SADEHA — 31

Publication: SADEHA · Issue: 31
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ISSN 2229-547X विदेह सदेह ३१ डॉ. कामिनी कामायनी & कुमार मनोज कश्यप केर गद्य आ पद्य रचना (विदेह www.videha.co.in/ पेटार अंक १-३५० सँ) विदेह-सदेह शृंखला- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ गद्य आ पद्यक एकटा समानान्तर संकलन विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। काॅपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति‍एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादि‍त अथवा संचारि‍त-प्रसारि‍त नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- अद्यतन। सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर) केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ "विदेह" पड़लै।इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA (c)२०००- अद्यतन। सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि। सम्पादक 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऐ ई-पत्रिकामे ई-प्रकाशित/ प्रथम प्रकाशित रचनाक प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ मूल आ अनूदित आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। (The Editor, Videha holds the right for print-web archive/ right to translate those archives and/ or e-publish/ print-publish the original/ translated archive). ऐ ई-पत्रिकामे कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। ISSN: 2229-547X मूल्‍य : भा. रू. १०००/- संस्‍करण: २०२२ Videha Sadeha 31: A Collection of Maithili Prose and Verse by Dr Kamini Kamayani & Kumar Manoj Kashyap e-published in Videha e-journal issues 1-350 at www.videha.co.in ). अनुक्रम गद्य-खण्ड (पृ. १-३३६) डॉ. कामिनी कामायनी- डॉनोम्पेंह, सेयाम रेयापक स्वर्णिम अतीत, लघुकथा- भागमंती, सोर, कोन डारि पर केकर खोता, घुइर ताकू, माटीक मुरुत, विलायत वाली कनिया, सूटक कपड़ा, चुमौन, चुट्टा लेमे की चुट्टी़, भरोस,लाल काकी, अभिशप्त, समय काल, कठजीब, कलंकित चान, उत्तराक नोर, महानगर मे सुनीता, संटू क उपनैन, शाश्वत कथा, कनिया पूतरा के विवाह, डाविर्नक बानर, टूटल तारा, अप्पन राज्य (पृ. २-२५४) कुमार मनोज कश्यप- विवसता, मरीचका, परजा, मर्यादाक हनन, प्रतिरोध, दृष्टिकोण, ओ तऽ बताह अछि, धर्मात्मा, मनस्ताप, गिरैत देवाल, कलाकार, नोर अंगोर, फ्यूज बल्व, पहिल चिट्ठी, दिन धराबय तीन नाम, घुरि आऊ निशा, अन्हेर, सीमान, उज़डल खोंता, मरिचिका, परजा, बदलैत समय, जरल पेट, जीतक आगू, माता कुमाता न भवति, ईमानदार, मास्टर साहेब, कचोट, नव-वर्ष, थाकल बाट, हारल मनुक्ख, भावना, बी०डी०ओ० (पृ. २५५-३३६) पद्य-खण्ड (पृ. ३३७-४७९) डॉ. कामिनी कामायनी- अंकोरवट मंदिर, जहिया ओ इतिहास सुनौलक, संग दिअ सदिखन अहिना, वसंत, बाजार मे स्त्री, बंजारा मोन, द्रौपदी, यशोधरा, गांधारी, शकुनतला, फागुन राग, काशीक घाट, चिडैक अभिलाष, भटकैत स्वप्न, आजुक विद्यार्थी, असमंजस, आतंकी गाम, लिखत के प्रेम गीत, आखिर कहिया धरि, भाषा, चक्का, ई केक्कर शोणित ?, खिड़की, भरोस, पुष्पांजलि, आस्थाक पूर्ण कलश, खिलैत पलास वन, आधुनिक स्त्रीगण १-५ (पृ. ३३८-४७२) कुमार मनोज कश्यप- वसंती दोहा, नहिं सुति रहब आहाँ चद्दरि तानि, किछु गजल (पृ. ४७३-४७९) 2

गद्य खण्ड डॉ. कामिनी कामायनी नोम्पेंह भोरे करीब पाँच बजे आंखि खुजल त अपना के मेकोंग नदी के तीर प ठाढ़ पयलों।कनी कनी निनियायल ,कनी कनी यात्रा स झमाराल ,उपर चितिर बीतिर आसमानदेख् क ,आ प्रातः के प्रमुदित समीरक स्पर्श स मोन प्रफुल्लित भ उठल।दूर नदी मे नाव चलि रहल छल।बड़का विशाल नदी [तीन नदी ,मेकोंग ,बास्साक,टोनलसप,जाहि मे मेकोंग सबस पईघ अछि ],जे अनेकों देशक माटीसींचने आबिरहल छल ,अपन लंबाई मे ओतय बहि रहल छल ,एकरे चाकर चौरस छाती प बसलछै ,कोनो समय एशिया के मोती कहाबय बाला ,ओहि देश क राजधानी ,नोम्पेंह । मन के उद्दाम वेग के लगाम दईत पहिने स बुक होटल जाकय,स्नान ,खान पान केबाद तुरतही शहर भ्रमण के लिए निकसबा के छल समय बड़ कम छल ,दर्शनीय स्थान बेशी । मुख्य मुख्य स्थान के लिस्ट कैब ड्राईवर के पकड़ा देलिए। सेयाम रेयाप स कनी बिशेष स्थिति ।देशक राजधानी अछि ,त स्वाभाविके छै ,जे देशक सबटा गणमान्य ,ओहदादार, पाग वाला लोक सब अहि ठाम रहैत छथी।सुंदर भवन ,प फ्रांसीसी स्थापत्य कला के बेसी प्रभाव छैक।[ कोनो समय मे फ्रांसीसी उपनिवेश जे छल] ठाम ठाम प नगरक रच्छा करैत जेना ,विश्रामक मुद्रा मे , पाछा के दु पैर मोड़ने ,अगुलका दु पैर ठाढ़ शेरक मूर्ति सब विगत के राजसी वैभव के प्रदर्शित करिरहलछल। शहर के सड़क चौड़ा चौड़ा,साफ सुथरा सुचिक्कन सुंदर छै । कतेक ठाम ओकर सब के नेता के मूर्ति सेहो ठाढ़। फूल ,फव्वारा स सुसज्जितमैदान ,सड़क ,दोग,दाग । पहिलुक पड़ाव छल म्यूजियम ,बड़ दिव्य , प्राचीन खमेर कालक बस्तु आ कलाकृति स ऊबडुब। अँकोर काल स पहिनुक ,[चौथी सदी ]स ,अंकोर काल धरि[चौदहवी सदी के ] सबटा प्रमुख इतिहास जेना अहिठाम रेखांकित कयल गेल अछि । ओहिठाम स किछुए दूरी प राजभवन व राजकीय महल अछि ,जे अहि शहरक गौरव और बढ़ा दईत अछि । अहि विस्तृत भवन परिसर मे अनेकों दिव्य आआकर्षक महल सब अछि ,जेना दरबार हौल ,नृत्य कक्ष ,राजा के निवास ,रानी के निवास ,नेपोलियन पैवेलियन ,आ भव्य पेगोडा। अहि ठाम अंकोरवट जेका बड़भीड़ छल । शहर मोटा मोटी चारि भाग मे विभक्त छै –उत्तर दक्षिण आकर्षक आवासीयक्षेत्र ,आ फैक्ट्री ,पश्चिम बहू मूल्य आवासीय आ आर्थिक क्षेत्र{विशेष}आ मध्यव हृदय अहि शहर के फ्रांसीसी भाग ,जतय मिनिस्ट्री ,बैंक ,उपनिवेश मकान ,बाजार आ होटल सब छै । पीयर रंगक सेंट्रल मार्केट ,खरीदवैया सभक अड्डा बनल रहैतअछि ,ओहि ठाम अनेक प्रकारक स्वर्ण आ रजतक आभूषणक स्टौल लगल अछि एकरा संग संग पुरानसिक्का ,कपड़ा लत्ता ,घड़ी ,फूल ,पेंटिंग आ खेनाय के सामाग्री स भरल पड़ल अछि । दोसर प्रसिद्ध बाजार अछि टुओल टॉम पोंग मार्केट ई रसियन बाजार के नाम स से विशेष जानल जाइत अछि । अनेक ठाम नाईट मार्केट सेहो लिखल देखाय पड़ल । ओतुक्का समय जीएमटी स सात घंटा आगा छैक। स्थानीय करेंसी रिएल छै,मुदा यू स डी निधोक भ क चलै छैक । अहि ठाम रायल यूनिवर्सिटी ,यूनिवर्सिटी ऑफफाइन आर्ट ,रॉयल यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रिकल्चर आदि अवस्थित छैक । शहर स कनिक फराक विश्व प्रसिद्ध किरीरोम नेशनल पार्क छै, जेकरा घूमबा लेल पर्याप्त समय चाही। अहि ठाम प्रत्येक वर्ष बड़ भव्य जलोत्सव होईत ,छैक, जेकरओरियौन कएक मास पहिनहि स प्रारम्भ भ जाईत छैक । एक सुंदर ,एक स्वप्न मयी राजधानी के दोसर हृदय विदारक पहलू ओकर किलिंग फील्ड सेहो छैक ,जे कोनो भीषण तानाशाहक ,लोम हर्षक ,नृशंस ,नरसंहार कजीवित दस्तावेज़ अछि । सन 1975 स 1989 धरि तानाशाह पोलपोट आ ओकर मंडली द्वारा सृजित कंपूचिया के रक्त रंजीत इतिहासक खुजल पृष्ठ । वार म्यूजियमके हथियारक ,आयुधक क्रूरता के कथा अहि ठाम अखन धरि सिसकी रहल अछि । ओहि विशाल परिसर के घेर क पर्यटक स्थल बनाओल गेल अछि ,जतय करीब20,000 स बेसी लोक के{जाहि मे स्त्री आ दु बरखक बच्चा सब सेहो रहैक } अमानुषिक हत्या कयल गेल छल ।ओकर सबहक खोपड़ी ,ओकर सबहक हड्डी ,ओकरसबहक पहिरल वस्त्र के एक गोट स्मारक बना क सुरक्षित राखल गेल अछि । ठाम ठाम लिखल छैक ,जे कृपया मैदानक घास प पैर नहीं राखू,के जाने ककर मृत शरीर अहि ठाम खसल छैक । ओहि भयानक त्रासदी के खिस्सा सुनि क ,आ प्रमाण देखि क ,मन अथाह वेदना स भरि गेल छल । गाईड बाजि रहल छल ,लोककहत्या करबा मे कोनो गोली व बारूद नहि खर्च भेलए,खजूरक काँटेदार जड़ि मे पटैक क ,बच्चा सब के मारल गेलै,आओर दुर्दांत वर्णन सुनि क मन खराप हुए लगल ,ततुरते ओहि ठाम स प्रस्थान कयलहू । आब शहरक बीच ओहि बड़का स्कूल मे अनलक ,जे ओहि नरसंहारक पहिल पृष्ठ छल ।औचक एक दिन जे सब स्कूल गेलाओ फेर आपस नै घुरला । कक्षा सब के जेल बनादेल गेल छल ,चारहु दिस कंटीली तार स तुरत घेरल गेल , आनन फानन मे एक एक कक्षा मे तीन तीन टा ईंट कदेवार ,अलग अलग सेल ,पॉल पॉट के जे जतय विरोध केलकै, ओकरा ओहिठाम निबटाबय के खूनी प्रयास । स्कूल के अन्य कमरा सब संग्रहालय बनल ,ओहि समयके साहित्य ,पत्रिका ,हत्या मे उपयोगी सामाग्री सब के समेटने सून आंखि स संसार के हेर रहल अछि ।हजारो हजार पन्ना अहि खूनी खेल प लिखल गेल ,फिल्म बनलदुनिया त्राहि त्राहि करि उठल छल । अहि विभीषिका के पार निकलबाक प्रयास मे आय धरि ई देश लागल अछि ,गरीबी ,बेरोजगारी ,बाल मजदूरी अनेकों विपत्ति छैक ,दुनिया भरी के स्वयम सेवीसंस्था त छैक ,मुदा काज की भ रहल छै भगवान जानै थ [, कतेकों मास धरि ई दृश्य हमर मन मस्तिष्क के तिरोहित करैत रहल छल ।] कहुना करि इमहर उमहर तकैत ,शहरक मनभावन चाकर चौरस बाट प मटर गस्ती करैत एक एक क्षणक आनंद उठाबैत रहलहू । स्थानीय समयानुसार करीब तीन बजे हम सब मंदिर पहुचलहु ,अनेक सीढ़ी चढ़ि क महात्मा बुद्धक मंदिर ,अहि ठाम ओ अमिताभ रूप मे छथी। सम्मुख पाँच पाँचफुट स बेशी उंच मोट मोट मोमबत्ती सब ,एक दु टा जरि रहल छल ।ओहि परिसर मे कीछु और मूर्ति सब छैक,कनी नीचा सीढ़ी स उतरि क एक नीक जलपान गृहसेहो छैक ,एक ठाम बाहर मे सेहो किछू पूजनीय मूर्ति सब के सजा संवारि क राखल गेल छल।ओहि ठाम स नीचा के दृश्य बड़ा रमणीय लगैक। नोम्पेंह के नाम अहि मंदिर प अछि ,पहाड़ी मंदिर ।एकर किस्सा सेहो बड़ मनोहर छैक । शहर मे नदी कातक दृश्य अति मनोहारिणी ,जल मे छोट पैघ जहाज पर पर्यटकक आवाजही ,संध्या समय भोरे जका भ्रमण करैत लोक ,अपन अपन छोट मोटसमान बेचैत फेरीवाला ,सायकिल के एक दीस अपन ठेला व टोकरी बान्हने फल ,सूखल माछ आ दि बेचैत लोक ।कत्तों बड़ तीव्र ध्वनि लगा क नब पीढ़ीनाचि रहल छल । नदी के कात म पाथरक बेंच प बैसल लोग भाव विभोर सन देखाई पड़े छल । कनी आगा एक टा बड़का विश्रामालय सन बनल [रौद वपानि स रक्षा करबा लेल’] ओहि ठाम फुटपाथ प एक टा छोट छिन मंडिल अछि ,जाहि मे मोंछ बाला तीन टा देवता विराजमान छलाह,ओहि के छोट प्रांगण मेआगि जरि रहल छल,,एक पूजैगिरि सन लोक बैसल,फूल बिकाय,लोक अपन श्रद्धा सुमन सफ़ेद कमल के रूप मे अर्पित करैक। सड़क के दोसर कात पार्क ,आ भव्य पैघ पैघ होटल ,मकान,दोकान सब । सोझा मे एक टा भारतीय होटल छल ,नीक अपन स्वादक शाकाहारी भोजन भेटल । दोकान्दार बतौलक ,बाहरी आगंतुक सबभारतीय भोजन पसीन्न करैक छै। ओतुक्का बाजार सब पाँच बजे बन्न भ जाय छै राति मे होटल ,बार एहने सन स्थान खुजल रहे छै । सड़क कात बेचय वाला सेहोअपन समय व गांहकि देखि व्यापार करैत अछि । भिनसरे स ,झाड पोछ करि दोकान सब खुजय लगे छै । बड़का बड़का ,फूल ,फल स सजल बाजार केटपैत ,आखिरी नजर स सलाम करैत,भोरे भोर हम दुनु गोटे एयर पोर्ट लेल प्रस्थान भ चुकल छी। शहर स नौ किलो मीटर प एयर पोर्ट छै ,टैक्सी के किराया सात यूसडी। अनेक सुंदर ,इमारत ,सरकारी सस्थान ,विभिन्न देशक सहयोग स चलैत संस्थान सबहकविशाल भवन सब स सजल सड़क एक गोट आधुनिक देशक झलक प्रस्तुति करि रहल छल । हाँ ,पॉल पौट के तानाशाही के यादगार सन एक ठाम{कत्तोंऔर ,भरिसक किलिंग फील्ड दिस ज़ेबा काल ] बड़का टा के होर्डिंग सन लागल,कोनो अंगरेजी अखबारमे युद्धक समय के छपल लोग सबहक फोटो छै,जाहि मे असंख्य लोग ,,शरणार्थी ,अपन प्राण बचबय लेल माथ प समान सब उठा क भागि रहल छै । जे किन्स्यातभविष्य के पीढ़ी लेल एक टा बड़का टा के चेतावनी छैक । बड़ मार्मिक छल । शहर के अधिकांश आबादी नवयुवक आ छोट बच्चा सब के छैक। समय के संग ,मुंह उठेबा के प्रयास मे लागल ,मुदा धूर्त वाणिज्यिक सभ्यताक युग मे मददिगारपहिने अपन स्वार्थ तकैत अछि ,रक्षक भक्षक अहिने अहिने ठाम बनि जाय छै। बड़का कंपनी अपन सामान बेचबा मे तल्लीन ,बड़का छोटका मौल के बिक्री बिशेख। तखन “समरथ के नहिं दोख गोसाई’ अहिना चलैत एलै है संसार । अनेक विसंगति के उपरांत , ई सुंदर शहर अपना संग ढेर रास खिस्सा पिहानी नेने बड़ दिन धरि ऊहापोह मे रखने छल । सेयाम रेयापक स्वर्णिम अतीत (यात्रा वृत्तान्त) धन धान्य स लबालब ,ऊंच ऊंच ,मोटका मोटका विशाल बिरिछ सबहक छाहरि मे ,नदी सब के मृदु जलक मध्य ,सुस्ताति, अलसायल ,कनी सुतल ,कनी जागल,प्राचीन सभ्यता के अतुल्य भार अपन छाती प रखने ,धरती के ई टुकड़ा ,विश्व के समक्ष अपन सबटा रहस्य खोलबा के लेल बेकल , विह्वल भ यात्री सभक प्रतीक्षा करि रहल अछि,यात्रीगण पर्याप्त संख्या मे अबितौ छथी । चारहू दिस पसरल,कुहरैत,विभत्स, निर्धनता ,अपन देशक कोनो रेलवे स्टेशन सन एयर पोर्ट ,लोकक आंखि मे संहियायल सन्नाटा, कोनो गहीड़ व्यथा के अकथ भूमिका मे डूबल सन लागल,त मोन मे हठात सहस्त्रों प्रश्न उठब स्वाभाविक छल ,अतेक पिछड़ल ,एहेन सकुचल वर्तमान वाला भूमि ,आखिर अजस्त्र प्रकृतिक सम्पदा स परिपूर्ण कोना ? अनेकों अही भांति के प्रश्न के मोन के कोनो कोन मे विराम दइत ,होटल आबि कनी विश्राम करबा लेल विवश भेलहू। दिन के साढ़े चारि बाजि रहल छल । अन्य पर्यटकक पसंदीदा सवारी टुकटुक लेलहू,आ गाईड के सलाह अनुसार मंदिरक एक छोट सन परिक्रमा लेल अग्रसर भेलहू। मंदिर के गेट धरि पहुंचैत पहुंचैत पाँच बजबा मे दस मिनट बाकी ।टिकट 40 डौलर प्रति व्यक्ति ,,मुदा तीन दिन धरि भ्रमण करब के अनुमति । पाँच बजे भोर स पाँच बजे सांझ धरि मंदिर के समय निर्धारित छैक। अहि धरती प पएर रखबा स पहिनहि स बूनि पड़ी रहल छल ,से जिद्दी बालक सन ठुमकैत रहि गेल छल भरि दिन ,ओहि मौसम मे टुकटुक प बइसल बइसल पघिलैत मेघ मे भिजैत अतीत के भव्यता स्मरण करैत मंदिर मंदिर देखैत रहलहू । शाकाहारी भोजन लेल शहरि के चीरेत,महाराजा होटल पहुचय मे परंपरागत दोकान सबहक भव्य झांकी बड़ सुखमय दृश्य प्रस्तुत करि रहल छल । हिन्दी भाषि होटल मालिक के हर्षित भ पुछलिय भारतीय छी? “ नई पाकिस्तान,पंजाब केर”। एक क्षण लेल विचलित मोन भेल ,पाकिस्तान त भारते छलय नै,खेनाय पिनाय सेहो एके । जे से । दोसर दिन अंकोरवट मंदिर आ म्यूजियम के कार्यक्रम बनल । मंदिरक टिकट कीनिए नेने रहि ,समय बचल ,विशाल अँकोरवट परिसर के परिक्रमा करबा लेल विश्व के प्राय सब कोना के लोग जुटल। [किछूयात्री त कएक दिन ,बल्कि महीनों स ओत्तय डेरा जमौने छल, अहि सभ्यता आ इतिहासक अनुसंधान करयवाला ,लेखक ,विद्यार्थी छथी ।] खमेर युग के स्वर्णिम कालक प्रतिनिधित्व करैत भीषण अरण्य मे ठाढ़ ,विश्व हेरिटेज मे शामिल ,अहि परिसर मे अंकोरवट मंदिर विश्व के सबस विशाल आ विस्तृत मंदिर अछि .सरिपहू मे अजगुत अछि , ,वास्तु,शिल्प कला के बेजोड़ प्रमाण ।नीक जका सुरक्षित रखल गेल अछि राजा सूर्य बर्मन द्वितीय द्वारा ,1,950,000,स्क्वायर मीटर, आने कि195 हेक्टेयर जमीन प बनाओल ई मंदिर प्रारम्भ मे हिन्दू देवता विष्णु के समर्पित कएल गेल छल,कालांतर मे बौद्ध धर्मक शरण मे चलि गेल । दोसर पईघ मंदिर अछि ,बायोन टैम्पल –महायान बौद्ध मंदिर सब मे ई सबस पैघ,अछि ,एकरा अँकोर थोम के मध्य मे बनाओल गेल छल ।तेसर ता प्रोम टैम्पल ,पर्यटकक सबस बेसी ध्यान आकर्षित करैत अछि ।समय व काल द्वारा उपेक्षित रहलाक कारणे मोटका मोटका विशाल बृक्ष सब मंदिरभवन ,आँगन के चीर क अपन प्रभाव स्थापित कय नेने अछि ।अहि मे मोट मोट ,लंबा लंबा अजोध साँप सब सेहो अड्डा जमौने अछि । आब एकर देख भाल बड़ सावधानी स कयल जा रहल अछि ,जाहि स मंदिर ढांचा के कोनो क्षति नहि पहुचे। बेकोंग मंदिर पिरामिडक शक्ल मे बनल भगवान शिव के समर्पित अछि ।मंदिर के प्रवेश द्वार सात मुंह वाला नाग सब स संरक्षित अछि । अनेकों देश एकर पुनरुत्थान लेल मददि कय रहल अछि । अहि क्रम मे भारत सरकारक पुरातत्व विभागक बोर्ड सेहो लागल देखल जा सकैत अछि । अनेकों ठाम यूनिसेफ के मददि स जीर्णोद्धार के काज भ रहल छै। किछू मंदिरक सिडही बड्ड उंच उंच ,नहि जानि ओहि प लोक कोना आराम स चढ़ैत होयत ,पर्यटकक सुविधा लेल अनेक ठाम लकड़ी के सुविधा जनक सिडही बनाओल गेल अछि । कतेको भूमिगत छिड़ियायल पाथरि कोनो समय मे भरल पूरल उल्लसित पूजनीय देव स्थल छल। अनेक ठाम ओहि प्राचीन पाषाण ईट के जोडि क कोनो प्राचीन ढांचा के रूप देल जा रहल छल । भवन के छत ,छज्जा प मोट मोट हरियर हरियर मखमली काही जमल छल , बड़ सोहनगर लगैत छल ।एक ठाम पुलक दुनु कात अनेकों यक्ष यक्षिणी के डाढ़ धरि मूर्ति सब, किछू साबूत,किछू भांगल ,किन्स्यात ओ कोनो किला के मुख्य दरवाजा रहल हेतैक। अप्सरा ,नाग ,हाथी ,शेर ,कमल दानव आदि के मूर्ति ,व भित्ति चित्र स कोना कोना आच्छादित अछि ।किछू मंदिर मे महात्मा बुद्ध के पीत वस्त्र पहिरा क हुनका समक्ष पुष्प अगरबत्ती राखल छल । किछू स्त्रीगण सब ,पर्यटक स फूल अगरबत्ती खरीदबा के अनुग्रह सेहो करैतछल । एक मंडिल के प्रांगण मे एक पुजारी सन लोक चादरि प बैस क किछू कन्या सभक हाथ मे ताग बन्हि रहल छल । मंदिर आ स्तूपक ई स्थान जादू ,टोना ,तंत्र ,मंत्र के आधिपत्य मे सेहो बड़ बेशी समाहित छल“[किन्स्यात एखनों] हिन्दू धर्म के प्रायः गणमान्य देवी देवता साबहक पाथरि प उत्खनन ,आ मूर्ति ,ई साबित करबा लेल पर्याप्त अछि जे एक समय ओतय हिन्दू धर्म के डंका बाजि रहल छल ,तदुपरान्त बौद्ध धर्म के प्रधानता भ गेल ॥महात्मा बुद्ध के जन्म स निर्वाण धरिक कथा ,जातक कथा ,के बड़ निक जका अनेक ठाम भित्तिचित्र मे ,प्राचीर मे दर्शाओल गेल अछि ।तीन दिन पर्याप्त अछि नीक जका घुमबा लेल ,ताही स तीन दिनक टिकट दईत छैक । मुदा हमारा सब लग समयक अभाव छल । सेयाम रेयप कोनो समय खमेर राज्य क राजधानी छल । हजारों हजार स्वर्ण मुद्रा खर्च करि क एकर निर्माण भेल छल ,आय अहि देशक अर्थ व्यवस्था एकरे काँध प अछि ,कंबोडिया लोक अँकोरवट के मंदिरे देखय अबैत अछि ,आ पर्यटन उद्योग स आम जन जीवन अपन जीवन यापन करैत अछि । अन्य देशक बनिस्पत ई देश बड़ सस्त,चीज बोस्त,गाड़ी ,होटल ,खेनाय ,स्पा ,मालिश ,सब किछू । बेशी संख्या धिया पूता के ,जवान लोक के ,बुढ़बड्ड कम ,देखाय पड़ल । तेसर दिन सेयाम रेयप के दोसर धरोहरि फ्लोटिंग विलेज के लेल प्रस्थान कएल। ड्राईवर चेन के गाम उमहरे छल ,ओ अप्पन गाम सेहो देखेबाक चाहैत छल । ओतुका गाम के देखबा के लालसा हमरो उद्दाम भ चुकल ,अविलंब ओकर प्रस्ताव स्वीकार कयलहू ।गाम एखनहु अपन अतीत के गरा लगौने ठाढ़ छै। कच्ची सड़क ,[जेकरा पक्की बनेबाक सरकारी प्रयास भ रहल छैक]के दुनु कात लहलह करैत धान क फ़सील रोपल जा रहल छल,सड़क पर कनिए दूर निकलला प ओकर भाय एक गोट स्कूटर प बइसल अपन संगी संग विपरीत दिस स आबि रहल छल ।चेन के दिस तकैत,मुसकैत । गाड़ी रोकि क ओ अप्पन पहिरलहा चमड़ा के नीकहा चप्पल भाई के दैत हमारा सब स बाजल ,ई हमर छोट भाय अछि’ ,आ अप्पन पर्स खोलि किछू टाका सेहो देलके।हमहु सब किछू ओतुका करेंसी देलियै। कनिए दूर आगु चलला के बाद ,बीच खेत स ,नितांत कच्ची {पुरना जमाना के बैल गाड़ी वाला रास्ता}देखा ,चेन कहलक पंदरह बीस मिनट पैदल चलय पड़त हम्मर गाम धरि,ओतय गाड़ी नहि जा सकैत अछि । ओहि ऊब्बड खाबड़ सड़क पर अहिना हमर मोंन परेशान ,शरीर अशोथकित भ गेल छल । आब हिम्मत नहिं,पैदल चलबा के । हमर मना केला के बाद ओ बाट घाट के घर सब देखबैत जेना गाईड बनि गेल । सड़क बनि रहल छै,जे प्रगति के सूचक छै ,बिजली के खंभा दूर दूर धरि नजरि आबैत छै ।अपना सब दिस के मचान सनक छोट छोट फूसक घर ,नीचा लकड़ी वला गाड़ी ,माल जाल ,,ऊपर सीढ़ी चढ़ि लोकवेद रहैत अछि ।घरक ,देवाल चार ,किछू फूसक ,किछू ताड़क खजूरक पत्ता के । किछू पक्का के सेहो । कहलक ओ “ अहि ठाम बड़ बारिस होय छैक ।,बरसा के मौसम मे ई सब ईलाका पानि मे डुबि जाय छै ।,ताहि लेल अहि ठाम बांसक,लकड़ीक एहेन घर बनाओल जाय छैक ।किछू खेत मे मिरचाई के पौधा लागल छल,कत्तेक ठाम बत्तकक फार्म छल ।किछूघर मे बइसल ज़नानी सब बांस के ,खजूरके पात स सामान बनबै छल ,जे खुजल दरबज्जा स ओहिना देखाय पड़ी रहल छल । दूर दूर धरि पसरल बाध ,एक टा खेत मे किछू स्त्रीगण पुरुख बड़का बड़का हैट पहिरने धान रोपि रहल छल । हमरा फोटो झिकैत देखि क ठठा क हंसल छल । कच्ची सड़क पाँच दस कोशक बाद पक्की सड़क मे एकाकार भ चुकल छल ।सड़क क कात वएह झोपड़ी सन घर व दोकान ,मुदा सब ठाम पानिक बोतल ,भांति भांति के लाल ,पियर,हरियर ,चिप्स व बिस्कुट के पैकेट । पर्यटकक सुविधा के चीज सब ।,हाँ , कतेको ठाम दु लीटर, पाँच लीटर के बोतल मे पेट्रोल ,डीजल बिकाईत छल । आगा ,जंगल झाड स बढ़ैत गाड़ी एकटा,गुमती लग रोकलक ,जतय25 डौलरक प्रति टिकट खरीदय पड़ल। जाबैत चेन टिकट लैत छल ,पाँच सात टा, सात स दस बरखक बच्चा सब गाड़ी के चारो कात स घेर लेलक ,हम एक टा फोटो खिचलिये ,त सब फटाफट गाल प,माथ प हाथ राखि ,पोज बना क ठाढ़ भ गेल । एक टा कन्या के हाथ मे पारदर्शी प्लास्टिक मे जीवित कछुआ छले,हॅलो हॅलो करैत ओ खरीदबा के ईसारा करय लगल ,आन बच्चा सब सेहो तरहत्थी पसारि देलके।चेन बड्बड़ाय लागले ,बाहरि आदमी सब केकरा सब के भिखमंगा बना देलके । कनिए दूर स नदी के सोर सुनाई पडैट छल । नदी के कात खूब चहल पहल ,नाव ,जहाज ,मल्लाह पैलवार ,पर्यटक सब । एक टा जहाज मे बैस क नदी के लंबाई मे यात्रा सुरू भेल । करीब आधा घंटा लागल ,फ्लोटिंग विल्लेज मे प्रवेश कयलहू ।आजूक युग मे इहो संभव छैक की? पानि के ऊपर बसल संसार ,बांस ,लकड़ी ,सब के बन्हि छिन्ह क बनल ,जल प तैरेत घर ,दोकान,पुरातनता के संग ,आधुनिकता सेहो घेंट मे घेंट मिलौने । जहाज क कैप्टन अपन जहाज के ओहि ठाम रोकलक ,जे एक टा पइघ दोकान सन छल,खेबा पीबा के ,चीज बोस्त खरीदबा के ,बाथरूम आदि के सुविधा स परिपूर्ण ।ओहि घर स सटल लकडी के पोखरा पाटन घर सन दू मंज़िला घर छल ,जाहि मे नीचा जाल स घेरल छल ,कतेक रास छोट पइघ मगरमच्छ सब ओतय विश्राम के मुद्रा मे निढाल भ पड़ल छल । एक टा दोसर घर मे नाइलोनक जाल सन दु टा बांस के खंभा मे बांहल छल ,जाहि प एक गोट स्त्री सुतल छली ,कत्तों कोनो स्त्री अपन आठ नौ मासक तंदुरुस्त बच्चा के लोईक लोईक क खेला रहल छल ॥ कियो रस्सी बुनेत ,कोनो कोनो दिनचर्या मे लगल ।एक ठाम दु घरक़ बीच पानि प जाफरी सन बनल ,ओहि मे मच्छरदानी लागल ,बत्तक ,आदि मजा स तैर रहल छल ।कुकुर सेहो छल । आवागमन के लेल प्राय सब के अपन अपन नाव ,छैक,चर्च ,स्कूल ,हेयर कटिंग सैलून ,अस्पताल सेहो सब छैक । टूटल भांगल अंगरेजी बाजिक अपन रोजी रोटी कमा रहल अछि । कोनो समय मे ई ईलाका कोनो राजा के नुकेबाक स्थान छल। नदी प डोलैत ओ गाम आदिम मनुखक कथा जेना कही रहल हो। पानी मे रहनाय कष्ट कारक त छइए। ओतुका पानि बड़ गंद,शिक्षा के स्तर त पूरे देशे मे खराप छै,तखन ओतुक्का गप्पे की । आपसी मे बड़ कम समय{12मिनट} पाँच बजवा मे बचल रहे ।सब किछू पाँच बजे बन्न भ जाय छै। बाटे मे वार म्यूजियम छल , काउंटर प ठाढ़ लड़की साढ़े पाँच तक खुलल रहबा के कही क टिकट काटि देने छल । वार मेमोरियल – हमरा सब के अलावा दस टा आर पर्यटक अहि धोका मे भीतर चली गेल रही ,सरकारी गाईड अपन टुटल,तोतराईल अंगरेजी मे देशक भीषण दुर्भाग्यक बखान करैत[,युद्ध के बाद इमहर ओमहार छितरायल सबटा लड़ाकु विमान ,हथियार सबके एक ठाम एक टा घेरल मैदान मे राखी देल गेल अछि ,आ एक कात किछू एकचारी जका बनल घर मे युद्ध के विभीषिका के जीवित तस्वीर सब ,लगाओल गेल छै]कोन बम के कतेक मारक क्षमता छल ,माईनिंग ब्लास्ट मनुक्ख लेल कतेक खतरनाक ,छोटका बम ,बड़का बम ,सैनिक के वस्त्र , क्रांति करि सबके कारी कारी परिधान । ओ बाजि रहल छल ,हमर देशक सीधा सादा किसान ,जे अतुका उर्वर माटि पानि मे अन्न उपजा क हंसी खुसी अपन जीवन जीबैत छल ,मुदा ओकर मुंहक अन्न छीन क ई सब हथियार ,टैंक ,प्रशिया ,रसिया ,चीन स मंगाओल गेल ,जखन युद्ध समाप्त भेल अतुका जंगल ,झाड ,बियाबाँ ,खेत ,मे लावारिस एकरा सब के आनि राखल गेल ,ई हमर देशक बरबादी के ,कथा कहि रहल अछि ।ओ सब जतेक नर संहार केलक धनक अपव्यय केलक ,देशक डाढ़ टुटले अछि । बिशेख किछू देखबा स पहिनहि समय समाप्त भ चुकल छल । तेसर दिन कल्चरल विल्लेज देखल -15 डालर प्रति व्यक्ति ,प्राचीन वास्तु शिल्प के प्रदर्शित करैत । सबटा कार्यक्रम दुपहर ढाई बजे स प्रारम्भ होईत छैक। एखन साढ़े एगारहे बाजि रहल छल।अहि स्वर्णिम समय के ओहि भव्य इमारत परिसरक परिक्रमा मे लगेबाक प्रयास मे आगा बढ़लहू त देखलहून ,हमारा सब संग संसार ससरि रहल अछि ,पर्यटकक बड़ निक उपस्थिति छल । चारि पाँच टा त थिएटरे छल ,न्यू थियेटर ,मिलेनियम थियेटर आदि । सांस्कृतिक गाँव ,जेना कि ओकर शब्दार्थ मे निहित अछि ,अपन सबटा ऐतिहासिक संपदा के एक ठाम सहेजने विश्व समुदाय के आश्चर्य चकित करबा के लेल उत्सुक अछि ।सन 2001 मे बनल आ 2003 मे जनता के लेल खुजल अहि थीम पार्क के 210,000 स्क्वेयर मीटर मे बनाओल गेल अछि जाहि मे एगारह टा ग्राम ,सब युगक अपन अपन रीति रिवाजक संग । संग्रहालय मे ,बुद्ध,के अनेक प्रतिमा ,शिवलिंग ,विष्णु ब्रम्हा ,अप्सरा हाथी ,बाघ ,प्राचीन जनजाति ,आदि के भव्य मूर्ति बड़ नीक प्रकार स लगाओल गेल अछि । चीनी विलेज ,खमेर विलेज आदि के नङ्घैत हम सब फ्लोटिंग विलेज पहुंचलहू। जलाशय मे बनल काष्ठ के विस्तृत घर ,पुल,भवन आदि ,मूल स बड़ बेशी सौन्दर्य वान लागि रहल छल । ठामे ठाम नयनाभिराम ,मनोरम मूर्ति ,मनुक्ख ,जानवर सब के बनल जे ओहि देशक संस्कृति के उद्योतक अछि । एक ठाम धरती मे छाती धरि धंसल,दुनु हाथ ऊपर उठौने दु टा भीमकाय पुरुषक मूर्ति छल ,जेकर एकटा के मुंह पर असीम वेदना ,आ दोसर के प्रकांड प्रसन्नता बड़ आकर्षित करि रहल छल ।बड़का गुरिल्ला जेकर झूला सन बनल दुनु गोलाकार हाथ प बईस क लोक सब फोटो खिचवा रहल छल, कत्तों बारह पंदरह फीट उंच सुपर मैन आदि इत्यादि । परिक्रमा करबा लेल बैटरी जनित गाड़ी सेहो सुलभ छल ,मुदा एक्का दुग्गी के छोड़ि सब पैरे बुलैत छल । देखैत देखैत ढाई बाजि गेल ,न्यू थिएटर मे प्रोग्राम देखवा लेल लोक सब अपन अपन स्थान ग्रहण कायल , भव्य कक्ष ,उत्तम साज सज्जा हाल पईघ रहे त आधे भरल लागै ।कलाकार सब आबि क अपन परंपरागत नृत्य प्रस्तुत कैल । ,बांस के ,मल्लाह के ,कमलक फूल के ,अप्सरा के आदि । मल्लाहक नाच देखि अपन देशक नाच मोन पड़ लागल ,ओहिना पाँच सात टा स्त्री सब ,घइल ल क पानि भरय नदी मे जाय अछि ,मल्लाह के पानि मे ज़ेबा स मलाहीन बरजै त अछि ,, उखड़ि समाट मे धान कुटैत अछि । बांस वला नृत्य मणिपुरक मोन पाड़ल। अप्सरा नृत्य ओतय के बड़ प्रसिद्ध छै॥एक थियेटर मे एके टा प्रो ग्राम ,दोसरि लेल दोसर ठाम ।मिलेनियम थियेटर बड़ निक ,लकड़ी के उत्कृष्ट कलाकृति अछि ।ओतय ,खमेर राजा सब के कोना विवाह होय छल एकर प्रस्तुति छल ।चीनी गाम मे चीनी नृत्य के मनोहारी मंचन कतेक रास कार्यक्रम देखैत हम सब बड़ थाकि गेल रही ,त कनी पहिनहि ओत स प्रस्थान कयलहू। अँकोर राष्ट्रीय स्ंग्रहालय अहि देशक सभ्यता संस्कृति के संग्रहण ,संरक्षण करबा के पुरातत्व विभाग के एक गोट अतीव सुंदर स्थान अछि । फ्रांसीसी स्थापत्य कला स ओत प्रोत, अहि प आधुनिक आ पुरातन दुनु शैली के प्रभाव अछि । अहि ठाम अनेक गैलरी अछि ,जाहि मे बुद्धा गैलरी मे बुद्ध के एक हजार दुर्लभ मूर्ति सब संग्रहीत अछि । आन गैलरी सब मे खमेर के स्वर्णिम इतिहासक ,मूर्ति ,राजा रानी ,परिधान ,आभूषण ,कलाकृति ,पाषाण के कथा , आदि के बड़ मनोहारिणी प्रस्तुति अछि । प्रायः सब प्रमुख भाषा मे [हिन्दी छोड़िए क] ऑडियो गाईड उपलब्ध अछि । फोटो झिकनाय निषेध छल ,ताहि लेल कानी मोन मलिन सेहो भ गेल । बहरेलों त आकाशक रंग बदलल छल सांझ उतरय लागल ,चारहु कात बिजली मुसैकमुसैक क अपन मुंह देखबय लगलै। आजूक राति एतय लेलअंतिम छल ,काल्हि कत्तों और ठेकान । शहर मे इमहर ओमहर बौवाबैत ढहनाबैत, घड़ी मे आठ बाजि गेले ,तखन पहिनहि स बुक कराओल होटल मे जा कए ओहि संस्कृति के महान अप्सरा नृत्य के आनंद मे डूबि गेल रही । लघुकथा- भागमंती बड़ दिनक बाद आइ ओइ घरक खुजल पुबरिया खिड़की दिस मानो दायके  धियान गेल । जाफरीसं घेरल, चुहचुही सं भरल , सुरूजक किरीनमे उमकैत, फूल पत्तीसं खिल खिलाइत एक तल्ला  घर । डबडबा गेलन्हि आंखि, हुलकय लागलै अतीत । तहिया ई इलाका एक्दम्मे सुन मसान छलै। राति के कोन गप्प ,दिन दहाड़ों ओमहर ज़ेबा क नाम प कोढ़ हहरि उठैक । रिक्शा वाला सेहो उमहर के यात्री के मूड़ी झूला क बरजै लगैक । महाराजी पूल के अहि पार पंचानाथ के पूजा करय बला लोक ,जनी जाति सेहो झुंडे मे आबेथ,  आ पुल के ओहि पार कनी दूरस्थ  सती स्थान के पूजा करि क हाली हाली घूरि जाईथ। मुदा शहरीकरण के तीव्र आँधी बसात के चपेट मे एला के कारण इमहरका जमीन तहिए सं मोटगर पाय मे  बिकै लागल छल।आ लगिच क गाम के महेश बाबू दू कट्टा जमीन किनी क अहि ठाम चारि टा कोठरी,किचन आ बाथरूम बना क बाकी जमीन के जाफरी स घेर लेने छलैथ।कंपाउंड मे छहर द ,आम लताम,शरीफा , नेबो,केरा के गाछ संग जाफरी प  लतरल लत्ती सब मे लुधकल  करेल ,सजमनि ,घेरा लगवा देलंहि। जे से तोड़ि क ल जाय,आ महेश बाबू खुश होथि,केकरो काज त भेल हमर परिश्रम । हुनक साबिकक पोखरा पाटन घर बड़ नीक खेती पथारी भरल पूरल पैलवार क दालान सेहो शहरक टुनमुनिया कोठरी  के ड्योढ़ स बेसिए छलेंह । तखन राति बिराति , कोर्ट मुकदमा ,डाक्टर अस्पताल क फेरि लगला प राति कटबा लेल एक टा अपन छत त भ गेल छल । ओहि घर क चौखटि प तहिया स नियमित दीप जरलै ,जखन महेश बाबू के बड़का पोता क विवाह दुरागमन भेल ।कनिया के सीथ मे सिंदूर पड़ितै मातर महेश बाबू के कहिया कत्त स कतेको अटकल काज सुनैट गेलैन। पिपरौलिया वाला जमीन के केस जीत गेला ,छोटका बाबा विधानसभा के चुनाव मे भारी बहुमत स विजयी घोसीत भेला ,तेसर पोता के आर्मी मे नौकरी लागि गेलेन्ह,सत्तरह साल स संतान के बाट तकैत ,सुरूज़ देव के अरघ प अरघ चढ़बैत बेटी के बेटा भेलैंह,गाय के बाछी भेलय ,सासुर मे कन्या सुमंगली मानल गेली ।चतुर्थी के परते दुरागमन करि कनिया के ल आयल गेल । ददिया सौस पहिनहि स मुनादी करबा देलखिन जे सब गोटे हुनका भागमंती नाम स सोर पाड़ेथ । हुनका होयन्हि कि पोत्पुतौह के माथ प राखी कि हाथ मे राखी ,कि करेज चीर क ओहि मे स्थापित करी ली ।दाय नौड़ी सब सेहो भागमंती भौजी अथवा बौवासिन कहनाए प्रारम्भ करि देने छल । कनिया अपन गाम मे इंटर मे पढ़ैत छली,त हुनक नाम कालेज मे लिखा क किछू दिन सासुओ अपन खबासिन,भनसीया  मुनेसरा  संग  आबी क रहलखीन । मुदा ओत्त गाम प राज काज मे बड़ हर्ज होमय लागल छलै। बड़ सोचि विचरि क पैल वारक सबस अरामतलबी  प्राणी बूलन पीसी के गाम स उठा क शहरि मे राखि देल गेल । छोटका ककाक बेटा श्रीहर जे मैट्रिक के परीक्षा गाम के स्कूल स देने छले,मेडिकल के तैयारी केलेल आईएसी मे नाम लिखा ओहो डेरा प जाकय रहय लागला । बड़का पोता कत्तों बाहर नौकरी करैत छल । एक गोट नब रिक्शा कीन क कनी दूरस्थ  पड़ोसी लकड़ी के दोकान बलाके भातिज बिपिन के अही शर्त प देल गेल जे कनिया के कत्तों जेबा एबा मे कोनो फिरिसानी नै होय ,तेकरा बाद मोन हो त भाड़ो कमा लै। किछू पाय महिनवारी सेहो बन्हि देल गेल ओकर । डेरा प के सब इंतजाम करि घरवैया निफीकीर भ गेल छला  । कनिया सुभासिनी अपन दियर संग कओलेज जाईथ,आ रिक्शा हुनका उतारि श्रीहरि के कओलेज छोड़ैत।घूरती काल मे सुभासनी एसगरे रिक्शा स जाईथ ।श्री हरी उमहरे स ट्यूशन चलि जायथ ,कखनों कोनो सवारी नै भेटैय त हुनका पैरे डेरा प आबय पड़ेंह। श्री देखबा मे सोरगर पोरगर गोर आकर्षक युवक भैयो क ततेक लजकोटर जे सदिखन धड़ खसौने ,धरती मे सटल ,गुम सुम गुमसुम,मुदा मेहनतिया बड़।आ राति दिनुक दिमागक  घिसाई स स्थानीय मेडिकल कओलेज मे अपन स्थान निश्चित करवा लेलन्हि। बरस छौ मास लगलै मेडिकल कओलेजक परिमार्जित वातावरण श्री के व्यक्तित्व के धो मांजि क दर्पण सन चमका देलकेंन्ह। सीना तनि गेलय, पोशाक बदलि गेलय आ आब केकर नजरि एहेन छल जे हुनका प नहिं अटकै । लोकल भेला क कारने हॉस्टल नहिं नेने छलथि। सुहासिनी के खुशी के ठेकान नहिं ,कत्तो जाईथ त हुनका होन्हि श्री हुनका संग रहैथ।हुनको भरि माथक  सिंदूर घटि क आध आंगुरक भ गेलन्ह,केश स तेल उड़ि गेल, पार्लर के फेरी लगा केश छोट करबा ,भौं छिलबय लागल छली । एक दू बेर घरबला लग  जा बड़का शहरक  हाव डीव ल लेने छलिह । गामक धाख छुटबा संग  , अंगेजी के दू चारि शब्द सेहो बाजि लईत , आब ओ माथ झूका क नै,माथ उठा  क  निधोक भ चलैत फिरैथ ,त आर सुन्नर लगैथ। विषय सेहो कोनो तेहने सन छल जाहि मे कोनो तरहक दिमाग नहि लगाओल जायछै।हुनका कोन नौकरी के बेगरता छल,ओ त ओहिना सख स पढ़ि रहल छली ,दुणु कुल मे पहिल स्त्री ,जे कओलेजक मुंह देखलेंन । पति देव  दू तीन मास  प अबैत छला। आब  हिनक बीए के अंतिम बरख चलि रहल छल ,परीक्षा द  माघ फागुन मे ई अपन घरवाला के डेरा प जाय वाली छलिह। इमहर  श्री कतेक बेर महिला कओलेज सुभासिनी संग जायत अबैत रहला ,मुदा आब हुनको  लाल दुपट्टा अपन गिरह मे बांधी नेने छल। एना बुझि पडलै जे कियो हुनक टिकी काटि के महिला विद्यालय के सोझा ठाढ़ नीमक गाछ क नीचा गाड़ि देने होय । कतेक बेर अपन किलास छोडिओ क ओ ओतय ठाढ़ रहैथ। सखी बहिनपा के टोंट सुनैत, मने मन मुसकेत सुहासिनी कखनों राज ,कखनों मनो कामना मंदिर, कखनों टावर घूमय जायथी,कखनों सिनेमा ।अपन पति के लिखल चिट्ठी हुनका पढ़ि पढ़ि क सुनाबैथ,आ  हुनक आंखि मे उपजल ईरखा देखि अंतस करन धरि मुग्ध होईथ । गाम स नीत दिन किओ नै कियो,   मइयाँ क हाथ क बनल किछू विशेष पकवान ल क आबि जाय।पीसी के शहर मे मोन औनाय त ओ इमहर उमहर के सखी बहिनपा स गप्प लड़ा क ,फेर बिपिन के रिक्शा स दु चारी दिन लेल गाम  घुरि आबेथ।मानो दाय स आगा खसि क गप्प करय बाली वएह स्नेहिल स्त्री छलिह।    एहने सुखक सुवासित मलयानिल सँग जिनगी कटि रहल छल। गोतिया नाता के बड़का लत्ती,आवा जाही , सेहो समय के सुगंधित बना रहल छल। भदवारि मास आबि गेल त बरखा बूनि,सँग कारी कचोर मेघ अपन लट छिटकौने ,आकाश मे छिरहरा खेलाय लागल।एक गोट एहने मनोरम साँझमे जखन ओ अपन बरंडा मे असगर  बैसल गर्जइत मेघ आ चमकैत बिजूरी के जुगल बंदी देख रहल छली,हठात ओ श्री के बजबय लेल हुनक कोठरी दिस बढ़ली। कुर्सी प बैसल ,दुनू टांग टेबुल प धेने  पेट प धैल कोनो किताब मे डूबल ओ  मुसैक रहल छल। हिनका देखि किछू घबडायल सन,किछू अनसोहात भावना के शिकार सन  झट दनी किताब बंद  करि देलथी। सुहासिनी झपटलखीन “,किएहेन पढ़े छलहू,जे हमारा देखि क बन्न करय पडल,एहेन बैरि हम भ गेलहू”।मुदा श्री हुनका किछू जबाव नै द क ,हुनक हाथ झिकैत कोठरी स बहरा गेल छलथी। ई सामान्य सन गप्प सुहासिनी के बड़ व्यथित करि देने छल ।दालि मे किछू कारी नजरि अयलन्ही। भरि राति मोन मे भांति भांति के गप्प बाईस्कोप मे देखाओल दृश्य  जका घूरियाति रहल ।  परात भेने श्री जलपान करि क कओलेज चलि गेला ,मुदा ओ बहन्ना करल ओछोन प पड़ल रहली ,अपन कॉलेज सेहो नहिं गेली । पीसी गाम गेल छली ,आ भनसिया के माछ आनय लेल पठा क ओ श्री के कोठरी पईसी टेबल प रखल ओकर एक एक किताब झाड़ली।इमहार सूंघली ओमहार कनखिएली ,कत्तों किछू नै हाथ अयलन्ही। दोसर तेसर दिन सेहो प्रयास कयल,मुदा अहू बेर निरर्थक । मोने मोन ठेकाने लगली कोनो फोटो जका अवश्य छल । मुदा केकर ? इमहर दुर्गा पूजा के लेल कओलेज मे तातील घोसित करि देल गेल ।घरवाला परसूँ आबि रहल छला।दू तीन दिन मे ओ हुनका संग हुनक डेरा प चलि जयति । गाम स जतरा करि डेरा अयली।भोरका ट्रेन छले। चीज वोस्त कोनो बेसि नै ,मात्र दस दिन लेल एक टा अटैची आ एयर बैग काफी छले । दुनू भाई गप्प करैत करैत कोनो समान आनय टाबर दिस गेला ,भनसिया भानस बनबय मे लिन तखन ओ एक बेर फेर हुलकी मारलैन श्री के कोठरी मे। ताख प रखल एक टा मोटका किताब हाथ मे लेलथी ।सबूत भेट गेलन । चुप चाप सबूत सहित अपन कोठरी मे आपस आबी गेली । दस दिनक छुट्टी ,बड़ विलंब स बीतल । पति के हुनक मुरुझायाल ,मुंह देखि आश्चर्य होयन्ह कि भेल जा रहल अछि ? किछू त कहू,डाक्टर स गप्प करी।मुदा ओ कहैथ परीक्षा के डर गारा मोकि रहल अछि । “छोडु परीक्षा ,तरीक्षा अहा के कोण नोकरी करबा के अछि” ।पति के अहि गप्प प ओ सहमि क बजैथ “ अतेक मेहनत अकारज भ जायत,मात्र दू मास आर छैक बस”। छठी के परना के उपरांत ,नवंबर के कानी मोलायम मोलायम सान रौद मे कओलेज खुजल त ,चारहू दिस किशोर ,युवा किल्लोल प्रस्फुटित होय लगलै।लाल पियर,परिधान ,कंधा प झुलैत पर्स ,पैर मे ऊंचका एड़ी के सैंडील,सखी सहेली ठिठिया ठिठिया क अपन हिय के उल्लास प्रकट करि रहल छल।छात्र सभक संग शिक्षिका सब सेहो जेना प्रसन्नताक महाकाव्य बांचि रहल होयथू । एना बुझी पड़ेक जेना वसंत आबि क ओहि ठाम रमि रहल छल  । मुदा सुहासिनी के आंखिक नीचा क करि कारी गोला किछूआओर कहबा लेल व्यग्र छल । ओ गुमसुम ,मुरुझैल सन काकरो बड़ उद्विग्नता स प्रतीक्षा करि रहल छली। सखी सब ठिठौली करेन्ह। “जीजाजी मोंन  पड़ी रहल छथीन,तै हमार सखी अटेक उदास ,आ ‘के पतिया लय जायत रे मोरे प्रियतम पास” ।किओ कहे ‘कोन काज छल पढ़े के ,हम रहितौं त किन्नों नहि अबितौं ,प्रियतम के छोड़िक,पढ़ाई जाए चूल्हीमे”। सुहासिनी के किछू नै सुनाई पड़ल,व्याकुल हिरणी सन ओ ओहिना इमहर उमहर तकैत रहली । ओहि दिन ओ लाल नूआ लाल आंगी ,लाल चूड़ी ,आ लाल सैंडील पहिरने छलिह,। हठात हुनक नजरि लाल पियर बेलबौटम वाली कन्या प टिकल। “पुष्पा” मस्तिष्क मे नाम अनुगुंजित होमय लगल । ओकर पछोर धेलथी। तबैत कओलेजक प्रथम घंटी बाजि चुकल छल ,सब कियो धड़ फड़ धड़ फड़ करैत अपन अपन कक्षा दिस बढ़ै लागल छल ।क्लास मे प्रवेश करय स पहिनहि ओ  पुष्पा के पाछा स हाथ खिंचलक “रुक तोरा स बड़ जरूरी गप्प करबक अछि”। प्रथम वर्षक छात्रा अपना सोझा अंतिम वर्ष के छात्रा के देखि घबड़ा गेल । ओ ओकरा खींचने खींचने बाथरूम दिस सुनसान मे ला आयल । ओकर लिखल चिट्ठी ,ओकर फोटो देखबैत बाजल “प्रेम करब के बड़ सख छलो, पूरा कओलेज के देखबिओ तोहर किरदानी”। आ अपन पैरक सैंडील उतारि ओकरा प पेशेवर अपराधी सन टूटि पडले । पहिने त पुष्पा सकपका गेल छली ,मुदा बादमे ओहो सीना तानि अड़ी गेली,की करबें। तखनेएक सेंडिल ओकर आंखि प लगले आ ओ बफारि कटैत नीचा खसि पदल ।“म्या गै म्या” एक त महा भयौन ध्वनि स सम्पूर्ण बाथरूम काँपि गेले । सुहासिनी प जेना अनेकों चुड़ैल असवार छल,ओ नीचा खसल पुष्पा प लात घुस्सा के बरसा करैत,भांति भांति के गारि पढ़ि रहल छल । ओकर पीठ प किओ डंडा मरलकै ‘राक्षसी” ओ मुंह उठौलक बड़का भीड़ संग गीता मैडम छलिह । बेसुध पुष्पा के उठा पुठा क बगल के क्लीनिक ल गेल ,जतय ओकरा मृत घोसीत करी डेल गेल छल । कनी काल मे पुलिस आबी क सुहासिनी के अपन जीप मे बैसा क ल जायत रहलै।कियो अनेरे घंटी टनटना देलके। चारहू कात सोर सराबा ,हो हल्ला होमय लागल छल ।कतेको प्रकारक नारा लगायल जाय लागल।आनन फानन मे सूचना बोर्ड प एक सप्ताह के छुट्टी के नोटिस चिपका देल गेल छल । मानो दाय हुनके द्लान प बैसल छलिह,जखन पुलिसक गाड़ी पिपियाती ,घिघियाति गर्द उड़बैत हुनका दरवज्जा प आयल छल।बरदी धारी पुलिस सब के देखिते मातर चारहू दिस जेना घनगर अनहार भ गेल छल ,सबहक  करेज बेतहासा धुकधुकै लागल ,हे विधाता ,ई किए आयल हमरा दुआरे । जीपक सोअर सुनी श्री कोठरी सा बहरैला । पुलिस के गप्प सुनी ओ तुरत ओकर जीप मे बइसी क जायत रहला । ओहि भम्म पडल सन्नाटा के चीरैत इमहर “दाय गै दाय  आब हम केकरा की मुंह देखेबै गे दाय’ घिघियाती ,अस्पस्ट स्वर स कलपैत बुलन पीसी  ओहि ठाम बेहोस भ क खसि पड़ल छलिह ।। सोर सबटा सतरंगी चादरि अपन अतृप्त काया पर लपेटि,इंद्रधनुष बनि सम्पूर्ण आसमान पर पसरि ज़ेबा के लालसा ओकर मन मे औचक नै प्रस्फुटित भेल रहै,ई त कतेक बरखक मुईल मीझैल लुत्ती छल हेतै जे समय आ अनुकूल वसंती झोंका के कोमल ,शीतल स्पर्श पाबि दावानल बनि धधकि उठल ,नै जंगलक लाज ,नै काल वा समयक। आ एक बेर जे भयौन धाह उठलै, त स्वाभाविक छल ,अपना  कात करौट के सम्पूर्ण  जीव जन्तु संग ,विशाल ,दैत्य सन बिकराल गाछ बिरीछ के सेहो भस्मीभूत करि देलके।ओहि झरकल खड़ पत्बार, कीट फतिंगा ,पशु पाखी के मध्य कारि स्याह भेल हरियरीके निहारि क आंखि स नॉर बहाबय बाला ,धरती आ आकाश ,एकदम स्तब्ध ।अपन हृदय के असीम पीड़ा नेने किछू पाखी चें चें करैत,अपन प्राण बचाबय लेल  दोसर वन प्रांत मे बौवा ढहना क शरणस्थली के आस मे निरास –निरास उडी चलल छल । कतेक चेंन स ओ सब अपन पुरान बास स्थल मे ,चहकैत,महकैत,गबैत ,चुगैत दिन काटि रहल छल ,मुदा हाय रे दावानल ,कोन आगि जठराग्नि के टपैत,मानसिक विचार के क्षत विक्षत करैत ,लक्षमनरेखा नांघय लेल बाध्य करि देल ,जे अकस्मात ओकर सबहक खोंता उजड़ि गेलय,ओकर सबहक ओ डारि अनकर भ चुकल छल । स्याह राति मे खिड़की स हेरैत आकास संग, स्वाति के मोन विचारक बाध बोन मे बुलैत बुलैत घृणा आ आत्मग्लानि स भरि ओकरा भाव विह्वल करि देलके, रहि रहि क कुहेस फूटे,संसार त्यागक विचार मों के आंदोलित करय लागै। कोन मुंह ल क  केकरा लग जेते ,सम्पूर्ण मुख मण्डल त खापड़िक पेंदी बनि गेल आब ,केहन परिहासक दृष्टि स छलनी छलनी करय लेल,वाणी स फुइसक सहानुभूति स, आत्महत्या धरि करबाक लेल प्रेरित करबा लेल  बेकल समाज ओकर प्रतीक्षा मे बाहरि ठाढ़ छैक  ।ओछोन प राखल मोबाइल फेर बफारि तोड़य लागले मुदा ओ ओहिना पथरालि सन ठाढ़। कनी कालक बाद  फोन उठा कॉल बौक्स प नजरि फेरलक उन्नीस टा मिस कॉल ,कतेक अपन लोक सब ।सुतल हाथ के कहुना घींच घांचि क टेबुल लैंप जरा क पैथोलॉजी के मोटका पोथी खोललक ,काल्हि परीक्षा छै,पेपर के नाम स दिमाग जखन किछू रक्त संचार भेलै त ओत्तय किछू दोसरे प्रकारक खलबल्ली होमय लगले।फेल करबाक हदस सेहो  हृदय मे  पइसय लागल छल,ओहि टौपर विद्यार्थी के ,जे फराके डिप्रेशनक विषय बनितेक। कालेज स आबिते अपन फ्लैट क सोझा सिडही प बैसल बड़ी माँ ,जिनक मंथरावादी दृष्टिकोण स के नहिं आहत भेल छल ,आ हुनक पूत  रिंकू के देखि ओकर  हाथ पएर सुन्न आ होश हवास गुम होमय लागले,  ‘ हे दैव ई दोसरपूतना के  किएक पठौलहू हमर बद्ध करबाक लेल कतेक हमर पाप अछि ओहि जनमक”।  मन मौन क्रंदन कयने छल,मुदा गरा लगिक  बुझि पडले कतेक बरख स ग्रीष्मक प्रचंड रौद मे भटकि रहल छल, आय जेना औचक हिमालय स्वयम लग आबि क अपन स्नेह पाश स तिरपित करी देल। अपन जन्म स्थान स अतेक दूर अहि नगर  मे धियापुत्ता सब के पढ़बे लेल ओ सब पहिनहि मकान किन नेने छलथी ,स्वाती के पपा त हुनके देखसी केलन्ही, मुदा निष्ठुर विधाता के कलम स ओ दुनु भाई बहिनी क भाग्य मे ग्रहण लागि गेले ,तखन मम्मी,  आ पप्पा के अरजल, लक्ष्मी ,जीवन के गाड़ी अहि महानगर मे सेहो निधोक घींचैत रहल छल । स्कूल पास करि उच्च शिक्षा लेल दुनु इंजीनियरिंग आ मेडीकल कालेज मे दाखिला ल चुकल छल । किन्स्यात इहों एक गोट कारण बनि गेल होय , अहि बंधन स नीफिकिर भेला के । घोर असगरुवा आ नैराश्य पूर्ण जीवन स त्राण पाबय लेल ईएह दुनु हुनका कम्प्युटर आ इन्टरनेट के दुनिया स परिचय पाती करौलक त ओसब स्वप्नों मे अहि महाविनाश क गप्प नहीं सोचल ।मुदा जीवनक सातो रंग जखन  मस्तिष्क क दरवाजा खोलि क बहरे लागले ,तखन जुग जुग के दग्ध हिय प पावसक मधुर मधुर बुन काया के जुड्बेत सूखैल जड़ि मे खादि पानि देनाय सुरू केलकै त ठूंठ सेहो अपन रंग देखबे लेल माथ उठौने हेतै । डारिक पोर पोर मे नांहि नांहि टा आंखि लागले आ देखिते देखिते लौजा लौजा पात स भरल झमट्गर गाछ फेर स बनबा मे कनिओ बिलंब नहिं भेल ।  ओहि हरियायल ठूंठ प हेजक हेज पखेरूगन किल्लोल करबा लेल उताहुल भ गेल । आ ओकर खोहड़ि मे इच्छाधारी नाग के बास हेबा मे सेहो मे कनिओ विलंब नहिं भेल  छल। समान्य लोक बुझि नहिं पाओल की प्रचंड रौदी मे  ई असमान्य हरियरी आब विषाक्त भ चुकल छैक। वा ई गाछ आब देबे भरोसे जीवित रहे त रहै,परिजनक आंखि मे त भुतहा बनिए गेल छल । पहिनुका चिड़े चुनमुन के सेहो पर्यावनक अहि खेल स मर्मांतक कष्ट भेल रहै ,सुखैले छल मुदा डारि प ओकर अपन खोंता त छल, जतय राति दिन ,मौसमक मारि स बचबा लेल तीनों अपन अपन पांखि पसारि क लोल मे लोल ध दाना चुगे छल ,ची चपड़ करैत छल, अपन अपन पांखि के बलगर बनेब् क नित दिन सपना देखैत छल । कखनों कखनों पैघ लोक क जिद सेहो धिया पुता के कोमल  परिवेश के,ओकर दुनिया के , मटियामेट करिक राखि दैत छैक । आ ओहो एहेन वीभत्स ,जे जन्म जन्मांतर धरि प्रेतक परछाही बनल  ओकर पछौड़ धेने रहि जाए छै। जखन ओ वृक्ष भुतहा कहाबय लेल बाध्य भ गेल त ओकर फड़ आ फूल के  तुलसी आ बेलपत्र जका त नहिं पूजल जेतै । अत्यंत उचगर स्थान प ,निधोक भ,  साँय  साँय, उदण्ड बहैत बसात ;एहेन मे त विशाल झमटगर गाछ सेहो क्षण मात्र मे भूमिशाई भ जाय छैक,ओसब त मात्र नान्ही टा के एक गोट कोमल तरुवर ।  तहन सब विचार मुंह भरे खसय लागल छल। दूर दूर धरि बियाबान,  चारहु  कात घनघोर तिमिर ,कोनो बाट कत्तहु नहि सुझै। चलबा के त छलैहे। जिंदगी त आगा बढ़ब के नाम छै । छुच्छ बासन मे सेहो हवा भरल रहे छैक , कत्तों कोनो वस्तु के प्रकृति खाली नहि रहय दईत छैक । तखन विचार शून्य मस्तिष्क कतेक दिन निष्क्रिय सुतल रहितैक । बड़ी मम्मी कहिया धरि  अपन घर गिरहस्थी तजि ओकरा ओगरने पड़ल रहितथि। स्वाति के माथ प ओकर जीवनक बोझ राखि,ताला कुंजी सुनझा क ,बोल भरोस दइत ,फेर फेर आबए के गप्प करैत अपन घर जाय लागली त ओकरा बुझा गेल रहे जे एके सहरि मे रहिओ क आब हुनक बाट अहि घर स बड़ दूर चलि गेल छल।  बाहर हुक्का लोली खेलाईत समय खिड़की दरवज्जा स ओहि घर मे हुलकी मारैत रहले , मुदा भीतर प्रवेश करबाक साहस नहि केलकै । काल्हिके स्वाति आय एकदम बदलि क पकठोस भ चुकल छल ।कखनों बाढ़ेन हाथ मे,त कखनों चकला बेलना ,आब ओकरा घरक़ सबटा काज करनाय कनिओ नहि अखरे । ई एकांत ओकरा लेल परम आवश्यक बनि गेल छल ।व्यर्थ मे कोनो काजवाली आबि क ओकरा और फिरिशन करे से एखन ओ कदापि नहि चाहैत छल । लोकल भेला के कारणे हॉस्टल लेल अपलाई नहि कैने छल पहिने  ,मुदा आब ,बीच सेशन मे त कोनो सवाल ए नहि छल भेटयके ,तखन अगिला बरिस क बाट जोहू  । उमहर हरियालि गाछ सेहो अपन पुरान मोह नहि छोड़ि पाबि रहल छल ,ओकर बाजब सुनब ,हसब ,पढब ,लिखब ओकरा असंख्य आंखि स सम्पूर्ण स्पर्श करबा लेल बेकल भ बेर बेर फोन करे त स्वाति के मनक संताप आओर बढि जाय । घृणा स ओकर माथ पैन बिजली के पंखा सन घुमय लगे । सम्पूर्ण आकास ,धरती ,पाताल क ,असहज दारुणसोर ओकर मस्तिष्क के धारीदार आरी स चिरय लागल छल ।छाती पीटेत, विलाप करैत, बताहि समुद्री धारा सब  आब एके स्वर स चिकरय लागल , एतेक तीव्र स्वर  'ईयह छै ओ' "ईएह छै ओ  जेकर  ,," चारहु दिस स ओकरा प उठल आंगुर' ,ओह ,कोन पताल मे नुकाय ,कोनअग्नि मे भस्म भ जाए ,किछू फ़ुरै नै छल तखन अपन आंखि संगे दुनु कान सेहो घबड़ा क बन्न करी नेने छल । दू तीन  सप्ताह  स  स्वाति चकोर   दिस नजरिओ उठा क  नहि देख सकल छल। अपने मे  गुमसुम ,आंखि क सोझा कारी ,जेना कजरौटा  के सब टा काजर निकालि क किओ ओकर सुंदर आंखि के नीचा मलि देने होय । एक दु बेर ओ  ओकरा सोझा ठाढ़ होबाक प्रयास कयबो कैल ,मुदा अपने मे ओझराएल स्वाति मेला मे हेड़ाएल नेना सन डराएल डराएल  इमहार उमहर तकेत चुप चाप चलल जाइत  रहल छल । चकोर की सोचते ,इहों संताप रहि रहि क ओकर मानसिक अवस्था के आओर व्यग्र करि दैक। काल्हि धरि जे ओकर व्याख्यान  सुनि आंखिक पपनी झपकेनाय बिसरी जायत छल,जे महान प्रचेता ,ऋषि ,मुनि के खिसा सुनि,अपन महती धरोहरि के कथा सुनि ,मिथिला दर्शन लेल उताहुल भ गेल छल ,आय ओकरा कोना कहते जे ,मिथिला के वर्तमान  मे  सेहो आब माहुर घोरा गेल अछि । राति राति भर गेरुआ के अपन करेज स सटौने,पलंग प पेटकुनिया देने ,टुकुर टुकुर तकेत ओकर दृष्टि सोझा पड़ल टेबुलक पाया स बहरा क कतेक कतेक जुगक पार स बौवा ढहनाक आपस आबय त लगे ,दरवाजा के कुंडी किओ खटखटा रहल अछि ,किंसयात ओ आपस आबि गेल होयथ,मुदा ओ त निष्ठुर हवा निकलै छल ,जखनओ धडफड़ा क उठे ,खुजल केवाड़ स दूर दूर धरि सड़क्क नियोन लाइट मे किओ कत्तों नै देखाय पडै। कखनों खिड़की के परदा हिलै, मुदा ओ कत्त झांकि रहल छली,। आंखि बहे “गै सुगनी हमर कत्थी लेल कनै छै’ ओकर माथ प हाथ राखि  बाजल ओ स्वर त वक्ता समेत आब बिला गेल । “पापा यौ पापा ,एहेन पहाड़ किए भ गेले हमर सबहक जीवन यओ पापा,विधाता किएक हमरे सब स बाम भ गेलखींन’। जखन ओकर कोढ़ फटे त जेना लगे कत्तों कोनो पहाड़ प बादल फाटल होय । सोफा प बई सल मुसकैत पापा अपन  सुगवा ,सुगनी के करेज स सटौने ओकरा दुनिया के सबस शक्तिशाली लोक  बनबए के सपना देखेत ,देखेत स्वयम स्वप्न भ गेला ,तखन माँ के आचरि,छतरी बनी दुनु के माथ झपने रहे ,आब ओ आचरि सेहो   पछिमक बड़का आंधड़ि मे उधिया गेलै। आब ,, ।दिमाग मे उधम मचबईत  अहि भयानक सोर केबलजोरी शांत करैत सोचल , शक्तिशाली त बनैए पड़तेआब  ,पापा कहैथ छलखिन,कमजोर गाछ  के सब मोचाड़ि क राखि दैत छै ,बलगर तर छाहरि  लैल ,अप्पन त अप्पन , दूर दूर स अंचिन्हार  सेहो हेंज क हेंज आबै छै आ ओ गाछ सहर्ष ओकरा स्वीकार सेहो  करैत छै”। एतेक दिन के बाद स्वाति के अपन स्वाभाविक गति स ,अपना दिस आबैत देखि चकोर जतय छल ओहि ठाम अजंता के मुरुत जका ठाढ़ भ गेल ।स्वाति ओकर हाथ घीचने केंटीन दिस बढि चुकल छल । आय ओकर मुख मण्डल प उदासी के कनिओ कोनो चेंह नहि छले,।  क्लास ,डिसेक्सन ,सेमिनार प्रोफेसर सब प ओहिना यथावत हाथ हिला हिला क गप्प करैत काफी पिबेत, सेंडविच खाइत,बाजैत रहल छल  । बेसी सनि रईब क घरक़ भोजन करबा लेल चकोर के जिद करी क स्वाति अपन घर आने छल ,। इमहर चारि पाँच मास भ गेलै त चकोर स्वयम अपन मुंह खोलइत बाजल छल “आब अहा घरक़ खेनाय लेल नहि बजबे छी,आंटी मना करैत छथी की’। “आंटी’ ,कनी काल लेल ओकर आंखि मे फेर स बिर्रो उठबा के कोसिस कयने छल ,मुदा बलगर बनवा के विचार ओकर ठोर प चौकीदार जका ठाढ़ भ गेलै मन मे उठले “फेस द फिअर ,फिअर विल डिसेपियर’ ।माथ झुलबैत कहलक , “माँ त आब  चलि गेलखीं’। “कत्त ,गाम ,कहिया औति’।ओ कनी अवाक सन भेल ।    “ नै नै ,आस्ट्रेलिया , ओ आब दोसर विवाह करी लेलखींन”। ई एतेक पैघ आ मर्मांतक कष्ट क गप्प ओ एना बाजि देलके जेना ओ ककरो आन स संबन्धित होय । चकोर के माथ नहि जानि की सोचि क  झुकि गेल छले,स्वाति ओकर मुह प खसल केस के अपन आंगुर स सइतेत ओकर हाथ मे हाथ धेने केंटीन स निकसि क बाहर लौन मे आयल  आ बेफिकिर ,बिन हारल खिलाड़ी जका जेकर की खेल खराप मौसमक कारणे अस्थगित भ गेल होय ,जय पराजय स मुक्त दुनू मेक्डौनाल्ड मे खाय लेल सीपी चलि गेल छल । लघुकथा- कोन डारि पर केकर खोता “यै बहिन ,कनी थमि जौथ ,तिलकौड क तरुवा तैर रहल छिएन्ह,तखन खइहथि’। बहिन ओसारा प राखल पीढ़ी प बईस गेल छलिह,सोझा परसल थारी राखल छल, दिनक एगारह बाजि रहल छल,कदंबक गाछ के ऊपर स  सुरूज़ महाराज दुनिया भरिक गाम घरक हिसाब किताब लेबा लेल मुस्तैद भेल अपन ताप स चहु दिस के खड़ पात धरि झरका रहल छलथि।  ,आय बटेदार सब स खेत पथारक हाब डीब लईत लईत बड़ बेर भ चुकल छल ,क्षुधा तीव्र भ गेल छलेंह,बजली “आब रहय दिऔ एखन ,राति क बना लेब ,एखन अहू आबि जाऊ खेबा लेल ,अहू के भूख लागल हैत’। मुदा ताबेत त पहिनहि स  धधकल चूल्ही प चढ़ल लोहिया मे कडूक तेल  पड्पड़ाय लगलै त केराव क घाठि मे पात लटपटा क  हब्बर हब्बर लोहिया मे खसा चुकल छलिह। हुनक ई तत्परता आ अनुराग देखि क ,ओ कनी काल लेल हाथ बारि नेने रहथि । कनी विलंब स दुनू गोटे सोझा सोझी बइस क मौन भ अपन भोजन ग्रहण करय लागल छलिह । नबका ड़िजेंन के लोहा लक्कड़ सीमेट स  बनल घर जे साबिकक खरिहान मे बनल छल,ओ त बहिनक छलेंह,कनिया के बख़रा मे त पुरना खपड़ैल घड़ाडी, मुदा आब कोन,दुहु घर त अपने सन  । ओत्ते टा चास बास मुदा रहनीहरि ,जेना बडका पोखरि मे दु टा पोठी माछ । अन्न पानि कोठी,तोठी मे रखनाय,उसीनिया कुटिया आब पूरने आँगन मे होय :एक्का दुग्गी जे सर कुटुम आबेन त हुनक रहब के बेबस्था नबका घर मे होय । ओहुना मन बहटारय लेल ओ दुनु कखनों अहि घर त कखनों ओई घर मे दिन व राति काटि लईथ । ओना त चोर चहारक हदस लोकके पहिनहु पईसल रहे ,मुदा आब कत्तेकों घर जिनक मुखिया बा कुलदीपक परदेस कमाई करय गेल छलेथ,ओत त बिसेख रुपे रतिजगा भ जाय ।  आ हिनको दुनु के परान सदिखन सिथुवा मे बन्न तड़पइत रहेंह । कहबों करथि ‘धन संपत्ति लुटबा के डर नहिं, सुने छिये जे मौगी सब के हाथ पएर काटि क ,की बुढ़ ,की बच्चा ,सबहक इज्जतों सेहो लुईट लईतछैक’। आ अहि डरे टोलक नबतुरिया धिया पुत्ता सब के  बाड़ी मे फड़ल लताम ,नेबों ,त कखनों केरा, आम ,कटहर ,लीची , बाटि क मोने मों न अपन फौज तैयार केने रहैथ जे बेर कुबेर गद्दह केला प आन कियो आबै वा नहिं आबे अहि मे स किछू नै किछू त अबस्से आयत । आ ओ सब कहबों करेन ‘एक बेर हाक देबै त केहनों नींद मे रहबे ,दौगल चलि आयब‘। ओ दुनु घरक बीचोबीच  कनि पछवाड़ी दिस घसकिक तेसर घर सेहो  टुकुर टुकुर ,माय टुग्गर सन ताकैत ठाढ़ छल,मुदा  तैयों ईर स भरल ओ घर हिनका सब के स्वीकार नहिं केल्केन्ह  ताही लेल उमहरक रस्ता टाट फट्टा लगा क बड़ पहिनहि बन्न करी देल गेल छल । ओहो घर अहि दुनु घर प’ अपन वक्र दृष्टि रखने छल फराके स । जेठ बैसाख क  उसिनति गरमी , कतबों पंखा ,कूलर लागल रहै ,मोटका मोटका पर्दा खिड़की प रहै ,मुदा नबका घर त राकसक मुंह बनि आगि उगलै , ईट के भट्ठी बनल । तखन कनिया के माटिक ओसारा बाला दच्छिनबरिया घर ,आहाहा ,एकदम शीतल ,जेना स्वर्ग , बाड़ी झाड़ी स सीहकेत बसात । त बेसी काल गरमी मे बहिन ओहि ओसारा वाला घर मे नीचा  बिछाओल पटिया प ,भात तीमन जे बना बथि कनिया प्रेम स ,खा क , ओंघडायल रहैत छली । पहाड़ सन दिन काटय लेल लच्छा के लच्छा ओझराल गप्प के पेटार खोलल जाय । आ पुरखा ,सर् कुटुम ,बाध बोन ,अड़ोसीया  पड़ोसिया केकर कहाँ ,सबहक कर्म कुकर्मक कतेको बेर पुनर्मूल्यांकन केल जाए । अहि एतिहासिक गप्प गोष्टी  मे,दुपहरिया मे बेसी  काल टोलक स्त्रीगन सेहो सब जुटथि,आ गामक ज्ञात इतिहास के रूपक आ क्षेपक सहित  ओहि महान घड़ारीके सौजन्य स नवीन दृष्टि स जनैथ। “भूपिंदर कका के पेलवार त बिलाइए गेलै नै । देखियौ ,केहेन उजाड़ लागै छेंह हुनकर डीह । पहिने जखन हम दुरागमन करि आयल रहिए,काकी के भागक चर्च घरे घर ,सात टा पूत ,दु टा छोटका भरिसक कुमार छलेंह,भरि घर पोता पोती ,काकीए के हुकुमति चलय छल घर मे । कनिया देखय त तीन चारिबेर आबैथ, “कनी टा मुंह हमहु देखबै’ तीन बरखक पोथी के जिद ,आ म्या कोहबर मे आबि क हमर घोघ उघारि क देखा दईथ। चुहचुही स भरल ,बड़का नाम गाम बाला कुटुम सब के आवाजाही ,,देखिते देखिते आब केहेन उजाड़ भ गेलै । बदलि त सौसे गामे गेलै ,भइयारी मे बाट बख़रा होइत गेलै ,किओ बाड़ी त,कियो ,गोहाली ,त कियो खरिहान मे चास बास बना लेलके ,मुदा हुनक पेलबार त उपटिए गेलै जेना एतय स”। “से की कहै छथिन्ह,महाबा के डीह देखथुन ,बड़का बड़का पाग बाला बेटा सब ,ओहेन सुंदर घड़ारी तोड़ि क नबका ड़िजेंन के घर त बनबा लेलथि , केहेन इल्टल बिल्टल सन लगे छैक आब,कियो इमहर स खिड़की  नोचलकेन्ह,किओ उमहर स दरवज्जा,बाड़ी के चहरदेवारी ढाहि पजेबा पर्यंत सब उघि ‘ ल गेलय। लोक के लोक कहे छै जे बिन पूत के डीह बिलटि जाए छै ,हुनक त पूत रहिते उजाड़ भ गेलन। खेत पथार त अपन अपन बेचि लेलथि ,मुदा सझिया के मकान , ओहिना संझा बाती धरि लेल मुंह तकेत ,नॉर बहबेत ,के ताकय एलै घुईरक दसो बरख स’। ओत्ते टा के दुपहरिया ,बुढ़ पुरान , की जुवानों सब पुरखा के गप्प ,दुरखा के गप्प ,संपत्ति बटबारा के गप्प ,बुढ़  नब के रास लीला  के गप्प ,ढेर रास गप्प क सिडही प चढ़ैत उतरेत दिवस काटि रहल छली। ओना आब ओहु ठाम टीवी आबि गेल छले,मुदा बेसी काल बिजली कटले रहैक,आ रहबों करे तईओ एहेन गोष्ठी के आनंद बुढ़ पुरान  के लेल भगवती के बरदाने बुझु । पुरान दिन के पागुर करैत हुनका सब के आंखि मे दोसरे चमक उठि जाए । जोजो बाबू के खिस्सा प कनिया त हसेत हसेत बेहाल ‘कोना हुनका लोक सब बकलेल कहेंह  ओ बताह नै घताह छलेथ,आबैथ अपन भाऊज स भेंट करय आ भरि टोल मे आंगने आँगन घुसि क जनी जाति स ठठा करैथ,किओ कहेंह ,कनी एक टा गीत सुनाऊ ,आ ओ ओहि ठाम धुस्स स बेसि जायथ,घेंट हिला हिला क ,आंगुर नचा नचा क नचारी,कजरी ,त झुम्मरी गीत सुरू करि देथ। सुन्नरों केहेन,पाँच हाथ के धूवा,दप दप गोर ,भाल प लाल सिंदूरक ठोप’। कालक प्रवाह के ग्रास बनल कतबों लोक गाम स उपटि क सहर दिस भागौ,गाम मे त लोकबेद रहबे करते न । आब कीछु सहरि क  भीड़ भाड़ स ,समस्या स ,बेरोजगारी स , गराकाट कंपीटीशन स , मशीनी जिनगी स उबि क गाम सेहो आबि रहल छथि । विवाहदान ,मुड़न उपनेंन ,एकादशी के जग ,पूजा हवन ,सब किछ त यथावत चलेत आबि रहल छल,नब लोक उत्साह स जीब रहल छल ,पुरना लोक सब हाफ़ैत,खीझैत,भोथरायल , भसियायाल बुद्धि ,कमजोर ,झलफल,झलफल दृष्टि स देखि रहल छल ,नब जुग के ,आ अपन मनोव्यथा के, कुंठा के ,अचटी ,कुचटी बाजि क निकालि लेत छल । कोनो एक खिस्सा प हुनका सब के हजार खिस्सा मोंन  पड़े । आ पचासों बरख पहिलुका  बटखरा स  आजुकसमाज के तराजू प तौलेत,केहन छुच्छ, केहन हीन,कतेक गर्हित लगेंह ,से हुनके सबहक आत्मा जनेक । ‘देखियो बिरेन के बेटी के ,चतुरथी स पहिनहि बर संग  ,  पदुवा के रिकसा प सिनेमा देखय मधबन्नी जा रहल छल,त बापे बजलखिन “रिकसा स जेमए त फिल्म छूटि जेतो ,चल, हम अपन मोटरसायकिल स छोड़ि दैत छिओ,हमरो कोर्ट ज़ेबा के अछिए’। आ बाजि क  भरि पोख हसली मनोजक माय । “ये बहिन ई कोन अजगुत गप्प कहलखिन , देखलखिन्ह नै चुनुलाल के बेटी के ,बापक विवाह कराओल बर के छोड़ि क अपन मन माफिक मनसा स दोसर विवाह करि लेलकै ,म्या ओकर सेहो आब सीना चाकर करि क बजेत छै “ह त कोन जुलुम केलकै ,पियक्कड़  छले, ओध बाध करि क मारे छले ,त ककरो दरेग ने उठले हमर बेटी लेल आ ओ जौ ओकरा स पिंड छोड़ा क पडायल त ,लोक् क करेज मे किएक धाह उठैत छैक’ । आब कहथुन’। कनिया के पुबरिया ओसारा दिस स आम रास्ता छल,त ओ सब ओहि ओसारा प नहिं बैस क ओहि स सटल कोठरी मे बैसारी करेत छली। कोठरी मे दू टा खिड़की ,एकटा पूब दिस ,एक टा दछिन दिस । दुनु प आधा आधा  पतरकी ,छाप बालानूआ के  परदा लागल,ओकरो मोड़ि क किम्हरों घुस्का दइथ,तखन ओहि बाट स जाए बला लोक सब प नजरि सेहो रखथि,ई मनसा कोन गामक छै ,किनको कुटुम त नहिं छैन,आ जौ कोनो टोलक एहेन लोग  नजरि पड़ि जाथिजिनका स आना माना रहेंह  ,त हुनक जतरा भंगटाबे लेल   कागद ,वा आचरिक खूंट के बाती सन बाटि क ,नाक मे घुसा क जबरदस्ती छीकल जाए ,कत्तेक बेर त अहि अपसकुन स लोक सब आपस घुईर जायथ,। आ अहि स स्त्र्रीगन सब के बड़ प्रसन्नता होय । हुनक सबहक निक जका मोन बहटि जाए । भोरुका तारा के देखि क दुनू गोटे उठि जायथ अपनअपन ओछोन प स ,नहा धो क ,भगवती नीप क ,पूजा पाठ के काज स जाबेत निवृत होथि,ताबेत सुरुज् क चक्का एक बीत ऊपर क्षितिज मे टंगा   सब  ठाम हुलकी मारेत रहेत छल । नबका घरक उपरका मंजिल के ग्रील मे बैसि दुनु गोटे स्टील के गिलास मे चाह पीबैत काल टोल भरि के अवलोकन करैत छली। बहिन त अपन ऊमीर के बड़का हिस्सा सहरे मे काटने छलिह,आब न ग्राम वासिनी भेलिह,मुदा आदति सब दिन स काक बजबा स पहिनहि उठबा के रही गेल छल। तहिया त आध छिध पूजा करि क घिया पूता लेल जलखई ,पनपियाइ बनाब मे जुटि जायथ,ओसब खा पीबी क स्कूल जाय त कनिकाल मे घरबला के ऑफिस ज़ेबा के समय भ जाए ,हुनका गेला के बाद घरक झाड़ू पोछा,बाल्टी भरि कपड़ा धोबैत नीत दिन बारह एक बाजि जाय । कहिओ ओ एक टा नौकर वा काजबाली नहीं रखली ,देहो भगवती के कीरपा स तंदुरुस्त छल,आ हाथो के बड़ सक्कत,जखन दू पाय ककरो दैतथिन नहिं ,तखन कियो हुनका ओत अपन मुंह बांहि क त नहिं काज करितेंह। मुदा वएह बहिन जखन सासु के सोझा गाम आबैथ त अपन पुबरिया घरक पलंग प चित्त पडल रहेत छली ,काजबाली सब काम करबै करैक,हुनका जाँतय पिचय लेल एक नौड़ी फराक स राखल जाय ,जे हुनका नहाबए सोनाबय, नुआ फट्टा सेहो धोबय। सहर ज़ेबा काल कनी कष्ट त मोंन मे अवस्से होएन ,मुदा ओहि सहरक नाम प त ई राजसी ठाठभेटल  छल ,ई सोचि अपन दियादिनी सब प उपेक्षा के दृष्टि फेरैत तांगा प बेसी क गाड़ी पकड़बा के लेल मधबन्नी जाय छलिह । कातिकी  पूर्णिमा के  दिन दोसर गाम के देवी मंदिर प भागवत कथा के भव्य आयोजन छल।जगननाथजी स विद्वान  पंडित सब आयल छलेथ, कतेक दिन पहिनहि स प्रचार भ रहल  छल, लोक के उत्सुकता हिय मे हिलकोर मारय लागले  । कहिया स नियारति नियारति गामक ढेर रास स्त्रीगण,पुरुखक संग ओहो दुनु रिकसा प बैसि क  नहा सुना क भोरे भोर विदा भेल रहथि । संजोग देखियो जे  ओ सब उमहर गेलथि,आ इमहर बहिनक कुटुम आबि गेलखिन, दुनु घरक कुंडी मे लटकल ताला देखि क तेसर घरक दुरखा लग ठाढ़ कुटुम के हुलसि क सुआगत करबा लेल ओ  दरबज्जा स्वतह खुजि गेल रहे । भोजन भात करि क पाहून कनी काल विश्राम करय लगला त हुनक स्त्री घरक और भीतर पइस तेसरा घर स अनुराग बढ़बय लेलअकुलाय लगली । भाई भौज छलखींन ,इमहरे समधियौन मे आयल छलाह ,त बहिनो मोंन पड़ी गेल छलेनह । मुदा भौज के त नीक मौका हाथ लगले,ननदि के अतीतक उद्यान मे भ्रमण करबके । हुनको ओ कहिओ कनिओ मोजर नै देने छलखिन ,ततेक गुमान छलेंह। आ तेसरो घर के आय अपन पीर  उगिलबा के परसर भेटले । आ खिस्सा के दोसरि छोर कुम्हारक चाक प गढ़ेबा लेल उन्मत्त भ  फर फर क बहरायत गेल । तीनो फरीक मे ,बाँट बख़रा त कहिया कत्त नै भ चुकल छल,कहे लेल त आब दुइए फरिक बचला  बड़का आ छोटका,मुदा तेसर संसार स प्रस्थान करबा स पूर्व  अपन स्त्री संग एक टा कंटिरबी सेहो  छोड़ि गेल छलथि। ओहि गुडकुनिया दईत धिया के कपार देखि पित्ती अपना ओत्त ल गेलथि, अपन बेटी त नहिं देलथी भगवती,एकरे पालब पोसब, पढायब लिखायब, कन्यादान करब ,आब माय के कत्तबों मोंन छटपटेलन्हि,सौस सेहो खुट्टा जका ठाढ़ भ गेलथि ‘ओ आहाँ के बेटी के  इंद्रासनक परी बनबय चाहेतछथी,आ आहाँ छुच्छ के विलाप कय रहल छी”। तखन सबहक बिचारे माय धी दुनू सहर चलि गेल छलिह।बरस दिन प माय त आबि गेली ,खिस्सा के पेटार नेने मुदा बेटी के त स्कूल मे नाम लिखा देल गेल रहे । माय के मोंन जखन  बड़ छटपटाय ,त पोस्ट ऑफिस स पोस्टकार्ड मंगबा क जोड़ी जाड़ि क लिखनाय सुरू करैथ त कनैत कनैत कतेक पहर बीत जाय । अबल दुबल प सिथुया चोख ,त मोसिबत के मारल के ,अपन रक्षा करय लेल बेसि काल जिह्वा प दुर्वासा के बास ,कराबइए पडेत  छल । ढोढ़िया साप के रूप सेहो अख़्तियार करय लेल लोकवेद बाध्य करि दैक।  पान सन जीबन पहाड़ सन दिन काटे लेल गाम घर मे लोक बेद के अकाल नै रहैत छैक।पहिनुका जुग मे त गप्प सप्प संग भांति भांति के काज धंधा सेहो चलेक,कुमारि बेटी के विवाहक लेल सिकी के मौनी बने ,गेरुआ के खोल प जोड़ा सुग्गा ,गुलाबक फूल काढ़ल जाए ,जनेऊ काटल जाए चरखा काटल जाय ,मुदा ताहिया बाजार घरे घर नहिं घुसल चल ,आ ने चीनक सुंदर सुंदर समान एना लोकके मोहने छल , ‘एँ ,के आंखि फोड़त अप्पन, बाजार मे एक स एक निक चीज भेटे छै’बाला प्रलयंकारी बाढि मे सब किछू भासियाएल जा रहल अछि । आब त विशुद्ध गप्प ,नबका शिक्षा के भूत ,गाम घरक लोक के कोढ़ि बना रहल अछि ,तखन अहिना कतेको खिस्सा के जन्म होईत छैक आ सोईरीए स पांखि लगा ,बंद खिड़की ,दरवज्जा के अछैत खुजल आकास मे उड़य  लागेत छल । ओहि खिस्सा सब मे कनिया के नॉर स सानल  जिनगी के कतेक रास दुख रहे ,से कतेको लोक ले करेज मे बरछी सन गड़ैत रहलै।  उपजा बाड़ी त हुनकर ,जिनकर,समांग , खेत खरिहान छल ,हिनका  त मात्र घड़ाड़ि, आ ओहो साबिकक घर ,बड़का विशाल जे रहल होय ,मुदा भदबारि मे जानक आफत ,कखनों इमहर स चूबे,कखनों उमहर स देवाल खसै,आ एकर मरम्मति करबय लेल कनिया के कतेको मास बरस दिन धरि बहिन के चिट्ठी प चिट्ठी पठाबए पड़े तीन चारि बरख मे किओ सहरि स आबै,आ जाबेत ओकरा दुरुस्त करै,ताबेत कोनो और समस्या ठाढ़ भ जाए ।एक बेर त बहिन गाम आबि क सबहक सोझा मे हुनका बड़ फज्झति केलकिन ‘अहा त अहिठाम आराम स बईसल खाय छी,आहाँ की बुझबै सहर मे पैलवार ल क रहे बला के कतेक फिरीशनी स दु चारि होमए पड़े छैक। अहाँ के बेटियो के जिम्मेबारी हमी सब उठेने छी ,तईओ अहाँ चैन स हमरा सब के नहि जीब’ देबय चहेत छी ।हिनकर ब्लडप्रेसर बढिगेल छन्हि। हम त हुनका कोनो काज कहिते नहिं छिएन्ह, गिरे पड़े छै घर त गिरय दियौ ,बारह टा कोठरी छै ,जखन सब खसि पड़ते ,तखन देखल जेतै’।  ओहि बेर स ओ कतबों कष्ट होयन्हि, हुनका चिट्ठी नैई लिखलखींह ,’ ‘बुझल जे हमारा किओ नहिं अछि अहि संसार  मे’। आ चारो कात स घर खसि क भुतहा हवेली सन लागै, सांझे लालटेम जराक’ दरवज्जा प राखि देथ,जे खसल पजेबा स बाट बटोहिया के ठेस ने लागि जाय । खेबा पिबा लेल साल भरि के अन्न हुनके दिस स देल जाए ,आ बाड़ी झाड़ी मे तीमन तरकारी त उपजिए जाए । मुदा कनियो के अपनघरबाला स बेसि कोढ़ बापक देल गहना गुरिया फाड़े ,चंद्रहार ,नथिया ,टीका ,कर्णफूल ,बाला,अनंत ,डढ़कस,पाजेब , सबटा त बहिन बैंक मे रखबाबय के नाम उतरबा नेने रहथि।बाद मे कखनों ओकर चर्च करैथ, त बहिन के कबौछ सन बोल स सम्पूर्ण देह मे आगि लेस दै “आब गहना ल क की करब ,लग मे राखब त ओहो डकूबा लुइट क ल जायत,भने बैंक मे रखल छैक’। अगहन मे वा माघ मे ,किंसयातओ कोनो जाड़े मास छल ,जखन बहिन सपैलवार सहरि स गाम बेटा सबहक उपनेन् करबा लेल गाम आयल छलिह। तहिया त गाम गामे छल आ टोल सेहो समस्त ऊर्जा स सम्पन्न ,जन धन स सब डीह भरल । एके दुग्गी लोक गाम स बहराएल छल ,मुदा गामक मजगुत डोर ओकरा खीचने रहै। मईया त बरख दिन पहिनहि स अहि शुभ दिन के ओरिओनमे  कोलहुक बरद सन राति दिन बिसरल लागल रहल छली। आँगन मे ओसारा सब प ओछाओल पटिया सब प पतियानी स राखल राहड़ि,ऊडेद केराव ,तीसी ,मड़ुआ ,मकई ,धान , सरिसब,आने की जतेक अन्न उपजा क बटेदार द जाईत छल,मईया ओकरा अपना हिसबे सइतने जा रहल छलिह,दालि दड़रबाक भूसा सहित छोड़ने छलिह ,आ ओकरा फटकबा झटकबा क पैघ छोट कोठी सब मे रखबय छलिह । तखन एक दिन कनिया के मोंन मे अयलंहि,  उपनेंन हेतैक,एतेक लोकवेद ,सर-कुटुम सब औताह,तखन ओ मड़बा प चढ़ि क बरुआ सब के की भीख देतीह,हुनकर हाथ त ठन ठन गोपाल । आ बड़ सोचि विचारि क मरतिया बाली पेटे दस सेर राहड़ी,दस सेर मकई ,पाँच सेर खेरही ,पाँच सेर केराव ,थोड़े गहूम ,थोड़े धान बेचि लेलथी । कीछु पाय हाथ मे आबी गेलन्ह त छौओ बरुआ लेल गामे के सोनरबा स सोनक औंठी गढ़बा लेलथि,ओहो मैना दीदी के नेहोरा पाती करी क । ई सब कारोबार त  ततेक गुप्त भेल रहै, जे घरक कोनो चार प कोनो कार कौआ सेहो नहिं बैसल छल,नहिं कोनो कोन सानि मे नढिया,गीदड़ बा बिलड़िए नुकाएल छल,मुदा तैयों ई गप्प जखन उजिएले,ओही घर मे  बड़का भुईकंप त आबिए गेल  छल । जखन बहिनक स्वामी बाध बोन दिस गेला अपन खेत पथार देखय सुनै,त  कुसियारक चोरि के दाग स मुक्ति पाबय लेल बीसेसर हुनका कान मे हुनके आंगनक करनी फुइकी देलकेंह। आंगन मे पाहुन पड़कक आगमन प्रारम्भ भ चुकल छले,कनिया अपन कोठरी के पट बन्न करि के कनेत रहली। हुनकर छुदरपन,हीनता,आ पापक पोथी नेने बहिनक घरबाला ज़ोर ज़ोर स आँगन मे बाचि रहल छलेथ ‘अही घर मे आब की उत्थान होयत ,जखन घरे मे मूस लागल अछि”।आ दुनु परानी हुनक हाथ के छूल पाईन धरि नहिं पिबाक सप्पथ खेलाह ,जखन कि तहिया सबटा खेत पथार सझिए रहेक। ‘दसरथ के अंगनमा मे शुभे हो शुभे’ बड़ ज़ोर ज़ोर स होमय लागल,मुदा काकी शुभे कोना कहितथ ,। उपनेन् के दिन सब कुटुमक  उपहास पूर्ण नजरि स बचबा के लेल ओ अपन कोठरी स नहिं निकसल छलिह, तीन दिनक भुखल पीयासल, चारीम दिन झलफल साँझ मे ,छौओ बरुआ लेल बनाओल औठी अपन सौसक हाथ मे राखि पट फेर बन्न क लेने रहथी। हिनको जिनगी स मोह कौन बाचल रहैक,बेटी के पार घाट लगबय लेल भगवती छलिह । तखन सुतली राति मे छुच्छ के लाज लिहाज के तिलांजलि दइत निकलि गेली नबकी पोखरि मे भसियाबय लेल ।कनीए दूर प बुढ़बा कोतबाल उधो टोकि देलकेन्ह’ ‘ कतय जाय छी मलकानि?’ ओ की चीन्हने हेतेक ओकर आंखि मे त रतौनी रहे ,मुदा उज्जर नुआ देखि भेलय कोनो दाय काकी हेतिह ,आ जौ  चुड़ैल हेते त तकरो काट छल ओकरा लग । तही लेल कनी उचगर स्वर मे ओ बाजल छल, आ ओहि स्वर प लगे के दालान प सुतल दिनेशक आंखि खुजि गेल छल ,माझ बाट प आबि ओहो ठाढ़ भ गेला ।किओ किछू ने बाजल आ ओ स्वेत वस्त्र धारिणी आगा पोखरि आ गाछी दिस बढ़ैत रहल छली। नब शोणित दिनेश पहिल बेर कोनो भूत वा चुड़ैल के पछोड़ धेलक ,संग मे उधो मन बढेलके । पोखरिक महाड़ प आबि ओ पलटि क ताकली,दोसर पहरि राति  मे आधा चान आकास मे चमेकि रहल छल ,ई त कमतौल बाली काकी छथीन ,दिनेश चौंकल,टोलक झंझट फसाद स पुरुखों सब परिचिते रहैत छलाह। छपाक के स्वर स ओकरा सब मे चेतना आएल,आ हुनक पीठे प दिनेश पानी मे छलांग लगा देने रहैक ।पोड़ीक हुनका बाहर आनल ,ओ त अचेत भेल । पहिल बेर गामक इतिहास मे एहेन खिसा भेल रहैजे निसाराति मे भगवति पानि मे डुबल प्राणी के बचा लेलथ। मुदा किओ इहों बाजल छल‘अक्खज ने मरै ,छुतहर नै फूटे’। बहिन के डरो पहिनहि बेर भेलन। प्राण परबा जेका पुक पुक करय लागल छल ,आय जौं किछ अधलाह भ जयते ,टोलक लोक जिनगी भरि हुनके उपराग दितेन्ह। दालान प बैसल झक झक उज्जर कुरता,सांची धोती आ बंडी पहिरने रोआबी मालिक के एक टा अदृस्ट भय सेहो पईस गेल छल । तहन  निर्बलक पछ मे उठल लोक् क दया माया देखि दुनु बेकती कनिया के हाथ पएरजोड़ी क शांत केने छलथी । बेटी के विवाह मे त एक टा दमड़ी नै देबए पडलेन्ह,मुदा मुईला प आगि त जौते देतन्ही,आ कन्याक  विवाह कतबों आदर्स हॉक, घरबैयाके त बर ताक’ मे ,दौड़ बरहा करेइए पड़े छैक, जेना गीध के धियान मुइल जानबरक मौस प रहे छै तहिना  कोनो कोनो लाथे हुनक बख़रा के जमीन जथा ओ  अपन नाम प लिखबा लेने रहैथ,आ हुनका अहि सब झंझट स मुक्त करि देने छलेथ ।   कतेको बरख बीतले, बहिनक सबटा बेटा के विवाह दान भेलन्हि ,सब अपन पेलवार  बढाबेत आन आन सहरि मे जे गेला ,से आपस मुड़ि क बहिनक अहंकार के बरक्कैत नहिं होमय देलखिन, कोनो पुतौह हुनका अपन नरेटी प हाथ नैराखय देलकेन  ।घर वाला के रिटायर भेलोपरांत गाम मे अपन नब मकान बना क रहय लागल छलिह,मुदा तखनो हुनक दोसरे धाह छलेंह । कनिया के खसल घर के मरम्मति करबा देल गेल छल ,मुदा ओकर मालिकाना हक  बहिने सब के हाथ मे छल । कतेको बरख बीमार पड़ी क मालिक जखन गोलोकवासी भेला ,बहिन नितांत एसगरुवा ।कनिया के बेटी  बरस दु बरस लेल माय के घुमाबए फिराबय ले ल जायन्ह,सबटा तीर्थ सेहो करबा देलकैन्ह। देखि देखि क हुनक कोढ़ फाड़ेन्ह,आय धरि त ओ दुनिए दारी मे रही गेल छलथी,आब त कोनो बेटो ने हुलकि मारे आबें ,ह कहिओ काल फोन फान करि लेई त सझिले मुदा ओहो आबे ने खाली बजबे तोही आबी जॉ ,जखन अपन कोखिक जनमल आन भ गेल त आन क जनमल के किए गारि सराप दइतथी, कहबीओ छै जे जहन बौह लगतौ कान तखन माय हेतों आन । पोसने त वेह ओहि बेटी के रहथी,मुदा कतेक सिनेह स से हुनक आत्मा जनैत रहेंह। जखन बहिन विह्वल भ क कनैथ,  हिम्मत जूटा क कनिया हुनका लग एनाय सुरू करी देलथी,आ नहुं नहुं बहिनक खेनाय पिनाय के भार हुनका बिन पूछने कनिया अपना माथ प राखि लेलथी । आब त  खूनक रिस्ता सेहो एहेन ने हेतै ,आध आध मिल क एक भ जाय छै ,नदी आ नाव ,आन्हर आ लाठी ,डॉल आ रस्सी ,तहिना बहिन आ कनिया,एक दोसरक जिबाक सहारा बनी गेल छलथि। लघुकथा- घुइर ताकू छोटकी काकी काल्हि रातिए अपन पियरका नुआ के सोडर मे उसिनलन्हि। परात भेने बुचीदाय स बजलीह  ‘गे खुरलुच्ची ,चलमे गे बच्चा , पोखरि स ई पखारि आनु । जखन नामे खुरलुच्ची पड़ल छल त बूच्ची दाय शांत कोना रहितथि ,सदी खन सब ठाम ज़ेबा लेल बेकल  पाँच छौ बरखक उमरि।   ‘चलू’ ,ओ फट दनी गोटरस खेलेनाय छोड़ि जेबा लेल दुनु टांग  पटकेत उठल । एक हाथ मे पीटना आ दोसर मे अलमुनियम के कारी खटखट ,पिचकल पाचकलछोटकी डेकची  मे उसिनल नूआ । भरि बाट उठैत बैसेत रहली , चलल ने होय छन नीक स  ,  अहि मध्य आह ,उह करैत अपन जुगक खिस्सा,गप्प सप्प बांचैत जा रहल छली। ‘ओ जुग छल,बुझलही बुची,हमर सबहक किओ पैर ने देखने होयत ,चौखटि स बाहरि पएर राखि दी कक्कर मजाल ?सब  दलान  त बूढ़ा सब पकड़ने ,। बुढ़ पुरनिया के कतेक प्रतिष्ठा ,कतेक लेहाज़  । ओ आराम ओ सुख आब कतय,कलिजुगक पाप स आब त ने तेहन धरतिए उपजे छै,माले जालक बरक्कति छै ,लोक सेहो तेहन खविस भ गेले ,खेती छोड़ि नौकरी करय लागल अछि । लाजो धाक नै बचले ,दलान प कोनो बुढ़ नै बचलेथ , घरे घर चुलही तर पुरुख सब घुसनाए सुरू करी देलके । तहिया कनिया बहुरिया दरवज्जा की ,खिड़किओ धरि स बाहरि हुलकी मारब स परहेज करैत छल ,,,,आब त , की पोखेर ,की इनार’कत्त नै पैठ ओकर सबहक । ‘आ ओ जे मसूद पुर बाली छथि,हुनक ससुर बड़ गरीब ,एतेक गरीब जे पनि भरनी धरि नै राखि सकैत छलिह ,,मुदा कुलीन एतेक जे तेसरे पहरि राति उठी क पोखरी,इनार स पानि बाला काज फरिछा लैत छलिह।पुतौहों एहेने सुशील भेटलनहिं   ,,मुदा आब हुनके पुतौह के देखही ,गई म्या,घर बाला कत दन की दन करे छै,,कोट पहिर क बुले छै मौगी”। ,एक बेर जखन ओ गप्प सुरू करी दईथ ,त लगबे ने करे की ,कोनो बच्चा बुतरु लग मे छन्हि की कोनो चेतन । भाय भाय बड़ बड़ेने जाइथ। जौं किओ नहिओं होय सुनए बाला तइयो हुनकर वएह चालि । “ओह गे बच्चा ,गै हाथ पकड़ा गे,,,पएर मे बग्घा लागि गेले ,ओ हो हो ,अ ह ह ह ,,महादेव ई की केलहु ‘। हाथ त हुनक पकडबे पडले ,नूआ बाला बासन सेहो माथ प उठबय पडले “ह चलू आब , एतेक कष्ट होय अछि ,पुतौह ने पखारि देती” । पुतौह के नाम प हुनका एड़ि के गरमी मगज प पहुँच गेलन्ही “मार बाढ़नि छूतहड़िया के  ,   हम्मर नूआ धोत की ओ अप्पन गजेड़ी भंगेड़ि बापक     सारा निपत ,”। पोखरिक घाट प टांग पसारि काकी इतमीनान स बैसेत बजली “ला गे बच्चा ,बासन ला ‘। तसली स नुआ उनटि,ओहि मे पानि भरि लग मे राखि लेलथि आ नुआ प चुरू स पानि  ध ध क पीटना स पीटय लगलिह । “काकी बूढ़ मे ई पीयर नुआ ‘? “गे चुप रह बेटी देलक ; देखै छै जे झुरकुट बूढ़ बसन पट्टी बाली ,केहेन छाप बाला नुआ पहिरति अछि’। “काकी  , मुदा नूआ मे कनिको जान  नहिं, जे दिन नै चरर   बाजि जायत ,दोसर कीन लीअ’।   “ह गे तोरे बाप हमरा कमा क पठा देता’।   ‘मर्र,  हमर बाप  किए पाए पठौता ,अपन जे कोसल रखने छी गाड़ि क’ से कोन दिन लेल’। काकी भयंकर तमसा  गेली “तोरे नाना देने अछि कोसल गाड़ि क राखय लेल ‘। बुच्चिदाय चुप भ गेलिह । ठेहुन धरि वस्त्र उठा क ,घाटक तेसर   चारिम सीढ़ी प ठाढ़ नुआ के एक छोर एक हाथ मे पकडली ,आ शेष के जुमा क पानि मे फेकलनि,नुआ छत्ता जका फुलि गेले ,तहन दुनु हाथ स नहु नहु छोट करैत ,दुनु हाथे गारि क पानि बहरेलथि। “हरे राम ,हरे राम करैत पानि स बाहर भेली । फेर नूआ बाला बासन आ पीटना बूची दाय के थमा देलथी। आधे बाट पहुंचल हेतीह कि लुखिया दौगल आबेत छल  ‘यए दाय ,जल्दी चलियो बड़का गाम बाला पीसा अलखींनह ‘। काकी एक दमे चिहुक उठली  ‘गैई म्या ,जुलुम भेल आब ?की करू की नहीं करू ,पाहून एला हें ,दलाने प बेसल हेताह , कोन बाटे जायब आँगन ,नूओ नीक नै पहिरने छी”। बुच्चीदाय हुनक समस्या के समाधान करैत बजली “हमर बाड़ी दने चलि जायब ‘। आ काकी पछबड़िया बाट स ओकर बाड़ी के इंट देवार कहुना क पकड़ि पकडि अपन आँगन मे पइसल  छलिह। “की काकी पाहून गेला ‘?   “ह गे ,कखने गेलथि । ओ राज काज बाला लोक ,हुनका पलखति छनि सरोजक बर जका  नीफिकिर भ क ससुर क कप्पार प बेसबा के’ ओ त ककरो बरियातीमे आयल छला त एक रत्ती ससुर् क हेम क्षेम लेबय चलि आयल छला ,एक लोटा पानि पिलथि ,चारी टा दछीनी सुपारी आ, दु जोड़ जनेऊ बस ,आ जायत रहला” । ओ ओसारा प अपन नूआ के सरियाबैत बैस रहली  ‘की कहिएईन् बहिन ।ई सौराठ बाली निरासी , हमारा जिबय नहीं देत ,की पाहून ,की पड़क ,ई अठ्ठा बज़्जरि खसा दैत अछि ,देखियो ,,आय फेर भानस बन्न करी मुंह फुलौने अन्हारघर मे पेटकुनिया देने पड़ल अछि, दुनिया भरि के गरिओलक ,फज्जति फज्जति करी देलक  । ओ त पैत रखलथि गोसाई जे ओझा खान पीन नहि केलथि।  हम त हैया हाथ उठा क चिकरि चिकरि क उगलहा स कहैथ छिएईन्ह जे कुमार बेटा रहि जाए ,,ओहि गाम नै विवाह करी ,ई कोन जनमक पाप अछि हमरा कप्पार प  ’। बूची के दाय अचार मे तेल ढारैत मौन भ हुनक गप्प सुनि रहल छली। तखने बड़की काकी सेहो आबि गेली “की भेल ए कनिया ,किएक एना बताहि भेल छी,’’? अहि आहे माहे मे बुच्चिदाय के बड़ मोंन लगेंह । जों ओसारा प गप्प होय त आँगन मे फुसीओ कोनो काजक लाथे ठाढ़ भ जाए ,बड़ आज्ञाकारी बनि पान सुपारी के तश्तरी  सेहो ल आबे । खास करि क दादी सबहक गप्प त खिस्सो पिहानी स रमनगर ,जे विशेख करि क पुतौहे ल क होइत छले , , आ रंग बिरंगक भाव भंगिमा । जे कनिया के ओ बड़ नीक ,बड़ सुनरि बुझे हुनको सबहक पोल खोलल जाए ,चीरहरण होय एहेन गोष्ठी मे । बड़की काकी छोटकी काकी के दुख सुनि तमेक पडलिह ‘ये एतबा मे अगुता गेलोन्हु ,हमर सतलखा बाली सन बज्र खसौनी स त लाख कच्छ नीक अछि ,ओकरा त भगवती रूपो देने छथिंह,आ ई करिलुट्ठी। नहा सुना क भगबती के सीरा नीप ,धूप दीप देखा क कहलिए “कनिया ,काल्हिओ उपासे छल ,आईओ बड़ बेर भेले ,जे देब स द दिय खाय लेल ,बड़ भूख लागि गेल’ कि ननदि स लड़ी क जरैत चुल्ही मे पानि ढारि बजेत अछि ‘अंगोरा खौथ’। चूड़ा फुला क खेलहू कहुना करि क। {हुनका चूड़ा दहि नहिं रुचय छलेंह} कनी दिन लेल एले ह मालती ,ओकरा देखय नहीं चाहे छै। भरि दिन हड़ हड़ खट खट  ,कखनों क़हत हमरा नूआ नहिं किन देत छथि, कतेक बेर अहिना पड़ा क नैहर पहुँच जायत अछि ,महिंदर त नहिं जाय छन कखनों बिदागरी करबा क आनय लेल ,अपने बाप भाय आनि क सासुर मे बैसा दैत छें न । एतेक ईर ,की कहू  कनिया घुड़क मारि धोंकड़िए जनेत अछि , कखनों  काल मों न करैत अछि जे बाध बोन मे पड़ा जाइ ,घर त्यागि दी  ” । “काकी ये ,सबहक पुतौहे किएक खराप होईत छै? सौसे किए नीक रहैत छै”?बइसल बइसल बुचिया अपन मौत् क फरमान जारी करि देलक । “गै , तू हमरा सब के अधलाह कहबे’ ये मठौली बाली ,देखू  अपन ,कबौछ लगा क जनमेने रही की ? हे दाय ,जहि नग्र तू जेबए ,अखने स हक्कन नॉर कनैत हैत”। “तखन त ई हो नगर कानल हेतैक”। आ पूरा बाजियो नहिं सकल की गाल प बड़ी जोर् क थापड़ पड़ले , ‘मरि गेले हे हे” पाछा मुडी क ताकलक,त माँ छलिह घोघ तानने । “ऊँह मोने मों न त खुसी ए भेल हेतेंन सौस सबहक निंदा सुनि देखबै लेल मारैत छथी’कनैत बजेत भागल ओ ओत्त स । “की गे फुलेसरी ,आय तोही फूल ल क एला हें ,कहिया एलही सासुर स  , ,सौस केहन छौ ,माने दाने छौ की ?” लालकाकी मलिनिया स गप्प करय लगलिह ,आ ओ नोरे झोरे कनैत ,सौसक देलहा दुखक बखान करय लागल ,ओहि दुख स पड़ा क त नैहर आबि गेल अछि। “बज़्जर खसो ,’लाल काकी ओकर सौस प  बज्र खसब लागली । बूची दाय फेर उपस्थित “यै लालकाकी ,आब अहि जुग मे लोक बज्जर ने बम खसबे छै। अहु ओकर सौस प बम खसबीओ ,एके बम मे सुरलोक चलि जेते’। लाल काकी हसय लागली “ई छौडी त जुग मे भूर करैत अछि ,एखन की बुझबहक दाय’। कत्तय कोन गाम मे , सत्संग वा भागवत चलि रहल छै ,बड़की काकी के सब खबरि रहैत छलनहि । अपने सब बुढ़िया विदा होइते छलिह,आ हाथ हाथ भरि घोघ तनौने  कनिया बहुरिया सब के सेहो  संग नेने जायथ। “ये काकी {हलाकी ओ सब दादी छलिह ,मुदा धिओ पुत्ता सब हुनका सब के काकिए कहेंह } आहाँ सब त बुढ़ पुरानछी,पुतौह सब त आजुकाल्हिक छथिन्ह ,सिनेमा देखा दियौ ,मेला घूमा दियो ,,ई की अपना संग हिनको सब के बैतरणी पार करय लेल नेने जाय छी ?’ बूची के गप्प सुनि छोटकी काकी अपना सब मे हाथ मुंह चमकबैत नहुं नहुं बजली “ई बुचिया ,बड़ बदियल,की कहियन्हि, काल्हि कहलिए जे हमरा संग कनि पोखरि चलबे ,चलि त गेल मुदा भरि बाट से दिक केलक से बुझु नै, गाडल धन ,कोसल ,निकालु ,नबका नुआ किनु ‘’। बूची के कान मे ई गप्प पडी गेले ,ओकरो शोणित खौल गेले ,मन मे उठले ‘माथ प उठा क हिनकर मईल बासन ,हाथ पकड़ि हिनक हम पोखरि ल गेलहू आ ई हमर निंदा करेत छथी’। ओकरा खबरि छले ,कत्तों ज़ेबा काल हुनका किओ घुईर ताकू कहि दैक त ओ एकरा बड़ पैघ अप शकुन माने छलिह ।हुनक देह स धधरा उठय लागे छल,आ मुंह स लाबा फुटय लगे ।,आ नतीजा ,बजनीहार के बड़का बड़का गारि आ सराप । जतरा सेहो स्थगित करि दैत छलिह । बस बुची दाय चिकरली पाछा स “यै छोटकी काकी ,यै घुईर ताकू ,घुईर ताकू ‘। आब की ,  बिरनी के छत्ता उजड़िचुकल छल। ,छोटकी काकी ओहि माझ बाट प ठाढ़ भ सम्पूर्ण टोलक स्त्रीगनक सोझा  बुचिया के दादीए  के गरियाबे लागल छलिह जे एहेन उकट्ठी पोती हिनका कोन पाप क कारने भेलन्हि।आ अपन माय के हाथे तूर जका धुनाई सोचि क , बुचिया ओत’ स लंक लगा क पड़ायल छल ॥ लघुकथा- माटीक मुरुत चारहु कात कुहेस् क साम्राज्य ,मोटका ,मोटका ,उज्जर ,धप धप, धूस ओढ़ने गाछ बिरिछ ,सोझा के लतामक गाछ जे घर स दस डेग पर ठिठुरति ठाढ़ छल ,आंखिक दर्शन शक्ति स, बाहरि , , हिमालय के तराई मे बसल अहि छोट सन शहर प,अहिना पहिनहु स ,शरद रानी बिशेख वात्सल्य प्रेम स आविर्भूत रहैत रहल छली,आ एखन त, सद्यः हुनके प्रिय समय आ, साम्राज्य । ओहि प्रलयंकारी शीतलहरी मे घरक भीतर लोक वेदक हाथ पैर सुन्न भेनाय स्वाभाविक छल ,मुदा कोढ़ फाड़ैत करून चित्कार ‘ ‘गै म्या, गै म्या” सुनि कियो नहिं सिरक क’ तर नुकायल रहि सकल छल,धड़ाधड़ि अड़ोसीया  पड़ोसिया के दरवज्जा खुलि गेल छले। ओढ़ना ,कंबल ,मोफलर ,सौल मे बांहल ,छेकल लोग हिम मानव बनल  टौवाइत टौवाइत एक दोसर स, ओहि अनुत्तरित प्रश्नक समाधान पाबए लेल बेकल ,मुदा केकरो किछू नहि बुझल जे मिसेज ठाकुर के किएक गाड़ी प, उठा पुठा क, अस्पताल ल जायल गेल ,वा  के एना हाक्रोश करि रहल छल । गप्प खुजबा मे कनि काल त, अवस्स लागले ,मुदा तखन ककरो बिस्वास ने भ रहल छल मिसेज ठाकुर त, एना सपनों मे नहि करि सकैत छली ,तहन केकरो पेट मे पईस क त’ लोग नहीं देख सकैत अछि । असंख्य सम्बोधन स संबोधित मनुख सन हुनको संग समय भेष बदलि क; डेगा डेगी आगा आगा चलैत ,लुका छिपी खेलाइत पाया कातक ओहि राज्य मे जा क’ नूका रहल छल । एक बीत्त के घोघ तानने, ओ दस बरखक बहुरिया पाँच हाथ क  ललका नुआ मे लेपटायल भट भट खसैथ, त बेस लाम चाकर सौसक बज्र बोलक लगाम तुरत हुनक कान मे पड़ेंह “की खुआ क  माए बाप पोसलक ,जे दु डेग चललों ने होएयै” । सासुर मे त जेकर जे रिश्ता नाता होए ,तही स,संबोधित करेन्ह,मुदा परोछ मे सबहक लेल भानपुर बाली रहैथ,। अपन जन्म स्थानक नाम जेना अपन पीठ प’खोदबा क, स्त्रीगन सासुर जैत अछि ,आ,जीवनपर्यंत ओकर वएह नेसान बनि जैत छैक । आब नीक सुभाव रहल ,ठोर मुंह नीक रहल,पीत्तमरू रहल  त’ ओहि गांमक मान मरजाद बढल,बदियल ,मरखाह ,गुमान वाली भेली त, परात उठि क, किओ ओहि गामक नाम  लेबा के सोचिओ नहि सकैत छल । भानपुर बाली के गोतियो सब हुनक अदम्य जीवट आ, संघर्षशील जीवनक  चर्च  परोछ मे करईत कखनों ने कखनों नतमस्त्क त’ भ’ जाएत हेताह ,मुदा प्रत्यक्ष मे लोक ओहि लोक क प्रशंसा केनाय उचित नहीं बुझे छै ,जेकरा स कोनो प्रकारक लाभ नै होय । एक सधल नटी सन दु टा खुट्टा पर बांहल ज़ोर प पएर ,आंखि एकदम ,सीध मे ,माथ पर चारी पाँच टा घैल ,,ह , भानपुर बाली एहीना पएर संभारि क, कतेको बेर अहि खूँट स’ ओहि खूँट आ, ओहि खूँट स, अहि खूँट आबैत जैत रहली ,मुदा तखन त’ हुनक धुआ देखि क दियाद  सभक हिय झरकि जाए । पेलवार क नजरि मे ओ अबला कतछलिह ,भरि मुह दांत भ’ गेल  छलन्हि,पीत्त देखाय पड़ ‘लागल छल,आ, माथ प, कनी टा टा सींघ सेहो देखाय पड़य लागल छल । मुदा ओ त बाद मे ।  , क’ ट’ करि क’ जोडि जाड़ि क’ चीठी पटरी लिखबा योग्य साक्षरता ,बेटी के पढ़ालिखा क जज बनेबा के छै की ?फुकते त’ चूल्हिए, बाला जमाना मे ,अतीतक ड्योढ़ि जे आब नब जमाए लेल पायस बनेबाक सेहो सामर्थ नहि रखैत छल,नवम दसम होइत ,सुखी सम्पन्न घर देखि अपन माथ क’ बोझ उतारि देल ,आब सासुर मे जे जेकर भाग्य ,भोगतै जिनगी ओहि भांति । तखन अपन छोट छोट हाथ स ओसारा प’ राखल बड़का सिलौट प’ मोटका लोढ़ी स’ मसल्ला पिसइत ,बड़की दियादिनी स’ नहु नहुं बजैथ “हम सबटा काज करि दैत छिएइन्ह,ई भानस करि लौथ हमारा रानहय नहि आबैत अछि,बाबू बड़ खिसियाय लागैत छथिंह,’ । दियादिनी मुसुकि क’ रही जायथि ,ससुर के गारि बात आंखि क’ सोझा नाचि उठेक “ई भानस मनुक्ख खेबा  जोगर छै ,दालि अनोन ,तरकारी मे एक ढ़ाकी नून ,’। सौस आगि प’ओडिका ल क घी ढ़ारैथ “सोइत्क बेटी छथि,सुकुमारि’ । गोर नारि ,पातर छितर ,कलसगर ,नीक आंखि नाक ,भानपुर बाली ,पीअर ,हरियर नुआ के देह मे ऊपर स’नीचा लपेटने निहुरि निहुरि क’ ओते बड़का टा आंगन मे दुनु  सांझ झाड़ू बहाड़ू करैत हाफ़य लागैत त’ पनभरनी बिजूरी ल’ग आबि क’ छीन लेन्ह बाढ्नि ‘है लभकी कनिया ,आहाँ किए छूबे हीए बाढ़्नि,हम कथि  ले हिये’। त’ घोघ क, नीचा स’ हुनक दाड़िमक बीज सन दांत चमकि जायन्ह।“सिखबाक चाहि नै,तखन नै बुझबे काज कोना होइत छै’। पाबनि तिहार मे जे नब नूआ आबै त पहिने घरक सब स्त्रीगन अपन अपन पसीन्न के चुनि लइथ,आब हुनका हरियर नै नीक लगे ,मुदा उपाय की ,दू नॉर कानि लइथ ,कतेक दिन धरि ओ नूआ ओहिना सन्दुक प’ राखल रहि जाए ,सब हुनक  अईठी प’ हसैत रहे कोन  कोन नै फकड़ा पढल जाए ,हारि क’ हुनका ओ नूआ पहिरैए पडैक । नहु नहु  आब हुनको सौख मौज जागय लागल रहेंह । अपन बड़का बड़का आंखि मे काजरि लगा क’ नीक जका नूआ पहिरै लागल छलिह । भरल दुपहरिया मे ,अपन कोठरिक दरबज्जा सटा , नीचा पटिया  ओछा क’ सीकी के बड़का पौती स’ कजरौटी,पोडर अफगान स्नो ,अलता ,टिकुली ,सिंदूरक कीया, किलिपक पत्ता ,ककबा संग बीत्त भरि के एना निकालि क’ पौती के सोझा ठाढ़ करैत । अपन बड़का बड़का केस के जुट्टी स’ निकालि क नारिकेर् क  तेल स बड़ी बड़ी काल धरि माथ् क मालिस करैत रहेथ 'फेर ककबा स' थकड़ईत थकड़इत पहिने बाम कात के जुट्टी गुथेथ,ओकर नीचा मे ललका फीता के खूब पैघ बड़का फूल बनाक ,ज़ोर स पीठ प फेक ,दोसर दिस क  जुट्टीगुथेथ, फूल बनाबैथ ,फेर दुनु के एक दोसर मे फसा क बीच माथ स कनी नीच क्लिप लगा क खोंपा  बनाबथि। गमछा के एक कोन के लोटा के पानि मे भिजा क' सबुंदानी मे राखल साबुन प रगड़ि मुह  पोछि  आंगुर स स्नो दुनु गाल प लगा बढ़िया स पचा क  पोडर लगेला के बाद  , टीकुली कपार प साटैथ,आखि मे काजर लगाक ,एना के हाथ मे उठा कनी काल धरि अपना के निहारैथ ,फेर नहीं जानि की सोची क' मुसुकि क ,सब चीज बोस्त ओरिया क मौनी मे ध ,कोठी के ऊपर राखि अपन पलंग प कनी काल पडल पडल घरक़ धरनि तकेत आंखि मुनि लइत छलिह ,की बेरहट लेल आंगन मे धिया पुता के आवाजाही सुरू भ’ जाय छल,फेर रतुका भोजनक ब्योंत ।कहिओ जखन अहि टोल,ओहि टोलक ससुर् बासि बेटी सब नैहर आबैथ त’ बड़का बाबा के हवेली के नब कनिया के देखय एबे करे जायथ,बड़की दादी हुलसि क’ हुनका सभके अपन ओसारा प’ राखल चौकी प,बैसबा स’ पहिने चद्दरी बिछेनाय नहिं बिसरथि । आ’ कनि काल् क गप्प सप्प के बाद पछबरिया घरक केबाड़ लग जा क’ बाजथि  ‘दाय सब एलखीन हें कनी बहरैयों घर स’ मुंह देखा दिओ”। छोटकी कनिया केबाड़ लग आबी क;   बड़का टा घोघ निकालि ,मुड़ी गोतने अपन दुनू पएर प  बैस रहैथ दादी कनि झांकी क’ देख लैथ फेर ,संतुष्ट भाव स ,केबाड़ खोलि आगाँ बढि कहथि “गे फूलो ,तुही देखा दहि नबकी भौजी के मुंह”। अपन विवाहक बाट जोहैत पितियौत ननदि फूलो चट स घोघ उठा क, मुड़ी पकड़ि तीनों दिस घुमा दैक ।  “कनिया बड़ सुन्नरि , केहेन परोड़क फाँक सन उछलल उछलल आंखि,  ठाढ़ नाक ,पनमा ठोर ” । कनिया के सुन्दरताई प अपन विचार परगट करि क जायत काल हुनका सबके  दादी आने की भानपुर बाली के सौस् क विलाप करेज  मे छूरा सन गड़य लागे “माटी के मुरुत एक टा गढ़ि क ध देलक,’ आ’ तेकरा बाद हुनक विपन्न नैहरक खोईचा छोड़ा क बखानय लगेथ त’ सुननहारों के अनसोहात लगे “जाए दिओ,बाप क धन स की होई छै, नीक लोक त भेट गेल” किओ ने कियो बजिए उठेक । गरमी मे सकाले भानस भात भ’ जाए आ’  घरक स्त्रीगण सब सेहो नीफिकिर भ; कखनों पछबरिया ओसारा प;कखनों पुबरिया बाड़ी बाला दुमुहा हवादार घर मे अपन किसिम किसिमक गप्प क पेटार खोलथि। टोल भरिक बेटी पुतहु सबहक बाजब, भूकब ,व्यवहार ,रूपरंग के  अपन अपन तराजू प जोखैत ,कखनों ओकिल त, कखनों जज के मुद्रा मे आबि जायथ। ओहि बइसारी मे बुढ़ पुरनिया सौस लेल जगह नै रहे ,एक्छहे जुबती सब ;,बियाहल ,कुमारि, । ओत्त  पानिभरनी, कुटिया पिसिया करनिहारि ,मालिन ,धोबिन ,खबासिन तेकरो सभक पैठ छल,मुदा उमरि के मामले मे कोनो दरेग नहीं ,आब हस्सी ठठा लोक अपने तुरीया  मे करते न । बाजए के सबके समान अधिकार त नहि छले,मुदा किओ चुप्पों नै रहे ,मुंह दाबि क त पुतौह सब हँसे ,गामक बेटी त, ठिठिएबे करे ज़ोर स । एहने जेठक सुनसान दुपहरिया मे ,जखन एक दिन अपन कोठरिक केबाड़ ओठङ्गा क’ सिंगार पटार करबा लेल पटिया ओछा क’ जुट्टी खोलि कोठी पर स एना ककबा उतारक लेल हाथ बढोलन्हि की पएर दाबी क’ चुप्पे स पईसल छलखींह, उघरल माथ कपार ,छिटकल केस ,भानपुर बाली के जेना ठकबकी लागि गेले ,देहक शोणित बरफ भ दिमागक सबटा गतिबिधी के अवरुद्ध करि देलके , हुनक अहि मनोदशा के फायदा उठबईत  टुनटुन भैया झट दनी हुनका बाम हाथ स पजियाबईत दाहिना हाथे हुनक मुंह बन्न करि देलथि। खूब बुझल छलनहि,एखन आँगन मे कियो नहि ,माय अपन भगिनी के बियाह क हकार  पुरय लेल अपन नैहर गेल छली,बड़की भौजी अपन छोटकी बहिनक दुरागमनक लेल अपन नैहर गेल छलथि ,तीनों बहिन अपन  अपन सासुर ,खबासीन दुनु ,सेहो लगनक समय मे नौत हकार पूरय  कत्तों कत्तों आन गाम  गेल ,। टुनटुन भैया के मनोरथि प, भानपुर बाली धधकैत अँगोरा फेकलथि ,अचानक ओ सिंहनी बनि हुनक पकड़ि स, छूटि हुनक दाहिना हाथ प’ ततेक ज़ोर स अपन दांत गडौलथि जे हुनक छरपट्टी छुटि गेलन्ह ,एतबा मे ओ केबाड़ खोलि सोझे दलान दिस प्रेत बाधा स ग्रसित मनुख जका पड़ेली,पितिया सौस जनार्दनक माए ,जे अपन दलान स उतरि टेटरा म्या स, बांगक गाछ लग ठाढ़ भ गप्प करैत छली, बड़की काकी के आँगन स दौड़बक आबाज सुनी दुरखा लग आबी चिहुकि उठली “की भेल ये कनिया ,गई म्या , ,”बड़का बड़का केस ओहिना खुजल ,माथ  प नुआ ने , आंखि मे भयानक भय ,ज़ोर ज़ोर स, चलैत साँस,मुंह स त’ किछू नहीं बहरेलन्हि,मुदा ओ हुनका भरि पाँज पकड़ि ज़ोर ज़ोर स कानय लागल छलिह । इमहर उमहर कान ठाढ़ केने लोक बेद के देखि क जनारदनक माए हुनका हुनके आँगन मे पछबरिया ओसारा धरि डाढ़ पकड़ि क आनलखिन्ह । कनी काल धरि हुनक माथ प, हाथ राखि नोर पोछि,सप्पत तप्पत दइथ ,सब टा खिस्सा उगलबेलखिन । घर बला पढुया छलथी त, बेसि  काल पर्देसिए बनल । फेर त जा धरि सौस नहीं आपस अयली ताबे तक हुनका ओगरि क ओ हुनक ओसारा प सुतैत रहल छली । सौस के कान मे जखन खिस्सा गेलन्हि ,त’ ससुर आ’ भैसुर संग ओहो त्रिया चरित त्रिया चरितक डिडिंबी नाद करैत  हुनक हाथक  छूल नहिं खेबा क सप्पत संग पेटकुनिया द’ पुतौह के सरापय  लागल छलिह ,किएक त  ओहि दिन स’ टुनटुन भैया निपता भ गेल छलईथ । उमहर  एहने नीफिकिर दुपहरिया मे जुबती सबहक बइसारी मे भानपुर बाली हीरोइन भ  गेल छलिह । किओ कहेक“गाल प दांत गड़ा दैतथि नै, जे जिनगी भरि के चेनहासी भ’ जयतइन्ही’। किओ कहे “हम जे रहितिये त तेहन ठाम नै लात मरितिएई जे ज़नानी के नाम धरि बिसरि जैतथि’ ‘एहने चालि प घरबाली छोड़ि देने हेतैन्ह’। तेकरा बाद सब अपन अपन गामक छिनार पुरुखक अनंत खिस्सा बांचैत। आ , दोसर ठामक बैसारी मे,जतए ,थकुचल ,झुरकुट ,खुर्राट सौस सबहक गप्प चले ,टुनटुन बाबुके सुधपनि के;हरेराम कका के माए अपन गरदनि के मोटका हसूली छूबेत ,मिचिया मिचिया क बाजेथ     ‘कहिओ हमरा सब दिस नजरि उठा क, नहिं देखलन्ही, तेहेन लजकोटर ओ ,सदिखन माठ झुका क छलेथ’।  ‘यै गरिब् क बेटी आनलहु बीयाहि क तखन त एहने सन दिन नै देखौता बिधाता।‘ कानक माकड़ी झूलबईत अनारस बाली बाबी बाजैथ । आ ओहि बइसारी मे जनार्दनक माय सेहो रहेत “हम सब मुरुख छल प्रपंच की बुझबई  ,कहबी छै जे घोर कलिजुग आबि गेले,’।टुनटुन बाबू के जननी नॉर पोछि बाजेथ “ओ बतहा के की पता छले जे ओसारा  प राखल लोटा उठा क क’ल स पीबा लेल पानि भरनाय ओकरा एतेक महग पड़ते ,देह मे त अहि कुलछनी के आगि नेसने रहे छै’। छले त टूटल जमींदारी ,मुदा एखनों बड़का गिरहस्थ ,,जमीन जायदाद गाछी ,माल जाल  संगे दस टा धिया पुत्ता बाला नामी घर ,दू तीन टा पूत त’ ऊच शिक्षा प्राप्त करि बढ़िया नौकरी सेहो करय लागल छलथि। अहि प्रसंगक बाद भानपुर बाली के घरबला कोलेजक  एक टा छुट्टी मे जखन गाम एलथी ,त’ फेर ओ आपस अपन कोलेजक मुंह देखे नहीं गेला ,कनिया लग जे दु चारि पाय जोडल छल , पेटी मे आ’ देह पर जे सब आभूषण छल संग ध ,दुनु बेक्ती ओहि घर क मधुर छाहरि स निकलि दुनिया के अथाह महासमुंदर मे दहिया भसीया क  अपन बाट ताकय लेल जायत रहल छला । कतेको बेर एहेन देखल गेले जे साधारण सन बाट ,कखनों क तेहन भयौन मोड़ ल लेत छै ,जे एक दिस उंच पहाड़ आ’दोसर दिस लोंमहर्षक खाधि। लोकबेद के कहब छै जे अप्पन  बाट मनुक्ख अपने कहाँ बनबे छै ,ओकर बस चलिते त’ ओ चिक्कन चुनमुन गंगाजल स’ धोल रस्ता प,पएर रखिते,मुदा जीबनक रस्ता त’ वैह बनबैत अछि ,जे जीबन बनेबक ,ओकर संचार करबाक ,आ’ ओकर संहार करबाक भार उठौने अछि । तखन सुंदर ,सूचिक्कन बाट सेहो काँट कूस ,पाथर  ,पानि स’ भरि दुसाध्य भ’ गेले कोना ,से अदृष्ट जानेथ।भानपुर बाली संग  किछू एहेने भेल छले।ओहि जमाना के  इंजीनियरीङ्ग्क पढ़ाई डेढ़ बरख पहिनहि छोड़ि घर बाला सड़क प’ बौआ रहल छलथी। कनिया के मोसियौत बहिनक घरबला अहि मुसीबतक घड़ी मे सुग्रीव जका हुनक संग धेने रहल।मास दिन धरिअपन घर क छत हुनको माथ प’  राखि डिस्टिल्ड वाटर के फैक्ट्री मे नौकरी के सेहो बेबस्था करा देलकन्हि। भानपुर बाली के की नाम छल हेतैन्ह की पता ,मुदा तत्कालीन रिवाज् क मोताबिक ,पहिलोठ संतान के नाम स म्या के नाम पड़ी जाए ,असेसरक माय ,बीन्नी के माय । धिया पुत्ता के बेर मे सेहो बिधाता जेना बाम बैसि रहल छलथी। मुदा कतेक बरखक बाद एक पर एक तराउपरि चारि टा धिया पुता स भगमान आचरि आ’ घर भरिदेलखिन्ह।आ ओतुक्का लोग हुनका सोना के माँ के नाम स चिन्ह लागल छल।  घरबला के त’ बुधिए बाम भ गेल रहेंह । अपन कुल खानदान क’ घमण्डक संग ओहि अधखिज्जु डिग्री के दंश हुनका सनकी सन बना देने छलन्हि। अपना ऊपर केकरो रोब जतेनाय हुनक पीत्त के तुरन्ते एड़ी स’ मगज धरि पहुंचा दैक। कार्य स्थल प’ नित्त दिन झंझट होमए लागल । घर आबि क’ भानपुर बाली प’ तामस झाड़ईथ ‘अहीके चलते हमरा आय ई दिन देखय पड़ि रहल अछि ,बड़ कष्ट छल त’ नदी पोखरि मे भसिया जयतों ,जहर माहुर खा सूती रहितों : तिरिया चरित्र मे फसि क, हम बर्बाद भ गेलों”। की करितथि भानपुर बाली ,बज्र सन बोल सुनैत सुनैत पाथर भ’ गेल छलथी पहिनहि स । बच्चा चारु इसकुल मे पढ़ैत छलेय । तनखा त’ कोनो खरापो नहिं छल । प्रतिदिन भोर मे काज प’ ज़ेबा काल पति कलह मचबैत  ‘अहाँ की बुझबै ,अपने त दरिद्रक बेटी छी, स्वाभिमान की होय छैक। आय हम अपन हिसाब करबा क रहबे ,ने बरदास होइत अछि कनहा के बोल”। भानपुर बाली आगा बढ़ी क हुनक माय बनी जायथ  ‘हमर गप्प छोड़ू ने ,मुदा अहा केकरो स याचना करय थोड़े जाय छी ,मेहनत करे छी,दुनिया करे छै, आब ई कोनो निषिद्ध चाकरी बाला जमाना त रहले नहिं ,देखियो बच्चा सब के निक इसकुल भेट गेले,सब त अहिं प, आश्रित अछि ने”। एक बेर  केकरो मुंह स  कत्तों सुनली ,जे सेना मे नीक नौकरी भेटेय छै । एक दिन घरबला के नीक मूड देखि क बजली त हुनक रौद्र रूप आ चिकरनाय सुनि क सब धिया पुत्ता कोठरी के मुंह लग आबि क’ ठाढ़ भ गेले “   हे देखैजाही एकर बुद्धि , तोहरि बाप रहतौ घर मे आ हम जाऊ सेना मे मरय”। मुदा कतेक दिन ,आखिर मे ओ नौकरी स इस्तीफा द देलथि। तखन एहने सन किछू भवितब्य के सोचि विचारि होसियारि भानपुर बाली पाँच  कोठरी के अपन मकान पहिनहि बनवा नेने छलथी ,एक टा बाईस कट्ठा के जमीन सेहो कीन लेने छलिह। आब घरबला जखन  त्यागपत्र द देलखीन त जे बकाया रुपैया भेटलनही,ओहि स खाली जमीन प, दू टा कोठरी गिलेबा प, ठाढ़ करि क’ जुत्ता के फैक्ट्री खोललन्हि। तीन टा कारीगर रखली । घरक सबटा काज सम्पन्न करि सीधे फैक्ट्री पहुंचथि ।  कखनों पतिदेव के अनेरे क्रोध देखि ,कारीगर सब के पोल्हा  क चाह पानि पिया क’ बुद्धि स’ काज लईथ। किछुए काल मे बिजनेस गति पकड़ि नेने रहेक । दुनु बेटी के कन्यादान करि गंगा नहा नेने छलैथ । मुदा बिपदा के ई कोना सोहेतेंह। ओ अपन चक्र चालि फेर स’ तेज करि देली । किओ कहलकैन सौस बड़ बीमार,किओ नै सेबा करे छेंन । जे पुतौह सब बड़ नाम गाम बाली छलिह ,धिया पुत्ता के पढ़ाबए के लाथे अपन अपन घरबला संगे बाहरि जायत रहली । एक टा बेटा त भागिए गेल छलेंह,मुदा तइयो पाँच टा पुतौह त बसिते छल ,आय बुढ़ारी मे ,बीमारी मे कियो काज क नै ।ई सुनि हुनक मोंन  कचोट स भरी गेलन्ही,आखिर ओ हमर स्वामी के माँ बाबू छथि,आ शास्त्र क बिधान अनुसारे हुनको धर्मक माँ पिता , हुनक करतब्य बोध हिय मे  उत्पात मचबए लागल । सबटा काज छौड़ि सौस लग आबि गेल रहैथ।ओ रोबदाब बाला धूवा ,मुट्ठी भरि के ठठरी बनल   बिछौन स सटल,ससुर सेहो दलान प पड़ल। मास दिन रहि क सब व्यवस्था दुरुस्त केली । जखन हुनक मुंह मे ओ कौर खुवाबथि सौस के आंखि स हर हर नॉर बहे लगै ,अपन दुनु हाथ जोडि ओ जेना हुनका स क्षमा मांगेथ । भानपुर बाली हाथ पकैड़ अपन माथ प राखि लइथ। ओछौने प नदी ,लग्घी होयन्ह , अपने स बिन घिनेने साफ करैथ ,दू टा मटकूड़ि राखीदेलथी,महेशक बेटी के हुनका कोठरी मे सूते के ,आ हुनक सब तरहक धियान राखय लेल  गछबा क  ओकर बियाह दानक सब टा  भार गछि लेलथि। भनसीया सेहो  राखि देलथी  ‘हम पाय देब आहाँ दुनू प्राणी के सेवा करबै खेबा पीबा मे ,पथ परहेज मे कोनो कोताहि नहिं हेबाक चाहि । कनी डेरो प हमरा देखनाय जरूरी अछि”। आ एक पएरसासुर आ दोसर डेरा प, रखने बरख धरि काटि देने छलिह । माय बाप संग ,गांमक लोग के आत्मा जुड़ा गेलय,आब हुनक कुल सील क डंका पिटाय लागल । किछू बरखक बाद जुत्ता फैक्ट्री बंद भ गेले ,घरबला के चिनिया बीमारी आ, ब्लड प्रेशर दबोचि लेलकन्ही। बेरा बेरी ससुर आ, सौस अपन अपन ठाम जायत रहला । इहों सबहक संग  ससुरक संपत्ति मे अपन हिस्सा बटबा लेलथी । मुदा बटाई प, ने लगा क, अपने स’ जन मजूर राखि खेती करबाबए के ठनली। परदेशक जमीन आ मकान बेचि क’गाम स सट्ल शहरि मे जमीन खरीद क’ मकान बना लेलथी जतय दियाद सबहक सेहो चास बास छलेन्ह। मकान क चारु कट छहरि द क  सोझा बदक फाटक सेहो ल्गबा लेलथी ,आंच  कट्ठा के ओहि चास बास मे आगा पाछा फल फूल के किसिम किसिम क गाछ  बिरीछ लगाबा लेलथि ।गाम प  बटला के बाद चालीस बीघा जमीन त’ हिस्सा मे पड़बे केलन्हि,आ ओ पोखरा पाटन बड़का हबेली मे छ टा कोठरी सेहो हिस्सा मे भेटलन्हि। अन्न पानि, उपजा बाड़ी बड़ नीक, गाय भइस पोसिया  लगा देने छलथी। साल भरि केअन्न  ओहि ठाम राखि क बाकी खेते स बेच दैथ। बड़का लग्गा बाला उपजाऊ जमीन ,जिनगी नीक जका कटय लागल । आ ई सबटा काज भानपुर बाली जनानी भईयो  क’ अपने करैथ ।आब उमरि सेहो भेलन्हि, आ’बेतहासा रौद बसात सहैत सहैत हुनको देह मे बीमारी पइस गेलन्ही।छोटका बेटा के  डाक्टरी मे नाम लिखा गेल छल, माय के सदी खन कहे , “बस कनी दिन रुकि जाऊ ,चारि बरख आउर ,हम नौकरी धेलउ की आहा के रानी जका बैसा क’ राखब ,ई बातरस ,ई दम फुल्ली सबटा दूर करि देब । बड़की पुतौह अपने सन कुलसील बाली आनली।बी एड करि रहल छल । पद्गाई के संगे गृहकार्य मे सेहो दक्ष ,अपन परिस्थिति के बुझए बाली ,पूजा पाठ करय बाली,सौस ससुर् क मान सम्मान देबए  बाली । मुदा पहिने कहल जे बिपदा के ने सोहेले बिन हड़ हड़ खट खट के जिनगी ।ओ कोना चाहितेथि जे आस क किरण कोनो ने कोनो दोग स हुनक जिनगी के इजोत स भरि दैक । दुनिया भरि के व्रत । ओहि नरक निवारण चतुरदसी  के परात उठली त घरबला के पलंगक नीचा खसल देखि सन्न रहि गेलिह ।बेटा पुतौह के मददि स कहुना करि ओछौन प’ सुथौलथी स्वास चलइ छल। अपने दौड़ गेली पड़ोसिया डाक्टर लग ,ओहो ओहिना भोरका चाहक कप सोझा क टेबुल प राखि झटकारैत संगे चलि अयलैन्ह। नॉरखसेबक काल नहीं छल ,तुरत एंबुलेंस मे लादि हुनका  नर्सिंग होम मे भरतीकराओल गेल ।  पक्षाघात क अटैक छल। शरीरक बाम अलंग सून। अहि बिपत्ति मे दुनु हाथ क मोटका सोनक बाला आ’ कांगुरिया आंगुरक बराबरि मोट गरा के चेन बिका गेलन्ही। मुदा संतोष छल सत्ती माय हुनक जान त बकसि देलखिन। पहिनहु ओ घरे मे रहैत छला,आब ओछौन प ,मुदा आंखिक सोझा त छलेथ ,आस त मन मे रहबे करेन्ह जे आए नै काल्हि,सखरा भगवत्ति के किरपा स उठि क अप्पन पएर प ठाढ़ त अवस्स हेता।आब  जे साधू ,संत ,बैद,डाक्टरक  अजगुत चमत्कारक  खिस्सा लोग सुनबे ओ आस् क डोरी पकड़ने दूर दूर धरि दौगति रहली । कोन जड़ी ,कोन  बूटी ,कोन तेल मालिस ,जादू टोना ,की सब नहि अजमबेत रहली ,मुदा हार नहि मानली ,बिसबास जीवित छलेनह। अहि मध्य खबरि भेटलनही जे छोटका बेटा जे अखन पहिले  बरख मेडिकल मे छल ,कोनो पहाड़िन स विवाह करि लेलके । दुख की आ कतेक होयतन्हि,किछू दिन भगवती के सोझा रिरियाती रहली ,मुदा मोंन  नै मानलकैन्ह त’ बस पकड़ि ओतेक दूर बेटा पुतौहक मुंह देखय औ बरखा बूनि के  परबाह नहिं करि क चलि पड़ल छलिह। फोन प गप्प भेल रहेंह ,सपूत बरुन बस स्टेंड प आबि दुनिया के सोझा माय के निहुरि क गोड़ लगलक । होटल मे ल जाक खुआदेलकईन्ह,आ फेर ओहि घूरती बस मे, ओहने मौसम मे रतुका  टिकस कटा क चढ़ा देलकेंह । सोचने रहैथ ,केकरो स विवाह करि लेलके त की ,आब त ओ हमर पुतौह भेली न ,त अपन कर्णफूल छोटका डिब्बी मे राखि पर्स मे ओरिया क ध नेने छलथी,कनिया के खाली हाथ कोना देखब । किछू टाका सेहो राखि लेलथी ,नब नब गिरहस्थी छै,ककरा स मांगते। अनहरिया रा ति ,कड़कैत बिजुरी ,बरसैत मेघ मे  तितति भीजति ,जखन ओ दरबज्जा खटखटौली,पुतौह के डरे हदास पईसी गेले ,अंदेसा भेलन्हि,खिड़की स झकलि ,माँ के देखि किछू पूछताथ करितथि तेइ स पहिनहि घर मे पएर रखैत बड़की पुतौह के भरि पाँज धरि मोन भरि कनली “केहन भ गेल बरुन ,अपन डेरो नै ल गेल ,आन लोक सन होटल मे खुआ क  अहि प्रलय काल मे ,बिन किछू सोचने रातराती बिदा करि देल। कतबों कहलिए कनी कनिया के मुंह देखा दे ,कहलक कोन सुन्नरी छै जे देखबै’। कनी दिनक बाद बरुनक फोन आबए लागले ,जायदाद मे  हमर बख़रा द दीय । हम अहि ठाम घर कीनब’। घर मे भूकंप आबी गेले ,चारुकात क धरतिए टा नहि,ऊपर अकास धरि डोलए लगलै। भानपुर बाली के सोझा परसल थारी निरैठे रहए लगलै ,हाथ पएर मे बग्घा लागए लगले,माथ टनके ,अनेरे बड़ बड़ाए लागल छलिह। “कोन  कोन दिन देखेता बिधाता ,जायदाद मे हिस्सा के मतलब जे ई घर बेचू ,गामक जमीन आधा करू ,गामक मकान आधा करू । तखन कोना करि क जीबनक भवसागर पार करब । तखन लोकबेद सलाह देलकेंह , बाटल जेते दादा के संपत्ति,बापक अरजल प हुनका अछैत किओ ने अपन जुईत चला सकैत अछि आ येह गप्प बड़का बाबू के सरबेटा जे नामी ओकिल छलथि सेहो कहलखिन ।“अशक्त बीमार बाप के सेवा करबा के फुरसति नहीं छेंन आ, संपति मे बख़रा तुरत चाहि, पढ़ाई लेल जे पाय पठा रहल छी ,सेहो बंद करू एहेन कपूत के’। मौसम अहि बेर केहेन तांडव केने छल। भयंकर ठंड । कम्मल ,सीरक मे भरि  दिन लपेट क त ओ बैसयबाली प्राणी नहिं छली , हाथक बुनल मौज़ा पएर मे ,साया के नीच गरम पैजामा ,कार्डिगन, ऊपर स मोटका पशमीना शौल मे अपना के नीक जका बानहि छेक क ब्रम्हबेला के  स्नान ,पूजा के बाद स इमहार उमहर लुड़ूखुड़ू मे लाइग जायथ । पुतहुक परीक्षा चलैत छलै। सबके चाह द क ,बाहर आँगन मे बोरसी मे आगि सुनगा क राखि देली,कनी काल मे निधु भ जेतैक त’ घरबला के कोठरी मे राखि,हुनकर मालिस करितथि। ताबैत  चाह ल’क बेसकी मे आबि गेलिह ,थर थरी लागए लगलैन्ह त, पर्दा लग रखल हीटर जे कनी खराप छलै ,कतेक दिन स  सोचने रहेथ ठीक करबाबक ,मुदा आय कपकपी बरदास नै भेलन्हि त जरा लेलखींह । कनिए काल मे गों गों के आबाज सुनि पुतौह पढ़ाई छोड़ि दौडलनन्हि,ओकरा भेले बाबूजी के कोठरी स स्वर आबि रहल अछि। मुदा ओ त बैसकी स आबेत  छ्लै, खिड़की के परदा पकड़ने ओ त नीक जका झरकि चुकल छलिह सबटा कपड़ा सुड्डाह  ,बाक बंद ,तुरत हुनक उठा क ,सूती चादरि आ,कम्मल मे लपेटि   बड़का अस्पताल ल जायल गेल डाक्टर नीचा  मुंह करि नीरास भ मुड़ी हिला देलके, नब्बे प्रतिशत झरकल ।   तीन दिनक भनक  कष्ट क उपरांत आखिरी मे माटि के मुरुत माटि जका भखरि गेल छलिह । इम्हर,मनुक्खक जाति, कियो कियो बिररो उड़ा देलके  ,आत्मह्त्या करि लेलथि,बेटा स परेसान छलखिन ,मुदा ओत्त उपस्थित सम्पूर्ण समाज किओ ने पतिएलके ,एहेन जीबट स्त्री त बड़ कम गढ़ैत छथिंह भगबती  ।कानेत कानेत पुतौह बजली “हीटर खराप छल ,ओहि मे करेंट आबैत छलै”। विलायत वाली कनिया अप्‍पन माॅटि पानि सॅ दूर ़बागमती सॅ बङ दूर ़आेहि जमाना के हिसाब सॅ ़बरखाें पहिने ़नर्मदा के क्षेत्र विदिशा मे आबि क’ चिरंजीब बाबू बसि रहलाह। प्‍िाहने त’किराए के मकान मे रहैत छलाह़ ़मुदा किन्ए दिन मे पाॅच कटठा क’ सुन्दर चाकर चाैरस प्‍लाॅट कीनि अपन मनाेरथ के पूर्ण करैत बङका टा के हवेली सन ठाढ कए लेलन्हि।एकदम पूरना रइर्स सभक नक्‍काशी दार झराेखा वाला हवेली ़बङ सुन्दरऊज्जर झक झक करैत संगमरमरक हवेली ।धीरे धीरे आगाॅ पाॅछा के किछु आआेरजमीन सेहाे खरिदलन्हि । मुदा तखन इर् घर भरल रहैत छल ।मैंया छली ़बाबा छलाह ़यानि की चिरंजीबि बाबू के मा ़बाबू ़एकटा छाेट भाए ़आ’ दू टा छाेट बहिन क संग अपन पेलवार मे दू टा बेटा आ’ तीन कन्या ।नाैकर चाकरक सेहाे कमी नहिं छल ।जतए गुङ रहैतछैक ़चुटी आेतए आबिए जाए छै ससरति । दूनू बहिनीक विवाह भ’ गेलए बेटी सब सेहाे अपन अपन घर चलि गेलन्हि ।म्ैांया आ’ बाबा एकाएकी अपन आखिरी जतरा प’ चलि गेलाह ।भाइर्मद्रास आ’ छाेटका दूनू बालक बाहरे पढैन्ह ़घर एकदम सुन भ’ गेलए ।नाैकर चाकरक गिनती सेहाे कम हाेमए लगलैन्ह चिरंजीब बाबू के वकालत सेहाे कम हाेमय लगलैन्ह ।अपन आ स्त्री दूनू व्यक्‍ति के स्वास्थ खराप ।घरवाली के डायबिटिज छलैन्ह़ ़गठिया सेहाे । अपन बी ़पी ़ हार्ट प्राब्लम । घरक सुन दूर करय लेल ज्येष्ठ बालक विभूति बाबू के विवाहक’याेजना बनाआेल गेल ।आेहाे वकालत पढने छलाह ।पिता के हाथ बॅटबए आबि गेलाहविवाह भ’ गेलन्हि ।कनियाके जाैं चानक टुकङा कहि त’ इर् हुनक अपमान हाेएतन्हि आे त साक्षात चान छलीह ।पढल गुनल कनि कम्मे मात्र बीए पास ।मुदा हुनका सब के अपन पूताैह सॅ नाैकरी त’ नहिं करेबाक छलैन्ह ़तााहि लेल कन्याक गुण आखानदान प’ विशेष ध्यान देल गेलए । पुताैह के आबए सॅ पहिने जेना आेहि घर मे चुहचुही फेर सॅ आबि गेल रहै़ ।ङ्राइर्ंग रूमक साेफा आ झाङफानूस के नवीनीकरण कराआेल गेल ।बरखाें बाद आेहि मकान मे रंगाइर् पाेताइर् भेल छल ।चिरंजीब बाब्ूा क’ प्रसन्नताक काेनेा ठेकाने नहि छल ।बङ गुणवान ़ सुशील लक्ष्मी कनिया घर मे आबि गेलीह । विभुति बाब्ूा के माए सेहाे ब्ङ प्रसन्न ।पूताैह के बेटिए जेकाॅ नाम सॅ बजाबथि ‘भारती’ ।आ’ भारती साल भरि क’ भीतरे हुनका सब के चान सन पाेता सेहाे दए देलन्हि । मुदा खिस्सा इर् नहि थीक ।नै हुनक दाैलतक ़नै साेहरतक ।खिस्सा क’ विषय छल विभ्ूाति बाबू के छाेट भाए ़जे इंजीनियर छलाह ।आ’अपना पसिन्नक’ आन जातिक कन्या सॅ विवाह करि लंदन चलि गेल छलाह ़सेहाे कियाे आने कहलकैन्ह । कत्तेक दिन धरि माए बाबू के तामस ़दुःख ़दर्द काेढ करेज मे हिलकाेर मारैत रहलैन्ह ।पीर रहि रहि क’ टसि मारै ।आ’ कानैत कानैत ़माए बताहि भ’ जाइथ ।तखन चिरंजीब बाबू समझा बूझा क’ चुप्‍प करबथि ।पूर्व जन्मक पाप कहैथ आ” आन धिया पुता दिस ़पाेता पाेती दिस धियान लगाब’ कहैथ ।पूजा पाठ ़रामायाण ़भागवत सब त’ चलिए रहल छल । सप्‍ताह पन्दरह दिन प’ महाकालक’ दर्शन करि आे खूब मिनती करैथ‘महाकाल ़सब सुख देने छी।छाेटका बेटा घूइर आबए ़़़़़़़़ ़़बस एक बेर मुॅह देख ली ़फेर जतए रहै ़आहाॅ खुस रखबै ।’ प्रवासी क’ जीनगी भले सुख चैन सॅ ़ग्रामीणक’ हङ हङ खट खट सॅदूर लगैत अछि ़मुदा इर् एकटा काल काेठरी के सजा जेना भ’ जाइत अछि ।अपन समाज क’ नीक बेजाय सॅ दूर ़संस्कृति आ’ रीति रिवाज सॅ मिलबाक लेल कखनाे क माेन आेइना जाए ़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़फूसियाही गप ़़़़़़़…आहे माहे ़़़़……इतियाैत पितियाैत ़़़़़़़़।आेहि मे एकटा फराक सिनेह छै ।असगर ़असगर नहि लगैत अछि ।ज्याें ज्याें उमरि बढए लगलन्हि दूनू व्यक्‍ति के अपन गाम माेन पङय लागल।चिरंजीबी बाबू के स्त्री साेन दाय त’अपन मातृभूमि लेल आेहिना बेकल भ’ जायथ ़जहिना छाेटका पुत्र लेल । अहिना करैत करैत दिन बीतैत रहलै ।तीनाे बेटी के विवाह ़जबलपुर ़भाेपाल आ” इंदाैर मे भेल रहै ।अहि प्रकारे मिथिला सॅ संपर्क टूटले जकाॅ छलैन्ह ।कहु त’ करीब करीब सबटा लगक’ संबंधी इम्हरे उम्हर छल ।मुदा सब अपन अपन काज मे व्यस्त ।पूताैह भारती अहिना बङ कम बजैत छली ़आ’ मैथिली त’ बिसरिए गेल छलथि ।अहि मे हुनक काेन दाेख ।नैहराे मे सब कियाे हिन्दीए बजैत छल । आैनाइत बाैआइत माेन ़साेनदाय के बङ दिक करैन्ह ़त’ शारीरिक व्याधि आआेर बढि जाय ।गठिया के प्रकाेप एत्तेक बढि गेलन्हि कि दुनु ठेहुन जेना जकङिलेलकैन्ह ।जाङ मास मे घरक बाहैर बगीचा मे लागल झूला प’ भारती बैसा दैत छलैन्ह ़़़़़़खवासिन चुप चाप हुनका मालिस करैन्ह ।दूर दूर ़़़़़़़़ ़ ़़ धरि हुनक दृष्टि घुइम फिर क’ वापस माली वाली प’ टिक जाए ।आदिवासी छैक ़हिन्दी बस दू चारि आखर जनैत अछि ।छत्तीस गढी बाेली बाजए लागैत छै ़जे साेनदाय के ब्ङ कमआबै ।आेकरा सॅ फालतु के गप केनाए सेहाे व्यर्थ ।पाॅच बीघा मे पसरल हुनक काेठी खे आगाॅ पाॅछा गाछिए गाछ ़़़ ़ ़़सब तरहकफल फूलक’ जेना आधुन्कि कण्व आश्रम हाे ।चिरू बाबू के पेङ पाैधा सॅ बङ लगाव । सङकक दाेसर कात सिन्धी ़पंजाबी सबहक काेठी छलैक ़़़़़़़़़़ ़़़कखनाे काल निमंत्रण प’ एनाय जेनाय हाेइत छल ।मुदा आब आे ़़़़़़़ ़़़़़़ ़़़नाटक बाज जिनगी सॅ तंग आबि गेल छलीह । विभुति बाबू पिता संग काेट चलि जायथि आ’ भारती दूनू बच्चा के स्कूल पठा क’ साैस लग बैस कखनाे कल्याण पढि कए सुनाबथि ़कखनाे गीता ़ कखनेा हिन्दी के एकबार ़़़ ़़ ़ ़ मुदा नब नुकूत आजू क’ जुबती कखनाे बाेर भ जाइत छली ़़ ़़़ ़।कतेक बेर घर वला के कहलन्हि ़बी़ एड’ करि लैत छी ़मुदा आे अनठबैत गेला़ ‘फुरसत कत्तए अहाॅ के ।बच्चा सब ़माॅ ़ ़़ बाबूजी हम ़घर दुआर ।” आ’ अहि घर दुआरक गिरहस्थी क’ तिलिस्म मे हुनका आेझरा क’ राखि देने छलाह । एक दिन भिनसरे भिनसर जुलाइर् मास क’ घनघाेर बादरि आ’ बिजुरि आकाश मे हाेड लगाैने छल ।पानि अखन पडबा सुरू नहि भेल छलै कि घरक घंटी बङ जाेर सॅ बजलै ।नाैकर सूतले छल । चिरू बाबू चाैकला ।आेना त’आे चारिए बजे आे उठि जाएत छला मुदा आए कनि अस्वस्थ सन माेन लागैत छलैन्ह ़़़़़ ़़ ़ ़ ‘एखन के भ’ सकैत अछि’ ।उठि क दरवज्जा खाेलला ़़ ़़ ़ ़ ़। अन्हार छलै ।बिजुरि से चमकै ।बरांडा के लाइट जराैला त’ धक सॅ रहि गेला ़़़़़़ ़़ ़ वरूण छलाह ़़ ़ ़़हुनक करेज त’ ततेक जाेर सॅ धक धक करए लगलन्हि कि आे एक क्षण विलैम क’ इहाे नहि देखला’ जे हुनक संग आर कियाे छन्हि वा’ नहि ।नेना जेकाचिकरैत ़़ ़ ‘ सुनै छी वरूनक’ माए ़़़़़ ़़ ़यै उठु यै ़़़़़़ ़़देखू बाैआ आयल ़़़़़़ ़़़।’आ’ भाैकासी पाङि क कानय लगला ।साेन दाय हङब्ङा क’ उठि गेलीह आ बिन गप बूझने हुनका कनैत देखि क’अ अपनाे कानय लगलीह ।ताबैत वरूण आ’ हुनक स्त्री पाॅच बरक कन्या सॅग घरक भीतर प्रवेश क चुकल छला ।माए बाबू के कनैत देखि हुनक पएर छूबैत बजला ़ ‘कथि लेल कनैत छी ।आब’ त हम आबिए गेलहू।’ उम्हर कनबा के साेर सुनि विभ्ुाति बाबू आ’ भारती से हाे अपन काेठरी सॅ बहरैला ।सबहक धियान वरूण प छल ।भाए भायक’ गल लगला ्र।पाॅच हाथक गाैर वर्ण वरूण ़़़़़़़ ़़आआेर सुन्नर लगैत छला कनि विलंब सॅ हुनक सबहक नजरि संग आयल स्त्री प’ पङल्ैान्ह ।तखन आे हङब्ङा क’ बजला ‘इर् हीना़ ़ ़़ ़़ ‘हीना माॅ बाबूजी ़भैया भाैजी के प्रणाम करियाै’।अंगरेजी मे बजलाह ।भाउज के कहला ‘इर् हिन्दी बेसी नहि जनैत अछि । सब अवाक भ हुनका देखय लागल ।छाेट सन ़दूबर पातरि ़़़़़़़़़़़़ ़ ़़ ़पिरस्याम ़़ ़ ़ ़ नाक नक्‍स सेहाे नीक नहि ।नै जानि कि देखला वरून अहि मे ़़़़़़ ़़ ़़ ़़घर पेलपेलवार सब के बिसरि गेला ़़़़़ ़़ ़़साेन दाय माेने माेन साेचए लागल छलीह । आ” पाॅच वर्खक स्वीटी एनमेन वरूण जेकाॅ ।वएह छूरी सन नाक ़ बङका बङका आॅखि आ’ दप दप करैत गाैर वर्ण ़ ़ ़ ़।चिरू बाबू आेकरा अपन काेरा मे बैसब के काेशिश केलाह त’ कनि कनि सकपकाएल सन ़आे हुनक कात मे राखल कुर्सी प’ संच मंच भ” क बैस गेल । पन्दरह दिनक प्राेग्राम छल ़़़़़ ़ ़़ आे सब इंडिया घूमय आएल छलाह ।बाबूजी लेल पाइर्प ़जे आे हुनके वियाेग मे छाेङि चुकल छलाह़ ़़़़़ ़़मॅा लेल दुशाला ़़़़ ़़ भैया भाैजी आ’ बच्चा सब लेल अंदाजे सॅ किछ किछ सनेस । हिना क नाम सकीना छल ़आै केरल के छलीह ़़़़़ ़ ़़लंदन के एक गाेट नर्सिग हाेम मे काज करैत छलीह ।रूप रंग जे हाेयन्हि ़़़ ़ ़ ़पूर्ण व्यहवार कुशल ़़़़ ़़ ़़हिन्दी बाजए नहि आबए ़मुदा बाजए के काेशिश करथि । घुमनाए फिर नाए सॅ जे टैम बचै ़साैस लग बैसथि ़़़हुनक गेठिया के दवाए आनैत कि खेबाक चाही कि नै ़़़़ ़़ ़ ़ ।पथ परहेज ़़़़़ ़ ़़ एकटा चार्ट बना क’डायनिंग रूम मे टाॅगि देलखिन्ह । शाेन दाए के दम्मा सेहाे रहैन्ह ़़़़़ ़़कखनाे क’ ततेक माेसकील भ’ जाए किउपरक’ सांस उपरे रहि जाए ।घबङाक’ चीरू बाबू के राति बिराति डाक्‍टर बजब पङैन्ह ।हीना आक्‍सीजन वाला छाेटका़ मशीन आनने छलीह अपन काेने रिश्तेदारक लेल ़ ़़़़़ ़़ माॅजी के देलथि ।इर् दवाइर् उ दवाइर् ़़़़ ़़ ़ ़ एना सेवा आेना सेवा ़़़ ़़ ़एना उठू एना बैसू ़़़़़़ ़ ़़़’आ’ साेन दाय नेना जेकाॅ हुनक गप्‍प मानि सबटा करैथ ।हिना राेज भाेर सांझ हुनका रक्‍सर साइज सेहाे कराबथि । आ सत्ते ़सप्‍ताह भरि मे साेन दाए बङ स्व्स्थ भ’ गेलीह ।आब कनि कनि दूर बिन मददि के चलि लैत छलीह ।आक्‍सीजन मशीन सॅ चिरू बाबू के दुश्चिन्ता से दूर भ गेलन्हि ़़़ ़ ़़ राति बिराति कखन की हाेयत ़़़़़़ ़ ़़ प्राण अधर मे लटकल रहैत छलैन्ह ़़। पन्दरह दिन काेना बीतलै ़़़़़़़़ ़ कियाे नहि जानि सकल ।जेबा के दिन वरूण माए बाबू सॅ कहला ‘हमरा माफ करि देलहू नै ।हम फेर आयब ़ मुदा जाै जाै अहाॅ सब कानब त’ नै आयब ।’ आ सत्ते जयबा काल हुनका दूनू मै सॅ कियाे नहि कानल छल । वरूण के गेनाए सप्‍ताह भरि भेल हेतैक कि पहिल फाेन आयल छल ़़ ़ ़‘अहाॅ सब काेना छी ़ ़ ़ ़’ हीना से माॅजी सॅ बीस मिनट गप्‍प करि सबटा हालचाल पुछलकैन्ह़ ़़’हुनका सबहक आॅखि मे जे चमक आबि गेल छल से दूरै सॅ देखार भ’ गेल छल ।मास दिन प’ दाेसर फाेन ।़ ़ ़ ़ ़छह मास प’ तेसर । आ’ आब दू बरक भ’ गेलए ़़़़़़एखन धरि काेनाे फाेन नहि आयल छल । इम्हर साेनदाए के बेटी जमाए सब भेंट करए लेल आबैत रहलैन्ह ।भारती परछाइर् जकाॅ भरि दिन पाछाॅ पाछाॅ।साैस लग इर् दबाइर् ़़ ़ ़ इर् दारू ़़़ ़़ ़ इर् गाेटी नेने ठाढ ।हुनक माेन कनि बेसी असक्‍त भ’ गेल छलैन्ह ।पकङि कए टहलाबए उठाबए पङै ।कखन की खेतीह ़़़़़ ़़आ” संगहि संग पाहुन पङकक आवभगत सेहाे ।काेना इंदाैर वाला आेझा खेताह ़ ़़ ़कत्त सूतता ़़़़ ़़ ़ रायपुर वाला पीसा खेला कि नहि ़़़़नाैकर बाबू जी के पान लगा क पनबटा मे देलकन्हि की नहि ।आ’ अपन दूनू छाेट नेना भुटकाक’ दिनचर्या ़ पढाय लिखाए ़़़ ़ ़़।दूनू अपन अपन क्‍लास मे फर्स्ट आबैत छल । भरि दिन घिरनी जेका घूमैत भारती के देखिक भाेपाल वाला जमाए बाजि उठला ़ ‘माॅजी ़हिनका््््््््््््््््् पुताैह महाकालक कृपा सॅ बङ नीक भैटले्े्ैन्ह ।कतैक सेवा करैत छन्हि ।हिनकाे आ प्‍ूृृृरा घर क देखभाल सेहाे ।’ आब साेन दाए के गठिया के सं ग हार्ट के बिंमारी सेहाे धए नेने छल धए नेने छल । बङी काल धरि कुर्सी प’ गुम सुम बैसल ़किछु साेचैत साेचैत ़ ़़ ़खनि देर मे साेन दाए बाजल छली़़़़़़ ़ ़़ “आेझा ़़़़़़़़ ़़ विलाएत वाली कनिया बङ नीक’ । सूटक कपड़ा वेदान्तक माय बेर बेर कहलखिन्ह ‘रै बाैआ ़ ़ ़ कनि अपन सूटक कपङा देखानै ़ ़ ़ ।गनगुआरि वाला पीसा आयल छथि ़़ ़हुनका विदाय मे द’ दैतियैन्ह त एखन कीन नै पैङतै ़ ़़ ़हाथ मे पाइर् नहि अछि एखन ।’ आहि रे बा़ ़़ देखै के काेन काज ़़ ़ हम त’ देखने छी नै ़ ़ ़आ आेतेक दामक सूट गनगुआरि वाला पीसा सपनाे मे देखने हेता ़ ़़जे पहिरय देबहुन ़ ़ ़ ।हुनका त’ कपङा देखिते मातर दाॅति लागि जेतैन्ह ़़ ़ ़सिलाइर्याे के पाए हेतैन्ह ़ ़ ़ धाेती द’ दहुन बिदाइर् ़ ़ ़आे आे हि जाेगर छथि ।’ माय चुप भ’ गेलीह । छाेटकी बहिन पुछलखिन्ह ़ ़ ़ ‘के देलक अछि सूटक कपङा ़़ ़ ़ कनि हमराे सब के देखय दियाै नै ।’ ‘आफिस मे एक गाेटे देलकै ़ ़ ़।आेकर कत्तेक काज नै हम कराैने छी ़़ ़।गिफ्‍ट त’ बङ लाेक देलकै़ ़ ़ कियाे तमधैल ़़ ़ कियाे गिलासक सेट ़ ़ ़़ ़ ़कियाे सेन्टक सीसी ़ ़ ़ ़आर किदन किदन ़ ़ ़ ़आे सब त’ हम आन लाेक मे बाॅटि देलियै़ ़ ़ मुदा इर् ़़़ ़सूटक कपङा हमरा बङ पसिन्न ़ ़ ़ एकर हम अपने सीएब भायजी के विवाह मे ़़ ़ ़ ़।’ ‘मुदा कनि खाेलि क’ देखैबतीए नै ़़ ़ ़।’ छाेटकी बहिन कनि अङए लगलीह ़़ ़त कनि खाैंझैत बजलाह ़़ ़ ‘गै छाैङी ़ ़ ़ एक बेर आेकर पैकिंग खुलि जेतैए त’ फेर सॅ चपेत मे आेकर तह टुटि जाइर्त छै ़़ ़ आ’ कपङा दुइर्र भ’ जाय छै ़़ ़ टेलर बदमासी करय लागै छै तखन ़ ़ ़ बुझली दाय ़़ ।’़ ़ ़ ़ ‘मुदा जखन अहाॅ एकर पैकेट खाेलबे नहि केलियै त’ बुझलियै काेना ़ ़ ़जे सूटे के कपङा छै ़ ़ ़।’़ ़ ‘ गै ़़ ़ ताेरा जकाॅ मूरूख छी ़ ़ ़ ़।उङैत चिङि के पाॅखि चिन्ह वला हम ़ ़ ़ ।पन्नी के नीचा सॅ ऊज्जर देखाय छल ़़ ़ बूझि गेलियै़ ़ ़।’ ‘ंंंंंमुदा इर् काेना बुझलिए जे सुटे के कपङा छैक ।धाेतियाे भ सकैत छै आे कहलक की़़़़़ ़ ़।’ बहिनाे कम नै छलीह। ‘गै भकलाेल ़़ ़ आे की कहत हमरा़ ़ ़ हम अपने नहि बूझबै़ ़ ़ धाेती के कपङा आ’ सुटक कपङा मे भेद छै से हम नै जनबै ़़ ़ ़।अहिना लाेक वेद हमरा आगाॅ पाॅछा बूलैत टहलैत रहैत छै ़़ ़ ।’ भायजी के विवाह तय भ’ गेलन्हि ।बाबूजी माॅ सब धिया पुत्ता के ल’ क’ बाजार गेलाह ़़़़़़ ़़ ़पसिन्नक कपङा खरीदबाबै लै ़़ ़ ्र बनराघाटवाला आेझा आ’ वेदान्त पहिने निकलि काेनेा काेनाे आआेर काज सॅ किराे मिराे सावक दाेकान गेल छलथि ।जखन हजमा चाैराहा लग गामक रिक्‍सा वाला पहूचलै ़़़त’ बाबूजी माॅ के कहलथि “वेदान्त के सेहाे बजा लैतियै ़ ़ ़ ़आेहाे अपन पसिन्नक कपङा खरीद लैतै़़़़ ़़ ़दस दिन बाॅचल छै ़़ ़ अहि बेर त धमगज्जरि लगन छै ़़ ़दरजीबा देबाे करतै की नै कपङा सब ़़। ‘” माॅ कहलखिन्ह ‘वेदान्त लग बङ दीव सूटक कपङा छै ़ ़़ आेकरा कियेा गिफ्‍ट देने छलैक ़ ़ ़ ़आे त वएह रखने अछि भायजी के विवाह मे पहिरय लेल ़़।’ ताबैत धरि पाछाॅ वाला रिक्‍सा दुनु सेहाे लग आबि गेलय ़़ आ’ सुनील बबलू दुनु भाय सेहाे उतरिक बाबूजीक ल’ग आबि गेलाह ‘हजमा चाैराहा त’ आबि गेलय आब किम्हऱ’ । ़ ‘बनारसी के दाेकान चलए।’ ‘बेस’ ।आ आे दूनू अपन रिक्‍सा प बैस थाेलबा के कहलथि ‘आगाॅ वाला रिक्‍सा के पाछाॅ बढ’। सब गाेटे अपन पसिन्नक वस्त्र कीनि दरजीबा के नाप दइर्त गाम अयलाह ़ता धरि वेदान्त आ बनरा घाट वाला आेझा गाम नै पहुॅचल छलाह ।बाबूजी के चिन्ता भेलनि ़ ़ ़ त’माॅबजलीह ‘बेदुआ के बाट घाट नै बूझल छै की ़़ ़आए नै त काल्हि जा क’ दरजीबा के कपङा के नाप द देतैक ़़ ़ राेज राेज त बजार अखन जाइर्ए पङै छैक।’ तखने वेदान्त आ आेझा अपन सायकिल घरक दू मुहाॅ मे ठाढ केलन्हि ़ ़ ़। “बाैआ ़़ ़बाबूजी कहै छलखुन्ह दरजीबा के कपङा कहिया देबहक़ ़ ़ ़’। ंमाॅ अपन मुॅह फाेलबे केलथि कि बजला ‘गै हमर भक्‍त अछि दरजीबा ़़ ़ ़एक दिन मे नहि एक घ्ंाटा मे सीब क’हमरा द’ देत ।तू आन काजक आेरियान कर ़़ ़ ।हॅ़़़़ ़ किछु खेनाय दे बङ भूख लागल अछि ़़ ़इर् बज्र देहाती बनराघाट बला संगे कि गेलहुॅ ‘काेल्ड ड्रींक’ सेहाे धरि नहि पीबए देलाह ़ ़ ़ ‘अहि मे की दन हाेइर्त छैक ़ ़ ़ महींसमाङ ़़ ़ ़ ़ ़ ़आ’ आेझा के खाैझाबैत़ ़ ़ ़हॅस्सी ठठा करैत ़़़़़़़़़ ़़ ़ दूनू खाय लेल बैसला़ ़ ़ ़ ़ ़।आेहि समय मलाहिन माछक छीटा नेने आॅगन मे पैुसल छल ।वेदान्त के देखि आेकर मुॅह प’ प्रसन्नताक’ लहरि दाैङि गेलए ़ ‘कहिया अलखिन बैाआ ़ ़ ़ ़ बाैआ माछक बङ साैकीऩ ़नेने सॅ ़ ़ ़माछक टाेकरीए नेने पङा गेल छलखीन कएक बेर नेना मे ।लाेक वेद खिहारि क’ हुनका सॅ टाेकरी छीने हल्ले ।’आे अनेरे बाजय लागल छल । ‘गै ताेहरि माछ सब नीके छाै नै ़ ़ ़’ ।माछक मतलब मलाहिनक धीय पुत्ता़ ़ ़ ़।’आ’ मलाहिन नूआ सॅ मूॅह छॅापि हॅसैत बाजल ‘बाैआ एखनाे ठठ्ठा करैत हथीन ़़ ़ ़बदललखिन नै कनियाे ।डिल्ली मे नाैकरी करैत छथिन्ह तैयाे नहि ़ ़ ़।’ इम्हर माछ तराइत रहल ़़़़़़। वेदान्त अपन बकलेलहा हरकति सॅ आेझा ़़़पीऊसा ़़़़़़भाउज ़ ़ ़ ़बहिन सबहक मनाेरंजन करैत करैत तरल माछ खाइत रहला ़ ़ ़।कनिए बेरक बाद सब पुरूषपात उठि क’ दलान प चलि गेलाह ़़ ़ ़ । घर मे हुनक अनेकाे खिस्सा के दाेहराबैत तैहराबैत स्त्रीगण सब लाेट पाेट हाेइत रहली़। बङकी भाैजी बजली ‘हम एक बेर नैहर मे रही त माॅजी मटकूङीमे बङ विशेख दही पाैरि क’ हिनका हाथे पठाैलन्ह़ि ़ ़।इर् सायकीलक पाॅछा मे मटकूङी राखि हमर घरक दरवज्जा लग आबि ततेक जाेर सॅ सायकिल के स्टैंड प’ ठाढ केलखिन्ह ़ ़ कि सायकील दही के मटकूङी के उपर खसलै ़़ ़ आ दही समेत मटकूङी के टूकङी टूकङी उङि गेलय ़ ़ ़बाॅचल दही आेहि ठाम जमीन प पसैर गेलय ़़ ़ ़ ़ ।’ दाेसर भाैजी बजली ‘ंमुनु जखन छाै मास के छलै ़़ ़हमसब दरभंगा डेरा प छलाैं ़ ़़ ़ ़ बङ जाेर सॅ आेकरा कान मे दरदि उठलै ़़ ़ ़ भरि राति आे कनैत रहलै़ ़ ़ ़ भिनसरे हिनका ल’ क” हम डाक्‍टर लग गेलहुॅ ़ ़ ़ ़कम्पाउंडर नाम पूछलकन्हि त अपन नाम लिखैलकिन्ह ़ ़़ ़आ” जखन उमरि पुछलकैन्ह त’ मुनु के लिखा चुपचाप हमरा बगलि मे आबि बैसला ़़ ़ ़ ़कनिए काल मे कंपाउंडर बजाैलकैन्ह ़ ़ ‘वेदान्त ़ ़ ़ उमरि छाै मास ़़ ़ ।’जखन हम पूछलियैन्ह ़ ़ त’ कहलैन्ह ‘हमरा भेल हमर नाम पूछैत अछि ़़ ़ आ’ जखन उमरि पुछलकैन्ह त लागल जे बच्चा के पूछि रहल अछि ़।’हम कहलियै जे तखनाे अहाॅ अपन नाम काटि क’ बच्चा के नाम किएक नहि लिखबा देलियै ।’त कहैथ छथि ‘नाम सॅ कि कानक दर्द बदलि जेतैक ।’ बङकी बहिन बजली ‘एक बेर इर् घर सॅ सेहाे भागल छथ़ि ़ ़ ़पढाइर् लिखाइर् मे माेन नहि लागैन्ह ़़ ़ ़ ़ बाबूजी डाॅटलखिन्ह त’ चुपचाप भाेरे भाेर पङा गेला ़़ । दुपहरिया मे मुजफ्‍फरपुर सॅ फाेन करैत छथि ‘बाबूजी हम घर सॅ पङा गेल छी ।’ बाबूजी पुछलन्हि ‘पङा क’ जेबए कत्तए़ ़ ़ ़।’त कहलन्हि ‘जत्तय भाेला बाबा ल’ जाइर्थ ।’ ‘बेस़ ़ ़ ़ अखन कत्तय छ ़़ ।’ ‘एखन हम मुजफरपुर मे छी ़़़ ़ ़ ।’ ‘अच्छा काेनाे गप नै ़़ ़ ़ ़अखन भाेलेबाबा कहैत छथुन जे घर आबि जा ़ ़़ ़तेकरा बाद देखल जेतै ।’ आ” आे सांझ धरि घर आबि गेल छलाह ।’ अहि गप्‍प सप्‍प क सूत्रधार मॅझिली बहिन बङ वियापक भ बजलीह ‘दीदी़ ़ ़ ़चारि पाॅच बरक पहिने जे आेझाजी अपन दुरगमनियाॅ माेटर सायकिल छाेङि देने छलखिन अहिठाम ़ ़ ़ आेकरा इर् खूब चलेलथि ़ ़ ।एक बेर काेनाे काज रहै ़़ ़ भरिसक शंभू के मूङन रहै़ ़ ़ इर् तीन चारि बच्चा के माेटरसायकिल प’ बैसा गाम मे घूमए निकलला ़ ़ ़ ततेक तेजी सॅ माेटरसायकिल चलैलखिन्ह जे एकटा बच्चा अहि खेत मे दाेसर आेय खेत मे ़ ़़ तेसर हिनकर पीठ पकङने चिकरए लागल़ ़ ़ ़रस्ता पेङा जाइर्त लाेक बच्चा दुनु के उठाक घर पहुॅचेलकै ़़ ़ ़ आे त’ जाेतलाहा खेत छलै ़़ ़ ़ ़नै ़़त़ ़ ़ पूछू नह़ि ़ ़ ़ ़ ़।’ ताबैत वेदान्त खाय लेल आबि गेल छलाह ़ ़ ़ आेझाजी सॅ बाजि लगबैत बजलाह ‘पाॅच साै के बाजी राखू़ ़ ़ ़ हम सब टा माछभात खा जायब ।’ आेझाजी हॅसला ‘ आै ंमहाराज़ ़ ़ ़ ़ सबटा माछभात जे खा जेबए त हमसब की खेबै़ ़ ़ ़ । आ’ ऊपरि सॅ पाॅच साै टाका सेहाे दिय ़़ ़ ़ हमरा कंगाल बनाव के विचार अछि की़ ।’ “बाैआ ़़ ़काल्हि भायजी के सेहाे नाप दिया दहुन ़़ ़ ।आे आय रतुका गाङी सॅ आबि रहल छथुन्ह ़ ़ ़ ़सिल्कक कुरता के एक टा कपङा छै राखल घर मे ़़ ़ ।’माॅ अपन दुनियाभरि के चिन्ता परगट करैत रहलीह । भिनसरे खा पीबि क़ ़ ़वेदान्त ़आेझाजी ़़़आ’ भायजी बजार दिस निकलए लगलाह ़ ़ ़त आेसारा मे राखल चाैकी प’ बैसल माॅ कनिया के सब गहना देखैत बजलीह ‘जा ़़ ़ कनिया के पाजेब त’ एबे नहि केलए बाैआ राै ़़ ़ ।’ त वेदान्त हुनका आश्वासन दैत बजलाह ‘जे सब बचलाहा काज छाै हमरा माेन पाङैत रहियै ़़ ़हम आनि देबाै ़ ़ ।’ छाेटकी बहिन के अपन माेबाइर्ल नंबर लिखाक कहलखिन्ह ़ ़ ‘जाै आर किछू मॅगबावके हेताै त फाेन करि दिहै ़ ़ ़ ।’ भायजी के मूॅह प’ जेना सूरूजक लाली आबि गेल छलैन ़ ़लाल टरेस़ ़ ़ सदिखन मुुूस्कैत़़ ़ ़़ ़ जेना अहि ब्रम्हांड मे आे प्रथम पुरूष थिकाह ़ ़ जिनकर विवाह हाेमए जा रहल अछि ।दूनू हाथ आगाॅ मे एक दाेसर सॅ सटाैने ़़ ़ ़ मुस्कैत दरजी लग ठाढ ़़़़़ ़़ ़ ़कुरता के नाप ़़ ़ ।वेदान्त आ’ आेझाजी कनि फराक सॅ भायजी के प्रसन्नता के आनंद उठबैत ठाढ़ ़ ़ ।भायजी मुस्कैत दरजी के कहलखिन्ह ‘हमर विवाह कलक्‍टर साहेबक कन्या सॅ भ’ रहल अछि ।कुरता कनि नीक सॅ सीबियह़।’ गाम प आबिते मातर आेझाजी अहि बात क बिराेर् उङा देलन्ह़ि ़। ‘ भायजी दरजीबा के काेना मुस्का मुस्का क’कहैत छलखिन्ह।’ घरे मे लाेक ठट्टा करए लगलैन्ह ‘कहै छलैथि जे विवाहे नहि करब संत रहब आ’ देसक समाजक सेबा करब ़ ़़ आ” विवाह भेबाे नहि केलन्हि ससुरक पदवी बङ साेहाेन लागए लगलैन्ह।’ मुदा भायजी के काेनेा गत्तरि मे जेना आब लाज धाक नहि बाॅचल छल ़ ़ ़ आे पलथा खसाैने आेहिना मुस्कैत बैसल छलाह ़़़। सब काजक आेरियाैन भ’ गेल ।कनिया के नूआ फट्टा लहठी सिंनुर सब डालामे राखि भगवति आगाॅ पङि गेल ।काल्हि हथधरी वला सब आबि रहल छथि ़ ़मुदा ़ एखन धरि वेदान्त अपन कपङा दरजी के नहि देलाह । जखन सब एक दिस सॅ ठाढ भ’ गेलए कि ‘पुरने कपङा पहिर क’ बरियातीमे जायब’।तखन आेझा के ल’ क’ आे अपन सूट सियाबए दरजी लग पहुॅचलाह ़ ़ । “भाय ़़ ़ जल्दी सॅ सूट तैयार करि के राखह ़़ ़ ़ आय सांझ क’ द दिह ़़ ़ काल्हि बराती जेबाक अछि ़ ।” दरजीबा ‘हॅ सर ़ ़ ़ एकदम ़़ ़ किएक नै” कहैत हुनकर पूरा शरीरक नाप लेला के बाद वस्त्र क’ पैकेट खाेललक । “इर् की सर ़ ़ ़ ़एक टा डबल बेडक चादरि आ’ दू टा गेरूआ के खाेल ।” आेझाजी के हॅसी तेहेन अनार ़़़़़़ ़़़छुरछुरी़ ़ ़ ़ जकाॅ फुटलै ़़ ़ ़ जे बंद हेबाक नामे नहि लइत छल ।दरजीबा सेहाे हॅसय लगलै ़ ़ ़ ़आ’ वेदान्त क’ मूॅह देखबा जाेगर छल ़़ ़ ़ ़ । चुमाैन माेन मे त’ बङ कचाैट भेल रहैए ़़ ़ ़ ़मुदा नीक कद काठी के स्वस्थ शरीरक’ भीतर एकटा सबल करेज सेहाे छल सुलेखा माए के ़़ ़ताहि लेल सब किछु बिसरि क’ लागि गेलीह अपन सूतल मनाेरथ के पूर्ण करए लेल ़़ ़ ़ ़ ़ चुमाैन क’ ब्याेंत मे । छाेटकी दियदिनी के फाेन केलीह त’ आे तुरंते हाजिर ।हुनका घर सॅ दूइर्ए डेग प रहैत छलीह आे ।़़ “छाेट छिन डाला नीक रहतै ़़ ़़ ़ल जाए मे ़ ़ ़उठबए बैसबए मे सुभीता हेतए। कनि धान ़सूपारी ़़़ ़़ ़लटखूट वस्तू के एक पाेटरी मे बाॅधि दियाै।’ ‘दीदी ़कनि दूइर्ब सेहाे राखि लैथ़़़़़ ़़़़़़़़।’छाेटकी मृदूला के अहि सलाह प’ हुनक मलिन मुॅह प’ सेहाे हॅसि आबि गेल छल’ । ‘दुर बताहि ़़़ ़़ कि पढबैत हेबए अहाॅ विद्यार्थी सब के विज्ञान ।सूखल दूइर्ब सॅ कत्ताे चुमाैन हाेइर्त छैक ।’ ‘जनेऊ आ’ डराडाेरि तए भेटबै नहि कलए ़़ ़ ़ ।’कनि हङबङाति सन आे बजलीह त मृदूला हुनक परेशानी के निवारण करैत बाजि पङलीह ‘हम अप्‍पन घर सॅ आनि दैत छियैन्ह ़़ ़ ़ ढेर रास हमर माॅ पठा देने रहै बाैआ के उपनैन मे ।आर कि सब चाहियन्हि ़़ ़ ़ देख लाैथ एक बेर फेर नीक सॅ ़़़़़ ़ ।’आ’ छुटलाहा समान सबहक लिस्ट बनाक’ आे फुरती देखबैत तुरंत बाहरि निकलि गेल छलीह । सब टा समान जुटा क’ नब एकरंगा लाल वस्त्र मे बान्हि ़ फेर आेकरा डाला सहित वस्त्र मे बान्हि क’ स्वतंत्रता सेनानी ट्रेन मे चढा देल गेल छल । सुलेखाक बाबू रिटायरमेन्ट के बाद कन्सलटेंसी करैत छलाह ़़ ़़।बेटी दुनु के कहियाकत्त न्ैा विवाह दान भ चुकल छल ़ ़़ ़ इर् सब सॅ छाेट बालक दुखहरण ़़ ़ ।कत्तेक कबूला पाॅति के बाद जनम नेने छलाह ।दादा दादी पाैत्रक’ लालसा मे कतेक तीर्थ व्रत ़ गंगा अराधऩ सब केन्ेा छलखिन्ह ़़ ़ हुनके सबक’ आसीरबादक फल छल इर् ़ ़ ़कत्तेक मनाेरथ ़़ ़ ़ कत्तेक ़़ ़ ़ खैर छाेङू इर् गप्‍प ।आ’घरवला सॅ आे आन आन विषय प’ गप करि हुनका अहि विचित्र परिस्थिति सॅ उबरए लेल बङ प्रयत्‍नशील भ’ गेल छलीह । दिल्ली मे हुनक दू टा भाय आ’ पितियाैत दियर सेहाे रहैत छलैन्ह ।फाेन नंमर छैन्हिए ़़ ़ बजा लेती सबके ।आेतेक मैथिल सब छै आेतए गीत नाद ़ ़़ ़ विध बाध ़़ ़ ़ माेने माेन भरि बाट अपन विचार करैथ ़़़ ़ ़ ़झपकी लैत रहलीह ़ ़ ़ ़नींद कत्तए ़़ ़ ़ ़आ काेना ़ ़ ़।सुलेखाके बाबू मिसरजी त’ नींदक गाेटी के अभ्यस्त ़ ़ ़ नै त’ हुनकाे दिक्‍कत हाेइतन्हि ।रहि रहि क माेन मे इ टीस त उठबे करै एक बेर माए बाबू सॅ विचार त क लैतथि ़ ़ आ’ आॅखि सॅ नाेर झरि जाए ़़़़़़।़ ़ ़ दिल्ली कएक बेर आयल छलीह ़़ ़ ़कखनाे वैष्णाे देवी ़़ ़ ़ कखनाें हरिद्वार ़़ ़ ़कखनाे केदार बद्री ़़़़कखनाे दिल्लीए घूमए ़ ़ ़ ़ आब त बेटा सेहाे बङका मल्टीनेशनल मे नीक पद प’ लागि क’ दिल्लीए मे आबि गेल अछि ।मुदा अहि बेर दिल्ली सरिपहुॅ एकदम बदलल बदलल सन लगैत छल ़ ़़एक त’ मानसिक द्वन्द ़़ ़उपर सॅ सम्पूर्ण दिल्ली के बदलल भाैगाेलिक नक्‍शा ़ ़़ ़बङका बङका गगन चुंबी इमारत ़ ़़ धङाधङि दाैङैत मेट्राे ़ ़ ़ ़आ’ बङका गाेल गाेल फ्‍लाइर् आेवर ़़ ़ ़ बङ अनठिया सन लगलैन्ह ़़ ़ काेन देस पहुॅच गेलहूॅ ़ ़ ़ ।बेटा टीसन प आएल छला । धक सॅ रहि गेल माएक करेज पूतक’ मूॅह देखिक। ‘साेना ़ ़़नीके छी नै ़ ़ ़ ।’आॅखि डबडबा गेलन्हि ़ ़ ़ काेढ त पहिने सॅ फाटि रहल छलैन्ह ़ ़़ भरि बाट त’ कानिते आयल छलीह । ‘ इर् की ़़ ़अहाॅ किएक विह्‍वल भ’ रहल छी।’साेना हुनका भरि पाॅज लैत बाजल । बाबूजी पहिने सॅ कनि फराक फराक ़एसगर एसगर रहए वला ़ ़़कनि कम बाजए वाला लाेक ़ ़ ़ गुमसुम माथ झुकाैने ़हुनका सब सॅ कनि दूर चलैत रहला आगाॅ आगाॅ । घर मे विवाहक काेनाे रमन चमन नै । ‘कत्त हेतए विवाह ़़ बङी काल धरि माेने माेन मंथन करैत आे बजलीह ़़़़़ ़ ़़त’ साेनू प्रफुल्लित हाेबैत बजलाह ‘ फाइर्व स्टार हाेटल हयात रिजेंसी मे विवाह हेतए ़़ ़ ़ तीन दिनक आयाेजन रखने छै लङकी वाला सब ़ ़ ़ ़नामी बिल्डरक बेटी छै न ़ ़ ़ ़।’ चुप्‍प ़़ ़ ।आे साेनू के दुनु चमकैत आॅखि देखैत रहि गेल छलीह ़़ ़। माेन पङि गेल सुलेखा ़ ़ ़़जे सदिखन हुनका टाेकैन्ह ़ ़़ ‘हे ़ ़़अहाॅ साेना साेना केने रहैत छी ़़मुदा हमरा आेकर लक्षण नीक नहि लगैत अछि ।सदिखन छाैङी सबसॅ गप्‍प करैत रहैत अछि पढत की ़़ ़ ।’आ’ पुत्र प्रेम मे आन्हर माॅ बेटी के चुप कराबैथ कहथि ‘जाए दही ताेरा की हाेएत छाै ़़ ़घी के लडडु टेढाे भला ़ ़ ़ ़कतबाे किछ करतै तैयाे बेटिए वला दरवज्जा के धूरि उङबए लेल एतय ।मरब त मूॅह मेउक यएह देत ़़ ़ तरि जायब हम ़़ ़।’आ’ बेटी भनभनाइत हटि जाए छल आेतए सॅ ।़ ़ ़ ़ चलू ़़़़़़़ ़ ़माॅ भगवति के कीरपा सॅ इर् प्रसन्न त अछि ।एकर खुशी अहिना बनल रहाै़ ़ ़ ।अतीत सॅ वर्त्तमान मे आबि साेचलीह । मेहदी ़़विवाह रिसेप्‍सन सब तीन दिनक भीतर तङातङि सम्पन्न करि नव जाेङा हनीमूनक लेल स्वीटजर लैंड उङि गेल छलाह ़तखन अपन डाेली खाेबी नेने इहाे दुनु व्यक्‍ति वापस ट्रेन पकङि दङिभंगा चलि आयल छलाह । मृदुला दाैङल एलीह ।बङका कंपाउंड़ ़ ़ ़ ़ साॅय साॅय करैत ।गमला आ’ फूलक कियारी के फूल पत्ता सूखायल ़जेना आेकरा सब के मूरछा मारि देने रहैय । बरामदा प टाॅमी अपन अगला दूनू टाॅग प’ मूॅह गङाैने सूस्त सन सूतल ़़ ़ ़। म्ंाुख्‍य ़़ ़दरवाजा सॅ प्रवेश करैत ़ ़़ ़गलियारा के बाॅया कात पूजाघर ़ ़ ़ उज्जर झक झक संगमर के फर्श प’ भगवति के साेझा आेहिना बाॅधिक राखल चुमाैनक डाला देखि ़मृदूला के माेन किछु शंकित भेलए मुदा आगाॅ बढि आे दीदी के बेडरूम मे पहुचली ।पलंग प’ पङल ़ ़ ़ ़छत निहारैत ़ ़ ़मूॅह सूखायल ़ ़ ़ ़आॅखिक नीचा कारीस्याह जेना कियाे काजरि मलि देने हाेय ़ ़ ़ ़कतेक दिनक बीमार सन । ‘माेन त नीक छन्हि नै ।’ आॅचरि सॅ गाेङ लगैत मृदुला बजलीह ‘ विवाह दान शुभ शुभ सम्पन्न भ गेलन्हि ।’ ‘ हॅ सब बङ उत्तम भेलए ।बङका फाइर्व स्टार हाेटल मे लाखाें रूपीया खर्च़ करिक’ विवाहाेत्‍सव मनाआेल गेलय ़ ़ ़ ़ ।बङका बङका लाेक ़ ़ प्रधान मंत्री सेहाे आयल छलाह ़ ़ ़ ़फिल्मी हीराे अभिषेक बच्चन आ आर किछु नबका हिराेइन सब सेहाे आयल छल।बङ थकान भ गेल ।सप्‍ताह भरि के भीतर एनाय जेनाए ़ ़।’ किछु इम्हर उम्हर के गप्‍प करैत करैत बजलीह ‘अपन जाति मे करितथि त कत्तेक नीक ़ ़़ ़ आन जाति आन संस्कार ़़ ़ ़ ़ मुदा खुश रहथि ।’ बाेल भराेस दइत ़मृदुला कहलीह “आब जाॅति पाॅजि के के पूछैत अछि ।समय बदलि रहल छै ़ ़ ़ अहिठाम कतेक पैघ लाेक सब आन जाति सॅ विवाह केने छथि । इर् सब बेकारक गप्‍प नै साेचथु।’ मृदुला चलि गेलीह किछु कालक बाद ।सुलेखा के माॅ ़जे अपन छाेट दियादिनी के छाेट बहिने बूझैत छलीह ़ ़ मुदा तखन हुनका मुॅह सॅ आेहि क्षण इर् गप्‍प नै निकलि सकलै ़़ ़ ़ जै विवाह सॅ पहिने फाइव स्टार हाेटलक सूट मे जखन आे अपन लाल कपङा मे बान्हल डाला खाेलए लेल आगाॅ बढली त’ भावी पुत्रवधु काेना अंगरेजी मे डपतैत बजली़ ‘आइ डाेन्ट लाइक दीज रस्टीक रिचुअल्स ़़ ़ ़ आस्क हर ़ ़़ ़ ़’आ माॅडल पुरूषाकृति ़़ ़ ़छह फूट सॅ कनिए कम ़़ ़़ मस्तानी चाल सॅ ़ ़ ़ निर्लज्ज भाव सॅ ़ ़ ़अपन लाख टका के डिजाइनर लहंगा संभारैत ़ ़़ साेनू के एक हाथ सॅ खींचैत बाहर निकलि गेल ़ ़ ़ ़। आेकरा भेल हेतैक ़ ़ ़ ़इर् देहाती रीति रिवाज करए वाली साैस मूर्ख हेतैक ़़ ़अंगरेजी की बूझतै़ ़ ़ ़ ़मुदा आे अपना समय के अंगरेजी मे एम ए पीएचडी ़़़़़़़़़ आ युनिवर्सिटी मै पढाैने छलीह ़़ ़ ़ ़पहिने सॅ टूटल ़़ माेन भैलन्हि कत्ताे एकांत मे जाकए फूटि फूटि क’ कानि । ़ ़ ़ चाराेकात जाटक माहाैल ़ ़ ़ ़ आेकर घर पेलवारक स्त्रीगण सब ़ ़ ़ ़ ़फुटबाॅलक गेंद जकाॅ ़़ ़ गाेल गाेल ़ ़़ गुङैक रहल ़़ ़़ खाली चमकैत वस्त्र आ” आभूषण सॅ लगैक जे इर् सब पाए बला लाेक अछि ़ ़ ़ ़ मुदा संस्कार बात व्यवहार ़ ़ ़ ़ ़ कत्त फॅसि गेला साेन ़ ़ ़ । ं ंमाेन मारने एक काेन मे अछूत सन बैसल रहि गेल छला दुनु व्यक्‍ति ़ ़ ़ ़कियाे अपन लाेक नै ़़ ़ नै माम नै पित्ती ़ ़़ किनकाे नहि बजाैला साेना ़ ़ ़ कि जिान किएक ़ नै ़़ कहुना क’ धीरज धरि हजार हजार माेन क’ बाेझ अपन करेज प नेने आे अपन नग्र वापस चलि आएल छलथि ।जे कन्याके विवाह सॅ पूर्व सेहाे अपन भावी साैस ससुरक’ प्रति एकाेरती इज्जत आ’ श्रद्वा नै छै आे बाद मे की देखाैत ़़ ़ ़ हुनका पुताैह सॅ काेन सेवा सुश्रुषा करबाब’ केछलैन्ह ़ ़ ़ ़ आे त अपने चीफ इंजीनियर क घरवाली ़ ़़ एखनाे चारि टा खवास लागल छलैन्ह ़़ ़ ़।आे त पूताैह के भालरिक फूल जकाॅ तरहत्त्‍थी प’ राखए लेल तैयार छलीह ़़ ़ ़ ़ ।मुदा इर् की ़ ़ ़ ़ । माएक जी गाय सन ।तैयाे सदि खन अपन माेन के परतारैत एतबै कहैथ “जाए दही हमरा सब के नै अपमान केलक ़ ़ ़ साेनू के त खुश रखतै न ़ ़ ़ ।भ गेलए आर की चाही हमरा ़ ़ ़ ।हमर बच्चा के माॅ भगवति खुश राखैथ ़ ़ ़ ।’ चुट्टा लेमे की चुट्टी़ गुडगाव क’ बड़का भव्यतम मालमे एक गोट बड़ सुन्नरि जेना कुम्हारक चाक पॅ बड़ प्रेम सॅ गढल कोनो भव्य प्रतिमा सन स्त्री केपरी पहिरने दू तीन गोटे संग खरीदारी करैत छल़ आ’ फर्राटेदार अंगरेजीक मध्य एक गोट एहेन आखर बाजल छल कि स्निग्धा चौंकिक’ ओकरा दिस तकलक ‘दिस टूहटूह रेड बकलेल कलऱ ।’ ‘अवस्से ई मैथिल अछ़ि।’ स्निग्धा अपन बेटी सॅ बाजल छल। ओकरा दिस तकैत़़ओकर गोर गोर हाथ पर कलाइ लग करीब एक इंच क’ कारी चेन्ह “हमर एक गोट संगी छल गुलाब़ तेकरो हाथ पर एहने चेन्ह छलै टैटू के ओहि जमानामे गोदना कहल जाइ छलै़। दूनू गोटे गुलाब लगा क’हाथ पर गोदना गोदबेने रहिए़ हमर त’ लिखा गेल मुदा ओ दर्द सॅ चिकरए लगलै़ आ’ अपन हाथ छोपि लेलकै़, एहेन लमगर चेन्ह भ गेल रहै़।’ओ अपन बेटी सॅ गप्‍प करैत छलीह़़ कि ओ हुनका घूरय लगलैन्हि। कनि अनसोहाति सन स्निग्धा दोसर स्टाल दिस बढय लगलीह़ कि ओ बड़ सुन्नरि स्त्री केपरी पहिरने पाछासॅ बड़ तेज चलैत एक हाथ सॅ पर्स पकड़ने आ’दोसर मे अपन धूपक चश्मा़ एकम्मे ल’ग आबि क’ कनि धखाति सऩ अनचिन्हार सन टोन मे अटकि अटकि हुनका टोकलकन्ह़ि- ‘गुलाब पुरनी पोखऱि के़ ।’ ‘हॅ हॅ’ आ’ स्निग्धा जेना चिहुकि क’ ओकर गरा लागि गेल रहथि ई केहेन चमत्त्‍कार भ’ गेलए़। ‘तू गुलाब।’ ‘हॅ गुलाब ।’ स्निग्धा के बेटी आ’ ओहि सुन्नरि स्त्री के संगी सब मूह बौने ठाढ़ । ई की तमासा़ जेना कुंभक मेला मे बिछुड़ल दू बहिनी भेंटल होय़। ‘तू कोना चिन्हलै’ प्रीति स्निग्धा सॅ पुछलक । ‘तोहरि हाथक करीया चेन्ह़ आ तू़’ अवाक स्निग्धा कनि विलमैत बाजल़-‘तोहर हाथ पर लिखल गुलाब आ’ आ’ परोड़क फाकि सनक आखि तोरा बिसरलै कहिया छलियौ आ’ कत्तो बैसि क’ बीतलाहा दिन मोन पाड़ैत छी ।’ आ’ सब गोटए चमचमाइत सीसा के दरवज्जा वला हल्दीराम मे एक टा कोन ताकि क’ आबि बैसली़। ओतए भीड़ सॅ ठसाठस भरल रेस्त्रामे कुरसी पर बैसल बैसल जेना करीब तीस बरखि पाछाक’ समय फेर सॅ पूरनी पोखरिक’ महाड़ पर धमाचौकड़ी मचबए लागल छल । ‘तोहर ददिहरै छलौ नै़’। ‘आ’ तोहर ममहरि ।’ आ’ दुनु भभा क’ हॅसलक जेना दुनु के हेरायल कोनो बड़ प्रिय खेलौना हाथ लागि गेल होय ।बड़ दिनक बाद एना बजनाए हृदय सॅ जेना प्रसन्नताक’फौव्वारा छुटए लगलै ।प्रेम सॅ ऊब डूब होइत दूनू के मूह एक गोट अजीब चमक सॅ भरि गेल छल । नेपाल तराई के एक गोट गाम टोल मे बड़ विवाह मूड़न आ’ उपनैन छल ताहि लेल दूर दूर सॅ लोक वेद सब ओतए आयल छल। अपन अपन सर संबंधी के ओतए । सबहक कुटुम सॅ सब दलान भरल। धिया पुत्ता सॅ खरिहान गाछी चारो दिस जेना खचबचिया सब उछलम कूद करि रहल होय ।स्त्रीगण सब अपन अदौड़ी दनौरी पाड़ैत| हॅस्सी ठठ्ठामे लागल चारो कात लाल पियर रंग सॅ रंगल नूआ़ धोती सब टांगल बांसक डाला चंगेरा पुड़हिल पातिल सब रंगल टीपल। गीत नाद होय। कत्तो बारहमासा कत्तो सोहरि। क़त्तो ‘शुभ के लगनमा शुभे हो शुभे’ कत्तो कत्तो सॅ समदौन आ डहकन सेहो सुनाय पड़ैत छल। आ गामक पूबारि टोलक पुरनि पोखरि क’ भीड़ पर जखन आठ बरखक दूनू संगी गुलाब लगौने छल तए पूबरिया महाड़ पर शिव मंदिरमे जाकए जल चढौने छल। ‘हे महादेव हमर दूनूक संग नहि छूटै ।’ ओत्तए पीपरक गाछ पर बैसल कार कौआ तखने काव काव करैत उड़ि गेल छलै| प्रीतिक दलान स्निग्धाक दलान सॅ कनि हटि कए पछाैति दिस छलै|बसबीट्टीक पाछा़ आ’ टोलक सब धिया पुत्ता प्रीतिए के खरिहान मे खेलय जुटै़। फागुनक मास़़। प्रीति नेने सॅ बड़ बियापक। आलथी पालथी मारि क’ नीचा मे गोबर सॅ नीपल खरिहान मे बैसि रहै आ’ सब धिया पुत्ता अपन अपन तरहत्त्‍थी ओकरा सोझामे रोपने बैसल। ओ पूंगबय लागै। मुदा जखने सुरू होय़ “अटकन मटकऩ दहिया चटकऩ”मूनमा जोर जोर सॅ हिलए लागै। पूनमी ठिठिया दैक आ’ सत्तो बिदकि क’ भागि जाए़। मोहनजी ओकरा पकड़ि क’ आनय आ फेर सॅ पुंगबए के क्रम मे प्रीति पीत्त सॅ माहुर होइत कानए लागै़ “आब तोरा सब संगे कहियो नहि खेलबौ।” तखन सब ओकरा मना तना क’ फेर सॅ खेला सुरू करै “केरा कूस़ महागऱ जागर पूरनी पत्ता हिलै डोलै माघ मास करेला फूलै। ओय करेला नाम की आमून गोटी जामुन गोटी तेतरी सोहाग गोटी़ बाँस काटे ठाँय ठाँय नदी गुंगुएल जाए कमलक फूल दूनू अलगल जाए बड़ी रानी छोटी रानी गेली नहाए” अहि बीच भोलबा कुन मुनाए किछु उकठ्ठी करै लेल कि शांति ओकरा आखि तरेर क’ दबाड़े त’ ओ संच मंच भ’ क’ बैसल रहि जाए़। प्रीति सबहक हाथ पर नजरि गड़ौने पूंगबैत रहै। “गहना गुरिया ल’ गेलन्हि चोर आब कि पहिरती कौआ के ठोर कौआ के ठोर त’ कारी आब की पहिरती साऽऽऽऽऽऽड़ी चूट्टा लेमे की चूट्टी।” स्निग्धा सदिखन चुट्टे कहै़ आ’ ओकरा ओ ततैक जोर सॅ मौसमे नैाह गड़ा क’बिठ्ठू काटै जे ओकर मूह लाल आ’ आखि सॅ भट भट नोर खसए लागै मुदा तैयो ओ हॅसैत़ एक मुठ्ठी काख तर आ’ एकटा माथ पर नेने खेलक’ नियमक’ मुताबिक शुद्व होमए लेल नहाए चलि जाए़ फुसिए़। “कत्त सॅ नहा क’ एलैं हैं ” कखनो डबरी क’ पानि सॅ कखनों खत्ता के पानि सॅ़ कखनों नाली के पानि सॅ आ’ जज क’ आसनि पर बैसल प्रीति खौझात़ि खौझात़ि ताबैत धरि सबके घुरबैत रहै जाबे धरि ओ सब गंगाजी के जल सॅ नहा क’ शुद्व भ’क’ नहि आबए । दूनू गुलाब गाछ पर चढै पोखरि मे कूदै इम्हर लताम तोङै़ उम्हर इमली तोड़ै इम्हर उम्हर बूलैत़ कखनो एक दोसर क’ आंगन मे जाकए भोजनोभात करि लैत छल ।गोटरस लुक्‍का छिपी डोला पाती़ दादी कहैथ ‘दुनु छौड़ी बड़ खुरलुच्ची लुक्‍खी जका फुदकैत रहैत अछि भरि दिन दूनू के एके गाम मे विवाह करबा देबए सासुरोमे उधम मचेतै ।’ “तू कोना लतामक गाछ पर सॅ खसल छलीह डोला पाती खेलबा काल़।’ “हॅ गै़ एखनो बथैत रहैत अछि ओ चोट़ ।” ओ केहेन दनि अपन मूह बनाक अपन बामा बाहि छुबए लागल जेना ओ चोट टटका होए । ‘ओकरा जे मारने छलही़।’ ‘केकरा गै ’ ‘ठेठरा के नाति थेथ्थर लछमनमा के़’। ‘हॅ हॅ बड़का बड़का आखि सॅ कोना गुरेर गुरेर क’ ताकए जखन हम सब एक्‍कट दूक्‍कट खेलाए़ । हम सब जतए खेलाए़ ओहि ठाम घुरियाबए लागै ‘हमरो खेलाउ न यै दाय सब़ ।’ कहियै जो कमल कक्‍का के बाड़ी सॅ लताम तोड़ने आ़ त’ कोना खी़ खी करि क’ हॅसय लागैत छल हेहरबा़।’ ‘मुदा ठेठरा के नाति आब एकदम्मे बदलि गेलए़ देख भी त’ आखि चोन्हरा जेतौ।’ ‘कि भ’ गेलै चारि टा हाथ आ’ चारि टा पएर भ’ गेलै की।’ ‘हॅ गै आब ओ पुलिसक बड़का औैफिसर बनि गेलए माए ओकर नैहरे मे रहैत छल़ ओहि गामक आधा सॅ बेसी जमीन आब लछमन परसाद खरीद क’ बैसल अछि बड़का बड़का लोक आब ओकरा सलाम करैत छै। एक टा पएर सॅ गाम नापै छै आ’ एक टा सॅ सहरि सौंसे गामक लोक आब डेराए छै ओकरा सॅ।’ ‘तोरा के कहलकौ।’ प्रीति अधीर भेल छल़ आखि मे अविश्वासक भाव सेहो़। ‘मौसी कहैत छलीह़। बड़का नेता के बेटी सॅ विवाह सेहो करि लेलक । ओकर माए सेहो महरानी बनि गेल अछ़ि गाड़िए पर घुमैत रहैत अछि आब़ ।’ ‘छोड़ लछमनमा के़ मुदा छौड़ा छलै बड़ पीत्तमरू़ आ’ तेजगर सेहो। कत्तेक थकुचने रहिए दुनु मिलक’ चाटे चाट गाल प मारने रहिए मुदा एकोबेर केकरो नहि कहलकै । हमरा त’ बड़ दिन धरि प्राण डरै सुखाएल छल़। कत्तहु बाबा के नहि ओकर नाना उपराग दै़ ।’ प्रीति स्निग्धा के घुरैत बाजल। ‘आ ओ भूत वला खिस्सा़ ।’ स्निग्धा मोन पाड़लकै प्रीति के एक गोट काकी के भूत लागि गेल रहै़ ‘तोहरि एक गोट काकी के जे भूत लागल रहै लोक सब बाजै़ जे झलफल सांझ मे बाड़ी मे जतए पीपरक गाछ छलैक़ चूल्हीक’ छौड़ फेंकए गेल छलथ़ि कि बड़का गाछक’ भूत धए लेलकन्ह़ि कि कहां नहि भेल रहै । कोन दन गाछ क’ टूस्सी मॅगाओल गेल बड़ लोक वेद सब जुटि गेल छल़। करीया कपड़ा पहिरने़ माथ पर सेहो करिया वस्त्र बन्हने । हाथ मे किदन किदन नेने़ लाल टरेस आखि वला कोनो ओझा आबि क’ भूत भगौने रहै़ ।’ ‘भूत की हाेइत छै कोना उनटा पएरे चलैत छै कोना नकिया क’ बजैत अछ़ि ई सब खिस्सा बड़ दिन धरि आंगन मे चलैत रहलै़ आ’ नेना भुटका सब बड़का टा के मूह बेने बड़ धियान सॅ ई सब गप्‍प सुनि अपन ज्ञान बढा क’ दाेसर दिऩ संहतिया सब के सेहाे बतबै ओहाे सब कतेक रास एहेन गाछ के चेन्ह लगोने छल जाहि पर लोक कहैक भूत रहै छै ।भूऽऽत कतेक ड’र लागै राति मे हम त’ कतेक बेर नींद मे चिकरए लगिए़ ‘भूत़ भूऊत़हमरा पकड़ि लेलक माेकने जाइत अछि घेंट़ ।’ ‘कत्तए छै भूत ’मा हमरा चुप्‍प कराबति कहैथ़ ‘ सगरे दिन नै जानि कत्त कत्त छिछियाबैत रहैत अछि कोन बाध कोन बोऩपएर धो क’ सूतल छलैं’ हम डराति डराति कहियै ‘हॅ’। ‘बजरंग बली के नाम ल’ क’ सूत़ भूत प्रेत किछु नै बिगाड़ै छै़ ।’आ’ हम जै हनूमान जी करैत फेर सॅ सूइत रहि ।’स्निग्धा भरि पेट छोले बटोरे खाइत बाजि रहल छल। ‘आ’ भूत प्रेतक पोटरी नेने मॅझली माैसी के बेटी जे राज विराज मे रहैत छल़ पहिने त’ खेल सुरू करै किछु आओऱ ‘डांग डूंग डांग डूंग ताले को आयाे हामी हरू ‘के ना़ राजा को छोरो को विवाह को फरसी लीनू । ’मुदा खेल छोड़ि क’ कहए लागै अपन इसकुलक बड़का गाछक खिस्सा़ जतए एक गोट नकियाति भूत ओकरा बरदान देदो छलैए ।ई सब खिस्सा तू कत्तेक धियान सॅ सुनही प्रीति जेना एको आखर छुटला कोनेा दोख नै लागि जाए़ वा’ परीच्छा मे पूछए वला उत्तर हाेक़ ।’ “गाम त’ बड़ पहिने छूटि गेल हमर सबहक पप्‍पा सहरि मे मकान बना लेलथ़ि आ’ धीरे धीरे सब भाय बहिनी के विवाह दान हाेइत माता पिता अपन आखिरी यात्रा पर न्किलि गेला़ तखन ओ सहरियाे छुटि गेल़ ़सब भाए बहिन एक दाेसरि सॅ हजाराे मील दूऱ ़ एकटा पृथ्वी के एक छोर पर त दाेसर दाेसर छोर प ।’प्रीति सुना रहल अछि । “आय काल्हि लोक सब बड़ ज्ञानी भ’ गेलए नै एक ठाम कोना रहतैक़ चरैवैती चरेवैती ’अपन आदि मानव जका फेर विश्व के कोना कोना छानि रहल अछि दुनिया देखय के उद्दाम लालसा़।’ आ’ जोर जोर सॅ ठहाका मारैत प्रीति अपन चश्मा के माथ पर स’ उतारि आंगुर सॅ कटलाहा केश सोझराबए लागल छल़ । समय जेना महानगर सॅ पड़ाऽऽ क’ ओहि गाम मे नूका गेल छल आ’ ओ दुनु बहिनपा ओकरा खिहारय निकलल छलीह। ओहिना गाछी सॅ बहैत बसात पुआरक बड़का बड़का टाल दलान पर बैसल पुरूष आ’ आंगनि मे स्त्रीगणक राज़ आ’ दुनु के आखि सॅ बचैत़ उत्त्‍पात मचबैत धिया पुत्ता । अहि बेर प्रीति उछलल़ ‘ओहि महफा लागल बैलगाड़ी के पाछा तू कोना भागल छलही़ ‘अनिया से मनिया दड़िभंगा वाली कनिया ’ कहैत गाड़ी के पीछा मे लटकल़ आ’ कोन एकटा फकड़ा पढै छलही़ देख नै़ एकदम बिसरि रहल छी़ कि छलै कि छलै ’अपन बिचला आंगुर सॅ माथ ठाेकैत बाजल़ ‘हॅ़ लाल भैया ल’क’ एला़ लाले लाले कनिया़ किछु एहने सन छलै नै़ ” प्रीति अपन विलक्षण स्मृति के परिचए दइत बाजल छल़ ओ बड़प्‍पन जे नेना मे छलै आ’ अपना के काबिल बूझए वला गप्‍प से एखनि धरि छइए छलैक़। अचानक अपन घड़ी पर तकैत बाजल़ ‘गुलाब आब चली छाै बाजि गेलए़ राैतुका फ्‍लाइट सॅ हमरा वाशिंगटन डी सी जेबा के अछ़ि बेटा अछि ओतए घरवला सेहाे ओहि ठाम पाेस्टेड छथि ’। हड़बड़ा क’ ओ अपन समान उठाैलक फेर समान टेबुल पर राखि पर्स खाेलि विजिटिंग कार्ड पर अपन व्यक्‍तिगत माेबाइल नंबर लिखिक स्निग्धा के देलकै “माेन त’ नै करैत अछि तोरा छोड़ए के मुदा जिनगी छै आए तीस बरखक बाद व्यतीत आॅखिक सोझा ठाढ भ’ गेल आब नै बिसरिहै ‘छोटी सी है दुनिया पहचाने रास्ते है तुम कभी तो मिलोगे़ कहीं तो मिलोगे तो पूछेंगे हाल़’ गाबैत फेर कनि हड़बड़ा क बाजल़ ‘अतीते मे हम सब भ्रमण करैत रहि गेलौ नबका किछु नै पूछलै किछु नै कहलियौ मुदा आब फेर भेंट हाेयत त’ खाली नबके गप्‍प करब़ बेस़ ।’ दुनु लिफ्‍ट सॅ उतरि अपन अपन गाड़ी दिस चलि आएल छली़ ़ ़प्रीति के ड्राइवर गाड़ी लग आनि लेलकै ओ गला मिलैत बाए बाए करैत चलि गेल । स्निग्धा ड्राइविंग करए सॅ पहिने ओकर विजिटिंग कार्ड अपन पर्स सॅ निकालि कए नहि जानि की सोचि कए देखए लागलै़। “श्री शान्ति भूषण़ विदेश विभाग भारत सरकाऱ’ ।ओकर करेज जोर जोर सॅ लोहरबा के भाॅति जकां धड़कए लागल छल हाथ सेहो थर थर कांपय लगलै़ अपन पाप के छुपबए लेल़ ओकर पति पर बेबुनियाद आराेप लगा क’ सस्पैंड करबए बला व्यक्‍ति यएह छल सी़ बी आई जाचक मांग के ठुकरा बए वला यएह थीक अप्‍पन लोक जे ओकर घर उजाड़ए के भरिसक प्रयास केने छल । विदेशे विभाग मे उच्च पदस्थ ओकर पति यएह नाम कहने छलैन्ह़ मुदा सरनेम नहि लिखबा सॅ ई पता नहि छल केकराे की ओ कत्तए के छथि । प्रीति जेना कसि क’ ओकर हाथ पर नैाह गड़ाैने पुछि रहल छल ‘चुट्टा लेमे की चुट्टी़’ ओकर मुह लाल भ’ गेलै़ ।आखि सॅ पानियो बहि गेलय़ । मुदा अहि बेर ओ हॅसि नहि सकल । ओकरा भेलए जे फेर नहि जानि कत्तेक अवधि धरि डबरा़ नाला पोखरि तलाब खत्ता खुत्ती मे नहाति नहाति प्रीति के नजरि मे शुद्व होबए लेल गंगा के तलाश मे भटकैत रहत़ । मुदा गंगा नहेलोपरान्त आब ओकरा नजरि मे पवित्र भ’सकत वा’ नहि किएक त’ दुनु के दुनिया बदलि गेल छल । आखि सॅ बहैत धार देखि बेटी बुझलक संगी के याद मे मां विहृवल भ’ गेल छथि ।हुनका ड्राइविंग सीट सॅ हटा अपने गाड़ी चलबए लागल छल। भरोस ‘अहीं के धान रहै़ बलु जे हम काटि देलौ हमरा अपने बहुते काज रहै है।’ धान क बाेझ माथ प’ स’ नीचा दरवज्जा लग पटकैत बटेसरा छाेटका भाय के देखैत मातर बाजल छल ।ओकर यएह पैघ पैघ आँखि मे लाल लाल डाेरी दूरे सॅ झ्लकैत नजरि आबए छलै ।दलान प’ कुरसी प’ बैसल अखबार सॅ नजरि हॅटबैत कान मे घुरियाति ओकर बाेल के अनठा क’ छाेटका भाय गप्‍प के पलटैत नहूँ नहूँ करि क’बजला ‘बटेसर बाबू तू त एतेक मेहनति छ इर्मानदार सेहो ।एतेक बूझनूक भ’ क’कनि कनि गप्‍प प’ नै न उबलबा के चाही । जो रे माॅ के कही चारि कप्‍प चाह बनवा क’ आँगन सॅ भेजथुन ।’ मुनेसरा दाैङ क’ आँगन चलि गेल आ’ बटेसर दलान प राखल अखङा चौकी के गर्द कांन्ह प राखल अपन मइर्ल अंगाेछा सॅ झाङैत बैस गेल । मुदा ओकर मुखाकृति एखनो धरि तामस सॅ भरल छलै ।ओ अपना विरूद्व एकोटा आखर नहिं सुनि सकैत अछि ‘बङका कका बाेलै हथीन जे बटेसरा अहाॅ सबके आँखि मे धूरा झोँकि रहल है।’ ‘अच्छा तो बङका कका के गप्‍प प तमसाएल छ़ धुर बुङबक़ ।’छाेटका भाय हॅसैत बजल जेना ई हो तमसैबाक के कोनो गप्‍प छै । कारी धूथूऱ एकदम गठल शरीऱ पूरा गाम मे एकटा वएह बचि गेल सहनी टाेल मे जवान मरद । आर सब दियाद बाद भाय बहिनी पंजाब हरियाणा सिलीगुङी़ नै जानि कत्त कत्त चलि गेल अछि कमाबए लेल । ई हो गेल छल कलकत्ता मुदा तुनुक मिजाज लङि झगङि क’ मारि पीट करि क ई ओत्त नहिं टीक स कल आ’ बौआ ढहना क’ फेर गामक रास्ता अपनैालक । बाबूजी के आगाँ पाछाँ करैत रहैन्ह त’ ओ कोना नै कोना ओकरा सरकारी नैाकरी लगवा देने रहैथ ।बाबूजी के खेत त’ ओकर बाबुए बटाए करैत छल मुदा ई किछु नब जमीन आ’ अपन बाङी झाङी बढाैलक बटाए के खेत। आठ टा धिया पुत्ता सबके पढेनाय लिखेनाय सरकारे के कपार प’ सबहक अप्‍पन सौख मौज गाम मे ओ पहिल लोक छल जेकरा घरक चार प’ सजिमनिक’ लत्ती नै भ’ क’ टीवी के एंटिना लागल छल ।पानि राखए लेल बङका सीनटैक्‍स के टब सेहो राखल काज त’ कोनेा नै होय मुदा अपन दू कोठरी के नब पक्‍का बनल घरक छत प’ ओकरा एना बैसा देलकै मानू ओ ओहि गामक ताजमहल होए ।कलकत्ता मे देखने रहै लहेरियासराय मे बैसाहलक ।बटेसर के अपनो फिट फाट बेस ।पैंट शर्ट हाफ पैंट सेहो कखनो क’ रंग बिरंगक’ टी शर्ट़ माथ प’लाल पियर टाेपी हाथ मे घङी आँखि प’ धूपक चश्मा ।सरकारी नाैकरक रो बदाब़ । अगहनी फसल कटबा के तैयारी भ’ रहल छल ।कोन कोन गाम सॅ नै ताकि ताकि क’ बाेनिहारि सब आनल जाय़ निमोछिया बूढबा़ स्त्रीगण दुगुना मजूरी तिरलोकी जे बङका कका के भातीज छल कहलकैन्ह ‘कका हमरा त’ सवा सौ बीघा लेलक ऊपर सॅ भरि पेट खेनाय बीङी तमाकू अलग सॅ ।’खगन बाबू आने की बङका कका चुपचाप मूङी झूकाैने सुनैत रहि गेल छलाह ‘कि जमाना आबि गेल छै ।’ बटेसरक कनिया छाेटका भाय के अंगना मे काज करैत छल कि जिट फिट मे रहै कन्हाैली बाली ।काकी क ेपरदेसिया बेटा बेटी पुताैह सब सेहो बङ मान संम्मान दैन्ह । ‘कन्हाैली वाली के मोन खराप छै़ ई सुनि काकी जेना बियाकुल भ’ जायथ़‘हे रौ बाउ बजार जाए छै कनि उनटि दस्त के दबाए नेने अबीहै बटेसरा के बौह के बङ रद दस्त भ’ रहल छै काल्हिए सॅ।’ काकी टाेल मे ककरो बजार जाइत देखि बाजि उठैथ । आ’ कन्हाैली बाली के की ठाठ़ रतुका अइर्ंठ बासन बाहरि अइर्ठार प’राखल राखल खरकैट रहल अछि जलखई भानस बनतई त कोना ।काकी पिछाैती मे जा कए चिकरि रहल छथि ‘रौ सोहना रे तिसबा़ गै मंजूआ माय के पठा कनि जल्दी देखि कत्तेक बेर भेल जाइर्त छै ।’आ’ बङ चिकरला के बाद अपन आँगन सॅ निकलि क’ झून झून पायल बजबैत आबै । ‘मायजी माथ मे बङी दरद हलै सोहना के बाबू कहैहलै बलू आय नै जो ।मुदा हम कहलिए जे काकी के बङी दिक्‍कत भ’ जैते ।भरि अंगना लोकवेद सब आयल है संजूआ के आंगन बाङी मे नाैकरी लागि गेलए त’ मंजूआ के मेहमान ले गेलै़ छाेट बच्चा है ऩ बहिनी नाैकरी प’ जेतय़ त’ बच्चा के खेलैते़ ओहि से दीक्‍कत हो गेल हमरो नहिं त’ मंजुआ आबि क’सब काज करिय दैत हलैन्ह ।’जल्दी जल्दी दूधक बासन माॅजैत बाजल ‘मायजी़ चुन्नी दाय क़़ त्त है कनि चाह पीबिताै ।’आ’ काकी चाह बनवा क’ सोहना़ बिसवा आ कन्हाैली वाली के बिस्कूट संगे पीबए लेल बजबा लेलखिन्ह़ । पवन आ’ गाेरखक घरवाली अपन सौसक ई रूप देखि क’ दंग रहि गेल छलीह ।अपना आगाँ केकरो किछु नै चलए देबए वाली जबरदस्त स्त्री आय दाय नाैकर प’ एत्तेक मेहरबान । ‘कि करबै कनिया आब ओ जुग नै छै बङ मूॅह ठाेर धेने रहै छी़ त’ काज करि दैत अछि एसगरि रहे छी उपाय की़ बाबूजी के समय मे भिनसरे सॅ दलान प’ मजलिस जमय लागै ‘चाह ला़ पानि ला़ ओ त’ बूटना छलै बटेसरा के बाप रहै जे हुनका पाछाँ लागल राति क’ दरवज्जा प’ सूत लेल सेहो तैयाऱ नै त’ ओहो एक टा आफत आब त’ सेहो नै एकसर एत्तेटा आँगनि मे काहि काहि करैत जीबि रहल छी़ । ताबैत बङका टा के घाेघ तनने कन्हाैली वाली आबि दूनू दियादिनी के गाेङ लगलक ‘कखनी अलखिन दीदी सब़़ काल भरै दिन काकी बाट तकैत रहलखिन्ह चारि दिन पहिले से सब घरक पलंग परक चादरि धाेआबै छली कनिया सब के साफ सुथरा घर भेटबा के चाही़ बलु़ ’ ।’कन्हाैली वाली बरांङा मे राखल बरतन सब समेटि क’ ऽ््ऽल’ प’ जाइर्त काल दू मिनट ठाढ भ’ बाजल । बङकी कनिया आ’ कन्हाैली वालीके दुरागमन एके दिन भेल छलै ताहि लेल ओ हुनका पैघ दियादिनी जकाॅ सम्मान दैत छल ।पहिने त’ बङ लाज करै’ ‘हे दीदी अलखिन है़ हाली हाली काम क’ दै छी ।’ननदि सब के कहै़ घाेघ तनने आबै़ ल’ग मे ठाढ से हो नै होय मुदा धीरे धीरे आन दियादिनी सब के अयला प’मुखरित भेल गेल़ ‘गै दाय सब़ बङकी दीदी त हमरा सॅ कहियेा बाेलबाे नै केलखिन्ह़ आ’ ई मॅझली के देखियाे कहै हे़ हे कन्हाैली बाली हमर नूआ कखनी साफ होतै ।’नबकी दियादिनी सब प’ चुटकी लेबए सॅ बाज नै आबै़ काकी के कान सेहो भरि दै । जखन घर मे लोक सब जूटै कन्हाैली वाली के नखरा आओर बढि जाए काकी सॅ कहैन्है ‘ऊ़ सोहना के बाबू कहै हल्ले़ बङकी भाैजी तोरा ला कि आनलकाै ।’ काकी कहलखिन्ह ‘अखने त’ अहाॅ के म्ॅाझला बौआ न’ब साङी आनि क’ पंजाब सॅ देने रहै बेटा लेल पेन्ट बूसट ।’ ‘हॅ से हम कहलिए बलू दैते रहै हथिन्ह की़ ।’ गप्‍प के तङाक सॅ पलति क’ बाजल । ओकरा परो छ मे काकी बजलीह ‘ऐंठी से बढि गेल छै जहिया सॅ अहि घर मे काज पकङलक उत्तान भ’ क’ चलैत अछि। पहिने घर बाला दारू पीबि क’ गत्तर गत्तर फाेङि दै़ पङा पङा क’ नैहर भागै छल आब देखियाै गिरहथनी भेल गप्‍प छाँटि रहल अछ़ि ।’ एक एक करि क’ आठ बच्चा़ ‘हे ओपरेसन उपरेसन कथी लेल करेबै़ एगाे दूगाे आर होते त होते ।’दीपारानी के टाेकला प’ बाजै ।देखैत देखैत दू तीन टा बेटा बेटी के विवाह दान करि क’ पाेता नाति वाली वाली बनि गेल आ’ जखन बङकी भाैजी सहरि सॅ गाम आबथि लाजे हुनका सोझाॅ सॅ हॅटि जाए़ ‘दीदी की सोचैत होथीन्ह़ ई बूढाे भे गेले ।’मुदा रंग बिरंगक साङी़ लहठी़ सिन्नुर काजरि पहिरनै ओ अपन पूताैह सॅ बेसी नब लागै। ‘बङकी दीदी साङी नै अनलखिन्ह हमरा लेल़’ दीदी के देखैत मातर ओकर फरमाइर्स आर बढि जाए ।आ’ अहि बेर छैठ मे जखन दीदी गाम पहुॅचलि त’कन्हाैली वाली हुलसि क’ ल’ग आयल । ‘हमर बेटा के नाैकरि नै लगते़ पंजाब से घुरि आयल ।’ बङकी कनिया चौंकली ‘चलि आयल़ ।हमरा घर प’ किएक नहि आयल ।’ ओ चुप़ ।दाेसर दिन आबि क’ कहैत अछ़ि ‘जे बलु संभुआ कहलकै जे भैया फाेन प’ कहलकै के छै़ हम तोरा नै चिन्हे हियाे।’बङकी कनिया क्षुब्ध ‘हमहीं उठेने रहियै़ आ’ हमहीं भैया सॅ गप्‍प करबेने रहियै़ पूछियाै त’ ।’संभुआ पिछाैती मे बाङी साफ करैत छल आयल ‘हॅ की ’बङकी कनिया लग माथ झूका लेलक । ‘अहाॅ के हम बजेने नै रही घर प़ ।’ ‘हूं’ ‘त कियाक नहि एलीयै़ ।’ ओ एकदमे चुप । ‘ एतेक झूठ बाजै छै ई सब ।’ बङकी कनिया घर मे जाकए बजली त’ छाेटकी ननदि टपकि पङली़ ‘ओ सब कोने सोइर्त बाभन छै जे झूठ नहि बजतै ।’ कन्हाैली बाली कन्हाैली बाली कन्हाैली बाली़ भरि दिन ओकरे चर्च ‘गै़ माॅ कन्हाैली बाली के बेटा रमुआ आरि प’ के’ सबटा सीसो पाॅगि लेलकाै ।’छाेटकी ननदि चिकरति आँगन मे पैंसली त’ माॅजी के मोन तामसे माहूर भ’गेलन्हि ओ नहा धाे क’ पूजा करय लेल बैसले छलीह ।पूजा घर सॅ बहरा पएर मे चप्‍पल पहिर पछुआति मे गेली ‘हे रमुआ के माऽऽ््ए़ हे कि भेलै़ छाैङा किएक एना अगत्ती जेकाॅ करैत अछ़ि पूछि लैते हम मना कैरतीयै तखन नै़ ।’आ ‘ओ घाेघ वाली काकीके देखि क’ रमुआ के बिखैन बिखैन क’ गरियाबए लागल छल़ । घर आबि क’ काकी परो क्ष मे खूब जहर उगलली ।कनिए काल मे फनकैत छाेटका भाए एला़ ‘संभुआ के टी़ वी ठीक करबा ब’ लेल देने रहियै़ से एखन धरि नै देलकै कहली एको बेऱ चारि सौ टाका सेहो देने रहि उपर सॅ़ ’। काकीफेर चिकरली़ कऽ््ल ल’ ग’ जाकए़़ “यै संभुआ के माय़ यै पूछियाै संभूआ के़ हमर टी़वी बेच बिकीन लेलक की ।’ काकी सेहो बूझैत छलीह ओ टी वी आ’ पैसा’ लेल संभूआ के उकटि दैत छलखिन्ह ‘एखनी दैत छी ’कहैत कहैत छाै मास बीता देलकै़ । ‘यै कनि कोबी कहबै संभूआ के आनय लेल ’काकी फटा फट खूजल पाए ताकुए लगली । ‘नमरी देबए त’ छदाम सेहो नहि घूरा क’ दैत ।’चुन्नीदाय किछु बाजय चाहली त’ माॅजी तमसा गेली “एसगरे रहै छी गाम मे तू सब गाेटे पाहुन पङक़ एलाॅ दू दिन मे चलि जेबें नै किछु कही ओकरा सब के़ जानै नै छी आब पहिलुका गप्‍प नै छै सरकारे एकर सबहक मान बढा देने छै़ ओ त’बाबूजी के एहसान छै़ बटेसरा के नाैकरी जे कनियाे आँखि मे लाज लिहाज बाॅचल छै नै त’ अपन दर दियाद के त’ ओतबाे पानि नहिं छै नै कोनो दरेग ।’ छैठक’ परना के बाद बङकी कनिया सहरि जाए लगली त ‘कन्हाैली बाली के कहलखिन्ह ‘अहीं के भरो से माॅ जी के छाेङने जाए छी़ देखबै ।’ ‘हे दीदी चिन्ता जुनि करूॅ ओ ठंढी मे माॅ गिर पङलखिन्ह़ क’ल’ प’ पिच्छङि हलै़ ।हमहीं हुूनका देख भाल करली़ पॅजरा मे केत्तना तेल मालिस तखनी जा क’उठलखिन्ह ।’ ‘ठीक छै एह ीस नै अहाॅ हुनकर असली पूताैह छियैन्ह हमरा सब के अहाॅ प’ बहुत भरो स अछि ।’ आ’ ओकर ब्हुत ब्हुत बङाई करैत रूपया पैसा दैत विदा भ’ रहल छल़ि तखने माॅजी भगवती घर सॅ बहरैत बाजए लगली़ ‘एसगरै रहैत छी़ सांझे सकाल सबटा दरबज्जा ब्ंाद क’ लैत छी इर्हाे सोचि नेने छी़ जाैं मरियेा जायब़ त कन्हाैलीबाली भाेरे भाेर दरबज्जा पीटबे करतै नै खुजतै त हल्ला हेतै चारो ं दिस बेटा बेटी के लोक सब खब्रि करतै़ बटेसरो लग सबहक फाेन नंमर छै ताहि लेल हमरा लेल निस्चिंत रहुॅ ।’बङकी कनिया के आँखि मे नोर भरि गेलन्हि बुढापा़ एसगरूआ भय सॅ ग्रसित माॅजी कन्हाैली बाली के पैलबारक जादती सहि रहल छथि गाम मे ते इर्हाे विकल्प छै़ मुदा निर्दय सहरि मे धन दाैलत सिनेह अनुराग दइर्याे क की अहाॅ केकरो विश्वास आ’ वफादारी पाबि सकैत छी किन्नाे नहिं । लाल काकी टक टक टक टक टुन टुऩ टुन टुन घंटी बजबैत तांगा के सोर सँ ओहि सूतल सूतल सुस्त सुस्त टोल मे हरकत आबि गेलए ।कोनो अभ्यागत सएह आबैत छलाह ताँगा पर किनको बेटा पूतौह किनको धी जमाए़ किनको समधी़ किनको सर कुटुम ।आऽ टक टक टुन टुन’ क ध्वनि जेना अहि खबरि के समस्त घर धरि पहुँचा दैत़ कियो आयल अछि पाहुन पड़क । दिनक करीब दस बाजल छल । मुदा गाम मे तँ पराते सब उठ़ि पराती गबैत पूजा पाठ नेम टेम करैत़ अपन दिनचर्या मे व्यस्त भऽ जाइत छल ताहि लेल दस एगारह बजैत बजैत फुरसते फुरसत । किछु अपन दरवज्जा सँ निकलि किछु अपन दलान सँ बहिराति ताँगा धरि औला़ ।आऽ खबरि पसरि गेल चारोंकात जे लालकाकी पटना जा रहल छथि।हुनक बड़का पाैत्र कन्हैयाजी आबि गेलखिन्ह लेबए लेल । लाल काकी अपन जमाना के परम सुन्नरि गोरवाहि स्त्री ततेक गोऱ जेना साक्षात चान बुलि रहल अछि धरती पर। आऽ एकदम लाल बूँद़ जेना अंगरेज । खिस्सा छल हुनका पाछाँ जे बड़का घरक बेटी के गौरव ढाह लेल सासुर मे हुनक पति के दोसर विवाह कराओल गेल ।ओहि समय समाज मे बहु विवाह पूर्णरूपेण प्रचलित छल । आऽ एकए क गोट कतेक कतेक विवाह करैत छलाह ।मुदा सौतिनियाँ डाह ।सौतिन संगे रहनाय एकटा बड़का दुखदायी प्रसंग छलैक स्त्रीगण समाजक लेल । सौतिन एतैन्ह़ करेज पर राहड़ि दड़रतैन्ह़ तखन हिनक टहंकार मारैत गौरव ढहतैन्ह़ बड़ उत्तान भऽ कऽ चलैत छथि। घरवला के विवाह भऽ गेलन्हि मुदा नबकी कनिया सासुरक मुँहो नहि देख सकलीह ।नैहरे मे भोजक पात उठब गेलीह त कोना नै कोना बिषहरा महाराज डँसि लेलखिन्ह ।जखन लाल काकी के ई खबरि भेटलैन्ह़ तँ ठठ्ठा कऽ हॅसैत बजलीह ‘लैह हमर गौरव तँ भगवति सेहो नहि ढाहि सकलीह ।’बाजए काल मे हुनक बुट्टी बुट्टी चमकैन्ह । आऽ दोसर खिस्सा हुनक जे प्रचलित छल ‘विवाहक बड़ दिन धरि हुनका पूत नै होए छल खाली धी धी धी । तँ ओ भगवान सँ कबुला केलथ़ि ‘ हे स़त्तनारैन महाराज ज्योँ हमरा पूतौह झोँट पकड़ि कऽ मरत तँ हम बाजा गाजा सँ अहाँक पूजा करब ।’एहि पर बड़ हॅसी ठठ्ठा भेलए मुदा भगवान जेना हुनका पर बड़ अनुग्रही छलखिन्ह । आऽ ओहो दिन एलैन्ह जखन घर मे पूतौह आबि गेलन्हि । मुदा ओ कबुला भगवानक पूजा के । आब करल की जाए । कबुला कबुला छल़ ।आखीर मे भगवानक पूजा के समय बीध जकाँ पूतौह हुनक एक टा लट पकड़लखिन्ह ओ ढोल पीपही सँ पूजा सम्पन्न भेल छल । मुदा हम जे लाल काकी के देखने रहियैन्ह पाकल़ पाकल छोट छोट केश़ वृद्वा़ कनि देहगर मुदा गेराई वएह बड़ स्नेहिल़ गप्पक सप्प के सिनेह । हम सब जखन गाम जाई हमर पपा ढेर रास फलफूल नेने जाइथ ।आऽ शरीफा लाल काकी के बड़ पसिन्न । ‘गै बच्चा दू टा सरीफा ला’।तखन एकोटा नैक सँ पाकल शरीफा नै छलै हम कनि कनि पाकल शरीफा के हाथ सँ कैस कैस कऽ दाबि दाबि कऽ एकदम घुल्लल बना कऽ द’ देलियैन्ह ।कनिए कालक बाद काकी हमरा तकने फिरैत छलीह ‘कत्त छै़ बुचिया ’ ।आऽ हमरा देखैत मातर बजली ‘ हे ले अपन सरीफा काँचे छाै।’ एक दिन हमर आंगन मे बनल मॅड़वा़ भाई सबहक उपनैनक पर बैसि हमरा खिस्सा सुनबूत छलीह ‘ जार्ज पंचम इंगलैंडक गद्दी प बैसलै तेकरा बाद जार्ज छठम जार्ज सप्ताम़ ।’आऽ ओहिक्रम जे ग्प्पर मोन पङैत अछ़ि ओ बाजल छलीह ‘उजरा जीर होइत छै़ ऊजरा मरीच हमर पीत्ती कलकत्ता सँ आनैत छलाह ।लोक चान प पहुँच गेलए ।’ हम अपन दाय सँ पूछलियैन्ह । ‘दूर हुनक गप्पठ सप्पल एहने रहैत छैन्ह उजरा मरीच आऽ चान परलोक ।चौरचन मे चान महाराज के अरघ देल जाइत अछि ओ भगवान छथि हुन्कर कि ओ त कनिए दिनक बाद सूरूज महाराज पर सेहो लोकवेद के पठा देती ।’ हुनक गप्पय पर पीठ पाछाँ बड़ मखौल उङै़ ।जीभक बड़ पातरि नीक नूकूत खायब़ नीक पहिरब । एक दिन दाय के बड़का पोत जमाए एलखिन्ह त ’हुनक कनिए कालक बाद अपन दरवज्जा सँ टहलैत टहलैत हमरा आंगन कऽ मॅड़वा पर आबि बैसलिह ‘बौआ दाए म्या़ अपन छोट दियादिनी के ओ अहि नाम सँ बजबए छलीह ‘कि सब बनेलहुँ अछि जमायक लेल’ ।आऽ दाय जे परम ओरियानी बुधियारि मृदूभाषी़ मर्यादा वाली सुन्नरि स्त्री छलीह़ बड़ आदर सँ अपन पैघ दियादिनी सँ जमाए्र के गेलाक बाद़ चाह पियाबैत बैस क विन्यास सँ गप्पआ करैथ । जीभ बस मे नहिं छलैन्ह तँ पेट सेहो जवाब द’ देने छलैन्ह ।आऽ लालकाकी बीमार भऽ गेल छलीह ।छोटका बेटा के पेलवार त ल’ग मे छलैन्ह मुदा पटना वला बेटा के मोन मे छरपट्टी लागि रहल छलै ‘माए के हम अपन लग राखि क बड़का डाक्टार सँ इलाज करैब।आँखिक सोझा रहत तँ हमरो मोन मे चैन रहत ।’ आऽ ताहि लेल टमटम आयल छल ।उम्हर काकी बड़का टा के भांगटि ठाढ केनो ‘मरि जायब मुदा मगह नहि जायब कॅह कासी कॅह उसर मगहर मगह मे जे मरै छै तेकरा पैठ नै होय छाै मगं दोषं दधाति इति मगध ’ ‘मगहीया डाेम सँ बत्तर हम्र जीनगी भ जायतँ ‘किन्नो किन्नों हम मगह नै जायब ।’ छोटकी पूतौह दरवज्जा पर बैस व्याख्यामन द रहल छलीह ‘तीन दिन सँ अन्न पानि तियागने छथिन्ह भरि राइत जागल़ कुहरैत ‘हम मगह नै जायब।’ अपन नूआ आंगी वला झोरा के छोटका टेबूल पर ठाढ भऽ क” दही के खाली मटकूङी मे राखि चार सँ लटकैत सींक पर टाँगि क नूका देने रहथि कखनो ओकरा कोठी के दोग मे नूका दैथ मुदा ताकैत ताकैत लोक ताकिए लैक ।कखनो अपना लग मे रहय वला पोता सब के बजा कऽ नहुँ नहुँ निहौरा करैथ’ ‘हे बाऊ अपन हिस्सा के जमीन हम तोरे सब के लिख देबऽ हमरा मगह नै जाए द’ ।’मुदा हुनक प्राणक रच्छा करय लेल सबके लगै पटना जेनाए आवश्यक छल ओतय पैघ पैघ ङाक्ट र । कन्हैया जी हुनक झोरा झपटा उठाबैन्ह ताँगा पर राखय लेल तँ ओ झपटि कऽ ओकर हाथ सँ झीक कऽ अपन करेज सँ लगा कऽ घाना पसारि दैथ़ ‘हम नहि जायब ई गाम छोङि कऽ एतय सँ हमर अर्थीए उठत अहि आंगन मे हम मॅहफा पर सँ उतरल छलहुँ ।’आऽ ओ भोकासी पाङि कऽ नीच्चा मे औंघङा औघङा कानथ़ि दरवज्जा के नीचा ठाढ सबहक आँखि झर झर बहैत छल विशेख करिक पूरना लोक सब के जे हुनका बड़ दिन सॅ़ कएक बरक सँ जनैत छल । ट्रेनक समय लगचिया गेल छल ।जेनाए परम आवश्यक ।आऽ बेर बेर अपन हाथक घङी देखैत एत्ते काल धरि किंकर्त्तव्य विमूढ ठाढ कन्हैयाजी काकी के भरि पाॅज पकङि कोरा मे उठा ताँगा पर बैसा देलकैन्ह जा ओ अन्न पानिक पोटरा पोटरी बाेरा झोरा राखय लेल मुड़ला असक्तद निर्बल काकि नै जानि कोन दैवीक शक्ति सँ उछैलकऽ ताँगा सँ नीचा उतरि दुर्गास्थान दिस पङाय लगलीह ।जेना कसाई के देख कऽ गाय चिकरैत छै़ ओहिना ओ अपन प्रिय बड़का पाैत्र के देख क। चिकरय लगलीह़ ।चिकरैत चिकरैत हुनक गरा बाझि गेलन्ह़ि ।कन्हैयाजी हुनका पाछाँ भगला आऽ लपकि कऽ फेर अपन कोरा मे उठा ताँगा प बैसा देलकैन्ह़ कियो लोटा मुँह मे लगा कऽ दू चारि घोँट पानि पीया देलकैन्ह ।कन्हैयाजी अपनो छरपि कऽ बैस रहला आऽ काकि के पॅजिएने रहला ।चीज वाेस्त लोके सब राखि देलकै आऽ तांगा वला के इसारा करि देलकै़ ओ तङाक सँ भगबए लागल घाेङा ओ हुनक कानब जेना कोने बच्ची दुरगमनिया कनिया के ।ताँगा के पाछाँ पाछाँ भरि टोलक लोक़ अङियातए़ बाेल भरोस दैत़ दियादिनी आऽ पुतौह सब़ ‘हे बौआ यौ गोड़ लगैत छी काकी के अवस्से पठा देबैन्ह ।’’ ‘ इलाज करा कऽ चलि अबिहथि ’ ‘जुनि कानैथ़ हिनका हमर सप्पहत़ ।’ आऽ पोखरि धरि अङियैत कऽ जखन ओ सब आपस हुनक दरवज्जा पर आबि बैसली त सबहक मूह नाक आँखि लाल लाल जेना रंग अबीर मलि देने होय ।झर झर नोर बहि रहल छलै एखनो धरि । आऽ ओहि दिन की रातियो मे धिया पुत्ता के छोङि पैघ ककरो अन्न नै धसले मुँह मे ।रहि रहि कऽ लाल काकी के ओ करूण क्रंदन जेना सबहक कान मे घुरियाति रहल छल ।पचासो वरखक अपन बास छोङि पहिल बेर ओ नैहर वा’ सासूर क आगाँ कत्ताे पएर राखने छलीह । अभिशप्त ग्राउंड फ्लोरक ओ भव्यतम चूँह चूँह करैत फ्लैट बेली चमेली बोगनबेलिया के लता पुष्प सॅ कनि झाँपल सन कंपाउंडक बङका देवार प’ ठाठ सॅ ठाढ रॉक गार्डनक किछु विशेष नमूना़ झरोखेदार लाल बङका लौह फाटकक कात मे चमकैत ग्रेनाइट पाथर एखनो पति के ऊपर ओकर नाम सुनहरा आखर सॅ अपन छाती प’ खोदबेने शान सॅ ठाढ ओ देवाऱ ओ नेम प्लेपट ओ लता कुंज ओ घर बङ किछु कहय चाहैत छलै ओकर सबहक जीभ तालुॅ सॅ सटि गेल होय जेना़ मुदा ओकर सबहक वियाकुलता ओकरा सब के अवस्से बुझाय पङि जाय जे इर् घर के जनैत छल लग सॅ । ‘शांति’ के नाम एखनो अपन करेज सॅ सटाैने ओ कतेक अशांत छल से वर्णनातीत बूझू ।कतेक बेर सांझ भोऱ वा दुपहरिया मे ओ नामे नै दरो देवार संगे ओ घर सेहो वियाकुल भ’ ताकए लागै अपन गृहस्वामिनी के ओ वात्स ल्यपूर्ण मधुर मधुर स्नेह सिक्तए स्पर्श़ ओ परम निश्छल हास्य ओ ममत्व् मुदा हश्र की कतेक बरख पहिने अपन किराया के फ्लै ट मे रहैत रहैत ओकर नजरि अहि ग्राउंड फ्लोर प’ पङल रहैक बिकाउ छल मुदा बङ मॅहग अपन म्युजिक के स्कूल चला चला क’ जे पाय जमा केने छल आ’ इकॉनोमिस्ट घरवला के जमा पूँजी सॅ त’ अहि इलाका मे इर् फ्लैेट खरीदनाए अहि जन्म मे त’ असंभवे छल़ मुदा जखन इच्छा प्रबल भ’ जाइत छै त’ विधाता कोनो नै कोनो विध आगाँ आबिए जाइर्त छथि । शांति के एक गोट दोस्त म्यूजिकक अनन्य प्रेमी गायक सहकर्मी़ कुबेर क’ परम कृपा पात्र के मददि सॅ ओ अहि एच आइर् जी डी डी ए फ्लैकटक अधिकारिणी बनि हर्षित भ’ आगाँ के सपना के महल सजेबा मे लागि गेल छल करीब बरख दिनक’ समय आ’ ऊपर सॅ दस लाख आओर अहि फ्लैगट के भीतरि बाहरि सॅ सुरूचिपूर्ण कोठी मे परिवर्तित करि देने छलै़ ओ दप दप करैत संगमरमरिक देवार ओ हल्का हरियर टाइल्स ।कत्त कत्त सॅ नहि आशियाना के सजावटक चीज बोस्त खरीदल गेल चाॅदनी चाैक़ चावङी बजार दिल्ली हाट़ लाइर्फ स्टाइल़ जयपुर जम्मू़ चैन्ने ।ड्राइंग रूमक पछवरिया देवार त एम एफ हुसैनक बङका कैनवासे बूझू़ कि लैंप शेड शैडिलियर्स़ साेरोस्की कटग्लास बाथरूमक सुन्दर टाइल्स़ बाथटब फिटिंग्स पर्दा सब किछु एकदम स्वर्ण मय जेना मिडास टच तीन बेडरूमक के बङका फ्लैुट मे आगाँ दिश कंपाउंड मे एक गोट कमरा संगीत कक्ष के रूप मे प्रतिष्ठित कराओल गेल जतय सॅ पंचम स्वर मे कखनो राग मल्हार छेङल जाए त’ तानपूरा आ’ सितार क संग कखनो राग भैरवी घरक पाछाॅ बङका पार्क पार्क मे बेसी दूर धरि बङका बङका फूलक पाैधा लगवा क’ ओतय दाना पानी राखि दै त’ चिङैचुनमुनक बहार कलरव सेहो ओहि घर के आत्मेमुग्ध करि दैक । देखला सॅ लागै़ जेना साैदर्य आ’ कला दूनू के संजाेग कत्ताै छै त’ ओ शांति मे वस्त्रे पहिरै त’ पएर क’ सैडिल सॅ ल क़ माथक किलिप धरि एके रंग जेना पुरान फिल्मक कोनो हिरोइन गीत संगीत त ओकर शरीरक सम्पूर्ण सेल मे व्याप्ति एक क्षण नै चुप सदिखन चाहे किचन मे हो वा बाथरूम मे भाैंरा जकॉ गुनगुनाइर्त सुंदरि जखन कालेानी के सङक प’ ठाढ भ’ अपन जन्नत के निहारै त’ अङाेसिन पङाेसिन सबहक करेज मे हूक उठै़ जेना ओकर सबहक छाति प’कियाे मूॅग दङङि रहल होय हूॅह’ । घरक लता कुॅज एक एक टा़ पजेबा पाथरि प्ला स्टर के ़ लाेकवेदक इर्रखा के भान होइर्त रहैत छलै मुदा ओ सब त’ अपन मलकानिक’उदारता प’ रइर्सी प’ कलात्मनक पहलूॅ प’ गीत संगीत प’ अपने मे ‘महो महो’भेल प्रसन्नतापूर्वक ओकरा आसीरबाद दइर्त छलै़ ओकरा प्रसन्न देखि ओ सब मिली क’ झिझिर कोना झिझिर कोना’ खेलाय लागैत छल । ‘नजरि लागे राज ताेरे बंगले पर’ जखन शांति गबै त’ इर्ंट इर्ंट सिहरि जाए ‘अइर् बंगला प’ कोनो दुष्टा़ कोनो कुटनी के नै लागै नजरि भगवत़ि ।’मुदा तैयाे केकर नजरि एतेक तेज धारदार जरैत गोइठ ासन छलै जे़ । उम्हर ओ करिया आ’ ऊजरा झाझी कूकूर केहेन दन भेल अलसाएल पङल एक कोन मे ।पहिने त’ भरि भरि दिन नै खाए शांति के बेडरूम मे बनल दूनु आलमीरा लग जाहि मे ओकर वस्त्र आ’ सैंडिल सब छलै सिूॅघ सूॅघि क’ बेहाल भ’ भूकए लागै़ कखनो अहि बहिनी के दुलार कखनो ओहि बहिनी के सिनेहि के अनठबैत कूॅ कूॅ करैत पङल ।मालिक अपने सॅ कोरा म्ेंा बैसा क दूध मे डूबा डुबा क’ बिस्कुट खुआबैथ त’ कनि मनि खाए । गृहस्वामी के माय बाबू दूनू परानी जे अहि शहरि मे कत्ताे अनतए रहैत छलाह दाैङल आबि गेलखिन्ह दूनु बेटी एक त’ बारहवी करि क’ फैशन टैक्ना ेलौजी करए छल दोसर बारहवीं मे ।माय बाबू अपन पुत्रक मुॅह देखिक बेकल भ’जायथ मुदा विधि क’ विधान । भुट्ट खाॅट पुरूख पहिनो चुप्पर आब त’ आओर चुप्पे भ’ गेला ।कनि फरिच्छ भेला प’ फैब इंडिया के घुठ्ठी सॅ कनिए ऊपर रंगीन कुरता पहिर छाति तनने दूनू कुकुर के सिकङि पकङि टहलए लेल कालाेनी मे निकलए छलाह़ आब बङका भोरे कहु त’ जे अंधारे मे घरक पाछाॅ कूकूर के टहला क’ घर मे पइस जाइत़ आत्मक निर्वासित सन । घर की छल एकदम सुन मसाऩ संगीत मुरूझा गेलए कन्या द्वुय अपने मे भरि भरिदिन दोस्त महिम संग घर मे चूँ शब्द नै शनै शनै बङकी पढए लेल अमेरिका चलि गेलए छाेटकी सेहो बारहवी करैत कोनो कोर्स करए लेल होस्टल चलि गेलए माए बाबू के अपनो घर दुआरि छलैन्ह कत्तेक दिन छाेङने रहितथि आखिर मे गृहस्वामी नाैकरानी आ’ दूनु कूकुर ।घरक रंग रूप एकदमे बदलि गेलए़ गाछ बिरीछ सुखैत़ पार्क सॅ सॅटल सबटा पाैधा सूखा गेलए अन्न पानिक अभाव मे चिङै चुनमुन धरि तियागि देलक ओहि बास के । ंमहल्ला के दू चारि जनानि जे शांति के जनैत छल ओहि बाटे आबैत जायत एक गोट अर्थपूर्ण दृष्टि ओहि फ्लैनट प’ अवस्से द’ दै आब ककरो नजरि मे ओहि घर वा घरनी लेल कोनो इरखा नहि बाॅचल छल़ ओ कलंकित भ’ गेल छलै नै अपराध बोध सॅ ग्रस््रत़ आ’ कहु नै अभिशप्तल । कएक बेर सुतलाहा राति मे लाेकवेदक वक्राेक्ति’ सुनि घरक नीन उखङि जाए़ ओकरा होय इर् पढल लिखल मूढमति निशाचरि सब आधुनिकता के चकचुक मे इर् हो बिसरि गेलए जे देवारो के कान होइत छै ।अपन माथ अपने सॅ नहि पीट सकैत छल माेन होय़ जाेर सॅ हाका्रेश करि मुदा शहरक मर्जादानुसारे कानब रोकै त’ जाेर सॅ सिसकारि ओहि सुनसान राति मे दूर दूर धरि अवस्से सुना जाइत छलै अहि मे त’ किम्हराें सॅ दू मत नहि छलै जै दूनू परानी पृथ्वी के दू ध्रूव ।एकटा इर्र घाट़ त’ एकटा बीर घाट एकटा सदिखन हाय पाय कि हाय पाय़ बाप म्या भाय़ बहिन पत्नी संतान सब किछु पाय ।दोसरि नख सॅ शिख धरि कला आ’ साैंदर्यक पुजैगरी भावना क’ उन्मत्त लहरि सॅ सराबोर जखन अपन सुकुमारि कंठ सॅ ‘छुप गया कोइर् रे दूर से पुकार के़ दरद अनोखी हाय़” गबै त’केकर करेज मे नै दरेग उठि जाए चिङै चुनमन धरि कुहुकए लागै़ ।जखन ओ दूनू संगी मिल क’ डुएट गाबैथ “तेरे मेरे सपने अब एक रंग है तू जहाॅ भी ले जाए राही़ ।’वा ‘ नैन साे नैन नाही मिलाव देखत सूरत आवत लाज गुइर्याॅ ” तखन त’ पूछू नहि इर्ट पाथरि प्लामस्टर फूल पाैधा जेना सब मिलि क’ ं ंमगन भ’झूमरि गाबए लागै कतेक प्राेग्राम अपन संगीत स्कूलक तत्वामवधान मे श्रीराम सेंटर कमानी आॅडीटाेरियम़ इंडिया हैबिटेट सेंटर वगैरह वगैरह मे देने रहै अपन छात्र संगे स्वयं अपनो स्टेज प’ कएकटा गीत ओ आ ‘ओकर दोस्त मिलि क’ प्रस्तुत करैत आ’ प्रबुद्व गणमान्य श्राेता सबहक गगन भेदी ताली के गङगङाहटि सॅ माथ सॅ पएर धरि सराबोर भ’ जायथ । गृहस्वामी तखनो डाेनेशऩ फंड अहि फिराक मे रहि जायथ ।हुनका तनिको भान नहि कि मुठ्ठी सॅ बालू जकॉ की ससरि रहल अछि । आ’ ओहि दिन सावनक सुहाैन गरजैत मेघ आकास मे बिजुरि लता संग संगत द रहल छल़ नीचा धरतीके ओहि फ्लैरट मे हारमाेनियम आ’सितारक जुगलबंदी आ ओहि जुगलबंदी सॅ जे समाॅ बंधलै़ बंधैत जाइत रहलै पानि बूनी के डरै कोनो विद्दार्थी नहि आयल छलै आ’ नै तबलची वा गिटारिस्ट सएह़ बच्चा सब स्कूल़ घरवला आफिस़ एकसरि दूनू दोस्त़ आकासक कारी कारी मेघ शांति के ह्दूयक शांति भंग करय लेल व्यग्र मन मजुर अहि मेघ मे नृत्य रत होय लेल पाखि फङफङेबे कएने छलै कि अप्रत्याुशित रूपेण पति के आगमन पित्तै आन्हर होइत कमंडलु सॅ अपन चुरू मे जल निकासि गाैतम श्राप देबए लेल हाथ ऊपर उठाैने ही रहैथ क़ि ‘जाे कुलच्छिनी़ आय सॅ तू प्रस्तर मूरत मे परिवर्तित भ जाे ।’ माेन मे इर् वाक आैनाइर्ते रहैन्ह कि अहिल्या अपन स्वभावक प्रतिकूल ज्वालामुखी जकॉ फुइट गेल़ हवा मे उठल हाथ पकङैत एकदम कठाेर स्वर मे बाजल ‘बस्स़ बङ भेल अहाॅ हमरा की सराप देब आय हम अहाॅ के द’ रहल छी़ ’गाैतम हकबक सन ठाढे़ हाथ मे कमंडल आ’ जल कत्तय जरूरी फाइलक पुलिन्दा नेने अनचिन्हार सन ताकितै रहि गेला़ ‘इर् कोन रूप एकर अजगुत इर् वएह थिक जे अठारह बरख पहिने लाल जाेङा मे मल्लिका ए तरन्नुम बनल ओकरा साेझाँ माथ झूकाैने बैसल़ साैस ससूरक आज्ञाकारिणी पति के अनुगामिनी बच्चा द्वय केर स्नेहिल माय लगक साप्ता़हिक हाट सॅ दूनू हाथ मे सब्जी सॅ भरल भरल भारी झाेरा उठा क’ अननिहारि मध्यम वर्गीय सुगृहणी अपन परिवारक धूरि प’ नचैत स्त्री ’ तेहेन ठनका खसलै जे ओहि हरियर वटवृक्ष के सम्पूर्ण सूडऽऽह करि देलकै ।तेकरा बाद बाहर आकास मे उधियाति सबटा मेघ तीव्र बसातक झाेंका सॅ उङि गेलुा मुदा ओ अनतए नि ह जाकऽ् गाैतमक मानस पटल प’ स्थायी रूपे बास ल’ लेलकै । कतेक घंटा दिऩ सप्ताीह़ मास़ बीतैत रहलै ‘बिन घरनी घर भूतक डेरा’ भ’ गेलै ।सम्पूर्ण घर अस्त व्यस्त़ सुन्नर चिक्क़न कजरिया टाइल्स क’ छटा मलिन होबए लगलै़ एत्तए बाल्टी फेंकल ओत्त’ झाङू़ ओह की दुर्गति । आ’ एक दिन छुट्टी के दिऩ भरिसक कोनो परब छलै फ्लै टक कागद सॅ अप्पनन नाम हॅटा क’ दूनू बेटी के नाम करि शांति आबि क’ ओ कागद गाैतम के पकङा देलकैन्ह अहि चेतावनी के संग ‘हम इर् घर अप्परन बेटी द्वय के दान द’रहल छी़ मुदा एकरा देखबा लेल हम अवस्से आबैत रहब जखन जखन हमर माेन करत़ इर् हमर स्वप्नए हमर शाेणित हमर प्राण अछि।’ सदिखन सलवार सूट़ साङी पहिरए वाली शांति जीन्स टाॅप मे सजल एक गोट गाैरवान्वित जुबती सन गरदनि धरि काटल केस झूलबैत़ बिन कोनो लाेच लाच के चलि जायत रहल । गाैतम के त’ नहि कहि मुदा बाहरि ग्रेनाइर्ट प’ सुनहरा आखर मे लिखल ओ नाम़ ओ घर ओ बाॅचल खूचल पााद पष्प बिलखि बिलखि क’ कानय बाजए लागल छल ‘सरिपहुॅ हम ‘अभिशप्तह’ भ’ गेलहॅू।’ समय काल अईठ्ठ बासन . . .सब ओहिना बरांडा सए ल’क’ भनसा घर धरि पसरल छल । कुरसी इम्हर घूमल .टेबुल उम्हर घसकल. . . . बिछौन स’ ल’क’ बाहरि आंगन के मंडवा धरि नूआ फट्टा छिडिआएल. . . महाजुद्व के बाद रणभूमि क’ स्थिति सन दृश्य. . . . ।काकी क़त्तो नजरि नहि अयलीह. . . ।घरे घर . .. बाङी झाङी ताकि औला सत्तू भाय . .. . मुदा एकदम सूुन . .. . .कियो कत्तो नै .. . . . ।कनिए काल मे गौरी बहरेली .. .पङोसिया के घर स’ । ‘दाय. . .काकी कत्त ्र. .? .।’ सत्तू भाए के देखि ओ कनि सकपका जेका गेल ।दङिभंगा मेडिकल कालेज मे पढै छथि . . .कहियो काल क’ गाम आबि जायत छथि . . ..।अपन माय बाबूजी त’ हैदराबाद मे रहैत छथिन . ..मझिला कका गामे मे रहि गेलखिन्ह. . . ।काकी बङ सिनेह सॅ खुआबए पियाबए छथिन्ह . .आ’ जौं कियो बगलक शहरि लहेरियासराय जाए त’ एक दिन पहिने हुनका समाद द’ दैन्ह. . .आ’ ओ सत्तु के पसिन्न के खेनाय . . .कखनो रोहु माछ. . . कखनो मखानक खीर. ..कखनो टिकरी . . .पिङकिया ..बना बना क’ पठा दैथ ।. . . .. . . गौरी बेसी काल धकमकायल नहिं रहल. . .आ’ ऑखि सॅ भटभट नोर खसबैत पूबरिया टोल दिस हाथ उठा क’ बाजल ‘मॉ. ्््. .. हौआ .. .नैहर जा रहल अछि तमसा क’।’ रिक्शा दूरे सॅ देखाय पङि रहल छल ।सत्तू भायके गप्प बूझवा मे विलंब नहि भेलन्हि . .. . .।ओ तीव्र गति सॅ दरवज्जा प’ अयला आ’ दूरखा मे लागल मंटुआ के सायकिल खींचैत रिक्शा के पछोङ धेला । ताबङतोङ पैडिल मारैत दुइए डेग प’ पकङि लेलखिन्ह रिक्शा के . . . ।काकी सन्न. .. ..ऑखि कानि कानि क’ अङहुल फूल सन लाल भेल . .. ।सत्तू काकी के किछु नहि कहि . . . रिक्शा बला के घुरौलथि . .. ।अपना खिङकी दरवज्जा सॅ हुलकी मारैत लोक़ . . । दलान .. .आंगन . . .टपैत . . .काकी चुपचाप सत्तू के पाछॉ चलैत . .. अपन कोठरी मे आबि पलंग प’ बैस रहली. . . .।गौरी के दू गिलास नेबो के शरबत बनाबय लेल कहि ओ काकी के पलंग ल’ग राखल एक गोट कुरसी के सोझ करैत बैस रहला “कत्तए जाए छलौं एना. ? . .बताहि भ’ गेलौं की . . .. .। शरबत पीबि क’ काकी के शरीर मे किछु जान सन बूझैलैन्ह. . . ..।ओ’ किछु बाजय चाहली . . .मुदा फेर कंठ अवरूद्व होमय लगलै आ आखर के स्थान प’ दुनु ऑखि सॅ नोर कोशकी के उन्मत्त धार सन फुटि पङलै. . . . .।आ’ ओ’ अपन ऑचरि सॅ मूॅह झापि करूण स्वर मे क्रंदन करय लगली ।. .सत्तू किछु काल धरि हुनका ओहिना कानय देलथि. . . . . ।मोनक सबटा गर्द गुबार ....धुरि . . .माटि. . . मवाद बहि जाए लेल । ई परम सहिष्णु. . खटनिहारि स्त्री. . . कोनो लिख लोढा पढि पाथरि’ . . . गमार अठाहरम सदी के नहि छली .. . . जनक आर्मी सॅ रिटायर्ड. . ..अपन धीया पुता के नीक स्कूल देने छलथि . . ..।मुदा भाग्यक सोझा त’ विधाता सेहो नतमस्तक . .. ।विवाह एहेन पुरूष सॅ भेलन्हि . . ..जे प्राचीन कालक चारित्रिक दृष्टिकोण सॅ त’ बङ उत्तम . .. नहि चोर बनोङ . . .नहि लबरा लुच्चा . . .नहि कोनो जन्नी जाति के ताकब झॉकब ने दारू . .. नै सिकरेट. . .. . म्ुादा. अपने दुनिया मे ंमगन घर पेलवारक कोनो चिंता नै . ... .. छै. . सब किछु .. . पाय कौङी मे कत्तय कोताहि करैत छथि. . . . .।हुनक परम यशस्वी पिता के ई फरमान . . ..जे आय धरि हुनक कुलक स्त्रीगण बाहरि नौकरी करय नहि गेली .. ओ कोना जेतीह .. . . ।एतेक दुरदिन त’ हमर नहि आबि गेल जे स्त्री के कमाई सॅ पेट भरल जेतैक़ . .. .त’ काकीके पढेबाक शौख मोनक कोनो कोन मे दाबल रहि गेलन्हि । घर वर देख क’ . .. . नीक जकॉ पता लगा क’ विवाह भेल छलै .. . बेस व्यवस्था गिन क’ .. .खानदानी छलैथ. .. जमीन जायदाद छलैन्ह भाई सब आफीसर. . वर.. . लग’क कओलेज मे लेक्चरर छलाह. . .।देखबा मे स्वस्थ. . . सुदर्शन . . .।आर कि देखैत छै कन्यागत. . .। काकी एकटा बुधियारि . ..कमासुत आ’ आज्ञाकारी पुतौहक रूप मे बङ प्रतिष्ठित भेल छलीह ।शनैः शनै कालक्रम मे पेलवारक रूप बदलए लगलै . . .वृद्वजन अपन अंतहीन यात्र्रा के यात्रिक होईत गेलाह . .. ननदि . ..दियर सबहक अपन गिरहस्थी . . .. ।हुनक अपनो पेलवार मे चारि टा धिया पुत्ता अवतीर्ण भ’ गेलखिन्ह. . . । म्ुादा पति ओहिना विरक्त. . .अहू जुग मे भरि चुरू कङू तेल .. . माथ मे चुभ चुभ करैत. . . . . धोती . . .मोटका खद्दरि के कुरता पहिरने . . .कॉख तरि छाता दबने अपन फटफटी सॅ कओलेज जायथि .. . ।आ’ बाकी समय अपन पढाय लिखाय पूजा पाठ . . .। अहिना चलैत रहि जैते. . . जीवन त’ कोन खराप. . . . मुदा धिया पुत्ता लग पास क’ इसकूल ..कओलेज सॅ पढि जुवावस्था के दरवज्जा प ढाढ होमए के कोरसिस करैत. . . .बङ बङ स्वप्न ऑखि मे नेने ..... ..अपन हिस्सा के अधिकार मांगय लेल पॉखि फङफङाबए .. .लगलै. . . तखन एक गोट धर्म संकट. .ठाढ़ . .. । कन्याक’ माय. . .कतेक रास .. .स्वप्न. . .संजोगने. बेटी के सिनुरदानक प्रतीक्षा मे. . .देवता पितर के नौतनाए आरंभ करि देने छलीह। पैघक विवाह हेतय तखन नै दोसरक बान्ह खुजतै . .. ।आ’ मोनक गप्प करए लेल बेकल . भ’ क’ पति ल’ग बैसथि त’ ओ मरखाह बरद जकॉ बिदकि जाथि .. ‘एखन कोन प्रलय होमए जा रहल छै. . . .हेतय सब किछु समय प’ . . . . ।’चिंतन मनन मे डूबल . .. तत्व मीमांसा बॉचए वला . . . पिता कत्तो जेबाके नामे प’ चीज बोस्त ..फेंकनाए. . .शुरू क’ दैथ. ।. .अहंकार अपना सॅ सहस्त्र गुण भारी . . . .परदादा के गजराज त’ चलि गेलन्हि मुदा ओकर स्र्वण घंटी नेने ई बुलि रहल छथि ।महानंद बाबू के पङपोता . . . . . .भलमानुष लोक आब बचले कत्त छै. . . . .जै छै हमहीं छी बस. . . . । काकी अपना भरिसक प्रयत्न करिए रहल छलीह. . . ।पंजीयार के बजा कए. . .गोतिया दियाद . . . सर कुटुम लगुआ भिरूआ मे तरे तर. . कतेक पाय कौङी खरचैत. . . .तरूआ तीमन .. . खेनाय पिनाय ।जखन कियो कोनो नीक कथा के संदर्भ मे किछु खबरि दैक . . . दौङ क’ .. . .भरल उत्साह सॅ . . .घरबला ल’ग जायथि. . . . ‘अहॉ एक बेर देख लैतियै नै . . ..अपन ऑखि सॅ .. .बङका गामक लङका छै. . . डाक्टर छै कलुआही मे .. ।’ घरबला सुनिते भङैक जायथ. . ‘हे सुनियौन. . . .हिनक गप्प. . . अपने रहली बङौदा आ’ अहमदा बाद मे. . .. आ’ हमर बेटी रहत कलुआही मे. . . . .।अहॉ के दिमाग त नै खराब भ’ गेल अछि . .. . .।ओकरा लेल भोले नाथ नीक सॅ नीक ‘बर’ पठौता. . ।’ कतेक बरख सॅ अहिना चलि रहल छल ।कतेक सुद्व बीतैत रहलै . . . .कतेक सभा लगैत रहलै .. बागमती हिमालयक पघिलल बरफ सम्ुान्दर मे पठबैत रहल छल. । कन्या पिता के कओलेज सॅ एम ए .करि दू बरख बैसला के पश्चात .. . बी. एड सेहो करि नेने छल. . . ।वएस त’ ढाढ नै रहतै ... ... . दिन प’ दिन बीतल चलल जा रहल छल. . . । पोरकॉ सत्तुए एक गोट कथा देने छलै .. ।दङिभंगे मेडिकल सॅ पास. . . एखन नौकरी नै छलै .. . .एम डी के तैयारी करैत छल .. . घरक बङ सुखीतगर. . . ।मुदा कका खिसियानि बिलाङि सन धुरखुन्ह नोंचय लगलखिन्ह .. .जे सत्तू के मूॅह अप्पन सन . .। ‘बेरोजगार डाक्टर गरा मे बॉधि दियै . . . .जा धरि नौकरी चाकरी नै हेतै .. . . गाम मे बैस बेटी उसीनिया कुटिया करत. . . जन मजूरक जलखई पनपियाई . .बनौत .. . . खबासिन बनि क’ रहि जायत भरि जीनगी. . ।’. ‘त उठियौ नै अपने. . . .सर्वगुण संपन्न वर .. . ताकए लेल . .जखन पाए कौङी गिनबे करबै. . . .त’ ई मूरूछा किएक मारने रहैत अछि सदिखन .. . .कि घरे मे बैसा क’ रखने रखने बूढ करि देबै बेटी के ।’ काकी के हिब कतेक बेर फाटि चुकल छलैन्ह. . . ओ कानि खींझ क’ बाजि भुकि क’ रहि जाय छली . . . की करितथि. . . . . उपै की .. . .।ई उचित अनुचितक गहीङ सोच. . . घरक मालिक सॅ विद्रोह केनाय हुनका उचित नहिं लगैत छल ।ओना त’ हुनका पीठ प’ बङ लोक .. . गोतिया दियाद सॅ ल’क अपन भाय बंधु धरि हुनका एक सॅ एक कथा पठबैथ. . . . अमेरिका वाला भाय त’ पाए पठाबए लेल सेहो तैयार बैसल .. . .मुदा प्रोफेसर साहब के की कहल जाओ .. . . ओ त’ मददिगार के’ शत्रु बुझि ऑखि लाल पियर केने घर मे कूदय लागैथ. . . ‘हे .. . हम मूईल नहि छी. . . जे लोक हमर बेटी प’ दया करत. . . ।बेसी दिक करब त’ हम गरा मे ससरफानी लगा क’ मरि जायब. . .लईत रहब तखन .. . ।’ ‘बीस लाख मे ओ कारी धुत्थुर. .. . . .अपन खानदान मे पहिल पढल. . . .डिबिया. .के ईजोत मे पढि पढि क’ इंजीनियर बनल .. .’ ‘ओहने हमर समधि .. . .कांध प’ अंगोछा. . . रखने . .. तरहत्थी प’ आंगुर सॅ तमाकू चुनबैत. . ।’ जखन शुद्वक समय आबै. . . घर मे कलेस बढि जाए. . . आ’ परिणाम काकी आठ आठ सांझ उपासल रहि जायथ. . . .स्वास्थ सेहो खराप भ’ गेलन्हि . . .सदिखन ढैकरैत. . . . गैस सॅ पेट फूलल. . . ब्लडप्रेशर . .आ’ हार्ट क’ बीमारी सेहो कसि क’ गहिया लेलकन्हि. . .।मानसिक तनाव से फराक़ . । सत्तु के आश्चर्य होय. . . एतेक ओरियानी..... .. . . . एतेक बुधिमति. स््रत्री. . . मुदा प्रतिकूल पति के सोझॉ कतेक बन्हैल. . .। ई मिथिले अछि जतय अनमेल विवाह धङल्ले सॅ चलि आयल रहल अछि। गिरहस्थी क’ गाङी के दुनू पहिया. . . . .दू दिस. . .भेलोपरांत. .गाङी पटरी प’ ससरैत. रहैत छै .. . .।कखनो काल लगैत अछि जे आब उनार हैत .. . . आब हैत. . .. मुदा फेर कोना नै कोना ससरए लगैत छै .. । बतीस बरक वैबाहिक जीनगी मे काकी के कियो भागैत . .पङैत. . वा मर्यादाविहिन वा’उच्श्रृकल होइत नहि देखने छल .. . ।मुदा आब सहनशक्ति जेना दम तोङि देने होए. . . । इम्हर राज्य मे सरकार बदललै . . .आ’ कहिया कत्तय के बिझाएल . . .घुनाएल बेकार सङैत बीएड़ .डिग्री वला सब के किस्मतक ताला खुजि गेलए .. . ।पिता कोना नै कोना ढरि गेलखिन्ह .. . . गौरी के सेहो लघीचक इसकूल मे नौकरी लागि गेलए. . . ।माएक’ करेज जुङैलन्हि. . .. पढै लिखै वाला काज मे धीया के मोन बहटरेतैन्ह. . . ।आ’ सुयोग्य वर सेहो. . . .. . । घरक माहौल मे त’ विधाते जे परिवत्र्तन आनए चाहितथिन्ह तखने संभव छल. . .।पुत्र दुनु कत्तो बाहरे पढाई करि रहल छल. . . छोटकी सेहो बीएड करि नौकरि पकङि नेने छलै. . .। कतेक बरख बाद भगवतिक किरपा सॅ प्रोफेसर साहबक मोन डोललैन्ह . . .. एक गोट कथा पसिन्न पङलैन्ह. .. . .।मुदा ओ अगिला वैसाख मे विवाह करता. . . ।बेस. . ..हुनके कोन हङबङी छलेन्ह .. . जे हङबङी आ’ धुकधुकी छलैन्ह. .. . . .से त’ कन्या वा’ हुन माएके ..।अगिला वैसाख मे एखन एगारह मास विलंब छल । .. .आब जे छल . . पसिन त’ वएह कथा. . . कि मूल गोत्र .. . टक्कर के . .. पेलवार नीक़ . .समधि सेहो उच्चस्तरीय अधिकारी .. . . .शहरि मे मकान. . . । काकी के चोटकल मुॅह प’ जेना किछु हरियरी आबए लगलै. . . .।भगवतीक’ चिनवाङ प’ बैस गोहराबए लगलीह. . .’अहींक़ . असरा मैया . . .जौ ई कथा भ’ जायत जोङा छागर चढैब. . . ।’गौरी के मलिन झमैल मुॅह प’ सेहो किछु चुहचुही आबए लागल. . .स्वप्न त’ सबके देखबाक अधिकार छै. . . ओहो अहि पृथ्वी के प्राणी . . . ओकरो सहस्त्रों स्वप्न दूरे सॅ ऑखि मे हिलकोर मारैत देखार होमए लगलै. . । अपन पुस्तैनी बङका घरक मरम्मति करबा ओकरा रंगबा ढोरबा क’ एक गोट भव्य हवेली क’ आभास दय देल गेलै. . . ।डयोढी के गेट बङ चाव सॅ अपने ठाढ भ’ क’ काकी लाल रंग सॅ. . रंगबेलन्हि .. ‘अहि गेट सॅ हमर बेटी मॅहफा सॅ विदा हैत. ।विवाह राति बिजली के लङी आ’ लाईट सॅ सजल ई कतेक दिव्य लगतैक . .।’ बजैत बजैत हुनक ऑखि मे इन्द्रधनुषी स्वप्न जेना झलकि उठै । वर पक्षक इच्छानुसारे दुरागमन चतुर्थीक पराते भ’ जेबाक निर्धारित भेलै. . ।ताहि लेल . .. दान दहेजक चीज वोस्तक ओरियान होमए लागल छल. . । देखैत देखैत फागुनो आबि गेलए. . .।चारोकात मॅह मॅह करैत फगुनाहट .. . .लोकक शरीर ’सॅ भरिगर वस्त्र उतरि क’ हल्लुक वस्त्र स्थान ग्रहण करि नेने छल .. ।वातावरण किछु सोहनगर भ’ गेल छलै .. .।घर सॅ ल’क’ अङोस पङोस धरि के नवतुरिया सब मे गौरी दीदी के विवाहक उत्साह किछु विशेषे रूप सॅ छल .. . ‘बरियाती सॅ से परीच्छा लेब हम सब कि ओ सार सब त्र्राही त्राही करता ।’ माय पितियानि सब मिलजुलि क’ कहिया कत्तए नै अदौङी दनौङी खोईट क’ राखि नेने रहथि . . ।लकङी के सर समान . . . ओहि लेल त’ खेतक आरिए आरि बङ शीसो. . . .किछु बङ पुरान सीसो काटि क’ दलानक’ पछबरिया ओसारा प’ गेटिआयल .. ।तैं छोटका कका फर्निचर सब बनबए लेल . . .बढीबा के कातिके सॅ अपन दरवज्जा प’ बैसा नेने तहथि . . .।बचलै .. . वर कनिया आ’ समधियाना के नूआ फट्टा .. . त’ ओ आब कि लोक जोगा क’ राखत . . .शहरि बजार मे तुरते भेंट जाईत छै. . . . .. सबटा काज प इत्मीनान सॅ नजरि फेरि काकी सरिपहॅु बङ प्रसन्न छलीह . . .। ओ दिन भरिसक रबि छल. .. .प्रोफेसर साहब अपन दलान प’ अराम कुरसीप’ बैसि एकबार पढि रहल छला. . .।तखने पोस्ट मैन पहुॅचलै. .. .गामक पोस्टमैन . .. अराम सॅ अपन घरक काज .. न्योता. पिहानी निबटा क’ छुट्टिए दिन बचलाहा डाक बॉटेत छल .. ।चिठ्ठी पढलोपरांत हुनक नजैर . . .एखबार सॅ उठि क’ आकास मे अटकि गेलन्हि . . .। लिखल त’ किछु विशेख नहि . . .एतबे छल दू पॉति ‘ हमरा माफ कएल जाओ. . .हमर बालक अपन औफिसे के एक गोट सहकर्मी सॅ विवाह करि लेलथि. . .।’ ंमुदा ई दू पॉति ओहि घरक लेल केहेन पैघ हङहङी बज्र साबित से वर्णनातीत . .. .अपन कोठरी मे पलंग प’ बैसल काकी बरक ललका पाग मे सुईया ताग ल’क’ घुनेस लगा रहल छलीह . .. .हाथ कॉपि कॉपि क’ जेना फङफङेलन्हि. . . . आ’ धुकचुके मे हुनक प्राणपखेरू संसारक सब बंधन तोङैत एकदम फुर्र सॅ उङि गेलए. . . . ।बौराएल सन धीया .. . .माएक छाति प’ माथ पटकि पटैक क’ बिलखए लगलै .. . . ‘हमरौ किएक नहि अपने संग ल’ गेलहूॅ. . . ।’बेटी के ह्दयक भाव माय सॅ बेसी आर के जानि सकैत अछि. . . . बिन मोलक ओकिल. . . पैरोकार । दिन केहनो प्रलयंकारी होय .. .बीतिए जाईत छैक़ . . .मनुक्ख सन जीवट परानी . .. . जहॉ अन्न आ’ पानि शरीर मे गेल .. ..काया उठि पुठि क’ ठाढ भ’ जाए छै. . .। जे हो . . . पहिने जकॉ त’ नहि मुदा ओहि घर मे फेर सॅ गति विधि त सुरूए भ’ गेल छल . .।रोज रोज ऑच पजरै. . .सोहारी . ..भात . . .तरकारी .. .दालि .. .रान्हले जाए . .प्रोफेसर साहब अपन कओलेज़ . .बेटी. . दूनू अपन अपन इसकुल. . .. . नौकरी प .. । ओहि अन्हङ. . पानि बाढि वला समय मे .. . . .सतू के खबरि भेटलै. . .ओ. . .कहुना करि छाति भरि पानि के चीरैत पहूचल छल. . .। भेलए कि जे जखन मुनहरि सांझ बीत गेलए .. . भदवारि के घनघोर धार धार बहैर रातियो मे जखन गौरी अपन इसकूल सॅ नहि घुरली. . . तहन पिता के करेज लोहरबा के धुकनी सन धुक धुक करए लागलै. . .भरि रात पिता आ’ छोटकी बेटी. . .अनदेसा क’ बङका बोझ क’ नीचा छटपटैत . . .जागल. . .. सगरे राति बाढि क’ घों . .. घों करैत. . . सोर .. .चारों कात बेंग झींगुरक . .. .कुकुर .. . .नढिया के डरोन स्वर .. . नदी के बॉध सेहो टुटि गेल छलै . . .. यातायत ठप्प. . . ट्रेन . .बस. स्थगित . . .जे जत्त छल. . .तत्ते घेरोल. . . .कत्तेको लोक पानि मे दहिया भसिया गेलए .. . । ई समाचार रेडियो प’ भोरे भोर आबि रहल छल . .। जखन सूरजोदय भेलै .. . प्रोफेसर साहब अपन छोटका भातीज सॅ कनि निहौरे करैत सन कहलखिन्ह. ‘कनि गौरी के इसकूल जा क’ खबरि आनए लेल ।ओकर माए अपना घर मे अलगे कूदय लगलि पॉच पॉच हाथ .. ‘अहि दाहङ मे कत्तए जायत हमर पूत भसियाबए लेल. . . ।’मुदा भातिज गौरी शंकर माए के परतारैथ. . .बङ हिम्मत करैत भरि भरि ठेहुन पाानि मे कहुना क’ सायकिल खीचैत निकलल। रोड प’ त कनि कम पानि रहै. . .उचगर सङक छल .. .मुदा कत्तो कत्तो त’ मत पूछु. . . .सायकिल सॅ उतैर उतैर क’ चलए पङ..ै. . . . ..कखनो काल त’ साुयकिल माथ प’ सेहो उठा लैक़ . . चारो कात प्रलयंकारी दृश्य . . .. जतय धरि नजरि जाए. . . पानिए पानि. . . .।पानि मे ठाढ गाछ .बिरीछ .. . ओना त’ बङ नीक लगै .. .मुदा गाछ सॅ बान्हल झ्ुाला जकॉ खाट. . ओहि प राखल चीज वोस्त .. . गाछ प बैसल घरबैया. .. .सब देखि ह्दय टूक टूक होमए लागै. . दोसर दिस जीनगी सॅ भरल .. .धिया पुत्ता. . . पानि मे उमकैत .. . । तीन चारि गाम टॅपि क’ रोडे प’ ओकर इसकूल उम्हर बाढिक प्रकोप न्ै.ा . . हैडमास्टरक गप्प सुनि गौरी शंकरक हाथ सॅ जेना तोता उङि गेलन्हि .. . ।केहेन जाचना के काल .. . .कोन पापक सजा द’ रहल छथि विधाता . .. । टुटल मन. . . असोथकित .. .भेल दरवज्जा प’ राखल चौकी प’ प्रोफेसर साहब पसैर गेल छला .. . । सत्तु आबि चुकल छलाह .. .मुईलो परांत मायक साध अधुरे रहि गेल . .ओहि बङका गेट सॅ बेटी के विदा करबा के .. . गौरी अपन एक गोट सहकर्मी संग विवाह करि कत्तो आओर चलि गेल छल. . ।कका के बोल भरोस दैत सत्तु एतबे बाजल छल ‘ई त अवश्यंभाबी छल .. .इएह छैे समयकाल।’ कठजीब नाम त’ हुनक पिता पितामह बड़ दीव ‘अन्नपूर्णा’ धयने छ्लखिंन्ह ,मुदा कपार , कत्त के अन्न आ’ केहेन पूर्ण ? आ’ शने;शने; लोक वेद हुनक नाम के छोट करैत करैत ,अंत मे पुरनी दाय बना क’ भरि टोल कि भरि गाम लेल जेना निश्चित करि देलकइ। हुनक आबक रैन बसेरा वा घर जे कहि दादे कका के गोहाली छल । ओ त’ आब अपने नै छलाह ,काकी छलखिन्ह।त’ हुनके आग्रह प’ ओ जखन अपन पिता के डीह स उपाड़ी फेकल गेली त’ हुनक अनंत धार नॉर के पोछै लेल नबकी काकी अपन आचरि बढ़ोने छलखिन्ह ।अप्पन झोरा झपटा ,गेरुआ ,सीरक ओछोंन बीछोन टूटलाही फूटलाही कासा ,पितड़िया बासन उसरगलहा लोटा सब सईत समेट क, रखलन्हि।आ’ ओहि दिन स ओ हुनक अघोषित अड्डा । भरि टोल मे दु चारि त आँगन एहेन छल जतए हुनक बैसब उठब छल ।मुदा हेम क्षेम त’ सबस ।बड़ कम लोक हुनका अनेरे बइसल वा तमसाइत देखने होयत ।सदिखन कोल्हू के बरद बनल काज मे जुटल ,पाईन बुनि के हुनके चिंता, टहटहौवा रौद के हुनके चिंता , रोपनि कटनी के हुनके चिंता ,ससुर बाइस बेटी के भार साठे के हुनके चिंता , दुरगमनीया कनिया के अहिब के फड़ बनबए के हुनके चिंता ,भरि गाम के नौतल हकारल अहिबाती के तेल सिनुर परसब के हुनके चिंता ,पाहून पड़क के आव भगत के हुनके चिंता, एतबा नहि परसौती के दबाए रानहब ,सोइरी मे चिल्का चिलकोड़ लेल चमाइन बजाएब ,किसुनमा दोकान स चीज़ वोस्तआनब केकरो कोनटा लागि क सीआईडी गिरि करब , सत पुछू त’ हुनक चिंता अनंत छल ।नई घर , , नई घराड़ी आगा नाथ नई पाछा पगहा , , तखन माथ प’ एतेक बोझ ,, , । तखन जे नहीं करबे पापी पेट , , । ‘दाय सुने छथिंह , कनी सोनरबा ओत चली जाथु , , ,एखन धरि नंकिरबा के कानक कुंडल नहीं पठेलकई । , , कखनों कोनो गाम बाली बाजि उठेक “ये दाय ,कनी डोमबा के ओत जाकय चारि टा सूप ,, कोनिया ,डगरा आ’ दुई टा चलनी लेल समाद पठा देथुंह ‘ ,, मुनेशरा के कहने रहिए मार बाढ़ेन्न जरलहबा के अपन ससुरारि मे जाकए बईस रहलई , , कहथीन कनी परसू भिनसरे पठा देतय’। आधा घोघ आधा मोड़त काढ़ने कोनो भौज दूरखा स’ झकैत बजा लईत छलिह ‘दीदी , , एखनि धरि संजुआ के बाबू नै एलखींन जोगबन्नी से , ,बड़का गाम बला ,जमाए आबि क’ द्लान प’ बईसल छथिन्ह,घर मे किछू कत्तों नै , , ,एक कप चाह देबए से नई दूध ,नई चाहक पत्ति , , ,कनी किसुनमा के दोंकान मे ई फुलही थारी बंधकी राखि क’ किछू पाए ल’आबौथ आ’ कनमा भरी घी आ’ मखान सेहो ल’ लिहथि’। आ’ हुनक ई सहयोगात्मक काज गामे टा मे नहीं अटकल छल ।दु ई कोश दूर मधबन्नी सहर “दाय ,, पर पाहून लेल तुलसी फूल चौर निघटी गेल छईक, , दुइयों सेर ल’ लिहथि , नारिकेरक तेल , कडु तेल ,हींग ,किनको खरपा, टकुआ ,लहठी ,टिकुली ,सिनुर , बांग , फुइस फड़क ,लटखुट ,चरखा,बेलना ,पापड़, पटिया ,, ,जेठक कड़ कड़कडौआ रौद , , माथ प’ पथिया मे बड़का बोझ रखने , ,धिपईत कारी स्याह पघिलल पिच रोड , , , पएर मे नै कोनो चट्टी , , ,घामे पसीने अपस्यात , , सबहक चीज बोस्त किन बैसाही क’ आनि दैत छलिह त’ ओय दिन हुनक बड़ मान, कियो कियो बियेन स’ हौंक सेहो दैन । दिन त’ दिन ,घोर निशा रैतियो मे हुनक निस्वार्थ सेवा लेबा स’ लोक नहि हीचूके ।संकराति के दोसरे राति धीरुवा के पेट मे मोचाड उठलई , , जे ओ छर पट्टी काटय लागल ,, ,घर मे सुतल अहि खाट प’ कखनो माए के उठाबै त’ कखनो ओहि खाट प’ सुतल काकी के , ,।अलसायल ,ओंघाएल दुनु बिछाऊँन प’ पडल पडल बजलथी ‘की होएछो?’ “माए गे बाड़ी जाएब’। आब त’ दुनु के नींद पड़ेल ।ललटेंमक टेमी उकसबईत माए बजलिह ‘भरी दिन हुरईत रहेत अछि आ’ सुतली राति मे हिनका दिशा फिरबा के ज़ोर मारे छैन ।अहि जड़ काल मे ,अनहार मे ककरा उठबिए’ ।काकी के तुरंत फुरेलेंह ‘पुरनी दाय के कहथुन नै’ । “आब के जेतय गोहाली हुनका उठाबै’ । माए कनी ओकताएल सन बजली त’ पितीयानि हाफ़ी लईत सीरक तर स’ बजली “ बिसरी गेलखिन ईएह त’ कहने रह थीन जे आय कोनो पुरुख पात द्लान प’ नै छै ओसारा प सुति रहबई ,कहथून नै’। माए सेहो सिरके तर स’सोर पाड़ली ‘ दाय , ,यई पुरनी दाय , , ,यई मरि गेलहू की जिबते छी’ ।मुदा हुनक स्वर बाहरि के घोर अंधकार स’ एकाकार होइत शून्य मे बिला गेल छल।इमहर धीरुवा पेट पकड़ने अहि कोन स’ ओहि कोन मोंगरी माछ जका तड़फैत, , घरे मे भ’जायत गे , , दे ललटेंम , ,हम एसगरे जायब , , मुदा ललटेंमक प्रतीक्षा सेहो नहीं करि सकले आ’ जिन जका दौड़ीक बाड़ी के केवाड़ी खोली चुकल छल ।माय हदबदा क’ उठली , , ‘भरी दिन अगत्ति धिया पूता के चक्कर मे कनी काल चैन स’ पड़िओ नही सकैत छि राइतो मे सेह’ । आ ओसारा प’ आबि भीम जका फोंफ काटेत दाय के देह हिल्बइत बजली ‘यई भिशिंड़ जका सुतल छी ,, क तेक मोट निन भ’ गेल , कुंभकरंक कान कटल्हू ,’।दाय हड्बड़ा क’ उठि बैसली ‘की भेले ,की भेले’ ।त’ माए बजल खिन ‘हे ते की अंगोरा , , धीरुवा अन्हारे मे भागले बाड़ी दिस , डोलमे पानि लक कनी जाथुन, हैया लीअ ललटेंम’ ।बोरा ओढने खालिए पएर भुतहा बाड़ी मे डोल नेने चलि गेल छलिह। दाय के खेनाय कखनों अहि आँगन स’ कखनों ओहि आँगन स’ भेटय ।स्त्रीगन सभक कहबी छल जे ओ जीभ के बड़ पातर ,ओना सब कीछू भकोसी जाए छथी ,सब किछू मे की , , जेना चारी दिनका मटकूड़ि मे सड़ल दही ,ट्टायल खाजा ,बज़्जर भेल ठकुआ ,, आ’ कटहरक को स’ ल’ क’ ओकर कामड़ी नेरहा धरि । आ’ पचि सेहो जायन्ह ।आकड़ पाथर पचाबए वाला जीब ,गज़ब के पाचन शक्ति । दुपहरिया क’ बइसारी मे स्त्रीगन सब हुनक पाचन शक्ति के एक स’ एक उदाहरण दैत हस्सी ठठा करैत अपन मोंन बहटारई छलिह। भरि दिन काज ‘यै दाय ,कनी हमर राहड़ी राखल छै उलैल , दस सेर लगीच दरड़ि देथुंह कनी ,कनी अरबा चौर क चिक्कस सेहो पीस दिहथी कतेक दिन स’ बंभोलिया के बगिया खेबाक मोन करैत छै’.।आ’ दाय टोलक भौजी स’ ल’क’ हुनक पुतहुओ सबहक अड़हैल काज मे दासोदास भेल ।कखन भोर होए आ’ कखन सांझ ,,के जाने । कखनों काल जौ कोनो काज नै त’ जनानी के बइसारी मे कोनो अधलाह काज वा झगड़ा फसाद के गप्प प’ कोनो पुतहु बाजि उठए ‘ई काज पुरनिए दाय के भ’ सकैत अछि ,’ वा ‘ई लुतरी लाड़ब मे वएह ओस्तद छथीन’।सेहो परोछ मे नै मुहे प’ ।दाय गुमसुम भ’ जायथ, , कखनों “ह ह हम कीएक कहबई , ,सप्पत खुआ लीय’ ।मुदा हुनका त’ पूतौह सभक टोंट आ’ अपमान सहबा के जेना आदति पड़ी गेल छलैन । काज तिहारक घर मे दाय के काज पानक लत्ती जका लतरल चलल जाए ।कखनों सिनेह स’ त’ कखनों आदेश स’ तिरस्कार स’ लोहछल बोल स , “ऐ यै ,देखियोन्ह त’ हिंकर सौख , , किदन कहबी छै जे , ,जेकरे दादा ,, मर बाढ़्नि ,बिसरिओ गेलिये ,उठु ,ई अदौड़ी खोटय अहाँ की बैसि रहलहु बौवासिन सब जेंका , ,जइयो कनी गुवरबा के कहने आबिओ बीस सेर दूध काल्ही भोर स’ भोर पहुँचा दै आँगन मे ,” “ ललबा अखन धरि नै एलई बजार स’ चौक प’ दारू तारु त’ नै पीबए लगलई ,कनी देखथुन त , आ हे जों भेटईन्ह त’ कहिहथी जे हम ओकरा नानी गामक बाट मोंन पड़ा देबई जखनहमारा स’ पईच लेब आयत” । आ’ पुरनी दाय ,भुट्ट ,कनी मोट गर गेंद जका अहि ठाम स’ ओहि ठाम गुड़कइत ।मौसम चाहे कहनों होय लोक के त’ अपन बेगरता पुर हेबा क चाही।ओय हुईल मालि मे केदन त’ हुनका खाय लेल पुछैन्ह ,आ’ सांझे मे खाइतथि त कोन जुलुम भ’ जेतय । जहिया ककरो आँगन मे काज तिहार रहए ,ओय दिन हुनक मैल नुआ के जबर्दस्ती हटा क’ साफ सुथरा व नब नुआ अपन आसन जमा लईत छल ,दाय के त’ छवि सेहो बदलि जायन्ह।ओ थुस्स स’ नई कत्तों बईसइथ, अपन पएर प’, पीढ़ा प’ चौखटी प’ ,पटिया प ,नब नुआ नई मैल भ जाए । अहि नुआ के एवज मे मास मास दिन धरि रातिदिन खटनाइ ,अहि बीच जों केकरो खड़ सेहो छुबए लगथि त’ घरक मलकाइन चिचिया उठेथ ‘हे लोक सब देखियोन्ह चक्र चालि हिनकर , ,नब नुआ देलीयेन्ह भोजन बेर मे दौगल ओतिह , आ’ काज क’ बेर दोसरा के आँगन सूईझ रहल छनहि , ,कनिओ धाक छईन आखि मे’। आ’ एकर ओकर काज करि क’ पेट भरब के प्रक्रिया सुखद त’ नहीये रहल हेतइक।हिनका हुनका आँगन स थारी गोहाली मे पहुँच त’जाए आ’ के जाने अहि मे कोनो दिन उपासे सुइत रहैत हेती । लाचार बेसहारा अनिश्चित जिनगी के एक टा बडका ऐब सेहो गहूम मे सूड़ा जका सेनहियाएल छल हुनका मे ,आंखि बचा क’ कोनो बोस्त इमहर स’ ओमहर करब के , बड़का चीज क त्तय ,मुदा किछों, , ।आ’ ककरो गरुड पुराण सुनबा काल जखन पंडित जी क’ प्रवचन चलै ,कोन पाप के कोन दंड भेटैत छै नरक मे , चोरनी के नाम प, दाय दिस ताकि ताकि क’ स्त्रीगन सब मुसके ,एक दोंसरा के बीट्ठू कटे ,।एकर आभास भेला के बावजूदों दाय निर्विकार भाव स’ अपन बड़का बडका आंखि ,नाक ,कान सब के एक सीध मे राखि क’ कथा वाचक् के चरण कमल मे बकोध्यान लगौने बइसल । टोलक कोन मे अपन सहोदर भाय भाउज , एकटा बहिन ,सेहो बाल विधवा ,, सासुर स’ देउर आयल छलेनह लेब’ त’ अपन जनक् क प ए र छानि कानए लगलिह दहो बहो कि हम आब नहीं जायब ओहि नगर ,। माए बाबू बेटी के दुख देखबा मे अपना के असमर्थ बुझेत कनीए दिन मे धरती स’ अलोप भ’गेलथि ,आ’ भोजाय नामी नट्टीन्न, , भाय घरबाली के मुट्ठी मे ,। पहिने त’ सब कियो संगे रहे छलथि, कतबों गुहागिज्जी होए ,मुदा ओय दिन नही जानि कोन गप्प प’ झगड़ा झाटी भेलय ,आ’ पटलपुर वाली हुनक सिकी मौनी, अड़जाल खड़जाल नुआ ,झोरा आदि सबटा निकालि दिरघु कका के खरिहान मे फेंक देलखिन ।गोबर स’ घर आँगन नीप क’ गंगाजल छीट डंका के चोट प’ ई उद्घोषित करी देलथी जे पुरनी दाय ह मरा लेल मुइल छथि। तहन बास के दईतन्हि ,नबकी काकी के छोड़िए क’ ।गोहाली मे त’ आब गाय बरद छै ने । योग्य पूत सब ,किओ कीछू बिगाडिओ नै सकेत छल । मुदा सहोद्र भाय लेल हुनकर अनुराग रहि रहि क’ चुबै न , ,छोट छोट भातिज भतीजी सब के इमहर उमहर स चोरएल ,नुकेल समान द’ दैत ।राइत बिराति सबहक आंखि बचा के ओकर आँगनो चली जाथि।भौज सेहो आब तेहन डाहीन नहि रहल छली । ‘नुनु (छोट भाय ) कतदन पड़ा क’ चलि गेलय ,नई खाय के ठेकान नई पीबय के, धिया पूता सब बिलटी रहल छै” ।ककरो ओसारा प बइसी जखन ओ विलाप करैत त’ लोकक मों न खिन्न भ जाए “ऊह फुटली आंखि नै देखेत छनही आ’ हिनक व्याकुलता देखियौन्ह”। एक राति पटोर बाली काकी चुप्पे पएर दाबि हिनका पाछा अपन आँगन मे अयली ,त’हींकर करनी देखि हुनका सौसे देह मे खौता फुकि देल कैन “हे ,हे ।हे दाय , , की करैत छी?” कनी कड़गर सन स्वर मे बजली ,त’ ओ घबड़ा क’ मड़ुआ के ढेर प’ख़सी पडली आ’ हुनक मुंह स निकसि गेलन्ह “मड़ुआ चोरबे छी”। भिनसरे सौसे टोल मे हल्ला भ’ गेले ‘दाय मड़ुआ चोरबे छली राति मे’ ।मुदा हुनका लेल धन सन ,ओ मजगुत प्राणी ,ओमहर इमहर बुलैत टहलेत ,कोनो कोनो काज् क ब्योंत मे अपना के एना खटबईत जेना ई कथा कोनो आन के भ’ रहल होय । पराग कका बनारस मे रहेत छला ,माए के देख चारि दिन लेल आयल छ लैथ,नबका धुइस छ्लेन्ह ,, , बड़ गरम , , ,जाड़क मास ,घर मे अलगन्नी प रखने छलथी ,कतेक ताकल गेल ,धरती गिड़ गेलै की अकास खा गेलै, कत्तों ने भेटलै ।ओ अहुरिया काटि क’ आपस छली गेलाह बनारस । “घर स आखिर लेते के ?’आ’ शक के सुइया सदी खन दाय प’ जा क’ अटकीजाए ,मुदा प्रमाण की ?’ आ’ एकटा धाक सेहो ,फुइस अकंड़ नई उठाबी ककरो ,।कियो इहों बाजी उठेक , ‘जाय दिओ गरीब ,अबला छ थिन्ह ,पराग बाबू के एकबाल बनल रहौक ’। “मुदा ओ केलखिन की ? ओढ़ेत बिछबइत त किओ नहीं देखलख’ । “भौजाई के द’ आएल हेती राताराती’। आ’ सब किओ बईस क’ अपन अपन मगज मारी करी क’ गहीड श्वास छोड़ैत मौन भ जायथ। हुनका खेनाय देबा मे त’ सबके अखरए लगे ।नीत रोगी के पुछै के ,, भाति भाति के फकड़ा पढ़ल जाए ।एक दिन क’ पाहून के तरुवा तीमन ,स चार लगा क’ लोक खुवा देत छै,मुदा नीत दिन ,” । क हुना करि क’ हुनका सोझा थारी पठा दैल जाए छल।केकरो भुखल ने रखबा चाहि ,धर्म के नाम प, कर्तव्य के नाम प’ हुनका खेनाय भेटन्ह । मुदा ओय दिन जखन दुरगमनिया कनिया के पाजेब कोहबरे स’ हेरा गेले तखन त’ हुनक सौस महेशक माए के तामसे जेना बुट्टी बुट्टी चमकय लगलन्ह ‘ई जुलुम आब ने सहबा जोगर छैक ,महेशक विवाह मे नबका नुआ देने छलियेन्ह” ।ओ अहिना अगिया बेताल छलिह,तुरंत फाड़ बान्ह वाली ज़नानी । भानस चढ़ल चुल्ही प’तेकरा छोड़ि झटा झट बढ़ ली गोहाली दिस ,अपना पीठ प’ चारि ज़नानी के फौज नेने ।चीज क’ नाम प’ गेरुआ खोल मे डोरी लगा क’ एक टा झोरा ,दुई तीन टा नुआ,एक गोट चादरी,केथरी,आ’ एक टा खूब मोटगर सन गेरुआ ।सब टा मैल चिक्कट ,कखनों काल साफ करैत ,इमहर ताकल,ओमहर ताकल ,अहि दोग देखल ,ओई दोग देखल,। माटि मे त गाड़ि क’नहि रखने छथी,मुदा तेहन कोनो चेन्ह नहि देखाय । एक जन के जे अपना के जासूस क महतारी बुझैत छलिह,के नजरि मोटका गेरुआ प’अटकल छल ,समस्त भीड़ के उक्साबईत बजली ‘गेरुआ के देखू नै’ । नेता के आदेश के पालन तुरंत होब लागले ,आय जेना महान रहस्यक उदघाटन होबए जा रहल छल ,अहि समाजक सब स’ भ्रष्ट आ’ पतित ,चोर क’ चारित्रिक हनन होबि रहल छल ,प्रमाणक संग । गेरुआ के सियों न खोलल गेल, तेकरा निच्चा फेर मुंह बन्न,,आखिर मे सर्व सम्मति स’ गेरुआ के फाड़ी देल गेल ,आब ओत ठाढ़ ज़नानी सबहक आंखि फाटल रही गेलय ,केकर सरौता,केकर पनबट्टा,केक्कर नुआ, केकर आंगी, साया, केकर कुर्ता, ,, मुदा पाजेब कत्तों नहि निकललै । दाय ककरो काज स’ लोहरबा ओत गेल छलथि । ताबेत मे ढनमनाई त ढनमनाइत ओहो आबी परमान पुर बाली के दु आरि प सुस्ताए लेल बइसी गेल छलिह । गोहाली मे बिरनी के छत्ता जकां उमड़ल भीड़ देखि ओहो ओत स’उठी अकचकायल सन ओत आयल छलिह ।आ’ ई प्रलयंकारी दृश्य देखि ओ जेना बज्र भ गेल छलिह ,एकदम शून्य ,जेना पाथर , , , ।चुप्प् चा प लद स ‘ओत बैसि रहली ।साक्षात ताड़का बनल महेष् क माए के मुंह स धधकल धधकल अंगोरा निकलि रहल छल “पाजेब की केलिये? नब नुकूत कनिया के छले ,एहेन कोन सौख मौज बुढाढ़ी मे पईस गेल ,पाए के बेगरता छल त’ हमारा कहितहु” । “यए काकी ,सोनरबा के ओतय राखी देने हेथिह” आए काल्ही बड़ एनाय जेनाय होय छन। सोनरबा ओत मदना के दौडएल गेल ।मुदा ओ एक्दमे नकारी देलके ,केहनों सप्पत खे बा लेल तैयार , ,।कियो मुसकी माँरेत बाजल “ओ किए नाक प’ माछी बैसय देतै, , कहबी छईक चोर चोर मोसियौत”। बाजि ताजि क’,माथ कपार भंगैत ओ खोजी दल ओहि ठाम स’आपस भ गेल छलिह..त’ लोक के लगलए आब बेचारी मुंह उठा क’ कोना जिबती,कोनो पोखरी , धार मे संहिया जेती वा जहर माहुर खा क’ सूती रहती ।किछू दयामंत सबके हुनक दुर्गति प’ आंखि झहरय लगलेन्ह ,’सब साय पूत बाली सब जेना दुधक धोल हौक ,अब्बल दूब्बल प’सिथूवा चोख”। त’किछू करेजगर ज़नानी के अपन ऐब नुकबए के बहन्ना भेट गैल ।‘ई त’सिन्हा चोर निकलली ,ओय दिन दूध औट क चीन _बारे प’ छोड़ि देने रहिए ,जे कनी सुसुम हेते तखन पौर क’ सिक प’लटका देबै ।मुदा कनिए काल मे नहा क’ आबे छी त’आधा दूध गायब ,दाय ओसारा प,सिलौट प, मसल्ला पिसेत छलिह” ।मुदा सत छल जे बीमार दियादनी के गायक दूध पिनाए हुनका नहीं सोहाए आ’कखनों,बिलाड़ी के नाम प,कखनों उधिया क। खसबा के अड़ मे कनी पैइनफेंट के अपने पीबी जायथ। ओम्हर साँझ पड़बा स’ पहिने कनिया के भाय नैहर स, दौगल एलै ,पाजेब नैहरे मे छूटि गेल रहै ।महेशक माए अहि खबरि के पीबी गेलिह ,एतेक शक्ति त नहीं छलेन्ह जे जा क’ दाय स माफी मांगि लइतथी । ओए राति केकरो घर क थारी दाय छूबों नहीं कयल्खींह ।कोना गिड़ल जेते अन्न ,एहेन कलंक्क ॰बाद । भिनसर भेने सब देखलक “दाय अपन गेरुआ के सीबी रहल छलिह । कनिए कालक़ बाद टोल मे एकरा ओकरा आँगन जा क कतो दालि ,कत्तों चिक्कस ,कुटिया पिसिया मे एना लागी गेल छली जेना किछू गप्पे नहि भेल होमए । कलंकित चान ओ टूहटूह इजोरिया . . सम्पूर्ण आकाश पर पूर्ण चंद्रक एकाधिपत्य. .दूर दूर धरि ठहक्का मारैत चॉदनी।नीचाधरती पर शीतल अमृतक धार .. ।ओहि निरमल धार सॅ सींचल गाछ . बिरीछ .खरिहान. दलान . .. बाडी झाडी .. ।पूबरिया बाडी मे पतियानी लागल केरा के गाछ .. मे लटकल घौंद .. .नीचा आलू के फसील .. . ओही इजोरिया राति मे सब किछु एक दम फरिच्छ देखाए पडैत छल । शंभु बाबू के भरि भरि रात नीन्न नै होबैत छलैन्ह. . चारि दिन पहिनहि जेहल सॅ छुटि क’ आयल छलाह .. .अंगरेजक जमाना. . क्रांतिकारी सब के घातक अपराधी मानि लोमहर्षक यातना देल जाए. दुनु टांग बान्धि क’ टेबुल पर राखि ओ मोटका हंटरक मारि .. .. दनादन . .बेहोश सेहो नै रहै दे. . पानि पिया पिया क’ होश मे आने . .पानियो भरि छांक नै पीबै दै .. घोंट भरि दैत गिलास झीक लैक़ . पानि पीयाबए बला .. हंटर बरसाबए बाला सब स्वदेशी .। .मात्र एक गोट. . ललका मूॅह वाला बिलाडि के ऑखि वाला . .अफसर अंगरेज़ ।. .. ओ प्रताडना ओ कष्ट .. सात दिन कोना एकांत वास .. ई सब हुनक दिमाग के भॅभोरि क’ राखि देने छल. .त’ ओहि मे सुखद सुमंगल नीन्न क’ प्रवेश हो त’ कोना हो । ओ पीडादायी .. एकाकी जीवन सॅ बचबा लेल लोक पैलवार आ’ समाजक निर्माण कएने अछि. ।किएक त’ ओ सामाजिक प्राणी अछि ।किछु मे त’ लागल रहैत अछि जा धरि धरती पर रहैत अछि। स्वराज्य क’लेल लडय वला के उद्देश्य सेहो सएह छल नै कि अपन समाज पर अपन बनाओल कानून के मध्य जीवन यापन करब . .ई विदेशिया सब हक गुलामी आ’ अत्याचार किएक सहब ।हॅ .. नीन्न नैं अबैन्ह त’ मोन दुनिया जहानक’ खोंचि खॉचि मे ओझरा जाएन्ह । ई भरिपोख इजोरिया के आनंद .. . .. ।अपन दलान पर ओ एसगरे नै सुतैत छलाह . .चारि टा खटिया आ’ पॉच टा चौकी आओर बिछैल छलै. . सब पटोपट .. .नीन्न क’ जादूगरनी खाली हिनके लग नहिं आबि रहल छल ।मोन भेलैन्ह. . .बिछौन सॅ उठि क’ रस्ता पर टहली. . आलस लगलैन्ह. . . ..मोन अपन खुरलुच्ची पन मे लागल. . नचबैत रहल बडी काल धरि. . ।जखन लग्घी लगलैन्ह. . त’ उठैए पडलैन्ह. . ।दलान क’ ठीक सोझॉ रस्ता छलै आ’ तकरा लगले हुनकर आ माझिल भायक खरिहान. .. . .सात भायक भैयारी मे बखरा बॉट हाले मे भेल रहे. . पहिने त’ साझीए छलैथ सब कियो. . मेल जोल पूर्ववत ..बीच मे रस्ता खरिहान आ’ दुनु कात सबहक पोखरा पाटन घर दुआरि. . .।बडका भायक घराडी . .पूबरीया बाडी के दहिन .. बाम कात भालसरिक . . आम लताम .कागजी नेबो अररनेबा क मध्य मे मुस्कैत कदंबक गाछ ठाढ़ । अहि टूह टूह इजोरिया मे सब किछु ओहिना चमकैत देखाय पडि रहल छल ।मौसम कनि सर्दियाय लागल छलै. . कनि कनि धुऑ धुऑ सन . .सेहो लगैक़ . मुदा ई धुॅआ सेहो पघिलल चानी सन लगैक।खरिहानक दॉया कात गोहाली. .एक कोठरी मे चारू गाय पागुर करैत दोसर मे बरद चारू. . मूॅह तकैत बैसल. . लग पास के चार सब पर सजमनि कदीमा भथुआ . के लत्ती छारल . ..सब टा मिल क’ बड सुन्नर दृश्य उपस्थित करैत छल . .।एकरे सब के निहारैत निहारैत औचक हुनक धियान. . कदंबक गाछ तरि ऊज्जर नूआ मे बुलैत स्त्री पर पडलैन्ह .. एक छन के लेल देह क’ रोईयॉ रोईया ठाढ भ’ गेलन्हि. . . . किंस्यात कोनो चुडैल. . पिशाचिन .. .ओहिना बाट पर ठाढ दम सधने ओ नाशै रोग हरै सब पीडा. . .सुमिरैत ओकरे परनजरि गडौने रहला ।नैं बड लाम नै बड छोट. . मध्यम कद काठी के . . .देखैत देखैत. . कदंबक गाछ तरि जाकए विलिन भ’ गेलए. .।सब टा भूतक सुनलाहा खिस्सा मोन पडए लगलैन्ह।अहि टोल मे . .सैझला भायक पुतौह सोईरीए मे मूईल छलिह. .चिल्का जीबैत रहि गेल छल. . ।लोक कहै .. एहेन स्त्री के आत्मा अपन बच्चा पर लागल रहै छै. . ओ ओकरा पर झपट्टा मारए के फेराक मे राति भरि अहुरिया कटैत रहै छै . .।कियो कियो कदंबक गाछ तर अधरतिया मे कानब के स्वर सेहो सुनैक़. ।कियो . .बाडी मे .. पोखरिक महाड पर केश छिटकौने नचैत सेहो देखै. . मुदा नेने सॅ क्रान्तिकारी आदमी. .हुनका अहि सब पर कहियो विसबास नै भेलन्हि. . तखन ज्ञात जगत सॅ बेसी रहस्यमय अज्ञात लोक अछि. . । मुदा ओ त’ बीसीये.ा बरख पहिनुक्का खिस्सा अछि ।कनिए काल मे एक गोट लमगर पुरूख सेहो दृष्टिगोचर भेल रहे. .ओहो ओहि कदंबक गाछ तरि विलिन. . ओहि गाछक पिछुआति मे बडका गाछी छलै. . ।ओ चौंकला . .एहेन लीला त’ ओ भूत परेतक कहियो नहिं सुनने छलैथि. . अहि गंभीर चिंता मे डूबल छलाह कि कखन नीन्न आबि दबोचलकैन्ह . नहिं पता ।बडका मोटका लोहा के हथकडी . . .हंटर. . आ ..लोम हर्षक चित्कार . कियो हुनक टांग झीक रहल छल. . ड़रौन स्वप्न सॅ घबडाक’ ओ ऑखि खोलला. त’ फरिच्छ भ’ गेल छलै. . खुभिया खबास. .आबि क हुनक पएर जॉति रहल छल .। ओकरा संगे अपन खेत पथार गाछी देखैत . ..ओ रतुका प्रसंग उठौलाह . .मस्तिष्क मे बाध बोन के स्थान परवएह घुमि रहल छल ।खुभिया बड बुधियार. .एक एक आखर सोचि समझि क’ बाजए बला . .आज्ञाकारी सेहो . .हुनके समवयस्क .. .ओकर पूरा खानदान हुनके सबहक रैयत . .।रतुका प्रसंग पर ओहो अपन अकिल लगबैत चुडैल . .राकसक गप के समर्थन कएने छल । दुपहरिया मे ओ अपन दलान सॅ टहलैत बुलैत . . खरिहान. . पूबरिया बाडी के नांघैत. . कदंबक दिस गेला .. ओ त’ बडका कका के घरक पछुऔत छल . .दलान त’ हुनक दलान सॅ सोझे देखान्हि .. मुदा घर खरिहान क ऊत्तर बारी मे बनल गोहाली सॅ झॅपा जाए छलै. कदंबक गाछ दिस एकदम एकांत .. ऊम्हर राहडि सॅ भरल खेत. . इम्हर ओम्हर केरा के ढेर रास गाछ .. . . . नीचा जमीन एकदम साफ़ . .एकदम अ’ड ।दिनों मे कियो नुकैल लोक के देख नहि सकैत छल .. .।आ’ अहि गुनथुन मे सुरूज महाराज अपन सातों घोडा के हॉकैत हाफैत . .अपस्यात भेल . पच्छिम क्षितीज पर अस्त होयबाक ओरियौन करि रहल छला ।.अपन . सुवर्णमयी रश्मि के खिहारि खिहारि क पकडैत अन्ततः अस्तगामी भेला ।ताहि समय मे सूरूज डूबबा सॅ पहिनहीए घरक चार सॅ उठैत धॅू स्वच्छ आकास के मलीन करए लागै. . ई धूॅआ कतै पैघ संकेत छलै समाज मे . .।जांै केकरो घर सॅ एकोदिन धूॅआ नै निकलै. . पडोसिया स हजो पीसी तुरंत टोकि दै.थ . “आय यै . .अहॉ के घर मे काल्हि चूल्हि नै जरल की . .।’ आ ओ गिरहस्थिन डब डब भरल ऑखि सॅ नीचा तकैत नहूॅ नहूॅ बाजि उठे ‘कि कहै छथीन . .बहिन. . . घर मे एक टा दाना नै छै. . धिया पुत्ता सब के बाडी झाडी सॅ लताम तोडि क’ द’ देलियै. . .हिन्कर मोन खराप छन्हि . .केना की करीयै . .किछु नै फुरैत अछि. ।’ “ अ‍ॅ यै हमरा अछैत अहॉ उपास पडब . . .सुइद मूर लगा क’ द’ देब जहिया हैत. आय ई पसेरी भरि अन्न राखू .।’ आ’ तुरंत चूल्हि पजरि जाए । सांझे सकाले खा पीबी क’ पुरूष पात अपन अपन दलान ध’ लैथ छलैथ .।स््रत्रीगण क’ राज त’ घरे अांगन टा मे. . .छहरि देबार क’भीतर ओ सब शेरनी .बीर बंकाडा ..।मुदा जखने घर सॅ बाहरि के कोनो काज पडै. . त’ होश हवास गुम. .तखन पॉच बरखक पुरूष बच्चा से हो हुनका सब पर भारी पडय लागै. . ।पुरूषक एतेक वर्चस्व एहै जे . .स्त्री की गाछ बिरीछ सेहो डरे थरथर कॉपै ।स्त्री आ’ पुरूष के गिरहस्थी रूपी गाडी के दूनू पहिया मानल गेल अछि . तखन दूनू मे एतेक विभेद किएक़ . .शंभू बाबू स्त्री शिक्षा के पक्षधर छलाह .. . . .ओ राजा राम मोहन राय . .केशव चन्द्र सेन. . गॉधी. .नेहरू सॅ विशेष प्रभावित छलाह .हुनके सह पर सम्पूर्ण परोपट्टाके स्त्रीगण तकली :टकुआः आ चरखा पर सूत काटि क’ दैन्ह आ’ ओ मधुबनी जा कए खादी भराड मे जमा क’ दैथ. . ओही ठाम सॅ बांग .. :तूर : आनि क’ सेहो वएह देथ ।घर पैलवार के सबसॅ छोट भाय. .हुनकर गप गॉधी जी सुनने छलथि. . पंचकोशी के क्रान्तिकारी जुवक सब सुनै छल. .बहिन ..भौजाय. . भतीजी सब के चिठ्ठी पतरी लिखए जोगर पढाय वएह करौने छलथि .। राति आयल ।फेर वएह उछन्नर .. नीन्न हुनक लग पास आबि के सब के बेसुध करि दै. . मुदा हिनका छकाबए लागैन्ह. . ।निशा रात्रि . .. चारहु कात. .सुन मसान . बाध बोन सॅ नढिया .गीदडि . .कूकूर क कानब. भौंकब ।वएह टूह टूह इजोरिया .. फेर सॅ आकाश देवी धरती परअपन अमृत घट ऊझीलबा लेल उत्सुक . . .शीतल बयार बहय लगलै. . ।आ’ ई कहबी जे अद्र्व रात्रि मे भूत प्रेत भ्रमण करैत रहै छै. . हुनका बड अनसोहॉत लागैन्ह . .।ई त’ ब्रम्ह सॅ साक्षात्कार करबा क’ मुर्हूत अछि ।मोन अहिना बऊआबैत ढहनाबैत .. . .अ‍ॅखि के अपना संग नेने ओही कदंबक गाछ तरि स्थिर भेल ।रतौंधी बला बुढबा चौकीदरबा के स्वर से हो बन्न भ’ गेल छलै।मुदा आय कोनो परि वा चुडैलएखन धरि नहिं आयल छल । आ’ हुनका भेलन्ह किंस्यात भ्रम भेल होयन्हि । . .एहेन पवित्र जगह मे .. कदंब .केरा .नेबो लग कतो ओहेन ओहेन अतृप्त आत्मा भटकै । आकाश मे पितडिया थारी जकॉ पूर्ण शशि अपन हास परिहास मे लागल छल .दुधिया चांदनी. .बरैक बरैक क’ ओस बिन्दु के रूप धरि थारी सॅ खसैत रहल छल . .।आब हुनक धियान सबहक दलान .चार .. खपडैल . .कोठा खरिहान गाछ बिरीछ सॅ ढनमनाइत. . .लग पास मे सूतल चारि टा खाट आ’ पॉच टा चौकी पर सूतल पैघ भाय आ’ बेटा भातीज सब सॅ निकसि विधु प पडलन्हि कतेक सुन्नर . . जेकर सहोदर बिष हुए. जे खारा पानि सॅ उत्पन्न . .अशांत उद्विघ्न जननी के कोखि सॅ एहेन शीतल सुन्नर संतान के जन्म . .कुदरत वा ईश्वर. . अपरंपार हुनक लीला ।चरखा चलबैत झूकल बुढिया जेना इसारा सॅ हुनका दिस सोमरस फेंकलकैन्ह. . ओ लोकि क’ पीने छलाह. . .।टुन टुन. . छमछम . .अप्सरा . .नाचि रहल अछि. . इन्द्रक दरबार मे. . घूॅघरू आ’ तबला के जुगलबन्दी. . वाह वाह .. अप्सरा जीत रहल अछि .. झन झनन . .झन .. नीन्नटूटि गेलन्हि. . परात भ’ गेल छलै. . .बरदक गरा मे बान्हल छोट छोट घंटी बाजि रहल छल. .कत्तो कियो पराती गाबि रहल छल. .।खुभिया आय हर जोतय लेल बरदक सेवा मे अन्हारे सॅ लागि गेल छल ।नींमक ‘ठारि नमा क’ दतमनि तोडला आ’ ओहो खुभिया संगे भमरा बाला खेत पहुॅचला “एतेक चाकर चौरस खेत अहि चऽऽर मे ककरो नैं छै भायजी ।’खुभिया जहन कहलकै .. त’ ओ गॅहिया क’ चारूकात हेरए लगला. . गौरव सॅ हुनक सीना आओर चौडा भ’ गेल छल ।खेतक कनिए कात सॅ बडका नदी के धार बहै छलै .. ..मुदा ओहि दिस सॅ ओय खेतक लेल .. कोनो विघ्न नैं छलै. . माटि कटबा के कोनो भय फिलहाल त’ नहिए छल ।लहलह करैत धान अगहन्नी. . ।किछु आओर अपन खेत घुमए लेल दूर दराज मे देखाए पडि रहल छल ।पहिनुका जमाना .बॅटेदार सब सेहो ईमान बाला. . मालिकक घरक भले पॉच बरखक बच्चे किएक नै ठाढ होय. .. हुनका परोछ मे.. कटनी नै करै ।एक एक टा खेत सोना उपजै छलै सोना . .सबहक दलान पर पुआरक बडका बडका टाल .. . . किछु के बडका बडका बखारी सब दूरे सॅ झलकै. . अन्न पानि राखए लेल. . माटिक कोठी त’ घरे घर छईए छल ।छोट सॅ छोट जमीन बाला के साल भरि क’ फसल त’ निकलिए जाए । जखन भूतही बलान मे बाडि आबै तै बरख त’ तबाही मचबे करैक ।ओना कृषि प्रधान समाज मे गामक सबलोकक पेट त’ भरिए जाए .. ओय समे के जाए छलै कमाबए लेल परदेस. . ताहू मे तिरहुतिया सब .. बड कम . .. ।हॅ आन आन जगह के लोग त’ ताहू समय मे त्रिनिदाद. . मॉरिशस. . कत्तएकहॉ नै जाए .. आ जौं लोक गेलो हेताह त’ हुनक भत्र्सने भेल हेतन्हि तत्कालिन समाज मे. . ।किछु पंडित सब .. बंगाल चलि गेला. . किछु आगरा. काशी .जयपुर आदि आदि जगह .. मुदा तखन हुनक भॉति भॉतिक कपोल कल्पित खिस्सा जन साधारणक मनोरंजन सेहो करैक । धीरे धीरे अंधेरिया राति होमय लगलै .. आब दृष्टि ओतेक ताकतबर नहिं लगै .. चारहू कात घुप्प अन्हार. . सबहक दलान पर मद्विम करि क’ जरैत लालटेम . ..पन्दरह दिन धरि प्रकृति के लटारम अहिना चल्ौत रहल .. आकास मे चमकैत .. कोटि कोटि तरेगन. . .फेर इजोरिया आबए लेल जोर मारए लागल छलै. ।अध रतिया क’ कनिक टा के चान आबि धरती के छबि निहारए लागै । आय राति मे . . . .जखन ओ गायत्री जप करैत बैसल छलाह .. फेर देखैत छथि. . अहि बेर स्त्री के माथ पर नूआ नै बडका बडका झमटगर केश. . .ओ बडका कका के दलान दिस बढल मुदा फेर ओ कदंबक गाछ दिस मुडि गेल. .।कनिए काल मे .. एक गोट लमगर पुरूष . .बडका कका के दलान सॅ उतरि धड झुकौने ओहि कदंबक गाछ मे विलिन भ’ गेल । अकस्मात हुनक मस्तिष्क मे कौंधलन्हि ई त’ काशी थीक बडका कका के पूत. . . .मुदा ओ स्त्री . . .ओ . .. के .. . ्र.।आ अही प्रश्नक उत्तर प्राप्त केनाय हुनका लेल अंगे्रज के देश सॅ खदेडनाय सॅ बेशी आवश्यक बुझाय पडय लागल छलैन्ह ।एक मोन भेलैन्ह जे पएर दाबि क’ एकर पछोर धैल जाए . .. . मुदा दोसरे छन अपन छुद्र विचार पर हुनका ग्लानि भेलन्हि ।नीक बेजाए . .पाप पुण्यक तत्व मीमांसा मे पौडैत हुनका ओंघी धरि दबोचलकन्हि । कएक दिन धरि बडका बडका केस हुनक मोन के ऊनक बडका गुच्छा जकॉ ओझरेने रहलन्हि . .ककरा सॅ पूछि. . .कोना की सोचतै लोक़ . ।मुदा नहि रहल गेलन्हि त’ भोजन समाप्त केला के बाद आने माने सॅ ज्योतिषक खिस्सा सुनबैत बजलैथ ‘स्त्री के बडका बडका केस. . डाढ सॅ नीचा . .ओकरा राजरानी बनबै छैक़ . ।’ अहि प्रसंग प. भॉति भॉति के मुॅह बिचकबैत. . हुनक . .गृहस्वामिनी बजलीह ‘ऐंऽऽऽऽऽऽऽऽऽह अंगोरा . . .बडका कका जे बूढ मे छौडी बियाहि क’ अनने छलथि. . से त’ बरकेसा रानी अछि. . ड़ाढ सॅ नीचा नागीन जकॉ लहरैत मोटका जुट्टी. . .मुदा राजरानी के कोनो लच्छन त’ नहिं देखाय पडलै ककरो ।सोलहम बरख होईत होई त कका के सेहो सुरधाम पठा देलकन्हि ।एक टा मुसरी धरि के जनम नहिं द’ सकलै बेचारो. ..जीब रहल छथि सतवा पूत आ’ पूतौहक नौडी बनि ।कत्तेक गंजन करै छन्हि .. सनतीया के माए. . ।’ बस . . .हुनका सूत्र वाक्य भेंट गेल छलैन्ह । जड काल नीक जकॉ सुरू भ’ गेल छल. . मोफलर सॅ कान बन्हने. . मोटका चद्दरि ओढने . . बाध मे बूलैत काल खुभीया सॅ बजला. “ ऐं रौ. . . .हमरा टोल मे भूत आ’ चुडैल क’ खेल कोना संभव छै .. . .. ई यज्ञ भूमि. . . हमर बाबा परबाबा कतेक रास यज्ञ .हवन पूजा पाठ केन्ो छलैथ एतय .. ।’ खुभिया गुमसुम . .माथ झुकौने धार क पानि मे उमकैत माछ सबके हेरैत रहल छल ।कनि काल बिलमि क’ बाजल ‘भायजी . . .जौं अहॉ सराप नै दी आ’ खराप . नै मानी त’ एक टा एकान्ति हमरो आहॉ सॅ करबा के लालसा छल ।’ ‘केहेन गप करए छ .. तोरा एहेन लोकके आय धरि कियो गारि वा सराप त’ कात जाओ कियो रे कारो करि क’ बाजल छ. . तू अपने एतेक बुद्वियार. . पैघ छोट के आदर करए वला . .एहेन विचार तोरा मन मे कोना एलो .. तू त’ हमर सबस बिसबासी लोक छ . ।’ बड गहीड सॉस खीचैत बाजल. . “मुदा ई गप जौं तेसरा के कान मे जेतै. . त’ हमर सबहक जीबन परलय भ जेतै ।’ “नै नै. . हे ले. .हम अप्पन जनेऊ के सप्पत खाए छी ..तेसर कान मे त’ हमरा मुॅह सॅ नहिए जयतौ. . ।’ “भायजी. . हमर आंगन बाली बडका कका के घराडी पर काज करै छै .. . एक दिन बडकी काकी ओकरा सप्पत द’ क’ पेट गिराबए के दबाय दोसरा गाम के एक टा बैद सॅ म्ांगबौलखिन्ह .. ।आ’ ई कहलखिन्ह जे जौ कियो जानत त’ हम जहर माहूर खा क’ त’ मरि जाएब . .आ’ ई पाप तोरे माथ पर जेतौ .. तोहर बाल बच्चा परजेतौ. . ।’हम त’ ओहि दिन बुझि गेल रहिए .. .मुदा डरे हम की बजितौं . .कासी बाबू सेहो आबि क’ हमरा दूनू परानी के धमका क’ गेल छलखिन ।’ ओ ठक बक जकॉ कतेक काल धरि खुभिया के देखैत ठाढ रहि गेल छला. . ।सम्पूर्ण शरीर मे अजीब सनक प्रकंपन होमए लागल छल्ौन्ह. . .. ।असक्त भ’ खेतक आरि पर बैस रहल छला। बडका कका के ई चारिम विवाह छलैन्ह. . . दू टा स्त्री त’ तेसर आ’ चारिम प्रसव काल मे वीर गति के प्राप्त कएने छलथि . .तेसर के बाप अपन बेटीके सासुर के मूॅहे नहि देखए देलखिन्ह .. तीनो नाति भगिनमान बनि क’ मातृके मे रहि गे ल छला ।. .ई चारिम . .पचास बरखक वय मे. . . ओ एकर पुरकस जोर लगा क’ विरोध कएने छला . .त’ वृद्वजन हुनका दबाडि देने छलथि . . ‘तौं त राति दिन गॉधी .. चर्चिल . .चाऊ करैत करैत अंगरेजी विद्या पढि अंगरेज भ’ चुकल छ।आहि रे बा . .अहि मे हर्ज की. . . घोडा आ’ पुरूष कहियो बूढ होय छै. . जखन समाज मे बहू विवाह प्रचलित छैक . चारू कात तुरूकक राज . .ओही कुकर्मी सबहक हाथ सॅ अपन स्त्री सब के बचेनाय . .अपन जाति बचेनाय हमर सबहक कत्र्तव्य थीक . .त’ अहि मे अहींके किएक दोष बूझि पडैत अछि. . सबसॅ बेसी अक्कीलगर अहीं छी।निरधनक बेटी के एक टा आश्रय भेट जेतै. . ।’ हॅ आश्रय त’ अवश्य भेट गेल रहै. . भरि जीवनक लेल. . भले बारह बरखक कन्या पचास बरखक बर. .।छल . .छदम . .व्यभिचार . .शोषण. . स्त्री के जीवन के जोंक जकॉ ग्रसित कएने अछि ।नारी मुक्ति के लेल ओ किछु नहि कए सकला .। किछु काल क बाद हुनक नजरि ऊपर आकास मे अटकल . .जतए ओए दिन बडका चान छल . .अखन दिवाकर महाराज स्थापित छैथ।मुॅह सॅ निकलि गेलन्हि. “ .कमजोर चान कलंकित अछि कि प्रचंड शक्तिमान भानु .. ।’। इति। उत्तराक नोर केहेन उदासी के मोटगरि चद्दरि मे लपेटल लटपटायल . ई जगह .. .लागि रहल अछि ।जेना सदाबहार गाछक सबटा पात झरि गेल होय ।सायं सायं बहैत बसात मे कत्तेको रूदनक स्वर मिलि क’ एकटा भयंकर चित्कार करि रहल अछि ।ओ गाछ . ओ बिरीछ. . ओ चिडै. . ओ चुनमुनी .. .. अपन उत्साह बिसरि कहुना करि अपन दिन कटैत हो जेना ।दूर .. पहाड .. . शाश्वत भ्रमक परदाफाश करबा क प्रयास मे प्रकृति के रहस्यवादी दृष्टिकोण सॅ फराक हटि क’ किछु आओर राग अलापि रहल छल ।कत्तेक अपरिचित भ’ गेलै. ई सब जे कहियो ओकर जीवन क ह्दय प्रदेश बनि चुकल छल । कसकि त’ उठल रहै मोन । बड दिन क’ बाद . . आंगुर प’ गिनलक . .पॉच सावनक बाद .. . ओ आयल छल मसूरी फेर सॅ .. ।जगह त’ वएह छलै. . ओहिना आकास. . के छुबैत. . पहाड़ . .पहाड .. प’ झूमैत हरियर कचोर ऊॅच ऊॅच गाछ. . . ओहिना साफ . धोल चमकैत वातावरण. . .ओहिना मकान क छत प’ कार . . .मुदा ओकरा ओकर जादुई आकर्षण बड निघटल लगलै ।ओ गप नै छलै. . जे ओकरा बौरा देने छलैक़ . . कि खिलखिल करैत .. जीन्दगी सॅ लब लब भरल।. . . ओ वसंत. . सन्न सन्नबहैत बयार सडकक कात बेंच प’ बैसैत मातर ओकर धियान दूर पर्वत प ससरति कारी सन कोने बिन्दु जकॉ वस्तु प’ पडलै. . वायनोकूलर सॅ झट देखलक़ . बकरी .. पहाडी बकरी .. ओकरा हॅसी लागि गेलए. . ठठा क’ हॅसि पडल छल. . बकरीयो के की सूझलै. . ओत्ते ऊपर चरय लेल गेल ।ओही दिन पूर्णिमा के चॉद ओही बकरी के झुंड सॅ कनिए उपर विश्राम करैत ओही परम सुन्दरता के निहारि रहल छली ।ओकर नजरि आब चॉद प’अटकि गेलय ।मुॅह सॅ स्वर फुटि पडलै. ‘चलो दिलदार चलो. . .चॉद के पार चलो. . . । . . ‘हम है तैयार चलो. . ।’आ विकल के स्वर मे स्वर मिलाएब ओकरा फेर सॅ जोर सॅ ठहाका लगाबए प’ मजबूर करि देने छल .. जे कनि क्षण के लेल ओही ठाम गूॅजए लागल छल।छुट्टी के दिन ओ दुनु अहिना सांझ पडय सॅ पहिने बौआबैत ढहनाबैत . .ओए पहाडी के चप्पा चप्पा छानि मारै. .गहराई मे उतरै. . चढाई प दौड दौड क’ चढबाक कोससि मे हाफैत हॉफैत ओही ठाम ओंघडा जाए. .. मौसम त’ अपने आप मे निराला. . .भंगतडाह. . .कखनो रूइस रहलौ. . कखनो. . कानए लगलहूॅ. . कखनो मंद मंद मुस्की. कखनो छिडियाएल. .. आब के संभारत. . .मुदा पहाड ओकर सब रूप प’ न्योछावर. . . कनियो रोषराख नै. . ..सनातन प्रेमी जे छलै. . ।साफ सुथरा निप्पल पोतल आकाश मे नहिं जानि कतय सॅ औचक मे कारी स्याह मेघ आबि झमाझम बरसि जाए .. .माल रोड प’ घुडसवारी करैत दुनु एकदम भींग जाए. . .तहन थर थर कॉपैत देह मे गरमी आनबा लेल. . लग पास के कॉफी हाउस मे जाकए चैन पाबए ।कैमल बैक हिल्स. . प’ घुमैत. . कंपनी बाग के झुल्ला प’ झुलैत. . .दिन सोन चिरैया सन फुर्र सॅ उडि जाए .। लोकक नजरि के बेपरवाही सॅ फेकैत. . विकल .. ओकरा एक छण के लेल एसगर नै छोडय चाहै. . ।. उत्तरा के ओकरा सॅ भेंट सीनियर्स के फेयर वेल पार्टी के मंच प’ भेल रहै. . जखन दूनू गोटे एक टा कोरस गेने छल. . .कि जादू छलै. . ओकर आवाज मे. . राजस्थानी सूफी गायक बला . . देखैतो राजपुरूष. . .राजस्थान के बासिन्दो छलै.. . अहि सॅ बेशी ओकरा किछु जानबा के उत्कंठा कहियो भेबो नै कैल रहै । गीत संगीत सॅ दुनु के लगाव एक टा नव रिश्ता कायम करि देने छल. . जे सर गम के सातो स्वर मे ओ दुनु सेहो समाहित ।कैम्टी फॉल मे नहैत. . .धनोल्टी के गेस्ट हाउस के बरामदा प’ राखल बडका कुरसी प’ बैस. . ओ दूनू त संगीतक नदी मे पौडैत गप सॅ बेसी गीते गाबैत रहैत छल । सुरकंडा देवी के यात्र्रा लेल वएह जिद केन्ो रहै. . नै त’ विकल के धरम करम सॅ कोनो मतलब नै. . .मुदा ओतेक ऊॅचाई प’ मेघक अपन घर मे. . . देखलक एकरा की झूंड के झूंड खिहारैत. . पकडि लेलक जेना ओकरे सबहक सुआगत लेल ठाढ़ . भयंकर नाद से विष वमन करैत बरसैत रहल. . ।ऊत्तरा के त’ हिम्मत प’ मनोमन पाथरि लदा गेल रहै ।ओ त’ गाडिए मे बैसल रहल. . मुदा. . विकल पानि के चिरैत. . ऊपरक चढाई प चढैत रहल मात्र ओकरे लेल ।ओतेक पानि मे पिच्छडि के बिन परवाह केने .. अपना के चार्वाक शिष्य घोषित करए वाला. . । बाजै ओ बड कम . .मुदा ओकर ऑखिक छलकैत भाव मे उत्तरा के सब प्रश्न क’ उत्तर भेंट जाय ।ओकरा प्रेम के आध्यात्मिकता पर नजरि पडय लगलै. . .अहि इंस्टीच्यूट मे आबए सॅ पहिने ओकरा होशे हवास कत्त छलै. . इम्हर ओम्हर ताकए झॉकए के. . .पढाई. . पढाई आ’ पढाई. . .सदिखन प्रथम प्रथम पाबैत .. .ओकर मनोबल. . अप्रत्याशित रूपेन ताकतवर भ’ चुकल छल. . . आ जखन अहि ठाम आयल. . .अहूॅ मे प्रथम. . .।ओकरा लागै असफलता की होबैत छै. . .केहेन होय छै आकांक्षा के अपूर्ण रहि जेनाय ।घर सॅ बाहरि धरि ओकरा प’ ईश्वरक असीम अनुकंपा. . ओ त’ धरती सॅ जेना पचास फीट ऊपर .।आ’ विकल सॅ मिलब ओकरा लेल अप्रत्याशित अनुभव छल .. .प्रेमक प्रथम अनुभूति. ... . . .माता पिता के विरोध केनाय स्वभाविक छलै . क़त्तेको सुयोग्य वर छॉटिक क’ रखने रहैथ. .जै पर ओ आंगुर रखै. .।मुदा ओकर प्रचंड जिद्द. . .आब ओहि मे अहंकार से हो संग ध’ नेने रहै. . .जाति पॉति .. आब के मानै. . छै. . ई जिन्दगी फेर नै भेटत. . . ।के गारंटी लै छै जे स्वजातिय मे विवाह केला सॅ स्वर्ग जेबा के रास्ता खुलि जाए छै. .।आब एत्तेक योग्य . . .निर्णय लेबा मे माहिर संतान के सोझा कोन माता पिता टिकतैथ. . .हथियार खसा देलखिन । विकल कहल. . .हमर अहि संसार मे अप्पन कहए बला अछिए के. . पता . .नहि क़त्तय जनम लेलौ. . .केहेन मॉ के प्रेम ..होय छै. . केहेन पिता के दुलार होय छै .. .अनाथालय मे पलल बढल . . ।अहॉ लेल त’ अप्पन जान देबा के मौका आयत पाछॉ हटय बला प्राणी हमरा नहिं बूझब ।अहॉ सॅ हमरा संसार भेंट गेल. . जेना प्रेमक प्रथम पाठक ज्ञान क’ संग संसारक ज्ञान भेल. ।’ओ कुमारक गरिदनि प’ एक हाथ रखने .. गाडी के खिडकी सॅ बाहर . . प्रकृति के अवलोकन मे लागल छल. . क़ि . .किरर. ऽऽऽऽऽ््््. संगे गाडी रूकि गेलै. . । ‘की भेलै. . .ओ अकचकाएल. . “ट्रैफिक जाम. .’ . रहस्यमय मुस्कुराहट संग विकल बाजल । ‘पहाडो प’ ट्रैफिक़ . ।’ ओकरा मुॅह सॅ निकलल आ’ दुनू खूब जोर सॅ एक स्वर मे हॅसि पडल छल ।सोझा मात्र तीन टा गाडी लागल .. .पुलिस कंट्रोल करैत .. । जाडक छोटका दिन जकॉ अति शीघ्र ट्रेनिंगक ओ अल्पावधि बीत गेल छल. . .बिना झंझट. . खर्च वर्च के कोर्ट मे जाकए. . अपन जन्मजन्मांतर के संबंध पर मोहर लगबा लेलक .. ।एतेक लग रहिओ क’एक दोसर के किछु जानबा बूझवा के मौको नञ्ािं भेटलै . . .तखन लागै संगीते जीन्दगी छै. . मुदा बाद मे लगै . . ओ त’ मात्र .. दूनू के कॉमन हॉबी. . आर की.. । अचानक ओकर हाथ मे ज्ोना माइक्रोस्कोप आबि गेलै. . .ओकर. . बैसब. . ओकर उठब .. पहिने कोना बजै छलै. . आब. . .नै कोनो तमीज नैं तहजीब .. . छोट छोट गप प’ चिडचिडायल सन. . .एक दिन जूत्ता पर पॉलिस नै लागल रहै त’ तामसे आन्हार भ’ पियुन प’ जूत्ता फेंक देलकै. . हजारि रंगक अजगुत गारिक संग । पोस्टिंग त’ दूनू के एके शहर मे छलै .. मुदा दू मिनिस्ट्री मे ।आ अही बीच जेना प्रेमक रंगीन चादरि के एके धोआन मे रंग जबरदस्त भखरए लगलै .. ।छोट छोट गप. . सोचलक . .आर सब मैनर्स त’ सीखिए जैतै. . .मुदा एकरा भीतर तामस किएक एत्तेक भरल छै. . ओ कोना कम हेतै. . .कोन दुख छै. . .कोन अपराध भाव सॅ ग्रस्त छै. . बजतै. . तखन नै .. किछु समाधान . .कोनो काउंसिलिंग हेतै । अहि पोस्टिंग मे ओकर प्रथम शिशु के जन्म भेल रहै. . .मैटरनिटी लीव प छल. . .कुदरत के अजगुत ईनाम पाबि क’ ओकर आत्मा परि तृप्त भ’ गेल छल. . आब किछु नै चाही प्रभु. . .अपन कृपा अहिना बरसेने रहब ।ओकर मॉ पापा आबि क’ किछु दिन ओकर सुख मे शामिल भेल छलखिन्ह. .। विकल के सुभाव ओकरा किछु विशेष बदलल लागै. . ।ऑफिस सॅ आबैत मातर बच्चा के कनी मन्ाि कोरा कॉख मे ल क’. . चाह ताह पीबि क’ सीधे अपन स्टडी मे चलि जाए. . ।कोनो खास गप सप्प नै. गीत संगीतक दरिया जेना सुखा गेल छल .. . .राति मे डिनर करैत दोसर कमरा मे जा कए सूति रहै. . बच्चा भरि राति कॉय कूय करैत सूतै जे नै दैक़ . इहो सही. . ओ त दिन मे सूति क’ नीद पूरा करि लैत छै. . मुदा विकल के दिन मे कत्त चैन . . । छुट्टी मे पडल पडल. .आब ओ बड बोर होबए लागल छल. . बच्चा के कामकाज देखभाल करए बाली बंगाली आया के वात्सल्य प्रेम देखि ओकर मन एकदम प्रसन्न .. ओकरे नीन सूतै ओकरे नीन जागै. . नहायब सफाई. . नैपकिन बदलब. . डिटॉल सॅ ओकर कपडा सब के पखारब . .एकदम समय प’ दूध बना क’ बोतल सॅ पियाएब. .सांझ मे प्रैम प’ सूता क अहाते मे कनी मन्ाि घूमा दै. . एक बेर ओकरा कहबा क’ देर छलै. . ओ फट स’ सीख क’ अनुकरण करए लागै. . ।उमहर सॅ धियान हटि क’ विकल प केन्द्रित भ’ गेलै. . .एतेक उदासीनता किएक एकर व्योहार मे. . .कनियो कोनो अपना पन नै. . पी 0आर 0के स्टाफ जेना बस ठोर पटपटा क’ हाल चाल पूछि लै. . ।नै ऑखि मे ओ चमक .. नै. . ठोर प’ मुस्कुराहट. .. . । ओकरा मोन पडलै. . .पहिनो त’ ओ नहिए बाजै. . छल बेसी. . जखन दूनू के भेंट होय. . त’ गीतकार .. संगीतकार क चर्चा सॅ सुरू होय आ’ गीत प’ आबि क’ समाप्त. . .।किंस्यात किछु परेशानी सॅ गुजरि रहल होयत ।घर मे पडल पडल ओकर दिमाग शैतानक अड्डा बनि गेल छल. सोचलक . बड आराम भेल आब ड्युटि ज्वाइन करि लेबा क’ चाही .. दू मास त’ भैए गेलै. . । एक दिन ओकरा जखन रहल नै गेलै. . ओ चुप्पे ओकर स्टडी मे जा कए पाछॉ सॅ ओर गरा मे हाथ धरि क’ अपन कान ओकर गाल मे सटबैत बाजल ‘कि भ’ रहल छै एतेक मुस्तैदीसॅ।’ हास्य मे कहल ई शब्द ओकरा एकदम चौंका देलकै. . चट सॅ अपन डायरी बन्न करि ओ अपना के ओकर बाहुपाश सॅ मुक्त करैत ठाढ भ’ गेल छल .. ‘अरे चलू तैयार भ’ जाए हमसब एक टा नाटक देखय चलैत छी ।’आ’ हाथ पकडने बाहर बरामदा मे चलि आयल छल । ओय दिन जे भेल हो मुदा एक टा संशय के बीजारोपण त’ अवश्य भ’ गेलै . .। ओकर मन औउनाइत रहलै. . ओ लिख की रहल अछि जे ओकरा सॅ दुराव छिपाव करए पडि रहल छै .।परोछ मे ओही कोठरी मे जाए त’ आलमरी मे ताला लटकैत. . .के जानै कुन्जी कत्तय छै. . ।आब जखन ठानिए नेने रहै ..रहस्यक उदघाटन करए लेल तखन कोन गप . .।ओय कोठरी मे बगीचा दिस सॅ सेहो एक टा खिडकी छलै. . जै प’ सदिखन परदा फैलल रहै छल।दिने मे ओ ओही परदा के कनी घिसका देने रहै ।रात के बारह बाजल . .चारों कात अन्हार .. सन्नाटा. . ।सब कियो खा पीबि क’ सूतल .. कुमार अंगेठीमोचाड करैत कुरसी सॅ उठल. .. ड़ायरी के अनबीरा मे बन्न करि कुरसी प’ चढि कुन्जी के रोशनदान मे राखि देलक ।बस . .ओ दिन छलै .. . । चक्र सुदर्शन सॅ ओकर गरा कटि गेल रहै . . .मस्तक . .कुरसी प’ बैसल .. शरीर. . धरती प’ खसल. .शोणित सॅ .. लथपथ. . .पॉच पॉच हाथ तडपैत. . .मुदा कत्तेक तडैपतैक़ . कनिए काल मे शान्त भ’ गेलै. . टेबुल प’ राखल मस्तक आब पूर्ण गंभीर भ’ क’ आगूॅ के रणनीति सोचैत रहल. . .।मामला गहीड छलै . .सोचबा मे समय लगलै । घर के शान्ति सामान्य रहल्ौ. . .भोजन बनै. . खेनाय खायल जाए. .बच्चा के झूला प’ झूलायल जाय. ..दासी मुसीक मुसीक क’ मेमसाहब के रंग बिरंगी किस्सा कहै. . मेम साहब ठहक्का मारै. . . मुदा ज्वाला मुखी धधकैत रहलै. . लावा नै बहरैलै. .तै स की . । अपन टा्रन्सफर नार्थ ईस्ट मे करा क’ बिना खड खडकेने . .निःशब्द महात्मा बुद्व जकॉ निशा रात्रि के फ्लाईट सॅ ओकर ओही घर सॅ .. पलायन भ’ चुकल छल । जीवन सॅ जीवन पथक लंबाई बेसी होइत एलैहैं ।नीचा हेरब . .खाधि. . गुफा. . वन .. पहाड़ . सागर. . .उपर मात्र एक टा नीरभ्र आकाश. .. .रंग बिरंगी उडैत पाखी . असीम शान्ति के खजाना .. .ऊपर सॅ धियान नीचा एलै. . ताकब सूरू कयल.. ..कोन पन्ना . .कोन पोथी. . कोन पंथ. . मंदिर .मस्जिद. .चर्च . .गुरूद्वारा . .गोनपा. . .ध्यान . .योग़ . ।मस्तिष्क फेर सॅ गरिदनि सॅ जुडि गेलै. . आब ह्दय मे जे परिवर्तन भेल होय. . दिमाग एकदम शान्त. . ।जीवन क’ ओही नाटकीय मोड प ‘यवनिका पतति’ कहि कहिया कत्त नै पूर्ण विराम लगा देल गेल छल।कोनो ‘हयु एन्ड क्राय’ नै मचलै । मसूरी मे फेर अयबा के कोनो सरकारिए प्रयोजन छलै ।आय ओकरा संग ओकर कोर्स मेट वान्या छल।समय अपन शाश्वत फेरी लगबैत ओहि ठाम कनि विसेष काल के लेल विलमल छल. .थाकल थेहियाएल. . ओंघाइत. . ओकर विश्राम क’ मूड देखि जडि चेतन सब अपन श्वॉस रोकने. . कियो कोनो उकठ्ठी नै करै. . कनियो सोर नै हुए . .।सडकक कात बनल बेन्च प’ बैसल ओ ओहिना सोझा के पहाड प’ दूर्््ऽऽऽऽऽऽ्चरैत बकरी के देखय लागल।ओही दिन जेकॉ आय सेहो बकरी चरैत छल. . कारी कारी बिन्दु मात्र ।ऑखि मे चमैक उठलै. . . ‘गडेरिया क’ जीनगी. . पहाड हो वा रेगिस्तान . असुविधा .. कष्ट सॅ भरल. . दीन हीन लाचार बीमार ‘ भीतक छोट छोट घर .. .उजडल उडल छप्पर . . माटीक चूल्ही प’ चढल माटीक बासन .मे . . .खदकैत. . भात. . . .माटिए के परात मे .. सानैत. . बाजरा के आटा . .चुनरी सॅ गंदा हाथ पोछैत. . खीझैत. . धूऑ सन मूॅह वाली स्त्री. . नीमक गाछ तर पडल खटिया .. चीलम पीबैत. . खोंखी करैत जर्जर वृद्व. . .ताड के पटिया प’ चीक्कट केथडी .. .फुल्लल हाथ पयर . .पीडा सॅ कहरैत कृशकाय वृद्वा. . . कनिए हटि क’ पॉच. सात ..नौ .. बरखक नंग धडंग धीयापुत्ता . करिक्का बकरी के बच्चा संग खेलाइत ..गाछ सॅ बान्हल माटिक बासन मे पानि पीबैत बूढ घोडा चारहु कात पसरल लिद्दी. .।’ घबडा क’ ओ ओही दिस सॅ मुॅह फेर नेने छल. ।मुदा कनिए काल मे नै जाने ओकरा की फुरलै ।वान्या के ई प्रसंग सुना ओ ओकर मन्तव्य जानबाक’ कोरसीस कयल. . ‘ई बता जे ओ गडेरिया पैलवार केकर प्रतिक्षा करैत रहै छल .. ओहेन नितांत गरीबियो मे ओकरा केकर आस छल हेतैक ।’ देवदार के सुडौल वृक्ष निहारैत. . वान्या कनि काल मुस्कैत रहल फेर ओकरा दिस ताकैत बाजल. ‘आर केकर . .ओही रोटी ठोकए वाली के जे मैल हाथ अपन चुनरी मे पोछैत छल .. आ .. जेकर तीनों बच्चा बकरी के बच्चा संग दौड लगबैत छल. .ओकरे .घरबला के .. आखिर ओही पैलवार मे ओकरा अलावा और के हेतै कमाए बला . . ।’ “की।” “नै एकदम ठीक ।कोनो पढल लिखल अपन पैर प’ ठाढ जागरूक स्त्री एहेन पैलवार के किएक शत्रु बनतै ।’ “मतलब’ ।वान्या कनि अचरज सॅ . कनि गहन दृष्टि सॅ ओकरा दिस ताकलक। “तौं नै बूझबही।’अनंत मे ताकैत .. अत्यंत विरक्त भाव स क’हि’ ओ वान्या संग ओहीठाम सॅ उठि वापस अपन गेस्ट हाउस मे चुपचाप चलि आयल छल .।। महानगर मे सुनीता “हाली हाली खा लू भनसा हो गैल है. . आ’ भीतरी से कुंडी लगा के सूति रहब।आ’ हे गे निसा .. तू देखीहै बौआ के .. . कोठरिये मे खेलीहै सब कोनो ।’अपन घरक सबटा काज निबटा क’ . . . तीनों धिया पुत्ता के खुआपिया क’एक गोट डिब्बा मे सूती साडी के लत्ता मे गिन गिन क’ सोहारी रखलक़ . दू गो नीसा. . दू गो रीता .. एगो बऊआ. . दू गो हम. . नीसा के पप्पा त’ खाईए लेलकै. . भाई जखनी औतै. . तखनी देखल जैतै. . ।अखनी त’ हम चाह पी के चल जाए छी .. ओ ठीना कोनो नै कोनो घर मे चाह बिस्कुट भेंटिए जाए है. .. आ’ दुपहरिया के खाना बनाब सॅ निचिन्त. . .आ जहिया नहि बनाबै . . भोर मे देर से ऑखि खुजै. . .त’ नीसा अपन सबके रोटी बना लैत छै. . पप्पा आ’ मामा के खुआ क’ ओकर लंच से हो बान्हि दैत छै. . मन मे सोचैत गुनैत मुस्कैत. ..नीसा के काबीलती पर गुम्हरैत . चप्पल पहिर क’ घर से निकलबा सॅ पहिने सोझा ठाढ तीनों धियापुत्ता प’ एक नजरि फेरैत ओ नीसा के फेर से सब बात बूझौलकै. . .घरवला एक कोना मे बैसल चुपचाप बीडी धूकि रहल छल. ।मुॅह प’ कोनो भाव नै. . कहियो नै रहलै आब कत्त से हौक . । जल्दी जल्दी ओ घरक सीढी उतरि गेल . . मुदा भरि बाट अपना संग चलय वाली संग फदकैत रहलै. . “हे गे सोनी .. कनियो देर हो जेत्तौ. .. .त’ ऊ जे बारह नंबर बाली हौ. . आगि उगले लगतउ मूॅह से ‘एत्ता देर क्यों हूआ. ..।’ हमरो बडा खीस बडलौ. . ।ठामे जबाब देलियै. . कोनो सरकारी नौकरी है .. जो हमको ऐसे डॉटते हो ।’मुॅह चुप्पे रहि गेलै ।आ उ जे सात नंबर बाली हौ. . .एक कप चाह पिया क’ बेटा बेटा करि के’ढेर के ढेर काज कराबे लगतौ . . ।कोनो नीम्मन घर पकडा जैतै .. त’ हम ओकरा छोडि देतीयै .. ।फोन अतउ त’ कहतौ .. तुम्हारा तो बहुत फोन आता है ।’ काज से घुरती काल टहटहौआ रौद .. .सुशीला के काज सेहो एक बजे धरि खतम हो जाय छै. . त’ एक घर बचलै . .कपडा वला. . जे काल्हियो हो जैतै .. कौन बेगरता है. . सोचि के ओहो ओकरा संग घर चलि पडल छल .. ।सुरेनदर भेटलै रस्ता मे. . .ई चिकरल ‘हौ जीजा .. .बिजली बला काम हमे डेढ सौ से एक दमडी कम मे नहीं करबौ. . .।’ओ चुपचाप मुस्कैत जाईत रहल छल .. .। ‘आहॉ के बिजलियो के काज आबै है।’सुसीला अकचका क पुछलकै त’ ओ फुलि क’ तुम्मा होईत बाजल “हे हम सब काज कयले हीयै. . .घर बनाबे के रोजा मिसतिरी बला .. माली बला .. सब्जी उपजाबए बला. . . .सब काज केले छिए इहॉ पर .. .गाव मे रहिए त’ हमर बडकी दियादिनी. . राति क ले जाए रहै खेत मे कटनी करवाबै ।’ घर पहुॅचल त’ दरवज्जा खूजल देखि क’ ओकर करेज हिल गेलै. . .नीसा के बाबू. . फोंफ काटैत नीचा मे बीछल चादर पर ओंघडायल. . .तीनों मे से एको धियापुत्ता ने घर मे. . उनटे पैरिए भागल जेना बिच्छा डंक मारि देने होय पैर मे .. .पाछॉ बाला पारक मे ताकल .. पीपरीक गाछ तरे मझली बेटी रीता कानैत ठाढ .. .माय के देखिक ओकर कोढ आर फैट गेलै. . “मम्मी बौआ हेराय गेलौ. . दीदी गेलौ है खोजे. . .।’ ओ त’ पहिनहीं सॅ आतंकित. . .बिन क्षण गमेने. . लग के मस्जिद मे मौलवी लग पहुॅचल. . .आ मौलवी के कही सुनी के निहोरा पाती करैत माईक सॅ एनाउंस करबा देलकै. “डेढ बरक के बच्चा. . रंग गोरा. . गरा मे करिया तागा .. लाल रंगक टी शर्ट पहिरने. . माथ पर बडका बडका झोंट .. .हेरा गेल छै. . जे भले आदमी के भेटै. . .कृपाकरी क’ ओकरा सेक्टर तीन के महजिद पर आनय के नेक काज करौ ।त एही काजक एवज मे अहू के अल्ला दौलते असबाब से भरि देत।’ मौलवी के बोल भरोस पर ओ कनी हल्लुक भ क’ अप्पन घर दिसा बढल त’ बडकी बेटी नीसा सेहो पारक दिस से आबैत छलै.। .मम्मी लग दौडल . . ‘पप्पा सूति रहलौ .. .दरवज्जा खूजल देखि के बऊआ नीचा जाय लेल जीना से एतना तेजी से उतरलौ. . कि जाबेत हम चप्पल पहीरिय पएर मे ताल्ले त उ निपात्ता .. .।’ भायक प्रेम से बेसी मतारी के भयानक आतंक .. आब त’ झोंट पकडि क’ हमरे मारत ई सोचि क’ सात बरखक नीसा ऑखि से ढरढर नोर बहाबैत जोर जोर से कानय लागल छल। दूनू बेटी के ल’ क’ ओ घर आयल .. घरबाला तखनि धरि फोंफे कटैत रहै. . ।पीत्त से आन्हर सुनीता पहिने त’ अप्पन माथ कपार के’ पीट अपन भाग्यके सरापलक़ . जे केहेन निकम्मा जोरे भगमान ओकरा बॉध देने हथीन .. .।तेकरा बाद सूतल आदमी के पएर झीक झीक क’ उठौलक .. “हे उठू नै .. इहॉ परलय मचल है आ अहॉ निभेर भेल सूतल हती .. देखीयौ. . .बौआ काहॉ चल गेलइ .. .माय गे माय ।’आ’ कानय लागल ।. . .. “बौआ कहॉ चली गेलै. .’ई वाक्य जेना ओकरा कान मे घुसि माथ फोडैत निकैल गेल होय .. ।बौआ .. पाथर पर के दूब .. .सोरह सोमबारी कैलकै. . तखनी भगमान देलखिन .. ततेक धडफडा के उठलै . . . जे खिडकी के पल्ला से माथ मे ठॉय चोट लगलै. . कपार दबने उठी के बैस त’ रहल मुदा एको आखर मूॅह से बहरैलै नहिं ।सुनीता बजैत रहलै . .कनैत रहलै. . ।फेर पाछॉ घुरि क’ कहलहक ‘दूनू बहिनी घर बन्न केने रहिए कोनो आदमी कहतौ त न खोलिहै. . .आ’ अहॉ चलू हमरा जोरे . .पुलिस लग .. आ’ जीजा के सेहो फोन करि दैत छिए।’ भाय परसू सेहो ताधरि डिउटी पर से आबि चुकल छल । सब मिलक’ फेर से मस्जिद पर पहुॅचल .. .ताबैत घंटा भरि भ’ गेल छलै . .आ’ कियो अनठिया सेक्तर तीन के झूलाबाला पारक के गेट पर कानैत ओही डेढ बरखक बच्चा के उठा क’ मस्जिद प’आनि क’ राखि देने छलै. . . बौआ के देखक सुनीता के जान मे जान अयलै।हुलसि क’ ओकरा कोरा लेलक आ दूनू हाथ से कसि क’ अपन करेज मे सटा लेलकै. . .अनमोल धन हमर. . । अहि अलबा दोलबा मे सांझ पडय लगलै. . त’ दौडल सांझ बला काज लेल । .. .राति क’ भनसा बन्ोबा काल. . .घरबला के खूब खूब लोहछि क’ कुबोल सुनोलक़ . . ‘बच्चा तक अॉहा के देखे पार नै लगैय. . . . मकान मालिक किराया मॉगे आबै है त’ अहॉ लुका जाय छी .. एतनो नै .बोलल होइय जे दू तीन दिनक बाद आऊ . .बा घरे प किराया पहुॅचा देबए. . .पेठिया से तीमन तरकारिए आनि क’ राखि लीअ. . खाली मुॅह लटकौने . .धौना गिरौने बैसल रहता जे बलु है न सुनीता सरदार ।’ “तू ही न पहिलुका नौकरी छोडबा के ई लगबा देले है. . जे इहॉ बेसी पैसा भेटत. . आब नाइट गाड के दूनू सिप्ट के नौकरी करि के त’हमर पराने निकल जेतै. . .हम नै करबौ ई नोकरी गावे चल जैबे .. ऊहें खेती पथारी करबै. . .।’ गाव के नाम सुनि सुनीता के दिमाग जेना आसमान से धरती पर आ गेलै .. . ‘नै .. दूनू सिप्ट के नोकरी नै करू एके बेर करू. . तनिका आरामो त जरूरी है.इए है .. .।’ ओकर अकड कनि कमजोर पडलै .. स्वर सेहो कनि मोलायम .. .”सूतू त’ तनिका कुंडी त लगा लैतीयै भीतर से केत्ते फिरीशानी होलै . ।” “हे हम कुंडी लगाबए लगलियै त’ नीसा चिकरए लगलै. . नै करहू बन्न .हम नीचा खेलय जेबै त’ हमे की करितीयै. . ।’पति अपन पल्ला झाडि सात बरखक बेटी के माथ प’ राखि देलकै. . .जेकरा इसकूल छोडबा के दूनू छोट भाई बहिनी के देखभाल करै के जिम्मेवारी के संगे आटा सानब .. रोटी पकायब बरतन मॉजब दोकान से बीडी गूटका आनब आ’ आर आर काजक संग कतेको काज करए पडैत छलै. . .उठौलक माय छोलनी आ’ दे दनादन .. .पीठ प’ दू चारिये छोलनी सॅ कमजोर बच्चा . .फर्श प’ खैस पडले. . चान्ह आबि गेलय जनू .. . ई देखि ओकर मगजक पारा तुरंते नीच्चा आबि गेलै. . .”हे संतोषी माय .. ई की भेलै .. .. गै .. बऊआ .. .नीसा .. गै .. ऑखि खोल नीसा .. .’ कोरा मे ल’ क’ पानि छिटलकै मुॅह प’. .ठोर अलगा क’ पानि ढारलकै मुॅह मे .. . .. .कनी काल मे नीसा ऑखि खोललकै. . . । “धिया पुत्ता के एना नै मारे के चाही ।’ बाप कुनमुनेलै. . त’ मूॅह लटकौने माए .. .सब के भोजन भात कराक’ अपनहू खा पीबी क’ सूति रहल छल. . .घरवला के त’ रतुका डिउटी .. .ओ त’ गेल काज प’ । “हे दिन त’ सब कोने के फिरीसानिए मे कटै हैक . . निफिकिर चाही त’ गावे मे न रहितीयै. . ।ऑय हे. . राति एतना हो हल्ला मारपीट काहे भेल. . .।’ “क़थी कहियो बहिना .. .छोटका बौआ के फल फुला के तुम्मा भ’ गेल है भरि भरि राति कानैत रहै है. . ई त’ भिनसरे खा पीबि क’ अपन टैंपू निकालि क’ काम पर चल जाए है. . .. कनिये हटि क’ हमर बाप मतारी के घर है ।त’ काल्हि खुन बच्चा के ले के हम डाकडर के देखाबे गेलीयै. . .आबैत जात बेरो हो गलई आ थाक़ सेहो गलियै .. .हम माय भीरा खा लेलीयै. . .सोचलियै. . .जे एकर पप्पा त’ रोज बाहरे खाय है. . ।काल्हि बाहर न खैले रहै. . .रोटी के डिब्बा खोललक त’ खाली .. .बस पीत्ते आन्हर. . .सूतलाहा बच्चा के डेंगा उठा के जाय रहै फेके बाहर . . दारू के नसा मे सांड बनल. . त’ हमहूॅ पीत्ता गेली. . गैस के पाईप खोलिक अपना देह मे आग लगबै लगलियौ. . ओ’ त’ पडोसिया हल्ला सुनि के दौडलै. . आ’ हम्मर चुन्नी से आगि मिझैलकै. . .दू थापड मरदावा के मारबो कैलकै .. .तखनि जा क’ सांत भेलै ।’ “जे बूझे छियै . .त’ कथी लै नहिं दू गो रोटी बना के सदिखन घर मे रखने रहै छी. . ऊ न खतई त’ धिया पुत्ता खा लेतै. . कोनो जिआन थोडे न होत. .।’ मीना के हिरदय एखेन धरि ओही आगि मे झुलसि रहल छलै. . ।ओकर स्वर बदलि गेलै. . “मार मू झौंसा के ओकर करेज नै डाहब जे आब दलीद्दर के भनसा करि क’ खुएबै. . .हम त’ जाय हिए माय भीरे ।’ सुनीता के करेज ओकर दुख से पसीझ गेलय ।ओ ओकर मदैद करए चाहलकै. . “के भर जिनगी बैठा के खुऔत. . .कोनो काज किए नै पकडि लैत छी. . काज के कोन कम्मी है. . ईहॉ पैसा बरसै है. . .कोठी वाली सब के कनि आटा सानि दिऔ त’ दू सौ टाका. . सब्जी काटि दियौ ..एक टैम खेनाई बनाए के अढाई हजार .. .। अहॉ के बीमार बच्चा ठीक हो जाएत त’ पकडि लेब माय तनि बच्चा के त’ राखिये लेत न. . ।’ ओकर नजरि एके संग पानी के टैंकर आ’ अपना घर के सोझा खटौली प’ बैसल बुधनी प’ पडलै. . “हे बुधनी पानी के गाडी अलौह जो भर ले डिब्बा सब मे. ।’ ओकर सलाह प’ बुधनी उछलि क’ बाजल ‘ओ जंग त’ मारा पीटी हो रहल है ।’’ ‘है चल. . हमहू चलै छियो देखे हिये केकर बाप के मजाल है . . . न भरे देतई. . .।’पॉच पॉच लिटर के दू डिब्बामे .. .भीड मे घुसि घासि क’ कहुना ओ भरिये नेने छल।बुधनी के कहलकै. ‘जखनी देखीहै ..टैंकर हमरा फोन करि दीहै. . हम दौडल आबि के पाानि भरबा लेब तोरो आ’ अपनो।’चार चार दिन प’ पानी आबै है .. त’ लोक की करतै. । सडक टपि क’ सीधा पबलीक इसकूल छलै . .. आ’ ओकरे सीधा मे ओ कालोनी जाहि सॅ सटल ई गाम.. जतय किराया प’ कोठरी ल’क’ ई सब रहै छलै. . . ।काज प’ अबैत जायत ओकर नजरि इसकूल के गेट प’ ठाढ माली प’ पडलै. . कई दिन सॅ ओ सोचैत रहै ओकरा सॅ गप करए के. ।ओही दिन ओ झटकि क’ ओकरा दिस बढल आ गप सप्प मे पता चललै जे ओहो ओकरे ईलाका दिसुका छै. . . अही ठिना माली गिरी के ठिका नेने हैय. . .। ‘ माली के काम त’ हमहूॅ करैत रहलियै ह’ बिजबासन के फारम मे . .. बडकी चूकी नरसर्ररी रहलै ह. . बडका बडका गमला उठाबी राखी. . .खाद पानी दियै. . निकौनी करियै. . बडी दिन तलक हम ऊ सब काम कयले हियै. . .।’. . . “त’ काहे छोडलू. . .उहॉ . ।’ “फारम के मालिक त’ बडा मानैत छलै हमरा. . .ओही मे ओकर बडका कोठी रहलै ह’. . हमरा बौआ के जनम मे हमर कोठरीपर आके पच्चीस सौ रूपीया देने रहै .. कहलकै. . “जे एकर जनम हमरे जनम दिन हुआ ह’ै देखना ई कतना बडा आदमी . बनेगा. . .मुदा ओ त’ सदिखन बाहरे रहैत छलै. . . आ ऊ ठेकेदरबा पैसा देबै मे.. .बडा हरामी . .. सब सनि रबि के पैसा के खातिर ओकरा से झगडा फसाद होय. . . ।अही से इहवा चलि अलीयै .. ।” आ बड चलाकी सॅ मुसैक मुसैक क’ ओ अपन घर बाला आ’ भाय लेल माली के काज गछबा लेलक़ “कि होतै. . रात मे डिउटी करथिन आ’ दिन मे माली के काज क’ लेथीन. . दूनू सिप्ट गाड के काम मे बडा परेसानी तनिको आराम नै. . .।.’ प्रसन्नता के मारे ओकर पएर जेना हवा से बात करए चाहै. . .हाली हाली पहुॅची घर आ’ हाली से बताबी ई खबरि . . । “कि है. . काहे एतना धडफडी देखा रहल छहू .. . ।” जीजा सेहो कोठरिये मे बैसल भेट गेलय. . ।आ डबल नोकरी के गप सुनि सब कियो के मन ताताथैया करए लगलै. . .। ‘चलू कुछो नींम्मन पकाऊ. . .खीर पूडी बनाऊ ।. .पाटी करू. . ।आय हमरा तरफ से. . ... जो गे नीसा . . लछमीया के दोकान से .. .एक पैकेट दूध आ’ आधा लीटर तेल नेने आ. . .. . आटा है न कि उहो मॅगाबे के पडतै. . . .. ।’ सुनीता के जबाब मे ‘कि आटा हो जैते’ ओ बड अधिकार सॅ अपन शर्ट के जेब सॅ नमरी निकालि नीसा दिस बढौलकै. . त’ नीसा उछेल पडलै. ‘हम चिप्स लेबै. ।’ अपन उदारता के परिचय दैत जीजा पचास टाका और निकाललक . .. .रीता सेहो ठुमकल. . हम टॉफी लेबै .. ।’ . “जो जो जे मन होउ खरीद लिहै . .।’ जीजा सुनीता के बूझैलकै. . ‘अब एतना पैसा के की करबहक़ . . दूनू के नाम पर एल आई सी खोलबा दियौ. . .महीने महीने हजार वा पनरह सौ जमा करै के होयत .. आ’ छौ साल मे एके बेर छौ लाख उठैब त’ देखाईयो पडत. . .. नाईट गाड बला पैसा खा पीब घरे भेज .. .आ माली बला पैसा जमा करए .. दू गो बेटी है बियाहे के. ।’छौ लाख के नाम सुनि सुनीता के मुॅह खूजल के खूजले रहि गेलै. . .। फेर कनि काल मे बाजल . ‘ठीके त’ कहैत हथीन जीजा .. खोलि दहु आ’ हमहूॅ त’ कमेटी लगौने छियै. . . ई सामने वाला कोठी. है न ललका फूल बाला . .इहॉ जे अंटी रहै है .. आ’ ओकर बेटा दूनु मिल क’ कमेटी चलाबे हैई ।बडा भला आदमी है. . बोली केहेन मीठ .. जेना मौध चुबे हई. . .सब के समय काल पडला प’ मददियो करे है. . ।’ “हॅ. . हॅ जनेत हीय ए महल्ला मे भला ओकरा लोकनि के के नहिं जानै है. ।’ ‘इंनिरा आवास मे जे पैंतीस हजार के चेक दु मरतबे मिलतै. . .त’ हम पहिले जाकए ईंट ..सूरखी .. गिरा लेबै. . आ’ पनरह दिन के भीतर खाली जमीन पर मकान के जोडैया करबा देबै. . . .ताकि दोसर चेक .. जल्दी से मिल जाए. . ताले . हलबैया बला दू कट्टा जे घरे के सोझा मे बिकाऊ है. . ओ खरीद क’ छोडि देबै ..” ।अपन भविष्यके योजना मे लीन सुनीता मूडी झूका क’ पूडी बेलैत बाजि रहल छल .. .। ‘आहॉ के घर नै ह’ की . .।’जीजा पूडी आ’ खीर के अचार संग सुआद लैत पूछलक .त’ मुडी उठा क’ सुनीता चमैक क’ बाजल ‘घऽऽऽऽऽर ।बियाह से पहिनहीं के है. . पक्का के मकान है. . ई पंजाब मे रहै हलखिन तहिये बनौने छलखिन. . .।’ “त फेर .. अहॉ के इनिरा आवास के पईसा कोना भेटल. . .।’. . “सबके भेटलै परोपट्टा मे .. दू हजार दे क’ आइल रहियै. . पोरकॉ .. .जे हमर नाम गरीबी रेखा के नीचे बाला लिस्ट मे आबे के चाही .. न त’ हम सूद सहित पईसा बोकरा लेनाय जाने हियै . .।’घरवला एकदम चुप्प .. जेना सुनीता मालकिन .. आ ओ ओकर खवास. . .।भाय सेहो चुप्प ।हब्बर हब्बर सबके खुआ पिया क’ ओ अईंठ बासन समेटय लागल छल .. दूनू नाइट गार्ड अपन अपन कम्म्ल. .ओढना झोरा झपटा ल’ क’ ओही पूसक थरथराति हाड हाड कॅपाबैत राति मे डियूटी पर जाय लेल निकलल ।छोटका बच्चा त’ सांझे सूति रहल छल. . दूनू बहिनी खाईत मातर पटापट ओछेना पर खसि क’ बेसुध ।तीनो के पतियानी से सुता के कम्मल चद्दरि ओढबैत झॉपि तोपि क’ निचिंत भेल . .।पछवारी देबाल प बडका कलेंडर टॉगल रहै. . हॅसैत लडकी के ।ई की. . ई त’ फाटल है. .कनि सुन अटकल. . .ओकर दिमाग फेर सॅ गरमाय लगलै. . ई हे छौडी सब के करिस्तानी होतै. . ।मन भेलै. . सूतले मे एक एक लात दूनू के मारी घींच क’ .. मुदा चुपचाप मन के बलजोरी काबू मे राखि .. कनिसून आटा घोरी क’ आगि प’ बरकौलक़ . आ’ तपते तपते चमस सॅ उठा क’ देबार प’ कलेंडर के साटि देलकै. . .। जीजा सेहो दूनू गोटे के संगे निकलि गेल रहै. . .मुदा कनिकबे काल के बाद ओ आपस कोठरी मे आबि गेलै।सुनीता बरतन धोकए दरबज्जा बन्न करितै कि ओ कोठरी मे पइस गेल रहै. . कनि काल लेल त’ ओकर मुॅह सूखा गेलै .. .मुदा की बजितै. . .। ‘हे देखियौ आय बिदेसी बोतल अनने हियै. . .अहू पीबियौ न एक घोंट. . ।’आ जबरदस्ती बोतल खोलि क’ ओकर मुॅह मे लगा देलकै. . सात रंगक मूॅह बनबैत ओ बाजल . ‘धूर मंसा .. अहू नै हद करै हीयै. . जाउ न मेहरारू रस्ता देखैत होयत . ।’ ‘ कनि देरे से जेबे त’ कोन जुलुम भै जेतै. . ।’आ’ सौंसे बोतल एके बेर मे पीबी गेलई । गोर नार . . लमगर पारत नीक नाक नक्स. . .बाली सुनीता . . . बीतबा कारी बूढ घरबाला. . .तखन जै जमाना मे बियाह भेल छलै. . सुखीतगर घर छलै. . लडिका पंजाब मे कमाइत छलै. ।. ओ बजाज के गमकौआ तेल. . पचास रूपया बाला. . .. . चमचमौआ नूआ पहिर छडी सन देह . . मलकैन बाली शेखी सॅ चलै त’ छोटका के संग बडका लोक के नजरि सेहो ओकरा प’ अटकि जाय .। ‘ओ पंजबिया के घर छोडि देलियै. . .अंटी जी त’ भिनसरहीं काज पर निकलि जाए. . आ साहब भरि दिन घरे मे .. कहै “सुनीता पैर दबा .. माथ दुखाता है माथ दबा. . ।’बजै जे हबाई जहाज के उडाबै है. . मुदा भर दिन त’ घरे मे घुसल देखीयै. . ।जेने जेने काज करियै. . .गिलास मे दारू नेने ठाढ भ’ जाय. . कहै. . जे तूमको पलौट लिख देंगे. . .।ओकरे पलौट लेल हम खग्गल हीयै. . .मन त’ कहिया से घोर मठ्ठा हो रहल छलै. . मुदा बेटा के बियाह के दिन ओकर घर के काज छोड देलीयै .. .।कत्तनो कहलकै. . मैडम जी तैयो न गेलियै. . पइसो लेबे न गेलियै ।’ रानू के सुनबैत चलल जाय रहल छल । “ है हाली हाली किएक चलल जाए छी ।’ सुशीला ओकरा बडका बडका डेग मारैत देखि क पूछलकै त’ चलिते चलिते ओ बाजल. . “कुछ न पूछू दिमाग खराप भेल है. . नीसा के पप्पा के ठंढी मार देलकै. . .जीजा के फोन आयल छलै. . .जाय हिए डाकडर लग।’ घर आबि क’ लहसून तेल बरका क’ सौंसे देह मे मालिस कैलकै. . .गरम गरम चाह बना क’ देलकै. . दलदल्ली तइयो नै कम भेलै .. ।तखन पडोस मे रहय बला डाकडर ओत्त ल’ गेलय. . देह मे गरमी आनै के सूईया देलकै . . .।गार्ड के ठेकेदार के फोन नंबर ओकर मोबाईल मे फीड छलै. . कोनो नै कोनो चेन्हासी लगा देने छलै जीजा. . .सब नंबर के सोझा .. जाहि से ओकरा कोनो प्रकारक फिरीसानी नै होय फोन करय मे . . .तुरंत ओ ओकर घंटी बजौलकै. . “हैलौ. . हम सुनीता बोलता है. . नीसा का पप्पा को ठंढी मार दिया है. . डाकडर के पास है. . आज रात का डियुटि नहीं करेगा . . ।आ’ हे भाई साहब उसको दिन का डियुटि दे दो न .. बडी ठंढी है. .गरम कपडा भी जादा नहीं है. एतना त’ कीरपा करो भैया .।’आ ओकर डियुटि किछु दिन क लेल बदलबा देलकै. . । इम्हर किछु दिन से ओकर माथ चकरायल रहै छलै. . कुछ न कुछ गडबड हो रहल है. . .तेसरा महीना चढि गेलै. . ।जेठ मे बौआ के मूडन गछने हीयै भगता के इहॉ. . सब गुड गोबर हो जेतै. . ओ अपने नसबंदी करौने है. . ।ओकर मन धुक धुक करैत बेसुध होबय लगलै. . .कि करू कि नै करू किछु फुरैत नै है. . तुरंते फेर जीजा के फोन लगौलक़ . ‘हे जीज्जा .. . . . ।’ ओ ओकरा भरिपोख भरोस देलकै. . . ‘अहि मे फीरीसान होबै के कोैना बात है. . सनिच्चर के दू बजे दिन मे आबै हिय .।’ घरबाला घरे मे रहै बजलक ‘ बडा तबियत खराप लागे है. . पेट मे मोचाड . .दस्त .. जाड .. जेकॉ लगैहै. डाकडर लग जाय हीये .. नीसा खेनाय बना देत त’ खा पी क’ डिउटी पर चल जायब. . उहॉ त’ देखबे केले हीयै कतना भीड रहै है. . .।’ ंमहिपालपुरक एक गोट किलनिक मे जतय ओ एक बेर और आयल छल. . सुरेन्दर संगे. .पहुॅच त गेल मुदा डाकडरक टेबुले पर ओ बेहोस भ’ गेलै. . चारि बोतल गुलकोज चढैल गेलै तीन घंटा के बाद ऑखि खूजलै .. त ऑटो मे बैसा क’ ओकर घर से तनिका पहिनही उतारि जीजा अपन घर जैत रहल. . .।कहुना लडखडाति .. .हॉफैत .. .ई अप्पन कोठरी मे आबि पहिनहीं से बिछौल चदरि प’ धडाम सॅ पडि रहल. . “मम्मी मम्मी’ धिया पुत्ता सब हल्ला कयने रहै त बड मोसकिल . से ऑखि खोलि क’ अंगुरी ठोर प’ राखि क चुप रहबा के ईसारा केलकै. .। सात बरखक नीसा बड बूझनूक तुरंत बूझि गेलै .. मम्मी के मोन जादा कराप है. . गिलास मे बोतल से ढारि क पानि देलकै. . अपन छोट छोट हाथ से माथ मे गमकौआ तेल लगेलकै. . हाथ पएर जॅतलकै. . .ओ निन्न पडि गेल छल । देह पीयर . . . ऑखि पीयर. .. .एकदम कमजोर । कोठी बाली सब फोन प’ फोन करय लगलै. . .त’ फोन के स्वीच ऑफ करि क’ राखि देलकै. . . मने मन गरियैलकै. . ‘जरलाही सब मरलो मे चैन नही लेबए देत. ।चारि दिन अपने से बरतन मॉजि ल्ोतै त’ हाथ घीस जतई।’ आठ दिनुका बाद कहुना करि क’ काज प’ पहुचल .. त’ दू टा काज त’ छुटिये गेलए. . .के ओतेक दिन बिन कोनो सूचना के .बिन आस के इंतजार करितै. . । “हे ई की हल्ला सुनै हीयै. . .।सब कहै है. . लाल फूल बाला कोठी के अंटीजी राताराति अपन मकान बेच के भागि गेलय. . .दूनु माय बेटा. .।’ “आय .. भागि गलई. . दादा हो दादा . .हमर एक लाख रूपया ओकरे हिया जमा रहै हो दादा .. . दू बरख से हाड हाड गला के .रिक्सा खींच खींच के .. पेट काटि काटि के ढेऊआ जमा कयने रही हो दादा. . ।’बीरेन साह बेसुद्व भेल अपन माथ प’ मुक्का मारैत ठामे के ठामे बैस रहल छलै. ।नथुनी राय से फराक अपन छाती कपार पीटय लागल .. ‘हमर डेढ लाख .. . रूपीया .. कतबो कहलकै. . मालिक .. पोस्टापीस मे राखे लेल. . मुदा नै मानलियै .. हमे. . .कहलियै जे हमरा लोकनि के अंटीये बैंक आ’ पोस्टापीस है. . न कोनो फारम भरे के झंझट .. .नै .. लिखा पढी करे के. . एको रजिसटर पर लिख लै है. . आ’ अंगूठा छाप लगबा लैत है. . ओ भगतीन बेचारी सदिखन मातारानी के नाम लैत रहै है.. .।’ जहीर अल्ला के नाम ल’ल’ क’ करेज मे मुक्का मारय लागल छल .. “अल्ला हो अल्ला. . ड़ूबि गेलो सब रूपा. . . हो अल्ला .. आब काहॉ से खरादिबौ अपन एसकूटर हो अल्ला ।’ सुसीला. मालती .मीरा .जोती. .सबहक ऑखि कनैत कनैत लाल टरेस. . “आब की होतै हो बाबा .. दुरगतिया पर दुरगतिया. . . .. बेटी के बियाहे लेल रखले रही पैसा. . .अब कइसे होखी बियाह. . .”। एतबे मे पी पी पी पी करैत सोर मचबैत .. मीडिया के गाडी सब आबे लगलै .. .लोक सब अपन ब्याकुल चेहरा नेने न्याय के आस मे ओकरा घेर लेलकै .. .” . ..आजतक बाला के टीम अपन कैमरा ल’ क’ कखनो फूलबाला कोठी के फोटो लै. . कखनो उपस्थित .. जन समुदाय के. . .।एकाध गो पुरूख पात से पूछताछ करि. चिक्कन चुनमुन जनानी सब प’अपन कैमरा फोकस करय लगलै. . .।आगॉ खडा सुनीता सॅ माइक नेने पुछलकै. . ‘अहॉ बताउ .कहिया से ओकरा सब के जनैत छलीयै। आ’ अहॉके कत्तेक पाय ले क’ भागल. . ।” “हम त’ इहॉ साल भर से हीयै. . .इलाका मे अंटी जी के बड इज्जत छलै. . भंडारा करै रहै. . कीरतन करै. . सब लोक पएर छूबै. . .।हमर त’ अस्सी हजार छलै. . मुदा हमर भाय के एक लाख पचीस हजार .. ।’ गाडी जहीना पींपा करैत आयल छलै. . तहिना पीं पां करैत चलि गेलै. . .। ओय दिन भरि ‘आजतक’ प इएह समाचार आबैत रहल छल .. .।हजारों लोक के रूपैया ठैक क’ ओ सब नै जाने कोन पताल मे घुसि गेल रहै. . पुलिस के थू थू होबैत रहल. . । कनि दिन सब कानि खींज क’ गारि सराप द’ क’ अपन मन के आगि मिझबैत रहल. . . ।एक दोसर के बोल भरोस दैत बाजै. . “चलू बूझबै जे कमेबे नञि कयली. . ।समांग रहतै त’ आरो कमा लेबे. . .लेकिन ओही पपीयहबा सब के नरक मे से गिंजन होतै. . ।’ “एकनी के की कहल जाव अपन घराडी आ’ जनानी दूनू बेच बिकिन क रूपीया कमाय मे माहिर .. .जनानियो एकर सब के एहने होबै है. ।न कऊनो दीन न ईमान. .।’ “परदेस हीकै की करबीही भाय. . .केकरा भीरे जेबीही. . .टीभी मे त’ देखेलकौ की होलै. . .गरीबन के आबाज के सुनै है ..।’टप टप टप ऑखि सै नोर मात्र खसि रहल छल सबहक .। बड दिन से जीजा के फोन नै आबै है. . करबो करै हियै. . त’ कहै है. .जे ई नंबर मोज्ूाद नै है. . ।कहले रहथिन जे कत्त दन त सौ गजा पलाट खरीदै हिये. . पचास गज आहॉ के आ पचास गज हम्मर. . दूनू गोडे उहे मिलके घर बनायब. . ।पइसो पचास हजार देने रहियै. . ।कि भेलै. . जमीन के रजीसटीरी भेले की नोई .. .।’अपन कोठरी मे बैसल . .बडका थारी मे आटा सानैत सोचि रहल छलै कि भाय आबि गेलै. . “हो भैया तनी देखहू त’ सुरेन्दर जीजा के बड दिन से कोनो खोज पुछारी नै भेलै. . कहैत रहै जनू अपन बेटी के बियाह करतै. गाम घर त’ नै चलि गेलै. . .।ओकर आंगन बाली सेहो नै फोन उठाबै है. . तनि ओकर कोठरी प’ जा के बूझतीय्ौ . .हाल चाल निम्मन है न।’ परसूराम अपन देह से कंबल उतारेत. . उनटे पएरे विदा भेल. . ।जायके त’ तनिको मोन नै करे. . .सोचने रहै. . कोठरी मे जाकए खायब आ’ सूति रहब. . मुदा जौं सुनीता के बात नै मानतै त’ ओ बेनग्गन करि देतै. . .।ई गली छोडि के तेसरा गली मे त’ ओकर कोठरी छलै. . .।पतरकी सीरही चढि क’ ऊपर तीन तल्ला प’ पहॅुचल त’ देखैत अछि. . .दरबज्जा प’ ललका परदा टांगल. . .।केबाड खूजल रहै. . .परदा हटा क’ भीतर घुसय चाहलक .. त’ कोठरी के कोना मे इसटोप प’ भनसा करैत जनानी दबाडलकै. . .”के छहू . .एना अनठिया लोक केना घूसल जाय है. . ।”फेर ओ बाहर निकैल क’ पूछलके “केकरा ताकै हियै ।’ परसू अकबकायल सन बाजि उठल. . “ओ बिजली मिसतीरी सुरेन्दर अही ठिना रहेत हथिन नै.. ।’ जनानी के किछू नै बूझैले सिरही के दोसर दिस आंगूर देखबैत बाजल “ हुनकारा से पुछियौन ओही जानैत होथिन्ह ।हम सब नाया किरायेदार हीयै ।’ परसू के उदास उतरल मूॅह देखि सुनीता तुरंत चुल्ही पर से ताबा उतारि गैस बन्न क’ बेकल भ’ पुछलक़ . “ बीमार सीमार है की ..।’भाय के किछु नहिं बाजैत देखि क’ ओ तेजी से उठि क’ घर से बाहर जयबा लेल पएर मे चट्टी पहिरए लागल कि भाय के मुॅह से फुटलै ‘कहिया से जानैत छलही ओकरा. . .’ओकर माथ प’ ओही ठंढी मे सेहो पसीना चुहचुहा गेल छलै. . “किएक पूछै छहू. . . दू तीन बरख से जनितै रहलियै ह’।” “ओकर कोनो पता ठेकाना मालूम हौ. . ।” “से त’ नई अ. . .कहने रहै जे बलु अहॉ के गामे के बगल के गाम मे हमर ससुरारी है. . .. अब कोन गाम से त’ नई पूछले रहियै. . .। से की भेलै. . ई लाल बूझक्कड जेना काहै बूझाबय लगलहू .. .हाली हाली कहू नै की बात है ।नै त’ हम अपने जाय ही ओकरा घर ।” “अब जाय के कोन फायदा .. . होतौ. . .ऊ त’ कोठरी छोडि के कतहू आर चलि गेलै. . यैलाईसी के नकली एजेंट बनी .. कतना आदमी के पईसा ठकि लेलकै. . अपन मकान मालिक के सेहो चूना लगा के भगलै. हम्मर किसमत हे भगबान. ।’ सुनीता के चक्कर आबि गेलय ओ एक डेग आगॉ डू डेग पाछॉ झूमैत झूमैत. . .ठाढे ठाढ धडाम सॅ जमीन पर खसि क’ बेहोस भ’ चुकल छल ।। संटू क उपनैन बसकट्टी धरि त’ सब किछु बड नीक जकॉ चलि रहल छल . ।मंझौल वाली काकी अपन .चारों पोता के उपनैन लेल कहिया .सॅ नहि देवता पीतर के भखनै छलीह. . . . . . चारों परदेया बेटा आखिर छुट्टी ल क’ गाम मे आबि क’ उपनैन करए लेल तैयार की भेला . . कका काकी के जेना बूडल राज्य भेंट गेलन्हि. . .चारू दिस जेना रोनके रौनक । पूरा घर दलान ढौरल गेल. . .खेत खरिहान साफ सफाई भेल ।दलान क सोझा राखल जारैन गोरहा सब के पछुअ‍ैती मे आमक गाछक तर तेना क’ तह लगा क’ राखल गेल जे क’ल’ प’ हाथ पैर धोबै लेल आबय वला लोकक नजरि मे नै गडै । पछवारि टोल .. .टोलबा प’ कत्त कत्त नै लोक दौडैत रहै दिन भरि. . . काजक ब्योंत मे .. । “हे .. ओकरा सब के साफ सुथरा मे चलए. . बूलए के आदति छैक .. . .ई गामक रस्ता .. .आ’ ओहि मे बसबिट्टी. . . . . . . कनि महेसबा के कहियौ. . .नीक जकॉ एतए सॅ अपन बसबिट्टी धरि के रस्ता साफ करि देतै. . .भरि टोलक लोक त’ जेना . . . ।” काकी. महेसबा के माय सॅ बजैत बजैत. .नाक भौं सिकोडति अपन ऑचरि उठा क’ नाक प’ राखि नेने छलीह ।ओ कठजीव. . . तुरंते आबि क ल’ग मे ठाढ़ ‘हजार रूपैया सॅ कम नञि लेब .. .एतेक गंदा है ऊहॉ .. . .।”ओ अलगे नाक ऑखि मूनैत. . भिनकैत भिनकैत जेना बाजल त’ काकी तुरंते हामी भरि देलखिन्ह. ‘रे .. .जो. . न । .. पाय कौडी जे हेतै से त’ देबे करबौ न।’ आ. बसकट्टी के बाद महेसर. . अपन गाल बजबैत .. . जनानी सॅ भरल ऑगन मे अंगेठी. मोचाड लईत बाजि रहल छल. ‘दू .दिन से. . बलू. . . . . . टोली वला सब के रोकने रहियै. . .ऊहॉ गंदा नै करै लै .. .छौडा सब के बिस्कुट चॉकलेटक लालच देलियै. . . देखलियै . . .आहॉ सब कत्ते साफ सुथरा हल्लै. . .सडक . .. आ’ बसबिट्टी. . . एतेक साफ त’ कलक्टरो के नै रहै. . . ।’ गणेश .सुरेश .. .दिनेश तीनों संगहि बाजल. . . “तैं न तोरा प’ ई बडका काज छोडल गेल छलौ. . .तू बड काबील छै. . .।’ ताबैत मे सॅझला भाय मॉ के तकैत आंगन मे अयला . ‘हलवाय के कत्त बैसैल जाए. ।’ काकी झट दनी भगवती घर सॅ कोनो काज छोडि बहरेली. “ललन बाबूके दरवज्जा प’ बैसाबही नै .. . ओतय अ’ड’ छै. . . आ’ जगहो चौरस. . ।’ म्ॉझला भाय जे चारों कात खरिहान सॅ ल’क’ पिछुबाडि धरि साफ सफाई भेल जगह के फेर सॅ साफ करबा मे लागल छलाह ‘कुटुम सब के एला सॅ पहिनहीं चारों लैट्रिन बाथरूम एकदम चकाचक भ’ जेबाके चाही।” छत के ऊपर मॅडबा बनाओल गेल छल .. मॅडवा. छाजए के .. . .. .चरखट्टी के .मधुर .. गीत नाद सॅ चारो कातक वातावरण मॅह मॅह करए लागल छल . .. लाल पीयर धोती .. .अंगना सॅ छत धरि डोरी प’ सुखैत. .बड मनोरम दृश्य उत्पन्न केने छलै. . । कुम्हैनिया के ऑगन मे पैसैत मातर .. .दीसपुर वाली पीसी चिकरए लगलीह ‘आय गै. . .आब तोरो सबके बिदागिरीए करबा क’ आनल जेतौ .. . .दू दिन सॅ मुनमा . .दौग दौग क’ जा रहल छै. . कुम्हर टोली .. .आ’ तोरा सब के कनियो दरेग नैं .. जे जल्दी जल्दी हाथी घोडा रैंग ढोर क’ पठाबी. . . अखन बरूआ सब बरमस्थान जेतै .. .घोडा चढाबए लेल. . . आ’ तू एखने आबि रहल छैं. . मार बाढैन तोरा. . ।’ कुम्हैंनियॉ .. .गोगैं करैत बाजल “दीदी. . .केते लगन हैक भरि गाम मे . . .मूडन . .उपलैन. . .वियाह. . . हाली हाली त’ सबके समान पहुॅचाईये रहल छिये . .”आ हुनक क्रोध सॅ बचाबा लेल दॉत निपोरि क’ ठिठियाय लगलै. . . । “नेग दियौ. . बडकी पीसी बरूआ के. ।” “हे . .हम बरूआ के बापे के पीसी छिए. . . .छिनरो .. .ई हो नै .. बूझल छौ. . .।” बडकी पीसी ओकरा दबाडैत. . . .चिकरैत बजली ‘गै आबै जाही बरूआ के पीसी सब. . .कुम्हेंनिया के नेग दै जाही ।” नेग खोंईछ मे राखैत. .ओकरा मुॅह प’ प्रसन्नता के लहरि दौड गेल रहै । गोटागोटी करैत सब कुटुम सब आबि गेलाह. . .दलान प’ पूरूख आ’ घर ओसारा प’ स्त्रीगण . .. । बिध बाध सबटा ऊपर छत प’ मॅडबा लग भ’ रहल छलै. . .जेठ मास. . .सरबत लस्सी सब के इंतजाम करि क’ राखल छल. तौला के तौला जमल दही बोरा मे भरल चूडा. मूॅगबा पैनतोआ . मुदा परसनहारे निपता . .. हलवैया .. .एखनधरि. . .आगि नै पजारने . “ मार बाढनि जनपिट्टा के. . .रै बौआ .. .केहेन हलबैया आनलैंहै. ।” संझला भाय कुरसों वाली पीसी के गप प’ ही ही करि क’ हॅसए लगला “ततेक लगन छै. . .सबटा हलवैया .. .पहिनहीं सॅ बुक .. . एक गोट पीपरौलिया बाला गछने छल. . .एन मौका प’ धोखा द’ देलकै. . .ई नब छै. . .हमरे ओतए सॅ काज सीखतै. . . ।” “केहेन जुलुम केलही तुहु रे .. ऐ सॅ’ नीक त’ हमरे कहितहि त’ सब मिल जुल क’ भानस करि दैतियौ।” किनको पानि भेटन्हि त’ चाह नै. . .किनको दबाए खेबाके रहैन्ह .. मुदा भिनसरे सॅ बासी मुॅहे. . .।भीषण अव्यवस्था . .... ब्डकी कनिया घोघ तर. सॅ छोटकी ननदि के बजौलखिन्ह .. “कीचन मे जाकए फटाफट .. कुकर मे भात चढा दियौ. . .दीदी सब भूखले छथिन्ह .. .हलबाई सॅ दालि तीमन आनि क’ हिनका सब के खुआ दैतियैन्ह . ।” मॅझिला भाय के सासुर सॅ बड बेशी पाहुन आ’ सबसॅ कम चुमौन .. . .. ।पाहुनक खातिर दारी हुनके प’ छलैन्ह .. .मुदा बडका पद सॅ रिटायर्ड ससुर के कुरसी लग नीचा बैस क’ ओ हुनकर म्ूॅह देखैत पैर मे चुरूक भरि तेल पचब ‘मे लागि गेल छलथि ।बडका भाय ब्रह बनल मडॅवे प’बैसल .. .सॅझिला हलुवाई के टीक प’ ठाढ़ . .कतहॅू किछु चोरा नै लिअ .. .छोटका. . जै पाहुन दिस खेनाय पिनाय ल’क’ जाथि. . . ओहि ठाम बैस मुख्यमंत्री बनबा के अपन उत्कृष्ट महत्वकांछा के घोडा प’ घोडसवारी करए लागैथ. . . बचला . .कका स्वयं . . .त’ अस्सी बरखक अथबल . . सुनाईयो नहि पडैन्ह. . । मॅझली भौजी . . .अपन तीनों भौजाई . .बहिन आ’ माय के ल’क’ घरक पट बंद करि लेलथि ।दू घंटा के बाद पट खुजलै. . .त’ छोटकी ननदि सबहक कान मे फुसफुसा क’ कहि रहल छलीह ‘देखलियै .. जादू. . .आयल छलैथ त’ सब केहेन कारी कारी झमारल झमारल . . . .आ’ घर बंद करि क’ कोन एहेन क्रीम पाउडर लगैेलथ जे सब गोर गोर. . .कि कपडा लत्ता. . .बनारसी . पटोर. . ।” बडकी भौजी छोटका भायके बरूआ के केश नेने छलथि ताहि लेल ओ अनौने .. . .।काकी .कहनौ छलखिन्ह. “बडकी बीमारे रहै छै. . .मझॅलीए ल’ लैतै केश. . ।” त’ मॅझली चट सॅ चमकि क’ बजलीह “ंंमॉ हमरा सधा क’ पठौतिह. . ।” हारि क’ बडकीए कनिया के लेबए पडलै केश . .। सबसॅ मुॅहजोर मैझिली. . . . . कत्थी लेल ककरो एक रत्ती पानियो लेल पूछतथि ।बेर बेर नूआ फेर क’ अपन संबंधी लग जा बैसैथ ।बिध लेल सोर होय “है मॅझली भौजी .. .है. . संटु के धोती दियौ नै. . .।’ कनि भन भनाइत कनि मुॅह चमकाबैत .. . रानी रूपमती के अंदाज मे अपन पएर उठबैत आबैथ । “चारू बरूआ के समान एक ठाम डाला प’ राखि दियौ. . ।बेर बेर आबए पडै छै. . .।’ ननकू बाजल त’ मॅझली अपन करिया मुॅह चमकाबैत .. . बजलीह “सबहक हम ठेका नेने छी की. . . हमरा संटु बाबू सॅ मतलब अछि ।’ दनौही मे . . .बरूआ सब नहा ‘क’ ठाढ़ . .बडकी भौजी छोटका बरूआ के बिधकरी .. .ओकरे मे लागल. . .अपन बेटा के धोती कुरता बिसरि गेलथि ।काकी के तामस चढय लगलै. . मॅझली के छोट बुद्वि के जबाब नै. . एतेक दिन सॅ बाहरि रहै छै. . तैयो. .किछो बाजबै त’ भरल आंगन मे घिनमाघिन करए लागत ।” कल्याणपुर वाली पीसी एईठ क’ बजली” ऐ बाहर रहने की होय छै. . चालि .. प्रकृति .. बेमाय .. ई तीनों संगहि जाय. . .माय केहेन छै. . ककरो सॅ बजबो नहिकेलकै. . दछिनाहा सब. . ।” ननदि सब फेर ननकू के निहोरा करि क दौडेली . ‘जो बौआ भगवती के सोझा मे ललका डाला प’ शुभम के पीरा धोती राखल छै. नेने आ दौडल .. ।”ओ बिफरल “हम त’ मझली भौजी के पहिनहि कहने रहियै. . कहलखिन्ह जे ठेका लेने छियै ।” मुदा ननकू जल्दी सॅ सायकिल सॅ जाकए धोती नेने आयल । उम्हर पोखरि सॅ घुरि क’ ऑगन पहुॅचैत मातर दोसरे दृश्य . . .हलवैया एखन धरि भोजन नै बनौने .. . तरकारी बनि क’ एक दिस राखल . . .आब पूडी छानय लेल लोहिया चढा रहल छल. . . “एै रौ. . .एतेक देर किएक भेलौ. ।सांझ पडि रहल छै .. कुटुम सब भुखलै. . बैसल छथि .. ।”बडकी पीसी के गप प’ हलवैया बाजल. . . ‘तखनी सॅ चाह कौफी. . बनाय रहल छलीयै. . मंझली कनिया आबि क’ कहलखिन्ह. .दस बीस गो परोठा बना दिय हुनकर बाबू भाय सब नै खेने छथिन्ह .. ।” “हलबैया लग सॅ सब टा रसगुल्ला गायब छै. . कन्हैया कहलकै .. मॅझली कनिया कोठरी मे पहुॅचा दै लेल कहने छलखिन्ह ।”छोटकी ननदि का्रेध मगज प’ चढल .।काकी क’ ल जोरि के बेटी के चुप करौलन्हि. ‘ . घिना नै . .कत्तो सॅ सुनतौ त’ जुलुम भ’ जेतै .।’ “छोटका दियर आबि क’ मॅझली भौजी के कहलखिन्ह “भौजी अहॉ अपना सर कुटुम के त’ भोजन करा दियौ ।” रंगल टीपल मुॅह प’ विचित्र सन भाव आनैत पटुआ सन तित स्वर मे बाजि उठलीह ‘लाज नै होईत अछि .. ।’ई वाक्य के व्याख्या तखन भेल जखन पोल खूजलै जे ओ त’ पहिनहीं अपन कुटुम सब के खुआ पिया चुकल छलीह .. मुदा चाहै छली जे सब कियो हुनके कुटुम के आव भगत मे लागल रहै . मॅडबा प’ बरूआ सब के भीख देबा काल .. मॅझली फेर अडि गेली “पहिनै हुनके माय भौजाय भीख देथिन्ह. ।”काकी के मन घोर भ’ गेलन्ह ।बडकी पीसी आगॉ बढि क’ बजलीह “कनिया पहिने घरक लोक भीख देतै ..तखन बाहरक़ . ।अहिना बिध होईत छै. . .।हुनक ऑखि लाल होमय लगलैन्ह . .माथ प’ कनि घोघ तानैत .. .कन्हुआ क’ बडकी दियादिनी दिस देखली .. । ‘एकरे खातिर माथ प’ नूआ आ घोघ तानए पडैत अछि .. ।’मोने मोन गरीयेने छलीह ।मुदा मोन मसोसि क’ भिक्षाटनक विधि संपन्न होमय देलखिन्ह । उपनैनक परात चारूकात अहि बातक चर्च होमय लगलै. . ‘मंझली कनिया के सबटा कुटुम बिगैड क’ चलि जायथ रहलखिन्ह. . .नीक जकॉ सुआगत जे नहि भेल रहैन्ह. . ।’ छोटका भाय अपन कपार ठोकैत बजला “आहि रे बा. . सब के छोडि क’ हुनके सब मे लागल रहितहू सब गोटे. ..अपन जमाय बेटी त’ सब लाज धाक तजि क’ लागले छलैन्ह ।जै कुटुम के आव भगत मे त्रुटि रहि गेलन्हि. . ओ बेचारा सब त’ किछु नहि बजलखिन्ह. . ।” काकी ऑखि सॅ ईसारा करि ओहि प्रसंग के समाप्त करबा लेल कहि क’ ओहि ठाम सॅ उठि क’ जायत रहल छलीह। शाश्वत कथा पार्टी सम्पन्न होबैत होबैत. . . राति के बारह बाजिए गेलए. . .।भरि पेट खा पीबि क’ लोकवेद त’ जाईत रहल . . .मुदा घनश्याम गार्डन के कनि कात मे जेबा लेल ठाढ केदारनाथक हाथ कसिक पकडि बड करूण स्वर मे बाजल. . . ‘आय अहॉ नहि जाऊ भाय. . . मन बड उदास लगैत अछि. ।’ ‘उदास. .’ . केदारनाथ के हॅसी नहिं लगलैन्ह. . . एतेक बडका धूमधाम . लाईट साउंड़ . ...पौप .. . .. फिल्म स्टार वाला पार्टी. . .सुरा .. सुन्दरि. . . .के बावजुदो जीनगी के ओ रस नहि प्रदान कयल .. .जेकरा लेल. . .किंस्यात हुनक मोन चातक पाखी सन लालायित रहैन्ह. . .।लिफ्ट सॅ दुनू सीधे टॉप फ्लोर के अपन भव्य ड्राईंग रूम मे जाकए दरवज्जा बंद करि संपूर्ण संसार सॅ ओझल भ’ गेलथि । “की गप करू. . . . आफिसक़ . . .स्त्रीक .. . प्रॉपर्टीक़ . .शहरक़. . . .”। “नै ......नै. . .किछु आन .. . फुसियाही. . . खिस्सा कहॅ..ु।” “आन कोन. . .बीतलाहे आब खिस्सा छैक़ . यर्थाथ . . .भोगल. . .”.। “शहरक खिस्सा मे की छै. . .कोन सुआद. . .खाली भटकाव. . .निरासा. . .भय .. .आतंक़ . .। .” “बेस. . तखन गामक खिस्सा सुनब. . .।’ “कोन गामक।” “कोनो गामक . . . नाम मे की राखल छै. . . चरित्र त सबहक एकरंग .. . .माटि पानि के गमक त’ एक .. . . आ मष्तिष्क मे बसल सुसुप्त आकांक्षा. .. अतीत के फेर सॅ जीबाक चाह .. . हॅ गामे के कहू. . . . हालाकि गामक जीनगी बड कम दिन बीतैलहु. . .. बड अभिलाष छल समस्याग्रस्त गाम सबहक उत्थान लेल . . .अवस्स किछु विशेष काज करब. . . मुदा सामर्थवान भैयौ क’ तेहेन नै जीनगी के मकडजाल मे ओझरा गेलहु. . .जे मोन अहुरिया काटि क’ रहि जाएत अछि. . . देखाबटि मे पानि जकॉ. .पाय बहा देल जाय छै. . .अहि सॅ अपन मातृभूमि. . के. . .कतेक हाथ. . .के काज़ . .कतेक के रोटी. . . .आदरि सॅ भेंट सकैत अछि. . .आस नहि छूटल अछि . ..एखनो. . आब भगवानक कीरपा जहिया. . . . .तखन सुरू करू खिस्सा .. . .।’ खिडकीसॅ दूर. . .अन्हार समुद्र मे. . .चमकैत लाईट. . .कोस्ट गार्ड. . वा व्यसायिक जहाज के निहारैत . .. कनि काल धरि मौन रहला. . .हुनको ऑखि किछु भरभरायल सन छल. . . .जेना अतीत क ताप सॅ दग्ध भ’ सीमा विहिन होमय लेल बाट ताकैत छल. . .नहुॅ नहु. . करि क’ मुॅह खोलला. . “राजा जनकक जुग के सुनब की. . .लखिमा ठकुराईन जुगक .. .की सोनिया गॉधी के जुगक़ . ।” “वाह. . . ईतिहासक की काल विभाजन कयल अपने. . .अदभुत. . .। इंदिरा आ सोनिया के मध्य समयक खिस्सा कहू।’ “ खिस्सा मे काल के बड महत्व छैक़ ।अहि सॅ अहॉ ओहि कालक राजनैतिक आर्थिक़ . सामाजिक आ मनोवैज्ञानिक स्थिति के अवलोकन करि सकैत छी ।सुनु. . .. गामक स्त्री.. समाजक खिस्सा. . पोस्ट इंदिरा गॉधी पीरियड .. . .. “एकटा छली सोनदाय एकटा चानदाय ।दुनु एकदोसरा लेल साक्षात जमराज .. .जौं एकटा के अवसरि भेटतैन्ह त’ दोसरा के सदेह जमलोक पहुचा दैतैथि. . .मुदा .. .मनुक्खक मजबूरी. . . .ताहि लेल कतेको दशक सॅ एक दोसरा के सहि रहल छलथि. . .।ओना दुनु अपन अपन बल देखेबा सॅ बाज नहि आबैथ .एकटा अपन घरक बल .. दोसरि समाजक़ . .। आ’ अहि धमगज्जरि मे आनंद उठाबैत समाज .. .। ओही दिन आंगन मे उसीनिया भ’ रहल छल. . .धानक़ . .जाड मास .. .सोनदाय खबासिन लग मोडहा प बैसल देखि रहल छली. . . .कि ताबैत चानदाय डगरा मे कनी चाऊर आ बूट नेने अयलथि।डगरा कनि कात मे ओसारा दिस राखि मिझैल एकचुल्हिया प’राखल खापडि उठा क’ कहलखिन्ह. . “गै .. मरदन्नी बाली .. . .ई खापडि चढा क’ ओय चुल्ही प’हम्मर चाउर आ’ बूट भूजि दे।’धान उसिना गेल रहै. . हॉय हॉय कनस्तर उतारि क’ मरदन्नी बाली आंगन मे उझीलए लागल. . . ।जरैत ऑच देखिक चानदाय खापडि चढा देलथि आगि प’ ।ई देखि क’ सोनदाय के सौंसे देह मे खौंता फुकि देलकन्हि. . .।चट सॅ मोढा सॅ तमैक’ क’ उठि धीपल खापडि हुनक देह प’ फेंकैत धधकैत अंगार सन बोल बजली ‘बड शौख अर्ररेलन्हि अछि भुज्जा खायक े .. त’ कनसार मे भूजा लौथ नै दरवज्जे लग त’ छै. . . अन्हार भ’ रहल छै. . .हिनका सूझै नै छन्हि .. ।”ओ मुडि क’ डगरा उठबैत छलीह . . ....धीपल .खापडि हुनक पीठ प’ खसलैन्ह. . .ओ चिचिया क’ दलान दिस भागल छलीह .. ।पीठ पर का नूआ कारी सॅ रंगेबाक क्रम मे कनि लहकियो गेल रहै ..।” “सोनदाय एहेन चंठ किएक़ . . .कि चान दाय हुनक सौतिन छलीह।” “ओह अहॉ की बाजि गेलौं ।आय के जुग मे सैोतिन के बॉटि खूटि क’ सरकारे भिन्न करि दैत छै .. .तै ओ दूनू सौतीन त’ नहिए टा छलीह .. । खैर .. .जे. . .से. . .चान दाय कुहैर कुहैर क ओ राति कटली .. .जेना विगत मे अनेको अवस्से कटल हेतैन्ह. . ।आ भिनसरे कियो आंगन मे सोनदाय सॅ कहय एलैन्ह जे तीन पहरि राति मे . . .एकपेडिया सॅ बाध दिस हुनका जायत देखल गेल । सोन दाय दस ठाम सॅ मुॅह बिचुका क’ अपन अनंत घृणा देखाबए चाहली. . .मुदा क्षण मात्र मे अपना के रोकि क’ एकगोट मॉजल कूटनीतिज्ञक जेकॉ अडोसिया पडोसिया के सुना क चिकरैत अपन छाति पीटय लगली “ई हमरा कत्तो के नहि छोडलथि. . आब त’ ई की की नाच नै नचौती।दैव रौ दैव ।आब हम करू त’ की करू .. .क़त्तेक पैघ ई फसादी छथि गै म्या। ” मुदा के गेलय धडफडायल पोखरि . . .तालाब. . .रेलक पटरी प’ ताक़ . . . .। दिन चढैत. . . बीतैत .. . .ई खबरि टोल की सौंसे गाम मे बूलए टहलए लगलै. . . आ’ राति देखि सबहक संग खबरि सेहो निफिकिर भ’ सूति रहल. . .छल । दिन .. सप्ताह. . .महीना बीत गेलै. .टोल समाजक दिनचर्या ओहिना चलैत रहल. . . ।आ’ फेर एक दिन. . . .चानदाय. . ओहि गाम की. . .ओहि टोलक अपन ओही दलान क चौकी प’ बैसल देखाय पडली “बहिन बजेने छल. . . .. दुखित छै. . .के जेतै देखय .. . शोणितक हिलकोर हमरा रोकि नहि सकल छल. . .छोट बहिन . .बेटी दाखिल. . .कोरा कॉख क’ खेलौने छियै. . . ।” सोनदाय आंगन सॅ चारिटा सोहारी . आ’ कनि भाटा अदौडी के तरकारी. . .एकटा .. . कनकट्टा अलमुनिया के झॅपना मे राखि .. .. .जखन की हुनक भनसा मे स्टीलक थारी बाटी भरल छल . . . . ..भातिजक हाथे पठा देने रहैथ .. .। “ ई कोन खिस्सा भाय. . .एहनो कोनो खिस्सा होय छै. . . ई त’ विशुद्व रूप सॅ त्रिया चरित्र के बखान करि रहल छी. . .जेकरा शास्त्र सेहो ‘नेति नेति’ करि निषेध कयने अछि ।” “त्रियाचरित्र कत्त. . . .ई त मानव मनोविज्ञानक रहस्यमय वर्णन थीक़ . .. .अब्बल आ’ बलमानक’ .. दीया आ’ तूफानक़ . .खिस्सा छै .. . शाश्वत कथा. . . .जुग जुग सॅ चलैत एलैए. . . .की दरिद्र .. .की मातवर .. . की पढल . .की मूरूख .. .की शहरि .. की गाम. . .सब ठाम एकरे तांडव .. .मुदा आधुनिक समाज आब एकर विश्लेषण करय लागल. . कि आखीर एना किएक़ . . ।त’ अपने कनि अपन वाणी के विराम दियौ आ’ हमर श्रवणामृत वाणी सॅ अपन कर्ण कुटीर के गुंजायमान करू । सोनदाय चानदायक संघर्ष क’ कथा अपन चरमोत्कर्ष प’ चढल चलल जाइत रहलै आ’ हिनका हुनका .. बडका छोटका .. सबके भावनात्मक धरातल प’ सब प्रकारक रस प्राप्त होबैत रहल .. . । मुदा खिस्सा त’ खिस्सा नहिं भ’ क’ जीबनक अंग बनि गेल छल ताहि लेल लोकवेद के तेहेन कोनो उत्सुकता नहि बॉचल छलै . .। उत्सुकता भेलय .. . . मुदा तखन .. .जखन हंसा एसगरे जायत रहलै . .. .कलपैत. . . .कनैत. . .बोकरैत .. . पेटकुनिया . . .देने. . .उपस्थित समाज सॅ क’ल’ जोरि क’ माफी मॉगैत. .. . . एकला चलो रे. .. एसगरे जाए रहल छली. . . .मान अपमान सॅ भिन्न. . . भूख पियास सॅ मुक्त. . .अपन आन. . .नीक बेजाय सॅ पृथक़ . . .। . .. कोठरी फोलल गेल. .त’ ऊपर चार मे . लाले लाल. .सुखैल जारैन खोंसल. . .निकालल गेल त’ करीब मन भरि. . . . मटकुडी सब मे . .सरबा सॅ मूॅह बंद करि राखल. . . चीनी. . . चाहक पत्ती. . .अचार .. .दालि. . . आमिल. . . सत्तु. . .अदौरी .. .चाऊर. . .घीऊ. . . .नहि जाने कत्त्ोक चीज पतियानी सॅ लगा क’ राखल. . . .चौकी के नीचा .. टुटलहिया बाकस मे .. .एगारक जोड नूआ. . .चारि टा शॉल. . .पॉच टा . . साया .. चारि टा आंगि ..दू टा स्वेटर. . . . . . चानी के हॅसुली.. . . .पनरसै टाका .. .बीस पैसाही .. .एक टा मटमैल सन बटुआ मे मूह बान्हि क’ राखल .. ।.. . कतेक रास अठन्नी .. चौअन्नी पॅचपैसाही. . .एक टा लत्ता मे लटपटायल. . . .। ओकरा ऊपर मे नीमक पात. .बाकस के ऊपर गोईठा .खडही. . बोरा. . .केथरी. . ।. ई एत्ते टा . . .राज पाट .. .लोकक ऑखि ढाबूस बेंग जकॉ बहरायल. . . टोलक लोक संगे भरि गामक लोक ई रानी महारानी के साज समान देखए लेल आबैत काल अपना मुॅह मे किसीम किसीम के गप सप्प भरने. आबै. . .आ .. पागुर करैत . . .गप के उनटैत पनटैत अपन विचार के परम सत्य मानैत. . .जाईत रहैत छल । “घोर आश्चर्य नै मदन भाय. . . .जेकरा की नै .. .।’ “जौं पहिनहिं सॅ बूझल रहितै. . .।’नबका घरक सीमटी बाला सीढी प’ बैसल आन आन लोकक संग ..सोन दाय के पच्छ मे समय जेना ठाढ भ’ गेल छलै .. .सहस्त्रो जिव्हा सॅ बाजय के मौका दईत “से सएह अहॉसब कहै जाईयौ. . .बडका बाबू .. .तखन हमर कोन दसा बाकी रखने छलीह .. .ईरनी बिरनी सन बगै बनौने. . .फाटल पुरान पहिरने . . .हिनका हुनका दरवज्जा प’ बैसल पहरि धरि. . . .नोर बहाबैत. . .खिधांस करैत. . .अपन दुखक फकरा पढैत. . . . .कोन गिन्जन नहि कयलथि हम्मर .. . .हुनका गेला के बाद त’ जेना आर सॉड बनि गेल छलथि .. . बज्जर खसौ ई सरकार के खैरात की बॅटनाय सुरू कयल .. .नीक नूकूत घरक नककटौन जनानी सब लाज धाक तजि क’ पॉत ीमे जाकए ठाढ़ . . . . ।’’ “ जाए दियौ. . .ई काल. . .अहि सब तरहक हिसाब किताबक लेल नहि अछि. . . .आब सोचू जे की कयल जाय. . .।बेर त सरासरि ससरल जा रहल छैक .।’ मझॅला कका आगॉ बढि क’ सोनदाय के व्यतीत सॅ वर्तमान मे तीर तारि क अनला .त’ ओ हडबडा गेलीह. . . ‘गै म्या. . . .केना की हेतै . . .।’ .’हुनक ऑखि भटभट चूबए लगलैन्ह .. . ताबैत भीमनाथ आबि क बाजल “तोंही जे कनबीही तखन कोन काज हैतै. . .भायजी सब बाहरे. . .।’ ओ धडफडा क’ ऑचरिक खूॅटी सॅ ऑखि मीडैत बजली. . “हॅ मझिला बौआ .. .आगि त हुनका भीमे देतैन्ह .. . जीवितौ एयह सेवा सुश्रुषा कयने छलैन्ह. . . तखन आब. . की. . ... ।’ उम्हर हुनके स्ांजोगल लकडी घी आदि ल ‘ क’हुनक आखिरी काज लेल लोक वेद प्रस्थान करैत गेल । कहुना करि क’ राति कटल. . .तीन दिन मे अहि सॅ उग्रास भ। एकाध नोर कानि सोनदाय अपन दलान प’ बैसली. . “गेली बेचारो. . . .अही लेल दुनिया मे अतेक छल कपट. . . अतेक हाय हाय. .’ आध्यात्म संग बैराग्य सेहो हुनका ग्रसित करि लेलकैन्ह.. “कहै छै लोक . . .करनी देखीह मरनी बेर. . . चटपट मे उडि गेलीह. . . हम्मर की गति होयत. . .।” “केहेन खिस्सा अपने पसारि रहल छी श्रीमान. . . जेकर नै कोनो ओर नै छोर. . . .ई की बॉचल जा रहल छै. . .अहि मे कोन मनोविज्ञानक झलकि .. . . ।’ “मनो विज्ञानक झलक़ . . . .एके बेर थोडबै झलकि उठतै .. आकास मे पूरनमासी के चान सन . . . .संच मंच भ’ क बैसू सोमरस क’ आस्वादन करैत रहू .. . कनि मनन करू तखन नै मरम धरि पहुॅचब। तखन किछु दिन टोलक चर्च क’ विषय सोनदाय. . . . सोनदाय .. . सोनदाय .. .।आब हुनक सब हीत एतय .. .आ’ महान बैरी. . .अधर्मी सासुर बाला. . “मार बाढनि .. झॉट बाढैन .. ओहि नगरक लोक के. . .देखियौ त’ करेज़ . .समाद प’ समाद पठाओल गेलै. . .तखनो नै कियो धुरि क’ अयलै. . . हिस्सा बॅटवा काल सत्तासोढे पैलवार छै. . .जाऊत सब पहिने खोजो पुछारि करैत छलै. . .”. . .। “जाय देथुन्ह बहिन. . .ओ बेचारी के जे गति लीखल छल से गति भेलय ।’ मुदा सोनदाय के हुनक गति वा र्दुगति सॅ कोनो तेहेन फिकीर नै छल .. .ओ त’ अपने चिन्ता मे डूबल. . . .ओहि दिन सॅ. . .अहुरिया कटैत छलीह .. .दू बजे दिन सॅ चारि बजे धरि सब लोकवेद ओही काज मे ओझरायल आ’ ओ मौका देखि ओही कोठरी मे पैसि . . . ढकना ढकनी गेरूआ सीरक . .मटकुडी .. . पेटीए टा नहि .. .छोटसन ठेंगा सॅ चार के कोन कोनसॅ झॅमारि क’ अलगा क’ देखलथि. . .मुदा क़त्तौ नै भेटलै. . . .पहसौल वाली के बजा क’ घर ओसारा नीपबैत काल. . .सेहो अपने मुस्तैद रहली. . . कत्तौ ककरो हाथ नै लागि जाए .. .।मुदा कोन फल .. . । भीमनाथक माय पुछलखिन्ह. . ‘पाय के की करथिन्ह बहिन. .’ .। ‘हम अपन हाथ उठाक’ किछु नै करबै .. .अहॉ सब के जेकरा देबा तेबा के अछि . नूआ फट्टा. . सब बॉटि दियौ .. .हम की करबै राखिक।’ सोनदायक प्रवासी पूत सब अयलन्हि. . . ओहि रहस्यमय वातावरण के चीरबा के क्रम मे व्यथित भ’ बजली ‘बौआ रौ. . .ओ त. घर सॅ पडा क’ राधेश्यामक दरवज्जा प’जा बैसलखून. . . .. भरि गामक लोककें कहने फिरथि. . .जे फलनामा के बौह हमरा खाय लै नहि दैत अछि. . .।राधेस्यामक घरवाली सोहाडी पका क’ चारि सांझ खुऔलकैन्ह त’ बाडी झाडी सॅ तीमन तरकारी .. .लताम केरा .. न्ो .बो. . .अररनेबा . . चोरा चोरा क’ ओकरा द’ अबथिन्ह. . .।की पाबनि की तिहार सब मे भंगट. . ..छठियो मे अहिना कयलन्हि. . . परना के परात सीताराम कहलेन्हि जे “काकी .. .अहॉ हुनका खाय लेल किएक नहिं दै छियैन्ह .’ बाजय पडल ‘जे बौआ आंगनि मे पॉच परकारक अन्न सुखाति रहैत छै .. .ओ उठा क’ ल’ लैथ .. हम हाथ पकडबै तखन नै. . . .।मुदा बौआ .. हमरा बड बेनग्गन कएने रहैथ छथि .. . .भात रोटी पठेबै त’ ककरा दलान प’ . . . कोनो ठेकान हिनकर .. . ।” “बेटा .. .. .तौं हुनका दू सौ अढाई सौ टाका द’ दहुन. . .जे सब हुनका खुएने छलखिन्ह. . .।” ई कही ओ अपन महान उदारता के परिचय देलथि त’ बेटा एक पहर सोच मे पडि गेलाह. . .जीबैत हुनका चोरा क’ पाय दी . . तैयो माय हुनका आने माने सॅ गरियाबै. .. अपन पैलवारक दू बरखक नेना के सेहो हुनका लग ठाढ नै होमय दैथ ..जौं कोनो पुतौह माथ मे कनि तेल कुड द’ दैन्ह ..वा पएरजॅतबा के दुस्साहस करैथ.. पकडा गेलीह .. .हुनका वा हुनक धिया सबहक नजरि सॅ तखन फेर ओकर गंजन गंजन. . . तखन चोरा नुका क’ कियो किछु समान .किछु पाय देबा सॅ नहि चूकै .. .. .आय एहेन उच्च विचार । “खिस्सा के अंत एयह अछि जे पचासो वरखक अपन रोआब .. कूटनीति .. .बदला .. .ईष्र्या.. . द्वेष प’ परदा देनाय सोनदाय के समाजक संग अ.पनो नजरि मे आवश्यक भ’ गेल रहै .. .किएक त’ चानोदाय आब बेचारी बनि क’ सबहक सहानुभूति हसोथि नेने रहैथ. . . आब हुनक सबहक मुॅह बन्न करबाक जरूरति अहि लेल पडि रहल छलैन्ह जे आब ओहो एसगरूआ भ’ गेल छलथि. . . धिया पुत्ता बालिग भ’ क’ अपन अपन लोल मे तिनका ल’ एक गोट नव घोसला के निर्माण हेतु उडि चुकल छल. . . .असहनीय एकांत .. . भातीज भीमनाथ. . पीसे काल सॅ आबि क’ नागनाथ जकॉ शरण ल’ नेने छलाह. .मुदा ओकर अपन स्वारर्थ . ।तखन उठबा बैसबा लेल लोकक आवश्यकता त’ पडिते छै. . .चाहै .. कतबो भरल पेट वाला होथु .. . । चरखा मे पूनी जकॉ गप कटैत किछु लोकक जीवन कटैत रहैत छैक़ . .आब अपन पच्छ मे लोक समाज के करबाक छलैन्ह . ..त’ दलान प’ बैसारी मे चाह पानि सेहो आंगन सॅ पठबए लागल छलीह. . .। “कथा के क्रम मे किछु उटपटांग तथ्य सोझा आयल अछि. . . जेना सोनदाय बेकल भ’ क’ की तकैत रहल छलीह. . .।” “अहिरेबा. . . .अहॉ एखन धरि ओहि सूत्र के गहिएने बैसल छी. . . . .बेस. . . ..त’ भेलय की जे चानदाय के कान मे सोनक मोटगर माकडी छलैन्ह. . .दप दप पीयर . . . .ओ गत भेला सॅ पहिनहीं सॅ हुनक कान सॅ गुम भ’ गेल छलै. . . ठोस. . एकदम दू भरि के. . .गरा मे सोनक सीकडी. . .।सोनदायके नजरि ओहि प’ गीद्व जकॉ गडल छल. . . भॉति भॉति के आसंका मोन मे घेरने. . .कतहु अपन बहिन के त’ नहि द’ देलथि. . . .वा राधेस्यामक घरवाली चारि सांझ रान्हि क’ खुओलकन्हि . . .वएह त’ ठकि फुसिया क’ नहि ल’ लेलकैन्ह. . . ।” आ’ ओ मनोविज्ञानबला कोन गप. . .एखन धरि त’ हमरा पकडि मे त’ नहि आएल अछि ।” “नहिं आयल त’ सुनु .. .अब्बल दुब्बर सेहो अपन भविष्यक’ लेल कतेक चिन्तित रहैत अछि . . . . ।जखन चान दाई के कोठरी सॅ जारनि अन्नपानि सब निकसल. . .त’ किछु लोकक कहबा छल जे ‘भरिसक संभावित बाढिक आसंका सॅ ओ अपन सबटा चाक चौबन्द बन्दोबस्त कए नेने छलीह .. जे कम सॅ कम कोठरी मे पडल पडल दू टा सोहारी त’ पेट मे जायत. . .। किछु आओर लोकक कहबा छल जे ओ अप्पन आखिरी कर्मक तैयारी अपने सोझा करि चुकल छलीह. . . . . .जानैत छलीह जे आगॉ नाथ नै पाछॉ पगहा के आगि देत .. . के क्रिया कर्म करत. . कोना क’ पैठ होयत .. से सबटा ब्योंत करि क’ रखने छलीह. . . । मर्मक गप ई भेलय जे भरि जीनगी ईलटल बिलटल सन रहियो क’ हुनका अपन अगिलका जनमक चिन्ता छल. . . .सोनदायक पैलवारक लोक नूका चोरा क’ किछु पाय टाका सदिखन दईतै रहैन्ह .. . आ ओ अन्तत .. गहन रूप सॅ एकरा ओकरा माध्यम सॅ चीज वोस्त मे बदलति रहली. . .मुदा ककरो कानो कान खबरि नै भ’ सकलै. . ।” “बेस. . . .आब त फरीछाऊ .. जे सोनदाय आ’ चानदाय मे कोन तरहक संबंध छल. . .।किएक ओ एक दोसराक’ शोणितक पियासल छलीह. . . ।” “एखन धरि अहॉ बूझि नहि पयलहु. . .त’ हमरे मुॅह सॅ सुनु. . .सोनदाय भाऊज छलथि चानदायक .. . ।” खिस्सा सुननिहार व्याकुल भ कानय लगला. “भाय .. .ई त अहॉ हमरे पैलवारक कथा कहलहूॅ. . . चानदाय हमर पीसी छलीह .. ।” खिस्सा कहनिहार के नशा सेहो चढि चुकल छल ।ओहो विहृवल भ’ कानय लगला. . . “चानदाय हमरे काकी छलीह .. . जमीन जायदाद क’ कागद प’ औंठा त’ लगबा लेलथि . . बाप पित्ति. . .मुदा कहियो घुरि क’ झॉकय नहि गेलथि जे पति विहिन अब्बल नारि भाऊजक खोरनाठी के ताप सहि कोना जीबैत अछि .. .।” आ’ दूनू धनाढय मित्र नवी मुंबई नरूल के ओही एन आर आई बिल्डिंगक बारहवीं मंजिल के अपन पैंट हाऊस मे फफकि फफकि क’ एक पहरि धरि कानैत रहि गेल रहैथ । कनिया पूतरा के विवाह बङका बङका अटैची. . .सूटकेस. . एसी .. टी वी . ..फ्रीज पलंग .. .अगङम बगङमक’ पैकिंग .. ओहिना बान्हल. . .राखल छलै . ओही बङका हॉल सॅ लऽ क’ ओकर कोठरी आ’ तीनो कातक बरान्डा धरि ।घरक बाहरि कंपाउंड मे ललका चरपहिया ठाढ झक झक करैत छल .।लोकवेद के गेलोपरांत. . ओ अपन माथ सॅ घोघ हॅटौलक़ . .नथिया बङ भारी छलै ..नाक बथैत बथैत फूलिक’ घोंघा जकॉ गोल भ’ गेल रहै .. ।नहुॅ नहुॅ ओकरा उतारि क’ ड्रेसिंग टेबुल प’ राखि देलकै आ’ छोटकी नथिया निकालय लेल निहुरि क’ अपन अटैची खोलि रहल छल कि कान मे किछु अनसोंहात . . अप्रिय . . . पटुआ सन तीत .. .लोंगिया मिर्चे सन लेसैत. . किछु कटु वचन तीर जकॉ घुसिक’ ह्दय प्रदेश मे खलबल्ली मचा देलकै . ।क्रोधक लुत्ती जेना सम्पूर्ण काया के एकेबेर प्रज्ज्वल्लित करबा लेल बेकल. . .मुदा मजबूरी . . नब अपरिचित माहौल आ’ पितृगृह के बिछौह . . .सब एके संग मिलक’ मोन के उद्विग्न करि देलकै .. .आ’ डोका सन बङका बङका ऑखि मे नोर डबडबा क’ काजर समेत खसबा लेल बेकल भ’ गेल छलै. . . ।अकस्मात नहिं जानि कोन देवयोग सॅ . ओकर स्मृति पटल के गुप्त खोह मे व्यतीतक किछु .. . . .अन्हार आकास मे बिजुरि जकॉ चमैकि उठलै .. आ’ क्षण मात्र लेल बाढिक’ पानि सन प्रलय मचबय लेल उबडूब करैत. . .ऑखिक पानि ठामेठाम ज्यों के त्यों . . . .ओहिना थिर रहि गेल रहै. ..।ठोर प आयल स्मित मुस्की सॅ. . श्यामल मुख चान सन चमैक उठलै. . . आ’ नोरक मध्य ठाढ भ’ गेल छल .. .कनिया पुतरा के विवाह . . । ओ दिन . . . .छुट्टी चलि रहल छलै गरमी के . .. दूर. . .संथाल परगना के कठोर पथरैल .. .ललका जमीन के भीजैबा लेल . ..उमङैत घुमङैत .. .कारी खरकट बादरि . . नाचि नाचि क’ ल’ग .े त’ आबै. . .मुदा बरसऽ के नाम नै लै .. .खोंझा रहल हौ जेना सूखल टटैल .. .पियासल धरती के ।मेघ त’ लगले रहै सदिखन . . .कत्तो भरिसक बरसल सेहो हेतैक .. .तैं. . .मद्विम .. .तेज बहैत बसात . . .खिङकी दरवज्जा के परदा के उङबैत बङ सोहनगर लागि रहल छल । आ’ एहने सुखगर मौसमक दुपहरिया. . . ओकर कोठरी मे होमए लागल कनिया के विवाहक ब्योंत. . .।लाल मोलायम . . रबङक गुङिया सब के साबुन सॅ नहा धो क’ एकबार प’ पसारि पंखा के नीचा सुखबा लेल राखि .. लाडो . . अडोस पडोस मे अपन किछु संगी सब सॅ राय मसविरा करए चलि गेल . . ।आधे पौन घंटा मे त’ घुरि आयल छल .कोठरी मे पैसिते . . .ओ दृश्य देखि ओ ततेक कैस क’ चिकरल छल .. .जे दोसर कोठरी मे विश्राम करैत दादी जे आइये गाम सॅ आयल छलीह झटकारैत बङका बङका डेग भरैत ओकरा लग आबि ठाढ भ’ गेलीह .. ई देखि हुनको कोढ कॉपि गेलन्हि . ..मुॅह प’ दुखक भाव के संगे कंठ सॅ ‘ च्च .. च्च’ . .निकसि गेल छलैन्ह ।कोन मे बैसल दूनू अगिलका पएर सॅ दबने .. .टॉमी .. .लाल लाल गुङिया के हब्बर हब्बर चिबा रहल छल ।हाथ पएर छिङियाबैत. . . . औल बौल भेल . . .ओकर मुॅह सॅ गुङिया झिकऽ चाहै .. .त’ ओ लाल टरेस ऑखि केने . . .नाक हिलबैत . . .सबटा दॉत देखाक’ ‘हूॅ.ऽ्््ऽऽ्ऽ्ऽकार करैत आर बेसी डरौन बनि गुर्रेऽ्् लागै । “हेऽ््ऽहे. . .मार बाढिनि’ कहैत दादी के किछुओ नहि फूरैलन्हि त’ बरान्डा मे राखल एक टा पैना उठौलन्हि .. . आ’ कहुना करि क ओकरा मुॅह प’ मारने छलैथ ।एके डंटा मे गुङिया छोङि किकियाइत कोठरी सॅ पङाऽ गेल छल ।गुङिया के त’ दुर्गति दुर्गति भ’ चुकाल छल. . . मोहनजोदङो के खोदाय मे बहरैल मूर्ति सन. . .अंग भंग़ . .एक टा ऑखि निपट. . . . हाथ टूटल .. .गल मे छेदे छेद .. दुनू पएर चूसल चिबैल. . . .। “‘ई गुङिया पपा कत्तो बाहर सॅ अनने छलथि. . .आब कत्त भेटतै. . .’ओकरा हिचुकि हिचुकि क’ कानैत खीझैत देखि दादी ओकरा गरा लगाक’ दुलारैत पुचकारैत बजलिह “ई हो कोनो कनिया छै. . बिलैति मेम .. .एकर भला लोक की वियाह करतै .. . इ त’ अपने विवाह करै छै आ’ छोङै छै .। ... . तोरा हम एहेन कनिया बना देबौ. . .जे खॉटी अपन देसक’. . एकरा सॅ हजार कच्छ नीक .. कनि जे सब कहै छियौ सबटा समान जुटा दे .. देखिहैं संगी सब मुॅह बेने के बेने रहि जेतौ .. . ।” निर्दोख बालपन . . .पितामही के आश्वासन मात्र सॅ क्षण भरि मे अपन अपार क्षति बिसरि पुलकैत. . .नान्हि नान्हि हाथ सॅ अपन ऑखिक नोर पोछैत . . .दू बीतक लाडो. .. . फुद्दी जकॉ उङि गेल छल .।रूइया के बङका बंडल .. .बैंडेज . ..आलमीरा मे राखल पपा के पुरना मलमल के कुरता . . .लाल. उजरा. . करिया ताग सुइया .. .कैंची . ..सूखल पातर पातर लकङी आनि अपन पलंगक कात ओछाओल पटिया प’ राखि देने छल । ओकर ऑखि खूजलै . . देबाल घङी मे चा.रि बाजि रहल छल. . . ‘एत्ते काल सुति रहलौं’ मने मन सोचैत .. . पलंग सॅ नीचा झकलक . . . . .तीन टा सुन्नर पुतला बनि क’ तैयार . .. करिया रेशमी ताग सॅ डाढ धरि लटकल . .कारी कारी केश. . पैघ ..पैघ ऑख़ि उपर मे तीरछा भौं .. .ठाढ नाक़ . .लाल लाल ठोर .. .।एक टा पुतरा के जुट्टी गुथैत ओ माथ उठौने छलैथ .। आकरा देखि अहं भाव सॅ मुस्कैत फेर सॅ अपन काज मे लागि गेली ।दियासलाय के डिब्बा सब जे ओ रेलगाङी बनबऽ लेल रखने रहै .. .दादी ओकर बङ दीव महफा बना क’ ओहि मे नव पुरान कतरन के ओहार लगा क’ . . .मोहक बना देने छलैथ . . .डिसपोजेबल सीरिंज के एक दोसर सॅ गोंद सॅ साटि क’ पंखा बनाओल गेल । आब सुरू भेल छल असल विवाहक तैयारी .. .कनिया के कपङा लत्ता गहना गुरिया. . . .मोती के छेद मे सूइया नै घूसै. . .त’ सोनी अपन घर सॅ फूल काढ बला पतरका सुइया अनने छलै. . .कएक टा माला गॉथल गेल. ।. .मॉ के पुरना रेशमी . .सूती नूआ फाङि क’ बनल नूआ. . .घागरा प’ गोटा लगाओल गेल. . .टीन के चॉकलेट बाला डिब्बा सब मे . .गुरिया के नूआ फट्टा .. .जेवरात . कीचन सेट टी सेट .. . .. एक टा डिब्बा मे लट खूट समान राखल गेल. . .छोट छोट मैटिक चुकङी के कान प’ छेद करि क’ ओकरा तराजू जकॉ बना ओही मे चौर दालि .. .मखान. . .चीनी . . लमनचूस. . बिस्कुट . . .भार दौरक सब समान राखि एक गोट सम्पूर्ण नब गिरहस्थी के संसार सजैबाक पयत्न कएल गेल । संगी .. . संघतिया सॅ भरल ‘ बुद्वक’ दूपहरिया मे बङ धूमधाम सॅ कनिया के विवाहक आयोजन भ’ रहल छल ।गुड्रडा अ ित प्रिय सखी जया के छलै .. ।ओ अपन गुुड्डा के सजा धजा क’ चाह वला बङका ट्रे मे लत्ता बिछा . . ओही प’ ओकरा चीत्ते सुता क’ . . .अपन माथ प’ नेने चारि टा बरियाती संग आबि गेल छल । विवाह हेतै कोना .. . . ।लाडो त’ अडियल घोङा बनल . . . ‘बिनु पंडितक कत्तो विवाह होइत छै .. ।’ सविता जे ओतए सबसॅ बूझनूक आ’ उमिर मे पैघ . . .करीब नौ बरखक छल. . .. अपन चारि बरखक लजकोटर भाय के परतारिक पंडित बनौलक . . . .ओ अनेरे लाजे मूॅह नुकौने . . . ‘बम. . बम.’ करेत कनिया बर दूनू के एक हाथ सॅ कनेरक फूल के माला पहिरौलक आ’ दोसर हाथ .के . .मुठ्ठी बन्हने पीठ क पाछॉ रखने ।जल्दी सॅ माला पहिराक दौगि क’ दोसर कोन मे गेल आ’ मुठ्ठी मे राखल चोरूका टॉफी अपन मुॅह मे झट दनी राखि नेने छल । लङकी बला के भोज भात करेनाय आवश्यक छलै. . ।किएक त’ ओहो सब पैघ लोक संग क़त्तेको विवाह क पार्टी मे गेल छल त’ खेनाय पिनाय सएह मुख्य गप होय। ओकरे बङाय वा हिनताय । भोजक व्यवस्थात’ ओ अपने दम प’ करि नेने .चूकिया फोङिक’ अठन्नी चौवन्नी के ढेर देखि सिंघाङा .. गुलाब जामून .. आ’ जिलेबी त’ मीत्तू साह के दोकान सॅ मॅगा नेने रहै. . आ’ मॉ सेहो भनसिया के कहि पूङी आ’ खीर बनवा देने रहैथ ।घरक बङका बरामदा प’ दरी चादरि बिछा लाडो सबके भरि पेट. . . पत्तल प’ खुऔने रहै. ।. ‘देखी त ..हम अपन गुरिया के विवाह मे केहेन हिय खोलिक भोज करि रहल छी .. . .आ इ सीमा जे केन्ो रहै. . .एकए क टा बिस्कूट खुआ देने रहै. . .. . . आ इ मा ला अपन गाछक लताम क’ एक एक टा फॉक पकङा देने रहै ।” खा पीब क’ सब गोटे गीत नादक कार्यक्रम मे जूटल. . .”चलनी के चालल दूल्हा अंखियो नै खोले है. .सॅ सुरू होइत ‘बाबूल की दुआए लेती जाऽऽ््।’ प समाप्त भेलोपरांत कनिया के घघरा बदलि नबका नूआ पहिरा क’ बङका टा के घोघ तानि मोङ माङि ओही महॅफा मे बैसाबऽ के कोरसीस करै .. त’ कखनो कनिया के माथ बाहर भ’ जाए त’ कखनो पएर । .. . .हारिक’ महफा के ऊपर कनिया के सूताक’ लाल डोरी सॅ बॉधि क’ विदा कराओल गेल ।पलंगक दोसर कोन मे बिछल ललका दरी जया के अस्थाई बासा बनल .. . कनिया ओहि ठाम पहुॅचली । विदाइ के पछैति थाकि क’ चूर भेल सब कियो लूडो खेलय मे लागि गेल छल. . .सविता के छोटका भाय सेहो । तेसर दिन जया आयल छल मूॅह बनौने . . दस ठाम सॅ नाक भौं कोंचियाति “ई की. . . .हमर गुड्डा के त’ तू ठकि लेलही. . . नै औंठी . . नै .. गरा मे चैन .. ।” .. लाडो त बकलेल जकॉ ओकर मुॅह ताकितै रहि गेलै. . ।ओ त’ अहि मे ऐंठल छल जे एतेक खरीच करि क’ शान सॅ . . .अपन कनिया के विवाह केन्ो छल. .. . . एहेन भव्य समारोह त’ ओही परोपट्टा मे कियो नहिं केन्ो छल । ओकर मूङी मित्र मंडली मे खूब उॅच भ गेल रहै ।अकस्मात इ आरोप सुनि मूहें भरे खसल “इहो सब होय छै विवाह मे . . .पहिने किएक नै बजलैं .. हम ओरियान करितौं।’ “हमरो कत्त बूझल छल. . .आय हमर नानी आयल छथि. . ओ कहलैन्ह .. लङका .के दान दहेज देल जाए छै. . .गुड्डा हमर एत्तेक नीक . . नै एको टा कपङा देलही नै बरतन जात. . ।केहेन विवाह गरीबहा जकॉ. . ।” ओकरा गेलोपरांत ओ गुमसुम बाहर कुरसी प’ बैसल रहै. . ।सांझ नहूॅ नहॅू भरियाय लगलै. . .।एना उदास. . .उदास देखि कंपाउंड मे टहलैत दादी. . ओकरा लग आबि पूछलथि त’ ओ अपन मोनक सबटा व्यथा उङिल देलकै. .।दादी बजली “हे. . . लैह. . ओ कोठा सोफा बला बरक माए. . .ओ कत्त देलकौ तोहर कनिया के गहना गुरिया. . .नै नथिया नै टीका .. .नै नूआ .. नै लहठी. . एहनो कत्तो विवाह होय छै ..सासुरो सॅ भार दोर आबै छै .. .तौं त’ एत्तेक सामान देबे केलही .. .. . ओना त’ सासुर मे राजा के बेटी के सेहो दूषै छै लोक़ . .जे हाथी त’ देलथि मुदा ओकरा बान्हय लेल कङी त’ देबै नहि केलथि ।मुदा ओकर कोन मूॅह छै दूसब के”। इ सुनैत मातर लाडो के संपूर्ण शरीर मे जेना सौसे ललका पिपरी लुधैक गेल होय . . . ओ दौगल जया के घर । जया अपन कोठरी मे टांग पसारने बैसल कनिया पुतरा के पेटार खोलने असार पसार करैत . .चीज वोस्त सरिया ब्ऽ मे व्यस्त छल ।लाडो एकदम सॅ ननस्टॉप रेर्काड जकॉ सुरू भ’ गेलै “ हमर त’ पच्चीस टाका खरच भ’ चुकल अछि. . तोहर कत्तेक पाय खर्च भेलौ. . .चुकिया हम्मर फुटल की तोहर . . ।” आ’ अहि उकटा पैंची मे गप ततेक बढि गेलय जे जया गुङिया के ल’क कैस क’ बजारि देलकै .. “ले ल जो अपन गुङिया के”आ तामसे किटकिटाक’ ओकर हाथ मे अपन बीसो दॉत गङा देलकै. . ।लाडो दर्द सॅ बिलबिला उठल .. .हाथ छोङबैत ओ ओकर गुड्डा के अपन पएरक नीचा लतमर्दन करैत ओकर मुकुट .. .तोङि देलकै. . मुॅह पिचका देलकै. . “एहने बर .. नै हाथ . .नै पएर ..” कहैत. . तामसे आन्हर होइत. . जया के झोंट खींच क’ चारि मुक्का पीठ प’ मारैत. . लंक लगा क’ ओत्त सॅ पङाऽ गेल छल । अहि घटना के उपरांत त’ दूनू मे तेहेन तनातनी जे एक दोसर के शोणित पीबए लेल उद्वत. .।नेना भुटका मे दू फॉङ भ’ गेल रहै. .।किछु दूनू पख के धेने .. .नारदक कार्य संपन्न करबा मे लागल । ओही दिन मेघ बरसि गेल रहै . . .चारो कातक जमीन भीजल. त्त्. .. . . .जलखई करिक’ धिया पुत्ता के झूंड़ .. . . . पडोस मे .. . पछिला हफ्ता ट्रक सॅ . .उझिलल बौलक ढेर पर उछलम खूद करै .. पहुॅचल । . . .केकरो घर बनैत रहै. . कल्हुका बारीश सॅ बौल भींजल .. .ओकरा खोदि खोदिक ओही मे अपन पएर राखि घर बनाबए मे असीम उत्साह आ ऊर्जा सॅ जूटल छल . . कि तखने कोनो अगत्ती आबिक लाडो के कहलकै. “हौआ अपन गाछक नीचा बनल चबूतरा प’ बैसल जया तोरा देखि क’ मुॅह बिचकाबै छौ. . आ’ किदुन किदुन बाजि ओहि चारू छौंङी सब संगे खूब ठहक्का मारै छौ. . ।”ओकरा जेना बिरनी काटि लेलकै. . .अपन पएर प’ थोपल बालू के एक झटका मे फेंकैत ओ दौगल चबूतरा दिस .. . ।ओकरा पाछॉ आन धिया पुत्ता सेहो अपन अपन महल के धराशायी करैत. . .तूफान मेल बनल पहुॅचल । दुनू पाटी घरक पाछॉ वला इनरक कात के बङका चबूतरा प घों घें करैत फॉङ बन्हने .. .।इ वाक् युद्व. . .मल्ल युद्व मे परिणत होमए लेल बेकल ।तखन दूनू .. क्रिकेट खेलैत अपन अपन छोट भायक हाथ सॅ बैट छीन नेने रहै. . .।धोबिनिया जे संजोगे सॅ कपङा नेने उम्हरसॅ आबैत रहै .. . .. दौगल लाडो के घर. . .चपरासी दौङा क’ ओकरा पङबाक आनल गेल ।एतेक गरमागरमी देखि क मतारी सब अपन अपन वीर बॉकुङा के खूब थपङियेने रहैथ ।. . .सब कियो छगुन्ता मे डूबल . . . नेना भुटका के संसार मे कोना एतेक कडुआहठ भरि गेलय । तेकरा बाद त’ कनिया पुतरा के विवाहे बन्न ।सबहक घर सॅ इ आदेश ‘खेलबैं त’ खेल . . मुदा विवाहदान किन्नौह नहि. . . ।’ ओ त हॉस्टल चलि गेल छल चौदह बरखक बनवास मे . ।ओत्त सॅ पपाके ट्रन्सफर भेला के बाद खिस्से खतम .. इ मस्तिष्कक कोन गव्हर सॅ निकैल ओकर स्मृति पटल प’ चान सन चमैक उठले सेनहि जानि ।ओ तुच्छ सन बेकार खेल वास्तव मे असल जीनग्ी के खेल छल .. . जतए उत्साह उमंग आ’ उल्लासक मध्य बङका काज प्रारंभ करैत लोक छोटका छोटका चीज मे उलझि अपन जीनगी नर्क बना लैत अछि । विदाइ के काल मॉ के बोल कान मे घुरय लगलै. . ‘नैहर खूजल. . पढल किताब. . सब किछु स्पष्ट .. मुदा सासुर ..नब अपरिचित पोथी. . गुढ रहस्य सॅ भरल. . कत्तेको बरख लागै छै बॉचबा मे . . किछु मगज मे घूसै छै .. मुदा सदिखन विवेक सॅ काज लेबए के पाठ पढबैत .. ।’ ड्राइंग रूम सॅ एखनो धरि व्यंग .. आक्रोश सॅ भरल अचटि कुचटि क’ स्वर आबि रहल छल “मोहनजी त’ गोनू झा के बाप निकलला .. जहिना कहलियैन्ह दू टा वस्त्र मे कनिया चाही तहिना दू टा वस्त्र मे पठा देलन्हि ।बङका पाग बला लोक ..’ ‘इजे छहौर महौर केलथि . . गाङी देलथि . .से त’ बेटिये के कमाए हेतैै न .. .एतेक दिन सॅ कमा रहल छै ।’ ‘एहेन कंगाल कुटुम .. . कहु त’ वरक माय के एकटा डायमंडके सेट धरि नै देलकै ।कत्त फॅसा देलथि बज्रभूषण बाबू हमर बेटा के .. ।. जटाधारी बाबू केहेन नीक कथा देने छलैथ. . .इनकम टैक्स कमीश्नरक एकलौती संतान .. कतेक मकान . . .क तैक फारम हाउस. . .मुदा जो रे कपार. . ।” लाडो क’ ऑखि मे थीर नोर भरभरा क’ खसय लगलै .. .मनुक्ख एसगरे बिन पैलवार के रहि नहि सकैत अछि .. .क़तबो पैर प’ ठाढ . . भ’ जाए .. .प्रगति के . . संपत्ति के सर्वोच्च शिखर प’ ठाढ भ’ जाए .. . .एकरा संग वा ओकरा संग .. .केकरो नै केकरो संग त’ चाहबै करी .. । संयम त्याग आ’ बुद्वि के बल प’ पैलवार चलै छै. . ।अही अतकही बतकही मे नहिं फॅसिक’ नब जीनगी के नीक जकॉ कोना जीबी तेकर सुरूआत करबाक चाही ।आखिर पढल गुनल अपन पएर प’ ठाढ के मतलब की ।तोङनाय त’ एक क्षणक काज छै .. बना क’राखब मे न’ काबिलती ।व्यवहार सॅ अपन बनबय पङतै सबके ।घरक चारदीवारी सॅ बाहर . . . आफिसमे. . . कत्तेको तरहक गप सुनबाक . . सहबा के पङै छै. .. जौं घरे मे सहि ली त’ अनर्थ की .. ।हॅ .. जखन जान प’ पङि जायत तखन त’ सोचले जेतै .. ।अनेको तरहक सद विचार सॅ मन हल्लुक भ गेलै. . ।ऑखिक नोर पोछि लाडो कान मे इयर फोन लगा आइ पौड प’ गीत सुनए लागल छल । डाविर्नक बानर ओहि सूनमसान बङका गाछी बला चौबटिया प’ ओकरा देखिते मातर. ‘ओ’ सिताहल नढिया सन दुम दबौने . . . पङाए . लागल। . ‘ओकर पङेनाय देखि ‘ओ’ गाछ प’ सॅ छरपल. . .धेलक ओकर पछोङ. . . ।मुदा ओ’ गहूॅमक चिक्कस . सायकिल प’ पाछॉ बन्हने कनियो घुरि क’ नहि तकलक़ . . आ’ ताबङतोङ पैडिल मारैत अप्पन दलाने प’ आबिक श्वॉस नेने छल . .। एना हॅफसैत . . . फागुन मास मे .. घामे पसीने देख़ि दरवज्जा प’ बैसल पिताजी. कनि घबङैल सन पूछला. .. . . “कि बाऊ. . . कि गप्प .. . एना किएक फिरीशान छहक़ . . . .किछु अनसोहॉत त’ नञि. . .” पिताजी के चिंतित मुॅह देखि बाऊ मुस्कैत बजला. ‘नै. . नै . . तेहेन कोनो गप्प नहि . ।मुदा .. .गुमटी बला चौक प’ जे बतहबा दाढी बला बुढबा गाछ प’ बैसल दूनू टांग मग मे झूलबैत रहै छै .. . . . किएक नै किएक हमरा देखिते मातर. . अपन बङका बङका पकलाहा दाढी प’ हाथ फेरैत .. . डरौन सन ऑखि चमकबैत .. . .अांगुर सॅ ईसारा करैत. . .थम. . . थम’ कहैत हमरा लग दौङि क’ आबए चाहैत अछि. . . . हमरा बङ डर होईत अछि .. . आय त’ ओ आमक मोटका डारि सॅ धम्म सॅ कूदि हमरा खिहारने खिहारने नरेशबा के आरा मिल धरि चलि आयल छल .. . मुदा बीचे मे बहेङा बला रोड प’ मोटरक आवाजाही सॅ ओकर दौङनाय मे व्यवधान उपस्थित भेलए. . . .आ’ हम देकुली .. .बला रस्ता धरि जान बचौने .चलि आबि रहल छी . ..।’ पिताजी बेस चिन्ता मे पङि गेल छलथि. . ।सब लोक त’ ओहि बाटे सहर बजार जाईत अछि राति .. बिराति .. सेहो . . .केकरो किछु नै कहियो भेलए .. . .।ओहि बङका गाछी सॅ कनि हटि कए . . .रेलवे गुमटी लग . . .के दोकान दार सब सेहो किछु तेहेन नै कहलकै. . ‘कत्तो सॅ आबि गेल छै साधुबबा .ओ अपाहिज .. . .ओ कि खिहारतै . .. आ’ कि गाछ प’ चढतै. . ।’ मुदा बौआ . .उर्फ तंतू के डर अजस्त्र. . . ।गाम सॅ बहराए के एक मात्र सोझ बाट त’ वएह . छल. . ।आ’ बौआ घर मे बन्न भ’ रहितथि त’ कोना ..कोनो छौमसिया त’ छलैथ नहि .. कओलेजिया .. . .किलास करए त’ जेबे करितथि. . .. ।तखन पिताजी रमकिसुनमा के छोटका सार के लगा देलखिन्ह संग़ . .जे विशेष डिलडौल क’ पहलवान लोक छल.. . “खाली तौं गुमती टपा दिहक ।” अपन बहिनक सासुर मे भरि दिन ओ बैसले रहै. . . त’ गुमती प’ सेहो कओलेज जेबा आ’ एबा काल बैसै. . .पिताजी के पाय सॅ चाह बिस्कुट खा पीबि क’ समय काटि लैक . .।आश्चर्य कि ओकरा संगे रहला प’ तंतु ओहि दढियल के ऑखि मे ऑखि दैत टकटकी लगौने रहै .. .तैयो ओ बङका गाछक जङि लग संचमंच भ’ निर्लिप्त भाव सॅ बैसल रहैक .. । मुुदा अहि सॅ समस्या नहि पङेलै . ..।आन प्रकारक उत्पात त’ बढिते चलल गेल छल. .।भेलए कि जे ओहि दिन दिनकर कका के छोटका बालकक विवाह छल. .. .. टोलक सबटा जर जुआन. .. बूढ पुरान पुरूष पात बरियाती चलि गेल रहैथ .. . । तंतु बाबू के एम ए फाइनलक परिच्छा चलि रहल छलैन्ह. . .त’ मोन मसोसिक’ रहि गेलाह. . .बरियाती के सरस खेनाय सॅ ऑखि मूॅदि नीरस किताब मे धियान लगौल्ौन्ह. ।. .पराते भ’ क’ पेपर छल ..ताहि लेल ओ दलाने प’ रहि क’ पढि रहल छला कि आंगन सॅ चिकरैत मॉ कहलखिन्ह. . ‘बौआ रौ. . . कनि पछबरिया बाङी सॅ चारि टा नेबो तोङि क’ आनि दे. . .ओलक सन्ना मे देबए . ..’।ओलक सन्ना हुनका बङ पसिन्न. . ।ओ जहिना पछवारि खेत दिस जाए लेल करिया कका के खङिहान सॅ मुङला . .कि हुनक एकमात्र बरद . . .अचौक उठि जोर जोर सॅ पोंछ हिलबैत .. कूदय लगलै. . . जेना ओकरा मे बिजली प्रवेश करि गेल होय .. .ओ रंभाय लागल आ’ खूॅट्टा के एके झटका मे उपाङि .. .खूट्टा सहित हुनका पाछॉ पङैल. . . ।ओ बेचारे त’ ब्रिटीश एम्पायरक गर्वनर सबहक कार्यकाल मे ङूबल . ..हाथ मे कौपी नेने मूङी झुकौने . . . .नेबो के गाछ दिस बढल चलल जा रहल छला. . . कि पाछॉ सॅ बरद हुनका धक्का मारि क’ खेत मे खसा देलकैन्ह . ..अकबकैल सन ओ .. . .कनिकाल त’ हुनका ठकबक्की लागि गेलैन्ह . .. ओ चारो नाल चित्त खेत मे पङल रहला . . . मुदा ओहो बारह सॅ पनरह सोहाङि खाय बला . . .बेस तंदुरूस्त . .जुआन लोक छलाह .. .त’ नीचा खसले खसले बरदक दुनु सींग पकङि जोर सॅ जुमा क’ लात मारैत ओकरा कनि फराक ठेलवा मे विजयी होइत .. . ठाढ भ’ क’ अपना के बचबैत ओकरा दिस झपटला .. . .मुदा बरद के नहि जानि की भ’ गेल छलै .. . .ओ फेर हुङकि क’ हुनका प’ पूरा जोर सॅ दौगल . . .आ’ ओहि गॅहुम बॉग भेल खेत मे पटकि .. . .अपन खूर सॅ हुनक पैजामा के डोरी फोलबा के कोरसीस कयने छल .। . . .ताबैत मे कोनो जनानीए अपन आंगन सॅ देखिक’ चिचिएलकै .. . तेकरा बाद आओर स्त्रीगणक जोर जोर सॅ सोर सुनि दोसर टोलवैया सब हाथ मे डंटा नेने दौङल आ’ बरद सॅ तंतु के कहुना करि क’ छोङबेलकैन्ह. . . ।आ’ ओहि दिन सॅ बरद आ’ बौआ मे अघोषित जुद्व शुरू भ’ गेल छल .. . . आब ओ बरद .. . . बरद नै भ’ क’ साक्षात. . . .पकलाहा दाढी बाला बुढबा भ’ गेल. . .क्रोध सॅ पागुर करैत. . हुनका घुईर घुईर क’ ताकए लागल छल. . । ओम्हर सबहक आश्चर्यक ठेकान नै रहलै. . . एतेक सीधा बरद. . . जेकरा पॉच बरक नेना सेहो सानी पानी दैत पीठ प’ .. मूॅह. . प’ . . हाथ फेर दैत छलैक .. .औचक ओ एहेन मरखाह. . .बदियल आ” डरौन कोना भ’ गेलय. . आ’ ओहो खाली तंतुए प’ किएक गुम्हरैत रहै छै .. . ।अपन मूॅह नमरा क’ कत्तो सॅ .. .तंतु के देखि पगुरैत भोकरए लागे छै .. । पिताजी के आश्चर्य त’ सातम आकास प’ .. .आन धिया पुत्ता छलैन्ह . .. टोल मे सेहो जनसंख्या कम नै. . .मुदा एकरे प’ किएक़ . .लाल वस्त्र सेहो नहि पहिरति अछि ई. . . । सब गोटे मिलक’ एकर समाधान जे निकाललैन्ह. . . ताहि सॅ ओहि कात हुनक गेनाय वर्जित भ’ गेलन्हि . .. ‘कोन बेगरता छै उम्हर जेबा के. . ।’ंंमॉ के आदेश त’ सर्वोपरि .. . । इम्हर टोल मे जखन सब कियो अपन अपन काज निबटा क’ हिनका लग जिज्ञासा करए पहुॅचल. . .ठट्टा केनाय शुरू. . ‘आखिर तोरे प’ किएक झपटै छ सब कियो. . ।’ तंतू कनि सीरियस भ’ क’ अपन टेबुल प’ खुजल किताब मे मूॅह गोति क’ आई ए एस के तैयारी मे लागि जायथ ।ओना जतेक प्रकारक प्रति योगी परीक्षा होईत छै .. . .आ’ आर्टस के छात्र ओहि मे बैस सकैत अछि . ..ओ सबहक फारम मॅगबाबैथ . .. आ’ किताब खरीदथि. . ।एवम प्रकारेण ई त’ निश्चित छल जे हुनका अपना भीतर सॅ कोनो पद क’ लेल ‘हूबा’ नहि छलैन्ह .. .।जे कनि भरिगर पदक नाम सुनैथ .. .त’ ओकर फारम अनबाबए लेल लोक वेद के बजार दौङा दैथ ।दोसर उल्लेखनीय गप्प जे कोनो पोस्टक लेल एप्लाई करबा सॅ पहिने ओकर बेसिक सैलरी आ’ अपन ज्येष्ठ भ्राता के बेसिक सैलरी सॅ तुलना करि क’ प्रसन्न भ’ जायथ .. ।एकरा पाछॉ मनोवैज्ञानिक के कहबी छल . . . सिबलिंग रिवालरी .. .. ...े पिताजी सदिखन अपन ज्येष्ठ बालकक बङाई करैथ त’ ई बेचारे मन्हुआईलसन अपना के अस्तित्वविहिन पाबि मोने मोन तिलमिलाईत रहि जायथ आ’ ओंघीओ मे इएह स्वप्न देखैत जे भायजी सॅ नीक पोस्ट हासिल करी जे तारिफ हमरो हुए. . . . . । रटबा मे हुनका साक्षात देवी के बरदान जेना .. . .. मुदा बिसरियो ततबे करैथ. . . आ’ एक के पॉति दोसर मे जोङि तेसरे वाक्य बना दैथ .. . .कतेक आलेख सब रटि क’ इस्कूल मे पुरस्कार सब सेहो जीत चुकल छलाह. . . ।अहि रटबा के क्रम मे अंग्रेजी हिन्दी डिक्शनरी सम्पूर्ण संपुट लगा क’ रटि चुकल छलाह .. .मुदा जखन भायजी के चिट्टी मे “चूङा विल बी ट्रान्समिटेड” लिखला .. त’ जनानी के माध्यम सॅ गप्प पसैर क’ पिताजी के कान मे पहुॅचलन्हि .. जे चूङा के कोन विद्वुत तरंग मे बदलि क’ ट्रांसमिट करता . त’ एक क्षण लेल बाबूजी सेहो थकमका गेल रहथि .. ।अप्पन अहि ओजस्वी संतानक बुद्वि प’ त’ हुनको यदा कदा संशय भ’ जानि . ।मुदा गलती त’ केकरो सॅ भ’ सकैत अछि’ ई कहि क’ तंतू बाबू कहियो अपन नाक प’ माछी नहि बैसय देलथि। उत्तिष्ठतः .. .जागृतः. . . .धावत :’ ई हुनक बीज मंत्र . .. जेकरा ओ रोज घोटैथ. । . घोटैत घोटैत ओ बैंकक पी ओ के परीक्षा देबा लेल सेहो तैयार .. ।. गणितक कठिनाई. . . मुदा बहादुर बौआ. . . गणितक सवाल के .. . . एबीसीडी .. .इम्हर सॅ आ’ ई एफ जी उम्हर सॅ. . . ..ह्यग्रएातएर तहान्। । । ।।ल्एस्स् तहान्हृ ..... .. . . . . . . .. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .. . . . . . . . . .रटैत रटैत भरल दलान प’ ओहि दिन ई उदघोषित करि देला जे आब ओ पी .. ओ .. के परीक्षा लेल पूर्ण रूपेण लंगोट कसि क’ तैयार छथि. . . ..आ’ अहिबेर कत्तो नै कत्तो ओ अवस्स निकालि लेताह . . .सफलता आखिर जेत्तै कत्त .. . .ऋ बेस. . .मॉ दही चीनी सॅ जतरा करा क’ विदा करोलथि. . .।विशेष उत्साहक संग किसुनमा के सार आ” हुनक अप्पन दुनु अनुज दङिभंगा आबि पटना बाला बस प’ बैसा देलकैन्ह. .। परीच्छा दैत तेसरा दिन ओ घुरला. . .।किसुनमा के सार बस स्टैंड प’ पहिने सॅ मुस्तैद. .. .अपन सायकिल गौंआ पानबाला के दोकान सॅ उठबैत दुनु अपन अपन सवारी प’ बैसला .. ।मुन्हरि सांझ म्ों . . .प्रधानमंत्री विकास योजना के तहत बनल सुचिक्कन पीच रोड टपैत . .. गामक खरंजा प’ बढल चलल जा रहल छलथि. . .कि नहि जानि कतए सॅ एक गोट सङल पीलिया कुकूर आबि क’ हुनक बाम कातक पैंट भरि मुॅह पकङि लेलकैन्ह. . .अहि क्रम मे ओ घुट्टी सॅ ऊपर हबैक सेहो लेलकैन्ह. . .।एकरा एकटा अपशगुन मानैत. .. . सबटा प्रसन्नता क्षणांश मे कर्पूर जकॉ .. .उङि . . . .चारूकात जरल माछ जेकॉ गंधाए लगलै. . । पिताजी के चिन्ता जायज़ . . . ‘ई कत्तो नौकरी चाकरी करैथ . .. तखन नै .. .कत्तो विवाहोदान. . . .।वएस त’ भइए गेल छन्हि . . .।खरच दुनिया भरि के. . .। बङ दिन धरि ओ अपार चिन्ता मे डूबल रहि गेल छलाह. .। बौआ. . . .ऊर्फ तंतु .. . . दुनिया जहान सॅ भिन्न . . .।पूब मे किरिन फूटबा सॅ पहिने उठि क’ घंटा भरि दंड बैठक करैथ ।. ..कसरति करैत मातर. . . .ओ ‘मनुक्ख गंध’. . “मनुक्ख गंध’ जकॉ .. . ‘भोजन गंध’ ‘ भोजन गंध’ करैत खेनाय प’ झ्पटैथ. ।भूख त’ हुनका सुतलि रातियो मे फिरिशान करि दैक .. . त’ ओ तुरंत जोङन देल दुध के उठा क’ पीबि जायथ .. . ।भिनसरे माय ताकिते रहि जायथ. ‘भरि सक बिलाङि पीबि गेल हेतए ..’आ’ दही पोरनिहारिके अक्षमता प’ आरोप लगबैत . .अपन मोनक भङास निकालि लैथ नीैक सॅ झपने नहि हेतैक .. ।’ मुदा कतेको बेर जखन ई प्रक्रिया दोहराओल तेहराओल गेल त’ मॉ पूतौह आ’ बेटी के कात करैत अपने हाथ सॅ मटकूङी के ऊपर चकला . . . . . ओहि प’ लोढी सेहो राखि देलथि .. .चूल्हि के एकदम लग’ मे. . . भनसा घरक सबटा खिङकी केवाङ बन्न. . . ।मुदा तैयो जखन परात भेने मटकूङी खाली. . . भेटलैन्ह .. .त’ हुनक आश्चर्यक ठेकान नै. . . “कियो टोना टापर त’ नहि करि रहल अछि. . . .दियाद बाद त’ अहिना दुष्ट. . . नजरि त’ हमरे घर प’ लागल रहै छै .. .बजर खसुआ सबके’. . .. ।’तखने दनदनाईत जलखई करबा लेल बौआ तंतु अयला त’ मायक’ ई विलाप सुनि रहस्योदघाटन करैत बजला. . ‘गै््््ऽऽऽऽ. ..हमरा रातिक पढैत पढैत भूख लागि जाईत अछि. . ..हमहीं. . .पीबि लैत छियो।’ ताहि दिन सॅ मॉ चारिटा सोहारी आ’ तरकारी .. .अरबेस क’ हुनक चौकी प’ राखि दैथ. . . जतय ओ पढैत रहैत छलाह. . . जाहि सॅ सुतली राति मे भनसा घर त’ नहि जायथ .. . ।मुदा भनसा घर सॅ की परहेज . . .ओ त’ भगबति के उसरगए लेल थारी मे राखल केरा दूध. . .चिनबारि प’स’ दिन दहाङे उठा क’ खा गेलाह. . ..पाथर भेल मॉ. . .थरथर कॉपैत. . .भगबति लग क’ल जोङने कलपि कलपि क’ हुनक सदबुद्वि लेल प्रार्थना करए लगली. . । जहिया सॅ बरद पटकने रहैन्ह तहिया सॅ बाङी झाङी बाला खास करिक’ घरसॅ बहराए .. बला काज त’ छुटिए गेल छल जे हुनक आलसी सुभाव लेल बरदाने सिद्व भेल छल । आब अपन विशेख समय शरीरे प’ लगाबैथ. . . मुनहरि सांझ मे सेहो घंटा दू घंटा . .. .कसरत करैथ . . . .ड़ाऊ डाऊ करि क’ खेनाय प’ छूटैथ . . . .।सेर सवा सेर . . .चाऊर बूटक भुज्जा फॉकैत . . . .दरवज्जा प’ . . .लैम्प जरौने . . कुरसी प’ बैसल झूलि झूलि क’ आई ए. एस क’ तैयारी सुरू करि दैथ. . आठ बजैत बजैत. . .भोजन भात भइए जाए. . .दस बाजैत बाजैत ओंघी सेहो दबोचि लैक . .. .गाम मे तहिया साढे आठ धरि त’ लोकवेद खा पीबि क’ निफिकिर भ’ क’ सुतियो रहै. . .। ओहि राति बङ धुऑ धार बरसा भेल रहै. . . भदवारि मास. . . चारो कात. . .बेंग़ . झिंगुरक जुगलबंदी. .. .सब तरि पिच्छङि. . . ..।परात भेने .. ..कनि अंधारे सन छलै. . . पिछौत मे . . .नहाए लेल चप्पा क’ल चलब गेला . . ..।औचक मे पएर पिछैङ गेलन्हि. . . . .आ दू . मूॅहा घरक सीढी के कोन मे पानि बुनी सॅ नूकैत घुरमुङिया क’ सूतल बिलाङि क’ उपर धंम्म सॅ खसला. . .. ओ त’ पहिने म्याऊ म्याऊ करैत एक दू .. .क्षण कराहलक .. .. मुदा तेकारा बाद खिसिया खिसिया क’ हुनका से भंभोरलक जे हिनकर होश हवास गुम .. .। ई अन्हार मे पङल पङल ‘मॉ गै .. . मॉ . .’ करैत चिकरए लगला. . त’ बगलक कोठरी मे चारि मसुआ नाति आ’ बेटी के संग सूतल मॉ चिहुक क’ भकुआयल ऑखि मीजैत मीजैत .. . बहरेली. . .।लालटेमक टेमी ऊच करैत .. .बेटा के ई रूप देखैत .. . हुनक एङी के पारा मगज प’ चढि गेलन्हि. . . ।सब किछु बिन कहने बुझि गेलथि. . ‘तोरा कहिया भगबत्ती अकिल देथुन. . .।धीया पुत्ता सेहो पिच्छङि के डरै . .. क’ल प’ ओहि दिस सॅ नहि जाए छै. . . ।’उम्हर चिल्का जे बीमार छलै. . आ’ भरि राति नहि सूतल छलै हिनकर चिकरनाए प’ नीद सॅ उठि क’ . चेंहुॅ चेहूॅ करैत गला फाङय लगलै. . .।आंैधाएल बहिन .. .कहुना करि क’ बैसैत .. . पलथा प’ ओकरा नेने .. . .आरे निनिया. . . . .आ’. . . ।’करि ओकरा सूतब मे लागल .. . आ’ नहूॅ नहूॅ फुसफुसा क’ अपन ‘तंतूभाय’ प’ आन्तरिक पीत्त सेहो. . .व्यक्त करि लैत छली. ‘हिनकर ताल अलबत्ते. . . भरि भरि राति .. . लोक जागल छै. . .आ’ भोरे भोर हिनकर ताल. . ।’ बाजि भ्ुाकि क’ मायक ह्दय मोम जकॉ पिघैल गेलै. . . ओ कङूक’ तेल आगि प’ पका क’ आनलथि . .. ‘ला ऽऽऽऽदेखो. . . देखी त’ . . . एकटा .. बिलाङियो तोरा नै गुदानै छै.ा .. . आर सबसॅ लङबा लेल त’ सिंग निकालि क’ सदिखन तैयार .. . ।दादी के त’ सौंसे भंभोरने छलौ .. . .नै लागै . ..छै एकर विष . . .।ओना त’ तू कुकूरो बला सूईया सेहो त’ लगबैनेए छलैह . .।’ फरिच्छ भेने तंतू. . .चारि टा पजेबा आनि पिच्छङ दिस सॅ लगा देलथि. . ‘आब नै खसतै कियो. . ।’ भौजाए बहिन सब हॅसए लगली .. ‘ अपने नै खसू . ..सएह .. .बङ. . .छै. ।. . आन सब त’ ठेकनगर छै . .।’ पिताजी के कोनो जोतखी कहलकैन्ह. . जे तंतू बाबू के किछु दिन स्थान परिवत्र्तन भ’ जेनाय आवश्यक़ . .किएक त’ हिनक मंगल बङ खराप .. . ।तंतू अपनो बङ दिन सॅ. मोन मे नियारने रहथि जे भायजी के’ पटिया क’ कहुना ..कुशीनगर प्रवासक इंतजाम करी. . .।आब ई सब ताल बेल देखि पिताजी सेहो सहर्ष तैयार भ’ गेला . . . ‘अहू ठाम तैयारी करै छ. . .ओहु ठाम करियह. . .।’ताकल गेल जे ओतय कोन संबंधी छथि. . . आ’ सबसॅ नजदिकक भायजीक सासुरक कुटुंब. . . ..ओही विद्दार्थीक डेरा प’ आसन जमौला. . । अजगुत लोक़ . .अजगुत पढाई. .. ।मुदा नीके छै. . .कसरति करैथ . ..होटलक खेनाय . ..भूख पेट सॅ फाजिल लागै. ..।कोठरी मे चना . . मूॅग़ . . गेहुॅम फूला क’ अंकुरी क’ संग़ . . सलाद लेल पत्ता कोबी .. टमाटर खीरा . .के संग कॉच भॉटा सेहो अजमेलाह . .।मुदा भॉटा के सलाद देखिक’ ओहि ठामक’ विद्दार्थी सब ठट्टा केलकैन्ह आ’ अपनो रूचिगर नहि लगलैन्ह .. . त’ भॉटा के सलाद सॅ निर्वासित करि देलथि .. .। मुदा अहु ठाम सेहो हुनका बङका बङका दाढी बाला बूढबा के लाल टरेस ऑखि पछोङ नहि छोङलक़ . .।आ’ नीन मे .. .जेना कियो घेंट मोईक रहल होयन्हि. . . जखन. तखन ओ घोंघियाय लागैथ .. .औंचक श्वास बन्न भ’ जायन्हि . . . .।तखन करितथि त’ की. . .घुईर अयल.ा अप्पन गाम. . ।मॉ कहली. . ‘जे जान रहतै. . त’ .गामे मे रहि क’ खेत पथार देखतै. एत्ते त’ देने छथिन्ह भगवान।’ उम्हर कुटुमक’ संघतिया सब कौंचबैन्ह. . ‘ कि भाय. . . कत्तए गेला अहॉ के चिङिया घर सॅ पङाएल संबंधी ..? . .भाय हम त’ कहैत छी जे विशुद्वरूपेण ओ अपन गार्जियन के ठकि रहल छैक .।एहेन वज्र. . . दू दू घंटा कसरत. .। . ओहि दिन इम्हर सॅ हम जाईत छलौं .. .सुनलौं .. .अहॉ के कोठरी सॅ ठहक्का . ..भेल अहॉ अपन घर सॅ आपस आबि गेल होयब . . . खिङकी सॅ झकलौं .. . .त’ देखैत छी . ..कुटुम एकसरे जोर जोर सॅ ठहक्का लगा रहल छथि. . . .पूछलोपरांत कहलन्हि जे हॅसी बला कसरत करि रहल छी .. . .।’ तंतू दोबारा घुईर क’ कुशीनगर नहि गेलाह .. .।ओ स्थान सेहो हुनका नहि धारलकैन्ह .. . ।तखन आब की कयल जाओ. . .।बङ सोचि विचारि क’ अपन छोट पुत्र संग लगा क’ पिताजी हुन का अपन ब्ङका सुपुत्र लग मायानगर पठा देलखिन्ह .. । भायजीक विवाह सॅ पूर्व सेहो ओ मायेनगर मे रहथि .. . ।मुदा कोचिंग .. . . .आई ए. . एस आ’ पी .. ओ क’. . . .समाप्त करि फेर सॅ गाम आपस आबि गेल छलाह .. ।आब त’ खाली तैयारिए करबा के न छै .. .एयह सोचि क’। पहिने त’ हुनक ईलाज कराओल गेल .. ..एना जौं सुतली राति मे श्वॉस अटकि जेतै. . ऋ. . कतेक दिन भाय सब अगोरने रहतै. . . ।आ’ भगबतिक बङका असीरबाद जे डाक्टरी दवाए सॅ मास भरि के भीतरे श्वॉस निर्विघ्न सुचारू रूप सॅ चलय लगलैन्ह . ..।मुदा ओ भयौन स्वप्न ऋ.. . .ओ .. चिंहुकि क’ नीन सॅ उठनाय. .? . बूढबाक लाल टरेस ऑख़ि . ऋ. ड़ाक्टर सॅ पूछला प’ कहलकै .. .साइकियाटी्र.स्ट सॅ इलाज कराऊ । भायजी सॅ अनुरोध करि क’ मुदगर. . .वेट लिफ्टिंग के आन समान सब सेहो किन नेने रहैथ. . ।आ’ बेसी काल आब ड्राईंग रूम मे वा .. .बालकनी मे ठाढ भ’ क’ मुदगरि भॉजैथ .. .।कखनो काल त’ कनि अनसोहॉत भ’ जाय .. . जे भेटघॉट करबा लेल लोक वेद ड्राईंग रूम मे आबै .. . आ’ ओ बीच दीवान प’ मूङी नीचा पएर ऊपर. . । अहि बीच भायजी अपन फ्लैट बदलि क’ कनि दूर दोसर ठाम चलि गेल छलाह .. .।बङ दिन सॅ ओतए रहैत छलाह .. .त’ सर कुटुम . ..गौंआ सब के आबए मे कोनो फिरिशानी नै होय .।मुदा नबका पता .. . । ‘तंतू भायजीक मकान शिफ्ट करबा काल स्वयं मुस्तैद छलाह ।भाय के अनुरोध प’ ओ सब सर कुटुम के नबका पता लिखक’ पठा देलखिन्ह .. . ।अहि बीच ओ’ गाम चलि गेलाह .. । उम्हर सब कियो फिरीशान . . .नबका मकानक पता गलत छै. ।किएक आ’ केकरा कहने फूसियाही पता देल गेल ? .. .अहि मे गामक लोक के नब न्ुाकूत कनिया के कूट चालि बूझाए पङलैन्ह. . .। कनिए दिनक बाद .. तंतु बाबू. . .फेर सॅ मायानगर प्रवासक लेल पधारलथि। ओहो भायजीक डेरा मे केकरो आओर के पाबि क’ घबङा गेलथि. . ।ई की केलथि भायजी चालाकी . .।झोरा झपटा नेने अस .पस मे पङल. . .कत्तजाऊ. .। .. .तखने मोन पङलै. . . . शुक्रवारी हाट त’ अहि सङक प’ लागैत छेै ।. ..ई पूछला प’ लोक हुनका पौकेट सी पठा देलकैन्क ।.. .आ’ अहि ठाम भाई जी मौजूद छलाह .. ।सी के स्थान प’ बी लिख क’ ओ सबके ईएह पता पठौने छलैथ. . ।एहेन गलती त’ ओ’ सदिखन करैत छलैथ ।मुदा हुनका के की सकैत छल . .। एहेन एहेन त’ कतेक रास प्रमाण छल .. .मुदा तखन तंतू बाबू अपन गलथोथरि प’ उतरि जायथ .. ‘हमरा जएह कहब सेएह नै. . ।’मायानगर प्रवास के ई खूब नीक जकॉ मुदगर घुमेबा मे. . .अखबार मे कपङा के सेल देखबा मे .. . .आ’ छह मासक भतीजी के डिब्बा के दूध .. आ’ फैरेक्स चोरा क’ फॉकवा मे . . ...कनि नुका क’ सङक प’ आबैत जाईत आईटम गल्र्स के देखबा मे .. .आ’ सूतबा के संग किछु जेनरल नॉलेजक पत्रिका रटबा मे लगौलथि .. । एक दिन सीढी सॅ उपरका फ्लैट मे चढैत उतरैेत. . हुनका आध्यात्मिक भान भेलन्हि जे किंस्यात .. .ई सब गमला बाहर सॅ आबए वला शुद्व वायु के अवरूद्व करि दैत छै .. .आ’ ओहि प्रदूषित वायु के कारणे. . जे बी. बी . .सी . .के अनुसारे दिल्ली मे बङ बेशी छै. . .हुनक नाक अवरूद्व करए लागै छैन्ह .. ।त’ ओ अपन भायक सोझा मे एकर पुरकस विरोध . . .व्यक्त करि . .. हुनका प’ दबाव देलखिन्ह .. .जे पङोसी के गमला के सीढी प’ सॅ हॅटवा दियौ. . ।भाय के कनि संकोच त’ अवस्से भेलैन्ह. . .मुदा अगियाबेताल अनुजक आग्रह ओ नहि ठुकरा सकलन्हि. . । गमला त’ बाहर छलै . ..हॅटि गेलए .. ... मुदा हिनक दरवज्जा सॅ सटले ओकर दरवज्जा जखन खुजै. . .आ’ मोटका सिकङी सॅ बान्हल बङका अलशेशियन कुकुर पूरा पूरा मुॅह खोलि जीभ निकालने .. . हॉफैत हॉफैत .. . . . . .नौकरक हाथ के डंटा के अछैत हुनका दिस ताकि लैक .. . त’ ओ’ जेना पैजामा मे नदी . .लग्घी करबा लेल प्रस्तुत .. ..।मुदा भायक एत्ते औकात कत्त जे .. ओ ब््िरागेडियर साहबक घर सॅ कुकुर के सेहो हॅटबा दैथ. . ।ताहि लेल ओ हुनक नौकर सॅ निहोरा पाति करि क’ टाईम पूछि लैत छलाह ओकर बहराय के . .।ओहि टाईम के ओ बङ मुस्तैदी सॅ व्यवहार मे आनए लगला ्र।. . .किछु भ’ जाए .. .चाहे .. दुनिया एम्हर सॅ ओंम्हर .. ओहि समय ओ घर सॅ बाहरि पएर नहि निकालथि. . । टा्रंजीस्टरक बङ पे्रमी .. . ।प्रायः सबटा समाचार आदि सॅ अंत धरि सुनैथ ।अहिना एक दिन शीर्षासन करैत न्यूज सुनि रहल छला ..्र। भीषण गरमी के बङका भोर. . । . .भायजी बाथरूम सॅ दौङल अयला ‘बौआऽऽऽऽ .. .कि कहलकै. . राजीव गॉधी के बारे मे .. ?’ .. . ‘भायजी अहिना कहैत छै . ..दू टा . .बच्चा छै .. पैलवार मे त’ की कहतै. ?’शीर्षासन जारी छल .।भाय ठाढ । ‘अवस्स किछु भ’ गेलए अछि ताहि लेल कहि रहल छै. .।’बस तङाक दिन पएर जमीन प’ ।.. ‘खट द’ उठि बैसला .. ‘कनिए काल मे न्यूज जग जाहिर भ’ गेल छल। समय अपन यात्रा जारी रखने छल . ..।बरख प’ बरक बीतैत चलल गेल . . .हिनकर कंपीटीशन कहियो समाप्त होमए के नामे नहि लै. . . . जाहि परीक्षा सबहक उमैर . ..वा चांस बचल छल. . तेकरे नांगङि पकङि लैथ. . . ।उम्हर गाम मे लोकवेद पिताजी के बूझबैन्ह. . “बङ भेलए कंपीटीशन सब. . . . ढेर रास नौकरी सब छै .. .अप्पन सामर्थ देखि कत्तो धय’ लेताह. . . . .मायानगर मे नौकरी के कोन कम्मी छै. . ।वा’ अहिं के एतेक लोक जनैत अछि . .. कत्तौ लगवा दियौ. . . ।आन धिया पुत्ता प’ धियान देब . . . . . ओकरो विवाह दान .. ।. मायानगर मे रहि क’ कंपीटीशनक तैयारी करैत छै. लङका . . सुनबा मे त’ मधुर लगै छै. ..मुदा कत्तए छै . ऋ.. .. भायक कपार प’ कतेक दिन एना बोझ रखबै. . . ओ कोन टाटा वा अंबानी अछि .. . ..।’पिताजी के तखन दिमाग खुजलैन्ह . . ।आ’ व्यर्थक उम्मीदक किला ढाहैत ओ’ किछु ठोस कदम उठबतैथ. . .कि अहि सॅ पहिने हुनक तेसर बालिग पुत्र बाजि उठला ‘पिताजी .. . हुनका गाम कथि लेल बजैबैन्ह. . . व्यर्थक बदनामी. . . .लोक वेद अहिना खिस्सा गढैत अछि. . .आ’ ओ अलगटेंट . .. कोन गप्प प’ उखङि जेता तेकर कोन ठेकान. . . ।पोरकें. . .गगन चचा के बङका बेटा के करेज प’ बैसि क’ ततेक मारि मारने रहथि जे ओकरा सप्ताह धरि हरदि चून लगबए पङलै. . ।चाची गरिया गरिया क’ टोल भरि के’ एकट्टा करि लेलन्हि. . ‘ई मोचंड . . .मारि दैत हमर बेटा के. ।’ आ’ ओहो छोटसन गप्प प’ ।ओ’ कहलकै ‘तंतूभाय आब जंतू सब सॅ ड’र नहि होबैत अछि ..? ’अहॉ कत्तो बाहर गेल रहि. . ।ताबैत मे छोटका बेटा सेहो बाजि उठला “हॅ ..पिताजी .. .छोटका पीसा के सेहो अहिठाम अहि चौकी प’ पटकने रहथीन्ह. . . ।ओहो फुसियाहिए गप्प प’ ।पीसा त’ सप्पत खा लेलथि .. .जे जौं ई एत्तय रहता त’ ओ घुईर क’ सासुर नहि औता .. ।अपन हॅसी केर बलजोरि रोकैत . . .आगॉ बाजैत गेल ‘ओय दिन पीसा के सोझॉ हुनका बिरनी काटि लेलकैन्ह .. . बाम ऑखि आ’ गाल फुलि क’ लालटरेस .। .. .आ’ फेर हुनके माथ लग उङै. . .त’ हॅसैत पीसा बजला ‘बिरनी कटलकौ .. .तूंबा फुलेलकौ. . .फेर गुम्हरै छौ तोरे प’ से किएक हौ।’ अहि प’ कनि पीत्ता क’ ओ बजला ‘हे हॅसू जुनि . .. हमर जनम ओहि नक्षत्र मे भेल छै. ..जाहि मे गॉधी जी के भेल छलैन्ह. ।’ ‘जुलुम गप्प. ..तखन त’ तोरो हत्या कैल जेत्तऽऽऽऽ।’ कत्तेक कहल जाए . .. ‘बङका कका के ओत्तए विवाह मे कुटुम सब आयल छलैन्ह .. .त’ किछु लोक हिनका दरवज्जा प’ पढैत देखिक हिनका लग आबि बैसला . .. सब पढल लिखल . ..नौेकरीहारा .. .।गप्प करबा मे त’ तंतू भाय सबके पछाङि दैत छथिन्ह . .. ।चीन प’ गप्प चललै .. त’ ई बङ जोश मे आबिक टांग झूला झूला क’ बाजय लगला ‘चीन मे देखियौ .. .कत्तेक विकास भ’ गेलए .. .सांस्कृतिक रिवोल्युशन. . . . ‘चलू गामक ओर’ .. .नारा सॅ ओकर गाम गाम एकटा शहरिक कान काटबा मे माहिर भ’ गेलै. . .देखैत देखैत .. .ओ’ सुपर पावर .. . .माओत्से तुंग की नेता छलै. . ।’ ‘मुदा ओकर नेता सब बङ अत्याचार सेहो केलकै. . ।’ कोने कुटूम हिनक गप्प काटिक बाजल त’ ई पिनकि गेलखिन्ह .. ‘की जनैत छी अहॉ माओत्से .. के बारे मे. . . खाली नाम सुनला टा सॅ नहि होइत छै . ..गहीङ मे जा कए जानए पङै छै. . ।’ताबैत बङका कका के सार फुद्दी बाबू बाजि देलखिन्ह. . ‘हौ. . माओत्से तोहर माम छ’ जे ओकर हिनताई प’ एतेक पिनकै . .छ ।’ ‘ंमाम त’ अहॉक हेताह . ..।’गप्प गरमै लगलै. . कि हम तुरंते हुनका मॉ के बहाना करि आंगन पठा देने रहियै. . । उम्हर अगत्ती धिया पुत्ता सब अपन दलान प’ बैसि बुझौब्बल खेलाय. . ‘खिस्सा कहै . .खिसनी .. सुन भाय मॅकङा जी जान लगा क’ चारि टांग केकरा. . .।’ ‘तंतू भाय के’ . . सब एके बेर चिकरै .बुेझक्कङ फेर सॅ पूछै. . . ‘खिस्सा कहे .. . . . . . . जी जान छोङि क’ चारि टॉग केकरा. . ।’ ‘तंतुभायके।’ ‘अ‍ै रौ .. .जी जान छोङियो क’ आ जी जान लगाबियो क’ तंतुए भाए कोना .. ।’ त’ चट दनी जबाब भेंट जाए. . . ‘जखन ओ’ चौकी प’ सूति क’ शवासन करैत छथि. ..तखन जी जान छूटले रहै छैन्ह .. .आ’ चौकी के चारि टांग .. . ।आ’ जखन ओ दंङ बैसकी लगाबैत छथि .. .तखन दुनू हाथ आ’ पएर धरती प’ रोपने. . .भेलै नै जी जान लगा क’ चारि टांग . .।’आ’ तखन जे समवेत ठहक्का के स्वर गूजै. . .तखने किये बाजि उठै. .हे . .सुनता कत्तो सॅ तंतु भाय त’ खिहारि खिहारि क’ अधमर्रू करि देथुन ।’छोटका बेटा अपन कान सॅ सुनने छल ई सब । मॉ सेहो अहि गंभीर समस्या प’ .. . . .भोजन करबा काल . . .पिताजी के सोझॉ मे बैस क’ .. . . .बाजल छलीह . .. ‘ओहू ठाम त’ ओकरा दिक्कते होईत छै. . . भौजाए सॅ पटिते नै छै. . ।छोट सन बरख दिनक भतीजी. . . .तेकर लत्ता के बिलङबा. . . ह्य.टैडी बियर हृ .. . .सॅ खेलाईत खेलाईत .. .तेना नै . ..जोर सॅ फेकलकै. . .जे नेना मूहें भरि खसलै. . .दुनू दुधी दॉत उखङि .. . खुनम खुन चारहु कात .. . .।हमहुॅ त’ ओहि ठाम छलियै पोरकॉ . .. .ओ’ ततेक डेराए छै आब ओकरा सॅ. . ओकरा देखिते मातर पलंग .. .कुरसी केदोग मे नूका जाय छै. . ओ त’ भाए एहेन नीक छै. . जे बर्दाश्त करि लैत छै. .. . .एतय गाम मे लोकवेद घटक मोङि दैत छै. . . आब त’ सब ईहो कहय लगलै .. .मोचंडक संग ओकरा भूत सेहो खिहारै छै. . ।कहनिहारक मूॅह मे ऊक लागै .. ।’ अहि बतकही सॅ फराक पिताजी गहन चिन्तन मनन के बाद अपन ज्येष्ठ संतान सॅ टेलिफोन प’ वार्तालाप करि मायानगरक रूख धेलन्हि .। . . .अहि होनहार बिरवान के’ क़त्तो नौकरीक जोगाङ मे कत्तेक लोकक दरवज्जा खटखटबए लगला .. . .. ।अहि बेर हुनका लोक सब छुच्छ आश्वासन द’ क’ टारि देलकैन्ह . . .।भाग्य तंतू बाबू के. . .कत्तो दालि गलबे नहि करै. . .जे पिताजै केक्कर कहॉ के नौकरी लगबा क’ अपन हाई कनेक्शनक परचम लहरौने छलाह .. .अहि बीर बालक मे .असोथकित भ’ गेल छलाह .. । अहि बीच गरमी के तातिल मे छोटकी बहिनक विवाह मे सब गोटे गाम गेला. . . ।गामक राजनीति . . .दिन प’ दिन विचित्रे भेल चलल जा रहल छल .. . .भोरे भोर लछमन कका आंगन मे आबि क’ मॉ के सुनबए लगलाह. . .. ‘पूबरिया बाङी के मालभोग आमक गाछ हमरा जमीन प’ अछि .. .से . ..एकरा कटबा दियौ .. ।’ पिताजी कत्तो बाहर गेल छलथि. . .।मॉ तंतू के कहलखिन्ह. . ‘बौआ रे . ..ई त’ अजगुत गप्प करै छथुन .. एतेक सिनेह सॅ तोहर पिताजी अहि मालभोगक बिरबा के कत्तए दन सॅ नै आनि क’ अपने हाथ सॅ. ..रोपने छलाह .. . .एकरा एहेन मधुर फल अहि परो पट्टा मे त’ कोने गाछक नहि छै. .।मुदा ई त’ आब नब गप्प .. . . .हमर जमीन मे .. .जखन की अहि आङि सॅ दू बङका डेग आगॉ धरि अपने जमीन अछि।तू अमीन के बजबा ले आ’ अपना सोझा मे नापि करबा क’ अहू कलेस के ... . पॉच लोकक सोझा मे जल्दी सॅ फरीछा ले. . नहि त’ जनिते छी दियादबादक कूकूर चालि. .मांझ काज तिहारक आंगन मे अङंगा लगा देत. . ।’ तंतू तखन भारतीय इतिहासक किछु पन्ना रटैत चौकी प’ बैसल.. बङका पितङिया बाटी मे . दूध .. .चूङा चीनी बङ प्रेम सॅ पलथा झूलबैत खा रहल छला . .।मॉ मनेसरा के अमीन ओतए दौङा देने छलैथ. . ।मुदा एखन त’ आधो घंटा नहि भेल छलैक ।ओ खेनाय समाप्त करि हाथ मे कॉपी नेने .. .अकबरक नीति संबंधी किछु पाठ घोटैत बाङी अयला. . . लछमन कका ओहि ठा’ विचित्र सन मनः स्थिति मे ठाढ छलैथ. .।अहि बेर ई गाछ लुधकि क’ फङल. . . .बङका. . बङका टा के आम .. . । ‘तंतू बाबू . .. ई गाछ त’ हमरे नमीन प’ छौ .. .देखहक .. . .अहि ठाम सॅ ओ जे गाछी सोझे सोझ भीखना के दरवज्जा लग देखाय पङै छै. . एत्त सॅ लक’ ओत्त धरि .. . ।’ओ अपन आंगुर सॅ देखबए लगला . .. मुदा तंतू के कनि हङबङी छलैन्ह . . ‘बेस कका अहॉ फुसि थोङबे कहबै. . ..।एना करू . ..जौं अहॉ के जमीन मे गाछ अछि त’ पहिने एकरा काटिए दियौ. ..।’ कहबा के देर छलै .. . . ..कोदारि हाथे मे .. .लछमन कका तङातङि बङका मोटका गाछ के घ्ांटा. भरि लागि क’ जङ मूल फङ समेत . .. असहाय अवस्था मे अनाथ सन. . . धरती प’ खसा देलखिन . .।ताधरि अमीन सेहो आबि गेल .. . . जमीन नपलक .. .त’ गाछ. .तंतूए के जमीन मे आ’ दू डेग आगॉ धरि हुनके जमीन .. ।’ मॉ बाङी जाकए देखली . .. .हुनकर त’ माथे घुमि गेलन्हि. . ।कनि बेरक बाद तेना बियाकुल भ’ क’ करूण स्वर मे क्रंदन करए लगली .. .जे लग पासक कतेक लोक जमा भ’ गेलए .. ।तीन दिन धरि मुॅह मे पानिक एक ब्ूॉन नहि लेलथि .. . . .नै मुॅह सॅ एक आखर बहरेलैन्ह. . ।मुदा ऑखि अपन नोर बहा क’ मोनक उद्वेग के हल्लुक करैत रहलै. . । तंतू बाबू सॅ लोकवेद बङ सिनेह सॅ गप्प करै. . ।पिताजी सेहो हुनका परोछ मे बाजैथ. . ‘हौ . .मुरूखक लाठी बीच्चे कपार. . ।कखन कोन नोकसान करि देत के जनैत अछि . .।आब जे छै . .से त’ भोगबा के छै । उम्हर बरियाती मे बरक पिता के पाकल पाकल दाढी देखैत मातर. . ओ’ पंडाल छोङि लत्ते पत्ते पङेला .. . ।पिताजी पीत्ते आन्हर .. . ‘बरियाती के सुआगत करबा लेल कोन काबिलती के काज़ . . अहि काजक लेल त’ कोनो . ..कोचिंग के आवश्यकता नहि. . ।’ मुदा एकर परवाह नै करैत ओ’ अपन छोट भाय सॅ बजला. . ‘पिताजी के बूझेनाय हमरा बूता के बाहरक चीज़ . . .ओहि बूढबा.. के दाढी आ’ लाल टरेस ऑखि हमरा फेर सॅ खिहरनाय सुरू करि ग्ोलक़ . .आ’ हमरा प’ की बीतैत अछि . . .हमहीं जनैत छी. . ।’अनुज हुनका शांत करिक’ भरारक डयुटि संभारय लेल कहि अपने बरियातिक सुआगत मे चलि गेल छला. . । भरार घर मे राखल छोटका मचिया प’ बैसि आगॉ एक गोट स्टूल प’ अपन किताबक पन्ना खोलने .. .किछु रटबा मे लागल छलाह .. . आ’ कागदक एक गोट प्लेट मे . .किछु लडडु . ..पैनतोवा रखने खाईत सेहो छलाह . ..कि तखने रोशनदान दिस हुनक नजरि गेलन्हि .. ।लाल लाल बङका बङका ऑखि . .पाकल पाकल दाढी .. . अांगुर सॅ किछु ईसारा करैत. .. ।ठाकुरजी कोल्ड ड्रिंक्स के बोतल लेबए एलथि. . . त’ देखैत छथि .. . तंतू भाय .. . लडू के चंगेरा प’ ओंघराएल पङल छथि . .. ।सोर पाङलखिन्ह ‘तंतू भाए. . .औ’ तंतू भाय’. . .मुदा किछु कत्तो नै. . ।ओ घबङेलाह .. .आन सारसबके बजौला .. ‘तंतू भायके दॉति लागल छैन्ह .. .।’ भरि पॉज उठा पुठा क’ . .चारि चारि गोटा मिल क’ हुनका दोसर कोठरी मे आनि पलंग प’ सुतौलन्हि . .।कनि प्रयासक पश्चात हुनक मुरछा टूटलैन्ह .. . पानि पीबी . .स्वस्थ भेला. . .।उम्हर दलान प’ बरियाती . ।. .एक गोटे के छोङि सब कियो दलान प’ भागल. . । कनि काल मे तंतू बाबू उठि पुठि क’ बैसैत बजलाह. . ‘भरारक रौशन दान सॅ झॅकैत ओ पाकल पाकल दाढी वला बुढबा. . . ।’ठाकुरजी दौगला .. . भरारक रौशनदान सॅ कनि सटल. . . पङोसिया के खपरैल प’ कारी बिलाङि सूतल . . ।आब ई कोन काजक जोगर. . . कनि बिलमि क’ ठाकुर जी हुनक छुच्छ स्वाभिमानक रच्छा करैत कहलखिन्ह. . ‘भायजी अहॉ पढबे करू. . . भरार हमीं संभारि लैत छियै. . । ंमायक कबूला रहैन्ह. . बरहम स्थान मे घोङा चढेबाक़ . .तंतूके हाथे. . . .।आ’ अहि कन्यादानक सेहो. ..। .जेठक धूप. . . सकाले जा कए बरम थान सॅ आपस भ’ जैब नै त’ बङका टहटहौआ रौद पकङा जैत. . .हालाकि एखन सातो नहि बाजल छलै. . मुदा सुरूज महराज अपन ढिठाई देखबए लगला जे हिनका सॅ पंगा नेनाए नीक नहि .. .यथाशीघ्र प्रस्थान करबा चाही. . । . ।त’ तंतू बाबू बाजा गाजा .. ठोल पिपही के संग गामक टेढ मेढ कच्ची रस्ता सॅ हाथ मे घोङा नेने बढल चलल जाईत छलाह. . ।माय पितियानि .. मौसी पिसी .. .बहिन भौजाय .. .आहे माहे स्त्रीगण सब पाछॉ सॅ गीत गाबैत चलल आबि रहल छलाह. . .। एतबै मे तंतू के हाथक घोङा सक्रिय होईत हुनका तेहेन कसि क’ दुलत्ति मारलकैन्ह . .कि ओ त’ सीधे जोतलाहा खेत मे उनटल . . . ।संगक छौङा सब दौगल. . . ।माय पितियानि गीत गबैत लग अयली त’देखैत छथि जे पिपही ढोलबाला त’ आगॉ बढल चलल जा रहल छै. . मुदा धिया पुत्ता ओहि खेत मे . . झूंड बनौने की क’ रहल छै .. .ऋ। तंतू कत्तो देखाए नहि पङि रहल छला. . ।मायक माथ ठनकलैन्ह . .. ओहो एकपेङिया सॅ नीचा उतरलिह. . . देखैत छथि . . .तंतू आ’ हुनक घोङा दूनू दू ठाम खसल. . .।तामसे त’ माहुर भ’ गेली. .मुदा क्रोध के’ पिबैत बजली. ‘रे अनमोल. . .तू घोङा उठा ले. . आ’ तंतू .. .चल झटकि क’ बेर बीतल जाए छै . . .आंगन मे सेहो पूजा छै. . ।’ घर आबिक मायक कोढ फाटि गेलन्हि. . ‘आब त’ तंतुआ के माटियो के घोङा पटैक दैत छै. .कि विपत्ति छै . .किजाने. गेलियै. . . ।हुनका लेल ओ’ कोन व्रत उपास नै करै छलीह .. । तंतू के अहि बेर मायानगर जयबा काल माय बिलखि क’ अपन बङका होसियार पूत के कहलखिन्ह ‘तू ही देखही .. . हमरा त’ एकर लच्छन कोनो नी क नहि लगैत अछि. .कोनो नोकरी लगबा दही. . .सतमा अठमा पास लङकी सॅ. . गरीबक बेटी सॅ .. विवाह दान करा दही जे एकर घर बसा दैक़ . ।’ मुदा बङका बेटा हिम्मत नै हारलैन्ह .. ‘मॉ अहॉ निफिकिर रहूॅ . .सब नीक करथिन्ह भोलेनाथ . .।’ भायक एक गोट संगी जे हुनका बारहो बरीख सॅ जानि आ’ देख रहल छल. . .आ’ हुनक बौधिक क्षमता के संग .. .शारीरिक शक्ति के नापि तौल रहल छल . ..बङ सोचि बिचारि क’ गप्प के घुमबैत फिरबैत . . .जाहि सॅ हुनका खराप सेहो नहि लागैन्ह . . .आ’ बेचारा के जिनगी सेहो बनि जाए .. . सलाह देलकैन्ह. . ‘एकबेर हिनका बालाजी ल’ क’ जईयो राजस्थान मे .. ।जौं किछु उपरि चक्कर हेतए त’ सेहो दूर भ’ जेतै. . ।’ अप्पन आफिस सॅ छुट्टी लईत भाय राता राती गाङी प’ हुनका बैसा क’ बालाजी के लेल प्रस्थान केलथि .. ।मई मासक ओ’ टहटहौआ .. रौद . . .चारो कात जेना आगि बरैस रहल छल. . .।मुदा भाय त’ अपन अहि भा एक लेल हिमालयक बरफ प’ सेहो बिशटी पहिर एक टंगा द’ तप करय लेल तैयार छला . . .त’ ई फौर्टी एट डिग्री तापमान की छल .. । आ’ आश्चर्य . . . .. . ओहि सीझैत गरमी मे. . ओहि बङका गाछक चब्ूातराके नीचा . . ..लोबान अगर बत्ती के मॅहक सूॅघैत मातर . .. थरथर कॉपैत तंतू . . .अपन दूनू ऑखि सॅ दहो बहो नोर बहबैत बाजए लगलाह “ हम त’ पिछला दू सौ बरीख सॅ अतृप्त अहि अखिल ब्रंहांड मे भटकि रहल छी. .।अपन किछु आरोपित सिद्वांत प’ लोकवेद संगे हमरो संशय छल . .. ताहि लेल हम गाम गाम गली गली भटकैत ओहि सिद्वांत के परम सत्य के कसौटी प’ कसबा लेल बिलखि रहल छलहूॅ . . .कि . .कओलेजक पछौति मे आमक गाछ प’ चढि क’ पोथी पढैत ई देखाए पङल. .।दोसरा दिन अपन बुशट के ऊपर पैजामा के बन्हने. . .एक बीत्त डोरी आगॉ मे लटकल .. .संघतिया सबहक मखौलक परवाह नै करैत . .. जाहि आत्म विश्वास सॅ ई अपन कओलेज सॅ चलल आबि रहल छल कि हमर गॅहकी नजरि एकरा प’ पङल. . .।हमरा लागल छल . ..हमर ‘सबजेक्ट’ हमरा सोझॉ ठाढ . .एकर क्रिया कलाप .. एकर व्यवहार .. .गप्प .. शप्प .. . सबटा हमरा आदि मानव के मोन पाङैत रहल .।कतेक साल धरि . .. असंख्य . ..जीव जंतु सब प’ अनुसंधान करैत अहि निचोङ प’ पहुॅचल छलहुॅ .. .कि मनुक्ख . .. .बानरक विकसित रूप अछि .. .।मुदा अहि मनुक्ख के देखि हमरा आश्चर्य भेल . .कि मनुक्ख एखनो बानर अछि. . . वा . ..बानर मन्ुक्ख बनि क’ बूलि टहलि रहल अछि. . । हम अप्पन शंका के समाधानक वास्ते एकरा पाछॉ लागि एकर पैजामा उतारि क’ ई देखबा के प्रयास मे छलहुॅ .. कि एकरा पोंछ छै. . .वा नहि .. . . ।आब .. . .जौं पोंछ नहियो हेतय .. . तैयो ई बिसवास भ’ गेल जे ई बानरे थीक .. .पोंछ विहिन बानर .. . ।हमर आत्मा जुङा गेल. . . परितृप्त भेल .. . ।हम एकरा स्वीकार करैत छी . .जे बानरक विकसित रूप मनुक्ख .. .नहिं .. .परंच .. .मनुक्ख आ’ बानरक आदि पुरूख कियो एके गोट छल होयत .. ।आब हमर भटकाव समाप्त भेल . . . लिअ .. . हम अप्पन ठाम चललहूॅ .. . ।’ तेकरा बाद तंतू त’ तंतुए रहला .. . मुदा फेर कोनो जंतु हुनका प’ कोनो उपद्रव नहिं केलकैन्ह. . . । टूटल तारा एखन फरिछ हेबा मे किछुए विलंब छल ।क्षितिज धाे माॅजि क’ अपन रतुका कारीख साफ करबा मे लीन ।चैती बयार गाछ बिरीछक पात के हल्लुके सॅ छुबैत दुलराबैत सहलाबैत बहि रहल छल आ संगहिं बढि रहल छल़ जमुना नदी के पार्श्व वर्ती बिरीछ प’ रैन बसेरा करैत खग विहगक मधुर कलरव गान ।उम्हर रश्मि रथी के सुआगतक तैयारी चलि रहल छल इम्हर अंतःपुर मे रत्नवजडित बङका पलंग प’ सूतल सुल्तानक आॅखि फूजि गेलै़ पार्श्व मे सूतल चंपा के खिलल खिलल कली सन मृग नयनी अपन सुतवा नाक गुलाबक फूल सन लाल लाल ठाेर ललाट प’ कमानी सन सजल भाैं सॅ अलाैकिक आभा पसारने ।साैंदर्य के साक्षात प्रतिमूर्ति के देखि वजीरे आजम़ भाव विभाेर भ’ उठला़ ।आे हुनका अपन आगाेश मे भरि लेलन्हि ।सुन्नरी जागि रहल छलीह मुदा लाथ केने पडल़ सुल्तानके बलिष्ठ बाॅहि मे कसमसाति सन पडल नहूॅ नहूॅ मनुहा़रि करैत किछु प्रेमक फकडा दाेहराबैत रहली़ काेन मे आतिशदान जरैत रहल छल ।खिडकी सॅ आकाशक कालिमा छॅटेत देखि रूपसी हडबडा क’ उठि बैसली’ “जहाॅ पनाह अन्नदाता बङ़ विलंब भ’ चुकल अछि आब हमरा यथाशीघ्र प्रस्थान के आज्ञा देल जाआे ।’ समा्रट क’ आॅखि मे पीडा के लहरि स्पष्ट देखार भ’ गेल छलै मुदा तत्क्षलण हुनक हाथ फराक भ’ गेल छलैन्ह आ’ आे एकदम माैन खिडकी के बाहर नदी मे दूर सॅ आबि रहल काेनाे कश्ती के देखबा मे लागि गेल छलाह । सुन्दरिक’ विदाइर् के पछैत आेही रत्नेजडित महलक दराेदिवार जेना एकदम बेराैनक सून सून सन लागए लगलै़ सुल्तान एतेक उदास भ गेल छलथि जेना कियाे हुनक माथ स’ ताज छीन नेने हाेयन्हि बङ असहाय हारल जुआङी सन । मस्तिष्कक साेर गुल कम करबा लेल आे पलंग सॅ उतरि अपन पएर मे बेस कीमती नागाेरी जुत्ती पहिर सुन्दर सुवासित बागीचा दिश टहलए जेबा लेल प्रस्तुत भेला मुदा नहिं जानि माेन मे काेन तरंग हिलकाेर मारि रहल छलैन्हपएर दीवाने खास क’ विपरीत संगमरमरक’ श्वेत धवल झराेखा दिस बढैत गेलन्हि जिम्हर जमुना के कारी कचाेर पानि बङ शांत भाव सॅ कश्ती वाला के मधुर रस सॅ भरल गीत सुनैत बहि रहल छल ।कनि विलमैत नहूॅ नहूॅ आे वाटिका दिस अग्रसर भेला ।सुन्नर महल एखनाें आैंधायल अलसाति सन पङल छल ।जाैवन सॅ प्रफुल्लित पुष्पदल प’ मॅडराति भमरा सबहक गुॅजन आ’ नदी के धीर गंभीर हहराति स्वर ऊपर अकास मे भाेरक रूहानी़ आध्यात्मिेक ताकत़ चिङै़ चुनमुनी के मधुर ताऩ मुदा सुल्तानक गमे इश्क प ‘किछु मरहमक काज नहिं करि सकल ।कत्ताे क्ष्ण मात्र नै बिलमति ।जेना छरपट्टी लागि गेल हाेयन्हि ।उद्विग्न ह्द य सॅ आे खुदा के इबादत करबा लेल माेती मस्जिद दिस बढि गेल छलाह । दूरस्थ मस्जिद सॅ आबैत अजानक स्वर हुनक ह्दयय के छूने बिन दशाे दिशा मे झहैर झहैर क’ विलुप्त भेल चलल जाइत छल ।बङ कुमन सॅ कहुना करि अपन आसन बिछा ठेहुन माेङि नमाज पढलन्हि।काॅच पाकल अपन नाम नाम दाढी प’ हाथ फेरैत अतीत मे डूबल भसियाएल सन स्नान करबा लेल आे हमाम दिश मुङि गेलाह ।चढैत सूरूजक संग दिवसक क्रिया कलाप प्रारंभ करए लेल दीवाने आम मे दरबार सजए लागल ।आब नै आे गुल रहल आ’ नहिं आे गुलशऩ सुल्तानक आे बुलंद साख सेहाे नहिं बाॅचल छल मुदा तैयाे बङका नामक टेग त’ लागले छल लाल किला के संग ।राजकाज सीमिते मुदा छलै त’ अवस्स ।बेसकीमती वस्त्राभूषण आे राजमुकुट पहिर राजसिंहासन प’ बैसि राजकीय माेहर लगबैत प्रशासक़ प्रबंधक आ’ न्यायाधीशक’ भूमिका निभाबैत निभाबैत आे’ जेना फेर सॅ नशा मे मातल बहकल बहकलसन व्यवहार करए लागल छलाह़ ।चतुर सुजान मं्रत्रि सबहक नजरि सॅ इर् नहिं बाॅचि सकल छल ।किंकर्त्तव्यविमूढ आे सब़ ।आखिर करितथि त’ की ।लाल़ टरेस़ उन्मत्त आॅखि आ’ नशा के आगाेश सॅ सुन्न हाेइर्त दिमाग क’ तंतु तंतु के सुरा आ’ सुन्नरि अपन हुश्न के हुकुमत मे बंधक बनाैने नचा रहल छल ।हुस्ऩ जाम आ’ इर्श्कक’ भॅमर मे घेरालि ऊबचुभ हाेइर्त माेहित नजरि सॅ आे अपन चारू कात देखल ।सम्पूर्ण दरबाऱ दरबारी़ प्रजा आ’ मंत्रि परिषद हुनका शत्रुसम दृष्टिगाेचर हाेमए लागल छल़ मस्तिष्कक खाेह मे त’ मंडीलक घंटी आ’ मस्जिदक अजान सन एकेटा स्वर प्रतिध्वनित हाेमैत रहल छल इम्तियाज़ इम्तियाज़ इम्तियाज ।हुनक वश चलितैन्ह त’ सम्पूर्ण संसारक मिल्कियत आेकरा नाम लिख आेकरा मल्लिकाए तरन्नुम बना विश्व मानचित्र प’ अमर बना दैतथि ।शनैः शनैः बढैत प्रचंड धूप हुनक बेचैनी के अनमनस्कता के आआेर बेलगाम करय लागल छल ।तखने विशाल विशाल कारी चारी टा अश्व अपन वीर जाेद्वा संग आेत’पधारल ।सहायक के घेाङा साैंपि सैनिक सब जहाॅपनाहक खिदमति मे अपन आदाब अर्ज करैत बङका बङका डेग भरैत दीवाने खास के दिस मुङि चुकल छल ।संर्पूण मंत्रिमंडल संग कनिकाल लेल सुल्तान सेहाे चिंता के अथाह सागरि मे डूबि गेल छलथि गुप्तलचर सब काेन सनेस ल’ एहेन व्यग्र भ’ पहुॅचल अछि ।आे सब यथाशीघ्र आेहिठामक कार्यवाही समाप्ता करि उठि चुकल छलाह । तीन साै बरक सॅ जे साम्राज्य जनमानस मे घुसिक’ आेकर रग रग मे अपन जङि जमा चुकल छल़ जेकर असीम सत्ता आ’ प्रचूर दाैलत साेऩ चानी हीरा जवाहरात लाेकक ह्दुय मे भय वा इज्जतक कारण बनल छल जेकर विराट न्यायप्रियता़ वा क्रूरता के शासन प्रबंधक’ चारूकात पताका फहरा रहल छल़ आेहि विख्या़त साम्राज्यक हाथ सॅ एक के बाद एक करिक’ रियासत सब निकलल जा रहल छल ।चारूकात विद्राेहक अग्नि प्रज्ज्वलित हाेमए लागल ऊपर सॅ विदेसी आक्रमण घाघ आ’ शातिर खेलाङी इर्स्टइंडिया कंपनी त’ बङ चालाकी सॅ टामस राे के पठा जहाॅगीरे के शासनकाल मे व्यापार करबा के अनुमति लइर्त शनैः शनैः अंगुरि पकैङ क’ पहुॅचा पकङनाय प्रारंभ करि देने छलै ।मैत्री के नाम प’ एते पैघ छलावा आे पहिल अंगरेज के पछाति कत्तेक रास राज के अपन भ्रामक महाजाल मे फॅसबैत चलल गेल़ ऐतिहासिक दस्तावेज अहि दुर्भाग्य पूर्ण गाथा के पत््ऱायक्ष प्रमाण अछि जे भारत भूमि के अनेकानेक राज रजवाङा के कूप मंडूकता आपसी इर्रखा़ द्वेष आ’ अदूरदर्शिता के लाभ उठबैत सबसॅ फराक फराक संध़ि करैत आेकर नाम देलके़ ट्रीट्री फाॅर फ्रेन्डशिप़ ट्रीट्री एडाेप्टे शन चलाकी सॅ कखनाे संधि कखनाे खेल मे हार जीतक बहाने हथियाबैत रहल सबटा राज्य । उम्हर अंगरेज क सर्तक चुस्त दिमाग इम्हर अभाग्यक प्रतीक़ इर् सुस्त़ सूतल सुल्ताऩ ।लाेक चकाेर सन हिनका दिश ताकि रहल छल़ सल्तनतक पुरान कला़ रण नीति देखाबए लेल मुदा एतए त’ नजारे किछु आैऱ ।दीवाने खास मे गुप्तमचर सबसॅ वार्ता करि आपसी विचार विमर्श क’ पश्चात दरबार उठि चुकल सुल्तानक कार्य अकुशलता क़र्त्तव्यहीनता़ आ’ विलासितासॅ उदास मंत्रिगण माथ झूकाैने अपन अपन घर दिस प्रस्थान त’ हाेमए लगला़ मुदा नाना विध दुश्चिन्ता सॅ आशंका सॅ भरल मस्तिष्क पएर मे जेना भारी भारी पाथरि बाॅधि देने छल़ कहुना करि घिसिया घिसिया क’ आगाॅ बढैत रहला अकस्मात बङ हिम्मत करि क’ वृद्व वजीर हाजी मियाॅ अपन भारी भरकम कनि बझल बझल सन स्वर मे बाजि उठल छलाह ‘दाैलते आजम विपत्ति के कारी कारी घनगर बादरि आब शाही आकास सॅ बेशी दूर नहिं छैक खुदा माफ करथि मुदा किछुए दिन मे इर् लाल सुर्ख इमारत सुसज्जित वैभव पूर्ण किला अंधार श्मशान घाट बनैत कालक तीव्र प्रवाह मे नहिं विलुप्ता भ’ जाए ।अपने किछु फरमान जारी करितियै अहि विपत्ति मे आखिर कएल की जाए सेना सब के कत्तेकाे मास सॅ दरमाहा नहि भेटलै अेाकराे सबहक माेन मे आका्रेशक’ लुत्ती प्रज्ज्वलित भ’ रहल छै तइयाे जहाॅपनाहक आदेश प’ आेकरा सब मे नब स्फूर्ति नब ऊर्जा उत्पसन्न कएल जा सकैत अछि ।’नहिं जानि काेन गप प’ सुल्तान एकदम हत्थाव सॅ उखङि गेला खाैंझाइत बाजि उठला ‘खुदा के इबादत करू सब मिल जुल क’ पाक कुरान शरीफ पढू उपर वला के रहमाेंकरम सॅ सब विपत्ति टैल जेतै अहाॅ सब व्यर्थ भयाक्रांत भ’ क’ काफिर जकाॅ गप करि रहल छी ।’हाजी मियाॅ के नजरि पहिने सॅ झूकल आब आआेर झुकि गेल छल ।आेहि वृद्व बुद्विमान पुरूख के संग देबए बला कत्तेकाे अमीर उमरा ।कत्तेक षङयं्रंत्र भ’ रहल छलै़ सब तरि ।शाही सेना के जांबाज सेनापत़ि क़त्तेक बेर हाजी साहब दिस सक्षम नेतृत्व् के उम्मेद सॅ तकने रहै़ मुदा पुरान लाेक कृतज्ञता के चासनी मे डूबल सुल्तान सॅ बगावत के गप साेचिआे नहि सकैत छल़ राजघराना मे काेनाे सक्षम नेतृत्वा दूर दूर धरि नजरि नहिं आबि रहल छल । गुप्तन षडयंत्रक’ माध्यम सॅ आेहि सुन्नरि के जान सॅ मारब के कत्तेक प्रयास कएल गेल आेहि निशाबद्व सुतली राति मे आेकर घर के आगि लगा सुपुर्दे खाक करि देल गेल रहै़ मुदा किस्मत आेकर आे त’ आेहि राति अपन भवन मे नै भ’ क’ हवेली के नर्म नाजुक अलंकृत पलंग प’ शाेभायमान छल ।अहि अग्नि कांड सॅ सुल्तानक शरीर मे अपन पूर्वजक वीर खून प्रवाहित हाेमए लगलै । तामसे मूॅह सॅ झाग फेन बहराए लगलै चाराें कात गुप्त चर सतर्क भेल आखिर इ काेन आदम जातक करिस्तानी अछि ।कएक दिन धरि आेहाे राज काज ठप्पा रहलै ।चारू कात मचल भयानक ड’र आशंका आ’ अस्थिरता के बीच फरियादि सब छाती पिटैत कानैत कल्पैत आपस जायत रहलै ।इ‘ त’ आआेर विकट माहाैल ।आखिर कूटनीतिक चालि चलि आेही नर्तकी के समझा बूझा क’ सुल्तान सॅ कहाआेल गेल जे आगि आर कियाे नहिं आेकर अपने असावधानी सॅ जरैत मशाल सॅ लागि गेल छलै हवा तेज रहै खिङकी खुजल ।इएह सब साेचैत हाजी मियाॅ आसमान मे रूहानी ताकत के दिस आस सॅ तकने छलथि ।सूरूज के भीषण ताप सॅ बचवा लेल त’ आेहि संगमरमरक वृहदाकार भवन के जमुना के पानि झींक क’ भीतरे भीतर शीतल बनेबाक साधन त’ वर्त्तमाने छलै़ मुदा तैयाे खस़ चाननक लेप आ’ विविध ठंढा सरबत के मध्य आेहि सहस्त्र जीव्हा बला धाह के राेकबा के भरिसक प्रयास कएल जा रहल छल। उम्हर प्रचंड भास्कर नहूॅ नहूॅ करिक’ अस्तगामी हाेबाक फेराक मे छलथिइम्हर सांझ मे सुल्तानक मनाेरंजनक लेल रंगमहलके फर्श के झाङ फानूसके राेशनदानके़ दराे दीवार के धाे पाेछिक’ चमका चमका क’ सुसज्जित कएल जा रहल छल ।रंग शालाके देवार मे चुनैल बेशकीमती पाथरि हीरा माेती़ पन्ना जवाहरात़ कंदीलक राेशनी मे स्वर्गक सुषमा बखानि रहल छल ।जमुना दिस सॅ अबैत शीतल मद्विम बयार इत्र फुलैल केवङा़ रातरानी़ के गंध सॅ मॅह मॅह करैत सुखमय वातावरण़ ।मशालची़ तबलची़ ढाेलकिया तानपूरा़ सितार सराेद़ पखावाज जलतरंग़ सारंगी़ अपन अपन वाद्य यंत्र नेने विशेषज्ञ सब अपन निर्धारित स्थान ध’ नेने रहथि ।हारमाेनियम प’ राग छेङल जा चुकल छल ।अपन ख्वाेबगाह सॅ निकसि रात्रिपरिधान मे सुल्ताऩ बङका भव्य फाैवारा सॅ कनि मध्य राखल गावतकिया प’ स्थान ग्रहण करि चुकल छलाह कि तखने म्ुानहरि सांझ मे संध्या सुन्नरि जकाॅ छम छम पाज्ेाब खनकाबैत़ अवगुंठन सॅ म्ुॅाह झॅपने नर्तकी के प्रवेश़ भेलै ।कनि झुकि क’ माेहिनी अदा सॅ सुल्तान के सलाम पेश करैत घाेघ उठा क’ फेंकलक़ भरिदिन आैंधायल चिन्तातुर मुखमंडल प’ जेठ मे जेना सावनक हरियरि आबि गेलै़ ।आे मुस्कैला महफिल धन्य धन्य भ’ गेल नामी गिरामी मुॅह लगुआ अमीर उमरा़ झराेखा सॅ झकैत़ गुलाम किन्नर दास दासीगण । माैध सॅ सनल स्वर लहरी हवा मे तूर जकाॅ दूर दूर धरि छितरै लागल छल़ ‘एै माेहब्बत तेरे अंजाम पे राेना्््््ऽ््ऽऽ््््््््ऽऽऽ््््््् आयाऽ्ऽ््््ऽऽ््।’बनल ठनल दू टा सुन्नरि अंगङाउर् र्लइत सुल्तान लग’ नमगर बङदीव नक्कानसी बला सुराहीदार स्वर्ण पात्र सॅ सुवर्णक गिलास मे भरि भरि क’ शराब पराेसि रहल छल ।गजल़ ठुमरि कजरी नृत्यवगान सॅ भरल माहाैल मे जाम प’ जाम पीबैत सुल्तान आ’ अमीऱ । जखने सुरू कयल ‘आज जानेऽऽऽ्् की जिद नाऽऽ््ऽ्ऽ्ऽ्कराे यूॅ ही पहलू ऽऽऽऽ्ऽ््मे बैठे रहाेऽ्ऽ्ऽऽ’आ’ सुल्तान गिलास हाथ मे नेने ठाढ भ’ झूमै लगला ।रूपकुवॅरिक’ के स्वर रंगशाला सॅ उछैल उछेल जमुना के विस्तृत पाट प’ विलिन हाेमैत रहलै ।किछु शायर लाेकनि सेहाे अपन शेर सॅ आेहि रंग मे आआेर रंग मिलाबैत रहला ।कनि काल मे सुन्नरीक साेझाॅ ताेहफा के ढेर लागि गेल रहै ।भीतर बैसल बाहर सॅ झॅकैत अमला सबहक राेम राेम सिसकि रहल छल महलक बाहर चाराें कात विद्राेह स्वर सुनाइ दैत छलै राजकर्मचारी के पकङि पकङि लाेक मारै़ ।आकुल व्याकुल जनानी सब महल सॅ पङेबाक ब्याेंत मे लागल कत्तेकाे नाह़ कश्ती किला के सुरंग मे तैयार केहनाे आपद स्थितिमे जमुना बाटे पङेबा लेल ।अन्तःपुर सॅ नित्यकप्रति कन्ना राेहट के आवाज़ आे असहाय स्त्रीगण दास दासी के मुॅह सॅ बाहरक गप सुनि मृत्युंभय सॅ काॅपैत जाेर जाेर सॅ घाना पसारबा आ’ इबादत तजि आैर की क’ सकैत छलीह । मनाेरंजऩ खेनाय पिनायके बाद गहराति राति मे अपन आराम गाह मे पसरल़ रूप सुंदरि के रंग मे मातल सुल्तान आय आेकरा अपन घर नहिं जाए द’ रहल छल । “आब आैर नहिं क्षणभरिक अलगाव हमरा पागल करि दैत अछ़ि कहूॅ त’ इ लाल किला इर् संपूर्ण सम्पत्ति अहाॅ के नाम लिख क’ आहि प’ शाही माेहर लगा दैत छी।’ ‘आलमपनाह़ हम अपने संग अहि वैभव विलास मे त’ अपार आनंद आ’ हर्षक संग रहि सकैत छी़ इ त’ हमर अहाे भाग्य हाेयत मुदा आे दुर्दिनक हमर सखी जे महलक बाहर खरभुजा बेचैत अछ़ि हम आ’ आे दू शरीर एक प्राण आे काेना जीतै़ बिलैट जेतै आे ।’सुंनरि के अपन आगाेस मे नेने मत्तवाला उन्मत्त प्रेमी सुल्तान आॅखि कनी खाेलने खाेलने बाजल छलाह ‘हम अहाॅ के संगी के अहाॅ के दासी मुर्करर करि रहल छी आब त’ खुशऽ्ऽ्ऽ्।’सुल्तान अपन छाति सॅ आेकर मुॅह उठा क’ पुछने छल़ कारी कजरारी बङका बङका पिपनी फङफङाबैत आे इत्मी्नान सॅ मुस्कैल छल जेना आेकर बङ पाकल गुरक’ इलाज भ’ गेल हाेए । आरामगाहक काेन मे जरैत मशाल सल्तनत के अहि दुर्भाग्य प’ फफैक फफैक क’ कानला के बाद मीझा गेल छलै ।दूर कत्तेकाे नढिया गीदङ कूकूरक कननाय प्रारंभ भ’ चुकल रहै । चाराें दिशा भीषण अंधकार मे विलिन ऊपर आकास मे आय चाॅन सेहाे नै़ भयंकर अंधेरिया़ अपन आधिपत्य कायम करि चुकल छलै़ तखने दच्छिन दिसक आकास सॅ एक गाेट लहकैत टूटल तारा महलक’ प्रांगण मे खसि पङल छलै । अप्‍पन राज्य खल्वाट माथ व्यथित चित्त राज सिंहासन सॅ उठि बेचैन भाव सॅ इम्हर आेम्हर बूलैत़ दूनू हाथ पाॅछा बन्हने ककाजी के फिरीशानी सॅ आेत्तय उपस्थित सब कियाे फिरीशान सब हक आॅखि हुनके मुॅह प’ गङल ।कएक घंटा सॅ चलि रहल छल इ घमरथन मगजमारी़ ।काेनाे प्रस्ताव प’ कखनाे कियाे बिदकि जाए त’ कखनाे किनकाे आॅखि भाैं चमकए लागै ।किछु लाेक त’ विशेष गरमागरमी देखाक’ तमैक क’ पङाइयाे गेल छलाह । क़ि छु के हॅकार प’ हकाॅर पठाआेल जा रहल छलैन्ह तैयाे नै टघरलाह । प्रजातंत्रक जादुइर् शक्‍ति सॅ लैस आेही प्रकांड विद्वान लाेकनिक मध्य पैसिक’ अपन ग्रामीण के ननिहरक पा्रेफेसर साहिब उर्फ ककाजी के समस्या किछु सरल करबाक काेरसीस करै लेल नहुॅ नहुॅ बजलहुॅ ‘शिक्षा लेल फुद्दी बाबू सवाेर्त्तम बङका कआेलेजक माननीय प्राेफेसऱ कत्तेक रास पाेथी सेहाे लिख चुकल छथि आ’ जनता जनार्दन सॅ स्वस्ति सेहाे लै आयल छथ़ि तखन ।’आे बूलैत रहला एकदम गुम्म ।हम हुनक पाॅछा पाॅछा ।किछु काल मे कनि झटकि क’ आे बाम कात क’ रेशमी परदा बला द्वार खाेलि काेठरी मे पैसि दरवज्जा बन्न करि लेला “इ त ताैं उचित कहि रहल छ मुदा अहि चुनाव मे त’ सात सात टा परफेसर जीत क’ एलाहैं सबहक अपन अपन डाेली खाेबी सब क़त्तेकाे पाेथी छपाैने छथि आ’ सबके इयह विभाग चाही ।तखन ।’ ‘तखन की ।’ “राम खेलाैनक नाम प’ ककराे आपत्ति नहिं बूझि पङि रहल छै ।’ “रमखेलाैन ’हम अकचकैलियै ‘आे कत्त के प्राेफेसर ।हमरा जनितब त’ बी ए कहुना चीट पुरजा सॅ पास केने आेहाे थर्ड डिविजन स्त्री पत्रिका सरिता गृहशाेभा़ आदि पैढ पैढक’ राजनीति के ककहरा जानबाक काेरसिस कएल ।’ ‘हॅ हाै से सब त’ शत प्रतिशत सत्‍य छैक मुदा आयकाल्हि आेकरे सबहक राज्य छै देखहक़ केहेन पैघ बहुमत सॅ जीत क’ आयल अछि ।दाेसऱ बङका जाति जकाॅ घमंड सेहाे नहिं सबहक मूॅह ठाेर पकङने रहैत अछि ।’ ‘फरिछा क’ कहु नै जे दशद्वारी छै बराे के माए कनियाे के माए़ जत्तए काेउ नृप हाेहूॅ हमे का हानी़ बला खिस्सा छै़ आेहिठाम आे घरे घर जा क’ सबहक माेन जीत चुकल अछि ।आेना इहाे सूचना अछि जे चाेरी चपाटी मे सेहाे आे विशेष पारंगत कआेलेज मे पढनाय सॅ बेसी आेकर धियान काॅमन रूमक सामान चाेरेनाय मे छल़ आे हाे टेनिसक टेबुल एत्ते पैघ समान से धरि गायब करि देने छल ।’ ‘इ सब गप बाजय बला नहि छै़ ताैं बेवकूफी नै करहक आे अहि पार्टी के एकटा मजगूत हाथ छै काेनाे दलके पूर्ण बहुमत त’ छै नै तखन सबके मिला क’ गाङी हाॅकबा के छै’।” “आ’ आे जे सभा मध्य मे रूपकुमरि आसन ग्रहण केने बैसल छथि हुनका काेन इन्द्रासन प’ बैसेबा के माेन बनाैने छियै ।” हमर इसारा ब्ूाझि ककाजी कनी बिहुॅसला ।हुनक थाकल झमारल मुख मंडल प’ प्रथम बेर सलज्ज भाव सॅ ऊर्जा के प्रवेश भेल छल आ’ आे कनी ताेतराति कनी हकलाति बजला ‘आेत आे त स्त्री कल्याण विभाग़ ।’ जखन सब किछु निर्णय लइये चुकल छी त’ घाेषणा करय मे विलंब कियेक़ ।शीघ्र एकटा समस्या त’ घटत।’ “हेऽऽ्ऽऽ् एना उधियेला सॅ बाैआ काज नै चलै छै ।कनि थमि जा ऽऽ ।देखहक राजनीति के शतरंजी चालि ।’ हुनक मुॅहक काेमल भाव द्रुत गति सॅ बदलि गेल रहैन्ह आ’ काेच सॅ उठि पुठि क’ काेठरी सॅ बहराइत फेर सॅ अपन सिंहासैन प’ आबि बैसला । “अपने सब की अथ उथ मे पडल छी बजियाै किछु आखिर नब राज्यक गठन भ’ रहल छै।” ककाजीक कठाेर अध्यादेश सुनि कंटीर बाबू साेझाॅ टेबुल प’ राखल बङका टाके कटाेरा सॅ रसगुल्ला निकालि चम्मसे सॅ मुॅह मे रखला आ’ मिचङा मिचङा क’ लगला बाजै ‘एतेक शीघ्र काेना भ’ जेतै इ समाधाऩ कत्तेक सूझबूझ देखबए पङतै जाहि सॅ जन प्रतिनिधि असंतुष्ट सेहाे नहिं हाेबैथ आ’ एकटा सबल मंत्रि परिषदक गठन सेहाे भ’ जाए ।’ उपस्थित जन अहि प्रस्ताव के बङ प्रशंसा करैत एगारहम बेर रसगुल्ला प’ झपटल रहैथ । विवादित शिक्षा के एक दिस टरका क’ दाेसर विषय प’ विचार विमर्श प्रारंभ भेल ।दाेसर सबसॅ जटिल प्रश्न छल स्वास्थ ।इहाे शिक्षे जकाॅ विवादक शिकार हाेमए लगलै़ करीब करीब आठ टा डाक्‍टऱ एक टा नैचराेपैथ चुनि क’ आयल छलाह आ’ सब के सब स्वास्थ विभागक लेल कच्छा पहिर मल्ल जुद्व मे भिरल । आ’ राति भरियाति देखि सभा’ दाेसर दिनक बैसारी के आसरा मे अनिर्णित समाप्‍त करि देल गेल छल । सब गेाटे के स्वस्थान प्रस्थानक पश्चात हम ककाजी सॅ निवेदन करैत कहलयिन्ह ‘इ छाेट राज्य बना क’ भारत सरकार अपन फिरीशानी सुरसा के मुॅह जकाॅ बढा रहल अछि ।कि अहि सॅ राज्यक विकास संभव छैक ।आ’ भ्रष्टाचार जङ समूल नष्ट भ’ जेतैक ।’ ककाजी टेबुल प’राखल साेनक पनबट्टा उठा आेहि सॅ मगही पान क’ डबल खिल्ली निकालि कल्ला तर राखैत कनि लटपटाइत स्वर मे बजला ‘आजुक समय छाेट राज्यक डिमांड करै छैक ।’ ‘ स्वतंत्रता सॅ पूर्व त’ भारत मे छाेटे राज्यक चलन छलै़ पाॅच साै पैंसठ राज्य़ तखन किएक सरदार पटेल के सुदृढ केन्द्र बनब’ लेल एकीकरणक मार्ग अख्‍तियार करए पडलै ।’ हमर अहि प्रश्न पर कुरसी के कात मे राखल पिकदानी मे पीक फेकैत बजला ‘सेऽऽ््््ऽ्ऽऽ्त आेकरा पाछाॅ दाेसर कएक तरहक तर्क छलै़ आ’ आेही समय वएह परम आवश्यकता रहल हेतैक ।’ ककाजी के’ राजनीति के बङ गहीङ अनुभव सत्त कही त’ आे चाणक्‍य छथि ।मुदा समयक निर्दय हाथे थकुचायल कहियाैन्ह समय आ’ परिस्थिति कहियाे संग नहिं देलकैन्ह त’ अपन प्रकांड विद्वता आ’ सर्जनात्‍मक क्षमता समाजक समक्ष रखबा मे बङ देर लागि गेलैन्ह़ मुदा प्रजातंत्र मे देर अबेर त’ हाेइते रहै छै़ ।कत्तेकाे चुनाव निर्दलिए भ’ लङल ।पाटी मे आबि इ पहिल विजय छलैन्ह । तखन शनैः शनैः उमिर सेहाे बढैत रहलैन्ह आ’ अजाेध नेता सबहक पाॅति मे आे अग्रगण्य ग्रह नक्षत्र सबटा अनुकूल़ अहि चुनावक’ जीत हुनके नेतृत्‍वक नाम प’ भेल छलैन्ह़ आने की पहिने सॅ मुख्‍य मंत्री के कुरसी रिजर्व । गप्‍पे गप मे राज्यक राजधानी के विषय मे चर्च भेलै़ त’ कहलैन्ह जे दङिभंगा के छाेङि आर काेन शहरि के डाढ मे एतेक दम छै जे राजधानी कहाति ।’ ‘मुदा शहर त’ बङ गंदा छै़ चारूकात उभचुभ करैत नाला के गंधाति पानि प’ जखन सूरूजक कीरन पङै छै त’ लगै छै फराक सॅ जेना ग्रेनाइट वा मार्बल्सक’ टाइल्स लागल हाेए टावरक चारूकात गंदगी़ अनकंट्राेल्ड टै्रफिक़ जतए ततए थूकैत़ नरगैाना पैलेस के देवार धरि नहि छाेङने पानक प्रेमीसब़ ।आ’ टीसन देखलियै दरिभंगा के रतुका गाङी सॅ जखन आबै छी पटाेपट नीचा सॅ ऊपर बेंच धरि गुदङी चेथरी चिक्‍कट आेढने पङल मनुक्‍ख ।इ सूतनिहार सब के । जेकरा गाङी पकङबा के रहतै़ से एना निफिकिर भ’ क’ सूततै एकर समाधान त’ हेबाक चाही नै किछु़ ।’ ककाजी अकाश मे चमकैत पूर्ण चान दिस तकैत कनि चिंतित स्वर मे बजला ‘हाैऽ््ऽऽ सबटा समस्या के समाधान हेतैक़ शहरक सबटा राह बाटक साैंदर्यीकरण कएल जेतै़ ।नाला नाली झाॅपि झूपि क’आेकर काते कात फूल पाैध लगाएल जेतै ।महाराजक सबटा महल के सेहाे काया कल्प कएल जेतै ।टीसन के कात मे ‘गरीब नमाज सबके लेल फराक सॅ माेसाफिर खाना बनाआेल जेतै अनाथालय वृद्वाश्रम सबटा बनतै ।’ ‘हॅ ककाजी अहि संग आेहिठाम लंगरक सेहाे व्यवस्था करबा देबै ।मुदा नियम बना देबै चारि दिन लगातार खेनिहार के जाैं आे अत्‍यंत वृद्व बीमार वा एकदम अपंग नहिं छथि त’ प्रतिदिन दू घंटा श्रमदान अवस्स करए पङतैन्ह ।आ’ अहि श्रमदानक तहत स्टेशनक आगू पाछू दूर दूर धरि सफाइर् कराआेल जेतै़ आेहिना अस्पताल सब मे भाेजनक व्यवस्था करि चारू कात सफाइर् राखल जा सकैत अछि ।इ खेनाय के याेजना एकटा सक्षम आ’ ठाेस कदम हेतै़ जे काेनाे राज्य अपन गरीब जनता लेल निञ्ंा प्रारंभ कएने हाेयत ।’ ककाजी कनि मुॅह टेढ करि क’ हमर मूर्खता प’ मुस्कैत बजला ‘हाै ताेहर इ यूटाेपियन स्कीम लागू करबा मे बङ दीक्‍कत हेतै़ दरिद्र राज्य छै़ जहाॅ सुनतै लाेक कि फाेकट मे खेनाए भेटैंत छै़ हजारक स्थान प’ पाॅच हजार पहुॅच जेतै मुदा काज करबा काल त’ एकाे साै भेट जाए त बङका भाग्य कहबाक चाही ।पाछाॅ सॅ विराेधी पार्टी टीक पकङने ‘ वेलफेयर गवर्नमेट के मतलब की फंड अहाॅ जन लुभावन काज मे खरीच देबै़ ।उपर सॅ बेगार खटनाए के विराेध करबा लेल़ हजार टा नेता पेट भरिते मातर जनमए लगतै’ ।’ ‘मुदा अहि दिशा मे प्रयास त’ कएले जा सकैत अछि ।’ “आब देखहक पहिने मंत्रि परिषदक गठन त’ माॅ जगदंबा के कृपा सॅ शुभ शुभ संपन्न भ’ जाए ।’ ‘से त’ भइये जेतै़ मुदा चाेर बनाेर के मंत्री नै बनेबै चाहे जे किछु भ’ जाए़ ।अपन राज्य बनि रहल छै राजा विदेहक किछु आदर्श त’ अवस्से स्थापित करबा के हेतै ।’ ‘मर्रऽऽ्््ऽ््् जीत क’ एलै हैं चाेर बनाेऱ आ’ मंत्री लेल घरे घरे जाकए ताकू इर्मानदार सत्‍यवादी राजा हरिश्चन्द ।जखन लाेक पंच बनै छै़ परमेश्वरक गुण आपरूपी आबि जाए छै़ ।’ ‘बेस़ तखन पडाेसिया काेडा मे किएक नहिं परमेश्वरत्‍व एलै मूॅह मे बकार नै़ लाेक त’ कहै छै एत्तेक शुद्व जेना गाय दिमाग मे सेहाे टनक टन भूस्से भरल ।मुदा चारि हजार कराेङक गबन करि केहेन ध्वजा फहरा देलकै ।’ ‘आे अविकसित़ अशिक्षित पिछङल राज्य छै़ मुदा एत्तय लाेक बङ शातिर छाेटका माेटका गबन भले क’ लाैथ़ बङका डकारब बङ माेसकिल ।’ ‘माेसकील काेना़ ।’ बिनु राज्य बनने स्था नीय स्वशासनक नामप’ जेकरा जे फुरेलै कइये रहल अछि ।केन्द्र सरकारक याेजना सब देख लियाै हम आेहि गाम सबहक नाम नहिं लेब मुदा आंगनबाङी कार्यक्रमक कत्तेक मखाैल उङैल जा रहल अछ़ि सएह हाल नरेगा के छै ।’ ‘शहरि सिखाबे काेतवाली। हाै जखन अंगरेज भारत सॅ विदा हाेमय लगलै तखन आेकराे एहनेसन अंदेशा हाेइत छलै गंमार हिन्दुस्तानी बत्तै कत्ताे राजकाज हाेय ।मुदा भेलै की नहिं आब इहाे देखिह जे मिथिला के लाेक कत्तेक नीक सॅ विदेह राज्यक स्थापना करैत अछि ।’ अहि बेर गहींङ साॅस लेबाके बारी हमर छल ‘एक टा आदर्श राज्य बनेबा लेल अहाॅके समक्ष की ठाेसगर प्‍लान अछि ।’ “ढेर रास प्‍लेन अछि प्‍लेनक’ काेन कंम्मी़ पहिल त’ राजधानिए के विश्व स्तरक हेरिटेज सिटी जकाॅ बनाैल जेत्ते ।समस्त़़ गामक पाेखरिक उत्‍थान के संग भसियायल पाेखरिक निर्माण महाङ सब पक्‍का कैल जेत्ते़ लग पासम्ेंा इस्कूल़ जत्त’सॅ लाेक वेद पाेखरि प’ नजरि रखता अंत्‍याेदय कार्यक्रमक तहत बी पी एल बला सबके घरे घर शाैचालय बनाैल जायत जाहि सॅ आे सब चारूकात गंदा नै करै सस्ती राेटी के दाेकान फेर सॅ खाेलल जेतै ।धिया पुत्ता के अनिवार्य शिक्षा अनिवार्य हेतै भाेट देनाय़ संतति उत्‍पादन प’ कंट्राेल खेल कूद सेहाे अनिवार्य माेबाइल काेर्ट दरवज्जा प’ अदालत़ । माछ के राजकीय चेन्ह त’ नहिं बना सकैत छी मुदा माछ आ मखान के उत्‍पादन मे त’ पुरकस जाेर लगैल जा सकैत अछ़ि पहिने पुरूखक उत्‍थान आे आलस तजि कर्मठ बनाैथ संगही संग स्त्री शिक्षा के कारगर बनैाल जेतै़ बेराेजगारी हटेबा लेल उद्याेग धंधा के बढैल जेतै ।’ ककाजी अहाॅक प्‍लेन त’ सर्वथा सार्थक़ वाह़ मन गदगदि करि देलहूॅ ‘आन्हर की चाही़ बस दू टा आॅख़ि ।हमरा त’ इर् बूझना पङि रहल अछ़ि सरिपहुॅ राजा जनकक राज्य कायम हाेमए जा रहल अछि ।फिलाेसाेफर किंग के चर्च सेहाे विश्व इतिहास मे भेल अछ़ि अहाॅ के इर् पाकल उमीऱ पाेपल मुॅह आ’ जर्जर शरीर त’ अवस्से सदाचरणक पाठ पढबैत़ सत्‍यम वद़ धर्मम चर वा तेन त्‍यक्‍तेन भून्जीथा़ के शिक्षा दैत परमात्‍मा आ’ पराेपकार मे मन वचन सॅ लागल रहए बला साबित हेतै़ ।’ अहि प’ नै जानि की साेचि क’ कनि रसिक भाव सॅ मुस्कैत बजला ‘से नै कह’ आब जाैबन के लाेक ययाति जकाॅ येन केन प्रकारेण जीत क’ ऋण पैंच लक’ जीवनक आनंद अंतिम क्षण धरि भाेगय लेल बेकल रहैत छै़ जुग वैराग्य शतक के नहिं श्रृंगार शतकक आबि गेल छै़ अखन आेहि स्वनाम धन्य उपराज्यपाल महाेदयक नाम की लेल जाए़ जे गुलगुल सङल पिचकल आम बनल छियासी बरीखक उमीर मे राजभवन मे मेनका रंभा ऊर्वशी सब संगे परम आध्यात्‍मिक सुख भाेगैत रंगल हाथे पकङल गेला़ ताहि सॅ उमीर प’ नहिं जा कदाचरणक काेनाे बयस नहिं हाेय छै ।’ हम चुप्‍प हाथ सॅ जेना ताेता उङि गेल ।कका अपन श्रीमुख सॅ जखन अहि संभावित पक्ष के उघारि क’ हमरा साेझाॅ राखि देला तखन फेर बाॅचल की़ आब़ । आेना एखन हुनक उमीर त’ सत्तरिए बरख छेन्ह़ ।हम अपन गप के एना बीच्चे मे बजारिक पराजय स्वीकार करि ली से त’ सुभाव आ’ संभव नहिं ।अपन दिश सॅ मक्‍खन लगबैत हुनक चारित्रिक गाैरवक गुणगान करैत आगाॅ बढलहुॅ । ‘जे नन्हू से गर्भहिं नन्हूॅ अंगरेजाे सब कहै छै’ मानिंर्ग शाेज द’ डे’ अपनेक त’ चरित्र के इर्मानदारी के ध्वज एखन धरि फहरा रहल अछ़ि पाइर् पाइर् के लेल तरसैत गिरहस्थी सॅ आखीर तंग आबि मटिया तेल सॅ अपन शरीर सिक्‍त करैत एक टा लुत्‍ती के बल प’ काकी अहाॅक’ संग की दुनिए सॅ विदा भ’ गेलथ़ि त’ आब अहाॅ की पथ भ्रष्ट हाेयब ।’ ‘पहिने इर् बताब जे ताैं हमर प्रशंसा करैत छ वा हीनताय ।’ “केहेन गप करैत छी इर् त’ अहाॅक चारित्रिक बलक प्रशंसा अछि ।संसार मे लाेक जतेक प्रकारक पाप छल प्रपंच दुष्कर्म करैत अछ़ि आे सब गिरहस्थिए के आङ मे ।आ’ ताहू काल अहाॅ नै डिगलियै़ भीष्म पितामह जकाॅ अडिग रहलियै़ एकरे कहल जाए छै न’ चारित्रिक बल ।’ “ताहि समय हम छलियै की़ भाखा के एक टा प्राेफेसर आेहाे एफिलिएट काॅलेज मे दरमाहा छाै छाै मास धरि बन्ऩ डिगतियै त’ आखिर कथि प’ कि कआेलेजक संस्थापकक घेंट काटि लेतियैक़ कि विद्यार्थी सबहक घर मे डाका पाङितियैक़ लिखेत रहलहूॅ किस्सा पिहानी जीबनक़़ तपैत राैद मे बसि क’ मधुर रसक’ ।मुदा तकराे पाय घरे सॅ लागै़ क्षेत्रिय भाखा के लेखक के वाहवाही आ लाेकक करतल ध्वनि तॅ भेट जायछै मुदा द्रव्यक प्रश्न प’ सब कियाे ठगि लैत छै़ केकर केकर नाम गिनबिय़ आेहि दारूण दुखक वर्णन करैत़ । आब भगवति के कीरपा सॅ पाॅवर एलै है त’ देखहक़ कहबी छै जे पाॅवर करप्‍ट एवरी बडी़ ।’आ’ बङका टा के रहस्यमय चुप्‍पी । हमरा आब अपना आप प’ बङ ग्लानि हाेमय लागल छल ।राजनीति मे आबि बुढापे मे इर्हाे अपन मटकूङी आगि प’ साेनहा क’ रखने छथि ।आने आय धरि जे लाेक हिनका इर्मानदार बूझल़ सब परम भ्रम मे जीबि रहल छल । रहल नै गेल आगाॅ बढि क’ अपन चुप्‍पी ताेङैत बजलहूॅ ‘सत्तरि बरखक अवस्था मे सुकरात अपन सिद्वांत लेल सत्ता सॅ भीङ गेलै विषपान करि लेलक मुदा अपन संगी हित चिंतक सभक देश छाेङबा के़ जेहल सॅ पङेबा के आग्रह हार्दिक अनुनय विनय के़ ठाेकर मारि देलकै़ ।आेहाे त ‘एकटा एहेन उदाहरण प्रस्तुत क’ देलक जे आए धरि लाेकक ह्‍दय प्रदेश मे बसि क’ असीम श्रद्वा सॅ आेकरा अमर रखने छै़ ।’ ‘ हे़ सुनि लिए कान खाेलिक’ हम नै सुकरात छी़ आ’ नै बनब चाहै छी ताैं बनिह़ ।’आे पीत्ते आन्हर हाेमए लगला । गप के आन दिस जाइत देखि हम अविलंब चारू कात सॅ घेर घारि क’ लक्ष्य दिस बढेलहुॅ “खैर आे सब त’ बादक गप छै़ मुदा ‘ “अपन राज्यक” रूपरेखा लेल अहाॅक’ आलेख त’ बङ दमदाऱ बङ तथ्य पूर्ण छल़ आ’ सुनबा मे आयल जे प्रधान मंत्री सेहाे अहि सकारात्‍मक प्रस्ताव’ के बङ सराहलन्हि । ‘ आब आे कनि तनाव रहित नजरि आैलाह़ ‘हाै जखन राम राज्यक परिकल्पने करबा के छै़ त’ लिखनम की दरिद्रता आ’ कवि आ’ लेखक सॅ बेसी कल्पना शील प्राणी आर के हाेइत अछि ।’ * * * * श्रीमान भेारका एक’बार हाथ मे नेने भभा क’ हॅसि उठला । हुनका हॅसैत देखि हमराे हॅसि निकलि गेल छल ।कनी चाैंकैत़ एक’बार सॅ मुॅह निकालिक’ प्रस्नवाचक दृष्टि सॅ हमरा हेरैत बजला ‘ताैं किएक हॅसलऽ’।हम बङ विनम्र भ’ कहलियैन्ह ‘अपने के हॅसैत देखि हमराे हॅसी बहरा गेल ।’ ‘मुदा हम त’ अपन रतुका स्वप्‍न प’ हॅसी रहल छी ।’ हुनक आॅखिक प्रश्न आब शंका मे बदैल गेल छल । ‘हमहूॅ वएह साेचि क’ हॅसि रहल छी ।’हमत’ अपने मगर मच्छी खाल के । ‘हॅ तहॅु आेहि स्वप्‍न मे उपस्थित छलऽ मुदा ताेराे काेना आे सपना अयलह ।’ “ नहिं नहिं हमरा त’ अहाॅक संग चलल विस्तार पूर्ण रतुका वार्तालाप माेन पङि गेल अपन राज्यक गठन करबा के त’ भेल जे आेहने साेहनगर स्वप्‍न देखने हैब ।’ अहि प’ आे’ खूब जाेर सॅ ठहाक्‍का लगाैलथ़ि आ’ हमहूॅ संग दैत साेझा टेबुल प’ राखल भफैत चाह पीबऽ लगलहुॅ । “जाैं आबए बला चुनाव मे हम जीत गेलहूॅ त’ ताेरा अवस्स अपन स्ेाक्रेटरी बनैब। ‘आे विनाेदक मूड मे आबि गेल छलाह। ‘एहेन काज जूनि करब़ विगत मे एकटा चचा अपन स्ेाक्रेटरी बनल भातीजके’ लंका मे विभिषन कहि पद प्रहार करैत अपन घर सॅ निष्कासित क’ चुकल अछि ।’ आ’ अहि हॅसी ठठा मे अपन राज्यक गप बुढिया के फुइस जकाॅ हवा बसात मे उङि विलुप्‍त भ’ गेल छल । कुमार मनोज कश्यप जन्‌म : १९६९ ई़ मे मधुबनी जिलांतर्गत सलेमपुर गाम मे। स्कूली शिक्षा गाममे आ उच्च शिक्षा मधुबनी मे। बाल्य काले सँ लेखनमे आभरुचि। कैक गोट रचना आकाशवाणी सँ प्रसारित आ विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित। सम्प्रति केंद्रिय सचिवालयमे अनुभाग अधिकारी पद पर पदस्थापित। विवसता अपन जन्मभूमि के प््राति मोह ककरा नहिं होईत छैक? जाहि धरा पर पहिल बेर पायर राखल, जकर धूरा-माटि मे खेल-खेल कऽ समर्थ भेलंहु, तकरा प््राति लगाव तऽ स्वभाविके आछ। अपन राज्यक सीमा मे प््रावेश कईयो कऽ गाम नहिं जाई से ने हमर मोन मानत आ ने गाम-परिवारक लोक। अहु बेर सरकारी यात्रा सँ मुस्किल सँ पलखति पाबि रातियो भरि लेल गाम जेबाक विचार कय बिदा भऽ गेलंहु बस धरबाक लेल। भोरे आपसे एबाक छल, तैं कोनो समान लऽ जेबाक दरकारे नहिं। सभ गामक चौक पर अहाँ के ओहन रिक्सावला भेट जायत जे चौक सँ बस लग-पासक गामक सवारी उठबैत आछ - आर कतहुँ नहिं जायत ओ - कतबो बेगरता होऊक लोक कें। चौक पर बस रुकिते ओ सभ रिक्सा लऽ कऽ तेना दौड़ैत आछ सवारी लेवाक हेतु जेना कोनो तिर्थ-स्थानक पण्डा। जकरा सवरी भेटि गेलैक से विजयी आ आन सभ हारल - मुदा पेᆬर सँ आगला प््रातियोगिता लेल डाँड़ बन्हने। कैकटा रिक्सावला हमरो पाछु दौड़ल, मुदा आई हमरा पायरे जेबाक मोन भऽ रहल छल, तैं मना कऽ देलियई। समान कोनो छलैहे नहिं आ साँझक सोहाओन मौसम, कियैक नहिं आनंद लेल जाय एकर। सभ सँ पैघ बात जे गामक एहि चिर-परिचित धुरियायल रस्ता पर चलि कऽ एक बेर पेᆬर हम अपन बितल दिन मोन पाड़ऽ चाहि रहल छलंहु। आततक स्मरण बड़ मनभावन भेल करैत छैक। सड़क पार कय हम चलऽ लगलंहु गामक ओहि रस्ता पर जे कहियो बड़ आत्मीय छल हमर। किछु आभास भेला पर पाछाँ तकलंहु - एकटा रिक्सवला निरीह भावें रिक्सा लऽ कऽ चल अबैत हमरा पाछाँ। लऽग आबि बाजल -'' हाकीम! तऽ नहिंये करबै रिक्सा? जे मोन हुअय से दऽ देब खुशी सँ, मुदा बैस जाऊ हमर रिक्सा पर।'' हम कहलियै - ''बेकार मे हमरा पाछाँ नहिं पड़, आई हमरा पायरे जेबाक ईच्छा भऽ रहल आछ । घुरि जो तों।'' रिक्सावला के आँखि मरल माँछ जेना थिर भऽ गेलै हमरा उपर। कल्पैत स्वर मे बाजल- ''ऐं यौ हाकिम! अंहु सन हाकिम-हुक्काम जँ पयरे चलऽ लगतै, तऽ हमरा सभ गरीब-गुरबा अपन परिवारक पेट कोना पोसतै?'' हमर पैर एकाएक थमकि गेल। बिना किछु बजने हम बैसि गेलंहु ओकर रिक्सा पर। मरीचका 'हे हर, हमरहु करहु प्रतिपाल ' - भवनीबाबूक मुंह सँ निकलल एहि गीतक भावार्थ सभ के बुझल छलैक। एते तक कि बच्चो सभ बुझि जाईत छल जे भावनीबाबू आब भोजनक प्रतीक्षा कय रहलाह अछि । भवानीबाबू -- जिला परिषदक सेवा-निवृत बड़ा बाबू । सस्ती जमाना मे भवानीबाबू एक-एक टा रुपैया जमा कऽ कऽ शहर मे जमीन खरीद लेलनि । मुदा घर टा बनि सकलनि सेवा-निवृति के बादे । सेवा-निवृति पर भेटल सभ पाई के लगा कऽ बनलनि चारि कोठली के पक्का-पुख्ता मकान । मुदा चारु कोठली दुनू बेटा आपस मे बाँटि लेलक । भवानीबाबू के आश्रय भेटलनि बालकनी मे । कनियाँ तऽ पहिने स्वर्गवासी भऽ चुकल रहथिन । भवानीबाबू अपने बनाओल घर मे आन बनि बालकनी के एक कोन मे टुटलहवा चौकी पर समय काटऽ लगलाह । हद तऽ तखन भऽ गेल जखन एक दिन भवानीबाबू के पेट सेहो बँटि गेलनि ---पार लगा कऽ दुनू भाई के घर सँ भोजन आबऽ लगलनि। आई भवानीबाबू बड़ी काल धरि गीत गबैत रहलाह ---बीच-बीच मे नजरि याचक-भाव सँ दुनू भाईक भनसा घर दिस बेरा-बारी सँ जाईत रहल । गीत अंतरा धरि पहुंचि गेल । फेर स्वर मद्धिम पड़ऽ लागल----उदास---- थाकल---हारल---हे हर, हमरहु करहु प्रतिपाल़। परजा बड़का भैयाक दलान; दलान नहिं गामक चौक बुझू़़़़देश-दुनियाँ, खेत-पथार, नीति-राजनीति सभ पर गर्मागरम बहस एतऽ सुनबा लेल भेटत । चुनावक समय मे कोनो आन टॉपिक पर बहस हुअय ; से कने अनसोहाँत होयत । सभ जुटल लोक चुनावक एक-एक मुद्दा पर तेना बिक्षा-बिक्षा कऽ खोईंछा छोरा रहल छलाह जे कोनो सेफोलोजिस्ट टी०वी० पर की करताह । बौवूᆬबाबूक कहब रहनि जे एहि बेर सत्ता परिवर्तन हेबे टा करत़़़़सभ सत्तारूढ सरकार सँ नाखुश आछ ; तकर औल ओ सभ एहि बेर चुकेबे करतनि । एहि पर नन्हवूᆬ बमकैत बाजल जे 'कक्का आहाँ कतऽ छी़़़लोकक आँखि नहि बट्टम छियै जे चहुँकात होईत विकास के नहि देखतै़़़अपने गाम मे देखियौ ने जे कतेक के सरकार पक्का मकान बना देलकै़़क़तेक कऽल गड़ा गेलै़़ग़ामक लेल रोडो तऽ सैंक्शन भईये गेल आछ । बौवूᆬबाबू प््रातिवाद केलनि--'कोन घर आ कऽलक बात करैत छह? जा कऽ ओकरा सभ सँ पुछहक गऽ ने जे कतेक जोड़ी पनही घसा कऽ आ कतेक घूस दऽ कऽ घर आ कऽल भेलैयै?'पेᆬर बजलाह--' हौ ई सरकार पाँच साल तक जनता के मुर्ख बना कऽ अपन धोधि बढ़बैत रहल । भल होअय लोक तऽ ई चोरबा सभ के जमानत जब्त करा दिअय। ' ई वाद-प््रातिवाद चलिये रहल छल कि मखना बिचहिं मे बाजल--'यौ मालिक! आहाँ आउर कथि लै बेकारे मे बतकटाझु करैत जाईत छी। हमर मुर्खहा बुद्धि तऽ एतबे बुझैत आछ जे केयो जीतऽ; केयो हारऽ़़़हम सभ तऽ परजा छी, परजे रहब। ' दलान पर कनी काल लै चुप्पी पसरि गेल छलै। मर्यादाक हनन मुख्य-आभयंता सन उच्च पद पर रहितो गंगाबाबूक सादगी, निश्छलता आ सेवा भावना उल्लेखनिय रहल आछ । हुनका लोक देवता बुझैत छनि। कोनो लोक एहि परोपट्टा मे नहिं भेटत जे कहि दिअय जे कोनो काज पड़ल होईक आ गंगाबाबू मना कऽ देने होथि । एहि परोपट्टाक जतेक जे लोक सिंचाई विभाग मे नोकरी करैत आछ से सभ गंगेबाबूक रखायल । ककरो नोकरी चाहियै तऽ सीधा सम्पर्क करय गंगाबाबू सँ । अपना ओहि ठाम रखबो करथिन आ नोकरियो रखा देथिन । गंगाबाबू पाई तऽ नहि कमैला मुदा यशक कोनो कमी नहिं । परोपट्टाक लोक हुनकर गुणगान करय, मुदा हुनकर अपने बेटा के छोड़ि कऽ। कोन माय-बापक ई ईक्षा नहि रहैत छैक जे ओकर संतान सुसभ्य, सुशिक्षित, सुसंस्कृत बनय; उच्च पद पर जा माय-बाप, गाम-घर, देश-जयवारक पाग ऊँच करय। गंगोबाबू यैह आकांक्षा लय अपन एकमात्र पुत्र प्रभास कें सभ साधन उपलब्ध करबैत रहलखिन जे कहुना मनुक्ख बनि जाय । हमरा सँ आगू नहिं बढ़य, तऽ कम-स-कम सम्मानजनक स्तर धरि तऽ जरुरे पहुँचय । मुदा कुसंगति मे पड़ि बेटा नेन्हपने सँ पढ़ाईक जगह पान, सुसंसकारक जगह शराब-सिगरेट आ भलमानुषक जगह भांग अपना लेलकैन । कोना-कोना कऽ घिचैत-घिचैत ओकरा बी०ए० के डिग्री देयाओल गेलैक । एहना मे कोनो नीक नोकरीक तऽ आशा केनाई व्यर्थे छलैक । आ एतेक पैघ आधकारीक संतान कोनो छोट नोकरी करय तऽ प्रतिष्ठा कतऽ रहतै ! अंततोगत्वा बड़ सोचि-विचारि कऽ प्रभास के गंगाबाबू व्यवसाये मे लगायब उचित बुझलनि । मुदा भाग्य ओतहु पाछाँ काहाँ छोड़लकनि ओहो डुबि गेलनि । प्रभास के एक दिन ओहिना बौआईत देखि हम पुछि देलियै, 'आहाँ मे प्रतिभा के तऽ कोनो कमी नहि; एकर सदुपयोग कऽ आहाँ शिखर तक पहुँचि सकैत छी। मानल जे आब सरकारी नोकरीक उम्र नहिं बाँचल आछ ; मुदा आजुक युग मे तऽ प्राईवेटे सेक्टर सरकारी सँ आगू जा रहल आछ । आहाँ ओतऽ ट्राई कऽ सकैत छी । ' प्रभास मुँह मे भरल गुटकाक पीक कें पीच्च सँ फेकैत बाजल, 'कक्का ! आहाँ कोन दुनियाँ मे छी? प्राईवेट सेक्टर के चाहियैक यंग, इनरजेटिक, क्वालिफाईड, प्रोमीसिंग़़ हमरा सन भकलोल नहिं । ' गुटका के महीन कऽ चिबबैत ओ फेर बाजल, 'सत्य पुछू तऽ हमर नाकामीक जिम्मेवार हमर बापे छथि । जखन ओ जनैत छलाह जे हम भुसकौल छी, तखन सालक साल फार्म भरबाक पास करेबाक बदला मे जौं कतहु नोकरी रखा देने रहितैथ तऽ हमर आई ई दशा नहिं रहैत। मुदा एहि मे तऽ हुनकर झूठ मर्यादा आगू आबि गेलैन । आब आहं कहू जे मर्यादाक हनन कतऽ छै--पुत्र के छोट नोकरी करेबा मे वा दर-दर के ठोकर खाई लेल छोड़ि देबा मे?' हम निरुत्तर बगल दिस ताकऽ लगलहुँ। सोझाँक ख़िडकी सँ ताकि रहल गंगाबाबू अढ़ भऽ जेबाक कोशिश कऽ रहल छलाह। प्रतिरोध एकटा राक्षस के एकटा नोकर रहैक स्वामीभक्त मेहनतिया कोनो काज मे नहिं नहिं कहऽ बला । मुदा राक्षस तेहने खुर्राट दंभी अपने अपन सोचय बला । बेचारा नोकर दिन भरि खटय मालिकक सेवा मे हाजिर रहय। मुदा जस नहिं भेटई। राक्षस नोकर पर हावी होई दुआरे हरदम धमकी दई -" काँचे चिबा कऽ खा जेबहु शोणित पीबि जेबहु "। बेचरा नोकर भय के साया मे तिल-तिल जरैत कहुना-कहुना दिन खेपैत गेल। डराईते-डराईत एक दिन ओकरा हृदय मे आत्म-चेतना जगलई -"नित्य तिल-तिल कऽ मरबा सँ नीक जे एके दिन मरि जाई मुक्ति पाबि ली एहि जीवन आ राक्षस दुहू सँ।" ओहि दिन जखने राक्षस काँचे चिबा जेबाक धमकी देलकै कि नोकर अडि़ गेलै। मुड़ी आगू कऽ कऽ कहलकै - "लिय मारि दिय हमरा काँचे चिबा जाऊ पीबि जाऊ शोणित हमर हम तैयार छी मरि जेबाक लेल। मरि-मरि कऽ जिबा सँ एके दिन मरि गेनाई नीक। " नोकरक सहसा अप्Çात्याशित रुप आ प्Çात्युत्तर पर तमतमा गेल राक्षस खून खौलऽ लगलै ओकर। मुदा दोसरे पल शांत पडि़ गेल -'एकरो मारि देबै तऽ के कहल मानत हमर? के करत सेवा-सुश्रूषा हमर?' क्षणहिं मे राक्षसक आंगुर नोकरक माथक केश संगे खेलऽ लागल छलै। दुहू निशब्द छल। दुहूक आंखि सँ सहस्त्रधार बहल जा रहल छलैक मुदा दुहूक अर्थ फराक छलैक। दृष्टिकोण राजपत्रित पदाधिकारी के पद पर चयनक जे खुशी रजत के भेल छलैक से क्रमशहे एकटा अनजान भय मे परिणत होईत चलि गेलैक । मोन मे धुकधुकि पैसऽ लगलैक, कारण --- सरकारी कार्यालयक कार्य-प्रणाली आ कार्य-संस्कृति दुहू सँ अनभिग़्यता । जखन सँ श्यामबाबू अपन आंखिक देखल घटना सुनेलखिन ओकरा जे कोना एकटा किरानी धोखा सँ आधकारी सँ फाईल पर दस्तखत करा लेलकै आ बेचारा निर्दोष आधकारी फसि गेलैक ; तखन सँ रजत आर बेसी विचलित भऽ गेल आछ। दोसरो घटना ओहने सुनेने छलखिन ओ जे एकटा कर्मचारी घूस खा कऽ कोर्ट-केसक फाईल दबा देलकै आ एकपक्षिय फैसला सरकार के खिलाफ भऽ गेलैक आ कोना बेचारा आधकारी के परिणामस्वरुप सस्पेंड कऽ देल गेलैक। ई सभ सुनि रजत के लगलैक जे ओ कांटक ताज पहिरऽ जा रहल आछ़, अबूह लागऽ लगलै ओकरा। सोचैत-सोचैत डरे पसेना-पसेना भऽ गेल रजत, क़ंठ सुखाय लगलैक ओकर। आईये योगदान करबाक छैक ओकरा। जँ-जँ समय लगीच आयल जा रहल छैक, तँ-तँ ओकर बेचैनी बढले जा रहल छैक। भीतर सँ सद्यः डेरायलो रहैत बाहर सँ कुबा देखेलक ओ। कँपैत डेगें तैयार भऽ ओ बाबूजीक पायर छुबि आशिर्वाद लेबऽ गेल। बाबूजीक पारखी आँखि सँ रजतक मनोदशा नुकायल नहि रहि सकलैक। माय-बाप आ संतान बीच सत्ये कोनो टेलिपैथी काज करैत छैक जे बिना मुंह खोलनहु सम्वेदनाक आदान-प्रदान करैत छैक। बगलक कुर्सी पर बैसबाक ईशारा करैत रजत के बुझाबऽ लगलाह - ''बाऊ! घबराईत कियैक छी? ई खुशी आ संगहि गर्वक बात आछ जे आहाँ भारत सरकारक एकटा उच्च पद पर आसीन होमय जा रहल छी। आहाँक योग्यताक पूर्ण परीक्षा कईयेकऽ आहाँ के ई जिम्मेदारीक पद सौंपल गेल आछ ।'' फेर पानक खिल्ली पनबट्टी सँ निकालि मुंह मे लैत आगू बजलाह- ''के पहिने सँ ऑफिसक काज सँ भिज्ञरहैत आछ? समय सभ कें सभ ज्ञान करा दैत छैक। अहाँ एतबा धरि करब जे आँखि आ कान दुहु खोलने रहब सदिखन। जतऽ कोनो प्रकारक परेशानी बुझाय तऽ सलाह लेबा मे कोनो टा संकोच नहि करब - चाहे ओ अहाँक मातहते कियैक ने हो!'' बाबूजीक बात सँ रजत के जेना कोनो दिव्य दृष्टि भेट गेलैक। लगलैक जेना मृग जकाँ कस्तुरी ओकरा संगे मे छैक आ ओ नाहक लोकक बात सुनि-सुनि चिंता मे पड़ल छल। एकटा मुस्की पसरि गेलै ओकर ठोर पर। ऑफिस मे कार्य-भार सम्हारिते दर्शन भेलै फाईलक अम्बार सँ। उपर सँ एकटा फाईल उठा पढिकऽ बुझबाक प्रयास करऽ लागल; मुदा निष्फल। कतबो अपना भरि प्रयास केलक रजत मुदा नहि बुझबा मे एलई ओकर विषय-वस्तु आ ने आगूक प्रक्रिया । फेर खखसिकऽ उच्च स्वरे बाजल-''किनकर फाईल आछ ई? ई आँक़डा आहाँ कतऽ सँ लेलंहु?'' सुनितहि किरानी अपन कुर्सी सँ उठि कऽ दौड़ल आयल जेना ओकरा सँ कोनो गलती भऽ गेल हो। फेर विस्तार सँ सभ बात बुझा देलकै। रजत ओकरा सभ के फाईल पर फरिछायल नोटिंग करबाक हिदायत दैत ओकरा अपन सीट पर जेबाक ईशारा केलकफेर विजयी भावें आँखि उठा कऽ तकलक। विजयी एहि दुआरे जे आधनस्थ कर्मचारी पर धाख जमाकऽ ओकरा सभक नजरि मे नवसिखुआक आभास नहि होमय देलकै संगहि कार्यक आरम्भ सेहो शुभ रहलै। शुरु भला तऽ अंतो भला। टेबुल पर राखल पानिक गिलास के एके छाक मे खाली क लेने छल रजत। ओम्हर आधनस्थ कर्मचारी सभक बीच मे यैह चर्चा होमऽ लगलै जे साहेब बड़ क़डा मिजाज के छथि। ओ तऽ बताह अछि देवनारायण सत्ये बताह भऽ गेलई ....लोक के विखिन्न-विखिन्न के गारि पढ़ैत छै़.... बेछोहे मारै लै दौड़ैत छै़ .....अंट-संट किदन बड़-बड़ाईत रहैत छै। आँखि क़डजनी सन लाल़़भयाओन चेहरा । सुकना बेटा के ओहि दिन तेहन कऽ ठोंठ दबेलकै जे छौंड़ा के प्राण उपरे रहि गेलै़.... ओ तऽ लोक सभ दौड़ कऽ छोड़ेलकै; नहि तऽ ओहि दिन ओकर मरबा मे कोन भाँगठ छलै ! ओना तऽ देवनारायण गुम-शुम रहै.... ककरो किछु नहि कहै ; मुदा जखने मोबाईल किंवा फोनक घंटी बजै कि ओ आक्रामक भऽ उठै़... ग़ारि बाजय लगै़.... मारै लै छुटै। किछु दिन तक तऽ चललै ; मुदा जखन एकर आक्रामकता दिन पर दिन बढ़िते गेलै;तऽ एक दिन नोकरियो सँ निकालि देल गेलै। सुनै छियै जे एक दिन ओ अपन अफसरे पर पानिक गिलास उठा कऽ फेक देने छलै । केयो कतेक दिन बर्दाश्त करितै ! बर्दाश्त तऽ ओकर घरो के लोक नहि कऽ सकलै़....क़तऽ घरक लोक सुख सँ दिन बितबैत छल; से नोकरी सँ निकालल जेबा सँ नूनो-रोटी पर आफत आबि गेलै ।...से देवनारायण के हाथ-पैर मे लोहा के क़डी पहिरा कऽ जिंजीर सँ बान्हि देल गेलै कतका घर मे़...घुप्प अन्हार । ककरो मोन पड़ै तऽ खेनाई ओकरा लेल राखि अबैक ; सेहो दूरे सँ....आन खन केयो घुरियो कऽ देखय नहि जाई ....कनियाँ तक नहि। देवनारायण जिला कोर्ट मे बड़ा बाबू छल़....बड़ चलती छलैक ओकर। ऑफीसक नियम सभ जेना ओकर जीहे पर छलै़क़ाज मे तऽ भूत। कतबो काज होऊ, ओ बिनु निपटेने घर नहि जाईत छल़़़क़तबो अबेर कियैक ने भऽ जाऊ। लोक कहैत छै जे देवनारायण के ऑफीसक कोनो किरानी वा चपरासी सँ कोनो बात के लऽ कऽ मुँहा - ठुट्ठी भऽ गेल छलै । ओ आदमी तकर बदला लई लै एकरा खौंझबई हेतु जखन-तखन फोन करई - 'नोचनी के दवाई भेटत आहाँ लग ? ' फोन कोनो बुथ सँ कैल करई जाहि सँ भंडा ने फुटि जाई । शुरू मे तऽ ओ 'रौंग नम्बर' कहि कऽ फोन पटकि देल करई । मुदा जखन ई बढ़िते गेलै आ सुतली रातियो मे फोन कऽ कऽ तंग करय लगलै ; तखन खौंझी सँ ओकरा मुँह सँ छोट-मोट गारि सेहो बहराय लगलई ....ओ चिड़चिड़ाह भऽ गेलै । लोक एकर एहि आकस्मिक स्वभाव परिवर्तनक कारण नहि बुझि सकलै आ पागल कहऽ लगलै---देवनारायण मजाकक वस्तु बनि गेल । लोक ओकरा दिक्क करई आ जखन ओ खौंझी मे अनाप-शनाप बाजय तऽ लोक ठहक्का मारि कऽ हँसय । एहि काज मे ओकर घरो के लोक कहाँ पाछु छलै़....ओहो सभ ओकरा चौल करऽ लगलै। एक दिन राति मे भगजोगनी के उड़ैत देखा कऽ ओकर बेटा कहने रहै - 'देखियौ, चिड़ै आगि लऽ कऽ उड़ि गेलै।' ताहि पर जे ओ चिक़डय लागल रहय - 'दौड़ै जा हऊ, चिड़ै आगि लऽ कऽ उड़ल जा रहल छै । ककरो घर ने जरा दई ।' ओकर पुरा परिवार समेत देखनाहर लोक ओकर एहि मति पर हँसैत-हँसैत लोट-पोट भऽ गेल छल। जखन ओकर विक्षिप्तता बढ़िते गेलै तऽ परिवारोक लोक आजिर भऽ कऽ सर्वसम्मत निर्णय लेलकै ...अनेरे परेशान भेला सँ नीक जे एकरा काँके पठा कऽ एहि गाड़ाक घेघ सँ मुक्ति पाओल जाय । सैह भेलै । आई देवनारायण के काँके मानसिक आरोग्यशाला मे भर्ती करेबाक हेतु पठाओल जा रहल छै़...क़ंकाल सन शरीऱ....बेतरतीब बढ़ल केश-दाढ़ी, फाटल- मैल-कुचैल कुर्ता-पायजामा....क़डीक दाग सँ स्याह भेल पैर-हाथ़..। कतेक महिना बाद कोठली सँ निकलि कऽ ईजोत मे आयल छल ! ओकर आँखि चोन्हरा गेलैक़....आई ओ पत्नि-बेटा-बेटी़..क़करो नहि चिन्हि पेने हेतै़...चिन्हबो कियैक करतै़....ओ तऽ बताह अछि। धर्मात्मा ओकरा धरम-करम मे बड़ निष्ठा छैक---भोरे-भोर अन्हर-गरे उठि , नहा -धो, उघारे देहे भीजल तौनी पहिरि कऽ मंदिर के नीक जकँ कैक बेर धोईत आछ तखन भरि मोन पूजा कऽ कऽ ओ दस बजे धरि घर आपस अबैत आछ -- तकरा बादे ओ अन्न-जल मुँह मे दैत आछ ---चाहे किछु बिति जाउक । केहनो बिकराल समय होऊक --- घनघोर झट्टक; कि कपरफोड़ा पाथर; कि हाड़ कँपबैत कनकनी -- ओकर एहि दिनचर्या मे कोनो टा फर्क नहिं पड़लैक --- सालक-साल बादो। लोक कतबो कहैत रहलैक जे खाली देह मे ठण्ढ़ा मारि देतैक ---पहिने जान; तखन जहान --- मुदा एहि सभ बातक कोनो टा असरि नहिं पड़लैक ओकरा पर । दानी-दयालु सेहो ओ तेहने---दुआरि पर आयल कोनो भीखमंगा के ओ बिनु खुअओने किन्नहुँ आपस नहि जाय देने हेतैक--बरू अपने कियैक ने भुखल रहि जाय पड़ल हो। नर आ नारायण दुनू पर अटुट श्रद्धा छैक ओकरा । सगरो बड़ गुणगान होईत छैक ओकर भत्तिᆬक -- ओकर सहृदयताक । भने तऽ केयो बजैत छल जे ओकर बाप बिनु सेवा -सुश्रूषा, अन्न-दवाई के काहि काटि कऽ मरल छलैक मनस्ताप आजिर भऽ गेल छल मोन फाईल निबटबैत-निबटबैत। मोन के कने हल्लुक करबा लेल कुर्सी सँ उठि अपन चैम्बर सँ बाहर निकलले रहि कि ऑफिसक पाछु ओहि कोन मे किछु देखि कऽ ठमकि गेलंहु। देखैत छी हमर अर्दली रामनिवास ककरो सँ मंद स्वर कनफुसकी करैत़़ किछु बुझबैत़़ ओ व्यक्त्ति अपन जेब सँ एकटा नोट निकाललक़़ रामनिवास ओ नोट ओहिना पैंटक जेब मे राखि लेलक़़ फेर ओहि व्यक्ति के आश्वस्त कऽ रामनिवास पाछु मुड़ल। अप्रत्याशित रुप सँ हमरा सामने देखि रामनिवास सकपका गेल़़ हवांस उड़ऽ लगलै़ चेहरा पीयर पड़ऽ लगलै़ पैर काँपऽ लगलै। चोट्टहि हमरा पैर पर खसि कऽ कानऽ लागल़़''हाकिम! बड़ पैघ गलती भऽ गेल हमरा सँ हमरा एहि बेर माँफ कऽ दियऽ हम कान पकरैत छी़ ।'' हमर तामस टीक तक चढ़ल जा रहल छल़़ हमर अर्दली आ घूस़़ ओकर की छैक?बदनामी तऽ हमर हैत। केयो कहैत तऽ बाद मे पतियबितौं आइ तऽ चोर सेन्हे पर धड़ा गेल। लोकक भीड़ बढ़ले जा रहल छलै़ ज़ते मुँह, तते तरहक बात। कनिये कालक बाद डी०एस०पी० अपने आबि रामनिवास के पकड़ि कऽ लऽ गेलाह। रामनिवास कनैत पुलिसक संग जा रहल छल़़ हमरा मोन के उसास भेटल़़ ठोर सँ कठोर सजा भेटक चाहि एहन भ्रष्टाचारी के़। दिन बीतल़़ समय बीतल़़ हमहुँ तबदला पर दोसर शहर मे आबि गेलंहु। एक दिन विभागीय मंत्री के औफिस सँ फोन आयल - मंत्रीजी भेंट करऽ चाहि रहल छथि। मंत्रीजीक आदेश भेलनि जे पुरनका ऑफिसक ठेकेदार धर्मपाल एण्ड संस के सभ बकाया बील बैक डेट मे पास कऽ दियौ। डेड लाईऩ तीन दिन के भीतर भुगतान भऽ जेबाक चाही। अनमनस्क मोन सँ हम पुरना बील सभ मँगा होटलक कक्ष मे बैसल पास कऽ रहल छी़ आन ऊपाईये की़ ऩोकरक लेल तऽ मालिकक आदेश सिरोधार्य। नोकरी करक अछि तऽ उचित-अनुचित सभटा करहि परत़़ हंसि कऽ की कानि कऽ । बील की छलैक सभटा झूठ़़ बिना काज करबायल़़ आब परमेश्वरे टा रक्षक सैह सुमीरि दस्तखत केने जा रहल छी झूठक पुलिंदा पर। जखन एतऽ आयले छी तऽ पुरनका मित्र सभ सँ भेंट-घाँट नहि केनाई सेहो कोनादन होयत । दोसर, मोनक भड़ास निकलि जाय तऽ मोनो हल्लुक होईत छैक । सैह सोचि पैर अकस्मात जिला जज के आवास दिस बढ़ि गेल। जिला जज कर्णजी हमर नीक मित्र मे सँ छलाह। बेचारे बड़ सहृदय लोक। जखन एहि ठाम पोस्टिंग रहय तखन एको दिन भेंट नहि भेला पर तुरत फोन आबि जाय जे निके छी कि नहि। चाय-स्नैक्स के बीच मे चर्चाक मध्य हमरा मोन पड़ि गेल रामनिवास़़ मोन कि पड़ल कर्णजी के कनियाँ मोन पाड़लनि । छगुंता भेल जे रामनिवास एखनो धरि जेले मे आछ। कर्णजी हमरा तजबीज करैत बजलाह- ''सजा तऽ अपराध सँ बेसी भईये गेलैक मुदा हम जमानति एहि द्वारे नहि देलियै जे ओकरा आहाँ स्वयं पक़डने रहि।'' हम हुनका सँ जमानतिक आग्रह कऽ लौटि फेर पुरना बील मे ओझरा गेलंहु। दोसर दिन बील सँ मगजमारी के बीच बाहर किछु आहट बुझना गेल़़ मुड़ी उठौलंहु़ आगाँ मे रामनिवास दुनू प्राणी कऽल जोड़ने ठाढ़ छल। केयो किछु नहि बाजल़़ दुनूक आँखि सँ आवरल नोर बहल जा रहल छलैक। हमरो मोन द्रवित भऽ गेल़़ अंतरात्मा कान उमेठलक़़ ''बीस रुपया लेल़़ सेहो काज जल्दी करा देबाक लेल ज़ँ सजा पाँच मासक जेल छैक; तऽ बिनु काज करेनहि ठेकेदार के गरीबक लाखो रुपया पेयमेट कऽ देबाक घोर अपराधक सजा कि हेबाक चाहि? उम्र कैद वा फाँसी वा ओहु सँ किछु बेसी़?'' रामनिवास दुनू प्राणिक आँखि सँ दहो-बहो बहैत नोर साईत हमरा सँ यैह मूक प्रश्न कऽ रहल छल। आई हम अपराधी रुप मे ठाढ़ छी ओकरा दुनूक समक्ष बौक बनल। गिरैत देवाल भालसरिक गाछक कात मे जे एकटा कोठली छै ओहि मे रहैत अछि बैठा- सपरिवार। ओ एकमात्रा कोठली बैठा के दोकान आ घर दुनू छैक - दिन मे दोकान आ राति मे घर। अहल भोरे उठि कमला घाट पर कपड़ा खिचनाई, ओतहि कपड़ा सुखा कऽ दुपहर तक घर लौटनाई, पेᆬर खिचल-सुखायल कपड़ा पर आयरन केनाई - यैह दिनचर्या छै बैठा के। नेना मे हमरा सभ कें परिहास सुझय -'नाम बैठा, मुदा हरदम ठाढ़े'। सत्ये बैठा बेसी काल ठाढे रहैत अछि । बैठा बैसैत छल तऽ मुदा सभटा काज खतम कईये कऽ - चाहे जखन हो। बैठाक ओ दिनक कार्यस्थल, राति मे विश्रामस्थल मे परिणत भऽ जायल करैक। एक कात खिचबाक लेल मोटरी बान्हल कपड़ाक ढेरी आ दोसर कात बैठा सपरिवार पति-पत्नी आ चारि गोट संतान - तीन टा बेटी आ एक टा बेटा क़ोरपछुआ। कनियाँ रस्ता कात मे चुल्ही पजाड़ि भानस करैक आ बैठा पटिया पर सुतल़ बीड़ी धुकैत, कोनो गीत़ऱाजा सल्हेश किंवा लोरिक़ ग़ुनगुनैत; धिया-पुता सभ आपस मे झगड़ा करैत किंवा खेलाईत। यैह टा क्षण होईत छलैक बैठाक आरामक, पलखति पेबाक़ एक क्षण के लेल सभटा दिन-दुनियाँ बिसरि जेबाक । बैठा डाँड़ तोरि मेहनति करैत छल जे दू पाई संजोगि बेटी के वियाह करा सकत । उपरा-उपरी तऽ छैहे तीनू बेटी। मुदा एहि हाड़-तोड़ मँहगी मे कतऽ सँ कऽ सकत बचत आ ताहि पर घड़ियालक मुंह सन लड़का बला के मुंह़ई चाही तऽ ओ चाही। बैठा लड़का बला ओहि ठाम सँ निराश घर घुमि आबय। लागई कोन जनम के पाप केलक जे बेटी के बाप बनल। गाम मे लोक सभ वुᆬटिचाल करैक़क़नियाँक मुंह हरदम तुम्मा लटकल़बेटी, निरीह मनस्ताप मे डुबल़क़ी करतैक बैठा ? अपराध-बोध सँ भड़ल़मुदा एहि सँ की भऽ सकैछ? समस्याक निदान तऽ किन्नहु नहि हेतैक । एक दिन भोरे-भोर सौंसे गाम गनगना गेलै जे बैठाक बड़की बेटी ककरो संग पड़ा गेलै। बैठाक कनियाँ-बच्चा सभ ओंघरिया मारै। गामक सभ लोक बेरा-बारी जुटऽ लगलै। कोई कहई - 'गामे-गाम छान माड़ - पड़ा कऽ आखिर जेतै कतऽ' ; तऽ ककरो कहब रहै जे पुलिस मे नालिस करा। बैठा स्थितप््राग़्य बनल रहल -- किंकर्तव्य विमूढ। मोन कहलकै - ' तोरा सामर्थ्य नहि छलहु तऽ अपने अपन रस्ता चुनि लेलकै छौंड़ी। जतऽ रहै, सुख सँ रहै। लोक के की नीको मे दुसतहु आ अधलाहो मे।' आँखि मे चमक आबि गेल छलै बैठा के । बच्चा सभ कन्ना-रोहट पसारने छलैक़ओम्हर कनियाँ के चट्-चट दाँती लगैत छलै । लोकक भीड़ बढले जा रहल छलै । कलाकार ओकर उमरि सात-आठ साल सँ बेसी तऽ नहिये हेबाक चाही। मुदा एक बात मानऽ पड़त जे कमाल के करतब करई छई छौंड़ा ..आगिक गोलाक बीच सँ चीता जकाँ छलांग लगा कऽ निकलि गेनाई, दुनू पैर के मोड़ि कान्ह पर राखि हाथ सँ चलनाई,छोट छल्ला के बीच सँ शरीर निकालि लेनाई़..आर की की ने़..! सभ कहैक जे कमाल के चुस्ती-फुर्ती छै छौंड़ा मे। एकर शरीर जेना रबड़ के बनल हो। सत्ये एहन सहजता आ चुमकी सँ ई सभ करतब करब सर्कसक कोनो माँजल कलकारो लेल कठिने हेतई। मात्रा तीन टा बच्चा मीलि कऽ कय रहल छल करतब - जनपथक तीर्मुहानी बला लाल बत्ती पऱ़ एक टा बच्चा ढोल पीटैत, दोसर कलाकार आ तेसर सहायक। लाल बत्ती पर रुकल सभ लोक अपलक देखि रहल छल करतब़ मुग्ध़..चकित। दृश्य परिवर्तन भेलैक। खेल रुकि गेलैक। सहसा महान कलाकारक हाथ झड़कल बाटी लऽ कऽ याचना मे सभक आगू घुमऽ लगलैक .. एक रुपया़..दू रुपयाक हेतु .. पेटक खातिर, वस्त्रक खातिऱ़..। ओकर याचक नजरि एक दीस जतऽ लोक सँ सहायताक उम्मीद बन्हने छलैक ततहि एक हाथ पेट-मुंह पर जा कऽ भूख कें संकेतित कऽ रहल छलै .. संकेतित कऽ रहल छलै जे पेटे खातिर जान जोखिम मे दऽ कऽ रहल छी ई खतरनाक खेल । बत्ती ताबते मे हरियर भऽ गेलैक। लोक तरकश सँ छुटल तीर जकाँ अपन-अपन वाहन सँ भागऽ लागल। लोक बिसारि देने छल छौंड़ाक अजगुत करतब के़ लोक अनसुना कऽ देने छल छौंड़ाक याचना के। छौंड़ा सड़कक कात मे ठाढ भेल अपन खालिये रहि गेल झड़कल बाटी दिस तकलकै फेर देखैत रहल सर्र -सर्र भागल पड़ायल जाईत गाड़ी के हुजुम के । एक बेर फेर सँ छौंड़ा प्रतिक्षा कऽ रहल छलै बत्ती कें लाल हेबाक़..किश्मतक कोन भरोस? नोर अंगोर 'जननी जन्म-भूमिश्र्च स्वर्गादपि गरियसि' -- मायक ई आदर्श वचन छनि आ एकरा ओ अक्षरशः पालन करैत छथि । सभ बुझा कऽ थाकि गेल, मुदा ओ गाम छोड़ि अन्यत्र रहब स्वीकार नहिये केलनि । अंगदक पैर जकाँ जमल रहि गेलि ओ गाम मे । एक्के ठाम कहलनि, '' जाहि घर मे डोली पर एलहुँ, ओहि घर सँ अर्थीये पर जायब ।'' की करितहुँ हम?  अंत मे भारती कें भरोसे ओकरा गाम मे छोड़ि शहर आपस आबि गेलहुँ । भारती बड़ सेवा-सुश्रूषा करैत छैक मायक---अपन जकाँ। माय सेहो बड़ खुश छलि भारती सँ। हमहुँ निश्र्िचंत भऽ गेल छलहुँ। आई जखन सँ माय फोन सँ बतेलनि जे--- 'भारती के वियाह ठीक भऽ गेलैक आछ---आगले फागुन मे वियाह छैक----किछु मदति तऽ करहि पड़त----आहं पर ओकर माय आश धेने आछ' --- तखन सँ हमर बेचैनी बढि गेल आछ । बात मदति के नहि छैक---ओ तऽ हम कऽ देबैक। मुदा वियाह के बाद भारती अपन सासुर चलि जायत तखन गाम मे माय के सेवा-सुश्रूषा के करतनि? गामो मे लोक कहाँ भेटैत छैक? बृद्धावस्था के कारण माय एसकरे गाम मे कोना रहतीह? कनियाँ के गाम मे छोड़ि दी तऽ बच्चा सभक भविष्य की हेतैक?-----प््राश्र्नक मक़डजाल मे हम ओझरायले चलि जा रहल छी । खीझ उठि रहल आछ मायक पुरान-पंथी पर----कहु तऽ आजुक रौकेट-युग मे एहन विचार पालने रहब कतेक युत्तिᆬसंगत आछ ? मुदा के बुझाबय हुनका । राति भरि कछ-मछ करैत रहि गेलहुँ। कनियाँ निश्र्िचंत सुतल छथि आ दुनु बच्चो। पहरेदारक सीटीक आबाज आ हमर मोनक  बेचैनी--- आपस मे तादातम्य स्थापित करबाक अनवरत प््रायास कऽ रहल आछ। धिरे सँ उठि कऽ घट-घटा कऽ पानिक  गिलास खाली कऽ कऽ घर सँ बाहर निकलि टहलऽ लगैत छि हम । एकाएक विचार दिमाग मे चमकल---  राईटींग --पैड पर कलम दौड़ऽ लागल। चिट्ठी लिफाफ मे बंद कऽ कऽ बेडरुम मे एलहुँ। कनियाँ काँचे निन्न मे करोट पेᆬरैत पुछलनि, ''निन्न नहि भेल की ?'' बिनु उत्तरक प््रातिक्षा केनहिं ओ पेᆬर गहींर निन्न मे सुति गेलीह। लेटर-बॉक्स मे चिट्ठी खसा कऽ हम ओहने आनंदक अनुभव केलहुँ जेहन कदाचित सफल ऑपरेशन के बाद रोगी करैत आछ। किछु दिनक बाद गाम गेल रहि। भारती के माय हमर पैर पर खसि छाती पीट-पीट कऽ कानऽ लागल, ''आब हमर दुनू माय-बेटी के की हेतै मालीक ? कतेक मोश्किल सँ छौंरिक वियाह ठीक केने छलियैक; सेहो मुदैया सब मोड़ि देलकैक रे बाप! समाज सँ लड़ि कऽ छौंरि के आहाँ ओहिठाम काज करऽ देलियै, तकर बदला दुश्मनमा सभ निकालि लेलकै रौ बाप ।'' भोकारि पाड़ि कनैत रहलै ओ; मोन भरि गरियबैत रहलै। बड़ मुश्किल सँ ओ चुप भऽ सकल छल । खेबा काल माय ओकर स्वर मे स्वर मिलबैत कहऽ लगलीह, ''कहु तऽ मसोम्माती भऽ कऽ कोना कोना कऽ बेटीक वियाह ठीक केने छलै बेचारी ---सेहो लोक के आँखि मे गड़ऽ लगलै। अपन कोंढ धुनि कऽ बेचारी गुजर करैत छैक----एहि मे कोन लाज? बेटी समाजक होईत छैक-----धुर्‌ जो एहि गामक लोक के। हे भगवता ! कथा मोड़निहार के कहियो नीक नहि करबै। भारती मायक नोर अंगोर भऽ कऽ पड़तै एहन दुश्मन पऱ़़ ।'' हमर हाथक कौर हाथे मे आ मुँह खुजले रहि गेल छल । फ्यूज बल्व से सत्ये वर्मा साहेबक डरे खऽड़ जरैत छलैक । से रूतबा आ धाख छलनि वर्मा साहेब के जे ककर मजाल जे कल्ला अलगबितै । वर्मा साहेब समय के तेहन ने पावंद जे कहैथ जे नौ बजे सँ ऑफीस शुरू हेबाक मतलब जे नौ बजे सभ काज करय लागय , नौ बजे ऑफीस आबय नहिं । ऑफिसक सभ आधकारी आ कर्मचारी छीह कटैत वर्मा साहेबक डरे जे कहीं कॉरीडोर मे घुमैत वा कैंटीन मे गप्प लड़बैत पक़डा ने जाई । जे केयो बाहर मे देखा गेला तनिकर तऽ अभगदशा बुझू दस लोकक बीच मे झाड़ सँ लऽ कऽ लिखित वार्निंग तक किछु भऽ सकैत छल । एतबे नहिं , आधकारी -कर्मचारी अपन सीट पर सँ भागल नहिं रहय तैं हुनकर समय-समय पर सरप्राईज भिजीट सेहो भेल करय । जे केयो सीट पर नहिं भेटलाह तनिकर नाम आ भिजीट समय नोट कऽ कऽ राखि लेथि आ मैसेज छोड़ि देथि जे जखन आबथि तऽ हमरा लग पठायब । वर्मा साहेब के चैम्बर मे घुसबा सँ पहिने कतेक-कतेक के आधा जान अपने निकलि जाईत छलैक़़ रूपे तेहने छलैऩ़पाँच हाथक चाकर-चौरठ शरीऱ़ एहन टा कल्ला़ भयाओन दृष्टि । आवाज की भारीबिना ले ईस कें'हू आर यू एंड व्हाई कम टु मी ?' लोक के पहिने सँ सोचल सभ बात बिसरा देबा लेल पर्याप्त छल । जीनका लग समुचित कारण नहिं भेलनि ; तनिका तऽ बुझु सस्पेंड हेबा सँ ब्रम्हो नहिं बचा सकथिन । वर्मा साहेब के लेल तऽ ककरो सस्पेंड करब नेना-भुटका के खेल । विभागीय सचिव रहथि तैं ककरो सँ कोनो आदेश लेबाक जरूरतो नहिं । पैघ-पैघ ऑफीसर तक के डाँट-डपट करबा मे वर्मा साहेब के कोनो टा असोकर्ज वा मलाल नहिं । डाँट-डपट की कैक बेर तऽ भरल लोकक बीच मे बेईज्जत तक कऽ देथिन । भरि ऑफीस मे कहबी पसरल छलैक जे जाबत तक लोक वर्मा साहेबक डाँट नहिं सुनि लैत आछ ताबत तक मोन हौंड़ैत रहैत छै। जहाँ ने डाँट पड़ल की मोन के शांति भेटैत छै । से वर्मा साहेब सरकारी सेवा सँ सेवानिवृत भऽ गेलाह । भरि ऑफीसक लोक जी-जी कऽ उठल। चर्चा ईहो छलैक जे वर्मा साहेब पेᆬर सँ सलाहकर बनि कऽ मंत्रालय मे ज्वाईंन करताह । गोपीबाबू तऽ सभ के चेतेन्हो रहथिन जे शैतान के जाबत तक श्राद्ध नहिं भऽ जाय ताबत ओकरा मुईल नहिं बुझल जेबाक चाही । तैं लोक साकाँक्ष नहियों होईत तते तर खुशी तऽ मनेनहे छल भरि ऑफिस मे चोराईये नुका कऽ सहा ; मिठाईयो बाँटले गेल छलैक । लोक के भीतरे-भीतर डरो छलैके जे कहीं वर्मा साहेब पेᆬर सँ आबि गेलाह तऽ सभ खुशी मनेनहार सँ हिसाब चुकता कऽ लेथिऩ़ भेदिया तऽ सभ ठाम रहिते छै ने । मंत्रालय के लोकक कपार एतबो खराब नहिं छलैक़़वर्मा साहेब दोबारा सँ नहिं एलाह । समय तऽ गतिमान होईत छैक ; बितैत गेलैक । वर्मा साहेब लोक के एखनो मोन छथिन खिस्साक रूप मे । वर्मा साहेव के अरदली बालकिशन सेहो समय पर सेवा निवृत भेल कतेक लोक आअयल-गेल ऑफीस चलैत रहलैक । ओहि दिन बालकिशन दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्मक बेंच पर बैसल ट्रेनक प््रातिक्षा मे छल कि तखने बगल मे बैसल कनियाँ केहुनिया कऽ ओकरा पुᆬसपुᆬसा कऽ कहलकै- 'ओम्हर देखहक तोहर पहिलुका साहेब ठाढ़ छथुऩ़भीड़ धकियबैत हैऩ़बजा कऽ बलु हमरा सीट पर बैसा दहक़़हम ओम्हर चल जाईत छी़हमरा आऊर तऽ ठाढ़ो रहब तऽ कोनो बात नहिंओ तऽ हाकीम-हुक्काम छथि ।' ईशारा सँ देखेलकई बालकिशन वर्मा साहेब के़लोकक रेला मे ट्रेनक प््रातिक्षा मे ठाढ़़़पसीना सँ तरबतर भेल़़एक हाथ सँ एटैची थम्हने आ दोसर हाथ सँ मुँह पर बेर-बेर माँथ सँ टघरि कऽ अबैत पसेना के रूमाल सँ पोछबाक अनवरत प््रायास करैत । कखनो काल रेला बढ़ै तऽ लोकक धक्का सँ अपन संतुलन सेहो बनबैत । बालकिशन किछु सोचलक आ कनियाँ के बाँहि पकड़ि कऽ बैसल रहबाक ईशारा केलकै- 'रहऽ दही़ बैसल रह तों । आब हम आ वर्मा साहेब दुनू गोटे पत्यूज बल्व जकाँ छी़पत्यूज बल्व मे कोन फरक जे हजार वॉट के छलैक की साठि वॉट के। ' वर्मा साहेब भीड़क दोगें खनहुँ-खनहुँ कनखिया कऽ बालकिशन के देखि लैत छलाह । बालकिशन आओर पैर पसारि कऽ बैसि रहल छल़़ट्रेनक एखनहुँ कोनो पता नहिं छलैक। पहिल चिट्‌ठी परमादरणीय बाबूजी, ओना तऽ बहुत दिन सँ बात मोन मे घुरियाईत छल ; मुदा हिम्मत नहिं जुटा पाबि रहल छलहुँ जे कोना आहाँक सोझाँ मुँहा-मुँहीं कहि सकी । आई नहिं जानि एतेक हिम्मत हमरा मे कतऽ सँ आबि गेल जे अपन भावना व्यत्तᆬ करबा लेल कागज-कलम लऽ कऽ बैसी गेलहुँ । सोझा-सोझी अपन भावना व्यत्तᆬ कऽ सकी ई हिम्मत तऽ हमरा मे एखनो नहिं आछ । तैं गामो-घर मे सभ हमरा मुँहदुब्बरि बुझैत छल । हमर ई कायरता हमरा आहाँ सभ सँ भेटल संस्कंारक थिक वा हमर अपने भीतरक कमजोरी से तऽ नहिं कहि ; मुदा हम एतबा धरि जनैत छी नारी जातिये के लोक सर्वसहा, अवला, भोग्या ऩहिं जानि की की सर्वनाम आ विशेषण दऽ कऽ मुँहदुब्बरि बनल रहबा लेल विवश कऽ दैत छैक । हम मानैत छी जे डिबिया लऽ कऽ तकला पर बहुत एहन मैथिलानिये भेटि जेतीह जे अपन आधकार छिनि कऽ पाबि लैत छथि़ मुदा एहन तऽ किंछु मुट्‌ठीये भरि छथि ने । हम तऽ अनुभव केलहुँ आछ जे नारी के सर्वसहा भऽ कऽ जीबाक लेल जिम्मेदार तऽ नारिये थिकदादी, पिसी, नानी,माय, काकी रूप मे । हमरा एखनो बड़ नीक जकाँ मोन आछ जे जखन माय के चारिमो बेटिये भेलैक तऽ आँगन मे जनि-जाति कोना कन्ना-रोहट पसारि देने रहय ; जेना कोनो बज्रपात वा अपशवुᆬन भऽ गेल हो। एहन सुन्नरि़साक्षात भगवती सन बच्चा के नाम राखल गेलैक - 'मनतोड़िया' । बाबूजी साईत आहाँ एहि पर विचार नहिं केने होयबैक जे पैघ भेला पर बेचारी के अपन नाम लऽ कऽ कतेक ग्लानि के सामना करऽ पड़लैकसंकोचे ओ अपन नाम ककरो नहिं कहैक । मनतोड़िया नाम जे सुनैक से कोनादन मुँह बना लैक । संकोचे ओ संक्षेप मे अपन नाम बतबैत छैक मिस एम0 चौधरी । आहाँ अंदाज लगा सकैत छी कतेक सिद्दति भोगऽ पड़ल हेतैक बेचारी के ! आहाँ तऽ पढ़ल-लिखल बाप छलियैकआहाँ तऽ कोनो सुन्नर, आधुनिक नाम राखि दितियैक। विक्वूᆬ के जनम के बाद पूरा परिवार के ध्यान कोना ओकरे दिस चलि गेलैक से तऽ अहुँ जनिते छी़ओकर एक-एक जरूरत के सभ ख्याल राखय मुदा हमरा सभ बहीन जेना टुअर सन भऽ गेलहुँअपडेरल । मानलहुँ जे विक्वूᆬ नेना छल आ नेना के सभ प्यार-दुलाड़ करैत छैक ; मुदा हमहुँ चारू बहीन तऽ कोनो सयान नहिये भऽ गेल छलहुँ। हमरो सभ के वात्स्ल्य आ स्नेह के भुख छल़़से तऽ केयो नहिं बुझलक । ई देखि कऽ हमर सभक मोन किं नहिं कचोटैत छल जे माय संदूक मे गुड़, चीनी, मेवा आ आनो नीक-निवुᆬत वस्तु सभ बंद कऽ कऽ रखैत छलीह आ चोरा कऽ विक्वूᆬ के खुअबैत छलीह । बाल मोने हम सभ बहीन मँगियै तऽ झझकारि लिअय़़क़ंखनो- कखनो बेसी लटारहम केला पर धेले चटकन सेहो पड़य। विक्वूᆬ कतबो बदमाशी करय तऽ कोनो बात नहिं; हमरा सभ बिनु गलतियो के मारि खाई़़मायक चटकन तेहन सक्कंत जे ओनाहों केयो किंछु करबाक सोचितो नहिं छल । आहाँ के तऽ बाबूजी साईत मोन होयत जे जखन विक्वूᆬ खेल-खेल मे हथौड़ी उठा कऽ हमर कपाड़ फोड़ि देने रहय तऽ माय उनटे हमरे ठुनकिंयबैत कहने रहय--'ईह ! लोथबी नहिंतन ! देखलही जे हथौड़ी उठेने मारऽ अबैत छौ तऽ पड़ायलो नहिं भेलौ '। ओ तऽ आहाँ ओहि काल मे रहि जे हमरा कोरा मे उठा कऽ शोणित पोछने रही आ माय पर तमसायल रही -' एक तऽ विक्वूᆬ बेचारी के कपाड़ फोड़ि देलकै आ उनटे आहाँ एकरे डँटैत छियै? ' बाबूजी हमरा सभ बहीनक एकेटा सम्बल अहीं टा रहि। मुदा धिरे-धिरे हमरा बुझाय लागल जे अहुँ के झुकाव विक्वूᆬये दिस बेसी आछ । नहिं तऽ विक्वूᆬ के सिनेमा-सर्कस, दोस्त-महीम पर उड़बै लेल एक्के बेर मे पाई निकालि कऽ दऽ दियै आ हमरा सभ के किंताबो-कॉपी लेल खेखनय पड़य । हम मात्र दू टा सलवार-सूट सँ काज चलाबी आ विक्वूᆬ लग नव-नव पैᆬशन के कपड़ाक अम्बार । सत्य पुछु तऽ बाबूजी एहि सभ कारणें हम अपन सहोदर छोट भाय के अपन प््रातिद्वंद्वी बुझऽ लगलहुँ हमरा एक-एक टा छोट-छीन गप्प तक कचोटऽ लागल मोन मे विद्रोहक भावना आबय लागल । मोनक पीड़ा मोने मे घुमरैत रहल व्यत्तᆬ करबाक तऽ हिम्मते नहिं छल । आहाँ कतेक प््रासन्न होईत छलहुँ बाबूजी आ कतेक गर्व होईत छल जखन हम स्वूᆬल मे गणित आ भौतिकी मे क्लासक हाईयेस्ट स्कंोरर होईत छलहुँ जे भेटैत छल सभ के आहाँ ई खुशखबरी सुना अबैत छलहुँ । हमरा कोरा मे उठा कऽ चुम्मा लैत कहैत छलहुँ जे हमर बेटी एक दिन हमर नाम करत । हमहुँ आगू जा कऽ ईंजिनियर बनबाक सपना बुनि लेने रही़उठैत-बैसैत अपना के ईंजिनियर के रूप मे देखि । एहि लेल जी-जान सँ परीक्षा के तैयारी मे जुटि गेल रही। मुदा बाबूजी नहिं जानि कोना अहाँ के मति फीरि गेल जे आहाँ हमर इंट्रेंसक फार्म भरबा मे ई कहि कऽ मना कऽ देने रही --- 'लड़की सभ लेल ई सभ ठीक नहिं होईत छैक । बी0एससी0 कऽ ले ओतबे बहुत छौ । ' पेᆬर आहाँ बड़की काकी दिस देखि कऽ बजने रही--' जतेक आगू जायत ओतेक पैघ ओहदावला लड़को तऽ भेटक चाही ! आ पेᆬर ओहन वर-घर लेल डाँड़ो तऽ सक्कंत रहक चाही ! ' बड़की काकीक संगे ओसारा पर बैसल सभ केयो स्वीकृति सूचक मुड़ी डोलओने छल । हमरा तऽ लागल छल जेना केयो हमरा गाछ पर चढ़ा कऽ छौ मारि देने हो़ केयो हमरा कल्पना-वुᆬसुम के पैर सँ मीड़ि कऽ नेस्त-नाबूत कऽ देने हो। बाबूजी साईत आहाँ के ई नहिं बुझल होयत जे आहाँक ओहि निर्णय सँ हमरा करेजा पर तखन की बीतल होयत ? आहाँ के मोने होयत जे एक बेर जखन अपन लहलहाईत गहुँमक सभ टा खेत साँढ़ भरिये राति मे निट्‌ठाह कऽ चरि गेल छल तऽ आहाँ कतेक दिन तक शोके व्यावुᆬल रहलहुँ । मुदा हमर ई शोक साँढ़ चरल जजाति सँ बेसी पैघ छल बाबूजी । फसील तऽ आगला बेर पेᆬर भऽ जेतैक मुदा हमर एतेक दिन सँ देखल सपना के महल जे एके झोंक मे बालूक देवाल जकाँ ढ़हि गेलैक तकर क्षतिपूर्ति की कहियो सम्भव छलैक? हम एसगर मे भरि-भरि राति कनैत रहैत छलहुँ । बाद मे कहुना-कहुना मोन के दिलासा दियेलहुँ -- ईंजिनियरिंग के पढ़ाई मे बड़ खर्चा अबैत छै । भऽ सकय जे आहाँ एहि डरे पाछु हटि गेल होई । आहाँ खेत बेचि कऽ डोनेशन दऽ कऽ विक्वूᆬ के प््रााईवेट डेंटल कॉलेज मे एडमीशन करेलहुँ । साईत एहि द्वारे जे विक्वूᆬ बेटा आछ़़माय -बाप के बुढ़ारी मे परवरिश करत । बेटी तऽ आनक घर चलि जायत़़ यैह ने ? आहाँक हाथें एहन दुराव सत्य पुछी तऽ बाबूजी हमरा भीतर सँ तोड़ि कऽ राखि देलकहमरा सोचय लेल विवश कऽ देलक जे एके माय-बापक संतान बेटी-बेटा के लेल भिन्न दृष्टिकोण किंयैक? किंयैक माय-बाप एखनहुँ सोचैत छथि जे बेटी लेल हुनकर दायित्व ओकर विवाह करा देब बंद तक सीमित छनि ; मुदा बेटा के पढ़ा-लिखा कऽ योग्य बनायब । की बेटी बेटा जकाँ माय-बापक देखभाल नहिं कऽ सकैछ वा करैछ ? तखन बेटा आ बेटी मे भावनाक एतेक पैघ अंतर किंयैक? खास कऽ आहाँक हाथें तऽ बाबूजी हम कहियो कल्पनो ने केने रही । हम आहाँ के प््रागतिवादी बुझैत रही से किं सत्ये पुᆬसि छल ? एतेक पढ़ियो-लिख कऽ बाबूजी साईत आहाँ सोचबाक प््रायास नहिं केलियै जे आजुक एहन पड़ाईत जिनगी मे एकटा गृहणी मात्र बनि कऽ जीवन काटब कतेक दुष्कंर छैकपति भोरे ऑफीस जेता तऽ मुन्हारि साँझ सँ पहिने नहिं घुमताह़़धिया-पुता स्वूᆬल, कॉलेज,संगी-साथी मे बाझल रहत । एसकर घर के भीतर बंद एक एक पल कोना बितैत छै से हम कोना वर्णन करू ? हमरा क्षमा करब बाबूजी यदि भावनावश हमरा सँ किंछु अनर्गल लिखा गेल हो । आई जखन भावनाक बान्ह टूटल तऽ अपना संगे सभ दमित भड़ास के बहओने चल गेल । हमर ई आशय कथमपि नहिं जे हम अपना उपर बीतल के उकेरि । मा भगवती सँ हम एतबे मँगैत छियैन जे हमर समाज के सद्‌बुद्धि देथुन जे सभ संतान के एके नजरि सँ ताकय । एहि चिट्‌ठी के लिखबाक हिम्मत तऽ हम आई कऽ लेलहुँ ; मुदा नहिं जानि एकरा डाक सँ पठेबाक हिम्मत कऽ सकब किं नहिं ? आहंक। दिन धराबय तीन नाम श्यामाबाबू़य़ानि श्यामानंद दास । भरि ऑफिस मे श्यामाबाबूक नामे विख्यात। गूढ-सँ-गूढ समस्याक चुटकी मे समाधन बतबैत छलाह श्यामाबाबू। तैं तऽ उच्चाधिकारी सभ सेहो हुनकर सलाह लेब नहि बिसरैत छलाह। श्यामाबाबू हमरा अपन छोट भाय जकाँ मानैत छलाह। जखन हम नया ज्वाईन केने रहि तऽ अंजान शहर मे अबुह बुझाईत रह ;मुदा श्यामाबाबू सँ भेंट होईते लागल जेना अपन लोकक बीच मे छी़य़ुग-युग सँ परिचित। डेरा तकबा सँ लऽ कऽ हिंग-हरदि सभ टा जोगार केने रहथि ओ। एतबे नहि, रोज पुछथि जे कोनो तकलीफ तऽ नहि बुझाईतअछि ? सेवा-निवृत भऽ श्याम बाबू अपन बनाओल मकान मे रहऽ भागलपुर चलि गेलाह।एहि बेर भागलपुर जेबाक हमरा जखने मौका भेटल हम निश्चय केलहुँ सर्वप्रथम श्यामबाबू सँ भेंट कैल जाय़ कतेक दिन भऽ गेल भेंटो भेला़सेवानिवृति के बाद तऽ नहिये। भागलपुर स्टेशन पर उतरि रिक्शा भंजियबैत रहि किं ता हुनकर एकमात्र पुत्र पर नजरि पड़ल। हम चिकरि कऽ ओकरा बजौलियैक। लग मे एला पर सभ सँ पहिने श्यामबाबूक हाल-चाल बुझबाक प्रयास केलहुँ। ओ गम्भीर होईत उत्तर देलक --''ओना तऽ निके छथि, मुदा दिमाग कने सनकिं सन गेल छैन।'' हमरा अचम्भित होईत देखि ओ बाजल---''घर पर चलु; छोट सन बजारक काज कऽ कऽ हम यैह एलहुँ।'' कहैत ओ स्वूᆬटर स्टार्ट कऽ कऽ आगू बढ़ि गेल। ई दुखद समाचार सुनि मोन भारी भऽ गेल । घर पर पहुँच कऽ श्यामबाबूक नोकर गेटे पर ठाढ़ भेट गेल। ई बड़ स्वामीभत्तᆬ आ नेने सँ हुनका ओहिठाम काज करैत आबि रहल अछि। हम ओकरा सँ पुछलियै---''रामू! मालिक कोना छथुन?'' ओ चोट्‌टहिं अत्यंत गम्भीर होईत बाजल--''मालीक आब कहाँ रहलाह ।'' पेᆬर हमरा बैठकी मे एबाक ईशारा कऽ स्वयम भीतर चलि गेल। हमर माथ घुमऽ लागल। लागल नहि जानि कतऽ आबि गेलहुँ अछि । मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्ना। ताबत श्यामबाबूक कनियाँ घर सँ बहरेलीह। हम हुनका कऽल जोरि आभवादन कऽ हुनके सँ स्पष्टीकरण चाहलहुँ। मुदा, हाय रे हमर दुर्भाग्य ! ओ आओर जरल पर नून छिटलन्हि--''ओना तऽ स्वस्थ छथि,मुदा अकान भऽ गेलाह अछि । '' हमर माथ आर बेसी चकराय लागल । लागल जेना हम गलत जगह आबि गेलहुँ अछि । या तऽ घरक सभ लोक हमरा सँ मसखरी कऽ रहल अछि या सभ सनकिं गेल अछि । तखने श्यामबाबू घर सँ बहरेलाह-- स्वस्थ, तंदुरुस्त, ओहने मुस्कंी, वैह स्वभाव़। हमरा देखिते भरि पाँज कऽ गसिया लेलनि। हमरो आँखि सँ नोर बहऽ लागल। पेᆬर अपना के संयत करैत सभ टा बात बता देलियनि आ हुनके सँ एकर कारण जानऽ चाहलहुँ। हुनकर ठोर पर चिर-परिचित मुस्कंी पसरि गेलनि। पेᆬर छलिया सुपारीक सरौता सँ महीन कतरा कटैत बजला--''ओ सभ केयो सत्ये बजैत अछि ।'' ''सत्य कोना श्यामबाबू?!!'' हम बिच्चहि मे टोकलियनि। एक चुटकी कतरा हमरा आगू बढ़ा ओ हमरा संयत करबाक प्रयास केलनि। पेᆬर हमर प्रश्नवाची नजरि के अकानैत बजलाह--'' ओ खिस्सा तऽ सुननहिं हेबैक जे आन्हर सभ एक टा हाथी के देखि कऽ ओकर स्वरुपक कोना भिन्न-भिन्न व्याख्या केने छलैक। सैह अहु ठाम छैक । ''पेᆬर खखसि कऽ भहरल स्वर मे आगू बजलाह---''हमर पुत्र आहाँ के कहलनि जे हम सनकिं गेल छी ; से अपना जगह पर ओहो सत्ये छथि। हम हुनकर नीक-अधलाह पर टोका-चाली करैत छियैन ; से हुनका पसिन्न नहिं। आब आहं कहु जे अधलाह पर हम जिबैत जी चुप्पो कोना रहि जाऊ ?बजा तऽ जाईते अछि । तैं ओ हमरा सनकाह बुझैत छथि। ''पुनः आगू बजलह--'' जहाँ तक रामूक प्रश्न छैक तऽ नोकरी करैत काल मे हमहीं ओकर वेतन आ सभ आवश्यकता के पुरा करैत छलियैक; से आब रिटायर भेला पर नहि भऽ पबैत छै । तखन आहं कहु जे हम ओकरा लेल मरले सन छियैक ने?'' हम अवाक भेल एक टक सँ श्यामबाबू के देखैत आ हुनकर व्याख्या सुनैत रहलहुँ। ओ आगू बाजब शुरू केलनि---''हमर पत्नि तऽ पोता-पोतीक संग नव आश्रय ताकिं लेलनि आ बेटा-पुतोहु के हँ-मे-हँ मिलबैत रहैत छथि। आब हमर संस्कंार कहू वा आदति जे हम ई सभ नहि कऽ पबैत छि । तैं ओ हमरा अकान बुझैत छथि । '' कहि कऽ श्यामबाबू ख़िडकी सँ बाहर शुन्याकाश दिस देखऽ लगलाह। पेᆬर एक टा दीर्घ-निश्वास छोड़ैत बजलाह--''दिन धराबय, तीन नाम।'' सुन्न पड़ि गेल चेहरा पर एकटा मुस्कंी अनबाक प्रयास करऽ लगलाह श्यामबाबू़आगि के छाऊर सँ झंपबाक एकटा थाकल प्रयास़किंवा जीवनक दंश सहबाक जीजिविषा़। । घुरि आऊ निशा आओर निशा अहाँ घुरि कंऽ नहि एलहुँ । व्याकुल, विदग्ध मोन संगे पथड़ायल आँखि पथ हेरैत रहि गेल । मुदा अहाँ के नहि एबाकं छल;से अहाँ नहि एलहुँ । दिमाग कंान मरोड़ैत आछ---'बुड़िबकं कंहाँ के! ओ भला किंयैकं एतहु! किंयैकं पागल बनि रहल छै ओकंरा पाछाँ ? तोहरा सँ ओकंरा कंोन रिस्ता; कंोन संबंध? दु पल के लेल भेंट किं भेलहु; अपन आधकंार जमाबऽ लगलै ओकंरा पर?' मोन कंहैत आछ---'कंोन रिस्ता से तऽ नहि जानि; मुदा ओ घुरि कंऽ एकं दिन आओत अवश्ये़।' निशा अहाँ अपना मुँह सँ भने कंोनो आश्वासन नहि देलहुँ; मुदा अहीं कंहु निशा हमर आँखि अहाँकं आँखि के मूकं निमंत्रण नहि देने छल? किं अहाँ झुकंल पलकं सँ मौन स्वीकृति नहि देने छल हुँ? तखन पेᆬर अहाँ घुरि कंऽ किंयैकं नहि एलहुँ निशा? हमर आँखि सदिखन स्टेशन, बस-स्टैंडकं भीड़ मे आहं के तकैत रहैत आछ जे कंखनो,कंतहु-ने-कंतहु भेटाईये जैब आ बिहुँसैत कंहब, 'हम आबि गेलहु रजत!'जखन-जखन हम श्रमजीवि ट्रेन पक़ंडबाकं लेल घर सँ निकंलैत छि तऽ लगैत आछ अहाँ स्टेशन पर पेᆬर भेटायब आ हँसि कंऽ बाजब--''हाय रजत! कंोना छि अहाँ? केहन संयोग जे हम सभ दोबारा स्टेशने पर सेहो गामे जाईत कंाल भेटलहुँ ।'' हम कंहितह ुँ- '' हम तऽ निके छी। आहाँ अपन वुᆬशल बताऊ? एतेकं दिन बाद भेंट भेल। हम तऽ कंहिया सँ आहाँकं बाट जोहि रहल छि।'' आहाँ चट्‌ट दऽ उत्तर दितहुँ --''अरे वाह! ने अपन पता बतेलहुँ; ने हमर पता लेलहुँ, पेᆬर भेंट हेबो कंरैत तऽ कंोना?'' पेᆬर हम सभ ट्रेन मे चढ़ि जयतहुँ। मुदा निशा अहाँ नहिये एलहुँ। हमरा सभकं मिलन केहन संयोग छल! आहाँ आ आहाँकं पिताजी निचुलकंा बर्थ पर बैसल रही। ओ बर्थ हमर छल। तै हम अपन बर्थ लग आबि पुछने रहि तऽ आहाँकं पिताजी बाजल रहथि, 'ई बर्थ आह के होयत। हमर दुनू उपरकंा बर्थ आछ। आहाँ के कंष्ट नहि हुअय तऽ हम दुनू एहि पर बैसल रहि।' उत्तर मे स्वीकृति सूचकं मुड़ी डोलेबाकं आतरित्तᆬ हम किंछु नहि बाजि सकंल रहि। आहाँ कं अलौकिंकं सुंदरता हमरा मुग्ध केलकं रुप-माधुरी़ज़ेना आहाँ कंोनो दोसर लोकं सँ पृथ्वी पर उतरल होई ! कंाश! किं हम शृंगार रसकं कंवि रहितहुँ तऽ कंाव्य-घट कें अहाँकं सौंदर्य-माधुरी सँ बूंद-बूंद भरि दितहुँ। कंाश! किं हम कंोनो चितेरा होईतहुँ तऽ एहि प््रोरणा-प््रातिमूर्ती कें फलकं पर साकंार उकेरि दितहुँ। हम कंवि-चित्रकंार भने नहि; भावुकं-हृदयकं स्वामी तऽ अवश्ये छी।हमर निरीह आँखि जे कंविता हृदय पर कंविता अंकिंत केलकं; मस्तिष्कं मे जे चित्र उकेरलकं ओकंर बरोबरि कंोनो कंवि-चित्रकंार किं कंहियो कंऽ सकैत आछ? आहाँ के शाईत मोन हेबे कंरत निशा, जे जखन बातकं सिलसिला चलि परलै तऽ हम अहाँकं नाम पुछने रहि। अहाँके किंछु बजबा सँ पहिने अहाँकं पिताजी उत्तर देलनि--''श्वेत निशा'' । ''सुंदर! अतीब सुंदर! श्वेत निशा यानि पुर्णिमाकं धवल ईजोरिया''-- हमरा मुँह सँ बहरायल रहय । ओहि पर आहाँ बाजल रहि--''ईजोरियाकं संगहि अन्हरियाकं शुरुआत सेहो़ ।'' एहि सँ पहिने किं हम एकंर दार्शनिकं व्याख्या सुनि पबितहुँ, आहाँकं पिताजी टोकंने रहथि, -''निशा! चायकं थरमश निकंाल। एकं-एकं कंप घरकं गर्मागर्म चाय भऽ जाय''। आहाँ एकं कंप चाय हमरो दिस बढ़ेने रहि। जखन हम मुड़ी डोला कंऽ लेबा सँ मना केलहुँ तऽ आहाँ कंटाक्ष कंयने रहि --''किंयैकं, हमरा हाथकं चाय नहि पियब कंी?'' मुदा, निशा आहाँ चाय अपना हाथ सँ कंहाँ देने रहि हमरा। चाय के कंप हमरा दिस आहाँकं पिताजी बढ़ेने रहथि। हम चायकं कंप बिना कंोनो प््रातिवाद के लऽ कंऽ पिबऽ लागल रहि; मुदा बेमजा ।आहाँकं आँखि जेना हमरा आँखि सँ कंहने रहै--'हम अपन हाथ सँ नहि दऽ सकंलहुँ एहि मे हमर कंोन दोष? बीच मे बाधा तऽ हमर पिताजी बनि रहलाह आछ।' सत्ये हम अपन सुधि-बुधि बिसरि गेल रहि निशा। हमर कंान आहाँकं पूजाकं घंटी सन टुन-टुन आवाज सुनबाकं लेल व्यग्र छल। मोन होईत छल आहाँ संगे असीम कंाल धरि बात कंरैत रहि। मुदा आहाँकं पिताजी बिच मे आबि जाथि। हुनके सँ पता चलल जे आहाँ दिल्ली विश्वविद्यालय मे साहित्य के छात्रा छी; साहित्यिकं लेखन मे सेहो आभरुचि आछ। आहाँकं पिताजी बैंकं आधकंारी छथि आ गर्मी छुट्‌टी मे गाम जा रहल छी। हमरा सेहो पटना तकं जयबाकं आछ से जानि आहाँकं पिताजी कंहने रहथि, 'चलू बढ़िआ भेल ।गप्प-शप्प कंरैत हमरा सभकं सफर आसानी सँ कंटि जायत।'' तकंरा बाद किंछुये कंाल मे आहाँकं पिताजी ऊंघाय लागल रहथि । आहाँ सँ बात कंरबाकं यैह उपयुत्तᆬ समय भऽ सकैछ, से बुझि हम पुछने रहि-''आहाँ के बोतल मे पानि आछ किं?''तखने आहाँकं पिताजी हड़-बड़ाकंऽ बाजल रहथि- ''हँ!हँ!य़ैह लियऽ।'' जाबत आहाँ किंछु बजितहुँ; बोतल हमरा हाथ मे धरा देलनि। हमर ईहो प््रायत्न बेकंारे चलि गेल छल। हम मोने-मोन गुम्हरि कंऽ रहि गेल रहि अपन हत-भाग्य पर आ आहाँकं पिताजीकं दखलंदाजी पर। मुदा कंईये किं सकैत छलहुँ? राति मे हमर मोन बेचैने रहल। आहाँ तऽ उपरकंा बर्थ पर निश्िचंत सुतल छलहुँ; मुदा हमर मोन आहाँकं सौंदर्य-पान लेल जागले रहि गेल। हम टॉयलेट जेबाकं बहाना सँ ठाढ़ भऽ कंऽ आहाँकं आनंद्य-सौंदर्य के अपलकं निहारैत रहलहुँक़ंोनो मूर्ति-शिल्पी जेना बड़ मनोयोग सँ स्वेत संगमरमर के तारासि-तरासि कंऽ ई आकंार देने हो़ यथा नाम, तथा रूप़़ओहने पूर्णिमाकं धवल चाँद सन मुख़डा़ग़ुलाबकं पंखुरी सन ठोऱ़क़ंाम-कंमान सन भौंह़़ अंग-प््रात्यंग सुघड़़़ज़ेना एकं-एकं टा कंविता़ । चेहरा पर लटकिं रहल अल्हड़ लट जेना कंहि रहल हो-'हम एहि ठाम नहि रहबई तऽ आहाँकं नजरि नहि लागि जयतै?'' तखने निशा आहाँ कंरोट पेᆬरने रहि। अपन चोरि पक़ंडल जेबाकं डऽरे हम टॉयलेट दिस चलि गेल रहि। भोर मे ट्रेन कंखन पटना पहुँचि गेल से बुझियो ने पौलहुँ ; नहि जनि पौलहुँ जे हमरा सभकं मिलन एतेकं क्षणिकं होयत। ट्रेन सँ उतरि कंऽ जयबा कंाल आहाँ घुमि-घुमि कंऽ कंतेकं हमरा दिस तकैत रहलहुँपेᆬर भीड़ मे कंतहु गुमि गेलहुँ। निशा हम एकंनो ओहि भीड़ सभ मे आहाँ के ताकिं रहल छि़ऩहि जानि कंहिया भेटा जायब आहाँ। अन्हेर

बड़ एकंात्मता बुझा रहल आछ हमरा स्वयं आ एहि ट्रेन मे---दुनू पड़ायल जाईत -- कंोनो-कंोनो स्टेशन पर बिलमैत -- नव-नव लोकं सँ परिचय आ पुरान सँ संग छुटब --तथापि ने मिलनकं खुशी ; ने वियोगकं दुःख----चरैवेति़ चरैवेति ।

टुगर हम क़ंक्कंा -कंाकंीकं कृपा पर जीबैत भैंस-बकंरी चरबैत । मोने आछ हमरा जे हम, जीबछा, मलहा सभ केयो टाईल-पुल्ली खेलबा मे एतेकं ने मस्त रही जे महींस के हाँकंबो बिसरि गेलहुँ । सभटा महींस भोकंनी साहुकं खेसारी खेत मे हुलि गेलै । एके-दू बेर तऽ मुँह मारने हेतै महींस सभ किं कंतऽ ने कंतऽ सँ दनदनाईत भोकंनी साहु जुमि गेलै़तामसे-पित्ते माहुर भेल़़बिखिन्न-बिखिन्न के गारि पढ़ैत । सभकं महींस तऽ हाँकिं कंऽ लईये गेलै ओ ; भोलबा सेहो पक़ंडा गेल । सभ छौंड़ा सभ जेम्हरे पओलकं तेम्हरे जान बचा कंऽ पड़ायल । डरे हमहुँ बेछोहे प़ड़ेलहुँ । डर भोकंनी बाबू सँ बेसी तऽ कंक्कंा आ कंाकंीकं छल़़दुनू बात-बात पर कंोना अधमौगति कंऽ मारैत आछ लाते-मुक्के, जे पओलकं ताहि लऽ कंऽमरबा-जीबाकं कंोनो ठेकंान ने ।

हम रेलवे कंाते-कंात पड़ायल जाईत रही किं लागल केयो पाछु सँ हमर आँगी पकंड़ि लेलकं डरे हमर होश गुम्म भऽ गेल अधमरू सन भऽ गेलहुँ । बफाड़ि कंटैत हम कंहुना एहि चाँगुर सँ अपना के छो़ड़ेबाकं अंतिम प््रायास कंरैत आगु दिस जोर लगबैत रहलहुँ । पेᆬर धम्म्‌ दऽ मुँहे भरे खसलहुँ । देह सँ माटि झाड़ैत हम पाछाँ तकंलहुँक़ेयो नहिं छल । जान मे जान आयल । हमर आँगी सिगनलकं तार मे ओझड़ा गेल छल । दूर तकं देखलहुँक़ेयो एम्हर नहिं आबि रहल छल । डर किंछु कंम भेल । ताबते कंोनो ट्रेन सिगनल पर आबि कंऽ ठाढ़ भेल । नुकंा कंऽ हम ओहि मे चढ़ि गेलहुँ डरे एकं कंोन मे दुबकंल ठाढ़ रही । एकंटा आदमी कंने कंात सहटि कंऽ हमरा बैस जेबाकं ईसारा केलकं । असोथकिंत तऽ भईये गेल रही ; बैसिते आँखि लागि गेल । आँखि खुजल तऽ सौंसे डिब्बा खाली छलैकं । धड़फ़डा कंऽ ट्रेन सँ नीचा उतरलहुँ । लोकंकं एहि अजश्र भीड़ मे एकंहुटा चेहरा चिन्हार नहिंज़गह अनचिन्हार; लोकं अनचिन्हार अनभुआर हम आब कंतऽ जायब ?क़ंी कंरब ?? बुकंौर लागऽ लागल हमरा डरे जाँघ थरथराय लागल - 'नहिं जानि कंोन दुरमतिया घेरने छल जे गाम सँ पड़ा गेलहुँग़ाम पर मारिये खैतौं ने ! पहिनहुँ किं कंोनो कंम्म मारि खेने छी ।क़ंी बिगड़ितै मारि खा कंऽ ? देह मे भूर तऽ नहिं ने भऽ जैतै ? मरि तऽ ने जैतौं ? एहि परदेश मे तऽ आब बिलटि कंऽ मुईनाईये लिखल आछ । बौड़ल लोकं अपन देश कंहाँ आपस जा पबैत आछ़़ओकंरा सभ के सुख-सराध लोकं ओहिना कंऽ दैत छै । ' डरे हदास उड़ऽ लागल जोर-जोर सँ हिचुकंऽ लागल रही ।

बुझायल जे केयो हमरा कंान्ह पर हाथ रखलकं चौंकिं कंऽ तकंलहुँ । एकंटा अधवयसु पुरूष हमर कंनबाकं कंारण जानऽ चाहि रहल छल । ओकंर स्नेह सँ हमर कंरेजा फाटि गेल मोन भेल भरि ईच्छा कंानी । हम किंछु ने बाजि सकंल रही । ओ हमरा स्टेशनकं खाली बेंच पर बैसा कंऽ मारते रास कंचड़ी-मुड़ही-घुघनी कंीनि कंऽ खेबा हेतु देलकं । भुख सँ तऽ अँतरी बैसल जाईत रहै़हम खाय लगलहुँ । कंने सुभ्यस्त भेलहुँ तऽ ओ पोल्हा कंऽ सभ बात पुछय लागल । पहिने तऽ हमरा किंछु नहिं बाजल भेल खाली हिचुकैत रहलहुँ । परदेश मे एकंटा अनचिन्हार द्वारा एहन स्नेह पओला सँ हम ओकंर कृतग्य भऽ गेल रही । हम ओकंरा सभ बात बता देलियै आ कंहलियै जे ओ हमरा गाम बला ट्रेन पर बैसा दिअय । ओ हमरा बड़ बोल-भरोस देलकं आ कंहलकं जे आब आई तऽ कंोनो ट्रेन नहिं छैकं ; कंाल्हि ट्रेन धड़ा देत । ता राति भरि लै अपना बासा पर लऽ गेल । मुदा ओ हमरा गामकं ट्रेन नहिं धड़ओलकं नित नव-नव बहाना । हमरे तुरिया ओकंरो बेटा रहै । खेलाईत-खाईत हमरो दिन बीतऽ लागल़़ग़ामकं सुरता धिरे-धिरे कंम होईत गेल ।

ओकंरा सभकं हमरा प््राति स्नेह व्रᆬमशहे कंम्म होईत गेलैकंआब हमरा उपर घरकं कंाजकं संगहिं माल-जाल , खेत-पथार, बाड़ी-झाड़ी सभ टा जिम्मेदारी छल़़क़ंान वुᆬरियेबाकं तकं के पलखति नहिंताहि पर गारि-गंजन सेहो हुअय लागल । आजिर भऽ कंऽ एकं दिन सिन्हा साहेब सँगे ओहि ठाम सँ पड़ा गेलहुँ ।

सिन्हा साहेब हमरा भोरे-भोर सभ दिन भेंट भऽ जाथि ओ टहलय निकंलैत छलाह आ हम मलिकंाईनकं पूजा लेल पूᆬल तोड़य निकंलैत छलहुँ । आपस मे देखि कंऽ मुस्किंयेनाई , पेᆬर प््राणाम आ तकंरा बाद बढ़ैत गेल अपनत्व । सिन्हा साहेब कंोनो पैघ ऑफीसर रहथि । हमरा अपन माय-बाप के मुँह तकं मोन नहिं लोकं कंहई अलच्छा जनमिते माय-बाप के खा गेलई । मुदा सिन्हा साहेब मे हम अपन माय-बापकं छाँह साफ देखैत छलहुँ । हम हुनकंा अपन देवता समान बुझैत रहलहुँ आ ओ हमरा अपन संतान सँ बढि कंऽ मानैत छलाह । अपने जतऽ-जतऽ जाईत रहलाह हमरा संगे रखलनि । एकं दिन अनचोके मे हुनकंो साहचर्य हमरा सभ के छुटि गेल आब ओ एहि दुनियाँ मे नहिं रहलाह ।

हम आब हुनकंर बेटाकं कंारखाना मे कंाज कंरैत छी । कंारखाना के कंाज सँ जयनगर जा रहल छी । ट्रेनकं ख़िडकंी सँ पाछु पड़ायल जाईत खेत-पथार, कंलम-गाछी, बाध-बोन, ईनार-पोखरि अचानकं हमरा मोन मे हमर बाल्यकंाल एकंटा छाँह जकंाँ पसरि गेल आछ । ट्रेन एके बेर धक्कंा संग रूकिं जाईत आछ । यात्री सभ एम्हर-ओम्हर तकैत एकं दोसरा सँ ट्रेन रूकंबाकं कंारण पुछि रहल आछ । किंछु गोटे तऽ कंारणकं खोज मे ट्रेन सँ नीचा उतरि गेल आछ । हमरो मोन उबिया गेल वा ई कंहु जे रेलकं पटरी कंातकं मनभावन दृश्य हमरो ट्रेन सँ नीचा उतरबा लेल विवश कंऽ देलकं। लोकं बजैत छै जे माओवादी सभ ट्रेन के पटरी उड़ा देने छै़आब ट्रेन आगू नहिं जा पाओत । हम चारू कंात मुड़ी घुमा कं चर -चित लैत छी - सामने पुल पर बोर्ड लागल छैकं -- कंमला पुल सं० ७ । हमर दिमाग पर जोर पड़ल हमरो गामकं पुल के तऽ लोकं साते नम्बर पुल कंहै । ओहु ठाम एकंटा एहने झमटगर पीपड़ के गाछ छलै । हम तजबीज कंरैत छी । यादकं आर कंोनो चिन्ह नहिं बुझाईत आछ । मुदा ई कंमला नदी जकंरा लोकं मोईन कंहैत छलैकं आ एकंर भीड़ पड़हकं ई पीपड़कं गाछ !? हम ट्रेन सँ अपन बैग लऽ कंऽ नीचा उतरि जाईत छी ।

रस्ता कंात मे गुम-सुम ठाढ़ हम आखयास कंऽ रहल छी समय कंतेकं जल्दी बदलि जाईत छैकं मोईनकं कंात मे पीपड़कं गाछ तर बदरिया के चाहकं दोकंाऩ़ओकंर दस पैसी नागीन बिस्वुᆬट कंी सुअदगर ! साँझ-भिनसर भरि गामकं लोकं जुटै एहि दोकंान पऱ़ग़ाम-घर, देश-दुनियाँ, खेती-पथारी सभ टा गप्प होई एहि ठाम । हमरो कंक्कंा घर मे कंतबो चाह पीने होऊ जाबत भोर-साँझ एतुक्कंा चाह नहिं पिबैत छल ताबे चैने नहिं क़ंाकंी भने कंतबो अपन कंपाड़ नोचौ । हमरा मोने आछ जे एकं बेर धानकं सीस लोढ़ि कंऽ ओहि पाई सँ चाह पिबैत रही कंी कंतऽ ने कंतऽ सँ कंक्कंा आबि गेल रहै आ बिना किंछु पुछने तेहन घरमेच्चा मारने रहै जे गाल पर लिला-मशा पड़ि गेल रहै । गिलास तऽ दुर पेᆬकंा कंऽ चूड़-चूड़ भऽ गेल रहै । लोकं सभ कंते दुर्‌ छीः केने रहै कंक्कंा के । ई मोईनो कंतेकं चौड़गर रहै ताहि दिन । कंी मजा अबै पीपड़कं पुᆬनगी पर चढ़ि कंऽ पानि मे वुᆬदई मे । कंते-कंते कंाल हम डुब्बी मारने रहि जाई पानि मे एके सुरूकिंया मे आधा मोईन के पार कंऽ जाई । देखनाहर अचम्भित रहि जाई । मोईनकं ओहि कंछाड़ पर कंतेकं रास जामुनकं गाछ रहै़ख़ाईत-खाईत अघा जाई केयो रोकं-टोकं केनहार नहिं । खायल भऽ जाय तऽ जामुनकं डारि तोड़ि दातमनि कंरब़़ सभ चेन्ह मेटल । कंतेकं मजा अबैत छलै ! एखनो मोने आछ मोकंना जे महेशकं बाड़ि सँ केरा घौड़ चोरा कंऽ कंाटि अनने रहै आ सभ मिलि कंऽ नहरिकं कंछेड़ मे खाधि खुनि कंऽ ओकंरा गाड़ने रही । झलफल अन्हार होईते सभ ओहि ठाम जमा होई आ भरि ईच्छा केरा खाई ।

हम बान्ह दिस नजरि दौड़बैत छी । साँझकं मैलछौंह अऩहार पसरल जा रहल आछ । चरबाहा, घासबाली, गोबर-गोईठा बिछयबाली सभ अपन-अपन घर आपस भऽ रहल आछ । रस्ता कंात मे ठाढ़ हम बितल समय के अपन मुट्‌ठी मे बंद कंरबाकं अंतहीन प््रायास कंऽ रहल छी । बगल सँ एनहार - गेनहार किंछु अचम्भित सन हमर मुँह देखि आगू बढ़ि जाईत आछ ।

- 'बड़ी कंाल सँ आहाँ के एतऽ ठाढ़ देखि रहल छी। कंतऽ जेबई अपने? '

- ' एहि गाम मे कंतऽ जेबई से तऽ हमरा अपनो नहिं बुझल आछ । बस एतबे टा मोन आछ जे साईत हम कंहियो एहि गामकं वासी रही । बाबूकं नाम तऽ नहिं मोन आछ कंारण हम हुनकंर मुँहों नहिं देखने छलहुँ । हँ हमर कंक्कंा के नाम बुधन छल । '

- 'कंोन बुधन? '

- 'बुधन मंडल । '

- 'तोहर नाम मदना तऽ ने छह ? ' - 'हँ हमर नाम मदन आछ । '

सुनिते ओ आदमी हमरा भरि पाँज कंऽ पकंड़ि लेलकं - ' मदना रौ ! कंतऽ छलैहैं एतेकं बरख धरि ? हमरा सभ के तऽ भेल जे कंतौ मरि-खपि गेलैं । हमरा नहिं चिन्हलैं?हम जीबछा !तोहर लंगोटिया यार !! ' पेᆬर हमरा माथ सँ पैर तकं निघारैत बाजल- 'तों तऽ साहेब भऽ गेलैं हमरा आऊर तऽ गाम मे ओहिना के ओहिना---दुनियाँ-जहानकं फिरेसानी !!! खैर छोड़ ई बात सभ । ई कंह जे एतेकं दिन कंहाँ पतनुकंान लेने छलैहैं ? बुडिबकं कंहाँ के ! अहुना केयो गाम बिसरैत आछ ? ' पेᆬर ओहि ठाम एकंत्र लोकं सभ के हमर परिचय दैत कंहलकै - ' कंक्कंा एकंरा नहिं चिन्हलियै ! ई अपन मदना छी ! अरे ! दछिनबाड़ि टोल मे जे बुधन मंडल छल ओकंरे भातिज हम सभ तऽ संगे उठी -बैसी , खाई-खेलाई़़ । ' लोकंकं आन्भग्यता देखैत बाजल - 'अरे ! तों सभ कंी जानऽ गेलही एकंरा बुधन मंडल के मरलो तऽ जमना बीति गेलै़आ ईहो मदना तऽ गोड़ चालीस बरखकं बाद गाम आयल हैत । ' ओ हमरा जनाबऽ लागल- 'तोहर कंक्कंा-कंाकंी दुनू आन्हर भऽ कंऽ मुईलउ अंतकंाल मे केयो एकं घोंट पानि तकं ने देबऽ बला़। संतान तऽ भगवान देबे नहिं केलखिन । डीह पर ओहिना जंगल-झाड़ जनमल़़निपुत्रकं डीह पर केयो किंयैकं जायत ?'

लाठी टेकंने एकंटा वृद्ध भीड़ के चीड़ कंऽ बीच मे आयल । 'कंक्कंा एकंरा नहिं चिन्हलियै ?ई बुधन मंडलकं भातीज मदना थीकं जे अहींकं मारिकं डरे महींस छोड़ि कंऽ जे पड़ायल से आई एते बरिख के बाद उपर भेलै । ' जीबछा कंहने रहै ।

'अच्छा ई मदना छी ! एकंदमे बदलि गेल ! कंतऽ छलह हौ एतेकं दिन? कंोना मोन पड़लह गाम -घर एतेकं युगकं बाद? ' हम गुम्मे रहलहुँ ।

'कंक्कंा ई मदना नान्हि टा गलती केलकं जे एकंर महींस आहाँकं खेत चरि गेल ताहि लेल एकंरा चालीस बरखकं वनबास भोगय पड़लैकं आ ई नक्सलबादी अताई सभ जे एहन - एहन पैघ जुलुम कंरैत आछ तकंरा देखऽ बला केयो नहिं ! सत्ये अन्हेर भऽ रहल आछ एहि कंलयुग मे । ' कंहि कंऽ ओ आकंाश दिस तकंलकं । पेᆬर हमर बाँहि पकंड़ि कंऽ कंहलकं - 'चल यार घर पर बैसि कंऽ दुनू दोस्त भरि मन बतियायब । ' लोकंकं हुजूम हमरा पाछाँ-पाछाँ चलि रहल छल । सीमान भीड़ सेहो अपना सभ दिसक पैसेंजर ट्रेन मे नहिं हुअय से अन्सोहांत सन लागत. आईयो ट्रेन मे कसम-कस्सा भीड़ छलई....मोटरा मोटरी से अलगे. जे कहुना भीतर ट्रेनक डिब्बा मे पैसबा मे सफल भ' गेल छल ओ एहि मनसा मे जेना पूरा ट्रेन ओकरे साम्राज्य हुअय आ आन केयो भीतर नहिं पैस' पाबय. आ जे बाहर से भीतर कहुना पैसबा लेल रडधुम्मस केने. मुदा ट्रेन के एहि सभ सौं कोन दरकार.....ओ त' नियत स्टेशन सभ पर रूकैत सीटी बजबैत सरपट भागल जा रहल छल. भीतर खिड़की लग बैसल एकटा तीस- पैंतीस सालक युवक बाहरक एक एक टा दृश्य देखि-देखि क' विभोर भ' रहल छल. एक एक टा दृश्य जेना ओकर आह्लाद के पाँखि लगा देने हो. बाबू ओम्हर देखियौ ओ गाछ-बृक्ष कोना सरपट पडायल जा रहल छै......हे ओम्हर देखियौ भैंस पर ओ छौंड़ा कोना निचैन सुतल छै आ भैंस चरि रहल छै ……......हे ओम्हर देखियौ ओई कात मे आसमान टुटि क' कोना धरती पर खसल छै . हे ओम्हर देखियौ .... घसबाहिन सभ माथ पर छिट्टा लेने कोना एक पतियानी सँ ठाढ़ छै.... ओम्हर देखियौ खेत मे फसिल कोना ओंघरा रहल छई. ….!!! ओकर कात मे बैसल ओकर पिता ओकर सभ बात पर मुस्किया क' देखथि आ ओकर पीठ थप-थपा क' ओकर उत्साहवर्धन करथि. ट्रेन मे बैसल किवां ठाढ़ो लोक ओकरा देखि-देखि मुस्किया रहल छल. भीडक धक्का-मुक्की कम भ' गेल छलै . मुदा सामने के सीट पर बैसल मिसरजी के असहाज भेल जा रहल छलनि. बड़ी काल धरी ओ अपन पोथी मे अपन खीझ नुकबैत रहलाह. जखन ओही युवक के कुतूहल आर बढ़ले जा रहल छलई त' हुनका अपन मोनक भड़ास रोकब कठिन भ' गेलनि - 'आहां हिनकर ईलाज कोनो नीक डाक्टर स' कियैक ने करबैत छियनि ? समुचित ईलाज भेला स' ई अवश्ये निके भ' जेता.' ' हम हिनकर ईलाजे करा क' दिल्ली स' घर घुमल छी.' 'तईयो......!!?' 'दरअसल हिनका नव आंखि जे भेटलनि हैं तैं देखि-देखि क' विभोर भ' रहल छथि.' मिसरजी के हलक सुख' लगलनि. जल्दी-जल्दी सेप घोंट' लगला. मुंह स' एको शब्द नहिं बहरेलनि. अपराध-बोध स' मुंह नुकबैत फेर स' पोथी के पन्ना पलट' लगला. उज़डल खोंता गोनमा कोना विसरत ओ दिऩ़ कोना विसरत असक्क, अवाह बापक बेवस , मौलायल चेहरा ; मायक भरि दिनक कुटाऊन-पिसाऊन कऽ कऽ आनल किछु मुट्‌ठी चाऊर किवा आटा जाहि सँ पूरा परिवारक पेट भरवाक असफल प्रयास ; छोट गदेल भाय-बहीनक भूखल, कृशकाय, अर्धनग्न शरीऱ़। कोना विसरत ओ दिल्ली एबा काल मायक कनैत-कनैत क़ंडजोनी सन भेल आँखि सँ बहैत नोर के नुआँक खूंट सँ बेर-बेर पोछब, बापक बेचारगी भरल सुन्न चेहरा, भाय-बहिनक वुᆬतूहल़़। ओकरा सभ पर विपत्तीक पहाड़ तऽ ओहि दिन टुटि पड़लै जहिया नवका जोड़ल देवाल लऽ दऽ कऽ ओकर बापक देह पर खसि पड़लै । जान तऽ कहुना बाँचि गेलैक ; मुदा दुनू पैर बेकाम भऽ गेलैक । आब ओ भरि दिन ओसारा पर पड़ल टुकुर-टुकुर तकैत रहैत छै़क़ कैयो कि सकैत छै । माईयो कि करतै ? भरि दिन लोकक अंगने-अंगने कुटाऊन- पिसाऊन करैत छै ; तखन जा कऽ केयो आध सेर - एक सेर अनाज दैत छैक । ओकरे कुड़ी जकाँ बाँटि दैत छैक सभ प्राणीक बीच मे़क़ंहुना प्राण रक्षा तऽ करहि पड़तै । कहल जाईत छैक जेठ संतान समय आ परिस्थिति के कारण समय सँ पहिनहि वयस्कं भऽ जायल करैत छैक । से गोनमो पर चरितार्थ भेलै । एक दिन ओ माय लग सहटि कऽ बैसि कऽ डराईत-डराईत कहलकै - ' माय गे, एगो बात कहियौ?' 'की ?' माय हाथ पर मड़ुआक रोटी ठोकैत पुछलकै । ' अपना गामक भोलवा, बदरिया, विलसा सभ दिल्ली जाई हई़क़ंमाई लै । हमरो मोन होईहै हमहुँ जयतौं । ओ सभ कहलक जे काज तुरते भेट जेतै। दू पाई कमईतौं तऽ घरक हालतो सुधरितै ।' - कहि कऽ गोनमा उत्तरक प्रतिक्षा मे मायक मुँह निहारऽ लगलै। मायक हाथक रोटी हाथे मे रहि गेलै । अकचकाईत ओ कहलकै -'तों एखन कोन जोकरक भेलैं जे कमाई लेल जेबैं ? तोरा के नोकरी रखतौ एखन ?' 'हम ओकरा सभ सँ पहिने पुछि लेलियै । सभ कहलक जे नोकरी भेटई मे कोनो भाँगठ नहि छै । शुरू मे काज सिखबाक समय मे कम पाई दैत छैक । बाद मे काज सिख जाऊ तऽ मोट दरमाहा भेटैत छैक । तों बस कतहु सँ हमरा किराया लेल चारि सय रूपैया जोगाड़ कऽ दे।' कोन माय चाहतै जे ओकर संतान ओकरा सँ दूर जाय ; ताहु मे खेलै-खाई के उम्र मे। मुदा परिस्थितिक आगु मे गोनमा माय के झुकहि पड़लै। मलिकानि कतेक दँत-खिष्ठी केलाक बाद आना-दर सूदि पर साढ़े चारि सय रूपैया देने छलखिन ओकरा । चारि सय रूपैया तऽ किराये के भेलै । परदेश जाई छै; तऽ किछु रूपैया तऽ संगो मे रहक चाही बेर-मोसीबत लेल । दिल्ली मे गोनमा के एकटा ज़डी-युनिट मे काज भेटलै। पहिने तऽ ओकरा ज़डीक काज सीखऽ पड़तै । खेनाई-पीनाई आ उपर सँ डेढ़ सय रूपैया सप्ताह मे भेटतै । डेढ़ो सय सप्ताहिक कि कम छैक !छः सय रुपैया महिना के भेलै । आँगुर पर हिसाब लगेलक गोनमा । एके महिना मे मलिकानि के सूदि सहित पाई आपस कऽ देतै । तकरा बाद माय के अँगने-अँगने काज केनाई ओ छोड़ा देत । जखन महिने -महिने माय के मनिआर्डर भेटतै ; तऽ कतेक खुश हेतै माय-बाबू ! जखन काज सीख जेतै आ बेसी पाई भेटऽ लगतै तऽ ओ अपना लेल एकटा जिंस-पैंट आ जूता कीनत । बड़ सौख छई एकर । माय के लेल साड़ी-साया-ब्लाउज, बाबू लेल धोआ धोती आ वुᆬर्ता आओर सभ भाय-बहिन के लेल रंग-विरंगक कपड़ा़। भाय-बहिन सभ के ओ स्वूᆬल मे नाम लिखबा देत । अपने नहि पढ़लक ताहि सँ कीभाय-बहिन पढ़ि-लिखि कऽ बड़का बनै से सपना छै ओकर । भविष्यक रंगीन सपना बुनैत गोनमा खूब मोन सँ काज सिखऽ लागल । ओस्ताद सेहो बड़ मानैत छै छौंड़ा वे ᆬ। की चिक्कंन कसीदा काढ़ैत छै़ज़ेना पहिनहि सँ सिखने हो । ओहि दिन ओस्ताद खुश भऽ कऽ चाय मँगेलाक बाद बँाचल खुदरा पाई ओकरे लग छोड़ि देने छलै। पेᆬर ओकर माथ हँसोथि कऽ कहने छलई ओ- 'ई एक दिन हमरो ओस्ताद निकलत । ' मालिको बड़ मनैत छई छौंड़ा के । ओहि दिन गोनमा किछु बुझि पबितै ओहि सँ पहिनहि ओकर खोंता उजड़ि गेलै। अवाक भऽ ओ देखैत रहि गेल छल ओकर देवता समान मालिक के पुलिस हथक़ंडी लगौने नेने जा रहल छलै। पेᆬर गोनमा सहित सभ काज सिखनाहर सभ बच्चा के दोसर जीप मे बैसा देल गेलै। लोकक गप्प सँ गोनमा के बुझना गेलै जे बाल-मजदूरी करेबा के जुर्म मे मालिक के पुलिस पकड़ि लेलकै । आब गोनमा सहित सभ बच्चा के आपस अपन-अपन गाम पठा देल जेतै जतऽ ओकरा सभ के स्कूल मे नाम लिखा कऽ पढ़ाई के व्यवस्था कैल जेतै । बदहवाश भऽ गेल छल गोनमा । ओकर सपनाक शिशा चूर-चूर भऽ कऽ ओकरा आगू मे पसरि गेल छलै। ओहि फुटल शिशा मे ओकरा नजरि आबि रहल छलै़मायक चिप्पी लागल धिंगी-धिंगी भेल नुआँ सँ लाज झँपबाक असफल कोशिश बाबूक निरीह, बेवस, मौलायल चेहरा़भूख सँ बिलबिलाईत छोट भाई-बहिऩ़सुदि पर उठाओल रूपैया़। कोन मुक्ति भेटलै ओकरा से नहि बुझि पौलक गोनमा । मरिचिका 'हे हर, हमरहु करहु प्रतिपाल ' - भवानीबाबूक मुँह सँ निकलल एहि गीतक भावार्थ मुहल्ला के अबाल-वृद्ध प्रायः सभ के बुझल छलैक । एते तक किं नेनो-भुटको सभ बुझि जाईत छल जे भवानीबाबू आब भोजनक प्रतिक्षा कय रहलाह आछ । भवानीबाबू -- जिला परिषदक सेवा-निवृत बड़ा बाबू । सस्ती जमाना मे भवानीबाबू एक-एक टा रुपैया जमा कऽ कऽ शहर मे जमीन खरीद लेलनि। मुदा घर टा बनि सकलनि सेवा-निवृति के बादे । सेवा-निवृति पर भेटल सभ पाई के लगा कऽ बनलनि चारि कोठली के पक्कंा-पुख्ता मकान । जहिया मकान बनि कऽ पूरा तैयार भऽ गेलनि तहिया भवानीबाबू बाहर ठाढ़ भऽ कऽ बड़ी काल तक जोहैत रहलाह ओहि मकान के । जतबा खुशी शाहजहाँ के ताजमहल बनबा कऽ नहि भेल हेतैक; ओहि सँ कैक गुण आत्मिक खुशी भवानीबाबू के भेट रहल छलनि 'अपन' मकान के देखि कऽ । हाथक सभ पाई खतम भऽ जेबाक सेहो आई कोनो दुख नहिं बुझा रहल छलनि हुनका । दुख भेलनि तऽ बस एतबे जे कनियाँ एहि मकान के देखबा लेल नहिं रहि सकलखिन । चारु कोठली दुनू बेटा मे आपस मे बँटा गेल - दू टा कोठली दुनू बेटा-पुतोहू के आ दू टा पोता-पोती के लेल । पूजा , स्टोर, पाहुन-परख एहि सभ लेल घरक कमी रहिये गेल । आब भवानीबाबू कतऽ जाथु ? अंत मे दुनू बेटा-पुतोहू सर्व-सम्मति सँ निर्णय कऽ कऽ हुनका आश्रय देलकनि बालकनीक एकटा कोन मे । कनियाँ तऽ पहिनहिं स्वर्गवासी भऽ चुकल रहथिन । भवानीबाबू अपने बनाओल घर मे आन बनि बालकनी के एक कोन मे टुटलहवा चौकी पर समय काटऽ लगलाह । हद तऽ तखन भऽ गेल जखन एक दिन भवानीबाबू के पेट सेहो बँटा गेलनि एक महिना जेठका बेटाक घर सँ तऽ दोसर महिना छोटका बेटा घर सँ । आई भवानीबाबू बड़ी काल धरि नहा-धो कऽ बैसल गीत गबैत रहि गेलाह ---बीच-बीच मे नजरि याचक-भाव सँ दुनू भाईक भनसा घर दिस सेहो बेरा-बारी सँ जाईत रहल । गीत अंतरा धरि पहुँचि गेल । स्वर मद्धिम पड़ऽ लागल----उदास----थाकल---हारल---हे हर, हमरहु करहु प्रतिपाल़़। परजा बड़का भैयाक दलान ; दलान नहिं गामक चौक बुझू़देश-दुनियाँ, खेत-पथार, नीति-राजनीति सभ पर गर्मागरम बहस एतऽ सुनबा लेल भेटत । चुनावक समय मे कोनो आन टॉपिक पर बहस हुअय ; से कने अनसोहाँत होयत । सभ जुटल लोक चुनावक एक-एक मुद्दा पर तेना बिक्षा-बिक्षा कऽ खोईंछा छोरा रहल छलाह जे कोनो सेफोलोजिस्ट टी०वी० पर की करताह । बौवूबाबूक कहब रहनि जे एहि बेर सत्ता परिवर्तन हेबे टा करत़़सभ सत्तारूढ सरकार सँ नाखुश आछ । तकर औल ओ सभ एहि बेर चुकेबे करतनि । एहि पर नन्हवू बमकैत बाजल -- 'कक्कंा आहाँ कतऽ छी !लोकक आँखि नहि बट्‌टम छियै जे चहुँकात होईत विकास के नहि देखतै ।अपने गाम मे देखियौ ने जे कतेक के सरकार पक्कंा मकान बना देलकै़क़ंतेक कऽल गड़ा गेलै़ग़ामक लेल रोडो तऽ सैंक्शन भईये गेल आछ । बौवूबाबू प्रतिवाद केलनि--'कोन घर आ कऽलक बात करैत छह? जा कऽ ओकरा सभ सँ पुछहक गऽ ने जे कतेक जोड़ी पनही खीया कऽ आ कतेक घूस दऽ कऽ घर आ कऽल भेलैयै ?' पेर बजलाह--' हौ ई सरकार पाँच साल तक जनता के मुर्ख बना कऽ अपन धोधि बढ़बैत रहल । भल होअय लोक तऽ ई चोरबा सभ के जमानत जब्त करा दिअय एहि बेर । ' ई वाद-प्रतिवाद चलिये रहल छल किं मखना बिचहिं मे बाजल --'यौ मालिक ! आहाँ आउर कथि लै बेकारे मे बतकटाझु करैत जाईत छी । हमर मुर्खाहा बुद्धि तऽ एतबे बुझैत आछ जे केयो जीतऽ; केयो हारऽहम सभ तऽ परजा छी, परजे रहब । ' दलान पर कनी काल लै चुप्पी पसरि गेल छलै। बदलैत समय आई सँ दस वर्ष पहिने जखन ऑफीस सँ घर घुमैत छलहुँ तऽ हमर नवका वुक्वुर भुकिं कऽ आ नवकी कनियाँ गऽर लागि कऽ हमर स्वागत करैत छलीह । आब काल करोट पेरि चुकल आछ हमर पोसुआ वुक्वुर आ कनियाँ दुनु अपन आदति अदला-बदली कऽ लेलनि । आब घर आबते हमर कनियाँ हमरा पर भुकिं कऽ आ हमर पोसुआ वुक्वुर हमर गऽर लागि कऽ हमर स्वागत करैत आछ । समय एहिना बदलैत छै । जरल पेट जेठक प्रचंड दुपहरियाक मे जखन छाँहों छाँह तकैत छैक घाम सँ लथपथ चिप्पी लागल मैल पढ़िया नुआँ, जे ओकर लाज के झँपबा मे मुश्किंल सँ समर्थ भऽ रहल छलैक, पहिरने एकटा स्त्री कोर मे एकटा दू-तीन बरखक नेना के लऽ कऽ हमरा सोझाँ ठाढ़ भऽ जाईत आछ । किंताब पर सँ हमर नजरि ओकरा दिस जाईत आछ । ओ स्त्री हमरा सँ याचना करैत आछ किंछु खेबा लेल देबाक। कहैत आछ जे काल्हि रातिये सँ ओकरा दुनू माय-बेटा के मुँह मे अन्नक एकोटा दाना नहिं गेलैक आछ । हमरा दया आबि जाईत आछ ओकरा पर । आँगन जा कऽ माय के कहैत छियैक । माय भनसा घर मे जा कऽ देखैत आछ - 'पोछि-पाछि कऽ दू मुट्‌ठी भात भेलै कनेके दालि बाँचल छई तरकारी तऽ बचबे ने केलै । कतऽ छई ओ ? कही बारी सँ केराक दू टुक पात काटि अनतै । अपना बासन मे तऽ नहिं देबई खाय लेल । ' ओ स्त्री केराक पात लऽ कऽ दुरूक्खा मे छाँह मे बैस गेल । माय भात आ दालि ओकरा आगू मे परसि देलकै । हमर आग्रह पर कनेक आमक वुच्चो दऽ देने छलै । ओ स्त्री अपन नेना के अपना हाथ सँ खुआईये रहल छलै तैयो ओ अनभरोस नेना अपने दुनू हाथ लगा कऽ भकोसऽ लागल रहै । तखने ओ स्त्री अपन बामा हाथ सँ नेना के दुनू हाथ पकड़ि कऽ कात कऽ देलकै आ अपने पैघ-पैघ कौर गीड़य लगलै । नेना भुईंयाँ मे ओंघरिया मरैत रहलै । जीतक आगू छहरि मे कनेक तऽ कटारि भेलै किं देखिते - देखिते सौंसे गाम दहा गेलै छती सँ उपर पानि ठेकिं गेलै आर बढ़िते जा रहल छलै। लोक वस्तु-जात जे समेटि सकल से समेटलक नहिं तऽ जान बचा कऽ पड़ायल । दस-पाँच टा लोक जकरा कोठा छलै से तऽ छत पर जा कऽ प्राण बचेलक । भुखना के पड़ेबाक कोनो रस्ता नहिं सुझलै तऽ अपन भीत घरक चार पर चढ़ि गेल । पानिक ओहि मारूक लहरि मे भीतक घर कतेक काल ठठितै अड़्‌ड़ा कऽ खसि पड़लै । चार पर बैसल भुखना आब पानिक हिलकोर मे ऊब-डुब करैत भसियायल जा रहल छल । हाकरोस कऽ कऽ लोक सभ सँ नेहोरा व्कंरैत रहलै बचेबा लेल । सब के तऽ अपन जान के पड़ल छलै़ ओकरा के बचाबओ । जीवन-मरन के बीच झुलैत भुखना चार के कसिया कऽ पक़ंडने भासल जा रहल छल । ओ जीवन हारिये देने छल किं चार एकटा पैघ नीमक गाछ सँ टकरा कऽ कनेक काल लेल विलमलै़ओ पूर्ति सँ भरि पाँज गाछ कसिया कऽ गाछ के पकड़ि लेलक । चार पेर सँ ओहिना भसियाईत चलि जाईत रहलई । ओ अपना शरीर मे बल अनलक आ पीछड़ैत-चढ़ैत गाछ पर चढ़िये गेल । गाछक एक पेड़ पर पैर राखि कऽ दोसर सँ अड़किं कऽ उसास छोड़लक लगलै जेना पुनर्जन्म भेल होई ओकर । गाछ पर ठाढ़ ओ बाढ़िक लीला देखैत रहल । ओहिना ठाढ़े-ठाढ़ कखन ओकर आँखि लागि गेलै से अपनो नहिं बुझलक ओ । भोर मे जखन सुरूजक लाली छीटकलै आ फरीछ भेलै तऽ ओकर आँखि खुजलै । चारू कात तकलक ओ सगरो पानिये-पानि़क़ंतहु-कतहु दूर -दूर मे कोनो टा गाछ किंवा कोनो कोठाक घरक आधा भाग टा मात्र देखवा मे एलै । अँगैठी-मोर करैत ओ अपन माथक उपर तकलक । तकिंते घिघियाय लागला साक्षात यमराज के अपना माथक उपर देखलक ओ एकटा कारी-भुजुंग सुच्चा गहुमन सँाप उपरका डारि मे लपटायल । एक बेर मृत्यु के मुँह मे जेबा सँ बाँचल तऽ दोसर मृत्यु लग मे ठाढ़ । गहुमन के डँसल तऽ पानियो नहिं मँगैत छै़ओकरा आँखिक आगू अन्हार होमय लगलै़आब ओकर प्राण जेबा मे कोनो टा भाँगठ नहिं । आँखि मुनि लेलक ओ आ आसन्न मृत्यु के प्रतिक्षा करय लागल । किं एक बेर पेर कतहु सँ हिम्मत जगलै ओकरा मे़ऩहुँये-नहुँये ओ दोसर डरि पर आबि गेल़़ गाछक एकटा डारि तोरलक आ समधानि कऽ गहुमन के माथ पर दऽ मारलक । निशान सटीक रहलै़सँाप अचेत भऽ कऽ पानि मे खसि पड़लै आ धारक सँग बहि गेलै । भुखना विजयी भाव से चारू कात तकलक । ओकर वीरता देखय वला ओतय के छलै ? माता कुमाता न भवति कक्काक तऽ एको मिसिया मोन नहिं रहनि जे स्वयं पटना जा कऽ बेटाक हाल-चाल पता करी । 'ई तऽ संताने के चाही जे वृद्ध माता-पिताक खोज-खबरि लेमय । जखन बेटा लेल हमरा सभक मरब-जियब धन्न सन तखन हमरे कोन पड़ल जे बउआई लै जाऊ ।' मुदा कक्काक एको टा तर्क काकीक जिद्द के नहिं झुका सकलनि। ओ काकी के कतबो बुझेबाक चेष्टा केलनि ; ओ घटनो मोन पाड़ि देलखिन जखन काकी बड़जोर दुखित रहथि आ बँचबाक उम्मीद कम्मे रहनि । तखन एके टा हकबाहि लागल रहनि जे बेटा के मुँह देखा दिय । तखनो बेटा नहिं आयल रहनि, छुट्‌टी नहिं भेटबाक लाथ कऽ कऽ । केयो पुछलकै तऽ खौंझा कऽ कहने रहय - ' हम कोनो डॉक्टर तऽ छी नहि जे देखि कऽ ईलाज करबैक । रुपैया पठाईये देलियै ईलाजक हेतु। आब हम किं करियौक?' कक्का के तऽ लागल रहनि जे आर अपनो दिस सँ रुपैया मिला कऽ बेटा के पठा देथि । मुदा फेर काकीक आँखिक भरल नोर हुनका विवश कऽ देने रहनि माहुर पीबि कऽ रहि जेबाक लेल । काकीक नेहोरा -पर-नेहोरा आ फेर सँ वैह नोर हुनका विवश कऽ देलकनि बेटाक हाल-चाल जानऽ पटना जेबाक लेल । कक्का जखन बेटाक सरकारी कोठी पर पहुँचल छलाह ओहि क्षण बेटा शहर सँ बाहर रहथिऩ़कोनो सरकारी काज सँ । नहियो चाहैत कक्का कें रुकऽ पड़ि गेलनि ओतऽ बिना बेटा कें भेंट केने, हाल-चाल पुछने कोना फीरि आबतथि ? नोकर जलखई-खेनाई पहुँचा जाईन । आर ककरो कोनो मतलब नहि़ पुतोहू, पोता, पोतीक लेल जेना कोनो अनचिन्हार व्यत्ति होथि अवांछित़़। आर-त-आर छोटका पोता आबि कऽ जखन पुछलकनि, 'आप पापा से कभी मिले नहीं हैं क्या जो उनके लिये रुके हैं?' तऽ कक्का माहुर पीबि कऽ रहि गेल छलाह । जाबत किंछु कहितथिन ओकरा , ताबत छौंड़ा दौड़ैत-दौड़ैत पड़ा गेल छल। जखन बेटा लौटलनि तखन कक्का बाहरे लॉन मे बैसल रहथि । कार सँ उतरिते लॉनक कोन मे कुर्सी पर बैसल कक्का पर नजरि पड़लै । अकचकायल ओ । पेᆬर कक्का दिस डेग बढ़बैत पुछलकनि, 'कखन एलहुँ ?' सहसा किंछु सोचि कऽ थमकिं गेल । क्षण भरि ओहिना ठाढ़ रहल । पेᆬर संगे आयल व्यत्ति दिस देखि कऽ बाजल, 'सरवेंट़़ फ्रॉम माई नेटिव प्लेस '। कक्काक मोनक सुप्त ज्वालामुखी के जेना केयो उकाठी नेना आगि लेस देने होई तहिना एकाएक फाटि गेलनि । एक्के डेग मे फानि कऽ दुनू के बीच मे पहुँचि गेलाह आ ओहि व्यत्तिᆬ सँ मुखातिभ होईत बजलाह, ' मैं इसका नौकर तो नहीं, पर इसके माँ का नौकर जरूर हूं ? ' बमकल कक्का धपड़ैत घरक बाट धऽ लेने छलाह । आई ओ अंतिम फैसला कऽ लेलनि़ऩोर आ आत्म-सम्मान मे ओ ककरा चुनताह । ईमानदार ओ मंत्रालय मे संयुत्तᆬ सचिव आछ । जतबे ओ कंर्तव्यनिष्ठ, स्वप्नदर्शी, अनुशासनप््रिाय आ सहयोगी मानल जाईछ ओहि सँ एकंो मिसिया कंम ईमानदार नहिं। सिविल सोसाईटी मे ओकंर गुणकं दोहाई देल जाईत छैकं ़़़़ पोलिटीकंल सर्किल मे ओकंर कंार्यक्षमताकं चर्चा भेल कंरैछ । अपन मंत्री के तऽ ओ मुँहलगुआ बनि गेल आछ़़़क़ंोनो कंटिन सँ कंठिन कंाज हो ओकंरा लेल सामान्य़़़़क़ेहनो जटिल समस्या हा े; ओ ओकंरा लग ओकंर समाधान चुटकंी मे तैयार ़़़क़ंोनो बातकं नकंारात्मकं जवाब तऽ ओकंरा लग छलहिये नहिं । कंाज मे तऽ आगया-बेताल आछ ओ़़़़ऑफीस मे कंाज़़़़घर पऱ़़़हरदम कंाजे-कंाज । मंत्री लग बात उठलै जे विभाग द्वारा नियंत्रित केंद्रीय योजना अपेक्षित परिणाम देबा मे समर्थ किंयैकं नहिं भऽ रहल छै ? समस्या समाधान हेतु स्वभाविके सचिव आ मंत्री के ध्यान ओकंरे दिस गेलैकं । ओकंरा भार देल गेलैकं - ' समस्या के अध्ययन कंऽ कंऽ एकं महिना मे योजना के दुरूस्त कंरकं उपाय सुझाऊ ।' ओ अपन मिशन पर लागि गेल़़़़रिपोर्ट बनेलकं, प््रोजेंटेशन केलकं । सार तत्व ई जे योजना के ठीकं सँ लागू नहिं हेबाकं कंारण छैकं ब्लॉकं आ जिला स्तरकं आधकंारी-कंर्मचारी के योजना के बारे मे अल्प किंवा अग़्यानता । ओकंर सुझाव छलैकं जे जौं जमीनी-स्तरकं कंार्मिकं सभकं क्षमता-निर्माण कंयल जाय तऽ एहि योजनाकं कंी ; सभ केंद्रीय आ राज्य योजना के सफलता सुनिश्िचत बुझु । सुझाव नीकं छलैकं़़़़मंत्रीजी तऽ एतेकं भावविह्वल भऽ गेलाह जे ओकंर पीठ ठोकिं कंऽ शावासी देलखिन । तत्कंाल आदेश भेलैकं जे ओ अपन कंार्य-योजना पर आगू बढ़य । एहि हेतु साधनकं कंोनो कंमी नहिं होमय देबाकं आश्वासन मंत्रीजी देलखिन । ओ आगू बढ़ल । सभ सँ पहिने अपन प््रिाय आधकंारी आ कंर्मचारीकं एकंटा टीम बनेलकं । तकंरा बाद एकंटा गाईड-लाईन मंत्रीजी सँ अनुमोदित कंरेलकं जाहि मे पाँच लाख तकं के राशि स्वीकृत कंरबाकं आधकंर संयुत्तᆬ-सचिव स्तर के आधकंारी के छलैकं । पेᆬर ओ देशकं चारू क्षेत्र मे चारि टा संसाधन-केन्द्र बनेलकं जाहि मे ओकंर परिचित यूनिवर्सिटी-प््राोपेᆬसर, रिसर्चर आदि सभ शामिल कंयल गेलैकं । संसाधन-केन्द्र सरकंार सँ प््रााप्त अनुदानकं दस प््रातिशत अपन स्थापना पर खर्च कंऽ सकैत छल जाहि मे वेतन, यातायात, कंम्प्यूटर सहित अन्य खर्च शामिल छलैकं । प््राति क्षेत्रिय सेमीनार तीन लाख रूपया आ राष्ट्रीय हेतु सामान्य खर्च सीमा पाँच लाख छलैकं जे परिस्थितिवश बढ़ाओल सेहो जा सकैत छलैकं । एहि सभ लेल संसाधन-केन्द्र सभ के सालकं शुरूहे मे दू-दू कंरोड़ रूपया बाँटि देल गेलैकं । ई रूपया खर्च भेला पर ओ सभ उपयोगिता-प््रामाणपत्र दऽ कंऽ आओर रूपया माँगि सकैत छल । ओकंर सर-वुᆬटुम्बकं आनो आन लोकं सभ जोगाड़ लगा कंऽ संसाधन-केन्द्र मे अपन नोकंरी पक्कंा केलकं । अपन लोकं के कृतग़्य कंरबाकं यैह तऽ मौकंा छलैकं ओकंरा । संसाधन-केन्द्र सभ के कंार्यशाला, सेमीनार, सम्मेलन आदि आयोजित कंऽ कंऽ ब्लॉकं, जिला, राज्य स्तर के कंार्मिकं सभ के प््राशिक्षण आ जागरूकं कंरकं छलैकं । केन्द्र सभ के एहि तरहें अपन कंार्य-व्रᆬम कंरकं छलैकं जे सभ शनि आ रवि कंऽ कंतहु ने कंतहु कंार्यशाला वा सेमीनार वा सम्मेलन होईतैकं । एहि हेतु ओकंरा सभ के अपन वार्षिकं-कंार्यव्रᆬम पहिनहिं अनुमोदित कंरेबाकं व्यवस्था छलैकं । संसाधन-केन्द्र सभकं बीच मे नीकं ताल-मेल बनेबाकं लेल व्यवस्था छलैकं जे ओ व्याख्यान, प््रास्तुतिकंरण आदि हेतु दोसर संसाधन-केन्द्र सँ साधन-सेवी सभ के आमंत्रित कंरय । ओ (संयुत्तᆬ सचिव) तऽ अपने बड़ पैघ साधन-सेवी छल ़़़़ ओकंरा अतेकं योजना के बारे मे कंकंरा बुझल छलैकं । तैं ओ सभ कंार्यशाला, सेमीनार आदि मे आमंत्रित होईत आछ । नियमनुसार प््राति व्याख्यान ओकंरा दस हजार रूपया सेहो भेटैत छैकं । ओहदा अनुसार एबा-जेबा एवं रहबाकं व्यवस्था अलग सँ । गरीबी दूर कंरबाकं योजना पर विचार-विमर्श पाँच-सितारा होटल सभ मे होईत छैकं - एहि पर किंछु मीडीया मे चर्चो होईत रहलैकं । ओ संसाधन-केन्द्र के प््राधान सभ के एकंटा मिटींग बजेलकं आ सुझाव देलकै जे कंार्यशाला सभ मे स्थानीय पत्रकंार सभ के सेहो बजाओल जाय । आखिर एहि मे कंोन दिक्कंत- ओ सभ लंच कंरत आ एकं-एकं टा बैग लेत - सैह ने ? मुदा फायदा तऽ देखू - ओ सभ हमर कंार्यव्रᆬम के प््राशंसा कंरत आ नीकं मीडीया कंवरेज भेटत । आब सभ खुश आछ । मास्टर साहेब परोपट्‌टा भरि मे मास्टर साहेब के नाम सँ चिन्हल जायवला भगवानबाबू आब एहि दुनिया मे नहि रहलाह --ई समाचार सुनिते भरि गामक लोकक बीच मे हुनकर व्यत्तिᆬत्व आ कृतित्वक मादें क्रिया-प्रतिक्रिया होमय लागल । हुनकर अंतिम दर्शनक हेतु लोक सभ जुटऽ लागल । मास्टर साहेब नेनपन मे पढ़ेने तऽ हमरो छलाह़़ओ गामक स्कूल मे मास्टर आ हम गामक बच्चा़हुनका सँ नहि पढ़ितौं तऽ जयतौं कतऽ ? हमरो मोन कहलक जे गुरूदेवक अंतिम-दर्शन कऽ अपन श्रद्धांजलि दऽ आबी । अपन बाल सखा आलोक सँ पुछलियै- ' चलबैं ?' ओ छुटितहिं मुँह बीचकबैत बाजल- 'धुर्‌ ! की जाऊ देखय हुनका । तेना पढ़ेलनि जे कतहु गोड़ा नहि बैसल । ' ओकर स्वर मे विषाद तऽ स्पष्ट छलैक मुदा मुईनाहर के बारे मे एहन वत्तᆬव्य तऽ साईत नहिये हेबाक चाही । पढ़ाई तऽ मास्टर साहेब के ठिके शून्ये छलनि। क्लास मे आबते ककरो ठाढ़ करा कऽ कहैत छलखिन कोनो पाठ जोर सँ पढ़ऽ आ अपने टेबुल पर पैर पसारि लगैत छलाह फोंफ काटऽ । जहाँ केयो कनेको बाजल किं एक दिस सँ सभ के छौंकिंया दैत छलखिन । बच्चा सभ मास्टर साहेब के 'दुख-हरणी '(पाकल बाँसक छौंकी) नामे सँ थर-थर कँपैत छल। आलोक पर तऽ मास्टर साहेब के खास ध्यान रहैत छलैन । हुनकर घर आ स्कूल सटले छलै । जऽन-हरवाहक पनपीयाई स्कूले लऽ आबथि आ आलोक जा कऽ ओकरा सभ के पनपीयाई कराबय । एकदिन बहाना बनबैत कहबो केने रहनि जे हमर पढ़ाई छुटि जायत । मास्टर साहेब ओहो बहाना के विफल करैत कहने रहथिन - 'तों जो, ताबत हम पढ़ाई रोकने छी । ' ओकरा गेलाक बाद बाजल रहथि - 'कहुना कऽ बईलेलौं ओकरा । ओ क्लास मे रहैत तऽ ककरो पढ़ऽ नहि दैत ।' पनपीयाई पहुँचेबाक बाद व्रᆬमशहे आलोक मास्टर साहेबक कपड़ा खिचब सँ लऽ कऽ घरक अनयान्यो काज करऽ लागल । एक दिन मास्टर साहेब क्लास मे आबते आलोक के ठाढ़ होमय कहि कऽ ओकरा कहलखिन- 'अलोक ! काल्हि तोहर बाबू भेटल छलाह। कहैत छलाह जे आलोक हिन्दी मे बड़ कमजोर आछ से कने आहाँ ओकरा पर ध्यान दियौ़साँझ मे एक घंटा पढ़ा देल करियौ । ' पेᆬर आदेशक स्वर मे बजलाह -'तों काल्हि सँ पाँच बजे साँझ मे हमरा ओतऽ आबि जायल कर पढ़बा लेल ।' सभ विद्यार्थी आलोकक मुँह दिस ताकऽ लागल छल । जे मास्टर साहेब क्लास मे नहि पढ़बैत छथिन से आलोक के ट्यूशन पढेथिन ककरो विश्वासे नहि होई । स्कूलक छुट्‌टी होईते तमतमायल आलोक सीधा अपन बाबू सँ जा कऽ पुछलकै जे मास्टर साहेब के की कहि देलियैन । ओ तऽ पहिने चवुᆬएलाह पेᆬर याददाश्त पर जोर दैत बजलाह--' अच्छा, अच्छा । अरे हम किंयैक कहबनि ट्यूशन पढ़ेबाक हेत ु। काल्हि चौक पर अपने कहऽ लगलाह जे आहाँक बेटा हमर विषय मे बड़ कमजोर आछ । ओकरा किंयैक नहि पठा दैत छियै हमरा ओतऽ पढ़ऽ लेल़़हम किं कोनो पाई लेबै। ' से मास्टर साहेब आब नहि रहलाह। हुनकर अंगना मे लोकक भीड़ बढ़ले जा रहल छल । जनि-जाति ओघढ़िया दऽ रहल छल़़पुरूष-पात्र अंतिम-यात्राक तैयारी मे जुटल छल । मास्टर साहेबक नश्वर शरीर भने पंच-तत्व मे विलिन भऽ जाउन ; मुदा हुनकर व्यत्तिᆬत्व के लोक कोना विसरि सकत । कचोट 'डिवोर्स इज ग्रांटेड। नाऊ यू बोथ आर लीगली सेपरेटेड ऑफ इच अदर' - कंहि कंऽ जज अदालतकं कंार्यवाही समाप्त कंऽ कंऽ उठि गेल छलाह। ओकंरा चेहरा पर पैघ सन मुस्कंान पसरि गेल छलै़माथकं बोझ हल्लुकं होईत सन बुझेलै। ओ विजयी भाव सँ तकंलकं मीरा दिस । मीराकं कंातर नजरि सेहो एकं पल लेल ओकंरा दिस उठलै ; पेᆬर जल्दी सँ अदालत सँ बहरा गेलि मीरा । ओ ठाढ़े रहि गेल अदालत मे । सोचैत़आई स्थिति कंोना एकंाएकं बदलि गेलैकंअप्रात्याशित। मीराकं वकंील बहस मे कंतेकं जोर दऽ कंऽ कंहैत छलै जे विवाह भारतीय समाजकं एकं टा पवित्र बंधन छई आ एहि बंधन के कंोनो उद्वेग मे तोड़ल नहि जा सकैछ । ओकंरा मोन पड़लै जखन मीराकं वकंील ओकंरा पर आरोप लगबैत कंहने छलैकं - 'योर ऑनर ! वास्तविकंता तऽ ई आछ जे श्रीमान विकंास हमर मुवक्किंल मीरा सँ तलाकं लऽ कंऽ दोसर विवाह अपन प्रोमिकंा सँग कंरय चाहैत छथि, जे पहिने परिवार आ समाजकं दवाबकं कंारणें नहि कंऽ सकंल छलाह । हमर मुवक्किंल कें पहिने रस्ता सँ हटेबा हेतु ओ तरह-तरह के प्राताड़ना दैत रहलाह़मारि-पीट, गारि-गंजऩक़ंी कंी नहि । ' किं तखने मीरा ठाढ़ भऽ कंऽ अपन वकंील के रोकैत जज दिस ईशारा कंरैत कंहने छलीह - ' हमरा क्षमा कंरब , ई सभ सत्य नहि आछ जज साहेब । हमर पति देवता-तुल्य छथि । हमरा ओ कंहियो अधलाह वचन तकं नहि कंहलनि ; हाथ उठेबाकं तऽ बाते नहिं । ओ किंयैकं हमरा सँ अलग होमय चहैत छथि से तऽ वैह जानथि । ' मीराकं एहि वत्तᆬव्य पर समूचा अदालत स्तब्ध रहि गेल छल। मीराकं भाय तामसे माहुर भऽ रहल छलाह। हुनकंर अँखि सँ व्रᆬोधकं ज्वाला पुᆬटय लागल छल़ठोर पटपटा रहल छल मुदा शब्द नहिं बहरायल। पाशा तँ तखन पलटि गेलै जखन एकंर वकंील कंहने छलै--'मी लॉर्ड ! हमर मुवक्किंल के अदालत सँ तलाकं मँगबाकं मुख्य कंारण आछ श्रीमति मीराकं व्यभिचार जे हिंदु मैरिज एक्ट-१९५५ के धारा-१३ के अंतर्गत तलाकंकं एकंटा पैघ कंारकं भऽ सकैछ । हमरा लग कैकंटा एहन दृष्टांत आछ जे हमर एहि आरोप के पुष्टि कंरत़। ' एहि सँ पहिने किं वकंील अपन फाईल कें पढ़ि कंऽ किंछु आगु बजतथि, किं मीरा उठि कंऽ ठाढ़ भऽ जज सँ कंहने रहै--' जज साहेब ! हम अपन पति कें तलाकं देबा लेल तैयार छी । हमरा बताओल जाय जे कंोन कंागज पर कंतऽ दस्तखत कंरऽ पड़तै । ' समूचा अदालत मे पेᆬर सँ सन्नाटा पसरि गेलै। सभ स्तब्ध भेल अड़ोस-पड़ोस ताकंय लगलै ; कंाना-पुᆬसी शुरू भऽ गेलै। केयो एहन उम्मीदो नहि केने छल । तलाकं भेटलाकं क्षणिकं खुशी के तुरते बाद ओकंरा भान भेलै जे मीराकं चरित्र पर एहन पैघ लाँछन लगा कंऽ ओ नीकं नहि केलकं । एकंरा एकंोटा किंछु एहन घटना नहि बुझल छै जाहि सँ मीराकं चरित्र पर कंोनो टा संदेह होई । चरित्रे तऽ नारीकं सभ सँ पैघ गहना होईत छैकं । पेᆬर सोचलकं तलाकंकं हेतु आन कंोनो कंारणो तऽ नहि छलै ओकंरा लेल़वकंीले कंहने छलै जे एहि ग्राउँड पर सद्यः तलाकं भेट जयतै एकंरा । ई धरि सत्य जे ओ अपन ईच्छा के विरुद्ध परिवार-समाजकं दवाब मे मीरा सँ विवाह केने छल । मुदा ओ अपन प्रोमिकंा के नहि बिसरि पओलकंविवाहकं बाद तऽ ओकंर प्रोम बढ़िते गेलैकं। पत्नि आ प्रोमिकंाकं वास्तविकं भेद के जनितो ओ पत्नि मे प्रोमिकंाकं गुण ताकंऽ लागल । परिणाम भेलै जे पत्नि सँ विरत्तिᆬ बढ़ऽ लगलै । जखन प्रोमिकंाकं ईशाराकं हवा भेटलै तऽ पत्नि सँ विरत्तिᆬ अदालत तकं तलाकंकं मुकंदमा रूप मे पहुँचि गेलै़घर-परिवार, गाम-समाज सभ सँ विद्रोह कंऽ कंऽसभ सँ सम्बंध विछोह कंऽ कंऽ । अपना के धिक्कंारऽ लागल ओ़चरित्र तऽ एकंर स्वयं कंलुषित छैकं जे व्याहता पत्नि के छोड़ि़। ओकंरा सन पतित भरि संसार मे केयो नहिं हेतैकं । मीरा सन धवल चरित्र पर कंलंकंकं दाग तऽ कंम सँ कंम नहिं लगावऽ बुझैत छलैकं ओकंरा । मीरा़! मीरा तऽ वीराँगना आछ़ज़खन एकंर वकंील ओकंर चरित्र के कंलंकिंत कंहऽ लगलै तऽ ओ अपन चरित्र पर लाँछना सुनबा सँ पहिनहि ओ तलाकंकं कंागज पर दस्तखत कंऽ देब नीकं बुझलकं। घर आबि कंऽ ओ पलंग पर धड़ाम सँ पड़ि रहल। सामनेकं देवाल पर एखनो एकंरा दुनूकं फोटो टाँगले छलैकं। ओकंर ध्यान ओहि फोटो पर टँगि गेलै़क़ंतेकं ध्यान राखैत छलैकं मीरा एकंर एकं-एकं जरूरति के ध्यान राखैत छलैकं। एकंरा तऽ मोनो ने छैकं जे द्विरागमनकं बाद सँ अपन जरूरति के कंोनो समान ई घर मे मँगने होईकं वा स्वयं उठा कंऽ लेने हुअय़ज़रूरति सँ पहिने मीरा सामान लऽ कंऽ हाजिर । लुड़ि-वितपनी, आवेश-वात सभ मे मीरा अव्वल । भरि गाम मे लोकं कंहै छै जे पुतोहू हुअय तऽ भोलबाबू सन। आस-पड़ोस, घर-परिवार, जन-हरवाह सभकं प्रिाय बनि गेल छलैकं मीरा। एकंो क्षण सासु-ससुर के नजरि नहिं पड़नि तऽ कंनियाँ-कंनियाँ के शोर। ननदि-देयोर भौजी-बौजीकं अनघोल केने। एकंरो तऽ कंोनो शिकंायत नहिये छलैकं मीरा सँ। मुदा किंश्मत बीचहिं मे अपन चालि चललै आ पूर्व-प्रोमिकंा सँ एकंर लगाव बढ़ऽ लगलै नहि चाहितो ओ प्रोमिकंा के प्रोम-जाल मे पँᆬसैत चलि गेल आ पेᆬर दुनू निश्चय केलकं मीरा सँ अलग भऽ विवाह कंरबाकं। एकंरा नीकं जकँा बुझल छलैकं जे मैथिलानी लेल पतिकं आतरित्तᆬ ओकंर कंतहु स्थान नहि आ सौतीन सेहो कंथमपि स्वीकंार्य नहि; तैं अंतिम रस्ता अदलते सँ तलाकं लेब बुझेलैै। गाम-समाज मे जे सुनलकं से थू-थू कंरय लागल। बाप जे धड़ खसेलनि से खसेनहिं रहि गेलाह़माथकं पाग बेटा खसा देने छलनि। ओकंर विद्रोहकं आगाँ सभ विफल भऽ गेल़ओ घर छोड़ि कंऽ पड़ा गेल ऩहिं जानि कंतऽ। आई ओकंरा प्राचंड झंझावातकं बाद पसरल विरानगि सन बुझा रहल छलै अपना भीतऱकिंछु टा नहिं नीकं लागि रहल छलै ओकंरा । अपराध-बोध सँ दबले जा रहल छल़किं पओलकं ओ़उनटे पुरखाकं मर्यादा मटियामेट भऽ गेलै़बाबू लोकंलाजें दलानो पर तकं नहि निकंलैत छथिऩमायकं आँखिकं नोर सँ आँचरकं खूट तीतले रहैत छै़हँसैत-खेलैत परिवार मे आई मरघटकं सन्नाटा सन पसरि गेल छै । एहि सभकं दोषी तऽ यैह आछ । ओ जतेकं सोचय; आत्म-ग्लानि सँ ततबे दबल जाय । प्रोमिकंाकं बेर-बेर फोन अबैत छलैकं। मोबाईल स्वीच-ऑफ कंऽ कंऽ ओ कंात मे पेᆬकं देलकं । उठल़दू-चारि टा कंपड़ा-लत्ता जल्दी-जल्दी ब्रीफकेश मे ठुसलकं आ घर मे ताला लगा बाहरा गेल । दलान पर बाबू आ कंक्कंा कंोनो गूढ़ विचार-मंथन मे लागल छलाह। ओ दुनूकं पायर छुलकंनि कंकंरो दिस सँ कंोनो प्रातिव्रिᆬया नहिं। ओ अप्रातिभ भऽ गेल। कंने कंाल ओहिना ज़डवत ठाढ़ रहल पेᆬर समान उठा कंऽ आँगन दिस विदा भेल । कंोनटा लग माय ठाढ़ छलैन, दबले स्वरे पुछलकंनि ' निके छी किंने?' ओ स्वीकृति-सूचकं मुड़ी डोलबैत अपना कंोठली मे चल गेल। मीराकं कंपड़ा-लत्ता, वस्तु-जात सभ किंछु ओहिना राखल जेना एखने नीकंलल होथि ओहि कंोठली सँ । माय चौखटि लग नुआँकं खूट सँ नोर पोछैत आबि कंऽ ठाढ़ भऽ गेलखिन। पेᆬर नहुयें-नहुयें कंहय लगलखिन-'बौआ आहाँ अपना पर ध्यान राखब़अहीं पर सदिखन चिंता लागल रहैत आछ । सुनै छियै कंनियाँकं भाय आहाँकं जान लेबा लेल उदवीर्त भऽ गेल आछ । गोनमाकं माय बजैत छलैकं जे ओ तऽ बंदूकं निकंालि कंऽ आहाँ के मारबाकं लेल निकंलि गेल छल। मुदा कंनियाँ ओकंर पैर गछेड़ कंऽ पड़ि रहलै जे भैया एहन पाप नहिं कंरू । एखन हम कंम सँ कंम सधवा तऽ कंहबैत छी़सींथ मे सिनूर पहिरैत छी़माँछ-माँसु खाईत छी। तलाकंकं कंागज पर दस्तखत मात्र कंऽ देने जन्म-जन्मांतरकं सम्बंध नहिं टुटि जायल कंरैत छै । हुनकंा कंरय दियनु ओ जे कंरैत छथि । अहुँ के जँ हम बोझ बुझाईत होई तऽ हमरा छोड़ि दिय़हम वुᆬटौन-चुरौन कंऽ कंऽ पेट पोसि लेब़संसार बड़कंा टा छै । ' सुनि कंऽ ओ ठामहिं ठाढ़ भऽ गेल- ' माय हम गंगापुर जा रहल छी मीरा सँ भेंट कंरय । ' माय अचम्भित भेल कंोनो आनष्टकं आशंकंा सँ ओकंरा रोकिंते रहि गेलखिऩओ मोटरसाईकिंल स्टार्ट कंऽ कंऽ आँखि सोंझा सँ दूर भऽ गेल। बाबू - कंक्कंा बौकं बनल दलान पर ठाढ़े रहि गेलाह। नव-वर्ष शहरी संस्कृति मे नव-वर्षक बड़ महत्त्व भऽ गेलैक आछ। चारु कात उल्लास, आनंद कोनो पाबनि-त्योहार सँ बेसिये। लोक पुरनका बितल साल सँ पिण्ड छोड़ा नवका साल कें स्वागत करय मे बेहाल़़ एहि मे केयो ककरो सँ पाछाँ नहिं रहऽ चाहैछ। धूम-धड़्‌क्का, नाच-गाऩ़ आई जकरा जे मोन मे आबय कऽ रहल आछ़़ नया सालक स्वागत मोन सँ कऽ रहल आछ। मुदा सब केयो थोड़बे? शहरक एहि उल्लास के नहि बुझि पाबि; सुकना के सात सालक बेटा पुछिये देलकै ओकरा सँ -'' बाबू, आई कि छियै जे लोक एना कऽ रहल आछ?'' ''बाऊ, पैघ लोक सभक नया साल आई सँ शुरु भऽ रहल छै; तैं सभ पाबनि मना रहल आछ।''- बाल-मन कें बुझेबाक प््रायास केलक सुकना। चोट्टहि प्रश्र्नक झड़ी लागि गेलै- ''हम सभ नया साल कियैक नहिं मनबैत छि? हमरा सभक नया साल कहिया एतैक??'' सुकना एहि अबोध कें कोना समझबौक जे गरीबक कोनो साल नया नहिं होईत छैक। बोनिहारक सभ सांझ नया साल आ सभ भिनसर पुरान साल जँका होईत छैक। बाप-बेटा दुनू चुप एक दोसराक मुँह देखि रहल छल़़ साईत आँखि आँखिक भाषा बूझि गेल छलैक। थाकल बाट ''सर, हमर मीटरक फाईल कहा तक पहुचलई?'' ''उपर सँ नहि लौटलै'' - बिजली ऑफिसक कर्मचरीक ई चिरपरिचित उत्तर फेर हमर कानमे गेल। उत्तर जेना स्टीरियोटाईप, प्री-रिकोर्डेड, बिना कोनो जाच-पड़ताल, नाम-पता पुछने, पेᆬकल सन। १५ दिन भऽ गेल बिजली ऑफिसक चक्कर लगबैत आऽ यैह उत्तर सुनैत । ''अरे ई सभ बड घाघ होईत छई। बिना 'सेवा' के किछु नहि हेतौक। परेशानी सँ बँचैक छहु तऽ सेवा करहि परतौ'' - अपन मित्र प्रभासक ई सलाह कचोटैतो मोन सँ मानहिं परल -विवसतामे। आखिर नोकरी छोड़ि कतेक दिन दौरैत रहब - अनायास,अनर्थक,आनश्रचत़। बिजली विभागक कर्मचारी 'सेवा' पबिते झट् दऽ हमरा आदेश-पत्र थम्हा देलक। जेना ओकरा सँपौती अबैत होईक- हमर मोनक आशय ओ पहिने बुझि गेल हो आ आदेश पहिने सँ तैयार रखने हो- हमरा देबाक हेतु। कायल भेलहुँ हम 'सेवा' महिमा सँ। विजयी भाव सँ आदेश-पत्र कें देखैत हम बाहर निकलि रहल छलहु कि नजरि परल कातमे लटकल बोर्ड पर जाहि पर मोंट आखरमे लिखल छलै -''रिश्वत लेना एवं देना जुर्म है।'' भने लोक पानक पीक फेकि विकृत कऽ देने छलै ओकरा। उपयुक्त चिज उपयुत्त जगह रहक चाही। रस्तामे फेकना भेटल बड़का लग्गा सँ बिजलीक तारमे टोका फंसबैत। हमरा देख कऽ मुस्कियायल ओऽ। लागल जेना हमर मुँह दुसि रहल हो। हारल मनुक्ख बरी काल सँ प्रतिक्षा कऽ रहल छलहु बस के। गामक कोनो बस आबिये नहिं रहल छलै। एक तऽ प्रतिक्षा ओहिना कष्टप्रद, तहु मे जेठक दुपहरिया मे। रौद आ पब्लिक ट्रांसपोर्टक स्थिति ---- खिन्न भऽ गेल मोन। समय बितेबाक आर कोनो साधन नहिं देखि, मोन नहिंयो रहैत ठंढा पिबाक लेल बढि गेलहु सामने के रेस्टोरेंट दिस -- छाँह तऽ भेटबे करत, सँगहि प््रातिक्षा के घड़ी सेहो बितत। बस एबा मे एखन आधा घंटा सँ कम समय नहिंये लगतैक। रेस्टोरेंट के तजबीज करैत आगू बढल जाईत छलहु कि केयो रस्ता रोकलक - जिर्ण, मलिन, बृद्ध नहिंयो रहैत बृद्ध सन - लाठी लेने '' भैया! दू रुपैया हुअय तऽ दऽ दियऽ, ट्रेकर पकड़ि गाम चल जायब। पायरे नहिं गेल भऽ रहल आछ ।'' आबाज मे एकटा संकोचक सँग दयनियता साफ झलकैत छलैक । तखने हमरा आगु मे नाचि गेल भीख माँगबाक नव-नव ढ़ब़ मोन परऽ लागल पढ़ल आ सुनल खिस्सा सभ जे कोना लोक ठका गेल ई सभ ढ़ब पऱ। ओकर याचना के अनसुना करैत हम बढ़ि गेलंहु रेस्टोरेंट दिस । बस अयला पर ख़िडकी कात सीट पर बैसि सुभ्यस्त भेलंहु। कने काल मे बस चलि पड़ल। रस्ता कात मे सहसा ककरो पर नजरि पड़ि गेल़ चौंकलंहु - 'ई वैह आदमी तऽ नहिं जे हमरा सँ दू रुपैया मँगैत छल?' दिमाग पर जोर देलहुँ हँ ई तऽ वैह आदमी आछ़़क़हुना- कहुना कऽ डेग बढबैत लगभग घिसियैत जँका --चलल जा रहल आछ गंतव्य दिस। ई दृश्य हमरा विचलित करऽ लागल़ हमर अंतरात्मा कचोटि उठल - 'दू रुपैया! मात्र दू रुपैयाक लेल बीमार - असक्क के पायरे जाय पड़ि रहल छैक आ तों मोन नहियो रहैत दस रुपैया ठंढा पी कऽ बर्बाद कऽ देलह! धिक्कार एहन मनुष्यता के!' अपराध बोध सँ हम आकाश दिस देखैत ओकर शून्यता मे विलिन भेल जा रहल छी। भावना जेठ महिना मे तऽ सूरज जेना भोरे सँ आगि उगलऽ लगैत छैक। दुपहरिया तक तऽ वातावरण ओहिना जेना लोहा गलाबऽ बला भट्ठी। छुट्टी के दिन रह्ने भोर मे देरिये सँ उठलंहु; साईत तहु द्वारे कनिया भानस करबा मे अलसा रहल छलीह। अंततोगत्वा निर्णय भेल - भोजन बाहरे कैल जाय। घर सँ बाहर निकललंहु। बाहर एकदम सुनसान - एक्का दुक्का लोक चलैत - सेहो साईत मजबूरीये मे। कियैक निकलत केयो घर सँ एहन समय मे? एहन रौद मे निकलनाई कोनो सजा सँ कम थोड़बे छैक। बड़ मसकत्ति के बाद एक टा रिक्सावला तैयार भेल लऽ जेबाक हेतु। रिक्सावला कि - अधबेसु, कृशकाय, हँपैᆬत़।रेस्टोरेंट पहुंचि भाड़ा पुछलियै। कहलक दस रुपैया। कनिया लड़ि पड़ली ओकरा सँ -''पांच रुपैया के दस रुपैया मंगैत छैंह! हमरा सभ कें बाहरी बुझैत छैं कि? ठक्क नहिंतन! एना जबर्दस्ती सँ बढिया होयतौक जे पौकेट सँ पाई निकालि ले। बजबियौ पुलिस के?'' बेचारा रिक्सावला घबड़ा गेल। पसेना सँ मैल-चिक्कट भेल गमछा सँ अपन मुंह पोछैत, बिना किछु बजने पांचक सिक्का लऽ कऽ चलि गेल बिना किछु बजने़ निरीह। रेस्टोरेंट मे भोजनोपरांत हमरा दस रुपैया टीप के रुप मे छोड़ैत देखि कनिया बजलिह - '' अपना स्टेटस के तऽ कम-सँ-कम ध्यान राखू। की दसे रुपैया दैत छियई - पाछाँ सँ गरियाओत'' एतबा कहि झट सँ पचासक नोट बिल-फोल्डर मे छोड़ैत हमरा चलबाक ईसारा केलनि। आकस्मात हमरा आंखिक आगाँ रिक्सावलाक चेहरा मूर्तिमान भऽ उठल। तुलना करऽ लगलंहु - रेस्टोरेंटक वेटर आ रिक्सावला मे - एकटा वातनुवूᆬलित कक्ष मे भोजन परसैत आ दोसर रौद मे कोंढ तोरैत। भवनाक अंतर सँ सिहरि उठलंहु हम। बी०डी०ओ० ओकर असली नाम की छलैक से तऽ नहिं कहि; मुदा हम सभ ओकरा 'माने' कहि कऽ बजबैत छलियैक। कारण, ओ बात-बात पर 'माने' शब्दक प्रयोग करैत छलीह। से 'माने' ओकर नामे पड़ि गेलई भरि गामक लोक लै। बाल-विधवा, संतानहीन 'माने' हमर घरक सदस्या जकाँ छलीह। हमरा बाद मे बुझवा मे आयल जे 'माने' हमरा ओहिठाम काज करैत छलीह। बृद्धावस्था के कारणे आब काज तऽ नहिंये कऽ सकैत छलीह; हँ दोसर नोकर-चाकर पर मुस्तैद भऽ काज धरि अवश्य करबैत छलीह। प्रधान मंत्रीक मधुबनी आगमन के लऽ कऽ लोक मे बेसी उल्लास आ उत्साह छलैक, सभ सक्षात दर्शनक पुण्य उठाबऽ चाहि रहल छल। लोकक एहि ईच्छा के पुरा करबा मे सहयोग दऽ रहल छलाह पार्टी कार्यकर्ता लोकनि जे बेसी-सँ-बेसी लोक के जुटा अपन शक्ति प्रदर्शन करबा लेल मुपत्त सवारी के व्यवस्था केने छलाह। हम मजाक मे 'माने' सँ पुछलियै- '' प्रधान मंत्री मधुबनी मे आबि रहल छथिन। अपन गामक सभ केयो जा रहल अछि देखऽ। अहाँ नहि जायब?'' ''के अबैत छथिन?''- माने पुछलनि। ''प्रधान मंत्री।'' - हम उत्तर देलियै। ''धुर! ओ कोनो बी०डी०ओ० छथिन जे 'बिरधा-पेलसुम'(वृद्धावस्था पेंसन) देताह। हम अनेरे की देखऽ जाऊ हुनका ?'' हम अवाक रहि गेलंहु माने के उत्तर सँ। पद्य खण्ड डॉ. कामिनी कामायनी अंकोरवट मंदिर कत्तेक विशाल / उन्नत प्रकोष्ठ / भीम काय /तना स/ गृह /आवृत । आब छाँह द रहल /वृक्ष /अतेक/ छी खंडहर /कतबो पुरान । दैदीप्यमान /खंडित /तइयो असेवित अछि /मूर्ति /तइयो ई ऊंच ऊंच प्रासाद वृंद / शेर , पद्म अछि भिंदिपाल / नयनाभिराम ओ अप्सरा नृत्य / ओ शांत ताल मे सुतल काल / आह क्षितिज स झांकि कनैत अछि चारु चन्द्र के रश्मि पुंज देखू जन नायक के प्रताप / की मौन /निर्लिप्त /बस सहैत ताप नीचा वसुधा /ऊपर आकाश / अखनों गुंजित अछि ओ स्वर महान / ओ महा यान /ओ महा प्राण / भींजैत पाषाण/कजरी बेहाल / बाचि रहल अछि स्वगत ठाढ़/ दिव्य कतेक ई अंकोरवट । कण कण मे इतिहास भरल कतेक शासक के राज छुपल/ गौरव ,गरिमा स ओत प्रोत / घड़ीघण्ट, शंख ,नित दिन बाजल कत्तेक वैष्णव गान भेल / कखनों शंकर आराध्य भेला तांडव रूप अपन धयला । कत्तो विष्णुप्रिया मुस्की मारैत। शिव जटा उमहर फहराय रहल / बड़का विशाल शिवलिंग कहलैथ/ छल हमरो कहियो राज एतय / अहि आनन /कानन मे कहिओ / डमरू के गुंजित गान छल मुदा काल के भय स महाकाल / गेला ओतयस नहिं,कत्तो पड़ाय/ ओ हेरै छथी मानव नियति । अहि यशोधरा पुर के बासी/ ओहि सेयाम रेप के घर आँगनि / ई कथा सुना बैत छै सून मे / कि कलाकृत्य /कि चित्र विचित्र कारीगर हेता कत्तेक सज्ञान । अमर अजर ओ राति बनल / देला इन्द्र आदेश जेकर / ओ महाशून्य मे ठाढ़ एखन / जोहैत अछि जानै बाट केकर । जहिया ओ इतिहास सुनौलक जहिया ओ इतिहास सुनौलक रोम रोम बरछी बनि मारल / केहेन आगि मे जरि रहल छी / कोन मूह स कथा कहु आब? तपत बौल मे तड़ैप रहल छी अपन  परती खेत पड़ल छल मुदा बाध अनकर लहरायल अपन सपना बेच रहल ओ  / हम्मर किम्हरो  मूह नुकायल/ भांति भांतिक भइज लगाकऽ / सब तर छल दाना छिड़ियौने / मुसुकि मुसुकि कऽ नमरि नमरि कऽ चान देखा कऽ जिह ललचौने / बान्हि देल गरदनि पर टाइ / गरा मिलल छल बनिक भाइ / पड़ा रहल छल तैयो मुड़ि कऽ / भाखा केँ मोटका जौरसँ बान्हल / चिचिया कऽ /घिसिया कऽ कहलक / अहि सँ केना आब तोँ बचमे / अहि जौर केँ काटि ने सकबेँ / परचम हमर सदा लहरायत अपन आब बचल कतय किछु / सबटा पच्छिम हड़पि रहल अछि संग दिअ सदिखन अहिना संग दिअ सदिखन अहिना ॥ आहाँ कहैत छी जी लेबै त / बिसरि जायब ओही गड़ैत क्षण के । अगिन ,पहाड़ ,खोह ,खधिया,/ बड़,पीपर ,ताड़ , आ पिच्छड़ी/ चढ़ल जतय स ,पिछड़ि गेलहू फेर / नित दिवसक अपमान भेटल बस / भरि पायल संसार स मन त / पड़ा रहल छल स्वास अगाड़ी/ तड़फ़ैत खसल जल बिन मच्छरी/ जरैत रौद /सुलगैत धरती / खलिए पएर,होश से गुम छल/ करी ने सकल विश्राम कनिकबो / चलबा लेल उध्यत सदिखन / चलईत जिमहर नेने मोसाफ़ीर / कठपुतरी छल ,जानै कक्कर/ मूक, बधिर सन ,बढ़ैत चलै छल / तजि रहल छल ,संग जे तन के / बांधी रहल ओकरा मन बलजोरी / किन्तु एक क्षण एहेनो आयल / लागल डेग बढ़त नहि एको / चट्टान लग खसल पड़ल त / दूर ठाढ़ दरिया मुसकायल / गरा सुखि अवरुद्ध पडल छल / अयलहू अहा सनेस नेने कीछु/ कहलहू अमृत रस अछि पी लू /बिसरि जाऊ पाछा के बाट सब / आगा के क्षण हसी का जीबू/ संग देब हम क्षण क्षण अहा के / तखन हमर हिम्मत छल घूरल/ देव दूत संग सुख सब पाओल / अहिना चलै चलाबू नैया/ गाबी हम झुमरि जी भरि के ।। वसंत नाचि रहल नब नब तरंग नूतन बसंत नूतन बसंत । नब ताल वृन्द़ नब छाग फाग़ न्ब गेह देह नब पात़ साग । नब बाट हाट नब प्रीत गीत नब लाेभ क्षाेभ नब हास्य रूदन नवनीत रूप नब कमल नयन । मन हर्षित भ’ नितराति कहल आयल बसंत नबका वसंत । नब सखी सखा नब मधुर रास नबका सूरूज नबका प्रकास । नब तालमेल नब धूर खेल नब जान माल नब वृद्द बाल । सब तर मदमातल छै अनंग नब नब बसंत नूतन बसंत़ । नब स्वप्‍न नयन मे उठल उठल उल्लास हिय मे भरल भरल । रज कण सॅ झाॅकैत अछि पर्यन्त नबका बसंत नबका बसंत । नब कुसुम कली सकुचाय उठल मदमस्त भ्रमर मॅडराय रहल कुहुक काेयलिया गाबि रहल रस रंग सुधा बरसाय रहल । अल्हड बसात चलै सनन सनन गंंंमकि उठल नंदन कानन । आयल गायल मन माेहि चलल नूतन वसंत नब नब वसंत । बाजार मे स्त्री आे रूप कुॅमरि कियै ठाढ आेत्तए ऋ की छानि रहल अछि राह बाट ऋ छिटकल कारी घन केश पास हर्षित मुख मंडल मन उदार । आॅखिक भाखा किछु कठाेर सन दप दप चमकैत उन्नत ललाट । ताकि रहल किछु गुमल चीज बरखा बूनि मे रहल भींज । बटुआ छै काॅन्ह सॅ लटकि रहल । ऊचका सैंडिल छै अटैकि रहल । चालि चलै छै नापि नापि रहि जाए छ ैधरती काॅपि काॅपि । कत्तेक इर् उर्जावान बनल ज्ञान भरल अभिमान भरल । ककरा सॅ कम छै अहि जुग मे इर् अर्जुन के अभिमान ताेडल । वामन अवतार विराट बनल इर् ताकि रहल ब्रम्हांड दिस । करे छै सब कियाे नमस्कार देखियाे अहि जुग के चमत्त्‍कार । इर् रूप कुमरि खूब बूझि रहल । समरथ के नहि छै दाेख काेनाे सहलक आेहाे बड बसात घाम नहि लेलक क्षण भरि के विराम । आय बल बुद्वि के ताकत प्ऽ्ऽऽ आे रूप कुमरि अछि ठाढ आेत्तय । बंजारा मोन मन मस्त मतंग फकीर बनल । मन सोर करैत अछि बेर बेर मन पड़ा रहल अछि फेर फेर डोलैत जाइए मन इम्हर उम्हर ई दंड भेदसँ बाहर अछि । मन झूठ फूइस गढि रहल सदा मन दौड़ भाग करि रहल सदा मन केँ परतारय लै प्राणी केहेन केहेन इतिहास गढल मन ककरो बसमे आयल नै मन जोगी भऽ रमि रहल इम्हर मन भोगी भऽ पड़ि रहल उम्हर मन केँ लाज लिहाज नै छै मन हेहर छै़ मन थेथ्थर छै ई चंचल पथ के राही छै । मन भागि रहल अछि चानक लेल मन सूरूज देखि उधिया लागल मन धरती पर छिछियाय रहल मन अनंतमे सन्हियालि रहल़़ मन कखनो शांत प्रशांत नहि । कखनो उकटा पैंचीमे कखनो बाकसमे अटैचीमे कखनो नरमे नारीमे कखनो धोतीमे साड़ीमे कखनो दादा परदादामे कखनो मान मर्जादामे हुलकी दैत अछि बेर बेर । गहनामे कखनो गुरियामे कखनो भाँगक पुरियामे कखनो तीमन तरकारीमे कखनो कोठीमे अटारीमे मायामे उनटै बेर बेर । बिरहा पर मन अछि डूबि रहल मल्हार पर अतिशय फूलि रहल मन करै छै कखनो साम गान कखनो कखनो फूसही बखान कखनो कानैत अछि नोर झोर कखनो हुलसति अछि जोर जोर । मन सज्जन छै मन हरीफ छै़ मन तुलसी छै मन कबीर छै़ मन के किछुओ अलभ्य नहि ई चारू लोकक मालिक छै़ । मन राह बाट के राहगीर लमहर चौरस वा बानवीर नृत्‍यरत अछि राति दिवस मन के कखनो विराम नहि मनक पाथेय छै बस चिन्तन । मन भ्रमण करै छै जुग जुगसँ ई सभ तर बूलै जुग जुगसँ मन रास विलास करैत सदा मन सन कोनो बंजारा नहि मन जोगी छै नागा जोगी । द्रौपदी सखा कहू रहस्य जिनगीक हमरा किछु नै सुझैए आगाँ आगाँ दू डेग फराक हतभाग्य हमर चलैए । संकट बाधा विध्न बहुल धेने पछोर किए हम्मर सुख चैनसॅ भरल जिनगी लिखल किएक नहि गिरधर जहिना चलल जनमक खिस्सा तहिना सकल यौवनक कहै लेल रानी, महल नसीब नै देखल भटकि कऽ वनमे सूरज अहिना उगथि पुरूबमे पच्छिम अस्त होबैत छल । दारूण दुख विपदाक संग कहुना दिवस हमर कटै छल । भोर साँझ नित देव पितरक हमहूँ ध्यान करैत छी । मानव तन एक बेर खसैत अछि हम नित रोज मरै छी । रूप गुणसँ सजल बहादुर हमरे पति कहाबथि बाट बाट पर खतरा जिनका हरदम घेरय आबै । कहू सखा हम कोना कऽ जिबतौं जौं संग अहाँ नै दैतौं मनक तार तरंगित करि कऽ बुद्वि बल नहि भरितौं । मोन पडै छै एखनो ओ दिन रोम रोम सिहरैत अछि । कोना द्युतमे दाव लगा कऽ हमरो सभ हारैत अछि । आएल जखन भवनमे हम्मर दूत सुनाबए खिस्सा कहने छलहुँ तमकि कऽ हमहूँ हारल के कोन हिस्सा हारि चुकल जे अपने पहिनहि हमरा की दाँव लगाओत पूछू जा कए गुरूवृन्द सॅ ई अधिकार के पाओत । न्यायक गप सुनि दुर्योधन कड़कि गरजि कऽ बाजल झोंट पकड़ि दासी ला जल्दी जौं नै होइ छै आएल अन्तःपुर सॅ दरबार धरि सौ जोजनक छल दूरी मुदा दूत राजा के आएल देखबैत किछु मजबूरी भरल सभामे जेठ श्रेष्ठ लग कऽल जोरि कऽ कानैत कातर दृष्टि ताकि रहल अछि गुरूजनसॅ किछु मांगैत। विदुर धृतक वाक् बन्न छल पांडव मूॅह लटकौने । कहै बहुरिया जे प्रजा गण तिनको किछु नै फुरैलन्हि। कनिक बजला भीष्म पिता त’ दुर्योधन धमकेलैन्ह राजनीति मे छल प्रपंच अहिना होइत एलैहेैं । कुटिल दुश्शासन विहॅसि विहॅसि क’ गज समान उन्मत्त छल । दूनू हाथ फङकि रहल नूआ घींचय लेल बेकल छल । पाबि इशारा जेठ भाय के दौगल छल अज्ञानी । अपने कुल के नंगा करय दुष्ट कुबुद्वि ओ प्राणी । पॉच पति कोन काज क’ जखन इज्जत लूईट रहल छल । मूॅह नूकौने सभामध्य कि जाने गुणि रहल छल । सारथि पुत्र ओहो छल ओत्तै दुर्योधन शकुनि संग । मुसिक रहल छल तिरछि नैन सॅ देखि हमर क्रंदन गंजन । ओकरा ई संताप छलै जे स्वयंवर मे पैठ नै भेटलै । बङ अपमान सूनि सहि क’ ओ असफल आपस एलै । बैसि कुटिल जन के संगत मे दुर्वचन बाजि रहल छल । टोंट करैत छल जोर जोर सॅ थपङी पाङि रहल छल । तखन सखा .हे नाथ कहु लज्जा हम्मर के बचौलक। मन मस्तिष्क मे आबि बसल के नूआ हम्मर के बढौलक । अहॉ नाथ हर क्षण संकट मे साथ हमर चलल छी । जीवन संगी रहै कियो अहॉ जीनगी के रक्षक छी । तन त’ छल संसार के संग मन रमल रहल अहीं मे । कटल काल रात्रि जीवन के विप्लव भरल सदी मे । हृदय हमर जौं बसल अहॉ मे कहु कि दोष हमर अछि दुख सॅ भरल अथाह समुद्र मे हम तखने पौङैत छी । बचतै नहि प्राण संकट मे जौं संग अहॉ नै दैतौ । दुःस्वप्न ओ समय गुजरि गेल लाक्षागृह मे रहि क । भिक्षा बुझि माता कुंती देली पॉच ठाम बाटि । नारि सॅ हम वस्तु भ’ गेलौ सेहो एकदम खॉटि । ओ केहेन कठिन क्षण आयल अब्ब्ल नारि जीवन लेल । सुनेैत वचन मन मरि चुकल ठाढ हमर काया रहि गेल । कोना क’ एतेक कुपित विधाता रथ मे केहेन क’ जोतला पॉच अश्व सॅ खींचा रहल औ टूटल जेकर पहिया । बरख दिन लेल अहिबाती हम फेर बदलि दोसर नाम । पूजै छी मॉ गौरा दाय के जीबैत पॉचो पति महान । बजैत काल रूकमणी सॅ खिस्सा हमहू छलौं धखायल । अनुशासन मे राखि पति के केहेन हम नियम बनायल । बरख समाप्त होमए काल नित अग्नि परीक्षा दै छी । जिनकर हाथ पकङि लैत छी हुनके सॅ नेह करैत छी । मुदा सिनेह प’ हम्मर छल पतियो सब के शंका । ईष्र्या डाह सॅ जरैत रहै छल हुनको मन के लंका । अर्जुन दिस किछु नजरि घुमा क’ हमरा दिस हेरैत छल । हृदय चीर क’ देखय चाहैत आखिर की सत्य कथा छल । योग्य पति के पत्नी भ’ क’ तैयो रहल उदासी । तङपैत देह प्राण सब रहि गेल रहि रहि पाङी भोकासी । लोकवेद के देखि थमकि उत्तान भ’ हम चललौं । बूझत कियौ किए क्षत्राणी के मन मे धाह उठल छै । ओहि धधरा सॅ भस्म होबए लै राज सजल छल सुन्नरि । आन्हर के पूत आन्हर चालि चलै छल बदतरि । हिय मे ओकरो द्वन्द्व उठल छल याज्ञसैनी के पाबी । बूझि नै पाबै रहि रहि सोचै कोन टा दॉव चलाबी । अभिमानी हम छलौं नाथ बङ जिद्दी आ’ गौरवाही शपथ खा क’ केस जे फोलल सेहो केलक तबाही । बुद्वि बल .चातुर्य सॅ हमरो गढने छलथि विधाता । ता पर रूप मनोहरि देलन्हि सकल जगत के ज्ञाता । लङैत रहल अछि जुग जुग सॅ नर पाबै लै नारी के । बिसरि क’ अप्पन सीमा रेखा अनित्य शरीर धारी के । एतेक आकर्षण द’ हमरा नीयत सबहक बिगाङल देखै जे बाहुबली हमरा पाबै वएह चलि आबै । के प ूछै छल अबल सॅ कि अहॉ किनका चाहैत छी अपन गप मनाबए वाला केकर गप मानैत अछि । बाहरि के कोलाहल तजि क’ अन्तःपुर मे आयल । देखि मुदा ऑगनि के दुर्गति मन हम्मर खौंझायल । छल. छदम :कुटिल चालि सॅ भरल भवन के झरोखा । जिनका बूझलौं सहृदए सयानी ओ सब बङका धोखा । गिरगिट जेका चालि बदलि क’ भेद लेबै छल नारि । आबै . .लग ठहरि क’ देखै ई केहेन मति मारि । कुटनी . .पिसुनी. . चुगलखोर सब दासी मीत कहाबै । अनकर खिस्सा मे किछु अपनो लागि लपेट कहि आबै । बाहर के बङका तपिश सॅ गरम होईत छल आंगन । क्लेश .द्वेष के लहकैत लावा लहरै बनि दावानल । कान रहै छै महल मे केवल ऑखिक’ काज कत्तौ नै । फुसफुस करि क’ स्वर गूॅजै छल स्पष्ट सुनाय किछु नै । भाग्य कत्त कि पॉच गाम के ओ शासक कहलेतथि मुदा सूई के नोंक बराबरि दूर्योधन कत्त दैतथि । कुश ओछा क’ जंगल जंगल रात्रि बिताबैथ परिजन । कएल की पाप बुझि नहि सकलन्हि बाट घाट मे भटकैत । दासी हमरो काल बनौलक सैरन्ध्री कहि लोक हॅसल छल । केस गुहैत हम विराट स्त्री के कानल भरि सिसकारी । देख सून मे कतेक बेर ओ नर पिशाच हमलावर । ताङय लागल हाथ पकङि क’ दैत प्रेम के आखर । आखीर करय पङल भीम के कीचक वध किछु बल सॅ । आत्म रक्षा लेल भेलय ई हत्या नहिं जाने कत्तेक छल सॅ। अहिना पति परोक्ष देखि क’ चकित भेल छल जयद्रथ । कुटी के आगॉ ठाढ भ’ गेल रोकि क’ अप्पन सुन्नर रथ । कामदेव के तीर लागल छल हिय मध्य बङ भारी । बहलाबैत फुसलाबेत बढि क’ पकङि नेने छल साङी । तीर तीर घिसियाबए लागल गाङी धरि आनय लेल छल तैयार तीर तरकश लै’ छटपट ओ भागए लेल । ताधरि अयला पॉच पा्रण देखैत हम्मर दुरगतिया । घुस्सा लात सॅ ढेर कयल खूनम खून छल बटिया । युधिष्ठिर के कहला प’ प्राण हरण नहिं भेलन्हि । भीम अनुज गरजि गरजि क’ केश हरन करि लेलन्हि।

तोङि ताङि क’ सीमा सबटा मन म्ो छोह उठैत अछि । विपदा संग सब ठाम सदिखन हम्मर नाम जुटैत अछि । राजपुरूख के संगिनी भ’ पग पग ठोकर खयलहूॅ । कोमल पैर जरैत धरती प’ राखि राखि चिल्लेलहू। वनवासी सब सखी सहेली ऑखि फाङि क’ हेरै । बिलखति हमरा घाम म्ो देखिक ऑचरि ल’ क’ घेरै । केहेन दुष्ट ओ राज हेतै जे वनवास पठौलक । जनी जाति सब घेंट मिलाक’ हमरो बङ समझौलक । किए करब अहॉ भानस बासन हम सब जखन उपस्थित । अहॉ सनक सुबुद्वि सुनारि रहू सदिखन व्यवस्थित । मुदा कहू ओहि सरल चित्त प्राणी के की कहितौं । कोना कटल उपवास मे जीवन कोना क’ नोर बहैबतौं । तखन विहॅसि क’ हमहू कहै छलौं खिस्सा रंग बिरंगा । कोना कोना बलजोरहा सब मिली मारै तुच्छ फतिंगा । व्रत उपास मे नर नारी सब हमरा न्योंत’ आबै । वनदेवी वा लछमी बुझि क’ दर्शन करि करि जावै । मातु कुंति के अचरज होई छल भीलनी संग देखि क’ हमरा । पंच बना क’ सब कियो रखने निर्णय मानि रहल छल । दाना दाना लेल तरसि गेल रहि एहनो दिन हम कटने छी । पीबी पानि पात रान्हि क’ कतेक राति हम कटने छी । भरि भरि राति तरेगण देखी कहुना नींद लगीच आबै । चैन के पहर दू पहर काटि क गृह कार्य मे लागि जाई । भोर होय त’ गाछ बिरीछ दिस टक टक नजरि लगा आबि । देखी कत्तो फङ फूल त’ झट सॅ तोङि क’ ल’ भागी । गीत मधुर हमहूॅ गाबै छल मुदा भास नै आब फूटै कत्तो कोनो राग सुनी त’ धार सहस्त्रों नोर छुटै । वानर भालू .रीछ विचित्र सब संहतिया बनि लग रहै । कूकूर .बिलाङि खरहा .मूषक कुटिया मे रच्छा आप करै । मुदा ध्यान सॅ छुटि नै पाबै हमरो ओ संकल्प भयानक । कोना क’ हम्मर केस तीर क’ महल सॅ बाहरि आनल । क्रोध सॅ थर थर कॉपि कॉपि पीसैत दॉत हम अप्पन। तकैत रही ओ क्षण की ठंढी पाबै कहिया हम्मर मन । नाथ ...क’ल’ जोरि बॉचि रहल छी सबटा पीर जीवन के । आखीर कत्ते पाप कयल मिटै नै ताप निज मन के । अग्नि के दुहिता हम अग्नि निसी दिन धधकैत रहलौं। कनि नै कहियो धाह कमती भेल । जल मे रहलौं तइयो । अगिन के गुण लोक बुझैत अछि मारक वा संहारक । मुदा कण कण शुद्व करि क’ बनबैत सेहो अछि पावन । रूप हमर प्रचंड क्रोध सॅ हरदम रहल अंगारक । अन्तःकरण मे इच्छा रहि गेल होईतौं हम उद्वारक । दया धरम सॅ भरल हिय मे कहियो लोभ नै आयल । अन धन देखि नै कहियो ककरो हम्मर मन ललचायल । विधना हमरो देल बहुत तखन अपन किस्मत छल खोंट । भवन अटारी बखारी खूजल ऑचरि हमर कतेक छल छोट । बादरि सॅ नित रोज लङैत हम फूस के छप्पर छानी । समय कष्ट के बढा जाईत छल चूबैत टप टप पानी । पॉच वीर के नींद नै भंगटै रहि हम अलख जगौने । जीव जन्तु सॅ रक्षा हेतु बोरसी मे आगि जरौने । ओहो की दिन छल नाथ जखन परसौती गृह हम ताकी । कत्त करितौं विश्राम कनि छोङितौं केकरा प’ बाकी। अपने हम बल ..बुद्वि के चाकर दास बनाबी । अपने बनी सखी सहेली अपने राह बनाबी । के पतियेतै कोना क’ नारी जंगल मे राति गमौलक । पॉच पति के संग पाबि क’ तैयो चैन नै पयोलक । तैयो दिन ओ सब भल छल आस के दीप जरैत छल । गरदा माटी पएर सनल छल पाखी कल्लोल करैत छल । पीबैत जल गजराज के देखि चकित भ्रमित हम हेरी । आब लगैत अछि काल के वाहन लगा रहल छल फेरी । राज स्त्री हम क्षत्र्राणी क्रोध हमर बङ भारी । सकल संपदा लुटि लोक मारै शब्द कटारी । ई नारी घमंडक मारल एयह अछि रिपु के शक्ति । मदमातल दिन राति रहैत अछि करैत कृष्ण के भक्ति । कहैथ मुरलीधर की करता हम एतेक बलशाली । हमरा लग बल चातुर्य अतुल अछि हुनक हाथ त’ खाली । दुर्योधन के ललकार सुनि कालो घबङाए रहल छल । सबटा ग्रह नक्षत्र कुमंगल ओहि ठाम आबि बसल छल । शकुनि मामा भ’ क’ जे खेल अनर्थ के खेलल । अपने हाथे सहोदरि के सौभाग्य परम हरि लेलक । जूआ ..मदिरा निंदा .. कलह सब के सहयोग ओतय छल। राजा के सिंहासन सॅ यमराज के राज चलैत छल । दूर लग के राजा हॅसि क’ निफिकिर राज कयल भरिपोख । जे बॉझल अछि गृह कलह मे ओकरा सॅ सब रहै निधोक । घेरने काल हस्तिनापुर के काल रात्रि सन महाविकट । दूर दृष्टि के गप कतए लुप्त जखन दृष्टि निकटस्थ । महापुरूष कियो एहेन नहि जे कौरव के राह देखा सकितै । कियो नै कहल जे शक्ति बढा क’ अश्वमेध ओ यज्ञ करितै । देव . .दया. .दर्शन सब बुझि क’ हम चित्त वश मे करैत अयलहूॅ । श्रेष्ठ जन के मान करैत अपमान के घूॅट पीबैत रहलौं । जहि पैलवार ल्ौ लोक करैत अछि व्रत तीरथ पूजा अर्चन । नौंत द’ ओत्त काल बजौलक नष्ट करय ले सुख जीवन । दिए सुबुद्वि हमरो जन के रहय एना नहि व्याकुल चित्त । उपजै हिय मे ज्ञान कि बुझै बंधु बांधव हित वा मीत । दंड भेद वा साम दाम सॅ चलैत रहल संसार अखिल । प्रेम प्रेम कतबो ऋषि भखलैन्ह ईष्र्या के बेल लतरैत गेल । कियो ककरो देखय नहि चाहै गप करत चाहै कतबो विशेष । निज स्वार्थ मे लीन सदा बात बात प’ करय कल्ोस । अश्वत्थामा के नाम सुमरि अंगोर उठैत अछि हमरा मन मे। मुदा देखि प्रत्यक्ष हुनक ्र माए आबैथ छथि नैनन मे । गुरू स्त्री ओ कानैथ नै जग मे नोर बहा हमरा सन । जीबैथ हुनक पूत बरख सौ जुङैल रहैन्ह हुनकर तन मन । हुनक तेल भरल दीया मे जरैत सहै सुख के बाती । दूनू कुलक े नाश कएल ओ छल अपने गोतिया नाती । क्षमा करैत छी नाथ अरि के ई सब चालि कियो आओर चलल । अग्नि पुत्री दग्ध हृदय के पक्ष किए रहितै उज्ज्वल । कएक जनम के कर्म भोगै लै आयल छी नारि तन मे । तङपि तङपि क’ राति दिवस संकल्प लईत छी मने मन मे । जीबाक अछि विरह कुंड मे रोग शोक किए घर बनैत । मन राखि दी मनमोहन लग लिखलाहा सब तन के हैत । शरीर के धर्म नष्ट भेनाय के एकरा एत्त रोकि सकल । मुदा प्राण के आकुलता प’ गंगा जल के छीट्टा देल । दावानल मे झरकि रहल छी तदपि आस नै तजलौं । कॉट कुस सॅ भरल मार्ग प माथ उठा क’ हम चललौं । भेलौं जखन जखन पुरवासी तीर चलल तरूआरि चलल। जतेक जेकर व्यंग वाण छल सब हमरा ललकारि चलल । किएक हमरा सॅ एतेक ईष्र्या बजलौं नै कटु वचन किनको । आदर सॅ हम नाम लईत छी दास दासी चारण तिनको । संचित पाप कतेक हमर छल कियो हमरा ई बूझेलक नहि । शिक्षा दीक्षा भेटल नहिं छल मातु पिता लग रहलौं नहि । जनिमते जुबती भ’ गेलहूॅ इहो छल अपराध हमर प्ुरूखक तृष्णा पूर्ण दृष्टि कयल सुबुद्वि नष्ट हमर। ताकि नजरि भरि बनै शत्रुओ हाय रे विधना ..जो रे कपार । सुमीत कहॉ कत्तौ छल हम्मर जे छल से सब शत्रु हजार । भवन के रानी राजकुमरि सब रहि रहि मारै ताना । नारि के भेस मे लङय आयल अछि ई कोन मर्दाना । अपन झरोखा मे बैसल हम सबहक गप सुनै छी । मुदा खून के घूॅट पीबि क’ चुप्पे चुप्प रहैत छी । पहिनहॅू सॅ सब सखा जनानी पीठ मे मुॅह छल चमकाबै। आखिर की ई पढल म्ांत्र कियो और नै ककरो मन भावै । मुदा प्रत्यक्ष मे होश गुम छल सिनेह देखाबैत गरा लागै । तखन छलै बान्हल मुट्टी थाह नै किनको किछु लागै । जादू मे विश्वास करि नै नै मंतर नै टोना । कर्म पथ प’ चलैत रहल जग हमरो कहलक कृष्णा । चारू कात अनहार जखन छल बाट नै कनियो सूझै । ऑखि मुनने चलैत रहल छी क्षण क्षण दृग के मींजैत । मेघ भरल अनहार राति मे चमकै जेना बिजुरिया । नाम अहॉ के कौंध मगज मे दिशा देखौल सॉवरिया । डाह दियादि एहेन होय छै बिसरि न्ौ सकतै ई जग । भाय भाय के रक्त पिपासु उठेतै आर केहेन पग । कहबा के त’ लोक कहै छल दू के कारण ई जुद्व ठनल । एक दिस दुष्ट दूर्योधन दोसर दिस ई नारि रहल । बिसरय के त’ नहि बिसरलौं दरबार सजल अपमान अपन । बरख बरख वन वन भटकल तजलौं नै प्रतिशोध वचन । क़..त्तेक बेर त’ पांडव हारि कत्तो पङा’ क जाए बसैथ । मुदा कर्म पथ के चेन्हाबैत रखलौं हम ओ काठी जरैत । कालि होय से आय हुए हम नॉघि चुकल छलौ सीमा । क्षमा करय नहिं आयल तहिया लई छी संहार क’ जिम्मा । जौं लछमी के अवतार छलौं त’ भेल किए संहार एतए। सासुर जाहि मे पएर धरल ओ चलि गेल पाताल किए । एक हाथ सॅ थपङी पाङि दुर्योधन की करि सकतथि । दोसर हाथ हम्मर नहि उठितै रणभेरी नहि बजि सकितै । भॉजि रहल तरूआरि हवा मे अपने कुलके घाती । त्रिया बिलखि क’ कानि रहल छल रहि रहि पीटै छाती । आखीर ओकरा द्वेष किएक छल हमरा सॅ एतेक भारी । नजरि उठा क’ हम त’ देखल हारल छल जखन जुआरी । खोदबिन मे लागल हरदम गुप्तचर सब छोङै छल । सबहक कान लगा हमरा दिस मुॅह अपना दिस मोङै छल । मनुक्ख नै बुझलक अपन स्त्री के अनका प’ ध्यान गङौने छल । बिसरि क’ सब औकात अपन हमरे सॅ नजरि लङौने छल । हमरा लेल ओ तृणवत मानुष बेईमान हत्यारा छल । नहि छल लच्छन कुलदीपक के मूरूख वीर बंकाङा छल । छन छन गरजि गरजि क’ बाजै लाज धाक नै एकोरत्ती। तामस जेना नाक प’ बैसल केहेन पिता केहेन पित्ती । नहिं ओकरा विवेक सॅ मतलब नैे बुद्वियार सॅ काजे लै । नहिं ओ सखा सहोदरि बूझै नहि गुरूजन के सम्माने दै । भय के ओ सामा्रज्य चला क’ मोइक देलक जनता के स्वर । चाटुकार सब सजा रहल छल ओकरे पतन लेल गहबर । राजपद के सब दोष सॅ ग्रसित ओकर संपूर्ण शरीर । चलै जेना गजराज चलैत हो धरती नै हो .हो जागीर । हॅसी छुटि गेल जौं हमरा त’ अहि मे हम्मर दोष कतए । देख किए नहि सकल दुष्ट कत्तए पानि सुखैल कत्तए । चंचल चपल सुभाव हमर नहिं सोची आगॉ पाछॉ । बूझि नै सकलहूॅ मर्म शब्द के सेहो बनल एक बाधा । कूदि घूमि चली मस्त भ’ हम त रहल जंगल वासी । महल के जीवन रास भेल नै नहि बूझलक ई भवन वासी । कान मे फूस फूस बाजि नै पाबी जे बाजी से जोर ही जोर । केक्कर के की अर्थ लगाबै सुनि त’ हुए मन कठोर । दोषी अपना आप के बूझि क’ हमहूॅ नतमस्तक छी । बेसुद्व.. .. सनकल .मानुस सन सब के घुरि रहल छी । सप्पत बेर बेर न्हि खयतौं आगि मे घी नहि ढरितै । त्रिया चरित्र के अङ मे पुरूखजन मन मानी नहिं करि सकितै । कुरूक्षेत्र सॅ आपस जखन आबैत छल सवारी । सब गाङी प’ सब चढल छल बचल खुचल नर नारी । कियो विक्षिप्त. .कियो चित्कारै कियो मूर्छित भरि बाट छलै । उन्मत्त कत्तैक गाङी सॅ कूदै राह बटोहिया फूटि पङै । वृद्व पीपर ठाढ ओतए ओ अपने नोर बहाबै छल । ब्रह्यसरोवर के जल रहि रहि थर थर थरथर कॉपै छल । तात . ..हम किए गवाह बनल छी कुरूक्षेत्र वा पीपर के । गीता अपने बॉचि रहल छी बढबैत ज्ञान धर्नुधर के । सबटा मोन आबि क’ फाङै बिन कोदारि गङासी के । कतए क’ पटकी माथ कि बदलै भाग्य प्रभू दुरभागी के । कानि कानि क’ भींज र ह ल अछि हम्मर सबटा नूआ । ई भदवारि मास मे सिहरै भूलकै रहि रहि धूआ । दादूर .झिंगुर . कीट . फतींगा सब तरि बील बनाओल । निशा रात्रि मे मेह के संगे ईहो पीर बढाओल । राति राति भर नीन्न नै आबै खिङकी सॅ झॉकि रहल छी । दूर दूर धरि खड नै खडकै सन्नाटा भॉपि रहल छी । चिग्घाङैत अश्व गज संगे असहाय मनुक्ख क’ हाक्रोश । कान मे गॅूजैत रहै सदिखन हिय के डाहि रहल अछि। ओ अठारह दिन सॅ पहिने जीवन नै एहेन विकट बनल । अवग्रह मे छल प्राण मुदा जीबय के किछु संबल छल । तखन छलै उमंग हिय मे तन मे छल उत्साह अजस्त्र । मुदा आब ओ गप कतए आब बचल मात्र अस्त्र वा शस्त्र । नोर नैे सूखै धर्मराज के अजुर्न के तीर नै फेर उठल । भीम गदा के तोङि क’ फेंकल नकुल सहदेव मुरूझाय रहल । कहै ल्ौ हम पटरानी बनलहूॅ कोन विलास हिय मे बॉचल । निज बंधु बांधव तनुज लग पास मे किछु नै रहल । मान केहेन अपमान केहेन जब सखा मीत नै हो अप्पन । हेरै ल्ौ सुहृदय नहि अछि सुन पङल अछि रंग भवन । आदर सत्कार शरीर के स्वामी आत्मा के नहि फर्क पङै । जे एहि रहस्य सॅ वंचित रहि गेल तिनका सब लेल नर्क इयह । राग रंग रस सबटा सोहै अपने राज नगर मे । अप्पन भाषा .अप्पन माटि अप्पन लोक के संगत मे । सोना .रूपा हीरा जवाहिर देल क़त्तेक दुख हमरा । धन के खातिर कलह फूटि गेल उठल भयानक धधरा । दग्घ हृदय फाटैत अछि रहि रहि ज्वालामुखी बनवा लेल । सहृय नै होईय असह्य पीर ई समय पाबि घनघोर बनल । चक्र कोन ई चलल स्वामी सकल मनोरथि टूटि चुकल । पुरूखक अहि अहं खेल मे स्त्री जाति किए लूटि चुकल । नहि चाहैत छल पांडव कहियो युद्वकरैथ स्वजन जन सॅ । अहिना बलगर राज्य हङपि क’ राज करै छै जुग जुग सॅ । राज्य बला बिन राज्य बला सब माटि के अछि पुतला । खेल रचा क’ समय काल मे सब भ’ जायत अछि निपता । माया के संसार मानि क’ जंग छिङल धम गज्जरि । फूस बनल मर्यादा जरि क’ चारू कात पसरि गेल । मुदा नाथ अहि खेल मे तङफल सबसॅ बेसी निरीह प्रजा । भले कियो सिंहासन बैसोथि करत के हुनकर परिचर्चा । झुका चुकल सब भाग्य के आगॉ अपन अपन माथा । मूक बधिर अपंग बनल ओ ठोकैत छथि छाती माथा । घर घर सून मसान बनल अछि देहरि प’ नै कत्तौ डिबिया । बस्ती मे अलच्छ कनैत अछि कूक्कूर . . . गीदङ .. .नढिया । आस त्यागि क’ जीबि रहल अछि नगर गाम के जनता । खिस्सा ककरा कहतै के सब भग्न हृदय के सुनता । सन्नाटा पसरल महल म्ो अछैत सेवक दास खवास के । बाजैत बाजैत कोढ फटै छै जीवन बिनु आह्वलादके । गेसू . .सुखना . . धनिया . . परमा कोचवान सब आबि कहै । चुल्ही सब धरि मिझा चुकल छै नै कत्तौ कनसार रहल । मालजाल सब बिसुखि गेलय यै बैसल नोर बहाबै छै। चारा कतबो राखल सोझा मुॅह कनियो नै घुमाबै छै । कत्तो कियो कल्लोल करय लेल धिया पुत्ता नै आबै । बनल वृद्व सब द्वार प’ बैसल चिंतित दिवस गमाबै । नै कियो गाबै गीत कि फागुन सेहो सुने लागै । भागि गेल रंगरेज की ओकरा रंगो नै आब सोहाबै । नाम प’ हमर धिक्कारैत अछि कुलक े कनिया मनिया ।

प्रतिशोध के महाज्वाल मे भस्म जेकर भेल दुनिया । हम त’ आगॉ बढि सुभदा्रके गरा लगाबए स्वयं गेलौं। किंतु देखि तनल भृकुटि सहमल चुप्प आपस अयलहॅू। पानि पान पीढा लै आब नै पूछैत अछि पांडव पत्नी । पथने छै अज्ञान कान सब तरि बूलै छै कुटनी । सौतिन सब नैहर सॅ आबि संबंधी संग चौल करै । दुष्ट वचन संग गारि श्राप सब हमरा दिस प्रेसित करि क’ । देव .. . आब अहॉ कहू कि हम अहि संताप सॅ त्र्राण पाबि कोना । सकल विश्व मुॅह फेर चुकल बिन आधार क’ प्राण टिकत कोना । नारि एसगरि ठाढ रहै छै जखन विपत्ति आबै छै । अपन जीवन के दाव लगा सबहक जीवन तारे छै।

कर्ण विदारक चीख सुनि क’ कुहरि कुहरि दिन काटैत छी । देख पांडव के घोर व्यथा हम मंडील मंडील भागै छी । युद्व समाप्त त’ हेबा के छलै इतिहास स्वयं भेल खून सॅ लाल। मुदा विनाश के गरदा ..माटि करतै सृष्टि धरि आत्र्तनाद । ई चुनमुनिया सुग्गा सेहो देखि ऑखि लैत अछि फेर । नहि बाजै छै कोयली बुलबुल नहि नाचै दुरखा मे मोर । आनि धरा प’ गढि बहन्ना हमरा कियै घिसियौलौं यौ । कतबो खून राजपूत कहियौ हर क्षण हम घबङेलौ यौ । राजा के अधिकार नै छै ओ फाग खेलै शोणित सॅ। सिथिया. काजरि पाजेब झूमका हेरै बाट विरहाकुल भ’ । चेरी आबि चुप नोर बहाबै आब नै करए ठिठोली ओ । क्षण क्षण ऑचरि ऑखि पोछति

बिसरि गेल अछि बोली ओ । विधना किए निष्ठुर भेलथि अहि हस्तिनापुर के खातिर । एके संग किए जनम लेल वीर.. . धुरंधर औ’ शातिर । आब लगैय जन साधारण जीबैत सब क़त्तेक सुखारी छै। ह’र’ जोईत क’ प्रियतम आबै भनसा करै सुनारी छै । पीढा बैसल पति के सोझा राखै ओ भरल छै थारी । प्रेम सॅ दूनू मिलजुलि खावै चाहे हो साग गेन्हारी । धिया पुत्ता के सोर सॅ हरिदम कुटिया ओकर मनोरम छै । लोकवेद सॅ गप लङाबैत मास नहाबै संगम छै । मुदा छो ट सन सुख नै द’ क’ बना देलहु पटरानी । शत्रु सॅ भरल कनैत विकल राज्य के महा रानी । अहॉ हमर संगी बनि क्षणक्षण हम्मर नोर हरै छी । सकल जगत के दुर्गति कहि कहि मन मे आस भरै छी । प्रभू हमर संबल छी बल छी अहीं आन्हर के लाठी छी । पैसि हृदय मे नयन द्वार सॅ मस्तिष्कक द्वन्द्व मिटाबैत छी । सोचि सोचि क’ व्यतीतक खिस्सा प्राण कटै अछि अहुरिया । बंद भवन कियो देखि नै पाबै पटकुनिया देने बहुरिया । नाथ हमर सौभाग्य अटल अछि तईयो हम विरहिणी बनल । कतबो सजाओल तन के चारिण मन बैरागिन किछु नैसुनल । उमिर कैद के सजा द’क’ हमरा किए छोङि देलहॅु एतय। हे मुकुन्द ल’ चक्रसुर्दशन टुकङी हम्मर किए नै बनैलहू यौ । स्त्री मात्र एक भोग्या नारी आर ओकर सम्मान केहेन। माता हो भले वीर पुरूख के पीबए छै अपमान कतेक । जौं सुनतथि ओ मातृशक्ति के युद्व के ज्वाला थमि जैतै । मातु कुंती गांधारी के संग जननी सब के हित रहितै । बाजि भूकि क’ कत्तबो रहि जाए नारि तरूआरि उठाबै नै। सहने अछि ओ प्रसव वेदना जननी ओ कहलाबै छै । व्रत .. उपवास .. अर्पण तर्पण करि सब के उमीर बढाबै ओ। राज करि काबिल बूझै सब अहि पाछॉ नहि भागै छै । ं मुदा कात क’ स्त्री वाणी के ओ सब चालि कुटिल चलला । राति राति षङयंत्र रचै छल चालि चलब कोना अगिला । एक विनती हम करै छी नाथ स्त्री नै दूषित हुए जग मे । नै रहतै पहचान पुरूख के वंश के थाह नै कियो पेतै । नारि प’ सब धर्म टिकल अछि गोत्र. . .मूल .. .मातृत्व अखंड। करूणा दया और रस संग सब संस्कार के बीजक मंत्र । मातृ प्रथम गुरू होबैत अछि कर्म अपन नै बिसरि सकै ओ। क्षणिक स्वार्थ दैहिक जीवन के भस्म नै ओकर धर्म करै । तखन कहल गीता मे अपने हम ही जग मे सृष्टि विनाश । हम ही छी उदित भास्कर हमहीं जीवन मृत्यु महान । सकल विश्व अछि ग्रास हमर सब पुरूब जनमक खेल रचल । प्रारब्ध के पाप नै पाछॉ छोङै चलेैत आबै छै जन्म जन्मांतर । नाथ अहॉ मन के स्वामी आब आर कहु की वाणी सॅ । जीवन . .हास ..विलास .. विनाश धुलै नै ऑखि क पानी सॅ । मीत अहॉ बस बसू हृदय मे हाथ सॅ हम छी कर्म करैत । नियत कर्म हमरो निर्धारित काटि लेबै जीवन अछैत । प्रियतम कृष्ण नाम धन अप्पन हमरा सॅ नहिं कखनो लेब छीन । भलै करै कतबो जग गंजन सुनैत रहै मन अहॉ के बीन । अहि क्षण भंगुर माया नगरी मे अर्मत्य केहेन ई अभिलाषा । जीवन सुख सौभाग्य भरल हो जगमे बाजै जन प्रेम के भाषा । यशोधरा (2011 दिसंबर मास मे महात्मा बुद्व के महासंबोधि प्राप्ति के 2600 बरख भेलोपरांत ’हम हुनक अद्र्धांगिनी के मोन पाङैत ई काव्य कुसुम हुनक चरण कमलेषु मे समर्पित कय रहल छी । .. ) मुरूछा टूटै .. लोक कहै छल धीरज धरू पटरानी सून ऑखि सॅ भवन निहारैत फेर खसैथ महारानी । टिकुली भाल सॅ खसल भिन्न भ’ लट सबटा छिङियायल । अस्त व्यस्त सब असन वसन छल गाल प नोर सुखायल । पङल पलंग प’ चित्त बेसुद्व संगी चेरी सब हिचुकैत ठाढ। ऑखि खुजैन्ह त’ हेरैत चहुॅ दिस आखीर कोना खुजलै केवाङ। दिप .दिप . दिप. दिप दीप जरै छल अहिना आधी रतिया । ज्वार उठाबैत मोन पङैत छल रहि रहि बीतल बतिया । रंग महल के लाल सोनहरा लिखल सब दरवाजा । मुदा नै कत्तौ बाजि रहल छल दुंदुभि वा बाजा । सोइरी गृह मे पङल किशोरी बनल हलाल के बकरी । बैरीन नींद ऑखि मे पैसल लुटा गेल सब गठरी । नाथ निकसि क’ द्वार फोलल त’ जोत किएक नै मिझायल । कत्तो कोनो खट खूट होयतै ऑखि हमर खूजि जैतै । हम कलंकिनी पङल रहि गेलहु सुख सॅ सुतल ओछावन । भटकै लै ओ विदा भ’ गेला दुर्गम जंगम वन कानन । कोना जीयब अहि सून भवन मे हिय हम्मर कॉपैत अछि । मुईला प सब के डाहै छै जीबतै हम डहि जाय छी । हॅसै छलथि उद्यान मे कहियो कखनो एको पल ल्ोल । तृप्त होय छल मन मंदिर हरियर भाव जगै छल । मुखारविन्द प’ छिटकल हुनकर कारी कारी कुंतल । हुलसि हवा सॅ गप्प करै छल झूमि झूमि क’ चंचल । ई दुधमूहॉ बालक लग मे काल बनि जनु आयल । क्षण मात्र मे भवन त्यागि क’ सब वैभव के बिसरायल । नामकरण ओ अपने कयला बिनु पंडित बिन ज्ञानी । पिता के प्रेम कतय सौं पाओत ई निरदोष परानी । कोना क’ झूलत बॉहि जनक के कोरा कॉख लै’ तरसत । चान सन अहि नेना के देखि मुख मंडल केकर हरषत । फेर कहथि अहि नेना के दोष की भस्म भेल ओ हमर कपार । देखि क’ धधरा विरहिणीके थमि जायत छै बहैत बयार । रचलन्हि कोन विधाता हमरा चिकनी माटि गढि गढि । जानै किएक कहै छल सब कियो लछमी हमरा बढि बढि । तजि गेला एकांत भवन मे त्रुटि हमरो किछु हेतै । निशारात्रि मे सिंहद्वार सॅ अकारण किए कियो जेत्तै । अपना मे एतेक डूबल छथि सोचि नै सकला हम्मर । कोना गिन गिन हम दिवस गमायब मुॅह हेरब हम कक्कर । अजगूत रूप धरि देलन्हि विधाता ओही मानुष के तन मे। मन मे छल वैराग्य समाओल रहितथि कोना भवन मे । लहठी कंगन पाजेब बिछिया हार नवलखा हीरा । कर्णफूल नकबेसर .. ड़ढकस औंठी .. नथुनी .. सीथिया. .। तजली सब सिंगार की काजरि बास ने ऑखि लेलक। अटोर पटोर सतरंगी चुनरिया अगिन के संपत्ति बनि गेल । पीत वस्त्र एक धारण कयलन्हि जोगिन रूप बनाओल । कठोर व्रत दिन बन्हल छल राग मोह सब भागल । ओ संन्यासी महल के बाहरि हम जोगिनिया भीतर । एकसंझा जे अन्न उसीनल उदरपूर्ति के लायक । देखि फूलकुमरि के दुर्गति जनक भाय सब आयल । नहि गेली मुदा छोङि डीह कतबो कियो समझाओल । ओ सुन्नरि सर्वांग एखनि धरि रूपक छलीह बखारी। दूर लग के राजा कतेको पठबए लागल पुछारी । रानी मुदा सज्ञानी एतेक मन सॅ कखनो नहिं हारल । करि बहाना जतन जतन सॅ सब के लग सॅ टारल । आब हमर जीवन वसंत सब हुनके संग रमल अछि । जाहि मार्ग प’ नाथ चलै छथि मन हमरो संग चलल अछि । वृद्व शूद्वोधन देखि दृश्य सब नोचथि अप्पन माथा । आर कतेक दुख देखय लेल रखने जीवित विधाता । तजला प्राण हवेली के’ बाहरि जाकए एकरा । ओ तजली सब वैभव अन्नधन भ’ घर मे एकसरहा । रोज सुरूज के जल चढा’ क’ मीनती मने मन करलन्हि । वन वन मे जे फिरि रहल छथि हुनकर पीर सब हरबैन्ह । तेज घाम मे बूलैत टहलैत हेता भुक्खल पियासल । गरा सॅ नीचा पानि नै उतरैन्ह लागै सब किछु डाहल । सूुन भवन चमगादङि बाजै दीप मिझल दीपदानी । दिवस कतेको पट नहि खोलथि विरह मे रमल दीवानी । आब सखी ई कारी बादरि ंमोन मे आगि पजारै । उमङि घुमङि चहुॅठाम सॅ बुलि क’ हमरे छत चित्कारै । बरसि बरसि सब दिस डूबा देल दादूर झिंगुर बाजै । राति राति भर जागल चिल्का सेहो पीर बढाबै । पानि बूनी मे भींज भींज क’ हेता कोना सौभाग्य हमर । कोमल काया पान फूल सन छल न्ौ रौद बसात जोगर। सुून भयौन जंगल मे हुनका भानस के करि देतैन्ह। जौं संग हमरा नेने रहितथि ई दुख हम हरिलैतियैन्ह । कहै लोक सब छह बरख धरि पता नहि कोनो ठेकाना। कत्त कत्त नै दूत पठाबैथ हारल सन महाराना । जतय कखनो चर्च हो हुनकर सखी सब दोैग पङै फुरती सॅ । कान सुनै किछु हुनक खिस्सा दृग बहै मस्त ी सॅ । अहि जनम की नाथ फेर सॅ दर्शन पायत ई दासी । सोचि सोचि ओही परम पुरूष के नीत दिन रहैन्ह उदासी । हाथ के रेखा रहि रहि देखैथ बजबैथ पंडित ध्यानी । कि गुनल अछि करम मे हमरा कहियौ पोथी बखानी । पतरा पोथा ल’ सब चुप छल ई होनी त’ होनी छल । कोना क’ रोकि देता महाराज कतबो करितथि छल वा’ बल । बाट घाट सॅ आनि पकङि सेवक जन साधु लाबै । जंतर मंतर जादू टोना सबहक नियम बताबै । ओझा गुनी दिन गुनै छल दिसा दिस उच्चारै । कतेक दिवस धरि खेल चलल ई किछु नै घाट उतारै । माईट आनै श्मशान सॅ प्राण प्रिय सब चेरी । छिटै कियो बाट गंगा जल शंख बजाबै ढेरी । ंमुदा लिखल के मेटा सकल कियो ओ पकिया रंग सियाही । निष्क्रिय शासक बैस रहल छल देखैत अपन तबाही । कपिलवस्तु के धुरि कनै छल फफकि फफकि क’ हरदम । तीरथ बनै भलै भविष्य मे एखनि त’ शोक सॅ सकदम । मूॅह सॅ वाक निकसबा खातिर तरसैत रहि जाए गरै मे । हॅसी राज्य सॅ दूर पङा गेल छोङि व्यथा नगरे मे। एला जखन प्रिय ज्ञानी भ’ क’ छह बरखक’ अन्तर प’। महल अटरिया उमकए लगलै नैन टिकल सुन्नर जोगी पर । शुक़ . पिक़ . . शुभ बोली बाजल उङल चलल लग आयल । ंमाल जालसब दौगि दौगि क’ अप्पन नेह देखायल । सखी समेत विमाता आयल छोङि क’ अपन धूनि । बांधव जन के घेर मे बैसल मुस्कैत छल नव मुनि । मात्र क्षण मे बिजुरि चमैक गेल बंद ऑखि के आगॉ। महाभाग प्रिय कांत आयल छथि मन बाजल भ’ बाजा । बलजोरि मन रोकि उठल छली बेलगाम सब घोङा । एना किए उताहुल भेलौं अपने औता ओ सोझॉ । सपन देखल भोर पहर ओ देसदेस बूलै छथि । आगॉ पाछॉ टाढ जनि सब उपदेश गुरू के सुनै छथि । ऑखि सॅ देखता संन्यासिन के झूलसल झरकल काया । उठै किंस्यात मन मे कनिको अहि अधम लेल माया । एला नाथ त’ ध्यान मे बैसल मुस्कैत छली महाजोगिन । परम दृष्टि सॅ शाक्य हेरलखिन्ह इहो रूप केहेन कय लन्हि । नजरि खूजल त’ चित्त शांत छल नै कोनो अवसाद छूपल । नहि छल कोनो राग द्वेष नहिं ऑखि मे कोनो भाव बेकल । कत्तेक ओज ओहि मुख मंडल पर सहस्त्रों सूरज जेना एके ठाम । स्थिर ऑखि .. चुप .. .मौन बैसल जीवन मात्र विराम विराम । क्षण मात्र मे प्रजा उठि क’ ओहि मार्ग प’ चलै लै बेकल। भाय भतीजा . . मातु .. भार्या सब नतमस्तक भ’ दीक्षा लेलक’। भिक्खुनी बनल चलल यशोधरा मुनि के पाछॉ पाछॉ । मन त’ पहिने त्यागि चुकल सब तन के आब की बाधा । जीवन के चरम उद्देश्य बूझि बंधन मे किए रहै प्राणी । छाया बनि क’ मनुक्ख रहै छै आगॉ चलै पिहानी। ठाम ठाममे बुलि बुलि क’ देखल दूखक जीवन । कोना नोर सॅ नोर बहै छै सुनि मुख कष्टक वर्णन । बौद्व विहार शरण स्थली भेल ध्यान .. चिंतन. . . उपवास मनन के । तजि पोथी वेद उपनिषद .. . . मानव के सहज सरल जीवन के । कष्ट भरल अहि संसार सॅ पार उबारय के बेङा । साधन सामथ्र्यहीन स्त्री के नेत्री भेलीह यशोधरा । सबहक लहकैत दग्ध हृदय पर शाश्वत सत्य के लेप लगा । शांत कयल जखन महाभिक्खुनि ऑखि फाङि क’ लोक हेरल । अलख जगौने जखन चलै छल महादेवी संग जन्नी जाति । दृश्य निहारि क’ भरि जायत छल जङ चेतन के छाति ऑखि । माटि के कण कण सटि क’ महासुन्नरि के तरबा सॅ कहै सखी हमरा नहि तजबै हम गहने छी कहिया सॅ । हमरो ई अभिलाष छल की बुद्व के रूपमति रानी। चलै राह पर जनम सुफल करि जन .जन के कल्याण करैथ। आस पङोस के राज मे पहुॅचल विद्युत तरंग सन यशुके गान राजकुवॅरि किछु पछोङ धेलन्हि राजागण लेल बुद्व के नाम । सही अर्थ मे ई सहचरि छल बुद्व एहेन परतापी के जौं ओ छल हेता ब्रह्य त’ ई साक्षात ब्रह्यानी छल प्हिल बेर इतिहास मे नारि राज तजि संन्यास चुनल । दीन दुखी शोषित प्रताङित लेल अपन दृष्टि फोलल । गांधारी हिय मे शूल.. .. .मुदा भाव निर्मूल रहि रहि क’ उठैत ई आह करैत अछि करेज के स्याह कानू त’ कत्तेक आ’ फाटू त’ कत्तेक । सबटा नोर एके बेर सहस्त धार बनि चुबि गेल छल ऑखि सॅ जखन पितामहक ई उदघोष कर्ण कुटीर के चीरैत छाती मे पवेशकरैत मचा देने छल पलय जे पराजित नरेशक’ सर्वांग सुन्नरि विजित क’ हाथ मे सौंप देल जाए तखन की ऋ आकाश मे उङैत पाखी क्षण भरि उङनाय तजि चिंतित आ’ व्याकुल छल बाध बोन मे चरैत उमकैत बैसल ठाढ पसु उद्विग्न भ’ . . . माथ झुका परती के निहारै छल। तप्पत तप्पत बयार जोर जोर सॅ बहैत तबाही के सनेस पसरैत। अंतरिक्ष मे बैसल इष्टदेव सॅ नम निवेदन करैत चिहुॅकि क’ बाजि उठल छल ई कीऋ कारी कारी मेघ अपन लट छितरेने उद्दाम अश्व सन दौगैत संपूर्ण नभ मंडल प’ पसरि त’ गेल मुदा स्वयं के आघात दैत पीटैत चिकरैत कंठ फाङि क’ कानब सॅ पहिनहीं माथ प’ हाथ धेने गुमसुम गुमसुम चुप्पेचाप .. . . .नहि जानि कोन कोन मे गेल बिला तखन कीऋ ओहो अपन रत्नजङित पलंग प’ कतेक काल धरि अपार केस रासि फोलने पेटकुनिया देने .. . . रहितथि पङल नहुॅ नहुॅ क’ भवनक पट्ट खोलि द्वार प’लटकल पीजङा सॅ निहारैत सुग्गा सॅ उदास भ’ बजै ल’ चाहल आखर लाजै . . . .मुॅह सॅ नहि बहरायल मुदा अवज्ञा कोना राजकुम्मरिक’ आबैत काल . . . देखल सब . . . कोना लङखङाति डगमगैत . . हकमैत. तोतराति आध छिध आखर .. . जेठक’ सूखैल घासक’ ढेर जकॉ दग्ध हिय मे लुत्ती लगा सनासन . .जरय लेल उकसाबए लगलै पिंजङा मे बन्न सुगबा. . .आखरक ताप नहि सकल सहि आ’ क्षण मात मे ओकर प्राण । कुम्मरि के हाथ मे रहि गेलेै मुदा ओ कानियो नहि सकलिह समस्त नोर .. . एके बेर. . .सहस्त धार बनि ऑखि सॅ चूबि चुकल छल। करेज फाटय के स्थिति मे क़त्तए ओ त’ बज भेल आ’ बज कत्तौ फाटय ओ त’ फाङब टा जानैत अछि । सब टा पट्ट महिषी .. .सखी सहेली सन्न एहेन कोन पन्न केहेन ई विध्वंसी . . . रचल चक चालि नहि जानि विधाता .. . देलन्हि ई केहेन आघात सहस्त्रो वजपात एक संग . . .क्षण भरि मे उन्मुक्त हवा के सहचरी सुशील कोमलांगी परी केहेन विषाक्त जेना बरख क’ ज्वरोपरांत उठल जुबती मुरूझायल अङहूल सन . . . निस्तेज मुख मंडल ऑखि मे पसरल दूर दूर धरि सन्नाटा कपोल द्वय प’ नोर मे भींजल काजरक’ चॉटा । ई अथाह दारूण .. केहेन करूणा कत्तेक व्यथा । मुदा काल शीघता सॅ बुलैत बॉचय जा रहल छल कोनो आओर पलयंकारी कथा । दारूण दुख हिस्सा मे नहि तोरे टा सब किछु त’ संग अछि ....रहत नै नोरे टा ठठा क’ हॅसल छल कत्तो कोनो राजा सजाबए लै महफा बजाबए लै बाजा । आ’ दौङैत रथ क’ स्वर्ण जङित चक्का मे ओझरायल अगनित कत्तेक रास खिस्सा आईयो कहैत अछि उङि उङि क’ रज कण कोना ओ कचनारि बेकल भ’ निहारल हवेली आ जन जन के मन मे उतारल ओ हरियर पीयर लाल कारी दुपट्टा ओ लहंगा ओ चुनरि चानी के पनबट्टा उङैत तूर सन ओ संध्या कुमारि असरफी ओ मोती ओ हीरा जवाहरि’ बिछिया हॅसुली बाजुबंद साङी नथिया ओ टीका मखमल ओ अटारी निहारल भरि ऑखि रूप जीनगी के पकृति धरा के माता बहिन के फफा क’ कानल काल देखि अपन करनी एकरे चुनल किएक अही परीक्षा घङी लेल मुदा भाग्य अप्पन कयल पूर्ब जन्मक तथापि निरासक लुत्ती मिझाबैत ओ ज्ञानी स्वयं कारी पट्टी बनल छल आ’ सुन्नरि सुनारि के दृग प चढल छल पति परमेश्वर जखन छथि नयन बिन त’ देखब नजरि सॅ हम किएक ई दिन ठिठुरैत . . .निहुरैत . . दुलारैत . मनाबैत चलल छल विधाता अपने हिसाबे मुदा हाथ मे आब ओकर डोर कत्तय ऋ ओ अपने पहिया के दॉत सॅ झीकैत बढल जा रहल छल देखय खेल बिक्कट । इन्द्रासनक परी. . .ऑखि प पट्टी केहेन. . . ई गर्विनी . .यक्षिणी. . . सुखदायी परम नागिन सन फुफकारैत . .कारी जुट्टी. . . बेकल अछि छुबए लेल नगर के माटि वाक विहिन. .सब . .झहरै छै नोर कत्तो नै उत्साह नै कोनो सोर क़त्तेक काल सॅ ठकुआयल ठाढ अछि भोर .. बिसरल अछि नाचय पमरिया आ’ मोर तखन राजपंडित महाशंख बजाओल आगॉ बढि क’ सोहागिन महफा सॅ उतारेत समवेत स्वर मे मंगल गान गायल विधना लिखल हमहू पात सब छी ई रानी हमर भावी राज्य माता नयन बिनुसहचर के कथा छल सुनल सब सबटा नीति के चालि बुझि रानी लै मन मे अथाह स्नेह उमङल ताबैत शोक सॅ उबैर क’ बहुरिया धो मॉजि अपन व्योहार के चमकायल सिनेहक मजगूत डोरी बांधवा मे कलेसक’ ताप ताग के’ जरा दै रहि रहि क’ ओ करूण वेदना आबै हिय के डॉवा डोल करै मुदा ओकर कोढ कहियो नहि फाटल ओ त’ कहिया कत्त नै बज भ’ गेल छल आ’ बज फटै नै फाङै छै सबके एकसरि जुबति .. .जौवन अपरूप पणय निवेदन .. .पति के पतीक्षा पसूति गृह सॅ . .अबैत पथम बाल क्रंदन . . डोलाबैत हिय के . . . अतिशय कोमल गाछ ..वा . . पानि बिनु तङफङाइत .. .छिलमिलाईत माछ . . अथवा कनसारि क’ बौल मे भङभङा क’ फूटैत लाबा सिंहासन सॅ दौगैत त’ मुदा वीरांगी .. . संयमी. . .क्षत्राणी क’ बहकल पएर. . ठामे ठाम ठमकल क़त्तेक स्वर गुंजायमान भेल कान मे दासी के स्वर सॅ बनल पतिबिम्ब गौर भुर्राक़ . .चन्दमासन .कारी औंठिया केश पैघ पैघ ऑखि वला .. स्वस्थ . भावी नरेशक वर्णन सुनि ओकर हाथ सॅ झपट्टा मारिक’ छीनैत नेना के. . .अपन दग्घ हिय सॅ लगौने ‘ नयन रहितौ नयन विहिन . . कतेक पैघ विपत्ति कतेक कठोर पण. . केहेन घोर तप मात बीत्त भरि क’ दूरी प ऑखि . क्षण मात मे पट्टी झटैक़ . . विस्फारित दृष्टि सॅ . .भरि पोख तकैत.... . .अपन लाल के. . . मुदा बज बनल करेज़ . बज नहि फाटैत अछि बज फाङैत अछि। आ’ हाथ कखनो . कर्मक रेघा नांघए के कोरसिस सेहो नहि कयल तखन समय काल के सेहो होबैेत रहलै प्राण बेकल. . एकसरि रूपवती. . .जौवन भार सॅ दबल. . हाथ सॅ टउआ क’ निहारैत नेना शिशु सबहक रूप एहेन केस रासि .. ओहेन मजगुत भुजबल राजीव लोचन . .मक्खन. . मोलायम चितवन पीतांबरी के गोटा .. . धनुषक’ नक्काशी. . .चेरी कहैत अछि. . .आ’ नैनन मे हुनक उपस्थित भ’.. .अतीत .. फरीछा दैत छन्हि सब किछु. . .पटोरक रंग़ .पलंगक़ . चद्दरि. . . .खिङकी. .दलानक’ परदा . . स्त्रीगण सबहक रूप गुण . . .सुनैत गुनैत. . . बसौने अपन मस्तिष्क मे . . एक गोट अजगुत संसार जौं पति नयन बिन . .आखीर तखन रहल की . . हुनक़ . भाग्य संसार. . पुर स्वामिनी . .महारानी. . .अभिमानी .. . . एतेक विस्तृत सामाज्य . .जीबए केर. .ई केहन सुन्नर आधार. . तखन रानी मात कान . . कान बनि गेलन्हि . रोम रोम । भनसा सॅ आबैत सुगंध. . पाक विद्या के पवीण हस्त भॉति भॉति क’ सामागी .. .मात गंध सॅ चिन्हैत. . . परोसति थारी मे स्वामी के. . .विहृवल भ’ पूछि लैथ ‘ई पायस केहेन आर्य ..’ . बनौने हमी छी . च्ोटी अछि पमाण ..।’ . विहॅसि श्रीमान .. बढाबैत ..अतिशय स्नेह सॅ पकंपित अपन बाम हाथ. . . . पमाणक’ कोन पयोजन ऋ.. . जखन हम दूनू नयन विहिन .. . हम जन्मजात . . अहॉक .स्नेह प आघात. भेल भानस. . .अहॉक स्पर्श मात सॅ. रसमय. मधुमय. . . भ’ उठैत अछि. . . .आ’ ई त’ सद्यः अपने कोमल हाथ सॅ रान्हल. . थामैत राजा के बढल हाथ. शब्द मात सॅ हृदय मे उठैत सिनेहक तीव . . .वेगवती धार के छुबैत. . .पकङि हुनक अर्इंठ हाथ. . .कठौत मे धोबए लेल . . दासी बढौलक जलपात ..। . निशा राति मे नीन्न .. किए नै किए बनि दियाद. . . लङए लागैत अछि ऑखि सॅ. . भवनक’ छत प’. .सिहकैत बयार मे .. नहुॅ नहुॅ टहलैत . . हाथ पकङने चेरी कहैत. . . आय अकास मे बङका टा के चान निकसल छै. . केहेन पीयर . .. जेना दूध मे फेंट देने होय केसर कियो. . ।. आ अनेको बिम्ब . . . विगत क’ चान के. . ऑखिक सोझा थरथर कॉपैत. . पूछि रहल .. . कोन अपराध हमर कहु सुन्नरी किएक नै हमरा हेरी रहल छी. . . .चकोर बताह बनल हमरा लै. . .अहॉ केना विरक्त बनल. .? . मुदा ओ पण .. . हिय प लागल छल जे वण. . करेज वज भ’ गेल छल. . .आ’ बज फटैत नहि अछि फाङैत अछि । मस्तिष्क मे बसल सबटा कोलाहल. . समय काल पाबि अर्थ गहण करैत ठाढ भेल सचित . .सावाक .. .आ अनायास . . .जीवन जीबा मे कोनो विशेष नहि देखैत कंटक मुदा काज पयोजन. . . शिशु बालकक उपनैन वा विद्याभ्यास .. . विवाह दान .. .परिछन. .चुमौन .. . समय ककर बंधुआ. . . ककर खवास एहेन पण .. .आय धरि के ज्ञात इतिहास मे । निभा सकल के. . . ताहू मे एकगोट नारि. . जेकरा लेल अहि समाजक नियत सदिखन विकट .. सूर्य. चन्द. .्र .गह नक्षत ्र्र.. .ताहि सॅ उपजल . .्र्र .वत उपवास सॅ एकदम फराक ........... .. . . . आन आन वत . .्र मात अन्न .पानि त्यागि भूमि शयन .. .अग्नि गमन वा एहने सन किछु .. ंमुदा ओ वत आ ई. . .असंभव. . दुसाध्य. . आजीवन दृष्टि बाध्य अछैत दृग़ .. . .्र स्ती एक गोट खेलौना. .्र्र . राज्य जीतबाक कम मे . . . ्र जीत लिअ ओकरो .. .ओ एकगोट वस्तु मात .. ्र. . फहराबू अपन ध्वजा. . .अपन वर्चस्व ्र ओकर कोन र्दद. . .अभिलाष वा ज्ञान .. मात सेविका .. . परिचारिका .. .्र तखन की. . .्र्र तखन विधान इएह बनौल ई समाज .. . जे स्ती आखीर उठौत किएक आवाज़ . .्र घेंट प’ बङका टा के फट्टा आ’ माथ प’ दुपट्टा .. .्र आ मजबूरि क अथाह समुद कत्त ..्र डूबब ्र.. . कत्त ..्र पौङब .. ्र. ताहू मे पराजित राज के दुहिता .. .्र मुदा भाग्य दासी नहि रानी सेहो बनायल. . . . . . . . . .आय सहस्तों बरिख बाद जुग औचक जेना जागि उठल बङका बङका परचम फहराबैत. ्र .. . पूछि रहल अछि हुनका सॅ. . .्र्र्र्र आखीर किएक बान्हल ऑखि प’ पट्टी. . ्र. ई अज्ञानता वा परम निराशा अतीत के एक गोट दुसह दुखद दिन देखौलक संसार क’ पथम विश्व जुद्व. . . कुरूक्षेतक जुद्व ..्र . कारण . ..मूल मे माते. . . . सौ टा संतान करैत घमासान. . .्र जिनक सहस्त पुत कोना नै हेतै एहेन जुद्व. . . . आ तखन ऑखि प’ पट्टी .. . ्र जानि बूझि क’ रहय लेल .. ्र. सत्य सॅ अनभिज्ञ. . . .्र अहॉ के नजरि मे सुयोधन .. .सुयोधने रहि गेल. . .्र्र मुदा कर्म. . .आ .. समाज धेल दोसरि नाम .. .सु’ हटि क’ दु’. . .आ इएह एक गोट आखर .. .्र भ’ गेलै पाथर. . . . ्र ंमानवता के संहारक़ . .आत्याचारी . .लोलूप. . ्र. ंमाता के कोमल उपदेश . . द सकैत छल इतिहास के एक गोट नीक संकेत. .्र आ’ वन वन नहि भटैक़ . ्र. पॉच गाम. . सॅ संतुष्ट .. ्र्र भ’ जयतथि अनंत मे विलिन. .्र . . मुदा युद्व त’ कदापि नहि . तङपि क कहलैन्ह जुग सॅ सुननेछी अहू सुरू सॅ. . . हमरा.. प’ जे कलंक लागै . मुदा अन्याय के गाछ प’ न्यायक फङ नै लागै छै .. . सत्य ई अहि गप के रहि गेलन्हि हुनको मन मे खेद. . . . किएक एहेन विभेद. . ्र. एके कुलक लोक एक दोसरा लेल. .. एतेक पैघ अरि .... . . . हे हरि. . . . . .तखन बहल जतेक शोणित आ’ नोर .. . . हिय नै रहल्ौ कठोर. . छल ओ सहस्त पुतक जननी. .के. . . .युद्व भूमि मे करैत. . हृदय .दावक विलाप. . असहृय वेदना. . . करूण संताप सुनौलन्हि जदुनंदन के भरि पोख सराप. . अहि संहार के .. ओएह संचालक . . अजस्त नोर सॅ . .पट्टी पारदर्शी भ’ . . .दृष्टिगत कयल सबटा नर संहार. .सुन्नर .. .विलक्षण काया . . पङल अंग भंग भेल. . .खसल माटीक मूरत .. .नै बाजय. .्र नै भूकय लेल .. ओ माटिक बासन सब . .एखन धरि नहि भांगल .. .अछि अजहू राखल आंगन. . .ताहि मे पोषल पूत सब कोना .. .एतेक शीघ भेला सपन . मात एक स्ती के माथ प’ कलंक़ . ्र आ’ अपने बुलि रहल छी निःशंक़ . . . हे रणछोङ . . कहै छी हिय तोङि. . चतुराई सॅ अहॉ के अपना अधीन करि के सकैत अछि. ्र. .जे स्वयं चौसठो कला मे पवीण. . .छल सॅ .. बल सॅ . .कौसल सॅ. . .तोङितौ सारथिसुत क अभिमान .. एकसर दुरजोधनक अज्ञान .. . ककरा बल प’ लङबा लेल ताल ठोकितै . . अहॉसन ज्ञानी. . .त्रिलोक दर्शी कहेबाक दंभ रखैत .. ्र. एतेक नहि भेल जे खूनक ई फाग रोकि दैतिएक़ . . . . चारू कात धधकैत आग़ि . . ताहि मे अहॉ तकैत छलहू केहेन न्याय . . . फुसियाही के खेल मे .. . सोचैत रहि गेलौं उपाय .. . चालि शतरंजक चला देलियै. . .अपने पाछॉ हटि क’ .. . मति भष्ट सब के जुटा देलियै. . धिया पुत्ता के कर्म के .. नाम देलियै धर्म के. . . युद्व त’ युद्व होइत छै. .परिणाम . .नर संहार. . तखन एकरा धर्मक नाम किएक देल. . धर्म की अछि .. . कहूॅ विस्तार सॅ .. . . . हङपब .. . मारब . .लूटब. . .जारब .. जाहि समस्याक समाधान . . .गप सॅ भ’ सकैत छल. . .ताहि लेल तरूआरि . . गङासा. .तीर धनुक्ख़ . ई कोन जुगक मनुक्ख .. . पाषाण कालक’ वा. . .ताहू सॅ पहिने के आदिम . . हे अवतारी. . .अहॉ त’ तखनो पकट भेलहु . .भरल सभा मे दा्रैपदी के जखन भ’ रहल छल चीर हरण. . .नूआ त’ बढा क’ वाह वाही लुटल . .जे पांचाली के लाजबचि गेल मुदा अहि कुकृत्यक विरोध मे स्वर त’ उठौबितौ. . गुरूजन. . . दूरजोधन के ललकारिक . .मल्लजुद्व मे पछाङि क’ . . शिक्षा त’ दैतियैक नैतिक़ . . .पांडव दिस स्नेह सिक्त .. . ..कौरव दिस फूटल दृष्टि. . . . आखिर कियै केशव. .्र . हित त’ पांडव के सेहो कतए. . . सब कानि खींझी क’ विलखि विलखि क’ अपन अपन शिविर मे . . . .करि रहल अछि . दारूण विलाप .. . कतए अहॉ के जय जय कार . . .सब युक्ति . . सब तर्क बेकार. . अहूॅ त’ एतबे मे रहि गेलहू. . . ..प्रेम सॅ नहि पूछल त’ साग विदूरक घर खेलहूॅ. . . . ओ समय मान सम्मान करेबाक कतए छल. . प्रेम त’ कत्तेक देल गोपी . . .तैयो तरसल. . देखैत रहलहू धर्मक’ रथ प’ चढल . .भाय भाय के कूक्कूर जकॉ लङल. . . अहि मे अहॉ क’ की विराटता . .पत्यक्ष ठाढ अपने. . .आ’ हस्तिनापुरक दू टा कुलक’ सर्वनाश भ गेलै. . . तखन अहॉ केहेन भगवान .. . .नहि जानि की छल. . .अहॉक दृष्टि .. . .अहॉक ईमान. . कतए उठाबए चाहैत छल स्वजन प’ पांडव अपन गांडीव. . . . निषिद्व भीख लेल मोन बना क’ पङारहल छल निर्जन मे . . . .सदाचारी ओ . . गुरूजन सोझॉ कहियो माथ नै उठाओल. . उकसा उकसा हाथ मे ओकरा हथियार पकङाओल शंखनाद करि रक्त जरैलौ कोखि उजाङय लेल. . स्त्रीजाति के . .धिक्कार अछि हे कृष्ण. . आयल छलहूॅ बहन्ना करि क’ मारए लेल वा तारय लेल ओ लूल्ह. . ई लांगङ. . .ओ कोढ़ि . .ई आन्हर. . ्र. एयह छल अहॉक सैन्य बल . . . ..वा कोनो पैघ छल .. तिल के ताङ . . राई के पहाङ .. . .ताहि प’ अपने ठाढ़ . .नेने हाथ मे सुदर्शन चक. . .बनौने दृष्टि वक .. . केकरा छल बनेबाक छिन्नमस्ता . . हमहू छी ठाढ़ .काटू हमर मत्था. . . . हे तेजस्वी पुरूख .. . देखने होयत जे अहॉक रूप . . आश्चर्य हेतै जुग के. . नायक . . महानायक . .देखि क’ दृश्य. . .फटैत अछि कियेक नहि करेज़ . . होबैत अछि किएक नहि मन मे कोनो दरेग .. . . सुनि क’ एहेन आत्र्तनाद .. . . .दिग्दिगंत धरि भ’ चुकल अछि .. .आका्रंत . . अहॉ एहेन निस्पृह.. . नहि कोनो मोह . . .नहि सिनेह. . . . भीषण ताप सॅ चट्टान सेहो भ’ जाईत अछि विखंडित. . . . .नारि अहॉ के नेह सॅ सराबोर करि देलक . .त’ दोसरो नारिए अहॉक अभिशप्त सेहो कय रहल. . लिखू. . . दिवस .. .समय .. . स्थान .. .्र्र . अहिना अहॉक कुलक घमासान . . . शोणितक एकएक बूॅद जरबैत .. . .करत चित्कार. . फाटत माथ कपार. . . आ’ ओहि शोकाकुल मानस दशा मे . . .करब अपने धरती सॅ पस्थान. . . . .अंत अहू के निकट. . . . होयत एतबै बिकट. . . . कनैत बजैत गांधारी ..्र . संभारैत अपन साङी . . .क्षण मात मे ततेक कमजोर . . जेना . .जन्मजात अशक्त . . .नहूॅ नहॅू . .पहुचल छली त’ महल मे. . मुदा सुनि कोलाहल .. . . कुंतीक वन गमनक’. . . पति सॅ कयल निवेदन. . . आब एत्त की .. . .कतेक सूनब सोर. . . .अहि कष्टक .. . कोन छोर. . . .नहि छल भाग्य मे जे सुख . .तेकर कोन दुख़ . . .लिखनहार सॅ केहेन बैर. . .स्वप्न छल जरि गेल. . . . .सूल सॅ भरल ई महल .. . आब कत्तय रहय बला रहल. . . कान मे सदिखन गुॅजैत अछि . .पुत . .पौत. . .सखा मीतक स्वर . . हिय मे उठैत अछि लहरि. . . सागरक छाति प’ छटपटाईत बताहि. . ्र. काटैत अछि किंस्याह अपने वंश सन आहि. . जतेक बॉचल आब जीवन. कटि जेतैक चलि क’ वन. . . मस्तिष्क मे शांति आर हेतै त’ कोना .. चलू ओहिना चली. . . चलाबैत छथि विधाता जेना. . . . तीनू गोटे. .संग निकसल. . तप करय ..वा अगिन मे भस्म होबए . .नियति. त’ चुप छल . . . ओकर हाथ मे किछु कत्तय .. . . . . । शकुनतला सिनेह सॅ सींचल . .. ड़ूमरिक फूल. . . . स्वप्नमय जीनगी के. . . छाहरि मे टहलैत. . . गुनैत. . . मृग शावकक पाछॉ दौगैत .. . . . .ठिठकैत. . . कलि कलि. . .कुसुम .कुसुम के अपन सिनेहक ताग सॅ गॉथैत. . . बांधैत. . . . सजाबैत. . .संभारैत. . .औचक एक दिन. . . . . अनचिन्हार सन. . . . धून लागल जाङक मास सब किछु झलफल. . . कत्तौ किछु नै स्पष्ट. . . . आ’ ओहि अस्पष्ट सन. . नदी के तल पृष्ट मे एक गोट मनोहर. . . बलिष्ट . .. आहृलादकारी. . . जोद्वा. क’ बिंब. . . .उभरि .. . . .. वेगवान वायु क’ संपर्क सॅ. . . असंख्य पतिबिंब मे परिवर्तित होईत. . . क्षणांश .. . मे तिरोहित भ’ उठल.. . .मुदा ओ एक क्षण . . . . .कएक दिन . . . मास. . . धरि. . . मुस्कैत. . .पैघ .पैघ मादक ऑखि सॅ .. .. . प्रेमक हकार. . पठबैत. . . पकृति पुरूष.क’ ताक झॉक . . ऋषिकन्या के बेकल करैत .. . . ऑखि ऊपर उठाक’ . . . .रहस्यक अवलोकन करय लेल. . . . . चहु दिस हेरैत. . .कमलाक्षी .... . . ..सन्न. . . . । अपन सोझा ठाढ .. . विशाल चुंबकक़ . .पभाव सॅ . .. धकधक करैत हिय के संभारब मे असमर्थ. . .. माथक अवगुंठन. . .कनि नीचा तीरैत. . . .पफुल्लित ... . सरोरूद .. . .मुखमंडल के झॅपबा के कम मे उठेलक हाथ . ।.. झट सॅ ओहि मृणालसन. . . हाथ के थामए लेल . ... .बढि गेल छल उष्ण .. .शोणित सॅ पवाहित . . मजगुत .. पौरूष हाथ .. . धङफङी मे नजरि स ॅनजरि मिललै. . . आ’ बिजुरि चमैक .. .ठनका सन खसि पङल रहै माथ । . . ई साक्षात. . . स्वर्गक अपसरा. . . जौं होईत हमर सहचरा. . . अनेकानेक द्वन्द्व क’ शिकार मे .. . फिरीशान . .फिरीशान . .. ओहि सुन मसान . ..घाटक .. .कात मे. . . प्रेमक पथम वल्लरि जनिमते .. . पफुल्लित भ’ उठल . .. तीर तरकस कामदेवक .. . खेल खेलाङी विधाता . .. लेखनहार सेहो स्वयं । ई ज्वर. . .बढैत. . . .चढैत .. . .दिमाग के करय लै गस्त .. . कएल अपन सबटा अजगुत. . .पॉख़ि . .पशस्त. .। स्वछंद विचरैत आगि .. . खिच्चा पकृति .. .के. ..करबा लेल तबाहि जोहि रहल छल बाट. . . आगंतुकक ठाठ. . .. छल सॅ भरल . . .अपन सिनेहक’ पथम निशान. . . .. सौपैत स्वर्ण मुद्रिका. . . .. यश. . . कीर्ति. . . सुनामक़ . .ध्वजा फहराबैत. . . . फेर अयबाक बोल भरोस दैत. . . . कएक दिवसक अन्तराल . . . .गाछ तर . . . बान्हल .. . अश्व प’. . . . आरोही. . .ओहि . . . घन घोर जंगल मे जाईत रहला. . . . जखन दूर धरि. . . ओकर पीठ हेरैत. . . .निहारैत .. . कुमुदनी. . . . पीपनी खसेनाय बिसरि गेल अपन .. . .। ई सब एतेक शीघ. . . . अनायास .. . कोना भ’ गेल .. . .षङयंत पकृति केर. ..। . ओ कोमल स्पर्श. . . . पानि मे ऊब डूब .. करैत. . एकटा. . . रस लोलुप भमर .. दोसर कॉच कली. . . . . अहि ज्वर भाटा मे डूबए लेल मात कलि. . . उङि चलल . .. रसपान करि. . .सुआरथी जीव .. . अपन देश .. . अपन गली. . .। ऑखि मे चमकैत .. .अतीतक’ मोहकता .. . . ओ सुन्नर चितवन. . . ओ मादक चपलता .. . . ठिठकल सन घर मे. . . .बिसरल सन रस्ता. . . । सखि बृन्द बेहाल .. .देखि कुसुम गुमसुम .. . हेरायल हेरायल चालि .. . . क्षण मात लेल. . .जे नहि कहियो स्थिर. . विदयुतलता. . . आखर सॅ पहिने हॅसी निकसै ठोर सॅ. . . नव तरू. सन. . ड़ोलैत ओ भामिनी .. . आय हठात .. . किएक . . .एना गुम .. . . फराक .फराक बैसल .. . एसगर ताकि रहल अछि उदास. . . . गुलाबक खिलल फूल प’ .. . म्ॉडराति . . . गुनगुनाति .. . चमकैत कृष्ण वर्णी छलिया .. . के बेतहास .. . । छिटकल छिटकल सब सॅ. . . नहि जायत अछि संगे नहाय .. . . नदी. . . वा फूल लोढय .. . फूलवारि .. . सदिखन ऑखि मे नोर .. . भेल भाव विभोर. . . मुसैक उठैत अछि कोने.ा पहर. . . तोङैत डारि. . .दोसरे क्षण. . . घरक पछुआति . ..मालिनी केर .. . जलधार मे फूलके खोंटि . .खोंटि क’ करैत पवाहित .. . हेरैत अछि . . .शांत .. .नील. . .आसमान .. . हिमालयक कोरा मे .. .पकृतिक झोरा सॅ. . निकासैत अछि पुष्पदल .. . भ’ भ’ क विहृवल. . . . कखनो क’ विहुॅसि क’ बजैत अछि स्वगत. . . ई वियोग घङी. . .अपनहु के .. . केहेन लागैत होयत कांत. .. एक प्राण आ दू काया . .. के रचल ई माया .. . । एतेक दिवस बीत रहल .. .. लेलथि कत्त. . .खोज खबरि. . .। हे नदी . .. . माते . . . साक्षी अहीं. . . . ओही गंधर्व परिणय के. . . एतेक विलंब तखन किएक भेल .. . बहै छन्हि .. . दूनू ऑखि हर हर. . . . सोझा राखल. . . समिधा के जारैन. . . तोङैत अनेरे. . .बनाबैत. . बाढनि .. . . कखनो बैसल कखनो ठाढ .. . तखने याचक आयल द्वार. . . . देखि घरक फूजल केवाङ. . . पाषाणी. . . मुस्कैत .. . छवि के निहारैत. . . चलला भिक्षुक़ .. चुट्टा झमकारैत .. . एहेन ओहेन नै ओ. . .ऋषि दुर्वासा. . . जिनक शब्द मात छल गङा.सा .. . . कि बिसरि जाए ओ जिनक यादि मे छै डूबल. . टटा रहल छी हम कएक सांझक भूखल .. . . दौगल सखी. . . .ई की कहल हे भिखारी . .. . नहि अछि सुध मे हम्मर कुमारि. . . . मुदा ताबैत .. .ओ वाक मुॅह सॅ निकसि. गेल .. . उध्र्वगामी हाथ .. .क्षण मात लेल ठहरि गेल. . ई की केलन्हि . . . विधाता हम्मर कंठ स्वर सॅ. . . कोना बॉचव आब हम अहि कलंक सॅ. . कमंडल सॅ चुरू भरि जल ल’ क’ फेंकलन्हि सकुन प’ अभिमंत्रित करि क’ इतिहास. क पन्ना प’ रहब अहॉ छापल .. पतापी पुतक जननी कहायब. .. . एखन त’ भोगय पङत हम्मर सराप .. . . किछु बॉचल अछि अहू के ओही जनमक पाप ..। सखी सब तखन. . . विलखिक .. . आशम मे दौगल. . . देशाटन सॅ आयल कण्व सॅ कहल छल .. . “हे तात .. . अपनेक . . .परोक्षक .. खिस्सा. . . सकल आशम के बिलटा रहल अछि .. . . गुमसुम .. .सूकू केर. . .प्राण आब बचाऊ. . . आ’ दुर्वासा क’ सराप सॅ एकरा हटाऊ । चहुॅ दिस अंधार भ’ चमकैत बिजुरि संग .. .उल्कापात भेल होय. . .सून .. . . चान्ह आबि गेलन्हि .. . . धम्म सॅ कुशासन प बैसि माथ हाथ. धेने ऋषि .. . कर्णकुटीर मे .. . ई केहेन पलयंकारी .. ..संदेश .. . सौर मंडल मे .. . चक .चक करैत चन्दम ासन मुखवाली शकुन के .. . अम्लान पंकजक ई हाल. . . जेना मुठ्ठी भरि छौर रगङि देने होय कियो .. . विरहाकुल. . .विवस पिता. . के. . सहजहीं मे देखाय पङि गेलन्हि . .. भविष्यत शेष .. . . आगामी संकट सॅ सहमि क’कानि .. . .वा .. .दूरस्थ भवितव्य सॅ .. .मुदित मुस्काबी . . नहि जानि पओला . . ऋषि विशेष. . . . .। सखा मीत गण आबि सूझेलकैन्ह बाट .. . हतोत्साह किएक गुरूवर .. . . . अहू नदी के . . . अवस्स हेतय कोनो नै कोनो घाट. .. . बाल्यकाल मे पिता आ’ यौवन मे पति भवन .. . आब हम सब आन .. . .ओ अप्पन .. . . चलैत चलूू करए लेल उपाय .. . . करब नै ताधरि विराम .. . विदा करब .. . सजा धजा क’ .. . पुष्पक महफा . .. तरू वल्लरिक झालरि . .. शीघ गमन करैत .. .सखा बंधु .. . कुल गौरवक परिचय दैत .. . षोङषोमंत्रोपचार सॅ देवी के पूजन अर्चन करैत. . . स्नेहिल .. सकुन के स ंग चलबा लेल उताहुल भेला त’ .. . . मुदा आगॉ पाछॉ. . . जङि. चेतनक हाल विचित .. . श्यामा. . . कजरी .. . धनि .. . चतुरंगि .. .गोला .. गौ . . . बाछा .. बाछी. . .रंभैत. . .रंभैत. . . ध लेलक़ . .पछोर .. . आन पशु पाखी .. . मेष .. . वृषभ .. . मृग .. . तोता .. .मैना .. . सकुन पाखीक’ झूण्ड .. . संरक्षित भेल छल जेकर सानिध्य मे . . . शिशु सकुन. . . खंजन. . . कचबचिया .. . सूझै नै किछु .. .देखाय नै पङै बटिया .. . बिलखैत .. .बिसुरैत .. . छाती पीटैत .. .दाय . .. पितियानि .. पीसी माय .. . .सखी सम्पदाय .. . . कोढ फाटय वला बिछोह सुनि .. . गाछ बिरीछक जङि डोलायमान .. . अपन लता गुल्म सॅ .. . डारि नीचा करि .. . छेकए लगलै. . .महाभागक बाट .. .क़ि . . .सून करि क’ अहि आशमके. . . .कतए नेने जाय छी सौभाग्य. . पाछॉ मुङि तकने छलहि .. . . मृगनैनी अश्रुपूरित ऑखि सॅ. . . . . छुटि रहल अछि .. . ई माटि .. . ई पानि. . . ई गाम .. .ई धाम .. . ई लोकवेद .. ई पशु पखेरू. . . ई सखी समाज़ . . कतए सुनब. . .ई स्वर. . .ई साज .. . . फटि रहल छलन्हि. . .हुनको हिय .. . अहि विदागरी क’ मर्मान्तक कष्ट सॅ. . . कानि रहल छलीह. . .असंख्य नोर .. थमि गेलन्हि पएर .. .कएक क्षणक लेल. . मुदा मचबए लगला .. .पुरूखगण सोर .. . . आ’ नहुॅ नहुॅ करितो. . . अङियातए आयल लोक .. . आपस भेल. . .हृदय मे भरि क’ शोक .. . कतेक सून ई आशम . ..जतए कल कल बहैत. . . धार सन. . . सबहक़ . दुख सुख़ . .क’ चिठ्ठा लिखैत. . . हॅसैत. . गलबहियॉ दैत. . .ऑखिक तारा .. .सकुन .. . नैहर तजि .. .आय सासुर चलि जाय रहल छली. . . दूर देश. . .जतय कियो अप्पन नै. . .मात . .नेहक पतीक पति. . .आ’ हुनक प्रारब्ध .. . .। मुदा दौगल चलल भाग्य. . हुनका सॅ पहिने.. . .. आ’ रचल सब टा. . कुचक. . . .बिन ककरो कहने .. . दोख काल. . ओही माछ के देल. . . आंगुर मे गस्सल मुद्रिका जे गीड लेल .. . तखन अहि प्रेमक मात एक जीबैत निशानी. . . श्वॉस लैत गर्भ मे. . . .एक कोमल सन प्राणी. . . . । एतय राजा के गौरव फराक़ . . . बहराय धाखे नै किनको मुॅह सॅ वाक़ . . ऋषि के निवेदन प’ तमैक ओ उठल छल. . . के. . . ई. .. .दुष्पचार लेल. . .खिस्सा गढैत अछि . . जौं हमरे अछि ई गर्भस्थ . प्राणी. . . हेतै . .त’ अवस्स कोनो हमरो निशानी. . . चेन्हासि. . . चिहॅुकि .. कुंतल .. . आंगुर निहारै छथि. . . नहिं बॉचल अछि .. .आब कोनो पमाण .. . देखल नहिं प्रिया के तिरछियो नजरि सॅ तिरस्कार कयल सबके वचन सॅ एकांतके भावुक .. .रसिक ई सखा. . . . समस्त जन के सोझॉ बनल बघनखा .. . . सहस्तों नौह सॅ मुॅह नोईच रहल अछि. . . असंख्य खापङिक’ कारिख़ . .हमरा मुॅह प’ पोईत रहल अछि. . . बहैत बरसाती नदी बनल धार दार नोर .. . केहेन मिथ्या. . .. . . कपट .. . छल. . .कत्तेक फुईस ई सोर .. . . . दुनु हाथ सॅ पोछैत अप्पन नोर. . . . . देखैत अछि .. .उचुकिक’ राजा के झॉकि .. . दया .. . प्रेम. . विह्वलता तुरंते छटि गेल. . . आ’ खंजन नयन मे .. . .विद्रोहक लुत्त्ती .. .भडकि गेल. . . . विश्वामित आ’ मेनका के शोणित फन फन करैत .. . करय लागल किल्लोल. . . हन हन रणचंडी .. सन .. . हुंकारय लेल. . . भरल दरबार प’ नजरि एकटा फेरैत. . . क्रोध सॅ कॉपैत .. . महाराज के हेरैत .. . . जोर .जोर आबैत जाईत श्वॉस के रोकैत. .. उठौने छल अप्पन दहिन हाथक आंगुर. . . करैत सिंहासनदिस ईसारा .. . कनि काल लेल सभासद की. . . बहैत बयार धरि चुप्प. . कोटि कोटि ऑखि उठल एक संग़ . फडकि रहल छल हुनक बाम अंग़ . एतेक पैघ छल. . . भेलै नहि आस्था आ’ विश्वासक जीत. . आ’ अछि कनियो नहि ई पाखंडी भयभीत. . . कनि काल . बिलमैत. . .कहल विचारि. . . हमनै कत्तौ सॅ . . .कनियो अबला नारि .. . करमक गति स्वीकार अछि हमरा. . . मुदा जाय छी हम सब सॅ आब कटि क . . नै भिक्षा हमर जीवन के संभारत. . . नै ककरो निठुरता जीवन के उजाडत. . . अपने की त्यागब .. हमहीं अहॉ के तजै छी .. आ जाईत जा. ईत ई भाषा भखैत छी. . . . जे ढोंग परिणय. . .के करि क’ जरौलक चिता प’ .. . .नहि . करथिन्ह माफ ओकरा कहियो विधाता .. . तडपतै. . .माछ सन रौंद सॅ धिपल बौल मे.. सिनेहक छॉह लेल ओ रेगिस्तान मे भटकतै .. . चपल वेग सॅ ओ चंचल चलल छल .. . हिय मे कत्तेको के हूक सन उठल छल. . ई लचकैत कॉच करची सन काया .. . ई जननी के ताप . .. . कि अदृष्टक’ माया. . .. मानस पिता नोर ढर ढर बहौला . .. मुदा मानिनी अपन पण सॅ हटल नै .. . अनचिन्हार बाट प’ उठल जे पग छल .. . ओ साहस. . .निश्चय ..... . . कर्मठता सॅ भरल छल. . . . बनल नै बिरिहिन . नै .. .. साधु संन्यासिन . . जनम द’ कुम्मर के रहल जंगल वासिन .. . सिंहासन . ..त नहि छल . ..परंच खटिया .. .पटिया .. . बैसि राजरानी ओ अडा जमौलक़ . . हुनक रूप आ’ गुण सॅ वशीभूत. . .सिनेहक भरल पात ल’ लोक दौगल. . पिता के सिखाओल ओ धर्मगत वाणी. . . ओ क्षात कर्मक सुृदृढ रस्ता .. . . . . अघोषित . ओ रानी .. . बसल सबहक हिय मे आ’ कण कण के आदर सॅ पुष्पित . ओ जीवन. . . गूॅजल जखन ओत्त पथम किलकारी. . . .त’ हर्षित विधाता .. . पफुल्लित नर नारि. . . बजौलक बधैया के ढोलक .. .मॅजीरा. . . संगहि बजौलक .. .लोटा . ..आ’ थारी .. . . इएह आब संगी. . . .नाता मीत. . .गोतिया. . . हिनके सानिध्य मे पलैत बाल शासक़ . . . गोर. . .भुर्राक़ . .पुष्ट ओ बालक़ . . स्फूर्ति. . ..अजब. . .तेज सॅ ओ भरल छल. . . . करैत मल्ल जुद्व . . . .संगी बनवासी नेना संग़ . . सबके करैत क्षण मे चीत्त ओ चलैत छल .. . . सूतल सिंह शावक के दुलारैत मलारैत. . . उठल शावकक संग दौड लगबैत रहैत छल. . . गिनती सिखल. . .सिंहनी के दॉत गिन गिन. . . मतारी के सुनबै. . .निरदोष बालक़ . . नै अश्व के .. . . सेर के आब नाथब .. . आ’ माता हुलसि क’ गरा सॅ लगाबैत .. . पठाबैथ फेर सॅ युद्व के गुर सीखा क’ .. . कोना सैन्य .. . बढत .. . न्याय करब त’ कोना .. . केहेन कूटनीति सॅ .. . रिपु हेते पराजित . .. पाठ पढि जननी सॅ आबैथ. . .. संहतिया प’ आजमाबैत . .. . वनवासी गरब सॅ निहारैत. . . . रानी के पूत . . .सिंह के पछाडैत. . . . चट्टान् ासन महिषि. ठाढ पाछॉ. . . नै चिन्ता फिकिर . . . . .नै भयगस्त काया . .. विचार मे घोरैत. . ..अमिय के पियाला .. . आ’ काया मे ढारैत पौष्टिक निवाला. . . . भरत नाम्नी ओ जे राज बनल छल. . . ओ शकुन के जीवन के धन धन कयल छल. . .. . . .. . .. .खिस्सा बाद के जे रहल होय. . . रहल अनभिज्ञ .. सत्य सॅ जग सदिखन. . . राखि देने छल. .दोष हरय लेल .पुरूषस्य चलित्तर के .. . . दुर्वासा. . .वा .. .माछक’ गप .. . . सुनल हेता .. . राज़ा. .भरतक डंका. . अजस्त. . . . . . . .बल. . . .शौर्यक .. . .साहस के खिस्सा जानै कएक सहस्त. . . . एतेक . टा सामाज्य. . मुदा. . कत्तो नहि उत्तराधिकारि .. . ऊपर सॅ आसन्न वृधावस्था. . .. चिंता नीत बढाबै. . .छल .. . मंति .परिषदक सलाह मानि .. . ओही जंगल दिस कूच केलथि. . .लिखल. .जतए .. पात .. पात. .प’ वीर. . . राजकुवरक नाम. . . . . देखल जे आनंदकारी .. .रूप. . .गुण . ..सॅ भरल देह. . . मात .. . पिता के नाम सुनि .. .क़ रेज औचक धडकि गेल. . . आंखिक सोझा .. .व्यतीत .. .करय लागल किल्लोल. . . ओ पाखीक गीत. . . .पकृति. . .ओ कुंतल . .हास्य स्मित .. . बरखों पहिनुका सूखल घाव. ...मे . .. टीस मारल असंख्य .. . . ई. . .की कयल. . विधाता .. . राखि .. .हमरे कान्ह प’ तीर. . . हमरे. . .. तनुज .. .हमर अंश ई. . . आय ठाढ़ . .कत्तेक गंभीर .. . . मात. . .शकुन. . . चेन्ह सकैत अछि. . .हमर पवित . .. सिन्ोह. . . बौआबैत .. .अतीत मे.. .. . . चलला .. . .बालकक पाछॉ .. . भयौन वन .पदेश . . .. वर्जित . ..जतय .. .भास्करक पवेश .. . दहाडैत .. .चहुॅदिस .. . भौल .. .हाथी. . . बब्बर सेर. . . . ओकरे संग दौगैत बाल्य भरत .. . .धेने सम्राटक हाथ .. . .. . . पदमासन मे बैसल . . .साधना लीन. . . लग मे होईत सोर .. औंचक मे देलि ऑखि फोलि. . . पत्यक्ष ठाढ . ..क’ल’ जोडने शासक .. पुतक पाछॉ. . . ऑखि मे भरल. . प्रायश्चितक भाव .. . पाकल केश .. . झूकल छाती .. .आगॉ के दू दॉत टूटल. . . मन मे कनियो कोनो भाव नै उपजल. . . ओ ओहिना स्थिर. . . . माता के हाथक ईसारा .. . .दैत कुसासन .. . भरतक संग . . .गहण कयल. . .नृपनंदन. . . चकित .भाव सॅ नहि हेर सकला. ..चहुकात .. . सकुन के मुख मंडल . . . एकदम सपाट. . . काल .. दुबकि क’ लागल छल कोनटा .. . ई सबल नारि . . .फाटत की नहि प्रियतम . .समक्ष .. त्रिया चरितक अ’ड मे खेलत खेल कोनटा. . . . कनतै .. .खींझतै. . . .छिडियेतै. . . .तिरस्कार .. . आरोप .. .पत्यारोप. . . . मुदा . . .नहिं किछु एहेन सन .. . अकूत. .धैर्य. . . .सहज स्वर .. .कनियो नहि तिक्त. . . कनियो नहिं लोहछल. . . स्वर फूटल छल सहज सुमंगल. . . . चिन्ह गेलौ. . राजन. . .हम अपन सिनेहक बंधन. . . नहि चाही हमरा कोनो चेन्हासी .. नहि राज मुद्रिका. . .नहि कोनो कंगन. . . . पथम प्रेम के उपजल फसिल. . अछि उपस्थित अहीं के समीप. . . बॉहू .. ...बल. . ..बुद्वि मे अहूॅ सॅ बीस. . कहि रहल अछि लोक चहू दिस. .. स्वीकार्य होयत त’ अपने के सौभाग्य .. . ओकरो गौरव .. .पिता के हाथ. . . रहतै माथ .. . त’ दिग्दिगंत. . . हेतै स्तुति .. .बजतै .. .घडीघंट भेल समाप्त. . .उत्तरदायित्व हमर .. . भावी सम्राट के गढब के. . .पोषब के. ।. .गहण करू हमर नमन. . . हम आ ब परम स्वतंत. . . स्नेहसिक्त हाथ भरत प’ फेरौलीह. . आ’ राजा के चरण मे माथ झूकाक’ पस्थान अपन मातृकुल लै भेली . .. .। फागुन राग फागुन मे रास रचाऊ सखी फागुन मे. .।। 2. . पीयरी पहिरने खेत मे देखियौ. . . नाचि रहल अछि जौवन. . . . सिनुरिया सन दहकि रहल अछि. . . चारूकात वन उपवन .. . . गरमाहट सॅ भरल ई सूरज .. . आब नै मूॅह नुकाबै. . . जोर जोर सॅ चलैत वसंती. . . सेहो डहकन गाबै. . . . मन उमकि रहल बेजोड़ . . चाहै सीमा तोडि लै फागुन मे. . . . .. .।।2 असगर कोना रहब फाग मे हिय हम्मर नहि मानै. . गाछ बिरीछ सब मुसिक रहल अछि कि सोचै कि जानै. . . . आस बढा क’ पॉती लिख लिख़. . पठबैत हम प्रियजन के. . . मग मे बैसल बिहुॅसि उठैत छी. . दीप जरा नैनन के. . . . हम्मर आंगन स्नेहक धाम बनल फागुन मे .. . .।।2 गठजोरि खेलु फाग सखी फागुन मे. . . . ई पूआ . . . ई मालपूआ. . . . ई दहीबडा. . . .मूॅगबा .. .इमरती .. . पहिने खेलू फाग पोख भरि पेट मे तखने ससरती. . . . बिन पीने . . मदिरा भॉग . .बौरैलौ फागुन मे. . . .. बलजोरि खेलूॅ फाग सखी फागुन मे. . . . .।।2 काशीक घाट बाबन टा घाट सॅ टघरैत बहैत नुकैत . . .मुस्कैत ऐंठैत. . .उमकैत झूमैत. . हॉफैत चलि रहल अछि नाह मद्विम मद्विम .. . . ऊपरि आकाश केर अपन बाहुपाश मे नेने कारी कचोर मेघ छिटकौने सबटा जट्टा बनौने बडका छॉहरि दैत जेठक जरैत रौद सॅ बचवा के असीरबाद पानि कम छै दूर दूर धरि सूखल कछार भनभनाति. . .असंख्य बौलक स्वर पर्यावरणक अधोगतिक पसारए चाहैत अछि खिस्सा मुदा हुनकर पठाओल हकार हुनक दरबार नहि सुनब आजु हम केकरो आनक विलाप नहिं देखब हम मंडिल के दुर्गति पंडा सबहक लूट खसोट वृद्व आ’ नगर वधू. .. प’ विभत्स रस क लेपन वा चहूॅ दिस पसरल कूडा कचरा के साम्राज्य खसत त’ अवस्स नोर हमर आय मुदा विश्वनाथे के मंडिल मे जाए दीवोदास क् राज्य मे औघड के त्रिशूल प’ बसल जे धाम वएह त’ हमर काशी हमर प्राण वएह त’ हमर स्वप्नक चिर प्रतीक्षित गाम ।। 2सारनाथक संत तपस्वी इम्हर एकांत मे प्रकृति सुन्नरि के रूप लावण्य निहारि एतेक ऐश्वर्य पाबि कतेक आनंद भेटल अपनेक मुख मंडल सॅ ज्ञात होबि रहल अछि यद्यपि छी ध्यानमग्न अपन पॉच शिष्यक संग गाछक नीचा तीतैत अविचल .. . . काल वा मौसमक प्रहार सॅ विजय वा पराजयक आस सॅ पृथक एकसरि लडैत अपना सॅ बढैत जा रहल छी र्निद्वन्द्व. . . सहस्त्रों बरख पहिने देल ओ प्रवचन अनुगुॅजित भ’ रहल अछि शंखनाद बनि मॅह मॅह करैत अछि वातावरण चारूकात अपनेक दैहिक सुवास सॅ ओहि दिन सॅ विलमल समय . . . चकित ..मुदित सीखा रहल अछि अष्टांगी मार्गक चरम ऊद्देश्य समेटने अपन बोरिया बिस्तरा नेने हाथ मे. छडी कमंडल .. . . ओहि चिरंतन बाट के बटोही जेकर पाथेय मात्र सत्य छै जीवनक कटुतम सत्य। । चिडैक अभिलाष एक पाखी मीत सॅ किछु कहि रहल छल डारि कत्तेक हम देखल अहि जनम मे भेट नहि पाओल हमरा कत्तौ बसेरा आस के एक खड नेने ठाढ एत्त । कखनो त’ कत्तो कोनो बिरीछ भेटत घर के एक नींव राखि .. . .. . . . खोंता सॅ बाहर हमहूॅ भरि पोख हेरब हमरो अंडा हमरो चिल्का हमरो संगी हमहूॅ कत्तौ चैन सॅ किछु राग टेरब मीत घूरल देर धरि निःचेष्ट भ’ क’ छोट एतेक स्वप्न कतैक ई अकिंचन भॉपि क’ ओकर एहेन मनोभावना के उडि चलल घबडा क’ ओ कमजोर पंखी। भटकैत स्वप्न बड़का... .अजोध. . . अजगर.. . . ससरति.. ससरति .. . . गिड़ने जा रहल अछि . .. . सब किछु .. . अप्प्न मान. . . मर्यादा अप्पन खेत पथार. . . अप्प्न. . .संस्कार विचार.. . नहि रहलै आब. . . कत्तो संझिया चुल्हि नहि बॉचल चुल्हिक छौड़ .. । आब त’ .. .गैस प’ बनै छै परसौती के दबाय घरक काज धंधा सॅ निफिकिर ... कन्या सब देखैत अछि टीवी. . के सिरियल .. . .’ बड़का बड़का विज्ञापन आ’ हेरायल अछि स्वप्नक दुनिया मे जतय बड़का गाङी मे. . . बढिया सूट पहिरने सदिखन मुस्कैत .. .सुन्नर राजकुॅमर . घुमाबैत अछि स्टियरिंग आ’ गाबै अछि सुहनगर प्रेमक मधुर मधुर गीत . .. . कात मे बैसल . । . .अर्धनग्न . . ..केश छिड़कोने सुनै अछि .. भाव मे ... डूबल ई प्रीत ... मधुर मधुर गीत.. ..वा जीवन संगीत ... मुदा गामक कन्या के नहि छै ई भान जे अहि सूटिंग के बाद नै ओ राजकुमर .. .नै ओ सुन्नरि. ..आ’ नहि ओ बड़का गाड़ी..माया जाल छै सब . .। सब अपन काज सम्पन्न करि .. . आओत अपन औकात प’ . .. . गाङी जेतय गाङी वाला लग़ .. दुनु के भेटतै पारिश्रमिक . . नाटक करबा लेल . आ’ फेर . . .ओ सब . .. कोनो ऐडक’ लेल. .. . ताकैत रहतै बाट ... मुदा बजारक .. .चलाकी बूझतै .. कोना कन्या. . . .. .ओ बेच की रहल अछि ओ त’ एकरा .. सत्त्य मानि .. टुटि रहल अछि . .अपना सॅ . .. अपन घर सॅ.. .अपन जड़ि सॅ . ई चमकैत अजगर. . . चुसि रहल छै. .. लोकक निर्दोष स्वप्न के आ’ भरि रहल अछि । ओहि मे ..कुंठा .. .मोहभंग .. . आ’ अंगोर. ।.. आजुक विद्यार्थी लोदी के लोढी बूझू सिस्टम सील समान थिंकर के कुतरूम बूझू पीसू एक समान बनत चहटगर चटनी । क्राम्ट  क्राम्पटन फैन भेल हॉब्स हासुआ छाप अकबर आब होटल बनल फैराडे   फेराडॉल बनल बढिया विज्ञापन  । भू के नक्शा  ताड़ि क’ अपन बनाउ प्ला न जतए मोन तत्त राखू एशिया यूरोप आनि रहत वसुधैव कुटुंबकम हरिश्चन्द्र औ प्रेमचंद दूनू बेमातर भाय एकके काज पोथी लिखब दोसरक गप्पे केनाय देखु इ नब नमूना । औरंजेब भागल कब्र  सॅ दुख सॅ ढहि गेल ताज मुँह नूकॉने हिम छलाह देखि विद्यार्थी आज एना की उचित लगै छै । सरस्वती के राज मे कानि रहल इसकुल ओहो केहेन दिन छलै बिहॅसति छल  गुरूकुल केहेन बयार चलल छै  । असमंजस ओ लड़ाइ तँ अहाँ स्वयं लड़ने रही़ जय पराजयक बिनू चिंताक लोकवेदक निंदा केँ अनठाबैत़़ सेहो तखऩ ओहि बयस मे जखन अहाँकेँ गट्टा एतेक मजगूत नहि छल जे सम्हारि पाबैत हथियारक बोझ़ एक दिस चक्रब्यूह़ आ़ऽ दोसर दिस अनंत जुआएल जोद्धा़ आने कि दुनु छोर प मृत्युतक तांडव मुदा बिनु इथ़-ऽऽउथ क अपन लक्ष्य मे लागल अहाँ संग्राम सँ मुँह नै नुकेलहुँ फेर आय चिकन चौरस अहि मैदान मे़ एतेक उदभ्रान्त किएक़ बढैत चलू .. विलमू नह़ि जिनगीक ई लड़ाइ सेहो अहीं के लड़बाक अछि़ हमर बीर अभिमन्यु .. । आतंकी गाम हाथ पएर मोङने ओ सूतल सूतल सन गाम़ जतए एखनो कियो कियो गाबैत छल पराती़ झूमऱि आ’ नचारी़ जतए एखनो रहैत छल विभेदक बावजुद संग संग बाघ आ’ बकरी । खरिहान मे पसरल छल दूर दूर धान हसैत ठिठियाति लाेक क’ छलै भरि मुँह पाऩ नव नूकुत प्रेमक होइत छल चर्च़ आ’ नीक बेजाए मे बुद्वि होए छल खर्च़ जतए अखनो बाँचल छल आंचरिक लाज़ जन्नी जाति जी जाति क’ करैत छलीह अप्‍पन काज । जतए एखनो भोर सॅ सांझ धरि बनैत छल किसिम किसिमके भानस भोजन सॅ तृप्‍त सुखासन पॅ बैसि ज्ञानी जन पढै छला मानस़ जतए एखनो सपना छलै भरत सन राजा के लछमन सन भाय आ’ रामक’ मर्यादा के़। ओहि सूतल सूतल ओंघाएल सन गाम मे पैसि गेल छल एक दिन अजगुत अन चिन्हार लोक रंग ढंग सॅ विचित्र हाथ मे कड़गर हरियर नोट़ आ’ बंदूक़ आयल छल खरीद शान्ति फैला क सब तरि भ्रान्त़ि । खेत खरिहान मे उगाबए लेल बारूद आर डी एक्‍स ओ सब छिटैत रहल पाए़ आ’ देखैत देखैत गामक पोखरि भ’ गेलए विषाक्‍त बंद भ’ गेलए पराती आ’ डेरा गेलए समाज़ आेत्तए आब काबिज छै भयानक अट्टहास करैत मुॅह सॅ उगलैत आगि बला आतंक क’ घिनौन राज । लिखत के प्रेम गीत कदंबक गाछ तऽ कटि चुकल छऽल आब कृशकाय एकसरि ठाढ राधा हेरए छलीह एखनाे कृष्णक बाट सखी सब पहिने संग छाेङलन्हि आब मुरारी सेहाे लापता केहेन घाेर कलिकाल प्रेमक शाश्वत कलि काेना मुरझा गेलय नहिं बाॅचल हृदयक उद्वेग नहि रहल आब आे राग अनुराग पाेखरी क’ घाट ़़ ़ ़ गाछी ़ ़इर्नार सब जेना विरान भ’ गेलए चिङै चुनमुन चुप्‍प चारहु कात ़ ़जेना अन्हार घुप्‍प प्रेम कत्तय उङि गेल कपूर सन कत्त ताकू ़़ ़ काेन बाध़ ़ ़काेन बाेन साेचैत छथि राधा भरल आॅखि सॅ कि जखन प्रेमी नहि त लिखत के प्रेम गीत के लिखत जाैवन के मधुर मधुर प्रीत ताकै छथि व्याकुल भ’ धरती आकास के गाछ बिरीछ ़़ ़लता कुॅज ़ ़ ़़दूर आ’ पास के लिखत के प्रेम गीत लिखत के प्रेम गीत विद्यापति जबाब दाैथ ़ ़ ़ ़ ़ ़ ़ । आखिर कहिया धरि आखिर कहिया धरि कूटैत रहब ढेकी मे धान आ’ बैसल बैसल करब नैहरक बखान आखिर कहिया धरि विषहरा के देबै दूध आ’ लावा आ’ गेातिया के देख साेन्हाति रहब आवा आखिर कहिया धरि मैथिल आ’काेबरा के मानैत रहब सत्‍य आ’ इरखा द्वेष के बनेने रहब लक्ष्य आखिर कहिया धरि कहिया धरि सीता के हेतैन्ह गुणगान आ आजुक सीता रहती गुमनाम आखिर कहिया धरि काेसकी करती नांगट भ’ नाच उजाङती बगीचा पाकल आ’ काॅच आखिर कहिया धरि कहिया धरि रहब एना छिटकल छिटकल तनसॅ बेराम आ’ माेन सॅ विकल आखिर कहिया धरि कहिया धरि नबका पुल टुटल रहत आ’ कहिया धरि निकम्मा सब जुटल रहत आखिर कहिया धरि कहिया धरि रघुबर के हेतै चुमान आ पाग पहिरा करब फुइसक बखान आखिर कहिया धरि कहिया धरि उगना खबास रहता आ कहिया धरि शंकर उपास करता आखिर कहिया धरि कहिया धरि पान मखान बिसरब कहिया धरि खेती के शान बिसरब आखिर कहिया धरि कहिया धरि आपस मे करब कटाैज कहिया धरि लङत ननदि आ भाैज आखिर कहिया धरि कहिया धरि अप्‍पन गाम बिसरब बाङी मे फङल लताम बिसरब आखिर कहिया धरि कहिया धरि कहबै मिथिला महान आ तरे तरे काटबै अपने बान्ह आखिर कहिया धरि कहिया धरि करैत रहब शैव्या विलाप आ मददि केनिहार के देब गारि आ सराप आखिर कहिया धरि कहिया धरि अनकर करब सत्‍कार आ’ अप्‍पन लाेक के देबै दुत्‍कार आखिर कहिया धरि कहिया धरि मिथिला एना सुने रहतै आ” कहिया धरि मैथिल सब दूखे सहतै आखिर कहिया धरि भाषा बङ दैन्य भाव सॅ आखर आखर खिहारि कल’ जाेरि करैत छल निहाेरा विकासक’ नाम प’ त’ छाेङिए देलिए गाम मुदा नै बिसरू हमरा हम अहाॅ के आन अहाॅक शान अहाॅक पहचान छी । पढुआ बाब्ूा भैया नूकैत रहला काेन तााकि क’ इम्हर उम्हर कान मे तूर ठूॅसि बहिर सेहाे भ’ जायथ पाॅछा सॅ अंगा खीचैत दाॅत निपाेरति फेर कलपै भाखा जूनि बिसरू हमरा बाजू नहि त हम नष्ट भ’ जायब हम अहाॅक बाबू दादू के भाखा छी हमरा फेर कत्त पायब लिपि त’ विलुप्‍ते प्रायः असगरे आब हम ंंमातृभूमि के नाम आ’ मिथिळा के प्राण छी बाबू भैया तमसेळाह कंधा उचकबैत मुॅह बिचकबैत कहला ताेरा बाजि क’ हम गॅमार बनल रहू धैंंंंंंंम नहि जायत हमर उत्त्‍धान जाे तू गामे घर मे नुकाएल रह सबहक अपमान आ दुत्‍कार सह इर् महानगरि छैक महानगरि एत्त साहबक भाखा चलै छै लार्ड मैकाले के आेहि दुर दुर सॅ कै बरख धरि पङल रहल बेसुध हाेश अबीते मातर फेर धेने रहल पछाेर परदेशाे मे हिम्मत नै छाेङलक गहिएने रहल चरण कमल अहि भैया अहि दीदी आेही मैंया के आ’ एक दिन ठहक्‍का मारि क’ हॅसि पङल जाेर सॅ देखू हम त’ अमर बाेली जकाॅ महानगरि मे पसरि गेलहुॅ हम गमार कत्त’ हमर साहित्‍य विशाळ अछि आय देशक राजधानी मे ठाठ सॅ अभिजात्‍य वर्गक’ मुॅह सॅ निकलि रहल छी जन मानस मे पसरि रहल छी हम सरिपहुॅ बसि रहल छी । चक्‍का चक्‍का जे संस्कृति के शान छल ़ आब उन्नति के पहचान बनि गेल । अहि सभ्य समाज मे जे जतेक नमहर तेकरा लग ततेक चक्‍का बङका दाैङल छाेटका दाैङल तेकरा पाॅछा नेंगङा दाेैङ रहल अछि आ दाेेैङि दाैङि क बैसाहय लागल नब नब पेेैघ पेेेेेेेेेैघ सुन्नर सुन्नर चक्‍का जेकर किछु पूछ नेेेेेै छले ैसेहाे गुङकि रहल अछि चारू कात चक्‍के चक्‍का आ ़ ‘ अहि चक्‍का सॅ जाम भ रहल अछि नगरक महानगरक सीमित सङक गारा गारी ठाेकम ठाेक थाना पुलिस काेट कचहरी जेळ सबहक पाछा लागि गेल अछि चक्‍का चक्‍का हटै तखन नेेै जाम हटतै डंडा बरसाबेेेेेेेेेैत पुलिसबाे थकले ेैकाेनाे राेक नै इर् ससरति ससरति टतेक ऊपर पहुॅच गेल अछि जत्त सॅ नीचा महाविनाशक ढलान छेेै चक्‍का के नियति आब की प्रगति आगाॅ बढते क़त्त ढलान प चढि आेहि ठाम विराम लेतए त काेना कि अहि प साेचलन्हि कहियाे आधुनिक विज्ञानी लाेक ई केक्कर शोणित ? माझ आँगन मे / बइसल/ सिलबट्टा पर /पिसा रहल छल भांग / हाँकी रहल छलथि गाछी पप्प क/दलान पर/ तापि रहल छथि पतौह जरा क /जुटल नीफिकिर लोग । उमहर /नहू नहू /करिक /समुच्चा खेत खरिहान / कनैत रहल हकन्न /पड़ाईत रहल नवतुरिया / जिल्ला के जिल्ला पा र /समुद्र क पार / नेने माथ पर अपन /स्वप्नक पोटरी/ आ पेट मे /संग्राम करैत /बयालीस हाथ क’ अंतड़ी । टमाटरक चटनी संग /गिड़इत सोहारी / करैत रहले करेज शीतल / भ जाए कीछु पाय /नई रहब परदेश तखन / सपना के महल बनबए ले/ पठबइत रहल /मनियाडर/कटैत रहले  दिवस / बग्गे बानी  /हुलिया /बिगाड़ि /सर्कस क जोकर बनि / करैत रहल/ मनोरंजन सबहक /मुदा असगर मे / बहैत रहलै नॉर के कात करि/शोणित सदिखन / मोंन  पड़े जखन जख़न गाम । ओ हेराइल /भोथियाइल लोक के निर्दोख आंखि स  / झकेत सपना पर /लागि गेल रहैक/ड्कूबा सब हक नजरि/ ओहि पान /मखानक  / जनक/जानकी / गौतम /याज्ञवल्यक / गंडक /बागमती स’ सिंचित /तपोमय /यज्ञ भूमि पर / लागय लागले / कलंकक कारी टीका   / वीभत्स आरोपक /लिखाए लागले /करिया सियाही स/ मिथिला के आजम गढ़ / तखन चित्कार कयने छल मों न / सियासत क शतरंजी चालि/ के बली चढि गेले /ओ सुतल / बिरहा  /नचारी  गबईत/संतोषी मनुख क भूखेल ,पिछड़ल प्रदेश । नब त’ आकाश कुसुम /पुरनको बंद पड़ल/ कल कारख़ाना /मिल /फैक्ट्री / अनेकों आश्वाशनक बादो खुजले नहिं जखन / तखन परदेश मे चिचियाति अरमान / कोन कोन राकस् क /हाथि लागि / बोकरए लागले शोणित / अपराधी ओ युवा / वा हमर घिनौन राजनीति / खेलईत रहल गोटरस/नुकेने मुंह बाउल मे / शूतरमुरगक जका/संकीर्ण /गर्हित जातिवाद्क अड़ मे / जरेत रहलै कुसियारक मधुर खेत । कलपति छथि महाकाल / ने जनम लेबे दिओ / वेद, सांख्यक भूमि पर आतंक्क ज्वालामुखी / हमहू छी गवाह  अप्पन भूमि के / लाल ;पियर धोती / पा ग आ टोपी /दिवाली आ दाहा/ लोटा आ’ बदना /कीर्तन आ अजान / बला माटि पा नि मे / पिछला कतेक दशक स/ विदेशी  आसुरी  शक्ति / किएक बारूद सानि रहल छै/ कराबिओ जांच शीघ्र एकर / दूर फेंकू पोखरी स/सड़ल माछ / महकइत  पानिओ  के सफाई के समय आबि गेलै / जागु सरकार /जागु /बड्ड कष्टकर छै / आतंकवाद के पट्टी माथ पर/ बान्ही क /जीनाए / समय के तकाजा अछि / एहु क्षेत्र के इंसाफ चाहि आब । खिड़की दिन मे तीन बेर / भिनसर ,दुपहरिआ’ सांझ / खोलि क खिड़की / हेरय छी हमहू दुनिया जहांन के / के कत्त स’ आबि रहल अछि/ के किमहर जा रहल अछि / ओकरा हाथ मे ओ की ? एकरा माथ पर’ ई की ? सूंघय छी हमहू हवा के / पाथने रहेत छी कान / अहि बदलति समय के / बड्ड लग स देखबा के उत्कंठा मे / चाहेत छी जाई /बाहर दूर धरि/ छूबी/ दसो आंगुर स / महसूस करि अहि बदलाव के / मुदा समय एकर अनुमति नहीं दैतै/ बुझल अछि खूब हमारा / मात्र एक गवाह क ‘रूप मे / ठाढ़ छी पल्ला पकड़ने / समय के संग हम / समय के कैद मे । भरोस बेकल /विह्वल  भरोस / अपना स हारल /समय स मारल / लज्जित /संकुचित /निराशा के गर्त मे धसल / पाबि नहि रहल अछि /जिबा के कोनो ठेकान । केकरा कहतै/आ पतियेते त के / की कहिओ ओकरो पुरखा के जमींदारी छल/ बिन लिखा पढ़ी /कलम दवात् क /बही खाता के / चलैत छलई/कारोबार /खेत स खरिहान  / आ गाछी स बथान धरि के /सोन ,चानी,रूपा / स ऊपर बइसल ईमान /एकरे अग्रज / धेने  अपन पिता  धर्मक ध्वजा दुनु हाथे / क ल जोड़ने लोक चा रहु दिस / निर्बल आ सबल् क मध्य एक गोट मजगुत कड़ी / मुदा हे लॉर्ड मेकाले /ई संताप अहि के देल / हमरा सन मंद बुद्धि वला /दोषी अहीके मानैत छी/ तेहेन शिक्षा के चलन / तार तार भेल हमर आवरण / जे नहीं लिखल गेल बही मे / हेतय कोना सही ? रोमन लिपि मे दस्तखत करे लेल / फड़केत आंगुर / गुरेर क ताकने छल ईमान के जाही दिन / पेटकुनिया देने कोठी के दोग मे धर्म अपन / ध्वजा समेटने /ओसारा पर/बइसल /कल्पैत कुहरेत / भरोस के देखि /शोक स आंखि सदा के लेल बन्न / करि/नब भविष्य के /नब मुहावरा गढ़वा लेल छोड़ि देने छल। पुष्पांजलि पुष्पांजलि । आजुर मे भरने / लाल /पीयर/हरियर / नारंगी /बैंगनी /भांति भांति के / रंग /गंध /रूप /आकार / स सज्जित /पुष्प दल / स्वास मे भरने /मलयानिल मादक / मद्धिम मद्धिम आंच प/ नहु नहु गर्माबईत हवा मे / नब नब तरु पल्लव के अड़ स/ झाकैत धरा सुन्नरी / करि रहल अछि / उन्मादित प्रेमी सन / भावविभोर भ’/ऋतु राज क/ आराधना मे/ अवरूद्ध गरा आ’ मूंद्ल आंखि से / पुष्पांजलि / रूपसी के सौन्दर्य स चकित / अनंग सेहो शंख नाद करि देल/ सजी रहल अछि रंगमंच / प्रेमोत्सव के /मुट्ठी मे आबि गेले / सभ हक /उड़बए लेल  अबीर /गुलाल उतरि गेला नर नारी मे/फेर स/नवल भेस मे / खेलय लेल फागुन के / कृष्ण आ’ राधा । आस्थाक पूर्ण कलश पोखरिक माटि सँ पितड़िया फुल्डालि माँजैत/ बाबी ओइ दिन बड़ उदास भऽ गेल छलीह/ जखन घासक छिट्टा ,माथ सँ उतारि/ घुटनक आंगनवाली /आँचर मे बान्हल / गंगा मैयाक परसाद देलकन्हि / हरिद्वार सँ आएल छल/ कुम्भ नहा कऽ / माथ  पर बोझ छल ,कतेक रास खिस्साक / सह सह करैत लोक / मुंडे मूँड चारु दिस / तिल रखबाक जग्गह नहि / उपरका स्वास उपरे / निचुलका नीचे / मुदा सहस्त्र बाहु सन बेटा / माय बाबू दुनु केँ पजिया कऽ भीड़केँ धकियाबैत / आबि गेला घाट पर / ओ निर्मल, ओ कन कन जल / डुबकी पर डुबकी / उतरि गेल सभ पाप / वएह तँ स्वर्ग / आँखिसँ देखल / ओ घंटी आ शंख सँ गुंजैत ,/ इन्द्रक दरबार सन सजल / मैयाक आरती । ओइ दिन तँ शुरुआते छलै पोथीक / बाँचैत रहली कतेको दिन / मास / सुध बुध बिसरल / बाबी संग कतेको मइया सभ लइत रहली उसास / देती की माते , हुनको ई पुण्य लाभ / बा  अहिना कोन मे पड़ल पड़ल / जिनगी होइत रहत खाक। माल जाल / पशु /पाखी / मृतककेँ उद्धार करए वाली / पतितपाविनी /सुनौथ हमरो सबहक विलाप । आ दलान पर/ आंगन मे/ ओसारा पर/ गोहाली मे / पोखरिक महाड़ पर/ बनैत रहलै बिसबासक पुल/ कुजरनी अपन तरकारी बेच कऽ/ मलाहीन माछ /तेलिन तेल / कुम्हइन अपन माटिक बासन बेचि / पुरहिताइन लोटा /हसूली / बन्हकी राखि करैत रहली बाटक ओरियान नहि जाति / नहि कुल गौरवक गुमान / कतेक दिन सँ एतबे लागल धियान / जे गंगा असननीया जेबै / आ ओहो माघ आबि गेलै /लागि  गेलै संगम मे कुम्भ / बिन कोनो पुरुख पातकेँ नेहोरा  पाती केने / मोटरी चोटरी बान्हने/ अधरतिए / टीसन पर/ पहुँच गेल रहै/नहा धो कऽ/ नब नब वस्त्र मे / सम्पूर्ण गामक आधा सँ बेसीए स्त्रीगण सभ / स्कूल /कॉलेज मे / पढ़य /पढ़बए वाली बेटी /पुतौह / अस्पताल मे काज करैत सिस्टर / डिग्री धारी नवतुरिया संग / गामक मुखिया सहजों पीसी सेहो / बुझैत अपना केँ महान / बहरायल छल / सबहक संग / करबक लेल अपन कल्याण / साध हेतै पूर्ण आब / करबाक गंगा अस्नान । खिलैत पलास वन खिलैत पलास वन । धरती सँ उनचास हाथ ऊपर/ उठल जे /प्रदीप्त मशाल/ भक, भुक, करैत/ मिझा गेल हुअए/ तँ ऐ मे बसातक कोन  दोष ? ओकर तँ अप्पन प्रवृत्ति/ ओ, समर्थ/ ओ शक्तिमान। मुदा, मिझैल मशाल/ ठाढ़ तँ ओहिना/ अप्पन, दुर्गतिक खिस्सा कहैत/ खसा रहल अछि/ दुनु आँखि सँ झर-झर नोर/ ई केहेन इजोर/ नै राति/ नै भोर/ चारू दिस / बिछल/ बर्फक सफेद चादरि/ छोट छोट/मोमक बाती/ आ कत्तेक पैघ उदासी/ ई कोन व्रत/ ई कोन उपास/ मुदा तैयो/ मोनमे जमल जा रहल  छै आस/ कि जे देवता/ पितर केँ /अप्पन निष्ठा आ प्रेम सँ/ गोहराबैत /आस्था केँ जीवित राखल / मानवीय संबंध केँ /मन प्राण मे सइतने / जुग जुग सँ ओकर कुशल भाखैत/ आइ फेर ओ जागि उठल अछि/ मनबै ले ब्रम्हा केँ/ चाही ओ रक्षा कवच/ लिखल ताड़ पत्र पर/ जे दनुज, दैत्य ,राकस केँ  दंड हुअए निश्चित/ नारीक चीर हरण/ करै नै दुष्ट जन/ रूप दिअ दुर्गा केँ / शक्ति दिअ काली केँ / काँपि उठैक सोचि कऽ धृष्टता  असुर जन / कतबो अनहर हुअए/ विश्वास आब संग छै/ पात पात  झड़ल /डाढ़ि पर/ खिलतै पलास वन/ एतबे मे/ आबए बाला ऋतु / कहि गेलै कान मे/ पाछाँ करू  नै आब अपन वाण/ तैयार दधीचि ओ  छथि/ देबए फेर सँ/ अपन  अस्थि दानमे। आधुनिक   स्त्रीगण १-५ १ एसगरि ओ चलैत/ निहारैत खेत, पथार, मचान  / आँकैत अपन बल/ झुकौने नहि धड़ / तकैत सीधा / चौकन्ना आँखि स्थिर मुखमंडल/ जाइत अछि स्कूल / खेलाइत अछि  / डोला पाती / गोटरस/ कबड्डी/ खो-खो / टेनिस / बैडमिंटन / आबै छै जोड़ऽ हिसाब / पढ़ै छै विज्ञान / आब नै  ओ छै अज्ञान। २ दलान पर राखल लालटेम / नै छै खाली बौआ  भाय सभक लेल / जाँत/ चक्की /, गोबर /, गोइठा,/ चूल्ही /, बासन /,छौड़ ,/ नहि डराबे छै आब /करबाक ओकरो छै होम वर्क / जनबाक छै प्रकाश वर्ष / समय आ दूरी पर / बनेबाक छै ढेर रास सवाल । पोखरि सँ भरैत काल डोल, मन करैत छै किल्लोल, की छै आर्कमिडीजक सिद्धांत। आनै छै पेठियासँ बेसाहि कऽ नून/ तेल/ तरकारी/ घरक समान/ करै छै होम वर्क, माएक काज आसान। बेलै छै चकलापर, उनटाबै छै  ताबा परका सोहारी, रटै छै एच टू एस ओ फोर। लगबै छै मइयाक फाटल बेमायमे / मरहम । देखै छथि दादी ,/ पिंजरासँ बहराएल सुगनीकेँ/ ऊपर पसरल ,/  उड़बा लेल /नील आसमान / धिया ने बोझ  /जुड़ाइत  छनि छाती आब । ३ पिकी पाड़ैत छौड़ाकेँ / नोचलक  टीक जखन/ किओ ने दूर छी कहलकै ,/ सब धैलकै  ओकर मान / आबै छै ओकरा मचबए सोर/ देखिकऽ चोर । करै छै निधोक भऽ भाय ,बाबूसँ गप्प / देखै छै टीवी / बुझै छै / कानून /दंड संहिता  / छेड़छाड़ ,बलात्कारी केँ / ताड़ै छै दस लग्गी फराके सँ/ चलै छै झुण्डमे / जेना मृग ,गज / धुक धुकी करेजक ,भगबे छै स्वासक जोरसँ / नाचै मजूर बनि , मुदा ओहिने चौकन्ना। नइ  सुनबै छै किओ आब / फकड़ा सभ ,सोन बराबरि हेबाक/ देखैत छै  सपना ओहो / जीवन सुधारबाक/ सोचै छै वैज्ञानिक, समाजशास्त्रीक धारपर संघर्ष जीवनकेँ आगाँ बढ़ेबाक नाम छै/ तखन ओ किए नै निहारe पूर्ण चान केँ । नव संविधानक प्रस्तावना लए जे बेकल / ओ समाज आइ ओकर भूमिका गढ़ि रहल । साम सँ नै दाम सँ दंड सँ नै भेद सँ/ दीपदान करि रहल बाटकेँ प्रकाशमान। पीठ पर ओकर अछि गार्गी /,मैत्रेयी/,सीताक अतीत / नब जुगक कथा जागृतिक सूर्य भेल / हाथमे रुमाल छै/ तँ दोसरमे मशाल सेहो/ आँखिमे आँखि देने / समयसँ ओ पूछि रहल/ कोन एहेन  विषम  मार्ग / जइ पर हम नै चलि सकब ? ४ संपत्ति ओ नै आब संपत्ति / ओकरो चाहि संपत्ति । खेत मे /पथार मे / मकान मे /दोकान मे / ज्ञात  आ अज्ञात मे / देथिन पिता हिस्सा ओकर / ओहो तँ हुनके तनज़ बुढ़ापेक लाठी ओहो / सेवाक ओहो हकदार / पठौतन्हि नै हुनका/ भयौन ओल्ड होम मे। ५ आदेस लऽ /विदेशमे/ पतिक गृह प्रदेशमे/ आएल अछि देबएले सुख / चाही ओकरो डगरा भरि सुख। प्रताड़णा वा लांछना / कटु /तिक्त वेदना /केँ ताप मे भस्म करि/ तखन ई कोन जिंदगी ? सिनेहकेँ सिनेहसँ/ कर्तव्यकेँ कर्तव्यसँ/ प्रेमकेँ प्रेमसँ/ सींचब तँ बाजत बाँसुरी / कुरुक्षेत्र ने बनए /छत /देवाल सँ घेरल जगह / प्रयास  इहै रहै / सभ ठाम हो रोशनी । नहि वीभत्स रूप हो / वसन्ते वसंत हो सदा / कर्तव्यक अधिकारक  /सूली पर / नहि चढ़ए पड़ैक। संकुचित विचार पर/ पद  प्रहार करि रहल / नब जुगक, नब कुसुम, नब चेतनासँ भरल। बातरसक दर्दसँ/ लोथ बनल सौस लेल/ बेकल बनल ओ ताकि रहल/ बातरसक दबाइ/ ससुरक मोतियाबिंद/ जोहि रहल बाट ओकर/ देखाबक छै सम्पूर्ण खेत खरिहान/ समस्याक जा नहि समाधान/ ताधरि नै ओकरा विराम/ सम्पन्न करब छै  होमवर्क/ एतबै ओकरा भान छै। कॉलेजक प्रांगण हो/ वा  घरसँ फराक कतौ/ चिंतन विशाल छै/ हटेबाक अंधकार छै/ धरती स्वर्ग बनै/ बूनै छै सपना जे/ आधुनिक समाजक रचनामे लागल ओ/ ओकरा कत्तऽ पलखति छै/ सुनबा के आलोचना । कुमार मनोज कश्यप ।जन्म-१९६९ ई़ मे मधुबनी जिलांतर्गत सलेमपुर गाम मे। स्कूली शिक्षा गाम मे आ उच्च शिक्षा मधुबनी मे। बाल्य काले सँ लेखन मे अभिरुचि। कैक गोट रचना आकाशवाणी सँ प्रसारित आ विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित। सम्प्रति केंद्रीय सचिवालय मे अनुभाग आधकारी पद पर पदस्थापित। वसंती दोहा गेंदा - गुलाब - पलाश संग, फूलल फूल कचनार । चिंहुकय आहट पर गोरी, आबि गेला पिया द्वार॥ भरल वसंती मास मे, पिया निर्दय बसल परदेश । अल्हड़ - मस्त वसंत, फेर बढ़ा देने आछ क्लेश ॥ धरती सँ मिलन के आछ, व्याकुल भेल आकाश । पिया विरह मे राति - दिन, पीयर पड़ल पलाश ॥ रंग - अबीर - गुलाल सँ, धरती भऽ गेल लाल । गोरी के गाल पर जेना, मलल चुटकी भरि गुलाल ॥ एम्हर - ओम्हर मटकि रहल, पीबि कऽ भांग वसंत । मन चंचल आई भऽ रहल , कि योगी कि संत ॥ पीबि कऽ भांग बसातो आब, लागल करय उत्पात । धूड़ा उड़ा कऽ पड़ा गेल, देमय कान ने कोनो बात ॥ सखि वासंती तोंहि हुनका, जा दय दिहनु संदेश । जी भरि मलबनि रंग हम, भेटता पिया जखन जे भेष ॥ ककरा सँ मोनक व्यथा कही, बुझत के मोर टीस । सुनि कऽ सभ हँसबे करत, बनत के मन-मीत ॥ नहिं सुति रहब आहाँ चद्दरि तानि अमर देश केर अमर पुत्र आहाँ, भारत माता केर संतान । मातृभूमि के सजग प््राहरी, नहि सुति रहब आहाँ चद्दरि तानि ॥ भगवान राम केर धनुष चढ़ा लिय, गुंजय तीनू लोक टंकार । साम-गान सँ जग अनुनादित, गुंजय वाणीक वीणा झंकार । भगवान कृष्ण केर चव्रᆬ सुदर्शन, आसुर लीला केर संहार । शोणित-रत्तᆬ सँ आई करक आछ, भारत माता केर श्रृंगार । असंख्य अमर बलिदानीक शोणित, के आछ करक सम्मान । मातृभूमि के सजग प््राहरी, नहि सुति रहब आहाँ चद्दरि तानि ॥ शपथ आहाँ के आई मातृभूमि के , शपथ आछ भगवान के । नहि बिसरब निज गौरव-महिमा, नहि बिसरब बलिदान के। राजनीति केर बात ने कथमपि , बात आछ केवल शैतान के । मात ृ- भूमि हित रक्षा मे तऽ , दंश नहि कोनो टा वाण के । दुश्मन देशक हँसि रहल आछ, करू मर्दन ओकर आई गुमान । मातृभूमि के सजग प््राहरी, नहि सुति रहब आहाँ चद्दरि तानि ॥ आगाँ मे जौं शास्त्र रहल , तऽ पाछाँ शस्त्र रहल सदि काल । शरणागत के शरण देल , तऽ भू-लुंठित कयल आरक भाल । रत्तᆬ-बीज के उन्मूलन मे, उष्मित शोणित सदिखन लाल । फन थवुᆬचई मे तारतम्य ने, जौं मित्रहु बनय काल - व्याल । विश्व-शांति उद्घोषक के, नहि मानय दुनियाँ कायर-निदान । मातृभूमि के सजग प््राहरी, नहि सुति रहब आहाँ चद्दरि तानि ॥ हल्दी-घाटीक रण - प््राांगण मे, एखनो गुंजित राणाक हुंकार । वीर शिवाजी सिखा रहल छथि, दुर्दम्य रण - कौशल संस्कार । वीर मराठा , राजपूत केर उष्मित रत्तᆬक अखनो प््राबल संचार । वीर जवानक कर्मभूमि ई, भारत आछ सरिपहुँ वीरक संसार । जीवि कऽ मरय लोक अनुखन, मरिकय जीवय लोक महान । मातृभूमि के सजग प््राहरी, नहि सुति रहब आहाँ चद्दरि तानि ॥ गोपनीय अणु-अस्त्र उठा कय, देखा दिय अपन शत्तिᆬ अपार । दुश्मन देशक सिहरि उठय, देखि रूप आहाँ केर प््रालयंकार । कैल जौं घुसपैठ दुश्मन तऽ , कय देब ओकर हम पूर्ण संहार । दोस्त सँ दोस्ती यद्यपि आछ , दुश्मन सँ बढ़ि कऽ प््राहार । रण-भूमि मे रण-चंडी आछ तैयार करक हेतु रण-आभयान । मातृभूमि के सजग प््राहरी, नहि सुति रहब आहाँ चद्दरि तानि ॥ बाजि गेल रण - डंक आब , तारतम्य के गुंजाईश कहाँ आछ । राजनीति के क्षुद्र-घाट पर पानि पियब ने आहाँक काज आछ । युवा-वीर बढि चलू समर मे, लाज देश केर आहंक हाथ आछ । द्रौपदीक चीर ने पेᆬर हरण हो, गांडीव-गदा आहंक हाथ आछ । उर्जित हो सम्पूर्ण देश , तानि दिय आई नव-निर्माण वितान । मातृभूमि के सजग प््राहरी, नहि सुति रहब आहाँ चद्दरि तानि ॥ गजल धज्जी रातुक श्याह आँचर मे, अहल भोर के ताकि रहल छि। अपन आंगन मे ठाढ़ हम, आई अपने घर के ताकि रहल छि । आहत मोनक घायल तड़पन, पेᆬरो आई कनाबऽ आयल। जतऽ जलन के पीड़ा कम हो, ओहन छाँह के ताकि रहल छि। दोसरा कें कि दोष देबई हम, अपनो सभ तऽ अंठिये बनला । याद ने कोनो बाँचल रहि जाय, ओहन ठौर के ताकि रहल छि। बगबाहो अपनहिं हाथें, आई कलम-बाग सभ जारऽ आयल। तड़पन जतऽ तड़पि रहि जायत, ओहने कहर के ताकि रहल छि। बिसरि गेल जे याद छलै, से सपना कियैक याद दियौलक? नोर ने ढ़रकय जाहि पलक सँ, एहन आँखि के ताकि रहल छि। निकलि गेलहुँ आछ सुन्न राह पर, अन्हारेक टा सम्बल केवल। अपन-आन केयो कतहु नहि, आई ओहन दर के ताकि रहल छि। गजल आदमी छल - छद्मक मोहरा बनल । आब गामो पर शहरक पहरा पड़ल । मनुक्खे रहल, मनुक्ख्ता लुटि गेलई। लट पांचाली के फेर सँ खुजले रहल । रंग अपनहुँ के आब जर्द सन भऽ गेलई। जिनगीक महल आई खंडहर सन ढ़हल। आब ककरा सँ कहतई मोनक व्यथा। कान मालिको के तऽ छई पाथरे बनल। अपनो पर कोना आब कोई भरोसा करय। सांस-सांसो मे माहुर आछ भरल पड़ल। बाटक धूरा जकाँ उड़िते रहि गेलहुँ। आँखि कानल मुदा मोन नहिये भरल। 478 || विदेह सदेह:३१ विदेह सदेह:३१|| 479