददायक होइत अछि। जेना, चीनी, मिरचाइ आ करैला तीनूक तीन तरहक स्वाद, मीठ, कड़ू आ तीत होइए। मुदा की मरिचाइक कीड़ा आबि करैलाक कीड़ा चीनीमे जीब सकत? कथमपि नै। जखन की ओ तँ अधलाहसँ नीकमे गेल।” पिताक बात सुनि दयानन्दकेँ आश्चर्य भेलनि, मुदा देवनन्दनक अनुसारे ऐमे आश्चर्य कोन। किएक तँ गामक दोसर नाम समाज सेहो छिऐ। जे शहर-बाजारमे नै अछि। ऐठाम उपन्यासकार समाजकेँ मानव नै मानवक जे मूल सभ्यता छै ओकरा एकैसम सदीक नव पीढ़ी लेल एकटा मिशाल देखौलनि अछि। जे वर्त्तमानमे आजुक पीढ़ी समाजकेँ नै बूझि किदैन बुझै छथिन, ओ बिसरि गेलाह जे समाज की थिक, ओकर मान-मर्यादा कि होइ छै, सामाजिक बन्धन की छी, ओकर कानून-कायदा की छै। आजूक वर्त्तमान आधुनिक समाज जइमे सभ अपने पाछू बेहाल रहैए। ओ केकर सुख-दुख, जीवन-मरणकेँ सुनत। ओ तँ भरिपेट नीक अन्न-तीमन खाएब मात्र जनैए। मुदा तइसँ कि मन थोड़े अस्थिर भऽ सकैए। जाधरि आत्माक संतुष्टि नै हेतैक। बुझेबामे केत्तौ कोनो प्रकारक किन्तु-परन्तु नै राखि, मनुक्ख एकटा सामाजिक प्राणी होइत अछि, ओकर अपन एकटा समाज छै, जइमे सभ एक-दोसराक सुखसँ सुखी आ दुखसँ दुखी होइ छथि, देखेबामे सफल भेलाह। वर्त्तमानमे जन्म जरूर जाति-समाजमे होइ छै, मुदा लगले आँखि-पाँखि भेने हमरालोकनि अपन मूल समाजकेँ भूलि-बिसरि आन समाजमे मिलि हूलि-मािल उठेने रहै छी। केतेक दुखक बात भेल। कला आ संस्कृितसँ दूर तँ स्वभाविक रूपे तँ छिहे ओना हम सभ कतेको नोर मंचपर किएक ने बहा ली। दोसर दिस उपन्यासकार मिथिलानिक एकटा गजब चित्र प्रस्तुत केलनि अछि। मैथिल नारि अपन पतिकेँ परमेश्वर मानै छथि। जिनकेपर हुनका भरि मांग सेनुर आ भरि हाथ चुड़ी रहैत छन्हि। अपना पतिक प्रति कतेक निष्ठा रखै छथि स्पष्ट अछि- “अदौसँ सावित्री, अनुसुर्इया आदि ऐ विषयमे जगविदित छथि। देवनंदनक माए सुभद्रा जिनका चेहरापर सोग नै अपितु सिनेह उमरि रहल छन्हि। मोने-मन आनंदित जे, जहिना हाथ पकड़लनि तहिना पार-घाट लगा देलनि। भड़ल-पुड़ल फुलवाड़ी अछि कतौ हेराएल रहब।” मिथिलानिक महान विचार आ तियागक स्तरकेँ कतेक सुक्ष्म रूपेँ उपन्यासकार रखलनि अछि। तियागक मूर्तिक रूपमे ऐ तरहेँ स्पष्ट अछि जे पतिकेँ मुइला बादो हर्ष छन्हि जे हमरा अछेत मरलाह से नीके भेलनि। अन्यथा मोनमे लागल रहैत जे हुनक शेष दिन केहेन...। सभ पौस-प्राणी गुनधुनमे पड़ल गाम चलल जा रहल छथि। देवनंदन सोचथि, से नै तँ आइ समाजक काज पड़त। समाजक की महत छै। मनुक्ख कोन तरहेँ सामाजिक प्राणी होइए, समाजक बीच बाबूजी केना जीबथि, कतेक परिवारसँ दोस्ती छलनि आ कतेकसँ दुश्मनी, गुनधुनमे पड़ल माएसँ पुछलखिन- “माए, कते परिवारसँ बाबूजी केँ दोस्ती छेलनि।” तखन माएकेँ मोन पड़लनि ओ समाज, जतए सभ मिलि कुमरम, बिआह, सामा, घरक गोसाँइसँ लऽ कऽ दुर्गा स्थानक गीत मोन पड़ए लगलनि। देवनंदनक बात सुनि माए-सुभद्रा बजलीह- “छिया, छिया। मिथिलाक समाज छी। ऐ समाजमे मुर्दा जरबैले, केकरो घरक आँगि मिझबैले, केकरो-साँप-ताप कटने रहल आकि गाछ-ताछपर सँ खसलापर केकरो कियो कहै नै छै। ई सामाजिक काज छी। तँए, अपन काज बूझि सभ अपने तैयार भऽ जाइत अछि।” ऐठाम उपन्यासकार मिथिला आ मैथिल समाजक एकटा विलक्षण उदाहरण द’ अपन सभ्यता आ संस्कृतिक परिचए द’ समाजक समुद्री रूपकेँ दर्शन करौलनि अछि। पूर्वोमे बाढ़ि एलापर करियाकाका आ देवनंदन द्वारा उठाओल गेल कदम आबैबला समाजक लेल एकटा आदर्श उपस्थित केलनि अछि। आखिर दिन बिसेक बाद सभ घूमि अपन-अपन घर आएल रहथि। ओही समाजक एकटा अभिन्न अंग देवनंदनक पिता जे समाजक प्रतिष्ठित व्यक्ति रघुनंदनक लहाश गाम पहुँचते आगू-आगू गाड़ी आ पाछू करमान लागल लोक दियादीमे सबहक चुल्हि मिझाएल। दोसर दिस उपन्यासकार जे मर्द-पुरुखक क्रिया-कलाप, स्त्रीगण सबहक गप-सप तँ एक दिस 111 बर्खक रधिया दादी गाइक गर्दनि जकाँ लटकल चमरी, बाइस गाहीक बर्ख भेल, पूर्वमे रधुनंदनकेँ कतेको दिन दूध पिऔने रहथिन, उपस्थित क’ सामाजिक आ मातृत्व प्रेमक ज्वलंत उदाहरण प्रस्तुत केलनि। जिनका दादी जूरशीतलमे अछिंजलसँ असिरवाद द’ फगुूआमे रँगो खेलाइत छलीह। से सप्तरंगी समाजक इंद्रधनुषी संबंधक एकटा विलक्षण उदाहरण अछि। श्राद्ध-बिआह समाजेक काज होइते अछि। समाज तँ समाजे होइए तहूमे ओहेन समाज जइठाम रघुनंदनकेँ उत्तरे-दछिने सुता उज्जर दप-दप वत्रसँ छाँपि सिरहानामे धूप-गुगुल जरैत अछि। तइ बीच बचनू, चंचन, झोली, बौकू, बतहू देहपर तौनी आ डाँरमे धोती पहिरने कान्हपर कुरहरि नेने संग-मिलि कानी-गाबी आ हँसी ऐ सँ पैघ सुख केकरा कहबै? जइ सुखक लेल लोक नीच-सँ-नीच काज करैए मुदा पाबि नै पबैए। ऐठाम उपन्यासकार भौतिक सुखकेँ सुख नै मानि आत्मिक सुख, अतिइन्द्रिय सुख जइसँ आत्मिक शान्ति भेटैत छै, ओ वास्तविक सुख थिक। तँए मात्र दैहिक सुखकेँ क्षणिक आ आत्मिक सुखकेँ वास्तविक बता अपनाकेँ आध्यात्मिक हेबाक सेहो परिचय द’ समाजोकेँ आध्यात्मिक बातपर चिन्तन-मनन अनुकरणक प्रेरणा देलनि अछि। समाजक समस्त काजक जिम्मा करियाकाकापर छन्हि। समाजक ऊँच-नीच, छोट-पैघ सभ जातिक लोक, जाति-परजाति सभ मिलि रघुकाकाक काजमे पूर्ण सहयोग देबए चाहै छथि चाहे ओ िकर्तनिया हुअए आकि भजनिया, लेलहा हुअए आकि बौका, सुन्दर काका होथि वा छीतन भाय दुनू परानी जे जातिक डोम छथि। जे पूर्वमे गुनापर रघुकाकाकेँ पाँचटा गीत सुनौने छलाह। जीविते छथि छीतन भाय। छितनो भायकेँ बरियातीमे हकार देब नै बिसरब, समाजक जाति-पातिक कुप्रर्थासँ निकालि मनुक्खक जे एकटा अपन समाज होइछ, मनुक्खक जे एकटा जाति होइए जइमे सभ वर्ग आ वर्णक लोक रहैए, वास्तवमे ओ ने समाज छी। ओइ जातिगत भावनासँ ग्रसित समाजकेँ ऊपर मुँहेँ उठा स्वच्छ वातावरणमे शुद्ध साँस लेबाक बाट देखौलनि हेन। जहिना हवा अनेक गैसक मिश्रन छी तहिना तँ समाजो अनेक वर्ग आ वर्णक मिश्रण छी। जौं से नै तँ कियो एक-दोसरक बिना जीब सकत? संभव नै, मुदा से बुझैत लोक अपने स्वार्थमे आन्हर भेल रहैए। आ फल्लंमा डोम तँ फल्लांमा दुसाध ई संस्कार नैन्हियेटा सँ माए-बाप देबामे पाछू नै रहै छथि। आखिर एकटा प्रश्न हमरा तरफसँ, अहाँ प्रबुध समाजक लेल अछि, जौं समाजमे सभ जाति नै रहत तँ की समाजिक जीवन चलि सकत यदि हँ तँ केना? जौं नै तँ फेर एहेन भावना किएक? डोमसँ हम छूबल जाएब, मुदा ओकर बनाओल चीज-बौस गौसाँइ-पितरपर चढ़त तँ की इष्ट-देव नै छुऔत। जौं छुआएत तँ सनातनिये सँ किएक ने..... ? आ जौं देव-पितर नै छुआएत तँ हमरा-अहाँकेँ छुएबाक कोन आधार बनल अछि?? झाँपले परदामे उपन्यासकार जाति-प्रथाकेँ तोड़ि एकटा आदर्शवादी समाज स्थापनापर जोर देलनि। जहिना फुलवाड़ीमे जुही, चमेली फूल रहैत अछि तहिना गेना गुलाब सेहो। अधला नै तँ नीकक महत्ते की? तीत नै तँ मीठक स्वादे की? कारी नै तँ गोरे की? तहिना तँ समाजो एकटा फुलवाड़ी होइ छै। जइमे सभ तरहक लोकक अपन-अपन भूमिका होइ छैक। विचार करबाक थिक जे वैदिक पद्धतिपर चलए बला समाजक चित्र जे जहजहि उपन्यासमे आएल अछि से तँ सहज अछि। मुदा आजुक ओहन समाज जइमे अलगाव अछि। मनुक्ख-मनुक्खमे एतेक अन्तर किएक अछि? प्रश्नक संग इशारामे उत्तर सेहो बतेबामे उपन्यासकार पाछू नै हटलथि। जेकर स्पष्ट उदाहरण रघुकाकाक बरियातीमे छीतन भाय सदृश लोककेँ अपन बाजाक संग भजन करैले चलैक लेल कहि एकटा आदर्श समाजक परिपक्व छाप छोड़लनि अछि। ओतबे नै, एकटा कहावत अछि ‘भेल-गेलपर शिव जगरनाथ’ एहने एकटा व्यक्ति छथि फोंचभाय, पाही जमीनदारक टहलू धड़फराएल आबि छौंकए चाहै छथि ई बाजि- ‘सभ कथुक आरिऔन तँ देखै छी मुदा ससर आ घी कहाँ अछि?’ माने काज भँगठा एवं भरिया देबए चाहलनि। मुदा लेलहा फोंचभायकेँ चौहटैत ई सावित क’ देलकनि जे रघुकाका आ देवभाय सँ हमरो केकरोसँ कम अपेक्षा नै। फोंचभाय कएल काजमे केवल गलतियेटा तकैबला लोक छथि। मुदा हाय रे उपन्यासकार, समस्त उपन्यासमे जीवन थिक तँ मरण असंभावी.., ई खेल चलिते रहैए। अही समाजक बीच लोक जनमो लइए आ मरबो करैए। पैघत्व तँ ऐ बातमे अछि जे जइ समाजमे रघुबाबू सन दाता छलाह आइ ओकरे ऋृण चुकबए खातिर अर्थी उठबैले बुझू जे मािर भ’ रहल अछि। तही बीच लेलहाक मुँहसँ अनायास निकलल जे सुनै जाउ, कान्ही लगा उठबियनु नै तँ दरद हेतनि।’ सभ मानि गेल। एक दिस आंगनसँ लहास उठल आ दोसर दिस सहनाइपर विदाइक धून। आहहा... यएह तँ सुख आ दुखक दुिनयाँ छी। जीवन-मरणक सार्थकता छी। मुदा हमरालोकनि जीवनक एक्के भाग देखै आ जनै छी। जीवन आ मरण सृष्टिक चक्र छी। ऐसँ कियो बाँचल कहाँ। एक िदस करियाकाका आ दोसर दिस सुन्नरकाका रघुभायकेँ अंतिम प्रणाम कऽ डेग आगू बढ़ौलनि। पाछू-पाछू देवनंदनक हाथमे आगि अा कोहा दऽ पाछू-पाछू बरिआती सजि विदा भेल। तइ पाछू करियाकाका रेलगाड़ीक गार्ड जकाँ पाछू-पाछू। गाछी पहुँचि सभ कियो सभ कथुक जोगर अपना-अपना विवेकसँ लगा सिरहौना-पथौना रूपी औछाओनपर सुता एक-एक चेरा चढ़बैत छाती भरि ऊँच कऽ सुन्दरकाका देवक बाँहि पकड़ि धधकैत उक मुँहमे लगा देलकनि। बाँकी सभ काज समाजक निअमानुसार तेरहसँ सत्तर दिन धरि चलैत रहल। समाज तँ समाजक निअम। तही बीच हुलन दुनू परानी, जेकर आधा देह झाँपल आ आधा उघार छल, ओसरक नीच्चेसँ अपन कर्मकेँ धर्म बूझि प्रणाम केलकनि आ मने-मन सोचबो करए जे रघुबाबूक काजमे कत्ते वर्तन लागत। ईम्हर देवबाबू जिनका गाड़ामे उतरी छन्हि हुनकोसँ बेसी चिन्ता करियाकाकाकेँ छन्हि मुदा करियाकाकासँ कम कुसुमलाल पण्डितकेँ कहाँ छै? ओकरा तँ ऐ बातक चिन्ता छै जे श्रधुआ वर्तनक काज तँ दसम-एगारहम दिन हएत, मुदा दहीक लेल? ओतबे नै, रघुनन्दन बाबूक काजक मादे ततबेक चिन्ता राजेसर नौआकेँ सेहो। जेकर काज एक दिस पुजबैक प्रकिया तँ दोसर दििस कर्म सम्पन्न करेबाक। मुदा एतेक सभ किछु होइतौ अपना समाजमे जे पण्डितक किरदानी छन्हि तेकरो बखिया उघारैमे कतौ कमी नै रखला अछि। जे नायकक रूपमे शिवशंकर छथि जे अदौसँ अद्यतन आन-आन श्राध-कर्मक उदाहरण दऽ जजमानक खून उड़िस जकाँ पीबैत रहलाह जेकर साक्षात् उदाहरण सिट्ठी भेल समाज सबहक सोझामे अछि। मनुक्ख विचारसँ पैघ होइत अछि। विचार बदलल। नव पीढ़ीक प्रसादे सुन्दर आ दुधिगर गाए सभ सेहो गाममे आएल। तइ बीच चाहक संग सभ सभ अपन-अपन विचार रखलनि। जइमे सर्वसम्मतिसँ विचार यएह भेल जे पाँच गोटे विचार कऽ डेग उठाउ, (1) श्राद्ध घरवारी आ कर्ताक अनुकूल हुअए। दानस्वरूप मात्र झरखंडी बाछा नै दागल जाए। (1)(2) आन गामक पंच माने भोज खेनिहारसँ परहेज कऽ गामक सभ जातिकेँ खुऔल जाए आन गामक दोस्त–कुटुम-दिआद तँ रहबे करता। (1)ऐ प्रकारे उपन्यासक मादे उपन्यासकार हमरालोकनिक बीच व्याप्त विभिन्न प्रकारक नीक आ अधला प्रथा-रीति-चलनि-मान्यताक बीच विभिन्न प्रकारक लोक सबहक अमुल्य विचार आ ओही समाजक दालि-भातमे मुसलचन्दक उदाहरण दऽ ओकरासँ सावधान केलनि। सृष्टिक जे चक्र छी जीवन-मरण जइसँ कियो बँचि नै सकै छी जेकरा समाज आ कर्त्तकेँ मनोनुकूल कऽ समाजमे रचनात्मक काज करी ऐ लेल एकटा दिशा-िनर्देश देलनि। जेकरा देवनन्दन जी अपने शब्दे स्वीकार कऽ पिताक निम्मिते साले-साल भोजे नै वल्कि यथासाध्य कल्याणकारी काजक प्रेरणा देलनि। पोथी समीक्षा-मौलाइल गाछक फूल जेना लगातार पाँच-सात सालक प्रचंड रौदी भेलाक बाद जौं रोहनि नक्षत्रमे एकटा कसगर अछार हुअए तँ गिरहत सभहक मोन फूलकोका जकाँ खिल उठैत छैक। सभ कियो खेत-पथार जोति, तामि-कोरि, खढ़-पतार सभ बाले-बच्चा मिल ओलि-पालि कऽ देबे सेबे बिहनि खसबैत छैक। गोर दसे दिनक पछाति हरिअरकंच बिहैनक टेम बिरारमे निकलए लगैत अछि। गिरहत सभ पोखरि-झाखरि दिस दिसा-मैदान करैत बॉसक उभ्भीबला दतमनि करैत लोटा नेनहि बिरार दिस चल जाइत छथि। बिरारमे उपजल हरियरकंच बिहैन देख आत्मा जुड़बैत छथि। देखते-देखते बिहैन पैघ भऽ जाइत अछि। गिरहत सभ ऐ आशामे पाँच-सात सालसँ बर्खो नै भेल जौं ऐबेर समए संग देत तँ बाले-बच्चा मिल खूब जतनसँ खेती करब आ ऐ रौदीसँ छुटकारा भेट जाएत। दिन दसे-पनरेहक बाद अारदारा चढ़िते खूब कसगर बर्खा भेल। आ गिरहत सभक आत्मा गूलाबक फूल जकाँ खिल उठल। किनको खुशीक कोनो सिमा नै। सभ बाले-बच्चे लाठी-बहिंगा (पटै), हर-कोदारि, चौकी आदि लऽ खेती करए लेल खेत दिस चललाह। आ कृपा महादेवक जे ऐ साल समए नीक रहल, संग देलक आ मनसंम्फे उपजा भेल। सभ आनंदित छथि। एकटा नव उत्साह आ आनंदक संग दोहाइ दै छथिन परमपिता परमात्माकेँ। ठीक तहिना उपन्यासकार जगदीश प्रसाद मंडल जीक द्वारा लिखल उपन्यास “मौलाइल गाछक फूल”सँ पाप्त भेल खुशी आत्माकेँ तृप्ति कऽ देलक। प्रो. हरिमोहन झा जीक बाद बुझू जे मैथिली साहित्याकासमे बड़का रौदी नै अपितु अकाल पड़ि गेल छल। पाठक-बन्धु हक्कोपरास छलाह, उपन्यास नामक वस्तु पाठककेँ हेरने नै भेटैत छलनि। आत्मा तँ उपन्यास पढ़ए लेल सदिखन व्याकुल रहैत छल। जइ कमीकेँ मण्डलजी दूर कऽ देलनि। लगातार एक-सँ-एक चिक्कन-चूनमुन उपन्यास लिख ने मात्र भारते उपितु आनो-आन देशमे रहएबला मैथिली भाषीक नजरिमे ख्याति पौलन्हि। अपन देशक कथे कोन नेपालक जनकपुरसँ लऽ तराइ क्षेत्रमे सेहो हिनक लिखल पोथी, उपन्यास, कथा संग्रह, कविता संग्रह, नाटक, एकांकी इत्यादि साहित्यक सभ विधा केर पोथी सहजताक संग उपलब्ध अइ। पोथी उपलब्ध सेहो मैथिली साहित्य लेल एक नवीन बात थिक। ओना ऐ लेल हम श्रुति प्रकाशनकेँ अलगसँ धन्यवाद देत छियन्हि। प्रस्तुत उपन्यासमे अपने अपना अनुसारे कतौ कोनो तरहक कोनो तरहक कमी नै रखने छी। अपितु सागरमे गागर भरि समाजक सभ वर्ग, सभ जाति, स्त्री-पुरूष, ऊँच-नीच, छोट-पैघ, नीक-बेजाए, धनीक-गरीब, नेना-भुटका, जवान-जुआनक लेल एकटा अलग संदेस छोड़एमे कतौ कमी नै रखलनि। जे पाठककेँ एक सांसमे उपन्यास पढ़ि जेबाक लेल बाघ्य कऽ दैत अछि। हमरा अनुसारे ई एकटा बड्ड पैघ उपन्यासकारक सार्थकता सिद्ध भऽ रहल अछि। यर्थाथवादी रूपमे गाममे रहितौं उपन्यास पढ़ए काल एहन लगैत अछि जे हम गाम नै अपितु मद्रासमे छी। मुदा मद्रासक चािल-वाणि, रहब-सुतब, लोक सबहक बाजब-भुकब, पैघ-पैघ कोठा-सोफा, अतिआधुनिक पैखाना घर आदि रहलाक बादो अपने अपना गामक माटिक यादि नै बिसरि सकलौं। जे रामाकान्त बाबू अपन गामक सोन्हगर मािटक सुगंधक सिनेहकेँ स्पष्ट करैत कहैत छथि- “हौ जुगे, बिना माटिये हाथ कोना मटियाएब?” उपन्यासक पात्रक नामक अनुसार गुणक विलक्षण समाबेस करब अपने कतौ नै बिसरलौं। नामक अनुसारे कामकेँ अपने स्पष्ट देखौने छी। समाजक जे जेहन लोक जेहन पदपर पदस्थापित छथि। ओइ कार्यक लेल समर्पण उपन्यासक विशेषता बतबैत अछि। ठाम-ठाम अध्यात्म, दर्शन, अपना संस्कृति आदिकेँ दर्शादा देब सभ पाठकक लेल मोन राखक योग्य बुझना गेल। यथा- “ई भूमि जनकक राज मिथिला थिक। तेँ मिथिलावासीकेँ जनकक रास्ता पकड़ि हमरा लोकनिकेँ चलक चाही, जाहिसँ प्रतिष्ठा सभ दिन बरकरार रहत।” ऐ उपन्यासक प्राय: सभ पात्रक चरित्र अति पवित्र, सामजिक समरसतासँ भरल बुझना जाइत अछि। हुनका लोकनिक सहज सज्जनता प्रकृत प्रदत्त बुझाइत अछि। समाज सुधारक जौं कोनो कथा हुअए तँ प्राय: सभ एक-दोसराक प्रति ओतबे जिम्मेवार स्वभावत: बुझना गेल जे एकटा सुसभ्य समाजक सामाजिक चिंतनक प्रति कर्त्तव्यनिष्ठ बुझना जाइत छथि। उपन्यासक केन्द्रीय पात्र रामाकान्त बाबू छथि। जे एकटा नीक जमीनदार होइतो सामाजिक कर्त्तव्यपरायणता, इमानदारी, समाजक सभ जातिक प्रति सिनेह, उदारचित्त विचारधारा, वास्तविक मानवतावादक चित्र, मानवक प्रति कर्त्तव्य ओकर दुख-सुख, मरनी-हरनीमे संग पुरब, हिनक चारित्रिक विशिष्टता स्पष्ट देखबा योग्य अछि। उपन्यासक आरम्भहिंमे जखन कि गाममे अकाल पड़ि जाइत छैक। लोक सभ अन्न बेतरे मरए लगैत अछि। जनकेँ काज कतौ नै भेटैत छै, खेती-खोलाक कतौ थाह-पथाह नै, लोकक घरमे दिनक-दिन चुल्हि नै पजरै छै। इनारोक पानि ससरि ततेक निचाँ चल गेलैक जे उगहनियो सभ छोट भऽ गेलैक। आ एम्हर बौएलालक प्राण भुखसँ छुटै-छुटैपर छल। तेहने दुरूह समैमे रामाकान्त बाबू द्वारा बड़की पोखरि उराहब, समाजक प्रति साहानुभूति हुनक हृदैक महानता देखल जाइत अछि। ऐ तरहेँ एक तँ लोककेँ विभिन्न प्रकारक अकर्मणयतासँ बचा कऽ दोसर दिस, अन्नाभावसँ ग्रस्त लोकक मरबासँ सेहो बचबैत छथि। रमाकान्तबाबूक अवधारणा ई जे ‘सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दु:खभाग भवेत्’क ‘‘अथवा सबए भूमि गोपाल की’’ सपष्ट कऽ दैत अछि। तँए रामाकान्तबाबू सामाजिक समरसता लेल ितयागक मिशाल स्वरूप अपन दू सय विधा जमीन गामक भूमिहीन परिवारक बीच वितरण करबा दैत छथिन। ठीक ओहिना जहिना चीम राजा चेन्पौ कएने रहथि। जइसँ गामक सभ व्यक्ति सुखी भऽ जाइ छथि, आ गाधीवादी विचारधारकेँ आरो मजगूती भेट जाइत अछि। अर्थात् व्यक्तिगत खुशी वा सुख-शांतिसँ एकटा समाज सुखी नै भऽ सकैत अछि। बल्कि सामाजिक सुख-शांतिक लेल व्यक्तिगत सुख-शांतिक तियाग करब मनुष्यक अहम कर्त्तव्य थिक। स्पष्ट अछि। मनुष्य एक समाजिक प्राणी थिक, जे सोनेलाककेँ विपति पड़लापर फुदिया द्वारा कहल गपसँ स्पष्ट होइत अछि। जे “भाय, तोरा जे हमर खूनक काज हेतह, हम सेहो देबह।” स्पष्ट अछि जे समाजमे एहिना सबहक काज सभकेँ होइत छैक। उपन्यासक मध्यमे मण्डलजी गाम-घरमे पसरल धर्मभिरूताक चित्रण करब सेहो नै बिसरलाह। जे सोनेलालक आंगनवालीकेँ बिमारीसँ ठीक भेलापर आयोजित भंडारामे दू साधू दलक द्वारा जे एकटा वैष्णम आ कबीरपंथसँ सोनेलाल कोना लुटल जाइत अछि। उपन्यासकार एहन समस्याक प्रति समाजकेँ सचेत करै छथि। आजुक मशीनक युग हमरा समाजकेँ कोन तरहेँ जोंक जकाँ पकड़ने अछि जे तरे-तर शोणित पीब रहल अछि मुदा पता तक नै चलै छै। ई स्पष्ट करबामे शत-प्रतिशत सफल छथि। कोन तरहेँ खून अपना खूनकेँ चिन्हबामे असमर्थ अछि एकदम स्पष्ट अछि जे महिन्द्रक पुत्र रमेश होस्टलसँ आबि अपन पिताकेँ गोड़ लागि ठकुआ कऽ आगाँमे ठाढ़ भऽ जाइत अछि, बाबा-दादीकेँ नै चिन्हैत अछि। बादमे पिताक कहलापर रमेश तीनू गोटेकेँ गोड़ लगलकनि। ऐ तरहेँ संयुक्त परिवारक महत्व जे मिथिलाक धरोहरि छल। ओकरा एकल परिवार बूझु जे झकझौरि कऽ राखि देलक। जे मानवीय सिनेहक नष्ट होइत स्वरूप थिक। एे प्रकारेँ उपन्यास “मौलाइल गाछक फूल”मे सामाजिक जिनगीक विभिन्न प्रकारक समस्या आ ओकर समुचित समाधान तकबाक पूर्ण प्रयत्न केलनि अछि। “मनुष्यसँ परिवार बनैत अछि आ परिवारसँ समाज। जँ परिवार ठाढ़ भऽ जाए तँ समाज स्वत: आगू बढ़ए लागत।” मण्डलजीक सामाजिक भावना आदर्शवादी भावनाक रूपमे परिलक्षित होइत अछि। जकरा धियानमे रखैत मद्रासमे डाक्टरी करैत डॉ. महेन्द्रकेँ गाममे एकटा स्वास्थ्य केन्द्रक स्थापनाक विचार गामवासीक सेवा लेल देखाओल गेल अछि। उपन्यासमे जाति-पाति, धर्म-सम्प्रादयमे खंिडत भेल गाम-समाजमे छूआ-छूत, ऊँच-नीचक खाधिकेँ रामाकान्तबाबू द्वारा भजुआ डोमक ऐठाम जा कऽ भोजन करब समाजक बीच समरसता स्थापना आ छूआ-छूतक अंत कऽ एकटा आदर्शवादी पूर्ण समाधान देखौलनि अछि। जेकरा अशिक्षासँ उत्पन्न लाइलाज बिमारीकेँ विचार मात्रमे परिवर्त्तन कऽ एकसूत्रमे बन्हबाक प्रयास, वरदान सावित भेल अछि। उपन्यासक समस्त नारी पात्र यथा- रधिया, श्यामा, सुगिया, सोनेलालक बहिन आदिमे पतिपरायणता सुख-दुखमे संग साथ देब। भारतीय नारीक मर्यादा स्पष्ट चित्र उपस्थित करबामे पूर्णत: सफल भेल छथि। सुमित्राक पढ़ि-लिख नीक नर्स बनब आ सुजाताकेँ पढ़ि-लिख नीक डाक्टर बनब, नारीक अबला नै अपितु सबला रूप देखबामे अबैत अछि। एतबे नै, उपन्यासक मादे मण्डलजी स्पष्ट दर्शा देलनि अछि जे गरीबो-गुरबामे ओ क्षमता छै जेकरा जँ कनिको सहयोग भेट जाए तँ ओ बहुत आगाँ बढ़ि सकैत अछि। नारीक एकटा अलग स्वरूप काली-दुगाँ आदि शक्तिक रूप सितिया केर चरित्र देखेबामे सफल रहलाह अछि। जखन आवारा छौड़ा ललबा ओकरा इज्जति लुटए चाहै छै तखन सितिया ललबाकेँ लाते-मुक्के थुरि-थारि कऽ राखि दैत छै। बात ओतइ नै खतम होइछ अपितु जखन ललबाक गौआँ सभ हसेरी बान्हि सितिया गामपर हमला करैत अछि तखन सितिया झांसीक रानी बनि सभकेँ परास्त कऽ दैत छै। ऐ तरहेँ मौलाइल गाछक फूल उपन्यासमे सहजता, समरसता, यथार्थवाद, आदर्शवाद, धर्मभिरूता, एकल एवं संयुक्त परिवारक रूप-रेखा खिंच एकटा मनोवैज्ञानिक विश्लेषण रूपमे उपन्यासकार हमरा लोकनिक मध्य उपस्थित छथि। हुनक ई िवधासँ उपन्यास जगतमे एक्केठाम सभ तरहक सुख, आनंदक अनुभव होइत छन्हि। आजुक समाज जे सभ तरहेँ मौलाएल अछि। अपना उपन्यासक मादे उपन्यासकार मात्र एक आदमी रामाकान्तबाबू हृदए परिवर्त्तन कऽ समाजमे एकटा नवका फूल खिलेबामे सश-प्रतिशत सफल भेला अछि। रामाकान्त बाबू द्वारा अपन दू सए बीघा जमीन- सबहक माथपर एकहक बीघा खेत अर्थात् जेकरा सात गो बेटा ओकरा सात बीघा दऽ सभकेँ एकटा नव जिनगी प्रदान करैत छथि। एक नव जिनगी जे पूर्णत: मौलाएल छल ओइमे फूल खीला दैत छथि। हमरा आशा नै अपितु विश्वास अछि जे श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी सन उपन्यासकार होथि आ रामाकान्तबाबू सन नायक तँ अपन समाज रूपी मौलाएल गाछ मौलाएल नै अपितु डगडगीसँ भल गाछ बनि फूलसँ लदि सकैत अछि। टैगोर साहित्य पुरस्कारक बहन्ने- यात्रा वृत्तान्त तारीख 10/6/2012 दिन रवि, िनरमलीसँ पटना जेबाक हेतु, स्थानिय मिलानपथसँ संध्या 8 बजे सरकारी बस द्वारा गोसाइ-पीतरकेँ सुमरि, आरक्षित जगहपर बैसल। मनमे सदिखन देव-पीतरक यादि, ताकि यात्रा शुभ हुअए। िनर्धारित समैसँ बस खुजल। भुतहा, नरहिया, फुलपरास होइत चनौरागंजमे काका (श्री जगदीश प्रसाद मण्डल) केँ गोर लागि आदरक संग बैसाओल। हुनका छोड़क हेतु बेरमा गामक कतौक लोक जेना कपिलेश्वर राउत, लक्ष्मी दास, शिवकुमार मिश्रा, अखिलेश, सुरेश, मिथिलेश आदि आएल छलन्हि। राति भरि देव-पीतरकेँ सुमरैत तीन बजे भोरमे दुनू बापुत पटना पहुँचलौं। बससँ उतरि पलेटफार्मकेँ गमछासँ झारि बैसलौं। ओंघीसँ आँखि डोका सन-सन आ रंग अरहुल सन। जाकि आँखि मुनलौं आकि काका उठौलन्हि जे उठु-उठु प्रात भऽ गेल। से ने तँ नदी-तदी तरगरे फीर लिअ। फरीच्छ भेलासँ सुलभ शौचालाइयोमे नम्मर लगाबए पड़त। सएह कएल। आँखि मिड़ैत डेग शौचालय दिसि बढ़ौल। बेरी-बेरी दुनू बापुत नदी फिरलौं। गामक बनाओल दतमनि, जेकर अगिला मुँह थकुचल आ पछिला भाग चीरल। मुँहमे दऽ चारिये घुस्सा ऐ कातसँ आेइ कात धरि दऽ कुरूर-आचमनि कऽ आगू बढ़लौं। एम्हर काका अखियासै छलाह जे चाहक दोकान केम्हर छैक। जे पहिने एक-हक गिलास चाह पीब लैतौं तखन जे होइतै से होइतै। गाँधीमैदानक उत्तरवारि कातमे धुआँ होइत देखलिऐ। तखन भरोस भेल। सहटि कऽ लग गेलौं। चुल्हि पजारनहि छल। ब्रेंचपर बैसेत दू गिलास चाहक आग्रह केलौं। समए साफ भऽ गेल रहैक। काका कहलनि जे से नै तँ कोनो टेक्सीबलाकेँ ताबत भाँजि ने लिअ, जे ओ हवाइ अड्डा जाएत जौं जाएत तँ पाइ कत्ते लेत? एकटा मुँहसच्च आदमीकेँ देखि हाक देलिऐ। आबि गछलक। भाड़ा एक साए लेत सेहो कहलक। चाह पीब दुनू बापूत टेक्सीमे बैसलौं, बैसिते विदा भेल। दुनू बापूत अनभ्ाुआरे रही। नै जानि हमरा कहैमे गलती भेल आकि ओकरा सुनैमे। ओ तँ हवाइ अड्डाक बदला मिठापुर बस अड्डा लऽ अनलक। आब तँ भेल तीतम्हा, ओ कहए जे नै सर हमरा तँ अहाँ बस अड्डा कहलौं, हवाइ अड्डा नै। से ने तँ हमरा भाड़ा दिअ आ हम जाएब। कनी काल तँ केनादन लागल, मुदा फेर ओकरे कहलिऐ बरनी जे लेबह से लिहह मुदा हमरा सभकेँ हवाइ अड्डा उतारह। ओ कहलक ओतए जेबइ तँ और एक साए टाका लेब। ऐ तरहेँ दू साए रूपैआमे हवाइ अड्डा पहुँचलौं। हवाइ अड्डामे जइठाम परम सिनेही श्रीमान् गजेन्द्र बाबूसँ साक्षात् दर्शन भेल। नमस्कार पाती भेलाक बाद बहुत बेसी उत्साहक संग हमरा लोकनिकेँ अपना गाड़ीसँ हवाइ अड्डाक भीतर लऽ गेलाह। लऽ जाइत जनौलन्हि जे हवाइ जहाजक यात्राक की केना निअम होइत छैक। गाड़ीसँ उतरलाक बाद गजेन्द्र बाबू हमरा दुनू बापुतक पाँच-सात गोट फोटो खिचलन्हि। हमहूँ हुनक फोटो अपना कैमरामे लेलौं। मोबाइलक घड़ीमे सात बाजि गेल छल। हमरा लोकनि एक-दोसरासँ फराक होबक स्थितिमे आबि.....। गजेन्द्र बाबू अपना बासापर गेलाह आ हम दुनू बापूत अपन-अपन पहिचान पत्र लऽ नीक लोक जकाँ लाइनमे ठाढ़ भऽ गेलौं। जनीजाति जकाँ मोटरी-चोंटरी तँ बेसी छल नै आ ने पंजबिया (पंजाब कमाइबला) जकाँ गरमियो मासमे कम्मलक मोटा। तँए कोनो दिक्कतो नहिये भेल। जाँच-परताल करा लेलाक बाद प्रतीक्षालय जा आरामसँ बैसिलौं। काकाकेँ कने चाहक खगता बूझि आग्रह करैत अपनो सुतारलौं। ओना आदति भलहिं काकाकेँ छन्हि आ से नित्य दू बजे स्वयं बना कऽ पीबक, मुदा हमरा से नै, पहिनहि कहि आएल छी जे भरि रातुक जगरना छल। तँए प्रति कप चालिस टाका देबामे अखरल नै। ऐ तरहेँ किछु कालक पछाति पुन: घोषणा भेल आ फेर दुनू बापूत लाइनमे लागि हवाइ अड्डाक भीतर मैदानमे गेलौं। दुइयो डेग तँ ने होइतै तइले अनेरे एकटा बड़का बस छल। जइपर चढ़ि हवाइ-जहाज लग गेलौं। पहिले भरि मन निगहारि-निगहारि कऽ देखलौं। पुन: अपना देवता-पीतरकेँ सुमरि हवा-जहाजक सीढ़ीपर चढ़ि भीतर गेलौं। मुँहेपर सिलेब रंगक चारिटा बच्चिया नाक-भौह चमका-चमका स्वागतमे हाथ जोड़ि अंग्रेजीमे कहलक- वेल्कम सर। आ भभा कऽ हँसि देलक जेना पढ़ौल सुगा हुअए। हवाइ जहाजमे सीट दुनू बापूतक एक्केठाम छल। सीट हेरि दुनू बापूत पहिने हबा-जहाजक भीतरक वातावरणक अवलोकन कएल। एना लगए जेना भरि जहाजमे बरफ खसि रहल होइ आ तइपरसँ गम-गम से करैत। बाहरमे जत्ते गर्मी भीतर ओतबए ठंढा कनिये कालक बाद मन एकदम्म शान्त भऽ गेल। तेकर बाद दूटा वयस्क बालक आबि अंग्रेजीमे किदैन-कहाँदन कहि हिन्दीमे दोहरौलक। जेकर भाव छल जे हमरा लोकनिसँ आग्रह करैत कहल गेल जे आब ई हाबा-जहाज अपना स्थानसँ ससमए मुम्बइ लेल उड़ान भरत। कुल तीन घंटा तीस मिनटक भीतर अपना स्थानपर पहुँचत। तँए अपने अपने लोकनि अपना-अपना सीटपर राखल बेल्टसँ डाँढ़ बान्हि ली। सएह करइ गेलौं। हवाइ-जहाज गुड़कए लगल। करीब बीघा दसे गुड़कलाक बाद वाया मुँहे घूमि अपन दिशा आ दशा बना बड़ी जोरसँ गुड़कए लगल। गुड़कैत-गुड़कैत एक्केबर हबा-जहाज साफे कऽ धरतीकेँ छोड़ि अकासमे उड़ए लगल। जी तँ सन् रहि गेल। मुदा किछु कालक बाद स्थिर भेल। खिड़कीसँ निच्चाँ तकलौं। आहिरे बल्लैया ई तँ किछु कतौ ने देखिऐ। सौंसे उज्जर-उज्जर बादलेटा। बादलक संग हबा-जहाज उड़ल जा रहल छल। हबा-जहाजक भीतर टेम-टेमपर चाह-जलखै भेटैत रहल मुदा बड़ मगह..। खएर छोड़ू। नअ पाँचमे जे हबा-जहाज खुलल ओ एक-पैंतिसमे मुम्बइ हवाइ-अड्डापर पहुँचलौं। करीब पनरह मिनटक बाद लोक सभ उतरए लगलाह। पाछू-पाछू हमहूँ दुनू बापूत उतरलौं। उतरिते मुम्बइ हवाइ-अड्डा देखि चकबिदोर लगि गेल। सभटा तँ देखलो सुनलो नहिये। काकाक सह पाबि कल्लौ करबाक लेल एकटा होटल पहुँचलौं। भोजन-साजन कऽ पुन: घूमि हवाइ-अड्डापर आबि लाइनमे लागि सामान चेक-चाक करा टीकट लऽ भीतर प्रवेश कएलौं। काकाक चाह पीबाक समए सेहो भऽ गेल रहनि। ई हमरा बूझल छल जे गाममे अपनेसँ बना साढ़े तीन बजेक लबधब पीबै छथिन। जहाज तँ चारि चालिसमे छल। हाथमे एक घंटा समए देखि एक-कप काैफी चारि बीस दस टाकामे किन दुनू बापूत पीबलौं। कनिये कालक पछाति घोषणा भेल पटने जकाँ लाइनमे लागि मुम्बइसँ कोच्चि लेल भीतर जा बैसलौं। बैसिते अपन घरक गोसाइ आ देव-पीतरकेँ सुमरब सहजहि मनमे आबए लगल। पहुलके जकाँ सभ अनुभव करैत कोच्चि पहुँचलौं समए होइत रहै छह चालिस। मोबाइलक सुइच ऑन केलौं होइते एकटा संदेश अाएल जे अंग्रेजीमे छल जेकर मैथिली रहए- हम प्रवीन कुमार सहयोगी मोहित रावत दिल्ली, उज्जर आ नील रंगक कमीज पहिर निकास द्वार लग ठाढ़ छी। हमरा दुनू बापूतकेँ धोती-कुर्ता देखि ओ पुछलनि- “अपने जगदीश प्रसाद मण्डल? हम प्रवीण कुमार। आउ अपनेक लोकनिक गाड़ी ठाढ़ अछि जे होटल छोड़ि देत।” गाड़ीक चालक आगू बढ़ि दुनू बैंग लऽ सम्हारि कऽ रखलनि। दुनू बापूत गाड़ीमे बैसलौं आ गाड़ी आगाँ ससरल। करीब चालिस मिनटक उपरान्त एकटा दस मंजिला मकान पूर्णत: वातानुकुलित, गोकुलम पार्क होटल कोच्चि, लग रूकल। यूनीफार्ममे सजल दरमान होटलक दरबज्जा खोलि ठाढ़ छल। गाड़ीक ड्राइवर बाहरक दरबज्जा खोललक। दुनू बापूत बहर भेलौं। दरमान झुकि कऽ स्वागत केलनि। भीतर गेलौं आकि नजरि एकटा अठारह बर्खक नवयौवना अति विलक्षण स्वभाववाली हिन्दी आ अंग्रेजीमे नीपुण अपन परिचए अंग्रेजीमे देलक। जेकर भाव छल, हम पूर्णिमा सैमसंग कम्पनीक तरफसँ सेवामे ठाढ़ छी। कहू हम अपनेक की मदति कऽ सकैत छी? पूर्णिमाक दुनू हाथ जोड़ब, निच्चा उज्जर तंग जीन्स आ ऊपर सुगापाखि रंगक टीसर्ट, नम्हर-नम्हर कारी भौर केशक किछु लट दहिना कातक छातीपर खसल। तिलकोरक फड़ सनक दुनू ठोर लाल टुहटुह। भरि आँखि काजर। खूब नम्हर-नम्हर हाथ आ पोरगर-पोरगर ओगरी सभ जे कोनो नीक कम्पनीक चमकीबला नहरंगासँ रँगल। दुनू हाथ जोड़ि मूर्ति जकाँ ठाढ़ छल। देखिते मन गद्गद् भऽ गेल। जे एहि वयस्क वालिका एतेक शालीन! हमरा अपनो भाग्यपर गौरव भेल जे धनि हमर मिथिला, धनि हम मैथिल आ धन्य हमर मैथिली। जइ प्रतापे हम दुनू बापूत टैगोर साहित्य पुरस्कार प्राप्त करबाक हेतु मिथिलाक गाम बेरमा, भाया तमुरिया, जिला मधुबनीसँ चलि कोच्चि पहुँचलौं। रिसेप्सनपर उचित आदर-भावोपरान्त रूममे नम्बर चारि साए छह केर कुंजी जे ए.टी.एम कार्ड जकाँ छल। पूर्णिमा हमरा सबहक संग आइ ओइ कुंजीसँ रूम खोलल। संगे ओही कार्ड रूपी कुंजीकेँ एकटा दोसर खोल्हियामे पैसौलक तँ भरि घर इजोत पसरि गेल। दू बेडक रूप। उज्जर धप्-धप् गद्दा-तोसक तकिया आदि अत्याधुनिक छल। सामने टेबुलपर एकटा एल.सी.डी, फोन आ चाह बनेबाक सभ सरमजाम छल। चाहक सरमजान देखिते काका तँ गद्गद् भऽ गेलाह कहलनि- “दुर्गानन्दजी, सभसँ पहिले एकटा चाह पीबू।” सएह कएल। चाह पीबैत टीबी खोलि कने काल देखलौं। तात् पूर्णिमा मन पड़लीह हुनकासँ हमरा एकटा बेगरतो छल। ओ अपन नम्बर देने छलीह डायल केलौं पाँचे मिनटक पछाति भीतर एलीह ओही अदाक संग। आग्रहपर बैसलीह। खगता कहलनियनि जे हमर कैमराक बेटरी डॉन भऽ गेल अछि कने चार्ज होइतए। पूर्णिमा हर्षक संग बेटरी लऽ रातुक भोजनक विषयमे सेहो बता देलनि। आ ई कहैत बाहर जेबाक अनुमति चाहलनि जे हम अही फ्लोरपर रूप नम्बर चारि साए दूमे छी। अपने लोकनिकेँ कोनो खगता हुअए तँ नि:संकोच बजा लेब। हम अहीं सबहक सेवार्थ आएल छी। धन्यवाद कहैत दुनू ठोरकेँ विहँुसबैत पूर्णिमा रूमसँ बाहर भेलीह। लागल एना जेना बिजली चल गेल हुअए आ रूम अन्हार गुज-गुज भऽ गेल हुअए। पछाति थोड़ेकालक, काका मोन पाड़लनि जे भोजनो करबै? हम कहलियनि- निश्तुकी। अपन-अपन कुर्ता पहिर दुनू बापूत भोजनक लेल द्वितीय तलपर पहुँचलौं। एक नजरि घुमा चारू कात देखलौं। अलग-अलग टेबुल आ कुर्सी लागल। सभ टेबुलपर कनिये टा-टा तोलिया, प्लेट, उज्जर धप्-धप् गिलास, पानिक बोतल आ काँटा चम्मच राखल छल। कने काल धरि दुनू बापूत गुमसुम रहलौं। जे पूछि-पूछि परसि-परसि खुआओत। मुदा ओतए तँ अपने-अपने परसि खाइबला हिसाब छल। बड़नी बड़ बेस। एकहक टा प्लेट लऽ दुनू बापूत आगाँ बढ़लौं। जे चीज-बौस चिन्है छेलिऐ ओ एकाधटा टुकड़ी उठा-उठा अपनो प्लेटमे राखी आ कक्कोकेँ दियनि। मुदा जे अनचिन्हार चीज-वौस छल तइमे पूछए पड़ए। सेहो हिन्दीमे नै किएक तँ हिन्दी तँ कियो बुझबे ने करए। मैथिली कथे कोन जे मैथिलो आब टाटा-बाइ-बाइ करैए। तखन पूछि-पाछि अपन-अपन पसिनक सभ सामग्री लऽ भोजन केलौं। भोजनक तँ विन्यासे जुनि पूछू, उत्तर भारतसँ लऽ दक्षिन भारतक सभ किथुक पूर्ण बेवस्था छल। भरि पोख भोजन दऽ दुनू बापूत आगाँ बढ़लौं देखलौं जे एकटा कराहीमे खीर सन किछु खाद्य पदार्थ छलैक। अपना जोगरक लेलौं। खाइते मन गद्गद् भऽ गेल। तत्पश्चात आइसक्रीम लऽ भोजन सम्पन्न करिते रही ताबत् मोहित रावत जी हमरा लोकनिक खोज-पुछाड़ि करैत लग पहुँचलाह। हाल-चाल भेल। आराम करए गेलौं। भीनसर तरगरे उठि नहा धो कऽ तैयार भेलौं। जलपान केलाक बाद दुनू बापूत होटलक निचला तलपर आबि सामाचार पत्र आदि देखि रहल छलौं तखने रेणुका वातरा जी एलीह। सबहक कुशल-छेम जानि आनन्दित भेलीह। एक-दोसरक परिचए-पात भेल। आ हमरा लोकनि ए.जे हाॅलक लेल विदा भेलौं। हॉल देखि मन गद्गद् भऽ गेल। ए.जे.हॉल पूर्णत: वातानुकुलित बैस पैघ हॉल। जइमे हजारक-हजार विद्वान लोकनि बैस सकैत छथि। बेस ऊँचगर मंच। जइपर दहिनासँ चढ़क लेल आ वायसँ उतरक हेतु सीढ़ी बनल छल। कथाकार-साहित्यकार लोकनिक बैसैक बेवस्था, मिडियाबलाक आ आमंत्रित अतिथिक सबहक अलग-अलग बेवस्था छल। दिनक तीन बजे पत्रकार लोकनिक संग भेँटवार्ता छल। एक कात सातो विद्वान, कथाकार, उपन्यासकार आ कवि लोकनि आदिक बैसैक बेवस्था छल जिनका आगाँ नाओं लिखल नेमप्लेट छल। आही दीर्घामे रेणुका वात्रा सेहो बैसलीह। बेराबरी सभ विद्वान लोकनि अपन-अपन पोथीक एक झलक अंग्रेजीमे रखलनि। तकर पछाति काका अपन पोथी संबंधी विचार मातृभाषा मैथिलीमे रखलनि। पूरा कक्ष विभिन्न प्रकारक कैमराक फ्लैशसँ चमकि रहल छल जेना साओन-भादवक बद्रीमे रहि-रहि बिजलोका चमकैत रहैत। विचार रखलाक बाद सभ विद्वान लोकनिसँ विभिन्न प्रकारक प्रश्न लऽ लऽ पत्रकार लोकनि लूझि पड़ला। सौभाग्यसँ हमहुँ विदेह प्रथम ई पाक्षिक पत्रिकाक सह सम्पादकक प्रतिनिधित्व करबाक हेतु उपस्थिति रही। आ पत्रकार लोकनिकेँ मैथिलीसँ हिन्दी आ अंग्रेजीमे भरि पोख संतोष प्रदान कएल। पाँच केम्हर दऽ कऽ बजलै सेहो नै बूझि पेलौं। सभ कियो ए.जे. हॉलक सभाकक्षमे प्रवेश कएल। अपन-अपन स्थान ग्रहण केलौं। आ शुरू भेल टैगोर लिटरेचर अवार्डक कार्यक्रम। ई तेसर पुरस्कार समारोह छल जेकर आयोजन ऐबेर कोच्चिमे भेल रहए। जइमे विभिन्न भाषामे साहित्यक योगदान हेतु सातटा भारतीय भाषाकेँ चुनल गेल, अंग्रेजी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, नेपाली आ सिन्धी रहए। जे पुरस्कृत कएल गेल। कोच्चिक बारह जूनक संध्या सैमसंग इण्डिया आ साहित्य अकादेमी द्वारा साहित्यमे स्वोत्तम योगदानक लेल सातो भाषाक लेखककेँ पुरस्कृत करबाक लेल तैयार छल। जेकर चयन साहित्य अकादेमीक पंच-परमेश्वर द्वारा भेल छल। एक झलक ओइ महान विभूतिक लेल जे क्रमश: ऐ तरहेँ उपस्थिति छलाह- 1. श्री अमिताभ घोष, अंग्रेजी, सी ऑफ पॉपिज, 2. श्रीमती शीलाकोलम्बकर, कोंकणी गैर्र, 3. श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, मैथिली, गामक जिनगी, 4. श्री अॅकिथम अच्युतम् नामबुदरी, मलयालम- अंथिमानाकालम, 5. श्री एन. कुंजमोहन सिंह, मणिपुरी, एना कैंगे केनवा माटे, 6. श्रीमती इंद्रमणि दरनाल, नेपाली, कृष्णा–कृष्णा आ 7म श्री अर्जन हसीद, सिंधी, ना अएना ना। एे कार्यक्रमक मुख्य अतिथि, डॉ. एम. विरापा मोइली, ओ.एन.भी कुरूप, एम.पी. विरेन्द्र कुमार, श्री अग्रहारा कृष्णमूर्ति, सचिव साहित्य अकादेमी दिल्ली आ श्री बी.डी. पार्क प्रेसीडेन्ट एण्ड सी.ई.ओ. साउथ-वेस्ट एसिया, मुख्य कार्यालय एच.क्यू, सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स छलाह। कार्यक्रमक दौरान नोवेल पुरस्कारसँ पुरस्कृत महाकवि रविन्द्रनाथ टैगोर केर संबंधमे अपन-अपन बहुमुल्य विचार रखलनि। कार्यक्रमक उद्-घोषिकाक रूपमे साहित्य एवं कलाक दुनियाँक प्रसिद्ध टी.भी. एंकर, मॉडल रजनी हरिदास द्वारा जबर्दस्त प्रस्तुति सबहक मनकेँ मोहि लेलक। कार्यक्रममे पुरस्कार वितरण हेतु उद्घोषणक पछाति विजेता विद्वान लोकनि मंचासीन होथि आ पुरस्कृत भऽ अपन-अपन स्थानपर आपस आबथि। पुरस्कारक रूपमे गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोरक एकटा बेस किमती मूर्ति, एकटा चिक्कन साल एवं एकानबे हजार रूपैयाक चेक प्रदान कएल गेल। बीच-बीच मिडियाक कैमरा बिजलोका जकाँ लौकैत रहल। पुरस्कार पाबि श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी अपन लिखल पोथी गामक जिनगीक विषयसँ पूर्व पोथी प्रकाशक श्रुति प्रकाशनकेँ धन्यवाद दैत विस्तारसँ मातृभाषामे अपन वानगी प्रस्तुत कऽ मिथिला आ मैथिलीक मर्यादाकेँ बढ़ौलनि। कार्यक्रमक समापन भरत नाट्यमक प्रसिद्ध नरर्तकी, कलाकार पद्मश्री शोभनाचन्द्र कुमार द्वारा भयंकर उत्साहपूर्ण स्तरीय नृत्यक संग भेल। पाँच बजे संध्यासँ दस बजे राति धरि बूझू जे छओ आंगुर घीऐमे छल जकर सफलताक श्रेय सुश्री रूचिका बत्ता, रेणुका भान, सैमसंग इण्डिया, बी.डी.पार्क आदिकेँ छन्हि। जे समस्त कार्यक्रमक दौरान काग चेष्टा आ बकोध्यानम् रूपमे रहला/रहलीह। ऐ सबहक पश्चात हमरा लोकनि होटल आबि स्वरूचि भोजन कऽ आराम केलौं। प्रात: भने चारि बजे भोरमे अभिवादनक संग हाथ हिलबैत गाड़ीमे बैसलौं। मुदा अखनो ओ हमरा मने अछि......। ताबत गाड़ी कोच्चि हवाइ-अड्डाक लेल प्रस्थान कऽ चुकल छल। राति दस-बजैत-बजैत यात्राक सम्पूर्ण आनन्द लैत दुनू बापूत गाम बेरमा-गोधनपुर आबि गेलौं। प्रो. वीणा ठाकुर, अध्यक्ष, मैथिली विभाग, ल.ना.मि.िवश्व विद्यालय दरभंगा। प्राचीन भारतीय संस्कृतिमे मिथिलाक योगदान 1. प्राचीन भारतक इतिहासमे मिथिलाक सांस्कृतिक इतिहास अत्यंत गौरवपूर्ण एवं महिमाशाली रहल अछि। सत्य तँ ई अछि जे मिथिलाक सांस्कृतिक इतिहासक ज्ञान बिना भारतक इति सांस्कृतिक इतिहासक यथार्थ ज्ञान संभव नहि अछि। सुदूर अतीतमे मानव मनीषा आर प्रतिभाक प्रोज्वल प्रकाश एतय विद्दमान छल, धर्म-दर्शन, ज्ञान-विज्ञानक प्रत्येक क्षेत्रमे विश्व विश्रुत ज्ञानी-गुणी जनक जन्मभूमि होएबाक सौभाग्य मिथिलाके प्राप्त छल। धर्म तथा दर्शनक क्षेत्रमे मिथिला नहि मात्र अपन महत्व स्थापित कयलक अपितु ओकर पुष्टि सेहो कयलक तथा तत्कालीन विश्वक चारू-दिशामे ओकर संदेश प्रसारित करैत मानव जातिक कल्याण साधन कयलक। जनक सदृश राजर्षि, याज्ञवल्क्य सदृश ज्ञानी, गार्गी, मैत्रेयी, भारती सदृश विदुषी नारी, जगत-जननी सीताक जन्म स्थली तथा गौतम, कपिल, मंडन मिश्र, वाचस्पति मिश्र, उअदयनाचार्य, गंगेश उपाध्याय, पक्षधर मिश्र, दार्शनिक प्रवर एवं ज्योतिरीश्वर-विद्यापति सदृश कवि तथा विद्वानक जन्म स्थली मिथिला भारतक इतिहासमे अनंत काल धरि अपन उज्वल कीर्त्ति स्थापित कऽ लेने अछि। जाहि प्रकारे प्राचीन युगमे एथेंस युनानि लेल ज्ञान-विज्ञान एवं सभ्यता-संस्कृतिक केन्द्रस्थल छल, तहिना मिथिला सम्पूर्ण भारत वर्ष लेल। 2. प्राचीन संस्कृत वाङ्मयक अवलोकन सँ ज्ञात होइत अछि-जे भू-भाग वर्त्तमानमे बिहार कहल जाइत अछि, ओ प्राचीन कालमे तीन खण्ड राज्यमे वियक्त छल; विदेह, मगध आर अंग। गंगा नदीक दक्षिण-पश्चिममे ‘मगध’ राज्य छल, जकर प्राचीन नाम “कीकट’’ छल आर जे अनार्यक निवास स्थान बुझल जाइत छल। पश्चात् ई प्रदेश मगध नामसँ अभिहित होमय लागल एवं एतुका निवासी के हेय दृष्टिसँ देखल जाइत छल। पाश्चात्य विद्वान वेवर, पार्जिटर आदि विस्तारसँ विचार करैत कहने छथि जे- अनार्थक आगमन एहि ठाम पूर्व दिशसँ बराबर होइत छल आर एहि ठामक निवासी आर्य सभ्यताक अधिपत्य सहजहिं स्वीकार नहि कयलक, ताहि हेतु वैदिक साहित्यमे ई प्रदेश निंदनीय कहल गेल। निरंतरमे कहल गेल अछि- “की कदा नाम देशोऽनार्थ विशेषः” मुदा एहि कीकट प्रदेशमे गया तीर्थ के अत्यंत पवित्र मानल गेल अछि; कीकटेषु गया पुण्या नदी पुण्या पुनः पुनः। च्यवनस्याल्रयं पुण्यं पुण्यं राज गृह वनस”। वौद्धायन धर्मसूत्रमे अंग एवं मगध निवासी संकीर्णयोनि कहल गेल छथि। मुदा वैदिक युगमे बिहारक एकटा भाग एहन छल जे आर्य सभ्यताक केन्द्रक रूपमे प्रसिद्ध छल आर ओ छल विदेह। शतपथ ब्राह्मणक अनुसार विदेह अपन पुरहितक संग सरस्वती नदीक तीरसँ सदानीरा (गंडकी)क तीरपर आयल छलाह आर नदी पार कऽ ओ पूर्व दिशामे अयलाह आर ओतए बसि गेलाह। इयह विदेह कालातंरमे मिथिला आर तीरभुक्ति नामसँ प्रसिद्ध भेल। वाल्मिकि रामायणक बाल-काण्डमे मिथिलाक चर्च करैत कहल गेल अछि; “रामोऽपिपरमा पूजा गौतमस्य महात्मनः। सकाशाद विधिवत् प्राण्य जगाम मिथिलां ततः”। ‘अनर्घ राघव’मे मिथिलाके विदेहक एकटा नगरी कहल गेल अछि; “वत्स! शृणोषि विदेहेषु मिथिलां नाम नगरीम्”। कालिदासक “रघुवंश”, श्री हर्षक “नहिषधीय चरित” तथा जयदेवक “प्रसन्न राघव” नाटकमे सेहो मिथिलाक उल्लेख भेटैत अछि। ‘भृंगदूत’मे “तीरभुक्ति”क उल्लेख मिथिला लेल बुझल गेल अछि। “गंगातीरावधिरधिगता यदभुवो भृङग युक्तिनाम्ना सैव त्रिभुवनतले विश्रुतः तीरभुक्ति:”। 3. विदेह वशंक सभसँ प्रसिद्ध राजा जनक भेलाह, जे बहुत पैघ ब्रह्मज्ञानी छलाह आर राजर्षि जनक नामसँ विख्यात भेलाह। हिनक राज सभा महाज्ञानी ब्राह्मण विद्वानसँ अलंकृत छल आर जाहिमे सर्व प्रधान ऋषि याज्ञवल्क्य छलाह। “शुक्ल यजुर्वेद’क प्रवर्त्तक याज्ञवल्क्य मानल जाइत छथि। आध्यात्म्य विद्याक संगहि वैदिक कर्मकाण्ड निष्णात ज्ञाता याज्ञवल्क्य: ख्याति सम्पूर्ण ब्रह्मावर्त्तमे व्याप्त छल। राजा जनक स्वंय ब्रह्म विधाय ज्ञाता एवं ब्राह्मणक पोषक छलाह। ब्राह्मग्रंथ आर उपनिषदमे जनक तथा याज्ञवल्क्यक आध्यात्म विधा संबन्धी शास्त्रार्थक चर्चा बहुतो प्रसंगमे कयल गेल अछि, मात्र चर्चा नहि अपितु प्रशंसा सेहो कयल गेल अछि। “बृहदारण्यकोपनिषद”क एक कथामे जनक द्वारा आहूत एक सभाक उल्लेख भेल अछि, जाहिमे कुरू-पांचाल आदि प्रदेशक बहुतो वेदक विद्वान पधारल छलाह आर जिनका सभके शास्त्रार्थमे परास्त कऽ याज्ञवल्क्य राज-सम्मान प्राप्त कयने छलाह। एहि सभामे विदुषी गार्गी सेहो उपस्थित छलीह। गार्गी आर याज्ञवल्क्य मध्य शास्त्रार्थक चर्चा “वृहदारण्यकोपनिषद”मे कयल अछि। तथा याज्ञवल्क्य द्वारा अपन पत्नी विदुषी मैत्रेयीकेँ प्रदत्त आध्यात्म्य तत्वक उपदेशक उल्लेख “बृहदारण्यकोपनिषद”मे अछि। बीतरागी, ब्रह्मज्ञानी आर त्यागी राजा जनकक सम्बन्धमे एकटा उक्ति प्रसिद्ध अछि- मिथिलायां प्रदीप्रायां नमे दहनति किञ्चन (सम्पूर्ण मिथिला जौं प्रदग्ध भऽ जाए, तथापि हमर किछु नष्ट नहि होएत)। शुकदेव सदृश सहज वीतरागी एवं परमज्ञानी पिता व्यासदेवक आज्ञासँ राजा जनकसँ त्राणोपदेश प्राप्त कएने छलाह। भगवान कृष्ण गीतामे प्रवृतिमार्गक आदर्श रूपमे जनकक उल्लेख कएने छथि। 4. महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा रचित विख्यात स्मृति ग्रंथ थिक। एहि ग्रंथमे चौदह विद्याक परिगणन एहि प्रकारे कएल गेल अछि – चारि वेद, छह अंग, एक मीमांसा, एक न्याय, एक पुराण आर एक धर्मशास्त्र। सम्पूर्ण वाङ्मयक समावेश एहि चौदह विद्यामे भऽ जाइत अछि, तथा याज्ञवल्क्य स्मृतिक अनुसार हिन्दु सम्पतिक उत्तराधिकार निर्णीत होइत अछि। 5. न्याय दर्शन कर्त्ता महर्षि गौतम मिथिलाक निवासी छलाह, जिनका श्रापसँ हिनक पत्नी अहिल्या पाथरक भऽ गेल छलीह। आर भगवान श्री राम जनकपुर यात्राक मार्गमे चरण स्पर्शसँ हिनक उद्धार कएने छलाह। न्याय शास्त्रक अतिरिक्त गौतम एकटा स्मृतिक रचना सेहो कएने छलाह। 6. विद्वान लोकनिक मतानुसार गौतम रचित ब्रह्म विद्यापर एकटा ग्रंथ छल, जे अनुपलब्ध अछि। वर्त्तमान कालहुँमे गौतम कुंड आर अहिल्या स्थान प्रसिद्ध अछि तथा गौतमक पुत्र शतानन्द राजा जनकक पुरहित छलाह। 7. सांख्य शास्त्रक निर्माता महर्षि कपिलक आश्रय मिथिलामे छल। हिनका द्वारा स्थापित शिवलिंग वर्त्तमानमे कपिलेश्वर नाथ महादेव नामसँ प्रसिद्ध तीर्थ स्थल अछि। 8. आचार्य शंकराचार्यक संग शास्त्रार्थ कएनिहार न्याय आ मीमांसाक अद्वितीय विद्वान मंडन मिश्र सेहो मिथिलाक रत्न छलाह। महिषी गाममे हिनक निवास स्थान छल, जे वर्त्तमानमे सहर्षा जिलामे अवस्थित अछि। हिनक धर्मपत्नी सरस्वतीक साक्षात अवतार विदुषी भारती शंकराचार्य आर मंडन मिश्रक मध्य शास्त्रार्थमे मध्यस्तता कएने छलीह आर मंडनमिश्रक पराजयक पश्चात स्वंय शंकराचार्यकेँ शास्त्रार्थमे पराजित कएने छलीह। कहल जाइत अछि जे मडंन मिश्रक गृहक पता शंकराचार्यसँ पूछबाक क्रममे एकटा पनिभरनी हुनका उत्तर दैत कहने छलनि जे “जगद् ध्रुवं स्याजगद् ध्रुवं आ कीड़ाङ्गना यत्र गिरो गिरंति। द्वारस्थ पीड़ाङ्गणसन्निरन्धो जानोहि तन्मण्डन मिश्र धाय”। ई प्रमाणित करैत अछि जे ओहि कालमे मिथिलामे संस्कृत विद्याक पूर्ण प्रचार छल तथा साधारण स्त्री सेहो सुशिक्षित छलीह। 9. मिथिला निवासी वाचस्पति मिश्र षददर्शनक अतिरिक्त समस्त शास्त्रक विद्वान छलाह। ब्रह्मसूत्र शंकर भाष्यपर हिनक “भामती टीका अत्यंत प्रसिद्ध अछि। वेदांतक ई एकटा प्रमाणिक ग्रंथ मानल जाइत अछि। हिनक रचित अन्य ग्रंथ अछि। ब्रह्म तत्व समीक्षा, न्याय कणिका, सांख्य तत्व कौमुदी, न्याय वर्त्तिक तात्पर्य आ योगदर्शन, ई हिनक विद्या-वेदध्यक परिचायक अछि। एकर काल एगारहम शताब्दी (सवंत) मानल जाइत अछि। 10. मिथिलाक न्याय शास्त्रक प्रसिद्ध पण्डित उदयनाचार्य रचित बहुतो ग्रंथ यथा – कुसुमाञ्जलि, किरणावली, लक्षणावली, न्यायपरिशिष्ट, आत्मतत्व विवेक आदि। स्वाभिमानी पण्डित उदयनाचार्यक ई गर्दौति, एखनहु प्रसिद्ध अछि - 11. ”वयमिह पदविद्यां तर्कमान्वीक्षिको आ। 12. यदि पथि विपथे आ वर्त्तयामस्स पन्था॥ 13. उदयति दिशि यस्यां भानुमान् सैव पूर्वा। 14. नहि तरणिरन्दीते दिक् पराधीन वृत्ति:”॥ 15. मिथिलाक अन्य प्राचीन दार्शनिकमे गंगेश उपाध्याय आ पक्षधर मिश्रक नाम विशेष रूपसँ उल्लेखनीय अछि। गंगेश उपाध्याय न्याय शास्त्रक अप्रतिम विद्वान छलाह आ खाद्य खडंन मतक खडंन अत्यंत विद्वतासँ कएने छलाह आ हिनक रचित प्रसिद्ध ग्रंथ थिक “तत्व चिंतामणि”। 16. पक्षधर मिश्रक सम्बन्धमे प्रचलित श्लोक-–“शंकर वाचस्पत्योः शंकरवाचस्पती सदृशौ। पक्षधर प्रतिपक्षी लक्षीभूतो नचय्वापि”॥ हिनक विद्वताकेँ प्रमाणित करैत अछि। विद्यापतिक समकालीन पक्षधर मिश्र “तत्व चिंतामणि” ग्रंथक “आलोक” नामक टीका रचना कयलनि संगहि “प्रसन्न राघव” आर “चन्द्रालोक” ग्रंथक सेहो रचना कयलनि।बंगालसँ बहुतो छात्र न्यायशास्त्रक अध्ययन करवा हेतु हिनका सँ अबैत छलाह तथा हिनक बंगाली शिष्य रघुनन्दन नवद्वीपमे न्यायशास्त्रक पठन-पाठन आ प्रचार कयलनि आर पक्षधर मिश्र द्वारा प्रवर्त्तित नव्यन्यायक परम्पराकेँ आँगा बढ़ौलनि। 17. मिथिलावासी गोवर्द्धनाचार्य उदयनाचार्यक शिष्य आ ‘आर्यासप्तशती’क रचयिता छलाह। दर्शनशास्त्रक पण्डितक संगहि कवि सेहो छलाह, जकर प्रमाण उक्त ग्रंथ थिक। 18. भवनाथ मिश्र आ हिनक सुपुत्र शंकर मिश्र दुनू प्रकाण्ड पण्डित छलाह। भवनाथ मिश्र महान पण्डितक संगहि सर्वथा निस्पृह छलाह, कहियो ककरहुँसँ कोनो याचना नहि कयलनि, ताहि हेतु हिनक नाम अयाची मिश्र पड़ि गेल। हिनक पुत्र शंकर मिश्रक ख्याति सम्पूर्ण मिथिलामे एकटा अलौकिक योग्यता सम्पन्न बालक रूपमे ख्यात भऽ गेल। मात्र पाँच वर्षक अवस्थामे हिनक इ महाराज दरभंगाक समक्ष निम्न श्लोक पढ़ि कऽ सुनौने छलाह- 19. ”वालोऽहं जगदान्द नमे वाला सरस्वती। 20. अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्यायम”॥ 21. (हम बालक छी, एखन पाँच वर्षक अवस्था सेहो पूर्ण नहि भेल अछि। मुदा हमर सरस्वती अर्थात् विद्या वला नहि छथि। तीनू लोकक हम वर्णन कऽ सकैत छी।) 22. ”अनर्थराघव” नाटकक रचयिता दार्शनिक प्रवर मुरारि मिश्र मिथिलाक निवासी छलाह आ साहित्यशास्त्रक ज्ञाता छलाह। बहुतो ग्रंथक रचयिता महान दार्शनिक वर्द्धमान उपाध्याय सेहो मिथिला निवासी महान विभूति छलाह। 23. महामहोपाध्याय महेश ठाकुर अपन विद्वताक बलपर सम्राट अकबरसँ मिथिला राज्य प्राप्त कयने छलाह। व्याकरण आ न्यायशास्त्रक श्रेष्ठ विद्वान महेश ठाकुर दरभंगा राजवंशक संस्थापक सेहो छलाह। महाराज शिवसिंहक मित्र आ राजपण्डित कवि कोकिल विद्यापति नहि मात्र मैथिली भाषाक सर्वश्रेष्ठ कवि छलाह अपितु हिनक गीत द्वारा विभिन्न भारतीय भाषा अनुप्राणित भेल आर बंगाल, आसाम, उड़ीसामे हिनक गीतक अनुकरणसँ एक नव भाषा साहित्यक उदय भेल जकरा व्रजवुलिक संज्ञा देल गेल। 24. एहि प्रकारे प्राचीन कालहिसँ मिथिला धर्म, दर्शन आ विभिन्न शास्त्रक केन्द्रस्थली रूपमे विख्यात रहल अछि। वेद, वेदांत, न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र, ज्योतिष, व्याकरण, साहित्य, कर्मकाण्ड कोनो एहन विद्या नहि अछि, जकर विश्व-विख्यात पण्डित एतय नहि भेलाह। मात्र प्राचीन आ मध्ययुगमे नहि अपितु वर्त्तमान कालमे अर्थात् बीसम शताब्दीमे सेहो एहि भूमिकेँ महामहोपाध्याय मीमांसक चित्रधर मिश्र, सर्वतंत्र-स्वतंत्र बच्चा झा, विद्या-वाचस्पति विश्व विख्यात वेदज्ञ मधुसुदन झा, महामहोपाध्याय वैयाकरण केसरी परमेश्वर झा, महामहोपाध्याय जयदेव मिश्र, महावैयाकरण विश्वनाथ झा, महामहोपाध्याय सर गंगानाथ झा, ज्योतिषी बबुआजी मिश्र, विख्यात विद्वान त्रिलोकनाथ मिश्र सदृश विख्यात विद्वान आ साहित्यमर्मज्ञक जन्म देबाक सौभाग्य प्राप्त अछि। एहिमे बच्चा झा अपना समयक दर्शनशास्त्रक अद्वितीय पण्डित छलाह आर दर्शन आ साहित्य विषयपर उच्च कोटिक रचना कयलनि। वैदिक साहित्यक प्रकाण्ड पण्डित मधुसूदन झाक ख्याति देश-विदेशमे विख्यात छलनि। काव्य आ काव्यशास्त्र आर श्रृंगारक क्षेत्रमे सेहो एतय “प्रसन्न राघव”, “अनर्थराघव”, “काव्यप्रदीप”, “रसमंजरी” “रसिक सर्वस्व” आर संगीत शास्त्र सबन्धी ग्रंथ “संगीत सर्वस्व” आ “सरस्वती छद्यलंकार”क रचना भेल। आधुनिक भारतीय आर्यभाषामे सर्वप्रथम गद्य ग्रंथ होयबाक गौरव मिथिला निवासी ज्योतिरिश्वर रचित “वर्णरत्नाकर”केँ प्राप्त अछि। 25. आ एवम् प्रकारे स्वतः सिद्ध अछि जे विश्वव्यापी भारतीय संस्कृतिक केन्द्र स्थल मिथिला रहल अछि, आर मिथिला चिरकालहिसँ अपन महत्वपूर्ण भूमिकाक निर्वाह धर्म, साहित्य, दर्शन आ न्यायक क्षेत्रमे करैत रहल अछि। गोनू झा आ आन मैथिली चित्रकथा प्रीति ठाकुर रचित “गोनू झा आ आन मैथिली चित्रकथा” पढ़बाक आ देखबाक सुयोग भेल। देखबाक ऐ लेल जे ई पोथी चित्रकथा थिक अर्थात चित्रक माध्यमे संकलित सोलह कथाक चित्रण लेखिका कएने छथि। सोलह कथामे नौ कथाक नायक छथि गोनू झा आ शेषमे रेशमा चूहड़मल, नैका-बनिजारा, भगता ज्योति पँजियार, महुआ घटवारिन, राजा सलहेस, छेछन महराज आ कालिदास। सभ पात्र मिथिलाक संस्कृतिक प्रतिनिधित्व करैत। वस्तुतः संस्कृति शब्द अत्यन्त व्यापक अछि, दोसर शब्दमे कहल जा सकैत अछि जे एहन व्यवहार जे परम्परासँ प्राप्त होइत अछि, संस्कृति कहबैत अछि। एकरा सामाजिक प्रथाक पर्याय सेहो कहल जा सकैत अछि। प्रेम, त्याग, दया, करुणा, सहानुभूति आदि समस्त गुण संस्कृतिक अन्तर्गत समाहित होइत अछि। संगहि कलाक उद्देश्य जौँ सौन्दर्यक अनुसंधान एवं रसानुभूति होइत अछि तँ कलाक संबंध लोक संस्कृतिसँ रहब आवश्यक भऽ जाइत अछि। गोनू झाक कथा मिथिलाक घर-घरमे जनकण्ठमे व्याप्त अछि प्रायः प्रत्येक मिथिला निवासी अपन बुजुर्गसँ गोनू झाक कथा सुनने होएत आ पश्चात अपन बाल-बच्चा संगी-साथीकेँ सुनौने होएत। तहिना नैका बनिजारा, सलहेस, छेछन महराज, भगता ज्योति पँजियार- अपन शर्य, वीरता, पराक्रम आ उदात्त व्यक्तित्वक कारणेँ कहियो जौँ लोकनायक छलाह तँ पाछाँ लोकदेवता रूपमे पूजित होमए लगलाह। तहिना कालिदास अपना विद्वता एवं पाण्डित्यसँ भारतीय संस्कृतिमे अपन महत्वपूर्ण स्थान निर्धारित कऽ लेने छथि। महुआ घटवारिनक आदर्श प्रेम कथाएहुठाँ आदर्श रूपमे चित्रित होइत अमर भऽ गेल अछि। पोथीमे संकलित प्रत्येक पात्र एवं कथा मिथिलाक संस्कृतिक प्रतिनिधित्व कऽ रहल अछि। संस्कृति लोक जीवनसँ सम्बद्ध रहैत अछि। समाज आ संस्कृतिमे अभिन्न सम्बन्ध अछि किएक तँ संस्कृतिक निर्माण काल सापेक्ष होइत अछि, जेना समाजमे नीक कृत्यक अनुकरण होइत अछि। किछु अवधि पश्चात ओ समाजक प्रकृति भऽ जाइत अछि। कालान्तरमे ईएह प्रकृति संस्कृतिक रूप धारण कऽ लैत अछि। एवं प्रकारे कृति, प्रकृति आ संस्कृतिक क्रम चलैत रहैत अछि। ईएह कारण अछि जे संस्कृतिक निर्माण आ विनाशमे समय लगैत अछि जखनकि सभ्यतामे परिवर्तन क्रम समयमे होइत अछि। पोथीमे संकलित प्रत्येक पात्र अपन-अपन समयक प्रतिनिधित्व करैत मिथिलाक संस्कृतिक प्रतीक छथि। कलाकार, लेखिका प्रीति ठाकुरजी रेखा आ रंगक माध्यमसँ चित्रकथाक रचना कएने छथि। प्रत्येक चित्र किछु संकेतकेँ प्रकट कऽ रहल अछि। अकारण वा अनायास किछु नै बनाओल जा सकैत अछि। प्रत्येक चित्र तथ्यात्मक अछि, प्रत्येक रेखा एकटा कथाक निर्माण कऽ रहल अछि । मिथिलाक जन-जीवनक अभिव्यक्ति ऐ चित्र कथाक माध्यमसँ भेल अछि। वस्तुतः लोक चित्र कला तत्कालीन लोक जीवनक चित्रण करैत अछि जेना लोकगीत, लोकनृत्य, लोकभाषा आदिमाध्यमसँ तत्कालीन समाजक स्वरूपक ज्ञान होइत अछि। फूलक सुगंध सदृश संस्कृति अलक्ष्य होइत अछि मुदा वातावरणकेँ अपन सौरभसँ सतत सुवासित करैत रहैत अछि। ई आन्तरिक गुण थिक जकर मात्र अनुभव कएल जा सकैत अछि। एकर स्थान हृदयमे रहैत अछि, बाह्य आचरण ओकर मात्र प्रतिफल थिक। ऐ संस्कृतिक अभिव्यक्तिक माध्यम कला होइत अछि जेना नृत्य कला, संगीत कला, चित्र कला। चित्रकला मूक होइत अछि जकर भाषा रंग आ रेखा चित्र होइत अछि।कलाकार प्रीति ठाकुरजी मिथिलाक ऐ संस्कृतिकेँ नै मात्र रंग रेखाक माध्यमसँ चित्रित कएने छथि अपितु शब्दक माध्यमसँ चित्रित करैत अपन कलाकृतिक सौन्दर्य द्विगुणित कऽ लेने छथि। वस्तुतः हिनक ई प्रयास सर्वथा प्रशंसनीय छन्हि। कला मानव संस्कृतिक उपज थिक, कला आ मनुष्यक सम्बन्ध अविभाज्य अछि। मानव द्वारा कलाक प्रतिष्ठा भेल अछि आ कला द्वारा मानव आत्मगौरव आ आत्मचैतन्य प्राप्त कएने अछि। कलाक माध्यमे सँ मानव जीवनमे माधुर्य आ सौन्दर्यशीलताक जन्म भेल आ कर्म मधुर आ सुन्दर बनि गेल। वस्तुतः सौन्दर्यक मूलभूत प्रेरणा कलाक उद्घम स्थल थिक आ सौन्दर्याभिरुचिक प्रमाण। मनुष्यक अनुकरण प्रवृत्ति थिक। आदियेकालसँ प्राकृतिक दृश्य मानव मोनकेँ आनन्दित करैत रहल आ ऐ दृश्यक निर्माण करबाक इच्छा मोनमे जागृत भेल आ ईएह इच्छा जन्मक प्रेरक भेल। प्रीति ठाकुर जीक आत्मगौरव एवं आत्मचैतन्य ऐ चित्र कथाक रचना लेल प्रेरक भेलनि, आत्मगौरव मिथिलाक संस्कृतिक प्रति एवं आत्मचैतन्य सौन्दर्यशीलताक कारणेँ आ जकर प्रतिफल भेल विभिन्न कालक मिथिलाक लोकनायकक चित्रकथाक माध्यमसँ निरूपण करबाक। प्रिन्ट मीडिया आ इलेक्ट्रानिक मीडियाक कारणेँ जखन सम्पूर्ण विश्वक ग्लोबलाइजेशन भऽ गेल अछि, मिथिलाक चित्रकलामे अन्य कलाक विधा सदृश सेहो पारम्परिक स्वरूपमे परिवर्तन भेल अछि। परिवर्तनेक दोसर नाम तँ विकास थिक। लेखिका मिथिला चित्रकलाक पारम्परिक स्वरूपमे परिवर्तन तँ कएने छथि मुदा लोक चित्रकथाक माध्यमसँ एकर सार्थकता आ प्रासंगिकतामे सफल भेल छथि। किएक तँ मिथिलाक चित्रकला मूल्यग्राही अथवा कोमल हृदय कलाकारक मात्र हॉबी थिक अपितु परम्परावद्ध समाजक एकटा अभिन्न जीवन-दर्शन थिक, संगहि मैथिल संस्कृतिक जीवनक एक अविच्छिन्न अंग सेहो। समाजक परिवर्तनक प्रभाव कला आ साहित्यपर पड़ब स्वाभाविक अछि संगहि कला आ साहित्य समाजक प्रतिबिम्ब सेहो थिक। वस्तुतः साहित्य युगक प्रवृत्ति एवं प्रयोजनक उपेक्षा नै कऽ सकैत अछि। कला जीवनसँ निरपेक्ष नै रहि सकैत अछि कारण एकर आधार मानव जीवन थिक। एकर पोषण जीवनसँ होइत छैक, एकर प्रभाव मानव जीवनपर पड़ैत छैक, तेँ कलाकार जीवनक प्रति अपन उत्तरदायित्वक उपेक्षा नै कऽ सकैत अछि। आ ईएह कारण अछि जे कलाक स्वरूपमे परिवर्तन होइत रहैत अछि। ऐ वैश्विक प्रतियोगिताक युगमे मिथिलाक चित्रकला जइमे मात्र कोहबर, डाला, अष्टदल, अरिपन, मंडप, वेदी आदिक चित्र निर्माणक परिधिमे ओझरायल अछि, आवश्यक अछि जे मिथिला चित्रकलाक विषयवस्तुमे विस्तार कएल जाए। लेखिकाक ई सर्वथा नूतन प्रयास छन्हि। प्रीति ठाकुरजी परम्परागत विषय वस्तुसँ आगाँ बढ़ि मिथिलाक लोककथाकेँ चित्रकथाक माध्यमे चित्रित करैत मैथिली साहित्य मध्य सर्वथा नूतन शैलीक रचना कएलनि अछि। निश्चित रूपसँ मैथिली साहित्यक भंडारमे श्रीवृद्धि तँ भेल अछिये, ई नव शैली, नव विषय वस्तु एक शब्दमे नव स्टाइल सर्वथा प्रशंसनीय अछि। समय परिवर्तनशील होइत अछि, ऐ बदलैत समयक संग जे अपनामे परिवर्तन नै आनैत अछि से विकासक धारासँ बाहर भऽ जाइत अछि। तेँ समयक यथार्थक चित्रण कलाक माध्यमसँ होएब आवश्यक अछि, तखने कला अपन प्रासंगिकता सिद्ध कऽ सकैत अछि। वर्तमान बदलैत आधुनिक समाजक आवश्यकताक अनुरूप लेखिका ऐ पोथीक रचना कएलनि, ई प्रासंगिक तँ अछिये संगहि लोकोपयोगी सेहो अछि। संगहि एकटा तथ्य आर महत्वपूर्ण अछि। मैथिली लोक साहित्यक संरक्षिका मिथिलाक महिला लोकनि छथि, किएक तँ हिनकहि कण्ठमे लोकगीत आ लोकनृत्य आ हिनकहिं हाथे लोकचित्रकला जीवित अछि। त्याग आ तपस्यासँ युक्त हिनका लोकनिक सांस्कृतिक चेतनासँ लोककला जीवित अछि तथा हिनकहि लोकनिक कोमल तूलिकाक प्रसादात मिथिलाक चित्रकला जीवित, संरक्षित एवं विकसित भऽ रहल अछि। आ ई पोथी “गोनू झा आ आन मैथिली चित्रकथा”क रचयिता सेहो महिला छथि। ई सर्वथा स्तुत्य थिक। जिनगीक जीत उपन्यासक समीक्षा श्री जगदीश प्रसाद मंडलक उपन्यास ‘जिनगीक जीत’ पढ़वाक अवसर भेटल। उपन्यास पढ़ि बुझाएल जे ई उपन्यास तँ वास्तवमे मिथिलाक संस्कृतिक जीत थिक, जीवनक जीत थिक, संस्कारक जीत थिक। जौं एक शब्दमे कहल जाए तँ यएह कहल जा सकैत अछि जे ई ‘लोक’क जीत थिक। जखनहि लोकक जीत थिक तँ स्वभाविक अछि जे एहि उपन्यासक मध्य लोक साहित्यक सुगन्ध चतुर्दिक पसरल हएत। उपन्यासक कथा मिथिलाक एकटा गाम कल्याणपुरक थिक, जतए जीविकाक मुख्य साधन थिक कृषि, जतए आधुनिक वैज्ञानिक युगक प्रकाश नहि पहुँचल अछि। जतए उच्चतम शिक्षाक लक्ष्य थिक बी.ए. पास करब आओर जतए एकैसम शताब्दी एखन धरि नहि आएल अछि आओर नहि आएल अछि शाइनिंग इंडियाक प्रकाश। उपन्यासकार प्रमुख पात्र छथि नायक बचेलाल, नायिका रूमा, मुख्य पात्र छथि बचेलालक माए सुमित्रा, अछेलाल, अछेलालक पत्नी मखनी इत्यादि। कथा अछि बचेलालक द्वन्द्व एवं द्वन्द्वसँ उपजल अवसादक एवं जीवन संघर्षक, सुमित्राक मिथिलाक नारीक गरिमाक अछेलालक कर्त्तव्य निष्ठताक, संगहि मानवीय संघर्षक, द्वन्द्वक आओर भविष्यक आशा-आकांक्षाक। नायकक मानसिक द्वन्द्व जौं जीवनक सार्थकता लेल अछि तँ नायकक माए सुमिताक दृष्टि स्पष्ट मानवीय गरिमासँ युक्त अछि। नायकसँ एक डेग आगाँ बढ़ि द्वन्द्वसँ मुक्तिक वाद देखबैत प्रकाश पुंज मध्य अछि। नायकक पत्नी रूमाक चरित्रपर प्रकाश नहि देल गेल अछि, ताहि कारणे रूमा उपन्यास मध्य गौण पात्र भऽ गेल छथि। कोनहुँ समाजक जातीय मनीषा, सामुदायिक चेतना, जातीय बोध मानवीय मूल्य आओर जीवन दर्शनक विविध पक्षमे अवगत होएवा लेल ओकर लोककेँ बुझब आवश्यक। उपन्यासकार एहि उपन्यास मध्य अत्यन्त इमानदारी पूर्वक अपन समाज, मिथिलाक समाज, रहन-सहन, आशा-आकांक्षा एवं समयक सत्य लिखने छथि। समाजक निम्न वगर्क, कृषक वर्गक जीवनक चित्रण अत्यन्त इमानदारी पूर्वक कएने छथि। उपन्यासकार मिथिलाक वास्तविक चित्रण करवामे सफल भेल छथि, मिथिलाक तात्कालीन दशाक चित्रण कएने छथि तँ मात्र और मात्र अपन भाषा, देश एवं सामािजक दायित्व समाजक प्रति प्रेम एवं प्रतिबद्धताक कारणे हिनकासँ ई उपन्यास लिखवा लेने अछि। यद्यपि कथाक प्रवाह अवरूद्ध अछि तथापि कथा अपन अंकमे देश-समाज, मानव, प्रकृति, संस्कृति, विकृति आदिकेँ समेटि अपन लक्ष्यपर पहुँचवामे सफल भऽ गेल छथि। हिनक उपन्यासमे हिनक व्यक्तित्व पाठकक समक्ष स्पष्ट प्रतीत भेल अछि। जीवन दर्शन आओर आध्यात्मसँ लऽ कऽ मनुष्यक समस्त राग-विराग ‘लोक’मे विद्यमान अछि। मिथिलाक लोक संस्कृति संवाहक उपन्यास ‘जिनगीक जीत’मे उपन्यासकार जीवनक ओहि सत्यकेँ आत्मसात् करबाक प्रयास कएने छथि जाहिमे जीवनक समस्त ‘सार’ नुकाएल अछि। उपन्यासक मध्यमे उपन्यासकार मनुष्य जीवनक समस्त राग-विराग, आशा-आकांक्षा, दीनता-हीनता, उत्कर्ष-अपकर्षक चित्रित करैत वस्तुत: जीवनक शाश्वत तथ्य- जीवाक इच्छाकेँ उजागर करवामे सफल भेल छथि। वस्तुत: ई उपन्यास ई उपन्यास भाषा अथवा वोलीमे जातीय स्मृतिक आ साहित्यिक रूप थिक जे हमर जातीय चेतना अथवा जातीय वोधकेँ सुरक्षित राखने अछि। मिथिलाक सूच्चा चित्र अंकित करैत उपन्यासकार अपन जीवनानुभवसँ संचित कएल ‘सार’ आओर ‘सत्य’केँ अभिव्यक्त कएने छथि। वस्तुत: ई उपन्यास मिथिलाक संस्कृतिक प्रतीक थिक आओर एकर सार थिक शाश्वत। उपन्यास मध्य प्रकृति, परिवेश, आध्यात्म, समरसता आओर समन्वयक छवि आओर छटा सर्वत्र दृष्टिगोचर होइत अछि। वर्तमान साहित्यमे ई प्रवृति प्रमुख अछि- एक समाजोन्मुख दोसर व्यक्ति निष्ठा तथा आत्म केन्द्रित। उपन्यासकारक प्रवृति समाजोन्मुख अछि। सम्पूर्ण उपन्यास मध्य मिथिलाक गामक लोकक रहन-सहन, अचार-विचारक चित्रण एतेक सजीव अछि जे पाठककेँ ओहि लोकमे लऽ जाइत अछि, जिनका गाम छुटि गेल छन्हि। उपन्यास मध्य मिथिलाक समाजक चित्र एतेक वास्तविक रूपमे चित्रित्र भेल अछि जे मिथिलाक मािट-पानिक सुगन्धसँ पाठकक हृदय सहजहि आहलादित भऽ जाइत अछि। वर्तमान समएमे गामक लोकक पलायन शहर दिशि भऽ गेल अछि, गाम पाछाँ छूटल जा रहल अछि। मुदा पाठक उपन्यास पढ़ि पुन: गाम घुिर जाइत अछि, गामक स्मृतिसँ पाठक बान्हल रहि जाइत अछि। सामाजिक प्रश्नक प्रती सजग उपन्यासकार अपन एहि रचनामे सामाजिक जीवनक अर्न्तविरोध, विसंगति एवं परिवेशक चित्रण करैत, सामाजिक प्रश्नक निदान मूलत: व्यक्तिमे ताकवामे सफल भऽ गेल छथि। मिथिलाक ग्रामीण समाजक, निम्न वर्गक एवं कृषक समुदायक मान्यता एवं परम्पराकेँ प्रस्तुत करैत उपन्यासकार उपन्यासकेँ अत्यन्त संवेदय बना देने छथि संगहि एकटा नव संदेश- आशाक संदेश, भविष्य निर्माणक संदेश देवाक सेहो प्रयास कएने छथि। एहि संदेशकेँ उपन्यासकार लोकक भाषामे व्यक्त करैत संकीर्ण एवं अव्यवहारिक पक्षकेँ मानवीय सरोकारसँ जोड़ैत कल्पनाशीलता एवं संवेदन शीलताकेँ केन्द्रमे राखि अपन उदेश्यकेँ चित्रित करवामे सफल भऽ गेल छथि। ‘बहुजन हिताय बहुजन सुखाय’क ध्वनि बुलंद करैत उपन्यासकार दया, ममता, आस्था, त्याग, परोपकार सदृश मानवीय गुणक पक्षधर प्रतीत होइत छथि। दोसर दिशि एहि गुणकेँ प्राप्तिक दिश निर्देश सेहो कएने छथि। आधुनिक बुद्धिजीवी मानवक कार्य, ज्ञान आओर इच्छाक बीच तालमेलक अभाव आधुनिक जीवनक विडम्बना थिक। मुदा उपन्यासकार मिथिलाक सरल, निश्छल एवं सहज लोकक चित्रण करैत वस्तुत: मिथिला शुद्ध, पवित्र एवं सत्यस्वायनक चित्रण कएने छथि। उपन्यासक सभसँ पैघ विशेषता थिक समाजक निम्नवर्गक बोलचालक भाषा, लोक संवाद एवं लोकोक्तिक प्रयोगक संग समाजक विषमता एवं विसंगतिपर प्रहार करव। अपन जीवनानुभवकेँ अलग शैली एवं शिल्पक माध्यमसँ निरूपित करवामे उपन्यासकार सफल भऽ गेल छथि। संगहि इहो सत्य जे उपन्यासकारक अर्न्तमन अत्यन्त कोमन तन्तुसँ निर्मित छन्हि तेँ हिनक उपन्यास मध्य ‘रिसेप्टीविटीक’ स्तर बहुत गाढ़ भऽ गेल छन्हि। उपन्यासकार प्रमाणित कऽ देने छथि जे सहज लोक भाषाक माध्यमसँ नहि मात्र अपन अन्तर्परिष्करण सम्भव अछि अपितु प्रकारान्तरसँ मानवीय दायित्वक निर्वहन सेहो। संवंधक अभावमे मनुष्य सुखा जाइत अछि। मनुष्य अपनामे वंद होएवा लेल नहि बनल अछि। मनुष्यमे जतेक जे अछि, सभ ओकरा अन्यसँ माने दोसरसँ जोड़ैत अछि आ प्रसन्नताकेँ बाँटैत अछि। सम्भत: यएह उपन्यासकारक इष्ट छन्हि। हम हिनक मंगलमय भविष्यक कामना करैत अंतमे मैथिली साहित्यक भंडारकेँ समृद्ध करवा हेतु साधुवाद दैत छियन्हि। पोथीक नाम- जिनगीक जीत (उपन्यास) उपन्यासकार- जगदीश प्रसाद मंडल प्रकाशक- श्रुति प्रकाशन, राजेन्द्र नगर दिल्ली। मूल्य- २५० टाका मात्र। प्रकाशन वर्ष- सन् २००९ पोथी पाप्तिक स्थान- पल्लवी डिस्ट्रीब्यूटर्स, वार्ड न.६, निर्मली, सुपौल, मोवाइल न. ९५७२४५०४०५ महाकवि मार्कण्डेय प्रवासी राजसी स्वभाव, सौम्य मुख-मुद्रा, शिष्ट व्यवहार शालीनताक प्रतिमूर्ति प्रवासी जीक जीवन सन् संवतसँ बान्हल समए नहि थिक, अपितु ओहि रचनाकार कलाकारक जीवन थिक जे वर वृक्ष सदृश्य होइत अछि। वस्तुत: प्रवासी जी कवि-महाकवि, निवंधकार, पत्रकार, साहित्यकार-उपन्यासकार, कथाकार-व्यंग्यकार छलाह। जखन हम प्रवासी जीक विषएमे कल्पना करैत छी तँ मोनमे एकहिटा बात अबैत अछि जे प्रवासी जी काव्यक स्तरपर, साहित्यक स्तरपर विचार आैर जीवनक स्तरपर समस्त संकीर्णताकेँ तोड़ैत आधुनिक सांस्कृति चेतनाक संवाहक छलाह। प्रवासी जी समएक तालकेँ चिन्हलनि, समस्त प्रभावकेँ ग्रहन केलनि, और अव्यानात कएलनि और ताहि करण्ो हिनक जीवनक समएक सीमा -सीमा हीन- भऽ गेल अछि। प्रवासी जीकेँ बुझवा लेल दू स्तरपर विचार करव आवश्यक भऽ जाइत अछि- पत्रकारक रूपमे तथ्यात्मक समएक प्रतीति और सृजनशील रचनाकारक रूपमे हुनक शाश्वत काल बोध। पत्रकारक समए ठोस तथ्यक समए होइत अछि और जाहि ठाम सामयिक घटना ओकर चेतनाकेँ निरन्तर मथैत रहैत अछि। तात्कालीन समस्त विभत्स घटनासँ हिनका प्रत्यक्षीकरण भेल और समयक एहि धारकेँ हिनक पत्रकार उजागर कएलक, और ई प्रगट भेल आर्यावर्तक सम्पादकक रूपमे अक्षर जगतक सम्पादक रूपमे मिथिला मिहिरमे झामलालक झामा, माटि-पानिमे कहलनि। गोनू झा ‘व्यग्य-स्तम्भ रूपमे प्रवासी जीक पत्रकारक और समयक विषम प्ररिस्थिति ओकरा सामाजिक चेतनासँ युक्त नव यर्थाथ परक दृष्टि प्रदान कएलक और जाहिमे हिनक पत्रकार देशक राजनीतिक आर्थिक एवं सामाजिक विसंगतिसँ उत्पन्न संकटसँ समंजनक प्रयास कएलक। दोसर दिश हिनक रचनाकार शाश्वत समयक धारासँ जुड़ल रहल। शाश्वत समयसँ जुड़वाक भाव हिनका अन्तर्दृष्टि प्रदान कएलक और कवि प्रवासी जी आत्योलष्जिक प्रक्रियासँ स्थापित भऽ शाश्वत मूल्यक प्रतिष्ठा करए लगलाह, संगहि अपन रचना द्वारा ओहि मूल्यकेँ सार्थकता प्रदान करए लगलाह। प्रवासी जी मानव वघटनक ओहि कालमे मानव जिजीविषाकेँ स्थापित करए लगलाह। प्रवासी जी आइ हमरा लोकनिक बीच नहि छथि, आव एकटा दूरी बना कऽ हुनक रचना और जीवनकेँ देखल जा सकैत अछि। तथापि एतेक धरि सत्य जे ओ काव्यसँ मात्र प्रेमेटा नहि करैत छलाह अपितु जीवनसँ थाकि कऽ काव्येमे शांति प्राप्त करैत छलाह। काव्यहुँमे गीत काव्यसँ प्रेम हिनक सभठाम उजागर होइत रहल। किएक तँ आदिम मानव-मनक आदिम उद्गार थिक गीत काव्य। आदिम आर्यन्मक प्रथम चेतना, सौर्न्दय बोधक प्रथम उन्मेष तथा आदिम हृदयक प्रथम स्पन्दन थिक गीत काव्य, और ई सुरक्षित अछि उषा गीतक रूपमे, उर्वशी-पुस्रंबाक सम्वेदना-सम्वादमे तथा इन्द्र-वरूरणक वन्दना-अर्चनामे और एहि प्राचीन परम्पराक प्रथम लििप-बन्धन थिक वेद, विशेषत: सामवेद। काव्य जौं गीतकेँ भिन्न अस्तित्व प्रदान कएनिहार प्रधान तत्व थिक स्वानुभूति, जाहिसँ ई विषयी प्रधान (subjective) भऽ जाइत अछि और एकरहि अभावमे काव्य विषय (objective) भऽ जाइत अछि। तथापि गीत काव्य लेल स्वानुभूतियोसँ महत्वपूर्ण भऽ जाइत अछि रागात्मक वृति। रागक संबध रतिसँ अछि और रति स्थायी भाव थिक, जे भक्ति एवं श्रृंगार दुनूमे पाओल जाइत अछि। यएह कारण थिक जे आदिम उषागीत आधुनिक काल धरिक गीत काव्यक विषय श्रृंगारिक रहल आएल अथवा भक्ति। दुनू प्रकारक भाव वोधमे प्रधान भऽ जाइत अछि स्वानुभूित। उषाक चित्रणमे वैदिक ऋृषिक एहने स्वानुभूति अछि एवं ऋृग्वैदिक वरूणक स्तुतिमे एकान्त तन्मयता। वस्तुत: रागात्मक भावाधारित (रतिभाव) चाहे श्रृंगारिक भावना हो अथवा भक्ति भावना दुनूमे द्रष्टाक स्वानुभूतिक अहम भूिमका रहैत अछि। और यएह स्वानुभूति भेटैत अछि प्रवासी जीक गीतमे। हुनकासँ भेल वार्ताकेँ जौं स्मरण कएल जाए तँ यएह स्पष्ट होइत अछि जे गीतक प्रतीक्षा हुनका राग विलक्षण छल। इहो सत्य अछि जे अपन काव्यपर चर्चासँ ओ सदैव अपनाकेँ बचबैत रहलाह। एकटा संवादमे संकोचक संग कहने छलाह- “अपन काजक मर्यादाक भीतर और ओहिमे उपलब्ध अवकाशक कारण, हमरा किछु कहवाक अवसर जौं अन्यत्र नहि भेटैत अछि तँ आपद धर्म कारण काव्ये, विशेष कऽ गीते हमरा माध्यम भेटैत अछि, जतय हम अपन बात विना कोनहुँ लाग-लपेटक कहि सकैत छी। कहि सकैत छी जे काव्ये हमरा लेल सभसँ नीक माध्यम रहल अछि।” एहि छोट-छीन आलेखमे प्रवासी जी रचित समस्त रचनाक मूल्यांकन असंभव, तेँ हम मात्र िहनक काव्य संकल्न ‘हे हम भेटव’क आधारपर, हिनक सान्निध्यकेँ पुन: पुन: स्मरण करैत, हिनक व्यक्तित्व मूल्यांकन जे हमरा लेल असंभव थिक, अपन व्यक्तिगत अनुभवकेँ पाठकक संग वाँटए चाहैत छी। यद्यपि सान्निध्यक व्यक्तिगत सुखकेँ शब्द द्वारा व्यक्त करब असंभव होइत अछि, शब्दक सार्मथ्यक एकटा सीमा होइत अछि। तथापि किछु शब्दमे व्यक्त करवाक संभवत: प्रयास तँ कएले जा सकैत अछि। प्रवासी जीक प्रथम कविता ‘हम भेटव’ भविष्यक संकेत मात्र नहि थिक अपितु अपन सहज और विवेकशील भाषाक माध्यमसँ प्रवासी जी ई प्रमाणित कऽ देलनि जे एहि ‘स्वान्त: सुखाय’ विधाक माध्यमसँ नहि मात्र अपन अर्न्तपरिष्करण सम्भव अछि अपितु प्रकारान्तरसँ मानवीय दायित्वक निर्वाहण सेहो। ‘हम भेटव’ काव्य संग्रहक बेशी कविता छोट-छोट अछि जाहिमे छोट-छोट मुद्दा सजीव और मार्मिक क्षणकेँ संयोगी कऽ राखल गेल अछि। एतए कविक निजी इच्छा अछि, समयक दवाब अछि, भाषाक गम्भीरता अछि, आस्था अछि और नव बाट ताकवाक बेचैनी सेहो अिछ। कहवाक तात्पर्य जे एहि छोट-छोट काव्यसँ प्रवासी जी काव्यस्वादक एकटा विशाल परिधिक निर्माण कएने छथि। अपन सामाजिक सरोकार और प्रकारान्तरसँ अपन मानवीय दायित्वपर भरोसा करैत प्रवासी जी कहि उठैत छथि- “जहिया-जहिया दृदएहीनता खटकत मोनक वाटपर। हम भेटव-इतिहास-नदीक चिक्कन चुनमुन धाटपर। जहिया-जहिया मैथिलत्व हारल थकियाएल सन लागत। हम भेटव-तिलकोर जकाँ-चतरल साहित्यक वाटपर।” कवि कर्मक यएह दायित्व प्रवासी जी लेल भविष्यक महात्वाकांक्षा थिक। तखनहि तँ शब्दक खिलाड़ी शब्दक शक्ति और सीमाक पड़ताल करैत कहैत छथि- “आइ अर्थ विहीन भाषाण मात्र कविता अछि। आइ मोनक बात कहवामे असुविधा अछि।” मुदा कवि निराश नहि छथि, कहैत छथि- “प्रवासी केर गजलमे कनैए मिथिलाचलक महिमा।” सुवासित साधना अछि नष्ट भऽ रहले, तुरन्त सम्हारू। जीवनक समस्त विडम्बनाकेँ चित्रित करैत प्रवासी जी कहि उठैत छथि- “अपने घरमे आव प्रवासक- अछि विडम्बना प्रवासी अपने दाँत अपन अघरक मुद्रित किताबकेँ कुतरैए।” पुन: कवि आशावादी होइत कामना करैत छथि- “चलह प्रवासी: अषाढ़क आह्वान करी, शीतल जलक कामना मनमे शेष अछि।” काव्यक क्राफ्टक अपेक्षा कथ्यक गम्भीरता और सादगीपर हिनक विशेष ध्यान छन्हि, तखनहि तँ शब्दक चयनमे तत्सम, तदभव अथवा अन्य देशज शब्दक प्रयोग कवि सायास नहि करैत छथि अपितु कथ्यकेँ यांत्रिक होएवाक आयास पाठककेँ नहि होमए दैत छथि। जखन कवि कहैत छथि- ई मैथिलीक नमस्कार छथि : प्रवासी, ई एन-मेन लगै छथि। तत्सम प्रणाम- सन। अथवा सुशब्दमे, सुगंधमे, सुवुद्धिमे बसह प्रवासी, सत्यपर शिव जकाँ ढरि जाइछ सुन्दरता। वस्तुत: हिनक प्रत्येक शब्द प्रत्येक पंक्ति, प्रत्येक रचना पाठकक स्मृतिमे संयोगि कऽ राखल कविता थिक। हिनक राजनैतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक सोच स्पष्ट अछि, मुदा हिनक काव्य राजनैतिक सामाजिक दस्तावेज नहि थिक। अपन अर्जित सत्य हिनक प्रत्येक काव्यमे मुखर भेल अछि। अनन्त रूपात्मक, अनन्त भावात्मक संसारक सूक्ष्म मुदा ठोस पहचान हिनक काव्यमे चित्रित अछि। समए मनुष्यक अनुभूतिकेँ जाहि मूलवर्ती सम्वन्धसँ दूर कऽ देने अछि हिनक काव्य तकरा जोड़वाक उपक्रम करैत पाठककेँ अपनहि जिज्ञासा मध्य ठाढ़ कऽ दैत अछि। प्रवासी जी अपन काव्यक बीज तत्व समाजक ओहि वर्गसँ लऽ कऽ आएल छथि, जकरा प्रति हिनक प्रतिबद्धता छन्हि। हिनक प्रत्येक कविता एहि वैविध्यमय जीवन जगतक भिन्न-भिन्न धरातल-आएल आशय- उदेश्यक अनुगूँज लेने अछि तथा पाठककेँ अपन समए-संसारमे जोड़वामे सक्षम अछि। पाठक अपन सुख-दुख, त्रास-ताप, ओकर खालीपन भरल हवाइ अनुभूति हिनक काव्य मध्य आकि लैत अछि। हिनक काव्यमे निहित व्यंग्य हिनक सम्प्रेषण क्षमताकेँ सहज बना दैत अछि। और यएह व्यंग्य हिनक काव्यमे, हिनक हृदएमे सुलगैत आिगकेँ अभिव्यक्त कऽ दैत अछि। प्रवासी जी कोनो ‘वाद’क कवि नहि छथि तथापि एकटा मौन क्रान्ति, एकटा शालीन असहमति, एकटा दृढ़ अस्वीकार भाव हिनक रचनामे सर्वत्र दृष्टिगोचर होइ अछि। उपरसँ चुप मुदा भीतरसँ क्रन्दन हिनक रचनामे नुकाएल रहैत अछि। यद्यपि उपरका मौन हिनक कमजोरी नहि छन्हि, अपितु यस्व’क निषेध करैत स्वाभाविकताक निकट आबि जाइत अछि। दोसर शब्दमे मानवताकेँ बचाएब और भविष्यक निर्माणक बेचैनी, तड़प और संघर्षक अछि। वस्तुत: हिनक संघर्ष दू धरातलपर मुखर होइत अछि- एक दिश जौं जीवन एवं मानवताकेँ बचाएवा लेल अछि तँ दोसर दिश रचनात्मकताक संघर्ष सेहो दृष्टिगोचर होइत अछि। प्रवासी जीक रचना जौं एकहि संग जटिल और कठिन अछि तँ दोसर दिश सहज और सरल। एहि दू वैपरित्यक मध्य ई अपनाकेँ साधि लेने छथि। जेना मानवताकेँ अपन शब्द-वाहन दऽ हम जगवै छी कोनो सत्यक पहिल कल्पना- कऽ हम कवि कहवै छी। वर्तमानकेँ जे भविष्य’दर्पणमे देखि रहल छी। तेँ अनन्त दिश काव्याध्यात्मिक स्वरकेँ साधि बढ़ल छी। प्रवासी जीक काव्यमे अनुभव जगत अत्यन्त व्यापक अछि। साहित्यक प्रत्येक दिव्यामे हिनक रूचि अन्त धरि बनल रहलनि। संस्कृति, वेद-पुराणसँ लऽ कऽ संस्कृति कलासिक्स अछि कतेको वेद अछि जाहिमे प्रवासी जी डुवल रहैत छलाह। ताहि कारणें हिनक रचना संसार वैविध्यपूर्ण सम्पन्नतासँ परिपूर्ण अछि। एहि दृष्टिए प्रवासी जीकेँ स्मरण करैत छी तँ जे कविता आँखिक सोझा आबि जाइत अछि ओ थिक- आब चुप रहने चलत नहि काज, लाचार युद्धिष्ठिर छी, बाजू अछि जनतन्त्र कतए। हमरे पिरवेशक रंगीन झूठ, कहवामे असुविधा अछि, परशुराम चाही, मोनक वैशालीमे इत्यादि। समयक शाश्वतमे प्रवासी जी मृत्युकेँ जीवनक विकास मानलनि, मृत्यु बोध हिनका जीवनक प्रति आशावादी बनौने रहलनि, मृत्युकेँ सृष्टिमे जीवनक सतत् प्रक्रिया और ओकर क्रमगत विकासक रूपमे स्वीकार करैत, शाश्वत सत्यक उद्धाटन करैत कहलनि- ‘हमर कैलास हमरेसँ पुछैए जे हम के छी, हमर जिहवका शय्याकपर- हमर शब्दो सुतैए नहि। प्रवासी गीत बन्हकी राखि कऽ ई गजल अनने छी, परीक्षा अछथ् की एकरो- क्यो पढ़ैए वा सुनैए नहि। मुदा हिनक मृत्यु वोध जीवनक प्रेरक वोध थिक, जीवन और समयक शाश्वत श्रृंखलासँ एक होएवाक विजय उद्घोष थिक। अत्यन्त समृद्ध शिल्पक स्वामी प्रवासी जीक भाषा साधल और तापसँ युक्त छन्हि। ओ भाषाकेँ बहुत सचेत होइत सहज मुदा अनुभव-गम्यएटा प्रदान कएने छथि। भाषाक उपमान एतेक टटका और प्रभावी छन्हि जे पाठककेँ सहजहि बान्हि लैत अछि। वस्तुत: प्रवासी जी बोल-चालमे भाषाक श्लेषात्मक शक्तिक प्रयोग करैत भाषाक सर्वथा एकटा नव मिजाज देलनि अछि और शिल्पमे हिनक प्राकृतिक वातावरणकेँ पूर्त करवाक विशिष्टता सर्वथा अनुपम छन्हि। वस्तुत: एकटा इमानदार रचनाकारक नियति यएह होइत अछि जे ओ सम्पूर्ण विश्वक काल-कट विष अपन हृदएमे धारण करैत, जीवन मंथनसँ निकलल अमृत रचनाक माध्यमसँ समाजकेँ प्रदान करैत अछि। यएह रचनाकारक आत्मदान होइत अछि। वस्तुत: कलाकार निरन्तर अपन व्यक्तिगत मोनकेँ एक महानतर मोनमे, और अपन क्षणिक अस्तित्वकेँ एक विशालतर अस्तित्वक उपर िनछावर करैत रहैत अछि। अपन निजी व्यक्तित्वकेँ एक वृहत्तर व्यक्तित्वक निर्माण मिटवैत रहैत अछि। यएह मिटनाइ साहित्यक अमरताक मूलाधार होइत अछि, किएक तँ भविष्यक उज्ज्वल वाट एतहिसँ निकलैत अछि। मानव मूल्यक निर्माण एतहि होइत अछि। सपनाक नीव सेहो अछि धरातलपर राखल जाइत अछि। वस्तुत: प्रवासी जी अपन सम्पूर्ण रचनामे एहने मानवीय आस्था और जिजीविषाक इवारत रचि अमर भऽ गेल छथि। अशोक बनैत कम बिगड़ैत बेसी-सुभाष चन्द्र यादवक दोसर कथा संग्रह बनैत बिगड़ैत सुभाष चन्द्र यादवक दोसर कथा संग्रह थिक। पहिल कथा संग्रह ‘घरदेखिया’ करीब छब्बीस वर्ष पूर्व आयल रहए। एतेक अंतराल पर आयल संग्रह स्वाभाविक रूपें लोकक ध्यान आकृष्ट करैत अछि। से अहू दुआरे जे सुभाष चन्द्र यादव मैथिलीक जानल-मानल कथाकार छथि। मैथिली कथा साहित्यमे सुभाषक अपन विशिष्ट योगदान अछि। आलोचक कुलानन्द मिश्रक कहब छनि जे मैथिली कथाक क्षेत्रमे एकटा निश्चित सीमाक अतिक्रमण सुभाष चन्द्र यादवक वादे आरम्भ भेल। जे अखनुक नव्यतम कथाकार लोकनिक प्रियतम आस्था आ पवित्रतम विश्वास बनि गेल अछि। अपन कथा-संग्रह ‘घरदेखिया’क शीर्षक कथा घरदेखिया सुभाषकेँ मैथिली कथामे स्थापित कऽ देने छल। ई कथा मिथिला मिहिरक 15सितम्बर1974क अंकमे पहिल बेर छपल रहए। ई कथा 1977मे मैथिली अकादमीक कथा संग्रहमे अपन स्थान बनौलक। कथाक संग देल सम्पादकीय टिप्पणीमे कहल गेल जे ‘बीसम शताब्दीक एहि उन्नत युदमे समाजक एकटा वर्गक यथार्थ सँ ई कथा जे अंतरंग साक्षात्कार करबैत अछि, से एके संग मोनमे अनिवर्चनीय आह्लाद आ भीतर धरि पैसि जाए बला अवसाद सँ भरि दैत अछि। कथामे भाषा कोना फोटोग्राफी करैत चलैत छैक, तकर बड़ सुन्दर उदाहरण ई कथा अछि’। वस्तुतः ‘घरदेखिया’ सुभाषक अनेको प्रसिद्ध कथामे सँ एक थिक। ओ कथा अभावग्रस्त लोकक घरक परिस्थिति केँ बहुत सुन्यस्त रूपें देखबाक संवेदित करैत अछि। उपेनक संग पाठक सेहो ‘काका’क आर्थिक अभाव केँ देखि चिंतित भऽ उठैत अछि। आब बेटीक बियाह लेल टाकाक जोगाड़ कोना हेतैक? पाठक सोचबा लेल विवश होइत अछि। निश्चित रूपसँ सुभाष मैथिली कथाकेँ अपना तरहक किछु उत्तम कथा सभ देलनि अछि। घरदेखियाक संग काठक बनल लोक, फँसरी आ झालि बहुतो पाठक आलोचक द्वारा प्रशंसित भेल अछि। ई कथा सभ सुभाषेक नहि मैथिलीक नीक कथाक रूपमे मानल जाइत अछि। सुभाषक नीक कथा आरो अछि। हम एतऽ किछु आर कथाक नाम लऽ सकैत छी। एकटा दुखांत कथा, उतर मेघ, जासूस कुकुर आ चोर, हीर्थ, परिचय, बेर-बेर, लिफ्ट आ फुकना। ई सभ कथा अपन शिल्प ओ कथ्यक संतुलनसँ अभीष्ट प्रभाव छोड़बामे सफल भेल अछि। कमसँ कम शब्द मे कोनो व्यक्ति, घटना अथवा भावक राजीव ओ भावपूर्ण अंकन एहि कथा सभमे भेल अछि। एकटा कलाकारक रूपमे सुभाष वर्णनसँ बेशी चित्रणमे अपन निपुणता देखबैत रहला अछि। से बिना कोनो ताम-झाम, रंग-रोगन के। तैं सुभाषक कथा सभ कखनो कऽ एकटा देखा-चित्र, शब्द चित्र सन लगैत अछि। साहित्यमे जेकरा रेखाचित्र कहल जाइत अछि, ओहि मे कमसँ कम शब्द मे कलात्मक ढ़ंग सँ कोनो वस्तु, व्यक्ति अथवा दृश्यक अंकन कएल जाइत अछि। एहिमे साधन शब्द होइत अचि, रेखा नहि। तैं एकरा शब्दचित्र सेहो कहल जा सकैत अछि। एकर अंग्रेजी नाम स्केच, फोटो नहि थिक। रेखाचित्र मे कथाक गहीरताक अभाव रहैत अछि, परंतु रेखाचित्रमे नहि। ई सभ बातक होइतो कथा आ रेखा चित्रमे बहुधा भेद करब मुश्किल होइत छैक। सुभाष चन्द्र यादवक ‘घरदेखिया’ संग्रह मे पैतीसटा कथा रहए। बनैत-बिगड़ैतमे एक्कैसटा कथा अछि। एहि एक्कैसटा कथामे एकटा कथा अछि ओ लड़की। ई कथा ‘असंगति’ नाम सँ ‘घरदेखिया’ संग्रहमे सेहो अछि। दुनू कथामे घटना एक्के थिक। मुदा उपस्थापन आ निस्पत्तिमे अंतर अछि। एहि प्रकारे एक्के घटना सँ निर्मित्त कथाक दूटा पाठ, दू शीर्षकसँ हमरा सभकेँ भेटैत अछि। घटना महानगरक होस्टल लगक थिक। मोटरमे बैसि कऽ एकटा लड़का आ लड़की चाह पीलक। चाह पीबि कऽ दुनू कप लड़की हाथमे रखने रहए। नवीन, जे ओकरासँ अपरिचित रहए, तकरा जाइत देखलक तँ पुछलकै जे की अहाँ ओहि दिस (चाहक दोकान दिस) ज रहल छी? सवाल खतम होइते नवीनक नजरि लड़कीक चेहरा सँ उतरि कऽ ओकर हाथक कपपर चलि गेलै आ ओ अपमान सँ तिलमिला गेल। ओकरा भीतर क्रोध आ घृणाक धधरा उठलै। की ओहि दुनूक अइंठ कप लऽ जाएत? लड़कीक नेत बुझिते ओ जबाब देलकै नहि। असंगति मे नवीन अंत धरि तिलमिलाइत रहैये आ सोचैये जे ओ किएक नहि कहि सकलै, ‘हाउ डिड यू डेयर?’ कथा एहि ठाम खतम होइत अछि। मुदा ओ लड़की मे एकरबादो कथाकेँ विस्तार देल गेल छै। नवीनक मानसिक अंतर्द्वन्द्व छैक। ओ सोचैत अछि जे दुनू मे क्यो दोषी रहल हेतै आ दुनू दोषी हेतै आ दुनूमे क्यो नहि। कारण आरो भऽ सकैत छल। अंततः एतबे सत्य रहि गेलै जे लड़की उदास भऽ गेल छलै आ नवीन दुखी। ई सभ बात ओ सोचने चल जा रहल छल। दुनू कथामे घटना कनियेंटा अछि। आर जे किछु अचि से मानसिके स्तर पर अछि। पहिलमे अपमानक बोध अंत धरि बनल छैक। एहि बातक पछताबा छै जे लड़की (असंगतिमे लड़कीक नाम कूकी थिक) के झाड़ि कऽ बदला किएक नहि लेलक? ओकरा औकात किएक नहि देखा सकलै! तोहर ई मजाल जे हमरा अइंठ कप उठा कऽ लऽ जाइ लेल कहबें? मुदा ओ लड़की मे ई अपमान बोध अंततः समझौता मे बदलि जाइत अछि। थोसथाम भऽ जाइत छैक। लड़कियो उदास जे अनेरे कहलकै आ नवीनो दुःखी जे अइंठ कप लऽ जइते तँ की भऽ जइतैक। मुदा ई सभटा मन कथे। मनेक भीतरमे चलैत। पजरैत आ मिझाइत। कथाक एहि दुनू पाठक विस्तारसँ तुलनात्मक अध्ययन बहुत रोचक भऽ सकैत अछि। बनैत बिगड़ैतमे संग्रहीत कथा सभसँ पूर्व कथाकार ‘अपन गप्प’ मे कहैत छथि जे ‘हमर रचना और किछु नहि, देश-कालक प्रति हमर प्रतिक्रिया थिक। हम अपन समयक सार तत्वकेँ प्रतिबिम्बित करऽ चाहैत छी। जीवन लेल जे किछु नीक आ श्रेयस्कर अछि, हमर रचना तकरे हासिल करऽ चाहैत अछि। हम एहन मनुक्ख गढ़ऽ चाहैत छी जे सभ सँ प्रेम करए। आ प्रेम बएह कऽ सकैत अछि जे सत्यक सर्वाधिक निकट हएत’। कथाकारक इच्छा आ कथा सभकेँ जँ देखी तँ लागत जे कथाकार अपन अभीष्ट केँ बहुत अंश धरि प्राप्त कऽ लेने छथि। जतऽ कतहु अभीष्टक प्राप्ति नहि भऽ सकलनि अछि तँ से अभीष्टक अस्पष्टता आ ताहि कारणे उत्पन्न शिल्पक कमजोरी थिक। प्रथम पुरूष कथावाचक वला अर्थात् कथा कहनिहार ओ कथा जननिहार जतऽ एक छथि से एगारह टा कथा अछि। एहि सभ कथा केँ आत्मानुभूतिक निकट मानल कथा अछि। एहन कथा सभ अछि, अपन-अपन दुःख, आतंक, एकटा अंत, एकटा प्रेम कथा, कनिया पुतरा, कारबार, कुश्ती, तृष्णा, दृष्टि, बात, रम्भा, हमर गाम। एहि एगारहो कथामे सँ दस टा कथा मे हम सोझे-सोझ पात्रक रूपमे कथामे सम्मिलित छथि। मुदा एकट्य़ा कथा ‘तृष्णा’ मे ओ दोसर पात्र अखिलनक खिस्सा कहैत छथि। एहि कथा सभक माध्यमे देश-कालक प्रति जे प्रतिक्रिया व्यक्त करैत छथि से यथार्थ लगैत अछि। से वर्त्तमान सामाजिक-आर्थिक स्थितिमे राग-भावक होइत अभावकेँ देखबैत अछि। सामाजिक-पारिवारिक सम्बन्ध-अनुबन्ध बदलि रहल अछि। अनकर दुख तकलीफक प्रति एक मारूक उदासीनता पसरि रहल छैक। कारोबारी सम्बन्ध अश्लीलता हदकेँ छूबि रहल अछि। शासन-व्यवस्था असंवेदनशील आ भ्रष्ट भऽ गेल छैक। लोक कमजोर आ असहायकेँ दबब चाहैत अछि। गाम-घरमे जमीन-जाल, सम्पत्तिक छीना-झपटी बढ़ल छैक। कथा-कार चाहैत छथि जे प्रेम कयनिहारक बीच सम्वादहीनता नहि उपजय। सम्वादहीनता सँ ओ बैचेन होइत छथि (एकटा प्रेम कथा) ओ मानैत छथि जे पति-पत्नीक बीचोमे सभ किछु साझी नहि होइत छैक (अपन-अपन दुख), शासन-व्यवस्थाक अंग भेलापर मित्र-परिचितोक बात-व्यवहार बदलि जाइत छैक। ई बात-व्यवहार आतंकित कऽ सकैत अछि (आतंक)। श्रद्धा आ स्नेह देखाबऽ लेल कर्मकाण्ड जरूरी नहि छैक (एकटा अंत), निश्छल आ निर्विकार यौवनकेँ छली आ विकारग्रस्त मानसिकतासँ बचाएब कठिन भेल जा रहल छैक (कनियाँ पुतरा)। एहि कारोबारी युगमे असहाय आ निर्बलकेँ आर्थिक-शारीरिक शोषणसँ बाँचब मुश्किल भऽ गेलैक अछि। मानवीयताक ह्रास भऽ रहल छैक (कारोबार), जीवनक आपा-धापी लोककेँ जहिना-तहिना रहबापर विवश करैत छैक (कुश्ती), कोनो सुन्दर-दृष्टि-भंगिमावाली स्त्रीक प्रति सहज खिंचाओ आ लगाओ सम्भव छैक। लोकमे ई इच्छा जनमि सकैत छैक जे ओकर संग हर्तदम बनल रहय। संग नहियो भेटतैक तँ स्मृति आत्माकेँ आलोकित करैत रहतैक (तृष्णा), मनुक्खकेँ जीबाक लेल सार्थक ओ व्यावहारिक दृष्टि आवश्यक छैक (दृष्टि), जीवनमे बहुतो घटना घटैत रहैत छैक। जीवन कथा चलैत रहैत छैक। दुख-सुख भोगैत रहैत अछि लोक। परन्तु बात कखनो-कखनो बनि पबैत छैक (बात), रम्भा सन रूपवती स्त्री ककरो कोनो अवस्थामे विचलित कऽ सकैत अछि। एहि विचलनमे मोनकेँ नुका कऽ राखब सम्भव नहि छैक। मोन पारदर्शी भऽ जाइत छैक। मोनक सुन्दरता आ कुरुपता देखार भऽ सकैत छैक (रम्भा), अनुपस्थित जमीन्दारक लेल गाम आब स्मृतिमे जा रहल छैक। गामक जीवन विकट भऽ गेल छैक। वस्तुतः गाम आब अपन नहि रहि गेलैक अछि (अपन गाम)। एहि सभ कथामे जे भाव-विचार व्यक्त भेल अछि से बहुलांशमे कथामे अनुस्यूत भऽ कऽ आएल अछि। मुदा जतऽ-ततऽ कथामे फूटसँ टिप्पणी, चिन्तन, दर्शन वा मन्तव्यक सोङर सेहो दिअ पड़लनि अछि कथाकारकेँ। कथा-संग्रहमे संगृहीत किछि कथा सभमे ई सोंगर कखनोकेँ कने खीचल-तीरल सेहो लागि सकैत अछि। लागि सकैत अछि ब्जे कथावाचक जेना किछु आगू बढ़ि गेल अछि आ कथा कतहु पाछूए छूटि गेल अछि। हमरा जनैत एकर कारण कथाक रूप-विधान थिक। ले आउट थिक। कथात्मकताक अभाव थिक। जेँकि सुभाष अपन कथा लेल वातावरण आ पृष्ठभूमिक निर्माण नहिएँ जकाँ करैत छथि तैँ हुनका अभीष्ट प्राप्ति लेल कखनहुँ कऽ फूटसँ उपक्रम करऽ पड़ैत छनि। किछु कथामे कोसीक बाढ़ि आ कोसी कातक गामक चित्रण बहुत प्रामाणिक रूपसँ भेल अछि। किछु कथामे असगर हेबाक कष्ट-भोग दारुण भऽ गेल अछि। एहि कथा सभक चित्रण भयाओन अछि। जाहि कथामे कोसी आ कोसी कातक गाम अछि से कथा केनरी आइलैंडक लारेल, परलय आ हमर गाम थिक। कोसीक बाढ़िसँ तबाही, कोसी कातक गामक रस्ता-पेंड़ाक दुरुहता कहैत अछि जे ई एकटा दोसरे संसार थिक। विकाससँ दूर, सामाजिक-पारिवारिक सम्बन्धक बदलैत आयाम आ ओहि भीतरसँ राग-विरागक झिलमिलाइत मनोभाव, बनैत बिगड़ैत जातीय-वर्गीय सम्बन्ध कथा सभकेँ स्मरणीय बनबैत अछि। “परलय” आ “हमर गाम” शीर्षक तँ कथाक अनुकूल लगैत अछि, ओकर संगति छैक मुदा केनरी आइलैंडक लारेलक कोनो संगति कथामे नहि भेटि पबैत अछि। कैनरी आइलैंड स्पेनक आइलैंड थिक, जे मेडीटरेनियन समुद्रमे अछि। एहि आइलैंडपर लारेल नामक गाछ खूब होइत छैक। एहि झमटगर गाछक छोट-छोट पातक उपयोग मुकुट, टोपी बना कऽ लोककेँ सम्मानित करबामे होइत रहल अछि। इन्गलैंडमे राजाक मुकुटमे लारेल लगाओल गेल रहैक। मुदा कथामे ई लारेल के थिक, से स्पष्ट नहि होइत अछि। कथाक संग शीर्षकक संगतिक समस्या किछु आनो कथाक संग अछि। “असुरक्षित” आ “एकाकी” बाहर आ भीतरसँ असगर भेल लोकक व्यक्तिचित्र थिक। ई दुनू कथा बहिरंग आ अंतरंगक बीच होइत आवाजाहीक कथा थिक। कखनो बहिरंग हावी भऽ जाइत छैक तँ कखनो अंतरंग। ई स्थिति व्यक्तिवादी मानसिकताक देन कहल जा सकैत अछि। एहन लोकमे असुरक्षा-बोध बढ़ि जाइत छैक। ओ अपन वर्तमान वातावरणक संग ताल-मेल नहि बैसा पबैत अछि। दाना, नदी आ कबाछु एहन कथा थिक जेकरामे कोनो पैघ बात कहबाक तागति छैक मुदा अन्ततः से बात उभरि नहि सकल अछि। एक ओझरायल अनुभूति आ संकोच, कहि सकैत छी जे एहि कथा सभकेँ पुष्पित हेबामे बाधक भेलैक अछि। तथापि “नदी” प्रवहमान धारक रूपमे तँ नहि मुदा रुकैत-चलैत वात्सल्यक अनुभूति जगबैत छैक। “दाना” एहि कारोबारी समयमे मनुक्खकेँ हरेक दाना लेल चिड़ै-चुनमुनी सन बनैत देखबैत अछि। “कबाछु”क अनुभूति जुगुप्सा जगबैत छैक जखनि कि एहि कथामे गहींर सत्यक बीज अछि। सत्य ई थिक जे जखन व्यक्तिक वर्ग बदलि जाइत छैक तँ ओकरा अपन पूर्ववर्ती व्यवहार, चालि-चलन, श्रम वा आराम सभक प्रति एक हीनता-बोध, लाज-संकोच उपजि जाइत छैक। कथा-संग्रहक नाम बनैत बिगड़ैत, एहि नामसँ प्रकाशित कथाक आधारपर राखल गेल अछि। एहि कथामे माय-बाप लगसँ परदेश चल गेल सन्तानक कुशलता लेल व्याकुल अनिष्टक आशंकासँ डेरायल, संतानसँ भेटल अवहेलनाक संताप भोगैत पति-पत्नीक खिस्सा कहल गेल अछि। पत्नीकेँ एहि मानसिकतामे कौआक टाहि आ कुकुरक कानब अशुभ लगैत छै। ओ परेशान होइत अछि। पति विभिन्न तर्कसँ पत्नीक ध्यान एहि अशुभ कल्पनासँ हटाबऽ चाहैत अछि। मुदा पत्नी खिसिया जाइत छै। कटाह बात कहि दैत छै। ओहि कटाह बातसँ पति आर पीड़ित होइत अछि। एहि क्रममे ओ विभिन्न बात सोचैत अछि। कौआक कुचरबाक मादे अशुभ कल्पनाकेँ कौआक विलायल जेबासँ जोड़ि दैत अछि। कौआ संग अपनो (दादाक) विला जेबाक कल्पना करैत अछि।एहि प्रकारेँ जेना सन्तानक विछोहसँ उपजल क्षोभ आ दुखमे अपनाकेँ कौआ सन कुरुप मानि, अशुभ मानि, विला जेबाक, मरि जएबाक, स्मृतिमे चल जेबाक उपालम्भ देल गेल अछि। सुइभाष चन्द्र यादवक एहि कथा-संग्रहक अनेक कथामे गामक, दादाक, स्नेह-भावक स्मृतिमे चल जेबाक बात कहल गेल अछि। जेना ई सभ आब स्मृतिएटामे जीवित रहत। वस्तुतः वर्तमान समएपर ई सभ कथाकारक प्रतिक्रिया थिक। ई प्रतिक्रिया समयकेँ बनैत कम आ बिगड़ैत बेसी देखि कऽ, पाबि कऽ व्यक्त भेल अछि। जेना ई समय बनि कम रहल अछि, बिगड़ि बेसी रहल अछि। वर्तमान समएपर कथाकारक ई प्रतिक्रिया यथार्थ भले ही हो, मुदा ई यथार्थ उदास आ निष्क्रिय करैत अछि। एहिसँ ने हृदएमे प्रेरणा होइत अछि आ ने आत्मबल भेटैत अछि। तैँ सुभाषजी सँ ई आशा करब अनर्गल नहि होएत जे ओ अगिला समएमे समकालीन यथार्थक एहन पक्ष सेहो प्रस्तुत करता जे प्रेरित आ सक्रिय करत। जाहिसँ आत्मबल भेटत। एहन कथा वस्तुतः कम बिगड़ैत आ बेसी बनैत कथा होएत। उषाकिरण खान अनुभूतिः एकटा पाठकीय प्रतिक्रिया जखन पन्ना जी लिखल कथा संग्रह ‘अनुभूति’ हमरा हाथमे आएल तखन अतिशय प्रसन्नता भेल। किएक तँ पन्ना जीक संगे हम कएक बेर अस्सीक दशक मे संगहि कथा पाथ कएने छलहुँ। हुनका कथाक मानसिक धरातल आ लेखकीय सावधानी बूझल छल। कथाकारक अनुभूतिक परिचय छल स्थिरचित्तक बुझनुक लेखिका सहजहि श्रोता एवं पाठक सँ सोझा सोझी गप्प करैत छथि। अनुभूतिक वेष्टन मोनक आगाँ पाछाँ रहैत छन्हि, तैं कथाक विकास एकटा सुष्पष्ट विचार यात्रा जकाँ छन्हि। पन्ना जी अनेक परिवेशक कथा लिखैत छथि। ठोस धरातल पर चलय बाली आइ काल्हिक स्त्रीक कथा ओ संवेदना संग नहि पएरक धमक संगे लिखने छथि। जेना ‘सेवानिवृत्ति’। सेवानिवृत्तिक पश्चात् संतान आ स्वजन परिजन मुँह बओने रहैत छथि, जीवन चरित कमाई आ बचत के कोना आलसात कए लेल जाए तकर ब्योंत मे लागल रहैत छथि मुदा वृद्ध माता पिताक चिंता नहिये टा करैत छथि। पन्ना झा जीक कथाकार स्वानुभूति केँ सोझाँ धए टा देलन्हि अछि ओकरा विवछओलन्हि अछि नहि। इएह हिनक विशेषता छन्हि। अपन दृढ़ पद चाप छोड़ब। सेवानिवृत्ति कथाक चर्च हम बारंबार करए चाहैत छी, ओ कथा बूँद मे समुद्र तँ थिके, एकटा पइघ संदेश दैत अछि। मनहि ओ स्वयं दुलारपुर सन नगरक कात बला गामक बेटी छथि तरौनी सन बुद्धिजीवी गामक पुतहु परंच मिथिलाक असूर्यम्पश्या ग्राम ललनाक ज्ञान छलन्हि, कलकत्ता जाए आ ओतए शिक्षा प्राप्त कए, ओतुक्का सामाजिक जीवन के अनुभव लए जे किछु अपना क्षेत्रक विकासक कामना कएलन्हि तकर सत्व ओ ‘सेवानिवृत्ति’ कथामे देने छथिन्ह, एकटा गाम जे आदर्श अछि, विद्यालय, अस्पताल इत्यादि छैक महाविद्यालय नहि छैक। महिला महाविद्यालय फोलब ‘हाइ-रिस्क’ काज छैक, छात्रा जुटतैक कि नहि? मुदा कल्पना शील लेखिका आधुनिक शिक्षाक आवश्यकता बलें महाविद्यालय फोललनि आ सफल भेलीह। कथामे स्वयं कथानायिका श्राद्धा केर विकास क्रमशः भेल छन्हि ओहिना जेना हुनक महिला शिक्षाक प्रयोजनक। आइ काल्हि शिक्षा सभक जन्मसिद्ध अधिकार छैक तकर कानूनी व्याख्या खूब प्रचारित भऽ रहल छैक। गुल्ली-डंटा खेलए बला बालकसँ लए गइचरवाही मे खैनी ठोकए बला नेन्ना सभ केँ धऽ कऽ स्कूल आनल जाइत छैक। भनहि ओ लोकनि मिड डे लंच लऽ कऽ पड़ा जाइत छथि। लेखिका कमौशा कथामे एकटा निरसय परसनक बालक निरसू केँ अपना संगे आनि गृहकार्यमे लगौलनि आ ओकरा शिक्षा देमए लागलीह। मुदा जखन ओ स्वस्थ सबल बला भऽ गेल। हिनकर सभटा शिक्षा बिसरि पुनः परिवारक अंतहीन जालमे ओझरा। कथामे कचोटक मात्रा स्वल्प छैक आ कमजोर वर्गक दारूण स्थितिक मात्रा अधिक छैक प्रायः सभकेँ बूझल छैक जे व्यक्तिगत आ सामाजिक प्रयाससँ गामे टा नहि घर सेहो खुशहाल आ चिंताहीन हेतैक मुदा से नहि होइत छैक। दूरदृष्टिक अभाव मे ग्रामीण अपन हर्ज करैत अछि, ओकरा अनकर दृष्टि केर लाभ लेबाक क्षमता नहि छैक। क्रमशः आधुनिक होइत समाजक एकटा सटीक कथा अछि-‘पुनरावृत्ति’ चारूकात लौह कवार लागल हो कतहुँ सँ हवाक सिहकी नहि प्रवेश करैक, सूर्यदेवक किरण नहि प्रवेश करैक तैं कि भोअ-साँझक अस्तित्व मेटा जाएत? नहि ने? न मिथिला मे प्रकाश आएल। पति सँ अकारणे प्रताड़ित स्त्री पिताक आशीर्वाद सँ स्वाबलम्बी भऽ जाइत छथि। पुत्रीक शिक्षाक प्रति सजग तँ छथि मुदा हुनकर भाग्य अपने सन होएतैन्ह से नहि बिचारने छलीह। मुदा अधिक आगाँ ससरल समय मे बेटी सुधा मान्यता केँचुल उतारि फेकलक आ स्पष्ट विचार संगे आगाँ पएर बढ़ओलक, मनहि ओ परिस्थिति जन्य पुनरावृत्तिक शिकार भेलीह मुदा सिनुर चुड़ी आ मिथ्या संस्कार केँ निषेध कएलन्हि। ओ उहापोहक अन्हारसँ उबरि एकटा सेविका सँ उद्गार व्यक्त करैत छथि जे माथ हल्लुक करक लेल- ‘एक कप चाय बना दे’ पन्ना जीक लेखिका मनोविज्ञानविद् छथिन्ह से- ‘असमान्य केँ सनक सामान्य केस हिस्ट्री बला कथा पढ़ि परिलक्षित होइत अछि। अही वजनकेँ कथा छैक सरोकार। पति-पत्नी संगे रहथि, दुनू एके शिक्षा प्राप्त करैथ आ एके जीविका मे संलग्न रहथि तथापि स्त्रीपर परिवार, समाज आ आजीविका तेहराएल बोझ रहैत छैक आ पति निश्चिंत; ई अजुका त्रासदी छैक जकरा सँ प्रत्येक शिक्षिताजूझैत अछि तँ मूल्यांकनक’ नायिका किएक ने जूझती? ’नीति प्रकरण’ कथामे ‘बिचमाइनक’ भूमिका महत्वपूर्ण छैक? जकर अप्पन घर बिगड़ल रहैत छैक ओ अनकर सुखी घर उजाड़य पर तुलल रहैत अछि। समय रहितहि यदि पति-पत्नी ई बूझि लेथि तखन कएक टा परिवार विघटित होअऽ सँ बाँचि जाएत। सघन संवेदनाक कथा छैक- ‘बऽर घुरिए गेल’। कतेको गीत कवित्त लिखलनि कवि विद्यापति, पं. हरिमोहन झा, यात्रीजी तथापि एकटा आडम्बर पूर्ण समाज नायक अविश्वस्तरीय, तरल प्रकारक वस्तुक अस्तित्व आइयो अछि। मिथ्या अहंकार, घोर लिप्साक प्रतीक मिथिलाक सर्वाध्जिक सोचबा पर विवश करैत छैक। पन्ना जीक प्रत्येक कथा किछुने कि अनुभव करबापर विवश करैत छैक आ तैं कथा-संग्रहक नामकरण अनुभूति बहुत नीक। एकटा नयनाभिराम आ बीछल पौथी मैथिली मे आबए से स्वागत योग्य अछि। प्रत्येक छोट कथा जे या तँ आकाशवाणीक लेल लिखल गेल आ कथा गोष्ठी मे पढ़बाक लेल लिखल गेल अछि महत्वपूर्ण। एकदम बूंदमे समुद्र। कथा, कथा सूत्र जकाँ बुझाइत अछि। पन्ना जी केँ हम आग्रह करबनि जे पलखति पाबि आब कथा सूत्रक विस्तार करथु आ पूर्ण कथा लिखथु जाहिसँ पाठकक छाँक पुस्तै। कथा संग्रह फ्लैपपर वांछित अवांछित शब्द संचयन छैक जाहिसँ बचल जा सकैत छलैक। ‘दू आखर’ लेखिकाक दृष्टिक निर्विविवाद टिप्पणी अछि आ हुनक स्वयं केर विकासक एकटा संक्षिप्त सूचना। पन्ना झा जी जन नन कन्त्ये वर्सियल व्यक्तित्वक जे अनुभूति सबकम हाथमे अछि से उत्तर आधुनिक मिथिलाक निर्माणक अनुभूति छैक जाहिमे बालक-बालिका युवजन आ वृद्ध-वृद्धा, दादा-दादी सब छथि। अर्थात् उत्तर आधुनिक विचार एसकरूआ नहि अछि, सभाराज बला परिवारक कामना करैत अछि समाज निर्वीथ नहि अछि, मदतिक हाथ चारू भागसँ बढ़ैत अछि। पन्ना जीक लेल शुभकामना। नागेन्द्र कुमार कर्ण मिथिला पञ्चकोशी परिक्रमा मिथिलाक प्रत्येक पावनि, तिहारमे परिक्रमा करबाक चलन पुराने आ अनिवार्य रहल अछि । मन्दिरमे हुए या कोनहु पुजा–पाठक बाद मन्दिरके कमसँकम एक चक्कर घुमबाक काज जे होइत अछि सैह परिक्रमा अछि । परिक्रमा कोनो निश्चित स्थानके कायल जाइत अछि । मिथिलामे विवाह सँ मृत्यु पर्यन्त परिक्रमा कायल जाइत अछि । विवाहमे वर–कनियाँ वेदीक चारुकात घुमल करैत अछि जे परिक्रमेक प्रतिक रहल अछि । अहिना परिक्रमा मिथिलाञ्चलमे सृष्टिक शुरुआतेसँ चलि आयल अछि । मिथिलाक राजधानी जनकपुरके केन्द्र मानि परिक्रमा करबाक परम्परा एतऽ रहल अछि, जकरा पंचकोशी, माध्यमिकी परिक्रमाक नामसँ सम्बोधन कायल जाइत अछि । हरेक वर्ष फागुण कृष्णपक्षक अमावश्यासँ शुरु भऽ फागुण पूर्णिमाधरि पञ्चकोशी परिक्रमा मनाओल जाइत अछि । परिक्रमा जनकपुरसँ शुरु भ जनकपुरेमे जाऽकऽ ईतीश्री होइत अछि । परिक्रमा वृहत, मध्य आ अन्तगृही पश्चात सम्पन्न होइत अछि । वृहद परिक्रमा उत्तरमे हिमालय पर्वत श्रेणी, पूवमे कोशी, दक्षिणमे गंगा आ पश्चिममे गण्डकधरिके परिक्रमाकबाद सम्पन्न होइत अछि । आइकाल्हि एहि तरहक परिक्रमा विरले कयल जाइत भेटैत अछि । मध्य परिक्रमा अठारहमं शताब्दीसँ पूवेसँ मनवैत अएबाक विश्वास कायल जाइत अछि । पहिने पहिने ई परिक्रमा ५ दिनधरि मनाओल जाइत छल । एहि परिक्रमाके २०म् शताब्दीमे आविकऽ महात्मा सुरकिशोर दास पाँच दिनसँ १५ दिन बनौलथि । जकर कारणसँ अखन एहि परिक्रमामे साघुसन्त, महन्थ, गृहस्थ, नागा लगायतक वृहत उपस्थिती रहैत अछि । मिथिलाक राजधानी जनकपुरके केन्द्रविन्दू मानि नेपाल आ भारतक १५ विश्राम स्थलमे बसोबास कऽ फागुन पूर्णिमाक दिन जनकपुरमे अन्तगृही परिक्रमा कएला पश्चात एकर समापन कायल जाइत अछि । १५ विश्रामस्थल जनकपुरसँ पाँच–पाँच कोशक दुरीमे रहबाक कारणे एकर नाम पञ्चकोशी परिक्रमा परल अछि । फागुण अमावश्याक दिन धनुषाक कचुरीसँ मिथिलाविहारीक (रामसीता) आ किशोरीजीक डोला बाजागाजा सहित जनकपुर स्थित जानकी मन्दिरमे लावि परिक्रमाक विधिवत शूरुवात होइत अछि । ई डोला मिथिलाक विभिन्न धार्मिक, ऐतिहासिक आ पुरातात्विक महत्व रहल स्थलक परिक्रमा कऽ कऽ जनकपुरमे आविकऽ सम्पन्न होइत अछि । जनकपुरमे मध्य परिक्रमा अन्तगृही परिक्रमाक रुपमे सम्पन्न होइत अछि । परिक्रमाक अवधिमे परिक्रमा यात्रीसब नेपाल आ भारतक १५ स्थानमे बास बसैत छथि । जाहिमे धनुषाक जनकपुर, धनुषाधाम, हनुमानगढी, औरही, सतोषर आ पर्वता, महोत्तरीक मटिहानी, जलेश्वर, मडै, धुव्रकुण्ड आ कञ्चनवन, भारतक गिरिजास्थान फुलहर, कल्याणेश्वर, विशौल आ करुणा लगायतक स्थानमे परिक्रमायात्रीसब विश्राम करैत छथि । परिक्रमाबासीसब करीब १२८ किलोमिटरक यात्रा कएल करैत छथि । नेपाल आ भारतक सामाजिक सदभावक सेतुक रुपमे रहल ई परिक्रमा धार्मिक, ऐतिहासिक आ पूरातात्विक महत्वक परिचायक अछि । परिक्रमा आर्थिक दुनु कातक जनताक मजबुतीक एकटा कारक सेहो बनल अछि । विश्रामस्थल विशिष्ट महत्वक भेलाकबादो अवस्था दयनिय रहल अछि । ताहि स्थलसबमे रहल जलाशय, मठ, मन्दिर उपेक्षाक कारणे दिनानुदिन जीर्ण बनि रहल अछि । परिक्रमा सडकक निर्माण हरेक वर्ष जोडतोडकसँग उठौलाक बादो अखनधरि सडकक निर्माण नहि भेलाक कारणे परिक्रमाबासीसबके अपेक्षाकृत बेसिए कष्ट भोगवाकलेल विवश कऽदैत अछि । परिक्रमा केलाकबाद सुख, शान्ति, मनोकामना पुर्ण होएबाक विश्वास रहल मान्यताक कारणे प्रत्येक वर्ष परिक्रमा यात्रीक संख्यामे बढोत्तरी होइत आयल अछि । परिक्रमा मार्ग मध्य परिक्रमा अर्थात पञ्चकोशी परिक्रमा नेपाल भारतक ८० कोशक वृत्ताकारमे धुमिकऽ मनाओल जाइत अछि । नेपाल आ भारतक १५ विश्राम स्थलमे फागुण अमावश्यासँ फागुण पूर्णिमाधरि ई परिक्रमा पुरा होइत अछि । हरेक विश्रामस्थलक अपने–अपने तरहक विशिष्ट आ पुरातात्विक महत्व रहल अछि । (१) हनुमानगढी ः— फागुण अमावश्याक दिन धनुषाक कचुरी मठसँ निकलल रामजानकी (मिथिलाविहारी)क डोला जानकी मन्दिर होइत बाजागाजा सहित हनुमानगढीमे रात्रिक विश्राम करैत अछि । एतऽ शताब्दियो पुरान हनुमानक विशाल मूर्ति रहल अछि । (२) कल्याणेश्वर (कलना) ः— विश्रामक दोसर पडाव स्थल भारतक कल्याणेश्वर अर्थात कलना अछि । एतऽ कल्याणेश्वरनाथ महादेवक मन्दिर अवस्थित अछि । राजर्षी जनकद्वारा अपन राजधानीक चारु कोन्हमे स्थापना कायल चारि महादेव मध्य ई एक अछि । (३) गिरिजास्थान (फुलहर) ः— कल्याणेश्वरस्थानसँ चारि कोस दक्षिण– पश्चिममे रहल गिरिजास्थान, परिक्रमाक तेसर दिनक विश्राम स्थल अछि । गिरिजास्थान पौराणिक स्थल रहबाक विश्वास अछि । त्रेता युगमे जानकीजी एत्तहि फुल लोढ़वाक समयमे श्रीरामसँ पहिल भेंट भेलछलनि से किंवदन्ति अछि । एतऽ दुःखहरण कुण्ड, सीतासागर आ फुलवारी रहल अछि । (४) मटिहानी ः— मिथिला पञ्चकोशी परिक्रमा चारिमदिन अर्थात फागुण शुक्ल तृतीयाक दिन महोत्तरी जिल्लाक पहिल विश्राम स्थल मटिहानीमें प्रवेश करैत अछि । एतऽ सीताजीक मटकोरक लेल माटि खनाएल विश्वास कायल जाइत अछि । एहिठाम प्रसिद्ध लक्ष्मी सागर नामक विशाल पोखरि आ प्रसिद्ध लक्ष्मीनारायणक मन्दिर रहल अछि । (५) जलेश्वर ः— मटिहानीसँ परिक्रमायात्री पाँचमदिन जलेश्वर पहुँचैत अछि जे मटिहानीसँ २ कोश पश्चिममे अवस्थित अछि । एतऽ जलमे विराजमान जलेश्वरनाथक पुजा आराधना पश्चात यात्रीक रतुका विश्राम एतहि होइत अछि । (६) मडै ः— फागुण शुक्ल पञ्चमीक दिन परिक्रमाक डोला जलेश्वरसँ प्रस्थान कऽ मडै पहुँचैत अछि आ एतऽ रातिक विश्राम करैत अछि । प्राचिनकालमे एतऽ माण्डव ऋर्षीक आश्रम आ सीताजीक विवाहकलेल मडवा (वेदी) एत्तहि बनाओलगेल बुढ़–पुरानक कहबी छन्हि । (७) धु्रवकुण्ड ः— परिक्रमावासी मडैÞसँ सातम दिन धु्रवकुण्ड पहुँचि एतऽ विश्राम करैत अछि । एतऽ ध्रुवक मन्दिर आ ध्रुव कुण्ड रहल अछि । (८) कञ्चनवन ः— ध्रुवको दर्शन कएला पश्चात परिक्रमाबासी महोत्तरीक अन्तिम पडाव स्थलक रुपमा रहल कञ्चनवनमे सप्तमीक दिन विश्राम लेल करैत अछि । एहिठाम ईच्छावती आ विरजा गंगाक पवित्र संगमस्थल भेलाक कारणे एकरा पवित्र मानल जाइत अछि । पौराणिककालमे एतऽ अनारवन, तमालवन, तालवन, कदलीवन लगायतक १२ टा रमणीय वन रहल छल । त्रेता युगमे एतऽ भगवान राम हारी खेलने रहल किंवदन्ति अनुसार एतऽ परिक्रमाबासी पहुँचिकऽ अविर खेलीकऽ होली मनवैत अछि । (९) पर्वता ः— नवम् दिन परिक्रमायात्री धनुषाक पर्वतामे विश्राम लैत अछि । राजा जनकद्वारा स्थापित क्षिरेश्वरनाथ महादेवक प्रसिद्ध मन्दिर एतऽ रहल अछि । (१०) धनुषाधाम ः— पर्वतासँ परिक्रमाबासी दशम् पडावस्थलक रुपमा रहल धनुषाधाम पहुँचैत अछि । एहिठाम जनकपुरमे सीताक स्वंयम्वर होइतकाल मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामद्वारा तोड़लगेल धनुषक एकटा टुकड़ी खसल विश्वास अछि । एतऽ सीताराम, हनुमान लगायतक मन्दिर रहल अछि, मुदा दर्शनार्थीक दर्शनक केन्द्रविन्दु धनुषे रहल पाओलगेल अछि । (११) सतोषर ः— फागुण शुक्ल दशमीक दिन परिक्रमाबासी डोलाक संगे सतोषर पहुँचल करैत अछि । एहिठाम सातटा पोखरी होयबाक कारणे एकर नाम सतोषर परल अछि । एतऽ शिव आ सीताराम मन्दिर रहल अछि । (१२) औरही ः— विमला नदीक तटमे अवस्थित औरहीमे परिक्रमा यात्रीसब अपन १२ दिनक विश्राम लेल करैत अछि । (१३) करुणा ः— नेपालक औरहीसँ पुनः परिक्रमा भारतक करुणामे तेरहम् दिनमे प्रवेश करैत अछि । एहिठाम करुणा नामक नदी विख्यात रहल अछि । (१४) विशौल ः— करुणाक विश्रान्तिकबाद परिक्रमाबासी चर्तुदशीक दिन भारतक विशौल पहुँचैत अछि । एहि स्थान होइत कमला नदी वहैत अछि आ एतऽ ऋर्षी विश्वामित्रक मन्दिर सेहो अवस्थित अछि । (१५) जनकपुर ः— भारतक विशौल पश्चात परिक्रमाक अन्तिम पडावस्थलक रुपमे नेपाल स्थित मिथिलाक राजधानीक रुपमे विश्व प्रसिद्ध रहल जनकपुरमे पहुँचिकऽ परिक्रमाबासी विश्राम करैत अछि । एतऽ रतुका विश्राम पश्चात अन्तिम प्रहरमे अन्तगृही परिक्रमा करबाक परम्परा रहल अछि । जानकी आ राममन्दिरके केन्द्रविन्दु मानिक अन्तगृही परिक्रमा होइत अछि । एतऽ सम्मत जरौलाकवादमे मिथिलामे होली अर्थात फगुआक डम्फ बजैत रंग आ अविरक वर्षा प्रारम्भ भऽजाइत अछि । सुजित कुमार झा पर कहल जाइत अछि, इख नहि भेल मनुष्य आ विष नहि भेल साँप कोन काजकेँ । तहिना साहित्यमे सेहो होइत अछि । कवि, लेखक अथवा साहित्यकार कहए चाहने बात पाठक अथवा श्रोता नहि वुझिसकल तऽ ओकर कोन अर्थ ? एकटा लेखक कहए चाहने अथवा देबए चाहने सन्देश श्रोता वा पाठक अनुसार फरक फरक हएत मुदा विनु सन्देशक ओ साहित्य विनु काजक होइत अछि । ओहन साहित्य चिरस्थायी सेहो नहि होइत अछि । मनोरञ्जनक लेल मात्र सिमित रहैत अछि । नहि तऽ ओहिकेँ लेल कवि, लेखक अथवा साहित्यकारकँे भरमग्दुर प्रयत्न करए पड़ैत अछि । अपन रचनाकँे चिरस्मरणीय बनाबए तथा ओहिकँे सान्दर्भिकताक लेल साहित्यकारकँे बहुत प्रयत्न करए पड़ैत अछि । तएँ आबए बला पुस्तासभक समयमे सेहो ओ रचनाक सान्दर्भिकता रहौक । हालहि मैथिली साहित्यक नवउदयीमान कथाकार एवं पत्रकारसुजीतकुमार झाक कथा संग्रह जिद्दीक सम्बन्धमे किछु लिखबाक प्रयत्न कएने छी । इएह भादव २३ गते महोत्तरी जिल्लाक जलेश्वर स्थित नेपाल पत्रकार महासंघ महोत्तरी शाखाक सभाहलमे आयोजित समीक्षा तथा परिचयात्मक कार्यक्रममे उठल सवालसभकेँ सेहो मनन कएलहुँ आ ई कथा संग्रह पढि कऽ अपन मोन भितर उठल बातसभकँे एतह रखवाक प्रयास कएलहुँ अछि । साहित्यकँे विविध विधासभमे सँ कथा विधा सेहो एक अछि । गद्य विधाकेँ एक सशक्त आ छोट समयमे पढि कऽ सम्पन्न करय बला आ प्रशस्त सन्देश देवाक सामथ्र्य कथामे होइत अछि । कविशेखर ज्योतिरीश्वर ठाकुर सँ शुरु भेल मैथिली साहित्यकँे गद्य अखन धरि अनवरत रुपमे आगु बढि रहल अछि आ गद्यकँे एक सशक्त विधा कथा रहल अछि । कथामे कोनो एक पक्षक बातकेँ उठाओल गेल अछि जे ई विधा पुरान मानल जाइत अछि । । पहिने–पहिने उपदेशात्मक कथासभ, नैतिक कथासभ, परिक कथासभ , भगवान आ दैत्यक कथासभ सुनाओल जाइत छल । धीरे धीरे सामाजिक घरातलक यर्थाथताकेँ समेटि कऽ यर्थातवादी कथासभ लिखाए लागल । मैथिली कथा साहित्यकेँ बात कएल जाए तऽ बहुत लम्बा परम्परा नहि रहलाक बादो एहिकँे गुणात्मक रुपमे नीक स्थिती रहल अछि । संस्कृतक कथासभकँे अनुवाद सँ शुरु भेल मैथिली कथा साहित्यकँे शुरुवात पत्रपत्रिका सँ भेल तथ्य रहल अछि । मैथिली पत्रपत्रिकाक प्रकाशन संगहि मैथिली कथा साहित्यकँे शुरुवात भेल मैथिली साहित्यिक इतिहास पुस्तकमे उल्लेख अछि । बासुदेव ठाकुरक सप्तध्याधा सँ शुरुवात भेल मैथिली कथा साहित्यकँे इतिहास अखन धरि रातो नदिमे बहि रहल पानि जेकाँ अछि । कोनो नदिमे जहिना बाढि अबैत अछि आ चलि जाइत अछि । ओहिना साहित्यमे सेहो प्रकाशनक बाढि आएल आ सुखाएल । संख्यात्मक रुपमे ओतके कथा संग्रहक प्रकाशनसभ नहि रहलाक बादो गुणात्मक रुपमे कोनो भाषा सँ मैथिली कथाक स्तरीयता कम नहि अछि । कथाक विभिन्न वादसभमे मैथिली साहित्यकारसभ कलम चलौने देखल गेल अछि । बासुदेव ठाकुरक सप्तध्याधा सँ शुरु भेल मैथिली कथा साहित्य लेखनीक इतिहासमेृ पं. सुन्दर झा शास्त्रीक अखनु बखारी नै फुजलै, डा.धीरेन्द्रक हिचुकैत बहैत सेती, डा.राजेन्द्र बिमलक इ कथा हमरे थिक, राम भरोस कापड़ी भ्रमरक कथा संग्रह तोरा संगे जयबौ रे कुजवा, डा.रेवती रमण लालक माधव नहि अएला मधुपुर सँ, डा.सुरेन्द्र लाभक कथायात्रा, अयोध्यानाथ चौधरीक एकटा हेरायल सम्बोधन, राजेश्वर नेपालीक सोमली, वृशेष चन्द्र लालक माल्हो आ सुजीतकुमार झाक चिडैं पश्चात आएल जिद्दी कथा संग्रह मुख्य अछि । एहिकेँ बाहेक बहुत कथा संग्रह आ कथासभ मैथिली साहित्यमे प्रकाशन भेल अछि जे उत्कृष्ट सेहो अछि । डा. धीरेन्द्रक अभिभावकीय परम्परामे बढल मैथिली कथा साहित्यमे विषयवस्तुक व्यापकता, राजनीतिक वदलावक प्रभाव, नेपालीय माटिपानिक गंध, पारिवारीक, सामाजिक, साँस्कृतिक आ राजनैतिक जीवन आ ओतए सँ पड़ल उतार चढाव देखल जाइत अछि । कथाशिल्पक दृष्टि सँ नव–नव प्रयोग सेहो देखल गेल अछि । तहिना उतारचढावक बीच वितल समयमे नेपालीय माटिमे मैथिली कथा संग्रह जिद्दीक प्रकाशन भेल अछि । कथाकार सुजित कुमार झाक पहिल कथा संग्रह चिडै आ तकरबाद आएल रिपोर्टर डायरी आ तेसर कृतिक रुपमे आएल कथा संग्रह जिद्दी वास्तवमे मैथिली साहित्य भण्डारमे बृद्धि भेल अछि । हुनकर दुनू पुस्तक सँ परिमार्जित आ सशक्तरुपमे जिद्दी कथा संग्रह आएल कहबामे कोनो भांगठ नहि अछि । कथा संग्रह जिद्दीमे नेपालीय मैथिली नारीसभक विषयवस्तुसभ उठाओल गेल अछि । एहि संग्रहक मुख्य पात्रसभ नारी अछि तऽ कथा सेहो नारीक आसपास घुमैत रहल कथा संग्रह जिद्दी नारीवादी कथासंग्रहकेँ रुपमे आगा आएल अछि । कथाकार सुजित कुमार झाकेँ नारीवादी कथाकारक रुपमे देखल गेल अछि । कथा संग्रह जिद्दीमे कथाकार नारीक सामाजिक, साँस्कृतिक, राजनीतिक स्तर पड़ल प्रभाव, एहि सँ सामाजिक जनजीवनमे पड़ल असर, अगामी दिनमे एहि सँ पड़ल जाएबला सामाजिक विखण्डनक खतराकेँ सुक्ष्मरुपमे देखल गेल अछि । कथा संग्रह यर्थातक धरातलमे ठाढ़ अछि । यद्यपि ई कथा संग्रह बेसी आदर्शोन्मुख यर्थातवाद दिस गेल अछि । एक दर्जन कथा समाविष्ट रहल कथासंग्रह जिद्दीमे हरेक कथा एक अलग छाप छोड़ए सफल भेल अछि । कथाक अन्त नहि पढए धरि कथावस्तुक शिर्षक अपुर्ण लगैत अछि । मुदा कथा पढलाक बाद एक निमेषमे मिथिलाञ्चलक धरातलीय यर्थात मानस पटलपर आबि जाइत अछि । पारस्परिक स्नेह, विश्वास, बलिदान, सेवा, करुणा, अनुशासनक धरातलमे रहि कऽ अपन मोन, सम्मान बचौने मिथिलाञ्चलमे ओ बातसभ समयानुक्रममे घटल घटनाक प्रेरणा सँ कथा जन्मल अछि । आ कथाकार कथासभक मार्फत ओ बातसभकेँ पुनःस्थापना होएबाक बात पर जोड़ देने छथि । सरसरती रुपमे माला बनाएल शैलीमे आगा बढैत जाएब आ अन्तमे पाठककेँ सोचमग्न बनाबैत कथाक इतिश्री करब कथाक महत्वपूर्ण बाट अछि । कथा संग्रहमे रहल १२ टा कथासभ मे सँ सभ उत्कृष्ट रहल अछि । पहिल कथा पूmल फुलाइए कऽ रहलमे महिलाक अथक प्रयास आ दृढ इच्छाक नमुना प्रस्तुत कएल गेल अछि तऽ महिलाकेँ एक्को् बेर नहि पुछि अभिभावक लडकीक विवाह करब, विवाहक समयमे लड़का पक्षद्वारा झुठ बाजब, दहेज आ रंगक कारण विवाहमे समस्या आएब सहितक समस्याकेँ सेहो देखाओल गेल अछि । जे समस्या मिथिलाञ्चलक घरघरमे रहल अछि । जेना उच्च विचार आ अथक प्रयास पश्चात इलेनोर रुजबेल्ट सँ अपन अपांग पतिकेँ राष्ट्रपति सन गरिमामय पदमे पहुँचाओल गेल छल । पूmल फुलाइएकऽ रहलमे जगदीशकेँ पिंकी अपन दृढ इच्छा शक्ति आ प्रयत्न सँ सहायक स्टेशन मास्टर बनाए कऽ छोडलन्हि । तहिना दोसर कथा नव व्यपारमे आधुनिक होइत गेल महिलाक जीवनशैली आ एहि सँ पड़ल जाएबला पारिवारिक कलहकेँ एकटा विम्वक आधारमे उजागर कएल गेल अछि । खाली घर सँ साउस, पुतहुँ आ पति बीचक अन्तरद्धन्द्ध, साउस पुतहुँक कलह, दाइकेँ पोतापोती प्रतिकँे मोहक संग संग दोसर भावनाकेँ कदर नहि कएला पर परिणामकेँ उजागर कएल गेल अछि । दू विचार, दू समयक प्रतिनिधित्व सेहो कएने अछि । तहिना लाल डायरी कथा हिन्दु आ मैथिली समाजमे रहल अन्धविश्वासकेँ देखाओल गेल अछि । जिद्दी कथा सँ अभिभावक जेना बेटा बेटीकेँ अनुशासनमे रखैत अछि । तहिना बेटा बेटी बनबाक यर्थातताकेँ स्वीकार कएने अछि । तहिना समयमे नहि चेतल गेल तऽ जिद्दीक परिणाम की होइत अछि से प्रष्ट अछि । बिना छलकपट, निर्देष आ व्यवहारिक भऽ मेहनत कएलापर सफलता अवश्य भेटैत अछि सन्देश जादु कथा छोडने अछि । ओतबे मात्र नहि आदर्श, अर्थहीन यात्रा, व्यर्थ उडान आ निष्ठा की देखावा कथामे नारी चरित्रक मनोविष्लेषण कएल गेल अछि । समाज की कहत ? दिखावाकँे लेल समाजमे भऽरहल कृकृत्य आ हदकँे वयान ओ कथासभमे कएल गेल अछि । तहिना केहन सजायमे धर्मपुत्रीक रुपमे घरमे आएल चमेलीकेँ हुनक घरपरिवार आ सतबा माएकेँ अपन बेटा भेलाक बाद कएल गेल व्यवहार आ ओकरबाद चमेली भोगने पीडाकेँ देखाओल गेल अछि । अन्तिम कथा मेनकामे राजिव सरकँे व्यवहार आ स्नेह सँ मेनकाक मोन भितर उब्जल उतार चढावकेँ देखाओल गेल अछि । समग्रमे कहल जाए तऽ कथा संग्रह जिद्दी बेसी आदर्शबादक नमुना प्रस्तुत कएने अछि तऽ महिलाकेँ मुख्यपात्रक रुपमे ठाढ़ अछि । समाजक विकृति, विसंगती, नीक बेजाए सभक हकदार प्रत्यक्ष वा अप्रत्यक्ष रुपमे महिला भेल वयान कएने अछि । तहिना मिथिलाक नारीसभकेँ आगा आ स्वछन्द भऽ आगा बढबाक प्रेरणा सेहो ई कथासंग्रह देने अछि । महिलासभक पक्षमे वकालत सेहो करैत अछि । मुदा की अपनासभक समाजमे आबि रहल पश्चिमी संस्कृति आ ओकर विकृति, विसंगतीक जिम्मेवार महिला अछि । की महिला आब जननीक बदला संहारकर्ता बनि रहल अछि । की मिथिलाक नारी आब सीता जेकाँ प्रतिव्रता आ सीता जेकाँ बनए सँ चुकल छथि ? यावत गम्भीर प्रश्नसभ सेहो ई कथासंग्रह उठौने अछि । पुरुषवादी सोच आ मानसिकताक कारण ई प्रश्नसभ जायज हएत ? मुदा महिलाक कारण समाज बदलल, समाज नीक आ सुशिक्षित बनैत गेल यर्थात कथाकार देखए नहि सकल अछि । साहित्यकार समाजक यर्थातताकेँ लाबि कऽ अपन रचना मार्फत सभक समक्ष पहुँचेबाक काज कएने छथि । कहल जा रहल अछि कोनो समाजक अध्ययन करवाक चाही तऽ ओ समाजक साहित्य पढलापर पहुँच जाएत । एहि सँ साहित्यकारकेँ गम्भीर आ चेतनशील भऽ रचना करय लेल प्रेरित करैत अछि । कथाकार पुरुषकेँ दोष नहि देखौने छथि । की मैथिली समाजमे सभ दोष महिलेके होइत अछि पुरुष मात्र रबर स्टाम्प अछि । ई सभ बात नहि आएब कथासंग्रहक कमजोर पक्ष सेहो देखल गेल अछि । कतिपय कथा दुखान्त सँ सुखान्त दिस आगा बढल अछि । कतेको स्थानमे दुःखान्त सँ शुरु भऽ दुःखान्तमे जा समाप्त होइत अछि । कथाकार सुजित कुमार झाक रचनासभ आओर उत्कृष्ट रचनासभ आबैक तकर अपेक्षा अछि । एक प्रकारक शैली सँ कथासंग्रहकेँ कनी ओझराहटिमे रखलाक बादो यर्थातताकेँ दृष्टिकोण सँ अब्बल अछि । भाषाशैली, मैथिली कहवी, प्रकृति तथा व्यक्ति वर्ण सेहो बढिया आ मिठासपूर्ण रहल अछि । पुस्तकक नामाकरण युगानुकुल कथासभ आएल अछि से सुखद बात अछि । मैथिली कथा साहित्यमे रौदी पड़ल समयमे एकहि वर्षमे दू दू टा कथा संग्रह आएब वास्तवमे कठिन काम अछि । मुदा ओ चुनौतीकेँ सेहो स्वीकार करैत सुजितक संग्रह प्रशंसनीय अछि । तहिना आफन्त नेपाल सेहो कथा संग्रहकेँ प्रकाशन कऽ बजार धरि लौने प्रति धन्यवादक पात्र रहल अछि । मैथिली साहित्य क्षेत्रकेँ एकटा आशाक केन्द्र आ भरोसाक साहित्यकारकेँ आगा बढाएब प्रात्ेसाहन कएने काजक लेल आफन्त नेपालकेँ साधुवाद देबहे पड़त । भालचन्द्र झा, मैथिलीक अतिरिक्त हिन्दी, मराठी, अग्रेजी आ गुजरातीमे निष्णात। १९७४ ई.सँ मराठी आ हिन्दी थिएटरमे निदेशक। बीछल बेरायल मराठी एकांकी-मराठीसँ मैथिली अनुवाद। बाल-शिक्षणपर निबन्ध- हमर शिक्षण-यात्रा १ ई गोट पचीस- तीस बरख पुरान गप्प अछि। तहिया हम नव-नव ए.टी.डी. (आर्ट टीचर्स डिप्लोमा) कएने रही। मुम्बइक (तखन बम्बइ रहै) एक गोट प्रसिद्ध स्कूलक प्राथमिक विभागमे सहायक शिक्षकक रूपमे नाकरी धऽ लेलहुँ। आध दिन नोकरी आ अाध दिन अपन कॉलेजक अगिलुका पढ़ाइ। किछुए दिनमे हमर पढ़एबाक पद्धतिकेँ लऽ कऽ अभिभावक सभक उपराग आबऽ लगलैक। नहूँ-नहूँ ई उपरागक स्वर कनेक ऊँच बुझाए लागल। बात मुख्याध्यापक धरि पहुँचि गेलै। मुख्याध्यापक शैक्षणिक क्षेत्रमे राष्ट्रपति अवार्ङसँ विभूषित छलाह। अपन काजक प्रति एतेक समर्पित, जे जाहि दिन हुनकर अपन बेटीक बियाह रहनि, ओहू दिन अपन काजक क्षतिपूर्तिक वास्ते भोरमे पाँचे बजे अपना टेबुलपर हाजिर। आ ककरो कानोकान खबरि धरि नहि। ने किओ प्यून आ ने कोनो सहायक। मुहूर्तक समएसँ किछु पहिने फोन कऽ देल गेलनि तँ कन्यादान करबाक हेतु विवाह मण्डपमे पहुँचलाह (महाराष्ट्रमे विवाह दिनमे होइत छै)। एकदिन हठात प्यून आबिकऽ हमरा हुनक समाद देलक जे ‘हेड गुरूजी अपनेकेँ याद कएलनि अछि’। एहने बिना कोनो कारणक ओ ककरो डिस्टर्ब नहि करैत छलाह। खासकऽ हमरा। हमरा सँ कनेक विशेष लगाव होएबाक कारण। जे हम ओहिकालक शिक्षक सभक लॉटमे नवतुरिए रही। दोसर जे कला शिक्षकक हैसियतसँ हम बिनु ककरो कहने अपने मोनसँ स्कूलमे अनेक तरहक विधाक काज करी। रूटीनसँ हटिकऽ किछु-किछु नब-नब प्रयोग करबामे हमरा बड्ड मोन लागए। किछु विषयान्तर तँ होएत मुदा एतऽ उदाहरणक वास्ते एक-दू गोट छोट-छिन प्रसंग कहब आवश्यक हएत। शिशु-वर्गक नेन्ना सभ जहन पहिल-पहिल बेर स्कूल अबैत अछि तँ माए-बापकें छोड़ैत नञि रहैत छैक। कनैत-कनैत अपस्यॉंत भेल रहैत छैक। झौहरि तँ एतेक पड़ैत छैक जे कान नञि देल जाइत छैक। स्कूलक पूरा स्टाफ ओकरा सभकें तरह-तरहसँ बौंसऽ मे लागल रहैत अछि। हमहूँ ओहि प्रयासमे लागल रही। नेन्ना सभक ध्यान बँटेबाक वास्ते हम किछु कागज आ ऑइल पेस्टल (मोमक रंग-पेन्सिल) आनि कऽ ओकरा सभक सोझाँमे राखऽ लगलिऐक। परिणामो जल्दीये देखाए लागल। ओहिमे सँ किछुकें तँ ओ कागज आ पेन्सिल देखिते मातर तरबा लहरि मगजमे पहुँचि गेलै। ओ सभ कागजकेँ हाथमे लऽ कऽ ओकरा चिर्री-चिर्री कऽ देलकै। पेन्सिल टुकड़ी-टुकड़ी कऽ कऽ बीगि देलकै। एक गोट नेन्नाकें जहन हम बहुत फोर्स केलिऐ तँ ओ हमरा हाथसँ पेन्सिल छीनि कऽ सामने राखल कागजपर जेना टूटि पड़ल। हाँञि-हाँञि कऽ पेन्सिलकेँ कागजपर घसऽ लागल। एक बेर जे कागजपर पेन्सिल रखलकै से फेर बिनु उठौनहें पूरा कागजकें भरि देलकै। मुदा एहि के बाद ओ शांत भऽ गेलै। भऽ सकैये, ओकर एनर्जी जबाब दऽ देने होइ। अथवा ओ हमर प्रतिक्रियाक प्रतीक्षा करऽ लागल हुअए। वा हमर प्रति अपन क्रोधक प्रदर्शन करबाक वास्ते ओ एहि माध्यमक उपयोग केलाक बाद शांत भऽ गेल। बहुत दिन धरि हम एहि विषएमे सोचैत रहलहुँ। से किएक तँ पूर्ण विश्वास अछि जे छोटोसँ छोट, प्रत्येक कृतिक (Act) किछु अर्थ होइत छैक, किछु प्रयोजन होइत छैक। भने आइ ओहि विशिष्ट कृतिक सार्थकता दृष्टिपथमे नहि आबए। मुदा बिना कोनो प्रयोजने कृति भऽ नञि सकैत अछि। कमसँ कम एतेक तँ बुझबामे आबिये गेल जे आत्म-प्रगटीकरण हेतु चित्रकला सन प्रभावी दोसर माध्यम नहि। जाहि माध्यममे बिना कोनो संस्कार वा व्याकरणकेँ नेन्नो अपन मोनक गप्प व्यक्त कऽ सकैत हुअए, ओहिसँ सरल आ श्रेष्ठ कोन माध्यम भऽ सकैत अछि ? किछु दिनक बाद जहन नेन्ना सभ स्कूलक माहौलसँ घुलि-मिलि गेल, हम एही तरहक एक गोट आर प्रयोग कएल। एक गोट कक्षाक साफ-सफाइ करा कऽ पूरा फर्शपर उज्जर प्लेन कागज पसारि देलिऐक। कोठरीमे एक गोट स्पीकर टँगवा देलिऐक । आ डोलमे भित्र-भित्र रंगकें घोरि कऽ कोठरीक बाहरक जमीनपर हेरा देलिऐक, जाहिसँ कोठरीमे जाइ काल ओकरा सभकें ओहि रंगेपर सँ जाए पड़ैक। आ तकर बाद कोठरीक स्पीकरपर नेन्ना सभक कोनो परिचित गीत शुरू कऽ देलिऐक। नेन्ना सभकें खालीए पएर ओहि कोठरीमे जएबाक लेल कहि देल गेलैक। अनेक रंगसँ पोताएल तरबा लऽ कऽ गीतक तालपर नेन्ना सभ ओहि उज्जर प्लेन कागजपर नाचऽ लागल। ओहि कागज परक रंग-बिरंगा छापकें देखि कऽ ओकर सभक जे प्रतिक्रिया भेलैक तकर वर्णन कोनो प्रतिभाशाली, संवेदनशील कवि कऽ सकैत छल। तकरा बाद तँ ओ सभ अपनेसँ बाहर जा-जा कऽ अपना पसंदक रंगमे पएर पोति-पोति कऽ भरि पोख अपन तरबाकें ओहि कॅनवासपर अंकित करऽ लागल। एहि तरहें बनल रंग-छापकें (Colour Print) चुनि-चुनि कऽ जहन ओकर फ्रेम बनाओल गेलै, तहन तँ ओकर सौंदर्य आर निखरि गेलैक। ओहि फ्रेमकें शिशुवर्गक कक्षा सभमे टाँगि देल गेलैक। तकरा बाद बहुत दिन धरि नेन्ना सभ अपन-अपन पएरक छाप चीन्हऽ मे अपन आनन्द हेरैत रहल। कहक माने ई जे एहि तरहक प्रयोग सभसँ हमर मुख्याध्यापक बड्ड प्रसत्र होथि। प्यून जखन हुनक समाद देलक तँ हम पहिल फुरसतिमे हुनकर केबिनमे पहुँचि गेलहुँ। ओ जाहि तरहें वातावरण बनबऽ लगलाह ओहिसँ ई बुझबा मे कनेको भाङ्गठ नहि भेल जे कोनो गम्भीर बात छैक। खैर ओकर अधिक विस्तारमे नहि जाइत एतऽ एतबे कहब जरूरी अछि, जे अभिभावक सभ हमर पढ़एबाक पद्धतिक विरोधमे हुनका धरि पहुँचि गेल रहथि। मिला-जुला कऽ उपराग एतबे जे ‘अहाँ नेन्ना सभकेँ चित्र बनाएब नञि सिखबैत छिऐक। घरमे नेन्ना सभक चित्र पूरा करबाक जिम्मेदारी माए-बापकें उठबऽ पड़ैत छैक।’ उपराग सुनिते एहि तरहक सोचक मूल स्रोत बुझबामे भाङ्गठ नञि भेल। एहि तरहक सोचक मूल स्रोत छैक प्रचलित शिक्षा पद्धति। हम सभ जाहि शिक्षा-व्यवस्थाकें अंगिकार कएने छी, ओकर सभसँ भारी समस्या हमरा जनितब इएह जे एहि शिक्षा-पद्धतिसँ नेन्ना सभक मोनपर जाहि तरहक संस्कार पड़ब अपेक्षित से नञि भऽ रहल छैक। विद्यार्थीकें स्वयंसिद्ध बनएबामे जाहि तरहक ज्ञान, मेहनत आ संयमक आवश्यकता होइत अछि, ओकर पूर्ण अभाव। किताबमे छपल शब्द पढ़ि देलहुँ वा पढ़वा देलहुँ। ओही महक किछु शब्दक पर्यायवाची शब्दक अर्थ कहि कऽ पड़सि देलहुँ। भऽ गेलै! छुतिका छुटि गेलै। स्वाइत गुरूदेव रविन्द्रनाथ ठाकुरकें ‘शान्तिनिकेतन’ आरंभ करबाक आवश्यकता बुझेलनि ! आ हम सभ एखनो धरि वएह लकीरक फकीर बनाबऽ मे लागल छी। नवीनताकेँ स्वीकारब तँ हमरा सभकें जेना पापे बुझाइत रहैत अछि। तें एहि युगक महान वैज्ञानिक आइन्सटाइनकें ई कहऽ पडलनि, जे ‘हमर शिक्षा-दीक्षा तँ ओही दिन समाप्त भऽ गेल, जाहि दिन हमरा स्कूलमे भर्ती करा देल गेल।’ कला जकाँ सृजनशील विषएक अवस्था कोनो भित्र नञि अछि। ब्लैकबोर्डपर कोनो चित्र खीचि देल आ नेन्ना सभकेँ ऑर्डर भऽ गेल, जे एकरा देखिकऽ चित्र बनबै जाऊ। भऽ गेलै। आब अपने टाइम-पास करबाक हेतु फ्री छी। गार्जियनो सभ एहिना सिखने छथि। तें नेन्नाकें कॉपी भरल देखलन्हि आ भऽ गेलाह प्रसन्न, जे चलू, पढ़ाई भऽ रहल छैक। कॉपी भरि रहल छैक। मुदा ओ सभ ई नञि सोचैत छथि, जे ब्लैकबोर्डपर बनाएल चित्र तँ कोनो वयस्कक दिमागक प्रतिमा (Image) छैक। नेन्ना सभक दिमागमे ओहि प्रतिमाकेँ स्थापित करबाक धडफड़ी किएक ? नेन्ना सभक दिमागक विकास-क्रमक अनुरूप ओकर अपनो किछु प्रतिमा हेबे करतैक। ओकरा सोझा अनबाक प्रयास किएक ने, जाहिसँ ओकर अपन स्वतंत्र विकास होइ? एहि बातकें एहि तरहें बूझल जाए। मानि लिअ जे वयस्क शिक्षक अपन विकसित (! ) दिमागसँ एकगोट फुजल छत्ताक चित्र ब्लैकबोर्ड पर बना कऽ नेन्ना सभकें ओकरा बनाबऽ लेल कहैत छथि। ब्लैकबोर्डपर चित्रित फुजल छत्ता, भौमितिक आकारक अनुरूप साधरणतया अर्धगोल देखाइत छैक। मुदा अहाँ देखबैक जे नेन्ना सभक मानस पटलपर भौमितिक आकारक मिती (Dimension) स्पष्ट नहि भेल छैक। पचमा- छठमा दर्जामे जहन भूमिती पढ़ाएल जेतैक तँ ओकरो दिमागमे मितीक अंतर स्पष्ट भऽ जेतै। एहि अवस्थामे वयस्क शिक्षक जहन अपन चित्रक तुलनामे नेन्ना सभक चित्रमे ‘गलती’ सुधारऽ लगैत छैक तँ नेन्ना सभ बाजि तँ किछु नञि सकैत अछि। मुदा भीतरे-भीतर ओकरा सभक दिमागमे घोंघाउज (Confusion) शरू भऽ जाइत छैक। किएक तँ ओकरा जनितबें ओहो वएह चित्र बनौने अछि। तहन गलती कोन तरहक भेलैक, से बुझबाक प्रगल्भता एखन ओकरामे विकासित नहि भेल छैक। नेन्ना सभक चित्र वयस्क सभक चित्रसँ भिन्न भने देखाइत हुअए, मुदा गलत नहि भऽ सकैत अछि। तें हमरा जनितब नेन्ना सभक चित्र देखबाक नञि पढ़बाक वस्तु होइत अछि। एहि बातकें जखन चित्रकला सिखाबऽ बला शिक्षके नञि बुझैत छथि तँ सामान्य स्त्री-पुरुषक कथे की ! ब्लैकबोर्डपर चित्र बना कऽ पढ़ाएब नेन्ना सभक स्वतंत्र सोचपर अन्याय करब भेलैक। ओकरा आश्रित बनेनाइ भेलैक। हम योजित विषयपर नेन्ना सभक स्तरपर चर्चा कऽ ओकरा सभकें प्रेरित करबामे अधिक विश्वास राखैत छी, जाहिसँ ओकरा सभक मानस पटलपर ओहि विषएकेँ लऽ कऽ ओकर अपन स्वतंत्र बिम्ब बनौ, आ तकरा बाद ओ सभ अपन क्षमताक अनुरूप कागजपर ओकरा उतारए। भनहि ओ चित्र वयस्क सभक दृष्टियेँ कतबो बेढब, आकारहीन, मितिहीन होइ मुदा ओहि चित्रमे नेन्ना सभक अपन व्यक्तित्व हेतैक, ओकरासँ अपनत्व हेतैक, ओकर आत्मविश्वास बढ़तैक, स्वतंत्र रूपसँ अपन दिमाग लगएबाक आदति लगतैक। नेन्ना सभक चित्रमे एहिसँ अपेक्षा हमरा अपराध बुझाइत अछि, किएक तँ एखन ई विषए पढ़एबाक मूल उद्देश्य, एहि विषएक प्रति ओकरा मोनमे आत्मीयता उत्पन्न करब छैक, ओकरा चित्रकार बनेनाइ नञि। ई तँ काले तए करतै जे ओ चित्रकार बनत की नञि। एहि विषएक माध्यमसँ ओकरामे खाली नवनिर्माणक क्षमताक प्रति आस्था जागृत कएल जा सकैत अछि। एक गोट ठोस उदाहरणसँ एहि संकल्पनाकें आर बेसी स्पष्ट कएल जा सकैत अछि। साधारण रूपसँ जहन नेन्ना सभकेँ मुर्गीक चित्र बनेबाक लेल कहल जाइत छैक तँ ओ मुर्गीक पेटमे अन्डा सेहो देखबैत छै। आब हम सभ तथाकथित संस्कारसँ ग्रस्त लोक जहन ई चित्र देखैत छी, तँ गुम भऽ जाइत छी। जे केहन मतसुन्न नेन्ना अछि ई ? मुर्गीक पेटमहुक अन्डा कतऽ सँ देख लेलक ई ? बस लगलहुँ ओकरा हूथऽ ... तरह-तरहसँ ओहि महक गलती बुझाबऽ। चीजक ‘असलियत’ बुझने, लगलहुँ ओकरा ‘असली’ चीजक अर्थ बुझाबऽ। असलियत ई अछि जे आठ-दस साल धरि नेन्ना सभकें यथार्थ दृष्टि प्राकृतिक रूपसँ भेटल रहैत छैक। एकरा दोसर शब्दमे ‘एक्स रे’ दृष्टि सेहो कहि सकैत छिऐक। प्रत्येक वस्तुकें देखबाक ओकर अपन दृष्टिकोण होइत छैक। वस्तुकें आर-पार ओ देख सकैत अछि। मुदा हमरा सभक दृष्टिमे ओकर एहि दृष्टिकें कोनो मोजरे नञि। हम सभ सदखनि अपन तथाकथित वयस्क (!) संस्कारित दृष्टिकोणसँ सभ चीजकें नपबाक अभ्यस्त छी। तैं ओकर यथार्थवादी दृष्टिकोणकेँ पढबामे हम सभ सक्षम होइत छी। ई रहने हमरा आओर तँ बुझितिऐक जे नेन्ना जहन मुर्गीक आङ्गिक विशेषताक बारेमे ख्याल करैत छैक तँ ओकर यथार्थवादी दृष्टिकोण इएह कहैत छैक जे मुर्गी अन्डा दैत छै। ई सोचिते ओकर मोन कहैत छै, एकर माने कतहु अन्डा जमा हेतैक। तुरत ओकर स्मरण ओकरा मदद करक वास्ते हाजिर भऽ जाइत छैक। माएसँ सुनने अछि, मुँहसँ खाएल अन्न पेटमे चलि जाइत छैक। माने पेटमे जमा होएबाक जगह छैक। ओ पेटमे अन्डा देखा दैत छैक। एहि प्रक्रियामे ओ गलत कोना आ कतऽ भेल? रहल वैज्ञानिक सत्यताक गप्प। तँ जेना-जेना ओकर उम्र बढतैक, उपरका दर्जामे ओ जाएत, ओकरा ईहो स्पष्ट भऽ जेतैक। एखनि तँ शिक्षकक उद्देश्य ई होबाक चाही जे ओ निडरतासँ अपना आपकें व्यक्त करबामे सक्षम हुअए। हमरा बुझने अपन कल्पना लादि कऽ शिक्षक आ गार्जियन सभ ओकर प्राकृतिक यथार्थकें, तार्किक दृष्टिकोणकें, ओकर स्मरणशक्तिक विकासकें कुंठित करबामे लागल छथि। सभाक उपसंहार करैत हम एतेक अवश्य कहलियन्हि, जे जाहि दिन नेन्ना सभक चित्रमे अपने सभ दखल देब बन्न कऽ देबन्हि, ओही दिनसँ नेन्ना सभक मानसिक विकास शुरू भऽ जेतैक। २ दुइये बरखमे मास्टरीसँ हमर मोन उपटि गेल। नोकरी छोडि देलहुँ। मुदा ई भाव सदिखन बनल रहल जे हम स्कूल नञि, अपन सिखबाक प्रयोगशाला छोडि़ रहल छी। मुदा ईहो स्थिति बहुत दिन धरि नञि रहल। पुरना स्कूलक एक गोट स्टाफ हमर अभित्र छलाह। एकदिन हमरा अचक्के भेट गेलाह। कहऽ लगलाह जे एक गोट शिक्षक एक गोट झुग्गी बस्तीमे स्कूल खोलि रहल छथि। ओकर विशेषता ई अछि जे ओहि स्कूलमे ओ एहने विद्यार्थीकेँ एडमिशन देबऽ चाहैत छथि जकरा कोनो आन स्कूलमे एडमिशन नहि भेटैत छै। गप्प वास्तवमे ध्यान देबऽ योग्य रहैक। एहन स्कूल खोलबाक हेतु तेहन ध्येयवादी शिक्षक सभक आवश्यकता हेतैक। अपन अभिन्नक मंतव्य बुझबामे हमरा कनियो भाङ्गठ नहि भेल। मुदा हमरा एकहि नोकरीमे ई बुझबामे आबि गेल छल जे मास्टरीमे जाहि तरहक संयम, स्थैर्य आ धैर्यक आवश्यकता होइत छैक, हमरामे ओकर लेशो मात्र नञि अछि। हुनका तत्काल हम कोनो वचन नञि देलियन्हि। असलमे हम फेरसँ ओहि रुटीनमे फँसऽ नहि चाहैत छलहुँ। मुदा ओ अपनहिसँ हमर नामक सिफारिश कऽ देलन्हि। किछुए दिनमे हमरा ओहि मुख्याध्यापकजीक समाद भेटि गेल। ई १९८१-८२ क गप्प अछि। एक गोट शिष्टाचारक धर्म बुझि हम हुनकासँ भेंट करबाक निश्चय कएल। मुदा हुनक कथा-वार्तासँ हम बड्ड प्रभावित भेलहुँ। ओहो हमर प्रतिक्रिया स्वरूप टिप्पणीसँ प्रभावित बुझएलाह। हम ट्रायल बेसिसपर किछु दिनक हेतु हुनकर ऑफर स्वीकार करबाक निश्चय केलहुँ। एहिबेर हमर नियुक्ति माध्यमिक दर्जा (पँचमा सँ दसमा दर्जा) हेतु भेल रहए। झुग्गी बस्तीक ओहि स्कूलमे सभ तरहक अपराध बेरोकटोक चलै छल। दारू बनेनाइ, बेचनाइ, पिनाइ आ जूआ खेलेनाइ तँ बड्ड साधारण गप्प। बस्तीक स्वाभाविक अस्वच्छतासँ पसरल दुर्गन्धि आ दारूक गंधसँ स्कूलमे नाक नञि देल जाइ। स्कूलक खिड़कीक निच्चा जुआक दाँव लगै। ओ तँ धन्य कही मुख्याध्यापकजीक जे ओ निडरतासँ एहिसभ सँ निपटैत छलाह। लाठी लऽ कऽ खिहारि-खिहारि कऽ ओकरा सभकेँ भगबथि। आ स्कूलमे ओकरे सभक बेटा-बेटीकें पढ़एबाक भार उठाबथि। बेरोजगार युवक सभ महिला शिक्षिका सभकें बड्ड उछन्नरि दै। जान मुट्ठीमे लऽ कऽ सभ व्यवहार चलैक, किएक तँ कखन ककरासँ उट्ठा-बज्जरि भऽ जाए, एकर कोनो गैरेंटी नञि। अनुकूल परिस्थितिमे कोनो काजकें सफल बनेनाइ कोनो विशेष गप्प नञि। मुदा सभ तरहसँ परिस्थितिक प्रतिकूलतामे कोनो काजकें सफल बनेनाइ एकटा उपलब्धिये कहल जा सकैत अछि। आ सेहो शिक्षा जेकाँ एक गोट गंभीर तथा जिम्मेदारीबला क्षेत्रमे। मुख्याध्यापकजीक एहि साहसकें एक तरहें तपस्ये कहल जएबाक चाही। बस इएह एक गोट बात छल जाहि सँ हम हुनका दिसि आकर्षित भेलहुँ। एक गोट भित्र तरहक, शिक्षाक असली बेगरताबला नेन्ना सभक संग साथक अनुभव। स्कूलक टाइम-टेबुलमे ‘चित्रकला’ एकतरहें जगह भरऽ बला (Filter) विषयक तौरपर लेल जाइत अछि। टाइम-टेबुलमे सभसँ अग्रिम स्थान पाबऽ बला विषए होइत अछि गणित (हिसाब), दोसर मान विज्ञानक, तेसर मान देल जाइत अछि भाषाकें, ताहूमे अंग्रेजीक स्थान प्रथम, तहन मातृभाषा, तकरा बाद द्वितीय भाषा। चारिम स्थानपर इतिहास, भूगोल, नागरिक शास्त्रकें कोनहुना फिट कऽ देल जाइत छैक। तहन अबैत छैक नम्बर पॉलिसी मैटरबला विषए सभक, जेना कार्यानुभव, हस्तकला, चित्रकला, पी.टी., जकरा ‘खेल’ क नामपर शहीद कऽ देल जाइत छैक। सप्ताहमे एक-दू बेर सांस्कृतिक कार्यक नामपर अनेक तरहक छूटल-छिरियाएल विषएसँ छुतिका छोड़ा लेल जाइत छैक। अइ कथापर गौर केलासँ शिक्षाक दर्जा आ ओहिसँ होबऽबला परिणामक अंदाज अाबि सकैत अछि। आटा पीसऽबला मशीनकें देखियौ। ओकर मुँहमे गहूम अथवा आन कोनो अनाज उझील देल जाइत छैक। आ किछुए कालमे दोसर दिसिसँ पिसाए आटा बहरा जाइत छैक। आजुक शिक्षा-पद्धतिकें देखिकऽ हमरा ई स्कूलो सभ विद्यार्थी बनाबऽ बला बड़का-बड़का मशीने बुझाए लगैत अछि, जाहिमे प्रत्येक वर्ष विद्याक अर्थी उठाओल जाइत अछि। त्रुटि दृष्टिकोण (Vision) मे नञि, त्रुटि कार्यान्वयन (Execution) मे अछि। प्रत्येक विषयक अपन किछु विशिष्टता छैक। समय आ स्थानक मर्याद अछि। तैँ सम्प्रति मात्र किछु पॉलिसी मैटरबला विषएक सन्दर्भमे हम अपन विचार राखब। असलमे एहि सभ विषएकें दू गोट श्रेणीमे राखल जा सकैत अछि। दिमागमे तनाव पैदा करऽ बला विषए आ दिमागी तनावकें ढील (Relax) करऽ बला विषय। मुख्य विषए सभ कोनो ने कोनो सिद्धान्तक व्याकरणक ज्ञान दैत छैक। एहि तरहक विषए सभमे शरीर स्थिर रहैत छैक मुदा दिमागी एकाग्रता, सतर्कता, आ जागरूकता अपन चरमपर, जाहिसँ दिमागपर दबाव बनैत छैक। दोसर दिस हस्तकला, चित्रकला, संगीत, कार्यानुभव, पी.टी. (खेल) एहि तरहक विषए सभमे एक तरहक नवनिर्मितिक आनन्द भेटैत छैक। संपूर्ण शरीरमे भित्र-भित्र तरहक लय, ताल आ भंगिमामे कृतिशील रहलासँ मनोरंजनक अनुभति होइत छैक। एहिसँ तनाव आ दबावकें ढील होमएमे मदति भेटैत छैक। तें नेन्ना सभक टाइम-टेबुलमे एहि दूनू तरहक विषएकें एहि तरहें बान्हल जएबाक चाही, जाहिसँ समतोल (Balance) बनल रहै। जतेक सम्भव भऽ सकै, तनाव उत्पत्र करऽबला विषएक बाद, तनावकेँ मुक्त करबाक वास्ते दोसर तरहक विषएक रचना करबाक चाही। जाहि सँ अगिलुका विषएक तनाव झेलबाक क्षमता उत्पत्र भऽ सकए। अइमे मेहनति छैक, दिमागी छैक। योजनाबद्ध तरीकासँ काज करबाक परीक्षा छैक। के करत ? मुदा एहि विषए सभक योग्य नियोजनसँ की चमत्कार भऽ सकैत छैक तकर प्रत्यक्ष अनुभव हमरा एहि स्कूलमे कएल अपन प्रयोगसँ भेल। जाहि तरहक वातावरणसँ ई स्कूल घेराएल छल तकर वर्णन तँ ऊपर केनहे छी। एहन वातावरणमे के टिकए ? तें शिक्षक सभक कमी सदिखन बनल रहैक। कोटा पद्धतिसँ शिक्षकक नियुक्ति, तकरामे आर अड़चनि पैदा करए। बहुत रास विषएक शिक्षके नहि भेटै। आपसमे कहुना कऽ ऐडजस्ट करैत विषए सभ पढ़ाअोल जाइ। हमरो कोनो ने कोनो शिक्षकक क्षतिपूर्ति करबाक वास्ते बेगरतू कक्षामे पठा देल जाए। हमहूँ एकरा एक गोट मौका बूझि कऽ टाइम-टेबुलपर देल विषए पढाबऽ लागी। कतहु अंग्रेजी तँ कतहु मराठी, कतहु हिन्दी तँ कतहु आन कोनो विषए। ताबत ए.टी.डी. कएलाक बाद हम रुपारेल कॉलेजसँ बी.ए. कऽ लेने रही। थिएटर डिप्लोमा चलि रहल छल। तैं पँचमासँ दसमा धरिक नेन्ना सभकें विषए पढ़ेनाइ ततेक कठिन नञि बुझाए। हम बी.ए. अर्थशास्त्र लऽ कएने रही। तें दसमा वर्गमे अर्थशास्त्र पढ़एबाक जिम्मा हमरे दऽ देल गेल रहए। नियामनुसार ई ठीक नञि छल। किऐक तँ हमर नियुक्ति रहए स्पेशल शिक्षकक रूपमे। मुख्य विषए पढ़एबाक हेतु हम प्रशिक्षित नञि रही। मुदा मुख्याध्यापको मजबूर छलाह। दोसर कोनो उपाये नञि रहनि। अहिना एकदिन हमरा दिमागमे एक गोट बात आएल। जे एकहि कक्षामे एक गोट विद्यार्थी प्रथम अबैत छैक। आ ओकरे बगलमे बैसऽबला फेल भऽ जाइत छैक, से किएक ? दोसर बात जे फेल विद्यार्थियो कोनो विषएमे बढिञाँ अंक आनैत अछि तँ कोनोमे खराप, से किएक ? जखन कि कक्षा, शिक्षक, समए सभ एके रंगक होइत छैक। किछु कारण तँ अवश्ये हेतैक। विचार केला सन्ता ई बुझाएल जे जाहि विषएमे ओ बेसी अंक आनैत अछि ओहिमे अवश्ये एहन किछु गप्प छैक जे ओकरा पसिन्न छैक। तें ओहि विषएमे ओकर मोन अधिक रमैत छैक। दोसर विषएमे ठीक एकर उल्टा हेतैक। यदि ओहि विशिष्ट विषएमे सँ ओकर पसीन (Interest) केँ ताकि लेल जाए तँ दोसर विषएमे ओकर ओहि पसीनकें पैदा कऽ कऽ परिणाम बदलल जा सकैत अछि की नहि ? हम एहि दिशामे प्रयत्न करबाक निश्चए केलहुँ। ओहि समएमे प्रत्येक कक्षाकें विद्यार्थी-संख्याक अनुसार ‘अ’-‘ब’-‘क’-‘ड’-‘ई’ ...एहि तरहेँ भिन्न-भिन्न विभागक संरचना कएल जाए। एहि व्यवस्थामे ‘अ’-‘ब’ मे बढिञाँ, पास होबऽ बला विद्यार्थी आ ओकरा बादक दर्जामे सभ भुसकौल, फेल होबऽबला विद्यार्थी सभ राखल जाइ। आब अइ तरहक भिन्न-भिनाऊज करबाक अनुमति नञि छैक। मिझ्झर कऽ बैसाएल जाइत छैक। तँ हम आठमा ‘ड’ क चारि गोट विद्यार्थीकेँ हेरि ओकरा सभकें दत्तक लेबाक विचार कएलहुँ। माने एहि चारि गोट विद्यार्थीक परीक्षा-परिणाममे परिवर्तन अनबाक दृष्टिसँ हम ओकरा सभक मार्गदर्शन करबाक जिम्मा उठा लेलहुँ। विद्यार्थी सभक मानसिकताकें परखऽ लेल हम चित्रकलाकें आधार बनाओल। हमरा सफलतो दृष्टिगोचार होमए लागल। एहि प्रयोगक पराकाष्ठामे हमरा आश्चर्यजनक गप्प सभक पता लागल। पँचमा दर्जाक एक गोट विद्यार्थी हमरा एहेन भेटल, जकरा कोनो चित्र बनाबऽ कहिऐक तँ ओ अपन चित्रकलाक कॉपी ठाढ़े (Vertical) अवस्थामे पकड़ैक। पहिने तँ एहि बातकें हम कोनो गम्भीरतासँ नहि लऽ पेलहुँ। मुदा जहन एकर पुनरावृत्ति होमए लगलैक तखन हमर ध्यान एहि दिसि गेल। तकरा बाद तँ हम जानि-बूझि कऽ ओकर प्रत्येक कृतिकें अपन अध्ययनक (Study) विषए बना लेलहुँ। ओकर रचना, आकृतिक बनावट, रंगक चुनाव, रंगबाक पद्धति... ओकर प्रत्येक कृतिकें कखनो हम अलग (Isolate) कऽ कऽ देखिऐक तँ कखनो आन विद्यार्थी सभक तुलनामे। ई क्रम बहुत दिन धरि चलैत रहलैक। एकर चरम आबि गेलै ओहि दिन, जहिया हम विषए देने रहिऐक ‘हमर परिवार’ (My family) । ओकर ई चित्र जेना भक दऽ हमर आँखि फोलि देलक। एहि चित्रसँ जाहि तरहक निष्कर्ष निकलल ओहिकें ठीकसँ बुझबा लेल सर्वप्रथम ओकर चित्रक बनावटकेँ ठीकसँ बूझए पड़त। सभसँ पहिने ओकरा द्वारा कागजकें ठाढ़ कऽ कऽ पकड़बाक पाछाँक रहस्य बूझि ली। कॉपी ठढ़का आयतक आकार लऽ लैत छैक। जाहिमे चौड़ाइ कम आ लम्बाइ बेसी होइत छैक। एहिसँ ओ ‘जगहक संकोच’ दिसि हमर सभक ध्यान आकृष्ट करऽ चाहैत छल। छोट जगह ओकर नियति बनि गेल छलैक। स्थानक ई अभाव ओकरा दिमागपर एतेक हाबी छलैक जे ओ एहिसँ बाहर सोचिये नहि सकैत छल। आब ओकर चित्रक संरचनाक (Construction) विषएमे। कागचक भीतर दिसि चारूकात अंदाजसँ एक-दू इन्चक बॉर्डर छोडि़ कऽ ओ रेघ खिचने छल। जेना ठाढ़ आयताकार कागजक भीतर एक गोट आर ठाढ़ आयत। चित्रक परिपूर्णतामे ई डायनिंग टेबुल जकॉं देखाइत छल। डायनिंग टेबुलक छवि (Image) ओकरा लेल आइ-काल्हुक सिनेमा आ टीभी प्रोग्रामक देन छलैक, ई बूझल जा सकैत अछि। टेबुलक उपरका हिस्सामे दू गोट अल्पवयी नेन्नाक बीचमे एक गोट वयस्क स्त्रीकेँ चित्रित कएल गेल रहैक। ई सम्भवत: ओकर माए आ भाएक छवि छलैक। आ ओकरा सभक आगूमे थारी, बाटी, आ गिलास सदृश किछु समान सभ। निचलुका हिस्सामे केवल एक गोट नेन्नाक आकार। सम्भवत: ओ स्वयं। ओकरो आगूमे ओहिना किछु बासन सभ। टेबुलक बिचला पूरा हिस्सा खाली। रंगक नामपर जे रंग भेटलैक ओकरा ओ पोछि-पाछि देने रहैक। एहिमे प्रत्येक वस्तुक प्रति ओकर उदासीनता प्रकट भऽ रहल छलैक। मुदा ओहूमे गौर करबाक गप्प ई जे लाल रंगक उपयोग प्रमाणमे किछु बेशिये बुझाइत रहैक। ई ओकर मरखाहा (Aggresive) प्रवृत्तिक निदर्शक छलै। आर किछु छोट-मोट विशेषता (Details) भऽ सकैत अछि जे हम बिसरि गेल होएब। मुदा कुल मिला कऽ ओहि नेन्नाक मानसिकता बुझबाक दृष्टिसँ ओकरा द्वारा चित्रित दृश्यक एतबा वर्णन काफी अछि। ओहि चित्रकें लऽ कऽ एक गोट कला शिक्षकक रूपमे तथा प्रत्येक कृतिक पाछाँक सत्यक सन्धानमे रुचि राखऽबला एक गोट विद्यार्थीक रूपमे हमरा अपना जे बुझाएल ताहि दिसि देखी। चित्रक विषए रहैक हमर परिवार (My family)। ई चित्रित करबाक वास्ते विद्यार्थी द्वारा ‘खाइक बेर’ क दृश्यक चुनाव करब, हमरा जनितब ओहि नेन्नाक जागृत बुद्धिकेँ देखाबैत छल। किएक तँ मुम्बइ सन शहरमे साधारण रूपसँ इएह ओ बेर होइत अछि, जाहिमे परिवारक सभ सदस्यक एक संगे बैसब संभावित छैक। वास्तवमे किओ बैसैत छैक कि नञि ई आन गप्प अछि। आन नेन्ना सभमे किओ एकरा लेल ‘बगीचा’ क चुनाव कएने छल, तँ किओ कोनो समारम्भक। एहि सभ विभिन्ना दृश्यक चुनावक पाछाँ सम्बन्धित पारिवारिक स्थितिकें लऽ कऽ बनल मानसिकताक छाप स्पष्ट रूपसँ बुझाइत छलैक। आब चित्रक रचनाक मादे। डायनिंग टेबुलक एक छोरपर बनल दू गोट नेन्नाक बीचमे बैसल स्त्री तथा दोसर छोरपर चित्रित एकसरि नेन्ना। ई पारिवारिक समबन्धमे आएल कोनो तरहक दूरी दिसि इंगित करैत अछि। सभसँ चौंकाबऽबला गप्प तँ ई छल जे एहि चित्रमे वयस्क पुरुषक रूपमे ककरो चित्रित नहि कएल गेल रहैक। हमरा बुझने ई बात परिवारसँ गाएब पिताक अस्तित्वक सम्बन्धमे छल। टेबुलक दोसर कोन्टा महक एक गोट नेन्नाक आकारक माध्यमसँ ओ ककरो एकसरिपन (Loneliness) देखा रहल छल। साइत परिवार-समूहसँ दुराएल नेनपन! कोनो ठोस निर्णयपर पहुँचबाक पहिने विचार कएलहुँ जे ओहि विद्यार्थीसँ एहि सम्बन्धमे गप्प कएल जाए। ओकरा अपन विश्वासपात्र बनएबाक दृष्टिसँ प्रयत्न शुरू कएलहुँ। किछुए दिनमे ओ बधि गेल। तकरा बाद फुसिए आहे-माहे करैत, ओकरा पोल्हा-पोल्हा कऽ जाहिसँ ओकरा कोनो तरहक शंका नञि होइ, ई ख्याल रखैत ओकर दिन क्रम, घरक वातावरण, माता-पिता, भाइ-बहिन इत्यादि जीवन सम्बन्धी बातक लेबऽ लगलहुँ। गप्प करिते सभ चीज फरिछा गेल। दुर्भाग्यसँ हमर कयास ठीके रहए। आब ओकर बापसँ गप्प करब हमरा बड्ड आवश्यक बुझाए लागल। दू-तीन बेरुक समादक बाद ओ भेंट करऽ आएल। किछु परिचय-पात्र भेलाक पश्चात जतबे गम्भीरतासँ हम ओकर बेटाक बारेमे चिन्ता व्यक्त करैत गेलहुँ, ओतबे दृढ़तासँ ओ एहि गप्पक खंडन करैत रहल। ओकरा मोने हम अनेरे एहि गप्पकें गंभीर बुझि रहल छलहुँ। हारि कऽ हम ओहि विषएकें छोड़ि ओकर नोकरीक विषएमे, ओकर परिवारक विषएमे, ओकर दिनचर्याक विषएमे गप्प करऽ लगलहुँ। बेटा नान्हिएटा रहैक, जखन ओकर पहिल स्त्री स्वर्ग सिधारि गेल रहैक। टुअर नेन्नाकें माएक कमी नञि बुझाइ, तैं ओ दोसर बियाह कऽ लेलक। नव माउगिसँ दू गोट आर नेन्ना, एक गोट बेटा, एक गोट बेटी। घरमे कमाए जोगरि वएह एके टा बेकति। भोरे काजपर चलि जाए तँ आबए साँझखनि। ई सभ बढिञाँसँ चलि रहल रहैक, एक तँ दोसर माउगि अपन नेन्ना आ ओकर पहिल नेन्नामे कहिओ कोनो फरक नहि केलकै। ई छल एहि दिसि देखबाक ओकर दृष्टिकोण। तैयो हम अपना मर्यादामे ओकरा हृदए धरि एतेक बात पहुँचा देलाइक जे एहि बेटाक बारेमे जतबा ओ बूझैत अछि ओतबा सभ किछु ठीक ठाक नञि छै। तैं तरहें आस-पड़ोससँ, दोस्त महीमसँ, आन कोनो स्रोतसँ एहि गप्पक वास्तविकताक जतेक जल्दी पता लगा लेत, ओकरा हेतु ओतबे योग्य हेतैक। खैर, बात आएल-गेल भऽ गेलैक। हमहूँ रुटीनमे लागि गेलहुँ। एकदिन अचानक शिक्षक-कक्षमे ओ हाजिर भऽ गेल। नमस्कार पातीक पश्चात हम अपन व्यक्तिगत काजमे लागि गेलहुँ। हमरा भेल अपन कोनो काजसँ ओ आएल होएत। मुदा जहन बड़ी काल धरि बिना कोनो एहन विशेष व्यवहारक मूड़ी खसौने बैसल देखलिऐक तँ शंका भेल। औपचारिकतावश पूछि देलिऐक जे कोनो विशेष कार्यसँ आएल छह की विद्यर्थीक रुटीन रिपोर्ट लेबाक वास्ते। हालाँकि अहि बातक संभावना कम्मे रहैक। कनेक कालक दुबिधाक बाद ओ कहलक जे अहींसँ भेंट करबाक अछि। अपन देह-भंगिमासँ ओ बड्ड डिस्टर्ब्ड बुझाएल। किछु संकोचमे सेहो रहए। हमरा कने-मने ई बुझबामे आबि गेल जे हम जे ओकर बेटाक मादे कहने रहिऐक, ओही सम्बन्धमे कोनो हेतैक। ओकरा सहज करबामे कनेक बेर तँ लागल मुदा हमरा लऽ कऽ सभ तरहें आरश्वस्त भेलाक बाद गरम बालुमे फुटैत मकइक लाबा जकाँ ओ भड़भड़ाए लागल। संपूर्ण रामायणक सार ई जे हम विद्यार्थीक चित्रकलाक आधारपर जे गप्प ओकरा कहने रहिऐक तकर वास्तविकता ओकरा समक्ष आबि गेल रहैक। हम जाहि शंकाक बीज ओकरा हृदएमे रोपि देने रहिऐक ओ राति-दिन ओकरा खिहारऽ लगलैक। ओहिसँ पाछाँ छोड़एबाक हेतु ओ एहि बातक तहमे जएबाक निश्चय केलक, जाहिसँ हमर सिद्धान्तक झूठ वा सत्य सामने आबि गेलापर ओकरा कमसँ कम एहि दुबिधासँ छुटकारा तँ भेटिये जेतैक। मुदा भेलै उन्टा। सत्यक ई चेहरा ओकर कल्पनोसँ अधिक भयंकर छलै। नव पत्नीकें अपन संतान भेलाक बादक परिस्थितिमे भेल बदलावसँ ओ पूर्णरूपेण अनभिज्ञ छल। भोरूक गेल नोकरीसँ साँझ धरि घुरए। बेटा किछु कहबो करैक तँ नेन्ना सभक गप्प बूझि कऽ बातकें टारि जाए। पत्नीयो हँसी-मजाकक आधार लऽ कऽ गप्पक गंभीरताकें स्पष्ट नहि होमऽ दैक। पतिक परोक्षमे ओहि नेन्नासँ ओकर व्यवहार पास-पड़ोसक लोक सभक नजरिमे सेहो आबऽ लागल रहैक। मुदा मुंबइ सन महानगरमे अनकर जीवनमे केओ जल्दी पैसार नञि करैत अछि। ककरो एतेक फुरिसतिए कतऽ ? केओ किछु कहियो दैक तँ पत्नी कानि-भाखि कऽ ओहि बातकें एना घुमा देथि जे ओकरा पत्नीक बातपर अविश्वास करबाक कोनो कारणें नहि रहि जाइक। हमरासँ चर्च भेलाक बाद ओ काजपर सँ कोनो ने कोनो बहन्ने औचक्कें घर घूरऽ लागल। घरबाक व्यवहारपर दूरेसँ नजरि राखऽ लागल तँ परिणामो देखाए लगलैक। लोक सभक मुँहसँ सूनल गप्पक सत्यता दृष्टिमे आबऽ लगलैक। पहिने तँ एकाध दिनक बात बूझि कऽ अनठेलक। मुदा अनुभवक पुनरावृतिसँ ओ ठहकल। स्कूल छुटलाक बाद बेटा घर लौटए तँ सतमाय दरबज्जो नञि फोलए। बेरहटिया धरि भोजन-भात निपटा कऽ दुनू नेन्नाक संग सूति रहए। आ ई दरबज्जा ठोकैत-ठोकैत कानि –बाजि कऽ भूखल-पिआसल चौकठेपर बस्ता लेने ओकर उठबाक बाट जोहैत बैसल रहि जाए। पड़ोसी सभक नजरि पड़ैक तँ ओ सभ किछु खुआ दैक। स्त्री उठैक तँ बहन्ना बना दैक जे मोन खराप छल, आँखि लागि गेल तैं नञि बुझलिऐक। ऊपरसँ डरो देखा दैक जे बाबूकें कहबही तँ बूझि लिहें। छोट-छोट गप्पपर लोहछा देनाइ तँ सामान्य गप्प रहैक। नेन्ना नहूँ-नहूँ अपना कोश (Cell) मे घुसऽ लगलैक। ओकरा असुरक्षाक भाव घेरऽ लगलैक। नेन्ना सभक ‘अहं’ बहुत व्यापक होइत छैक। ओहि ‘अहं’ केँ नान्हियोटा धक्का लगलासँ ओ लोहछि जाइत अछि। मुदा नेन्ना सभ लग ओहि भावनाकें, दर्दकें, व्यक्त करबाक हेतु सियान सन साधन नञि होइत छैक। योग्य शब्द संग्रह नञि होइत छैक। दोसर शब्दमे एहि उम्रक नेन्ना सभ लग हम-अहाँ आसानीसँ बूझि सकिऐ एहि तरहक भावनाक आदात-प्रदानक कोनो स्पष्ट भाषा विकसित नहि भेल रहैत छैक। तैँ ओ सभ अपन भावनाकेँ प्रतीकात्मक रूपसँ व्यक्त करबाक प्रयत्न करैत देखाइत अछि। ई प्रतीकात्मकता उम्रक विभिन्न अवस्थामे भिन्न–भिन्न तरहक होइत जाइत छैक। उदाहरणार्थ, शैशवावस्थामे नेना सभ अनेकानेक तरहसँ कानि कऽ अपन भावना व्यक्त करैत छथि। आइ तँ एहि तरहक भाषाक विश्लेषण सेहो सम्भव भऽ गेल अछि। एहि भाषाकेँ ज्ञाता वा अभ्यासक, नेना सभक कानब सुनि कऽ ओहि विशिष्ट समएमे हुनक जे माँग आ समस्या छनि तकर निदान कऽ सकैत छथि। बाल्यावस्थामे अपन विरोध जतएबाक हेतु नेना सभ रूसि कऽ खेनाइ बारि कऽ अथवा कोनो आन तरहक नोकसान कऽ कऽ अपन भावनाकेँ व्यक्त करैत देखाइत अछि। नेना सभक व्यक्त करबाक इएह प्रतीकात्मक भाषाक कड़ीमे चित्रकला एक गोट महत्वपूर्ण अध्याय अछि। तैं हमर कहब अछि, जे नेना सभक चित्रकला देखबाक नहि अपितु पढ़बाक वस्तु होइत अछि। विद्यार्थीक पिताकेँ हम जतेक बुझा सकलिऐक, बुझेलिऐक। ‘जे बेटा भीतरसँ पूर्ण रूपेण टूटि गेल अछि, ओकरा शीघ्रातिशीघ्र मूल स्वभावपर आनब अति आवश्यक अछि। सभसँ पहिने ओकरा भीतरसँ असुरक्षाक भावनाकेँ निकालब जरुरी अछि। ओकर हेराएल आत्मविश्वासकेँ पुनः प्रस्थापित केनाइ जरूरी अछि। पाछाँ छुटि गेल माता–पिताक अस्तित्वकेँ ओकरा जीवनमे सम्मिलित करब जरूरी अछि। ओकरा भीतर ई विश्वास जगेनाइ जरूरी अछि जे ओहो एहि परिवारक एक गोट महत्वपूर्ण सदस्य अछि। एहि परिवारक ओकरो आवश्यकता छैक आ आन सदस्य जकाँ ओकरो सभ तरहेँ सभपर समान हक छैक। अन्यथा एहि परिवारक व्यवहारसँ एखन धरि ओकरा भीतर जाहि तरहक शत्रुत्व (Hatred) पनपि रहल अछि, ओ आगू चलि कऽ एहन भयानक रूप लऽ सकैत अछि, जकर एखन कल्पनो नञि कएल जा सकैत अछि’। ई सुनि कऽ ओ किछु ठहकल। पूछलक, ‘तखन आब उपाय की’? हम कहलियन्हि- ‘उपाय ई जे सभसँ पहिने अपना घरबालीकेँ बुझबिऔन्ह जे हुनकर व्यवहारक की परिणाम भऽ सकैत अछि। तकरा बाद किछु दिनक छुट्टी लऽ लिअ। एहि माहौलसँ ओकरा बाहर निकालू। सपरिवार पन्द्रह–बीस दिनक लेल कतहु बाहर घुमि आउ। मुदा एहि पूरा समएमे ओकरा ई अनुभव कराओल जाए जे आइ धरिक अनुभवसँ ओकर जे भावना बनल छलैक से गलत छै। खास कऽ सतमाएक माध्यमसँ ई सन्देश जाए। एहि यात्राक सभ कार्यक्रम ओकरा केन्द्रमे राखि कऽ बनाओल जेबाक चाही। मुदा सतभाय, सतबहीन, सतमाय तथा पिताक समान सहभागिता रहौक। ओकरा प्रति सभक व्यवहार सहज रहौक। ओहिमे कोनो तरहक देखाबा नहि रहौक। नेनाकेँ ई शंका नञि होइ जे जानि–बुझि कऽ हमरापर विशेष ध्यान देल जा रहल अछि। एहिसँ अपन पुरनका अनुभवकेँ ओ एक गोट दुःस्वप्न मानि कऽ ओहिसँ बाहर आबि जाएत। मुदा ओकर बाद एहि पुरनका अनुभवक ने चर्चा होए आ ने पुनरावृत्ति’। ओकर किछुए दिनक बाद हम स्कूल छोड़ि देने रही। मुदा हमरा पूर्ण विश्वास अछि जे ओहि विद्यार्थीक जीवनमे अवश्ये किछु सकारात्मक उद्यम भेल हेतैक, जकर पूर्ण श्रेय जएबाक चाही चित्रकला सन सृजन शील विषएकेँ जकरा माध्यमसँ ओ अपन आंतरिक भावनाकेँ व्यक्त करबामे सक्षम भऽ सकल। ब्युटी कुमारी, सहायक शिक्षिका, संस्कृत मधुराम इंटर स्तरीय विद्यालय, ग्वालपाड़ा, मधेपुरा (बिहार)। राहुलजी एक नजरिमे दुनियाँमे प्रतिभाक धनिक लोकक कमी नै अछि तखन सर्वतोमुखी प्रतिभाक धनिक व्यक्ति तँ ओंगुरीपर गिनल जा सकैत अछि । राहुल सांकृत्यायन गिनल-चुनल ओहेन प्रतिभाक धनिक लोकमे छथिन जिनकर जोड़ ने अछि । हिनकर तुलना करै लऽ रुपकक कल्पना करनाय दुस्साध्य लागैत अछि। राहुलजी जीवनक सब अंगक सामाजिक विज्ञानक सब शाखाक केँ समृद्ध आ विकसित कऽ लिखने छथि। बौद्ध धर्मावलम्बी केँ तँ दावा अछि कि 20वीं सदी मे भगवान बुद्धक विचारकेँ सबसे बेसी प्रचार- प्रसार करैवाला लोक मे राहुलजी अग्रगण्य छथि। औपनिषदिक परम्परा सँ आधुनिक स्वरुपक कल्पना करैवाला ज्ञानक खोज मे तलवारक धार पर चलैवाला मनीषि राहुल सांकृत्यायन छथि। दर्षन साहित्य राजनीति आ इतिहासक पण्डितो स्वीकार करैत छथि कि राहुलजी श्रेष्ठ पण्डित छलाह। राहुलजी ओं महापण्डित रहथि जे अतीतक प्रमाणिक आ प्रसांगिक अनुभव सऽ लाभ लऽ नवज्ञानक मार्ग प्रशस्त कएलथि। राहुलजी कर्मठ कर्मयोगी जेकाँ अपन अनमोल समयक उपयोग कए वास्तविक स्वरुप केँ देखलखिन्ह आ बुझलखिन्ह। ओकर संगे-संग अपन देषक लोको केँ बुझबैक प्रयास कलथिन्ह । हुनका लए चुपचाप बैसनाए असंभव रहै। ओ अपन एक-एक क्षणक उपयोग सार्थक कार्य मे करैत रहैथ। चरैवेति -चरैवेतिक सिद्धान्तक अक्षरशः पालन करैत रहैथ। विश्लेषण आ संश्लेषण कलामे महारत हासिल रहै हुनका। ग्राह्य आ अग्राह्य वस्तु केँ परिखैत रहैथ राहुलजी। राहुलजीक व्यक्तिव्यक निर्माण कोना भेल एकर अध्ययन जेतै मजेदार अछि ओतबैक प्ररेणादायक। आजमगढ़ जिलाक मझोला किसान परिवारमे हिनकर जन्म भेल रहै। नाम छलैन्ह केदारनाथ पांडे। पाँच सालक उमरमे हिनकर शिक्षा आरम्भ भेल मुदा परिवारक वातावरण एहन नै रहै कि पढ़ाय-लिखाय ठीक -ठाक चलि सकै। इएह बीच मे हिनकर विवाह भऽ गेल परिवारक वातावरण सऽ केदारनाथक मन उचैट गेल, तखन घरसँ भागैक सिलसिला शुरु भऽ गेल- कलकता बनारस मद्रास अयोध्या लाहौरक चक्कर लगाबैं लगलाह। यही चक्कर मँ ओ एक मठक महन्तक शिष्यत्व ग्रहण कएलथिन जेकर बाद हुनकर नाम रामोदार साधु भऽ गेल। बाद मे मठक महन्ती मिलैत रहैन्ह मुदा अपना आप केँ बांहि केँ नै राखि सकलाह। तखनक मनोदषाक वर्णन आगू आबि केँ कएने छथि- भावी महन्त बनाबै लऽ महन्त लक्ष्मणदास हमरा बनारस सँ लाबलैथ। यदि हम मठ मे ठहैर केँ नै रहि सकलौं आ महन्त नै बनि सकलूँ तऽ एहि मे हमर अपन घुमक्कड़ी आ ज्ञानक तीव्र जिज्ञासा रहै। भागैक दौर मे कतौ किछ समय रुकि कऽ केदारनाथ संस्कृत अंग्रेजी हिन्दी अरबी सभक अध्ययन कैलथिन्ह। लाहौर मे अध्ययन करैत आर्यसमाजक अनुयायी भऽ गेलाह। बौद्ध साहित्यक संग बड़ लगाव भऽ गेल रहैन्ह । घुमक्कड़ प्रवृति तऽ रहबै करै आब बौद्धधर्मक प्रति झुकाव होएबाक कारणेँ लुंबिनी सारनाथ राजगृह नालन्दा आदि बौद्ध तीर्थस्थानक यात्रा कएलैन्ह। इहा बीच गाँधीक आँधीमे अर्थात् स्वाधीनता आन्दोलनोमे कुदि गलैथ। छह मासक जेलमे सजा भऽ गेल। संन्यासी रामोदार उर्फ केदारनाथ उर्फ राहुलजी केँ आजादी खातीर लड़ैत देखि लोक हुनकर चरण धूलि पाबै लऽ दौड़ेत रहैथ। ओ राजनीति मे त्याग आ समर्पणभावक विशेष महत्व दैत रहैथ। हुनकर कहब रहैन्ह - राजनीतिमे खूनक वएह स्थान अछि जे पूजा पाठ मे चन्दनक। राजनीतिमे रहैत हुनकर विद्यानुराग कम नै भेल। जेलयात्रा आ ज्ञानयात्रा दूनूक क्रम ने टूटल। ज्ञानक खोज मे कतै बेर श्रीलंका तिब्बत इंगलैण्ड रुस ईरान मंगोलिया चीन आदि देशक यात्रा कएलैन्ह। तिब्बत जाए केँ एहेन-एहेन दुर्लभ ग्रन्थक खोज कैलखिन्ह जेकर अभावमे भारतक इतिहासक अभिन्न अंग भऽ गेल । ज्ञानक साधना जारी रहल। किछ दिन बौद्धक चीवर धारण कए ओकरो सऽ मूँह मोड़ि ललैन। 1937 मे सोवियत संघ गेलैथ ओतहि एक रुसी महिला संग विवाह कएलन्हि जिनका सऽ पुत्र ईगोर क जन्म भेल।अखन धरि राहुल सांकृत्यायन प्रसिद्ध भारतीय विद्वानक रुपमे सभठाम प्रतिष्ठित भऽ गेल रहैथ। हुनकर ग्रन्थ आ लेख केँ धूम मचल रहै। आम लोकक मुक्ति लऽ राजनीतिक हथियार केँ ओ सही तरीका सँऽ उपयोग मे लाबै पर जोर देयि रहैथ। अपन अनुभवक आधार पर क्रान्तिकारी दृष्टिकोणक समर्थक भऽ गेल रहैथ राहुलजी। 1938-39 केँ जमाना रहै। देशपर अंग्रेजक शासन रहै। किछैक राज्यमे काँग्रेसक शासन रहै। राहुलजीक इच्छा रहै कि किसानकेँ जमीन्दारक आ भू- स्वामिक अन्याय सँ छूटकारा मिलवाक चाही-भला इहो कोनो निक बात भेल कि किसान जमीन जोते बुने फसल उपजाबै आ मिले भूस्वामी केँ राहुलजी एहेन अन्यायक घोर विरोधी छलाह। गरीब किसानक पक्ष मे बिहारक अमवारी गाम मे राहुलजी सत्याग्रहीक दलक संग उतैर गलाह सत्याग्रह करवाक लेल । हुनका सब केँ कुचलेक लेल जमीन्दारक हाथी गुण्डा पुलिस सिपाही सब रहै। राहुलजी हाथमे हसिया लए फसल काटै लागलाह। हुनकर ई रूप देखि जमीन्दारक इशारापर एगो महावत राहुलजीक माथ पर जोरदार लाठीक प्रहार कएलक माथ फाइट गेल। खूनक धारा बहि गेल। तैइयो राहुलजीकँ अन्य सत्याग्रही संग गिरफ्तार कए लेल गेल। तखन बिहारमे कांग्रेसक शासन रहै। राहुलजी केँ हथकड़ी पहिराए पुलिस जेल लइ गेल। लोकमे एहि धटनासँ क्षोभ आ रोष रहै। मुदा राहुलजीक मन मे प्रतिषोधक भावना नै रहै। सिद्धान्त पर चलैवाला निर्भीक योद्धा जेना शोषणमुक्त समाजक स्थापना खातिर संघर्षरत रहैथ राहुलजी। मुदा अमवारी मे जे हुनका माथ पर चोट लागल रहै ओ बड़ गहीर रहै जेकर परिणाम भेल कि 1961 मे माथक पक्षाघात सँ ओ पीड़ित भऽ गेलाहा इएह हुनकर मौतक कारणो बनल। दोसर विश्वयुद्धक जमानामे राहुलजी अमवारी सत्याग्रह वाला केसमे जेलक सजा काटि रहल रहैथ। ओहि समय मे महात्मा गाँधी, नेहरु, आ रवीन्द्रनाथ ठाकुर सनक लोक हिटलरक नाजीवाद आ जापानक सैन्यवादक खिलाफ लोक केँ जागरुक करै मे लागल रहैथ। राहुलजी सेहो एकरा खातिर लोकभाषा मे नाटक लिखलैन्हि जेकर मंचन करि आमलोक केँ फासीवाद विरोधी आन्दोलन मे भाग लेबाक खातिर प्रेरित कैलथिन्ह। 1945 मे राहुलजी लेनिनग्राद विश्वविद्यालयक प्राच्यविभाग मे प्राध्यापकक पदकेँ सम्हारबाक लेल सेावियत संघ गेलैथ। ओतए अपन अर्धांगनी आ पुत्रसँ मिलके बड़ प्रसन्न भेलाह। अखन दोसर विश्वयुद्ध खतमे भेल रहै। स्तालिनग्रादमे सहस़्त्र टूटल-फूटल मोटर आ हवाई जहाजक ढ़ेर लागल रहै। आधासँ अधिक मकान धराशायी भऽ गेल रहै। मुदा लोकके जोश देखैत बनैत रहै। सब एकजुट भऽ निर्माण कार्यमे लागल रहैथ। आमजनक भागीदारी देखि सोवियत जन सोवियतक भूमि दूनुक प्रति हुनकर अनुराग आ सम्मान दुगुना भऽ गेल। एकर चर्चा करैत ओ लिखैत छथिं इतिहास मानैत अछि आ मनेत रहतै कि मानवताक प्रगतिमे सबसे बड़का बाधक शक्ति हिटलरक फासिज्मक रूपमे उपजल रहै जेकर नाश करैक श्रेय सोवियत रूस केँ जाइत अछि। एहिबेर राहुलजी पचीस मास तक सोवियत संघ मे रहला। ओतए अध्यापनक संगे मध्य एषियाक इतिहासक ढ़ेर सामग्री आ दुर्लभग्रन्थ जमा कएलैन्हा। अनके भाषा सिखलैखिन्ह आ अनेक किताबक हिन्दी अनुवादो कएलैन्ह। सावियत संघ सँ विदा काल पुत्र आ अर्धंगनी दूनू मे सँ कियों छोड़े लएँ तैयार नै रहथिन्ह ओ दूनू फूटि-फूटि कऽ कानैत रहथिन्ह मुदा जीवन कर्तव्य कोनो माया- मोह केँ माने लए तैयार नै रहैत अछि। द्रवित हृदय केँ कठोर कए राहुलजी विदा भेलाह। एहि यात्राक बाद राहुलजी हिन्दीक प्रचार -प्रसार, ग्रन्थक सम्पादन, लेखन मे अपन जीवन समर्पित कऽ देलथिन्ह। राहुलजी सामाजिक कुरीति, वर्ण -व्यवस्था, जातीय उन्माद, साम्प्रदायिक वैमन्स्यक सबदिन विरोध कैलथिन्हि। हुनकर समझ्ा रहै कि आर्थिक विषमता सब कुरीतिक जैड़ थिक। भाषाक सम्बन्धों मे हुनकर विचार साफ रहै कि अंग्रेजी के ँ भारतक लोक पर नै थोपबाक चाहि। एकर विकल्प खोजे मे जतैक अबेर भऽ रहल अछि राष्ट्रीय एकता ओतेक खतरा मे पड़ि रहल अछि। बसंत झा उगना इ कहानी १३४८-१४५२ के बिचक अछि जाही मे महा कवी विद्यापति के जन्म बिस्फी गाम मे भेलानी और ओ मैथिलीक बहुत पैघ कवी भेला जिनका कबी कोकिल के उपाधि देल गेलनी और ओ महादेव के बहुत पैघ भक्त सेहो छला कवी विद्यापतिक रचना एतेक प्रभाबी होईत छलनी जे जखन ओ आपण रचना के गबैत छला त कैलाश पर बईसल भगबान महादेव प्रशन्न भ जाईत छला और हरदम हुनक रचना सुनबाक इच्छा राखैत छला, ई इच्छा एतेक बड़ी गेलनि जे ओ एक दिन माता पार्वती के कहलखिन " हे देवी सुनु, हम मृत्युलोक जा रहल छी कवी विद्यापतिक रचना हमरा बहुत नीक लागैत अछि और हमर मोन भ रहल अछि जे हम हुनका संगे रही क' हुनक रचना सुनी, त अहां अही ठाम कैलाश मे रहू और हम जा रहल छी मृत्युलो" और रचना सुनबाक लेल धरती पर आबी गेला, और विद्यापति के ओतै नौकर बनी क उगना के नाम स काज कर लागला ओ विद्यापतिक चाकरी मे लागी गेला ओ हुनकर सब काज करथिन हुनका पूजक लेल फूल और बेलपत्र तोरी क आनैथ बरद के चरबैथ सब चाकरी करैत और राइत मे सुत्बा काल मे हुनकर पैर सेहो दबबैथ (धन्य ओ विद्यापति जिनक पैर देवक देव महादेव दबबैथ) अहि प्रकारे जखन बहुत दीन बीत गेल, ओम्हर माता पार्बती बहुत चिंतित भ गेली हुनका लगलैन जे आब महादेब मृत्यु लोक स वापस नै एता, और ओ हुनका बापस अनबाक प्रयास मे लैग गेली, ओ क्रोध के आदेश देलखिन जे आहा जाऊ और विद्यापतिक पत्नी सुधीरा मे प्रवेश क जाऊ जाही स उगना द्वारा कोनो गलत काज भेला पर सुधीरा हुनका मारी क भगा देती, लेकिन माता पार्वती के इ प्रयाश सफल नै भेलैन तखन ओ दोसर प्रयाश केलि ओ प्याश के कबी विद्यापतिक ऊपर तखन सवार क देलखिन जखन ओ एकटा जंगल के रास्ता स उगना संगे राजा शिव शिंह के ओतै जारहल छला ओ घोर जंगल छलाई ओत दूर दूर तक ज'लक कोनो आस नै छलाई और ओही बिच मे कवी विद्यापति प्याश स तरपअ लागला "रे उगना जल्दी सँ पाइन ला रउ नै ता हम मइर जेबउ बर जोर स प्यास लागी गेलौ" कहैत जमीन पर ओन्घ्रे लगला, आब उगना की करता ओ परेशान भ गेला एम्हर उम्हर पाइन के तलाश मे भट्क' लगला हुनका पाइन नै भेटलैन, तखन ओ एकटा गाछक पाछू मे नुका गेला और अपण असली रूप धारण क' अपन जटा सँ गंगाजल निकालला' और फेर उगनाक रूप धारण क विद्यापति के ज'ल देलखिन, विद्यापति जल पिबैते देरी चौक गेला ओ उगना स पूछ' लागला " रे उगना इ त गंगाजल छऊ, बता एता गंगाजल कत स अन्लाए" आब उगना की करता ओ कतबो बहाना बनेला लेकिन हुनकर एको नै चलल, ओ कि करता हुनका विबश भ अपन रूप देखाब' परलानी और ओ अपन असली रूपक दर्शन कवी विद्यापति के देलखिन, विद्यापति महादेवक अशली रूपक दर्शन करिते देरी चकित रही गेला और हुनक चरण पर खसी क हुनका स छमाँ माँग' लागला "प्रभु हमरा छमाँ करू हम अहां के चिन्ह नै सकलौं हमरा स पहुत पैघ अपराध भ गेल" तखन हुनका उठाबैत महादेव कहलखिन "हम आहा संगे एखन और रहब, लेकिन हमर एकता शर्त अछि जे आहा इ बात केकरो स नै कहबनी और जखने आहा इ बात केकरो लंग बाजब ओही छन हम अहाँ लंग स चली जायब" विद्यापति शर्त के मंजूर करैत और दुनु गोटे राजदरबार के तरफ चली गेला, माता पार्बती के इहो प्रयाश सफल नै भेलैन. तखन एक दिन उगन के बेलपत्र लावय मे कनिक देरी भ गेलनि ताहि पर सुधीरा एतेक क्रोधित भ गेली कि ओ चुल्हा मे जरैत एकटा लकड़ी निकली क हुनका मारबाक लेल उठेल्खिन "सर'धुआ आय तोरा नै छोर्बाऊ तू बड शैतान भ गेला हन हमर बच्चा सब भूख स बिलाय्प रहल अछि और तू एतेक देर स बेलपत्र ल' क' एलै हन" कहैत हुनका दिश बढ़लखिन, तखन विद्यापति स देखल नै गेलन्हि और ओ बजला "हे हे इ की करैत छि इ त साक्छात महादेव छैथ" और एतबे कहिते महादेव गायब भ गेलखिन, फेर विद्यापति हुनका जंगले जंगले तक' लगला और "उगना रे मोर कतै गेला" गबैत रहला लेकिन उगना फेर हुनका नै भेटलखिन, और ओ अपन प्राण तियैग देलखिन I ओ स्थान जाहि ठाम देवक देव महादेव कवी-कोकिल विद्यापति के अपन अशली रूपक दर्शन देने छलखिन ओही ठाम "बाबा उगना" के मंदिर छैन और ओहिमे शिवलिंग जे छाई से अंकुरित छाई, जेकर कहानी किछु एहन, छाई जे एक बेर गामक एक बुजुर्ग ब्यक्ति के महादेव सपना देलखिन की "हम एकता गाछक जैर मे छी" और ओतै बहुत पैघ जंगल छलई तखन गामक लोक सब तैयार भ क ओय ठाम गेला और पहुँच क जखन खुदाई केला त देखलखिन की एकटा बहुत सुन्दर शिवलिंग छाई, सब गेटे बहुत खुश भेला और विचार भेलय की हिनका बस्ती पर ल चलू ओय ठाम मंदिर बना क हिनक स्थापना करब और हुनका उठेबाक लेल जखने हाथ लगेलखिन की ओ फेर स जमीन के भीतर चली गेला, फेर स कोरल गेल और हुनका निकलवाक प्रयाश कैल गेलई, इ प्रयाश दू तीन बेर कैल गेल मुदा सब बेर ओ जमीन के भीतर चली जायत छला, तखन सब गोटे के बुझबा मे एलईन जे इ अहि ठाम रहता और अय ठाम स नै जेता, तखन ओही ठाम साफ सफाए कैल गेल और तत्काल मंडप बनैल गेल और बाद मे मंदिरक निर्माण सुरु भेल जे १९३२ मे जा क तैयार भेल और अहि मंदिरक परिसर मे ओ अस्थान सेहो अछि जाहि ठाम महादेव अपना जटा स गंगाजल निकलने छला और आय ओ इनारक रूप मे अछि जेकरा "च्न्द्रकुप" के नाम स जानल जैत छाई और एखनो ओकर जल शुद्ध गंगाजल छाई, जे लैब टेस्टेड छाई ! दरभंगा के एकटा बहुत प्रशिद्ध डॉक्टर अपना मेडिकल लैब मे एकर टेस्ट केने छलखिन और ओ अय बात के सुचना ग्रामीण सब के देलखिन जे अय मे पूरा गंगाजल के तत्व बिद्यमान अछि, और इ दोसर रुपे सेहो टेस्टेड छाई, अय जल के यदि अहां बोतल मे राखि देबय ता इ ख़राब नै होइत छाई इ स्थान मधुबनी जिलाक भवानी पुर गाम मे स्थित अछि एत' सब गेटे एकबेर जरुर आबी, एही स्थानक कुनु तरहक जानकारिक लेल अहां हमरा स संपर्क क सकैत छि "जय बाबा उग्रनाथ" हमर इ सोभाग्य अछि कि हमर जन्म एही गाम मे भेल अछि और हमर बचपन अय स्थान पर बीतल अछि, धीरेन्द्र कुमार, निर्मली, सुपौल, बिहार नो एंट्री : मा प्रविश- (उदय नारायण सिंह 'नचिकेता') नाटक अधुनातन अछि। पूर्वक नाटक नै पढ़ने मात्र हमर विचार ऐ नाटकपर केन्द्रित अछि। समएक संगे लेखन, विषए-वस्तु, पात्र काल सभमे परिवर्त्तन होइत अछि। मैथिली साहित्यकेँ अधुनातन हेबाक चाही, तै आकांक्षाकेँ ई नाटक पूर्ति करैत अछि। नाटककारकेँ एकर सम्यक बोध छन्हि तँए मैथिल होएबाक कारणे हम आभार व्यक्त करैत छी। समाजमे जे घटित होइत अछि रचनाकार प्राय: ओकरे चित्रण करैत छथि। नाटककार स्वर्ग-नरकक अवधारणापर नाटक लिखने छथि मुदा नाटकक विषए-वस्तु प्रासंगिक धरतीक विद्रूपता अछि। ऐ विद्रूपताक माध्यम बनौने छथि। भागम-भाग, क्यू, वर्ण-व्यवस्था समाजसँ उपजल चाेरि, बेरोजगारी आ धूर्तता सन समस्या ऐ नाटकमे संयोजित अछि। नाटकमे पात्रक संख्याक अनुकूल विषए-वस्तु जे उठैत गेल अछि ओकरा नाटककार ऐसँ कमो पात्रमे मंचपर आनि सकैत छलाह। पात्रक अधिक्य मंचपर सफल िनर्देशककेँ सुलभ हेतनि मिथिलामे एकर अभाव होएत। भऽ सकैत अछि हुनकर दृष्टिमे संपूर्ण धरती हुअए। समस्याकेँ मंचपर आनब पूर्ण सफलता होइत अछि ओकरा तीक्ष्णता संगे राखब जैसँ दर्शकक हृदएपर प्रभाव पड़ै तैमे कमी अनुभव होइत अछि। कोनो रचना जँ हमरा बान्हि लिअए ऐमे अभाव अछि। नाटकक संवादमे शब्दक खेल कतहुँ-कतहुँ देखएमे अबैत अछि पृष्ट सं- 20-21 द्रष्टव्य अछि। संवादकेँ बान्हल नै जा सकल अछि। नाटककार अतीतक प्रत्यंचापर भविष्यक वाण चढ़ा शर-संधान करैत अछि। समाजक स्थितिसँ ओकर विसंगति लक्ष्य छन्हि। “चोर सिखावय बीमा-महिमा पाकेटमारो करै बयान! मार उच्चका झाड़ि लेलक अछि पाट-कपाट तऽ जय सियाराम।।” समाजक छदम्, राजनीतिक उलटा-फेर आकर्षक ढंगसँ व्यक्त अछि। निरालाक शीध्र झरो हे जीर्ण पत्र' सदृश नाटककारकेँ नवीन आकांक्षा छन्हि- “आऊ पुरातन, आऊ हे नूतन। हे नवयौवन, आऊ सनातन।। प्राण-परायण, जीर्ण जरायन। कज्र-कठिन प्रणाम गौण गरायन।” नाटकमे गीतक प्रयोग श्लाध्य अछि। संगीत दर्शककेँ बान्हि कऽ रखैत अछि तैमे नाटककार सफल छथि। हास्य जै ढंगे मुखर अछि। करूण तहिना मुखर नै अछि। नाटककारकेँ संस्कृतक नीक ज्ञान छन्हि- नाटकसँ उद्भाषित होइत अछि। काल-बोध आ वास्तविकतो चित्रणमे जतऽ उपयोगी अछि ततहिं आम दर्शक लेल बोधगम्यतामे अशक्त अछि। ओना श्री गजेन्द्र ठाकुर जी प्रकाशकक दिससँ विचार व्यक्त केने छथि। पाश्चात्य आ भारतीय काव्यशास्त्रीय दृष्टिकोणसँ हुनकर विचार स्वागत योग्य अछि। कोनो रचनामे गुण-अवगुण दुनू होइत अछि। तै दृष्टिकोणसँ हम सशक्त भऽ सकैत छी नाटक सफल अछि आ मैथिली साहित्यक एकटा उपलब्धि अछि। प्रीति ठाकुरक दुनू चित्रकथापर धीरेन्द्र कुमार एक नजरि मैथिली साहित्यमे पहिल बेर श्रुति प्रकाशन, नई दिल्लीसँ प्रकाशित िचत्रकथा उमेश जीक माध्यमसँ भेटल। साहित्य पूर्ण तखने होइत अछि जखन साहित्य सभ विधामे लिखल जाए आ रचना प्रौढ़ होइ। हमर दृष्टिमे चित्रकथामे प्रीति ठाकुरक रचना मैथिली लोक-कथा आ गोनु झा आन मैथिली िचत्रकथा, सफल रचना थीक। लेखिका धन्यवादक पात्र छथि, एहि कारणे जे मैथिली दिसि हुनक दृष्टि गेलनि। दोसर कारण ई जे मैथिलीक विरासतमे जे कथा लोकमुखमे सुरक्षित अछि तकरा ओ लेखनिक रूप प्रदान कऽ मैथिलीक चित्रकथा विधा जे नगण्य सन अिछ- ताहिकेँ समृद्ध करक प्रयास केलनि अछि। मैथिली चित्रकथामे ‘मोती दाइ, राजा सजहेस, बोधि-कायस्थ, बहुरा गोढ़िन नटुआ दयाल, अमता घरेन, दीना भदरी, जालिम सिंह, नैका बनिजारा, रघुनी मरड़, विद्यापतिक आयु अवसान आ गोनु झा आ आन मैथिली चित्रकथामे प्रकाशित अछि ‘गोनु झा आ माँ दुर्गा, गोनु आ स्वर्ग, गोनु आ स्वर्ण चोर, गोनु झा आ विलाड़ि, गोनु झाक दूटा बरद, गोनु झाक महीस, गोनु झाक अशर्फी, गोनु झा आ कर अधिकारीक दाढ़ी, गोनु झाक माए, रेशमा चूहड़मल, नैका बनिजारा, भगता ज्योति पजियार, महुआ घटबारिन, राजा सलहेस, छेछन महराज, राजा सलहेस आ कालिदास। सभटा कथा मिथिलाक धरतीसँ सम्बद्ध अछि आ एखन धरि लोक मुखमे सुरक्षित अछि। समैएक परिवर्तन संगे लोक रूचि आ लोक संस्कारमे परिवर्त्तन सेहो होइत अछि। अपन देशक गप्प लिअऽ। आइ पोथीमे सुरक्षित अछि आयुर्वेद विद्या, यूनानी विद्या, होमयोपैथी आ कतेक रास ज्ञानसँ समर्पित विद्या। जँ पोथीमे सुरक्षित नहि रहत तखन अगिला पीढ़ी एहि विद्यासँ अनभिज्ञ रहि जाएत। तेँ हमर मिथिलामे जे कथा पसरल अछि ओकरा पोथी स्वरूपमे प्रदान कऽ प्रीति ठाकुर जी प्रशंसनीय काज केलनि अछि। वीरवलक कथा भऽ सकै छल जे लोक विसरि जाइत मुदा पोथी स्वरूपमे रहलासँ आइ धरि ओ लोक-मानसक रंजनक माध्यम बनल अछि। चित्रकथाक अपन महत्व होइत अछि। वाह्य-सँप्रेषणसँ जे प्रभाव वंचित रहि जाइत अछि ओ सँप्रेषित होइत अछि चित्रसँ। नाटकमे अभिनयसँ जे सँप्रेषित नहि होइत अछि ओ सँप्रेषित अछि रंग, ध्वनि आ प्रकाशसँ तहिना चित्रकथामे सेहो होइत अछि। प्रसुत आलोच्य पोथीक चित्र सशकृ अछि। वाल साहित्य लेल ई काज प्रति जीक सराहनीय छन्हि। चारि वर्खक नेना जेकरा अक्षर बोध नहियो छै सेहो कथाकेँ परेख सकैए। चित्रक माध्यमसँ। वाल साहित्यक जे अभाव अपना मैथिलीमे अछि ताहिपर बड़का-बड़का विद्वानक अछैत थोड़ेकवो ध्यान नहि देल गेल छल आ खास कऽ एहि तरहक। पोथी आकर्षक, रूचिकर आ बालमनकेँ प्रभावित करैत अछि। एहि लेल हम फेर एक वेर श्रीमती प्रीति ठाकुरकेँ धन्यवाद दैत छिएनि। संगे आशा करब जे आगाँ सेहो एहि तरहक काज करथि। डॉ. शेफालिका वर्मा प्रीति ठाकुर क मैथिली चित्रकथा प्रत्येक भाषा में किछ एहेन रचनाकार होयत छथि, महिला वाकि पुरुष-वर्ग, अपन विलक्षण प्रतिभा के कारन सब से फराक बुझा पडैत छैथ . ई दोसर बात थीक की आलोचक वर्ग महिला लेखन के इतिहासक पन्ना के एकटा कोन द दैत छैथ . किछ भाग्यशाली लेखिका के किछ स्थानों भेटि जायत छैक ,मुदा ,समग्रता में नै. लेखन में महिला पुरुष नै होयत छैक, जे विषय पर लेखक लिखैत छैथ , ओहि पर लेखिका सेहो लिखैत छैथ, कखनो बेसी नीक,.बस, आब एकेटा प्रतीक्षा ऐछ जे कोनो सशक्त महिला आलोचक के देखी, जे महिला नै भै मात्र आलोचक रहैथ,पूर्वाग्रह से रहित नीक आलोचना के जन्म दैत. मैथिली साहित्यक इतिहास में चारि चान लगावैथ, हम जनैत छी एहेन विद्वान लेखिकाक कमी नै ऐछ...... आय प्रीति ठाकुर क मैथिली चित्रकथा, गोनुझा पर पोथी देखी चमत्कृत भ गेलों . पहिने ते हम मैथिलीक नेना भुटका लेल कोमिक्स बुझ्लों, मुदा पढे लगलों ते एकरा में डूबी गेलों. गागर में सागर===अद्भुद ..मैथिली लोकगाथा क विपुल संसार के शिव क जटाजूट जकां कोना समेटी लेने छैथ,ई पढला उप्रानते बुझा पडत. कतेक कथा क खाली नाम सुनने छलों , ओ सब एहि पोथी में साकार छल. जहिना आजुक समाज अकबर बीरबल के बिसरि रहल अछ ,ओहिना गोनू झा के. प्रस्तुत पोथिक माध्यम स पाठक अपन समाज क सब वर्ग के आदर्श के चीन्ही सकैत छैथ प्रीति जी के अशेष शुभकामना एतेक सुन्दर पोथी लेल , प्रीति जी आ गजेन्द्र जी से हम एकटा आग्रह करवैक जे कोसी नदी लेल बड खिस्सा कथा समाज में पसरल छैक, ओकरो चित्रकला में समेटी लैथ. कोसी नदीक रहस्यमय चरित्र, सिंघेश्वर बाबा से विवाह आदि, आदि खिस्सा सब.....जहिना समाज क प्रत्येक क्षेत्र में नारी आय निरंतर आगू बढ़ी रहल छथि , ओहिना मैथिली मिथिलाक विकास में आजुक नारी अपन अपन स्तर से अमूल्य योगदान द रहल छथि. अशेष साधुवाद, प्रीति जी ,असंख्य शुभाशंसा ......... अरविन्द ठाकुर लोकदेव भीम केवट आठम सदीक मध्य धरि गुप्त-वंशक शासन नरभराइत-नरभराइत चलल। हर्षवर्धनक बाद सम्पूर्ण शासन-क्षेत्रमे अराजकता आ अव्यवस्था पसरि गेल। मत्स्य-न्यायसँ त्रस्त प्रजा अपन रक्षाक लेल सर्वसम्मतिसँ शस्त्र, शास्त्र आ कृषिमे निष्णात अयाचक-ब्राह्मण गोपालकेँ अपन राजा चुनलक। हुनकेसँ पाल वंशक प्रारम्भ भेल। गोपाल बिहार आ बंगालकेँ एकसूत्रमे बान्हि जनसहयोगसँ शासनकेँ सुव्यवस्थित केलनि। गोपाल परम लोकप्रिय राजा भेलाह आ हुनकासँ प्रारम्भ पाल शासन कालमे शिक्षा-संस्कृतिक चतुर्दिक विकास भेल। एगारहम शताब्दी आएल। तखन पालवंशी राजा विग्रहपाल तृतीयक शासन छल। ओहो अपन पूर्वज सभ जकाँ प्रजापालक आ न्यायपरायण छलाह। मुदा हुनक ज्येष्ठ पुत्र महिपाल-द्वितीय सत्तालोलुप छल। पिताक मृत्युक उपरान्त ओ अपन दुनू छोट भाए शूरपाल आ रामपालकेँ बन्दी बनाए कारागारमे ढाठि देलक आ शासनक मनमाना संचालन करए लागल। गुप्तकालमे पूर्वी मिथिला आ पश्चिमी बंगालकेँ मिलाकए एकटा राज्य बनाओल गेल छल- पौन्ड्रवर्धन। एहि क्षेत्रान्तर्गत छल भेरियारीगढ़। ई अजुका अररिया जिला मुख्यालयसँ प्रायः १६ किलोमीटर दूर नेपाल सीमापर अवस्थित अछि। एहि भेरियारीगढ़मे दिब्बोक नामक पालशासकक एकटा प्रभावशाली सामन्त अपन भातिज भीम केवटक संग रहै छलाह। ओ अपन प्रजाक कल्याण लेल तँ तत्पर रहिते छलाह, हुनका अनेक सिद्धि सेहो प्राप्त छलनि। ओ भेरियारीगढ़सँ शासन आ पनार नदीक मनोरम तीरपर भागनगर गामस्थित एक गुफामे योग साधना करैत छलाह। मोरंगक राजा भीमदेवक संग हुनक प्रगाढ़ मैत्री छल। महिपाल द्वारा अपन भाए सभक संग कएल कुकृत्य आ अराजक शासन पद्धतिसँ सामन्त दिब्बोक क्षुब्ध भए गेलाह। ओ अपन राजाक निन्दनीय कृत्यक विरोध करए लगलाह। ओ केवट सभक २२ (बाइस) उपजातिकेँ संगठित केलनि आ तकर नेतृत्व लेल अपन भातिज भीम केवटकेँ नियुक्त केलनि। संघर्षक योजना बनए लागल। क्षेत्रक अन्य अनेक छोट-बड़ सामन्त सभ भीम केवटक झंडाक नीचाँ एकजुट होबए लागल। महिपालकेँ एकर भनक लागल तँ ओ एक भाए शूरपालकेँ मुक्त कए शासनमे हिस्सेदार बला लेलक। मुदा एहिसँ स्थिति नञि सम्हरलै। जनाक्रोश अप्[अन चरमपर आबि गेल छलै। भीम केवटक नेतृत्वबला जन-सेना आक्रामक भए गेल। राजा महिपाल शक्तिशाली सेनाक संग-संग ग्राम्य रक्षादल वाहिनीसँ सम्पन्न छल मुदा प्रजाक विश्वास ओकरा संग नञि छलै। भयंकर युद्ध भेलै जाहिमे महिपाल हारि गेल आ क्रुद्ध प्रजा ओकर वध कए देलकै। शूरपाल आ रामपाल मुक्त कए देल गेलाह आ दुनू भाए बंगाल दिस चलि गेलाह। विजयोपरान्त दिब्बोकेँ राजा बनाएल गेल। हुनका कोनो पुत्र नञि छलनि तेँ हुनक मृत्युक उपरान्त भीम केवट राजा भेलाह। एक बेर मोरंग राजा भीमदेवक बहिन तिरफूल सुन्नरि एक सए नाहमे सनेस आ दहेजक संग अपन सासुर जाइ छलीह। सिरीपुर चौरमे किराँत डकैत सभ सइयो नाह लूटि लेलक आ तिरफूल सुन्नरिक हरण कए व्पतालक एहिठाम राखि देलक। हाहाकार मचि गेलै। राजा भीमदेव अपन मित्र भीम केवटसँ गोहार कए मदति माँगलनि। भीम केवट भागनगर गुफामे भगवतीक ध्यान लगौलनि। भगवती परगट भए हुनका तिरफूल सुन्नरिक पता देलथिन। भीम केवट अपन बलशाली हाथमे अढ़ाय मोनक खण्डा लेने बनहौटा घोड़ापर सवार भए किरांत सभक उन्मूलन लेल अग्रसर भेलाह। किरांत सभक सभटा मंतरकेँ अपन साधनाक बलपर काटैत भीम केवट पताल-लोक धरि पहुँचि गेलाह। अपन खंडासँ किरात डकैत सभक वध कए ओ तिरफूल सुन्नरिकेँ मुक्त करैलनि। ताहि काल धरि बौद्ध धर्म कलुषित होअए लागल छल। वज्रयानी सभ विकृत गुह्य साधनामे लागि गेल छल। भीम केवट अपन शासन क्षेत्रमे एहि दुराचारकेँ प्रतिबन्धित केलनि। वज्रयानी बौद्ध मठ सभकेँ उजाड़ि ओकरा शिव मन्दिरक रूप देल गेल। अत्यन्त लोकोपकारी काज सभ करैत भीम केवट अपन शासनकालमे जननायक बनल रहलाह। आइयो भीम केवट लोकदेव रूपमे स्मरण कएल जाइत छथि आ हुनक वीर गाथा लोकगीत बनि लोक कंठमे बसल अछि। लोकदेव लोरिक सौँसे इलाकामे उघरा पंवारक आतंक पसरल छल। ओ परम अत्याचारी आ दिश्चरित्र छल। ककतो धन-सम्पत्ति लूटि लेब आ मनपसिन्न युवतीक अपहरण कए लेब ओकर दिनचर्या बनल छल। उघरा गामक अपन गढ़सँ कज्जलगिरि हाथीपर चढ़ि एकसँ एक अड़िजंग पट्ठा आ पहलमान सभक संग जखन उघरा पंवार बहराबै तँ लोककेँ अदंक धए लए। युवती लोकनि पतनुकान लए लिअए आ संपन्नसँ संपन्न आ प्रभावशाली लोक ओकरा आगाँ नतमस्तक रहै। कमला नदीक कछेरपर गोठ गौरा गाम। एहि गामक मांजरि परम सुन्दरी छलीह। उघरा पंवार मांजरिकेँ अपन अंकशायिनी बनबय छाहैत छल। मांजरि हाबी पत्तनक भगवती मंदिरमे प्रतिदिन पूजा करथि आ अपन सतीत्व रक्षा लेल गोहारि करथि। मांजरिक पिता महरकेँ एक लाख गाय छलनि आ पत्नीक नाम छलनि पद्मा मौहरि। दुनू प्राणीकेँ उघरा पंवारक मोनक बात बूझल रहनि तेँ दुनू चिन्तामग्न भए मांजरिक माम सेवाचनकेँ बजयलनि। मांजरिक लेल निर्भीक आ प्रचण्ड योद्धा वर खोजबाक भार सेवाचनकेँ देल गेलनि। एहि क्रममे अगौरा गामक सिलहट अखाड़ाक ख्याति सेवाचनक कानमे सेहो पड़लनि। एहि अखाड़ाक प्रधान मल्ल छलाह लोरिक। लोरिक अपन अस्सी मोनक विशाल भारी खण्डाक प्रबल वेगसँ संचालन करथि तँ बिजली चमकै। हुनक छोट भाय सावर तेहने मस्त पहलमान। ओहि अखाड़ामे लोरिकक अन्य मल्ल-संगी छल- राजल धोबी, बारू दुसाध आ बंठा चमार। सेवाचन अगौरा एलाह तँ हुनका अगौराक राजा सहदेवक शतखंडा महल देखि पड़लनि। ओतए गेलाह तँ हुनक खूब आवभगत भेल आ ओ राजकुमार महादेवकेँ देखलनि। एहन सुकोमल युवक हुनका मांजरि लेल नञि जँचलनि। ओ महलसँ निराश भए घुरैत छलाह तँ डगरपर राजल धोबीक पत्नी फुलिया हुनका लोरिकक मादे बतैलकनि। सेवाचन कुब्बेक दलानपर एलाह। लोरिकक आ सावरक पिता कुब्बे राजा सहदेवक हरबाह छलाह आ हुनक पत्नीक नाम छलनि- खुलैन। सेवाचन खुब्बेक विपन्नतासँ व्यथित तँ भेलाह, मुदा सिलहट अखाड़ापर लोरिकक पौरुष देखि हुनका लगलनि जेना साक्षात भैरव वीर-वेशमे ठाढ़ छथि। हुनका भरोस भए गेलनि जे इएह तरुण अपन वीरतासँ मांजरिक सतीत्व-रक्षा कए सकैत अछि। ओ कुब्बेक एहिठाम भोजन कयलनि आ विवाह तय भए गेल। उघरा पंवारक प्रचण्ड शक्तिसँ आतंकित साअमान्य जनकेँ बरियात जयबाक साहस नञि भेलनि। बरियातमे मात्र निर्भीक परिजन आ चुनौटा वीर सभ चलल। रस्तामे एकटा नदीक कातमे सात सय धोबी कोनो राजाक कपड़ा धोइत रहए। राजल ओहि धोबी सभसँ आग्रह केलकनि जे सभ बरियातीकेँ कपड़ा दिअओ जे फिरती काल घुराए देल जाएत। धोबी प्रधान प्रत्युत्तरमे राजलक अपमान कए देलकनि। फेर की छल। बरियाती सभ सभटा वस्त्र लूटि लेलक आ पहिरिकेँ आगाँ बढ़ल। दोसर दिन ओ सभ बगड़ा-बजार पहुँचल। भुखायल बरियातीकेँ बजारबला सभ भोजन देब अस्वीकार कए देलक। बस पहर भरिमे बरियाती बगड़ा-बजारकेँ लूटि लेलक आ खा-पी कए आगाँ बढ़ल। गौरा गामक एकटा फैलगर गाछीमे बरियातीक डेरा खसलै। महर दिससँ भोजन सामग्रीक अमार लागि गेल। कुब्बे असगरे सत्ताइस मोन दूध पीबि गेलाह, सात सए तोला दही चाटि गेलाह, सत्तरि माठ सकरौरी चाभि देलथिन आ विशेष आग्रहपर सए हाँड़ी छाल्ही सेहो उदरस्थ कए गेलाह। आनो-आन बरियाती तहिना कएलक। उघरा पंवार विवाहकेँ बाधित करए लेल पहलमान सभकेँ स्त्री-वेशमे पठयलक। बूढ़ कुब्बे अपन ताड़क छौंकीसँ सभकेँ झँटिआबय लगलाह। बहुत मरल, बहुत पड़ायल। फेर पंवार अपन कज्जलगिरि हाथीकेँ पठैलक। सभ बरियाती मिलि ओकरो बेहाल कए देलकै। ओहो पड़ायल। कन्या पक्ष दिससँ एक गोटय पद्मा मौहरिक समाद लए कए आएल जे जाधरि किरण-छबि-मौर, माने चौकक आकाश-तारा-पटोर आ बिजुवनक माणिक चोली नञि देल जेतैक ताधरि कन्यादान संभव नञि। ई सभ अनबाक भार लैत राजल धोबी बाजल- “एतएसँ पचीसे कोसपर बिजुवन छै। ओहिठामक बड़का भारी योगिन कोसा मालिन ई तीनू चीज एक्के संग बेचैत अछि। ओकरासँ ई सभ उधार लए लेबै आ नञि देत तँ घरसुरक मैल छोड़ाए देबै।” सावर सेहो ओकर संग भेल। ओ सभ बाटमे किछु लताम तोड़ि कए आ किछु पोठी माछ पकड़ि कए राखि लेलक। गोंगा बानरकेँ लताममे आ कनही बिलाइकेँ पोठी माछमे ओझरा कए ओ दुनू कोसा मालिन लग पहुँचल जे मंडपमे बैसलि बारह बरषसँ खीर रान्हि रहल छलि। ओकर विभिन्न प्रलोभनसँ बचैत आ धमकीक संग ओकर वस्तुजातक मोल दए देबाक वचन दैत दुनू गोटय सभ वस्तु लए आनल। तखन जाकए सिनुरदान भेल। वर-वधु कोहबर प्रवेश कएलनि। रातिमे पंवारक पठाओल प्रसिद्ध चोर-मल्ल सोनिका आ मनिका चार अलगाकए तरुआरि लेने कोहबरमे घुसि गेल। लोरिक अपन खंडासँ दुनूक मूड़ी छोपि लेलनि। मांजरि तीनटा अनाथक पालन कएने छलीह। प्रथम छल बाजिल कौआ। दोसर छलीह परम बलशालिनी आ महाकाय लुरकी। तेसर छल नांगर छौड़ा नन्हुआँ, जे गाय सभक चरबाही करैत छल। सोनिका आ मनिका मारले गेल छल कि नन्हुआँ चिकरल- “पाहुन, दौगू। उघरा पंवार खरिका बथानक गोथरसँ महरक सभटा गाय हाँकने जाए रहल अछि।” एहि हाकपर लोरिक अपन हाथमे खंडा लेने कोहबरसँ निकलि दौगि गेलाह। ओम्हर खरिका बथान लग पंवार अपन सैनिक सभक संग तैयार छल। लोरिकपर अगिनियाँ बाण चलए लगलैक। ओहिसँ बचए लेल लोरिक धारक कछेरपर एकटा फाटमे धसिकए बैसि गेल। पंवार अपन कज्जलगिरी हाथीपर चढ़ल ओकरा दिस बढ़ल। ओ लग अलए कि लोरिक लपकि कए अपन खंडासँ हाथीक सूँढ़ छोपटि लेलक। हथी अरराकए खसल आ पंवार ओहिपरसँ कुदकिकए एक दिस भागल। लोरिक फाटसँ बहराएल आ सैनिक सभक मूड़ी छोपए लागल। पंवारलग एकटा तीर च्बचल छलै। ओ भूमिपर सूतिकए लोरिकक जांघमे तीर मारलक। जाँघसँ शोणित फुहार देबए लगलैक मुदा लोरिक कहाँ थम्हयबला। ओकर खंडा चलिते रहल आ सैनिक सभ मुंडविहीन होइत गेल। अंततः उघरा पंवार अपन बचल सैनिक संग भागि गेल। लोरिक घुरिकए कोहबर एलाह। बरियाती विदाइ बेर पंवार अपन बचल योद्धा सभक संग फेर जुमि गेल। भीषण युद्ध भेल। लुरकी अपन व्रज-समाठ लेने पंवारेसँ भीड़ि गेल। ओ समाठसँ पंवारक माथपर चोट करैत छलीह, मुदा पंवार अपन रत्न-जड़ित अभेद किरीटक कारणेँबचि-बचि जाइ। एहिपर लोरिकक दृष्टि पड़ल। ओ अपन खंडाक नोकसँ किरीटकेँ नीचाँ खसाए देलक। पंवार प्राण लए कए अपन गढ़ दिस भागल। खसल किरीट उठाकए लुरकी ओकरा लोरिकक माथपर राखि देलकै। किरीट पहिरने लोरिक पंवारक पछोर धेलनि। गढ़क फाटक तक अबैत-अबैत लोरिक पंवारक मूड़ी छोपि लेलनि। गढ़मे हाहाकार मचि गेल। गढ़मे घूसि लोरिक बाल-बच्चा आ रानीकेँ अभय-दान देलनि। रनिवासक काराक फाटक खोलबाए ओहिमे ढ़ाठलि सात तूर सुन्नरिकेँ कारामुक्त कए देल गेल। जन-जनमे जय-जयकार भए उठल। महा-अत्याचारी उघरा पंवारसँ लोककेँ मुक्ति भेटल। लोरिक सभ गोटयसँ विदा लेलनि आ बरियाती संग आगाँ बढ़लाह। आगू-आगू रक्तरंजित वज्र-समाठ लेने लुरकी, ओकर कन्हापर बैसल विशाल कौआ बाजिल आ तकरा पाछू छलै रतन ओहारबला पालकीमे मांजरि। तकरा पाछू चलैत छलाह हाथमे अस्सी मोनक खंडा लेने सिंह जकाँ झुमैत वीर लोरिक। हुनक खंडासँ तखनो पंवारक रक्त चुबिए रहल छल। पद्य खण्ड गजेन्द्र ठाकुर मिथिलाक ध्वज ग़ीत मिथिलाक ध्वज फहरायत जगतमे, माँ रूषलि,भूषलि,दूषलि, देखल हम, अकुलाइत छी, भँसियाइत अछि मन। छी विद्याक उद्योगक कर्मभूमि सँ, पछाड़ि आयत सन्तति अहाँक पुनि, बुद्धि, चातुर्यक आ’ शौर्यक करसँ, विजयक प्रति करू अहँ शंका जुनि। मैथिली छथि अल्पप्राण भेल जौँ, सन्ध्यक्षर बाजि करब हम न्योरा, वर्ण स्फोटक बनत स्पर्शसँ हमर, ध्वज खसत नहि हे मातु मिथिला। किछु संस्कृत सुभाषितक संकलन। गाम सभमे देखैत हेबै किछु लोक संस्कृत सुभाषितक चोटगर प्रयोग करैत छथि। प्रस्तुत अछि अहाँ लेल एहने किछु बीछल सुभाषित। सुभाषितम् (सुष्ठि भाषितम् सुभाषितम्) मातेव रक्षति पितेव हिते नियुङ्कते कान्तेव चाभिरमयत्यपनीयं खेदम्। लक्ष्मीं तनोति वितनोति च दिक्षुं कीर्ति किं किं न साधयति कल्पलतेव विद्या॥ यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम्? लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति ॥ आत्मार्थ जीवलोकेऽस्मिन को न जीवति मानवः। परं परोपकारार्थं यो जीवति स जीवति॥ गच्छन् पिपीलको याति योजनानाम् शतान्यपि अगच्छन् वैनतोयोपि पदमेकम् आगच्छति तृणानि भूमिरूदकं वाक् चतुर्थी च सूंतता। एतान्यपि सतां गेहे नोच्छिद्यंते कदाचन॥ सुलभाः पुरुषाः लोके सततं प्रियवादिनः। अप्रियस्यय च पर्थ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः॥ उपर्जितानां वित्तानां त्याग एकहि रक्षणम्। तडागोदरसंस्थानां परीवाद इताम्भसाम्॥ पुस्तकष्था तु या विद्या परहस्तगतं धनम्। कार्यकाले समुत्पन्ने न सा विद्या न तद्दनम्। बहूनाम् अल्पसाराणां संहतिः कार्यसाधिका। तृणैर्गुणत्वमापन्नेः बध्यंते मत्तदंतिनः॥ जलबिन्दु निपातेन् क्रमशः पूर्ण्यते घटः। स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च॥ चिन्तनीया हि विपदाम् आदावते प्रतिक्रिया। न कूपखननं युक्तम् प्रदीप्ते वह्णिना गृहे॥ मातृवत् परदारेषु परद्रव्येषु लोष्टवत् आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः। यस्य कृत्यं न जानन्ति मंत्रं वा मंत्रितं परे। कृतमेवास्य जानन्ति सर्वै पण्डिते उच्यते। सदयं हृदयं यस्य भाषितं सत्यभूषितम्। कायः परहिते यस्य कलिस्तस्य करोति किम्॥ गतानुगतिकोलोकः न लोकः पारमार्थिकः गङ्गासैक्त लिङ्गेन नष्टं मे ताम्रभाजनम्। दानेन पाणिः न तु कङ्कणेन स्नानेन शुद्धिः न तु चन्दनेन। मानेन तृप्तिः न तु भोजनेन ज्ञानेन मुक्तिः न तु मुण्डनेन॥ आचार्यात् पादमादत्ते पादं शिष्यः स्वमेधया। पादं सब्रह्मचारिभ्यः पादं कालक्रमेण च। यथा चित्तं तथा वाचो यथा वाचस्तथा क्रिया। चित्ते वाचि क्रियायां च महता मेकरूपता॥ अमन्त्रमक्षरं नास्ति नास्ति मूलमनौषधम्। अयोग्यः पुरुषो नास्ति योजकस्तत्र दुर्लभः। आयत्यां गुणदोषज्ञः तदात्वे क्षिप्रनिश्चयः। अतीते कार्यशेषज्ञो विपदा नाभिभूयते॥ गते शोकं न कुर्वीत भविष्यं नैव चिन्तयेत्। वर्तमानेषु कालेषु वर्तयन्ति विचक्षणाः। छायामन्यस्य कुर्वन्ति तिष्ठन्ति स्वयमातपे। फलान्यापि परार्थाय वृक्षाः सत्पुरुषाः इव॥ उपकारिषु यः साधुः साधुत्वे तस्य को गुणः। आरिषु यः साधुः स सादुरिति कीर्तितः॥ उद्यमनैव सिध्यंति कार्याणि न मनोरथैः। नहि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशंति मुखे मृगा। अयं निजः परोवेत्ति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥ प्रियवाक्य प्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः। तस्मात् तदेव वक्त्तव्यं वचने का दरिद्रता। नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते वने। विक्रमार्जित सत्त्वस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता। वज्रादपि कठोराणि मृदुणि कुसुमादपि। लोकोत्तराणाम चेतांसि को हि विज्ञातुमर्हति। अन्नदानं परं दानं विद्यादनमतः परम्। अन्नेन क्षणिका तृप्तिः यवज्जीवं च विद्यया॥ षड् दोषाः पुरुषेणेह ह्यातव्या भूतिमिच्छिता। निद्रा तन्द्रा भयं क्रोधः आलस्य दीर्घसूत्रता॥ अकृत्वा परसन्तापम् अगत्वा खलनमताम्। अनुत्सृज्य सतां वर्त्म यत् स्वल्पमपि तद् बहु॥ अपार भूमि विस्तारम् अगम्य जन संकुलम् राष्ट्रं संघटनाहीनं प्रभवेन्नात्मरक्षणे॥ बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र (शुक्ल यजुर्वेद अध्याय 22, मंत्र 22) डाउनलोड करू। विश्वक प्रथम देशभक्त्ति गीत (शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। सिद्धिरस्तु। संदेश १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ अन्तर्जालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अंक जखन प्रिंट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे। मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री (पेटार) आर्काइवमे बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)... अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रशंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। 2122 || विदेह सदेह:३० विदेह सदेह:३०|| 2121
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अरविन्द ठाकूर- लोकदेव भीम केवट, लोकदेव लोरिक (पृ. २०९१- २०९८)
विदेह सदेह:३०|| 334 ; ify id # Is Vers: ~ = 2S fe} pence aoe Oi 6. ee ot ore चित्र:प्रीति ठाकुर
विदेह सदेह:३०|| 333 चित्र:प्रीति ठाकुर
336 || विदेह सदेह:३० प्रयोग होइत अछि | एहि अंकमे कोबर (पुरैन) देल जा5 रहल अछि। 2 कि चित्र: तूलिका
340 || विदेह सदेह:३० VEUOUU WU UT UU UU yyy र pn. ae ay. Gl | 9 A + A en Tie oo 7 od \ \\ 6 a, HEM |
विदेह सदेह:३०|| 34] स्वास्तिका: कक्षा २ (Hive कार्मेल, पटना) — AX Co —]