SADEHA — 32

Publication: SADEHA · Issue: 32
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ISSN 2229-547X विदेह सदेह ३२ रचनात्मक गद्य-पद्य लेखन भाग-१ (विदेह www.videha.co.in/ पेटार अंक १-३५० सँ) विदेह-सदेह शृंखला- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ गद्य आ पद्यक एकटा समानान्तर संकलन विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। काॅपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति‍एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादि‍त अथवा संचारि‍त-प्रसारि‍त नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- अद्यतन। सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर) केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ "विदेह" पड़लै।इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA (c)२०००- अद्यतन। सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि। सम्पादक 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऐ ई-पत्रिकामे ई-प्रकाशित/ प्रथम प्रकाशित रचनाक प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ मूल आ अनूदित आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। (The Editor, Videha holds the right for print-web archive/ right to translate those archives and/ or e-publish/ print-publish the original/ translated archive). ऐ ई-पत्रिकामे कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। ISSN: 2229-547X मूल्‍य : भा. रू. ५,०००/- संस्‍करण: २०२२ Videha Sadeha 32: A Collection (Vol.I) of Creative Maithili Writings in Prose and Verse e-published in Videha e-journal issues 1-350 at www.videha.co.in). अनुक्रम गद्य-खण्ड (पृ. १-१३५८) जगदानन्द झा 'मनु'- माटिक बासन (पृ. २-५) भालचन्द्र झा- चूल्हि (पृ. ६-१७) गंगेश गुंजन- भोज परक आँटी- सत्तरिक नव-खाढ़िक युवा नवतुरिआसँ, मैथिलीक उर्वर क्षेत्रमे कॉरपोरेट-जगत धाप, किछु एहनो बात विषय, गोबरक मूल्य (पृ. १८-३२) उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’- नो एंट्री: मा प्रविश (पृ. ३३-१६३) राधाकृष्ण चौधरी- मिथिलाक इतिहास (पृ. १६४-७२३) प्रेमशंकर सिंह- बीसम शताब्दी- मैथिलीक स्वर्ण युग, सामाजिक विवर्त्तक जीवन झा, मैथिली भाषाक साहित्‍य, लोकनाट्य, पारंपरिक नाटक, मायानन्‍दक रेडिया-रूपक, हुनकासँ भेट भेल छल, अमरक एकांकी-प्रहसनक सामाजिक यथार्थ, लोकगाथा ओ मणिपद्रम, चेतना समिति ओ नाट्यमंच, जयकान्‍त मिश्र जीवन आ साहित्‍य–साधना (पृ. ७२४-१०६७) डॉ. कैलाश कुमार मिश्र- समीक्षा- बनैत बिगड़ैत (पृ. १०६८-१०७४) गजेन्द्र ठाकुर- समीक्षा- बनैत बिगड़ैत (पृ. १०७५-११०३) महाप्रकाश- सुभाष चन्द्र यादव पर (पृ. ११०४-११०४) सुभाष चन्द्र यादव- बनैत बिगड़ैत आ आन कथा (अपन-अपन दुख, असुरक्षित, आतंक, ओ लड़की, एकटा अंत, एकटा प्रेम कथा, एकाकी, कनियाँ-पुतरा, कबाछु, कारबार, कुश्ती, कैनरी आइलैण्डक लॉरेल, तृष्णा, दाना, दृष्टि, नदी, परलय, बनैत-बिगड़ैत, बात, रंभा, हमर गाम) (पृ. ११०५-१२४३) विभा रानी- माउगि, भाग रौ, बलचन्दा (पृ. १२४४-१३४७) डॉ शिव प्रसाद यादव द्वारा साहित्य मनीषी मायानन्द मिश्रसँ साक्षात्कार- (पृ. १३४८-१३५८) पद्य-खण्ड (पृ. १३५९-१५८०) उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’- अन्तर्द्वन्द्व (पृ. १३६०-१३६१) शैलेन्द्र मोहन झा- सपना, हम तऽ छी परदेशमे, चलला मुरारी छौरी फ़ँसबय! (पृ. १३६२-१३६८) जितमोहन झा- भक्तिगीत (पृ. १३६९-१३७०) प्रकाश झा- हमर मिथिलाक दर्शन (पृ. १३७१-१३७२) गंगेश गुंजन- बाल कविता- आउ हनुमान, भेटताह अनन्त?, दिल्ली नगर बस मे तामस: एक- दू, आयुर्दा, परिवर्त्तन, देश छोड़ि कत' गेल, देश छोड़ि कियेक गेलय?, गाम, बीच बाट पर खसल लाल गमछा, गीत १-२, बाढ़िक त्रासदीपर गजल सन किछु, गजल जेकाँ किछु- मैथिलीमे १-३, समर्पित गजल सन किछु (कवि भीमनाथ झा कें समर्पित, कवि रामलोचन ठाकुर कें समर्पित, कवि-पत्रकार अजित आज़ाद कें समर्पित, शेफालिका वर्मा जी कें समर्पित, प्रिय सकेतानंद कें समर्पित), स्वतंत्रता-दिवस २०१०, राधा (विदेह ई-पत्रिकामे धारावाहिक रूपेँ खेप १-३० ई-प्रकाशित) (पृ. १३७३-१५८०) 2

गद्य खण्ड मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत् - हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम् अक्खर (अक्षर ) खम्भा तिहुअन खेत्तहि काञि तसु कित्तिवल्लि पसरेइ। अक्खर खम्भारम्भ जउ मञ्चो बन्धि न देइ॥ [कीर्तिलता प्रथमः पल्लवः पहिल दोहा।]माने अक्षररूपी स्तम्भ निर्माण कए ओहिपर (काव्यरूपी) मंच जँ नहि बान्हल जाए तँ एहि त्रिभुवनरूपी क्षेत्रमे ओकर कीर्तिरूपी लता (वल्लि) प्रसारित कोना होयत। INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/JagdanandJha.jpg" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/JagdanandJha.jpg" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/JagdanandJha.jpg" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/JagdanandJha.jpg" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/JagdanandJha.jpg" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/JagdanandJha.jpg" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/JagdanandJha.jpg" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/JagdanandJha.jpg" \* MERGEFORMATINET जगदानन्द झा 'मनु', ग्राम पोस्ट - हरिपुर डीहटोल, मधुबनी माटिक बासन केदार प्रसाद गामक एकटा कुशल कुम्हार । माटिक बासन जेना घैल, ढाकन, मटकुरी बना अपन जीवन यापन करै छलाह । माटिक बासन बनेनाइ मात्र हुनक आजीवकाक साधन नहि भs कs हुनका लेल एकटा सुन्नर कारीगरी छल । अपन काज करैकाल ओ ऐना तनमय भs जाइ छलाह जेना एकटा भक्त अपन अराध्य देवताक ध्यानमे अपन तन-मनक सुधि बिसैर जाइत छैक । ओ अपन स्वं साधनासँ धिरे-धिरे छठि मैयाक सुन्नर व आकर्षित हाथी सेहो बनबए लगला । हुनकर बनाएल माटिक बासन आ छठिक हाथीक बड्ड प्रशंसा होइत छल । धिरे-धिरे गामक परिवेश बदलए लागल । माटिक बासनक जगह स्टील आ आन-आन धातु लेबए लागल । केदार प्रसादजीक आमदनी कम होबए लगलन्हि मुदा ओ अपन काजक प्रति निष्ठा आ समर्पणकेँ दुवारे कुम्हारक काज नहि छोरि पएला । हुनक सुन्नर सुशिल बेटा बिभू नेन्नेसँ अपन पुस्तैनी काजमे माँजल । ई कहैमे कोनो संकोच नहि जे ओ अपन बाबूओ सँ बीसे । केदार प्रसादजी एहि गपकेँ नीकसँ बुझैत अपन होनहार पुतकेँ गुणसँ मोने-मोन खुस छलाह आ चिंतीत सेहो । चिंतीत एहि दुवारे की कुम्हारक काजक कि बर्तमान छैक आ कि भबिष्य हेतै से हुनका बुझल मुदा बिभूक हस्तकौशल देखि ओकरा एहि काजसँ बाहर केनाइ उचित नहि बुझलाह । बिभू सेहो इस्कूल पढ़ाइक संगे-संग अपन बाबूक सभटा गुणकेँ अंगीकार केने गेल । अपन बाबूक छठिक हाथीसँ आगू बढ़ि ओ मूर्तिकलामे अपन हस्तकौशलक उपयोग करै लागल । ओकर बनाएल मूर्तिक चर्चा गाम भरिमे होबए लगलै । जतए ओकर बाबूक बनाएल छठिक हाथीकेँ एगारह टाका भेटन्हि ओतए ओकर बनाएल छोट-छोट कनियाँ- पुतड़ा सभकेँ सय-सबासय टाका भेटअ लगलै । बिभू अपन बाबूक देख-रेखमे मूर्तिकलामे दिनो- दिन आगू बढ़ए लागल । आब ओकर बनाएल माए सरोस्वती, कृष्णास्टमी, विश्वकर्मा पूजाक मूर्तिक माँग चारूकातक बीस गाम तक होबए लगलै मुदा बिभूक बाबू तैयो ओकर बनाएल मूर्तिमे कोनो ने कोनो दोख निकालि आ ओकरा अओर बेसी नीक मूर्ति बनाबैक प्रेरणा देथिन । बिभू सेहो हुनक गपकेँ मन्त्र मानि आगू आरो नीक मूर्ति बनाबएमे लागि जे । बिभू दसम वर्गकेँ बाद इस्कूली पढ़ाइ छोड़ि पूर्णतः मूर्तिकलामे अपनाकेँ समर्पित कए लेलक । अठारहम बरखक पूर्ण बुझनूक भs गेल आब ओकरा नीक बेजएकेँ ज्ञान भs गेलै । ओकर मूर्तिक प्रशंषा आब गाम नहि, जिला नहि राज स्तरपर होबै लगलै । आब तँ ओकर बनाएल एक-एकटा मूर्तिकेँ दू-दू तिन-तिन हजार टाका भेटए लगलै । मुदा ओकर बाबू एखनो ओकर मूर्तिमे कोनो ने कोनो दोख निकाइल ओकरा आर सुन्नर मूर्ति बनाबैक निर्देश देथिन । पहिले बिभू हुनक गपकेँ मन्त्र मानि कमी दूर करैक चेष्टामे लागि जाइ छल मुदा आब हुनक गपसँ ओकर मोन कतौ-ने कतौ आहत होइत छलै । मुदा बिरोध करैक सहाश नहि तेँ मोनकेँ मारि हुनक बताएल निर्देशमे लागि जाइ छल । जेना-तेना काज आगू बढ़ैत रहल आ ओकर बनाएल गेल मूर्तिक चर्चा आब राजक सीमासँ निकैल बाहर दस्तक देबए लगलै । राजसरकारकेँ गृहमंत्रालयसँ बिभूकेँ पत्र एलै जाहिमे ओकर बनाएल गेल मुर्तिकेँ अखिल भारतीय मूर्ति प्रदर्शनीमे राखक व्यवस्था कएल गेल रहैक । सभटा खर्चा राजसरकारक आ विजेताकेँ देशक सर्वश्रेष्ट मूर्तिकारक सम्मानकेँ संगे-संग एक लाख टाकाक नगद इनाम सेहो । ई पत्र पाबि बिभूकेँ बड्ड प्रसंता भेलै । सभसँ पहिले दौरल-दौरल अपन बाबूकेँ एहि गपक सुचना देलक । केदार प्रसादजी सेहो बड्ड प्रसन्य भेलाह हुनकर जीवन भरिकेँ मेहनत रंग लाइब रहल छल । बिभू राति-राति भरि जागि-जागि कए अपन मार्गदर्शक गुरु बाबू संगे लागि गेल । एकसँ एक नीक-नीक मूर्ति बनेलक मुदा केदार प्रसादजी सभ मूर्तिमे कोनो ने कोनो कमी निकाइले देथिन । केदार प्रसादजीक बताएल कमीकेँ दूर करैकेँ बदला बिभूक मोनमे आब नकारात्मक प्रवृति घर करए लगले । हुनक बताएल कमीपर आब ओ सबाल-जबाब करए लागल । काइल्ह प्रतियोगता लेल मूर्ति भेजैक अंतिम दिन आ आइ बिभू अपन बनाएल मूर्ति सभमे सँ एकटा सभसँ नीक मूर्तिकेँ अंतिम रूप देबएमे लागि गेल । केदार प्रसादजी बारीकीसँ ओहि मूर्तिकेँ निरीक्षण करैत, बिभूक दिमागमे हलचल चलि रहल छल - "हाँ आब तँ ई कोनो ने कोनो गल्ती बतेबे करता ।" ततबामे केदार प्रसादजी अपन चुप्पीकेँ तोरैत बजलाह -"सुन्नर ! आइ तक बनाएल गेल मूर्ति सभमे सर्बश्रेस्थ ।" कनीक काल चुप रहला बाद फेर -" मुदा ।" मुदा की आब तँ बिभूक मोन बिफैर गेलै - "अबस्य कोनो ने कोनो कमी गनेता ।" केदार प्रसादजी अपन गपकेँ आगू बढ़ाबैत -" ई जँ एना रहितेए तँ आरो बेसी नीक, आ ई रंग जँ फलाँ फलाँ रहथि तँ जबरदस्त होइते ।" नैन्हेटासँ जिनक गपकेँ मन्त्र मानि पूरा करैमे जि-जानसँ लागि जाइ छल आइ हुनक गपकेँ नहि पचा पएलक । बिफैर कए बाजि उठल -"रहै दियौ ! अहाँकेँ तँ एनाहिते दोख निकालए अबैए, अपन बनेएल ढाकन बसनी तँ कियो एको टाकामे नहि किनैए आ हम केतबो नीक मूर्ति बना लि कोनो ने कोनो दोख अबश्य निकाइल देब ।" बिभूक गप सूनिते मातर केदार प्रसादजीक शांत मुद्रा भंग भए सोचनीए भs गेलनि । एकटा नमहर साँस लैत बिभूक पीठ ठोकैत बजलाह -"बस बेटा बस ! जहिया व्यक्तिकेँ अपन पूर्णताकेँ आभाष भs जाइ छैक ओकर बाद ओकर जीवनक विकास ओतहिए रुकि जाइ छैक । पूर्णताकेँ आभास दिमागक आगू बढ़ैक चेतनामे लकबा लगादै छैक ।" किछु छन चुप्प,दुनू गोटे शांत । बिभूक आँखिसँ नोर टघरैत जे आइ ई की कए लेलहुँ, ओकरा अपन गल्तीक ज्ञान भs गेलै । केदार प्रसादजी आगू - "हमर सपना छल जे हमर बेटा राजक आ देशक नहि वरण दुनियाँक सर्वश्रेष्ट मूर्तिकार बनत.....मुदा नहि । कोनो गप नहि हमराकेँ जनै छल ? कियो नहि । हमर बेटाकेँ पूरा राज जनैत अछि एकटा नीक मूर्तिकारकेँ रूपमे । हमरा लेल बड्ड पैघ गप अछि । मुदा हमर सपना ------- आब नहि पूरा होएत । ई कहि ओ ओहि कक्षसँ बाहर भs गेला । भालचन्द्र झा, ए.टी.डी., बी.ए., (अर्थशास्त्र), मुम्बईसँ थिएटर कलामे डिप्लोमा। मैथिलीक अतिरिक्त हिन्दी, मराठी, अग्रेजी आऽ गुजरातीमे निष्णात। १९७४ ई.सँ मराठी आऽ हिन्दी थिएटरमे निदेशक। महाराष्ट्र राज्य उपाधि १९८६ आऽ १९९९ मे। थिएटर वर्कशॉप पर अतिथीय भाषण आऽ नामी संस्थानक नाटक प्रतियोगिताक हेतु न्यायाधीश। आइ.एन.टी. केर लेल नाटक “सीता” केर निर्देशन। “वासुदेव संगति” आइ.एन.टी.क लोक कलाक शोध आऽ प्रदर्शनसँ जुड़ल छथि आऽ नाट्यशालासँ जुड़ल छथि विकलांग बाल लेल थिएटरसँ। निम्न टी.वी. मीडियामे रचनात्मक निदेशक रूपेँ कार्य- आभलमया (मराठी दैनिक धारावाहिक ६० एपीसोड), आकाश (हिन्दी, जी.टी.वी.), जीवन संध्या (मराठी), सफलता (रजस्थानी), पोलिसनामा (महाराष्ट्र शासनक लेल), मुन्गी उदाली आकाशी (मराठी), जय गणेश (मराठी), कच्ची-सौन्धी (हिन्दी डी.डी.), यात्रा (मराठी), धनाजी नाना चौधरी (महाराष्ट्र शासनक लेल), श्री पी.के अना पाटिल (मराठी), स्वयम्बर (मराठी), फिर नहीं कभी नहीं( नशा-सुधारपर), आहट (एड्सपर), बैंगन राजा (बच्चाक लेल कठपुतली शो), मेरा देश महान (बच्चाक लेल कठपुतली शो), झूठा पालतू(बच्चाक लेल कठपुतली शो), टी.वी. नाटक- बन्दी (लेखक- राजीव जोशी), शतकवली (लेखक- स्व. उत्पल दत्त), चित्रकाठी (लेखक- स्व. मनोहर वाकोडे), हृदयची गोस्ता (लेखक- राजीव जोशी), हद्दापार (लेखक- एह.एम.मराठे), वालन (लेखक- अज्ञात)। लेखन- बीछल बेरायल मराठी एकांकी, सिंहावलोकन (मराठी साहित्यक १५० वर्ष), आकाश (जी.टी.वी.क धारावाहिकक ३० एपीसोड), जीवन सन्ध्या( मराठी साप्ताहिक, डी.डी, मुम्बई), धनाजी नाना चौधरी (मराठी), स्वयम्बर (मराठी), फिर नहीं कभी नहीं( हिन्दी), आहट (हिन्दी), यात्रा ( मराठी सीरयल), मयूरपन्ख ( मराठी बाल-धारावाहिक), हेल्थकेअर इन २०० ए.डी.) (डी.डी.)। थिएटर वर्कशॉप- कला विभाग, महाराष्ट्र सरकार, अखिल भारतीय मराठी नाट्य परिषद, दक्षिण-मध्य क्षेत्र कला केन्द्र, नागपुर, स्व. गजानन जहागीरदारक प्राध्यापकत्वमे चन्द्राक फिल्मक लेल अभिनय स्कूल, उस्ताद अमजद अली खानक दू टा संगीत प्रदर्शन। श्री भालचन्द्र झा एखन फ़्री-लान्स लेखक-निदेशकक रूपमे कार्यरत छथि। चूल्हि '... चूल्हि आ स्त्री - दुनूक प्रारब्ध एके जकाँ होइत छैक, बुझलहक? जरैत-जरैत जीबइए में दुनूक गुजरि होइत छैक... गै दाई !' जाबैत जियलै - ई गप्प, माय हमरा सदिखन कहिते रहलै। ई कह' में जे मर्म नुकाएल छलै, से बुझबाक उमिर त' नहिंए रहय, मुदा जाहि तरहैं उसाँस ल' क' माय ई बात कहय, ताहि स' ई त' लागबे करय जे ई गप्प अबस्से कोनो तरहक जीवन-मंत्र हेतैक - अहि तरहक विचार मोन मे आबि आबि जाय। ... आ देखियौ भाग्यक खेला, जे हमर आ चूल्हिक संग कहाँदनि जनमिते देरी कि धरा गेलै। माइये कहथिन्ह जे हमर जनम अहिना जाड़ स' कनकनाइत राति मे भेलै। हे दाई - जनम त' भ' गेलै, मुदा मुँह स' पहिल केहां निकाल' लेल चुल्हिएक सहारा लेब' पड़लै। अपन गरमी द' क' चूल्हिए हमरा बचा लेने रहय। आ ताहि लेल वा की, जे घर-आँगनक लोक आओर हमर नामे ध' देलकै चुल्हिया' ...। आब कहियौ त' भला, इहो कोनो रीत भेलै नाम जोड़बाक ! ओ त' धन्यभाग हमर, जे बबा के की फुरेलन्हि आ नामकरणक दिन हमर नाम राखि देलखिन्ह - 'सिया सुन्नरि'। तैयो घर-आँगन के त' बूझिते छियै ने' ... एक बेर जे कह' लगलै 'च्ुूल्हिया' त' ओ कियो बदलै भला! हे दाई, 'सिया-सुन्नरि'। ई नाम त' मात्र कागजे लेल रहि गेलै। बबा त' बड्ड खिसियैथिन्ह मुदा लोको सभ थेथर भ' गेल रहै। हुनका सोझा मे त' सभ किओ दम साधि लै, मुदा जखने परोछ भेलाह कि फेर सभके कोनो झरकबाही लागि जाय छलै... चुल्हिया, चूल्हियाक से किलोल मचि जाय जे की कही ... आई त' हँसियो लागि जाइयै । मुदा छोटपन मे हमरा बड़्‌ड खराब लागय, बुझलहुँ की? आई बैसल-बैसल जहन ओ गप्प सभ मोन पड़ेैयै त' विचार' लागै छी जे वास्तव में, एहन आगांक बिचार करयबला पुरूख पात्र के रहब घर में कतेक जरूरी होई छै। नञि त' घूमैत रहू जनम भरि अपन एहने जरल धनकल सन नाम ल' क' ... चुल्हिया ..पनबसना दाई ... ताबा कुमारी ... चकला देबी ...!!! धुर्र जाउ, अहाँ के हँस्सी लगैय' ... आ हम सोचै छी जे देखियौ त'। बेटी आओर के एक गोट नीक नामो टा नसीब नञि होई छै अइ समाज मे... तहन आर कथीक आस धरै ओ...? कोन भरोस पर जीबय ओ? ... त' कह' जे लगलहुँ ... जे कनि बूझ' सूझ' जोगर भेलहुँ त' देखियैक जे हमरा घरक चूल्हि जहाँ कनिको करियैलै कि हमर माय ओकरा लीप-पोइत क' ओकरा चिक्कनि चुनमुन बना दैक। चूल्हि सेहो ओकरा लेखे एकटा नान्हि टाक बच्चे टा रहै। जाहि माया आ ममति स' ओ हमरा आओर के धोबै-पोछै छलै, ओहि स' कम माया ममति नञि देखलियै हम ओकरा चूल्हि लीपैतकाल। आ, कने नीक स' सोचियौ, त' चूल्हि स' जे ओकर सिनेह रहय से अनर्गल नञि छलै ने! यै! जे चूल्हि आजन्म जरि धनकि क' लोग आओरक पेट भरै छै, ओकरे प्रति लोक एतेक कृतघ्न कोना क' भ' जाइत छैक? ... माउगि के ल' क' सेहो अपना समाज मे अहिना होबैत एलैये आई धरि। भरि जिनगी दोसरे लेल जरितहु-धनकितहु बेर पडला पर ओकरो अही चूल्हि जँका कात क' दै छैक लोक आओर। जिबिते जी मुँह में छाउर भरने पड़ल रहैत अछि अपन भनसाघर क एकटा कोन्टा मे...। धुरि जो। हमहूँ ई कोन जरल धनकल सनक कथा ल' क' बैसि गेलहँु। त'...कहैत जे छलहुँ ...। रसे - रसे ई चूल्हि लीप' पोतक काज हमरे जिम्मा लागि गेल। आ ओहि में हमर मोने सेहो लाग' लागल। बुझलहुँ ! फूसि कियैक बाजब? आहि रे बा। ले बलैय्या के। एकटा बात त' कहब बिसरिए गेलहुँ। हमर माय बड्ड लुरिगर आ तैं अपना लूरि-ढंगक कारणे पूरे परोपट्टा में नामी। सत्यनारायण भगवानक पूजा मे ओ जे अरिपन दै से की कहू। देखितहुँ त' आँखि चोन्हरा जयतियैक। केहनो खरकट्टल बासन कियैक नञि रहौ - से कहै छी जे यदि ओ माँजि दैक त' बर्तन चानी जकां झलमल क' उठै छलै। हे, छठि मे अहिबातक पातिल जे ढेरितै - तँ एहन, जे गाँम के लोक कहै छी, भकचन्ह रहि जाइत छलै। माउगि बला कोनो एहेन लुरि बाँकी नञि छलै, जाहि मे ओ ककरो स' पाछां भ' जइतियैक, कहै छी जे से । सिआइयो-कढ़ाई सीख' लेल परोपट्टाक नवकनिञा सभ के कहै छी जे से सिहंता लागल रहैत छलै जे कहिया ओ हुनकर अंगना मे आबथु आ कहिया ओ सभ हुनका स' अपन मनपसीनक चीज बतुस आओर बनाबय के सीखि लियए। माय मे बस कमी छलैक त' एकेटा, जे ओ नैहरक बड्ड गरीब छलै ! आ गाँम-घर मे त' बुझले अछि, जे जकरा लग टाका पूँजीक ढेर छै, सएह लोक मातबर कहल जाइत छैक। ओ मनुक्ख मे गनल जाइत छैक। आ कि नञि? लूरि-बेबहार त' बादक गप्प भेलै। टाका पूँजी रहलै त' बींगलो-बताह सभ बुधियार भ' जाइ छै। आ से जे नञि रहलै त' आँखि-कान रहितहु लोक आन्हरे-लांगड़ बुझल जाइ छै। यै, जौं सच-सच पूछी त' अपना सभ मे माउगि-मनुक्ख स' बियाहदान थोड़बे कएल जाइत छैक? बियाह-दान त' होइत छैक जर-जमीन स', टाका-पूँजी स', किंवा धन-संपत्ति, मान-मरातब स'। माउगि त' ओहि बियाहक उललक्ष्य मे देल गेल एकटा सनेसे (भेंटवस्तु) छैक। से कियैक त' पूँजी-टाका कतबो कियैक नञि रहौक, एकदिन त' खतम भइए जाइत छैक। तहन मोन कोना क' रहतैक जे अई घर मे बियाहो भेल छै ककरो! से बस, माउगि नामक सनेस के देखि क' ई बुझल जाइत रहैत छैक जे अहू घर मे एकटा बियाह भेल छैक। तैं बूझियौ जे माउगि भ' गेलै यादगारक एकटा समान। बुझलहुँ कि नञि। बस अहिना एकटा समान रहै हमर माय। से कियैक त' हमर दाई जे रहथिन - कहै छी जे बड्ड लोभी। हुनका भगवान संतोषक नामक वस्तु जेना देनेहि नञि रहथिन्ह जिनगी मे। बार रौ बाप। चानी परक तेलो चाट' लेल तैयार रह' बला एहन लोभी स्त्री हम नहीं देखलहुँ आई धरि, से जे कहै छी। ओ त' हमर बाबा जाबति समंगगर रहथिन्ह, ताबति हिनकर जितुए नञि चलैन्हि तैं, वरना हमर माय एहि घर मे अबितियैक भला? बाबा अपना जुतिए माय के पुतोहु बनाक' ल' त' एलखिन, मुदा अँगना मे त' जे हाल ओकर करथिन दाई से दलान पर बैसल ओ बेचारे की जान' गेलथिन्ह। आ गरीबी जे आदमी के सहनशीलता सिखा दैत छै, से त' अहां के बुझले अछि। हमर माय अपन करमक लेख बुझि क' सभकिछु चुपचाप सहन कएने जाइ। ककरा कहितियैक! के रहै ओकर अपन, जकरा कहिक' दू छनक दु:खो बाँटि लितियैक? नैहर बला सभ तँ छौंरी सभके ब्याह-दान करबा क' कहुना क' अपन पतिया छोड़ा लैये ने। तकर बाद त' कहबी छै जे ओ आ ओकर तकदीर। जे जे पा्ररब्ध छै ओकरा लेल, तकरा स' ओकरा सभके कोन सरोकार । आ दैबक रचना देखियो, एकरे ओ सभ हिन्दू धर्मक महादान 'कन्यादान' कहै छथि। दानो कर' लेल कन्ये भेटलन्हि भगवानक ई भक्त लोकनि के। बुझलहूँ। ओहि काल मे की अखनो। आस्त्तिकता-नास्तिकताक सवाले नञि! मात्र कर्तव्य दुधारी चलेनाई आ नामे भ' गेलै ई दानक कन्यादान त' अहि मे किओ की क' सकैय'? बेटा के दान कर' के बात नहिं फुरैलनि। हँ, बेटाक बिक्री त' होइते छलै, आइयो होइते छै। ओह, बिक्री नञि, कन्यादान जकाँ एकरो सम्माननीय नाम छै - तिलक दहेज। बेटीक सुख लेल बेटीक भावी घर के खलिहान आ कोठी जकाँ भरि देबाक कर्तव्य बोध ! नञि जानि हम सब कहिया धरि एकरा सभके करमक लेख कहि-कहि के अपना आओर के बहटारैत रहबै। त' कह' जे लगलहुँ ... हमरा माय मे आ गाय मे कोनो अंतर नञि रहै, बुझलहँु? सभ लाथे। हम जखन-जखन गाय के नबेद खुआब' जइयै - अकस्माते कहै छी जे हमर ध्यान ओकर आँखि दिस चलि जाय। सदिखन लागय जेना ओहि आँखि में करूणा भरल रहै छै। करूणा छोड़ि क' जेना दोसर कोनो भाव भगवान भरनैये नञि रहथिन्ह गायक ऑखि मे! आ एम्हर हमरा माय के आँखि मे सेहो कोनो भय आ करुणाक मिश्रित भाव एहन रचि-बसि गेल रहै जे भय ओकर देहक दोसर नाम भ' गेल रहै आ करुणा आंखिक। जखन देखितियै, जेना डेराएले रहै आ दयनीये बनल रहै। लागै जेना अहि घर मे सदिखन ओ अपना के असुरक्षिते बुझै। आ सरिपहुं अही डरक खातिर ओकरा मे चौबीसो पहर खटैत रहबाक ताकति आबि गेल छलै। कखनो जे बैसल देखितीयै माय के! ओह! कहियो, कखनो, पलखतियो लेल! हे... मुदा एकटा बात जे कहलहुँ - आँखि बला। सँाचे कहै छी, आँखि कहियो झूठ नञि बाजि सकैयै। अहाँक मोनक छोट स' छोट छीन उथल-पुथल के देखार क' दइत छै ई आँखि। तैं देखै नै छियै जे अइ पुरूष-प्रधान समाज मे नियमे बनि गेल छै जे कोनो माउगि पुरूषक सोझा मे आबि क' ठाढ़ नञि भ' सकैय', ठाढ़ भ' क' नञि रहि सकैये। डर बनले रहै छै आ कि नै। सदिखन तकरा नुकौने रही जे कतहु आँखि मे किओ किछु देखि लेलक, तहन तँ उधारे भ' जायब। कत' नुकाएब अपन ढ़ोंगी स्वरूप...? तैं नियमे बना देलकै धोधक आ नाम द' दैलकै संस्कृति आ परंपराक। यदि संस्कृति आ परंपराक एतबे धेयान रहै छै त' पुरूष पात्र कियैक नञि करै छथि ई सभ' परहेज, पाबनि तिहार, व्रत उपवास, कोखि सेनूर लेल सभ थान-भगवती थान, दुर्गाथान, महावीर थान गोहरबैत, हरतालिकाक निर्जला उपास करैत, बटसाइतक बड़ भगवानक 108 फेरा लगबैत। कहू त' भला जे इहो कोनो नियम भेलै जे पुरूष पात्र अपने त' सांढ़ जँका छुट्टा, अंबड बनल घूमैत रहौक आ माउगि आओर जोताएल रहौक अपन चूल्हा-चौकी मे...। धुर्र जो, हमहूँ की अनर्गल बात ल' क' बैसि गेलहुँ। त' कह' लगलहुँ जे हमर माय बेदसा बेदसा भ' भ' क' काम करै। आ हमर दाई जखन अबै त' ओकरा संहारे करबाक पाछू लागल रहैक। कियैक... त' नैहर स' किछु दान-दहेज नञि आनलकै ने, तैं! आ ताहू पर देखियौ, कतबो राति बीत जाए... तैयो हमर माय दाई के चानि पर तेल रगड़ने, हुनक गोड़ हाथ जाँतने बगैर नञि सूतै। बुझलहुँ। अपन ई कर्तव्य ओ मरितो दम धरि नञि छोड़लकै। आ तैयो ई हडासंखनी के कहै छियै जे करेज नहिं पसिजलै। आ... ई सभ देख क' हमर एकटा विचार पक्का भ' गेलै जे माउगिक मोजरि ओकर लूरि सँ बेसी कीमती छै ओकर नैहर स' आब' बला बिदाईक समान के। बियाह दान आई काल्हि स्त्री पुरूष मे नञि ने कएल जाई छै। ओ त' कयल जाई छै जर-जमीन सँ... टाका-पूँजी सँ ... धन-दौलति सँ... मान मरजाद सँ... मातबरी स'। ओत' हमर भागक लेख जे हमर बियाह माय के रहिते भ' गेलै। बाबू त' नहिंए रहथिन्ह। सासुर अयलाक बाद कहियो किओ गाम घर से एम्हर-ओम्हर स' आबि जाय, त' माय के समाचार कने-मने बुझि जइयैक। मोन हुअए, जे भरि पोखि हुनका आओर स' गप्प करी। मुदा सासु बीच मे मचिया ल' क' बैसि जातथि। त' जे आएल छल, ओकरा स' भेंट घांट करबाक लेल हम जे भीतर स' छन भर लेल दलानक कोठरी मे आबी त' मात्र औपचारिक हाल-चालि पूछलाक अतिरिक्त कइए की सकै छलहुं। तइयो किओ-किओ सासुक परबाहि नञि क' क' मायक व्यथा बखानिए जाए आ ई सभ सुनिक' त' हमर कोंढि फाटि जाय...। सुनि क' हेहरू भ' भ' क' कान' लागी। बुझलहुँ। आर कइये की सकतियैक? हमहूँ त माउगे रहियै ने ? ओम्हर जेना ओ बन्हाएल... ओहिना एम्हर हम बन्हाएल...। कोनो लाथे कोन्टाबला घर मे चलि जाइ आ मुंह मे अँचरा कोंचि क' खूब... भरि मोन कानी। कहू त'... जाहि घर मे अपन दु:खो के नुकाए क' भोग' पड़ै... ओकरा घर कहल जेतै। याहि टा होई छै अपन घर? माउगि लेल, माउगक अपन घर लेल, जाहि लेल शास्त्र सम्मत शिक्षा, जे जाहि घर मे डोली उतरौ ताहि घर स' अर्थीए उठौ गै बाउ। एहन एहन घर । मुदा उपाय? थू, एहन अपनापन पर! हे दाई, अहिना होइते-होइते एक दिन इहो सुनि लेलियैक जे माय अपन असावधानीक कारणे चूल्हि मे जरि क' मरि गेलै...। अँ ... यै .. जाहि चूल्हि के ओ अपन संतानों स' बढ़िक परिचर्या केलकै, सएह चूल्हि ओकरा जरा देलकै। के पतियेतै एहेन-एहेन कथा पर। आओर किओ पतियाओ वा नञि, हमरा त' रत्तीयो भरि विश्र्वास नहिं भेलै अइ बात पर। बूझि त' गेलियै सभ किछु, मुदा जकर हेराई छै, ओकरा बाजब के अधिकार त' नहिंए रहि जाइ छै ने यौ! के सुनतै ओकर आक्रोशक कथा? के बूुझतै ओकर मोनक व्यथा। भीतरे-भीतरे दाँत पर दाँत गस्सा क' क' इहो आघात पचा लेलहुँ...। बुझा देलियै मोन के जे अहू लाथे जरैत-जरैत जीब' स' त' ओ बचि गेलै। जीबिते में कोन सुख रहै जे मरला स' कम भ' जयतयन्हि ! सोचै छी जे चूल्हियो के नै देखल गेलै ओकर अवस्था। तैं ल' लेलकै ओकरा अपना कोरा में... जेना साीता के अग्नि माता ल' लेने छलीह! सीता त' तइयो घुरा देल गेल छलीह अग्नि द्वारा, मुदा चूल्हि त' धरती माता जकाँ ओकरा अपना मे समेटि लेलकै - सदिखन लेल। सुता देलकै चिर-निद्रा मे... आ मोनक एकटा गप्प कहू.. आब त' हमरो ओहि चूल्हि स' ऐतेक नेह भ' गेल अछि से की कहू ! कनिको झरकल देखलियै ने कि बस, लीप' लेल बैसि जाइत छियै...। हर खन लगैत रहैये जे कतहु माय देख लेतै त' की कहतै - देखियो त' कने। एना किओ चूल्हि के राखैए! कहै छी जे जाबति लीपबै नै ताबति कान में जेना माइयेक आवाज गॅूंजैत रहैत अछि - 'हे सिया-सन्ुनरि... कने देखहक त'... केहेन करिया गेल छह चूल्हि... लीप देबहक से नै !' आ हम चाभी लागल मशीन जँका उठै छी... आ नूरा ल' क' चूल्हि के लीप' लागै छी। अँगना घर में सभ किओ हँसियो उड़बैत छथि जे - ई कतहु बताहि त' नहिं भ' गेलीहए। चूल्हि के किओ एतेक जल्दी-जल्दी लीपय? मुदा हमरा कनिको रोष नै लगैये लोक आओर अइ हँसी ठट्ठा पर...कियैक त' हम जनैत छी जे माउगि आ चूल्हिक एके प्रारब्ध होईत छै... जरू आ जरि -जरि क' जीबैत रहू। अहीे में ओकरा आओरक बास छै...।' जे कथा ई सभ किओ नहिं बुझलखिन्ह, सएह कथा कहै छी जे नान्हि टाक हमर छोटकी बेटी अही उमिर मे बुझि गेल छै। एखने किछु देर भेलै, हमर छोटकी आ ननटुनवा दुनू खेलाई छलै। की से बुझलहुँ ... घर-घर ! दुनू आपस मे खेलौना बाँटे छलै आ हम अहिना कोनियाँ घर मे बैसल-बैसल देखै छलियै जे देखियो की करै जाई छै ओ सभ! थारी लेलकै ननटुनमाँ त' बाटी लेलकै हमर छोटकी। लाठी लेलकै ननटुनमा त' चकला-बेलनी लेलकै छोटकी। ननटुनमाँ पँजिएलकै अपन सन्दूक, तँ छोटकी सम्हारलकै अपन घैल-तमघैल। अहिना करैत-करैत ननटुनमा के हाथ पड़ि गेलै, कहै छी जे चूल्हि पर...। आ ननटुनमाक हाथ पड़लाक देरी से कहै छी जे हमर छोटकी तेहेन ने चील जकाँ झपट्टा मारलकै आ खींच लेलकै चूल्हि के अपना दीस जे हम ताकिते रहि गेलहुँ ओकरा। ओ कह' लागलै ननटुनमा के -'हे... चूल्हि कतहु पुरूष पात्र लेल भेलैये। लेबइये के अछि त' दियासलाई ल' लीय'। अहाँ के काज आओत कतहु, कखनो ! चूल्हि त' मौगी आओरक काज अबै छै ...। अहाँक कोन मतलबि एकरा आओर स' ! ओ सुनि क' जेना सुन्न रहि गेलहँु... बुझलहँु। कतके जल्दी बूझि गेलै हमर ई नन्हकी, अपन ई नान्हिपने में अइ दुनियाँक रीति रेबाज ! यै, आइ ओ एतेक बुझि गेलैये त' भ' सकैये जे प्रारब्ध हेतै त' एकरा स' सावधानो हेबाक रस्ता खोजि लेतै ओ। जतेक अधिकार स' ओ चूल्हि के अपना दिसि क' क' दियासलाई ओकरा दिसि बढ़ा देलकै, भ' सकै छै, तहिना एक दिन ओहि दियासलाइक जरैत तीली अपना दिसि बढैत देखि सएह अधिकार स' ओकरा फँूकि क' मिझा देतै आ जरैत काठी बढ़ब' बलाक गस्सा ओतबे कसि क' पकड़ि लेतै, जतेक कसिक' चूल्हिक परिपाटी ओकरा धएने छै। मुदा एखनि त' चली... उठी। आब नोर त' सुखा गेलै। देखियै, चूल्हि सुखेलै की नहिं... । गंगेश गुंजन (१९४२- ) भोज परक आँटी- सत्तरिक नव-खाढ़िक युवा नवतुरिआसँ “भोज परक आँटी” अवश्य सुनल हएत बन्धु! हमरा लोकनि ते आब आयु-अवरोहणक प्रक्रियामे छी। मुदा पराभव अछि अपन एहि मैथिल मानक ओ स्वप्न जे मिथिलांचलक समग्र सामाजिक परिवर्तनक अर्थात्- जनपथक निर्माण (राजपथ नहि) आकांक्षामे सौँसे बातपर उत्कट डेगे चलिते रहबा लेल विवश छी। हमर गाम पिलखबारो ताहि से जुटल अछि, जाहिसँ हितेन्द्रजी अहाँक गाम केओटी। हमरा पीढ़ीकेँ तँ इतिहास “भोज परक आँटी” बना लेबाक बेर-बेर उपाय कएलक, जेना-तेना बँचबामे सफल रहलियैक, मुदा भऽ कहाँ कोनो खास सकलैक। तेकरे टा अफसोच। एक बोझक रूपमे फसिलकेँ खरिहानधरि कहाँ पहुँचा सकलियैक। तेकरे टा दुःख! मुदा टिकल रहलियैक अपन जीवन-मूल्य आऽ समाज दर्शनक भूमिपर। एक टा कवि-लेखक जे संघर्ष असकरो कऽ सकैत छी। से रस्ता चलबाक यत्न। जे से। पूरा बिहार- आन्दोलनक परिणति एहन आऽ एतए धरि भऽ जेतैक से क्यो सोचियोसकैत छलैक? अवश्ये बुझल हएत जे ताहि आन्दोलनक उपज- आमद भरि देश कैक टा महापद आसीन सी.एम. समेत कतोक एम.पी., एम.एल.ए. महोदय छथि। अहाँक पीढ़ीमे यदि सत्येक (सन्देह नहि सत्तरिक कारवाँक भव से कहि रहल छी जे) सत्ये मिथिलाक दर्द अछि तँ राजनीतिकेँ चिन्हैत जाइ जाऊ। पोलीटिक्स कऽ एहि नव अवतारकेँ। से भाषाक। ताहूमे मैथिलीक नव-नव ब्रांडक नेता आ एहन राजनीतिकेँ चीन्हि जाऊ। कारण जे राजनीतिक ई एकदम नव अवतार ठीक विश्व-बाजारी अवतार! कोनो औसत सुख लेल ककरो “भोज परक आँटी” नहि बनब। एहि वाष्पीकरणक प्रवाहमे एहन लोक नीक समय अर्थात् कोनो प्रतिगामी व्यवस्था रोकि नहि सकैत अछि। स्वयं राजनीतिक विचारधारा-अवधारणामे सेहो युगक अनुसार सकारात्मक पुनर्विचार चलि रहल छैक। जाति, धर्म, सम्प्रदय, क्षेत्रीयता सभसँ ऊपर सोचैत। समग्रतासँ एक होऊ। अपन मिथिलाँचलो तँ देशेमे ने अछि। अपम माँ मैथिली तँ अवश्ये महान। मुदा अन्य लोकक मातृभाषा सेहो तुच्छ नहि। अपना देशक सभ भाषा श्रेष्ठ अछि। मुदा दुर्भाग्यसँ किछु मूढ़ मैथिल मानसिकताक लोक आर तँ आर हिन्दी तककेँ अपमान जेकाँ कऽ देबाकेँ अपन मैथिल प्रेम बुझि लैत छथि, ई नकारात्मक प्रवृत्ति उचित नहि। हम तँ तेहन समयकेँ सहन कएने छी, जे किछु परम् विद्वान् अत्यन्त आदरणीय लोक लिखैत तँ मैथिली नहि तँ इंग्लिश। हिन्दी नहि। ई बहुत विचित्र लागए। आखिर हिन्दी अपन बहुत गौरवशाली लोकतन्त्र राष्ट्र-भाषा थिक। बन्धु! से मानसिकता बदलि जरूर रहल अछि मुदा अहाँ खाढ़िक (पीढ़ीक) युवा नवतुरिआमे आओर तेजीसँ परिवर्तन चाही। बात नहि रुचए तँ बिसरि जाएब, आग्रह! मैथिलीक उर्वर क्षेत्रमे कॉरपोरेट-जगत धाप एम्हर आब मैथिलीकेँ ई अष्टम सूचीक मान्यता एकटा आओर नव वादक उपहार-दरभंगा-मधुबनी-सहरसा वादक उपहार बनि रहलए। नव बाजारी प्रवृत्तिक ई प्रच्छन्न बीज-वपन आरम्भ भ’ चुकल अछि। सावधान। जे वर्ग एहि नव प्रयोजन-सिद्धिक बाट पर चलि आ’ चला रहलाह अछि, तनिकासँ संवाद होयबाक चाही। एखनहि-एही काल। अन्यथा मैथिलीक जतेक आ’ जेहन हानि आइ धरि नहि भेल छलैक, ताहिसँ बहुत बेशी आ’ खतरनाक नोकसान भ’ जयतैक। देशमे प्रचलित तुच्छतावादी प्रवृत्तिक विरुद्ध रखबारी कर’ पड़त। पूरवाग्रह मुक्त्त मन-प्राणसँ। अपना-अप्नी क’ क’ सुतारबाक, हथिययबाक अवसरवादी प्रवृत्तिसँ बाज अबै जाथि। मैथिलीक विषयकेँ समग्रतामे -देखि-बूझि क’- जाहिमे सम्पूर्ण मिथिला, मैथिल आ’ मैथिली अछि। छुछे दरभंगा-सहरसा-मधुबनी –ए टा नहि। आ’ ने छुच्छे सोति-ब्राह्मण-ब्राह्म्णेतर मैथिली भाषा-संस्कृति। तहिना साहित्य कथा कि कविता कि उपन्यास कि नाटके टा नहि। ई सभटा समस्त मिथिलांचलक एक जातीय सांस्कृतिक समग्रता तथा लोक गरिमाक, मानवीय गुणवत्ता, जीवनमूल्यक दबाबमे करैत रचनाकर-विचारकक संघर्ष आ’ आदर्शोन्मुख अभिव्यक्त्तिमे समस्त युग-यथार्थ बनैत अछि। ओना अपना-अपना पीढ़ीक प्रति आग्रह-आवेश स्वाभाविक, तेँ सभ दिना यथार्थ। मुदा वैह यदि कट्टरताक रूप ल’ लिअय तँ सामाजिक जहर बनि जाइछ। दुःखद आ’ चिन्तक विषय तँ ई जे एहन प्रवृत्ति मैथिली भाषा आ’ साहित्यमे सृजनरत अधिकांश नव्यतम रचनाकारमे पर्यंत देखाइ पड़’ लागलए। जनिकर लेखनसँ मैथिलीकेँ बड़-बड़ आशा छैक। से लोक सेहो।ई दुश्चिन्तेक विषय। एहन विभाजनकारी, विद्वेषोन्मुखी डेगकेँ रोकबाक चेतना जगाउ। आरम्भेमे-एखने। एहन वेगमे संस्थामूल्य सभक क्षय होयबामे समकालीन लोकक नकारात्मक पहल केर मुख्य भूमिका रहैत आयल छैक। आइ तँ आर। संस्था समेत साहित्यक आकलन-मूल्यांकनसँ ल’ साहित्य-सम्मान धरिक मानदण्ड-निकष-कसौटीक निष्पक्षता आ’ ईमानदारी पर प्रश्न उठि रहल अछि। संस्था मूल्य सभक क्षरण आ’ कठघरामे ठाढ़ कएल जयबाक घटना सभकेँ, हल्लुक क’ नहि, बहुत गंभीरता आ’ जिम्मेदारीसँ स्वीकार करबाक एखनहि अछि- बेर छैक। नहि तँ पछताय लेल तँ सौँसे भविष्य धएल अछि। एहि परिस्थिति तथा एकर खतरनाक प्रवृत्ति पर लोकक ध्यान जयबाक चाही, जे कोना एन.आर.आइ. प्रकारक लोक सभ आइ एक-बएक अचानक मैथिलीक भाषा-सांस्कृतिक आँगनकेँ सेहो कब्जा क’ रहल छथि। तेहन देशी एन.आर.आइ प्रकारक लोककेँ अवश्य चिन्हित कयल जयबाक चाही जे मिथिलांचल-मैथिली भाषा आ’ लोकक प्रसँग कहियो किछु नहि कयलनि। कोनो योगदान नहि। परन्तु आइ मैथिलीक ओहू क्षेत्रक अवसर आ’ संस्थाकेँ अपने अधीन क’ लेबाक प्रबंधमे सक्रिय, लगातार सफल भ’ रहल छथि। विडंबना तँ ई जे मैथिली-मिथिलांचलक विरुद्ध एहि गतिविधिमे बहुत रास तथाकथित मैथिलीक उच्चकोटिक लेखक-समालोचक-कवि ( छद्म प्रातिशील रचनाकार समेत) सेहो कोनो आपत्ति वा विरोध दर्ज नहि क’ रहल छथि। बल्कि मैथिलीक एहि नवोदयक-साम्राज्यवादक परोक्ष सहयोगे क’ रहल छथि। सँभव जे भविष्यमे अपना लेल कोनो उत्पादक अवसरक वास्ते निवेश बुद्धिसँ, ई सभ क’ रहल होथि, एकरे व्यावहारिक बाट मानि क’ चुप बनल छथि। युवा पीढ़ीक सेहो। के पड़य एहि सभमे? अद्यावधि प्राप्त इतिहासक जानकारीमे तत्काल यश-धनक अति-उताहुल , व्यग्र नव पीढ़ी! ई पराभव बजार आ’ भूमंडलीकरण (प्रायः!) मिथिलांचलक एहि नव गणित आ’ समाजशास्त्रकेँ की चीन्हओ? जा रहल लोक चीन्हओ कि आबि रहल लोक? ककर दायित्व। हमरा जनैत अवसर आ’ दूरगामी प्रभाव परिणतिकेँ दृष्टिमे राखि क’, छुच्छे बौद्धिकताक, बुद्धिजीविताक संकीर्णताक नहि, सबजन मैथिल अर्थात् जनसाधारणक मंगलकेँ नजरि पर राखि, स्वच्छ हृदय, पारदर्शी व्य्वहारवादक चलन अनै जाउ। यदि सत्ये मैथिली, मिथिलासँ अनुराग हो। पारम्परिक मैथिल कूटिचालि चोड़ै जाइ जाउ। अंततः मैथिली अपना सभक एकहि टा नाओ अछि। सभ गोटय एही नाओमे सवार छी। पार उतरब तँ सभ क्यो। तेँ नाओमे भूर नहि हो। बीचहिमे डूबय ने कतहु। अन्हारोमे अनका टाटक भूर देखबाक आँखि आ’ नेत बदल’ पड़तैक।(अन्हारोमे अनका टाटक भूर देखबाक बिम्ब पूर्णियाक कवि- प्रशान्तजीक मन पड़ि गेलय ‘सद्य मैथिल छी’) जे ओ’ आकश्ववाणी पटनाक मैथिली कार्यक्रम भारतीमे प्रसारित कयने रहथि)। नकारात्मक-ध्वंसात्मक समझ आ’ बुद्धिसँ परहेज करए जाइ जे क्यो से क’ रह्ल होइ। चन्द्रमा पर नव प्रभुवर्गक प्लॉट-रजिस्ट्री जेकाँ सद्याः उपलब्ध मैथिलीक एहन ऐतिहासिक अवसरक उपयोग सोचै जाउ-उपभोग नहि। दरभंगा बनाम सहरसा बना क’ मैथिलीक क्षेत्रीय रजिस्ट्री जुनि करबै जाउ। मनै छी, कहियो छल हेतै ई मनवाद। मुदा से मैथिलीक नितांत दोसर दौर छलैक। से ध्यान रखबाक थिक। ई(वि)काल प्रायः सभ भाषा-साहित्यक इतिहासमे अबैत रहलैए। साहित्यिक सरोकार समाजसँ रहैत छैक, तथा समाज जीवन-यापन समेत जीवन-शैली आ’ जीवन मूल्यक निर्मिति आ’ निर्वहन तत्कालीन सत्ताक उपज होइत अछि। तेँ जन साधारणे लोकटा नहि, बुद्धिजीवी आ’ नेतृवर्ग सेहो ताही दबाबमे अपन प्राथमिकता तय क’ क’ अपन बाट बनबैत अछि आ’ सुभीता चह’ लगैत अछि। कालांतरमे जल्दीये तकर अभ्यस्त भ’ जाइत अछि। मध्यम वर्ग बेशी आ’ जल्दी। ई सुविधावादी जीवन-शैली आ’ जीवनदर्शन जन्मैत छैक- कहियो धर्म-सत्ता, कहियो राज-सत्ता, कहियो विकलांग लोकतंत्र वा कहियो अपरिपक्व लोक सत्ताक विचार-व्यवहारक संवेदनशील व्यवस्था शासनक अधीनतामे। बहुसंख्यक जनताक अशिक्षा दुआरे। तखन ओहि समयक जे बुधियार वर्ग रहैत अछि से सत्ताक अनुगमन करबाक सुभीतगर निष्कंटक बाट चुनैये। सुभीताकेँ अपन जीवन-मूल्य बना लैत अछि। जे बुधियार नहि अर्थात् जनसाधारण लोक, ताहि परिस्थितिकेँ अपन नियति वा प्रारब्ध मानि लैत अछि। एना अगिला कएक पीढ़ी धरि एहिना ओंघड़ाइत चलैत चलि जाइत छैक। गुलामी खाली कोनो बाहरीये देश वा सम्राट-साम्राज्येक टा नहि होइत अछि। गतानुगतिकता आ’ यथास्थितिवादी मानसिकता आ’ युगक प्रगति-गतिकेँ नहि बूझि, मूड़ी निहुँरैने सभ किछु स्वीकार आ’ सहैत चलि जाइक प्रवृत्ति सेहो गुलामियेक थिक। सत्ता तुष्ट लोकक ताबेदारी सेहो नव भाँग-गाँजाक अभ्यास अर्थात् गुलामिये होइत अछि। से ई सभ प्रकारक गुलामी बहुत युग धरि चलैत रहि जाइत छैक- अगिला कोनो सामाजिक परिवर्त्तन- कोनो महाक्रांति अयबा धरि। एखन धरिक इतिहासक शिक्षा तँ यैह कहैत अछि। उर्वर क्षेत्रक आविष्कारक बाद बजार ओकरा हथियबैत छैक। तेहन लोक से क’ नहि गुजरय। निजी सम्पत्ति ने बना लिअय। एकर रजिस्ट्री-केबाला ने करबा ने करबा लिअय। मैथिलीकेँ मसोमातक जमीन जेकाँ अपना-अपना नामे लिखबाक व्योंतमे लागल तेहन लोक से क’ नहि लिअय। एहि प्रक्रियामे माफियो –घुसपैठियो सभक गतिविधि अचानक तेज भ’ जाइत छैक। कहबाक प्र्योजन नहि जे मैथिली एखन सैह उर्वर क्षेत्र बनल अछि। मैथिली माफियाक कॉरपोरेट सेक्टर जोशमे अछि। गतिविधि तेज केने अछि। मैथिलीक विषयकेँ समग्रतामे -देखि-बूझि क’- जाहिमे सम्पूर्ण मिथिला, मैथिल आ’ मैथिली अछि। छुच्छे दरभंगा-सहरसा-मधुबनी-ए टा नहि। आ’ ने छुच्छे सोति-ब्राह्मण-ब्राह्मणेतर मैथिली भाषा, संस्कृति। तहिना साहित्य कथा कि कविता कि उपन्यास कि नाटके नहि। ई सभटा समस्त मिथिलांचलक एक जातीय सांस्कृतिक समग्रता तथा लोक गरिमा, मानवीय गुणवत्ता, जीवनमूल्यक दबाबमे करैत रचनाकार-विचारकक संघर्ष आ’ तकरे आदर्शोन्मुख अभिव्यक्त्तिमे युग-यथार्थ बनैत अछि। सद्यः उपलब्ध मैथिलीक एहन ऐतिहासिक अवसरक उपयोग सोचै जाइ- उपभोग नहि। दरभंगा बनाम सहरसा बना क’ मैथिलीक रजिस्ट्री-बन्दोबस्त नहि करबै जाइ जाय। किछु एहनो बात विषय यद्यपि एहि बात –‘सगर राति दीप जरय’ पर हम सिद्धांततः प्रभासजीसँ सहमत नहि रहलौँ, परन्तु एम्हर पछिला दशकमे ई तिमाही-कथा गोष्ठी- ‘सगर राति दीप जरय’- आजुक मैथिली कथा-विधामे की योगदान कएलक अछि, से तथ्य आब इतिहासमे दर्ज अछि। ई बात सही छैक जे एहन कोनो कार्य कोनो एक गोटेक नहि होइछ। मुदा सभ वर्त्तमानकेँ ओहि एक संस्थापना-कल्पक व्यक्त्ति-लेखककेँ अवसरोचित रूपेँ कृतज्ञतासँ स्मरण अवश्य कयल जयबाक चाही। से लेखकीय नैतिकता थिक। आ’ हमरा जनतबे, से रहथि- स्व. प्रभास कुमार चौधरी। हमरा तखन दुखद निराशा भेल जखन एहि बेरक मैथिली साहित्य अकादेमी पुरस्कार पओनिहार प्रदीप बिहारीजी साहित्य अकादेमी-सभागारमे लेखक-सम्मिलन-अवसर पर अपना वक्तव्यमे सगर राति दीप्प जरयक उपलब्धिक चर्चा तँ कएलन्हि, मुदा स्व. प्रभास जीक नामोल्लेखो नहि कयलखिन। एकरा हम साधारण घटना नहि मानि सकैत छी। गंभीर बात बुझैत छी। कारण हमरा लोकनि रचनाकार छी। औसत कोटिक कोनो राजनीतिक नहि। संभव हो नाम अनावधानतामे छूटि गेल होनि। मुदा हमरा सभ लेखक छी तेँ एहन असावधानी करबा लेल स्वाधीन नहि छी। यद्यपि अपन खेद हम हुनका प्रकट कयलियनि। हमरा लगैये जे अपन-अपन सकारात्मक इतिहासक प्रति सभ पीढ़ीक मनमे कृतज्ञताक भाव अंततः लेखकक ऊर्जा आ’ प्रेरणे बनैत रहैत छैक। बतौर कवि हम मैथिलीमे जाहि काल-बिन्दु पर ठाढ छी, तकर जड़ि विद्यापतिसँ ल’ सुमन-किरण-मधुप- आ यात्रीएमे। ई सोचि क’ मन कृतज्ञ होइत अछि! बल्कि गौरांवित। ओना, एकटा लेखक रूपमे हम एहिमे सँ क्यो नहि छी। जेना सभ, सभक कारयित्री प्रस्थान छथि, तहिना हमहुँ नागार्जुन-यात्रीक कारयात्री प्रस्थान छी। आ’ ई भाव हमरा रचनाकर्ममे अग्रसर करबाक उत्तरदायित्व द’ गेलय। तर्पण तिल-कुश –अंजलि बला कर्मकाण्डकेँ तँ हम नहि मानैत छी, मुदा पुरखाक तर्पण हमरा प्रिय अछि। अपना शैलीमे। अपन जीवन-मूल्यक एकटा अभिन्न तत्त्व बुझाइत अछि। तकर बाट की हो? अवसर पर कृतज्ञ स्मृति! अवसर पर- तिथि पर नहि। गोबरक मूल्य भागलपुर मे एकटा उनटा पुल कहबैत छैक। उनटा पुलसँ दक्षिण मुँह जे सड़क जाइत छैक, तकरा बौंसीे रोड कहल जाइत छैक। बौंसी रोड पर कएक टा बस्तीमोहल्ला लगेलग पड़ैत छैक। बहुत रास दोकान आ लोकक, ट्रकबस, टमटम, रिक्शा सभक खूब घन आवाजाही। सुखायल मौसम मे भरि ठेहुन ध्ूरा आ भदवारि मे भरि ठेहुन पानिकादो। शहरी नाला सभक कारी गंदगीसँ सड़क भरलपूरल। कैक समय तं पयरे आयबजायब कठिन । मुदा सड़क छैक पीच। मोजाहिदपुर मिरजान हाट चौक, हबीबपुर आ हुसैनाबाद तथा अलीगंज। कैक जाति आ पेशाक लोक । काठ गोदामसँ ल क तसरक उद्योगी धरि आ जानवरक गंध् तोड़ैत हड्डीक टालसँ ल क हरियर टटका तरकारी सभक हाट धरि । तहिना टिक टिक घोड़ासँ ल क बड़दोसँ बत्तर ठेलासँ छातीतोड़ श्रम करैत घामेपसेने तर माल उघैत मजूर सेहो। बच्चा, सियान सभक भीड़ भेटत । कतहु दोकानमे लागल फलकल कोबीक छत्ता जकाँ कतहु अलकतराक उनटल पीपा जकां। ई दृश्य थिक सड़कक दुनू कातक उनटा पुलसँ ता अलीगंज। अलीगंजसँ किछुए आगाँसँ सड़क खूब पकठोस छैक। चिक्कन कारी। तेहन जे कैक टा परिवार ओहिपर मकैगहूम पर्यन्त पथार द क सुखबैत भेटत। ओही इलाकाक एकटा घटना थिक। आने बीच सड़क परक अलीगंज बस्ती जत खतम होइत छैक ताही ठाम सड़कक कातमे एकटा आर कल छैक जे हरदम अबन्ड छौँड़ा जकाँ छुरछुरबैत रहैत छैक। यद्यपि भागलपुर मे पीबाक पानिक कष्ट बड़ सामान्य बात अछि, मुदा एत पानिक उदारता देखिक से समस्या अखबारी पफूसि बनि जाइत छैक। खैर, ताहू दिन खूब तेजीसँ पानि छुरछुरा रहल छलैक। क्यो भरनिहार नहि रहैक। खूब रौद रहैक। चानि खापड़ि जकाँ तबैत। तेहन सन जे चानि पर यदि बेलिक रोटी ध् देल जाइक तँ पाकि जयतैक। एहना मौसम मे कलसँ सटले दस गोटे बीस गोटे अपन चानि तबबैत यदि घोलिमालि करैत ठाढ़ हो तँ ध्यान जायब स्वाभाविके। हमहूँ अपनाके ँ रौद, लू आ उमसमे उलबैत पकबैत ओहि द क ल जाइत रही। एकटा उपयुक्त कारण बुझायल सुस्तयबाक। भने किछु लोक घोँघाउज क रहल छलैक। लगमे कलसँ ओतेक प्रवाह सँ जल झहरि रहल छलैक से एकटा मनोवैज्ञानिक शीतलता पसारि रहल छलैक मने। जखन ओहि गोल लग पहुँचलहुँ तँ ईहो देखबा योग्य भेल जे ओहि घोँघाउजि मण्डलीसँ आगाँ एक टा मिनी बस ठाढ़ छैक। सन्देह नहि रहल जे कोनो दुर्घटना सँ फराक किछु बात नहि छैक। एहन दुर्घटना मे सड़कपर ककरो मृत्यु सामान्य बात थिक। डेग अनेरे किछु झटकि गेल। लग पहुँचलहुँ आ ओहि घरेलू घोंघाउजिक कन्हापरसँ हुलकि क देखलहुँ तँ बीचमे दू पथिया गोबर हेरायल बीच सड़कपर। एक टा छौंँड़ा हुकुरहुकुर करैत...। घोंघाउजि खूब जोरसँ चलि रहल छल। ओही लोकक गोलमे एक कात करीब १०१२ बर्षक दूठा छौंड़ी आदंकेँ चुप्प ठाढ़ि आ कनैत... खरफकी पहिरने खूजल देह, छिट्टा सन केश...। ओहिमे सँ एक टा छौंड़ीक जमड़ी लागल अगंिह मे पफाटल पैंट, ताहिपर टटका गोबर लेभरल। दुनू छौँड़ीक गालपर हाथमे, सौँसे देहपर गोबर लागल आ दुर्घटनाग्रस्त छौँड़ाक छातीपर गोबर लागल । दू टा नान्हि टा हाथक छाप यद्यपि ओहि कड़ा रौदमे सुखा गेल रहैक, मुदा स्पष्ट रहैक। आदंकमे पड़लि दुनू छौँड़ी, अंदाज करैत छी, गोबरबिछनी छैक। बाटघाट जाइत अबैत गायमहींसक गोबर जमा अछि, भरि दिन तकर गोइठा थोपैत अछि, माय वा परिवारक क्यो लोक तकरा सुखबैत अछि आ बड़का पथियामे सजाक शहर जाक बेचैत अछि । जीविकाक एक साध्न यैह गोइठाक आमदनी। गोइठा जाहिसँ बनय से गोबर आबय कतसँ एहिना अनिश्चित। कहियो एको पथिया कहियो किछु नें। तेेँ एहि सड़कपर गोइठा बिछनी छौँड़ी सभक आपस मे होइत झोंटाझोंटीक दृश्य बड़ आम घटना रहैत छैक। आ ओकरा मायबाप केँ गारिसराप देलक, ओ ओकरा माय बहिनके ँ घोड़ासँ वियाह करौलक... एकहि दिन पहिने दूटा छौँड़ी बीच सड़कपर तेना पटकमपटकी करैत रहय आ एक दोसराक झोंटाके ँ तेना नोचि रहल छल जे दया आ क्रोध् दुनू आबय मनमे, मुदा समाधन की। गोबर जकर जीविका छैक ताहि परक आफत तँ ठीके नै सहल हेतैक ओकरा ताहूमे एक दिन हम एकटा छौँड़ी के ँ पुछने रहिऐकतोरा सिनी केहने एना झगड़ा करै छे ँ, जरी टा गोबर के वास्ते?' जरी टा छलै? एतना छलै, हम्मे जमा करी क रखलिऐ आरू ई रध्यिा मोटकीध्ुम्मी ने अपने छिट्टामे ध्री लेलक। आय हमरा केतना मारतै माय ? माय तँ इहे ने कहतै जे हम्मे गोबर नहि बीछय छलियै, कहीं दिन भर खेली रहल छलियै? की खयतै लोगें?' हमर प्रश्न हमरे खूब भारी चमेटा जकाँ बुझायल, हम चोट्टहि ससरि गेल रही। मुदा ओहि दिनुका दृश्य बड़ भार्मिक छलैक। आदंके ँ चुपचाप दहोबहो कनैत दुनू छौँड़ी एक बेर चारू कातक लोकके ँ एक बेर शोणित बहैत बच्चाके ँ देखैत ठाढ़ि रहैक। की होलै भाइ जी?' हम एकटा सज्जनसँ पुछलियनि। अरे कलियुग छौं भाई जी। बताब जरी टा गोबर के वास्ते एकरा सिनी मे आपसे मे झगड़ा होलै आरू हौ छौ ँड़ी एकर छोट भाइके ँ ध्केली देलकै मिनी बसके आगूमे। देखै नै छहौ जे घड़ी मे दम टुटल छै छौँड़ाके आहा... जरी टा गोबर छलै उफ? माय किरिया खा के कही तँ लछमिनियाके ँ जे हमर एक चोत गोबड़ छलय कि नै ?' अचानक जेना खूब साहस करैत आदंकित एक टा छौंड़ी कनिते बाजलि हमरा अकस्मात लोकसभपर खासक ओही भाइ साहेबपर क्रोध् उठल। विचित्रा बात तोरा की नहि देखाइ रहल छ जे ई बुतरू मरि रहल दै आ अस्पताल पहुँचाबै के पिफकिर नै करीक दबकि बनल खाड़ छ ध्क्किार।' सभ जेना हमरेपर गुम्हर लागल। आब की ई बच पाड़तै? की फयदा लय गेलासँ।' तैयो लै जायमे की हर्जा? भाइसाहेब ठीके तँ कही रहल छै हौ।' एक गोटे अपन विचार देलकैक। मुदा तकर कोनो प्रयोजन नहि भेलैक। घोलफचक्का मचिते रहलैक, ओ दुनू गोबरबिछनी छौंड़ी आदंके ठाढ़िए रहलि लोकसँ घेरायलि। बीच बाटपर ओहि घायल नेनाक प्राण छुटि गेलैक। एक चुरफक पानियो ने देलकै क्यो। एहि संदर्भमे एकटा लेखकक टिप्पणी प्रस्ताव करैत छी जे ई दृश्य छल एकटा नहि, कैकटा गोबर पर जिनहार परिवारक बच्चाक संघर्षक। एक बहिन ककरो एक चोत गोबर चोरा लेलकै तँ तामसमे ओ चौरौनिहारक छोट भाइके ँ सड़कपर ध्क्का द देलकै आ मिनीबस ओकरा पीचि देलकै। पीचपर शोणित आ गोबर बराबरि दामक भेल जे रौदमे सुखाइत रहलैक। बौंसी रोडक ई दृश्य जे देखने होयता सैह बुझने होयता एतबे कहब। हमरा तँ ईहो नहि बुझल अछि जे मुइल छौंड़ाक मायोबाप छलैक कि नहि? छलैको तँ ओकरा कखन खबरि भेल होयतैक जे ओकर बेटा मिनीबसमे पिचा क मरि गेलैक। वा मिनीबसक ड्राइवर कोन थानामे जाक कहने होयतैक जे हम एकटा निरीह छौंड़ाके ँ खून क क आबि रहल छी? हमरा तँ नहि बूझल अछि ओहि दुनू छौंड़ियो क, मुदा ओहि घटनाक बादसँ मनमे एहि बातक अंदेशा अवश्य होइत रहैत अछि जे कतहु दुनू छौंड़ी पफेर ने एहि बौंसी रोडपर गोबर बीछैत भेटि जाय... कतहु पफेर ने भेटि जाय।..... आ, सत्य पूछी तँ आब हमरा सभटा गोबर बिछनी एक्के रंग लगैत अछि। उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’, जन्म- 1951कलकत्ता (पश्चिम बंगाल) शिक्षा- बी. ए. (सम्मान) भाषाविज्ञान (प्रथम ईशान स्कॉलर) कलकत्ता विश्वविद्यालय, कलकत्ता एम.ए. भाषाविज्ञान, पी-एचडी. भाषाविज्ञान, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली रचना संसार- मैथिली साहित्य मध्य छद्म नाम ‘नचितकेता’क नामे, मैथिली आ बंगला साहित्यक कवि आ नाटककारक रूपमे प्रख्यात श्री सिंह एखन धरि चारि कविता संग्रह, एगारह गोट नाटक (मैथिलीमे), छओ साहित्यिक निबंध आ दू टा कविता संग्रह (बांग्लामे), एकर अतिरिक्त एहि दुनू भाषामे आ अंग्रेजीमे कतोक पुस्तकक अनुवाद क’ चुकल छथि। आन साहित्यिक गतिविधि- प्रो. सिंह बांगलादेश, कॅरबियन आयलैंड, फ्रांस, जर्मनी, इटली, नेपाल, पाकिस्तान, रूस, सिंगापुर, स्वीडन, थायलैंड आर अमेरिकामे विविध विषय पर अपन व्याख्यान देने छथि। इंडो-इटैलियन कल्चरल एक्सचेंज फॉर क्रिएटिव रायटर्सक सदस्य(1999), त्रिनिदाद आर टॉबेगो मे कार्यालयी प्रतिनिधिक सदस्य (2002), आ मॉरीशस (2005), फ्रैंकफर्ट पुस्तक मेलामे आमंत्रित कवि, जतय ‘इंडिया गेस्ट ऑफ ऑनर’ सँ सम्मानित भेलाह (2006), हालहिमे चीन मे संपन्न एगारह लेखकक सांस्कृतिक प्रतिनिधिक प्रमुखक रूपमे भाग नेने छलाह। कार्यक्षेत्र- महाराजा सियाजी राव विश्वविद्यालय,बड़ौदा,(1979-81), दक्षिणी गुजरात विश्वविद्यालय (1981-85), दिल्ली विश्वविद्यालय,दिल्ली (1985-87), हैदराबाद विश्वविद्यालय, हैदराबाद,(1987-2000) मे भाषाविज्ञानक प्रोफेसर, ओ अतिथि प्रोफेसरक रूपमे इंडियन इन्स्टीच्यूट ऑफ एडवांस स्टडी, शिमला (1989) मे काज करैत वर्तमानमे केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर मे निदेशकक पद पर आसीन छथि। नो एण्ट्री: मा प्रविश! (मैथिली साहित्यक सुप्रसिद्ध प्रयोगधर्मी नाटककार श्री नचिकेताजीक टटका नाटक, जे विगत 25 वर्षक मौनभंगक पश्चात् पाठकक सम्मुख प्रस्तुत भ' रहल अछि, विदेह मे।) स्वर्ग अर्थात् ‘बहिश्त’ तथा नरक माने दोज़ख़—ई दुनू कतय छैक ? तकर कल्पना आ ताहि लेल उत्सुकता कतेको भावुक मोनकेँ सब दिन सँ चिन्ताग्रस्त कएलक अछि। चारि दशक पहिने ‘जीन-पाल सार्त्रे’ क एकटा नाटक पढ़ने छलहुँ, जतय तीन टा पात्र स्वर्ग केहन होइत अछि ? तकरहि चर्चा करैत कतेको अंक केँ भरि देने छल-- ‘नो एण्ट्री: मा प्रविश!’ केर रचनाक्रम मे भरिसक अवचेतन मोनमे ई बात अवश्य घूमि रहल छल । सैमूअल बेकेटक ‘वेटिंग फॉर गॉडोट’ केर प्रभाव सेहो पड़ल छल, जतय ईश्वरक अथवा कोनो प्राप्य वस्तुक हेतु कतेको गोटेक अंतहीन प्रतीक्षा नाट्यकृतिक इतिहासमे अमिट छाप छोड़ने छल। संगहि संग आर्थर मिलर केर ‘अ स्ट्रेचर नेम्ड डिजाइर’ तथा एडबर्ड अल्बी केर ‘बॉक्स’—इहो दुनू नाटक सँ हम अत्यंत उत्प्रेरित भेल छलहुँ। कलकत्तामे नाटक मंचन देखैत नेनपन बीतल—संगहि अल्पे वयस सँ मिथिला संघ तथा मैथिली रंगमंच—दनू संस्था द्वारा मंचित नाटक सभमे अभिनय करबाक अवसर, हमरा नाट्यकर्म दिस प्रवृत कएलक। ताहिपर बादल सरकारक ‘एबांग इन्द्रजीत’ आ बरटॉल्ट ब्रीच केर ‘थ्री पेनिस’ ऑपेरा—जकरा बंगलामे नाम देल गेल छल ‘तीन पयसार पाला’ –सन उत्कृष्ट प्रस्तुति देखि कए मोनमे अवश्य ई इच्छा जागल छल जे कहियहुँ –जखन मिथिलाक दर्शककेँ बाढ़ि आ सूखार सँ चैन भेटतन्हि आ ओ सब नाट्य-प्रेमी ‘एब्सट्रैक्ट’ नाटकक रसास्वादन करबाक क्षमता केँ प्राप्त क’ लेताह, अथवा जहिया मैथिलीक सांस्कृतिक जगत मे ‘ऑपेरा’ खेलाबय बला उच्च मानक रंगकर्मी सेहो आबि जेताह, तखनहि भरिसक एहि तरहक उच्च मानक नाटकक रचना आ मंचनक संग अपना केँ जोड़ि सकब। तावत अग्रज नाट्य निर्देशक श्रीकान्त मंडलजीक फरमाइश केँ मानैत एक वा दू टा नारी पात्रक नब्बे मिनटक कम जटिल नाटक लिखैत रही। 2008 धरि अबैत-अबैत ई लागल, जे आब जखन एतेक संख्यामे नीक-नीक मैथिल अभिनेता-अभिनेत्री लोकनि नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी) तथा अन्यान्य संस्था सँ प्रशिक्षण प्राप्त कए मंच पर अपन कलाक प्रदर्शन क’ रहल छथि, एतबे नहि मैथिलीमे टेलिवीजन धारावाहिक ‘नैन ने तिरपित भेल’ केर निर्माण, निर्देशन आ प्रदर्शन (हमरहि नाटक ‘प्रत्यावर्तन’ पर आधारित) आरंभ भ’ गेल अछि, आर तँ आर जखन मैथिली मे ई-जर्नल धरि आबि गेल छैक (जाहिमे हमर ई नाटक धारावाहिक रूपेँ प्रकाशित भेल— www.videha.co.in केर आर्काइव द्रष्टव्य अछि), तखन बुझि पड़ल जे आब एहि तरहक विषयक रूप-संकल्पना तथा एहन समायोजन केर संग अपनाकेँ जोड़ि सकब। गत वर्षक अंतमे डेढ़ हजार वर्ष पुरान एकटा चीनी ऑपेरा ‘खियान’ जकर उच्चारण ‘शियान’ होयत, केर पुनर्मंचन देखल छलहुँ सेहो भीतरे भीतर काज क’ रहल छल—एहि सभ परिस्थितिक प्रभाव आ प्रेरणाक परिणामस्वरूप ‘नो एण्ट्री: मा प्रविश!’ केर जन्म भेल। मुदा मिथिलाक लेल ई कोनो नव बात नहि छल। हम सब अपन पौराणिक नाट्य-गौरव केँ बिसरि गेल छी तैँ । जँ नाच-नौटंकी केँ छोड़ियहु देल जाय, मिथिलामे छओ सात सय वर्ष पूर्वहि सँ अनेकों नाटकक रचना भ’ रहल छल जतय गीत-नाद आ नृत्य-नाट्यक समायोजनक प्रमाण भेटि रहल अछि। ई मोन राखहि पड़त, अंग्रेजीमे जखन चौसर साहित्य-सर्जनक जगत केर एकटा उज्ज्वल नक्षत्र छलाह, आ नव-नव प्रतिमानक स्थापना क’ रहल छलाह, तखनहि ‘वर्ण(न) रत्नाकर’क लेल प्रख्यात ज्योतिरीश्वर ठाकुरक वर्णन मे हम सब ई देखैत छी जे ओहि युगमे जखन मैथिली मे लिखल नाटक सब अभिनीत होइत छल, तँ ताहिमे गीत-वाद्यक प्रवीण अबैत छलाह कर्णाट देशसँ, ओ कुशल नृत्यांगना आ नट अबैत छलाह तेलंगाना देशसँ। ताहि युगमे मैथिली नाटकक यश अखिल-भारतीय स्तर धरि प्रचारित भ’ गेल छल। मुदा बीसम शताब्दी अबैत-अबैत हम सब स्तरीय नाटकक रचना आ मंचनक प्रतियोगितामे पछुआ गेल छी (कारण चाहे जे रहल हो)। तैँ एहि नाटकक माध्यमसँ प्रयास कएल गेल अछि जे एकर कथानक एहन हो जाहिसँ मिथिले नहि, अपितु समग्र भारतक पाठक, अभिनेता ओ दर्शककेँ ओ आकर्षित क’ सकय। सब ठामक लोक ‘नो एण्ट्री’ मे एण्ट्री क’ सकैत छथि। आब देखा चाही, कोना आ कहिया धरि ई नाटक अन्यान्य भाषा-संस्कृतिक मंच पर सेहो प्रवेश क’ सकत आ समादृत हैत—ठीक जेना हमर मित्रवर गिरीश कर्नार्ड केर हयवदन आर नाग-मंडल, आ अग्रजप्रतिम नाट्यकार विजय तेंदुलकर क शांतता कोर्ट चालू आहे वा घासीराम कोतवाल केँ कन्नड़ आ मराठी विश्वक बाहरो भेटल छलन्हि। अधिकांश मैथिली नाटक प्रांतीयता आ स्थानीयताक (यद्यपि तकरो आवश्यकता होइत छैक) परिधिमे सीमित अछि, जे हमर सभक नाट्यकर्म केँ हमरे सब धरि सीमित राखि देलक अछि। एमहर जखन हमर मैथिली काव्य संकलन—मध्यमपुरूष एकवचन, (वाणी प्रकाशन, दिल्ली,2006) केर अनुवाद, तमिल भाषा मे छपि कए (‘मुन्नीलइ ओरूमइ’ अदियाल, चेन्नई, 2008) समादृत भेल तखनहि हमर इहो विश्वास सुदृढ़ भ’ गेल जे भरिसक आब हमरा सभक नाटको केँ आन ठाम पहुँचबाक चाही। अंततः जँ सुधी पाठक, रंगकर्मी आ दर्शक वृन्दकेँ ई नाटक किछु सोचय लेल आ मंचन करबा लेल उत्प्रेरित क’ सकय, जँ कतहू ई नाटक अपने सभक अंतःस्थलकेँ छूबि जाय तँ हम अपनाकेँ कृतकृत्य बूझब। नो एंट्री : मा प्रविश (चारि अंकीय मैथिली नाटक) मैथिली साहित्यक सुप्रसिद्ध प्रयोगधर्मी नाटककार श्री नचिकेताजीक टटका नाटक, जे विगत 25 वर्षक मौनभंगक पश्चात् पाठकक सम्मुख  प्रस्तुत भ' रहल अछि। सर्वप्रथम विदेहमे एकरा  धारावाहिक रूपेँ ई-प्रकाशित कएल जा रहल अछि। पात्र – परिचय पर्दा उठितहि – ढोल–पिपही, बाजा–गाजा बजौनिहार–सब दूटा चोर, जाहि मे सँ एक गोटे पॉकिट–मार आ एकटा उचक्का दू गोट भद्र व्यक्ति प्रेमी प्रेमिका बाजार सँ घुरैत प्रौढ़ व्यक्ति बीमा कंपनीक एजेंट रद्‌दी किनै–बेचैबला भिख-मंगनी रमणी-मोहन नंदी–भृंगी कैकटा मृत सैनिक बाद मे नेता आ नेताक दूटा चमचा/कतेको अनुयायी वाम-पंथी युवा अभिनेता यम चित्रगुप्त उच्च–वंशीय महिला अप्सरा/नृत्यांगना-लोकनि प्रथम कल्लोल प्रथम कल्लोल [एकटा बड़का–टा दरबज्जा मंचक बीच मे देखल जाइछ। दरबज्जाक दुनू दिसि एकटा अदृश्य मुदा सक्कत देवार छैक, जे बुझि लेबाक अछि – कखनहु अभिनेता लोकनिक अभिनय–कुशलता सँ तथा कतेको वार्तालाप सँ से स्पष्ट भ’ जाइछ। मंच परक प्रकाश–व्यवस्था सँ ई पता नहि चलैत अछि जे दिन थिक अथवा राति, आलोक कनेक मद्धिम, सुर–संगत होइत सेहो कने मरियल सन। एकटा कतार मे दस–बारह गोटे ठाढ़ छथि जाहि मे कैकटा चोर–उचक्का, एक-दू गोटे भद्र व्यक्ति मुदा ई स्पष्ट जे हुनका लोकनिक निधन भ’ चुकल छन्हि। एकटा प्रेमी–युगल जे विष-पान क’ कए आत्म-हत्या कैल अछि, मुदा एत’ स्वर्गक (चाही त’ नरकक सेहो कहि सकै छी) द्वार लग आबि कए कने विह्वल भ’ गेल छथि जे आब की कैल जाइक। एकटा प्रौढ व्यक्तित जे बजारक झोरा ल’ कए आबि गेल छथि–बुझाइछ कोनो पथ–दुर्घटनाक शिकार भेल छथि बाजार सँ घुरैत काल। एकटा बीमा कंपनीक एजेंट सेहो छथि, किछु परेशानी छनि सेहो स्पष्ट। एकटा रद्‌दीबला जे रद्दी कागजक खरीद–बिक्री करैत छल, एकटा भिख-मंगनी–एकटा पुतलाकेँ अपन बौआ (भरिसक ई कहै चाहैत छल जे वैह छल ओकर मुइल बालक अथवा तकर प्रतिरूप) जकाँ काँख तर नेने, आ एक गोट अत्यंत बूढ़ व्यक्ति सेहो छथि, जनिक रमणी–प्रीति एखनहु कम नहि भेल छनि, हुनका हमसब रमणी–मोहने कहबनि। सब गोटे कतार मे त’ छथि, मुदा धीरजक अभाव स्पष्ट भ’ जाइछ। क्यो-क्यो दोसरो-दोसर लोग केँ लाँघि कए आगाँ जैबाक प्रयास करैत छथि, त’ क्यो से देखि कए शोर करय लागैत छथि। मात्र तीन–चारिटा मृत सैनिक–जे कि सब सँ पाछाँ ठाढ़ छथि, हुनका सबमे ने कोनो विकृति लखा दैछ आ ने कोनो हड़बड़ी। ] बजार-बला वृद्ध : हे – हे – हे देखै जाउ... देखि रहल छी की नहि सबटा तमाशा....कोना–कोना क’ रहल छइ ई सब! की ? त’ कनीटा त’ आगाँ बढ़ि जाई ! [एकटा चोर आ एकटा उचक्का केँ देखा कए बाजि रहल छलाह जे सब ओना त’ चारिम तथा पाँचम स्थान पर ठाढ़ छैक, मुदा कतेको काल सँ अथक प्रयास क’ रहल अछि जे कोना दुनू भद्र व्यक्ति आ प्रेमी–प्रेमिका युगलकेँ पार क’ कए कतारक आगाँ पहुँचि जाई!] बीमा एजेंट : [नहि बूझि पबैत छथि जे ओ वृद्ध व्यक्ति हुनके सँ किछु कहि रहल छथि कि आन ककरहु सँ। बजार-बला वृद्ध सँ आगाँ छल रद्‌दी बेचैबला आ तकरहु सँ आगाँ छलाह बीमा बाबू।] हमरा किछु कहलहुँ ? बाजारी : अहाँ ओम्हर देखब त’ बूझि जायब हम की कहि रहल छी आ ककरा दय...! [अकस्मात् अत्यंत क्रोधक आवेश मे आबि] हे रौ! की बुझै छहीं...क्यो नहि देखि रहल छौ ? [बीमा बाबू केँ बजारक झोरा थम्हबैत -] हे ई धरू त’! हम देखै छी। [कहैत शोर करैत आगाँ बढ़ि कए एकटा चोर आ उचक्का केँ कॉलर पकड़ि कए घसीटैत पाछाँ पुनः चारिम-पाँचम स्थान पर ल’ अबैत छथि, ओसब वाद–प्रतिवाद कर’ लगैत अछि -] चोर : हमर कॉलर कियै धरै छी ? उचक्का : हे बूढ़ौ ! हमर कमीज, फाड़ि देबैं की ? बाजारी : कमीजे कियैक ? तोहर आँखि सेहो देबौ हम फोड़ि ! की बूझै छेँ ? क्यो किछु कहै बाला नहि छौ एत’? उचक्का : के छै हमरा टोकै–बला एत’? देखा त’ दिय’ ? बाजारी : (डपटैत) हे, पकड़ त’ एकर टीक! चोर : आहि रे बा ! हम की कैल जे हमर टीक धैने छी? दोसर चोर : (जे कि असल मे पॉकिट–मार छल) हे हे, टीक छोड़ि दी, नंगड़ी पकड़ि लियह सरबा क’ ! चोर : (गोस्सा सँ) तोँ चुप रह ! बदमाश नहितन ! पॉकिट-मार : (अकड़ि कए) कियै ? हम कियै नहि बाजब ? उचक्का : (वृद्ध व्यक्तिक हाथ सँ अपना केँ छोड़बैत) ओय खुदरा ! बेसी बड़बड़ैलें त’... (हाथ सँ इशारा करैत अछि गरा काटि देबाक) पॉकिट-मार : त’ की करबें ? उचक्का : (भयंकर मुद्रामे आगाँ बढ़ैत) त’ देब धड़ सँ गरा केँ अलगाय... रामपुरी देखने छह ? रामपुरी ? (कहैत एकटा चाकू बहार करैत अछि अंगा तर सँ।) चोर : हे, की क’ रहल छी... भाइजी, छोड़ि दियौक ने ! बच्चा छै... कखनहु–कखनहु जोश मे आबि जाइ छै ! भद्र व्यक्ति 1 : (पंक्तिक आगाँ सँ) हँ, हँ... छोड़ि ने देल जाय ! उचक्का : [भयंकर मुद्रा आ नाटकीयता केँ बरकरार रखैत पंक्तिक आगाँ दिसि जा कए... अपन रामपुरी चाकू केँ दोसर हाथ मे उस्तरा जकाँ घसैत] छोड़ि दियह की मजा चखा देल जाय ? [एहन भाव–भंगिमा देखि दुनू भद्र व्यक्ति डरै छथि– प्रेमी–युगल अपनहिमे मगन छथि; हुनका दुनू केँ दुनियाक आर किछु सँ कोनो लेन-देन नहि...] की ? [घुरि कए पॉकिट–मार दिसि अबैत... तावत् ई सब देखि बाजारी वृद्धक होश उड़ि जाइत छनि... ओ चोरक टीक/ कॉलर जे कही... छोड़ि दैत छथि घबड़ा कए ] की रौ ? दियौ भोंकि ? आ कि…? चोर : उचकू–भाइजी ! बच्चा छै... अपने बिरादरीक बुझू...! [आँखि सँ इशारा करै छथि।] उचक्का : [अट्टहास् करैत] ऐं ? अपने बिरादरीक थिकै ? [हँसब बंद कए- पूछैत] की रौ ? कोन काज करै छेँ? [पॉकिट-मार डरेँ किछु बाजि नहि पबैत अछि– मात्र दाहिना हाथक दूटा आङुर केँ कैंची जकाँ चला कए देखबैत छैक।] उचक्का : पॉकिट-मार थिकेँ रौ ? [पुनः हँस’ लागै छथि छूरी केँ तह लगबैत’] चोर : कहलहुँ नहि भाईजी ? ने ई हमरा सन माँजल चोर बनि सकल आ ने कहियो सपनहुँ मे सोचि सकल जे अहाँ सन गुंडा आ बदमाशो बनि सकत ! उचक्का : बदमाश ? ककरा कहलेँ बदमाश ? आँय ! पॉकिट-मार : हमरा, हुजूर ! ओकर बात जाय दियह ! गेल छल गिरहथक घर मे सेंध देब’... जे आइ ने जानि कत्ते टका-पैसा-गहना भेटत ! त’ पहिले बेरि मे जागि गेल गिरहथ, आ तकर चारि–चारिटा जवान-जहान बालक आ सँगहि आठ–आठटा कुकुर... तेहन ने हल्ला मचा देलक जे पकड़ि कए पीटैत–पीटैत एत’ पठा देलक ! (हँसैत... उचक्का सेहो हँसि दैत अछि) आब बुझु ! ई केहन चोर थिक ! (मुँह दूसैत) हमरा कहैत छथि ! [कतारक आनो-आन लोक आ अंततः सब गोटे हँसय लागैत छथि] भद्र-व्यक्तित 1 : आँय, यौ, चोर थिकौं ? लागै त’ नहि छी चोर जकाँ... चोर : किएक ? चोर देख’ मे केहन होइत छैक ? पॉकिट-मार : हमरा जकाँ...! (कहैत, हँसैत अछि, आरो एक-दू गोटे हँसि दैत छथि।) चललाह भिखारी बौआ बन’... ? की ? त’ हम तस्कर-राज छी ! [कतहु सँ एकटा टूल आनि ताहि पर ठाढ़ होइत... मंचक आन दिसिसँ भाषणक भंगिमा मे ] सुनू, सुनू, सुनू भाई–भगिनी! सुनू सब गोटे! श्रीमान्, श्रील 108 श्री श्री बुद्धि-शंकर महाराज तस्कर सम्राट आबि रहल छथि! सावधान, होशियार! [एतबा कहैत टूल पर सँ उतरि अपन हाथ-मुँहक मूकाभिनयसँ एहन भंगिमा करैत छथि जेना कि भोंपू बजा रहल होथि... पाछाँ सँ भोंपू – पिपहीक शब्द कनिये काल सुनल जाइछ, जाबत ओ ‘मार्च’ करैत चोर लग अबैत अछि...] चोर : [कनेक लजबैत] नहि तोरा हम साथ लितहुँ ओहि रातिकेँ, आ ने हमर पिटाइ देखबाक मौके तोरा भैटतिहौक! [कहैत आँखि मे एक-दूइ बुन्न पानि आबि जाइत छैक।] पॉकिट-मार : आ-हा-हा! एहि मे लजबैक आ मोन दुखैक कोन गप्प? [थम्हैत, लग आबि कए] देखह! आई ने त’ काल्हि-चोरि त’ पकड़ले जाइछ। आ एकबेर जँ भंडा- फोड़ भ’ जाइत अछि त’ बज्जर त’ माथ पर खसबे करत ! सैह भेल... एहि मे दुख कोन बातक ? उचक्का : (हँसैत) हँ, दुखी कियै होइ छहक? बाजारी : [एतबा काल आश्चर्य भए सबटा सुनि रहल छलाह। आब रहल नहि गेलनि – अगुआ कए बाजय लगलाह] हे भगवान! हमर भाग मे छल स्वस्थहि शरीर मे बिना कोनो रोग-शोक भेनहि स्वर्ग मे जायब... तैँ हम एत’ ऐलहुँ, आ स्वर्गक द्वार पर ठ़ाढ छी क्यू मे...! मुदा ई सब चोर–उचक्का जँ स्वर्गे मे जायत, तखन केहन हैत ओ स्वर्ग रहबाक लेल ? पॉकिट-मार : से कियै बाबा ? अहाँ की बूझै छी, स्वर्ग त’ सभक लेल होइत अछि ! एहि मे ककरहु बपौती त’ नञि। बाजारी : [बीमा एजेंट केँ] आब बूझू ! आब.... चोर सिखाबय गुण केर महिमा,1 पॉकिट–मारो करै बयान! मार उचक्का झाड़ि लेलक अछि, पाट–कपाट त’ जय सियाराम ! [चोर-उचक्का-पॉकिट-मार ताली दैत अछि, सुनि कए चौंकैत भिख-मंगनी आ प्रेमी-युगल बिनु किछु बुझनहि ताली बजाब’ लागैत अछि।] चोर : ई त’ नीक फकरा बनि गेल यौ! पॉकिट-मार : एम्हर तस्कर-राज त’ ओम्हर कवि-राज! बाजारी : (खौंझैत’) कियै ? कोन गुण छह तोहर, जकर बखान करै अयलह एत’? पॉकिट-मार : (इंगित करैत आ हँसैत) हाथक सफाई... अपन जेब मे त’ देखू , किछुओ बाकी अछि वा नञि... बाजारी : [बाजारी तुरंत अपन जेब टटोलैत छथि – त’ हाथ पॉकिटक भूर देने बाहर आबि जाइत छनि। आश्चर्य चकित भ’ कए मुँह सँ मात्र विस्मयक आभास होइत छनि।] जा ! [बीमा बाबूकेँ आब रहल नञि गेलनि। ओ ठहक्का पाड़ि कए हँस’ लगलाह- हुनकर देखा–देखी कैक गोटे बाजारी दिसि हाथ सँ इशारा करैत हँसि रहल छलाह।] चोर : [हाथ उठा कए सबकेँ थम्हबाक इशारा करैत] हँसि त’ रहल छी खूब ! उचक्का : ई बात त’ स्पष्ट जे मनोरंजनो खूब भेल हैतनि। पॉकिट-मार : मुदा अपन-अपन पॉकिट मे त’ हाथ ध’ कए देखू ! [भिख-मंगनी आ प्रेमी-युगल केँ छोड़ि सब क्यो पॉकिट टेब’ लागैत’ छथि आ बैगक भीतर ताकि-झाँकि कए देख’ लागैत छथि त’ पता चलैत छनि जे सभक पाइ, आ नहि त’ बटुआ गायब भ’ गेल छनि। हुनका सबकेँ ई बात बुझिते देरी चोर, उचक्का, पॉकिट-मार आ भिख-मंगनी हँस’ लागैत छथि। बाकी सब गोटे हतबुद्धि भए टुकुर-टुकुर ताकिते रहि जाइत छथि] भिख-मंगनी : नंगटाक कोन डर चोर की उचक्का ? जेम्हरहि तकै छी लागै अछि धक्का ! धक्का खा कए नाचब त’ नाचू ने ! खेल खेल हारि कए बाँचब त’ बाँचू ने ! [चोर-उचक्का–पॉकिट-मार, समवेत स्वर मे जेना धुन गाबि रहल होथि] नंगटाक कोन डर चोर कि उचक्का ! आँखिएक सामने पलटल छक्का ! भिख-मंगनी : खेल–खेल हारि कए सबटा फक्का ! समवेत-स्वर : नंगटाक कोन डर चोर कि उचक्का ? [कहैत चारू गोटे गोल-गोल घुर’ लागै छथि आ नाचि- नाचि कए कहै छथि।] सब गोटे : आब जायब, तब जायब, कत’ औ कक्का ? पॉकिट मे हाथ दी त’ सब किछु लक्खा ! नंगटाक कोन डर चोर कि उचक्का ! बीमा-बाबू : (चीत्कार करैत) हे थम्ह’ ! बंद कर’ ई तमाशा... चोर : (जेना बीमा-बाबूक चारू दिसि सपना मे भासि रहल होथि एहन भंगिमा मे) तमाशा नञि... हताशा....! उचक्का : (ताहिना चलैत) हताशा नञि... निराशा ! पॉकिट-मार : [पॉकिट सँ छह-सातटा बटुआ बाहर क’ कए देखा – देखा कए] ने हताशा आ ने निराशा, मात्र तमाशा...ल’ लैह बाबू छह आना, हरेक बटुआ छह आना! [कहैत एक–एकटा बटुआ बॉल जकाँ तकर मालिकक दिसि फेंकैत छथि आ हुनका लोकनि मे तकरा सबटाकेँ बटौर’ लेल हड़बड़ी मचि जाइत छनि। एहि मौकाक फायदा उठबैत चोर–उचक्का-पॉकिट-मार आ भिख-मंगनी कतारक सब सँ आगाँ जा’ कए ठाढ भ’ जाइत छथि।] रद्‌दी-बला : [जकर कोनो नुकसान नहि भेल छल ओ मात्र मस्ती क’ रहल छल आ घटनासँ भरपूर आनन्द ल’ रहल छल।] हे बाबू– भैया लोकनि ! एकर आनन्द नञि अछि कोनो जे “भूलल-भटकल कहुना क’ कए घुरि आयल अछि हमर बटुआ”। [कहैत दू डेग बढा’ कए नाचिओ लैत’ छथि।] ई जे बुझै छी जे अहाँक धन अहीं केँ घुरि आयल...मुदा ई बुझियो रहल छी की नञि जे ई सबटा फूसि थिक ! बीमा-बाबू : (आश्चर्य होइत) आँय ? से की ? बाजारी : (गरा सँ गरा मिला कए) सबटा फूसि ? भद्र-व्यक्ति 1 : की कहै छी ? भद्र-व्यक्ति 2 : माने बटुआ त’ भेटल, मुदा भीतर भरिसक ढन–ढन ! रद्‌दी-बला : से हम कत’ कहलहुँ ? बटुओ अहींक आ पाइयो छैहे! मुदा एखन ने बटुआक कोनो काज रहत’ आ ने पाइयेक! बीमा-बाबू : माने ? रद्‌दी-बला : माने नञि बुझलियैक ? औ बाबू ! आयल छी सब गोटे यमालय... ठाढ़ छी बन्द दरबज्जाक सामने...कतार सँ... एक–दोसरा सँ जूझि रहल छी जे के पहिल ठाम मे रहत आ के रहत तकर बाद...? तखन ई पाइ आ बटुआक कोन काज ? भद्र-व्यक्ति 1 : सत्ये त’! भीतर गेलहुँ तखन त’ ई पाइ कोनो काज मे नहि लागत ! बाजारी : आँय ? भद्र-व्यक्ति 2 : नहि बुझिलियैक ? दोसर देस मे जाइ छी त’ थोड़े चलैत छैक अपन रुपैया ? (आन लोग सँ सहमतिक अपेक्षा मे-) छै कि नञि ? रमणी-मोहन : (जेना दीर्घ मौनता के तोड़ैत पहिल बेरि किछु ढंग केर बात बाजि रहल छथि एहन भंगिमा मे... एहि सँ पहिने ओ कखनहु प्रेमी-युगलक लग जाय प्रेमिका केँ पियासल नजरि द’ रहल छलाह त’ कखनहु भिख-मंगनिये लग आबि आँखि सँ तकर शरीर केँ जेना पीबि रहल छलाह...) अपन प्रेमिका जखन अनकर बियाहल पत्नी बनि जाइत छथि तखन तकरा सँ कोन लाभ ? (कहैत दीर्घ-श्वास त्याग करैत छथि।) बीमा-बाबू : (डाँटैत) हे...अहाँ चुप्प रहू! क’ रहल छी बात रुपैयाक, आ ई कहै छथि रूप दय...! रमणी-मोहन : हाय! हम त’ कहै छलहुँ रूपा दय! (भिख-मंगनीरमणी-मोहन लग सटल चलि आबै छैक।) भिख-मंगनी : हाय! के थिकी रूपा ? रमणी-मोहन : “कानि-कानि प्रवक्ष्यामि रूपक्यानि रमणी च... ! बाजारी : माने ? रमणी-मोहन : एकर अर्थ कनेक गंभीर होइत छैक... अहाँ सन बाजारी नहि बूझत! भिख-मंगनी : [लास्य करैत] हमरा बुझाउ ने! [तावत भिख-मंगनीक भंगिमा देखि कने-कने बिहुँसैत’ पॉकिट–मार लग आबि जाइत अछि।] भिख-मंगनी : [कपट क्रोधेँ] हँसै कियै छें ? हे... (कोरा सँ पुतलाकेँ पॉकिट-मारकेँ थम्हबैत) हे पकड़ू त’ एकरा... (कहैत रमणी-मोहन लग जा कए) औ मोहन जी! अहाँ की ने कहलहुँ, एखनहु धरि भीतर मे एकटा छटपटी मचल यै’! रमणी-धमनी कोन बात’ कहलहुँ ? रमणी-मोहन : धूर मूर्ख! हम त’ करै छलहुँ शकुन्तलाक गप्प, मन्दोदरीक व्यथा... तोँ की बुझबेँ ? भिख-मंगनी : सबटा व्यथा केर गप बुझै छी हम... भीख मांगि-मांगि खाइ छी, तकर माने ई थोड़े, जे ने हमर शरीर अछि आ ने कोनो व्यथा... ? रमणी-मोहन : धत् तोरी! अपन व्यथा–तथा छोड़, आ भीतर की छैक, ताहि दय सोच ! (कहैत बंद दरबज्जा दिसि देखबैत छथि-) पॉकिट-मार : (अवाक् भ’ कए दरबज्जा दिसि देखैत) भीतर ? की छइ भीतरमे... ? रमणी-मोहन : (नृत्यक भंगिमा करैत ताल ठोकि-ठोकि कए) भीतर ? “धा–धिन–धिन्ना... भरल तमन्ना ! तेरे-केरे-धिन-ता... आब नञि चिन्ता ! भिख-मंगनी : (आश्चर्य भए) माने ? की छिकै ई ? रमणी-मोहन : (गर्व सँ) ‘की’ नञि... ‘की’ नञि... ‘के’ बोल ! बोल- भीतर ‘के’ छथि ? के, के छथि? पॉकिट-मार : के, के छथि? रमणी-मोहन : एक बेरि अहि द्वारकेँ पार कयलेँ त’ भीतर भेटती एक सँ एक सुर–नारी,उर्वशी–मेनका–रम्भा... ! (बाजैत बाजैत जेना मुँहमे पानि आबि जाइत छनि-) भिख-मंगनी : ईः! रंभा...मेनका... ! (मुँह दूसैत) मुँह-झरकी सब... बज्जर खसौ सबटा पर! रमणी-मोहन : (हँसैत) कोना खसतैक बज्जर ? बज्र त’ छनि देवराज इन्द्र लग ! आ अप्सरा त’ सबटा छथि हुनकहि नृत्यांगना। [भिख-मंगनीक प्रतिक्रिया देखि कैक गोटे हँस’ लगैत छथि] पॉकिट-मार : हे....एकटा बात हम कहि दैत छी – ई नहि बूझू जे दरबज्जा खोलितहि आनंदे आनंद ! बाजारी : तखन ? बीमा-बाबू : अहू ठाम छै अशांति, तोड़-फोड़, बाढ़ि आ सूखा ? आ कि चारू दिसि छइ हरियर, अकाससँ झहरैत खुशी केर लहर आ माटिसँ उगलैत सोना ? पॉकिट-मार : किएक ? जँ अशांति, तोड़-फोड़ होइत त’ नीक... की बूझै छी, एत्तहु अहाँ जीवन–बीमा चलाब’ चाहै छी की ? चोर : (एतबा काल उचक्का सँ फुसुर-फुसुर क’ रहल छल आ ओत्तहि, दरबज्जा लग ठाढ़ छल– एहि बात पर हँसैत आगाँ आबि जाइत अछि) स्वर्गमे जीवन-बीमा ? वाह ! ई त’ बड्ड नीक गप्प ! पॉकिट-मार : देवराज इंद्रक बज्र.. बोलू कतेक बोली लगबै छी? उचक्का : पन्द्रह करोड़! चोर : सोलह! पॉकिट-मार : साढे-बाईस! बीमा-बाबू : पच्चीस करोड़! रमणी-मोहन : हे हौ! तोँ सब बताह भेलह ? स्वर्गक राजा केर बज्र, तकर बीमा हेतैक एक सय करोड़ सँ कम मे ? [कतहु सँ एकटा स्टूलक जोगाड़ क’ कए ताहि पर चट दय ठाढ़ भ’ कए-] पॉकिट-मार : बोलू, बोलू भाई-सब ! सौ करोड़ ! बीमा-बाबू : सौ करोड़ एक ! चोर : सौ करोड़ दू – रमणी-मोहन : एक सौ दस ! भिख-मंगनी : सवा सौ करोड़ ! चोर : डेढ़सौ करोड़... भिख-मंगनी : पचपन – चोर : साठि – भिख-मंगनी : एकसठि – [दूनूक आँखि–मुँह पर ‘टेनशन’ क छाप स्पष्ट भ’ जाइत छैक। ] चोर : (खौंझैत) एक सौ नब्बै... [एतेक बड़का बोली पर भिख-मंगनी चुप भ’ जाइत अछि।] पॉकिट-मार : त’ भाई-सब ! आब अंतिम घड़ी आबि गेल अछि – 190 एक, 190 दू, 190... [ठहक्का पाड़ि कए हँस’ लगलाह बाजारी, दूनू भद्र व्यक्ति आ रद्‌दी-बला-] पॉकिट-मार : की भेल ? चोर : हँस्सीक मतलब ? बाजारी : (हँसैते कहैत छथि) हौ बाबू ! एहन मजेदार मोल-नीलामी हम कतहु नञि देखने छी ! भद्र-व्यक्ति 1 : एकटा चोर... भद्र-व्यक्ति 2 : त’ दोसर भिख-मंगनी... बाजारी : आ चलबै बला पॉकिट-मार... [कहैत तीनू गोटे हँस’ लागै छथि] बीमा-बाबू : त’ एहि मे कोन अचरज? भद्र-व्यक्ति 1 : आ कोन चीजक बीमाक मोल लागि रहल अछि–त’ बज्र केर ! भद्र-व्यक्ति 2 : बज्जर खसौ एहन नीलामी पर ! बाजारी : (गीत गाब’ लागै’ छथि) चोर सिखाबय बीमा–महिमा, पॉकिट-मारो करै बयान ! मार उचक्का झाड़ि लेलक अछि, पाट कपाट त’ जय सियाराम ! दुनू भद्र-व्यक्ति : (एक्कहि संगे) जय सियाराम ! [पहिल खेप मे तीनू गोटे नाच’-गाब’ लागै छथि। तकर बाद धीरे-धीरे बीमा बाबू आ रद्‌दी-बला सेहो संग दैत छथि।] बाजारी : कौआ बजबै हंसक बाजा भद्र-व्यक्ति 1 : हंस गबै अछि मोरक गीत भद्र-व्यक्ति 2 : गीत की गाओत ? छल बदनाम ! बाजारी : नाट-विराटल जय सियाराम ! जय सियाराम ! जय सियाराम! समवेत : मार उचक्का झाड़ि लेलक अछि। पाट-कपाटक जय सियाराम ! [तावत् नचैत नंदी-भृंगीक प्रवेश होइत छैक। दुनूक नृत्य छलनि शास्त्रीय तथा मुँहमे बोलो तबलेक-] नंदी : धर-धर–धरणी भृंगी : मर-झर जरनी नंदी : डाहक छाँह मे भृंगी : स्याह विशेष नंदी : कपटक छट-फट भृंगी : बगलक दल-दल नंदी : हुलकि-दुलकि कए भृंगी : भेल अवशेष ! दुनू गोटे : [एक्कहि संग गबैत-नचैत तरुआरि सँ चहुँदिसि लड़ैत, अगणित मुदा अदृश्य योद्धाक गर काटैत-] चाम-चकित छी, भान-भ्रमित छी बेरि-बेरि बदनाम कूपित छी गड़-गड़ निगड़ ई हर-पर्वत पर तीन लोक चहुँ धाम कथित छी कपटक छट-फट त्रिकट विकट कट नट जट लट-कय अट-पट संशय नर-जर देहक बात निशेष ! डाहक छाँह मे स्याह विशेष ! [जखन गीत-नाद आ नृत्य समाप्त भ’ जाइत अछि तखन नंदी एकटा टूल पर ठाढ़ भ’ कए सब केँ संबोधित कर’ लागै छथि।] नंदी : [सभक दृष्टि- आकर्षित करैत] सुनू सुनू सभटा भाइ-बहीन! नीक जकाँ सुनि लिय’ आ जँ किछु जिज्ञासा हो त’ सेहो पूछि लिय’। [सब गोटे गोल भ’ कए ठाढ़ भ’ जाइत छथि।] भृंगी : हम सब जे किछु कहब से अहि लेल कहब जरूरी अछि, जे आब दरबज्जा खोलितहि ओहि पार जैबाक मौका भेटत सबकेँ। मुदा ई जानब जरूरी अछि जे ओहि पार अहाँ लेल की अछि प्रतीक्षा करैत! (बाजैत सभक दिसि देखि लैत छथि।) अहाँ सब जनै छी ,की छैक ओहि पार? चोर : स्वर्ग! पॉकिट-मार : नरक! भिख-मंगनी : अकास! रद्‌दी-बला : पाताल! नंदी : ने क्यो पूरापूरी ठीक बाजल... आ ने क्यो गलते बात कहल ! भृंगी : ई सबटा छैक ओहि पार– एक ठाम, एक्कहि स्थान पर... नंदी : आब ई त’ अहाँ सभक अपन-अपन कृतकर्मक फल भेटबाक बात थिक... ककरा भागमे की अछि... बाजारी : (टोकैत) से के कहत ? नंदी : महाकाल! भृंगी : ककरहु भेटत ढेर रास काज त’ ककरहु लेल रहत कतेको स्पर्धा...! क्यो समय बीताओत नृत्य-गीत, काव्य-कलाक सङे, आ क्यो एहि सबसँ दूर रहत गंभीर शोध मे लागल ! नंदी : ककरहु लेल रहत पुष्प–शय्या...त’ ककरहु एखनहुँ चलबाक अछि काँट पर दय... ! बीमा-बाबू : से कोना ? नंदी : देखू ! ई त’ अपन-अपन भाग्य जे एत’ अहाँ-लोकनिमे बहुत कम्मे गोटे एहन छी जे संपूर्ण उमरि जीबाक बाद तखन एत’ हाजिर भेल छी। क्यो बजार सँ घुरैत काल गाड़ी तर कुचलल गेल छी (बाजारी हाथ उठबैत आ कहैत ''हम...हम...'' ) त’ क्यो चोरि करै काल पकड़ा गेलहुँ आ गाम-घरक लोग पीटि-पीटि कए पठा देलक एत’! (चोर ई प्रसंगक आरंभ होइतहि ससरि कए पड़यबाक चेष्टा क’ रहल छल त’ ओकरा दू-तीन गोटे पकड़ि कए ''हे ई थिक ...इयैह... !'' आदि बजलाह) क्यो अतिरिक्त व्यस्तता आ काजक टेनशन मे अस्वस्थ भेल छलहुँ (दुनू भद्र व्यक्ति मात्र हाथ उठबैत छथि जेना स्कूली छात्र सब कक्षामे हाजिरी लगबैत अछि), त’ क्यो रेलक पटरी पर अपन अंतिम क्षण मे आबि पहुँचल छलहुँ (रद्‌दी बला आ भिख-मंगनी बाजल “जेना कि हम!” अथवा “हमरो त’ सैह भेल छल”। कतेको कारण भ’ सकैत छल। [बजैत बजैत चारिटा मृत सैनिक मुइलो पर विचित्र जकाँ मार्च करैत करैत मंच पर आगाँ दिस आबि जाइत छथि।] बीमा-बाबू : [चारू गोटे केँ देखबैत] आ ई सब ? नंदी : समय सँ पहिनहि, कोनो ने कोनो सीमामे.... घुसपैठीक हाथेँ नहि त’ लड़ाई केर मैदानमे... ! मृत सैनिक : (समवेत स्वरेँ) लड़ाईक मैदानमे... ! बीमा-बाबू : बुझलहुँ ! मुदा... नंदी : मुदा ई नहि बुझलहुँ जे बीमाक काजकेँ छोड़ि कए अहाँ एत’ किएक आयल छी? बीमा-बाबू : हम सब त’ सदिखन नव-नव मार्केटक खोजमे कतहु पहुँचिये जाइ छी, एतहु तहिना बूझू... ! भृंगी : (नंदी सँ) बुझलहुँ नहि ?...आब एतेक रास बीमा कंपनी आबि गेल अछि जे ई बेचारे... [तावत् नंदी-भृंगीक चारू कात जमा भेल भीड़ ओहि पार पाछाँ दिसि सँ एकटा खलबली जकाँ मचि गेल। पता चलल दुनू प्रेमी आपस मे झगड़ा क’ रहल छल। रास्ता बनाओल गेल त’ ओ दुनू सामने आबि गेल।] नंदी : (जेना मध्यस्थता क’ रहल छथि) की भेल ?की बात थिक? हमरो सब केँ त’ बूझ’ दियह! प्रेमिका : देखू ने... जखन दुनू गोटेक परिवार बिल्कुल मान’ लेल तैयार नञि छल हमरा दुनूक संबंध तखन... प्रेमी : तखन मिलि कए विचार कैने छलहुँ जे संगहिसंग जान द’ देब... प्रेमिका : सैह भेल, मुदा…. नंदी : मुदा ? प्रेमिका : मुदा आब ई कहि रहल छथि...हिनका घुरि जैबाक छनि... प्रेमी : हँ...हम चाहै छी एक बेर आर जीबाक प्रयास करी। मुदा ई नहि घुर’ चाहै छथि। प्रेमिका : हँ, हम नञि चाहै छी जे धुरि जाई... ! रमणी-मोहन : (अगुआ कए प्रेमिका लग आबि कए) नञि जाय चाहै छथि त’ रह दियौक ने... हम त’ छीहे ! (कहैत आर आगाँ बढ़बाक प्रयास करैत’ छथि।) भृंगी : धत् ! (रमणी-मोहन केँ तिरस्कार करैत) अहाँ हँटू त’... ! आ चुप रहू ! नंदी : मुदा ई त’ अहाँ दुनू गोटे हमरा दुनू केँ धर्म-संकट मे पहुँचा देलहुँ। भृंगी : आ घुरबे कियै’ करब ? प्रेमी : एक बेर आर प्रयास करी, जँ हमर दुनूक विवाहक लेल ओ लोकनि राजी भ’ जाथि। भृंगी : ओ – ई बात ? नंदी : त’ एकर निदान त’ सहजेँ क’ सकै छी हम सब? प्रेमिका : से कोना ? भृंगी : किछुओ नहि...बस, छोट-छीन-‘ऐक्सिडेंट’ करबा दिय’ आ ल’ आनू दुनू जोड़ी माय-बाप केँ (एतहि...यमालय मे...) प्रेमी : नहि-नहि ! प्रेमिका : से कोना भ’ सकै छइ ? प्रेमी : हम सब नञि चाहब जे हमरा सभक लेल हुनको लोकनिक प्राण हरल जाइन। नंदी : तखन त’ एक्कहि टा उपाय भ’ सकैत अछि। प्रेमी-प्रेमिका : (एक्कहि संगेँ) की ? कोन उपाय ? भृंगी : इयैह...जे अहाँ दुनूक विवाह... नंदी : एतहि क’ देल जाय... [सब प्रसन्न भ’ जाइत छथि – स्पष्टतः सभक दुश्चिन्ता दूर भ’ जाइत छनि। प्रेमिका लजा’ जाइत छथि, प्रेमी सेहो प्रसन्न, मुदा कनेक शंकित सेहो-] भृंगी : खाली इयैह सोच’ पड़त’ जे कन्यादान के करत... ! बाजारी : (आगाँ बढ़ि कए) आ हम त’ छी ने ! (कहैत प्रेमिकाक माथ पर हाथ रखैत छथि; स्नेहक आभास–प्रेमिका झुकि कए हुनक पैर छूबैत छथि।) भृंगी : बस आब दरकार खाली ढोल-पिपही आ बाजा–गाजा... ! नंदी : सेहो भ’ जेतैक... ! [दुनू हाथ सँ तीन बेर ताली दैत छथि। एकटा कतार सँ ढोल–पिपही-बाजा बजौनिहार सब आबैत छथि आ बाजा-बजब’ लागै छथि। सबटा पात्र हुनके सभक पाछू - पाछू एकटा पंक्ति मे चलैत-नाचैत, आनन्द करैत बाहर चलि जाइत छथि।] [मंच पर रहि जाइत छैक मात्र बंद विशाल स्वर्ग-द्वार। स्पॉट-लाईट दरबज्जा पर पड़ैत अछि आ अन्हार भ’ कए प्रथम कल्लोलक समाप्तिक घोषणा करैत अछि।] *** दोसर कल्लोल दोसर कल्लोल [पश्चाद्पट मे स्वर्ग-द्वारे लखा दैछ मुदा मंचक एक दिसि द्वारक बाम भागक देबार लग एकटा भाषण देबा जोकर कनेक ऊँच भाषण-मंच आ ताहि पर एकटा माईक देखल जायत। भाषण-मंच पर तीनटा नीक कुर्सी देखल जायत। ओमहर दरबज्जाक सामने आ भाषण-मंचक लग बाईस-चौबीस-टा भाड़ा केर कुर्सी सेहो राखल रहत जाहि पर चारि-टा मृत सैनिक सँ ल’ कए चारि-गोट बाजा बजौनिहार आ प्रथम कल्लोल मे देखल सब गोटे – नंदी– भृंगी केँ ल’ कए चौदहो गोटे बैसल प्रतीक्षा करैत छथि। लगैछ सब क्यो प्रतीक्षा करैत-करैत परेशान भ’ गेल छथि।] अनुचर-1 : (नेताजी एखनहु धरि नहि आयल छलाह। हुनक दूटा अनुचर मे सँ एक गोटे कहुना माईक पर किछु ने किछु बजबाक प्रयास क’ रहल छल – जाहि सँ लोग ऊबि कए कतहु सरकि ने जाय!) त’ भाई – बहिन सब ! जे हम कहै छलहुँ... आजुक एहि अशांतिमय परिवेश मे एकमात्र बदरीये बाबू छथि जे शांतिक दूत बनि कए मथिले मात्र नहि, समस्त भारतक आतंकवादी, कलेसवादी, उग्रवादी, अत्यूग्रवादी, चंडवादी, प्रचंडवादी सँ ल’ कए सब तरहक विवादीक झगड़ा-विवादकेँ मेटैबाक लेल द्विचक्रयान सँ ल’ कए वायुयान धरि , सभ तरहक वाहन मे अत्यंत कष्ट आ जोखिम उठा कए सफर करैत रहलाह। आ अहिना सब ठाम... सगरे, अपन बातक जादुई छड़ीकेँ चलबैत सभक दुःख- दर्द केँ दूर करैत रहलाह। मिथिलाक महान नेता एक बद्री-विशाल सिंहे छथि जे... बाजारी : (परेशान भ’ कए) हौ, से सबटा त’ बुझलियह मुदा ई त’ बताब’ जे बद्री बाबू छथि कत’? बीमा-बाबू : आर कतेक देर प्रतीक्षा करय पड़त ? अनुचर 2 : (जे भाषण-मंचक कोना पर ठाढ़ रहैत अछि आ बीच-बीच मे उतरि कए बाहर जा कए झाँकि कए देखबाक प्रयास क’ कए घुरि-घुरि आबैत छल।) हे, आब आबिये रहल हेताह ! बाजारी : हे हौ! इयैह बात त’ हम सब बड़ी काल सँ सुनि रहल छियह ! “आब आबिये रहल छथि...” बीमा-बाबू : आ बैसल बैसल पैर मे बघा लागि रहल अछि...हमरा सँ त’ बेसी देर धरि बैसले नहि जाइत अछि। अनुचर 1 : (सब केँ शांत करैत) हे...बात सुनू... बात सुनू भाइ-सब ! बैसै जाउ, कने शांत भ’ कए बैसल ने जाइ जाउ! अनुचर 2 : (बजबाक भंगिमा सँ स्पष्ट भ’ जाइत छनि जे फूसि बाजि रहल छथि-) कनिये काल पूर्व ओ धर्म-शिला हैलिकॉप्टर पर सँ उतरल छथि। आब ओ रास्ता मे छथि– कखनहु पहुँचि सकै छथि... ! अनुचर 1 : आब जखन ओ आबिये रहल छथि, प्रायः पहुँचिये गेल छथि, आजुक समय-समन्वय-सामान्यजन आ चारुकात चलि रहल अनाचार दय बद्री बाबूकेँ की कहबाक छनि, से सुनैत जाय जाउ ! बाजारी : अच्छा त’ कह’ ने कोन नव बात कहब’! अनुचर1 : ओना अहीं कियैक हम सब चाहै छी जे सब किछु नव हो... ! रास्ता नव हो, ओ पथ जतय पहुँचत से लक्ष्य नव हो, एहन पथ पर सँ चलनिहार हमरा-अहाँ सनक पुरनका जमानाक लोग मात्र नञि – नवीन युगक नवतुरिया सब हो ! पुरातन ग्लानि, पुरना दुःख-दर्द सब, प्राचीने इतिहासक पृष्ठ पर हमसब ओझरायल जकाँ मात्र ठाढ़ नहि रही, किछु नव करी... ! बीमा-बाबू : ई बात त’ ठीके कहि रहल छी। भद्र व्यक्ति : (दुनू गोटे) ‘ठीक, ठीक ! एकदम ठीक”, आदि। अनुचर1 : आ इयैह बात बद्री विशाल बाबू सेहो बाजैत छथि-विशाल जनिक हृदय, श्रम-जीवी मनुक्खक लेल जनिक हृदय सँ सदिखन रक्त झरै छनि, जनिका लेल पुरनका लोक, रीति-रेवाज ततबे महत्वपूर्ण जतबा नवयौवनक ज्वार, नवीन पीढ़ीक आशा-आकांक्षा - ई सब किछु। आजुक युग मे वैह एकटा राजनेता छथि जे नव आ पुरानक बीच मे एकटा सेतु बनल स्वयं ठाढ छथि आ ओ सेतु जेना कहि रहल हो--- आउ पुरातन, आऊ हे नूतन। हे नवयौवन, आऊ सनातन ।। प्राण-परायण, जीर्ण जरायन। बज्र-कठिन प्रण गौण गरायन।। सुतनु सुधनु सुख सँ गायन। जीर्ण ई धरणी तटमुख त्रायन ।। अघन सधन मन धन-दुख-दायन। जाऊ पुरातन, आऊ नवायन।। [एहन उत्कृष्ट काव्य-पाठ सुनि रद्‌दी-बला आ भिख-मंगनी प्रशंसा सूचक “वाह-वाह” कहैत ताली बजाब’ लागै’ छथि। त’ हिनका दुनू केँ देखि अनुचर 2 आ नंदी-भृंगी केँ छोड़ि बाकी सब सोटे ताली बजाब’ लागैत छथि।] चोर : (लगमे बैसल रद्‌दी-बला केँ) हे... किछु बुझलह एकर कविता कि आहिना ? (रद्‌दी-बला आँखि उठा कए मात्र देखैत अछि, जिज्ञासा आँखि मे...) हमरा त’ किछु नहि बुझ’ मे आयल। रद्‌दी-बला : नव किछु भरि जिनगी कैने रहित’ तखन ने? एहि ठामक माल ओम्हर...आ ओहि ठामक एम्हर... ! भिख-मंगनी : ठीके त’! तोँ कोना बुझबह ? चोर : पहिल दूटा पाँती त’ बुझिये गेल छलहुँ। मुदा तकर बाद सबटा कुहेस जकाँ अस्पष्ट...एत्तेक नवीन छल जे बुझ’ मे नहि आयल ! अनुचर 2 : हे! के हल्ला क’ रहल छी ? भिख-मंगनी : हे ई चोरबा कहै छल... चोर : (डाँटैत) चुप! भिख-मंगनी नहितन... हमरा ‘चोर’ कहैये! भिख-मंगनी : हाय गौ माय! ‘चोर’ केँ ‘चोर’ नहि कहबै त’ की कहू ? कोन नव नामे बजाऊ ? अनुचर 1 : (माईक सँ, कनेक स्वर केँ कर्कश करैत) हे अहाँ सब एक दोसरा सँ झगड़ा नहि करु! जे किछु बतिआबक अछि, हमरे सँ पुछू ! (भिख-मंगनी केँ देखा कए) हे अहाँ... (भिख-मंगनी एम्हर-ओम्हर देखैत अछि) हँ, हँ – अही केँ कहै छी ! बाजू...की बाजै छलहुँ ? पहिने बाजू- अहाँ के छी ? चोर : (बिहुँसैत) भिख-मंग- (वाक्य अधूरे रहि जाइत छनि, कियैक त’ भिख-मंगनी झपटि कए चोरक मुँह पर हाथ ध’ दैत अछि-बाँकी बाजै नहि दैछ।) (तावत् दुनू अनुचर झपटा-झपटी देखि कए, “हे... हे...!” कहैत मना करबाक प्रयास मे अगुआ अबैत अछि।) भिख-मंगनी : (चोरक मुँह पर सँ अपन हाथ केँ हँटाबैत, ठाढ़ भ’ कए अपन परिचय दैत, कने लजबैत...) हमर नाम भेल ‘अनसूया!’ अनुचर1 : अच्छा, अच्छा! त’ अहाँ अवश्ये श्रमजीवी वर्गक छी...सैह लागैत अछि ! भिख-मंगनी : हँ! अनुचर 2 : कोन ठाम घर भेल ? भिख-मंगनी : घर त’ भेल सरिसवपाही...मुदा, अनुचर 2 : मुदा? भिख-मंगनी : रहै छलहुँ दिल्ली मे... असोक नगर बस्ती मे... अनुचर 1 : आ’ काज कोन करैत छलहुँ बहिन ? भिख-मंगनी : गेल त’ छलहुँ मिथिला चित्रकलाक हुनर ल’ कए, अपन बनायल किछु कृति बेच’ लेल... मुदा,... (दीर्घ-श्वास त्यागि) के जानै छल, जे ओ शहरे एहन छल जत’ कला-तला केर कोनो कदर नहि... अंतत: हमरा कोनो चौराहाक भिख-मंगनी बना कए छोड़ि देलक। अनुचर 2 : आ-हा-हा,ई त’ घोर अन्याय भेल अहाँक संग। घोर अन्याय... अन्हेर भ’ गेल! अनुचर 1 : (प्रयास करैत प्रसंगकेँ बदलैत छथि– गला खखाड़ि कए) मुदा ई नहि बतैलहुँ जे अहाँ कह’ की चाहैत छलहुँ ? भिख-मंगनी : हमरा लागल, अहाँ जे बात कहि रहल छलहुँ ताहि मे बहुत किछु नव छल, तकर अलावे- रद्‌दी-बला : हमरा सब केँ त’ बुझ’ मे कोनो दिक्कति नहि भेल, मुदा अनुचर 2 : मुदा ? भिख-मंगनी : (चोर केँ देखा कए) हिनकर कहब छनि जे मात्र पहिल दूटा पाँतीक अर्थ स्पष्ट छल, आ तकर बाद... अनुचर 1 : ओ...आब बुझलहुँ। भ’ सकैछ...ई भ’ सकैछ जे किनको-किनको हमर सभक वक्तव्य कठिन आ नहि त’ अपाच्य लगनि। ई संभव अछि जे हिनका लेल नव-पुरानक संज्ञा किछु आरे... [बात पूरा हैबाक पूर्वे रद्‌दी-बला आ भिख-मंगनी हँसि दैत अछि...संगहि उचक्का आ बाजारी सेहो। अनुचर-द्वय बुझि नहि पबैत छथि जे ओसब कियैक हँसि रहल छलाह।] कियैक ? की भेल ? हम किछु गलत कहलहुँ की ? रद्‌दी-बला : अहाँ कियैक गलत वा फूसि बाजब? भिख-मंगनी : अहाँ त’ उचिते कहलियैक। बाजारी : मुदा हिनका पूछि कए त’ देखू-ई कोन तरहक सेवा मे नियुक्त छथि ! अनुचर 2 : [अनुचर-द्वय बूझि नहि पबैत छथि जे की कहताह।] क.. कियैक? अनुचर 1 : (चोर सँ) की सब बाजि रहल छथि ई-सब? [चोर शांत-चित्तेँ उठि कए ठाढ होइत अछि आ भाषण–मंचक दिसि आगाँ बढैत जाइत अछि। अंत मे मंच पर चढ़ि कए बजैत छथि...] चोर : (अनुचर 1 केँ) जँ ई चाहै छी हमर उत्तर सुनब, आ जँ सत्ते किछु नव सुन’ चाहै छी तखन हमरा कनीकाल माईक सँ बाजै देमे पड़त। (अनुचर-द्वय केँ चुप देखि) कहू की विचार! अनुचर 1 : (नर्वस भ’ जाइत छथि) हँ-हँ, कियै नञि? चोर : [माईक हाथ मे पाबि चोर कुर्ता केर आस्तीन आदि समटैत एकटा दीर्घ भाषणक लेल प्रस्तुत होइत छथि।] अहाँ सब आश्चर्यचकित हैब आ भरिसक परेशान सेहो, जे हम कोन नव बात कहि सकब। [अनुचर-द्वय केँ अपन परिचय दैत] आखिर छी त’ हम एकटा सामान्य चोरे, छोट-छीन चोरि करैत छलहुँ, मुदा भूलो सँ ककरहु ने जान नेने छी आ ने आघाते केने छी। चोरि केँ हम अपन कर्म आ धर्म बुझैत छलहुँ – ई जेना हमर ढाल जकाँ छल हमरा कोनो बड़का अपराध सँ बचैबाक! सोचै छलहुँ जे चोरि, माने तस्करता – एकटा ऊँच दर्जा केर कला सैह थिक। सामान्य भद्र व्यक्तिक लेल एतेक सहजे ई काज संभव नहि भ’ सकैत छनि। (दुनू भद्र व्यक्तिकेँ देखा कए) हिनके दुनू केँ देखिऔन ने...त’ हमर बात बूझि जायब।(हँसैत) हिनका दुनूक समक्ष कोनो लोभनीय वस्तु राखि दियनु... तैयहु, इच्छा होइतहु ई लोकनि ओहि वस्तु केँ ल’ कए चम्पत् नहि भ’ सकैत छथि। (गंभीर मुद्रामे) कहबाक तात्पर्य ई जे जेना मिथिला चित्रकला एकटा कला थिक, चोरि करब सेहो चौंसठि कलाक भीतर एकटा कला होइत अछि। अनुचर 2 : मानलहुँ। ई मानि गेलहुँ जे चौर्यकला एकटा महत्वपूर्ण वृत्ति थिक, मात्र प्रवृत्ति नहि। मुदा... चोर : (हुनक बात केँ जेना हवा मे लोकि लैत छथि) मुदा ई प्रश्न उठि सकैत अछि जे हम चोरि करिते किएक छी ? विशेष...तखन, जखन कि परिवारमे क्यो अछिये नहि.. तखन एहन कार्य अथवा कलाक प्रयोगक कोन प्रयोजन छल? बाजारी : ठीक ! चोर : जँ आन-आन वृति सभ दय सोची त’ ई बूझब कठिन भ’ जाइत अछि जे चोरी वा तस्करी कत’ नहि अछि? आजुक संगीतकार पछिलुका जमाना केर गीत-संगीतसँ ‘प्रेरणा’ लैत छथि। तहियौका संगीतकार पुरनका संगीतकेँ नव शरीरमे गबबै छलाह। हुनकर सभक ‘प्रेरणा’ छलनि कीर्तन आ लोक-संगीत। आ कीर्तनिञा लोकनि केँ कथी लेल हिचकिचाहटि हैतनि अपनहु सँ प्राचीन शास्त्रीय संगीत सँ कनी-मनी नकल उतारबामे ? (थम्हैत सभक ‘मूड’ केँ बुझबाक प्रयास करैत) सैह बात सनीमा मे थियेटर मे ... कथा, कविता मे सेहो....! बाजारी : तोँ कहैत छह आजुक सभटा लेखक कल्हुका साहित्यकारक नकल करैत अछि, आ कल्हुका लोक परसुका कवि लेखकक रचनासँ चोरी करै छल...? अनुचर 1 : माने चोरि पर चोरि...? अनुचर 2 : आ चोरिये पर टिकल अछि दुनियाँ ? बाजारी : हे... ई त’ अन्हेर क’ देलह हौ...! चोर : अन्हेर कियै हैत ? कोनो दू टा पाँति ल’ लिय’ ने - ‘मेघक बरखा.... बाजारी : ई त’ रवीन्द्रनाथ ठाकुरक कविता भेल, नेना-भुटका सभ लेल लिखल... भद्र व्यक्ति 1 : (असंतुष्ट स्वरमे) एहिमे चोरी केर कोन बात भेल ? बाजारी : ओ ककर नकल उतारि रहल छलाह ? भद्र व्यक्ति 2 : हुनका सन महान कविकेँ चोर कहै छी ? चोर : (जेना हिनका सभक बात सुनतहि नहि छथि-हाथसँ सभटा बात केँ झारैत...) विद्यापतियेक पाँति लिय—“माधव बहुत मिनती करी तोय !” उचक्का : एकरा लखे तँ सभ क्यो चोर... पॉकिट-मार : (हँसैत) आ सबटा दुनियाँ अछि भरल फुसिसँ...सबटा महामाया... बाजारी : हे एकर बातमे नहि आउ ! (अनुचर द्वयसँ) अहाँसभ कोन नव बात कहै दय छलहुँ...सैह कहु । चोर : (उच्च स्वरमे) कोना कहताह ओ नव बात ? विद्यापतिक एहि एक पाँतिमे कोन एहन शब्द छल जे ने अहाँ जानै छी आ ने हम? ‘माधव’... ‘बहुत’... वा ‘मिनती’... अथवा एहन कोन वाक्य ओ बाजैत छलाह जे हुनकासँ पहिनहि क्यो नहि बाजि देने छल ? आ शतेको एहन कवि भेल हेताह जे मेघक बरिसब दय बजने हेताह आ एहन सभटा शब्दसँ गढ़ने हेताह अपन कविता केँ ? (सभ क्यो एहि तर्क पर कनेक चुप भ’ क’ सोच’ लेल बाध्य भ’ जाइत छथि।) अनुचर 1 : माने...? चोर : माने ई जे दुनियाँ मे एहन कोनो वाक्य नञि भ’ सकैछ जकर एकटा बड़का टा अंश आन क्यो कखनहु कतहु कोनो ने कोनो उद्देश्यसँ वा मजबूरीसँ बाजि नञि देने होथि ! भ’ सकैछ अहाँ तीन व्यक्तिक तीनटा बातक टुकड़ी- टुकड़ी जोड़ि कय किछु बाजि रहल होइक ! एहिमे नव कोन बात भ’ सकैछ ? बाजारी : हम सदिखन नव बात कहबा लेल थोड़े बाजै छी ? हम त’ मोनक कोनो ने कोनो भावनाकेँ बस उगड़ि दैत छी....। चोर : आ तैँ आइ धरि जे किछु बजलहुँ से सभटा बाजारमे.... माने एहि पृथ्वीक कोनो ने कोनो बाजारमे क्यो ने क्यो अथवा कैक गोटे पहिनहुँ बजने छल ? अनुचर 1 : तखन अहाँ कह’ चाहै छी जे.... चोर : (पुन: बातकेँ काटैत) ने अहाँ किछु नव बात कहि सकै छी आ ने अहाँ केर नेता...। (तावत नेपथ्यमे शोर होइत छैक ..”नेताजी अयलाह”, “हे वैह छथि नेताजी” कतय, कतय यौ ! हे देखै नञि छी ? आदि सुनबामे अबैत अछि। क्यो नारा देम’ लागैत अछि---‘नेताजी जिन्दाबाद’ देशक नेता बदरी बाबू जिन्दाबाद, जिन्दाबाद ! आदि सुनल जाइछ। मंचपर बैसल सब गोटामे जेना खलबली मचि गेल होइक। सभ उठि कय ठाढ़ भ’ जाइत छथि। क्यो-क्यो अनका सभक परवाहि कयने बिनु अगुआ ऐबाक प्रयास करैत छथि। तावत गर मे एकटा गेंदाक माला पहिरने आ कपार पर एकटा ललका तिलक लगौने कुर्ता - पैजामामे सभकेँ नमस्कार करैत नेताजी मंच पर अबैत छथि...पाछू- पाछू पाँच-सात गोटे आर अबैत छथि आ सब मिलि कए एकटा अकारण भीड़क कारण बनि जाइत छथि। “नमस्कार ! नमस्कार ! जय मिथिला... जय जानकी माता..कहैत ओ मंच पर उपस्थित होइत छथि आ बगलहिमे माईक पर चोरकेँ पबैत छथि। धीरे-धीरे सब क्यो अपन-अपन आसन पर बैसि जाइत छथि, अनुचर दुनू कोना की करताह नेताजीक लेल से बुझि नहि पबैत छथि, कखनहु लोककेँ शांत करैत छथि त’ कखनहु “नेताजी जिन्दाबाद” ! कहि छथि त’ फेरो कखनहुँ हुनक पाछू-पाछू आबि कए कुर्सी आदि सरिआब’ लगैत छथि। अतिरिक्त लोक सभ तावत् बाहर चलि जाइत छथि।) नेताजी : (अनुचर 1 सँ चोर केँ देखा कए) ई के थिकाह ? (दुनू अनुचर की कहताह से बुझि नहि पबैत छथि।) चोर : (अपनहि अगुआ कए अपन परिचय दैत) जी, हम एकटा सामान्य कलाकार छी...? नेताजी : (उठि कए अपन बात कहैत चोर केँ आलिंगन करैत) अरे...अरे.... अहोभाग्य हमर...! चोर : (अपनाकेँ छोड़बैत) नञि, नञि अहाँ जे बुझि रहल छी से नञि... नेताजी : माने ? चोर : हमर कलाकारी त’ बड़ साधारण मानक थीक। बाजारी : औ नेताजी... अहूँ कोन भ्रम मे पड़ि गेलहुँ ‘चोर’ थिकाह ई.... ‘चोर’! ...(चोर माथ झुका लैत अछि)। नेताजी : (चौंकैत मुदा अपन विस्मय पर प्रयास क’ कए काबू पाबि) आँय...ताहिसँ की, ई त’ हमरे गाम-घरक पाहुन छथि.... (कनेक ‘मुस्की’ दैत) क्यो जनमे सँ त’ ‘चोर’ नहि होइत अछि....हमर समाजक स्थितिये ककरो चोर त’ ककरो ‘पॉकिट-मार’ आ ककरहु-ककरहु ‘उचक्का’ बना दैत अछि। (जखन ओ ‘पॉकिट-मार’ आ ‘उचक्का’ दय बजैत छथि तखन एक-एक क’ कए पॉकिट-मार एवं उचक्का उठि कए ठाढ़ भ’ जाइत अछि) पॉकिट-मार : हुजूर ! हम छी पॉकिट-मार ! उचक्का : हम एकटा उचक्का छी... लफंगा कही त’ सेहो चलि सकैछ… गली-मोहल्लाक ‘दादा’ छी ! नेताजी : (जेना संतुष्ट भेल होथि) वाह ,वाह.... एत’ त’ देखि रहल छी सब तरहक लोक उपस्थित भेल छथि। हमर माथा फोड़ैत काल विरोधी पक्षक नेता ठीके कहने छलाह जे स्वर्ग आ नर्कक बीचमे हमरा अपन संसारक एकटा छोट- छीन सजिल्द संस्करण भेटि जायत....हमरा ऊकडू नञि लागत दुनियाँ छोड़ि कए जायमे...! (थम्हैत) एत त’ देखि रहल छी क्यो बाजारक झोरा नेने छथि त’ क्यो प्रेमक जीवैत पोथा नेने आ क्यो - क्यो रणभूमिसँ सोझे बन्दूक नेने उपस्थित भेल छथि, बस जे किछु कमी अछि से.... [हिनका बाजैत-बाजैत एकटा युवक प्रवेश करैत अछि, हाथमे एकटा ललका झंडा नेने—वामपंथी बातचीत हाव भाव तेहने] वामपंथी : जे किछु कमी अछि से हम पूरा क’ दैत छी। (सभ क्यो चौंकि कए हुनका दिसि देखैत छथि) उचक्का : (जेना चिन्हल लोक होथि) रौ जीतो छीकेँ रौ ? जितेन्दर ? वामपंथी : (उग्र स्वरमे) जीतो ? के जीतो ? कतहुका जीतो? हम त’ सब दिन हारले लोकक दिसि झुकल छी। नेता : हँ, हँ से सब त’ ठीके छैक—त’ अहाँ एत’ आउ ने मंच पर ....(वामपंथी युवक प्रसन्न भ’ कए मंच पर चढ़ैत छथि—दुनू अनुचरसँ आप्यायित भ’ कए आर अधिक प्रसन्न होइत छथि।) एत’ सत्ते अहाँ सन् महान युवा नेता केर अभाव खटकि रहल छल अहाँ भने हारल लोकक नेता होइ, अहाँ लोकनिक झंडाक रंग जे हो – लाल कि हरियर, हमरा सभक पीढ़ीक सबटा आशा, अहीं सब छी... वामपंथी : से सब त’ ठीक अछि, मुदा (चोर केँ देखा क’) ई के थिकाह ? नेता : ई एकटा पैघ कलाकार थिकाह। चोर : (टोकैत) हम चोर थिकहुँ सरकार। वामपंथी : आँय ? पॉकिट-मार : (भीड़मे ठाढ़ होइत) हम पॉकिट-मार ! उचक्का : (ओहो लगलहि उठि कए ठाढ होइत छथि) आ हम उचक्का ! भिख-मंगनी : (उठि कय) हम भिख-मंगनी ! रमणी मोहन : हम बलात्कारक सजा भोगि रहल छी—जनताक हाथे पीटा क’ एत’ आयल छी। वामपंथी : (आक्रोश करैत) छी,छी, छी ! एहन सभ लोक छैक एतय... (नेताकेँ पुछैत) आ’ अहाँ चोर-चोट्टा लोकनिक नेता थिकहुँ ? अफसोस अइ..... नेता : आ- हा-हा ! एतेक अफसोस किएक क’ रहल छी ? जखन दुनियाँ मे हर तरहक लोक होइत छैक, तखन ई स्वाभाविक छैक जे एत्तहु एकर पुनरावृति हैत । आ ईसा मसीह की कहैत छथि ? अनुचर 1 : चोरीक निन्दा करू ! अनुचर 2 : चोरक नहि ! चोर : ई बात ईसा मसीह नहि कहने छथि..... अनुचर 1 : तखन ? अनुचर 2 : की कहने छलाह ? चोर : पापक त्याग करू, पापीक नहि.....! वामपंथी : जाय दिअ धार्मिक गप-शप....! (चोर सँ) त’ अहाँ की कह’ चाहै छी ? चोरी पाप नहि थिक ? चोर : (बिहुँसैत) ‘पाप’ आ पुण्यक चिन्ता वामपंथीक सीमासँ बाहरक गप्प भेल। हम कहै छलहुँ दुनियाँक सबटा जीबैत कवि-कथाकार मुइल कवि-कथाकारक कंधे पर अपन इमारत ठाढ़ करैत छथि....के केहन कलाकारीसँ अनकर बात केँ परोसत तकरे खेल छइ सबटा.....! अनुचर 1 : ई कहै छथि पीढी-दर-पीढी सब क्यो अनकहि बात आ खिस्सा पर गढैत अछि अपन कहानी..... अनुचर 2 : कहि छथि—किछु नहि नव अछि एहि दुनियाँमे.... सबटा पुराने बात ! नेता : अर्थात् चोरायब एकटा शाश्वत प्रवृति थिक । वामपंथी : नॉन-सेन्स ! नेता : कियैक ? पृथ्वीराज संयुक्ता केँ ल’ कए चम्पत नहि भेल छलाह ? आ अर्जुन चित्रांगदाकेँ ? (युवा केँ माथ डोलबैत देखि) आ किसुन भगवानकेँ की कहबनि ? कतहु ‘माखन’ चोराबैत छथि त’ कतहु ‘कपड़ा लत्ता’… वामपंथी : (खौंझैत) इयैह भेल अहाँ सब सन नेताक समस्या... अहिना मारल गेल हिन्दुस्तान! मौका भेटतहि ब्रह्मा- विष्णु-महेश केँ ल’ आबै छी उतारि क’ ताखा पर सँ.... बाजारी : (मजाक करैत) हे... आब आबि गेल छी हमहीं सब ताखा पर सँ उतरि स्वर्गक द्वार मे...चलब ओहि पार तँ ई सब भेंट हैबे करताह। नेता : मानू, आ कि नहि मानू.... छी त’ जाहि देशक लोग तकर नामो मे त’ इतिहासे–पुराण लेपल अछि कि नञि ? ‘भारत’ कही त’ ‘भरत’ क कथा मोन पड़त आ ‘हिन्दुस्तान’ कही त’ ‘हिन्दू’ केँ कोना अलग क’ सकै छी ? बाजारी : (व्यंग्यक स्वरमे) हे - ई सब अपन देश मे थोड़े ओझरायल रहताह ? ई सब त’ बस बामे कात दैखैत रहैत छथि—ने भारत कहता आ ने हिन्दुस्तान ! ई सब त’ ‘इण्डिया’ कहताह ‘इण्डिया’ ! पॉकिट-मार : (कमर डोला कए दू डेग नाचियो लैत छथि) “आइ लव माइ इण्डिया.... आइ लव माइ इण्डिया” ! वामपंथी : (डपटैत) थम्हू ! (पॉकिट-मार जेना अधे नाचि कए प्रस्तरीभूत भ’ जाइत छथि।) ई सब ‘चीप’ बात कतहुँ आन ठाम जा क’ करू (नेतासँ) देश-प्रेम अहीं सभक बपौती नहि थिक ! नेता : नञि - नञि से हम सब कत’ कहलहुँ ? अनुचर 1 : हम सब त’ कहि रहल छी— देश-प्रेमो सँ बढि कए भेल अहाँ सब लेखे-विश्व-प्रेम ! अनुचर 2 : ‘यूनिवर्सल ब्रदरहूड’ ! अनुचर 1 : (जेना नारा द’ रहल होथि) दुनियाँक मजदूर ...! अनुचर 2 : एक हो ! (एकबेर आर नाराकेँ दोहराबैत छथि। तेसर बेर जखन अनुचर 1 कहैत छथि—दुनियाँक किसान तखन उचक्का, पॉकिट-मार, भिख-मंगनी, रद्दीवला अपन-अपन मुट्ठी बन्न कएने सीना तानि कए कहैत छथि ‘लाल सलाम’) वामपंथी : बंद करू ई तमाशा ! नेता : (हाथसँ इशारा करैत) हे सब गोटे सुनू त’ पहिने ओ की कह’ चाहै छथि....! वामपंथी : (गंभीर मुद्रामे) अहाँ मस्खरी करू कि तमाशा.... देशक बाहर दिस देखबामे हर्जे की ? अनुचर 1 : हर्ज कोनो नहि। वामपंथी : बाहरसँ जँ एकटा हवा केर झोंका आओत त’ अहाँ की खिड़की केँ बन्न क’ कए रखबै ? अनुचर 2 : कथमपि नहि ! वामपंथी : कार्ल मार्क्स सन महान व्यक्तिक बात हम सब किएक नञि सुनै लै तैयार छी ? अनुचर 1 : कियै नहि सुनब ? वामपंथी : दुनियाँक सबटा मजदूर-किसान जँ एक स्वर मे बाजै त’ एहिमे अपराध की ? अनुचर द्वय : (एक्कहि स्वरमे) कोनो नहि ! वामपंथी : लेनिन जे पथ दैखौलनि, ताहि पर हम सब कियै नञि चलब ? वामपंथी : इन्कलाब ! अनुचर द्वय : जिन्दाबाद ! वामपंथी : (मुट्ठी तानैत) जिन्दाबाद, जिन्दाबाद ! अनुचर द्वय : (नारा देबाक स्वरमे) इन्कलाब जिन्दाबाद ! (कहैत –कहैत दुनू अनुचर जेबी सँ छोटका सन कैकटा लाल पताका निकालि क’ एक-एकटाकेँ हाथमे धरैत तथा धराबैत मंचक चारूकात नाराबाजी करैत चक्कर काटय लागै छथि। दुनूक पाछाँ - पाछाँ पॉकिट-मार, भिख-मंगनी, उचक्का, रद्दीवला सेहो सब जुटि जाइत छथि, सभक हाथमे छोट-छोट लाल झंडी, सभ क्यो तरह-तरहक नारा दैत छथि। एकटा चक्कर काटि कए जखन ओ सभ पुन: भाषण मंचक लग आबि जाइत छथि। मुदा भाषण- मंचक लग पहुँचि कए नारा केर तेवर दोसरे भ’ जाइत अछि।) उचक्का : (जेना मजाक करै चाहैत छथि) “हम्मर नेता चेयरमैन माओ” बाँकी लोग : “बाँकी सब क्यो दूर जाओ !” चोर : (भाषण मंच पर सँ) एक मिनट ....थम्हू, थम्हू ! (सब क्यो चुप भ’ जाइत छथि, आब वामपंथी युवा आ नेताजी दिसि घुरि कए बाजैत छथि--) इयैह त’ हमहूँ कह चाहैत छलहूँ... ने हमरा लेलिन सँ शिकायत छनि ने चेयरमैन माओ सँ..... दुनू अपन देश, अपन लोगक लेल अनेक काज कयलनि अथक श्रम कयने छलाह भरि जिनगी ; ने गीतासँ शिकायत ने गुरूवाणी सँ दुनू अप्पन अप्पन जगह मे अत्यंत महत्वपूर्ण अछि... मुदा एतबे कहै छलहुँ जे एहिमे सँ क्यो अथवा किछुओ हवा सँ नञि बहि कए आयल छल.... शून्य सँ नहि उगल छलाह क्यो ! (सभ क्यो चुप्प भ’ कए चोरक दलील केँ सुनै छथि आ तकर तर्क केँ बुझक’ प्रयास करैत छथि।) सब एक दोसरासँ जुड़ल छथि । मार्क्स नञि होइतथि त’ भरिसक लेलिनो नञि, आ ओ अयलाह तैं माओ सेहो... प्रत्येक घटनाक पूर्वपक्ष होइ छैक..... वामपंथी : (हँसैत) माने क्यो ‘ओरिजिनल’ नञि सबटा ‘डुप्लीकेट’, क्यो नहि असली सबटा नकली ! (सभ हँसि दैत छथि) चोर : हम कत’ कहलहुँ..... ‘सब क्यो नकली, सबटा चोर !’ ई सब त’ अहाँ लोकनि कहि रहल छी। (थम्हैत) हम मात्र कहल, कोनो बात पूर्ण रूप सँ नव नञि होइत अछि... ओहिमे कत्तेको पुरनका प्रसंग रहैत अछि ठूसल ! नेता : (सभक दिसि देखैत) तर्क त’ जबरदस्त देने छथि (वामपंथी युवाक व्यंग्य करैत) नीक-नीक केँ पछाड़ि देने छथि । अनुचर 1 : मुदा हिनकर थ्योरीक नाम की भेलनि ? अनुचर 1 : कोन नामसँ जानल जायत ई....? नेता : कियै ? ‘चोर पुराण’! (सब क्यो हँसैत छथि—वामपंथी युवाकेँ छोड़ि—हुनका अपन पराजय स्वीकार्य नञि छनि) बाजारी : त’ सुनै जाउ हमर गीत.... नेता आ दुनू अनुचर: हँ ,हँ, भ’ जाय...! बाजारी : (गाबैत छथि आ कनी-मनी अंग संचालन सेहो करैत छथि) एत’ चोर कोतवाल केँ डाँटै, गाबै जाय जाऊ चोर-पुरान ! कतबा नव छै कतेक पुरनका, के छै ज्ञानी के अज्ञान ? गाबै जाय जाऊ चोर-पुरान ! गर्तक भीतर शर्त्त रहै छइ, शर्त्तक भीतर भूर पुरान ! नाच नचै छै गीत गबै छइ, सब केर बाहर भीतर ठान ! गाबै जाय जाऊ चोर-पुरान ! नव त’ किछुओ नञि छइ बौआ, सबटा जानल छइ पहिचान ! एक-दोसराकेँ जोड़ि दैत अछि, धोख् धिनक-धिन् चोर पुरान! गाबै जाय जाऊ चोर-पुरान ! (जखन ओ एकक बाद एक पाँति गाबि रहल छलाह, धीरे-धीरे आनो लोग सब गाबै - नाचै मे अपनाकेँ जोड़ि रहल छलाह। अनुचर 1 कतहु सँ एकटा गेंदा केर माला ल’ क’ चोरक गरा मे पहिरा दैत छथि। अनुचर 2 एकटा थारी मे कर्पूरक दीप बारैत चोरक आरती सेहो क’ दैत छथि भिख-मंगनी आगाँ बढि चोर केँ तिलक सेहो लगा दैत अछि। धीरे-धीरे चोर मंच सँ उतरि कए नचैत-गबैत लोग सभक बीच आबि जाइत अछि—तावत् गीत चलिए रहल छल) बाजारी : हम छी चोर आ चोर अहूँ छी, साधु-संत घनघोर अहूँ छी ! च-छ-ज-झ छोर अहीं छी, नदी किनारक जोर अहीं छी ! झोर बहइ यै करै बखान, गाबै जाय जाऊ चोर-पुरान ! नऽव तनिक छै दऽ ब तकर गर, परखि-झरकि कए राख बराबर, प-फ-ब-म मोर अहीं छी, अन्हारो केर छोर अहीं छी ! करै छी अहींकेँ कपट-प्रणाम! गाबै जाय जाऊ चोर पुरान ! [नाचैत-गाबैत, ढ़ोल पिपही बजबैत सब क्यो गोल-गोल घुमै छथि। भाषण मंच पर मात्र नेता आ वामपंथी युवा एक बेरि नचनिहार सभक दिसि आ एक बेरि एक-दोसराक दिसि देखि रहल छलाह धीरे-धीरे प्रकाश मद्धिम भ’ जाइत अछि आ अंतमे कल्लोलक समाप्ति भ’ जाइछ।] *** तेसर कल्लोल तेसर कल्लोल [भाषण - मंचपर नेता आ वामपंथी युवा पूर्ववत ठाढ़ छथि—हुनके दुनू पर प्रकाश पड़ैत छनि। बाकी मंच पर लगइत अछि एखनहु भोरूका कुहेस अछि—सब क्यो अर्ध- जाग्रत अर्ध-मृत जकाँ पड़ल छथि। मात्र चारि टा मृत सैनिक बन्दूक तानने भाषण - मंचक आस - पास पहरा दैत नजरि आबि रहल छलाह। तीनटा स्पॉट लाईट—दूटा भाषण-मंच पर आ एकटा बुलंद दरबज्जा पर पड़ल।] वामपंथी : (क्षुरधार स्वरमे) एकटा बात साफ-साफ बाजू त’... नेता : कोन बात ? वामपंथी : इयैह, ई चोरबा जे किछु बाजि रहल छल... नेता : से ? वामपंथी : अहाँ तकर सभटा विश्वास करै छी ? (नेता हँसि दैत छथि। से देखि वामपंथी युवा खिसिया जाइत छथि।) हँसि कियै रहल छी ? नेता : कियै ? हँसी पर पानंदी छैक की ? वामपंथी : हँसी पर कियैक रहत पानंदी ? मुदा आर कतेको बात पर पानंदी त’ छैक.. अहाँक पार्टी तकरा मानत तखन ने ? नेता : हमर पार्टी जकरा मानलक अछि, हमरा ताहि पर कोन आपत्ति ? वामपंथी : (बातकेँ काटैत) झूठ ! सबटा फूसि ! नेता : से कोना ? वामपंथी : (तर्क दैत) कियैक ? ई नञि निश्चित भेल जे हमसब बान्हल रहब एकटा बंधन मे ? नेता : हँ, गठ-बंधन त’ भेल छल, जेना मिलल-जुलल सरकार मे होइ छइ...? वामपंथी : (व्यंग्य करैत) आ तकर कैकटा असूल सेहो होइत छैक.... नेता : जेना ? वामपंथी : जेना सबटा महत्वपूर्ण बात पर आपसमे बातचीत क’ कए तखन दुनियाक सामने मुँह खोलब... की ? एहन निश्चय भेल छल वा नञि ? नेता : हँ...! वामपंथी : आ ताहि बातपर हमसब सरकार केँ बाहर सँ समर्थन द’ रहल छी... छै कि नञि ? नेता : बेशक ! ठीके बात बाजि देलहुँ। वामपंथी : मुदा अहाँ की क’ रहल छी ? नेता : की ? वामपंथी : (आर धीरज नञि ध’ पबैत छथि--) तखन बात-बात पर हमरा सब सँ हँटि कए बिल्कुल आने बात कियै करै लागै छी? सदिखन विरोध कियै करै चाहै छी? नेता : “वाह रे भैया ! वाह कन्हैया— जैह कहै छी जतबे टा हो— सब मे कहि दी ता-ता-थैया ?” की बुझै छी, अहाँ सबक नाङरि धैने चलत हमर पार्टी ? वामपंथी : प्रयोजन पड़त त’ सैह करै पड़त ! नेता : हँ ! से हिंछा त्यागिये दी त’ नीक ! की त’ हम सरकार केँ नैतिक समर्थन दै छी ? तकर माने की, इयैह जे अहाँ अंट- संट जैह किछु बाजब, हँ-मे-हँ कह’ पड़त ? (वामपंथी किछु कह’ चाहैत छथि) बात त’ ओ कलाकार लाख टाकाक कहि रहल छल। चोरी करैत छल तैं की ? तर्क त’ ओ ठीके देने छल...झूठ त’ नञि बाजि रहल छल ओ ! वामपंथी : तखन आर की ? चोर उचक्के केँ अपन पार्टी मे राखि लियह। नेता : कियै ? राजनीति मे एत्तेक बड़का-बड़का चोरी क’ कए कतेको गोटे त’ प्रख्यात भैये गेल छथि। आब हुनका सभक पास हैरैबाक योग्य कतेको वस्तु हेतनि ! मुदा तकरा लेल अहाँ आ अहाँक पार्टी कियै डरै छी ? वामपंथी : हम सब कियै डरब ? हम सब की सरकार चलबै छी जे डर हैत ? नेता : (हँसैत) ठीके कहलहुँ ! सब सँ नीक त’ छी अहीं सब-ने कोनो काज करबाक दायित्व ने कोनो हेरैबाक दुश्चिन्ता, मात्र बीच-बीच मे हिनका सवाल पूछू त’ हुनका खेदाड़ि केँ भगाउ ! नहि त’ हमरा सभक पार्टिये केँ खबरदार करै लागै छी...... डरा धमका क’ चाहै छी बाजी मारि ली--- वामपंथी : ई त’ अहाँक सोच भेल। हम सब त’ मात्र सदर्थक आलोचना करैत छी—“कॉन्सट्रक्टिव क्रिटिसिज्म” ! नेता : आ हम सब अहाँ लोकनिक पाछाँ घुरिते फकरा कहै छी— “वाह रे वामा बम-बम भोले ! दाहिना नञि जो बामा बोलै ! दच्छिन घुरने प्राण रहत नञि ! अंकक जोरो साथ रहत नञि ! कतय चकेवा, सामा डोलै, “वाह रे वामा बम-बम बोलै !” वामपंथी : (एसगरे व्यंग्य करैत थपड़ी पाड़ैत छथि) वाह ! कविता त’ नीके क’ लै छी। नेता : हम सब छी राजनीतिक उपज, हमरा सब बुते सबटा संभव अछि..... वामपंथी : छी त’ नेता, मुदा भ’ सकैछी.... नेता : (बात केँ जेना लोकि लैत छथि) अभिनेता सेहो ! [कहिते देरी बाहर हल्ला मचै लागैत अछि—जेना उच्च-स्वरमे फिल्मक गीत बाजि रहल हो ; तकरहि संगे तालीक गड़गड़ाहटि, सीटीक आवाज सेहो । हो-हल्ला होइत देरी मंचो पर सुस्तायल लोग सबटा मे जेना खलबली मचि गेल हो। सब क्यो हड़बड़ा कए उठैत एक–दोसरा सँ पूछि रहल छथि—‘की भेल, त’ की भेल ?’ तावत एकटा नमहर माला पहिरने एकटा फिल्मी हीरो प्रवेश करैत छथि। पाछाँ-पाछाँ पाँच-दसटा धीया-पुता सब ‘ऑटोग्राफ’क लेल धावित होइत छथि। दू-चारि गोटेक खाता पर गर्वक संग अपन हस्ताक्षर करैत—“बस, आब नञि, बाँकी बादमे....” कहैत अभिनेता मंचक दिसि अगुआ आबैत छथि। आँखिक करिया चश्मा खोलि हाथ मे लैत छथि। मंच परक लोक सब तालीक गड़गड़ाहटि सँ हुनकर स्वागत करैत छथि—तावत् धीया-पुता सभ धुरि जाइछ।] अभिनेता : (भाषण-मंच पर चढ़ैत) नमस्कार बदरी बाबू, जय सियाराम ! नेता : नमस्कार ! मुदा अहाँ केँ की भेल छल जे एत’ आब’ पड़ल ? अभिनेता : वैह... जे होइते छैक... अपन ‘स्टंट’ अपनहि क’ रहल छलहुँ मोटर साइकिल पर सवार भ’ कए ....आ कि ऐक्सिडेंट भ’ गेल... आ सोझे एत’ चल अयलहुँ... नेता : अहो भाग्य हमरा सभक। अभिनेता : (हाथ सँ हुनक बात केँ नकारबाक मुद्रा दैखबैत) जाय दिअ ओहि बात केँ, (वामपंथी युवा केँ देखा कए) मुदा.. हिनका नहि चिन्हलियनि। नेता : ओ-हो ! ई छथि नवीन निश्छल ! कॉमरेड हमर सभक समर्थक थिकाह। अभिनेता : (सलाम ठोकैत) लाल सलाम, कॉमरेड ! वामपंथी : (हाथ जोड़ि कए नमस्कार करैत छथि—ततबा प्रसन्न नहि बुझाइत छथि।) नमस्कार ! नेता : (अभिनेताक परिचय कराबैत) हिनका त’ चिन्हते हैबनि....! [वामपंथी युवा केँ माथ हिलाबै सँ पहिनहि बाँकी जनता चीत्कार करैत कहैत अछि—“विवेक कुमार!”आ पुनः ताली बजा कए हिनक अभिनन्दन करैत अछि। आभिनेता अपनहु कखनहु झुकि कए, कखनहु आधुनिक भंगिमामे हाथ हिला कए त’ ककरहु दिसि “आदाब” करबाक अभिनय करैत छथि—हुनक हाव-भाव सँ स्पष्ट अछि जे अपन लोकप्रियताक खूब उपभोग क’ रहल छथि।] वामपंथी : हिनका के नहि जानत ? टी.वी. केर छोट पर्दा सँ ल’ कए फिल्मक पर्दा धरि ई त’ सदिखन लखा दैत छथि--- अभिनेता : (एकाधिक अर्थमे) छी त’ हम सबटा पर्दा पर, मुदा पर्दाफाश करबा आ करैबा लेल नञि... मात्र अभिनय करबा लेल ! वामपंथी : ‘पर्दाफाश’ कियै नञि.. अभिनेता : (वाक्य केँ पूरा नहि करै दैत छथि) हम तँ मात्र सैह बाजै छी जे बात आने क्यो गढ़ैत अछि.... नेता : ठीक ! पर्दाफाश त’ ओ करत जकरा सदिखन किछु नव कहबाक आ नव खबरि बेचबाक ‘टेनशन’ रहल हो ! (‘हेडलाइन’ दैखैबाक लेल दुनू हाथ केँ पसारि कए-) ‘ब्रेकिंग न्यूज’ नवका खबरि, टटका खबरि, हेडलाइन ! अभिनेता : औ बाबू—हम ने नव बात कहै छी आ ने कहि सकै छी... हमर डोरि त’ कथाकार आ निर्देशकक हाथ मे रहैत अछि... ओ कहैत छथि ‘राम कहू’ त’ ‘राम’ कहै छी, कहै छथि ‘नमाज़’ पढ़ू त’ सैह करै छी। अनुचर 1 : कहल जाइ छनि, बाम दिसि घुरू आ खूब नारा लगाउ.... अनुचर 2 : त’ शोर कर’ लागैत छथि “मानछी ना” “मानबो ना” ! अनुचर 1 : मानब नञि, जानब नञि... तोरा आर केँ गुदानब नञि... अनुचर 2 : हम जे चाही मानै पड़त, नञि त’ राज गमाबै पड़त ! (नेता आ दुनू अनुचर हँसि दैत छथि। अभिनेता सेहो कौतुकक बोध करै छथि) वामपंथी : (व्यंग्य करैत) माने ई बुझी जे अहाँ जे किछु करै छी, सबटा घीसल-पीटल पुरनके कथा पर....? अभिनेता : घीसल हो वा पीटल, तकर दायित्व हमर थिक थोड़बे ? वामपंथी : त’ ककर थिक ? अभिनेता : तकर सभक दायित्व छनि आन-आन लोकक... हमर काज मे बाँकी सबटा त’ पुराने होइ छइ...कहियहु- कखनहु ‘डायलॉग’ आ गीतक बोल सेहो ...मुदा किछु रहिते छइ नव, नञि त’ तकरा पब्लिक कियै लेत ? (एतबा सुनतहि चोर उठि कए ठाढ़ होइत अछि) चोर : अरे, इहो त’ हमरहि बात दोहरा रहल छथि...जे... अनुचर 1 : नव नञि, किछु नञि, किछु नव नञि... अनुचर 2 : बात पुराने, नव परिचय... अनुचर 1 : सौ मे आधा जानले बात... अनुचर 2 : बाँकी सेहो छइहे साथ ! चोर : (दुनूक कविता गढ़बाक प्रयास केँ अस्वीकार करैत आ अपन तर्क केँ आगाँ बढ़बैत) नञि, नञि हम ‘मज़ाक’ नहि करै चाहै छी...इयैह त’ हमहूँ कहै चाहै छलहुँ जे संसार मे सबतरि पुराने बात पसरल अछि...नव किछु होइ छइ... मुदा कहियहु - कखनहु... बाजारी : (गला खखारि कए...एतबा काल, जागि जैबाक बादो मात्र श्रोताक भूमिकाक निर्वाह क’ रहल छलाह) हँ-हँ, आब मानि लेलियह तोहर बात नव- पुरान दय... मुदा कहै छह ‘संसार’ सँ बाहर निकलू तखन नव-पुरानक सबटा हिसाब बदलि जाइ छइ ? चोर : हमरा सन चोर की जानत आन ठामक खबरि ? अनुचर 1 : ठीक ! अनुचर 2 : चोर की जानत स्वर्गक महिमा ? चोर : जतय हम सब एखन छी, भ’ सकैछ एतहुका नियम किछु आर हो... अभिनेता : ठीक कहलह हौ ! भ’ सकैछ, एतय ने किछु नव होइ छइ, आ ने कछु पुरान ! नेता : ने क्यो दच्छिन रहि सकैछ आ ने बाम ! चोर : आ ने नेता आ अभिनेताक बीच मे कोनो फर्क रहि जाइछ... अभिनेता : (हँसैत) ओहुना, हमरा सभक पृथ्वी पर नेता थोड़े कोनो नव बात कहै छथि... खाली हमरे सब पर दोष कियै दै जाइ छइ लोक ? वामपंथी : आ बिनु अभिनेता भेने कि क्यो नेता बनि सकैत अछि ? चोर : किन्नहु नञि ! नेता : ओना देखल जाय त’ दुनियाँ मे एखन ‘कॉम्पीटीशन’ बड़ बेसी छैक...सबटा अभिनेता चाहै छइ जे हमहूँ नेता बनि जाइ... हमहूँ कियै नञि देश चला सकै छी ? चोर : खाली हमरे सभक जाति-बिरादरी छइ जे कखनहु सपनो नञि दोखि सकै छइ नेता बनबाक....चोर- उचक्का-भिखारी- रद्दीवला छी...छलहुँ आ सैह रहि जायब... वामपंथी : मुदा अहूँ सब केँ मोसकिल होमै वला अछि.... चोर : कियै ? वामपंथी : कियै त’ चोर नहियो नेता बनि सकय, नेता-लोकनि त’ चोरी करै मे ककरहु सँ पाछाँ नञि होइ छथि। जेम्हरे देखू... सब ठाम ‘स्कैंडल’ एक सँ बढ़ि कए एक... नेता : (खौंझैत) मोन राखब...अहूँक पार्टीमे गुंडा-बदमाश भरल अछि....सब छटल चोर-उचक्का...(एहि बात पर चोर-उचक्का-भिख-मंगनी आदि सब हँसि दैत छथि।) अभिनेता : (वामपंथी, नेता केँ किछ कटु शब्द बाजै लगताह से बूझि , तकरा रोकैत) औ बाबू ! हम त’ एत’ नव छी , मुदा हमरा त’ लागैये .... एत’ ने किछु ‘हम्मर’ थीक आ ने कछु अनकर तैं ने चोरीक प्रश्न उठै छइ आ ने सीना जोरीक ! चोर : ठीक...ठीक ! बिल्कुल ठीक कहलहुँ। (अभिनेताक बात शुरू होइत देरी मंच पर एक गोट उच्च- वंशीय महिला प्रवेश करैत छथि आ अभिनेताक बाद चोर केँ उठि कए ठाढ़ भए बात करैत देखि सोझे चोरेक लग चलि आबै छथि अपन प्रश्न पूछै।) महिला : (चोर सँ) एकटा बात कहू... एत’ स्वर्गक द्वार त’ इयैह थिक कि नहि ? (बंद दरबज्जा केँ देखा कए) चोर : आँय ! महिला : स्वर्गक दरबज्जा.... ? रमणी मोहन : (उत्सुकता देखबैत, उठि कए लग अबैत) हँ-हँ ! इयैह त’ भेल स्वर्गक प्रवेश द्वार ! महिला : (रमणी-मोहन दिस सप्रश्न) त’ एत’ की कोनो क्यू- ‘सिस्टम’ छइ ? बाजारी : (उठि कए ठाढ़ भ’ जाइत छथि, जेना पुन: कतार बनाबै लेल जुटि जैताह) हँ से त’ छइहे.... [ई बात कहैत देरी जेना ‘भगदड़’ मचि जाइत अछि आ पुनः सब क्यो कुर्सी पर सँ उठि-उठि के कतार मे जुटि जैबाक प्रयास करैत छथि। क्यो-क्यो सबटा कुर्सी केँ तह लगैबाक प्रयास करैत अछि त’ क्यो सबटाकेँ मंचक एक कात हँटा कए कतारक लेल जगह बनैबा मे जुटि जाइत अछि....क्यो हल्ला - गुल्ला आरंभ क’ दैत छथि। नेताजी माईक पर सँ “हे, सुनै जाउ” “शांत भ’ जाउ” आदि कहै छथि, मुदा हुनकर बात सभक हल्ला - गुल्ला मे जेना डूबि जाइत छनि। दुनू अनुचर नेताजीक देखा-देखी कैक गोटे केँ समझाबै - बुझाबैक प्रयास करै छथि, मुदा क्यो नहि तैयार छथि हिनका दुनूक बात मानै लेल। कनेके देर मे मंच पर सँ सब किछु हँटि जाइत अछि आ पुनः एकटा कतार बनि जाइत अछि..... पुनः प्रथमे दृश्य जकाँ कतहु-कतहु जेना संघर्ष चलि रहल होइक गुप्त रूप सँ। भाषणक मंच पर मात्र तीन गोटे छथि—बीच मे अभिनेता, बामा दिसि वामपंथी युवा, आ अभिनेताक दक्षिण दिसि बदरी बाबू.... चारू मृत सैनिक पुनः कतारक लग ठाढ़ छथि। मात्र रमणी- मोहन, महिला आ चोर छथि मंचक बीचो-बीच, सबटा अवाक् भ’ कए देखैत।] महिला : (चोर सँ) हे, अहाँ सभक एत’ ‘लेडीज’ सभक लेल अलग ‘क्यू’ नहि होइ छैक ? चोर : अलग ‘क्यू’ ? रमणी-मोहन : हँ-हँ, कियै नञि ? अहाँ की एकरा सभक संग धक्का-मुक्की करब ? (महिलाक हाथ ध’ कए) आउने—(एकटा पृथक क्यू बनबैत) अहाँ एत’ ठाढ़ भ’ जाउ वी.आई.पी. क्यू थिकै... जेना मंदिर मे नञि होइ छइ ? चोर : वी. आइ. पी.... एतहु ? वामपंथी : (भाषण मंच पर सँ उतरैत छथि) बात त’ ई ठीके बजलाह। अभिनेता : (अधिकतर फुर्ती देखबैत वी.आई.पी. क्यू मे ठाढ़ होइत) ई त’ पृथ्वीक मनुक्खक लेल नव बात नहिये थिक... (चोरसँ) तैं एहिमे आश्चर्य कियै भ’ रहल छह ? [तावत नेता, हुनक दुनू अनुचर आ वामपंथी युवा मे जेना स्पर्धा भ’ रहल होइक जे के, वी. आई.पी. क्यू मे पहिने ठाढ़ हैताह। एकटा अनुचर रमणी- मोहनकेँ पकड़ि कए “हे ...अहाँ ओत’ कोना ठाढ़ छी”? कहैत वी. आई. पी. क्यू केर पाछाँ आनि कए ठाढ़ क’ दैत छथि। अभिनेता आ महिला आपस मे गप-शप आ हँसी मजाक करै लागैत छथि। रमणी-मोहन मूड़ी झुकौने क्यू केर अंत मे ठाढ़ रहैत छथि। वामपंथी युवा छलाह अभिनेताक पाछाँ ठाढ़, हुनकर पाछाँ बदरी बाबू आ एकटा अनुचर—जे बदरी बाबूक हाथ आ पीठ मे आराम द’ रहल छल। आ दोसर अनुचर ठीक क’ नेने छल- अपनहि मोने जे दोसर क्यू–साधारण मनुक्ख बाला- तकर देख-रेखक दायित्व तकरे पर छैक। तैं ओहि क्यू मे असंतोष आ छोट-मोट झगड़ा केँ डाँटि-डपटि कए ठीक क’ रहल छल। आ हठात् मंच पर एहि विशाल परिवर्तनक दिसि अवाक भ’ कए देखैत चोर कोनो क्यू मे ठाढ़ नहि रहि कए भाषण-मंचक पासे सँ दुनू कतार दिसि देखि रहल छल। यम आ पाछू-पाछू चित्रगुप्त प्रवेश करैत छथि। युवक हाथमे एकटा दंड आ माथ पर मुकुट, परिधेय छलनि राजकीय, हाव-भाव सँ दुनू कतार मे जेना एकटा खलबली मचि जाइत अछि। कतेको गोटे “हे आबि गेलाह” वैह छथि, “हे इयैह त’ थिकाह !” आदि सुनल जा रहल छल। चित्रगुप्तक हाथमे एकटा मोट पोथा छलनि जे खोलि-खोलि कए नाम-धाम मिला लेबाक आदति छलनि हुनकर। यमराज प्रविष्ट भ’ कए सर्वप्रथम साधारण मनुक्खक कतार दिसि देखैत छथि आ जेना एक मुहूर्तक लेल ओत’ थम्हैत छथि। सब क्यो शांत भ’ जाइत अछि-सभक बोलती बंद—जे अनुचर कतार केँ ठीक क’ रहल छल—ओहो साधारण मनुक्खक कतारक आगाँ दिसि कतहु उचक्के लग घुसिया कए ठाढ़ भ’ जाइत अछि। यमराज पुनः आगाँ बढ़ैत छथि त’ वी. आई. पी. कतारक पास आबै छथि—ओत’ ठाढ़ सब गोटे हुनका नमस्कार करैत छथि। वामपंथी युवा अभिनेता सँ पूछैत छथि “ई के थिकाह ?” उत्तर मे अभिनेता जो किछु कहैत छथि से पूर्ण रूपसँ स्पष्ट त’ नहि होइछ मुदा दबले स्वरेँ बाजै छथि “चिन्हलहुँ नहि ? “ईयैह त’ छथि यमराज !” वामपंथी युवा घबड़ा कए एकटा लाल सलाम ठोकि दैत छथि आ पुनः नमस्कार सहो करै लागैत छथि। यमराज हिनकर सभक उपेक्षा करैत चोरक लग चलि आबै छथि भाषण मंचक लग मे।] यमराज : (चोर सँ) अहाँ एतय कियै छी महात्मन् ! (हुनक एहि बात पर, विषेशतया ‘महात्मन् !’ एहि संबोधन सँ जेना दुनू कतार मे खलबली मचि जाइत अछि। एतबा धरि जे चारू मृत सैनिक सँ ल’ कए सब क्यो एक दोसरा सँ पूछै लागैत छथि....“महात्मन् ?” “महात्मा कियैक कहलाह ई ?” “ई सत्ये महात्मा थिकाह की ?” “ई की कहि रहल छथि ? ” त’ क्यो-क्यो उत्तर मे… “पता नहि !” ने जानि कियैक...। भ’ सकैछ… आदि,आदि बाजै लागैत छथि। परिवेश जेना अशांत भ’ जाइत अछि यमराज असंतुष्ट भ’ जाइत छथि) आ ! की हल्ला करै जाइ छी सब ? देखि नहि रहल छी जे हिनका सँ बात क’ रहल छी ? (हुनकर डाँट सुनि दुनू अनुचर ठोर पर आङुर धैने “श्-श्-श्-श् !” आदि कहैत सब केँ चुप कराबैत अछि। हठात् जेना खलबली मचल छलैक तहिना सब क्यो चुपचाप भ’ जाइत छथि।) चोर : (विह्वल भ’ कए) महाराज ! यमराज : (चोर दिसि घुरैत) हूँ त’ हम की कहि रहल छलहुँ ? (उत्तरक अपेक्षा छनि चित्रगुप्त सँ) चित्रगुप्त : प्रभु, अपने हिनका सँ आगमनक कारण पूछि रहल छलियनि... यमराज : (मोन पड़ैत छनि) हँ ! हम कहै छलहुँ (चोर सँ) अहाँ एत’ कियैक ? चोर : (घबड़ाइत) नञि महाराज, हम त’ कतारे मे छलहुँ....सब सँ पाछाँ... ओ त’ एत’ राजनीति केर बात चलि रहल छल ... आ नेताजी लोकनि आबि गेल छलाह तैं.... यमराज : (आश्चर्य होइत) ‘राजनीति’? ‘नेताजी’? माने ? (नेताजी घबड़ाबैत गला खखारैत कतार सँ बहिरा कए आगाँ आबि जाइत छथि। पाछाँ-पाछाँ थरथरबैत दुनू अनुचर सेहो ठाड़ भ’ जाइत छथि।) नेता : (बाजबाक प्रयास करैत छथि साहस क’ कए मुदा गला सँ बोली नहि निकलैत छनि) जी… हम छी ‘बदरी-विशाल’! चोर : इयैह भेला नेताजी ! (तावत वामपंथी युवा सेहो अगुआ आबै छथि।) आ ईहो छथि नेताजी--- मुदा रंमे कने लाल ! चित्रगुप्त : (मुस्की लैत) हिनकर रंग लाल त’ हुनकर ? (नेताजी केँ देखाबैत छथि) चोर : ओ त’ कहैत छथि ‘हरियर’ मुदा... चित्रगुप्त : (जेना सत्ये जानै चाहै छथि) मुदा ? चोर : जे निन्दा करै छइ से कहै छइ रंग छनि ‘कारी’! नेता : नञि, नञि....हम बिल्कुल साफ छी, महाराज, बिल्कुल सफेद.... वामपंथी : (तिर्यक दृष्टिएँ नेता केँ दैखैत) ने ‘हरियर’ छथि आ नञि ‘कार’.... मुदा छनि हिनकहि सरकार ! (अंतिम शब्द पर जोर दैत छथि नेताजी क्रोधक अभिव्यक्ति केँ गीड़ि जाइत छथि) चित्रगुप्त : बुझलहुँ—ई छथि नेता सरकार, अर्थात् ‘नायक’ आ (अभिनेता केँ देखा) ई छथि ‘अभिनेता’ अर्थात् ‘अधिनायक’ आओर अहाँ छी.... नेता : (वाक्य केँ समाप्त नहि होमै दैत छथि) खलनायक ! (यमराज केँ छोड़ि सभ क्यो हँसि दैत छथि हँसीक धारा कम होइत बंद भ’ जाइत अछि जखन यमराज अपन दंड उठा इशारा करैत छथि सब शांत भ’ जाइत छथि।) यमराज : (आवाज कम नहि भेल अछि से देखि) देखि रहल छी सब क्यो जुटल छी एत’—नेता सँ ल’ कए अनु-नेता धरि... चोर : उपनेता, छरनेता, परनेता - सब क्यो ! यमराज : मुदा ई नहि स्पष्ट अछि जे ओ सभ कतार मे ठाढ़ भ’ कए एना धक्का-मुक्की कियै क’ रहल छथि। अनुचर 1 : (जा कए घेंट पकड़ि कए पॉकिट-मार केँ ल’ आनैत छथि—पाछाँ-पाछाँ उचक्का अहिना चलि आबैत अछि) हे हौ ! बताबह--कियैक धक्का-मुक्की क’ रहल छह ? पॉकिट-मार : हम कत’ धक्का द’ रहल छलहुँ, हमरे पर त’ सब क्यो गरजैत-बरसैत अछि। [तावत यमराज (अपन चश्मा पहिरि कए) चित्रगुप्तक खाता केँ उल्टा-पुल्टा कए दैखै चाहैत छथि—अनुचर दुनू भाग- दौड़ कए कतहुँ सँ एकटा ऊँच टूल आनि दैत छथि। टूल केँ मंचक बाम दिसि राखल जाइछ, ताहिपर विशालाकार रजिष्टर केँ राखि कए यमराज देखब शुरू करै छथि। नंदी-भृंगी अगुआ कए हुनक सहायताक लेल दुनू बगल ठाढ़ भ’ जाइत छथि—अनुचर-दुनू केँ पाछाँ दिसि धकेलि कए। नहि त’ अनुचर द्वय केँ मोन छलैक रजिष्टर मे झाँकि कए देखी जे भाग मे की लिखल अछि। मुदा धक्का खा कए अपन सन मुँह बनबैत पुनः नेताजीक दुनू दिसि जा कए ठाढ़ भ’ जाइत छथि। यमराज अपन काज करै लागैत छथि। हुनका कोनो दिसि ध्यान नहि छनि। नंदी अपन जेब सँ एकटा तह लगायल अथवा ‘रोल’ कैल कागज केँ खोलैत छथि आ जेना अपनहि तीनू मे एक-एक क’ कए नाम पढ़ि रहल छथि एत’ उपस्थित लोग सभक आ भृंगी रजिष्टरक पन्ना उल्टाबैत वर्णानुक्रमक अनुसार ओ नाम खोलि कए बहार करैत छथि—तखन यमराज ‘रिकार्ड’ केँ पढ़ै छथि, हिनका तीनू केँ आन कोनो दिसि ध्यान नहि छनि।] चित्रगुप्त : मुदा ई त’ बताऊ- ओना ओत’ कतार बना कए ठाढ़ कियै छी ? पॉकिट-मार : हुजूर स्वर्ग जाय चाहै छी.... उचक्का : ई ! लुच्चा नहितन, मोन भेल त’ ‘चलल मुरारी हीरो बनय’.... स्वर्ग जैताह...मुँह त’ देखू ! चित्रगुप्त : (थम्हबैत) जाय दियन्हु हिनकर बात... मुदा ई बताऊ—एत’ कतारक तात्पर्य की ? चोर : नञि बुझलहुँ...कतार लगायब त’ हमर सभक आदतिये बनि गेल अछि.. पॉकिट-मार : (उचक्का दिसि दैखबैत) आ कतार तोड़ब सेहो.... नेताजी : (जेना आब फुरलनि) ई सब त’ हमर सभक सभ्य समाजक नियमे बनि गेल अछि... धीरज धरी, अपन बेरी आबय तखने अहाँ केँ सेवा भेटत... अनुचर 1 : चाहे ओ रेलक टिकट हो... अनुचर 2 : चाहे बिजली-पानिक बिल... चोर : कतहु फोन करू त’ कहत “अब आप क्यू में हैं”... आ कि बस बाजा बजबै लागत... (पॉकिट-मार टेलिफोनक ‘कॉल होल्डिंग’ क कोनो सुर केँ मुँह सँ बजा दैत छथि।) चित्रगुप्त : मुदा एत’ कोन सेवाक अपेक्षा छल ? नेताजी : माने ? चोर : नञि बुझलियैक ? अनुचर 1 : अहाँ बुझल ? अनुचर 2 : जेना ई सब बात बुझै छथि ! चोर : सब बात त’ नहिये बुझै छी—मुदा ई पूछि रहल छथि, एत’ कोन लड्डू लेल कतार मे ठाढ़ छी अहाँ सभ ? चित्रगुप्त : हम सैह जानै चाहै छलहुँ... कोन बातक प्रतीक्षा करै छलाह ई सब गोटे ? चोर : (अनुचर 1 केँ) अहाँ बताउ ने कियैक ठाढ़ छलहुँ ? अनुचर 1 : (तोतराबै लागै छथि) हम..माने... चोर : (अनुचर 2 सँ) अच्छा त’ अहीं बताउ.... कथी लेल ठाढ़ छी एत’ क्यू मे...? अनुचर 2 : सब क्यो ठाढ़ छथि तँ हमहूँ ... अनुचर 1 : हमर सभक महान नेता बदरी बाबू जखन कतार मे ठाढ़ रहि कए प्रतीक्षा क’ सकै छथि, तखन हम सब कियैक नहि ? चित्रगुप्त : (हुनक बात केँ समाप्त होमै नहि द’ कए) मुदा प्रतीक्षा कथीक छलनि ? चोर : किनकर प्रतीक्षा ?...सेहो कहि सकै छी ! पॉकिट-मार : ई सब त’ कहै छलाह—रंभा—संभा... चोर : (हँसैत) धत् ! मेनका रंभा, उर्वशी...(हँसैत छथि) चित्रगुप्त : ओ ! त’ प्रतीक्षा करै छलहुँ कखन दरबज्जा खुजत आ अप्सरा सबटा अयतीह ? (हँसैत छथि।) नेता : (प्रतिवादक स्वरमे) नहि-नहि... हम सब त’ इयैह प्रतीक्षा क’ रहल छलहुँ जे... अनुचर 1 : .....कखन अपने लोकनि आयब... अनुचर 2 : .....आ कखन स्वर्गक द्वार खुजत.... नेता : आ कखन ओ घड़ी आओत जखन हम सब स्वर्ग जा’ सकब ! [कहैत-कहैत मंचक परिवेश स्वपनिल बनि गेल आ कैकटा नृत्यांगना/अप्सरा नाचैत-गाबैत मंच पर आबि जाइत छथि.... नृत्य-गीतक संगहि धीरे-धीरे अन्हार भ’ जाइछ।] *** चतुर्थ कल्लोल चतुर्थ कल्लोल [जेना-जेना मंच पर प्रकाश उजागर होइत अछि त’ देखल जायत जे यमराज चित्रगुप्तक रजिष्टर केर चेकिंग क’ रहल छथि। आ बाँकी सब गोटे सशंक चित्र लए ठाढ़ छथि। किछुये देर मे यमराजक सबटा ‘चेकिंग’ भ’ जाइत छनि। ओ रजिष्टर पर सँ मुड़ी उठौने अपन चश्मा केँ खोलैत नंदी केँ किछु इशारा करैत छथि।] नंदी : (सीना तानि कए मलेट्रीक कप्तान जकाँ उच्च स्वरमे) सब क्यो सुनै.... भृंगी : (आर जोर सँ) सुनू....सुनू...सनू- उ-उ-उ ! नंदी : (आदेश करैत छथि) “आगे देखेगा....! आगे देख !” (कहैत देरी सब क्यो अगुआ कए सचेत भेने सामने देखै लागैत छथि ; मात्र यमराज आ चित्रगुप्त विश्रान्तिक मुद्रा मे छथि।) भृंगी : (जे एक-दू गोटे भूल क’ रहल छथि हुनका सम्हारैत छथि---) ‘हे यू ! स्टैंड इरेक्ट... स्टैंड इन आ रो !’ (जे कनेको टेढ़-घोंच जकाँ ठाढ़ो छलाह, से सोझ भ’ जाइत छथि, सचेत सेहो आ लगैछ जेना एकटा दर्शक दिसि मुँह कैने ठाढ़ पंक्ति बना नेने होथि।) नंदी : (पुनः सेनाकेँ आदेश देबाक स्वर मे) सा-व-धा-न! (सब क्यो ‘सावधान’ अर्थात् ‘अटेनशन’ केर भंगिमा मे ठाढ़ भ’ जाइत छथि।) वि-श्रा-म! (सब क्यो ‘विश्राम’ क अवस्थामे आबि जाइत छथि।) भृंगी : (दहिना दिसि ‘मार्च’ क’ कए चलबाक आदेश दैत) दाहिने मुड़ेगा--दाहिने मोड़ ! (सभ क्यो तत्क्षण दहिना दिसि घुरि जाइत छथि।) नंदी : (आदेश करैत) आगे बढ़ेगा ! आ-गे-ए-ए बढ ! (सब क्यो बढ़ि जाइत छथि।) एक-दो-एक-दो-एक-दो-एक ! एक ! एक ! [सब गोटे मार्च करैत मंचक दहिना दिसि होइत यमराज-चित्रगुप्त केँ पार करैत संपूर्ण मंचक आगाँ सँ पाछाँ होइत घुरि बाम दिसि होइत पुनः जे जतय छल तत्तहि आबि जाइत छथि। तखनहि भृंगीक स्वर सुनल जाइछ ‘हॉल्ट’ त’ सब थम्हि जाइत छथि.... नहि त’ नंदी एक - दो चलिये रहल छल।] चित्रगुप्त : (सभक ‘मार्च’ समाप्त भ’ गेलाक बाद) उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति सँ हम कहै चाहैत छियनि जे एत’ उपस्थित सब क्यो एकटा मूल धारणाक शिकार भेल छथि—सभक मोन मे एकटा भ्रम छनि जे पृथ्वी पर सँ एतय एक बेरि आबि गेलाक मतलबे इयैह जे आब ओ स्वर्गक द्वार मे आबि गेल छथि। आब मात्र प्रतीक्षा करै पड़तनि... धीरज ध’ लेताह आ तकर बादे सभकेँ भेटतनि ओ पुरस्कार जकरा लेल कतेको श्रम ,कतेको कष्ट—सबटा स्वीकार्य भ’ जाइछ। नेताजी : (आश्चर्य होइत) तखन की ई सबटा भ्रम मात्र छल, एकटा भूल धारणा छल---जे कहियो सत्य भ’ नहि सकैत अछि ? चित्रगुप्त : ठीक बुझलहुँ आब---ई सबटा भ्रम छल। नंदी : सपना नहि... भृंगी : मात्र बुझबाक दोष छल... वामपंथी : तखन ई दरबज्जा, दरबज्जा नहि छल....किछु आन वस्तु छल....? चित्रगुप्त : ई दरबज्जा कोनो माया- द्वार नहि थिक....आई सँ कतेको युग पहिने ई खुजतो छल, बंदो होइत छल...! नेताजी : मुदा आब? अनुचर 1 : आब ई नञि खुजैत अछि की ? अनचर 2 : जँ हम सब सामने जा कए तारस्वर मे पुकारि- पुकारि कए कही—‘खुलि जो सिमसिम्’ तैयहु नहि किछु हैत! नंदी : ई कोनो ‘अलीबाबा चालीस चोर’ क खिस्सा थिक थोड़े… भृंगी : आ ई कोनो धन-रत्नक गुफा थिक थोड़े ! वामपंथी : त’ ई दरबज्जाक पाछाँ छइ कोन चीज ? नेता : की छइ ओहि पार ? अनुचर 1 : मंदाकिनी ? अनुचर 2 : वैतरिणी ? अभिनेता : आ कि बड़का टा किला जकर सबटा कोठरी सँ आबि रहल हो दबल स्वरेँ ककरहु क्रन्दनक आहटि...नोर बहाबैत आत्मा सब...! चोर : आ कि एकटा नदी-किनारक विशाल शमशान - घाट,जतय जरि रहल हो हजारक हजार चिता...हक्कन कानैत आत्मीय जन...? बाजारी : नहि त’ भ’ सकैछ एकटा बड़का बजारे छइ जतय दिन-राति जबरदस्त खरीद-बिक्री चलि रहल हो। भिख-मंगनी : इहो त’ भ’ सकैछ जे घुरिते भेटत एकटा बड़का टा सड़क बाट काटैत एकटा आन राजपथक आ दुनूक मोड़ पर हाथ आ झोरा पसारैत ठाढ़ अछि लाखो लोग- भुखमरी, बाढ़ि , दंगा फसाद सँ उजड़ल उपटल लोग.... रद्दीवला : नञि त’ एकटा ब-ड़-की टा केर ‘डम्पिंग ग्राउंड’ जतय सबटा वस्तु व्यवहार क’ क’ कए लोग सब फेकै जाय होइक—रद्दी सँ ल’ कए जूठ-काँट, पुरनका टूटल भाँगल चीज सँ ल’ कए ताजा बिना वारिसक लहास... प्रेमिका : कि आयातित अवांछित सद्यः जनमल कोनो शिशु... प्रेमी : कन्या शिशु, हजारोक हजार, जकरा सबकेँ भ्रुणे केँ कोखिसँ उपारि कए फेंकल गेल हो... वामपंथी : अथवा हजारो हजार बंद होइत कारखानाक बजैत सीटी आ लाखो परिवारक जरैत भूखल-थाकल चूल्हि-चपाटी.... नेताजी : ई त’ अहीं जानै छी जे दरबज्जाक ओहि पार की छइ... हम सब त’ मात्र अन्दाजे क’ सकै छी जे भरिसक ओम्हर हजारोक हजार अनकहल दुःखक कथा उमड़ि-घुमड़ि रहल छइ अथवा छइ एकटा विशाल आनन्दक लहर जे अपनाकेँ रोकि नेने होइक ई देखबाक लेल जे दरबज्जा देने के आओत अगिला बेरि... चित्रगुप्त : ई सबटा एक साथ छैक ओहि पार, ठीक जेना पृथ्वी पर रचल जाय छइ स्वर्ग सँ ल’ कए नर्क-सबटा ठाम ! जे क्यो नदीक एहि पार छइ तकरा लागै छइ ने जानि सबटा खुशी भरिसक छइ ओहि पार ! नंदी : भरिसक नीक जकाँ देखने नहि हैब ओहि दरबज्जा आ देबार दिसि ! भृंगी : एखनहु देखब त’ ऊपर एकटा कोना मे लटकि रहल अछि बोर्ड—“नो एन्ट्री!” नेताजी : (आश्चर्य होइत) आँय! (सब क्यो घुरि कय दरबज्जा दिस दैखैत छथि) सब क्यो : “नो एंट्री ?” (प्रकाश अथवा स्पॉट-लाइट ओहि बोर्ड पर पड़ैत अछि) नेताजी : ई त’ नञि छल पता ककरहु.. नहि त’... चित्रगुप्त : नहि त? नेताजी : (विमर्ष होइत) नहि त’....पता नहि....नहि त’ की करितहुँ.... वामपंथी : मुदा आब ? आब की हैत ? अभिनेता : आब की करब हम सब ? नेता : आब की हैत ? (चित्रगुप्त किछु नहि बाजैत छथि आ नंदी-भृंगी सेहो चुप रहैत छथि । एक पल केर लेल जेना समय थम्हि गेल होइक।) अनुचर 1 : यमराजेसँ पूछल जाइन ! अनुचर 2 : (घबड़ा कए) के पूछत गय ? अहीं जाउ ने ! (केहुँनी सँ ठेलैत छथि।) अनुचर 1 : नञि-नञि.... हम नञि ? (पछुआ अबैत छथि।) अनुचर 2 : तखन नेताजीए सँ कहियनि जे ओ फरिछा लेथि ! अनुचर द्वय : नेताजी ! (नेताजीकेँ घुरि कए देखैते देरी दुनू जेना इशारा क’ कए कहैत होथि पूछबा दय। नेताजी : (विचित्र शब्द बजैत छथि- कंठ सूखि जाइत छनि) ह..ह...! [नेताजी किछु ने बाजि पबैत छथि आ ने पुछिए सकैत छथि। मात्र यमराजक लग जा कए ठाढ़ भ’ जाइत छथि। यमराज रजिष्टर मे एक बेरि दैखैत छथि, एक बेरि नेताजी दिस] यमराज : बदरी विशाल मिसर ! नेताजी : (जेना कठघरामे ठाढ़ अपन स्वीकारोक्ति दैत होथि) जी ! यमराज : आयु पचपन ! नेताजी : (अस्पष्ट स्वरेँ) साढ़े तिरपन ! नंदी : असली उमरि बताउ ! भृंगी : सर्टिफिकेट-बला नञि ! नेताजी : जी पचपन ! यमराज : जन्म भाद्र मासे, कृष्ण पक्षे, त्रयोदश घटिका, षड्-त्रिशंति पल, पंचदश विपल... जन्म-राशि धनु...लग्न-वृश्चिक, रोहिणी नक्षत्र, गण-मनुष्य, योनि-सर्प, योग-शुक्ल, वर्ग मार्जार, करण- शकुनि! [जेना-जेना यमराज बाजैत चलि जाइत छथि—प्रकाश कम होइत मंचक बामे दिसि मात्र रहैत अछि जाहि आलोक मे यमराज आ मुड़ी झुकौने नेताजी स्पष्ट लखा दैत छथि। बाँकी सभक उपर मद्धिम प्रकाश। नंदी यमराजक दंड केँ धैने हुनकर पाछाँ सीना तानि कए ठाढ़ छथि, भृंगी टूल पर पोथीक विशेष पृष्ठ पर आँगुर रखने रजिष्टरकेँ धैने छथि। चित्रगुप्त लगे मे ठाढ़ छथि, यमराजक स्वर मे धीरे-धीरे जेना प्रतिध्वनि सुनल जाइत छनि-एना लागि रहल हो।] नेताजी : जी ! यमराज : (हुंकार दैत) अहाँ केँ दैखैत छी ‘शश योग’ छैक...(श्लोक पढ़ैत छथि अथवा पाछाँ सँ प्रतिध्वन्त स्वरेँ ‘प्रि रिकॉर्डेड’ उच्चारण सुनल जाइत अछि-) “भूपो वा सचिवो वनाचलरतः सेनापतिः क्रकूरधीःधातोर्वाद-विनोद-वंचनपरो दाता सरोषेक्षणः। तेजस्वी निजमातृभक्तिनिरत: शूरोऽसितांग सुखी जातः सप्ततिमायुरेति शशके जारक्रियाशीलवान् अर्थात—नेता बनब त’ अहाँक भागमे लिखल अछि आ सदिखन सेवक आ अनुचर-अनुयायी सँ घेरल रहब सेहो लिखल अछि.... छोट-मोट अन्याय नहि कैने होइ—से नहि...मुदा बहुत गोटे अहाँक नाम ल’ कए अपराध करै जाइ छल—से बात स्पष्ट। वैह जे कतेको जननेता केँ होइ छनि..कखनहु देखियो कए अनठा दैत छलहुँ। बाजै मे बड़ पटु छी से त’ स्पष्टे अछि.. मुदा ई की देखि रहल छी—नुका चोरा कए विवाहक अतिरिक्तो प्रेम करबा दय.. सत्ये एहन किछु चलि रहल अछि की?” नेता : (स्पष्टत: एहन गोपनीय बात सब सुनि कए अत्यंत लज्जित भ’ जाइत छथि। हुनक दुनू बगल मे ठाढ़ दुनू अनुचर अकास दिसि मूड़ी उठा कए एम्हर-ओम्हर देखै लागै छथि जेना ओसब किछु नहि सुनि रहल छथि) नहि...माने ..तेहन किछु नहि.. चित्रगुप्त : (मुस्की दैत) मुदा कनी-मनी...?.नहि? नेता : हँ, वैह.... बुझू जे... यमराज : सब बुझि गेलहुँ.... चित्रगुप्त : मुदा ओ कहै छथि हुनकर उमर भेलनि पचपन और शश-योग कहै छइ जीवित रहताह सत्तरि सँ बेसी उमरि धरि तखन ? यमराज : तखन बात त’ स्पष्ट जे समय सँ पहिनहि अहाँ कोनो घृण्य राजनैतिक चक्रांतक शिकार बनैत एतय पठाओल गेल छी। (मोटका रजिष्टर केँ बन्न करैत छथि--) नेता : तकर माने ? यमराज : तकर माने ठीक तहिना जेना एहि चारि गोट सैनिक केँ एत’ ऐबाक आवश्यकता नहि छल... ओहो सब अहीं जकाँ .. माने इयैह जे अहाँ मुक्त छी, घुरि सकै छी राजनीतिक जगत मे... एतय कतारमे ठाढ़ रहबाक कोनो दरकारे नहि... नेता : आँय ! (कहैत देरी दुनू अनुचर आनन्दक अतिरिक्त प्रकाश करैत हुनका भरिपाँज पकड़ि लैत छथि। संगहि कनेक देर मे नारेबाजी सेहो शुरू क दैत छथि।) [नेताजीक आगाँ दूटा सैनिक सेहो मंच सँ निष्क्रांत होइत छथि।] यमराज : (नेताजीक संगहि खिसकि जा रहै चाहै छथि से देखि कए, दुनू अनुचर सँ) अहाँ सभ कत’ जा रहल छी ? (दुनूक पैर थम्हि जाइत छनि।) की ? नहि बाजलहुँ किछु ? अनुचर 1 : आ.. जी.. हम सब..नेताजी... जा रहल छथि तैं... यमराज : कोनो तैं-वैं नहि चलत..(घुरि कए) चित्रगुप्त ! चित्रगुप्त : जी ? यमराज : नीक जकाँ उल्टा-पुल्टा कए, देखू त’ रजिष्टर मे हिनका सब दय की लिखल छनि... चित्रगुप्त : जी !....(अनुचर 1 केँ देखा कए) राजनीतिक जगतमे बदरी विशाल बाबू जतेक मार-काट कैने- करौने छथि—से सबटा हिनके दुनूक कृपासँ होइ छलनि.... अनुचर 1 : (आपत्ति जताबैत) नहि... माने... यमराज : (डाँटैत) चोप! कोनो-माने ताने नहि... चित्रगुप्त : (आदेश दैत) सोझे भुनै केर कड़ाही मे ल’ जा कए फेंकल जाय ! (कहैत देरी नंदी आ भृंगी अनुचर 1 आ अनुचर 2 केँ दुनू दिसि सँ ध’ कए बाहर ल’ जाइत छथि—ओम्हर बाँकी मृत सैनिक मे सँ दू गोटे हिनका ल’ कए आगाँ बढ़ैत छथि आ नंदी-भृंगी अपन-अपन स्थान पर घुरि आबैत छथि।) प्रेमी युगल : (दुनू आर धीरज नहि राखि पबैत छथि) आ हम सब ? प्रेमी : हमरा दुनूकेँ की हैत ? प्रेमिका : ई हमरा कतेको कालसँ घुरि चलबा लेल कहैत छलाह... मुदा हमही नहि सुनि रहल छलियनि ! प्रेमी : की एहन नहि भ’ सकैत अछि जे..... बाजारी : (आगाँ बढ़ैत) हे.... हिनका दुनू केँ अवश्य एकबेर जिनगी देबाक मौका देल जाइन... चित्रगुप्त : से कियै ? बाजारी : देखू...एत त’ हम कन्यादान क’ कए विवाह करबा देलियनि... मुदा वस्तुतः त’ ई दुनू गोटे अपन-अपन परिवारक जे क्यो अभिभावक छथि तनिका सभक आशीर्वाद नहि भेटि सकलनि। भद्र व्यक्ति 2 : ...आ तैं दुनू गोटे निश्चित कैने छलाह जे जीयब त’ संगहि आ मरब त’ संगहि.. मुदा आब त’ हम सब विवाह कैये देने छी... बाजारी व्यक्ति : तैं हमरा लगैछ जे दुनू परिवारो आब मानि लेताह... भद्र व्यक्ति 1 : भ’ सकैछ आब पश्चातापो क’ रहल छथि। यमराज : बड़ बेस... चित्रगुप्त : आ जँ एखनहु अक्खड़ दैखौता त’ अहाँ सब हुनका लोकनिकेँ समझा बुझा’ सकबनि कि नहि ? भद्र व्यक्ति 1,2 : अवश्य...अवश्य ! यमराज : बेस... तखन (नंदी-भृंगीकेँ) एहि दुनू बालक-बालिका आ हिनका दुनूक एतहुका अभिभावक लोकनिकेँ रस्ता देखा दियन्हु... [नंदी-भृंगी प्रेमी-प्रेमिका आ ओहि तीनू गोटेकेँ (दुनू भद्र व्यक्ति आ बाजारी वृद्धकेँ) रस्ता देखा कए बाहर ल’ जाइत छथि...पाछू-पाछू ढोल-पिपही बजा कए ‘मार्च’ करैत बाहर ल’ जाइत छथि। तखन रहि जाइत छथि जेसब ताहि सबमे सँ अभिनेता अगुआ आबै छथि।] चित्रगुप्त : (जेना यमराज केँ अभिनेताक परिचय द’ रहल छथि) ई विवेक कुमार भेलाह... (नंदी सँ) पृष्ठ पाँच सौ अड़तीस... अभिनेता : (आश्चर्य-चकित होइत, चित्रगुप्त सँ) अहाँ केँ हमर पृष्ठो मोन अछि...करोड़ो मनुक्खमे....? ई त’ आश्चर्यक गप्प भेल... चित्रगुप्त : एहि मे अचरजक कोन बात? एतेक किछु करैत रहैत छी जे बेरि-बेरि ओहि पृष्ठ पर ‘एन्ट्री’ करै-टा पड़ै अछि...तैं..... नंदी : (जेना घोषणा क’ रहल होथि...) पृ. 538, विवेक कुमार उर्फ.....? अभिनेता : (टोकैत) हे कथी लय दोसर-दोसर नाम सब लै जाइ छी ? बड़ मोसकिल सँ त’ अपन जाति-पाति केँ पाछाँ छोड़ा सकल.... आ तखन एत्तहु आबि कए....? चित्रगुप्त : आगाँ बढ़’! नाम छोड़ि दहक ! नंदी : आगाँ रिकार्ड त’ ई कहै अछि जे ओना ई छलाह त’ बड्ड मामूली व्यक्ति, तखन अपन कुशलता सँ, आओर सौभाग्यो सँ, पहुँचि गेल छथि शिखर पर... पाइ बहुत कमौलनि.. (झुकि कए नीक जकाँ रजिष्टर मे सँ पढ़ैत...) दान-ध्यान सेहो कैने छथि... ततबा नहि जतबा क’ सकैत छलाह अनेक महिला सँ हिनक नाम केँ जोड़ल जाइ छनि...अफवाहि केँ अपने पसिन्न करै छथि... एहि मामलामे बदनामे रहलाह... आ तैं पारिवारिक जीवन सुखद नहि छलनि... निःसंतान छथि, पत्नीकेँ त्यागि देताह ताहिसँ पहिनहि वैह छोड़ि कए चलि गेलीह... वस्तुतः पत्नीक कहब छलनि ई असलमे नपुंसक छलाह... अभिनेता : (नंदी केँ थम्हबैत) की सभक सामने अंट-संट पढ़ि रहल छी पोथासँ ? पत्नी छोड़ि कए चलि गेलीह… नीक कैलीह, एखन सुखी छथि एकटा अधेड़ उमरक नवयुवकक संगे.... मीडिया बला सभसँ पाइ भेटलनि आ कि कहानी बनबै लगलीह... ‘अफसाना’.... जे बिकत बड्ड बेसी। चित्रगुप्त : से ओ सब जाय दहक ...ई कह आर कोन विशेष बात सभ दर्ज छैक.. भृंगी : (ओहो झुकि कए देखि रहल छलाह रजिष्टर मे, आब रहल नहि गेलनि---) हिनक जत्तेक मित्र छनि, शत्रुक संख्या ताहिसँ बहुत गुना बेसी छनि। यमराज : से त’ स्वाभाविके..... भृंगी : हिनक शत्रुपक्ष कहैत अछि ई नुका–चोरा कए कतेको वामपंथी गोष्ठी केँ मदति करैत छलाह.... बहुतो ताहि तरहक संगठन केँ .... वामपंथी : (प्रतिवादक स्वरमे) कथमपि नहि... ई सब फूसि बाजि रहल छी अहाँसब.... भृंगी : बाजि कहाँ रहल छी यौ कामरेड? हम त’ मात्र पढ़ि रहल छी--! वामपंथी : हिनका सन ‘बुर्जोआ’ गोष्ठीक सदस्य कखनहु करत गै मदति कोनो साम्यवादीक ? असंभव ! अभिनेता : कियै? साम्यवाद पर अहींसभक जन्म-सिद्ध अधिकार छै की? आन क्यो ‘साम्य’ क कल्पना नहि क’ सकैत अछि ? वामपंथी : (व्यंग्यात्मक स्वरें) कियैक नहि ? कल्पनाक घोड़ा पर के लगाम लगा सकैत अछि ? करू, जतेक मर्जी कल्पना करै जाऊ ! मुदा हम सब छी वास्तविक जगत् मे वास्तव केँ भोगि रहल छी... अभिनेता : वास्तवमे भोगी छी अहाँ सब, भोगक लालसा मे ‘साम्य’ दय गेलहुँ बिसरि ‘वाद’टा मोन रहल ... वाद-विवाद मे काज मे आबैत अछि....! चित्रगुप्त : वाद-विवाद सँ काज कोन ? कहबाक तात्पर्य ई जे विवेक कुमार जीक विवेक भरिसक बड़ बेसी काज करैत छनि...तैं..... यमराज : (गंभीर मुद्रामे) हुम्-म्-म् ! (नंदी सँ) तखन देखै छी विपक्ष सँ बैसी सपक्षे मे सबटा पढ़ि रहल छी... चित्रगुप्त : तकर अलावे ...ई हिनक अकाल आगमन थिकनि.... स्टंटमैनक बालक छल अस्वस्थ, गेल छल छुट्टी ल’ क’ अपन घर... त’ ई अपनहि स्टंट करै लगलाह... अभिनेता : (बिहुँसैत) कनियें टा चूक भ’ गेलैक कि पहाड़ी पर सँ खसि पड़लहुँ.... यमराज : कनिये-कनिये भूल-चूक मे बदलि जाइत अछि इतिहास आ पुराण...सबटा पुण्य बहा जाइत अछि तनिके पापसँ ! मुदा जे हो (नंदी सँ) हिनका एखनहुँ अनेक दिन जीबाक छनि.. पठा दियौक पृथ्वी पर... वामपंथी : (अगुआ कए) आ हम ? हमर की हैत ? (एक बेरि यमराज तँ एक बेरि चित्रगुप्त दिसि देखैत छथि। मात्र भृंगी ससम्मान अभिनेताकेँ बाहर पहुँचाबै जाइत छथि।) यमराज : अहाँक कथा मे तँ स्वर्ग-नर्क कोनो टा नहि अछि...ने छी हम आ ने चित्रगुप्त... वामपंथी : जी, से त’...(कहै जाइत छलाह ‘अवश्य !’ मुदा ताहि सँ पहिनहि टोकल जाइत छथि।) चित्रगुप्त : सैह जखन बात छैक त’ अहाँ अपने विचार करू अपन भविष्य....(पॉकिट सँ एकटा मुद्राकेँ ‘टॉस’ करबाक भंगिमा मे.....) कहु की कहै छी ‘चित’ की ‘पट’? वामपंथी : हमर विश्वास आ हमर शिक्षा किछु आने तरहक छल, मुदा जे प्रत्यक्ष क’ रहल छी (कहैत देवार.... यमराज... चित्रगुप्त आदि केँ देखाबैत छथि) तकरे अस्वीकार कोना करू ? यमराज : कियैक ? ईहो त’ भ’ सकैछ जे आँखि धोखा द’ रहल अछि...ई सबटा एकटा दुःस्वप्न मात्र थिक... कल्पलोक मात्र थिक...ई, जतय घुसै जायब त’ देखब बोर्ड पर टांगल अछि---‘नो एन्ट्री’! वामपंथी : तखन ? चित्रगुप्त : तखन की ? वामपंथी : तखन हम की करू ? यमराज : (गंभीर मुद्रामे) पहिने ई कहू... विषम के थिक ? मनुक्ख कि प्रकृति ? वामपंथी : दुनू... यमराज : के कम के बेसी ? वामपंथी : प्रकृति मे तैयहु कत्तहु ‘प्राकृतिक न्याय’ (नैचरल जस्टिस) काजक’ रहल अछि, मुदा मनुक्खक स्वभावक आधारे अन्याय पर ठाढ़ अछि... यमराज : की अहाँक राजनीति एहन अन्याय केँ दूर नहि क’ सकैत अछि ? वामपंथी : प्रयास करैत अछि... यमराज : ठीक अछि... तखन हिनको तीनू गोटे केँ नेने जाऊ ! (चोर उचक्का आ पॉकिट-मारक दिसि देखा क’ बाजैत छथि) आ देखू हिनका सब केँ बदलि सकै छी वा नहि ? वामपंथी : बेस.... [कहैत पॉकिट-मार आ उचक्का हुनका लग चलि आबै छथि। चोर कनेक इतस्ततः करैत छथि आ अंत मे पूछि दैत छथि जाय सँ पूर्व…] चोर : तखन एहि सँ आगाँ ? यमराज-चित्रगुप्त-नंदी : (एक्कहि संग) ‘नो एनट्री’... [कहैत देरी तीनू गोटे केँ साथ ल’ कए वामपंथी युवा वाहर जैबाक लेल उद्यत होइत छथि कि तावत् अभिनेता केँ छोड़ि कए भृंगी घुरि कए मंच पर प्रवेश क’ रहल छलाह।] यमराज : मा प्रविश.... चित्रगुप्त : कदाचन! [चारू गोटे एक पलक लेल चौंकैत थम्हैत छथि ....तकर बादे निष्क्रांत होइत छथि। हुनका सभक प्रस्थानक पाछाँ भृंगी आगाँ बढ़ैत छथि यमराजक दिसि।] यमराज : (भृंगी सँ) की समाचार ? भृंगी : चारू धाम हल्ला मचल अछि... यमराज : से की ? भृंगी : इयैह जे स्वर्गक सबटा नियम केँ बदलल जा रहल अछि.... चित्रगुप्त : जेना ? भृंगी : जेना कतेको गोटा केँ पृथ्वी पर घुरबाक मौका लागि गेलनि... नंदी : आ ओमहर धीपल कड़ाही लेने सबटा यमदूत प्रतीक्षा क’ रहल अछि जे कखन पापी-तापी आओत आ कखन ओसब आपन काज क’ सकताह ? भृंगी : मुदा अहाँ दुनू छी जे.... सबटा बिसरि सब केँ माफी द’ रहल छी... नंदी : भरिसक अपन भूमिका बिसरि गेल छी हमसब.... यमराज : एकर बाद मोन राखब...आब त‘ क्यो नहि आओत कि ने? भृंगी : दूर-दूर धरि कत्तहु क्यो नहि... नंदी : सबतरि फक्का....! [क्यो नहि नजरि करैत अछि जे भाषण-मंचक लग मे अपना केँ बचौने ठाढ़ि भिख-मंगनी चुप्पे-चाप सबटा बात सुनि रहल छलीह आ उपभोग क’ रहल छलीह...] चित्रगुप्त : आब हमरा सँ ई नमहर दाढ़ी केँ राखल नहि जाओत.... यमराज : हमरहुँ मुकुटक तर माथ पर पसेना भरल अछि..... (कहैत मुकुट खोलि लैत छथि आ संगहि नंदी आबि कए यमराजक बाहरी पोषाक खोलै लागि जाइत छथि। मुकुट उतारि नकली नमहर केश केँ उतारि, यमराज अंगरक्खा केँ उतारि यमराज स्वाभाविक मनुक्ख जकाँ बनि जाइत छथि....।) [तखनहि भृंगी जा कए चित्रगुप्तक मुरेठा केँ खोलि मेक-अप बला नकली दाढ़ी उपारै लागि जाइत छथि। यमराज आ चित्रगुप्तक देवत्वक एहि तरहक त्यागक दृश्य केँ देखि भिख-मंगनी हँसि दैत छथि। हुनका पर पहिने ककरहु नजरि नहि छलनि... तैं सब क्यो आश्चर्य होइ छथि। स्पॉट लाइट भिख-मंगनी पर पड़ै छनि। हुनका ओना हँसैत देखि यमराज नंदीक हाथ सँ अपन मुकुट आ पोशाक अपन हाथें ल’ लैत छथि... जेना पुनः सजबाक अक्षम्य प्रयास क’ रहल होथि।] चित्रगुप्त : (अपन दाढ़ी आ मुकुट हाथ मे धयने) हँसि कियै रहल छी ? [भिख-मंगनी आर हँसैत छथि... किछु कहि नहि पबैत छथि।] यमराज : अरे ....! ई त’ बड़ वाचाल छथि...! नंदी : ने ओ मूक छथि आ ने वाचाल... भृंगी : (जेना एकांत मे कहि रहल होथि) हमरे बिरादरीक छथि कलाकारे भेलीह ! यमराज : (आँखि मे उत्साह) कोन कला करै छथि ? भिख-मंगनी : अभिनय त’ नहि करै आबै यै..... एखन त’ आबै यै मात्र भिख मांगैक कला... कोना अपन दुर्दशाकेँ सभक सामने उजागर कैल जाय तकरे कला महाराज ! चित्रगुप्त : तखन त’ अभिनय आबिते छनि... यमराज : सैह त’ ! भिख-मंगनी : दुर्भागा त’ छीहे आ दुर्दशा त’ अछिए... कला मात्र ई जे कोना तकरा आँखि-मुँह पर छापि दी जे अहाँ सन-सन दानी किछु देबा लेल बाध्य भ’ जाइ...! ओना ‘अभिनय’ हम नहि क’ सकै छी... यमराज : ई ‘ओना अभिनय’ की भेल ? नंदी : जेना ‘हास्य’! भृंगी : जेना ‘लास्य’! चित्रगुप्त : (पूछैत) जेना ‘प्रेम’? नंदी : उर्फ ‘मुहब्बत’! भृंगी : उर्फ ‘गुदगुदी’...? भिख-मंगनी : (चौंकैत) नहि बाबा ! ई हमरा सँ नहि हैत...(लास्यक इंगित करैत) ई देखबाक हो त’ ओम्हर देखू....! [कहैत जेना गाड़ीक ‘हेड लाइट’ नुका नुका कए प्रेम करै बला सब पर पड़ैत अछि, तहिना प्रकाश जा पड़ल रमणी-मोहन आ अंत मे आयल उच्च वंशीय महिला पर, जे दुनू एक दोसराक हाथ मे हाथ देने हँसि-हँसि कए बातचीत क’ रहल छलाह। एतबा काल सँ जे एत’ यमराजक दरबार चलि रहल छलनि, जेना ताहि सँ अवगते नहि होथि। आँखि पर प्रकाश पड़ितहि आँखि चोन्हिया जाइत छनि... बड़ असंतुष्ट होइत छथि.. हड़बड़ा कए ओहि महिलाक हाथ छोड़ि दैत छथि] रमणी-मोहन : (प्रतिवादक स्वरमे) ... हे के सब छी ओतय ? कियै तंग करै जाइ छी? देखि नहि रहल छी की क’ रहल छी ? भिख-मंगनी : (जेना बहुत दिनक परिचित होथि तेहने स्वर मे... लग जा कए) की क’ रहल छी ? रमणी-मोहन : (घबड़ा कए) क्-की करब ? ई इयैह.... यमराज : (पास मे जाय नीक जकाँ उच्च वंशीय महिला केँ देखैत ...) ई के थिकीह ? रमणी-मोहन : ई न्-न्-निभा थिकीह ! यमराज : निभा के ? (आब रमणी-मोहन दिस देखैत... एतबा काल महिले दिसि देखि रहल छलाह।) [रमणी-मोहन तोतराबैत छथि... बूझि नहि पबैत छथि जे की उत्तर देबाक चाही। यमराज आ चित्रगुप्त—दुनू केँ आधा मेक-अप उतारल अवस्थामे देखि एक बेरि हँसि कए परिवेश केँ हल्लुक बनैबाक प्रयास करैत छथि त’ एक बेरि गंभीर भ’ कए किछु बजबाक प्रयास करैत छथि। एतबा देर धरि महिलाक कोनो विकार नहि...कखनहुँ अपन नहक ‘पॉलिश’ दिसि देखै छथि त’ कखनहुँ साड़ी केँ ठीक-ठाक करै मे लागै छथि त’ कखनहुँ हाथ सँ अपन केश विन्यास केँ सोझराबै मे जुटि जाइत छथि।] यमराज : बेस...बेस ! त’ अहाँ के छी ? भिख-मंगनी : ई छथि ‘रमणी......मोहन’ ! यमराज : एतय की क’ रहल छी ? रमणी-मोहन : जी, एतय ...(एक बेरि दरबज्जा दिसि देखबैत छथि एक बेरि एत्तेक जे भीड़ छल जेना तकरहि खोज करैत)...कतार मे सब सँ आगाँ ठाढ़ छलियै जे कखन ई दरबज्जा खुजत आ.... नंदी : कतार ? चित्रगुप्त : कतय गेल कतार ? भृंगी : सब क्यो भीतर चलि गेला की ? नंदी : हिनका टपकि कए ? रमणी-मोहन : आँय?(आश्चर्य होइत छथि) भिख-मंगनी : से कोना भ’ सकैछ? ई त’ सब सँ आगाँ छलाह... वी.आई.पी. क्यू मे...? नहि ? रमणी-मोहन : हँ... माने... पता नहि बाँकी सब गोटे कोना...? नंदी : (व्यंग्य करैत) हिनका पूछि लियन्हु ने...जँ ई किछु बता सकती... भृंगी : ओ नहि बाजै छथि...(बौक हैबाक संकेत करैत छथि।) रमणी-मोहन : नहि-नहि, अहाँ जे सोचि रहल छी. से नहि... नंदी : कोना बुझलहुँ जे ई की सोचि रहल छलाह...? भिख-मंगनी : नहि... ई बाजै छथि, मुदा हमरा-अहाँ जकाँ सब बात पर नहि। तखनहि बाजै छथि जखन बतिया कए हिनका किछु लाभ भ’ सकै छनि...! रमणी-मोहन : नहि-नहि, ओ अवश्य बाजै छथि...हमरा सँ त’ कतेक रास बात.... यमराज : जेना? रमणी-मोहन : जेना...!आब हम कोना कहू जे....? जेना ओ कहै छलीह... आ हम कहै छलियनि... यमराज : (महिलासँ) की ऐ ? निभाजी ? (महिला आँखि उठा कए यमराज केँ एक बेरि देखि कए नजरि केँ आन दिसि घुरा लैत छथि।) ई त’ किछु नहि कहैत छथि। (रमणी-मोहन सँ कहैत छथि।) भिख-मंगनी : (हँसि कए) ई अहाँ सँ बात करती थोड़े ? हँ, जँ ई पता चलनि जे अहीं लग अछि एहि विशाल दरबज्जाक चाभी... जँ जानि जैती जे स्वर्गक अप्सरा बनबाक लेल अहीं एकमात्र मदति क’ सकैत छियनि तखनहि बजती ओ ! चित्रगुप्त : आ नहि त’... भिख-मंगनी : (हँसि दैत छथि) नहि त’.... ई रमणीक हृदयक द्वार थिक बाबू....! सहजें एत्त’ प्रवेश नहि भेटत....हा-हा-हा ‘नो एंट्री’ एत्तहु... नंदी : मुदा ई बूढ़ौ त’.... (रमणी-मोहन केँ देखबैत छथि। रमणी-मोहन केँ उकरू लागि रहल छनि जे लोग हुनकर उमरि दय बात क’ रहल अछि।) भृंगी : हँ मुँह त’ देखू... माथ पर त’ मात्र दुइ चारि टा केश छनि.. (रमणी-मोहन पॉकिटसँ कंघी बहार क’ कए केश-विन्यास कर’ लागैत छथि) टकला नहितन... यमराज : (विरक्त भए) आः थम्ह’ तोँ सभ ! भिख-मंगनी : हँ.. थम्हू ! ई कोनो जेहन-तेहन व्यकति नहि छथि... रमणी-मोहन छथि, जानै छथि रमणीक हृदयक बंद द्वार कोना खुजल जाइत अछि... ईहो कलाकारिये होइ छइ.... चित्रगुप्त : हँ-हँ.. अवश्य...(थम्हैत) महाराज ! (इशारा करैत) अहाँ कने प्रयास करितहुँ त’...भ’ सकैछ... [यमराज अस्फुट स्वरेँ किछु कहैत छथि आ गला खखारैत छथि। चित्रगुप्त बुझि जाइत छथि जे यमराज ‘पंचशर’ द्वारा आक्रान्त भ’ गेल छथि—मुदा चित्रगुप्त वस्तुतः सब केँ खदेड़ि दैत छथि महिलाक पास सँ] हे ...जाय जाउ त...! एत्त की देखि रहल छी, तमाशा ? ( कहैत जेना आंगन बोहारल जाइत अछि ताहि तरहेँ एक्कहि झटकामे नंदी- भृंगी-रमणीमोहन-भिख-मंगनी—सबकेँ ल’ कए भाषण-मंच दिसि, मंचक एक कातमे ल’ जाइत छथि। बीच मंच पर रहि जाइत छथि ओ सुसज्जित सुन्दरी उच्चवंशीय महिला आ यमराज। संकोचसँ आ डरैत यमराज एक बेरि पाछाँ घुरि कए चित्रगुप्तक दिसि देखैतो छथि। एक दोसराकेँ उत्तेजना-वश धरैत सब क्यो एकहि संग उत्सुकताक संग कतारमे ठाढ़ जेना झुकि कए देखबाक आ सुनबाक प्रयास क’ रहल छलाह जे ने जानि आब की होइत अछि...। यमराज केँ एक-दू बेरि पाछू घुरि कए देखैत देखि चित्रगुप्त इशारा क’ कए हुनका उत्साह प्रदान करैत छथि।] यमराज : (मधुर स्वरमे) निभा...! सुनू ने, निभा... [महिला मुँह उठा कए यमराज दिसि दैखै छथि। आँखिमे जिज्ञासा...] चित्रगुप्त : (दबले स्वरमे, जेना ‘प्रॉम्प्ट’ क’ रहल होथि) चाभी.. चाभी देखाउ !(यमराज घुरि कए देखै छथि, जेना सुनबाक प्रयास क’ रहल होथि चित्रगुप्तक बातकेँ) दरबज्जा... दरबज्जा ! (स्वर्ग दिसि देखबैत छथि।) यमराज : (जेना बुझि गेल होथि की कहल जा रहल छनि...आब महिला दिसि घुरैत) देखि रहल छी ? (महिला घुरि कए दरबज्जा दिसि दैखैत छथि आ तकर बाद यमराज दिसि घुरि कए जेना आँखिए सँ पूछि रहल होथि—“हँ देखि त’ रहल छी... तखन कहै की चाहै छी ?”) अहाँ जाय चाहै छी ओहि पार ? (महिला सदर्थक भंगिमामे मूड़ी डोलबैत छथि) एक्कहि उपाय अछि जाहिसँ जा सकै छी ओहि पार... (महिला अविश्वासक भंगिमा करैत हँसि दैत छथि...) चित्रगुप्त : (आब धीरज नहि राखि सकैत छथि) कियै ? विश्वास नहि होइये ? नंदी : इयैह त’ छथि ‘यमराज’। भृंगी : आ इयैह त’ ठीक करै छथि जे---- नंदी : के नर्क मे जाओत... भृंगी : आ के स्वर्गमे! महिला : (रमणी-मोहनसँ) सत्ये ? (रमणी-मोहन माथ डोला कए ‘हँ’ कहैत छथि, रमणी मोहने सँ पूछैत छथि---) मुदा ओहि दरबज्जा पर त’ लिखल अछि ‘प्रवेश निषेध’ भिख-मंगनी : मात्र हुनकहि लग छनि चाभी... चित्रगुप्त : जाहिसँ खुलि सकैत अछि सबटा ताला... भिख-मंगनी : (यमराजसँ) ओ चाभी त’ देखाउ ! (यमराज मात्र हँसैत छथि) देखाउ ने ! (यमराज पोशाकक भीतरसँ एकटा बड़की टा चाभी बहार करैत छथि।) इयैह लियह ! (कहैत भिख-मंगनी यमराजक हाथसँ प्रायः झपटि कए चाभी ल’ कए महिला केँ दैत छथि।) महिला : (चाभी हाथमे भेटैते देरी जेना त्रिलोकक सबटा साम्राज्य भेटि गेल होनि एहन भाव भंगिमा देखबैत छथि। रमणी मोहनकेँ इशारा करैत छथि आ एहन दृष्टिएँ बाँकी सब गोटे दिसि देखैत छथि जेना हुनका सबसँ हिनका कोनो परिचये नहि छनि।) चलू ..आब देखै की छी, आब हमरा सब केँ क्यो नहि रोकैबाला... (कहैत रमणी-मोहनक हाथ धैने दरबज्जा दिसि तेजी सँ बढ़ैत पहुँचैत छथि। चाभी रमणी-मोहनक हाथ मे द’ कए कहैत छथि) हे लियह... अहीं खोलू.... क’ दिय सबटा प्रतीक्षा केर अवसान ! [रमणी-मोहन चाभी त’ लैत छथि, मुदा शंकित दृष्टिएँ एक बेरि यमराज आ चित्रगुप्त दिसि देखैत छथि त’ एक बेरि ओहि महिला दिसि, आ कि पुनः नंदी-भृंगी दिसि देखै छथि।] भिख-मंगनी : (जेना रमणी-मोहनक पौरूष केँ ललकार द’ रहल होथि) आबहु देखि की रहल छी... जोर लगाऊ ने.... (रमणी-मोहन लजा कए आ हड़बड़ा कए चाभी सँ दरबज्जा खोलबाक प्रयास करैत छथि मुदा कोनो लाभ नहि होइत छनि।) महिला : की भेल ? (उद्विघ्न भए) ठीक सँ कोशिश करू ने ! (रमणी-मोहन पुनः प्रयास करैत छथि।) भिख-मंगनी : (जोर-जोरसँ हँसैत) बस ! एतबे ताकति छल बाँकी ? एकटा चाभी सँ सामान्य दरबज्जा धरि नहि खोल’ आबै ये ? (हँसैत) छठी केर दूध नहि पीने छी की ? हा- हा- हा! नंदी : (हँसैत) ई रमणी मोहन पुरूष थिकाह की रमणी ? [नंदी आ भृंगी सेहो रमणी-मोहनक दुर्दशा देखि हँसीक ‘कोरस’ मे योगदान करै छथि। महिला हड़बड़ा कए रमणी-मोहन सँ चाभी हाथ मे लै छथि।] महिला : (रमणी-मोहनसँ) हँटू हमरे खोलै दियह ! चित्रगुप्त : थम्हू ! व्यर्थ प्रयास जूनि करू ! ई खोलब अहाँक बुते नहि हैत। महिला : (असंतोष आ क्षोभ स्वरमे) कियै नहि हैत ? चित्रगुप्त : कारण ई कोनो साधारण दरबज्जा नहि थिक... ई मोनक दरबज्जा थिक... मात्र चाभीटा सँ ई नहि खोलल जै सकैछ। महिला : (क्रोधक स्वरमे यमराजसँ) तखन की हमरा ठगबाक लेल चाभी देलहुँ ? नंदी : एकरा खोलबाक मंतर मनुक्खक मोनक भीतरे होइ छैक। महिला : (खिसिया कए) ककर मोनक भीतर ? अहाँ सब सन पाजी बदमाशक मोनक भीतर कि हमरा सन पढ़ल-लिखल उच्चवर्गक लोगक मोनक भीतर ? भृंगी : टेबि कए त’ देखू ‘मोन’ अहाँक भीतर मे एखनहुँ अछि कि रास्ता चलैत ककरहु द’ देने छी ? [एहि बात पर नंदी आ भिख-मंगनी हँसि दैत छथि।] भिख-मंगनी : ककरहु भीखमे द’ देने हेतीह.... महिला : हम नै तोरा जकाँ भीख मांगै छी आने भीख दैते छी ! रमणी-मोहन : (अगुआ कए महिला केँ शांत करैत) छोड़ू निभा ! की अहाँ छुच्छे एकरा सब सन लोगक संग मुँह लागै छी....! नंदी : (रमणी-मोहनक नकल करैत जेना भिख-मंगनीएकेँ निभा मानि कए बाजा रहल होथि) छिः निभा ! की अहुँ अहिना मोनक भीख लेबा-देबा दय बाजि रहल छी ? भिख-मंगनी : (ढ़ोंग करैत) से कियै ? नंदी : नहि बुझलहुँ ? (भिख-मंगनी मूड़ी डोला कए इशारासँ ‘नहि’ कहैत छथि) देखू हम छी उच्चवर्गक...(आब भृंगी केँ देखा कए) आ ई थीक निम्न-वर्गक,नीच लोग ! (कहिते देरी भृंगी पीठ झुका कए एना चलै फिरै लागैत छथि जेना संपूर्ण शरीर नीचाँ भ’ गेल होइन।) भिख-मंगनी : (नवका कथानक केँ उत्साहित करैत) बेल.... आ तकर बाद ? नंदी : तकर बाद की ? मोन तँ हमरे लग अछि कि नहि ? भिख-मंगनी : ठीक-ठीक ! नंदी : आ मोन हमर झोरामे एकटा रहत थोड़बे ? रास्ता चलैत कतेको रमणी-मोहन हमरा जुटिते अछि...सभक मोन हमर एहि झोरामे रखने हम घुरैत रहैत छी। (कहि कए नंदी महिलाक चलबाक नकल करैत—जेना कंधा पर एकटा बैग सेहो छनि—ताहि तरहेँ चलैत छथि कैक डेग।) भृंगी : (चालि पर थपड़ी पाड़ैत) वाह-वाह ! वाह-वाह ! भिख-मंगनी : जखन झोरामे एत्तेक रास मोन अछि त’ द’ कियै नहि दै छी दू चारि टा दाने मे ? भृंगी : (हँसैत) हे तोरा त’ दाने- ध्यानक सूझत’ ! नंदी : हम छी उच्चवर्गक ! (गर्वसँ चलैत छथि) हम मोन बेचि सकै छी मुदा दान करब ? किन्नहुँ नहि...नैव-नैव च ! महिला : (सभक तिर्यक वाक्य आ मसखरी सँ अप्रसन्न भए) चलू त’ हमरा संग... (रमणी मोहनसँ) एक बेरि आर ‘मोन’ सँ कोशिश करै छी ! [दुनू गोटे दरबज्जाक पास जा कए मनः संयोगि क’ कए हाथ जोड़ि तत्पश्चात चाभी सँ दरबज्जा खोलबाक प्रयास करैत छथि। यमराज केँ छोड़ि सब गोटे जेना एकटा अदृश्य देबार बना कए ठाढ़ भेने सब किछु देखि रहल छथि।] रमणी-मोहन : (परेशान भ’ कए... अलीबाबाक कथा मोन पड़ैत छनि) खुलि जो सिम-सिम ! (दरबज्जा टस सँ मस नहि होइछ। दुनू गोटे हताश भ’ जाइत छथि।) [हिनकर दुनूक हालति देखि कए नंदी,भृंगी आ भिख-मंगनी गीत गाबै लागैत छथि।] नंदी : “गली-गली मे गीत गबै छें, झोरामे की छौ तोहर बिकाय ?” भृंगी : “झोरा मे हम्मर सुग्गा- मैना, सती मांजरी, दच्छिन राय !” भिख-मंगनी : “की हौ सुग्गा कियै गेलें तों, हम्मर गाम छोड़ि ओहि अंगिना ?” नंदी : “माथमे प्रेमक भूत नचै छल, कहै करेज—मैना,मैना !” भृंगी : (आगाँ बढ़ैत रमणी-मोहनक लग मे आबि) “की हे मैना, कियै कटौले, पंख अपन तों मीतक नाम ?” भिख-मंगनी : (उत्साहित भए महिलाक चारु दिसि घुरि-घुरि कए नाचैत आ गाबैत छथि---) “की कहियहु हे, डूब देलहुँ अछि, बिनु किछु सोचनहि दच्छिन-बाम !” नंदी : (ओहो वृत्ताकार नृत्यमे योगदान करैत) “की हौ सुग्गा कत’ छौ चाभी, कोना तों जैबें स्वर्ग-धाम ?” भृंगी : “दरबज्जा पर मोन केर ताला, घुसब मना छैक हिनकर नाम।” भिख-मंगनी : ‘नो एंट्री’ छै ‘नो एंट्री’ भाइ, लागै ने अछि ई छइ चैना।’ नंदी : “छइ बसंत, छइ प्रेम अनंत, तैं कहै करेज मैना,मैना।” कोरस : ‘नो एंट्री’ छै ‘नो एंट्री’ भाइ, कहै निभा रमणा- रमणा।’ नंदी : “सबतरि प्रेमक भूत नचै छइ, कहै करेज हँ-ना, हँ-ना।” चित्रगुप्त : (अकस्मात् चीत्कार करैत) सा-व-धा-न! (सब क्यो सावधान सब क्यो सावधान भ’ जाइत छथि) वि-श्रा-म! (सब क्यो विश्रांति बला भंगिमामे ठाढ़ भ’ जाइत अछि। सब गोटे निर्वाक आ निर्जीव भ’ जाइत छथि।) कोरस : (दूरसँ जेना एहन स्वर भासल आबि रहल अछि) “नो एंट्री’ छइ, ‘नो एंट्री’ भाइ, मोन नञि लागै, ने चैना !” “नो एंट्री’ छइ ‘नो एंट्री’ छइ दरबज्जा पर कर धरना !” [धीरे-धीरे मंच अन्हार भ’ जाइत अछि।] *** राधाकृष्ण चौधरी मिथिलाक इतिहास अध्याय–१ मिथिलाक इतिहास भूमिका वैदिक युगक भूमिका:- प्राचीन वैदिक साहित्‍यमे अंग मगध आ मिथिलाक कोनो स्‍पष्‍ट उल्‍लेख नहि भेटइत अछि। ऋग्‍वेद संहितामे उपरोक्‍त तीनू खण्‍डमे सँ कोनो खण्‍डक नाम उल्लिखित नहि अछि। ऋग्‍वेदक तेसर अष्‍टकक ५३म सूक्तक चौदहम ऋचामे ‘कीकट’क उल्‍लेख अछि आ ओहिठामक राजा ‘प्रमगन्‍द’क सम्बन्‍धमे बहुत रास निन्‍दनीय बात सेहो। यास्कक अनुसार ‘कीकट’ देशमे अनार्य लोकनिक निवास छल। सायणाचार्य एहि मतसँ सहमत होइतहुँ आगाँ कहैत छथि जे ‘कीकट’क निवासी नास्तिक छलाह आ योग, दान, होम इत्‍यादिपर हुनका लोकनिकेँ एक्को रत्ती विश्‍वास नहि छलन्हि। ओ लोकनि इहलोकिक छलाह आ परलोकमे हुनका लोकनिकेँ कोनो प्रकारक विश्‍वास नहि छलन्हि। ओ लोकनि भौतिकवादी छलाह। वायुपुराणक गया माहात्म्य मे कहल गेल अछि— “कीकटेषु गया पुण्‍या नदी पुण्‍या पुन: पुन:, च्‍यवनस्‍या श्रमं पुण्‍यं पुण्‍यं राजगृहं वनम्”। एहिसँ स्पष्ट अछि जे ‘कीकट’ दक्षिण विहारमे छल आ ओहिठामक निवासी भौतिकवादी दर्शनमे विश्‍वास रखैत छलाह। ‘कीकट’क सम्बन्धमे वैदिक विद्वान लोकनिक मध्‍य मतभेद अखनो बनल अछि आ आहि विवादमे पड़ब हमरा लोकनिक हेतु एतए आवश्‍यक नहि बुझना जाइछ। एहन मानल जाइत अछि जे संहिता कालमे आर्य-सभ्‍यताक प्रधान केन्‍द्र सरस्‍वती आ हृषद्वती नदीक मध्‍यमे छल आ ओहि स्‍थानकेँ मनु ब्रह्मावर्त्त कहने छथि। ब्राह्मण कालमे आहि संस्‍कृतिक केन्‍द्र छल कुरू–पाँचाल जकरा मनु ब्रह्मर्षि देश कहने छथि। शतपथ ब्राह्मणमे कुरू पाँचाल देशक विशेष प्रशंसा भेल, अछि आ ऐतरेय ब्राह्मणमे आर्य देशक हेतु अस्‍याँ श्रुवायां प्रतिष्‍ठायां विशेषणक प्रयोग भेल अछि। सदानीरा नदी (गण्‍डक) पार ककए जखन आर्य लोकनि मिथिलाक क्षेत्रमे उतरलाह तखन अत्‍यंत द्रूतगतिसँ आर्य संस्‍कृतिक प्रसार अहि क्षेत्रमे भेल आ मिथिला विदेह समस्‍त पूर्वी भारतमे आर्य सभ्‍यताक प्रसार-प्रचारक एकटा प्रधान केन्‍द्र बनि गेल। कोनो संहितामे स्‍पष्‍ट रूपे विदेहक उल्‍लेख नहि भेटइत अछि। तैत्तिरीय आ काठक संहितामे “वैदेह्य”, “वैदेही” एवँ “वैदेह” शब्दक प्रयोग भैटेत अछि परञ्च आहि सभहिक व्‍यवहार गाय आ बरदक हेतु भेल अछि। ऐतरेय ब्राह्मणमे जाहिठाम आर्य देशक चर्चा भेलो अछि ताहुठाम “विदेह’’ शब्दक पृथक उल्लेख नहि भेटइत अछि। काशी, कोशल, मगध, अंग, आदि शब्‍द संग ‘विदेहो’केँ प्राच्य देशमे साटि देल गेल अछि। ‘विदेहक’ पृथक उल्लेख स्‍पष्‍ट रूपें शतपथ ब्राह्मणमे भेटइत अछि। ओहिठाम इ कहल गेल अछि जे विदेघ माथव अपन पुरोहित गौतम राहूगणक संग वैश्‍वानर अग्निक अनुशरण करैत-करैत सरस्‍वती नदीक तीरसँ सदानीराक तीर धरि पहुँचलाह। एहिसँ पूर्व आर्य लोकनि सदानीराक पारकए पूब दिसि नहि गेल छलाह तै तँ इ एक महत्‍वपूर्ण घटना मानल जाइत अछि। वैश्‍वानर विदेघ माथवकेँ सदानीरा टपबाक आदेश देलथिन्‍ह। विदेघ अपन पुरोहितक संग ओकरा पार केलन्हि आ तखनेसँ ओ देश ‘विदेह’ कहबे लागल। सदानीरा विदेह आ कोशलक बीचक सीमा रेखा बनल। ताहि दिनसँ विदेह आर्य सभ्‍यताक प्रधान केन्‍द्र बनि गेल। शतपथ बाह्मणक शेष अध्यायमे जनकक दरबारक कथा सुरक्षित अछि। मिथिलाक राजा जनक अपना ओहिठाम देशक विभिन्‍न भागसँ ब्रह्मज्ञानी लोकनिकेँ आमंत्रित कऽ कए बजबैत छलाह, आ हुनक दरबारमे तँ कुरू पाँचालसँ बरोबरि ऋषि-मुनि लोकनि आबिते रहैत छलाह। ऋषि याज्ञवल्क्य विदेहमे रहैत छलाह आ ताहु हेतु मिथिलाक प्रसिि‍द्ध समस्‍त आर्यावर्तमे छल। जनक याज्ञवल्क्य तँ बुझु जेना आर्य संस्‍कृतिक द्योतक बुझल जाइत छलाह आ ब्रह्मज्ञानक क्षेत्रमे हिनका लोकनिक कोनो ककरोसँ तुलना ताहि दिनमे नहि छल। कुरु पाँचालक ऋषिगणक कुटियामे शिक्षित रहितहुँ याज्ञवल्क्य जखन जनकक ओहिठाम शास्‍त्रार्थमे पहुँचलाह तखन ओ ओहिठाम उपस्थित कुरू पाँचालक ऋषिगणकेँ शास्त्रार्थमे पराजित केलन्हि आ अपन विद्वताक प्रकाश सेहो। हुनक वचन मात्र अध्‍यात्‍म विधेटामे नञ अपितु वैदिक क्रियाकलापमे सेहो सर्वथा प्रामाणिक मानल जाइत छल। परम्परामे हिनका शुक्‍ल यजुर्वेदक प्रवर्तक मानल गेल अछि। शतपथ ब्राह्मण एवँ बृहदारण्यकोपनिषदक अनेकानेक स्‍थल पर जनक–याज्ञवल्क्यक ब्रह्मज्ञानक विवेचनाक वर्णन अछि आ ठाम-ठाम विभिन्‍न ऋषि लोकनिक शास्‍त्रार्थक सेहो। ब्रह्मज्ञानक हेतु तैतिरीय ब्राह्मणमे सेहो राजा जनकक प्रशंसा कैल गेल अछि। जनक ब्रह्मज्ञानक हेतु केहेन प्रसिद्ध रहल हेताह तकर एकटा सामान्‍य संकेत हमरा लोकनिकेँ कौशीतकी उपनिषदक एक कथामे भेटइत अछि जाहिमे कहल गेल अछि कि गर्गवंशक ‘बालाकि’ नामक एक ब्रह्मज्ञानी काशीराज अजातशुत्रक ओतए ब्रह्मज्ञानक निरूपणकेँ जखन पहुँचलाह तँ राजा हुनकासँ प्रसन्‍न भए एक हजार गाय देलथिन्‍ह आ कहलथिन्‍ह जे देखु तइयो लोक सब “जनक-जनक’’ चिकैरि रहल अछि। वैदिक युगमे ब्रह्मज्ञानक चरम उत्‍कर्ष विदेहमे भेल छल। ब्रह्मज्ञान आर्य संस्‍कृतिक चरम उत्‍कर्ष बुझल जाइत छल–वैदिक मंत्रक उत्‍थान ब्रह्मावर्तमे, क्रिया कलापक विकास ब्रह्मर्षि देशमे एवँ “ब्रह्मविद्या”क विवेचन विदेहमे भेल। एहि हेतु ताहि दिनसँ समस्‍त आर्यावर्तक लोककेँ विदेह आवए पड़इत छलन्हि। विदेह पूर्वी भारतमे वैदिक कालमे आर्य सभ्‍यताक प्रधान केन्‍द्र छल। एहिठाम क्षत्रिय सेहो वेदवत्ता होइत छलाह। संस्‍कृत साहित्‍य मध्य मिथिला, विदेह एवँ तीरभुक्तिक वर्णनः बालकाण्‍ड (बाल्‍मीकि)मे मिथिलाक वर्णन एवँ प्रकारे अछि- रामायण (बालकाण्‍ड, सर्ग४८)- “रामोऽपि परमांपूजाँ गौतमस्‍य महामन:” सकाशाद् विधिवत् प्राप्य जगाम मिथिलाँतत”:’’॥ अनर्घ राघवमे (अंक २) “श्रृणोषि विदेहेषु मिथिलां नाम नगरीम्” जयदेव-प्रसन्‍नराघव-(अंक २) “तदिह मिथिलायां पंचरात्र निवासेन श्रमोपऽनेतव्‍य। प्रसंगादयं च राजा जनको द्रष्टव्यः।” रघुवंश-(सर्ग–११) “संन्‍यमन्‍वयन सम्भृतक्रतु हेतु मैथिलः स मिथिलां व्रजन् वशी”। नैषधीयचरित-(सर्ग–१२) “अपीयमेनं मिथिला पुरन्दरं निपीय दृष्टि: शिथिला स्तुते वरम्।” ‘रामायण चम्‍पू’’ (बालकाण्‍ड) “अथ मिथिलां प्रतिप्रस्थित: कौशिकस्‍तमित्थम कथयत्” दशकुमारचरित (उत्तरपीठिका–३ उच्छ्वास) “एषोब्रऽह्मस्मि पर्य्यटने कदा गतो विदेहेषु मिथिलाम प्रविश्यैव” कथासरितसागर (जम्बक ३, तरंग–५) “ददो वैदेह देशे च राज्यं गोपालकार्यसः। सत्कार हेतोर्नृपतिः श्वशुर्यायानुगच्छतेः॥ भृंगदूत (गंगानंद झा)-१७म शताब्दी– “गंगातीरावधिरधि गता यद् भुवोभृंगभुक्ति नीम्नासैव त्रिभुवनतले विश्रुता तीरभुक्तिः॥ भृंगदूतमे दरभंगाक वर्णन एवँ प्रकारे अछि– नस्यापाथः परमाविमणं सन्निपियाभिरामा– गारांकामायुध दरभंगा राजधानीमुपेयाः॥ रघुवीर कवि– “लक्ष्मीश्वरोपायना”मे– “देशाः संतु सहस्त्रोऽपि ममतु स्वाभाविक प्रीतये, श्रेयान् देश विशेष एषं मिथिलानामा क्षमामंडले”। बदरी नाथ झा- ‘गुणेश्वर चरित चम्पू’’ “अस्तिस्वस्ति समस्त भूमिबल श्रेय प्रशस्ति‍ि‍श्रुता प्रत्यर्थिस्मयमन्थनाप्त मिथिला नामाऽभिरामाकृति:। प्रेक्षाशालिविपश्चिदालिललितोत्संगाऽभिषंगार्दिनी, नीवृद्-वृन्दम चर्चिकाऽर्चिततरश्रीस्तीरभुक्तिः सदा”। गंगा गण्डकी संगमसँ पश्चिम सुप्रसिद्ध सोनपुर टीसनक समीप जे हरिहर क्षेत्र अछि तकरो उल्लेख भृंगदूतमे भेटइत अछि। एहि भृंगदूतमे गाण्डवीश्वर स्थान, ब्रह्मपुर, वाग्वती (वाग्मती) एवँ कमला नदीक उल्लेख सेहो भेटइत अछि। कहबी छैक जे गाण्डवीश्वर महादेव राजा जनकक दक्षिणक द्वारपाल रहथिन्ह आ ओ स्थान सम्प्रति जोगिआरा टीसनक समीप अछि। ओना मिथिला नामसँ प्राचीन जनक राजक राजधानीक बोध होइछ परञ्च एतए स्मरण राखबि आवश्यक जे मिथिला, तीरभुक्ति, विदेह, आदि शब्द एक एहन भौगोलिक इकाईक द्योतक थिक जे गंगाक उत्तरमे छल आ विभिन्न छोट-छोट गणराज्यमे बटल छल। प्राचीन कालक बिहारमे गंगाक दक्षिणमे छल अंग आ मगध आ उत्तरमे छल मिथिला जकरा अंतर्गत कैकटा छोट–छीन राज्य सब छल। जातक कथा आ जैन साहित्यक अतिरिक्त वृहद विष्णुपुराणक मिथिला महात्‍म्‍यमे मिथिलाक जे वर्णन अछि ताहिसँ एकर महत्व एवँ जनप्रियताक पता लगइयै। एहि मिथिलाक अंतर्गत छल तँ प्राचीन कालक वैशाली जकर विस्तृत विवरण रामायण, रामायण चम्पू एवँ भृंगदूतमे भेटइत अछि। प्राचीन ‘विशाला’ नगरिये बौद्ध कालक वैशाली थिक। विशालाक नामक बोध अद्यतन “बिसारा” परगनासँ होइत अछि। एहि क्षेत्रमे एकटा भैरव स्थान सेहो छल जकर चर्च भृंगदूतमे भेल अछि। बाल्मिकीय रामायणक बालकाण्डमे गौतमाश्रम अहल्यास्थानक उल्लेख भेल अछि। अहियारी गाँव (कमतौल टीसन)सँ अधुना एकर बोध होइछ। भृंगदूतमे “सरिसव” ग्राम आ कोटिश्वर महादेवक उल्लेख सेहो भेटइत अछि। iii. नाम एवं मिथिलाक भौगोलिक सीमा:- शतपथ ब्राह्मणक अनुसार नदीक बहुलताक कारणे मिथिलाक भूमि दलदल जकाँ छल। कहल जाएछ जे अग्निदेवक आज्ञासँ माथव विदेघ आ गोतम राहुगण सदानीरा (गण्डकी)क पूबमे जाकऽ बसलाह आ उएह क्षेत्र इतिहासमे मिथिला, विदेह, तीरभुक्ति एवँ तिरहुतक नामसँ प्रसिद्ध भेल। दलदल भूमिकेँ अग्निदेव सुखाकेँ कठोर बनौलन्हि आ जंगलकेँ जराकेँ एहि पूर्वी भूमिकेँ रहबा योग्य स्थान सेहो। आर्य ऋषि लोकनि ओहिठाम अगणित यज्ञक आयोजन केलन्हि आ असंख्य यज्ञ आ होम होयबाक कारणे ओहिठामक भूमि रहबा योग्य बनि सकल। नदीक बाहुल्यक कारणे संभव जे एहि क्षेत्रकेँ तीरभुक्ति कहल गेल छल। प्राचीन कालमे तीरभुक्ति समस्त उत्तरी बिहारक द्योतक छल आ एकर सीमा पश्चिममे श्रावस्तीभुक्ति आ पूबमे पुण्ड्रवर्धनभुक्तिसँ मिलैत–जुलैत छल आ एकर एहि विशालताक परिचय हमरा आयनी–अकबरीमे वर्णित तिरहुत सरकारक महालक नाम सभसँ सेहो भेटइत अछि। परंपरागत साधनमे मिथिलाक जे विवरण उपलब्ध अछि तकर सिंहावलोकन करब अपेक्षित। ओहि वर्णनमे ऐतिहासिकताक पुट कतबा दूर धरि अछि से नहि कहि सकैत छी तथापि पौराणिक आख्यानक महत्व तँ ऐतिहासिक दृष्टिये अछिये एहिमे संदेहक कोनो गुंजाइश नहि। भविष्य पुराणक अनुसार अयोध्याक महाराज मनुक पुत्र निमि एहि यज्ञ भूमिमे आवि अपनाकेँ कृत्य–कृत्य बुझलन्हि आ ओहिठामक ऋषि लोकनिक तप आ यज्ञसँ लाभान्वित भेलाह। निमिक पुत्र ‘मिथि’ एक शक्तिशाली शासक भेलाह आ ओ अपन पराक्रमक प्रदशनार्थ एहिठाम एकटा नगरक निर्माण केलन्हि जे ‘मिथिला’क नामसँ प्रसिद्ध भेल। एहिमे कहलगेल अछि जे पुरी निर्माता होएबाक कारणे ‘मिथिला’क दोसर नाम ‘जनक’ पड़ल। भविष्य पुराण:- निमेः पुत्रस्तु तत्रैव मिथिर्नाम महान स्मृतः। प्रथमं भुजबलैर्येन तैरहूतस्थ पार्श्वतः॥ निर्म्मितस्वीयनाम्ना च मिथिलापुरमुनमम्। पुरीजनन सामर्थ्‍याज्‍जनक: सच कीर्तितः॥ वाल्मीकीय रामायण:- राजाऽभूतिषु लोकेषु विश्रुतः स्वेनकर्मणा निमिः परमधर्मात्मा सर्वतत्व वतांवरः। तस्य पुत्रो मिथिर्नाम जनको मिथिपुत्रक कथन अछि जे जखन वशिष्ठ यज्ञाभिलाषी निमिक निमंत्रण अस्वीकार कए इन्द्रक पुरोहिताइ करबाक हेतु स्वर्ग गेलाह तखन वशिष्ठक अनुपस्थितिमे भृगु आदि अन्यान्य ऋषि मुनि लोकनिक साहाय्यसँ निमि अपन यज्ञक संपादन केलन्हि। वशिष्ठ स्वर्गसँ घुरलापर जखन यज्ञकेँ सम्पादन भेल देखलन्हि तखन क्रुद्ध भए ओ राजा निमिकेँ “विदेह” भजेबाक श्राप देलन्हि। वशिष्ठक एहि श्रापसँ चारूकात हाहाकार मचि गेल। प्रजा लोकनि घबरा उठलाह। अराजकताक स्थिति देखि उपस्थित ऋषिगण निमिक मृत शरीरकेँ मथेऽ लगलाह आ मथला उत्तर जे शरीर उत्पन्न भेल तकरे “मिथिला” अथवा “विदेह”क संज्ञा देल गेल। इ लोकनि “जनक” नामसँ सेहो प्रसिद्ध भेलाह। श्रीमदभागवत:- जन्मना जनकः सोऽभूद्वैदेहस्तुः विदेहजः। मिथिलोमथनाज्जातो मिथिला येन निर्म्मिता॥ देवी भागवतसँ ज्ञात होइछ जे निमिक उन्नैसम पीढ़ीमे राजर्षि सीरध्वज जनक भेल छलाह (आर) श्रीमदभागवतसँ इ बुझल जाइत अछि जे जनक वंशक शासक लोकनि एहेन वातावरण बना देने छलाह जे हुनक पार्श्ववर्ती गृहस्थ सेहो सुख दुःखसँ मुक्त भऽ गेल छलाह। ‘विदेह’ जे कि महत्वपूर्ण कल्पना छल आ जकर प्राप्तिक हेतु लोग ललायत रहैत छल से ओहि देशक नामक संकेत सेहो दैत अछि जाहिठाम जनक वंशक लोग अपन राज्यक स्थापना कएने छलाह। शुकदेव जी (व्यासक पुत्र) जखन अपन पितासँ तपचर्याक हेतु आज्ञा माँगलन्हि तखन हुनका योगिराज जनकक दृष्टांत दैत इ कहल गेलन्हि जे ओ घरोमे रहिकेँ तपस्या कऽ सकैत छथि। शुकदेवजीकेँ असंतुष्ट देखि व्यास हुनका राजर्षि जनकक ओतए पठा देलथिन्ह। देवी भागवत– वंशेऽस्मिन्येऽपि राजानस्ते सर्वे जनकास्तथा। विख्याता ज्ञानिनः सर्वे वेदेहाः परिकीर्तिताः॥ वर्षद्वयेन मेरूंच समुल्लङ्घ्य महामतिः। हिमालये च वर्षेण जगाम मिथिलां पति॥ प्रविष्टो मिथिलांमध्ये पश्यंसर्वर्द्धिमुतम्। प्रजाश्चः सुखिता सर्वाः सदाचाराः मुखंस्थिताः॥ श्रीमद् भागवत– एते वै मैथिला राजन्नात्म विद्याविशारदाः योगेश्वरं प्रसादेन द्वन्दैमुक्ता गृहष्वेपि॥ मिथिलाक सीमाक सबंधमे देवी भागवतमे निम्नांकित विवरण अछि। एवं निमिसुतो राजा प्राथतोजनकोऽभवत्। नगरी निर्मिता तेन गंगातीरे मनोहरा। मिथिलेति सुविख्याता गोपुराट्टाल संयुता धनधान्य समायुक्ताः हर्हेशाला विराजिता॥ शक्तिसंगम तंत्र:- गण्डकी तीरमारभ्य चम्पारण्यांतंग शिवे। विदेहभूः समाख्याता तीरभुक्त्यमिधः सतु॥ स्कन्द पुराण:- गण्डकी कौशिकी चैव तयोमध्ये वरस्थलम्। बृहद् विष्णुपुराण:- कौशिकीन्तु समारभ्य गण्डकीमधिगम्यवै। योजनानि चतुर्विशंद् व्यायामः परिकीर्त्तितः॥ गंगाप्रवाहमारभ्य यावद्धैमवतंवनम्। विस्तारः षोडश प्रोक्तो देशस्य कुलनन्दन। मिथिलानाम नगरी तत्रास्ते लोक विश्रुता॥ अगस्त्य रामायण:- वैदेहोपवनस्यांते दिश्यैशान्यां मनोहरम्। विशालं सरसस्तीरे गौरीमंदिरमुत्तमम्॥ वैदेही वाटिका तत्र नाना पुष्प सुगुम्फिता। रक्षितमालिकन्याभिः सर्वतु सुखदा शुभा॥ मिथिलाक उत्तरमे हिमालय, दक्षिणमे गंगा, पूबमे कौशिकी आ पश्चिममे गण्डकी अछि। चन्दा झा:- गंगा बहथि जनिक दक्षिण दिशि, पूर्व कौशिकी धारा पश्चिम बहथि गण्डकी, उत्तर हिमवत बल विस्तारा। प्राचीन मिथिलामे आधुनिक दरभंगा, मुजफ्फरपुर, मोतिहारी, (दरद–गण्डकी देश), सहरसा, पुर्णियाँ, बेगूसराय, कटिहार, विहपुर, एवँ नेपालक दक्षिणी भाग सम्मिलित छल। नदीक प्रधानता हेवाक कारणे मिथिलाकेँ तीरभुक्ति सेहो कहल गेल छैक– वृहद् विष्णु पुराण:- गंगा हिमवतोर्मध्ये नदी पञ्च दशांतरे। तैरभुक्तिरिति ख्यातो देशः परम पावनः॥ तीरभुक्ति नाम होएबाक निम्नलिखित कारण बताओल गेल अछि। i.) शाम्भकी, सुवर्ण एवँ तपोवनसँ भुक्तमान होएबाक कारणे इ तीरभुक्ति कहाओल। ii.) कौशिकी, गंगा आ गण्डकीक तीरधरि एकर सीमा छलैक तैं एकरा तीरभुक्तिक संज्ञा देल गेलैक। iii.) ऋक्, यजु आ साम तीनहुक वेद सभसँ आहुति देवऽबला ब्राह्मण समूहक निवाससँ त्रि–आहुति अर्थात तिरहुतक नामसँ इ स्थान प्रख्यात भेल। १६–१७म शताब्दीक तिब्बती यात्री लामा तारनाथक विवरणमे तिरहुतकेँ “तिराहुति” कहल गेल अछि। आ आयनी अकबरीमे तँ सहजहि एक विस्तृत विवरण भेटिते अछि। ऐतिहासिक दृष्टिकोणसँ भुक्ति शब्द प्रयोग गुप्त युगसँ प्रारंभ भेल आ शिलालेखमे एकर उल्लेख भेटइत अछि। वैशालीसँ प्राप्त कैकटा मोहरपर तीरभुक्ति शब्दक उल्लेख अछि आ संगहि कटरासँ प्राप्त अभिलेख, नारायण पालक भागलपुर अभिलेख, वनगाँव ताम्रपत्र अभिलेख आदिसँ ‘तीरभुक्ति’पर प्रकाश पड़इयै आ इ बुझि पड़इयै जे ताहि दिनमे तीरभुक्ति समस्त उत्तर बिहारक द्योतक छल जकरा पश्चिममे छल आधुनिक उत्तर प्रदेश और पूबमे बंगाल। महानंदाक पश्चिम आ गण्डकीक पूबक समस्त भूमि तीरभुक्ति कहबैत छल, एहिमे कोनो संदेह नहि। जातकमे मिथिलाक क्षेत्र जे वर्णन अछि आ आयनी अकम्बरीमे वर्णित तिरहुत सरकारक विवरण हमर उपरोक्त मतक समर्थन करइयै। देशक भूगोल आ सीमा राजनैतिक उथल-पुथलक कारणे बदलैत रहैत छैक आ मिथिलाक राजनैतिक इतिहासमे सेहो एहेन कतेक परिवर्तन भेल छैक तथापि एकर जे एकटा साँस्कृतिक स्वरूप अछि से आविच्छिन्न रूपें चलि आवि रहल अछि आ उएह रूप एकर भौगोलिक सीमाक स्पष्ट आभास दैत अछि। प्राचीन साहित्यमे मिथिला आ जनकपुर नाम भेटैछ परञ्च गुप्तयुगसँ तीरभुक्ति नाम प्रशस्त भऽ गेल। ___ “प्राग्ज्योतिषः कामरूपे तीरभुक्तिस्तु निच्छविः विदेहाश्‍चाय कश्मीरे” लिंग पुराण:- “तीरभुक्ति प्रदेशेतु हलावर्त्ते हलेश्वरः” प्राचीन मिथिलाक पुरातात्विक विश्लेषण एवँ अध्ययन अखनोधरि अपेक्षिते अछि। नेपालक सीमा जे सम्प्रति जनकपुर अछि तकरे प्राचीन विदेह मानल गेल अछि। सुरूचि आ गाँधार जातकमे विदेह एवँ मिथिलाक भौगोलिक सीमाक विवरण भेटइत अछि। विदेहक चारू मुख्य फाटकपर चारिटा बाजार छल। महाजनक जातकमे तँ विदेहक राजधानी ‘मिथिला’क भव्य वर्णन अछि–मिथिलाक नगरीक सोभा, बाजार आ राज दरबारक शोभा, सामान्य लोगक पहिरब–ओढ़ब, खान–पान, रहन–सहन, सैनिक–संगठन, रथ, हाथी, घोड़ा, आदि एहेन कोनो अंश छुट्ल नहि अछि जकर वर्णन ओहिमे नहि भेटइत हो। अयोध्यासँ मिथिला पहुँचबामे विश्वामित्रकेँ चारि दिन लागल छलन्हि परञ्च राजा दशरथक ओतए जनक जाहि दूतकेँ पठौने छलाह तकरा मात्र तीन दिन लगलैक। दशरथ चारि दिनमे अयोध्यासँ मिथिला पहुँचल छलाह। महावीर एवँ बुद्धक समयमे विदेहक सीमा एवँ प्रकारे छल– ___ लम्बाइमे कौशिकीसँ गण्डक धरि २४ योजन। ___ चौड़ाइमे हिमालयसँ गंगा धरि १६ योजन। ___ मिथिलासँ वैशाली ३५ मील उत्तर पश्चिम दिसि छल। ___ जातकक अनुसार विदेह राज्यक सीमा ३००० लीग छल आ राजधानी मिथिलाक ७ लीग। ___ मिथिला जम्बुद्वीपक एकटा प्रधान नगर छल। ___ सदानीरा नदी बुढ़ी गण्डकक द्योतक छल। ___ तीरभुक्ति नामक संदर्भमे भृंगदूतमे कहल गेल अछि– “गंगा तीरावधिरधिगता यदभुओ भृङ्गभूर्क्तिनामा सैव त्रिभुवन तले विश्रुताः तीरभुक्ति” आ शक्तिसंगम तंत्रमे– गण्डकीतीरमारभ्य चम्पारण्यांतकं शिवे विदेहभूः समाख्याता तीरभुक्तिमिधोर्मनु:। ‘भुक्ति’ शब्दसँ प्रान्तक बोध होइछ आ गुप्त युगमे समस्त मिथिला तीरभुक्ति नामसँ प्रसिद्ध छल आ एहिसँ समस्त उत्तर बिहारक बोध होइत छल। भोगौलिक दृष्टिये मिथिलाक निम्नलिखित नाम सेहो महत्वपूर्ण अछि– विदेह, तीरभुक्ति, तपोभूमि, शाम्भवी, सुवर्णकानन, मन्तिली, वैजयंती, जनकपुर इत्यादि परञ्च एहि सभमे विदेह, मिथिला, तीरभुक्ति आ तिरहुत विशेष प्रचलित अछि। चारिम शताब्दीमे तीरभुक्ति नाम प्रसिद्ध भऽ चुकल छल। त्रिकाण्डशेष, गुप्त अभिलेख आ बारहम शताब्दीक एकटा अभिलेख एवँ अन्यान्य अभिलेख सभमे ‘तीरभुक्ति’क नाम भेटइत अछि। iv. मिथिला भूमि:- सम्प्रति जे मोतिहारी, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, सहरसा, पूर्णियाँ, बेगूसराय, आदि क्षेत्र अछि सैह प्राचीनकालमे मिथिला, विदेह, तीरभुक्ति, कहबैत छल आ वैशाली एकर अंतर्गत छल। गण्डकीसँ महानंदा आ हिमालयसँ गंगाध‍िरक क्षेत्रक अंतर्गत मिथिला छल। मिथिलाक सीमा लगभग २५००० वर्ग मील छल। हियुएन संग जे ‘पूरा भारत’क वर्णन कैने छथि ताहिमे मिथिलोक उल्लेख अछि। मिथिलाक नाम उत्पत्तिक सम्बन्धमे निम्नलिखित श्लोक प्रसिद्ध अछि– “निमिः पुत्रस्तु तत्रैव (मिथिर्नाम) महान स्मृतः प्रथमं भुजबलेर्येन त्रैहूतस्य पार्श्वतः। निर्म्मितंस्वीय नाम्नाच मिथिलापुरमुत्तम् पुरीजनन सामर्थ्‍यात् जनकः सच कीर्तितः॥ (शब्दकल्पद्रूम-iii.७२३) वृहद विष्णुपुराणक मिथिला महात्म्य खण्ड– मिथिला नाम नगरी नमास्ते लोक विश्रुता पंचभिः कारणैः पुण्या विख्याताजगतीत्रये॥ पाणिनिः- मन्थते शत्रवोयस्यां=मथ+“मिथिलादयश्च” इतिदूलच अकारस्येत्वं निपात्यते स्वनाम ख्यातनगरी। सातु जनकराज पुरायथा। विदेहा मिथिलाप्रोक्ता। इति हलायुधः- मिथिला भूमिक विशेषता इ अछि जे एहिठाम नदीक बाहुल्यक कारणे जमीन उपजाउ अछि आ सभ प्रकारक अन्नक खेती एतए होइत अछि। एहिठामक जनसंख्याक विशेष भाग अहुखन खेतीपर निर्भर करैत अछि। प्रतिवर्ष एहिठाम नदीक बाढ़ि अबैत अछि, गाम घर दहा जाइत अछि, लोग वेलल्ला भऽ जाइत अछि तथापि अपन माँटि-पानिक प्रति एहिठामक लोककेँ ततेक प्रेम आ आसक्ति छैक जे ओ एकरा तैयो छोड़वा लेल तैयार नहि अछि आ ओहि माँटि-पानिसँ सटिकेँ रहब अपन जीवनक सार बुझैत अछि। गण्डक, वाग्मती, बलान, लखनदेइ, कमला, करेह, जीवछ, कोशी, तिलयुगा, गंगाक मारि मिथिलाक लोग जन्म-जन्मांतरसँ सहैत आबि रहल अछि। नदीक बिना मिथिलाक भूमिक कल्पने नहि भऽ सकइयै। नदीक कारणे तँ मिथिलाक नामो तीरभुक्ति पड़ल छल कहियो। नदीमे सप्तगण्डकी आ सप्तकौशिकीक उल्लेख अछि आ एकर स्रोत नेपालमे अछि। आब दुनू नदीकेँ नियंत्रित करबाक हेतु कोशी आ गंडक योजना बनल अछि आ आन-आन नदीकेँ पालतु बनेबाक प्रयास भऽ रहल अछि। मिथिला भूमिक बनावट एकरा कैक अर्थमे सुरक्षा प्रदान करैत छैक। एक दिसि हिमालय पर्वत छैक तँ तीन दिसि नदी आ तैं एहिठामक लोक किछु विशेष स्वभावक होइत छथि जकर संकेत विद्यापतिक पुरूष परीक्षामे अछि। नदीक पूजा एहिठाम ओहिना होइछ जेना कोनो देवी देवताक आ सभ नदीक पूजाक गीत सेहो उपलब्ध अछि। पावनि तिहारपर नदीमे स्नान करब आवश्यक बुझना जाइत अछि। अक्षय-तृतीया (वैशाख शुक्ल)क दिन नदीमे स्नान करबाक परम धार्मिक मानल गेल अछि। मिथिलाक लोग अपन देश, संस्कृति, भाषा आ संस्कारक प्रति बड्ड कट्टर होइत छथि। भौगोलिक दृष्टिये मिथिलाक क्षेत्र एकटा राजनैतिक इकाइक रूपमे प्राचीन कालहिंसँ बनल रहल अछि आ तैं एकर सांस्कृतिक वैशिष्टय अखनो बाँचल छैक। v. मिथिलाक निवासीः- जे केओ मिथिला अथवा मैथिल संस्कृतिसँ अपरिचित छथि हुनका ‘मिथिला’सँ मात्र मैथिल ब्राह्मणक बोध होइत छन्हि परञ्च इ बोध हैव भ्रामक थिक, कारण मिथिला एकटा भौगोलिक सीमाक द्योतक थिक आ ओहि सीमाक अंतर्गत रहनिहार प्रत्येक ओहि भौगोलिक इकाइक अंग भेलाह चाहे हुनक जाति, वर्ण, अथवा वर्ग जे हो। मिथिलाक रहनिहार प्रत्येक व्यक्ति मैथिल कहौता एहिमे कोनो संदेह नहि रहबाक चाही। धार्मिक क्षेत्रक प्रधान आ आध्यात्मिक रूपें प्रभुत्व रहलाक कारणें ब्राह्मणक प्रधानता रहलन्हि आ लगातार ७००–८०० वर्ष ब्राह्मण राजवंशक शासन रहबाक कारणें ब्राह्मणक राजनैतिक महत्व सेहो बनल रहल। इ फराक कथा जे सामान्य ब्राह्मण गरीब छथि परञ्च इ बातां सांच जे ब्राह्मणक राज्य रहलासँ राजनीतिमे ब्राह्मणकेँ विशेष प्राधिकार भेटलन्हि आ ओ लोकनि सामंतवादी युगसँ अद्यावधि सभ क्षेत्रमे नेतृत्व केलन्हि। स्मरणीय जे आनवर्णक तुलनामे मिथिलामे ब्राह्मणक जनसंख्या बहुत कम अछि। ब्राह्मणक अतिरिक्त मिथिलामे क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र (सभ प्रकार), कायस्थ, मुसलमान, इसाइ आदि सब वर्णक लोग रहैत छथि। मिथिलाक विशाल क्षेत्रमे सूरी, तेली, कलवार, यादव, राजपूत, वर्णसँ कम धनी आ शक्तिशाली नहि छथि। मिथिलामे कतेक वर्णक लोग मध्य युगमे रहैत छलाह तकर विश्लेषण ज्योतिरिश्वर ठाकुरक वर्णरत्नाकरसँ भेटैछ। मुसलमानोमे सैयद, पाठान, मोमिन, शेख, आदि शाखा सम्प्रदायक लोगक वास छन्हि। जमीन्दारमे ब्राह्मणक अतिरिक्त, भूमिहार ब्राह्मण, राजपूत, आ यादव लोकनि एक्को पैसा कम नहि छथि। यत्र-तत्र कायस्थ लोकनिकेँ सेहो जमीन्दारी छलन्हि मुदा ओ लोकनि आब विशेषतः कलमफरोसीमे रहि गेल छथि। मिथिला क्षेत्रमे मुसलमानो जमीन्दार कैकटा छलाह। वर्गक हिसाबे मिथिलामे मूलरूपेण दूटा वर्ग अछि–गरीबक वर्ग आ धनिकक वर्ग। जे केओ धनमान छथि (चाहे जाति कोनो होहि) ओ धनी वर्गमे छथि–आ गरीब गरीबक वर्ग। दुनू वर्गक बीच संघर्ष चलि रहल अछि। जमीन्दारी उठलाक उपरांत इ संघर्ष आ तीव्र भऽ गेल अछि कारण आर्थिक हिसाबें मिथिला तुलनात्मक दृष्टिये विशेष शोषित आ पीड़ित अछि। उत्तर भारतक अन्नागारक पदवीसँ विभूषित रहितहुँ मिथिलाक सामान्य लोगकेँ अहुँखन पावभरिक अन्न आ पाँच हाथक वस्त्र नहि भेटइत छैक आ ओ अपन पेट भरबाक लेल चारू कात बौआइत रहैत अछि। मिथिलाक निम्नवर्गक सामाजिक श्रृखंला करीब-करीब टुटि चुकल अछि आ ओ शोषण यंत्रमे नीक जकाँ पीसा रहल अछि। इ स्थिति आब क्रांतिक आह्वान जहिया करे। मिथिलाक उत्तरी आ उत्तर-पूर्वी सीमापर इण्डो-मंगोलाइड जातिक लोग सेहो बसैत छथि जे थारू कहबैत छथि। हुनका लोकनिकेँ रहन-सहन अहुँखन पुराने छन्हि यद्यपि ओ लोकनि परिश्रम करबामे ककरोसँ कम नहि छथि। शूद्रमे शुद्ध आ अशुद्ध (अछूत) दुनू तरहक लोग अबैत छथि। डोम, चमार, दुसाध, मुशहर, हलालखोर, धानुक, अमार्त, केओट, कुरमी, कहार, कोइरी आदि सेहो पर्याप्त संख्यामे मिथिलामे बसैत छथि। जनसंख्याक हिसाबे यादव सभसँ आगाँ छथि। दुसाध, कोइरी, चमार, कुरमी आदिक जनसंख्या जोड़ि देलासँ तथाकथित पिछड़ावर्गक जनसंख्या तथाकथित अगुआवर्गक जनसंख्यासँ बेसी अछि। जनगणनाक आधारपर निम्नलिखित जातिक ज्ञान होइछ– गोप (यादव), ब्राह्मण, राजपूत, दुसाध, कोइरी, चमार, शेख, भूमिहार, कुर्मी, मल्लाह, जोलहा, तेली, कान्दु (कानू), नोनिया, धानुख, मुशहर, तांती, कायस्थ, कमार, हजाम, धुनिया, कुम्हार, धोबी, कलवार, केओट, सोनार, कहार, कुँजरा, सुनरी, पठान, हलवाइ, तमौली, इत्यादि। अघ्‍याय–२ मिथिलाक इतिहासक अध्ययनक साधन भारतीय इतिहासक अध्ययनक हेतु जतवा जे स्त्रोत उपलब्ध अछि तकर शतांशो मिथिलाक इतिहासक हेतु नहि अछि। मिथिलाक दुर्भाग्य इहो जे पुरातत्ववेत्ता लोकनिक ध्यान आर्य सभ्यताक पूर्वी सीमाक प्राचीनतम केन्द्र दिसि अद्यावधि नहि गेल छन्हि। पता नहि जेतैन्ह अथवा नहि। मिथिलाक प्राचीन भौगोलिक सीमा, जाहिमे जनकपुर आ सिमराँवगढ सेहो सम्मिलित अछि, क विशेष भाग सम्प्रति नेपाल तराइमे पड़इत अछि आ ओतए सरकारक दिसिसँ एहि क्षेत्रक प्राचीन ऐतिहासिक तत्वक पता लगेबाक हेतु अखन धरि कोनो सशक्त प्रयास नहि भेल अछि। मोतिहारी, वैशाली, गोरहोघाट, पुर्णियाँ, आदि क्षेत्रक यदा–कदा पुरातत्वक खोज भेला उत्तरो एहि दिसि ध्यान नहि देल गेल अछि। आ तैं मिथिलाक इतिहासक अध्ययनक जे एकटा महत्वपूर्ण स्त्रोत होएबाक चाही से सम्प्रति अपूर्णे अछि। आन–आन क्षेत्रक हेतु जतबो साधन उपलब्ध भेल छैक ततओ मिथिलाक हेतु नहि भऽ सकल अछि कारण एहि दिसि मैथिल-अमैथिल इतिहासकारक ध्यान नीक जकाँ आकृष्ट नहि कैल गेल अछि। मिथिलाक प्राचीन गौरव आ साँस्कृतिक देनक अध्ययनक हेतु हमरा लोकनि अहुँखन मात्र साहित्यिक साधनेपर निर्भर करए पड़इत अछि जकर नतीजा इ होइयै जे कोनो प्राचीन प्रश्नपर हमरा लोकनि एकटा निर्णयात्मक मत नहि दऽ सकैत छी। प्रत्येक प्रश्न विवादास्पद अछि आ निर्विवाद रूपें हम अखनो इ कहबाक स्थितिमे नहि छी जे अमूक बात किंवा घटना अमूक समयमे घटित भेले हैत। इ अनिश्चितताक स्थिति अखन मिथिलाक इतिहासमे बहुत दिन धरि बनले रहत। यूनान जकाँ हमरा ओतए नञि कोनो हिरोडोटस आ थुसीडाइड्स भेल छथि आ नञि मुसलमान शासकक इतिहासकार जकाँ कोनो इतिहासकारे। विदेशी यात्रियो लोकनि जे विवरण एहि क्षेत्रक देने छथि से मात्र सामान्ये कहल जा सकइयै आ ओहिसँ स्थितिमे कोनो परिवर्तन नहि अवइयै। एहना स्थितिमे एहि प्राचीन क्षेत्रक इतिहासक निर्माण करब एकटा जटिल समस्या बनल अछि आ ओहि समस्या मध्य हमरा लोकनिकेँ ऐतिहासिक साधन खोजिकेँ संकलित करबाक अछि। मिथिलामे पैघसँ पैघ दार्शनिक एवँ तात्विक विषयपर ग्रंथक रचना भेल अछि जाहिसँ इ प्रमाणित होइछ जे एहिठामक लोग विज्ञ एवँ विद्वान छलाह परञ्च अपना संबंधमे किछु लिखबाक क्रममे ओ लोकनि राजर्षि जनकक विदेह नीतिये अपनौलन्हि अछि एहिमे कोनो सन्देह नहि। ‘मैथिल’ शब्द “वैदिक” युगसँ व्यवहृत होइत आएल अछि आ एहिसँ इ स्पष्ट होइत अछि जे ताहि दिनसँ मिथिलाक भौगोलिक इकाइ स्वीकृत अछि आ एहि भौगोलिक क्षेत्रमे रहनिहार मैथिल कहबैत छलाह–बिहारमे एतेक प्राचीन गौरव आर कोनो क्षेत्रकेँ प्राप्त नहि छैक तथापि एकर इतिहास अखनो एतेक संदिग्ध आ अनिर्णयात्मक स्थितिमे अछि से एकटा विचारणीय विषय। प्राचीन मिथिलाक इतिहासक अध्ययनक हेतु मुख्य साधन अछि वेद, उपनिषद्, ब्राह्म साहित्य, अरण्यक, महाभारत, रामायण, पुराण, स्मृति, पाणिनि, पतञ्जलि, आदिक रचना एवँ तत्कालीन बौद्ध आ जैन साहित्य। मिथिलाक सम्बन्धमे सूचना हमरा लोकनिकेँ यजुर्वेद एवँ अथर्ववेदसँ भेटए लगैत अछि यथापि अप्रत्यक्ष रूपें मिथिलाक ऐतिहासिक घटनाक विवरण ऋग्वेदमे सेहो देखल जा सकइयै। शतपथ ब्राह्मण, ऐतरेय ब्राह्मण, पंचविंश ब्राह्मण, बृहदारण्यकोपनिषद्, एवँ छन्दोग्योपनिषद्मे मिथिलाक तत्कालीन राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक, एवँ धार्मिक अवस्थाक विस्तृत विवरण भेटइत अछि। एहिमे सभसँ महत्वपूर्ण विवरण शतपथ ब्राह्मणक अछि जाहिमे जनककेँ सम्राट कहल गेल अछि आ संगहि याज्ञवल्क्यक संरक्षक सेहो। साँस्कृतिक स्थितिक अध्ययनक हेतु तँ उपरोक्त साधन अद्वितीय अछि आ एहि बातकेँ विदेशी विद्वान सेहो मानैत छथि। एहिमे संदेह नहि जे एहि युगमे ब्राह्मण वर्गक प्रधानता छल तथापि परीक्षितक बादसँ जनक वंशक इतिहासक हेतु उपरोक्त साधनक अध्ययन अत्यावश्यक मानल जाइत अछि। एतरेय ब्राह्मणसँ तत्कालीन अवस्थाक विवरण भेटइत अछि आ उपनिषद् तँ सहजहि दार्शनिक विचार-विमर्शक खान अछिये। ओहिमे जाहि ढंगे वाद–विवाद अछि से सर्वथा अद्वितीय कहल जा सकइयै। पाणिनि, पतञ्जलि एवँ अर्थशास्त्र (कौटिल्यक)सँ सेहो प्राचीन मिथिलाक इतिहासक विभिन्न अंशपर प्रकाश पड़इत अछि। बौद्ध आ जैन साहित्यक संबंधमे इ साँचि कहल गेल अछि जे जखन कोनो आन साधन मिथिलाक इतिहासक हेतु नहि प्राप्त होइत अछि तखन बौद्ध आ जैन साधन हमरा लोकनिक साहाय्यक हेतु प्रस्तुत होइत अछि। दीपवंश, महावंश, अशोकविद्वान, अश्वघोषक, बुद्धचरित, बुद्धघोषक रचना सभऽ, धम्मपद्दद्ठ कथा, असंग, वसुवन्धु, दिगनाग, धर्मकीर्ति, आदिक रचनासँ मिथिलाक सांस्कृतिक एवँ दार्शनिक इतिहासक निर्माणमे बहु साहाय्य भेटइत अछि। बौद्ध दार्शनिक लोकनिकेँ कहबाक क्रममे मिथिलामे नव–न्यायक जन्म भेल छल आ तैं ७–८ शताब्दीसँ १५–१६म शताब्दी धरि जे बौद्ध एवँ मैथिल दार्शनिकक मध्य वाद–विवाद भेल अछि से मिथिलाक साँस्कृतिक इतिहासक अध्ययनक हेतु परमावश्‍यक मानल जाइत अछि। वाचस्पति मिश्र (वृद्ध)सँ लऽ कऽ शंकर मिश्र धरिक समस्त ग्रंथ आ नालंदा विक्रमशिलाक महान पंडित लोकनिक रचित ग्रंथक अध्ययन एहि हेतु सर्वथा अपेक्षित। ओना बौद्धकालीन मिथिलाक सर्वांगीन इतिहासक हेतु समस्त जातकक अध्ययन आवश्यक बुझना जाइछ। महापदानक जातक, गाँधार जातक, सुरूचि जातक, महाजनक जातक, निमि जातक, महानारदकस्सप जातक इत्यादि सँ तत्कालीन मिथिलाक राजनैतिक समाजिक एवँ साँस्कृतिक इतिहासपर वृहत् प्रकाश पड़इयै– जाहिसँ सामान्य लोकक दैनन्दिनीक ज्ञान सेहो होइत अछि। जातकमे जे राजनैतिक श्रृंखला बताओल गेल अछि ताहिसँ पुराण वर्णित अवस्थामे काफी मतभेद अछि तैं राजनैतिक इतिहासक निर्माणमे जातकक अध्ययनमे सतर्कताक आवश्यकता अछि। सामाजिक–साँस्कृतिक–आर्थिक अवस्थाक अध्ययनक हेतु जातक प्रमुख साधन मानल गेल अछि। जैन स्रोतमे सेहो मिथिलाक विभिन्न स्थितिक विशद् विश्लेषण भेटइत अछि आ ओहि दृष्टिकोणसँ उतराध्यायनसूत्र, उवासगदसाओ, कल्पसूत्र, स्थविरावलीचरित्र (परिशिष्ट पर्वन) एवँ त्रिशस्तिशलाकापुरूष आदि ग्रंथक अध्ययन अपेक्षित अछि। कखनो कखनो जैन एवँ बौद्ध उपाख्यानमे समता सेहो देखबामे अवइयै। जैन–बौद्ध साहित्य आ अन्यान्य साधन मिथिलाक सामाजिक–आर्थिक इतिहासक अध्ययनक हेतु बहु लाभदायक मानल गेल अछि कारण ओहि सभ विवरणमे सामान्य लोकक जीवनपर सेहो प्रकाश पड़इत अछि। जातक आदिसँ इहो ज्ञात होइछ जे कोना ताहि दिनक मैथिल अपन घर दुआर छोड़िकेँ व्यापार–व्यवसायक हेतु देश–विदेश जाइत छलाह आ ओहिमे बहुत गोटए ओहिठाम बैसिओ जाइत छलाह। ओ लोकनि वेस उद्यमी आ परिश्रमी होइत छलाह आ समुद्र यात्राक हेतु कोनो संकीर्णता हुनका लोकनिमे नहि छलन्हि। महाभारत, रामायण, आ पुराणमे मिथिलाक सबंधमे प्रचुर सामग्री अछि परञ्च एहि तीनूमे वैज्ञानिकताक हिसाबें कतहु कोनो साम्य नहि छैक। पुराणक विभिन्न खण्डमे जतवा जे नामावली अथवा राजाक सूची भेटइत अछि ताहिमे एकरूपता नहि देखबामे अवइयै आ एहि विरोधाभाससँ इतिहासक सामान्य विद्यार्थी अगुताकेँ घबरा जाइत अछि। ब्रिटिश विद्वान पारजीटर महोदय आ बंगाली विद्वान प्रधान महोदय बड्ड परिश्रम कए पुराण रूपी जंगलसँ मिथिलाक राजवंशक इतिहासक एकटा रूपरेखा प्रस्तुत करबामे समर्थ भेल छथि तथापि ओकरा सर्वसम्मत अखनो नहि मानल जाइत छैक। प्राचीन–कालमे इतिहास–पुराण एकटा अध्ययनक महत्वपूर्ण विषय छल आ अध्ययनक दृष्टिकोणसँ एकरा पंचमवेद सेहो कहल गेल छैक तथापि एकरा अध्ययनमे जे एकटा वस्तुनिष्ठताक अपेक्षा छल से प्राचीन विद्वान लोकनि नहि राखि सकलाह आ पुराणमे ततेक रास एम्हर–ओम्हरक बात घुसिया गेल जे एकर ऐतिहासिकतामे लोगकेँ संदेह होमए लगलैक। एहिठाम एतवा स्मरणीय जे एतवा भेला उत्तरो पुराण, रामायण आ महाभारतक एतिहासिक महत्वकेँ काटल नहि जा सकइयै। परंपरागत इतिहासक जे अपन महत्व छैक ताहि हिसाबे उपरोक्त साधनक अध्ययन कऽ कए हमरा लोकनि मिथिलाक इतिहासक निर्माणमे एहिसँ साहाय्य लऽ सकैत छी। मिथिलाक इतिहासक अध्ययनक हेतु लिगिट मैनुस्कृप्ट सेहो आवश्यक बुझना जाइत अछि। एहिसँ मिथिला आ वैशाली दुनूक इतिहासपर प्रकाश पड़इत अछि। एहिमे कहल गेल अछि जे जखन वैशालीमे गणराज्य छल तखन मिथिलामे राजतंत्र आ मिथिलामे ताहि दिनमे एकटा प्रधानमंत्री छलाह जिनक नाम खण्ड छलन्हि आ हुनका अधीनमे ५०० अमात्य रहथिन्ह। संस्कृत साहित्यक विभिन्न अंशसँ मिथिलाक इतिहासक अध्ययनमे सहायता भेटइत अछि। कालिदास, भवभूति, दण्डिन, राजशेखर, आदिक रचनासँ मिथिलाक इतिहासक विभिन्न पक्षपर प्रकाश पड़इयै। लक्ष्मीधरक कृत्यकल्पतरू, श्रीनिवासक भद्दीकाव्यटीका, जयसिंहक लिंगवार्त्तिक, श्रीधर ठक्कुरक काव्यप्रकाशविवेक, नारायणक छांदोग्यपरिशिष्ट एवँ मिथिला आ भारतक अन्य भागसँ प्राप्त मिथिलाक्षरक पाण्डुलिपि आदिसँ मिथिलाक इतिहासक निर्माणमे सहायता भेटइत अछि। विल्हणक विक्रमाँकदेवचरित, विद्यापतिक समस्त रचना, वर्धमानक दण्डविवेक, अभिनव वाचस्पति मिश्रक समस्त रचना, गणेश्वरक सुगति सोपान, चण्डेश्वरक आठो रत्नाकर, ज्योतिरीश्वर ठाकुरक वर्णरत्नाकर आदि ग्रंथ मिथिलाक इतिहासक निर्माणमे उपादेय सिद्ध भेल अछि। बिहार रिसर्च सोसायटी द्वारा प्रकाशित “कैटलोग आफ मिथिला मैनुस्कृप्ट” (४ भाग), हरिप्रसाद शास्त्री द्वारा संपादित “कैटलोग आफ नेपाल दरबार मैनुस्कृप्ट” इत्यादिसँ सेहो मिथिलाक इतिहासक सभ पक्षपर विशेष प्रकाश पड़इयै। मिथिलामे सुरक्षित तालपत्रपर ब्राह्मण आ कायस्थक पाञ्जि सेहो मिथिलाक सामाजिक इतिहासक एकटा मूलि स्त्रोत मानल गेल अछि। ओना पुरातात्विक साधनक अभाव तँ मिथिलामे अछि तथापि मोतिहारीसँ बंगालक सीमा धरि जे विभिन्न पुरातात्विक महत्वक स्थान अछि तकर सर्वेक्षणसँ मिथिलाक इतिहासक निर्माणमे सहायता भेटत। मिथिलाक प्रमुख क्षेत्रक उत्खनन अखनो नहि भेल अछि तैं ओहिठामसँ पर्याप्त मात्रामे शिलालेख, सिक्का, आदि नहि भेटल अछि। एम्हर मोतिहारीसँ कैकटा ताम्रलेख प्रकाशित भेल अछि, मुजफ्फरपुरक कटरा थानासँ जीवगुप्तक एकटा अभिलेख भेटल अछि जाहिसँ पता लगैत अछि जे तीरभुक्तिमे चामुण्डा नामक एकटा विषय छल। इमादपुरसँ पाल कालीन अभिलेख भेटल अछि जाहिसँ इ सिद्ध होइछ जे पाल लोकनिक शासन मिथिलापर छल। नौलागढ (बेगूसराय)सँ दूटा पालकालीन अभिलेख भेटल अछि– जाहिमे एकटा क्रिमिला विषयक आ दोसरमे एकटा बिहारक उल्लेख अछि। एहिठाम इहो स्मरणीय जे एहि क्षेत्रसँ गुप्तकालीन मोहर एवँ ‘रक्षमुक्त विषय’क एकटा गुप्तकालीन मोहर सेहो भेटल अछि जाहिसँ इ स्पष्ट होइछ जे मिथिलाक इ क्षेत्र शासनक प्रधान केन्द्र छल। बनगाँव (सहरसा)क गोरहोघाट, पटुआहा, आदि स्थानसँ पंचमार्क्ड सिक्का तँ बहुत पूर्वहिं भेटल छल आ एम्हर विग्रहपाल तृतीयक एकटा प्रमुख ताम्रलेख बहरायल अछि जाहिमे इ कहल गेल अछि जे तीरभुक्तिक अंतर्गत हौद्रेय नामक एकटा विषय छल। इएह हौद्रेय आधुनिक हरदी थिक। एहिसँ पूर्व हमरा लोकनिकेँ तीरभुक्तिमे मात्र एक्केटा विषयक ज्ञान छल आ ओ छल ‘कक्ष’ विषय जकर उल्लेख नारायण पालक भागलपुर ताम्रलेखमे भेल अछि। इ कक्ष विषयक सम्बन्धमे अखनो धरि इतिहासकार एकमत नहि भेल छथि मुदा हमर अपन विचार इ अछि जे इ ‘कक्ष’ विषय प्राचीन अंगुतरापमे छल आ महाभारतमे वर्णित ‘कौशिकी कक्ष’क प्रतीक छल। नारायण पालक ताम्रलेखमे एहि कक्ष विषयक विवरण भेटइत अछि। चामुण्डा विषय पश्चिममे, हौद्रेय केन्द्रमे आ कक्ष विषय तीरभुक्तिक पूर्वी सीमाक संकेत छल। एकर अतिरिक्त पंचोभसँ प्राप्त ताम्रपत्र सेहो मिथिलाक इतिहासक अध्य़यनक हेतु अत्यावश्यक। अन्धराठाढी़सँ प्राप्त श्रीधरक अभिलेख, कन्दाहासँ नरसिंह देव ओइनवारक अभिलेख, भगीरथपुरसँ प्राप्त ओइनवार कालीन अभिलेख, मुहम्मद तुगलकक अभिलेख, वेदीवनक तुगलक कालीन अभिलेख, इब्राहिम शाह शर्कीक अभिलेख, शिवसिंहक सिक्का, ओइनवार शासक भैरव सिंह देवक चाँदीक सिक्का आदिसँ मिथिलाक इतिहासक विभिन्न पक्षपर प्रकाश पड़इत अछि। नेपाल वंशावली आ नेपालसँ प्राप्त अभिलेख जाहिमे सिमराँवगढ स्थित नान्यदेवक तथाकथित अभिलेख एवँ प्रताप मल्लक शिलालेख महत्वपूर्ण अछि। एम्हर आबिकेँ वैशाली, बलिराजगढ, करिऔन आदि स्थानक उत्खननसँ जे सामग्री प्राप्त भेल अछि सेहो मिथिलाक इतिहासक निर्माणमे सहायक सिद्ध भेल अछि। महेशवारा (बेगूसराय)सँ प्राप्त रूकनुद्दिन कैकशक अभिलेख तँ अन्यान्य दृष्टिकोणसँ महत्वपूर्ण अछि। मिथिलाक विभिन्न भागसँ मुसलमानी सिक्का पर्याप्त मात्रामे भेटल अछि जाहिसँ राजनैतिक इतिहासक निर्माणमे सहायता भेटइत अछि। मटिहानी (बेगूसराय)सँ बंगालक सुल्तान नसरत शाहक अभिलेख सेहो भेटल छल आ कहल जाइत अछि जे बेगूसरायक समीप नूरपुर गाँवमे मीरजाफरक पुत्रक एकटा अभिलेख अछि। विदेशी यात्री लोकनि सेहो मिथिलामे आएल छलाह आ एहिमे चीनसँ आयल यात्री लोकनिक विशेष महत्व अछि कारण ओ लोकनि एतए बौद्धधर्मक अध्ययनार्थ अबैत छलाह। फाहियान, हियुएनसंग, सूंगयुन, इंसिंग आदि यात्रीक नाम उल्लेखनीय अछि। इ लोकनि मिथिलाक विभिन्न क्षेत्रक भ्रमण कएने छलाह आ ओ लोकनि जे अपन विवरण लिखने छथि ताहिसँ एहि क्षेत्रपर विशेष प्रकाश पड़इयै। वृज्जी, लिच्छवी एवँ तीरभुक्तिक प्रसंग हिनका लोकनिक लेख उपादेय अछि। विदेशी यात्रीमे सर्वप्रमुख व्यक्ति, जे मिथिलाक हेतु सर्वतोभावेन महत्वपूर्ण कहल जा सकैत छथि, भेलाह तिब्बती यात्री धर्मस्वामी जे १३म शताब्दीक पूर्वार्द्धमे मिथिला होइत नालंदा गेल छलाह। तखन मिथिला राजगद्दीपर कर्णाटवंशीय रामसिंह देव विराजमान छलाह। धर्मस्वामी मिथिलाक संबंधमे बहुत रास बात लिखने छथि। बहुत दिनधरि ओ रामसिंहक दरबारमे सेहो रहल छलाह आ रामसिंह हुनका अपन पुरोहित बनबाक हेतु आग्रहो केने छलथिन्ह परञ्च ओकरा ओ स्वीकार नहि केलन्हि। ताहि दिनमे मिथिलापर मुसलमानी आक्रमण प्रारंभ भऽ चुकल छल तकर विवरण ओ दैत छथि कारण जखन वैशाली बाटे जाइत छलाह तखन ओ अपना आँखिये इ सभ घटना देखलन्हि। धर्मस्वामी मिथिलाक इतिहासक हेतु एकटा आवश्यक स्त्रोत भेला। नया पैश एकटा दोसर महत्वपूर्ण साधन भेल वसातिलुनउंस जकर लेखक छलाह मुहम्मद सद्र उला अहमद हसन दाबिर इदुसी (उर्फ ताज) आ ओ इखतिसान उद देहलवीक नामे सेहो विख्यात छलाह। ओ गयासुद्दीन तुगलकक संगे बंगाल आक्रमणमे गेल छलाह आ घुरती कालमे मिथिला पर गयासुद्दीन तुगलकक आक्रमणक समयमे हुनके संग छलाह। तैं इहो एकटा आँखि देखल साधन भेल आ ओहि हिसाबे महत्वपूर्ण सेहो। फोलियो १२ (एकर सम्पूर्ण पटनाक काशी प्रसाद जायसवाल शोध संस्थानमे सुरक्षित अछि आ ४टा फोलियो जकर संबंध मिथिलाक इतिहाससँ छैक, हमर हिस्ट्री आफ मुस्लिम रूल इन तिरहुतमे छपल अछि)पर लिखल अछि जे हरिसिंह देव ककरो कोनाे सलाह नहि सुनलन्हि आ पराकेँ पहाड़ दिसि चलि गेलाह। गयासुद्दीन तुगलकक तिरहुत आक्रमणक संबंधमे एहिसँ प्रामाणिक दोसर कोनो साधन उपलब्ध नहि अछि। तिरहुत ताहि दिन विस्तृत आ सुखी संपन्न राज्य छल आ अखन धरि ककरो अधीन नहि छल तैं गयासुद्दीन बंगालसँ घुरबा काल अपना अधीनमे करबाक प्रयास केलक। इसामी अपन फुतुह–सालातीनमे लिखने छथि जे गयासुद्दीन तिरहुतक कर्णाटवंशक अंतिम राजापर आक्रमण केँलन्हि आ ओ बिना कोनो प्रकारक विरोध केने पहाड़–जंगल दिसि भागि गेलाह। सुल्तान तीन दिन धरि ओतए ठहरलाह आ जंगलकेँ काटिकेँ सम्पूर्ण क्षेत्रकेँ साफ करौलन्हि। तेसर दिन ओ मिथिला राज्यक विशाल किला जकर दिवाल गगनचुम्बी छल आ जे सात टा गहिर खाधिसँ चारू कातसँ घेरल छल, पर आक्रमण केँलन्हि आ ओहिपर विजय प्राप्त केला उत्तर ओहि किलामे दू या तीन सप्ताह रूकला आ चारू दिसक विरोधकेँ दबैलन्हि आ एवँ प्रकारें मिथिलापर अपन प्रभुत्व स्थापित केलन्हि। जेबासँ पूर्व ओ तवलिघाक पुत्र धर्मात्मा अहमदकेँ तिरहुतक प्रधान बनौलन्हि। एवँ प्रकारे एक–दू मासक बाद गयासुद्दीन अपन राजधानी दिसि चलि गेलाह। फरिस्ता आ मुल्लातकिया जे राजाक गिरफ्तारीक गप्प लिखैत छथि से गलती बुझि पड़इयै। वसातिनुलउंसक अनुसार तिरहुतक राजा समृद्धशाली छलाह, आ हुनका सैनिकक कोनो अभाव नहि छलन्हि। विराट राजभवन छलन्हि आ सभ तरहें ओ सुखी आ सम्पन्न छलाह। अपन अजेय दूर्ग–किलाबंदी आ सेनापर अटूट विश्वास छलन्हि आ आइ धरि कतहु हुनक माथ झुकल नहि छलन्हि। गयासुद्दीनक पहुँचबाक समाचार सुनितहिं ओ एतेक भयभीत भऽ गेलाह जे हुनक सब घमण्ड धूल–धूसरित भऽ गेल। अपन प्रतिष्ठा बचेबाक हेतु ओ अपन तेज घोड़ापर चढ़िकेँ भागि गेलाह। वसातिनुलउंसक लेखकक विचार अछि जे जँ राजा मेलसँ चाहतैथ तँ गयासुद्दीन हुनका संग बढ़िया व्यवहार करितथिन मुदा ओ बिनु कोनो प्रकारक वार्ता कएने भागि गेला। अपन स्वतंत्रताक रक्षाक हेतु ओ पहाड़क कोरामे नुका रहलाह। गयासुद्दीन ओहिठाम थोड़ेक दिन ठहरि समस्त राज्यक शासनक व्यवस्था अपने निर्देशनमे केलन्हि। ग्राम मुखिया (मकोद्दम) लोकनिक संग नीक व्यवहार दर्शौलन्हि आ तकर बाद सब प्रबंध केला उत्तर ओहिठामसँ अपन राजधानी दिसि बढ़लाह। एकर अतिरिक्त एकटा आर महत्वपूर्ण साधन अछि मुल्ला तकियाक वयाज। मुल्ला तकियाक वयाज पटनाक मासिक (पटना–१९४६)मे छपल अछि आ ‘मिथिला’ साप्ताहिकमे सेहो एकर मुख्य साराँश मैथिलीमे छपल छल बहुत दिन पूर्वहिं जे आब उपलब्ध नहि अछि। मुल्ला तकिया मुगल कालीन रइस छलाह। आसाम जेबाक क्रममे मिथिला होइत गेल छलाह आ ताहि दिनमे एहिठाम जत्तेक जे किछु छल तकर विस्तृत विवरण संकलित कए ओ मिथिलाक एकटा व्योरेवार इतिहास बनौने छलाह। एकर अतिरिक्त फरिता, अलवदाओनी, अबुल फजल, अब्दुल सलिम आ गुलाम होसेन हुसेनक पोथी सभसँ सेहो मिथिलाक इतिहासपर पर्याप्त प्रकाश पड़इत अछि। मुसलमानी साधनक अतिरिक्त इस्ट इण्डिया कम्पनीक रेकार्डस, कलक्टरेटक कागज पत्र, अंग्रेज कर्मचारी लोकनिक मध्य भेल पत्राचार, जमीन्दारीक कागज आ दरभंगा राजक सचिवालय एवँ रेकार्डस रूममे सुरक्षित पुरान कागज सभ सेहो मिथिलाक इतिहासक निर्माणक हेतु सहायक सिद्ध होएत। मिथिलामे जे बहुत रास जमीन्दारी छल ओहि सभ जमीन्दारक ओतए विभिन्न प्रकारक सरकारी गैर सरकारी कागज उपलब्ध अछि आ ओहि सभसँ मिथिलाक आधुनिक इतिहासक निर्माणमे काफी सहायता भेट सकइयै। एहि सभ कऽ संकलन एवँ प्रकाशन आवश्यक अछि– दरभंगा राज्यक इतिहासक निर्माणमे एहिसँ बड्ड सहायता भेटल अछि। दरभंगा, बनैली, नरहन, बेतिया, सुरसंड, गंधवरिया, चक्रवार आदि राजवंशक वृहद एवँ वैज्ञानिक इतिहास नहि लिखल जा सकल अछि। दरभंगा राजक अतिरिक्त बाँकी राज सभहक संबंध हमरा लोकनिकेँ पूर्ण जानकारियो नहि अछि कारण साधनक अभाव अछि। एहि सभ साधनक वैज्ञानिक अध्ययन केलासँ मिथिलाक प्रामाणिक इतिहासक निर्माण भऽ सकइयै। सब साधनक समीचीन व्याख्या केला उत्तरे हमरा लोकनि मिथिलाक समीक्षात्मक सर्वेक्षण कऽ सकैत छी। ओना आन प्रांतक तुलना एहिठाम साधनक सर्वथा अभावे कहल जाएत तथापि जतवा जे उपलब्ध अछि ताहिपर वैज्ञानिक रूपें अध्ययन करब आवश्यक। मिथिलाक हेतु मैथिली साधनपर विशेष निर्भर करए पड़त। एहि प्रसंगमे एकटा उदाहरण देव अप्रासंगिक नहि होइत। विद्यापति कवि होइतहुँ इतिहासक नीक ज्ञाता छलाह जकर प्रमाण हमरा हुनक ग्रंथ सभसँ भेटइत अछि। पुरूष परीक्षा जाहि सिल–सिलेवार ढंगसँ ओ ऐतिहासिक व्यक्तित्वक विवेचन कएने छथि ताहिसँ हुनक ऐतिहासिक बोध एवँ वस्तुनिष्ठताक पता लगइयै। (एहि सबंधमे द्रष्टव्य–हमर लेख–विद्यापतिज पुरूष परीक्षा–जे हमर ‘हिस्ट्री आफ मुस्लिम रूल इन तिरहुत’क परिशिष्टमे छपल अछि।) ज्ञातव्य जे पुरूष परीक्षाक अध्ययन केला उपरांत स्वर्गीय चन्दा झा मिथिलाक इतिहासक अध्ययन दिसि आकृष्ट भेल छलाह आ ओहि संबंधमे बहुत रास सामग्री सेहो जमा केने छलाह। कीर्तिलता, कीर्तिपताका, लिखनावली आदि ग्रंथ सेहो ओतवे महत्वपूर्ण अछि। मिथिलाक इतिहासक लेल मैथिली साधनक हेतु खोज करए पड़त कारण एकर एकटा अविच्छिन्न प्रवाह वैदिक कालसँ अद्यावधि बनल अछि। यशस्तिलकचम्पूमे तिरहुत रेजिमेंटक विवरण मिथिलाक स्वतंत्र व्यक्तित्वकेँ स्पष्ट करइत अछि जकर स्पष्टोक्ति विद्यापतिमे भेल अछि। मिथिलाक इतिहासक निर्माणक हेतु उपरोक्त सभ साधनक वैज्ञानिक अध्ययन एवं ओकर समीक्षात्मक विश्लेषण अपेक्षित अछि। अघ्‍याय–३ जनकवंशक इतिहास कुरू–पाँचालमे कुरूवंशक अंत भेला उत्तर भारतक जे सर्व प्रसिद्ध राजवंश छल तकरे हमरा लोकनि जनक वंशक नामसँ जनैत छी। एहि वंशक सर्वश्रेष्ठ एवँ सर्व प्रसिद्ध राजा छलाह जनक जनिक दरबार दर्शनक प्रसिद्ध केन्द्र छल आ ओहि हेतु मिथिलामे जनक वंशक एतेक प्रसिद्धियो अछि। कुरू लोकनिक अवसानक कालमे पूर्वी भारतमे जनक वंश उत्थानक पथपर छल। एकर सभसँ पैघ प्रमाण इ अछि जे ब्राह्मण साहित्यमे ताहि दिनमे कुरू राजकुमार लोकनिकेँ ‘राजन’क संज्ञासँ सम्बोधित कैल जाइत छलन्हि आ जनक राजवंशक लोककेँ ‘सम्राट’क संज्ञासँ। शतपथ ब्राह्मणमे सम्राटकेँ राजनसँ पैघ मानल गेल अछि। पौराणिक चाकरायन आ निचक्षुक समयमे कुरू लोकनिक पतन भेल छलन्हि। राजा परीक्षितक अवसान भऽ चुकल छल परञ्च हुनक स्मृति अखनो लोकक मध्य विराजमान छल आ मिथिलाक राजदरबारमे ओ अहुँखन श्रद्धाक संग चर्चित छलाह। जनकक सभामे जे दार्शनिक विचार–विमर्श एवँ चिंतनक क्रम चलैत छल ताहुठाम राजा परीक्षित एकटा विचारणीय विषय बनल छलाह जेना कि भुज्यु लाह्यायनि एवँ याज्ञवल्क्यक विवादसँ स्पष्ट होइछ। सम्प्रति हमरा लोकनिक समक्ष जे साधन मिलल अछि ताहि आधार इ कहब कठिन अछि जे जनमेजेय आ जनक वंशक मध्य कोनो प्रकारक सम्पर्क छल अथवा नहि। पुराण एवँ महाकाव्यमे जनक आ परीक्षित वंशकेँ सम–सामयिक कहल गेल छैक। जनककेँ उद्दालक आरूणि आ याज्ञवल्क्यक सम–सामयिक कहल गेल छैक। महाभारतमे वर्णित अछि जे जनमेजेयक सर्पसत्रमे उद्दालक आरूणि एवँ हुनक पुत्र श्वेतकेतु उपस्थित छलाह। विष्णुपुराणमे तँ एतवा धरि कहल गेल अछि जे जनमेजेयक पुत्र एवँ अधिकारी शतानीक याज्ञवल्क्यसँ वेदक शिक्षा ग्रहण केलन्हि। उपरोक्त कथनकेँ प्रामाणिक मानव असंभव कारण वैदिक साहित्य, पुराण आ महाकाव्यक मध्य तिथि निर्धारण एवँ राजवंशक साक्ष्यक सम्बन्धमे एकटा विरोधाभास अछि आ तैं अद्यावधि एहि सभ शासक लोकनिक काल निर्धारण एकटा समस्ये बनल अछि। देश–विदेशमे एहि प्रश्नपर वेस विवाद भेल अछि परञ्च तइयो प्रामाणिकताक लेशमात्र कतहु देखबामे नहि अवइयै। शतपथ ब्राह्मणक अनुसार दैवापशौनक जनमेजेयक सम–सामयिक छलाह। जैमिनी उपनिषद एवँ वंश ब्राह्मणक अनुसार दैवाप शौनकक शिष्य छलाह दृति एन्द्रोत आ एन्द्रोतक शिष्य छलाह पुलुष प्राचीन योग्य। पुलुषक शिष्य छलाह पौलुषी सत्ययज्ञ। छान्दोग्य उपनिषदक अनुसार सत्ययज्ञ उद्दालक आरूणि एवँ बुडिल आश्वतराश्वीक समकालीन छलाह आ एहि हिसाबे तँ ओ जनकक समकालीन सेहो रहल हेताह। एहिसँ स्पष्ट होइछ जे एन्द्रोत जनमेजेयक समकालीन रहल हेताह आ सातयज्ञि जनकक। जनक जनमेजेयसँ पाँच–छह पीढ़ी बादमे भेल होथि से संभव। विदेह राजक सर्वप्रथम उल्लेख हमरा लोकनिकेँ यजुर्वेदक संहितामे भेटइत अछि। वाल्मीकि रामायणक अनुसार एहि राजवंशक मूल संस्थापक छलाह राजा निमि। हुनके पुत्र छलाह मिथि आ मिथिक पुत्र जनक प्रथम। ओहि वंशक जे सीताक पिता छलाह उएह भेलाह जनक द्वितीय आ हुनक भ्राता कुशध्वज साँकास्यक शासक छलाह। वायु एवँ विष्णुपुराणमे निमिकेँ इक्ष्वाकुक पुत्र कहल गेल अछि आ ओहि निमिकेँ विदेहक संज्ञा सेहो देल गेल अछि। ओहि ‘विदेह’सँ ओहि क्षेत्रक नाम विदेह सेहो पड़ल। वायुपुराणमे वशिष्ठक जाहि श्रापक उल्लेख अछि तकर वर्णन हमरा लोकनिकेँ बृहद्देवतामे सेहो भेटइत अछि। उपरोक्त दुनू पुराणक अनुसार निमिक पुत्र ‘मिथि’केँ जनक प्रथम सेहो मानल जाइत अछि आ ओहि क्रममे सीताक पिताक नाम सीरध्वज जनक सेहो भेटइत अछि। इएह सीरध्वज संभवतः रामायणक द्वितीय जनक भऽ सकैत छथि। पुराणक अनुसार एहिवंशक अंतिम राजा कृति छलाह। रामायण, महाभारत आ पुराणक अध्ययनसँ इ स्पष्ट होइछ जे जनक, व्यक्ति विशेषक नामक अतिरिक्त, वंशक नाम सेहो छल। एहि प्रसंगमे इ स्मरण राखब आवश्यक जे एहि वंशक क्रममे जनकानाम, जनकै आदि शब्दक जे प्रयोग भेल अछि ताहुसँ उपरोक्त कथन प्रमाणित होइत अछि। वैदिक साहित्यमे नमिसाप्य नामक एकटा विदेहक राजाक उल्लेख सेहो भेटइत अछि। मुदा एहिठाम इ स्मरणीय जे नमिसाप्य कतहु कोनोठाम मिथिलाक राजवंशक संस्थापकक रूप नहि उपस्थित कैल गेल अछि। शतपथ ब्राह्मणक कथासँ एतवा धरि स्पष्ट अछि जे विदेघ माथव मिथिलाक राजवंशक ऐतिहासिक संस्थापक छलाह। ओ सरस्वती नदीक तटसँ सदानीरा (गण्डकी)केँ तट धरि आएल छलाह। हुनका संग हुनक पुरोहित गोतम राहुगण। सरस्वतीक तटसँ जंगलकेँ जरबैत ओ लोकनि मिथिला धरि पहुँचलाह। एहिसँ पूर्व कोनो ब्राह्मण एम्हर एतए दूर धरि नहि आएल छलाह कारण ताधरि एहि क्षेत्रकेँ अग्नि वैश्वानर द्वारा जराओल नहि गेल छल। एम्हुरका जमीन दल–दल छल आ किछु उपजा वारी नहि होइत छल। अग्निदेव जखन एहि भूमिकेँ जराकेँ पवित्र केलन्हि तखन माथव हुनकासँ पूछलथिन्ह जें हम आब कोम्हर जाइ ताहिपर अग्निदेव कहलथिन्ह जे अहाँ पूर्व दिस जाउ आ ओतहि अपन वास स्थापित करू तदुपरांत माथव विदेघ अथवा मिथि विदेह ओहिना काज केलन्हि आ उत्तर पूर्वी भारतमे एकमात्र आर्य राज्यक स्थापना संभव भेल। जँ हमरा लोकनि शतपथ ब्राह्मणक एहि कथाक ऐतिहासिकताकेँ स्वीकार करैत छी तखन तँ इ स्पष्ट भऽ जाइछ जे ‘निमि साप्य’ मिथिलाक संस्थापक नहि छलाह आ नञि हुनका इ प्रतिष्ठे देल जा सकैत छन्हि। मज्झिम निकाय आ निमि जातकमे मखादेवकेँ मिथिलाक राजवंशक संस्थापक कहल गेल छैक। जनक वंशक सम्बन्धमे एवँ प्रकारे ततेक रास नञि मतभेद अछि जे ओहि प्रसंगमे कोनो निर्णयात्मक उत्तर देव असंभव। बृहद्देवतामे उल्लेख अछि जे विदेह लोकनि सरस्वती तटसँ मिथिला पहुँचला उपरांतो अपन वंशसँ सरस्वती नदी संबंध बहुत दिन धरि बनौने रहलाह आ एहि बातक पुष्टि तखन आर होइछ जखन हमरा लोकनि पंचविंश ब्राह्मणक निमि साप्य प्रकरणपर दृष्टिपात करैत छी। बौद्ध साहित्यमे मिथिलामे निमिकेँ प्रथम शासक नहि मानि बादक शासक मानल गेल अछि। मिथिलाक राजवंशकेँ सामान्यतः जनक वंश कहल गेल अछि तैं कोन जनक ‘महान जनक’ छलाह जनिक पुत्री सीता छलथिन्ह अथवा जनिक दरबारमे विद्वदजनक गोष्ठी भेल छल से कहब असंभव। ओकर प्रामाणिकता सिद्ध करब सेहो असंभव। विभिन्न स्त्रोतसँ उपलब्ध सामग्रीक अध्ययन केला संता हमरा लोकनि एहि निष्कर्षपर पहुँचैत छी जे सीताक पिताक नाम छल सीरध्वज जनक। पुराणमे जनक राजवंशक जे सूची अछि ताहि आधारपर हमरा लोकनि उपरोक्त निर्णयपर पहुँचैत छी। अयोध्याक भरतक माम छलथिन्ह केकेयीक राजा अश्वपति आ सीरध्वज जनक हुनके समकालीन छलाह। उद्दालक आरूणि आ बुडिल एहि दुनू राजाक दरबारमे बरोबरि जाइत छलाह। भवभूति सेहो एहिमतक समर्थक छथि जे सीरध्वज जनक सीताक पिता छलाह। जातक नं ५३९मे जाहि महाजनकक चर्च अछि सैह संभवतः सीरध्वज जनक छलाह आ हुनके दरबार विद्वानक हेतु विश्वविख्यात छल। एहि महाजनकक सम्बन्धमे कहबी अछि– “ मिथिलायाम् प्रदिप्तायाम् न मे दहयति किञ्चन्। अपिच भऽवति मैथिलेन गीतम् नगरम् उपाहितम् अग्निनाभिविक्ष्य, न खलु मम हि दह्यतेत्र किञ्चित् स्वयमिदमाह किलस्म भूमिपालः” एहिसँ तँ स्पष्ट रूपे जनक विदेहक बोध होइछ। महाभारत, शतपथ ब्राह्मण एवँ वृहदारण्यकोपनिषदमे जनककेँ सम्राटक संज्ञा देल गेल छैक। सम्राट जनकक महानताक द्योतक कहल जा सकइयै कारण बिनु वाजपेय यज्ञ केने केओ सम्राट नहि कहा सकैत छल। आश्वलायन स्त्रोत सूत्रमे जनककेँ महान यज्ञकर्ताक रूपमे वर्णन कैल गेल छन्हि। सम्राटक हिसाबें कम आ चिंतक एवँ दार्शनिक हिसाबें बेसी इ महान जनक इतिहासमे विशेष प्रसिद्ध छथि आ मिथिलाक अहुना जतवा जे सांस्कृतिक प्रतिष्ठा अछि ओकर जड़िमे छथि इएह राजा जनक आ हुनक राजदरबार। ताहि दिनमे मिथिलाक राजदरबार संस्कृति आ दर्शनक प्रधान केन्द्र छल आ एहिठाम विजय प्राप्त करबाक अर्थ होइत छल समस्त भारतमे यश प्राप्त करब। कुरू पाँचाल, मद्र, कौशल आदि स्थानक विद्वान लोकनि जनकक दरबारकेँ सुशोभित करैत छलाह। किछु प्रसिद्ध विद्वानक नाम एवँ प्रकार छन्हि–अश्वल, जारतकारव आर्तभाग, भुज्यु लाहयायनि, उषस्त चाकरायण, कहोड़ (कहोल) कौषीतकेय, गार्गी वाचक्नवी, उद्दालक आरूणि, आ विदग्ध शाकल्य इत्यादि। कुरू–पाँचालक ब्राह्मण संग जनकक सम्बन्ध विलक्षण छलन्हि आ ओहिठामसँ तरह–तरहक विद्वानकेँ ओ अपना ओतए बजबैत छलाह। राजा जनकक संबंधमे ऐतिहासिकताक जतवा जे अभाव हो मुदा ओकर साँस्कृतिक महत्वक सम्बन्धमे ककरो कोनो प्रकारक सन्देह नहि छन्हि। जेना कि उपर कहल जा चुकल अछि जनक वंशक प्रामाणिक इतिहास प्रस्तुत करब एकटा कठिन समस्या अहुँखन बनले अछि आ सम्प्रति एकर कोनो निदानो देखबामे नहि अवइयै। जाहि ‘कृत’केँ कुतक्षणसँ तुलना कैल गेल अछि से संभवतः कराल जनक रहल हेताह कारण ऐतिहासिक दृष्टिकोणसँ हमरा लोकनि जनैत छी जे कराल जनक अजातशत्रुक समकालीन छलाह आ हुनके शासन कालमे जनक वंशक अंत भेल। इहो संभव जे ‘कृति’ आ ‘कराल’ दुनू जनक वंशक अंतिम शासक होथि। वैदिक साहित्यमे माथव आ जनकक अतिरिक्त दू आ विदेह वंशक उल्लेख भेटइत अछि–निमि साप्य आ पर आहलारक। किछु विद्वान पर अाहलारकें कोशलक शासक पर आतणारसँ मिलबैत छथि। पंचविंश ब्राह्मणमे निमि साप्यकेँ एक महान यज्ञकर्ता कहल गेल अछि आ तैं किछु गोटए हुनका जनकसँ मिलबैत छथि। वैदिक निमि साप्यक तुलना उतराध्यायन सूत्रक राजा निमिसँ। विष्णुपुराणक नेमीसँ, मज्झिम निकायक मखादेव सुत्तक निमिसँ तथा कुम्भकार एवँ निमिजातकमे वर्णित ओहि नामक राजासँ करैत छथि। एकर प्रत्यक्षीकरण अखनो एकटा ऐतिहासिक समस्या बनल अछि। निमिजातकक अनुसार ओ मैथिल राजवंशक अंतिम शासक छलाह आ संगहि पाँचालक राजा द्विमुख, गाँधारक नग्गति आ कलिंगक करण्डुक समकालीन सेहो। मज्झिम निकायक उपरोक्त सुत्तमे कराल(कलार) जनककेँ निमिक पुत्र कहल गेल अछि। कौटिल्यक अर्थशास्त्रमे एहि कराल जनककेँ ‘वैदेह’ कहल गेल अछि। एहि राजाक संग ‘वैदेह’ वंशक अंत भेल। वैदेह वंशक अंत होइतहि एहिठाम कुलीनतंत्री गणतंत्रक स्थापना भेल आ इ वैशाली कुलीनतंत्र अथवा वृज्जिसंघक एकटा प्रमुख अंग बनि गेल। प्राचीन परंपरासँ एहिबातक सबूत भेटइत अछि जे विदेहक पतनमे काशीक हाथ सेहो छल। अजातशत्रु विदेह राज्यक यश–प्रतिष्ठाकेँ देखि इर्ष्या करैत छलाह। काशी आ विदेहमे बरोबरि संघर्ष होइत रहैत छलैक। महाभारतक अनुसार काशीक प्रतरदन आ विदेहक जनकक मध्य संघर्ष भेल छल। परमथ्थजोतिक नामक बौद्ध ग्रंथमे कहल गेल अछि जे जनक वंशक अंत भेलापर उत्तर बिहार अथवा मिथिलामे लिच्छवी लोकनिक शक्तिशाली शासन प्रारंभ भेल। लिच्छवीक सम्बन्ध सेहो काशीसँ बताओल जाइत अछि। किछु स्त्रोत सभ मे एहि बातक दिसि संकेत कैल गेल अछि जे वैशाली विदेहपर अप्रत्यक्ष वा प्रत्यक्ष रूपें काशीक प्रभाव छल। यजुर्वेद संहिताक अध्ययनसँ ज्ञात होइछ जे ब्राह्मण युगमे विदेहक राजनैतिक आ साँस्कृतिक महत्व एक्के रंग छल। ताहि दिनमे विदेहक गाय समस्त उत्तरी भारतमे प्रसिद्ध छल। पश्चिममे जे स्थान कुरू–पाँचाल लोकनिक छलन्हि से पूर्वमे कोशल–विदेह लोकनिक। कोशल आ विदेहक निवासी विदेघ माथवकेँ अपन पूर्वज अथवा संस्थापक मनैत छथि। एहिठाम इ स्मरण रखबाक अछि जे विदेघ माथव (विदेह माधव) अपना मुँहमे अग्निवैश्वानरकेँ लऽ कऽ चलल छलाह। एहिसँ इ स्पष्ट अछि जे पूर्वी भारतक इ समस्त हिस्सा जंगल आ दलदल छल आ अग्नि वैश्वानरक प्रतापें ओहि जंगलकेँ जराकेँ विदेघ माथव एकरा रहबा योग्य भूमि बनौलन्हि। विदेह आर्यक प्रसारक पूर्वी सीमारेखा बनल। एकटा प्राचीन परंपरामे तँ इहो कहल गेल अछि जे विदेहक आर्यीकरण भेलाक पछाति शतपथ ब्राह्मणक रचना विदेहेमे भेल। एहि सम्बन्धमे विद्वानक मध्य काफी मतभेद अछि। एतवा धरि निश्चित एवँ निर्विवाद रूपें कहल जा सकइयै जे विदेहक साँस्कृतिक मान्यता समस्त उत्तर भारतमे छल। उपनिषदक युग विदेहक ब्राह्मणक प्रतिष्ठा कुरू–पाँचालक ब्राह्मणसँ विशेष छल। विदेहक महत्व एतेक छल जे बादोमे एकर चर्च विभिन्न साहित्य इत्यादिमे होइत रहल। जातक, बौद्ध साहित्य, अध्यात्म रामायण, रामायण आदि ग्रंथ सबमे विदेहक वैशिष्ट्यक विश्लेषण भेटइत अछि। अपन दिग्विजयक क्रममे भीम विदेहक राजाकेँ पराजित कएने छलाह। विदेहक राजधानी मिथिलापर कर्ण अपन दिग्विजयक क्रममे अपन आधिपत्य स्थापित कएने छलाह। शांति पर्वमे एक स्थलपर जनक–याज्ञवल्क्यक वार्तालापक प्रसंग आएल अछि। एकर अतिरिक्त महाभारतमे विदेह राज जनकक प्रसंगमे निम्नलिखित बातक उल्लेख भेटइयै– ______ i) जनकक आध्यात्मिकताक विवरण; ______ ii) पंचशिख आ शुलभाक संग जनकक वार्तालाप; ______ iii) शुककेँ जनक द्वारा शिक्षा देबाक प्रसंग; भीम आ अर्जुनक संग जखन कृष्ण इन्द्रप्रस्थसँ राजगीर जाइत छलाह तखन ओ मिथिला सेहो आएल छलाह आ एहेन बुझि पड़इयै जे ताहि दिनमे राजगीर जेबाक बाट मिथिले दऽ कए छल। भीष्म पर्वमे विदेह लोकनिक विश्लेषण अछि। भीष्म पर्वक एक स्थान पर विदेह लोकनिक उल्लेख एक बेर मगध लोकनिक संग आ दोसर बेर ताम्रलिप्तक लोकनिक संग भेल अछि। ‘विदेह’ शब्दक उत्पत्तिक विवरण विशद् रूपेण विष्णु पुराणमे भेटइत अछि। विदेह निमिसँ उत्पन्न मिथि जे नगर बसौलन्हि सैह मिथिला कहाओल। दीघनिकायक महागोविन्द सुत्तांतमे कहल गेल अछि जे गोविन्द नामक एक व्यक्ति मिथिलाक संस्थापक छलाह। विभिन्न स्त्रोतसँ विदेहक विभिन्न राजा लोकनिक नाम भेटइत अछि–सागर देव, भरत, अंगीरस, रूचि, सुरूचि, पताप, महापताल, सुदश्शन, नेरू, महासम्मत, मुचल, महामुचल, कल्यानद्वय, सतधनु, मखादेव, साधीन इत्यादि। स्वप्नवासवादत्तम् (अंक–६)मे सेहो उदयनकेँ ‘वैदेहीपुत्र’ कहल गेल छन्हि। बिम्बिसारक पत्नी वासवी (अजातशत्रुक माय) सेहो ‘विदेहपुत्री’ छलीहे। वर्धमान महावीर विदेहपुत्री विदेहदत्ताक पुत्र छलाह आ ओ स्वयं बहुत दिनधरि मिथिला–विदेहमे रहल छलाह। छह टा वर्षावास ओ विदेहमे बितौने छलाह। महावीर आ बुद्धक समयमे जे वृज्जि संघ छल तकर दूटा प्रमुख सदस्य छलाह लिच्छवी आ विदेह लोकनि। एहि वृज्जि संघकेँ कौटिल्य राजशब्दोपजीवी संघ कहने छथि। विदेहक वन सम्पत्ति महत्वपूर्ण छल आ एहिठामक प्राकृतिक साधन सेहो समृद्ध छल। धन, जन, पशुक कतहु कोनो अभाव नहि छल। जातकक अनुसार विदेहमे १६००० गाँव छल आ १६००० नाचैवाली छौड़ी। रथ, घोड़ा, हाथी, बरद, गाय, माल आदिक तैं कथेऽ नञ। चीनी यात्री लोकनि सेहो मिथिला–विदेह आ वृज्जीक विवरण उपस्थित कएने छथि आ ओहि आधारपर किछु विद्वान मिथिलाक राजधानी जनकपुरकेँ मानैत छथि। जातकमे एवँ जैन ग्रंथ सभमे विदेह संबधी असंख्य कथा सभ सुरक्षित अछि। एक कथामे कहल गेल अछि जे विदेहक राजाकेँ गान्धार राज वोधिसत्वक संग मित्रताक सम्बन्ध छलन्हि। दुनू अपन राजकेँ छोड़ि तपस्या करबाक हेतु हिमालय गेल छलाह। मखादेव, साधीन, सुरूचि आदिक सम्बन्धमे सेहो कैक प्रकारक कथा जातकमे सुरक्षित अछि। साधीन एक पवित्र आत्मा छलाह जनिक न्यायप्रियतासँ इश्वर लोकनि सेहो प्रभावित छलाह। सुरूचिक पत्नीक नाम सुमेधा छलन्हि आ उहो दुनू गोटए परम धर्मात्मा छलाह। वैदिक युगमे काशी, कोशल आ विदेह प्रधान आर्य केन्द्र छल। मगध आ अंगक निवासीकेँ व्रात्‍य बुझल जाइत छलैक आ व्रात्‍य अर्थ होइत छल ‘पतित’। प्राच्यक सबटा आर्य केन्द्र सभमे विदेह सर्व प्रधान छल। गौतम, याज्ञवल्क्य, भृगु, वामदेव, कण्व, अगस्त, भार्गव, भारद्वाज, इत्यादि ऋषिगण विदेहमे एकत्र भेल छलाह आ सत्प्रयाससँ ओ निमिकेँ जीवित केँलन्हि। मिथिला–विदेहक शासक लोकनि जनक आ “वैदेह” पदवीसँ विभूषित होइत छलाह। राजा जनक ‘ब्रह्मज्ञान’क अंवेषणार्थ कुरू पाँचालसँ बहुत रास ब्राह्मणकेँ बजौलन्हि आ ओहिक्रम ओ याज्ञवल्क्यसँ ब्रह्मविद्याक उपदेश पऔलनि। याज्ञवल्क्य जनकक राजगुरू बनलाह आ विदेहमे ब्रह्मविद्याक केन्द्र स्थापित भेल। विदेह आ अयोध्यामे वैवाहिक संबंध स्थापित भेल। महाभारत युद्धमे मिथिलाक राजा क्षेमधूर्त्ति दुर्योधनक पक्षमे छलाह किएक तँ पाण्डुवंश एक बेर मिथिलापर आक्रमण कएने छलाह। दुर्योधन मिथिलेमे बलभद्रक ओतए गदा सिखने छलाह आ तखनहिसँ मिथिलेश आ दुर्योधनमे बेस मित्रता भऽ गेल छलन्हि। महाभारत युद्धक समयमे मिथिलामे विराट नामक एकटा शासक छलाह। दरभंगा जिलाक बराटपुर आ सहरसा जिलाक बराटपुर दुनू एहि राजाक राजधानी कहल जाइयै। सहरसाक वराटपुरसँ साबिकक वस्तु सेहो प्राप्त भेल अछि ओ जाहिमे मध्य युगक एकटा शिलालेख सेहो अछि। नेपाल क्षेत्रमे सेहो एकटा विराटनगर छैक। मिथिला स्थित विराटनगरमे युधिष्ठिर राजा विराटक ओतए बहुत दिन धरि अज्ञातवासमे रहल छलाह। कहल जाइछ जे वराटपुर आ कीचकगढ़ प्रांत सहरसा जिलाक धर्मपुर परगनामे छल आ पचपड़रिया ग्राममे पाण्डव लोकनि अपन अज्ञातवासक समय बितौने छलाह। विदेहक सम्बन्धमे जे सामग्री उपलब्ध अछि ताहि आधारपर निर्णयात्मक इतिहासक निर्माण करब असंभव अछि। प्राच्यमे रहनिहार काशी, कोशल, मगध, आ विदेहक लोगमे विदेह वासीकेँ विशिष्ट स्थान देल गेल छैक। मनुस्मृतिमे वैश्य पिता आ ब्राह्मण मातासँ उत्पन्न व्यक्तिकेँ “वैदेह” कहल गेल छैक। मनुस्मृति मे ब्रह्मर्षि देशकेँ विशेष महत्व देल गेल छैक जतए भरत लोकनि रहैत छलाह। एकर अर्थ इ भेल जे मनु पूर्वी क्षेत्रकेँ बहुत पवित्र नहि मानैत छलाह। लिच्छविक संग ओ विदेह लोकनिकेँ सेहो व्रात्यक कोटिमे रखने छथि। मनु चाहे एहि क्षेत्रकेँ जाहि हिसाबे देखने होथि, महाभारतमे मिथिलाकेँ विशेष प्रतिष्ठा देल गेल अछि। शुखदेव तँ जनकसँ ब्रह्मविद्या सिखबाक हेतु मिथिला आएल छलाह। ‘जनक’ पदवीक प्रारंभ राजा मिथिक समयसँ भेल छल। I. जनक वंशक राजाक नामावली ____ निमि (विदेह) ____ मिथि ____ अरिष्टनेमि ____ सीरध्वज–(जनक द्वितीय), सीताक पिता (छोट भ्राता कुशध्वज- हिनका सँकाश्य जीतलापर सीरध्वज ओतुका राजा बना देलन्हि।) ____ भानुमंत ____ सतद्युम्न– (प्रद्युम्न) ____ शुचि (मुनि) ____ उर्जवह ____ सुतध्वज (सत्वध्वज, सनध्वज) ____ शकुनी (कुणी)-(एहिठामसँ जनक वंश दू भागमे बँटि गेल) II. (पुराणक अनुसार बनाओल सूची) ____ निमि ____ मिथि ____ उदावसु ____ नन्दिवर्धन ____ सुकेतु ____ देवराट् ____ बृहद्रथ (बृहदुक्त) ____ महावीर ____ सुधृति ____ धृष्टकेतु ____ हरयाश्व ____ मरू ____ प्रतिन्धक ____ कीर्तिरथ ____ देवमिढ़ ____ विबुद्ध ____ महिधक्र ____ कीर्तिराट ____ महारोमा ____ स्वर्णरोमा ____ हृस्वरोमा ____ सीरध्वज जनक (जनक द्वितीय) III. (सीरध्वजक वंशज) ____ कृतिजनक (अपना समयक महान शासक आ चिंतक) (बहुलाश्वक पुत्र) ____ उग्रायुध IV. साँकाश्‍यमे ____ कुशध्वज–(भरत आ शत्रुघ्नक ससूर) ____ धर्मध्वज ____ कृतध्वज आ ____ मितध्वज ____ खाण्डिक्य–(हिनका केँशीध्वजसँ युद्ध भेल छलैन्ह) ____ पुराणमे साँकाश्यक जनक वंशक अंत एहिठाम भऽ जाइत अछि। पार्जिटर महोदय अपन डायनस्टीज आफ द कलि एजमे लिखने छथि कलिंगाश्चैव द्वात्रिंशद् अश्मकाः पंचविंशतिः कुरवश्चापि षट्–त्रिशद् अष्टाविंशति मैथिलाः॥ महापद्मनन्द मैथिल राज्यकेँ पराजित कएने छलाह–ताहि दिन पुराणक अनुसार २४टा इक्ष्वाकु, २७टा पाँचाल, २४टा काशी, ३६टा कुरू आ २८टा मैथिल शासक क्षत्रिय वंशमे शासन कऽ चुकल छलाह। V. जातक सूची:- सुरूचि सुरूचि कुमार महापणाद संदिग्ध:- विदेह महाजनक अरित्थ जनक, पोल जनक महाजनक द्वितीय दिघावु कुमार VI. अन्यान्य राजाक नाम–(जातकसँ) _ कलार अथवा कराल जनक _ अंगति _ साधीन _ पर अहलार VII. विदेह राजतंत्रक अवसान अर्थशास्त्र मे– दाण्डक्यो नाम भोजः कामाद ब्राह्मणकान्यामभिमन्यमानः सुबन्धुराष्ट्रो विनाशकरालश्च वैदेहः। एहिसँ स्पष्ट अछि जे कराल जनकक समयमे मिथिलाक राजतंत्रक अंत भेल। राजा कराल व्यभिचारी छलाह आ अपन चरित्रक चलते हुनका राजगद्दीसँ हाथ धोमए पड़लन्हि। अश्वघोष अपन बुद्धचरितमे सेहो एहि प्रसंगमे लिखने छथि– “कराल जनकश्चैव हृत्वा ब्राह्मणकन्यकाम् अवापभ्रंशमप्येवं न तु से जे न मन्मथम्” कहल जाइत अछि जे कराल जनकक प्रजा राजाक दुर्व्यहारसँ तंग आबि विद्रोह केलन्हि आ राजाकेँ मारिओ देलन्हि आ विदेह राजतंत्रक ओहि दिनसँ अंत भऽ गेल। विदेह राजतंत्रक अवसानमे भीतरे–भीतर काशीक हाथ सेहो रहल होएत एहन अन्दाज लगाओल जा सकइयै। सुरूचि जातकक अनुसार काशीक राजा ब्रह्मदत्त अपन पुत्री सुमेधाक विवाह विदेहक राजकुमारसँ करेबा लेल तैयार नहि भेला आ तकरा चलते विदेह राज काशीपर खिसिया गेलाह। आरो बहुत रास बात लऽ कए काशी मिथिलाक उन्नति नहि देखए चाहैत छल आ तरे–तर मिथिलाकेँ नष्ट करबाक कुचक्र करैत रहैत छल। काशीक अतिरिक्त कुरू–पाँचालसँ सेहो मिथिलाकेँ मतभेद रहैत छलैक। कुरू–पाँचालक महत्व घटलाक बाद मिथिलाक प्रगतिसँ कुरू–पाँचालकेँ इर्ष्या होइत छलैक। कुरू–पाँचालसँ पैघ विद्वानोंकेँ एहिठाम बजाओत जाइत छलैक। महाउमग्ग जातकसँ ज्ञात होइछ जे उत्तर पाँचालक राजा ब्रह्मदत्तसँ मिथिलाक राजाकेँ लड़ाइ भेल छलैक आ एहि सभसँ दिनानुदिन मिथिलापर परेशानी बढ़ले जाइत छलैक। मिथिलाक राज्यमे सेहो आपसी संघर्ष होइते रहैत छलैक जाहिसँ ओहिठाम चारूकात असंतोष पसरल छल। इएह कारण छल जे खण्ड सन सुयोग्य महामंत्री विदेह छोड़िकेँ वैशाली चलि गेल छलाह आ ओहिठाम सम्मानित भेल छलाह। बुद्धघोषक अनुसारे जनक वंशक शासनक अंत भेला उपरांत लिच्छवी लोकनि ओकर उत्तराधिकारी भेलाह परञ्च एहि प्रश्नकेँ लऽ कए विद्वानक बीच अखनो मतभेद बनल अछि। पौराणिक आधारपर कहल जाइये जे वैशालीमे इक्ष्वाकु वंशक अंत भेलापर वैशाली मिथिलामे मिलगेल परञ्च अहुपर विद्वान लोकनि एकमत नहि छथि। विदेह वृज्जीगणराज्यक (जाहिमे आठ गणराज्य सम्मिलित छल) एक प्रमुख सदस्यक रूपमे छल। संघक रूपमे पतञ्जलि विदेहक वर्णन केने छथि– “संघान्माभूत् पंचालानाम पत्यम् विदेहा नामपत्यमिति”। विदेह आ वैशालीमे इ.पू. ६ठम शताब्दी गणराज्य छल से मानल जाइत अछि। कराल जनकक बाद संभवतः मिथिलामे गणराज्यक स्थापना भेला उत्तरो ओहिठाम शासककेँ राजा कहल जाइत होन्हि से संभव। उवासगद साओ (५म शताब्दीक)मे मिथिलाक वर्णन अछि। १२म शताब्दीक अभिधानप्पदीपिकामे २४ प्रसिद्ध नगरक नाममे मिथिला आ वैशालीक नाम अछि। जैन आ बौद्ध साहित्यमे मिथिलाकेँ गणराज्यक रूपमे वर्णन कैल गेल छैक आ ओहिसँ ओकर प्रसिद्धि छलैक से स्पष्ट अछि। वैशाली समेत जे दशटा गणराज्यक उल्लेख पालि साहित्यमे अछि ताहिमे मिथिलोक स्थान छल जाहिसँ बुझना जाइत अछि जे कराल जनकक पतनक बाद वैशाली समेत विदेहमे गणराज्यक स्थापना भऽ गेल। बुद्धक समयमे विदेहक गणना गणराज्यक रूपमे कैल गेल अछि। अजातशत्रुक आक्रमणसँ वैशालीक अंत भेल आ महापद्मनन्दक आक्रमणसँ मिथिलाक। वैशालीक पतनक बादो लगभग २५० वर्ष धरि मिथिला अपनाकेँ मगध साम्राज्यवादक चाङुरसँ मुक्त रखबामे सफल रहल छल। नंदवंशक बाद भारतमे मौर्यक तत्वावधानमे एकटा अखिल भारतीय साम्राज्यक स्थापना भेल आ मिथिला ओकरे अंग भऽ गेल। अध्याय–४ वैशालीक इतिहास i.) भौगोलिक विश्लेषण:- अति प्राचीन कालमे भौगोलिक क्षेत्रक हिसाबे वैशाली विदेह राज्यक अंतर्गत छल, आ विदेह जकाँ वैशालीमे सेहो पहिने राजतंत्र छल आ तत्पश्चात् गणतंत्र भेल। वैशाली गण्डकसँ पूर्व अछि आ एकर आर्यीकरण विदेहक संग भेल छल। प्राचीन उत्तर बिहारक वैशाली आ विदेह दुनू महत्वपूर्ण राज्य छल आ दुनूक अपन अलग–अलग ऐतिहासिक महत्व छैक। अति प्राचीन विदेहक अंग होइतहुँ, वैशालीक सेहो अपन एकटा निर्धारित क्षेत्र छैक। प्राचीन वैशालीक अंतर्गत चम्पारण आ मुजफ्फरपुर जिलाक विशेष भाग छल आ विदेहक अंतर्गत छल दरभंगा, कटिहार, समस्तीपुर, मधुबनी, सहरसा, पूर्णियाँ, अररिया, बेगूसराय, मूँगेरक उत्तरी भाग, भागलपुरक उत्तरी भाग आ नेपालक तराइ सेहो विदेह वैशालीक अंश छल। विदेह शब्दक अर्थ ताहि दिनमे वेस व्यापक छल–विदेह एकटा जातिक नामक संकेत सेहो दैत छल। विदेह एकटा भौगोलिक सीमाक प्रतीक छल एवँ विदेह एकटा राज्य छल जकरा अंतर्गत ताहि दिनमे गण्डकीक पूवसँ महानंदा धरिक समस्त क्षेत्र सम्मिलित छल। आधुनिक उत्तर बिहारक द्योतक छल विदेह। इएह कारण थिक जे एहि व्यापकताक कारणे महावीरक जन्मस्थान कुण्डग्रामकेँ विदेहमे मानल गेल अछि, अजातशत्रुकेँ वैदेही पुत्र कहल गेल अछि। विदेहक व्यापकताक प्रभाव पाछाँ धरि बनल रहल कारण हम देखैत छी जे ‘ललित विस्‍तर’मे विदेहक संगहि पूर्व विदेहक वर्णन सेहो अछि। शक्ति संगम तंत्रमे जे मिथिला क्षेत्रक वर्णन भेल अछि ताहिमे कहल गेल अछि गण्डकीक तीरसँ चम्पाक जंगल धरिक जे क्षेत्र अछि उएह क्षेत्र विदेह अथवा तैरभुक्ति कहबैत अछि। चम्पाक जंगलसँ एहिठाम बहुत गोटए चम्पारणक उत्तरी जंगली भागक अर्थ लैत छथि मुदा जखन हम एकर सीमाक विश्लेषण आन ठाम देखैत छी तखन हमरा इ बुझि पड़इयै जे इ विश्लेषण समीचीन नहि अछि कारण विदेहक सीमा एतबेटा नहि भऽ सकइयै। चम्पाक जंगल धरिक अर्थ भेल ओ क्षेत्र जे चम्पाक उत्तरी भागमे छल आ जकरा बौद्ध साहित्यमे अंगुतराप कहल गेल अछि। चम्पा आ विदेहक सीमा कोनो एक खास बिन्दु पर मिलैत छल एहिमे संदेह नहि। पुरूषोत्तम देव अपन त्रिकाण्डशेषमे एवं वामन अपन लिंगावुशासनमे विदेह आ तीरभुक्तिकेँ पर्यायवाची शब्द मानने छथि। बारहम शताब्दीक एकटा शिलालेखमे वैशालीकेँ तीरभुक्तिक अंतर्गत बताओल गेल अछि। जीनप्रभासूरी अपन विविध तीर्थकल्पमे सेहो किछु एहि प्रकारक संकेत दैत तीरभुक्तिक विवरण देने छथि। शक्ति संगम तंत्रमे सेहो विदेह आ तीरभुक्तिकेँ पर्यायवाची शब्द मानल गेल अछि। बौद्ध लोकनि विदेह आ वैशालीकेँ दू अलग–अलग राज्यक रूपमे वर्णन कएने छथि। बौद्ध साहित्यमे वैशाली आ वृज्जिकेँ पर्यायवाची मानल गेल अछि। मूँगेर आ भागलपुरक उत्तरी भागकेँ बौद्ध साहित्यमे अंगुतराप कहल गेल अछि जकर सीमा कोनो समयमे लिच्छवीक राज्यसँ मिलैत छल। अंगुतरापक सीमा कमला–कोशीक बीच छल। प्राचीन अंगक उत्तरी सीमा छल कोशी आ पश्चिममे एकर क्षेत्र बेगूसरायक गण्डकी धरि पसरल छल। वैशालीक लिच्छवी लोकनिक अधिकार कमला नदी धरि बढ़ि गेल छलन्हि आ तकर बाद मिथिलाक राज्य शुरू होइत छल जाहिमे ताहि दिनक अंगुतराप आ पुण्ड्रवर्धनभुक्तिक किछु अंश समाहित छल। तैं हमरा बुझने शक्ति संगम तंत्रमे जे चम्पाक जंगल धरिक गप्प अछि तकरासँ चम्पारण नहि बुझि अंगुतराप एवँ ओकर ओहि क्षेत्रक बोध होइछ जाहिठाम ताहिठाम खाली जंगले–जंगल छल आ जमीन सेहो दलदले छल। गण्डकीसँ अंगक जंगलक सीमा धरि विदेहक राज्य पसरल होएत इ वेसी तर्कसंगत बुझि पड़इयै आ तैं अखनो इ परिभाषा एकटा विचारणीय विषय बनल अछि। ii.) ऐतिहासिक विवरण (राजतंत्र धरि):- विदेहक प्राचीन इतिहास जकाँ वैशालीक प्राचीन इतिहास ओझरैले अछि। यद्यपि पौराणिक स्त्रोतसँ वैशालीक विवरण भेटइत अछि परञ्च वैदिक साहित्यमे वैशालीक कोनो श्रृंखलाबद्ध विवरण उपस्थित नहि अछि। यत्र–तत्र एहन एकाधटा नाम वैदिक साहित्य अथवा वेदमे भेटइत अछि जकर सम्पर्क वैशालीसँ रहल हो परञ्च एहि आधारपर वैशालीक कोनो इतिहास निर्माण करब असंभव। अथर्ववेदमे तक्षक वैशालेयक उल्लेख अछि आ हुनका विशालान्मज विराजक पुत्र कहल गेल छन्हि। पंचविंश ब्राह्मणमे हुनके (वैशालेय)केँ एकटा सर्पयज्ञक पुरोहितक रूपमे वर्णन कैल गेल अछि। पुराणमे वैशालीक इतिहासक सम्बन्धमे बहुत रास सामग्री अछि परंतु ओहिमे ततेक नञि विरोधाभास अछि जे ओहिमे सँ कोनो ठोस सत्यक निर्माण करब एकटा कठिन कार्य। मार्कण्डेपुराणमे मनु आ हुनक पुत्र प्रियव्रत तथा उत्तानपादक कथा अछि। प्रियव्रतक संतानक घनिष्ठ सम्बन्ध वैशाली एवँ हिमालय क्षेत्रसँ छलन्हि। वृद्धावस्थामे अग्निध्र (प्रियव्रतक पुत्र)गण्डकीपर अवस्थित शालग्राम (हिमालय) गेल छलाह। हुनक पुत्र नाभि तपस्याक हेतु वैशाली आएल छलाह। ताहि दिनमे वैशाली विशालाक नामसँ प्रसिद्ध छल। नाभिक पुत्र छलाह ऋषभ (संभवतः प्रथम जैन तीर्थकर इएह छलाह) आ हुनक पुत्र भेला भरत जिनका नामपर एहि देशक नाम अछि। भारतवर्षक पूर्वक नाम छल हिमवर्ष। भरत अपन राज्य सुमतिकेँ दए तपस्यामे चलि गेलाह। मार्कण्डे, भागवत्, विष्णु आदि पुराणमे वैशालीक इतिहास जे विवरण अवइयै ताहिमे तत्तेक नञि संशयात्मक बात सभ अछि जे हमरा लोकनि कोनो एकटा निर्णयात्मक सत्यपर नहि पहुँचि सकैत छी तथापि ओहि स्त्रोतक आधारपर एकटा वैज्ञानिक इतिहासक रूपरेखा ठाढ़ करबाक प्रयास कैल गेल अछि। गजेन्द्र मोक्षक प्रसंग सेहो वैशालीक इतिहासक प्रसंगमे अवइयै। गज–ग्राहक संघर्ष वैशालीक गण्डकी क्षेत्रमे भेल छल आ कहल गेल अछि जे विष्णु गजकेँ ग्राहक चाङ्गुरसँ बचाकेँ एहि क्षेत्रकेँ एकटा तीर्थक स्थान बना देलन्हि। इ घटना गंगा–गण्डकक संगमपर भेल छ्ल आ तैं एकरा गजेन्द्र मोक्ष तीर्थ, हरिहर क्षेत्र, हरि क्षेत्र कहल गेल अछि आ पुराणमे एहि स्थानकेँ विशाला क्षेत्रक अधीन राखल गेल अछि। दितिक तपस्याक क्षेत्र सेहो वैशाली छल। दितिक पुत्र मरूत लोकनि जे समुद्रमंथनक कार्य कएने छलाह ताहिसँ इ स्पष्ट होइछ जे अति प्राचीन कालहिसँ वैशालीक लोक समुद्रसँ परिचित छलाह। हिन्दू, जैन आ बौद्ध धर्मक दृष्टिये सेहो वैशालीक इतिहास महत्वपूर्ण मानल जाइयै। विदेह–वैशालीक प्राक्–इतिहासक सम्बन्धमे हमरा लोकनिक ज्ञान एकदम स्वल्पोसँ कम अछि तथापि जे किछु हम जानतो छी से रामायण, महाभारत, पुराण आदि ग्रंथक आधारपर। ओहु सभ साधनमे सभमे अलग–अलग विवरण अछि। विदेहक आर्यीकरणसँ वैशालीक इतिहास प्रारंभ होइत अछि आ प्राचीन ग्रंथक आधार इ बुझना जाइत अछि जे मनुवैवस्वतकेँ ९टा पुत्र छलथिन्ह आ एकटा पुत्री जिनक नाम छलन्हि इला। नओ पुत्रक नाम अछि–इक्ष्वाकु, नाभाग (नृग), धृष्ट, शरयाति, नरिष्यंत, प्रांशु, नाभानेदिष्ठ, कारूष आ पृषधर। मनु भारतकेँ १० भागमे बटलन्हि। एहि ९ओ पुत्रमे नाभानेदिष्ठ वैशाली राज्यक संस्थापक भेलाह। हिनका वंशमे ३४टा शासक भेलथिन्ह जाहिमे सबसँ अंतिम छलाह सुमति। सुमति अयोध्याक दशरथ आ विदेहक सीरध्वज जनकक समकालीन छलाह। नाभानेदिष्ठक सम्बन्धमे सेहो प्राचीन साहित्यमे एकमत नहि छैक। रामायण महाभारत एहि नामपर गुम्म छथि। एहन बुझि पड़इयै जे पाछाँ चलिकेँ लोग एहि नामकेँ बिसैर गेल छल। राजा विशालकेँ वैशालीक संस्थापक मानल गेल छन्हि। रामायणमे वैशालीक राजा सुमतिक शासन क्षेत्र सम्बन्धमे कहल गेल अछि जे हुनक शासन गण्डकसँ पूर्व आ विदेहसँ दक्षिण पश्चिम दिसि छल। एहिसँ स्पष्ट अछि जे नाभानेदिष्ठ जाहि राज्यक स्थापना वैशालीमे केने छलाह तकर सीमा ताहि दिनमे बड्ड छोट छल। हुनक पुत्र भेला नाभाग, जे वैश्य कन्यासँ विवाह केलाक कारणे, गद्दीसँ वंचित रहलाह। कृषि आ व्यवसायमे ओ वेसी रत रहए लगलाह आ हुनका भाइ सभसँ सेहो नहि पटलाक कारणे बरोबरि टंट–घंट लगले रहैत छलन्हि। नाभाग अपनि पत्नी प्रेमक चलते राजगद्दीकेँ त्यागलन्हि आ क्षत्रियत्व छोड़ि वैश्यत्व ग्रहण केलन्हि। हुनका तीनटा पुत्र छलथिन्ह जाहिमे एकटाक नाम भालचंद छलन्हि आ दू भाइ ब्राह्मणत्व प्राप्त कएने छलाह। नाभागक अथक परिश्रमक कारणे वैशाली क्षेत्रमे कृषि आ व्यवसायकेँ प्रोत्साहन भेटलैक आ अति प्राचीन कालहिसँ वैशाली कृषि एवँ उद्योगक प्रधान केन्द्र बनि गेल। एक विद्वानक तँ इहो मत छन्हि जे नाभागक वैश्यत्व ग्रहण करब वैशालीक नामक उत्पत्तिसँ सम्बन्ध रखइयै। नगरक हिसाबें नाभाग अपना क्षेत्रकेँ वैश्य लोकनिक हेतु सभसँ प्रमुख नगर बनैलन्हि आ उएह नगर बादमे ‘वास्यु लोकनिक नगर’ अथवा वैशालीक नामसँ प्रसिद्ध भेल। विदेह ब्रह्मविद्या आ आर्य संस्कृतिक केन्द्र बनल आ वैशाली कृषि, उद्योग, वेद–विरोधी धर्म आ कुलीनतंत्र शासन पद्धतिक केन्द्र। ओहि युगमे मात्र पत्नीक हेतु राजगद्दीक त्याग करब एवँ ब्राह्मण व्यवस्थाक परित्याग कए वैश्यत्व ग्रहण करब एक महानक्रांतिकारी कदम छल। एहि विवाहक एकटा दोसरो असर पड़ल सामाजिक व्यवस्थापर जकरा चलते वैशालीमे बादक राजा सबकेँ “आयोगव” कहल गेल अछि। एहिसँ एक एहेन जातिक बोध होइछ जकर माय वैश्य आ पिता शूद्र रहल हो। शतपथ ब्राह्मणमे राजा मरुत्तकेँ आयोगव कहल गेल अछि। नाभागक वैश्य पत्नीक नाम सुप्रभा छलन्हि। सुप्रभासँ उत्पन्न पुत्रक नाम छल भलंदन। ओ राजर्षि निप (काम्पिल्त)सँ सहायता लय अपन पैत्रिक राज्यकेँ प्राप्त करबाक प्रयत्न केलन्हि आ एहि क्रम ओ सफल भेलाह आ अपन सर संबन्धीकेँ पराजित कए ओ राज्य प्राप्त केलन्हि आ राजमुकुट अपना पिताक देलन्हि मुदा पिता ओ ग्रहण करबासँ अस्वीकार केलथिन्ह। तखन भलंदन स्वयं शासक भऽ गेलाह। न्यायपूर्वक ढंगसँ ओ शासन केलन्हि आ अपन कर्तव्य पथपर चलैत रहलाह। हुनका वत्सप्रि नामक एकटा योग्य पुत्र छलथिन्ह। वत्सप्रिक पत्नीक नाम छल मुदावती (सुनंदा)। अपना पिताक बाद वत्सप्रि शासक भेलाह। हुनक दोसर नाम अजवाहन सेहो छलन्हि। ओ मालवाक राजाक संग वैवाहिक सम्बन्धक कारणें ओ एक पुश्तधरि मालवापर सेहो शासन केलन्हि। हुनक शासन काल शांतिप्रिय छल आ ओ अपन उदारता एवँ महानताक हेतु प्रसिद्ध छलाह। सुनन्दा (मुदावती)सँ १२टा पुत्र छलथिन्ह–प्रांशु, प्रचीर, सूर, सुचक्र, विक्रम, क्रम, बालीन, बलाक, चण्ड, प्रचण्ड, सुविक्रम, स्वरूप। पौराणिक स्रोतसँ इहो ज्ञात होइछ जे वेदक तीनटा वैश्य मंत्रकर्त्ता लोकनि वैशालियेक शासक छलाह जनिक नाम छलैन भलंदन, वत्सप्रि (वाशव) आ संकील। प्रांशु अपन पिताक पछाति वैशालीक शासक भेलाह। ओ एकटा सशक्त शासक छलाह। ओकर बाद प्रजानि, (प्रजापति, प्रमति) हुनक पुत्र, शासक भेलाह। एहि समयमे वैशाली राज्यमे किछु आपसी संघर्ष शुरू भेल। प्रजानिक पाँच पुत्रमे खनित्र महत्वपूर्ण भेलाह आ अपन पिताक बाद शासक सेहो। ओ बहुत वीर आ बुधियार छलाह। अपना प्रजाक हेतु ओ सभ किछु करबाक लेल प्रस्तुत रहैत छलाह। अपना भाइ सबहिक प्रति ओ दयावान आ विचारवान छलाह। ओ अपन सभ भाइकेँ अपना अधीनमे छोट–छोट राजा बना देने छलाह। अंतमे हुनके एकटा छोट भाइ हुनका विरोधमे विद्रोह कए राज्यक शांतिकेँ नष्ट कए देल। खनित्रक पछाति हुनक पुत्र क्षुप शासक भेलाह। हुनका चाक्षुश सेहो कहल जाइत छन्हि। ओ ब्राह्मण लोकनिकेँ प्रचुर दान दए यशक भागी बनलाह। हुनका बाद हुनक पुत्र विंश राजा भेलाह। हुनक दोसर नाम वीर छल। तीर चलेबामे ओ बड्ड निपुण छलाह आ संगहि ओ एक शक्तिशाली शासक सेहो छलाह। हुनका बाद हुनक पुत्र विविंश शासक भेलाह। हुनका समयमे जनसंख्याक वृद्धिक कारण अन्याय बढ़ि गेल छल। स्थितिक सुधारक हेतु ओ कैक प्रकारक यज्ञ सेहो केलन्हि। विविंशकेँ १५टा पुत्र छलथिन्ह जाहिमे सबसँ पैघक नाम छलन्हि खनीनेत्र। हुनका पुराणमे धार्मिक शासक कहल गेल छन्हि। ओ ब्राह्मणकेँ उदारतापूर्वक दान दैत छलाह। हुनका पुत्र नहि छलन्हि तँ पुत्र प्राप्तिक हेतु ओ पशुयज्ञक त्याग केलन्हि। गोमतीक तटपर पापहारिणी यज्ञक आयोजन केलन्हि। एकर फलस्वरूप हुनका एकटा पुत्र भेलन्हि जकर नाम बलाश्व छल। वैशालीक इक्ष्वाकु–मानव क्षेत्रमे बलाश्वक राज्यारोहणसँ ऐतिहासिक स्तरपर आर्यक तत्वक विस्तार भेल। एहि राजाकेँ बलाश्व–करनधम सेहो कहल जाइत अछि। खनीनेत्र आ करनधमक बीचमे एकटा विभूति राजाक उल्लेख सेहो भेटइत अछि। करनधम वैशालीक एकटा महत्वपूर्ण शासक छलाह। ओ बहुत रास क्षेत्रकेँ जीतलन्हि आ अपन राज्यक अंतर्गत केलन्हि। नव–नव प्रकारक कर पराजित राज्यपर लगौलन्हि। वीरा नामक कन्यासँ स्वयंवरक माध्यमे हुनक विवाह भेल छलन्हि आ ओहिसँ उत्पन्न पुत्रक नाम छल अविक्षित। अविक्षित एतेक निपुण एवँ योग्य छलाह जे सात ठाम स्वयंवरमे हुनके जयमाल पड़लन्हि। जयमाल पहिरौनिहार कन्याक नाम एवँ प्रकार अछि– ____ i.) हेमधर्मक पुत्री वरा ____ ii.) सुदेवक पुत्री गौरी (काशी) ____ iii.) बालिनक पुत्री सुभद्रा (अंग–वंग) ____ iv.) वीरक पुत्री लीलावती (अविक्षितक मायक बहिन) ____ v.) वीरभद्रक पुत्री अनिभा (ऐजन) ____ vi.) भीमक पुत्री मान्यवती (विदर्भ) ____ vii.) दम्‍भक पुत्री कुमुदवती (मालवा) उपरोक्त सूची एहिबातक द्योतक अछि जे वैशालीक सम्पर्क ताहि दिनमे सभ प्रसिद्ध राज्य सभसँ छल आ एहिसँ वैशाली राज्यक महत्वक संकेत भेटइत अछि। अंग, वंग, विदर्भ, मालवा आदि राज्यक संग सम्पर्क तत्कालीन अंतर राज्य सम्बन्धक प्रतीक मानल जा सकइयै। ताहि दिन हैहेय राज्यक शासक लोकनि विदेह एवँ वैशालीपर आक्रमणक सूरसारमे लागल रहैत छलाह परञ्च हुनका लोकनिकेँ एहिमे कोनो सफलता नहि भेटलन्हि कारण करनधम, अविक्षित, एवँ मरुत्त सन्–सन् शासक वैशालीक राजगद्दीपर छलाह। करनधम अपना युगक एकटा प्रतिभाशाली व्यक्तित्व छलाह जे वैशाली एवँ समस्त उत्तर भारतक इतिहासपर एकटा अमिट छाप छोड़ने छथि। महाभारतमे जे पाँचटा तीर्थक वर्णन अछि ताहिमे कारन्धमतीर्थक महत्वपूर्ण स्थान अछि। आन तीर्थक नाम अछि अगस्त्य, सौभद्र, पौलोम एवँ भारद्वाजीय। महाभारतमे करन्धमकेँ एकटा प्राचीन धर्मात्मा राजाक रूपमे वर्णन कैल गेल छैक। स्कन्धपुराणमे करन्धमकेँ राजर्षि कहल गेल छैक। करन्धम एक महान शासक छलाह आ अपना राज्यक सभ विद्रोही तत्वकेँ दबाकेँ एक सशक्त राज्यक स्थापना कएने छलाह आ बहुत दिन धरि तक शासन कएने छलाह। वैशालीक साम्राज्यवादी परंपराक जन्मदाता करन्धमकेँ मानल जाइत अछि। हुनक पुरोहित छलथिन्ह अंगीरस। हुनके शासन कालसँ वैशालीक राजदरबारमे अंगीरस पुरोहित लोकनिक प्रभाव बढ़लन्हि। करन्धमक बाद हुनक पुत्र अविक्षित शासक भेला। ओ हैहेय आक्रमणकेँ रोकबामे समर्थ भेलाह। विदिशाक संग सेहो हुनका किछु खटपट भेल छलन्हि। तकर बाद हुनक पुत्र मरुत्त शासक भेला। पुराणमे मरुत्तकेँ चक्रवर्त्तीक संज्ञा देल गेल छैक। महाभारतमे मरुत्तकेँ भारतक १६ राजामे सँ एक प्रमुख राजा मानल गेल छैक। मरुत्तक तुलना विष्णु, वासव आ प्रजापतिसँ सेहो कैल गेल छैक। महाभारतमे मरुत्तक हेतु सम्राट शब्दक व्यवहार भेल छैक। एक किंवदंती छैक जे न्यायक तरूआरि मुचुकुन्दसँ लकए मरुत्त रैवतकेँ देलथिन्ह आ एहिसँ इ ज्ञात होइत अछि जे ओ एक न्याय–प्रिय शासक छलाह। हुनक अंगिरस पुरोहितक नाम छल सम्वर्त। ओ बड्ड पैघ–पैघ यज्ञ कएने छलाह आ धर्मप्रिय शासकमे हुनक नाम अग्रगण्य छन्हि। मरुत्त अपन पुत्रीक विवाह संवर्तक संग केलन्हि। हिनका शासन कालमे ‘एन्द्रमहाभिषेक’क आयोजनक उल्लेख भेटइयै आ अश्‍वमेध यज्ञक श्रेय हुनका देल जाइत छन्हि। विभिन्न स्थानपर पैघ–पैघ यज्ञ करबाक आ करेबाक श्रेय सेहो हिनका देल जाइत छन्हि। स्कन्द पुराणक अनुसार गण्डकी उपत्यकाक राजा मरुत्त यज्ञ करबाक हेतु एक बेर जय आ विजयकेँ आमंत्रित कएने छलाह आ हुनका लोकनिकेँ प्रचूर दक्षिणा देने छलाह। कोनो अघटित घटनाक चलते हिनका दुनू गोटएकेँ श्राप पड़लन्हि आ इएह दुनू गोटए गज आ ग्राहमे एहि क्षेत्रमे परिवर्त्तित भऽ गेलाह आ बादमे इएह स्थान हरिहर क्षेत्रक नामसँ प्रसिद्ध भेल। मरुत्त नाग आ हैहेय लोकनिकेँ सेहो पराजित केलन्हि। मरुत्तकेँ सात टा पत्नी छलथिन्ह– ____ i.) विदर्भ राजक पुत्री प्रभावती ____ ii.) सौवी राजक पुत्री–सुवीग ____ iii.) मागधकेतुवीर्यक पुत्री–सुकेशी (अंग–वंगक आनव वंशक) ____ iv.) मद्रराजासिन्धुवीर्यक पुत्री–केकयी ____ v.) केकयी राजक पुत्री–सैरन्ध्री ____ vi.) सिन्धुक आनवराजक पुत्री–वपुषमती ____ vii.) चेदी राज्यक पुत्री–सुशोभना एहि वैवाहिक सम्बन्धसँ वैशालीक स्थिति सुदृढ़ छल आ भारतक विभिन्न राज्यक संग एकर सम्बन्ध सेहो नीक छल। मरुत्तक अठारह पुत्रमे ज्येष्ठ पुत्रक नाम छल नरिष्यंत। नरिष्यंत एक प्रमुख शासक छलाह आ उहो वैवाहिक सम्बन्धक माध्यमे अपन ताकत बढ़ौलन्हि। ओकर बाद हुनक पुत्र दम शासक भेलाह। दमक बाद राज्यवर्द्धन आ ओ दक्षिणापथसँ अपन वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित केलन्हि। एकर बाद पुनः वैशालीक इतिहास अंधकारपूर्ण अछि आ तृणबिन्दुक राज्यारोहणसँ पुनः हमरा लोकनि एकटा लीखपर पहुँचैत छी। तृणबिन्दुक सम्बन्धमे कोनो विशेष जानकारी हमरा लोकनिकेँ नहि अछि। संभव जे ओ कोनो स्थानीय शासक रहल होथि आ राजनैतिक अस्थायित्वक स्थितिसँ लाभ उठा कए एकटा सशक्त राज्यक स्थापनामे समर्थ भेल होथि। पुराण सभमे तृणबिन्दु महिपति आ राजर्षि दुनू कहल गेल छैक। हिनक पत्नीक नाम छल अलभवुषा आ हिनका लोकनिककेँ तीनटा पुत्र छलैन्ह–विशाल, शून्यबंधु आ धूम्रकेतु। विशाल वैशाली नगरक संस्थापक मानल जाइत छथि। हिनक पुत्री इलाविलाक विवाह पुलस्त्य (दक्षिणक राक्षसवंश)सँ भेल छल। एवँ प्रकारे एहि बेर क्षत्रिय कन्याक विवाह ब्राह्मणसँ भेल। बुझि पड़इयै जे वैशालीक शासक लोकनि विवाहक मामलामे उदार छलाह। एहिसँ उत्पन्न पुत्र विश्रवस मुनिक आश्रम नर्मदा तटपर छल। दक्षिणक पौलस्त्य वंशक उत्पत्ति वैशालीक राजवंशसँ भेल छल। तृणबिन्दुक पुत्र विशाल प्राचीन भारतीय इतिहासक प्रसिद्ध मील स्तंभ मानल जाइत छथि। ओ अपना नामपर अपन राजधानीक नाम विशाला रखलन्हि जे कालक्रमेण वैशालीक नामसँ प्रसिद्ध भेल। मार्कण्डेपुराणमे सेहो एकटा विशालग्रामक उल्लेख भेटइत अछि आ अथर्ववेदमे वर्णित तक्षक वैशालेयक उल्लेख तँ हम पूर्वहिं कऽ चुकल छी। राजा विशालकेँ विशालाक प्रभु, आ विशालापुरीक संस्थापकक रूप से बताओल गेल अछि। ओहि समयमे गया आ वैशालीक बीच घनिष्ठ सम्पर्क छल। राजा विशाल पितृपूजा आ पिण्डदानक समर्थक छलाह आ ऐतिहासिक दृष्टिकोणसँ हुनका पिण्डदानक प्रवर्त्तको कहल जा सकइयै। ब्रह्माण्डपुराणमे राजा विशालकेँ धर्मात्मा पुरूष कहल गेल अछि। मार्कण्डेपुराणमे विशाल नामक एकटा ब्राह्मण आ हुनक पुत्र वैशालीक उल्लेख भेटइत अछि। वैशालीमे एकटा महावन छल जे गौतमबुद्धक समय धरि विराजमान छल। विशाल बहादुरीक द्योतक सेहो बुझल जाइत अछि। आ संभवतः अहु अर्थमे ‘वैशाली’ शब्दक उद्भव भेल हो। सम्प्रति ‘राजा विशालक गढ’ प्राचीन वैशालीक खण्डहरक रूपमे विराजमान अछि जकर उत्खननसँ ताहि दिनक बहुत रास सामग्री उपलब्ध भेल अछि। विशालक बाद हेमचन्द्र शासक भेलाह, तखन क्रमिक रूपें सुचन्द्र, धूम्राश्व, श्रृंजय, सहदेव, कृशाश्व, सोमदत्त, जनमेजेय, आ सुमति। वैशालीक इतिहासमे सुमतिक शासन बड्ड महत्वपूर्ण मानल गेल अछि। अपनावंशक ओ सभसँ अंतिम राजा मानल गेल छथि। विश्वामित्र जखन राम लक्ष्मणक संग वैशाली पहुँचल छलाह तखन एहिठाम सुमति शासन करैत छलाह। वैशालीकेँ ‘उत्तमपुरी’ कहल गेल अछि। देखबामे ओ एतेक सुन्दर एवँ स्वर्गीय छल जे सामान्य लोगकेँ बुझि पड़इत होइक जे जेना इ स्वर्गे हो। सुमति आदरपूर्वक विश्वामित्र, राम एवँ लक्ष्मणक ठहरबाक प्रबंध केलथिन्ह आ यथायोग्य स्वागत सेहो। ओहिठामसँ मिथिला पहुँचबाक बीचमे ओ लोकनि गौतमाश्रम सेहो रूकल छलाह। सुमतिक बाद वैशालीक इतिहास पुनः अंधकारपूर्ण भऽ गेल आ एकर जे स्थिति रहल तकर कोनो ज्ञान हमरा लोकनिकेँ नहि अछि। राजतंत्रक अंत आ कुलीनतंत्रक प्रगति जे कोना एहि क्षेत्रमे भेल तकरा संबन्धमे अखनो विशेष बात संदिग्ध एवँ अनिश्चिते अछि। iii.) सुमतिक पछाति आ वज्जीकुलीनतंत्रक स्थापना धरिक इतिहास:- सुमतिक शासनक अंत भेला पर लगभग ६०० वर्षक पछाति वैशालीमे कुलीनतंत्रीय शासनक विकास भेल आ क्रमेण वृज्जीसंघ सेहो। एहि ६०० वर्षकेँ वैशालीक इतिहासमे अन्धकार युग कहल गेल अछि। साहित्य एवँ पौराणिक परंपरामे सुमतिक बाद कोनो राजाक नामक संकेत नहि अछि। महाभारत युद्धक समयमे विदेह, कोशल एवँ मल्लराष्ट्रक विवरण तँ भेटइत अछि परञ्च वैशालीक सम्बन्धमे कोनो सूचना उपलब्ध नहि होइछ। एहेन बुझि पड़इयै जे सुमतिक अवसानक पछाति विदेहक पराक्रम बढ़ि गेल छल आ वैशालीक विशेष भागपर संभवतः विदेहक आधिपत्य भऽ गेल छल। उत्तर बिहारक विदेह आ मल्लक उल्लेख महाभारत युद्धक प्रसंगमे अबैत अछि तँ संभव जे वैशालीक विशेष भागपर विदेहक आधिपत्य (वैशालीपर विदेह राज्यक आधिपत्य) भऽ गेल हो आ किछु अंशपर मल्ल लोकनिक। वैशालीक स्वतंत्र सत्ता समाप्त रहलाक कारणे वैशालीक स्वतंत्र उल्लेख नहि भेटल स्वाभाविके बुझि पड़इत अछि। किछु विद्वानक मत छन्हि जे राजा सुमतिक पछाति वैशालीपर किछु दिनक हेतु कोशलक आधिपत्य भऽ गेल छल। कोशलक कमजोर भेलापर विदेह राज्य ओहि परिस्थितिसँ लाभ उठाकेँ वैशालीकेँ अपना अधीन कऽ लेलन्हि। ताहि दिनमे रामक सार भानुमंत मिथिलामे शासक छलाह। वैशालीक प्रभुत्व घटि चुकल छल। विदेहक आधिपत्य भेला संता वैशालीक अपन जे स्वतंत्र संबन्ध यादव अथवा पाण्डव लोकनिसँ रहल हेतन्हि सेहो गौण भऽ गेल हेतन्हि आ इ लोकनि अपन अधीनस्थ स्थितिक कारणें गुम–सुम भए अपन समय कटइत हेताह। भऽ सकइयै जे विदेहक राजतंत्रक अंत भेने दुनू ठाम एक्के बेर कुलीनतंत्रीय गणतंत्रक स्थापना भेल हो। सुमतिक पछाति मिथिलाक इतिहासक जे क्रम उपलब्ध अछि ताहि आधार पर इ उचित बुझना जाइत अछि जे मिथिला अपन साम्राज्यवादी प्रसारक क्रममे वैशालीकेँ पराजित कए अपना अधीन कऽ लेने होएत। साम्राज्यवादी प्रवृतिक प्रारंभ सीरध्वज जनक धरि जीवित छल आ ओ साँकास्य धरि अपन राज्यक सीमाक विस्तार कएने छलाह। महाभारत युद्धक पश्चात जे एकटा अनिश्चितताक स्थिति उत्पन्न भेल ताहिसँ लाभ उठाके जनकवंशक शासक गण, उग्रसेन, जनदेव, धर्मध्वज, तथा आयुस्थन, अपन साम्राज्यवादी परंपराकेँ आगाँ बढ़ौलन्हि आ करीब बारह पुस्त धरि एकरा जारी रखलन्हि। अयोध्याक राज्यक छिन्न–भिन्न भेल उत्तरो मिथिलाक राज्यक विस्तार होइते रहल। कोशल–काशीमे बरोबरि खटपट होइत रहल। वैशालीक वस्तुस्थितिक सम्बन्धमे कोनो ठोस ज्ञान हमरा लोकनिकेँ एहि समयमे नहि अछि। महाभारतमे प्राचीन भारतीय गणतंत्र एवँ विभिन्न जातिक विवरण भेटइत अछि परञ्च ओहु सूचीमे वैशाली अथवा ओहिठामक गणतंत्रक कोनो उल्लेख नहि अछि। एकमात्र उल्लेख जे वैशालीक सम्बन्धमे अछि से विशालाक पुत्री भद्रा–वैशाली–जाहि राजकुमारीक हेतु द्वारावतीक वासुदेव, वेदिक शिशुपाल, एवँ कारूषक शासक लालायित रहैत छलाह। वैशालीमे नाग प्रधानक उल्लेख सेहो भेटइत अछि आ कहल जाइत अछि इ लोकनि अर्जुनक साहायता कएने छलथिन्ह। वैशालीमे नाग लोकनिक प्रधानताक विवरण दीर्घनिकाय आ महावंशमे सेहो भेटइत अछि। अथर्ववेदमे तक्षक वैशालेयक उल्लेख तँ हम पूर्वहिं कऽ चुकल छी। वैशालीसँ गुप्तकालीन अवशेषमे बहुत रास सर्प मूर्ति भेटल अछि जाहिसँ इ स्पष्ट होइछ जे एहिक्षेत्र नाग लोकनिक प्रधानता रहल हेतन्हि। कहल जाइत अछि जे भीमसेन अपन दिग्विजयक क्रममे गण्डक लोकनिकेँ पराजित कएने छलाह। अहुँठाम वैशाली नाम नहि दए गण्डक लोकनिक (गण्डकक समीप रहनिहार) नाम अछि आ अहुँसँ बुझि पड़इयै जे वैशालीक राजनैतिक महत्व ताहि दिन धरि समाप्त भऽ चुकल छल। ओहि दिग्विजयक क्रमक जे सूची अछि ताहिमे विदेहक पूर्वहि गण्डक लोकनिक विवरण अछि। भीमसेन उत्तरी कोशल, मल्ल, जलोद्भव, जनक वैदेह, शक, वर्बर, एवँ सातटा किरात प्रधानकेँ पराजित कएने छलाह आ शरमक, वर्मक आ गोपालकक्ष लोकनिकेँ सेहो। किछु गोटएक मत छन्हि जे इ तीनू वर्ग वैशालीक निवासी छलाह आ ओतहिक ब्राह्मण, क्षत्रिय आ वैश्यक द्योतक सेहो। मुदा ठोस साधनक अभावमे इ सब एकटा अंदाज मात्र थिक आ तैं एहिपर पूर्ण विश्वास करब असंभव। सुमतिक बादसँ लिच्छविक उत्थान धरिक इतिहास अंधकार पूर्ण अछि आ ओहिमे जे कोनो एकटा मान्य तथ्य अछियो तँ से मात्र इएह एहि ६०० वर्षक अभ्यंतरमे वैशाली कैक टुकड़ामे बटि गेल छल आ मुख्य रूपसँ विदेह एवँ मल्ल लोकनि एकर विशेष भागपर अपन आधिपत्य स्थापित कऽ लेने छल। iv.) मिथिलामे गणराज्यक स्थापनाक इतिहास:- अन्धकार युगसँ जखन वैशाली अवतीर्ण होइछ तखन हम देखैत छी जे वैशालीक नेतृत्वमे समस्त उत्तर बिहारमे एकटा कुलीनतंत्रीय गणराज्यक परंपराक स्थापना होइत अछि। इ.पू. छठी शताब्दी समस्त विश्वक इतिहासमे अपन एकटा महत्वपूर्ण स्थान रखइयै आ भारतमे तँ सहजहि इ युग एकटा युगांतकारी युग छल–राजनैतिक आ साँस्कृतिक दृष्टियें। मिथिलाक इतिहास दृष्टियें सेहो इ युग युगांतकारी कहल जा सकइयै। राजनीतिमे राजतंत्रक उत्तराधिकारी गणतंत्र भेल आ विचारक क्षेत्रमे वर्धमान महावीर आ गौतमबुद्ध एकटा नव कीर्तिमान स्थापित केलन्हि। वैशालीमे कहिया आ कोना गणराज्यक स्थापना भेल एकर ठीक–ठीक पता हमरा लोकनिकेँ नहि अछि मुदा एतवा हम सब जनैत छी जे महावीर आ बुद्धक समयमे वैशालीमे कुलीनतंत्रीय गणराज्यक प्रभुत्व छल। बुद्ध जाहि शब्दमे वैशालीक गणराज्यक प्रशंसा कएने छथि ताहिसँ बुझना जाइत अछि जे बुद्धसँ १००–२०० वर्ष पूर्वहिंसँ इ गणराज्य रहल हो। कराल जनकक अत्याचारी शासनसँ तंग आबि जखन प्रजा विद्रोह कए विदेह राज्यमे क्रांति मचौलक तखन ओहिठाम राजतंत्रक अवसान भेल आ गणराज्यक स्थापना। कहल जाइत अछि जे एहि घटनाक फलस्वरूपें समस्त उत्तर बिहारमे गणराज्यक परंपरा प्रारंभ भेल आ चूँकि वैशाली विदेहक अंग छल तै वैशालियोमे गणराज्यक स्थापना भेल। कराल जनक विदेहक जनक वंशक अंतिम राजा छलाह आ हुनक अवसानक पछातियेसँ मिथिलामे गणतंत्रक स्थापना मानल जाइत अछि। कहल जाइत अछि महाभारत युद्धक २२ पुस्त कऽ बाद बौद्ध धर्मक उत्थान भेल आ एहि बीचमे मिथिलामे गणतंत्रक स्थापना भेल होएत। पुराणमे एहि बीच २८ मैथिल राजाक उल्लेख भेटइत अछि। बौद्ध धर्मक उत्थानक बहुत पूर्वहिं मिथिलामे गणतंत्रक स्थापना भेल होएत तकर संकेत हम उपर दए चुकल छी। पुराणमे २८ मैथिल राजाक विवरण अछि आ जातकमे मात्र १५ राजाक २८ मे सँ जे १५ घटा देल जाइक तें १३ राजा बचि जाइत छथि आ महाभारत युद्ध आ गणराज्यक स्थापनाक बीच संभवतः इएह १३ राजा मिथिलामे राज्य कएने होएताह। एहि १३मे अंतिम राजा कराल जनक रहल हेताह। जातकमे मखादेवकेँ मिथिलाक राजतंत्रक संस्थापक मानल गेल अछि। मिथिलामे जातक सूचीक अनुसार राजाक नाम एवँ प्रकारे अछि– ____ सुरूचि प्रथम, सुरूचि द्वितीय, सुरूचि तृतीय, महापनाद (जातक नं-४८९+२६४) ____ महाजनक प्रथम, अरिठ्ठजनक, पोलजनक, महाजनक द्वितीय, दिघावु (जातक नं–५३९ ) ____ साधीन, नारद (जातक नं-४९४) ____ निमि, कलार (जातक नं–९, ४०८, ५४१) ____ मखादेव (जातक नं–९, ५४१) ____ अंगति (जातक नं-५४४) वर्द्धमान महावीरसँ २५० वर्ष पूर्व मिथिलामे निमि नामक एकटा शासक भेल छलाह जे जैन धर्म ग्रहण कएने छलाह। इ. पू. ७५० क आसपास मिथिलामे जनक वंशक अंतिम शासकक राज्यक अवसान भेल आ तकराबादे ओहिठाम गणतंत्रक स्थापना भेल। मिथिलामे गणराज्यक स्थापनाक संगहि वज्जी गणराज्यक स्थापना सेहो भेल। मिथिलामे राजतंत्रक पश्चात गणतंत्रक स्थापना एकटा मह्त्वपूर्ण घटना मानल गेल अछि। कौटिल्यक अनुसार वज्जी (वृज्जी) आ लिच्छवी अलग–अलग छल। महापरिनिवान्नसुतमे बुद्ध वज्जी लोकनिक गुणगाथा कएने छथि आ पाणिनि सेहो वृज्जी लोकनिक विवरण देने छथि। वज्जी गणराज्यक संदर्भमे अष्टकुलकक उल्लेखसँ ज्ञात होइत अछि जे एहिमे आठकुलक लोग संगठित रहल होइत। तथापि एहिठाम लिच्छवियेक प्रधानता रहल होइत। लिच्छवी लोकनि वैशालीक रहनिहार छलाह आ अष्टकुलकक सर्वशक्तिमान सदस्य सेहो। ज्ञात्रिक नामक जाति सेहो वज्जी गणराज्यमे प्रसिद्ध छल। एहि कुलमे वर्धमान महावीरक जन्म भेल छलन्हि। सूत्रकृतांगमे ज्ञात्रिकक सम्पर्क उग्र, भोज, इक्ष्वाकु, कौरव, लिच्छवी आदिसँ बताओल गेल अछि। एहिसँ बुझि पड़इत अछि जे इ सब एक दोसराक समीपे रहैत छलाह आ उत्तर बिहारक विभिन्न क्षेत्रपर हिनका लोकनिक अधिकार छलन्हि। इ सब गणराज्यक सदस्य छलाह अथवा नहि से कहब असंभव। मिथिलामे जे वज्जी गणराज्य छल तकर दूटा प्रमुख महारथी रहैथ वैशाली आ विदेह। v.) गणराज्यक सदस्य जाति:- लिच्छवी वज्जी गणराज्यक सर्वश्रेष्ठ अंग रहैथ। बौद्ध साहित्यमे लिच्छवीक विशद विश्लेषण भेल अछि। हुनका लोकनिक प्रधान केन्द्र छल वैशाली आ राजनैतिक रूपे ओ वैशाली आ नेपालपर अपन अधिकार स्थापित कएने छलाह। चारिम शताब्दीमे जे गुप्त साम्राज्यक स्थापना मगधमे भेल छल ताहुमे लिच्छवी लोकनिक विशेष हाथ छलन्हि। लगभग ८०० वर्ष धरि बिहार आ नेपाल इतिहासकेँ लिच्छवी लोकनि प्रभावित कएने छलाह। लिच्छवी जातिक उत्पत्तिक सम्बन्धमे अद्यतन विद्वान लोकनिक बीच मतभेद बनले अछि। लिच्छवि, निच्छवि, लिच्चिकि, लेच्छवी, लेच्छाइ, लेच्छकी, आदि शब्द लिच्छविक द्योतक मानल जाइत अछि। पालि साहित्य, सिक्का, अभिलेख, आ अन्यान्य साधन सबमे लिच्छवी शब्दक प्रयोग भेटइत अछि जाहिसँ इ ज्ञात होइछ जे इयैह शब्द इतिहासमे जनप्रिय भए स्वीकृत भऽ गेल। कौटिल्य, मेधातिथी, गोविन्दराज आदि लिच्छवी शब्दक व्यवहार कएने छथि। बहुत रास विद्वानक कहब छैन्ह जे लिच्छवी लोकनि विदेशी छलाह–आ हुनक सम्बन्ध तिब्बत, कोलारियन, सिथियन, तथा फारससँ छलन्हि। किछु विद्वानक मत छैन्ह जे लिच्छवीक सम्बन्ध यूची जातिसँ छलन्हि। तिब्बती उत्पत्तिपर विशेष जोर देल जाइत अछि। लिच्छवीक आचार–विचार आ सामाजिक नियम आदिक आधार इ कहल गेल अछि जे हुनका लोकनिक उत्पत्ति तिब्बती स्रोतसँ भेल होएत। एहिमतक समर्थकक विचार छन्हि जे प्रागैतिहासिक कालमे किछु मंगोलियन–तिब्बती जाति एहि क्षेत्रमे आबिकेँ बसल हेताह आ ओहिसँ लिच्छवी लोकनिक उत्पत्ति भेल होएतैन्ह। भारतीय विद्वान लोकनि लिच्छवीकेँ भारतीय मनैत छथि परञ्च अपनहु सबमे किछु एहनो विद्वान छथि जनिक विचार छन्हि जे लिच्छवी लोकनिक उत्पत्ति परसिया (फारस)सँ भेल होएत। निच्छवि शब्दक उत्पत्ति फारसक ‘निसि विस’ नगरसँ भेल अछि आ ओहिसँ लिच्छवीक उत्पत्ति सेहो। फारसक इतिहास विवरणमे कतहु एहेन उल्लेख नहि भेटइत अछि जाहि आधारपर इ कहल जाए जे फारसक लोग पूर्वी भारतमे आबिकेँ कहियो बसल छलाह अथवा पूर्वी भारतसँ कहियो हुनका लोकनिकेँ कोनो प्रकारक सम्पर्क रहल होन्हि। प्राचीन भारतीय साहित्यमे लिच्छवी लोकनिकेँ क्षत्रियक रूपमे वर्णन भेल छैक। महापरिनिव्‍वाणसुतसँ ज्ञात होइछ जे ओ लोकनि क्षत्रियक हिसाबे बुद्धक शवक अवशेष प्राप्त करबा लेल इच्छुक छलाह। सिगालजातकमे लिच्छवी कन्याकेँ क्षत्रिय कहल गेल छैक। महाली नामक लिच्छवी अपनाकेँ बुद्ध जकाँ क्षत्रिय घोषित करैत अछि। जैनकल्प सूत्रमे वैशालीक लिच्छवी नेता चेतकक बहिन त्रिशलाकेँ क्षत्रियाणी कहल गेल छैक। लिच्छवीक उत्पत्तिक सम्बन्धमे बुद्धघोषक मत छन्हि जे ओ लोकनि क्षत्रिय छलाह। नेपाल वंशावलीमे लिच्छवी सूर्यवंशी क्षत्रिय कहल गेल छैक। मनु लिच्छवीकेँ व्रात्य–क्षत्रिय कहैत छथि। वज्जि आ लिच्छवीक मध्य कोन सम्बन्ध छल अथवा दुनूक बीच कोनो सीमा रेखा छल अथवा नहि से कहब असंभव। वृज्जी–वज्जी गणराज्यक सर्वश्रेष्ठ सदस्य लिच्छविये लोकनि छलाह। बुद्ध लिच्छवीक तुलना तावतिंशदेवसँ कएने छथि। वृज्जि (वज्जिका) आ लिच्छवी दुनू दू शब्द छल परञ्च लिच्छवीक प्रधानताक कारणे वज्जीसँ लिच्छवीक बोध होइत छल। नेपाल अभिलेखमे लिच्छवीकुलकेतु, लिच्छवीकुलांबरपूर्णचन्द्र, लिच्छवीकुलानंदकार, लिच्छवीकुलतिलको आदि शब्दक व्यवहार भेल अछि। चीनी आ तिब्बती स्रोतसँ ज्ञात होइछ जे इ लोकनि लिच्छवीक नामसँ प्रसिद्ध छलाह। एक परंपराक अनुसार तिब्बतक राजवंश लिच्छवीक वंशज छलाह। प्राचीन कालमे संभव जे नेपालक बाटे तिब्बत आ मिथिलाक सम्बन्ध घनिष्ठ रहल हो आ राजनैतिक–साँस्कृतिक आदान–प्रदान होइत हो। हिमालयक तराइमे किरात लोकनिक वास छल आ इ लोकनि बरोबरि पहाड़क आर पार जाइत आवैत छलाह आ दुनू दिससँ हिनका लोकनिकेँ सम्पर्क छलन्हि। एहि क्रम तिब्बत आ मिथिलाक संपर्क घनिष्ठ भेल हो से संभव आ दुनूक बीच साँस्कृतिक आदान–प्रदान सेहो। लिच्छवी लोकनि विचारसँ प्रगतिशील छलाह आ तै जँ हिनक विचार तिब्बती विचारधाराकेँ ताहि दिनमे प्रभावित केने हो तँ कोनो आश्चर्यक गप्प नहि। एहिठामक संस्कृतिसँ प्रभावित होएब हुनका लोकनिक लेल स्वाभाविक छल कारण मिथिला तिब्बती नेपाली व्यापारीक बाटपर पड़इत छल। लिच्छवीकेँ विदेशी नहि कहल जा सकइयै। लिच्छवी आ विदेह दुनू क्षत्रिय छलाह आ हुनका लोकनिकेँ कोनो जातिगत विभिन्नता देखबामे नहि अवइयै। अहुयुगमे वैशालीकेँ विदेहक अंगे बुझल जाइत छल आ तैं तँ त्रिशलाकेँ वैदेही कहल गेल अछि। लिच्छवी लोकनि देखबा सुनबामे सुन्दर होइत छलाह आ हुनकर पहिरब ओढ़ब अत्यंत सुन्दर होइत छलन्हि। अंगुत्तर निकायमे आन क्षत्रिय शासक जकाँ लिच्छवी लोकनिकेँ अभिषिक्त मानल गेल छन्हि। हियुएनसंग लिच्छवीकेँ क्षत्रिय कहने छथि। लिच्छवी लोकनि ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य, कार्तिकेय, वासुकी, लक्ष्मी आ विजयश्रीक पूजा करइत छलाह आ अहुसँ इ स्पष्ट अछि जे ओ विदेशी नहि छलाह। वैशालीमे जैन, बौद्ध आ ब्राह्मण धर्मक प्रधानता छल आ नेपालमे सेहो इ लोकनि ओहि सब धर्मक पालन करइत छलाह। लिच्छवीक अतिरिक्त आ कैकटा जाति वैशालीमे रहैत छलाह जकर विवरण निम्नांकित अछि। ज्ञात्रिक जाति ओहिमे सबसँ प्रसिद्ध छल आ एहि कुलमे जैनधर्मक संस्थापक वर्द्धमान महावीरक जन्म भेल छलन्हि। ज्ञात्रिक लोकनिक प्रधान केन्द्र छल कुन्द ग्राम आ कोलाग्ग। बौद्ध साहित्यमे महावीरकेँ नात (नाट) पुत्र कहल गेल छन्हि। इ लोकनि काश्यप गोत्रक छलाह। वज्जी गणराज्यक विकासमे हिनका लोकनिक विशेष योगदान छलन्हि। राहुल साँकृत्यायनक अनुसार आजक जथरिया भूमिहार ब्राह्मण एहि ज्ञात्रिकक वंशज छथि। राहुलजीक एहि मतकेँ सब केओ नहि मानैत छथि। उग्र लोकनि सेहो एक प्रसिद्ध जाति छलाह। वैशालीसँ हिनका लोकनिकेँ घनिष्ठ सम्पर्क छलन्हि। ‘हत्थीगाम’क समीप इ सब रहैथ होथि से संभव। बृहदारण्यकोपनिषद एवँ धम्मपद्दठीकामे उग्र लोकनिक विवरण भेटइत अछि मुदा ओ लोकनि इएह उग्र छलाह अथवा नहि से कहब असंभव। विदेह आ काशीमे उग्र लोकनिक प्रभुता आ सैन्यबलक चर्च भेटइत अछि। बुद्ध सेहो उग्र लोकनिक शहरमे गेल छलाह। सूत्रकृतांगमे उग्रकेँ बड्ड पैघ स्थान देल गेल छन्हि आ ललितविस्तरमे जे ६४ लिपिक विवरण अछि ताहिमे एकटा उग्र लिपिक विवरण सेहो अछि। ओहि ६४ मे एकटा पूर्व विदेहक लिपिक वर्णन सेहो भेटइत अछि। उग्रकेँ मिश्रित जाति सेहो कहल गेल अछि। जैन साहित्यमे उग्र जकाँ भोगकेँ सेहो क्षत्रिय कहल गेल छैक। इ लोकनि प्रथम जैन तीर्थकंर ऋषभक वंशज छलाह महापरिनिव्वानसुत्तसँ ज्ञात अछि जे वैशालीसँ पावा जेवाक रास्तामे भोगनगर, जम्बुगाम, अम्बगाम, हत्थिगाम, भण्डगाम आदि भेटइत छल आ एहि सबसँ भोग लोकनिक घनिष्ठ सम्पर्क छलन्हि। सूत्रकृतांगमे इक्ष्वाकु लोकनिक विवरण अछि आ इहो लोकनि वज्जी क्षेत्र रहैत छलाह। संभवतः इ लोकनि सुमतिक वंशज होथि। चूँकि विदेह लोकनि इक्ष्वाकुक पुत्र निमिक वंशज छलाह तैं इहो संभव अछि जे इहो लोकनि अपनाकेँ इक्ष्वाकु कहैत होथि। इहो संभव जे अयोध्याक इक्ष्वाकु एम्हर आबिकेँ बसि गेल होथि। वज्जी संघमे कौरव लोकनिक उपस्थिति एकटा समस्याक प्रश्न बनि गेल अछि। एहि सम्बन्धमे निम्नलिखित तथ्यकेँ स्मरण राखब आवश्यक। महाभारतक अनुसार पाण्डु मिथिला जाकए विदेहकेँ पराजित कएने छलाह। भीम गण्डक लोकनिकेँ पराजित केला उत्तर वैदेहक जनककेँ पराजित केलन्हि। ओ विदेहपर आधिपत्य स्थापित कए ओहिठाम अपन खुट्टा गारि अपन साम्राज्यवादी अभियानकेँ आगाँ बढ़ौलन्हि आ कौशिकी कच्छक राजाकेँ पराजित केलन्हि। इ क्षेत्र सम्प्रति विहपुर–पूर्णियाँ क्षेत्रक संकेत दैत अछि। कौशिकी क्षेत्र आ एहिसँ पूर्वक क्षेत्रपर एकटा कौरव राजकुमारकेँ लादि देल गेल। एम्हर विदेहमे जे कौरव बचि गेलाह से एहिठामक वासी बनिकेँ रहि गेला। हस्तिनापुरक अंत भेलापर सेहो कौरव लोकनि एहि क्षेत्रमे आबिकेँ बसलाह। राजा जनक दरबारमे तँ प्रारंभहिसँ कुरू पाँचालक ब्राह्मण लोकनिक अबरजात बनले छल। वज्जी गणराज्यक अंतर्गत बहुत तरहकेँ लोग रहल होएत एहिमे संदेह नहि। त्रिकाण्डशेषमे लिच्छवी, वैदेह आ तैरभुक्तकेँ पर्यायवाची शब्द मानल गेल छैक आ वज्जी संघक अगुआ इएह सब छलाह। कुछ विद्वानक कथन अछि जे कराल जनकक मृत्युक पश्चातो विदेहमे राजतंत्र बनल रहल आ महापद्म नंद जखन मिथिलाकेँ जीतलैन्ह तकर बादे मिथिलामे गणराज्य भेल मुदा हमरा इ बात मान्य नहि बुझि पड़इयै कारण कराल जनकक मृत्यु भेला उपरांत मिथिलामे विद्रोहक आगि भभकि उठल आ ओतए राजतंत्रकेँ समाप्त कऽ कए गणतंत्रक स्थापना कैल गेल। बुद्धक समयमे विदेह एकटा गणतांत्रिक राज्य छल। अजातशत्रुक वैशाली आक्रमणक पछाति एहि क्षेत्रक सूर्यास्तक संकेत भेटए लागल। पतंजलि एहि बातक साक्षी छथि जे विदेहमे गणराज्य छल। एहिमे आठ कुलक संघ छल। मल्ल, विदेह, उग्र, भोग, इक्ष्वाकु, ज्ञात्रि, कौरव एवँ लिच्छवीकेँ मिलाकेँ एकटा शासन छल–जकरा हमरा लोकनि लिच्छवी, विदेह अथवा वज्जीसंघक नामसँ जनैत छी। vi.) बौद्ध साधन आ मिथिलाक इतिहास:- अंगुत्तर निकायमे वज्जी संघक विवरण अछि मुदा विदेहक नाम नहि अछि। इहो संभव जे वज्जी संघक सदस्य रहलाक कारणे एहिमे एकर नाम नहि देल गेल हो। दीपवंशमे वर्णित परंपराक अनुसार कराल जनकक पुत्र छलाह समङ्कर आ हुनका बाद राजा भेलाह अशोक। ओहि परंपरामे इहो कथा अछि जे चम्पानगरक राजा नागदेवक वंशज कैक पुस्त धरि मिथिलापर शासन केलन्हि। एहिमे सबसँ अंतिम राजा भेलाह बुद्धदत्त। दीपवंशक कथासँ इ सिद्ध होइत अछि जे कराल जनकक बादो मिथिलामे राजा द्वारा शासन होइत रहल आ मिथिला नगरमे २५ टा राजा तकर बादो शासन केलन्हि जाहिमे बुद्धदत्त अंतिम छलाह। तकर बाद राज्य मगधक अंतर्गत चल गेल। एकर अतिरिक्त मिथिलामे अंगति, सुमित्र आ विरूधक नाम सेहो भेटइत अछि। अंगतिक शिक्षक छलाह गुणकस्सप।गुणकस्सपक विचार पुराणकस्सप आ मखलि गोसाल्लक विचारसँ मिलैत–जुलैत अछि आ इ सब बुद्धक समकालीन छलाह। राजा सुमित्रक सम्बन्धमे ललितविस्तरमे वर्णन भेटइत अछि। ललितविस्तरमे मिथिलाक सौन्दर्यक वर्णन अछि–आ ओहिमे इहो कहल गेल अछि जे सुमित्रकेँ हाथी, घोडा, रथ आ पैदल सेनाक कोनो अभाव नहि छलन्हि। सबतरहे सुखी सम्पन्न रहैतहुँ राजा बड्ड बूढ़ छलाह आ शासन क्षमता हुनक घटि चुकल छलन्हि। विदेहक तुलनामे ललितविस्तरमे वैशालीक गणराज्यक विशेष प्रशंसा अछि। इहो सूचना भेटइत अछि जे राजा विरूधक मंत्री सकलकेँ विदेह छोड़िकेँ वैशाली भागे पड़ल छलिन्ह कारण विदेह राज दरबारमे तरह–तरहकेँ षडयंत्र चलि रहल छल। आन मंत्री सब हिनकासँ इर्ष्या करैत छलाह। सकल वैशालीमे आबिकेँ प्रख्यात भेलाह आ एहिठाम नायकक पदपर निर्वाचित भऽ गेलाह। गिलगिट मैन्युसक्रिप्टमे सेहो मिथिलाक कोनो एक अनामा राजाक प्रधानमंत्री खण्डक उल्लेख भेटइत अछि। खण्ड ५०० अमात्यक प्रधान छलाह। हुनक जनप्रियतासँ आन–आन मंत्री घबड़ा उठलाह आ हुनका समाप्त करबाक प्रयास करे लगलाह। ओ लोकनि राजाकेँ इ कहिकेँ भरकावे लगलाह जे ‘खण्ड’ अपनाकेँ राजा बुझि रहल छथि आ तदनुसार काज कऽ रहल छथि। खण्ड एहि सबसँ तंग आबि वैशाली (जे कि गणराज्य छल) चल गेलाह जाहिठाम लिच्छवी लोकनि हुनक स्वागत केलथिन्ह। एहि सबसँ स्पष्ट होइत अछि जे वैशाली विदेहसँ पूर्वहि गणराज्य भऽ चुकल होएत। vii.) वज्जी गणराज्यक राजनैतिक सम्बन्ध:- इ. पू. छठी शताब्दीक १६ महाजनपदमे वज्जीक विवरणकेँ सम्मिलित करब एहि बातक द्योतक थिक जे ताहि काल तक एकर राजनैतिक प्रतिष्ठा स्थापित भऽ चुकल छल। अंगुत्तर निकायमे सेहो एकर विवरण अछि। वज्जीसंघक स्थापना ताहि दिनमे भेल छल जखन ने तँ काशीपर कोशलक अधिकार भेल छल आ ने अंगपर मगधक। वज्जीसंघ आ बिम्बिसारक राज्यक सीमा मिलैत–जुलैत छल। दुनूक बीच युद्ध भेल छल तकरो उल्लेख यदा कदा भेटइत अछि। दुनूक बीच युद्धक कारण कि छल से कहब असंभव अछि। संभव अछि जे मगध जखन अंगपर आक्रमण केलक तखन मगधक नजरि अंगक उत्तरी भाग अंगुतरापपर सेहो छलैक। अंगुतरापक सीमा वज्जीसंघक सीमासँ मिलैत–जुलैत छलैक आ तै वज्जीसंघकेँ सतर्क रहब आवश्यक छलैक। एहि अंगुतराप प्रश्न लऽ कए दुनूक बीच मतभेदक संभावना भऽ सकैत छैक। अंगुतराप एक महत्वपूर्ण जनपद छल आ बौद्ध धर्मक केन्द्र सेहो। एहिठाम बुद्ध कैक बेर गेल छलाह आ आपण ग्राममे एकाध मास रहलो छलाह। अंग जीतलाक बाद बिम्बिसार अंगुतरापपर अपन आधिपत्य स्थापित करए चाहैत हेताह जकर विरोध करब वैशालीक हेतु स्वाभाविक छल। एहि क्रममे जे संघर्ष भेल होएत ताहिमे संभवतः लिच्छवी लोकनि अंगुतराप क्षेत्रपर अधिकार कऽ लेने हेताह जे बिम्बिसार मानबा लेल तैयार नहि भेल हेताह आ एहि कारणे दुनूमे युद्ध भेल हेतन्हि। झगड़ाक एकटा आओर कारण अम्बपाली सेहो छल। बिम्बिसार चुपेचाप वैशालीमे आबिकेँ एकाध सप्ताह रहल छलाह आ अम्बपालीसँ बिम्बिसारकेँ एकटा पुत्रो छलन्हि जकर नाम छल अभय। संघर्षक चाहे जे कारण अथवा स्वरूप रहल हो परञ्च अंतमे जा कए वैशालीक संग बिम्बिसार वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित केलन्हि आ एकर फलस्वरूप दुनू राज्यक बीच युद्धक अंत भेल। तखनसँ मगधक संग वैशालीक सम्बन्ध अजातशत्रुक आक्रमणक समय धरि ठीके रहल। मल्ल आ लिच्छवीक बीचक सम्बन्ध सेहो बढ़िया छल। दुनूक ओतए गणराज्यक व्यवस्था छल आ दुनूकेँ जैन आ बौद्ध धर्मक प्रति आस्था छलन्हि। मनु दुनूक वर्णन व्रात्य कहिकेँ केने छथि। अजातशत्रुक आक्रमणक समयमे दुनू सम्मिलित रूपें हिनक विरोध कएने छलाह। महावीरक मृत्युक अवसरपर सेहो ओ लोकनि सम्मिलित रुपें काज कएने छलाह। कोशल राजाक सेनापति बन्धुल मल्ल रहथिन। कोशल राज्यक संग सेहो लिच्छवी लोकनिक सम्बन्ध बढ़िये छलन्हि। लिच्छवी महाली आ राजकुमार प्रसेनजित तक्षशिलामे संगे पढ़ैत छलाह। दुनूमे खूब दोस्ती छलन्हि। वत्सक संग सेहो वैशालीक वैवाहिक सम्बन्ध छल। वत्सराज सतानिकक विवाह चेतकक पुत्री मृगावतीसँ भेल छल। उद्यन ओहि दुआरे वैदेही पुत्र कहबैत छथि। अध्याय–५ मिथिलाक राजनैतिक इतिहास (ई. पू. छठी शताब्दीसँ ई. स. ३२० धरिक) ई. पू. छठी शताब्दीमे भारतमे केन्द्रीय सत्ताक अभाव छल आ समस्त उत्तरी भारत सोलह महाजनपदमे बटल छल। एहिमे बिहारमे अंग, मगध, वज्जि, मल्ल, प्रसिद्ध छलाह। एहि महाजनपद सबमे किछु राजतंत्रात्मक आ किछु गणतंत्रात्मक छल–बौद्ध साहित्यमे जे गणराज्यक उल्लेख भेटैछ ताहिमे बिहारमे वैशालीक लिच्छवी एवँ अन्य गणराज्यक संग मिथिलाक विदेह गणराज्यक उल्लेख सेहो भेटइत अछि। उत्तर बिहारक महाजनपदकेँ सम्मिलित रूपें वृज्जि – मल्ल सेहो कहल जाइत छल। वृज्जि गणराज्य आठ राज्यक एकटा संघ छल जाहिमे लिच्छवी, विदेह, ज्ञात्रिक प्रसिद्ध छलाह। संघक राजधानी वैशालीमे छल आ एकर स्वरुप कुलीनतांत्रिक छल। वृज्जि शासनमे प्रत्येक गाँवक राजाकेँ सरदार कहल जाइत छल। राज्यक सामूहिक कार्यक विचार एक परिषद होइत छल जकर ओ राजा लोकनि सदस्य होइत छलाह। किछु मल्ल लोकनि सेहो उत्तर बिहारमे रहैत छलाह। ताहि दिनमे जे दू प्रकारक राजनैतिक व्यवस्था छल आ ताहुपर जे केन्द्रीय सत्ताक अभाव छल तकरा चलते दुनू राजनैतिक पद्धतिक मध्य बरोबरि संघर्ष होइत रहैत छलैक आ एम्हर मगध अपन हाथ–पैर पसारि रहल छल। मगध, कोशल, वत्स, अवंती एहि चारू राज्यक मध्य आधिपत्यक हेतु संघर्ष चलि रहल छल आ ओ सब अपन–अपन क्षेत्रमे अपन–अपन प्रसारमे लागल छलाह। उपरोक्त चारू राज्यक तुलनामे मगधकेँ विशेष सफलता भेटलैक आ तकर मूलकारण इएह छैक जे मगध ताहि दिनमे आर्थिक दृष्टिये सफल आ सबल छल। राजनैतिक संगठनक वास्तविक पृष्ठाधार आर्थिक आ सामाजिक होइत अछि। मगध खनिज पदार्थक हेतु प्रसिद्ध छल आ लोहा एकर सबसँ पैघ उपलब्धि छल। लोहापर आधिपत्य रहबाक कारणे मगध सब समकालीन राज्यकेँ पराजित करबामे सफल भेल। नदी तटपर अवस्थित एवँ राजगीर एवँ अन्य पहाड़सँ घेरल बंधल मगधकेँ प्रकृति जेना एकटा प्राकृत सुरक्षा प्रदान केने होइक तेहने बुझल जाइत छल आ ताहिपर सँ मगधसँ तक्षशिला तक व्यापारिक मार्ग एवँ लोहापर ओकर एकाधिपत्य ओकरा सर्वतोभावेन साम्राज्यवादी बनेबामे समर्थ सिद्ध भेलैक– एहि बातकेँ हमरा लोकनि एतिहासिक विश्लेषणसँ हँटा नहि सकैत छी। आर्थिक तत्वक संगठनात्मक आधारक जे रूपरेखा हमरा लोकनिकेँ कौटिल्यक अर्थशास्त्रमे भेटइत अछि ओहिसँ स्पष्ट अछि जे मगधमे सुनियोजित व्यवस्थाक स्थापनामे कैक शताब्दीक परिश्रम रहल होएत। बिम्बिसारक नेतृत्वमे मगध साम्राज्यवादक श्रीगणेश भेल आ ओ अंगकेँ पराजित कए जखन अंगुतराप आ कौशिकी कक्ष दिसि बढ़लाह तखन हुनका वैशालीक लिच्छवी लोकनिसँ संघर्ष भेलन्हि आ से खटपट दुनू राज्यक बीच बादोमे बनल रहल। अंगुतराप आ वैशाली विदेहक सीमा कमला नदीक इर्द–गिर्द मिलैत छल। बादमे लिच्छवी चेटकक पुत्रीसँ विवाह कए ओ वैशालीक संग मित्रता स्थापित केलन्हि आ वैशालीक सुप्रसिद्ध गणिका अम्बपालीसँ सेहो हुनका एकटा पुत्र भेलन्हि। वैवाहिक सम्बन्धक माध्यमे ओ मगध राज्यक सम्बन्धक विस्तार केलन्हि। मगध साम्राज्य प्रसारक अट्टालिका एहि सम्बन्धपर ठाढ़ छल। अजातशत्रु अपन पिताक साम्राज्यवादी नीतिकेँ चालू रखलन्हि। ओ इ बात जनैत छलाह जे जाधरि वृज्जि संघक नाश नहि होएत ताधरि मगध साम्राज्यक एकाधिपत्य नहि संभव होएत तैं राज्यारोहणक बादसँ ओ एहि जोगारमे लागि गेलाह जे येन–केन प्रकारेण वृज्जिसंघकेँ मटियामेट कैल जाए। ओ एहि हेतु असंख्य बहाना खोजलन्हि। पिताक समय सेहो एहि दुनू राज्यक बीच खटपट भेल छल परञ्च अजातशत्रुक समयमे इ सामान्य खटपट अपन चरमोत्कर्षपर पहुँच गेल। हिनक मंत्री छलाह वर्षकार जनिका कौटिल्यक अगुआ कहल जाइत छन्हि। वर्षकार एहि सम्बन्धमे बुद्धसँ परामर्श करए गृद्धकूट पर्वतपर गेला। एहि प्रसंगपर बुद्ध जे वर्षकारकेँ उत्तर देलथिन्ह तकरा सत–अपरिहाणि–धम्म कहल जाइत छैक जकर विश्लेषण हम पाछाँ करब। वर्षकार एहिसँ अपन सुराग बाहर केलन्हि आ वज्जि संघमे फूट अनबाक प्रयासमे लागि गेलाह। अजातशत्रु आ वृज्जि संघक बीच युद्धक मुख्य कारण छल राजाक साम्राज्यवादी नीति। राजा एहि गणराज्यकेँ नष्ट कए मगधक अधीन करए चाहैत छलाह। जैन साधनसँ पता लगइयै जे लिच्छवी राजकुमारी चेलनासँ बिम्बिसारकेँ दूटा पुत्र छलन्हि–हल्ल आ वेहल्ल। बिम्बिसार हिनका दुनू भाइकेँ बहुत रास वस्तु उपहारमे देने छलथिन्ह परञ्च अजातशत्रु जखन अपन पिताकेँ मारिकेँ राजगद्दीपर बैसलाह तखन ओ हिनका दुनू भाइसँ ओ सब वस्तु वापस मंगलथिन्ह। ओ लोकनि देवासँ नकारि गेलथिन्ह। अपन रक्षार्थ ओ लोकनि अपन नाना (वैशाली)क ओहिठाम चल गेलाह आ अजातशत्रु खिसियाकेँ वैशालीपर आक्रमण कऽ देलन्हि। बौद्ध साधनक अनुसार मगध आ वैशालीक बीच गंगा नदी बहैत छल आ तकर एक कातमे एकटा कोनो प्रसिद्ध खान छल आ ओकरा सटले एकटा बन्दरगाह सेहो। एहि खान आ बन्दरगाहपर आधा–आधा हिस्सा दुनू राज्यक छल। वज्जि लोकनि शक्तिशाली होएबाक कारणे मगध लोकनिकेँ ओहि अधिकारक उपयोग नहि करए दैत छलथिन्ह तै अजातशत्रु शस्त्र द्वारा एहि प्रश्नक निबटारा करए चाहैत छलाह। अजातशत्रु सब दिसिसँ दारूण अस्त्रक संचय केलन्हि आ वर्षकारक साम्राज्यवादी सल्लाहक अनुकरण करैत ओ वृज्जिसंघपर आक्रमण केलन्हि। वृज्जिसंघ तत्त्कालीन मिथिलाक विशेष भागक प्रतिनिधित्व करैत छल। भयंकर युद्धक अगुआ भेलाह साम्राज्यवादी अजातशत्रु। लड़ाइ बहुत दिनधरि चलैत रहल। काशी आ अंग पछाति वैशाली विजय मगध साम्राज्यक स्थापनाक तेसर चरण छल। तिरयावली सूत्रक अनुसार लिच्छवी राज चेटक अठारह गणराज्यकेँ सहायताक हेतु अपील केलन्हि आ अजातशत्रुसँ लड़बाक हेतु एकटा संयुक्त मोर्चाक निर्माण केलन्हि। एहि युद्धमे अजातशत्रु महाशील कंटक आ रथमूशल सन सन युद्ध यंत्रक प्रयोग कएने छलाह। एहि दुनू राज्यक बीच लगभग १६ वर्ष धरि युद्ध चलैत रहल। आजीविक सम्प्रदायक प्रधान मखली गोस्साल सेहो एहि युद्धमे मारल गेलाह। मगध एहि युद्धमे सब प्रकारक कूटनीतिक प्रयोग केलक। अंततोगत्वा अजातशत्रु विजयी भेलाह आ वैशालीक गणराज्यक प्रभुताक अवसान भेल आ मगध साम्राज्य एहिपर अपन आधिपत्य स्थापित केलक। वैशालीपर विजय प्राप्त करब मगध साम्राज्यक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानल जाइत अछि आर अजातशत्रुक समयमे इ उपलब्धि प्राप्त भेल। तकर बाद जे राजा लोकनिक भेलाह से मगध साम्राज्यक उपलब्धि आ बढ़ौलन्हि आ एकर उत्कर्ष नन्दवंशक अधीनमे सर्वाधिक भेल। नन्दवंश शासक महापद्मकेँ पुराणमे अखिलक्षत्रांतकारी, सर्वक्षत्रांतक आ एकराट् कहल गेल छैक। महापद्म मैथिलकेँ सेहो पराजित कएने छलाह। एकर तात्पर्य इ भेल जे वैशालीक पराभव भेला उत्तर विदेहक मैथिल लोकनि संभवतः अपन स्वतंत्रता बचाकेँ रखबामे समर्थ भेल छलाह। मिथिलाक क्षत्रिय शासककेँ इ श्रेय छलन्हि परञ्च क्षत्रिय हंता महापद्म सब क्षत्रिय राज्यकेँ समाप्त करबाक क्रममे मैथिल लोकनिकेँ सेहो पराजित कए हुनका अपना राज्यक अंतर्गत कऽ लेलन्हि। एहि घटनाक बादहिसँ पाटलिपुत्र अखिल भारतीय साम्राज्यक केन्द्र भऽ गेल आ स्वतंत्र वैशाली विदेहक परंपरा समाप्त भऽ गेल। इ दुनू राज्य नन्दवंशक पछाति मौर्य साम्राज्यक अंग बनि गेल। एहि घटनाक बादसँ कर्णाटवंशक उत्थान धरि मिथिला मगधक अंग बनल रहल परञ्च साँस्कृतिक दृष्टिकोणसँ मिथिला अहु स्थितिमे अपन साँस्कृतिक परंपराकेँ आ वैशाली अपन गणतांत्रिक पद्धतिकेँ जोगौने रहल। ओहि प्राचीन कालहुँमे मिथिला वासी सुवर्ण भूमि आ पूर्वी द्वीप समूहसँ अपन सम्बन्ध बनौने रहल छलाह जकर प्रमाण हमरा लोकनिकेँ जातकसँ भेटइत अछि। एक कथासँ ज्ञात होइछ जे एक बेर विदेहक गद्दीक हेतु दु राजकुमारक मध्य संघर्ष भेलन्हि आ ओहिमे एक भाए मारल गेलाह। गर्भवती हुनक मैथिल विधवा मिथिलासँ पड़ाय गेलि आ चम्पा (भागलपुर)मे एकटा ब्राह्मणक ओतए शरणार्थी बनिकेँ रहलीह। ओहि विधवाक पुत्र महाजनक पैघ भेलापर अपन पूर्वस्थितिक ज्ञान प्राप्त कए अपन राज्य वापस करबाक हेतु दृढ़ संकल्प भेलाह। एहि हेतु धनक आवश्यकता छलन्हि तैं धनोपार्जनक हेतु ओ सुवर्ण भूमि दिसि गेलाह। बंगालक खाढ़ीमे हुनक जहाज टुटि गेलन्हि तखन खाढ़ीक अधिष्ठातृ देवी मणिमेखला हुनका अपन कोरामे उठा कए मिथिलापुरी पहुँचा देलन्हि। कम्बुजदेश नामक पोथीमे रमेश मजुमदार लिखने छथि जे प्राचीनकालमे चीनक युनान राज्य विदेह प्रांत कहबैत छल आ ओकर राजधानीक नाम मिथिला छलैक। कखनो कखनो एकरा मिथिला राष्ट्र सेहो कहल जाइत छलैक। चीनी परंपरामे जकरा नानचाआे कहल गेल छैक ओकरे एहि परंपरामे मिथिला राष्ट्र सेहो कहल गेल छैक। एहिसँ सिद्ध होइत अछि जे प्राचीन मिथिलाक लोक सब दक्षिण पूर्वी एशिया एवँ चीनक युनान प्रांत धरि व्यापारक हेतु जाइत छलाह आ अपना संगे अपन स्मृतिक रक्षार्थ अपन साँस्कृतिक परंपराकेँ सेहो उगौहने जाइत छलाह। वैशालीसँ सेहो लोग सब व्यापारक हेतु भारतसँ बाहर जाइत छलाह जकर सबसँ पैघ प्रमाण इ अछि जे बर्मामे एखनो “वेत्थाली” (वैशाली) नामक एकटा प्रसिद्ध स्थान विराजमान अछि। अजातशत्रुक हाथे जखन लिच्छवी लोकनि पराजित भेलाह तकर पश्चात विदेह वैशालीक गौरव लुप्त भऽ गेल आ मगध साम्राज्य अपन उत्कर्षपर पहुँचबाक सरंजाममे आओर तत्पर भऽ गेल। उदायिनक समय धरि लिच्छवी लोकनि अपन प्रतिष्ठाकेँ सुरक्षित रखबाक यथेष्ट प्रयत्न कएने छलाह। उदायिन साम्राज्यक दृष्टिकेँ ध्यानमे राखि राजगृहक परित्याग केलन्हि आ पाटलिपुत्रमे अपन राजधानी बनौलन्हि। एहिसँ गंगापारक विदेह आ लिच्छवीपर नियंत्रण रखबामे सुविधा भेटलन्हि। उदायिनक उत्तराधिकारीक समयमे सेहो लिच्छवी–मगधक संघर्ष चलिते रहल परञ्च नंदवंशक शासन काल धरि अबैत–अबैत उत्तर बिहार अथवा मिथिला–विदेह–वैशालीक प्राचीन परंपरा लुप्तप्राय भऽ गेल आ एहि समस्त क्षेत्रपर मगधक आधिपत्य भऽ गेलैक। नन्दवंशक शासन कालमे राजनैतिक पराभवक वावजूदो विदेह–वैशालीक सांस्कृतिक गरिमा बनल रहलैक आ अपन शासन सुविधाकेँ ध्यानमे रखैत साम्राज्यवादी नंदवंश शासक लोकनि मिथिलाक गणराज्यक परंपरामे हेर–फेर नहि केलन्हि आ वैशालीक प्रधानता सेहो बनल रहल। वृज्जिसंघक गणराज्यक स्वरूप यथावत छल आ ओहिमे कोनो प्रकार हेर–फेर नहि भेल छल, एकर सबसँ पैघ प्रमाण इ अछि जे कौटिल्य अपन अर्थशास्त्रमे लिच्छवी सबकेँ “राजशब्दोपजीवितः गणराजानः” कहने छथि। एकर अर्थ इ भेल जे राजनैतिक हिसाबे मैथिल लोकनि मगधक प्रभुत्वकेँ स्वीकार कऽ लेने होएताह आ आंतरिक रूपें ओ लोकनि अपन वैधानिक परंपराकेँ बचाकेँ रखने हेताह। एकर आठ सौ वर्ष बाद धरि वैशालीक महत्व बनल रहल छलसँ तँ गुप्तकालीन इतिहासक अध्ययनसँ स्पष्ट होइछ। ई. पू. छठम शताब्दीसँ जे एकटा राजनैतिक एकता एवँ धार्मिक विद्रोहक प्रभावक प्रादूर्भाव भेल छल ताहिसँ मिथिला बाँचल कोना रहि सकैत छल। वर्द्धमान महावीर आ गौतम बुद्ध, जैन आ बौद्ध धर्मक प्रणेता लोकनिक सम्बन्ध एहि क्षेत्रसँ बड्ड घनिष्‍ठ छलन्हि आ दुनू व्यक्ति बरोबरि एहि क्षेत्रक सीमाक अंतर्गत अपन वर्षावास करैत छलाह। महावीर अर्हत् (पूज्य), जिन (विजेता), निग्रंथ (बन्धनहीन) सेहो कहबैत छलाह आ ओ कोशल, मगध, विदेह इत्यादि स्थानक भ्रमण कएने छलाह। वैशाली तँ हुनक जन्मस्थाने छलन्हि। मगधराज बिम्बिसारक रानी चेलना महावीरक बहिन छलथिन्ह। धार्मिक पक्षपर विवेचन हमरा लोकनिक साँस्कृतिक खण्डमे करब। बौद्ध धर्मक प्रभाव सेहो मिथिलापर बड्ड छल। हम उपर लिखि आएल छी जे संभवतः अंगुतरापपर आक्रमण करबाक क्रममे मगध राज बिम्बिसारक खटपट लिच्छवी लोकनिसँ भेल होएतन्हि। अंगुतरापक आपण गाँवमे बुद्ध एकाध मास रहल छलाह आ ओतुका ब्राह्मण लोकनि हुनक विशेष आदर भाव कएने छलथिन्ह। सप्तरी, भाला परगना, बुद्धग्राम, रत्नपुर, ब्रह्मपुर, विसारा, बेतिया, चम्पारण, आदि बौद्ध धर्मक प्रधान केन्द्र छल। नन्दक शासन कालमे जँ पाणिनि पाटलिपुत्र आएल छलाह तँ ओहि आस पासमे वैशालीमे दोसर बौद्धसंगीति भेल छल जे धार्मिक दृष्टिकोणसँ मानल गेल अछि। वैशाली मौर्ययुगमे पटना आ हिमालय राज्य नेपालक बाटमे पड़इत छल। वैशालीमे अशोक एकटा स्तंभ सेहो बनौने छलाह आ एकटा स्तूप सेहो जाहिमे ओ बुद्धकेँ अवशेषकेँ सुरक्षित रखबौने छलाह। बुद्धक अवशेष एम्हुरका जे उत्खनन भेल अछि ताहिसँ प्राप्त भेल अछि। वैशाली व्यापारोक प्रधान केन्द्र छल। मिथिला आ नेपालक सम्बन्ध सेहो मधुर छल। तराइ क्षेत्रमे किरात लोकनि बसैत छलाह आ मैथिल सांस्कृतिक निर्माणमे किरातक योगदान ककरोसँ कम नहि छन्हि। मौर्य युगक अवशेष ततेक ने प्रचुर मात्रामे मिथिलाक चारु कातसँ भेटइत अछि जे इ निश्चित भऽ जाइत अछि जे मौर्ययुगमे समस्त मिथिला पूर्णरूपेण मगध साम्राज्यक एकटा प्रमुख अंग बनि गेल छल। पूर्णियाँ, वनगाम–महिषी, पटुआहा, बहेड़ा, हाजीपुर, वैशाली, आदि क्षेत्रसँ पंचमार्क्ड सिक्का विशेष मात्रामे प्राप्त भेल छैक आ मौर्य युगीन मॉटिक मुरूत, खेलौना इत्यादि तँ सहजहि मिथिलाक कोन–कोनमे भेटइत छैक। मृण्मूर्ति तँ एहेन कोनो क्षेत्र नहि अछि जाहि ठामसँ नहि भेटल हो। भऽ सकैछ जे एहि क्षेत्रमे एकर कैकटा केन्द्र सेहो रहल हो। एकर अतिरिक्त मिथिलाक विभिन्न क्षेत्र सबसँ नादर्नब्लैक पॉलिश्ड वेयर (N.B.P) सेहो भेटइत अछि आ एहि सब सम्मिलित साधनक आधारपर इ निर्विवाद रूपें कहल जा सकइयै जे मिथिला क्षेत्र पूर्णतोभावेन पाटलिपुत्रक अधीन रहल छल। मिथिलाक इतिहासकार डॉक्टर उपेन्द्र ठाकुर ई.पू.३२६सँ १०९७ ई. धरिकेँ मिथिलापर जे शासन छल तकरा ओ विदेशी शासनक संज्ञा देने छथि मुदा हुनक इ तर्क युक्तिसंगत नहि बुझि पड़इयै कारण मिथिला (जे कि भारतक एकटा अंग थिक) क संदर्भमे हम मगधकेँ विदेशी कोना मानि सकैत छियैक। दोसर गप्प इहो जे जँ मौर्य, गुप्त, पाल, प्रतिहार आदि मिथिलाक हेतु विदेशी बुझल जाइथ तखन तँ इहो स्मरण राखेक चाही जे कर्णाट लोकनि तँ आर दक्षिणसँ आएल छलाह तँ ओ लोकनि देशी कोना भऽ गेलाह। एक समय एहनो छल जखन मिथिलाक प्रभुत्व छल आ समस्त वैशाली आ नेपालक तराइपर मिथिलाक प्रभुत्व छल तँ कि एकरा वैशालीपर विदेशी शासन कहल जेतैक? ओहिना जखन वैशालीक प्रभुत्व बढ़ल तखन मिथिला वैशालीक अंग भऽ गेल तँ ओहिकालकेँ मिथिलाक हेतु विदेशी शासन कियैक नहि मानल गेलैक? अजातशत्रु वैशालीकेँ आ नंद लोकनि मिथिलाकेँ पराजित कए मगध साम्राज्यक उत्कर्ष केलन्हि आ मगधक तत्वावधानमे समस्त उत्तर भारतक नहि अपितु समस्त भारतक राजनैतिक एकीकरण भेल तैं हेतु मिथिलाक इतिहासक संदर्भमे एहिकालमे मिथिलाक हेतु विदेशी शासनक काल कहब युक्ति संगत नहि बुझना जाइत अछि। दोसर बात इ जे मगध साम्राज्यक उत्कर्ष भेला उत्तरो वैशाली एवँ विदेहक आंतरिक स्वायत्ता बनले रहलैक आ ओहिमे कोनो प्रकारक हस्तक्षेपक उदाहरण नहि भेटइत अछि। लिच्छवी लोकनि अपन नियमपर चलिते रहलाह। पतंजलि सेहो जनपदक रूपमे मिथिलाक उल्लेख कएने छथिये। तत्कालीन साहित्यक प्रमाणकेँ जँ साक्ष्य मानल जाए तँ इ निर्विवाद रूपें कहल जा सकइयै जे एतावता मिथिला राजनैतिक रूपें मगध साम्राज्यक अधीन रहितहुँ अपना आपमे स्वतंत्र छल। मगधक तत्वावधानमे अखिल भारतीय एकता एकटा ऐतिहासिक क्रम छल जकरा फले लगभग हजार वर्ष धरि मगधक इतिहास भारतवर्षक इतिहास बनल रहल आ मगधक अवसानक पछाति पुनः देशमे छोट–छोट राज्यक जेना उजाटि उठि गेल हो तहिना बुझना जाइत छल। मौर्य साम्राज्यक स्थापना भारतीय इतिहासमे एकटा महत्वपूर्ण घटना मानल गेल अछि। एकर विवरण पुराणमे एवँ प्रकारे अछि– “उद्धरिष्यति तान् सर्वान् कौटिल्यो वै द्विजर्षभः कौटिल्यश्चन्द्रगुप्तं तु ततो राज्येभिषेक्ष्यति” मुद्राराक्षसक अनुसार चन्द्रगुप्त हिमालयसँ दक्षिणार्णव धरि अपन राज्य सीमाकेँ विस्तृत केलन्हि। वैशाली आ मिथिला मौर्य साम्राज्यक प्रान्त छल आ एहिठाम जे अखनो गणराज्य वर्त्तमान छल तकर सबसँ पैघ प्रमाण अछि कौटिल्यक अर्थशास्त्र। अशोकक स्तम्भ लेख लौरियानन्दन आ रामपुरबा तथा स्तंभ चम्पारण, वैशालीसँ भेटल छैक आ ओम्हर पूबमे धरहरा (बनमनखी–पूर्णियाँ)क समीप सिकलीगढ दिसि सेहो अशोक स्तंभक होएबाक किछु प्रमाण भेटल छैक जाहिसँ इ पुष्ट होइछ जे अशोक काल धरि मिथिलापर मौर्य साम्राज्य अक्षुण्ण भावें बनल रहल। नेपाल आ तराइक विशिष्ट भागपर सेहो अशोकक राज्य छल। वैशालीक प्रभुत्व तखनो बनल छल और अशोक मिथिले बाटे नेपाल गेल छलाह–पाटलिपुत्रसँ विदा भऽ कए ताहि दिनमे लोक पहिने वैशाली पहुँचैत छल आ तब केसरिया, लौरियाए अरेराज, बेतिया, लौरिया नंदनगढ, जानकीगढ आ रामपुरबा होइत भीखनाठोरी लग पहुँचैत छल आ ओहिठामसँ नेपाल जाइत छल। अशोक एहि बाटे नेपाल गेल छलाह आ नेपालकेँ अपना राज्यमे मिलौने छलाह। लिच्छवी, किरात, मल्ल, विदेह आदि जाति सबमे ताहि दिनमे वेस मेलजोल छल आ हिनको लोकनिक संपर्क नेपालसँ घनिष्‍ठ छलन्हि। वैशाली उत्खननसँ प्राप्त एकटा मुहर पर लिखल अछि–“वैशाली अनुसम्यानक टकार”–जाहिसँ इ बुझि पड़इयै जे वैशाली मौर्य कालमे शासनक एकटा प्रधान केँन्द्र छल आ खासकर अशोकक समय एकर प्रधानता आओर बढ़ि गेल छलैक। अशोकक समय बहुत रास व्यक्ति बौद्ध धर्मक प्रचार करबाक हेतु तिब्बतो गेल रहैथ। मौर्य साम्राज्यक पतनक पछाति शूंगवंशक स्थापना भेल। इ ब्राह्मवंश छल। ब्राह्मण धर्मक प्रभुत्व बढ़ल परञ्च संगहि विकेन्द्रीकरणक प्रवृत्तिकेँ सेहो बढ़ावा भेटलैक। शूंग कालहुमे मिथिलापर पाटलिपुत्रक प्रभाव बनले रहलैक। शूंगकालीन स्तंभ गण्डक तीरपर काली मंदिरक समीप सोनपुरमे भेटल छैक आ जयमंगला गढ़ (बेगूसराय)सँ प्राप्त लकड़ीक पुलक संगहि शूंगकालीन मृण्मूर्तिक आविष्कार एकटा पैघ पुरातात्विक घटना मानल गेल अछि। पटना (कुम्हरार) आ नौलागढ़ (बेगूसराय)सँ शूंगकालीन मॉटिक मुरूत आ साज श्रृंगारक सामान सेहो भेटल अछि। नेपालमे किरात लोकनिक महत्व बनल छल आ उहो लोकनि संभवतः शूंग लोकनिक आधिपत्य स्वीकार केने छलाह। रैमा गाममे एक पुरान पोखरि छैक जकरा लोग क ओहिठाम सुनगाही पोखरि कहैत छैक। ओहिमे सँ बहुत रास प्राचीन सामग्री भेटल छैक आ ओहिठामक लोग विश्वास छन्हि जे इ पोखरि शूंगकालीन थिक। शूंगकालहु धरि अंगमे ब्राह्मण धर्मक प्रचार–प्रसार विशेष रूपें नहि भेल छल परञ्च मिथिलामे ब्राह्मण–धर्मक पुनुरूत्थान एहि युगमे विशेष रूपें भेल छल। विदेह आ अंगक बीचमे एकटा प्रसिद्ध स्थान छल कालकवन। शूंगक पछाति कण्व लोकनिक शासन रहल। हुनका लोकनिक समयमे मिथिला–वैशाली क्षेत्रपर पाटलिपुत्रक प्रभाव घटि गेल छल। एहि स्थितिसँ लाभ उठाकेँ लिच्छवी लोकनि शनैः शनैः अपन सत्ता बढ़ौने जा रहल छलाह। दक्षिणमे आन्ध्र–सातवाहन, पूर्वमे कलिंगक खरवेल आ पश्चिममे शक् क्षत्रप लोकनि अपन प्रभाव बढ़ा रहल छलाह। दू–दू बेर कलिंग राज खरवेल मगधपर आक्रमण कऽ चुकल छलाह परञ्च मिथिलापर हुनक आधिपत्य भेलन्हि अथवा नहि से कहब कठिन। मिथिलामे एखनहुँ पुरातात्विक ढँगक उत्खनन नहि भेल छैक तैं जनक राजवंशसँ लकए कर्णाट राजवंश धरिक इतिहासकेँ अन्धकारपूर्ण कहल जा सकइयै यद्यपि साँस्कृतिक दृष्टिकोणसँ एहि युगक विशेष महत्व अछि। कुषाण लोकनि कनिष्कक नेतृत्वमे वैशाली धरि आएल छलाह से संभव। कहल जाइत छैक जे कनिष्क वैशालीसँ बुद्धक भिक्षाटन बला बाटी उठाकेँ गान्धार लऽ गेल छलाह। राज्ञो महाक्षत्रपस्य स्वामी रूद्रारुद्रसिंहस्य दुहितु राज्ञो महाक्षत्रपस्य स्वामी रूद्रसेनस्य भगिन्या महादेव्या प्रभुदामायाह॥ 1 वैशालीसँ शक क्षत्रप रूद्रसेनक बहिन महादेवी प्रभुदामाक एक गोट लिखल मोहर पाओल गेल छैक 1 जाहिसँ इ अनुमान लगाओल जा सकैत अछि जे शक क्षत्रप सबहिक संग ताहि दिनमे एहि क्षेत्रक संपर्क छलैक। एहि सम्बन्धक वास्तविक स्वरूपक ठेकान लगाएब अखनो कठिन अछि। एहि क्षेत्र सबसँ बहुत क्षत्रप आ कुषाण मुद्रा तथा सिक्का भेटल अछि। मनुस्मृतिमे लिच्छवी, विदेह, मल्ल जाति सबकेँ व्रात्य कहल गेल छैक जकर कारण इएह थिक जे इ सब वैदिक कर्मकाण्डक कोनो परवाहि नहि करैत छलाह। मौर्योत्तर कालमे प्रकार–प्रकारक लोगक उल्लेख भेटैछ आ ओकर सम्बन्ध वैशाली मिथिला क्षेत्रसँ बताओल जाइत अछि। एहि प्रसंगक विशेष रूप हम अपन लेखमे “कम्प्रीहेनसिम हिस्ट्री आफ बिहार”मे प्रस्तुत कएने छी आ एहिठाम मात्र ओकर संकेत धरि दैत छी। टालेमी (भूगोलवेत्ता) अपन पुस्तकमे कहने छथि जे गण्डकसँ महानंदा धरि “मरूण्डाइ” नामक एक गोट जातिक आधिपत्य छलन्हि। एहि जातिक प्रभाव एहि क्षेत्रपर छल। मौर्योत्तर कालमे मिथिलामे सेहो एक प्रकारक अस्तव्यस्तता छल आ एकर नतीजा इ होइत छल जे चारू कातक महत्वाकाँक्षी लोक सब एकर लाभ उठा लैत छलाह। ‘मरूण्डाइ’ जातिक विवरण कैक साधनसँ प्राप्त होइत अछि परञ्च वस्तुस्थिति कि छल ताहि सम्बन्धमे ठीक–ठीक निर्णय देव अंसभव। टालेमी निश्चय कोनो आधारपर अपन मंतव्य देने हेताह जे आधार आब हमरा लोकनिकेँ उपलब्ध नहि अछि। ‘मरूण्डाइ’क अतिरिक्त आरो एक गोट जाति छलैक जकर राज्य उत्तरी बिहारमे छलैक। ओहि जातिक नाम छल ‘भर’ (भर राजपूतोकेँ कहल जाइत छैक)। भर लोकनिक अवशेष सहरसा आ बेगूसरायमे अछि। सिहेंश्वर स्थानमे रायभीर नामक एकटा स्थान छैक जकरा भर लोकनिकेँ राजधानी कहल जाइत छैक। बेगूसरायमे तप्पा सरौंजा सेहो भर लोकनिक प्रधान केन्द्र छल। भर लोकनिकेँ विश्वास छैन्ह जे ओ सब भारशिव–नाग वंशक उत्तराधिकारी छथि। जँ इ कथन सत्य हो तँ इ मानल जा सकैत अछि जे भारशिव नाग वंशक आधिपत्य सेहो मिथिलापर छल। भर लोकनिक अनेक किंवदंती एखनो मधेपुरामे पाओल जाइत छैक। मरूण्डाइ, भर, किरात आदि जाति सबहिक प्रभुत्व मिथिलाक किछु खास–खास अंसेपर रहल हेतैक। एहेन अनुमान लगाओल जाइत छैक जे मौर्य लोकनिक पतनक पछाति लिच्छवी लोकनि अपन अस्तित्वक पुनर्स्‍थापन लागि गेल हेताह–कुषाण लोकनिक प्रभुत्वसँ हुनका लोकनिकेँ धक्का पहुँचल हेतन्हि आ ओहि अनिश्चितताक अवस्थासँ लाभ उठाकेँ भारशिव नाग वंशक लोग मिथिलाक क्षेत्रमे अपन सत्ता स्थापित कएने होएताह। कुषाणक प्रभावक वृद्धि भेलापर लिच्छवी लोकनि ओतएसँ हँटिकेँ जे नेपाल गेलाह से अपन प्रभुत्व कायम केलन्हि आ तहियासँ करीब ७०० वर्ष धरि ओतए शासन करैत रहि गेलाह। ओहि लिच्छवी लोकनिक सम्बन्ध पाटलिपुत्रसँ सेहो छल। एक परंपरामे तँ इहो सुरक्षित अछि जे लिच्छवी लोकनि पाटलिपुत्रपर सेहो शासन करैत छलाह आ नेपाली शिलालेखक अनुसार ‘सुपुष्प’ लिच्छवीक जन्म पाटलिपुत्रमे भेल छलन्हि। लिच्छवीक अंत:- अजातशत्रुक पछाति लिच्छवी लोकनिक इतिहास संदिग्ध भऽ जाइछ। कौटिल्यक अर्थशास्त्रमे गणराज्यक रूपमे हुनका लोकनिक उल्लेख अछि मुदा कोनो प्रामाणिक इतिहास हुनका लोकनिक अद्यावधि नहि भेटल अछि। लिच्छवी जाति एवँ राष्ट्रक रूपमे जीवित रहलाह आ आठ सौ वर्ष बाद पुनः बिहारक इतिहासमे अपन उचित भूमिकाक निर्वाह करैत लगभग ७०० वर्ष धरि नेपालपर सेहो शासन केलन्हि मुदा तइयो कोनो एकटा प्रामाणिक इतिहास हुनका लोकनिक नहि भेटइयै। हितनारायण झाक शोध प्रबन्ध जे लिच्छवीपर छन्हि ताहुमे कोनो विशेष नव बात देखबामे नहि अवइयै आ ने कोनो नव तथ्यक उद्घाटने भेल अछि। नेपालक लिच्छवीकेँ सूर्यवंशी लिच्छवी कहल गेल छन्हि। तिब्बती परंपराक अनुसार तिब्बतक प्रारंभिक शासककेँ ‘लि–च–व्य’ कहल जाइत छलैक आ हुनका लोकनिककेँ विदेशी बुझल जाइत छलन्हि। एहिसँ इ अनुमान लगाओल जाइत अछि जे लिच्छवीक एक शाखा नेपालमे बसल आ दोसर शाखा तिब्बतमे। नेपालमे लिच्छवी लोकनि राजतंत्रात्मक प्रणालीक समर्थक बनलाह। संभवतः अपन वैशालीक अनुभव हुनका राजतंत्रात्मक पद्धति केँ अपनेबापर बाध्य केने होन्हि से एकटा विचारणीय विषय। तिब्बतमे सेहो इ लोकनि राजतंत्रात्मक सत्ताक समर्थक बनि गेलाह। सब किछु होइतहुँ तिब्बत नेपाल आ वैशालीक लिच्छवीक मध्य एक प्रकारक सम्बन्ध बनले रहल आ हुनका लोकनिक आप अपनौती सेहो बनल रहलैन्ह। नेपालक लिच्छवी लोकनि ब्राह्मण आ बौद्ध धर्मक समर्थक रहलाह आ हुनके लोकनिक समयमे शैव आ शाक्तक प्रधानता सेहो बढ़ल। जयदेव द्वितीय (नेपाल)क शिलालेखक अनुसार लिच्छवी लोकनि किछु दिन धरि मगधक शासक सेहो छलाह। हुनक पूर्वज सुपुष्पक जन्म पाटलिपुत्रमे भेल छलन्हि। सुपुष्पक जन्म संभवतः प्रथम शताब्दीमे भेल छलन्हि आ तखन कुषाण लोकनिक प्रधानता रहल होएत। इ अनुमान लगाओल जाइत अछि जे ओ लोकनि कुषाणक सत्ताकेँ स्वीकार कए अपन अस्तित्वक रक्षा कएने होएताह। एहिमे सँ जे विशेष स्वाभिमानी रहल होएताह से अपन स्वतंत्रताक रक्षार्थ नेपाल दिसि बढ़ि गेल हेताह। कनिष्कक परोक्ष भेलापर पुनः लिच्छवी लोकनि अपन स्वतंत्रताक स्थापना करबामे संभव भेल होएताह। नेपालमे जाकए ओ लोकनि राजतंत्रात्मक पद्धतिकेँ अपनौलन्हि आ तैं संभवतः समुद्रगुप्त हुनका लोकनिकेँ जीति अपन राज्यक अंतर्गत कएने होएताह। लिच्छवी राजकुमारीक विवाह एक महत्वाकाँक्षी साम्राज्यवादी राजकुमारक संग हैब एकटा आश्चर्यक बात बुझि पड़इयै। लिच्छवी लोकनि तखन स्वयं गणराज्यक सिद्धांतमे विश्वास करैत छलाह अथवा नहि से एकटा विचारणीय विषय। दोसर बात इ ओ लोकनि सेहो पाटलिपुत्रकेँ जीतकेँ ओहिपर राज्य करैत छलाह जाहिसँ इ स्पष्ट होइछ जे लोकनि अपन पुरान आदर्शवादी गणराज्यक सिद्धांतक परित्याग कऽ चुकल छलाह। इहो संभव अछि जे जखन अजातशत्रुक हाथे ओ पराजित भेलाह तखन वैशालीक पुरान प्रतिष्ठा लुप्त भऽ चुकल छल आ ओहि मध्य जे महत्वाकाँक्षी राजनेता छलाह से समय पाबि मौर्य साम्राज्यक पराभव देखि मगधपर आक्रमण कए अपन हारक बदला चुकौलनि आ पाटलिपुत्रपर अपन शासन स्थापित केलन्हि। गणराज्यक सिद्धांतक प्रति हुनक सहानुभूति भने रहल होन्ह परञ्च वास्तविकता इ अछि जे गुप्त साम्राज्यक पूर्व उहो अप्रत्यक्ष रूपें राजतंत्रात्मक पद्धतिक समर्थक भऽ गेल छलाह आ चन्द्रगुप्त प्रथमकेँ होनहार देखि अपन पुत्रीसँ हुनक विवाह कराओल। मगध साम्राज्यक उत्कर्ष मे लिच्छवीक एहि योगदानसँ सहायता भेटलैक आ गुप्त साम्राज्यक शासन कालमे गणराज्य परम्पराक बचल खुचल अवशेष समाप्त भेल। इ एक एहेन विषय अछि जाहि दिसि विद्वानक ध्यान आकृष्ट नहि भेल छन्हि आ जाहिपर नीक जकाँ सोचल नहि गेल अछि। मिथिलाक इतिहासक दृष्टिकोणे इ एकटा अत्यंत महत्वपूर्ण शोधक विषय थिक। कौमुदी महोत्सव नाटक एहि पक्षपर विशेष प्रकाश दैत अछि। एहि ग्रंथक आधारपर हम जनैत छी कल्याणवर्मनक पिता सुन्दरवर्मनक मृत्यु पाटलिपुत्रक रक्षा करैत भेलन्हि। ओहि समयमे पाटलिपुत्रपर चन्डसेन आ लिच्छवी घेरा डालने छलाह। सुन्दरवर्मन क्षत्रिय पाटलिपुत्रक शासक छलाह। सुन्दरवर्मनक वंशकेँ मगध वंश (कोटकुल) कहल गेल छैक। सुन्दरवर्मन चण्डसेनकेँ अपन कृतक पुत्रक रूपमे ग्रहण केने छलाह। लिच्छवी लोकनि एहि मगध कुलक विरोधी छलाह तथापि चण्डसेन लिच्छवी राजकुमारीसँ विवाह केलन्हि परञ्च ताहि बीच बुढ़ारीमे सुन्दरवर्मनकेँ एकटा पुत्र उत्पन्न भेलन्हि जाहि दुआरे राजगद्दीपर चण्डसेनक अधिकारपर प्रश्नसूचक चेन्ह लागि गेलन्हि। मगधकुल होइतहुँ चण्डसेन पाटलिपुत्रपर अपन घेरा डललन्हि आ राजधानी कुसुमपुरकेँ चारूकातसँ घेर लेलन्हि। एहिकाजमे हुनका अपन सासुरक लोग (लिच्छवी) सबसँ बड्ड साहाय्य भेटलन्हि आ ओ विजयी भऽ मगधपर अपन राज्यक स्थापना केलन्हि। सुन्दरवर्मनक अपन पुत्र कल्याणवर्मन अपन प्रधानमंत्री मंत्रगुप्त आ सेनापति कुँजरक संग मिलि मगध राज्यकेँ बचेबाक अथक प्रयत्न केलन्हि। एहि बीच मगध राज्यक सीमापर सबर आ पुलिन्द जातिक लोग विद्रोह कऽ देलन्हि आ चण्डसेन हुनका लोकनिकेँ नियंत्रणमे अनबाक हेतु पाटलिपुत्र छोड़िकेँ बहरेला। इ विद्रोह मंत्रगुप्तक मंत्रणाक फल छल। चण्डसेनक अनुपस्थितिमे मंत्रगुप्त नगर परिषदक सदस्यक संग मंत्रणा केलन्हि आ कल्याणवर्मनक हेतु मार्ग प्रशस्त सेहो। कल्याणवर्मन तुरंत पाटलिपुत्र बजाओल गेल आ हुनका राजगद्दीपर बैसाओल गेल। सुरसेन आ मथुरा तथा यादवक संग मित्रताक सम्बन्ध स्थापित भेल। मथुराक राजकुमारी कीर्त्तिमतिसँ कल्याणवर्मनक विवाह भेल। स्वर्गीय काशी प्रसाद जायसवालक कथन छन्हि जे इएह चण्डसेन चन्द्रगुप्त प्रथम छलाह आ लिच्छवीक संग हुनक विवाह भेल छलन्हि। वनस्फर (कनिष्कक राज्यपाल)क समयमे लिच्छवी लोकनि वैशाली दिसि चल आएल छलाह परञ्च कनिष्कक अवसान भेलापर ओ पुनः पाटलिपुत्रक सीमा धरि अपन अधिकार बढ़ा लेने छलाह। लिच्छवी लोकनिक प्रोत्साहनेपर चण्डसेन अपन कृत्रिम पिताक विरूद्धमे विरोध कएने छलाह। लिच्छवी लोकनिकेँ इ पसिन्न नहि छलन्हि जे कल्याणवर्मन मगधक गद्दीपर रहैथ। कल्याणवर्मनकेँ भगेबाक प्रयास भेल–कल्याणवर्मन जे मगधमे बजाकेँ गद्दीपर बैसाओल गेल छलाह ताहि उत्सवक हेतु ओ कौमुदी महोत्सव मनौने छलहि आ ओहि घटनासँ प्रेरित भऽ कविि‍यत्र किशोरिका वज्जिका कौमुदी महोत्सव नामक नाटकक रचना केलन्हि। एहिमे लिच्छवीकेँ म्लेच्छ आ चण्डसेनकेँ कारस्कर कहल गेल छैक। चण्डसेनक विवाह लिच्छवीसँ भेला उत्तर ओ कल्याणवर्मनकेँ पराजित करबामे एवँ पुलिन्द एवँ शवर लोकनिक विद्रोहकेँ दबेबामे समर्थ भेलाह आ पाटलिपुत्रमे एक नव राजवंशक स्थापनामे सेहो। प्रयाग प्रशस्तिक कोटकुलकेँ जायसवाल एहि मगध कुलसँ मिलबैत छथि। कौमुदी महोत्सवक घटनाक प्रामाणिकताक लऽ कए विद्वान लोकनिमे बड्ड विभेद छन्हि। चन्द्रगुप्तक पिता घटोतकचगुप्त स्वयं राजा छलाह परञ्च कौमुदी महोत्सवमे चण्डसेनकेँ हटेबाक उल्लेख अछि। दोसर गप्प इहो अछि जे ओहि कालमे मगधपर लिच्छवीक प्रधानता छल। जखन गुप्तवंशक उत्थान होइत छलैक तखन पाटलिपुत्र धरि लिच्छवी लोकनि अपन प्रसार कऽ चुकल छलाह। ताहि कालमे कहल जाइत अछि जे मगधमे कोनो क्षत्रिय वंशक शासन छल जकरा उखाड़बाक लेल दक्षिण–पश्चिमसँ गुप्त लोकनि बढ़ल अबैत छलाह आ एम्हर पूव–उत्तर दिसिसँ लिच्छवी लोकनि। एवँ प्रकारे राजनैतिक दृष्टियें गुप्त आ लिच्छवी दुनूक सम्मिलित उद्देश्य छल मगधक क्षत्रिय राजवंशकेँ अंत करबाक। एहना स्थितिमे दुनूक बीच वैवाहिक सम्बन्धक स्थापना तत्कालीन मान्य राजनैतिक परिकल्पनाक प्रमुख अंग छल आ तैं इ कोनो अस्वाभाविक बात नहि बुझाइत अछि। गुप्तक पूर्वक स्थिति पाटलिपुत्रमे कि छल से निश्चित रूपे कहब अंसभव। किछु गोट एक मत छन्हि जे प्राक्–गुप्त कालमे मगधमे शक–सीथियन लोकनिक शासन छल परञ्च जायसवाल एहि बातकेँ नहि मानैत छथि आ हुनक विश्वास छन्हि जे वर्मन लोकनिक शासन ताहि दिन (कौमुदी महोत्सवक अनुसार)मे मगधमे छलन्हि। वर्मन लोकनिकेँ किछु गोटए आन्ध्रक वंशज सेहो मनैत छथि। लिच्छवीक संग गुप्तक वैवाहिक सम्बन्ध प्राचीन भारतीय इतिहासक एकटा महत्वपूर्ण घटना मानल गेल अछि आ एकरे फले गुप्त साम्राज्यक उत्कर्ष संभव भेल। लिच्छवी आ मगधक एहि सम्बन्धसँ दू राज्यक मिलन भेलैक आ गुप्त साम्राज्यक नींव पड़लैक। गुप्त अभिलेखमे जाहि ढ़ँगे लिच्छवीकेँ महत्व देल गेल छैक ताहिसँ प्रामाणित होइत अछि जे तखन धरि लिच्छवीक महत्व घटल नहि छलैक। इ ठीक जे एहि वैवाहिक सम्बन्धक बाद आ गुप्त साम्राज्यक स्थापनाक संगहि गणराज्यक अवसान भऽ गेलैक मुदा लिच्छवी आ वैशाली तइयो इतिहासमे जीवित रहल। गुप्त साम्राज्यक पतन पछाति विदेह–वैशालीक प्राचीन गणराज्यक गौरव समाप्त भऽ गेल आ परञ्च दुनूक नाम इतिहासमे अमर रहल। फाहियान, हियुएन संग, इत्सिंग, सूंगयुन आदि चीनी यात्री लोकनि एतए एलाह आ एहिठामक वैभवकेँ देखि आश्चर्य चकित भऽ गेलाह। ६३५मे जखन हियुएन संग एते आएल छलाह तखन वैशाली पतनोन्मुख छल। प्राचीन अवशेष मात्र लोकक मोनमे सुरक्षित छल। एतेक बादो वैशालीक प्रतिष्ठा विदेशोमे बनल छल तकर सबसँ पैघ प्रमाण इ अछि ७८९ ई.मे अराकान (बर्मा)क चन्द्रवंशक शासक ओतए वैशाली नामक एकटा नगर बसौने छलाह। करीब २०० वर्ष धरि इ बौद्ध धर्मक एकटा प्रधान केन्द्र बनल छल। इएह स्थान आव वेत्थाली नामे प्रसिद्ध अछि। इ अखन अम्याब जिलामे अछि। बर्मा परम्परामे एकटा कथा सुरक्षित अछि जाहिमे कहल गेल अछि जे बर्माक राजा अनिरूद्ध (१०४४–१०७७) वैशालीक एकटा राजकुमारीसँ विवाह केने छल आ ओकर पुत्र जे बर्माक राजा भेलैक से बड्ड नामी आ प्रतापी भेलैक। चीनी यात्री आ वैशाली:- फाहियानक यात्रा विवरणसँ वैशालीक महत्वक पता लगइयै। वैशाली बौद्ध धर्मक प्रधान केन्द्र छल आ तैं चीनी यात्री एते अबैत छलाह। एहिठाम बुद्ध अपन परिनिर्वाणक घोषणा कएने छलाह। षष्ठम शताब्दीमे दोसर चीनी यात्री वांग–हियुएन सी दुइ बेर वैशाली आएल छलाह आ ओ अपन दोसर यात्रामे बौद्ध महात्मा सबकेँ ओढ़न–पहिरन दानमे देने छलथिन्ह। ओहि शताब्दी तेसर चीनी यात्री सुंग–युन सेहो आएल छलाह। हुनका द्वारा वर्णित बातमे ४० टा देश सबहिक नाम अछि जाहिमे टी एल. लो (Tiel–Lo) नामक एक स्थान छैक जकरा किछु गोटए तिरहुत मनैत छथि। सुंग–युनक अनुसारे एहि प्रदेशपर हूण लोकनिक आधिपत्य छल। सुंग–युनक एहि विवरणक समर्थन आन कोनो साधनसँ नहि होइछ आ तिरहुतपर हूण साम्राज्यक प्रभावक कोनो टा प्रमाण एखन धरि नहि भेटल अछि तैं Tiel–Loकेँ मानबामे संदेहक गुंजाइश बनल अछि। हियुएन संग सेहो तिरहुत आएल छलाह। ओ अशोक द्वारा निर्मित्त स्तूपक उल्लेख कएने छथि। हुनक विवरणसँ इहो ज्ञात होइछ जे हुनका समय तिरहुतपर हर्षवर्धनक आधिपत्य छल आ हुनक ‘पाँच भारत’मे तिरहुतकेँ एकटा प्रमुख स्थान प्राप्त छलैक। हर्षक मृत्युक पछाति वांग–हियुएन–सी नामक एकटा शिष्टमंडलक नेता बनिकेँ आएल छलाह आ हुनका तिरहुतक गवर्नर अरूणाश्वसँ युद्ध भेल छलैन्ह जकर विवरण यथास्थान देल जाएत। सातम शताब्दीमे इत्सिंग नामक एकटा आर चीनी यात्री तिरहुत आएल छलाह। चीनी यात्री लोकनिक लेखसँ इ स्पष्ट होइछ जे उत्तर विहारमे किछु एहेन महत्वपूर्ण धार्मिक केन्द्र छल जतए चीनी यात्री लोकनि अपन श्रद्धा प्रदर्शित करबाक हेतु जाइत छलाह। एहि सब सिन्–चे मंदिर सर्वाधिक महत्वपूर्ण केँन्द्र छल जाहिठाम निम्नलिखित यात्री आएल छलाह– i) ह्वेन–चिउ(प्रकाशमति) ‘सिनचे’मे बहुत दिन धरि रहि नेपाल आ तिब्बत बाटे घुरल छलाह। ii) ताओ–हि (श्री देव) कोशी प्रांतमे रहैत छलाह। iii) सिन–चिउ (चरित वर्मा) सिन्–चे मंदिरमे रहैत छलाह। iv) चिंग–हिंग (प्रज्ञादेव) सिन्–चे मंदिरक निरीक्षण केने छलाह। v) ताँग ने–वैशाली आ कोशी देशक यात्रा के ने छलाह। vi) ह्वीन–लुन (प्रज्ञावर्मा) सिन्–चे मंदिरमे आएल छलाह। सिन्–चे मंदिरक वास्तविक स्थलक जानकारी अद्यावधि प्राप्त नहि अछि। परञ्च इ मंदिर छल कतहु तिरहुतमे–वैशाली आ कोशी प्रदेशक मध्य। इ निश्चय एकटा प्रसिद्ध बौद्ध केन्द्र रहल होएत। सुदुर पूर्वक यात्री लोकनि एहिठाम एकत्रित होएत छलाह आ धार्मिक उद्देश्यक पूर्तिक हेतु एतए रहितो छलाह। प्रसिद्ध शिक्षा केन्द्रक हिसाबे सेहो इ स्थान प्रसिद्ध रहल होएत। अध्याय–६ ३२० ई.सँ १०९७ ई. धरिक मिथिलाक राजनैतिक इतिहास गुप्तवंशक उत्थान भारतीय इतिहासमे एकटा महत्वपूर्ण घटना मानल गेल अछि। मिथिलाक हेतु एकर महत्व एहि लेल बढ़ि जाइत छैक कि मिथिलाक वैशालीक राजकुमारीक संग विवाह भेला उत्तरे चन्द्रगुप्त प्रथम साम्राज्य निर्माण करबामे सफल भेलाह। दोसर बात इहो जे एहि वैवाहिक सम्बन्धक बाद वैशालीक प्राचीन गणराज्यक परम्परा सेहो संभवतः समाप्त भऽ गेल आ वैशाली आब पूर्णरूपेण मगध साम्राज्य एकटा प्रमुख अंग बनि गेल। लिच्छवीक सम्बन्ध जतवा जे परिकल्पना भऽ सकइयै तकर विवेचन हमरा लोकनि पूर्वहिं कऽ चुकल छी आ ओहिसँ इहो स्पष्ट भेल अछि जे कोनो ने कोनो प्रकारे गुप्त साम्राज्यक उत्कर्षक पूर्वहिंसँ लिच्छवी आ पाटलिपुत्रक बीच घनिष्ठ सम्बन्ध छल। जँ लिच्छवीक कोनो महत्व नहि रहैत तँ चन्द्रगुप्त प्रथम हुनका सब संग वैवाहिक सम्बन्ध स्थापिते किएक करितैथि। गुप्त लोकनिक जे साम्राज्य विजयक सूची भेटइत अछि ताहिमे वैशालीक नाम नहि अछि यद्यपि नेपालक नाम अछि आ तैं आधारपर इ अनुमान लगायब युक्तिसंगत बुझि पड़इयै जे वैशाली तँ प्रारंभहिंसँ हुनका लोकनिक साम्राज्यक अंग छल। वैशालीक शक्ति हुनका लोकनिक साम्राज्य निर्माणमे सहायक भेलन्हि। पुराणमे वर्णित क्षेत्रमे वैशालीक नाम नहि अछि– “अनु–गंगा–प्रयागंच साकेतम् मगधिस्तथा एतान जनपदान सर्व्वान् भोक्षयंते गुप्तवंशजाः॥ पतंजलिक एहि प्रकार एकटा वाक्य तुलना करबाक योग्य अछि– “अनु गंगं–हस्तिनापुरम्– अनुगंगं वाराणसी; अनु शोणम् पाटलिपुत्रम्”– समुद्रगुप्तक प्रयाग प्रशस्तिमे सेहो वैशालीक उल्लेख नहि रहब एहि तथ्यक समर्थन करैत अछि जे वैशालीक विजय करबाक आवश्यकता गुप्त लोकनिक हेतु आवश्यक नहि छल कारण इ तँ गुप्त लोकनिक अपन छलन्हि आ कुमार देवीक जे महत्व सिक्का आदिमे भेटल छन्हि सेहो एहि बातकेँ पुष्ट करइयै। समुद्रगुप्तकेँ ‘सर्व राजोच्छेत्ता’ कहल गेल छन्हि। वैशालीक प्रधानताक प्रमुख कारण इएह छल जे कुमार देवीसँ विवाह केला उत्तरे गुप्त लोकनि लिच्छवीक सहायतासँ पाटलिपुत्रपर अधिकार करबामे समर्थ भेल छलाह। कुमार देवीक दिसिसँ हुनका लोकनिकेँ वैशाली राज्य भेटल छलन्हि। समस्त तिरहुत गुप्त साम्राज्यक एकटा प्रमुख केन्द्र छल आ वैशाली ओहि प्रांतीय राज्यक राजधानी। वैशालीक महत्व तँ अहुसँ सिद्ध होइछ जे एहिठामक राज्यपाल युवराजे होइत छलाह आ गोविन्द गुप्त युवराज एहिठामक राज्यपाल छलाह तकर प्रमाण अछि वैशालीसँ प्राप्त अभिलेख। गुप्तलेखमे एहि क्षेत्र तीरभुक्ति कहल गेल छैक। ‘लिच्छवी दौहित्र’ कहिकेँ अपनाकेँ गौरवान्वित बुझनिहार समुद्रगुप्तक उक्तिसँ एतवा धरि स्पष्ट अछि जे ताहि दिनमे लिच्छवीक प्रतिष्ठा आ प्रभुत्व दुनू बनल हेतैन्ह आ वैवाहिक सम्बन्धक कारणे इ दुनू चीज गुप्त लोकनिकेँ स्वयंमेव उपलब्ध भेल होएतन्हि। मौर्य साम्राज्यक पछाति जे विकेन्द्रीकरणक प्रवृत्ति बढ़ल आ मगधपर बरोबरि आक्रमणक ताँता लागल रहल ताहिसँ लाभ उठाए लिच्छवी लोकनि अपन पुरान गौरवकेँ पुर्नस्थापित करबामे सफल भेलाह आ अपन सीमाकेँ नेपालसँ तिब्बत धरि बढ़ौलन्हि आ क्रमेण पाटलिपुत्रक सीमा धरि सेहो। जँ से बात नहि रहैत तँ चन्द्रगुप्त प्रथम अपन रानीक नामे सिक्का किएक बनावतैथ अथवा समुद्रगुप्त अपनाकेँ लिच्छवी दौहित्र कहबा किएक गौरवान्वित बुझितैथ। वैशालीक उत्खननसँ प्राप्त एकटा मोहरपर लिखल अछि–“महाराजाधिराज श्री चन्द्रगुप्त पत्नी महादेवी श्री ध्रुवस्वामिनी”– ओहिसँ प्राप्त सामग्रीक आधारपर इ बुझबामे अवइयै जे तिरहुत प्रांतीय शासनक एकटा प्रमुख केन्द्र छल आ से तीरभुक्तिक विषयमे अनेक सामग्री भेटल अछि जाहिसँ ओत्तुका तत्कालीन शासन पद्धति एवँ समाजक व्यवस्थाक सम्बन्धमे ज्ञान प्राप्त होइछ। प्रांतीय आ नगर शासनक एहेन सुन्दर चित्रण आनठाम भेटब अंसभव। चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्यक समयमे एहिठामक राज्यपाल छलाह युवराज गोविन्दगुप्त। गुप्तयुगमे मिथिलाक सीमा पश्चिममे श्रावस्ती भुक्तिसँ मिलैत छल आ पूवमे पुण्ड्रवर्द्धन भुक्तिक किछु अंश सेहो मिथिलाक अंतर्गत रहल होएत जतए करण कायस्थ लोकनि “दत्त” पदवीधारी कैक पुस्त धरि राज्यपालक पदपर रहला आ जनिक अभिलेख सम्प्रति उपलब्ध अछि। मिथिलाक सीमा ताहि दिनमे पश्चिममे श्रावस्ती भुक्ति, उत्तरमे नेपाल, दक्षिणमे श्रीनगर भुक्ति आ पूवमे पुण्ड्रवर्द्धन भुक्तिक सीमासँ मिलैत जुलैत छल आ इ गुप्त शासनक एकटा प्रधान केन्द्र छल आ एकर महत्व एतेक छलैक जे राज्यवंशक लोक स्वयं एकरा अपना चार्जमे रखैत छलाह। गुप्त साम्राज्यक शासन पद्धतिक अध्ययन बसाढ़क उत्खननसँ प्राप्त सामग्रीक बिनु संभव नहि छल। अखनो ओहिमे कतेक रास एहनो शब्द अछि जकर अर्थ स्पष्ट नहि भऽ रहल अछि। निम्नलिखित प्रशासनिक शब्दावली ओहिठामसँ प्राप्त अछि– i.) उपरिक ii.) कुमारामात्य iii.) महाप्रतिहार iv.) तलवर v.) महादण्डनायक vi.) विनय स्थिति स्थापक vii.) भट्टाश्वपति viii.) युवराजपादीय कुमारामात्याधिकरण ix.) रणभाण्डागाराधिकरण x.) बलाधिकरण xi.) दण्डपाशाधिकरण xii.) तीरभुक्तौ विनयस्थिति स्थापकाधिकरण xiii) वैशाल्याधिष्ठानाधिकरण xiv.) श्री परमभट्टारक पादीय कुमारामात्याधिकरण xv.) तीरभुक्त्युपरिकाधिकरण– वैशालीसँ प्राप्त अवशेष सबहिक आधारपर इ प्रामाणिक रूपें कहल जा सकइयै जे गुप्तयुगमे एहि क्षेत्रमे एकटा सुसंगठित शासन प्रणाली छल आ एकरे आदर्श मानि गुप्त साम्राज्यमे प्रांतीय आ स्थानीय शासन प्रणालीक स्थापना भेल छल। दामोदरपुरसँ प्राप्त ताम्रलेख एहिबातक साक्षी अछि। भुक्ति ताहि दिनमे प्रांत अथवा प्रमण्डलक द्योतक छल। अधिकरण शब्द सचिवालयक द्योतक थिक आ प्रत्येक विभागकेँ अपन–अपन अधिकरण होइत छलैक जेना कि उपरोक्त विवरणसँ स्पष्ट अछि। प्रांतमे प्रसिद्ध होइत छलाह राज्यपाल, सेनापति, प्रतिहार आ अन्यान्य पदाधिकारी। युवराजक अधीन सेहो मंत्री लोकनि रहैत छलथिन्ह आ कोषाध्यक्ष, युद्धविभाग, न्याय विभाग, नियंत्रण विभाग आदिक पदाधिकारी एवँ कर्मचारी लोकनि सेहो प्रांतीय सचिवालयमे रहैत छलाह। स्थानीय शासनक दृष्टिकोणे वैशालीक अपन अलग अधिष्ठान स्थल आ ओकर सचिवालय–कार्यालय सेहो फराके रहैत छल। साम्राज्यक शासन यंत्रक अपन मुख्यालय होइत छलैक जे प्रांतीय कार्यालय कहबैत छल आ स्थानीय शासनक अलग कार्यालय होइत छलैक। स्थानीय कार्यालय होएब अहुलेल आवश्यक छल कि ओहि संस्थाकेँ स्थानीय मामलापर विचार करए पड़इत छलैक। वैशाली एकटा प्रसिद्ध व्यापारक केन्द्र सेहो छल आ व्यापारी लोकनिक सेहो अपन संगठन छलन्हि जे “श्रेष्ठी–सार्थवाह–कुलिक–निगम” शब्दसँ ज्ञात होइछ। प्रांतीय शासन विभागक अतिरिक्त एहिठामक स्थानीय शासन सेहो वेस संगठित छल जेना कि उपयुक्त सूचीसँ ज्ञात होइछ। वैशालीक नगर शासन व्यवस्था सुन्दर छल। उदानकूप परिषदक उल्लेखसँ स्थानीय शासनक बोध होइछ। वैशालीक व्यावसायिक संगठन, निगम, श्रेणी, सार्थवाह, कुलिक आदि सेहो अपन मोहर रखैत छलाह। बैंक प्रणाली नीक जकाँ वैशालीमे संगठित छल–‘कुलिक’ शब्द एकर संकेत थिक। ‘प्रथम कुलिक’क उल्लेख सेहो कैकटा मोहरपर भेटइत अछि। वसाढ़, भीठ, बंगाल आदि स्थानक उत्खननसँ प्राप्त सामग्रीक आधारपर इ कहल जा सकइयै जे गुप्तकालीन शासन–व्यवस्थाक स्वरूपमे एकरूपता छल आ एकर श्रेय गुप्त सम्राट लोकनिकेँ छलन्हि। ओना वैशाली तँ अतिप्राचीन कालसँ प्रशासनक प्रधान केन्द्र बनल आ ओहिठाम गणतांत्रिक परम्पराक प्रभाव गुप्तयुगक शासन संगठनमे सेहो देखल जा सकइयै। समुन्नत आर्थिक जीवनक हेतु सुगठित शासन प्रणाली आवश्यक बुझल जाइत अछि आ वैशालीकेँ जे बैंकक प्रणाली सेहो संगठित छल से उपरोक्त कथनकेँ आर समर्थन दैत अछि। श्रेष्ठी, कुलिक, निगम आदिक अलग–अलग सभापति होइत छलैक आ ओहिमे जे श्रेष्ठ होइत छलहि हुनका “प्रथम”क विशेषसँ विभूषित कैल जाइत छलन्हि। व्यापारी आ बैंकर लोकनि अपन पत्राचार आ कारोबारमे अपन–अपन मोहरक व्यवहार करैत छलाह। ओहिठाम बहुत मुद्रापर श्रेष्ठी निगमस्य सेहो उल्लिखित अछि आ बहुतो गोटएक नाम सेहो ओहि मुद्रा सबसँ भेटइत अछि। जेना उदाहरणार्थ निम्नलिखित नाम देल जा सकइयै– हरि, उमाभटट, नागसिंह, सालिभद्र, धनहरि, उमापलित, वर्ग्ग, उग्रसेन, कृष्णदत्त, सुखित, नागदत्त, गोण्ड, नन्द, वर्म्म, गौरिदास–इ सब केओ कुलिक छलाह। सार्थवाहमे डोड्डकक नाम आओर श्रेष्ठीमे षष्ठिदत्त, आ श्रीदासक नामक उल्लेख अछि। एहने एक मुद्रा बेगूसरायसँ प्राप्त भेल अछि जाहिपर “सुहमाकस्य” आ “श्री समुद्र” लिखल अछि। पुण्ड्रवर्धन भुक्तिक ओहि क्षेत्रमे जे तीरभुक्तिक भौगोलिक सीमाक समीप पड़इत छल ताहिपर कैक पुस्त धरि जे ‘दत्त’ करण (कायस्थ लोकनि) राज्यपाल छलाह तकर प्रमाण गुप्त अभिलेखसँ भेटइत अछि। चिरातदत्त, जयदत्त, ब्रह्मदत्त, स्थाणुदत्त, जीवदत्त, आदिक नाम गुप्त अभिलेखमे अछि। चिरातदत्त उपरिक छलाह। प्रांतीय शासनक हेतु जे बोर्ड होइत छल ताहिमे श्रेष्ठी, निगम, कुलिक, सार्थवाहक एक एकटा प्रतिनिधिक अतिरिक्त ओहिमे प्रथम कायस्थ सेहो रहैत छलाह। उपरिकक पदक वंशानुगत हैव एहि बातक संकेत दैत अछि जे ताहि दिनमे सामंतवादी प्रवृत्तिक विकास भऽ चुकल छल। पुण्ड्रवर्द्धन भुक्तिक सीमा हिमालयमे वाराह क्षेत्र धरि पसरल छल आ ओहिठाम कोकामुख स्वामी नामक एकटा प्रधान तीर्थ सेहो छल– तैं एहि क्षेत्रकेँ मिथिलाक क्षेत्र मानव स्वाभाविके कारण इ मिथिलाक भौगोलिक सीमामे पड़इयै। गुप्तयुग धरि मिथिला गुप्त साम्राज्यक एकटा प्रमुख अंग बनल रहल। गुप्त साम्राज्यक अंतिम दिनमे मिथिलाक इतिहासमे पुनः एकटा अनिश्चितताक स्थिति आबि गेल। गुप्त लोकनिक एकटा प्रांतीय राज्यपाल यशोधर्मन एहि स्थितिसँ लाभ उठाए अपन अधिकारक विस्तारमे लागि गेलाह आ लौहित्य (असम) धरिक क्षेत्रकेँ जीतकेँ अपना अधीनमे केलन्हि। एहि क्रममे ओ पुण्ड्रवर्द्धनक उपरिक दत्त लोकनिकेँ पराजित कए ओहु क्षेत्रपर अपन अधिकार बढ़ौलन्हि आ दत्त लोकनिक पुस्तैनी गवर्नरी एकर बाद समाप्त भऽ गेलैन्ह। एहि आधारपर हम इ अनुमान लगा सकैत छी जे किछु दिनक हेतु यशोधर्मनक प्रभुत्व मिथिलोमे अवश्य रहल हेतैन्ह। ५३३क मंदसोर अभिलेखसँ हमरा लोकनिकेँ उपरोक्त बातक ज्ञान होइछ। यशोधर्मन हूण लोकनिकेँ पराजित कए यशक अर्जन कएने छलाह आ तैं भारतमे ताहि दिनमे हुनक प्रतिष्ठा विशेष छलन्हि। परञ्च हुनक विजयाभियान बहुत दिन धरि नहि टिकलन्हि आ शीघ्रहिं हुनक राज्य समाप्त भऽ गेलैन्ह। मिथिलाक हेतु अनिश्चितताक अवस्था बनले रहल। यशोधर्मन ओम्हर अपन डफली बजा रहल छलाह आ एम्हर पूबमे उत्तर गुप्त लोकनि गुप्त साम्राज्यक पतन (५५४ इ.)सँ लाभ उठाए अपन अस्तित्वकेँ सुरक्षित करबामे एवँ मजबूत करबामे लागि गेल छलाह। बिहारमे ओहि युगमे मौखरी लोकनि सेहो अपन अधिकार जमेबाक चेष्टामे लागल छलाह। एहि अनिश्चितताक स्थितिसँ तँ सब केओ लाभ उठबे चाहिते छलाह आ तैं चालूक्य कीर्त्तिवर्मन सेहो अंग, मगध, आ वंगपर आक्रमण केलन्हि। उत्तरगुप्त, मौखरी आ अन्यान्य शासकक बीच ताहि दिन आधिपत्यक हेतु संघर्ष चलि रहल छल। जीवित गुप्त अपन प्रयासमे सफल भेल होएताह से अन्दाज लगाओल जा सकइयै। मगधक शासक महासेन गुप्त असम धरि अपन अधिकार क्षेत्रक विकास केलन्हि आ तैं इ अनुमान लगाओल जाइत अछि जे ओ मिथिलापर सेहो अपन आधिपत्य कायम केने हेताह। ताहि दिनक स्थिति इ छल कि जहाँ कोनो एक राज्य कमजोर भेल कि दोसर ओकरापर टुटि पड़इत छल आ ओकरा अपना अधीन कऽ लैत छल। संभव अछि जे मौखरी लोकनि अपन साम्राज्य विकासक क्रममे मिथिलोकेँ अपना अधीनमे कऽ लेने होथि। कटरा (मुजफ्फरपुर)सँ जीवगुप्तक एकटा अभिलेख भेटल अछि परञ्च ओहिसँ राजनैतिक इतिहासपर तत्काल कोनो आलोक नहि पड़ि रहल अछि। कामरूपक वर्मन वंशक शासक लोकनि सेहो मिथिलाक पूर्वी क्षेत्र पूर्णियाँपर कैक पुस्तसँ अधिकार जमा लेने छलाह। गुप्त साम्राज्यक पतनक बाद मिथिलाक इतिहास अंधकारमय भऽ जाइत अछि आ कोनो संगठित एवँ नियोजित इतिहासक संकेत कतहुसँ नहि भेटइत अछि। चारूकात जे राज्य विस्तारक संघर्ष चलि रहल छल ताहिमे मिथिला एकटा प्रमुख शिकार छल आ विभिन्न महत्वाकाँक्षी राजा लोकनि शिकारीक काज करैत छलाह। हर्षवर्द्धनक अमलमे मिथिला हुनक साम्राज्यक अंश छल एहिमे कोनो सन्देह नहि। हर्षक समय धरि अबैत–अबैत राजनीतिक क्षेत्रमे पाटलिपुत्रक स्थान कन्नौज लऽ लेने छल आ पाटलिपुत्रक महिमा घटि चुकल छल। हर्षक राजधानी छल कन्नौज जकरा महोदय श्री सेहो कहल जाइत छलैक आ जकर महिमाक विवरण चीनी यात्री हियुएन सांग प्रस्तुत कएने छथि। हर्षक पूर्व शशाँक मिथिलापर शासन केने होथि से संभव कारण ताहि दिनमे शंशाँक पश्चिममे अपन आधिपत्य बढ़ेबाक हेतु सब तरहे प्रयत्नशील छलाह। प्रभाकर वर्द्धनक पुत्र राज्यवर्द्धनक हत्या बंगालक शशाँकक हाथे भेल छलन्हि। शासक भेला उत्तर हर्ष अपन राज्यवर्द्धनक मृत्युक बदला लेबाक हेतु कटिबद्ध छलाह आ ओहि उद्देश्यसँ प्रेरित भऽ ओ अपन सैनिक अभियानक श्री गणेश केलन्हि। शशाँक पराजित भेलाह आ अपना सन मुँह बनाकेँ अपन पराजयक घूंट पीबैत रहलाह। हर्ष लगातार ६ वर्ष धरि अपन अभियान जारी रखलन्हि आ उत्तर भारतक विशिष्ट भागपर अपन अधिकार जमौलन्हि। चीनी यात्रीक अनुसार ओ ‘पाँचो भारत’ (जाहिमे मिथिला सेहो सम्मिलित छल) जीति कए उत्तर भारतमे स्थायित्व अनलन्हि–‘पाँचो भारत’ भेल स्वराष्ट्र (पंजाब), कान्यकुब्‍ज, मिथिला, गौड़, तथा उत्कल। ६४१ इ.मे ओ मगधपर सेहो अपन आधिपत्य कायम केलन्हि आ भारतक चारूकातक राजाकेँ सैतलन्हि। गुप्त साम्राज्यक पतन भेलापर जे एकटा अनिश्चितताक स्थिति उत्पन्न भऽ गेल छल तकरा हर्ष समाप्त केलन्हि आ समस्त उत्तर भारतपर एकटा स्थायी शासनक रूपरेखा प्रस्तुत केलन्हि। ओ समस्त भारतकेँ पुनः एकछत्र शासनक अधीन करए चाहैत छलाह आ हुनक दुश्मन पुलकेशिन द्वितीय हुनका “सकलोतरापथस्वामी” कहने छथिन्ह। हर्षक शासन तँ बहुत दिन धरि नहि रहल तथापि हर्षक महत्व एहि लेल अछि जे हर्ष अपना समयमे एकटा स्थायित्वक रूपरेखा प्रस्तुत कएने छलाह जे हुनका परोक्ष भेलापर समाप्त भऽ गेल। हर्षक समयमे भारतमे सामंतवादक पूर्ण विकास भऽ गेल छल आ हर्षक शासन प्रणालीपर सेहो एकर प्रभाव देखबामे अवइयै। हियुएन सांग सेहो एहि बातक साक्षी छथि। हर्ष स्वयं घुमि–घुमिकेँ अपन शासनक निरीक्षण करैत छलाह आ जागीरक रूपमे अपन कर्मचारी आ सैनिककेँ वेतन दैत छलाह। शासन संगठनमे ओ मौर्य आ गुप्तसँ प्रभावित छलाह आ हुनक साम्राज्य प्रांत, भुक्ति आ विषयमे विभाजित छल। तीरभुक्ति शासनक एकटा प्रधान केन्द्र छल आ हर्षक समयमे ओहिठाम अर्जुन अथवा अरूणाश्व नामक एक महत्वाकाँक्षी व्यक्ति राज्यपाल छलाह। हर्षक देहावसान भेलापर पुनः राज्यमे अराजकता पसरि गेल आ महत्वाकाँक्षी अर्जुन ओहिसँ लाभ उठाकेँ राज्यकेँ हड़पि लेलन्हि आ स्वयं शासक बनिकेँ बैसि गेलाह। एकर अर्थ इ होइछ जे हर्षक समयमे तीरभुक्ति एक महत्वपूर्ण प्रांत छल आ एहिठामक राज्यपालक शक्ति आन राज्यक अपेक्षा विशेष छलैक। अर्जुन (अरूणाश्व) महात्वाकाँक्षी होइतो योग्य सैनिक एवँ संगठन कर्त्ता सेहो रहल होएत आ परिस्थिति अनुकूल भेला उत्तर ओहिसँ लाभ उठौने होएत। तिब्बती आक्रमण:- हर्ष अपन मृत्युक पूर्वहिं चीनक सम्राटक ओतए एकटा शिष्टमण्डल (दूत मण्डल) पठौने छलाह आ ओकरे उत्तरमे चीनक सम्राट सेहो एकटा दूतमण्डल हर्षवर्द्धनक दरबार पठौने छलाह आ ओहि दूतमण्डलक नेता छलाह वाँग–हियुएन–सी। वाँगक नेतृत्वमे जखन चीनी दूतमण्डल भारत पहुँचल तखन हर्षक मृत्यु भऽ चुकल छल आ अरूणाश्व समस्त राज्यकेँ हड़पिकेँ शासक बनि चुकल छलाह। ओहि दूतमण्डलक संग हुनक व्यवहार तँ अशोभनीय भेवे केलन्हि आ संगहि ओ दूतमण्डलकेँ बेइज्जत सेहो केलन्हि। वाँग भागिकेँ नेपाल चलि गेलाह आ ओतएसँ तिब्बत सेहो। तिब्बतमे ताहि दिनमे शासक छलाह प्रसिद्ध श्रौंग–सान–गंपो। श्रौंग, वाँगकेँ १२०० चुनल तिब्बती सैनिक देलथिन्ह आ नेपालसँ सेहो हुनका ७००० सेना भेटलन्हि। तिब्बती–नेपाली सहयोगसँ वाँग अरूणाश्वकेँ पराजित कए उत्तरी बिहार अथवा तिरहुतपर अपन प्रभाव जमौलन्हि। अर्जुनक विद्रोहकेँ दबाओल गेल आ ओ भागबाक प्रयास केलन्हि मुदा हुनका गिरफ्तार कऽ लेल गेल आ चीनक सम्राटक ओतए बंदीक रूपमे उपस्थित कैल गेल। कहल जाइत अछि– जे वाँगक एहि प्रयासमे कामरूपक भास्करवर्मन सेहो सहायक भेल छलथिन्ह। इ घटना तँ ओना देखलासँ सामान्य बुझि पड़इयै परञ्च ऐतिहासिक दृष्टिकोणसँ इ एकटा महत्वपूर्ण घटना मानल गेल अछि जकर संक्षिप्त विवेचन आवश्यक बुझना जाइत अछि। अर्जुन अथवा अरूणाश्वक सम्बन्धमे पूर्ण जानकारी नहि अछि परञ्च ओ तीरभुक्तिक राज्यपाल छलाह से निश्चित अछि आ हर्षक परोक्ष भेलापर ओहि साम्राज्यक अधिकारी सेहो भऽ गेला। वाँगक संग एहि प्रकारक व्यवहार ओ किएक केलन्हि से बुझबामे नहि अवइयै। वाँग स्वयं सब मिलाकेँ चारि बेर कूटनीतिक काजक प्रसंग भारत आएल छलाह आ भारत विवरणक सम्बन्धमे हुनक एकटा पोथी सेहो उपलब्ध अछि। पोथीक मूल तँ लुप्त भऽ गेल अछि मुदा ओकर अंशकेँ संकलित कए ताओचेन नामक एक व्यक्ति ओकरा सुरक्षित रखने छथि। ताँग वंशक इतिहासमे भारतपर वाँगक आक्रमणक विवरण भेटइयै जाहिमे इ कहल गेल अछि जे वाँगक दूतमण्डल पहुँचबाक किछुऐ पूर्व शिलादित्य (हर्ष) मरि चुकल छलाह आ समस्त देशमे अराजकता पसरल छल। नाफुती (तीरभुक्ति)क अरूणाश्व (ओलानाशुएन) राजगद्दी हड़पि चुकल छलाह। वाँगक दूतमण्डलकेँ भगेबा गेबाक प्रयासमे ओ लागल छलाह। दूतमण्डलक संग मात्र ३०टा घोड़सवार छल। वाँग कोहुना भागिकेँ बचलाह। तिब्बत आ नेपालसँ सेना आनि दूतमण्डलक दोसर प्रमुख पदाधिकारी, सियांग-चेन-जेनक नेतृत्वमे तीन दिन धरि युद्ध भेल आ अंतमे अरूणाश्व पराजित भेलाह। वाँग जखन बन्दीक रूपमे अरूणाश्वकेँ लऽ कए चीन पहुँचलाह तखन वाँगकेँ प्रोन्नत कओल गेलन्हि। उपरोक्त विवरण ताँग वंशक पुरना इतिहासमे भेटइत अछि। ताँग वंशक नवका इतिहासमे सेहो एहि घटनाक विवरण एवँ प्रकारे भेटइत अछि। ६४८मे वाँगकेँ जखन भारत दूतमण्डलक नेता बनाके पठाओल गेलन्हि तखन हर्षक अवसान भऽ चुकल छल आ अरूणाश्व राज्यक अधिकारी भऽ चुकल छलाह। ओ तीरभुक्तिक शासक छलाह। तिब्बत आ नेपालसँ सहायता लऽ वाँग अपन वेइज्जतीक बदला लेबाक हेतु तिरहुतपर आक्रमण केलन्हि। ओ अपन सेनाकेँ कैक भागमे विभक्त कए अपन तेसर दिन चा-पुओ-हो-लो नामक स्थानपर पहुँचलाह आ ओहिपर अपन आधिपत्य कायम केलन्हि। एहिक्रममे ३००० व्यक्तिक हत्या भेल आ १०००० व्यक्तिकेँ नदीमे डुबाओल गेल। अर्जुन भागिकेँ पुनः अपन शक्ति संचय केलन्हि आ फेर वाँगक संग युद्ध शुरू केलन्हि मुदा हुनका कोनो सफलता नहि भेटलन्हि। राजाक जनानखानाक प्रधान दुश्मनक बाट रोकबाक हेतु किएन-तो-वाइ नामक नदीक मार्ग अवरूद्ध कए देलन्हि तथापि चीनी दूतमण्डल हिनका लोकनिकेँ पराजित केलन्हि आ अरूणाश्वक पत्नी समूह एवँ पुत्रादिकेँ गिरफ्त कए माल असवाब सब लूटि लेलन्हि। चीनी सेना नायक उपरोक्त चेन-जेनक समक्ष ५८०टा नगर आत्म समर्पण केलक। पूर्वी भारतक राजा ची-कीउ-मो (श्री कुमार) अथवा भास्करवर्मन चीनी दूतमण्डलक बड्ड सहायता केलथिन्ह आ हुनका लोकनिकेँ घोड़ा, बड़द, अस्त्र, शस्त्र, तीर धनुष आदि बहुत रास सामान उपहारमे देलथिन्ह। चीनी सम्राटक हेतु ओ एकटा भारतक मानचित्र सेहो उपहारमे देलथिन्ह। दूतमण्डलसँ ओ आग्रह केलथिन्ह जे ओतएसँ ओ लाओ-जेक एकटा चित्र पठा दैथ। अरूणाश्व बन्दीक रूप चीनमे रहलाह आ ओतहि हुनक मृत्यु भेलैन्ह। मात्वलिन सेहो एहि घटनाक विवरण उपस्थित कएने छथि आ हुनक विवरण ताँग वंशक नवका इतिहाससँ मिलैत–जुलैत अछि। मात्वलिनक अनुसार चीनी सम्राट ६४६ ई.मे मगध सम्राटक ओतए एकटा दूतमण्डल पठौने छलाह। अर्जुन अथवा अरूणाश्वकेँ चीनी स्रोतमे तिरहुतक शासक मानल गेल छैक आ दुनूक बीच जे युद्ध भेलैक से कतहु एहि क्षेत्रमे भेल हेतैक। वाँग कन्नौज धरि गेल होएताह ओहिमे संदेह बुझना जाइत अछि। तिरहुतक राज्यपाल अरूणाश्व हर्षक परोक्ष भेलापर तिरहुतहिसँ अपनाकेँ साम्राज्यक अधिकारी घोषित कएने होथि से संभव। चीनमे जाहिठाम अर्जुनक शव अछि ताहिठाम एकटा जे स्मारकपर लेख छैक ताहिमे लिखल छैक “तीरभुक्तिक हिन्दूराजा अरूणाश्व”। अहुँसँ इ स्पष्ट होइछ जे अर्जुन अथवा अरूणाश्व तीरभुक्तिक शासक छलाह आ वाँगक युद्ध तीरभुक्तिक सीमे धरि सीमित रहल होएत। एहि घटनाक विवरण चीनक करीब २५टा सँ बेसी ग्रंथमे भेटइत आ आधुनिक शोध एवँ एहि २५सो ग्रंथक उपयुक्त अंशक अनुवादक अध्ययनसँ एतवा धरि स्पष्ट होइत अछि जे हर्षक परोक्ष भेलापर अर्जुन तीरभुक्तिक शासक छलाह। चीनी दूतमण्डल आ हुनका बीच संघर्ष भेल छल जाहिमे ओ पराजित भेल छलाह आ एहि युद्धक कार्यस्थल छल गण्डकी, वाग्मती, बलान आ गंगाक बीचक भूमि। युद्धक वास्तविक स्थान कोन छल से निर्णय करब अद्यतन कठिन समस्या बनल अछि। वृज्जि क्षेत्रसँ अंगुतराप क्षेत्रक वीच इ लड़ाइ भेल छल से धरि निश्चित आ वाँगक शक्तिशाली सैनिकक समक्ष जँ तत्काल छोट-पैघ शहर सब आत्मसमर्पण क देने हुए तँ एहिमे कोनो आश्चर्यक गप्प नहि। किछु दृष्टिदोष अथवा विचार दोषसँ इ आक्रमण भेल हुए सेहो संभव। वाँगकेँ अर्जुन दुश्मन बुझि विरोध केने हेथिन्ह आ ओ जखन सहायतार्थ तिब्बत पहुँचलाह तखन ओहिठामक शासक श्रौंग सेहो एकटा महत्वाकाँक्षी व्यक्ति रहैथ आ विचारसँ साम्राज्यवादी सेहो। ओ एहि अवसरकेँ अपन साम्राज्य विस्तारक अवसरक रूपमे देखने होथि तँ कोनो आश्चर्य नहि कारण ताहि दिनमे हुनक प्रभुत्वक धाख चीन आ नेपाल धरि पसरल छलन्हि। वाँगक माध्यमसँ ओ तिब्बती प्रभाव भारतपर बढ़बे चाहैत छलाह परञ्च से संभव नहि भऽ सकलन्हि कारण इ युद्ध तिरहुत धरि सीमित रहि गेल आ ४०–५० वर्षक बाद ओहि विदेशी सत्ता उखारिकेँ फेक देल गेल। एकर कोनो स्थायी प्रभाव भारतक इतिहासपर नहि पड़ल। अहुमे संदेह अछि जे श्रौंग स्वयं भारतपर आक्रमण केने होथि कारण श्रौंगक विजयक विवरण जाहि तिब्बती परम्परामे सुरक्षित अछि ताहिमे कतहु भारतक नाम नहि अछि। केवल मात्वलिन एहि बातक उल्लेख केने छथि। दोसर बात जे महत्व रखैत अछि से भेल इ जे नेपाली परम्परामे एहि घटनाक विधिवत उल्लेख कतहु नहि अवइयै। पूर्वी भारतपर हर्षक शासन ६४१मे भेल छल। चीनी परम्परामे अर्जुनकेँ पूर्वी भारतक शासक (तीरभुक्तिक) कहल गेल छैक आ तैं संभव जे हर्षक परोक्ष भेलापर ओ (पूर्वी भारत) पुनः अपनाकेँ कन्नौजक नियंत्रणसँ मुक्त कऽ लेने हो आ अर्जुन गवर्नरक हिसाबे ओहिपर अपन अधिकार कऽ लेने होथि। एहि घटनाक एतेक विस्तारसँ चीनी परम्परामे वर्णन कैल गेल हो से संभव। एतवा धरि तँ निश्चित रूपे माने पड़त जे अर्जुन आ चीनी दूत वाँगक वीच खटपट अवश्य भेलैक आ एहि क्रममे तीरभुक्तिपर आक्रमण सेहो। एकर स्थान एवँ अन्यान्य बातक विश्लेषण अखन आर शोधक अपेक्षा रखइयै। हम पहिने कहि चुकल छी जे कामरूपक भास्करवर्मनक पूर्वजक समयमे बहुत रास मैथिल साम्प्रदायिक ब्राह्मण कामरूप गेल रहैथ आ ओतुका शासकक अनुग्रह प्राप्त केने रहैथ। हर्षक पूर्वहिं निर्धनपुर ताम्रलेखसँ इ ज्ञात होइछ जे वर्मन वंशक सीमा पुर्णियाँक कोशी धरि छलन्हि आ तकर पश्चिममे तिरहुतक राज्य छल जाहिपर हर्षक अधिकार छल। जाधरि हर्ष जीवित रहलाह ताधरि कामरूपक शासक हुनक मित्र बनल रहलथिन्ह मुदा हर्षक परोक्ष भेला उत्तर भास्करवर्मन चीनी दूतमण्डलक सहायता केने छलथिन्ह से उपरोक्त विवरणसँ स्पष्ट अछि– एकर कि कारण से नहि कहि। संभवतः अर्जुनक प्रभुत्व देखि आ तीरभुक्ति राज्यक विस्तारसँ ओ घबड़ा कए चीनी दूतमण्डलक समर्थन केने होथि से संभव। दोसर बात इहो भऽ सकइयै जे चीनक डरसँ ओ एना केने होथि। ऐहनो बुझि पड़इयै जे जखन वाँगक आक्रमणक समयमे मौखरी, उत्तर गुप्त आ नेपालक लिच्छवी शासकक वीच संभवतः कोनो प्रकारक समझौता भेल छल आ ओ लोकनि तिब्बती साम्राज्यवादी प्रसारक विरोधमे संगठित छलाह। अदु शक्तिशाली संगठनसँ भयभीत भऽ भास्करवर्मन वाँगक सहायता केने होथि तँ कोनो आश्चर्यक गप्प नहि। भास्करवर्मन सेहो महत्वाकाँक्षी छलाह आ तैं हुनक आंतरिक इच्छा इ अवश्य रहल हेतैन्ह जो कामरूप राज्यक प्रसार हो। कामरूप आ मिथिलाक सीमा सेहो मिलैत जुलैत छल। हर्षक मृत्युक उपरांत ओ कन्नौजसँ अपन सम्बन्ध विच्छेद कए कर्ण सुवर्णकेँ अपना राज्यमे मिला लेने छलाह आ अपन चारूकातक छोट छीन क्षेत्र सबकेँ सेहो। निर्धनपुर ताम्रलेखक आधार इ कहल जा सकइयै जे ओ मिथिलाक पूर्वी भागक किछु हिस्सापर अपन अधिकार जमा लेने छलाह आ ओतहिसँ संभवतः ओ वाँगक सहायता केने छलाह। ६४८सँ ७०३ ई. धरि मिथिलापर तिब्बती आधिपत्य बनल रहल। एहि बीचक इतिहास अंधकारमय अछि। मिथिलापर बहुत दिन धरि तिब्बती प्रभाव नहि रहि सकलैक आ उत्तरगुप्त शासक लोकनि अपन परिश्रमसँ पुनः सम्पूर्ण बिहारकेँ जीति अपना अधीन केलन्हि आ मिथिलाकेँ तिब्बती आक्रमणसँ मुक्त सेहो। कटरा (मुजफ्फरपुर)सँ प्राप्त अभिलेख (ताम्रलेख)सँ ज्ञात होइछ जे जीवगुप्त नामक कोनो व्यक्ति ओहि क्षेत्रपर शासन करैत छलाह। तिथिक अभावमे किछु कहब असंभव अछि मुदा अंदाजन इएह कहल जा सकइयै जे इ संभवतः उत्तरगुप्त वंशक केयो रहल हेताह आ तिब्बती आक्रमणसँ मुक्त भेलापर एहि क्षेत्रक शासनाधिकारी भेल होएताह। गुप्तवंशक परम्पराक पुनर्स्थापनामे व्यस्त जे सर्व प्रसिद्ध व्यक्ति भेलाह एहि वंशमे हुनक नाम छलन्हि आदित्य सेन। महासेन गुप्तक शासन कालहिसँ मिथिलापर हिनका लोकनिक प्रभुत्व छलन्हि आ आदित्यसेनक समय धरि तँ उत्तरगुप्त लोकनि पूर्वी भारतक एकटा प्रसिद्ध राजवंश घोषित भऽ चुकल छलाह। अफशड़, मंदार आ शाहपुरसँ प्राप्त अभिलेखक आधार इ निश्चित रूपें कहल जा सकइत अछि जे आदित्यसेन समस्त बिहारपर अपन आधिपत्य कायम केलन्हि आ वृहत्तर मगध राज्यक संस्थापकक नामसँ बहु चर्चित भेलाह। हुनका परमभट्टारक-महाराजाधिराजक पदवी छलन्हि आ ओ गंगा सागर धरि अपन राज्य बढ़ा अश्वमेध यज्ञ सेहो केने छलाह। ताँग वंशक इतिहाससँ हमरा इ ज्ञात होइत अछि जे मिथिला आ नेपाल ७०३ धरि विदेशी नियंत्रणसँ मुक्त भऽ गेल छल। सिल्वोंलेवीक अनुसार ७०२मे मिथिलामे उत्तर गुप्तक शासनक स्थापना एकटा महत्वपूर्ण घटना मानल गेल अछि। नेपाली अभिलेखमे सेहो आदित्य सेनकेँ मगधक महत्वपूर्ण शासकक रूपमे वर्णन कैल गेल छैक। नेपालक शिवदेव मौखरी भोगवर्मनक जमाय छलाह आ भोगवर्मन आदित्य सेनक बेटीसँ विवाह केने छलाह। एवँ प्रकारे तीनू राज्य एक दोसरासँ सम्बन्धित छल। आदित्य सेनक बादो हुनका लोकनिककेँ प्रभाव बनल रहल आ जीवित गुप्त द्वितीय धरि ओ लोकनि उतरापथनाथ कहबैत रहलाह। मिथिलाक इतिहासमे बुझु जे बारी-बारी कऽ कए उत्तर भारतक सब छोट-छीन राज्य कोनो ने कोनो रूपे राज्य केलन्हि आ मिथिलामे कोनो स्थायी राज्यक स्थापना १०९४ क पूर्व नहि भऽ सकल। उत्तर गुप्तक बाद मिथिलाक इतिहासक जे स्थिति छल से ठीकसँ हमरा लोकनिकेँ ज्ञातव्य नहि अछि। उत्तरगुप्तक राज्यक अंत केलन्हि कन्नौजक यशोवर्मन। गौड़वहीक कवि वाक्पतिक अनुसार यशोवर्मन गुप्त लोकनिकेँ पराजित केलन्हि आ हिमालय प्रदेशकेँ जीति अपना राज्यमे मिलौलन्हि। आ एहि क्रममे जँ ओ तिरहुतकेँ जीतने होथि तँ कोनो असंभव बात नहि। कश्मीर सेहो अपन प्रभाव बढ़ा रहल छल आ पूर्वमे सेहो पूण्ड्रवर्द्धन भुक्तिक दिसि कश्मीरक प्रभावक वृद्धि देखबामे आबे लगैत अछि। ललितादित्य मुक्तपीड़ एहि क्षेत्रमे यशोवर्मनकेँ पराजित कए अपन प्रभाव क्षेत्र बढ़ा लेने छलाह। लामा तारनाथक अनुसार मिथिलामे चन्द्रवंशक शासन छल जकर सम्बन्ध पश्चिममे राजा भतृहरिसँ छलैक। चन्द्रवंशक राज्य वर्मा आ पूर्वी बंगालमे सेहो छलैक। वर्माक चन्द्रवंशक शासक लोकनि ‘वेथाली’ (वैशाली) नामक एक गोट शहर बसौने छलाह। चन्द्रवंशक पछाति मिथिलामे पालवंशक स्थापना भेल छल। उत्तरपूर्वी भारतक विभिन्न प्रदेशक कोनो श्रृंखलाबद्ध एवँ साधनयुक्त इतिहास नहि अछि। आ मिथिलाक जहाँधरि प्रश्न अछि से तँ सर्वथा अपूर्णे अछि। लामा तारनाथ जकर वर्णन कएने छथि तकर समर्थन कोनो आन साधनसँ नहि भऽ रहल अछि तैं एकरा अखन संदिग्धे मानल जाएत। चन्द्रवंशक प्रश्न विवादास्पद अछि। जँ एहि वंशक राज्य रहलो हैत तँ पूर्वी मिथिलेपर रहल होएत कारण उएह स्थान वंगक समीप अछि। किछु गोटए अहुमतक छथि जे यशोवर्मनक आक्रमणक उपरांते तिब्बती प्रभाव तीरभुक्ति क्षेत्र परसँ घटल होएत। यशोवर्मन मालदह, राजशाही आ पुर्णियाँ धरि बढ़ल छलाह आ तत्पश्चात कश्मीरक शासक सेहो “पंच गौड़” (मिथिला जकर एकटा प्रमुख अंश छल) पर अपन विजय प्राप्त केने छलाह। हियुएन-सांग द्वारा वर्णित “पाँच भारत” बादमे “पंच गौड़”क नामसँ प्रसिद्ध भेल आ पाल कालमे एहि ‘पंच गौड़’केँ विशेष प्रतिष्ठा प्राप्त भेलैक। तारनाथक अनुसार एहि ‘पंच गौड़’मे चन्द्रवंशक पछाति अराजकता पसरि गेल छल आ ओहि क्षेत्रमे कोनो प्रकारक राज्य नहि रहि गेल छल। चारूकात मत्स्यन्यायक प्रधानता छल आ कोनो व्यवस्था नहि रहि गेल छल। चन्द्रवंश (सिंह चन्द्रक पुत्र)क बलिचन्द्रकेँ भंगलसँ भगा देल गेल छलन्हि। लिच्छवी पंचमसिंह (जनिक राज्य ताहि दिनमे तिब्बतसँ त्रिलिङु आ बनारससँ समुद्र धरि रहैन्ह) बलिचन्द्रकेँ पराजित केने रहथिन्ह आ ओ भंगलसँ भागिकेँ तिरहुतमे आबिकेँ राज्य शुरू केने छलाह। बलिचन्द्रक पुत्र विमल चन्द्र अपन पिताक पराजयक बदला लेलन्हि आ अपन राज्यक विस्तार बंगाल आ असम धरि केलन्हि। हुनक पुत्र छलाह गोविन्द्रचन्द्र आ गोविन्द्रचन्द्रक पुत्र भेलाह ललितचन्द्र। इ दुनू गोटए सिद्धि प्राप्त कए राज्यसँ विमुख भऽ गेलाह आ तत्पश्चात् राज्यमे अराजकता पसरि गेल आ मत्स्यन्यायक स्थिति उत्पन्न भेल। पाल वंश:- एहि मत्स्यन्यायक स्थितिसँ उबारबाक हेतु ओहिठामक लोग गोपाल नामक एक व्यक्तिकेँ अपन शासक चुनलक आ उएह पाल वंशक संस्थापक भेलाह। मत्स्यन्याय आ अराजकताक स्थिति समाप्त कए गोपाल चन्द्रवंशक समस्त राज्य क्षेत्र व्यवस्थाक स्थापना केलन्हि आ तखन लऽ कए (७५०–१०००) लगभग २५० वर्ष धरि समस्त पूर्वी भारतमे एक प्रकारक शांति बनल रहल। पाल युगक इतिहास भारतीय इतिहासमे महत्वपूर्ण स्थान रखइयै आ मिथिलाक इतिहासक हेतु सेहो इ काल महत्वपूर्ण मानल गेल अछि। गोपाल चूंकि चन्द्रवंशक उत्तराधिकारीक रूपमे शासक भेल छलाह तैं इ अनुमान लगाएब स्वाभाविक जे ओ तीरभुक्तिक शासक सेहो अवश्य रहल होएताह कारण तीरभुक्तियोपर चन्द्रवंशक शासन रहल छल। गोपालक बाद हुनक पुत्र धर्मपाल शासक भेलाह। पाल साम्राज्यक वास्तविक संस्थापक धर्मपाले छलाह एहिमे संदेह नहि। उत्तर भारतपर आ खास कऽ कए कन्नौजपर आधिपत्य प्राप्त करबाक हेतु हुनका राष्ट्रकूट आ प्रतिहार वंशसँ युद्ध मोल लेबए पड़लन्हि जे हुनका बादो चलैत रहलैन्ह। खलीमपुर अभिलेख एवँ तारनाथक विवरणसँ ज्ञात होइछ जे तिरहुत हुनक राज्यक अंतर्गत छल आ पूवमे कामरूप धरि अपन राज्यक सीमा बढ़ौने छलाह। मूंगेरक समीप ओ प्रतिहार शासक नागभट्ट द्वितीयकेँ हरौने छलाह। राज्यक प्रसारक क्रममे ओ हिमालय धरि गेल छलाह आ वागमती नदीपर अवस्थित गोकर्ण धरि अपन राज्यकेँ बढ़ौने छलाह। गोकर्ण एकटा प्रसिद्ध धार्मिक स्थल छल तैं संभव जे ओतए धरि ओ धर्म करबाक हेतु गेल होथि मुदा वास्तविक कारण इ छल जे ओहि क्षेत्रमे किरातक राज्य छल आ तैं हिनका डर छलन्हि जे किरात लोकनि तिरहुतक क्षेत्रमे किछु उत्पात मचा सकैत छथि तैं हेतु किरात लोकनिकेँ पराजित करब आवश्यक छल। पशुपतिनाथ मंदिरकेँ उत्तर पूबमे गोकर्णक जंगलमे किरात लोकनिककेँ राजधानी छलन्हि आ तैं ओ ओतए दूर धरि जाकए किरात लोकनिकेँ पराजित केलन्हि। स्वयंभु पुराणमे कहल गेल अछि जे धर्मपाल नेपालक राजगद्दीपर अधिकार प्राप्त केलन्हि। इ गप्प संभवतः गोकर्णपर धर्मपालक आक्रमणकेँ प्रमाणित करैत अछि। नेपालपर हुनक अधिकार भेल हो अथवा नहि परञ्च किरातकेँ दबाबे राखब मिथिलाकेँ संदर्भमे आवश्यक छल आ धर्मपाल एहिबातकेँ साम्राज्यवादी हिसाबें नीक जकाँ बुझैत छलाह। मूंगेर ताम्रलेखमे ‘गंगा समेतं बुद्धि’क जे उल्लेख अछि से गोकर्णसँ सर्वथा भिन्न स्थान भेल आ तैं दुनूकेँ मिलाएब उचित नहि बुझना जाइत अछि। मूंगेर ताम्रलेखोसँ इ ज्ञात होइत अछि जे धर्मपाल हिमालयक तराइमे आक्रमण कएने छलाह। मूंगेरमे जे लड़ाइ भेल छल ताहुमे तीरभुक्तिक योगदान रहल होएत से निश्चिते। धर्मपाल समस्त उत्तरी भारतमे अपन धाख जमौने छलाह एकर प्रमाण हमरा कैकटा स्रोतसँ भेटइत अछि:- केशव प्रशस्ति, खलिमपुर अभिलेख एवँ भागलपुर ताम्रलेख। गुजराती कवि सोढ़्ढ़ल अपन उदय सुन्दरी कथामे देवपालकेँ उत्तरा पथ स्वामी कहने छथि। ‘पंच गौड़’ हुनक साम्राज्य सीमाक बोध दैत अछि। ‘पंच गौड़’ शब्दकेँ प्रसिद्ध केनिहार भेलाह कल्हण जे अपन राज तरंगिणीमे एकर विवरण देने छथि मुदा एकर राजनैतिक स्वरूपक वास्तविक जन्मदाता धर्मपाले रहल हेताह जनिक साम्राज्य पंजाबसँ बंगाल आ हिमालयसँ मध्य भारत धरि पसरल छल। मिथिला नेपालपर सेहो हुनक प्रभुत्व छल। धर्मपालक पछाति हुनक पुत्र देवपाल राजा भेलाह आ हुनक साम्राज्य हिमालयसँ विन्ध्य पर्वत धरि पसरल छल। उहो प्रतिहार राजा मिहिर भोजकेँ हरौलन्हि। हुनकहि समयमे पाल साम्राज्य अपन चरमोत्कर्षपर पहुँचल। वाचस्पति आ राजा नृग:- एहिठाम एक प्रश्नपर विचार कऽ लेब आवश्यक बुझना जाइत अछि। स्वर्गीय महामहोपाध्याय उमेश मिश्र राजा नृगक चर्च कए एकटा समस्या उपस्थित कऽ देने छथि जाहि लऽ कए इतिहासकारमे विवाद हैव स्वाभाविके। नृग नामक एक राजाक नामक उल्लेख पुराणमे अछि मुदा ओहिसँ वाचस्पति कालीन नृगक तुलना नहि भऽ सकइयै। वाचस्पति (९म शताब्दी) अपन भामतीमे नृग नामक महत्वपूर्ण राजाक उल्लेख कएने छथि। उमेश्र मिश्रक अनुसार नृग किरात लोकनिक राजा छलाह ओ अपन भामती एहि राजाक ओतए बैसि कए लिखने छलाह। नृग वाचस्पतिकेँ सम्मानित केने छथिन्ह। ‘नव-न्यायक इतिहास’क रचयिता एहि नृगकेँ बंगालक आदिसूरसँ मिलबैत छथि। एहिठाम स्मरणीय जे वाचस्पति अपन न्याय कणिकामे सेहो आदिसूरक फराकेँ वर्णन कएने छथि। नृगक सम्बन्धमे वाचस्पति अपन भामतीक अंतमे लिखैत छथि– “नृपांतराणां मनसाप्यगम्यां भ्रूक्षेपमात्रेण चकार कीर्तिम्, कार्त्तस्वरासारसुपूरितार्थ सार्थः स्वयं शास्त्रविचक्षणश्च, नरेश्वरा यच्चरितानुकारमिच्छंति कर्त्तुं न च पारयंति तस्मिन्महीपे महनीय कीर्तौ श्रीमन्नृगेऽकारि मया निबन्धः॥ दोसर स्थानपर एवँ प्रकारे वर्णन अछि– “न चायापि न दृश्यंते लीलामात्र विनिर्मितानि महाप्रसाद प्रमदवनानि श्रीमन्नृगनरेन्द्राणामन्येशां मनसापि दुष्करानि नरेश्वराणाम्”॥ ‘नृग’क ‘महीप’ एवँ नरेन्द्र कहल गेल छन्हि आ एहिसँ इ अनुमान लगाओल जाइत अछि जे ओ मिथिलाक कोनो भागमे ताहि दिनमे राज्य करइत हेताह। ‘नृग’ आ “आदिसूर” दुनू दू व्यक्ति छलाह एहिमे सेहो कोनो सन्देह नहि। ‘नृग’ किरात लोकनिक शासक होथि से संभव कारण ताहि दिनमे किरात आ पाल लोकनिक बीच बरोबरि खटपट होइत रहन्हि आ एकर उल्लेख हम धर्मपालक समयमे कऽ आएल छी। आदिसूर पूर्वी मिथिलाक शासक छलाह जकर सीमा बंगालसँ मिलैत छल आ वाचस्पति सन विद्वानकेँ दुनू राजाक दरबारसँ सम्बन्ध हैव कोनो आश्चर्यक विषय नहि। नृगसँ ‘नरवाहन’क बोध सेहो होइयै आ किरात लोकनिक बीच इ बेश प्रचलित छल– अहु किरात लोकनिक क्षेत्र मिथिलाक उत्तरी पूर्वी भागमे छल। ‘नृग’ एकटा समस्या मूलक नाम भऽ गेल अछि। एहिठाम अमलानंद सरस्वती अपन भामतीक टीका वेदांत कल्पतरूमे लिखने छथि– “तथाविधःसार्थोयस्यप्रकृतत्वेनवर्त्ततेस नृगस्तथेत्यपरः। नृग इति राज्ञ आख्या...” ‘नृग’ एकटा परम्पराक द्योतक सेहो मानल गेल छथि आ ओ परम्परा भेल दयालु हैव, दानी हेव आ सब तरहें परोपकारी हैव। एहि परम्पराक एकटा उल्लेख गुप्तकालीन अभिलेखोमे अछि– “भूमि प्रदानान्न परं प्रदानं दानाद्विशिष्टं परिपालनञ्च। सर्वेऽतिसृष्टा परिपाल्य भूमिं नृपा नृगाधास्त्रिदियं प्रपन्नाः॥ एहि अभिलेखमे महाराज संक्षोभ्यक तुलना परम्परागत दानी नृगसँ कैल गेल अछि। अमलानंद सरस्वती सेहो अपन टीकामे ताहिकालक शासकक तुलना राजा नृगसँ करबाक चेष्टा कएने छथि। जेना कि हम उपर कहि चुकल छी राजा नृग पौराणिक राजा नृगक संकेत मात्र छथि आ ओ दानशीलता आ जनप्रियताक हेतु प्रसिद्ध छथि। १४ शताब्दीक सारंगधरक रचनामे सेहो नृगक उल्लेख भेटइयै। अहुठाम परम्परागत रूपेमे। उपेन्द्र ठाकुर सब तथ्यक परीक्षण केला उत्तर इ निर्णय दैत छथि जे ‘नृग’ शब्दसँ एहिठाम पाल राजा देवपालक तुलना कैल गेल अछि आ वाचस्पति अपन भामतीमे देवपालकेँ नृग कहलन्हि अछि। तिथि सम्बन्धी जे झंझटि अछि ताहि संदर्भमे अखन अहुमतकेँ संदिग्धे कहल जाएत। उमेश मिश्रक अनुसार नृग कर्णाटसँ आबि मिथिलामे राज्य स्थापित केने छलाह परञ्च इ मत तर्कपूर्ण नहि अछि किएक नान्यदेवसँ पूर्व एकर कोनो प्रमाण नहि भेटइयै। हमरा बुझने ‘नृग’ आ आदिसूर दुनू दू व्यक्ति छलाह आ मिथिला प्रांतक उत्तरी पूर्वी एवँ पूर्वी भागक क्रमशः शासक छलाह। वाचस्पतिक समय धरि मिथिला आ उत्तर भारतमे सामंतवादी प्रथाक विकास भऽ चुकल छल आ अभिलेख, साहित्य एवँ विदेशी यात्रीक विवरण एहिबातकेँ पुष्ट करैत अछि। पालवंशक स्थापनाक संगहि उत्तर पूर्वी भारतमे एकटा स्थायित्व एलैक आ पाल साम्राज्यक विस्तारसँ नेपाल धरिक क्षेत्र तक एकटा सुव्यवस्थित राज्यक स्थापना भेलैक। ताहि दिनमे आवागमन एवँ यातायातक सुविधाक अभाव रहलाक कारणे इ शासक लोकनि विभिन्न क्षेत्रकेँ जीतिकेँ ओहिठाम अधिकारीकेँ सुपुर्द करैत छलाह आ हुनका सामंतक स्थितिमे राखि अपन शासन सुव्यवस्थाकेँ चलबैत छलाह। जँ वाचस्पति मिश्र देवपालक ओतए अपन भामती ग्रंथ लिखतैथ तँ ओ देवपालक नामक स्थानपर ‘नृग’क नाम किएक लिखतैथ? देवपाल अपने बड्ड पैघ लोक छलाह आ वाचस्पति सन विद्वानक हाथे अपन नाम उल्लिखित करेबामे अपनाकेँ गौरवान्वित बुझितैथ। वाचस्पतियोकेँ एहिमे कोनो आपत्ति नहि होइतैन्ह कारण देवपालक शासन धरि एकटा व्यवस्थित व्यवस्थाक स्थापना भऽ चुकल छल। दोसर बात इहो जे वाचस्पति जहिना आदिसूरक नामक उल्लेख केने छथि ठीक तहिना नृगक नाम। तैं इ माने पड़त जे इ दुनू व्यक्ति अलग अलग राजा छलाह आ दुनूक दरबारमे रहिकेँ ओ दुनू ग्रंथक निर्माण केने छलाह। प्रथम किरात सामंत छलाह आ दोसर पूर्वी मिथिलाक सामंत– जे दुनू पालेक अंतर्गत हेताह। जाधरि आर साधन उपलब्ध नहि होइयै ताधरि नृगक समस्या एहिना बनल रहत। नृग राजा सहरसा जिलांतर्गत बड़गामक रहनिहार छलाह। एहनो एकटा मत अछि। देवपालक बाद पाल साम्राज्यक स्थितिमे डावाँडोल शुरू भेल आ चारूकातसँ पुनः आक्रमण–प्रत्याक्रमण होमए लागल। नारायणपालक भागलपुर अभिलेखसँ इ ज्ञात होइत अछि जे तीरभुक्तिक कक्ष विषय (जकर तुलना कौशिकी कक्षसँ कैल जा सकइयै)मे पाल शासक पशुपताचार्य परिषद एवँ शिवभट्टारक लोकनिक हेतु किछु दान देने छलाह। ८६६ ई. क आसपास राष्ट्रकूट शासक अमोघवर्ष अंग, वंग आ मगध धरि अपन अधिकार बढ़ा लेने छलाह। कृष्ण द्वितीय राष्ट्रकूटक समक्ष सैह स्थिति छल। ओम्हरसँ प्रतिहार भोज आ महेन्द्रपाल सेहो पाल साम्राज्यक सीमामे अपन अधिकार बढ़ा चुकल छलाह। प्रतिहार लोकनि तिरहुत धरि अपन अधिकार बढ़ौने छलाह। महेन्द्रपाल प्रतिहार तँ बंगालमे पहाड़पुर धरि पहुँचि गेल छलाह। पाल साम्राज्य बिहारक किछु भाग धरि सीमित रहि गेल छल। मिथिला पाल–प्रतिहार साम्राज्यक बीचमे बत्तीस दाँतक बीचमे जीभक स्थितिमे छल– कखनो प्रतिहार लोकनि बढ़ैथ आ कखनो पाल लोकनि। एहि काल मिथिलाक कोनो प्रामाणिक इतिहास भेटतो नहि अछि आ हम देखैत इएह छी जे पश्चिम आ पूब दुनू दिसिसँ जे आक्रमण होइत छल, मिथिला ओकर शिकार भऽ जाइत छल। पाल लोकनि कोनो रूपें अपन अस्तित्वकेँ ढ़ोने जाइत छलाह एहिमे संदेह नहि यद्यपि हुनक प्रभुत्व बहुत घटि गेल छलन्हि। ९५३–५४ ई.मे जेजाभुक्तिक चन्देल लोकनि मिथिलापर आक्रमण केलन्हि। यशोवर्मन आ हुनक पुत्र धंग मिथिलापर आक्रमण केलन्हि आ गुर्जर प्रतिहारक नियंत्रणसँ ओकरा मुक्त कए अपना अधीनमे केलन्हि मुदा ओ लोकनि बहुत दिन धरि एहि क्षेत्रपर राज्य नहि कऽ सकलाह। चन्देल आक्रमणसँ समस्त उत्तरी भारत पराजित भेल आ आक्रान्त सेहो आ पाल साम्राज्यकेँ एहिसँ बेस धक्का लगलैक। एहिसँ पूर्वहिं प्रतिहार आ राष्ट्रकूट लोकनिक आक्रमणसँ पाल साम्राज्य शिथिल भइयै चुकल छल आ चन्देल आक्रमण ओकरा आर तहस नहस कऽ देलकै। नवम–दशम शताब्दीमे गण्डक आ शोण नदी सब प्रतिहार आ पाल राज्यक सीमा छलैक। चन्देलक प्रभाव पूर्णियाँ धरि पसरल छल आ ओहि कालमे चारूकात अस्तव्यस्तता बढ़ि गेल छल। महिपाल प्रथम एक बेर पुनः पाल साम्राज्यकेँ श्रृंखलाबद्ध करबाक प्रयास केलन्हि आ पाल साम्राज्य फेर संगठित भऽ अपना पैरपर ठाढ़ भेल। महिपाल प्रथमक अभिलेख मुजफ्फरपुर जिलाक इमादपुर गाममे भेटल अछि आ एहिसँ इ सिद्ध होइत अछि जे महिपाल उत्तर आ दक्षिण दुनू बिहारक शासक छलाह। हुनक राज्यक सीमा बनारस धरि छलन्हि। परञ्च हुनको शासन काल सुखद एवँ शांतिपूर्ण नहि रहलन्हि। विभिन्न साधन इ ज्ञात होइछ जे चेदि–कलचुरी लोकनि सेहो मिथिलापर अपन जाल फेरने छलाह आ हाथ पैर पसारने छलाह। महिपाल आ कलचुरीमे संघर्ष भेल छलन्हि अथवा नहि से ज्ञातव्य नहि अछि तखन एतवा जरूर अछि ११ म शताब्दीमे चोल लोकनिक संग दक्षिणसँ बहुत रास कर्णाट लोकनि एम्हर आबिकेँ बैसि गेल छलाह। प्राकृतपैंगलमसँ सेहो ज्ञात होइत अछि जे ताहि दिनमे चम्पारण बाटे सेहो ओम्हर गोरखपुर दिसि किछु आक्रमण भेल छल। मिथिलाक इतिहासक कोनो स्पष्ट तस्वीर हमरा लोकनिककेँ एहि युगक उपलब्ध नहि होइत अछि। पाल लोकनि येन केन प्रकारेण अपन अस्तित्व बनौने रखलन्हि आ बिहार–बंगालक विभिन्न भागपर छिटपुट ढ़ंगे शासन करैत रहलाह। नौलागढ़ आ वनगाँवसँ जे विग्रहपाल तृतीयक अभिलेख भेटत अछि ताहिसँ इ स्पष्ट होइछ जे पाल लोकनि अपन अंतिम कालमे तीरभुक्तिमे अपनाकेँ बचौलन्हि कारण ताहि दिनमे कलचुरी कर्णक आक्रमणसँ बंगाल आक्रांत छल और विग्रहपाल तृतीय आ कलचुरीक वीच जे मनमुटाव चल अबैत छल तकरा अतीश दीपंकरक प्रयासे मेटाओल गेल आ दुनूक वीच एकटा वैवाहिक संधि भेल। विग्रहपाल तृतीय यौवनश्रीसँ विवाह केलन्हि आ हुनका दुनूक वीच जे संधि भेलन्हि तकरा कपाल संधि कहल गेल अछि। नौलागढ़ आ वनगामक अभिलेखकेँ देखलासँ इ प्रतीत होइछ जे मिथिला कलचुरीक आक्रमणसँ बचल छल आ मिथिलापर पाल लोकनिक शासन चल अबैत छल। अपन ह्रासकालमे पाल लोकनि तीरभुक्तिकेँ अपन राजधानी बनौलन्हि आ ओहिठामसँ शासन केनाइ प्रारंभ केलन्हि। विग्रहपाल तृतीयक समयमे पालवंशक सूर्यास्त भऽ रहल छलैक। प्राकृतपैंगलम् आ अन्य साधन सबसँ इ ज्ञात होइछ जे गण्डक क्षेत्र धरि कलचुरी वंशक लोक अपन प्रभुत्व बढ़ा लेने छलाह। पाल लोकनिसँ हुनक संघर्ष बढ़ि रहल छलन्हि। संध्याकर नन्दीक ‘राम चरित’मे ताहि दिनक राजनैतिक स्थितिक बढ़िया विवरण अछि। नेपालक हस्तलिखित पोथीमे रामायणक एक गोट पोथी उपलब्ध भेल अछि जकरा अनुसार संवत १०७६मे तीरभुक्तिमे एकटा सोमवंशोद्भव महाराजाधिराज गाँगेयदेवक शासन छल। ओहि रामायणक किष्किन्धा काण्डकेँ अंतमे लिखल अछि–“सम्वत् १०७६ आषाढ़ वदी४ महाराजाधिराज पुण्यावलोक सोमवंशोद्भव गौड़ध्वज श्रीमद् गांगेयदेव भुज्यमान तीरभुक्तौ कल्याण विजयराज्ये नेपालदेशीय श्री भंक्षुशालिक श्री आनन्दास्य पाटकावस्थित (कायस्थ) पंडित श्रीकुरस्यात्मज गोपतिना लेखिदम्”–१९४०मे एकर दोसर प्रति भेटलैक जाहिमे “गौड़ध्वज”क स्थानपर “गरूड़ध्वज” छैक। एहि पुष्पिकाक अध्ययनसँ मिथिलाक इतिहासक वस्तुस्थितिपर विद्वानक बीच पूर्ण मतभेद छन्हि। किछु गोटए एकरा कलचुरी गंगेयदेव मनैत छथि आ किछु गोटए कर्णाट गंगेयदेव। हमरा बुझने इ कर्णाट गंगेयदेव छलाह। एकर कारण इ अछि जे मिथिलामे अद्यावधि कलचुरी शासनक प्रमाण उपलब्ध नहि। दोसर बात इ जे कलचुरी शासकक संग विग्रहपाल तृतीय कपाल संधि आ वैवाहिक संधि कए अपन अस्तित्वकेँ सुरक्षित रखने छलाह। तेसर बात इ जे कोनो उल्लेख नहि पाओल जाइत अछि आ ने अप्रत्यक्षे रूपसँ एकर कोनो विवरण कलचुरी साधनमे भेटइयै। चारिमबात इ जे महिपालक ४८म वर्ष धरि तिरहुत हुनका अधीनमे छलन्हि तखन ओहिठाम गंगेयदेव कलचुरीक राज्य कोना भऽ सकइयै। महिपालक बादो रामपाल धरि मिथिलामे पालवंशक राज्य बनल रहल आ पालवंशक अंत भेलापर कर्णाट लोकनिक शासन प्रारंभ भऽ गेल। मिथिलाक समस्त क्षेत्रमे पालकालीन अवशेष भेटइत अछि जखन कि एम्हर कलचुरीक कोनोटा अवशेष मिथिलामे नहि भेटइछ। एहि प्रश्नपर विस्तृत रूपें विचार हमरा लोकनि कर्णाट कालक अध्ययन क्रममे करब। जखन पालवंशक सूर्यास्त भऽ रहल छल तखन दक्षिणक षष्ठम विक्रमादित्य उत्तरमे अपन भाग्य अजमेबाक हेतु आगाँ बढ़ि रहल छलाह। अध्याय–7 कर्णाटवंशक इतिहास ग्यारहम शताब्दीक अंतिम चरणमे मिथिलाक अवस्था अत्यंत दयनीय आ सोचनीय भऽ गेल छल कारण एहिठाम कोनो प्रकारक केन्द्रीय सत्ता नहि रहि गेल छल आ चारूकातसँ महत्वाकाँक्षी शासक लोकनि एहिपर अपन गिद्ध-दृष्टि लगौने छलाह। पाल लोकनिक शासन डगमगा गेल छल। कलचुरी लोकनि पश्चिमसँ हिनका सबके ठेलैत–ठेलैत मिथिलाक एक कोनमे पहुँचा देने छल। १०७७ एवँ १०७९क बीच कलचुरी शोढ़देव गण्डकीमे स्नान कए दान कएने छलाह तकर प्रमाण एकटा शिलालेखसँ भेटइत अछि। एहिसँ इ नहि बुझबाक अछि जे कलचुरी लोकनिक शासन स्थायी रूपे मिथिलापर छ्ल। एहिसँ तात्पर्य एतबे बहराइत अछि जे मिथिलाक दुर्बल राजनैतिक स्थितिसँ लाभ उठा कए विभिन्न राज्य एहिपर अपन सत्ता स्थापित करए चाहैत छलाह। सन्ध्याकर नन्दीक रामचरितमे तत्कालीन राजनीतिक विशद विश्लेषण अछि आ ओहिसँ इहो ज्ञात होइछ जे विग्रहपाल तृतीय कर्णकेँ हरौने छलाह। हुनक नौलागढ़ आ बनगामक शिलालेखक उल्लेख हम पूर्वहिं कऽ चुकल छी। पाल लोकनि सेहो एहिकालमे सबठामसँ सिकुरिकेँ मिथिलेमे आबि गेल छलाह। कुब्जिकामतमक एकटा तालपत्र पोथीमे इ लिखल अछि जे रामपालदेव नेपालक शासक छलाह जाहिसँ स्पष्ट होइछ जे विग्रहपाल तृतीयसँ रामपाल धरि मिथिला आ नेपाल पाल साम्राज्यक मुख्य केन्द्र छल। एहि अनिश्चित स्थितिसँ जखन सब दिशक महत्वाकाँक्षी शासक लाभान्वित होइत छलाह तखन दक्षिणक महत्वाकाँक्षी लोकनि किएक मुँह तकैत रहितैथ? हमरा लोकनिकेँ विल्हणक विक्रमाँकदेवचरितसँ ज्ञात होइछ जे चालुक्य सोमेश्वर (१०४०–१०६९) मालवाक परमारक राजधानी धारकेँ जीतलैन्ह आ भोजक भोजकेँ ओतएसँ पड़ाए पड़लन्हि आ डाहलक राजा कलचुरि कर्णक शक्तिकेँ सेहो नष्ट केलन्हि। हुनक पुत्र विक्रमादित्य षष्ठम अपन बापोसँ एक डेग आगाँ बढ़लाह आ गौड़ कामरूपपर दू बेर विजय प्राप्त केलन्हि। बाप–बेटाक लगातार उत्तर भारतीय विजयक फलस्वरूप उत्तर बिहार, बंगाल आ कन्नौजक राजनीतिमे क्रांतिकारी परिवर्त्तन भेल। ओ लोकनि नेपाल धरि आक्रमण केने छलाह। विक्रमादित्य षष्ठमक पुत्र सोमेश्वर तृतीय अपन एक शिलालेखमे कहने छथि जे आन्ध्र, द्रविड़, मगध आ नेपालक शासक लोकनि हुनका पैरपर अपन माथ टेकने छलाह। चालुक्य आक्रमण एहि बातकेँ सिद्ध करइयै जे उत्तर भारतमे ताधरि परमार आ कलचुरि वंशक पतन प्रारंभ भऽ गेल होएत। जँ से नहि होएत तँ एक्के बेर चालुक्य लोकनि आन्हर बिहाड़ि जँका समस्त उत्तर भारत एवँ नेपालकेँ कोना आक्रांत केने रहितैथ? विरोधक संभावना नहि रहला संता ओ लोकनि प्रोत्साहित भए एहि सब क्षेत्रपर अपन प्रभुत्व जमौने हेताह। हिनकहि सब संग दक्षिणसँ बहुत रास कर्णाट सेनापति लोकनि उत्तर भारतमे अवतरित भेलाह आ एक्कहि संग उत्तर भारतमे मिथिला–नेपालमे कर्णाट नान्यदेवक, बंगालमे विजय सेनक आ कन्नौजमे चन्द्रदेव गहढ़वालक उत्थान संभव भेल। गहढ़वाल लोकनि बढ़ैत–बढ़ैत गंगाक दक्षिणमे मूंगेर धरि पहुँच चुकल छलाह। कर्णाट लोकनिक उत्पत्ति:- जनक वंशक परोक्ष भेलापर मिथिलाक अपन कोनो राजवंशक राज्य मिथिलामे नहि भेल छलैक। १०९७मे मिथिलामे कर्णाट वंशक स्थापना ताहि हिसाबे एकटा महत्वपूर्ण घटना मानल जा सकइयै। मुदा इ कर्णाट लोकनि केँ छलाह आ कोना मिथिलामे आबिकेँ बसलाह आ शासक भेलाह से पूर्ण रूपेण अखनो धरि ज्ञात नहि अछि आ हमरा लोकनि निश्चित रूपे इ नहि कहि सकैछी जे कर्णाट लोकनि अमूक आ अमूक छलाह। जेना कि हम पहिने देखि चुकल छी कि ग्यारहम शताब्दीक अंतिम चरणमे मिथिला, कन्नौज आ बंगालमे करीब करीब एक्के समय तीनटा स्वतंत्र राज्यक स्थापना भेल छल आ ओ तीनू राज्य तत्कालीन राजनीतिमे महत्वपूर्ण भूमिका अदा केने छल। मिथिलाक व्यक्तित्वक पूर्ण विकास एहिवंशक शासन कालमे भेल आ तहियेसँ मिथिलाक प्रसिद्धि बढ़लैक। कर्णाट लोकनि अपनाकेँ कर्णाट क्षत्रिय कहैत छलाह। सेनवंश शासक सेहो अपनाकेँ कर्णाट क्षत्रिय कहैत छलाह। हिनका लोकनिक सम्बन्धमे विद्वानक बीचमे पूर्ण मतभेद अछि। इ लोकनि कर्णाट छलाह एतवा धरि निश्चित अछि कारण नान्यदेव अपनाकेँ कर्णाट कुलभूषण कहने छथि आ सामंत सेन अपनाकेँ कर्णाट क्षत्रियक कुल शिरोमणि। हेमचन्द्र राय चौधरीक मत छन्हि जे देवपालक मूंगेर ताम्रलेखमे जाहि कर्णाट लोकनिक उल्लेख अछि सम्भवतः उएह कर्णाट लोकनि बादमे चलिके अलग–अलग राज्यक स्थापना केलन्हि। एहिमतक समर्थन केनिहार एक गोटएक कथन इ अछि जे जखन मगध– मिथिलामे पालवंशक ह्रास प्रारंभ भेल तखन उएह कर्णाट लोकनि (जे अखन धरि एहि क्षेत्रमे चुप्पी साधने छलाह) ओहि स्थितिसँ लाभ उठाके विस्तार केलन्हि आ कर्णाट सत्ताक स्थापना सेहो। एकमत इहो अछि जे राजेन्द्र चोलक आक्रमणक समयमे बहुत रास कर्णाट सैनिक एम्हर आएल छलाह आ राजेन्द्र चोलक घुरि जेबाक वाद एहिठाम रहि गेलाह आ एम्हुरका राजनीतिमे सक्रिय भाग लेबए लगलाह। राजेन्द्र चोल अपनाक गंगाइकोण्ड सेहो कहने छथि जाहिसँ प्रमाणित होइछ जे विजयाभियानक क्रममे इ गंगा धरि आएल छलाह। परंतु सब साधनक सामान्य अध्ययन केला उत्तर इ प्रतीत होइछ जे राजेन्द्र चोलक अभियानक विशेष प्रभाव तत्कालीन उत्तर भारतक राजनीतिपर नहि पड़ल छल। तैं इ कहब जे हुनका संगे आएल कर्णाट लोकनि एतए बसलाह से वैज्ञानिककेँ नहि बुझि पड़इयै। देवपालसँ मदनपाल धरि जतवा जे पाल अभिलेख अछि ताहि सबमे गौड़, मालव, खस, हूण, कुलिक, कर्णाट, लाट्, चाट, भाट, आदि शब्दक मात्र औपचारिक व्यवहार अछि आ एहि शब्दसँ मिथिला अथवा बंगालक कर्णाटकेँ जोड़ब समीचीन नहि बुझाइत अछि। कर्णाट शासक लोकनि कर्णाटसँ आबि मिथिलामे बसल छलाह इ सर्व सम्मतिसँ स्वीकृत अछि– विवाद एतवे अछि जे ओ लोकनि कखन, कहिआ आ कोना एतए आबिकेँ रहलाह आ कोन रूपे सत्ता हथिऔलन्हि। नेपाली परम्परा आ वंशावलिमे सेहो मिथिलाक नान्यदेवक वंशकेँ कर्णाट क्षत्रिय कहल गेल छैक। नान्यदेव भरतक नाट्यशास्त्रपर एकटा टीका लिखने छलाह जे सर्व प्रसिद्ध अछि आ ओहिक्रममे ओ अपना सम्बन्धमे निम्नलिखित पदवी सबहिक प्रयोग कएने छथि–नान्यपति, नान्य, महासामंताधिपति धर्मावलोक, धर्माधारभूपति, मिथिलेश, एवँ कर्णाट कुलभूषण। नान्य शब्दक व्यवहार हमरा लोकनि अन्हराठाढ़ी अभिलेखमे सेहो भेटइत अछि। नान्य शब्दक उत्पत्ति द्रविड़ शब्द ‘नन्नीय’सँ भेल अछि। नान्यदेव अपन टीकामे जतवा देशी रागक उल्लेख केने छथि से सब कर्णाट शैलीक राग थिक आ ओहुसँ इ सिद्ध होइत अछि जे नान्यदेव कर्णाटकक रहल होएताह अथवा कर्णाटकसँ हुनक सम्बन्ध कोनो ने कोनो रूपे अवश्य रहल हेतन्हि। चाहे कारण जे भी रहल हो, एतवा धरि निश्चित अछि जे ग्यारहम शताब्दीक अंतिम चरणमे कर्णाट लोकनि उत्तर भारतक राजनीतिमे सक्रिय रूपसँ भाग लेमए लागल छलाह। एक मत इहो अछि जे कलचुरि गंगेयदेवक संग जे कर्णाट लोकनि सैनिकक रूपमे एतए आएल छलाह उएह सब बादमे चलिकेँ शासक भऽ गेलाह परञ्च इहो मत ने सर्वमान्य भऽ सकइयै। एहिठाम केवल एतवे स्मरण राखब आवश्यक अछि जे जँ गंगेय देवक आक्रमण मिथिलापर भेवे कैल होन्हि तँ से नान्यदेवक प्रादूर्भावसँ ६०–७० वर्ष पूर्वे भेल हेतैन्ह आ ओहना स्थिति हुनक (गंगेयदेव) सैनिक मिथिलापर अधिपत्य स्थापित केने हेथिन्ह से संभव नहि बुझाइत अछि। तैं एहि तर्ककेँ मानब असंभव। रामकृष्ण कविक अनुसार राष्ट्रकूट लोकनि सेहो कर्णाट कहबैत छलाह आ जखन दक्षिणमे हुनक अवसान समीप एलन्हि तखन ओ लोकनि ओहिठामसँ हँटि उत्तर दिसि बढ़लाह आ कन्नौज, मिथिला आ बंगालमे अपन शासन स्थापित केलन्हि। एहि कथनक कोनो शुद्ध ऐतिहासिक अथवा परम्परागत आधार नहि अछि। राष्ट्रकूट इतिहासक मर्मज्ञ स्वर्गीय सदाशिव अनंत अल्तेकरसँ हम एहि सम्बन्ध जखन विचार विमर्श कैल तखन ओ कहने छलाह जे मिथिलामे कहियो कोनो रूपे राष्ट्रकूट लोकनिक शासन ने छल आ ने ओकर कोनो प्रमाणे अछि। तैं राष्ट्रकूटकेँ एहिठाम कर्णाटसँ मिलाएब उचित नहि बुझना जाइत अछि। सुप्रसिद्ध फ्रेंच विद्वान सिल्वाँ लेवीक अनुसार मिथिलामे कर्णाट वंशक उत्पत्तिक सम्बन्ध सोमेश्वर चालुक्य एवँ ओकर वंशजक उत्तर भारतपर आक्रमणसँ छैक आ इएह सबसँ समीचीन तर्क बुझियो पड़इत अछि। विल्हणक विक्रमाँकदेव चरितमे एहि आक्रमणक विवरण भेटइयै आ पिता–पुत्र–पौत्रक अभियानक समय सेहो एहन अछि जे मिथिलाक तत्कालीन राजनैतिक स्थितिसँ मिलैत–जुलैत अछि। एहि आक्रमणक फलस्वरूपे बहुत रास कर्णाट वीर, सैनिक एवँ सामान्य लोक सब एम्हर आबिकेँ मिथिला, मगध, वंग, कन्नौज आदि स्थानमे बसि गेल छलाह। एहि आक्रमणक फले उत्तर भारतक परमार आ कलचुरि राजवंशक पराभव सेहो भेल छल। क्षेमेश्वरक चण्डकौशिकमे एकटा कथा अछि जाहिसँ भान (ज्ञात) होइछ जे पालवंशक महिपाल कोनो कर्णाटराजकेँ हरौने छलाह– “य संश्रित्य प्रकृति गहनामार्य्या चाणक्यनीति हत्वानंदान् कुसुमनगरं चन्द्रगुप्तो जिणाय कर्णाटत्वं धुवमुपगतानत्व तानेव हंतुं दादैपोघः स पुनरभवत् श्री महीपाल देवः”॥ आब इ कर्णाट राज केँ छलाह से अखुनका स्थितिमे कहब कठिन। संभवतः कर्णाटकेन्दु विक्रमादित्य षष्ठम गौड़पर आक्रमण केने होथि। विक्रमादित्यक नागपुर प्रशस्तिसँ त एतवा स्पष्ट अछि जे कर्णाट लोकनिक सम्पर्क चेदिराज कर्णसँ सेहो छलन्हि आ ओ हिनके लोकनिक मदतिसँ मालवाकेँ पराजित केने छलाह। मुदा इ कहब एहि सहयोगक फले मिथिलामे कर्णाट नान्यदेवकेँ राज्य स्थापित करबामे सुविधा भेलैन्ह से तर्क संगत नहि बुझि पड़इयै कारण एहि दुनू घटनामे तिथिक जे अंतर अछि से ततेक व्यापक जे दुनूकेँ जोड़ब असंभव। सोमेश्‍वर एवँ विक्रमादित्य षष्ठमक आक्रमणक फले जे कर्णाट सैनिक एवँ सेनापति लोकनि एम्हर एलाह सैह राज्यक स्थापनामे समर्थ भेल छलाह कारण एम्हर आएल सेनापति लोकनि एम्हुरका स्थिति देखि एम्हरे रहि जाएब उचित बुझलन्हि कारण एम्हर रहबामे दुनू हाथमे लड्डुये–लड्डु छल। सेन वंशक संस्थापक अपनाकेँ कर्णाट कुललक्ष्मीक संरक्षक कहने छथि। विक्रमादित्य षष्ठम आ सोमेश्‍वर तृतीय अपन प्रभाव नेपाल धरि बढ़ौने छलाह। एकर बादसँ विभिन्न भारतीय राजा लोकनि नेपालपर अपन प्रभाव बढ़ेबाक प्रयास केलन्हि। पाल लोकनि जखन कलचुरिक संग लटपटाएल छलाह तखने चालुक्य लोकनिक आक्रमणकेँ फले उत्तर भारतक कैक स्थानपर कर्णाट लोकनि पसरि चुकल छलाह आ ओहिठामक राजनीतिमे हस्तक्षेप करब शुरू कऽ देने छलाह। एहि तथ्यक प्रमाण हमरा विक्रमाँकदेव चरितसँ भेटइत अछि। १०५३ ई. क आसपाससँ चालुक्य लोकनि एम्हर सक्रिय रूपें हुलकी–बुलकी देमए लागल छलाह। १०५३ कऽ केलावाड़ी अभिलेखसँ इ ज्ञात होइछ जे सेनानायक भोगरस वंगकेँ जीति लेने छलाह। इ सोमेश्वर प्रथमक सेनानायक छलाह। चालुक्यक एकटा सामंत, जकर नाम आच छलैक, सेहो विक्रमादित्य षष्ठमक समयमे वंग धरि आक्रमण केने छलाह। एहि दुनू घटनासँ इ स्पष्ट भऽ जाइत अछि जे हिनके लोकनिक संग आएल सेनापति, सेनानायक, सामन्त, सिपाही आदि व्यक्ति एम्हुरका स्थिति देखि एम्हरे रहि जाइ जाएत गेलाह। नान्य अथवा हुनक पूर्वज एहने एकटा सामंत–सेनापति रहल हेताह जे नेपालक तलहट्टी मिथिलाकेँ उपयुक्त बुझि ओहिठाम बसि गेल हेताह आ चालुक्य वंशक वापस भेलाह अपन स्वतंत्र सत्ता घोषित कए मिथिला आ नेपालक शासक बनि गेल हेताह। शासक भेला उत्तरो ओ अपनाकेँ महा सामंताधिपति कहैत रहलाह से एहिबातक द्योतक थिक जे राजा हेबाक पूर्व हुनक कि स्थिति छल। नान्यदेव (१०९७–११४७):- हम उपर देखि चुकल छी जे चालुक्य आक्रमणक समयसँ चालुक्य सेनाक विशेष भाग मिथिला आ बंगालमे बसि गेल छल। नान्यदेव मिथिलामे कर्णाट वंशक संस्थापक भेलाह। एहिठाम इ स्मरण राखब आवश्यक जे एहि वंशक तत्वावधानमे समस्त पूर्वी भारत मिथिले एक गोट एहेन राज्य छल जाहिठाम २२७ वर्ष धरि (१०९७–१३२४) मुसलमान लोकनिक कोनो राजनीतिक प्रभाव नहि जमि सकलैक। राजनीतिक एवँ साँस्कृतिक दृष्टिकोणसँ नान्यदेवक शासन काल तँ महत्वपूर्ण अछिये परञ्च कर्णाटवंशक शासनकेँ स्वर्णयुग कहल गेल छैक किएक तँ एहि युगमे मिथिलामे लगभग १४००–१५०० वर्षक बाद स्वतंत्र संगठित राज्य एवँ शासन प्रणालीक स्थापना भेलैक आ कला, साहित्यक संगहि संग मैथिली भाषाक विकास सेहो भेलैक। नान्यदेव अपन दीर्घ राजकालमे पाल, कलचुरि, सेन आ गहढ़वालक पारस्परिक संघर्षक मध्य अपन दूरदर्शिता, नीतिकुशलता, एवँ वीरतासँ अपन राज्यक स्थापना केलन्हि आ उत्तरोत्तर ओकरा शक्तिशाली बनौलन्हि। ओ अपना वंशक संस्थापक संगहि संग एकटा सर्वश्रेष्ठ शासक सेहो छलाह जनिक स्थान तत्कालीन भारतीय राजा सबहिक मध्य महत्वपूर्ण छल। नान्यदेव १०९७ इ.मे सिमरौनगढ़मे राजगद्दीपर बैसलाह आ कर्णाट वंशक स्थापना केलन्हि। निम्नलिखित श्लोकसँ उपरोक्त तिथिक भान होइयै आ कहल गेल अछि जे इ लेख सिमरौनगढ़ (जे सम्प्रति नेपालमे अछि)सँ प्राप्त भेल अछि। “नन्देन्दु विन्दु विधु सम्मितशाकवर्षे सच्छ्रविणे सितदले मुनिसिद्धितिथ्याम्। स्वा(ती) तौ शनैश्चर दिन करिवैर लग्ने श्री नान्यदेव नृपतिर्व्यदधीत वास्तुम्” शक् १०१९ (=१०९७ ई.)क स्वाती नक्षत्रमे शनि दिन(श्रावण सप्तमी)केँ नान्यदेव राजा भेला–याने मिथिला राज्यक स्थापना केलन्हि। १६२८ ई. भतगाँवक राजा जगज्योतिमल्ल रचित मुदितकुवलयाश्वसँ सेहो ज्ञात होइछ जे नान्यदेवक १८ जुलाइ १०९७केँ मिथिला राज्यक स्थापना केलन्हि। मिथिला राज्यक स्थापनाक क्रममे नान्यदेवक स्थान सर्वप्रथम छन्हि आ तकर प्रमाण हमरा नेपालक परम्परा एवँ वंशावली आ शिलालेखसँ भेटइत अछि। प्रतापमल्लक शिलालेखमे सेहो एहि क्रमे नाम अछि। नान्यदेव मिथिला राज्यक स्थापना मिथिला–नेपालक सिमानपर सिमरौनगढ़मे केने छलाह आ ओहिठामसँ चारूकात पसरल छलाह। मैथिल परम्परामे एकटा कथा सुरक्षित अछि जे एवँ प्रकारे अछि। कहल गेल अछि जे प्रारंभमे नान्यदेव नीलगिरी प्रांत (दक्षिण भारत)मे राज्य करैत छलाह आ ओतहिसँ ओ मिथिला प्रांत आएल छलाह। घुमैत–फिरैत ओ सीतामढ़ी जिलांतर्गत नान्यपुर परगन्नास्थ पुपरी ग्रामक समीप कोइली ग्राममे विश्राम केलन्हि। एकदिन ओ अपन खेमाक कातसँ एकटा विषधर सर्पकेँ जाइत देखलन्हि जाहिपर निम्नलिखित श्लोक लिखल छल– “रामोवेत्ति नलोकेत्ति वेत्ति राजा पुरूखाः अलर्कस्य धनं प्राप्य नान्यो राजाभविष्यति”। परम्परा के हटा जँ देखल जाइक तँ एहिसँ इएह सिद्ध होइछ जे अलक्षित धनक प्राप्ति कए नान्यदेव मिथिलाक राजा हेताह। कहल जाइत अछि जे हुनका एहेन धन प्राप्त भेल छलन्हि जाहिसँ हुनका राज्यशक्ति अर्जन करबामे सहायता भेटल छलन्हि। ओ दक्षिणमे नीलगिरीमे राजा छलाह अथवा नहि से कहब तँ कठिन अछि मुदा एतबा धरि ज्ञातव्य जे मिथिला पहुँचलाहपर हुनका किछु अलक्षित धनक लाभ अवश्य भेलन्हि आ ओ ओहिसँ लाभान्वित भए मिथिला राज्य प्राप्त करबामे अग्रसर भेलाह। तखन मिथिलामे कोनो प्रकारक विरोधक संभावना नहि रहि गेल छल। नान्यदेवकेँ कामरूपक धर्मपालक समकालीन कहल गेल छन्हि। धर्मपालक शासनकालमे कालिका पुराणक संकलन भेल छल आ ओहि कालिका पुराणमे सबसँ प्राचीन उल्लेख भरत भाष्यक अछि जकर लेखक नान्यदेव छलाह। ओहि कालमे मिथिलासँ बासतरिया ब्राह्म लोकनिक परिवार असम गेल छल। मिथिला ताहि दिन धरि तंत्रक प्रमुख केन्द्र बनि चुकल छल आ कालिका पुराणक संकलनक मूल उद्देश्य छल मिथिला आ असमक बीच एक प्रकारक साँस्कृतिक सम्पर्क स्थापित करब। नान्यदेव, जे कि अभिनव गुप्तक नामे सेहो प्रसिद्ध छलाह, क प्रसंग के.सी.पाण्डेयक विचार छन्हि जे ओ १०१४–१५ इ.मे भेल होएताह मुदा से कोनो रूपे मान्य नहि भऽ सकइयै आ एहि प्रसंगक तर्क हम आनठाम उपस्थित कऽ चुकल छी (द्रष्टव्य–काशी प्रसाद जायसवाल संस्थान द्वारा प्रकाशित बिहारक बृहत् इतिहास–अंग्रेजीमे)। सिमरौनगढ़ शिलालेखमे नान्यदेवक तिथि स्पष्ट अछि जकर संकेत हम पूर्वहिं दऽ चुकल छी। नान्यदेवक मंत्री श्रीधर दासक एकटा बिनु तिथिक शिलालेख, जे अन्हराठाढ़ी गाममे अछि, क पाठ निम्नलिखित अछि– “ॐ श्रीमन्नान्य पतिर्जेता गुणरत्न महार्णवः यत्कीर्त्यां जनितम् विश्वे द्वितीय क्षीर सागर। मंत्रिणा तस्यन्नान्यस्य क्षत्र वंशाब्ज भानुना दवोयकारित श्रीधरः श्रीधरेणच यस्यास्य बाल्मीकेर विजयो प्रबन्ध जलधौ व्यासस्य चात्यद् भुत्ते वाद्यैरण वद्य गद्य चतुरैन्यैश्च विस्तारिते अस्माकम् क्वर्पुनग्गिरामवसरः कोवाकारोत्यादर यद्वालबचोप्य”। १६४८क प्रताप मल्लक शिलालेखमे नान्यदेवक वंशक क्रम एवँ प्रकारे अछि– “आसीत् श्री सूर्यवंशे रघुकुल नृपजो रामचन्द्रो नृपेशः तद्वंशो नान्यदेवोऽवनि पतिरभवत सुतः गंगदेवः। तत्पुत्रोऽभून्नृसिंहो नरपतिरतुलस्तत्सुतो रामसिंहः तज्जः श्री शक्तिसिंहो धरणिपतिरभत् भूप भूपालसिंह तस्मात्कर्णाट चूड़ामणि विहरियुत्सिंह देवौस्यवंशे”। ओहिकाल राजनीतिक परिस्थितिक अध्ययनसँ हमरा लोकनि नान्यदेवक उचित मूल्याँकन कऽ सकैत छी। बंगालमे सेन वंशक स्थापना भऽ चुकल छल आ कन्नौजमे गहढ़वाल राज्य सेहो जमि रहल छल। मूंगेरक क्षेत्र पाल लोकनि सिमैटिकेँ आबि गेल छलाह। जखन पाल, सेन आ गहढ़वाल अपने–अपनेमे बाँझल छलाह तखन नान्यदेव मिथिलासँ नेपालपर आक्रमण केलन्हि आ ओकरा अपन राज्यमे मिला लेलन्हि। सेन सबकेँ हरेबाक हेतु नान्यदेव गहढ़वालसँ बढ़िया सम्बन्ध रखैत छलाह आ एकर प्रमाण हमरा विद्यापतिक पुरूष परीक्षासँ सेहो भेटइत अछि जाहिमे लिखल अछि नान्यदेवक पुत्र मल्लदेव राजा जयचन्द्रक ओतए सम्मानित भावें रहैत छलाह। विजयसेनक देवपाड़ा शिलालेखसँ इ ज्ञात होइछ जे नान्यकेँ पराजित कए विजयसेन गिरफ्तार कऽ लेने छलन्हि। सेन आ कर्णाट वंशक वीच बरोबरि खटपट होइते रहैत छल आ पूर्वी मिथिला (सहरसा–पूर्णियाँ)क क्षेत्रमे दुनूकेँ कोनो ने कोनो रूपें झंझटि चलिते रहन्हि। एहि हेतु नान्यदेव गहढ़वाल लोकनिक संग नीक सम्बन्ध रखैत छलाह। नान्यदेव मिथिलामे मात्र कर्णाटवंशक स्थापनेटा धरि नहि केलन्हि अपितु एकरा दृढ़ सेहो केलन्हि आ समस्त मिथिलापर अपन एकक्षत्र शासन कायम केलन्हि। गण्डकीसँ कौशिकी धरि आ हिमालयसँ गंगाधरि अपन राज्यक विस्तार करबामे ओ सक्षम भेला। मिथिलाक इतिहासक संदर्भमे नान्यदेवकेँ उएह स्थान प्राप्त छन्हि जे समस्त भारतक इतिहासक संदर्भमे चन्द्रगुप्त मौर्यकेँ। जनक वंशक पश्चात् एहन प्रशस्त राज्य मिथिलामे आ कहिओ नहि बनल। ओहि समयमे मिथिलाक जे राजनैतिक स्थिति छलैक ताहिमे नान्यदेव एहिसँ बेसी किछु कइयो नहि सकइत छलाह। राज्यक स्थापनाक संगहि संग ओकरा सुदृढ़ बनेबाक हेतु ओ संगठित शासन विधानक जन्म सेहो देलन्हि। नान्य अपनाकेँ श्रीमहासामंताधिपति, श्रीमन्नान्यपति, कर्णाटकुलभूषण, धर्माधर भूपति, राजनारायण, नृपमल्ल, मोहन, मुरारी, प्रत्ययग्रवानिपति, मिथिलेश्वर, सामंतधिपति आदि–कहने छथि। अन्हराठाढ़ी अभिलेखमे हुनका ‘श्रीमान’ कहल गेल छन्हि। एहि सबसँ हुनक पूर्वक स्थितिक भान होइयै आ बुझि पड़इयै ओ पूर्वमे सामंत रहल होएताह आ बादमे शासक भेल होएताह। ताहि दिनक अनिश्चित राजनैतिक स्थितिमे ओ मिथिलाक व्यक्तित्वक विकास केलन्हि आ मिथिलाकेँ एकटा रूप देलन्हि। मिथिलाक चौहद्दीक परिभाषा जे हमरा लोकनि देखइत छी तकरा राज्यक रूपमे चरितार्थ उएह केलन्हि आ तैं ओ प्रशंसनीय छथि। ओ स्वयं एक पैघ कूटनीतिज्ञ एवँ सफल योद्धा छलाह। चम्पारणमे राजधानीक स्थापना करब (सिमरौनगढ़) हुनक कूटनीतिज्ञताक परिचय देने छथि। ताहि दिनमे दरद–गण्डकी क्षेत्र धरि पश्चिमक राज्य छल आ मिथिलाक सीमा ओहि राज्यसँ मिलैत छल आ ओम्हर यशः कर्णक नजरि सेहो एहि दिसि लगले छल। तैं नान्यदेव ओहि खतरासँ अपन राज्यक रक्षार्थ ओम्हरे अपन राजधानी बनौलन्हि जाहिसँ पश्चिम आ उत्तर दुनूक सुरक्षा हो। एहि विचारसँ ओ अपन राज्यक राजनीतिकेँ सेहो संचालित करैत छलाह। नान्य जे टीका लिखने छथि ताहिमे ओ अपनाकेँ सौवीर आ मालवक विजेता घोषित कएने छथि– “जित सौवीर वीरेण सौवीरक उदहृतः” “लुप्तमालव भूपाल कीर्तिर्मालव पञ्चमीम्” “बाँगलि केति कथिता मिथिलेश्वरेण”। “श्री रागस्यैक भूमिर्ललित मधुर वाग्भिंत बंगाल–गौड़, प्रौढ़ प्राग्भारसारः कुकुभमुभयथासाधयन्विश्रमुच्चैः। संग्रामे भैरवोयः प्रबिलसति मुहुर्धूर्जरीयस्य कण्ठे, सौवीरो ध्यायमोनं व्यधितकृतमतिः भूपतिः नान्यदेवः”॥ सौवीर, मालवा, बंगाल आ गौड़केँ पराजित करबाक श्रेय ओ अपनापर लैत छथि–सौवीर, मालवापर संभवतः ओ मिथिलेश्वर होएबाक पूर्वहिं विजय प्राप्त केने होएताह। बंगालक प्रश्न लऽ कए हुनका सेन वंशसँ झंझटि भेलन्हि तकर वर्णन उपर कऽ चुकल छी आ संभव जे अंततोगत्वा हुनका बंगाल–गौड़पर विजय प्राप्त भेल होन्हि। बंगाल आ गौड़क प्रश्नपर नान्यदेव आ विजयसेनक वीच मनोमालिन्य भेल होन्हि अथवा रहैत होन्हि से संभव। दिनेश चन्द्र सरकार सेनवंश आ कर्णाटवंशक सब तथ्यक अध्ययन केलाक पछाति एहि निर्णयपर पहुँचल छथि जे विजयसेनकेँ नान्यदेवक विरूद्ध कोनो खास सफलता नहि भेटल छलन्हि। गिरीन्द्र मोहन सरकार सेहो एहिबातसँ हमरा लोकनिकेँ अवगत करौने छथि जे सेनक मिथिलामे शासन अथवा राज्य हेबाक कोनो ठोस प्रमाण नहि अछि। देवपाड़ा शिलालेखक अध्ययनसँ एतबे प्रमाणित होइछ जे विजयसेन नान्यदेव आ राघवक घमण्डकेँ चूर केलन्हि। मिथिलामे अपन अस्तित्वकेँ सुदृढ़ कए आ अपन चारूकात विस्तारक कोनो आशा नहि देखि नान्यदेव नेपाल दिसि अपन ध्यान लगौलन्हि। ताहि दिनमे नेपालोमे कैक गोट राज्य छल आ ओहिमे आपसमे आधिपत्यक हेतु संघर्ष होइत रहैत छल। नान्यदेव एहि स्थितिसँ लाभ उठौलन्हि आ नेपालक राजनीतिमे हस्तक्षेप करब प्रारंभ केलन्हि। नेपाली परम्पराक अनुसार ओ समस्त नेपालकेँ अपना अधीनमे केलन्हि आ नेपालक स्थानीय शासक, पाटन आ काठमाण्डुक जयदेव मल्ल आ भात गाँवक आनंद मल्लकेँ गद्दीसँ उतारलन्हि। नेपाली परंपराक अनुसार नेपालक राजवंशकेँ नान्यदेव समाप्त नहि केलन्हि–बुझि पड़इयै जे जखन ओ लोकनि नान्यदेवक सत्ताकेँ स्वीकार कऽ लेलथिन्ह तखन नान्यदेव हुनका लोकनिकेँ अपन अधीनस्थ शासक बनाकेँ छोड़ि देलथिन्ह। सामंतवादी व्यवस्थाक इ एकटा प्रमुख बात छल। नेपालक इतिहासकार दिली रमण रेगमीक अनुसार नान्यदेव सम्पूर्ण नेपालकेँ नहि जीतने छलाह आ हुनका ११४१मे फेर दोसर बेर नेपालपर आक्रमण करए पड़ल छलन्हि। नान्यक परोक्ष भेलापर पुनः ठाकुरी वंशक लोग अपन आधिपत्य बना लेने छलाह। नेपालपर नान्यदेव जे कर्णाट वंशक स्थापना केलन्हि तकरा हुनक वंशज हरिसिंह देव बादमे सुदृढ़ केलथिन्ह। विजेता, राज्यनिर्माता, कुशल प्रशासक एवँ संगठन कर्त्ताक अतिरिक्त नान्यदेव स्वयं एक बहुत पैघ विद्वान छलाह आ भरतक नाट्यशास्त्रपर एक गोट टीका सेहो लिखने छलाह। श्रीधर दास एवँ रत्नदेव नान्यदेवक प्रधानमंत्री छलथिन्ह। श्रीधर दासक पिता बटुदास सेनक महासामंत छलाह आ श्रीधर दास सेहो महामाण्डलिक छलाह। हिनक मूल राजधानी सिमरौनगढ़ (नेपाल)मे छलन्हि आ दोसर राजधानी नान्यपुरमे। नान्यदेव ५० वर्ष धरि राज्य केलन्हि आ सब किछु सफलतापूर्वक उपलब्ध कए मिथिला राज्यकेँ एकटा स्वरूप प्रदान केलथि। मिथिला तहियासँ आइ धरि संस्कृतिक एकटा प्रधान केन्द्र बनल अछि। राजनैतिक इतिहासक महत्वक लोप भेलो उत्तर सांस्कृतिक दृष्टिकोणसँ नान्यदेवक शासनक अपन अलग महत्व अछि। मल्ल देव:- विद्यापति अपन पुरूष परीक्षामे मल्लदेवकेँ युवराज कहने छथि परञ्च मिथिलामे कर्णाट वंशक शासन श्रृंखलामे नान्यदेवक बाद गंगदेवक नाम अवइयै तैं मल्लदेवक युवराजक संज्ञा एकटा समस्या बनि गेल अछि। सभ साधनक अध्ययन केलापर इ प्रतीत होइछ जे नान्यदेवक बाद मिथिला राज्य संभवतः दुनू भाइमे बटि गेल छल आ दुनू गोटए अपन–अपन क्षेत्रपर शासन करैत हेताह। पुरूष परीक्षाक अनुसार नान्यदेवक पुत्र मल्लदेव बड्ड साहसी आ स्वाभिमानी छलाह। ओ किछु दिन धरि कन्नौजक जयचन्द्रक ओतए छलाह आ फेर ओहिठामसँ चिक्कौर राजाक ओतए आबिकेँ रहला। मैथिली अनुश्रति इ कहल जाइत अछि जे दुनू भाएमे पटइत नहि छलन्हि आ तैं जखन गंगदेव नेपाल एवँ वंगक संग बाझल छलाह तखन मल्लदेव हुनक मदति नहि केने छलथिन्ह। जयचन्द्र मल्लदेवक वीरतासँ बड्ड प्रभावित छलाह। सहरसा जिलामे मलडीहा आ मल्हनी गोपाल मल्लदेवक नामपर बसल अछि। भीठ भगवानपुरमे मंदिरमे एकटा अभिलेख अछि जाहिमे लिखल अछि– “ॐ श्री मल्लदेवस्य”। किंवदंती अछि जे भीठ भगवानपुर मल्लदेवक राजधानी छल। भीठ भगवानपुर गंधवरिया राजपूतक केन्द्र सेहो मानल गेल अछि आ गंधवरिया परम्परामे सेहो एकटा मल्लदेवक नाम अवइयै। तैं इ कोन मल्लदेवक शिलालेख थिक से कहब असंभव। विभिन्न तथ्यक परीक्षणक बाद हम एहि निर्णयपर पहुँचल छी जे नान्यदेवक पछाति मिथिला राज्यक विभाजन भेलैक आ ओकर पूर्वी भागपर मल्लदेवक आधिपत्य रहलैक। पश्चात मल्लदेवक वंशज सेहो एहि क्षेत्रपर शासन केलन्हि जकर अप्रत्यक्ष रूपें कतेको प्रमाण भेटइत अछि। राज्यक बटबारा भऽ गेलसँ कर्णाट वंशक प्रभाव किछु घटि अवश्य गेल होएतैक आ तैं नान्यदेवक पछाति हमरा लोकनिकेँ कर्णाट राज्यक विशेष विस्तार देखबामे नहि अवइयै। स्वर्गीय कालिकारज्जन कानूनगोय एकठाम लिखने छथि जे १२१३–१२२७क बीच मिथिलामे कोनो कर्णाट अरिमल्लदेवक शासन छल मुदा एहिठाम स्मरणीय जे एहि नामक कोनो शासक मिथिलामे नहि भेल छथि। नेपालमे एहि नामक शासक भेलहि अवश्य परञ्च ओ कर्णाटवंशक नहि छलाह आ ने ताहि दिनमे नेपालक कोनो प्रभाव मिथिलाक कोनो भागपर छल। इहो संभव अछि जे कानूनगोय महोदय मल्लदेवकेँ अरिमल्लदेव बुझि लेने होथि। एकर कारण हमरा बुझने इ अछि जे मिथिला परम्परामे कहल गेल छैक जे नान्यक एकटा पुत्र नेपालमे शासन करैत रहथिन्ह आ चूंकि नान्यक एकटा पुत्रक नाम मल्लदेव छलन्हि तैं कानूनगोय साहेब ओहि नामकेँ अरिमल्लदेवक संगे मिझ्झर क देने होथि। तैं हम अपन एक लेखमे (जे आनठाम प्रकाशित अछि) मल्लदेवकेँ मिथिलाक एकटा विसरल राजाक संज्ञा देने छी। मल्लदेव पूर्वी मिथिलापर तँ राज्य करिते छलाहे आ संगहि नेपालक किछु भागपर सेहो। भीठ भगवानपुर एकटा केन्द्रीय स्थल छल तैं ओकरा ओ अपन राजधानी बनौलन्हि कारण ओहिठामसँ ओ अपन शासन बढ़िया जकाँ दुनूठाम चला सकैत छलाह। कहल जाइत अछि जे हुनके दरबारमे स्मृतिकार वर्द्धमान उपाध्याय सेहो रहैत छलाह जनिक एकटा शिलालेख आसी (मटिआरी) (हाटी परगन्ना)सँ उपलब्ध अछि। ओ मल्लदेवक समयमे धर्माधिकरणक पदपर नियुक्त छलाह। शिलालेख एवँ प्रकारे अछि– “जातो वंशे बिल्व पंचाभिधाने धमाध्यक्षो वर्द्धमानो भवेशात्। देवस्याग्रे देवयष्टि ध्वजाग्रा रूढ़ कृत्वाऽस्थापद्वैन तेयम्”॥ भीठ भगवानपुरक मंदिर आ पोखरिसँ बहराएल बहुत रास बस्तुजात एहि बातकेँ प्रमाणित करैत अछि जे प्राचीन कालमे इ एकटा महत्वपूर्ण स्थान रहल होएत। कलात्मक वस्तुजात जे कर्णाटकालीन बुझि पड़इत अछि से ओतए प्रचुर मात्रामे बहराएल अछि आ किछु वस्तु तँ एहनो अछि जकरा अपूर्व कहल जा सकइयै। एकर विस्तृत विवरण कतेक ठाम हम कैल अछि। कर्णाट कालीन पुरातात्विक महत्वक बहुत रास वस्तु बहेड़ासँ सेहो बाहर भेल अछि। भगवानपुरक डीह–डाबर, पोखरि आ मंदिर विस्तारसँ देखलासँ आ सामरिक दृष्टिकोणसँ ओहिगामक चौहद्दीक अध्ययन केलासँ इ बुझना जाइत अछि जे मल्लदेव ओहि स्थानकेँ अपन राजधानी बनौने हेताह आ ओतहिसँ ओ नेपाल आ सहरसा–पूर्णियाँ क्षेत्र धरि अपन राज्यक नियंत्रण करैत हेताह। प्राचीन कालमे सहरसा–पूर्णियाँ जेबाक रास्ता, बाट–घाट, सबटा एहि दऽ कऽ छल आ नेपालो जेबामे हुनका एहिठामसँ सुभीता होइत हेतन्हि। ओहि स्थानक उत्खनन भेलासँ ओहिपर आर प्रकाश पड़बाक संभावना अछि। जाधरि आर कोनो नवीन तथ्य हमरा लोकनिक समक्ष नहि अवइयै ताधरि मल्लदेवक ऐतिहासिकता संदिग्धे मानल जाएत। मल्लदेवक सम्बन्ध अखन आ शोधक अपेक्षा अछि। गंगदेव:- ११४७ ई.मे नान्यदेवक मृत्युक उपरांत आ पारिवारिक कलह एवँ उपरोक्तक पछाति गंगदेव मिथिलाक राजगद्दीपर आसीन भेलाह। ओ बंगालक वल्लालसेनक समकालीन छलाह आ स्वयं एक महत्वाकाँक्षी शासक सेहो। विजय सेनक हाथे अपन पिता नान्यदेवक बेइज्जतीक बात ओ बिसरल नहि छलाह आ ओ अवसरक खोजमे छलाह जाहिसँ एकर बदला लऽ सकैथ। गंगदेव आ गाँगेयदेवक प्रश्नपर इतिहासकारक मध्य जे एकटा विवाद चलि रहल अछि ताहि दिस हम पाठकक ध्यान पूर्वहिं आकृष्ट कए चुकल छी। रामायणक पुष्पिकामे जे एकटा गाँगेयदेवक विश्लेषण भेल अछि ताहि प्रसंगमे मिथिलाक इतिहासकार उपेन्द्र ठाकुरक विचार छन्हि जे ओ गाँगेयदेव कलचुरि वंशक छलाह आ हुनका महिपालसँ संघर्ष भेल छलन्हि। परञ्च हमरा एहिठाम एहि प्रश्नपर विचार करबाक हेतु निम्नलिखित बातकेँ ध्यानमे राखए पड़त। रामायणक एक पोथीमे छैक–‘गौड़ध्वज’ श्रीमद गांगेयदेव–एहिमे पुण्याव लोक शब्दक व्यवहार अछि आ विनु कोनो संकेत संवत् १०७६क। दोसर पाठमे ‘गौड़ध्वज’क स्थानपर “गरूड़ध्वज” छैक। उपेन्द्र ठाकुर महामहोपाध्याय मिराशीक मतसँ सहमति प्रगट कएने छथि। मुदा एहिठाम विचारणीय विषय इ अछि जे १०७६ शक छल अथवा विक्रम आ दोसर बात इ जे महिपाल प्रथमक समयमे पाल वंशक पुनरूद्धार भेल छल आ तैं ओहि कालमे कलचुरि लोकनिकेँ ‘गौड़ध्वज’क उपाधिसँ विभूषित हेबाक कोनो संभावना नहि बुझाइत अछि। महिपाल प्रथम अपन साम्राज्यक सीमा बनारस धरि बढ़ौने रहैथ आ जँ कलचुरि गांगेयदेवकेँ से शक्ति रहितन्हि तँ ओ अवश्ये बंगालक महिपालक प्रगतिकेँ रोकितैथ परञ्च से कहाँ हमरा लोकनिक देखबामे अवइयै। दोसर बात इहो जे मिथिलासँ महिपालक काल अभिलेखो भेटल अछि। संवतक संकेत नहि रहब सेहो एकटा दिग्भ्रमक जन्म दैत अछि। पोथी लिखनिहार श्रीकरक आत्मज कायस्थ मिथिलाक नरंगवाली मूलक एकटा प्रमुख व्यक्ति छलाह आ अहुँसँ इ प्रमाणित होइछ जे अपन तीरभुक्तिक महाराजाधिराज पुण्यावलोक श्री गंगदेवक प्रसंगहिमे लिखने हेताह। तत्कालीन राजनैतिक अवस्थाकेँ ध्यानमे राखि जखन हम एहि साधनक अध्ययन करैत छी तखन इ स्पष्ट भऽ जाइत अछि जे बारहम शताब्दी उतरार्द्धमे बंगालमे पालवंशक ह्रास भऽ रहल छल आ बंगालक सेनवंश आ मिथिलाक कर्णाट लोकनि ओहि पाल साम्राज्यपर अपन गिद्ध दृष्टि लगौने छलाह। एहेन बुझि पड़इयै जे प्रारंभमे मिथिलाक कर्णाट आ बंगालक सेन संगहि मिलि पालकेँ परास्त कए ओतएसँ भगौलन्हि आ जखन आपसी बटबाराक प्रश्न उठल तखन दुनूमे संभवतः विवाद भेलन्हि आ सेन आ कर्णाट वंशमे झगड़ा भेल। पाल लोकनिकेँ पराजित करबाक श्रेयक कारणें मिथिलाक गाँगेयदेव “गौड़ध्वज”क उपाधिसँ विभूषित भेलाह। तैं रामायणक पुष्पिकामे उल्लिखित ‘गांगेयदेव’ मिथिलाक गंगदेव थिकाह जे मिथिलासँ बंगाल धरि अपन शासनक प्रसार केने छलाह आ बल्लालसेन मिथिलाक बढ़ैत शक्तिसँ सशंकित भऽ भागलपुर धरि गंगाक दक्षिणमे अपन सत्ता बढ़ा लेने छलाह। बल्लालसेनक एकटा अभिलेख धातु सनोखर (भागलपुर)सँ प्राप्त भेल अछि जे एहिबातकेँ सिद्ध करइयै। बल्लाल चरितमे कहल गेल अछि जे बल्लालसेन पंचगौड़ (वंग, वागड़ी, वरेन्द्र, राढ़ आ मिथिला)क शासक छलाह परञ्च हमरा बुझने पहिल चारिपर हुनक शासन छलन्हि आ पाँचमकेँ ओ अपन बापक अमलक प्रतिष्ठाक रूपमे जोड़ने छलाह। पूर्वहिं इ देखाओल जा चुकल अछि कि मिथिलापर सेन राज्यक कोनो स्पष्ट प्रमाण नहि छल तैं आब इ निर्विवाद रूपें कहल जा सकइयै जे गंगदेवक शासन कालमे मिथिला पूर्णरूपेण स्वतंत्र छल आ कर्णाट लोकनि अक्षुण्ण भावें एहिठाम राज्य करैत छलाह। दुनू राज्यक सीमा मिलैत जुलैत छल तैं यदा कदा टंट–घंट भऽ जाएब स्वाभाविके छल। लक्ष्मण संवत् प्रचलनक साक्ष्य दऽ केँ इ कहब जे मिथिलामे सेन वंशक राज्य छल से समीचीन प्रतीत नहि होइछ आ ने एकरा सिद्ध करबाक हेतु कोनो ठोस प्रमाणे अछि। गंगदेव अपन मंत्री श्रीधर दासक सहायतासँ उत्तमोत्तम रीतिसँ अपन राज काज चलबैत रहलाह। हुनका समयमे कर्णाट शासन प्रणालीकेँ दृढ़ बनाओल गेलैक। राजस्व प्रशासनकेँ वैज्ञानिक ढ़ंगपर चलेबाक हेतु ओ अपन राज्यकेँ परगन्नामे विभाजित केलन्हि आ प्रत्येक परगन्नामे मुखिया अथवा प्रधान नियुक्त भेलाह जे ‘चौधरी’ कहबैत गेलाह। न्याय प्रशासनक हेतु पंचायती व्यवस्थाक स्थापना भेल। जन कल्याण आ कृषिक उन्नतिक हेतु ओ अपना राज्यमे अनेकानेक पोखरि एवँ जलाशयक व्यवस्था केलन्हि। अपन राज्यकेँ ओ अपना शासन कालमे सुरक्षित रखबामे समर्थ भेलाह। पश्चिममे गहढ़वाल, पूर्वमे सेन आ दक्षिणमे पाल लोकनिसँ अपन साम्राज्यक सुरक्षा रखैत ओ नेपालोपर अपन अधिकारक दावी देनहि रहलाह आ एवँ प्रकारे नान्यदेव द्वारा स्थापित राज्यकेँ गंगदेव आर दृढ़ बनौलन्हि जाहिसँ मिथिलाक प्रतिष्ठा चारूकात बढ़ल। गंगदेवक समयमे मिथिलामे शांति आ सुव्यवस्था बनल रहल आ कोम्हरोसँ कोनो आक्रमण नहि भेल। इएह कारण छल जे ओ शासन संगठन आ प्रशासनिक सुधार दिसि अपन ध्यान देबामे समर्थ भेलाह। नान्यदेव तँ विजय प्राप्त कैक राज्यक जन्म देलन्हि आ गंगदेव ओकरा संगठित केलन्हि आ शांति प्रदान केलन्हि। इ एकटा अजीव संयोग थिक जे पिता पुत्र दुनू एक्के रंग कूटनीतिज्ञ, दूरदर्शी आ कुशल विजेता आ प्रशासक बहरेलाह। बारहम शताब्दीक श्रीवल्लभाचार्य (न्याय–लीलावतीक लेखक) निम्नलिखित वाक्य एकटा तत्कालीन कर्णाट शासक उल्लेख करैत छथि– “यदि च गगनमात्मावान्यधर्मणान्यमवच्छिन्द्यात् काश्मीर वर्त्तिना कुङ्कुम रागेण कर्णाट चक्रवर्त्ति (ललना) करकमवच्छिन्द्यात्–” आब इ कर्णाट चक्रवर्त्ति (ललना)केँ छलाह से कहब असंभव। नान्यदेव, मल्लदेव आ गंगदेव–सब भऽ सकैत छथि। ‘ललना’ शब्द मैथिलीमे छोट बच्चाक हेतु प्रयोग होइत छैक तैं हमरा बुझने एहिसँ नान्यदेवक कोनो पुत्रक संकेत होइयै, आब ओ मल्लदेव हेताह अथवा गाँगदेव से कहब कठिन। श्री वल्लवभाचार्य–एकटा शासन करैत राजाक नाम सेहो लिखैत छथि–“श्री शालि वाहनो नृपति”– अहु राजाक पहचान असंभव अछि। मिथिलासँ प्राप्त मैथिलीक पाण्डुलिपि सब से एहेन बहुत रास राजा सबहक नाम भेटइत अछि जकरा कोनो राजवंशसँ मिलाएब अथवा जोड़ब असंभव भऽ जाइत अछि। मिथिलाक इतिहासक साधनो अखन धरि इएह सब रहल अछि तैं एकरा तिरस्कारो करब असंभव। नरसिंह देव–(११८७–१२२७)– गंगदेवक परोक्ष भेलापर मिथिलाक राजगद्दीपर नरसिंह देव बैसलाह। हुनका समयमे मिथिला आ नेपालक मध्य किछु खट–पट भेल छल आ एकर नतीजा इ भेल जे नेपाल मिथिलासँ फराक भऽ गेल। रामदत्त अपन दान पद्धतिमे नरसिंह देवकेँ कर्णाटान्वय भूषणः- कहने छथि। रामदत्त हुनक मंत्री छलाह आ रामदत्तक अनुसार नरसिंह देव मिथिलाक अक्षुण्ण शासक छलाह। विद्यापतिक पुरूष परीक्षासँ ज्ञात होइछ जे नरसिंह देव अपन पिता मल्लदेवक संग कन्नौज गेल छलैथ। ओतएसँ ओ दिल्ली सेहो गेल छलाह आ शहाबुद्दीन गोरीक सेनामे सेनानायकक काज कएने छलाह जाहिसँ गोरी हिनकासँ प्रसन्न भऽ हिनका मिथिलामे अक्षुण्ण करबाक हेतु छोड़ि देबाक आश्वासन देने रहथिन्ह। इ चाचिक देव चौहानक परम मित्र छलाह। कहल जाइत जे इहो एक कुशल शासक छलाह मुदा राजनैतिक दृष्टिकोणसँ हम देखैत छी जे हिनका राज्यमे नेपाल हिनका हाथसँ बाहर भऽ गेल आ ताधरि बाहर रहल जाधरि हरिसिंह देव पुनः ओकरा नहि जीतलन्हि। दोसर बात इहो जे मुसलमान लोकनि पश्चिम आ पूबसँ मिथिला राज्यकेँ दबबे लागल छलाह आ आक्रमण श्री गणेश सेहो हिनके समयमे प्रारंभ भऽ गेल छल। मिथिला राज्यकेँ मुसलमान लोकनि अपन आँखिमे काँट जकाँ बुझैत छलाह आ तैं ओ लोकनि एम्हर–ओम्हरसँ हुलकी–बुलकी देव आरंभ कऽ देने छलाह। नरसिंह देव अपना भरि मिथिला राज्यकेँ चारूकातसँ सुरक्षित रखबाक यथेष्ट प्रयास केलन्हि आ एहि क्रममे हुनका बहुत किछु सफलता भेटलन्हि। रामसिंह देव–(१२२७–१२८५)– रामसिंह देव कर्णाट वंशक एक सफल आ कुशल शासक छलाह जनिक महिमाक गुनगान तिब्बती यात्री धर्मस्वामी सेहो कएने छथि। कर्मादित्य ठाकुर रामसिंह देवक मंत्री छलथिन्ह आ कर्मादित्यक एकटा अभिलेख ल.सं.२१२क सेहो उपलब्ध अछि। हिनका समयमे समस्त उत्तर भारतमे मुसलमानी सत्ताक प्रसार भऽ चुकल छल आ मिथिलाक चारूकात मुसलमानी आक्रमणक संभावना बढ़ि गेल छल। वैशालीमे मुसलमानी आक्रमणक स्वरूपक विवरण धर्मस्वामी उपस्थित कएने छथि। लखनौतीक हिसामुद्दिनइवाज मिथिलोसँ कर प्राप्त केने छल आ तिरहुतमे पूर्व–पश्चिम दुनू दिसिसँ आक्रमण होइत रहैत छल। रामसिंह देवक पदवीमे ‘भुजबलभीम’ आ ‘भीमपराक्रम’क विशेष महत्व रखइयै। हिनकसान्धि विग्रहिक छलाह देवादित्य ठाकुर जिनका वंशमे बड्ड पैघ–पैघ विद्वान आ पराक्रमी लोक सब भेल छलाह। धनवान होएबाक कारणे ओ लोकनि महत्तक (महथा) सेहो कहबैत छलाह। रामसिंह देव विद्या आ धर्मक समर्थक आ प्रवर्त्तक छलाह। हुनके समयमे मिथिलामे वैदिक टीका लिखल गेलैक। ओहिकालमे सामाजिक एवँ धार्मिक नियमक प्रतिपादन भेल आ शासन विधानमे सेहो बेस सुधार भेलैक। प्रत्येक गामक हेतु कोतवालक नियुक्ति भेल। गामक प्रत्येक समाचार चौधरी कोतवालकेँ दैत छलैक आ ओहि ठामसँ ओ समाचार राजा धरि पहुँचैत छल। ओहि समयमे पटवारी प्रथाक विकास भेल। रामसिंह देव पैघ विद्या प्रेमी छलाह आ हुनके समयमे श्रीधर आचार्य अमरकोशपर अपन टीका लिखलन्हि। रामसिंह देवक समयमे प्रसिद्ध तिब्बती यात्री धर्मस्वामी एम्हर आएल छलाह आ रामसिंह देवक संग हुनक सम्बन्ध मधुर छलन्हि। ओ आती–जाती दुनू बेर रामसिंह देवक संगे रहलो छलाह। ओहि समयमे मिथिलामे मुसलमान लोकनिक प्रकोप बढ़ल जाइत छल। रामसिंह राजधानी ‘‘प’ट’’ (सिमरौनगढ़)क सुन्दर विश्लेषण धर्मस्वामी कएने छथि। ‘‘प’ट’’ बड्ड पैघ आ उन्नत नगर छल आ चारूकातसँ दुर्ग आ खाधिसँ घेरल–बेढ़ल छल। सब तरहे एकर सुरक्षाक प्रबंध कैल गेल छल। इ नगर उत्तरमे छल। एहिठाम ओ ज्वरसँ पीड़ित सेहो भेल छलाह। नेपालसँ एहिठाम एबामे हुनका तीन मास लागल छलन्हि। रोगसँ मुक्त भेलापर जखन ओ अपन देश जेबाक हेतु तैयार भेला तखन रामसिंह हुनका किछु दिन आ रहबाक हेतु आग्रह केलथिन्ह। एतबे नहि रामसिंह हुनका अपन प्रधान पुरोहितक पदपर नियुक्त करबाक आश्वासन सेहो देलथिन्ह मुदा तइयो ओ एतए रहबा लेल तैयार नहि भेलाह आ घुरबाक हेतु तत्पर भऽ गेलाह। रामसिंह हुनका बहुत रास वस्तुजात उपहारमे देलथिन्ह। धर्मस्वामीक विवरण इ स्पष्ट होइछ जे मुसलमान लोकनिक प्रभाव बड्ड बढ़ि गेल छल आ रामसिंह किलाबंदीपर विशेष बल देने छलाह। रामसिंहक अपन राजभवन सात गोट भीत आ २१ गोट खाधिसँ घेरल छल। वैशालीक निवासी लोकनि मुसलमानी आक्रमणसँ हड़कम्पित छलाह। वैशालीमे एकटा प्रसिद्ध ताराक मूर्त्ति छल। धर्मस्वामीक मुसलमानी आक्रमण सम्बन्धी मतक समर्थन परम्परागत साहित्य एवँ साधनसँ सेहो होइत अछि जाहिमे इ कहल गेल अछि जे रामसिंहकेँ मुसलमानसँ लड़ए पड़ल छलन्हि। मुसलमान लोकनि गंगाक दक्षिणमे मूंगेर, भागलपुर, पटना, आदि स्थानमे पसरि चुकल छलाह आ ओम्हर बंगालक शासक सेहो पश्चिम दिसि अपन शक्तिकेँ बढ़ेबामे लागल छलाह। ओहि दुनूमे बरोबरि संघर्ष चलैत रहन्हि आ मिथिलाक शासक अपन ‘वेतसिवृति’क पालन कए अपन स्वतंत्रताकेँ सुरक्षित रखबामे व्यस्त छलाह। रामसिंह देव एहि हेतु कत्तेक प्रयत्नशील छलाह तकर प्रमाण तँ एतवे अछि जे ओ जँ अपन राज्यक विस्तार नहि केलन्हि तँ हुनका समयमे हुनक राज्य एक्को इंच घटल नहि आ साँस्कृतिक एवँ सामाजिक दृष्टिकोण ओ जे समाज रचनाक सांस्कृतिक पृष्ठभूमि बनौलन्हि तकरे आधारपर बादमे हरिसिंह देवी पंजी प्रथा ठाढ़ भेल। शक्ति सिंह:-(शक्र सिंह)–(1285–95)–?– रामसिंहक पछाति शक्तिसिंह अथवा शक्रसिंह मिथिलाक राजा भेलाह। ओ महा पंडित, प्रतापी एवँ पराक्रमी शासक छलाह आ दिल्लीक शासकक संग हुनक सम्बन्ध बरोबरि बनल रहलन्हि–इ सम्बन्ध विरोध आ मित्रता दुनूक छलन्हि। हम्मीरक विरूद्धक अभियान शक्तिसिंह अलाउद्दीन खलजीक संग रहैथ आ हुनका संग हुनक मंत्री देवादित्य आ हुनक आत्मज वीरेश्वर सेहो रहथिन्ह। अपन मंत्रीक स्वामीद्रोहक कारणे (रायमल्ल आ रामपाल) हम्मीर पराजित भेलाह। अलाउद्दीन देवादित्यकेँ ‘मंत्रिरत्नाकर’ पदवीसँ विभूषित केलथिन्ह। शक्तिसिंहक संग खलजी सम्राटक मित्रता बनल रहल आ मिथिलाक स्वतंत्रता सेहो बाँचल रहल। शक्तिसिंह अत्याचारी शासक छलाह। हुनक निरंकुश शासनकेँ रोकबाक हेतु वृद्ध सब सातटा प्रमुख वृद्धकेँ चुनिकेँ एकटा ‘वृद्ध–परिषद’क निर्माण कएने छलाह। हुनक अत्याचारी शासनसँ हुनक दरबारी आ मंत्री लोकनि कूपित भऽ गेल छलाह। राजाक निरंकुशताक विरोधमे सर्वप्रथम अवाज उठौलनि चण्डेश्वर ठाकुर जे अपना युगक एकटा प्रसिद्ध विद्वान आ राजनीतिज्ञ छलाह। हुनके प्रयासे राजाक निरंकुशतापर रोक लागि सकल। दरभंगाक आनंदवागक पश्चिम ‘सुखीदिग्घी’ पोखरि हिनके खुनाओल थिक आ आधुनिक सकुरीक बसौनिहार शक्तिसिंहें थिकाह। शक्तिसिंहक बाद एकटा भूपाल सिंहक नाम भेटइयै मुदा ओ शासक भेलाह अथवा नहि से कहब असंभव। हरिसिंह देव:-(१२९५–१३२४-?)– नान्यदेवक पश्चात् कर्णाटवंशक सबसँ प्रसिद्ध एवँ महान शासक हरिसिंह देव भेलाह जे मिथिला आ नेपालक इतिहासमे कैक दृष्टिये विख्यात छथि आ जनिक शासन काल पूर्वी भारतक इतिहासमे महत्वपूर्ण मानल गेल अछि। हिनक जन्म, राज्यारोहण, मृत्यु इत्यादिक वास्तविकताक सम्बन्धमे हमरा लोकनिक ज्ञान अपूर्ण अछि अथवा इहो कहि सकैत छी जे हिनका सम्बन्ध सबटा एतिहासिक तथ्य अद्यावधि अनिश्चितता एवँ सन्दिग्धक गर्भेमे अछि। एकर मूल कारण इ अछि जे मिथिलाक एहिकालक इतिहासक अध्ययनक हेतु जे प्रामाणिक साधन चाही तकर सर्वथा अभाव अछि। तथापि जतवे जे साधन उपलब्ध अछि ताहि आधारपर हमरा लोकनि हरिसिंह देवक शासन एकटा वस्तुनिष्ठ अध्ययन प्रस्तुत करबाक प्रयास करब। ने राजनीतिक इतिहासक हिसाबे आ साँस्कृतिक इतिहासक हिसाबे हरिसिंह देवकेँ विसरल जा सकइयै। जँ नान्यदेव एहिवंशक संस्थापकक हिसाबे स्मरणीय छथि तँ हरिसिंह अपन नेपाल विजय एवँ पंजी–प्रथाक संस्थापकक रूपें मिथिलाक इतिहासमे अमर छथि। एम्हर आबिकेँ आब मिथिलाक इतिहासक महत्व दिसि पौवात्य–पाश्चात्य विद्वानक ध्यान आकृष्ट भेल छन्हि आ एकर प्रमाण भेल लुसिआनो पेतेकक ‘मिडिभल हिस्ट्री आफ नेपाल’ तथा भारतीय विद्या भवन द्वारा प्रकाशित “दिल्ली सल्तनत” (खण्ड–6)मे विवेचित मिथिलाक इतिहासक अंश। आब मिथिलाक इतिहासक एहिकालकेँ उपेक्षित करब कठिन अछि कारण एहि सम्बन्धमे जे अद्यावधि एकटा भ्रांति पसरल छल से दूर भऽ गेल अछि आ सामाजिक इतिहासक अध्ययनार्थ हरिसिंह देवक पंजी प्रथा एकटा प्रमुख विषय बनल अछि। कहिआ, कोना आ कोन रूपें ओ मिथिलाक शासन भार ग्रहण केलन्हि तकर कोनो ठोस प्रमाण हमरा लग नहि अछि मुदा हुनका सम्बन्धमे प्रचलित किंवा व्यवहृत शब्दावली एहि बातक प्रमाण अछि जे ओ शक्तिशाली शासक छलाह। अपना काल धरि ओ कहियो ककरो समक्ष ने अपन माथ झुकौने छलाह आ ने टेकने छलाह। अपनाकेँ स्वाभिमानी स्वतंत्र आ निर्भीक बुझैत छलाह आ एहिबातक प्रमाण हमरा वसातिनुलउन्ससँ भेटइत अछि। पुरूष परीक्षामे विद्यापति हुनका ‘कर्णाट–कुल–सम्भव’ कहने छथिन्ह; चण्डेश्वरक कृत्यरत्नाकरमे हुनका ‘कर्णाट वंशोद्भव’ कहल गेल छन्हि। ज्योतिरीश्वर ठाकुरक धूर्त समागममे कर्णाट चूड़ामणिक संज्ञा हिनका देल गेल छन्हि। कर्णाटवंशोद्भव शत्रुजेता हरिसिंह देव मिथिलामे अपन एकटा नव कीर्तिमान स्थापित केने छलाह। हुनक सान्धिविग्रहिक मंत्री देवादित्य ठाकुर छलथिन्ह। देवादित्य यशस्वी, बुद्धिमान एवँ दानी छलाह। हुनक पश्चात् हुनक पुत्र वीरेश्वर ठाकुर मंत्री भेलाह। उहो महा दानी छलाह आ समुद्र सन गहिर पोखरि दहिभत गाममे खुनौने छलाह। ओ श्रौतकर्मानुष्ठाता ब्राह्मण लोकनिकेँ उदारता पूर्वक दान देने छलाह आ गामक गाम दानमे सेहो हुनका लोकनिकेँ देने छलाह। उहो एकटा पोखरि खुनौने छलाह जकर नाम छल ‘वीरसागर’ आ ओहिसँ गामक नाम ‘विरसागर’ पड़ल। वीरेश्वर ठाकुरकेँ ‘महावर्तिक नैबन्धिक’ सेहो कहल जाइत छलन्हि। वीरेश्वर ठाकुरक बाद हुनक पुत्र चण्डेश्वर ठाकुर महामत्तक सांधिविग्रहिक भेलाह। उहो प्रतापी, साहसी, उदार एवँ दानी छलाह आ हरिसिंह देवक मित्र, सलाहकार एवँ दार्शनिक सेहो छलाह। हरिसिंह देव हिनक समयमे वयस्क भऽ चुकल छलाह आ राज काज सम्हारि लेने छलाह। इहो हावी परगन्नाक सिमराम ग्राममे एकटा पोखरि खुनौने छलाह जे “सुरवय” कहबैत अछि। नाबालिक अवस्थामे राजगद्दीपर बैसलाक कारणे हरिसिंहक देखरेख सुयोग्य मंत्रिगणक हाथमे छल आ राजाक दिसि इएह मंत्री लोकनि सब काज करैत छलाह। हरिसिंह देव जखन जवान भेलाह तखन चण्डेश्वर ठाकुर हुनक मंत्री छलथिन्ह। ब्राह्मणक एकवंशसँ कर्णाट राजदरबारमे तीन पीढ़ी धरि बरोबरि मंत्री होइत रहलाह–ताहिसँ इ सिद्ध होइत जे एहि कालमे सामंतवादी व्यवस्थाक विकासक कारणे मंत्रीपद वंशानुगत भऽ चुकल छल आ राजापर हुनका लोकनिक विशेष नियंत्रण रहैत छलन्हि। हम उपर देखि चुकल छी जे शक्ति सिंह जखन निरकुंश बनबाक चेष्टा केलन्हि तखन इएह सामंत लोकनि हुनक ओहि चेष्टाकेँ विफल कैल आ हरिसिंह देवक नाबालिग रहबाक कारणे हुनका लोकनिक अधिकारमे अत्यधिक वृद्धि भेल। विद्यापतिक पुरूष परीक्षासँ इहो ज्ञान होइछ जे हरिसिंह देव यादव राजा देवगिरिक रामदेवक समकालीन छलाह आ गोरखपुरक राज दरबारमे हुनक कला–प्रेमी होएबाक चर्च बरोबरि होइत छलन्हि। हरिसिंह देवक नामसँ समकालीन राजा लोकनि नीक जकाँ परिचित छलाह। हरिसिंह देवक मंत्री चण्डेश्वर अपना कालक प्रसिद्ध विद्वान छलाह आ तैं हिनक नामसँ मिथिला राज्योक नामक प्रसार होइत छल। हरिसिंह देवक समयमे चण्डेश्वर ठाकुर नेपाल अभियानक नेतृत्व केलन्हि। ओतए इ किरात राजा सबकेँ एवँ सूर्यवंशी क्षत्रिय राजा गणकेँ पराजित कए सम्पूर्ण नेपाल राज्यपर मिथिलाक आधिपत्य जमौलन्हि। एहिसँ इ तँ स्पष्ट भऽ जाइछ जे नरसिंह देवक समयमे नेपालसँ खट–पट भेलाक बाद नेपाल अपनाकेँ मिथिलाक नियंत्रणसँ मुक्त कऽ लेने छल कारण जँ से बात नहि रहैत तँ चण्डेश्वर ठाकुरकेँ हरिसिंह देवक शासन कालमे पुनः नेपालपर आक्रमण करबाक आवश्यकता कियैक भेलैन्ह। दोसर बात इहो जे हरिसिंह देवक प्रभाव जखन नेपालपर पुनः स्थापित भेल तँ मिथिलाक प्रतिष्ठा सेहो बढ़ल आ एहि हिसाबे हरिसिंह देवक शासनकाल महत्वपूर्ण मानल जा सकइयै। हरिसिंह देव तुगलकसँ पराजित भेलाक बाद भागिकेँ नेपाले गेल छलाह। चण्डेश्वर ठाकुर वाग्मतीक नदीक तटपर स्वर्ण तुलापुरूष महादान कयने छलाह आ उएह प्रथम व्यक्ति छलाह जे पशुपति नाथ धरि पहुँचल छलाह। चण्डेश्वर ठाकुर अधीन हरिब्रह्म नामक एक सामंतक चर्च प्राकृत–पैंगलममे भेल अछि। हरिसिंह देवक समयमे मिथिलाक राज्य सुरक्षित रहल यद्यपि ताहि समय तक पश्चिमी आ पूर्वी राज्यसँ मिथिलापर बरोबरि प्रहार भऽ रहल छल। नेपाल धरि अपन राज्यक सीमाकेँ पुनः बढ़ेबाक श्रेय हरिसिंह देवकेँ छन्हि। नेहरामे हरिसिंह देव सेहो अपन एकटा मुख्यालय रखने छलाह आ ओहिठाम एकटा गढ़ सेहो छल। ज्योतिरीश्वर ठाकुरक ‘धूर्त समागम नाटक’सँ ज्ञात होइछ जे हरिसिंह देवकेँ कोनो सुरत्राणसँ झगड़ा भेल छलन्हि जकर परिणाम अनिर्णीत बुझना जाइत अछि। हरिसिंह देवक पादपद्मपर कतेको प्रतापी राजा अपन–अपन माथ नमवैत छलाह। “नानायोध निरूद्ध निर्जित सुरत्राणात्र सद्वाहिनी नृत्यद्भीमकबन्धमेलक दलद् भुमि भ्रमद् मुधरः॥ अस्ति श्री हरिसिंह देव नृपतिः कर्णाट् चूड़ामणिः दृप्यत्पार्थिव सार्थ मौलिमुकुटन्यस्ताङघ्र पंकेरूहः”॥ उमापतिक पारिजातहरणसँ सेहो इ स्पष्ट होइछ जे हरिसिंह देव आ कोनो मुसलमान शासकक बीच संघर्ष भेल छल मुदा ज्योतिरीश्वर आ उमापतिक विवरणमे कोनो मुसलमान शासकक नाम नहि रहलासँ कठिनताक अनुभव हैव स्वाभाविके। ओहि सबसँ केवल एतवे ज्ञान होइछ जे हरिसिंह देवकेँ बरोबरि मुसलमान शासक लोकनिसँ टंटा होइत रहन्हि आ ओहि सभहिक वावजूदो ओ मिथिलाकेँ राज्य सुरक्षित रखैत अपन प्रजाक कल्याणमे लागल रहैथ। हमरा बुझि पड़इयै जे मिथिलाक राज्यक भविष्यक सम्बन्ध हुनका पूर्वाभास भऽ गेल छलन्हि आ तैं ओ नेपालपर पुनः अपन आधिपत्य कायम करबाक प्रयासमे लागल छलाह। मिथिलामे चारूकातसँ तंगी देखि ओ अपना हेतु नेपाल राज्यकेँ सुरक्षित राखए चाहैत जाहिसँ किओ मुसलमानी आक्रमणसँ आक्रांत भेलापर ओतए जाएकेँ रहि सकैथ। इएह कारण थिक जे हुनक मंत्री नेपालपर पूर्ण आधिपत्य कायम केने छलाह। तुगलक आक्रमणक बाद ओ भागिकेँ ओम्हरे गेओ केलाह। कहल जाइत अछि जे मिथिला छोड़बाक पूर्व ओ नेहरा पोखरिपर विश्वचक्र महादान यज्ञ कयने छलाह। १३२३–२४ ई.मे मिथिलापर ि‍गयासुद्दीन तुगलकक आक्रमण भेल। कहल जाइत अछि जे बंगाल आ मिथिलाक शासकक संग एक प्रकार गुप्त समझौता छल आ दुनू अपन–अपन स्वतंत्रताकेँ सुरक्षित रखबाक लेल प्रयत्नशील छलाह। ि‍गयासुद्दीन तुगलक एहि दुनू राज्यकेँ अपना आँखिक काँट बुझैत छल आ तैं बंगालपर आक्रमण केलाक बाद ओ मिथिले बाटे घुरल आ एहिठाम शासककेँ अपना अधीन करबाक प्रयास केलक। फरिस्ताक अनुसार तिरहुतक राजा संघर्षक हेतु आगाँ बढ़लाह परञ्च हुनका खेहारिकेँ जंगलमे ठेल देल गेलन्हि। तुगलक राजा जंगलकेँ अपने हाथसँ कटलन्हि आ जखन जंगल साफ भेल तखन ओ देखलन्हि जे तिरहुत राजाक एकटा बड़का किला अछि जे चारूकात बड़का–बड़का खाधिसँ घेरल अछि। उच्च उच्च भीति आ सातटा खाधिसँ घेरल किला देखि तुगलक शासक थोड़ेक कालक हेतु धतमतेलाह आ तत्पश्चात् सातोटा खाधिकेँ भरि ओ किलाक भीत आ देवालकेँ नष्ट केलन्हि। एहि सब काजमे हुनका तीन हफ्ता लगलन्हि। राजा सपरिवार गिरफ्त भेलाह आ तिरहुतक शासन भार मलिक तबलिगाक पुत्र अहमद खाँक हाथमे देल गेल। तकर बाद तुगलक राजा दिल्ली दिसि प्रस्थान केलन्हि। वरनीक अनुसार जखन ि‍गयासुद्दीन तुगलक तिरहुत पहुँचलाह तखन सब राजा लोकनि आत्म समर्पणकेँ देलन्हि। वसातिनुलउंसक अनुसार तिरहुतक राजा पड़ाकेँ नेपाल चल गेलाह आ तिरहुतपर तुगलक शासन स्थापित भऽ गेल। (विशद् विश्लेषणक हेतु देखु हमर लिखल पोथी– “हिस्ट्री आफ मुस्लिम रूल इन तिरहुत”)। चण्डेश्वर ठाकुरक दान रत्नाकर आ ज्योतिरीश्वर ठाकुरक धूर्तसमागम नाटक तथा उमापतिक पारिजातहरण नाटकसँ एतवा धरि स्पष्ट होइयै जे i) हरिसिंह देव म्लेच्छसँ आप्लावित पृथ्वीकेँ मुक्त कएने छलाह आ, ii) ओ कोनो सुरत्राणकेँ पराजित कएने छलाह आ iii) पृथ्वीपर जे म्लेच्छ लोकनि भार स्वरूप छथि तकरासँ ओ पृथ्वीकेँ हलुक केने छलाह। फरिस्ताक कथन जे हरिसिंह देव सपरिवार गिरफ्त भेलाह से मान्य नहि अछि कारण आँखिक देखल हाल लिखनिहार वसातिनुलउंसमे एकर समर्थन नहि केने छथि। ओहिमे इ स्पष्ट लिखल अछि जे राजा भागिकेँ नेपाल चल गेलाह आ ओतहि बसि गेलाह। परिस्थितिसँ वाध्य भऽ भागि जेबाक कथा आ पहाड़मे घुसिया जेबाक बात मैथिली परम्परामे निम्नलिखित श्लोकमे सुरक्षित अछि। “वाणाब्धि बाहु सम्मित शाकवर्षे पौषस्य शुक्ल दशमी क्षितिसूनुवारे त्यकत्वा स्व–पट्टन पुरी हरिसिंह देवो दुर्दैव देशित पथे गिरिमाविवेश”– मिथिलासँ निराश्रित भेलापर हरिसिंह देव पड़ाकेँ नेपाल गेला जतए १० वर्ष पूर्व चण्डेश्वर ठाकुर किरात आ क्षत्रिय शासक लोकनिकेँ हराके मिथिलाक प्रभुत्व स्थापित कएने छलाह। हरिसिंह देव नेपाल पहुँचि सूर्यवंशी राज्यक स्थापना केलन्हि से कहल जाइत अछि। ओ भातगाँवमे अपन केन्द्र बनौलन्हि। नेपालपर मिथिलाक आक्रमणक तिथि लऽ कए इतिहासकारमे मतभेद छन्हि। दिली रमण रेग्मी १३१४ (चण्डेश्वर द्वारा आक्रमणक तिथि)केँ नेपालपर आक्रमणक तिथि मनैत छथि परञ्च भगवान लाल इन्द्र जी आ राइट महोदय १३२४ ई.केँ (जखन हरिसिंह देव मिथिलासँ पड़ाय ओतए पहुँचलाह)। एहि दुनू तिथिमे कोनो संघर्षक गुंजाइश नहि अछि यदि हमरा लोकनि एकरा एहि ढ़ँगे देखी–चण्डेश्वर मिथिला राज्यक मंत्री हिसाबे नेपालकेँ जीतने छलाह आ तहियासँ पुनः नेपाल मिथिलाक अधीन भऽ गेल छल। हरिसिंह देव जखन ओतए पहुँचलाह तखन ओ विधिवत अपनाकेँ ओतुका शासक घोषित केलन्हि आ भातगाँवमे अपन प्रधान कार्यालयक स्थापना केलन्हि। एहि दुनूमे विशेष साम्य अछि। १३१४सँ १३२४ धरि ओ मिथिलासँ नेपालपर राज्य करैत छलाह मुदा १३२४क पछाति मुख्यरूपेण नेपालक एकमात्र शासक भऽ गेलाह। १३१४क बादहिसँ नेपालमे मैथिल लोकनिक आवागमन शुरू भऽ गेलन्हि। मिथिलामे मुसलमानक प्रकोप बढ़ल आ नेपालमे मल्ल लोकनिक मुदा हरिसिंह देव बड्ड चतुर व्यक्ति छलाह आ ओ ओतुक्का मल्ल लोकनिक संग वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित कऽ लेलन्हि। नेपालक वंशावली आ शिलालेख एहिबातक सबूत अछि जे हरिसिंह देव नेपालमे जा कए नीक जकाँ जमि गेल छलाह आ हुनक प्रभुत्व ओहिठाम नीक जकाँ स्वीकृत भऽ गेल छलन्हि। काठमाण्डुक एकटा शिलालेखमे हरिसिंह देवकेँ कर्णाट वंशोद्भव आ कर्णाट चूड़ामणि कहल गेल छन्हि।- “जातः श्री हरिसिंह देव नृपतिः प्रौढ़ प्रतापोदयः तद्वंशे विमले महारिपुहरे गाम्भीर्य रत्नाकरः कर्त्तायः सरसामूपेत्य मिथिलां संलक्ष्य लक्षप्रियो नेपाले पुनराद्यवैभवंयुते स्थैर्यः चिरम्विद्यते”। हरिसिंह देवक उत्तराधिकारीकेँ चीनी सम्राट नेपालक कानूनी शासक मानैत रहथिन्ह। कर्णाट वंशक पतन:- हरिसिंह देवक बाद मिथिलामे कर्णाट वंशक पतन भऽ गेल। बहुत रास साहित्यिक साधनक अध्ययन केला संता एवँ पाण्डुलिपिक पुष्पिका सबकेँ देखलासँ इ प्रतीत होइछ जे हरिसिंह देवक नेपाल पड़ैला उत्तरो मिथिलामे बचल कर्णाट लोकनि मिथिलाक स्वतंत्रताक हेतु संघर्ष करैत रहलाह आ मुसलमान लोकनिक पैरकेँ नहि जमे देल गेल। कर्णाट वंशक अंतो भेलापर मिथिलाक किछु क्षेत्र सबमे कर्णाट शासन विद्यमान छल आ एकर प्रमाण भेटइत अछि। श्रीवल्लभाचार्य कर्णाट राजवंशक उल्लेख कएने छथि। ओ अपन कर्णाट राजाकेँ नृपति कहने छथि। एहि सम्बन्धमे सबसँ महत्वपूर्ण अछि मधुसूदन ठाकुरक ‘कण्टकोद्धार’ पुस्तकक पुष्पिका। मधुसूदन ठाकुर कर्णाट चक्रवती महाराजाधिराज रामराजक अधीन रहिकेँ लिखने छलाह। पुष्पिकामे लिखल अछि– “इति महाराजाधिराज कर्णाट चक्रवर्ती भुजबल भीम सम्मस्त दिग्विजयार्जित सम्‍मत संतोष निखिल भूमण्डल श्री रामराज कारितायां महामहोपाध्याय सठ्ठक्कुर श्री मधुसूदन कृता वनुमान। लोक कण्टकोद्धारः सम्पूर्ण मिति। लं.सं.५२९ फाल्गुन शुक्लाष्टम्याँमध्ययन शालिना श्री भवदेवशर्मणा भौरग्रामेऽपूरीय मिति”। एहिसँ स्पष्ट होइछ जे कर्णाटवंशक किछु लोकनि हरिसिंह देवक बादो मिथिलामे शासन करैत रहलाह भने हुनक क्षेत्र सीमित आ छोट रहल हो। ओइनवार वंशक बादो ओ लोकनि मिथिलाक विभिन्न क्षेत्रमे शासन करिते रहि गेला। ओइनवार वंशक समाप्त भेलोपर जे अराजकताक स्थिति उत्पन्न भेल छल ताहुसँ लाभ उठाकए कर्णाट रामराज अपन प्रभाव क्षेत्रक विस्तार केने होथि से संभव। सकरपुरा ड्योढ़ी (राजपुतक जमीन्दारी) सेहो नान्यदेवक वंशजक अंग छथि आ मिथिलाक राजपुत लोकनि सेहो कर्णाट कुलसँ अपन सम्बन्ध जोड़बामे गौरवान्वित बुझैत छथि। मुसलमानी आक्रमणक चलते मिथिलामे कर्णाट वंशक अंत भेल। हरिसिंह देवक बाद केओ योग्य शासक नहि रहि गेलाह जे एहिठाम कर्णाटवंशकेँ दृढ़ करितैथ आ ओम्हर तुगलक लोकनि जखन एहिठामक शासन भार अपना हाथमे लेलन्हि आ देखलन्हि जे चलाएब असंभव अछि तखन ओ लोकनि एहेन व्यक्तिक खोज करए लगलाह जिनकापर हुनका विश्वास होन्हि। कर्णाट लोकनिपर हुनक विश्वास हिल चुकल छलन्हि तैं ओ लोकनि सुगौनाक राजपंडित कामेश्वरक वंशजकेँ अपन प्रतिनिधि चुनलन्हि आ मिथिलाक शासन बागडोर हुनके लोकनिक हाथमे देलन्हि। फिरोजशाह शाह तुगलक भोगीश्वरकेँ प्रियसरवा कहिकेँ संबोधित कयने छथि। १०९७सँ १३२५ धरि कर्णाट लोकनि मिथिलापर शासन कए एकटा अमिट छाप छोड़ने छथि जाहिसँ मिथिलाक निजी व्यक्तित्वक विकास भेल आ मैथिली संस्कृतिक पृष्ट पोषण सेहो। परञ्च ऐतिहासिक नियमक अनुसार सामंतवादी व्यवस्थाक गुण–दोषक चलते जेना सब राज्यक पराभव भेल छैक तहिना मिथिलाक कर्णाट राज्य अपन अवधिक पूर्ण कए लुप्तप्राय भेल आ मिथिलामे मुसलमानी शक्तिक प्रादुर्भावक संगहि ओइनवारक स्थापना कर्णाट वंशक अवशेषपर भेल। परिशिष्ट– चण्डेश्वर ठाकुरक कृत्य रत्नाकरक किछु आवश्यक श्लोक– अस्ति श्री हरिसिंह देव नृपतिर्निः शेष विद्वोषिणां निर्माथी मिथिलां प्रशासदखिलाँ कर्णाटवंशोद्भवः। आशाः सिञ्चति यो यशोभिरमलैः पीयूष धारा द्रवैर्देवः सारद शर्वरी पतिरिवाशेष प्रियंभावुकः॥ आस्मिन्दिग्विजयोद्यते बलभरात्कुब्जी भवद्भिः फणै रन्योन्यं निविड़ं मिलद्भिरभितः शेषः सहस्रेणसः। गच्छत्यम्बुजबान्धवे दिन पतौ प्रत्यक् पयोधेरधः सद्यः सङ्कुचदब्जकोरक वपुः सादृश्यमालम्बते॥ मा माखेदं भजध्वं जलधिमुपगतेबान्धवे पंकजाना मंतः पञ्चेपुरोष व्यसन भयजुषाश्चक्रवाकावराकाः। श्रीमत्कर्णाट भूमीपति मुकुट मणिः प्रीणयन्नद्य लोका– नेष प्रौढ़ प्रतापद्युमणिरूदयिनी संपदं संतनोति॥ एतस्याद्भुत संधि विग्रह धुरां ओढ़ापविवीकृत– क्ष्मालोका शरदिन्दु सुन्दर यशः संदोदृगंगाम्बुभिः॥ आसीन्मंत्रमयद्युति प्रतिहता मित्रान्धकारोदयो देवादित्य इतिप्रसन्नहृदयो देवद्रुमोजङ्गमः॥ यः संधि विग्रह विधौ विविधानुभावः शौर्योदयेन मिथिलाधिपराज्यभारम्। निर्मत्सरं सुनयसञ्चित कोषजातम् सप्तांग संघटन सम्मृतमेव चक्रे॥ प्रज्ञावताँ सदसि संसरि वाक्पटूनां राज्ञांसभासु परिषत्स्वपि मंत्र भाजाम्। चितेऽर्विनाञ्च कविताश्वपिसत्कवीनां वीरेश्वरः स्फुरति विश्वविलासि कीर्तिः श्रीमानमुष्यतनयो नवचन्द्र चारू राचारवन्द्य नव कलतरु प्ररोहः। सत्सन्धिविग्रह धुरोण पदालम्ब श्चण्डेश्वरो विजयते सचिचावतंसः। उन्मूल्याद्रि नितम्बमम्बर मणिं कृत्वापताकाऽवृतं, सेनोद्धू तरजोभरेरेनिभृतं भित्वा महाकर्दमम्। दुर्गसत्पथ मातनोद् दृढ़मथो निर्मायदुर्गपुन– र्नेपाल क्षितिपालवर्गमनयद् दुर्ग समंतादयम्। आलीनं गिरिकन्दरासु विपनेष्वंतर्हितं निर्झरे, गंभीरे चिरंमग्नमद्रि शिखर प्राग् भारमाप्य स्थितम्॥ नेपाले विजिते बलेन सुतरां भीतात्मभिर्भूमिपै–, र्विस्मृत्यद्युमणेः कुले भगवतः स्वंजन्मतत्ततकृतम्॥ एषमैथिल मही भुजा भुज द्वन्दवारित समस्त वैरिणा श्री विधायिनि कुलक्रमागते संधिविग्रह पदेनियोजितः॥ गणेश्वर ठाकुरक सुगति सोपानक आरंभक श्लोक– अभूद्देवादित्यः सचिव तिलको मैथिलपते– र्निज प्रज्ञा ज्योतिर्द्दलित रिपु चक्रान्ध तमसः।, समंताद श्रांतोल्लसित सुहृदकेपिल ममौ समुद् भुते यस्मिन द्विज कुल सरोर्जैर्विकसितम्। अस्मान्महादान तड़ागयाग भूदान देवालय पूत विश्वः। वीरेश्वरोऽजायत मंत्रिराजः क्ष्मापालचूड़ामणि चुम्बितांङ्घ्रः। लसन्महीपाल किरीट रत्न रोचिच्छयरज्जतपाद पद्मः। अस्यानुजन्मा गुणगौरवेण गणेश्वरो मंत्रिमणिश्चकास्ति। संशोषयन्ननिशमौर्व (मैर्ष) निभ प्रतापै– र्गौड़ावनी परिवृढ़ं सुरतान सिन्धुम् धर्मावलम्बनकरः करूणार्द्रचेता– यस्तीर भुक्ति मतुलामतुलः प्रशास्ति॥ श्रीमानेषु महामत्तक महाराजाधिराजोमहा– सामंतधिपतिर्विक स्वर यशः पुष्पस्यकल्पद्रुमः। चक्रे मैथिलनाथ भूमि पतिभिः सप्तांग राज्यास्थिति– प्रौढ़ानेक वशव्वंदैहक हृदयो दोः स्तम्भ सम्भावितः॥ वेदस्मृति पुराणादि दृष्ट्वा लोकहितैषिणा कृतं सुगति सोपानं श्रीगणेश्वर मंत्रिणा॥ गणेश्वरक पुत्र रामदत्त– संधि विग्रह मंत्रीन्द्र देवादित्य ननुद्भवः। भूमिपाल शिरोरत्न रज्जिताङिघ्रसरोरूहः। सान्धि विग्रहिकः श्रीमद्वीरेश्वर सहोदरः महामत्तकः श्रीमान विराजति गणेश्वरः। श्रीमता रामदत्तेन मंत्रिणा तस्य सुनुना। पद्दतिः क्रियते रम्या धर्म्या वाजसनेयियाम्॥ उपर्युक्त श्लोक सबसँ कर्णाटकालीन मिथिलाक इतिहासक विविधपक्षपर यथेष्ट प्रकाश पड़इयै तैं एहिठाम ओहिसबकेँ परिशिष्टक रूपमे जोड़ि देल अछि। तिथि आ तथ्यक सम्बन्ध अद्यपर्यंत विवाद बनले अछि तैं ओहि सम्बन्धमे कोनो निर्णय देव असंभव। (विशेष विवरणक हेतु देखू हमर निबन्ध– ‘द कर्णाट्ज आफ मिथिला’) अध्याय–८ ओइनवार वंशक इतिहास कर्णाट वंशक परोक्ष भेलापर मिथिलामे ओइनवार वंशक राज्य प्रारंभ भेल। ओइनवार वंशकेँ ‘कामेश्वर वंश’ तथा ‘सुगौना वंश’ सेहो कहल गेल छैक। ‘कामेश्वर वंश’ एहि कारणे कि राज पंडित कामेश्वर एहि वंशक संस्थापक छलाह और ‘सुगौना वंश’ एहि कारणे कि सुगौनामे एहि वंशक राजधानी छल। ओइनवार लोकनि ‘खौआड़े जगत्पुर’ मूलक काश्यप गोत्र मैथिल ब्राह्मण रहैथ। हिनक पूर्वजमे जयपति, हुनक पुत्र हिङ्गु आ हुनक पुत्र ओएन ठाकुर छलाह। ओ अत्यंत विद्वान आ परम तपस्वी छलाह आ हुनके कोनो कर्णाट राजासँ ‘ओइनि’ गाम दानमे भेटल छलन्हि। एहि कारणे एहि वंशक नाम ओइनवार वंश पड़ल। ओएन ठाकुरक पुत्र भेला अतिरूप, अतिरूपक पुत्र विश्वरूप, हुनक पुत्र गोविन्द, हुनक पुत्र लक्ष्मण आ लक्ष्मण ठाकुरक छटा पुत्र छलथिन्ह–यथा १. राज पण्डित कामेश्वर, २. हर्षण, ३. त्रिपुरे, ४. तेवाड़ी, ५. सलखन, ६. गौड़ ठाम–ठाम एकटा सातम पुत्रक उल्लेख अवइयै जकर नाम रामेश्वर छल। एहि छःमेसँ एक गोटएक वंश अहुखन मालदह जिलामे विराजमान छथि। एहेन बुझना जाइत अछि जे कर्णाट शासक हरिसिंह देवक पड़ैलाक बाद मिथिलामे कर्णाट लोकनिक सत्ताक ह्रास भेल आ शासनक उलट–फेर बरोबरि होइत रहल। गयासुद्दीन तुगलक शासनक हेतु अपन प्रबन्ध केलन्हि आ हुनक पुत्र मुहम्मद तुगलकक समयमे मिथिला तुगलक साम्राज्यक एकटा प्रांत बनि चुकल छल आ एकरा तुगलकपुर अथवा तिरहूत सेहो कहल जाइत छलैक। १३२३–२४सँ करीब ३० वर्ष धरि एक प्रकारक अव्यवस्था बनल रहलैक। कर्णाट लोकनि अपन सत्ताकेँ पुनः स्थापित करबाक हेतु प्रयत्नशील एवँ संघर्षशील बनल रहलाह मुदा हुनका लोकनिकेँ कोनो सफलता हाथ नहि लगलन्हि आ छिट–पुट भऽ एम्हर–ओम्हरमे बिखैर गेलाह आ यत्र तत्र अपन क्षेत्र बनाकेँ रहए लगलाह। ओम्हर दिल्लीसँ तिरहूतक शासन करब कोनो आसान काज नहि छल कारण पूवसँ बंगालक गिद्ध दृष्टि सेहो मिथिलापर लगले रहैत छलैक आ जहाँ दिल्लीक दिसिसँ कनिओ ढ़िलाइ भेलैक कि बंगाल बाला सब धर मिथिलापर चढ़ि बैसैत छल। इ एकटा एहेन कटु सत्य छल जकरा दिल्ली नकारि नहि सकैत छल। दिल्लीक हकमे मिथिला दिल्लीक अंग बनल रहब सामरिक दृष्टियें महत्वपूर्ण छलैक कारण तखन दिल्ली मिथिलाकेँ अड्डा बनाए बंगालक मुकाबला कऽ सकैत छल। बंगालक हकमे मिथिलाकेँ बंगालक पक्षमे रहब उचित बुझना जाइत छलैक आ तैं बंगाल आ दिल्ली तथा पश्चिमक आन राज्य एहि दृष्टियें मिथिलाकेँ देखैत छल। मिथिलाक शासक लोकनि एहि अवसरसँ लाभ उठाए अपन स्वतंत्रताक सुरक्षार्थ ताकमे रहैथ छलाह परञ्च ओइनवार वंशमे कर्णाट शासक नान्यदेव अथवा हरिसिंह देव सन केओ योग्य आ कुशल शासक नहि भेला तैं एहि मौकाक लाभ उठेबामे असमर्थ रहलाह। शिवसिंह सबसँ योग्य, कर्मठ, एवँ स्वतंत्र प्रेमी व्यक्ति छलाह आ मिथिलाक स्वतंत्रताक रक्षार्थ अपन प्राणक बाजी लगौलन्हि। ओइनवार वंशमे शिवसिंह आ भैरवसिंहक नाम चिर स्मरणीय रहल कारण ओ दुनू गोटए अपना–अपना ढ़ँगे मिथिलाक स्वतंत्रताक रक्षार्थ किछु उठानहि रखने छलाह। १३२४ आ १३५५क मध्य मिथिलाक श्रृंखलावद्ध इतिहासक अभाव अछि। तुगलक कालमे मिथिला दिल्लीक प्रांत छल आ एकर उल्लेख हम पूर्वहिं कऽ चुकल छी। बंगालकेँ इ बात पसिन्न नहि छलैक आ बंगालक शासक हाजी इलियास शाह सेहो एकटा महत्वाकाँक्षी शासक छल। तिरहूतपर आक्रमण करबाक ओकर मूल उद्देश्य इ छलैक जे ओहि बाटे ओ नेपाल धरि जाए चाहैत छल आ तैं जखन दिल्लीक ढ़िलाई एम्हर देखलक तखन मिथिलापर आक्रमण कए हाजीपुर धरि पहुँचि गेल आ हाजीपुरक स्थापना अपना नामपर केलक आ पुनः नेपालपर आक्रमण केलक जकर प्रमाण नेपालसँ प्राप्त एकटा शिलालेख अछि। तुगलक लोकनिकेँ इ बात सहय नहि भेलन्हि आ फिरोज तुगलक तुरंत एकर बदला लेबाक हेतु मिथिला बाटे बंगालपर आक्रमणक योजना बनौलन्हि। बरनीक विवरणसँ स्पष्ट अछि जे फिरोज गोरखपुर, खरोसा आ तिरहूतक बाटे बंगाल दिसि गेल छलाह आ संभवतः राजविराज लग कोशी नदीकेँ टपने छलाह। मधुबनी जिलामे अखनो एकटा पिरूजगढ़ नामक स्थान अछि जे फिरोज तुगलकक बाटक संकेत दइयै। १३५५क आसपास इ घटना घटल छल। फिरोज शाह सब स्थितिकेँ देखि एहि निर्णयपर पहुँचल हेताह जे मिथिलाक आंतिरिक स्वतंत्रताकेँ सुरक्षित राखियेकेँ ओ मिथिलाकेँ दिल्लीक मित्र बनाकेँ राखि सकैत छथि। एहि तथ्यकेँ स्वीकार कए ओ एकटा दूरदर्शिता आ कूटनीतिज्ञताक परिचय देलन्हि। मिथिलाक स्वतंत्रताक स्वीकृति दए ओ ओइनवार लोकनिक अधीन मिथिलाक शासन भार छोड़लन्हि आ ओहि क्रम ओ ओइनवार वंशीय ‘भोगिसराय’केँ अपन प्रियसखा कहिकेँ संबोधित केलन्हि। मिथिला पुनः स्वतंत्र रूपें अपन शासन प्रारंभ केलक परञ्च ताहि दिनक समय एहेन छल कि चारूकात दिन राति खट–पट होइते रहैत छल। मैथिली परम्पराक अनुसार फिरोज तुगलक राज पण्डित कामेश्वरकेँ मिथिलाक राज्य देने छलाह आ हुनक पुत्र भोगीश्वरकेँ ‘प्रियसखा’ कहि सम्मान केलन्हि। राजपण्डित कामेश्वर ठाकुर ‘ठाकुर’ कहबैत छलाह तैं किछु गोटए एहिवंशकेँ ‘ठाकुर वंश’ सेहो कहैत छथि। वर्धमानक गंगकृत्य विवेकमे कहल गेल अछि “कामेशो मिथिला मासत”। कामेश्वर स्वयं सिद्धपुरूष एवँ योगी होएबाक कारणे मिथिलाक राज्य गछवा लेल तैयार नहि छलाह तथापि भोगीश्वरक आग्रह ओ गछलन्हि आ किछु दिन शासन केलन्हि। कामेश्वरकेँ ‘राय’ आ ‘राजपण्डित’ दुनू कहल गेल छन्हि। कामेश्वरक बाद भोगीश्वर राजा भेलाह। हुनको ‘राय’ कहल जाइत छलन्हि आ कीर्तिलतासँ ज्ञात होइछ जे ओ फिरोज शाहक परम मित्र छलाह। भोगीश्वरक बाद गणेश्वर शासक भेलाह। हुनक समयमे ओइनवार वंशमे बटवारा हेतु संघर्ष भेल जाहिमे लोग दू दलमे बटि गेलाह–एक दल भोगीश्वरक छोट भाइ भवसिंहक समर्थक छल आ दोसर दल गणेश्वरक। जे भेल हो मुदा हम देखैत छी जे गणेश्वर राजा भेलाह। भवेशक पुत्र द्वय कुमर हरसिंह आ कुमर त्रिपुर सिंहकेँ इ बात अप्रिय बुझि पड़लन्हि आ ओ लोकनि अर्जुन राय आ कुमार रत्नाकरक मदतिसँ गणेश्वरक वध केलन्हि। तत्पश्चात भवेश राजा भेलाह। भवेशक दरबारेमे चण्डेश्वर ठाकुर अपन ‘रत्नाकर’– विशेष कए राजनीति रत्नाकरक रचना केने छलाह। विद्यापतिक कीर्तिलतामे एहि घटनाक विवरण दोसरा ढ़ंगे अछि। विद्यापतिक अनुसार गणेश्वरक हत्या अर्सलान नामक एक मुसलमानक हाथें भेल छल जे मिथिलाक तत्कालीन अराजक स्थितिसँ लाभ उठाकेँ मिथिलाक राज्यकेँ हथिया लेने छल। मैथिली परम्परामे सेहो एहि प्रश्नपर मतैक्य नहि अछि मुदा सब साधनक वैज्ञानिक अध्ययन केला संता इ स्पष्ट होइछ जे मिथिलामे ताहि दिनमे गद्दीक हेतु गृहयुद्धक स्थिति विराजमान छल। गणेश्वरक दुनू पुत्र कीर्तिसिंह आ वीरसिंह बालिग भेलापर अपन पितामह भ्राता भवसिंहसँ राज्यक हेतु प्रार्थना केलन्हि परञ्च से नहि भेटलन्हि। अपन पिताक हत्याक प्रतिशोध लेबाक हेतु इ दुनू भाइ जौनपुर राजा इब्राहिम शाहक ओतए साहाय्यक हेतु पहुँचलाह। महामहोपाध्याय परमेश्वर झा लिखैत छथि जे कीर्तिसिंह वीरसिंह फिरोज शाहक ओतए नालिस कएल आ फिरोज शाह मिथिलापर चढ़ाइ कए हरसिंह त्रिपुर सिंहकेँ मारि राज्य कीर्तिसिंहकेँ फिरौलन्हि। मुदा विद्यापतिक कीर्तिलतासँ एहि बातक समर्थन नहि होइछ। बापक वैरिकेँ कीर्तिसिंह सधौलन्हि से बात ठीक अछि मुदा एहि हेतु फिरोजशाह मिथिला पर आक्रमण केने छलाह तकर कोनो प्रमाण नहि आछि। एहि गृहयुद्धक क्रममे दुनू पक्ष तत्कालीन मुसलमानी प्रतिनिधिसँ साहाय्यक अपेक्षा रखने होथि तँ कोनो आश्चर्यक बात नहि आ एहिक्रममे गणेश्वरकेँ अपनेसँ नहि मारि कोनो मुसलमानक हाथे मरबौने होथि सेहो संभव कारण जखन लोक ज्ञान आ तर्ककेँ स्वार्थ वश तिलांजलि दैत अछि तखन ओ कोनो प्रकारक काज (नैतिक–अनैतिक)क बैसइयै। भैय्यारीमे जखन एहि प्रकारक झगड़ा होइत तखन तँ दुश्मन लाभ उठवे करइयै। विद्यापति ओइनवार वंशसँ एत्तेक घनिष्ट छलाह कि ओ एहि घिनौना बातकेँ दाबि देलन्हि आ एकर कतहु चर्चो धरि नहि केलन्हि आ गणेश्वरक हत्याक उत्तरदायित्व अर्सलानपर देलन्हि। मुदा विद्यापतिक विवरणसँ एतवा धरि तैं स्पष्ट अछिये जे ताहि दिनमे मिथिलामे चारूकात अराजकता पसरल छल आ केओ ककरो कहबमे नहि छल। ‘अर्सलान’ अर्थ होइछ ‘वीर’ ‘बहादुर’, ‘जमामर्द’ इत्यादि। वीर अफगान नामक पदाधिकारी ताहि दिन तिरहूतमे छल आ इहो संभव अछि जे गृहयुद्धक स्थितिकेँ देखि ओ एक पक्षक भऽ गेल हुए आ स्वयं मिथिलाक राज्य हथिया लेने हुए। गणेश्वरक मृत्युक कारण अखनो धरि मिथिलाक इतिहासमे एकटा समस्यामूलक प्रश्न बनल अछि आ विद्यापति ओकरा झँपबाक हेतु सब प्रयास कएने छथि कारण गणेश्वरक पुत्रक प्रति विद्यापति सहानुभूति रखैत छलाह आ हुनक अधिकारक स्थापनाक हेतु हुनका लऽ कए जौनपुर सेहो गेल छलाह। ओ कीर्तिसिंहकेँ ‘पुरूष श्रेष्ठ’क कोटिमे रखने छथि आ मैथिल कवि दामोदर मिश्र अपन छन्द ग्रंथ “वाणी भूषण”मे सेहो कीर्ति सिंहक सम्बन्धमे निम्नलिखित उद्गार प्रगट केने छथि। “कीर्ति सिंह नृपजीव यावद मृत द्युति–तरणी” “त्वयि चलति चलति वसुधा वसुधाधिप कीर्तिसिंह धरणी रमणे”। कीर्तिलता मध्यक विवरण एतवा धरि अवश्य स्पष्ट कऽ दैत अछि जे तत्कालीन स्थिति गंभीर छल आ जौनपुरक शासक मिथिलाक राजकुमारक सहायता केने छलथिन्ह। उपेन्द्र ठाकुरक मत छन्हि जे गणेश्वरक समयमे मिथिलाक बटबारा भऽ गेल छल आ ओइनवार वंश दू भागमे बटिकेँ शासन करैत छल। भवसिंहक शासक हैव तैं चण्डेश्वरक राजनीति रत्नाकरसँ प्रमाणित अछि। परञ्च गणेश्वरक पुत्रक स्थिति कि छल से कहब असंभव। उपेन्द्र ठाकुर मिथिलाकेँ जौनपुरक सामंत राज्य हौएबाक बात कहने छथि मुदा एकर कोनो प्रमाण ओ नहि देने छथि आ कीर्ति सिंहक सम्बन्धमे जे तिथि देल गेल अछि सेहो गलती अछि। भवेशक शासनकाल (भवसिंह) संभवतः मिथिलाक दुर्दशाकेँ देखि समस्त मिथिलाकेँ एक रखबाक ओ यथेष्ट प्रयास केने छलाह। कन्दाहा अभिलेखमे हुनका ‘पृथ्वीपति द्विजवरो’ भवसिंह कहल गेल छन्हि आ विद्यापति अपन शैव सर्वस्वसारमे हुनक वैभवक वर्णन करैत लिखैत छथि– “गंगोहुंग तरंगिता मललसत् कीर्तिच्छटांक्षालित क्षोणिक्ष्मातल सर्वपर्वत वरो वीरत्रतालंकृत....” भवसिंह एतेक प्रतापी शासक छलाह जे छोट–छोट सामंत शासक हुनका डरे थर–थर कंपैत छल। ओ सब सतत अपन माथ हिनका पैर टेकने रहैत छल। भवसिंह प्रतापी राजा छलाह आ दानी सेहो। वाग्मतीक तटपर ओ अपन पार्थिव शरीरकेँ त्यागलन्हि आ ओहिठाम हुनक दुनू पत्नी सेहो सती भेलथिन्ह। भवसिंहक बाद देवसिंह राजा भेलाह। परमेश्वर झाक अनुसार ओइनिमे कीर्ति सिंहक राज्य भेने राति दिन खट पट होइतन्हि तैं महाराज भवसिंह अपन अंतिम समयमे ओहि स्थानकेँ त्यागि दरभंगासँ दक्षिण वाग्मती तटपर अपन स्कन्धावार बनौने छलाह। देवसिंह जखन राजा भेलाह देकुलीमे अपन राजधानी बनौलन्हि जाहिठाम अखनो स्मार्त निबन्धकर्त्ता धर्माधिकारी अभिनव वर्धमान उपाध्यायक स्थापित “वर्धमानेश्वर” नामक महादेवक मंदिर अछि। देवसिंहक विरूद ‘गरूड़नारायण’ छलन्हि। हुनक पत्नीक नाम छलन्हि हासिनी देवी। पुरूष परीक्षा आ शैवसर्वस्वसारक अनुसार देवसिंह एक कुशल प्रशासक आ सफल विजेता छलाह। मिथिलाक एक उदारशासकक रूपमे ओ सेहो प्रसिद्ध छथि कारण ओ ‘तुला पुरूषदान’ सेहो करौने छलाह। कृषि आ जनकल्याणक हेतु ओ अपना राज्यमे बड्ड पैघ–पैघ पोखरि सेहो खुनौने छलाह। एक पोखरिक नाम देवसागर छल आ ओहिसँ सटल बस्तीक नाम सगरपुर छल। ओ विद्या आ संस्कृतिक समर्थक सेहो छलाह आ विद्यापतिक अनुसार ओ “वीरेषु मान्याः सुधियाँ वरेण्योः” छलाह। हुनके कहलापर विद्यापति “भूपरिक्रमा” लिखने छलाह जाहिमे नैमिष्य जंगलसँ मिथिला धरिक बलदेवक यात्रा विवरणक उल्लेख अछि। संगहि एहिमे नीतिपरक कथा सेहो कहल गेल अछि। देवसिंहक अनुमतिसँ श्रीदत्त एकाग्निदान पद्धतिक रचना केलन्हि। हुनके समयमे मुरारिक पितामह हरिहर प्रधान न्यायाधीश छलाह। हिनके दरबारमे स्मृति तत्वामृतक रचयिता अभिनव वर्द्धमान रहैत छलाह आ ओ धर्माधिकारी सेहो छलाह। देवसिंहक समयमे आबिकेँ मिथिलाक दुर्व्यवस्थामे थोड़–बहुत सुधार भेल आ आब ओ लोकनि एहि बातकेँ बुझए लगलाह जे जाधरि ओइनवार वंश पुनः एकजूट भऽ प्रयत्नशील नहि रहत ताधरि मिथिलाक दुर्व्यवस्था बनले रहतैक। देवसिंह एहि दिशामे विशेष प्रयास केने छलाह आ अपना चारूकातक क्षेत्रपर अपन प्रभावकेँ दृढ़ करबामे किछु उठा नहि रखने छलाह। कीर्तिसिंहक ओहिठामसँ देवसिंहक दरबारमे विद्यापतिक आएब एकटा विचारणीय विषय अछि। विद्यापति ओइनवार कुलक सब किछु छलाह आ ओइनवारक नेतृत्वमे मिथिलाक स्वतंत्रताकेँ सुरक्षित देखए चाहैत छलाह। तैं जखन देवसिंहक प्रयाससँ विद्यापतिकेँ इ विश्वास भेलैन्ह जे इ समस्त मिथिलाक एकता एवँ स्वतंत्रताक हेतु प्रयत्नशील छथि तखन ओ कीर्तिसिंहक संग छोड़ि देवसिंहक ओतए आबि गेलाह आ तहियासँ यावज्जीवन हुनके वंशजक संग रहलाह। जे विद्यापति गणेश्वरक हत्याक वाद कीर्तिसिंहक हकक हेतु सब किछु केने रहैथ सैह विद्यापति जखन देखलन्हि जे कीर्तिसिंहक नेतृत्वमे मिथिलाक एकता संभव नहि होएत आ मिथिलाक स्वतंत्रता सेहो नहि वाँचत तखन ओ अपन निर्णय बदलि देलन्हि आ देवसिंहक प्रयासमे सहयोग देलन्हि। ‘घर फुटे गँवार लूटे’क कहावत मिथिलामे चरितार्थ भऽ चुकल छल आ एकर कि परिणाम होइछ से विद्यापति देखि चुकल छलाह तैं ओ देवसिंहक वंशजक संग अपन भाग्यकेँ सटा देलन्हि आ तहियासँ अपन मृत्यु धरि ओ मिथिलाक एकता एवँ स्वतंत्रताक हेतु तल्लीन रहलाह आ स्वयं युद्ध एवँ शांतिमे एक रंग बहादुर जकाँ ठाढ़ रहलाह। देवसिंहक ज्येष्ठ पुत्र शिवसिंह विद्यापतिक अभिन्न छलथिन्ह आ शिवसिंह मिथिलाक इतिहासपर जे अमिट छाप छोड़ने छथि तकरा विद्यापति अपन लेखनीसँ आर अमर बना देने छलथिन्ह। शिवसिंह:- ओइनवार वंशक सर्वश्रेष्ठ, सर्वप्रसिद्ध आ एतिहासिक दृष्टिकोणसँ सबसँ महत्वपूर्ण शासक छलाह शिवसिंह। हिनक विरूद्ध छलन्हि रूपनारायण। इ दुनू भाइ छलाह अपने आ पद्मसिंह। बाल्य कालहिसँ इ राजदरबारमे रहैत छलाह आ बालिग भेलापर अपन पिताक सबटा राज्यक कार्य करैत छलाह। इ बड्ड तीक्ष्ण बुद्धिक लोक छलाह आ राजनीतिमे सर्वथा निपुण सेहो। योग्य राजकुमार बनेबाक विचारे हिनक पिता देवसिंह हिनका विद्यापतिक संग लगौने रहथिन्ह आ नीतिमे निपुणता प्राप्त करेबाक हेतु विद्यापति शिवसिंहक आदेशानुसार ‘पुरूष परीक्षा’क रचना केने छलाह। विद्यापतिक गीतमे १२९ पदमे (११२+१७) शिवसिंहक नाम अछि। १५ वर्षक अवस्थहिंसँ इ राज्यक प्रशासनमे हाथ बटबैत छलाह। जखन ओ राजा भेलाह तखन ओ देकुली (देवकुली)सँ अपन राजधानी हटाकेँ गजरथपुर अनलन्हि। ओकरा शिवसिंहपुर सेहो कहल जाइत छैक। एहिठाम गजरथपुरसँ शिवसिंह विद्यापतिकेँ दान देने छलथिन्ह। राज्य प्रशासनमे हाथ बटेबा काल हुनका अपन परम मित्र एवँ अभिन्न विद्यापतिसँ सेहो सहयोग भेटइत रहन्हि। शिवसिंह परम विद्वान, उदार, सुन्दर, तथा प्रतापी छलाह। हुनक खुनाओल पोखरि वारि भड़ौरामे रजोखरि नामसँ प्रसिद्ध अछि आ हुनक बनाओल सड़क सब रजबान्ह (राजबन्ध) शिवसिंहपुरसँ राजवाड़ा घोड़ दौड़ धरि हुनक गजरथक सड़क अत्यंत सुदृढ़ आ चाकर अछि। पोखरि आ सड़क ओ प्रजाक कल्याणार्थ बनौने छलाह। एहि प्रसंगमे हुनका सम्बन्धमे एकटा लोकोक्ति निम्नांकित अछि– “पोखरि रजोखरि आ सब पोखरा, राजा शिवसिंह आ सब छोकड़ा। तालते भूपाल ताल आरो सब तलैया, राजा ते शिवसिंह आरो सब रजैया”॥ शिवसिंहक समयमे तिरहूतक राज्य शक्तिशाली भऽ गेल छल। अपना चारूकातक परिस्थितिकेँ ध्यानमे राखि ओ अपन राजधानी गजरथपुरमे अनने छलाह आ राज्यक विभिन्न भागसँ सड़क द्वारा ओकरा जोड़ने छलाह। गौड़ आ गज्जनक विरूद्ध ओ संघर्ष केने छलाह जकर प्रमाण हमरा पुरूष परीक्षासँ भेटइयै। देवसिंहक समयमे सेहो मिथिलामे मुसलमानी प्रकोप छल। परम्पराक अनुसार अपन पिताक शासनकालमे मुसलमानी सेनासँ लड़बाक हेतु ओ पठाओल गेल छलाह आ ओहिमे पराजित भेलाक कारणे गिरफ्त भेल छलाह। हुनके छोड़ेबाक हेतु विद्यापति गेल छलथिन्ह आ मुसलमानी शासक विद्यापतिक काव्य प्रतिभासँ प्रभावित भए शिवसिंहकेँ छोड़ि देने रहैन्ह आ विद्यापतिक बहुत सम्मान केने रहैन्ह। राजा भेलाह शिवसिंह एहि अपमानकेँ बिसरल नहि छलाह आ तैं अपन स्वाभिमान आ मिथिलाक स्वतंत्रताक रक्षार्थ हुनका कतेको मुसलमान शासकसँ संघर्ष करए पड़लन्हि। जेना कि हम पूर्वहिं कहि चुकल छी जे मध्य युगमे मिथिलापर पश्चिम आ पूब दुनू दिसिसँ दबाब पड़इत छल आ मिथिला ‘वेत्तसिवृत्ति’क नियम पालन करैत छल। दिल्ली, जौनपुर, बंगाल, सभहिक नजरि मिथिलापर छलैक। शिवसिंहक पूर्ण इच्छा छलन्हि जे मिथिलाकेँ पूर्णरूपेण स्वतंत्र राज्यक रूपमे राखल जाए आ ताहि प्रयासमे ओ कोनो कसैरि उठा नहि रखलन्हि। अपन कम दिनक शासनमे ओ जाहि निपुणताक परिचय देने छथि से कोनो देशक राजाक हेतु एकटा गौरवक विषय। शिवसिंहकेँ पँचगौड़ेश्वर सेहो कहल गेल छन्हि। बंगालोमे मिथिला जकाँ अराजक स्थिति छल आ ओतहु शिवसिंह जकाँ राजा गणेश ओहि स्थितिसँ लाभ उठाकेँ ओतए अपन शासन स्थापित कऽ लेने छलाह। हुनक पुत्र जदुसेन मुसलमान भऽ गेलाह आ जलालुद्दीनक नामे ओतुका राजा बनलाह। ओ शिवसिंहक समकालीन छलाह। शिवसिंह हिनका विरूद्ध अभियान शुरू केलन्हि आ हिनका पराजित केलन्हि आ हिनक राज्यक किछु अंशकेँ अपना राज्यमे मिलौलन्हि। बंगालपर विजय प्राप्त करबाक हेतु इ पंचगौड़ेश्वर कहाओल गेल हेताह से संभव। ताहि कालमे पश्चिममे जौनपुरक इब्राहिम शर्कीक बड्ड प्रभाव छलैक आ बंगालमे जखन मुसलमानी शासनक पराभव भेल तखन ओतए गणेशक उत्थान भेल। मिथिलामे शिवसिंह आ बंगालमे गणेशक प्रादुर्भावसँ पश्चिमक मुसलमान शासनक कान ठाढ़ भेल आ बंगालक मुसलमान संत लोकनि इब्राहिम शर्कीकेँ एहि बातक हेतु चेतौलन्हि। बंगालक निमंत्रण पर इब्राहिम शर्की बढ़लाह जाहिसँ ओहिठाम पुनः मुसलमानी शासनक पुनर्स्थापित भऽ सकए। एहिक्रममे मिथिलामे हुनका शिवसिंहसँ झंझट हैव स्वाभाविक कियैक तँ शिवसिंह बंगालक जलालुद्दीनकेँ पराजित कए ओतए धरि अपन राज्यक विस्तार कऽ लेने छलाह आ संगहि मिथिलाकेँ पूर्णरूपेण स्वतंत्र सेहो। इब्राहिमकेँ एहि दूमेसँ कोनो बात पसिन्न नहिये पड़ल होएतन्हि आ तैं मिथिलापर आक्रमण करब हुनक बंगाल नीतिक एकटा प्रमुख अंग रहल होएत। शर्की कालीन अभिलेख तिरहूतमे मुल्ला तकिया देखने छलाह आ ताहिसँ इ बुझना जाइत अछि जे शिवसिंहकेँ परास्त करबाक हेतु अथवा बदला लेबाक हेतु इब्राहिम शाह तिरहूतपर आक्रमण केने हेताह। हुनक समर्थक कीर्तिसिंहक प्रताप आब मिथिलामे नहि छलैक आ स्वाभिमानी एवँ स्वतंत्रता प्रेमी शिवसिंहक शासन पूब–पश्चिम दुनूकेँ चैलेंज कऽ रहल छलैक। एहना स्थितिमे इब्राहिम शर्की चुप्प बैसनिहार नहि छलाह। दुनूक बीच संघर्ष भेल जकर परिणाम हमरा लोकनिकेँ ज्ञात नहि अछि आ एकर बादे ओ वंगाल दिसि बढ़ल होएताह। एहो संभव जे बंगालसँ घुरबो काल (जतए ओ शिवसिंहक महत्वाकाँक्षाक विषयमे सुनने होथि) ओ मिथिलापर आक्रमण कए गेल होथि। मुदा तत्कालीन साधनक आधारपर एहि सम्बन्धमे कोनो ठोस निर्णय देव असंभव अछि। शिवसिंह स्वतंत्र रूपें लगभग ३–४ वर्ष धरि शासन केलन्हि परञ्च कहियो ओ निश्चिंत भऽ सुति नहि सकलाह कारण सब दिन हुनका कोनो ने कोनो समस्या लगले रहैन्ह। दिल्ली आ जौनपुर हुनका बरोबरि तंग करैत रहैन्ह जो ओ पसिन्न नहि करैत छलाह। मुसलमान शासककेँ जे तिरहूतसँ कर भेटइत रहैक से देव ओ वंद कऽ देलैन्ह आ ओ अपनाकेँ पूर्णरूपेण स्वतंत्र घोषित कऽ देलैन्ह। इ शासककेँ छलाह से सम्प्रति कहब असंभव मुदा कर बन्द केलाक बाद ओ खिसिया गेलाह आ शिवसिंहक संगहि युद्ध बजरब स्वाभाविक भऽ गेल। एतवे नहि अपन स्वतंत्रताकेँ व्यापक बनेबाक हेतु शिवसिंह अपना नामे सोनाक सिक्का बहार केलन्हि आ एहिक्रममे ओ इ सिद्ध कऽ देलैन्ह जे मिथिलाक कोनो दोसर महाप्रभु शिवसिंह छोड़िकेँ आ केओ नहि छल। एहिसँ मिथिलाक गौरवमे वृद्धि भेल आ शिवसिंह नान्यदेवक परम्परामे आबि गेला। शिवसिंहक एहि काजसँ तत्कालीन छोट–छोट राजाकेँ प्रेरणा भेटलैक आ शिवसिंहक शासन काल धरि मिथिलाक स्वतंत्रता सेहो अक्षुण्ण रहलैक। इ मिथिलाक इतिहासक हेतु एकटा गौरवक विषय मानल जाइत अछि। मुसलमान सुल्तान शिवसिंहक एहेन विद्रोही रूप देखि आश्चर्यचकित भऽ गेलाह। शिवसिंह सेहो अपन गिरफ्त होएबाक अपमानकेँ बिसरने नहि छलाह। दुनू अपन–अपन जिद्दपर छलाह जकर नतीजा इ भेल जे दुनूक बीच युद्ध अवश्यम्भावी भऽ गेल। एहि युद्धक परिणाम तँ बुझल नहि अछि परञ्च एकर बाद शिवसिंह हारि गेला, अथवा मारल गेलाह या लापता भऽ गेलाह से बुझल नहि अछि। मारलो गेल होथि से असंभव बात नहि। किछु गोटएक मत छन्हि जे शिवसिंह नेपालक जंगलमे भागि गेलाह अथवा ओम्हरे लापता भऽ गेलाह। एकर अर्थ किछु लेल जा सकइयै। एहि पराजयक बाद लखिमा देवी विद्यापतिक संगे द्रोणवार राजा पुरादित्यक ओतए सप्तरी परगन्नामे चल गेला। नेपालमे सेहो एकटा शिवराजगढ़ अछि जकरा लोक शिवसिंहसँ जोड़ैत अछि आ किछु गोटएक विचार छन्हि जे रानी लखिमा अपन पतिक स्मारक स्वरूप एहि गढ़क निर्माण करौने छलीह। विद्यापति एहि युद्धक वर्णन जाहि रूपें केने छथि ताहिसँ बुझना जाइत अछि इ भयंकर युद्ध छल। विद्यापति सेहो शिवसिंहक संगे युद्धमे शरीक भेल छलाह। युद्धक स्वरूप विद्यापतिक निम्नलिखित कवितासँ स्पष्ट होएतः– “दूर दुग्गमदमसि भज्जे, ओ गाढ़ गड़ गूठीअ गण्जेओ। पातिसाह ससीम सीमा समदरसे ओरे। ढोल तरल निसान सद्दहि भेरि काटल संख नद्दहि। तीन भूअन निकेत के तकि सनभरि ओरे॥ कोहे नीरे पयान चलियो वायुमध्य सयगरूओ। तरणि तेअ तुलाधार परताप गहि ओरे॥ मेरू कनक सुभेरू कम्पिय धरणि पूरिय गगन झम्पिय। हाति तुरय पदाति पयभर कमन सहि ओरे॥ तरल तर तखारि रङ्ग़े विज्जुदाम छटा तरंगे, घोरघन संघात वारिस काल दरस ओरे॥ तुरय कोटी चाप चूरिय चारदिस चौविदिशपूरिय। विषम सार असारधारा धोरनी भरि ओरे॥ अन्धकुअ कबन्ध लाइअ फेखी फफफरिस गाइअ। रूहिरमत्त परेत भूत वेताल विछलि ओरे॥ पारभइ परिपन्थ गज्जिय भूमि मण्डल मुण्डे मण्डिअ। चारू चन्द्रकलेब कीर्तिसुकेत की तुलि ओरे। रामरूपे स्वधरम राखिअ दान दप्पे दधीचि खीखिअ। सुकवि नव जयदेव भनि ओरे॥ देवसिंह नरेन्द्र नन्दन शत्रु नखइ कुल निकन्दन, सिंह समशिवसिंह मया सकल गुणक निधान गणि ओरे”॥ शिवसिंह मात्र एक विजेतेटा नहि अपितु कला, संस्कृति आ साहित्यक संरक्षक सेहो छलाह। हुनक दरबार विद्वान, पण्डित, कवि, दार्शनिक एवँ चिंतक लोकनिसँ भरल रहैत छल आ एहि मानेमे ओ राजा विक्रमादित्य आ भोजसँ एक्को पाइ कम नहि छलाह। विद्यापति, वाचस्पति, अमृतकर, जयंत, लखिमा आदिक नामसँ सब केओ परिचित छथिओ। विद्यापति तँ हुनक सब किछु छलथिन्ह आ पदावलीक रचना शिवसिंहक राज दरबारमे भेल। शिवसिंहक मंत्रीगण छलाह अच्युत, महेश (महेश्वर) आ रतिधर। शंकर नामक एकटा प्रमुख अधिकारी सेहो हुनका दरबारमे रहैत छलाह। तरौनीक एक पोखरिक अंगनइमे शिवसिंह कालीन एतिहासिक अवशेष सब सुरक्षित अछि। ओहि समयक एकटा पोखरि ‘भटोखरि’क नामसँ प्रसिद्ध अछि। मिथिलामे ओ प्रथम राजा छलाह जे स्वर्ण मुद्राक प्रचलन चलौने छलाह आ जकर दूटा अवशेष अखनो प्राप्य अछि। शिवसिंहक सम्बन्धमे कहल गेल अछि जे ओ अपना समयक समकालीन राजा सभहिक मध्य एकटा अद्वितीय प्रतिभाक व्यक्ति छलाह जे एतवे कम दिनमे समस्त उत्तरी भारतमे अपन धाक जमा लेने छलाह। परञ्च सबहिक दिन सबखन एक्के रंग नहि रहैत अछि तैं शिवसिंह एकर अपवाद कोना होइतैथ। शिवसिंहक परोक्ष भेलाहपर पद्मसिंह मिथिलाक शासक भेला आ मैथिल परम्पराक अनुसार ओ दिल्ली सुल्तानकेँ कर देब स्वीकार केलन्हि। हुनका समएमे विद्यापति हुनक सलाहकार छलथिन्ह। ताहि कालमे विद्यापति ठाकुरकेँ मंत्री सेहो कहल गेल छन्हि। ओ पद्मा, पद्मौलि आदिक स्थापना केलन्हि आ चम्पारणमे पद्मकेलि नामक स्थानक सेहो। विद्यापति हिनका नृपति पद्मसिंह कहिकेँ उल्लेख केने छथि। विद्यापतिक अनुसार पद्मसिंह भीम जकाँ बहादुर छलाह आ दानीक हिसाबे कल्पवृक्षे बुझल जाइछ। शैवसर्वस्वसारमे विद्यापति लिखने छथि– “संग्रामांगन सीम भीम सदृश....दाने स्वल्पित कल्पवृक्ष”। पद्मसिंहकेँ कोनो पुत्र नहि छलन्हि। पद्मसिंहक बाद महारानी लखिमा मिथिला राज्यक भार अपना हाथमे लेलन्हि। उपेन्द्र ठाकुर लिखने छथि जे शिवसिंहक पछाति लखिमा उत्तराधिकारिणी भेलीह मुदा से बात विश्वास करबा योग्य नहि अछि कारण हम देखि चुकल छी जे विद्यापतिक संग लखिमा द्रोणवार पुरादित्यक दरबारमे चल गेल छलीहे आ मिथिलामे बचि गेल छलाह पद्मसिंह जे मुसलमानी महाप्रभुकेँ कर देबाक वचन दए मिथिला राज्यक आंतरिक स्वतंत्रता सुरक्षित रखबामे समर्थ भेल छलाह। मैथिली परम्परामे एकटा कथा सुरक्षित अछि जाहिसँ एहि बातपर प्रकाश पड़इयै। शिवसिंहक लापता भेलापर कायस्थ चन्द्रकरक पुत्र एवँ शिवसिंहक मंत्री अमृतकर पटना गेला आ ओतए जाए सुल्तानक प्रतिनिधिसँ भेट कए मिथिलाक स्वतंत्रताक भीख मंगलन्हि। तखन जे समझौता भेल तदनुसार पद्मसिंह राजगद्दीपर बैसलाह। पद्मसिंह बछौर परगन्नामे पदुमा नामक स्थानपर अपन राजधानी बनौलन्हि। एहि परम्पराकेँ ध्यानमे राखिक स्पष्ट होइछ जे शिवसिंहक बाद मिथिलाक गद्दीपर पद्मसिंह बैसलाह आ तत्पश्चात लखिमा रानी। लखिमा रानीकेँ गद्दीपर बैसबाक मूल कारण इ छल जे पद्मसिंह सेहो अपुत्रे मरल छलाह। बारह वर्ष धरि ओ शिवसिंहक प्रतीक्षा नियमानुसार केलन्हि आ तदुपरांत शिवसिंहक श्राद्धादि कए विद्यापतिक विचारसँ ओ राजगद्दीपर बैसलीह। लखिमा देवी नीति, धर्मनिष्ठा, उदारता, एवँ विद्वता आदिमे निपुण छलीहे आ विद्यापतिक सहयोगसँ नीक जकाँ करीब नौ वर्ष धरि राज्य केलन्हि। एकर बाद पद्मसिंहक पत्नी विश्वास देवीक शासन भेलन्हि। ओ विसौली गाममे अपन राजधानी बनौलनि आ बहुत रास धार्मिक कृत्य केलन्हि। विद्यापति हिनका समयमे बहुत रास पोथी लिखलन्हि। देवसिंहक वंशजक अंत एहिठाम भऽ गेल आ तत्पश्चात हुनक वैमात्रैय भाए कुमर हरसिंहक शाखाक शासन पुनः प्रारंभ भेल। इ बहुत कम दिन धरि शासन केलन्हि आ हिनका समयमे कोनो खास घटनो नहि घटल। विभागसार (विद्यापति), कृत महार्णव एवँ महादान निर्णय (वाचस्पति), विवाद चन्द्र (मिसारुमिश्र) तथा गंगकृत्य विवेक (वर्द्धमान) आदि पोथी सबमे हिनक नामक उल्लेख भेटइयै। कन्दाहा अभिलेखमे सेहो हिनक उल्लेख अछि। ओ विद्वान उदार एवँ योद्धा छलाह। हिनक बाद हिनक पुत्र रत्न सिंह प्रसिद्ध नरसिंह दर्पनारायण राजगद्दीपर बैसलाह। नरसिंह अत्यंत प्रतापी राजा छलाह आ तैं हिनका दर्पनारायणक विरूद मंत्री लोकनि देने रहथिन्ह। कहल जाइत अछि जे ओ अपने मंत्री विद्यापति ठाकुरसँ विभागसागर नामक कानूनी ग्रंथक निर्माण करौने छलाह आ तदनुसार न्यायालयमे कार्य करबाक आज्ञा देने छलाह। कन्दाहा (सहरसा)क सूर्य मन्दिर पर एखनो हिनक लिखाओल उपलब्ध अछि आ ओकर तिथि देल अछि शक १३७५ (१४५३–५४ ई.) ओहि शिलालेखक पाठ एवँ प्रकारे अछि– “पृथ्वीपति द्विजवरो भव (सिंह) आसी दाशी विषेन्द्र वपुरूज्जवल कीर्तिराशिः। तस्यात्मजः सकल कृत्य विचार धीरो वीरो वभूव वि (हरसिंह देवः)॥ (दोः ?) स्तंभद्वय निर्जिनाहिततप श्रेणी किरीटोपल ज्योत्सनावर्द्धित पाद पल्लव नख श्रेणी मयुखावलिः॥ दाताततनयोमयोक्त विधिना भूमण्डलं पालयत् धीरः श्री नरसिंह भूपतिलकः कांतोधुना राजते। विदेशतोस्यायतनं खेरिदम चीकरत्। विल्व पंचकुलोदभुतः श्रमदवंशधरे कृती....”॥ एहिलेखमे नरसिंहक पूर्वज उल्लेख अछि आ इहो कहल गेल अछि जे ओ अपन दुनू शक्तिशाली भुजासँ अपन दुश्मनकेँ दबौने छलाह आ सब हुनके पैरपर लोट पोट करैत छल। कामन्दकीय नीतिसारक अनुसार ओ अपन राज्यकेँ रक्षा करैत छलाह। एहिमे हुनका ‘भूपति तिलक’ सेहो कहल गेल छन्हि। दुर्गा भक्ति तरंगिनीमे विद्यापति हिनका योद्धा कहने छथिन्ह। इ अपने आ हिनक पत्नी धीरमति एक्के रंग उदार छलाह। कहल जाइत अछि जे धीरमतिक आदेशानुसार काशीमे एकटा वापी खुनाओल गेल छल आ धर्मात्माक हेतु एकटा धर्मशालाक निर्माण सेहो कैल गेल छल। हिनके आदेशपर विद्यापति दानवाम्यावली ग्रंथक निर्माण कएने छलाह। एहिमे नरसिंह देवक हेतु निम्नलिखित वाक्यक प्रयोग भेल अछि। “श्री कामेश्वर राज पण्डित कुलालंकार सारः श्रिया मावासो नरसिंह देव मिथिला भूमण्डलाखण्डलः। दृव्यद् दुर्धरवैरिदर्पदलनोऽभूद्दर्पनारायणो। विख्यातः शरदिन्दु कुन्द धवल भ्राम्यद्यशो मण्डलः। तस्योदार गुणाश्रस्य मिथिला क्ष्मापाल चूड़ामणेः॥ हिनके समयमे विद्यापति व्याढ़िभक्तितरंगिणी सेहो बनौने छलाह। व्याढ़िभक्तितरंगिणी आ विभागसारक मूल अपन पोथी ‘मिथिला इन द एज ऑफ विद्यापति’क परिशिष्टमे छपने छी। हिनका समयमे बहुत रास विभिन्न विषयक ग्रंथक रचना सेहो भेल। नरसिंहक बाद धीरसिंह राजा भेलाह। नरसिंहकेँ चारिटा पुत्र छलथिन्ह– धीरसिंह हृदय नारायण (प्रथम पत्नीसँ) भैरवसिंह रूपनारायण चन्द्र सिंह (द्वितीय पत्नीसँ) दुर्लभ सिंह (रण सिंह) धीरसिंह अपने पिता जकाँ एकटा योग्य शासक छलाह। ई. १४६० क आसपास गद्दीपर बैसलाह आ विद्यापति हिनको हेतु प्रशंसाक पुल बान्हने छथि। मर्यादा, पराक्रम आ प्रज्ञा तीनुमे इ अपूर्व छलाह। हिनको दरबारमे बहुत रास विद्वान रहैथ छलथिन्ह। हिनके छोट भाए चन्द्रसिंह चनौर (चन्द्रपुर)क निर्माता छलाह। चन्द्र सिंहक आदेशपर कृष्ण मिश्रक प्रबोध चन्द्रोदय नाटकपर रूचि शर्मा अपन टीका लिखने छलाह। धीरसिंहक कंसनारायण सेहो कहल जाइत छलन्हि। भैरवसिंह देव:- मिथिलामे शिवसिंहक बाद ओइनवार वंशमे सबसँ प्रसिद्ध शासक भेलाह भैरव सिंह देव जे पुनः एक बेर शिवसिंह जकाँ समस्त मिथिलाक एकीकरण केलन्हि आ मिथिलाकेँ पूर्ण स्वतंत्र घोषित केलन्हि। उहो शिवसिंह जकाँ अपन चानीक सिक्का चलौने छलाह आ ओहि सिक्काक आधारपर इ निर्विवाद रूपें कहल जाइत अछि जे ओ १४७५ ई. मिथिलाक गद्दीपर बैसलाह। हुनक स्त्री जयाक अनुरोधपर वाचस्‍पति मिश्र द्वैत निर्णयक रचना कएने छलाह। शिवसिंह जकाँ इहो पंचगौड़ेश्वरक उपाधिसँ विभूषित छलाह। हिनका सम्बन्धमे निम्नलिखित शब्दावली ध्यान देबाक योग्य अछि। विद्यापति:- शौयावर्जित पंचगौड़धरणी नाथोप नम्रीकृता– नेर्को तुङ्ग तुरंग संग सहितच्छत्राभि रामोदयः श्रीमद भैरव सिंह देव नृपतिर्यस्यानुजन्मा जय त्याचन्द्रार्कमखण्डकीर्ति सहितः श्री रूपनारायणः। रूचि शर्मा (प्रबोधचन्दोदयक टीकामे):- न्यायेनावति तीरभुक्ति वसुधां श्री धीरसिंह नृपे श्रीमद भैरव सिंह भूमिपतिना भ्रात्रानुजेनांविते। वर्द्धमान (दण्डविवेक):- गौड़ेश्वर प्रतिसरीरमति प्रतापः केदारराय मवगच्छति दारतुत्यम्॥ संभवतः शिवसिंह जकाँ भैरवसिंह सेहो अपन पिताक समयसँ शासनमे हाथ बटबैत छलाह। हिनका समयक सबसँ मुख्य घटना इ अछि जे इ बंगाल सुल्तान द्वारा कैल गेल मिथिलाक अप्राकृतिक बटवाराकेँ तोड़लन्हि आ पुनः समस्त मिथिलाकेँ एक कए ओहिपर अपन एक क्षत्र राज्यक स्थापना केलन्हि। बछौड़ परगन्नाक बरूआर ग्राममे ओ अपन राजधानी बनौलन्हि कारण इएह सबसँ सुरक्षित स्थान हिनका बुझि पड़लन्हि। एतए इ स्मरण रखबाक अछि जे हाजी इलियास १३४६ ई.मे मिथिलापर आक्रमणक क्रममे हाजीपुर तक बढ़ल छल आ मिथिलाक ओइनवार राजाकेँ पराजित कऽ कए मिथिलाकेँ दू भागमे बाँटि देने छल। गंडकक उत्तरी भागमे ओ ओइनवार लोकनिकेँ शासन करैत छोड़ि देलकन्हि आ गण्डकक दक्षिणी भाग समस्तीपुर, बेगूसराय, बछवाड़ा, महनार, हाजीपुर आदि क्षेत्रकेँ ओ अपना अधीन रखलक। गण्डकपर अपना दिसि ओ समस्तीपुर (शमसुद्दीनपुर) नामक नगरक स्थापना केलक। तिरहूतक ओइनवार शासककेँ इ सब दिन खटकैत रहैन्ह। एहि आप्राकृतिक बटबाराकेँ किछु दिनक हेतु शिवसिंह नष्ट कए समस्त मिथिलाक एकीकरण कएने छलाह परंतु शिवसिंहक परोक्ष भेलापर पुनः यथास्थितिक स्थापना भेल आ केओ मैथिल शासक एहि दिसि ध्यान नहि देलन्हि। भैरव सिंह एक महत्वाकाँक्षी व्यक्ति छलाह आ मिथिलाक अप्राकृतिक बटवारा हुनका बरोबरि खटकैत रहैन्ह तैं ओ राजगद्दीपर एला उत्तर सबसँ पहिने एहि दिसि ध्यान देलन्हि आ एहिमे सफल सेहो भेला। धीरसिंहक समयसँ बंगालसँ खटपट होइत छल आ इ बात भैरवसिंह देखैत छलाह। बेर–कुबेरमे हुनके बंगालक विरूद्ध अभियानमे जाइयो पड़इत छलन्हि तैं जखन ओ शासक भेलाह तखन ओ एहि दिसि अपन ध्यान देलन्हि। हुनका समय बंगाल सुल्तानक प्रतिनिधि केदार राय हाजीपुरमे रहैत छल। भैरव सिंह केदार रायकेँ पराजित कए ओहि क्षेत्रपर अपन आधिपत्य स्थापित केलन्हि आ समस्त मिथिलाक एकीकरण करबामे समर्थ भेला। ओ सौसँ उपर पोखरि खुनौलन्हि। एहिमे जरहटिया गामक पोखरि सबसँ पैघ छल। हिनका दरबारमे चौहान केसरी सिंह आ संग्राम सिंह प्रसिद्ध सिपाही छलथिन्ह आ परम्परागत कथाक अनुसार ओ एहि दुनू सिपाही लंका पठौने छलाह। जरहटिया पोखरिक यज्ञोत्सव बड्ड पैघ भेल छल आ ओहिमे तत्कालीन राजा महाराजा आ विद्वान लोकनिकेँ आमंत्रित कैल गेल छलन्हि। ओहि क्रममे उपरोक्त दुनू दूतकेँ लंको पठाओल गेल छलन्हि। ताहि दिनमे बंगाली विद्वान रघुनाथ शिरोमणि सेहो एहिठाम पढ़ि रहल छलाह आ एहि यज्ञमे नुकाकेँ सब किछु देखैत छलाह। यज्ञमे गलती मंत्र पढ़ल जा रहल छल आ से हुनका नहि रहल गेलन्हि तो ओ बाजि उठलाह–“साखती कथिता कर्विता पण्डितराज (रत्न) शिरोमणिना”– एहिसँ लोग हुनका चिन्ह लेलक। पोखरिक अतिरिक्त भैरवसिंहक समयमे बहुत रास नगर पट्टनक स्थापना सेहो भेल छल। ‘तुलापुरूषदान’क चर्च सेहो भेटइत अछि। संस्कृत साहित्यमे बहुत रास ग्रंथक रचना एहि कालमे भेल। विद्यापति, वाचस्पति, पक्षधर आदि सन धुरन्धर विद्वान हुनका दरबारमे छलथिन्ह आ राजा स्वयं संस्कृत साहित्यक बड्ड पैघ पृष्टपोषक छलाह। हुनका दरबारमे वाचस्पति ‘परिषद्’ रहथिन्ह, आ वर्द्धमान धर्माधिकरणिक रहथिन्ह। हिनक विरूद छलन्हि ‘रूपनारायण’। भैरवसिंहक वाद रामभद्र शासक भेला आ हिनको विरूद रूपनारायणे छलन्हि। इहो अपन राजधानी रामभद्रपुर नामक गाममे बनौलन्हि। कहल जाइत अछि जे हिनका पटनामे सिकन्दर लोदी संगे भेट भेल छलन्हि आ दुनूमे बेस दोस्ती सेहो छलन्हि। इ हुनका संग शतरंज इत्यादि सेहो खेलाइत छलाह। सुल्तान रहस्य नृत्य देखबा काल हुनकहुँ अपना समीपमे स्थान देथिन्ह। गौड़, बंगाल, मालदह, मुर्शिदाबाद आदि स्थानकेँ ओ जीतने छलाह। सिकन्दर लोदी बंगालकेँ ध्यानमे राखि मिथिलाक शासककेँ अपना दिसि पटियाकेँ रखने होथि से संभव। विभाकर द्वैतविवेक नामक ग्रंथसँ निम्नलिखित वाक्य स्पष्ट अछि। “सिकन्दर पुरन्दरो गुरूदुरोदरक्रीड़या दिनं गमयति ध्रुवं विविध नागरी विभ्रमैः। पचण्ड रिपुमण्डली मुकुट कोटि प्रभा। समजित पदाम्बुजं यमिह मित्र भावंनयन्॥ येना खानि समुद्रखात सदृशं वापीगतं निजेले। येनादायि च तानि तान्यथ महादानानि पुण्यत्मना। जागेत्येद्भुत विक्रमः संजगती कन्याकर ग्राहको। गौड़ोवीवलयेन्द्रदविदहनः श्री रामभद्रो नृपः ॥ रामभद्र अत्यंत विद्याप्रिय छलाह। वाचस्पति हिनको समयमे जीवित छलाह। सिकन्दर लोदीकेँ रामभद्रपर बड्ड विश्वास छलन्हि आ तैं आवश्यकता पड़लापर हिनक बजाहटि होइत रहैन्ह। रामभद्र उदार, दानी आ विद्याप्रेमी छलाह आ ओइनवार परम्पराक अनुसार इहो बहुत रास पोखरि इत्यादि खुनौने छलाह। हिनका समयमे भट्ट श्री राम नामक एक यात्री गयासँ तीरभुक्ति तीर्थ करबाक हेतु आयल छलाह आ ओ रामभद्रक दानप्रियता एवँ उदारतासँ बड्ड प्रभावित भेल छलाह। मिथिला होइत ओ प्रयाग घुरल छलाह। ओ तीरभुक्तिक विद्वत समाजसँ एत्तेक प्रभावित भेल छलाह जे एहि बातक उल्लेख ओ अपन पोथी ‘विद्वत प्रबोधिनी’मे सेहो केने छथि– “गयाया निर्गता रामस्तीर्भूक्त्याख्‍यदेशपम्। रूपनारायणं विप्रं संतुष्टं स्वागिराकरोत्॥ रूपनारायणाद् भूपादाज्ञां प्राप्य सुतान्वितः। तीरभूक्त्याख्‍यदेशाश्च प्रयागं समुपागतः”॥ एहिवंशक सबसँ अंतिम शासक छलाह लक्ष्मी नाथ देव कंस नारायण जनिका समयक अभिलेख भगीरथपुरसँ प्राप्त भेल अछि। १५१३ ई.मे इ मिथिलामे शासन करैत छलाह। १५१० ई.मे गद्दीपर बैसल होथि से संभव कारण ओहि वर्षमे हिनके शासन कालमे देवी माहात्म्यक एकटा पाण्डुलिपि तैयार भेल छल। भगीरथपुर अभिलेखमे हिनका ‘राजाधिराज’ कहल गेल छन्हि– “यवनपति भयाधायकस्तीरभुक्तौ राजा राजाधिराजः समर–सः कंसनारायणो सौ”। हिनका डरे यवन लोकनि थर–थर कंपैत छलाह। कहल जाइयै जे हिनक चरित्र संदेहास्पद छल आ इ अपन कोनो मंत्री श्री धरक पत्नीसँ सम्बन्ध रखैत छलाह। हिनका समयमे मिथिलापर मुसलमानी आक्रमण भेल। १५२६ ई.मे हिनक मृत्यु भेल जेना कि निम्नलिखित श्लोकसँ स्पष्ट अछि– “अंकाब्धिवेदशशि (१४४९) सम्मित शाकवर्षे, भाद्रेसिते, प्रतिपदिं क्षिति सुनुवारे हा हा निहात्य इव कंसनारायणौऽसौ, त्याज्य देवसरसीनिकटे शरीरम्”– १४४९ शाक अथवा १५२६ ई.मे अपन पार्थिव शरीर त्यागलन्हि। संभवतः बंगालक नशरत शाहक हाथे इ पराजित भेल छलाह किएक तँ नशरत शाहक एकटा अभिलेख बेगूसरायक मटिहानी अंचलसँ प्राप्त भेल अछि। नशरत दिल्लीक सुल्तान संग भेल संधिकेँ नहि मानि मिथिलापर आक्रमण केलन्हि आ लक्ष्मीनाथ कंसनारायणकेँ पराजित कए अपन जमाए अलाउद्दीनकेँ एहिठामक राज्यपाल नियुक्त केलन्हि। एकर बादक इतिहास पूर्णरूपेण ज्ञात नहि अछि। ओइनवारक शक्तिक ह्रास भऽ गेलैक। तथापि ओइनवार वंशक लोग यत्र तत्र मिथिलामे राज्य करैत रहलाह आ एम्हर अराजकता सेहो बढ़े लागल। केन्द्रीय सत्ता टुटि गेलासँ चारूकातक राजा–सामंत अपन स्वतंत्रता घोषित कऽ लेलन्हि आ मुसलमान लोकनि सेहो एहि क्षेत्रमे अपन अधिकार बढ़ेबामे प्रयत्नशील भऽ गेलाह। ओइनवार वंशक एकटा इन्द्रसेन (शालिहोत्रसारसंग्रहक लेखक)क नाम भेटइत अछि जकरा सम्बन्धमे हमरा लोकनिकेँ कोनो विशेष ज्ञान नहि अछि। १४३४–३५मे चम्पारणमे राजा पृथ्वीनारायण सिंह देवक राज्य छल (महाराज पृथ्वीनारायण सिंह देव भुज्यमान राज्ये चम्पकारण्यनगरे)। हिनक उत्तराधिकारी छलथिन्ह शक्तिसिंह आ तकर बाद हुनक पुत्र मदन सिंह। मदन सिंह, मदन–रत्न–प्रदीपक लेखक छलाह। इ सब राजा अपन सिक्का सेहो चलौने रहैथ जाहिपर लिखल अछि– “गोविन्द चरण प्रणत–श्री चम्पकारण्ये”। हिनक मुद्रा हिमालय तराइसँ दिल्ली धरि भेटइत अछि। मदन सिंहक राज्य गोरखपुर धरि छलन्हि। नरसिंह पुराणक पाण्डुलिपिक पुष्पिकामे एकर प्रमाण अछि– “....महाराजाधिराज श्रीमन्मदन सिंह देवानाम् विजयिनाम् शासति गोरक्षपुरे.....”। चम्पारणक लौरिया नंदनगढ़मे अशोकक स्तंभपर एकटा लेख अछि– “नृपनारायण सुत नृप अमरसिंह”। इ केँ छलाह आ कतुका राजा छलाह से कहब असंभव। महाराज लक्ष्मीनाथ अपुत्र छलाह तैं हुनक बाद हुनक कायस्थ मंत्री केशव मजूमदार राजक भार सम्हारलन्हि आ उएह राजा भेला। ओइनवारक परंपराक निर्वाह करैत उहो जन–कल्याणक हेतु पोखरि खुनौलन्हि आ दानादिक नीक व्यवस्था केलन्हि। मजलिश खाँ नामक व्यक्ति सेहो एहि स्थितिसँ लाभ उठाए किछु दिन मिथिलापर शासन केलन्हि। केशव मजूमदार कुशल व्यक्ति छलाह आ ओइनवार शासनक सब बातसँ अवगत रहबाक कारणे ओ मिथिलाकेँ अपना शासन कालमे यथासाध्य स्वतंत्र रखलन्हि आ मैथिल परम्परा निर्वाह करैत जन कल्याणार्थ बहुत किछु केलन्हि। ओइनवार वंश आपसी कलह आ बटवारासँ खण्डित भऽ चुकल छल। राजकुलक सम्बन्धसँ ओइनवार मूलक ब्राह्मण लोकनि “कुमार” पदवी धारण करए लगलाह आ ‘कुमार’ पदवी धारी ओइनवार ब्राह्मण लोकनिक एक शाखा अहुखन मालदह जिलाक अराइदंगा गाममे छथिन्ह। ओइनवार वंशक अनेक शिलालेख आ किछु मुद्रा सेहो अछि जाहिपर हमरा सब इ कहि सकैत छी जे ओइनवार लोकनि कर्णाट वंश जकाँ मिथिलाक स्वतंत्रताक सुरक्षाक हेतु किछु उठा नहि रखलन्हि आ हुनका शासन काल मैथिलक प्रसार चारूकात भेल। एहि वंशक तत्वाधानमे साहित्य, कला, व्याकरण, स्मृति, निबंध, दर्शन, इत्यादिक विकास भेल। महाकवि विद्यापति देवसिंहक समयसँ भैरव सिंहक शासन काल धरि ओइनवार राजनीतिक एकटा प्रमुख स्तंभ छलाह। राजकाजमे एतवा व्यस्त रहितो ओ अपन लिखब–पढ़ब नहि छोड़लन्हि आ मातृभाषाकेँ सेहो नहि बिसरलाह। एहिवंशक समयमे गोनू झा सेहो भेल छलाह। एहिवंशक परोक्ष भेलापर मिथिलामे मुसलमानी प्रभावक वृद्धि भेल। (एहि प्रसंगमे हमर “हिस्ट्री ऑफ मुस्लिम रूल इन तिरहूत” देखल जा सकइयै आ देखु हमर निबन्ध–“द ओइनवारज ऑफ मिथिला”) अध्याय–९ खण्डवला वंशक इतिहास ओइनवार वंशक अंत भेलापर मिथिलामे केशव मजुमदार आ मजलिश खाँक शासन रहल। केन्द्रीय सत्ताक समाप्त भऽ गेलापर आ मुसलमान लोकनिककेँ लगातार आक्रमणसँ मिथिला छिन्न भिन्न भऽ गेल छल आ चारूकात अराजकता पसैरि गेल छल। जे जेम्हरे पेलक से तेम्हरे अपन आधिपत्य कायम कऽ लेलक आ एहियुगमे मिथिलामे बेसी बावू बवुआन लोकनिक बढ़ती भेलैन्ह। किछु राजपूत लोकनि सेहो एहिसँ लाभ उठौलन्हि आ कैक ठाम अपन स्वतंत्र राज्य कायम करबामे सफल भेलाह। समस्त मिथिलामे हाजीपुरसँ बंगालक सीमा धरि मुसलमानी प्रभाव बढ़ि चुकल छल आ मुगल साम्राज्यक स्थापना धरि करीब–करीब इएह स्थिति बनल रहल। एहिठाम मुगल साम्राज्यक स्थापना हम बाबरक समयसँ नहि लऽ कए १५५६ यानि अकबरक समयसँ लैत छी कारण बाबर द्वारा स्थापित राज्य तँ राज्ये मात्र रहल आ हुनक पुत्र ओहि राज्यकेँ जोगा नहि सकलाह। नतीजा भेल जे बिहारेक शेरशाह मुगल साम्राज्यकेँ नस्तनाबूद केलन्हि आ अपन सत्ता स्थापित करबामे समर्थ भेलाह। शेरशाहक एकटा उत्तराधिकारी सिक्का तिरहूत भेटल अछि आ एकटा मैथिली लिपिक अभिलेख सूर्यगढ़ा (मूंगेर)सँ। अकबरक शासन भेलाक बाद जे परिवर्त्तन भेल तकर प्रभाव मिथिलापर स्वाभाविक रूपें पड़ल। खण्डवला वंशक सम्बन्धमे कहल जाइत अछि जे हिनका लोकनिकेँ मुगल सम्राट अकबरसँ समस्त मिथिलाक राज्य भेटल छलन्हि। दरभंगा राजक इतिहास विस्तृत रूपे डॉ. जटाशंकर झा शोध कएने छथि आ एहि दृष्टिकोणें हुनक “हिस्ट्री ऑफ दरभंगा राज” आ “महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह” पठनीय ग्रंथ अछि। खण्डवला वंशक संस्थापक छलाह महामहोपाध्याय महेश ठाकुर। हिनक पूर्वज मिथिलेक रहथिन्ह आ ओहिमे एक गोटए शंकर्शन उपाध्यायकेँ किछु दान खण्डवामे भेटबाक बाद ओम्हरे जाके बसि गेल छलाह। महेश ठाकुर हुनके वंशज छलाह (दशम पीढ़ी) आ जमीन जायदाद वाला रहबाक कारणे इ लोकनि उपाध्यायसँ ठाकुर (सामंती पदवी) कहबे लागल छलाह। १६म शताब्दीमे इ लोकनि मण्डला (गढ़ मण्डल–वस्तर)सँ पुनः एलाह। हिनक पितामह श्रीपति ठाकुर भर राजपुतकेँ किछु दान दऽ कए भौर गाम बसौने छलथिन्ह। एहिठाम स्मरणीय जे ओइनवार वंशक पतनक बाद जे अराजक स्थिति शुरू भेल छल ताहिसँ लाभ उठाकेँ भर राजपूत लोकनि सेहो अपन स्वतंत्र राज्य स्थापित कऽ लेने छलाह। भौरमे आबिकेँ बसला कारणे खण्डवला लोकनि ‘खरौरे भौर’ कहौलथि। एहिवंशमे विद्वानक जे एकटा परम्परा चलि आबि रहल छल तकरा अनुरूपें इ लोकनि भौरमे एकटा संस्कृत विद्या केन्द्रक स्थापना केने छलाह जत्ते देशक विभिन्न भागसँ विद्यार्थी लोकनि पढ़बालेल अबैत छलाह। महेश ठाकुरक ज्येष्ठ भाए भगीरथक कारणे भौरक प्रतिष्ठा बड्ड बढ़ि गेल छल– “पद्म पत्रमपि यत्र दुर्लभम्, रन्धनं भवति नेन्धनं बिना। श्री भगीरथ गुणेन केवलम्, भौर गौरव कथा गरीयसी”॥ गढ़ेश–नृप–वर्णन–संग्रह श्लोकक पाण्डुलिपिक अध्ययनसँ मैथिल विद्वानक जे विवरण भेटइत अछि ताहिमे महेश ठाकुरक प्रशंसनीय उल्लेख अछि। रूपनाथ मैथिलक पाण्डुलिपि गढ़ेश–नृप–वर्णनम् कऽ उपरोक्त पाण्डुलिपि पूरक थिक आ ओहि पाण्डुलिपिमे गढ़मण्डल राज्यक विवरण भेटइत अछि। रूपनाथक अनुसार महेश ठाकुर भौर ठक्कुर लोकनिक वंशजक रूपमे वर्णित छथि आ संगहि यादोरायक धार्मिक गुरूक रूपमे सेहो। महेश दलपत शाह आ रानी दुर्गावतीक समकालीन छलाह। खण्डवा, मण्डला, रतनपुर आ वस्तरमे हिनक बेस इज्जति रहैन्ह। महेश ठाकुर दुर्गावतीकेँ पुराण सुनबैत छलाह। एक दिन कोनो कारणे ओ ओतए अपन प्रिय शिष्य रघुनंदनकेँ पठौलन्हि परञ्च रघुनन्दनकेँ ओतए किछु खटपट भऽ गेलैन्ह आ ओतहिसँ गुरू शिष्य दुनू गोटए दिल्ली दिस बिदा भेलाह। ओहिठाम मुगल दरबारमे इ लोकनि अपन विद्वतासँ सम्राटकेँ प्रभावित केलन्हि आ रघुनन्दन जे फरमान प्राप्त केलन्हि से दक्षिणा स्वरूप अपन गुरूदेव महेश ठाकुरकेँ दऽ देलन्हि। महेश ठाकुरक आर तीनू भाइ दिल्लीसँ घुरिकेँ वस्तर, रतनपुर आ मण्डला दिसि चल गेला किएक तँ ओहिठाम हुनका लोकनिकेँ जागीर छलन्हि आ महेश ठाकुर असगरे फरमानक संग घुरला। मण्डला अखनो धरि महेशपुर आ तिरहूतिया टोल अछि। मैथिल परम्परामे सेहो महेश ठाकुरक राज्य प्राप्तिक उल्लेख भेटइत अछि– “नवग्रह वेद वसुन्धरा शकमे अकबर शाह पंडित सुबुध महेश को किन्हो मिथिलानाह”॥ “आसीत पण्डित मण्डलाग्र गणिता भूमण्डला खण्डला। जाता खण्डवाल कुले गिरि सुता भक्तो महेशः कृति। शाकेरण्ध्र तुरंग श्रुतिमही (१४४८=??) लक्षिते हविनेवाग्देवी कृप्या सुयेन मिथिलादेशः समस्तोऽर्जितः”॥ “अति पवित्र मंगल करण राम जनमकेँ दिन। अकबर तुषित महेश को तिरहुति राजा करेन॥ जेना कि पूर्वहिं कहल जा चुकल अछि जे महेश ठाकुर जखन फरमान लऽ कए मिथिलामे राज्य करबाक हेतु पहुँचलाह तखन हुनका विरोधक सामना करए पड़लन्हि कारण एहिठामक स्वतंत्र राजपूत राजा लोकनि ताधरि स्वतंत्रताक स्वाद लऽ लेने छलाह। ओइनवारक बाद जे स्थिति उत्पन्न भेलैक तकर विवरण हम प्रस्तुत कऽ चुकल छी आ इहो कहि चुकल छी जे राजपूत लोकनि अपन प्रभाव बढ़ा लेने छलाह। तथा सरौंजा आ पररीमे पहिने हिन्दू राजा चुनचुनक राज्य छल परञ्च चुनचुनक परोक्ष भेलापर लक्ष्मी सिंह नामक एकटा राजपुत राजा ओहि क्षेत्रपर शासन करए लगलाह। ओइनवारक बबुआन लोकनि सेहो ठाम–ठाम अपन अधिकार जमौने छलाह आ १७म शताब्दीमे औरंगजेबक शासन काल धरि मिथिलामे एकटा ओइनवार शासकक विवरण (तलवार–अभिलेख–जे मिथिला भारतीमे प्रकाशित भेल अछि) भेटल अछि। एहिसँ तँ सामान्यतः इएह स्पष्ट होइछ जे महेश ठाकुरकेँ प्रारंभमे काफी मुश्किल भेल होएतन्हि। ताहि दिनमे मिथिला छोट–छोट खण्डमे बटल छल। भौर प्रधान प्रशासनिक केन्द्र छल। महेश ठाकुरक समय मिथिलाक स्थितिक वर्णन निम्नांकित अछि– “रहै भौर क्षत्री प्रबल, वसत भौर निज ठौर सूर समर विजयी बड़े, सब क्षत्री सिरमौर॥ अच्युतमेघ गोपाल मिलि, मारौ क्षत्री राज निज सुत लै भागी तबै रानी नैहर राज बहुत दिवसकेँ बाद सौं सजि आये पम्मार युद्ध करण मिथिलेशसँ सेना अपरंपार”॥ महेश ठाकुर सब प्रकारक विरोधकेँ दबेबामे सफल भेला। एहिठाम प्रश्न इ उठइयै जे राज्य गुरू दक्षिणामे भेटल छलन्हि अथवा ओ स्वयं ओकरा प्राप्त केने छलाह। एहिपर विद्वानक बीच मतभेद अछि आ एक सिद्धांत इहो अछि जे ओ अपन विद्वतासँ मानसिंहकेँ प्रभावित कए राज्य प्राप्त केने छलाह। अकबर सेहो एहि पक्षमे छल जे कहुना चारूकात शांति बनल रहए जाहिसँ ओ अपन राज्य विस्तार कऽ सके आ तैं मिथिलाक भार महेश ठाकुरकेँ सुपुर्द कए ओ निश्चिंत होमए चाहैत छल। तिरहूतक कलक्टरक १७८९क एक पत्रसँ इ ज्ञात होइछ जे महेश ठाकुर ओइनवार वंशक पुरोहित छलाह आ ओइनवार वंशक अंत भेलापर ओ स्वयं दिल्ली जाए ओतुक्का शासककेँ सब स्थितिसँ अवगत कराए अपना हेतु राज्य प्राप्त कऽ केँ अनलन्हि। एक आर किंवदंती बुकानन पुर्णियाँ रिपोर्टमे सुरक्षित अछि। प्रिंसेपक अनुसार खण्डवला वंश मुगल साम्राज्यक अंतर्गत एक स्वायत्त राज्य छल आ ओहि राज्यक अधीन कतैको सामंत लोकनि रहैत छलाह। गोपाल ठाकुरक देल अकबरक फरमानसँ इ स्पष्ट अछि जे आंतरिक मामला मिथिला पूर्णरूपेण स्वतंत्र छल–चौधराइ आ कानूनगोय समस्त तिरहूतक हिनका लोकनिकेँ प्राप्त छलन्हि। १६५२ ई.क मजहरनामासँ सेहो स्पष्ट होइछ जे महेश ठाकुर एहिवंशक संस्थापक छलाह। औरंगजेबक समयमे एहिवंशकेँ बिहार आ बंगालक ११० परगन्ना दानस्वरूप भेटल रहैक आ संगहि खिलत आ महिमरेतिव (माँछक चेन्ह–जे दरभंगा राज्यक राजकीय चेन्ह छल)। एहिसँ स्पष्ट भऽ जाइछ जे समस्त तिरहूतपर एहिवंशक प्रभाव महेश ठाकुरक समयसँ चलल अबैत छल। महेश ठाकुर मिथिलामे खण्डवला कुलक संस्थापक छलाह एहिमे आब सन्देह नहि रहि गेल अछि। अपन राजा हेबाक अवसरकेँ चिरस्मरणीय बनेबाक हेतु ओ धौत परीक्षाक प्रथा चलौलन्हि। महेश ठाकुर मात्र एक शासकेटा नहि अपितु एक पैघ विद्वानो छलाह आ बहुत रास पोथी सेहो लिखने छलाह। कहल जाइत अछि जे मिथिलामे राज्य प्राप्त भेलाक बाद ओ गढ़ मण्डलासँ अपन देवी (कंकाली देवी)केँ सेहो ओतएसँ अनलन्हि। ओ अकबरनामाक एकटा संक्षिप्त संस्कृत संस्करण बाहर केलन्हि जे सर्वदेश वृतांत संग्रहक नामसँ प्रसिद्ध अछि। कहल जाइत अछि जे महेश ठाकुर अकबरक शासनक ३४म वर्ष एहि ग्रंथक अनुवाद कएने छलाह। बीरबलक आदेशपर इ अनुवाद भेल छल। किनको–किनको इहो मत छन्हि जे एहि अनुवादक बाद महेश ठाकुरकेँ मिथिलाक राज भेटलन्हि। सुभद्र झाक संपादकत्वमे इ पोथी प्रकाशित अछि। एहि ग्रंथसँ इ ज्ञात होइत अछि जे हिमायुँ नरहन आएल छलाह आ तिरहूत आ पूर्णियाँमे ओ जागीर सेहो देने छलथिन्ह। इ दुनू स्थानक जागीर ओ अपन भाए हिन्दालकेँ देने छलाह आ हुनका अपन जागीर ठीक कऽ कए बंगाल दिसि बढ़बाक आदेश देने छलाह। मैथिली शब्दक सेहो एहि संस्कृत पोथीमे बेस व्यवहार अछि। उदाहरणार्थ– i) सम्यक्तया ii) गल्ली iii) असुस्थ iv) तरवारि v) सुस्थ vi) ढ़व्य=ढ़ौआ vii) विचीय–विचीय (बीछि–बीछि) viii) वस्तु जातानि– ix) हत्था जोरी– आ एहेन बहुत शब्द ओहि संकलनमे अछि। महेश ठाकुरक बाद हुनक द्वितीय पुत्र गोपाल ठाकुर गद्दीपर बैसलाह। कहल जाइत अछि जे ओ विद्रोही राजपूत प्रधान लोकनिकेँ दबौलन्हि। हिनके समयमे टोडरमलक राजस्व व्यवस्था लागू भेल छल। हिनका समयमे भेटल फरमानक उल्लेख हम पूर्वहिं कऽ चुकल छी। मिथिलाक आंतरिक झंझटमे इ ततेक बाझल छलाह जे जखन दिल्लीसँ हिनका बजाहटि एलन्हि तँ अपने नहि जा कए ओ अपन पुत्र हेमांगद ठाकुरकेँ पठौलन्हि जे ओतए कोनो कारणवश गिरफ्त भऽ गेलाह आ ओहि गिरफ्तावस्थामे अपन सुप्रसिद्ध एवँ अद्वितीय ज्योतिष शास्त्रक पोथी लिखलन्हि। कागज कलमक अभावमे ओतए ओ माँटिपर लिखैत छलाह आ जखन राजाकेँ एकर सूचना भेटलन्हि तँ राजाक पूछलापर ओ कहल थिन्ह जे एक हजार वर्ष धरि कहिया–कहिया ग्रहण लागत तकरे हिसाब ओ लिखि रहल छथि। ‘राहू पराग पंजी’ नामे इ ग्रंथ प्रचलित अछि, आ ओहिमे लिखल अछि– “खण्डवला कुल तरणेर्गोपालादापयं गौरी हेमाङ्गद सतनुते पंजी (!) राहू परागस्य”। राजा हिनकासँ प्रसन्न भऽ हिनका मुक्त कए देल आ तिरहूत राज्यक जे बकिऔता छल सेहो माफ कऽ देलक। हेमाङ्गद तकर बादसँ पढ़वे–लिखबेमे अपन समय व्यतीत करे लगलाह। गोपालक बाद शुभंकर ठाकुर शासक भेलाह। शुभंकर ठाकुरक नामपर दरभंगा लग अखनो शुभकंरपुर अछि। इ एक पैघ विद्वान आ लेखक सेहो छलाह। ओ भौरमे अपन राजधानी स्थापित केलन्हि किएक तँ एहिठाम पहिने भर राजपूत लोकनिक प्रधानता छल। हुनका बाद हुनक पुत्र पुरूषोत्तम ठाकुर शासक भेला। हिनक बजाहटि मुगल राजस्व पदाधिकारीक ओहिठाम भेल छलन्हि आ राजस्व पदाधिकारी दरभंगाक किला घाटमे ठहरल छलाह। ओहि पदाधिकारीकेँ मुगलशासकक हाथे सजा भेटलैकि। हिनकहि शासनकालमे तिरहूतक दूटा ब्राह्मणकेँ मुगल दरबारमे पुरष्कार भेटल छलैक। पुरूषोत्तमक बाद हुनक सतभाय नारायण ठाकुर राजा भेलाह। नारायण ठाकुरक समयमे दू फरमान भेटल छलैक जाहिसँ दूटा गामक न ननकार प्राप्त भेल छलन्हि–सरसो (परगन्ना भौर) आ बिजिलपुर (परगन्ना वेराय)। भखारा परगन्नाक स्थितिकेँ सुधारबामे हिनक विशेष हाथ छलन्हि आ १६४५ तक ओ राज्य करैत रहलाह। तकर बाद सुन्दर ठाकुर राजा भेलाह। राज्यक बटबाराक संकेत भेटइत अछि। एहिकालमे शाहजहाँक शासन छल आ हकीकत अली नामक एक व्यक्ति दरभंगाक नवाब छलाह। “ल सं ५०९ श्रावणवदि १४ खौ पुनः परमभट्टारकाश्व पति गजपति नरपति राज्य त्रयाधिपति सुरत्राण शासत शाहजहाँ सम्मानित नओवाव हकीकत खाण संभुज्यमान तीरभुक्त्यंतरित, स्स् तीसाठतया संलग्न झोरिया ग्रामे....। हिनके शासन कालमे मैथिल रघुदेव शाहजहाँक विरूदावली बनौने छलाह। सुन्दर ठाकुरक बाद महिनाथ ठाकुर राजा भेलाह। ओ पलामू आ मोरंगमे मुगल सम्राटक सहायता केने छलथिन्ह जकर सबूत उपलब्ध अछि। सुन्दर ठाकुर सुन्दरपुर मोहल्ला बसौलन्हि आ भालपट्टीमे सुन्दर सागर पोखरि खुनौलन्हि। एहि पोखरिक नाम रामकविक आनन्द विजय नाटिकामे भेटइत अछि। सुन्दर ठाकुर देखबामे बड्ड सुन्दर छलाह– “अरविन्द विनन्दित सुन्दर लोचन सुन्दर ठक्कुर सुन्दरता। मदनेन समं विधिना तुलिता कलिता मिथिलैक पुरन्दरता। तव खण्डवला कुल मण्डन भूप। सदा मतिरस्तु मुकुन्द रता नैने नगरे निले कमलापर वारिधि मंथन मन्दरता”– महिनाथ ठाकुरक समयक एकटा औरंगजेबक फरमान सेहो उपलब्ध अछि। महिनाथ ठाकुरक काजसँ प्रसन्न भऽ मुगल सम्राट हिनका आर राज्य देलथिन्ह– सदर जमीन्दारी सरकार तिरहूत (तराइक संग)–१०२ परगन्ना परगन्ना धरमपुरक जमीन्दारी सरकार मूंगेर–एक परगन्ना– बंगालसँ सेहो निम्नलिखित इलाका भेटलन्हि– माछक निसानी सेहो– सरकार पूर्णियाँ–५ परगन्ना– सरकार ताजपुर–२ परगन्ना– महिनाथ ठाकुरकेँ बेतियाक राजा गजसिंहसँ सेहो झंझटि भेलन्हि। मिरजा, फिदाइ आ जीवन हिनका समयमे तिरहूतमे मुगल फौजदार छल। महिनाथ ठाकुरक शासन कालमे खण्डवला कुल अपन चरमोत्कर्षपर पहुँचल छल। महिनाथ ठाकुर बेतिया (सिमरॉव)क राजा गजसिंहकेँ पछाड़लन्हि जे सुगौना पहुँचिकेँ सुगौना किलामे आराम करैत छलाह। “धाय मिथिलाकेँ महिनाथ सिंह महाराज बाजकेँ झपटते सुगाओंपर चढ़ि गयौ। घेराकरि दौड़ि दरवाजेमे दरेरा लगे धरव, लागै मुचित्यौं आगे आग सी लहरि गयो। दौड़–दौड़ पैदल कंगुरनमे चढ़ि लागै। लेहुकी लहरि सो सोति ताल भरि गयौ। कहु ढ़ाल कहु तरकस तलवार डारि तौलौ। गज सिंह खोलि खिड़की दै निकल गयो। महिनाथ ठाकुर मैथिली साहित्यक सेहो संरक्षक छलाह। हिनके समयमे लोचनक राजतंरगिणी आ नैषध काव्यक रचना भेल छल। हिनकहि समयमे इहो निर्णय भेल जे दरभंगा राज्य भविष्यमे बटत नहि आ ओहि हिसाबे उत्तराधिकारक नियम सेहो बना देल गेल। एकर बाद नरपति ठाकुर शासक भेलाह। दुनू भाए (महिनाथ आ नरपति)क सम्बन्ध केहेन छल से निम्नलिखित काव्यसँ स्पष्ट होएत। कालीक पूजक छलाह– “वदन भयान कानशब कुण्डल विकट दशन धन पाँती। फूजल केश वेश तुअकेँ कहजनि नवजलधर काँती॥ काटल माथ हाथ अति शोभित तीक्ष्ण खङ्ग कर लाइ। भय निर्भय वर दहिन हाथ कए रहिअ दिगम्बर माइ॥ पीन पयोधर उपर राजित रूधिर स्रवित मुण्ड हारा। कटि किङ्किणि शब कर करू मंडित सृक बहु शोणित धारा॥ वसिअ मशान ध्यान शब उपर योगिनि गणरहु साथे। नरपति पति राखिअ जग इश्वरि करू महिनाथ सतार्थ॥ नरपति ठाकुर कुशल योद्धा छलाह आ तलवार भजबामे बेस कुशल। पलामू आ मोरंगमे जे महिनाथ ठाकुर मुगलक सहाय्यक हेतु सेना पठौने छलाह ताहिमे ओ ओहि सेनाक नेतृत्व नरपति ठाकुरक हाथमे देने छलथिन्ह। हुनक बहादुरीसँ सम्राट सेहो बड्ड प्रसन्न छलाह। एकर विवरण कतेको ठाम भेटइत अछि। उपरला पदसँ सेहो एकर भान होइयै। नेपाल तराइमे एकटा मकवानपुर राज्य छल। ओइनवार वंशक अंत भेला इ राजा लोकनि तिरहूत राज्यक किछु हिस्साकेँ हड़पि लेने छलाह। नरपति ठाकुर हिनका विरूद्ध पटनाक सूबेदारक ओहिठाम शिकायत केलन्हि आ ओहिठाम सूबेदारक आश्वासन भेटलापर ओ आन जमीन्दार लोकनिकेँ संग लए शिकार खेलबाक बहानासँ मकवानपुर राज्यपर आक्रमण केलन्हि आ ओतुका राजाकेँ गिरफ्तार कऽ लेलन्हि। ओहि राजाकेँ पकड़िकेँ दरभंगाक फौजदारक ओतए आनल गेल। ओ मिथिलाक राजाकेँ सलाना १२०० टाका आ हाथी नजराना देव स्वीकार कैल। मुगल सम्राटक संग हिनक सम्बन्ध बढ़िया छलन्हि आ तैं हिनका समयमे खण्डवला कुलक प्रतिष्ठा बढ़ल। नरपति ठाकुरक बाद हुनक पुत्र राघव सिंह राजा भेला। ‘ठाकुर’क स्थान ओ ‘सिंह’ पदवी लेलन्हि। उहो अपन पिता जकाँ एकटा प्रतापी शासक छलाह आ हुनका मिथिला पति सेहो कहल गेल छन्हि। बेतियाक राजा ध्रुवसिंहसँ हुनका खटपट भेलैन्ह आ संघर्ष सेहो– “नगहु खङ्ग ध्रुवसिंह तोहि उपर यम चढ़ौ। मिथिलापति सौवेर दिन–दिन तोहि बढ़ौ॥ तेकयत कुलवधिक एतो राघव नृप राजा। एहि दल दलन सम्मथ भीम भारत जिमि गाजा॥ कवि कहत रामरे मूढ़ सुनु जेहि दल प्रचण्ड भैरो रहत। ठहरे न फौज जाथ इति कोन जब सरदार खाँ तेगा गहत”॥ प्रसिद्ध अफगान लड़ाकू सरदार खाँ हिनका दरबारमे छल। बिहारी लाल अपन ‘आयनी तिरहूत’मे लिखने छथि जे औरंगजेब हिनको राजाक उपाधि देने छलन्हि। किछु गोटएक मत छन्हि जे इ पदवी हुनका अलीवर्दीसँ भेटल छलन्हि। एक लाख टाका जमाक हिसाब इ तिरहूत राज्यक मुकर्ररी लेने छलाह। नवावक दिवान धरणिधरकेँ सेहो ५०,००० टाका नजराना दैत छलथिन्ह। मकवानीक राजा जखन वार्षिक नजराना देव बन्द कऽ देलन्हि तखन हुनका मकवानपुरक खिलाफ सेहो आक्रमण करए पड़लन्हि। युद्धक घोषणा होइतहुँ मकवानीक राजा हिनकासँ मेल मिलाप कऽ लेलथिन्ह आ बेसी नजराना देवाक प्रतिज्ञा केलथिन्ह। हिनका समयमे एक आर प्रसिद्ध घटना भेल। बीरू कुरमी जे पहिन हिनका ओतए रहैन्ह तकरा ओ राजस्व पदाधिकारी बनाकेँ धर्मपुर परगन्ना पठौलन्हि। बीरू ओतए अपन एकटा किला बना लेलक आ ओहिसँ राजकेँ राजस्व पठाएब बन्द कऽ देलक। ओकरा विरूद्ध सेना पठाओल गेल आ ओहिमे वीरूक बेटा मारल गेल आ वीरू पराजित भेल। ओकरा सम्बन्धमे निम्नलिखित कहावत अछि– “वीरनगर वीर साह का बसे कौशिका तीर का पति राखे कौशिका का राखे रघुवीर”। बुकाननक पुर्णियाँ रिपोर्टमे लिखल अछि जे वीरूक हाल सुनि सरमस्त अली खाँक नेतृत्वमे दिल्लीसँ सेना पठाओल गेल। पहिल बेर तँ ओ सेना पराजित भऽ गेल मुदा दोसर बेर राघव सिंहक मदतिसँ वीरू पराजित भेल। राघव सिंहक अधिकार पुनः समस्त परगन्नापर भेलैन्ह परञ्च नाथपुर आ गोराड़ी हुनकासँ लकए पुर्णियाँक राजाकेँ दऽ देल गेलैन्ह। राघव सिंह दानी आ उदार व्यक्ति छलाह आ बहुत रास मन्दिर इत्यादिक निर्माण सेहो करौने छलाह। हुनक दूटा शिलालेख उपलब्ध अछि– मधुरवाणीश्वर (परगन्ना हाटी)क शिलालेख–ॐ नमः शिवाय। आसीन्नासीर दासी भवदरि निवह(:) क्ष्माभृताँकोऽपि धन्यः पुण्य(:) श्री शालिखण्डोरय (मल) कव रसमाहुति वंशाग्रगण्यः॥ समस्तो यावदात स्फुरदमलयशोरा सिरस्वती कृतान्य– स्त्रीकः श्रीकण्ठ भक्तिस्फुट घटितमतिस्तीरभुक्तिश्वरोयः॥ तस्य श्रीमन्नरपतिसिंहस्यासन् सुताः फलतपसः श्रीमद् राघव सिंहो येषां ज्यायान्महाराजः॥ श्रीनन्द नन्दन इति प्रथितः पृथिव्यां। सवस्वदोऽस्य नृपतेरभवतकनीयन्। श्री भानुदग्र गुण ठाकुर सिंह नामा। कामारिसक्त हृदयोऽवरजस्तदीयः॥ एतेषांतु विशेषज्ञा प्रज्ञावज्ञातधीरधीः। स्वसामधुरवाणीति नामतोऽप्यर्थतोऽप्यभूतः॥ नखन वंशकवीर श्रीमद्धरिजीव शर्मणः कृतिनः। कल्पमहीरूहदान प्रभृति महादान यायिनी दयिता॥ शाके लोचन वाण (१६५२) भूपति मते मास शुभे माघवे। पक्षे स्वच्छ तरेऽधि पंचभि तिथौवाचस्पतेवसिरे॥ उन्मीलन्मदगण्ड मण्डलवलद्वेतण्ड वृन्देश्वरे। श्रीमद् राघव सिंह नाम्नि मिथिला नाथे महीशासति॥ हुनकर दोसर शिलालेख लोहना गामसँ भेटल अछि– ॐ स्वस्ति। श्रीमद् राघव सिंह वाहु विलंसज्जेत्रास्तविक्षोभित– प्रोधद्धरै महीप संभव यशः शुभ्रीभवद् भुतले। प्राज्ञ श्री बलभद्र वलितो यत्नेन शम्योरिदं गर्भागारम कारयद् दृढ़तरं निर्वाण संप्राप्तये॥ शाके वारण वेदराज कमिते राकेश्वरे भास्वरे पौषे मासि विलासि मोद रचिते कामान्वितायांति थौ। शाके १६४८ राघव सिंहक बाद विष्णु सिंह शासक भेलाह। आ चार वर्ष धरि शासन कए ओ मरि गेलाह। हुनका बाद राजा नरेन्द्र सिंह राजा भेलाह। नरेन्द्र सिंहक शासन काल मिथिलामे बड्ड महत्वपूर्ण मानल गेल अछि। ओ बड्ड वीर छलाह। हुनका सम्बन्धमे चन्दा झा लिखने छथि– “नृपति नरेन्द्र सिंह भेल जखन। अरिधर कानन पसरल तखन॥ ताकि ताकि शत्रुक संघार। कैलन्हि बहुत छात्र व्यवहार॥ कतहु जुद्धि नहि एला हारि। अतिशय तेज तनिक तरूआरि”॥ मुसलमानसँ जखन हिनका संघर्ष भेल छलन्हि तखन नरहनक बबुआन हिनका मदति केने छलथिन्ह। नरेन्द्र सिंह आ नरहनक बबुआनक बहादुरी देखि नवाव आश्चर्यचकित रहि गेल छलाह जकर स्पष्टीकरण निम्नलिखित पद्यसँ होइछ– “ऐसो महाघोर जोर जंग सुल्तानी बीच झुकत बबरजंग संगर करीन्द्र हैं। औलिया नवाव नामदार पूछै बार–बार। ये दोनो कौन लड़त अरिवारण परीन्द्र हैं। साहेब सुजान जैनुद्दिन अहमद खाँ सामनेयय अजेकरत कहत कवि चन्द्र हैं। ये तो द्रोणवारकेँशो साह के अजीत साह आगे राघो सिंह जी के नवल नरेन्द्र हैं। हुनका समयमे बछौर परगन्ना लऽ कए पुनः झंझट ठाढ़ भेल। बछौरक रूपनारायण इ झंझट केने छलाह। नरेन्द्र सिंह नवाव महावत जंगक ओतए जाय मुर्शिदाबादमे अपन दावी रखलन्हि परञ्च नवाव हुनकासँ अनुरोध केलथिन्ह जे ओ बछौर परगन्ना रूपनारायणकेँ दऽ देथुन्ह। राजमहल धरि सब गोटए संगहि अबैत गेलाह आ ओतए पुनः नवाव हुनकासँ आग्रह केलथिन्ह तखन नरेन्द्र सिंह एहि शर्त्तपर देबा लेल तैयार भेलाह जे ओ हुनका (नरेन्द्र सिंहक) प्रति राजभक्त रहताह आ करहिया, चिचरी आ जयनगरपर ओ कोनो प्रकारक दावा नहि करताह कारण इ सब तिरहूत राजाक सम्पत्ति छल। राजा आ नवावमे बढ़िया सम्बन्ध छलन्हि। नरेन्द्र सिंहकेँ जे सुविधा सरकार द्वारा भेटलैक तकर विवरण कम्पनीक कागज सबमे सेहो भेटइत अछि। कन्दर्पी घाटक लड़ाइक विवरण जे लाल कवि कएने छथि ताहिसँ ताहि दिनक मिथिला दरबारक ज्ञान होइछ। नरेन्द्र सिंह अपन पिताक स्मारककेँ चिरस्थायी बनेबाक कारणे सहरसा जिलामे राघवपुर (राघोपुर) नामक स्थानक स्थापना केलन्हि। मठक स्थापनाक हेतु कैक व्यक्तिकेँ दान देलन्हि। हुनक एकटा पत्नी महिषिक छलथिन्ह आ तिनके आग्रहपर ओ महिषिमे उग्रताराक मन्दिरक जीर्णोद्धार केलन्हि। हुनक दरबार विद्वानक हेतु एकटा बड़का आश्रय छल। नरेन्द्र सिंहक पछाति प्रताप सिंह राजा भेलाह। ओ भनवारासँ राजधानी हटाके झंझारपुर अनलन्हि आ फेर ओतएसँ दरभंगा। स्थानीय परम्परामे हुनका “मिथिलेश” कहल गेल छन्हि। ताहि कालमे तिरहूतसँ बंगाल धरि चोर–डकैतक प्रभाव बढ़ि गेल छल आ कम्पनीक रेकार्डमे कहल गेल अछि जे प्रताप सिंह हिनका लोकनिकेँ मदति करैत छलाह। हिनका सजा देबाक बातपर सेहो विचार कैल गेल छल। दान देबामे इहो बड्ड उदार छलाह आ हिनक दानक कैकटा कागज सेहो भेटल अछि। हिनका समयमे फ्रान्सिस ग्रांड दरभंगा (तिरहूत)क कलक्टर छलाह। १७७४मे तिरहूतकेँ पटना प्रोविनसिअल कौंसिलक अंतर्गत कऽ देल गेल। १७७१मे नेपालक पृथ्वीसिंह जे भारत सरकारसँ समझौता कए कर देबाक प्रतिज्ञा केलन्हि से कर भारत सरकारकेँ राजा प्रताप सिंहक माध्यमे पठाओल जाइत छलन्हि। १७७०मे राजा प्रताप सिंहकेँ वंसीटार्ट आ राजा सितावरायसँ तिरहूतक राज्य मुकर्ररी पट्टापर भेटल छलन्हि। ओहि वर्ष तिरहूतक हेतु इस्ट इण्डिया कम्पनी एकटा सुपरभाइजर सेहो बहाल केने छल। कर देबामे विलंब भेलाक कारण हिनका झंझटक सामना करए पड़लन्हि। खेआली राम आ हिम्मत अलीकेँ तिरहूतक आर्थिक हालत जाँच करबाक हेतु पठाओल गेलन्हि। दरभंगाक राजधानी अनबाक सम्बन्धमे निम्नलिखित काव्य उल्लेखनीय अछि– दोहा– “नृत्यत फणिन फणानंपर खंजन पाँखि पसारि सो लाखि सब पूछत भऽये अद्भुत बात निहारि॥ पूछत भये नेरश तब सुनु सोति सब लोग खंजन फणि पर शोभहिं थाको कौन संयोग”॥ कवित्त– कहत लगे है तब मंत्री प्रबल लोग सुनियं मिथिलेश जो ज्योतिषमे प्रमाण है। सरस है भूमि याको जीति न सकत कोउ वास करिबेकेँ यह विधिकेँ निशानि है॥ सुनिकेँ आनन्द उर उमगे उछाह बढ़िकेँ बोले महाराज ने सरस भरि वाणी है। हुकुम हमारी यह जाहिर जहान करो भौरा को छाड़ि यहाँ दरभंगा राजधानी है। दोहा– राजधानी दरभंगा भऽ सकल गुणान खानि भौरा छाड़ि भूप तब सम्मत सबके जानि”॥ विद्या प्रेमी हेबाक कारणे महाराज प्रताप सिंह आलापुर परगन्नाक जगतपुर ग्राम ओ पंडित भवानी नाथ शर्माकेँ दानमे दऽ देलैन्ह जाहिसँ ओ आन आर विद्यार्थीक खर्च चला सकैथ। “महाराजाधिराज श्रीमत प्रताप बहादुरः– वंग देशाटनांतराभेक भूपाले दत्तानेक वृत्तितरा स्वीकारक स्मार्ता धर्मज्ञ तर्क मीमाँसा वेदांतालंकार कानन पञ्चानन धर्मधीर श्री भवानीनाथ शर्मषु वृत्तिपत्रम ददाति सकल छात्राध्ययन निर्वाहाय सूर्य बिहार सरकार पटनाभ्यांतर्गत तीरभुक्त देशांतर्गत परगन्ना आलापुर अंतर्गत जगतपुर सारैण्यक ससीमक सकाननक ग्रामस्य श्री विष्णु प्रीति सम्पादनायच यवनायवन साधारण स्वसपथपूर्वक वृत्ति रक्षणामेव करिष्यति...” हुनका बाद राजा माधव सिंह गद्दीपर बैसलाह। ओ स्थायी रूपेण दरभंगाकेँ अपन राजधानी बनौलन्हि। १७८५सँ अद्यावधि हिनका लोकनिक राजधानी दरभंगा रहल अछि। खण्डवला कुलक इतिहासमे माधव सिंहक शासनकेँ बड्ड महत्वपूर्ण मानल गेल अछि। ओ अपन प्राचीन परम्पराक अनुसार समस्त तिरहूतपर प्रभुत्वक माँग अंग्रेजक समक्ष रखने छलाह आ चिरस्थायी बन्दोबस्तकेँ मनबा लेल तैयार नहि छलाह। एहि हेतु ओ सम्राट शाह आलम द्वितीयक दरबारमे सेहो दरखास्त देने छलाह आ शाह आलमसँ १८०० ई.मे एकर स्वीकृति सेहो भेट गेल छलन्हि। परञ्च कम्पनीक अधिकारी लोकनि हिनक बात नहि सुनलकैन्ह आ नहि शाह आलमक स्वीकृतियेकेँ मानलकैन्ह आ हिनका लोकनिकेँ जमीन्दारक दर्जा दऽ देलकैन्ह आ तहिये इ राजा दरभंगाक जमीन्दारी कहबे लागल जे १९४७ तक रहल। १७८१ खेआली राम राजा कल्याण सिंहक डिप्टी बहाल भेलाह। राजा कल्याण सिंहसँ राजा माधव सिंहकेँ सेहो मतभेद भेल छलन्हि। एम्हर जखन कल्याण सिंह से झंझटि चलिते छलन्हि कि तामे हुनका दरभंगा सदर दिवानीक अदालतक हाकिमसँ सेहो मतभेद शुरू भऽ गेलन्हि। हुनक आदमी सबकेँ गिरफ्तार कऽ लेल गेलन्हि। राय मोहन लाल आ माधव सिंहक बीच तँ झंझट चलिये रहल छलन्हि। १७८३मे डनकनक हस्तक्षेप हिनक मामला सरियेलन्हि। दोसर एकटा झंझट आ हुनका शासन कालमे उत्पन्न भेल। सरदार खान अफगानक बेटा कराम अली अपन मृत्युसँ पूर्व अपन सब सम्पत्ति राजा माधव सिंहकेँ दानमे लिखि देने छलथिन्ह। १७९५मे दरभंगाक कलक्टर, दरभंगाक तहसिलदारकेँ आदेश देलथिन्ह जे ओ कराम अलीक सम्पत्तिकेँ जप्त कऽ लौथ। राजा माधव सिंह एकर विरोध केलन्हि आ ओम्हर कराम अलीक भगिना सेहो एकटा दरखास्त देलक जे कराम अलीक दानपत्र जाली थिक। अंतमे माधव सिंहक जीत भेल आ ओ सम्पत्ति हुनका भेटलन्हि। माधव सिंह उदार आ दानी छलाहे आ बहुत रास मन्दिरक निर्माता सेहो। १८म शताब्दीक उत्तरार्द्धमे समस्त पूर्वी भारतक स्थिति चिंतनीय भऽ गेल छल आ समस्त क्षेत्रमे सन्यासी फकीरक बगे बनाकेँ चौर–डकैत चारूकात उपद्रव करैत छलाह। हिनका सबकेँ संरक्षण आ प्रोत्साहन मोरंगक राजासँ भेटइत छलन्हि। मोरंग आ तिरहूतक सीमा मिलैत–जुलैत छल। सन्यासी–फकीरक नेता छलाह खुर्रम शाह आ ओ ताहि दिन नेपालसँ मुक्त भऽ मोरंगक एकटा गाम मटिहानीमे रहैत छलाह। तिरहूतक सीमापर इ लोकनि आतंक मचौने छलाह। १८०४मे परगन्ना छै आ फरकीयाक तिरहूतसँ अलग कऽ कए भागलपुरमे मिला देल गेलैक। माधव सिंहक समय धरि तिरहूत एक स्वायत्त हिन्दू राज्य छल जकर अपन न्यायालय छलैक आ अपन न्यायाधीश होइत छलैक। एकर सबसँ पैघ प्रमाण इ अछि १७९४ ई.क एकटा न्यायाधीशक निर्णय संस्कृतिमे भेटल अछि जाहिमे गुलामकन्याक उपर स्वत्वाधिकारक प्रश्नपर निर्णय अछि। एहि निर्णयकेँ बड़ा महत्वपूर्ण मानल गेल आ अठारहम शताब्दीक अन्तिम चरण धरि न्यायालयक निर्णय संस्कृतमे लिखल जाइत छल तकर इ प्रमाण थिक आ गुलामक स्थितिपर सेहो प्रकाश पड़इत अछि। माधव सिंहक समयसँ दरभंगा राजक स्थिति पूर्णरूपेण जमीन्दारक स्थितिमे परिवर्त्तित भऽ गेल। माधव सिंहक पछाति छत्रसिंह महाराज भेलाह। १८१२क बाद जखन अंग्रेजकेँ नेपाल संग झंझटि भेलन्हि तखन ओ लोकनि बेतिया, पुर्णियाँ आ दरभंगाक राजा लोकनिकेँ आदेश देलन्हि जे अपन–अपन सीमाक सुरक्षार्थ ओ लोकनि प्रयत्नशील रहौथ। एहि अवसरपर छत्रसिंह अंग्रेज लोकनिकेँ साहाय्य देने छलथिन्ह। एकर कारण इ छल जे नेपाली सब तिरहूत क्षेत्रमे सेहो हुलकी–बुलकी दैत छल आ एम्हर–आम्हरसँ लूट पाट सेहो करैत छल। १८१५मे हुनका महाराज बहादुरक पदवी भेटलन्हि। छत्रसिंहक समयमे बेतिया राज आ तिरहूत राजक बीचक सम्बन्ध बढ़िया भऽ गेल छल। दुनू गोटेकेँ पटनाक पाटन देवीक मन्दिरमे भेट भेलापर स्थितिमे सुधार भेलैक। सौराठक मन्दिरकेँ छत्र सिंह पूरा करौलन्हि आ ओहिमे माधवेश्वर महादेवक स्थापना सेहो। सौराठमे ओ एकटा धर्मशाला सेहो बनबौलन्हि। हुनका बाद महाराज रूद्र सिंह गद्दीपर बैसलाह। हुनका बाद राजा महेश्वर सिंह गद्दीपर बैसलाह। हुनके समयमे सिपाही विद्रोह भेल छल। अंग्रेजकेँ बरोबरि हिनकापर शक बनल रहैत छलन्हि। अंग्रेजक निगरानी हिनकापर रहैत रहैन्ह। नाथपुर आ पुर्णियाँक बीच डाकक व्यवस्थाक हेतु इ अंग्रेजी सरकारकेँ १६टा घोड़सवार सेहो देने रहैथ। संताल विद्रोहकेँ दबेबामे सेहो इ अंग्रेजक मदति केने रहैथ मुदा तैइयो अंग्रेजकेँ हिनकापर विश्वास नहि होइत छलन्हि। १८६०मे हिनका मरलाक बाद दरभंगा १८७८ धरि कोर्ट आफ वार्डसक अधीन रहल। ओकर बाद महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह राजगद्दीपर बैसलाह। ओ एक सफल शासक, कुशल प्रशासक, विद्या प्रेमी, विधायक आ राजनीतिज्ञ छलाह। हुनका समयमे दरभंगा राज्यक उत्तरोत्तर विकास भेल। दरभंगामे लेडी डफरिन अस्पतालक स्थापना आ खड़गपुर (मूंगेर)मे सेहो एकटा अस्पतालक स्थापना केलन्हि। काँग्रेसकेँ बरोबरि चन्दा दैत रहलाह। कलकत्ता विश्वविद्यालयकेँ ओ हृदय खोलिकेँ दान देलन्हि आ दरभंगामे राज स्कूलक स्थापना केँलन्हि। ताहि दिनमे ऐहेन कोनो शिक्षण संस्था नहि छल जहिमे मांगलापर अथवा बिनु मंगनो इ सहायता नहि देने होथि। १८८८मे काँग्रेसकेँ अधिवेशन करबा लेल इ ‘लाउपर कास्ल’ प्रयागमे कीनिकेँ देने छलथिन्ह आ सालाना १०,००० टाका चंदा तँ दैते रहथिन्ह। महात्मा गाँधीसँ सेहो हिनका पत्राचार छलन्हि। ताहि दिनक प्रधान व्यक्ति के. एम. बनर्जी, नरेन्द्र नाथ सेन, आनन्द मोहन वोस, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी, आदिसँ हिनका व्यक्तिगत सम्बन्ध छलन्हि। लेजिसलेटिभ कौंसिलक सेहो इ एकटा प्रमुख सदस्य छलाह आ ओहिमे सक्रिय भाग लैत छलाह। ओ बिहार जमीन्दार सभक सभापति छलाह। ओ एक पैघ पुस्तक प्रेमी सेहो छलाह। हुनका बाद महाराज रामेश्वर सिंह गद्दीपर बैसलाह। ओ बहुत पैघ विद्वान छलाह आ किछु दिनक हेतु मैजिस्ट्रेटक पदपर सेहो नियुक्त भेल छलाह। दरभंगा, छपरा आ भागलपुरमे ओ मैजिस्ट्रेट रहल छलाह। पाछाँ ओहिसँ त्यागपत्र दए ओ लेजिस लेटिभ कौंसिलक सदस्य बनलाह। लक्ष्मीश्वर सिंहक अमल ओ राजनगरमे रहैत छलाह। ओ सरकारक खैरखाह छलाह आ अंग्रेजक संग हिनक सम्बन्ध बढ़िया छलन्हि। सनातन धर्म सभाक ओ सर्वेसर्वा छलाह। ओ बिहार जमीन्दार सभाक आजीवन सभापति रहलाह। ओ एक धार्मिक व्यक्ति छलाह। हिन्दू विश्वविद्यालयक स्थापनामे हुनक विशेष योगदान छलन्हि। हिनके प्रयासे बिहारमे संस्कृत एशोसियेसनक स्थापना भेल छल। हिनका बाद १९२९मे महाराज कामेश्वर सिंह गद्दीपर बैसलाह। गद्दीपर बैसितहि ओ राजनगर अपन छोट भाए कुमार साहेबकेँ दऽ देलन्हि। इ राउण्‍ड टेबिल कंफ्रेंसमे भाग लेने छलाह। जमीन्दार सभाक सभापति इहो बनल रहलाह। १९४७मे जमीन्दार उन्मूलन भेलाक बाद आन जमीन्दारी जकाँ दरभंगा राज्यक जमीन्दारी सेहो समाप्त भऽ गेल। पटना विश्वविद्यालयमे रामेश्वर सिंह मैथिली चेयरक हेतु इ १,२०,००० टाका दान देने छलाह। संस्कृत एशोसियेसनक सभापति इ बनल रहलाह आ अंतमे अपन “आनन्दवाग पैलेस”केँ संस्कृत विश्वविद्यालयक स्थापनाक हेतु दानमे देलन्हि। संस्कृत एशोसियेसनकेँ “मिथिलेश महेश” लेक्चररशिपक हेतु सेहो दान देने छलाह। दरभंगामे मिथिला रिसर्च इंस्टीच्युटक स्थापना हिनके दानस्वरूप सम्भव भेल। विभिन्न विश्वविद्यालय, महाविद्यालय आ स्कूलकेँ दान देवाक अतिरिक्त, इ पटनामे ‘इंडियन नेशन, ‘आर्यावर्त्त’ आ ‘मिथिला मिहिर’ पत्र–पत्रिकाक स्थापना सेहो केलन्हि। राज कम्पाउंडक आधुनिकीकरण हिनके समएमे भेल। ‘दरभंगा इम्प्रूभमेंट ट्रस्ट’क स्थापना हिनके प्रयासे भेल छल। अाधुनिकीकरण १, १९६२केँ हिनक मृत्यु भेलन्हि आ खण्डक्‍टवला कुलक परम्पराक सूर्यास्त ओहि दिन भेल। हुनकासँ तीन वर्ष पूर्वहिं हुनक छोट भाए (कुमार साहेब)क मृत्यु भऽ चुकल छलन्हि जाहिसँ ओ बड्ड दुखी रहैत छलाह। महाराजाधिराज कामेश्वर सिंहकेँ कोनो संतान नहि छलन्हि आ तैं ओ अपना मरबासँ पूर्व एकटा “विल” बना देने छलाह जकर एक्जीक्युटर भेला पटना उच्च न्यायालयक भूतपूर्व न्यायाधीश पंडित लक्ष्मीकांत झा जे सम्प्रति काज कऽ रहल छथि। राजा बहादुर विशेश्वर सिंह (कुमार साहेब)क तीनटा पुत्र छथिन्ह कुमार जीवेश्वर सिंह, कुमार यज्ञेश्वर सिंह आ कुमार शुभेश्वर सिंह। अहिमे कुमार शुभेश्वर सिंह अपन पित्तीक परम्पराक निर्वाह करबाक प्रयासमे प्रयत्नशील छथि आ सभ तरहे सामाजिक आ सांस्कृतिक कार्यमे भाग लैत छथि। महेश ठाकुरक स्थापित खण्डवला कुलक इतिहास मिथिलामे ओतवे महत्वपूर्ण जतवा कर्णाट वंशक आ ओइनवार वंशक। अहि तीनू वंशमे सभसँ बेसी दिन शासन केलन्हि खण्डवला कुलक लोग। (खण्डवलाक इतिहासक हेतु देखु हमर निबन्ध– “द खण्डवलाज आफ मिथिला” जाहिमे माधव सिंह धरि पूर्ण विवरण उपलब्ध अछि।) अध्याय–१० मिथिला आ नेपाल नेपाल शब्दक उद्गम एखन धरि रहस्यमय अछि। अति प्राचीन कालसँ नेपालक इतिहास मिथिलाक इतिहास संग निकटतम रूपें संबंधित अछि। मिथिला एहेन स्थान रहल अछि जाहिठाम नाना प्रकारक धार्मिक आन्दोलन एवँ दर्शनक उत्पत्ति भेल छैक आ नेपाल ओहि आन्दोलन सबकेँ उर्वरा शक्ति देलकै जाहिसँ वो आन्दोलन सब पुष्पित वो फलदायक भेल। नेपालमे आर्यत्वक विकास मिथिले बाटे भेलैक। एहिठाम हम मिथिला आ नेपालक मात्र राजनैतिक सम्बन्धक चर्चा करब। किरातः- भूतकालक कुहेसक मध्य नेपालक प्रारंभिक इतिहासक विषयमे किछु विशेष ज्ञात नहि अछि। ई.पू. ५९०सँ ११०ई. धरि नेपाल किरात संस्कृतिक प्रधान केन्द्र छल। किरातक वर्णन शुक्ल यजुर्वेदमे आएल छैक। इहो कहल जाइत छैक जे अति प्राचीन कालसँ किरात लोकनि पूर्वी नेपालमे रहैत जाइत छलाह। ‘किराते’ शब्द जंगली अनार्य जातिकेँ सूचित करैछ जे पहाड़पर एवँ भारतक उत्तरपूर्वी भागमे रहैत छलाह। सिल्वाँ लेवीक विचार छन्हि जे किरातक उत्पत्ति मंगोलसँ भेल छल आ दुनू एक्के छलाह। महाभारतसँ ज्ञात होइछ जे जखन अर्जुन हिमालयमे तपस्या करैत छलाह तखन महादेव किरातक भेषमे अर्जुनक परीक्षा लेने छलाह। महाभारतक वनपर्वमे एकटा किरातपर्व सेहो अछि आ यजुर्वेद शतरूद्रीयसँ सेहो एहिपर प्रकाश पड़इयै। भारतक उत्तरी पूर्वी सीमा सेहो किरात संस्कृतिसँ सम्बन्धित छल। ओ सब पूर्वी हिमालयक वासी छलाह। अपन दिग्विजयक क्रममे भीमकेँ विदेह देश छोड़लाक पश्चात किरात सबसँ भेंट भेल छलन्हि। किरात लोकनि पीअर रंगक होइत छलाह। लेवीक अनुसार किरातक सम्पर्क चीन आ म्लेच्छसँ सेहो छलन्हि। रामायणसँ सेहो प्रमाणित अछि जे किरात लोकनि पीअर रंगक होइत छलाह। विष्णु पुराण एवँ मार्कण्डे पुराणसँ ज्ञात होइछ जे इ लोकनि पूर्वी भारतमे रहैत छलाह। वो हिमालयक दक्षिणी मार्गपर सम्पूर्ण उत्तर–पूर्वी भारतमे, नेपालसँ सटले उत्तरी बिहारमे आ गंगाक उत्तरी भागमे बसि गेल छलाह। इ उएह प्रदेश छल जाहि मध्यसँ चीनक व्यापार भारतक गंगावर्ती धरातलसँ होइत छलैक। नेपाल–मिथिलाक संस्कृतिक इतिहासमे हिनका लोकनिक महत्वपूर्ण स्थान छैक। प्रारंभमे संभवतः किरात लोकनि नेपालक स्थानीय राजवंशी छलाह। नेपालपर किरात लोकनिक राज्य बहुत दिन धरि छलन्हि। वो लोकनि ई.पू, ६००सँ संभवतः नेपालपर राज्य करैत छलाह। हिन्दू संस्कृतिक विकासमे वो नेपालमे भारतीय मंगोलियनक प्रमुखताक हेतु सब पृष्ठाधार बनौलन्हि। प्रायः ई.पू.३१२मे जखन संभूत विजय मरि गेला तखन जैन धर्मावम्बीमे विभाजन भेल आ तकर पश्चात उत्तर भारतमे बारह वर्ष धरि अकाल रहलैक। भद्रवाहु नामक एक जैन साधु अकाल भेलापर दक्षिण दिसि चल गेला आ अकाल समाप्त भेलापर घुरला। जैन धर्मसँ छुटकारा लए ओ अपन शेष जीवन व्यतीत करबाक हेतु नेपाल चल गेला। जैनी सबहक जुटान पटनामे भेल आ हुनका तकबाक हेतु स्थूलभद्र नेपाल गेला आ ओतए हुनकासँ चौदह पर्व पओलन्हि। गौतम बुद्धक जन्म तँ नेपाल क्षेत्रमे भेल परञ्च ओ नेपाल भ्रमण केने छलाह अथवा नहि से कहब कठिन। अशोकक प्रयाससँ नेपालमे बौद्ध धर्मक प्रसार भेल। कहल जाइछ जे कौटिल्यकेँ सेहो नेपालक पूर्ण ज्ञान छलन्हि। अशोकक समकालीन नेपालमे छलाह स्थुमिको। नेपाल उनक हेतु विशेष प्रसिद्ध छल। लुम्बिनीमे अशोक ४८ गोट स्तूपक निर्माण करौने छलाह आ स्थुमिकोक शासन कालमे वो स्वयं नेपालो गेल छलाह। अशोकक समयमे नेपालक शासन किरात लोकनिक हाथमे छलैक। अशोकक पुत्री आ जमाय नेपालमे छलाह। अशोकक बादो दशरथक प्रभाव नेपालमे बनल छलैक। नेपाल आ मिथिलाक सम्पर्क मौर्य साम्राज्यक ह्रासक समय धरि बनल छलैक। शूंग कालक मुद्रा पश्चिमी नेपालसँ प्राप्त भेल अछि जाहि आधारपर इ अनुमान लगाओल जाइत अछि जे शुंग लोकनिक एक प्रकारक दुर्बल नियंत्रण नेपालपर छलन्हि। कुषाण लोकनिक शासन चम्पारण धरि छल आ तिरहूतोपर हुनका लोकनिक प्रभाव छलन्हि। नेपालपर कुषाण शासन हेबाक समर्थन स्वर्गीय जायसवाल महोदय केने छथि। कुषाण मुद्राक पता काठमाण्डु लग सेहो लगलैक अछि तैं जायसवाल महोदयक विचारकेँ मान्यता भेटइत छैक। ‘रधिया’ नामक ग्रामसँ सेहो कतेक रास ताँमाक मुद्रा विम कैडफिसेज आ कनिष्कक भेटल छैक आ जँ एहि प्रमाणपर किछुओ विश्वास कैल जाइक तँ कुषाण शासनक प्रमाण सिद्ध होइत छैक। कैक शताब्दी धरि नेपालपर शासन करैत काल किरात सबकेँ जखन–तखन अनायास विड़रो सबसँ संघर्ष करए पड़लन्हि। राजनैतिक अस्थायित्वक रहितहुँ ओ सांस्कृतिक जीवन आ राजनीतिक नियमक स्थापनामे बहुत किछु केलन्हि। किछु विद्वानक मत छन्हि जे इण्डो मंगोलाइड सब सर्वप्रथम भारतपर शासन केलन्हि आ तब नेपाल गेला। सुसंस्कृत इण्डो मंगोलाइडक रूपमे नेपालक नेवारक उल्लेख भेल छैक। नेवार लोकनि प्रायः ई.पू. तेसर शताब्दीमे एला। ताधरि अशोक पाटनमे बहुत रास बौद्ध चैत्यक निर्माण कऽ चुकल छलाह। तहियासँ ओहि क्षेत्रमे बौद्ध धर्मक प्रसार बनले रहल आ बादमे महायान सम्प्रदायक पद्धति ओ विचार सेहो बिहारेसँ ओतए गेल। ओहिठामक शैव, शक्ति आ वैष्णव धर्मक सम्बन्धमे सेहो इएह कहल जा सकैत अछि। इ सभ आंशिक रूपमे उत्तरी बिहारक आरंभक मंगोलाइडक प्रतिक्रिया स्वरूप छल। आर्यीकरणक पूर्व मिथिला सेहो किरात संस्कृतिक प्रधान केन्द्र छल। इण्डो मंगोलाइड एकटा सामूहिक संस्कृतिक विकासमे पैघ योगदान देलन्हि। ११०ई.क आसपास किरात वंशक अंत नेपालमे भेल आ तखनसँ लऽ कए २०५ ई. धरि नेपालक इतिहास अन्धकारपूर्ण अछि। एहि बीच कोनो लिखित प्रमाण नहि भेटइयै। गुणाढ़यक ‘बृहत्कथा’मे नेपाल देशक शिव नामक नगरमे राजा यशकेतुक शासन करबाक उल्लेख भेटइयै। कखन आ कोन प्रकारे किरात लोकनिक ह्रास भेल से हमरा लोकनि नहि जनैत छी आ ने तकर कोनो ठोस सबुते भेटइत अछि। इहो कहल जाइत अछि जे ‘निमिष’ नामक एक गोट राजा नेपालमे विजय प्राप्त केने छलाह आ निमिष राजवंश करीब १४५ वर्ष धरि ओतए शासन केने छलाह आ एहि वंशमे पाँच गोट राजा भेल छलाह– निमिष मनाक्ष, काकवर्मन, पशुप्रेक्ष देव, आ भास्कर वर्मन। एहि राजवंशक समयमे आर्य लोकनिकेँ नेपालमे शरण भेटलन्हि। पशुप्रेक्ष देव नेपालमे पशुपतिनाथक मन्दिरक स्थापना केलन्हि आ भारतसँ आर्यसबकेँ अनलन्हि। एकर बाद नेपालमे लिच्छवी वंशक शासन शुरू होइत अछि। लिच्छवी वंशक इतिहास:- लिच्छवीक सम्बन्ध मनु लिखैत छथि– “द्विजातयः सर्वणासु जनयन्त्य व्रतांस्तुयान्। तांसावित्री परिभ्रष्टान् व्रात्यानितिविनिर्हिशेत्॥ व्रात्यातु जायते विप्रात्पापात्मा भूजकण्टकः। आवंत्यवाट धानौच पुष्पधः शैख एवचः॥ झल्लोमल्लश्च राजन्यांद् व्रात्यन्निच्छिविरेवच। नरश्य करणश्चैव खसाँ द्रविड् एवच”॥ (एहि सम्बन्धमे देखु हमर “व्रात्यज इन एंसियेंट इण्डिया”) लिच्छवी लोकनिक सम्बन्ध नेपालसँ बड्ड घनिष्‍ठ छलैक। किछु विद्वानक विचार छन्हि जे इहो लोकनि मंगोलाइडसँ उद््भूत छलाह। नेपालक मल्ल, खस आदिक कोटिमे मनु लिच्छवी (निच्छवी)केँ रखने छथि। लिच्छवी लोकनिक प्रभाव मिथिलामे अत्यधिक विकसित छलैक आ ओतहिसँ इ लोकनि नेपाल धरि अपन शक्तिक प्रसार केलन्हि। नेपालमे किरात शासनक अवसान भेलापर सोमवंशी एवँ सूर्यवंशी लोकनिक शासनक संदिग्ध प्रमाण अछि। निमिष वंशकेँ सोमवंशी कहल गेल अछि आ ओकर बादे सूर्यवंशी राज्यक स्थापना भेल। लिच्छवी लोकनि निमिष वंशकेँ उखाड़ि फेकलन्हि आ तकर बाद लगभग ५००वर्ष धरि नेपालपर शासन केलन्हि। नेपाली संवत जे १११ई.सँ आरंभ छैक सैह संभवतः लिच्छवी लोकनिक राज्यारोहणक संकेत दैत अछि। ओहुना अखन इएह मान्य अछि जे लिच्छवी लोकनि नेपालमे इस्वी सन् प्रथम शताब्दीक समीप अपन साम्राज्यक स्थापना केने छलाह आ अपन संवतक प्रारंभ सेहो। सूर्यवंशी शासनक स्थापनाक पश्चाते नेपालमे यथार्थ एतिहासिक कालक प्रारंभ मानल जाइत अछि। दुनू राजवंश मिथिलासँ आएल छल एहि सब राजवंशक समयमे नेपाल आ मिथिला नियमित रूपें राजनैतिक आ साँस्कृतिक सन्दर्भ बनल रहलैक। प्रथम ऐतिहासिक राजा भेलाह जयदेव। हुनका आ जयदेव द्वितीयक बीचमे 33टा राजा भेल छलाह। समुद्रगुप्तक समयमे नेपाल गुप्त साम्राज्यक चाङ्गुरमे पड़ल छल। प्रयाग प्रशस्तिसँ एकर स्प्ष्टीकरण होइछ– नेपालक सीमांत शासकक सेवा प्राप्त करबाक संदर्भ अछि। सूर्यवंशी लिच्छवी कोनो शासक नेपालमे तखन रहल होएताह जनिका हेतु “प्रत्यन्त नेपाल नृपति” शब्दक व्यवहार कैल गेल अछि। मिथिलासँ नेपाल धरि तखन लिच्छवी लोकनिक विस्तार छलन्हि आ समुद्रगुप्त लिच्छवी दौहित्र छलाह तैं एहि घटनाकेँ मात्र घरेलु घटना मानल जा सकइयै। एहि युगमे नेपालमे वैष्णववादक प्रवेश भेल। मान देवक चंगुनारायण मन्दिरक शिलालेख एवँ आन–आन शिलालेखसँ इ ज्ञात होइछ जे लिच्छवी राजा लोकनि बौद्ध धर्म, ब्राह्मण धर्म, शैव धर्म, वैष्णव धर्म, शाक्त आदि सबकेँ प्रोत्साहन दैत छलाह। नरेन्द्र देवक शासन कालमे मत्स्येन्द्र नाथ नामक संप्रदायक प्रचलन भेल। लिच्छवीक समयमे महायान शाखा सेहो अपन आकार ग्रहण केलक। लिच्छवी लोकनि ३५०सँ ८९९ धरि शासन केलन्हि–बीचमे मात्र अंशुवर्मन आ जिश्नुगुप्त छोड़िकेँ जे स्वतंत्र शासन केने छलाह। अंशुवर्मन:- महासामंत अंशुवर्मन सातम शताब्दीक पूर्वार्द्धक एकटा महत्वपूर्ण शासक भेल छथि। वो अपनाकेँ महासामंत कहने छथि। वो बेश शक्तिशाली शासक छलाह आ तराइ राज्यक विशिष्ट भागकेँ अपना राज्यमे मिला लेने छलाह। अपन राज्यक विस्तार ओ बेतिया धरि कऽ लेने छलाह जतए हुनक साम्राज्यक सीमा हर्षक साम्राज्यसँ मिलैत छल। प्रसिद्ध व्याकरणाचार्य चन्द्रवर्मन एवँ नालन्दा विश्वविद्यालयक प्रसिद्ध शिक्षक अंशुवर्मनक दरबारक शोभा बढ़ौने रहथिन्ह। अंशुवर्मन जाहि नेपाल राज्यक स्थापना केलन्हि ताहि परम्पराकेँ जिश्नुगुप्त रखलन्हि आ बढ़ौलन्हि। ६४३मे अंशुवर्मनक मृत्युक पश्चात नरेन्द्र देवक नेतृत्वमे नेपालमे लिच्छवी शासनक पुनर्जन्म भेलैक। लिच्छवी शासन नेपालमे किछु अवधि धरि रहलैक एकर प्रमाण हमरा मंजूश्री मूलकल्पसँ भेटइत अछि– “भविष्यति तदाकाले उत्तरां दिशिमाश्रृतः। नेपाल मण्डले ख्याते हिमाद्रे कुक्षिमाश्रिते॥ राजा मानवेन्द्रस्तु लिच्छवीनां कुलोद्भवः। सोऽपि मंत्रार्थ सिद्धस्तु महाभोगी भविष्यति॥ पतनक कारण– “उदयः जिहनुनोह्यंते म्लेच्छानां विविधास्तथा। अभ्योधे भ्रष्ट मर्यादा बहिः प्राज्ञोपभोजिनः॥ शस्त्र सम्पात विध्वस्ता नेपालाधिपतिस्तदा। विद्या लुप्ता लुप्तराजानो म्लेच्छ तस्कर सेविनः”॥ (राहुलजी द्वारा सम्पादित) मानदेव लिच्छवी छलाह आ तकर बादो कैकटा लिच्छवी शासक भेलाह। लिच्छवी शासनक प्रसंगक उल्लेख हियुएन संग सेहो केने छथि। अंशुवर्मन ‘महासामंत’ कहबै छथि जाहिसँ मान होइयै जे जो ६३३ई.धरि लिच्छवी राजाक प्रभुत्वक स्वीकार करैत छलाह। नेपालक वैवाहिक सम्बन्ध सेहो बिहारसँ चलैत छल। सोमदेवक विवाह मौखरी भोगवर्मनक पुत्री ओ आदित्य सेनक प्रपौत्री वत्स देवीसँ भेल छलन्हि। अहीर:- मंजूश्री मूलकल्पमे मानदेव द्वितीयक पश्चात राज विप्लवक वर्णन भेटइयै जाहिसँ ज्ञात होइछ जे नेपालमे गोलमाल भेल छल। अहीर लोकनिक आक्रमणसँ नेपाल आक्रांत छल। वंशावलीक अनुसार वो लोकनि भारतक समतलसँ आएल अहीर छलाह। हिनका लोकनि अहीरगुप्त सेहो कहल गेल छन्हि। ५००सँ ५९०क बीच एहिमे पाँचटा शासक भेलाह जाहिमे परमगुप्त पराक्रमी छलाह आ ओ लिच्छवी लोकनिकेँ शिकस्त केने छलाह। हुनक एकटा पौत्र सिमरौनगढ़मे शासन करैत छलाह। ओहि राजवंशक दोसर शाखा तराइमे शासन करैत छल। जयगुप्त द्वितीयक मुद्रा चम्पारण आ मगधमे भेटल अछि। ६४३–४४मे जिश्नुगुप्तक पश्चात अहीरवंश दू भागमे बटि गेल छल आ लिच्छवी लोकनि पुनः अपन राज्यकक स्थापना कऽ लेने छलाह। तकर बाद नेपालकेँ तिब्बतमे मिलि जेबाक संभावना बुझि पड़इयै आ मंजूश्री मूलकल्पमे एकर अप्रत्यक्ष प्रमाण अछि। इ उएह समय छल जखन तिब्बती राजा चीनी राजदूतकेँ तिरहूतपर आक्रमण करबाक हेतु साहाय्य देने रहथिन्ह आ संभव जे ओहिक्रममे नेपालपर तिब्बती प्रभाव बढ़ि गेल हो। मंजूश्री मूलकल्पसँ ज्ञात होइत अछि नेपाल शासन अन्यायी म्लेच्छपर निर्भर रहए लागल छल तथा राज्यक प्रथा समाप्त भऽ गेल छलैक। तिब्बती शासक श्राँगक विवाह अंशुवर्मनक बेटीसँ भेल छलैक। ७०३क बाद नेपाल विदेशी शासनसँ मुक्ति पेवाक हेतु माथ उठौलक। धर्मदेवक पुत्र मानदेव तृतीय विजयक चारिटा स्तंभ निर्मित केने छलाह। लिच्छवी लोकनिक पुनरागमनसँ नेपालक सवतोमुखी विकास भेल। ७०५ ई. मानदेव तृतीयक चंगुनारायण अभिलेखसँ ज्ञात होइछ जे ओ मल्ल सबहिक संग युद्ध कएने छलाह आ गण्डक धरि पहुँचि गेल छलाह। स्वंयभुनाथ शिलालेखसँ तत्कालीन संविधानपर सेहो प्रकाश पड़इत अछि। एहिठाम इ स्मरणीय थिक जे नेपालक लिच्छवी बरोबरि मिथिलासँ सम्पर्क बनौने रखैत छलाह। शिवदेवक विवाह आदित्यसेनक पौत्रीसँ छलन्हि। शिवदेवक पश्‍चात जयदेव गद्दीपर बैसलाह आ हुनक पदवी छलन्हि ‘परचक्रकाम’। जयदेव शक्तिशाली शासक छलाह। शिवदेव अपना शिलालेखमे अपनाकेँ–“भट्टारक महाराज लिच्छवी कुलकेतु” कहने छथि। जयदेवकेँ कश्मीर धरि विजयक श्रेय देल जाइत छन्हि। जयदेव मिथिलाक सीमा धरि अपन राज्यक विस्तार केने छलाह आ हुनक सम्पर्क पाटलिपुत्र आ गौड़सँ सेहो बढ़िया छलन्हि। ८७९–८८०मे राघव देव नेपालक संवत चलौलन्हि मुदा हिनका जयदेवसँ कोन सम्बन्ध छलन्हि से हमरा लोकनि नहि जनैत छी। लिच्छवीक पश्चात नेपालक ठाकुरी राजवंशक सम्पर्क अपना सबहिक क्षेत्रसँ बढ़िया छलैक। नेपालमे महायानक प्रधानता छल आ ओहिठामक विद्यार्थी नालंदा (आ बादमे विक्रमशिला)मे पढ़बाक हेतु अबैत छलाह। पालवंशक समयमे इ सम्बन्ध आ घनिष्ट भऽ गेल। रमेश चन्द्र मजुमदारक मत छन्हि जे इमादपुर (मुजफ्फरपुर)मे जे पाल अभिलेख भेटल अछि ताहिपर जे संवत ४८ पढ़ल गेल अछि से भ्रामक अछि आ ओकरा नेपाली (नेवारी) संवत–१४८ बुझबाक थिक जे १०४८ई.क बरोबरि होइत अछि आ जखन मिथिलापर महिपाल प्रथम शासन करैत छलाह। सब तथ्यक स्पष्ट अध्ययन केला उत्तर हुनक मंतव्य छन्हि जे मूर्तिक समर्पित केनिहार व्यक्ति नेपाल वासी रहल होएताह आ तैं ओ नेवारी संवतक व्यवहार कएने छथि। १०३८मे नेपाली लोकनि मिथिला बाटे विक्रमशिला गेल छलाह आ ओतएसँ अतीश दीपंकरकेँ लऽ कए तिब्बत घुरल छलाह। अतीशक नेपाल पहुँचलाक बाद नेपाली महायानमे तंत्रक प्रवेश भेलैक। एग्यारहम शताब्दीमे नेपाल आंतरिक रूपें बटि गेल तीन राज्यमे–पाटन, काठमाण्डु आ भातगाँव आ ओहिठाम केन्द्रीय सत्ताक सर्वथा अभाव भऽ गेल आ एहिसँ लाभ उठाकेँ विभिन्न राज्यक आक्रमण नेपालपर शुरू भऽ गेलैक। चालूक्य, कलचुरी, यादव, जैतुंगी आदिक शिलालेखसँ ज्ञात होइछ जे इ सब नेपालपर आक्रमण कएने छलाह। एहि स्थितिसँ लाभ उठाए नान्यदेव सेहो नेपालपर आक्रमण केलन्हि। नान्यदेव नेपालपर मिथिलाक आधिपत्य स्थापित करबामे समर्थ भेलाह। राजकरैत शासक सबकेँ पदच्युत कऽ ओ अपन राजधानी भातगाँवमे बनौलन्हि। नेपाली परम्पराक अनुसार वो काठमाण्डुक जगदेव मल्ल एवँ पाटन–भातगाँवक आनंद मल्लकेँ बन्दी बनौलन्हि आ जे सब हिनक प्रभुत्व स्वीकार केलन्हि हुनका इ माफ कऽ देलथिन्ह। नेपालमे नान्यदेवकेँ कहियो चैन नहि भेटलन्हि आ बरोबरि किछु ने किछु खटपट होइते रहलैन्ह। एकमत इहो अछि जे नान्यदेवकेँ पुनः दोसर बेर (११४१मे) नेपालपर आक्रमण करए पड़लन्हि। नान्यदेवक प्रभुत्व तँ नेपालपर बनल रहलैन्ह मुदा हुनक उत्तराधिकारी लोकनि ओकरा रखबामे समर्थ भेलाह कि नहि से एकटा संदिग्ध विषय। परम्परानुसार नान्यदेवक एकटा पुत्र नेपालपर शासन करैत छलाह। संभवतः मल्लदेव एहिठामक शासक छलाह आ भीठ भगवानपुर धरि हिनक राज्यक प्रसार छल। नरसिंह देवक समयमे मिथिला आ नेपालमे फेर खटपट भेलैक आ दुनू राज्य अलग भऽ गेल। मिथिलासँ नेपाल पृथक भऽ गेल। नान्यदेवक बादहिसँ नेपालमे कर्णाट शासन दुर्बल भऽ गेल छलैक आ नेपालमे कर्णाट शासनकेँ ठाकुरी राजा लोकनि उखाड़ि फेकने छलाह। एहि आस पासमे नेपालमे मल्ल लोकनिक उत्थान सेहो देखबामे अवइयै। इ वंश अरि मल्लदेवसँ शुरू होइछ। नीलग्रीव स्तंभ अभिलेखसँ ज्ञात होइछ जे धर्ममल्ल आ रूपमल्ल नेपालक मल्ल लोकनिक पूर्वज छलाह। एहि वंशक प्रमुख शासक छलाह अरि मल्लदेव। मल्ल लोकनिक प्रभुत्वक कालमे मिथिलाक मंत्री चण्डेश्वर नेपालपर आक्रमण केलन्हि आ नेपालक राजाकेँ पराजित केलन्हि। चण्डेश्वरक ‘कृत्य रत्नाकर’मे सेहो एकर विवरण अछि। वाग्मतीक तटपर एहि उपलक्ष्यमे तुलापुरूष दानक उल्लेख सेहो अछि। १३१४मे नेपालपर दक्षिणसँ (मिथिला) चढ़ाइक प्रमाण स्पष्ट अछि। हरिसिंह देव पराजित भेला उत्तर नेपाल गेला आ नेपाली शासक बिना प्रतिरोध आत्मसमर्पण कऽ देलकन्हि। हरिसिंह देव भातगाँवमे सूर्यवंशी राजवंशक परिपाटी स्थापित केलन्हि। ओ अपन शक्तिकेँ नेपालमे पुनः संगठित केलन्हि आ कर्णाट प्रभुत्वक स्थापना सेहो। भातगाँवसँ ओ शासन करैत छलाह आ ओतहि ओ तुलजादेवीक मन्दिरक स्थापना केलन्हि। नेपालमे हुनक सार्वभौम होएबाक निम्नलिखित अभिलेखसँ स्पष्ट अछि– “जातः श्रीहरिसिंह देव नृपति प्रौढ़ प्रतापोरयः। तद्वंर्श विमले महारिपुहरे गाम्भीर्यरत्नाकरः॥ कर्त्तायः सरसामुपेत्य मिथिलां संलक्ष्य लक्षप्रियो। नेपाले पुनरोद्य वैभवयुते स्थैर्यं विधते चिरम्॥ हरिसिंह देवक नेपाल आक्रमणक प्रश्नपर इतिहासकारक मध्य काफी मतभेद अछि। लुसिआनो पेतेकक विचार छन्हि जे मल्ल लोकनि स्वतंत्र छलाह आ अपनाकेँ महाराजिधराज परमेश्वर परमभट्टारक कहैत छलाह जाहिसँ इ भान होइछ जे हुनका लोकनिपर कोनो विदेशी सत्ताक शासन नहि छलन्हि। मिथिलापर चण्डेश्वर द्वारा आक्रमणक बातकेँ ओ मनैत छथि परञ्च ओ इहो कहैत छथि जे ओहि आक्रमणक फले मिथिलाक आधिपत्य नेपालपर नहि भेलैक। मिथिलासँ भागलापर ओ नेपालमे अपन राज्य बनौलन्हि तकरा वो नहि मनैत छथि। एकटा वंशावली पोथीक आधारपर इहो सिद्ध कएने छथि जे हरिसिंह देव नेपाल पहुँचलाक बाद मरि गेला आ रजगाँवक माँझी भारो हुनक पुत्रकेँ गिरफ्तार कए बंदी बना लेलकन्हि आ धन–वित्त छीनि लेलकन्हि। एवँ प्रकारे हरिसिंह देवक वंश एहिठाम समाप्त भऽ गेलैन्ह। लुसिआनो पेतेकक मतकेँ हम ओहिना राखि देने छी जेना वो लिखने छथि। इहो कहल जाइत अछि जे ओहि समयमे पश्चिमी नेपालसँ आदित्यमल्लक आक्रमण सेहो भेल छल। तिरहुतिया जगतसिंह सेहो किछु दिनक हेतु नेपालमे राज्य केने छलाह। एक विद्वानक अनुसार हरिसिंह देवक परिवार एवँ हुनक उत्तराधिकारी हुनका बादो नेपालपर शासन केलक। उत्तराधिकारी लोकनिक नाम एवँप्रकारे अछि– i. मतिसिंह–(१३१५–६९)– सिमरौनगढ़क राजगद्दीपर सेहो राज्य केलन्हि आ नेपालपर सेहो। चीनक सम्राट सिमरौनगढ़ शासककेँ मान्यता दैत छलथिन्ह। शमशुद्दीन इलियास जखन नेपालपर आक्रमण करबाक हेतु बढ़लाह तखन ओ सिमरौन गढ़क शासककेँ सेहो परास्त केलन्हि आ ओहि बाटे नेपाल गेलाह। मतिसिंहक नामपर मोतिहारी अछि। ii. शक्ति सिंह iii. श्यामसिंह– हिनका कोनो पुत्र नहि भेल आ हुनक पुत्रीक विवाह मल्लवंशक राजकुमारसँ भेल। मतिसिंहक ओतए चीनक दूत आएल छल। चीनक सम्राटक ओहिठामसँ एकटा मोहर सेहो आएल छलैक आ शक्तिसिंहक ओहिठाम सेहो एकटा चीनी सम्राटक मोहर आ पत्र आएल छलैक। श्यामसिंहक राज्यारोहणक चीनी सम्राटक हाथे भेल छल। एहि तथ्य सबसँ प्रत्यक्ष अछि चीनी सम्राट एहि कर्णाटवंशीकेँ नेपालक सार्वभौम राजा बुझैत छलाह। अहु सम्बन्धमे पेतेकक मत अछि जे इ सब बात गलत थिक। १३८२ ई. क इथाम बहाल अभिलेखसँ स्पष्ट होइयै जे मदन रामक पुत्र शक्तिसिंह नेपाली अनेक रामक वंशज छलाह ने कि कर्णाट वंशीय। नेपालक इतिहासमे अहुखन कतेको मतभेद अछि आ रहत। रज्जलदेवीक पति जयार्जुनक शासनकालमे जयस्थिति मल्ल द्वारा राज्य शासनमे नियम विरूद्ध विप्लव कैल गेल। जयस्थितिकेँ सिमरौनक हरिसिंह देवक वंशज कहल गेल अछि। नायक देवी आ जगतसिंहक पुत्री रज्जलादेवीसँ जयस्थिति विवाह केलन्हि। जयस्थिति जयार्जुनकेँ पराजित कए नेपालक राजा भेलाह। ओ सूर्यवंशी कर्णाटक योग्य प्रतिनिधि सिद्ध भेलाह। पृथ्वीसिंहक आधिपत्य स्थापित होयबाक समय धरि हुनक वंश शासन करैत रहल। जयस्थितिमल्लक संग रज्जल्ला देवीक विवाह भेलासँ तीनटा शक्तिशाली शासक परिवार–ठाकुरी, कर्णाट ओ मल्ल संयुक्त भऽ गेल। जयस्थितिमल्ल शक्तिशाली शासक छलाह। हुनक उत्तराधिकारी यक्षमल्ल अपन अधिकार मिथिला धरि बढ़ौलन्हि। ओ अपन प्रतिद्वन्दीकेँ हराय राज्यकेँ चारि भागमे विभक्त केलन्हि। i. भातगाँव– अपन ज्येष्ठ पुत्र राज्यमल्लकेँ ii. बनेपा– रणमल्लकेँ iii.काठमाण्डु– रत्नमल्लकेँ iv.पाटन– अपन पुत्रीकेँ। एकर परिणाम भेल नेपालक सर्वनाश। सत्रहम शताब्दीमे नेपाल अनेकानेक जागीरमे बँटि गेल। सबसँ पूबमे किरात प्रदेश छल जाहिमे दूध कोशीक समतल, ओकर शाखा तथा सून कोशीक पूबमे तराइक किछु भाग सेहो छलैक। मुसलमानी आक्रमणः- ऐतिहासिक सम्पर्क पकड़बाक हेतु पुनः इस्वीसन् चौदहम शताब्दीक चर्चा करए पड़इत अछि। कहल जाइछ जे अलाउद्दीन खलजी सेहो अपन प्रभाव नेपाल धरि बढ़ौने छलाह यद्यपि एकर कोनो ठोस प्रमाण हमरा लोकनिकेँ उपलब्ध नहि अछि। १३४६–४७मे बंगालक शासक शमसुद्दीन हाजी इलियास नेपालपर आक्रमण केलन्हि आ एहिबातक उल्लेख स्वयंभूनाथक अभिलेखमे अछि। एहि शिलालेखक अनुसार हाजी इलियास काठमाण्डुकेँ घेर लेलक, शहरमे आगि लगादेलक, लूट पाट मचौलक एवँ मूर्त्ति सबकेँ ध्वस्त केलक। शिलालेखक तिथि अछि नेवारी ४९२=१३७१–७२इ.।मन्दिर पुनः निर्मित भेलैक आ स्तूप पुनर्स्थापित भेल आ ओकर समारोह मनाओल गेल। एहि शिलालेखक संपादन के.पी.जायसवाल केने छथि। तकर बादसँ पुनः कोनो आक्रमणक उल्लेख नहि भेटइत अछि। मल्लक शासनः- जयस्थितिक चर्च हमर पूर्वहि कचुकल छी। हुनक उत्तराधिकारी छलाह जगज्योतिमल्ल। ओ मैथिल वंशमणिक मिलिकेँ ‘संगीत भास्कर’ नामक पुस्तकक रचना केने छलाह। हुनक उत्तराधिकारी ज्योतिमल्ल भेला आ हुनक यक्षमल्ल। यक्षमल्ल अपन अधिकारक विस्तार समतल भूमि दिसि सेहो केलन्हि। यक्षमल्लक तृतीय पुत्र रत्नमल्ल मैथिल ब्राह्मणक प्रभावक अधीन छलाह। रत्नमल्लक उत्तराधिकारी छलाह अमरमल्ल आ हुनक महेन्द्रमल्ल जे चानीक मुद्राक व्यवहार शुरू केलन्हि। ओ तिरहूतसँ चानी मंगवैत छलाह। एम्हर आबि मिथिला आ नेपालक बीचक सम्बन्ध खूब बढ़िया नहि रहल। खण्डवला कुलक राजा महिनाथ ठाकुर अपन राज्य विस्तारक क्रममे मोरंगकेँ जीति लेलन्हि। मिथिला तिरहूति गीतक प्रचार एहि राजाक समयमे भेल छल। नेपाल तराइक लोग सब खटपट करैत छल आ तै मोरंगक जमीन्दार सबकेँ दबेबाक हेतु औरंगजेब गोरखपुरक फौजदार आ मिथिलाक फौजदारकेँ पठौलन्हि। सत्रहम शताब्दीमे मिथिला आ नेपालमे खटपट होएबाक एकटा कारण मकवानी राज्य छल जे तराइ वो घाटीक उपहिमालय मार्गक सटले दक्षिण आ दक्षिण–पश्चिममे रहैक। एहिठाम एकटा प्रमुख शासक छलाह राजा हरिहर जे बड्ड महत्वाकाँक्षी छलाह। राघवसिंह जखन मिथिलाक राजा भेलाह तखन फेर एहि राज्यकेँ लऽ कए नेपालसँ खटपट शुरू भेल। नेपाल तराइक पंचमहलाक राजा भूपसिंहकेँ युद्धमे हरौलन्हि आ भूपसिंह ओहिमे मारल गेला। दरभंगाक खण्डवला राज्यक सीमा मकवानी राज्य धरि पहुँचल। मोरंग राजाक ओतए सेहो मिथिलाक धाख बनल। बंजर सब सेहो तराइक क्षेत्रमे शरणलेने छलाह आ अलीवर्दी हुनका सबहिक विरूद्ध उचित कारवाइ केने छलाह। बंजर लोकनि भपटिआही टीसनसँ मकवानी राज्यक सीमा धरि पसरल छल। १७६५मे नेपालमे गोरखा लोकनि शक्तिशाली भऽ गेलाह। १८०२ई.सँ नेपालक सम्पर्क इस्ट इण्डिया कम्पनीक अधिकारीसँ भेल जखन कि नेपाली लोकनि हुनकासँ भेंट करबाक हेतु पटना अबैत गेल। नेपाल आ इस्ट इण्डिया कम्पनीक सम्बन्ध मधुर नहि भऽ सकल आ दिनानुदिन झंझट बढ़िते गेल। अंग्रेज आ नेपालीक बीच युद्ध भइयैकेँ रहल आ ओ युद्ध भेल मिथिला भूमिपर। युद्धमे नेपाली लोकनि अपन अधिकारक विस्तार तराइमे छपरा (सारन) धरि क चुकल छलाह। चारूकात लड़ाइ प्रारंभऽ छल। सारनसँ कोशी धरि आ वीचमे मकवानी होइत अंग्रेजक एकटा टुकड़ी नेपालक राजधानी दिसि बढ़ल। लड़ाइक भीषण रूप देखि गजराज मिश्र शांतिक वार्त्ता चलौलन्हि। १८१५मे एक समझौताक अनुसार इ निश्चित भेलैक जे नेपालकेँ ओहिभूमि पर अधिकार छोड़ि देवाक चाही जाहिपर ब्रिटिशक कब्जा भऽ गेल छलैक। एहि संधिसँ कोनो संतोषजनक परिणाम नहि बहरेलैक। १८१६मे पुनः मकवानीपुर लग फेर भिड़ंत भेलैक आ गोरखा पराजित भेल। १८१४ई.२८ नवम्बरक सुगौलीक संधिकेँ जखन गोरखा लोकनि बिना कोनो शर्त्त स्वीकार केलन्हि तखनहि अंग्रेज युद्धबंदीक घोषणा १८१६मे केलन्हि। एवँ प्रकारे अंग्रेज आ नेपालक बीच संघर्षक मुख्य स्थल मिथिले रहल आ सुगौलीक सन्धिक पश्चात दुनू राज्यक बीचक सम्बन्ध सुधरल। अध्याय–११ मुल्ला तकियाक वयाजक अनुसार मिथिलाक इतिहास मुल्ला तकिया अकबरक समकालीन छलाह आ ओ अपन असमक भ्रमणक क्रममे मिथिला बाटे गेल छलाह। ओ मिथिलामे जे देखलन्हि–सुनलन्हि से आ अन्यान्य साधनकेँ आधार अपन एकटा ‘वयाज’ (डायरी) लिखलन्हि जे मिथिलाक इतिहासक अध्ययनक हेतु सर्वथा अपेक्षित अछि। एहि वयाजपर आधारित एकटा विस्तृत निबन्ध पटनाक मासिर पत्रिकामे १९४६मे छपल छल आ दरभंगासँ प्रकाशित डॉ. लक्ष्मण झा द्वारा संपादित साप्ताहिक मैथिली “मिथिला” (२ फरवरी, ९ फरवरी आ १९ फरवरी १९५३क अंक सब)मे सेहो एकरापर आधारित किछु अंश प्रकाशित अछि। मिथिलाक इतिहासक हेतु इ एकटा अपूर्व साधन मानल जा सकइयै आ एकर उपयोग हम अपन ‘हिस्ट्री ऑफ मुस्लिम रूल इन तिरहूत’मे सेहो कैल अछि। मैथिली पाठकक हेतु हम एहिठाम मुल्ला तकियाक वयाजक सारांश उपस्थित कऽ रहल छी। मिथिलापर मुसलमानी राज्यक विस्तारक अध्ययन क्रममे सेहो एकर विवरण भेटत। वयाजक अनुसार राजा लक्ष्मणसेनपर आक्रमणक पूर्व बख्तियार खलजी मिथिलाक किछु भागपर आक्रमण कएने छलाह। मिथिलाक राजा नरसिंह देव बंगालक राजा लक्ष्मण सेनक अधीन शासन करैत छलाह। पाछाँ ओ मुसलमान राजाक अधीनता स्वीकार केलन्हि आ तखनसँ ओ मुसलमान शासक गियासुद्दीन इवाजक समय धरि कर दैत रहलाह। १२२५मे जखन इल्तुतमिश बंगालपर आक्रमण केलन्हि तखन गियासुद्दीन इवाज हुनकासँ मेल कऽ लेलन्हि। बिहारकेँ बंगालसँ फराक कए फुटे प्रांत बना देल गेल आ मल्लिक अलाउद्दीन जानीकेँ ओहिठामक राज्यपाल नियुक्त कैल गेल। इल्तुतमिसक घुरलापर गियासुद्दीन नरसिंह देवक मदतिसँ पुनः बिहारपर आधिपत्य स्थापित कऽ लेलन्हि। बदला लेबाक विचारसँ सुल्तानक पुत्र बंगालपर आक्रमण केलन्हि आ गियासुद्दीन मारल गेला। नरसिंह देव हुनकासँ माँफी माँगिकेँ अपनाकेँ छोड़ोलन्हि आ कर देबाक वचन देलन्हि। रजिया बेगमक शासन कालमे बंगाल पुनः दिल्लीक नियंत्रणसँ मुक्त भऽ गेल। राजा नरसिंह देव सेहो विद्रोह कऽ देलन्हि। तुगलक तुगान खाँ मिथिला विद्रोहकेँ दबेबाक हेतु पठाओल गेलन्हि आ ओ ओहि राज्यपर अपन सत्ता स्थापित कए बहुत रास वस्तुजात लूटिकेँ लऽ गेलाह। मिथिलाक राजा बहुत दिन धरि नजरबन्द रहलाह। १२४४मे ओ चंगेज खाँक आक्रमणक समयमे ओ अपन बहादुरी देखौलन्हि आ तकर पुरस्कार स्वरूप हुनका सुल्तान अलाउद्दीन मसूद प्रसन्न भऽ तिरहूत राज्य घुरा देलथिन्ह आ हुनका एकटा सम्मानित राजा घोषित कए बिदा केलथिन्ह। मिथिलाकेँ सूबेदारक मातहदीसँ हटा देल गेल आ एकरा सोझे दिल्लीक अधीन कऽ लेल गेल। आब इ अपन कर दिल्लीकेँ देबए लगला। ‘तबाकते नासिरी’मे एहि आक्रमणक वर्णन अछि। विद्यापति सेहो अपन ‘पुरूष परीक्षा’मे नरसिंह देवक दिल्ली प्रवासक चर्चा कएने छथि। हिनक पुत्र रामसिंह देवक समयमे सेहो किछु संघर्ष भेल छल। हिनके समयमे दरभंगामे राम चौक नाम मोहल्लाक स्थापना भेल। अलाउद्दीनक समयमे मिथिला पर पुनः मुसलमानी आक्रमणक चर्च भेटइत अछि। इतिहासमे एकर उल्लेख आनठाम नहि भेटइत अछि मुदा मुल्लाक वयाजमे एकर विस्तृत विवरण अछि। एहि आक्रमणक अंतर्गत मखदून ताज मोहम्मद फकीहक पुत्र शेख मुहम्मद इस्माइलक नेतृत्वमे तीन बेर युद्ध भेल छल। पहिल एवँ दोसर बेर शाही सेना पराजित भऽ गेल छलाह आ मिथिलाक जीत भेल छल। प्रथम लड़ाइक स्थान दरभंगामे अखनो “मुकबेश” नामसँ प्रसिद्ध अछि। शेख मुहमद इस्माइल जखन राजापर दोसर बेर आक्रमण करबाक विचार केलक तखन सेना पठेबाक हेतु बादशाहसँ निवेदन केलक। रजीउल मुल्क मलिक महमूदक सेनापतित्वमे शाही फौज मिथिलाक धरतीपर उतरल। अहुबेर हुनका अपने सन मुँह लऽ कए पराजित भऽ कए घुरे पड़लन्हि। इ लड़ाइ जाहि स्थानपर भेल छल ताहि स्थानपर राजा अपन राजधानी दरभंगासँ उठाकेँ लऽ गेला। शक्रसिंहक नामपर ओ स्थान सम्प्रति सकरी नामसँ विख्यात अछि। तेसर बेर पुनः युद्ध भेल जाहिमे मिथिलाक पराजय भेल आ राजा अपन मंत्री सबहिक संग पकड़ल गेला। गिरफ्त भेला उत्तर राजा क्षमा याचना केलन्हि आ आजीवन कर देबाक वचन देलन्हि। एहिशर्त्तपर अलाउद्दीन हुनका राज्य घुरा देलथिन्ह। बादमे शक्तिसिंह (शक्रसिंह) अलाउद्दीनक हिन्दू फौजक सेनापति सेहो नियुक्त भेला। जखन अलाउद्दीनकेँ हम्मीर देवसँ युद्ध भेलन्हि तखन शक्रसिंह अलाउद्दीनक आर्थिक आ सैनिक सहायता देलन्हि। शक्रसिंह स्वयं रणक्षेत्रमे उतरलाह आ एहिसँ अलाउद्दीनकेँ बड्ड बल भेटलन्हि। शक्रसिंह एवँ प्रकारे मिथिलाक स्वतंत्रताकेँ सुरक्षित रखबामे समर्थ भेलाह। दरभंगाक ‘सुखी दिग्घी’ अखनो शक्रसिंहक स्मारक स्वरूप अछि। हरिसिंह देव कर्णाट वंशक अंतिम राजा छलाह आ हरिसिंहपुर सेहो अपन राजधानी बनौने छलाह। गियासुद्दीन तुगलक जखन बंगालक विद्रोहकेँ दबाकेँ घुरलाह तखन ओ तिरहूतपर ध्यान देलन्हि। तिरहूतक राज्य ओ दखल केलन्हि। कहल जाइत अछि जे तिरहूतक राजा बंगालक मदतिमे छलाह। हरिसिंह देव अपन मजबूत किला, कठिन रास्ता ओ दुरूह जंगल आदिक बलें पहिने तँ गियासुद्दीनक विरोध केलन्हि परञ्च बादमे पराजित भऽ पकड़ल गेलाह। सुल्तान हुनका पकड़िकेँ दिल्ली लऽ गेला आ मिथिलाक शासन भार अहमद खाँक हाथमे देलन्हि। गियासुद्दीनक बाद मुहम्मद तुगलक दिल्लीक शासक भेलाह। राज्याभिषेकक अवसर ओ हरिसिंह देवकेँ मुक्त कऽ देलैन्ह। हरिसिंह देव कर देबाक बचन देलन्हि तखन हुनका राज्य घुरा देल गेलैन्ह आ ओ प्रमुख सेनापतिक पदपर सेहो नियुक्त भेलाह। इ सब भेलाक बाद सुल्तानकेँ बुझबामे एलन्हि जे राजाक मंत्री वीरेश्वर ठाकुरक संग एक विचित्र पाथर छन्हि जकर संसर्गसँ सब प्रकारक धातु सोना भऽ जाइत अछि। इ पाथर अलाउद्दीन खलजीकेँ नहि देल गेल छल। सुल्तान आदेश बहार केलन्हि वाजाप्ता एक फरमान द्वारा जो ओहि पाथरकेँ शाही खजानामे जमा कऽ देल जाइक। वीरेश्वर जखन पाथरक बदलामे हीरा उपस्थित केलन्हि तखन सुल्तान ओकरा लेबासँ अस्वीकार केलन्हि। तकर बाद वीरेश्वर बजलाह जे काशीमे गंगा स्नान केलाक उत्तर ओ ओहि पाथरकेँ शाही खजानामे जमा करताह। शाही सरंक्षणमे वीरेश्वरकेँ काशी आनल गेल। काशी एबाक पूर्व ओ राजा हरिसिंह देवसँ सेहो भेंट केलन्हि आ काशीमे स्नान करबाक क्रममे ओ पाथरकेँ गंगेमे राखि देलन्हि। शाही संरक्षक एहि प्रसंगकेँ लऽ कए हरिसिंह देवक शिकायत सुल्तान लग कऽ देलक। एहिपर मिथिला राज्य जप्त भेल आ हरिसिंह देवकेँ आजीवन कारावासक आदेश भेटल। एहिबातक सूचना राजाकेँ पहनहि भेट गेलन्हि आ ओ तुरंत पड़ाएकेँ नेपाल चल गेला। बादमे हुनक पता नहि लागल। मिथिलाकेँ तुगलक साम्राज्यमे मिला लेल गेल। सुल्तान तिरहूतकेँ एक अलग प्रांत बना देलैन्ह आ तिरहूतक महत्व बढ़ल आ दरभंगा ओकर राजधानी बनल। तिरहूतकेँ तुगलकपुर सेहो कहल गेल। ओतए एकटा किला आ जामा मस्जिदक स्थापना भेल। १३४०मे मुहम्मद तुगलक मिथिलाक शासन भार कामेश्वर ठाकुरकेँ देलन्हि। बंगालक शासनक भार सुल्तान शमसुद्दीन हाजी इलियासकेँ देलन्हि। मिथिलासँ कर वसूली करब आ राजापर निगरानी रखबाक भार सेहो हिनकेपर देल गेलैन्ह। कामेश्वर ठाकुर ओइनी गामक रहए वाला छलाह आ इ गाम हुनका पूर्वजकेँ कर्णाट शासकसँ जागीरक रूपमे भेटल छलन्हि। कामेश्वर ठाकुर राज्य प्राप्त केला उत्तर अपनहि गामकेँ राजधानी बनौलन्हि। मुहम्मद तुगलकक जीवैत हाजी इलियास अपन निवास दरभंगामे रखलक परञ्च मुहम्मद तुगलकक मुइलाक बाद ओ अपनाकेँ स्वतंत्र घोषित कए देलक आ कर देव सेहो बंद कऽ देलक। अपन साम्राज्य क्षेत्र विस्तारक योजनाक क्रममे ओ अपन आसपासक इलाकापर अपन अधिकार बढ़ौलक आ कोशी धरिक क्षेत्रपर अपन आधिपत्य स्थापित कऽ देलक। ओ मिथिलाक राजाक संग युद्ध कए मिथिला राज्यकेँ दू भागमे विभक्त कऽ देलक। बूढ़ी गंडकक उत्तरी भागमे मिथिलाक राज्य रहल आ ओकर दक्षिणमे इलियासक राज्य भेल। एवँ प्रकारे नेपाल तराइसँ बेगूसराय धरि ओ अधिकारक स्थापना केलक आ कामेश्वर वंशकेँ ओइनीसँ हँटौलक। मिथिलाक एहि अप्राकृतिक बटवाराक विरोधमे कामेश्वर ठाकुर विद्रोह कऽ देलन्हि मुदा ओहि विद्रोहकेँ शख्तीसँ दबाओल गेल। एहि शख्तीसँ विद्रोह दबेबाक क्रममे बहुतो गाम नष्ट–भ्रष्ट भऽ गेल। विद्रोह दबौलाक पश्चात ओ बूढी गण्डकक तटपर अपन राज्यक सुरक्षार्थ एकटा प्रशासनिक केन्द्र बनौलक जे शमसुद्दीनपुर (समस्तीपुर)क नामे ताहि दिनमे प्रसिद्ध छल। गंगाक तटपर ओ हाजीपुर बसौलक आ ओतए एकटा किलाक निर्माण सेहो केलक। फिरोज तुगलककेँ जखन इ सूचना भेटलैक तँ ओ आगि वबुला भऽ गेल आ समाचार सुनतहि ओ दिल्लीसँ मिथिलाक हेतु विदा भऽ गेल। जावत फिरोज गोरखपुर पहुँचल तावत हाजी इलियास अपन बोरिया–विस्तर बान्हिकेँ पण्डुआ दिसि विदा भऽ गेल। ओतहु अपनाकेँ सुरक्षित नहि देखि ओ ओतएसँ एकदला दिसि चलगेल। जखन फिरोज मिथिला पहुँचल तखन कामेश्वर ठाकुर तथा छोट–मोट जमीन्दार लोकनि उपहार लऽ कए सुल्तानक समक्ष उपस्थित भेलाह आ हाजी इलियासक लूट–पाटक शिकायत केलन्हि। सुल्तान कामेश्वर ठाकुरकेँ पुरस्कृत केलथिन्ह। कामेश्वर ठाकुर हुनक अधीनता स्वीकार केलन्हि आ कर देबाक प्रतिज्ञा केलन्हि। फिरोज मिथिलाक दुनू भागकेँ मिलाकेँ फेर एक कऽ देलैन्ह आ ओहिठाम अपन काजी नियुक्त केलन्हि। सुल्तान ओहिठामसँ एकदला दिसि विदा भेला। १३५३ फिरोज तुगलक कामेश्वर ठाकुरकेँ छोट बालक भोगीश्वरकेँ राजा बनौलन्हि मुदा मुल्ला तकिया एहि प्रसंगमे चुप्प छथि। बरनी सेहो एहि विषयमे किछु नहि कहैत छथि। फिरोज विद्रोही इलियासकेँ दबाकेँ जखन घुरला तखन ओ मिथिलामे अपन हाकिम बहाल केलन्हि। मुल्ला तकिया कोनो स्पष्ट संकेत एहि सम्बन्धमे नहि दैत छथि। मिथिलामे मुसलमानी शासनक प्रसारक सम्बन्धमे जखन विवरण प्रस्तुत करब तखन सब बातक समीचीन व्याख्या करब। एहिठाम तँ मात्र मुल्ला तकियाक वयाजक आधारपर वस्तुस्थितिकेँ उपस्थिति कैल गेल अछि। फिरोज तुगलक पुनः मिथिलाकेँ दिल्लीक एकटा प्रांत बना लेलन्हि आ एहिठामक राजा पुनः दिल्लीक अधीन भऽ गेलाह भने हुनका स्वायत्तता प्राप्त रहल होन्हि से दोसर गप्प। कर वसूल करबाक हेतु फिरोज तुगलक एतए अपन आदमीकेँ नियुक्त केलन्हि। भोगीश्वर फिरोजक मित्र छलाह। दरभंगाक उत्पत्तिः- एहि प्रसंगमे दरभंगाक उत्पत्तिक सम्बन्धमे दूएक बात कहि देव आवश्यक बुझना जाइत अछि। दरभंगा शब्दक उत्पत्ति कहिया आ कोना भेल एहि प्रश्नपर अखनो धरि मत विभिन्नता अछिए। तवारिखुल फितरत (फितरतक इतिहास)क अनुसार दरभंगाकेँ बसायवला गियासुद्दीन तुगलक छलाह। हरिसिंह देवकेँ पराजित कए ओ एहि नगरकेँ बसौलन्हि एहेन बुझल जाइत अछि। हरिसिंह देव पड़ाएकेँ जंगल–पहाड़ दिसि चल गेल छलाह। सुल्तान गियासुद्दीन तुगलक अपन आक्रमणक क्रममे हुनकापर कब्जा करबा लेल जंगल कटबा देलन्हि। एहि साफ कैल जंगलक नाम “दारू भंग” राखल गेल। संस्कृतमे “दारू”क अर्थ होइछ लकड़ी आ ‘भंग’क अर्थ भेल काटब, छाटब आ नष्ट करब। चूंकि स्वयं सुल्तान अपना हाथे तरूआरिसँ जंगलकेँ काटिकेँ नष्ट केने छलाह आ ओहिठाम अपन आधिपत्य स्थापित कएने छलाह तैं ओहि स्थानकेँ “दारूभंग” कहल गेल जे क्रमेण दरभंगाक नामे प्रसिद्ध भेल। अखन धरि इ मत सर्वमान्य नहि भेल अछि। विलियम हण्टर दरभंगी खाँ सँ दरभंगाक उत्पत्ति बतबैत छथि। दरभंगी खाँ आइसँ करीब १२५ वर्ष पहिने भेल छलाह आ ओ मुहम्मद रहीम रूहेलाक पौत्र छलाह। हिनक वंशज अखनो दरभंगामे छथिन्ह। दरभंगी खाँक बसाओल दरभंगा बाला सिद्धांत कोनो तरहे मान्य नहि बुझि पड़इयै परञ्च तइयो हम देखइत जे ओमैली सेहो हण्टरेक मतकेँ मानने छथि। दरभंगा ओहिसँ पुरान नगर अछि तैं हण्टर आ ओमैलीक मत अमान्य अछि। इहो सिद्धांत प्रतिपादित कैल गेल अछि जे ‘द्वार–वंग’ अथवा दूर–वंग या दार–इ–वंगलसँ दरभंगा शब्दक निर्माण भेल अछि। दरभंगाकेँ ‘द्वार वंग’क संज्ञा देव उपयुक्त नहि बुझि पड़इयै कारण कोन रूपे एकरा बंगालक द्वार कहल जेतैक? इ बात ठीक जे मध्य युगमे दिल्लीक सेना एहि बाटे बंगाल जाइत छल। मिथिलाक संस्कृत लेखक पण्डित गंगादत्त झा(१६१५–१६८४) अपन भृंगदूतमे दरभंगा शब्दक उल्लेख कएने छथि– “तस्याः पाथः परम विमलं सन्निपियाभिरामा– गारां कामायुध दरभंगा राजधानी मुपेयाः”। अहुँसँ इ सिद्ध होइछ जे दरभंगीक पूर्वहिसँ दरभंगा नाम प्रचलित अछि। १७७८मे प्रतापसिंह सेहो दरभंगामे अपन राजधानी बनौने छलाह मुदा हुनकासँ १०० वर्ष पूर्वसँ ‘दरभंगा’ राजधानीक रूपमे प्रख्यात छल जकर प्रमाण हमरा ‘भृंगदूत’क कविसँ भेटइत अछि। ओहि कविक विवरणसँ इहो ज्ञात होइछ जे दरभंगा (राजधानी) वाग्मती नदीक तटपर स्थापित छल आ ओतए एहेन एहेन सुन्दर भवन सब छल जे देखबामे कामदेवक तरूआरि सन लगैत छल। भृंगदूतक आधार इ कहल जा सकइयै जे ‘दरभंगा’ १७म शताब्दीमे एकटा प्रसिद्ध दर्शनीय नगर छल। दरभंगामे ताहिदिनमे मुगल बादशाहक प्रतिनिधि रहैत छलाह आ खण्डवला कुलक राजधानी “भौर”मे छल आ भौर आ दरभंगाक मध्य मधुर सम्बन्ध छल। महाराज माधव सिंहक समयसँ खण्डवला कुलक महाराज लोकनि स्थायी रूपेँ दरभंगामे रहए लगलाह। एक इहो सिद्धांत प्रतिपादित कैल गेल अछि जे ‘दलभंग’सँ दरभंगाक उत्पत्ति भेल अछि–गजरथपुरमे शिवसिंहक पराजय भेलापर ओहि स्थानक नाम ‘दलभंग’ राखल गेलैक किएक तँ ओहिठाम शिवसिंहक ‘दल’केँ ‘भंग’ कैल गेल छलन्हि। परञ्च अहुमे विशेष तथ्य नहि बुझा पड़इत अछि। ओना तँ सब गोटए अपन–अपन तर्क उपस्थित कएने छथि मुदा कोनो तर्क ने अखन धरि मान्य भेल अछि आ ने ओकरा हेतु कोनो प्रामाणिक साधने उपलब्ध अछि। १७म शताब्दीमे ‘दरभंगा’ नामक प्रचलन इ सिद्ध करैत अछि जे इ नाम बहुत पूर्वहिसँ प्रख्यात रहल होएत। तैं हमर अपन विचार इ अछि जे एहि शब्दक उत्पत्ति गियासुद्दीन तुगलकक समयमे भेल जे ‘दारू’–‘भंग’ केलैन्ह आ ओहि दारूभंगसँ दरभंगा शब्दक विन्यास भेल। इ जखन तुगलक साम्राज्यक एकटा अंग बनल तखन मिथिला तुगलकपुरक नामे प्रसिद्ध भेल आ ओकरे राजधानी भेल ‘दरभंगा’। दरभंगा ताहि दिनमे जंग़ल छल आ तकरा कटबामे सबकेँ डर होइत छलैक तैं गियासुद्दीन अपनहि जखन जंगल काटब शुरू केलन्हि तखन आ सब केओ मिलिकेँ एहिमे योगदान देलथिन्ह आ जंगल साफ भेलैक आ ओहिठाम तुगलक साम्राज्यक प्रधान कार्यालय बनल। तिरहूतक तुगलक कालीन सिक्का सेहो भेटल अछि। अध्याय–१२ मिथिलाक इतिहासमे मुसलमानी अमल कर्णाट वंशक समयसँ मिथिलामे मुसलमान लोकनि हुलकी–बुलकी देव शुरू कऽ देने छल। ७११ई. जखन सिन्धपर अरब लोकनिक आक्रमण भेलैक ताहिसँ पूर्वहुसँ अरब लोकनिक सम्पर्क पश्चिमी आ दक्षिणी भारतसँ छलैक आ ओ लोकनि ओहि क्षेत्रमे व्यापार करबाक हेतु अवैत छलाह। जखन अरब लोकनि सिन्धपर आक्रमण केलन्हि तकर बादहिसँ भारतक संग राजनैतिक सम्बन्धक शुरूआत मानल जाइत अछि। ७११ सँ १२०० ई.क बीच बहुत रास मुसलमान चिंतक आ संत उत्तर भारतक विभिन्न क्षेत्रमे पसरि गेलाह आ मिथिला क्षेत्र सेहो सूफी लोकनिक एकटा प्रधान केन्द्र छल। ओम्हर पूबमे बंगाल धरि बख्तियार खलजीक समय धरि मुसलमानी प्रकोप बढ़ि चुकल छल आ बिहारोमे गंगा दक्षिण भागमे मगधपर मुसलमान लोकनि अपन आधिपत्य जमा चुकल छलाह। मिथिलेटा एकटा भाग बचल छल जाहिपर हिनका लोकनिक नियंत्रण अखन धरि नहि भेल छलन्हि यद्यपि इ लोकनि एहि बातक हेतु सतत प्रयत्नशील रहैत छलाह। मुल्ला तकियाक वयाजक अनुसार तँ मुसलमान लोकनि बख्तियार खलजीक समयमे मिथिलोपर आक्रमण कएने छलाह यद्यपि एकर कोनो आन प्रमाण ओना नहि भेटइत अछि। गंगाक मार्गसँ जेवा काल किवाँ गंगा कोशीक संगम दिसिसँ भने इ लोकनि लूट–पाट करैत होथि से दोसर कथा मुदा हिनका लोकनिक आधिपत्य तिरहूतपर भेल नहि छलन्हि। पूबमे मिथिलाकेँ मुसलमानी प्रगतिक पथमे बाधक बुझल जाइत छलैक कारण ताहि दिनमे अहिठाम सशक्त कर्णाट लोकनिक शासन छल आ तैं सब ठामसँ विद्वान लोकनि पड़ायकेँ एतए अबैत छलाह। पश्चिमक मुसलमान लोकनि तँ तत्काल मिथिलाकेँ अपना नियंत्रणमे नहि आनि सकलाह परञ्च बंगालक मुसलमान शासकक गिद्ध दृष्टि सेहो मिथिलाक स्वतंत्र कर्णाट राज्यपर लगले रहैत छलैक आ तैं जखन कोनो मौका भेटैक तखने वो लोकनि मिथिला दिसि बढ़ि जाइत छलाह। गंगदेवक कर्णाट शासक लोकनिमे ओ शक्ति नहि रहि गेल छलन्हि जाहिसँ ओ लोकनि शक्तिशाली आक्रमणक विरोध करितैथ। १२११ आ १२२९क बीचमे बंगालक विजेता गियासुद्दीन इवाज मिथिलाक राजाक क्षेत्र अपन नाक घुसौलन्हि आ हुनकासँ कर वसूल केनाई प्रारंभ केलन्हि। अहिसँ पूर्व मिथिलाक राजा ककरो सामने ने तँ झुकल छलाह आ ने कर देने छलाह। बंगाल पड़ोसिया होइतहुँ मिथिलापर मुसलमानी आक्रमणक श्रीगणेश केलक। बंगालसँ तिरहूतमे एबाक हेतु रस्तो सुगम छलैक। कोशी, गण्डक आ गंगाक काते कात तिरहूत होइत बंगाल जाएव–आएव सुगम छल आ तैं ताहि दिन पश्चिम आ पूबक आक्रमणकारी लोकनि अहि मार्गक प्रश्रय लेने छलाह। बीचमे पड़ैत छल तिरहूतक राज्य जे समयानुसार ‘वेत्तसिवृत्ति’क पालन करैत अपन स्वतंत्रताक सुरक्षाक हेतु यथासाध्य परिश्रम करैत छल। कानूनगोय महोदयकेँ इ बात बुझबामे नहि अवैत छन्हि जे जखन मिथिला आ कामरूपक स्वतंत्र राज्यकेँ बख्तियार नहि जीत सकल तखन ओ तिब्बत दिसि बढ़बाक प्रयास कियैक केलक? बख्तियार खलजीक मूल उद्धेश्य छल प्रांत सबकेँ लूटब आ धन जमा करब तैं कोन प्रांत स्वतंत्र रहल अथवा गुलाम भेल तकर चिंता हुनका नहि छलन्हि। आ वो मात्र अपन स्वार्थ आ महत्वाकाँक्षाक पूर्त्तिक हेतु सब काज करैत छलाह। पश्चिमसँ एक्के वेर बंगाल धरि मुसलमानी राज्यक प्रसार कऽ देव ताहि दिनमे कि कोनो कम उपलब्धिक बात भेलैक? बंगाल विजयक क्रममे नदीक मार्गक अवलंबनमे मिथिला दक्षिण पूर्वी सीमा देने जँ ओ गुजरल होथि तँ कोनो आश्चर्यक गप्प नहि। सेनवंशक संग बरोबरि खटपल रहलसँ मिथिलाक इ अंश विशेष काल अरक्षित रहैत छल आ तैं यदि अहि बाटे बंगाल जेबाक क्रममे मुसलमान लोकनि अपन प्रभाव क्षेत्र एकरा बना लेने होथि तँ से संभव। परञ्च एतए स्मरण रखबाक अछि जे गियासुद्दीन इवाजक पूर्व धरि कोनो मुसलमान शासक मिथिलाक राजासँ कर नहि वसूल केने छलाह। तैं बख्तियारक प्रभावक गप्पक प्रसंग मिथिलापर व्यर्थ बुझना जाइछ। बख्तियारक पुत्र इख्तियारोक तिरहूतपर आक्रमण करबाक संकैत भेटइत अछि परंञ्च उहो आक्रमण लूट–पाटे जकाँ छल कारण ओहिसँ तिरहूत राज्यक अक्षुण्णता एवं अखण्डतापर कोनो आँच नहि आएल। दक्षिण बिहारपर ओकर आक्रमणक स्थायी प्रभाव पड़लैक कारण उदंतपुर विश्वविद्यालयकेँ उहै नष्ट केलक आ अपन बहादुरीक प्रदर्शन कुतुबुद्दीन ऐबकक दरबारमे दिल्लीमे जाके केलक। बंग, कामरूप आ तिरहूतक शासकसँ ऐतिहासिक तौरपर कर वसूल केनिहार व्यक्ति छलाह गियासुद्दीन इवाज। कानूनगोएक मत जे तिरहूतक सम्बन्धमे छन्हि से पूर्णतया भ्रामक मानल जाइत अछि आ ओकर कोनो ऐतिहासिक प्रमाण नहि भेटइयै। अरिमल्लदेव नामक कोनो राजा मिथिलामे नहि भेल अछि आ ओहिकालमे नरसिंह देव अहिठामक शासक छलाह। अहि शंकाक समाधानक हेतु हम प्रोफेसर कानूनगोएकेँ लिखने छलियन्हि आ हुनके आदेशानुसार डॉ. रमेश मजुमदारकेँ सेहो। श्री मजुमदार महोदय इ लिखलन्हि जे कर्णाटवंशमे अरिमल्लदेवक नामक कोनो शासक नहि भेल छथि जकर राज्य मिथिलामे हो। कानूनगोए महोदयक अनुसार मिथिलाक पूर्वी भाग ताहि दिनमे लखनावतीक अधिकार भऽ गेल छलैक। कोन आधारपर कानूनगोए महोदय अहि निर्णयपर पहुँचल छथि तकर प्रमाण ओ नहि देने छथि आ अहिकालमे मिथिलाक राज्य टुकड़ा–टुकड़ामे बटबाक प्रमाण हमरा लोकनिकेँ नहि भेटल अछि। यदि ओ सिलवाँ लेवीसँ प्रेरित भए अपन निर्णय बनौने छथि तखन आव एतवे कहि देव उचित जे आधुनिक शोधक आधार लेवी महोदयक मत मान्य नहि अछि। नरसिंह देवक शासन कालसँ मुसलमानी प्रकोप मिथिलामे बढ़ल सेटा मान्य अछि आ मैथिल परम्परामे सेहो अहिबातकेँ स्वीकार कैल गेल अछि आ विद्यापतिक पुरूष परीक्षा एकर साक्षी अछि। नरसिंह देव पहिल व्यक्ति छलाह जे कर देलन्हि आ दिल्ली आ बंगाल दुनु ठामसँ सम्बन्ध बनौलन्हि। इ सब होइतहुँ ओ अपन स्वतंत्रताकेँ सुरक्षित रखबामे सफल भेला। बछवाड़ाक समीप ब्रह्मपुरा गाममे एकटा मस्जिद अखनहु वर्त्तमान अछि जकरा इल्तुतमिश प्रचुर मात्रामे दान देने छलैक। एहिसँ बुझि पड़इयै जे मिथिलाक एहि क्षेत्रपर इल्तुतमिशक प्रभाव रहल हेतैक आ तखने ओ दान देने हेतैक। इल्तुतमिशक समयमे तुगान खाँ बिहारक राज्यपाल छलाह मुदा ताहि दिनक बिहारमे मिथिला सम्मिलित नहि छल। मिथिला बिहारसँ फुटे एक स्वतंत्र राज्य छल जकरा जीतबाक लेल बंगाल आ दिल्ली दुनु समान रूपसँ प्रयत्नशील छलाह। तुगान खाँ अपनाके बंगाल आ बिहारक शासक बना लेलक आ रजिया बेगमसँ ओकर मंजूरी लऽ लेलक। अहि स्थितिकेँ देखि नरसिंह देव पुनः अपनाकेँ स्वतंत्र घोषित कलेलन्हि आ कर देव बन्द कऽ देलन्हि। मुदा थोड़बे दिनक बाद ओ गिरफ्त भऽ गेला आ दिल्ली लऽ जाएल गेलाह। चंगेज खाँक विरूद्ध अपन बहादुरी देखा ओ पुनः मिथिलाक स्वतंत्रता प्राप्त केलन्हि आ एहि आदेशसँ घुरला जे ओ सोझे दिल्लीकेँ कर देल करौथ। रामसिंह देवक समयमे मुसलमानी आक्रमणक प्रकोप बढ़ि गेल छल। तुगान खाँक तिरहूत आक्रमणक उल्लेख मुसलमानी स्रोतमे भेटइत अछि परञ्च ओहिमे राजाक नाम नहि अछि। कालक हिसाबे तखन रामसिंह देव मिथिलापर शासन करैत छलाह। तुगानक आक्रमणसँ मिथिलाक स्वतंत्रताकेँ धक्का अवश्य पहुँचले परञ्च स्वतंत्रता सुरक्षित रहलै। तुगान प्रचुर मात्रा धन–वित्त प्राप्त केलक। तिब्बती यात्री धर्मस्वामी जे रामसिंहक शासनकालमे एतए आएल छलाह से अपना आँखि सब किछु देखलन्हि आ लिखैत छथि जे मुसलमानी प्रकोपसँ वैशालीक निवासी हड़कम्पित छलाह आ मुसलमानी सेनाक आवागमनसँ जे धुरा उड़ैत छल ताहिसँ सौसे मेघ अन्हार भऽ जाइत छल। तुरूक आक्रमणक संख्या दिन प्रतिदिन बढ़िते जाइत छलैक आ तिरहूतक राजा रामसिंह देव मुसलमानी प्रकोपसँ बचबाक हेतु अपन राजधानीक चारूकात बढ़िया किलाबंदी करौने छलाह। किछु संस्कृतक पाण्डुलिपिक पुष्पिकासँ सेहो इ ज्ञात होइछ जे रामसिंहकेँ मुसलमान सबसँ संघर्ष करए पड़ल छलन्हि आ ओहिमे हुनका अभूतपूर्व सफलता सेहो भेटल छलन्हि। चारूकातसँ मुसलमानक प्रकोप रहितहुँ रामसिंह अपन पूर्वजक जकाँ मिथिलाक स्वतंत्रताकेँ सुरक्षित रखबामे समर्थ भेलाह आ एहि हेतु हिनक शासन काल मानल गेल अछि। शक्तिसिंहक समयमे मिथिलापर अलाउद्दीनक आक्रमणक विवरण मुल्ला तकियाक वयाजमे भेटइत अछि परञ्च कोनो आन साधनसँ एकर संपुष्टि नहि होइत छैक। अलाउद्दीनकेँ हम्मीरक विरूद्ध इ सहायता देने छलथिन्ह आ हिनका हम्बीरध्वांत भानुः कहल गेल छन्हि। हिनका संग देवादित्य ठाकुर आ देवादित्यक पुत्र वीरेश्वर सेहो गेल छलथिन्ह। चण्डेश्वरक कृत्यचिंतामणिमे एकर उल्लेख अछि। फरिश्ताक विवरणमे अछि जे अलाउद्दीन समस्त बिहारकेँ जीत लेने छलाह मुदा तहिया मिथिला बिहारसँ भिन्न छल आ बिहार कहलासँ मिथिलाक बोध नहि होइत छल। अलाउद्दीन मिथिलाक व्यक्तित्व आ वैभवकेँ देखि ओकरा मित्र बनौने होथि से संभव कारण ओहि मित्रतासँ हुनका कैकटा लाभ छलन्हि। सर्वप्रथम लाभ तँ इ भेलैन्ह जे ओ मैथिल शासककेँ अपना पक्षमे कए हम्बीरक विरोधमे ठाढ़ केलन्हि आ देवादित्यकेँ ‘मंत्री रत्नाकर’ पदवीसँ विभूषित केलन्हि। अहि सबसँ बुझि पड़इयै जे ओ बिना युद्ध केनहि मिथिलाकेँ अपना मैत्री भावसँ मिला लेने होएताह आ ओहिठाम अपन प्रभाव क्षेत्र बढ़ौने होएताह। मिथिलामे प्रभाव क्षेत्र बढ़ाएब आवश्यक छल किएक तँ ओम्हर बंगाल दिसि मुसलमान लोकनि मिथिलाक पूर्वी दक्षिणी क्षेत्रमे घुसि रहल छलाह। अहि प्रसंगक विवरणक पूर्व बलबनक संक्षिप्त उल्लेख आवश्यक अछि। कहल जाइत अछि जे अपन बंगाल अभियानक क्रममे बलबन इकलिम–इ–लखनौती तथा अरशाह–इ–बंगालकेँ दबाकेँ अपना अधीनमे केने छलाह आ मुसलमानी बंगालक राज्यपालक रूपमे ओ अपन पुत्र बुगरा खाँकेँ ओतए नियुक्त केलन्हि। बुगरा खाँकेँ ओ कहलन्हि जे अहाँ “दिआर–इ–बंगाल”केँ जीतबाक प्रयास करू। किछु गोटएक मत छन्हि जे सोनार गाँवक दशरथ दनुजराय (वंग)क राज्य ‘दिआर–इ–बंगाल’मे छलन्हि। एहि दिआर–इ–बंगालकेँ किछु तिरहूत जिलाक दरभंगा बुझैत छथि जे हमरा बुझबे अप्राँसगिक बुझि पड़इयै कारण अहिठाम दशरथ–दनुजरायक राज्य छल ने कि कर्णाट वंशक। बंगालक द्वार जँ एकरा बुझल जाइक तँ इ क्षेत्र कतहु बंगालक समीप रहल होइत कारण बलबनक समयमे मिथिलामे कर्णाट वंशक राज्य छल आ ओ तीरभुक्तिक नामे प्रसिद्ध छल आ ‘दिआर–इ–बंगाल’क नाम ताधरि प्रचलित नहि भेल छलैक। बलबनक समयमे बिहारकेँ बंगालसँ अलग कैल गेल छलैक से बात ठीक मुदा तखन मिथिला बिहारसँ फराके एकटा स्वतंत्र राज्य छल। १९५५मे महेशवारा (बेगूसराय)सँ फिरूजएतिगिन (१२९०–९२)क एकटा सुप्रसिद्ध एवं अद्वितीय शिलालेख उपलब्ध भेल अछि जकरा हम पूनासँ प्रकाशित करौने छी। फिरोज एतिगीन बंगालक रूकनुद्दीन कैकश द्वारा नियुक्त एक प्रशासक छलाह जे अपनाकेँ ओहि अभिलेख द्वितीय सिकन्दर आ खानक खान कहने छथि। एहि प्रशासकक नामक एक गोट आर अभिलेख लक्खीसराय (मूंगेर)सँ सेहो प्राप्त भेल अछि। रूकनुद्दीन कैकस बलबनक वंशक छल आ मिथिला क्षेत्रमे ओकर अधिकारक प्रसार अहिबातक संकेत दैत अछि जे शक्तिसिंह आ हरिसिंह देवक समय बंगालक शासक दक्षिणसँ गंगा पार कए गण्डक धरि बढ़ि चुकल छलाह आ कर्णाट शासककेँ ओहि क्षेत्रसँ धकिया चुकल छलाह। कर्णाट शासक लोकनि बंगालक दबाबसँ तबाह भऽ रहल छलाह। मुल्ला तकिआ एहिबातक उल्लेख नहि कएने छथि मुदा अभिलेख जखन साक्षाते मौजूद अछि तखन दोसर साधनक अपेक्षे कोन? गण्डक क्षेत्रसँ अहि शिलालेखक प्राप्ति अहि बातकेँ स्पष्ट कऽ दैत अछि जे ओहिकाल धरि अवैत–अवैत कर्णाट लोकनिक शक्ति दक्षिणमे क्षीण भऽ चुकल छलन्हि। अहि क्षेत्रमे गंगाक दुनु कात बंगालक सीमा धरि दियारा सब अछि–अहि दियारा सबकेँ संकेत “दिआर–इ–बंगाल”सँ होइत हो से संभव कारण गंगाक दुनु काते बंगाल जेबा–एबाक रास्ता छल। अहि अभिलेखसँ कर्णाट राज्यक वास्तविक विस्तारक सम्बन्धमे प्रश्न उठब स्वाभाविक बुझि पड़इत अछि। बलबनक बाद बलबनी शाखा बंगालमे स्वतंत्र शासन करए लागल छल आ एतए धरि अपन राज्यक सीमा बढ़ा लेने छल। एकर बाद छिट–पुट ढ़ंगसँ मुसलमान लोकनि एम्हर–ओम्हरसँ हुलकी–बुलकी दैत रहलाह आ लूट–पाट करैत रहलाह। चारूकात मुसलमानी प्रभावक वावजूदो जे मिथिलाक कर्णाट लोकनि अखन धरि अपन स्वतंत्रता सुरक्षित रखने छलाह, इ कोनो कम गौरवक विषय नहि। लखनौती जेबाक बाटमे मिथिला पड़ैत छल आ तैं एहिपर एबा–जेबा कालमे सब केओ अपन किछु ने किछु बना लैत छलाह। संगठित रूपेँ मिथिलापर सुनियोजित आक्रमण केनिहार व्यक्ति छलाह गियासुद्दीन खलजी। सुगति सोपानसँ ज्ञात होइछ मिथिलाक राजनैतिक स्थिति दयनीय भऽ गेल छल। दान रत्नाकरक एक श्लोकमे कहल गेल अछि जे मिथिला म्लेच्छ रूपी समुद्रमे डुबि गेल छल (मग्नाम्लेच्छमहार्णवे.....)। कहबाक तात्पर्य इ भेल जे हरिसिंह देवक समय तक अवैत मुसलमानी आक्रमणक प्रकोप मिथिलापर बढ़ि गेल छल आ हरिसिंह देव अखन धरि ककरो समक्ष झुकल नहि छलाह जेना ज्योतिरीश्वरक विवरण सँ स्पष्ट होइछ। अपितु हमरा बुझना जाइत अछि जे वो कोनो सुलतानकेँ पराजित सेहो केने छलाह– आव इ सुलतानकेँ छलाह से कहब कठिन? नामक अभाव किछु निश्चित नहि कहल जा सकइयै। नाबालिक होएबाक कारणे हरिसिंह देवकेँ बहुत दिन धरि अपना मंत्री सबक अधीनमे रहए पड़ल छलन्हि। १३२३–२४मे मिथिलापर गियासुद्दीन तुगलकक आक्रमण भेल। मिथिलापर आक्रमणक पूर्व ओ बंगालपर आक्रमण कएने छलाह मुदा कानूनगोए महोदय कहैत छथि जे ओ पहिने तिरहूत आ तब बंगालपर आक्रमण केलन्हि। मुदा से मत मान्य नहि अछि। गियासुद्दीनक आक्रमणक विवरण सब मुसलमानी स्रोतमे भेटइत अछि, मुल्ला तकिआमे सेहो आ एहि घटनाक एकटा चश्मदीद गवाह सेहो छथि जनिक पोथी वशातिनुलउन्स अखनो उपलब्ध अछि आ जकर फोटो कॉपी पटनाक काशी प्रसाद जायसवाल शोध संस्थानमे अखनो राखल अछि। ओहि पाण्डुलिपिक बारहम पातपर मिथिलाक राजाक सम्बन्धमे कहल गेल अछि जे ककरो कोनो बात नहि सुनलन्हि, तर्क आ बुद्धिसँ काज नहि लेलन्हि आ अनेरो पहाड़ दिसि पड़ा गेलाह–आगि जकाँ पाथरक पाछु नुका गेला मुदा तइयो चकमक करिते रहलाह। इशामीक अनुसार गियासुद्दीन तिरहूतपर आक्रमण केलन्हि आ ओहिठामक राजा एत्तेक भयभीत भऽ गेला जे बिना कोनो प्रकारक विरोध केने भागि गेला। हिन्दू लोकनि सेहो जंगलमे नुका रहलाह। सुल्तान जखन अपनहि हाथसँ जंगल काटब शुरू केलन्हि तखन सैनिक सेहो ओहिमे जुटि गेला आ तीन दिनमे सम्पूर्ण जंगल साफ भऽ गेल। तकर बाद राजाक किलापर चढ़ाई भेल जे सातटा पैघ–पैघ पानि भरल खाधिसँ घेरल छल। किलापर विजय प्राप्त कए राजाक धन सम्पत्ति सबटा लूटलन्हि आ विरोधीक हत्या केलन्हि। अहमदकेँ अहिठामक शासक नियुक्त कए ओ ओतएसँ वापस गेलाह। फरिश्ता आ मुल्ला तकिआमे हरिसिंह देवक गिरफ्तारक गप्प झूठ अछि कारण वशातिनुल–उंसक विवरणसँ इ बात कटि जाइत अछि। वशातिनुलउंस (लेखक–इखतिस्सान)क अनुसार–तिरहूतक राजाकेँ प्रचुर सामग्री उपलब्ध छलन्हि, जन–धनक कोनो अभाव नहि छलन्हि, मजबूत किला छलन्हि, नीक व्यक्तित्व छलन्हि मुदा ओ घमण्डे चूर रहैत छलाह आ विद्रोहक भावनाक् नेतृत्व सेहो करैत छलाह। राजद्रोह हुनकामे कूटि–कूटिकेँ भरल छल। एहिसँ पूर्वक शासकक प्रति कहियो ओ अपन माथ नहि झुकौने छलाह, ने ककरो मातहदी गछने छलाह आ ने कहिओ पराजित भेल छलाह। सुल्तानक आगमनक सूचनासँ ओ भयभीत भऽ गेला आ संगहि चिंतित सेहो। ओ किंकर्तव्यविमूढ़ भऽ बैसि गेला। एतेक चिंतातुर आ अपाहिज जकाँ ओ भऽ गेला जे सब किछु रहितहुँ ओ सुल्तानक विरोध करबाक वजाय किला छोड़ि भगबाक घोषणा करैत ओ सबसँ तेज घोड़ापर चढ़िकेँ भागि गेलाह। भोरमे जे अपनाकेँ सम्राट बुझैत छलाह तिनके स्थिति साँझमे भिखारि जकाँ भऽ गेलैन। ओ ओतए पहाड़ दिसि भगलाह आ अपनाकेँ पाथरक पाछु नुका लेलन्हि। सुल्तान ओहिठाम बहुत दिन धरि रूकला आ प्रशासनिक व्यवस्था केलन्हि। जे केओ सुल्तानक आज्ञा मानलन्हि हुनका क्षमादान भेटलन्हि आ बाँकीकेँ सजा। सब किछु ठीक ठाक केलाक बाद ओ ओहिठामसँ दिल्ली दिसि विदा भेला। तिरहूत तुगलक साम्राज्यक एकटा अंग बनि गेल आ ओकरा तुगलकपुर सेहो कहल जाइत छल। एवँ प्रकारे कर्णाट कालक गौरव पूर्ण शासनक अंत भेल आ शुद्ध रूपे मिथिलामे मुसलमानी अमल शुरू भेल। एतवा दिन मुसलमान एम्हर–आम्हरसँ हस्तक्षेप करैत छलाह मुदा आव मिथिला दिल्ली सल्तनतक एकटा प्रांत बनि गेल आ एकर स्वतंत्र सत्ता समाप्त भऽ गेलैक जकरा पुनर्स्थापित करबाक प्रयास बादमे शिवसिंह आ भैरव सिंह केलन्हि। कर्णाट वंशक पराभव भेलापर मिथिलामे ओइनवार वंशक स्थापना भेल आ इ राजवंश तुगलक साम्राज्यक करद राज्य छल। ओना आंतरिक मामलामे जे स्वायतत्ता प्राप्त रहल हौकसँ दोसर बात मुदा वास्तविकता आव इएह जे कर्णाट कालीन स्वतंत्रता लुप्त भऽ चुकल छल आ मुसलमानी प्रभाव मिथिलामे काफी बढ़ि गेल छल। खास कऽ कए तुगलक लोकनिक सम्बन्ध ओइनवार शासकक संग बरोबरि बनल रहलन्हि आ जखन तुगलक वंशक ह्रास भेल तखन आन–आन शक्ति सब सेहो मिथिलाकेँ धमकावे लागल। बंगाल, जौनपुर, अवध आ दिल्ली सबहिक मुसलमान शासकक नजरि मिथिलापर बनल रहैन्ह आ जखन जे मौका पावैथि सैह हाथ मारि लैत छलाह। कोनो तरहे मिथिलाकेँ चैन नहि छलैक आ बेचारे शिवसिंह आ भैरवसिंहक सत्प्रयासक बादो मिथिला स्थायीरूपेण राजनीतिक क्षेत्र कर्णाटकालीन मर्यादा नहि प्राप्त कऽ सकल। इ तँ धन्य विद्यापति जे अहिवंशक गौरवगाथाक यशोगान कऽ एकरा अमरत्व प्रदान करेबामे समर्थ भेलाह। गियासुद्दीन तुगलकक समयमे तिरहूतकेँ बंगालसँ फूटका कऽ एकटा अलग प्रांत बनाओल गेल छल आ दरभंगामे ओकर राजधानी छल। ताहि दिनसँ दरभंगा मुसलमानी शक्तिक प्रसारक जे एकटा केन्द्र बनल से बनले रहल जा धरि कि ओहिपर अंग्रेजक कब्जा नहि भऽ गेलैक। ओइनवार वंशकेँ तुगलक लोकनिक हाथे राज्य भेटल छलन्हि तैं ओ लोकनि ओहिवंशक उपकृत छलाह। मोहम्मद तुगलकक समयमे एकर आर प्रसार भेलैक आ तिरहूत पर तुगलक शक्तिक विस्तार सेहो मुदा महत्वाकाँक्षी लोकनिक तँ कतहुँ अभाव नहि अछि आ इएह कारण छल जे बंगालक शमसुद्दीन हाजी इलियास रक्षकक स्थान पर भक्षकक काज केलन्हि आ तिरहूत आ नेपाल पर आक्रमण कए देलन्हि। तुगलक साम्राज्यमे मोहम्मद तुगलकक पगलपनीक चलते जे अव्यवस्था उत्पन्न भऽ गेल छलैक ताहिसँ प्रोत्साहित भए गोरखपुर, बहराइच, चम्पारण, तिरहूत आदिक राजा ढ़ीट भगेल छलाह आ शमसुद्दीन इलियास अपन महत्वाकाँक्षाक पूर्त्ति करबाक हेतु हिनका लोकनिकेँ सजा देवाक ढ़ोंग रचलक। हिन्दू राजा लोकनि आपसमे बटल छलाह जकर परिणाम इ भेल जे इ लोकनि सम्मिलित भए ओकर मुकाविला नहि कऽ सकलाह आ हाजी इलियास अपन विजयक डंका बजबैत हाजीपुर धरि पहुँचि गेल। गोरखपुर धरि ओकर प्रभाव बढ़लैक आ मिथिलामे ओइनवार राजाक अधिकारकेँ ओ सीमित ककए बूढ़ी गण्डकक उत्तरी भागमे राखि देलक आ दक्षिणक समस्त भागपर अपन आधिपत्य स्थापित केलक। समस्तीपुरसँ बेगूसराय धरि आ ओम्हर हाजीपुर धरि इलियासक आधिपत्य बढ़लैक आ समस्तीपुर एवँ हाजीपुरक संस्थापको इएह मानल जाइत अछि। हाजीपुरक सामरिक महत्व ताहि दिनसँ बनले रहल आ मुसलमान कालमे एकर महत्व छल। बंगालोक प्रतिनिधि अहिठाम रहैत छलाह। जखन फिरोज तुगलक गद्दीपर बैसलाह तखन इलियासक ढ़ीटपनी दिसि हुनक ध्यान आकृष्ट भेलन्हि आ तैं तुगलक साम्राज्यक निर्धारित सीमापर अपन सत्ता स्थापित करबाक हेतु ओ अग्रसर भेलाह। एम्हर जे हिन्दू राजा सब इलियाससँ पराजित भेल छलाह सेहो सब इलियाससँ खिसियैले छलाह आ तैं ओ लोकनि हर्षौत्फ्फुल भेलाह। फिरोज तुगलकक स्वागतमे ठाढ़ भेला गोरखपुर, कारूष, चम्पारण आ तिरहूतक शासक लोकनि। अहि सबपर अपन सत्ता स्थापित कए फिरोज सरयु नदीसँ कोशी नदीक क्षेत्र धरिक इलाकापर अपन प्रशासनिक व्यवस्था ठीक केलन्हि आ ओकरा अपन अधीनमे पुनः आलन्हि। फिरोजक प्रगतिक सूचना सुनितहि इलियास तिरहूतसँ भागल आ फिरोज हुनका पाँछा गेला। इलियास पहिने पण्डुआ पहुँचल आ तकर बाद एकदला। फिरोज तुगलक तिरहूत बाटे बंगाल दिसि गेलाह आ झंझारपुर अनुमण्डलमे सम्प्रति एकटा पिरूजगढ़ अछि जे फिरोज द्वारा स्थापित कहल जाइत अछि। ओहिठामसँ ओ राजविराज लग कोशी पार करैत बंगाल पहुँचलाह आ इलियासकेँ हरौलन्हि। ओहिठामसँ घुरलापर मिथिलाक सहयोगक प्रतिदान स्वरूप ओ भोगीश्वरकेँ अपन प्रियसखा कहैत मिथिलाक राजा बनौलन्हि। कहल जाइत अछि जे तिरहूतक दुनू भागकेँ मिलाकेँ ओ एक केलन्हि आ समस्त राजक भार ओइनवार लोकनिकेँ देलन्हि। मुदा किछु गोटएक मत छन्हि जे इ काजक श्रेय शिवसिंहकेँ छलन्हि। दिल्ली घुरबासँ पूर्व फिरोज मिथिलाक हेतु अपन कलक्टर आ काजी बहाल केलन्हि। हाजी इलियासकेँ मिथिलासँ भगाकेँ ओहिपर ओ पुनः अपन आधिपत्य स्थापित केलन्हि आ ओइनवार वंशकेँ करद राज्यक रूपमे रहए देलन्हि। इ लोकनि वार्षिक कर तुगलककेँ दैत रहलाह। इलियास अपना अमलमे तिरहूतमे बहुत रास किला बनबौने छल मुदा ओकरा गेलापर ओहि सब किलाकेँ हिन्दू लोकनि तोड़ देलन्हि। फिरोज तुगलकक दिल्ली चल जेबाक बाद ओइनवार वंशमे आंतरिक संघर्ष प्रारंभ भेलैक आ एम्हर तुगलक लोकनिक प्रभाव सेहो घटे लगलन्हि। गणेश्वरक हत्यासँ मिथिलामे एक नवस्थिति उत्पन्न भेल जकर चर्च हम पूर्वहि कऽ चुकल छी। बिहारमे मलिक वीर अफगान तुगलक लोकनिक प्रतिनिधि छलाह मुदा तिरहूतपर हुनक कोनो अधिकार छलन्हि अथवा नहि से कहब कठिन कारण तिरहूत तखन बिहारसँ अलग राज्य छल। कीर्तिसिंह आ वीर सिंहक जौनपुर यात्राक उल्लेख पूर्वहि भऽ चुकल अछि आ इ लोकनिक जौनपुरक इब्राहिम शर्कीसँ मदति लेबाक हेतु विद्यापतिक संगे ओतए गेल छलाह। फिरोज तुगलकक पोता सुल्तान महमूद तुगलक बिहार आ तिरहूतक राज्य अपन वजीर ख्वाजा जहाँ (जकरा मलिक–उस–शर्क) सेहो कहल जाइत छैक के देने छलाह आ ओ जखन देखलन्हि जे दिल्लीक गद्दी लड़खड़ा रहल अछि तखन ओ अपन स्वतंत्रता घोषित कऽ लेलन्हि। ओ अपन पदवी सुल्तान–उस–शर्क रखलन्हि आ अपनाकेँ जौनपुरक शासक घोषित केलन्हि। आ अवध, बिहार, तिरहूत तथा गंगाक दोआव धरि ओ अपन आधिपत्य कायम रखलन्हि। एतवा धरि निश्चित अछि जौनपुरक आक्रमण मिथिला पर भेल छलैक मुदा ओ कीर्ति सिंह–वीर सिंहक हेतु अथवा बंगालमे मुसलमानी सत्ताक पुनर्स्थापनक क्रममे से कहब कठिन। मुल्ला तकिया विवरणमे इब्राहिम शाह शर्कीक शिलालेखक उल्लेख अछि जाहिसँ तथ्यक पुष्टि होइछ मुदा तत्कालीन घटना क्रमक सम्बन्ध ततेक रास नेऽ बात सब मिझ्झर भेल अछि जे ओहिमे सँ कोनो वास्तविक तथ्यकेँ बाहर करब कठिन गप्प। एहि हेतु अखन आरो प्रयास करए पड़त आ तखनहि हमरा लोकनि ओहि औझरैल जालसँ बाहर हैब। १४६० धरि मिथिला जौनपुरी राज्यक मातहदी राज्य छल तकर कोनो प्रमाण हमरा लोकनिकेँ नहि भेटइत अछि। मुसलमानी साधन सेहो एत्तेक स्पष्ट नहि अछि जाहि आधार किछु ठोस बात कहल जा सकए। जखन तुगलक साम्राज्यक पतनक बाद चारूकात अस्थायित्व छल आ कोनो निस्तुकी राजाक शासन जमि नहि रहल छल तखनहि मिथिलामे शिवसिंहक उदय भेलन्हि आ ओ मिथिलाकेँ मुसलमानी नियंत्रणसँ मुक्त कऽ अपन सोनाक सिक्का बाहर केलन्हि। बंगाल, जौनपुर, दिल्ली आ आन–आन, छोट–छोट राज्य जखन सब अपन डफली बजा रहल छलाह तखन शिवसिंहे किएक चुप्प बैसितैथ? शिवसिंहक संघर्ष जौनपुरक शर्की राजाक संग भेल छलन्हि। ओना तँ अहि युद्धक पूर्ण विवरण नहि ज्ञात अछि मुदा कीर्तिपताकाक विवरणसँ एहि युद्धक संकेत भेट सकइयै। हुनका द्वारा घोषित मिथिलाक स्वतंत्रता मुसलमानक आँखिमे काँट जकाँ गरए लागल आ ओ अपन स्वतंत्रताक सुरक्षार्थ अपन जानक बाजी लगौलन्हि। शिवसिंह लड़ैत–लड़ैत मारल गेला अथवा कतहु पड़ा गेला से कहब कठिन। शिवसिंहक बादसँ मिथिलापर आधिपत्यक हेतु दिल्ली, जौनपुर आ बंगालक बीच घीचांतीरी होइत रहल। शिवसिंहक पछाति कालक्रमेण इलियास वाला बटबाराकेँ बंगालक शासन पुनः जीऔलक आ ओहि क्षेत्रपर पुनः अपन स्तित्व कायम केलक। भैरवसिंहक समयमे ओहि क्षेत्रपर बंगालक प्रतिनिधि रहैत छल से वर्धमानक दण्डविवेक ग्रंथसँ ज्ञात होइछ– “गौड़ेश्वर प्रतिसरीरमति प्रतापः। केदार रायमवगच्छति दारतुल्यम्”॥ इ केदार राय बंगाल सुल्तानक प्रतिनिधि छलाह। इ हाजीपुरमे अपन मुख्यालय रखने छलाह। भैरव सिंह हिनका पराजित कऽ पंचगौड़ेश्‍वरक पदवीसँ विभूषित भेल छलाह आ मिथिलाक दुनू भागकेँ एक वेर पुनः जोड़िकेँ एक केने छलाह आ संगहि अपनाकेँ स्वतंत्र सेहो घोषित केने छलाह। तकर बाद लोदी वंशक प्रभाव मिथिलापर बढ़लैक आ सिकन्दर लोदी मिथिलाक राजाक परम मित्र छलाह जकर उल्लेख हम पूर्वहि कऽ चुकल छी। सिकन्दर जौनपुरकेँ हराकेँ अपन राज्यक विस्तार पटना, तिरहूत आ सारन चम्पारण धरि केने छलाह। वाकिआत–इ–मुस्तकीसँ ज्ञात होइछ जे ताहि दिनमे चम्पारणमे मियाँ हुसैन फारमुली जागीरदार छलाह। आधिपत्यक हेतु लोदी आ बंगालक शासकक बीच संघर्ष होइत रहल आ मिथिला पेड़ाइत रहल। लोदीक समयसँ मिथिलापर मुसलमानक प्रभाव एकदम प्रत्यक्ष होमए लगलैक। बेगूसरायमे एकटा लोदीडीह अखनो अछि आ तुगलकसँ लऽ कऽ शाह आलम धरिक सिक्का ओतएसँ प्राप्त भेल अछि। दिल्ली आ बंगाल दुनु मिथिलापर अधिकार प्राप्त करबा लेल संघर्षशील रहैत छलाह। भगिरथपुर अभिलेख अहिबातक साक्षी अछि जे मिथिलापर चारूकातसँ मुसलमानी प्रकोप खूब जोर–शोरसँ बढ़ि गेल छल। १५२६मे पानीपतक पहिल लड़ाईमे इब्राहिम लोदी परास्त भेला। बाबरक लेख इत्यादिमे तिरहूतक राजा रूपनारायणक उल्लेख भेटइयै। तिरहूत बाबरकेँ कर दैत छल। बाबरसँ पूर्वहुँ तिरहूतमे अपन आधिपत्य कायम रखबाक हेतु मुसलमान लोकनि किछु उठा नहि रखलन्हि। बंगालक राजा नसरत शाह तिरहूतक राजाकेँ परास्त केलक आ नसरत शाहक एकटा अभिलेख बेगूसरायक मटिहानी गामसँ प्राप्त भेल छैक। नसरत अलाउद्दीनकेँ तिरहूतक गवर्नरक रूपमे नियुक्त केलक। नसरतक अवसान भेलापर मकदूम शाह विद्रोह केलक आ सासारामक अफगान नेता शेरशाहक संग मित्रता सेहो। शेरशाह चम्पारणसँ चटगाँव धरि जीतबाक प्रयास केने छल। हुमायुँक भाएक प्रभाव नरहनमे छलैक जे कि महेश ठाकुरक सर्वदेश वृतांत संग्रहसँ बुझना जाइत अछि। हाजीपुरपर शेरशाहक प्रभाव छलैक। १५४७मे हुमायुँ मिरजा हिन्दालकेँ हाजीपुरपर कब्जा करबाक आदेश देलकै। १५३० सँ १५४५ धरि मिथिलामे अराजकता रहलैक आ तकर किछु दिनक बाद केशव कायस्थ राजा भेल। दिल्ली सँ इ राज्यक भार हुनका भेटल छलन्हि। शेरशाह आ हुनक वंशजक शासन तिरहूतपर छलन्हि। तेघड़ा क्षेत्रमे मुगल–अफगानक संघर्ष भेल छल। मुगल साम्राज्यक समयमे मिथिलाक हेतु दिल्ली दिसि गवर्नर अथवा मुगलक प्रतिनिधि नियुक्त कैल जाइत छल। दरभंगामे बरोबरि फौजदार रहैत छल। महेश ठाकुरक शासनकालमे बहुत रास पठान सब तिरहूतमे आबिकेँ बसि गेल। 1575मे जखन दाउद खाँ अफगान मुगलक विरोधमे विद्रोह केलन्हि तखन मिथिलाकेँ पठान सब हुनक संग देलन्हि। दाउदकेँ दबेबाक हेतु अकबर बिहार, तिरहूत आ हाजीपुरसँ सेना जमा केने छलाह। सैनिक दृष्टिकोणसँ मुगलकालमे हाजीपुर बहु महत्वपूर्ण भऽ गेल छल। अकबर हाजीपुरकेँ बरोबरि सुरक्षित राखए चाहैत छलाह आ खान–इ–आजमकेँ बंगाल आ तिरहूतक गवर्नर नियुक्त केने छलाह। मुजफ्फर खाँ चम्पारणक राजा उदीकरणक संग मिलि विद्रोही लोकनिकेँ दबौने छलाह। तिरहूतक राजा सम्राटकेँ कर दैत छलथिन्ह। १५८०क बाद शुभंकर ठाकुर भौरमे मिथिलाक राजधानी बनौलन्हि आ मुगल सम्राटसँ अपन बढ़िया सम्बन्ध बनाके रखलन्हि। शुभंकर ठाकुरक समयमे जखन अकबर काबुल दिसि गेल छलाह तखन एम्हर तिरहूतमे बदम्क्षीक पुत्र बहादुर शाह साम्राज्यक विरूद्ध विद्रोह केलन्हि आ अपन नामक सिक्का आ खुतबा शुरू क देलन्हि। पश्चात् ओ आजम खाँक नौकर सब द्वारा मारल गेला। पुरूषोत्तम ठाकुर जखन राजा भेलाह तखन हुनका राजस्व जमा करबाक हेतु किला घाटमे बजाओल गेलन्हि आ ओतहि धोखासँ मारि देल गेलन्हि। हुनक पत्नी दिल्ली जाए जहाँगीरक दरबारमे एकर शिकायत कैलक आ पुरूषोत्तमक हत्याराकेँ मृत्युदण्ड देल गेलैक। रानी ओतहि जमुना नदीक निगम बोध घाटपर सती भऽ गेलीह। हुनक बाद नारायण ठाकुरक शासन कालमे कोनो एहेन महत्वपूर्ण घटना नहि घटल आ मुसलमानक सम्बन्ध यथावत रहल। तब सुन्दर ठाकुर राजा भेलाह। १६६१मे औरंगजेबक एकटा फरमान अछि जाहिमे उल्लिखित अछि जे महिनाथ ठाकुर पलामू आ मोरंगकेँ जीतबामे साहाय्य देने छलाह। हुनका समय नवाब मिरजा खाँ दरभंगाक फौजदार छलाह। पलामूक चेरो सरदार प्रतापराय सम्राटकेँ कर देव बन्द कऽ देने छलाह आ अपना क्षेत्रमे तहलका मचौने छलाह। हिनका दबेबाक हेतु औरंगजेबक आदेश एलापर फौजदार महिनाथ ठाकुरसँ मदति लेलन्हि आ पलामूक संग-संग मोरंगक विद्रोही लोकनिकेँ सेहो दबाओल गेल। ओहि हेतु औरंगजेब हिनका धन्यवाद सेहो देने छलथिन्ह। अहिसँ इ स्पष्ट अछि जे मुगल सम्राटक अधीन छलाह। हिनका पारितोषिक हेतु मूंगेर, हवेली, ताजपुर, पूर्णियाँ, धरमपुर आदिक जमीन्दारी भेटलन्हि आ माछक निशान सेहो। मोरंगक विरूद्धक लड़ाइमे नरपति ठाकुर सेहो संग देने छलथिन्ह। महिनाथक बाद नरपति ठाकुर राजा भेलाह। मिरजा खाँक पश्चात मासूमखाँ, नुसेरी खाँ, शाहनवाज खाँ आ हादी खाँक ओहिठामक फौजदार भेला। नरपति ठाकुरकेँ मकवानपुरक राजासँ झंझट भेलन्हि। नरपति ठाकुर तखन सूबादारसँ अनुरोध केलन्हि आ सूबादारसँ आश्वासन भेटलापर मकवानीपर आक्रमण केलन्हि। मकवानीक राजाकेँ पकड़िकेँ दरभंगाक फौजदारक समक्ष आनल गेल जतए ओ कर देव स्वीकार केलन्हि। बादमे नवाब फिदाई खाँ (1692 – 1702) ओकरा आ बढ़ाकेँ बेसी कऽ देलन्हि। तकर बाद राघव सिंहक शासन भेल। 1701मे शमशेर खाँ तिरहूतक फौजदार छलाह। ओहि वर्ष राघव सिंह राजा भेल छलाह। अलीवर्दी हुनका राजाक पदवी देने छलन्हि। ओ तिरहूतक राज्य मुकर्ररीपर लऽ लेने छलाह मुदा पारिवारिक संघर्षक चलते केओ एक गोटए जाके नवाबकेँ हुनका विरोधमे खबरि कऽ देलकन्हि आ नतीजा इ भेलैक जे हुनकापर चढ़ाई भऽ गेलन्हि आ हुनक राज्य जप्त कऽ लेल गेलन्हि। रिआज – उस सालातिनक अनुसार भौरक राजाक विद्रोही प्रवृत्तिक कारणे इ आक्रमण भेल छल। पुनः हुनका ‘रेवन्यु कलक्टर’ बनाकेँ तिरहूत वापस पठैल गेलन्हि। नवाबक दीवान धरणीधरकेँ सेहो इ पचास हजार टाका सालाना दैत छलथिन्ह। एकर बाद विष्णु सिंह राजा भेलाह आ तकर बाद नरेन्द्र सिंह। नरेन्द्र सिंहक शासनकाल महत्वपूर्ण अछि। हिनकहि शासनकालमे कन्दर्पी घाटक लड़ाई भेल छल। राजा रामनारायणसँ हिनका संघर्ष भेल छलन्हि जकर विवरण हमरा लालकविसँ प्राप्त होइछ। रामनारायणक नेतृत्वमे भिखारी महथा, सलावत राय आ वख्त सिंह पाँच हजार सेनाक संग मिथिलाक राजा नरेन्द्र सिंहपर आक्रमण केने छलाह। रामनारायण भिखारी महथाकेँ आदेश देलथिन्ह जो तिरहूतकेँ सोझे अपना कब्जामे कऽ लौथ। सलावत राय सेहो हुनका संग गेलथिन्ह। राजा नरेन्द्र सिंह सेहो तैयारी कऽ कए बढ़लाह। बक्सी गोकुलनाथ झा, जाफर खाँ आ हालाराय सेहो हुनका संग आगाँ भेलथिन्ह। राजा मित्रजित आ उमराव सिंहकेँ आगाँ पठौलथिन्ह जाहिसँ ओ लोकनि दुश्मनक सेनाकेँ रोकि सकैथ। सलावत राय उमरावकेँ हाथे मारल गेला आ भिखारी महथा कहुना बचिकेँ भागलाह। लालकविक वर्णनक किछु अंश एवँ प्रकारे अछि– “रामनारायण भूपतें कहयौ मुखालिफ जाय। हाकिम को मिथिलेशने, दीन्हों अदल उठाय॥ सीरकरो तिरहूति को, ताके रचो उपाय। फौजदार महथा भये, संग सलावति राय॥ वख्त सिंह कुल उद्धरण, रोड़मल्ल दिलपुर। चौभान भानु भानू सुउअ, एक एक तैं सूर॥ याही सब तै नाथ करी, फौजे पाँच हजार। दिग शुल सन्मुख जोगिनी, महथ उतरे पार॥ पड़ै उठाय धाय धाय एक एक सँ लड़ै। मनो गजेन्द्र सो गजेन्द्र जंग जोर को धरै॥ महीप मित्रजित राव वख्त सिंह को धरै। चखा चखी चोट चोट लोट पोट ह्वैगिरै॥ एहि युद्धमे नरहनक राजा नरेन्द्र सिंहक संग देने छलाह। कन्दर्पी घाटक युद्ध बलान नदीक तटपर भेल छल। नरेन्द्र सिंह एहि युद्धमे विजयी भेल छलाह। दरभंगाक अफगान लोकनि सेहो करीब तीन मासक हेतु अपनाकेँ स्वतंत्र घोषित कऽ चुकल छलाह। दरभंगाक अफगान आ दरभंगाक महाराज लोकनिक बीच सम्बन्ध बढ़िया छल। अलीवर्दीक विरोधमे दरभंगाक अफगान लोकनि मराठाक संग षडयंत्र करए लागल छलाह। अफगान सब अखनो मोहद्दीनगरक समीपमे छथि। 1765मे जखन अंग्रेजकेँ बंगाल, बिहार आ उड़ीसाक दिवानी भेट गेलैक तखन राजनैतिक स्थितिमे पूर्ण परिवर्त्तन भऽ गेलैक आ मुसलमानी अमल एक रूपें समाप्त भऽ गेलैक। 1774मे तिरहूतकेँ पटनाक अधीन कऽ देल गेलैक आ 1782मे ग्रैण्‍ड तिरहूतक कलक्टर भऽ कए एला। तखन मुजफ्फरपुर तिरहूतक अधीन छल। मुसलमानी अमलक अंत भेलापर अंग्रेजक अमल शुरू भेल आ मिथिला ओकर एकटा अंश बनि गेल। मुगल कालमे मिथिला तीन प्रकारमे विभाजित छल – हाजीपुर, चम्पारण आ तिरहूत आ अधुना (तिरहूत) मिथिलाक प्राचीन सीमा क्षेत्रक हिसाबे मुजफ्फरपुर, दरभंगा आ कोशी प्रमण्डल मिलाकेँ मिथिला कहाओल जाइत अछि। अंग्रेज अपना सुविधानुसार प्रशासनिक क्षेत्र बनौने छलाह आ आजुक शासक ओकरा आओर अपना सुविधानुसार बना रहल छथि। अध्याय–१३ मिथिलामे अंग्रेजी राजक अमल (१७६५–१९४७) १७६४क बक्सरक लड़ाइ भारतक हेतु एकटा निर्णायक युद्ध छल कारण एकरा बाद इ स्पष्ट भऽ गेल छल जे उत्तर भारतक कोनो शक्तिकेँ आब अंग्रेजसँ मुकाबिला करबाक क्षमता नहि रहि गेल छलन्हि। १७६५मे अंग्रेजी इस्ट इण्डिया कम्पनीकेँ जखन दिवानी भेटलैक तखनहिसँ भारतमे अंग्रेजी राज्यक स्थापनाक वीजारोपण सेहो भऽ गेलैक। १८म शताब्दी उत्तर भारत आ दक्षिण भारतक महत्वाकाँक्षी नेता लोकनिक स्वार्थ पूर्त्तिक युग छल जखन लोग देशक पैघ स्वार्थकेँ बिसैरि अपन छोट–छोट स्वार्थक पूर्त्तिक हेतु देशक बलिदान करैत जाइत गेलाह। तिरहूत औरंगजेब समय धरि मुर्शिदाबादक नवाबक मातहदीमे छल। १७४०सँ बिहार आ तिरहूतक भाग्य मुर्शिदाबादसँ मिलल छल आ ओहिठामक नवाब बिहारमे अपन उपनवाब बहाल करैत छलाह। अलीवर्दी खाँ पहिने बिहारेक उपनवाब छलाह। अलीवर्दीक कृपासँ अंग्रेज व्यापारी लोकनिकेँ थोड़ेक सुविधा प्राप्त भेल रहैन्ह। १७५६मे अलीवर्दीक मृत्यु भऽ गेलैक आ तकर बाद सिराजुद्दौलाह बंगालक नवाब भेल। अंग्रेज लोकनि अपन कुचक्रसँ पलासीक युद्धमे सिराजकेँ परास्त कए मीरजाफरकेँ १७५७मे नवाब बनौलन्हि। १७६०मीरजाफरकेँ हटा कए मीरकासिमकेँ नवाब बनाओल गेल। मीरकासिम मूंगेरकेँ अपन राजधानी बनौलन्हि। हुनका अंग्रेजसँ पटइत नहि छलन्हि आ बरोबरि खटपट होइत रहन्हि आ अंग्रेज मीरकासिमक चुस्ती चालाकीसँ खार खाइत छलाह। १७६३मे अंग्रेज आ मीरकासिमक बीचक सम्बन्ध आ खराब भऽ गेल आ मीरकासिम दिल्लीक शाह आलम आ अवधक नवाब शुजाउद्दौलाहक सहाय्यसँ अंग्रेजक पटनामे स्थित कम्पनीपर धावा करबाक विचार केलन्हि। एकरे नतीजा भेल १७६४क बक्सरक लड़ाइ। एहिमे अंग्रेज लोकनि विजयी भेलाह आ १७६५मे हुनका दिवानी भेटलन्हि। बंगाल, बिहार आ उड़ीसाक ओ अप्रत्यक्ष रूपेँ मालिक भऽ गेलाह। तहियेसँ मिथिलामे अंग्रेजी राज्यक अमल मानल जा सकइयै। १७६५मे राबर्ट बारकर अपन सेनाक संग उत्तरी बिहारमे विद्रोही जमीन्दारकेँ दबेबाक हेतु ऐलाह। बेतियाक जमीन्दार जे गत दू वर्षसँ अराजक स्थितिसँ लाभ उठाकेँ विद्रोहक झंडा गारि देने छलाह तनिका इ धतेलन्हि। ओ जमीन्दार अपन किलामे नुका रहल छला। बारकरक पहुँचलाक बाद ओ तुरंत हुनकासँ समझौता कऽ लेलन्हि आ सबटा बकिऔता चुका देलन्हि। बारकर बेतियाक सम्बन्धमे बड्ड बढ़िया विवरण देने छथि। १७७२मे जखन बोर्ड आफ रेवन्युक स्थापना भेल तखन तिरहूतक सेहो राजस्वक आधारपर समझौता भेल। १७७४मे तिरहूतकेँ पटनाक अधीन कऽ देल गेलैक। १७७२मे फ्रांसीस ग्रैण्ड तिरहूतक प्रथम कलक्टर भऽ के एलाह। ग्रैण्ड नीलहा कोठीक संस्थापक सेहो छलाह आ हिनके प्रयासे समस्त तिरहूतमे नीलहा कोठीक जाल बिछा देल गेल छल। १७८७धरि ग्रैण्ड साहेब रहलाह आ एहि बीच ओ समस्त तिरहूतक सर्वेक्षण राजस्वक दृष्टिये केलन्हि। तकर बाद वार्थस्ट एला। १७६२मे राजा प्रताप सिंह भौरसँ हटाकेँ दरभंगामे अपन राजधानी लऽ अनले छलाह। १७७०मे जखन पटनामे रेवेन्यु कौंसिलक स्थापना भेल तखन पुनः प्रताप सिंहकेँ अपन जमीन्दारीक मुकर्ररी कम्पनीसँ भेटलन्हि। केली तिरहूतक राजस्व अधीक्षक भऽ कऽ एलाह। १७७१मे प्रताप सिंह आ केलीमे मतभेद प्रारंभ भेल। राजाक ओतए बहुत रास बकिऔता भऽ गेल छलन्हि आ अंग्रेज लोकनि हिनक पुरान स्तित्वकेँ नहि रहए देमए चाहैत छलथिन्ह। माधवसिंहक समयमे फेर नव हिसाबे कम्पनीक संग समझौता भेलन्हि, ओना राज्यारोहणक पूर्वहिं माधवसिंहकेँ धीरज नारायणसँ कैकटा परगन्ना भेटल छलन्हि। सबटा बकिऔता चुकौलापर राज्य पुनः माधवसिंहकेँ वापस भेलन्हि। ताहि दिनमे एक प्रकारक अस्थायित्व छल तैं लगले–लगले परिवर्त्तनो होइत रहैत छल। तथापि १७८१ सँ १७८९ धरि दरभंगा निस्तुकी रूपें माधव सिंहक अधीन रहल। वार्थस्ट कलक्टर दरभंगा आबि महाराजसँ भेट कए अनुरोध केलकन्हि जे दमामी बन्दोबस्त मानि लैथ परञ्च माधवसिंह बड़ा चिंतामे पड़ि गेल छलाह आ कोनो निर्णय लेबामे असमर्थ रहलाह। वो गवर्नर जेनरलसँ अनुरोध केलन्हि जे हुनक राज्य घुरा देल जान्हि। जखन इ सब वार्तालाप छल तखन हुनका कराम अलीक स्टेट सेहो प्राप्त भेलैन्ह (१७९५)। एहिमे १५परगन्नामे ३५टा गाम छल। सरकार बहादुर अहिबातकेँ नहि मानि एहि सब दान बला गाँव अपन राज्यमे मिला लेलक। पुनः झंझटक बाद १८००इ.मे इ सम्पत्ति राजकेँ भेटलैक। अतंतोगत्वा दरभंगा राज सेहो दमामीबन्दोबस्तक अधीन भऽ गेल। महाराज छत्रसिंहक समयमे कम्पनीक संग सम्बन्ध आर बढ़िया भेलैक। कम्पनीकेँ तखन नेपालसँ खटपट होइत छलैक आ लड़ाइक संभावना बढ़ल जाइत छलैक। कम्पनीक प्रतिनिधि महाराजसँ भेंट केलक आ हिनकासँ अनुरोध केलकन्हि जे संभावित गोरखा आक्रमणक विरूद्ध हिनका लोकनिकेँ सतर्क रहबाक चाही। तिरहूतक कलक्टर सीलीकेँ सेहो लिखल गेलैक जे ओ क्षेत्रक सब जमीन्दार सबसँ सेना प्राप्त करबाक प्रयास करे। सीली सेजर बैडशाक नाम जे पत्र लिखने छलाह जनकपुरसँ ताहिसँ ज्ञात होइछ जे दरभंगा महाराजकेँ छोड़ि केओ सक्रिय सहयोग नहि देने छलन्हि। छत्रसिंह करीब ९हजार टाकाक मदति सेहो देने रहथिन्ह। योग्य सैनिकक व्यवस्था सेहो इ कऽ देने छलथिन्ह। हिनक खुफिया सब अंग्रेजकेँ गोरखाक आक्रमणक पूर्व सूचना एवं ओकरा सबहिक बढ़बाक बाटक संकेत सेहो देलकन्हि। नेपालक विरूद्धक संघर्षमे अंग्रेजक मुख्य सहायक (सब तरहें) छत्र सिंह छलाह आ अंग्रेज सेना तखन पुपरी तक पहुँच चुकल। खिसियाकेँ नेपालक राजा अपन सैनिककेँ इ आदेश देलन्हि जे वो तिरहूत जिलाक सब गामकेँ लूट–पाट शुरू करे। जखन नेपालक विरूद्ध अंग्रेजक जीत भेलैक तखन छत्रसिंहकेँ महाराज बहादुरक पदवी भेटलन्हि। युद्ध समाप्त भेला उत्तरो अंग्रेजक अनुरोधपर छत्रसिंहक सेना मोतिहारीमे बनल रहल। इ लोकनि सतत अंग्रेजक खैरखाह बनल रहल। महेश्वर सिंहक समयमे सिपाही विद्रोह भेल। अंग्रेजकेँ हिन्दुस्तानी जमीन्दारपर सन्देह होइते छलैक आ ताहिपर एकटा कारणो आबि गेलैक। एक अफवाह प्रसारित भेलैक जे बहेड़ाक डिपुटी मजिस्ट्रेट मिस्टर डोवटनपर महाराजक एकटा कर्मचारी बन्दुक उठौलक यद्यपि इ बात किछु दोसर छलैक। महाराज अपन स्वामीभक्ति प्रदर्शित करबाक हेतु अंग्रेजकेँ नाथपुर आ पुर्णियाँक बीच डाक व्यवस्था चालू रखबाक हेतु १६टा घोड़सवार देलथिन्ह। १०० सिपाही सेहो ओ अंग्रेजकेँ पठौलन्हि मुदा ओ लोकनि संशकित रहबाक कारणे ओकरा घुरा देलन्हि। १८५५मे संथाल विद्रोहकेँ दबेबाक हेतु सेहो महाराज हाथी इत्यादि कम्पनीक सैनिककेँ देने छलथिन्ह। महाराज महेश्वर सिंहक बाद कोर्ट आफ वार्डस भऽ गेलैक। तिरहूतमे सिपाही विद्रोहक प्रभाव कोनो रूपें कम नहि छल। अंग्रेजक संग बढ़िया सम्बन्ध रखितहुँ महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह देशक नब्जकेँ चिन्हलन्हि आ काँग्रेसक प्रारंभिक अवस्थामे जी जानसँ मदति केलन्हि जकर उल्लेख हम पूर्वहिं कऽ चुकल छी। सिपाही विद्रोहक बाद समस्त भारतपर अंग्रेजक एकछत्र राज्य कायम भेल आ तिरहूत कमीश्नरीक एकटा अंग जिलाक रूपमे दरभंगाकेँ राखल गेल। महेश ठाकुर वंश अंग्रेजी राजक समएमे दरभंगा राजक नामें प्रसिद्ध भेल आ उत्तर बिहारक प्रायः सब जिलामे किछु न किछु हिनका लोकनिकेँ रहबे करैन्ह। रामेश्वर सिंह आ कामेश्वर सिंहक समयमे सेहो ब्रिटिश सरकारक संग सम्बन्ध बढ़िये रहलन्हि आ १९३५–१९३६मे महाराज कामेश्वर सिंह अपन स्तित्वकेँ आर दृढ़ केलन्हि आ हुनकमे बृद्धि भेलन्हि। नेटिभ राज्यक स्थिति प्राप्त करबाक हुनक पैघ अभिलाषा छलन्हि आ अहि दिशामे ओ बहुत प्रयत्नो केने छलाह। सामान्य प्रतिष्ठाक हिसाबे आन जमीन्दारक अपेक्षा दरभंगा राज्यक विशेष महत्व छलैक आ अंग्रेज लोकनि एकरा अपन एकटा पैघ सम्बल मानैत छलाह। १९३५क कानूनक बाद जे राष्ट्रीयताक एकटा वयार बहल तकरा फलें परिवर्त्तन स्वाभाविक भगेल आ १९४७मे भारतक स्वाधीनताक बाद बिहार पहिल राज्य छल जे जमीन्दारी उन्मूलनक हेतु कानून पास केलक आ बिहारसँ जमीन्दारी प्रथा समाप्त भऽ गेल। बिहारक सब जमीन्दार समाप्त भऽ गेला आ ओहि क्रममे मिथिलाक सबसँ पैघ जमीन्दार जे कहियो मिथिलेशो कहबैत छलाह, सेहो समाप्त भऽ गेला। II तिरहूतमे नीलहा कोठीक इतिहास:- उत्तर बिहार आधुनिक भारतक इतिहासक दृष्टिकोणसँ बड्ड महत्वपूर्ण मानल गेल अछि कारण नीलक खेती अहिठाम होइत छल आ एकरा हेतु अंतर्राष्ट्रीय बाजार प्राप्त छल। नीलक अपन महत्व होइत छैक आ जखन इ बुझना गेलैक जे उत्तर बिहार एकरा हेतु उपर्युक्त स्थान अछि तखन इस्ट इण्डिया कम्पनीक कार्यकर्त्ता लोकनिक ध्यान अहि दिसि जाएब स्वाभाविके। अंग्रेजक आगमनक पूर्वहिंसँ अहिठाम नीलक खेती बढ़िया जकाँ होइत छल। युरोपमे इ रंग ततेक जनप्रिय भऽ गेल छलैक जे एकर माँग बढ़ि गेल छलैक। भारतवर्षमे सेहो एकर खेतीक प्रश्न किछु विवाद उठल हेतैक जकर कारण स्पष्ट नहि अछि मुदा १८३७ई.क लार्ड मैकौलेक एकटा मेमोरेण्डम छैक जाहिसँ अहि वस्तुपर प्रकाश पड़इयै आ इ आभास भेटइयै जे तकर बादसँ बंगालमे नीलक खेती कम होमए लागल आ नीलक खेतीपर तिरहूतमे विशेष ध्यान दिये जाए लागल। १७८२ ग्रैण्ड तिरहूतक कलक्टर भऽ कए आएल छलाह आ १७८५मे ओ लिखैत छथि जे ओ अपने तिरहूतमे नीलक खेतीक सूत्रपात युरोपीय पद्धतिपर केलन्हि। इ ओ सबटा अपने खर्चपर केने छलाह। अंग्रेजक सर्वप्रथम फैक्ट्री ओना तिरहूतमे १६५०–१७००क बीच हाजीपूरक समीप सिंघिया अथवा लालगंजमे भेल छल आ तहियासँ अहि क्षेत्रमे अंग्रेजक प्रभाव बढ़ैत गेल आ ग्रैण्ड जखन कलक्टर भऽ कए एलाह तखन नीलक खेतीकेँ विशेष प्रोत्साहन भेटल। ग्रैण्ड एकरा एकटा उद्योगक हिसाबे विकसित केलन्हि। १७८८क ४फरवरीक एकटा रिपोर्टमे कहल गेल अछि जे तिरहूत कलक्टरीमे जे बारह–गोटए युरोपियन रहैत छथि ताहिमे १०गोटए नीलक खेती करैत छथि। इ बारहो गोटए कम्पनीक नौकर नहि छलाह। एहिमे सँ ६ गोटएक नाम छल–पीटर डी रोजेरियो, जेम्स जेंटिल, जी. डब्लु. एस. शुमान, जेम्स गेलन, जान मिलर आ फ्रांसिस रोज। जेम्स गेलन रोजेरियोक मनेजर छलाह। फ्रांसीस रोज जबर्दस्ती तिरहूतमे राजवल्लभक जागीरमे अपन नीलक खेती शुरू कऽ देने छलाह। १७९३मे नील फैक्ट्रीक संख्या ९ भऽ गेल छल। नील फैक्ट्रीक स्थापनासँ कानूनी व्यवस्था जटिल भऽ गेल छल आ ओहिपर सरकारकेँ ध्यान देमए पड़इत छलैक। एकर कारण इ छल कि इ लोकनि तरह–तरहक अन्याय आ जोर जबर्दस्ती करैत जाइत छलाह। १७९३मे तिरहूतक जज नीवकेँ बाध्य भऽ कए डोनबल नामक एक फ्रेंच नागरिक तथा टोमस पार्ककेँ तिरहूत छोड़बाक आदेश देमए पड़ल छलन्हि। टोमस पार्क सरैया आ सिंहियामे बिना कोनो लाइसेंसकेँ बसि गेल छलाह। बिना लाइसेंसकेँ कतहु बसब ताहि दिनमे गैरकानूनी छल। ढ़ोलीक जेम्स आर्नल्डकेँ सेहो जज महोदय ताकिद कऽ देने छलाह जो स्थानीय लोकनिक कुलाचारपर ध्यान राखैथि आ ओकरा विरूद्ध कोनो काज नहि करैथ। एहेन आदेश देबाक कारण इ छल जे जेम्स आर्नल्ड एकटा ब्राह्मणकेँ मारि बैसल छलाह। एवं प्रकारे रोज कोनो ने कोनो समस्या उठिते छल आ एकर विस्तृत इतिहास हमरा लोकनिकेँ मिन्डन विलसनक “हिस्ट्री आफ बिहार इंडिगो फैक्ट्रीज”मे भेटइत अछि। ९टा प्रारंभिक नीलक कोठी जे फुजल छल तकर विवरण एवं प्रकारे अछि:- (i) दाउदपुर - (ii) सराय - विलियम औखी हण्टर (iii) ढ़ोली - (iv) अथर - जेम्स जेंटिल (v) शाहपुर - रिचार्डसन परविस (vi) काँटी - अकेजेण्डर नामेल (vii) मोतीपुर - ‘’ (viii) दयोरिया - फिंच (ix) बनारा - ल्युयिस किक तथा शुमान १७९४मे मात्र ७६७ बीघा १४ कट्ठा जमीनपर नीलक खेती होइत छल मुदा थोड़वे दिनमे ओकर एतेक विकास भेलैक जे समस्त उत्तर बिहारक कोन-कोनमे नीलहा साहेब सब पसरि गेल आ बढ़ियासँ बढ़िया जमीनपर अपन अधिकार कऽ लेलक। १८०३मे २५टा नील कोठी छल जाहिमे प्रमुखक नाम अछि भवराहा (भौर), मुहम्मदपुर, बेलसर, पिपराघाट, दलसिंहसराय, जितवारपुर, तिवारा, कमतौल, चितवारा, पुपरी, शाहपुरूण्डी इत्यादि। १८१०मे कलक्टर अहिबातक अनुशंसा केलन्हि जे २५टा नील फैक्ट्रीकेँ खजानासँ कर्ज देल जाइक कारण इ लोकनि अपना क्षेत्र बेकार सबकेँ काज दैत छथि आ एवं प्रकारे बेकारीक समस्याकेँ दूर करैत छथि। १८१०मे लगभग १०,०००मन नील तिरहूतसँ कलकत्ता पठाओल जाइत छल। चम्पारणमे नेपाल युद्ध समाप्त भेलाक बाद कर्नल हीकी नामक एक व्यक्ति १८१३इ. मे नीलक खेती शुरू केलन्हि। हीकी बारामे अपन फैक्ट्री खोललन्हि। ओकर ठीक बाद राजपुर आ तुरकौलियामे मोरन आ नहल अपन अपन नीलक कारखाना खोललन्हि। १८४५मे सिरहामे कैप्टेन टाइलर अपन कारखाना खोललन्हि। १८१६मे चम्पारणमे नीलक खेतीक उल्लेख नहि भेटइयै मुदा १८३०क रिपोर्टमे एकर वर्णन अछि। चीनीक स्थानपर लोग नील उपजाएब शुरू केलन्हि। नीलक खेती अहि हिसाबसँ बढ़ए लागल कि तिरहूतक कलक्टर घबरा गेला। १८२८मे लिखलन्हि जे आब अहिपर रोक लगाना चाही। १८५०मे तिरहूतमे (दरभंगा मुजफ्फरपुरमे) ८६टा नीलक कारखाना भऽ गेल छल। सब गोटए चीनीक कारबार छोड़ि नीलपर उतरि गेल छलाह। नील उद्योगपर युरोपियन लोकनिक एकाधिपत्य छलन्हि। सिपाही विद्रोहक समयमे जे तिरहूतमे बेसी विस्फोट नहि भेल तकर कारण इएह छल जे अहि क्षेत्रमे नीलहा साहेबक बोलबाला आ दबदबा छल आ मजूर सब हिनका सबसँ रोजी रोटी पबैत छल आ तैं दबाबमे रहैत छल। सिपाही विद्रोहक समयमे अहि क्षेत्रमे शांति स्थापनाक भार सरकार हिनके लोकनिपर छोड़ि देने छलन्हि आ इ लोकनि ओकर नीक जकाँ निर्वाह केलन्हि। दलसिंहसराय, तिवारा आ जितवारपुरक कारखाना पुरान छल आ ओहि सबहक बड्ड धाक छलैक। १८७४मे तिरहूतक सबसँ पैघ नीलक कारवार पण्डौलमे छलैक जकर क्षेत्रफल ३०० वर्गमील छलैक। १८६७–६८मे नीलक खेतीक विरोधमे एकटा जबर्दस्त प्रदर्शन चम्पारणमे भेलैक। रैयतक शोषण चरमोत्कर्षपर छलैक आ ओकर कोनो निदान सेहो नहि बहराइत छलैक। मजदूरकेँ पूरा पारिश्रमिक नहि देल जाइत छलैक। मजदूर लोकनि नीलक खेती करबासँ इंकार करए लागल आ जिउकतिया नामक गाममे अहि विरोधक पहिल उदाहरण भेटइत अछि। आनगामक लोग सब सेहो एकर देखा–देखी शुरू केलक। अहि वस्तुकेँ जल्दी सोझरेवाक हेतु मोतिहारीमे तत्काल कचहरीक स्थापना भेल। रैयतक प्रति थोड़ेक सुविधा सेहो देखाओल गेल। अंग्रेजकेँ शक्क भेलैक जे अहि आन्दोलनकेँ केओ उसका रहल अछि। आ हुनका लोकनि दृष्टि बेतिया राजपर गेल। १८७६मे बेतिया राजमे अंग्रेज मनेजर बहाल भेल आ तकर बाद फेर अंग्रेज लोकनि नीलक खेती दिस ध्यान देलन्हि। १९म शताब्दीक अन्त धरि चम्पारणमे कुल २१ फैक्ट्री आ ४८टा ओकर शाखा छल। चम्पारण, मुजफ्फरपुर, दरभंगाक नीलहा साहेब मिलि कए १८०१मे अपना सबहिक हेतु एकटा नियम बनौलन्हि आ १८७७ ओ लोकनि बिहार इण्डिगो प्लांटर्स एशोसियेशन नामक संस्था सेहो स्थापित केलन्हि। एकर मुख्यालय मुजफ्फरपुरमे छल आ एकरा सरकारसँ मान्यता छलैक। मूंगेर, भागलपुर, पूर्णियाँक बिभिन्न भागमे नीलक खेती पसरि गेल आ बेगूसराय, सहरसा, पूर्णियाँ आ कटिहार जिलाक बिभिन्न नीलहा कोठीक ताँता लागि गेल छल। १८९६मे मंझौल, बेगूसराय, भगवानपूर, बेगमसराय, दौलतपुर आदि स्थानमे नीलक कारखाना खुजल छल। ओनातँ १८७७सँ अहि जिलामे नीलक प्रसार भऽ चुकल छल। बेगूसरायक कोठी १८६३मे बनल छल। सहरसामे चपराम, सिंहेश्वर, पथरघट, राघोपुर आदि क्षेत्रमे प्रमुख नीलक कोठी सब छल आ तहिना पुर्णियाँ आ कटिहारमे सेहो। एक्के नीलहा साहेबक कैकटा कोठी होइत छल। प्रतापगंज दिसि सेहो एकटा प्रसिद्ध कोठी छल। तिरहूत प्लांटर्स लोकनि एकटा सैनिक टुकड़ी सेहो बनौने छलाह जकर नाम छल ‘दऽ बिहार लाइट हार्स’। १८५७–५८क सिपाही विद्रोहक समयमे जखन हिनका लोकनिकेँ तिरहूतमे शांति सुरक्षा रखबाक भार देल गेल छलन्हि तखन इ लोकनि सरकारक समक्ष अहि आशयक एकटा आवेदन देने छलाह जे हिनका लोकनिकेँ अपना हेतु एक प्रकार सैनिक संगठन करबाक अधिकार भेटैन्ह। १८६१–६२ ई. इ अधिकार हिनका लोकनिकेँ भेटलन्हि आ इ लोकनि ‘सूबा बिहार माउंटेड राइफिल्स’ नामक एकटा संस्था बनौलन्हि। १८८६मे ओकर नाम बदलिकेँ ‘बिहार लाइट हार्स’कऽ देल गेल। १९१४–१८क प्रथम विश्वयुद्धमे एहिसँ सरकारकेँ बहुत सहायता भेटल छलैक। १९२०मे एक कानून द्वारा एकरा ‘आक्जिलियरी फोर्स’मे परिवर्त्तित कऽ देल गेलैक। १९म शताब्दीक अन्तिम चरणमे नीलक खेतीकेँ बड़का धक्का लगलैक। १८९६मे जर्मनीमे एकटा सिंथेटिक सस्त नीलक आविष्कार भेलैक आ संसार भरिमे प्रसिद्ध भऽ गेलैक आ एकर परिणाम इ भेलैक जे अहिठामक नीलक खेती समाप्त होमए लगलैक। नीलक दाम २५०सँ घटिकेँ १५०/- मन भगेलैक। जाहिमे नील उपजैत छलैक ताहिमे लोग तम्बाकु आ कुसियारक खेती शुरू केलक। प्लांटर्स एशोसियेसन सेहो अहि प्रकारक निर्णय लेलक। १९१४मे विश्वयुद्धक कारण जब जर्मनीसँ नील एनाए बन्द भऽ गेलैक तखन फेर साहेब लोकनिक ध्यान अहि दिसि गेलन्हि आ पुनः नीलक खेत शुरू भेल मुदा से बहुत दिन धरि चलल नहि। नीलक खेती समाप्त भेल। III स्वातंत्र्य संग्राम आ मिथिला:- प्राचीन मिथिलाक सीमा अंग्रेज अमलमे आबिकेँ नहि रहि गेल। अंग्रेजक आगमन कालहिसँ प्रत्यक्ष एवँ अप्रत्यक्ष रूपेँ ओकर विरोध सबठाँ शुरू भऽ गेल छल कारण हुनका लोकनिक स्वार्थ अपन साम्राज्य विस्तारमे छलन्हि, जनताक कल्याणमे नहि। तथापि शक्तिशाली होएबाक कारणे आ अहिठाम आंतरिक फूट रहबाक कारणे हुनका लोकनि जे सफलता भेटलन्हि तकरा परिणाम स्वरूप ओ लोकनि २००वर्ष धरि अहिठाम शासन केलन्हि आ १९४७मे अहि देशक पिण्ड छोड़िकेँ ओ लोकनि गेला। मिथिलामे सिपाही विद्रोहक बाद जे विरोधक पहिल आवाज उठल छल से उएह जे चम्पारणमे किसान लोकनि नीलहा कोठीक साहबक विरूद्ध उठौने छलाह आ तिरहूतक हिसाबे ओ एकटा महत्वपूर्ण घटना भेल। ओहि विद्रोहक सूत्रकेँ महात्मा गाँधी १९१७मे चम्पारणमे पकड़लन्हि आ सत्यक संग अपन प्रयोग शुरू केलन्हि। अहि दृष्टिकोणसँ इ निर्विवाद रूपें कहल जा सकइयै जे वास्तविक अर्थमे स्वाधीनता संग्रामक श्रीगणेश गाँधीक युगमे मिथिलहिक आँगनसँ भेल। जँ कहियो महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह लाउथर कासल कीनिकेँ काँग्रेसक सेसनक हेतु देने छलाह तँ काँग्रेस ओकर प्रतिदान चम्पारणमे गाँधीजीकेँ नियुक्त कऽ देलक आ चम्पारणमे स्वातंत्र्य संग्रामक जे आगि पजरलसँ तातक जड़ैत रहल जातक कि भारत स्वतंत्र नहि भेल। वैशाली विदेहक गणराज्य परम्पराक अनुरूप अशोक द्वारा चिन्हित एवं शेरशाहक सुशासनसँ पदांकित चम्पारणक पवित्र क्षेत्र गाँधीजीक कर्मभूमि बनि महावीरक अहिंसाकेँ साकाररूप प्रदान केलक। १९१७–१९४७धरि गण्डकसँ कोशी आ हिमालयसँ गंगाधरिक क्षेत्रमे एकसँ एक सपूत जन्म लेलन्हि जे स्वतंत्रताक हेतु अपन प्राणक आहूति देने छलाह। कलकत्तासँ आबि प्रफुल्ल चाकी आ खुदीराम बोस सेहो अपनाकेँ अहि भूमिमे अमर केलन्हि। राष्ट्रीय संग्रामक इतिहास लिखब हमर अभीष्ट एतए नहि अछि मात्र एतबे कहबाक अछि जे स्वातंत्र्य संग्राममे मिथिला कोनो प्रांतसँ ककरोसँ पाछु नहि छल। १९१७मे जँ गाँधीजी बाट देखौलन्हि तँ १९४२मे मिथिला सेहो अपन सर्वस्व निछावर कऽ देलक हुनके आह्वानपर आ उत्तर बिहार १९४२मे सब तरहें क्रांतिकारी लोकनिक गढ़ बनल छल। सब बिचारक राजनेता मिथिलाक क्षेत्र अपन विचारक भूमिकाक निर्वाह केलन्हि आ हुनके लोकनिक सत्प्रयासे १९४७मे भारतक स्वतंत्रता प्राप्त भेल–ओहिमे मिथिलाक योगदान ओतवे छल जतवा आन कोनो प्रांतक। क्रांतिकारी दलक इतिहासमे सेहो मिथिलाक नाम प्रख्यात छैक। अध्याय–१४ मिथिलाक अन्यान्य राजवंशक विवरण (i.) गंधवरिया राजवंशक इतिहास:- स्वर्गीय पुलकित लाल दास ‘मधुर’ अथक परिश्रम कए गन्धवरियाक इतिहास लिखि स्वनामधन्य श्री भोला लाल दासक ओतए प्रकाशनार्थ पठौने छलाह। कोनो कारणवश इ पाण्डुलिपि (जे कि आब जीर्णावस्थामे अछि) प्रकाशित नहि भऽ सकल आ गन्धवरियाक इतिहासक प्रसंग एकदिन जखन हमरा भोला बाबूसँ गप्प भेल तखन ओ एहि पाण्डुलिपिक चर्च केलन्हि आ हमरा आग्रहपर ओ पाण्डुलिपि हमरा पठा देलन्हि। पाण्डुलिपि देखलापर इ बुझबामे आएल जे मधुरजी गन्धवरियाक इतिहास किंवदंतीक आधारपर लिखने छथि मुदा ताहु हेतु हुनक परिश्रम स्तुत्य एवं सराहनीय अछि। जखन गन्धवरिया कतहु किछु प्रामाणिक इतिहासक सामग्री नहि एकत्रित भऽ सकल अछि ताहि दृष्टिकोणे मधुरजीक इ सत्प्रयास सर्वथा प्रशंसनीय अछि। सोनबरसा राज केसमे गन्धवरियाक इतिहास देल गेल अछि मुदा ओहुमे जे गन्धवरिया लोकनि सोनबरसाक विरोधमे गवाही देलन्हि ताहि मँहक एकटा प्रमुख व्यक्ति स्वर्गीय श्री चंचल प्रसाद सिंह मुइलासँ पूर्व हमरा व्यक्तिगत रूपें इ कहने गेला जे हुनक अपन जे वयान ओहि केसमे भेल छन्हि से एकदम उल्टा छन्हि तैं गन्धवरियाक इतिहासक हेतु ओकरा उपयोग करबामे ओकरा ‘रिभर्स’ कऽ कए पढ़ब उचित। ओहु केसमे जे इतिहास बनाओल गेल अछि से बहुत किछु परंपरेपर आधारित अछि मुदा ओहिमे एक बहुत महत्वपूर्ण बात इ भेटल जे गन्धवरियाक द्वारा देल दानपत्र सब बहुत किछु उपस्थित कैल गेल छल जाहिमे किछु चुनल दानपत्रक अंग्रेजी अनुवादक अंश हम अपन ‘हिस्ट्री आफ मुस्लिम रूल इन तिरहूत’मे प्रकाशित कैल अछि। सहरसा जिलामे गन्धवरियाक एतेक प्रभुत्व छल तइयो ओकर कोनो उल्लेख पुरनका ‘भागलपुर गजेटियर’मे नहि छल आ जखन सहरसा जिला बनल आ ओकर नव गजेटियर बनल तखन ओहिमे इतिहास लिखबाक भार हमरा भेटल आ ओहिक्रममे हम एक पाराग्राफमे गन्धवरियाक चर्च कैल। एकर अतिरिक्त आ कोनो प्रामाणिक इतिहास गन्धवरियाक नहि बनल अछि आ ने अद्यावधि एहि दिशामे कोनो प्रयासे भऽ रहल अछि। एहना स्थितिमे मधुरजीक लिखल गन्धवरियाक इतिहासक मूलकेँ हम अहिठाम प्रस्तुत कऽ रहल छी जाहिसँ ओहि मृतात्माकेँ अपन कृतिक स्वीकृति देखि आनन्द होन्हि। अनापेक्षित बातकेँ हटा देल गेल अछि। गन्धवरिया लोकनिक गन्धवारडीह एखनो शकरी आ दरभंगा टीसनक बीचमे अछि आ हुनका लोकनिक ओतए जीवछक पूजा होइत छन्हि। गन्धवरिया लोकनि पँचमहलामे पसरल छथि– वरूआरी, सुखपुर, परशरमा, बरैल आ यदिया मानगंजकेँ मिलाकेँ पँचमहला कहल जाइत छल। जाहिठाम मधुरजीक अंश समाप्त होएत ओतए हम संकेत दऽ देब। दरभंगा ओ विशेषतः उत्तर भागलपुर (सम्प्रति सहरसा जिला)मे गन्धवरिया वंशज राजपूतक संख्या अत्यधिक अछि। दरभंगा जिलांतर्गत भीठ भगवानपुरक राजा साहेब तथा सहरसा जिलांतर्गत दुर्गापुर भद्दीक राजा साहेब एवँ वरूआरी, पछगछिया, सुखपुर, बरैल, परसरमा, रजनी, मोहनपुर, सोहा साहपुर, देहद, नोनैती, सहसौल, मंगुआ, धवौली, पामा, पस्तपार, कपसिया, विष्णुपुर एवं वारा इत्यादि ग्राम स्थित बहुसंख्यक छोट पैघ जमीन्दार लोकनि एहि वंशक थिकाह आ सोनबरसाक स्वर्गीय महाराज हरिवल्लभ नारायण सिंह सेहो एहि वंशक छलाह। इ राजवंश बहुत प्राचीन थिक ओ एहि राजवंशक सम्बन्ध मालवाक सुप्रसिद्ध धारानगरीक परमारवंशीय राजा भोज देवक वंशसँ अछि। एहिवंशक नाम “गन्धवरिया” एतै आबिकेँ पड़ल। राजा भोज देवक ३५म पीढ़ीक पश्चात् ३६म पीढ़ीक राजा प्रतिराज साह अपन धर्मपत्नी तथा दूइ पुत्रक संग ब्रह्मपुत्र स्नानक निमित्त आसाम गेल छलाह। एहि यात्रा जखन ओ लोकनि फिरलाह तँ पुर्णियाँ जिलांतर्गत सुप्रसिद्ध सौरिया ड्योढ़ीक समीप मार्गमे कतहु कोनो संक्रामक रोगसँ राजा–रानीक देहांत भऽ गेलन्हि। सौरिया राजक प्रतिनिधि एखनो दुर्गागंजमे छथि। माता–पिताक देहांत भेलापर दुनू अनाथ बालक भूलल–भटकल सौरिया राजाक ओतए उपस्थित भेलाह आ अपन पूर्ण परिचय देलन्हि। सौरिया राज ताहि समयमे बड्ड पैघ आ प्रतिष्ठित छल। ओ दुनू भाइकेँ यथोचित आदर पुरस्कार अपना ओतए आश्रय प्रदान केलन्हि तथा कालांतर उपनयन संस्कारो करा देलन्हि। उपनयनक समय उक्त दुनू भाइक गोत्र अवगत नहि रहबाक कारणे हुनका लोकनिकेँ परासर गोत्र देल गेल जबकि परमारक गोत्र कौण्डिन्य छल। दुनू राजकुमारक नाम लखेशराय आ परवेशराय छलन्हि। ओ लोकनि वीर आ योद्धा छलाह। सौरिया राजक जमीन्दारी दरभंगा राज्यमे सेहो पबै छलन्हि। कोनो कारणे ओहिठाम युद्ध उपस्थित भेलन्हि। राजा साहेब अहि दुनू भाइकेँ सेनानायक बनाए अपन सेना पठौलन्हि। कहल जाइछ जे दुनू भाइ एक राति कतहु निवास कैलन्हि कि निशीथ राति भेलापर शिविरक आगाँ किछु दूरपर एक वृद्धा स्त्रीक कानव ओ दुनू गोटए सुनलन्हि। जिज्ञासा केला संता ओ स्त्री बाजलि “जे हम अहाँ घरक गोसाओन भगवती थिकहुँ। हमरा अहाँ लोकनि कतहु स्थान दिअह”। एहिपर ओ दुनू भाइ बजलाह जे हम सब तँ स्वयं पराश्रित छी तैं हमरा वरदान दिअह जे हमरा लोकनि एहि युद्धमे विजय पाबी। ओ स्त्री हुनका लोकनिकेँ एक बहुत उत्तम खड्ग प्रदान कैल जकर दुनू पृष्ट भागपर बहुत सूक्ष्म अक्षरमे समस्त दुर्गा सप्तशती अंकित छल। इ खड्ग प्रथम दुर्गापुर भद्दीमे छल पश्चात् महाराज हरिवल्लभ नारायण सिंह ओकरा सोनबरसा आनलन्हि। ओहिमे कहियो बीझ नहि लागल छल। ओ खड्ग एक पनबट्टामे चौपेतल बन्द रहैत छल आ झाड़ि देला संता ओ खड्गक आकारक भऽ जाइत छल। दुनू भाइ युद्धमे विजयी भेला। समस्त रणक्षेत्र मुर्दासँ पाटि गेल आ दुर्गन्ध दूर–दूर धरि व्याप्त भऽ गेल। एहिसँ सौरियाक राजा प्रसन्न भए एहिवंशक नाम ‘गन्धवरिया’ रखलन्हि। इ युद्ध दरभंगा जिलांतर्गत गंधवारि नामक गाममे भेल छल। गंधवारि आ अन्यान्य क्षेत्रक हिनका लोकनिकेँ उपहार स्वरूप भेटलन्हि। लखेशरायक शाखामे दरभंगा जिलांतर्गत (सम्प्रति मधुबनी) भीठ भगवानपुरक श्रीमान राजा निर्भय नारायणजी भेल छथि आ परवेशक शाखामे सहरसाक गन्धवरिया जमीन्दार लोकनि छथि। सहरसाक विशेष भूभाग एहि शाखाक अधीन छल। दुर्गापुर भद्दी एकर प्रधान केन्द्र छल। परिवेशरायकेँ चारि पुत्र भेलन्हि– लक्ष्मण सिंह, भरत सिंह, गणेश सिंह, वल्लभ सिंह। गणेश सिंह आ वल्लभ सिंह निसंतान भेलाह। भरत सिंहक शाखामे धवौलीक जमीन्दार भेल छथि। लक्ष्मण सिंहकेँ तीन पुत्र भेलन्हि– रामकृष्ण, निशंक आ माधव सिंह। एहिमे माधव सिंह मुसलमान भए गेलाह आ नौहट्टाक शासक भेलाह। ‘निशंक’क नामपर निशंकपुर कुढ़ा परगन्नाक नामकरण भेल। प्रथम एहि परगन्नाक नाम मात्र ‘कुढ़ा’ छल बादमे ओहिमे निशंकपुर जोड़ल गेल। निशंककेँ चारि पुत्र भेलन्हि– दान शाह, दरियाव शाह, गोपाल शाह आ क्षत्रपति शाह। दरियाव शाहक शाखामे वरूआरी, सुखपुर, बरैल तथा परसरमाक गन्धवरिया लोकनि छथि। लक्ष्मण सिंहक ज्येष्ठ पुत्र रामकृष्णकेँ चारि पुत्र भेलन्हि– वसंत सिंह, वसुमन सिंह, धर्मागत सिंह, रंजित सिंह। वसुमन सिंहक शाखामे पछगछियाक राज भेल। धर्मागत सिंहक शाखामे जदिया मानगंजक जमीन्दार लोकनि भेल छथि। रंजित सिंहक शाखामे सोनबरसा राज भेल। एहि वंशक हरिवल्लभ नारायण सिंहकेँ १९०८मे सोनबरसासँ १०–१२मील उत्तर कांप नामक सर्किलमे साढ़े नौ बजे रातिमे शौचक समय मारि देलकन्हि। हिनक एक कन्याक विवाह जयपुरक स्टेटक संम्बन्धीक संग भेल छलन्हि। आ हिनका एकोटा पुत्र नहि छलन्हि। ओहि कन्याक पुत्र रूद्रप्रताप सिंह सोनबरसाक राजा भेलाह। एहि शाखामे सोहा, साहपुर, सहमौरा, देहद, वेहट, वराटपुर, तथा मंगुआक गंधवरिया जमीन्दार भेल छथि। एहिमे साहपुरक राजदरबार सेहो प्रसिद्ध छल–हुनका दरबारमे बिहपुर मिलकीक श्यामसुंदर कवि आ शाह आलमनगरक गोपीनाथ कवि उपस्थित छलाह। स्वर्गीय चंचल प्रसाद सिंह सेहो सोनबरसाक दमाद छलाह। वंसत सिंहकेँ जहाँगीरसँ राजाक उपाधि भेटल छलन्हि। राजा वसंत सिंह गंधवारिसँ अपन राजधानी हटाकेँ सहरसा जिलामे वसंतपुर नामक गाम बसौलन्हि आ ओतहि अपन राजधानी बनौलन्हि। मधेपुरासँ १८–२०मील पूब इ गाम अछि। वंसत सिंहकेँ चारि पुत्र छलन्हि– रामशाह, वैरिशाह, कल्याण शाह, गंगाराम शाह। प्रथम पुत्रक शाखा नहि चलल। वैरिशाह राजा भेल। कल्याण शाहक शाखामे रजनीक जमीन्दार लोकनि आ गंगारामक शाखामे वाराक जमीन्दार लोकनि भेलाह। इ अपना नामपर गंगापुर तालुका बसौलन्हि। वैरिशाहकेँ दु रानी छलन्हि– जाहिमे जेठरानीसँ राजा केसरी सिंह आ जोरावर सिंह भेलथिन्ह आ छोट रानीसँ पद्मसिंह। जोरावर सिंहक शाखामे मोहनपुर आ पस्तपारक जमीन्दार लोकनि भेलाह। पद्मसिंहक शाखामे कोड़लाहीक जमीन्दार लोकनि भेल छन्हि। राजा केसरी सिंह प्रतिभाशाली व्यक्ति छलाह। हुनका औरंगजेबसँ राजाक उपाधि भेटल छलन्हि। केसरी सिंहक पुत्र धीरा सिंह, धीरा सिंहक कीर्ति सिंह, कीर्ति सिंहक राजा जगदत्त सिंह भेलाह जे बड्ड प्रतापी, दयालु आ दानवीर छलाह। गंगापुर, दुर्गापुर आ बेलारी तालुका हिनका अधिकारमे छलन्हि। इ जनश्रुति विशेष प्रख्यात अछि जे ताहि समयमे दरभंगा राजक कोनो महारानी कौशिकी स्नानक निमित्त अवै छलीह। सिंहेश्वरक समीप बेलारीमे हुनक डेरा पड़ल। इ सुनिकेँ जे इ दोसरा गोटाक राज्य थिकन्हि ओ बजलीह जे हम आन राज्यमे अन्न जल ग्रहण नहि कऽ सकैत छी। जगदत्त सिंह तत्काल बेलारी तालुकाक दानपत्र लिखिकेँ महारानीसँ स्नान भोजनक आग्रह केलन्हि। उक्त बेलारी तालुका हेवनि धरि बड़हगोरियाक खड़ौड़य बबुआन लोकनिक अधीन छल आ तत्पश्चात् राज दरभंगाक भेल। जगदत्त सिंहकेँ चारि पुत्र भेलैन्ह– हरिहर सिंह, नल सिंह, त्रिभुवन सिंह, रत्न सिंह। त्रिभुवन सिंह ‘पामा’मे अपन ड्यौढ़ी बनौलन्हि। मधुरजीक विवरण संक्षेपमे एतबे अछि। मधुरजीक विवरणसँ आ आन विवरणसँ किछु तफात देखबामे अवइयै। पंचगछियाक राजवंश अपनाकेँ नान्यदेवक वंशज हरिसिंह देवक पुत्र पतिराज सिंहसँ उत्पत्ति मनैत छथि। पतिराज सिंह ‘गन्धवारपुर’मे अपन वास स्थापित केलन्हि आ तै गन्धवरिया कहौलथि। परञ्च इहो लोकनि अपनाकेँ पतिराज सिंहक पुत्र परवेश रायक वंशज कहैत छथि। रामकृष्ण सिंहक वंशज भेला पछगछिया स्टेट। हिनका लोकनिक वंश वृक्षक अनुसार– लक्ष्मण सिंहसँ राजक बटबारा एवं प्रकारे भेल– माधव सिंह रामकृष्ण निशंकसिंह (मुहम्मद खान) (दुर्गापुर, सोनबरसा (पंचमहला) (नवहट्टा) पछगछिया इत्यादि) सोनबरसा, पछगछिया तथा बरूआरी प्रसिद्ध स्टेट मानल जाइत छल। पंचमहलामे बरूआरी मुख्य स्टेट छल। निशंक सिंहक पुत्र दरिया सिंहक वंशज भेला बरूआरी स्टेट। अहिवंशमे राजा कोकिल सिंह प्रख्यात भेल छथि जनिका सम्राट शाह आलमसँ ११७५ हिजरीमे शाही फरमान भेटल छलन्हि। राजाक उपाधि हिनका सम्राटसँ भेटल छलन्हि। बरूआरी तिरहूत सरकारक अधीन छल आ कोकिल सिंहकेँ अहिक्षेत्रक ननकार हैसियत भेटल छलन्हि। गन्धवरिया लोकनिक कुलदेवी “जीवछ”क प्रतिमा वरूआरी राजदरबारमे छल आ ओकर पूजा नियमित रूपेँ होइत छल। ‘जीवछ’क प्रतिमाकेँ नोहट्टासँ अहिठाम आनल गेल छल। निशंक सिंह दानी सिंह दरिया सिंह क्षत्रपति सिंह गोपाल सिंह (परसरमा) (वरूआरी) (गोबरगढ़ा) (कुमरखन) सुन्‍दर सिंह कृष्ण नारायण सिंह (सुखपुर) (बरैल) एतवा सब किछु होइतहुँ गन्धवरियाक कोनो प्रामाणिक इतिहास नहि बनि पाओल अछि। जे किछु दानपत्रक अंग्रेजी अनुवादमे केसमे भेटल अछि से बेसी भीठ–भगवानपुरक राजा सबहिक। भीठ भगवानपुर गन्धवरियाक पैघ हिस्साक राजधानी छल आ हुनका लोकनिक स्तित्व निश्चित रूपें दृढ़ छलन्हि आ ओ दानपत्र दैत छलाह जकर प्रमाण अछि। दरभंगाक गन्धवरिया लोकनि सेहो अपन इतिहासक रूपरेखा नहि प्रकाशित केने छथि तैं ओहि सम्बन्धमे किछु कहब असंभव। हमरा बुझने ओइनवार वंशक पतनक बाद ‘भौर’ क्षेत्रमे राजपूत लोकनि अपन प्रभुत्व जमा लेने छलाह आ स्वतंत्र राज्य स्थापित केने छलाह। खण्डवलासँ हुनका संघर्षो भेल छलन्हि आ ओहि संघर्षक क्रममे ओ लोकनि भीठ–भगवानपुर होइत सहरसा–पुर्णियाँक सीमा धरि पसरि गेला। “गन्ध” आ “भर” (राजपूत)क शब्दक मिलनसँ गन्धवारि बनल (‘गन्धभर’) आ ओहि गाँवकेँ ओ लोकनि अपन राजधानी बनौलन्हि। कालांतरमे भीठ–भगवानपुर हिनका लोकनि प्रधान केन्द्र बनल। इतिहासक परंपराक पालन करैत इहो लोकनि अपन सम्बन्ध प्राचीन परमार वंशक संग जोड़लन्हि आ ‘नीलदेव’ नामक एक व्यक्तिक अनुसंधान केलन्हि। ओहिमे सँ केओ अपनाकेँ विक्रमादित्यक वंशज कहलैन्हि आ केओ नान्यदेवक। भीठ भगवानपुरक वंश तालिका तँ हमरा लग नहि अछि मुदा सहरसाक गंधवरिया लोकनिक वंश तालिका देखलासँ इ स्पष्ट होइछ जे परमार भोज आ नान्यदेवसँ अपनाकेँ जोड़निहार गन्धवरिया लोकनि लखेश आ परवेशक अपन पूर्वज मनैत छथि। पूर्वजक हिसाबे सब स्रोत एकमत अछि। परंपरामे इहो सुरक्षित अछि जे नीलदेव गंधवारिमे आबिकेँ बसल छलाह आ ‘जीवछ’ नदीकेँ अपन कुलदेवता बनौने छलाह। कहल जाइत अछि जे नीलदेव राजा गंधकेँ मारिकेँ अपन राज्य बनौलन्हि। सहरसा जिलामे भगवतीक आशीष स्वरूप राज भेटबाक जे गप्प अछि ताहुमे कैक प्रकारक कथा आ किंवदंती भेटइयै। मात्र एक बातपर सब स्रोत एकमत अछि जे हिनका लोकनिकेँ उपनयनक अवसरपर अपन गोत्र याद नहि रहला संता ‘परासर गोत्र’ देल गेलन्हि। जा धरि कोनो आन वैज्ञानिक साधन उपलब्ध नहि होइछ ताधरि गन्धवरियाक इतिहास अहिना किंवदंती आ परम्परापर आधारित रहत। ii. बनैली राजक इतिहास:- प्राचीनताक दृष्टिकोणसँ बनैलीक इतिहास सेहो अपन महत्व रखैत अछि। १४म शताब्दीमे गदाधर झा नामक एक विद्वान दरभंगा जिलाक वैगनी नवादा नामक गाममे रहैत छलाह। कहल जाइत अछि जे हिनक विद्वतासँ प्रभावित भए ि‍गयासुद्दीन तुगलक हिनका काफी सम्पत्ति दानमे देने छलथिन्ह। हुनकासँ नवम पीढ़ीमे भेला देवनंदन झा जनिका परमानंद झा आ मानिक झा नामक दूटा पुत्र छलथिन्ह। परमानंद झा संस्कृत, फारसी आ अरबीक प्रसिद्ध विद्वान छलाह। शिकारक सेहो हुनका बड्ड शौख छलन्हि। बाघ मारबामे तँ वो सहजहि निपुणते प्राप्त केने छलाह। अपन पूर्वजसँ हिनका पर्याप्त धन सम्पत्ति भेटले छलन्हि आ इ अपन क्षेत्रक पूर्ण मालिक छलाह। क्षेत्रक प्रशासनिक काज लऽ कए हिनका बरोबरि अजीमाबाद जाए पड़इत छलन्हि आ तैं हिनक निपुणताकेँ देखि अठारहम् शताब्दीमे हिनका फकराबाद परगन्नाक चौधरी बना देल गेलन्हि। दिनानुदिन हिनक ख्याति बढ़ैत गेलन्हि परञ्च इ अपन काज सम्पादन करबामे असावधान होइत गेलाह। फलस्वरूप इ अजीमाबादक कोपभाजन बनला आ दरभंगासँ भागि कमला नदी बाटे फरकिया दिसि प्रस्थान केलन्हि। अजीमाबादक सरकारसँ डर बनले रहैन्ह तैं फरकियाकेँ छोड़ि ओ धरमपुर दिसि बढ़ला आ पुर्णियाँक क्षेत्रमे अमौर दिसि चल गेलाह। ताहि दिनमे नवाब आ अंग्रेजमे खटपट चलि रहल छल। एम्हर हिनका लाल सिंह चौधरी आ दुलार सिंह चौधरी दूटा पुत्र उत्पन्न भेलन्हि। हुनक भाए माणिक चौधरीक देहांत भऽ गेलन्हि। माणिक चौधरीक एक पुत्र छलथिन्ह हरीलाल चौधरी। ओहि समयमे अमौरमे भैरव मल्लिक नामक एकटा सम्पन्न कायस्थ सेहो रहैत छलाह जे बड्ड जनप्रिय, निपुण आ उत्साही लोक छलाह आ जिनकर प्रतिष्ठा ओहि क्षेत्रमे अपूर्व छल। ओ पूर्णियाँ आ दिनाजपुर क्षेत्रक कानूनगोय छलाह। इएह अपना ओहिठाम परमानन्द चौधरीकेँ रहबाक प्रश्रय देलन्हि। कृषिकार्य कए अपन पालन पोषण करबाक हेतु परती जमीन सेहो ओ परमानंद चौधरीकेँ देलन्हि। तकर बादहिसँ परमानंद चौधरीक भाग्य पलटल। पहसाराक प्रसिद्ध राजा इन्द्रनारायण राय एक दिन अपन पालकीपर बैसल कतहु जाइत छलाह कि बाटहिमे परमानन्द चौधरी एकटा रहु माछ मारिकेँ हुनका समक्ष उपस्थित केलन्हि। राजा प्रसन्न भए हुनका अपना ओतए तहसीलदार मनेजरमे बहाल कऽ लेलथिन्ह। परमानन्द शक्तिशाली लोक भऽ गेलाह आ ओहि क्षेत्रमे हुनक प्रभाव बढ़ए लागल। एक दिन पुर्णियाँक नवाब शिकारक हेतु एम्हर एला मुदा हुनका एक्कोटा शिकार नहि भेटलन्हि तखन परमानंद चौधरी हुनका देखितहि देखितहि एकटा बाघ मारिकेँ देलथिन्ह। नवाब पसिन्न भए हुनका “हजारी”क उपाधि देलथिन्ह आ वो आब हजारी चौधरीक नामे प्रसिद्ध भऽ गेलाह। हिनक पुत्र दुलार सिंह कृषि आ व्यापारक माध्यमसँ अपन आर्थिक स्थितिकेँ सुदृढ़ केलन्हि। घी, इलायची, आ लकड़ीक व्यापार ओ नेपालसँ शुरू केलन्हि आ नवाबसँ मिलिकेँ ओहि सब वस्तुकेँ कलकत्ता धरि पठबे लगलाह। फेर हाथीक व्यापार शुरू केलन्हि जाहिमे बड्ड लाभ भेलन्हि। अहि क्षेत्रमे धनीमानी व्यक्तिमे हुनक गिनती होमए लागल। भैरव मल्लिकक धन बिलहि गेल आ ओ शोकाकुल भए मरि गेल। हुनका स्थानपर दुलार सिंह कानुनगोय नियुक्त भेला। एम्हर ताधरि परमानंद चौधरी असजा आ मोरंग तटक तीरा परगन्नाक अधिकारी सेहो भऽ चुकल छलाह। ओम्हर ताधरि राजा इन्द्रनारायण सिंहक महाल कुरसाकाँटाक बन्दोबस्त दमामी बन्दोबस्तक समय इ लऽ लेने छलाह। राजा इन्द्रनारायण हुनक एहि विश्वासघाती कार्यसँ असंतुष्ट भऽ गेल छलथिन्ह। हजारी चौधरीक परोक्ष भेलापर हुनका लोकनिमे आपसी मनमुटाव शुरू भेल। दुलार सिंह हरीलालकेँ अमौरक इलाका दऽ कए अपन घरेलु कलहकेँ शांत केलन्हि। हरीलालक उत्तराधिकारी अयोग्य बहरेला। दुलारसिंह बनैलीमे अपन निवास स्थान बनौलन्हि। ओतहिसँ हिनक प्रभावमे वृद्धि शुरू भेल। दुलार सिंहक दू पुत्र छलथिन्ह सर्वानन्द आ वेदानन्द– सर्वानन्द निसंतान मरि गेलाह। वेदानंदक कार्यकलापसँ वंशक कीर्ति बढ़ल। दुलार सिंहकेँ दोसर विवाहसँ कतेको संतान भेलैन्ह जाहिमे प्रख्यात भेलाह रूद्रानंद सिंह जे अपन पुत्र श्रीनंदनक नामपर श्रीनगर राजक स्थापना केलन्हि। कानूनगोय रहलाक कारणे सरकारक ओतए दुलार सिंहक वेश प्रभाव छल आ अपन प्रभावहिसँ ओ नवहट्टा, धपहर, गोगरी आदि क्षेत्र धरि अपन अधिकारक विस्तार केलन्हि। ओम्हर पुर्णियाँ आ मालदह धरि अपन जमीन्दारी बढ़ौलन्हि। नेपाल युद्धमे सेहो इ कम्पनी सरकारकेँ सहायता देने छलाह। नेपाल विजयक पश्चात् हिनका कम्पनी सरकारसँ राजाबहादुरक उपाधि भेटलन्हि। नेपाल आ अंग्रेजक बीच सीमा निर्णयक समयमे कम्पनी सरकार तीरा परगन्नाक समीप हिनका सातकोस भूमि बन्दोबस्तमे दऽ देलकन्हि। दुलार सिंहक बाद हुनक पुत्र वेदानंद सिंह राजा भेला आ हुनको कम्पनीसँ राजाक उपाधि भेटल छलन्हि। हुनका समयमे राज दू भागमे बटि गेल। वेदानंद अपन पैत्रिक बनैलीमे रहलाह आ रूद्रानन्द सौरा नदी टपि कए श्रीनगरमे बसलाह। वेदानन्द खरगपुर महाल कीनिके अपना राजमे मिलौलन्हि आ अपन राजक पूर्ण विस्तार केलन्हि। हिनके बनैली राजक संस्थापक कहल जा सकइयै। हिनक विवाह मिथिलामे महेश ठाकुरक वंशजमे भेल छलन्हि। इ विद्या प्रेमी सेहो छलाह आ किछु पोथिओ लिखने छलाह। हिनक बाद लीलानंद सिंह राजा भेलाह। हिनका तीनटा पत्नी छलथिन्ह– प्रथम पत्नीसँ पद्मानंद सिंह आ तेसर पत्नीसँ कुमार कलानन्द आ कृत्यानंद सिंह भेलथिन्ह। लीलानंद सिंह अपना समयक मिथिलाक एक प्रमुख व्यक्ति छलाह। हिनक परोक्ष भेलापर राजा पद्मानंद सिंह राजा भेलाह आ हिनका अंग्रेजी राजसँ सरकारक उपाधि सेहो भेटल छलन्हि। हिनकहि समयमे राजमे बटबाराक मामला शुरू भेल जाहिमे हिनका ७आना आ कुमार कलानंद आ कृत्यानंदकेँ ९आना हिस्सा भेटलन्हि। पद्मानंद सिंह अपना बापे जकाँ दानी छलाह। वैद्यनाथ मंदिरक फाटक बनेबामे हिनक पूर्ण योगदान छलन्हि। महादेवक प्रति हिनक निम्नलिखित कविता प्रसिद्ध अछि– ”जो अलका पति की सुख–सम्पत्ति देइ मेरो प्रभु भौन भरेंगे। अङ्कलिये गिरि राज सुता, कर पंकज तेसिर आइ धरेंगे॥ चन्द्र विभूषण भाल धरे, दुख जाल कराल हमार हरेंगे। पद्मानंद सदा शिवकेँ, हरखाहमखाह निवाह करेंगे॥ करै पवित्र जाको दर्शनदिव्य देवन को, सेवाते होत जाके सहजहि सनाथ है। गायें यश जाको, पावें मंगल मनोरथको, छाइ छिति कीरति कृपाल गुणगाथ हैं॥ नाथनकेँ नाथको अनाथनकेँ नाथ प्रभु, देवनकेँ नाथ मेरे बाबा वैद्यनाथ हैं॥ बनारसमे श्यामा मंदिर आ तारा मंदिरक स्थापना हिनके पत्नी लोकनिक प्रयत्ने भेल छल। हिनक पुत्र लोकनिक अकालमृत्यु भऽ गेलन्हि। हिनक वंशजक रानी चन्द्रावतीक कोठी भागलपुरमे अछि। कलानंद सिंहकेँ सेहो सरकार बहादुरसँ राजा बहादुरक पदवी भेटलन्हि। हिनक दूटा पुत्र भेलथिन्ह कुमार रामानंद सिंह आ कुमार कृष्णानंद सिंह। कृष्णानंद सिंह अपन निवास स्थान सुल्तानगंजक श्रीकृष्णगढ़मे बनौलन्हि। कलानंद सिंहक बाद राजा कृत्यानंद सिंहक प्रभाव बनैली राजमे सबसँ विशेष छल। बिहारक जमीन्दारमे इ सर्वप्रथम ग्रैजुएट छलाह आ अंग्रेजी, हिन्दी आ संस्कृतक असाधारण विद्वान सेहो। खेलकुद आ शिकारमे इ अद्वितीय छलाह। बंगाल–बिहारक काउंसिलमे सेहो इ सक्रिय भाग लैत छलाह आ पटनासँ बिहारी पत्रिकाक प्रकाशन सेहो करौने छलाह। तेजनारायण जुबिली कालेजक आपात् कालमे इ अपूर्व सहयोग दए ओहि कालेजकेँ जीवित रखलन्हि आ ताहि दिनक हिसाबे ६लाखक दान देने छलाह। हिनके दानक स्वरूप ओहि कालेजक नाम तेजनारायण बनैली कालेज पड़ल अछि। हिनको राजाबहादुरक उपाधि छलन्हि आ सनद देवा काल बिहारक राज्यपाल बेली साहेब तेजनारायण जुबिली कालेजमे देल हिनक सराहणीय दानक उल्लेख केने छलाह। भागलपुरमे आयोजित अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलनक स्वागताध्यक्ष सेहो छलाह। कलकत्ता विश्वविद्यालयमे मैथिलीकेँ स्थान दियेबामे हिनक अपूर्व योगदान छल। बिहार प्रांतीय संस्कृत सम्मेलनक सभापति सेहो इ छलाह। वंशवृक्ष गदाधर झा ११म पीढ़ी–दुलार सिंह चौधरी (१२) सर्वानंद सिंह वेदानंद सिंह रूद्रानंद सिंह लीलानंद सिंह (श्रीनगर राज्य शाखा पद्मानंद सिंह कुमार गंगानन्द सिंह) कलानंद सिंह कृत्यानंद सिंह पद्मानंद सिंह कलानंद सिंह कृत्यानन्द सिंह चन्द्रानन्द सिंह रामनंद सिंह श्यामानंद सिंह सूर्यानन्द सिंह कृष्णानन्द सिंह बिमलानंद सिंह (सुलतान गंज) तारानन्द सिंह दुर्गानन्द सिंह जयानन्द सिंह नुनु जी iii. शंकरपुर राजक इतिहास:- शंकरपुर मधेपुरासँ उत्तर १२मीलक दूरीपर अछि। एकरा बड़गोड़िया स्टेट सेहो कहल जाइत छल कारण बड़गोरिया नामक एकटा गाम दरभंगामे अछि जाहि नामपर अहि राजक नामकरण भेल छल। शंकरपुरक समीप दूटा प्रसिद्ध प्राचीन गढ़ अछि राय भीर आ बुधिया गढ़ी। एकरे समीपमे बेलारी गाम अछि। बेलारीक सम्बन्धमे किंवदन्ती अछि जे वल्लालसेन अहिगामक संस्थापक छलाह। शंकरपुरक समीप मधेली बजार आ वंसतपुर नामक प्रसिद्ध एतिहासिक स्थान अछि जाहिठाम सीत–वसंतक ध्वंसावशेष देखबामे अवइयै। बेलारी तालुका पहिने दुर्गापुरक अधीन छल। पाछाँ दरभंगा राजक अंतर्गत भेल। खण्डवला कुलक महाराज छत्रसिंहक तेसर पुत्र नेत्रेश्वर सिंहकेँ बबुआनीक हिसाबे शंकरपुर भेटलन्हि। तखनहिसँ शंकरपुर राजक स्थापना मानल जा सकइयै। हिनका दूटा पुत्र छलथिन्ह एकरदेश्वर सिंह आ जनेश्वर सिंह। जनेश्वर सिंह लक्ष्मीश्वर सिंहक अभिभावकत्वमे रहलाह। जनेश्वर सिंह प्रख्यात पुरूष भेल छथि। इ विद्याप्रेमी छलाह आ मधेपुरामे संस्कृत विद्यालयक स्थापना केने छलाह। हिनक पुस्तकालय अपूर्व छल जे हिनक परोक्ष भेलापर लक्ष्मीश्वर पुस्तकालय दरभंगामे पठा देल गेल। वैवाहिक दृष्टिकोणे एकरदेश्वर सिंहक सम्बन्ध सौरिया राज (संस्थापक राजा सुमेर सिंह चौधरी)सँ सेहो छल। एकरदेश्वर सिंहकेँ तीन पुत्र भेलथिन्ह– होमेश्वर सिंह, कुलेश्वर सिंह, चितेश्वर सिंह। वंशवृक्ष महाराज रूद्र सिंह नेत्रेश्वर सिंह एकरदेश्वर सिंह जनेश्वर सिंह होमेश्वर सिंह फुलेश्वर सिंह चितेश्वर सिंह iv. हरावत स्टेटक इतिहास:- इ राज सहरसा आ पूर्णियाँक सीमा रेखापर छल। हरावत परगन्नामे रहलाक कारणे अहि राजक नाम हरावत राज पड़ल। अहि राजक संस्थापक अग्निवंशीय चौहान छलाह परञ्च बादमे इ लोकनि जैन धर्ममे दीक्षा लेलन्हि। सम्राट शाहजहाँक समयमे हिनका लोकनिकेँ राजाक उपाधिसँ विभूषित कैल गेलन्हि आ राजस्थानसँ इ लोकनि मुर्शिदाबाद पहुँचलाह। हरावत परगन्नामे स्टेट संस्थापकक रूपमे प्रतापसिंहक नाम अवइयै। हिनक व्यक्तित्वसँ प्रभावित भए दिल्ली सम्राट आ बंगालक नवाबसँ हिनका खिल्लत भेटल छलन्हि। हरावतक प्रसिद्ध राजा इन्द्रनारायणक पत्नी इन्द्रावतीक कर्त्तापुत्र विजयगोविन्द सिंह प्रताप सिंहसँ महाजनी कारबार शुरू केलन्हि। इन्द्रनारायणक जमीन्दारी सौरिया राजक नामे प्रख्यात छल जे हिनक पूर्वज सुमेरसिंह चौधरीकेँ मुसलमान सम्राटसँ भेटल छलन्हि। विजय गोविन्दसँ प्रताप सिंहकेँ झगड़ा भेलन्हि आ १८५०मे सम्पूर्ण हरावत परगन्नाक जमीन्दारीपर प्रतापक अधिपत्य भऽ गेलैन्ह। एवँ प्रकारे सौरिया राजक एक महत्वपूर्ण भाग समाप्त भऽ गेल। हुनके नामपर प्रतापगंज बाजार बसल अछि। प्रतापसिंह अहिवंशक सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति भेलाह। अपना मृत्युसँ पूर्वहिं ओ अपन सम्पत्ति अपन दुनू पुत्र लक्ष्मीपति सिंह आ धनपति सिंहमे बटबा देलन्हि। इ दुनू भाए सार्वजनिक काममे सक्रिय रूपसँ भाग लेलन्हि। धनपति सिंह सेहो काफी प्रसिद्ध व्यक्ति भेल छथि। हिनका तीनटा पुत्र छलथिन्ह– गनपत, नरपत, बहादुर। गनपत सिंह अपना नामपर गनपत गंज बजार बसौलन्हि। नरपत सिंह कैसरे हिन्द कहबैत छलाह। हिनक पुत्रमे शूरपत सिंह प्रसिद्ध भेल छथि। ओ महाजनी भाषाक अतिरिक्त आरो कैक भाषाक जानकार छथि। हिन्दीसँ हुनका विशेष प्रेम छलन्हि आ जैन धर्म ग्रंथक हिन्दीमे अनुवाद सेहो करौने छलाह। प्राचीनकालमे हरावत जंगल छल आ आइनी–अकबरीमे एकर राजस्वक उल्लेख अछि। नाथपुरक चलते हरावतक बड्ड नाम छल मुदा कोशीक पेटमे सब जाके नष्ट भऽ गेल। वंशवृक्ष राजा सोमचंद ४८म प्रताप सिंह । । लक्ष्मीपत धनपत । । । । छत्रपत गनपत नरपत बहादुर । । । शूरपत महिपत भूपत v. चक्रवारक इतिहास:- मिथिलाक पाँजि आ अंग्रेजक इस्ट इण्डिया कम्पनीक कागज देखलासँ ज्ञात होइत अछि जे मुगलकालक अंतिम दिनमे बेगूसराय इलाकामे एकटा छोट–छीन राज चक्रवार ब्राह्मण लोकनि बनौने छलाह जे सम्प्रति चक्रवार भूमिहारक नामे प्रसिद्ध छथि। शुद्ध भूमिहारक दृष्टिकोणसँ लिखल गेल स्वामी सहजानंदक ‘ब्रह्मर्षिवंश विस्तर’मे चक्रवारकेँ भूमिहारमे नहि गिनल गेल छैक आ बहुतो दिन धरि ओ लोकनि मैथिल कहबैत छलाह। चक्रवारक मूल छन्हि ‘बेलौंचे सुदइ’। स्थानीय परम्पराक आधारपर ज्ञात होइछ जे चिरायुँमिश्र नामक एक व्यक्ति बेलौंचे डीहसँ उपटिकेँ बेगूसराय जिलाक साम्हो ग्राममे आबिकेँ बसि गेल छलाह। मुल्ला तकियाक वयाजसँ इ ज्ञात होइछ जे ओ हाजी इलियास तिरहूत राजकेँ दू भागमे बटने छल आ गंडकक दक्षिणी भागपर अपन अधिपत्य स्थापित कए बेगूसराय क्षेत्र धरि अपन प्रभाव बढ़ा लेने छल। फिरोज तुगलक पुनः तिरहूतक सम्पूर्ण राज्य भोगीश्वरकें हस्तांतरित कऽ देने छलाह। मिथिलाक ब्राह्मण शासक, ओइनवार वंशक लोग, आंतरिक मामलामे स्वतंत्र छलाह परञ्च दिल्लीक प्रभुताक मनैत छलाह। ओहि कालमे जे एक प्रकारक अस्तव्यस्तता छल तकरा चलते बहुत रास मैथिल ब्राह्मण अपन जीविकोपार्जनक हेतु चारोकात बहराइत गेलाह। तेरहम–चौदहम शताब्दीमे चिरायुँ मिश्र सेहो गंगा स्नान करबाक दृष्टिये साम्हो दिसि पहुँचलाह आ ओतुका प्राकृतिक छटा देखि आकृष्ट भए गेलाह आ ओतुके लोकक आग्रहपर ओतए बसि गेलाह। चक्रवार परम्परामे तँ इ कथा सुरक्षित अछि जे तहियेसँ हुनका लोकनि राज्य ओतए बनि गेलन्हि आ चक्रवारक प्रभाव पूर्णियाँसँ बक्सर धरि गंगाक दुनूकात पसरि गेल। तुगलक कालीन मलिक वायासँ संघर्ष हेबाक कथा सेहो चक्रवार परम्परामे सुरक्षित अछि। (अहि प्रसंगमे देखु–हमरे लिखल–‘चक्रवारस आफ बेगूसराय’) अठारहम शताब्दीक पूर्वार्द्धमे मुगल साम्राज्यक विघटन प्रारंभ भऽ गेल छल। प्रांतीय राज्यपाल लोकनि अपन स्वतंत्रता घोषित करए लागल छलाह। एहना स्थितिमे चक्रवार लोकनि सेहो अपनाकेँ बेगूसराय क्षेत्रमे स्वतंत्र घोषित कए देलन्हि। हुनक स्वतंत्र राज होएबाक सबसँ पैघ प्रमाण इ अछि जे चक्रवार राजक विभिन्न व्यक्ति अपन हस्ताक्षर आ मुद्रासँ युक्त अनेको दानपत्र देने छथि। चक्रवार राजा बख्तावर सिंहक एक भूमिदान पत्रसँ इ प्रतीत होइछ जे हुनक अधिपत्य दलसिंहसराय धरि छल। “महाराज बख्तावर सिंह देवदेवानाम्”–क उपाधिसँ सेहो इ सूचित होइछ जे ओ मात्र एक सामंतेटा नहीं अपितु अपना प्रदेशक एक स्वतंत्र शासक सेहो। कम्पनीक कागजातमे बख्तावर सिंहक उल्लेख चक्रवारक राजाक रूपेँ भेल अछि। राजा शिवदत्त सिंह चक्रवारक एकटा दानक मान्यता अलीवर्दी स्वीकृत केने छल आ ओहि दानकेँ ओ यथावत् रहए देने छल। इहो कहल जाइछ जे राजा बख्तावर सिंहक पितृव्य रूको सिंह फरकिया परगन्नाकेँ लूटने छलाह जे तखन राजा कुंजल सिंहक अधीनमे छल। रूको सिंह १७३०मे कुंजल सिंहक हत्या कऽ देलन्हि। कम्पनीक लेखसँ बुझि पड़इयै जे १७१९धरि चक्रवार लोकनि बेगूसरायमे प्रभुता संपन्न राज्यक रूपमे स्वीकृत भऽ चुकल छलाह। ओ लोकनि सरकारकेँ लगान देब बन्द कऽ देने छलाह आ मूंगेरसँ पटना धरि गंगा नदीक मार्गपर नियंत्रण सेहो कऽ लेने छलाह। ओहि मार्गसँ जाइबला सब नावकेँ रोकिकेँ ओ लोकनि कर वसूल करैत छलाह आ ओकरा लूटितो छलाह। अंग्रेज कम्पनीकेँ अपन नावक संग सेना सेहो पठवे पड़इत छलैक। कोन्ना आ अन्य स्थानमे चक्रवार लोकनि सबल पड़इत छलाह। चक्रवार लोकनि अंग्रेजक नावपर आक्रमणो करैत छलाह आ अंग्रेज आ चक्रवारक बीच बरोबरि युद्ध होइत छल। अंग्रेज लोकनि १७२१मे बख्तावर सिंहकेँ चक्रवारक राजा मानि लेलाह। अलीवर्दी चक्रवारकेँ पराजित करबामे सफल भेलाह। कहल जाइत अछि जे १७३०मे विश्वासघात कऽ कए अलीवर्दीक आदमी चक्रवार राजाकेँ मारि देलक। हालवेल अपन पोथीमे अहि विश्वासघातक वर्णन केने अछि। ओ चक्रवार राजा कोन छल तकर नाम नहि भेटइत अछि कारण बख्तावर सिंह अलीवर्दीसँ नीक सम्बन्ध स्थापित कऽ लेने छलाह आ बादमे अलीवर्दीक अभियानमे हुनक मदति सेहो केलथिन्ह। चक्रवार वंशक दलेल सिंह टेकारी राजक एक महत्वपूर्ण पदाधिकारी छलाह आ राजा मित्रजित सिंहक प्राण बचेबामे सहायक भेल छलाह। १७९३मे दमामी बन्दोबस्तक समय कार्नवलिस साम्होक बन्दोबस्त चक्रवार दिग्विजय नारायणक संग कऽ देलक। अखनो धरि बेगूसराय जिलाक बारह गाम चक्रवार लोकनि पसरल छथि आ अपन प्राचीन इतिहासक अध्ययनसँ गौरवान्वित होइत छथि। चक्रवार कालमे बेगूसरायक महत्व काफी बढ़ि गेल छल आ एकर प्रमाण हमरा कम्पनी रेकार्डससँ भेटइत अछि। vi. नरहनक द्रोणवार वंश :- द्रोणवार लोकनिकेँ छथि, कहाँसँ एलाह आ कोना अहिठाम अपन राजक स्थापना केलन्हि तकर कोनो प्रामाणिक इतिहास नहि भेटैछ आ अपन अथक परिश्रमक बाबजूदो हम कोनो ठोस सामग्री जुटेबामे समर्थ नहि भेलहुँ अछि। इ लोकनि पश्चिमसँ एलाह आ एक परम्पराक अनुसार कन्नौजसँ। जँ अहि परम्परामे विश्वास कैल जाइक तखन तँ हमरा बुझि पड़इयै जे कोलाञ्चसँ ब्राह्मण लोकनिकेँ बजाकेँ जे दान देल जाइत छल ताहिकालक ओहिमहक कोनो शाखा द्रोणवारक पूर्वज रहल हेथिन्ह। पंचोभ ताम्रपत्र अभिलेखसँ स्पष्ट अछि जे १३म शताब्दी धरि कोलाञ्च ब्राह्मणकेँ आमंत्रित कए दान देल जाइत छलन्हि। द्रोणवार परम्परामे कहल जाइत अछि जे कन्नौज से जे द्रोणवारक शाखा तिरहूत अवइत छल ताहिमे सँ किछु गोटए बाटहिमे गाजीपुरमे रूकि गेलाह। कहल जाइत अछि जे तिरहूतमे ‘द्रोणवार’ लोकनि ‘द्रोणडीह’सँ आएल छथि। दोसर परम्पराक अनुसार हिमालयक तलहट्टीमे द्रोणसागर नामक कोनो ताल अछि जकर चारूकात बहुत रास ब्राह्मण बसैत छलाह आ तैं इ लोकनि द्रोणवार कहौलन्हि। रेलवे बोर्ड द्वारा प्रकाशित ‘तीर्थाटन–प्रदीपिका’ नामक पोथीमे काशीपुर द्रोणसागरक वर्णन अछि। पाण्डव लोकनि अपन गुरू द्रोणाचार्यक हेतु ‘द्रोणसागर’क निर्माण केने छलाह। सरैसा परगन्नाक द्रोणवारक ओतए जे मैथिल पंडितक लिखल हस्तलेख सब अछि ताहिमे ओ लोकनि द्रोणवारक हेतु ‘द्रोणवंशोद्भव’ शब्दक व्यवहार कएने छथि। द्रोणवार लोकनि अपनाकेँ द्रोणक वंशज कहैत छथि आ पश्चिमक वासी सेहो। मुसलमानी उपद्रव बढ़लाक बाद इ लोकनि अपन मूलस्थानसँ भगलाह आ ओहि क्रममे एक शाखा तिरहूतमे आबिकेँ बसलाह। विद्यापति अपन लिखनावलीमे द्रोणवार पुरादित्यक उल्लेख केने छथि जिनक राज नेपालक तराइमे छल आ जाहिठाम विद्यापति लखिमाकेँ लऽ कए प्रश्रय लेने छलाह। परमेश्वर झाक अनुसार शिवसिंह रनिवासक सब स्त्रीवर्गकेँ विद्यापति ठाकुरक संग कए नेपालक तराइमे रजाबनौली गाम सप्तरी परगन्नाक अधिपति निजमित्र पुरादित्य नामक द्रोणवंशीय दोनवार राजाक शरणमे पठौलन्हि। पुरादित्य द्रोणवार हुनका सबहिक सम्मानपूर्वक रक्षा केलन्हि। एहिसँ स्पष्ट अछि जे ओइनवार वंशक शिवसिंह आ द्रोणवार वंशक पुरादित्यक मध्य घनिष्ट मित्रता छल। अहिठाम विद्यापति लिखनावली लिखलन्हि आ भागवतक प्रतिलिपि सेहो तैयार केलन्हि। द्रोणवारक बस्ती देकुलीक सम्बन्धमे परमेश्वर झा लिखैत छथि जे तेसर देकुली मुजफ्फरपुर जिलामे शिवहर राजधानीसँ एक कोस पूर्व सीतामढ़ी सड़कसँ दक्षिण भागमे अछि, ताहिमे एक बहुत खाधिमे एक शिवलिंग भुवनेश्वर नामक छथि आ एहि गामक विषयमे बहुत रास पुरान कथोपकथन अछि जाहिमे कौरव पाण्डवक उल्लेख सेहो अबैछ। संभव जे इ देकुली द्रोणवारक मूल स्थान रहल हो आ एतहिसँ ओ लोकनि चारूकात पसरल होथि। द्रोणवारक संघर्ष बौद्ध लोकनिसँ तिरहूतक सीमामे भेल छलन्हि से हमरा लोकनिकेँ विद्यापतिसँ ज्ञात होइछ। एहिसँ इहो सिद्ध होइछ जे द्रोणवार लोकनि सेहो मिथिलाक उत्तरांचलमे प्रबल शक्तिक रूपमे विराजमान छलाह आ मैथिल ब्राह्मणहि जकाँ बौद्ध विरोधी सेहो छलाह। आन द्रोणवार वंशक एहेन प्रमाण आर कहाँ भेटइत अछि। द्रोणवार लोकनि मूलरूपेण तिरहूतक अंशमे प्राचीन कालमे रहल हेताह आ नेपालक तराइ धरि अपन राजक विस्तार केने होथि से संभव। द्रोणवार परम्परा एकटा कथा इहो अछि जे बुद्धक देहावसान भेलापर जखन हुनक अस्थि वितरण होइत छल तखन मिथिलामे द्रोण ब्राह्मण लोकनि हुनक अस्थि अनने छलाह। जँ ताहिकाल ‘द्रोणवार’ लोकनि मिथिलामे उपस्थित छलाह तखन तँ हमर इ मत आरो पुष्ट होइछ जे द्रोणवार अहिठामक थिकाह आ मिथिलाक आन ब्राह्मण जकाँ हिनको उत्पत्ति तिरहूतेमे भेल छलन्हि। मात्र अस्थि संचय करबा लेल ओ द्रोण लोकनि ओतए दूरसँ एतए नहि आएल होएताह। कालक्रमेण ब्राह्मण कौलिक कार्यसँ अपनाकेँ फराक कऽ लेलापर इ लोकनि भूमिहार कऽ कोटिमे राखल गेल होथि से संभव। एक दोसर परम्पराक अनुसार नेपाल दरबारसँ द्रोणवार लोकनिकेँ राजाक उपाधि भेटलन्हि आ हिनक शौर्यकेँ देखैत मकमानी जिलाक भार हिनका लोकनिकेँ देल गेल छलन्हि। द्रोणवार राजा अभिमान राय प्रसिद्ध भेला आ मकमानीमे हिनक अधिपत्य छलन्हि आ इ लोकनि ‘पाण्डेय’ कहबैत छलाह। अभिमानक मृत्युक पश्चात् हुनक कर्मचारी लोकनि महारानीकेँ लऽ कए मिथिला प्रांतक दक्षिणी सीमापर स्थित बेलौंचे सुदइ मूलक चक्रवार ब्राह्मणक राज्यमे पहुँचा देलन्हि। अभिमान रायक पुत्र छलाह गंग़ाराम। गंगाराम अहिवंशक सर्वप्रसिद्ध व्यक्ति भेल छथि आ हिनका सम्बन्धमे बहुत रास किंवदंती अछि। चक्रवार राजा अपन कन्यासँ गंगारामक विवाह करौलन्हि। सार–बहनोइमे सामान्य बाताबाती भेलापर ओ राज्य छोड़ि देलन्हि आ अपन पत्नीकेँ संग लऽ कए ओतएसँ चलि देलन्हि। ससूरसँ सेनाक साहाय्य भेटलन्हि आ ओ सरैसा परगन्नामे अपन राजक स्थापना केलन्हि। सरैसा परगन्नाक “पुनाश” गाममे हिनक पूर्वज पहिने रहैत छलथिन्ह तैं सरैसा परगन्नामे राज्य स्थापनाक निर्णय इ केलन्हि। ताहि दिनमे ओहि सब क्षेत्रपर मुसलमानक आधिपत्य छल। ताजखाँ (ताजपुरक संस्थापक) आ सुल्तानखाँ (सुल्तानपुरक संस्थापक)केँ मारि इ मोखामे अपन राजधानी बनौलन्हि। सरैसा परगन्ना नरहनसँ जन्दाहा धरि करीब ४०मील नाम अछि आ पोखरैरासँ सुल्तानपुर घाट धरि करीब २०मील चाकर अछि। हिनक एक विवाह मैथिल ब्राह्मण परिवारमे सेहो छलन्हि। पहिल पत्नीक नाम भागरानी आ दोसराक नाम मुक्तारानी छलन्हि। हिनक दुनूरानी मोखागढ़मे सती भेलथिन्ह। भागरानीसँ उत्पन्न पुत्र भेला राय बड्ड प्रतापी भेलाह। भेला राय मोखा सुल्तानपुरमे रहलाह आ मालाराय ‘वीरसिंहपुर–पोखरैरा’मे। भेला रायक वंशज नरहनक पूर्वज भेलाह। अहिवंशक लोग बनारसक गद्दीपर छथि। भेला रायक पुत्र विक्रमादित्य रायकेँ सरैसा परगन्नाक ‘चौधराइ’ भेटलन्हि। विक्रमादित्य राय बड़ा पराक्रमी छलाह। इ अपना नामपर ‘विक्रमपुर’ गाम बसौलन्हि। हिनक पुत्र हरेकृष्ण राय नरहनमे अपन दोसर राजधानी बनौलन्हि।– प्रधान राजधानी मोखा आ दोसर नरहन। वंशवृक्षक अनुसार इतिहास एवं प्रकारे अछि– द्रोणवार हरगोविन्द राय– चौधरी केशवनारायण राय (सरैसा, भूषारी, नैपुर परगन्ना) फतेह नारायण अजीत नारायण चित्र नारायण (इमादपुर परगन्नाकेँ मिलौलन्हि) अजीत नारायण–सम्राटसँ टभका, सुरौली, लोमा, विझरौली, ननकार, लाखिराजक रूपमे हिनका भेटलन्हि। हिनक वैवाहिक सम्बन्ध टेकारीसँ छलन्हि। हिनक जेठपुत्र दिग्विजय नारायण बनारसक राजा बलबंत सिंहक बेटीसँ विवाह केलन्हि । वारेन हेस्टिंग्सक मदतिसँ बलबंत सिंहक बाद चेतसिंह बनारसक गद्दीपर बैसलाह। जखन चेतसिंह वारेन हेस्टिंग्ससँ पराजित भेलाह आ बनारसक राजगद्दी खाली भेल तखन नरहनक अजीत नारायणक पौत्र आ दिग्विजय नारायणक पुत्र वारेन हेस्टिंग्सक अनुमतिसँ बनारसक गद्दीपर बैसलाह। हुनक नाम छलन्हि राजा महीप सिंह आ इ सालाना ३८ लाख टाका वारेन हेस्टिंग्सकेँ देबाक वचन देलथिन्ह। तहियासँ बनारसक गद्दीपर हिनके वंशज शासन कै रहल अछि। महीप सिंह उदित सिंह इश्वरी प्रसाद सिंह प्रभुनारायण सिंह आदित्य नारायण सिंह दिग्विजयक भ्राता नरहन स्टेटक मालिक भेला। महाराज दरभंगाक जे नवाबक संग कन्दर्पी घाटक लड़ाइ भेल छल ताहिमे सर्वजीत सिंह नरेन्द्र सिंहक दिस छलाह। हुनक भाए उमराव सिंह नरहनक सैनिकक नेतृत्व करैत छलाह आ एकर विवरण हमरा लाल कविसँ भेटइत अछि। नरेन्द्र सिंह प्रसन्न भए हिनका दुनू भाइकेँ पुरस्कृत करए चाहैत छलथिन्ह मुदा ओ लोकनि पुरस्कार लेबासँ नकारि गेलाह तथापि फरकिया परगन्नामे हिनका लोकनिकेँ किछु गाँव भेटलन्हि। दरभंगा राज परिवारमे एहि हेतु नरहन राज परिवारक बड्ड सम्मान छलैक। हिनका लोकनिमे एतेक नीक सम्बन्ध छल जे महाराज प्रताप सिंहक समयमे जखन नवाबक दबाब बढ़ल तँ प्रताप सिंह अपन परिवारकेँ नरहन पठा देलन्हि आ अपने बेतिया चल गेलाह। रामेश्वर सिंह धरि इ सम्बन्ध ओहिना बनल छल। सर्वजीत रणजीत रूप नारायण राम नारायण परमेश्वरी प्रसाद सिंह नरहन दरबारमे चित्रधर मिश्र आ चंदा झा सन प्रसिद्ध विद्वानकेँ प्रश्रय भेटल छलन्हि आ महामहोपाध्याय गंगानाथ झासँ सेहो हिनका लोकनिक बढ़िया सम्बन्ध छल। राम नारायणक सम्बन्ध नेपालक जंगबहादुर शाहसँ सेहो छल कारण दुनू गोटएकेँ सोनपुर मेलामे भेट भेल छलन्हि। राम नारायण नेपालो गेल छलाह। vii. बेतिया राजक इतिहास:- सोलहम शताब्दीक उतरार्द्धमे उग्रसेन सिंहक पुत्र गज सिंह द्वारा बेतिया राजक स्थापना भेल। गज सिंहकेँ शाहजहाँसँ राजाक पदवी भेटल छलन्हि। इ मिथिलाक राजा महिनाथ ठाकुरक समकालीन छलाह आ हुनका समयमे दुनूक बीच मनमुटाव आ खटपट सेहो भेल छल। मुगल साम्राज्यक कमजोर भेलापर उत्तर बिहारक सबटा राज्य स्वतंत्र हेबाक प्रयासमे लागि गेल छल आ बेतिया राज एकर कोनो अपवाद नहि कहल जा सकइयै। १७२९मे अलीवर्दी बेतिया राजपर आक्रमण कए ओकरा अपना अधीन केने छलाह। १७४८मे बेतियाक राजा लोकनि दरभंगा अफगानक संग मित्रता केलन्हि। दरभंगा अफगान अलीवर्दीक सेना द्वारा पराजित भेला। दरभंगा अफगानकेँ बेतियाक राजा सब बरोबरि मदति करैत रहैथ। अलीवर्दीक बाद पुनः बेतिया अपन स्वतंत्रता घोषित कए लेलक आ अंग्रेजी सत्ताक विरूद्ध ताधरि बनल रहल जाधरि कि १७५९मे अंग्रेजी सेनाक आक्रमण बेतियापर भेल। मीरजाफरक पुत्र मीरन अंग्रेजी सेनाक संग १७६०मे बेतियापर धावा मारलक आ बेतियाक स्वतंत्रता पुनः समाप्त भऽ गेल। १७६२मे मीरकासीम बेतियाक विरूद्ध सेना पठौलन्हि आ बेतियापर अपन अधिकार जमौलन्हि। १७६६मे राबर्ट बेकरक प्रयाससँ बेतियामे अंग्रेजी सत्ताक स्थापना संभव भऽ सकल। १७६२मे ओहिठाम जुगलकेश्वर सिंह राजा छलाह। हुनका पुनः इस्ट इण्डिया कम्पनीसँ झंझट भेलन्हि कारण बहुतो दिनसँ बेतियापर करक बकिऔता खसल छलैक। कर देबाक बजाय बेतियाक राजा अंग्रेजी सेनासँ युद्ध करब उचित आ सम्मानीय बुझलैथ आ युद्धमे परास्त भेला उत्तर ओ भागिकेँ बुन्देलखंड चल गेला आ कम्पनी हुनक राजकेँ अपना अधीन कऽ लेलक। बादमे जखन राजक स्थिति अंग्रेजक बुते नहि सुधरलैक तखन अंग्रेज पुनः जुगलकेश्वर सिंहसँ वार्त्ता शुरू केलक आ हुनका घुरबाक लेल अनुरोध केलक। अंग्रेज जुगलकेश्वर सिंहकेँ मझवा आ सिमरौन परगन्ना सेहो देलक आ बाँकि क्षेत्रकेँ गजसिंहक पौत्र आ पितिऔत श्री किशुन सिंह आ अवधुत सिंहमे बाँटि देलक। उएह लोकनि बादमे क्रमशः शिवहर (मुजफ्फरपुर) आ मधुबन (चम्पारण) राजक संस्थापक होइत गेलाह। १७९१ जुगलकेश्वर सिंहक पुत्र वीरकेश्वर सिंहक संग कम्पनीक समझौता भेल आ वीरकेश्वरक नेतृत्वमे बेतिया राजक स्थिति सुदृढ़ भेल। कम्पनी आ नेपालक बीच जे युद्ध भेल ताहिमे वीरकेश्वर सिंह सक्रिय भाग लेलन्हि। १८१६मे आनन्दकेश्वर सिंह राजा भेला आ लार्ड विलियम बेंटिङ्गसँ हुनका महाराज बहादुरक पदवी भेटलन्हि। एकर कारण इ छल जे ओ अंग्रेजकेँ बड्ड मदति केने छलाह। हुनका बाद नवलकेश्वर सिंह राजा भेलाह आ १८५५मे राजेन्द्रकेश्वर सिंह। सिपाही विद्रोहक अवसरपर इ अंग्रेजक अपूर्व सहायता केने छलाह। हुनका आ हुनक पुत्र हरेन्द्रकेश्वरकेँ महाराज बहादुरक पदवी अंग्रेजसँ भेटल छलन्हि। १८९३मे हरेन्द्रकेश्वरकेँ के.सी.आइ.इक पदवी सेहो भेटलन्हि। बेतियाक शासक लोकनि भूमिहार ब्राह्मण छलाह। इ लोकनि अपना राजकालमे नीक अस्पताल आ पुस्तकालय बनौने छलाह। इ लोकनि साहित्य प्रेमी सेहो छलाह। हिनका लोकनिक दरबारमे कवि आ कलाकारक बड्ड आदर छल। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र आ राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्दकेँ हिनका लोकनिक ओतएसँ बरोबरि सहायता भेटइत छलन्हि। ओना तँ बेतिया राज बड्ड प्राचीन मानल गेल अछि मुदा एकरा सम्बन्धमे अखन सब बात स्पष्ट नहि भऽ सकल अछि। बेतिया राजक वंशावली एवं प्रकारे अछि। बेतिया राजक वंशावली गंगेश्वर देव मकेश्वर देव राजा देव धानोराज उदय करण राज, जदुराज उग्रसेन गज सिंह (राज सिंह ?) दिलीप सिंह पृथ्वी सिंह सत्रजित सिंह ध्रुवसिंह (बड्ड पैघ किला बनौने छलाह। अपन बेटीक बेटा जुगलकेश्वरकेँ कोरामे लेलन्हि। कारण हिनका पुत्र नहि छलन्हि। शिवनाथ सिंह जुगलकेश्वर सिंह वीरकेश्वर सिंह वीरकेश्‍वर सिंह नवलकेश्वर सिंह महेन्द्रकेश्वर सिंह आनन्दकेश्‍वर सिंह राजेन्द्रकेश्वर सिंह हरेन्द्रकेश्वर सिंह (महारानी शिवरतन–महारानी जानकी कुँवर) भूमिहार ब्राह्मणक इ वंश अपनाकेँ बड्ड प्राचीन मनैत छथि। हिनका लोकनिक वैवाहिक सम्बन्ध बनारस राजसँ सेहो अछि। कामेश्वर वंश जकाँ इहो लोकनि अपनाकेँ सुगौनासँ जोड़ैत छथि मुदा एतिहासिक तत्वक अभावमे अखन किछु कहब असंभव। बेतियाक वर्णन १७८६मे प्रकाशित गजेटियरमे भेटइत अछि। १७८६मे अहिठाम इशाइ मिशनक एकटा शाखा छल। छोट छिन्ह राज सभहिक विवरण:- शिवहरक स्थापना बेतिया राजक शाखासँ भेल छल। सुरसंड राज सेहो भूमिहार ब्राह्मण वंशक राज छल जकर स्थापना महाराज प्रताप सिंह (दरभंगा)क समयमे भेल। एहिमे सर्वाधिक प्रसिद्ध व्यक्ति चन्द्रेश्वर प्रसाद नारायण सिंह भेल छथि जे नेपाल क्रांति (१९५०)क समयमे भारतक राजदूत रहल छलाह। बनैली राजक शाखाक रूपमे श्रीनगर राजक स्थापना भेल अछि। रूद्रानंद सिंह अपन पुत्र श्रीनन्दन सिंहक नामपर श्रीनगरक स्थापना केने छलाह श्रीनन्दन सिंहक तीन पुत्र नित्यानंद सिंह, कमलानंद सिंह आ कालिकानंद सिंह भेला। कमलानंद सिंह साहित्य सेवी छलाह। आ हिन्दीक प्रगतिक हेतु लाखो टाका खर्च केने छलाह। ‘साहित्य सरोज’, ‘अभिनव भोज’, ‘कलियुगी हरिश्चन्द्र’, ‘कलिकर्ण’ आदि उपाधिसँ इ विभूषित छलाह। हिनके पुत्र भेलथिन्ह कुमार गंगानन्द सिंह जे मैथिली, हिन्दी, अंग्रेजी आ प्राचीन भारतीय इतिहासक प्रकाण्ड पण्डित छलाह। कालिकानंद सिंह आ गंगानंदक पुस्तकालय दर्शनीय छल। पुर्णियाँमे राजा पृथ्वीचन्द लालक राज सेहो प्रख्यात छल। छोट–मोट मुसलमान राजक संख्या सेहो ओतए बड्ड अछि। पुर्णियाँमे श्रोत्रिय लोकनिक रजबारा सेहो छल जाहिमे सौरिया राजक इतिहास प्रसिद्ध अछि। मुसलमानी राजमे खगड़ाक मुसलमानी राज प्रसिद्ध छल। अध्याय–15 मिथिलाक प्रशासनिक इतिहास प्राचीन कालमे मिथिला एक एहेन स्थान छल जतए जनक सन शासक छलाह, याज्ञवल्क्य सन विधि विशेषज्ञ एवँ विधिकर्त्ता तथा गौतम सन प्रख्यात नैयायिक। एक ठाम एहेन त्रिरत्नक जुटब कोनो सामान्य बात नहि अपितु ओहि माँटिक विशेषता कहल जा सकइयै। जनक कालीन मिथिला अपना युगमे राजतंत्रक प्रधान केन्द्र छल मुदा ओ राजतंत्र सब तरहे आदर्श राजतंत्र कहल जा सकइयै आ एकर प्रमाण हमरा उपनिषदसँ भेटइत अछि। (अफलातुन (प्लेटो)क दार्शनिक राजाक कल्पना मिथिलहिमे जनक युगमे साकार भेल छल आ हमर एहि कथनकेँ कोनो रूपेँ अतिशयोक्ति नहि कहल जा सकइयै। बृहदारण्यक उपनिषदसँ ज्ञात होइछ जे राजा अपन प्रजाक हाल–चाल बुझबाक हेतु बरोबरि अपन राज्यमे भ्रमण करैत रहैत छलाह आ राजाक अहि परिभ्रमणक क्रममे गामक बृद्ध लोकनि राजाक ठहरबाक आ सुख सुविधाक व्यवस्था करैत छलाह। जाधरि राजा अहि प्रकारक यात्रापर रहैत छलाह ताधरि ओ लोकनि राजाक संग रहैत छलाह। गामक मुख्य पदाधिकारी उग्रकर्मासूत कहबैत छलाह आ ओ गामक बृद्धक संग मिलि शासन कार्य चलबैत छलाह। राजा अपन प्रजासँ प्रेम करैत छलाह आ प्रजाक स्थितिक ज्ञान प्राप्त करबाक लेल स्वयं बरोबरि भ्रमणशील रहैत छलाह। उग्रकर्मासूतकेँ पुलिस पदाधिकारी सेहो कहल गेल अछि। प्राचीनकाल ग्यारह रत्निनमे एकटा ‘सूत’ सेहो होइत छलाह आ बादमे इएह इतिहासकारक काज सेहो करए लागल छलाह। जनक कालीन मिथिलामे हिनक मुख्य काज छल ग्रामीण शासन व्यवस्थाकेँ सुदृढ़ बनाके राखब आ जनताक कल्याणपर ध्यान देब। एतबा सब किछु होइतहुँ ताहु दिनमे अकाल पड़इत छल आ जनकक समयमे अनावृष्टिक कारणे अकाल पड़ल छल जाहिमे जनककेँ स्वयं हर जोतए पड़ल छलन्हि। वैदिक कालमे मिथिलामे राजतंत्रिय व्यवस्था छल आ वंशानुगत राजतंत्र प्रणालीक जड़ि जमि चुकल छल। पवित्रताक भावना राजा लोकनिकेँ रहैत छलन्हि। राजा लोकनि शक्तिशाली होइत छलाह। राजदरबारमे ब्राह्मणक प्रधानता छल आ संगहि सेनापति आ रथकार सेहो रहैत छलाह। एतरेय ब्राह्मणक अनुसार ककरोसँ कोनो काज लेब राजाक विशेषाधिकार बुझल जाइत छल। राजा समस्त मानवक एक मात्र शासक मानल जाइत छलाह आ ओहिमे जे गैरजबाबदेह होइत छलाह हुनका प्रजाक भोक्ता कहल जाइत छल। जनप्रिय राजा लोकनिकेँ देवक संज्ञा भेटइत छलन्हि। ब्राह्मण साहित्यमे राजा जनककेँ सम्राट सेहो कहल गेल छन्हि। राजा जनकक समयमे राजतंत्र मिथिलामे चरमोत्कर्षपर छल। अत्याचारी राजापर अंकुश रखबाक हेतु प्राचीन मनीषि लोकनि अधिकाधिक नियम बनौने छलाह। राज्याभिषेकक अवसरपर जे शपथ ग्रहण होइत छल ताहिमे राजाकेँ इ प्रतिज्ञा करए पड़इत छलन्हि जे ओ अपना प्रजाक हेतु किछु उठा नहि रखताह। राज्यमे सूत, ग्रामणी आ अनान्य अधिकारी वर्गक बड्ड महत्व छल आ राजाक निर्वाचनमे इएह लोकनि सर्वेसर्वा होइत छलाह। तैं तँ शतपथ ब्राह्मणमे हिनका लोकनिकेँ “राजकृत” सेहो कहल गेल छन्हि। वैदिक युगमे विदथ, सभा आ समितिक उल्लेख सेहो भेटैछ। विदथ बड्ड पुरान संस्था छल आ मिथिलामे एकर प्रचलन छलैक अथवा नहिसे कहब असंभव। सभा–समिति प्राचीन वैदिक वैधानिक संस्था छल आ एहि माध्यमसँ राजापर अंकुश राखल जाइत छल। गिलगिटसँ प्राप्त बौद्ध पाण्डुलिपिमे एहिबातक उल्लेख अछि जे मिथिलाक राजाक ओतए ५००अमात्य रहैत छलाह जाहिमे ‘खण्ड’ अमात्य अग्रगण्य छलाह। खण्ड शक्तिशाली अमात्य छलाह आ समस्त मिथिला राज्यमे हुनक धाक जमल छलन्हि। खण्डक वक्तव्यसँ इ स्पष्ट अछि कि जखन वैशालीमे गणराज्यक स्थापना भऽ चुकल छल तखनो मिथिलामे राजतंत्र प्रतिष्ठित राजनैतिक व्यवस्था छल। महाउम्मग्गजातकसँ इ ज्ञात होइत अछि जे मिथिलामे राजा विदेहक ओतए केवट नामक एकटा प्रधानमंत्री छलाह। मिथिलापर एकबेर जखन उत्तर पाँचाल दिसिसँ आक्रमण भेल छल तखन मिथिलाक रक्षार्थ केवट किछु उठा नहि रखने छलाह। केवटक कथाक विशद विश्लेषण जातक कथामे भेटइत अछि। कराल जनकक कुकृत्यसँ तंग भए मिथिलाक जनता राजतंत्रक जूआकेँ उठा फेकलक आ ओहि स्थानपर वैशालीक देखादेखी गणतंत्रक स्थापना केलक। किछु दिनक पश्चात् विदेह गणराज्य अपन सुरक्षार्थ वैशालीक गणराज्यसँ मिलि जुलिकेँ रहए लागल आ वज्जीसंघक प्रमुख सदस्य सेहो भऽ गेल। वैशालीक गणराज्य शासन पद्धति:- वैशालीक लिच्छवी लोकनिक शासन गणतांत्रिक छल। राज्यक शक्ति जनतामे निहित छल। कौटिल्य लिच्छवी लोकनिक हेतु ‘राज शब्दोपजीवीसंघ’क व्यवहार कएने छथि। ‘ललितविस्तर’क अनुसार वैशालीक प्रत्येक व्यक्ति अपना सम्बन्धमे इएह बुझैत छल जे ओ राजा अछि। केओ अपनाकेँ ककरोसँ छोट नहि बुझैत छलाह। ओहिठामक राज्यशक्ति समूहमे निहित छल। शासक राज्यक सेवक बुझल जाइत छलाह। परिषदक बैसक जाहि भवनमे होइत छल तकरा ‘संथागार’ कहल जाइत छल। संथागारेमे बैसिकेँ सब केओ राजनैतिक आ सामाजिक प्रश्नपर विचार विमर्श करैत जाइत छलाह। परिषदक सभापति अथवा गणमुख्य सेहो राजा कहबैत छलाह। वैशालीमे ७७०७राजाक उल्लेख भेटइत अछि। संभवतः इ सब गोटए कुलीन परिवारक छलाह आ शासन सत्ता हिनके लोकनिक मध्य निहित छल। इएह कारण अछि जे वैशालीक शासनकेँ कुलीनतंत्र सेहो कहल गेल अछि। आजुक संसद जकाँ ताहि दिनक संथागारमे सेहो सबटा कार्य नियमानुसार होइत छल। सदस्य लोकनिक बैसबाक प्रबन्धकेँ आसन कहल जाइत छल आ परिषदक कार्यवाहीक हेतु निश्चित गणपूर्त्तिक आवश्यकता छल। गणपूर्त्ति करेनिहार पदाधिकारीकेँ गणपूरक कहल जाइत छल। परिषदमे उपस्थित प्रस्तावकेँ प्रतिज्ञा कहल जाइत छल। प्रस्तावपर वाद–विवाद होइत छल आ तकर बाद ओहिपर मत लेल जाइत छल। मतकेँ गुप्त राखल जाइत छल आ पारित प्रस्तावकेँ सबकेँ मानए पड़इत छलन्हि। गणक मुख्य अधिकारी होइत छलाह राजा, उपराजा, सेनापति, भांडागारिक, इत्यादि आ सेना, अर्थ आ न्याय शासनक मुख्य अंग छल। बौद्ध साहित्यमे हिरण्यक, सारथी आदि कर्मचारीक उल्लेख सेहो भेटइत अछि। नायक नामक एक पदाधिकारीक उल्लेख सेहो भेटइत अछि। न्याय विभागक अधिकारीकेँ विनय महामात्य कहल जाइत छल। अभियुक्तकेँ सर्वप्रथम हिनके समक्ष उपस्थित कैल जाइत छल आ अहिठाम सर्वप्रथम आरोपक जाँच होइत छल। निरपराध भेलापर अपराधीकेँ मुक्त कऽ देल जाइत छल आ अपराध सिद्ध भेलापर पुनः ओकरा व्यावहारिक अथवा वोहारिक महामात्यक समक्ष उपस्थित कैल जाइत छल। निरपराध सिद्ध भेलापर अपराधी मुक्त कऽ देल जाइत छल अन्यथा ओकरा पुनः अट्ठकुलकक समक्ष उपस्थित कैल जाइत छल। क्रमशः अभियुक्तकेँ सेनापति, उपराजा आ राजाक समक्ष उपस्थित कैल जाइत छल। अभियुक्तकेँ दण्ड तखने देल जाइत छल जखन ओकर अपराध पूर्णतया सिद्ध भऽ जाइक। समस्त न्याय प्रणालीक रेकार्ड राखल जाइत छल जकरा ‘पवेणीपुस्तक’ कहल जाइत छलैक। न्याय व्यवस्था समता आ स्वतंत्रताक सिद्धांतपर आधारित छल। अपील करबाक व्यवस्था सेहो छल। नगर व्यवस्थाक भार नगरगुत्तिकपर रहैत छल। नगरमे शांति स्थापनाक दायित्वक भार ओहि पदाधिकारीपर छलैक। नगरगुत्तिककेँ रातिक राजा सेहो कहल जाइत छलैक। अहिठाम इ स्मरण रखबाक अछि जे वैशाली लिच्छवी संघक राजधानी छल आ संगहि वृज्जि गणसंघक सेहो तैं वैशालीक अत्यधिक महत्व बौद्धयुगमे भऽ गेल छल। विदेह आ लिच्छवी संयुक्त रूपसँ संवज्जि कहबैत छलाह आ वृज्जिसंघमे आठटा गणराज्य सम्मिलित छल। कल्पसूत्रक अनुसार लिच्छवीक एहेन सम्बन्ध एकबेर मल्लक संग सेहो छल आ इ दुनू गोटए मिलिकेँ एकबेर संयुक्त परिषदक निर्माण केने छलाह जाहिमे १८ सदस्य छलाह–९लिच्छवी आ ९मल्ल। इहो लोकनि राजा कहबैत छलाह। साम्राज्यवादी आक्रमणक प्रकोपसँ बचबाक हेतु इ लोकनि समय–समयपर अपन संघ बनबैत छलाह। वैशाली सबमे प्रमुख छल तैं सब छोट–छोट, गणराज्य वैशालीक संग मिलिकेँ संघ बनेबाक हेतु उत्सुक रहैत छल। वृज्जिसंघ शासनकेँ परामर्श देबाक हेतु एक संस्था छल अष्टकुलक जाहिमे आठो गणक प्रतिनिधि रहैत छलाह। संघक सब सदस्यक अधिकार बरोबरि छलन्हि। उच्चतम न्यायालयकेँ अष्टकुलक कहल जाइत छल। संघ शासन प्रणालीक अपन नियम छल जाहिसँ संघ शासन संचालित होइत छल। वैशाली ताहि दिनमे सर्वश्रेष्ठ संघ राज्यक केन्द्र छल। बुद्ध वैशाली गणतंत्रक मतैक्य, सौहार्द, आदर, दृढ़ता, पराक्रम आदिक भावनासँ बड्ड प्रभावित छलाह आ बेर–बेर वैशाली अबैत रहैत छलाह। बुद्धक अनुसार जे गणराज्य निम्नलिखित सातटा आदर्शक (सप्तअपरिहाणिसुत्त) पालन करैत रहत तकर कहिओ ह्रास नहि हेतैक– i) नियमित एवँ व्यवस्थित रूपें सदति सभाक आयोजन करब– ii) विचार, उत्थान एवँ व्यवहारमे सदस्यक मतैक्य रहब– iii) व्यवहृत सिद्धांतक प्रयोग करब– iv) बृद्ध लोकनिक प्रति आदर, श्रद्धा, सहयोग एवँ प्रतिष्ठाक भाव राखब– v) संघक चैत्यक प्रति श्रद्धा एवँ सहयोगक भावना राखब– vi) पराजित देशक स्त्रीक संग उचित व्यवहार करब– vii) अर्हत् क प्रति समुचित सहयोग एवं रक्षाक भावना राखब। महापरिनिर्वाणसुत्तसँ ज्ञात होइछ ज वृज्जीसंघक शासन व्यवस्थामे– i) विभिन्न संघक सभाक अधिवेशन बरोबरि नियमित रूपेँ होइत रहैत छल। ii) वृज्जीसंघक सदस्य लोकनि बरोबरि आपसमे मिलैत–जुलैत रहैत छलाह आ शासन चलेबामे सतर्कताक परिचय दैत छलाह। iii) ओ लोकनि अपन परम्परागत नियमक पालनक प्रति जागरूक रहैत छलाह। iv) शासनमे बुझनुक बृद्ध लोकनिक हाथ रहए दैत छलाह। वैशालीमे कोना आ कहिया गणराज्यक स्थापना भेल से कहब असंभव। बुद्ध तँ लिच्छवी लोकनिक प्रशंसा ‘तावतिंश देव’ कहिकेँ केने छथि आ ओ स्वयं गणशासन प्रणालीसँ एतेक प्रभावित भेल छलाह जे ओ एहि प्रणालीकेँ अपन संघ संगठनक आदर्श मानलन्हि। ७७०७राजा ओहिठाम राजकुलोद्भव मानल जाइत छलाह आ ओहिना व्यवहारो करैत छलाह। वैशालीक पुष्करिणी हिनके लोकनिक हेतु सुरक्षित रहैत छल। इ लोकनि वैशालीक एक विशिष्ट क्षेत्रसँ संबन्धित छलाह। जैन कल्पसूत्रसँ इहो स्पष्ट होइछ जे वैशाली शासनक एकटा कार्यकारिणी समिति सेहो छल। वैशाली सन प्राचीन न्याय व्यवस्थाक कोनो दोसर उदाहरण संसारमे नहि भेटइत अछि। अभियुक्तकेँ तखने दण्डित कैल जा सकैत छल जखन ओ क्रमशः सातो न्याय समितिसँ एकमतसँ दण्डित घोषित हुए। वृज्जीसंघक शासनमे सेहो समानताक सिद्धांतक पालन होइत छल। अजातशत्रुक आक्रमणक बादो जखन वैशाली मगध साम्राज्यक अंग बनि गेल तखनो एकर गणतांत्रिक स्वरूप अपना क्षेत्रमे बनले रहल। मौर्य युगसँ वैशाली–विदेह मौर्य साम्राज्यक एकटा अंग बनिकेँ रहल। अशोकक समयमे वैशाली आ चम्पारणक प्रशासनिक महत्व बढ़ल होइत कारण अहि दुनूठाम अशोकक स्तंभ अछि। अशोकक स्तंभसँ इ अनुमान लगाओल जाइछ जे प्रशासनिक दृष्टिकोणसँ मिथिलाक महत्व घटल नहि छल अपितु बढ़ले छल। अहि बाटे नेपाल जेबाक मार्ग छल तैं प्रशासनिक दृष्टिये सीमासँ सटल वैशाली–विदेह राज्यकेँ सुरक्षित राखब आ ओकरासँ नीक संबन्ध बनौने राखब साम्राज्यवादी शासकोक अभीष्ट रहैत छलन्हि। वैशालीसँ पुर्णियाँ धरिक सीमा मिथिला प्रांतक अंतर्गत छल आ मिथिला उत्तर बिहारक एकटा प्रमुख प्रशासनिक केन्द्र छल। साम्राज्यवादी छत्रछायाक अंतर्गत रहितहुँ मिथिला अपन प्रजातांत्रिक प्रणालीकेँ सोहागक सिन्दुर जकाँ संजोगने छल। पतञ्जलिक महाभाष्यमे सेहो जतए–ततए मिथिला जनपदक उल्लेख भेटइत अछि। मौर्य साम्राज्यक समाप्त भेलापर वैशाली पुनः अपन स्वतंत्रता प्राप्त केलक से बुझि पड़इयै। वैशालीक उत्खननसँ जे बहुत रास मोहर सब भेटल अछि ताहिपर श्रेणी, सार्थवाह, कुलिक, निगम आदिक उल्लेख भेटइयै। एहेन बुझना जाइत अछि जे वैशालीमे श्रेष्ठी, सार्थवाह आ शिल्पी लोकनिक सम्मिलित निगम छल आ एहि निगमक काज विभिन्न नगर सबमे पसरल छल। श्रेष्ठी–सार्थवाह–कुलिक निगमक २७४टा मोहर वैशालीसँ भेटल अछि जाहिमे ७५टा इशानदासक, ३८टा मातृदासक, ३७टा गोभिस्वामीक मोहर अछि। संभवतः इ लोकनि निगम शाखाक अध्यक्ष रहल होयताह। ठाम–ठाम मोहर सबक अतिरिक्त भगवान, जिन, पशुपति आदिक नामक उल्लेख सेहो भेटइत अछि। गुप्तकालमे वैशाली तीरभुक्ति प्रांतक राजधानी छल आ ओहिठामसँ प्राप्त मुद्रामे एकरा अधिष्ठान सेहो कहल गेल छैक। एहि प्रांतक महत्व अहुँसँ बुझना जाइत अछि जे स्वयं गोविन्दगुप्त एहि प्रांतक राज्यपाल छलाह आ हुनक एक अभिलेख सेहो अहिठामसँ भेटल अछि। महाराजाधिराज श्री चन्द्रगुप्त पत्नी श्री गोविन्द गुप्त माता श्री ध्रुवस्वामिनी– अहिठामसँ बहुत रास मुद्रा, अभिलेख आदि भेटल अछि। प्रांतीय शासकक रूपमे राजकुलक लोग नियुक्त होइत छलाह। हुनका लोकनिकेँ युवराज कुमारामात्य कहल जाइत छलन्हि। प्रान्तीय शासककेँ अपन अपन महासेनापति, महादण्डनायक आ अन्यान्य कर्मचारी होइत छलन्हि। पुण्ड्रवर्द्धन भुक्ति आ तीरभुक्तिक क्षेत्र ताहि दिनक मिथिला प्रांतमे छल। युवराज कुमारामात्यक अधीन भुक्तिक शासनक हेतु उपरिक नियुक्ति होइत छल आ पुण्ड्रवर्द्धन भुक्तिमे करण कायस्थक ‘दत्त’ पदवी धारी ‘चिरात दत्त’क ३–४पुस्त उपरिकक पदपर विराजमान छलाह। उपरिककेँ प्रांतीय शासक अथवा गवर्नर कहल जाइत छल। प्रांतीय शासकक मुख्य कर्त्तव्य निम्नलिखित छल– i) शांति–व्यवस्थाकेँ सुरक्षित राखब ii) कर वसूलीक व्यवस्थाकेँ सुदृढ़ राखब iii) प्रजाक रक्षा करब iv) सुख–समृद्धिक प्रबन्ध करब v) राजाक प्रति प्रजामे बिश्वास उत्पन्न करब vi) सीमावर्त्ती राज्यक आक्रमणसँ अपन क्षेत्रकेँ सुरक्षित राखब। गुप्तकालमे प्रादेशिक शासक लोकनिक सम्पर्क सोझे राजासँ छलन्हि। सामंतवादक विकास अहियुगमे प्रारंभ भऽ चुकल छल आ एकर प्रभाव शासनपर पड़ब स्वाभाविकेँ छल। उत्खननसँ प्राप्त सामग्रीक आधारपर प्रांतीय शासनसँ सम्बन्धित निम्नलिखित कर्मचारीक विवरण भेटइत अछि– उपरिक, कुमारपालाधिकरण (राजकुमारक मंत्रीक कार्यालय), बलाधिकरण (सेनापतिक कार्यालय), दण्डपाशाधिकरण (पुलिस अधिकारीक कार्यालय), महादण्डनायक (प्रमुख न्यायाधीश), विनय स्थिति स्थापक (कानून आ व्यवस्था मंत्री)। गुप्तकालमे केन्द्रीय शासनक विभिन्न विभागकेँ अधिकरण कहल जाइत छलैक आ एक प्रकारक राष्ट्रीय सेवाक प्रावधान सेहो छलैक। जकरा ‘कुमारामात्य’ कहल जाइत छलैक। ‘कुमारामात्य’ साम्राज्यक शासन प्रणालीक स्थायी सेवामे रहैत छलाह आ हुनका कतहु कोनो काजमे पठाओल जा सकैत छल। ओ लोकनि प्रशासनिक सेवाक सदस्य होइत छलाह। कवि हरिषेण सेहो अपनाकेँ कुमारामात्य कहने छथि। कुमारामात्यक सम्बन्ध प्रांतीय आ स्थानीय शासनसँ सेहो रहैत छल। वैशालीसँ प्राप्त सूचना प्रशासनिक सम्बन्धमे एवँ प्रकारे अछि– i) कुमारामात्यधिकरणस्य ii) युवराज पादीयकुमारामात्यधिकरण iii) परमभट्टारक पादीय कुमारामात्यधिकरण iv) वालाधिकरणस्य v) रण भाण्डागारिधिकरणस्य vi) दण्डपाशाधिकरणस्य vii) तीरभुक्तौपरिकाधिकरणस्य viii) तीरभुक्तौ विनय स्थिति स्थापकाधिकरणस्य ix) तीरभुक्तौ कुमारामात्यधिकरणस्य x) वैशालयाधिष्ठानाधिकरण भुक्तिक अधीन विषय (जिला) होइत छल। विभिन्न स्रोतसँ इ ज्ञात होइछ जे पालयुग धरि अवैत–अवैत तीरभुक्तिमे चामुण्डा, होद्रेय, कक्ष विषय छल आ नौलागढ़सँ प्राप्त अभिलेखक अनुसार एक ‘रक्षमुक्त विषयाधिकरण’ नामक सेहो एकटा प्रशासनिक केन्द्र छल। विषयमे पादितरिक आ गौल्मिक नामक अधिकारी होइत छलाह। अक्षपटलाधिकृत गामक जमीनक लेखा–जोखा रखैत छलाह। विषयमे चारि सदस्यक एकटा परामर्शदातृ समिति सेहो होइत छल जाहिमे नगर श्रेष्ठी, सार्थवाह, प्रथमकुलिक आ प्रथमकायस्थ सदस्य होइत छलाह। विषयपति अपन जिलाक प्रमुख व्यक्तिक संग मिलिकेँ शासन करैत छलाह। वैशालीमे नगर शासन स्थानीय निगमक हाथमे छल। अहिठाम पुण्ड्रवर्द्धन–पुर्णियाँ (जे कि पूर्वी मिथिलाक अंश रहल अछि)केँ सम्बन्धमे किछु कहिदेव आवश्यक। प्राचीन कालहिसँ प्रशासनिक, सामरिक आ साँस्कृतिक दृष्टिकोणसँ पुर्णियाँक महत्व रहल अछि आ मिथिलाक सुरक्षा सेहो पुर्णियाँक सुरक्षासँ सम्बद्ध मानल गेल अछि। गुप्तलोकनि पूर्वी प्रदेशपर अपन नियंत्रण रखबाक हेतु अहिठाम अपन शासनक एक प्रमुख केन्द्र बनौने छलाह। कंनिघमक अनुसार वैशालीक वृज्जीसंघ सेहो एहि प्रदेश अपन नियंत्रण रखैत छलाह। पुण्ड्रवर्द्धन भुक्तिक समीकरण पुर्णियाँसँ करब अत्यंत स्वाभाविक बुझना जाइत अछि। अभिलेखमे कोकामुखस्वामी आ स्वेतवाराहस्वामी उल्लेख भेटइत अछि जे नेपालक धनकुट्टा नामक स्थान लग अछि आ पुर्णियाँ जिलाक अभ्यंतर सेहो। बादमे जे आर अभिलेख सबमे वराहक्षेत्र किंवा ‘पुण्ड्र’क उल्लेख भेटैछ से सब पुर्णियाँक संकेत दैत अछि। पुर्णियाँक प्रशासनकेँ नियंत्रणमे राखब अहुलेल आवश्यक छल कारण पुर्णियाँक सीमा नेपाल, असम, बंगालसँ मिलैत छल। पुण्ड्रवर्द्धन भुक्ति बंगाल–बिहारक पूर्वी अंश मिलाकेँ छल आ पुर्णियाँ ओकर प्रमुख केन्द्र छल। हर्षक शासन कालमे सेहो मिथिलाक प्रधानता बनल रहल। राज्यसत्ताक कमजोरीक कारणे राजतंत्रक विकेन्द्रीकरण भऽ गेल छल आ हर्षक मृत्युक पश्चात् तिरहूतमे अराजकता पसरि गेल छल जे लगभग ५० वर्ष धरि बनल रहल। दोसर बात इहो जे अहियुगमे सामंतवादी प्रवृत्ति दृढ़तर भेल आ शासनयंत्रमे एकर प्रभाव स्पष्ट होमए लागल। चीनी यात्री हियुएन संग सेहो एहि बातक समर्थन केने छथि। हर्षक शासनक मुख्य आधार छल व्यक्तिगत भ्रमण एवँ निरीक्षण आ तैं हर्षक परोक्ष भेलापर शासन यंत्र एकदम ढ़ील भऽ गेल आ चारूकात सब केओ अपन–अपन हाथ–पैर पसारे लगलाह। तहियासँ लऽ कए पाल शासनक स्थापना धरि एक प्रकारक अस्थायित्व बनल रहल आ मिथिलाक क्षेत्रपर चारू दिसिसँ आक्रमण होइत रहल। एहि अराजकताक कालोमे तीरभुक्ति एक प्रमुख प्रांत छल आ उत्तर गुप्त शासक लोकनिक मुख्य शासन केन्द्र सेहो जकर प्रमाण हमरा कटरासँ प्राप्त ताम्रलेखसँ भेटइत अछि। कटरा (मुजफ्फरपुर)सँ प्राप्त जीवगुप्तक अभिलेखमे तीरभुक्तिक चामुण्डा विषयक आ तिष्टिहल पाटकक उल्लेख भेटइत अछि। तारा नामक स्थानसँ इ ताम्रपत्र देल गेल छल आ ओहिमे सुरभकार, याम्या आ हरिग्रामक नामक गामक उल्लेख सेहो भेटइत अछि। एहि ताम्रलेखमे निम्नलिखित शासनाधिकारीक वर्णन अछि– i) महासान्धिविग्रहिक ii) अक्षपटलिक iii) सर्वाधिकाहिक iv) प्रतिहार v) सेनापति आ vi) महासामंत पालयुगमे तीरभुक्ति एकटा प्रधान केन्द्र छल। ओना तँ नारायण पाल भागलपुर ताम्रलेखमे तीरभुक्तिक कक्ष (कौशिकी–कच्छ–छै परगना) विषय आ गाम सबहिक वर्णन भेटिते अछि मुदा तिरहूतक केन्द्र वनगाँवसँ जे ताम्र अभिलेख (विग्रह पाल तृतीयक) भेटल अछि ताहुसँ तीरभुक्तिक शासनपर प्रकाश पड़इयै। पालकालमे जखन कलचुरी वंशक आक्रमणक प्रकोप बढ़ल तखन पाल लोकनि अपनाकेँ समेटकेँ तीरभुक्तिमे सुरक्षित रखलन्हि आ एवं प्रकारे अपन साम्राज्य आ प्रतिष्ठाकेँ बचौलन्हि। मिथिला भौगोलिक दृष्टिये सुरक्षित छल तैं ओ लोकनि एम्हरे घसकिकेँ एलाह। वनगाँवक अभिलेखसँ ज्ञात होइछ जे तीरभुक्तिमे हौद्रेय (आधुनिक हरदी गाँव सहरसा) विषय सेहो छल। गुप्तयुगसँ कर्णाटवंशक स्थापना धरि तीरभुक्ति शासनक एकटा प्रधान केन्द्र बनल रहल। ११म शताब्दीक दूटा अभिलेख चम्पारणसँ हालहिमे उपलब्ध भेल अछि जाहिसँ ताहि दिन शासन प्रणालीपर किछु प्रकाश पड़इयै। गोरखपुरसँ चम्पारण धरि क्षेत्रकेँ दरद गण्डकी देश कहल जाइत छल आ प्रशासनिक इकाइक हिसाबे दरद–गण्डकी–मण्डल जकरा अधीनमे विआलिसि विषय (४२ग्राम) छल। एहि लेखसँ इ स्पष्ट अछि जे अहिठाम विषय मण्डलक एकटा छोट अंग मानल गेल अछि। चम्पारणक इ दुनूटा अभिलेख कर्णाटक पूर्व थिक आ प्रतिहार लोकनिक सत्ताक कमजोर भेलापर इ लोकनि संभवतः एहि क्षेत्रपर अपन सत्ता स्थापित केने छलाह। एहि दुनू अभिलेखमे निम्नलिखित प्रशासनिक शब्दावली भेटइत अछि। i) राणक, ii) ठाकुर, iii) अमात्य, iv) पुरोहित, v) महामत्तक, vi) महासान्धिविग्रहिक, vii) महाप्रतिहार, viii) महाक्षपटलिक, ix) महासाधनिक, x) महापीलुपति, xi) महासेनापति, xii) महाकटकाध्यक्ष, xiii) दुष्टसाध्यासाधनिक, xiv) दाण्डिक, xv) दण्डपाशिक, xvi) शौल्किक, xvii) गौल्मिक, xviii) दूतसंप्रेषणिक, xix) तलवर्गिक, xx) अंगरक्षक, xxi) चाट–भाट, इत्यादि। एहिमे वर्णित बहुत रास शब्दावली पाल अभिलेखमे सेहो भेटल अछि। एहि अभिलेखसँ इहो अनुमान लगाओल जाइछ जे मिथिलाक सीमा पश्चिममे श्रावस्ती भुक्तिसँ पश्चिमोत्तरमे दरद–गण्डकी–देशसँ आ पूबमे पुण्ड्रवर्द्धन भुक्तिसँ मिलल जुलल छल। एवँ प्रकारे समस्त उत्तर बिहारक प्रतिनिधित्व प्राचीन कालक तीरभुक्ति करैत छल आ अहि दृष्टिकोणे एकर प्रशासनिक महत्व अद्वितीय छलैक जे मुगलकाल धरि बनल रहलैक। उत्तरमे कर्णाट लोकनि सिमरौनगढ़ धरि बढ़ले रहैत आ ओतए अपन राजधानी बनौने रहैत। ग्राममे ग्राम पंचायतक व्यवस्था छल आ अभिलेख सबमे पञ्चमण्डली आ पञ्चकुलक उल्लेख भेटइत अछि। १०९७मे जखन कर्णाटवंशक स्थापना भेल तखन पुनः शासन व्यवस्थाक संगठन मिथिलाक आवश्यकताक अनुकूल गठित भेल यद्यपि एकर आधार छल सामंतवादी व्यवस्था। नान्यदेव अहिठामक शासन व्यवस्थाकेँ सुगठित केलन्हि आ मिथिलाक निजीगौरव एवँ विशिष्टताक विकास सेहो। नान्यदेव स्वयं कर्णाट वंशक संस्थापक छलाह तैं शासनमे हुनक प्रधानता रहब स्वाभाविके। शासकक प्रधान राजा होइत छलाह। प्रजाक रक्षा करब उचित बुझल जाइत छल– चण्डेश्वर तँ प्रजाकेँ विष्णु कहने छथि। राजा शासन, न्याय एवँ प्रशासनिक यंत्रक अध्यक्ष होइत छलाह। शासनकेँ सुरूचिपूर्ण ढ़ँगसँ चलेबाक हेतु राजा बरोबरि प्राचीन परम्परा एवम मान्यताकेँ ध्यानमे रखैत छलाह। शासकक संगहि संग मिथिलाक राजा प्रसिद्ध विद्वानो होइत छ्लाह आ उदाहरण स्वरूप हमरा लोकनि नान्यदेव, रामसिंह देव, शिवसिंह, लखिमा, विश्वास देवी आदिक नाम लऽ सकैत छी। राजा लोकनि परमेश्वर, परमभट्टारक, महाराजाधिराज, महानृपति, क्षितिपाल, भूपाल, मिथिलाधिपति, भुजवल भीम, भीमपराक्रम, कर्णाटचूड़ामणि, दशमदेव अवतार, एकादश अवतार, भूमिपति, मुकुटमणि, आदि पदवीसँ विभूषित होइत छलाह। नान्यदेव, गंगदेव, रामसिंहदेवक शासन धरि तँ कोनो प्रकारक गोलमाल देखबामे नहि अवइयै परञ्च शक्तिसिंहदेवक शासनकालमे मंत्री लोकनि शासन सत्ता अपना हाथमे लऽ लेने छलाह। सामंते मंत्री होइत छलाह। शक्तिसिंहक कठोर शासनसँ ओ लोकनि उबि गेल छलाह तैं हुनकासँ सब अधिकार छीनिके अपना हाथमे लऽ लेलन्हि। मंत्रियेक संरक्षणमे बहुत दिन धरि हरिसिंह देव नाम मात्रक शासक छलाह। सामंतवादी व्यवस्थाक फलें राजाक शक्ति क्षीण अवश्य भेल छल मुदा शक्तिशाली शासक अपन अधिकारक उपयोग कइये लैत छलाह। हरिसिंह देव, शिवसिंह देव, भैरव सिंह देव आदि शासक एकर उदाहरण छथि। सामान्यतः राजाकेँ सामन्तक बलपर निर्भर करए पड़इत छलन्हि। राजाकेँ सहायता देबाक हेतु मंत्रिपरिषदक व्यवस्था सेहो छल। मिथिलामे प्रधानमंत्रीकेँ महामत्तक कहल जाइत छल। अन्हराठाढ़ी आ हावीडीह अभिलेखमे प्रधानमंत्री लोकनिकेँ मंत्रीक नामसँ संबोधित कैल गेल अछि। मंत्री लोकनिकेँ संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव, आ संश्रयक पूर्ण ज्ञान रहब आवश्यक बुझना जाइत छल। श्रीधरदास एवँ रत्नदेवक वंशज मिथिलामे बहुतो दिन धरि मंत्री पदक भार सम्हारने छलाह। श्रीधरदासकेँ सेन वंश दिसिसँ महामण्डलिकक पदवी भेटल छलन्हि। रत्नदेवक वंशजकेँ सामंतवादी पदवी ‘रउत’ रहैन्ह आ विद्यापतिमे रत्नदेवक वंशज रउत रजदेवक उल्लेख अछि। रामादित्य, कर्मादित्य, वीरेश्वर, देवादित्य, गणेश्वर, चंडेश्वर आदि सेहो प्रमुख मंत्रीगण मिथिलामे भेल छथि। शक्तिसिंहक निरंकुश शासनसँ जखन मंत्रीगण उबि गेल छलाह तखन ओ लोकनि सात बृद्धक एकटा परिषद बनौलन्हि आ शक्तिसिंहकेँ गद्दीसँ उतारि ओहि परिषदक हाथमे शासन भार देलन्हि। एहिसँ मंत्रिपरिषदक व्यापकता एवँ अधिकारक पता लगइयै। पाछाँ जखन हरिसिंह देव वयस्क भेला तखन हुनक राज्याभिषेक भेल। ताहिसँ पूर्व संभवतः चण्डेश्वर राज्यक भार सम्हारने छलाह। चण्डेश्वर साँधिविग्रहिक छलाह। हुनका महावार्त्तिक नैबन्धिक सेहो कहल गेल अछि। एहिसँ प्रत्यक्ष अछि जे चण्डेश्वर बड्ड शक्तिशाली मंत्री छलाह। मंत्री लोकनि सामंत, महासामंत, मांडलिक, महामाण्डलिक, महाराज, महामत्तक आदि पदवी एवँ उपाधिसँ विभूषित होइत छलाह। इ लोकनि हृदयसँ दान इत्यादि सेहो करैत छलाह आ एहि दिशामे वीरेश्वर आ चण्डेश्वरक नाम अग्रगण्य अछि। चण्डेश्वरक अधीन जे एकटा सामन्त हरिब्रह्म छलाह तिनक एकटा पद प्राकृत पैगंलममे सुरक्षित अछि। मंत्रिपरिषदक अतिरिक्त आरो कतैक पदाधिकारी होइत छलाह जेना– i) महामुद्राधिकृत ii) महासर्वाधिकृत iii) महाधर्माध्यक्ष iv) धर्माध्यक्ष v) प्राडविवाक vi) कोषाध्यक्ष vii) स्थानांतरिक, इत्यादि। ग्राम शासनक न्यूनतम इकाइ छल। ग्रामक अध्यक्षकेँ ग्रामपति कहल जाइत छल। ग्रामपति कर वसूल कए राजाक ओतए पठबैत छलाह। गुल्म सेहो एकटा ग्राम पदाधिकारी होइत छलाह। तीन अथवा पाँचटा ग्रामकेँ मिलाकेँ एकटा गुल्म नियुक्त होइत छलाह। एकर अतिरिक्त दश ग्रामपति, विंशति ग्रामपति, त्रिंशति ग्रामपति, सहस्त्र ग्रामपति, इत्यादिक उल्लेख सेहो भेटइत अछि। प्रत्येक ग्राममे एकटा मुखिया होइत छल। केन्द्रीय शासन ग्राम शासनक सफलतापर निर्भर करैत छल। ग्राम सभामे राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, आ साँस्कृतिक आदि विषयपर विचार विमर्श होइत छल। ग्रामक झगड़ा दन ग्राम सभामे फरियैल जाइत छल। जखन ग्राम सभा फरियैबामे असमर्थ होइत छल, तखने उपरका अधिकारीक ओतए ओ पठाओल जाइत छल। मिथिलाक समस्त राजनैतिक संगठनक आधारशिला छल ग्राम सभा। ग्राम सभाक पदाधिकारीकेँ पारिश्रामिक भेटइत छलन्हि जकर विवरण निम्नांकित अछि– i) दशेश– दश गामक अधिकारीकेँ जोतबाक हेतु ओतेक जमीन भेटइत छलन्हि जतेक ओ एक हरसँ स्वयं जोति सकैत छलाह। ii) विंशतिंश– बीस गामक अधिकारीकेँ चारिटा हरसँ स्वयं जोति सकबा जोकर जमीन भेटइत छलन्हि। iii) सतेश–एक सौ गामक अधिकारीकेँ एकटा सम्पूर्ण गामे भेटइत छलन्हि। iv) सहस्राधिपति– एक हजार ग्रामक अधिकारीकेँ एकटा सम्पूर्ण नगर भेटइत छलन्हि। ग्राम शासन संगठनक प्रसंगमे गंगदेवक नाम अग्रगण्य अछि। मिथिलामे एकर सर्वश्रेष्ठ श्रेय हुनके छन्हि। ओ समस्त मिथिला राज्यकेँ राजस्व प्रशासनक दृष्टिकोणसँ कतेको परगन्नामे बटने छलाह आ प्रत्येक परगन्नाक हेतु चौधरी आ कोतवाल नियुक्त केने छलाह। इएह लोकनि ग्राम शांति आ राजस्व वसूलीक हेतु उत्तरदायी होइत छलाह आ हिनके लोकनिक योग्यता आ सहयोगपर केन्द्रीय शासनक सफलता निर्भर करैत छल। ग्राम शासन आ केन्द्रीय शासनक मध्य सम्पर्क स्थापित करबाक हेतु आ ओकरा बनाकेँ रखबाक हेतु एक प्रकारक विशेष कर्मचारी होइत छलाह जकरा ‘स्निग्ध’ कहल जाइत छल। ‘स्निग्ध’केँ ग्राम विभागक मंत्रियो कहि सकैत छी। यदा कदा ‘स्निग्ध’क स्वार्थपूर्ण आचरणसँ ग्रामीण तबाहो होइत छलाह। ‘सवार्थ चिंतकम्’ नामक एकटा अधिकारी आ होइत छलाह जिनका ग्रामीण लोकनि ‘राहु’ बुझैत छलथिन्ह। ग्राममे पंचायतक चुनाव जनतांत्रिक पद्धतिसँ होइत छल आ मिथिलामे एकर परम्परा बड्ड प्राचीन छल। प्रत्येक गामक हेतु पुलिस (आरक्षी)क नियुक्ति सेहो होइत छल। प्रत्येक दिन पुलिस लोकनिकेँ अपन काजक ब्योरा गामक मुखियाकेँ देमए पड़इत छलन्हि। जँ कतहु कोनो गड़बड़ी भेल तँ ओहि हेतु पुलिसकेँ उत्तरदायी ठहराओल जाइत छल। मिथिलाक अभिलेख आ प्राचीन पोथी सबमे बहुत रास प्रशासनिक शब्दावली भेटइत अछि जाहिसँ बुझि पड़इयै जे ओ सब ताहि दिनमे व्यवहारमे छल। संग्रामगुप्तक पंचोभ ताम्रलेख(१३म शाताब्दी)मे निम्नलिखित अधिकारीक विवरण भेटइत अछि– i) महाराजाधिराज वर्णनरत्नाकरमे– ii) महामाण्डलिक i)भूपाल iii) महासान्धिविग्रहिक ii)माण्डलिक iv) महाव्युहपति iii)सामन्त v) महाधिकारिक iv)सेनापति vi) महामुद्राधिकारिक v)पुरपति vii) महामत्तक vi)मंत्री viii) महासाधनिक vii)पुरोहित ix) महाकटुक viii) धर्माधिकरण x) महाकरणाध्यक्ष ix) सान्धिविग्रहिक xi) वार्तिनैबन्धिक x) महामत्तक xii) महादण्डनायक xi) प्रातबलकरणाध्यक्ष xiii) महापंचकुलिक xii) शांतिकरणिक xiv) महासामन्तराणक xiii) दुर्गपाल xv) महाश्रेष्ठिदानिक xiv)राजगुरू, इत्यादि। xvi) गुल्मपति xvii) खण्डपाल xviii) नरपति xix) महौत्थिक xx) महाधर्माधिकरणिक, इत्यादि। चण्डेश्वरक राजनीति रत्नाकर:- भारतीय राजनैतिक विचारधाराक विकासक इतिहासमे मिथिलाक चण्डेश्वरक स्थान अग्रगण्य अछि। ओनातँ भारतमे राजनीति शास्त्रपर प्राचीन कालहिसँ ग्रंथ लिखल जा रहल अछि आ एकर प्रमाण हमरा महाभारत, शुक्र, उशनस आ कौटिल्य तथा कामन्दकमे भेटइत अछि। एहिमे कौटिल्यक ग्रंथ सर्वश्रेष्ठ अछि आ पाछाँ सब केओ ओकरे अनुकरण केने छथि। चण्डेश्वर ग्रंथ राजनीति रत्नाकरमे सब पूर्वाचार्यक मत उद्धृत अछि। मध्ययुगीन विचारकमे चण्डेश्वरक नाम विशेष रूपें उल्लेखनीय अछि। ओ एक संभ्रान्त, प्रतिष्ठित एवँ विद्वान परिवारमे जन्म ग्रहण केने छलाह। ओ देवादित्यक पौत्र आ वीरेश्वरक पुत्र छलाह आ इ तीनु गोटए कर्णाट शासक हरिसिंह देवक शासन काल मंत्री पदकेँ सुशोभित केने छलाह। हिनक पित्ती धीरेश्वर, शुभदत्त आ लक्ष्मीदत्त तथा गणेश्वर सेहो पैघ–पैघ राज्याधिकारी छलाह। ओ लोकनि अपना युगक धुरन्धर विद्वान सेहो छलाह। चण्डेश्वर मिथिलाक प्रसिद्ध निबन्धकार भेल छथि आ कृत्यरत्नाकर, दानरत्नाकर, व्यवहार रत्नाकर, शुद्धि रत्नाकर, पूजा रत्नाकर, गृहस्थ रत्नाकर, विवाद रत्नाकर, राजनीति रत्नाकर हिनक प्रमुख रचना भेल छन्हि। मिथिलाक धर्म व्यवस्था आ कानूनक प्रसंगमे हिनक विवाद रत्नाकर आ वाचस्पतिक विवाद चिंतामणि प्रामाणिक ग्रंथ मानल जाइत अछि। स्मार्त विषयपर लिखल हुनक ग्रंथ कृत्य चिंतामणिमे उत्सव–संस्कारक वर्णन अछि। चण्डेश्वरक व्यक्तित्व एवँ कृतित्वक प्रभाव उत्तरवर्त्ती विद्वानपर सेहो देखबामे अवइयै। मैथिल आ बंगाली विद्वान हुनकासँ प्रभावित देखल जाइत छथि। मिसरूमिश्र, वर्द्धमान, वाचस्पति मिश्र, आ रघुनंदन चण्डेश्वरसँ एतेक प्रभावित छथि जे ओ लोकनि अपना ग्रथमे हुनक ग्रंथक असंख्य उदाहरण देने छथि। ओइनवार वंशक राजा भवेशक आज्ञासँ चण्डेश्वर राजनीतिरत्नाकरक रचना केलन्हि। ओहियुगक दृष्टिये एहि ग्रंथक बड्ड महत्व अछि। राजनीति विषयपर इ एकटा प्रौढ़ ग्रंथ मानल गेल अछि। एहिमे १६टा तरंग अछि आ सबहक व्यवस्था एवं क्रमबद्धतापर चण्डेश्वर विशेष ध्यान देने छथि। विषय प्रतिपादनक दृष्टिये सेहो इ महत्वपूर्ण मानल जा सकइयै। सोलहो तंरग एवँ प्रकारे अछि– i) राजाक निरूपण, x)सेनापतिक निरूपण ii) मंत्रीक निरूपण, xi)दूतक निरूपण iii) पुरोहितक निरूपण, xii) राजाक सामान्य कार्यक निरूपण iv) प्राड़विवाकक निरूपण, xiii) दण्डक निरूपण v) सभ्यक निरूपण, xiv)राज्यव्यवस्थाक निरूपण vi) दुर्गक निरूपण, xv)पुरोहित आदि द्वारा राज्यदान निरूपण vii) मंत्रणाक निरूपण, xvi)राज्याभिषेक निरूपण viii) कोषक निरूपण, ix) सेनाक निरूपण, अहिठाम द्रष्टव्य जे चण्डेश्वर पहिने विजिगीषु राजा अमात्य एवँ अन्यान्य प्रवृति आ राज्यव्यवस्थाक प्रतिपादन केला उत्तर राज्याभिषेकपर सबसँ अंतमे विचार करैत छथि। राजाक वास्तविक एवँ न्यायसंगत उत्तराधिकारी भेला ज्येष्ठ पुत्र आ तैं राज्याभिषेक हुनके हेतैन्ह आ ताहि प्रसंगक एहिमे विस्तृत विवरण अछि। प्रत्येक विषयक निरूपण करबाक पूर्व चण्डेश्वर प्रारंभमे कोनो प्रामाणिक विधिग्रंथ अथवा राजनीतिज्ञक मतक उद्धरण दैत छथि आ तखन अपन मत स्थापित करैत छथि। पारस्परिक मतांतर एवँ विषमतामे समन्वय स्थापित करब हुनक लक्ष्य बुझना जाइत अछि। एहि ग्रंथक प्रणयनक क्रममे ओ वेद, पुराण, धर्मग्रंथ, स्मृति ग्रंथ, सूत्र ग्रंथ, राजनीति विषयक ग्रंथ आदि अध्ययन कए ओकर समन्वय स्थापित करबाक दृष्टिये सर्वमान्य सिद्धांतक स्थापना सेहो। प्रत्येक विषयक सांगोपांग विवेचन करबामे ओ बीच–बीचमे अपन स्वतंत्र टिप्पणी सेहो देने छथि जाहिसँ इ स्पष्ट अछि जे ओ कोनो बातकेँ आँखि मुनिकेँ नहि मानए बाला छलाह। एहि आलोचनात्मक टिप्पणीसँ ग्रंथक उपयोगिता आ विलक्षणता बढ़ि गेल अछि। कोनो दृष्टिये देखला उत्तर इ निर्विवाद अछि जे ‘राजनीति रत्नाकर’ अपना ढ़ँगक एक अपूर्व ग्रंथ अछि आ राजनीति चिंतनक क्षेत्रमे मिथिलाक इ अनुपम देन अछि। प्राचीन पारिभाषिक शब्दक अर्थबोधक हेतु चण्डेश्वर जे पद्धति अपनौने छथि से विशेष रूपे उल्लेखनीय अछि। विभिन्न प्रमाणसँ अपन तर्ककेँ पुष्ट कऽ कए ओ अपन मतक स्थापना केने छथि आ ओहिमे समन्वय स्थापित करबाक प्रयास सेहो। अपन ग्रंथक अंतमे ओ लिखैत छथि–“मनु एवँ अन्य स्मृति ग्रंथमे निरूपित राजनीतिक अगाध एवम विशाल सागरसँ सार स्वरूप रत्नक चयन कए एवँ नीति निबंधक सर्वसम्मत मतक संकलन कए हम एहि ग्रंथक रचना कैल अछि जे भगवानकेँ मान्य हेतैन्ह, राजा द्वारा समादृत होएत आ उदार व्यक्तिक ऐश्वर्य वृद्धिक हेतु लाभदायक सिद्ध हेतैन्ह”। मध्य युगमे जखन कि राजनीति विषयक पुस्तकक कोनो अभाव नहि छल तखन चण्डेश्वरकेँ इ पोथी लिखबाक आवश्यकता किएक भेलैन्ह से एकटा विचारणीय विषय। इ ग्रंथ लिखबाक पाछाँ चण्डेश्वरक अभिप्राय इ छल जे प्रत्येक राजा धर्म आ अर्थमे सामंजस्य स्थापित करैत न्यायोचित मार्गपर चलिकेँ राजनीतिक वास्तविक कर्तव्य एवँ दायित्वक निर्वाह करैथ। सोलहो तरंगक प्रतिपाद्य विषय देखला उत्तर इ स्पष्ट भऽ जाइछ। i) राजा:- चण्डेश्वर मनुक मतक उद्धरण दैत लिखने छथि जे संसारक रक्षार्थ प्रजापति राजाक सृष्टि केने छलाह। प्रजाक रक्षा कैनिहार राज्याभिषिक पुरूषकेँ राजा मानल गेल अछि। याज्ञवल्क्य द्वारा वर्णित राजाकेँ अपेक्षित गुणक वर्णन सेहो कैल गेल अछि। एहि गुणक अतिरिक्त चण्डेश्वरक अनुसार राजाकेँ धार्मिक सेहो हेबाक चाही। तीन प्रकारक राजाक वर्णन ओ करैत छथि–सम्राट (चक्रवर्त्ती), सकर (कर दै वाला) आ अकर (कर नहि दै वाला)। तीनुक धर्म आ गुण एक समान होएबाक चाही। प्रजाक पालन, विद्वान, बृद्ध एवँ ब्राह्मणक रक्षा राजाक मुख्य कर्तव्य मानल गेल अछि। राजाकेँ विभिन्न विषयक ज्ञान रहबाक चाही। व्यसन रहित राजाकेँ एहिक आ पारलौकिक सफलता भेटइत छैक आ अन्याय केनिहार राजाक शीघ्रहि नाश भऽ जेबाक संभावना रहैत छैक। चण्डेश्वर कौटिल्य द्वारा निर्धारित राजाक कर्तब्य आ अधिकारक चर्च नहि केने छथि। ii) अमात्य:- राजाकेँ चाही जे ओ सात–आठ सुपरिक्षित व्यक्तिकेँ अमात्य नियुक्त करैथ कारण ओहि बिनु राज काज चलब असंभव। सन्धि विग्रह आदि प्रश्नपर राजाकेँ अमात्यक संग विचार विमर्श करबाक चाही। अमात्यक परिषदकेँ मंत्रिपरिषद कहल गेल अछि। iii) पुरोहित:- वेद–वेदार्थक ज्ञाताके पुरोहितक पदपर नियुक्त करबाक चाही। श्रौत–स्मार्त कार्यमे राजाकेँ पुरोहितक संग ऋत्विजक नियुक्ति करबाक चाही। iv) प्राडविवाक:- धर्म एवम न्याय व्यवस्थाक हेतु प्राडविवाक (मुख्य न्यायाधीश)क नियुक्ति आवश्यक मानल गेल अछि। प्राडविवाककेँ कुलीन, शील सम्पन्न, गुणवान, सत्यवक्ता, निर्भीक, चतुर आ निपुण होएबाक चाही। प्राडविवाक तीन सभ्यक संग मिलिकेँ निर्णय दैथ से सर्वोत्तम–एकमतसँ निर्णय हो तँ ओकरे धार्मिक निर्णय मानबाक चाही। v) सभा–सभ्य:- चारि प्रकारक सभाक वर्णन भेल अछि– प्रतिष्ठिता–नगर अथवा राजा द्वारा निश्चित कैल गेल स्थानपर जे सभा आहूत हो तकरा प्रतिष्ठिता कहल गेल अछि। अप्रतिष्ठिता–कोनो गाममे आयोजित होइवाला सभाकेँ अप्रतिष्ठिता कहल गेल अछि। सुमुद्रिता–जाहिमे अध्यक्ष एवँ न्यायाधीश विराजमान होथि। शासिता–जाहिमे राजा विद्यमान होथि। सभाक दश अंग कहल गेल अछि–राजा, अधिकारी (वक्रा), सभासद, धर्मशास्त्र, गणक, लेखक, सुवर्ण, अग्नि, जल आ दण्डधारी। राजा शासन करैत छथि, अधिकारी वक्रा भेला, सभासद निरीक्षणक कार्य करैत छथि, धर्मशास्त्र निर्णयक काज करैत अछि, गणक हिसाब लिखैत छथि, लेखक न्यायालयक कार्यवाही लिखैत छथि, सुवर्ण, अग्नि आ जल सपथक सामग्री भेल। उत्तम कार्यक अधिष्ठाता, सत्य–धर्मक प्रति अनुरक्त निर्लोभ एवँ निष्पक्ष व्यक्तिकेँ राजाकेँ सभ्य चुनबाक चाही। एहने लोग धर्म आ कर्ममे निष्णात होइत छथि। निर्णयक शुद्धता सभासदक शुद्धतापर निर्भर करैत अछि। अधार्मिक बातक प्रतिवाद करब हुनक प्रमुख कर्त्तव्य छल। vi) दुर्ग:- राजाक हेतु दुर्गक निर्माण करब आवश्यक छल। छह प्रकारक दुर्गक चर्च कैल गेल अछि। राजाकेँ स्वयं गिरि दुर्गमे आश्रय लेना चाही कारण सब दुर्ग ओकरे श्रेष्ठ मानल गेल छैक। प्रत्येक दुर्गमे सब किछु रहबाक चाही। vii) मंत्रणा:- एकांत राजभवन अथवा जंगलमे जतए मंत्रभेदक कोनो आशंका नहि हो ततए गुप्त मंत्रणा करबाक चाही। मंत्रणाकेँ सब तरहे गुप्त राखब आवश्यक। viii) कोष:- एहने कोषकेँ प्रशंसनीय मानल गेल अछि जाहिमे द्रव्य जमा हो मुदा बाहर नहि कैल जाए। राजाकेँ कोषक वृद्धिक हेतु सतत प्रयत्नशील रहबाक चाही। ix) सेना:- राजाकेँ सेना आ बलक व्यवस्थापर पूर्ण ध्यान देबाक चाही। एहिमे छह प्रकारक सेनाक संयोजनक चर्च भेल अछि। x) सेनापति:- हस्ति, अश्व, रथ, पदाति सेना, सेनापतिक अधीन रहैत अछि आ एहि पदक सेहो ओतवे महत्व अछि जतवा पुरोहित आ अमात्यक। पुरूषार्थयुक्त, लोकप्रिय, दक्ष, शस्त्रास्त्रसँ युक्त, रण विद्यामे कुशल, प्रवासक संकटकेँ सहएवाला व्यक्तिकेँ सेनापतिक पदपर नियुक्त करबाक चाही। xi) राजदूत आ गुप्तचर:- सन्धि एवँ विग्रहक दायित्व राजदूतपर निर्भर करैत अछि। एहिपर एहि ग्रंथमे विशेष विचार कैल गेल अछि। दूतकेँ सच्चरित्र, चतुर, मेधावी, देशकालक ज्ञाता, निर्भीक, आ सुवक्ता होएबाक चाही। दूतकेँ राजाक मुँह कहल गेल अछि। दूतकेँ मारबाक नहि चाही चाहे ओ मलेच्छे कियैक ने हो? गुप्तचर सेहो राज्यक प्रमुख अंग मानल गेल अछि। स्वराष्ट्र आ परराष्ट्रक वस्तुस्थितिक पता लगाएब गुप्तचरक मुख्य कार्य छल। xii) राजाक सामान्य कार्य:- एहि प्रसंगमे मनुक सहारा लैत चण्डेश्वर लिखैत छथि– i) युद्धसँ विमुख नहि हैव। ii) प्रजाक पालन। iii) ब्राह्मणक सेवा। iv) सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव, संश्रय (षड्गुण)क चिंतन–मनन करब। v) साम–दाम–दण्ड–भेदपर विचार करब, दण्डक प्रयोग तखने करबाक चाही जखन सब उपाय निरर्थक सिद्ध हो। vi) राजाकेँ धनक टोहमे बरोबरि रहबाक चाही। vii) राज्यक रक्षा आ अपन सुरक्षा। xiii) दण्ड:- शारीरिक–आर्थिक–देशकालकेँ ध्यानमे राखि दण्ड–विधान बनेबाक चाही। xiv) राज्यक उत्तराधिकार:- सुयोग्य ज्येष्ठ पुत्रकेँ देबाक चाही। xv) पुरोहितक हाथे राज्याभिषेक:- उत्तराधिकार सौंपबाक पूर्वहि जँ देहावसान भऽ जाए तँ पुरोहित आ मंत्री द्वारा ज्येष्ठ पुत्रकेँ अभिषिक्त करबाक चाही। जँ कोनो पुत्र नहि हो तँ राजवंशक कोनो उपयुक्त व्यक्तिकेँ चुनबाक चाही। xvi) राज्याभिषेक:- राजा अपन जीवन कालहिमे ज्येष्ठ पुत्रकेँ युवराज पदपर नियुक्त कऽ सकैत छथि। जँ कोनो पुत्र नहि हो तँ प्रजा आ ब्राह्मणक परामर्शसँ कोनो समीपवर्त्ती अन्य व्यक्तिकेँ ओहि पदपर आनिकेँ राज्याभिषेक कैल जा सकइयै। अभिषिक्त युवराजकेँ मान्य परम्पराक अनुसार चलबाक चाही। धर्मशास्त्र आ अर्थशास्त्रमे विरोध भेलापर मध्यम मार्गक अवलंवन कए अपन व्यावहारिक बुद्धिसँ राज्यक संचालन करबाक चाही। चण्डेश्वर अपन राजनीति रत्नाकरमे अमर सिंह, कात्यायन, कामन्दक, कुल्लूक भट्ट, कौटिल्य, नारद, भागवत, मनु, याज्ञवल्क्य, रामायण–महाभारत, लक्ष्मीधर, वसिष्ठ, विष्णु, बृहस्पति, व्यास, शुक्र, श्रीकर, हारीत, आदिसँ मत उद्धृत केने छथि। राजनीति रत्नाकर एक प्रकार संग्रह ग्रंथ थिक आ मध्य युगमे जखन लोग सब मौलिक ग्रंथक अवगाहन करबामे असमर्थ छल तखन चण्डेश्वर एहि ग्रंथक रचना कए ओहि अभावक पूर्त्ति केलन्हि। एकर लोकप्रियता एवँ प्रसिद्धिक इएह कारण अछि। चण्डेश्वरक राजनीति रत्नाकर मिथिलाक हेतु एकटा आदर्श ग्रंथ भेल आ तदनुसार मिथिलामे शासन पद्धति संगठित भेल जकर प्रमाण हमरा ओइनवार वंशक शासन पद्धतिसँ लगइयै। देवसिंह अपना जीवतहि शिवसिंहकेँ युवराज बनौने छलाह। अहिठाम इहो स्मरण रखबाक अछि जे १३२५क बाद मिथिलमे मुसलमानी अमल प्रारंभ भऽ चुकल छल आ अहिठाम मुसलमान शासकक प्रतिनिधि सेहो रहैत छलाह। अहिबातकेँ ध्यानमे राखियेकेँ चण्डेश्वर अपन राजनीति रत्नाकरमे विचारक प्रतिपादन केने छथि आ अपन समन्वयवादी प्रवृत्तिक परिचय सेहो देने छथि। सामंतवादी कुलीन लोकनिक प्रभाव तँ सहजहि बढ़िये गेल छल। विद्यापतिक रचना आ अन्यान्य साधन सबसँ निम्नलिखित मंत्री आ कुलीनक नाम भेटइत अछि। i) अच्युत, ii) महेश, iii) रतिधर, iv) रतिपति आ शंकर, v) वाचस्पति (परिषद छलाह), vi) रउत रजदेव, vii) अमृतकर आ अमिञंकर, viii) गणेश्वर, ix) चण्डेश्वर। न्याय व्यवस्थाक क्षेत्रमे मिथिलाक योगदान विशेष रहल अछि आ ताहुमे फौजदारीक क्षेत्रमे सेहो। वर्धमानक दण्डविवेक कानूनक एक प्रमुख पोथी मानल गेल अछि। न्याय व्यवस्थामे जाति सेहो देखल जाइत छल आ तदनुसार अभियुक्तकेँ सजा देल जाइत छल। सब किछु होइतहुँ वर्द्धमान बहुत अर्थमे स्पष्ट वक्रा छलाह आ मूल सत्यकेँ पकड़ने छलाह। हुनक विश्वास छलन्हि जे लोभ आ अज्ञानतावशे दिवानी मुकदमाक संख्या बढ़ैत अछि। हुनक विचार छलन्हि जे अभियुक्तकेँ एहि हिसाबे सजा देल जाइन्ह जे पुनः ओ ओहन काज नहि करए आ ओकरा चरित्रमे सुधार भऽ जाइक। ब्राह्मण अभियुक्तकेँ सुविधा भेटइत छलन्हि। गैर कानूनी ढ़ंगसँ दोसराक चीज वस्तु लेबकेँ चोरी कहल गेल अछि आ एहि प्रकारक तीनटा वर्गीकरण वर्द्धमान कएने छथि– i) साहस कृत (डकैती) ii) प्रकाशतस्कर (ठग) iii) अप्रकाशतस्कर (चोर) वर्द्धमान दण्डक वर्गीकरण एवँ प्रकारे केने छथि– दण्ड वाक् धिक् धन् वध् निर्वासन् धन् धनदण्ड सर्वस्वहरण वध पीड़न अंगच्छेद प्रमापण पीड़न ताण्डव अवरोधन बन्धन विडम्बन वाचस्पति मिश्रक अनुसार सजा देबाक अधिकार राजाकेँ छन्हि। न्यायपालिकाक अध्यक्ष राजा होइत छलाह आ हुनका कानूनक पालन करए पड़इत छलन्हि। कानूनमे साक्ष्यक रूप ‘बृषल’केँ विश्वास नहि कैल जाइत छल आ तैं साक्षी ओ नहि भऽ सकैत छलाह। कानून आ राजनीतिक दृष्टिये वाचस्पतिक विवादचिंतामणि, नीतिचिंतामणि आ विवाद निर्णय महत्वपूर्ण मानल गेल अछि। विद्यापति सेहो एकटा कानून ग्रंथ लिखने छलाह जकर नाम छल विभागसार। वकीलकेँ मिथिलामे व्यावहारिक कहल जाइत छल। मुसलमान लोकनि शांतिसुरक्षाक हेतु ठाम–ठाम कोतवालक नियुक्ति करैत छलाह आ कोतवाल शब्दक व्यवहार हमरा विद्यापतिमे सेहो भेटइत अछि जाहिसँ इ स्पष्ट होइछ जे कोतवाल मिथिलाक शासन प्रणालीक एकटा प्रमुख अंग बनि चुकल छल। विद्यापतिमे कोतवालक हेतु कोटवार शब्दक व्यवहार अछि। बादमे कोतवालक स्थान फौजदार लेलक। काजी, ख्वाजा, मखदुम आदि शब्दक व्यवहार मिथिलाक शासन प्रणालीमे शुरू भऽ चुकल छल। वज्रघंटक विवरण सेहो भेटइत अछि। कीर्त्तिपताकासँ निम्नलिखित व्यक्ति (पदाधिकारी लोकनि?)क नाम उपलब्ध होइयै। सूरज, राजनन्दन, हरदत्त, भिखु, पुण्डमल्ल, गोपाल मल्लिक, जयसिंह, हरिहर, रजदेव, केदारदास, सोहन, मुरारि, रामसिंह, पृथ्वीसिंह, विदु, दामोदरा, जनरंजन, सोने, विद्याधर, कमलाकर, श्रीराम, श्रीशाखो, सनेही झा। इ सब गोटए राज्यक पदाधिकारी छलाह। गोपाल मल्लिक आ पुण्डमल्ल धनुर्विद्यामे निपुण छलाह। रउत रजदेव योद्धा छलाह। युद्धक वर्णनक क्रममे ज्योतिरीश्वर ठाकुर ३६प्रकारक वस्त्रास्त्रक नाम गिनौने छथि आ विद्यापति सेहो सेनापति, दलपति आ राउतक वर्णन केने छथि। ज्योतिरीश्वर ‘राजनीति’ शब्दक व्यवहार केने छथि आ राजनीति केनिहारक हेतु ‘तत्वज्ञ’ शब्दक। राजनीतिकताक तत्वज्ञ क्रममे “मंत्रगोपन, मृत्यमरण, देशरक्षा, वलावलज्ञान, कोषसंचय, व्युहरचना, व्युहप्रवेश, व्युहभंग, शंशय”क विवरण वर्णन रत्नाकरमे अछि। विद्यापतिक लिखनावलीमे निम्नलिखित शब्दावली भेटइत अछि– i) महापत्निक ठक्कुर ii) महामत्तक ठक्कुर iii) महासूपकारपति iv) महापार्णागारिक ठक्कुर v) स्वस्रागरिक vi) पानियगारिक vii) महादश नैबन्धिक ठक्कुर viii) महादेव गारिक ठक्कुर ix) कोषागार x) महाभानुगारिक xi) दलपति xii) राउत xiii) कार्यि xiv) ओसथि xv) मोकद्दम, इत्यादि। खण्डवला कुलक समयसँ मुगल अधिकारी तिरहूतमे रहए लागल। सम्प्रति मिथिला तीन प्रमण्डलमे विभक्त अछि–तिरहूत, दरभंगा आ सहरसा। अध्याय–16 मिथिलाक सामाजिक इतिहास मिथिलाक अस्तित्व वैदिक कालहिसँ अद्यावधि सुरक्षित अछि। मिथिलामे आर्यक आगमनक पूर्व मिथिलाक सामाजिक व्यवस्थाक रूपरेखा केहेन छल से कहब असंभव। ओकर ठीक–ठीक अनुमान लगायबो संभव नहि अछि। मिथिलाक संस्कृतिक अविछिन्न प्रभाव रहल अछि। आजुक मिथिलामे हमरा लोकनि जे देखैत छी ताहिसँ बहुत भिन्न ओहि दिनक अवस्था सामान्य जनक हेतु नहि छल। प्रत्येक देशक अपन अपन देशगत विशेषता होइत छैक आ ओहिपर ओहि देशक भूगोलक प्रभाव रहिते छैक। मिथिला एहि नियमक अपवाद नहि रहल अछि आ रहबे किएक करैत? सामाजिक नियमक निर्माण कोनो एक दिनमे नहि होइत छैक आ सामाजिक व्यवस्थापर मात्र भूगोलक नहि अपितु आर्थिक व्यवस्थाक प्रभाव सेहो पड़इत छैक। पूर्व वैदिक कालमे समाजक व्यवस्था कठोर नहि बनल छल आ बहुत दूर धरि ओ व्यवस्था स्वच्छन्द एवँ मुक्त छल। समाजमे प्रत्येक व्यक्तिकेँ मुक्त वातावरणक अनुभव होइत छलैक आ ओ लोकनि कोनो स्थायी नियमक निर्माण कए नहि बैसि गेल छलाह। गतिशील समाज छल आ तैं विकासोन्मुख सेहो। एवँ प्रकारे इ समाज बहुतो दिन धरि चलल आ शनैः शनैः आर्यक विस्तार जहिना भारतवर्षक विभिन्न भागमे होमए लगलैक तहिना समाजोमे तदनुकुल परिवर्त्तन अवश्यम्भावी बुझना गेलैक आ समाजक महारथी लोकनि ओहि दिसि अपन ध्यान देलन्हि। साम्राज्यक विस्तारक संगहि अर्थनीतिक पेंच कसे जाए लागल आ समाज ओहिसँ भिन्न नहि रहि सकल। वर्णाश्रमक व्यवस्था, भने कोनो ऊँच्च आदर्शसँ भेलहो, पछाति ओ अपन दुर्गुणक संग हमरा लोकनिक समक्ष उपस्थित भेल आ जेना जेना वर्ग विभेद बढल गेल तेना-तेना एकर स्वरूप दिन प्रतिदिन विकृत होइत गेलैक। जँ से नहि होइत तँ मिथिलामे पुनः जनक सन शासक, याज्ञवल्क्य सन विधिनिर्माता एवं गौतम सन सूक्ष्म विचारक किएक नहि अवतीर्ण भेलाह? आ ने फेर उत्पन्न भेलीह कोनो गार्गी आ मैत्रेयी? एहि मूलतथ्यकेँ जाधरि हमरा लोकनि अवगाहन करबाक चेष्टा नहि करब ताधरि हमरा लोकनिक कल्याण नहि आ ने तत्वक उचित दिगदर्शने। सर्वप्रथम चारि वर्णक उल्लेख ऋगवेदक पुरूष सूक्तमे भेटइत अछि। प्रारंभमे एहेन बुझि पड़ैत अछि जे जखन आर्य लोकनिक विस्तार भेलैन्ह आ हुनका लोकनिकेँ अहिठामक मूलनिवासीसँ सम्पर्क भेलैन्ह तखन दुहुक संस्कृतिमे पर्याप्त भिन्नता छल आ ओ लोकनिकेँ वर्णक विभाजन उचित बुझलन्हि आ तदनुकुल वर्णक विभाजन भेल। मिथिलामे आर्यक प्रसारक समय वर्णव्यवस्थाक प्रचलन भऽ चुकल छल। मुदा ताहि दिनमे अझुका कट्टरता देखबामे नहि अवइयै। विवाहादिक प्रसंगमे ऋगवेद आ शतपथ ब्राह्मणमे भिन्नता देखबामे अवैछ। ब्राह्मण आ क्षत्रियकेँ अपनासँ छोट वर्गमे विवाह करबाक अधिकार प्राप्त छलन्हि। ब्राह्मण कालमे शूद्र लोकनिक अवस्था शोचनीय भऽ गेल छल। एतरेय ब्राह्मणमे शूद्रक दुर्दशाक वर्णन भेटइत अछि। शूद्र लोकनि सब अधिकारसँ वंचित छलाह आ समाजमे हुनक स्थान निकृष्टतम् छलन्हि। कालांतरमे किछु एहेन व्यवस्था बनल जाहिमे ब्राह्मण-क्षत्रिय लोकनि सम्मिलित रूपें निम्नवर्गक शोषणमे रत भऽ गेलाह। एकर मूल कारण इ छल जे जँ-जँ सामाजिक व्यवस्था गूढ़ होइत गेल तँ तँ इ दुनू वर्ग उत्पादनक साधन एवं तत्संबधी ज्ञानक कुंजी अपना हाथमे दबौने गेलाह आ निम्न दुनू वर्गक लोग हिनका सबहिक अधीन होइत गेल। जखन आर कोनो चारा नहि रहलैक आ परिस्थिति दिनानुदिन बदतर होइत गेलैक तखन शूद्रकेँ वेदोसँ वंचित कैल गेलैक। एहि सब घटना क्रमक उल्लेख तत्कालीन साहित्य एवं कथा सबमे सुरक्षित अछि। दरिद्र लोकनिक की दशा रहल होइत तकर पूर्वाभास तँ महाभारतक अध्ययनसँ भेटइत अछि जतए इन्द्रोकेँ इ कहए पड़ल छन्हि जे दुःखक अनुभव करबाक हो तँ मर्त्यलोक जा कए हुनका लोकनिक संग रहिकेँ देखि आउ। महाभारतक अनुशासन पर्वमे एहि दृष्टिकोणक बहुत रास घटना वर्णित अछि। समाजक वर्गीकरण दिनानुदिन विषम होइत गेल। शूद्र एवं अन्यान्य छोट छीन वर्ग़क लोग सब जमीनक अभावमे मजूर अथवा बेगारीक अवस्थाकेँ प्राप्त केलक आ ओम्हर दोसर दिसि गगन चुम्बी अट्टालिका ओकरा लोकनिक दयनीय एवं उपेक्षित आ असहाय अवस्थापर अट्टहास करए लागल। सूत्र एवं स्मृति साहित्यमे एहि बातक पुष्ट प्रमाण अछि। करहुक मामिलामे वैश्य-शूद्रेकेँ तंग होमए पड़इत छलन्हि। वैदिक युगमे जाति वा वर्गक निर्णय कर्मसँ होइत छल आ आन वर्णक लोगो अपन कर्मसँ ब्राह्मण भऽ सकैत छल। शतपथ ब्राह्मणक अनुसार राजा जनक याज्ञवल्क्यक उपदेश एवं अपन कर्तव्यसँ ब्राह्मण भेल छलाह। तैत्तिरीय ब्राह्मणमे विद्वानेकेँ ब्राह्मण कहल गेल अछि। स्त्री, शूद्र, श्वान आ गायकेँ "अनृत"क संज्ञा देल गेल छैक। विवाहमे खरीद-बिक्रीक प्रथा छल। बहु विवाहक प्रथा सेहो छल। धनसम्पत्तिसँ सेहो स्त्रीगणकेँ वंचित राखल जाइत छल। पूर्व वैदिक कालक जे मुक्त वातावरण छल से आब समाप्त भऽ चुकल छल आ ओकर स्थान लऽ लेने छल संकीर्णता। सामाजिक दृष्टिकोणसँ संकीर्णताक समावेश घातक सिद्ध भेल। संकीर्णताक भावनाकेँ प्रश्रय देबाक हेतु अत्यधिक साहित्य एवं कर्मकाण्डी नियमक निर्माण भेल। ओना उपरसँ देखबामे तँ इएह बुझि पड़ैछ जे स्त्रीगणक स्थान समाजमे बड्ड उँच्च छलन्हि मुदा इ स्थिति वास्तविकतासँ बड्ड दूर छल। गार्गी आ मैत्रेयीक नामसँ कोनो देश अपनाकेँ गौरवान्वित बुझओ परञ्च हमरा लोकनिकेँ एतए इ स्मरण राखब आवश्यक जे ओ लोकनि नियमक अपवाद मात्र छलीह। ओहिठाम याज्ञवल्क्यक दोसर पत्नी कात्यायनीकेँ देखिऔक तँ बुझबामे असौकर्य नहि होएत जे समाजमे स्त्रीक वास्तविक स्थिति की छल? सुलभा आ गार्गीक देनसँ भारतक दर्शन भरपुर अछि। जतए एक दिसि मनुक्खकेँ अधिकाधिक विवाह करबाक अधिकार प्राप्त छलन्हि ओहिठाम एक स्त्रीकेँ दोसर विवाह करबाक आ दोसराक संग मेल जोलक कोनो अधिकार नहीं छलैक। सुरूचि जातकमे एकटा कथा सुरक्षित अछि जकर सारांश भेल-"मिथिलाक राज्य बड्ड विस्तृत अछि आ एहिठामक शासककेँ १६०००(सोलह हजार) पत्नी छन्हि"। एहिसँ प्रत्यक्ष भऽ जाइछ जे सामाजिक व्यवस्थामे स्त्रीगणक की स्थिति छल? एतरेय ब्राह्मणमे कहल गेल अछि जे पुतोहु अपन श्वसूरक सोझाँ नहीं जाइत छलीहे, जँ अनचोकसँ श्वसूरक नजरि पुतोहुपर पड़ि जाइत छलन्हि तँ पुतोहु बेचारी नुका रहैत छलीह। मिथिलामे पर्दा प्रथा आ पुतोहु-श्वसूरक सम्बन्धक इ प्राचीनतम उदाहरण भेल आ मैथिल समाजमे ताहि दिनसँ अद्यावधि कोनो विशेष परिवर्त्तन नहीं देखबामे अबैछ। विधवाक स्थितिओ प्रायः अझुके जकाँ छल। समाजमे विधवाकेँ हेय दृष्टिये देखल जाइत छल आ स्थिति बदतर छल। रखेल रखबाक प्रथा, दासी पुत्रक साथ दुर्व्यवहार, व्यभिचार एवं वेश्यावृत्तिक उल्लेख सेहो भेटैछ। राजदरबारमे असंख्य दासी पुत्री आ रखेलक व्यवस्था रहैत छल। मिथिलाक विभाण्डक मुनिक पुत्र ऋषि श्रृंग्यकेँ अंगक एकटा सुन्दरी फुसला लेने छलन्हि। किंवदंती अछि जे अंगक राजा लोमपाद अपन बेटी शांताकेँ एहि कार्यक हेतु अगुऔने छलाह। एहि घटनाक उल्लेख अश्वघोष सेहो कएने छथि। "ऋष्य श्रृंग मुनि सुतं स्त्रीष्व पंडितम्। उपायै विविधैः शांता जग्राहच जहारच"॥ पुराण आ जातकमे वर्णित समाजमे बहुत किछु समानता अछि। दिन प्रति दिन समाजमे कट्टरता एव अनुदार भावना जड़ि पकड़ने जाइत छल। धनक महत्व बढ़ए लागल छल आ विद्या आ विद्वानक महत्व क्रमशः घटए लागल छल। ओना तँ लक्ष्मी-सरस्वतीक आपसी द्वेष बौद्धयुगमे आबिकेँ विशेष रूपें चरितार्थ भेल छल मुदा ओहुँसँ पूर्वहुँ हमरा एहि सब वस्तुक स्पष्ट उदाहरण भेटइत अछि। ब्राह्मणक अपेक्षा धनाढ्यक प्रतिष्ठा बढ़ि रहल छल। आवश्यकतानुसार आब लोक अपन रोजगार चुनए लागल आ प्राचीन कालमे ब्राह्मण लोकनिक लेल जे खेती निषिद्ध मानल जाइत छल से आब नहि रहि गेल। ब्राह्मण खेती आ व्यवसाय दुनूमे लागि गेलाह। पुराणादिक अध्ययनसँ इ सब बात स्पष्ट भऽ जाइछ। बौद्ध साहित्यक अनुसार ब्राह्मण लोकनि अपन जीविकाक हेतु सब काज करैत छलाह। जातक तँ एहि प्रकारक कथा सबसँ भरले अछि। सामाजिक नैतिकतामे सेहो परिवर्त्तन भेल आ प्राचीन मूल्याँकनक मापदण्डमे सेहो समयानुसार उचित संशोधन आ परिवर्त्तन कैल गेल। मनुक्खक जीवनक कमसँ कम तीनटा विभाजन सर्वप्रथम छान्दोग्य उपनिषदमे देखबामे अवइयै। उपनिषद कालमे मिथिलामे क्षत्रिय ब्राह्मणक स्तर धरि पहुँचि चुकल छलाह। ज्ञान एवं ब्रह्मविद्याक क्षेत्रमे ओ कोनो रूपें ब्राह्मणसँ कम नहि छलाह। उपनिषदमे कर्मकाण्डक विरोधमे उठैत भावनाक प्रदर्शन सेहो देखबामे अवइयै। उपनिषदमे हम जे देखैत छी ताहिसँ स्पष्ट अछि जे ओ युग मिथिलाक सामाजिक-साँस्कृतिक इतिहासक उत्कर्षक युग छल आ सब तरहे सुखी सम्पन्न सेहो। एक बात जे स्मरणीय अछि उ भेल इ जे मिथिलाक क्षत्रिय शासक कोनो रूपेँ ब्राह्मणसँ अपनाकेँ कम नहीं बुझैत छलाह आ ब्राह्मणोकेँ इ स्वीकार करबामे कोनो आपत्ति नहि छलन्हि। स्वयं याज्ञवल्क्य जनकक एहि गुणकेँ स्पष्ट रूपे मनने छथि आ गीतामे सेहो एकर संकेत अछि। वर्ण व्यवस्था ताहि दिनमे एतेक दृढ़ नहि भेल छल। बौद्ध एवं जैन धर्मक कार्य क्षेत्र सेहो मिथिलामे छल आ एकर प्रभाव तत्कालीन समाजपर पड़ब स्वाभाविके छल। अवैदिक धर्मक विकासक मुख्य स्थान छल मगध आ वैशाली सेहो ओहि प्रभावसँ अक्षुण्ण नहि छल। बौद्ध युग धरि अबैत अबैत ब्राह्मण सत्ताक भीत ढ़हि रहल छल आ क्षत्रिय लोकनिक प्रभाव चारूकात दिनानुदिन बढ़ि रहल छल। भोजन भावक नियमादिमे सेहो परिवर्त्तन अवश्यम्भावी भऽ गेल छल। जातकक अनुसार एहि युगमे ब्राह्मण लोकनि सबहिक संग भोजन भाव करैत छलाह आ एहेन ब्राह्मण सबकेँ कट्टर वैदिक लोकनि अपना पाँतीसँ फराके रखैत छलाह। सभहिक संग खेनिहार ब्राह्मण लोकनिकेँ पतित कहल जाइत छल। सामाजिक मान्यताक हेतु एहि युगमे संघर्ष चलैत रहल आ तरह तरहक उथल-पुथलक कारणे समाजमे सतत अस्थायित्व बनल रहल। आजीविक, जैन, आ बौद्ध संप्रदायक प्रसारसँ वेदक अपौरूषेयतामे लोगक संदेह उत्पन्न होमए लगलैक आ एवं प्रकारे समाजक वर्गीकरणमे सेहो। कारण उपरोक्त तीनू सम्प्रदायक नेता वर्णव्यवस्थाक कट्टर विरोधी छलाह। एकरे प्रभाव स्वरूप जाति पातिक खाधि भोथा रहल छल आ एहि अग्निधार बहुत रास सड़ल विचारक होम सेहो भए रहल छल। प्रारंभमे वैशालीसँ आगाँ एहि विचार सबहिक दालि नहीं गलल छलैक परञ्च काल क्रमेण एकर प्रभावसँ मिथिला मुक्त नहि रहि सकल। वैशालियो पूर्णतः वर्ण-व्यवस्थासँ मुक्त नहि भऽ सकल यद्यपि बौद्ध लिच्छवी लोकनिकेँ तावतिंशदेव कहने छथि। धनक प्रभाव एहि सब क्षेत्रमे सेहो बनले छल आ गरीब मानवता कहिओ अपनापर होइत अन्यायक विरोधमे सशक्त भऽ कए ठाढ़ नहि भऽ सकल। लिच्छवी लोकनिक रहन सहन सेहो वर्गगत छलन्हि जँ एहि व्यवस्थामे कतहु कोनो प्रकारक छूट देखबामे अबैत हो तँ ओकरा नियमक अपवाद कहब। समाजक भद्र लोकनि चाण्डालकेँ हेय दृष्टिसँ देखैत छलाह आ समाजमे चाण्डालक स्थिति बदतर छल। ओ लोकनि नगरसँ बाहर रहैत छलाह। घृणित कार्य हुनके सबसँ कराओल जाइत छल। हुनका लोकनिक अवस्थामे सुधारक कोनो आसार देखबामे नहि अबैत छल। भृत्य, गुलाम, बहिया आदिक स्थिति तँ आर चिंतनीय छल कारण इ लोकनि तँ शूद्रक कोटिमे छलाहे। स्वयं बुद्ध जे अपना मुँहसँ गुलामक अवस्थाक वर्णन कएने छथि ताहिसँ रोमाँच भऽ जाइछ। जातकमे चारि प्रकारक गुलामक वर्णन अछि। वहियाक प्रथा मिथिलामे अति प्राचीन कालसँ चलि आबि रहल अछि। कौटिल्यक अर्थशास्त्र आ अन्यान्य ग्रंथ सबमे एकर उल्लेख भेटइयै। वेश्याक प्रचलन ऐहु युगमे छल आ वैशालीक अम्बपालीक नाम तँ सर्वविदित अछिये। यद्यपि बुद्ध स्वयं एहि व्यवस्थाक विरोधी छलाह आ एतए धरि जे ओ स्त्रीकेँ संघमे एबासँ वर्जित करैत छलाह मुदा तइयो जखन अम्बपाली हुनका प्रति अपन भक्ति दरसौलक तखन बुद्ध ओकर निमंत्रण स्वीकार कए ओतए भोजन केलन्हि। अभिजात वर्गक लोक सबहिक ओतए गणिकाक ढ़ेर लागल रहैत छल। एहिमे बहुतो नृत्य एवं संगीत कलामे निपुण होइत छलीहे। कोनो कोनो राजदरबार १६०००गणिकाक उल्लेख भेटइयै। पर्दा प्रथाक संकेत बौद्धयुगमे भेटइत अछि। बौद्धकालमे धनसम्पति आ राज्याधिकार सामाजिक मापदण्ड भेल आ क्षत्रिय लोकनिक महत्व समाजमे एतेक बढ़लन्हि जे ओ लोकनि आब विशेष रूपेँ आहूत होमए लगलाह। विदेह-वैशालीमे ओ लोकनि आर शक्तिशाली छलाह। वर्ण-व्यवस्थामे एवं प्रकारे सेहो थोड़ेक परिवर्त्तन हैव स्वाभाविक भऽ गेल। अशिक्षित ब्राह्मण लोकनि निम्नस्तरकेँ प्राप्त भेलाह। क्षत्रिय लोकनिक प्रभाव वृद्धिक सबसँ पैघ उदाहरण इएह भेल जे वैशालीक अभिषेक पुष्पकरिणीमे लिच्छवी राजा लोकनि अनका स्नान नहि करए दैत रहथिन्ह। समस्त लिच्छवी क्षेत्र तीन हिस्सामे वर्ग अथवा वर्णक आधारपर बटल छल आ प्रत्येक क्षेत्रक रहनिहार अपनहि क्षेत्रमे विवाहादि कऽ सकैत छल। पैघ वर्णक बालक जँ छोट वर्णक कन्यासँ विवाह करए तँ ताहि दिनमे एकर मान्यता छल मुदा एहिबात स्मरण राखबाक इ अछि जे राजकुमार नाभाग जखन एक वैश्य कन्यासँ विवाह केलन्हि तखन हुनका गद्दीसँ वंचित कए देल गेलन्हि। एहिसँ अनुमान लगाओल जाइत अछि जे राजदरबारमे अंर्तजातीय विवाहकेँ प्रोत्साहन नहीं देल जाइत छल। कुलीन परिवार एवँ अभिजात वर्गक सदस्यगण ताहु दिनमे एकर कट्टर विरोधी छलाह। ब्रह्मचारी एवं धर्मप्रचारक लोकनि कतहु भोजन कऽ सकैत छलाह। ओ लोकनि जातीयताक बन्धनसँ अपनाकेँ मुक्त मनैत छलाह। शूद्र लोकनि भनसिया नियुक्त होइत छलाह। माँछ-माँउसक व्यवहार ब्राह्मण लोकनिक ओतए सेहो होइत छल। भोजन-भावमे मध्ययुगीन कट्टरता ताहि दिनमे नहि छल। गैर ब्राह्मण लोकनि सेहो सब किछु खाइत-पीबैत छलाह। छुआछूतक कट्टरता नहि रहितहुँ इ देखबामे अबैछ जे चाण्डालसँ सब केओ फराके रहैत छलाह आ चाण्डाल नगरक बाहर रहैत छल। चाण्डालकेँ अछूत बुझल जाइत छल आ जँ ओकर नजरि ककरो भोजनपर पड़ि जाइत छल तँ ओहि भोजनक परित्याग कैल जाइत छल। बुद्धक संघक स्थापनाक पछाति बहुतो शूद्र आ छोट वर्णक लोग सब ओहिमे सम्मिलित भेल छल। वर्णाश्रमक प्रधानता तथापि बौद्धयुगमे बनले रहल। एहि युगमे ब्रह्मचर्याश्रमक प्रधानता विशेष छल। विभिन्न आश्रमक महत्वपर एहि युगमे बेस विवाद चलि रहल छल। विवादक मुख्य प्रश्न इएह छल जे वाणप्रस्थ आ सन्यासमे कोन उत्तम? ओना तँ एहि युगमे हम इ देखैत छी जे सन्यासक प्रवृत्ति दिनानुदिन बढ़ि रहल छल। मार्कण्डे पुराणक कथाक अनुसार वैशालीक राजा लोकनि-खनित्र, मरूत्त, वरिष्यंत, मखदेव आदि-सन्यास ग्रहण कएने छलाह। ब्रह्मचर्य, ग्रार्हस्थ, वाणप्रस्थ आ सन्यासी सम्बन्धी नियम एखनो पूर्णरूपेण स्थायी नहि भेल छल। बौधायन धर्मसूत्रमे तँ वाणप्रस्थ आ सन्यासक प्रतिकूल वातावरण देखबामे अवइयै। किछु धर्मसूत्र सबमे गृहस्थाश्रमक अपेक्षा वाणप्रस्थक सराहना कैल गेल अछि मुदा इहो विचार ततेक संदिग्ध रूपे प्रगट भेल अछि जे ओहि सब आधारपर किछु निश्चित बात कहब अथवा कोनो मत निर्धारित करव असंभव। एहियुगमे परिवारक चर्च सेहो भेटइत अछि। ताहि दिन भिन्न-भिनाओज नीक नहि बुझल जाइत छल। कन्याक हेतु विवाहक निश्चित आयु १६वर्ष छलैक आ जाहि कन्याकेँ भाई इत्यादि नहि रहैत छलैक से अपन पैत्रिक धनक उत्तराधिकारिणी सेहो होइत छल। 'स्त्रीधन' सिद्धांतक विकास एहि युगमे भेल छल। सती प्रथाक उल्लेख सेहो ठाम-ठाम भेटइत अछि। वैशालीक राजा खनित्र आ वरिष्यंतक पत्नी सती भेल छलथिन्ह। मादरी जे अपनाकेँ एहि सतीत्वमे अनने छलीह ताहुसँ सती प्रथाक संकेत भेटइत अछि। बौद्ध युगक ओना इतिहासमे अपन विशेष महत्व छैक परञ्च वैशालीक हेतु तँ इ स्वर्णयुग छल। जाहि पुष्करिणीक उल्लेख हम पूर्वहि कऽ चुकल छी ताहिमे स्नान करबाक हेतु श्रावस्तीक सेनापति बन्धुल मल्लक स्त्री मल्लिका व्यग्र छलीह आ एकर वर्णन हमरा जातकमे भेटइत अछि। जातकमे कहल गेल अछि..... "वैसाली नगरे गणराज कुलानाम्। अभिषेक मंगल पोक्खरी नम्॥ ओतरित्वा नहातापानीयम्। पातुकम् अहि समीति"॥ बन्धुल अपन पत्नीकेँ लऽ ओहिठाम गेलाह मुदा पहरू लोकनि हुनका दुनूकेँ नहि जाए देलथिन्ह आ अंतमे एहि लेल युद्ध भेल आ ओ दुनू गोटए ओहिमे स्नान कऽ घुरइत गेलाह। एकर अतिरिक्त वैशालीमे आर कतेको दर्शनीय वस्तु छल– उदेन चैत्य, गोतमक चैत्य, सतम्बक चैत्य, बहुपुत्तक चैत्य, सारदन्द चैत्य, चापाल चैत्य, कपिनय्य चैत्य. मर्कट हृदतीर चैत्य, मुकुट बन्धन चैत्य, इत्यादि। वैशालीमे एहि युगमे महालि, महानाम, सिंह, गोश्रृंङ्गी, भद्द आदि नामक प्रधान व्यक्ति भेल छलाह। चुल्लुवग्गमे लिच्छवी भद्रक उल्लेख एहि प्रसंगमे अछि जे एकबेर हुनका बौद्ध संघसँ निष्काषित कऽ देल गेल छल मुदा पुनः सुधार भेलापर हुनका लऽ लेल गेल छल। ओहि समयमे समाजसँ निष्कासित करबाक प्रथा एवं प्रकारे छल–जाहि सभकेँ निष्कासित करबाक होन्हि तिनका भोजनार्थ निमंत्रण देल जाइत छलन्हि आ आसनपर बैठला उत्तर हुनक जल पात्रकेँ उलटि देल जाइत छलन्हि। पुनः जखन हुनका समाजमे लेल जाइत छलन्हि तखन ओहि पात्रकेँ सोझ कऽ केँ राखल जाइत छलैक। जाहि समयमे तोमर देव वैशालीक प्रधान छलाह तखन लिच्छवी लोकनि साज गोज कए हुनक स्वागत कएने छलाह। केओ नील, केओ स्वेत आ केओ लालरंगक शास्त्रास्त्र एवं आभूषण आ वेशभूषासँ सुसज्जित भए बु्द्धक स्वागतार्थ उपस्थित भेल छलाह। महविस्तुमे एकर विवरण एवं प्रकारे अछि- "संत्यत्र लिच्छवयः पीतास्या पीतरथा पीत रश्मि प्रत्योदयष्टि। पीतवस्त्रा, पीतालंकारा, पीतोष्णीशा, पीतछत्राः पीतखङ्ग मुनिपादुका। पीतास्या पीतरथा पीतरश्मि प्रत्योदमुष्णीशा। पीता च पंचक कुपा पीलावस्त्रा अलंकारा:॥ नीलास्या, नीलरथा, नीलरश्मि प्रत्यादमुष्णीशा। नीला च पंचक कुपा नीलावस्त्रा अलंकाराः॥ वैशालीक आम्रकानन जाहिमे अम्बपाली रहैत छलीह सेहो बड्ड प्रसिद्ध छल। बौद्ध धर्मक इतिहासक दृष्टिकोणसँ सेहो वैशालीक अत्यधिक महत्व अछि। अहिठाम इ निर्णय लेल गेल छल जे स्त्री लोकनिकेँ संघमे प्रवेशक अनुमति देल जाइछ। एतहि भिक्षुणी संघक स्थापना सेहो भेल छल। आनंदक कहलापर बुद्ध एहिबातकेँ मनने छलाह आ एहिपर अपन स्वीकृति दैत बौद्धधर्मक सम्बन्धमे भविष्यवाणी सेहो कएने छलाह- "स्त्री जातिक प्रवेशसँ बौद्धधर्म आब ५००वर्ष धरि जीवित रहत"। वैशालीसँ जेबा काल बुद्ध इ कहि गेल छलाह जे आब ओ पुनः एतए घुरिकेँ नहि आबि सकताह। वैशालीक लोग सब इ सुनि बड्ड दुखी भेल छल– "इदं अपश्चिमं नाथ वैशाल्यास्तव दर्शनम्। न भूयो सुगतो बुद्धो वैशाली आगमिष्यति"॥ हुनका महापरिनिर्वाणक सए वर्ष बाद वैशालीमे बौद्धसंघक दोसर संगीति भेल छल। मिथिलाक माँटिमे एहेन प्रभाव जे अहिठामक लोग सब बेस तार्किक होइत छलाह। नागार्जुनक शिष्य भिक्षुदेव जखन वैशाली जेबाक हेतु प्रस्तुत भेलाह तखन नागार्जुन कहलथिन्ह- "ओना अहाँ जाए चाहैत छी तँ जाउ मुदा इ स्मरण राखब जे ओहिठामक नवीनो भिक्षुक लोकनि बड्ड जबर्दस्त तार्किक होइत छथि"। जैन ग्रंथ सबसँ सेहो ताहि दिनक सामाजिक अवस्थाक विवरण भेटइयै। वैशालीमे क्षत्रिय, ब्राह्मण आ वणिक भिन्न-भिन्न उपनगरमे रहैत छलाह। सामाजिक क्षेत्रमे हुनका लोकनिक मध्य सहयोग एवं सहकारिताक भावना व्यापक छलन्हि। ओ लोकनि विदेशी अतिथिकेँ सम्मिलित रूपें स्वागत करबाक हेतु जाइत छलाह। ओ लोकनि बड्ड कर्मठ होइत छलाह आ रंगीन वस्त्रसँ विशेष प्रेम छलन्हि। दालि, भात, तरकारीक अतिरिक्त ताहि दिनमे माँछ-माँउसक प्रचलन सेहो छल। अपना नगरसँ हुनका लोकनिकेँ बड्ड प्रेम छलन्हि। हीरा, जवाहिरात, सोना, चानीसँ हुनका लोकनिक हाथी, घोड़ा, आ सवारी सजल रहैत छलन्हि। शिकार हुनका लोकनिकेँ बड्ड प्रिय छलन्हि। अंगुत्तर निकायक अनुसार लिच्छवी बालक लोकनि बड्ड चंचल आ नटखटिया होइत छलाह। लिच्छवी लोकनि स्वतंत्रता आ स्वाभिमानक प्रेमी छलाह। शिक्षा प्राप्त करबाक हेतु ओ लोकनि दूर-दूर देश धरि जाइत छलाह। विवाहक नियमावली लिच्छवी लोकनिक हेतु कठोर छलन्हि। जाहि कन्याकेँ विवाह करबाक विचार होन्हि से लिच्छवी गणकेँ सूचना दैत रहथिन्ह आ गणक दिसि हुनका लेल सुन्दर वर चुनल जाइत छल। स्त्रीक सतीत्वक रक्षार्थ लिच्छवी लोकनिक किछु उठा नहि रखैत छलाह। एहिमे राजा आ रंकमे कोनो कानूनी भेद नहि छल। मृतकक दाह संस्कारक सम्बन्धमे सेहो हुनका लोकनिक अपन नियम छलन्हि- मुर्दा जरेबाक, गारबाक, अथवा ओहिना छोड़ि देबाक प्रथा हुनका ओतए छलन्हि। मुर्दाकेँ गाँछमे लटकेबाक उल्लेख सेहो भेटइत अछि। हुनका लोकनि ओहिठाम एकटा उत्सव होइत छल जकरा "सब्बरतिवार" कहल जाइत छल जाहिमे ओ लोकनि भरि राति जागिकेँ नाच गान करैत छलाह आ एकर उदाहरण अंगुत्तर-निकायमे भेटइत अछि। मौर्य युगमे सर्वप्रथम समस्त भारतक राजनैतिक एकीकरण भेल आ मिथिलाक क्षेत्र अखिल भारतीय साम्राज्यक अंग बनल। सामाजिक दृष्टिकोणसँ सेहो इ युग महत्वपूर्ण मानल गेल अछि। राज्यक स्वरूप मंगलकारी छल यद्यपि राजाक शक्तिमे अपार बृद्धि भेल छलैक। साँसारिकताकेँ प्रति आस्था लोगमे बढ़ि गेल छलैक आ प्रत्येक व्यक्ति जीवनकेँ सुखी रूपे व्यतित करबा लेल इच्छुक छल। ताहि दिनमे मनुष्य सुगठित, स्वस्थ आ बलवान होइत छल। वस्त्राभूषणक प्रति हुनका लोकनिक स्नेह विशेष रहैत छलन्हि आ खेलकूद, नाचगान आ संगीतक प्रचलन बढ़िया छल। मगधक राजधानी पाटलिपुत्र ताहि दिनमे संसारक सर्वश्रेष्ठ नगर छल आ प्रधान क्रीड़ा केन्द्र सेहो। एहि क्रीड़ाक अंतर्गत शाल-भंजिका एवं अशोक पुष्प प्रचायिका विशेष रूपे प्रचलित छल। कौटिल्यक अर्थशास्त्र आ अशोकक अभिलेखमे उत्सव, समाज, आ यात्राक उल्लेख भेटइत अछि जाहिमे आमोद-प्रमोदक व्यवस्था छल आ सब केओ बड्ड उत्साहसँ ओहिमे भाग लैत छलाह। कौटिल्य वर्णाश्रम धर्मक बड्ड पैघ समर्थक छलाह। एहि धर्मक समुचित पालन कराएब राजाक कर्तव्य छल। अशोकक शासन कालमे वर्णाश्रम धर्मपर विशेष ध्यान नहि देल गेल कारण अशोक स्वयं बौद्ध छलाह आ हुनका एहि व्यवस्थापर पूर्ण आस्था नहि छलन्हि। चन्द्रगुप्त मौर्य स्वयं शूद्र छलाह तैं हम देखैत छी जे एहि युगमे शूद्रक प्रति कौटिल्यक विचार मनुक अपेक्षा विशेष उदारवादी छल। वर्ण व्यवस्थाक अंतर्गत कतेको जाति–उपजाति बढ़ि गेल। मनु तँ बहुतों विदेशी जाति सबकेँ क्षत्रियक श्रेणीमे रखने छथि। मिथिलाक लिच्छवी लोकनिकेँ सेहो मनु व्रात्य कहने छथि। व्रात्यकेँ सेहो ओ चारि वर्णमे बटने छथि–व्रात्य ब्राह्मण, व्रात्य क्षत्रिय, व्रात्य वैश्य एवँ व्रात्य शूद्र। यवन दूत मेगास्थनीज लिखने छथि जे एहिठाम युनान जकाँ गुलामक व्यवस्था नहि छल। एहि युगमे स्त्रीकेँ अवस्थामे सेहो परिवर्त्तन भेलैक। कौटिल्य स्त्रीकेँ सम्पत्ति अर्जित करबाक आ रखबाक अधिकार देने छथिन्ह। अपन जेवरपर खर्च करबाक अधिकार सेहो हुनका लोकनिकेँ छलन्हि। जँ कोनो व्यक्तिकेँ बेटा नहि रहैक तँ ओकरा बेटीकेँ ओहि सम्पत्तिक स्वामित्वाधिकार भेटइत छलैक। स्त्रीक कल्याणक हेतु अशोकक समयमे “स्त्री–अध्यक्ष–महामात्र”क नियुक्ति भेल छलैक। गुलाम लोकनिक प्रति सेहो राज्यक विचार उदार छल। प्रत्येक गुलामकेँ अपन स्वतंत्रता प्राप्त करबाक अधिकार छलैक। मौर्योत्तर कालमे चारि वर्णक व्यवस्था बनल रहल। जाति आ उपजातिक संख्यामे विशेष बृद्धि भेल। चारूवर्णक लोग अपना–अपना वर्णक अभ्यंतरहिमे वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करैत छलाह। वराहमिहिरक वृहत्संहिताक अनुसार नगरमे चारूवर्णक भिन्न–भिन्न क्षेत्र होइत छल। चीनी यात्रीक विवरणसँ स्पष्ट अछि जे ब्राह्मण लोकनि पूज्य बुझल जाइत छलाह। ब्राह्मण लोकनिक शुद्ध जीवन व्यतीत करबाक प्रसंग सेहो ओहिमे भेटइत अछि। समाजमे ब्राह्मणक प्रतिष्ठा विशेष छल आ मनु ओकरा आर प्रतिष्ठित बनौलन्हि। नारदक अनुसार श्रोत्रिय लोकनिकेँ कर नहि लगबाक चाही। ब्राह्मण वर्गकेँ सब प्रकारक सुविधा प्राप्त छलन्हि। गुप्त युगमे ब्राह्मण लोकनिक वर्गीकरण वैदिक शाखाक अनुरूप भेल। पाछाँ आबिकेँ एकर आर वर्गीकरण भेल। मौर्योत्तरकालीन भारतमे क्षत्रिय लोकनिक प्रधानता बढ़ल। शूंग वंश आ कण्ववंशक स्थापनासँ मिथिलामे पुनः ब्राह्मण धर्मक पुनर्स्थापन सम्भव भेल आ ब्राह्मण लोकनिक सत्तामे बृद्धि सेहो। एहियुगमे मिथिलाक ब्राह्मण मिथिलासँ बाहर जाए अपन शाखा–प्रशाखाक स्थापना कएने छलाह। शासन भार जे केओ लैथ हुनक धर्म क्षत्रियक धर्म भऽ जाइत छल। ओना सामान्यतः शासनक भार क्षत्रिय लोकनिक हाथमे रहैत छलन्हि। क्षत्रिय युद्धविद्या, कला, संगीतमे तँ पारंगत होइते छलाह संगहि ओ लोकनि विद्वान सेहो होइत छलाह। समुद्रगुप्तक प्रयाग प्रशस्तिसँ एहिपक्षपर विशेष प्रकाश पड़इयै। जे केओ शासक अथवा राजा होइत छलाह हुनके क्षत्रियक संज्ञा भेटइत छलन्हि। गुप्तशासक लोकनि ओना तँ क्षत्रिय नहि छलाह मुदा जखन राजा भऽ गेलाह तखन ओ क्षत्रिय कहबे लगलाह। राजाक गुणक विवरण बाणक हर्षचरितमे सेहो भेटइत अछि। कृषि आ व्यापारक भार वैश्यपर छलन्हि। इ लोकनि दान आ धर्मक प्रपक्षी होइत छलाह। स्थान–स्थानपर धर्मशाला, अस्पताल आ सत्रक स्थापना इ लोकनि बड्ड प्रेमसँ करबैत छलाह। व्यापार आ उद्योगक संचालनार्थ इ लोकनि अपना मध्य जे संगठन बनौने छलाह तकरा श्रेणी अथवा गिल्ड कहल जाइत छल। मिथिलामे श्रेष्ठी आ सार्थवाहक जे उल्लेख भेटइत अछि सेहो हिनके लोकनिक तत्वावधानमे बनैत छल। शूद्र लोकनिक स्थिति चिंतनीय छलन्हि। ओ लोकनि छोट छीन रोजगारक संग खेती गृहस्थी सेहो करैत जाइत छलाह। हुनका लोकनिकेँ वेद पढ़बाक अधिकारसँ वंचित राखल गेल छल। बिना मंत्रक ओ लोकनि अपन यज्ञादि करैत छलाह। मूल रूपें ओ लोकनि दू भागमे बटल छलाह–सत्–शूद्र आ असत्–शूद्र। असत्–शूद्रकेँ अछूत कहल जाइत छलन्हि। अनुलोम–प्रतिलोम प्रथाक कारणे कतेको मिश्रित जातिक अर्विभाव समाजमे भऽ चुकल छल। चाण्डालक स्थिति यथावत् छल। मिथिलाक उत्तरी छोरपर थारू आ किरात नामक जाति सेहो बसैत छल। विवाहादिक नियममे कोनो विशेष परिवर्त्तन एहियुगमे नहि भेल। अपन–अपन जातिक अंतर्गतहिमे विवाहादि होइत छल। अनुलोम–प्रतिलोम विवाहक उल्लेख सेहो यदा–कदा भेटिते अछि। मान्य व्यवस्थाक वावजूदो अंतर्जातीय विवाह सेहो होइते छल। गुप्तकालीन साहित्यमे ठाम ठाम गंधर्व विवाहक उल्लेख सेहो भेटइत अछि। एहियुगमे स्त्रीगणक स्थितिमे आ अवनति भेल। हुनका लोकनि शूद्रे जकाँ वेदक अध्ययनसँ वंचित राखल गेल। वेद मंत्रोच्चारण ओ लोकनि नहि कऽ सकैत छलीह। किछु गोटए पढ़ल–लिखल सेहो होइत छलीहे मुदा ओहन स्त्रीगणक संख्या महान समुद्रमे एकठोप तेल जकाँ छल। पर्दा प्रथाक सम्बन्धमे कालिदास घूंघट–घोघक उल्लेख केने छथि। एहि युगमे स्मृतिकार लोकनि विधवाक सम्बन्धमे आर कठिन नियम बनौलन्हि। शंख, अंगीरस आ हारीत स्मृतिमे तँ एतेक धरि कहल गेल आछि जे विधवाकेँ अपना पतिक चितापर जरिकेँ प्राणांत कए लेबाक चाही। तत्कालीन अभिलेखमे सेहो सतीक उल्लेख भेटइयै। वस्त्राभूषणमे ताहिदिनक लोग शौकीन होइत छलाह। रेशमी सूती आ ऊनी कपड़ाक विशेष प्रचलन छल। धोती, साड़ी, साया, दुपट्टा, आंगी, जनेउ, बाला इत्यादिक व्यवहार होइत छल। मिथिलाक क्षेत्रसँ प्राप्त मूर्त्तिसँ तत्कालीन वेशभूषाक ज्ञान होइछ। लोग सब नाभीक नीचासँ धोती पहिरैत छलाह आ स्त्रीगण सब साड़ी सेहो ओहिना। स्त्रीगण सब साड़ीक संगे दूपट्टो ओढ़ैत छलीह। टोपीक व्यवहार सेहो होइत छल। नौलागढ़सँ जे एकटा माँटिक मुरूत भेटल अछि ताहिमे देखैत छी जे एक गोटए बेस सुन्दर मुरेठा बन्हने अछि। इ मुरूत गुप्तकालीन थिक। ओहुसँ पहिलुका आर एकटा सुन्दर स्त्रीक माटिक मुरूत ओतहिसँ भेटल आछि जाहिमे केश विन्यास शैली आ विशेषता देखबामे अवइयै। सौन्दर्य प्रसाधन एवँ श्रृंगार प्रक्रियाक रूप एहि दुनू माँटिक मुरूत बढ़िया जकाँ ज्ञात होइत अछि आ संगहि दु युगक सौन्दर्य साधनक ज्ञान सेहो। स्त्रीक मुरूत शुंगकालीन थिक। मिथिला आ वैशालीसँ प्राप्त माँटिक मुरूतसँ तत्कालीन सौन्दर्य प्रसाधनक चित्र भेटइयै। औंठी, कर्णफूल, कण्ठहार, बाला, इत्यादिक व्यवहार होइत छल। ताहि दिनमे जे मिथिलाक स्त्रीगण पाइत पहिरैत रहैथ तकरो अन्यतम नमूना मिथिलाक मुरूत सबमे भेटइत अछि। सुगन्धित तेल आ अन्यान्य सौन्दर्य साधनक व्यवहार सेहो ताहि दिनमे होइत छल। दाँतमे मिस्सी लगेबाक प्रथा सेहो छल आ हियुएन संग एकर उल्लेख कएने छथि। गुप्तयुगक पछाति एवँ कर्णाटवंशक उत्थान धरि वर्णाश्रम धर्मक प्रधानता बनले रहल आ ठाम–ठाम कठोर सेहो भेल। स्मृतिकार लोकनिक रचनासँ एकर भान होइछ। अनुलोम–प्रतिलोमक फले अनेको वर्णशंकर उपजाति आदिक विकास भेल। असत् शूद्र अंत्यजक नामसँ पाँचम वर्णमे परिगणित भेल। एहियुगमे पंचगौड़क कल्पना सेहो साकार भेल आ पंचगौड़ ब्राह्मणक सूत्रपात सेहो। ब्राह्मण लोकनि दोसरो वर्णक जीविकाकेँ अपनौलन्हि। यज्ञक संगहि संग ओ लोकनि मूर्त्तिपूजा आ पुरोहिताइक पेशा सेहो अपनौलन्हि। ब्राह्मण लोकनि सेनापतिक काजमे सेहो निपुण होमए लगलाह। पालवंशक अधीन बहुतो ब्राह्मण सेनापति रहैथ जकर उल्लेख पाल अभिलेखमे अछि। एहियुगमे ब्राह्मण लोकनिकेँ प्रचुर मात्रामे खेत दानमे भेटल छलन्हि आ ओ लोकनि पैघ–पैघ सामंत भेल छलाह आ जमीनकेँ दोसराक हाथे खेती करबाय ओ लोकनि अपन सामंत प्रदत्त राजनैतिक अधिकारक सुरक्षामे व्यस्त रहैत छलाह। ब्राह्मण–क्षत्रिय आब खेतियो दिसि भीर गेल छलाह। शूद्र लोकनिक अवस्था आ दयनीय भऽ गेल छलैक। एहियुगसँ डोम, चमार, नट आदिक उल्लेख सेहो भेटइत अछि। भाटक उल्लेख तँ सहजहि भेटितहि अछि। एहियुगमे जातिकर्म, नामकरण, उपनयन, विवाह, श्राद्ध इत्यादि संस्कारक उल्लेख भेटइत अछि। विवाह संस्कार प्रधान सामाजिक संस्कार मानल जाइत छल। बहुपत्नित्वक उदाहरण सेहो भेटइत अछि। ब्राह्मण अन्य जातिक भोजन अथवा जल नहि ग्रहण करैत छलाह। एहियुगमे प्रायश्चितक विधान सेहो बनल। माँछ, माउँस आ मदिराक व्यवहार होइत छल। सिद्ध कवि लोकनिक लेखतँ एहि सब विवरणसँ भरल अछि। चर्यापद(मैथिलीक आदि रूप)मे एकठाम लिखल अछि जे स्त्री लोकनि मदिरा बेचइत छलीह। क्षत्रिय लोकनि विशेष मदिरा पान करैत छलाह। पहिरब–ओढ़बमे कोनो विशेष फर्क देखबामे नहि अवइयै। मूर्त्ति सबसँ श्रृंङ्गारिकताक भान होइछ। कर्णफूल, हार, भुजदण्ड, करघनी, कंगन, बाला आदि आभूषणक व्यवहार होइत छल। कुमकुम लगेबाक प्रथा सेहो छल। सतीप्रथाक प्रचलन तँ चलिये आबि रहल छल। एक लेखमे दीपावलीक उल्लेख सेहो भेटइत अछि– “दीपोत्सव दिने अभिनव निष्पन्न प्रेक्षा मध्य मण्डपे”। संगीत आ नृत्यक आयोजन तँ बरोबरि होइते छल। चर्यापदमे सतरंजक उल्लेख सेहो अछि। जूआक प्रथा प्रचलित छल। एहियुगमे अन्धविश्वास आ तंत्रमंत्रक प्रधानता बढ़ि चुकल छल। ज्योतिषपर लोकक आस्था जमि चुकल छल। विजयसेनक देवपारा अभिलेखमे ग्राम ललनाक नगर जीवनक अनभिज्ञता आ अबोधपनक उल्लेख भेल अछि। मुसलमान लोकनि भारतमे पसरि चुकल छलाह तैं एहि युगमे शुद्धिक सिद्धांतक प्रतिपादन सेहो भेल। मिथिलामे पान आ चौपाड़िक प्रचलन खूब छल। शबरस्वामीक लेखसँ तत्कालीन मैथिल समाजक झाँकी भेटइत अछि। ओ ‘हूराहिरी’क उल्लेख कएने छथि। शतपथ ब्राह्मणमे कहल अछि– “तस्माद वराहं गावोऽनु धावंती”। गम्हरी, दही, दूध, चूड़ा, आदिक उल्लेख सेहो शबरस्वामीमे भेटइयै। इहो दास आ गुलामक उल्लेख कएने छथि। हुनका लेखनीसँ चिड़इ खेबाक प्रथाक अप्रत्यक्ष रूपे उदाहरण भेटइयै। दही भातक उल्लेख सेहो ओहिमे भेटइयै। माछ खेबाक निपुणताक वर्णनमे तँ एहने बुझि पड़ैत अछि–जेना शबरस्वामी नाचि उठल होथि। ओ खीर बनेबाक उल्लेख सेहो केने छथि। “ये एकस्मिन कार्यिन विकल्पे न साधकाः श्रूयंते ते परस्परेण विरोधिनोभवंति। लोकवन्–यथा मत्स्यांन् न पयसा समश्नीयादिति। यद्यपि सगुणमत्स्या भवंति तथापि पयसा सहन समश्यंते”। एहियुगमे जातिक रूप कायस्थ जातिक विकास आ उत्थान भेलैक। उशनस आ वेदव्यासक स्मृतिमे कायस्थक उल्लेख जातिक रूपमे भेल अछि। याज्ञवल्क्य स्मृतिमे सेहो कायस्थक उल्लेख भेल अछि। गुप्तकालीन अभिलेखमे सेहो प्रथम कायस्थक उल्लेख भेटइत अछि। गुणैगार ताम्रपत्रमे सैनिक मंत्री लोकनाथकेँ कायस्थ कहल गेल छन्हि। बंगाल–पूर्णियाँ क्षेत्रक पुण्ड्रवर्द्धन भुक्तिमे तीन चारि पुस्त धरि चिरातदत्त (करण कायस्थ) राज्यपाल छलाह। ५५०ई.क पश्चात् कायस्थ लोकनि एक जातिक रूपमे समाजमे स्थापित भऽ चुकल छलाह। ‘प्रथम कायस्थ’ मुख्य सचिव होइत छलाह। कायस्थमे अखन विशेष उपजातिक वृद्धि नहि भेल छल। ‘करण’ सेहो कायस्थक द्योतक छलाह ओना इ एकटा ‘पद’ छल जाहिपर काज केनिहार सब केओ करणिक कहबैत छलाह आ जतए एकर मुख्यालय होइत छल तकरा अधिकरण कहल जाइत छल। मिथिलामे करण कायस्थक प्रभुता कर्णाटवंशक स्थापनाक संग बढ़लैक। वैशाली क्षेत्रमे ११–१२म शताब्दीक एकटा लेख प्राप्त भेल अछि जाहिमे करण कायस्थक उल्लेख अछि। ई लेख बुद्धक प्रतिमाक पादपीठपर खोदल अछि। एहि मूर्त्तिक दान केनिहार करणिक महायान पंथी भक्त छलाह। “देय धर्मोऽयम् अवरमहायानयायिनः करणिकोच्छाहः माणिकसुतस्य”– एवँ प्रकारे हम देखैत छी जे कर्णाट वंशक स्थापना धरि मिथिलाक समाज सब स्टेजसँ गुजरि चुकल छल। नान्यदेवक पछाति मिथिलाक अपन निखार प्रत्यक्ष भेलैक आ सामाजिक क्षेत्रमे जे क्रांतिकारी परिवर्त्तन भेलैक तकरे हमरा लोकनि हरिसिंह देवी प्रथाक नामे जनैत छी जकर प्रभाव अखन धरि मिथिलामे बनल अछि। पंजी प्रथाक विकास:- महाराज हरिसिंह देव कर्णाटवंशक अंतिम शासक छलाह जे मुसलमान द्वारा पराजित भऽ पड़ा गेला। पड़ेबासँ पूर्व मिथिलाक सामाजिक नियमनक हेतु ओ जे एकटा विस्तृत व्यवस्था केलन्हि ओकरे अधुना हमरा लोकनि–‘हरिसिंह देवी’ प्रथाक नामे जनैत छी अथवा सुसंस्कृत भाषामे एकरा पंजी प्रथा कहल जाइत अछि। एहि सम्बन्धमे अखनो धरि कैक प्रश्नपर विद्वानक बीच मतभेद बनले अछि। ओना एहि प्रथाक जन्म देनिहार तँ हरिसिंह देवकेँ मानल जाइत छन्हि मुदा किछु विद्वानक अनुसारे एकर इतिहास प्राचीन अछि। कुलीन प्रथाक स्थापना जँ जन्मक विशुद्धतापर भेल छल तखन तँ एहि प्रसंगपर मीमाँसक कुमारिल भट्टक मंतव्य जे तंत्रवार्तिकमे प्रसारित अछि से देखब आवश्यक– “विशिष्टेनैव हि प्रयत्नेन महाकुलीनाः परिरक्षंति आत्मानम्। अनेनैव हि हेतुना राजभिर्ब्राह्मणैश्च स्वपितृपितामहादि पारम्पर्या– विस्मरणार्थ समूहलेख्यानि प्रवर्तितानि तथा च प्रतिकूलं गुणदोष स्मरणात्तदनुरूपः प्रवृत्ति निवृत्तयो दृश्यंते”॥ अर्थ भेल जे कुलीनकेँ अपन जातिक रक्षाक हेतु बड्ड प्रयत्न करए पड़इत छन्हि। तहि सँ क्षत्रिय एवँ ब्राह्मण लोकनि अपन पिता पितामह प्रभृति पूर्वजक नाम बिसरि नहि जाइ तँ “समूह संख्य” रखैत छथि आ प्रत्येक कुलमे गुण–दोषक विवेचन कए तदनुसार सम्बन्ध करबामे प्रवृत होइत छथि। जँ एहि प्रमाणकेँ कुलीन प्रथा अथवा पाँजि रखबाक प्रथाक प्रारंभ मानल जाइक तँ इ कहए पड़त जे सर्वप्रथम एकर उदगम मिथिलामे भेल आ बादमे जखन लोग एकरा बिसरि गेलाह छल तखन हरिसिंह देव ओकरा वैज्ञानिक पद्धतिपर पंजीबद्ध करौलन्हि। सातम–आठम शताब्दीसँ हरिसिंह देव धरिक कालमे जँ लोग एहि ‘समूह लेख’ पद्धतिकेँ विसैरि गेलाह तँ कोनो आश्चर्यक गप्प नहि कारण एहि बीचमे मिथिलापर चारूकातसँ आक्रमण होइत रहल छल आ एक अस्थिरताक स्थिति व्यापक छल। कर्णाटवंशक स्थापनाक बाद पुनः एक प्रकार स्थायित्व आ नवजागरण आएल आ तैं सामाजिक उच्छृखंलतापर पूर्णविराम लगेबाक हेतु सामाजिक नियमनक आवश्यकता लोककेँ बुझि पड़लैक आ हरिसिंह देवकेँ इ श्रेय छन्हि जे ब्राह्मण–क्षत्रिय मध्य प्रचलित प्राचीन पद्धति अपना शासन कालमे पूर्णरूपेण वैज्ञानिक बनौलन्हि। स्वर्गीय रमानाथ झाक अनुसारे समूह लेख्य पाँजि जकाँ राखल जाइत छल आ प्रत्येक वैवाहिक सम्बन्ध भेल उत्तर ओहिपर टीपि लेल जाइत छल। कुमारिलक ‘समूह लेख्य’ समस्त ब्राह्मणक एकत्र संग्रहित भऽ पंजी कहाओल। एहि परिचय सबहिक आधारपर एक एक कुल एक एकटा नाम दऽ देल गेल जे नाम ओहिकुलक पूर्वजक आदिम ज्ञात निवास स्थान गामक नामपर भेल ओ सैह ओहि कुलक मूल कहाओल। कुमारिलक समएमे गुणदोषक विवेचन लोग स्वयं करैत छल मुदा हरिसिंह देवीक बाद आब परिचयक आधारपर गुण–दोषक विवेचण होएब प्रारंभ भेल। बंगालक कुलीन प्रथा जाति मूलक छल आ अकुलीनक संपर्क होइतहुँ कुलीन अपन कुलीनत्वसँ पतित भऽ जाइत छल। मिथिलामे उच्चता–नीचताक अवधारण स्मृतिक अनुसारहि भेल। मनुक उक्ति देखबा योग्य अछि– “कुविवाहैः क्रियालोपैर्वेदाध्ययनेन च कुलान्यकुलताँ यांति ब्राह्मणातिक्रमेण च”– उत्तमैरूत्तमैर्नित्यं सम्बन्धानाचरेत्सह निनिषुः कुलमुत्कर्षमधमानधमाँस्त्यजेत्”॥ उपरोक्तसँ स्पष्ट अछि जे जातिक अपकर्ष किंवा उत्कर्ष वैवाहिक सम्बन्धसँ नियमित होइत छल। मुदा मात्र जन्मक शुद्धिमात्र एकर नियामक नहि छल। भवभूतिक मालती माधवक टीकामे धर्माधिकरणिक जगद्धर लिखने छथि– “जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेयः संस्काराद् द्विज उच्यते विधया याति विप्रत्वं त्रिभिः श्रोत्रिय उच्यते”॥ एतवा सब किछु रहितहुँ विद्या ओ आचारकेँ गौण मानि मात्र जन्मक उत्कर्षकेँ प्रधानता दए सामाजिक नियमन जहियासँ आरम्भ भेल तहियेसँ एहि व्यवस्थामे दोष आबए लागल। विवाहक सम्बन्धमे प्राचीन कालहिसँ किछु नियम बनल छल–विवाहक अधिकार ओहि कन्यासँ भऽ सकैत अछि जे– i) एक गोत्रक नञि हो। ii) एक प्रवरक नञि हो। iii) माएक सपिण्ड नञि हो। iv) बापोक दिसि कोनो पूर्वजक ६पुश्त धरि निम्न नञि हो। v) माएक दिसिसँ कोनो पूर्वजक ५पुश्त धरि निम्न नञि हो। vi) पितामह–मातामहक संतान नञि हो। vii) कठमाम (सतमाएक भाई)क संतान नञि हो। स्वजनक संग विवाह नहि भऽ सकैत छल कारण ओहन विवाहसँ उत्पन्न संतानकेँ चण्डाल कहल जाइत छलैक। मिथिलामे स्मृतिसारक रचयिता हरिनाथसँ एहने गलती भऽ गेल छलन्हि आ तैं हरिसिंह देव पंजी प्रथाक निर्माण केने छलाह सएह कहल जाइत अछि। सब केओ इ कथा जानने छथि तैं अहिठाम एकरा दोहराएब हम आवश्यक नहि बुझैत छी। हरिनाथ अनधिकारमे विवाह कऽ लेने छलाह कारण हुनक पत्नी हुनक साक्षात पितिऔत भाइक दौहित्री लथिन्ह। जाहि समूह लेखक उल्लेख हम पूर्वहिं कैल अछि हरिसिंह देव ओकरे वैज्ञानिक पद्धतिपर आनि पंजी प्रथाक जन्मदाता कहबैत छथि। हरिसिंह देवक आदेशानुसार सब ब्राह्मणक परिचय संग्रहित भेल आ ओहि संग्रहकेँ विशिष्ट पंडितक जिम्मा लगा देल गेल जे सब किछु देखि अधिकार निर्णय करैथ आ विवाहक हेतु प्रमाण पत्र दैथ–ओहि प्रमाण पत्रकेँ ‘अस्वजन’ पत्र कहल जाइत छैक। संग्रहित परिचयमे प्रत्येक विवाह आ विवाहक संतानक नाम जोड़ल जाइत छल आ उएह परिचय पञ्जी कहाओल आ जिनका जिम्मा एकर भार देल गेलन्हि सैह पञ्जीकार कहौलथि। ‘अस्वजन पत्र’ लिखके देबाक प्रथा सिद्धांत कहाओल जे अद्यावधि ब्राह्मण आ करण कायस्थमे प्रचलित अछि। जे लोकनि परिचय एकत्र करैत छलाह से ‘परिचेता’ कहबैत छलाह–एहि प्रसंगमे गोत्र, प्रवर आ शाखा सेहो लिखल जाइत छल। सब परिचयकेँ गोत्रक अनुसार अलग–अलग रखलासँ प्रत्येक गोत्रक भिन्न–भिन्न कुलक चित्र समक्ष आबि जाइत छल। कुलक नाम कुलक प्राचीनतम ज्ञात निवास स्थानपर राखल गेल जे ओहि कुलक “मूल” कहाओल। बादमे गोत्र आ मूलसँ प्रत्येक वंशक संकेत भेटए लागल। गुप्त युगहिंसँ एहिबातक प्रमाण भेटइत अछि जे ब्राह्मण अपन ग्राम अथवा निवास स्थानहिसँ चिन्हल जाइत छलाह आ गुप्तयुगसँ पाल युग धरिक अभिलेख सबमे ब्राह्मण लोकनिक चारि–पाँच पुस्तक विवरण भेटइत अछि। ब्राह्मण लोकनि जाहि–जाहि गाममे निवास करैत छलाह ताहि–ताहि गामक प्रशंसा सेहो अभिलेख सबमे भेटइत अछि। मध्ययुगमे राढ़क ब्राह्मण लोक ५६उपजातिमे बटि गेल छलाह आ हिनका लोकनिक वर्गीकरण गाम–गाँइ–गामीकक आधारपर भेल छलन्हि। ११–१३म शताब्दीक अभिलेखमे एकर उल्लेख भेटइत अछि। ठीक अहिना हरिसिंह देव मूल–निवासक आधारपर ब्राह्मण लोकनिकेँ करीब १८०मूलमे बँटने छलाह आ मिथिलाक करण कायस्थकेँ करीब ३५०मूलमे। अहिना अम्बष्ट कायस्थ सेहो करीब १००घरमे बटल छथि। ब्रह्मवैवर्त्त पुराणक ब्रह्मखण्डमे कहाबत अछि जे देश भेदसँ जाति भेद उत्पन्न होइछ आ मध्ययुगीन पंजी परम्परा जे जोड़ देल गेल अछि से एहिबातक सबूत मानल जा सकइयै। गाम–गामक महत्व बढ़ए लागल। संग्रहित पाँजिमे जे सबसँ प्राचीनतम ज्ञात पुरूषक नाम उपलब्ध भेल उएह ‘बीजी–पुरूष’ कहौला। जँ एक्के गामक वासी दु कुलमे भेटला तँ हुनक भेदकेँ स्पष्ट करबाक हेतु कुलक मूलक संगहि–संग नव निवास स्थानक नाम जोड़ि देल गेल। मिथिलाक ब्राह्मण लोकनि सामवेद आ शुक्ल यजुर्वेदक अनुयायी छथि–सामवेदी कौथुम शाखीय छथि आ यजुर्वेदी माध्यन्दिन शाखीय। क्रमशः इ दुनू छन्दोग आ वाजसेनयि कहबैत छथि। सामवेदी–छन्दोगमे मात्र शाँडिल्य गोत्र प्रचलित अछि आ माध्यन्दिन वाजसेनयिमे वत्स, काश्यप, पराशर, कात्यायन, सावर्ण आ भारद्वाज। एहि सात गोत्रक कुल व्यवस्थित कहबैत छथि। ब्राह्मणक आ ग्यारहटा गोत्र जे मिथिलामे अछि से भेल–गार्ग्य, कौशिक, अलाम्बुकाक्ष, कृष्णात्रेय, गौतम, मौदगल्य, वशिष्ठ, कौण्डिन्य, कपिल आ तण्डि। प्रत्येक गोत्रमे कैकटा मूल अछि। ओना तँ लगभग २००मूलक आभास भेटइत अछि परञ्च ब्राह्मण विद्वान लोकनि मात्र सात गोट गोत्र आ ३४या ३६टा मूलकेँ व्यवस्थित मानैत छथि। मिथिलामे कुलीनताक परिचायक छल जन्मक विशुद्धता, आचारक चारूता आ विद्या व्यवसाय–एहि तीनुसँ युक्त व्यक्तिकेँ श्रोत्रिय कहल जाइत छलन्हि। एहिठाम स्मरणीय जे पाँजिमे मात्र परिचय संग्रहित अछि जाहि आधारपर विवाहक अधिकारक निर्णय होइत अछि। हरिसिंह देव ब्राह्मणकेँ तीन श्रेणी (श्रोत्रिय, योग्य, जयबार)मे बँटने छलाह–इ कथन निराधार अछि। आदर्शकेँ बिसरिकेँ जखन हमरा लोकनि केवल भेदपर जोड़ देब प्रारंभ कैल तखनहिसँ एहि व्यवस्थामे कुरीतिक प्रवेश भेल। जे जे नीच काज करैत गेलाह से क्रमशः नीच होइत गेला। ब्राह्मण पाञ्जिक अनुसार अधिकार निर्णयक नियम एवँ प्रकारे अछि– i) कन्याक पिताक पितामहक पितामह। ii) कन्याक पिताक पितामहक मातामह। iii) कन्याक पिताक पितामहीक पितामह। iv) कन्याक पिताक पितामहीक मातामह। v) कन्याक पिताक मातामहक पितामह। vi) कन्याक पिताक मातामहक मातामह। vii) कन्याक पिताक मातामहीक पितामह। viii) कन्याक पिताक मातामहीक मातामह। ix) कन्याक माताक पितामहक पितामह। x) कन्याक माताक पितामहक मातामह। xi) कन्याक माताक पितामहिक पितामह। xii) कन्याक माताक पितामहीक मातामह। xiii) कन्याक माताक मातामहक पितामह। xiv) कन्याक माताक मातामहक मातामह। xv) कन्याक माताक मातामहीक पितामह। xvi) कन्याक माताक मातामहीक मातामह। आठम पीढ़ीसँ सपिण्डत्व हटि जाइत छैक। मिथिलामे पाञ्जिक अध्ययन अखनो वैज्ञानिक पद्धतिसँ नहि भेल अछि कारण ओकर साहित्य एतेक जटिल अछि जे सब केओ ओकर अध्ययन कइयो नहि सकैत छथि। रमानाथ बाबूक अतिरिक्त आ एकाध गोटए पाञ्जिक अध्ययन कएने छथि मुदा पूर्णरूपेण वैज्ञानिक ढ़ँग आ तालपत्रपर लिखित पाञ्जिक अध्ययन मेजर विनोद बिहारी वर्मा अपन “मैथिल करण कायस्थक पाञ्जिक सर्वेक्षण”मे कएने छथि। इ अध्ययन अपना ढ़ँगक अद्वितीय अछि आ पाञ्जिक अध्ययनक क्षेत्रमे इ अपन एकटा नव कीर्तिमान स्थापित केलक आछि। तालपत्र हिनक काफी प्राचीन अछि आ पाँजि प्रथाक स्थापनाक लगभग ५०वर्षक अभ्यंतरहिमे लिखल अछि। एहि आधारपर अखन आरो कतेक अध्ययन प्रस्तुत कैल जा सकइयै। पाँजि प्रथाक नींव जाहि आधारपर पड़ल तकरा सम्बन्धमे मेजर वर्मा लिखैत छथि– चण्डेश्वर ठाकुरक गृहस्थ रत्नाकरसँ उद्धृत किछु स्मृतिकारक कथन उद्धृत कैल जाइछ जाहिपर पाँजी प्रथाक नींव पड़ल।– मनुशातातपौ:- असपिण्डा तुया मातुर सगोत्रा चयापितुः। सा प्रशस्ता द्विजातीनाँ दार कर्म्मणि मैथुने॥ एवँ प्रकारे ओ गौतम, याज्ञवल्क्य, हारीत, विष्णुपुराण आदिसँ विभिन्न मत उपस्थित कएने छथि। पाँजि जखन उपस्थित कएल गेल तखन देशक स्थिति चिंतनीय छल। करण कायस्थ पाञ्जिक अध्ययनसँ स्पष्ट होइछ जे कठोर बन्धनक पश्चातो पाँजिमे “स्वयं गृहीता” कन्या, “चेचिक विजाती”सँ व्याहक उल्लेख, “कुलाल” जातिक उल्लेख, “चेटिका धृताः” आदिक यत्र–तत्र विवरण भेटइत अछि। जातिक रक्षा करब पाञ्जिक एकमात्र प्रयोजन छल परञ्च कायस्थ पाञ्जिक अध्ययनसँ स्पष्ट अछि जे किछु अंतर्जातीय विवाह सेहो होइत छल। करण कायस्थक पाञ्जिमे गोत्रक उल्लेख नहि अछि। बलायिन मूलक आदि पुरूष मंधदासक गोत्र राढ़मे अत्रि, कुचबिहारमे वशिष्ट आ मिथिलामे काश्यप लिखल गेल अछि। पाञ्जिमे कतहु नहि कहल गेल अछि जे अमूक मूल श्रेष्ठ आ छोट अछि आ ने भलमानुसे–गृहस्थक चर्च ओहिमे कतहु अछि। पाञ्जिक पूर्ण शिक्षा प्राचीन कालमे पञ्जीकार लोकनिकेँ देल जाइत छलन्हि आ प्राचीन पाठशालामे मिथिलामे पाञ्जि शास्त्रक पढ़ाइ होइत आ जे एहिमे उत्तीर्ण होइत छलाह सएह ‘पञ्जीकार’ होएबाक योग्यता प्राप्त करैत छलाह। पञ्जीकारकेँ निम्नलिखित वस्तुसँ अवगत हैव आवश्यक छल– i) मूल निर्णय, ii) डेरावली, iii) वंशावली, iv) सादा उतेढ़। पाञ्जि लिखबाक हेतु किछु नियमक पालन आवश्यक छल। पञ्जीक एक पातक एक पृष्ठक सोलह कालम आ गाम एवं प्रकारे विभक्त कैल गेल अछि– मायक वंशक हेतु आठ कालम आ गाम। पितामहीक वंशक हेतु चारि कालम आ गाम। प्रपितामहीक वंशक हेतु दू कालम आ गाम। वृद्धा प्रपितामहीक वंशक हेतु एक कालम आ गाम। अपन स्वयंक ५पीढ़ी पूर्वजक हेतु एक कालम आ गाम। पाञ्जिक १६कालम विभक्त देखबामे अवइयै। एक पातक एक पृष्टमे १६मूल गामक उल्लेख रहैत अछि–३१व्यक्तिक नाम आ १६कन्याक नामक उल्लेख रहैत अछि। अधुना पाञ्जि देखबाक अथवा अध्ययन करबाक अवगति आब पञ्जीकारोकेँ नहि छन्हि। कायस्थक पञ्जीकार मूलतः दुई वंशक छथि–महुनी आ सीसब। पाञ्जिमे जातीय इतिहास सुरक्षित अछि। पंञ्जीक तिथि:- पञ्जीक तिथिक सम्बन्ध सेहो विद्वानक बीच मतभेद अछि। सब तथ्यक अनुशीलन केला उपरांत हमरा अपन विचार इ अछि जे पञ्जीक प्रारंभ १३१०–११ ई.मे भेल होएत। १३२३ सँ १३२७ धरिक तिथि जे मनैत छथि से हमरा बुझने मान्य नहि भऽ सकइयै कारण १३२३सँ १३२७क बीच हरिसिंह देव मुसलमानी आक्रमणसँ ततेक तबाह आ व्यस्त छलाह जे ओहि समयमे कोनो एहेन काज करब असंभव छल। नेपाली स्रोतसँ इहो ज्ञात होइछ जे हरिसिंह देव १३२६ई. धरि मिथिलासँ पड़ा चुकल छलाह आ तकर बादक हुनक इतिहासक कोनो निस्तुकी पता हमरा लोकनिकेँ नहि अछि। काठमाण्डुक वीर पुस्तकालयक गोपाल वंशावलीक मूल एतए विज्ञ पाठकक हेतु देल जा रहल अछि – “स माघ शुदि ३ तिरहूतिः हरशिंहु राजासन मिह्लोसन तासत्र गही टो ढ़ीलीस तुरूक याके वंङ रायत मानालपं थमु अगु गन याङ वस्यं शिमरावन गड्ढ़ भङ्ग याङ तिरहूतिया राजा महाथ आदिन समस्त वडङ व्यसन वंग्व टों ग्वलछिनो लिन्दुंबिल ववः ग्वलछिनो राजगाम द्वलखा धारे वंग्व। हिंपोतस राजा हरसिंह तो शिकथ्वस काय नो मआथ नो उभय बंधि यंङा कूलन ज्वोङाव हंग्व राज गामया मझीधारो धायान समस्त धन कासन”। उपरोक्त वंशावलीसँ स्पष्ट अछि जे हरिसिंह देव ७जनवरी १३२६केँ शिमराँव गढ़क नष्ट भ्रष्ट भेला पड़ेला आ तकर बाद ओ मरि गेला। राजगाँवक माँझी भारो हुनक पुत्रकेँ गिरफ्तार कए कैदी बना लेलकन्हि आ हुनक सब वस्तुजात लूटि–पाटि लेलकन्हि। ओ शरणार्थीक श्रेणीमे छलाहे शासक हिसाबमे नहि। एहि प्रसंगकेँ जखन हमरा लोकनि ध्यानमे राखब तखन बुझना जाएत जे पञ्जी प्रबन्ध सन काजक प्रारंभ १३२३–१३२७क बीच नहि भेल होएत। मैथिल परम्परामे इ कहल गेल अछि जे शक् १२४८मे नेहरामे विश्वचक्र महादान कएने छलाह। ओ पञ्जी निर्णयार्थ विद्वान लोकनिक आह्वान कएने छलाह। शक् १२४८मे इ सम्भव नहि भऽ सकइयै कारण तखन ओ पराजित भऽ नेपाल पड़ा चुकल छलाह। रघुनन्दन झा द्वारा बनाओल पञ्जी प्रबन्धक आदिमे एहि तरहे श्लोक अछि– “शाके श्री हरिसिंह देव नृपतेर्भूपार्क १२१६ तुल्ये जनि– स्तस्माद्दंत मितेऽब्दके द्विजगणैः पञ्जी प्रबन्धः कृतः”॥ १२१६+७८=१२९४ई. जखन हरिसिंह देव एकटा नाबालिकक रूपमे छल। अहु समयमे पञ्जी प्रबन्ध सन मूल प्रश्नपर विचार करबाक क्षमता हिनकामे तखन नहि हेतैन्ह तैं इहो तिथि हमरा बुझने अमान्य अछि। शक्तिसिंहक समयसँ मिथिलामे अस्तव्यस्तता छल। चण्डेश्वर ठाकुर हरिसिंह देवक मुख्य सलाहकार छलाह आ राज्यक हेतु सब काज करैत छलाह। नेपाल विजयक अवसरपर तुला पुरूष सेहो केने छलाह। १३१४क आसपास हरिसिंह देव वयस्क भेलापर अपन राज्यक भार सम्हारलन्हि आ तखने चण्डेश्वरक तत्वावधानमे नेपाल विजयक खुशखबरी सेहो भेटलन्हि। ओम्हर मुसलमानी प्रकोप जोरसँ बढ़ि रहल छल तैं हेतु सामाजिक नियम निष्ठाकेँ सुदृढ़ करबाक हेतु हिनक ध्यान आकृष्ट कैल गेलन्हि आ एहि दिसि ध्यान देलन्हि आ पञ्जी प्रबन्धक व्यवस्था केलन्हि। पाञ्जिमे छोट–पैघक गप्प नहि छल–इ सभ कल्पना मात्र थिक। सब जातिक हेतु पञ्जी प्रबन्ध भेल छल मुदा मैथिल ब्राह्मण आ कायस्थ छोड़िकेँ इ चलल नहि। सूरी लोकनिक बीच सेहो पाञ्जि छल आ रहरिया तथा मधेपुरमे एकर संकेत भेटल अछि। सूरीमे पञ्जि आ पदवी एखनो विराजमान अछि। एतए पैघ काज करबाक हेतु काफी समय आ पलखतिक आवश्यकता छल तैं १३१०सँ १३१४क बीच पञ्जी प्रबन्धक प्रारंभ हैव बेसी युक्तिसंगत बुझि पड़इयै। निम्नलिखित तीनटा स्रोतपर एहि प्रसंगमे विचार करब आवश्यक– “शाके युग्म गुणार्क सम्मित वरे भूपाल चूड़ामणिः श्रीमच्छृ हरिसिंह देव विजयी पञ्जी प्रबन्धः कृतः तस्मात कर्ण बीजकलितं सुद्विंश्व चक्रेपुरा। कायस्थ मति प्रदस्थ गुणिनः श्री शंकर दत्तभान”॥ शंकर दत्त मल्लिककेँ (सीसब मूल)केँ १३१०–११मे हरिसिंह देव पञ्जी प्रबन्ध करबाक आदेश देने छलथिन्ह। श्यामलाल चौधरी लिखित “वंशावली मैथिल कर्ण कायस्थ उपाख्यान पुस्तक वंश कुलदीपक” (इ पांडुलिपि सम्प्रति नैशनल लाइब्रेरी, कलकत्ताक, ‘शांति देवी–राधा कृष्ण चौधरी संग्रह’मे सुरक्षित अछि आ ओहिठाम कायस्थ पञ्जीक तालपत्र पोथी सेहो)मे कहल गेल अछि जे शंकर दत्त मल्लिक अपन भागिन मोहिनवार मूल ग्रामसँ लडूआरी डेरा अवस्थित गुणपति दासकेँ पाञ्जि देलथिन्ह तैं इ वंश पञ्जीकारक वंश कहाओल। श्याम लाल चौधरी एवम प्रकारे श्लोक लिखने छथि- “शाके युग्म गुणार्क सम्मित वरे भूपाल चूड़ामणि तस्मात् करण विज कलितं कायस्थ पञ्जी प्रबन्धः कृतः तस्मात् मंत्र गुणीनां श्री गुणपतिः दत्तवान॥ तेसर स्रोतकेँ स्पष्ट केनिहार छथि मेजर विनोद बिहारी वर्मा। हुनका द्वारा प्रस्तुत अध्ययनक स्रोतमे एकठाम लं.सं. २३३(=१३५२)मे लिखल कोनो ‘दत्त मल्लिक’क सबूत भेटलन्हि अछि। इ ओहि ‘दत्त मल्लिक’केँ शंकर दत्तक पुत्र शंभू दत्त मल्लिक मानैत छथि। शंभूदत्त मल्लिक पाञ्जिक नकल करब १३५२ई.शुरू केलन्हि। शंकर दत्त कवि सेहो छलाह। एहिसब तथ्यकेँ एकठाम संग्रहित कए जखन हम अध्ययन करैत छी तँ हमरा इ स्पष्ट बुझना जाइत अछि जे पाञ्जि निर्माणमे प्रमुख रूपे ब्राह्मण आ कायस्थ लोकनिक योगदान छ्लैक आ १३१०सँ १३१४क मध्य पञ्जी प्रथा व्यवस्थापित भेल। तकर बाद जखन हरिसिंह पड़ाकेँ चल गेला तखन–पण्डित लोकनि बैसिकेँ ओकरा सरिऔलन्हि आ ताहिमे ताहि दिनमे १५–२०वर्ष लगले हेतैन्ह तैं संभव जे ब्राह्मण–कायस्थक पाञ्जि आ वंश संग्रह करबामे जे समय लागल हेतैन्ह तकर बाद जे एकटा साँगोपाँग विवरण प्रस्तुत भेल होएत से १२४८ शक=१३२६/२७मे प्रकाशित भेल होएत। मिथिलाक तत्कालीन राजनैतिक स्थितिमे देखैत उपरोक्त तर्क हमरा बेशी युक्तिसंगत बुझि पड़इयै आ तैं एकर तिथि निर्णय करबाक प्रश्नपर ओहि तथ्यकेँ ध्यानमे राखब आवश्यक। कर्णाट आ ओइनवार युग मिथिलाक सामाजिक इतिहासक दृष्टिये महत्वपूर्ण मानल गेल अछि। बौद्ध धर्मक ह्रास भेलापर एतए ब्राह्मण व्यवस्थाक पुनर्स्थापन भेल आ जातीयताक व्यवस्थामे जे थोड़ बहुत लचड़ एहि बीचमे आबि गेल छल तकरा मैथिल निबंधकार लोकनि अनेकानेक स्मृति ग्रंथादि लिखिकेँ ठोस बनौलन्हि। सामाजिक कार्य कलापक हेतु सेहो बहुत रास ग्रंथ लिखल गेल जाहिमे चण्डेश्वरक गृहस्थ रत्नाकर सर्वश्रेष्ठ अछि। कुलीन प्रथाक विकास मिथिलामे एहियुगमे भेल। ओना एकर विश्लेषण पञ्जी प्रबन्धक प्रसंग भेल अछि परञ्ज ओकर एतिहासिक पृष्ठभूमि एहिठाम राखब आवश्यक। कुलीन व्यवस्थाक संस्थापक छलाह आदि सूर जे पूर्वी मिथिलामे कतहुँ शासन करैत छलाह आ वृद्ध वाचस्पति हुनके ओत्तए रहि अपन न्यायकणिका नामक पुस्तकक रचना कएने छलाह। आदिसूर क समय (९म शताब्दी)मे मिथिला आ बिहारमे बौद्धधर्मक प्रधानता छल आ तैं ब्राह्मणत्वक रक्षार्थ ओ कोलाञ्चसँ पाँचटा शुद्ध ब्राह्मणकेँ बजाय अपना ओतए आश्रय देलन्हि। आदिसूरक दरबारमे ब्राह्मण लोकनिक वर्गीकरण प्रारंभ भेल छल आ पाछाँ बल्ला सेन अपनाकेँ आदिसूरक वंशसँ मिलाय अपनाकेँ कुलीन प्रथाक जन्मदाता घोषित केलन्हि मुदा एहिठाम इ स्मरणीय जे मिथिलाँचलसँ प्राप्त दू ताम्र पत्र (बनगाँव आ पंचोभ) अभिलेखमे दान देबाक हेतु कोलाञ्च ब्राह्मणक उल्लेख स्पष्ट अछि। मिथिलाक पाञ्जिमे जे मूल ग्राम अछि सएह ओकर प्राचीनताक सबसँ पैघ प्रमाण मानल जा सकइयै। एवँ प्रकारे कुलीन व्यवस्थाक जन्म सर्वप्रथम मिथिलहिमे भेल छल आ पाछाँ एहिठामसँ बंगाल आ असममे इ पसरल। हरिसिंह देव ओहिसब पुराण व्यवस्थाकेँ एकत्र कए पञ्जी प्रबन्धक व्यवस्था केने छलाह। एहि प्रथाक बादसँ विवाहादिक नियम सेहो श्रृंखलाबद्ध भेल। पञ्जि आ घटकक प्रथा चलल। एहि प्रथाकेँ जँ रमानाथ बाबू समाजक नियमनक हेतु सर्वश्रेष्ठ मनने छथि तँ उपेन्द्र ठाकुर एकरा प्रतिक्रियावादी कहने छथि। एकरा चलते सामाजिक संकीर्णता दिनानुदिन बढ़ैत गेल आ बिकौआक प्रथा प्रचलित भेल। एहि युगमे क्षत्रियक रूपमे राजपूत लोकनिक विकास भेलन्हि–हुनको लोकनिमे पाञ्जिक प्रथा चललन्हि मुदा बहुत दिन धरि नहि रहि सकलन्हि। ओना मिथिलामे ताहि दिनमे गन्धवरिया राजपूतक विकास भऽ चुकल छल तथापि ज्योतिरीश्वरक वर्ण रत्नाकरमे ३६टा राजपूत जातिक वर्णन भेटइत अछि। वैश्यमे व्यापारी वर्ग, कर्मकार, कलाकार, पशुपालक, खेतिहर, साहूकार, आदि लोकक गिनती छलैक। वैश्य मूल रूपेण खेती करैत छलाह आ व्यापार सेहो। आर्थिक उन्नतिक भार हिनके लोकनिपर छलन्हि। शूद्रक स्थान दयनीय छल। तेली, सूरी, धाँगर, यादव, धानुक, केओट, अमात आदि शूद्रक श्रेणीमे गिनाइत छलाह आ हिनका लोकनिकेँ कोनो विशेष सामाजिक अधिकार नहि प्राप्त छलन्हि। मुख्यतः इ लोकनि बान्हल मजूर होइत छलाह आ हिनका लोकनिक सब किछु अपन मालिकपर निर्भर करैत छलन्हि। जँ वर्ण रत्नाकरमे एकर उल्लेख अछि तँ विद्यापतिक लिखनावलीमे हिनका लोकनिक दयनीय स्थितिक वर्णन। वर्ण रत्नाकरमे दू प्रकारक छोट जातिक वर्णन अछि– i) अनिर्वासित आ, ii) निर्वासित। एकर अतिरिक्त ज्योतिरीश्वर ‘मन्द–जातीय’क एकटा पैघ सूची उपस्थित कएने छथि। ओहि सबसँ छोट जातिक सामाजिक स्तित्वक पता चलइयै। गुलामी आ बेगारीक प्रथा सेहो छल। स्त्रीक अवस्था तँ आर दयनीय भऽ गेल छल। समाजमे स्त्रीकेँ कोनो उच्च स्थान प्राप्त नहि छलन्हि आ एकर स्पष्टीकरण तँ ज्योतिरीश्वरक निम्नलिखित वाक्यहि भऽ जाइत अछि–“स्त्रीक चरित्र अइसन दुर्लभ्य; स्त्रीक चरण अइसन दारूण” विद्यापति सेहो स्त्रीकेँ “अलप गेआनी” कहने छथि। इ बात ठीक जे एहि युगमे लखिमा, धीरमती, विश्वास देवी सेहो भेलीह आ चन्द्रकला सन निपुण स्त्री सेहो परञ्च हिनका लोकनिक आधारपर इ नहि कहल जा सकइयै जे समस्त मिथिला स्त्रीक स्थान हिनके सब जकाँ छल। सती प्रथाक प्रचलन सेहो छल आ इ राजपूतमे बेसी छल। चौठम (मूँगेर)सँ प्राप्त एकटा कागजसँ एहि बातक ज्ञान होइछ। भवसिंहक दुह पत्नी सेहो वाग्मतीक तटपर सती भेल छलथिन्ह। स्त्री शिक्षापर विशेष ध्यान नहि देल जाइत छल। पर्दा प्रथाक प्रचलन छल आ वैश्यावृत्तिक प्रचलन सेहो। विवाहिता स्त्री लोकनिकेँ सुहागिन कहल जाइत छलन्हि आ ओ लोकनि सिन्दुरक व्यवहार करैत छलीह। पाटी फारबाक, काजर लगेबाक, तरहथी रंगबाक, नह रंगबाक प्रथा स्त्रीगणक मध्य विशेष प्रचलित छल। पानसँ दाँत लाल आ मिस्सीसँ दाँत करबाक प्रथा छल। गोदना पड़ेबाक उल्लेख सेहो लोकगीतादिमे भेटइत अछि। घोघ काढ़बाक प्रथा छल। धोती साड़ीक प्रचुर व्यवहार छल आ स्त्री लोकनि साया आ चोलीक व्यवहार सेहो करैत छलीह। कसीदा काढ़बामे मैथिलानी निपुण बुझल जाइत छली। छौड़ी सब लंहगा, घघरा आ कंचुकी पहिरैत छल। पनटीक व्यवहार होइत छल। भोज भातक प्रथा सेहो छल आ मैथिल तँ भोजन भट्ट होइते छलाह। ज्योतिरीश्वर ‘पुर्नभोज वर्णनाः’ लिखने छथि। चूड़ा दहीक विशेष व्यवहार होइत छल। लिखनावलीमे जे पत्रादिक नमूना अछि ताहिसँ छोट जातिक सामाजिक अवस्थाक ज्ञान होइछ। स्वयं विद्यापति लिखने छथि– “उच्चैः कक्षमधः कक्षे समकक्षे नरंप्रति नियमे व्यवहारे च लिख्यते लिखन क्रमः”। हिन्दू मुसलमानक सम्पर्क बढ़लासँ हिन्दू लोकनिक मध्य एक प्रकार अस्तव्यस्तता आबि गेल छल। विद्यापति अपन कीर्तिलतामे एकर विस्तृत वर्णन कएने छथि– “धरि आनए बाभन बटुआ, मथा चढ़ाबए गाइक चुड़ुआ। फोट चाट जनेउ तोड़, उमर चढ़ाबए चाह घोड़। हिन्दु बोलि दुरहि निकार, छोट ओ तुरूका भभकी मार। हिन्दुहि गोट्टओ गिलिये हल, तुरूक देखि होइ भान”॥ चण्डेश्वरक कृत्य रत्नाकरमे ओहियुगक पूजा–पाठ, पविनितिहार एवँ उत्सवादिक वर्णन भेटइत अछि। गौरी पूजा, दुर्गाव्रत, दुर्गारथ, वाराह द्वादशी, नरसिंह द्वादशी, बुद्ध द्वादशी, मत्स्य द्वादशी, रासकल्याण, महाष्टमी आदिक उल्लेख भेटइत अछि। एकर अतिरिक्त उदकोत्सव महोत्सव, विनायक पूजा, भाष्कर पूजा, सूर्यपूजा, आदिक उल्लेख सेहो भेटइत अछि। फगुआक उल्लेख सेहो भेल अछि। (विस्तृत विवरणक हेतु देखु हमर पोथी–“मिथिला इन द एज आफ विद्यापति”)। स्मृतिकारक दृष्टिकोण:- सामाजिक समस्याक प्रति मैथिल स्मृतिकारक अपन विशिष्ट दृष्टिकोण छलन्हि जकर मूल उद्देश्य छल समन्वयात्मक प्रवृतिकेँ प्रोत्साहन देव। ओ लोकनि वैदिक एवँ अवैदिक तत्वकेँ अपन स्मृतिमे स्थान एकटा विशिष्ट समन्वयात्मक प्रवृत्तिकेँ जन्म देलन्हि कारण ताहि दिनक परिस्थितिमे ओकर आवश्यकता छल। एहि दृष्टिकोणसँ ओ लोकनि गौड़ीय आ उत्कलीय स्मृतिकारसँ बड्ड आगाँ छलाह। श्रीदत्त उपाध्याय, चण्डेश्वर आ विद्यापतिक कार्य एहि क्षेत्रमे प्रशंसनीय अछि। कीर्तिलतासँ जे स्थितिक भान होइछ ताहिसँ बुझना जाइत अछि जे मिथिलोमे हिन्दूक स्थिति दयनीय छल आ ओ लोकनि लाचारीक हालतमे रहैत छलाह। जखन राजकुमारे इब्राहिम शाहक प्रति कहलन्हि–“अज्ज पुण्णा पुरिसथ्थ, पातिसाह–पापोस पाइअ”, तखन दोसरा कोन गप्प? कन्याक बिक्री सेहो होइते छल। मुदा तखन मिथिलामे उपाये कि छल? विद्यापति हिन्दू मुसलमानक प्रसंगमे प्रायश्चितक कोनो चर्च नहि केने छथि। वाचस्पति सेहो एहि दिसि कोनो विशेष ध्यान नहि देलन्हि आ मात्र एतवे कहिकेँ छोड़ि देलन्हि जे मलेच्छक भाषा नहि सिखबाक थिक(मलेच्छ भाषां न शिक्षेत्)। ताहि दिन धरि बुझि पड़इयै जे मिथिलामे एहेन कोनो समस्या नहि उठल हेतैक कारण कतवो मुसलमानी प्रकोप किएक ने बढ़ल हौक एहिठाम हिन्दू शासक छल आ सूफी लोकनिक विशेष प्रभाव रहलासँ मनोमालिन्य कम छल। अगर ककरो जबर्दस्ती मुसलमान बनाइयै देल गेलैक अथवा गोमाँस खुआइये देल गेलैक तँ ओकरा प्रायश्चित् कराके घुरेबासँ कोन लाभ। ओहिठामक लोग तँ ओहिना विशेष कट्टर होइत छल तैं समस्या एखन धरि जटिल नहि भेल छलैक। हिन्दूधर्मकेँ सुरक्षित रखबाक हेतु बहुत रास पारिजात, रत्नाकर इत्यादिक निर्माण भेल परञ्च लोक एतेक आलसी भऽ गेल छल जे ककरो एतेक पढ़बाक–बुझबाक पलखति नहि छलैक। बहुत गोटए कोनो नियमोक पालन नहि करैत छलाह। एहिसबकेँ ध्यानमे राखि शंकर मिश्र एकटा संक्षिप्त ‘छन्दोगांटिकोद्धार’ रचना केलन्हि आ ओकरा अंतमे लिखलन्हि– “एतावत्यपि कृते न प्रत्यवेयात्, अन्यथा तु प्रत्यवेयात्”। रूद्रधर अपन शुद्धि विवेकमे लिखलन्हि– “सत्येव रत्नाकर–पारिजात मिताक्षरा–हारकतादयोऽन्ये। तत्रापि तत्रालसमानसानां भवेद प्रमोदम्य मम प्रयासः”। चण्डेश्वर अपन गृहस्थरत्नाकरमे विवाहक नियमक प्रतिपादन कएने छथि। मैथिल परम्परामे प्रतिलोम विवाहकेँ मान्यता नहि छैक यद्यपि एहिपर विचार आ विवाद दुनू भेल छैक। मैथिल स्मृतिकार लोकनिक सामन्त दरबारमे रहैत जाइत छलाह आ तैं इ लोकनि अपन रचनामे ब्राह्मणेटाक महत्व दैत छलाह अनका नहि। शासक आ सामन्त सेहो ब्राह्मण छलाह आ स्मृतिकार लोकनि अपने सेहो। शूद्रकेँ तँ कोनो स्थाने नहि देल जाइत छलैक। शूद्र प्राडविवाक सेहो नहि भऽ सकैत छलाह। तथापि रूद्रधरक इ वाक्य देखबा योग्य अछि–“शूद्रस्य वृषोत्सर्ग वाक्ये एव वेद पाठाधिकारो नान्यत्र इति सर्वप्रामाणिक सिद्धम्”–(श्राद्धविवेक)। इ कतेक हास्यास्पद बुझि पड़इयै जे जखन मुसलमान अथवा आन विदेशी ब्राह्मण–शूद्रकेँ एक्के रंग बुझैत रहन्हि आ जखन दुनूक एक भऽ कए चलब अत्यावश्यक छल तखन ब्राह्मण स्मृतिकार लोकनि अपन समन्वयात्मक प्रवृत्तिक बाबजूदो सबकेँ मिलाकेँ एक संग नहि लऽ चलि सकलाह। बहु विवाहक प्रथा पञ्जी प्रबन्धक कारणे बढ़ि गेल छल। गृहस्थ रत्नाकरक अध्ययनसँ स्पष्ट अछि जे दोसर विवाह करबाक पूर्व प्रथम पत्नीक प्रबन्ध कऽ देबाक चाही। विधवा विवाहक सम्बन्धमे कोनो स्पष्ट निर्देश नहि भेटइयै। चण्डेश्वर विवाहक सम्बन्धमे मात्र एतबे कहैत छथि जे पूर्व वर कन्याक पक्षक दिसिसँ कोनो बात ककरोसँ नुकाकेँ नहि रखबाक चाही। कोनो दोष कोनो पक्ष दिसि हो तँ ओकरा स्पष्ट कहि देबाक चाही आ जँ कोनो बात नहि कहल गेल आ विवाहक बाद ओकर पता चलल तखन ओहि हेतु दण्डक निर्देश सेहो देल अछि। मैथिल स्मृतिकारक प्रयत्नसँ हिन्दू कानूनक मिथिला स्कूलक स्थापना भेल। एहिमे ओ लोकनि लक्ष्मीधरक कृत्य कल्पतरूसँ बड्ड प्रभावित भेलाह। सामाजिक दुश्मनक विवरण वर्धमान अपन दण्ड विवेकमे ‘प्रकाश तस्कर’ कहिकेँ केने छथि– मांत्रिक, ताँत्रिक, व्यापारी, वैद्य, झूठ गवाही देनिहार, इत्यादि भला आदमीक वेशमे समाजक हेतु खतरनाक बुझल गेल छथि। दानपर मिथिलामे विशेष बल देल जाइत छल। चण्डेश्वरक दान रत्नाकर, रामदत्तक षोडस–महादान–पद्धति, वाचस्पतिक महादान निर्णय एवँ विद्यापतिक ‘दान वाक्यावली’ एहिबातक प्रमाण अछि। दानोमे सप्तसमुद्रदान, हेमहस्तिरथदान, विश्व चक्रदान आदिक उल्लेख अछि। एहि सबसँ स्पष्ट अछि जे इ सब ग्रंथ राजा–महाराजा, सामंत लोकनिक हेतु लिखल जाइत छल आ सामान्य गरीब लोककेँ एहिसँ कोनो लाभ नहि छलैक। विद्यापतिकेँ छोड़ि कोनो मैथिल स्मृतिकार गरीबक हेतु दानक रास्ता नहि बतौलन्हि अछि। मैथिल स्मृतिकार लोकनि तंत्र पंचरात्र एवँ पाशुपत साहित्यसँ प्रभावित छलाह। समन्वयवादी होइतहुँ ओ लोकनि पंचोपासनाक समर्थक छलाह। दैनन्दिन जीवनकेँ नियमित रखबाक हेतु ओ लोकनि धर्मपर विशेष जोड़ देलन्हि। समाजपर एकर प्रभाव पड़ल। संस्कृतक सुरक्षा हिनका लोकनिक प्रयासे भेल। समाजमे गुलामक प्रथा सेहो प्रचलित छल। गुलामीक एहेन विकराल रूप छल जे पुछु जनि। सामंतवादी व्यवस्था छल आ बन्हिल मजूर छल। वहियाक खरीद बिक्री होइत छल। गौरीव वाटिका पत्र, बही–खाता, अजातपत्र, अकरारपत्र, जनौढ़ी, निस्तार पत्र, लिखनावली आदिसँ बहिया सबहिक स्थितिक पता लगैत अछि। १८–१९म शताब्दी धरि एकर प्रचलन मिथिलामे छलैक। वहियाक स्वत्वाधिकारक प्रश्नपर बरोबरि लोककेँ आपसमे झगड़ा–झाँट होइत छलैक आ अंततोगत्वा ओकर निर्णय कचहरीमे जाके होइत छलैक। प्राचीन कालसँ इ व्यवस्था चल अबैत छल। जातक, बौद्ध साहित्य आ कौटिल्यक अध्ययनसँ एहिपर पूर्ण प्रकाश पड़इत अछि। मिथिलामे प्राचीन कालहिसँ दास–दासीक संख्याक विवरण प्राचीन साहित्यमे भेटइत अछि। नारदक अनुसार जँ कोनो गुलाम अपन मालिकक जीवनक रक्षा केलक आ मालिक बचि गेला तँ ओकरा गुलामीसँ मुक्त कऽ देल जाइत छलैक। विवाद चिंतामणिमे नारदक मतकेँ वाचस्पति उद्धृत केने छथि जाहिसँ स्पष्ट होइछ जे ताहि दिनमे नारदक इ मत मान्य छल। मिथिलाक सामंतवादी समाजमे हेवनिधरि खवास लोकनिक जे महत्व छलैक ताहिसँ बुझना जाइत अछि जे प्रियपात्र गुलाम, खवास आ वहिया अपन मालिकक मोनकेँ जीतिकेँ बहुत किछु प्राप्त करैत छल। विद्यापतिक लिखनावली आ मैथिल स्मृतिकार लोकनिक रचनादिमे सेहो एहि प्रसंगक विशेष बात भेटइत अछि। दू ब्राह्मण परिवारमे एकटा गुलाम लऽ कए जे झगड़ा भेल आ ताहिपर न्यायालय अपन निर्णय देलन्हि से अद्यावधि सुरक्षित अछि आ तत्कालीन सामाजिक व्यवस्थापर प्रकाश दइयै। वहिया लोकनिक स्थिति बड्ड दयनीय होइत छल आ ओकरा सबहिक इज्जत सदति खतरेमे रहैत छलैक। बहिया सभहिक अदला–बदला, लिखा–पढ़ी, कऽ कए होइत छल जाहिसँ केओ कत्तौसँ भागे नहि। भगलापर ओकरा सजा देल जाइत छलैक। १७७०आ १८११क दूटा एहनो उदाहरणक प्रमाण हमरा लोकनिकेँ भेटल अछि। गुलामक अंतर्गत निम्नलिखितकेँ हमरा लोकनि राखि सकैत छी– गुलाम, नफर, खवास, डिंगर, कामकार, वहिया, इत्यादि। कुरमी, धानुख, केओट, अमात, कहार, आदि जातिक लोग खवासीमे राखल जाइत छल आ वहियाकेँ बान्हल मजूर बुझल जाइत छलैक। एहि सबहिक लोग घर गृहस्थीसँ खेती आ बहलमानी धरि करैत छलैक। चमार जूता आ चमड़ाक कारबारक हेतु राखल जाइत छल आ ओहुना वर्गसँ बान्हल मजूर होएत छल। मिथिलाक कोन–कोनमे छोट पैघ जमीन्दारक संख्या ततेक ने छल जे कोनो एहेन गाम नहि छल जाहिठाम खवासी आ वहियागिरी नहि हो। जखन एकर अभाव होमए लागल आ तंग भऽ कए पीड़ित–शोषित लोग भागे लागल तखन एहि व्यवस्थाकेँ दृढ़ करबाक हेतु कतेको उपाय रचल गेल आ लिखापढ़ी शुरू भेल। जे गुलामी या वहियागिरीसँ छुटइत छल तकरा हेतु निस्तार पत्र लिखल जाइत छल। मिथिलाक सामंतवादी व्यवस्थाक इ एकटा प्रमुख अंग छल। जकर उदाहरण हेवनिधरि मिथिलामे देखबामे अवइत छल। अपना शताब्दीक उतरार्द्धमे एहि प्रथाक ह्रास देखबामे अवइयै कारण आब मिथिलाक शोलकन्हक विशेष भाग अपना गामकेँ छोड़ि कमेबाक हेतु बाहर चल जाइत अछि। अध्याय–१७ मिथिलाक आर्थिक इतिहास मिथिलाक आर्थिक अवस्था अति प्राचीन कालसँ अद्यपर्यंत कृषिपर आधारित रहल अछि। प्राचीन कालमे अखन जकाँ जलक अभाव नहि छल। मिथिलाक प्राकृतिक बनाबट किछु एहेन अछि जाहिसँ एहिठाम कृषिक प्रगति नीक जकाँ होइत अछि। वैदिक कालमे खेत जोतबाक, बीआ पारबाक, काटबा आ फसिल तैयार करबाक विस्तृत रूपें उल्लेख भेटइत अछि। पकला उत्तर अन्नकेँ काटल जाइत छल आ तखन ओकरा बोझ बान्हिकेँ खरिहानमे आनल जाइत छल। दाउन होइत छल तकर पश्चात् ओसौनी होइत छल आ तखन ओकरा सरियाकेँ व्यवहारक हेतु राखल जाइत छल। एहि लेल कृषक लोकनिकेँ बड्ड परिश्रम करए पड़इत छलन्हि। नापतौलक आधार छल ‘खाड़ी’। बखारीक उल्लेख सेहो भेटइत अछि। मिथिलामे चाउर, जौ, मूँग, मकई, गहूम, तिल, मसुरी, आदि वस्तु उपजैत छल। जौ के रोपनी शीतकालमे होइत छल आ गर्मी मासमे ओकरा काटल जाइत छल। धानक रोपनी बरसातमे होइत छल आ अगहनमे ओकर कटनी होइत छलैक। अनावृष्टिसँ कृषिकेँ क्षति पहुँचैत छलैक। कीड़ा–मकोड़ासँ सेहो फसिल बर्बाद होइत छल। अन्हर, बिहाड़ि, बसात, अतिवृष्टि आ अनावृष्टिक संगहि टिड्डीक प्रकोपसँ कृषिकेँ धक्का पहुँचैत छलैक। अनावृष्टिसँ अकालक संभावना सेहो रहैत छलैक। सामान्य किसानक स्थिति बढ़िया नहि छल आ हुनका मालिक लोकनिक अत्याचारसँ तबाह होमए पड़इत छलन्हि। कृषकक समूह विशाल होइतहुँ हुनका लोकनिकेँ कोनो विशेषाधिकार नहि छलन्हि आ हुनका लोकनिपर कर्जक बोझ बरोबरि बनले रहैत छलन्हि। उपनिषदमे जे जनकक बहुदक्षिणा यज्ञक उल्लेख अछि ताहिसँ इ अनुमान लगाओल जा सकइयै जे मिथिला ताहि दिनमे एक समृद्धशाली राज्य छल। राजकोश धन–धान्यसँ अवश्ये भरल होइत अन्यथा एतेक पैघ यज्ञ ओ कइयै कोना सकितैथ। ओहि यज्ञमे हजारोक संख्यामे गाय आ सोनाक दान भेल छल। गाय बड़दपर विशेष ध्यान देल जाइत छल ताहि दिनमे। बृहदारण्यक उपनिषदक अध्ययनसँ बुझि पड़इयै जे मिथिला ताहि दिनमे सुखी सम्पन्न राष्ट्र छल आ ओतए कोनो वस्तुक अभाव नहि छलैक। ओहिमे सामानसँ लदल बैलगाड़ीक उल्लेख सेहो अछि। आवागमनक हेतु रथ एवँ नावक व्यवहार होइत छल। ‘स्वर्णपाद’क व्यवहार एहि बातक संकेत दैत अछि जे ताहि दिनमे सोनाक सिक्काक प्रचलन छल। आर्थिक निश्चिंतताक कारणे देशमे आध्यात्मिक एवँ बौद्धिक विकास संभव भेल छल। मैथिल लोकनि ताहि दिनमे स्वभावसँ शांत एवँ क्रियाशील छलाह। पढ़ब–लिखबपर विशेष ध्यान दैत छलाह तथापि सैनिकक रूपें सेहो ओ लोकनि ककरोसँ कम नहि छलाह आ तीर चलेबामे तँ अग्रगण्ये। कृषि मनुष्यक मुख्य कार्य छल। लोक सब विशेष कए गामेमे रहैत छल। गाममे ३०–४०सँ लऽ कए १०००परिवार धरि रहैत छल। गामक समीपहि गाछी–बिरछी सेहो रहैत छल। गामक अध्यक्ष अथवा गण्यमान्य व्यक्ति गामभोजक होइत छलाह। गामक हेतु इ सर्वश्रेष्ठ एवम महत्वपूर्ण पद छल। राजाक हेतु कर वसूल करब, कृषि व्यवस्थाक निरीक्षण करब, ग्रामीण झगड़ा–झंझटकेँ फरिछैब हिनका लोकनिक मुख्य कर्तव्य छल। जँ उपजा नहि होइत छल तँ ग्रामीण लोकनिक भोजनक व्यवस्था हिनके करए पड़इत छलन्हि। उपजनिहार खेतमे पहरूदार सेहो राखल जाइत छल। उत्पादनक साधन मूल रूपें धनीमानी लोकक हाथमे छल तैं साधारण कृषकक स्थिति दयनीय रहब स्वाभाविके छल। जँ कोनो कारणे अन्न नहि उपजल तँ हिनका लोकनिकेँ अपार कष्टक सामना करए पड़इत छलन्हि। अकाल पड़बाक उल्लेख प्राचीन साहित्यमे भेटइत अछि। महावस्तुमे एहि बातक स्पष्ट उल्लेख अछि जे वैशालीमे एक बेर भीषण अकाल पड़ल छल। भूखसँ पीड़ित भऽ असंख्य लोक मुइल छल आ मुर्दाक दुर्गन्धसँ समस्त नगरक वातावरण दुर्गन्ध पूर्ण भऽ गेल छल। एहि युगमे बाढ़िक प्रकोपक उल्लेख सेहो भेटइत अछि। गण्डकसँ पूर्वक क्षेत्रमे जलक बाहुल्य रहैत छल। मौर्यकालीन अभिलेखमे अकाल आ अभावक उल्लेख भेटइयै। मिथिलाक अंतर्गत विदेह, वैशाली, चम्पारण, अंगुतराप, पुण्ड्र, कौशिकी कक्ष, आदि स्थान सब कृषिक हेतु प्रसिद्ध छल आ एहि समस्त प्रदेशकेँ अन्नक भण्डार कहल जाइत छल। अंगुतरापक आपण गाम सुखी सम्पन्न छल। खेती करबाक हेतु खेतकेँ छोट–छोट टुकड़ीमे बाटल जाइत छल आ खेतक बीच सबमे आड़ि सेहो होइत छल। मिथिलामे इ प्रथा अद्यपर्यंत अछिये। ताहि दिन मिथिलामे जमीनपर स्वत्वाधिकारक प्रश्न लऽ कए विद्वानमे मतभेद बनल अछि। अखन जतवा जे साधन उपलब्ध अछि ताहि आधारपर कोनो निर्णयात्मक मतक प्रतिपादन करब कठिन अछि कारण जमीनपर दुनू पक्षक विचारक हेतु सामग्रीक अभाव नहि अछि। व्यक्तिगत रूपें हमर अपन मंतव्य तँ इ अछि जे प्राचीन कालमे औपचारिक रूपें समस्त जमीनक अधिकारी राजा होइत छलाह किएक तँ परम्परागत विचारे ‘सवै भूमि गोपाल की” मानल जाइत छल आ राजा ईश्वरक प्रतिनिधि हिसाबे जमीनक मालिक सेहो होइत छलाह। विद्वान लोकनि तीनटा मत प्रतिपादन केने छथि–व्यक्तिगत, सामूहिक आ राजकीय स्वत्वाधिकार आ तीनू मतक पक्ष–विपक्षमे एक्के रंग तर्क देल जा सकइयै। फाहियान लिखने छथि जे केओ राजकीय जमीन जोतैत छथि हुनका ओहिमे सँ किछु अंश राजाकेँ देमए पड़इत छन्हि। अर्थशास्त्रमे राज्य नियंत्रित कृषि व्यवस्थाक विवरण अछि। जातकमे सामूहिक स्वत्वाधिकारक विवरण भेटइत अछि। जमीन प्राचीनकालक आर्थिक जीवनक नींव छल जाहिपर समस्त आर्थिक रूपरेखा ठाढ़ छल। जातकमे भोगगाम आ अर्थशास्त्रमे ‘आयुधीय’ गामक उल्लेख भेटइयै। एहि सभक व्याख्या प्रत्येक विद्वान अपना–अपना ढ़ँगे करैत छथि। अर्थशास्त्रमे कौटिल्य कर्मचारीकेँ नगद वेतन देबाक व्यवस्था केने छथि मुदा ‘आयुधीय’ गामक उल्लेख किछु विद्वानकेँ दोसर अर्थ लगैत छन्हि। जखनसँ प्रचुर मात्रामे जमीनक दान शुरू भेल तखनसँ सामंतवादक वीजारोपण सेहो भेल आ भारतक अन्य प्रांत जकाँ मिथिलामे सेहो सामंतवादी प्रथाक विकासक सूत्रपात भेल। सामंतवाद मिथिलामे मध्ययुगमे अपन चरमोत्कर्षपर छल। सामंतवादक प्रभावे जमीनक टुकड़ी–टुकड़ीमे बटब बढ़ए लागल आ बेगार प्रथाक श्रीगणेश सेहो भेल। गुप्त युगसँ जे प्रथा प्रारंभ भेल से मिथिलामे बनल रहल आ सामंतवादी व्यवस्थाक प्रभाव हमरा लोकनिक दैनन्दिन जीवनपर सेहो पड़ल। सिक्का एवँ कर व्यवस्था:- एहि प्रसंगमे कर व्यवस्था एवँ सिक्काक प्रसंगपर विचार करब अप्रांसगिक नहि होएत। टाका–पैसाक व्यवहार होइत छल अथवा नहि से निश्चित रूपसँ कहब असंभव मुदा वैदिक साहित्यमे हिरण्य, अयस, श्याम, लौह, शीशा, कार्षापण आदिक उल्लेख भेटइत अछि। चानीक टाकाकेँ ‘निष्क’ कहल जाइत छल। सिक्काकेँ कृष्णल, सतमान, हिरण्य, पिण्ड, आ कार्षापण सेहो कहल जाइत छल। ‘स्वर्ण’ सेहो सिक्काक हेतु व्यवहार होइत छल। कतहु–कतहु सिक्काकेँ ‘पाद’ सेहो कहल गेल छैक। राजाजनक अपन यज्ञमे प्रत्येक गामपर दश–दश ‘स्वर्ण पाद’ लगौने छलाह। ओहिमे प्रत्येक ब्राह्मणकेँ तीन–तीन सतमान सेहो देल गेल छलन्हि। बौद्ध साहित्यमे सेहो एहि हेतु बहुत शब्दक व्यवहार भेल अछि। चानी आ तामाक प्राचीन सिक्का प्रचुर मात्रामे मिथिलाक विभिन्न क्षेत्रसँ प्राप्त भेल अछि–हाजीपुर, चम्पारण, वैशाली, असुरगढ़, गोरहोघाट, पटुआहा, बहेड़ा, जयमंगलागढ़, पुर्णियाँ, बलिराजगढ़, मंगलगढ़ इत्यादि। एहि सभ स्थानसँ तँ घैलक–घैल सिक्का बहराएल अछि। जातक कथामे वस्तुक दाम ‘पण’क माध्यमसँ देल गेल जाइत छल। सिक्काकेँ पण सेहो कहल जाइत छल। साधारणतः सिक्काक तीन नाप छल–२४, ३२ आ ४०रत्ती। ‘पाद’ १००रत्तीक चौथाई भाग होइत छल। लोककेँ राजाकेँ किछु कर सेहो देमए पड़ैत छलैक। डी. आर. भण्डारकरक अनुसार जनक कालीन आ बौद्धकालीन मिथिलामे “पाद” करक व्यवहार विशेष प्रचलित छल। राजस्व प्रशासनक जे मान्य सिद्धांत छल तदनुसार मिथिलाक शासक लोकनि कर संचय आ ओसूली करैत छलाह। ‘षडभाग’ सिद्धांत तँ सर्वमान्य छल। राजा प्रजाक रक्षा करैत छलाह आ तकरा बदलामे प्रजा राजाकेँ कर दैत छल। ‘कर’क रूपमे जमीनसँ प्राप्त कर सभसँ प्रमुख छल। समाहर्त्ता राजस्व प्रशासक होइत छल। हुनका सहायतार्थ गोप तथा स्थानिक सेहो होइत छलाह। पतञ्जलिक अनुसार क्षेत्रकर नामक एकटा पदाधिकारी महत्वपूर्ण व्यक्ति होइत छलाह जे कृषियोग्य भूमिक सर्वेक्षण कए ओहिपर कर लगेबाक अनुशंसा करैत छलाह। बलि, भाग, भोग, कर, हिरण्य, उदक भाग, उद्रंग, सीत आदि कैक प्रकारक कर होइत छल। एहिमे किछु कर तँ बड्ड कष्टकर छल। उपरोक्त शब्दक विश्लेषण करबामे विद्वान लोकनिक बीच मतभेद छन्हि तथापि उपरोक्त सबटा कर प्रचलित छल सेहो मान्य अछि। एकर अतिरिक्त शुल्क, क्लिप्त, उपक्लिप्त, प्रणय, विष्टी, उत्संग आदि सेहो करेक विभिन्न नाम छल आ इ राजकीय आयक मुख्य स्रोत मानल जाइत छल। इ सब प्रकारक कर मिथिलामे व्याप्त छल आ ओहि ठामसँ प्राप्त शिलालेख आ तत्सम्बन्धी प्राचीन साहित्यमे सेहो एकर उल्लेख अछि। सामूहिक आर्थिक जीवन:- बौद्ध साहित्यसँ इहो स्पष्ट होइछ जे मिथिलामे मिलि जुलिकेँ रहबाक व्यवस्था आ श्रेणीबद्ध भऽ काज करबाक आदत बहुत पुराण अछि। जातक कथासँ इ ज्ञात होइत अछि जे विदेहक निवासी बंगाल होइत समुद्रक मार्गसँ विदेश जाए व्यापार करैत छलाह। ओ लोकनि एहि हेतु सामूहिक व्यवस्था करैत छलाह–आ नाव आ जहाज सेहो बनबैत छलाह। विदेहमे बाहरोसँ व्यापारी लोकनि अबैत छलाह। एहि मानेमे पूर्व–पश्चिम दुनूसँ मिथिलाक घनिष्ट सम्बन्ध छल। आर्थिक जीवनक क्षेत्रमे एहि प्रकारक सामूहिक संगठन लाभदायक सिद्ध होइत छल आ मैथिल लोकनि एहिसँ विशेष लाभान्वित होइत छलाह। बृहदारण्यक उपनिषदसँ एकर प्रमाण भेटइत अछि। सामूहिकताक हेतु गण, व्रात, पूग, संघ, जाति, श्रेणी आदि शब्दक व्यवहार होइत छल। ‘श्रेणी’ मूलतः व्यापारी लोकनिक संगठन छल। व्यापारी लोकनि वणिक कहबैत छलाह। व्यापारक संचालनक हेतु व्यापारी लोकनि अपन ‘श्रेणी’ आ संघ बनबैत छलाह। किछु गोटए एकरा गणक संज्ञा सेहो दैत छथि। रामायण–महाभारतमे सेहो व्यापारी संघक उल्लेख भेटइत अछि। रामायणमे ‘नैगम’ शब्दक व्यवहार भेल अछि। वैदिक साहित्यक ‘श्रेष्ठी’ आ उपनिषदक ‘श्रेष्ठिन’ शब्दो सेहो सामूहिकताक परिचायक थिक। मनु आ पाणिनिमे सेहो श्रेणी शब्दक उल्लेख अछि। बौद्ध साहित्य तँ श्रेणी शब्दसँ भरले अछि। लोहार, सोनार, कुम्हार, तेली, व्यापारी, मछुआ, कमार इत्यादि लोकनिक अपन अलग–अलग श्रेणी होइत छलैक। हुनका लोकनिक अपन नियम कानून सेहो भिन्ने छलन्हि। ओ लोकनि अपन नियम अपने मिलिकेँ बनबैत छलाह। हिनका लोकनिक मध्य जे कोनो मतभेद होइत छलन्हि तँ ओकरो निपटारा ओ लोकनि अपन संघेक द्वारा करैत छलैथ। संघ श्रेणीक प्रधान लोकनिकेँ राजदरबारमे समादर होइत छलन्हि आ कानून इत्यादि बनेबा काल हुनका लोकनिक राय–विचार लेल जाइत छलन्हि। मिथिलाक महत्वक वर्णन एहि दृष्टिकोणे महाउमग्ग जातकमे अछि जाहिसँ इ ज्ञात होइत अछि जे नगरक चारू कोनमे निगमक संगठन छल। श्रेणीक प्रधानकेँ प्रमुख, प्रधान, जेट्ठक अथवा सेठी कहल जाइत छलैक। कमार, सोनार, लोहार, मालाकार, ताँती, कुम्हार आदि सभ वर्गक अपन–अपन प्रधान होइत छलैक। श्रेणीक अंतर्गत काज केनिहार पदाधिकारीक वेतन इत्यादि श्रेणीसँ देल जाइत छलैक। समय–समयपर राजा श्रेणीक प्रधानकेँ विचार–विमर्श करबाक हेतु बजबैत छलथिन्ह। व्यापारी वर्गक प्रतिनिधिकेँ बरोबरि राजदरबारसँ सम्पर्क राखे पड़इत छलैक। श्रेणीकेँ बहुत रास वैधानिक अधिकार सेहो प्राप्त छलैक। सामूहिक जीवनक सभसँ पैघ प्रमाण हमरा वैशालीक उत्खननसँ प्राप्त अवशेष सबसँ भेटइत अछि। सार्थवाह, कुलिक, निगम आदि शब्दक व्यवहार ओहिठाम प्रचुर मात्रामे भेल अछि। नगर शासनमे हिनका लोकनिक बड्ड पैघ हाथ छलन्हि। ओहिठामक बहुत मुद्रापर “श्रेष्ठी निगमस्य” उल्लिखित अछि आ ओहिपर बहुत गोटएक नाम सेहो भेटइत अछि– जेना हरि, उमा भट्ट, नाग सिंह, सालिभद्र, धनहरि, उमापालित, वर्ग्ग, उग्रसेन, कृष्ण दत्त, सुखित, नागदत्त, गोण्ड, नन्द, वर्म्म, गौरिदास इत्यादि– इ सभ गोटए कुलिक छलाह। सार्थवाहमे डोड्डकक नाम आ श्रेष्ठिमे षष्ठिदत्त आ श्रीदासक नामक उल्लेख अछि। बेगूसरायसँ प्राप्त एकटा माँटिक मुद्रापर ‘श्री समुद्र’ आ दोसरपर ‘सुहमाकस्य’ लिखल भेटइत अछि। वैशालीमे बैकिंग प्रथाकेँ चालू रखबाक श्रेय हिनके लोकनिकेँ छन्हि आ वैशाली व्यापारी एवँ सम्पत्तिधारी लोकनिक केन्द्र छल। एहि युगमे मैथिल लोकनि अपन आश्चर्यकारी साहसिक भावनाक परिचय देने छलाह। उद्योग– व्यापारक स्थानीयकरणक कारण श्रेणीकेँ बल भेटल छलैक आ व्यापारक उत्कर्षक कारणे सेट्ठी लोकनिक उत्थान भेल छल। अपन संगठनकेँ मजबूत कऽ कए रखबाक आवश्यकता अहू लेल छलैक जे हुनका लोकनिपर कोनो–कोनसँ कोन प्रकार घातक आक्रमण नहि होमए आ हुनका लोकनिक स्वार्थपर आँच नहि आबे। सामूहिकताक भावनासँ जे बल भेटइत छैक तकर अनुभव ओ लोकनिक लेने छलाह आ ओकर लाभकेँ देखि चुकल छलाह। हुनक संगठित शक्तिकेँ नजरअन्दाज आब शासको नहि कऽ सकैत छलाह। प्रत्येक व्यवसायक पृथक–पृथक संघ छल। मुग्ग–पक्क–जातकमे १८टा श्रेणी (गिल्ड)क उल्लेख अछि। रमेश मजुमदार २७टा श्रेणी (गिल्ड)क उल्लेख केने छथि। एकटा जातकमे मिथिलाक चारिटा श्रेणीक उल्लेख अछि। श्रेणी कैक प्रकारक अर्थ व्यवस्थाक सहायक छलः– i) बैंकिंग प्रणालीकेँ जीवित राखब। ii) सब तरह वस्तुकेँ न्यास रूपमे सुरक्षित राखब। iii) कर्ज देबाक व्यवस्था करब। iv) अपना क्षेत्रक अंतर्गतक भूमिक व्यवस्था करब। v) राजस्व ओसुलीक काजमे सहायता देब। vi) आपसमे सद्भावना बनाके राखब। vii) अपना सदस्यक दिसि ठीका, पट्टा इत्यादि लेबाक व्यवस्था करब। viii) बिक्री व्यवस्थाकेँ नियमित करब। ix) अपना सदस्यकेँ अनुशासित राखब आ समय–समयपर सामयिक कर लगाएब। x) सामूहिक कार्यक व्यवस्था करब। xi) आवश्यक वस्तुजात पैदा करब। xii) विज्ञापन प्रसारित करब। xiii) आवश्यकता भेलापर स्थानीय तौरपर व्यवहारक हेतु सिक्का बाहर करब। श्रेणीकेँ समाज आ राज्यमे प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त छलैक। जातकक अनुसार भाण्डागारिकक कार्यक्षेत्र श्रेणीक निरीक्षण धरि सीमित छल। श्रेणीक नियमक मान्यता राजाकेँ देमए पड़इत छलन्हि। प्राचीन कालक सामूहिक जीवनमे एकर विशेष महत्व छलैक आ जातकक अनुसार मिथिलामे सेहो श्रेणीबद्ध सामूहिक जीवनक प्रमाण भेटइत अछि। व्यापार एवँ उद्योग:- अति प्राचीन कालसँ मिथिलामे उद्योग आ व्यापारक काफी प्रगति भेल छल। मिथिला चारू कात नदीसँ घेरल अछिये आ तैं आवागमनक कोनो असुविधा कहियो रहबे नहि केलैक। विदेहसँ तक्षशिला धरि राजमार्ग बनले छल। जातक सभ तँ मिथिलामे उद्योग–व्यापार सम्बन्धी कथा सभसँ भरल अछि। विदेहमे बाहरोसँ व्यापारी अवइत छलाह। वैशाली आ विदेह मुख्य व्यापारक मार्गपर छल। राजगृह, कौशाम्बी, पाटलिपुत्र, वैशाली, कुशीनगर, कपिलवस्तु, श्रावस्ती आ मिथिलाक बीच आवागमनक मार्ग प्रशस्त छल। कश्मीरसँ होइत गाँधार धरि मिथिलासँ सोझे एक सड़क अबइत छल जकरा मिथिलासँ उज्जैन, बनारस, चम्पा, ताम्रलिप्ति, कपिलवस्तु, इन्द्रप्रस्थ, शाकल, कुशावती, पाटलिपुत्र आदि स्थानक सड़कसँ सम्बन्ध छल। सामुद्रिक व्यापारकेँ इ लोकनि बड्ड महत्व दैत छलाह आ समुद्रमे चलए बला जहाजकेँ ‘वाहनम्’ कहैत छलाह। मैथिल लोकनि दक्षिणी चीनमे अपन एक साँस्कृतिक उपनिवेश सेहो बसौने छलाह आ ओतए किछु स्थानक नाम विदेह आ मिथिला सेहो रखने छलाह। रामायणमे वैशालीकेँ उद्योग व्यापारक केन्द्रक संगहि एकटा बन्दरगाह से कहल गेल अछि। चीन, तिब्बत आ नेपालक संग मिथिलाक व्यापारिक सम्बन्ध छल। सूती कपड़ाक कारबार ताहि दिनमे मिथिलामे बेसी होइत छल। बौद्ध साहित्यक अध्ययनसँ एहि पक्षपर विशेष प्रकाश पड़इयै–तंतु, ताँती, तंतभण्ड, तंत–वित्थनम् आदि शब्द ताँतीसँ सम्बन्धित काजक संकेत दैत अछि। मिथिलाक ‘कोकटी’ अखनहुँ प्रसिद्ध अछि आ तखनहुँ प्रसिद्ध छल। एकर अतिरिक्त मिथिलाक मुख्य उद्योगमे अवइत अछि चीनी, तेल, हड्डीपर कैल काज, धातु उद्योग, चमड़ा उद्योग, माँटिक बर्तनक उद्योग, वेंत, तारक पातक बनल वस्तु, सिलाई–फराई, इत्यादि। जहिना आई इ सब वस्तुक हेतु मिथिला प्रसिद्ध अछि तहिना प्राचीन कालहुमे छल। कुसियारक चर्च तँ तेरहम शताब्दीक तिब्बती यात्री सेहो कएने छथि। ढ़ोल, बाजा, आ अन्यान्य छोट–मोट उद्योगक निर्माण सेहो मिथिलामे होइत छल। युद्ध कालीन अस्त्र–शस्त्र सेहो बनैत छल आ कहल जाइत अछि जे लिच्छवीक विरूद्ध युद्ध शुरू करबाक कालमे अजातशत्रु रथ मूसल आ ‘महाशील कांतार’ सन यंत्रक व्यवहार केने छलाह। लिच्छवी लोकनि कुंकुम आ सुगन्धित द्रव्यक व्यापार करैत छलाह। कमार लोकनि काठपर तरह–तरहक कलाकारी करइत छलाह आ पाथर धातुक माला सेहो बनबैत छलाह। माँटिक सौन्दर्यपूर्ण वासन आदि बनैत छल आ ओहिपर तरह–तरहक पालिश आ कलाकारी होइत छल। माँटिक बासन एकटा कारी चमकैत पालिश होइत छल जकरा “नादर्न ब्लैक पालिश्ड वेयर” कहल जाइत छलैक आ समस्त भारतमे एकर माँग छल। मिथिलाक विभिन्न क्षेत्रसँ इ प्रचुर मात्रामे प्राप्त भेल अछि। मिथिलामे कपूर, चानन, नोन, रेशमी, ऊन, अफीम, कागज, सोना, तामा, पाथर, चूना, आदि वस्तु बाहरसँ मंगाओल जाइत छल। व्यापारिक दृष्टिकोणसँ मिथिलाक सम्पर्क पूबमे ताम्रलिप्ति आ पश्चिममे भरूकच्छसँ छलैक। मिथिलासँ सभ प्रकार अन्न, दलहन आदि वस्तु बाहर जाइत छल। फल फलिहारी बाहर पठाओल जाइत छल। व्यापारक दृष्टिकोणे निम्नलिखित पथ महत्वपूर्ण छल– i) मिथिला–राजगीर ii) मिथिला–श्रावस्ती iii) मिथिला–कपिलवस्तु iv) विदेह–पुष्कलावती v) मिथिला–चम्पा vi) मिथिला–सिन्धु vii) मिथिला–प्रतिष्ठान viii) मिथिला–ताम्रलिप्ति ix) मिथिला–नेपाल–तिब्बत स्थल मार्गक अतिरिक्त इ लोकनि समुद्र मार्गक व्यवहार सेहो करैत छलाह। गण्डकसँ गंगा आ चम्पाक मार्ग बाटे इ लोकनि ताम्रलिप्ति धरि पहुँचैत छलाह आ ओहिठामसँ सुवर्ण भूमि आ अन्यान्य स्थानपर जाइत छलाह। जातकक कथासँ इ ज्ञात होइछ जे सिन्धुक घोड़ाक व्यवहार मिथिलामे होइत छल आ सिन्धुक सम्पर्क भेलासँ मिथिलाक व्यापारिक सम्बन्ध पश्चिमोसँ घनिष्ट हैव बुझि पड़इयै। भारतक व्यापारी लोकनि वेविलोन धरि जाइत छलाह तैं संभव जे मैथिल व्यापारी सिन्धु बाटे आन व्यापारी सब संग ओम्हर जाइत होथि। प्रशस्त स्थल आ समुद्र मार्गक कारणे मिथिलाक व्यापारिक प्रगति अपन उत्कर्षपर छल आ जातक एकर सबूत अछि। (एहि विषयपर विस्तृत अध्ययनक हेतु देखु–मुहम्मद अकीकक लिखल–“इकोनौमिक हिस्ट्री आफ मिथिला”)। मौर्य युगकेँ मंगलकारी राज्यक युग कहल गेल छैक। एहि युगमे जनताक सर्वांगीण आर्थिक जीवनक नियंत्रण राज्यक माध्यमसँ होइत छल। खान इत्यादिपर राज्यक प्रभुत्व छल। राज्यक जमीन आ कृषि कार्यक निरीक्षणक हेतु अधीक्षक नियुक्त होइत छलाह। राज्यक प्रत्येक विभागक हेतु अलग–अलग निरीक्षक रहैत छलाह। राज्यक दिसिसँ कृषिकेँ विशेष महत्व देल जाइत छलैक आ जनकल्याणकेँ ध्यानमे राखि इ स्वाभाविको छल। बंजर जमीन सभमे खेती करबाक हेतु शूद्र लोकनिकेँ बसाओल जाइत छलैक। पुरोहित आ विद्वान ब्राह्मण लोकनिकेँ दानमे जमीन भेटइत छलैक। सिंचाई–पटौनी आ मालक व्यवस्था राज्यक दिसिसँ होइत छलैक। प्राकृतिक उपद्रवसँ बचबाक हेतु राज्यक दिसिसँ सब प्रबन्ध होइत छल। गाम सभमे सहयोग समितिक व्यवस्था सेहो छल आ केओ एहिमे सम्मिलित नहि होइत छलाह हुनका दण्डित कैल जाइत छल। उद्योग, व्यापार आ वाणिज्य सेहो प्रगतिक पथपर छल। प्रशस्त राजमार्गक व्यवस्थासँ व्यापारक प्रगतिमे सहायता भेटइत छलैक। बाजारमे निर्धारित मूल्यपर सब वस्तुक बिक्री होइत छल आ मूल्य नियंत्रण आ वेतन निर्धारणक सिद्धांतक प्रतिपादन आइसँ २३००वर्ष पूर्व कौटिल्य केने छलाह। जे केओ राज्यकर देबामे असमर्थ छलाह हुनका ओहि बदलामे बेगारी करए पड़ैत छलन्हि। व्यापारीकेँ पूर्ण मात्रामे कर देमए पड़इत छलन्हि। गुप्त युगमे कोनो विशेष परिवर्त्तन देखबामे नहि अवइयै। कृषि, उद्योग, व्यापारक प्रगति अहुयुगमे भेल। वैशालीसँ प्राप्त मुद्रा एहि युगक आर्थिक जीवनपर प्रकाश दैत अछि। फाहियान आ हियुएन संगक यात्रा विवरणसँ इ ज्ञात होइछ जे मिथिलाक आर्थिक अवस्था ओहि युगमे बेजाय नहि छल। एहि युगमे सामंतवादी प्रथाक विकास भेल। लोककेँ आब जमीन्दारी प्रथाक अनुभव होमए लागल छलन्हि। जनताक विशिष्ट समूह अहुखन गामेमे बसैत छल आ कृषि आजीविकाक प्रधान आधार छल। ‘कर’क मात्रामे हेर–फेर आब जमीनक अनुसारे हैव प्रारंभ भेल। जाहिठाम पटौनीक व्यवस्था छल ताहिठाम कर बेसी लगैत छलैक आ वंजर जमीनक कम। हियुएन संगक अनुसार एहिठामक किसान परिश्रमी होइत छलाह आ अधिक अन्न उपजबैत छलाह। जमीन मूलरूपसँ तीन भागमे बाँटल जाइत छल– i) गोचर–जाहिमे भिन्न प्रकारक घास उपजैत छल। ii) बंजर–कोनो प्रकारक उपजा नहि होइत छल। iii) उपजाऊ। हाटक व्यवस्था सेहो प्रारंभ भऽ गेल छल। हाटक निरीक्षणक हेतु ‘हट्टपति’ नामक एकटा अधिकारी सेहो नियुक्त होइत छलाह। ब्राह्मण आ क्षत्रियकेँ कर रहित जमीन दानमे भेटइत छलन्हि। एहि युगमे जमीन छोट–छोट टुकड़ामे बँटि चुकल छल। भूमि नापबाक प्रणाली प्रचलित भऽ चुकल छल आ गुप्तयुगमे एकरा कुलवाप्य कहल जाइत छल। अन्न नापबाक प्रणाली सेहो प्रचलित भऽ चुकल छल आ ओकरा ‘द्रोण’ कहल जाइत छलैक। खेतीबारी हरसँ होइत छल। एहि युगमे व्यापारक प्रगति सेहो खूब भेल छल। एहियुगमे बहुतो गोटए मिथिलासँ काशी जाइत छलाह। सिक्काक रूपमे कौड़ीक प्रचलन सेहो भऽ चुकल छल। लहना–तगादाक वेश बढ़ल–चढ़ल छल आ सूदक दर ९% सँ १२% धरि छल। भोजन वस्त्रक सामग्री एकठामसँ दोसर ठाम पठाओल जाइत छल। कैक प्रकारक आभूषण बनाओल जाइत छल। एक स्थानसँ दोसर स्थान सामान बैलगाड़ी आ नावपर पठाओल जाइत छल। आ सभपर चूंगीकर सेहो लगैत छलैक। एक बैलगाड़ीपर बीस बोझसँ बेसी सामान लदलासँ दू टाका शुल्क लगैत छल। किराना वाला बैलगाड़ीपर एक टाका शुल्क लगैत छल। कथा सरित्सागरसँ ज्ञात होइत अछि जे काशीक चारूकात रस्ताक जाल बिछाओल छल। पुण्ड्रवर्द्धनसँ पाटलिपुत्र धरि मिथिले बाटे रस्ता छल। एहि सबसँ स्पष्ट होइछ जे प्राचीन मिथिला सब तरहे सम्पन्न छल। आ देश–विदेशसँ ओकर सम्पर्क बनल छलैक। सामान्य मनुक्खक जीवनमे कोनो विशेष परिवर्त्तन नहि भेल छलैक। धनी लोकनि अपना धनकेँ गारिकेँ रखैत छलाह। मध्ययुगीन मिथिलाक आर्थिक इतिहासक जनबाक हेतु साधनक अभाव अछि तथापि तत्कालीन साहित्यक अध्ययनसँ हमरा लोकनिकेँ पर्याप्त ज्ञान प्राप्त होइछ। ज्योतिरीश्वरक वर्णरत्नाकरमे एहि युगक आर्थिक स्थितिक विवरण भेटइत अछि। ओहि ग्रंथसँ इ प्रतीत होइछ जे ताहि दिनमे मिथिलाक ग्रामीण स्वर प्राञ्जल भऽ उठल छल। चाउर, जौ, विभिन्न प्रकारक दालि, बाजरा, मटर, तेलहन, कुसियार, रूई, पिआज, लहसून, दाना इत्यादि मिथिलामे प्रचुर मात्रामे उपजैत छल। चूड़ा आ चाउरक भूजाक उल्लेख सेहो भेटइत अछि। सोआ, मेथी, मंगरैल आ सोंफक खेती सेहो होइत छल। आम, खजूर, नेमो, नारंगी, अनार, अंजीर, जामून, कटहर, सपाटु, लताम, पपीता आदि फलक उल्लेख सेहो भेटइत अछि। चूड़ा दहीक प्रथा विशेष प्रचलित छल। अन्न रखबाक हेतु बखारी बनैत छल। चीनी आ गूड़क प्राचुर्य छल। एहिठामसँ मधु नेपाल जाइत छल। ताड़ी–दारू सेहो बनैत छल। महुआक दारू बड्ड प्रचलित छल। पानक बड़का व्यवसाय मिथिलामे होएत छल। पान लगेबाक विधिपर ज्योतिरीश्वरतँ विभिन्न प्रकारक विधानो बतौने छथि। ओहिमे तरह–तरहक मशाला पड़इत छलैक आ ओ सभ मशाला देशक विभिन्न भागसँ मँगाओल जाइत छलैक। तीस प्रकारक वस्त्रक वर्णन ज्योतिरीश्वर स्वयं कएने छथि। दामी वस्त्रक अंगपोछा बनैत छल। ओ रंगरेज आ मुशहरीक उल्लेख सेहो कएने छथि। विभिन्न प्रकारक धातुसँ अनेकानेक प्रकार बासन–बर्त्तन बनैत छल। वर्णरत्नाकरमे अष्ट धातुक उल्लेख सेहो भेल अछि। लोहा आ अन्यान्य धातु गलेबाक कलामे मैथिल निपुण होइत छलाह। एहिठामक लोहार लोहा गलाकेँ हर, खुरपी, कैंची, चक्कू, कुरहड़ि आदि बनबैत छलाह। खपरैल घरक उल्लेख सेहो भेटइत अछि। कमार लोकनि काठक अनेको वस्तु बनबैत छलाह। ज्योतिरीश्वर ३६प्रकारक शस्त्रास्त्रक उल्लेख केने छथि। वर्णरत्नाकरसँ ज्ञात होइछ जे मैथिल लोकनि तंजोर, सिलहट, अजमेर, काँची, चोलप्रदेश, कामरूप, बंगाल, गुजरात, काठियावाढ़, तेलंगना, आदि स्थान सभसँ अपन वस्त्र मंगबैत छलाह। ओहिमे श्रीखण्ड, मलय आ सूरतक उल्लेख सेहो अछि। नाव बनेबामे मैथिल लोकनि सिद्धहस्त छलाह। एकर विवरण धर्मस्वामी सेहो उपस्थित केने छथि। नाव सबमे सिंह, बाघ, घोड़ा, बत्तक, साँप, माँछ आदिक चेन्ह रहैत छल। नाव बनेबामे मैथिल लोकनि अपन सौन्दर्यबोधक परिचय दैत छलाह। स्वास्थ्यपर सेहो विशेष ध्यान देल जाइत छल। मिथिला ताहिदिनमे दूध दहीक हेतु प्रसिद्ध छल आ ओहिठाम लोग स्वस्थ होइत छल। देहक श्रृंगारक संग देहक सेवाक विन्यास सेहो छल। देह मालिश कएनिहारकेँ मरदनिया कहल जाइत छलैक। भोजनमे गरम मशालाक प्रयोग होइत छल। आ शरीरक सौन्दर्यक हेतु अगुरू, कर्पूर आदिक व्यवहार प्रचुर मात्रामे होइत छल। जीवनक एहन कोनो अंश अथवा सौन्दर्य सामग्रीक एहेन कोनो अवयव नहि जकर उल्लेख वर्णरत्नाकरमे नहि हो। पंचशायकमे एक दिसि स्त्रीक प्रसाधनक सभ विषयक वर्णन अछि तँ दोसर दिसि परिवार नियोजन आ गर्भ निरोधक तकक विधि लिखल अछि। कामसूत्रसँ कोनो अंशमे एहि ग्रंथक महत्व कम नहि अछि। ज्योतिरीश्वरक वर्णरत्नाकर, पंचशायक आ विद्यापतिक कीर्तिलता एवँ लिखनावली पढ़लासँ बहुत बातक ज्ञान होइछ। विद्यापतिक लिखनावलीसँ इ ज्ञात होइत अछि जे राजस्वकर सेहो वसूल होइत छल। भूमि नपबाक उल्लेख सेहो ओहिमे अछि। दानपत्रक सूची सेहो राखल जाइत छल। एहि ग्रंथमे ऋण–पत्र, खेती–व्यवस्था पत्र, बन्धकी–व्यवस्था पत्र आदिक विवरण भेटइत अछि। दानवाक्यावलीमे राहरि, साठी आ लतामक चर्च अछि आ ओहिमे कैक प्रकारक वस्त्रक उल्लेख सेहो भेल अछि– कार्पासिक वस्त्र, समेम वस्त्र, क्षौम वस्त्र, कौशेय वस्त्र, कुश वस्त्र, कृमिज वस्त्र, मृगलोमजवस्त्र, वृक्षावक् संभव वस्त्र आ आविक वस्त्र। कीर्तिलतामे बाजार, हाट, नगर, आदिक विशिष्ट वर्णन अछि। बजारमे पनहट्टा, धनहट्टा, सोनहट्टा, पकवानहट्टा, मछहट्टा इत्यादिक उल्लेख अछि। ओहि ग्रंथमे दरिद्रताक उल्लेख सेहो अछि। तत्कालीन दरिद्रताक विवरण ओहिमे अछि। कीर्तिपताकामे विद्यापति कहने छथि जे राजाक मुख्य कर्त्तव्य होना चाही दरिद्रताकेँ खतम करब। ऋणक उल्लेखो कीर्तिलतामे अछि आ दरिद्रताक विवरण तँ पदावलीक कतेको गीतमे। आर्थिक इतिहासक दृष्टिकोणसँ इ युग अखनो एकटा विशिष्ट अध्ययनक अपेक्षा रखइयै कारण ने तँ उपेन्द्र ठाकुर आ ने मोहम्मद अकीक एहि कालपर कोनो प्रकाश देने छथि। थोड़ बहुत विवरण हम मिथिला इन द एज आफ विद्यापतिमे कैल अछि। मुसलमानी प्रसारसँ आर्थिक जीवनक रूपरेखामे सेहो थोड़ेक परिवर्त्तन भेलैक मुदा तइयो मैथिल अपन कट्टरताक कारणे आन प्रांतक अपेक्षा एहिठाम अपनाकेँ फराके रखलन्हि आ अपन विधि–विधानकेँ यथाशक्ति सुरक्षित सेहो। मुसलमानी शासन कालमे मिथिलाक आर्थिक जीवनमे कोनो विशेष उल्लेखनीय प्रगति नहि भेलैक अपितु स्थिति यथावते रहलैक। शाहजहाँक समयमे जखन समस्त भारतमे अकालक स्थिति उत्पन्न भेलैक तँ मिथिलो ओहिसँ वाँचल नहि रहल। कास्तकार आ सामान्य किसानक स्थिति बड्ड दयनीय भऽ गेलैक। तिरहूतमे ताहि दिनमे बंजारा लोकनिक उपद्रव जोरपर छल। बरनिअरक यात्रा विवरणसँ ज्ञात होइछ जे बंजारा समस्या उभरिकेँ ऊपर आएल छल आ ओकरा दबेबाक हेतु संगठित प्रयास भऽ रहल छल। कृषक लोकनिक स्थिति बदत्तर भऽ गेल छल आ औरंगजेबक परोक्ष भेलापर तँ स्थिति आर चिन्तनीय आ दयनीय भऽ गेल छल। भारतमे अंग्रेज आ अन्यान्य विदेशी लोकनिक कारबार आ व्यापार शुरू भऽ गेल छल आ शोषण प्रक्रियामे एकटा नव गति आबि गेल छलैक। १७५७मे पलासीक लड़ाईक बादक स्थितिकेँ भारतीय अर्थनीतिक इतिहासमे अंधकारपूर्ण कहल गेल अछि। अंग्रेज, मुसलमानी अमला–फैला, हिन्दू–जमीन्दार, बंजारा, सन्यासी सभ मिलिकेँ जनताकेँ लूटबामे लागल छल आ संगहि अपन–अपन जेबी गरम करबामे। देशक चिन्ता ककरो नहि छलैक। चारूकात हाहाकार आ अकालक स्थिति छल। १७५७क पछातिमे मिथिलामे बरोबरि अकाल पड़इत रहल। बेकारीक समस्या उत्पन्न भऽ गेल। कृषि आ उद्योगक स्थिति दिन–प्रतिदिन खसए लागल। तिरहूतक गामक गाम उजार होमए लागल। १७७०मे बड़का अकाल पड़ल आ ओहिठामक लोग खेती बारी छोड़िकेँ पड़ाए लागल। ओहि वर्षमे दरभंगाक विशेष भागमे चासक कोनो काज नहि भऽ सकल आ स्थिति एहेन भऽ गेल जे १७८३मे दरभंगाक कलक्टर एहि आशयक प्रस्ताव रखलन्हि जे अवध प्रांतसँ खेतिहर मंगाकए दरभंगामे खेतीक व्यवस्था कैल जाइक। एहि अकालक कारण मुजफ्फरपुरक कलक्टरीसँ प्राप्त कागज सभसँ ज्ञात होइछ। हाजीपूरसँ पुर्णियाँ धरि अभूतपूर्व अकाल पड़ल छल। एकर मुख्य कारण इ छल जे सरकार अकारण सभ बातमे हस्तक्षेप करैत छल, आवागमन एवँ यातायातक असुविधा छल आ ताहि दिनमे केओ एहेन योग्य नेता नहि छलाह जे एहि सभहिक निराकरणक कोनो प्रयास करितैथि। एहेन अराजक स्थितिमे जकरा जतए जे हाथ लगैक से सैह करे आ जमीन्दारी अत्याचार आ शोषणक तँ कोनो कथे नहि छल। १७८२मे बाध्य भऽ कए इ नियम बनबे पड़लैक जे बिना अंग्रेजी सरकारक अनुमतिकेँ केओ जमीन्दार अपन जमीनकेँ एम्हर–ओम्हर नहि कऽ सकइयै। वार्थहस्ट्र साहेब १७८७मे तिरहूतक शासक भेला। दरभंगाक महाराज आ इस्ट इण्डिया कम्पनीक बीच एहि प्रश्नकेँ लऽ कए बरोबरि झंझट होइते रहलन्हि (देखु–हमर ‘द खण्डवलाज आफ मिथिला’)। स्थिति एहेन विभत्स भऽ गेल छल जे परगन्ना पचही, आलापुर आ भौरमे किछु उपजावारी नहि होइत छल आ इ सभ जंगलमे परिवर्त्तित भऽ गेल छल। एहि सभ क्षेत्रमे जंगली जानवरक वास भऽ गेल छल। अंग्रेजकेँ अपन राज्यक सुरक्षाक चिंता छलन्हि आ जमीन्दार लोकनिकेँ अपन सम्पत्तिक आ बीचमे पिसाइत छल दरिद्र जनता जकरा हेतु चारूकात अन्हारे अन्हार छलैक। सरकार आ जमीन्दारक अतिरिक्त महाजन लोकनि सेहो निर्दय भऽ कए जनताक पसीनाक कमाई छीन लैत छलैक। मानव–कृत शोषण यंत्रकेँ साहाय्य देनिहार प्रकृति सेहो छलैक। अतिवृष्टि आ अनावृष्टि तँ अपन रूप देखिबते छल आ ताहिपर नदीक बाढ़ि तँ अपन नङटे नाच देखिबते छल। मिथिलामे नदीक तँ अभाव अछि नहि आ प्रति वर्ष एकर बाढ़ि अखने जकाँ ताहि दिनमे अबैत छल। गंगा, गण्डक, वाग्मती, कमला, कोशी, बलान, करेह, लखनदै आदि नदीक बाढ़ि बरसातमे तीन मास धरि मिथिलाकेँ समुद्रमे बदैल दैत छलैक जाहिसँ एकर आर्थिक जीवन अस्त–व्यस्त भऽ जाइत छलैक। कोशीकेँ तँ सहजहि ‘दुखक नदी’ कहले गेल अछि। एहिसँ सब फसिल नष्ट भऽ जाइत छल, महामारीक प्रकोप बढ़ैत छल आ आवागमन एवँ यातायातक सुविधा लुप्त प्राय भऽ जाइत छल। एहना स्थितिमे बरोबरि अकाल हैव स्वाभाविके–१५५५सँ १९७५धरि मिथिलामे कतेको बेर अकाल पड़ल अछि आ महामारीक प्रकोप बढ़ल अछि–१५७३–७४, १५८३–८४, १५९५–९६, १६३०, आ अंग्रेजक समय १७७०सँ १९००क बीच १५–२०बेर अकालक दर्शन लोककेँ भेल छलैक। १६३०क अकाल तँ अद्वितीय छल। ओहि साल मिथिलासँ बहुत रास लोगकेँ भागिकेँ दोसर ठाम चल गेल छल। मिथिलामे बाढ़ि तँ वार्षिक क्रम जकाँ अबैत अछि आ एहेन शायद कोनो वर्ष होएत जाहिमे बाढ़ि नहि आएल हो। बाढ़ि आ अकाल मिथिलाक आर्थिक इतिहासक एकटा अभिन्न अंग मानल जाइत अछि। १७७०क अकाल मिथिलाक इतिहासमे अद्वितीय छल आ मिथिलाक जनसंख्या घटिकेँ एक दम्म कम्म भऽ गेल छल। १८७३–७४मे पुनः एकटा ओहने अकाल मिथिलामे भेल छल जकर विवरण हमरा फतुरी लाल कविक अकाली कवित्तसँ भेटइयै– अकाली कवित्त अप्रकाशित अछि। अकालकेँ दूर करबाक हेतु आ मजूरकेँ राेजी देबाक हेतु ताहि काल रेलगाड़ीक योजना चलाओल गेल जकरा सम्बन्धमे फतुरीलाल लिखैत छथि– “कम्पनी अजान जान कलनको बनाय शान। पवन को छकाय मैदानमे धरायो है॥ छोड़त है अड़ादार बड़ा बीच धाय–धाय। सभेलोग हटाजात केताजात खड़ा है॥ तारकी अपारकार खबरि देत वार वार। चेत गयो टिकसदार रेल की उवाई है॥ करत है अनोर शोर पीछे कत लगत छोर। जोर की धमाक से मशीन की बड़ाई है॥ कम्पूसन पहरदार कोथी सब अजबदार। कोइला भर करल कार धूआँसे उड़ायो है॥ बाजा एक बजन लाग हाथी अस। पिकन लाग जैसा जो चढ़नदार वैसाधर पायो है॥ गंगाकेँ भरल धार उतरि गयो फतूर पार गाड़ीकी। अजबकार कवित्त यह बनाया है”॥ अकाल, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, बाढ़ि, अभाव, एवँ प्राकृतिक प्रकोपसँ मिथिलाक आर्थिक जीवन परम्परागत रूपें प्रभावित रहल अछि आ अहुखन अछिये। अंग्रेजक अमलमे आबिकेँ जखन रेलगाड़ीक सुविधा बढ़ल आ आवागमन एवँ यातायात आ संचार व्यवस्थामे सुधार भेल तखन मिथिलाक आर्थिक इतिहासक रूपरेखामे परिवर्त्तन हैव स्वाभाविक भऽ गेल। उद्योग आ व्यापारक प्रगति सेहो भेल परञ्च ओकरा अखनो पर्याप्त नहि कहल जा सकइयै। प्राचीन कालहि मिथिलामे उद्योग–व्यापार विकसित अवस्थामे छल आ मध्य कालक विशिष्ट भागमे एकर से स्थिति बनल रहलैक मुदा इस्ट–इण्डिया कम्पनीक समयमे आबिकेँ एहिमे थोड़ेक ह्रास अवश्य भेलैक। खाद्य सामग्रीक अतिरिक्त मिथिलाक क्षेत्रमे कुसियार, तम्बाकु आ पाट आ मिरचाई बेस मात्रामे उपजैत अछि एहि लऽ कए मिथिलाक व्यापारो अछि। सब प्रकारक खादीक कपड़ा सेहो एहिठाम बनैत अछि। कोकटीक हेतु तँ मिथिला सर्वप्रसिद्ध अछिये। मिथिलामे व्यापारक प्रसिद्ध केन्द्र छल– हाजीपुर, लालगंज, बगहा, गोविन्दपुर, सतराघाट, दरभंगा, कमतौल, खगड़िया, रोसरा, पूसा, समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर, रानीगंज, नबाबगंज, नाथपुर, साहेबगंज, राजगंज, रामपुर, अलीगंज, खबासपुर, दुलालगंज, कलियागंज, देवगंज, किसनगंज, बहादुरगंज, बारसोई, बेगूसराय, तेघड़ा, दलसिंहसराय इत्यादि। एहिमे नाथपुर तँ अंतराष्ट्रीय व्यापारक मुख्य केन्द्र छल जाहिठाम प्रचुरमात्रामे नेपाली लोकनि सामान लऽ कए अबैत छलाह आ एहिठामसँ सामान लऽ कए जाइत छलाह। अंग्रेजक अमल धरि नाथपुर एक प्रख्यात व्यापारिक केन्द्र छल। १८३६ नारेदिगर आ नाथपुरक सर्वेक्षण अंग्रेज द्वारा कैल गेल जकर रेकर्ड सम्प्रति सुरक्षित अछि। सिन्दूर, कागज, आ अफीमक व्यापार बेस होइत छल। अफीमक कारखाना विदुपुर, लालगंज, दरभंगा, वैगनी नवादा, आदि स्थानमे छल। पाटक कारबार पुर्णियाँ आ सहरसामे सबसँ बेसी होइत छल आ नीलक सम्बन्धमे पूर्ण विवरण हम पूर्वहिं दऽ चुकल छी। एतवा होइतहुँ मिथिलामे २०म शताब्दीमे कोशीक प्रकोपक बढ़लासँ आर्थिक स्थिति दयनीय भऽ गेल छल। रेलमार्ग सबटा टूटि फाटि गेल, गामक गाम उजरि गेल छल। नाथपुरक व्यापारिक महत्व नष्ट भऽ गेल छल आ जे प्राचीन उपलब्धि आर्थिक दृष्टिकोणे मिथिलाक छल से आब इतिहासक वस्तु बनिकेँ रहि गेल। राष्ट्रीय आन्दोलन आ स्वदेशीक पुनरूत्थानक क्रममे कोकटीक हेतु प्रसिद्ध तिरहूत (मिथिला)केँ पुनः अखिल भारतीय खादीक प्रधान केन्द्र बनाओल गेल आ मधुबनीमे एकर मुख्यालय राखल गेल। बहुत गोटएक गुजर एखनो एहिसँ चलि रहल अछि। १९५५मे कोशीकेँ बन्हबाक प्रयास भेल आ वीरपुरमे कोशी बैरेजक निर्माण भेलासँ दरभंगा, सहरसा, पूर्णियाँ आ उत्तर मूंगेर आ भागलपुर पूर्णतः लाभान्वित भेल अछि। मिथिलामे आर सब नदीकेँ जँ बान्हल आ नियंत्रित कैल जाइक तँ मिथिलाक आर्थिक स्थितिक रूप रेखा बदलि जेतैक। पूर्णियाँ–सहरसा जतबे कष्ट कोशीक कारणे भोगने छल अखन ततबे सुभ्यस्त आ सम्पन्न भऽ गेल अछि। स्वर्गीय ललित नारायण मिश्र जखन रेल मंत्री बनलाह तखन ओ एहि सभ क्षेत्रक टुटल फाटल रेलवे लाइनकेँ चालू करौलन्हि। एहिसँ एहि क्षेत्रक आर्थिक विकासक संभावना आर बढ़ि गेल आ दुर्भाग्यक गप्प इ एहने एक लाइनक उद्घाटनक हेतु जखन ओ ०२/०१/७५केँ समस्तीपुरमे पहुँचलाह तँ ओतए एक संदिग्ध स्थितिमे बम बिस्फोटक कारणे मारल गेलाह। अध्याय–18 धर्म आ दर्शन धर्म:- वैदिक युगहिसँ मिथिला धर्म आ दर्शनक प्रधान केन्द्र रहल अछि। प्रारंभमे एकेश्वरवादी मत बड्ड प्रचलित छल आ ऋग्वेदमे एकर विशद विश्लेषण भेल अछि। वेदक प्रारंभिक कालमे यज्ञक महत्व विशेष छल मुदा पाछाँ जे हमरा लोकनि प्रजापतिक कथा–पिहानी पढ़ैत छी ताहिसँ इहो ज्ञात होइछ जे ‘अवतारवाद’क सिद्धान्त सेहो जोर पकड़ि रहल छल। ब्राह्मण साहित्यमे प्रजापति ‘पुरूष’क रूपमे ठाढ़ भेल छथि आ एहेन बुझि पड़इत अछि जेना की विश्वक भार सम्हारवाक कार्य हुनके माथपर पड़ि गेल हो। ‘आत्मा’ आ ‘ब्रह्म’क विकास उपनिषदक युगमे भेल। हिन्दू धर्मक दार्शनिक विश्लेषण उपनिषदमे भेटइत अछि आ एहिमे विशिष्ट भागक विश्लेषण मिथिला भूमिमे राजा जनकक दरबारमे भेल छल। अखिल भारतीय धर्मक रूपमे जैन धर्म आ अखिल विश्व धर्मक रूपमे बौद्ध धर्मक उत्थान प्रसार आ प्रचार मिथिलहिक अंगनामे भेलैक। जनक सेहो अपना युगक विद्रोही छलाह आ प्राचीन नियमक उल्लंघन कए यज्ञ सम्बन्धी अपन कर्त्तव्य कए एहि बातकेँ सिद्ध केने छलाह जे मनुष्य अपन कर्त्तब्यसँ किछु प्राप्त कऽ सकइयै। ओहि परम्पराक अनुरूप आ प्राचीन कट्टरता एवँ अन्धविश्वासकेँ कटैत तथा वेदक अपौरूषेयतामे अविश्वास करैत मिथिला आङनमे अवतीर्ण भेल छलाह वर्द्धमान महावीर आ गौतम बुद्ध। वर्द्धमान महावीरक जन्म वैशालीमे भेल छलन्हि– कुंडग्राममे जाहिठाम ज्ञात्रिक लोकनि रहैत छलाह। महावीरकेँ विदेह, वैदेहीदत्ता, विदेह जात्य, विदेह सुकुमार, वैशालिक एवँ वैशालिए इत्यादि कहल गेल छन्हि। आ चारांगसुत्तमे तँ साफ लिखल अछि– “समणस्स णं भगवओ महावीरस्स अम्मा वासिट्ठत्सगुता तीरो णं तिन्नि नां तं– तिसला इव विदेह दिन्ना इव पियकारिणी इवा”। महावीरक माए त्रिशलाकेँ वैदेही कहल जाइत छलन्हि। २१म तीर्थंकर नेमीनाथक जन्म सेहो मिथिलेमे भेल छल। महावीर १२टा वर्षावास वैशालीमे आ ६टा वर्षावास मिथिलामे बितौने छलाह। विदेह आ वैशालीमे महावीर बहुत रास शिष्य छलथिन्ह आ एहि सब क्षेत्रमे हिनक प्रतिपादित धर्मक विशेष प्रचार भेल छल। जैन साहित्यमे मिथिलाक प्रचुर वर्णन भेटइत अछि जाहिसँ इ स्पष्ट होइछ जैन आ मिथिलाक बीच घनिष्ट सम्पर्क छल आ मिथिलाक साँस्कृतिक परम्परा जैन विद्वान लोकनिक ध्यान अपना दिसि आकृष्ट केने छलन्हि। प्रारंभिक अवस्था बुद्ध सेहो जैन धर्म दिसि आकृष्ट आ प्रभावित भेल छलाह मुदा से मात्र किछु दिनक हेतु। बौद्ध धर्मक उत्थान आ प्रसारक पूर्व विदेह आ वैशाली जैन धर्मक एकटा प्रधान केन्द्र छल। महावीर वर्ण व्यवस्थाक विरोधी छलाह तथापि ओ त्रिवर्णक एक प्रकारे समर्थक सेहो छलाह। जैन धर्म निर्वाणपर जोर देने अछि। हरिभद्र अपन ‘षडदर्शन समुच्चय’मे लिखने छथि– “आत्यंतिको वियोगस्तु देहादेर्मोक्ष उच्च्यते”– महावीरक विश्वास छलन्हि जे मनुष्य अपन कर्मसँ वर्ण–व्यवस्था रूपी जालकेँ तोड़ि सकइयै। चाण्डालोमे सद्गुण भऽ सकैत जे ओ उचित कर्त्तव्यक पालन करए। मनुष्यक आस्था हुनक अपूर्व विश्वास छलन्हि आ बहुत ब्राह्मणो हुनक मतकेँ महत्व दैत छलथिन्ह। कल्पसूत्रक सुखवोधिका टीकामे लिखल अछि– “प्रभु अपापापुर्या....जगाम, तत्र बहवो ब्राह्मणाः मिलिताः.... चतुश्चत्वारिंशच्छा तानि द्विजाः प्रवजिताः”। जैन लोकनि दर्शन आ न्यायक क्षेत्रमे सेहो बड्ड पैघ योगदान देने छथि। महावीरक इतिहास मिथिलाक प्राचीन इतिहाससँ जुटल अछि आ जैन साहित्यक अनुसार मिथिलाक राजा निमि जैन धर्म स्वीकार केने छलाह आ श्रमण भऽ गेल छलाह। उत्तराध्ययनसूत्रमे लिखल अछि– “नमी नमेइ अप्पाणं सक्खं सक्केण चोइओ चइऊण गेह चं वेदेहि सामण्णे पज्जुंवट्ठिओ”। एहिठाम स्मरण रखबाक अछि बौद्ध परम्परामे एहने किछु बात एहि राजाक सम्बन्धमे सेहो अछि जेना कि महाजनक जातकक कथासँ ज्ञात होइछ। विदेहमे महावीरक पर्याप्त समर्थक रहल हेतन्हि एहिमे संदेह नहि। वैशालीमे तँ हिनक विशेष प्रभाव रहबे करैन्ह। एहिठामसँ जैन धर्मक प्रसार सबतरि भेल। हियुएन संगक समय धरि एहिठाम ‘निग्रंथ’ लोकनिक पर्याप्त संख्या छल। जैन लोकनि सेहो स्तुपक निर्माता होइत छलाह आ ओहन एक स्तुप वैशालीमे सेहो छल तकर प्रमाण जैन साहित्यमे भेटइत अछि। बौद्ध धर्मक दृष्टिकोणे सेहो मिथिला महत्वपूर्ण मानल गेल अछि। ई. पू. ६ठम शताब्दी तँ समस्त विश्व इतिहासक दृष्टिकोणसँ सहजहि महत्वपूर्ण अछि, मिथिलाक हेतु तँ आ विशेष रूपें। वैदिक कर्मकाण्डक विरोध तँ उपनिषदक युगहिसँ स्पष्ट भऽ चुकल छल मुदा ओहि विरोधक परिणति भेल जैन आ बौद्ध धर्मक उत्थानसँ। मुण्डक उपनिषदमे विरोध तीव्रतासँ भेल छल। विरोध तीव्रता भेलेसँ जँ काज चलितै तँ से बात नहि। एक दिसि तँ ओ लोकनि वैदिक कर्मकाण्डक विरोध केलन्हि आ दोसर दिसि एहन गहन दर्शनक प्रतिपादन केलन्हि जकरा सामान्य लोक बुझबामे असमर्थ छल। एहना स्थितिमे सामान्य लोकक हेतु सुधारक अपेक्षा छल आ बुद्धक अवतीर्ण भेनाइ ओहि अपेक्षाक पूर्ति मात्र छल। ब्राह्मण धर्मक कर्मकाण्ड आ कुरीतिसँ लोग तंग आबि चुकल छल आ एकटा निदानक खोजमे छल। विदेह आ वैशालीमे बौद्ध धर्मक पर्याप्त प्रभाव रहल हैत एकर सबसँ पैघ प्रमाण इ अछि जे मनु लिच्छविये जकाँ विदेह लोकनिकेँ व्रात्य कहने छथिन्ह। विदेह– भेलाह ओ जनक पिता वैश्य आ माता ब्राह्मण हेथिन्ह। बौद्ध धर्मक प्रभाव मिथिलामे रहल होइत एकर प्रमाण जातक कथा साहित्यसँ सेहो भेटइत अछि। जातक कथामे एहि सम्बन्धमे बहुत रास प्रसंग अछि। सभ किछु होइतहुँ मिथिलापर बौद्ध धर्मक कोनो स्थायी प्रभाव नहि पड़ल कारण हम देखैत छी जे बौद्ध धर्मक तुरंत बाद ओहिठाम पुनः सनातन धर्मक तुती बाजए लगैत अछि। बुद्ध वैशालीक सब तरहे प्रशंसा केने छथि आ अशोक बौद्ध धर्मक प्रसारक हेतु किछु उठा नहि रखलन्हि मुदा तइयो मिथिलाक समस्त भूमि एकरा प्रभावमे स्थायी रूपे नहि आबि सकल। मिथिलाक विभिन्न क्षेत्र बौद्ध धर्मक केन्द्र आ प्राचीन अवशेष अछि मुदा धर्मक प्रभाव कोनो अवशेष नहि देखबामे अवइयै। जँ बौद्ध धर्मक प्रचार–प्रसार भेलो हैत तँ मिथिलामे शूंग–कण्व कालीन शासनक समय ब्राह्मण लोकनि ओकरा नीप–पोतिके एक कऽ देने होएताह। कनिष्क बुद्धक भिक्षापात्र लेबाक हेतु वैशाली धरि आएल छलाह आ ओहियुगक गणेशक एकटा मूर्त्ति करिऔनसँ भेटल अछि जे एहि बातक प्रमाण दैत अछि जे कनिष्कक युग धरि बौद्ध धर्मक प्रभाव एम्हर घटि चुकल छल। हियुएन संग लिखैत छथि जे सातम शताब्दीमे मिथिला वैशालीक क्षेत्रमे बौद्ध धर्मक प्रभाव घटि चुकल छल। ब्राह्मण धर्म पुनः अपन प्राचीन सत्ता प्राप्तक चुकल छल। बौद्ध धर्म एहिठाम स्थानीय सम्प्रदायमे मिलिकेँ लुप्त भऽ गेल छल। मैथिल परम्परामे एकटा कथा सुरक्षित अछि जे पम्मार(परमार) विक्रमादित्यक राज्य मिथिला धरि छल। मिथिलामे विक्रमादित्यक एबाक कारण इ जे हरिहर क्षेत्रमे बौद्ध संघ तथा मैथिल वर्गकेँ शास्त्रार्थ भेल परञ्च बौद्ध सब राजाक बलसँ मैथिलक अपमान केलन्हि। तखन सब मैथिल क्रुद्ध भए वररूचि मिश्रक पुत्र जयादित्य मिश्रकेँ विक्रमादित्यक ओतए पठौलन्हि। ओतए शिप्रानदीक तटस्थ महाकाल शिवमन्दिरमे पूजाक समय भेंट भऽ गेलैन्ह– तखन दुनू गोटएक बीच श्लोक बद्ध प्रश्नोत्तर भेल– “के यूयं, कुत आयाता, अत्र वक्तव्यमस्तिकिम्? मैथिला मिथिलातोऽत्र शकादित्येन पीड़िताः॥ आसजीवति कुत्रास्ति? नेपाले बौद्ध संकुले। इतोभ्रष्टस्ततो भ्रष्टः सोऽचिरेणभर्विष्यति”॥ तखन विक्रमादित्य मिथिला मण्डल आबिकेँ दखल कैल आ बौद्ध लोकनिकेँ पराजित केलक। हुनके वंशक राजपूत एहिठाम गन्धवरिया कहबैत छथि। बौद्ध धर्म एहिठाम हिन्दूधर्ममे मिझ्झर भऽ गेल आ सनातनधर्मी हुनका विष्णुक नवम अवतार मानि लेलथिन्ह– गीत गोविन्दमे लिखल अछि– “निन्दसि यज्ञ विधेरहह श्रुतिजातम्। सदय हृदय दर्शित पशु घातम्। केशवधृत बुद्ध शरीर। जय जगदीश हरे”। मिथिला मौलिक रूपे सनातनी मानल जाइत अछि आ एहिठाम वर्णाश्रमक प्रतिष्ठा अति प्राचीन कालहि चलि आबि रहल अछि। उपनिषद युगमे एतए आत्मा आ ब्रह्मक विश्लेषण भेल–राजा जनक अपन कर्त्तव्य पथसँ जे एकटा मार्ग संकेत केलन्हि सेहो बहुत दिन धरि चलि नहि सकल आ जैन धर्म तँ सहजहि अन्हर–बिहाड़ि जकाँ आएल आ चलि गेल। ओ वसात ककरो लगलैक ककरो नहिओ लगलैक। बुद्ध मध्यम मार्गक समर्थक छलाह। हुनक कथन छलन्हि जे आत्मा निरोधक माध्यमसँ आत्माक उन्नति भऽ सकइयै। शील, समाधि आ प्रज्ञाकेँ इ लोकनि उत्कृष्ट यज्ञ कहलन्हि। वैशालीमे बौद्धधर्मक प्रधानता विशेष छल आ ओतए बौद्ध लोकनिक दोसर संगीति भेल छल। ओहिमे किछु क्रांतिकारी निर्णय सेहो लेल गेल छल। महायान गीतासँ प्रभावित कहल जाइत अछि। बौद्ध धर्मक उत्थानक पाछाँ वैदिक परम्पराकेँ मिथिलामे किछु चोट लगलैक। मिथिला शीघ्रहि ओहि घातक आक्रमणसँ हटिके पुनः अपना पैरपर ठाढ़ भेल। पूर्वी भारतमे आर्य संस्कृतिक प्रथम मान्य केन्द्र रहला उत्तरो मिथिलामे धार्मिक क्षेत्रक प्रधानता छल शिव, शक्ति आ विष्णुक। त्रिपुण्ड चाननक प्रतीक इएह तीनु देवता छथि। मिथिलाक सर्वश्रेष्ठ इश्वर शिव छथि जनिका भैरव सेहो कहल जाइत छन्हि आ एहेन शायदे मिथिलामे कोनो गाम हैत जतए शिवमन्दिर अथवा भैरव मन्दिर नहि हो। एकमुख लिंगसँ चतुर्मुख लिङ्गक अवशेष मिथिलाक कोन–कोनसँ भेटल अछि। प्राचीन अभिलेखमे सेहो शिव माहेश्वरक विवरण अछि। संग्राम गुप्तक अभिलेखमे शिवक वाहन नन्दीक विवरण सेहो अछि। मिथिला कवि लोकनि सेहो शिवक महिमाक गुण–गान कएने छथि–विद्यापतिसँ चंदा झा धरि। शक्तिक प्रधानता सेहो मिथिलामे ओतवे रहल अछि। शक्तिक संगहि संग एतए तंत्रक प्रचार सेहो विशेष रूपें भेल अछि आ मध्यकालीन मिथिलाक देवादित्य, वर्धमान, मदन उपाध्याय आदि शाक्त आ तांत्रिक छलाह। मिथिलामे नेना सभकेँ जे पहिल पाठ देल जाइत अछि ताहुसँ तंत्रक झलक भेटइयै आ अरिपन इत्यादिक आधार तँ तंत्र अछिये। मात्रिका पूजा शक्ति पूजाक प्रतीक थिक। पाग बनेबाक कला तंत्रसँ प्रभावित अछि। मिथिलाक एहेन कोनो धार्मिक अवसर नहि अछि जाहिमे शक्तिक उपासना नहि होइत हो। खोजपुरसँ एकटा दुर्गाक प्रतिमा (अभिलेख सहित) सेहो भेटल अछि। नेपालक तुलजादेवीक स्थापनाक श्रेय मैथिलेकेँ देल जाइत छन्हि। एवँ प्रकारे मिथिलामे शिवशक्तिक प्रभाव तँ छलाहे आ अधुना अछियो। मुदा मध्ययुगमे मिथिलामे वैष्णव धर्मक प्रभाव सेहो ओतबे छल। भागवत, हरिवंश आ ब्रह्मवैवर्त्त पुराणसँ मिथिलाक वैष्णव धर्म प्रभावित छल। कृष्णक प्रभाव मिथिलामे कोनो रूपे कम नहि छल। प्राक्–विद्यापति युगसँ एकर प्रभाव देखबामे अवइयै। उमापति भवानी, हरि आ शिवक उल्लेख अपन परिजातहरणमे केने छथि। चण्डेश्वर अपन कृत्यरत्नाकरमे गौरी आ शंकरीक संगहि संग मत्‍स्य आ कच्छप अवतारक उल्लेख सेहो केने छथि। पूजा रत्नाकरमे तँ शिव, विष्णु, दुर्गा आ सूर्यक पूजाक तांत्रिक विधिक वर्णन अछि। ज्योतिरीश्वर धूर्तसमागममे अपना शिवक पक्षधर कहने छथि। विद्यापति सब देवी–देवतापर गीत बनौने छथि। हुनक दुर्गाभक्ति तरंगिणीमे दुर्गापूजाक विधि अछि, शैव सर्वस्वसारमे शिवक महिमा अछि, ब्याढ़ि–भक्तितरंगिणीमे सर्पपूजाक विधान अछि आ वर्षकृत्यमे वर्ष भरिक कृत्यक विवरण। जतेक साहित्यकार आ दार्शनिक मिथिलामे भेल छथि सब कोनोने कोनो रूपे शिव, विष्णु, शक्ति, सूर्य आदि देवी–देवताक बन्दना केने छथि तैं ककरो कोनो सम्प्रदायमे बान्हिकेँ राखब उचित नहि बुझना जाइत अछि। हरपति आगमाचार्य अपन मंत्र प्रदीपमे शैव–शाक्त आ वैष्णव देवी देवताक उल्लेख कएने छथि। विष्णुपुरीक विष्णु पूजा कल्पलता एवँ भक्ति रत्नावली वैष्णव धर्मक एकटा प्रधान स्तंभ थिक। वैष्णव धर्मक प्रसार–प्रचारमे गीत गोविन्दक विशेष हाथ रहल अछि। कृष्ण अवतारक संगहि संग सर्वश्रेष्ठ देवतो मानल जाए लग लाहे। ११–१२म शताब्दीमे नान्यदेवक मंत्री श्रीधर दास कमलादित्य (विष्णु)क एकटा मन्दिर बनौलन्हि। प्राचीन मिथिलामे विष्णुपूजाक तिथि सेहो निश्चित् रहैत छल। विष्णुक सब अवतारक पूजा होइत छल। भगीरथपुर अभिलेखसँ ज्ञात होइछ रानी अनुमतिक आज्ञासँ माधवक मन्दिर बनाओल गेल छल। विष्णुक प्रभाव मिथिलामे कतेक छल से एहिसँ बुझल जा सकइयै जे उमापति अपन पारिजातहरणमे हरिसिंह देवकेँ विष्णुक दशम अवतार मनैत छथि आ विद्यापति शिवसिंहकेँ एकादशम अवतार। नरसिंह ठाकुर कृष्णक उल्लेखक संदर्भमे वंशीवट एवम मुरलीक उल्लेख सेहो केने छथि। विद्यापति स्वयं भागवतसँ अवगत छलाह। विद्यापतिक पूर्व आ विद्यापतिक बादो वैष्णव धर्म आ पदावलीक धार बहिते रहल आ एकर प्रमाण इ अछि जे विद्यापतिक बहुत दिन बादो मनबोध अपन प्रसिद्ध काव्य “कृष्ण जन्म” (हरिवंश)क रचना केलन्हि। तंत्रक प्रधानता मिथिलामे प्राचीन कालसँ रहल अछि। तंत्रक माध्यमे मिथिलामे हेवनि धरि बहुतो साधक भऽ गेल छथि। तंत्रक विकासक भूमि मिथिलोकेँ मानल गेल अछि “गौड़े प्रकाशिता विद्या मैथिलैः प्रबलीकृता। क्वचित् क्वचिन्महाराष्ट्रे गुर्जरं प्रलयं गताः”॥ बंगालमे उत्पन्न भेलोत्तर तंत्र मिथिलेमे आबिकेँ दृढ़ भेल। नवन्यायक जन्मदाता गंगेशक सम्बन्धमे किंवदंती अछि जे ओ कालीक साधना कऽ कए ओतेक पैघ विद्वान भेल छलाह। तंत्रपर मिथिलामे बहुत रास पोथी सेहो लिखल गेल अछि। देवनाथ ठाकुरक तंत्र कौमुदी एहि दृष्टिकोणे बड्ड महत्वपूर्ण अछि। हुनक दोसर पोथीक नाम अछि मंत्र कौमुदी आ इ दुनू पुस्तक तांत्रिक विधिमे ज्ञान प्राप्त करबाक हेतु महत्वपूर्ण मानल गेल अछि। नरसिंहक लिखल ताराभुक्ति सुधार्णव सेहो महत्वपूर्ण पोथी मानल गेल अछि। एहिमे केवल तारेक नहि अपितु समस्त शक्तिक पूजा विधि अछि आ एकर ग्यारहम अध्यायमे काली भक्ति सुधार्णव सेहो अछि। ताराक संग कालीकेँ अनबाक औचित्यपर विचार करैत लिखल गेल अछि।- “यथा काली तथा तारा या तारा कालिकैव सा। उभयोर्नहि भेदोऽस्ति। इति गन्धर्वतंत्र वचनात् काली विधिरपि निरूप्यते”॥ हरिपति आगमाचार्य मंत्र प्रदीपक रचना केलन्हि। कुमार गदाधर शारदा तिलकपर टीका लिखलन्हि आ ओहि ग्रंथक नाम रखलैन्ह तंत्र प्रदीप। वामाचार आ कुलाचारक दृष्टिये साधक मण्डन आ भवानी भक्ति मोदिका महत्वपूर्ण पोथी मानल जाइत अछि। कहल गेल अछि जे कलियुगक तंत्रे प्रधान अछि आ शूद्र–शोलकन्हिमे एकर विशेष प्रचलन रहत। निम्नलिखित श्लोकसँ एकर स्वरूप बुझबामे आओत– “यद्यप्येते प्रयोगाः कालीं तारां वाधिकृत्य प्रोक्तः तमागम। यथा काली तथा नीला यथा नीला तथोन्मुखौ॥ यथोन्मुखी तथा दुर्गा नाम्ना भेदोऽस्ति कुत्रचित्॥ प्रणम्य पार्वतीनाथं स्वगुरूंच विनायकम् ईशान्नाथः करोत्येनां भवानी भक्ति मोदकाम्। कुलर्णिवे सर्वेभ्यश्चोत्तमा वेदा वेदोभ्यो वैष्णवं परम्। वैष्णवादुतमं कौलं कौलइत् परतरं नहि॥ कौलं कुलधर्म प्रतिपादकं शास्त्रं भवानी भक्ति युक्तमित्यर्थः। विहाय सर्वधर्मांश्च नानागुरू मतातिच। जपार्चामेव जानीयान्नान्य चिंता विधीयते”॥ घनानंद दास नामक एकटा मैथिल कर्ण कायस्थ प्रख्यात तांत्रिक मिथिलामे भऽ गेल छथि। सूर्यपूजाक विधान सेहो मिथिलामे छल आ एकर प्रचार सेहो। गुप्त युगक बादसँ सूर्यपूजाक प्रधानता मिथिलामे बढ़ल छल आ मिथिलाक विभिन्न क्षेत्रसँ सूर्य मूर्त्तिक भग्नावशेष सभ भेटल अछि जाहिमे बरौनीसँ प्राप्त एकटा मूर्त्ति अखनो बेगूसरायक संग्रहालयमे राखल अछि। कलात्मक आ धार्मिक दुनू दृष्टिकोणसँ इ मूर्त्ति महत्वपूर्ण अछि। एकर अतिरिक्त सबसँ महत्वपूर्ण वस्तु इ जे ओइनवार शासक नरसिंह देव सहरसा जिलाक कन्दाहा गाममे एकटा सूर्यक मन्दिर बनबौलन्हि जे अहुखन विराजमान अछि आ जाहिपर एकटा अभिलेख सेहो अछि। भवादित्यक मन्दिरक नामे अखनो ओ मन्दिर ओतए प्रसिद्ध अछि। मिथिलाक चारूकातसँ प्राप्त अभिलेख मिथिलाक धार्मिक एवँ सामाजिक आर्थिक जीवनपर पूर्ण प्रकाश दैत अछि आ ओहिसँ इहो बुझना जाइत अछि जे हिन्दू धर्मक विभिन्न सम्प्रदायक मान्यता एहि क्षेत्रमे छल। पालशासक लोकनि कक्ष विषय (कौशिकी कक्ष)मे शिवमन्दिरक निर्माण हेतु दान देने छलाह। एहि सभसँ स्पष्ट होइछ जे कोनो विशेष संप्रदायक प्रति आकृष्ट नहि भऽ एहिठामक लोग सभ देवी देवताक अर्चना करैत छलाह आ धार्मिक दृष्टिकोणमे ओहि अर्थे उदार छलाह। महिषीक महत्व:- तांत्रिक दृष्टिकोणसँ मिथिलामे महिषीक उल्लेख करब आवश्यक भऽ जाइत अछि। गामसँ बाहर आग्नेय कोणमे पश्चिमाभिमुख एकटा मन्दिर अछि। ताहि मध्य एकटा नील सरस्वती अक्षोभ्य ऋषि सहित तारामूर्ति विराजित छथि। एहिठाम दूर–दूरसँ लोक अनुष्ठानार्थ अबैत छथि। नवरात्रमे विशेष उत्सव होइछ। ओहिठाम तारा, नील सरस्वती, एकजला, लक्ष्मीनारायण, त्रिपुरसुन्दरी, सीतला, तारानाथ आदि देवी–देवताक मूर्त्ति अछि आ ६टा कुंड सेहो जकर नाम क्रमशः अछि– ताराकुंड, ताराकंचुकीकुण्ड, वशिष्‍ठकुण्ड, गौतमकुण्ड, अक्षोभ्यकुण्ड, आ मानसरोवरकुण्ड। एहि सभ कुण्डक वर्णन चीनाचार तंत्रमे पाओल जाइत अछि “वशिष्‍ठकुण्डं पापघ्नं, कुण्डं च गौतमाभिधां अक्षोभ्यकुण्डं सफलं, चैतज्जाभ्य दिशिस्मित। तत समीपे महेशाजि सरोमानससंज्ञकम् माहिष्मत्याश्चमहात्मश्रृणु साध्वि बरानने। वशिष्ठं समानिता तारणी चीन देशतः नारिभ्येन जटाशक्ति तथा नील सरस्वती अक्षोभ्य गरूणायुक्ता स्थापिता यत्रसुन्दरी”॥ कहल जाइत अछि जे चीनाचार तंत्र नामक पोथी दरभंगा राजक पुस्तकालयमे अछि। मैथिली परम्पराक अनुसार दक्ष एकटा यज्ञक आयोजन केलन्हि जाहिमे ओ ने शिव आ ने पार्वतीकेँ आमंत्रित केलन्हि। ओतए सती पार्वती अपन बापक ओत यज्ञक कथा सुनि पहुँचलीह आ ओतए अपन पतिक अपमान देखि यज्ञ कुण्डमे कुदि पड़लीह। शिवकेँ जखन एहि बातक भान भेलन्हि तँ ओ ओतए पहुँचलाह आ सतीक शरीरकेँ अपना कन्हापर उठौलन्हि। शिवकेँ एहेन तमतमाएल देखि विष्णुक चिंतित हैव स्वाभाविके छल आ तैं ओ अपन चक्र घुमौलन्हि जाहिसँ सतीक देह कटि–कटिकेँ ठाम–ठाम खसए लागल। सतीक आँखि महिषीमे खसल आ तहियेसँ महिषी तंत्रक एकटा प्रधान केन्द्र बनि गेल। एकटा दोसर परम्पराक अनुसार अति प्राचीन कालमे महिषीमे असूर लोकनिक अड्डा छल आ ओकरे नियंत्रित करबाक हेतु वशिष्ठ चीनसँ शक्तिकेँ अनने छलाह। महिषीकेँ महिषासुरक राजधानी सेहो कहल गेल अछि। सभ ठामक आ सभ तरहक तांत्रिक लोकनिक जमघट एहिठाम प्राचीन कालहिसँ होइत अछि। महिषीक नील सरस्वतीकेँ तांत्रिक लोकनि महानील सरस्वती मनैत छथि जकर अप्रत्यक्ष उल्लेख हमरा लोकनिकेँ पाल अभिलेखमे “उरूनील पद्मा”क रूपमे भेटइत अछि। महिषीकेँ सिद्धपीठ सेहो मानल गेल छैक- “कमला विमला चैव तथा माहिष्मतीपुरी वाराही त्रिपुरा चैव वाग्मती नील वाहिनी”। मिथिला महात्म्य आ शक्तिपीठमे सेहो एकर विवरण भेटइत अछि। ओहि क्षेत्रमे वाणेश्वर महादेव सेहो अछि जकर स्थापनाक श्रेय वाणासूरकेँ देल जाइत छैक। तारा, भवादित्य आ वाणेश्वर महिषीक त्रिकोण तंत्र थिक जाहिसँ महिषीक तांत्रिक केन्द्र होएबाक प्रमाण पुष्ट होइत अछि। एकटा लोकगीत अछि- “भवा भवादित्य देवना महेश बनगाँ दुर्गा मिटे कलेश बोलोरे मधुरी वाणी दुर्गा”। महिषीसँ थोड़ेक दूरपर मधेपुरामे प्रसिद्ध सिंहेश्वरक मन्दिर सेहो अछि। महिषीमे मण्डन–शंकराचार्य विवाद भेल छल। ताँत्रिक केन्द्रक हिसाबे मिथिलामे कात्यायनी स्थान आ जयमंगलागढ़क सेहो बड्ड महत्व अछि। प्राचीनकालमे संभवतः जयमंगला गढ़ तांत्रिक बौद्धक केन्द्र रहल होएत। जयमंगला गढ़क उल्लेख मैथिली परम्परामे सेहो अछि आ पुरातात्विक दृष्टिकोणसँ तँ ओ पुराण स्थान अछिये। मिथिलामे तंत्रक प्रचारक जे रूप रहल हो से अलग बात मुदा एतवा धरि निश्चित अछि जे एहिठाम आदि कालहिसँ शक्ति पूजाक बड्ड महत्व रहल अछि आ अहुखन मिथिलामे घरे–घर गोसाउनिक पूजा होइते अछि। मैथिल तांत्रिक विशेष कए वामाचारक पक्षधर होइत छलाह। मिथिलामे कौल आ दशमहाविद्याक प्राधान्य छल। काली, तारा, भुवनेश्वरी, दुर्गा, पार्वती, आदिशक्तिकेँ विशेष महत्व देल जाइत छल। मिथिलाक तांत्रिकमे वामाचार आ दक्षिणाचार दुनू पाओल जाइत छथि। तंत्रक फलहि एहिठाम अभिचारकर्मक प्रारंभ भेल। लक्ष्मीधर ६४तंत्रक नाम गिनौने छथि। शूद्र आ मिश्रित जातिक लोगक हेतु वामाचारमे विशेष स्थान छल। ओना तंत्रक साधनामे जाति–पातिक कोनो विशेष महत्व नहि छल। तंत्र मिथिलाक धार्मिक जीवनक एकटा मुख्य अंग छल आ अध्ययन–अध्यापनक अतिरिक्त मिथिलामे एकर साधना सेहो कैल जाइत छल। दक्षिणाचार प्रतिष्ठित बुझल जाइत छल। कहल जाइत अछि जे तंत्र लऽ कए मिथिला आ चीनक सम्पर्क भेल छलैक। मिथिलामे अहुखन नवरात्रक विशेष महत्व अछि आ अहुँसँ एकर तंत्रसँ प्रभावित हैव सिद्ध होइत अछि। दार्शनिक पृष्ठभूमिमे मिथिलामे जे धार्मिक विकास भेल ताहि फले मिथिलामे कर्मकाण्डक अभिवृद्धि भेल आ इ मिथिलाक साँस्कृतिक जीवनक एकटा प्रधान अंग बनि गेल। कर्मकाण्डक विकास एहिठाम प्राचीन कालमे भेल आ एखनो हमरा लोकनिक जीवन एवँ संसारपर एकर प्रभाव देखबामे अवैत अछि। वर्णाश्रमक विकासक संगहि संग कर्मकाण्डो अपना लोकनिक जीवन संस्कारक एक प्रमुख अंग बनि गेल अछि। कर्मकाण्डपर अनेकानेक ग्रंथ मिथिलामे लिखल गेल अछि आ कर्णाट कालमे वीरेश्वर, गणेश्वर आ रामदत्त एहिपर कतेको पोथी लिखने छथि। चण्डेश्वरक ‘गृहस्थरत्नाकर’ आ ‘कृत्यरत्नाकर’ तथा ‘पूजारत्नाकर’ एहि दृष्टिकोणसँ बड्ड महत्वपूर्ण अछि। मिथिलाक मुख्य संस्कार जे सभ वर्णमे देखल जाइत अछि से भेल नामकरण, चूड़ाकरण, उपनयन आ विवाह। इ सभ कार्य मिथिलामे अपना पद्धतिक अनुसार होइत छल। प्राचीन मिथिलामे जैमिनीय कर्म मीमाँसा समादृत छल आ एखनो एकरे प्रधानता अछि। कर्मकाण्डक पुष्टिकरणक हेतु तँ महाराज भैरवसिंहक शासन कालमे जरहटिया गाममे १४००मीमाँसक एक महान सम्मेलन भेल छल। जरहटियामे सभसँ पैघ पोखरि अछि जकर यज्ञ बड्ड उत्साहसँ भेल छल जाहिमे देश देशांतरक राजा आ विद्वानकेँ बजाओल गेल छल। लंकाक राजाकेँ आमंत्रित करबाक हेतु चौहान संग्राम सिंह आ केसरी सिंहकेँ पठाओल गेल छलन्हि। मैथिल लोकनि श्रौत, स्मार्त आ आगम तीनू कर्मकाण्डक अनुष्ठानक विधि लिखने छथि। एहि दृष्टिकोणसँ गोकुल उपाध्यायक कुण्डकादम्बरी महत्वपूर्ण मानल गेल अछि। एकर अतिरिक्त संध्या तर्पण आ एकोदिष्टसँ पार्वनक नियम सेहो मैथिल लोकनिक ओतए प्रचलित अछि। मैथिल श्रीदत्तक ‘आह्निक’क प्रचलन एखनहुँ देखबामे अबैछ। विद्यापतिक ‘वर्षकृत्य’ सेहो एहि दृष्टिकोणसँ महत्वपूर्ण अछि। कर्मकाण्डपर अनेकानेक ग्रंथक प्रणयन भेल छल जाहिमे देशकर्म पद्धतिक बड्ड नाम छल। पूर्व–मीमाँसक लोकनिक ध्यान सेहो एहि दिशि गेल छलन्हि। श्राद्ध कर्मपर सेहो अनेकानेक ग्रंथक रचना भेल। शिव शक्ति आ विष्णु पूजाक विधानपर सेहो पोथी लिखल गेल। नारायण पालक अभिलेखसँ ज्ञात होइछ जे कौशिकी कक्ष क्षेत्रमे एक हजार शिव मन्दिर बनल छल। मिथिलामे त्रिमूर्त्ति (ब्रह्मा–विष्णु–महेश)क कल्पना बड्ड पुरान रहल अछि। मुदा व्यवहारमे देखबामे इएह–अवैत अछि जे मिथिलामे शिव आ शक्तिक जनप्रियता विशेष रहल अछि। तंत्रक प्रधानता ताहु दिनमे छल आ एखनो अछि। तांत्रिक केन्द्र होएबाक कारणे मिथिलाक प्रसिद्धि विशेष छल आ बाहरोसँ लोक एहिठाम अबैत जाइत छलाह। शक्ति पूजाक विराट रूप अखनहुँ मिथिलामे देखल जाइत अछि। नवरात्रक महत्व अखनो एतए बड्ड अछि। तंत्रक प्रभाव तँ एहिठामक वेश भूषा आ साधारण जीवनमे अखनो देखबामे अवइयै जेना अइपन, साँवर पूजा, पाग, त्रिपुण्ड इत्यादि। मातृकापूजाक प्रथा प्राचीन कालसँ अद्यावधि विराजमान अछि। वर्णरत्नाकरमे विभिन्न प्रकारक सम्प्रदायक उल्लेख अछि आ ओहिसँ इहो ज्ञात होइछ जे एहिठाम नाथ पंथ आ अन्यान्य मतक विकास सेहो भेल छल। धर्मस्थान आ सिद्ध लोकनिक वर्णन सेहो ओहि पोथीमे अछि। ज्योतिरीश्वर ‘बौद्ध पक्ष’क व्यवहार केने छथि आ ओहि संगे उदयनक उल्लेख सेहो। पावनितिहारक उल्लेख हमरा लोकनिकेँ चण्डेश्वरक कृत्यरत्नाकरसँ भेटइत अछि। फागुन मासमे होलीक उल्लेख भेल अछि। प्रत्येक मासमे कोनो ने कोनो उत्सव होइते छल। प्रत्येक पूजाक अवसरपर यज्ञ आओर दानक व्यवस्था छल। स्कंद पूजा दीपजराकेँ होइत छल। कार्तिकेयक व्रतक बड्ड महत्व छल। हिन्दोल चैत्र, मदन द्वादशी, वसंतोत्सव, अक्षयतृतिया, गौरीव्रत, गंगा दशहरा, मत्स्य–द्वादशी, दुर्गाक रथयात्रा, पितृपक्ष, नवरात्र, देवोत्थान एकादशी, कोजागरा, शिव चतुर्दशी, आदि पावनिक नाम चण्डेश्वर लिखने छथि। मिथिलामे बिहुला पूजा, इन्द्रपूजा, कृष्णाष्टमी, गणेश चतुर्थी, जीतिया, धन्वन्तरी पूजा, दीपावली, सामाचकेबा, मधुश्रावणी, नेवान्न आदिक विधान सेहो बनल अछि। हरिहर क्षेत्रक स्थान सेहो प्राचीन कालहिसँ प्रसिद्ध रहल अछि। मिथिलामे मुसलमानक एलाक बाद दुनू संप्रदायक बीच क्रमेण समन्वय स्थापित भेल आ मिथिला क्षेत्र सूफी लोकनिकेँ विशेष रूपें आकृष्ट केलक। ज्योतिरीश्वर आ विद्यापतिमे जे अरबी–फारसी शब्द भेटइयै ताहिसँ स्पष्ट भऽ जाइछ जे मिथिलामे मुसलमानक सम्पर्क पूर्वहिसँ रहल होइत। इस्लामी संस्कृतिक प्रभाव मिथिलाक धर्म आ संस्कृतिपर पड़ल होएत एहिमे कोनो सन्देह नहि। सत्यनारायण पूजा एकर एकटा प्रमाण देल जा सकइयै। मिथिलाक मुसलमानोपर एहिठामक संस्कृतिक प्रभाव पड़ल। तजिया दाहामे मैथिल लोकनि सेहो सक्रिय भाग लैत छथि। अकबरक चलाओल फसली संवतक व्यवहार मिथिलामे विशेष अछि। मैथिलीरागमे इमान आ फिरदौस मुसलमानी संपर्कक देन थिक। मुसलमान लोकनि मिथिलामे रहि मैथिल संस्कृतिसँ प्रभावित भेलाह आ सूफीक अप्रत्यक्ष प्रभाव तँ मिथिलाक भक्ति भावनापर देखले जा सकइयै। लोरिक कथापर आधारित दाउद अपन प्रेमकाव्य चन्दायन लिखने छथि। एवँ प्रकारे साँस्कृतिक समन्वय दुनू संस्कृतिमे भेल। अंग्रेजक आवागमनसँ अहुस्थितिमे परिवर्त्तन भेल मुदा मिथिलाक कट्टरता मिथिलामे इसाई धर्मक दालिकेँ गले नहि देलकन्हि। ओना ठाम–ठाम गिरिजाघर फूजल मुदा ताहिसँ कोनो प्रभाव मिथिलाक जनजीवनपर नहि पड़ल। धर्ममे एहिठाम अखनो कर्मकाण्डी लोकनिक संख्या विशेष अछि आ कट्टर मैथिल अखनो सहजहि अपन अधिकार छोड़बा लेल प्रस्तुत नहि होइत छथि। ओ क्रियाकर्मकेँ विशेष महत्व दैत छथि आ अपन पद्धतिक अनुसार सभ काज करबाक पक्षपाती होइत छथि। दर्शन:- मिथिला प्राचीन कालहिसँ दर्शनक एकटा प्रधान केन्द्र रहल अछि। ब्रह्मविद्याक जन्मदाता जनक जाहि दर्शनक श्रीगणेश केलन्हि तकर अभिवृद्धि दिनानुदिन होइत गेल आ मिथिला अपन न्याय आ दर्शनक हेतु जगत्प्रसिद्ध भऽ गेल। “ततत्वंअसि”क मूलमंत्र हमरे लोकनि देने छी जकर विश्लेषण बादक प्रकाण्ड पण्डित लोकनि विभिन्न रूपे कएने छथि। माया, कर्म, मुक्ति, आत्मा सभहिक विश्लेषण राजा जनकक ओहिठाम भेल छल। धर्म मनुष्यक आन्तरिक सुखानुभूतिक वस्तु थिक–एहु सिद्धांतक विवेचन मिथिलेमे भेल अछि आ शतपथ ब्राह्मणमे कहल गेल अछि– “मनश्चहं वैवाकच भुजो देवभ्यो यज्ञः वहतः”– स्मरण रखबाक वस्तु इ अछि जे प्राचीन परम्पराक अवहेलना राजा जनक यज्ञ करबाक अधिकारक घोषणासँ कैलन्हि आ यज्ञ सेहो बिना पुरोहित वर्गक हस्तक्षेपकेँ। ओहि युगक हिसाबे इ एक महान क्रांतिकारी बात छल जकर नेतृत्व कए जनक पूर्वी भारतमे एकटा नव कीर्त्तिमानक स्थापना केलन्हि आ भविष्यक हेतु मार्गदर्शन सेहो। जखन ओ इ काज सफलता पूर्वक कऽ लेलन्हि तखन हुनक अभिलाषा तँ पूर्ण भेवे केलन्हि मुदा एकरा संगहि संग इहो मान्य भेल जे कर्मक माध्यमसँ सभ केओ सभ किछु भऽ सकइयै। उपनिषद साहित्य मिथिलाक एहि गुण गौरवसँ भरल–पुरल अछि। जनकक एहि प्रतिज्ञासँ मिथिलामे एक नूतन युगक आविर्भाव भेल। आत्माक तत्वज्ञक हेतु संसारमे कोनो बाधा नहि रहि जाइत छैक। एहि सत्यक विवेचन मिथिलहिमे भेल अछि– “तरति शोकं आत्मवित्”– आओर एकरहि संगहि संग इहो कहल गेल अछि जे “ब्रह्मविद् बहमैव भवति”। ब्रह्मक जननिहारे ब्राह्मण कहबैत अछि। बृहदारण्यक उपनिषदमे एहि सभ बातक स्पष्टीकरण भेल अछि। राजा जनकक ओहिठाम दूर–दूरसँ दार्शनिक लोकनि अवैत छलाह आ तैं मिथिलाकेँ दार्शनिकक भूमिए कहल गेल अछि। साँस्कृतिक दृष्टिकोणसँ तँ ओहुना उपनिषद युग भारतीय संस्कृतिक चरमोत्कर्ष मानल गेल अछि। मिथिलामे प्रारंभहिसँ छात्र लोकनिकेँ दार्शनिक शिक्षा देल जाइत छलन्हि आ एहि प्रकारे दार्शनिक शिक्षाक पृष्ठभूमि बनाओल जाइत छल। एहिठाम कुरू–पाँचाल धरिसँ लोग दार्शनिक शिक्षा लेबए अबैत छलाह। जनक स्वयं अपने पैघ–पैघ विद्वानसँ शिक्षा प्राप्त केने छलाह। हुनका दरबारमे पैघ–पैघ विद्वान सेहो रहैत छलथिन्ह। ओ अश्वमेध यज्ञ सेहो केने छलाह। ब्रह्मवैवर्त्तमे कहल गेल अछि जे निमी आ हुनक उत्तराधिकारी जनक वैदेह आयुर्वेदपर सेहो लिखने छलाह। एहि युगमे गौतम आ कपिल आयुर्वेद शास्त्रपर सेहो लिखने छलाह। चक्रपाणि शुश्रुतक टीकामे कपिलक उल्लेख केने छथि। व्यास निदान ग्रंथक टीकामे गौतमक उल्लेख केने छथि। मिथिला गयायुर्वेद (गाय बड़दक आयुर्वेद)पर सेहो एकटा ग्रंथ एहियुगमे लिखल गेल छल मुदा ओकर कोनो प्रमाण अखन नहि भेट रहल अछि। शुश्रुत अपन पोथी उत्तरतंत्रमे विदेह राज्यक वर्णन कएने छथि– “शाकल्य शास्त्राभिहिता विदेहाधिप कीर्तितः”। न्यायशास्त्रक प्रणेता महर्षि गौतम मैथिल छलाह। गौतमक अक्षपादक उल्लेख चीनी यात्रीक विवरणमे सेहो भेटइत अछि। राहुलजीक अनुसार अक्षपाद, वात्साययन आ उद्योतकर मैथिल छलाह। याज्ञवल्क्यक जीवन चरित्र तँ सहजहि मिथिलाक साँस्कृतिक इतिहासक जीवन चरित्र थीक। केओ केओ हुनका योगदर्शनक अगुआ सेहो मनैत अछि। “योगीश्वरं याज्ञवल्क्यं संपूज्य मुनयोऽब्रुवन्”। याज्ञवल्क्यक सामाजिक ओ सांस्कृतिक विचार उदार छल। गौतम, कपिल, ऋषि श्रृंग्य (मधेपुराक स्थित श्रृंगेश्वरक संस्थापक), विभाण्डक, सतानन्द, वेदवती आदि विद्वान–विदुषी मिथिलाक गौरवकेँ उठौने छथि। सामान्यतया दर्शनक संख्या ६ मानल गेल अछि। नास्तिक दर्शन विश्वक प्रत्यक्ष रूपकेँ निरूपण केनिहार शास्त्र थिक। नाम, रूप, कर्मवाला पदार्थक (प्रत्यक्ष जगतक) नास्तिक दर्शन जतेक गंभीरतापूर्वक विचार केलक अछि ततेक आस्तिक दर्शन दृश्य जगतपर नहि। एहि तथ्यकेँ दृष्टिमे राखि नास्तिक दर्शनक अवहेलना नहि कैल जा सकइयै। ओकर ज्ञान राखब आवश्यक। वेदांत निर्गुण आत्मा मानैत अछि। जैन दर्शनक मुक्तिक तीन प्रधान मार्ग अछि– सम्यग् दर्शन, सम्यग् ज्ञान आ सम्यग् चरित्र। वैशेषिकक उद्देश्य प्रधान तथा विश्व थिक। वैशेषिक दर्शन ईश्वरक द्वारा साक्षात सृष्टिक उद्भव नहि मानि ईश्वरक इच्छासँ सृष्टिक प्रवृत्ति मानैत अछि। अणुवाद एहि तंत्रक प्रिय धरातल थिक। महामुनि कपिल वैशेषिक तंत्र संमत परमाणुवादसँ संतुष्ट नहि छलाह। वैशेषिक दर्शनक प्रधान लक्ष्य अधिभूत प्रपंच थिक– द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय– जकर आधिभौतिक जगतसँ सम्बन्ध मानल गेल अछि। साँख्य एहि सभसँ अतिरिक्त एक पुरूष सत्ता आर मनलक अछि। कपिलक दर्शन साँख्य नामे विख्यात अछि। साँख्यतंत्र प्रकृतिकेँ जगतक कारण मनलक अछि। प्रकृति जगतक कर्त्री थिकीह। “प्रकृतिः कर्त्री, पुरूषस्तु पुष्करपलाशवत् निर्लेपः किंतु चेतनः”। वैशेषिक परमाणुसँ विश्वक उत्पत्ति मानैत अछि। इ दर्शन स्थूल शरीर सम्बन्धी भूतक व्याजसँ सांसारिक पदार्थक साधर्म्य एवँ वैधर्म्यक निरूपण केलक अछि। नास्तिक दर्शनकेँ शास्त्रार्थ द्वारा परास्त करबाक उद्देश्यसँ तर्कशास्त्रक निर्माण भेल। विदेहक राज्य सभामे एवँ याज्ञवल्क्यक सभापतित्वमे ब्राह्मण ग्रंथक निर्माणेटा नहि भेल अपितु गूढ़ धर्मतत्वक निर्णय सेहो। कर्मक अनुष्ठान करबामे कृष्ण विदेह राज जनककेँ सर्वश्रेष्ठ मनने छलाह आ ओकरे आदर्श मनैत छलाह। न्यायशास्त्रक उद्गम स्थल मिथिले अछि। गौतम एवँ कणाद मैथिल छलाह। भारतीय गूढ़ दर्शनक तत्वक विवेचना मिथिलामे प्रारंभ भेल छल आ ओहि परम्पराकेँ बादमे मण्डन, वाचस्पति, मदन, उदयनाचार्य, गंगेश, पक्षधर, आ शंकर मिश्र बढ़ौलन्हि। मिथिलामे पूर्व मीमाँसा आ वेदांत (उत्तर मीमाँसा)क पूर्ण रूपेण विकास भेल छल। कर्मकाण्ड (पूर्व मीमाँसा) आ ज्ञान काण्ड (उत्तर मीमाँसा)पर एहि ठाम विशद् विश्लेषण कैल गेल। वेदांतक माध्यमसँ ब्रह्म–जिज्ञासापर जोर देल गेल अछि। वेदांत उपनिषद्, गीता आ वादरायणक ब्रह्मसूत्रपर आधारित अछि। वेदांतक विश्लेषण बादमे बहुतो गोटए अपना–अपना ढ़ँगे केने छथि। न्याय आ मीमाँसाकेँ मिथिलाक अपूर्व देन मानल जाइत अछि। गौतमसँ गंगेश धरि दर्शनक इतिहास मिथिलाक एकटा स्वर्णिम पृष्ठ मानल गेल अछि। मीमाँसाकेँ प्रखर केनिहार छलाह कुमारिल, प्रभाकर आ मुरारी। मिथिलाक दर्शनक इतिहासमे कुमारिल आ शंकरक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल गेल अछि। ब्रह्मसूत्रपर टीका लिखि शंकर वेदांतकेँ आर जगजिआर केलन्हि। कुमारिल जैमिनीक मीमाँसा सूत्रक आलोचना केने छथि। हुनका भट्टक पदवी छलन्हि आ तै हुनक मतकेँ भट्टमत सेहो कहल जाइत छन्हि। मैथिल लोकनि हिनका मिथिलाकेँ मनैत छथि आ आनन्दगिरी शंकर दिग्विजयमे मण्डन मिश्रकेँ कुमारिलक भगिनीपति कहने छथि। भट्टपुराक निवासी कुमारिलकेँ मानल गेल अछि आ हुनका मतकेँ भट्टमत कहल गेल अछि। बौद्ध दार्शनिक धर्मकीर्तिसँ सेहो हुनका वाद–विवाद भेल छलन्हि। हिनक प्रसिद्ध पुस्तक अछि श्लोक वार्त्तिक, तंत्रवार्त्तिक, वृहत् टीका, मध्यम टीका इत्यादि। तंत्र वार्त्तिक शबर भाष्यपर टीका थिक। श्लोकवार्त्तिकपर बहुत रास मैथिल विद्वान सभ टीका लिखने छथि। भट्टमतक संस्थापकक रूपेँ ओ मिथिलामे प्रख्यात छथि। पूर्व मीमाँसा आ वेदांतक क्षेत्रमे मिथिलाक इतिहासमे मण्डन मिश्रक नाम अग्रगण्य अछि। एक परम्पराक अनुसार वाद विवादमे मण्डन शंकराचार्य द्वारा पराजित भेलाह आ शंकराचार्यक मत ग्रहण केलाक बाद ओ सुरेश्वराचार्यक नामे प्रसिद्ध भेलाह। अपन रचनासँ ओ बौद्ध दार्शनिक लोकनिकेँ धतौलन्हि। मण्डन–सुरेश्वराचार्यक मिलौनाइ विद्वानकेँ ग्राह्य नहि छन्हि। मैथिल परम्पराक अनुसार मण्डन महिषीक रहनिहार छलाह आ शंकर जखन वाद–विवादक हेतु आएल छलाह तखन ओ काफी बृद्ध भऽ गेल छलाह। ओ कुमारिलक बहनोइ छलाह आ हुनक पत्नी भारती अद्वितीय विदुषी छलथिन्ह। मण्डन भट्टमतक विशेषज्ञ आ व्याख्याता छला आ कुमारिलक तंत्रवार्त्तिकपर टीका लिखने छलाह। मण्डनक प्रसिद्ध पुस्तक अछि विधि विवेक, भावना विवेक, विभ्रम विवेक इत्यादि। अपन रचनाक आधारपर ओ अद्वैतक प्रवर्त्तक कहल जा सकैत छथि। हुनक अद्वितीय विद्याक हेतु शंकरकेँ एतए आबए पड़ल छलन्हि आ दुनूक बीच जे वार्त्तालाप भेल छल ताहिमे भारती सभापतित्व केने छलीह। मण्डनक ब्रह्मसिद्धि प्राक्–शंकर वेदांतक प्रसिद्ध ग्रंथ मानल गेल अछि। “स्वतः प्रमाण” (मीमाँसा वेदांत) आ “परतः प्रमाण” (न्यायादि) शब्द हुनक दार्शनिक ज्ञानक परिचय दैत अछि। ‘ब्रह्मसिद्धि’क “ब्रह्मतत्व समीक्षा”क अंशपर वाचस्पति टीका लिखने छलाह। मीमाँसाक क्षेत्रमे गुरूमतक प्रवर्त्तक प्रभाकर मिश्रक उल्लेख करब आवश्यक बुझना जाइत अछि। एहिमतकेँ प्रभाकर स्कूल सेहो कहल जाइत अछि। मीमाँसाक लोकनि हिनका गुरूक पदवी देने छथिन्ह। इ मण्डन मिश्रक सहपाठी छलाह। शबर भाष्य हिनको एकटा टीका छन्हि–‘बृहतिः’। प्रभाकरक मतकेँ गुरूमत, कुमारिलक मतकेँ भट्टमत आ मुरारि मिश्रक मतकेँ मिश्रमत कहल जाइत छैक। मुरारिक पथ हिनका दुनूसँ भिन्न छल। मुरारिक पथ ‘तृतीय पथ’ कहल गेल छैक। वाचस्पति मिश्रक नाम मिथिलाक दर्शनक इतिहासमे अद्वितीय अछि। ओ पूर्वी मिथिलाक निवासी छलाह आ ओम्हुरके राजाक दरबारमे रहैत छलाह। राहुलजीक अनुसारे वाचस्पतिक प्रसादे मिथिलाक दार्शनिक ज्ञान बाँचल, बढ़ल आ बौद्ध दार्शनिकक आक्रमणसँ बचि सकल। बौद्ध दर्शनक खण्डन कए ओ आदर्शवादी दर्शनक रक्षा केलन्हि। उद्योतकरक न्यायवार्त्तिकपर हुनक टीका प्रसिद्ध अछि। वाचस्पतिकेँ षडदर्शनवल्लभ, सर्वतंत्र स्वतंत्र आ द्वादश दर्शन टीकाकारक संज्ञा भेटल छलन्हि। हुनका तात्पर्चाचार्यक पदवी सेहो छलन्हि। शंकर भाष्य ब्रह्मसूत्र ओ जे अपन टीका लिखने छलाह तकर नाम छल भामती (अपन पत्नीक नामपर) जकर विशद विश्लेषण अखनो अपेक्षिते अछि। वेदांत साहित्यमे भामतीक स्थान अद्वितीय अछि आ ओहिमे ओ बौद्ध सिद्धांत ‘प्रतीत्य समुत्पाद’क उल्लेख सेहो केने छथि। तात्पर्य टीकामे ओ दिङ्नागक उक्ति देने छथि। षडदर्शनक सभ अंशपर ओ अपन विवेचन उपस्थित केने छथि आ ईश्वर कृष्णक साँख्यकारिकापर हुनक टीका साँखतत्व कौमुदी साँख्य साहित्यमे अद्वितीय स्थान रखैत अछि। मण्डन मिश्रक विधि विवेक आ ‘ब्रह्मसिद्धि’पर ओ क्रमशः न्यायकणिका एवँ तत्वसमीक्षा, तत्वबिन्दू नामक टीका लिखलन्हि। अपना युगमे ओ समस्त उत्तर भारतमे वेदांतपर एक मात्र अधिकारी विद्वान मानल जाइत छलाहे। न्यायकणिका न्यायक अपूर्व पुस्तक मानल गेल अछि। दर्शनक क्षेत्रमे हुनका सर्वज्ञ मानल गेल अछि। दृष्टिश्रृष्टिवाद एवँ जीवश्रृष्टि अविद्यापक्षक हुनका संस्थापक मानल गेल अछि। योगदर्शनक टीका रूपे ओ तत्ववैशारदी लिखलन्हि। एहिसँ इ प्रत्यक्ष भऽ जाइछ जे दर्शनक एहेन कोनो शाखा नहि छल जाहिपर ओ नहि लिखने होथि। हिनकहि प्रयाससँ समस्त न्यायशास्त्रपर मिथिलाक एकाधिपत्य भेल। इ बौद्ध दार्शनिक वसुबन्धुक उल्लेख सेहो कएने छथि। मीमाँसाक इतिहासमे पार्थसारथी मिश्रक नाम सेहो उल्लेखनीय अछि। शास्त्रदीपिका नामक पोथी हिनक प्रसिद्ध अछि। इ कुमारिलक समर्थक छलाह आ सालिकनाथ मिश्र प्रभाकरक। श्लोकवार्त्तिकपर पार्थसारथी मिश्रक टीका न्याय रत्नाकरक नामे प्रसिद्ध अछि। एकर बाद मिथिलामे अवतीर्ण भेलाह प्रसिद्ध नैयायिक उदयनाचार्य। इ न्यायशास्त्रक अद्वितीय विद्वान छलाह। किरणावली, कुसुमाँजलि, न्याय परिशिष्ट, न्यायवार्त्तिक, तात्पर्य परिशुद्धि, आत्मतत्वविवेक आदि हिनक लिखल प्रसिद्ध पुस्तक सभ अछि। न्यायक क्षेत्रमे ओ अद्वितीय मानल गेल छथि आ अपन तर्क प्रणालीसँ ओ बौद्ध लोकनिकेँ परास्त कए पूर्ण यश प्राप्त केने छलाह। मैथिली परम्परामे तँ एतेक धरि कहल गेल अछि जे ओ बौद्धसँ ततेक दूर रहए चाहैत छलाह जे ओ मिथिलासँ दूर जाके राजा आदिसूरक धर्माधिकरणिक बनि गेलाह। हुनक ग्रंथ लक्षणावलीसँ ज्ञात होइछ जे ९८४इ.मे ओ जीवित छलाह। आत्मतत्वविवेक चारि परिच्छेदमे बटल अछि– i) प्रथम परिच्छेदमे संसारक अस्थायित्वपर विचार भेल अछि। ii) दोसर परिच्छेदमे ओ आदर्शवादीक व्यक्तिगतक विश्लेषण करैत छथि। iii) तेसर परिच्छेदमे गुणसँ फराक ओ द्रव्यकेँ नहि मनैत छथि। iv) चारिम परिच्छेदमे इश्वरक हेबाक पक्षमे पूर्ण नैयायिकक तर्क उपस्थित केने छथि। इ हुनक सभसँ प्रसिद्ध ग्रंथ मानल गेल अछि आ एहिमे ओ बौद्ध लोकनिक पूर्ण आलोचना केने छथि आ बौद्धक अनात्मवादक विरूद्ध एहिमे आत्माक प्रतिष्ठाकेँ पुनर्स्थापित कैल गेल अछि। न्यायकुसुमाञ्जलिमे सेहो ईश्वरक स्तित्वपर विचार कैल गेल अछि आ बौद्धक दृष्टिकोणक आलोचना सेहो। तेरहम शताब्दीमे वर्द्धमान ‘प्रकाश’क टीका आ रूचिदत्त ‘मकरन्द’ नामक टीका एहिपर लिखलन्हि। वैशेषिकक दृष्टिकोणसँ उदयन अपन न्याय पद्धतिक स्थापना केने छलाह। नव–न्यायक प्रमुख संस्थापकमे हुनक नाम आएब स्वाभाविके। हुनका नामपर निम्नलिखित श्लोक प्रचलित अछि– “एश्वर्य मदमत्तोऽसि मामवज्ञाय वर्त्तसे पुनर्बौद्धे समायाते मदधीना तवस्थितिः” – मीमाँसाक अतिरिक्त मिथिलाक महत्वपूर्ण योगदान नव–न्यायक क्षेत्रमे रहल अछि। एहि नव न्यायक संस्थापक छलाह गंगेश उपाध्याय। उदयनाचार्य बौद्धक विरूद्ध जे तर्कपूर्ण विवाद प्रारंभ केने छलाह तकर स्वागत केलैन्हि बंगालक रघुनाथ शिरोमणि तथा मिथिलाक शंकर मिश्र आ भगीरथ ठाकुर। अत्रेय नारायणाचार्य आदि बादमे ओकर विशद विश्लेषण सेहो केने छलाह। उदयनाचार्यक पूर्वहिसँ मिथिलामे मण्डन–वाचस्पति दर्शनक जे एकटा अविच्छिन्न श्रृंखला चलौने छलाह तकर परिणति भेल गंगेशक नव–न्यायक स्थापनामे। करिऔनमे ताहि दिनमे दर्शनक अध्ययन–अध्यापनक एकटा प्रधान केन्द्र छल आ ओतहि भेल छलाह उदयनाचार्य आ ओहि केन्द्रक छात्र छलाह गंगेश उपाध्याय। पुरनका न्याय आ वैशेषिककेँ मिलाजुलाकेँ नवन्यायक जन्मदाता छलाह गंगेश। नव–न्यायपर श्रीहर्षक खण्डन–खण्ड–खाद्यक प्रभाव सेहो देखबामे अवइयै। गंगेश अपन तत्वचिंतामणिमे श्रीहर्षक मतक आलोचना केने छथि। गंगेशमे हमरा मीमाँसा आ वेदांतक आलोचना सेहो भेटइत अछि। ओ मात्र चारिटा प्रमाणकेँ मनैत छथि– i) प्रत्यक्ष, ii) अनुमान, iii) उपमान, आ iv) शब्द। पुनः प्रत्यक्षकेँ बारह वादमे, अनुमानकेँ सत्रह वादमे, आ शब्दकेँ सोलह वादमे बाँटल गेल अछि। बादमे चलिकेँ नवद्वीपक लोग सभ अनुमानपर विशेष जोर देलन्हि। ताहि दिनसँ अद्यावधि तत्वचिंतामणि अद्वितीय न्यायक ग्रंथ मानल गेल अछि आ नव–न्यायक तँ इ मूल स्रोते भेल। मिथिलासँ पढ़िकेँ गेलाक बाद जखन रघुनाथ शिरोमणि नादियामे नव–न्यायक स्थापना केलन्हि तखन ओहिठाम गंगेशक ग्रंथपर बहुत रास आलोचना लिखल गेल। मिथिलामे पक्षधर मिश्र एहि ग्रंथपर ‘आलोक’ नामक टीका लिखलन्हि आ बंगालमे हुनक शिष्य रघुनाथ शिरोमणि ‘दीधिति’ नामक टीका आ मथुरानाथ तर्कवागिश ‘प्रकाश’ नामक टीका लिखलन्हि। पुनः ‘दीधिति’पर जागदीशी आ गदाधरी टीका लिखल गेल। गंगेश तँ एहिरूपक नव–न्यायक सृष्टि केलन्हि जे आगाँ चलिकेँ विशेष विद्वत–प्रिय भेल आ प्राचीन न्यायशास्त्र पठन प्रणालीमे आमूल परिवर्त्तन अनलक। युग युगांतरसँ भारतमे मैथिल लोकनि श्रेष्ठतम नैयायिक भेल छथि। नव–न्यायक स्थापना तँ मिथिलामे भेल मुदा एकर प्रस्फुटन नादियामे (देखु–इंगलस नामक अमरीकी विद्वानक पोथी–“मटेरियल्स फार द स्टडी आफ नव–न्याय”)। गंगेशक पुत्र वर्द्धमान सेहो पैघ नैयायिक भेलाह। ओ गंगेशक सभ पोथीपर टीका लिखने छथि। ‘प्रकाश’ नामक टीकाक रचयिता ओ छलाह। लीलावती प्रकाशमे ओ अपन पिताक सम्बन्धमे कहने छथि– “न्यायाम्भोज पतङ्गाय मीमाँसा पार दृश्यने गंगेश्वराय गुरवेपित्रेऽत्र नमः” एहिठाम इ स्मरण रखबाक अछि जे वर्द्धमान धर्माधिकरणिक वर्द्धमानसँ भिन्न छलाह। बड्ड प्रतिष्ठाक संग सर्वदर्शन संग्रहमे हिनक उल्लेख भेल अछि। नव–न्यायक क्षेत्रमे मिथिलामे निम्नलिखित व्यक्ति प्रसिद्ध भेल छथि– पक्षधर (जयदेव), वासुदेव, रूचिदत्त, भगीरथ ठाकुर, महेश ठाकुर, शंकर मिश्र, वाचस्पति मिश्र (अभिनव), मिसारू मिश्र, दुर्गादत्त मिश्र, देवनाथ ठाकुर, मधुसुदन ठाकुर इत्यादि। वाचस्पति मिश्र न्याय, मीमाँसा धर्मशास्त्र आदिक प्रकाण्ड पण्डित भेल छथि। हुनक पुत्र नरहरि मिश्र सेहो महान विद्वान छलथिन्ह। अयाची मिश्रक पुत्र शंकर मिश्र अपना युगक अद्वितीय विद्वान छलाह। शंकर मिश्रक पिता भवनाथ मिश्र सेहो पैघ नैयायिक छलाह। शंकर मिश्रक सम्बन्धमे कहबी अछि जे जखन ओ नेना छलाह तखन मिथिलाक कोनो राजा ओहि बाटे जा रहल छलाह जे हिनक सौन्दर्यसँ अत्यंत मुग्ध भऽ गेलाह आ बालककेँ बजाकेँ कोनो श्लोक सुनेबाक हेतु कहलथिन्ह। शंकर मिश्र निम्नलिखित श्लोक सुनौलन्हि– “बालोऽहं जगदानन्द न मे वाला सरस्वती अपुर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्रयम्”। महाराज कहलथिन्ह जे अपन आनक मिश्रित कए श्लोक पढ़ू–तखन शंकर मिश्र पढ़लन्हि– “चलितश्चकितश्छन्नः प्रयाणेल्व भूपते सहर्षशीर्षा पुरूषः सहश्राक्षः सहस्त्रपात्”। महाराज प्रसन्न भए दान देलथिन्ह। शंकर मिश्र महाराज भैरव सिंहक कनिष्ठ पुत्र राजा पुरूषोत्तम देवक आश्रित रहैथ। शंकर अपना समयक अद्वितीय विद्वान छलाह आ बहुत रास पोथीक प्रणेता सेहो रहल छथि। पक्षधर मिश्र (जयदेव–पीयूष वर्ष) विद्यापतिक समकालीन व्यक्ति छलाह आ मिथिलाक नव–न्यायक एक प्रकाण्ड विद्वान सेहो। उहो भैरव सिंहक समयमे विराजमान छलाह। न्याय–शास्त्र ओ अदभूत विद्वान छलाह। मैथिली परम्परामे इ बात सुरक्षित अछि जे जतय कतहु कोनो विषयमे शास्त्रार्थ अथवा वाद–विवाद होमए लगैक आ ओहिमे जकर पक्ष लचल होइक तकरे पक्ष धय उपपादन करेऽ लागैथि पक्षधर आ एवँ प्रकारे सर्वत्र विजयी हेबाक कारणे लोक हुनका ‘पक्षधर’ कहए लागल। हुनका सम्बन्धमे निम्नलिखित श्लोक प्रचलित अछि– “शंकर वाचस्पत्योः शंकर वाचस्पति सदृशौ। पक्षधर प्रतिपक्षी लक्षी (क्ष्यी) भूतो न वर्त्तते जगति”॥ कवि समाजमे ओ ‘पीयूष वर्ष’क नामे प्रसिद्ध छलाह आ चन्द्रालोकमे ओ अपन एहि नामक व्यवहार सेहो केने छथि– “चन्द्रालोकंममुं स्वयं वितनुते पीयूषवर्षः कृती”॥ पक्षधर मिश्रक हाथक लिखल विष्णुपुराणमे निम्नलिखित श्लोक भेटइत अछि। तड़िपतपर लिखल इ पोथी भटपुरा गाममे अछि (पोथी जोगियार गामक केशव झा नैयायिकक ओतए छलन्हि)। “वाणैर्वेद युतैः सशंभुनयनैः संख्या गर्त हायने श्रीमदगौड़मही भुजो गुरूदिने मार्गे च पक्षेसिते। षष्ठयांताममरावती मधिवसन् या भूमिदेवालया श्रीमत पक्षधरः सुपुस्तकमिदं शुद्धं व्यलेखीद् द्रुतम्॥ (लं.सं.–३४५) पक्षधर मिश्रक सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ मानल गेल अछि ‘आलोक’ आ एहि ‘आलोक’ आरो कतए गोटए बादमे टीका लिखलन्हि। रघुनाथ शिरोमणि मिथिला विजयार्थ आएल छलाह परंतु पक्षधर मिश्रक विद्यार्थी सभसँ परास्त भए तृतीय श्रेणीक छात्रक संग हुनकासँ पढ़ए लगलाह आ थोड़ेक दिन अपन प्रतिभासँ उत्तम विद्वान भए स्वदेश गेलाह आ वंग देशमे न्याय विद्याक प्रचार आ उन्नति केलन्हि। ‘आलोक’ गंगेशक तत्व चिंतामणिपर टीका थिक। हिनक लिखल दोसर ग्रंथ अछि चन्द्रालोक– इ ग्रंथ अलंकार विषयपर अछि आ एकरे आधारपर अधयजी दीक्षित कुवलयानन्द नामक अलंकार ग्रंथ बनौलन्हि। इ एकटा प्रसन्न–राघव नाटक सेहो लिखने छलाह। हिनक आरो बहुत रास पुस्तक सभ अछि। शंकर मिश्रक समय धरि मैथिल विद्वान लोकनि बौद्ध मान्यताकेँ कटैत रहलाह अपन आदर्शवादी दर्शनक विश्लेषणमे व्यस्त रहलाह। बौद्ध धर्मक दूटा शाखा भऽ गेल छल– हीनयान आ महायान। महायानक प्रभावे वज्रयान–तंत्रयानक विकास सेहो भेल आ मिथिलाक तंत्रहुँपर बौद्ध तंत्रक प्रभाव पड़ल हो तँ कोनो आश्चर्य नहि। कुमारिल भट्ट आ शंकराचार्यक प्रभावसँ बौद्ध धर्मक ह्रास भेल। ‘शंकर दिग्विजय’मे कुमारिलक मुँहसँ शंकराचार्यकेँ निम्नलिखित वाक्य कहाओल गेल अछि– “श्रुत्यर्थ धर्म विमुखान सुगतान् निहंतुं जातं गुहं भुवि भवंतमहं नु जाने”॥ एहिमे तथ्य कहाँ धरि से कहब कठिन मुदा इ तँ निश्चित अछि जे कुमारिल, शंकराचार्य, मंडन आ वृद्ध वाचस्पतिक प्रयासे मिथिलामे बौद्ध धर्मक अंकुश नहि जमि सकल आ एहिठाम हिन्दूधर्मक प्रधानता बनल रहल। अद्वैत वेदांतक इतिहासमे शंकराचार्य एक नवीन धाराक प्रवर्त्तक मानल जाइत छथि। बड्ड सूक्ष्म ढ़ँगसँ ओ अपना ग्रंथमे बौद्धमतक खण्डन केने छथि। माधवक शंकर दिग्विजयक अनुसार सुधन्वा नामक एक राजा शंकराचार्यक कहलापर हजारो बौद्धकेँ नदीमे डुबा देलन्हि। मुदा एहिमे तथ्य कतबा अछि से कहब असंभव। शंकराचार्य आ मंडनसँ विशेष श्रेय बृद्ध–वाचस्पतिकेँ भेटबाक चाही जे अपन युक्तिसंगत तर्क आ दार्शनिक कुशलतासँ बौद्ध लोकनिकेँ परास्त करबामे सफल भेलाह। वाचस्पति मिश्रसँ शंकर– पक्षधर मिश्र धरि दर्शनक क्षेत्रमे इ बाद–विवाद चलैत रहल। एहि सभ वाद–विवादक बाबजूदो मिथिलामे कर्णाट आ ओइनवार वंशक समयमे हम देखैत छी जे धार्मिक सहिष्णुताक भावना विराजमान छल। १२३४–३६धरि तिब्बती यात्री धर्मस्वामी (बौद्ध) भारतमे छलाह आ राजा रामसिंह देवसँ हुनका विशेष प्रेम छलन्हि। रामसिंह स्वयं तँ ब्राह्मण धर्मक समर्थक छलाह तथापि ओ धर्मस्वामीकेँ अपन राज पुरोहित बनबाक हेतु आग्रह केने छलथिन्ह। ओहि कालमे वैशालीमे एकटा ताराक मुरूतक उल्लेख सेहो धर्मस्वामी केने छथि। कट्टर मैथिल लोकनि बौद्ध–विरोधी छलाह आ उपेन्द्र ठाकुरक मते मैथिल ब्राह्मण बौद्धकेँ मुसलमानसँ बेसी घृणा करैत छलाह। ज्योतिरीश्वर ठाकुर बौद्धकेँ पतीत आ खतरनाक कहने छथि आ बौद्ध विरोधी भावनाकेँ प्रखर करबाक हेतु उदयनक प्रशंसा केने छथि। सप्तरी इलाकामे बौद्ध आ हिन्दूक बीच बरोबरि संघर्ष होइते रहैत छल। मिथिलामे ताराक प्रधानता प्राचीन कालहिसँ अछि तकर प्रमाण हमरा धर्मस्वामीसँ भेटइत अछि। ‘तारा’केँ ताहि दिनमे बौद्ध देवीक रूपमे मानल जाइत छल। मुदा तंत्रक विकास भेलासँ ‘तारा’ तांत्रिक देवीक रूपमे सेहो स्वीकृत भेल आ मिथिलामे एकर जनप्रियता बढ़ि गेलैक। १२–१३म शताब्दीमे वैशालीकेँ तीरभुक्तिक अंतर्गत राखल गेल अछि। बौद्ध धर्मक सम्बन्धमे चण्डेश्वरक कृत्यरत्नाकरमे कहल गेल अछि जे बुद्धक पूजा चैत्र शुक्ल प्रतिपदाकेँ होएबाक चाही। वैशाख आ श्रावण सेहो बौद्ध पूजाक बिधान बताओल गेल अछि। एहिसँ बुझि पड़इयै जे बौद्ध लोकनिक किछु संख्या मिथिलामे अवश्य रहल होएत आ चण्डेश्वर सन समन्वयवादी ओकरो ध्यानमे राखि अपन विधान बनौने होएताह। मिथिलामे सूफीसंत लोकनिक प्रभाव सेहो विशेष छल आ प्रोफेसर सैयद हसन असकरीक निबन्ध सभमे एकर विशद विश्लेषण भेल अछि। सूफी लोकनिक प्रभावे एहि क्षेत्रमे रहस्यवादक विकास भेल। मिथिलामे शेख फत्तु, शेख बुरहान आ इसमाइल, सैयद मुहम्मद, सैयद अहमद, अबुल फतेह हियायतुल्लाह, मीर इब्राहिम चिस्ती, शेख काजीन शुत्तारी, अब्दुर रहमान, शेख हुसैन, शाह ताजद्दुनीन, शेख शमशुद्दीन, शमन मदारी, पीर शाह नजीर, आ शेख ताजुद्दीन मदारी आदि प्रमुख सूफी संत सभ भऽ गेल छथि। बिहारी लालक ‘आयनी–तिरहूत’मे मिथिलाक बहुत रास मुसलमानी परिवारक इतिहास सुरक्षित अछि। शताब्दीक सम्पर्क आ संघर्षक उपरांत तँ आब मिथिलाक माँटि–पानिमे इ लोकनि एहेन मिल गेल छथि जे ओहिसँ हिनका लोकनिकेँ फराक करब असंभव। हिनका लोकनिक ‘मरसिया’ मैथिली साहित्यक एकटा प्रमुख अंग बनि चुकल अछि। अध्याय–19 मिथिलामे शिक्षाक विकास उपनिषद् एहि बातक प्रमाण अछि जे मिथिलामे अतिप्राचीन कालहिसँ शिक्षाक प्रचार बेस रहल अछि। विद्या व्ययसनी एहि ठामक लोग सभ दिनसँ होइत आएल छथि आ विद्वानक प्रतिष्ठाक स्वीकृतिक सर्वश्रेष्ठ एवँ सर्वप्रथम उदाहरण हमरा जनकक राजसभासँ भेटइत अछि। उपनिषदसँ इ ज्ञात होइछ जे ताहि दिनमे लोक शिक्षापर विशेष ध्यान दैत जाइत छलाह। याज्ञवल्क्यक मत छन्हि जे गुरूकेँ विद्यार्थीसँ ताधरि कोनो प्रकारक दान इत्यादि नहि ग्रहण करबाक चाही जाधरि ओ अपन शिक्षा समाप्त नहि कऽ लैत छथि। एकर अर्थ इ भेल जे गरीबसँ गरीब विद्यार्थी सेहो गुरूक ओतए जाए शिक्षा प्राप्त कऽ सकैत छल। शिक्षा प्राप्त करबाक मार्गमे अर्थक कमीकेँ बाधक नहि बुझल जाइत छल। शिक्षको निस्वार्थ भावे समाजक सेवा करैत छलाह। शिक्षककेँ राज्यसँ पूर्ण सहयोग भेटइत छलन्हि आ हुनक सम्मान आ प्रतिष्ठाक तँ कोनो कथे नहि। यज्ञमे राजा ब्राह्मणकेँ गाय आ सोना दानमे दैत छलथिन्ह। विद्वान कखनो कोनो स्थिति कोनो सहाय्यक हेतु राज दरबारमे निःसकोच आ सकैत छलाह। आचार्य लोकनिक सभ प्रकारक दिक्कतकेँ दूर करबाक कार्यकेँ शासक अपन धर्म बुझैत छलाह किएक तँ हुनका लोकनिक जीवन विद्याध्यनक हेतु समर्पित छल। चारि वेदक अतिरिक्त इतिहास, पुराण, विद्या, उपनिषद्, श्लोक, सूत्र, अनुव्याख्यान, व्याख्यान आदिक पठन–पाठन होइत छल। ऋषिक आश्रम विद्यालयक काज करैत छल आ आश्रमेकेँ प्रसिद्ध विद्या केन्द्र मानल जाइत छल। विदेहमे ताहि दिनमे पढ़ल–लिखल लोगक संख्या विशेष छल। बाल‍िक सर्वप्रथम तँ अपना घरेमे शिक्षा भेटइत छलैक। ताहि दिनमे बालक–बालिकामे कोनो भेद नहि छल आ दुहुकेँ शिक्षा देबाक प्रथा छल। वैदिक स्कूलमे (चरणमे) बालिकाक प्रवेश सेहो होइत छल। कथ–सम्प्रदायमे शिक्षित बालिकाकेँ कथी कहल जाइत छल। ताहिदिन गार्गी, मैत्रेयी, सुलभा सन विदुषी छलीहे। उपनयनक बाद अध्ययनक विशेष कर्म शुरू होइत छल। विद्यार्थी जीवन बारह वर्षक होइत छल आ बारह वर्ष विद्यार्थी अपन गुरूक संग रहि विद्याध्ययन करैत छलाह। विद्यार्थीकेँ आचार्य कुलवासिन आ अंतेवासिन कहल जाइत छलन्हि। दिनमे सुतव निषेध छल। गैर–ब्राह्मणकेँ शिक्षाक एतेक सुविधा नहि रहल हेतैन्ह। एक लव्यक कथासँ एहि बातपर प्रकाश पड़इत अछि। उद्दालक, आरूणि, स्वेतकेतु, आदि तहि दिनक प्रसिद्ध विद्वान छलाह। भ्रमणशील रहितहुँ किछु गोटए विद्याक उपार्जन करैत छलाह आ एहेन भ्रमणशील विद्यार्थीसँ जनककेँ भेट भेल छलन्हि– स्वेतकेतु आरूणेय, सोमशुष्म, सत्ययज्ञी आ याज्ञवल्क्य। एहि क्रममे जनक– याज्ञवल्क्यकेँ विवादो भेल छलन्हि आ एकर बादहिसँ जनक ‘ब्रह्मवादिन’क कोटिमे आवि गेल छलाह। प्रसिद्ध क्षत्रिय विद्वानमे काशीक अजातशत्रु, प्रवाहन जैवाली, केकैयक अश्वपति, विदेहक जनक, तथा प्रतर्दन आदिक नाम उल्लेखनीय अछि। उपनिषद् युगमे मिथिला विद्याक प्रधान केन्द्र छल। जनक ‘ब्रह्म’क सम्बन्धमे निम्नलिखित ६शिक्षकसँ अपन ज्ञान प्राप्त केने छलाह– जित्वन, उदंक, बरकु, गर्दभी विपीत, सत्यकाम, साकल्य। याज्ञवल्क्यसँ ओ उपनिषदक ज्ञान प्राप्त केने छलाह। जनकक उदारतासँ काशीक अजातशत्रु तबाह रहैत छलाह। जनकक अश्वमेध यज्ञक अवसरपर निम्नलिखित दार्शनिक लोकनि उपस्थित छलाह। उद्दालक आरूणि, अश्वल, जारूतकोख आर्त्तभाग, भुज्युलाहयायनि, उशष्ट चाक्रायण, कहोड़, कौषितकेय, विदग्ध शाकल्य एवँ गार्गी आ एहिमे याज्ञवल्क्य विजयी भेल छलाह। जनक प्रभावित भए अपन समस्त विदेह राज्य याज्ञवल्क्यकेँ अर्पित केने छलाह। शिक्षाक प्रगतिक क्रम ओकर बादो चलिते रहल आ बौद्ध युगमे तँ वैशाली अति प्रसिद्ध केन्द्र भऽ गेल। तक्षशिला विश्वविद्यालयमे मिथिला आ वैशालीक विद्यार्थी पढ़बाक हेतु जाइत छलाह। महिला सेहो विदुषी होइत छलीहे। ओ लोकनि पढ़बाक हेतु तक्षशिला जाइत छली कि नहि से कहब कठिन कारण जातकमे एकर एहेन कोनो उल्लेख नहि भेटइत अछि। चाण्डालकेँ शिक्षासँ वर्जित राखल जाइत छल। वैशाली सेहो शिक्षाक एकटा प्रधान केन्द्र मानल जाइत छल। बुद्ध एहिठाम अपन कैकटा सारगर्भित प्रवचन देने छलाह। धार्मिक आ दार्शनिक वाद–विवादक हेतु लिच्छवी लोकनि एत्तए एकटा कूटागार प्रशाल बनबौने छलाह। तकर बादसँ जखन समस्त भारत एक राजनैतिक सूत्रमे बन्हि गेल तखन एहिमे एकरूपता आबए लागल। मौर्य–गुप्त–हर्ष आ पाल युगमे सेहो मिथिलाक अपन वैशिष्टय सुरक्षित रहल। उत्तर बिहारमे सेहो कैकटा बौद्ध बिहार छल जकर प्रमाण भेटइत अछि आ एहने एकटा बौद्ध बिहारमे बौद्ध संत नरोपा रहैत छलाह जे ओतएसँ विक्रमशिला गेल छलाह। नौलागढ़सँ एकटा जे अभिलेख भेटल अछि ताहु आधारपर इ कहल जाइत अछि जे ओहि क्षेत्रमे एकटा विहार छल। मिथिलामे कर्णाटवंशक स्थापनाक बाद मिथिलाक अपन व्यक्तित्व विकसित भेल आ ताहि दिनसँ साँस्कृतिक एवँ सामाजिक क्षेत्रमे मिथिलाक अपूर्व योगदान रहल अछि। कर्णाट, ओइनवार आ खण्डवला कुल शासक लोकनि स्वयं पण्डित छलाह आ ओ लोकनि विद्या–प्रसारक नीक व्यवस्था केलन्हि आ अपना–अपना शासनकालमे विद्या–प्रसारक प्राचीन परम्पराक पुनर्स्थापन केलन्हि। एहियुगमे विभिन्न विषयपर मिथिलामे पोथी लिखल गेल आ प्राचीन पोथी सभपर असंख्य टीका। प्रत्येक मुख्य बातक हेतु निबन्धक निर्माण भेल आ विद्याक विभिन्न पक्षपर विस्तृतरूपेण ग्रंथक रचना कैल गेल। कर्णाट युगकेँ एहि दृष्टिकोणसँ स्वर्ण युग कहल गेल छैक। समस्त मिथिलामे शिक्षा केन्द्रक जेना जाल बिछा देल गेल। व्याकरणक क्षेत्र पद्मनाभ दत्तक नाम चिरस्मरणीय रहत कारण ओ अपन ‘सुपद्म’क रचना कए एहि दिशामे बड्ड पैघ योगदान देलन्हि। छन्दशास्त्रपर भानुदत्त मिश्रक रचना महत्वपूर्ण अछि आ ‘सरस्वती कण्ठाभरण’पर रत्नेश्वरक टीका सेहो प्रशंसनीय अछि। कामशास्त्रपर भानुदत्तक अतिरिक्त ज्योतिरीश्वरक पंचशायक एवँ रंगशेखर महत्वपूर्ण ग्रंथ मानल गेल अछि। भवदत्त प्रणीत नैषधचरितमक टीका एखनो धरि पढ़ाओल जाइत अछि। पृथ्वीधर आचार्य मृच्छकटिकपर टीका लिखलन्हि। अमरकोशपर श्रीकर आचार्यक टीका संस्कृत साहित्यक एक अमूल्य निधि मानल जाइत अछि। ज्योतिरीश्वरक ‘वर्णरत्नाकर’ अपना ढ़ँगक अपूर्व ग्रंथ अछि जाहिसँ मैथिली साहित्य गौरवान्वित अछि। दार्शनिक क्षेत्रक लेखक उल्लेख हम पूर्वहि कऽ चुकल छी तै दोहरायब उचित नहि बुझना जाइत अछि। श्रीदत्त उपाध्याय, हरिनाथ उपाध्याय, भवशर्मण, इन्द्रपति, लक्ष्मीपति आ चण्डेश्वर, विद्यापतिक परिवारक योगदान एहि युगमे विशेष रहल अछि। मिथिला न्याय–मीमाँसाक हेतु अत्यंत प्रसिद्ध छल आ देश–देशांतर लोक इ दुनू विषय पढ़बाक हेतु एहिठाम अबैत छलाह। ताहि कालमे मिथिलेटा एहेन अंचल छल जाहिठाम देशक कोन–कोनसँ विद्वान लोकनि आबिकेँ शरण लैत छलाह। साँस्कृतिक दृष्टिकोणसँ मिथिलाक महात्म्य बड्ड बढ़ि गेल छल। नालन्दा–विक्रमशिला जखन नष्ट भऽ रहल छल तखन बहुत पण्डित जे पोथी लऽ कए भागि रहल छलाह ताहिमे बहुतोकेँ मिथिलेमे शरण भेटलन्हि। उत्तर भारतमे आर जतए कतहु उथल–पुथल होइक तखन ओतहुँसँ विद्वान लोकनि मिथिला दिसि चल अवइत छलाह कियैक तँ एहिठाम विद्वान लोकनिक समादर होइत छल। मण्डन मिश्रक समयसँ मिथिलाक प्रसिद्धि समस्त भारतमे प्रसारित भए चुकल छल आ तकर बाद तँ एकापर एक एहेन विद्वान एहिठाम होइत गेलाह जाहिसँ मिथिलाक प्रसिद्धि समस्त भारतमे दिनानुदिन बढ़िते चल गेल। मध्य–युगमे न्याय–वैशेषिक–मीमाँसा वेदांतक हेतु मिथिला भारतमे प्रसिद्ध भए गेल छल आ मुसलमानी आक्रमणक फलस्वरूप वर्णाश्रमक जे डोरी ढ़ील भेल जाइत छल ताहु हेतु मिथिलामे निबन्ध आ कर्मकाण्डपर ग्रंथक रचना एवँ ओकर अध्ययन–अध्यापन प्रारंभ भए चुकल छल। एहि सभमे योग्यता प्राप्त करबाक हेतु बाहरसँ विद्वान लोकनि एतए पढ़बा लेल अबैत छलाह आ विशेष कऽ कए न्यायक अध्ययनक हेतु मिथिला–विश्वविद्यालय समस्त भारतमे अद्वितीय छल। जखन मगधक अवसान भेलैक तखन मिथिला विश्वविद्यालयक चरमोत्कर्ष भेल आ पक्षधर मिश्रक अनुमतिसँ रघुनाथ शिरोमणि जखन नादियामे नव–न्यायक केन्द्र खोललन्हि तखनसँ नादियाक प्रभुत्व बढ़ल। ताहि दिन मिथिलाक विद्वानक महत्व तँ एतबेसँ बुझना जाइत जे बंगालक विद्वान लोकनि मैथिल निबन्धकार लोकनिक मतकेँ महत्व दैत छलथिन्ह आ बंगालक नैयायिक मैथिल नैयायिकक वाक्यकेँ प्रमाण मनैत छलाह। ओहि युगक मिथिलाक प्रत्येक विद्वान अपना आपमे एकटा संस्थे होइत छलाह। मिथिलाक संस्कृत एवँ भाषा साहित्यक हेतु एकरा स्वर्णयुग मानल गेल अछि। मिथिलामे कर्णाट–ओइनवार कालमे उदयन, गंगेश, वर्द्धमान, पद्मनाभ, जगद्धर, शंकर, वाचस्पति, पक्षधर आदि जे विद्वान भेल छथि ताहिसँ कोनो देश आ कोनो काल गौरवान्वित भऽ सकैछ। विद्यापतिकेँ तँ सहजहि सभ केओ एकस्वरसँ भारतीय भाषाक सर्वश्रेष्ठ गीतकार मनैत छथि। गीतकाव्यक दृष्टिकोणसँ कालिदास आ जयदेवक बाद विद्यापतियेक स्थान अबैत अछि। ओनातँ विद्यापति मैथिली पदावली लऽ कए प्रसिद्ध छथि मुदा स्मरण रखबाक विषय इ जे एहेन कोनो विषय नहि अछि जाहिपर विद्यापति नहि लिखने होथि। लखिमा रानी सेहो प्रथम कोटिक विदुषी छलीहे। स्वयं महेश ठाकुर अपन विद्याक बले मिथिलाक राज्य प्राप्त केने छलाहे आ ओहि खण्डवला वंशमे आरो कतेक अद्वितीय विद्वान लोकनि भेल छथि। महेश ठाकुर स्वयं अकबरनामाक संस्कृत अनुवाद सेहो केने छलाह आ हेमांगद ठाकुर ज्योतिषपर अपूर्व ग्रंथ लिखने छलाह। महेश ठाकुर तँ प्रसिद्ध विद्वानक कोटिमे गिनल जाइत छथि आ हुनक वाक्यकेँ प्रमाणो मानल गेल अछि। कविन्द्रचन्द्रोदयमे विश्वंभर मैथिलोपाध्याय, बदरीनाथ उपाध्याय मैथिल, दामोदर उपाध्याय मैथिल आदिक उल्लेख अछि। शाहजहाँक दरबारमे सेहो दूटा मैथिल विद्वान अपन विद्वता प्रदर्शित केने छलाह आ एहि पाँतिक लेखकक पूर्वज सेहो कोनो मुगल बादशाहसँ अपन विद्वता प्रदर्शित कए, जमीन्दारी प्राप्त केने छलाह आ चौधराइ सेहो। ओ मूल ताम्रपत्र गत सौ वर्ष पूर्वहि भीषण अग्निकाण्डमे स्वाहा भऽ गेल। खण्डवला शासक विद्वान लोकनिकेँ जागीर दैत छलाह जकर प्रमाण अछि। ताहि दिनमे मिथिलामे गामे–गाम विद्यालय छल आ जाहिठाम जाहि विषयक पण्डित रहैत छलाह ताहिठाम सैह विषय नीक जकाँ पढ़ाओल जाइत छल। राजा महराजाक दिसिसँ विद्वानकेँ प्रोत्साहन भेटइत छलैक। मिथिला विश्वविद्यालयमे ताहि दिन अन्य विषयक अतिरिक्त नव–न्यायपर विशेष ध्यान देल जाइत छल। नव–न्याय पढ़बाक हेतु भारतक कोन–कोनसँ एहिठाम विद्यार्थीगण अबैत छलाह। विद्वता एवँ विद्याक क्षेत्रमे मिथिलाक स्थान अग्रगण्य छल आ मध्य युगमे नालन्दाक स्थान बुझु जे मिथिलेकेँ प्राप्त भऽ गेल छलैक। नालंदा जकाँ मिथिला विश्वविद्यालयकेँ अट्टालिका वाला भवन नहि छलैक, कारण एहिठाम तँ टोल आ चौपाड़िक व्यवस्था छल। मिथिला विश्वविद्यालयक आन वैशिष्ट्य छलैक। स्नातकत्व प्राप्त करबाक जे कसौटी एहिठाम छल ताहिसँ यदि अझुका स्नातक लोकनिकेँ मिलाओल जाइन्ह तँ एक्को गोटए अहुना स्नातक नहि कहा सकताह। मिथिला विश्वविद्यालयमे जे परीक्षा पद्धति छल तकरा शलाका–परीक्षा कहल जाइत छलैक। इ परीक्षा बड्ड कठिन छलैक। एहिमे शास्त्रार्थक व्यवस्था छल आ ओहि शास्त्रार्थमे प्रकाण्ड पण्डित लोकनि सेहो बैसैत छलाह। ‘शलाका’क अर्थ भेल जे पाण्डुलिपिक पृष्ट सभ जे सुइसँ घोपल जाइत छल ताहिमे सँ कतहुँसँ कोनो विषयपर शास्त्रार्थक सूत्रपात्र भऽ सकैत छल। जखन पाठ्यक्रमक पढ़ाइ समाप्त होइत छल तखन सभ छात्र एकठाम बैसैत छलाह आ ओहिमे गुरूजन सेहो सम्मिलित होइत छलाह आ तकर बाद शास्त्रार्थ प्रारंभ होइत छल आ ओहि शास्त्रार्थक पश्चात् स्नातकत्वक प्रमाण पत्र देल जाइत छलन्हि। ओहुसँ एक कठिन परीक्षा प्रणाली छल जकरा ‘षडयंत्र’ कहल जाइत छल। एहि प्रणालीमे छात्र लोकनिकेँ अपन विद्वताक प्रदर्शन जनताक मध्य करए पड़इत छलन्हि। ओहि परीक्षामे केओ हुनकासँ कोनो प्रकारक प्रश्न कए सकैत छल आ जखन ओहन लोग हुनका उत्तरसँ संतुष्ट होइत छलथिन्ह तखने हुनका प्रमाण पत्र भेंट सकैत छलन्हि। प्राध्यापक लोकनिकेँ उपाध्याय, महोपाध्याय, महामहोपाध्याय कहल जाइत छलन्हि। मिथिला विश्वविद्यालयमे चारूवेद, मीमाँसा, न्याय, दर्शन, धर्मशास्त्र, आयुर्वेद आदि विषयक शिक्षा देल जाइत छल। मिथिला विश्वविद्यालयक सबन्धमे एकटा किंवदंती प्रचलित अछि– जकर उल्लेख एहिठाम आवश्यक बुझना जाइत अछि। पक्षधर मिश्रक एकटा बंगाली शिष्य छलथिन्ह रघुनाथ शिरोमणि। परीक्षाक अवसरपर किछु एहेन बात भेल जाहिसँ रघुनाथ शिरोमणिक विद्वतापर किछु चोट पहुँचल। सन्ध्या भेलापर पक्षधर मिश्र अपन आगंन गेला आ पूर्णिमाक इजोरियामे बैसि ओ अपन पत्नीकेँ कहइत रहथिन्ह जे आइ हमरासँ एक बड्ड पैघ गलती भऽ गेल अछि। शास्त्रार्थ कालमे रघुनाथ बेचारा ठीके बजने छल मुदा हम ओकरा काटि देने छलियैक जाहिसँ ओकरा प्रतिष्ठापर अवस्से चोट पहुँचल हेतैक। हम तँ उचित बुझैत छी जे हम ओकरा बजाकेँ इ बात स्पष्ट कहि दियैक। एम्हर रघुनाथ तरूआरि नेने गुरूपर आक्रमण करबाक हेतु झोंझहिमे नुकाएल अपन गुरूक सभ बात सुनि रहल छल। पक्षधर मिश्र जहिना अपन स्वीकारोक्ति अपन पत्नीक समक्ष केलन्हि तहिना रघुनाथ अपन तरूआरि फेकि अपन गुरूक चरणपर खसि पड़ल। ओ अपन मूर्खताक हेतु माँफी मंगलक आ उदगार प्रगट केलक जे अहाँ सन गुरूसँ हमरा इएह आशा रखबाक चाहैत छल। रघुनाथ शिरोमणि मिथिला विश्वविद्यालयक एक प्रख्यात छात्र छल आ ओ मिथिलाक इतिहासक एकटा अंग बनि चुकल अछि। मैथिली परम्परामे सेहो ओकरा सम्बन्धमे एकटा प्रवाद छैक जकर उल्लेख करब आवश्यक। जरहटिया गाममे भैरवसिंह देवक खुनाओल पोखरिक प्रसंगक उल्लेख हमरा लोकनि पूर्वहि कऽ चुकल छी। ओहिमे पाथरक जाठि लंकासँ बनिकेँ आएल छल मुदा ओहिमे शर्त्त इ छल जे यज्ञमे कोनो ‘काण’ अथवा ‘विकलांग’ व्यक्ति नहि उपस्थित रहैथ। शुभ लग्नमे यज्ञ प्रारंभ भेल। जखन जाठि बैसेबाक बेरि भेलैक तखन मृदंग ध्वनि छोड़लक– “भादिक भादिक भादिक भा भैरव भूपति देव सभा” यज्ञ देखबाक हेतु कोनो कोनमे रघुनाथ शिरोमणि जे ‘काण’ (काना) छलाह सेहो बैसल छलाह। हुनका उपरोक्त अपूर्ण वाक्य सुनिकेँ रहल नहि गेलैन्ह आ वो तत्काल बाजि उठलाह– “सारवती कथिता कविना पण्डितराज (रत्न) शिरोमणि ना” एहि श्लोकहिसँ हुनक परिचय स्पष्ट भऽ गेल आ लंकावासी काना व्यक्तिकेँ देखि पोखरिमे जाठि फेक भागि गेलाह। रघुनाथ शिरोमणिसँ प्रसन्न भए पक्षधर मिश्र हुनका बंगालमे स्वतंत्र रूपें नव–न्याय विश्वविद्यालयक स्थापनाक अनुमति देलथिन्ह आ तखनहिसँ नादिया नव–न्यायक अध्ययनक प्रधान केन्द्र बनि गेल। नादियाक स्थापनाक उपरान्त मिथिलाक महत्व घटए लागल तथापि स्मृतिक क्षेत्रमे चण्डेश्वर, हरिनाथ, भवशर्मण, इन्द्रपति, विद्यापति, वाचस्पतिक कारणे मिथिलाक प्रभुत्व बनल रहल। मिथिला विश्वविद्यालयक प्रतापे संस्कृत साहित्य सुरक्षित रहि सकल। घरे–घरे मिथिलामे ताहि दिन पाण्डुलिपि तरिपत लिखल जाइत छल। महामहोपाध्याय पी.वी.कणे ठीके कहने छथि जे याज्ञवल्क्यक समयसँ आइ धरि मिथिला अपन विद्वताक परम्पराकेँ सुरक्षित रखने अछि। महेश ठाकुरक समयसँ मिथिला विश्वविद्यालयक परीक्षा पद्धतिमे एक नवीन पद्धतिक श्रीगणेश भेल जकरा ‘धौत परीक्षा’क नामे हमरा लोकनि जनैत छी। जनिका विद्वान कहेबाक शौख छलन्हि हुनका लेल इ परीक्षा पास करब आवश्यक कारण एहिमे बिनु परीक्षोतीर्ण भेने केओ विद्वान नहि कहा सकैत छलाह। एहि परीक्षाक नियम इ छल जे प्रत्येक वर्ष एकर घोषणा कैल जाइत छल आ इच्छुक संस्कृत पण्डित लोकनि ओहिमे उपस्थित भए छलाह। परीक्षोतीर्ण भेलापर नैयायिक लोकनिकेँ एक जोड़ लाल धोती आ वैदिक एवँ वैयाकरण लोकनिकेँ एक जोड़ पीअर धोती विदाइ भेटइत छलन्हि। एहिमे मिथिलाक बाहरोसँ विद्वान अबैत छलाह। एहिमे सफल भेल विद्वान अपनाकेँ सगौरव “धौत परीक्षोतीर्ण” कहैत छलाह। दरभंगा राजक अंत भेलाक पूर्व धरि मिथिलामे इ व्यवस्था छल। एम्हर आबिकेँ स्वर्गीय डाक्टर गंगानाथ झा एहि परीक्षाक सिलेबस (पाठ्यक्रम) सेहो निर्धारित कऽ देने छलाह। खण्डवाल कुलक समयमे संस्कृत आ मैथिली साहित्यक रचनामे अभिवृद्धि भेल। महेश ठाकुरक वंशज सभ एकापर एक विद्वान छलाह–स्वयं पोथी लिखलन्हि आ उतारलन्हि आ विद्वान लोकनिकेँ प्रश्रय दए पोथी लिखबौलन्हि। नरपति ठाकुरक समयमे लोचन अपन रागतरंगिणी नामक पोथी लिखलन्हि। मैथिलियोसँ विशेष खण्डवला कुलक समयमे संस्कृत साहित्यक अभिवृद्धि भेल आ महिनाथ ठाकुरक समयमे तिरहुति गीतक प्रचार सेहो। हेवनि धरि मिथिलामे संस्कृत विद्वानक कोनो अभाव नहि छल आ बहुतोकेँ दरभंगा राजसँ वृति भेटइत छलन्हि। ताहु दिनमे मैथिल विद्वान बाहर जाके अपन नाम कमाइत छलाह। ब्राह्मण मुख्यतः दानपर आधारित रहैत छलाह आ जखन मिथिलाक स्थिति विपन्न भऽ गेल तखन ओ लोकनि मिथिलासँ बहराए बाहरो जाए लगलाह। ओना अपन विद्वताकेँ प्रदर्शित करबाक हेतु सेहो ओ लोकनि मिथिलासँ बाहर जाइत छलाह। भवनाथ मिश्र अयाचीक शिष्यगण भारतक कोन–कोनमे पसरल छलथिन्ह। एहिमे सँ बहुतो प्रवासेमे रहियो गेलाह जकर प्रमाण अखनो अछि। भारतक कोन–कोनमे ब्राह्मण लोकनिक टोली अखनो देखल जा सकइयै जे अपनाकेँ मैथिल कहैत छथि। काव्य प्रदीपक रचयिता गोविन्द ठाकुर कृष्णनगरक राजा भवानंद रायक ओतए रहैत छलाह। हुनक वंशज दिनाजपुरमे बसि गेलथिन्ह। मालदहमे सेहो ओइनवार वंशक शाखा एखनो विराजमान छथि आ ओहिवंशक स्वर्गीय अतुल चन्द्र कुमर (हमर प्रिय मित्र) बंगाल सरकारक पार्लियामेंट्री सचिव सेहो रहल छलाह। हुनक देल ओइनवार वंशक वंशवृक्ष परिशिष्टमे भेटत। भवनाथ मिश्र अयाचीक प्रपौत्र एवँ रसमंजरीक सुप्रसिद्ध लेखक कविराज भानुदत्त मध्य भारतकेँ कैक राज्यमे भ्रमण केलन्हि आ हुनक लेखनीसँ गढ़मण्डलाक राजा संग्राम सिंह, बन्दोगढ़क बघेल राजकुमार (रेवा), अहमदनगरक राजा निजाम शाह आ राजा शेरखाँक पता लगइयै। हिनके पुत्रक नाति गंगानंद बिकानेर धरि गेल छलाह। महामहोपाध्याय गोकुलनाथ उपाध्याय आ हिनक भ्राता महामहोपाध्याय जगन्नाथ गढ़वालक राजा फतेहशाहक ओतए छलाह। भवानी नाथ मिश्र (उर्फ सचल मिश्र) एक प्रसिद्ध न्यायाधीश भेल छथि जे १८म शताब्दीमे पूनामे पेशवा माधव रावक ओतए रहैथ। ओहिठाम पेशवासँ हुनका जबलपुरमे दूटा गाम भेटलन्हि जतए हुनक वंशज अखनो छथिन्ह। हुनका ओतए अद्वितीय सम्मान भेटल छलन्हि। कृष्णदत्त मैथिल नागपुरक भोंसलाक प्रधानमंत्री देवजी पुरूषोत्तमक ध्यान आकृष्ट केने छलाह। इ बहुत पैघ नाटककार छलाह आ हिनका सम्बन्धमे हमर निबन्ध फराके प्रकाशित अछि। महेश ठाकुरक भ्राता गढ़मण्डलाक संग्रामशाहक पुरोहित छलाह आ हुनक वंशज बहुत दिन धरि महिष्मतीनगरमे बसल छलाह। अखनो मैथिल ब्राह्मणक बहुत रास शाखा ओम्हर छथि। शाहजहाँक दरबारमे सेहो दूटा मैथिल अपन विद्वताक परिचय देने छलाह। हुनका दुनूकेँ शाहजहाँसँ इनाम भेटल छलन्हि आ दूटा गाम दानमे सेहो। रघुदेव मिश्र शाहजहाँक प्रशंसामे एकटा ‘विरूदावली’ सेहो बनौने छलाह। संस्कृत शिक्षाक सम्बन्धमे ‘हरिहरसूक्ति मुक्तावली’मे विशेष बात भेटइत अछि। मिथिलामे विद्याक किछु प्रसिद्ध केन्द्र छल– जजुआर (यजुर्वेदक शिक्षाक हेतु प्रसिद्ध), रीगा (ऋग्वेदक हेतु), अथरी (अथर्ववेदक हेतु), माउबहेट (माध्यनन्दिनी शाखाक हेतु), कुथुमा (कौथुमी शाखाक हेतु), शकरी (शकारी शाखाक हेतु), भट्टसिम्मरि एवँ भट्टपुर (मीमाँसाक भट्ट स्कूलक हेतु) इत्यादि। मिथिलामे तँ कुम्भकारकेँ सेहो पण्डिते कहल जाइत छैक (कुम्भकारोऽपि पण्डितः)। टोल आ चौपाड़ि तँ अखनहुँ मिथिलाक गाम–गाममे पसरल अछि। एहिठामक शिक्षा परम्पराकेँ देखि १८–१९म शताब्दीमे अँग्रेज एहिठामक भूमिकेँ विश्व–विद्यालयक हेतु उपयुक्त मनने छलाह। १९७२मे मिथिला विश्वविद्यालयक स्थापना भेल आ १९७५मे ललित बाबूक परोक्ष भेलापर ओकर नाम ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय कऽ देल गेल। कला:- शिक्षाक संगहि संग मिथिलामे कलाक विकास सेहो युग–युगांतरसँ होइत आबि रहल अछि। उत्खननक अभावमे इ कहब कठिन अछि जे प्राचीन कालमे मिथिलाक कलाक स्वरूप कि छल आ कोना छल। पुरातात्विक साधनक अभावमे ओहि पक्षपर किछु कहब असंभव। मिथिला–महात्म्यमे जे मिथिलाक वर्णन भेटइत अछि ताहि आधार इ अनुमान लगाओल जा सकइयै जे मिथिला नगरी सुनियोजित ढ़ँगसँ योजनाबद्ध रूपेँ बनल छल आ देखबा सुनबामे सर्वोत्तम रहल होएत। मिथिला–महात्म्य तँ जे वर्णन अछि तकरा जाधरि पुरातत्व सिद्ध नहि कऽ दैत अछि ताधरि तँ ओकरा काल्पनिके माने पड़त। जातक कथा सभमे सेहो मिथिला नगरीक विशिष्ट विवरण भेटइत अछि आ ओहुसँ इ सिद्ध होइत अछि जे मिथिला एकटा सुनियोजित नगर छल जे देखबामे सुन्दर छल आ एकर सीमा वेश विस्तृत छलैक। जातकमे राज दरबार आ किलाक विवरण सेहो भेटइत अछि। विदेह, वैशाली, अंगुतराप क्षेत्रक प्राचीन इतिहास पुरातात्विक अंवेषणक अपेक्षा अखनो रखैत अछि। एहि सभ क्षेत्रसँ प्राक्–बौद्धकालीन अवशेष प्रचुर मात्रामे भेटइत अछि आ नादर्न ब्लैक पालिश्डवेयर (एन.बी.पी.)क प्राप्ति एहि बातकेँ सिद्ध करैत अछि जे बौद्ध युगमे एहि सभ क्षेत्रमे कलात्मकताक रूप निखरि गेल हैत। एन.बी.पी.क संगहि संग ताहि दिनक सिक्का सभ सेहो भेटल अछि। मिथिलाक गामहि गाम गढ़ सभसँ भरल अछि आ तैं इ निर्विवाद रूपे कहल जा सकइयै जे किलाबन्दीक क्षेत्रमे एहिठामक लोक प्रसिद्धि प्राप्त केने छल। बलिराजगढ़सँ प्राप्त ईंटा एहिबातक सबुत अछि। गढ़क निर्माण सुनियोजित ढ़ँगसँ होइत छल आ मौर्यकालमे गढ़ निर्माणक सम्बन्धमे कौटिल्यक मत स्पष्ट अछि। किलाक निर्माण रक्षात्मक दृष्टिकोणसँ होइत छल। मिथिलाक गढ़ सभसँ माँटिक गोलक प्रचुर संख्यामे भेटल अछि। मौर्यकालीन अवशेष पुर्णियाँ, सहरसा, दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, बेगूसराय, हाजीपुर, मुजफ्फरपुर, वैशाली आदि स्थानसँ प्राप्त भेल अछि आ ताहुमे मृण्मूर्त्ति सभ भेटल अछि से तँ सर्वथा अद्वितीय अछिये। शूंगकालक अवशेष सभ सेहो भेटल अछि। वैशालीक अतिरिक्त अशोक कालीन एकटा मौर्यकालीन स्तंभ धरहरा (पुर्णियाँ)सँ सेहो प्राप्त भेल अछि। जयमंगलागढ़सँ मौर्यकालीन एकटा काष्ट पुलक अवशेष भेटल अछि। पाटलिपुत्रक बाद उत्तर बिहारमे इएह एकटा काष्ठपुलक नमूना मौर्यकालीन भेटल अछि। इ निश्चित रूपें कहि सकैत छी जे अशोक कालमे उत्तर बिहारमे सेहो किछु भवनादि, स्तंभादिक निर्माण भेल आ वैशालीमे थोड़ बहुत चैत्य इत्यादि बनल। चम्पारण आ जयमंगलागढ़मे सेहो एहेन प्राचीन अवशेषक उदाहरण भेटल अछि आ चम्पारणसँ तँ सहजहि पृथ्वीक एकटा मुर्त्तिये। पालि–साहित्यमे वैशालीक सम्बन्ध बहुत रास वर्णन अछि आ चैत्यक विवरण सेहो। वैशालीक पोखरि लिच्छवी लोकनिक समयमे कलात्मक छल। गुप्तकालीन अवशेष सेहो मिथिलाक सभ क्षेत्रसँ प्राप्त भेल अछि आ ओहिमे सँ विशेष भाग कोशी आ आन–आन नदीक बाढ़िमे भासि गेल अछि। एक अत्युत्तम गुप्तकालीन मृण्मूर्त्ति नौलागढ़सँ भेटल छल आ संगहि किछु सिक्का साँचा सेहो। आरो कतेक रास गुप्तकालीन सामग्री एम्हर–आम्हरसँ भेटल अछि। बरौनीसँ प्राप्त एकटा सूर्यक मुरूत (कारी पाथरमे) उल्लेखनीय अछि कारण ओहिमे पैरमे जूता आ देहमे जनेउ सेहो अछि। एम्हर आबिकेँ पालकालीन अवशेष वैशाली, उचैठ, बलिराजगढ़, नौलागढ़, जयमंगलागढ़, अलौलीगढ़, महिषी, पुर्णियाँ, आओर सहरसा तथा बेगूसरायसँ भेटल अछि। कलाक दृष्टिसँ इ युग अत्यंत महत्वपूर्ण मानल गेल अछि आ बेगूसराय जिलाक गामे गाम पालमूर्त्तिसँ भरल अछि। बीहट, रजौरा, बरौनी, संहौल, नौला, जयमंगला, वीरपुर, आदि जतहि देखु सभ पालकालीन मुरूतसँ भरल अछि। नौलागढ़, जयमंगलागढ़, वीरपुर आदिसँ प्राप्त पालकालीन मूर्त्ति विधित्सा एवँ अभिकल्पना सभ तरहे विलक्षण अछि। पालयुगमे बौद्ध कलाकेँ प्रश्रय तँ भेटवे कैल मुदा हिन्दू कला शैलीक अवहेलना नहि भेल से निश्चित। एहि युगमे मिथिलामे आकाशचारी गन्धर्वक प्रचुरता एवँ ऐन्द्रियिक विस्तारक दुनू सीमांतक बीच जे संतुलन देखाओल गेल अछि से सर्वथा प्रशंसनीय आ स्तुत्य अछि। धार्मिक वस्तुकेँ कलात्मक वस्तुमे रूपांतरित कए देल गेल अछि। मुख्य मुरूत सभहिक दुनू पार्श्वमे सेवारत देवतागण एवँ अनुगत मूर्त्तिकेँ पृथक कमलाशनपर राखल गेल अछि जे निरूपित देवताक वाहनकेँ प्रदर्शित करैत अछि। शारीरिक बल एवँ पौरूषकेँ चारूता आ लालित्यमे परिवर्त्तित कए देल गेल अछि। मध्यकालीन कलाक पूर्वी स्कूलक रूपमे एहि युगमे मिथिलाक योगदान रहल होएत से बुझि पड़इयै। बाराह, सूर्य, गंगा, शिव–पार्वती, दुर्गा आदिक पालकालीन मुरूतक अवशेष सौसे मिथिलामे छिड़िएल अछि। बाराह मूर्त्ति विष्णुक बाराह अवतारक चित्रणक प्रतीक थिक। जयमंगलागढ़क सुखासन पोजमे शिव–पार्वतीक मूरूत अद्वितीय अछि। अपन दहिना हाथकेँ शिवक दहिना कन्हापर राखि पार्वती महादेवक वामा जाँघपर एहि मुरूतमे बैसल छथि। शिव अपन बामा हाथसँ पार्वतीक संग गाढ़ालिङ्गनबद्ध भेल छथि आ शिवक हाथ पार्वतीक स्तनकेँ छुएत छन्हि। एहि प्रकारक मुरूत तांत्रिक क्षेत्रसँ विशेष भेटल अछि। एहेन टुटल–फुटल मुरूत महिषीमे सेहो बहुत रास अछि आ तारा (खदिरवणी)क मुरूत सेहो पालकालीने थिक। जयमंगला आ महिषी दुनू प्रसिद्ध तांत्रिक केन्द्र मानल जाइत अछि। तांत्रिक साधक लोकनि सुखासन पोजमे बैसल शिवक कोरामे पार्वतीकेँ अपना मोनमे केन्द्रित कए साधना करैत छथि। नारायण पालक अभिलेखसँ स्पष्ट अछि जे कौशिकी कच्छकेँ क्षेत्रमे एक हजार शिव मन्दिरक स्थापनाक हेतु दान देल गेल छल। निश्चित रूपें एहि सभ क्षेत्रमे स्थापत्य कलाक पूर्ण विकास भेल होएत। सुन्दर रीतिसँ अभिकल्पित स्तंभ हमरा लोकनि नौलागढ़, जयमंगलागढ़ आ संहौलसँ भेटल अछि जाहिसँ स्थापत्यक सम्बन्धमे ज्ञान प्राप्त होइत अछि। इमादपुर (मुजफ्फरपुर)सँ धातुक मूर्त्ति सेहो भेटल अछि। पालयुगमे तीरभुक्तिमे बौद्ध आ तांत्रिक संप्रदायक प्रभाव परिलक्षित होइत अछि। कलाक दृष्टिकोणसँ मिथिला कहियो कोनो रूपे बाँझ नहि रहल आ सभ युगमे किछुने किछु कलात्मक वस्तुक निर्माण एहिठाम होइते रहल। मूर्त्तिकला आ स्थापत्यमे सेहो मिथिला पछुऐल नहि छल। स्पूनर तिरहूतक किछु मन्दिरकेँ मिथिला आ तिरहूतक शैलीक मानैत छथि– i) बगहाक हरमंदिर (चम्पारण) ii) त्रिवेणीक कमलेश्वरी नाथक मंदिर (चम्पारण) iii) सौराठक महादेव मंदिर (मधुबनी) iv) अहियारीक रामचन्द्रक मंदिर (दरभंगा) v) सुबेगढ़क भगवती मंदिर (मुजफ्फरपुर) vi) शिवहरक शिवमंदिर (मुजफ्फरपुर) vii) मुजफ्फरपुरक राम मंदिर viii) सिमराँव गढ़क कंकाली देवीक मंदिर। एम्हर जे बहेड़ामे उत्खनन भेल अछि ताहुसँ एकटा मंदिरक अवशेष भेटल अछि जकर विवरण हम आनठाम प्रकाशित करौने छी। बहेड़ाक उत्खननसँ मंदिरक मिथिला शैलीपर प्रकाश पड़इयै। स्पूनरक ध्यान कंदाहाक सूर्यमंदिर दिसि नहि गेल छलन्हि जाहिसँ हुनका इ बुझनामे आबतन्हि जे ओइनवार लोकनिक समयमे स्थापत्य कलाक स्वरूप कि छल। भगीरथपुर उत्खननसँ सेहो बुझना जाइत अछि जे ओहिठाम एक मंदिरक निर्माण भेल छल जे काल–क्रमेण टुटि गेल मुदा जकर अवशेष उत्खननसँ प्राप्त भेल अछि। श्रीधरदास (कर्णाट काल)क कमलादित्यक मंदिरसँ मन्दिर बनेबाक जे परम्परा मिथिलामे प्रारंभ भेल से बरोबरि चलिते रहल आ मन्दिर बनेबाक क्षेत्रमे मिथिला निश्चितरूपे अपन एकटा अलग शैलीक निर्माण केलक। शिल्प एवँ वास्तुकलामे सेहो मिथिला पछुऐल नहि छल आ वेलवा (सारण)सँ भीठ भगवानपुरक अवशेषक अध्ययन केलासँ एहि बातक पुष्टि होइत अछि। वेलवा आ भीठ भगवानपुरक कलापर कामशास्त्रक प्रभाव स्पष्ट अछि आ एहिसँ इहो साफ देखबामे अवइयै जे कलाक क्षेत्रमे ओ लोकनि वस्तुस्थितिकेँ नहि बिसरने छलाह। मूर्त्तिकलाक क्षेत्रमे सेहो प्रचुर सामग्री भेटल अछि। हाजीपुरसँ पुर्णियाँ धरि मूर्त्तिकला (पाथर आ माँटि)क असंख्य अवशेष भेटल अछि। वैशाली, लौरिया नंदन गढ़, अरेराज, पुनौरा, जनकपुर, दरभंगा, भगीरथपुर, देकुली, बहेड़ा, बलिराजगढ़, लदहो, बौराम, बाउर, भीठ भगवानपुर, बरौनी, जयमंगलागढ़, नौलागढ़, असुरगढ़, अलौलीगढ़, बीहट, वीरपुर, संहौल, पटुआरा, महिषी, बलबागढ़ी, हरदी, परसरमा, अन्हराठाढ़ी, श्रीनगर, पुरैनिया, सिकलीगढ़, आदि स्थानसँ प्राप्त विभिन्न युगक मूर्त्तिकला उपलब्ध अछि। लौरिया नंदनगढ़सँ स्वर्ण मूर्त्ति (मातृ देवता-पृथ्वी) भेटल अछि। भीठ भगवानपुरक मुरूत सभकेँ विद्यापति गीतक साकार रूप मानल जा सकइयै। मैथिल शासक मूर्त्तिकला शैलीकेँ यथाशक्ति जीवित रखबाक प्रयास केलन्हि मुदा पालयुगीन सफलता हुनका लोकनिकेँ नहि भेट सकलन्हि। प्राचीन कालसँ अद्यावधि मिथिलामे कखनो मूर्त्तिकलाक नेऽ तँ ह्रास भेल आ नेऽ लोपे। एखनो मिथिलाक माँटिक मुरूत देखबा योग्य होइछ। संहौलसँ प्राप्त एक मुरूत कारी पाथरक (पत्रलेखन मुद्रामे नायिका) बेगूसराय काँलेजक संग्रहालयमे राखल अछि जे कोनो अर्थे खजुराहो आ भुवनेश्वरक तुलनामे कम नहि अछि। ओहने एक शाल भंजिकाक मुरूत सेहो अछि। सूर्यक मुरूतक उल्लेख तँ कइये चुकल छी। बहेड़ासँ एकटा काँसाँक मुरूत सेहो भेटल अछि जकर बनाबट कुर्किहारक मूर्त्तिकला सन छैक। भवन निर्माण कलाक क्षेत्रमे मिथिला अपन गौरवक निर्वाह केने छल। मुजफ्फरपुरक मंदिरक सम्बन्धमे स्पूनर साहेब कहने छथि जे ओ ‘नवरत्न टाइप’क विशिष्ट उदाहरण थिक। सिमरौनगढ़क अवशेषसँ कर्णाटकालीन भवन निर्माणक उदाहरण भेटइत अछि। सिमरौनगढ़ कर्णाट लोकनिक राजधानी छल आ ओतहि रामसिंहक समयमे तिब्बती यात्री धर्मस्वामी आएल छलाह। ओ सिमरौनगढ़क जे वर्णन उपस्थित कएने छथि ताहिसँ बुझि पड़इयै जे सिमरौन संगठित एवँ सुनियोजित नगर छल आ ओकरा चारूकात विशाल किलाबंदी छलैक। सिमरौनसँ प्राप्त अवशेषसँ इ प्रतीत होइत अछि जे नीचाँ मे पहिने पाथरक आधार देल जाइत छल आ ताहिपर सँ चिक्कन ईंटाक नींव दऽ कए भवन बनैत छल। पाथर आ ईंटापर तरह–तरहक नक्कासी सेहो होइत छल आ बलिराजगढ़सँ प्राप्त ईंटापर मनुक्खक तरहथीक छाप देखल गेल छैक। नक्कासीदार ईंटा बहेड़ासँ सेहो प्राप्त भेल अछि। एकटा ईंटापर अश्वमेध घोड़ाक छाप अछि आ दोसरपर कोनो तांत्रिक चक्रक। मैथिल संस्कारक अध्ययन एहेन–एहेन कलात्मक वस्तुक उपलब्धिसँ सेहो भऽ सकैछ। जतवा धरि जे अखनो धरि मिथिलामे प्राप्त भेल अछि तकरा कलात्मक दृष्टिसँ अन्यतम कहि सकैत छी। मिथिलाक अपन वैशिष्ट ओकर भित्तिचित्र, अइपन, कोहवरमे छैक जे अद्यावधि “मिथिला पेंटिङ्गस”क नामे प्रसिद्ध भए देश–विदेशमे नाम अर्जन केलक अछि। अरिपनक आधार तँ ओना पुराणमे सेहो अछि मुदा तंत्रसँ इ कम प्रभावित नहि अछि। अइपन–कोहवर लिखब एक विशिष्ट कला बुझल जाइत छल आओर मिथिलाक प्रत्येक नारीमे एहिमे सिद्धहस्थ होएब आवश्यक बुझना जाइत छल। कोबरा–मड़बाक चित्र सेहो बनइत छल आ एकटा पाण्डुलिपिक मुख्य पृष्ट मड़बाक चित्र हमरा बरौनीसँ प्राप्त भेल अछि। ओहि चित्रमे वरपक्ष आ कन्यापक्षक लोग पाग पहिरने मड़बापर बैसल देखल जाइत छथि। एहि चित्रकेँ हम विशेष महत्वपूर्ण मनैत छी कारण एहेन पाण्डुलिपि हमरा आ कतहु देखबामे नहि आएल अछि। इ पाण्डुलिपिक पृष्ट छान्दोग्य विवाह पद्धतिक पाण्डुलिपिक एक पृष्ट थिक। कागजपर चित्र बनाएब सेहो मिथिलाक पुरान कला थिक आ बारहम शताब्दीक एक पाण्डुलिपिपर एक ताराक चित्र बनल अछि जाहिमे तीरभुक्ति आ वैशाली दुहुक उल्लेख अछि। भित्तिचित्र, कोहबर, अइपन, आदिमे दुर्गा, सीता, काली, राधा, रामकृष्ण, शिव, आदिक चित्र बनैत अछि आओर मिथिलामे एहेन कोनो उत्सव नहि होइत अछि जाहिमे चित्रादि नहि बनैत हो। सभ अवसरक हेतु निर्धारित चित्रमाला अछि। सूर्य, चन्द्रमा, बाँस, कमल, तोता, मैना, माँछ इत्यादिक प्रयोग सेहो एहि चित्र सभमे होइत अछि। चित्र बनेबाक पाछाँ एक विशिष्ट कथा साहित्य एहिमे जूटल अछि जकर संग्रह आ अध्ययन अपेक्षित बुझना जाइत अछि। आर्थर सेहो एहि क्षेत्रमे किछु काज केने छथि आ आबतँ सहजहि एहि कलाक अंतराष्ट्रीय प्रसार भऽ गेल अछि। मिथिलामे करण कायस्थ आ ब्राह्मणक परिवार एकरा एखनो धेने अछि। सिक्की, मौनी, सूप, डाला, कोनिया आदिपर सेहो चित्र बनेबाक प्रथा अछि। सिक्कीक तँ बहुत रास कलात्मक वस्तु बनाओल जाइत अछि। एहि सभ कलाकेँ गृहकला कहल गेल छैक आ मिथिलामे अति प्राचीन कालहिसँ इ सभ प्रथा चलि आबि रहल अछि। एहिमे तरह–तरहक रंगक व्यवहार होइत अछि जेना गुलाबी, पीअर, हरिअर, लाल, सुगा पाँखिक रंग इत्यादि। एक प्रकारक माँटि सेहो ओहन होइत छल जाहिसँ रंग तैयार कैल जाइत छल। संगीतक क्षेत्रमे मिथिलाक योगदान ककरोसँ कम नहि रहल अछि। कर्णाटवंशक संस्थापक नान्यदेवक शासन कालमे संगीतमे बहुत रास नवीन राग आ भासक प्रयोग शुरू भेल। नान्यदेव स्वयं एक महान संगीतज्ञ छलाह। सारंगदेव अपन संगीत रत्नाकरमे एहि बातक उल्लेख केने छथि। नान्यदेव स्वयं ‘सरस्वती हृदयालंकार’ नामक एक प्रसिद्ध ग्रंथक रचयिता छलाह। श्रीधर दासक अन्धराठाढ़ी अभिलेखमे कहल गेल अछि जे नान्यदेव ‘ग्रंथमहार्णव’ नामक पोथीक रचयिता सेहो छलाह। नान्यदेव संगीतमे 160राग सभहिक वर्णन केने छथि। नान्यदेवक स्थापित कैल परम्परा संगीतक क्षेत्रमे मिथिलामे सदति व्याप्त रहल। मिथिलामे एकपर एक संगीतज्ञ सभ युगमे भेल छथि। पुरूष परीक्षाक एक कथासँ ज्ञात होइछ जे हरिसिंह देव स्वयं सेहो एकटा पैघ संगीतज्ञ छलाह। ज्योतिरीश्वर ठाकुर, सिंह भूपाल, जगज्योतिमल्ल, आ लोचन प्रसिद्ध संगीतज्ञ भऽ चुकल छथि। विद्यापति आ लखिमाक नाम सेहो एहि क्षेत्रमे अमर अछि। पूर्व समयमे भवभूति नामक एक ब्राह्मण रहैथ जे नवीन धुनि (ध्वनि) सभमे गीत बनौलन्हि। ओहि समयमे सुमति नामक कायस्थ पश्चिमसँ आबिकेँ हुनकासँ सभ कला सिखलन्हि आ राजसभामे ओकर प्रदर्शन केलन्हि आ ताहियासँ ओ कलावान, कथक, कलाओत आदिक नामे प्रसिद्ध भेला। हुनक संततिमे कतेको व्यक्ति “मल्लिक”क उपाधि धारण केलन्हि। सुमतिक पुत्र छलाह उदय आ हुनक पुत्र जयत भेलाह। जयत सुश्वर गायक छलाह तैं शिवसिंह हुनका विद्यापति ठाकुरक समीप शिक्षार्थ समर्पण कैल। विद्यापति हुनका हेतु नवीन–नवीन धुनि सभहक कल्पना कए गीत बनौलन्हि जकर अग्रगायक राजसभामे जयत भेला। जयतक पुत्र कृष्ण देशी रागमे गान करैथ। हुनक पुत्र भेला हरिहर मल्लिक आ हुनक पुत्र घनश्याम विशिष्ट गायक भेलाह। घनश्यामक पुत्र सभ देशी सम्प्रदायक गानमे निपुण भेलाह। तदनुसारहिं लोचन कवि एवँ नरपति ठाकुर तिरहूत राग सभहिक प्रचार केलन्हि। रागतरंगिणीमे गीतक भनिता अछि ताहिमे नरपति आ महिनाथक उल्लेख अछि। संगीतक क्षेत्रमे मिथिलाक अपन अलग शैली छैक। संगीतमे ओ लोकनि कतेक पारखी होइत छलाह तकर पता वर्णनरत्नाकरक भाट वर्णनासँ लगैत अछि। ओहिमे सात प्रकारक गायन दोष आ १४प्रकारक गीति दोषक उल्लेख अछि। पेशेवर गबैयाकेँ विद्यांवित कहल जाइत छल। वर्णरत्नाकरमे नृत्यवर्णनाक उल्लेखक संगहि संग लोरिक नाचक उल्लेख सेहो अछि। ढ़ोलकक विभिन्न प्रकारक रस आ तालक वर्णन सेहो अछि। जगद्धर अपन संगीत सर्वस्वमे सेहो मैथिल संगीत शैलीक विशद विश्लेषण केने छथि। मिथिला संगीत शैलीक क्षेत्रमे घनश्यामक श्रीहस्त मुक्तावली सेहो प्रसिद्ध मानल गेल अछि। संगीतक क्षेत्रमे वंशमणि झाक नाम सेहो उल्लेखनीय अछि। लोचन अपन रागतंरगिणीमे मैथिल रागक सम्बन्धमे निम्नलिखित उद्गार प्रगट केने छथि– “श्रीमद्विद्यापति कवियितुः काव्यार्णानुवद्वौस्ततत्प्रायानथतदनु गरव्यात गीतैर्विद्वान्। रागानेभ्यः कथमपित्तथा वर्तुलीकृत्य धीमाना प्रेम्णाक्षी मंन्नापरितो लोचनस्तांल्लिलेख”॥ ओ प्रसिद्ध राग सभहिक उल्लेख सेहो केने छथि। रागक उल्लेख:- ललिता विभासी तदनु भैरव्यहिरानि वराड़ीच। गोपीवल्लभ गुजरी रामकली कापशारंगी॥ कौशिक कोरा राख्यो वसंतो धनछीतथा। असावारी चश्रीरागो गौड़ा मालव मालवौ॥ भूपाली राज विजयनायः कामोद देशाखौः। केदारोऽथ मलारी इत्येते मैथिलाः कथिताः॥ मैथिल रागक प्रचार ओहिकालमे नेपाल, गोरखपुर, बंगाल आ आसाम धरि भेल छल। संगीत आ नृत्यकला मिथिलामे एक समयमे अपन चरमोत्कर्षपर छल। शुभंकर ठाकुर नृत्य विद्यापर एकटा महान ग्रंथ लिखने छलाह। मैथिल गवैयाक बजाहटि त्रिपुराक राजाक ओतएसँ होइत छलन्हि। संगीतमे मिथिला शैलीक विकासक हेतु लोचनक रागतंरगिणी आनिवार्य ग्रंथ बुझना जाइत अछि। हेवनि धरि मिथिला संगीतक प्रधान केन्द्र छल आ पचगछियाक स्वर्गीय रायबहादुर लक्ष्मीनारायण सिंहक दरबार समस्त भारतीय गायक लोकनिक हेतु एकटा बड़का आश्रय छल। हुनके एहिठाम माँगन खबास प्रसिद्ध गबैया छल आ माँगनक शिष्य रघु झा सेहो। लक्ष्मीनारायण सिंह अखिल भारतीय स्तरक प्रसिद्ध संगीतज्ञ छलाह आ अपन जमीन्दारीकेँ संगीतक पाछाँ बिलटा देलन्हि। अध्याय–२० मिथिलाक संस्कृति I. विषय–प्रवेश मिथिला एकटा भौगोलिक इकाइ छल अति प्राचीन कालसँ। यजुर्वेदक समयसँ ‘मैथिल’ शब्द एक संस्कृतिक परिचायक छल आ मिथिलाक भौगोलिक इकाईक अंतर्गत जे केओ रहैत छलाह से ‘मैथिल’ कहबैत छलाह। अधुना एकर अर्थ दोसर लेल जाइत अछि परञ्च प्राचीन कालमे से बात नहि छल। मैथिल संस्कृतिक विकास कालक्रमेण होइत गेलैक आ ‘मैथिलत्व’ जे अपन एकटा व्यक्तित्व छैक तकर पूर्णोत्कर्ष विद्यापतिमे आबिकेँ भेल। प्राचीन कालक मिथिक संतान माथव कहौलन्हि आ ओहिसँ ‘मैथिल’ शब्दक आविर्भाव भेल। अर्जुन आ श्रीकृष्णक मध्ये भेल गप्पसँ ‘मैथिल’क चित्र स्पष्ट होइछ। एहिठाम विदेह जनकक कर्मानुष्ठानपर बल देल गेल अछि। शतपथ ब्राह्मणक निर्माण मैथिलक हाथे भेल सेहो कहल जाइछ। याज्ञवल्क्यकेँ एकर श्रेय देल जाइत छन्हि– “याज्ञवक्‍म्‍योहि मैथिलः”। ब्राह्मण युगमे विदेहक राज्यसभामे याज्ञवल्क्यक सभापतित्वमे वेदमहर्षिगण गूढ़ धर्मतत्वक निर्णय करैत छलाह। मिथिलेकेँ न्यायशास्त्रक उदगम–स्थल मानल गेल अछि आ परम्परानुसार गौतम एवँ कणादकेँ मैथिल कहल गेल छन्हि। मिथिलामे राजर्षिविद्या, सिद्धविद्या, राजविद्या, एवँ आर्षविद्याकेँ क्रमशः वैज्ञान, ज्ञान, ऐश्वर्य एवँ धर्मक नामसँ सम्बोधित कैल गेल अछि। मिथिलामे बुद्धियोगक प्राधान्य रहल अछि। श्रीकृष्ण कर्मानुष्ठानक रूपमे विदेह जनककेँ आदर्श मनने छथि। विद्याकेँ मिथिलाक वैभव मानल गेल अछि। उपनिषद् कालमे मिथिला विदेहक नामे ज्ञात छल। बृहदारण्यकमे जनककेँ विदेहक राजा कहल गेल छन्हि। विद्या आ दानक हेतु ओ सुप्रसिद्ध छलाह। अपन समकक्षीक मध्य ओ अद्वितीय छलाह। भौतिक दृष्टिकोणसँ सेहो विदेह एकटा सुसंपन्न राज्य छल आ एहिठाम आध्यात्मिक एवँ विद्वतपूर्ण विकासक संभावना विशेष छल। जनक बहुदक्षिणा यज्ञ केने छलाह जाहिमे दूर–दूर देशसँ ब्राह्मण लोकनिकेँ आमंत्रित कैल गेल छलन्हि आ ओहिठाम कुरू–पाँचालक ब्राह्मण सेहो आएल छलाह। वैदिक कर्मकाण्डक प्रधान केन्द्र छल मिथिला ताहि दिनमे। जनक ब्राह्मणकेँ गाय आ सोना दानमे दैत छलाह। ब्रह्मविद्याक गूढ़ तत्वक विश्लेषणक हेतु हिनका दरबारमे एकटा बृहत् जमघट भेल छल विद्वानक जाहिमे ताहि दिन सबटा प्रसिद्ध विद्वान सम्मिलित भेल छलाह। जनक स्वयं एक पैघ दार्शनिक छलाह। एहि जमघटमे याज्ञवल्क्य, आर्तभाग, लाह्यायनी भुज्य, चाक्रायण उषस्त, कौषितकेय कहोल, गार्गी, आरूणी उद्दालक एवँ शाकल्य आदि विद्वान उपस्थित छलाह। बेरा–बेरी याज्ञवल्क्य एहिमे सभकेँ पराजित केलन्हि। जनक याज्ञवल्क्यक विद्वतासँ प्रभावित भेला आ हुनका अपना ओतए रखलन्हि। याज्ञवल्क्यक दूटा पत्नी छलथिन्ह मैत्रेयी आ कात्यायनी। विदेहक लोग विशेष विद्या प्रेमी होइत छलाह। स्त्री शिक्षा सेहो बड्ड प्रचलित छल। मैत्रेयी विदुषी छलीह। गार्गीक विद्वताक प्रशंसा तँ बृहदारण्यकमे अछिये। गार्गी याज्ञवल्क्यक संग विवादमे भाग लेने छलीह। याज्ञवल्क्य स्मृतिमे कहल गेल अछि– “मिथिलास्थः सयोगीन्द्रः क्षणंध्यात्वा व्रवीन्मुनीन्” जनक वंशक राजा सभ योगीश्वर याज्ञवल्क्यक प्रसादे ब्रह्मज्ञानी भेलाह– “एते वै मैथिला राजन्नात्म विद्या विशारदः योगीश्वर प्रसादेन द्वर्न्यैमुक्ता गृहेष्वपि” व्यासक पुत्र शुकदेवजी मिथिलेमे ब्रह्मविद्याक शिक्षा प्राप्त केने छलाह। गीतामे श्रीकृष्ण कहने छथि– “कर्मणैवहि संसिद्धि मास्थिता जनकादयः” एहि सभ तथ्यसँ मात्र एतबे संकेत देल गेल अछि जे मैथिल संस्कृतिक नींव वैदिक युगमे पड़ल आ ओकर बहुमुखी विकास भेल। एक सम्पूर्ण भौगोलिक क्षेत्रक भौतिक सुविधाक आधारे इ विकास संभव भेल होएतैक एहिमे सन्देह नहि कारण जाधरि चारूकात सुरक्षा एवँ शांति नहि रहैत छैक ताधरि आध्यात्मिक चिंतनक हेतु वातावरण उपयुक्त नहि बुझल जाइत छैक। समस्त ब्राह्मण साहित्य एवँ उपनिषद् मैथिलक कृतित्वक प्राचीनकालक गवाही थिक जकर अवहेलना मिथिलाक साँस्कृतिक इतिहासक अध्ययनक क्रममे नहि कैल जा सकइयै। मिथिलाक सीमाक सम्बन्धमे विवाद भने हो मुदा मैथिली संस्कृतिक प्रवाह जे अविच्छिन्न चलैत रहल अछि आ जकर चरमोत्कर्ष विद्यापतिमे भेलैक ताहिमे सन्देहक कोनो गुंजाइश नहि अछि। अति प्राचीनकालसँ एखन धरि मिथिलाक भूमि संस्कृतिक एक विशिष्ट केन्द्र रहल अछि आ संस्कृतिक ओहि पातर डोरीसँ बान्हल अझुको मिथिलावासी निर्वाह कऽ रहल छथि। ओहि संस्कृतिक अपन जे वैशिष्टय छैक तकर निखार अखनो धरि पूर्णरूपेण नहि भेल छैक। एकर वैशिष्टयक विस्तृत विवरण महाभारतमे भेल अछि– “मैथिलस्य”– शब्दक व्यवहार एहि कथनकेँ पुष्ट करैत अछि। बौद्ध आ जैन साहित्यमे सेहो मैथिलक विशिष्टता सुरक्षित अछि। अश्वघोष अपन बुद्धचरितमे लिखने छथि– “ध्रुवानुजौ यौ बलिबज्रबाहु वैभ्राजमाषाढ़ मथांतिदेवम्। विदेह राजं जनकं तथैव (रामं द्रुमं सेनजित स्वराज्ञः)” बृहदारण्यक उपनिषदमे अछि– “सहोवाचाजातशत्रु सहस्त्रमेतस्यांवाचिदध्मो। जनको जनक इति वैजना धावंतीति”॥ पाणिनिमे ‘मैथिल’ शब्दक उल्लेख मैथिल संस्कृतिक व्यापकता एवँ प्राचीनताक द्योतक थिक। मैथिल आ तैरहूतक एक्के संग व्यवहार भविष्य पुराणमे सेहो भेल अछि– “निमेः पुत्रस्तु तत्रैव मिथिनमि महानस्मृतः प्रथमं भुजूबलैर्येन तैरहूतस्य पार्श्वतः॥ निर्म्मितं स्वीय नाम्ना च मिथिलापुरमुतमम्। पुरीजनन सामर्थ्याज्जनकः स च कीर्तितः”॥ श्रीमद् भागवतमे कहल गेल अछि– “जन्मना जनकः सोऽभूद्वैदेहस्तु विदेहजः। मिथिलो मथनाज्जातो मिथिला येन निर्मिता”॥ “एते वै मैथिला राजन्नात्म विद्या विशारदाः योगेश्वर प्रसादेन द्वन्दैर्मुक्ता गृहेष्वपि”। मिथिलाक जनक एहि परम्पराक स्थापना करबामे समर्थ भेल छलाह जे लोग गृहस्थ रहितहुँ जीवन्मुक्त भऽ सकैत छल आ अपनाकेँ ‘विदेह’ कहि सकैत छल। मिथिलाक इ एकटा विशिष्ट देन संस्कृतिक क्षेत्रमे मानल गेल अछि जकर एहेन उदाहरण दोसर ठाम नहि भेटइत अछि। जखन व्यासजीक पुत्र शुकदेवजी अपन पितासँ तपश्चर्याक हेतु आज्ञा मंगलन्हि तखन व्यासजी हुनका योगिराज जनकक दृष्टांत रखैत कहलथिन्ह जे अहाँ घरोमे रहिकेँ तपस्या कऽ सकैत छी। अहिसँ जखन ओ संतुष्ट नहि भेला तखन हुनका राजर्षि जनक ओतए उपदेश ग्रहण करबाक हेतु पठाओल गेलैन्ह। देवी भागवतमे एहि प्रसंगक उल्लेख अछि। मिथिला पहुँचलापर शुकदेवजी जनकक द्वारपालक प्रश्न “किं सुखं, किं दुखम्” प्रश्नसँ आश्चर्यचकित भऽ गेलाह। एहि प्रश्नक समीचीन उत्तर देने बिना ओ भीतर नहि जा सकैत छलाह परञ्च जखन जनकजीकेँ हुनक आगमनक सूचना भेटलन्हि तखन ओ हुनका स्वागतक संग भीतर लऽ गेलथिन्ह। शुकदेव जी ज्ञान प्राप्त कए मिथिलासँ घुरलाह। कहल जाइछ जे कृष्ण सेहो जनकसँ ज्ञान चर्चाक हेतु मिथिलामे आएल छलाह। महाभारत, ब्रह्मपुराण, पद्मपुराण, रामायण, आदि ग्रंथमे मिथिलाकेँ ज्ञान भूमि कहल गेल छैक। मिथिलाक धर्मव्याधक उल्लेख महाभारतमे भेल अछि जे एक क्रोधी ब्राह्मणकेँ गृह तपस्याक शिक्षा दए गृहस्थ बनौने छलाह। आनन्द रामायणक अनुसार रावण त्रिलोक सुन्दरी लक्ष्मीरूपा पद्माक रूपगुणक प्रशंसा सुनि ओकरा प्राप्त करबाक हेतु उताहुल भऽ गेल छलाह आ अंततोगत्वा रत्नरूपमे परिणत पद्माकेँ प्राप्त कए अपना ओतए आनि पूजाक पेटीमे रखलन्हि। दोसर दिन जखन मन्दोदरीकेँ देखेबाक हेतु पेटी खोलल गेल तँ ओहिमे एकटा विकराल सहस्त्रमुखी पद्माकेँ देखि रावण त्रस्त भऽ गेल तखन पद्मा रावणकेँ कहलन्हि– “अहाँ एहिठाम आनिकेँ हमर जे अपमान कैल अछि ताहिमे अहाँक नष्ट निश्चित अछि। अहाँ अविलंब हमरा अपना ओतए धऽ आउ गेऽ आ ओतहि हमरा माँटिमे गारि दियह। हजार वर्षक पछाति ओहि पवित्र भूमिसँ जखन हम पुनः उत्पन्न होएब तखन अहाँ अपन नाशकेँ अवश्यम्भावी बुझि लेब”। इएह सीता भऽ कए जन्म लेलथि। मिथिलाक धार्मिक महत्व विवरण निम्नलिखित उद्धरणसँ स्पष्ट होइत अछि– देवी भागवतक छठम् स्कन्धमे मिथिलाक सम्बन्धमे कहल गेल अछि– “एवँ निमिसुतो राजा प्रथितो जनकोऽभवत् नगरी निर्मिता तेन गंगातीरे मनोहरा। मिथिलेति सुविख्याता गोपुराट्टाल संयुता धनधान्य समायुक्ता हट्टशाला विराजिता”॥ बृहद्विष्णुपुराण:- “तत्रयात्रा महापुण्या सर्वकामसमृद्धिनी इयंतु मिथिला पुण्या स्वयं रामस्वरूपिणी॥ मिथिला सर्वतः पुण्या सुराणामपि दुर्लभा। अतस्तीर्थेषु सर्वेषु मिथिला पूज्यते सदा॥ माया पुर्जादिकाः प्रोक्ताः सामान्येन विमुक्तिदाः। यैषा तु मिथिला राजन् विष्णु सायुज्य कारिणी”॥ यामलसारोद्दार:- (शिवजनक संवाद - ‘बृहदविष्णुपुराण’) “बैकुण्ठगान पुरस्कृत्य लोकाल्लंक्ष्मी रवातरत्। बैकुण्ठस्तु निजांशेन मिथिला भूमिमाविशत्॥ अतोनिवास भूमिस्ते सर्वस्थानाद्विशिष्यते। बैकुण्ठान्नकला न्यूना दृश्यते मिथिला मया॥ मिथिला वासमासाद्य जीवन्मुक्तो भवेन्नरः। देहांते राघवं प्राप्य तद् भक्तैः सह मोदते”॥ मिथिलाक तीर्थ सभहिक नामक विवरण सेहो रामायण, विष्णुपुराण, स्कन्दपुराण आदि ग्रंथ सभमे भेटइत अछि। अगस्त्य रामायणमे निम्नांकित वर्णन अछि– “वैदेहो पवन स्यांते दिश्यैशान्यां मनोहरम्। विशालं सरस्तीरे गौरीमंदिरमुतमम्॥ वैदेही वाटिका तत्र नाना पुष्पसुगुम्फिता। रक्षिता मालिकन्याभिः सुर्वर्तुसुखदाशुभा॥ प्रभाते प्रत्यहंतत्र गत्वा स्नात्वालिभिः सह। गौरीमपूजयत्सीता मात्राज्ञप्ता सुभक्तितः”॥ स्कन्दपुराण:- “आसीद् बह्मपुरी नाम्ना मिथिलायाँ विराजिता। तस्यां लसति धर्मात्मा गौतमोनाम् तापसः॥ अहल्यानाम तत्पली पतिभक्ता प्रियंवदा। सर्वलक्षण सम्पन्ना सासीत्सर्वांगसुन्दरी”॥ बृहद विष्णुपुराण:- “गौतमस्या श्रमे याम्ये पातालोस्थित पाथसि। स्तात्वाकुण्डेनमेद्भक्तया ययुः पाठफलंलभेत्”॥ “विभाण्डको महायोगी दक्षिणो निवसत्यसौ। गौतमस्याश्रमात्पुण्याधाम्य पश्चिम कोणके”॥ एहिसँ स्पष्ट अछि जे विभाण्डक मुनिक आश्रम गौतमाश्रमसँ सटले छल। मिथिला मात्र अध्यात्म विद्येटामे नहि अपितु शस्त्र आ शास्त्र दुहुक हेतु प्रसिद्ध छल। पराशर मैत्रेय संवादमे कहल गेल अछि जे सभ ठाम आ सभ समयमे जाहिठाम शत्रुक मथन होइत हो उएह जनक निर्मित मिथिला थिक। “अंतोवहिश्च सर्वत्र मथ्यंते रिपवः सदा। मिथिला नाम सा ज्ञेया जनकैश्च कृता मही”॥ एहि पक्षपर रामायणमे सेहो विशद् विश्लेषण भेल अछि। जनक विषय विरागी रहितहुँ राज–काज किंवा साँसारिक कर्तव्यसँ कथमपि विमुख नहि रहैत छलाह। तैं तँ हुनका राजर्षि, जीवन्मुक्त, योगी आ विदेह कहल गेल छन्हि। रामायणमे कहल गेल अछि जे राजा सुधन्वा मिथिलापर घेरा डालिकेँ शिवधनुष जनकक ओहिठाम पठाकेँ पद्माक्षी सीताक याचना केलन्हि। जनक एहिबातकेँ नहि मानलन्हि जकर नतीजा भेल युद्ध। राजा सुधन्वाकेँ मारि ओ साँकाश्यमे अपन वीर भ्राता कुशध्वजक अभिषेक केलन्हि। एहिसँ स्पष्ट अछि जे जनक व्यावहारिक सेहो छलाह। वैशाली अपन गणतांत्रिक शासन पद्धतिक हेतु विश्वविख्यात छल एवँ जैन धर्म आ बौद्ध धर्मक प्रसार केन्द्रक हेतु सेहो। वैशालीक गरिमासँ स्वयं गौतमबुद्ध एतेक प्रभावित छलाह जे एहि स्थानकेँ ओ तावतिंश देवसँ तुलना कएने छथि। वैशाली लोकनि नागरिकताक कलामे अपना समयमे अपूर्व छलाह आ ताहि दिनमे चारूकात हिनक यश छिड़िऐल छल। चम्पारण तँ सहजहि वैदिक कालहिसँ प्रसिद्ध साँस्कृतिक केन्द्र छल। लौरिया नंदनगढ़मे ८०फीट उँच्च स्तुप भेटल अछि आ ओहिठाम वैदिक समाधिभूमिक टिलहासँ एकटा स्वर्णपत्रपर अंकित पृथ्वीमाताक चित्र भेटल अछि जे कैक मानेमे अपूर्व अछि। ओहिठाम एकटा अशोकक स्तंभ सेहो अछि जाहिपर अशोकक धर्मोपदेश अंकित अछि। आधुनिक युगोमे महात्मा गाँधी अपन अहिंसात्मक संघर्षक प्रयोग सेहो एहिठामसँ प्रारंभ केने छलाह। ‘हरिहर क्षेत्र’ मिथिलाक एकटा महान धार्मिक केन्द्र मानल गेल अछि आ पुराणक अनुसार गजग्राहकक युद्ध एतहि भेल छल। धार्मिक आर्थिक आ सामाजिक बिकासक क्रममे मिथिलाक विशिष्ट योगदान रहल अछि। एहिठाम इ उल्लेख करब आवश्यक बुझना जाइत अछि जे दरभंगाक महाराज स्वर्गीय रमेश्वर सिंहक सत्प्रयासे हरिद्वारमे गंगा नहरक बाँधकेँ कटबाओल गेल आ गंगाक रूकल प्रवाहकेँ पुनः भगीरथ–खातमे आनल गेल जाहिसँ हमरा लोकनिकेँ गंगाक दर्शन भरहल अछि। मिथिलामे हुनका ‘अपर–भगीरथ’ कहल जाइत छन्हि। जखन खादीक आन्दोलन प्रारंभ भेल तखन अखिल भारतीय खादीक केन्द्र मधुबनीमे स्थापित भेल आ अद्यावधि ओ चलल आबि रहल अछि आ खादीक प्रामाणिकताक हेतु मधुबनीक नाम आवश्यक मानल जाइत अछि। ओना मधुबनी हस्तशिल्प आ कुटिरशिल्पक हेतु सेहो प्रसिद्ध अछि। मिथिलाक संस्कृतिक विकास कोनो एक दिनमे अथवा एक ठाम नहि भेल छल। मिथिलाक सीमा काफी विस्तृत छल आ एकर सभ क्षेत्र सारणसँ महानंदा धरि कोनो ने कोनो रूपें मैथिल संस्कृतिक विकासक स्रोत छल। जैन आ बौद्ध साहित्यक अतिरिक्त आरो बहुत रास साहित्यिक साधन अछि जाहिमे मिथिलाक संस्कृतिक विवरण भेटइत अछि आ जकर मूल्याँकन अद्यावधि नहि भऽ सकल अछि। मैथिल संस्कृतिक विशिष्ट अध्ययनक हेतु एक एहेन दलक आवश्यकता अछि जे वर्षौ एहि काजक हेतु अपनाकेँ समर्पण कऽ दैथि आ तखने एकर सर्वांगीण अध्ययन संभव भऽ सकत। सोमदेवक ‘यशस्तिलक चम्पू’मे हमरा लोकनि ‘तिरहूत रेजिमेंट’क उल्लेख भेटइयै जाहिसँ बुझना जाइत अछि जे एहिठामक निवासी युद्ध विद्यामे सेहो निपुण होइत छलाह आ एहिठामक ‘रेजिमेन्ट’क विशेष महत्व रहैत छल। साहित्यक क्षेत्रमे ‘मैथिल रीति’क उल्लेख भेटइत अछि जे एहि बातक द्योतक थिक जे गौड़ीय आ ‘वैदर्भी रीति’क अतिरिक्त एकटा ‘मैथिल रीति’ सेहो एकटा स्कूलक प्रतिनिधित्व करैत छल। कलामे मिथिलाक अपूर्व योगदान रहल अछि। हस्तकला, शिल्पकला, चित्रकला, आदि जे हेवनिमे अंतराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त केलक अछि। मैथिलत्वक अपन विशेषता तँ एहने छलैक जे विद्यापति बाध्य भए एहि गुणकेँ अपन ‘पुरूष परीक्षा’मे वर्णन केने छथि। ‘विद्यापति’मे आबिकेँ मैथिल संस्कृति अपन चरमोत्कर्षपर पहुँचल आ मैथिलक व्यक्तित्वक शुद्ध रूपें निखार ओहिठाम आबिकेँ भेल। बिहारक आन भागक अपेक्षा मिथिलेटा एकटा एहेन क्षेत्र अछि जकर अपन साँस्कृतिक वैशिष्ट्य अखन धरि बनल छैकि आ जकर एकटा साँस्कृतिक खण्ड कहल जा सकैत अछि–अपन लिपि, अपन कला, अपन सामाजिक संस्कार, अपन भौगौलिक इकाई, अपन साहित्य एवँ अपन कानूनक स्कूल तथा परम्परा एकरा एखनहुँ अपन व्यक्तित्व प्रदान केने छैक जे आन कोनो क्षेत्रमे नहि देखबामे अवइयै। रहन–सहन, खान–पान, विधि–व्यवहार, नियम–परिनियम, सामाजिक दृष्टिकोण, आर्थिक समानता आ भाषा एवँ साहित्यक श्रृखंलाबद्ध विकास क्रम तथा साँस्कृतिक गतिविधिक अविच्छिन्न प्रवाह एवँ एकरूपता मिथिलाक साँस्कृतिक परम्पराक द्योतक थिक आ इएह कारण थिक जे एकर व्यक्तित्वक वैशिष्टय अखनो धरि सुरक्षित अछि। ‘मिथिला’, ‘मैथिल’ शब्दसँ एकटा संस्कृतिक बोध होइत अछि आ एहि नामसँ हम अखिल भारतमे कतहु समादृत भऽ सकैत छी आ व्यक्तिगत रूपें हम भेलो छी। इ दुनू शब्द मात्र एकटा भौगौलिक क्षेत्रक द्योतक नहि अपितु एकटा संस्कृतिक द्योतक थिक जकर विकासक क्रमक प्रारंभ हमरा यजुर्वेदमे देखबामे अवइयै आ चरमोत्कर्ष विद्यापतिमे। II. मिथिलाक संस्कृतिक विशिष्टता - अइपन मिथिलाक चित्रकला (अइपन) :- मिथिलाक अरिपन आब एकटा विश्वकलाक रूपमे परिवर्त्तित भए स्वीकृत भऽ चुकल अछि आ मैथिली कलामे दक्ष लोकनिकेँ आब सरकारी उपाधि सेहो भेटए लागल छन्हि। ‘अरिपन’ शब्दक विकास आलेपन अथवा आलिम्पणसँ भेल अछि– ‘आलेपन’ 64कलामे सँ एक कला मानल गेल अछि जकरा हमरा लोकनि चित्र अथवा शिल्पकला कहि सकैत छी। अरिपन देबाक प्रथा तँ प्राचीन कालहिसँ चलि आबि रहल अछि। प्रत्येक शुभ कार्यमे कोनो ने कोनो रूपें अरिपन देबाक प्रणाली प्राचीन कालहुँमे छल। शुभ कर्मक अवसरपर ‘सर्वतोभद्र’, ‘स्वस्तिक’, ‘षोड़सदल’, ‘अष्टदल’, आदि एकरे प्रभेद मानल गेल अछि आ एकर प्रमाण हमरा प्राचीन साहित्यमे सेहो भेटइत अछि। निम्नलिखित उद्धरण सभसँ प्रमाण भेटत। ब्रह्माण्ड पुराण:- “विवाहो सर्वयज्ञेषु प्रतिष्ठादिषुकर्मषु। निर्विघ्नार्थ मुनिश्रेष्ठ न थोद्वेगाद्भतेषुच॥ वासुदेव कथाभिश्च स्तोत्रैरन्यैश्चे वैष्णवैः। सुभाषितैरिन्द्रजालैर्भूमिशोभाभिरैवः च”॥ भूमि शोभाक विवरण एहिठाम देखबामे अवइयै। इएह भूमि शोभाकेँ हमरा लोकनि अपना ओतए ‘अरिपन’ कहैत छी। संस्कार रत्नमाला (भट्ट गोपीनाथ कृत):- “लग्नाहेमातृकाः पूज्याः पूज्या गौरी हरान्विता। पीठे वै तदलाभे तु सुश्लाक्षणे तण्डुलान्विते॥ पंकज कारयित्वा तु तंत्र गौरी हरौ यजेत्”॥ संस्थाप्य गणपं गौरी काञ्चनी काण्चने गजे। कृत्वोपवासनियमं गजं गौरीञ्च पूजयेत्”॥ एहिठाम “सुश्लक्षण”, ‘ताण्डुलान्वित’ आदिसँ इ भान होइछ जे अरिपनक हेतु चाउर पीसिकेँ चौरठ बनाओल जाइत छल आ तखन ओकरा घेरिकेँ अरिपन देल जाइत छल। स्वनिर्मित गजक ऊपर गौरी आ गणपतिक पूजनक प्रसंगक विवरण भविष्यपुराण आदि अन्याय ग्रंथमे सेहो भेटइत अछि। एहि सभ साधनक आधारपर इ कहल जाइत अछि जे भूमिकेँ बढ़िया जकाँ नीपिकेँ ओहिपर मंडल आलेपन कए (अरिपन दए) नवघटक स्थापना करबाक चाही। चण्डेश्वर कृत्यरत्नाकरमे लिखने छथि– “पूजयेन्मंगलां तत्र मण्डले विधि वत्सदा”– अर्थात् अरिपन दऽ कए सदैव विधिपूर्वक मंगला देवीक पूजा करी। एहि प्रसंगमे निम्नलिखित ग्रंथ सेहो उल्लेखनीय बुझना जाइत अछि– पूजा प्रकाश (वीरमित्र मिश्र):- “पद्माष्ट दलं तत्र कर्णिका केसरोज्ज्वलम्। उभाभ्याँ वेदतंत्राभ्याँ मध्ये तुभय सिद्धये”॥ पूजा प्रदीपमे गोविन्द ठाकुर लिखने छथि– “यंत्राधारमाश्रित्यैव पूजा विहिता”। एकर आरो कतेक रास उदाहरण देल जा सकइयै मुदा स्थानाभावक कारणे एहिठाम ओतेक उद्धरण देब संभव नहि। पर्व भेदसँ नाना प्रकारक अरिपन मिथिलामे स्त्रीगण दैत छथि। अपन चिरंतन संस्कृतिक प्रभावक फलें एहिठाम स्त्रीगणमे इ कलाक विलक्षणता देखबामे अवइयै। प्रत्येक अवसरक फराक–फराक आलेपनक (अरिपनक) विधि छैक। विवाहोत्तर महुअकक शुभ अवसर जे दूटा पुरैनी पातक आकारक अरिपन देल जाइत अछि से भेल वर–वधुक अविच्छिन्न सम्बन्धक प्रतीक। ठीक ओहिना कोजागराक अवसरपर लक्ष्मीपूजासँ सम्बन्धित अरिपन मखानक तीन पातक आकारक बनाओल जाइत अछि। पृथ्वी पूजाक अवसरपर त्रिकोण यंत्राकार, देवोत्थानमे प्रवोधिनी, साँझक ‘मंदिराकार’ आ तुलसी पूजाक अरिपनक अलग विधान अछि। सभ पर्वपर अलग–अलग अरिपन देबाक परिपाटी मिथिलामे अद्यपर्यंत अछि। सत्यनारायण पूजाक अवसरपर जे ‘चौशंख’ अरिपन देल जाइत अछि से बड्ड मार्मिक अछि– ‘चौशंख’ चतुर्भुज भगवानक द्योतक थिक। पष्ठी देवीक पूजाक अवसर ‘कमलाकार’ अरिपन देबाक प्रणाली अछि। देवोत्थान (प्रवोधिनी)क सम्बन्धमे चण्डेश्वर लिखैत छथि– “वासुदेव कथाभिश्च स्तोत्रैरन्यैश्च वैष्णवैः। सुभाषितैरिन्द्रजालैर्भूमिशोभाभिरेवच”॥ ‘भूमि शोभा’क अर्थ भेल अरिपन। कुल देवताक सम्बन्धमे रूद्रधरक मत छन्हि– “ततः कतैक भुक्ता ब्राह्मणी तण्डुल चूर्णेनोपलेपनं विधाय तत्समीपे पूर्व भागो परिफलके पट्टके वा तथैवोपलेपयेत।...एवँ सुन्दरं महावेदि मण्डलं कृत्वैशान्यां ग्रहवैद्यां श्वेत वर्णिकयाऽष्टादशदलं पद्मं विलिरव्य....” हेमाद्रि सेहो अरिपनक उल्लेख केने छथि आ श्रीहर्षक नैषधीय चरितमे सेहो एकर विवरण एवँ प्रकारे अछि– “धृत लाञ्छन गोमयाञ्चनं विधुमालेपनपाण्डरं विधि। भ्रमयत्युचितं विदर्भजाऽनननीराजनवर्द्धमानकम्”॥ एकर टीकामे नारायण लिखने छथि– “आलेपनम्–पिष्टोदकम्–अईपण–इति लोके प्रसिद्धम्”। आगाँ ओ पुनः लिखने छथि– “चतुष्कोण निर्माणार्थ हरिद्राचूर्ण मिश्रितं तण्डुल पिष्टं तस्यदाने–आलेपवरणे पंडिताः–चतुराः”॥ विवाह, श्राद्ध, पूजा आदि अवसरक हेतु विविध प्रकारक अरिपन लिखबाक व्यवस्था मिथिलामे प्राचीन कालसँ चलि आबि रहल अछि। विवाहक सप्तपदी प्रकरणक प्रसंगमे सेहो आलेपनक उल्लेख भेटइत अछि। आलेपन शब्दक व्याख्या शब्दकल्पद्रूममे सेहो भेल अछि। विद्यापति एकर उल्लेख एवँ प्रकारे केने छथि। “ललातरूअर मंडप जीति, निरमल ससधरधवलए भीति। हरि जब आओब गोकुलपुर, घरे–घरे नगर बाजए जयतूर। अलिपन देओब मोतिमहार, मंगलकलसक करब कुचगर”॥ वैदिक युगहिसँ मिथिलामे सभटा मांगलिक कार्य सर्वतोभद्रादिमंडलेपर होइत छल। ओना अरिपनक परिपाटी तँ समस्त भारतमे कोनो ने कोनो रूपें अछिये मुदा एहिकलामे मिथिलाक अपन एकटा वैशिष्ट्य छैक। हरिद्रा–कुंकुम–केसर आदिक संग सिन्दूरक संग अरिपन देबाक परिपाटी मिथिलेटामे अछि। मिथिलाक लोक चित्रकलामे अपन एकटा सादगी अछि। इ कला सनातन कालसँ प्रवाहित होइत आएल अछि। मिथिलाक एहिकलामे उन्मुक्त भावना एवँ परिष्कृत शैली, नैसर्गिक अभिव्यंजना एवँ सुरूचिक जे समन्वय देखबामे अवइयै से आनठाम भेटल असंभव। लोक संस्कृतिक एहेन प्राँजल प्रसाद आ कत्ते भेटत? कहल जाइत अछि जे स्वस्तिक अरिपनक प्रारंभ वैदिक युगहिमे भेल छल। ‘सर्वतोभद्र’ आ ‘स्वस्तिक’केँ एक्के मानल गेल अछि। मिथिलामे प्रचलित ‘अरिपन’ आ अन्यान्य चित्रशैलीकेँ ‘मिथिला शैली’क नामसँ सेहो जानल गेल अछि। एकरा आधुनिक विद्वान लोकनि “मिथिला स्कूल आफ पेन्टिङ्ग” सेहो कहैत छथि आ अधुना एहि धरोहरकेँ संयोगिकेँ रखने छथि मैथिल करण कायस्थ आ ब्राह्मण ललना लोकनि। आर्थर महोदय एहि कलाक विशिष्ट अध्ययन केने छथि आ एहि सम्बन्धमे अपन मतो प्रकाशित केने छथि। एहि चित्रक अध्ययनसँ सामाजिक धार्मिक आदिक ज्ञान सेहो होइत अछि। अरिपन आ भित्ति चित्र कालजयी भए एखनो मिथिलाक घर–घरमे व्याप्त अछि। एहिमे दू प्रकारक भेद अछि। भित्ति चित्र आ भूमि चित्र। भूमि चित्र अइपनक नामे प्रसिद्ध अछि। मिथिलाक सबटा शुभकार्यमे अइपन लिखबाक प्रथा अहुखन बनल अछि। वीरेश्वर एवँ रामदत्तक लेख सभसँ सेहो एहिबातपर प्रकाश पड़इत अछि। अइपनपर तंत्रक प्रभाव स्पष्ट अछि आ एकर कारण इ थिक जे मिथिला तंत्रक प्रधान केन्द्र छल आ अइपन ओकर यांत्रिक प्रकाश थिक। मैथिल निबन्धकार लोकनि एकर महत्वक विश्लेषण अपना लेख सभमे केने छथि। अरिपनमे मूलतः तुसारी पूजा, पृथिवी, साँझ, मौहक, मधुश्रावणी, द्वादशा, गवहा संक्रान्ति, कोजागरा, सुखरात्रि, षडदल, अष्टदल, स्वस्तिक आदि प्रसिद्ध अछि। भित्ति चित्रमे हरिसौं पूजाक चित्र, सरोवर, नयनायोगिन, बाँस, पुरैन, देहरिपरक चित्र, दहीक भरिया, माँछक भरिया, गोपी चीरहरण लीला आदि प्रसिद्ध अछि। डाला, हाथी, कोहवरक घरक हाथी, चुमाओनक डाला, रंग–बिरंगक पहिया आदिक चित्र सेहो प्रसिद्ध मानल गेल अछि। मिथिलामे एखनो उपरोक्त चित्रशैलीक व्यापकता देखबामे अवइयै। संगीत:- संगीत मैथिल संस्कृतिक एकटा अभिन्न अंग मानल गेल अछि। प्राचीन कालहिसँ मिथिलामे संगीतक पद्धति चलि आबि रहल अछि। १४हम शताब्दीमे मिथिलामे संगीतपर सिंह भूपाल “संगीत–रत्नाकर–व्याख्या” नामक ग्रंथ लिखने छलाह। १६हम शताब्दीमे जगद्धर ‘संगीत सर्वश्व’ नामक ग्रंथ लिखलन्हि आ ओकर तुरंत बाद खड़गराम आ कल्लीराम “लच्छिराघव” नामक ग्रंथक रचना केलन्हि। लोचनक रागतरंगिणी तँ सर्व प्रसिद्ध अछिये जकर उल्लेख पूर्वहि भेल अछि। मिथिलामे संगीतक प्रारंभ वैदिक गानसँ मानल जाइत अछि। गौतम, भृगु, विश्वामित्र, याज्ञवल्क्य आदिक आश्रममे वैदिक यज्ञ आ गान सदैव होइत रहैत छल आ ओ परम्परा मिथिलामे बहुत दिन धरि बनल रहल। जनक विदेहकेँ राजदरबार तँ सहजहि एकर आश्रय केन्द्र छल। वैदिक गानमे ऋग्‍वेदक मंत्रसमूह गाओल जाइत छल। सामवेदक गानक निर्माणमे मिथिलाक अपूर्व योगदान अछि। याज्ञवल्क्य संगीत विद्याकेँ मुक्तिमार्गक साधन मनैत छलाह–“वीणा वादन तत्वज्ञः श्रुतिजातिविशारदः। तालज्ञश्चा प्रयासेन मुक्तिमार्गेनिगच्छति”॥ वैदिक गानमे जकरा स्वरमण्डल कहल गेल अछि ओहि समूहक सात स्वरकेँ (स,री,ग,म,प,ध,नी) सप्तक कहल गेल अछि। संगीतक इ सात स्वर अपन–अपन स्थानपर निश्चित बनल अछि। एहि सात स्वरक फेर अलग–अलग समूह सेहो होइछ। १६म–१७म शताब्दीमे दामोदर मिश्र छ टा रागक स्थापना केलन्हि। एक–एक रागक पाँच–पाँचटा रागिणी एवँ हुनक आठ–आठ पुत्र आ आठ–आठ पुत्रवधु। ओ रागकेँ पुरूष आ रागिणीकेँ स्त्री मनलन्हि। भैरव, मालकोष, हिंडोल, दीपक, मेघ आ श्री– इ छ टा राग भेल। ‘गीत गोविन्द’केँ प्रबन्ध काव्यक गानक रूपमे मानल गेल अछि। “वाग्देवता चारित्रचित्रित चित्रसद्मा....करोति जयदेव कवि प्रबन्धम्”। ओकर बाद एहि श्रेणीमे विदापति ठाकुरक पद्मावली सेहो अबैत अछि। विद्यापति स्वयं एक पैघ संगीतकार छलाह। मिथिलामे ‘नचारी’ आ ‘लगनी’ अहुखन प्रसिद्ध अछि। मिथिलामे संगीतक मुख्य केन्द्र रहल अछि दरभंगा। आइन–ए–अकबरीमे विद्यापतिक नचारीक उल्लेख अछि आ संगहि ६रागक ६–६रागिणीक उल्लेख सेहो अछि। पचगछिया मिथिला संगीतक एकटा प्रधान केन्द्र अद्यावधि मानल जाइत अछि। एहिठामक रायबहादुर लक्ष्मीनारायण सिंहक दरबारमे माँगन खबास सन प्रसिद्ध गबैया रहैत छलाह। एहि सम्बन्धमे हम पहिने बहुत किछु लिखि चुकल छी तैं ओकरा एहिठाम दोहरैब आवश्यक नहि बुझना जाइत अछि। III. मैथिल संस्कृतिक स्तंभ – मैथिल संस्कृतिक किछु प्रमुख स्तंभ:- i) गौतम– मिथिलाक ब्रह्मपुर गाँवक रहनिहार छलाह। गौतम कुण्ड एवँ अहिल्या स्थानसँ हुनक सम्बन्ध बताओल जाइत अछि। ii) याज्ञवल्क्य– हिनका सम्बन्धमे मतभेद अछि मुदा हिनको मैथिल कहल गेल अछि। महाराज जनकक समकालीन आ योगी छलाह। इ अपनाकेँ “मिथिलास्‍थस्‍स योगीन्द्रः” कहने छथि। हिनक पत्नी मैत्रेयी वेदांतक विदुषी छलथिन्ह। iii) कपिल– मिथिलामे साँख्यक निर्माता मानल जाइत छथि। iv) मण्डन मिश्र– न्याय आ मीमाँसाक अद्वितीय विद्वान सहरसा जिलाक महिषी ग्रामक निवासी छलाह। शंकराचार्यसँ हिनक शास्त्रार्थ भेल छल जाहिमे हिनक पत्नी भारती(शारदा) अध्यक्षता केने छलीह। हिनक पनिभरनी शंकराचार्यकेँ बाट देखबैत कहने छलथिन्ह– “स्वतः प्रमाणं परतः प्रमाणं शुकाङ्गनायत्र विचास्थंति। शिष्योप शिष्यैरूपगीयमानमवेहि तन्मण्डनमिश्रधाम॥ जगद् ध्रुवं स्याज्जगद् ध्रुवं आ कीराङ्गनायत्र गिरोगिरंति। द्वारस्थनीडाङ्गणसान्नेरूद्दा जा नीहि तन्मण्डन मिश्र धाम”॥ v) वाचस्पति– अद्वितीय दार्शनिक जनिक ‘भामती’ दर्शनक क्षेत्रमे अपूर्व ग्रंथ मानल गेल अछि। इ सर्वतंत्र स्वतंत्र विद्वान छलाह आ पूर्वी मिथिलाक निवासी छलाह। vi) उदयनाचार्य– ओना तँ करिऔनक निवासी कहल जाइत छथि मुदा पूर्वी मिथिलाक निवासी हेबाक प्रमाण सेहो हिनका सम्बन्धमे भेटइत अछि। ओ पैघ दार्शनिक छलाह आ हिनक निम्नोक्त गर्वोक्ति प्रसिद्ध अछि– “वयमहि पदविद्यां तर्क मान्वीक्षिकींवा यदि पथि विपथे वा वर्त्तयामस्सपंथा॥ उदयति दिशि यस्यां भानुमान् सैव पूर्वा नहि तरणिरूदीते दिक्पराधीन वृत्तिः”॥ हिनक लिखल अनेक ग्रंथ उपलब्ध अछि आ ओ एक विश्वविख्यात दार्शनिक छलाह। मिथिलाक प्रसिद्धिक प्रसारमे हिनक योगदान ककरोसँ कोनो हालतमे कम नहि अछि। कहल जाइत अछि जे जगन्नाथ धाम जेबाक कालमे हिनका मोनमे इश्वर सम्बन्धी संकल्प–विकल्प होमए लागल आ जगदीशपुरी नामक स्थानमे जखन ओ एक मंदिरमे प्रवेश केलन्हि तखन एकाएक मंदिरक केबार बन्द भऽ गेल। इश्वरक प्रति हुनक आस्था बढ़ि गेलन्हि आ ओ लिखलन्हि– उपस्थितेषु बौद्देषु मदधीना तवस्थितिः ऐश्वर्य्य मदमत्तस्सवं मामवज्ञाय वर्त्तसे॥ vii) गंगेश उपाध्याय– मंगरौनी निवासी गंगेश न्याय–शास्त्र दुधर्ष विद्वान भेल छथि आ हिनक प्रसिद्ध ग्रंथ “तत्वचिंतामणि” अपना विषयक अद्वितीय ग्रंथ मानल गेल अछि। नव–न्यायक जन्मदाता इ छलाह जाहि हेतु मिथिला जगत्प्रसिद्ध भेल। viii) अभिनव वाचस्पति– धर्मशास्त्रज्ञ आ दार्शनिक छलाह आ मिथिलाक धर्मशास्त्र साहित्य एवँ न्याय आ कानूनक सुदृढ़ करबामे हिनक अपूर्व योगदान रहल छन्हि। ix) पक्षधर मिश्र– तार्किकक संगहि संग न्याय–शास्त्रक अद्वितीय विद्वान छलाह। गंगेशक तत्व चिंतामणिपर हिनक टीका ‘आलोक’ सर्व विदित अछि। हिनके अनुमतिसँ रघुनाथ शिरोमणि नादियामे ‘नव–न्याय’क केन्द्रक स्थापना केने छलाह। तकरा बादहिसँ नादिया नव–न्यायक प्रसिद्ध केन्द्र भेल। इ ‘प्रसन्न राघव’ (नाटक) आ ‘चन्द्रालोक’ रचयिता सेहो छलाह आ हिनका सम्बन्ध कैक प्रकारक किंवदंती मिथिलामे अहुखन प्रचलित अछि– “शंकर वाचस्पत्योः शंकरवाचस्पती सदृशौ। पक्षधर प्रतिपक्षी लक्षीभूतो न च क्वापि”॥ x) शंकर मिश्र– भवनाथ मिश्र अयाचीक पुत्र शंकर मिश्र मिथिलाक साँस्कृतिक इतिहासक एकटा कीर्त्तिस्तंभ मानल गेल छथि। पाँच वर्षक अवस्था निम्नलिखित श्लोक सुनाकेँ मिथिलाक शासककेँ इ चकाचौंध कऽ देने छलाह– “बालोऽहं जगदानन्दनमे बाला सरस्वती अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम्”॥ जखन मिथिलाक शासक एकरा वर्णन करे कहलथिन्ह तखन ओ पूछलथिन्ह जे लौकिक अथवा वैदिक कोन रूपें–तखन महाराज कहलथिन्ह जे दुहु रूपें वर्णन करु– “चकितश्चलितश्छन्नः प्रयाणे तव भूपते सहस्त्रशीर्षा पुरूषः सहस्त्राक्षः सहस्रपात्”॥ एहिमे पहिल पांति स्वनिर्मित लौकिक संस्कृत थिक आ दोसर पांति वैदिक मंत्र थिक। xi) विद्यापति ठाकुर– मिथिलाक संस्कृतिक चरमोत्कर्ष भेल महाकवि विद्यापति जे हमरा लोकनिक रक्तमे अद्यतन समाहित छथि आ जिनका बिना मिथिलाक साँस्कृतिक इतिहासक कल्पनो करब असंभव अछि। मैथिल जनजीवनक एहेन कोनो अंश नहि अछि जाहिमे विद्यापति व्याप्त नहि होथि आ इ गौरव एहि रूपें संसारक आन कोनो कविकेँ प्राप्त नहि भेल छन्हि। जन्मसँ मृत्यु धरिक सामाजिक संस्कारोपर विद्यापति अद्यावधि व्याप्त छथि आ मैथिल संस्कृतिक विशिष्ट तत्वमे जे किछु एखनो बाँचल अछि तकर एकमात्र श्रेय विद्यापतिकेँ छन्हि। मैथिली संस्कृतिक ओ एहेन कीर्तिस्तंभ छथि जकर मूल्याँकन करब अखनो धरि संभव नहि भेल अछि। ओ मैथिलकेँ ‘पुरूषार्थ’क पाठ पढ़ौलन्हि आ ‘सुपुरूष’क कल्पनाकेँ साकार करबामे समर्थ भेलाह। ‘पुरूष’क चरित्रक विभिन्न पक्षक विश्लेषण करैत ओ कहने छथि जे विद्या, बुद्धि आ विवेककेँ समुचित रूपें उपयोग केनिहार व्यक्तिये मानव कहा सकैत छथि। पुरूषार्थक अर्थे भेल मनुक्खक संतुलित विकास। परम्परावादी होइतहुँ विद्यापति युगपुरूष छलाह आ भविष्यक हेतु संकेत देनिहार सेहो। अपना समयक हिसाबे ओ प्रगतिशील कहल जा सकैत छथि आ विचारमे वस्तुनिष्ठ आ धर्मनिरपेक्ष सेहो। ‘विभागसार’ नामक कानूनी ग्रंथ लिखि विद्यापति अपन राजनैतिक पटुता आ ज्ञानक परिचय तँ देने छथिये, संगहि एहि पुस्तकक माध्यमसँ ओ ओइनवार वंशक एकताकेँ सुदृढ़ रखबामे सेहो सफल भेल छलाह। विद्यापति मूलरूपेण तीन प्रकारक मैथिली गीतक रचना कए अपनाकेँ अमर कऽ गेलाह आ मैथिल संस्कृतिकेँ नव–जीवन प्रदान कऽ गेलाह। मैथिलीमे एहि तीनू प्रकारक गीतक रचना कए ओ मैथिली भाषा, मिथिलाक संस्कृति माध्यमकेँ सेहो अमरत्व प्रदान केलन्हि। प्रथम कोटिक गीत भेल विभिन्न देवी–देवताक प्रति गाओल गीत सभ जे अद्यावधि मिथिलामे ओहिना प्रचलित अछि जेना ताहि दिनमे रहल होएत। सभ प्रकारक सामाजिक उत्सवपर इ गीत सभ गाओल जाइत अछि आ एहिसँ मैथिल संस्कृतिक एकरूपता देखबामे अवइयै। एकरा सामान्यतः व्यवहार गीत कहल जाइत अछि। दोसर प्रकारक गीत भेल–शिवगीत जाहिमे नचारी आ महेशवाणीकेँ राखल जा सकइयै आ जाहि माध्यमसँ विद्यापति मिथिलाक शोषित–पीड़ित मानव व्यथाकेँ चित्रित करबामे सफल भेल छथि। तेसर प्रकारक गीत भेल सामान्य स्थितिक जीवन–यापन करैत जीवनक उपभोग करैत प्रेम गीत–प्रेमी आ प्रेयसीक मिलन, विरह, संभोग सम्बन्धी गीत जाहिमे राधाकृष्णकेँ आनि चित्रित कैल गेल अछि। एहि दिशामे ओ जयदेवसँ प्रभावित देखना जाइत छथि। प्रेमी–प्रेमिकाक हेतु तँ विद्यापति प्राणदायकेँ कहल जा सकैत छथि कारण मानव द्वारा संभावित एहेन कोनो मनः स्थिति नहि अछि जकर वर्णन विद्यापति नहि केने होथि। शिव गीतक सेहो तीन रूप देखबामे अवइयै– i) शिवक स्तुति किंवा प्रार्थना; ii) शिव–विवाह, आ iii) शिवक पारिवारिक जीवन सम्बन्धी गीत। साहित्यक इतिहास दृष्टिकोणे विद्यापतिक शिवगीत साहित्यक क्षेत्रमे एकटा अपूर्व देन कहल जा सकइयै जकर दोसर उदाहरण हमरा देखबामे नहि अवइयै। नचारीक हेतु विद्यापति समस्त भारतमे प्रसिद्ध छथि। एकर प्रभाव आनोठाम देखल जाइत अछि खास कए नेपालमे। त्रैभाषिक नाटक कऽ रचना कए विद्यापति जे आदर्श स्थापित केलन्हि तकरा मिथिलामे हेवनि धरि लोग अनुसरण करैत रहलाह आ हर्षनाथ धरि त्रैभाषिक नाटकक रचना होइत रहल। मैथिल संस्कृति एकटा अन्यतम उदाहरण जे हमरा विद्यापति गीतसँ भेटइत से भेल शिव–विवाहक गीत–एकटा अपूर्व महेशवाणी जाहिमे पाँचगोट मैथिल विवाह विधिक उल्लेख अछि आ इ गीत भाषा गीत संग्रह (संख्या ६६)मे संग्रहित अछि। प्रथमहि एहि संग्रहमे प्रकाशित भेल अछि–एहिमे परिछन, तकरबाद पटिआपर बैसब, महुअक, सासु द्वारा बेदीपर घुमोनाइ, आ पाँचम गौरीक सखी सभ द्वारा महादेवकेँ काजर करब आदि विद्याक उल्लेख अछि जे अहुखन मिथिलामे प्रचलित अछि–एहि महेशवाणीकेँ एतए उद्धृत कैल जाइत अछि– “दोला तर नबइते ससि पसि परू, बाघछाल गेल छिड़िआइ। तेहि अमिअ रसे मृगरिपु जिबि उठु, भागें मोए अएलाहुँ पड़ाइ॥ दोसर विधि पड़िचाँ चढ़ि बैसलाहे, जषने दिगंबर आइ रे। लाजक लेल गोरि नहि आबए, सखि सभे गेल पड़ाइ॥ माइ हे माड़ब मए नहि जेबए, जहाँ बस उमत जमाइ॥ पएर धोअए षने दूध पिउल फणि, हर लागल तसु चोरी। सबे सबतहु करताल बजाबए, मधुरहासे हँस गोरी॥ सासुहि शंकरवदन उगारल, आँचर छानल ग्रिमपासे। देखि गिरिभाने भोगि कुच चढ़लाह, आओर कि कहब उपहासे॥ गोरि सखि मिलि इस सीर धरि, नयन आँजल मन मोहे। एकहाथ नयनानल डाढ़ल, दोसर गिड़ल गंगा गोहे॥ भनइ विद्यापति सुनह मन्दाइनि, ओ वर सहजक भोरा। गोरि सहित हर देथु अभयवर, पुरत मनोरथ तोरा”॥ महादेवक स्वरूप एवँ वेषसँ अदभुत स्थिति उत्पन्न भगेल छल। एहिमे विद्यापति कालीन विवाहक लौकिक विधिक विवरण भेटइत अछि जाहिसँ तत्कालीन मैथिली संस्कृतिक सामाजिक रूपक दर्शन होइछ। एकरा परिछनक गीत सेहो कहि सकैत छी। एहि क्रममे एकटा आर गीत द्रष्टव्य अछि– “कौन वर आनल तपसिया, गोरि मुगुध भेलि देखि रंगरसिया॥ नयन अनल काजर कहाँ लगाओब। जटा गांग–गोट कैसे कए चुँवाओब॥ भुत बरिआती कत्तए जेमाओब। पाँच वदन महुअक कहा पाओब॥ पानि पिनाक मुसरे सरे गाबए। बाघछाल ओढ़न किछु न सोहाबए॥ भनइ विद्यापति ओ वरदायक। देथु अभय वर ओ जुग नायक”॥ आँखि आगि रहलाक कारणे काजर कत्तए करबैन्ह, जटामे गंगाक मोनि रहलाक कारणे चुमाओन कोना करबैन्ह, भूत–प्रेत बरिआतीकेँ भोजन कत्तए करेबैन्ह, पाँचटा मुँह छन्हि महुअक कोन मुँहे करेबैन्ह। हाथक पिनाकसँ अठोङ्गर कुटैत। अहुठाम मैथिल विवाहक विधक विवरण भेटइत अछि आ विद्यापतिक सामाजिक व्यापकताक सेहो। जाहि दृष्टिये देखबा हो देखु। मुदा इ मानए पड़त जे विद्यापति मैथिली संस्कृतिक व्यापकताकेँ जीवंत रखलन्हि आ प्राचीन कालहिसँ चल अबैत परम्पराकेँ एकठा समेटिकेँ मैथिलत्वक वैशिष्ट्यकेँ शिखरपर चढ़ौलन्हि। तैं तँ विद्यापति हमरा लोकनिक संस्कृतिक आलोक स्तंभ छथि। IV. मैथिल संस्कृतिक उत्कर्ष–मैथिली भाषा:- कोनो संस्कृतिक एकरूपताक द्योतक होइछ भाषा आ बिहारमे मिथिलेटा एकटा एहेन साँस्कृतिक क्षेत्र अछि जकर एकरूपताकेँ द्योतित केनिहार मैथिली भाषा अद्यपर्यंत जीवित अछि। मिथिला उपनिषद् युगहिसँ प्रसिद्ध विद्याकेन्द्र रहल अछि आ जखन मगधक प्रबल प्रताप सूर्य डुबियो गेल छलैक तखनहुँ मिथिला अपन संस्कृति आ विद्याकेँ सुरक्षित रखने छल। इतिहासक क्रममे सभ्यता ओ संस्कृतिक जत्तेक अंग–उपांग अछि ताहि सभमे मिथिला अपन स्वतंत्र स्थान बना लेने अछि। अधुना भारतीय सभ्यता मध्य मैथिल संस्कृति एवँ भाषाक विशिष्ट स्थान अछि। मिथिलाक विद्या, संस्कृति एवँ भाषासँ समस्त उत्तरभारत अनुशासित– प्रभावित भेल अछि आ ब्रजलोकसँ आसाम धरि एकर प्रत्यक्ष–अप्रत्यक्ष प्रभाव देखल जा सकइयै। अति प्राचीन होइतहुँ मैथिली एक जीवंत भाषा थिक। बिहारमे मैथिलीक प्रभेद भेल दक्षिण भागलपुरक ‘छिकाछिकी’, चम्पारणक ‘मधेशी’ तथा छोट लोकक ‘जोलहा’ बोली आदि। मैथिलीक प्राचीनताक सम्बन्धमे एतबे स्मरण राखब आवश्यक अछि जे ‘ललितविस्तर’ नामक बौद्ध ग्रंथमे जे ६४लिपिक विवरण भेटइयै ताहिमे एकटा ‘वैदेही’ लिपिक उल्लेख सेहो अछि। मिथिलाक नाम प्रसिद्ध भेलापर उएह लिपि ‘मैथिली’ आ ‘तिरहूत’क प्रसिद्ध भेलापर ‘तिरहूता’क नामे प्रसिद्ध भेल। मिथिलासँ असम धरि इएह लिपि प्रचलित अछि। बृद्ध वाचस्पतिसँ अद्यावधि जतबा जे संस्कृतक पंडित, मनीषि एवँ विद्वान भेल छथि से सभ केओ मैथिली लिपि आ भाषाकेँ जीवित रखबाक प्रयास केने छथि आ ओहिमे योगदान सेहो देने छथि। रूचिपति जगद्धर, चण्डेश्वर, विद्यापति आदि व्यक्ति अपन संस्कृत रचनादिमे मैथिली शब्दक प्रचुर मात्रामे व्यवहार केने छथि जाहिसँ बुझना जाइत अछि जे भाषाक रूपमे मैथिलीक स्वीकृति अति प्राचीन कालहिमे भऽ गेल छल। वाचस्पति मिश्र ‘भामती’मे मैथिली शब्द ‘हड़ी’क व्यवहार केने छथि। मैथिलीक प्राचीनतम उपलब्ध ग्रंथ अछि ज्योतिरीश्वर ठाकुरक ‘वर्णन रत्नाकर’ जे अपना ढ़ँगक अद्वितीय ग्रंथ मानल गेल अछि आ अपूर्व गद्यग्रंथक हिसाबे पूर्वी भारतीय भाषाक प्राचीनतम ग्रंथ थिक। एहेन अदभुत ग्रंथ भारतवर्षक आन कोनो भाषामे अद्यावधि उपलब्ध नहि भेल अछि। ज्योतिरीश्वर, उमापति, विद्यापति, अमृतकर, अमियकर, गोविन्द दास, केशनारायण आदि कवि–मनीषिक प्रयासे मैथिली १३–१४–१५म शताब्दी धरि समस्त उत्तर पूर्वी भारत एवँ नेपालक एकमात्र साँस्कृतिक भाषा छल आ इ समस्त क्षेत्र एक साँस्कृतिक सूत्रमे बान्हल छल। चारिसे वर्ष धरि नेपालक राजा ओ हुनका सभसँ प्रोत्साहित धुरन्धर विद्वान मैथिल लोकनि मैथिलीमे सहस्त्र काव्य ओ नाटकक रचना केलन्हि। प्राचीन शिलालेख ओ अन्यान्य एतिहासिक साधनसँ इ स्पष्ट होइछ जे एक समयमे मैथिली उत्तर भारतवर्ष आ नेपालमे पूर्ण रूपें व्याप्त छल आ नेपालमे गोरखा शासनक पूर्व धरि एक प्रकारक राष्ट्रभाषे छल। विद्यापतिक लिखनावलीसँ सामाजिक स्थितिक ज्ञान होइछ। मिथिलामे बहिया–बहिकिरनीक क्रय–विक्रय होइत छल आ एकर बहुत रास प्रमाणो मिथिलामे यत्र–तत्र भेटल अछि आ एहि प्रश्नकेँ लऽ कए मर मुकदमा सेहो होइत छल। भेष–भाव–भाषा एवँ लिपिपर कोनो जाति आ देशक मर्यादा निर्भर करैत अछि आ एहि दृष्टिये मिथिला–मैथिलीक जे अविच्छिन्न प्रवाह ८–९म शताब्दीमे प्रारंभ भेल छल से अद्यावधि प्रवाहित अछिये जाहिसँ मैथिल संस्कृतिक स्वरूप परिलक्षित होइछ। जाहि मैथिलीक उद्भव एवँ विकास हमरा लोकनि अखन देखि रहल छी तकर उत्पत्ति बौद्ध–गान आ दोहा आदिक कालसँ भेल अछि जे कि निम्नलिखित विवरणसँ स्पष्ट होएत। ८म शताब्दीसँ १२मशताब्दी धरि बौद्ध भिक्षु लोकनि जाहि चलित भाषामे अपन स्फुट दोहा, गीत आदिक रचना केलन्हि तकरे साहित्यमे ‘सिद्धगान’क संज्ञा देल गेल अछि। एहिमे सँ बहुत रास सिद्ध लोकनि बिहारेक निवासी छलाह। सिद्ध लोकनि भाषाकेँ महान भाषाविद लोकनि अपना–अपना ढ़ँगे लेने छथि आ केओ ओकरा हिन्दी, बंगला, असमी, उड़िया आदिक प्राचीन रूप मनने छथि। एहिठाम स्मरण रखबाक अछि जे प्रातः स्मरणीय राहुल सांकृत्यायन एहि सिद्धगानक भाषाकेँ मैथिली मगहीक प्राचीन रूप कहने छथि। ज्योतिरीश्वर ठाकुरक वर्ण रत्नाकरमे सेहो एहि सिद्ध सभहिक नाम भेटइत अछि। सिद्ध गानक भाषाक उदाहारणसँ सेहो इ स्पष्ट होएत जे इएह मैथिलीक आदि रूप थिक– सरहपाद (८–९म शताब्दी)– जह मन पवन न संचरइ रवि शशि नाह पवेश तहिं वह चित्त विसाम करू सरहे कहिअ उवेश। विरूपा (९म शताब्दी)– दशम दुआरत चिन्ह देखइया, आइल गराहक अपणो वहिआ। चउसठि घड़िये देह पसारा, पइठल गराहक नाहि निसारा। कम्बलपाद (९म शताब्दी)– खुण्टी उपाड़ी मेलल काच्छि, वाहतु कामलि सदगुरू पुच्छि। कुक्कुरीपाद– दिवसे विहुड़ी काइड़ भाअ राति भइले कामरू जाअ। अइसन चर्य्या कुक्कुरी पाएँ गाइड़ केड़ि मज्झें एकुड़ी एहि सनाइड़। भानो थे कुक्कुरी पाए भवा थेरा जे एथु बुझएँ सो एथुवीरा। उपरोक्त गीतमे संचरइ, करू, भाअ, जाअ, अइसन आदि ठेठ मैथिली शब्द जकर प्रयोग अहुखन मैथिलीमे व्याप्त अछि। एहि प्रकारक प्रयोग ज्योतिरीश्वर आ विद्यापति सेहो केने छथि। वर्णन रत्नाकर, कीर्तिलता आ पदावलीमे एहेन सभ प्रंयोग आ भाषाक साम्य देखबामे अवइयै। सिद्धगानक भाषा वर्णन रत्नाकर आ कीर्तिलताक भाषासँ विशेष भिन्न नहि अछि। एहि कोटिमे प्राकृतपैंगलमकेँ सेहो राखि सकैत छी। लोरिक आ डाकवचनावली सेहो प्राचीन अछि। शंकरदत्त, उमापति आ विद्यापतिक प्रयासे मैथिलीक प्रगति विशेष भेल। उमापतिक मैथिली गीत कोनो साहित्यक शोभा भऽ सकैत अछि। उमापति आ विद्यापति ज्योतिरीश्वरक अपेक्षा चलित मैथिलीक प्रयोग विशेष केने छथि। विद्यापति ‘देसिल बअना’क व्यवहार कए अपनाकेँ गौरवान्वित बुझैत छलाह। उमापति आ विद्यापतिक मैथिलीक रूपक बानगी देखब आवश्यक– उमापति: अनगुन परिहरि हरखि हेरू धनिमानक सबधि विहाने। हिमगिरि कुम्मरि चरण हृदय, धरि सुमति उमापति भाने॥ विद्यापति: साँझक वेरां जमुनाक तीरां कदवेरी वनतरूतरा अकमि कानरा कि कहब काला सोझांहि बुझल सखि कुसुमसरा कण्ठ गरल नहि मृगमद चारू फणिपति मोरा नहि मुकुताहारू। भनहि विद्यापति सुन देवंकामा एक दोस अछि ओहि नामक रामा॥ गोविन्द दास: कोटि कुसुमसर वरिसय जे पर तेहिकि जलदजल लागि प्रेम दहन कर हृदय जकर पुनि ताहि कि वज्रक आगि। जसु पद तल हम जीवन सौंपल ताहि कि तनु अनुरोध। गोविन्द दास कहए धनि अभिसरू सहचरि आओल वोध॥ गोविन्द दासक एकाक्षर अनुप्रासक एकटा अन्यतम उदाहरण देखब आवश्यक– काँचा कंचन कांति कमलमुखी कुसुमित कानन जोइ। कुंज कुटीर कलावती कातर कान्हु कान्हु की रोइ॥ कि कहब कितब कत जे कुल कामिनी कठिन कुसुम सर सहइ। करहि कपोल केश कत कुंनचत कालिन्दीकूल से रहइ॥ लोचनक रागतंरगिणीमे ३७मैथिल कविक गीत सभ संग्रहित अछि। लोचन ब्रजभाषाकेँ मध्यदेशी भाषा आ विद्यापतिक भाषाकेँ देशी भाषा कहने छथि। लोचन स्वयं ब्रजभाषा आ मैथिलीमे गीत बनौने छलाह। लोचनक एकटा मैथिली गीतक नमूना निम्नांकित अछि– साँवर वदन विहुसिया, मधुवन जाइते मिलल तोर रसिकया। सुनासि न मधुर मुरली रव, सुकृत सफलकर सवे समुचित नव। लोचन भन बुझ सरस विमलमति, मधुमति पति महिनाथ महीमति। मध्यकालीन मैथिली गद्यक एकटा नमूना– “हमरा वहियाक हराइक बेटी पदुमी नाम्नी गौरवर्णा जे तोहरे बेटा ञे श्रीकृष्णा ञे बिहायाले से हमे एक टका लए तोहरा हमे देलियावे। ताहि सँ हमरा कञो लञे सम्बन्ध नहि”। एवँ प्रकारे हम देखैत छी जे मैथिलीक विकास क्रम बरोबरि बनल रहल अछि। एकर प्रगति कहिओ अवरूद्ध नहि भेल। हिन्दीमे क्रियाक रूप कर्त्ताक कर्मकेँ अनुसार परिवर्त्तित होइत अछि, आ लिंगभेद प्रधान रहैत अछि, मुदा मैथिलीमे से बात नहि अछि। मैथिलीमे लिंगभेदक क्रम गौण रहैत अछि आ क्रिया कारकक अनुसार बदलैत अछि। आदर, अत्यादर, अनादर, आदि भावक संगहि क्रियाक रूप भिन्न होइछ जे आन ठाम देखबामे नहि अवइयै। १७–१८म शताब्दीमे आबिकेँ मैथिलीक रूपमे परिवर्तन देखबामे अवइयै आ ओहि दृष्टिये मनबोधक कृष्णजन्ममे मैथिलीक ठेठ रूप देखबामे अवइयै– “कतओक दिवस जखन वितिगेल, हरि पुनि हथगर गोरगर भेल। से कोन ठाम जतय नहि जाथि, कय वेरि आङ्गनहु सँ बहराथि”॥ एहि मैथिलीक रूपक साम्य आधुनिक मैथिलीसँ अछि। मनबोधक पछाति हर्षनाथ, चन्दा झा, जीवन झा, रघुनन्दन दास, लाल दास आदिक नाम उल्लेखनीय अछि। हिनका लोकनिक उद्धरण देव आवश्यक– चन्दा झा– “पड़ा पड़ा बड़ा बड़ा गृहाद्द जारि देलकौ– विदेह कन्यका विपति जानि, कानि लेलकौ बहुत छोट बानरे सभैक हाल कैलकौ प्रचण्ड दण्ड देनिहार दूत चोर धेलकौ”। हर्षनाथ– “रमनि हे सुनिय वचन दय कान। जें ओ मोर मानिय दोष दोष करि. करू धनि दण्ड विधान”। लाल दास– “खसल निशुंभ महा बलबान, संज्ञालुप्त सुतल हतज्ञान। देखि निशुंभ को महिमे पड़ल, आएल शुम्भ क्रोध अति भरल। जीवन झा– “विरह व्यथा अति आकुल रमनी, सकल कलेबर केवल धमनी। सहजहि पातर लकलक हियकर, धक धक रे की”॥ अन्यान्य भाषा जकाँ मैथिलीक अपन लिपि सेहो छैक जे अद्यावधि जीवित छैक आ ठेठ मिथिलामे जकर अखनो सभ कार्यक अवसरपर व्यवहार होइत छैक। मैथिलीक विकास २०म शताब्दीमे सभसँ बेसी भेल अछि आ ताहुमे स्वतंत्रता प्राप्तिक पछाति तँ आरो बेसी। अहिठाम मैथिली साहित्यक इतिहास लिखब हमर अभीष्ट नहि अछि–एहि विषयपर कतेक पुस्तक उपलब्ध अछि आ कतेक गोटए लिखिओ रहल छथि। हमर कथ्य एतबे जे मैथिली भाषा मिथिलाक सांस्कृतिक एकरूपताक सर्वश्रेष्ठ साधन रहल अछि आ ७००–८००वर्ष सँ मैथिलीक माध्यमसँ मिथिलाक राजनैतिक आ साँस्कृतिक एकताक निर्माणमे साहाय्य भेटल अछि। भाषाकेँ संस्कृतिक संबलक रूपमे उपस्थित कैल गेल अछि आ मैथिलीक प्राधान्य एहि बातक स्पष्ट सबूत अछि। V. मैथिल संस्कृतिक निजी वैशिष्ट:- जेना बंगाल, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, गुजरात, कर्णाटक, केरल आदि प्रांत भाषिक, साँस्कृतिक, भौगौलिक, ऐतिहासिक आदि दृष्टिये प्रांत कहल जाइत अछि ठीक तहिना बिहारमे मिथिलेटा एहेन एकटा साँस्कृतिक क्षेत्र अछि जे सभ दृष्टिये प्रांत कहल जा सकैत अछि। भौगोलिक ऐतिहासिक, साँस्कृतिक एवँ भाषिक दृष्टिये मिथिला एकटा महान केन्द्र अति प्राचीन कालसँ रहल आ एकर अपन साँस्कृतिक वैशिष्टक महत्ता सेहो वैदिक कालसँ अद्यावधि अविच्छिन्न रूपें चलि आबि रहल अछि। उत्थान–पतन इतिहासक एकटा अकाट्य नियम आ तैं मिथिला एकर कोनो अपवाद नहि परञ्च एकर साँस्कृतिक एकता सभ दिन बनल रहल छैक आ इतिहास एकर साक्षी अछि। एकर क्षेत्र विस्तीर्ण अछि आ मिथिला एकटा भौगौलिक इकाइ मानल गेल अहि जे सम्प्रति तीन प्रमण्डल (तिरहूत, दरभंगा आ कोशी)मे विभक्त अछि। उत्तरमे नेपाल, पूर्वमे पश्चिम बंगाल, दक्षिणमे मगध, आ पश्चिममे बिहार आ उत्तरप्रदेशक अंश अछि। नदीक द्वारा सिञ्चित हेबाक कारणे एकरा ‘तीरभुक्ति’ सेहो कहल गेल अछि। ‘तीरभुक्ति’क रहनिहारक गर्वोक्तिक उल्लेख विद्यापति अपन ‘पुरूष परीक्षा’मे कएने छथि– “अहो तीरभुक्तीयाः स्वभावाद् गुणगर्विणो भवंति” (तिरहुतिया स्वभावतः गुणगर्वित होइ अछि)। विद्यापतिक इ उक्ति मैथिल सँस्कृतिक एक विशेषताक द्योतक थिक। परिवर्त्तनशील सृष्टिमे अपरिवर्त्तित रूपें डटल रहिकेँ मिथिला अपन वैशिष्ट्यक जे परिचय देलक अछि तकर उदाहरण स्वरूप इ कहल जा सकइयै जे अपन आङनमे जन्मल, पोसल आ बढ़ल जैन धर्म आ बौद्ध धर्मकेँ इ कहियो अंगीकार नहि केलक आ वैदिक धर्म आ कर्मकाण्डकेँ अपनौने रहल। जहिना जैन–बौद्ध मैथिलक वैदिकत्वकेँ पलटि नहि सकलाह तहिना बादमे मुसलमान लोकनि एहिठामक कट्टरताक गढ़केँ नहि ढ़ाहि सकलाह। मिथिलाक सामाजिक संगठन दृढ़ रहल आ ओकरा दृढ़तर बनाओल गेल। कट्टरताक निर्वाहक हेतु शास्त्र पुराणक अध्ययनपर विशेष बल देल गेल आ कर्मकाण्डक समर्थनक हेतु ‘निबन्ध’क रचना भेल। सनातन समाज रूपी स्तम्भकेँ जैन, बौद्ध, मुसलमान अथवा अंग्रेजी प्रभाव सर्वतोभावेन हिलेबामे समर्थ नहि भेल। मिथिलामे सनातन धर्मक प्रति जनताक प्रगाढ़ प्रेम अछि आ ओकरा अहुखन डिगैब असंभव। एम्हर आबिक जे अखिल भारतीय स्तरपर सुधार आन्दोलनो भेल तकरो कोनो प्रभाव मैथिलपर नहि भेल। एतावता मैथिल संस्कृतिक धार अक्षुण्ण रूपें प्रवाहित होइत चलल आबि रहल अछि भने आजुक दृष्टिये हम ओकरा अनुदार कही से दोसर कथा। मिथिला आदर्शवादी दर्शनक जन्मभूमि मानल गेल अछि। दर्शनक दिग्गज आचार्य लोकनि मिथिलाक धरतीकेँ अपन विद्वतासँ चमत्कृत कएने छथि। एहिठामक देन थिक “स्वतः प्रमाणं” (मीमाँसा वेदांत) आ “परतः प्रमाणं” (न्याय)। मण्डन मिश्र मीमाँसक छलाह। आनन्दगिरि कुमारिल भट्टकेँ सेहो मैथिल कहने छथि। मैथिलक आदर्श रहल अछि जीवन्मुक्त रहब। श्री शुकदेव जी एहिठाम आबि जनकसँ उपदेश लए अपन मोह भंग केने छलाह। योगवाशिष्ठ आ गर्गसंहितामे एहि प्रसंगक कथा अछि। शनैः शनैः मिथिलामे धार्मिक कर्मकाण्डी लोकनिक संख्यामे वृद्धि भेल। विष्णु, शिव, शक्ति आदिक पूजा नियमित रूपें शास्त्रानुकुल ढ़ँगे अहुखन मिथिलामे होइत अछि। कर्मकाण्ड शरीरक संस्कारसँ सम्बन्ध रखैत अछि। संस्कार कर्म पूर्व कालमे अनेक रूपक रहितहुँ एम्हर आबिकेँ दश प्रकारैक अवगत होइत अछि। वीरेश्वर, गणेश्वर, रामदत्त आदिक लेख सभसँ एहिपर विशेष प्रकाश पड़ैत अछि। दश प्रकारक कर्ममे ६काम्य तथा ४नित्य मानल गेल अछि– नामकरण, चूड़ाकरण, उपनयन आ विवाहक हवैछ, जे यथायोग्य नहि केने वर्णाश्रमक विलोप मानल जाइत अछि। एकर विधि एखनहुँ मिथिलहिमे यथासमय ओ यथाशास्त्र होइत देखल जाइत अछि। मिथिलामे जैमिनीय कर्म मीमाँसा शास्त्रक अधिक प्रभाव छल ओ अछिओ। श्रौत–स्मार्त–आगम तीनू कर्मकाण्डक यथा वदनुष्ठान ओ लोकमे आविष्कार मैथिल विद्वानहिक कैल भेटइत अछि। ‘कुण्डकादम्बरी’मे गोकुलनाथ उपाध्याय ग्रह योगसँ लऽ कऽ अश्वमेधांत कर्मकलापक कुण्ड निर्माण कऽ गेल छथि। मैथिल एखन धरि संध्यातर्पण एवँ एकोदिष्ट पार्यण करैत छथि। पंचदेवोपासक मैथिल अहुखन होइते छथि। एकर प्रचार मिथिलहिमे सर्वतोभावेन देखल जाइत अछि। मिथिलामे मनुक अतिरिक्त याज्ञवल्क्य निर्दिष्ट आचारक विशेष प्रचार अछि। मैथिल विद्वानक विश्वास छन्हि जे आचारक संग धर्मक जाहि तरहक सम्बन्ध छैक आरोग्य शास्त्रसँ कम नहि। प्रातः कृत्यादिसँ शयनपर्यंत, व्रत आदिसँ लऽ साधारण आचमन सभ वैज्ञानिक तत्वसँ भरल अछि। विचार स्वातंत्र्यक उदाहरण निम्नलिखित वाक्यसँ भेटत– “यस्तर्केणानुसन्धते सधर्म वेद नेतरः”– विद्यापतिक ‘पुरूषपरीक्षा’मे अपन–अपन कर्तव्यक समुचित ढ़ँगसे करबकेँ धर्म कहल गेल अछि। ‘बृहदारण्यकोपनिषद’ जकर रचना मिथिलामे भेल छल ताहिमे यौनधर्मक सम्बन्धमे स्पष्ट रूपे कहल गेल अछि– “सर्वेषामानन्दा नामुपुष्यं एकायतननम्”। मनुष्यकेँ संस्कारयुक्त कर्म करबाक अधिकार मिथिलामे देल गेल छैक। संस्कार एवँ कर्मक सम्बन्धमे मनुक मत अछि– “स्वाध्यायेन व्रतैर्होमैस्त्रै विद्येनेज्यया सुतैः। महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियतेतनुः”॥ वेदक अध्ययन, ब्रह्मचर्य अवस्थाक पालन, सायं प्रातः केर होम, देव ओ ऋषिक तर्पण, संतानक उत्पत्ति, पाँच महायज्ञ (ब्रह्मयज्ञ–अध्यापन, पितृयज्ञ–तर्पण, देवयज्ञ–देवप्रीत्यर्थ अग्निमे होमक आहूत देव, भूतयज्ञ–बलिविश्वेदेवक, नृयज्ञ–अतिथि केर पूजन) तथा आन ज्योतिष्टोमादिक काम्ययज्ञक द्वारा शरीरकेँ पवित्र करब उचित मानल गेल अछि। एकर सभकेँ संस्कार कहल गेल अछि। संस्कार कुलाचारक अनुसार होइत अछि। संस्कारानुसार सभ जातिक कर्म सेहो निर्धारित अछि। करण कायस्थ कोनो वर्णगत नहिओं रहला उत्तर मिथिलामे सम्मानित रहला अछि। हिनका लोकनिक आचार–विचार तथा व्यवहार कोनो रूपें द्विजसँ कम नहि कहल जा सकैत अछि। ब्राह्मणे जकाँ सभ संस्कार हिनको लोकनि ओतए होइत अछि आ संगहि धार्मिक तथा सामाजिक कार्यकलाप सेहो–वैवाहिक सम्बन्धो अहुखन धरि हरि सिंह देवीय पद्धतिसँ होइत छन्हि। कायस्थहुक हेतु प्राचीन कालमे वैवाहिक सभाक व्यवस्था मधुबनी आ जगतपुरमे छल। मिथिलामे सत शूद्रकेँ ‘सोलकन्ह’ आ असत् शूद्रकेँ ‘अछोप’ कहल गेल छैक। मिथिलामे संस्कारक पालन पूर्णरूपेण होइत आ अहुखन प्राचीन परम्परा देहातमे विराजमान अछि। पाँचम वर्षमे एहिठाम विद्यारंभ संस्कार शुरू होइत अछि–आ ओहि अवस्थामे बालककेँ ‘खड़ी’ अथवा ‘भट्टा’ धराओल जाइत अछि। धार्मिक कर्म केला उत्तर गुरूजी बालकक हाथ धकए “आँजी सिद्धिरस्तु” लिखबैत छथिन्ह। आँजीकेँ केओ प्रणवक भ्रष्टरूप, गणेशक अंकुश, सूंढ़क प्रतीक अथवा त्रिशूलक चेन्ह कहैत छथि। विद्या प्रारंभक पूर्वहिसँ बालककेँ संस्कृत श्लोक इत्यादि सिखाओल अथवा रटाओल जाइत छन्हि आ ओहिमे सर्वप्रसिद्ध श्लोक निम्नांकित अछि– “साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी। उग्रेण तपसा लब्धो यथा पशुपतिः पतिः॥ बालोऽहं ‘जगदानन्द’ नमे वाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत् त्रयम्॥ मा निषाद प्रतिष्ठानवमगमः शाश्वतीः सभा। यत्क्रौञ्च मिथुनादेकम वधीः काममोहितम्॥ सा रमा न वरारोहा नगे भागमनाहि या॥ याहि न तामगभागेन हारो रावण मार सा”॥ मिथिलामे विवाह संस्कार सेहो एकटा महत्वपूर्ण संस्कार मानल गेल अछि आ मैथिल व्यवस्थाक अनुरूप बारह वर्ष धरि विवाह भए जाएब आवश्यक बुझना जाइत अछि। शास्त्रमे कन्यासँ त्रिगुण अथवा अढ़ाए गुण पैघ वरक हैव उचित मानल गेल छैक। विवाहक हेतु कन्याक गुण, कुल आदिपर सेहो विचार कैल जाइत छैक। वैवाहिक सभा समौल, सौराठ, परतापुर, भखराइन, बनगाँव आदि स्थानमे पूर्वमे होइत छल। अखन आब मात्र सौराठ सभा रहि गेल अछि जाहिठाम शुद्धक समयमे एक विशाल मेला लगैत अछि आ जकरा देखबाक हेतु दूर–दूरसँ लोग सभ अबैत छथि। शास्त्रीय अनुमति देबाक हेतु पञ्जी प्रबंधक सभ सामग्री सहित पञ्जियार लोकनि सेहो एहिठाम उपस्थित रहैत छथि। जखन दुनू पक्षकेँ (वरपक्ष–कन्यापक्ष) सर्वथा सम्बन्ध करबाक निश्चय भऽ जाइत छन्हि तखन ‘अस्वजनपत्र’ लऽ कन्या पक्षक लोक लौकिक व्यवहारानुसार ‘हथधरी’ कए अपन गाम जाइत छथि। ‘अस्वजनपत्र’केँ गोसाउनिक सिरामे समर्पित कैल जाइत अछि। सिद्धांत भऽ गेलापर दुनू पक्ष निश्चित भऽ जाइत छथि। तकर बाद विवाह निश्चित बुझल जाइत अछि। धर्मक क्षेत्रक हम विवेचन कऽ चुकल छी जे मिथिलामे पंचदेवोपासनाक पद्धति बड्ड प्राचीन अछि आ मैथिलक वैशिष्ट्यक हिसाबे एकर महत्व एखनो बनले अछि। एहिठाम स्मरण रखबाक अछि कि सभ किछु रहितहुँ एहिठाम कहिओ कोनो प्रकारक साम्प्रदायिक कलह नहि भेल अछि आ सभ प्रकारक धार्मिक विचारक लोग एहिठाम अपन–अपन धर्मक पालन करैत आएल छथि। एक्के ठाम अथवा एक्के परिवारमे शैव शाक्त, आ वैष्णव देखल जा सकैत छथि। वस्तुतः साम्प्रदायिकतामे जाहि प्रकारक सामंजस्य एहिठाममे देखबामे अवइयै तेहेन अन्यत्र भेटब बड्ड दुर्लभ। सभ सभहिक धार्मिक कार्यकलापमे सक्रिय रूपेण भाग लैत छथि। भारतीय संस्कृतिक इएह मूलमंत्र रहल अछि आ मिथिलामे एकरा चरितार्थ होइत हम देखि सकैत छी। मिथिला तांत्रिक सम्प्रदाय अपन एकटा स्थान भारतक संदर्भमे रखैत अछि तैं ओकर विवेचन अपेक्षित। तांत्रिक संप्रदाय आ मिथिला– शिव आ शक्तिक प्रधानता मिथिलामे प्राचीन कालहिसँ चलि आबि रहल अछि। शिवक पूजाक हेतु मिथिलामे शिवमंदिरक कोनो अभाव नहि अछि आ सभ वर्ग आ वर्णक लोग शिवक पूजा करैत छथि। शिवकेँ आशुतोष सेहो कहल गेल छन्हि आ मिथिलाक गामक गाममे विद्यापति रचित नचारी आ महेशवाणी केओ कखनो सुनि सकैत अछि। शिवक संगहि संग मिथिलामे शक्तिक उपासनो होइछ आ सभ घरमे गोसाउनिक पूजा नियमित रूपें प्रतिदिन हेवे करैत अछि–मिथिलामे कुल देवी सभ घरमे पाओल जाइत अछि। स्मृतिक अनुसार शिवतत्वक ज्ञान प्राप्त करबाक हेतु शक्तिक उपासना आवश्यक मानल गेल अछि। तैं तँ कहल गेल अछि– “शिवोहि शक्ति राहतः शक्तः कर्तुन किंचन”। एकर समर्थन शंकराचार्यक सौन्दर्यलहरीमे सेहो भेल अछि– “शिवः शक्तयायुक्तो यदि भवति शक्तः प्रभाषितुम्। नचेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि”॥ शिवतत्वक ज्ञान प्राप्तिक हेतु शक्तितत्वक ज्ञान अपेक्षित अछि आ मिथिलाक संस्कृतिमे एहि दुहु तत्वकेँ बुझब अत्यावश्यक मानल गेल अछि। श्रुति तीन भागमे विभक्त अछि– कर्मकाण्ड, उपासना काण्ड, आ ब्रह्मकाण्ड। कर्मकाण्डक प्रवर्त्तक भेल छथि जैमिनीय (पूर्व मीमाँसा), ब्रह्मकाण्डक प्रवर्त्तक ब्रह्मसूत्रकार व्यास रचित उत्तर मीमाँसाकार आ उपासना काण्डक प्रवर्त्तक भेल छथि नारद। आगम शास्त्र ज्ञानी उपासना काण्डकेँ महत्व दैत छथि। ज्ञान आ उपासना श्रुति मूलक मानल गेल अछि आ इ दुनू मत अद्वैतक समर्थक अछि। सकल साधारणक सुविधाक हेतु आगम मार्गक उपस्थान केनिहार छलाह ब्रह्माक चारू पुत्र–सनक, सनन्दन, सनातन, आ सनत कुमार–जेहि महादेवसँ प्रार्थना कए एहि मार्गक सूत्रपात केलन्हि। चारू गोटएकेँ महादेव जे उपदेश देलथिन्ह सैह ‘आगम’ कहाओल आ इएह ‘आगमशास्त्र’ तंत्रक नामे प्रसिद्ध भेल। ‘वैदिक’ आ ‘आगम’ भिन्न पद्धति अछि। एकरे हमरा लोकनि अधुना ‘निगम’ (वेद–वेदांग) आ ‘आगम’ (तंत्र–मंत्र)क नामे जनैत छी। कुलार्णवमे लिखल अछि– “कृते श्रुत्युक्त आचारस्त्रेतायां स्मृति संभवः। द्वापरेतु पुराणोक्तः कलवागमसम्मतः”॥ कलियुगमे आगमशास्त्रक प्रधानता रहबाक गप्प एहिठाम कहल गेल अछि। महानिर्वाणतंत्रमे शिव पार्वतीकेँ कहने छथि जे आगम मार्गक बिना अनुशरण केने कलियुगमे सिद्धिक प्राप्ति असंभव। वाराही तंत्रमे आगमक निम्नांकित लक्षण बताओल गेल अछि– “सृष्टिश्च प्रलयश्चैव देवतानांतर्थाचनम्। साधनञ्चैव सर्वेषां पुरश्चरणमेव च॥ षट्कर्मसाधनञ्चैव ध्यानयोगश्चतुर्विधः। सप्तर्भिलक्षणैर्युक्तमागमं तद्विदुर्बुधाः”॥ आगम उएह कहबैत अछि जाहिमे सृष्टि, प्रलय, देवतार्चन, कार्यसाधन, पुरश्चरण षट्कर्म आदि वाधा दूर करबाक एवँ शांति स्थापनाक हेतु वशीकरण, विद्वेषण, उच्चाटन आ मारणक विधानक योग हो। आगमशास्त्र शिव शक्तिसँ सम्बन्धित मानल गेल अछि। आगमक तीन मुख्य भेद भेल डामर (तमस्), यामल (रजस्), आ तंत्र (सत्व)। पुनः एहि सभक प्रभेद एवँ प्रकारे अछि– डामर– योग, शिव, दुर्गा, सारस्वत, ब्रह्म, एवँ गन्धर्व। यामल– आदियामल, ब्रह्मयामल, विष्णुयामल, गणेशयामल, आदित्ययामल, तथा रूद्रयामल। तंत्रक विभिन्न प्रभेदक विवरण वाराही तंत्रमे भेटइत अछि। मिथिलामे शक्तिक प्रधानताक कारणे शाक्ततंत्रक प्रचार अछि–कौलमत एवँ दशमहाविद्याक प्रचार एत्तए बेसी भेल अछि। कौलमतावलम्बी वामाचारक प्रवर्त्तक भेलाह कारण एहि मार्गमे सिद्धिक प्राप्ति शीघ्र होइछ। काली एवँ ताराक प्रधानता मिथिलामे विशेष रूपें छल। वशिष्ट ताराक उपासक भेल छथि। बौद्ध धर्मक प्रभाव भने मैथिलपर नहि रहल हो से संभवे मुदा बौद्ध तंत्रक प्रभाव तँ स्पष्ट रूपें मिथिलाक तंत्रक इतिहासपर पड़ल अछि आ चीन–तिब्बतसँ मिथिलाक साँस्कृतिक सम्बन्ध एहि माध्यमसँ भेल अछि। दश महाविद्या प्रथाक समुचित आदर अहुखन मिथिलामे अछि। वामाचार एवँ कौलमतक प्रचार सामान्यतः मिथिलाक निम्नवर्गक लोगमे भेल। ओना ग्रंथादिमे तँ 64तंत्रक नाम भेटइत अछि। चन्द्रकला, ज्योत्सनावती, कलानिधि, कुलार्णव, कुलेश्वरी, भुवनेश्वरी, बाहर्स्पत्य ओ दुर्वासामतमे ब्राह्मणादि चारू वर्णकेँ ओ वर्णसंकरहुक समान अधिकार देल गेल छैक। प्रथम तीन वर्गकेँ दक्षिणाचार मार्गे आ शूद्रादि आ वर्णसंकरकेँ वामाचार मार्गे साधना करबाक अधिकार प्राप्त छैक। मिथिलामे तांत्रिक स्थान सभमे विशेषकए छोटलोककेँ भगताक रूपमे एखनो देखल जाइत अछि। अखनो मिथिलामे कैकटा प्रधान तांत्रिक केन्द्र अछि आ ओहिसभ ठाम जाँति–पाँतिक कोनो बन्धन नहि देखबामे अवइयै। तांत्रिक धर्मक उत्थानक पाछाँ सेहो किछु आर्थिक आ सामाजिक तथ्य छल जकर अनुसंधान एखनो पूर्णरूपेण नहि भऽ सकल अछि। पूर्वी भारतमे मैथिली, असमी, आ बंगाली संस्कृतिमे तंत्र एकटा महत्वपूर्ण भूमिकाक निर्वाह केने अछि। मिथिलामे घनानंद दास नामक एकटा प्रसिद्ध कायस्थ तांत्रिक भेल छलाह। तंत्र व्यापक अछि आ लौकिक पारलौकिक दुहु मार्गक बताओल गेल अछि। मोक्ष प्राप्तिक मार्गमे भोगकेँ नहि त्यागे पड़ए सैह विधान तंत्रमे बताओल गेल अछि। सर्वप्रथम आदिशक्ति प्रकृतिक पूजा प्रारंभ भेल आ ताहि दिनसँ मिथिलामे तंत्रक परम्परा चलि आबि रहल अछि। ब्रह्मस्वरूप प्रकृतिक प्राप्तिक हेतु तंत्रमे पंचमकारक विधान सेहो बताओल गेल अछि–पंचमकारक नाम एवँ लक्षण एवँ प्रकारे अछि– “आनन्दं परमं ब्रह्ममकारास्तस्य सूचका मत्स्यं, मांसं तथा मद्यं मुद्रा मैथुनेव च। एते पंचमकाराः स्युमोक्षदा हि युगे–युगे”॥ कुलार्णव तंत्रमे एकर विश्लेषण एवँ प्रकारे अछि– मत्स्यः– मायामलादिशमनान्मोक्षमार्गनिरूपणात्। अष्ट दुःखादि विरहान्मत्स्येतिपरिकीर्तितः॥ माँसः– मांगल्य जननाद्देवि संविदानंददानतः। सर्वदैव प्रियत्वाच्‍च माँस इत्यभिधीयनः॥ मद्यः– सुमनः सेवितत्वाच्च राजत्वात्ससर्वदाप्रिये। आनन्द जननाद्देवि सुरेतिपरिकीर्तितः॥ मुद्राः– मुदं कुर्वंति देवानांमनांसिद्रावयंतिच तस्मान्मुद्रा इतिख्याता दर्शिना व्याकुलेश्वरी॥ मैथुनः– सर्वद्रोहं विनिमुक्त्वा तवप्राणप्रिय भवेत्। एकाकारो भवेद्देवि त्वयि ब्रह्मणि मैथुनम्॥ मिथिलामे तांत्रिक साधनाक आधारपर पैघ–पैघ तांत्रिक अपन सिद्धि द्वारा लोककेँ चकित केने छथि। इएह कारण थिक जे अहुखन मिथिलामे तंत्रवादक मर्म सुरक्षित अछि। स्त्रीगणक स्थिति:- मिथिलाक सामाजिक–साँस्कृतिक वैशिष्ट्यमे स्त्रीगणक स्तित्व महत्वपूर्ण रहल अछि आ एहिठाम हमरा सभ प्रकारक स्त्रीगणक विभेद देखबामे अवइयै। ओना भारतीय संस्कृतिमे तँ स्पष्ट कहल गेल अछि जे स्त्रीकेँ कहियो कोनो अवस्था स्वच्छन्द रहब अपेक्षित नहि अछि– “पिता रक्षति कौमारे भर्त्ता रक्षति यौवने। पुत्रश्च स्थविरे रक्षित् न स्त्री स्वातंत्र्यमर्हति”॥ स्त्रीकेँ कुल, जाति, समाज एवँ देशक गौरव बुझल गेल अछि। स्त्री शिक्षाक आधुनिक परिपाटी ताहि दिनक मिथिलामे नहि छल ओना रानी–महारानी लोकनि विदुषी होइत छलीह से देखबामे अवइयै। ‘मैत्रेयी’ ब्रह्मवादिनी भेल छलीह आ ‘मल्ली’ नामक एक मैथिलानी जैन लोकनिक एक तीर्थकंर भेल छथि। मंडन मिश्रक पत्नी ‘भारती’ तँ सर्वविदीत छथिये। लखिमा ठकुराइन आ विद्यापतिक कुलवधु तथा ‘विश्वास देवी’क नाम तँ प्रख्यात अछिये। मुदा एहिसँ इ अनुमान नहि लगेबाक चाही जे मिथिलाकेँ सामान्य नारि लोकनिकेँ सेहो एहने शिक्षा देल जाइत छलन्हि। परम्परागत रूपें परिवारमे जे किछु सिखाओल जाइत छलैक सैह हुनक शिक्षा भेलैन्ह। पर्दा प्रथाक संकेत तँ मनुक कालहिसँ देखबामे अवइयै। मेधातिथि अपन मनुभाष्य (४१४४)मे कहने छथि–“अवगुण्ठितामेव हि विशेषे स्पृहयंति”। मिथिलामे स्त्री पर्दाक हिसाबे घोघ काढ़ैत छथि आ इ प्रथा एखनो धरि विराजमान अछि। मिथिलामे नारीक सौन्दर्य, कोमलता, माधुर्य, पवित्रता आ शीलक रक्षार्थ पर्दाकेँ आवश्यक बुझल गेल अछि। मध्ययुगमे मिथिलामे एहिप्रथाक विशेष प्रचार भेल छल। अहु प्रथाक प्रचलन पैघ लोकमे जतवा अछि ततवा छोट लोकमे नहि कारण छोट लोककेँ तँ बाल–बच्चा समेत सदति बाहर–भीतर काज करए पड़िते छैक। मिथिलामे कुमारि ब्राह्मणकेँ पवित्र मानल गेल छैक आ कुमारि भोजनक प्रथा अद्यतन प्रचलित अछिये। अविवाहित कन्या मिथिलामे माँथ नहि झपैत अछि। मिथिलामे कोजागरा पूर्णिमा, सुखरात्रि आ कार्तिकमे शामा–चकेबाक प्रचलन स्त्रीगणक मध्य प्रसिद्ध अछि। एहिठामक सामाजिक संगठन अद्यावधि जीवंत अछि आ सामाजिक नियमक उल्लंघन केनिहारकेँ दण्ड देल जाइत छैक। बाल–विवाह आ अनमेल विवाहक प्रणाली पहिने जेहेन छल ताहिसँ आब किछु बदलल अछि। स्त्री शिक्षामे प्रगति भेल अछि आ पर्दा प्रथा सेहो कम भेल अछि। कट्टर मैथिल लोकनि (चाहे ओ कोनो वर्णक किऐक ने होथि) अखनो स्पर्शास्पर्शक सम्बन्धमे बड्ड विचार रखैत छथि आ चमैन जे घरक ओतए महत्वपूर्ण काज करैत अछि तकरा अखनो अछापक गिनतीमे राखल गेल अछि। सभठाम परिवर्त्तन भेला उत्तरो मिथिलाक गाम घरमे अहुखन कट्टरता आ अन्धविश्वास जनित प्रलाप देखल जा सकइयै। रघुनंदन दासक ‘मिथिला नाटक’मे तथ्यपूर्ण सामाजिक चित्रण अछि। अध्याय–२१ परिशिष्ट १. मिथिलाक इतिहासपर चंदा झाक मंतव्य नान्य राजा क्षत्रिय कर्णाट छलाह जे शाके १०१९मे राज्य पौलन्हि। २२६वर्ष धरि हुनक संतान लोकनि राज्य केलन्हि। हुनक मंत्री जबदी परगन्ना स्थित अन्धराठाढ़ी गाममे कमलादित्य विष्णुक स्थापना केलन्हि। आधारशिलामे लेख श्लोकार्थ अछि– नान्य राजाक मंत्री श्रीधर श्रीधरक प्रतिष्ठा केलन्हि। खसल पाथरक चौखठिपर “मकरध्वज योगी” लिखल अछि। शाके १०४०मे चिक्कौर राजाक राज्यमे जयचन्द्र राजासँ असगरे संग्राम कैल। काफर राजाकेँ मारबाक बहादुरीमे पुरस्कार स्वरूप महमुद गजनी नरसिंहकेँ तिरहूतक राजा बनौलक। नरसिंह नान्यक पोता छल। बंगदेशसँ घुरबाकाल गयासुद्दीन सिमरौनगढ़ीसँ नरसिंह देवकेँ लऽ गेल छलाह। हरिसिंह देव मैथिल ब्राह्मणक पञ्जी प्रबन्ध केलन्हि। हुनक मंत्री रहथिन्ह साँधिविग्रहिक महावार्त्तिक–निबन्धकारक, महामत्तक वीरेश्वर ठाकुर। रणस्तंभ किलापर विजयाभियानक अवसरपर मैथिल मंत्री वीरेश्वर अलाउद्दीनक संग छलाह। १२९५इ. मे हम्वीर स्वर्गवासी भेलाह। अलाउद्दीन वीरेश्वरकेँ मंत्रिरत्नाकरक पदवीसँ अलंकृत केलन्हि। शक्रसिंह देव कर्णाटक मंत्री छलाह। हरिसिंह देव अपना वंशक पंचम राजा छलाह। शाके १२१६मे जन्म भेल छलन्हि। ओ १२४८शाकेमे दरभंगासँ पूब ७कोश एवँ सकरीसँ १1/2 (डेढ़)कोश दक्षिण नेहरा राघोपुरमे निवास करैत छलाह। ओहि गाममे पैघ–पैघ पोखरि आ किला छल। ओ ओतहि पञ्जी प्रबन्धक व्यवस्था केलन्हि। दैवाधीन ओ पटना छोड़ि उत्तर पहाड़ जंगल दिसि चल गेलाह। मिथिलामे भाला परगन्नामे मौजे उमागाममे अहुखन हरिसिंह देव पूज्य छथि। ओतहु भवन आदि देखबामे अवइयै। कर्णाट वंश राज्य भोग–वर्ष–२२६ i) नान्यदेव–३६ ii) गंगदेव–१४–गंगासागर iii) नरसिंह देव–५२ iv) रामसिंह देव–९२ v) शक्रसिंह–१२–सुखीदीघी vi) हरिसिंह–२०–निजाम्बुदीर्घिका नोट:- एहि प्रसंगमे हमर अपन मत “कर्णाट्ज आफ मिथिला” (भण्डारकर शोध पत्रिका–१९५५) प्रकाशित अछि। संगहि ‘कम्प्रीहेनसिभ हिस्ट्री आफ बिहार खण्ड–१’मे सेहो हम सभ तथ्यक विवेचन कैल अछि। रामसिंह देवक पछाति १२६०इ.मे मिथिलामे वीरसिंह नामक राजाक विवरण पेटेक देने छथि जे विचारणीय अछि आ संगहि एहि तथ्यपर ओ नव प्रकाश सेहो देने छथि। द्रष्टव्य अछि हुनके लिखल “मिडिवल हिस्ट्री आफ नेपाल” आ बिहार रिसर्च सोसायटीक महाराजा वाल्युममे “मिथिला आ नेपाल” नामक हुनक निबन्ध। “शाके श्रीहरसिंहदेव नृपतेर्भूपार्क तुल्येजनि– स्तस्माद्दंतमितेऽब्दके द्विजगणैः पञ्जी प्रबन्धः कृतः। तस्माद्वैरिजवंश वैरिकलिने (?) सद्विश्व चक्रेपुरा सद्विप्राय समर्पितः सुकृतिने शांताय तस्मैनमः॥1॥ शास्तानान्यपतिर्बभूव तदनुश्रीगाङ्गदेवो नृप स्तत्सूनुर्नरसिंहदेवनृपतिः श्री रामसिंहस्तः। तत्सूनुः खलु शक्रसिंह विजयी भूपाल वन्द्यस्ततो यत्र श्रीहरि (हर) सिंह देव नृपतिः कर्णाट चूड़ामणि॥२॥ वाणब्धिबाहुशशिसम्मित शाकवर्षे पौषस्य शुक्लदशमी क्षितिसूनुवारे। त्यक्तवा सुपट्टनपुरीं हरि (र?) सिंह देवो दुर्देव देशित पथो गिरिमाविवेश॥३॥ मिथिलामे जबदीनहड़ी परगन्नामे बलिराजगढ़क समीप सिहुलावन (सिरिहला) नामक प्रसिद्ध स्थान अछि जतए बलदेवजी स्यमंतक मणिक हेतु ६०वर्ष धरि निवास कएने छलाह। दुर्योधन, क्षेमधूर्त्ति, जलसन्ध आदिक सम्बन्ध सेहो एहि स्थानसँ छल। पक्षधर मिश्र १३५०शाकेमे हरिनारायण प्रसिद्ध भैरवदेवक सभामे उपस्थित छलाह। श्रीकृष्ण स्यमंतक मणि जाम्बवानकेँ पराजित कए प्राप्त केलन्हि आ ओ मणि ओ सत्राजितकेँ देलन्हि। सत्राजित सत्यभामा नामक कन्याकेँ देलन्हि। सत्यभामा रातिमे सत्राजितकेँ मारि मणि लऽ अकरूरकेँ एहि शर्त्तमे देलन्हि जे ओ एहि चोरीक गप्पकेँ प्रकासमे नहि अनताह। सत्यभामा हस्तिनापुर पहुँचि पितामरण एवँ मणिहरणक समाचार श्रीकृष्णकेँ देलन्हि। श्रीकृष्ण द्वारका पहुँचि अपन जेठ भाइ बलभद्र जीसँ एकरा खोजबाक हेतु आग्रह केलन्हि। मणि नहि भेटलाक कारणे कृष्णकेँ क्रोध भेलन्हि आ तखन ओ मिथिलामे आबि राज सत्कारसँ प्रसन्न भऽ धर्मागंद गढ़मे निवास केलन्हि आ तखनहिसँ ओहि गढ़क नाम कोपगढ़ पड़ल। ६०वर्षक पछाति कृष्णजी द्वारिका घुरलाह। बलिराजगढ़ ओ क्षेमगढ़ सेहो प्रसिद्ध अछि------- स्कन्दपुराण (सह्याद्रिखण्ड–अध्याय–३५)क आधारपर सौनल मुनिसँ उत्पन्न क्षत्रिय वंशक बीसम राजा बलिराज छलाह (चन्द्रवंशी)। हरिअमय बलिराजपुर मूल प्रसिद्ध अछि जाहिमे ब्राह्मण श्रोत्रिय महामहोपाध्याय सचल मिश्र पूनामे वाजीराव पेशवासँ अनेक दान प्राप्त केने छलाह। बलिराजपुर गढ़क समीप मदनेश्वर महादेव छथि जकर स्थापना बलिराजक दादा मदन कएने छलाह आ जनिक नामपर मदनोगाम सेहो अछि। १२८१सालमे हावी परगन्नामे साहो मौजेमे पोखरि खुनैतकाल एकटा प्रतिमा बाहर भेल से हावीडीहमे राखल छल आ लक्ष्मीनारायणक प्रतिमा शिलामे निम्नलिखित लेख उत्कीर्ण छल– “श्रीमान्मदनमाधवः” पद्मावती देवी–सौनल्यमुनि १.) यदु २.) भास्कर ३.) सुरथ ४.) गर्जन ५.) दण्डधारी ६.) खड़्गधर ७.) श्रीवदन ८.) नागराज ९.) गुणराज १०.) शिव ११.) सोमनाथ १२.) महाकाल १३.) दुन्दुभि १४.) बिम्बराज १५.) देवक १६.) अनिरूद्ध १७.) गोपति १८.) मदन १९.) सुनेत्र २०.) बलिराज– (जकरा नामपर बलिराज गढ़ अछि।) परिशिष्ट–२ ओइनवार वंशक वंश तालिका ओएन ठाकुर अतिरूप ठाकुर विश्वरूप ठाकुर गोविन्द ठाकुर लक्ष्मण ठाकुर राजपण्डित कामेश्वर–हर्षण (सुगौनेशः)–तेवाड़ी–सलखन–त्रिपुरे–गौड़। राजा भोगीश्वर महत्तक कुसुमेश्वर राजा भवसिंह राजा भोगीश्वर राजा गणेश्वर राजा कीर्तिसिंह(?) वीर सिंह राजा भवसिंह राजा देवसिंह राजा हरसिंह (पद्मसिंहक बाद राजा भेलाह) त्रिपुर सिंह (राज्य दुर्जन खाड़े–पुत्र अर्जुन राय) राजा देव सिंह शिवसिंह पद्मसिंह राजा हरसिंह दर्पनारायण पदांकित रत्नसिंह–नरसिंह हृदय नारायण धीरसिंह (पुत्र–राघवेन्द्र) हरिनारायण भैरवसिंह (धीर सिंहक भ्राता) (विश्वास देवी)- ? रूपनारायण रामभद्र कंसनारायण लक्ष्मीनाथ (शिव सिंह) लखिमा रानी–विश्वास देवी(?) पद्मसिंह (भैरवसिंहकेँ चन्द्रसिंह नामक एक छोट भाइक उल्लेख अछि– इ संभवतः सतभाय रहथिन्ह। इहो कोनो क्षेत्रमे राज करैत छलाह–विद्यपति आ मिसारू मिश्र हिनक ‘नरेश’, ‘नृपति’ कहैत छथिन्ह। हिनक पत्नीक नाम सेहो लखिमा रहन्हि।) नोट:- चंदा झाक अनुसार त्रिपुरसिंहक पुत्र अर्जुन राय गणेश्वरकेँ मारलन्हि। कारण छल राजगद्दीक हेतु आपसी झगड़ा कामेश्वर आ हर्षणक वंशजमे। कीर्ति सिंह बादशाहक मददसँ राजा भेलाह। चंदा झा लिखनावलीक आधारपर कहैत छथि जे बन्धुघाती अर्जुन (त्रिपुरक पुत्र) सेहो मारल गेला। कीर्ति सिंह–वीर सिंह अपुत्र मरि गेलाह तखन भवसिंहक वंशक हाथमे शासन गेलन्हि। ओइनवार वंशक एक शाखा अहुखन अराइदंगा (मालदह) पश्चिम बंगालमे विराजमान छथि जे अपनाकेँ कामेश्वर ठाकुरक वंशज मानैत छथि। हुनक वंश वृक्ष हमरा स्वर्गीय अतुल चन्द्र कुमर १९५८मे पठौने छलाह। लक्ष्मण ठाकुर आठम पीढ़ीमे भेलाह कुलमन–ओइनीसँ मुर्शिदाबाद गेला। संतोष (अराइदंगा पहुँचलाह) बोधनारायण भोलानाथ काशीनाथ दुर्गाप्रसाद चण्डीप्रसाद विशेश्वर वीरेश्वर रामेश्वर हरेश्वर विशेश्वर नवीन दिनानाथ उपेन्द्र दिनानाथ स्वर्गीय अतुल चन्द्र कुमर (भूतपूर्व पार्लियामेंट्री सेक्रेट्री, बंगाल) अरूण चन्द्र कुमर (पुरनका मालदह गजेटियरमे सेहो हिनका लोकनिक विवरण भेटइत अछि।) मिथिला भारतीमे प्रो. हेतुकर झाक निबन्धसँ स्पष्ट अछि जे मिथिलामे १७–१८म शताब्दी धरि ओइनवार लोकनि राजनैतिक दृष्टिये महत्वपूर्ण छलाह आ मुगल बादशाहत एहि तथ्यकेँ मनैत छलाह। अराइदंगाक ओइनवार लोकनिक क्षेत्र पुर्णियाँ धरि पसरल छलन्हि आ हेवनि धरि ओ लोकनि राजनैतिक दृष्टिकोणे मालदहोमे महत्वपूर्ण बुझल जाइत छलाह। परिशिष्ट–३ विद्यापतिक वंशावली विष्णु ठाकुर हरादित्य कर्मादित्य वीरेश्वर धीरेश्वर गणेश्वर धीरेश्वर जयदत्त गणपति विद्यापति कर्मादित्यक शिलालेख:- अब्देनेत्र शशाँक पक्षगादिते श्रीलक्ष्मण क्षमाप्रते र्मासि श्रावण संज्ञकेँ मुनितिथौ स्वात्यां गुरौशोभने। हावीपट्टन संज्ञकेँ सुविदिते हैहट्ट देवी शिवा कर्मादित्य सुमंत्रिणेह विहिता सौभाग्य देव्याज्ञया। मिथिलायां हावीडीहेति प्रसिद्धे देवी सिंहासन शिलायामुत्कीर्णमस्तीति। तथैव तिलकेश्वरशिवमठे कर्मादित्य नाम्नैव कीर्तिशिलायामुत्कीर्ण मास्ति॥ विद्यापतिक पूर्वज मिथिला राज्यक प्रशासनमे सक्रिय भाग लैत छलथिन्ह जकर प्रमाण हमरा लोकनि निम्नलिखित प्रशासनिक शब्दावलीसँ भेटइत अछि। एहिसँ मिथिलाक प्रशासनक विभिन्न विभागक ज्ञान सेहो होइत अछि। प्रशासनिक शब्दावलीक सूची:- i) सान्धिविग्रहिक ii) राजवल्लभ iii) पाण्डागरिक iv) महावार्तिक नैबन्धिक v) महामत्तक vi) महामत्तक सान्धिविग्रहिक (चण्डेश्वर) vii) भाण्डागारिक viii) स्थानांतरिक ix) मुद्राहस्तक x) राजपण्डित xi) सुमंत्रिण परिशिष्ट–४ शिवसिंह द्वारा विद्यापतिकेँ देल गेल ताम्रपत्रक प्रतिलिपि:- स्वस्ति। गजरथेत्यादि–समस्त प्रक्रिया विराजमान श्रीमद्रामेश्वरी वरलब्ध प्रसाद–भवानी भवभक्ति भावन परायण–रूपनारायण महाराजाधिराज–श्री माधव सिंह देवपादाः समर विजयिनः जरैल तप्पायां विसपीग्रामवास्तव्य सकल लोकान् भूकर्षकाँश्च समादिशंति–मतमस्तु भवतां ग्रामोऽयमस्माभिः सप्त क्रियाभिनव जयदेव महाराज पण्डित ठक्कुर श्री विद्यापतिभ्यः शासनीकृत्य प्रदत्तोऽतोयूयमेतेषां वचन करीयभूय कर्षणादिकं करिष्यथेति लसं २९३ श्रावणशुद्धि सप्तम्यांगुरौ। श्लोकास्तु–अब्दे लक्ष्मण सेन भूपति मते वह्नि(3) ग्रह(९) द्वय(२) ङ्किते। मासिश्रावण संज्ञकेँ मुनि तिथौपक्षेऽवलक्षे गुरौ॥ वाग्वत्याः सरितस्तहे गजरथेत्याख्याप्रसिद्धेपुरे। दित्सोत्साहविवृद्दबाहुपुलकः सभ्यायमध्येसभम्॥१॥ प्रज्ञावान् प्रचुरोर्वरंपृथुतराभोगं नदी मातृकं सारण्यं ससरोवरंच विसपीनामानमासीमतः। श्री विद्यापतिशर्मणे सुकवये वाणीरसास्वाद विद् वीरः श्री शिवसिंह देव नृपतिर्ग्रामं ददेशासनम्॥२॥ येन साहस मयेन शास्त्रिणातुङ्गवाहवर पृष्ठवर्तिना। अश्वपतिबलयोर्बलं जितं गज्जनाधिपतिगौऽभूजाम्॥३॥ रौप्य कुंभ इव कज्जल रेखा स्वेत पद्म इव शैवल वल्ली। यस्यकीर्तितवकेतककांत्या म्लानिमेतिविजितो हरिणाङ्क॥४॥ द्विषन्नृपति वाहिनी रूधिर वाहिनी कोटिभिः। प्रतापतरूवृद्दये समरमेदिनी प्लाविता॥ समस्त हरिदङ्गना चिकुरपाशवासः क्षमं। सितप्रणवपाण्डरं जगतियेन लब्धं यशः॥५॥ मतङ्गजरथप्रदः कनकदान कल्पद्रुम स्तुलापुरूषमद्भुतं निजधनैः पितादापितः। अवानिच महात्मना जगतियेन भूमिभुजा परापरपयोनिधि प्रथम मैत्र पात्रं सरः॥६॥ नरपतिकुलमान्यः कर्णशिक्षावदान्यः परिचित परमार्थो दानतुष्टार्थिसार्थः। निजचरितपवित्रो देवसिंहस्य पुत्रः सजयति शिवसिंहो वैरिनागेन्द्र सिंहः॥७॥ ग्रामेगृहणंत्यमुष्मिन् किमपिनृपतयोहिन्दवोऽन्ये तुरूष्का गोकोलम्वात्म मांसैः सहितमनुदिनं भुज्यते ते स्वधर्मम्। येचैनं ग्रामरत्नं नृपकर रहितं पालयंति प्रतापै– स्तेषां सत्कीर्ति गाथा दिशि दिशि सुचरंगीयतां वन्दिवृन्दै॥८॥ ल.स. २९३ शाके १३२४ शिवसिंह राजा भेलाह। चारि महिनेक बाद विद्यापतिकेँ विस्फी ग्राम दानक ताम्रपत्र देलन्हि। १३२६मे हरसिंह देव तिरहूत छोड़ि नेपालक जंगलमे गेलाह। भाला परगन्नामे उमगाममे गुप्त रहबाक हेतु एकटा प्रसिद्ध किला छल। कामेश्वर पण्डितकेँ बादशाहसँ राज्य भेटलन्हि मुदा सिद्धपुरूष होएबाक कारणे ओ अंगीकार नञि केलन्हि। फिरोजशाह भोगीश्वरकेँ राज देलन्हि। भोगीश्वरसँ भवसिंह राज्य बटलन्हि। १३६०मे भोगीश्वर मरि गेलाह आ गणेश्वर राजा भेलाह। गणेश्वरकेँ भवसिंहक पौत्र (त्रिपुर सिंहक पुत्र) मारि देलकन्हि। हर्षण ठाकुरक पौत्र रत्नाकरक हाथ सेहो एहिमे छल । गणेश्वरक पुत्र वीरसिंह आ कीर्तिसिंह दिल्ली पहुँचलाह आ बादशाहक मदतिसँ कीर्तिसिंह राजा भेलाह। अर्जुन पुरादित्य द्रोणवारक हाथे मारल गेलाह। शिव सिंह १५वर्षक अवस्थामे पिताक जीवतहि राजा भेला। देवसिंह देवकुली बसौलन्हि (दरभंगा कचहरीसँ सबाकोस दक्षिण)। शिवसिंहपुर (गजरथपुर)क स्थापना शिवसिंह करौलन्हि। देवसिंहक बाद शिवसिंह तीन वर्ष नौ मास राज्य केलन्हि। एकवेर पकड़ाकेँ दिल्ली गेल छलाह। अंतमे यवनसँ पराभूत भए उत्तर पहाड़मे चलि गेलाह। विद्यापति लखिमाकेँ लऽ कऽ द्रोणवार पुरादित्यक ओतए रहे लगलाह। शिवसिंहक मंत्री चन्द्रकरक पुत्र अमृतकर पटना जाए बादशाहसँ अभयदान लऽ कऽ बछौरमे पद्मामे रहए लगलाह। लखिमा १२वर्षक बाद सती भेलीह तकर बाद एक वर्ष पद्मसिंह राज्य केलन्हि आ तकर बाद पद्मसिंहक रानी विश्वास देवी १२वर्ष धरि। भाला परगन्नामे बिसौली गाम विश्वास देवीक नामपर अछि। ***विश्वास देवीक बाद धीर सिंह प्रसिद्ध हृदयनारायण तत्पर राजा भैरव सिंह हरिनारायण–मिथिलामे १४००मीमाँसक जमघट भेल छल–भैरवसिंहक पुत्र हरिनारायण(?)–भैरवसिंह बछौर परगन्नामे वरूआर नामक गाममे अपन राजधानी बनौलन्हि परिशिष्ट–५ राजा संग्राम गुप्त देवक पंचोभ अभिलेख (मूल हमर ‘सिलेक्ट इन्सक्रिपसन्स आफ बिहार’मे प्रकाशित अछि।) लहेरियासरायक समीप पंचोभ ग्रामसँ एकटा ताम्रलेख बहुत दिन पूर्वहि बाहर भेल छल जे मिथिलाक इतिहासक दृष्टिकोणसँ महत्वपूर्ण कहल जा सकइयै। एहि अभिलेखमे तिथि नहि अछि परञ्च लिपिक आधारपर एकरा १३म शताब्दीमे राखल जा सकइयै। इ अभिलेख माण्डलिक राजा संग्रामगुप्तक थिक। एहिमे निम्नलिखित ६राजाक उल्लेख अछि– (संभव जे इ लोकनि उत्तर गुप्त वंशसँ सम्बन्धित होथि।) i) यज्ञेश गुप्त ii) दामोदर गुप्त iii) देवगुप्त iv) राजादित्य गुप्त v) कृष्णगुप्त vi) संग्रामगुप्त एहिमे उपर्युक्त मात्र तीनटाकेँ राजा कहल गेल छैक। संग्राम गुप्त स्वयं “परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर महामाण्डलिक” आदि पदवीसँ विभूषित छथि। इ सभ कोनो सोमवंशी अर्जुनक वंशज कहल गेल छथि। भऽ सकैत अछि जे इ सम्राट हर्षवर्द्धनक राज्यपाल अर्जुन (जे तिरहूतक राज्यपाल छलाह)क वंशज होथि। किछु इतिहासकार एहिमे वर्णित स्थानक मिलान मूंगेर जिलाक जयनगरसँ करैत छथि जे हमरा बुझने अस्वाभाविक अछि आ एहि वंशकेँ पाल अथवा सेनवंशक सामंत माण्डलिक सिद्ध करबाक चेष्टा करैत छथि। इ निर्णय तथ्यपूर्ण नहि बुझना जाइत अछि कारण ताहि दिनमे मिथिलामे कर्णाट वंशक शासन सर्वशक्तिमान छल। दरभंगा (आव मधुबनी जिला)मे सेहो जयनगर नामक एकटा प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थान अछि। हमरा बुझने संग्राम देव अवश्ये एहिठाम कर्णाट वंशक महामाण्डलिक रहल होएताह आ पञ्जी प्रबन्धक पहिने इ ताम्रपत्र प्रकाशित भेल होएत कारण एहुमे कोलाञ्च ब्राह्मणकेँ दान देबाक व्यवस्था देखबामे अवइयै। प्रशासनिक शब्दावलीक दृष्टिये सेहो इ अभिलेख महत्वपूर्ण मानल जाइत अछि। प्रशासनिक शब्दावलीक सूची हम मिथिलाक प्रशासनिक इतिहासक क्रममे लिखि चुकल छी तैं एहिठाम दोहराएब उचित नहि बुझना जाइत अछि। संग्राम गुप्तक सम्बन्ध जे मंतव्य पहिलुक विद्वान लोकनि देने छथि से हमरा मान्य नहि अछि आ हमर अपन विचार इ अछि जे इ लोकनि मिथिलाक छलाह आ एहिठामक कोनो शासकक महामाण्डलिक रहल हेताह। परिशिष्ट–७ मिथिलासँ प्राप्त किछु हिन्दू आ मुस्लिम अभिलेख (१) अशोकक पंचम स्तंभलेख (रमपुरवा : चम्पारण) १. देवानं पिये पियदसि लाज हेवं आह। सड्डवीसति साभि सितेनमे इमानि पि जातानि अवध्यानिकयानि। सेयथ २. सुके सालिक अलुने चकवाके हँसे नंदीमुखे गेलाहे जतूक अंबाक पिलिक दुग्ले अनठिक मछे वेदवेयके ३. गंगा पुपुटकेँ संकुज मछे कफट सेयके पंन–ससे सिमले संडके ओक पिंडे पलसते सेन कपोते ४. गाम कपोते सबे चतुपदे ये पटिभोगं नो एतिन च खादयाति। अजका नानि एलका च सूकली च गभिनीव ५. पाय–मीना व अवध्य पोतके च कानि आसं मासिके। विधि कुकुटे नो कट विये। तुसे सजी वेनो झापयति विये। ६. दाबे अनठाये व विहिसाये व नो झापयितविये। जीवेन जीवे नो पुसितविये। तीसू चातुं मासु तिस्यं पुनंमासियं ७. तिनि–दिवसानि चस्वुदसं पंनडसं पटिपदं धुवाये च अनुपोसथं मछे अवध्ये नोपि विकेतविये। एतानि येव ८. दिवसानि नाग वनसि केवट भोगसि यानि अंनानिपि जीवनिका यानि नोहं तवियानि। अठमि पखाये चावु दसाये ९. पंतऽसाय तिसा ये पुनावसुने तीसु चातुं मासीसु सुदिवसाये गोने नो निलाखेतविये। अजके एलके सूकले १०. एवापि अंने नील्वखियति नो नीलखित विये। तिसाय पुना वसुने चातुं मास–प्रखाय अस्वस गोनस ११. लखने नो कट विये। याव सड्डवीसति वसाभि सितेनमे एताये अंतलिकाये पंन वीसति बन्धन मोखानि कयनि। (२) अशोकक षष्ठम स्तम्भ लेख (रमपुरवा : चम्पारण) १. देवानं पिये पियदसि लाज हेवं आह। दुवाऽस वसाभि–सितेन मेघंमलिपि लिखापित लोकस हित सुखाये। से तं अपहट २. तं तं धंम बढ़ि पापोव। हेवं लोकस हित सुखे ति पटिवेखामि अथ इयं नातिसु हेवं पत्या–संनेसु हेवं अपक ठेसु। किंम कानि ३. सुखं आव हामी ति तथा च विदहामि। हेमेव सर्वकायेषु पटिवेखानिं। सर्वपासंग पिमे पूजित विवधाय पूजाय। ए चुइयं। ४. अतन पचूप गमने से मे मोख्यमुते। सड्डवीसति वसाभि सितेनमे इयं धंम लिपि लिखापिति। (३) वैशालीसँ प्राप्त किछु महत्वपूर्ण शिलालेख १. ध्रुवस्वामिनीक मुद्रा अभिलेखे महाराजाधिराज श्री चन्द्रगुप्त पत्नी श्री गोविन्द गुप्त माता श्री ध्रुवस्वामिनी (एहिपर शीघ्रहि हमर लेख प्रकाशित भए रहल अछि।) २. घटोत्कच गुप्तस्य। (४) संघ श्रेणी एवं राजकर्मचारी लोकनिक मुद्रा लेख १. कुमारामात्याधिकरणस्य। २.युवराजपादीय कुमारामात्याधिकरण। ३. श्रेष्ठिसार्थवाहकुलिकनिगम। ४.श्रीयुवराजभट्टारकपादीय कुमारामात्यअधिकरणस्य ५. श्रीपरमभट्टारकपादीय कुमारामात्याधिकरण। ६. युवराजभट्टारकपादीय......काधिकरणस्य ७. युवराजभट्टारकपादीय बालाधिकरणस्य ८. श्रीरणभाण्डागाराधिकरणस्य ९. दण्डपाशाधिकरणस्य १०. महाप्रतिहार तरवर विनयशूरस्य ११. महादण्डनायक अग्निगुप्तस्य १२. भट्टास्वपति यज्ञवत्सस्य १३. तीरभुक्त्यौपरिकाधिकरणस्य १४. तीरभुक्तौ विनयस्थितिस्थापकाधिकरणस्य १५. तीर कुमारामात्याधिकरणस्य १६. उदानकूपे परिषदः १७. वैशाल्याधिष्ठानाधिकरण १८. वैशाल्यामरप्रकृतिकुटुम्बिनाम् १९. वैशाल विषयाः २०. श्रेष्ठकुलिकनिगम् २१. वैशाली अनुटकारे सम्यानक २२. सुजातर्षस् २३. आम्रात्केश्वर २४. श्रीविष्णुपाद स्वामीनारायण २५. जयत्यानंतो अभवान साम्बा २६. जितं भगवतोनंतस्यनन्देश्वरी वरस्वामिनः २७. नमः पशुपतेः २८. रविदास २९. भगवतादितस्य ३०. राज्ञोमहाक्षत्रपस्य स्वामीरूद्रासिंहस्य दुहितु राज्ञोमहाक्षत्रपस्य स्वामीरूद्रसेनस्य भगिन्या महा देव्या प्रभुदमायाः। ३१. देयधमोयम् प्रवर महायानायिनः करणिक उच्छाह माणकस्य सुतस्य यदत्रपुण्यं तद्भवत्व चर्योपाध्याय मातापित्रोरात्मनश्च पूर्वगमं कृत्वा सकल सत्वरासे रनुत्तर्ज्ञानावाप्रयैति। ३२. कुमारामात्याधिकरणश्च सर्व्वंग विषये ब्राह्मणाद्यपुरस्सरान् वर्त्तमानांभविनश्च ३३. श्रीसामंत......विषयपतिंसाधिकरणान्......व्यवहारी जनपदान बोधयत्यस्तु ओ विदितम्। ३४. श्री लोकनाथस्य ३५. ल.स. २३९ शोधरवली श्री चण्डेश्वरस्य कीर्ति– एहिमे लक्ष्मण सम्वत् देल अछि ताहि आधारपर एकरा महामत्तक चण्डेश्वरक अभिलेख मानि सकै छी। (५) किछु दिन पूर्व मुजफ्फरपुर जिलांतर्गत कटरा थानासँ पाँचम छठम शताब्दीक एकटा ताम्रलेख भेटल अछि जे गुप्तकालीन ि‍थक आओर जाहिमे तीरभुक्तिक उल्लेखक संगहि संग चामुण्डा विषयक उल्लेख सेहो अछि। इ अभिलेख आओर चम्पारणसँ प्राप्त तीन चारिटा ताम्रलेख अप्रकाशित अछि आओर इ पटना प्रमण्डलक विद्वान आयुक्त श्री श्रीधर वासुदेव सोहनीक संग छन्हि। आशा अछि ज ओ शीघ्रे एहि सभ अभिलेखकेँ प्रकाशित करौताह। आब इ ताम्रलेख एपिग्राफिया इण्डिकाक वाल्युम ३५मे प्रकाशित भऽ चुकल अछि। ओहिठाम मोतिहारीसँ प्राप्त दूटा आर अभिलेख प्रकाशित अछि। (६) गुप्तकालीन एकटा मुद्रा (माटिक) हमरा बेगूसरायमे प्राप्त भेल छल जाहिमे एकपीठपर गुप्ताक्षरमे लेख अछि आओर दोसर पीठपर मिथिलाक्षरमे आओर लं.सं.क उल्लेख सेहो अछि। (मुद्राक गुप्ताक्षर वाला लेख) सुहमाकस्य–सुहमाकस्य (मिथिलाक्षर वाला लेख) सं. ६७ द्यौ पौशदिने नगम केदत्तम् दभम् शाध्येच्यैकेः केशवा पदे इति–इ मुद्रा हमरा लग अछि। एकर अतिरिक्त बुद्धमंत्र–ये धम्महेतु प्रभवा......आदि लिखल ढ़ेरक ढ़ेर मूर्त्ति मिथिलामे भेटइत अछि। (७) पालकालीन मिथिलाक शिलालेख (i) भागलपुर कौपरप्लेटमे तीरभुक्ति आओर कक्ष विषयक उल्लेख अछि आओर ओहिमे कहल गेल अछि जे तीरभुक्तिमे हजार शिवमन्दिरक निर्माण भेल छल, (ii) इमादपुर (मुजफ्फरपुर जिलासँ पाप्त) अभिलेख। महिपाल प्रथमक अभिलेख ॐ श्रीमान महिपाल देव राजसम् ४८ ज्येष्ठ दिने सुकलपक्षे २ आलै चकोऽरि माहवसुत साहि देवधर्म्म, (iii) वनगाँव (सहरसा)सँ प्राप्त विग्रहपाल तृतीयक ताम्र अभिलेख इ सभटा अभिलेख हमर ‘सेलक्ट इन्सक्रिपसन्स आफ बिहार’मे छपल अछि। (पाँति २४): काञ्चनपुर समावासीता श्रीमञ्जय स्कन्ध वारात परम सौगतो महाराजाधिराज श्रीमन्नयपालदेव पादानुध्यातः परमेश्वरः परम भट्टारको २५. महाराजाधिराजः श्रीविग्रहपाल देवः कुशली। तीरभुक्तौ हौद्रेय वैषयिक वसुकावर्तात। यथोप्तत्या पंचशत्ति कांशे। २६. समुपगता शेष....३७. शाण्डिल सगोत्राय। ३८. शाण्डिल्यासित देवल प्रवराय नरसिंह स ब्रह्मचारिणे। छन्दोग शाखाध्यायिने। मीमाँसा व्याकरण तर्क विद्याविदे। ३९. कोलाञ्च विर्निगताय। इट्टाहाक वास्तव्याया योग स्वामी पौत्राय। तुंग पुत्राय। श्री घण्टुक शर्मणे। विषुवत संकांत्याम्। विधिवत्। गं। ४०. गायाम् स्नात्वा शासनी कृत्य प्रदतास्माभिः। (iv) नौलागढ़ (बेगूसराय)सँ प्राप्त विग्रहपाल तृतीयक अभिलेख सिद्धम् श्री विग्रहपाल देव राज्ये सम्वत् २४ क्रिमिलिया शौण्डिक महामती दुहित्रा धाम्मजिपल्या आशोककया कारिता॥ (v) नौलागढ़सँ प्राप्त दोसर अभिलेख नमोधर्माय......श्रद्धा कारूण्य संभेदरदान मस्तुम माये पुण्यधारां। भिक्षा भुजामित्यमायधतुमक्ष। वाट (वदि)...आश्रय मन्विता। यद वध (च) स्वाहा (or श्रद्धा) क्रौद्वोचिंता....भा..वमद...दमल व्यवस्थिताह....श्रद्धाया भाव (च)...यद् गृहादि (धै)....याद दक....बिहार...एहि अभिलेखसँ संदिग्ध रूपें इ बुझना जाइत अछि जे पालकालमे मिथिलामे नौलागढ़ अंचलमे कोनो एकटा बौद्ध बिहार अवश्य छल। अन्यान्य अभिलेख पंचोभ ताम्रलेखक किछु अंश पांति १. श्री संग्रामगुप्तः २. ॐ स्वस्तिः परम भट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर, परममाहेश्वर, वृषभध्वज, सोमांवयज्ञार्जुन वंशोन्न जयपुर ३. परमेश्वर महामाण्डलिक श्रीराजादित्य गुप्तदेव पादानुध्यात राजपुत श्रीकृष्णगुप्त सुत परमभट्टारक महाराजाधिराज ४. परमेश्वर परममाहेश्वर वृषभध्वज सोमान्वयजार्ज्जुन वंशोद्भव जयपुर परमेश्वर महामाण्डलिक श्रीमत् संग्रामगुप्त देवपाद प्रवर्द्धमान विजयराज्ये ५. सप्तदश सम्वत्सरे कार्तिक कृष्ण नवम्यां तिथौ श्री मज्जयस्कन्धवारात् अयदेव महाराजाधिराज महामाण्डलिक श्रीमत् संग्रामगुप्त देवोविजयी....६.७.महासान्धिविग्रहिक, महाव्यूहपति महाधिकारिक, महामुद्राधिकारिक महामत्तक, महापीलुपति, महासाधनिक, महाक्षपटलिक, महाप्रतिहार, महाधर्माधिकरणिक, महाकरणाध्यक्ष, ८. वार्तिनैबन्धिक, महाकटुक, महौत्थिक, तासनिक, महादण्डनायक, महादानिक, महापंचकुलिक, महासामंतराणक, महाश्रेष्ठिदानिक, धूलिदानिक, घट्टपाल, खण्डपाल, नरपति, गुल्मपति, ९. नौ बलव्यापृत गोमहिषवड़बाध्यक्ष राजपादोपजीविनी......११. ............समस्तपीड़ोपकर वर्ज्जितो अचाटभट प्रवेषो महतानुग्रहेण एहि अभिलेखमे शासन सम्बन्धी बहुतो एहेन शब्दक उल्लेख भेल अछि जकर विश्लेषण एखनो धरि फरिछाकेँ नहि भेल अछि। इ सभ अभिलेख हमर Selected Inscriptions Of Bihar मे प्रकाशित अछि। आसीक (महिआहीक) पाथर–लेख जातो वंशे विल्व पंचाभिधाने धमाध्यक्षो वर्द्धमान भवेशात्। देवास्याग्रे देवयष्टि ध्वजाग्रा रूढ़ँ कृत्वाऽस्थापय द्वैन तेयम्। एहिमे नैयायिक वर्द्धमानक उल्लेख भेल अछि। तिलकेश्वरगढ़क अभिलेख अब्देनेत्र शशांकपक्ष गणिते श्री लक्ष्मणाक्ष्मपतेर्मासि श्रावण संज्ञकेँ मुनि तिथौ र्त्वात्यांगुरुउशोभने। हावीपतन संज्ञकेँ सुबिदिते हैहट्टदेवी शिवा कर्मादित्य सुमंव्रिणेह विहिता सौभाग्य देव्याज्ञा– एहि अभिलेखमे रानी सौभाग्य देवी, मंत्री कर्मादित्यक उल्लेख संगहि हैहट्ट भगवतीक उल्लेख सेहो भेल अछि। खोजपुरक अभिलेख एक महत्वपूर्ण अभिलेख खोजपुरक दुर्गाक मूर्त्तिपर अछि जाहिमे ल.स.१४७क उल्लेख भेल अछि आ ओर मदनकपुत्र सूर्यकरक नाम सेहो उल्लिखित अछि। कन्दाहाक अभिलेख कन्दाहा अभिलेखक उल्लेख पूर्वहि राजनैतिक इतिहासमे भए चुकल अछि। स्मरणीय अछि जे एहि अभिलेखमे ‘विल्वपंचकुलोद्भुत्’ शब्द व्यवहृत अछि जे वर्द्धमानक आसीक अभिलेखमे अछि। भगीरथपुरक अभिलेख पांति १. स्नुषाहरिनारायण क्षितिपतेर्ग्गतेः क्ष्माभृतां बधूर्न्नृपतिमण्डली। महितराम भूमीपतेः २. द्विजोत्तम सुखप्रदानृपति कंसनारायण प्रवीरजननीमुदा मठमधीकरत सुन्दरम्। ३. दानैर्य्या दलयाम्बभूवँ जगतां दारिद्रयमत्युत्कटं कीर्त्यायाः सुन्दर तरान् लोकांश्चकारायुतान। ४. किञ्चोच्चैर्व्विनयान्नयाश्च वशतां नीतोयया बान्धवाः सेयं विश्वविलक्षणोज्जवल गुणग्रामा मठं निर्ममे। ५. वेदरन्ध्रहरनेत्र चिन्हिते लक्ष्मणस्य नृपतेर्म्म तेब्दके। विश्वविश्रु तगुणागुणालयं देवतालय मर्मुमुदाऽकरोत। ६. कविता माधव सुकवे: कीतिदेव्‍या: सुधम्‍बुधि स्‍फीता। त्रिभुवन भुवना भोगेः विलसतु कल्‍पान्‍त पर्यन्‍तम्।। ७. देवी देवलयमियममु कारयामास कृच्‍छे भक्‍त्‍या नक्‍तं दिनमथमति.....क्ता। यैषां शेषे जगति जागतीनाथ नायस्य योषा भूषा भूता विविध विधया रुपनारायणस्‍य। ८. धन्‍वा का कीर्तिरष्या कुलधर कविता कीर्तनीयानुमत्‍या लक्ष्‍मी: सा कापि लक्ष्‍मीधरमुपगता साधवारधनाया। सूनुज्जिययान् यदीयो यवनपयि भयाधाकस्‍तीरभुक्तौ राजा राजाधिराज: समर:.....स: कंसनारायणौ सौ.....श्रीमदनुमतिदेवी नामाज्ञया:-मिथिलाक राजनैतिक एवं सांस्‍कृतिक इतिहासक दृष्टिकोणसँ इ अभिलेख बड्ड महत्‍वपूर्ण अछि। श्रीनगर (मधेपुरा)क अभिलेख मगरध्‍वज योगी ७०० इयह अभिलेख एकटा अन्‍धराठाड़ीमे सेहो अछि। वरांटपुर (सहरसा)क अभिलेख श्रीमन्‍माहेश्‍वरी वरलब्‍ध सत्क्रिया विराजमान बुद्धेश वंशस्‍य सदा चन्‍द्रराज श्रीमत् सर्व्‍वसिंहदेव विजयी लदहोद विष्णुमूर्त्तिक पादुका लेख (एखनधरि अप्रकाशित छल) श्रीरामनाथ राजन्यो विष्‍णु: सेवक सेवक: स्‍वरेर देव तलयो विष्‍णुर्नाम करिष्‍यति। मिथिलामे एखनो असंख्‍य लेख सब चारुकात छिड़िआएल पड़ल अछि तैँ प्रत्‍येक मैथिलक इ कर्तव्‍य होइछ जे ओ लोकनि एहि दिसि ध्‍यान दऽ ओकर संग्रह करथि। जे शिलालेख सब राजनैतिक इतिहासवाला खण्‍डमे छपि चुकल छल से एहिठाम नहि देल गेल अछि। १० मिथिलासँ प्राप्‍त किछु मुस्लिम-अभिलेख (i) महेशवारा (बेगूसराय)सँ प्राप्‍त १२०९ई. एकटा अरबी शिलालेख १६५५मे प्राप्‍त भेल जे भण्‍डारकर शोध्‍रसंस्‍थान (१९५६)मे प्रकशित भेल अछि। एहिमे भवन बनेबाक उल्‍लेख अछि। इ लेख बंगाल सुलतान रुकबुद्दीन कैकाउसक समय थिक। (ii) तुगलककालीन वेदीवन (चम्‍पारण) अभिलेख १. तमाम शुद इन हलकात-उल-अक्‍ताव-उल अकवर २. दर अहाद इसहान शाह-इ-आदिल शाह मुहम्‍मद ३. बिन तुगलक शाह लजलामुकोहुब दौलतहु ४. अनाम बजैल इज्‍जुद दौलत वद्दीन ५. काजी-इ-मुहर खासब जिकरुल्लाह बकर ६. वोएन वन्‍दाह महमुद विनुयुसुफ अलमुलकावा ९. विष्‍टुम मह-इ-रबिउल अब्‍वल सनत सब ब अरबीनव सब मयत वेदीवन अभिलेख बड्ड महत्‍वपूर्ण अछि। हिन्‍दू लोकनि बहुत दिनधरि एकरा ‘भगवानक चरणापाद’ कहि पूजा करइत रहथि। इ शिलालेख महमुद तुगलक कालक थिक (हिजरी ७४७-१३४६ ई.) एहिसँ निश्चित रुपे प्रतीत होइछ जे १३४६मे चम्‍पारण धरि तुगलक शासनक प्रमाण भेटइयै। दरभंगासँ प्राप्‍त मुहम्‍मद तुगलकक अभिलेख कल्ललाह ओतलमनजा विलहसनत फलहु अश्र अम्‍सलह बिन मस्जिद अलमुजाहिद फी साबीलिल्लाह मुहम्‍मद बिन अस-सुल्‍लान अस सइद इस शहीद इल गाजी गियासुद्दुनिया वद्दीन अनरुल्लाह बुरहानहु इज सोयलत अन तारिख-इ-बेन एही फकुल हवाल मस्जिद अल अक्‍स फिसानत इ सित ब इशरीन बसबा मयात अल हिजारिया उन नबुब: ७२६-इ अभिलेख मुल्ला तकियाक बयाजमे सुरक्षित अछि आओर पटनाक मासिर पत्रिका मे छपल छल (१९४६ ई.मे)। अभिलेखसँ इ प्रतीत होइछ जे महम्‍मद तुगलकक आदेशानुसार दरभंगामे एकटा विशाल मस्जिद हिजरी ७२६मे बनल छल। हरिसिंहदेव पराजित भऽ चुकल छलाह। तुगलक-कालीन दूटा सिक्का सेहो भेटल अछि जाहिपर तुगलकपुर उर्फ तिरहुत लिखल अछि। दरभंगासँ प्राप्‍त इब्राहिमशाह शार्कीक अभिलेख कलन नबिया सल्‍लालाटु अलैहावसल्लम मम बिन मस्जिद अल्‍लाह बिनल्लाह लहु वैतन फिल जन्नत ही विन हजल मस्जिद फी जमनल इमाम नायव-उलखलीफा अमीरुल मुमीनीन अबुल फतह इब्राहिम शाह अस सुलतान खलदह खिलाफत तहु सनत खस व समन मयत ८०५-इ. अभिलेख बहुत महत्‍वपूर्ण अछि कारण (८०५-१४०२-३इ.) इब्राहिमशाहक लेख मिथिलाक केन्‍द्रमे भेटल अछि आओर एहिसँ प्रमाणित होइछ जे शर्की लोकनि दरभंगापर अधिकार प्राप्‍त कएने छलाह-ओहि वर्ष दरभंगा बा‍टे इब्राहिमशाह बंगाल जाइत छलाह आओर हुनक उद्देश्‍य छल शिवसिहकेँ परास्‍त करब कारण शिवसिंह बंगालक राजा गणेशक साहाय्य कऽ रहल छलथिन्‍ह। एहि सम्‍बन्‍धमे प्रो. अस्‍करीक लेख Bengal Past and Present मे छपल अछि। बंगाल सुलतान नसीर शाहक अभिलेख (बेगूसराय-मटिहानीसँ प्राप्‍त) बिसमिल्लाह इर रहमान दूर रहिम नसरुन मीनल्लाह ब फथुन करीब। हजल मस्जिद अल जमायउल मुअज्‍जम नसीरशाह अस सुलतान खल्ल दल्लह वो मुलकहु व सलन्‍तहु। इ ओहि नसीरशाहक अभिलेख थिक जे मिथिलाक ओइनवार वंशक अन्तिम शासककेँ पराजित कएने छलाह। इहो अभिलेख आव “परसियन आ अरेबिक इन्‍सक्रिपसन्स आफ बिहार’’मे छपल अछि। परिशिष्‍ट–८ १२३४-३६ इ.क मध्‍य तिव्‍वतसँ एक यात्री आएल छलाह जनिक भारतीय नाम धर्मस्‍वामी छलन्हि। ओ तिरहुतमे कर्णाट राजा रामसिंहदेवसँ भेंट कएने छलाह आओर रामसिंहदेवक कालीन मिथिलाक बहुत सुन्‍दर वर्णन एहिमे अछि। ‘धर्मस्‍वामीक जीवनी’क सम्‍पादन प्रसिद्ध रूसी विद्वान डा. जी. रोयरिक कहने छथि आओर एकर प्रकाशन पटना स्थित काशी प्रसाद जायसवाल शोध संस्‍थानसँ भेल अछि। हम ओहि पोथीमेसँ किछु ओहन अंश एहिठाम दऽ रहल छी जाहिसँ तत्‍कालीन मिथिलापर प्रकाश पड़ैछ: P. 58.- In this Country (Tirhut) there was a town called PA.-TA, which had some 600,000 houses and was surrounded by seven walls…..outside of the town walls stood the Raja’s palace which had eleven large gates and was surrounded by twentyone ditches filled with water and rows of trees. There were three gates facing each direction, East, West and South, and two gates facing North………guards were stationed, more than ten archers at each bridge. These protective measures were due to the fear of the Turushkas…….who during the year had led an army but failed to reach it. It was also said that there were three men experts in swordsmanship. The Raja owned a she-elephent. P. 60– Ma-hes (महिंसक उल्लेख)–non-Budddhist kingdom of Tirhut. P. 61-uninhabited border of Vaisali. There exists a miraculous stone image of the Arya Tara with her head and body turned towards the left, foot placed flat, and the right foot turned side ways the right head in the varmudra and the left hand holding the symbol by the Three Jewels in front of the heart…….they were told that the inhabitants were in a state of great commotion and panickstriken because of rumours of Turushka troops. P. 61- When they had reached the Vaisali, all the inhabitants had fled at dawn from fear of the Turushka soldiery …….the soldiery left for western India P.98- According to Dharmaswami one pana equalled to eighty Cowries……At that time he was in possession of an extraordinary manuscript. P. 99-….the owner of the house stole the book-fell ill in Trihut (on his return Journey)- The tantric treated me-and I did not die…..The Tantric appears to have been a manifestation of the four. Armed Protector. P.100……he was told that the Raja of the Pata city was coming to the street corner, The Raja was accompanied by a crowd of drummers and dancers with banners, buntings, brandishing fans and sounding conches and various musical instruments All the house tops and street corners were ever hung with silk trappings. The Raja named Ramasimha was coming riding on a she elephant, sitting on a throne adorned with precious stones and furnished with an ornamented curtain. The Dharmaswamin received an invitation from the Minisiter who said “please come! If you do not come in person the Raja will punish you. The Raja comes to the street corner only once a year, and there is a pageant. The minister sent a sedan chair (Doli) for the Dharamaswamin, who went to meet the Raja. The Dharamaswamin greeted the Raja in Sanskrit slokas and the Raja was very much pleased and presented the Dharamswamin with some gold, a roll of cloth, numerous medicines, rice, and many excellent offerings and reauested Dharamswamin to become his chaplain but Dharamswamin replied that it was improper for him, a Buddhist, to become the Guru of a non-Buddhist. The Raja accepted it, and said “well stay here for some days”. The Dharamswamin said that the Raja honourd him with mumerous requisites, P.101-Among the large gathering of people in the town of PA-TA in Tirhut, Dharamswamin met with some Nepalese whom he had met previously. एहि पोथीसँ मिथिलाक सांस्‍कृतिक जीवनपर बड्ड प्रकाश पड़इत अछि। एहि पोथीमे जे ‘वैवर्त लिपि’क उल्‍लेख अछि सैह आधुनिक मैथिलीक लिपि थिक। शिल्‍पशास्‍त्र, चिकित्‍सा, दर्शन, व्‍याकरण, न्‍याय, मण्‍डल इत्‍यादिक अध्‍ययन ओहि युगमे होइत छल। कालिदास सम्‍बन्‍धी किंवदन्‍ती एहि पोथीमे अछि आओर चन्‍द्रकीर्ति आओर चन्‍द्रगोमिनक शास्‍त्रार्थक चर्चा सेहो। पटकेँ डा. अल्‍तेकर सिमराँगढ़ मानने छथि जे हमरो मान्‍य अछि। एहि आधारपर आब जँ ओतए उत्‍खनन होअए तँ बड्ड लाभदायक होएत। तिरहुतमे तान्त्रिक चर्च अछि। एक चरित्रहीन एवं हठी स्‍त्रीक उल्‍लेख सेहो अछि। एहिसँ लक्ष्‍मणसेन सम्‍वत् सम्‍बन्‍धी अध्‍ययनमे साहाय्य भेटइत अछि। मिथिलामे कुसियारक खेती खूब होइत छल। काली मंदिरक समक्ष बलिदानक प्रथा छल। छूआछूतक प्रथा छल आओर अछूत लोकनि अपन कान नहि छेदबइत छलाह। अछूतसँ देखला वा छूअल अन्न पैघ वर्णक लोक नहि खाइत छलाह। पान खेबाक प्रथा छल आओर मैथिल लोकनि ताम्‍बुल विन्‍यासमे प्रवीण छलाह। खुरचन डोकाक चून बनइत छल आओर ओहिमे कैक प्रकारक सुगन्धित मशाला सेहो मिलाओल जाइत छल। भीजल कपड़ामे पान लगाकेँ राखल जाइत छल। दाँत रंगबाक हेतु सुरतीक व्‍यवहार होइत छल। टाकाक प्रचलन छल आओर एक पण ७०कौड़ीक बराबर होइत छल। परिशिष्‍ट–९ प्राकृतपैंगलम् आ मैथिली मैथिली भाषा आओर साहित्‍यक स्‍थान भारतीय भाषा मध्‍य महत्‍वपूर्ण छैक। कलकत्ताक मैथिली संघ द्वारा प्रकाशित विद्यापति-पर्व अंकक १९६१क अंकमे हमर एक निबन्‍ध प्रकाशित भेल अछि; प्राक् विद्यापति कालीन मैथिली। जाहिमे हम मैथिलीक प्राचीनतापर अपन विचार संक्षेपमे रखने छी तैं ओकरा एतए दोहराएब उचित नहि बुझना जाइत अछि। मैथिली लिपिक प्राचीनताक सबसँ पैघ प्रमाण इएह जे ‘ललित विस्‍तर’मे एकर उल्‍लेख अछि; आदित्‍यसेन (सातम शताब्‍द)क अभिलेख एहि लिपिमे अछि, धर्मस्वामीन एकर उल्‍लेख वैवर्त लिपिक नामे कएने छथि; ल. स. ६९क एक माटिक मुद्रापर मिथिलाक्षर लिखल भेटल अछि; खोजपुर (दरभंगा)सँ ल. सं. १४७क। एकर अतिरिक्त मिथिलासँ जतेक अभिलेख आओर सिक्‍का लेख भेटल अछि सब मैथिली लिपिमे अछि- तैँ एकर वैज्ञानिक अध्‍ययनक आवश्‍यकता। मित्रवर आचार्य परमानन्‍द शास्त्री मैथिली लिपिक वैज्ञानिक अध्‍ययन मिथिलामिहिरक पृष्‍ठक माध्‍यमसँ प्रस्‍तुत कएने छथि जे स्‍तुत्‍य अछि। अकबरकालीन मिथिलाक्षरक एक अभिलेख एखन हालहिमे गोड्डा (संताल परगना)क एक मन्दिरसँ प्राप्‍त भेल अछि आओर ओकर प्रतिलिपि काशीप्रसाद जायवाल संस्‍थान, पटनामे सुरक्षित अछि। लिपिक संगहि मैथिली भाषा सेहो बड्ड प्रचीन अछि आओर सिद्ध लोकनिक भाषा एकर सबसँ पैघ प्रमारण ि‍थक। तिब्‍बती बौद्धधर्मक प्रसिद्ध रूसी विद्वान वसिलज्‍यु (Wassilijeu) अपन एक लेखमे एकठाम लिखने छथि जे सिद्ध कवि लोकनि अपन-अपन मातृभाषामे गीत लिखने छलाह। साहित्‍य निश्चित रुपेँ ज्‍योतिरीश्‍वरक पूर्वहि एक निश्चित शैलीपर पहुँच चुकल छल अन्यथा लोरिक सन वीरकाव्‍य अथवा वर्णरत्‍नाकर सन् महान् ग्रन्‍थक रचना तँ हठात् नहिए भऽ गेल। डा. जयकान्‍त मिश्रक History of Maithili Literature क प्रथम भागमे बहुतो एहेन विद्वान आओर ग्रंथ अछि जकर उल्लेख नहि भेल अछि आओर जे मूल रूपसँ मैथिलीक अंग थिक। हमरा विश्‍वास अछि जे ओ अपन भविष्‍यक संस्‍करणमे एहि सबहक अपना पोथीमे अवश्‍य स्‍थान देथिन्‍ह। ‘प्राकृत-पैंगलम्’क उल्‍लेख डा. मिश्र कतहु नहि कएने छथि आ ने कृष्‍णदत्त मैथिलक। (कृष्‍णदत्त मैथिलपर देखु हमर लेख जे Journal of the Bihar Research Society मे छपल अछि।) बंगला भाषाक सुप्रसिद्ध विद्वान आओर प्रसिद्ध भाषा विद्वान डा. श्रीकुमार बनर्जी History of Maithili Literature क आलोचना करैत सेहो अइकमीक उल्‍लेख कएने छथि (द्रष्‍टव्‍य Jouranl of the Asiatic Society of Bengal XVI Letters-p. २६९)। प्राकृतपैंगलमक संबन्‍धमे इ स्मरण राखब आवश्‍यक जे एकर भाषा प्राय: ओएह थिक जे विद्यापतिक कीर्तिलता आओर कीर्तिपताकाक भाषा अछि तथा एहि ग्रंथक रचनामे (गीत सभहिक संग्रह पूर्वी भारतमे भेल छल।) महामंत्री चण्डेश्‍वरक प्रशस्तिमे बनाओल दूटा गीत सेहो अछि आओर एकर बनौनि‍हार छलाह चण्डेश्वरक अधीनस्‍थ सामन्‍त ‘हरिब्रह्म’। ‘प्राकृतपैंगलम’मे कतोक शताब्दक भाषाक परिचय भेटइत अछि आओर ओहिमे जतवा जे प्रयोग भेल। अछि से मूलत: मैथिली प्रयोगसँ मिलैत-जुलैत अछि। ‘सिद्धगान’पर जतेक लोक सब माथापच्ची कएने छथि ततवे जँ प्राकृतपैंगलममे एहुखन कएल जाए तँ मैथिलीक बड्ड उपकार होएत। डा. सुभ्रद झा कबीरकेँ मैथिल सिद्ध करबाक बीड़ा तँ उठौलन्हि (देखु Journal of the Bihar University) (हुनक लेख) मुदा ‘प्राकृत-पैंगलम्’ जे शुद्ध मैथिलीक वस्‍तु थिक, ताहिपर कोनो विशिष्‍ट ध्‍यान नहि देलन्हि। एकर प्रमाण एहिसँ बुझना जाइत अछि जे ओ अपन प्रसिद्ध पोथी Formation of Maithili Language मे एहि ग्रन्‍थक बड्ड कम चर्च कएने छथि। डा. सुभद्र झाक पोथीसँ किछु अंश हम पाठकक हेतु उद्धृत् कऽ रहल छी: पृ.41-The Prakritpainglam gives an example to several metres and verses which may be said to have been composed in proto-Maithili..... there is nothing in them that may prevent them being called Maithili of an early period….. पृ.4२-The language of the Charyas Sarvananda, Prakritpainglam, Kirtilata and Kirtipataka represent Maithili of the oldest period in as much as it preserves some of the Apabhramsa characteristics’. पोथीक दाम ततेक छन्हि जे केयो साधारण मै‍थिल पाठक एकरा कीनिकए नहि पढ़ि सकैछ। एतबा कहितो इ प्राकृतपैंगलमपर विशेष ध्‍यान नहि देने छथि। एहि पोथीक आलोचना जे हालहिमे छपल अछि लण्डनमे से उत्‍साहवर्द्धक नहि कहल जा सकैछ। भाषा आओर अन्‍यान्य समस्‍याक अध्‍ययनक हेतु आओर देखू राहूलजीक हिन्‍दी काव्‍य-धारा जाहिमे एहि सभ वस्‍तुक विशद् विश्‍लेषण भेल अछि। ‘प्राकृतपैंगलम’मे मिथिलाक इतिहासक सम्‍बन्‍धी सेहो बहुत सटीक बात सब लिखल अछि (देखू-हमरे लेख- Prakrtapainglam–an important source for the study of the History of Mithila) । ‘प्राकृत-पैंगलम’क दूटा संस्‍करण हमरा बूझल अछि– (i) सी. एम. घोष द्वारा सम्पादित एवं विव्लियोथिका इन्डिका सीरीज, कलकत्तासँ प्रकाशित १९०२ई.मे प्राकृत-पैंगलम् आओर (ii) एम्‍हर हालहिमे हिन्‍दीमे एकर एक संस्‍करण दिल्‍लीसँ प्रकाशित भेल अछि। एहि सम्‍बन्‍धमे हरिवंश कोछड़क ‘अपभ्रंश साहित्‍य’क अध्‍ययन आवश्‍यक बुझना जाइत अछि। ‘प्राकृतपैंगलम्’पर प्रो. एस. एन, घोषालक बहुतो लेख अंग्रेजीमे भारतवर्षक विभिन्न शोधपत्रिकामे प्रकाशित भेल छन्हि। एहिठाम ‘प्राकृतपैंगलम्’सँ हम थोड़ेक ओहन शब्‍दक संचय कएने छी जकर रूप शुद्ध मैथिलीक अछि एहि हेतु जे केओ १४म शताब्‍दक मैथिली शब्‍द देखए चाहथि से डा. उमेश मिश्रक लेख JBORS-XIV पृष्‍ठ २६६-२७३मे देखि सकइत छथि। हम अपन ‘प्राकृत-विद्यापति’ वाला लेखक इ एकटा पद सेहो प्राकृतपैंगलमसँ देने छी जाहिसँ सिद्ध होइछ जे इ मैथिली थिक। स्‍थानाभावक कारण एकर विश्‍लेषण एहिठाम संभव नहि। परिशिष्‍ट–१० मिथिलाक प्राचीन सीमा जनबार श्रोत (i) मिथिलास्‍थ: योगीन्‍द्र: सम्‍यग् ध्‍यात्‍वा ब्रवीन मुनीन्। यस्मिन देशे मृग: कृष्‍णस्तस्मिन् धर्मान् निबोधयत् (याज्ञवल्‍क्‍यस्‍मृति-आचार १२) (ii) डा. उमेश मिश्र द्वारा सम्‍पादित विद्याकरसहस्‍त्रक पृ.१४७मे लिखल अछि: जाता स यत्र सीता सरिदम यत्रपुण्या। यत्रास्‍ते सन्निधाने सुरनगरनदी भैरवौ यत्र लिङ्गम्। मीमांसा-न्‍याय-वेदाध्‍ययन- पटुतरैः पण्डितैपण्डिताया भूदेवो यत्र भूपो यजनवसुमती सास्तिमे तीरभुक्तिः (iii) त्रिकाण्डशेषकोष (a) गण्‍डकी तीरमारभ्‍य चम्‍पारण्‍यान्‍तकं शिवे: विदेहभू: समाख्‍याता तीर-भुक्तमिधो मनुः। (आओर देखु-शक्तिसंगमसूत्र) (b) प्राग्‍ज्‍योतिष: कामरुपे तीरभुक्तिस्‍तु लिच्‍छविः (पृष्‍ठ ५६) (iv) काठकसंहिता- xiii,४- इन्‍द्रो वै वृत्रमहस्‍तं हस्‍तस्‍सप्तभिर्भोगै: पर्यहंस्‍तस्‍य मूर्ध्नो वैदेहीरुदायंस्‍ता: प्राचीरायंस्तस्माताः पुरस्‍य जघन्‍यमृषयं वैदेहमनुद्यान्‍तममन्‍यतेममिदानी मालभेय तेन त्‍वा इतो मुच्‍येयेति (v) वायुपुराण (८८-३०६) मिथिर्नाम महा‍वीर्यो येनासौ मिथिलाऽभवत् (vi) शब्‍दकल्‍पद्रुम-७२३-विदेहा मिथिला प्रोक्ता (vii) लिङ्गपुराण-तीर-भुक्ति प्रदेशे तु हलावत्ते हलेश्‍वर:। (viii) चन्‍दा झा-गंगा बहति जनिक दक्षिण दिसि पूर्व कौशिकी धारा पश्चिम बहति गणडकी उत्तरहिमवत बलविस्‍तारा कमला त्रियुगा अमृता धेमुड़ा वागमती कृतसारा मध्‍य वहत लक्ष्‍मणा प्रभृति से मिथिला विद्यागारा (ix) राजनैतिक इतिहासक पाद टिप्‍पणी मे बहुत किछु लिखल जा चुकल अछि आओर देखू- IHQ -XXXV.No.२. (x) प्रवचनो सारोद्धार आओर विविध तीर्थकल्‍पमे विदेह जनपदक राजधानी मिथिला कहल गेल अछि। एकर सीमा पूर्वसँ पश्चिम १८० मील आओर उत्तरसँ दक्षिण १२५कहल गेल अछि। निरयावलियाओमे मिथिलाक राजधानी वैशाली कहल गेल अछि। प्रेमशंकर सिंह बीसम शताब्दी- मैथिलीक स्वर्ण युग अतीत आ भविष्यक संग सम्बन्ध स्थापित क’ कए साहित्य अपन अस्तिात्वक सत्यताक उद्घोषणा करैछ। विश्व-मानव अत्यन्त उत्सुकतापूर्वक साहित्यक गवाक्षसँ अतीतक गिरिगह्वरक गुफामे प्रवाहित जीवन-धाराक अवलोकन करैछ आ अपन गम्भीरतम उद्देश्यक विविध प्रकारक साधन भूल आ संशोधन द्वारा प्राप्त करैत अपन भावी जीवनकेँ सिंचित होइत देखबाक उत्कट अभिलाषा रखैछ। अतीतक प्रेरणा आ भविष्यक चेतना नहि तँ साहित्य नहि। अतीत, वर्तमान आ भविष्यक कड़ीक अनन्त श्रृंखलाक रूपमे भावक सृष्टि होइत चल जाइछ आ मानव अपन प्रगतिक नियमादि, सिद्धान्तादिकेँ अपन वास्तविक सत्ताक विकासक मंगल कंगन पहिरि कए अपन दुनू हाथसँ आवृत्त कयने रहैछ। विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर (1861-1941) क कथन छनि जे विश्व-मानवक विराट जीवन साहित्य द्वारा आत्मप्रकाश करैछ। एहन साहित्यक आकलनक तात्पर्य काव्यकार एवं गद्यकारक जीवनी, भाषा तथा पाठ सम्बन्धी अध्ययन तथा साहित्यक विविध विधादिक अध्ययन करब मात्र नहि, प्रत्युत ओकर सम्बन्ध संस्कृतिक इतिहाससँ अछि, मानव-मनसँ, सभ्यताक इतिहासमे साहित्य द्वारा सुरक्षित मनसँ अछि। उन्नैसम शताब्दीमे भारतवर्षमे नवजागरणक प्रबल ज्वार उठल। तकर कोनो प्रभाव मिथिलांचलपर नहि पड़ल, कारण मिथिलावासी प्राचीन परम्पराक पृष्ठपोषक रहलाक कारणेँ संस्कृत शिक्षामे लागल रहलाह आ अंग्रेजी शिक्षा तथा पाश्चात्य विचारधाराक महत्वकेँ नहि स्वीकारलनि। नवजागरणक फलस्वरूप षष्ठ दशकमे भारतीय परतन्त्रताक बेड़ीसँ मुक्त होएबाक निमित्त सन् 1857 ई. मे सिपाही विद्रोह कएलक। मिथिलाक नव शासक मैथिलीकेँ कोनो स्थान नहि देलनि। एहि दशकक अन्तिम बेलामे मिथिलाक प्रशासन ‘कोर्ट ऑफ वार्ड्स कँ अधीन ’ चल गेल जकर प्रभाव मिथिलापर पड़लैक।जे एहिठामक निवासीकेँ प्रथमे-प्रथम पश्चिमक स्पर्शानुभूति भेलनि। किन्तु दुर्भाग्य भेलैक ‘ जे कोर्ट ऑफ वार्ड्स’ द्वारा मिथिलाक भाषा मैथिली आ ओकर लिपिकेँ बहिष्कृत क कए ओकरा स्थानापन्न कयलक उर्दू आ फारसी तथा देवनागरी। मिथिलेश महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह (1858-1898)क गद्दीनशीन भेलापर उन्नैसम शताब्दीक अष्टदशकोत्तर कालमे मिथिलावासीक सामाजिक, सांस्कृतिक एवं साहित्यिक जीवनमे नव चेतनाक संचार भेलैक। हुनक चुम्बकीय व्यक्त्तित्व, कृपापूर्ण व्यवहार, विद्या-व्यसन आ असीम देशभक्ति एवं दानशीलताक फलस्वरूप विद्वान साहित्य सर्जककेँ आकृष्ट कएलक। हुनक उत्तराधिकारी मिथिलेश महाराज रमेश्वर सिंह (1898-1929) मेहो उक्त परम्पराकेँ कायम रखलनि। उन्नैसम शताब्दीक अष्टदशकोत्तर कालमे भारतीयमे अभूतपूर्व जनजागरण भेलैक, जकर फलस्वरूप स्वतन्त्रता संग्रामक नव स्फुलिंग जागृत भेल आ ओ सभ स्वतन्त्रताक निमित्त अत्यधिक सचेष्टताक संग सन्नद्ध भेलाह, जकर प्रभाव साहित्य सृजनिहारपर पड़लनि। यद्यपि शताब्दीक अन्तिम वर्ष धरि धार्मिक आ सांस्कृतिक चिन्तन पर रुढ़िवादिताक पुनः प्रकोपक विस्तृत छायासँ बौद्धिक आ साहित्यिक प्रगतिक समक्ष अवसादपूर्ण वातावरणक परिव्याप्त भ’ गेलैक। तथापि मैथिली साहित्य जगतमे उत्कर्ष अनबाक निमित्त अपन परम्परागत परिधानक परित्याग क’ नव प्रवृत्तिक रचनाकारक प्रादुर्भाव भेल जाहिमे मातृभाषानुरागी आ प्रकाशनक सौविध्यसँ साहित्य नव रूप धारण करय लागल जकर नेतृत्व कयलनि कवीश्वर चन्दा झा (1830-1907), कविवर जीवन झा (1848-1912), पण्डित लालदास (1856-1921), परमेश्वर झा (1856-1924), तुलापति सिंह (1859-1914), साहित्यरत्नाकर मुन्शी रघुनन्दन दास (1868-1945), मुकुन्द झा बक्शी (1860-1938), जीवछ मिश्र (1864-1923), चेतनाथ झा (1866-1921), खुद्दी झा (1866-1927), मुरलीधर झा (1868-1929), जनार्दन झा प्रगुजनसीदन गुसर गंगानाथ झा (1872-1941), दीनबन्धु झा (1873-1955), रामचन्द्र मिश्र (1873-1938), बबुआजी मिश्र (1878-1959), गुणवन्तलालदास (1880-1943), कुशेश्वर कुमर (1881-1943), विद्यानन्द ठाकुर (1890-1950), कविशेखर बद्रीनाथ झा (1893-174), पुलकितलालदास (1893-1943), गंगापति सिंह (1894-1969), उमेश मिश्र (1896-1967), धनुषधारीलाल दास (1896-1965), भोलालादास (1897-1977), अमरनाथ झा (1897-1955), राजपण्डित बलदेव मिश्र (1897-1965), कुमार गंगानन्द सिंह (1898-1970), ब्रजमोहन ठाकुर (1899-1970) एवं रासबिहारीलाल दास आदि-आदि जे विविध साहित्यिक विधादिक जन्म देलनि आ एकरा सम्वर्धित करबाक दृढ़ संकल्प कयलनि। वस्तुतः विगत शताब्दी मैथिली साहित्यक हेतु एक क्रान्तिकारी युगक रूपमे प्रस्तुत भेल। अंग्रेजी राज्यक स्थापना देशक साहित्यिक, वैज्ञानिक, राजनैतिक, आर्थिक आ सामाजिक क्षेत्रमे एक नव स्फूर्ति प्रदान कए मिथिलांचलक जीवन-शैली आ सोचक पुनर्संस्कार कयलक। एहि शताब्दीमे आधुनिक शिक्षा, छापाखाना आ सरल यातायातक सुविधाक अभाव रहितहुँ मैथिलीमे साहित्य सृजनक परम्परा वर्त्तमान रहल। बहुतो दिन धरि मैथिली साहित्य संस्कृत साहित्यक प्रतिछाया सदृश रहल। एहिमे साहित्यिक एवं अन्य प्रकारक लेखन निरन्तर होइत रहल। दुइ विश्व युद्धक बीचक कालमे मैथिली साहित्यक सर्वांगीन समुद्धारक चेतना अनलक। एहि कालक लेखनमे ई नव मनोदशा प्रतिफलित भेल आ साहित्यक विभिन्न विधामे उल्लेख्य योग्य परिवर्तन भेल।ह यथार्थतः मैथिली सहित्य अपन परम्परावादी प्रशस्त मार्गक परित्याग क’ कए गद्यक आश्रय ग्रहण क’ नवीन मार्गपर डेग राखि शनैः-शनैः अग्रसर भेल तकर श्रेय आ प्रेय दुनू विगत शताब्दीकेँ छैक जे साहित्य सरिताक प्रवहमान धारा सदृश कलकल छलछल करैत अग्रसर भेल, तकर साक्षी थिक विभिन्न विधादिक साहित्येतिहासक प्रकाशन। एहि स्वर्णिम कालक सहस्राब्दीक सम्पूर्ण साहित्यकेँ स्थूल रूपेँ दू धारामे विभाजित कयल जा सकैछ- काव्य-धारा अ गद्या-धारा। युग संधिक उत्कर्ष बेलामे साहित्यिक गतिविधिक क्षेत्र काव्यसँ बेसी गद्यकेँ प्रधानता भेटल। लोकक ध्यान राजनीति आ सामाजिक सुधार दिस गेलैक आ काव्यक विकासक लेल अनुकूल आराम वा पलखतिक वातावरण आब नहि रहलैक। नवोदित रचनाकारकेँ कविता सदृश विलास-वस्तुक लेल साधन आ समय नहि रहलनि। युग-सन्धिक उत्कर्ष बेलामे उदभूत विभिन्न साहित्यिक विधादि भीतिपर दृष्टिनिक्षेप अकारान्त क्रमसँ कयल जाइत अछि, जे विगत शताब्दी कोन रूपेँ एकरा स्वर्णकाल उद्घोषित करबाक दिशामे अवदान कयलक तकर संक्षिप्त रूपरेखा अपनेक समक्ष प्रस्तुत कयल जा रहल अछि। कविता सकल जीवनकेँ अपनामे समाहित करैत अछि आ मैथिली कविता एकर अपवाद नहि। विगत शताब्दीक मैथिली काव्यधाराक सर्वेक्षणसँ ज्ञात होइछ जे काव्यकार दुइ भागमे विभक्त छथि- किछु तँ परम्परागत रूपक अनुयायी छथि तँ किछु नव प्रयोग कयनिहार मेहो। शताब्दीक सन्धि-बेलामे मैथिली काव्यकेँ पारम्परिक एवं नवीन दुनू रूपमे अभिव्यक्ति भेटलैक। पारम्परिक एवं आधुनिक काव्य जटिल रूपेँ मिझरा गेल अछि। काव्यकार लोकनि लोकप्रिय धुन एवं शैलीपर आधारित गीतक रचनाक सामाजिक, राजनीतिक चेतना जगयबाक प्रयास कयलनि। स्वाधीनताक पश्चात् मैथिली काव्यकेँ आगू बढ़यबामे मैथिली पत्रिकादि महत्वपूर्ण भूमिकाक निर्वाह कयलक। स्वाधीनोत्तर काव्यक प्रवृत्ति सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक स्थितिक कारणेँ आ समाजवादी विचारधाराक प्रसादक कारणेँ प्रगतिशील कहल गेल अनेक काव्यक रचना भेल। चीनी आक्रमण तथा पाकिस्तानक संग भेल युद्धसँ राष्ट्रवादी जोश, एकताक भावना एवं देश-भक्तिक स्फुरण भेल। राष्ट्रीय जागरण एवं वीरताक चित्रण करैत कतोक काव्यक रचना भेल। मैथिली काव्य-धारा भारतीय भाषाक समकालीन प्रवृत्तिसँ मेहो प्रभावित भेल। किछु कवि एहनो दृष्टिगोचर भ’ रहल छथि जनिक रचनामे कोनो विशेष प्रवृत्तिक कारणेँ हुनका फराक कयल जाऽ सकैछ। आलोच्यकालक काव्य-साहित्यकेँ निम्नस्थ वर्गमे विभाजित कयल जा सकैछ: १.महाकाव्य, खण्डकाव्य, प्रबन्ध काव्य। २.पारम्परिक गीति काव्य। ३.मुक्तक काव्य। ४.नव रूप आ नव विषय एवं अन्यान्य जकरा अन्तर्गत पद्यबद्ध कथा, हास्य ओ व्यंग्य, प्रगतिशील, देशप्रेम, देशभक्तिपरक सम्बोधगीत एवं शोक गीत, प्रेम ओ शृंगार तथा नव कविता। विगत शताब्दीक सत्तरिक दशकक मध्यमे किछु युवा कवि नवकविताक रचना करब प्रारम्भ कयलनि। जीवनक प्रति रुचि, मानवीय मूल्य आ वातावरणमे परिवर्त्तन तथा व्यक्तिवादी प्रवृत्ति एहन कविताक प्रमुख स्वर अछि। एहि आन्दोलनक फलस्वरूप काव्य साहित्यमे परिवर्त्तनक स्वर गुंजित होमय लागल जे सम्पूर्ण साहित्यमे दृष्टिगोचर होइछ। विवेच्य शताब्दीमे कविक ध्यान आजुक मानव एवं ओकर बहुविध समस्या तथा ओकर बहुविध तत्‍व दिस विशेष रूपेँ आकृष्ट भेल अछि, तथापि प्राचीन विषय-वस्तु जेना सत्यता, वीरता, प्रेम, पराक्रम आदि तँ आदर्श रूपेँ रहबे करत। एहि प्रकारेँ आधुनिक काव्य-धारा विषय-वस्तुक क्षेत्रमे निस्संदेह समृद्ध भेल अछि, तथा नव-नव काव्य रूपक मेहो स्थापित भेल अछि। अमित्राक्षर वा मुक्तवृत्त तथा अनेक नव-नव लय तथा छन्द-बन्धनक सफल प्रयोग एहि युगक प्रवृत्ति भ’ गेल अछि। छन्दकेँ वर्त्तमान पीढ़ीक कवि पूर्णतः त्यागि देलनि मे एक ध्यानाकर्षक वैलक्षण्य थिक। स्वयं कोनो मौलिक छन्द उदभाषित करबाक एकोगोट प्रयोग नहि देखि पड़ैछ। एहन काव्यकारक संदर्भ, संकेत, उपमा, प्रतीक सभ नव-नव आ पारम्परिक कविताक रसिक लोकनिकेँ काव्योपयुक्त शब्द राशि छलनि तँ ऐंस्ट (ANGST) युगक बहुतो कवि अपन नव शब्द भण्डार बनौलनि। एकर कारण थिक जे कवि लोकनि कृत्रिमताक कोनो खास दर्शन अपनौलनि। नव तूरक कोनो कविक विषयमे ई नहि कहल जा सकैछ, जे आयामिक वा अन्य प्रकारक कोनो खास वादक प्रभाव हुनकापर पड़लनि अछि। तथापि बहुतो दृष्टान्त, सन्दर्भ, संकेत, प्रतीक, मिथकक प्रयोग तथा शब्दावलीमे किछु प्रभाव ताकल जा सकैछ। काव्य-भाषा, बिम्ब आ अलंकारक क्षेत्रमे हुनका सभकेँ नव-नव उदभावना करबाक छनि। गद्य-धारा आधुनिक भारतीय भाषामे गद्य-साहित्यक आविर्भाव भारतीय जीवनमे ओहि मंजिलक द्योतक थिक, जखन मध्ययुगीन वातावरणसँ बहरा क’ वैज्ञानिकताक प्रतीक बनल। हमर समग्र गद्य साहित्य जीवनक परिष्करण आ उत्थानक साहित्य थिक। आइ एकरा माध्यमे हम अन्तर्राष्ट्रीय ज्ञान-विज्ञानक सम्पर्कमे अयलहुँ। मुसलमानी शासन कालमे अरबी-फारसी साहित्यक सम्पर्क भेलासँ गद्य रचनाकेँ प्रोत्साहन नहि भेटि सकल। पूर्व आ पश्चिमक सम्पर्कक फलस्वरूप नवचेतना उत्पन्न भेल, समाज अपन हेरायल शक्तिकेँ जमा क गतिशील भेल, साहित्यमे गद्यक श्रीवृद्धि भेल। अतएव विगत शताब्दी मैथिली गद्यक स्वर्णकाल थिक। आब तेँ ई साहित्यक प्रधान अंग बनि गेल अछि। एहि समयमे मिथिलांचलवासी पश्चिमक एक सजीव आ उन्नत्तिशीलजातिक सम्पर्कमे अयलाह आ ओ जाति अपना संग यूरोपीय औद्योगिक क्रान्तिक पश्चात् सभ्यता ल’ कए आयल। नवीन शिक्षा पद्धति, वैज्ञानिक आविष्करादिक प्रवृत्तिसँ मैथिली साहित्य अछूत नहि रहल। शासन सम्बन्धी आवश्यकता तथा जीवन परिस्थितिक कारणेँ गद्य सदृश नवीन साहित्यक माध्यमक आवश्यकता भेल आ वास्तवमे गद्य द्वारा मैथिलीमे आधुनिकताक बीज वपन भेलैक। वस्तुतः नवयुगमे नव शिक्षा-पद्धतिमे पालित-पोषित शिक्षित समुदायक आविर्भावक कारणेँ मैथिली गद्य-परम्पराक क्रमबद्ध इतिहास विगत शताब्दीसँ उपलब्ध भ’ रहल अछि। नवीनता जँ भेटैत अछि मात्र गद्यक रूपमे।नवीनता एहि अर्थमे जे ई साहित्यक प्रमुख आ स्थायी अंग बनि गेल अछि। गद्यक अटूट परम्परा भेटैछ जे एकर उज्जवल भविष्यक संकेत करैछ। मिथिलांचलमे आधुनिकताक बीजवपन गद्य रचनासँ मानल जयबाक चाही। वास्तवमे गद्यक इतिहास मिथिलांचलक जीवनमे बढ़ैत पाश्चात्य प्रभावक इतिहास कही तँ अनुचित नहि हैत। गद्य-साहित्यक प्रसंगमे ई बात स्मरण रखबाक चाही जे विगत शताब्दीमे अधिकांश उपयोगी आ व्यावहारिक विषयसँ सम्बन्धित रचना भेल। वर्तमान समयमे गद्यमे अनुवाद, आलोचना, इतिहास, उपन्यास, कथा, नाटक-एकांकी, निबन्ध, पत्रिका तथा विविध रूपमे रचित गद्य साहित्यक रचना भ’ रहल, कारण जाहि-जाहि साधन द्वारा गद्यक विकास भेल अछि ओ सभ नवीन आवश्यकताक पूर्तिक लेल व्यावहारिक दृष्टिकोणमे सन्निहित अछि। साहित्यकार सभक द्वारा एकरा सजयबाक आ सँवारक कार्य कयल गेल। मैथिली गद्यक गाथा मिथिलांचलक नवजीवनक प्रभातकालीन चेतना, स्फूर्ति, ग्राहिका शक्ति आ गतिशीलताक आशा भरल गाथा थिक। जाहि दिन गद्यक कोनो प्रथम पृष्ठ प्रेसमे मुद्रित भेल हैत मे दिन निस्सन्देह साहित्यक क्रान्तिक दिन रहल हैत। अनुवाद विगत शताब्दीक चतुर्थ दशकमे मैथिली साहित्यान्तर्गत अनुवादक सूत्रपात भेल। आरम्भिक कालमे ओकर गति मन्थर रहलैक; किन्तु स्वाधीनताक पश्चात् एकर विकासमे गति आयल आ वर्तमान समयमे ई एक अत्यन्त सशक्त विधाक रूपमे प्रतिफलित भेल अछि तथा एकर सर्वोपरि उपलब्धि थिक जे प्रचुर परिमाणमे गद्य आ पद्य प्रकाशमे आयल अछि। एहि प्रकारक साहित्यिक उपलब्धि अतीतमे नहि छल। आधुनिक, प्राचीन भारतीय भाषाक संगहि संग पाश्चात्य भाषा आ साहित्यक सहस्राधिक गद्य-पद्य मैथिली गद्य साहित्यक श्रीवृद्धिमे सहायक भेल अछि। आलोचना साहित्यिक सृजन आ ओकर आलोचनाक धारा समानान्तर चलैछ। प्रत्येक युगक साहित्य एक एहन आलोचनाक उदभवना करैछ जे ओकर अनुरूप होइछ। एहि प्रकारेँ प्रत्येक युगक आलोचना मेहो ओहि युगक रचनाकेँ अनुकूल स्वरूप प्रदान करैछ। वस्तुतः देश आ समाजक परिवर्त्तनशील प्रवृत्ति एक भाग साहित्य निर्माणकेँ दिशा दैछ आ समीक्षा ओकर स्वरूप निर्धारित करैछ। अतएव रचनात्मक साहित्यक इतिहास आ समीक्षाक इतिहासमे धारावाहिकताक समानता रहैछ। मैथिलीमे आलोचनाक उदय विगत शताब्दीमे भेल आ एकर विचित्र स्थिति अछि तथा ई ओकर सभसँ दुर्बल अंग थिक। विवेच्य कालक मैथिली आलोचना विधाक सम्पूर्ण विकास यात्राकेँ दृष्टिमे राखि हम एकर तीन रूप निर्धारित कयल अछि। प्रथम रूप संस्कृत समालोचना सिद्धांत वा निर्णयात्मक अछि। एहि प्रणालीक अनुगमन कयनिहार संस्कृत आचार्य लोकनिक रूप थिक। द्वितीय अछि पाश्चात्य समालोचना सिद्धांत। तृतीय रूप अछि जाहिमे प्राचीन भारतीय आ पाश्चात्य सिद्धान्तक समन्वय कयल गेल अछि। जीवनक नव परिस्थिति एवं नव सामाजिक चेतनाक कारणेँ विशुद्ध भारतीय दृष्टिकोण अपनायब तँ असम्भव थिक। किन्तु दुर्भाग्यवश अन्य दू रूपक कोनो विशिष्ट आ निश्चित परम्परा स्थापित नहि भ’ सकल अछि। साहित्यक उत्कर्षक सन्धि-बेलामे आलोचना शास्त्र विभिन्न मत वादक अजायब घर बनि गेल अछि। ओकर प्रधान आधार वैयक्तिक रुचि-अरुचि अछि ने कि कोनो सिद्धान्तक आधार। एकहि आलोचकक समीक्षामे परस्पर विरोधी बात आ ओकर सुसंगत रूप नहि भेटैछ। वर्तमानमे प्रवणता सभसँ बेसी देखल जाइछ जे भारत एवं पाश्चात्यक विभिन्न विश्वविद्यालयमे मैथिली विषयपर अनुसंधान भेल अछि आ भ रहल अछि, जकर संख्या लगभग तीन सहस्रादिसँ अधिक अछि। किन्तु मैथिली अनुसंधानक जे स्थिति अछि ताहिपर कतिपय प्रश्न चिन्ह लागि गेल अछि। अधिकांशतः अनुसंधान अप्रकाशित अछि। वर्तमान परिप्रेक्ष्यमे ओकर प्रकाशनक प्रयोजन अछि, जाहिसँ यथार्थ स्थितिक रहस्योदघटन भ’ सकय तथा ई विधा अभिवद्धिति भ’ सकय। इतिहास-लेखन: साहित्येतिहासक लेखन तँ ओहि साहित्यक दर्पण समान होइछ जकर अवलोकनहिसँ साहित्यक यथार्थताक परिज्ञान पाठककेँ होइछ। विगत शताब्दीकेँ स्वर्णकाल उदघोषित करबाक आ मातृभाषानुरागी प्रबुद्ध पाठककेँ अपन मातृभाषाक गौरव-गरिमाक आख्यान प्रस्तुत करबाक लेल कतिपय इतिहासकार एकर साहित्यिक परम्पराक पुनराख्यान निमित्त साहित्येतिहासिक ग्रन्थक रचना आ ओकर प्रकाशन कयलनि। किन्तु एहि साहित्येतिहासक ग्रन्थक अवलोकनोपरान्त निराश होमय पड़ैछ, कारण निष्पक्ष भावेँ मैथिलीक वैज्ञानिक पद्धतिक अनुसरण क’ कए अद्यापि इतिहास नहि लिखल गेल अछि जे चिन्तनीय विषय थिक। प्रत्येक इतिहासकार दलगत भावनासँ उत्प्रेरित छथि जाहि कारणेँ  महत्‍वपूर्ण कृतिकारक चरचा पर्यन्त नहि भ’ सकल अछि। एहि सन्दर्भमे हम दुइ इतिहासक चर्चा करब। साहित्य अकादेमीक सत्प्रयाससँ ‘इण्डियन लिटरेचर सिन्स इण्डिपेनडेन्स ’ (1973) प्रकाशित भेल जकेर त्रुटिक विषयमे मिथिला मिहिरक कतोक अंकमे एकर भर्त्सना कयल गेल। युग-संधिक उत्कर्ष बेलामे ‘ए हिस्ट्री ऑफ मोडर्न मैथिली लिटेरेचर’ (2004) प्रकाशमे आयल अछि जकरा कतिपय कारणेँ साहित्य जगतमे विवादास्पद ओ अपूर्ण मेहो अछि जकरा इतिहास कहबामे संकोचक अवबोध होइछ। वर्तमान संदर्भमे प्रयोजन अछि एक एहन साहित्येतिहासक जाहिमे साहित्यिक यथार्थ स्वरूपक उदघाटन हो तथा उपेक्षित लेखक लोकनिक कृतित्वक सम्यक रूपेण उल्लेख प्रवृत्तिक अनुरूप हो। उपन्यास आधुनिक भारतीय भाषा साहित्यक अन्तर्गत उपन्यास लेखनक प्रादुर्भाव पश्चिमक नव सभ्यता आ प्रिंटिंग प्रेसक देन थिक आ मानव जीवनकेँ समग्र रूपसँ देखबाक प्रयास मैथिली उपन्यासान्तर्गत विगत शताब्दीक प्रथम दशकमे भेल। ई.एम.फॉस्टर (1879-) क कथन छनि जे जीवनक गुप्त रहस्यकेँ समग्र रूपसँ अभिव्यक्तिक क्षमता जतेक उपन्यासमे अछि ओतेक अन्य कोनो विधामे नहि। इएह कारण अछि जे विगत शताब्दीमे उपन्यास अपन सीमाक कारणेँ महत्वपूर्ण विधाक रूपमे साहित्यमे प्रवेश पौलक तथा प्रधान साहित्यिक रूप बनि गेल जकरा द्वारा मानव अपन वाह्य एवं आन्तरिक समस्यादिकेँ सोझरयबाक प्रयासमे संलग्न अछि। मिथिलांचलक नव-चेतना, आकांक्षा आ विषमता, राष्ट्रीय संग्रामक विभिन्न मतवाद सामाजिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक विषमता आदिक अभिव्यक्ति मैथिली उपन्यासक प्रमुख रूपेँ मुखरित भेल। विगत शताब्दीक चतुर्थ दशकक आरम्भिक साल मैथिली उपन्यास जगतमे विशेष महत्व रखैत अछि। ‘मिथिला’ (1929) मासिक पत्रमे हरिमोहन झा (1908-1984)क ‘कन्यादान’’ धारावाहिक रूपेँ उपन्यास प्रकाशित होमय लागल। उपन्यास लिखबाक प्रेरणा हुनका जनार्दन झा ‘जनसीदन’’ सँ भेटलनि। स्त्री-शिक्षाक आवश्यकता तथा नव-पुरान सम्बन्धी विचारक संघर्ष देखयबाक लेल एकर रचना कयल गेल छल। पुस्तकाकार प्रकाशित होइतहि ई उपन्यास लोकप्रिय भ’ गेल। सामाजिक जीवनक एतेक व्यापक चित्रण एहिसँ पूर्व नहि भेल छल। सामाजिक कुरीतिक पर्दाफाश होइत देखि क’ रुढ़िवादी तिलमिला गेलाह, किन्तु नवयुवक वृन्द एकर स्वागत कयलनि। एहि उपन्यासक प्रभाव मुख्यतः तीन रूपमे पड़ल- प्रथम समाजक मनोवृत्तिपर, द्वितीय कन्या लोकनिक व्यक्तिगत जीवनपर तथा तृतीय मैथिली लेखक समुदायपर। जतय स्वाधीनतापूर्व मैथिली उपन्यासक संख्याअत्यल्प छल ततय स्वाधीनोत्तर युगक प्रवेश एहि विधामे नव स्पन्दन आनि देलक आ एकर सहस्रमुखी धारा प्रवाहित भेल आ युग-संधिक उत्कर्ष बेलामे अनेक उपन्यासकार प्रादुर्भूत भ’ अपन प्रतिभाक किरण बिखेरि क’ एकरा समुन्नतशील बनौलनि तथा संदर्भमे बना रहल छथि। उपन्यास-लेखनक क्षेत्रमे एक कीर्तिमान स्थापित कयलनि विलक्षण प्रतिभासम्पन्न उपन्यासकार ब्रजकिशोर वर्मा मणिपद्म (1918-1986) जे क्वालिटी आ क्वान्टिटीक दृष्टिएँ डेढ़ दर्जन उपन्यास एहि साहित्यकेँ भेट देलनि जे अद्यापि कोनो उपन्यासकार द्वारा सम्भव नहि भ’ सकल अछि। हिनक एक नवतम् उपन्यास ‘सोना रूपा हीरा ’ प्रकाशनक पथपर अछि। दुइ शताब्दीक संधि बेलामे उपन्यास साहित्यमे नव-नव मार्ग प्रशस्त भेल अछि, जाहिसँ ई एक सशक्त विधाक रूपमे चर्चित-अर्चित भऽ रहल अछि। प्रथम विश्‍व-युद्धक पश्चात् कांग्रेसक नेतृत्वमे राजनीतिक चेतनाक जागरण भेल संगहि सामाजिक आ आर्थिक आन्दोलनक जन्म भेल। उपन्यासकार जमीन्दारीक अत्याचार, दरिद्र किसान, अंग्रेज शासक नीति, नागरिक जीवन, नारी समस्या, समाजमे व्याप्त कुसंस्कार, विवाह प्रथा, शिक्षा आदि अनेक विषयकेँ ल’ कए उपन्यासक निर्माण कयलनि। मिथिलांचलक ग्रामीण जीवनक चित्रणक प्रमुखता आरम्भिक कालमे अवश्य रहलैक, किन्तु आब ओहिमे शहरी मध्यवर्गक मजदूरक जीवनक आर्थिक, राजनैतिक आ मनोवैज्ञानिक समस्याक प्रमुखता भ’ गेल अछि। एहि दृष्टिएँ उपन्यास क्षेत्रमे अनेक प्रयोग भेल अछि तथा पाश्चात्य विचारक प्रभाव साहित्यपर स्पष्ट लक्षित भ’ रहल अछि। अधुनातन समयमे मैथिलीक अनेक आधुनिक जीवनक विसंगति, अनेक जटिल राजनीतिक, आर्थिक आ मनोवैज्ञानिक यथार्थताकेँ ल’ कए अपन कृतिक निर्माण क रहक छथि अ’ शैली आ व्यक्तिवत्क दृष्टिसँ नवीनता उद्भासित क’ रहल छथि। कथा: साहित्यिक विधानमे कथा नवीनतम अछि। मैथिली कथा-साहित्यक इतिहास पूर्णरूपेण बीसम शताब्दीक देन थिक, जकर विकास तृतीय दशकक पूर्व नहि भ’ सकल छल। प्रारम्भमे संस्कृत कथाक रूपान्तरण प्रकाशित भेल। मैथिली कथा-साहित्यकेँ लोकप्रिय बनयबाक श्रेय अछि मैथिलीक पत्रिकादिकेँ। मैथिली कथामे परिवर्त्तनक सूत्रपात होइत अछि विगत शताब्दीक द्वितीय दशकक पश्चात् जा क’। मैथिली कथा साहित्यपर विचार करैत एकरा निम्नस्थ कालखण्डमे विभाजित कयल जा’ सकैछ। 1.  प्रारम्भ युग- 1920 ई.सँ 1935 ई. 2.  प्रगति युग 1936 ई. सँ 1946 ई. 3.  प्रयोग युग 1947 ई.क पश्चात् स्वाधीनता पूर्वमे कतिपय कथाकार साहित्यमे प्रवेश कयलनि, किन्तु हुनक परिपक्व कथा स्वाधीनताक पश्चात् प्रकशमे आयल। देशक स्वाधीन भेलाक पश्चात् मैथिली कथामे तीव् विकास  भेल। मैथिली गल्प-साहित्यक विकासमे पत्रिकादिक योगदान सर्वाधिक रहल अछि। प्रत्येक पत्रिकाक रुझान साधारणतः कथा दिस रहल अछि। अतः नव-नव कथाक रचनाक संगहि-संग नव-नव कथाकारक आविर्भाव अत्यन्त द्रुत गतिएँ भेल। अति आधुनिक कथा-साहित्यमे जाहि नवयुवक कथाकारक अवदान अछि ओ गल्प वाङमयक जे मानदण्ड अछि ओकर सम्यक् परिचय रखैत गल्प रचनामे संलग्न भेलाह। शनैः-शनैः सामाजिक जीवनमे घटित भेनिहार साधारण घटनाकेँ आधार बना क’ कथाक रचना भेल तथा यथार्थवादी आ’ कल्पना प्रसूत कथाक दुइ धारा जकर प्रवर्त्तक हरिमोहन झा एवं वजकिशोर वर्मा ‘मणिपद्म’ कयलनि जाहिमे राजकमल (1929-1967), ललित (1932-1983), मायानन्द (1934), प्रभास कुमार चौधरी (1941-1998) आदि कतिपय कथाकार योगदान छलनि। उपर्युक्त कथाकार लोकनिमे सामाजिक चेतना छलनि आ हुनका सभक कथा-आदर्शपूर्ण संवेदनशीलताक विशेष गुण आ मनोविज्ञानक हल्लुक पुट अछि। परवर्ती कथाकार लोकनि रोमांसपूर्ण कथाक सर्जन कयलनि। युग-संधिक उत्कर्ष बेलाक कथाकार जीवनक कथानक चुनलनि, मध्यवर्गक जीर्ण-जीवनक वर्णन कयलनि, व्यक्तिक मनक विश्लेषण कयलनि, स्त्री-पुरुषक प्रेमक चित्रण कयलनि आ आधुनिक जीवनक मानसिक आ भौतिक विषमताक पार्श्वभूमिपर अपन कथाकेँ आधारित कयलनि। मैथिली कथा साहित्यक क्षेत्र व्यापक भेल तथा मूल्य एवं दृष्टिकोणमे परिवर्त्तनक संग विषय-वस्तुमे अधिक वैविध्य आयल अछि। सत्तरिक दशकमे कथा सभमे यथार्थवादी एवं व्यक्तिवादी स्वर तीख आ सुस्पष्ट भेल। मैथिली कथाक प्रमुख भाग सामाजिक कथा थिक। सामाजिक जीवन एवं विचारधारामे परिवर्त्तनकेँ चित्रित कयनिहार कथाक रचना भेल। सामाजिक संरचना, परिवार एवं व्यक्तिगत जीवनक विभिन्न पक्षमे भ’ रहल परिवर्तनक यथार्थ निष्ठ चित्रण कथाकार लोकनि कयलनि अछि। मैथिलीमे लघु कथा, व्यंग्य कथा, लोक कथा इत्यादि विविध रोचक रचना मेहो भेल अछि। सर्वविध मैथिली कथा साहित्यक सम्वर्द्धक कथाकार लोकनिक सक्रिय सहभागिताक फलस्वरूप ई एक सुविकसित विधाक रूपमे अपन स्थान सुरक्षित क’ लेलक अछि। नाटक-एकांकी: विगत शताब्दी मैथिली नाटक-एकांकीक हेतु एक क्रान्तिकारी युगक रूपमे प्रस्तुत भेल। आधुनिक मैथिली नाट्य जगत जखन अन्धकारमे टापर-टोइया द’ रहल छल तखन युग-पुरुष जीवन झा गद्यक नव-ज्योतिसँ सम्पूर्ण मैथिली नाट्य-साहित्यकेँ आलोकित कयलनि। आधुनिक मैथिली नाटकक जन्म एही शताब्दीमे भेल जकरा प्रवर्तन कयलनि कीर्ति-पुरुष जीवन झा। ई मैथिली गद्यक महान उन्नायक रहथि। ओ गद्यकेँ नवीन स्वरूप प्रदान कयलनि। अपन नाट्यादिक माध्यमे मैथिली गद्यक मंगल द्वारकेँ खोललनि तथा भविष्यक नाटककारकेँ एक नव प्रेरणा देलनि। मैथिलीमे उच्च कोटिक नाट्य-साहित्यक निर्माण कार्य विगत शताब्दीक अनुपम उपहार एहि साहित्यकेँ भेटलैक। विगत शताब्दीक नाटककार जीवनक विभिन्न क्षेत्रसँ सामग्री ग्रहण क’ कए सामाजिक, धार्मिक, विशुद्ध साहित्यिक, पौराणिक आ राष्ट्रीय एवं राजनीतिक नाटकक परम्पराकेँ जन्म देलनि आ भारतीय नवोत्थानकालीन भावनाक प्रचार कयलनि। जीवन झाक पश्चात् मैथिलीक दोसर नाटककार साहित्यरत्नाकर मुंशी रघुनन्दन दास आ पण्डित लालदास आ हुनका सभक पश्चातो नाटकक क्षेत्रमे एहि परम्पराक निर्वाह होइत रहल। देशक आवश्यकतानुसार विगत शताब्दीमे ऐतिहासिक नाटकक रचना भेल। पौराणिक कथाकेँ नव-ढ़ंगे प्रतिपादित कयल जाय लागल। मैथिलीक किछु नाटककार प्रतीकात्मक नाटकक रचना कयलनि, किन्तु ई परम्परा अधिक पुष्ट नहि भ’ सकल। यद्यपि गीति-नाट्यक रचना मेहो विगत शताब्दीमे भेल तथापि मैथिलीमे सुन्दर गीति-नाट्यक रूपमे सोमदेव (1934-) क ‘चरैवेति’ (1982) एक प्रतिमान प्रस्तुत करैछ। विवेच्य कालावधिमे समस्या नाटकक रचना भेल अछि। यूरोपीय प्रभावक अन्तर्गत समस्या नाटकमे बुद्धिवादक आधारपर सामाजिक, व्यक्तिगत तथा जीवनक अन्य क्षेत्रमे व्यर्थक आडम्बर आ वाह्याचार तथा परम्परा पालनक विरोध कयल गेल अछि। किन्तु मैथिलीक समस्या नाटकक बुद्धिवाद ठकिुंत आ ओकर क्षेत्र सीमित अछि, जाहिमे जार्ज बर्नाड शॉ आ हेनरिक इब्सनक तीक्ष्ण दृष्टिक अभाव अछि। ओहुना ई परम्परा मैथिलीमे विकसित नहि भेल आलोच्यकालमे रंगमंचक अभावक कारणेँ एकर प्रगतिमे बाधक सिद्ध भेल अछि। मैथिलीमे एक साधु अभिनयशाला नहि भेलासँ पाठ्य साहित्यक विकासक गति एक विशेष दिशामे झुकि गेल अर्थात् एहन नाटकक निर्माण होइत रहल जे साहित्यिक आनन्दक दृष्टिएँ सुन्दर रचना थिक, किन्तु रंगमंचीय विधानक दृष्टिएँ दोषपूर्ण अछि। विगत शताब्दीक नाट्य-साहित्यपर विवेचन करबाकाल मात्र रंगमंचपर ध्यान नहि देबाक चाही। जँ रंगमंचकेँ नाटकक कसौटी मानि लेल जाए तँ विश्वक अनेक प्रसिद्ध नाटकादिकेँ नाटकक श्रेणीसँ निष्कासित करए पड़त। शैलीक दृष्टिसँ मैथिली नाट्य साहित्य पूर्व आ पश्चिमकेँ ल’ कए चलल छल, किन्तु शनैः-शनैः ओ’ पश्चिमाभिमुख अधिक भ’ गेल अछि आ। भारतीय तत्व नगण्य भेल जा रहल अछि। विगत शताब्दीक चतुर्थ दशकमे साहित्य रत्नाकर मुंशी रघुनन्दन दासकेँ श्रेय आ प्रेय दुनू छनि जे मैथिलीमे एकांकी रचनाक शुभारम्भ कयलनि जे पश्चात् जा क’ एक सबल प्राणवन्त विधाक रूपमे पल्लवित भेल। वर्तमान समयमे एकांकी लिखल जा रहल अछि अवश्य, किन्तु किछु अपवादकेँ छोड़ि क’ एकांकीक वास्तविक कलाक कसौटीपर खरा रहनिहार एकांकीक अनुसंधान करबा-काल निराश होमए पड़ैछ। पृष्ठभूमि, वातावरण आ कार्य व्यापारक अभाव प्रायः सभ एकांकीमे भेटैछ। एकर उद्देश्यक परिधि विस्तृत अछि। ओ सामाजिक, ऐतिहासिक, राष्ट्रीय, मनोवैज्ञानिक, हास्य-व्यंग्यपूर्ण आदि अनेक उद्देश्यकेँ ल’ कए लिखल गेल अछि। वैश्वीकरणक फलस्वरूप आधुनिक जीवनक विडम्बनापर गम्भीर प्रहार करब एकांकीकारक कर्तव्य भ’ गेलनि अछि। रेडियो आ’ टेलीभीजनक कारणेँ नाटकक नवीनतम रूप ध्वनि रूपकमे भेटैछ, जकर टेकनिक एकांकीक टेकनिकसँ भिन्न होइछ। रंगमंचीय कलाक दृष्टिसँ एकांकीक ध्वनि रूपककेँ आघात पहुँचबाक पूर्ण सम्भावना अछि, ओहिना जेना फिल्मक प्रचारसँ नाट्यकलाकेँ क्षति पहुँचल अछि। निबन्ध : भारतीय समाजमे एक नव सांस्कृतिक आ राजनैतिक चेतनाक उदय, पत्रिकाक प्रकाशन, साधारण विषय, सामाजिक आन्दोलनक फलस्वरूप पत्रिकाक संग जाहि साहित्यरूपक जन्मक संगहि ओकर स्वाभाव पत्रकारिताक विशेषताक झलक भेटैछ। विषय वैविध्य, सामाजिक आ राजनैतिक, शैलीक रोचकता आ गांभीर्य, गौरवक अभाव आदि आरम्भिक निबन्धक एहन गुण अछि जे पत्रकारितासँ सम्बद्ध अछि। निबन्ध तँ ज्ञान राशिक संचित कोश थिक। निबन्धकार समाजक भाष्यकार आ आलोचक मेहो होइत छथि। अतएव सामाजिक परिस्थितिक जेहन प्रभाव निबन्धमे देखबामे अबैछ ओ साहित्यक अन्य रूपमे नहि। विवेच्य कालावधिमे निबन्धक विषय जीवनक अनेक क्षेत्रसँ लेल गेल तुच्छसँ तुच्छ तथा गम्भीरसँ गम्भीर विषयपर निबन्ध उपलब्ध होइछ। यद्यपि ओहिमे चिन्तन-मननक गम्भीरताक अभाव अछि तथापि ओकर सामाजिक चेतना व्यापक छल। समयानुकूल विविध विषयपर बिनु कोनो पूर्वाग्रहक स्वच्छन्द भ’ कए निबन्धकार आत्मीयताक संग अपन हृदय पाठकक समक्ष रखलनि। बिनु कोनो संकोचक विदेशी शासक वा शोषककेँ डाँटि-फटकारि सकैत रहथि तँ अपना ओतयक पण्डित मुल्ला आ पुरान शास्त्रकार धरि हुनक कठहुज्जतिपर नीक अधलाह कहलनि। निबन्धकार एक भाग आतुर वा प्रवाह पतित परिवर्त्तनवादी अंग्रेजी सभ्यताक गुलामक खबरि लेलनि तँ दोसर भाग नूतनता भीरु रुढ़िवादीक भर्त्सना कयलनि। विगत शताब्दीमे गद्य शैलीक निर्माण निबन्धकारक वैयक्तिक प्रयासक प्रतिफल थिक। भाषाक दृष्टिएँ तत्कालीन निबन्धकार लोकनिमे सामूहिक भाव – कॉरपोरेट सेन्सक अभाव छल। गद्यक कोनो स्वीकृत रूप नहि भेलाक कारणेँ ओकर भाषा सार्वजनिक रूप नहि प्राप्त क’ सकल। आलोच्य्कालक आरम्भिक निबन्धमे विषय आ’ शैलीक दृष्टिएँ वैविध्य भेटैछ। शनैः-शनैः निबन्धमे पत्रकारिताक स्वच्छन्दता क्षीण होमय लागल। पत्रिकाक संख्या बढ़लाक कारणेँ साप्ताहिक, मासिक एवं त्रैमासिक पत्रक दूरी बढ़ैत गेल आ निबन्धकार शनैः-शनैः शिक्षित आ शिष्ट समाजक समीप अबैत गेलाह। पश्चात् जा’ क गम्भीर विषयपर निबन्ध लिखल जाय लागल जाहिसँ ओकर रूप-रंग गम्भीर भ’ गेलैक। साहित्यिक समालोचनात्मक निबन्धक धारा जतेक पुष्ट भेल ओतेक रचना विषयक नियमानुवर्तिता छोड़ि क’ नव ढ़ंगसँ कम अधिक स्वच्छन्दतापूर्वक शैलीमे निबन्ध नहि लिखल गेल। हरिमोहन झा प्रचुर परिमाणमे प्रधान व्यंग्य निबन्धक रचना कयलनि जकर-विकास युग सन्धिक उत्कर्ष बेलामे भ’ रहल अछि। व्यंग्यक मूल वृत्ति सामाजिक वातावरणक विशिष्ट सन्दर्भमे आलोचना भ’ रहल अछि। एकरा मूलमे नव सामाजिक चेतना आ ओहिसँ उत्पन्न आलोचना वृत्ति प्रखर व्यंग्यक रूप धारण क’ कए एहन निबन्धमे अबैत अछि। एहन निबन्धकार लैंब आ’ लूकसक अपेक्षा, प्रवृत्तिक विचारसँ चेस्टरटन, प्रत्युत स्विफटक अधिक समीप छथि। मैथिली निबन्ध अपन अत्यल्प जीवनकालमे कोन प्रकारेँ विविध रूप-रंगमे विगत शताब्दीसँ विकसित होइत आयल जे आगाँ साहित्यमे विषय-वैविध्य जहिना-जहिना विकसित होइत जायत तहिना-तहिना भावी पीढ़ीक निबन्धकार बढ़ैत जयतह। पठन-पाठनमे स्वीकृति: एकर प्राचीन साहित्यक गौरव-गरिमासँ अवगत भ’ कए विगत शताब्दीक द्वितीय दशकमे आधुनिक भारतक प्राचीनतम कलकत्ता विश्वविद्यालयमे प्रथमे-प्रथम मैथिली भाषा आ साहित्यक एम.ए. स्तर धरि पठन-पाठनक शुभारम्भ कएलनि सर आशुतोष मुखर्जी (1864-1924) आधुनिक भारतीय भाषा विभागक अन्तर्गत। तत्पश्चात् आलोच्य शताब्दीक षष्ठ दशकक पूर्वार्द्धमे पटना विश्वविद्यालयक संगहि संग बिहारक अन्यान्य विश्वविद्यालयमे मेहो एकर पठन-पाठनक व्यवस्था भेलैक। शिक्षण संस्थानमे मैथिलीक मान्यता भेटलाक पश्चात् साहित्यकार लोकनिक दायित्व बढ़लनि जे एहि निमित्त तदनुरूप पाठ्य-ग्रन्थक निर्माणार्थ ओ सभ सक्रिय भेलाह आ सहित्यान्तर्गत नव स्पन्दनक प्रादुर्भाव भेल। पत्रिका: पुनर्जागरणक एहि प्रवृत्तिक मैथिलीक सचेष्ट मनीषी तपः सपूत संघर्षरत भ’ साहित्यक नव निर्माणक दिशामे उन्मुख भेलाह। एहिमे सन्देह नहि जे प्रगतिशील आ सामान्य पूर्वाग्रह मुक्त शिक्षित समाजकेँ वाणी देबाक निमित्त प्रवासी मातृभाषानुरागी लोकनिक सत्प्रयाससँ जयपुरसँ ‘मैथिल हितसाधन ’ (1905) तथा काशीसँ ‘मिथिला मोद ’ (1906) क प्रकाशनक शुभारम्भ भेलैक, जकरा एक क्रान्तिकारी डेग कहल जा सकैछ, जे गद्य साहित्यक गतिविधिसँ पाठककेँ परिचय करौलनि। एकरा माध्यमे सामयिक साहित्यिक परम्पराक अध्ययन, चिन्तन आ मननक क्रम स्वाभाविक आ वांछनीय नहि, प्रत्युत भविष्यक हेतु मार्ग निर्देश करबाक, रुढ़ि आ विश्वास, शास्त्रीय मान्यतादिक मूल्यांकन करबाक, युगक नवीन आवश्यकता आ परखबाक दृष्टिएँ अत्यावश्यक छ्ल। एहि दृष्टिएँ साहित्य निर्माता आ अध्येता एक दोसराक समीप आबि गेलाह आ कोनो ठोस वस्तु प्राप्ति करबाक प्रशस्त मार्गक निर्माण कयलनि। एक नव शक्ति उदआषित भेल, पर्युषितक स्थान अपर्युषितक जन्म भेल। एकर जोरदार प्रभाव पड़लैक मिथिलांचलक मैथिल समुदायपर जे ओ सभ एहिसँ अनुप्राणित भ दरभंगासँ ‘मिथिला मिहिर ’ (1909-) क प्रकाशनक शुभारम्भ कयलनि जे विगत शताब्दीक नवम दशक धरि अनवरत चलैत रहल जे पाठकक संगहि लेखक वर्गक सबल दल तैयार कयलक आ ओकर नवीनतम अंक देखबाक निमित्त जहिना पाठकमे उत्सुकता रहैत छलनि तहिना लेखक लोकनि मे मेहो औत्सुक्य रहैत छलनि जे हुनक कोन रचना प्रकाशित भेल अछि। मैथिली पत्रकारिताक दोसर चरणक प्रारम्भ प्रथम विश्वयुद्ध (1914-1918) क पश्चात् प्रारम्भ भेल। एहि समयमे सामाजिक, बौद्धिक आ औद्योगिक विकासक रचनात्मक कार्यक्रम हेतु मेधावी जनशक्तिक लोप भ’ गेलैक। विश्व-युद्धक समाप्तिक पश्चात् लोकक मोह भंग भ’ गेलैक जे विदेशी आधिपत्यक चापसँ किछु आशा क’ रहल रहथि। एहि निराशासँ 1920 ई. मे राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी द्वारा समाज सुधार आ असहयोग आन्दोलनक शुभारम्भ मिथिलांचलक चम्पारनसँ भेल। एहि आन्दोलनक हेतु परिस्थिति अनुकूल भेल अपन किछु गम्भीर मन, देशी लोकक विपरीत एहि आन्दोलनक स्वागत सोत्साह कयलनि आ मैथिली पत्रिका आलोच्य कालक तृतीय दशाब्दमे प्रकाशनक पथपर अग्रसर भेल। मैथिली पत्रिकाक तेसर चरणक शुभारम्भ आलोच्य शताब्दीक चतुर्थ दशकमे गवर्नमेट ऑफ इण्डिया एक्ट (1935) द्वारा देशमे संवैधानिक परिवर्त्तनसँ भेल। एहि समयक अवसान बेलामे द्वितीय विश्व-युद्ध (1939-1945) प्रारम्भ भेलैक तथा कतिपय नव-नव पत्रिका साहित्य जगतमे प्रवेश कयलक। विगत शताब्दीक षष्ठ दशकमे अनेक पत्रिका प्रकाशित भेल जाहिमे वैदेही (1950) एवं मिथिला दर्शन (1953) मैथिली साहित्यक नव-निर्माण अहम् भूमिकाक निर्माणे नहि कएलक प्रत्युत रचनाकारक संगहि पाठक वर्गक निर्माण कयलक। युग-सन्धिक उत्कर्ष बेलामे गोट बीमेक पत्रिका चलि रहल अछि जाहिमे कोलकातासँ प्रकाशित कर्णामृत विगत 26 वर्षसँ अनवरत चलि रहल अछि, किन्तु शेष पत्रिकादि कखन काल क्‍वलित भ’ जायत ओ तँ भविष्यपर निर्भर करैछ। प्रकाशन: विगत एवं वर्तमान सहस्राब्दी मैथिलीक जे उत्कर्ष जनमानसक समक्ष प्रस्तुत अछि तकर ज्वलन्त साक्षी थिक जे साहित्य निर्माताक संगहि-संग प्रकाशनक सौविध्यक फलस्वरूप मैथिली साहित्यमे विपुल परिमाणमे गद्य-पद्य साहित्यक प्रकाशन भेल अछि, तकर श्रेय आ प्रेय मैथिली अकादमी आ साहित्य अकादेमीकेँ छैक। मैथिली अकादमी द्वारा विविध विधादिक स्तरीय ग्रंथ अद्यापि लगभग अढ़ाय सय तथा साहित्य अकादेमी द्वारा डेढ़ सय ग्रन्थक प्रकाशन भ’ सकल अछि। एहि दृष्टिसँ कोलकाताक प्रवासी संस्थादिकेँ छैक जे ओतएसँ विविध-विधादिक सहस्राधिक मौलिक अनूदित पुस्तकक प्रकाशन संभव भ’ सकल अछि जे एक प्रतिमान प्रस्तुत करैछ। एहि दिशामे चेतना समिति अर्द्ध शतकसँ बेशी पुस्तकक प्रकाशन कयलक अछि जे उल्लेख्य योग्य अछि। वर्त्तमान परिप्रेक्ष्यमे प्रयोजन अछि जे अन्यान्य संस्थादि जे पुस्तक प्रकाशनमे सक्रिय अछि तकर सिलसिलेवार ढ़ंगसँ पुस्तक-प्रकाशनमे सहयोग देथि। एहिसँ अतिरिक्त कतिपय साहित्यिक संस्था तथा लेखक लोकनि अपन रुचिक अनुकूल साहित्यिक प्रकाशन क’ कए एकरा सम्वर्दि्धत करबाक दिशामे संलग्न छथि जे एहि साहित्यक रीढ़केँ सुदृढ़ कयलक अछि। युग-सन्धिक उत्कर्ष बेलामे जेना पुस्तक प्रकाशनक बाढ़ि आबि गेल अछि। महिला साहित्यकारक प्रादुर्भाव: स्वातन्त्र्योत्तर साहित्यान्तर्गत जनजागरणक जे मन्त्र फूकल गेल तकर महिला साहित्यकारपर अत्यन्त तीव्र प्रभाव पड़ल। विगत शताब्दीमे पुरुष लेखकक समानहि महिला लेखक प्रचुर परिमाणमे साहित्यक प्रत्येक विधामे अपन उपस्थिति दर्ज करौलनि जकरा नहि अस्वीकारल जा सकैछ। शताब्दीक सन्धि-बेलामे महिला साहित्यकारक कृतित्वक अवगाहनोपरान्त स्पष्ट प्रतिभाषित होइत अछि, जे हुनकामे साहित्य-साधनाक अपरिमित सम्भावना छनि। हुनका सभक रचनाक क्षमता एवं गुणवत्ता दुनू दृष्टिएँ उल्लेखनीय अछि। साहित्यक क्षेत्रमे मिथिलांचलक नारी समाजक जागरण विगत शताब्दीक अर्द्धशतकक पश्चात् भेल जे सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि थिक। महिलामे साहित्यिक अभिरुचि जगयबाक श्रेय छैक मैथिली पत्रिकादिकेँ जकर कतिपय उदाहरण अछि। साहित्यक कोनो एहन विधा बाकी नहि अछि जाहिमे ई लोकनि अपन हस्ताक्षर नहि कयलनि। हमरा दृष्टिएँ हुनका सभमे साहित्य-साधनाक अपरिमित सम्भावना युग-सन्धिक उत्कर्षमे स्पष्ट परिलक्षित भ’ रहल अछि। विविध गद्य: युग सन्धिक उत्कर्ष बेलामे मैथिलीमे आत्मकथा, जीवनी, यात्रा, संस्मरण, साक्षात्कार आ परिचर्चा विषयपर साहित्य पाठकक समक्ष आयल अछि। विभिन्न पत्रिकादिमे समय-समयपर एहन रचनादि अवश्य प्रकाशित भेल अछि, किन्तु ओ सभ प्रकाशनाभावक कारणेँ धूल-धूसरित भ’ रहल अछि। वर्तमान शताब्दीक प्रथम दशाब्दमे ब्रजकिशोर वर्मा ‘मणिपद्म ’ क एक अनमोल संस्मरण प्रकाशमे आयल अछि, ‘हुनकासँ ’ भेट भेल छल (2004) जकर सम्पादन कयलनि प्रेमशंकर सिंह एवं इन्द्रमोहनलाल दास, जे अत्यधिक चर्चित-अर्चित भेल अछि। एकरा माध्यमे मिथिलाक अनेक कीर्तिपुरुषक व्यक्तित्व ओ कृतित्वक संगहि मिथिलाक सांस्कृतिक चेतना तथा गौरवमय परम्पराक चित्रण क’ मैथिली पाठककेँ अनुप्राणित कयलनि अछि। संस्थादिक सक्रिय सहभागिता: मैथिली साहित्यक उत्कर्ष बेलामे विगत शताब्दीमे मातृभाषानुरागी लोकनिक सक्रिय सहभागिताक फलस्वरूप मैथिली भाषा आ साहित्यक उन्नयनार्थ भारतक विभिन्न क्षेत्रमे यथा- मैथिल महासभा (1910), मैथिल छात्र सम्मेलन (1910), मैथिली क्ल्ब (1918), मैथिल शिक्षित समाज (1919), मैथिल सम्मेलन (1923), मैथिल युवक संघ (1930), मैथिली साहित्य परिषद (1930), मिथिला लोक संघ (1947), अखिल भारतीय मैथिली साहित्य समिति (1950), चेतना समिति (1954), कर्णगोष्ठी (1974) आदि-आदि साहित्यिक संस्थादिक प्रादुर्भूत भेल जे योजना वद्ध रूपेँ मनसा -वाचा-कर्मणा दत्तचित्त भ’ कार्यरत भेल, जकर फलस्वरूप एकर विकासक अवरुद्ध मार्ग शनैः-शनैः प्रशस्त होइत गेल। सन् 1947 ई.मे विश्व लेखक सम्मेलन पी.ई.एन.मे, 1960 ई. मे इलाहाबादमे एवं 1963 ई. मे दिल्लीमे पुस्तक प्रदर्शनीक फलस्वरूप 1965 ई. मे साहित्य अकादेमीमे आ वर्तमान शताब्दीमे भारतीय संविधानमे एहि भाषा आऽ साहित्यकेँ अष्टम अनुसूचीमे एक प्राचीन भाषाक रूपमे मान्यता भेटलाक तत्पश्चात् एकर विकासक गति तीवातर होइत गेल। वर्तमान परिप्रेक्ष्यमे प्रयोजन अछि जे समग्र संस्थादिक सिलसिलेवार ढ़गसँ अनुसंधान क’ कए तथ्योपलब्ध ऐतिहासिक वृत्तिक लेखा-जोखा प्रस्तुत कयल जाय जे भावी पीढ़ीकेँ ई दिशा निर्देश करत। एहि प्रकारक संस्थादिक संख्या बड़ विशाल अछि तेँ ऐतिहासिक वृत्तिक लेखा-जोखा करब आवश्यक अछि। निःसारण: युग-सन्धिक उत्कर्ष बेलामे बीसम शताब्दीकेँ स्वर्णिम काल उद्घोषित करबाक-पाछाँ कतिपय आर्थिक, ऐतिहासिक, धार्मिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक आ सामाजिक तत्वक परिप्रेक्ष्यमे मैथिली साहित्यक उन्नयनार्थ जे क्रिया-कलाप भेल तकर वास्तविक रूपेँ विवरण प्रस्तुत करब एक दुर्वह कार्य थिक तथापि साहित्यिक गवाक्षसँ उल्लेख योग्य परिस्थिति एवं परिवेशमे एकरा स्वर्णिम काल उदघोषित करबाक उपक्रम कयल गेल अछि। विगत शताब्दीक मैथिली साहित्य जाहि सजीवता, प्रतिभा आ विभिन्न विचारादर्श आ गतिविधिक परिचय दैत अछि ओकर जड़िमे जाहि प्रकारेँ उन्नैसम शताब्दीक उत्तरार्धमे जमल ओहिना बीसम शताब्दीक उत्तरार्धक बौद्धिक क्रियाशीलताक पूर्वाभास हमरा भेटैछ। वर्तमान परिप्रेक्ष्यमे ई श्रेय आ प्रेय बीसम शताब्दीकेँ छैक जे आलोच्य कालक सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि थिक गद्य-साहित्य। जतय एक भाग परम्परागत मैथिली साहित्य अपन बन्धनमे बरोबरि बन्हने रहल आ अपनाकेँ मेटबैत रहल ओतय निश्चये अभूतपूर्व आ निस्सन्देह गद्यक रूपमे प्रतिष्ठित भेल। आलोच्य कालीन गद्य मैथिली साहित्यमे एक नव युगक अवतरण कयलक। साहित्येतिहासमे क्रमबद्ध परम्परा एहि शताब्दीक महत्वपूर्ण अवदान थिक जे अपन भविष्यक प्रति आशाक सम्बल लेने साहित्यमे प्रवेश कयलक आ ओकर शब्दकोशमे आश्चर्यजनक वृद्धि भेलैक। वस्तुतः आलोच्य शताब्दी गद्य-युग थिक जे अवतारणा आलोच्यकालीन गद्य थिक। युगसन्धिक उन्मेषबेलामे गद्य जगतक संगहि संग काव्य जगतक अभूतपूर्व समागम एहि कालावधिमे भेल जे मैथिली साहित्यान्तर्गत कतिपय नव-नव विधादिक जन्म भेलैक, ओकर संस्कार भेलैक आ ओकर प्रचार-प्रसार द्रुतगतिएँ भेलैक आ भ’ रहल अछि जे वर्तमान सन्दर्भमे ओ साहित्यक सर्वाधिक प्रमुख अंग बनि क’ अपन अस्तित्वकेँ सुरक्षित कयलक आ लोकप्रिय भ’ गेल अछि। वर्तमानमे साहित्यक कोनो एहन विधा नहि अछि जाहिमे तिल-तिल नूतनताक संचार नहि भ’ रहल हो आ साहित्य नव स्पंदनसँ भरि गेल अछि। वर्त्तमान समयमे हमरा लोकनि अपन मातृभाषाक अत्यन्त समीपमे छी आ एहिमे कतिपय उलझन आ सन्देहपूर्ण स्थल अछि। तथापि निस्सन्देह कहल जा सकैछ जे मैथिली जीवनक सहस्राब्दीक कालावधि मानसिक उथल-पुथल आ बौद्धिक क्रान्तिक संधि-स्थल थिक। विविध-धारा अन्तर्धाराक बीच वर्तमानमे हम मैथिली साहित्यक संधि स्थलपर स्थिर भ’ नवयुगक आशा भरल प्रतीक्षा क’ रहल छी। गेटेक कथन छनि ‘वी बिड यू होप-‘ इतिहास हमरा एहिसँ नीक संदेश नहि द’ सकैछ। सामाजिक विवर्त्तक जीवन झा उनैसम शताब्दीक पंचम दशकमे आधुनिक मैथिली साहित्यक क्षितिजपर एक प्रतिभासम्पन्न साहित्य मनीषीक आविर्भाव भेल जे अपन नवोन्मेषशालिनी प्रतिभाक प्रसादात परिप्रदीत्पि प्रकाश पुञ्जसँ बीसम शताब्दीक प्रथम दशक धरि अबैत-अबैत मैथिली नाट्य-साहित्यक पूर्ववर्त्ती परम्परामे क्रान्तिकारी परिवर्त्तन आनि, परवत्ती युगक नाट्यकार लोकनिक हेतु एक उन्मेष, नमोन्मेषक नेतृत्व नवीन नाट्य गद्यक जनक, प्रगतिशील विचारक, संवेदनशील मनोवृत्ति, कल्पनाशील मस्तिष्क, सरस रोमांचक अनुभूति एवं मैथिल समाजमे परिव्याप्त समस्याक प्रति अतिसाकांक्ष भ’ समाजकेँ दिशा-निर्देश करबाक स्तुत्य प्रयास कयलनि, ओ रहथि शलाका पुरुष कविवर जीवन झा (1848-1912)। राजदरबारसँ सम्पोषित रहितहुँ ओ जन-जनमे चेतनाक दीप जरौलनि, कण-कणमे उत्साह पसारलनि आ क्षण-क्षणमे सर्जनाक दिशा निर्दिष्ट कयलनि। युगपुरुष जीवन झाक समसामयिक समाज आ साहित्य बौद्धिक उत्तेजनाक लहरिसँ गुजरि रहल छल। राजनीति, समाजनीति, अर्थनीति, धर्मनीति, संस्कृति, संगीत, नाटक एवं चित्रकारीपर वैज्ञानिक प्रभावक फलस्वरूप परिर्द्धन, परिवर्त्तन, परिमार्जन प्रारम्भ भ’ गेल छलैक। शिक्षाक नवज्योतिक फलस्वरूप सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आर्थिक चेतनाक उदय भेल, जकर स्वाभाविक अभिव्यक्ति हिनक नाटकादिक प्रमुख केन्द्र विन्दु थिक। ओ एक दूरदर्शी साहित्य चिन्तक सदृश आशा-निराशाक मिलन-विन्दुपर जनमानसकेँ देखलनि। ओ नैराश्यक अन्धकारमे आशाक दीप जरौलनि। युगीन परम्पराकेँ नीक जकाँ चिन्हलनि तथा युगानुभूति एवं कालक सत्यताक कोनो स्थितिकेँ अभिव्यक्त करबाक शक्तिकेँ दमित नहि क’ पौलनि। सामाजिक वातावरणक विशिष्ट सन्दर्भमे सामाजिक विषमताक हुँकार, तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक स्थितिक उपस्थापनमे अक्षर पुरुष प्रमाणित भेलाह। सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक दृष्टिसँ जखन हम हिनक नाटकादिक परीक्षण-निरीक्षण करैत छी, तखन हम ओकरा समसामयिक सामाजिक स्थितिक दर्पण, सांस्कृतिक वैभवक धरोहरि आ आर्थिक विपन्नतासँ संत्रस्त समाजक यथार्थ एलबम कहि सकैत छी। ई सर्वविदित सत्य थिक जे ओहि कृतिकारक कृतित्व अक्षय रहैछ, जे सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आर्थिक जीवनक वास्तविक प्रतिनिधित्व करैछ, जनिका हृदयमे उपर्युक्तक प्रति पूर्ण आस्था रहैछ तथा ओकर अधःपतनकेँ जन मानसक समक्ष रेखांकित क’ सचेष्ट हेबाक प्रेरणा दैछ, कारण साहित्य तँ हमर जीवनानुभूतिकेँ प्रतिविम्बित करैछ। युगपुरुष जीवन झाक नाटकादिक प्रेरणास्रोत थिक नवीन जागरणक ज्योति। अपन सजग आँखिएँ ओ देश-देशान्तरक विकासोन्मुख गतिविधिपर दृष्टि निक्षेप कयलनि, एहि विषयक अनुभव कयलनि जे मैथिल समाजमे नवजागरणक अभाव अछि। ई अपन नाटकक कथानकक चयनक निमित्त मिथिलाक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक स्थिति दिस दृकपात कयलनि तथा अपन युगक वास्तविक समसामयिक स्थितिक रूपायन ओहिमे कयलनि। संस्कृत पण्डित रहितहुँ जीवन झा आधुनिकताक पूर्णपक्षपाती अपन कृतित्वमे दृष्टिगत होइत छथि। मिथिलांचलमे परिव्याप्त वैवाहिक समस्या छल तकरा केन्द्र-बिन्दु बनाय सामाजिक वातावरणक विशिष्ट सन्दर्भमे देशन्नितिक निमित्त नाटकक माध्यमे जन-आन्दोलनक प्रेरणा देलनि, कारण मिथिलामोद ओ मैथिल महासभाक आविर्भावसँ पूर्वहि ई अपन नाट्यकृतिमे ओकर समाधानार्थ विचार प्रस्तुत कयलनि। मैथिल समाजमे तिलक-दहेज, जाति-पाँजिक नामपर कन्यापर होइत अत्याचार एवं अन्याय एवं अन्य सामाजिक कुप्रथापर प्रत्यक्ष वा परोक्ष रूपेँ अपन आलोचनात्मक दृष्टिकोण जनसामान्यक समक्ष प्रस्तुत कयलनि। सामाजिक पृष्ठभूमिकेँ आधार बनाय ई मैथिलीमे नाट्य-लेखनक शुभारम्भ कयलनि। हिनक तीन सम्पूर्ण नाटक सुन्दर संयोग (1904), सामवती पुनर्जन्म, नर्मदा सागर सट्टक एवं खण्डित मैथिली सट्टक समकालीन सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक परिस्थितिक उद्देश्य निर्धारणमे सहायक होइछ। वस्तुतः हिनक नाटकादिमे मैथिल समाजक विश्वास एवं संस्कारक प्रतिबिम्ब भेटैछ, जकरा माध्यमे ओ उच्च जीवनक प्रतिष्ठाक आकांक्षी भेलाह। हिनक सम्पूर्ण नाट्य-साहित्यमे व्याप्त सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक स्तरक सन्निवेशक कारणेँ मिथिलांचलक वातावरणमे परिव्याप्त अछि। विवाहक चौमुखी समस्यापर आधारित वासना, प्रेम, मिलन आ विछोह यद्यपि हिनक नाटकक केन्द्र-बिन्दु थिक, जकर समाजशास्त्रीय एवं भाषाशास्त्रीय अध्ययन अपेक्षणीय अछि। सामाजिक वातावरणक विशिष्ट सन्दर्भमे मैथिल सामाजिक जीवनक अधिकाधिक प्रामाणिक रूप सुन्दर संयोग एवं नर्मदा सागर सट्टक मे प्रस्तुत करबामे ओ सफलता प्राप्त कयलनि। हिनक नाटकादि मात्र मनोरंजनक हेतु नहि, प्रत्युत जीवनक गम्भीर समस्याक समाधान करबाक उद्देश्यसँ उत्प्रेरित भ’ रचना कयलनि। एकर नायक-नायिका मिथिलांचलक परम्परागत कुलीन प्रथाक रूप प्रदर्शित करैछ। यद्यपि ‘सामवती पुनर्जन्म’ क कथानक पौराणिक पृष्ठभूमिपर आधारित अछि, तथापि ओकर प्रत्येक पात्र समसामयिक समाज, संस्कृति एवं आर्थिक पृष्ठभूमिमे उतारल गेल अछि। ‘सुन्दर संयोग’ मे नाट्यकार समाजक ओहि मानसिक स्थितिक विश्लेषण कयलनि अछि, जे जाति-पाँजि, कुलीनता, बिकौआ प्रथापर प्रचलित बहु-विवाह आ पत्नी-परित्यागक सन विकृतिसँ उत्पन्न होइत छल। तथाकथित कुलीनजन अनेक बियाह करैत रहथि आ पत्नीकेँ नैहरमे छोड़ि दैत रहथि। भलमानुसक पत्नीक जीवन गति इएह छलैक। विवाह क कए जाथि आ’ जीवन भरि वापस नहि आबथि। दाम्पत्य सुख एहन कन्याक निमित्त जीवन भरि अननभूत सत्य बनल रहि जाइत छलैक। ओ ने तँ कुमारिए रहैत छल आ वास्तवमे सधवे। सधवा रहितो वैधव्य-वेदना सहैत रहैत छल। एहन स्थितिक चित्रण निम्नस्थ पंक्तिमे व्यि‍ञ्जत भेल अछि: सीमन्तक सिन्दूरक रेखासँ छी हम धनमन्ती। हाथक दू लहठीसँ होइछ सधवामे नित गनती। मिथिलांचलमे कुलीनताक बलपर प्रतिवर्ष विवाह करब सामान्य बात छल। समाजमे एहन परम्परा प्रचलित छलैक जे एक ठाम विवाह आ चतुर्थी सम्पन्न क’ कए दोसर ठाम पुनः विवाह करैत छलाह। कुलीन व्यक्ति विवाहोपरान्त पलटि क’ जयबाक प्रयोजन नहि बुझैत रहथि। समयक क्रममे अपन पत्नीक आकृति आ सासुरक लोककेँ बिसरि जाथि। अत्यल्प परिचयक कारणेँ सर-कुटुम्बकेँ नहि चिन्हब तँ सर्वथा स्वाभाविक। एहन विषम स्थितिमे कन्याक माता-पिता, समाज आ कन्याकेँ केहन मानसिक यातना होइत छलैक, निराशा आ विषादसँ आछन्न मनःस्थितिमे कोना जीवन-यापन करैत छल मे स्वतः कल्पनातीत छल। कोनो सौभाग्यशालिनी कन्याकेँ पुनः दाम्पत्य जीवन प्राप्त होयतैक, कतेक उल्लास होयतैक, केहन हर्ष होयतैक, ओहो काल्पनिक अछि। मिथिलांचलमे प्रचलित कन्यादानी शब्द ओही परिणीता; किन्तु परित्यक्ता नारीक यातनामय इतिहासकेँ अपनामे समेटने अछि। युगपुरुष जीवन झाक समसामयिक सामाजिक वातावरणमे परम्परा परिव्याप्त छल। सामाजिक जीवन मे ई प्रतिष्ठाक विषय छल। नाटककार एहि सामाजिक परिस्थितिसँ पूर्ण अवगत रहथि। एकर दुष्प्रभावकेँ ओ अनुभव कयने रहथि। समाजक ओहि परिवेशमे कन्यापक्षक मानसिक अन्तर्द्वन्दकेँ ओ सुन्दर संयोगमे अभिव्यक्त कयलनि। समाजक समक्ष ओ सुन्दर मिश्र सदृश आदर्श पुरुषक रूपमे प्रस्तुत कयलनि। सुन्दर मिश्र अपन सासुरक प्रत्येक व्यक्ति, अपन पत्नीकेँ तखने चिन्ह जाइत छथि, जखन हरदत्त पण्डा हुनक ससुरक पूर्व पुरखाक नाम गाम बाँचैत छथि। ओ चतुर्थी दिन पत्नीक अस्वस्थताक कारणेँ सासुर छोड़ि देने रहथि। ओ अपन पत्नी पर्यन्तकेँ नहि चिन्ह पौने रहथि। इएह स्थिति तँ सरलाक ओकर माय, ओकर परिवार, ओकर सखी-बहिनपा ओ समाजक छलैक। किन्तु सभक मन मे आशाक किरण छलैक जे भलमानुस सुन्दर मिश्र विवाह क’ कए चल गेलाह तँ आने बिकौआ वर जकाँ नहि जे आबथि। एहि मानसिकताक अभिव्यक्ति सरस्वतीक कथन मे अभिव्यक्त भेल अछि। जखन ओ वैद्यनाथकेँ प्रार्थना करैत छथि; ‘हे वैद्यनाथ! जे जे कबुला कैल सभ मनोरथ पुरल, आब जमाइकेँ कुशल पूर्वक देखी मे वरदान दिअ ’ (सुन्दर संयोग, पृष्ठ 12)। सरस्वतीक मनोभाव अत्यधिक पल्लवित भेल अछि, जखन ओ अनचीन्हेमे (अपन जमाय) सुन्दर मिश्रकेँ कहैत छथिन, हेँ बाबू! बड़ पुण्य रहैत तँ एकर ई वयस भेलैक जमाय चुतुर्थि अहिक दिन एकरा दुखित छोड़िकेँ जे गेलाह मे आइ धरि उदेशो ने पबै छिऐन्ह! (सुन्दर संयोग, पृष्ठ-14)। जखन पण्डाइन संकेत करैत छथिन जे पण्डित बाबू सरलाक वर थिकथिन तखन हुनक निराशा व्यक्त होइत छनि, ‘एहन भाग गहमर कहाँ जे जमायकेँ देखब परन्तु वैद्यनाथ बड़ गोट थिकाह।’ (सुन्दर-संयोग, पृष्ठ-19) सरलाक मनोव्यथा तावत धरि अव्यक्त रहैछ जावत धरि ओकरा संकेत नहि भेटैछ जे पण्डित बाबू सम्भवतः ओकरे वर थिकथिन। तत्पश्चात् ओकर विरह व्यथाक अभिव्यक्ति भेल अछि। मुदा ओ सामान्य विरह नहि थिक। सरलाक कथन गद्य आ गीतमे सामाजिक परिवेश-जन्य विषाद बजैत अछि, हे वैद्यनाथ! ऐ तरहेँ दुखिनीकेँ किए सतबैत छहक। (सुन्दर-संयोग, पृष्ठ-20) मे ‘दुखिनी ’ शब्दक मार्मिकताक अनुभूति तखने भ’ सकैछ, जखन ओहि समयक सामाजिक परिवेशक अनुभव हो। ओहि सामाजिक कुप्रथाक पृष्ठभूमिमे सरलाक कथन विशेषार्थ बोध भ’ जाइछ; एतदिन शिवपद मेवल, केवल एतबहि काज। मे प्रसन्न वर भाषल राखल मोर कुल लाज॥ (सुन्दर संयोग, पृष्ठ-18) बुझा देमक चाही कौखना अनजानकेँ कनिएँ। जे ई अपराध छौ तोहर किए हमरासँ रुसल छी॥ (सुन्दर संयोग, पृष्ठ-19) सरलाक विरह समाजशास्त्रीय विषय थिक जे समाजक परिस्थितिसँ उत्पन्न भेल अछि। एहि तथ्यकेँ ट्यकार अन्तमे स्पष्ट करैत छथि। सुन्दर सासुरसँ गाम जयबाक जखन प्रस्ताव करैत छथि, तखन उद्विग्न भ’ जाइछ, ‘हमरा बुझि परैए जे एहि लोकक मन फेरि अन्तऽ गेलैक।” (सुन्दर संयोग, पृष्ठ-33)। ओऽ सुन्दरकेँ कहैत छथिन, और नहि किछु, जे फेरि ओएह बरहमासा सबने गाबक पड़ै (सुन्दर संयोग, पृष्ठ-34)। सुन्दर जखन ओहि बारहमासा गीतक जिज्ञासा करैत छथिन तँ सरलाक उत्तर थिक, ‘छओ मासक प्राप्त खन लोक वाजै जे आब नहि औथीन तखनसँ कादम्बरी बहिनक संग इएह गीत सब गबै छलहुँ। (सुन्दर संयोग, पृष्ठ-34) सुन्दर संयोग नाटकक कथानक सामान्य प्रेम-कथाक परिधिमे नहि राखल जा सकैछ। ओ थिक मैथिल समाजमे प्रचलित नारी-यातनाक मानस-इतिकथा। प्रकारान्तरेँ नाट्यकार ओहि प्रथाक प्रति अरुचि प्रदर्शित करैत समाधान रूपमे सुन्दर सदृश आदर्श पुरुषक प्रयोजनीयता देखौलनि। सुन्दरमे आदर्श पतिक प्राण प्रतिष्ठा क’ कए नाट्यकार समाजकेँ कान्ता सम्मति उपदेश देलनि। हिनक नाटकमे मिथिलाक सामाजिक जीवनमे व्याप्त विवाह सम्बन्धी कुप्रथादिक प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण प्रतिफलित भेल अछि, तकर विश्लेषणसँ प्रतिभाषित होइछ जे नाटककार सामाजिक सुधारक प्रति पूर्णतः साकांक्ष रहथि। विवाह सदृश अतिमहत्वपूर्ण संयोजनमे निरीह पात्री होइछ, कन्या सामवती पुनर्जन्मक प्रस्तावनामे नटीक कथन थिक: कन्या कुल मर्यादामे बान्हलि फूजय मुँह न बकार। (सामवती पुनर्जन्म, पृष्ठ-3) समाजमे कन्याकेँ पुत्रक अपेक्षा न्यून मानल जाइत अछि जे सर्वथा अनुचित। तेँ तँ गौतमीक कथन थिक; ‘तखन पुत्र वा कन्या दु टा संसारमे ह्वै छैक। हम तँ बड़ि प्रसन्न छी।‘ (सामवती पुनर्जन्म पृष्ठ-23) जीवन झा कालीन मिथिलांचलक समाज दुइ वर्ग-सम्पन्न एवं विपन्न वर्गमे विभाजित छल। ताहि कारणेँ स्वजातिमे जाति-पाँजि, कुलीन-अकुलीन, सोति-जोग, भलमानुष, जयवार, पठियार इत्यादिक विचार समाजमे घून जकाँ लागल छलैक। एकरे फलस्वरूप कन्या-विक्रय, बिकौआ प्रथा, बहुविवाह प्रथा आ अनेक अमानुषिक समस्याकेँ जन्म दैत छल। ई श्रेय युगपुरुष जीवन झाकेँ छनि जे अपन नाटकक माध्यमे एकर साक्षात विरोध करबाक साहस कयलनि। नर्मदा सागर सट्टक”क सुन्दर मिश्र तकर ज्वलन्त प्रमाण छथि। मोदन मिश्र सुन्दर मिश्रकेँ नीक जाति-पाँजिक वर त्रिविक्रम ठाकुरक संग नर्मदाक विवाह करयबाक विचार दैत अपन मतक समर्थनमे कहैत छथि: कुलहीन जमाय अधीन कुलीन सुता अनुताप सदा सहती। बसि नीच मनुष्यक बीच यथोचित नीच कथा कहती सुनती।। पठियार अगार अाचार-विचार विचारि विचारि व्यथा सहती। परिवार समान जहाँ न तहाँ भरिजन्म कोना सुख सैँ रहती॥ (कविवर जीवन झा रचनावली, पृष्ठ-107) उपर्युक्त पंक्तिमे कन्याक पिताक मानसिक व्यथाक तथा सामाजिक व्यवस्था, ओकर परिवेश आ परिस्थितिक रेखांकन नाटककार अत्यन्त सूक्ष्मताक संग क’ कए समाजकेँ दिशा-निर्देश करबाक उपक्रम कयलनि। एहिपर सुन्दर मिश्रक कथन छनि: उत्तम जाति जमाय असङ्गत कष्ट सुता सभ काल जनाउति। सासु दयादिन आदि अनादर वाद कथेँ कुल छोट गनाउति।। जीउति जौ सहि गारि कदाचित् मातु-पिता हित बन्धु कनाउति। ई असमञ्जस हैत निरर्थक ऊँचक सङ्ग जे नीच वनाउति॥ (कविवर जीवन झा रचनावली पृष्ठ-107) नाटककार सामाजिक वातावरणमे परिव्याप्त वैवाहिक प्रथाक प्रसंगमे अपन विचार व्यक्त करैत ओकर मात्र आलोचने नहि कयलनि, प्रत्युत एहन वैवाहिक सम्बन्धक प्रसंगपर तीक्ष्ण व्यंग्य मेहो कयलनि तथा समाजकेँ सुधरबाक संकेत देलनि। सामवती पुनर्जन्ममे बन्धुजीवक विकौआ मनोवृत्ति आ पुनर्विवाह करबाक चेष्टाक प्रति सारस्वत ओ वेदमित्रक तिरस्कार भावसँ नाटककारक व्यक्तिगत विचार धाराक परिचय भेटैत अछि। एहि प्रसंगमे बन्धुजीवक कथन छनि: जे हमरा ठुनकाबथि मे लय पहिरथु राङ। हम पुनि कतहु विकायब पोसब अपन समाङ। (सामवती पुनर्जन्म, पृष्‍ठ.39) उपर्युक्त कथनमे विकौआ प्रथाक निन्दाक स्पष्ट झलक भेटैत अछि। सामवती पुनर्जन्ममे घटक द्वारा सारस्वतकेँ वर पक्षसँ टाका गनयबाक प्रस्तावपर सरस्वतक उत्तरक अवलोकन करू, ‘छी छी टाकाक चर्चा कोन हमरा तेहन मैत्री अछि आ ओ ततेटा व्यक्ति छथि जे एहन कथा सुि‍न टाका तँ गनि देताह। परन्तु असन्तोष हयतैन्हि। ई कथा पुनि जनि बाजी”। (सामवती पुनर्जन्म, पृष्ठ-46)। नर्मदा सागर सट्टकमे त्रिविक्रम ठाकुर दिससँ नर्मदाक प्रति टाका गनयबाक घटकक प्रस्तावपर सुन्दर मिश्रक विपरीत प्रतिक्रियाक संग देल गेल उत्तर: पिता आनि वर कन्या का वसन-विभूषण-युक्त। सादर अर्पण मन्त्रवत मे विवाह विधि युक्त॥ (कविवर जीवन झा रचनावली, पृष्ठ-109) मिथिलांचलक समाजमे प्रचलित नियमानुकूल वैवाहिक सम्पर्क स्थापत्यर्थ घटक-पजिआड़क नियोजन एक आवश्यक उपादान थिक। युगपुरुष जीवन झाक चाहे सामाजिक नाटक हो वा पौराणिक ओ अपन प्रत्येक नाटकमे एकर नियोजन कयलनि अछि। सामवती पुनर्जन्ममे मेहो घटक पजिआड़क नियोजन कयल गेल अछि। जखन सारस्वत आ वेद मित्रक बीच अपन सन्तानक विवाहार्थ स्वीकृति भेटैछ तखन वेदमित्रक कथन छनि, यद्यपि ब्राह्मणक विवाहमे अपद व्यय कोना ने हैइ छैक तथापि घटक-पजिआड़ जे कहताह ततबा टाका त अवश्य ओरिआ लेबै पड़त। (सामवती पुनर्जन्म, पृष्ठ-4) अक्षरपुरुष जीवन झा मिथिलांचलक सामाजिक जीवनसँ निरपेक्ष नहि भ’ सकलाह तेँ हिनक नाटकादिमे सबठाम सामाजिक वातावरणक विशिष्ट सन्दर्भक संगहि-संग सांस्कृतिक एवं आर्थिक जीवनक अति यथार्थ प्रतिनिधित्व करैछ। हिनक समस्त नाटक जनसामान्यक निकषपर अक्षरसः सत्यताक आवरणसँ आच्छादित अछि जाहिमे आशा-आकांक्षा, आचार-विचार, आमोद-प्रमोद, स्त्री-पुरुषक सुख-दुःख, रहन-सहन, खान-पान, वेश-भूषा, भाव-भाषा, राजनीति आदिक यथार्थ परिचय भेटैत अछि। ओ मिथिलाक सांस्कृतिक परम्पराक प्रबल समर्थक रहथि जकर प्रतिरूप हिनक नाटकादिमे स्थल-स्थलपर उपलब्ध होइछ। मैथिल संस्कृतिक अनुरूप विवाह पूर्व घटक-पजिआड़क नियोजन हमर सांस्कृतिक परम्पराक अनुरूप समाजमे प्रचलित नियमानुकूल वैवाहिक सम्पर्कक स्थापत्यर्थ घटक-पजिआड़क नियोजन आवश्यक अछि। सामवती पुनर्जन्म एवं नर्मदा सागर सट्टकमे जे घटक-पजिआड़क चर्चा भेल अछि ओ सर्वथा मैथिल संस्कृतिक अनुकूलहि अछि। जतेक दूर धरि वेशभूषाक प्रश्‍न अछि हिनक नाटकान्तर्गत विशुद्ध रूपेँ मैथिल संस्कृतिक अनुरूपहि पात्रक वेशभूषाक संग साक्षात्कार होइछ। नर्मदा सागर सट्टकक घटकराजक स्वरूपक तँ अवलोकन करू: जैखन देखल लटपर पाग। धोती तौनी नोसिक दाग॥ कयलक लोक गाम घर त्याग। हमरा हृदय भेल अनुराग॥ (कविवर जीवन झा रचनावली पृष्ठ-17) हाथमे फराठी छनि, अवस्था विशेषक कारणेँ हुनक डाँर पर्यन्त झुकि गेल छनि, पाग लटपर छनि। एहन वेश-भूषाकेँ देखि लोककेँ घटककेँ चिन्हब कनेको भाङठ नहि होइत छनि: ओ जेना छल केहन उकाठी। उचकि पड़ायल हमर फराठी॥ बीतल वयस वर्ष थिक साठी। पैरन सोझ पड़य बिनु लाठी॥ जौँ जनितहुँ एहि गामक ढाठी। तौँ न आबि भसिअइतहुँ भाठी॥ (कविवर जीवन झा रचनावली, पृष्ठ-95) एहिमे नाटककार मिथिलामे वैवाहिक अवसरपर घटकक कर्तव्यपरायणता तथा ओकर वेश-भूषाक यथार्थ स्थितिक चित्रण अत्यन्त मार्मिकताक संग कयलनि अछि। सांस्कृतिक परिदृश्यमे मिथिलामे पर्दा प्रथाक पालन सामाजिक रीति-नीतिक अनुकूलहि हिनक नाटकादिमे वर्णित अछि। एहि प्रथाक अनुसारेँ ससुर-भैंसुर वा परिवारक श्रेष्ठ व्यक्तिक समक्ष वा अपरिचित व्यक्तिक समक्ष मिथिलांचलक महिला नहि जाइत छथि। एहि प्रथाक अनुरूपहि कादम्बरी एवं अभिरानी एहि रहस्यसँ अवगत रहितहुँ जे सुन्दर निश्चित रूपेँ सरलाक पति थिकथिन तथापि ओ सभ आत्मीयता नहि प्रदर्शित करैत छथि। सुन्दरकेँ मेहो अनुभव होमय लगैत छनि जे सरला हुनक पत्‍नी छथिन, किन्तु मर्यादाक पालनार्थ ओ अपन वास्तविक परिचय नहि उदघाटित करैत छथि। सांस्कृतिक परिवेशक नियोजनक दृष्टिएँ जखन हिनक नाट्य साहित्यक विश्लेषण करैत छी तँ स्पष्ट प्रतिभाषित होइछ, जे युगपुरुष जीवन झा मिथिलाक संस्कृतिक अनुरूपहि फगुआक हुड़दंगक चित्रण सामवती पुनर्जन्ममे कयलनि अछि। विदर्भराज सपरिवार बैसल छथि आ मृदंग वाद्य सहित हुनक राज्य वेश्या कलावती नचैत अछि आ गीत गबैत अछि: रङ्ग रस होरी हो। गाबह सब मिलि रङ्ग॥ रहसि-रहसि सब फागु सुहागिन गाबय मनक उमङ्ग। पहु परदेश विताओल हमरा (सरि खहे) भेल मनोरथ भङ्ग॥ (सामवती पुनर्जन्म, पृष्ठ-14) एहि नाटकक होलिकोत्सवक दृश्य अत्यन्त मनोरम अछि। रंग अबीरक प्रयोग सँ होरीक हुड़दंग मचल अछि। ओहि अवसरपर राजसभाक प्रत्येक पात्र रंग अबीरसँ बोरल अछि। लोक होरीक हुड़दंग मचयबा आ उधम मचयबामे अस्त-व्यस्त अछि। राज्यादेश अछि जे एहि अवसरपर जे अनच्छुक होथि तनिका एहिसँ फराके राखल जाय अन्यथा रंग-अबीरक सराबोर राज्याधिकारी लोकनि राजभवनमे उपस्थित छथि। राजभवन दिस जाइत नगरक शोभा ओ होलिकोत्सवक विकृत रूप दृष्टिगत होइछ। सभ एक दोसराक संग हँसी-मजाकमे व्यस्त देखल जाइछ। एहि अवसरपर बसन्तक राजाकेँ आशीर्वाद दैछ: महाराजक मन हरलक नटी, कहो लोक अपवाद। सय वर्ष सँ जनि जीवी घटी हम दैछी आशिर्वाद। (सामवती पुनर्जन्म, पृष्ठ-14) शलाकापुरुष जीवन झाकेँ मिथिलाक सांस्कृतिक परम्पराक गम्भीर अनुभव छलनि तेँ ओ अपन नाटकमे एकर पालनार्थ उपयुक्त अवसर बहार क’ लेलनि। कीर्ति पुरुष जीवन झा अपन नाटकादिमे धार्मिक भावनाक चित्रण मेहो अत्यन्त मार्मिकताक संग कयलनि जे हुनक सांस्कृतिक पृष्ठभूमिक पृष्ठपोषक हैबाक प्रमाण दैछ। सामवती पुनर्जन्ममे अर्थोपार्जनार्थ सामवान आ सुमेधा विदर्भराजक ओतय दम्पत्ति-रूपमे पूजनार्थ नियुक्त होइत छथि। सांस्कृतिक एवं धार्मिक पृष्ठभूमिक परिप्रेक्ष्यमे सुन्दर-संयोगक कथानकक श्रीगणेश वैद्यनाथधामक प्रांगणसँ आरम्भ होइछ तथा ओकर अन्त मेहो ओतहि भ’ जाइछ। नर्मदासागर सट्टकमे नाटककार कपिलेश्वरमे शिवार्चनाक चर्चा कयलनि अछि। कार्तिक पूर्णिमाक अवसरपर लोक स्नानार्थ गंगा-कमला जाइत अछि जे हमर सांस्कृतिक एवं धार्मिक जीवनक अविभाज्य अंगक रूपमे चित्रित अछि। सांस्कृतिक एवं धार्मिक दृष्टिएँ जखन हिनक नाटकादिक विश्लेषण करैत छी तँ स्पष्ट भ’ जाइछ जे ई परम शिवभक्त परायण रहथि जे हिनक नाटकादिमे प्रयुक्त नचारी आ महेशवाणीसँ भ’ जाइत अछि। मिथिलांचलक सांस्कृतिक पृष्ठभूमिमे एहि ठामक निवासीक वैशिष्ट्य रहल अछि जे सात्विक भोजनक पक्षपाती रहलाह अछि। एतय तामसी भोजन सर्वथा वर्जित मानल जाइछ। एहि परम्पराक पालन नाटककार स्थल-स्थलपर अपन नाटक मे कयलनि अछि। सामवती पुनर्जन्ममे नाटककार समाजमे प्रचलित नवलोकक बीच मदिरापानक परम्परासँ क्षुब्ध भ’ एकर बहिष्कार करबाक उदघोषणा कयलनि। एहि प्रसंगमे सुमेधाक कथन छनि, ‘एहि सभ कारणसँ राज्य निषिद्ध थिक। देखू तँ मदिरापान कयनेँ केहन लाल लाल आँखि छलैकय। छी छी आब मन प्रसन्न भेल अछि मन अवग्रहमे पड़ल छलहुँ”। (सामवती पुनर्जन्म, पृष्ठ-19)। मिथिलांचल निवासीक प्रमुख भोज्य वस्तुमे रहल अछि रेडीमेड चूड़ा आ दही जकर चर्चा पौराणिक साहित्यमे मेहो यत्र-तत्र उपलब्ध होइछ। नर्मदासागर सट्टकमे एहि भोज्य-सामग्रीक विश्लेषण नाटककारक प्रमुख प्रतिपाद्य अछि जखन घटकराज भोजन करैत छथि: केव नथबै अछि नाकक पूड़ा। ककरहु केव आगाँ बैसौलेँ थकड़ि बन्है अछि जूड़ा॥ झट झट गट गट घटक गिड़ै छथि राव दही संग चूड़ा। दुइ एक बेर पानि दै मलि मलि कात पसौलन्हि गूड़ा। धड़ि एक विछलन्हि पुनि अगुतैला सह-सह करइछ सूड़ा॥ (कविवर जीवन झा रचनावली, पृष्ठ-99) कीर्तिपुरुष जीवन झाक नाटकादिक वैशिष्ट्य एहि विषयकेँ ल’ कए अछि जे मिथिलांचलक सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवनक चित्रणक क्रममे वैवाहिक अवसरपर होम आदिक व्यवस्थाक निमित्त लावा, जारनि, धान, घी, जल, कुश, आगि आदिक चित्रण सामवती पुनर्जन्ममे कयलनि अछि। जटिलकेँ सारस्वत आज्ञा दैत छथिन: लावा जारनि धान धिउ जल कुश विष्टर आगि। माङव पर सञ्चित करह सब पुरहित सङ्ग लागि॥ (सामवती पुनर्जन्म, पृष्ठ-47) वैवाहिक विधिमे लौकिक एवं वैदिक दुनू रीतिक परिपालन कयल गेल अछि एहि नाटकान्तर्गत। चतुर्थीक विधि सम्पन्न होइछ संगहि संग भार-दोरक चर्चा मेहो नाटककार कयलनि अछि। अक्षर पुरुष जीवन झा मिथिलांचलक सामाजिक जीवनक चित्रण अत्यन्त कुशलताक संग कयलनि अछि। सामवती पुनर्जन्म एवं नर्मदा सागर सट्टकमे सामाजिक रीति नीतिक चर्चा करैत नाट्यकार जाहि वैवाहिक प्रथाक उल्लेख कयलनि अछि मे अत्यन्त प्राचीन परम्परा अछि। मिथिलांचलमे एहि प्रकारक प्रथा एवं परम्परा प्रचलित अछि जे वैवाहिक अवसरपर वर एवं कन्या पक्षक घटक पजिआड़क मिलान होइछ, जाहिमे पर्याप्त टाकाक प्रयोजन पड़ैछ जाहिसँ विवाहक उचित प्रबन्ध कयल जा सकय। सामवती पुनर्जन्म एहि प्रसंगक विश्लेषण पूर्वमे कयल गेल अछि। नर्मदा सागर सट्टकमे मेहो एहि स्थितिक चित्रण भेल अछि। घटकराज नर्मदाक विवाहार्थ ओ सागरक ओतय प्रस्तुत होइत छथि तँ सामाजिक एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमिमे एहि परम्पराक निर्वाह कोना करैत छथि तकर अवलोकन तँ करू, ‘भौजी! एहना ठाम घटक जे हयत मे लगले कोना विचार देत? पजिआड़केँ जे इच्छा होइन्ह मे बूझि लै जाउ। ’ (कविवर जीवन झा रचनावली, पृष्ठ-97)। सामाजिक व्यवस्थाकेँ सुदृढ़ बनयबामे आर्थिक स्थिति दृढ़ता अत्यन्त प्रयोजनीय बुझना जाइछ। वित्त विहीन व्यक्तिक सामाजिक जीवनमे कोनो मूल्य नहि रहि जाइछ। अतएव जाहि समाजक आर्थिक जीवन जतेक सबल रहत ओ उन्नतिक पथपर अग्रसर भ’ समाजकेँ दिशा-निर्देश करबामे सक्षम भ’ सकैछ। जतेक दूर धरि मिथिलांचलक सामाजिक जीवनक आर्थिक स्थितिक प्रश्न अछि ओ सदा सर्वदा आर्थिक विपन्नतासँ संत्रस्त रहल जकर फलस्वरूप कन्या-विक्रय सदृश कुप्रथाक जन्म भेलैक। जीवन झा अपन नाटकादिमे आर्थिक विपन्नताक दिग्दर्शन अनेक स्थलपर करौलनि अछि। सामवती पुनर्जन्ममे सामवान एवं सुमेधाक वैवाहिक प्रसंगमे सामाजिक आर्थिक विपन्नताक दिग्दर्शन होइत अछि जे विवाहक नियोजनार्थ प्रचुर टाकाक प्रयोजनार्थ समाजक विपन्नताक दिग्दर्शन करौलनि अछि। एहि प्रसंगमे बन्धुजीवक कथन समसामयिक समाजक विपन्नताक चित्र दर्शबैत अछि जखन ओ कहैछ, ‘घरमे तैखन सुख जौं पर्याप्त धन हो। हमरा तँ सतत सभ वस्तुक व्ययता लगले रहैए ’। (सामवती पुनर्जन्म, पृष्ठ-20)। आर्थिक विपन्नताक कारणेँ समसामयिक समाजान्तर्गत भीख मङनी प्रथाक जन्म भेल। नाटककार सामवती पुनर्जन्ममे एहि प्रथाक यथार्थताक संग चित्रण कयलनि अछि। भिक्षुक ब्राह्मणक ओतय भीखक हेतु प्रार्थित होइत छथि, किन्तु परिस्थिति वसात हुनका भीख नहि भेटैत छनि। शलाका पुरुष जीवन झाकेँ सामाजिक जीवनक गम्भीर अनुभव छलनि तेँ ओ स्थल-स्थलपर नारी दोस दिस समाजकेँ साकांक्ष करैत देखल जाइत छथि। सामाजिक, सांस्कृतिक तथा आर्थिक पृष्ठभूमिमे नारीकेँ सामाजिक मर्यादाक पालनार्थ मद्यपान, निरर्थक भ्रमणशील बनब, तन्त्राक आह्वान, पतिपर निष्प्रयोजन रोष, दुर्जन व्यक्तिक संग प्रवास गमन आदिकेँ ओ कुल ललनाक निमित्त वर्जित कयलनि। एहि प्रसंगमे ओ नर्मदा सागर सट्टकमे अपन अभिमत प्रगट कयलनि: मद्यपान पर्य्यटन पुनि तन्द्रा पतिपर रोष। दुर्जन सङ्ग प्रवास यैह छवटा नारिक दोष॥ (कविवर जीवन झा रचनावली, पृष्ठ-112) बीसम शताब्दीक प्रथम दशकक मैथिली नाट्य सहित्यक जनक अक्षर पुरुष जीवन झा अपन समयक प्रकाश स्तम्भ रहथि जनिक नाटकादिमे मिथिलाक सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक जीवनक जाहि स्वरूपक प्रदर्शन करैछ तकर सार्थकता एहिमे अछि जे नाटककार ओकर समुचित समाधान ओही समस्यान्तर्गत कयलनि। युग विधायक जीवन झा एहि विचारधाराक अत्यन्त व्यापक प्रभाव हुनक समसामयिक साहित्यकार लोकनिपर पड़लनि जे परवर्ती युगक नाटककार लोकनिक हेतु एक प्रकाश-पुञ्ज प्रमाणित भेल। एकर श्रेय आ प्रेय कविवर जीवन झाकेँ छनि जे मिथिलांचलक तत्कालीन सामाजिक सांस्कृतिक एवं आर्थिक परिस्थितिकेँ नीक जकाँ जानि बूझि क’ युगक आवश्यकताकेँ ध्यानमे राखि क’ अपना सम्मुख जनसाधारणक दृष्टिकोणकेँ समन्वित क’ कए मौलिक नाट्य-रच्नाक सूत्रपात कयलनि तथा नाट्य-प्रणालीक सन्दर्भमे नवीन दृष्टिकोण अपनौलनि। हुनका नाट्य-रचनाक ज्ञान निश्चये विस्तृत छलनि। ओ समसामयिक समाजमे घटित होइत घटनाकेँ अपन अनुभवक आधारपर विश्लेषण कयलनि। आधुनिक मैथिली नाट्य साहित्यान्तर्गत अक्षर पुरुष जीवन झा नाटकक क्षेत्रमे सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक स्थितिक प्रसंगमे एक कीर्तिमान स्थापित कयलनि जे एहि साहित्यक निमित्त एक अविस्मरणीय ऐतिहासिक घटना थिक जे अधुनातन सन्दर्भमे मैथिल समाजक हेतु दिशाबोधक प्रमाणित भेल। मैथिली भाषाक साहित्‍य ऋगवेदक भाषाक अध्ययन-अनुशीलन, चिन्तन-मनन, विवेचन-विश्लेषणसँ अवबोध होइत अछि जे वैदिक युगमे तीन उपभाषा प्रचलित छल- ‘उत्तरक भाषा ’ मध्यक भाषा ’ आ ‘पूर्वी मध्यक भाषा ’। ब्राह्मण ग्रन्थक अवगहनोपरान्त एहन प्रतीत होइत अछि, ओही भाषा सभकेँ क्रमशः ‘उदीच्च,’ ‘मध्यदेशीय,’ एवं ‘प्राच्य ’ भाषाक नामसँ सम्बोधित कएल गेल। प्राच्य बोली अर्द्ध मागधी आ मागधी प्राकृतक साक्षात माय छलीह। ‘पूर्वी हिन्दी ’ आ ‘कौसली’ क स्रोत अर्द्ध मागधी थिक। एखन मागधी अपभ्रंशक अत्याधुनिक प्रतिनिधित्व बाङ्ला, असमिया, ओडिया, मैथिली, मगही आ भोजपुरी क’ रहल अछि। उपर्युक्त पृष्ठभूमिमे स्पष्ट भ’ जाइछ जे मैथिली आर्यभाषा परिवारक एक प्राचीनतम भाषा थिक। एकर उत्पत्ति पूर्वी प्राकृतक पूर्वी कोष्ठ मगध विदेह प्राकृतसँ भेल अछि। प्राचीन उपलब्ध सामग्रीमे एकर अनेक नाम प्रकाशमे आयल अछि। विश्वकवि विद्यापति (1350-1450) एकरा ‘अवहट्ठ,’ लोचन (1650-1725), ‘मिथिला अपभ्रंश’ बेलिगत्ती (Beluigatti), ‘तिरहुतिया’, वा ‘तिरहूतियन’ आ सुभद्र झा (1909-2000), ‘मिथिला अपभ्रंश’ नामे सम्बोधित कयलनि। मिथिलाक भाषाक उल्लेख ‘आइने’ ‘अकबरी’ मे मेहो भेल अछि जतय एकरा पृथक भाषाक रूपमे स्वीकार कयल गेल अछि। आधुनिक कालमे मैथिली नाम सर्वाधिक प्रचलित अछि। ई नाम जे लोकप्रियता अर्जित कएलक तकर सब श्रेय छनि हेनरी थॉमस कोलव्रुककेँ जे सर्वप्रथम एशियाटिक रिसर्चेज भाग-7, पृष्ठ 199 पर हुनक संस्कृत आर प्राकृत सम्बन्धी निबन्धक अन्तर्गत भेटैत अछि। तत्पश्चात् सिरामपुर मिशनरी द्वारा अपन सोसायटीक 1816 ई.क छठम मेम्वायरमे अन्य आर्य भाषा सभक संग तुलना करैत मैथिली शब्दक उल्लेख कयलनि अछि(इण्डियन एण्टीक्वेरी 1903, पृ.245)। पाछाँ जा क’ एस.ड्ब्लू. फेलन, विशप कैम्पबेल (1814-1891), डॉ. हार्नेले (1841-1915) आ केलाग आदि विद्वत्-वृन्द स्थल-स्थलपर मिथिलाक भाषा मैथिलीक चर्चा कयलनि अछि। पाश्चात्य विद्वत्-वृन्दमे मैथिलीक सबसँ उल्लेखनीय मेवा डॉ. जार्ज अवाहम ग्रियर्सन (1851-1941) कयलनि। वस्तुतः ग्रियर्सन द्वारा मैथली शब्दक प्रचार कयल गेल आ मिथिलाक भाषाक अर्थमे कयल जाय लागल। मिथिलाक भाषा मैथिलीक एहि व्यापकताकेँ सर्वप्रथम डॉ. सर जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन लक्ष्य कयलनि। 1880 ई. मे अपन ‘बिहारी भाषा ’ क व्याकरणक भूमिका ओ लिखलनि जे ‘निकट भूतमे मिथिलाक भाषापर पश्चिमसँ भोजपुरी अधिकार क’ लेलक अछि आ बदलामे ई गंगा पार क’ गेल अछि आर उत्तर पटना तथा मुंगेर एवं भागलपुरक ओहि भागपर अधिकार क’ लेलक जे गंगाक दक्षिणमे पड़ैत अछि। ई कोशीकेँ पार क’ पूर्णियाँ धरि पसरि गेल। ओ पुनः 1903 ई. मे गंगाक दक्षिण भागलपुर एवं मुंगेरक अतिरिक्त संथाल परगनाक पश्चिमोत्तर भागकेँ मैथिली कहलनि। अतएव मैथिल संस्कृति आ मैथिली भाषा मिथिलाक भौगोलिक सीमासँ विशेष व्यापक अछि। मैथिली भाषा सम्बन्धी सीमापर जखन विचार करब तखन पायब जे मैथिलीक पश्चिमी, पूर्वी, उत्तरी तथा दक्षिणी सीमापर क्रमशः भोजपुरी, बाङला, नेपाली आ मगही भाषा स्थित अछि। अपन निजी क्षेत्रमे मुण्डा आ संताली एहि दुनू अनार्य भाषासँ मिलैत अछि। ई कहब निरर्थक अछि जे अपन पड़ोसक भाषासँ सीमापर ओहिसँ मिश्रित भ’ जाइत अछि आर ओहि क्षेत्रमे ई कहब कठिन अछि जे बाजल गेनिहार भाषा ओहि भाषादिसँ प्रभावित मैथिलीक उपभाषा थिक वा नहि। मैथिली मुख्यतया उत्तर-पूर्वक बिहारक आदिवासी लोकनिक मातृभाषा थिक। बिहार प्रान्तक मधुबनी, दरभंगा, समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर, हाजीपुर, वैशाली, सीतामढ़ी, शिवहर, पूर्वी चम्पारण, पश्चिमी चम्पारण, बेगुसराय, खगड़िया, सहरसा, सुपौल, मधेपुरा, पूर्णियाँ, किशनगंज, कटिहार, मुंगेर, भागलपुर, लखीसराय, शेखपुरा, बाँका, आर झारखण्ड प्रदेशक संथाल परगना, गोड्डा, देवघर, जामताड़ा इत्यादि जिलामे ई भाषा बाजल जाइत अछि। एहि भाषाकेँ ई श्रेय छैक जे ई अन्तर्राष्ट्रीय भाषाक रूपमे नेपालक रोतहट, सरलाही, सप्तरी, महोत्तरी आ मोरंग आदि जिलामे बाजल जाइत अछि। एहि भाषा-क्षेत्रक उत्तरमे मगही आर ओड़िया तथा पश्चिममे हिन्दी अछि। प्राचीन कालसँ ल’ कए आधुनिक काल धरि भाषातत्वविद् लोकनि एकर बोली उपरूपक तालिका प्रस्तुत कएलनि अछि। एकर निम्‍नांकित उपरूप अद्यापि उपलब्ध अछि: मानक मैथिली, दक्षिणी मैथिली, पूर्वी मैथिली, पश्चिमी मैथिली, छेका-छीकी मैथिली, जोलही बोली आ केन्द्रीय वर्त्तात्मक मैथिली। मैथिली भाषाक अधिकांश साहित्य मानक मैथिली मे उपलब्‍ध अछि जकरा ‘साहित्यिक भाषा,’ ‘साधुभाषा अथवा शिष्‍टभाषा’ मेहो कहल जाइत अछि। अधिकांश समयधरि ई एकमात्र साहित्यिक अभिव्‍यक्तिक भाषा छल जाहि आधारपर एकरा नकमा मैथिली कहल जाइत अछि। ई दरभंगा आमघुबनी जिला मे बाजल जाइत अछि। दक्षिणी मानक मैथिली समस्‍तीपुर, बेगूसराय, खगडिया, सहरसा, मेधपुरा आ सुपौल जिला आदि मे बाजल जाइत अछि। एहि मे मानक मैथिली सँ किछु अन्‍तर अछि। पूर्वी मैथिली पूर्णिया, अररिया, किशनगंज, कटिहार आदि जिला क केन्‍द्रीय आर पश्चिमी भाग मे अशिक्षित वर्ग सभ मे चलैत अछि तथा महानन्‍दा सँ पूर्व सेहो हिन्‍दू लोकन बजैत छथि जतय मुसलमान मुख्‍यत: बाडव्‍ला बजैत अछि। छिकाछिकी बोली गंगाक दक्षिण भाग मे बाजल जाइत अछि। एहि मे खगडि़या आ बेगूसराय जिला क पूर्वी भाग, बॉंका जिलाक पश्चिम भाग केँ छोडि क’ संथाल परगनाक उत्‍तरी आ पश्चिमी भाग मे बाजल जाइत अछि। पश्चिमी मैथिली मुजफफरपुर, पूर्वी चाम्‍पारण आ पश्चिमी चाम्‍पारण जिलाक पूर्वी भाग मे बाजल जाइछ। चम्‍पारण आ उत्तर मुजफफरपुर क बोली भोजपुरी सँ प्रभावित अछि। जोलही बोली दरभंगा जिलाक अधिकांश इस्‍लाम धर्मावलम्‍बी अपन पडोसी हिन्‍दू क भाषा मैथिली बजैत अछि, मुदा ओकर बोली थोडे क विकृत आर अरबी-फारसी शब्‍दएँ सँ मिश्रित। रहैत अछि। वर्तमान समय मे मैथिलीक दू उपभाषाक नव नामकरण आ नवजागरण भेल अछि जाहि मे प्रथम थिक अंगिका अा द्वितीय थिक बज्जिका। अंगिका भाषाक नाम पड़ल अछि जकरा हम पूर्वी मैथिली कहल अछि आ डा. सर जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन छिकाछीकी गॅवारी कहलनि।एकर क्षेत्र भागलपुर, गोडा आ देवधर तथा संथाल परगना मानल जाइत अछि। बज्जिका ओहि उपभाषाक नाम पडल अछि जकरा हम पश्चिमी मैथिली कहलहुँ अछि। ई नामकरण बज्‍जी आ लिच्छिवी क इतिहास क आधार पर कयल गेल अछि, किन्‍तु आधुनिक परिप्रेक्ष्‍य मे एहि जातिक नामोनिशान नहि भेटैत अछि। मैथिली व्‍याकरणक अपन निजी विशेषता अछि। एकर विशिष्‍टताक प्रसंग मे डा. सर जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन लिग्विस्टिक सर्वे ऑफ इण्डिया (खण्‍ड-5, भाग-2 1902), ‘एन इण्‍ट्रोडक्‍शन टू द मैथिली लैंग्‍वेज ऑफ नौर्थ विहार (1800) तथा सेभन ग्रामर्स ऑफ द डायलेक्‍ट्स एण्‍ड सब डायलेक्‍ट ऑफ द विहारी लैंग्‍वेज (1883) मे विस्‍तारपूर्वक विचार क’ ई प्रमाणित क’ देलनि अछि जे ई विश्ष्टिता अन्‍य भारतीय भाषादि मे नहि उपलब्‍ध भ’ रहल अछि। मैथिली व्‍याकरण मे सर्वनामक तीन रूप प्रयुक्‍त होइत अछि-‘अपने’, ‘अहॉं’ आ ‘तों’ वा तोरा, मुदा बाडव्‍ला मे दू ‘आपनी’ आ ‘तूमि’ वा ‘तुइ’ आ हिन्‍दी मे मेहो दूइए रूप प्रयुक्‍त होइत अछि आप आ तुम। मात्र भषा-शास्‍त्रक दृष्टिऍं सँ नहि, प्रत्‍युत व्‍याकरण आ शब्‍दावलीक विभन्‍नतादि आ विशेषतादि कारणेँ नहि, अन्‍य भाषा-भाषी लोकनिक द्वारा सरलता सँ बुझबाक कारणेँ नहि, प्रत्युत अपन एक स्‍वतन्‍त्र साहित्यिक आ सांस्‍कृतिक परम्‍परा हैबाक कारणेँ मैथिली भाषाक स्‍वतन्‍त्र अस्तित्‍व अछि। मैथिली भाषा आ व्‍याकरणक सम्‍बन्‍ध मे अनेक कार्य भेल अछि। ओहुना संस्‍कृत आ अंग्रेजी व्‍याकरणक आधार मानि क’ मैथिली मे छोट-पैघ अनेक व्‍याकरण लिखल गेल अछि, मुदा महावैयाकरण दीनबन्‍धु झा (1878-1955) क मिथिला भाषा विद्योतन (1945) क ऐतिहासिक महत्‍व अछि जकरा सूत्र-शैली मे ओ लिखलनि जे संस्‍कृत-प्राकृतक श्रेष्‍ठ व्‍याकरणादि सँ तुलना कयल जा सकैछ। एहि व्‍याकरण केँ आधार मानि क’ गोविन्‍द झा (1923) लघुविद्योतन (1963) आ उच्‍चतर मैथिली व्‍याकरण (1979) क रचना कयलनि। हिनक अन्‍य कृति मे मैथिलीक उद्गम ओ विकास (1968) आ मैथिली भाषा (1909-2000) द फारमेशन ऑफ मैथिली लैग्‍वेज (1960) सर्वाधिक उल्‍लेखनीय कार्य कयलनि अि‍छ। अन्‍य स्‍वतन्‍त्र साहित्यिक भाषाक समान मैथिली भाषाक अपन स्‍वतन्‍त्र प्राचीन लिपि थिक जकरा तिरहुता वा मथिलाक्षर वा मैथिलाक्षर वा मैथिली लिपि कहल जाइत अछि। तिरहुता नामसँ ज्ञात होइत अछि जे ई लिपि तिरहुत देशक अछि जकर विकास तीरमुक्‍त वा तिर्हुत नामक व्‍यवहार हैबाक बाद पूर्णत: प्राप्‍त कयल गेल अछि। बौद्ध ग्रन्‍थ ललित-विस्‍तर मे एहि लिपि केँ वैदेही लिपि क नाम पर अभिहित कयल गेल अछि। घुमा क’ लिखनिहार पूर्वी वर्णमाला साक्षात बाडला असमिया, मैथिली आ ओडिया लिपिक स्रोत थिक। वस्‍तुत: मिथिलांचल मे उपलब्‍ध प्राचीन संस्‍कृत ग्रन्‍थ एही लिपि मे उपलब्‍ध अछि जकरा बाडव्‍ला, असमिया आ ओडि़्याक पण्डित लोकनि केँ पढबा मेन सुविधा होइत छ‍। पटना सँ प्रकाशित परमानन्‍दशास्‍त्रा 1915 मिथिलामिहिर मे आचार्य मिथिलाक्षरक उद्भव ओ विकास (1960-61) मे अनेक किस्‍म मे एहि लिपिक तात्विक अघ्‍ययन प्रस्‍तुत कयलनि, किन्‍तु दुर्योग रहल जे पुस्‍तकाकार प्रकाशित नहि भ’ सकल। एहि दिशा मे राजेश्‍वर झा (1923-1977) मिथिरलाक्षरक उद्भव आ विकास (1971) लिखि क’ एकर ऐतिहाकिसकता, प्राचीनता, शास्‍त्रीयता प्रमाणित कयलनि अछि जे भाषा-वैज्ञाानिक दृष्टिसँ एकर सर्वातिशायी महत्‍व थिक। उनैसम शमाब्‍दीक मध्‍य चरिध ई लिपि जीवित छल, मुदा वर्त्तमान सन्‍दर्भ मे एकरा लोक बिसरि गेल अछि आ ओकरा स्‍थन पर देवनागरी लिपि व्‍यवहार कयल जाय लागल अछि। मैथिली साहित्‍य क इतिहासकार लोकनि एकरा सामान्‍यत: तीन काल आदिकाल, मघ्‍यकाल आ आधुनिककाल मे विभक्‍त क’ अघ्‍ययन कयलनि अछि। किन्‍तु ओकर समय सीमाक निर्धारण भे इतिहासकार लोकनि मे मतैक्‍यक सर्वथा अभाव अछि। इतिहास-लेखनक आधार-भूत प्रक्रियाकेँ घ्‍यान मे राखिक’ एकरा निम्‍नस्‍थ काल खण्‍ड मे विभाजित करब श्रेयस्‍कर प्रतीत होइत अछि: i. आदिकाल 800 ई. सँ 1350 ई. धरि। ii. मघ्‍यकाल 1351 ई. सँ 1857 ई. धरि। iii. आधुनिक काल i. ब्रिटिशकाल 1857 ई. सँ 1947 ई. धरि। ii. स्‍वातन्‍त्रयोत्‍तर 1947 सँ अर्द्यपर्यन्‍त। सन् 1857 ई. क सिपाही विद्रोहक पश्‍चात् मैथिली साहितय मे आधुनिक कालक सूत्रपात मानल जा सकैछ। ई विशाल मुगल साम्राज्‍यक अन्तिम वर्ष थिक। मुगल शासनक अवसानोपरान्‍त ब्रिटिश शासन काल मे जाहि सामाजिक चेतनाक उदय भेल ओहि मे सन् 1857 ई. पश्‍चात् क्षिप्रता अबैत अछि। एहि सामाजिक चेतनाक प्रतिनिधित्‍व नवीन शिक्षित बुद्धि जीवी वर्ग कयलक ले एक भाग अपन प्राचीन संस्‍कृति क सुरक्षाक प्रति उत्‍सुकताा देखौलक आ दोसर भाग युग क नव आलोकक स्‍वागत कयलक। एहि सांस्‍कृतिक अनुष्‍ठान मे भारतीय भाषादिक विकास भेल आ ओकर साहित्‍य सम्‍पन्‍न आ समृद्ध होइत अछि। पश्चिमी शिक्षाक प्रचार, रेल-तारक व्‍यवहार, स्‍ववाय शासनक व्‍यवस्‍था, मुद्रण कलाक आविष्‍कार आ सामाजिक चेतनाक प्रभाव साहित्‍य पर पडल आ ओ रुढ परम्‍परादिकेँ तोडि क’ नव दिशाक दिस चलि पडल। मैथिली साहित्‍यक इतिहास मे नव-युगक निर्माण मे कमीश्‍वर चन्‍दा झा (1831-1907) आ पण्डित लालदास (1856-1921) अवदान सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण अछि। हुनक राजनीतिक.सामाजिक रचनादिक आधारपर अनुमान कयल जा सकैछ जे सन् 1857 ई. क पश्‍चात् परिवर्त्तित परिस्थितिक सहजल प्रक्रिया छल। वस्‍तुत: चन्‍दा झा आ लालदास मैथिली साहितय मे नवयुग अनबा मे समर्थ भेलाहि। अपन गदय रचनादि द्वारा ओ लोकनि आधुनिकता क द्वार खोललनि। फेर जहिना-जहिना मिथिलान्‍चल मे नव आलोक पसरल साहितय मेहो नव-नूतन किसलयक संग पल्‍लवित भेल। सर्वप्रथम साहित्‍य तँ ओ रहस्‍यवादी गीत एवं कवितादिक थिक जकर अन्‍वेषण नेपाल मे तथा प्रकाशन बंगाल मे भेल। एकर रचयिता सिद्ध लोकनि छथि। एहि सिद्ध लोकनिक सम्‍बन्‍ध बौद्ध लोकनिक महायान शाखासँ छलनि। एहि रचना-संग्रहक नाम बौद्ध गान ओ दोहा देल गेल अछि। सन् 1323 बंगाब्‍द अर्थात् सन् 1916 ई. मे महामहोपाघ्‍याय डा. हरप्रसाद शास्‍त्री (1853-1931) सर्वप्रथम एकर प्रकाशन करौने छलाह। एहि मे संग्रहीत कविता सभक भाषा अति प्राचीन अछि मथा एहि मे ओ विशेषतादि अछि जे बाङव्‍ला. मैथिली, मगाही आदि पूर्वीय भषादि मे अछि। एहि कारणसँ एहि भाषादिक प्रारम्भिक रूपक उदाहरण मे राखल जाइत अछि। एहि कारण सँ एहि भाषादिक प्रारम्भिक रूपक उदाहरण मे राखल जाइत अछि। वस्‍तुत: ई कवितादि तहिया लिखल गेल जखन आधुनिक पूर्वीय भाषादि अपन प्रारम्भिक अवस्‍था मे छल। भाषा वैज्ञानिक लोकनि एहि विषय मे एकमत छथि। अत: एहि कवितादिक भाषा पूर्वीय अथवा मागधी अपभं्रशक पूर्वीय रूप थिक। यद्यपि एहि पर शौरमेनी अपभ्रँशक मेहो प्रभाव संक्षिप्‍त अछि। तथापि ई स्‍वाभाविक अछि जे एहि मे ओ सभ तत्‍व उपलबध अछि जे मागधी अपभ्रँशक पूर्वीय रूप थिक। यद्यपि एहि पर शौरमेनी अपभ्रँशक मेहो प्रभाव संक्षिप्‍त अछि। तथापि ई स्‍वाभाविक अछि जे एहि मे ओ सभ तत्‍व उपलब्‍ध अछि जे मागधी अपभ्रँश सँ विकसित वर्त्तमान भाषादि मे मेहो पाओल जाइत अछि। एकरा संगहि ई मानबाक लेल प्रचुर साधन अछि। ई संग्रह प्राचीन मैथिलीक रूप थिक। एकर रचयिता अधिकांश मिथिलाक निवासी रहल हैताह। बौद्ध गान ओ दोहा मे तीन प्रकारक साहित्‍य उपलब्‍ध भ’ रहल आछि, जकरा मैथिलीक प्रारम्भिक रूप कहल जा सकैछ। ओ अछि: दोहा कोश, चर्चाचर्च विनिश्‍चय आ डाकार्णव। एकर रवचिता बौद्ध सिद्ध आ तान्त्रिक रहथि। हिनक भाषा मिथिलाक पूर्वी भागक प्राचीन रूप थिक। एहि सामग्री आदिक आधारपर एकर रचयिता लोकनिक समय आठम शताब्‍दी सँ तेरहस शताब्‍दी धरि निश्‍चय कयल जाइत अछि। विषयक दृष्टि सँ एहि रचनादिक ओतेक महत्‍व नहि जतेक की भाषाक दृष्टिऍं अछि। एकर भाषा एहन अछि जकरा आधारपर एकरा मैथिली, बाङव्‍ला, असमिया, हिन्‍दी, मगही आ भोजपुरी आदि प्रत्‍येक भाषा-भाषी अपन सम्‍पत्ति घोषित करैत छथि। एहि समय भारतीय आर्य भाषा निर्माणक स्थिति मे छल। इएह कारण अछि जे भाषा-वैज्ञानिक लोकनि एहि रचना-समूह मे भारतीय पूर्वाञ्चलक सभ भाषादिक रूप भेटैत अछि। संगहि-संग ई मानबाक लेल मेहो प्रचुर साधन अछि जे एहि संग्रह केँ प्रधानत: मैथिलीक रूप थिक। ज्‍योतिरीश्‍वर (1280-1340) वर्णरत्‍नाकर (1940) मे एकर सम्‍पूर्ण नामावली द’ देलनि अछि। पूर्वीय भाषादि मे सर्वप्रथम मैथिलीक प्रयोग गम्‍भीर साहित्‍यक रूप मे कयल गेल छल। बाङव्‍ला आ आसमी मे तँ साहित्‍य-रचनाक प्रयास एक शताब्‍दी पाछॉं जा क’ प्रारम्‍भ भेल तथा एकरा लेल मैथिलीक महान कवि विद्यापति प्रेरक सिद्ध भेलााहि। एकर अतिरिक्‍त प्राचीन अप्रपभं्रश मे कविता लिखबाक परम्‍परा मात्र मिथिला मे छल आ ई परम्‍परा चौदह म शताब्‍दी धरि चलैत रहल। विद्यापति अपन दू पुस्‍तक-कीर्तिलता (1924) आ कीर्तिपताका (1960) तथा अनेक छोट कवितादिक रचना मे कयलनि जे देश्‍य-मिश्रित अपभ्रंश शिला प्राकृत पैङ्गालम’ टीकाकर वंशीधर एहि मे संगृहीत अपभ्रंश कवितादिक भाषाकेँ अवहट्ठ कहलनि। डा. सुभद्र झा एकरा आदिकालीन मैथिली कहलनि। ओ लिखैत छथि. प्राकृत पैङ्गलम मे उदाहरण स्‍वरूप अनेक शब्‍द एवं पद देल गेल अछि जकरा विषय मे कहल जा सकैछ जे ओ प्राक् मैथिली मे रचित थिक ओहि मे एहन किछु नहि अछि जकरा आदिकालीन मैथिली कहबासँ वंचित क’ सकी।‘ राधाकृष्‍ण चौधरी (1924-1984) मिथिलाक सांस्‍कृतिक इतिहास (1961) क परिशिष्‍ट-ग मे प्राकृत पैङ्गलम मे व्‍यवहृत 115 शब्‍दादिक सूची देलनि अछि तथा एकहरा आदिकालीन मैथिलीक ग्रन्‍थ मानलनि अछि। तथापि एहि प्राचीन भाषाक विषय मे सुनिश्चित एवं अन्तिम रूपसँ विचार करब आवश्‍यक अछि। वर्त्तमान परिप्रेक्ष्‍य मे एकरा प्राक् मैथिली मानव तर्क संगत अछि। दोसर प्रकारक साहित्‍य जे उपलब्‍ध भ’ रहल अछि ओ थिक डाकवचनावली। एहि वचनावली मे स्‍थानीय लोक प्रसिद्ध विज्ञाता, ज्‍योतिष एवं कृषि सम्‍बन्‍धी वचन, जीवन आ विविध विषयक समालोचना भेटैत अछि। ई जनसामान्‍य मे प्रचलित अछि तथा एकर विस्‍तार आसामसॅ ल’ कए राजस्‍थान धरि सम्‍पूर्ण आर्यवर्त मे विस्‍तृत अछि। एकर रचयिताक सम्‍बन्‍ध मे विद्वान लोकति मे मतैक्‍य नहि अछि तथा अनेक जनश्रुति आदि प्रचलित अछि। देशक भिन्‍न भिन्‍न भाग सब मे एकर रचयिता लोकतिक भिन्‍न-भिन्‍न नाम अछि। मिथिला मे डाक, घाघ, भण्‍डरी एवं डंक आदि प्रचलित आदि। एम्‍हर आबि क’ देशक विभिन्‍न भागसॅ एहि वचनावलीक कतिपय संग्रह प्रकाया मे आयल अछि, परन्‍तु एहि मे सँ कोनो, कोनो प्राचीन हस्‍तलिखित प्रति पर आधारित नहि भ’ कए ओहि भू-भाग मे प्रचलित अनेक मौखिक रूप पर अछि। एकर फलस्‍वरूप प्रत्‍येक संस्‍करणक भाषा आधुनिक भ’ गेल अछि। मैथिलीक हेतु ई सौभाग्‍यक बात थिक जे डाकक नाम पर प्रचलित अनेक वचन मैथिल विद्वान द्वारा रचित ज्‍योतिषक प्राचीन ग्रन्‍थादि मे उद्घृत अछि। जाहि मे किछु तँ चौदहम-पन्‍द्रहम शताब्‍दीक थिक। एहि उद्धरणादिक भाषा अत्‍यन्‍त प्राचीन अछि तथा बौद्ध गान ओ दोहा क भाषासँ साम्‍य रखैत अछि। ओना तँ मिथिला सँ जे वचनावली प्रकाशित भेल अछि ओकर भाषा आधुनिकताक छाप नेने अछि। मात्र मिथिलाक आचार्यगण कोनो महान आचार्यक वचन सदृश प्रमाणक हेतु डाक वचनादि केँ जे उद्घृत कयलनि अछि ओहिसँ ओकर मैथिल उद्भव आ प्राचीनता सिद्ध होइत अछि। अत: ई कहब पूर्णत: संगत सिद्ध होइत अछि जे डाक मैथिल रहथि आ हुनक लोक प्रसिद्ध साखी आदिक भाषा प्राचीन मैथिली थिक। कालान्‍तर मे ई सम्‍पूर्ण भारत मे प्रचलित भ’ गेल तथा अपन मौखिक परम्‍परा मे नूतन रूप धारण क’ लेलक अछि। मात्र डाके एहन व्‍यक्ति नहि रहथि जे एहि प्रकारक लोक प्रसिद्ध वर्णनक रचना प्राचीन मैथिली मे कयलनि। एतबा तँ निश्चित अछि जे सबसँ विख्‍यात इएह छथि। सप्‍तरत्‍नाकरकर्त्ता महामहोपाध्‍याय चण्‍डेश्‍वर अपन कृतचिन्‍तामणि नामक ज्‍योतिष निबन्‍धक प्रशानग्रन्‍थ मे अवहट्ठ भाषाक अनेक पद म्रमाण रूप मे उदृत कयलनि अछि, जकरा क्षपणक जातक भृगुसंहिता तथा कापलिक जातक प्रभृत ग्रन्‍थसँ उदृत कहलनि अछि। यद्यपि ई ग्रन्‍थ आब अनुपलब्‍ध अछि, अतएंव ई नियिचत रूप सँ नहि कहल जा सकैछ जे उक्‍त ग्रन्‍थ ओही भाषा मे लिखल गेल अथवा ओहि मे कतहु सँ उद्धृत कयल गेल अंछि। परन्‍तु डाकवचनावली क रचनाक समानहि ई सब मेहो जनसाधारण केँ प्रभावित करबाक लेल विद्वान लोकनि हुनके भाषाक आश्रय लैत रहथि आ चाण्‍डेश्‍वर सदृश विद्वान् मेहो प्रमाण स्‍वरूप ओंकरा उदृत करबा मे कनेको कुण्ठित नहि भेलाह।तेसर प्रकारक जे साहित्‍य उपलब्‍ध अछि ओ लोक प्रसिद्ध आख्‍यान आ गीतक थिक। एहि मे किछु तँ साहित्यिक थिक। गोपीचन्‍दक गीत एही श्रेणी मे अबैत अछि। ई गीत ओही समयक थिक जाहि समयक डाकक वचन थिक। ई गीत भीख मॉंगनिहारक एक वर्ग द्वारा गाओल जाइत अछि जकरा गुदरिया गोसांईक नाम देल गेल अछि। एहि गीतक अतिरिक्‍त लोरिक, सलहेेस. बिहुला, मरसिया आदिक गीत कथादि एही वर्गक थिक। ई सभ रचनादि प्राचीन कालक थिक। एहि कथादिक विशेषता ईहो अछि जे एकर कथानायक कोनो अवतारी देवता वा अंशी पुरूष नहि छथि। डा. सर जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन एकर संकलनक प्रयास कयने रहथि। युग-युगसँ ई जनकण्‍ठ मे पीढी-दर-पीढी गुंजित होइत आवि रहल अछि। एकर भाषाक परिशुद्धता क विषय मे क्यो दावा नहि क’ सकैछ। अपन मौखिक परम्‍परा सँ एकर भाषा मे निश्चित रूपेण परिवर्त्तन भेल हैत। एहि रचनाहि केँ देखि क’ ई स्‍पष्‍ट प्रमाण भेटैत अछि जे मैथिली अपभ्रंश भाषाकेँ लोकप्रिय रचनाक लेल प्रयोग करबाक परम्‍परा मात्र उपयोगी साहित्‍यक लेल नहि, प्रत्‍युत मनोरंजनक लेल हशे-मिथिला मे पूर्व भारतीय अपभ्रंश भाषाक आरम्भिक स्थिति मे जकर समय भाषा वैज्ञाानिक एक हजार ई. निधारित करैत छथि।डा. सर जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन सर्व प्रथम एहन गीतादि केँ इण्डियन एण्‍टीक्‍वेटी खण्‍ड-10 मे प्रकाशित करौलनि। एकर अतिरिक्‍त समबिहारी फोक सॉंग्‍स (1884), टू भरसन्‍स ऑफ द सांग्‍स आफ गोपी चन्‍द (जे. ए. एस. बी. खण्‍ड 54, भाग-1 अा ‘द वर्थ आफ लोरिक (कैम्ब्रिज 1929) आदि मे प्रकाशित अछिजे उल्‍लेखनीय अछि। एम्‍हर आबि क’ लोकगीतक कतिपय संग्रह प्रकाश मे आयल अछि जाहिसँ एकर विकास मे गति आयल अछि। मिथिलाञ्चलक विभिन्‍न जनपद मे मैथिलीक करीब तीस लोक नाट्यक प्रस्‍तुति हम देखल अछि जाहि मे लोक जीवनक स्‍वाभाविक अभिव्‍यक्ति भेल अछि। एहि लोक-नाट्यादि मे गीत, संगीत आ नृत्‍यक त्रिवेणी प्रवाहित भे ल अछि जाहि मे लोक जीवनक स्‍वाभाविक अभिव्‍यक्ति भेल अछि। एहि लोक-नाट्यादि मे गीत,संगीत आ नृत्‍यक त्रिवेणी प्रवाहित भेल अछि जाहि मे लोक-जीवनक सार-गर्वित भावसँ सम्‍पन्‍न, तत्‍कालीन युग क प्रवृतिक मनोरंजकता प्रदान करबाक हेतु नव-नव आयामक व्‍यवस्‍था कयलक। कालन्‍तर मे इएह साहित्यिक विधादिक रूप मे विकसित भेल। विविध मांगलिक अवसर जेना व्त-त्‍याैहार, धार्मिक, सांस्‍कृतिक लोकोसव इत्‍यादिक विशेष परिस्थिति मे विभिन्‍न प्रक्रियादि सँ उदभूत सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्‍कृतिक आ साहित्यिक चेतनाक परिणाम थिक मैथिली लकि-नाट्य। मिथिला और मैथिली साहित्‍यक ऐतिहासिक ग्रन्‍थ क अवगाहन सँ ज्ञात होइछ जे मिथिला पर अनेक राजवंश शासन कयलक जाहि मे तीन राजवंश क शासक लोकति मे कर्णाट राजवंश (1097-1324), ओइनवार राजवंश (1353-1526) आ खण्‍डवला राजवंश (1556-1947) प्रमुख छथि। कर्णाटवंशीय राजा लोकनिक छत्र-छाया मे मैथिली साहित्यिक साहित्‍यकार लोकनि केँ प्रोत्‍साहन भेटबाक प्रक्रिया प्रारम्‍भ भेल। ज्‍योतिरीश्‍वर ठाकुर एही राजवंशक छठम राजा महाराज हरिसिंह देव (1443-1444) क सभासद रहथि। ओइनवार वंशक शासनकाल मे मैथिली साहित्‍यक विकास अत्‍यन्‍त दुतगतिऍं भेल, कारण एहि राजवंशक राजा लोकनि केँ साहित्‍यक प्रति अधिक अभिरुचि छलनि जकर फलस्‍वरूप साहित्‍य मनीषी लोकतिकेँ कतेक राजा लोकनि प्रोत्‍साहित कयलनि जाहि मे उल्‍लेखनीय छथि विद्यापति’ जनिम सरस पदावली मैथिली साहित्‍यक अमरत्यक सबसँ पैघ मेतु बनल। महाकवि जयदेवक अनुकरणकेँ क’ कए ओ राधा कृष्‍णक रहंगारपूर्व लीलाक गुणगान कयलनि। हिनक विविध रचनादिक अवगाहन सँ ज्ञान होइत अछि जे एहि राजवंशक कतिपय राजा लोकनिक अवगाहन सँ ज्ञान होइत अछि जे एहि राजवंशक कतिपय राजा लोकनिक संग हिनक सम्‍पर्क रहल। ओइनयार वंशक पतनोपरान्‍त मिथिलामे खण्‍डबला कुलक स्‍थापना भेल जे आधुनिक मैथिली साहित्‍यक लोकनिकेँ प्रोत्‍साहित करब प्रारम्‍भ कयलनि जाहिमे उल्लेखनीय छथि कवीश्‍वर चन्‍द्र झा आ महाकविलालदास आ साहित्‍यरत्‍नाकर मुंशी रघुनि‍ि‍िन्दिन दास (1860-1945)। ई साहित्‍यमनीषी लोकनिक रचनादि मे सर्वथा आधुनिक कताक शुभारम्‍भ होइत अछि। सर्व प्रथम प्रामाणिम पुस्‍तक जे खॉटी मैथिली मे अछि आ थिक ज्‍योतिरीश्‍वर ठाकुरक वर्णरत्‍नाकर (1940) आ धूर्तसमागम (1960)। ई दुनू पुस्‍तक चौदहम शताब्‍दीक आरम्‍भ मे लिखल गेल छल। वर्णरत्‍नाकरक विषय मे सन् 1901 ई. मे बंगाल एशियाि‍टक सोसायटीक सचिव केँ महामहोपाघ्‍याय डा. हरप्रसाद शास्‍त्री सूचना देने रहथि। प्रथमे प्रथम एकर प्रकाशन डा. सुनीतिकुमार चटर्जी (1890-1977) आ पण्डित बबुआजी मिश्र क संयुक्‍त सम्‍पादकत्‍व मे एकर प्रकाशन भेल छल। अपन रिपोर्ट मे महामहोपाघ्‍याय डा. हरप्रसाद शास्‍त्री कहने रहथि, ई ग्रन्‍थ काव्‍य नहि, काव्‍योपयोगी ग्रन्‍थ कहि सकैत छी। यदि ज्‍योतिरीश्‍वर वास्‍तव मे इच्‍छापूर्वक काव्‍य ग्रन्‍थ लिखितथि तँ एकर स्‍वरूप आन रूपक रहैत, मुदा वर्णनक अवसर पाबि ग्रन्‍थकारक सहज कवित्‍व प्राय: नहि मानलक आ लाख रोकनहुँ पर मेहो कस्‍तुरी मोदक समान प्रकटभ’ गेल। स्‍थल-स्‍थलक वर्णनकेँ देखि क’ कादम्‍बरी प्रभृति संस्‍कृत गद्य-काव्‍यक स्‍मरण भ’ जाइत अछि। एहि प्रकारक उन्‍नत गद्य-साहित्‍य केँ देखि क’ अनुमान होइत अछि जे एहि सँ चारि-पॉंच शताब्‍दी पूर्व मिथिला भाषा मे नियचये साहित्‍य रचना प्रारम्‍भ भ’ गेल छल। अनेक अनुच्छिट उपमादिक संग्रह. भाषा-उपभाषाक उल्‍लेख द्वारा भाषा-विज्ञान सम्‍बन्‍धी अनेक सामग्री, ओहि समयक सामाजिक तथा साहित्यिक विचारक भण्‍डार, ओहि समयक वर्णन-शैली इतयादि विशेषताक विशद रूप एहि ग्रन्‍थ मे उपलब्‍ध अछि।प्रतिपाद्य गद्य ग्रन्‍थ भावी कवि आ कत्‍थक लोकनिक क हेतु एकपथ प्रदर्शक ग्रन्‍थ बनायब छल जेना जँ नायकक वर्णन करबाक हो तँ कोन-कोन विषयक उल्‍लेख करब उचित, जँ नायिका वर्णन करबाक हो तँ कोन-कोन विषयक निरूपण करब आवश्‍यक अछि। ई ग्रन्‍थ सात कल्‍लोल मे विभाजित अछि जेना नगरवर्णन, नायिका वर्णन, आस्‍थान वर्णन, ऋतु-वर्णन, प्रयानक वर्णन, भट्टादि वर्णन आ श्‍मशान वर्णन। सबसँ महत्‍वक बात ई थिक जे ई पुस्‍तक गद्य मे अछि तथा उत्‍तर भारतक कोनो भाषा साहित्‍य मे एतेक प्राचीन ग्रन्‍थ नहि भेहैत अछि। जखन दोसर-दोसर प्रान्‍त अपन भाव प्रकाशनक लेल कोनो साहित्यिक माघ्‍यमक अभाव मे अन्‍धकार मे टापर-टोइया द’ रहल छल, तखन मैथिली एक पूर्ण भाषा क रूप मे विकसित भ’ गेल छल जाहि सँ समाजक स्‍वरूप केँ प्रकट कयल जाय सकय। ई कोनो लोकप्रिय भाषाक प्रधान विशेषता थिक। वर्णरतनाकर एकर सटीक उदाहरण थिक।ज्‍योतिरीश्‍वरक दोसर रचना संस्‍कृत-प्राकृत-मैथिली मिश्रित त्रिभाषिक नाटक थिक धूर्त समागम । ई नाटक जतय मैथिली कविता आ नाटकीय परम्‍पराक द्योतक थिक, ओतहितत्‍कालीन समाजक चित्र प्रस्‍तुत करैत अछि।ऐहिमे लेखक एक सम्‍पन्‍न गृहस्‍थक चित्र अंकित कयलनि अछि जनिक चातु:शालक चारू भाग कतहु महींस बान्‍हल अछि, कतहु बाछा-बाछीक संग पुष्‍ट थनत्‍वाली गाय एम्‍हर-ओम्‍हर जा रहल अछि, कतहु दासी सुन्‍दर भवनक प्रागंण मे मन्‍द-मन्‍द गति सँ अवगाहन क’ रहल अछि।वर्णरत्‍नाकर आ धूर्तसमागम क रचना लोकभाषाक आलोकमय भविष्‍यक सूचक छल। भाषा-साहित्यक एहि अभ्‍युदय आ विकासक कोनो साहित्यिक प्रेरणाक परिणाम नहि कहल जा सकैछ, प्रत्‍युत ई तँ साहित्यिक जड़वाद सँ असन्‍तुष्‍ट जनताक स्‍वाभाविक प्रवृत्तिक प्रकाशन छल। भाषा मे फूटैत कवि-प्रतिभा जखन राजा लोकति केँ चमत्‍कृत कयलक तखन हुनक संरक्षण एवं प्रोत्‍साहनक फलस्‍वरूप भाषा-काव्‍यक विकास भेल। ई विकास एहि बातक द्योतक जे लोक भाषा केँ साहित्यिक गौरव सॅ विशेष अवधि धरि वंचित नहि कयल जा सकैछ। जे सामान्‍य जन मानसक व्‍यापक भाषा बनि गेल ओहि मे व्‍यवहारोपसोगी एवं ललित दुनू प्रकारक साहित्यिक सृष्टि अवश्‍य हैत। मैथिली साहित्‍यक इतिहासक इतिहासक अवलोकन कयला सँ एकर स्‍पष्‍ट बोध होइछ। वस्‍तुत: ज्‍योतिरीश्‍वरक रचनादि मैथिली गंगाक हरद्वार थिक जतय ओ लोक भाषाक सामान्‍य धरातल पर उतरि क’ पूर्ण वेग सँ प्रवाहित होमय लागल। एकर पश्‍चात् उमापति उपाघ्‍याय सर्वाधिक लोकप्रिय नाटकक भेलाह जनिक पारिजातहरणनाटक असमक वैष्‍णवसंत शंकरदेव (1499-1568) अत्‍यधिक प्रभावित भेलाह। मैथिली साहित्‍य केँ ई सौभाग्‍य अछि जे ओइनवार वंशक शासनकाल मे एक एहन प्रतिभासम्‍पन्‍न व्‍यक्तित्‍वक प्रादुर्भाव भेल जनिक काव्‍यप्रतिभा अमर भ’ गेल आ ओ मात्र मिथिला धरि सीमित नहि रहल ; प्रत्‍युत पूर्वान्‍चल मे बंगाल, आसाम आ ओड़सा धरि ख्‍याति अर्जित कयलक आ समस्‍त भारतवर्ष मे लोकप्रियता अर्जित कयलनि ओ रहथि विद्यापति। हिनक गन्‍थक विषय-वैविघ्‍यकेँ देखला सँ ज्ञात होइत अछि जे ओ केवल कविए नहि, प्रत्‍युत सर्वतोमुखी प्रतिभासँ समलंकृत सच्चिन्‍तक रहथि। ओ एकहि संग शास्‍त्रकार, राजनीति-विशारद, इतिहासकार, भूवृतान्‍त लेखक, अर्थशास्‍त्रविद्, नीतिशास्‍त्र विचक्षण, धर्म-व्‍यवस्‍थापक, निबन्‍धकार, शिक्षक, कथाकार, संगीतज्ञ आ पुरूषार्थ पुजारी रहथि। ई निम्‍नस्‍थ संस्‍कृत ग्रन्‍थादिक रचना कयलनि यथा, भूपरिक्रमण (1976), शैव सर्वस्‍वसार (1815), लिखनावली (1969), दुर्भाभक्तिरडिणी (1902), शैवसर्वस्‍वसार (1980), शैव सर्वस्‍वसार पुराण-भूतसंग्रह (1981), गंगावाक्‍यावली (अप्रकाशित), दानवाक्‍यावली (1981), विभागसार (1976), व्‍याडी‍भक्तितरङ्गिणी (2008), गयापत्तलक (अप्रकाशित) एवं वर्ष कृत्‍य (अप्रकाशित)।संस्‍कृत-प्राकृत-मैथिली मिश्रित रचनादि मे त्रिभाषिक नाटक गोरक्षविजय (1960) आ मणिमञ्जरी (1966) आ अवहट्ठ रचनादि मे कीर्तिलता (1924) एवं कीर्तिपताका (1960) थिक । विशुद्ध मैथिली मे ई पदावलीक रचना कयलनि जकर उपलब्‍धताक स्रोत थिक नेपाल, मिथिलाञ्चलक अन्‍तर्गत रामभद्रपुर, तरौनी एवं रागतरडिणी आ बंगालक अन्‍तर्गत क्षणदागीतचिन्‍तामणि, पदामृतसमुद्र, पदकल्‍पतरू, कीर्तनानन्‍द आ संकीर्तनामृत तथा लोककण्‍ठक पद। एहि पदक संख्‍या एक हजार पॉंच सयक लगधक अछि। यद्यपि हिनक अधिकांश रचनादि प्रकाश मे आबि गेल अछि तथापि गंगावाक्‍यावली, गयापतलक आ वर्षकृत्‍य पुस्‍तकाकार प्रकाशन नहि भ’ पाओल अछि। ई पीडा दायक स्थिति अछि जे हिनक रचनादि एतेक लोकप्रिस भेल तथापि हिनक समग्र रचनादिक प्रकाशन ग्रन्‍थावली वा रचनावलीक रूप मे अद्यापि प्रकाशित नहि भ’ पाओल अछि। वस्‍तुत: एहन प्रतिभासम्‍पन्‍न महाकविक कृतिकेँ घ्‍यान मे राखि अद्यापि साहित्‍य चिन्‍तक लोकनि जतेक अपुसन्‍धान आ आलोचना प्रस्‍तुत कयलनि अछि ओकरा एकांगी कहल जा सकैछ जे ओ पुरूषार्थ कवि रहथि जे अपन कृति आदि मे कोनो-ने-कोना रूप सॅ पुरूषार्थ चतुष्‍टय क प्रतिपादण्‍न कयलनि अछि। हिनक सम्‍पूर्ण कृतिक मुख्‍य उद्देश्‍य अछि पौरूष। विद्यापति अपन कृति सभ मे मानवक उदारता, वीरता, धीरता, साहसिकता, निर्भीकता, स्‍पष्‍टता, कर्तव्‍यपरायणता, बुद्धि आ ज्ञानवर्द्धक सभ साधन पर बल देलनि अछि जे सामाजिक आ सांस्‍कृतिक वातावरणक निर्माण मे समान रूपसँ सहयोग प्रदान क’ सकमय। जाहि मानव मे उपर्युक्‍त गुणक अभाव अछि जे हुनका दृष्टि मे अयलनि तकर ओ उपहास कयलनि। पुरूषार्थ चतुष्‍टय क दृष्टिएँ हिनक समग्र कृति हिनक नवोन्‍मेषशालिनी प्रतिभाक विपुल-वैण्‍द्रष्‍क परिचय दैत अछि। लोक मे स्‍व-धर्म आ राष्‍ट्र-धर्म क सुरक्षा क भावना ओ संचारित आ ओकरा पल्‍लवित पुष्पित करय चाहैत रहथि। अपन समग्र पदावली मे ओ अतीव मृदुलता, जनजीवन मे सुसुप्‍त मधुर-भाव केँ जगयबाक क्षमता मिथिलाक जनमानस मे अभिहिंत हैबाक कारणेँ ई सर्वाधिक लोकप्रिय भेल। विद्यापति अपन साहित्‍य-साधनाक माघ्‍यमे मैथिली-साहित्‍य भंडार केँ भरबाक लेल अनेक विधा क रचना कयलनि। हिनक एक-एक रचना मैथिलीक अमूल्‍य-निधि थिक जाहि मे एक भाग श्रंगारिकताक आभास भेटैछ तँ दोसर भाग भक्तिक, मुदा विद्यापतिक समग्र कृति पर जखन प्रत्‍यक्ष रूप सँ विचार करैत छी तखन स्‍पष्‍ट भ’ जाइठ जे भारतीय-चिन्‍तन-धारासँ प्रभावित भ’ कए ओ पुरूषार्थ-चतुष्‍टयक उदेदश्‍यसँ समग्र रचनादि कयने रहथि।एहि प्रकारेँ विद्यापति मैथिली-साहित्‍य मे जे परम्‍पराक शुभारम्‍भ कयलनि ओकरा परवर्ती कवि लोकनि अपना क’ रचना कयलनि। विद्यापतिक समसायिक एवं परवर्ती कविलोकनि एहि साहित्‍यक बहुमूल्‍य मेवा कयलनि। हिनक समसामयिक कवि लोकनि मे भवानीनाथ (1375-1450), अमृतकर (1450-1500), चन्‍द्रकला (1400-1475), कंसनारायण (1475-1528), गोविन्‍द कवि (1450-1530), लक्ष्‍मी रागे (1500-1550), नवकवि यशोधर (1500-1550), जीवनाथ (1500), दस-अवधान (1500), सदानन्‍द 1550), भीषम (600), चतुर्भुज (1575-1640), श्‍यामसुन्‍दर (1500), भीषम (1609-1950), गंगाधर (1600) श्रीनिवास मल्‍ल (1640) इत्‍यादि उल्‍लेखनीय छथि। विद्यापतिक परवर्ती मैथिलीक कवि लोकनिक रचनादि केँ प्रोत्‍साहिंत कयनिहार नरेश लोकनि मे कंसनारायणक नाम अग्रगण्‍य अछि जनिक दरबार मे जतेक कवि लोकन रहथि ओ सभ विद्यापति द्वारा चलाओल गीतशैली केँ सर्वाधिक प्रश्रय देलनि जाहि मे उल्‍लेखनीय छथि महाकवि गोविन्‍ददास (1663-4-1670-71)। हिनक एकमात्र रचना ‘श्रंृगारभजनावली’ (1938) प्रकाशित अछि। हिनक कवितादि सॅ श्रृंगारिकताक बोध होइछ, किन्‍तु ओ भक्ति विषयक रचना थिक। बंगालक वैष्‍णक वैष्‍णव भक्‍त कवि हिनका बंगाली बनयबाक प्रयास कयलनि, किन्‍तु ई मिथिलाक रहथि जनिक रचनाक अर्थक दुरूहताक कारणेँ प्रसिद्ध अछि। विद्यापतिक पश्‍चात् ई मैथिलीक दोसर प्रसिद्ध कवि छथि। महाराज कसनारायणक संग हुनका ओही रूपक सम्‍बन्‍ध छलनि जे विद्यापति केँ महाराज शिवसिंहक संग छल। मैथिलीक हिनक पदावली साहित्‍य समस्‍त पूर्वान्‍चल मे एहि नवीन पद्धतिक पोषक सिद्ध भेल। विद्यापतिक उत्तराधिकारी कवि लोकति मे महाकवि लोचन (1650-1725) क नाम अग्रगण्‍य अछि। यद्यपि मैथिली मे हिनक अधिकांश रचनादि नहि उपलब्‍ध भ’ रहल अछि तथापि जे उपलब्‍ध भ’ रहल अछि ओ कलाक दृष्टिसँ उच्‍च कोटिक थिक। किन्‍तु एकमात्र ‘रागतरिङणीग‍ (1924) उपलब्‍ध भ’ रहल अछि। हिनक हाथक लिखल नैषधीय चरित क एक प्रति ललितनारायण मिथिला विश्‍वविद्यालय दरभंगाक पुस्‍तकालय मे सुरक्षित अछि। लोचत संस्‍कृत क निष्‍णात विद्वान, संगीतक मर्मज्ञ आ कवि रहथि। हिनक कवितावली ‘रागतरिडिणी’ मे उपलब्‍ध अछि।ओइनवार वंशक पतनोपरान्‍त अनेक वर्ष धरि मिथिला मे अरकताआ अस्थिरताक स्थिति बनल रहल। पुन: मिथिलाक विद्वान, कवि, संगीतज्ञ आश्रयक अन्‍वेषण मे अपन समीपवर्ती राष्‍ट्र नेपाल चल गेलाह। एम्‍हर दिल्‍लीक सिंहासन पर अकबर केँ बैसबाक पश्‍चात् उत्तरभारतक राजनीतिक स्थिति मे परिवर्त्तन भेल। एही समय मे मिथिलाक शासन-सूत्र खण्‍डलाकुलक महेश ठाकुर (1556-1569) केँ भेटलनि आ दिल्‍ली केन्‍द्र सँ मिथिलाक निकट सम्‍पर्क स्‍थापित भेल। महेश ठाकुरक अधिकांश समय पश्चिम मे व्‍यतीत भेल छलनि, अत: पश्चिमक भाषा-साहित्‍यक एतय प्रचार-प्रसार नहि भेल, प्रत्‍युत स्‍थानीय साहित्‍य मेहो प्रभावित भेल। इएह कारण थिक भेल, प्रतयुत स्‍थानीय साहित्‍य मेहो प्रभावित भेल। इएह कारण थिक जे लोचन राँगेतरिडिगणी मे राग-रागिणीक उदाहरण स्‍वरूप ब्रजभाषाक अनेक स्‍वनिर्मित पद उद्धृत कयलनि अछि।मैथिली साहित्‍यक मघ्‍यकालीन साहित्यिक रचनाक दृष्टिऍं स्‍वर्णकाल कहल जा सकैछ। यद्यपि एहि समयक राजनैतिक दृष्टिसँ उथल-पुथल भेल. किन्‍तु साहित्‍यपर एकर कोनो प्रभाव नहि पड़ल। एहि राजनैतिक उथल-पुथल क कारणेँ मैथिल विद्वत-वर्ग एतय सँ पडा़-क’ नेपाल चल गेलाह। ओ सभ ओहि ठामक राजदरबार मे संरक्षण आ प्रोत्‍साहनक हेतु गेलाह। नेपाल सुसंस्‍कृत शिक्षा-प्रेमी लोकनिक द्वारा मैथिलीक नेपाल मे साहित्यिक भाषाक रूप मे स्‍वीकार कयल गेल। ओहि समय मे मल्‍लवंशक शासल छल। मल्‍ल शासक लोकनि काव्‍य आ नाटकक अत्‍याधिक प्रेमी रहथि। मल्‍ल राजवंशक द्वारा मैथिल साहित्‍यकार लोकनि केँ प्रोतसाहित कयल गेल जकर फलस्‍वरूप मैथिलीक प्रारम्भिक नाट्य-साहित्‍यक रचना नेपाल मे प्रारम्‍भ भेल। विद्यापतिक परिपाटरी पर रचल गेनिहार स्‍वतंत्र पदक अतिरिक्‍त एहि कालावधिक अधिकांश पदनाटक मे गुम्फित अछि। मैथिली गीत सँ गुम्फित संस्‍कृत-प्राकृत नाटकक रचनाक श्रीगणेश ज्‍योतिशीश्‍वर कयने रहथि जकरा उमापति उपाघ्‍याय आगॉं बढौ़लति जे एहि कालावधि मे विशेष प्रचलित भेल। क्रमश: संस्‍कृत प्राकृतक व्‍यवहार कम होमय लागल आम मैथिली मे सम्‍पूर्ण नाटक लिखल जाय लागल। पदावली-साहित्‍यक समान मघ्‍यकालीन नाटक नेपाल आ आसाम धरि व्‍यापक भ’ गेल। एहि एकारेँ मैथिली नाटकक विकास तीन केन्‍द्र मे भेल,मिथिला, नेपाल आ आसाम।नेपालक मैथिली नाटककार लोकनिक कार्य भूमि भातागॉव, काठमाण्‍डू आ ललितपुर पाटन मे रहल। नेपाल मे मैथिलीनाटक संस्‍कृत नाटक परम्‍पराक स्‍थानपर मैथिली नाटकक सूत्रपात भेल। ऐहि समय मे मुसलमानक प्रभाव सँ नेपाल मुक्‍त छल जकर फलस्‍वरूप सांस्‍कृतिक आ साहित्यिक क्रिया-कलाप मे कोतो नरहक व्‍यवधान नहि भेल। एहि प्रकारेँ नेपाल मे मैथिली नाटकक सूत्रपात भेल जे एक भाग अपन नव-शिल्‍पक उत्‍थान मे लागल रहल आ दोसर भाग प्राचीन संस्‍कृत-प्राकृत-मैथिली मिश्रित त्रिभाषिक नाट्य फलाकस्‍वरूप केँ किछु दिन धरि अपन पूर्ववर्ती स्‍वरूप केँ सुरक्षित रखलका नेपाल मे मैथिली नाटकक जे श्रृंखला स्‍थापित भेल ओ कर सब श्रेय मल्‍ल राजवंश केँ छैक। भात गॉव मे प्रचुर परिमाण मे नाटक लिखल गेल आ उल्‍लेखनीय नाटककार मे जगज्‍योतिर्मल्‍ल (1613-1633), जगत्‍प्रकाशमल्‍ल (1637-1672), सुमतिजितामित्रमल्‍ल (1672-1696), रणजीतमल्‍ल (1722-1772),भूपतीन्‍द्रमल्‍ल (1696-17क22) आ श्रीनिवासमल्‍ल (1658-1685) छथि। रणजीतमल्‍ल सबसँ बेसी नाटकक रचना कयलनि। काठमाण्‍डू आ पाटनक उल्‍लेखनीय नाटककार मे वंशमणि आ सिद्ध नरसिंह देव (1622-1657) क नाम लेल जाइत अछि। ई नाटककार लोकनि प्रचुर परिमाण मे नाटकक रचना कयलनि जनहि मे जगज्‍योर्मल्‍ल क हार गौरी विवाह (1970). विश्‍वमल्‍लक विद्याविलाप (1965) आ जगत्‍प्रकाश मल्‍लक प्रभावती हरण नाट्क अदयापि प्रकाशित भ’ पाओल अछि। शेष अन्‍य नाटककार लोकनिक नाटकक प्रकाशन अद्यापि नहि भ’ पाओल अछि जे नेपाल दरबार लाईब्रेरी मे संरक्षित अछि। शेष अन्‍य नाटकादिक प्रकाशनसँ मैथिली नाटकक उदय आ विकास पर नव प्रकाश पडि़़ सकैछ। एहि नाटकादि मे गीतक प्रधानता अछि, कथानक पौराणिक अछि, नाटककार क्‍यो होथु, किन्‍तु ओहि मे प्रयुक्‍त गीतादि अन्‍य कवि लोकनिक उपलब्ध होइछ। सभा नाटक अभिनीयता सँ पूर्ण अछि आ ओकर भाषा मानक मैथिलीक प्रतिमान प्रस्‍तुत करैत अछि। महाराज पृथ्‍वीनारायण साह (1768-1775) क आक्रमणक फलस्‍वरूप मल्‍ल राजवंश द्वारा स्‍थापित परम्‍परा समाप्‍त भ’ गेल आ ओकरा स्‍थान पर गोरखा राजवंशक स्‍थापना भेल। एकर फलस्‍वरूप काठमाण्‍डू आ पाटन मे नाटकक परम्‍परा क समाप्ति भ’ गेल, किन्‍तु भातगॉव मे अद्यापि ई परम्‍परा सुरक्षित अछि।नेपालक उपर्युक्‍त परम्‍पराक क्षीण आलोक मिथिला मे सेहो भेटैत अछि। मिथिला मे जे नाटक लिखल गेल ओकर नाम केँ न’ कए विद्वान लोकन मे मतैक्‍यक अभाव अछि। डा. जयकान्‍त मिश्र (1922-2009) एकरा कीर्त्त‍िनयॉं नाटक रसानाथ झा (1906-1971) कीर्त्तनियॉं नाच आ डा. प्रेमशंकर सिंह (1942) लीला नाटक नामसँ अभिहित कयलनि अछि। एहि नाटककादि मे मूलरूप सँ शिव तथा विष्‍णु क लीला प्रस्‍तुत कयल गेल अछि। एहि नाटककदि केँ नाट्य मण्‍डली आदि कृष्‍ण आ शिवसम्‍बन्‍धी विविध कथादि केँ आधार बना क’ प्रदर्शन करैत छल. एहि कोटिक नाटक मे उपलब्ध सामग्री सभकेँ तीन काल खण्‍ड मे बाॅटल जा सकैछ: प्रथम उत्‍थान, द्वितीय उत्‍थान आ तृतीय उत्‍थान । प्रथम उत्‍थानक नाटककार मे गोविन्‍दक नलचरितनाटक रामदास (1644-1671) क आनन्‍द विजय नाटक, देवानन्‍दक उषाहरण आ रमापतिक रुकिमणीहरण इत्‍यादिक नामोलेख कयल जा सकैछ। द्वितीय उत्‍थानक उल्‍लेखनीय नाटककार लोकनि मे लाल कविक गौरीस्‍वयंवर (1960), नन्‍दीपतिक कृष्‍णकेलि माला नाटक (1960), गोकुलानन्‍द क मानचरित नाटक, शिवदतक पारिजात हरण, कर्णजयानन्‍दक रुकमागद नाटक श्रीकान्‍त गणक श्रीकृष्‍ण जन्‍म रहस्‍य, काल्‍हारामदासक’ गौरी स्‍वयंवर नाटक, रत्‍नपाणिक उषाहरण नाटिका, भानुनाधक प्रभावती हरण आ हर्षनाथ झा (1897-1898) क उषाहरण, माछवानन्‍द एवं राधाकृष्‍ण मिलन लीला (1962) आदि साहित्यिक दृष्टिसँ उल्‍लेख नीय अछि।तृतीय उत्‍थानक नाटककार मे विश्‍वनाथ झा क रमेश्‍वरचत्‍न्द्रिक चन्‍दा झा क अहिल्‍या चरित नाटक महामहोपाघ्‍याय परमेश्‍वर झा क महिषासुर मर्दनी आ राज पण्डित बलदेव मिश्र (1897-1975) क राजराजेश्‍वरी एवं रमेशोदय नाटक’ उल्‍लेखनीय थिक। एहि मे सँ किछु नाटक अनुसंधाना लोकनिक अथक प्रयास सँ प्रकाश सँ प्रकाश मे आयल अछि, किन्‍तु अधिकांश अद्यपि अप्रकाशित अछि। ई नाटककार लोकनिक नाटकादि मे नाटकीयताक अभाव परिलक्षित होइत अछि तथापि एहि कालक नाटकक बुझैत दीपक क्षीण आलोकक अभास भटैत अछि।मैथिली नाटकक विकसित आ सुव्‍यवस्थित स्‍वरूप हमरा असम मे उपलब्‍ध होइत अछि। महाप्रभु वैतन्‍यक वैष्‍णव धर्मक समस्‍त पूर्वाचल क भारतीय साहित्‍य पर यथेष्‍ट परिमाण मे पड़ल जकर परिणाम भेल जे साहित्‍य पूर्णत: भक्तिमय भ’ गेल। फलत: साहित्‍य मे रसक दृष्टिसँ विशेषत: कृष्‍णक अवतार लीला कथा केँ अधिक प्रश्रय देल गेल। वैष्‍णव कवि लोकनिक अभिव्‍यक्तिक भाषा अन्‍धकारमय छल। विद्यापतिक श्रृंगार रसक पदावली मे राधाकृष्‍णक उल्‍लेख रहलाक कारणेँ चैतन्‍यदेव ओकरा भक्तिरस क कविता बुझलनि। ओ वैष्‍णव धर्मक प्रचारार्थ विद्यापतिक कविता केँ माघ्‍यम बनौलनि। जखन विद्यापतिक भाषा आसाम पहुँचल तखत युगपुरूष शंकरदेव (1449-1568) आ हुनक शिष्‍य माधवदेव (148951556) विद्यापतिक भाषाक अनुकरण क’ कए ओकरा संग असमिया केँ मिश्रित क’ कए एक नूतन भाषा ब्रजबुलिक जन्‍म देलनि। आसमाक ब्रजबुलि असमिया साहित्‍यक मेरूदण्‍ड थिक। एकरा माघ्‍यम सँ असमिया-साहित्‍य रस-समृद्ध भेल अछि। एक दू रूप थिक: वरगीत आ अडयानाट। युगपुरूष शंकरदेव वैष्‍णव धर्मक प्रचारार्थ नाटक केॅं माघ्‍यम बनौलनि। अडीयानाट मे गद्य आ पद्यक समविभाग थिक। सबसँ आश्‍चर्यक बात थिक जे महापुरूष शंकरदेव विशुद्ध आसमिया मे रचना कयलनि, मुदा विद्यापतिक भाषासँ ओ एतेक अधिक प्रभावित भेलाह जे मैथिली-मिश्रित असमिया मे वरगीत आ नाटकक रचना कयलनि। असमी साहित्‍य मे एकर एहि विशिष्‍टता पर प्रकाश दैत अछि। डा. वाणीकान्‍त कातकी क कथन छनि, जाहि प्रकारेँ प्रचण्‍ड वात्‍या वन मे लागल दत्‍वागिन केँ प्रज्‍वलित करबा मे सहायक होइत अछि ओही प्रकारेँ साहित्‍य जातीय एवं महाजातीय आन्‍दोलन केँ प्रेरित करैछ। नाटक, गीत एवं पद ई तीनू शंकरदेवक वैष्‍णव-आन्‍दोलन केँ शाक्‍त प्रदेश मे एतेक व्‍यापक आ लोकप्रिय बनौलक जाहि प्रकारेँ मरूभूमिक ऊँट जलक गन्‍ध-सूत्र पकडि़ क’ जलाशयक खोल मे चलि पडैछ ओही प्रकारेँ तृषित जनता वरगीतक सौरभसँ आकृष्‍ट भ’ कए शंकर माधवक शरणापन्‍न भेलाह असमिया साहित्‍य, 510 वाणी कान्‍ता काकती)।युगपुरूष शंकरदेव अपन तीर्थ-यात्राक क्रम मे विद्यापति क वैष्‍णव-सम्‍प्रदायक गुरुमानि मिथिला अयलाह। ओहि समय मैथिली-काव्‍य आ नाट्य-साहित्‍य विकासक अपन चरमपर छल। उमापति उपाघ्‍याय रचित पारिजातहरण क अभिनय अत्‍यधिक भ’ रहल छल। एकर विषय-वस्‍तु मेहो राधाकृष्‍ण छल। पारिजात हरण अभिनीत होइत देखि क’ प्रयोक्‍ता शंकरदेव अत्‍याधिक प्रभावित भेलनाह। एस. के. भूइयॉंक मातानुसार, आङयानाटक भाषा मैथिलीक तथा आसमियाक मिश्रणक विलक्षणक विलक्षण उदाहरण प्रस्‍तुत करैत अछि। ‘(On Ak.ik.a NAT, S शंकरादेव अपन अद्वितीय प्रतिभा आ अप्रतिभ वैदुण्‍यक बल पर असमिया साहित्‍य मे अडीया नाटक जनकक रूप मे प्रख्‍यात छथि। नाटककार लोकनि पुराणादि सँ उपादान क चयन कयलनि आ एहि सन्‍दर्भ मे भागवत पुराण, हरिवंश पुराण एवं रामायण हुनक प्रधान उपजीव्‍य रहल। शंकरदेवक निम्‍नांकित नाटक कालिदमन (1518), पत्‍नीप्रसाद (1521), केलिगोपाल (1540), रामविजय (1568), रुक्मिणी हरण (1568) एवं पारिजात हरण (1568) आ माधवदेवक भोजनविहार, भूमि लोटवा, अर्जुन भंजन (1538), विम्‍परा-गुचोबा, रासझुमरा, चोरधरा, कटोरा-खेलोबा, भूषण हेरोवा एउवं ब्रहमा-मोहन आदि प्रकाशित आछि। एकर अतिरिक्‍त गोपाल अता (1533-1688), द्विजराजभूषण (1507-1571), रामचरन ठाकुर (1521-1600) आ दैत्‍यारि ठाकुर (1564-1622) आदि नाटककार उल्‍लेखनीय छथि। यद्यपि एहि नाटक सभक कथा-वस्‍तु पौराणिक रहल, किन्‍तु संस्‍कृत और प्राकृतक स्‍थान पर मैथिली-असमिया-मिश्रित गद्यक प्रयोग भेल। गीतक स्थिति यथावत रहल, किन्‍तु संस्‍कृत-प्राकृतक प्रयोग नहि कयल गेल जतय ओ अनिवार्य छल। एहि नाटकादिक उद्देश्‍य मनोविनोद नहि, प्रत्‍युत वैष्‍णव धर्म प्रचार करब छल। एहि लेल अधिकांश नाटकादि मे कृष्‍णक वात्‍सल्‍यमय आ दासत्‍व भावक पूर्ण लीलाक रूप मे वर्णन कयल गेल। रंगमंचक दृष्टिसँ ई अधिक सुव्‍यवस्थित अछि।एहि नाटकादि विषय-वस्‍तु, रूप-रचना, भाषा आदि विशिष्‍टता केँ देखलासँ प्रतिभाषित होइत अछि जे युगपुरूष शंकरदेव असमक लोक मनोरंजनक विधा पर मैथिली आ ब्रज क्षेत्र मे प्रचलित रंग-शैलीक आरोपन ओहिना कयलनि जेना संस्‍कृत नाटकक शास्‍त्रोक्‍त परम्‍परा छल, कारण नाटकक माघ्‍यमसँ ओ वैष्‍णव धर्मक प्रचार-प्रसार करय चाहैत छलाह। मघ्‍यकालीन अन्‍य उल्‍लेखनीय सामग्री सभ मे मैथिली गद्यक प्राचीन परम्‍परा केँ जोडबाक निमित प्राचीन दस्‍तावेजादि मे एक एकरनामा, गौरीव चटिका, बहिखत, अजातपत्र, एकरपत्र, निस्‍तार पत्र, दानपत्र, फैसलापत्र आ चिट्ठी-पत्री उपलब्‍ध होइत अछि। एहि अभिलेखादि मे शायत्र कतहु साहित्यिक सौन्‍दर्य भेरैछ। मैथिली साहित्‍य मे एकर महत्‍व एहि बात केँ ल’ कए अछि जे सब मैथिली गद्यक विकास-क्रम विच्छिन्‍न परम्‍पराक पूर्ति करैत अछि। पद्य-काव्‍यक परम्‍परा तँ पूर्णवते रहल, किन्‍तु एहि युग मे महाकाव्‍य, चरित-काव्‍य, सस्‍मर आदि लिखबाक परम्‍पराक शुभारम्‍भ भेल। नव राजनैतिक, सांस्‍कृतिक, सामाजिक आ साहित्यिक स्‍वरूपक जन्‍म भेल आ मैथिली मे नवयुगक प्रारम्‍भ भेल। एहि समय मे डा. सरजार्ज अब्राहम ग्रियर्सन द्वारा संकलित एवं सम्‍पादित रचनादि मे मैथिली कस्‍टोमैथी (1882) तथा ट्वेन्‍टी वन वैष्‍णव हिम्‍स (1884), भोल झा द्वारा सम्‍पादित मैथिली गीत संग्रह (चारि खण्‍ड) (1917), लतितेश्‍वर सिंह द्वारा सम्‍पादित मैथिली संस्‍कृत भक्ति गीतादिक संग्रह, मैथिल भक्‍त प्रकाश (1920) आ जितेन्‍द्र नारायण झा द्वारा संकलित आ कविशेखर बदरीनाथ झा (18931974) द्वारा सम्‍पादित मैथिली गीतरत्‍नावली उल्‍लेखनीय अछि। एहि काल खण्‍ड मे गीतिकाव्‍य क परम्‍पराक विकास भेल। विद्यापतिक परम्‍पराक अतिरिक्‍त गीति-काव्‍यक काव्‍यकार भेलाह ओहि मे भञ्जन कवि, लालकवि, कर्णश्‍याम अछि प्रमुख छथि।परवर्त्ती मघ्‍यकाल मे एक नव-धारा चलल जकरा सन्‍त काव्‍य क नाम सँ सम्‍बोधित कयल जाइछ जकर आधार स्‍तम्‍भ मे साहेबराम दास (लगाधक 1746), महात्‍मा रोहिणीदत्त गोंसाई, महात्‍मा तारादत्त गोंसाई, महात्‍मा रामरूपदास, महात्‍मा लक्ष्‍मीनाथ गोंसाई (1787-1872)महात्‍माहरिकिंकरदास,महात्‍मा रामरूपदास, महात्‍मा हकरू गोंसाई, महात्‍मा परमानन्‍द दास आ रघुवर गोंसाई प्रमुख छथि। लक्ष्‍मीनाथ गोंसाई क गीतावली (1969) मे प्रकाश मे आयल अछि।विद्यापतिक श्रृंगार-प्रधान गीत परम्‍पराक विपरीत मनबोध (निधन 1788) कथा काव्‍यक माघ्‍य मे कृष्‍णजन्‍म (1934) क रचना कयलनि। हिनक लोक प्रियताक प्रमुख कारण थिक जे ई ग्राम्‍य-शब्‍दादिक स्‍वच्‍छन्‍द भ’ कए प्रयोग कयलनि। इएह कारण अछि जे मैथिली साहित्‍य मे हिनक महत्‍वपूर्ण स्‍थान अछि।अनेक दृष्टिऍं मैथिली साहितयक आधुनिक काल मे अत्‍याधिक आधुनिकताक आभास भेटैत अछि। सन् 1857 ई. क सिपाही विद्रोह क पश्‍चात् भारत वर्षक राजनैतिक क्षेत्र मे बड पैध परिवर्त्तन भेल जाहि सँ साहित्‍य मेहो अछूत नहि रहल। जतय अन्‍यान्‍य भारतीय भाषादि मे साहित्‍य मे गद्यक दिशा मे अत्‍याधिक प्रगति भेल ततय मैथिली उपेक्षित रहल। एकर प्रमुख तत्‍व छल फोर्ट विलियम कालेज क द्वारा उपेक्षा, मिशीनरी द्वारा उदासीनता, लिथो आ टाइप प्रेसक अभाव, समाज सुधार सम्‍बन्‍धी आन्‍दोलनक अभाव, नव-शिक्षा योजना आ कचहरी क भाषा मे मैथिलीक उपेक्षा, मैथिल पण्डित लोकनिक संकीर्ण दृष्टिकोण तथा मैथिली भाषा-भाषी मे जनजागरणक अभाव। एहि दिशा मे उपर्युक्‍त उपेक्षा नीतिक फलस्‍वरूप मैथिली भाषा-भाषी जतय रहथि ततय एहि गेलाह। आधुनिक युग मे एहि साहित्‍यक जे प्रगति भेल अछि ओकर एवं श्रेय कवीश्‍वर चन्‍दाझा, लालदास आ साहित्‍यरत्‍नाकर मुंशी रघुनन्‍दन दास केँ छनि जे मौलिक, अनूदित रचनाक द्वारा मैथिली साहित्‍यक श्रृंगार कयलनि।मैथिली मे पत्र-पत्रिकादिक प्रकाशन क फलस्‍वरूप गद्य-साहित्‍यक विकास भेल जकरा माघ्‍यमे सुन्‍दर भाषाक निर्माण भेल, शब्‍द-भंडार मे श्रीवृद्धि भेल आ विश्‍वविद्यालय स्‍तर पर मैथिली केँ पाठ्य-विषयक रूप मे स्‍वीकार कयल गेल। बीसम शताब्‍दीक प्रारम्भिक दशक मे मैथिली मे पत्र-पत्रकादिक प्रकाशनक शुभारम्‍भ भेल जकर फलस्‍वरूप आधुनिक गद्य-साहित्यिक विकास मे तीवता आयल। मुद्रण कलाक नवीन वैज्ञाानिक प्रगतिक फलस्‍वरूप पत्रिकादिक प्रकाशन मे जोरदार प्रगति भेल। मैथिली पत्रकारिताक प्रारम्भिक अवस्‍था तप, उत्‍सर्ग आ पीडा़दायक रहल अछि। मैथिलीक सर्वप्रथम पत्रिका मिथिलेतर क्षेत्र जयपुर सँ प्रकाशित भेल मैथिल हित साधन (1905)। एकर प्रकाशनक दोसर वर्ष काशीसँ मिथिलामोद (1906) क प्रकाशन भेल। मिथिलामोद मातृभाषाक जागरणक जे शंखनाद कयलक ओकरा निरर्थक नहि कहल जा सकैछ, कारण मैथिलीक आडण्‍न मे बैह शंखनाद क्रान्तिक स्‍वर बबल। निर्भीकता, व्‍यंग्‍य, मैथिलीत्‍वक समर्थन, मैथिली भाषाक ओजस्विता एहि पत्रिकाक प्रधान गुण छन। मिथिला सँ मिथिला मिहिर (1907) मे उदित भेल। प्रारम्‍भ मे एकर स्‍वरूप मासिक रहल आ पाछॉं जा क’ ई साप्‍ताहिक भ’ गेल। मैथिली मे ई पत्रिका दीर्घजीवी रहल। सन् 1960 ई सँ 1989 धरि ई प्रकाशित होइत रहल। जतय धरि मैथिली मेवाक प्रश्‍न अछि एकर योगदान सराहणीय रहल। एकरा द्वारा गद्य केँ अभिवर्द्धित करबाक उश्‍य सँ उत्‍प्रेरित भ’ कए वर्त्तमान गद्य-गंगा विविध रूप सँ समलंकृत भेल अछि। स्‍वातन्‍योत्तर काल मे मैथिली गद्य-साहित्‍यक विकास विभिन्‍न विधा यथा उपन्‍यास, कहानी, निबन्‍ध, आलोचना, यात्रा, संस्‍मरण, साक्षात्‍कार आदि गद्यक संभावित विधादिक विकास मे एकर बहुमूल्‍य योगदान रहल। प्रथम विश्‍व युद्ध क पश्‍चात् मैथिली पत्रिकादिक प्रकाशान मे तीवता क संचार भेल। एहि कालावधि मे अनेक पत्रिकादि प्रकाशित भेल जे साहित्यिक जागरण मे सहयोग दैत रहल। ई पत्रिकादि मातृभाषाक प्रति जे शिक्षित जनमानसक घ्‍यान आकृष्‍ट होइत रहल जकर प्रतिफल ने तँ एकरा अवश्‍ये कहब। मैथिल प्रभा (1920-1926, मैथिली प्रभाकर) (1929-1930), श्री मैथिली (1925-1927), मिथिला (1929-1931), मिथिलामित्र (1931-1932), मैथिल बन्‍धु (1935), मैथिलयुवक (1931-1941), जीवन-प्रभा (1940-1950), भारती (1937), विभूति (1936-1938), मैथिली साहित्‍यपत्र (1937-1938) आदि अनेक पत्रिकादि साहित्‍यक जागरण मे सहयोग दैत रहल अछि।देशक स्‍वाधीनताक पश्‍चात् तँ मातृभाषादिक महत्‍व आर वेसी बढि गेल अछि। जनसाधारणक घ्‍यान मातृभाषाक दिस गेल आ सचेष्‍ट एवं जागस्‍क भ’ कए एकर विकास मे संलग्‍न भेलाह। स्‍वतंत्रताक प्रभात मे स्‍वदेश (1948) क अभ्‍युदय भेल। पटना सँ मिथिला ज्‍योति (1949) प्रकाशित भेल। सीतामढी सँ वैदेही (1950) प्रकट भेल। मातृभाषाक एहि नवोत्‍थाान मे मिथिला दर्शन (1952), पल्‍लव (1948), मिथिला मेवक (1954), निर्माण (1955), इजोत (1960), मिथिला दूत (1954), बटुक (1949) घीयापूता (1957), कर्णामृत (1981), अन्तिका (1998), पूर्वातर मैथिल (2000) एवं घर बाहर (2001) इत्‍यादि सब पत्रिकादिक योगदान अछि।मैथिली मे एहि पत्रिकादिक महत्‍व समाचार पत्रक रूप मे नहि बछि। साप्‍ताहिक पत्रिकादि मे देश-विदेशक थोड बहुत समाचार छपैत छल तथापि ई समाचार पत्र कहयबाक अधिकारी नहि। यद्यपि ई समाचार पत्र स्‍थाई रूपेँ नहि चलि सकल, तथापि ई प्रमाणित क’ देलक जे जँ समुचित व्‍यवस्‍थाक संग समाचार पत्र चलाओत जाय तँ मैथिली प्रेमी जनमानसक सहयोग निश्‍चये भेटत।ई पत्रिकादि मैथिलीक विकास मे अति महत्‍वपूर्ण भूमिका क निर्वाह कयलक। एहि पत्रिकादिक साहित्यिक महत्‍व अछि। पत्रिकादि सँ मैथिली साहित्‍यक विकास मे अपेक्षित सहायता भेटल। ई गद्यक प्रवर्द्धन कयलक, ज्ञानक प्रवार कयलक, मातृभाषा मे मनोरंजक साहित्‍य केँ प्रोत्‍साहित कयलक तथा मातृभाषानुरागी पाठक वर्ग क निर्माण कयलका एकरा संगहि प्रेरणा आ प्रोत्‍सा‍हनक फलस्‍वरूप नव लेखकक दल तैयार भेल जे मैथिलीक श्रृंगार-विन्‍यास मे लगन सँ संग देलनि। मिथिला पत्रिकादि पर ई एक नव दायिच्‍व छल जे ओ मैथिली केँ न्‍यायोचित स्‍थान दियबा मे संघर्ष करय। एहि दिशा मे सफलता मेहो भेटल। सरकारी काज मे तँ नहि परन्‍तु शिक्षा-विभाग मे मैथिली केँ स्‍थान भेटि गेल। देशक स्‍वाधीन भेलाक पश्‍चात् उपर्युक्‍त पत्रिकादि पर आरो दायिच्‍व आबि गेल अछि। मैथिलीक संग मिथिला आ मैथिलक स्‍वर मेहो उग्र रूप धारण क’ रहल अछि। मातृभाषाक प्रति ममत्‍वक संगहि-संग राजनीतिक आ आर्थिक दृष्टि कोण मेहो व्‍यापक भ’ गेल अछि। मैथिली पत्रिकादि एकर सफल नेतृत्‍व करैत अछि। एहि पत्रिकादिक माघ्‍यमसँ एकर शैलीक यथार्थ स्‍वरूपक निर्धारण कयल गेल आ गद्यकेँ व्‍याकरणक कठोर नियमादि सँ बान्‍हल गेल। एतबा स्‍वीकार करय पडत जे एहि पत्रिकादिक माघ्‍यमे गद्य केँ एक अभिनव दिशा भेटल।सामाजिक जागृत, राजनीतिक असन्‍तोष आ पत्रिकादिक प्रकाशनक फलस्‍वरूप निबन्‍ध महत्‍वपूर्ण साहित्यिक विधाक उदय भेल विचार आ विषयक बन्‍धन नहि रहबाक कारणेँ आत्‍म-प्रदर्शन, ज्ञान-गरिमा, बहुश्रुतता तथा सूक्ष्‍म पर्यवेक्षणक झलक रहबाक कारणेँ ई साहित्यिक महत्‍व प्राप्‍त क’ सकल। वास्‍तव मे आधुनिक मैथिली गद्य मे निबन्‍ध प्रारम्भिक युग सँ उपलब्‍ध भ’ रहल अछि, मुदा एकर समुचित विकास बीसम शताब्‍दी मे आबि क’ भेल अछि। मैथिल हित साधन, मिथिलामोद, मिथिलामिहिर, श्रीमैथिली, मिथिला, भारती, विभूति, कर्णामृत, वैदेही, मिथिला दर्शन आदि पत्रिकादिक प्रकाशनक फलस्‍वरूप ई विधा आर पुष्‍टतर भेल अछि। आरम्‍भ मे सामयिक, सामाजिक एवं साहित्यिक आदि विविधाविधादि क संगहि-संग अनेक उपदेशात्‍मक निबन्‍ध लिखल गेल। एकरा संगहि-संग अनेक विषयादि पर पाण्डित्‍व पूर्ण आ गम्‍भीर निबन्‍धक रचना भेल। पत्रिकादिक सम्‍पादकीयक माघ्‍य मे निबन्‍धक विषय, शैली कथ्‍य आ प्रभाव सभ रूप मे एकर परिधिक परिधिक विस्‍तार कयल गेल,गद्य केँ परिमार्जित कयल गेल। मिथिला मोदक सम्‍पादक महामहोपाघ्‍याय मुरलीधर झा (1869-1929) आ मिथिला मिहिर सम्‍पादक सुधांशु शेखर चैधरी (1920-1990) तथा अन्‍य पत्रिकादिक सम्‍पादक जे प्रख्‍यात साहित्‍यकार रहथि, विशिष्‍ट गद्यकार रहथि जनिका द्धारा लिखल गेल सम्‍पादकीय निबन्‍धादि केँ पुस्‍तकार संकलित नहि कयल गेल अछि जे प्रमाणिक इतिहास, साहित्‍यक इतिहास, समाजक इतिहास ओहि सम्‍पादकीय निबन्‍धादिक दुइ संग्रह प्रकाश मे आयल अछि जाहि मे लक्ष्‍मण झा (1916-2000) क विचार चिन्‍तामणि (2002) एवं भीमनाथ झा (1945) क लघूतरीय (2003)।सम्‍पूर्ण मैथिली निबन्‍ध-साहित्‍य केँ चारिभाग मे विभाजित कयल जा सकैछ: i अभ्‍युत्‍थान युग 1906-1920 i परिमार्जन युग 1921-1947 ii उत्‍कर्ष युग 1947-1960 iv प्रसरण युग 1960 क पश्‍चात्। मैथिली निबन्‍ध साहित्‍यक विकास क्रम उद्भव आ अभ्‍यास, प्रयत्‍न आ निर्माण, उत्‍कर्ष आ परिष्‍कार तथा प्रसार आ प्रसाधनक अवस्‍था मे निरन्‍तर गतिशील आ विकासोन्‍मुख रहल अछि। विषय आ शैलीक दृष्टिसँ एहि मे विविधता भेटैत अछि। मैथिली मे अदयापि प्रकाशित निबन्‍धादिक वर्गीकरण आ निबन्‍धकारक पैध सूची प्रस्‍तुत करब कठिन अछि, मुदा ओकरा विचारात्‍मक, वर्णनात्‍मक, भावनात्‍मक, आलोचनात्‍मक अवश्‍य कहि सकैत छी। वर्तमान सन्‍दर्भ मे आत्‍म-चरित, जीवनी, संस्‍मरण, इतिहास, भूगोल, दर्शन, धर्म आदि विषयादि केँ घ्‍यान मे राखि क’ अनेक निंबध लिखल गेल अछि। एहि रचनादिक विश्ष्टिता एहि विषय केँ ल’ कए अछि जे एहि‍ मे निबन्‍ध शैली मे नवीनताक आभास भेटैत अछि। एहि मे युग चेतन्‍तक प्राणवता नियोजित अछि। ई वैयक्तिक, सामाजिक, साहित्यिक आ शास्‍त्रीय भूमि पर संवरण करैत स्‍वच्‍छन्‍दता आ कलात्‍मकता एवं भौतिकता यथार्थोन्‍मुखताक दिशा मे अग्रसर भ’ रहल अछि। व्‍यक्ति आ विषय, कला आ शास्‍त्र, संवेदन आ चिन्‍तन क स्‍वर एहि मे संप्रयुक्‍त आ आस्‍वाद्य अछि। मैथिली निबंध व्‍यक्ति आ विषय तटक बीच प्रवाहित भ’ रहल अछि। अद्यतन परिणति एहन अछि जे मूलधारा सँ विकसित भ’ विषय आ व्‍यक्ति विषयक प्रवाह मे दू नहरक समान पृथक्-पृथक् सौन्‍दर्य उद्घाटित क’ सकल अछि जेना प्रगतिवादी आ आत्‍म-केन्द्रित निबंध।मैथिली निबंध क्रम विकास स्‍वरापूर्ण आ समृद्ध युक्‍त अछि। ओहि मे प्रौढता, परिवर्त्तनक अतिरिक्‍त वस्‍तु, दृष्टिकोण, रूप-शैली आ भाषा-प्रयोग क वैविघ्‍य अर्जित कयलक अछि। एहि विधाक एक अपन पहचान अछि जे कालान्‍तर मे मैथिली साहित्यिक गौरव मानल जायत। एहि प्रकार निबन्‍धकारक भाव-प्रवणता, हार्दिकता, कल्‍पनाशीलता एवं स्‍वच्‍छन्‍द प्रवृत्तिक परिणाम स्‍वरूप मैथिली निबन्‍ध साहित्‍य अपन नव पल्‍लव सँ पल्‍लवित कयलक अछि। खट्टर ककाक तरंग (1948) कनाम सँ प्रकाशित हरिमोहन झा (1908-1984) क कृति हुनका विशिष्‍ट निबन्‍धकारक परिचय दैत अछि। एहि मे लेखक अत्‍यन्‍त कुशलतापूर्वक व्‍यक्ति, समाज, धर्म, दर्शन आदि सभक आलोचना प्रस्‍तुत कयलनि अछि। थैकरे जकरा राउण्‍ड एपाउट पेपर्स, कहलनि वैह विश्ष्टिता हुनक निबन्‍धा हिमे परिलक्षित होइत अछि। एहिमे संग्रहीन प्रत्‍येक निबन्‍ध वार्त्तालाप रूपमे अछि जाहिमे बाकू विलासक चातुर्य्यक सगहि वस्‍तु-विन्‍यासक अदयुत कुशलता देखबाक हेतु भेटैछ। हास्‍य-व्‍यंग्‍य एवं उवितक दृष्टि सँ ई बिन्‍ध लेखकक मैलिक प्रतिभाक परिचायक थिक। हमर निबन्‍ध साहित्‍यक परिसर मे स्‍केच, रिपार्ताज, संस्‍मरण सहरा विषयकेँ सम्मिलित क’ लेल जाइत अछि। किन्‍तु सत्‍य बाततेँ ई थिक जे ई सभ विधादि हमरा ओतय प्रासम्भिकावस्‍थहि मे रहल अछि। मैथिली निबन्‍ध साहित्‍य मैथिली गदयक विकासमे अत्‍यधिक फलत: गदयकेँ विविध प्रकारक विचारदिक अभिव्‍यक्ति माध्‍यम बनय पड़ल जकर फल स्‍वरुप एहि विधामे पण्डित लाल दास कस्‍त्रीधर्म शिक्षा (1910), राधाकृष्‍ण चौधरीक साहित्यिक निबन्‍धावली (1950) एवं शारान्ति धा (1968), रमानाथ झा क निबंधमाला (1370साल) एवं प्रबन्‍ध संग्रह (1317 साल) शैलेन्‍द्र मोहन झा (1929-1994) क पथहेरथि राधा (1963), उमेश मिश्र (1895-1967) क मैथिल संस्‍कृति ओ सम्‍चता (1960), बलदेव मिश्रक ‘शिक्षु शिक्षा (1952), गपशप विवेक (195A), भारत शिक्षा (1955), रामायण शिक्षा (1965), संस्‍कृति (2006संवत्) अमरनाथ झा (1937) क दुतनिलचिल ओ अन्‍य निबन्‍ध (1979) इत्यादि उल्‍लेख्‍य योग्‍य प्रकाशन जनमानसक समक्ष आयल अछि। ओनातँ मैथिली कथाबीज रुपमे कीर्तिलता मे उपलब्‍ध अछि, किन्‍तु गदयक विकास क हछि सँ आधुनिक मैथिली कथा सहित्यिक विधादि मे सर्वधा नवीनतम अछि। एकर क्षेत्र विस्‍तृत अछि। यदयपि प्रारम्भिक कथादिमे सुधारवादी प्रवृत्तिक परिचय भेटैत अछि तथायि आगाँ जा क’ कथाकार लोकनिक ध्‍यान वातावरणक निर्माण आ चरित्र-चियण हिस गेल आ शिल्‍यक दृष्‍ट सँ मेहो महत्पूर्ण परिवर्त्तन भेल। वस्‍तुत: एहि साहित्यिाक विद्याक उन्‍नैसम शताब्‍दी सँ मानल जाइत अछि। अधुनातन तथ्‍य अछि जे ओहिमे मानब जातिक आधुनिक आ नव संवेनादि केँ व्‍यक्‍त करबाक शक्ति अन्‍य सब साहित्यिक विधादिक तुलनामे सर्वाधिक अछि। मैथिली साहित्‍यमे कथा विकास बीसम शताब्‍दीक तृतीय दशक सँ पहिने नहि भ्‍ा’ सकल। तहयो ई मानय पड़त जे एकरा लेल भूमि निर्माण पहिनहि भ’ गेल छल। आधुनिक मैथिली साहित्‍यक नव जागरणक जे इतिहास प्रारम्‍भ होइत अछि, ओहिमे संस्‍काृतक विद्वान् ला कन्तिक हाथ छल, जनिका अंग्रेजी शिक्षा सँ कोनो सम्‍बन्‍ध नहि छल, तथापि अन्‍यान्‍य भारतीय भाषाक नव विकासक प्रेरणा पाबि क’ मैथिली कथा केँ नव रूप देबाक लेल प्रवृत भेलाह। उन्क्षैसम शताब्‍दीक अन्तिम दशक मे कवीश्‍वर चन्‍दा झा द्वारा पुरूष-परीक्षाक अनुवाद सँ ल’ कए बीसम शताब्‍दीक प्रथम तीन दशकक अधिकांश कथा साहित्‍य अनुवाद अछि अथवा उपाख्‍यान मात्र पर आधारित अछि, जाहि मे भौतिकताक अभाव, गतिहीनता एवं चरित्र-चित्रण कवन दृष्टिकोणक अभाव अछि, तथापि जतय धरि साहित्य मे चैतन्‍य अनबाक प्रश्‍न अछि, कथाक विकासक दृष्टिसँ पृष्‍ठभूमिक प्रश्‍न अछि, ओंकर स्‍थायी मूल्‍य छैक। मैथिली कथाक विकास केँ लक्ष्‍य क’ कए 1920 ई. क काल केँ भूमिका काल कहि सकैत छी। एहि समय धरि कथा स्‍वस्‍थ नहि भ’ सकल। एहि अ‍वधि मे संस्‍कृत उपाख्‍यान केँ ग्रहण क’ कए लिखबाक प्रचुरता रहल। एहि भूमिका कालक कतिपय घटना महत्‍वपूर्ण अछि। सुधारवादी आन्‍दोलन, स्‍वदेशी आन्‍दोलन सदृश आन्‍दोलन बुद्धि जीवी मानस केँ प्रभावित क’ रहल छल । वस्‍तुत: मैथिली कथा साहितयक विकास पर विचार करैत एकरा: i प्रारम्‍भ युग 1920-1935ई. ii प्रगति युग 1935-1946 ई. iii प्रयोग युग 1947-1960 ई. iv विस्‍तार युग 1960-2000 ई. मैथिली कथाक विकास क्रम मे दू कथाक चर्चा करब विशेष रूप सँ आवश्‍यक भ’ जाइत अछि। ओ रहथि काली कुमार दास लिखित भीषण अन्‍याय (1923) तथा भोल झा रचित मनुष्‍यक मोल (1924)। एहि दूनू कथा मे आधुनिक शिल्‍प तथा वस्‍तुक प्रति संचेतना देखल जाइत अछि। एकर पश्‍चात् मैथिली गद्यक विकास तीव्रगति सँ होमय लागल।ई कहब कठिन अछि जे मिथिला मोद, मिथिला मिहिर आ मैथिली प्रभाक नीति एहि नव कथा शिल्‍पक प्रति केहन छल। सन् 1920 ई. क पश्‍चात् विभिन्‍न समयादि पर कथाकार साहित्‍यक क्षेत्र मे प्रवेश करैत रहलाह। परन्‍तु एकरा संगहि-संग तरुण प्रतिभाशाली कथाकार लोकनिक दोसर दल मेहो प्रस्‍तुत भ’ रहल छल जनिक प्रतिभा, चेतना एवं कथा-शिल्‍प क चमत्‍कार विशेष रूप सँ सन् 1935 ई. क पश्‍चात् देखबाक हेतु भेटैछ। पूर्व स्‍वतंत्रता युग मे अनेक प्रशस्‍त कथाकार साहितय क्षेत्र मे प्रवेश कयलनि, किन्‍तु हुनक परिपक्‍व शैली कथादि स्‍वाधीनता प्राप्तिक पश्‍चाते प्रकाश मे आयल।मैथिली कथा केँ लोकप्रिय बनयाबाक श्रेय हरिमोहन झा केँ छनि। प्रणम्य देवता (1945) क कथादि जकरा कथाकार कटाक्षपूर्ण रेखाचित्र कहलनि, प्रधानत: सामाजिक जीवनक आलोचनादि प्रस्‍तुत करैत अछि। सबसँ पैघ विलक्षणता तँ हुनक उपस्‍थापन शैली सम्‍बन्‍धी मौलिकतादि छनि। प्राचीन कथा-पद्धति केँ ग्रहण क’ कए गम्‍भीर सँ गम्‍भीर विषयादि केँ सरस सुस्‍वाद बन क’ जन-मन-रंजन क संगहि रूढिग्रस्‍त, जीर्ण-शीर्ष विचारधारा पर कशाधात क’ कए नव प्रगति क प्रेरणा दैत छथि। ने तँ हुनका प्राचीन अन्‍ध-विश्‍वास क प्रति निष्‍ठा छलनि आ ने तँ नवीन अन्‍धानुकरणक प्रति आसक्तिए। प्रणम्‍य देवता क कथादि मे छोट पैद्य अनेक रास समस्‍यादिक दिस पाठक क घ्‍यान आकर्षित कयलनि जाहि मे सामाजिक व्‍यंग्‍यक अत्‍यंत भव्‍य रूप भटैत अछि।आगॉं चक’ कथाकर लोकनि व्‍यक्तिक ऐान्तिक जीवन आ हुनक व्‍यक्तिगत वैशिष्‍ट्य केँ घ्‍यान मे राखिाक’ कथा रचना कयलनि। एहन कथा मे मानव मनोविज्ञानक पूर्ण घ्‍यान राखल गेल आ पात्रक बाहय प्रवृतिक संगहि-संग ओकर अन्‍तर्मनक झॉंकी देखबा मे आयल। मानव-मनक उदघाटन मे कलात्‍मकता तख नहि। अबैत अछि जखन ओ द्वन्‍द्व आ संघर्ष मे पड़ल रहैछ। एहि दृष्टिसँ उपेन्‍द्रनाथ झा व्‍यास (1917-2002) क कथा रूसल जमाय (1949) तथा सुधांशु शेखर चौधरी क भारती (1948) मे एक पुरूष तथा एक नारी क प्रतिक्रियादि ओकर अन्‍त: संघर्ष क रूप मे स्‍फुट अछि। मनाथ झा (1923) रचित आध घण्‍टा तथा माधवजी मे अन्‍त: संर्घष क चित्रण अत्‍यन्‍त मार्मिक अछि। एहि प्रकारेँ योगानन्‍द झा (1922-1986) क कथा ककर कोन दोष तथा लिखलाहा (1946) मे मानव मलोविज्ञानक मधुर विन्‍यास अछि।स्‍वातन्‍त्रयोतर काल मे मैथिली कथाक विकास अत्‍यंत दुतगतिऍं भेल अछि। बौद्धिकताक समावेश आ मनोविज्ञाान दू एहन तत्‍व रहल अछि जे मैथिली कथा-रूपक विकास मे अपेक्षित सहायता देलक अछि। किन्‍तु स्‍वतन्‍त्राक पूर्व जतय ई परिवर्त्तनक सूचक रहल आब ओ विकासक प्रमिमान भ’ गेल अछि। रूढिवाद तँ हमर धर्मान्‍धता पर जबर्दस्‍त आघात कयलक अछि तथा एकर प्रभाव सँ प्राचीन पोषित संस्‍कार निष्‍प्रभ भ’ गेल अछि। ओहिना बौद्धिक विकास सँ समाजवादी विचारधारा केँ बल भेटल अछि आ मानव व्‍यक्तित्‍वक प्रति आदरक भाव जागल अछि। एहि सभक गम्‍भीर असर नव कथाक विषय आ उपादानपर पड़ल अछि तथा रूढिवादी परम्‍परा, सामाजिक शोषण, वर्ग-संघर्ष आ बारीक असहाय जीवन केँ स्‍पर्श कयनिहार अनेक रास कथादि लिखल गेल अछि। परिणाम स्‍वरूप समकालीन सत्‍य यथार्थक चित्रण कयनिहार प्रभाववादी कथाक जन्‍म भेल अछि।जीवनक एहि यथार्थ चित्रण केँ मनोवैज्ञानिक विश्‍लेषण निश्‍चये गम्‍भीरता देलक अछि। जतय पूर्वक कथा मे बाह्य जीवनक वर्णनक प्राचूर्य्य रहैत छल ओतय कथाकार लोकनिक दृष्टि अन्‍तर्मुखी भ’ गेल अछि। सत्‍यता तँ ई अछि जे मनोविज्ञान कथाकार लोकनि केँ सूक्ष्‍म दृष्टि सँ समृद्ध कयलक अछि। फलत: चरित्र-चित्रण विशेष स्‍वत्‍भाविक आ विश्‍वसनीय जँचय लागल। हठात् एहन कथाकार लोकनिपर टाइप क आरोप नहि लगाओज जा सकैछ। उदाहरणक लेल अन मेल विवाह पर प्रकाश देनिहार ललित (1932-1983) लिखित कलकतिया पेट (1953) केँ देखल जा सकैछ। मानव मनोविज्ञानक मानवीय अन्‍त: प्रवृतिक पकड़ मायानन्‍द मिश्र (1934) मे अत्‍यधिक अछि। अपन कहानी आगिमोम आ पाथर (1956) मे ओ दृश्‍यक गहराई मे ओ उतरि क’ ओहि तुफान केँ देखबाक प्रयास कयलनि जकर साधारणत: उपरका सतह पर अनुभव नहि होइछ। हिनक अन्‍य कथादि मे मेहो ई विशेषता समन्वित अछि। वस्‍तुत: मनोविज्ञान नवकथाकेँ सजि धाजि क’ आकर्षक बना देलक अछि। एहन कथादि मे घटना क बाहुल्‍य नहि अछि, प्रत्‍युत एक छोट सन साधारण सन घटना रहैत अछि जकर छाप एक मूड एवं भाव स्थितिक रूप मे मन पर शेष रहि जाइत अछि।फ्रायड क मनोविज्ञान सम्‍बन्‍धी अघ्‍ययन मे अवचेतन मनक प्रसंग मे जे निष्‍कर्ष प्रस्‍तुत कयल गेल अछि ओकरा कतिपय मैथिली कथाकार लोकनि पात्रक व्‍यक्तित्‍वक मानदण्‍ड बनौलनि अछि। परन्‍तु अत्‍याधुनिक कथादिक प्रति तीव प्रतिक्रिया कयल जाय लागल अछि। एहि कथादि मे जीवनक प्रति अनास्‍था, मानवीय चेतनाक उपेक्षा एवं मेक्‍सक क्षेत्र मे उच्‍छृंखलताक आरोप लगाओल जाइत अछि। ई सत्‍य अछि जे अवचेतन मानस मे चक्‍कर काटैत विभिन्‍न क्रिया-प्रतिक्रियादिक ताना-बाला सँ नीक सँ नीक कथाक रचना कयल जा सकैछ जे साहित्‍यक नव्‍यतम उपलब्धि हैत। फ्रायड, युंग, एडलर आदि मनोवैज्ञानि क लोकनिक कथन छनि जे मनुष्‍य सत्‍यताक विकास क्रम मे भाव प्रकृतिक अनेक रास आदिम प्रवृति आदि केँ दूषित कहि क’ ओकरा दबा देलनि अदि जकर फलस्‍वरूप आजुकछ कृत्रिम जीवन मे अनेक रास विवृति आदि आबि गेल अछि। हुनक मतानुसार मानवक समस्‍त क्रिया कलाप क मूल प्रेरणा-स्रोत ओकर यौन-आकां थिक आ ओकर परितृप्ति केँ मानि क’ जीवन व्‍यापार चलबैत अछि। ई तथ्‍य जेना मेक्‍सक क्षेत्र मे विद्रोह क’ देलक आ नारीक तथा कामुकताक नग्‍न चित्रण पर प्रगतिवाद क मोहर लागि गेल। राजकमल चौधरी (1929-क1967) आ कल्‍पना शरण (1933) आदि क सम्‍मुख आइ मनोविज्ञानक इएह रूप अछि। राजकमल चौधरीक ड़लक लिखल गेल बड़ा कम कथा एहन अछि जाहि मे शारीरिक सीमा केँ स्‍पर्श कयनिहार काम-वासनाक चर्चा नहि हो। परीक्षाक लेल हिनक किरतनियॉं (1956), चन्‍नरदास, 956) , हरिद्वारवास (1957) आदि कथादिकेँ देखल जा सकैछ। कल्‍पनाशरण तँ रंगीन पर्दा (1956) मे सासु आ जमायक यौन सम्‍बन्‍धक चित्रण क’ कए अदमूत साहसिकताक परिचय देलनि अछि। ललित अपन कथा मुक्ति (1956) मे अस्‍वस्‍थ मन आ मस्तिष्‍कक परीक्षा क’ कए ओकार निदानक प्रयास कयलनि अछि। उपर्युक्‍त कथाकार लोकनिक विषय मे एकहि संग अनास्‍थावादी, अस्तित्‍ववादी, वीभत्‍सवादी कहि क’ लांक्षणा लगाओल जाय लागल अछि।सम्‍प्रति कथाक क्षेत्र मे यथार्थवादीक एक दल बहार भेल अछि। एहि श्रेणीक कथाकार लोकनिक रचनादि मे जीवनक प्रति गहल अनुभूति पाओल जाइत अछि। महान कलाक सम्‍बन्‍ध धरातल सँ हैबाक चाही आ ओहिसँ एहन वस्‍तु प्रकट हो जाहि मे मानव वास्‍तव मे मानव बनि सकय। फ्रायड वा मार्क्‍स क सिद्धान्‍त एहन कथाकार केँ अवश्‍य प्रभावित कयलक अछि, परन्‍तु ओ सभ अनुभव कयलनि जे कला यथार्थ सँ ऊपर अछि। अति आधुनिक कथा साहित्‍य पर जाहि कथाकार लोकनिक हाथ अछि, ओ विश्‍वक गल्‍प वाडव्‍मयक विकासक मानदण्‍ड छथि, जाहि मे सम्‍यक् परिचय रखैत गप्‍प रचना मे संलग्‍न छथि। नव कथाकार मे सोमदेव (1934), प्रभास कुमार चौधरी (1941-1998), मायानन्‍द मिश्र, रामदेव झा (1936), गोविन्‍द झा (1923), गंगेश गुंन (1942), रमानन्‍द रेणु (1934), जीवकान्‍त (1936), नीरजारेणु (1945), ब्रंजकिशोर वर्मा मणिपद्य (1918-1986) घूमकेतु (1932-2000) शैलेन्‍द्रमोहन झा, (1929-1994) नगेन्‍द्र कुमार आदि-आदि उल्‍लेखनीय छथि। एकर अतिरिक्‍त शताधिक कथाकार एहि विधाक विकासक दिशा मे सचेष्‍ट छथि।स्‍वाधीनता पूर्व जतय अत्‍यन्‍त कठिनताक संग कहानी प्रकाशित होइत छल ओतय स्‍वातन्‍त्रयोतर काल मे बड़ बेसी संख्‍या मे कथा-संग्रहक प्रका‍शन होमय जागज अछि। उतर स्‍वतन्‍त्रता युग मे मैथिली कथाक विकास मे पत्रिकादिक योगदान सर्वाधिक रहल अछि। प्रत्‍येक पत्रिकादिक झुकाव साधारणतया कथाक दिस रहल अछि। अतएवं नव कथाक रचनाक संगहि-संग नव-नव कथाकारक अविर्भाव अत्‍यन्‍त द्रुत गति सँ भेल अछि। जतय धरि लघु कथाक प्रश्‍न अछि एकर परिवेश अत्यन्‍त छोट होइत अछि। एहन कथा सूक्तिक विशेषता सँ समन्वित होइत अछि अथवा कोनो छोट घटना केँ अपना क’ कोनो महान सत्‍यक उदघटनक प्रयास रहल अछि। मैथिली मे व्‍यंग्‍य कथाक साहित्‍य सुसम्‍पन्‍न अछि। किछु व्‍यंग्‍य-कथादि अपन शिल्‍पगत वैशिष्‍ट्यक आधारपर लघु कथाक कोटि मे गनल जायत। लोक-कथा एवं बाल-कथाक रूप मे हमर कथा-साहित्‍यक विकास भ’ रहल अछि। मैथिली कथादि मे राजनीति, धर्म नीति. समाज सुधार सम्‍बन्‍धी तत्‍वकेँ आधार बना क’ कथाकार लोकनि एहि विधा केँ सम्‍पुष्‍ट करबाक प्रयास मे लागल छथि जे एकर आलकमय भविष्‍यक सूचक कहल जा सकैछ।आधुनिक भारतीय भाषा साहित्‍यादि मे उपन्‍यास एक नवविधा अछि जाहि मे मैथिली उपन्‍सासक इतिहास तँ आरो नव थिक। बात्तव्‍ला साहित्‍यक समीपवार्ती हैबाक कारणेँ मैथिली उपन्‍यासदि विकास मे एकर यथेष्‍ट प्रभाव पड़ल अछि। मैथिली मे उपन्‍यास लेखकक आरम्‍भ अनुवाद सँ भेल मिथिला मिहिर मे तुलापति सिंह (1859-1914) रचित, धारावाहिक रूप मे प्रकाशित मदनराज चरित (1908) मनोरंजनक दृष्टि सँ एकर जे महत्‍व हो, परन्‍तु एहि मे यथार्थ जीवनक चित्रण लेशमात्र नहि छल। मैथिली मे मौलिक उपन्‍यास-लेखन जीवछ मिश्र (1864-1923) क रमेश्‍वर (1915) सँ होइत अछि। एहि कडीकेँ आगॉं बढयबा मे जनार्दन झा जनसीदन (1872-1951) रचित निर्दयी सासु (1916), शशिकला (1915) उल्‍लेखनीय अछि। ई दूनू उपन्‍यास मिथिला मिहिर मे धारावहिक रूपेँ प्रकाशित भेल। हिनक अन्‍य उपन्‍यास मे पुनर्विवाह (1926), कलियुगी संयासी (1929) आ, द्विराममन रहस्‍य (1945) क चर्चा कयल जा सकैछ। फेर रासविहारी लाल दास कृत सुमति (1918) आ पुष्‍पानन्‍द झा (1898-1967) लिखित मिथिला दर्पण (1925) क प्रकाशन होइत अछि। मिथिला दर्पण क प्रकाशनोपरान्‍त मैथिली उपन्‍सास लेखन मे एक नव संचेताक विकास भेल जकर फलस्‍वरूप मिथिला नामक पत्रिका मे प्रकाशित हरिमोहन झाक कन्‍यादान (1929) धारावाहिक रूप सँ प्रकाशित होमय लागल। स्‍त्री-शिक्षाक आवश्‍यकता तथा नव-पुरान विचारक संघर्ष केँ देख्‍ायबाक उद्देश्‍य सँ एकर रचना कयल गेल छल। पुस्‍तकाकार रूप मे एकर प्रकाशन 1933 ई. मे भेल। एकर प्रभाव मुरुयत: तीन रूपेँ पड़ल-पहिल समाजक मनोवृतिपर, दोसर कन्‍या लोकनिक व्‍यक्तिगत जीवनपर आ तेसर मैथिली लेखक समुदायपर एकर प्रकाशनक फलस्‍वरूप मैथिली उपन्‍यास पढनिहार क संख्‍या मे अत्‍यधिक वृद्धि भेल आ एहि सँ मैथिली लेखक लोकनिकेँ प्रोत्‍साहन भेटलनि। एही बीच मे कान्‍चीनाथ झा किरण (1906-1989) क चन्‍द्रग्रहण (1932) क प्रकाशन भेल। यद्यपि एकर स्‍वरूप अत्‍यन्‍त लघु अछि तथापि एकर स्‍थायी महत्‍व अछि। परिपकवता आ परिमार्जन क दृष्टिसँ कुमार गंगानन्‍द सिंह (1898-1970) क अगिलही (1935) सर्वोत्‍कृष्‍ट अछि।सामाजिक आवेष्‍टन मे जतेक उपन्‍यास लिखल गेल ओकर संख्‍या पर्याप्‍त अछि। गंगापति सिह (1881-1973) क विधवा करणक चित्र सुशीला (1943) मे प्रस्‍तुत कयल गेल। योगानन्‍द झा भलमानुस (1944) मिथिला मे प्रचलित कुलीन प्रथाक निस्‍सारता पर लिखनल गेल उपन्‍यास अछि। वैद्यनाथ मिश्र यात्री (1911-1998) वृद्ध-विवाह केँ ल’ कए पारो (1946) क रचना कयलनि। एही समस्‍या केँ ल’ कए फेर हुनक दोसर उपन्‍यास नवतुरिया (1954) प्रकाशित भेल। फेर चतुरानन मिश्र क कला (1947) एहि प्रवृतिक प्रसंग मे क्रान्तिकारी प्रवृति केँ ल’ कए उपस्थित होइेत अछि। विधवाक जीवनसॅा उपन्‍यास एखन धरि लिखल जा रहल अछि। मायानन्‍द मिश्र अपन उपन्‍यास विहाडि-पात-पाथर (1960) नारी समस्‍याक संगहि-संग वैद्यव्‍यक काणिक रूप प्रस्‍तुत कयलनि अछि। मैथिली उपन्‍यासक सामाजिक परिसर मे आर अनेक नाम अछि जाहि मे छोट-पैघ सामाजिक समस्‍यादिक वर्णन भेल अछि। बदरीनारायण दास लिखित चन्‍द्रकला (1948) मे चन्‍द्रग्रहण मे वर्णित कथा केँ नवरूप मे प्रस्‍तुत कयल गेल अछि। एहि प्रकारेँ तारानन्‍द कंठ रचित दुवक्षित (1957) मे नवतुरियाक कथाकेँ नव प्रकार सँ प्रस्‍तुत कयल गेल अछि।सामाजिक जीवनक चित्रण जतेक कुशलता सँ ब्रंजकिशोर वर्मा मणिपद्य रचित अनलपथ (1953) मे पबैत छी ओ शायदे अन्‍यत्र उपलब्‍ध हो।मैथिली मे व्‍यक्ति परक उपन्‍यासादिक चर्चा भेल अछि। एहन उपन्‍यासादि मे सामाजिकता जतेक रहैत अछि ओतेक प्राय: सामान्‍य व्‍यक्तिक जीवन मे नहि। ई दोसर बात थिक जे कखनो-कखनो व्‍यक्तिक सामाजिक चेतना विशेष जागरूक भ’ जाइत अछि। मैथिली मे नर नारीक आकर्षणक चित्रण कयनिहार प्रथम उपन्‍यास हरिनन्‍दन ठाकुर सरोज (1908-1945) लिखित माधवी-माधव (1935) थिक, परन्‍तु मनोवैज्ञानिक स्‍वाभाविकताक न्‍यूनता सँ ओहि मे कृत्रिमताक मात्रा विशेष अछि। उपेन्‍द्रनाथ झा व्‍यासक उपन्‍यास कुमार (1946) एहि दृष्टि सँ विशेष महत्‍व रखैत अछि जाहि मे देओर-भाउज क आदर्श प्रेम कथा केँ अत्‍यन्‍त मनोवैज्ञानिक ढंग सँ प्रस्‍तुत कयल गेल अछि। नर-नारी क एहि सहज आकर्षण वृति पर शैलेन्‍द्रमोहन झाक प्रतिमा (1948) क कथा-वस्‍तु आधाररित अछि। फेर हुनक मधुश्रावणी (1956) क कथा-वस्‍तुक निर्माण मेहो व्‍यक्तिक एही आकर्षण-प्रतयाकर्षण पर भेल अछि।एहन उपन्‍यास मे यौन-आकर्षणक सत्‍यता केँ प्रमाणित करबाक लेल सामाजिक नैतिकता केँ खुजल चुनौती देल जाय लागल अछि आ लेखक दृष्टिकोण एहन लगैछ जेना वंशगत संस्‍कार बेसी दिन धरि एकर रक्षा नहि क’ सकत। एहन उपन्‍यासादि मे जतय व्‍यक्तिक वाह्याडम्‍बर क पर्दाफाश भेल अछि, संगहि-संग आन्‍तरिक जगतक वीभत्‍स नग्‍नता केँ निर्ममता पूर्वक देखल गेल अछि। राजकमल चौधरी रचित पाथर फूल (1957) एवं आदि कथा (1958) मे इएह प्रवृति पबैत छी।उपन्‍यासक एहि विकासोन्‍मुख परम्‍परा मे किछु जासूसी उपन्‍यास मेहो लिखल गेल अछि। एहि वर्गक अग्रगण उपन्‍यासकार मे छथि गणेशचन्‍द्र चौधरी जनिक कृष्‍णक इत्‍या (1957) एवं रत्‍नहार (1957) क नाम सँ हिनक दू जासूसी उपन्‍यास प्रकाश मे आयल अछि। एहि कडी़केँ आगॉं बढयबाक परम्‍परा मे ब्रजकिशोर वर्मा मणिपद्य क क्रोवागर्ल एवं सोमदेवक ब्रहमपिशाच (1970) (1972) क गणना मेहो गणना कयल जा सकैछ।मैथिली उपन्‍यासक प्रगतिक सामान्‍य विवेचन कयलाक पश्‍चात् हम देखैत छी जे ओकर वर्ण्‍य-विषयक दृष्टि सँ मैथिली मे अनेक प्रकारक उपन्‍यास लिखल गेल अछि। आइ हमरा पौराणिक, ऐतिहासिक, सामाजिक, राजनीतिक, लोक गाथात्‍मक जासूसी सभ प्रकारक उपन्‍यास भेटैत अछि। सामान्‍य दृष्टि मे ओकरा वस्‍तु परक आ व्‍यक्ति परक एहि दू कोटि मे राश्खि सकैत छी। वस्‍तुपरक उपन्‍यासक श्रेणी मे ओहि सब उपन्‍यासक गणना करब जे हमर जीवनक बाह्य अंगक अघ्‍ययन प्रस्‍तुत करैत अछि। एकक विपरीत व्‍यक्तिपरक उपन्‍यास सभ मे मनुष्‍यक अन्‍तर्मनक अघ्‍ययनक प्रयास पबैत छी। एहि मे मनुष्‍यक प्रवृति सबपर, रहस्‍यमय भावनादिपर गुत्‍थी सबपर कुण्‍ठादि एवं दुर्बलतादिपर प्रकाश देल गेल अछि। एहि दृष्टि सँ हमर साहित्‍य मे वस्‍तुपरक उपन्‍यासादिक संख्‍या पर्याप्‍त अछि। शिक्षा-प्रधान आ पौराणिक उपन्‍यास, ऐतिहासिक उपन्‍यास, समस्‍या प्रधान सामाजिक उपन्‍यास घटना प्रधान जासूसी उपन्‍यासक एही कोटि मे अबैत अछि। मैथिली उपन्‍यासक उर्वर उपन्‍यासकार मे ब्रजकिशोर वर्मा मणिपद्य क नाम अन्‍यतम अछि। ई मिथिलाक लोक साहित्‍यक अघ्‍ययन-अनुशीलन, चिन्‍तनमनन क’ कए हुनक व्‍यक्तित्‍व आ वाग्‍भंगिमा केँ एहन परिचालित कयलनि अछि जे मैथिलीक अन्‍य उपन्‍यासकार लोकनि मे नहि उपलब्‍ध होइत अछि। ई छोट-पैद्य पन्‍द्रह उपन्‍यासक रचना कयलनि जे अछि यथा अनलपथ(1953), विद्यापति (1960), लोरिक विजय (1973), रायरणपाल (1976) लवहरि-कुशहरि (1976), फुटपाथ (1978), अर्द्धनारीश्‍वर (1981) दुलरा दयाल (1984), नागभूमि (1985), आदिम गुलाम (2003), कनकी (2003), भारतीक वलाडि (1978) एवं सोना रूपा हीरा (अ प्रकाशित) 1 ई अपन अधिकांश उपन्‍यासादि मे लोकगाथाक वा भांगिमाक चासनी द’ कए विलक्षण गद्यक निर्माण कयलनि अछि। हिनक उपन्‍यासादि क सफलताक मूल तत्‍व अछि हिनक दृष्टिक महनता आ अन्‍तर्वेधकता।मैथिली चर्चित उपन्‍यासकार लोकनि मे राजकमल चौधरी, मायानन्‍द मिश्र, सुधांशु शेखर चौधरी, प्रभास कुमार चैधरी, धीरेन्‍द्र, ललित, जीवकान्‍त, रमानन्‍द रेणु, लिली रे, उषाकिरण खॉं आदि अनेक उपन्‍यासकार लोकनि वर्त्तमान सामाजिक, राजनीतिक पृष्‍ठभूमिक आधार पर उपन्‍यासादिक रचना कयलनि अछि। उपर्युक्‍त उपन्‍यासकार लोकनिक कृति एहि प्रकारक अछि। राजकमल चौधरी आदि कथा (1958), पाथर फूल (1967) आ आन्‍दोलन (1968) क रचना कयलनि जाहिमे ओ काम-वासनक सम्‍बन्‍ध मे नि:संकोच आ स्‍वच्‍छन्‍द विवेचन कयलनि अछि। मायानन्‍द मिश्र मिथिलाक जन-जीवनक अनुरूप बिहाडि पात पाथर (1960), खोंता आ चिडै (1922) आ ऐतिहासिक उपन्‍यास मंत्रचुत्र (1986) क रचना कयलनि। सोमदेव चानोदाइ (1959) आ ब्रहमपिशाच मे समकालीन समाज मे व्‍याप्‍त समस्‍यादि केँ उठयबाक प्रयास कयलनि अछि। मैथिलीक सशक्‍त उपन्‍यासकार छथि सुधांशु शेखर चौधरी जे ई बतहा संसार (1979), निवोदिता (1996), तरपट्टा ऊपर पट्टा (2003), दरिद्रछिगडि (1987) आ अंग्रेजी फूलक चिट्ठी (2003) क रचना कयलनि जाहि मे सामाजिक सन्‍दर्भ मे विविध समस्‍यादि केँ उद्घाटित कयलनि अछि।मिथिलाक ग्रामीण परिवेश मे निम्‍न वर्गीय केँ दिशा-निर्देश आ गम्‍भीर चिन्‍तन देलनि अछि ललित पृथ्‍वीपुत्र (1965) मे। मैथिली मे रमानन्‍द रेणु दूध फूल (1967) आ उत्‍तर जनपद (2003) मे मिथिलाक आंचलिक परिवेश केँ आधार बना क’ कए मार्मिक चित्रण कयलनि अछि। जीवकानक दू कुहेसक बाट (1968), पनिपत (1967), अग्निबान (1969), पीअर गुलाब(1970) एवं कतहु नहि कतहु (1971) उल्‍लेखयोग्‍य औपन्‍यासिक कृति थिक। हिनक उपन्‍यासादि मे किंकर्तव्‍यविमूढ आ क्षुब्‍ध, असफल युवकक राम कहानी जकरा जीवन मे पल-पल मे निराशा आ निराशा झलकैत अछि आ भूख, निराशा आ बेरोजगारीक अग्नि आधुनिक समाजकेँ कोना तबाह करैत अछि ओकर मार्मिक रेखाकंन भेल अछि। मैथिलीक नवोदित उपन्‍यासकार मे प्रभासकुमार चौधरी अन्‍यतम छथि जे अभिशप्‍त (1970), युगपुरुष (1971), हमरालग रहब (1977), नवारम्‍भ (1979) आ राजा पोरबरि मे कतेक मछरी (1981) क रचना कयलनि। एहि क्षेत्र मे धीरेन्‍द्रक दुइ उपन्‍यास भोरूकबा (1965) एवं का दो आ कोयला (1982 ) उल्‍लेखनीय अछि।मैथिली उपन्‍यासक क्षेत्र मे उपेन्‍द्रनाथ झा व्‍यास क लघु उपल्‍यास दूपत्र (1969) क विशेष महत्‍व अछि, कारण पत्रात्‍मक शैली मे नव प्रयोग आ नव-विषय वस्‍तुक कारण ई अभिनव प्रयोग भेल अछि। मैथिली उपन्‍यास मे लिली रे क आगमनक फलस्‍वरूप एक नव क्रान्ति आयल। ओ पटाक्षेप (1979), मरीचिका प्रथम खंड (1981), मरीचिका द्वितीय खंड (1981), उपसंहार (1991) क रचना कयलनि। नव कथानक पृष्‍ठभूमि मे ओ अपन उपन्‍यासक कथानक केँ विन्यसस्‍त क’ ई जतयबाक उपक्रम कयलनि जे मैथिली उपन्‍यासकार लोकनिकेँ नव दिशा भेटल।इतिहास प्रयोगक सन्‍दर्भ मे मौलिक उपन्‍यासकार रचना भेल अछि जे किंवदन्‍ती पर आधारित अछि यथा केदारनाथ ठाकुरक सौन्‍दर्योपासनाक पुरस्‍कार (1914), ब्रजकिशोर वर्मा मणिपद्यक विद्यापति (1960), रवीन्‍द्रनाथ ठाकुरक गोनू झा (1968) आ मार्कण्‍डेय प्रवासीक हम कालिदास (1982) । लोकगाथा पर आधारित उपन्‍यासक अन्‍तर्गत लक्ष्‍मीपति सिंह (1907-1979) क चामुण्‍डा (1933) आ ब्रजकिशोर वर्मा मणिपद्य क लोरिक विजय, राजा सलहेस, नौकाबनिजारा, लवहरि कुशहरि, रायरणपाल एवं दुलरादयाल मे अज्ञात इतिहास क समावेश कलेल लोकतात्‍वक आश्रय लेल गेल गेल अछि। ऐतिहासिक तथ्‍य केँ आधार बना क’ जे उपन्‍यास लिखल गेल अछि ओहि मे इतिहास तथ्‍योपलब्‍ध सूत्र केँ पकडि क’ तत्‍कालीन समयक राजनीतिक, धार्मिक, राष्‍ट्रीय, सांस्‍कृतिक पर्यावरण आ परिवेश केँ सजीव रूप सँ प्रतिष्ठित करबा मे समर्थ भेल अछि ओहि मे चन्‍द्रनारायण मिश्र (1928-1982) क बालदित्‍य (1980) तथा वैशाखी पूर्णिमा (1982), ब्रजकिशोर वर्मा मणिपद्य क आदिम गुलाम (2003) आ मायानन्‍द मिश्र क मन्‍त्रपुत्र (1985) आ गोविन्‍द झा क विद्यापतिक आत्‍मकथा (1993) कयल जाइत अछि।आधुनिक भारतीय भाषादि मे मैथिली नाट्य-सम्‍पादक गौरवशाली परम्‍परा आ ओकर विशाल पृष्‍ठभूमि एहि साहित्‍यक प्रारम्भिकावस्‍था सँ अविच्छिन्‍न रूपसँ चलैत आबि रहल अछि, मुदा बीसम शताब्‍दी क आरम्भिक चरण मे मैथिली नाटक, एकांकी आ रंगमंचक दिशा मे साहित्यिक अन्‍यान्‍य विधादिक अपेक्षा अत्‍यन्‍त तीवगति सँ प्रगतिक पथपर अग्रसर भेल अछि जाहि मे सन्‍देह नहि। मैथिली नाटकक प्राचीन परम्‍परा क टिमटिमाइत लौ एहि युग मे नव ज्‍योति भेटल पश्चिमी आदर्शक जाहि दीप वर्तिका केँ सजार्ज अब्राहम ग्रियर्सन मिथिला अनने रहथि ओकर क्षीण प्रकाश आधुनिक मैथिली नाटकक आदि प्रवर्त्तक जीवन झा (1848-1912) पर यथेष्‍ट परिमाण मे पड़ल। जाहि समय ओ नाट्य-निर्माणक दिशा मे उन्‍मुख भेलाह ओहि समय संस्‍कृत नाट्य-परम्‍परा, कीर्ततियॉं नाटक वा कीर्तनिऑं नाच वा लीला नाट्य परम्‍परा आ पारसी थियेटर सँ लोक ऊवि चुकल रहथि। जीवन झाक समक्ष एक चौराहा छल। कोन मार्गक अनुसारण कयल जाय जे एक समस्‍या आ परीक्षा दुनू छल। जीवन झा मघ्‍यम मार्गक अनुसरण कयलनि। ई सभ प्रवृति केँ समन्वित क’ कए एनल एक नव प्रवृतिक जन्‍म देलनि जकर आलोक मैथिली नाटक प्रगतिक दिस उन्‍मुख भेल। ई चारि नाटक क रचना कयलनि जेथिक सुन्‍दर संयोग,(1904), मैथिली सट्टक (1906), नमदि। सट्टक (1906) आ समावती पुनर्जन्‍म (1908)। हिनका पश्‍चात् जे नाटकादि लिखल गेल ओकर दू श्रेणी अछि-एकांकी आ अनेकांकी। एहि कालावधि मे जे नाटक लिखल गेल अछि-एकांकी आ अनेकांकी। एहि कालावधि मे जे नाटक लिखल गेल अछि ओकरा दुइ श्रेणी मे विभाजित कर सकैत छी: विषय-वस्‍तुक दृष्टिसँ आ रचना-शिल्‍पक दृष्टि सँ। विषय वस्‍तुक दृष्टि सँ पौराणिक,ऐतिहासिक आ सामाजिक। एहि श्रेणी क अन्‍तर्गत मैथिली मे प्रचुर परिमाण मे नाटक लिखल गेल अछि। पौरणिक नाटकादि मे लालदासक सावित्री-सत्‍यवालन (1908), आनन्‍द झाक सीता स्‍वयंवर (1938) महावीर झा वीर क शम्‍भू वध (1936), दामोदर झाक गन्‍धर्व विवाह (1953) आ जीवनाथ झाक दुर्गाविजय (संवात् 2015) आदि नाटकादिक गणना कयल जा सकैछ। हमर ऐतिहासिक कहल जाय बाला नाटक इतिहास सँ प्राप्‍त सामान्‍य विवरणादि आ सुनल सुनाओल विषयादि एवं जल‍िश्रुत आदि पर आधारित अछि। ऐतिहासिक पुरूष विद्यापतिक जीपनसँ सम्‍बद्ध रहबाक, कारणेँ एकरा ऐतिहासिक नाटक नहि कहल जा सकैछ। ईशनाथ झा (1907-1965) रचित उगना (1956), विद्यानाथ रायक विद्यापति (1959) आ ब्रजकि शोरवण क कण्‍ठहार एवं जीवनाथ झा रचित वीरनरेन्‍द्र (1956) क चर्चा कयल जाइत अछि। सामाजिक नाटकक तेसर कोटि सामाजिक नाटकादि थिक। एहि नाटक सभक कथा सर्वथा वर्त्तमान युग क थिक। एहि श्रेणी क नाटक क दू रूप अछि-प्रतीक नाटक आ समस्‍या नाटक। प्रतीक नाटकक शशिनाथ झा रचित कलिधर्म प्रकाशिका (1911-12) तथा साहित्‍य रत्‍नाकर मुंशीधुनन्‍दन दास रचित मिथिला नाटक (1920-22) अबैत अछि। एहि नाटकादि मे वर्तमान युगीन कतिपय समस्‍यादि पर विचार कयल गेल अछि। सामाजिक नाटकक दोसर रूप थिक समस्‍या नाटक। एहि मे नाटकादिक अन्‍तर्गत कतिपय सामाजिक समस्‍यादि केँ उठाओल गेल अछि। एहि मे समाज मे फैलल विभिन्‍न विरूपता, रूढि, सामाजिक अपराध विषमता, राष्‍ट्रीय चेतना, सत्‍याग्रह आन्‍दोलन आदि केँ मुख्‍य आधार बनाओल गेल अछि। एहन नाटकादि मे ईशनाथ झा क चीनी क ड्डूलहु (1937-39), शारदानन्‍द झा क फेरार (1950), गोविन्‍द झा क बसात (शाके 1820), राजा शिव सिंह (1976), अन्तिम प्रणाम (1982) एवं रूकिमणी हरण (1989), सुधांशु शेेखर चौधरी क भफाइत चाहक जिनगी (1975) ढहैत देवाल क लेटाइत ऑंचर (1976), पहिल सॉझ (1982) एवं लग क दूरी (1992), महेन्‍द्र मलंगियाक लक्ष्‍मण रेखा खण्डित (1970), एक कमल नोर मे (1970), जुआयल कनकनी (1972), ओकरा आडव्‍नक बारहमासा (1980), कमला कातक राम लक्ष्‍मण मे सीता (1981), काठक लोक (1987), गाम नई सुतैए (1993) एवं ओरिजल काम (2000), सोमदेवक चरैवेति (1982), उदयनारायण सिंह नचिकेताक नाटकक नाम जीवन (1971), एक छल राजा (1973), नाटकक लेल (1974), रामलीला (1974), प्रर्त्तयावर्तन (1976) एवं नोतइन्‍ट्री मा प्रविश (2008) अरविन्‍द अक्‍कूक तालमुट्ठी (1982), आगि धधकि रहल छै 1(1981) एना कते दिन ? (1985), अन्‍हारजंगल (1987), रक्‍त (1992), आतंक (1994), के ककर ? (1996) पढुआ कक्‍का अएला गाम (1998) बाह रे हम आ बाह रे हमर नाटक (1998), गुलाब छडी (1999), राज्‍यभिषेक (2004), ब्रजकिशोर वर्मा मणिपद्य क झुमकी (1977) एवं तेसर कतियॉं (1986) मन्‍त्रेश्‍वर झा क प्रायश्चित (1994) एवं सौभाग्‍यवती भव (1994), उदयवन्‍द्रझा विनोद क उदास गाछ क बासन्‍त (1992) रामभरोस कापड़ भ्रभरक एकटा आर वसन्‍त (2001), रोहिणी रमण झा क अन्तिम गहना (1989) राजा सलहेस (1990), कुमार शैलेन्‍द्र क अग्निपथ क सामा (2000), वनदेवी पुग्‍त्र भवनाथ क लीडर (1994), कुमार गगनक शपथग्रहण (2003), कमल मोहल चुन्‍नूक नव घर उठे (2002), विनोद कुमार मिश्र वन्‍धुक एकरा चिनता (2006), छात्रानन्‍द सिंह झा क सुनू जानकी (2008) इत्‍यादि आधुनिक कालक चर्चित नाटककार छथि। एहि कालावधि मे अनेक नाटककार लोकनि नाट्य-साहित्‍यक विकास मे अपन योगदान देलनि।स्‍वातन्‍त्रयोत्तर काल मे मैथिली-नाट्य-लेखन मे एहन सभ प्रश्‍न केँ नाटकीय रूप देबाक हेतु तत्‍पर भ’ उठलाह जकर सम्‍बन्‍ध युग सँ अछि जाहि मे ओ जीव रहल अछि आ एहि लेल आदर्शादिक काल्‍पनिक एवं वायनीय जगत सँ सम्‍बन्‍ध विच्‍छेद क’ कए वास्‍तविकताक धरातल पर पैर जमयबाक लेल मैथिली-नाटककार केँ पूर्ण वेग सँ गमिमान हैबा मे नवनता, ताजगी, प्रोैढता आ कलात्‍मकताक मौलिक व्‍यक्तित्‍व प्राप्‍त करबाक लेल संघर्ष करय पड़ल। अतएव दासतासँ मुक्‍त भ’ कए आधुनिक नाट्य-लेखनक स्‍वर अपन सम्‍पूर्ण सृजन प्रक्रिया मे सामूहिक भारतीय मनक नव सन्‍दर्भ अछि। सामाजिक यथार्थ केँ अभिव्‍यक्ति देनिहार नाट्य –लेखनक क्षेत्र मे एहन औरो नाटककार छथि जे नाट्य कृति क सफलताक संगहि रंगमंच पर किछु सर्वथा नव क’ देखयबाक दृष्टि सँ साहित्यिकतासँ अधिक जनरुचिक आकर्षण पर विश्‍वास रखैत छथि। आइ जे नाटक लिखल जा रहल अछि, ओहि मे नाटकक कथ्‍य आ शिल्‍प क अन्‍तर प्राचीन नाटकक तुलना मे व्‍यापक भ’ गेल अछि आ एहि लेल ई नाटक समकालीन सामाजिक यथार्थ केँ जनता धरि ल’ जाय चाहैत अछि, अत: कथा‍हीन नाटक दर्शक केँ अधिकतम निकट अछि, कारण दर्शके होइछ जकर स्‍वीकृति रंगमंचीय आलोचनाक मानदण्‍ड बनैत अछि। दर्शक ओ‍ही स्थितिक दृश्‍य रूप मे ग्रहण करैछ जे ओकर रंगमंचीय जीवनक लगपास घटैत अछि आ स्थिति सभाक दृश्‍य बनययवा मे नाट्यकारक सम्‍मुख रंगमंच पूर्णत: परिकल्पित रहैत अछि। कथाहीन नाटकक रंगमंचीय असफलता प्रस्‍तुतिकरणक आधुनिकता सँ सम्‍बद्ध अछि।मैथिली मे विशुद्ध एंकाकी-प्रहसन आ रेडियो रूपक क लेखनक सूत्रपात बीसम शताब्‍दीक चतुर्थ दशक सँ प्रारम्‍भ होइत अछि। साहित्‍यरत्‍नाकर मुंशीरधुनन्‍दनदास दूतांगद व्‍यायोग (1933) क रचना क’ कए एकांकी-लेखनक परम्‍परा क सूत्रपात कयलनि जे आइ एक स्‍वतन्‍त्र विधाक रूप मे विकसित भेल अछि। वर्त्तमान युग एकर विकासक लेल अधिक उर्वर सिद्ध भेल अछि। मैथिली में अनेक एकांकीकार लोकनि एकांकी प्रहसन आ रेडिया रूपकक रचना कए एहि विधा केँ सम्‍पुष्‍ट करबाक दिशा मे सहभागी बनलाह अछि। वस्‍तुत: नवयुगक उपज थिक, अतएव एहि मे संस्‍कृत एकांकी क विधान कम भेटैत अछि। एकांकी, प्रहसन आ रेडियो रूपकक लोकप्रियताक फलस्‍वरूप अधिकाधिक संख्‍या मे साहित्‍य-मनीषी एहि विधा क अन्‍तर्गत कतिपय संग्रह प्रकाश मे आयल अछि यथा तन्‍त्रनाथ झा (1909-1924) क एकांकी चयनिका (1949) परमेश्‍वर मिश्रक त्रिवेणी (1950) चन्‍द्रनाथ मिश्र अमर (1925) क खजबा टोपी (2006), बालगोविन्‍द झा व्‍यथित, (1932-2002) क त्रिपथगा (1968),भाग्‍यनारायण झा (1937) क सोनक ममता (1969), दिनेश कुमार झा (1941-2004) क सप्‍तरश्मि (1971), उदयनारायण सिंह नचिकेताक जनतक एवं अन्‍य एकांकी (1978), रामदेव झा (1936) क पसिझैत पाथर (1989), रवीन्‍द्र राकेश क अन्‍तर्ज्वत्‍ल (1991), सुधांशु शेखर चौधरी क हथटुट्टा कुरसी (1992), महेन्‍द्र मलंगियाक टूटल तागक एकटा ओर (1983), मन्‍त्रेश्‍वर झा क समारोह (1991), धूर्त्ततगरी (1993), बहुरूपिया (1993) एवं पराजय (1994) आ ब्रजकिशोर वर्मा मणिपद्यक अनमिल आखर (2008) इत्‍यादि।एकांकी, प्रहनल आ रेडियो रूपकक प्रणेतादिक मानसिक क्षितिजक विस्‍तार भेलनि, जनिका नव चेतना भेटलनि, नव दिशा मे अग्रसर हैबाक प्रेरणा भेटलनि, नव दृष्टि भेटलनि तनिका हम प्रतिनिधि एकांकी कार क रूप मे उदघोषित कयलहुँ अछि। एहन रचनाकार क कृति मे नव प्रवृति क प्रति आग्रह अछि। मैथिलीक साहित्‍यकार लोकनिक मानसिक क्षितिजक विस्‍तार भेलानि आ हुनक नाट्य-कला सम्‍बन्‍धी मान्‍यतादि मे क्रा‍न्तिकारी परिवर्तन भेल। मैथिलीक ई सौभाग्‍य रहल अछि जे अधिकांश साहित्‍य चिन्‍तक एकहि संग एकांकीकार, रेडियो रूपककार आ प्रहसनकार मेहो छथि। अतएवं एहि विधाक अन्‍तर्गत प्रतिनिधि रचनाकार भेलहि कुमार गंगानन्‍द सिंह (1878-1770) हरिमोहन झा, तन्‍त्र नाथ झा, ब्रजकिशोर वर्मा मणिपद्य, सुधांशु शेखर चौधरी, गोविन्‍द झा, चन्‍द्रनाथ मिश्र अमर, रामदेव झा, मन्‍त्रेश्‍वर झत्त आ महेन्‍द्र मलंगिया आदि उल्‍लेखनीय छथि। मैथिली एकांकी, रेडियो रूपक आ प्रहसनक उदय केँ ल’ कए अद्यातन प्रकाशनसँ प्रतीत होइत अछि जे ई विधा अपन उन्‍नतिक शिखर पर पहुँचि गेल अछि। रचनाकार सामाजिक, राजनीतिक आ मनोवैज्ञानिक समस्‍यादि केँ ल’ कए सोझरयबाक संगहि-संग नव विचार, समसामयिक जीवनक समस्‍या आ ओकर समाधान एवं जीवन-मूल्‍यक आलोचना, राष्‍ट्र, मातृभूमि तथा मातृभाषाक प्रति सम्‍मान आ नव राष्‍ट्रक निर्माणक प्रेरणा रचनाकार लोकन देलनि अछि। एहि विधा मे वर्त्तमान युगक आशा आकांक्षा, कुंठा-संत्रास, द्वन्‍द्व एवं जजीविषा केँ अभिव्‍यक्ति देल गेल अछि। वैचारिक आ विषय-वस्‍तुक नवीनता क कारणेँ नव-नव शिल्‍पक एकांकी, रेडियो रूपक आ प्रहसन दृि‍ष्टगत भ’ रहल अछि।नाटकक क्षेत्र मे नव आन्‍दोलनक फलस्‍वरूप मैथिली रंगमंचक विकास मे गति आयल अछि। स्‍वातन्‍त्रयोतर युग मे रंगमंचक सम्‍बन्‍ध मे चिन्‍तन-मननक नव आभासक स्रोत प्रवाहित होमय लागल अि‍छ। नाटक केँ मंचोपयोगी बलनयबाक लेल रंगमंचीयताक अपेक्षित तत्‍व जेना दृश्‍य-विधानक संक्षिप्‍त आ सन्‍तुलित स्‍वरूप, संक्षिप्‍त सरल जीवन, स्‍वाभाविक एवं पात्रोचित संवाद, रंग-संकेत, संगीत एवं काव्‍य-तत्‍वक संतुलित प्रयोग मैथिली नाटकादि मे भेल अछि। यद्यपि मैथिली मे व्‍यावसायिक रंगमंचक अभाव रहल अछि, तथापि अव्‍यावसायिक रंगमंचक कलाकार लोकनि एकरा प्राणवन्‍त बना देलनि अछि। एहि दिशा मे कोलकाता स्थित संस्‍थादि मे मिथिला कलाकेन्‍द्र (1960), मैथिली रंगमंच (1966), अखिल भारतीय मिथिला संघ (1963), कूर्मि-क्षत्रिय-छात्र-वृतिकोष (1968), मिथि यात्रिक (1971), आल इण्डिया मैथिल संघ (1973), मिथिला-मित्र-संघ (1974), कर्ण गोष्‍ठीक जयान्‍त लोक मंच (1983) आ कोकिल मंच (19090) सदृश रंगकर्मी संस्‍थादि नव नाट्य आन्‍दोलन मे अनेक नाटककार केँ एहि दिशा मे प्रेरित कयलक। रंगमंचक क्षेत्र मे चेतना समिति पटना क नाटय मंच (1972), अरिपन (1987), भंगिमा (1984), आडडान नवतरं, ग, कला समिति आदि रंगकर्मी लोकनिक सहयोग क फलस्‍वरूप एकर विकास तेजी सँ भ’ रहल अछि। रंगमंचक क्षेत्र मे एकर विकास मात्र मिथिलांचले धरि सीमित नहि रहल, प्रत्युत पडो़सी राष्‍ट्र नेपाल मे सेहो एकर विकास भेल जाहि मे चित्रगुप्‍त सांस्‍कृतिक केन्‍द्र जनकपुर धाम, मिथिला नाट्यकला परिषद नेपाल, भानु कला केन्‍द्र विराट नगर इत्‍यादि रंगकर्मी संस्‍थादिक सहयोग रहल अछि। मिथिलांचलक पडो़सी प्रदेश झारखण्‍ड मे मेहो एकर विकसित स्‍वरूपक अवलोकन होइत अछि जाहि मे मिथिलाक्षर जमशेदपुर, मैथिली कलामंच बोकारो स्‍टील सिटी. मिथिला सांस्‍कृतिक परिषद बोफारों स्‍टील सिटी इत्‍यादि उल्‍लेखनीय अछि। मैथिली मे आदिकाल मे काव्‍य-धाराक जे बीजारोपण भेल छल ओकर वास्‍तविक विकास आधुनिक काल मे भेल अछि। जतय धरि आदि कालीन काव्‍य-धारा राधा-कृष्‍ण आ हरगौरी केँ घ्‍सान मे राखि क’ कवि लोकनि काव्‍य-रचना कयलनि ततय आधुनिक काल मे विविध रूपा काव्‍य-धारा क प्रश्‍न अछि ओहि मे मुख्‍य रूप सँ दू प्रवृत्ति भेटैत अछि। एक भाग जतय विषय-वस्‍तु, भाव-भाषा इत्‍यादि दृष्टिसँ अनेक कवि लोकनि अपना केँ सर्वथा प्राचीन परम्‍परावादी रहबाक प्रयास कयलनि ओतय दोसर भाग अनेक कवि लोकनि अपना केँ सर्वथा नवीनतासँ सम्‍बद्ध रख्‍ालनि। परम्‍परावादी काव्‍य मे महाकाव्‍य, खण्‍डकाव्‍य, प्रबन्‍ध-काव्‍य, परम्‍परावादी गीति-काव्‍य आ मुक्‍तकाव्‍य आदिक रचनादि सँ मैथिली काव्‍य-काननक श्रृंगार कयलनि। एहि दिशा मे एक नवीनता ई भैटैत अछि जे मैथिली साहित्‍य मे सर्वप्रथम राम-काव्‍यक परम्‍परा स्‍थापित कयलनि आ ओहि मे कवीश्‍वर झा मिथिला भाषा रामायण (मधुश्रावणी 1984) आ लालदास रमेश्‍वर चरित मिथिला भाषा रामायण (संवत् 2011) क रचना क’ कए महाकाव्‍य लेखनक सूत्रपात कयलनि। तत्‍पश्‍चात एहि कालक कवि लोकनिक दृष्टि काव्‍यक एहि प्रवृतिक दिशा मे गेल जकर परिणाम भेल जे एहि साहित्य मे पचास सँ बेसी महाकाव्‍य प्रकाश मे आयल अछि जाहि मे उल्‍लेखनीय छथि कविशेखर बदरीनाथ झा क एकावली परिणय (1938-40), मुंशी रघुनन्‍दन दासक सुभद्राहरण (1937-44) तन्‍त्रनाथ झा क कीचक बध (1938-6क1), सीताराम झा (1991-1975) क म्‍बचरित (संवत 2013), जीवनाथ झाक रावणवध (2012 संवत्) दीनानाथ पाठक बन्‍ध (1928-1962) क चाणक्‍य (1959-61), काशीकान्‍त मिश्र मधुप (1906-1987) क राधाविरह (1969), वैद्यनाथ मल्लिक विधु (1912-1987) क सीतायन (1973), सुरेन्‍द्र झा सुमन (1910-2002) क दत्तवती (1987), मतिनाथ मिश्रक राजा सलेंस (1986), बौआजी झा अज्ञाात क रुक्मिणी परिणय (1990) आ प्रतिज्ञा पाण्‍डव (1995), विश्‍वनाथ झा विषपायीक रामसुजश सागर (1978), मार्कण्‍डे प्रवासीक अगस्‍त्‍यायनी (1980), ईनाथ झा क महाभारत (1987) उपेन्‍द्रनाथ झा व्‍यासक मैथिली महाभारत आदि पर्व (1994) कााग्‍चीनाथ झा किरणक पराशर (1984) आ चन्‍द्रभानु सिंह क शकुन्‍तला (2002) इत्‍यादि।खण्‍ड काव्‍य मेहो आधुनिक कालक देमेथिक जाहि मे कवि लोकनि एहि दिशा मे अपन प्रतिभाक प्रस्‍फुटन कयलनि जकर परिणाम भेल अछि जे अनेक कवि लोकनिक प्रयास एहि विधाक श्रीवृद्धि मे अपन योगदान देलनि जाहि मे उल्‍लेखनीय छथि उपेन्‍द्र नाथ झा व्‍यासक सँन्‍यासी (1947) एवं पतन (1969), केदारनाथ लाभ (1932) क लखिामा रानी (1960) एवं भारती (1964), अमरेन्‍द्र मिश्र क एकलव्‍य (1970) एवं सत्‍यकेतु (1977), लक्षमण झा क उत्‍सर्ग (1975), रवीन्‍द्रनाथ ठाकुर क पंचकन्‍या (1977), योगेश्‍वर झा क नोर (1979), सुरेन्‍द्र झा सुमनक उत्तरा (1980) लोकपति सिहं क द्रोहाग्नि (1969), बुद्धिधारी सिंह रमाकर (1919-1991) क समाधि (1983) इतयादि।कमीश्‍वर चन्‍दा झाक मैथिली कविता मे नवोथानक प्रेरक शक्ति छनि। ई काव्‍य क बहिरंग अा अन्‍तरंग दुनू क्षेत्र मे परिवर्त्तन अनबामे समर्थ भेलाह। जतय पहिने श्रंृगार आ भक्ति विषयक रचनादिक प्रचुरता छल ततय ओ सामाजिक आ राजनी।रतिक विषयक समावेश प्रथस मे प्रथस काव्‍य मे कयलनि। चन्‍दा झा एक नव सामाजिक प्रेरणा सँ अनुप्राणित रहथि। जँ ओ एक भाग प्राचीन परम्‍पराक विशिष्‍ट कवि सिद्ध होइत छथि तँ दोसर भाग नवीन परम्‍पराक सूत्रधार मेहो। मैथिली काव्‍य-धाराक इतिहास मे सन् 1929 ई. क अत्‍यन्‍त महत्‍वपूर्ण स्‍थान अछि। मैथिली गीताञ्जलिक नाम सँ राष्‍ट्रीय कवितादिक प्रथम महत्‍वपूर्ण संकलन एही समय मे प्रकाशित भेल छल। वस्‍तुत: एहि कवितादि सँ मैथिली मे देशप्रेमक राष्‍ट्रीय-सांस्‍कृतिक कविता धाराक सूत्रपात होइत अछि। देशप्रेमक अतिरिक्‍त समाज कल्‍याणक जतेक साधन भ’ सकैछ ओहि दिस एहि कालक कवि लोकनि निर्देश देलनि। मैथिली कविता मे प्रगतिवादक एक विशिष्‍ट काव्‍य-प्रवृति क रूप मे मान्‍य भ’ गेल अछि। मैथिली काव्‍य मे एहि प्रवृति विकास भेल। मैथिली कविता मे प्रगतिवादी काव्‍य क प्रारम्‍भ ओतय सँ मानि सकैत छी जखन कवि लोकनि मानवताक प्रति सहानुभूति प्रकट करय लगैत छथि। एही मानवतावादी भावनाक कारणेँ रमानाथ झा भुवनेश्‍वर सिंह भुवन (1907-1944) केँ प्रगतिवादक प्रवर्त्तक मानैत छथि। किन्‍तु हिनका सँ पूर्व वैद्यनाथ मिश्र यात्री क रचनादि मे यह प्रवृत्ति प्रकट भ’ गेल छल। युग-युग सँ सामन्‍ती शिक्षाक नीचा दबायल कविक वाणी जँ एक भाग अपन मनक उद्गार व्‍यक्‍त करैत अछि तँ पुन: तत्‍काले जनमन क भावदि केँ प्रकट करबाक हेतु मचलि उठल। वस्‍तुत: प्रगतिशील साहित्‍य मे कवि लोकनिक क्रान्तिकारी आत्‍मा ज्‍वालामुखीक समान स्‍फुलिंग फेकैत्त प्रतीत होइत छथि। प्रगतिवादी कवि लोकनि मानव केँ सर्वोपरि सत्ताक रूप मे स्‍वीकार कयलनि। एहि प्रकारेँ मैथिली कविता मे अधिकाधिक कवि लोकनि प्रनतिवादी कविताक निर्माण स्‍वस्‍थ आ व्‍यापक रूपेँ कयलनि अछि। प्रगतिवादी काव्‍य प्रधानत: बुद्धि प्रधान अथि। वैयक्तिक कवितादि मे जाहि मसृण भावुकता एवं कल्‍पना प्रवण अर्न्‍तदृष्टि दर्शन होइत अछि । प्रस्‍तुत काव्‍य-प्रवृति मे ओहि दिस असक्तिक अभाव अछि। वस्‍तुत: परिस्थिति कवि लोकनिक दृष्टि परिवर्तित क’ देलकनि। बुद्धिवादी दृष्टिकोणे क परिण्‍ााम थिक जाहि मे वर्त्तमान समय मे कवि लोकनि क व्‍यंग्‍य प्रधान कविता लिखबाक प्रेरणा देलक। जखन सोझ आङु सँ धी नहि बहराइछ तँ टेढ आङुर क आश्रय लेमय पडैछ। ई व्‍यंग्‍य साहित्यिक टेढ आङुर व्‍यंग्‍य-प्रधान कवितादि क माघ्‍यमे समाज आ व्‍यक्ति क दुर्लबता पर मार्मिक चुटकी लेल गेल अछि। कवि लोकनि वर्तमान समाज मे प्रचलित मिथ्‍याचार. रूढिवादिता, पाखण्‍ड, आडम्‍बरक संगहि राजनीतिक विरूपता, अवसरवादिता आदि पर तीव् व्‍यंग्‍य कयलनि अछि।साम्‍प्रतिक मैथिली कविता मे एकहि संगहि विभिन्‍न प्रवृत्ति आदि क विकास देखि रहल छी। अतएंव एकरा कोनो विशेष नाम सँ अभिहित करबाक ओकर सुस्‍पष्‍ट रूप-परिचय नहि भेटैछ। सुविधाक दृष्टिसँ एकरा नवगीतिवाद क नाम कहि सकैत छी। विशेषत: तरुण कवि लोकनि एकरा लोक प्रिय बनौलनि अछि। ओना तँ परम्‍परावादी धाराक कवि लोकनि एहि धारा मे दिलचस्‍पी देखाबय लगलाह आ अपन रचनादि सँ योगदान देलनि। नवगीतिवाद मे ने तँ परम्‍परावादी लोकनिक इतिवृत्तात्‍मकता अछि आ ने व्‍यक्तिवादी क निरपेक्षता। वस्‍तुत: नवगीतिवाद काव्‍य-धाराक ई नव मोड़ थिक जाहि मे वैयक्तिक प्रतिभा नवयुगक नव-काव्‍य-चेतना क नूतन-स्‍वर माधुरी सँ समन्वित क’ कए प्रकट भेल अछि।आधुनिक मैथिली कविता मे गीति-काव्‍यक विकास एक नव-रूप सँ मेहो भेल अछि। ई वस्‍तुत: हमर साहित्‍य पर नव प्रभावक परिणाम थिक मर नव गीति काव्‍य पाश्‍चात्‍य लिरिकक उपजीवी थिक। ई पूर्णत: आघ्‍यान्‍तीत काव्‍य थिक जाहि मे हमरा अनुभूति क सहज अभिव्‍यक्ति क बोध होइत अछि। प्रारम्भिक एवं मघ्‍यकालीन मैथिली गीत निश्चित रूप सँ संगीत सँ सम्‍बद्ध छल। सभ गीत कवि संगीतक विशेषज्ञ बुझल जाइत छलाइ तथा प्रत्‍येक गीति-कविता कोनो-कविता कोनो-ने-कोनो राग-रागिणी सँ बान्‍हल रहैत छल। आधुनिकाल मे नव गीति-काव्‍य केँ विकासक पथ पर अग्रसर पाबि रहल छी। गीति-काव्‍य क कविक अन्‍तर्गत क ओ स्‍वत: प्रेरित तीवतम भावात्‍मक अभिव्‍यक्ति थिक जाहि मे विशिष्‍ट पदावलीक सौन्‍दर्य अनुभूतिक एक्य एवं संगीतात्‍मकता क योग सँ द्विगुणित होइत अछि। नव गीति काव्‍यक विकास राष्‍ट्रीय-सांस्‍कृतिक काव्‍यादि मे भेटैत अछि, ओना तँ एकर परिष्‍कृत रूपक दर्शन वैयक्ति कवितादि मे आबि क’ होइत अछि। राष्‍ट्रीय-सांस्‍कृतिक धाराक कवितादि विशेषत: उपदेश काव्‍य थिक वा विचारात्‍मक कोटिक रचनादि थिक। फलत: ई वर्णन प्रधान भ’ गेल अछि आ इतिवृत्तात्‍मक थिक जाहि मे भावमिव्‍यञ्जना क दृष्टि सँ सीरलता एवं भावात्‍मकता क अभाव पबैत छी। आलोच्‍य काल मे विभिन्‍न विषयादि सँ सम्‍बन्धित रचनादि भ’ गेल अछि। प्रधानत: एकरा प्रेमगीत, भावपर क गीत, प्रकृति सम्‍बन्‍धी गीत, विचारात्‍मक गीत एवं बुद्धिप्रधान गीत आदि वर्गादि मे बॉंटि सकैत छी। मैथिली काव्‍य मे गीतादि कविकासोन्‍मुख परम्‍परा मे अनेक कवि छथि। एहि कवि गीतकार लोकनिक विस्‍तृत नामावली प्रस्‍तुत करब कोनो विशेष अर्थ नहि रखैछ। मैथिली गीति-काव्‍य क दोसर प्रचलित रूप थिक सम्‍बोध- गीति। वस्‍तुत: गीत काव्‍यक एहि स्‍वरूपक विकास अंग्रेजी काव्‍य ओड क अनुकरण पर भेल अछि। सम्‍बोध-गीति काव्‍यादि मे कविक भावना कोनो वस्‍तु विशेष केँ सम्‍बोधित्त क’ कए प्रकट होइत अछि। मैथिली सम्‍बोध गीति काव्‍यादि मे विषयक वैविघ्‍य एवं शैलीगत अनेक रूपताक दर्शन होइत अछि। सत्‍य ता तँाई अछि जे आलोच्‍य कालीन मैथिली गीति काव्‍य म सम्‍बोध-गीति अपन समृद्ध परम्‍परा स्‍थापित क’ लेलक अछि आ आइ हम ओकरा परिष्‍कृत रूप मे पबैत छी। आधुनिक गीति। काव्‍यक एक रूप चतुदर्शपदी कविताक थिक। एकर विकास अंग्रेजीक सॉनेटक अनुकरण पर भेल अछि चौदह पंक्ति मे रचित गीति-काव्‍यक एहि रूपकक महत्‍व एकर स्‍वरूप केँ ल’ कए अछि जाहि आधार पर एकर नामांकन कयल गेल अछि। मैथिली मे एकर रचना अत्‍यल्‍प भेल अछि।गीति काव्‍यक अतिरिक्‍त अनिवद्ध वर्ग क दोसर काव्‍य-रूप मुक्‍तक थिक। मैथिली मे सेहो पथान्‍तर निरपेक्ष कविते केँ मुक्‍तक कहल गेल अछि। मैथिली मे मुक्‍तक काव्‍यक विकास आलोच्‍यकाल मे आबि क’ भेल अछि। आधुनिक युगक पूर्व काव्‍यक कवि लोकनिक घ्‍यान नहि गेल। चन्‍दा झा पहिल कवि रहथि जे तत्‍कालीन सामाजिक, राजनीतिक जीवन केँ लक्ष्‍य क’ कए मुक्‍तक रचना कयलनि। मैथिली मे मुक्‍तक काव्‍यक विषय क दृष्टि सँ विविधताक दर्शन होइत अछि। श्रृंगार, भक्ति, नीति वा उपदेश एहि सम्‍पूर्ण विषयादि सँ सम्‍बद्ध मुक्‍तक काव्‍य लिखल गेल अछि। मुक्‍तक एक कला प्रधान काव्‍य-रूप थिक आ एकर कलात्‍मकता उक्ति-वैचित्रय केँ ल’ कए अछि। एही सँ चन्‍दा झा क इतिवृत्तात्‍मक शैलीक आगॉं जा क’ परिष्‍कार पबैत छी। आब कविगण उक्ति कौशलक अनुरूप मुक्‍तकक विकास मे सहायक भेलाह।एहर आबि क’ मैथिली काव्‍य क्षेत्र मे नव कविताक घ्‍वनि प्रतिघ्‍वनित होइत अछि। एहि काव्‍यकेँ ल’ कए विद्वान लोकनि मे मतैक्‍यक अभाव अछि। किछु क कथन छनि जे नव कविताक स्‍वर सार्वभौम स्‍वर थिक। किछु क कथन छनि जे मैथिलीक नव कविताक आजुक जे स्‍वरूप दृष्टिगत भ’ रहल अछि ओकर निर्माण मे अन्‍य भाषा साहित्‍यादिक प्रवृि‍त्त प्रेरक भूमिकाक निर्वाह कयलक। मायानन्‍द मिश्र क अनुसारेँ मैथिली मे नव कविताक उन्‍मेष 1960 ई. क लगपास मे भेल। एहि काव्‍य मे प्रगतिशील मूल्‍यक आशा, अखिल मानवता, सौन्‍दर्य क्षेत्रक विस्‍तार, बौद्धिकताक प्रतिष्‍ठा, कटु ययार्थक अभिव्‍यक्ति, धार्मिक कर्मकाण्‍ड पर अनास्‍था, अविश्‍वास, अनास्‍था, असन्‍तोषक प्रति विद्रोहक अभिव्‍यक्ति भेल अछि। जतय धरि शिल्‍पक प्रश्‍न अछि ओ साघ्‍य नहि साधन थिक। मैथिली काव्‍य-धाराक अन्‍यतम नव प्रवृत्ति गीत, नवगीत आ गजल दिस उन्‍मुख भ’ रहल अछि। यद्यपि मैथिली मे गीत रचनाक प्राचीनतम परम्‍परा रहल अछि, तथापि गीत, नवगीत आ गलज लिखबाक नव परम्‍परा चलल अछि। एहि मे मिथिलाक परम्‍परागत लोक धुन केँ अपना क’ कवि लोकनि एकरा अगसर कयलनि अछि। मैथिली मे नव गीत क स्‍वतंत्र काव्‍य-विधा स्‍थापित हैबाक प्र‍क्रिया मे अछि। अरबी या उर्दू काव्‍य-परम्‍परा सँ प्रभावित भ’ कए मैथिलीक कवि लोकनि गजल लिखबाक परम्‍परा अष्‍टदशकोत्‍तर काल मे भेल अछि, तथापि काव्‍यक ई नव प्रवृि‍त्त दिस कवि लोकनिक घ्‍यान गेलनि जकर उत्तरोत्तर स्‍वरूप सोझॉं आबि रहल अछि। एहि प्रकारेँ आध्‍ुनिक मैथिली काव्‍य विविध वस्‍तु-विन्‍यास आ शैली सँ समन्वित भ’ कए दिनप्रतिदिन उन्‍नति क’ रहल अछि।समालोचना आधुनिक साहित्‍यक विशिष्‍ट अंग थिक। पाश्‍चात्‍य साहित्‍यक सम्‍पर्कक माघ्‍यमे समालोचनाक शुभारम्‍भ भेल जकरा मैथिलीक साहित्‍यकार लोकनि चिन्‍हलनि। एहि प्रकारेँ साहित्‍यक अघ्‍ययन सहो समालोचना साहित्‍यक अन्‍तर्गत अपेक्षित भ’ जाइत अछि। भाषा आ साहित्यक रूप मे मैथिली पर विचार करबाक प्रारम्भिक विदेशी विद्वान लोकनि कयलनि। एहि विदेशी विद्वान लोकनिक समानहि बंगाली विद्वान् लोकतिन सेहो मैथिलीक प्रति अपन रुचि प्रदर्शित कयलनि। प्राचीन साहित्यिक कृति सभक अन्‍वेषणक दिशा मे चन्‍दा झा क महत्‍व अक्षुण अछि। कवीश्‍वर चन्‍दा झा अनुसन्‍धानक क्षेत्र मे नव गति भरि देलनि आ ओकरे परिणाम भेल जे प्राचीन साहित्यिक कृति सभक सम्‍पादन होमय लागल। प्राचीन कवि लोकनिक काल आ परिचय केँ ल’ कए विद्वान लोकनि मे मनभिन्‍नता रहल जकर परिणाम रूप मे उपलब्‍ध सामग्री समक अनुशीलन क’ कए उक्ति संगत निष्‍कर्ष उपस्थित कयल गेल।मैथिली मे आलोचना साहित्‍यक वास्‍तविक विकास नहि भ’ पौलक अछि। ओकर भव्‍य स्‍वरूपक निर्माण बीसस शताब्‍दी मे आबि क’ भेल अछि। मैथिली पत्रकाि‍रता क अगदूत महामहोपाघ्‍याय मुरलीधर झा आलोचनाक क्षेत्र मे नव भाषा, नव-शैली एवं विविध आलच्‍य वस्‍तुक संग अयलाह। ओ आलोचनाक लेल विविध प्रकारक साधन, साहित्‍य-निर्माण, भाषा-परिमार्जन, समाज-सुधार एवं राष्‍ट्रीय आन्‍दोलन आदि अनेक विषय सुझौलनि। किन्‍तु एहि काल अर्थात् सन् 1906 ई. धरि आलोचना आ निबन्‍ध दुनू एहि प्रकारेँ सम्‍बद्ध रहल जे ओकर बीच कोनो स्‍पष्‍ट विभाजक रेखाकंन करब सम्‍भव नहि भ’ सकल। एहि काल मे मोद-मण्‍डल तथा ओकरा बाहर क लेखक लोकनि निबन्‍ध आ आलोचनाक सम्मिलित रुपहि रहल।साहित्‍यक क्षेत्र मे दू महारथीक योगदान अत्‍यन्‍त महत्‍वक थिक। विशेषत: प्रस्‍तुत सन्‍दर्भ मे उक्‍त दूनू महारथीक गरु-गम्‍भीर व्‍यक्तित्‍व, विवेक एवं विलक्षणता, अघ्‍ययन एवं मनन सब मिल क’ आलोचना केँ नव रूप देवाक चेष्‍टा कयलनि। बाबू भोलालाल दास (1897-1977) आ सुरेन्‍द्र झा सुमन दूनू अपन विशेषादि क संग साहित्‍यक क्षेत्र मे आयल रहथि। भोलालाल दास एक अघ्‍ययनशील विद्वान्, समाज सुधारक आ मातृभाषाक अनयन्‍य अनुरागी रूप मे प्रकट भेलाह। सुरेन्‍द्र झा सुमन संसकृत साहित्‍यक गहन अघ्‍ययन एवं पाण्डित्‍य, बाङला साहित्‍यक प्रति अभिरुचि, अंग्रेजी एवं हिन्‍दी साहित्‍य क निकटतम परिचय, भावुक कवि हृदय एवं विलक्षण कवि प्रतिभा सॅ समन्वित रहथि। भोलालालदास मिथिला आ भारतीक सम्‍पादन कयलनि आ सुरेन्‍द्र झा सुमन मिथिला मिहिर क सम्‍पादन क’ रहल रहथि।मैथिली आलोचनाक ऐतिहासिक विकास क्रम मे, आरम्‍भ मे वैह आलोचक अबैत छथि जे संस्‍कृत साहित्‍य मे निष्‍ठा रखैत रहथि। उमेश मिश्र एवं बलदेव मिश्र सदृश वर्योवृद्ध आलोचक एही वर्गक प्रतिनिधत्व क’ रहल रहथि। किन्‍तु आलोचना साहित्‍य मे जे नव रूप प्राप्‍त कयलक अछि अथवा ओकर विकासक जे गति देखबा मे आबि रहल अछि, ओकर सब श्रेय अघ्‍ययन क्षेत्र सँ व्‍यक्ति सभ केँ छनि जे आलोचनाक लेल एक सुव्‍यवस्थित मानदण्‍डक निर्माण मे व्‍यस्‍त रहलाह। एहन आलोचकक पंक्ति मे नरेन्‍द्रनाथ दास (1904-1993), रमानाथ झा, कान्‍चीनाथ झा किरण, ब्रजकिशोर वर्मा मणिपद्य, शैलेन्‍द्र मोहन झा, दुर्गानाथ झा श्रीश (1929-2000) आदिक नाम लेल जाइत अछि। दोसर पीढीक आलोचक लोकनि सामंजस्‍य स्थिति निर्माण कयलनि। हिनका सभक उद्देश्‍यक समुचित विवेचन एवं मूल्‍याकंन करब छनि। ई सभ आलोच्‍यक अन्‍तर्तिहित सौन्‍दर्य केँ प्रकाश मे अनलनि जे साहित्‍य क अर्न्‍तत जे सौष्‍ठव अछि तकरबोध अपन पाठक केँ करा देव अपन कर्त्तव्‍य बुझैत छथि नव पीढीक आलोचक साहित्‍य मे सामाजिक मर्यादाक व्‍यास नहि करैत होथि, एहन बात नहि अछि, परन्‍तु एहन स्थिति जँ उत्‍पन्‍न भ’ जाय तँ ओकरा अपराध नहि मानैत छथि। आलोचकक ई दोसर पीढी सँ सम्‍बन्‍ध एक नव दल मेहो फूटैत दृष्टिगत होइत अछि। एहन नव आलोचकक प्रतिभा मे व्‍यक्ति चिन्‍तन एवं समाज मंगलक अदभूत सामंजस्‍यक प्रतिफलत भेटैत अछि। वस्‍तुत: हिनका सभ क’ द्वारा निर्मित आलोचना विभिन्‍न युगक सांस्‍कृतिक एवं दार्शनिक आदर्शक आकलनक संगहि रचनाक मनोवैज्ञानिक आ साहित्यिक विशेषादिक अघ्‍ययन उपक्रम थिक।मैथिली आलोचनाक व्‍यावहारिक पक्ष अपेक्षाकृत पुष्‍ट आ सबल अछि, तकर मूल कारण थिक जे सिद्धान्‍त पक्ष सँ व्‍यवहार पक्ष केँ सरल मानल जायत अछि। दोसर बात थिक जे सतत रचनात्‍मक साहित्‍यक पयलोचन होइत रहैत अछि आ अघ्‍यापनक क्षेत्र मे से हो साहित्‍यालोचनाक व्‍यावहारिक पक्षक आवश्‍यकता अधिक होइत अछि। हमारा ओतय व्‍यावहारिक आलोचनाक सामान्‍यत: चारि रूप अछि भाषण , भूमिका, पुस्‍तक परिचय आ समीक्षात्‍मक साहित्‍य। मैथिली मे आलोचनाक एक अर्थ दोषविष्‍करण होइत अछि। निस्‍सन्‍देह समालोचनाक एहि रूप मे प्रयोग ओकर योग रूढि अर्थ मे अछि। तथापि एहि सँ थोड़ बहुत मात्रा मे हमर साहित्‍य केँ मेहो आक्रान्‍त क’ रहल अछि।परन्‍तु ई रुप विशेषत: साम्‍प्रतिक साहितयमे सेहो पाओल जाइल अछि आ स्‍वस्‍थ आलोचनाक विकासक संगहि-संग एहि प्रवृत्तिक अवसान मेहो भेल जा रहल अछि। आधुनिक समय मे मनोविज्ञान एवं समाजविज्ञान आलोचक केँ नव दृष्टि देलक अछि आ विज्ञाानक नव आलोक मे आलोचनाक स्‍वस्‍थ परम्‍पराक विकास भ’ रहल अछि। मैथिली साहित्‍य मेहो एहि सँ असम्‍पृक्‍त नहि अछि आ ओकरा एकर शुभ भविष्‍यक सूचक मानल जायत। साठोत्तर मैथिली साहित्‍य मे शोधक दिशा मे सन्‍तोष जनक प्रगति भेल अछि। अनेक शोधकर्ता लोकनि विशालकाय शोधप्रबन्‍ध केँ प्रस्‍तुत क’ कए विभिन्‍न उपाधि प्राप्‍त कयलनि अछि आ मैथिली आलोचनाक भण्‍डार केँ शोधक विषय बना क’ शोधप्रबन्‍ध प्रस्‍तुत कयलनि अछि। एहि मे अधिकांश शोध-प्रबन्‍ध अप्रकाशित अछि अतएव एहि प्रसंग मे टिप्‍पणी नहि कयल जा सकैछ। प्राचीन आलोचनाक गति जतय मन्‍थर छल ततय आधुनिक समय मे एकर विकास दुतगतिऍं भ’ रहल अछि।मैथिली साहित्‍य क लेल यात्रा-साहित्‍य नयतम विधा थिक जकरा अन्‍तर्गत तीर्थ-दर्शतन ऐतिहासिक स्‍थलक परिभ्रमण आ विदेश-यात्रा अबैत अछि। जतय धरि मैथिली साहित्‍यक प्रश्‍न अछि, यद्यपि एहन रचनाक सूत्रपात बीसम शताब्‍दी क प्रथम दशक मे भेल आ चेतनाथ झा (1866-1921) क जगन्‍नाथपुरीक यात्रा (1910) पुस्‍तककार रूप मे प्रकाशित धार्मिक कट्टरता क कारणेँ मिथिलावासी विदेश भ्रमण नहि करय चाहैत र‍हथि आ जे सभ यात्रा मेहो कयलनि ओकरा विवरण नहि प्रस्‍तुत कयलनि। सर्व प्रथम सुभद्रझा (1910-2000) अपन विदेश यात्रा केँ प्रवास नामे प्रकाशित करौलनि। विदेश यात्रा सँ सम्‍बन्धित हिनक दोसर पुस्‍तक आयल यात्रा प्रकरण शतक। डा. जगदीशचन्‍द्र झा क विदेश यात्रा सात समुद्र पार (1969), नगेन्‍द्र कुमारक आयर लैण्‍डक यात्रा शामली (1981) उपेन्‍द्रनाथ झा व्‍यासक अमेरिका यात्रा विदेशभ्रमण, आङचेतकरझाक विदेशयात्रा पृथ्‍वी परिक्रमा (1992) प्रकाशित भेल। भारत भ्रमण सँ सम्‍बन्धित रचनादि मे जीवानन्‍द ठाकुरक बदरीनाथ क यात्रा, जयन्‍ती देवीक गया यात्रा (1969), सीताराम झाक भारतभ्रमण आ शेफालिका वर्माक यायावदी (1995) तथा ब्रजकिशोर वर्मा मणिपद्यक ओहिठाम गेल छलहुँ (2004) प्रकाशित अछि। मैथिलीक विभिन्‍न प्राचीन आ आर्वाचीन पत्रिकादिक अवगाहनोपरान्‍त ई जानकारी भेटैत अछि।किछु यात्रा प्रेमी लोकनि अपन व्‍यक्तिगत यात्रादि केँ मूर्त रूप अवश्‍य प्रदान कयलनि, मुदा पुस्‍तककार रूप मे नहि प्रकाशित नहि भ’ सकल अछि। अन्‍य विधादि क तुलना मे ई विधा अद्यापि सशक्‍त नहि पाओल अछि।आत्‍मकथा, जीवनी, संस्‍मरण, साक्षात्‍कार आ इन्‍टरव्‍यू साहित्‍य मे नगण्‍य अछि। एहि दिशा मे महामहोपाघ्‍याय डा. सर गंगानाथ झा (1872-1941) क अंग्रेजी मे लिखित आत्‍मकथा मैथिली मे अनूदित भ’ कए प्रकाश मे आयल अछि। एहि दिशा मे मौलिक आत्‍मकथा हरिमोहन झा क जीवनयात्रा (1984), लक्षमीपतिसिंह क अतीत क स्‍मृति पटल, काशीकान्‍त मिश्रधुपक प्रेरणापुन्‍ज (1980), तलिका झा (1930) क राजलक्ष्‍मी एक भाव-चित्र (1972), मेरेन्‍द्रझा सुमनक मोन पड़ैत अछि (2000), भीमनाथ झत्‍क मनि आडव्‍न मे ठाढ (2000) आ गोविन्‍द झा क आत्‍मालाप (2002) तशा स्‍मृति सन्‍घ्‍या एवं जीवन चरित साहित्यिक दृष्टिसँ उल्‍लेखनीय अछि। एहि दिशा मे ब्रजकिशोर वर्मा मणिपद्य हुनका सँ भेट भेल छल (2004) अदभूत संस्‍मरण लिखलनि जकरा डा. प्रेमशंकर सिंह सम्‍पादित कयलनि जकरा पढि क’ पाठक केँ प्रेरणा भेटैत छनि। आत्‍कथा आ संस्‍मरणक अदभुत स्‍वरूप क दिग्‍दर्शन होइत अछि। गिरीन्‍द्र मोहन मिश्र (1890-1993) क किछु देखल किछु सुनेखे मिथिलाक राजनीतिक, सांस्‍कृतिक आ सामाजिक पक्षादि पर प्रमाणिक विवरण प्रस्‍तुत करैत अछि। मैथिली लोक साहित्‍यक विपुल सामग्री लोक कण्‍ठ मे व्‍याप्‍त अि‍छ,मुदा एहि दिशा मे जतेक प्रकाशन होमक चाही ओ अद्यापि नहि भ’ सकल अछि। आइ धरि एहि साहित्‍य मे एहि विधाक अन्‍तर्गत मैथिली लोककोक्ति। कोशक सम्‍पादन डा. प्रेमशंकर सिंह कयलनि अछि। अनुसन्‍धानोत्‍तर लोक गीतक अनेक संग्रह प्रकाश मे आयल अछि जाहि मे उल्‍लेखनीय अछि अणिमा सिंह क मैथिली लोकगीत (1970), कामेश्‍वरी देवीक मैथिलीक संस्‍कार गीत (1980), लोकनाथ मिश्रक मैथिलीक व्‍यवहार गीत (1970) आ बालगोविन्‍द झा व्‍यथित क मैथिली ग्राम्‍य-गीत दू खण्‍ड।मैथिली बाल-साहित्‍यक स्थिति सन्‍तोष जनक नहि। एकर प्रमुख कारण थिक जे मैथिलीक प्रारम्भिक शिक्षा क रूप मे अंगीकार नहि कयल गेल अछि। तथापि साहित्‍यक एहि प्रभाग केँ विकसित करबाक दिशा मे साहित्‍य-चिन्‍तक देखबा मे आबि रहल छथि। विगत शताब्‍दीक अन्तिम दशक मे किछु बाल साहित्‍य अवश्‍य प्रकाश मे आयल अछि जकर संस्‍था नागण्‍य अछि।अनुवाद सँ साहित्‍यक श्रीवृद्धि होइत अछि। बीसम शताब्‍दीक आरम्भिक चरण मे अनेक संस्‍कृत आख्‍यायिकादि, कथादिक अनुवाद मैथिली मे भेल जकर फलस्‍वरूप एहि विधाक दिस लेखक लोकनिक घ्‍यान देलनि। साहित्‍य अकादेमी द्वारा मैथिलीक मान्‍यता भेटल विभिन्‍न शताब्‍दी षष्‍ठ दशकोत्‍तर काल मे जकर फलस्‍वरूप विभिन्‍न भारतीय भाषादि सँ स्‍तरीय गंन्‍थक अनुवाद मैथिली मे सम्‍भव भ’ सकल। कतिपय विदेशी भाषादिक ग्रन्‍थादिक अनुवाद भेल। एहि दिशा मे लोकक घ्‍यानाकर्षित भेल अछि।मिथिला आ मैथिलीक प्राची इतिहासक प्रसंग मे महत्‍वपूर्ण कार्य भेल अछि। एहि दिशा मे श्‍यामनारासण सिंह क History of Tochut (1922), महामहोपाघ्‍याय परमेश्‍वर झा (1886-1924) क मिथिला तत्‍व विमर्श (1949), महामहोपाघ्‍याय मुकुन्‍द झा वक्‍शी (1860-1938) क मिथिलाभाषामय इतिहास, जयकान्‍त मिश्रक a History of Mithi Leteraterse Volume I एवं II (1949-1950), राधाकृष्‍ण चैधरीक A Saver of Maitlie Leteratere (1976) आ Miahtil in the Age of vidyapati (1976) आ राम प्रकाश शर्मा क मिथिला का इतिहास (1979), दुर्गानाथ झा श्रीश (1929-2000) (1932-2000) एवं बालगोविंद झा व्‍यवथितक इत्‍यादि कृति प्रकाशित अछि, किन्‍तु दुर्योगक विषय थिक जे अद्यपि मैथिलीक सांगोपांग इतिहास नहि लिखल गेल अछि जे सभ वर्गक समुचित प्रतिनिधित्‍व करैत हो। अतएवं जे ऐतिहासिक कृति उपलब्‍ध अछि ओ एकांगी अछि। आलोच्‍यकालीन भाषा आ साहित्यक स्‍वरूप ओकर विकासोन्‍मुख प्रवृत्ति‍ क द्योतक थिक। देशक परिवर्त्तित परिस्थिति मे साहित्‍यकेँ नवशरा सँ विकसित हैबाक हेतु प्रेरित कयलक अछि। वर्तमान परिप्रेक्ष्‍य मे हमर साहित्‍यकार भगीरथ सदृश साधना द्वारा मैथिली साहित्‍य मे भाव-मन्‍दाकिनीक अवतारणा मातृभाषाक प्रति जे जनरुचि लागल अछि ओकर प्रचार-प्रसारक हेतु सन्‍नद्ध छथि। वर्तमान सन्‍दर्भ मे एहि साहित्‍यक इतिहास नव जागरण, नवीन शिक्षा प्रचार एवं पाश्‍चात्‍य सम्‍पर्कक समन्वित परिणाम थिक। जतय प्राचीन आ मघ्‍यकाल मे ई गीताम्‍मक रूप सँ गतिशल छाल तथा ओहि मे विषय वा रूपक विविधादिक अभाव छल ओतय आधुनिक आ स्‍वातन्‍त्रयोत्‍तर काल मे साहित्‍यक विकास विविध विधादि प्रचलित भेल अछि। देशक स्‍वाधीनता साहित्‍यक विकास मे जेनला नव रूप सँ योगदान देलक अछि। देशक स्‍वाधीनता साहित्यिक विकास मे जेना नव रूप सँ योगदान देलक अछि। भाषाक प्रचारक संगहि आइ साहित्‍यक विभिन्‍न विधादि रचनात्‍मक कृति सभसँ भरल जा रहल अछि। तथापि मैथिली केँ एखन बड़ पैद्य मैदान पार करबाक छैक। लोकनाट्य जीवनमे लोक आ साहित्‍यक सर्वातिशायी महत्‍व अछि। लोक शब्‍द अत्‍यन्‍त प्राचीन अछि। लोक शब्‍द अत्‍यन्‍त प्राचीन अछि। आधुनिक सभ्‍यतासँ दूर, अपन प्राकृतिक परिवेशमे निवास कयनिहार तथाकथित अशिक्षित एवं असंस्‍कृत जनताकेँ लोक कहल जाइछ जकर आचार विचार एवं जीवन परम्‍परायुक्‍त नियमसँ नियंत्रित होइछ। लोक समाजक ओ वर्ग थिक जे अभिजात्‍य संस्‍कार, शास्‍त्रीयता, पांडित्‍यक चेतना आर पांडित्‍यक अंधकारसँ शून्‍य अछि जे एक परम्‍पराक प्रवाहमे जीवित अछि। एहन लोकक अभिव्‍यक्तिमे जीवनक जे तत्‍व भेटैत अछि ओ हमर सहित्‍यक विकासक अवरूद्ध मार्गमे नव गति प्रदान करैत ओकरा संबर्द्धित करबामे अहं भूमिकाक निर्वाह करैत अछि। एहिमे जनजीवनक वर्त्तमान स्‍वरूपक उपस्‍थापन अत्‍यन्‍त मूलत: एकर पात्र समकालीन स्थितिक संकेत करैत अछि। लोकायतनक समस्‍त विधा समवेतमे लोक नाटयक अत्‍यन्‍त महत्‍वपूर्ण स्‍थान अछि जे अनेक रूपमे लोक जीवनक स्‍वस्‍थ मनोरंजन करैत आयल अछि। मिथिलांचलक लोकनाट्य एहि साहित्‍यक अमूल्‍य निधि थिक जाहिमे हमर सांस्‍कृतिक जीवनक आंचलिकता प्रचुर परिणामे उपलब्‍ध अछि। वस्‍तुत: लोकजीवनसँ स्‍वत: उद्भाषित लोकनाट्य ओहि क्षेत्रक सास्‍तकृतिक चेतनाक धरोहरि थिक। एहि सांस्‍कृतिक चेतनासँ निष्‍पन्‍न मैथिली लोकनाट्य हमर जीवन आ सहित्‍यक अविभाज्‍य अंग अछि। लोक जीवनक स्‍वाभाविक अभिव्‍यक्ति लोकनाट्यमे भेल अछि। लोकनाट्यमे गीत, संगीत एवं नृत्‍यक त्रिवेणी प्रवाहित भेल अछि। गीतक संग सगीतक योजना अत्‍यधिक आनन्‍द प्रदान करैत अछि; किन्‍तु एकरा संग नृत्‍य मेहो हो तँ आनन्‍दक सीमा अनन्‍तभ जाइछ। कालिदासक अनुसारेँ नाट्य जनमनक अनुरंजनक सर्वोत्‍कृष्‍ट साधन थिक। लोक जीवनमे एहि नाट्यक सर्वातिशायी महत्‍व अछि जकरा देखिक प्रसन्‍नताक अनुभव करैछ। जहिना भोजपुरीक विदेशिया, गुजरातक गर्वा एवं भवाई, मालवाक माच बंगालक यात्रा एवं गंभीरा, महाराष्‍टृक तमाशा आदि लोकनाट्यमे गीत, संगीत एवं नृत्‍यक त्रिवेणी प्रवाहित भेल ताहिना मिथिलांचलक लोकनाट्यमे मे हो उपर्युक्‍त त्रिवेणीक अद्भुत समन्‍वय भेल अछि। लोकनाट्य लोकजीवनक सारगर्भित भावसँ सम्‍पन्‍न तत्‍कालीन युगक प्रवृत्तिक मौलिक आरण्‍यान करैत अछि। जीवनक कोनो परिस्थितिमे एकर सभ कए क्‍यो जीवित नहि रहि सकैछ। लोक मानस अपन प्रवृत्तिकेँ मनोरंजकता प्रदान करबाक हेतु एक नव आयामक व्‍यवस्‍था कयलक जे कालान्‍तरमे साहित्‍य-विधाक रूपमे विकसित भेल। लोक जीवनसँ संबंधित विविध मांगलिक अवसर यथा पावनि-तिहार, धार्मिक, सांस्‍कृतिक लोकोत्‍सव आदिक विशेष परिस्थितिजन्‍य प्रक्रियासँ उद्भूत सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्‍कृतिक चेतनाक परिणाम थिक मैथिली लोकनाट्यक लोकधर्मी वैशिष्‍ट्य। लोक महत्‍वा : नाट्यशास्‍त्रक टीकाकार अभिनवगुप्‍ताचार्य धर्मी शब्‍दकें व्‍याख्‍यायित करैत अपन मतक स्‍पष्‍टीकरण कयलनि जे अभिनय लोकधर्म वा लोकमूलक लोकोपयोगी सामयिक तत्‍वक अनुकरण करैछ।1 नाट्याचार्य भरतक मान्‍यता छनि जे अभिनयमे मात्र अभिनेतेक प्रमुखता नहि रहैछ, प्रत्‍युत श्रोता एवं दर्शककेँ लोकशास्‍त्रक ज्ञान अपेक्षित अछि। लोकाचार, लोकभाषा तथा लोक-शिल्‍पक ज्ञाता दर्शक नाटक वा अभिनयक वास्‍तविक आनन्‍द प्राप्‍त क’ सकैछ। एहि प्रकारेँ नाटकमे वेद, आध्‍यात्‍म, व्‍याकरण, शास्त्र एवं छन्‍द शास्‍त्रक समन्वित दर्शन होइत अछि जाहिमे लोक मान्‍यातकेँ जीवन एवं साहित्‍यसँ अन्‍योन्‍याश्रय सम्‍बन्‍ध स्‍थापित भ’ जाइत अछि। अतएव नाटकक सफलता वा विफलतामे लोकरुचि अत्‍यन्‍त महत्‍वपूर्ण भूमिकाक निर्वाह करैछ।2 एहि प्रसंगमे नाट्याचार्य भरतक मत छनि जे शास्‍त्र, धर्म, शिल्‍प तथा लोक-क्रिया, लोक धर्म प्रवृत्त रहैछ तकरे नाटक कहल जाइछ। नाटक लोकवृत्तिक अनुकरण करैत चलैछ। भरत लोक वृतान्‍तक अनुकरण क’ कए नाटक क निर्माण कयलनि।3 लोक सब कार्यक अनुदर्शक अछि। वस्‍तुत: लोक जीवनसँ सम्‍बद्ध नाट्य एवं शास्‍त्र सम्‍मत नाट्यमे कोनो अन्‍तर नहि अछि। आदि आचार्य भरत एवं हुनक व्‍याख्‍याकार अभिनवगुप्‍तक क‍थन छनि जे लोकतीत अनुभवसँ नाट्य रसक प्राप्ति होइछ। भरत कालीन भारतमे साहित्‍य वा नागरिक नाट्य एवं ग्रामीण नाट्यमे कोनो अन्‍तर नहि छल ई अन्‍तर तखन आयल जखन नाटक राजदरवारमे संरक्षित भेल। नाटक सर्व संग्रही नाट्य परम्‍पराकेँ गतिशील रखबाक हेतु गुप्‍ता कालक पश्‍चात् प्रयोक्‍ता एवं नाट्याचार्यक प्रयाससँ आंचलिक एवं अनौपचारिक नाट्य-शैलीक उद्भवना भेल। एहि प्रकारेँ नाट्य-सिद्धान्‍तक प्रतिपादक एवं नाट्य लेखनक एक एहन श्रेणी बनल हैत जाहिमे नाट्याचार्य, निर्देशक तथा प्रयोक्‍ताक एक स्‍वतन्‍त्र वर्ग रहल होयतैक। लोक जनसाधारणक रुचि एवं नाट्यकेँ लोक मानसक प्रतिपादक रहल होयतैक। तत्‍पश्‍चात लोकनाट्य अपन वास्‍तविक रूपमे सोझॉं आयल।4 लोकधर्मी नाट्यक स्रोत एवं क्षेत्र लोक जीवनक सहज संस्‍कार लोकधर्मी नाट्यक सहस स्रोत थिक। एहिमे आपसी प्रेम भाव, धार्मिक अनुष्‍ठान, मेला-ठेला, वत-त्‍यौहार तथा विविध सुख देनिहार लोकानुरंजनक मूलभूत विन्‍दु थिक। एहीसॅ लोकधर्मी नाट्यक अन्‍त: सलिला प्रवाहित भेल। एकर स्रोत सामूहिक जीवन, टुटैत-जुटैत आ विकसित होइत अपन रुढि़ परम्‍परा तथा प्रवृत्तिकेँ सुरक्षित रखने अछि तथा ई वाह्य वातावरण क’ कोनो प्रभाव नहि पड़य देलक। एकर सृजन, प्रणयन प्रयोग एवं प्रवर्त्तनमे लोकजीवनक योगदान अछि जे सहित्यिक विशिष्‍ट अंग अछि। एकर प्रणयनमे प्रकृतिक विशाल कोरासँ अनायासहि एकर उत्‍पत्ति भेल। मेघक गर्जन, बिजलीक चमकब एवं गर्जब, प्रलयंकारी स्‍वरूप, मेघ बरसब, मोर नाचब, पतझड़, वसंत, हेमन्‍त आदि ऋतु प्रकृतिक अनन्‍त असीम लोकनाट्यक उद्गम एवं विकासक मूलाधार अछि जे लोक जीवनसँ नि: सृभ’ सहित्‍यक विशिष्‍ट अंग बनल। लोकनाट्यमे एखनो अवशिष्‍ट अछि तत्‍कालीन परिस्थितिक सुकुमारता एवं सुग्राह्यता। आेहिमे लोक जीवनक महत्‍वक प्रतिपादन भेल अछि तेँ एकरा लोकप्रिय होयब सवर्था स्‍वाभाविके। एकर काव्‍य भाग एवं प्रयोग भाग लोकधर्माश्रित अछि। लोकनाट्यमे जनसामान्‍यक अर्थात, लोक मनोरंजनमे हमर जीवनक, प्रतिबिम्‍ब भेटैछ जे साहित्‍यक अविभाज्‍य अंग अछि। एहि नाट्यक उत्‍पत्ति लोक-विश्‍वास, लोक प्रचलन, धार्मिक रुढि़, जन परंपरा वीर पूजा, मनोरंजन, उत्‍सव, मांगलिक पर्व एवं लोकादि अवसरक धारणाक बीचमे भेल। अतएव लोकनाट्यसँ तात्‍पर्य नाटकक ओहि स्‍वरूपसँ अछि जकर सम्‍बन्‍ध विशिष्‍ट शिक्षित समाजसँ भिन्‍ना सर्वसाधारणक जीवनसँ अछि जे परंपरा अपन क्षेत्रक जनसमुदायक मनोरंजनक साधन रहल अछि।6 एहिमे जनसामान्‍यक चाहे गामक होथु वा शहरक एतबे विशेषता अछि जे ओ शिक्षा-दीक्षा, पहिरब-ओढ़ब, खान-पान, आचार-विचार, संस्‍कार तथा व्‍यवहारमे ओहि क्षेत्रमे प्रतिनिधि संस्‍कृतिक प्रतीक रहथु एवं देशक जनसाधरणक मूर्त्त रूपमे स्‍पष्‍ट अछि।7 लोक-नाट्य कोनो जाति विशेषक संपत्ति नहि, प्रत्‍युत एकर क्षेत्र, जाति, समूह, गॉंव, जिला, प्रान्‍तव्‍यापी प्रभाव थिक। एहि प्रकारेँ साहित्‍यकेँ परिपोषणक हेतु एहि नाट्य-परम्‍परामे अपन जनपदीय संस्‍कृति, अनुश्रुति, प्रचलित परंपरा, रुढि़ किंवदन्‍ती, विश्‍वास, मान्‍यता एवं धारणाक सांगोपांग रूपमे परिवेष्ठित अछि। अतएव ई एक क्षेत्र अपन जनपद विशेष धरि सीमित रहैत अछि। एहिमे भौगोलिक स्थिति, नृत्‍य,संगीत तथा कथा बीज मेहो अपन-अपन क्षेत्रक रहैत अछि। वस्‍तुत: लोकनाट्य समाजक सभ्‍य एवं सुसंस्‍कृत कहो2 निहार लोकसँ सर्वथा भिन्‍न्‍ा सभ्‍यताकेँ चरौनिहार बाह्य आडम्‍बर एवं उपचारसँ अनभिज्ञ अपन रुढि़ अर्थमे पूर्ण तथा शिक्षित एवं सुसंस्‍कृत होइत अछि।8 लोक जीवनक परंपरा युगक अभीप्‍सा, अभिरुचि आर मान्‍यताक अनुसारेँ ई निरन्‍तर प्रवाहमान रहल अछि।9 लोकनाट्य हमर परम्‍परापक धरोकर थिक। मुसलमानक आक्रमणक फलस्‍वरूप एहि परम्‍पराक शनै:-शनै: ह्रास होमय लागल। एहना स्थितिमे ग्रामीण परिवेशमे ई परम्‍परा सुरक्षित रहल ।10 एकर क्षेत्र अत्‍यन्‍त व्‍यापक अछि। लोकधर्मी नाट्य जाति विशेषक संपति थिक जे समुदाय विशेषक प्रतिनिधित्‍व करैछ। एहि प्रकारेँ ई नाट्य-विधा हमर गामक संपत्ति थिक जे अपन जनपदीय, संस्‍कृति, रुढि़, विश्‍वास, मान्‍यता एवं धारणाक सांगोपांग रूपमे परिवेश्ष्ठि तकने एकर क्षेत्र जनपदे धरि सीमित रहि गेल।11 भौगोलिक स्थितिमे नृत्‍य, संगीत तथा कथा बीज मेहो अपन विशिष्‍ट क्षेत्रमे प्रचलित अछि। रचना विधान : लोकनाट्यक रचना-विधान शास्‍त्रीय नियमानुसार नहि होइछ। एहिमे लोक परंपरा तथा चिर विकसित नाट्य-रुढि़क सर्वाधिक महत्‍व अछि। तात्‍विक दृष्टिएँ गीत, नृत्‍य, पुराण तथा यथार्थ जीवनक प्रसंग लोक-जीवनक कथानक प्रधानता अछि। एहिमे जीवन एवं प्रकृतिक सहज प्रतिछवि होइछ। जीवनक विविध आनन्‍ददायक त्तत्‍वक सर्वाधिक महत्त्ता एकर प्रमुख स्‍वर थिक। 12 एकर वेश-भूषा एवं श्रृंगार प्रसाधमे कोनो प्रकारक तामझामक आयोजन नहि कयल जाइछ। सामाजिक मान्‍यता : लोकनाट्यक सामाजिक मान्‍यता अछि। एहिमे अनेक समस्‍याक विविध स्‍वरूपक विश्‍लेषण कयल गेल अछि। ई हमर सामाजिक इतिहासपर महत्‍वपूर्ण प्रकाश दैत अछि, कारण धर्म, नियम एवं सामाजिक परंपराक कठोरताक विरूद्ध नाट्य-कलाक संघर्ष चलि रहल छल।13 लोक स्‍वभाव एवं लोक-व्‍यवहारक सुख-दु:खक अभिव्‍यक्ति एहिमे भेल अछि। वस्‍तुत: मनुष्‍यक सहज भावक अभिप्राय विशेषसँ एकर अभिनय प्राणवन्‍त भ’ गेल अछि। एहिमे सामाजिक जीवनक सारगर्भित अभ्‍युदयक युगानुरूप विकासक यथातथ्‍यता प्रस्‍तुत कयल गेल अछि। एकर सुदीर्घ परम्‍परा आ क्षेत्रीय सरलताक कारणेँ ई जनजीवनक अत्‍यधिक सन्निकट रहल अछि। ई समाजक जीवन-शैलीमे सामूहिकता तथा लोकनुरंजकताक प्रति पूर्ण प्रतिबद्ध अछि। ई लोकजीवनसँ समूहगत दायित्‍वसँ परिपूरित मनोरंजनक उत्‍सवकें ल कए अबैत अछि जे लोकजीवनक सम्‍पर्कमे पल्‍लवित-पुष्पित भेल अछि। मिथिलांचलक लोक-नाट्य समाजशास्‍त्रक दृष्टिएँ, अन्‍त: संबंधक अध्‍ययनक दृष्टिएँ अत्‍यधिक महत्‍वपूर्ण अछि। सामाजिक ओ सांस्‍कृतिक परिप्रेक्ष्‍यमे प्रदर्शनक रूपमे ई सभ नाट्य अधिक जनरुचिसँ सम्‍पोषित जनकल्‍याणक भावनाक हेतु पूर्ण प्रतिबद्ध अछि। मानव जातिक विकासक क्रमिकतामे लोकनाट्य रहि नर-नारीक आत्‍मानुभूतिकेँ स्‍पष्‍टतासँ मुखरित करैत रहल अछि। मिथिलांचलक लोकनाट्य : सम्‍पूर्ण मिथिलांचल ग्रामीण क्षेत्र अछि। ग्राम्‍य जीवनक प्रमुखताक कारणेँ लोकजीवनक जतेक भव्‍य स्‍वरूप एहिमे उपलब्‍ध अछि ततेक अन्‍यत्र दुर्लभ अछि। वस्‍तुत: मिथिलांचलक ग्रामीण जीवन सभ्‍यतासँ पृथक अछि तकर परिणाम एतबा अवश्‍य भेलैक जे ओ अपन प्राचीन स्‍वरूपकेँ तदवत सुरक्षित रखने रहल। एकर, रूप, रंग एवं रसमे अद्यावधि कोनो परिवर्त्तन नहि भेल अछि। भौगोलिक दृष्टिसँ मिथिलाक बनाबटि एहन अछि जे एकर उर्वर भूमि हमर संस्‍कृतिकेँ यथावत सुरक्षित रखने अछि। एहन बनबटि लोकनाट्यक हेतु सर्वथा अनुकूल अछि। इऐह कारण अछि जे एतय अनेक लोकनाट्य सुरक्षित रहल। एहि भूमिमे लोकनाट्यक विविधताक दर्शन नहि होइछ। एक समान भूमि नाट्य रूपकेँ सीमित एवं संकीर्ण बनबैत अछि। नाट्य विविधता तथा विकासशीलताक हेतु भूमिक विविध रूपता आवश्‍यक प्रतीत होइछ। हमर लोकनाट्यक विशाल, सुदृढ़ एेतिहासिक परम्‍परा अछि। लोकमंच आ लोकनृत्‍य : मिथिलांचलक विकास कहिया भेलक ई एक अहं प्रश्‍न अछि। मिथिलांचलक ई सौभाग्‍य रहल अछि जे लोकमंचक माध्‍यमे पृथक्-पृथक् क्षेत्रमे लोकारंजनक रूपमे ई जीवित रहल। लोक जीवनमे सुरक्षित ई रंगमंच ने तँ मात्र विशाल भूभागमे रंगमचीय निरन्‍तता बनौने रहल, प्रत्‍युत संस्‍कृत रंगमंच तथा सहज स्‍वाभाविक स्‍थानीय लोकनाट्य परंपराक एक मिश्रित समन्वित रूपकेँ शताब्‍दी अक्षुण राखलक। मैथिली रंगमंचक अध्‍ययनक ई एक पक्ष अछि जे मैथिलीक प्राचीन महत्‍वपूर्ण कला रूपमे पुनरूद्धार एवं पुनरूज्‍जीवन प्राप्‍त कयलक। लोक मंचक दृष्टिएँ मिथिलांचक प्रचलित लोकनृत्‍यक महत्‍वपूर्ण स्‍थान अछि। लोकनृत्‍य वस्‍तुत: प्राकृतिक नृत्‍य थिक। लोक जीवनमे जतय कतहु भावुकताक क्षण अबैछ ततय ओकर अनुकूल कोनो ने कोनो नृत्‍यक रूप प्रकट होमय लगैछ।14लोकनृत्‍यमे मिथिलांचलक सांस्‍कृतिक अन्‍तरात्‍माक प्रतिध्‍वनि गुजित होइत अछि तथा एकरा माध्‍यमे लोक जीवनक दृश्‍य हमरा समक्ष अबैत रहल। एहन नृत्‍यक कथानकमे नैसर्गिक सुन्‍दरता एवं उल्‍लास एवं जीवनमे परिव्‍याप्‍त व्‍यापक दरिद्रतापर आधरित होयबाक कारणेँ अत्‍यधिक मर्मस्‍पर्शी, भाव-पूर्ण आकर्षक अछि। वस्‍तुत: लोकनृत्‍य हमर दुखमय जीवनकेँ सुखमय बनयबाक प्रयास करैछ। विशेषत: मिथिलांचलक लोकनृत्‍य एतेक प्राणवन्‍त अछि जे सतत हमर जीवनकेँ सुखमय बनौने रहल अछि। अति प्राचीन कालहिसँ मिथिलांचलमे एहन लोकनाट्यक प्रचलन रहल जे समय-समयपर ओहिमे परिवर्त्तन, परिवर्द्धन आर परिमार्जन होइत रहलैक। एहि नाट्यप्रदर्शनमे वेश-भूषा एवं श्रृंगार प्रसाधनक कोनो प्रयोजनक नहि पड़ैछ। पमरिया एवं नटुआक नाचमे घघरा अचकन एवं मुलतानी पगड़ीक प्रयोग कयल गेल अछि वर्त्तमान शताब्‍दीमे।15 यद्यपि मैथिली लोकमंचक स्‍वरूपक प्रसंगमे कोनो ठोस प्रमाणक अभाव अछि, किन्‍तु एतबा निर्विवाद अछि जे मिथिलामे गीत काव्‍यक उद्भव मनुष्‍यक वाणीक संगहि भेल। एतदर्थ मनुष्‍य जीवनसँ संबद्ध जीवनक प्रत्‍येक सुख दु:खक अवसर पर एकरा माध्‍यमे जीवनक चरम उद्देश्‍यक पूर्त्तिक प्रयास कयल गेल जकर दिग्‍दर्शन मिथिलांचल गोसाउनिक एवं पितरक गीतमे उपलब्‍ध अछि। मिथिलाक लोकजीवनमे रागात्‍मक प्रवृत्तिक व्‍यापक संबंध मात्र उपनयन, विवाह आदिमे नहि रहि, कन्‍याक विदागरी कालक रागात्‍मक रूदन एवं मृत्‍यूपरान्‍त क्रन्‍दनमे मेहो परिलक्षित होइछ। मैथिली लोक नाट्यक प्रकार : मिथिलामे निम्‍नस्‍थ लोक नाट्यक अनुष्‍ठानगत परंपरा प्रचालित अछि जहिमे लोकमंचक स्‍वरूपक दिग्‍दर्शन होइछ यथा दसौत, सामा-चकेवा, झिया, जट-जटिन, झुम्‍म‍िर, रमखेलिया, डोमकछ, लोरिक, सलहेस, गोपीचन्‍द, विदापत, हरिलता एवं बिहुला आदिक उल्‍लेख लोक-नाट्यान्‍तर्गत कयल जाइ एतदिरिक्‍त एतय अन्‍य प्रचालित लोकनाट्य अछि यथा चौपहरा, नारदी, नयना-योगिन, भाव, झड़नी, पमरिया आदिक उल्‍लेख मेहो भेल अछि जाहि दिशमे अनुसंधानक प्रयोजन अछि। दसौत : दसौतमे वर-कनियाकेँ लोक-जीवनसँ सम्‍बद्व माया, मोह, आदिसँ अवगत करबाक हेतु एकर नाट्यायोजन कयल जाइछ। मानव जीवनक कटु दिग्‍दर्शन एवं लोक जीवनसँ सम्‍बद्व ज्ञानक अर्जन एहि नाट्यक उद्देश्‍य अछि जकर स्‍वरूप लोकगीतमे सुरक्षित अछि। सामा-चकेवा : सामा चकेवा-लोक नाट्यक संबंध्‍ा मूलत: कृषिसँ अछि। एहि लोक नाट्याभिनयक द्वारा बहिन अपन भायक धनक अभ्‍युदय ककामना एवं हुनका घरमे धनधान्‍यक कल्‍पनाकेँ साकार करैत लक्ष्‍मीक आह्वान करैत अछि। आनुभाविक बुद्धिक आकुल चेष्‍टासँ सामाजिक अंकुश दग्‍ध होइछ। यौवनमे सौन्‍दर्यक पूर्ण विकास होइछ, आत्‍माक चिरन्‍तनक ध्‍वनि बनि जाइछ जे पतिहीना नारीक हेतु अभिशाप धिक। एकर कथोपकथनमे नारीक वास्‍तविक रूपक दिग्‍दर्शन होइछ। बहिनिक प्रति भायक अवलम्‍बन तँ रहि‍तहि छैक, मुदा नारीक त्‍यागक भावना, पिताक सम्‍पत्तिमे भातीजक अधिकार तथा मात्र मोटरीक अंशपर संतोषमे आसक्तिक विरोध तथा विरिक्‍त भोगक विशिष्‍ट विवारक अभिव्‍यक्ति सिनुर केर आस मे सन्निहित अछि। 17एहि नाट्याभिनयक परिपाटी मिथिलांचलक प्रत्‍येक वर्गमे प्रचालित अछि जे एकर सर्वव्‍यापकताक घोतक थिक1 एकर स्‍वरूप गीतात्‍मक अछि। झिझिया : झिझिया लोक नाट्याभिनक रूप आन लोकनाट्याभिनयसँ सर्वधा भिन्‍न अछि। एहि लोक नाट्याभिनय द्वारा उाइन-योगिनक साधनामे व्‍यवधान उपस्थित कयल जाइछ। एकर स्‍वरूप मेहो गीतात्‍मक अछि। जटजटिन : जट-जटिन पढ्य-बद्व लोकनाट्य थिक। एहि लोक नाट्यक कथानक लो‍कजीवनक वैवाहिक जीवनक विविध समस्‍या, सुख-दु:ख पुरुषक पार्शविक बलात्‍कारी प्रवृत्तिक बर्बरता, यौवनक विषम समस्‍याक अन्‍तर्ध्‍वनि एवं जीवनक विविध अनु‍भूति एहिमे स्‍वाभविक रूपेँ चित्रित भेल अछि। एहि लोकनाट्यमे अन्‍तर्द्वन्‍द्वक प्रमुखता अछि।18 एकर प्रस्‍तावनामे सहगान एवं नृत्‍य सहित संवाद गीत द्वारा उत्‍सवक उल्‍लासक हेतु उद्दीपनक भावक प्रमुखता अछि। एहिमे उत्‍सवक लालसाक संग जीवनक अन्‍तक आशंकाक शाश्‍वत संयोगक मार्मिक उल्‍लेख अछि जे दाम्‍पत्‍य जीवनसँ सम्‍बद्व धटनाक क्रमिक परिचय भेटैछ। एकर कथानक विवाहसँ प्रारंभ होइछ। एहिमे नारी स्‍वान्‍त्रताक ध्‍वनि अनुगुंजित होइत अछि। लोक मानसक माध्‍यमे एहि लोकनाट्यमे हमर जीवनक झाँकी भेटैत अछि। एहि लोक नाट्याभिनयोपरान्‍त महिला द्वारा हर जोतबाक परम्‍परा अछि। अनावृष्टि भेलापर नग्‍न स्‍त्री द्वारा हर जोतबाक तथा बेंग कूटिक अपन पड़ोसिक आंगनमे पेकबाक परम्‍परा मेहो अछि।19 वर्षाक अभावमे अकालक सांगोपांग चित्रण एहिमे उपलब्‍ध अछि1 स्‍त्री द्वारा हर जोतब, ब्राहमण द्वारा दैनिक कर्मक अवहेलना तथा सामन्‍तवादक विरोधी प्रवृत्तिक मार्मिक चित्रण एहिमे भेल अछि। एहिमे पतिक प्रति पत्‍नीक शिष्‍टता, व्‍यवहार कुशलता एवं नम्रताक शिक्षा भेटैछ; किन्‍तु मुक्‍त, स्‍वतंत्र स्‍वावलंविनी तथा श्रम-शीला सहचरीक चित्रांकन मेहो भेल अछि। अतएव जटिनक व्‍यावहारिक जीवन वेशी स्‍वाधीनता तथा समानाधिकार प्रिय अछि।20 जट स्‍वाभावत: पत्‍नी पर अधिकार जमायब चाहैछ तथा पत्‍नीकेँ मनोनुकूल बनाबय चाहैछ जे मुग्‍धाक आचरणक सर्वधा प्रतिकूल अछि। एकर नाट्यभिनयकेँ अत्‍यन्‍त मनोरंजक बनयबाक हेतु रोहिदास एवं रवाेदपाडनीक गीत गाओल जाइछ एहि लोक नाट्याभिनयक आयोजन हमर जीवनकेँ मुखमय एवं समृद्धिमय बनयाबाक निमित्त कयल जाइछ।एहि प्रकार नाट्याभिनय मात्र मिथिलांचलेमे सीमित नहि, प्रत्‍युत तमिलनाडु एवं मध्‍यप्रदेशक संगहि विदेशमे वटिश को‍लम्बियाक डॉमसन इन्डियनक बीच यूरोपमे मेहो प्रचालित अछि जकर चर्चा प्रेजर द गोल्‍डेन वाउमे छथि।20 झुम्‍म‍िर : मिथिलांचलमे ‘झुम्‍मरि’ लोक नाट्याभिनय प्रचालित अछि जे लोकजीवनक माध्‍यमे भाय-बहिनक उमड़ल स्‍नेहमे परलक्षित होइछ। एहिमे नि:स्‍वार्थ वात्‍सल्‍य रस पूरित हृदयक, जे अपन बाल गोपालक मंगल कामनाक हेतु पैधसँ पैध प्रलोभनकेँ लात मारि सकैछ। एहिमे बहु विवाहक धमकी, खाद्यान्‍नक अभाव, अनमेल विवाह, श्रृंगार प्रसाधन, मनोरंजन, आभूषण आदि विविध पक्षपर प्रकाश देल गेल अछि जे मानव जीवनमे स्‍थायी महत्‍व रखैछ जाहिसँ स्‍पष्‍ट होइछ जे प्राचीन का‍लहिसँ अद्यावधि एहि लोक नाट्याभिनयक महत्‍व अछि। वर्त्तमान परिप्रेक्ष्‍यमे एहि लोकनाट्यमे कतिपय परिवर्त्‍तन भेल अछि। एकर भाषा, भाव, शैली आर विषय समसामयिकताक कोमल साँचामे परिष्‍कृत एवं परिवर्द्वित भेल जा रहल अछि। रमखेलिया : नेपाल तराई थारू एवं अहीरमे रमखेलिया सर्वाधिक प्रचालित लोकनाट्य अछि। एहि लोकनाट्य बंगलाक कृतिवासक रामायणक अधिक प्रभाव अछि। नेपालक उपत्‍यकामे देवीनाथ, ज्‍चापूनाच, महाकाली नाच आदिक अतिरिक्‍त सराय केलाक छाउ नाचमे मेहो मुखौटाक प्रयोग होइत अछि। रमखेलियामे मेहो मुखौटा ओ अनेक उपकरणादिक प्रयोगसँ एकर प्राचीनता एवं समृति परंपरा प्रतिभाषित होइत अछि। एकर संवाद गीतत्‍मक ओ गद्यात्‍मक अछि। डोमकछ : डोमकछक शाब्दिक अर्थ होइछ डोमक स्‍वांग। एकर अभिनय महिलाक द्वारा कयल जाइछ। एहिमे पुरुषक प्रवेश निषेध रहैछ। पुत्र विवाहक अवसर पर जखन घरक पुरुष वर्ग वरियात चल जाइत छथि तखन ओहि राति घर आंगनक ओ अड़ोस-पड़ोसक स्‍त्रीगण राति भरि खेल-खेल (डोमकछ) मे जागि जाइछ तथा चोरीक भयसँ समाजक रक्षा करैछ। डोमकछमे विवाहक सामाजिक आवश्‍यकता पर बल देल जाइछ। एकर कथोपकधन गीतात्‍मक ओ गद्यात्‍मक दुनू संवाद मैथिलीमे उपलब्‍ध अछि। एहिमे विवाहक सामाजिक आवश्‍यकताक संकेत भेटैत अछि। लोरिक : लोरिक वा लोरिकायन मैथिली लोक कंठक अनमोल रत्‍न थिक। एकर कथा पूर्वमे पूर्णियाँ उत्तरमे हिमपर्वत, दक्षिणमे गंगा तथा पश्चिमतमे ओदन्‍तपुर विहारमे चर्चित अछि। एहि लोक नाट्यचर्चा वर्णरत्‍नाकरमे मेहो उपलब्‍ध होइछ। सलहेस : मिथिलांचल एवं पूर्वी नेपाल तराइक जनजीवनमे ई नाट्य अत्‍यन्‍त प्रिय अछि। किन्‍तु मो‍रंगिया सलहेस एवं मिधिलांचल परिसरमे प्रचालित सलहेसमे किछु भिन्‍नता अछि। एकरो कथानक गदय ओ पदय दुनूमे उपलब्‍ध अछि। कतहु-कतहु कथोप भ’ कथन ओ दृश्‍यविधान मिश्रित गेल अछि। एहि लोकनाट्यमे विदूषकक चर्चा भेल अछि। सलहेसक संग सूरम्‍भ शब्‍दक प्रयोग भेल अछि जे ओकर वीरताक थिक। गोपीचन्‍द : प्रस्‍तुत लोकनाट्य भारतक विभिन्‍न भूभागमे प्रचालित अछि, किन्‍तु एकर उदगमक श्रेय बंगालकेँ छैक। एकर कथानायक गोपीचन्‍द्र छधि। एहिमे मैनावतीक कार्यक्षमता ओ दीक्षित जीवनक प्रवाहपूर्ण वर्णन भेटैत अछि। एकर कथानकक सम्‍बन्‍ध नाथ सम्‍प्रदायसँ अछि जे सर्वशून्‍यकेँ परम तत्‍व मानैत छथि। एकर कथानक मिथिलांचल धरि सीमित नहि अछि, प्रत्‍युत आसामी, पंजाबी, गुजराती, मराठी एवं नेपालीमे मेहो उपलब्‍ध्‍ा होइछ जाहिपर बंगालक स्‍पष्‍ट प्रभाव अछि। मिथिलांचलमे एहि लोकनाट्यक प्रस्‍तोता रूपमे गुदरिया बाबाजी जानल लाइछ। विदापत : पूर्णियँा जिलामे विदापद नाट्यक आंचलिक अछि। एकर प्रदर्शन मुक्‍त रंगभूमिमे नृत्‍य, संगीत ओ अभिनयक माध्‍यमे होइत अछि जकर मूलाधार अछि लोकधर्मिता जे पूर्वाचल समाजमे अपन अस्तित्‍व अक्षुण्‍ण रखने अछि। कृष्‍ण लीलाक साभिनय प्रदर्शनक कारणेँ विदापतमे एखनो अपूँर्व भाव सौन्‍दर्य, श्रुति माधुर्य, लोकानुरंजन एवं प्रभावोत्‍पादकता आदयावधि सुरक्षित अछि। एहि लोक नाट्यमे शास्‍त्रीय एवं लोक परंपराक अदभुत सामंजस्‍य भेल अछि। एहिमे लोकधर्म, लोकाचार तथा लोक आदर्शक प्रमुखता अछि। हरिलता : एहि लोकनाट्यमे चित्रमेन, बुद्धमेन ओ धर्माविलोकक प्रेम कथाकेँ अभिनय द्वारा प्रस्‍तुत कयल जाइछ। लोकधर्मी नाट्यक सभ तत्‍व एहिमे मुखर अछि। एक संवाद पदयमय ओ गदयमय दुनू अछि। एकर भाषामे प्रवाह, शैलीमे सरलता तथा कथोपकथनमे सशक्‍तता अछि। प्रेम गाथाक समायोजन तथा प्रस्‍तुतीकरणक उत्‍स जेना लगैछ जे ओ संभवत: मध्‍यकालीन प्रेम कथाक विश्रृंखलित कड़ीक संकेत करैछ जे कालान्‍तरमे लोकनाट्यक रूपमे प्रसिद्ध भेल। बिहुला : बिहुला महादेवक बेटी छलीह जे बारह वर्षक अवस्‍थामे वामुकी नागसँ परिणीता भेलीह। ओ गौरीकेँ कटैत छलीह आ पुन: मृत्‍यु मुक्‍तक दैत छलीह। एहिसँ महादेव प्रसन्‍न भ’ हुनका वरदान देलथिन जे चान्‍दो बनियॉं द्वारा अहॉंक पूजा हैत। किन्‍तु चान्‍दो बिहुलाक पूजामे अपन असमर्थता प्रगट कयलक जकर परिणाम भेलैक जे बिसहीर चान्‍दोकेँ चेतावनी देलथिन तथा ओकर पुत्र सर्प दंशसँ मरि गेल। अन्‍तमे बाला कुमरक विहुलाक संग विवाहल गेल जे सर्प दंशसँ मृत प्राय छल; विहुला अपन पातिवत धर्मसँ अपन पतिकें बचा लेलनि। बिसहीर बिहुलाक पतिकेँ दंशक हेतु तैयार नहि भेल। विषहरी शेषनागक आराधना कयलक। ओ जादू-टोना, जड़ी-बुटीसँ विज्‍जीक द्वारा ओकरा गंभीर निद्रामे राखलनि। किन्‍तु बिहुला आ बालाकुमार सुतल छलाह ओतय ओ गेल आ बाला कुमारकें दंश माहि देलक। बिहुला अपन मृत पतिकेँ जीवित करबाक हेतु इन्‍द्र, सूर्य आदि देवताक सान्निध्यमे गेल तथा ओकर पति पुन: जीवित भ’ गेल। राय बहादुर दिनेश चन्‍द्र सेन बंगालमे जखन बिहुलाक तथा लिखलनि तत्‍पश्‍चात् एकर प्रचार अत्‍यधिक भेलैक। भागलपुर परिसरमे ई कथा एवं पूजाक विधान मेहो प्रचलित अछि। एक कथानक सोद्देश्‍यतासँ भरल नारीक आदर्श ओ पातिवतक अभिनयक रूपमे प्रख्‍यात अछि। सीमांकन : उपर्युक्‍त विश्‍लेषणसँ स्‍पष्‍ट भ’ जाइछ जे प्रागैतिहासिक एवं ऐतिहासिक एहि कृतिमे लोक जीवनक चित्रांकन भेल अछि जे मैथिली साहित्‍यक अमूल्‍य निधिक चित्रांकन भेल अछि जे मैथिली साहित्‍यक अमूल्‍य निधि थिक। एहिमे लोक जीवनक परम्‍परा, लोक विश्‍वास एवं अनुश्रुति रूपमे सुरक्षित रहल जे समयक गतिमे शनै:- शनै: हमर साहित्‍यकेँ प्रभावित कयलक। ई परम्‍परा चिरन्‍तनसँ विकसित होइत रहल तथा ओकर मान्‍यता ओकर प्रतिमान युगक अभिरुचिक अनुकूल परिवर्त्तित होइत गेल। एहि परंपराक चित्र, संगीत एवं अभिनयक वास्‍तविक विश्‍लेषण कयल जाय तँ आहिमे लोक जीवनक स्‍पष्‍ट छाप परिलक्षित हैत। उपर्युक्‍त परम्‍पराक पृष्‍ठभूमिमे भरत, धनंजय, अभिनवगुप्‍त, नीन्‍दकेश्‍वर तथा रामचन्‍द्र गुणचन्‍द्र आदि नाट्याचार्य लोक जीवनसँ प्रेरणा ग्रहण क’ कए नाट्यधर्मी नाटकक रचना करबाक प्रेरणा देलनि। उपर्युक्‍त परम्‍पराक परिप्रेक्ष्‍यमे मिथिलांचलक लोकमंच विभिन्‍न आख्‍यानपर आधारित भ’ विकसित भेल जकर दिग्‍दर्शन उपलब्‍ध होइक जाहिमे मिथिलांचलक लोकजीवनक विभिन्‍न समस्‍याकेँ प्रतिपादित कयल गेल जे हमर साहित्‍यक अक्षय भंडार थिक। सभ्‍यता एवं विकासक नामपर नागरिक जीवन लोक जीवनकेँ अनेक क्षेत्रमे प्रभावित कयने जा रहल अछि। एहना स्थितिमे प्रयोजन अछि मैथिली लोक अनुरंजक साधनकेँ यथावत संग्र‍हीत कयल जाय। मैथिली लोक नाट्यक अध्‍ययन मात्र मौलिक एवं ज्ञान विस्‍तारकेँ नहि, प्रत्‍युत लोक जीवनक सांस्‍कृतिक स्‍वरूपक संरक्षाक दृष्टिऍं हमर साहित्‍यक हेतु उपयोगी हैत। आलोच्‍य नाट्य सभक अतिरिक्‍तो मिथिलांचलमे अनेक एहन लोकनाट्य अछि जे जीवन्‍त कथा तत्‍वसँ भरल, प्रदर्शन सार्वभौम सत्‍ताक अनुकूल अछि। एहिमे अल्‍लाह रुदल, रायरणपाल, गुगली घटवार, दुलरादलाल, दीनाभद्री, भगता, लुखेसरी, ढ़ोला कुँवर, काली विलास, विषहारा, अघोरी आदि विशिष्‍ट अछि जकर कथानक, कथोपकथन, अभिनय परम्‍परा, रंगमंच, रूप-योजना, भाषा-शैली लोकानुरंजन आदि हमर साहित्‍यक अति महत्‍वपूर्ण अंग अछि। मिथिलांचलक उपर्युक्‍त नाट्य रूप सभमे आधारभूत तत्‍वक अतिरिक्‍त स्‍थानीय विशिष्‍टता उपलब्‍ध होइत अछि जाहिमे हमर जीवनक अभिव्‍यक्ति भेल अछि जे साहित्‍यक अविभाज्‍य अंग थिक। ई लोकनाट्य लोकोनुरंजनक संग‍हि-संग लोकाभिव्‍यक्तिक सरल माध्‍यमक रूपमे प्रचलित अछि, तकरा आजुक परिस्थितिमे आवश्‍यकतानुसार उपयोगी बनाओल जा सकैछ। आधुनिक परिवेशमे संदेश प्रचारक हेतु मिथिलाक लोकमंच सर्वाधिक उपयोगी सिद्ध भ’ सकैछ। मिथिलामे उपलब्‍ध कतिपय लोकनाट्यक गतिशील परम्‍पराकेँ विश्‍लेषण गवेषणा ओ अनुशीलन सौविध्‍यक दृष्टिएँ उपयोगी अछि। मैथिली लोकनाट्य हमर प्राचीन जीवन, जीवन प्रकृति ओ प्रवृतिक साक्षात स्‍वरूपकेँ स्थिर करबामे सहायक भेल आ तत्‍कालीन युगक लोक मानसक दशा-दिशाक अभिज्ञान अद्यावधि करबैत अपन युगधर्मक प्रति प्रतिबद्ध अछि। एहि संदर्भ मे अदयावधि प्रकाशित एवं विवेचित लोकनाट्यक सर्वेक्षणसँ ई तथ्‍य स्‍पष्‍ट भ’ जाइत अछि जे सभक मूल आत्‍मा आ उद्देश्‍य समाने छैक जकरा नगरीय मंचपर समुचित रीतिएँ उपस्‍थापनसँ एकर भविष्‍य आर विकासमय, उज्‍ज्‍वलमय प्रमाणित भ’ सकैछ। लोकनाट्य लोक जीवनक प्रागैतिहासिक जीवनक मौलिक दस्‍तावेज सदृश विश्‍लेषणक निष्‍कर्षपर गवेषणाक प्रयोजन अछि। ई हमर सांस्‍कृतिक जीवनक धरोहर धिक। वर्त्तमान परिप्रेक्ष्‍यमे आवश्‍यकता अछि जे एहि दिशामे अनुसंधान क’ कए एकर समुचित प्रकाशनक योजना बनाओल जाय जे हमर संस्‍कृति सभ्‍यता, जीवनक लौकिक पक्ष साहित्‍य जगतक समक्ष आओत जे हमर जीवनकेँ प्रकाशितक नव रश्मिसँ आलोकित क’ सकत। मिथिलांचलक लोकनाट्य जनजीवनक दृष्टिसँ अलि‍क्षत भ’ रहल अछि तकरा सभक समक्ष अनबाक आवश्‍यकता अछि जाहिसँ ओकर नवीनीकरणक प्रक्रिया द्वारा वैज्ञानिक आधार प्रदान कयल जा सकैछ। संदर्भ : 1. हिन्‍दी अभिनव भारती, संपादक एवं भाष्‍यकार आचार्य विश्‍वेश्‍वर सिद्धान्‍त शिरोमणि, हिन्‍दी विभाग, दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय, दिल्‍ली, 1960, पृष्‍ठ-435 2. मैथिली नाटक ओ रंगमंच, डॉ. प्रेमशंकर सिंह, मैथिली अकादमी, पटना, 1978 पृष्‍ठ-102 3. यानि शास्‍त्राणि ये धर्मायानि शिल्‍पानिया: क्रिया:। लोक धर्म प्रवृत्तनि तानि नाट्ये प्रकीर्तितम्।। नाट्यशास्‍त्र, संपादन-डॉं. मनमोहन घोष, मनीषा ग्रंथालय प्रा. लि., 4/3 बंकिम चटर्जी स्‍ट्रीट, कलकत्ता, 1967, अध्‍याय-26, श्‍लोक-124-125, पृष्‍ठ.221 4. मैथिली नाटक औ रंगमंच, डॉ. प्रेमशंकर सिंह, पृष्‍ठ-103 5. परम्‍पराशील नाट्य, जगदीशचन्‍द्र माथुर, विहार राष्‍ट्रभाषा परिषद् पटना, 1969 6. लोक धर्मी नाट्य परंपरा, डॉ. श्‍याम परमार, हिन्‍दी प्रचारक पुस्‍तकालय, वाराणसी, 1958, पृष्‍ठ-30 7. भारतीय लोक नृत्‍य एवं सैद्धान्तिक अध्‍ययन, देवीलाल सामर, भारतीय लोक कला मंडल उदयपुर, 1976, पृष्‍ठ-1 8. लोक-नाट्य-परंपरा और प्रवृत्तियॉं, डॉ. महेन्‍द्र भावना, बाफना प्रकाशन जयपुर, 1971 पृष्‍ठ-4 9. मैथिली नाटक ओ रंगमंच, डॉ. प्रेमशंकर सिंह, पृष्‍ठ-109 10. आधुनिक हिन्‍दी साहित्‍य, डॉ. लक्ष्‍मी सागर वार्ष्‍णेय, हिन्‍दी परिषद्, इलाहाबाद युनिवर्सिटी, संशोधित और परिवर्द्धित संस्‍करण 1948, पृष्‍ठ-224 11. मैथिली नाटक ओ रंगमंच, डॉ. प्रेमशंकर सिंह, पृष्‍ठ-114 12. तथैव, पृष्‍ठ-114-115 13. तथैव, पृष्‍ठ-117 14. हिन्‍दी साहित्‍य कोष भाग-1, प्रधान संपादक-धीरेन्‍द्र वर्मा, ज्ञानमण्‍डल लिमिटेड, वाराणसी, द्वितीय संस्‍करण वसंच पंचमी 2020 पृष्‍ठ-751 15. मैथिली नाटक ओ रंगमंच, डॉ. प्रेमशंकर सिंह, पृष्‍ठ-127 16. तथैव, पृष्‍ठ-131 17. मैथिली नाटक परिचय, डॉ. प्रेमशंकर सिंह, मैथिली अकादमी पटना, 1981, पृ-131 18. जट-जीटन, राजेश्‍वर झा, मैथिली साहित्‍य संस्‍थान पटना, 1971, पृष्‍ठ-4 19. मैथिली नाटक परिचय, डॉ. प्रेमशंकर सिंह, पृष्‍ठ-47 20. Golden Bough, J. E. Prazer, Abridged Edition, 1960, Page-96 21. पूर्वाचलीय लोक साहित्‍य, चेतना समिति पटना, 1974, पृष्‍ठ-7 पारंपरिक नाटक साहित्‍यक अन्य विधाक तुलनामे भारतक विभिन्‍न जन–जनपदमे सर्वाधिक नाट्य रचना मिथिलाचंलमे भेल; इऐह कारण अछि जै एकर इतिहास अति प्राचीन एवं प्रौढ़ अछि। शिष्‍टवर्ग ओ निरक्षर समाजमे साहित्यिक अभिरुचि उत्‍पन्‍न करबाक हेतु मैथिलीक साहित्‍य–मनीषी नाट्य रचना दिस अत्‍यधिक उन्‍मुख भेलाह। देश कालक आधारपर मानव-मूल्‍य परिवर्त्तित होइत गेल, युगीन दड़ारिमे जतय ओकर जर्जर परम्‍परावादी सिद्ध्ान्‍त अ‍टकि गेलैक ओतय साहित्‍य सेहो समयक मांगक अनुसारेँ करोट फेरलक। मै‍थिली नाटक अपन अत्‍यन्‍त पैघ-यात्रा–पारक आइ एक चौबटिया पर ठाढ़ दृष्टिगोचर होइत अछि। आधुनिक नाटककार परम्‍परावादी मान्‍यतादिकेँ घ्‍वस्‍त नहि कयलनि; प्रत्‍युत नाटककेँ रंगमंचक दिशामे अभियान कयलनि। कथा-साहित्‍य सदृश अपन निश्चित कलेवरमे ओ अपनाकेँ चमका देबाक संकल्‍प कयलनि। नवीन मूल्‍यक अन्‍वेषगमे पारंपरिक नाट्कारक कथ्‍य एवं शिल्‍प दुनूमे युगान्‍तकारी परिवर्त्‍तनक श्रीगणेश क्‍यलनि। मघ्‍यकालकेँ छोडि क’ परंपरावादी नाट्ककार स्‍वच्‍छन्‍दतावादी कम यथार्थवादी एवं बौद्धि‍क छथि। नाट्य-शिल्‍पमे भेल परिवर्त्तन नाटककेँ पठनक सीमित क्षेत्र‍सँ बहार क’ कए रगंमंचक अत्‍यधिक समीप आनि देलक अछि। वस्‍तुत: नाटक एक एहन विधा थिक जे अपन परंपराक विरासतसँ अधिक लाभान्वित भेल अछि। कथा-विस्‍तारकेँ नाटकीय सौष्‍ठव प्रदान करबाक हेतु विषकंभक, प्रवेशक, अंकास्‍य, अंकावतार आदि जे परंपरागत मैथिली नाटक शैली छल तथा नाट्य-शास्‍त्र प्रणालीक सम्‍मत आधुनिक नाटककारक प्रवृत्ति भेलनि। वस्‍तु-विधान, पात्र-परिकल्‍पना, चरित्र-चित्रण एवं संवाद योजनामे नव दृ‍ष्टिकेँ स्‍वीकारलनि। नाटक रसोद्रेकक साधन नहि रहि क’ देशक नव-निर्माणक प्रेरक शक्ति बनि गेल अछि। नैराश्‍यक अंधकारमे आशाक दीप जरयबाक प्रेरणा पारंपरिक नाटककार देलनि अछि। पारंपरिक मैथिली नाटक बहिरंग संरचनाक सँदर्भमे नाटककार समन्‍वकारी छथि अर्थात् भारतीय एवं पाश्‍चात्‍य रूढि़ क’ समाकलन ओ नाटकान्‍तर्गत कयलनि अछि। मैथिली नाटक आधुनीकरण वा अंग्रेजीकरणक प्रवृत्ति स्‍पष्‍ट अछि। पाश्‍चात्‍य नाट्य-शैलीमे जे संघर्ष, द्वन्‍द्व, मनोवैज्ञानिक चरित्र-चित्रणकेँ नाटककार अपन उद्देश्‍य बुझ‍लनि। अनुकरणक ई प्रवृत्ति मैथिली भाषी क्षेत्रक नाटककारकेँ यथार्थोन्‍मुख एवं बौद्विक हैबाक हेतु बाध्‍य कयलक। मैथिलीक पारंपरिक नाटक किछुु एहन अछि जकर सूचनामात्र साहित्‍योतिहासिक ग्रंथमे उपलब्‍ध होइत अछि; किन्‍तु दुर्योगक विषय थिक जे अद्यावधि ओकर प्रकाशनक दिशामे तँ ने कोनो अनुसंधाता आने कोनो संस्‍था एहि दिशामे प्रयास कयलक अछि। यद्यपि विभिन्‍न विश्‍वविद्यालयादिमे नाटक पर अधिकाधिक संख्‍यामे प्रबंध प्रस्‍तुत कयल जा रहल अछि तथापि अनुसंधित्‍सु ओही सूचना मात्रकेँ दोहरेबाक प्रयत्‍न कयलनि, किन्‍तु अप्रकाशित पारंपरिक मैथिली नाटकक प्रकाशनक दिशामे कोनो सक्रिय प्रयास नहि कयकलनि। एहि संदर्भ मे डॉo जयकान्‍त मिश्र विश्‍वनाथ झाक रमेश्‍वर चन्द्रिका आधुनिक मैथिली साहित्‍यक जनक कवीश्‍वर चन्‍दा झाक (1831-1907) अहिल्‍या चारित नाटक एवं बलदेव मिश्रक (1887-1946) राज राजेश्‍वर नाटक (1920) एवं रमेशोदय नाटक परंपरागत नाटक सूचना देलनि जे अद्यावधि अप्रकाशित अछि। एहि दिशामे प्रयासक प्रयोजन अछि जे उपर्युक्‍त नाटकादि मैथिली पाठकक सम्‍मुख आबय जाहिसँ नव ढ़ंगे मैथिलीक परंपरागत नाट्य–शैलीक आलोचना भ’ सकय। मैथिली नाटक अतिप्राचीन रहितहुँ ओ सतत अनुसंधेय अछि; कारण श्रखलाव्‍ाद्ध रूपेँ ओकर अन्‍वेषण अद्यावधि सुव्‍यवस्थित रूपसँ नहि भ’ सकल अछि। जहिनाक–जहिना अनुसंधित्‍सु एहि दिशामे सचेष्‍टता देखौलनि तहिना-तहिना मैथिली नाट्य साहित्‍यपर प्रकाशक नव ज्‍योति पडि़ रहल अछि जे एकर आलोकमय भविष्‍यक सूचक कहल जा सवैछ। गहन अनुसंधानक फलस्‍वरूप एहि श्रंखलान्‍तर्गत एक परंपरागत नाट्यकारक नाट्यकृति प्रकाशमे आयल अछि ओ छथि तेजनाथ झा (1854-1934) जनिक सुरराज विजय नाटक (1919) किन्‍तु एहि नाटक संबंधमे ने कोनो इतिहासकार वनि कोनो अनुसंधता अद्यावधि सूचना देलनि जे अत्‍यधिक खेदक विषय थिक। ई ठेय छैक जिज्ञासा (1995) क’ विद्वान संपादक वृन्‍दकेँ जे संपूर्ण नाटककेँ अपन प्रवेशांकमे प्रकाशित कयलनि अछि। जहिना जीवन झा (1848-1912) परंपरागत नाट्य–शैलीक अनुकरण क’ कए पारंपरिक नाटक रचना श्रीगणेश कयलनि तहिना तेजनाथ झा रचित सुरराज विजय नाटक सेहा ओही शैलीकेँ आगॉं बढ़यबाक दिशामे एक अभिनव प्रयासक कयलनि। वस्‍तुत: सुरराजविजय नाटक स मैथिलीक पारंपरिक नाट्य–साहित्‍यक इतिहासमे एक सेतुक काज करैछ जे जीवन झा एवं साहित्‍यरत्‍नाकर मुंशीरघुनन्‍दन दासक (1860-1945) बीच एक नव नाटक क’ सूचना मैथिली नाट्यालोचककेँ भेटलनि अछि1 जतय जीवन झा, लालदास (1856-1921) एवं साहित्‍यरत्‍नाकर मुंशी रघुनन्‍दन दासक नाटकादिमे स्‍थल-स्‍थल पर पारंपरिक नेपाल, मिथिला, एवं असामक अंकीया नाट सदृश धड़ल्‍लत्त सँ संस्‍कृत श्‍लोकक माध्‍यमे मैथिली पदक भावकेँ व्‍यक्‍त कयल गेल ततय तेजनाथ झाक विशिष्‍टता छनि जे ओ सुरराजविजय नाटकमे कतहु संस्‍कृत श्‍लोकक प्रयोग नहि कय‍लनि। विशुद्व मैथिली गद्यक अनुकरण ओ जीवन झासँ अवश्‍य कयलनि आर पारसी थिरैटरिकल कम्‍पनीक प्रभावक कारणेँ ओ मैथिली पद्यक प्रयोग नाटकमे कयकलनि। मैथिली नाटक परिदृश्‍यमे किछु नाटक निश्चित रूपेँ उपलब्‍ध होइत अछि जे विशुद्व रूपेँ मध्‍यकालक शैलीपर आधुनिक कालमे लिखल गेल अछि। हमरा लोकनिकेँ महामहोपाध्‍याय हर्षनाथ झाँक (1844-1899) जतेक नाटक उपलब्‍ध होइत अछि जकर प्रकाशन हर्षनाथ काव्‍य–ग्रंथावी मे भेल ओ तँ विद्धयु रूपेँ पारंपरिक नाटक थिक जाहिमे मैथिलीक प्रांरभिक नाट्ककेँ मध्‍यकालीन। नाटक वंशज कहबामे कोनो तारतम्‍य नहि। मध्‍यकालनीन नाटक त्रैभाविषक छल, कृथोपकथ्‍न संस्‍ककत प्राकृत तथा ओहिमे मात्र मैथिली गीतक समावेशक ‘कारणेँ ओकरा मैथिली नारक गेल। अतएव हर्षनाथ द्वारा लिखित जे नाटक उपलब्‍ध अछि क्ष तकरा पारंपरिक परिप्रेशर विशलेषण कश्‍यल जायत। एहिसँ स्‍वत: स्‍पष्‍ट भ’ जाइछ जे क’ पारंपरिक नाटक अछि जे मूलत : मध्‍यकालक पृष्‍ठभूमिमे लिखल गेल अछि आ दोसर ओ अछि जे आधुनिकताक परिप्रेक्ष्‍य मे लिखित पारं‍परिक नाटक थिक। जतस परंपरागत मैि‍थली नाटकमे मैथिली गद्क अभाव, पदयक प्राचूर्य, संस्‍कृत श्‍लोकादिक अधिकताक संगहि कथोकथपन सेहो संस्‍कृत वा प्राकृतमे हाेइत छल ततय जीवन झा तेजनाथ शा लालदास एवं मुंशी रघुनन्‍दन दास नाटक अनुशीलनसँ स्‍पष्‍ट भ’ जाइछ जे वर्त्तमान युगमे परंपरागत मैथिली नाटकमे एक क्रान्तिकारी परिवर्त्तन भेल जे ओ मैथिली गीत एवं संस्‍कृतक रलोकक सर्वथा परित्‍याग नहि क’ कए विशुद्व रूपेँ मैथिली गदयकेँ कथोपकथनक साधन मानि ओकरा अपन अभिव्‍यक्तिक माध्‍यम प्रमुख कारण धिक जे मध्‍यकालकेँ छोडि क’ जतेक पारं‍परिक नाटक उपलब्‍ध अछि गदयक प्रचुरता परिलक्षित होइत अछि। जीवन झा क प्रखर प्रतिभा–किरण मैथिली नाट्य–साहित्‍यक क्षितिज पर एक अद्भभुत आलोकक संग प्रस्‍फुटित भेल। जीवन झा जखन नाट्य रचना आरंभ कयलनि तखन आधुनिक गद्यक न्‍योँ राखल जा चुकल छल; किन्‍तु ओकर कानो निशिचत एवं व्‍यवस्थित स्‍वरूप नहि निर्धारित भेल छलैक। मौलिक रूपसँ मौ‍ििथली नाट्य साहित्‍यक वास्‍तिव‍क विकास हिनकहिसँ होइत अछि। परंपरावादी आर नवीन विचारधाराक एहन संधर्ष कालमे जीवन झा सत्‍यत: मातृभूमि प्रेमी तथा भाषा प्रेमी कोना मौन रहि सकैत छलाह? अतएव ओ मात़भाषक सेवाक हेतु दृढ़ संकल्‍प कयलनि ओ गदयक विधामे नाटककेँ पहिने एहि हेतु चयन कयलनि जे ओकरा माध्‍यमे जनपसामान्‍यमे श्रेष्‍ठ आर साधारण व्‍यक्ति धरि अपन उद्भावनाकेँ सुगमतापूर्वक पहुँचा सकथि ओ मौलिक पारंपरिक नाटक सृजनक मैथिली नाट्य भंडारकेँ समृद्व करबाक प्रयास कयलनि। जीवन झासँ प्रेरणा प्राप्‍त क’ कए हुनक समकालीन अनेक लेखक नाटक रचना कय‍लनि। जीवन झा कालीन लेखक लोकनि विविध भावनाक व्‍यापक प्रचार करबाक हेतु ओहिमे नाट्य कलात्‍मकला गौण छलैक। तत्‍कालीन परिस्थिति एवं समस्‍याकेँ ओ यथार्थ रीतिऍं प्रतिविम्बित कयलनि। परम्‍परागत मैथिली नाट्य साहित्‍य एवं संस्‍कृत नाटक शास्‍त्रीयतासँ ओ प्रभावित भेलाह; किन्‍तु शनै: शनै: हनका पर तत्‍कालीन रुचिक प्रभाव सेहा यथेष्‍ट मात्रामे पड़लनि। नाट्य रचनाकेँ समयानुकूल बनयबाक दृष्टिऍं अग्रसर परंपरागत संस्‍कृत नाट्य शास्‍त्रकेँ ओ अपन आधार अवश्‍य बनौलनि; किन्‍तु यथासंभव आधुनिकताक प्रवेश करयबाक दिशामे यथेष्‍ट प्रयास कयलनि। तत्‍कालीन अभिनय व्‍यवसाय आ पारसी कम्‍पनीक क्रिया-कलापक प्रभाव एहि युगक नाटककार लोकनिपर पार्यप्‍त पड़लनि। पारसी कंपनीक अभिनयमे उत्तेजना, भावोद्रवेग, प्रेमोद्गगार आदि तथ्‍यक प्रभाव हुनक समकालीन नाट्य-साहित्‍यपर अवश्‍य पड़लनि। नाटक वस्‍तु-विन्‍यासमे परंपरागत नाट्य प्रस्‍तुतिक सर्वथा परित्‍याग नहि कयल गेल। नाट्य रचनामे स्‍वाभाविकताक भूमिपर कथानकक विन्‍यास कयल गेल। यद्यपि एहि नाटक भाषा अशास्‍त्रीय रहल तथापि ओकर प्रयोग पात्रक अनुकूलताक अनुसारेँ भेल तेँ भाषामे उन्‍मुतता तथा सरलताक दिग्‍दर्शन अनेक स्‍थलपर भेल जकर फलस्‍वरूप ओहिमे कृत्रिमताक समावेश भ’ गेलैक। वन झा मैथिली नाट्य गदयक संस्‍दपके नयहिहवछलाह; प्रत्‍युत विभिन्‍न नाट्य-शैलीक जनमदाता सेहो रहथि। हिनक भाषा-शैलीमे लोक प्रचालित शब्‍द, मुहावरा एवं लाकोक्तिक प्रयोग भेल जकर फलस्‍वरूप हिनक भाषामे एक अद्भभुत सौन्‍दर्य आबि गेल संगहि स्‍वाभाविकताक रक्षा सेहो भेल। हिनक नाटकादिमे सरसता, सरलता, स्‍पष्‍टता एवं चित्रमयताक दिग्‍दर्शन होइत अछि। हिनक प्रत्‍येक नाटक पद्य-गद्य मिश्रित नाटक थिक। हिनक नाटकादिमे गद्यक प्रधानता रहितहुँ पद्यक प्रचुर प्रयोग भेटैछ। पदय प्रयोगक अतिरिक्‍त ई गीतक अवतारणा सेहो कयलनि। काव्‍य-वैभवक दृष्टिएँ हिनक एक-एक पद् अमूल्‍य निधिक समान अछि। पदय एवं गीतक प्रयोग नीरवताक परिहराक’ रसोत्‍पादन करबामे, वातावरणक सृष्टि करबामे तथा पात्रक मनोभाव एवं चरित्रगत विशेषताकेँ प्रगट करबामे सहायक भेल अछि। हिनक नाटकापिमे भावक अनुरू विविध छन्‍दक विधान उपलब्‍ध होइछ। अतएव प्रतिपाद्य प्रबन्‍धान्‍तर्गत हम मध्‍यकालकेँ छोडि क’ मै‍थिलीक पारंपरिक नाटक परिप्रेक्ष्‍यमे एहि आलेखकेँ केन्द्रित करबाक उपक्रम कयलहुँ अछि। प्रतिपादय प्रबंधकेँ विश्‍लेषणक क्रममे हम एकरा दुइ भागमे विभाजित करैत छी- मौलिक एवं अनूदित। मैथिलीमे वर्त्‍तमान कालमे किछु एहन नाटक अवश्‍य उपलब्‍ध हाइछ जे वस्‍तुत: मध्‍य-कालक शै‍लीक अनुकरणपर लिखल गेल अछि आ अनूदित नाटकान्‍तर्गत ओहन नाटक चर्चा कयल जायत जे संस्‍कृत वा अंग्रजी वा फ्रेंच वा बांङला वा हिन्‍दी नाटक याथावत् मैथिलीमे गदय-पदयानुवाद वा गदयानुवार कयाल गेल अछि। मैथिलीक पारंपरिक नाटककार विविध प्रतृत्तिक नाटक रचना।कयलनि। अतएव अाम विश्‍लेषणक सुविधाक दृष्टिएँ पारंपरिक नाटककेँ विभिन्‍न वर्गमे विभाजित क’ कए विश्‍लेषण करब। विष्‍य-वस्‍तुक आधारपर पारंपरिक नाटक तीन प्रकार भ’ सकैछ- पौराणिक, ऐतिहासिक एवं सामाजिक। सामाजिक नाटककेँ हम पुन: दुइ खण्‍डमे विभाजित करैत छी- प्रतीक नाटक एवं समस्‍या नाटक। उपर्युक्‍त परिप्रेक्ष्‍यमे मैथिलीक पारंपरिक नाटकपर विचार कयल जा रहल अछि। परंपरागत पौराणिक नाटक : मैथिलीक पारंपरिक पौ‍राणिक नाटक क्षेत्रमे हर्थनाथ झा क’ उषहरण 5 (1962) माधावानल 6 (1962) राधाकृष्‍ण मिलना लीला (1962) जीवन झा क सामवती पुनर्जन्‍म (1908), तेजनाथ झा सुरराज विजय नाटक (1995), लालदास सावित्री-सत्‍यवान10 (1909), त्रिलोकनाथ मिश्र (1889-1960) क जीमूतवाहन चरित (1352 साल), आनन्‍द झा 1913) क सीता स्‍वयंवर (1995 सवत्) ठाकुरप्रसाद झाक सीता परिणय13 (1960) दामोदर झाक गन्‍धर्व विवाह14 (1210 सवत्), जीवनाथ झाक दुर्गा विजय15 (2015 साल), शंभुनाथ झाक पुत्रदान16 (1982) एवं शिवाकान्‍त ठाकुरक कृष्‍ण विनु राधा17(1984) आदिक गणना कयल जाइछ। उपर्युक्‍त नाटकादिक कथान‍क पुराणाश्रित एवं महाभारताश्रित अछि अत: तदयुगीन वातावरण, आकस्मिता आदिक पूर्ण समावेश अछि एहि नाटक पात्र सभ अलौक्कि गुणसँ युक्‍त छथि। उपर्युक्‍त नाटक पौराणिक परिवेशमे संस्‍कृत नाटक्‍क गणसँ अलंकृत अछि तें ई सभ मैथिलीक पारंपरिक नाटक थिक। मध्‍यकालीन पारंपरिक नाटक क अन्तिम नक्षत्र छथि महामहोपाध्‍याय हर्षनाथ झा हिनक नाटकादिमे कथोपकनक अपेक्षा गीतक प्रधानता अछि। गीतहिक माध्‍यमे कथा-विकास होइछ। संवादमे संस्‍कृत एवं प्राकृत तथा गीतमे मैथिलीक प्रयोग भेटैछ। उषा हरण नाट्यशास्‍त्रीय लक्षणसँ युक्‍त अछि। एहिमे प्रख्‍यात पौराणिक कथा-वस्‍तु, धीरोदात्‍त अनिरूद्ध नायक अंगीरस श्रृंगार, अन्‍य रस अंग, पॉंचो संधि ओ पॉंच अंक अछि। एकर कथानक हरिवंश पुराणसँ लेल गेल अछि। एहिमे प्रयुक्‍त गीत संस्‍कृतनिष्‍ठ मैथिली आ संस्‍कृत एवं विदयापदतिक शैलीपर उपमा तथा उत्‍प्रेक्षा अलंकारक सरस एवं कौशलपूर्ण वर्णनक अति‍रिक्‍त एहिमे नाटकीय विशेषताक अभाव अछि। ई नाटक नाटकीयतासँ पूर्ण अछि। एहिमे नाट्यकारक कवित्‍वपूर्ण अभिव्‍यक्ति भेल अछि। एकर कला पक्ष अत्‍यन्‍त सबल अछि जे नाट्यकारक कलात्‍मक दृष्टिकोणक परिचायक थिक। ई संस्‍कृ‍तनिष्‍ठ सुललित शब्‍दक प्रयोगक कए नाटक्‍केँ अत्‍यधिक बनओलनि।18 माधयवानन्‍द नाटक (62) मे नान्‍दीक पश्‍चात् सूत्रधार रंगमंचपर उपस्थित भ’ कए नाट्यक अभिनयक प्रस्‍ताव प्रस्‍तावनामे करैत छथि। संपूर्ण नाटक पाँच अंकमे विभाजित अछि। एकर कथा अत्‍यल्‍प एवं गीतक बाहुल्‍य अछि। एकहि भावकेँ व्‍यक्‍त करबाक हेतु अनेक गीतक प्रयोग भेल अछि। एहिमे संवाद नगण्‍य अछि। एहि नाटकमे प्रयुक्‍त गीत पर मध्‍यकालीन पारंपरिक नाटक अनुकूल थिक। एकर कथोपथधन संस्‍कृत एवं प्राकृतमे तथा गीत मैथिलीमे अछि। गीतक भाषा संस्‍कृतनिष्ठ अछि। हिनक वैशिष्‍ट्य अछि जे जाहि रसक गीत ई लि‍खलनि ओकरे व्‍यंजक वर्णक प्रयोग कयालनि। कलापक्ष एवं भावपक्षक सुन्‍दर समन्‍वय एहिमे भेल अछि। पात्रक मनोवैज्ञानिक विश्‍लेषण करबामे ई असफल रहलाह अछि। गीतक अ‍ाधिक्‍यक कारणेँ हिनक कवित्‍व शक्ति प्रकाशित भेल अछि। प्रांजल भाषा, वर्णन सौष्‍ठव, विभिन्‍न अलंकारक प्रयोग अति कुशलताक संग भेल अछि।''19 राधा कृष्‍ण मिलना लीला (1962) मे मात्र गीत तत्‍वक प्रधानता अछि। एहि नाटकमे कथोपकथन एवं दृश्‍य-विधानक सर्वथा अभाव अछि। पात्रक प्रवेश एवं निष्‍क्रमण तथा रंग-निर्देश आदिक सूचना संस्‍कृत श्‍लोक माध्‍यमेँ देल गेल अछि। एहि नाटक प्रसंगमे डॉ. जयकान्‍त मिश्रक कथन छनि जे वजक रासधारीक सुविधाक हेतु कालान्‍तरमे एहिमे त्जभाषाक समावेश कयल गेल।20 उपर्युक्‍त तीनू नाटकमे नाटककार मध्‍यकालीन पारंपरिक नाटकप्रतृत्तिकेँ यथावत अनुकरण कयलनि। जेँ एहि सभ नाटकर रचना आधुनिक कालमे भेल अछि तेँ एकर चर्चा एतय अपेक्षित अछि।‍ विशुद्धा मैथिलीमे पौराणिक नाटक रचनाक श्रीगणेश कयलनि जीवन झा सामवती पुनर्जन्‍म (1908) क रचाना क’ कए। प्रतिपादय नाटकमे शास्‍त्रीय परम्‍परा समीपवर्त्ती युगसँ प्रचलित विभिन्‍न नाट्य रूपक समन्‍वय दृष्टिगत होइत अदि। क्‍था-प्रवाह दुतगतिएँ अग्रसर हाेइछ; किन्‍तु नाटककारक कुशलताक फलस्‍वरूप तारतम्‍य एवं रोचकता कतहु बाधित नहि भेल अछि। कथोपकथन गाथित तथा प्रसंगनुकूल अछि। नाटक संवादक प्रत्‍येक वाक्‍यमे नाटकीय गतिशीलता अछि आ एको अंश एहन नहि अछि जे अनावश्‍यक एवं शिथिल हो। बीच-बीचमे स्‍वगत भाषणक आयोजन अछि, जनान्तिकक अवश्‍यकतानुसार प्रयोग भेल अछि। एकर आरंभमे नान्‍दी पाठमे मैथिलीक आश्रयण अछि ओहि प्रकारेँ भरत वाक्‍यमे नहि कयल गेल अछि। एहि प्रसंगमे नाट्यालोचक डॉ. प्रेमशंकर सिंहक कथन छनि: एकर कथानक पौराणिक प़ृष्‍ठभूमिमे अछि; किन्‍तु ई अस्‍वाभाविक प्र‍तीत हाेइछ। एक कथामे रसक आभास मात्रा होइछ जे नाटकीय समीक्षक दृष्टिऍं दोषपूर्ण अछि। वैवाहिक प्रसंगमे अनेक स्‍थलपर असंगतिपूर्ण विषयक उल्‍लेख भेल अछि। नाट्यकार प्रतिभाक बलपर अस्‍वाभाकबि कथानककेँ बनयबाक प्रयास कयलनि अछि। मंगलाचरण, प्रस्‍तावना, भरत वाक्‍य, चामत्‍कारकि कथन, श्रृंगारिक कथन, श्रृंगरिक गीत, गजल, ठुमरी, पौराणिक कथानकमे सामाजिकताक समावेश कथा- प्रवाहकेँ द्रुत गतिऍं आगाँ बढ़बैछ। एकर कथानक संस्‍कृत नाट्य परम्‍पत्‍क समान परंपरगत अछि जे इतिहास एवं अनुरूप अछि।21 मैथिलीक पारांपरिक नाट्य साहित्‍यक अन्‍तर्गत एक नव आयामक श्रीगणेश करैछ तेजनाथ झा क सदय- प्रकाशित सुरराज विजय नाटक। एहि नाटक रचना काल थिक 1919; किन्‍तु एकर प्रकाशन भेल अछि 1995 मे । एहि नाटक मंचन महाराजाधिराज रमेश्‍वर सिंहक समक्ष इन्‍द्र पूजाक अवसरपर भेल छल। नाटक मुख्‍त: इन्‍द्र एवं वृत्रासुरक घटनापर आधृत अछि जाहिमे शचीक संयोग एवं वियोग तथा परंपरगत नाटक विदूषकक हास-परिहासक रोचक वर्णन कयल गेल अछि। एहि नाटक विशिष्‍टता अछि जे एहिमे लीला वा कीर्तनियाँ एवं पाससी थियेटरक शैलीक मिश्रित स्‍वरूपक परिचय भेटैत अछि। नाटक परंपरागत नाटक सदृश पॉंच अंकमे विभाजित अछि। नाटकान्‍तमे भरत-वाक्‍यक परम्‍परा पर आशीर्वादी गीतक नव प्रयोग कयलनि जे नाटककारक मौलिक्‍ता छनि। नाटकक भाषा अत्‍यन्‍त स्‍वाभाविक, जीवनपूर्ण, प्रवाहमयी एवं प्रभाववेत्‍पादक अछि। भाषा-शैजीमे भावाचित शब्‍द-निर्माण एवं शब्‍द चयनमे नाटकरकेँ अत्‍यधिक सफलता भेटलनि अछि। हिनक नाटकमे भाषा-प्रयोग प्राय: पात्रक प्रकृति एवं योग्‍यतानुरूप एवं विषयानुरूप आ परिस्थितिक अनुकूल भेल अछि। हिनक नाटक भाषा विषयानुरूप सेहो परिवर्त्तित होइत अछि। भावभिव्‍यक्तिक अनुरूप कोमल पुरुष भाषाक प्रयोग हिनक नाटक वैशिष्‍ट्य थिक। प्रेमक प्रसंगमे भाषा मधुर आर रसपूर्ण दर्शकक हृदयकेँ स्‍पर्श करबामे समर्थ अछि। हिनक नाट्य-रचनामे विषयानुसार भाषाक‍ विभिन्‍न शैली भावात्‍मम, व्‍यंग्‍याक एवं विश्‍लेषणात्‍मक रूपक दर्शन होइत अछि। नाटककार व्‍यंग्‍यात्‍मक रेखाचित्र अपन नाटकमे विदूषकक माध्‍यमे उतारलनि अछि। एहन स्‍थलपर व्‍यंग्‍यक गरिमा तथा लक्षण-व्‍यंजना आदि शब्‍द-शक्तिक प्रयोग स्‍पष्‍ट ध्‍वनित होइत अछि। हिनक गद्य ओ पदय दुनू समान रूपेँ उच्‍चकोटिक धिक। पारंपरिक मैथिली नाटक मजत्‍वपूर्ण कृति धिक लालदास क सावित्री-सत्‍यवान (1979) एकर रचना ओ कहिया क्‍यलनि तकर निश्चित समय अढ्यावधि अनुसंधेय अछि; किन्‍तु किछु अंश मिथिला मिहिर 1909 क अंकमे प्रकाशित भेल छल जकर सूचना विविध साहित्‍येतिहासिक ग्रंथमे उपलब्‍ध होइछ। संस्‍कृत लक्षण ग्रन्‍थानुरूप प्रतिपाद्य नाटक पारंपरिक शैलीक अनुकरणपर लिखल गेल अछि। एकर मंगल श्‍लोक संस्‍कृतमे अछि। नान्‍दीमे मंगल गीत, महाराजाधिराज रमेश्‍वर सिहंक विरूदावली गीत गाओल जाइछ तत्‍पश्‍चात प्रस्‍तावनान्‍तर्गत वीर, श्रृंगार, अदभुत, करुण रस सम्मिलित संयुक्‍त शास्‍त्रोक्‍त नाटकमे सावित्री सत्‍यवान नाटककेँ अभिनीत करबाक उद्ददेश्‍यपर प्रकाश देल गेल अछि। नाटक सम्‍पूर्ण कथावस्‍तु एक अंकसँ दस अंक धरि चलैत अछि। प्रथम अंकसँ पंचम अंक धरि नाटक पूर्वार्द्ध धिक तथा षष्‍ठसँ दशम अंक धरि उत्तरार्द्ध। नाटक कथानक पौराणक अछि तथा एहिमे नाटकारक अदभुत कवित्‍व शक्तिक संगहि-संग मैथिलीक विलक्षण प्रौढ़ गढ्यक प्रारुप उपलब्‍ध होइछ। मंचनक दृष्टिऍं ई नाटक अभिनयोपयोगी नहि अछि; कारण संवाद एतेक पैघ-पैघ एवं पात्राक बाहुल्‍य अछि जे मंचोपयोगिताक हनन करैछ।23 अन्‍तमे भरत वाक्‍य अछि जाहिमे सर्वेभवन्‍तु सुखिन: सर्वेसन्‍तु निरामया क पावन उपेश देल अछि। भाषाक सौटकी पर जखन प्रतिपादय नाटक विश्‍लेषण करैत छी तखन एहिमे दुइ संस्‍कृतक श्‍लोक प्रयोग भेल अछि प्रथम नाटक आदिमे आ दाेसर क नाटकक अन्‍तमे। मैथिली गीतक प्रचुर प्रयोग एहिमे भेल अछि जे स्‍पष्‍ट करैछ जे हिनका संगीतमे विशष अभिरुचि छलीि‍न। राग-रागिणीक नीक ज्ञान तथा छन्‍दपर अदभुत अधिकार छलनि। इऐह कारण अछि जे अधिकांश गीतक संग ओकर रागक निर्देश कयलनि तथा ओकर स्‍वरक आरोह-अवरोहक विधिक सेहा उल्‍लेख कयलनि। एहि नाटकमे भाषागत दोष, शब्‍दक अधिकता, वाक्‍यविन्‍यासमे शिथिलता, व्‍याकरण सम्‍बन्‍धी कीि‍तपय दोष दृष्टिगत होइछ जे मैथिलीक प्रारंभिक परम्‍परागत नाटक हेबाक कारणेँ म‍हत्‍व नहि रखैछ। जीमूतवाहन चरित (1952) पोराणिक परिवेशमे रचित नाटक थिक। इहो नाटक पारंपरिक पृ‍ष्‍ठभूमिमे लिखल गेल अछि संगहि नाटकीयताक दृष्टिसँ उपयुक्‍त प्राय: सभ तत्‍वक समावेश अछि। एहि नाटक विचार- विन्‍दुमे सुरेन्‍द्र झा ‘’सुमन’’ क शब्‍देँ स्‍पष्‍ट अछि ‘’पुरान प्रसिद्व धीरोदात्त चारित जीमूतवाहन नायक छथि। कथावस्‍तु गनधर्व- विढ्याधर युगक आख्‍यान रहितहुँ आधुनिक रीति नीतिसँ अनुरयूत रहने रोचिष्‍णु अदि। कवि अपन समयक संस्‍कार द्वारा पुराण युगहुकेँ अदयतन ओ सजीव बनौने छधि। भाषामे यथायोग्‍य पात्रामुखे मैथिलीक केन्‍द्रीय ओ प्रान्‍तीयँ प्रयोग प्रचुर अछि जे रूपक रचनाक स्‍वभाविक स्रोत अछि।24 किन्‍तु कखनहु अति भ’ जयबासँ अस्‍वाभाविक भ’ गेल अछि। जीमूतवाहनक सासुरक लोक सुनन्‍द द्वारा ‘ओझा जीमूतवाहन कहा क’ लेखक अति उत्‍साहमे आबिक जेना पोराणिकताकेँ खंडित क’ देने छधि। संस्‍कृत लक्षण ग्रंथक प्रणालीपर नाटक लिखलनि आनन्‍द झा सीता सव्‍यंवर (1995 सं.) क अन्‍तर्गत जाहिमे नान्‍दी, प्रस्‍तावना नान्‍दी एवं सूत्रधार पाचँ अंकमे -रामक वैवाहिक प्रसंगक कथानककेँ थारीतिएँ अनुस्‍यूत कयलनि अछि। नाटकर कथानक पौराणिकतासँ ओतप्रोत संगहि विविध भापाक प्रयोग नाटककार पात्राक योग्‍यतानुरूप क’ कए एहिमे विशेष रोचकता अनबाक उपक्रम कयलनि अछि। खासक परशुराम एवं लक्ष्‍मणक वात्तर्तालाप अत्‍यन्‍त रोचक अछि। भारत वक्‍यक रूपमे समदाउन गाओल गेल अछि। नाटककार युगक बुद्धिवादसँ प्रभावित छयि तें क्‍थोपकथन चमत्‍कारक नहि भेल अछि। एहिमे पात्रोचित भाषाक प्रयोग स्‍वाभाविकताक उद्घाटनमे सहायक नहि होइछ, प्रत्‍युत मैथिलीक कतिपय उपभाषाक परिचय दैछ। नाटक पारंपरिक शैलीक अनुरूप रहितहुँ स्‍थल-स्‍थल पर आधुनिकताक छाप नने अछि। एहि नाटकमे पारंपरिक नाटक सदृश संस्‍कृत श्‍लोकक प्रयोग नहि भेल अछि। ''जनकक शासन व्‍यवस्‍था, आचार-विचार, रहन-सहन एवं रीति-नीतिक वर्णन मिथिलाक अनुरू भेल अछि जे सीता स्‍वयंवरक पृष्‍ठभूमिमे उचित प्रतीत होइछ।''25 ठाकुरप्रसाद झाक सीता परिणय (1950) पाँच अंकमे विभक्‍त अछि। एहिमे नाट‍कीय लक्षणक यथासाध्‍य निवेश भेल अछि। नान्‍दी, प्रस्‍तावना एवं अंक-विभाजन एकर उपयुक्‍त अछि। एहि संबंधमे नाटकारक कथन छनि-‘’ एहिमे प्राचीन नाटकक छायासँ सूत्रधार, नटी कंचुकी आदि पात्रक प्रवेश कयल गेल अछि तथा मिथिलाक भावपूर्ण रीति, व्‍यवहार, सभ्‍यता तथा शक्तिक प्रधानता देखाओल गेल अछि।''26 एहि नाटकमे डेग-डेगपर गीतक प्रयोग भेल अछि। एकर पात्र कपाल-कल्पित अछि। सीता स्‍वंयवर एवं सीता परिणय क कथानकमे समानता अछि। दामोदर झाक गान्‍धर्व विवाह (2010 संवत् ) क कथानक यदयपि महाभारत श्रित अि‍छ तथापि एहिमे सबसँ पैघ बात जे ध्‍यानकेँ आकर्षित करैत अछि ओ थिक आधुनिक मैथिल समाजक आचार-व्‍यवहारक निदर्शन। यदयपि प्रचनि परम्‍पराक परिप्रेक्ष्‍यमे ई नाटक लिखल गेल अछि तथापित नवीनताक निदर्शन अनके स्‍थलपर भेटैछ। विवाहोपरान्‍त चतुर्थीक भोज, दुर्वाक्षत तथा एतेक दूर धरि जे सबोधन पर्यन्‍तमे छोटकी भौजी, करिया भाई, छोटकी दाइ आदिक प्रयोगक पूर्णतया मैथिल वातावरण उपकस्‍थता कयल गेल अछि। प्रतिपादय नाटक नाट्यशास्‍त्रानुकूल अछि जाहिमे नाटककारक कौशलक परिचय भेटैछ। एहि प्रसंगमे ित्रलोकनाथ मिश्रक कथन छनि ‘‘विद्वान युवक कविक लेखनकि कृति स्‍वरूप ई नाटक नवीन रहितहुँ प्राचीनताक ताहि रूपेँ अक्षुण्‍ण रक्षा कएने छथि जाहिसँ वर्त्तमान युगक कतोक स्‍वचछन्‍द मैथिली कविक निरंकुश काव्‍यक हेतु एकरा तीक्ष्‍ण अंकुश कहि सकैत छी।‘’ 27 एकर नाट्य-शैली पारंपरिक अछि; कल्‍पनामे नवीनतामे नाटककारक प्रतिभाक निदर्शन होइत अछि। नाटकमे ऐतिहासिक एवं देशकालक तथ्‍यक अभाव,पात्रक आधिक्‍य, शि‍थिल, गति‍हीन एवं नाटककारक प्रतिभक निदर्शन होइत अछि। नाटकमे ऐतिहासिक एवं देशकालक तथ्‍यक अभाव, पात्रक आधिक्‍य, शिथिल, गति‍हीन एवं नाटकीयतासँ रहित कथोपक्‍धन, पारंपरिक नाट्य-सदृश गीतक बाहुल्‍य, पात्रोचित भाषाक अभाव रहलाक कारणेँ एकर नाटकीयता समाप्‍त भ’ जाइत अछि। एहि नाटकमे गदयक संगहि-संग पयक प्रचुर प्रयोग भेल अछि। एहि संदर्भ विष्‍णुलाल शास्‍त्रीक कथन छनि। एहिमे प्राचीन नाट्य शास्‍त्रक नियमक परिपालन करैत नबीनताक समावेश नीनताक समावेश ताहि तरहेँ कएल गेल अछि जे ओवहिसँ दुनू दृष्टिक पाठकक रुचिक पूर्ति होएत तथा एहिसँ मैथिलीक नाटक विषयक अभावक पूर्तिक संग निर्दिष्‍ट मनोरंजन होएत।''28 एहि प्रसंगमे डाॅ. प्रेमशंकर सिंहक कथन छनि ‘’यदयपि प्राचीन परंपराक परिप्रेक्ष्‍यमे ई नाटक लिखल गेल अछि तथापि नवीनता अनेक स्‍थलपर भेटैछ। ई नाटक अभिनयोपयोगी नहि अछि। नाटकमे देशकालक तध्‍यक अभाव, पात्रक अ‍ाधिक्‍य, शिथिल, गतिहीन एवं नाटकीयतासँ रहित कथोपकथन, गीतक बहुलता, पात्रानुकूल भाषाक सर्वत्र निर्वाह नहि इत्‍यादि विभिन्‍न तथ्‍यक पर्यालोचसँ सपष्‍ट भ’ जाइछ जे नाट्यनार असफल छयि29 जीवनाथ झा दुर्गा विजय (2015 सं.) मे सेहो पारंपरिक नाट्य-शैलीक अनुकरण क’ कए पौराणिकताक परिवेशमे एकर रचना कयलनि। यद्यपि एहि नाटकेँ पारंपरिक नाटक क्षेत्रमे राखल जाइत अछि, किन्‍तु एहिमे ने तँ प्रस्‍तावना अछि आर ने विषकंभके। एकर मुख्‍य रस वीर, अंगरस हास्‍य, करुण, भयानक एवं श्रृंगार अछि। नाटक अतिशय सरल एवं रोचक अछि। अनुप्रासयुक्‍त छोट-छोट कथोपकथन नाटक वैशिष्‍ट्य कहल जा सकैछ। आधुनिक मंच विधिक अनुकरण क’ कए नाटयकार एकरा रंगमंचोपयुक्‍त बनयबाक प्रयास कयलनि अछि। पुत्रदान (1992) मे शंभुनाथ झा अर्जुन-चित्रांगदक पौराणिक आख्‍यात्‍नकेँ आधार बनौलनि जाहिमे हिनक कवित्‍वक संगहि भविष्‍णु नाटकीय प्रतिभाक परिचय भेटैछ। एहिमे जनरुचिक रक्षा कयल गेल अछि। नाटकीय रोचकता एंव मंचोपयोगिता एकर वैशिष्‍ट्य अछि। डाॅ. शिवाकान्‍त ठाकुर परम्‍परागत संस्‍कृत नाट्य-शैलीक अनुकरण क’ कए कृष्‍ण विनु राधा (1984) नाटक रचना कयलनि जाहिमे राधाक विरह वैशिष्‍ट्यकेँ नाट्य रूप प्रदान कयल गेल अछि। यदयपि एकर कथानकमे कोनो नवीनता नहि; प्रत्‍युत परिपाटी पर आधृत अछि तथापि एहिमे नाट्यकारक मौलिकताक आभास स्‍थल-स्‍थलपर भैटछ। उपर्युक्‍त नाटकादि पौराणिक परिवेशमे संस्‍कृत नाटक अनुरूप अछि। एहि नाटकादिमे कोनो प्रकारक नवीनता नहि भेटैछ। जॅ नवीनता भेटितो अछि तँ दुइ बातपर- पौराणिक कथानकक भंडारसँ वोग्‍य कथानकक चयन एवं ओकर रूपायतनमे यथासंभव मैथिलत्‍व दिस झुकाब। अत: नाटक सहित्‍यमे पहिल बेर अंगद, जीमूतवाहन आदि नायकक रूपमे अवतरित कयल गेल छधि। जतय नाटककार एहन : स्‍थलक सर्जन हेतु साकांक्ष रहलाह अछि ततय ओ मिथिलांचामक रीति-नीतिक चित्रण कयलनि अछि। परंपरगत सामजिक नाटक : पारंपारिक नाट्य-शैलीक अनुकरण क’ कए सामाजिक नाटकक रचना मैथिलीमे सेहो भेल अछि। मैथिलीक सामाजिक परंपरागत नाट्य-शैलीक पुराेधा युग-पुरुष जीवन झा छयि जनिक सुन्‍दर-संयोग 30 (1904), ईशनाथ झा (1907-1965) क चीनीक लड्डू 31 (1989) उल्‍लेखनय परम्‍परागत मैथिली नाटक थिक जकर विश्‍लेषर्ण कयल जा रहल अछि। सामाजिक विषय-वस्‍तुक परिप्रेक्ष्‍यमे पारंपरिक नाटक लिखनिहारमे जीवन झा सर्वप्रथम छथि जे शास्‍त्रीय परम्‍पराक संगहि संग आधुनिकताक समन्‍वय क्यितिन अछि सुन्‍दर संयोग मे। एहिमे नाटकीय कौतुहलताकेँ एहि प्रकारेँ समाविष्‍ट कयल गेल अछि जे पाठकक जिज्ञासाक तुष्टि आदयापान्‍त पढ़ने बिनु नहि होइत अछि।33 सुन्‍दर सबकेँ चिन्‍ह जाइत छथि आर हुनक हाथक लिखल पत्र पढि क’ सरलाक मामा सेहो चिन्‍ह जाइत छयि; परन्‍तु नाटककार एहन दुनू पात्रक संभाषण प्रस्‍तुत करैत छथि जे ककरो परिचय करबाक अवसरे नहि भेटैत छनि। यदयपि कादम्‍बरी मस्‍तकपर लागल तिलक चिन्‍हकेँ देखि संदेह करैछ, किन्‍तु मिथ्‍यावाद एवं सरस्‍वतीक माँ क भये ओ प्रत्‍यक्ष रूपसँ एकरा प्रकट नहि क’ पबैछ। वास्‍तविकताक रहस्‍योदद्याटन गाम पहुँचलापर होइछ तखन विस्‍मय मिश्रित आनंदक अनु‍भूति होइछ। पाठककेँ पहिनेसँ जागृत जिज्ञासाक तुष्टि एहि प्रसंगपर अनायासे भ’ जाइछ। एहि प्रकारेँ नाटकीय कोतुहलक निर्वाह नाटककारक कुशलता एवं सिद्धहस्‍तताक परिचायक अछि।34 यद्य‍पि एकर कथांश अत्‍यरूप अछि। किन्‍तु प्रस्‍तुतीकरण एवं वर्णन सौष्‍ठवमे नाटककारक प्रतिभा एवं निपुणता प्र‍दर्शित होइत अछि।35 कथानकक विकास एहन मोड़ उपस्थित करैछ ओहिमे अनायासे नाटकीय व्‍यग्‍ंय एवं डासुकताक तृविृ अछि। कथोपक‍थन छोट, चुस्‍त सरस, हृदयरूपर्शी एवं नाटकीस्‍यतासँ परिपूर्ण अछि। भाषा संस्‍कृनिष्‍ठ, प्रांजल एवं माधुर्य्य गुणसँ संयुक्‍त अछि। एकहि सामाजिक स्‍तरक पात्रक सन्निवेशक कारणोँ भाषाक एकरुपता दृष्टिगत होइत अछि। भावावेशक स्‍थलपर अवश्‍ये ओहिमे भाव-भारवहनक अद्भभुत शाक्ति देखबामे अबैछ। चारित्र-चित्रणक दृष्टिएँ नाटककार असफल छथि। एहि छोट नाटकमे पात्रक बाहुल्‍य अछि जाहिसँ पात्रक वैशिष्‍ट्य नहि प्रकाशित भ’ पबैछ। किन्‍तु नाटककारक वैशिष्‍ट्य अछि जे एहन संवाद योजना कय‍लनि अछि जे प्रत्‍येक पात्रक मनोवृतिक संकेत अेटि जाइत अछि।36 तीर्थस्‍थानमे अनावश्‍यक लज्‍जा एवं औपचारिकताक कारणेँ ओ अपन परिचय नहि दैत छथि। ई हुनक शालीनता एवं धीरप्रशान्‍तक ढ्योतक थिक। सरलाक हृदयमे प्रेम वियोगक ज्‍वाला प्रज्‍जवलित अछि प्रमाणमन्‍त: कारण प्रतृत्तय: ‘’क आधार पर ओ आपन प्रेमी दिस आ‍कर्षित होइत भाव प्रगट नहि करैत छयि; किन्‍तु वीहावश नहि कहि पबैत छथि। अपन अन्‍तर्द्वन्‍द्वकेँ ओ अपन सखी पर्यन्‍तकेँ नहि कहैत छधि। सरोजक कथनसँ स्‍पष्‍ट अछि जे ओ सहृदया, चचंल एवं प्रौढ़ छयि। मनोवैज्ञानिकताक अभावमे नाटककार चरित्र-चित्रणमे निपुणता नहि प्राप्‍त क’ सकलाह।37 एहिमे पचीस मैथिली त एवं गारि संस्‍कृतक गीत प्रयुक्‍त भेल अछि जाहिते पन्‍द्रह मात्र चतुर्थ अंक्‍मे अछि। एहि गीतक भावादि स्‍पष्‍ट करैछ जै नाटककारकेँ साहित्यिक एवं लोकजीवनक परंपराक अनुभव छलनि तेँ दूनूक समन्‍यात्‍मक स्‍वरूप परिचय देलनि। गीतक बाहुल्‍यक कारणेँ कथा-प्रवाहमे गतिरोध आबि गेल अछि। एहिमे प्रयुक्‍त गीतसँ हमरा प्रतीत होइछ जे हिनकापर मिथिलाक कीर्त्तनिया वा लीला एवं पारसी थियेट्रिकल कम्‍पनीक शैलीक प्रभाव अछि।38 मैथिली नाढ्य-साहित्‍यक इतिहासमे असंदिग्‍ध रूपें ईशनथ झा क ‘’चीनीक लड्डू (1937-39) सर्वश्रेष्‍ठ पारंपारिक सामाजिक नाटक थिक। एहिमे पारिवारिक वातावरणक जीवन्‍त चित्रा उपस्थित कयल गेल संगहि दुष्‍ट एवं धूर्त्तसँ साकांक्ष रहबाक संकेत भेटैत अछि। एक सुखी-सम्‍पन्‍न परिवार कुचक्र एवं कलहक कारणेँ कोनो मरूभूमि बनि जाइछ तकर हृदयस्‍पर्शी चित्र नाट्यकार प्रस्‍तुत कयलनि अछि। परिवारक रेखाचित्रकेँ नाट्यकार अत्‍यन्‍त स‍तर्कताक संगहि पारिवारिक विषम स्थिति, कलह एवं ओकर दुष्‍परिणाम दुष्‍टक सरलता तथा वैमनस्‍यसँ अनुचिल लाभ उठौनिहार आर अन्‍तमे कुकृत्‍यतक फलभाग आदि तथ्‍यसँ समाजकेँ साकांक्ष रहबाक संकेत देलनि अछि।39 एहिमे नाटककारक प्रतिभा सजीव भ’ गेल अछि जे ओ पारंपरिक भारतीय एवं पाश्‍चात्‍य नाट्यकलाकेँ सहज समन्वित रूपमे प्रस्‍तुत करबामे हिनक वै‍शिष्‍ट्य छनि। नाटककार शेविि‍स्‍रयक ‘’ऑथेलो’’ सँ खलनायक, संर्षघ आदिसँ प्रेरणा ग्रहण क’ कए अ‍ाहि विषय-वस्‍तु पर भारतीय नाट्य-कलाक अवतारणा कयलनि।‘’ ऑथेलो क खलनायक इयागो सँ प्रेरणा ग्रहण क’ नाटक कखलनायक बटुआ, दास प्रेमकान्‍त एवं हुनक पत्‍नी सरलताक अनुचित लाभ उठबैछ। एहिमे पाश्‍चात्‍य शैलीक अनुकरणपर भारतीय शैलीक आवरणक कारणेँ ई नाटक सहज रूपमे आकर्षक एवं गतिशील भ’ गेल अछि। एहिमे कथा एवं चरित्र वैचित्र्यक पूर्ण विधान अछि। कथा प्रवाह सहज गतिसँ अग्रसर होइत अकस्‍मात् अपन धारामे एहि वेगसँ एक आवर्त्त उत्‍पन्‍न करैछ जे छल, प्रवंचना विश्‍वासघाता आर तज्‍जन्‍य निराशा- अंधकारक संधर्षक कारणेँ सुधाकान्‍त ओहिसँ ग्रस्‍त भ’ कए अकालहि आलक ग्रास बनि जाइत छधि। एकर संघर्ष कारणेँ कथानकक धारा कखनो वेगवती भ’ जाइछ तँ करणज्ञो सप गत्तिवाली घटना। क्रम मे कतहू निर्मितधार, स्‍वाभा विक प्रेम, औदार्य, मान्‍ह वत्‍सलता, शांति तथा संतोष अछि तँ कतहु ईर्ष्‍या, द्वेष, हत्‍या संकीर्णता आर लोभ। एहि प्रकारेँ नाटक पाश्‍चात्‍य शैलीक अनुसारेँ विरोधक रमसीमा आर नियतिक आधारपर कथा‍नकक सृष्टि कयल गेल अछि।39 भा‍रतीय पद्वतिक अनुसारेँ गर्भ-संधिक आधार एकर नामकरण चीनीक लड्डू कयल गेल अछि। एहि लक्ष्‍यक प्राप्तिक हेतु नायक एवं अन्‍य पात्र सतत उद्योगशील रहैछ। जँ सुधाकान्‍तक मृत्‍यूपरान्‍त नाटक समाप्‍त भ’ जाइत तँ भारतीय वा पाश्‍चात्‍य पारंपरिक शैलीक अनुसारेँ कोनो सफल प्रयोग नहि होइत। कारण भारतीय पद्वतिक अनुसारेँ ने तँ नायककेँ फल प्राप्ति, आ ने पाशचात्‍य पद्धतिक अनुसारेँ खलनायककेँ समुचित न्‍याये भेटि सकैत। अतएव नायकक म़त्‍यु भ’ जाइछ तथापि भारतीय मान्‍यताक अनुरूप आत्‍मा वै जायते पुत्र: आत्‍माक प्र‍तीक ओकर आत्‍मजकेँ प्राप्‍त होइत अछि। अतएव नाटक करुण सुखान्‍त करब अछि। नाटकमे कथोपकथनक सर्वोपरि स्‍थान अछि ज‍कर निर्वाहमे नाटककारकेँ सफलता भेटलनि अछि। कथा-वस्‍तुक विकास, कौतूहल, नाटकीय व्‍यंग्‍य, चरित्रक विकास मात्र संवाद तत्‍व पद निर्भर करैछ। उपर्युक्‍त नाटकमे सब गुण वर्त्तमान अछि। एहि नाटकमे भारतीय पारंपरिक एवं पाश्‍चात्‍य उत्‍कृष्‍ट समन्‍वयात्‍मक रूप उपस्थित करैछ। एहि भारतीय पारंपरिक एवं पाशचात्‍य शैलीक उत्‍कृष्‍ट समन्‍वात्‍मक रूप उपस्थित करैछ। एहि नाटक फलागम दुष्‍ट व्‍याक्तिकेँ समुचित न्‍यायक आदर्शक उदबोधन कयल गेल अछि।40 एहि पारंपरिक नाटकमे गीत आर संगीतक प्राचूर्य अछि संगहि-संग कथोपकथनमे मैथिलीक सुन्‍दर गदयक स्‍वरूप भेटैछ। एहिमे जे प्रयोग भेल अछि ओ नी‍रसताक परिहार क’ रसोत्‍पादन करबा, वातावरणक सृष्टि करबाक तथा पात्रक मनोभाव आर चरित्रगत विशेषताकेँ प्रगट करबामे सहायक भेल अछि। कथोपकथनक भाषा विषयानुकूल एवं पात्रक स्थिति, योग्‍यता एवं प्रकृतिक प्रयुक्‍त भेल अछि। परम्‍परागत प्र‍तीक नाटक : पारंप‍रिक नाट्य-शैलीक अनुकरण पर एक मात्र प्र‍तीक नाटक उपलब्‍ध होइछ ओ थिक आधुनिक मैथिलीक शिलान्‍यासकर्त्ता साहित्‍यरत्‍पाकर मुंशी रघुनन्‍दन दासक मिथिला नाटक (1923)। एहि नाटक पृष्‍ठभूमि पारंपरिक नाटक पूष्‍ठभूमि थिक। यद्यपि ई नाटक संस्‍कृत लक्ष्‍णगंथानुसारेँ नहि लिखल गेल अछि तथापि एकरा हम पारंपरिक नाटक श्रेणीमे राखल, अछि. कारण जाहि पृ‍ष्‍ठभूमिमे ई नाटक लिखल गेल छल ओहि नाटकमे नान्‍दी, प्रवेशक, विषँभक गर्भ-संधि एवं भरत-वाक्‍यक प्रयोग भेल अछि तथापि एकरा पारंपरिके नाटक कहब उचित हैत। नाटककार एहिमे अपन विविध भाषाक ज्ञानक परिचय देलनि अछि। एहिमे संस्‍कृतमे श्‍लोक, मैथिलीमे गदय-पदय, बंगला, हिन्‍दी आदि विविध भाषाक नुमाइश कयलनि अछि। हिनक भाषाक विम्‍ब विधायिनी शक्ति अपार अछि। वक्‍ता बोधव्‍य आर श्रोताक अनुकूल हुनक भाषा बदलैत अछि। संस्‍कृत नाटक समान भेदकेँ अपनौलनि अछि। शिक्षित एवं अशिक्षित पात्रक भाषामे विविधता ई पारंपरिक नाटकक अनुरूप अपनौलनि अछि। एहिमे पात्रक एतेक बहुलता अछि जे मंचोपयोगिताक दृष्टिएँ उपयुकत नहि कहल जा सकैछ तथापति एकर अीिानयक प्रसंगमे सूचना भेटैछ कारण ओहि समयमे अभिनयोपयोगी नाटक्‍क मैथिलीमे सर्वधा अभावे छल।45 परंपरगत ऐतिहासिक नाटक : विदयापतिक जीवन वृकेँ आधार बनाव क’ मैथिलीमे अत्‍यधिक नाटकक रचना भेल; किन्‍तु परंपरागत शैलीक अनुकरण कयनिहारमे उल्‍लेखनीय छथि ईशनाथ क उगना 46 (1956), डाॅ. व्रजकिशोर वर्मा मणिपद्मम (1918-1986) क कंठहार 47 (2021) विक्रम सं जीवनाथ झाक ‘’ वीर नरेन्‍द्र’’ 48 (1956), राधाकृष्‍ण चौधरीक) (1924-1985) ‘’राज्‍याभिषक’’ 49(1962)।9 विदयापतिक भक्ति-भावनासँ प्रसन्‍न भ’ कए महादेव हुनक सेवामे छलथिन; किन्‍तु रहस्‍योदघटनक पश्‍चात् ओ अन्‍तर्ध्‍यान भ’ जाइत छधि। एहि प्रसंगमे रोचकता एवं नाटकीयता अनबाक हेतु अनेक काल्‍पनिक पात्रक नाटककार सृष्टि कयलनि अछि। एहि नााट्य-शैलीक अनायासहि निर्वाह म भ’ गेल अछि। नाटककार एहिमे विदयापति कालीन समाजक समसामयिक स्थितिक आंशिक ज्ञान देलनि अछि। नाटकमे सफल रूपसँ ऐतिहासिकता, सामाजिकता एवं रूपकत्‍वक निर्वाह नाट्यकारक कौशल एवं ठोस मौलिक चिन्‍तन-प्रतिभाकेँ प्रदर्शित करैत अछि। नाटकीय कौतूहलक प्राप्ति होइछ50 चारित्र-चित्रणकक दृष्टिएँ नाटक पूर्णतया सफल अछि। एहि नाटककक आकर्षणक केन्‍द्र-बिन्‍दु थिक । विदयापति अपन दार्शनिक, भावुक भक्‍त आर सांस्‍कृतिक चरित्रक कारणेँ पाठक एवं दर्शकपर अमिट छाप छोड़ैत छथि। अतएव हुनक चरित्र सरलता एवं सादगीक प्रतीक थिक । कथोपकथनमे नाटकीय लाधवक ध्‍यान राखल गेल अछि। प्रत्‍येक वाक्‍य मे गणित अछि। क‍तहु अनावश्‍यक विस्‍तार नहि कयल गेल अछि।कर संवाद छोट, नाटकीय आर भाव-व्‍यंजक अछि1 कथोपकथन चारित्रिक वैशिष्‍ट्यकेँ स्‍पष्‍ट करैत अछि। ई नाटक मंचोपयोगी अछि। इएह कारण अछि जे एकर अभिनय शहरी एवं ग्रामीण परिवेशमे अनेक बेर भेल अछि।51 वीर नरेन्‍द्र नाटक (1956) एक ऐतिहासिक, मौलिक वीर रसात्‍मक नाटक थिक जाहिमे वीर नरेन्‍द्र सिंहक वीरता प्रतिपादित अछि जकर रचना नाटककार ऐतिहासिक परिवेशमे कयलनि अछि। एहि प्रसंगमे सुरेन्‍द्र झा सुमनक कथन छनि लेखक, बड़ निपुणतासँ नाटकीय कथा-वस्‍तुक विन्‍यास कयने छथि। रंगमंचक अनुकूल दृश्‍यक विभाग करैत, सूच्‍य अंशकेँ लक्षणानुकूल विषकम्‍भक-प्रवेश द्वारा यथास्‍थान निवेशक कथानकक जटिलताकेँ लेखक सोझरौने छथि । कथोपकथन जे नाटकक रीढ़ थिक, पात्रक प्रकृतिक अनुरूप प्रभावोत्‍पादक भाषामे अछि। 50 प्राचीन परम्‍परानुरूप आधुनिक रंगमंचक हेतु ई प्रथम मैथिली नाटक थिक।51 राधाकृष्‍ण चौधरी ऐतिहासक पृष्‍ठभूमिमे राज्‍याभिषेक (1962) क रचना कयलनि जाहिमे विशेषत: मिथिलाक इतिहास प्रच्‍छन्‍न पृष्‍ठकेँ उदघाटित कयलनि अछि। ओइनवार वंश (1353-1526) क प्रसिद्ध राजा महाराज शिवसिंह (1413-1416) मिथिलाकेँ स्‍वतंत्र घोषित कयने छलाह तकर रक्षार्थ ओ सतत युद्धरत रहलाह आर अन्‍ततवीरगतिकेँ प्राप्‍त कयलनि। यदयपि शिवसिंहक राज्‍याभिषेक तँ नहि भेलनि, किन्‍तु लखिमा हुनक मुकुट ओ शंखवालाक टुकड़ीकेँ विधिवत राज्‍याभिषेक कयलनि। नाटकमे शिवसिंहक राज्‍याभिषेक तथा स्‍वतंत्रता संग्रामक हेतु विविध मंत्रणाक अनुपम चित्र भेटैछ। यदयपि नाटक्‍क भाषा पात्रोचित अछि किन्‍तु स्‍थल-स्‍थलपर स्‍वाभाविकताक हनन भेल अछि। बंगदूत एवं इवाहिम साहक दूतक मैथिली बाजब अनुपयुक्‍म कहल जा सकैछ। नाटक वीर रसावेष्टित अछि। ई मैथिलीक दुखान्‍त पारंबरिक नाटक थिक। पैघ-पैघ कथोपकथन एवं जटिल दृश्‍य विधानक कारणेँ ई नाटक रंगमंचोपयोगी नहि अछि। 52 मैथिलीमे विदयापतिक पृष्‍ठभूमिमे कतिपय नाटक रचना भेल, किन्‍तु ओहिमे व्रजकिशोर वर्मा मणिपद् क कंठहार (2021) विक्रम सं. नाटकक एक पृथक अस्तित्‍व अछि; कारण ऐहिहासिक पृष्‍ठभूमिमे रचित एहि नाटकमे नाटककार काल्‍पनिकताक कतहु प्रयोग नहि कयलनि अछि। विदयापति शास्‍त्र एवं शास्‍त्र दुनू विषयक ज्ञाता रहथि। गढ़ गोढियारक समर क्षेत्रमे हिनक शस्‍त्र-शास्‍त्र विषयक ज्ञानक परिचय भेटैछ। ई नाटक पारंपरिक शैलीमे लखल गेल अछि जे एकर विशिष्‍टता थिक। नाटककार प्राचीनतामे नवीनता, नवीनतामे आधुनिकता आ आधुनिकातामे सरसता अनबाक चेष्‍टा कयलनि अछि। नाटक कथोपकथन यद्यपि सजीवअछि तथापि एहिमे उपन्‍यासक रोचकता, नाटक अभिनेयता एवं संगीतमयता सहेज प्रस्‍फुटित भेल अछि। घटनाक बाहुल्‍यक कारणेँ एकर मंचोनयोगितामे हनन करैछ।53 मैथिलीक पारपरिक शैलीमे लिखित गोविन्‍द झा (1923) रुक्‍णी-हरण (1989) कृष्‍ण लीलाक अनेक कथामेसँ रुक्मिणी हरणक इतिहास प्रसिद्ध कथाक पृष्‍ठभूमिमे युगीन यथाथक प्रक्षेपण प्रतिपादय नाटक विशेषता धिक। मैथिली नाटकक क्षेत्रमे ई एक नवीन एवं अभिनव प्रयोग अछि। नाट्यकार अत्‍यन्‍त सजीवताक संग पारंपरिक शैलीमे फिंरगी द्वारा कयल गेल मजदूरपर अत्‍याचारक विरूदमे क्रान्तिक स्‍वरक आह्वान कय‍लनि अछि। नाट्यकार ऐतिहासिक तथक आलोकमे रुकमिनआक प्रेम प्रसंगक कपोक-कल्‍पना एहिमे कयलनि अछि। एहि नाटकान्‍तर्गत मिथिलाक सांस्‍कृतिक एवं सामाजिक परिदर्शन दूस्‍तर पर चलैत अछि।एक भाग आम जन-जीवन, जमींदारक अय्याशी ि‍लालहा आहेनक्‍र । गौरक आन्‍तक एवं शोषणक विरूद्ध होइत जनताक आक्रोश वा विद्रोहक कथा तथा दोसेर भाग विसरल भुति आएल विरासतक सशक्‍त नाट्य-शैली कीर्त्तनिया वा लीला नाटक्‍क स्‍मरण करबैत अछि। 54 प्रतिपादय नाटकमे विभिन्‍न सत्ता क केन्‍द्र मे सत्ता वर्गक पारस्‍परिक द्वन्‍द्व अन्‍तर्विरोध, अहंकार आ वैमनस्‍य एवं युद्धक कथा कहैत जाहिमे जनसामान्‍यक भूमिका मूक दर्शक रहैछ अाहिमे जनसामान्‍यक कोनो हस्‍तक्षेप नहि होइछ। समयक क्रममे मि‍थिलांचलक सामाजिक आ राजनीतिक परिदृश्‍यमे परिवर्त्तन होइछ। शनै-शनै व्‍यापारी रूपमे समस्‍त मिथिलांचलमे अंग्रेज अपन हाथ पैर पसारि लेलक। एहिठामक राजा, जमींदार आ अमला सभ अग्रेजक हाथक कठपुतरी बनि गेल तथा अनायास प्राप्‍त संवृद्धिसँ निरंकुश बनि गेल। एहिठामक विपुल प्राकृतिक संपदा , मेहनती मजदूर, विशाल भूमि एवं ललनाक आकर्षक सौन्‍दर्य अंग्रजकेँ उन्‍तत्तक देलक। तानाशाही प्रवृत्तिक अंग्रेज एत्तका लोकक प्रति पशुवत व्‍यवहार करय लागल। ई आक्रोशाग्नि व्‍याक्तिसँ समाजमे पसरि गेलैक। समाजमे अदभुत उत्‍तेजना अयलैक तथा ओ व्‍यग्र भ’ कए अंग्रेजकेँ ध्‍वंस करय लागल ।55 यदयपि मैथिली नाट्य साहित्‍यक अन्‍तर्गत ऐतिहासिक नाटकक अभाव नहि अछि तथापि प्रत्‍येक नाटक पारंपरिक नाटकक परिधिमे नहि अबैछ। मैथिली पुरोधा विद्यापति (1350-1938) क जीवन-चरित्रकेँ केन्‍द्र-विन्‍दु मानि एक दर्जन नाटक लिखल अछि, किन्‍तु ओ सब पारंपरिक नाटक शास्‍त्रीय परंपरासँ अपन पृथक अछि तेँ एतय उल्‍लेखनीय नहि। कीर्त्तनियॉं वा लीला नाटक शैलीक परिवेशमे वर्त्तमान शताब्‍दीक नवत दशाब्‍दमे गोविन्‍द झा तदवत पारंपरिक नाटकक रचना कयलनि जे वर्त्तमान परिप्रेक्ष्‍यमे परंपरागत प्रवृत्तिक नाट्यरचना संभव अछि तकर ज्‍वलन्‍त प्रमाण उपर्युक्‍त नाटक अनुशीलनसँ भ’ जाइत अछि। पारंपरिक विभिन्‍न भाषासँ अनूदित मैथिली नाटक: भारतीय अन्‍यान्‍य साहित्‍यमे विविध भाषाक नाटक अनुवादक ज्‍वार आयल तकरे फलस्‍वरूप मैथिली साहित्‍यान्‍तर्गत परंपरागत नाटक अनुवादक श्रीगणेश भेल। मैथिलीमे अदयावधि जतेक नाटक अनूदित भेल अछि ओकरा हम परंपरागत नाटकक श्रृंखलान्‍तर्गत राखि सकैत छी कारण अनुवादक लोकनि ओहने नाटकक अनुवाद मैथिलीमे कयलनि जे अपन साहित्‍यमे पूर्ण प्रतिष्ठित छल। संस्‍कृत, अंग्रेजी एवं फ्रेचसँ मैथिलीमे नाटक अनुवाद भेल अछि जे संस्‍कृत नाटकसँ निश्‍िचत रूपेण शास्‍त्रीय परंपराक अनुशीलन करैत अछि। अंग्रेजी शिक्षा, संस्‍कृति एवं साहित्‍यक प्रचूर प्रसारक फलस्‍रूप अंग्रजी नाटकक मैथिलीमे अनुवाद भेल जे हमर पारंपरिक नाट्य-रचना विधानकेँ अतिशय प्रभावित कयलक अछि। शिक्षा-संस्थदिमे अंग्रजी नाटक अभिनयक पद्धति हमर परँमरागत अभिनय पद्धतिकेँ परिवर्त्तित क’ देलक अछि। परम्‍परा एवं विधानसँ ई अभिनयमे एक नव स्‍पन्‍दन भरि देलक अछि। चमत्‍कारपूर्ण कथानक तथा कतहु-कतहु गीत वा संगीत आर नृत्‍यक प्रबन्‍धक नाटककार जनताक युगीन रुचिक परितोष कयलनि अछि। जनरुचिक परिमार्जनक रूप मैथिली नाटकक एक निजी वैशिष्‍ट् अछि। अंग्रेजीसँ अत्‍यल्‍प नाटकक अनुवाद मैथिलीमे भेल अछि। एहि दिशामे राजेन्‍द्र झा स्‍वतंत्र सुप्रसिद्व नाट्यकार शेक्‍सपियरक ऑधेलो क अनुवाद देशमणि 56 (1957) एवं एज यू लाइक इट क राजमीण 57 (1968) तथा इब्‍सनक द घोस्‍ट क अनुवाद दामोदर झा भूतक छाया 58 (1965) विशेष उल्‍लेखनीय अछि। फ्रेंच भाषासँ एकमात्र एकांकीक अनुवाद मैथिलीमे प्रकाशित भेल ओ थिक ऑस्‍कर वाइल्‍डक सालोम क सलोम 59 (1965) क अनुवाद कय‍लनि डॉo इलारानी सिंह (1945-1995)। संस्‍कृत नाट्य –साहित्‍यक विशाल परिप्रेक्ष्‍यमे जतेक नाटक मैथिलीमे अनूदित भेल अछि ओकरा हम पारंपरिक नाटकक श्रेण‍ीीमे रखैत छी: कारण ओहि सभक रचना संस्‍कृत लक्षणानुसारेँ भेल अछि। संस्‍कृतक नाटकतेँ पारंपरिक नाटक अछिए तेँ ओहिमे पारंपरिक अनुवाद मैथिलीमे भेल अछि यथा महाकवि कालिदासक अभिज्ञानशाकुन्‍तलमक क अनुवाद कयलनि ईशनाथ झा मैथिली शकुल्‍तला नाटक60 (1367 साल) एवं महाकवि शूद्रकक मृच्‍छ‍कटिकम् मैथिली मृच्‍छकटिक61 (1995)। मैथिली साहित्‍यहुक क्षेत्रमे प्रगीशीलता अनबाक दृष्टिएँ जीवनन्‍द ठाकुर (सस्‍कृत नाटक अभ्‍युदय कालक) महाकवि भास रचित विभिन्‍न नाटावलीकेँ गदय-पद्यानुवाद कयलनि जाहिमे अभिषेक62 (1945) भासनाटकावली, भाग- दूतावाक्‍य मध्‍यम येयाग’ एवं पंचरात्रा (1947), भासनाटवाली , भाग-3 मे 64 उरु भङ्ग एवं बाल चरित (1948) एवं भासनाटकावली भाग-4 मे 65 कर्णभारम् एवं दूत घटोत्‍वच (1373 साल) उल्‍लेखनीय अछि। महाकवि का‍लिदासक दुइ नाटकक मैथिलीमे अनुवाद भेल जाहिमे मालविकाग्नि मित्र 66 (1354 साल) एवं विक्रमोर्वशीय 67 (1945) क अनुवादक क्रमश: छथि गेविन्‍द झा एवं भवनाथ झा। मैथिलीमे हर्षक रत्‍नावली नाटिकाक दुइ अनुवाद उपलब्‍ध होइछ जाहिमे परमानप्‍द झा 68 द्वारा 1956 मे तथा सुन्‍दर झाा शास्‍त्री 69 द्वारा 1962 मे अनूदित भेल जे प्रकाशित अछि। भवभूतिक उत्तर रामचारित 2 क सेहा दुइ अनुवाद मैथिलीमे उपलब्‍ध अछि। एकक अनुवादक छयि डाo राजकुमार मिश्र 70 जकर प्रकाशन 1954 मे भेल; किन्‍तु साहित्‍यरत्‍नाकर मुंशी रधुनन्‍दन दास 71 द्वारा अनूदित नाटक प्रकाशन भेल 1982 मे। मुंशी रघुनन्‍दन दास द्वारा अनूदिल उतर रामचरित साहित्तत्यिक मूल्‍यसँ वेशी वर्त्‍तमान पपिरप्रेक्ष्‍ये एकर ऐतिहासकि मूल्‍य भ’ गेल अछि। परमानन्‍द झा वाणभट्टक पार्वती परिचय 72 (1964) क डाण सुधाकर झा ‘’शास्‍त्री (-1974) विशाखदत्तक मुद्राराक्षस (1965-66)73 एवं आनन्‍द झा जयदेवक प्रबोध चन्‍द्रोदय (1941) क मैथिली पदय-गदयानुवद कयलनि। उपर्युक्‍त संस्‍कृत नाटकादि मैथिलीक पारंपरिक नाट्यसहित्‍य श्रृंखलामे एक नवआयाम निर्माण करबामे सहायक सिद्व भेल। कोनो भाषाक साहित्‍य तावत् पूर्णत: समृद्व नहि भ’ सकैछ यावत् ओ अपन पूर्ववर्त्ती ग समकातीन साहित्‍यक समुचित ज्ञानकेँ आत्‍मसात नहि कयने हो। विशेषत: संस्‍कृत-साहित्‍या जाहिमे भारतीय आत्‍माक छवि युुग- युुगसँ झलकैत आयल अछि, ओकरा छोडि़दी तँ कोनो भारतीय भाषा साहत्यि अपन उन्‍न‍ति नहि क’ सकैछ। इऐह कारण अछि जै अदयावधि मैथिलीक अभ्‍युन्‍नतिक हेतु संस्‍कृत नाट्य साहित्‍यक अनुवादक रोकनि अ नुपम रत्‍न सभक सौन्‍दर्य अपना भाषा केँ उन्‍नतिक पथ पर अग्रसर करबाक हेतु एक अभाकक पूर्ति कयलनि अछि। मैथिलीमे रोचक गदय- पदयमे अनुवाद क’ कए अनुवादक लोकनि पारंपरिक नाटक क्षेत्रमे उल्‍लेखनीय कार्यक कयलनि अछि। निष्‍कर्ष : उन्‍नैस शताब्‍दीक छठम दशाब्‍दसँ मैथिली साहित्‍यमे आधुनिक कालक प्रारंभ होइछ तहिया सँ ल’ कए स्‍वातन्‍योत्तर कालधरि मैथिली नाटक विविध प्रवृत्तिक दिग्‍दर्शन होइत अछि। मध्‍यकालीन पारंपरिक मैथिली नाटक प्रभाव आधुनिक कालक मैथिली नाटककारपर एतेक वेशी पड़लनि ते आधुनिक कालक प्रारंभिकावस्‍थामे महामहोपाध्‍याय हर्षनाथ झा ओकर अक्षरस: अनुकरण क’ कए नाट्य रचना क्‍यलनि। दासर प्रवृत्तिक नाटककार भेलाह युगपुरुषा जीवन झाा जे ओ ओहि परंपराक अनुकारण तँ अवश्‍यक कय‍लनि; किन्‍तु नाटकमे गदयक प्रयोगक एक ओहिमे नवीनता अनलनि, किन्‍तु हुनको प्रवृत्ति पारंपरिके रहल। हिनक शैलीकेँ अनुकरण कयलनि साहित्‍यरत्‍नाकर मुशी रघुनन्‍दन दास जे अपन नाटकमे कथानकमे तँ नवीनता अवश्‍य अनलनि, किन्‍तु जतेक दूर धरि विषय उपस्‍थापनक प्रश्‍न अछि ओहिमे जीवन झा क द्वारा जे मार्ग प्रशस्‍त कयल गेल छल तकरे आगॉं बढ़ौलनि। लालदास क गदयमे तत्‍सम शब्‍दक बाहुल्‍यक कारणेँ ओ बोझिाल बनिगेल, किन्‍तुओ संस्‍कृत रखोकक अल्‍य प्रयोग कयलनि। विशुद्ध रुपेँ पारम्‍परिक नाटकक रचना कयलनि तेजनाथ झा जे मात्र पद्य-गद्यमे सुरराज विजय नाटक रचना कय‍लनि। अधिकंश पारंपरिक नाटक कथानक पुराणाश्रित एवं महाभारताश्रित रहलाक कारणेँ ओकर मंचनमे असुविधा भेल जाहि कारणेँ नाटक मात्र पठनीय बनि भेल। सामाजिक नाटक, प्रतीक नाटक, ऐतिहासिक नाटक जे पारंपरिक शैल‍ीक अनुकरणपर लिखल गेल आेहिमेसँ किछु एहन अछि जकरा अभिनयोपयोगी कहल जा सकैछ। अतएव समग्र रूपेँ पर्यालोचन कयलासँ स्‍वत: स्‍पष्‍ट भ’ जाइछ जे मैथिलीक पारंपरिक नाटक विषय तथा ओकर प्रतिपादन शैलीमे निरन्‍तर विकासक गति परिलक्षित होइत अछि। पारंपरिक मैधिली नाट्य-साहित्‍य उपयुक्‍त मंचक अभावमे देश-कालानुरूप अनेक उत्‍ससँ सम्‍पर्क आ प्रभाव ग्रहण करैल जनमानसकेँ अनुरेजित एवं उदेूलित करैत‍ रहल अछि। जाहि नाटकमे मानव जीवनक अतलमे प्रवेश क’ कए ओकर शाश्‍वत-भावनाकेँ उद्वे ि‍लत करबाक क्षमता रहत वै‍ह नाटक चिरस्‍थायी भ’ सकैत अछि। संदर्भ: 1. ए हिस्‍ट्री आफॅ मैथिली लिटरेचर, भोल्‍यूम-।, तीरभुक्ति पब्लिकेशन्‍स, । सर पी.सी. बनर्जी रो, इलाहबाद,ख्‍ा 1949 पृष्‍ठ-353-357 2. जिज्ञासा, वर्ष-।, अंक-।, जनवरी-जून 1995, पृष्‍ठ-62 3. दरभंगा प्रेस कंपनी (प्राइवेट) लिमिटेड, दरभंगा, 1962 4. मैथिली नाटक ओ रंगमंच, डॉ0 प्रेमशंकर सिंह, मैधिली अकादमी पटना, 1978, पृष्‍ठ.-63 5. संपादक अमरनाथ झा, दरभ्रगा प्रेस कंपनी (प्राइवेट) लिमिटेड ददभगा, 1962 6. तत्रैव 7. तत्रैव 8. काशी राजक सभा पंडिल झौपाख्‍य शर्मा, 1920 9. जिज्ञासा, वर्ष-। अंक, जनवरी-जून 1995 10. मैथिली अकादमी, पटना, 1979 11. राजप्रेस, दरभंगा, 1352 साल 12. कांचीनाथ झा, रानी चन्‍द्रवती श्‍यामा दातव्‍य चिकित्‍सालय कचौरी गली, संवत् 1995 13. सूर्यकान्‍त झा, ग्राम नेहरा शाहपुर, मुंगेर 1960 14. काशी राज मुद्रणालय, बनारस, संवत् 2010 15. वैदेही समिति, लालबीग, दरभंगा, संवत् 2015 17. मिथिला किरण दरभंगा 1984 18. मैधिली नाटक परिचय, डॉ. प्रेमशंकर सिंह, मैधिली अकादमी पटना, 1981, पृष्‍ठ 14 19. तत्रैव, पृष्‍ठ-97-98 20. ए हिस्‍ट्री ऑफ मैथिली लिटरेचर, भोल्‍यूम- 2, डॉ0 जयकान्‍त मिश्र, पृष्‍ठ-349 21. मिथिलाक विभूति जीवन झा, डॉ. प्रेमशंकर सिंह, मैथिली अकादमी पटना, 1988, पृo-19 22. आधुनिक मैधिली साहित्‍य का विकास, डॉ0 शैलेन्‍द्र मोहन झाा(अप्रकशित) पृष्‍ठ- 23. मैधिली नाटक परिचय नाटक, डाo प्रेमशंकर सिंह, पृष्‍ठ-141 24. जीमूतवाहन चरित नाटक, विचार विन्‍दु, पृष्‍ठ-क 25. मैधिली नाटक परिचय, डाo प्रेमशंकर सिह, पृष्‍ठ-142 26. सीता परिणय, पृष्‍ठ-25 27. गान्‍धर्व विवाह, गरूजनक मुख्‍सँ , पृष्‍ठ-क 28. तथैव, पृष्‍ठ-क 29. मैथिली नाटक परिचय, डॉo प्रेमशंकर ि‍संह, पृष्‍ठ-34 30. काशी राजक सभा पंडित लक्ष्‍मण झा, तृतीय संस्‍करण संवत् 1938 31. विद्यापति प्रकाशन, दरभंगा, द्वितीय संस्‍करण -1960 32. चेतना समिति, ि‍वद्यापति भवन, पटना 1989 33. मिधिलाक विभूति जीवन झा, डॉ. प्रेमशंकर सिह, पृष्‍ठ-17 34. मैथिली नाटक उद्भव और विकास, डॉ. प्रतापनाराण झा, कला संकाय, महाराजा सयाजीव राव विश्‍वविढ्यालय, बड़ौदा, 1973, पृष्‍ठ-। 201-202 35. मैथिली नाटक परिचय, डॉ. प्रेमशंकर सिंह, पृष्‍ठ-145 36. मिथिलाक विभूति जीवन झा, डॉ. प्रेमशंकर सिंह, पृष्‍ठ-25 37. मैथिली नाटक उद्भव आओर विकास, डॉ. लेखानाथ मिश्र, आशुतोष मिश्र पौना, अड़ेरहाट मधुबनी, 1978, पृष्‍ठ-360 38. मिथिलाक विभूति जीवन झा, डॉ. प्रेम शंकर सिंह, पृष्‍ठ-25 39. मैथिली नाटक का अद्भभव और विकास, डॉ. प्रताप नारायण झा, पृष्‍ठ-216-218 40. तथैव, पृष्‍ठ-218 41. मैथिली नाटक परिचय, डॉ. प्रेमशंकर सिंह, पृष्‍ठ-45 42. रुक्मिणी हरण, गोविन्‍द झा, नेपथ्‍य कथा, पृष्‍ठ-ड. 43. तथैव, निर्देशकक दिससँ पृष्‍ठ-6 44. मुंशी रघुनन्‍दन दास, बनारस सिटी 1980 संवत् 45. मैथिली नाटक परिचय, डॉ. प्रेमशंकर सिंह, पृष्‍ठ-101 46. दरभंगा प्रेस कम्‍पनी (प्राइवेट) लिमिटेड, दरभंगा 1363 47. मैथिली प्रकाशन समिति, सरिसव दरभंगा, विक्रम 2021 48. माधव झा, दीनबन्‍धु पुस्‍तकालय, इसहपुर रामनगर, सरिसवपाही, मधुबनी 1956 49. मिथिला मिहिर 8 अप्रील 1962 सँ 13 मई 1962 धीर धारवाहिक रूपेँ प्रकाशित। 50. मैथिली नाटक का उद्भाव और विकास, डॉ. प्रताप नारायण झा, पृष्‍ठ-213 51. आधुनिक मैधिली नाटकमे चारित्रक विकास, डॉ. इन्दिरा झा, स्‍वाती प्रकाशन, लँगरटोली पटना, 1987, पृष्‍ठ-142 52. वीर नरेन्‍द्र नाटक, जीवनाथ झा, भूमिका, पृष्‍ठ-2 53. मैधिली नाटक परिचय, डॉ. प्रेमशंकर सिंह, पृष्‍ठ-127 54. मैथिली नाटकक उद्भभव आओर विकास, डॉ. लेखनाथ मिश्र, पृष्‍ठ-348 55. मैथिली नाटक परिचय, डॉ. प्रेमशंकर सिंह, पृष्‍ठ-24 56. स्‍वतंत्र पुस्‍तकालय, विक्रमपुर, पोस्‍ट-विहपुर, भगलपुर, 1968 58. सुधा प्रकाशन, दरभंगा, 1965 59. मिथिला दर्शन प्राइवेट लिमिटेड, 14 व्रजनाथ मित्‍तर लेन कलकत्‍ता, 1965 60. ग्रंथालय प्रकाशन,दरभंगा, 1367 साल 61. सूर्यनारायण झा, दरभंगा प्रेस कम्‍पनी लिमिटेड, 1955 62. राजप्रेस दरभंगा, 1945 63. राजप्रेस दरभंगा, 1947 64. दरभंगा प्रेस कंपनी लिमिटेड, दरभंगा 1948 65. दरभंगा प्रेस कंपनी (प्राइवेट) लिमिटेड, दरभंगा, 1373 साल 66. मैथिली साहित्‍य परिष्‍ट, दरभंगा, 1354 साल 67. श्री अजन्‍ता प्रेस (प्राइवेट) लिमिटेड, 1945 68. पाठक एण्‍ड सन्‍स, दरभंगा 1956 69. महेन्‍द्र विद्याभूषण, ग्राम-बभनिगामा (वार्त्ता) पोस्‍ट-जनक्‍पुर धाम, जिला महोतरी 1962 70. राजकुमार मिश्र, पण्‍डौल, मखुबनी, 1954 71. मैथिली अकादीम पटना, 1982 72. भारती प्रकाशन, काली स्‍थान, दरभंगा चतुर्थ संस्‍करण 1964 73. मैथिली मंदिर, मिधिला प्रेस, टावर चौक, दरभंग, 1965-66 74. चन्‍द्रकान्‍त झा, पी. मोद प्रेस, कचौड़ी गली, काशी, 1941 मायानन्‍दक रेडिया-रूपक शिल्‍प समय परिवर्त्तनशील अछि, जकर प्रभाव अभिव्‍यक्तिक माघ्‍यम पर पडैछ आ साहि‍त्‍यक स्‍वरूप विधान सेहो परिवर्त्तित भ’ गेल। अभिव्‍यक्तिक परिवर्त्तनक फलस्‍वरूप नाट्यक रूप-विधान पूर्णत: परिवर्तित भ’ गेल अछि। रेडियो रूपक औने सुंदर पाठ्य सामग्री भ’ सकैछ जेना संस्‍कृतक अमर कवि अपन नाटक सभ मे देलनि। रेडियो क आविष्‍कारक फलस्‍वरूप रेडिया-रूपक केँ जकरा दृश्‍य काव्‍यक अन्‍तर्गत गणना कयल जाइत छल ओ आग्‍ब श्रव्‍य-काव्‍यक श्रेणी मे परिवर्त्तित भ’ गेल अछि। रेडियो-रूपक एक नवरूप मे हमरा समक्ष आयल अछि। जहि कला कृति केँ रंगमंचपर प्रेक्षकक समक्ष प्रस्‍तुत कयल जाइत छल ओ आब स्‍टूडियो मे अभिनीत भ’ कए श्रोताक कान धरि पहुँचि गेल अछि। पूर्व मे नाट्य-प्रेमी नाटक समक्ष प्रस्‍तुत होइत छलाइ,किन्‍तु आब नाटक हुनका समक्ष प्रस्‍तुत होमय लागल अछि। आधुनिक परिप्रेक्ष्‍य मे प्रेक्षक मात्र श्रोता रहि गेल अछि आ रेडियो सम्‍पन्‍न आ विपन्‍न घरक प्रेक्षागृह बनि गेल अछि। वस्‍तुत: रेडियो रूपक रंगमंचीय नाटक दृश्‍य-पक्ष हैबाक कारणेँ शुद्ध शब्‍दमे निहित भावना पक्ष मे कलहु-कतहु अवरोध्‍ा आबि सकैछ ओतय रेडिया-रूपक मे भावना पक्ष निर्वाध गतिशील रहैछ। रेडियो-रूपक पूर्णत: श्रव्‍य काव्‍यथिक।ध्‍वनिस्‍कर मूलभूत आपार मैथिका ध्‍वनि भावा व्‍यक्तिक सशक्‍त साधन थिक। जे कार्य चित्रकारमे रंगक माघ्‍यमे करैछ रेडियो रूपककार आ प्रस्‍तुतकर्ता घ्‍वनि क माघ्‍यमे करैछ। एडवर्ड सेकविल वेस्‍टक कथान छनि जे आत्‍यन्तिक नमनीयता आ काल्‍चनात्‍मक सांकेतिकताक शक्तिक कारणेँ ई रंगमंच आ चित्रपट सँ अधिक नाटकीयता क सृष्टि करैत अछि। अभिव्‍यक्ति माघ्‍यमक परिवर्त्तन क’ प्रभाव मैथिली साहित्‍य चिन्‍तक मनीषी लोकनिपर सेहो पड़लनि. कारण समयक जे मॉंग छलैक ओहिसँ साहित्‍य मनीषी लोकनि कोनो निरपेक्ष रहि सकैत छथि। एकर परिणाम भेज जे मैथिली साहित्‍य मे रेडिया-रूपकक रचनाक शुभारम्‍भ भेल तथा बीसम शताब्‍दीक उत्तरार्द्ध मे ई विधा पूर्ण विकसित भ’ गेल जकर प्रभाव रवनाकार लोकनिपर पड़लनि। स्‍वातन्योत्तर काल मैथिली भाषा आ साहित्‍यक हेतु उत्‍थान कालक रूप मे जानल जाइत अछि, कारण कतिपय साहित्‍य-चिन्‍तक प्रादुर्भाव भेल जे मनसा-वाचा-कर्मणा अपन मातृभाषाक उन्‍नयनार्थ साहित्यिक गतिविध्‍ा मे सहयोग देलनि ताहि परिप्रेक्ष्‍य मे वर्त्तमान शताब्‍दी पतलखित-पुष्वित भ’ रहल अछि। मैथिली भाषा आ साहित्यिक क्षेत्रमे गत शताब्‍दीमे क्रान्तिक बीजवपन भेल जे साहित्यिक गतिविधिकेँ दिश्‍ा संकेत करबा मे साहियक सिद्ध भेल। कतिपय साहित्‍य सेवी तप: सपूत नव स्‍फूर्ति आ नवस्‍पन्‍दनक संग साहित्‍य ओ भाषाक सम्‍बर्द्धनमे अपन अभूतपूर्व साहित्यिक अवदानक संग प्रवेश कयलनि जे साहित्‍यक स्रोत एक नव स्‍पन्‍दनसँ भरय लागल तथा ओहिमे जे अभाव छल तकर पूत्‍यर्थ रचनाधर्मी साहित्‍य चिन्‍तक अत्‍यंत लगनशीलता आ तन्मयताक संग एकर सम्‍बर्द्धनार्थतत्‍पर भेलाह जकर परिणाम भेल जे मातृभाषाक विशाल भण्‍डार केँ भरबाक निमित्त ओ सब कृ संकल्‍प भेलाह। गत शताब्‍दीक चतुर्थ दशकमे मातृभाषाक उन्‍नयनार्थ एक नवोन्‍मेषशालिनी प्रतिभा सम्‍पन्‍न साहित्‍य चिन्‍तकक प्रादुर्भाव भेल जे उपन्‍यासकारक रूपमे कथाकारक रूपमे, गीतकारक रूपमे आ समीक्षकक, रूपमे सम्‍पोषित कयलनि ओ छथि मायानन्‍द मिश्र (1934) जनिक अक्षय कृतिसँ मैथिली पाठक नीक जकाँ परिचित छथि; किंतुओ एक विशिष्‍ट रेडियो-रूपककार सेहो छथि तकर परिचय अद्यापि नहि भेटि पौलनि अछि तकर दोषी मैथिलीक इतिहासकार आ आलोचक छथि। एहि प्रसंगमे इतिहासकार आ आलोचक सर्वथा मौन छथि। ने जानि किएक ई एक अनुउरित प्रश्‍न अछि। रेडियो मे जीविकापन्‍न करवाक कारणेँ ओ समय-समयपर भवानन्‍दक नामे रेडिया-रूपकक रचना कयलनि। हिनक पॉंच रेडिया-रूपक अद्यापि हमरा दृष्टिपथपर आयल अछि ओ क्थिक, एके बापक बेटा, नवलोक: नवगप्‍प, गुड-चाउर, अपन आन आ इतिहासक विसरल (अभियान-2) शेष चारू अद्याापि अप्राशित अछि, किन्‍तु सभक प्रसारण आकाशवाणी पटनासँ भेल अछि। जीवकोपार्जनार्थ मायानन्‍द आकाशवाणी पटनाक चौपाल कार्यक्रमसँ बिगत अनेक वर्ष धरि सम्‍बद्ध रहलाह तेँ उनका समय-समयपर रेडियो रूपकक रचनाक प्रतिबद्धता रहलनि। ओ रेडिया-रूपकक शिल्‍पक सैद्धान्तिक एवं व्‍यावहारिक पक्षक सूक्ष्‍मताक संग अघ्‍ययन कयलनि। हिनक उपलब्‍ध रेडियो रूपकमे हमर पारिवारिक, सामाजिक आ ऐतिहासिक पहलूक चित्रण भेल अछि। कलाकार युग-जीवनक प्रति आर्थिक जागरूक रहैछ तथा ओकार प्रयास रहैछ जे संसारकेँ खुजल ऑंखिए देखय। मायानन्‍द सजग मानवतापादी कलाकार छथि तेँ ओ युगीन समस्‍याक प्रति अपन जागरूकता देखौलनि। आधुनिक आर्थिक वैषयसँ उत्‍पन्‍न तिक्‍तताक स्थिति, समाजक मघ्‍यवर्गीय लोकक वेरोजगारी, ओकर दुर्दशा, सामाजिक यथार्थ आदिकेँ ओ अपन रेडिया रूपकमे चित्रित क’ कए ओहिपर तीक्ष्‍ण व्‍यंग्‍य सेहो कयलनि। यथार्थक पृष्‍ठभूमिपर आधारित आर्द्श-स्‍व्‍र हिनक रेडियो-रूपक मे मुख्‍य स्‍वर थिक। कथानक : मायानन्‍दक रेडिया-रूपकमे युगीन समस्‍याक प्रति अधिक जागरूकता देखबा मे अबैछ। आधुनिक आर्थिक वैषम्‍यसँ उत्‍पन्‍न स्थिति समाजक मघ्‍यवर्गीय लोकक वेरोजगारी,ओकर दुर्दशा, संघर्ष आदिकेँ ओ अपन रेडियो रूपमे उपस्‍थापित कयलनि। एहि परिप्रेक्ष्‍ामे हमर समाजक पारिवारिक यथार्थकेँ अंंकित करबाक उपक्रम कयलनि जाहिसँ कथाक विकास सरल गतिसँ भेल अछि। कथाकार हैबाक कारणेँ ओ रेडिया-रूपकक कथानकक निर्माणमे अपन कुशलताक परिचय देलनि। ई अपन रेडियो रूपकक कथानक निर्माणमे जिज्ञासा तत्‍वपर विशेष बल देलनि। हिनक प्राय: सब रेडिया-रूपक कोनो-ने-कोनो रहस्‍यपर आधारित अछि जकरा उदघाटत कयल गेल अछि जाहिसँ रूपक चमत्‍कारिक बनि गेल अछि। हिनक कथानक संघर्षपर आधारित अछि। कथानक निर्माणमे विशेष कौशल परिलक्षित होइत अछि। ओहिमे संघर्ष अछि, गति अछि। एक्‍के बापक बेटा क कथानक एक आदर्श अातृप्रेमक उदाहरण प्रस्‍तुत करैत अछि। हरि आ मदन दूनू भय छथि। हरि एक आफिसमे अल्‍प वेतन भोगी मुलाजिम अछि। अपन छोट भाय मदनकेँ शिक्षित-दीक्षित करबामे ओ कोन कोन ने बेलना बेललनि, किन्‍तु यथासमय नाेकरी-चाकरीक व्‍यवस्‍था नहि भ’ पौलनि तँ एक ट्यूशनके व्‍यवस्‍था कयलनि जाहिमे अपन वेतनक टाका मिला क’ ओकर अहँक तुष्टि कयलनि। अन्‍तत: एहि रहस्‍यक उदघाटन तखन होइछ जखन मदनक डिपटी कलकटरक परिणाम अबैत अछि। पारिवारिक परिवेशमे अल्‍प आयक कारणेँ कर्जक भारसँ आयल तिक्‍तताक एक सुखद सोहान वातावरणमे परिवर्तित भ’ जाइछ। अध्‍ाुुनातन संदर्भमे एहन भ्रातृम कतहु नहि देखबामे अबैछ। रेडियो रूपककार एक एहन वातावरणक निर्माण करबामे सफल भ’ पौलनि अछि जे भ्रातृप्रेमक अदभुत उदाहरण प्रस्‍तुत करैछ। पारिवारिक पृष्‍ठभूमिपर केन्द्रित अछि नव लोक: नवगप्‍पक कथानक। किसुन एवं विसुन दूनू भैयारी नोन-पानि जकॉं सम्मिलत रहैत छलाह; किन्‍तु जिसेबी साहूक कर्जक तगादाक कारणेँ पारस्‍परिक प्रेम एहन तिक्‍त वातावरणक निर्माण करबामे सक्षम होइछ जे एक दोसराक जानी दुशमन मानि संयुक्‍त परिवारके खण्डित करबाक हेतु डेग उठयबाक उपक्रम करैत छथि। मधुकान्‍तक सत्‍प्रयासेँ सब समस्‍याक समाधानोपरान्‍त तिक्‍तता मधुरिमामे वरिवर्तित भ’ जाइछ तथा संयुक्‍त परिवार यथावत रहि जाइत अछि। रेडियो-रूपककार समाजिक परिवेशमे परिवर्त्तित विचारधाराक धरातलपर नव दिशा समाकेँ एहिमे देबाक उपक्रम कयलनि अछि जे नवतावादी सर्वथा नव आयामक सृजन करबामे सहायक होहत छथि जे टूटैत परिवार पुन: संगठित भ’ जाइत अछि। अन्‍यथा विखण्डित भ’ जाइत। पति-पत्‍नीक हास-परिहासपर केन्द्रित अछि गुड चाउर कथानक। पारिवारिक पृष्‍ठकभूमिमे कलहक जडि़ होइत अछि गहना-गुरियाा जकरा लेल पारस्‍परिक ईर्ष्‍या-द्वेष्‍ा उत्‍पन्‍न भ’ कए प्रेमक पवित्र बंधनकेँ तोडि़ दैत अछि। द्वारिका अपन पत्‍नी लक्ष्‍मीकेँ आध्‍ा सेरक सूति गढबा दैत छथि जकर फलस्‍वरूप संयुक्‍त-परिवारमे विघ्‍नक बीजारोपण होइछ तथा माधव पत्‍नी जयाकेँ ई घटना सर्वथा अनसोहॉंत लगैत छनि। जया माधवकेँ सतत प्रेरित करैत छथि जे साझी आश्रममे रहबाक अरब कोनो अर्थ नहि एहि गेल अछि। शनै:-शनै: समस्‍या एतेक गम्‍भीर भ’ जाइछ जे एहि घटनाकेँ ल’ कए द्वाारिका आ माधव संयुक्‍त परिवारक परम्‍पराकेँ खण्डित क’ कए भीन-बखरा करबाक हेतु उताहुल भ’ जाइत छथि। किन्‍तु लक्ष्‍मीकेँ ई स्‍वीकार नहि होइत छनि जे हुनका पसिन नहि। अन्‍तत: भीन-बखराक बात खटाईमे पडि़ जाइत अछि तथा दुनू भाय संयुक्‍त परिवारमे रहबाक अभिलाषी बनि जाइत छथि। अपन: आन रेडियो रूपकमे सामाजिक वातावरणक विशिष्‍ट संदर्भकेँ रेखांकित करैत अछि जे हमर समाजमे एहन-एहन महनुभाव एरवनो वर्त्तमान छथि जनिक सतत इएह प्रयास रहैछ जे एहन विषम वातावरणक निर्माण करी से भाय-भायक बीच जे आपसी प्रेम, स्‍नेह, आ सदभावना अछि ओ तिक्‍ततामे परिवर्त्तित भ’ जाय। शीतल झा एक एहने पात्र छथि जे मुखियाक चुनावक अवसरपर शिवान्‍त आ विष्‍णुकान्‍तकेँ चुनावमे एक दोसाराक विरोधी रूप मे वर्णित क’ कए अपन उल्‍लूसोझ करबाक प्रयासमे लागि झूठ-फूस, प्रपंचक तानावाना बुनि क’ दुनू भायकेँ चुनाव लड़बाक हेतु सतत उत्‍प्रेरित करैत रहैत छथि तथा दुनू पक्षसँ पर्याप्‍त टाका-पैसा ऐंठि क’ अपन स्‍वार्थ सिद्धि करबा मे कनियो कुंठित नहि होइत छथि। किन्‍तु वास्‍तविकताक रहस्‍योदघटन तखन जा क’ होइत अछि जखन कि वि्ताक वखीक अवसरपर दुनू भायकेँ एहि प्रसंगमे विस्‍तारसँ विवेचन करबाक अवसर भटैत छनि तथा शीतल झाक वास्‍तविकतासँ अवगत होइत छथि। सामाजिक कथानकक अतिरिक्‍त हिनक एक रेडियो रूपक थिक इतिहासक विसरत्‍ल जाहि मे रूपककार इतिहासक एक आवृत अघ्‍यायकेँ अनावृत करबाक अपक्रम कयलनि अछि। एहिमे मल्‍ल जनपदक भट्टारक सूर्यकूलभूषण सम्राटक ओहि कथाँश दिस संकेत कयलनि अछि जे भारतक प्राचीनतम विश्‍व विद्यालय वैदिक साहित्‍य आ परित्तनीक सूत्र अघ्‍ययनार्थ गेल रहथि, किंतु पितृत्‍यक देहावसानोपरांत सुखद जीवनक परित्‍याग क’ कए सम्राट पदकेँ सुशोभित कयलनि। आचार्य नागभद्रक पटट् शिष्‍य श्रेष्‍ठ आर्यशिल्‍पीके पारखी सम्राट तत्‍क्षण हुनक शिल्‍प कलासँ परिचित भ’ जाइत छथि जनिक शिल्‍प सम्राट तत्‍क्षण हुनक शिल्‍प कलाऍं परिचित भ’ जाइत छथि जनिक शिल्‍प ज्ञान समग्र आयावर्त मे प्रख्‍यात तथा यशोघ्‍वज दिगदिगन्‍त मे व्‍याक्‍त छल। सम्राटक आदेशानुरूप शिल्‍पीकेँ दुर्गाक भव्‍य प्रतिमा निर्माण आज्ञा भेटैछ, किन्‍तु दुर्योगसँ एहन नहि भ’ पौनक आ मूर्ति निर्माण भ’ गेलैक राजकुमारी मारूतिका जे साम्राज्ञी छलीह। सम्राट क्रोधान्‍ध भ’ सूर्योदयसँ पूर्व ओकरा राज्‍य निष्‍कासनक आज्ञा देल गेलैक। कतोक दिनक पश्‍चात् आर्य शिल्‍पी विक्षिप्‍तता अवस्‍थामे मल्‍ल सम्राट स्‍द्र सिंहक समक्ष प्रस्‍तुत कयल जाइछ। सम्राट एहि विषयसँ अवगत रहथि जे नागभद्रक अथवा हुनक शिष्‍यकद्वारा बनाओल निर्मित प्रतिमामे प्राण प्रतिष्‍ठा स्‍वयं भ’ जाइत छैक। सम्राट इच्‍छा व्‍यक्‍त कयलनि जे एक एहन काल्‍पनिक अलौकिक नारीक कामना अछि जकर छवि इन्‍द्रधनुषोसँ अधिक आकर्षक, जकर कान्ति सघन जलदमे छिकैत विद्युतलतो सँ अधिक प्रखर जकर मादकता सोमरस पर्यन्‍तकेँ नीरस तथा कोमलता नवीनताकेँ कठोर बना दैत छैक। सम्राट इच्‍छा छलनि जे मल्‍ल जनपद विखदैकेँ पराकाष्‍ठा क’ काव्‍य-निर्माणक आधार दैक तथा सौन्‍दर्य स्‍ने‍ही केँ महान् पवित्र मंदाकिनीक नीक स्‍नानक फल दैक। राजाक आज्ञा शिरोधार्य क’ कए मूर्तिनिर्माणार्थ छओ पक्षक कलावधि देल जाइछ। आर्यशिल्‍पीक अपूर्ण सौन्‍दर्य आ ओकार शिल्‍प ज्ञानपर आकर्षित भ’ कए राजकुमारी तुँगभद्रा शनै:-शनै: ओंकार सामीप्‍य सुखक लाभक आकाकंक्षिणी बनि जाइछ तथा अपन अगाध स्‍नेह जलसँ ओकरा अभिसिक्‍त करबाक उपक्रम करैछ, किन्‍तु आर्य शिल्‍पीक समक्ष हुनक अरण्‍य रोदन निष्‍फल भ’ जाइछ। मूर्तिनिर्माणमे शिल्‍पी ततेक ने तन्‍मय भ’ जाइछ जे मूर्तिक सौन्‍दर्य रेखा आर्य महारानी मारूति तथा नासिका आ भौं तुंगभद्रा सदृश स्‍वयंमेव बनि जाइछ। सम्राट आर्य शिल्‍पीक मूर्ति कलापर आकर्षित भ’ महामात्‍यक समक्ष विचार व्‍यक्‍त कयलनि जे तुँगभद्रा आ आर्य शिल्‍पी एकत्रित भ’ कए नूतन-शिल्‍पकलाक सृष्टि करथि, कारण राजकुमारी संगीतकलामे निपुणा छलीह। एकर राजकुमारी संगीतकलामे निपुणा छलीह। एकर सुखद परिणाम हैत जे मल्‍ल जनपद सौन्‍दर्य सााम्‍पदाक लेल पुन: विश्‍वभासरी मे अपन ज्‍योति जगाओत।आर्य िशल्‍पीक मूर्ति कला आर्य शिल्‍पीक क्षमता सर्वदा राजकुमारी तुंगभद्राक अनुरूप अछि। सम्राट व्‍यक्तिक मूल्‍य वैयक्तिक योग्‍यताक आधारपर अंकित करबाक आकांक्षी छथि। आर्य शिल्‍पी एवं तुंगभद्राक समाचारसँ मल्‍ल साम्राज्ञी उज्‍जैनक राजकुमारी मारुति जे मल्‍ल सम्राट रूद्रपतिक अधागिणी छथि ओ अतीव विह्रलता, मंद, कल्‍पन आ स्पन्‍दनक अनुभवमे रहल छथि, कारण कोनो समयमे मारुति स्‍वयं आर्यशिल्‍पीक छलीह, किन्‍तु पँरिस्थितिक विपरीतताक फलस्‍वरूप ओ आर्य शिल्‍पीकेँ अपन बनयबासे असमर्थ भ’ गेल छलीह तथा पिताक आज्ञानुरूप महामहिम मल्‍ल सम्राटक रूद्र पतिक अधाँगिणी बनबा लेल विवश भ’ गेल छलीह। एक नारीक जे विवशता होइछ जकर फलस्‍वरूप ओ आर्यशिल्‍पीकेँ अपनयबामे असक्षम भ’ गेलीह। परिवत्तित परिवेशमे वास्‍तविकताक रहस्‍योदघटान नखन होइछ जखन सम्राट रूद्रपति अपन कन्‍याक हेतु ओही आर्य शिल्‍पीक चयन करबाक अभिलाषी भेलाह जे पूर्वमे राजमाताक प्रेमी छल। राजमाता अर्थात् मारुति स्‍वयं आर्यशिल्‍पीक समक्ष प्रस्‍तुत भ’ कए वास्‍तविकताकेँ उदघाटन करैत छथि। यथास्थिति सँ परिचित भ’ कए आर्यशिल्‍पी सम्राटकेँ बिनु कोनो सूचना देने अदृश्‍य भ’ जाइत छथि। हिनक समग्र रेडियो-रूपक पारिवारिक परिवेशपर केन्द्रित अछि। स्‍वतंत्रताक पश्‍चात् पारिवारिक स्‍वरूपपर एतेक शीघ्रतासँ परिवर्त्तन भेल अछि जे संयुक्‍त परिवारक मान्‍यता शनै:-शनै:- खंण्डित होमय लागत आ एकांगी परिवारक उदय होमय लगलैक ताहि परिप्रेक्ष्‍यमे संयुक्‍त परिवारक पारम्‍परिक ढॉंचाकेँ सुरक्षित रखवाक उद्देश्‍य सँ उत्‍प्रेरित भ’ ओ अपन समग्र रेडियो-रूपकमे ओकार मान्‍यताकेँ पुनस्थापित करबाक कल्‍पना कयलनि। ओ इतिहासक ओहि अघ्‍यायपर दृक्पात कयलनि जाहि दिस साहित्‍यकारक घ्‍यान नहि आकर्षित भेल छलनि। इतिहासक बिसरलक कथानकमे पर्याप्‍त नाटकीय तत्‍व अछि आ ई एक प्रभावशाली रेडियो-रूपक थिक। पात्र: मायानन्‍दक रेडियो रूपकक वैशिष्‍ट्य थिक ओ कथा-विन्‍यासमे अत्‍यल्प पात्रक प्रयोग कयलनि अछि। पात्राक चुनावमे ओ अपन कल्‍पनाशक्तिक प्रयोग क’ कए अत्‍यंत कुशलताक संग पात्रक चयन कयलनि। हिनक रेडियो-रूपकमे प्रयुक्‍त पात्रक मनमे कोनो ने कोनो द्वन्‍द्व अश्‍य अछि। हुनक प्रत्‍येक पात्रक मानसिक द्वन्‍द्वक सूक्ष्‍मसँ सूक्ष्‍म परतकेँ उदघाटित करबामे सफलता प्राप्‍त कयालनि अछि। हिनक पात्रक मनोभाव आ द्वन्‍द्वकेँ अत्‍यंत कुशलताक संग उदघटित करबामे साक्षम भेलाह अछि। मनुष्‍य जेहन देखबामे लगैछ भीतरसँ ओ ओहन नहि रहैछ। मनुष्‍यक वाह्य व्‍यवहार कोनो स्थितिमे ओकर वास्तविक चरित्रक परिचायक भइये ने सकैछ। मायानन्‍द एक मनोवैज्ञानी सदृश्‍य पात्राक अन्‍त:स्‍थल मे प्रवेश क’ कए मानवक कृत्रिम आवरणकेँ हटा क’ वास्‍तविक रूपकेँ स्‍पष्‍ट करबाक प्रयास अपन प्रत्‍येक रेडियो-रूपकमे कयलनि अछि। मनुष्‍यक आन्‍तरिक रूप अत्‍यंत संवेदनशील, भाव-प्रवण आ कोमल होइत अछि। ओ एहने पात्रक चयन कयलनि वा पात्रक जीवन क्षण्‍ाकेँ उदघटित कयलनि जाहिमे द्वन्‍द्वक तीवता अछि। मनोवैज्ञानिक पात्रक प्रभाव हुनक नाटकीय शिल्‍पपर प्रचुर परिमाणमे पड़ल अछि। हुनक विशिष्‍टता थिक जे ओ हरेक पात्रक भावनाक सधनता आ तीव्रताकेँ सरलतासँ पाठकक समक्ष प्रस्‍तुत कयलनि। हिनक रेडियो रूपकक धरातल मुख्‍यत: भावनात्‍मक अछि। हिनक रेडियो रूपकमे पात्रशील-निरूपणक विनियोगमे रूपककारक सफलता एहिमे अछि जे अत्‍यल्प पात्रक प्रयोग द्वारा घटनाकेँ मार्मिकताक संग उपस्थ्ति करबामे सक्षम भ’ पौलनि। अपन: आनमे तीन पुरुष पात्र आ दू महिला पात्री,गुडचाउरमे पुरुष एवं दू स्‍त्री पात्र, नवलोक: नवगप्‍पमे पॉंच पुरुष आ दू स्‍त्री पात्र तथा इतिहासक बिसरलमे चारि पुरुष आ तीन स्‍त्री पात्रक प्रयोग रेडिया रूपककार कयलनि अछि जे हुनक विलक्षण शिल्‍पक प्रमाण थिक। इतिहासक बिसरल एक मनोवैज्ञानिक रेडियो रूपक थिक जकरा अर्न्‍तगत प्रत्‍येक पात्रक मानसिक यातनाक प्रसंगमे विस्‍तार पूर्वक विश्‍लेषण रूपककार कयलनि अछि। आर्य शिल्‍प, तुंगभद्रा, मारुति एवं महाराज रुद्रसिंह सभ मानसिक द्वन्‍द्वसँ गुजरि रहल अछि। महाराजक उत्‍कट अभिलाषा छलनि जे आर्य शिल्‍पी आ तुंगभद्राक सम्मिलित प्रयाससँ एक नूतन सौन्‍दर्य कलाक निर्माण संभव अछि, किन्‍तु साम्राज्ञी मारुति जे यथार्थ वस्‍तुस्थितिसँ अवगत छथि। ओ नहि चाहैत छथि जे एहन कार्य महाराज द्वारा कयल जाय तदर्थ ओ प्रयत्‍नशील भ’ आर्य शिल्‍पीकेँ ओतयसँ विदा भ’ जयबाक अनुरोध करैत छथि। प्रतिपाद्य रेडियो रूपकक पात्रक मानसिक अंतर्द्वन्‍द्व अपन पराकाष्‍ठासँ गुजरि रहल अछि। दू भायक बीच अनार्द्वन्‍द्व क रूप भेटैछ अपन: आन, गुड चाउर, नवलोक: नवगप्‍प एवं एक्‍केवापक बेटामे। प्रत्‍येक पात्र अपना अनुसारेँ प्रत्‍येक कार्यकेँ क्रिया रूप देबापर उताहुल अछि, किन्‍तु स्थितिक यर्था‍थतासँ अवगत भेलापर सभ एकहि भ’ जाइत अछि। रेडियो रूपकमे मनोवैज्ञानिक चित्रणक अनेक सुविधा प्राप्‍त अछि जकर प्रयोग रूपककार पात्रक मानसिक ओझसैठ केँ अत्‍यंत सरलासँ अंकित करैत छथि। एहिमे सामाजिक जीवनक विविध्‍ा रूपिणी यर्थाथताकेँ अंकित कयल जा सकैछ जे अन्‍तरकेँ उद्वेलिन कयहानिर द्वन्‍द्वक चित्रण भेल अछि। समाजमे भेटनिहार किछु विशेष प्रकारक व्‍यक्तिकेँ घ्‍यानमे राखि क’ एहि रेडियो रूपक सभक रचना भेल अछि। संवाद : सम्‍वाद लेखनमे मायानन्‍द अत्‍यंत निपुण छथि। वातावरण आ प्रसंगक अनुरूप छाेट-पैघ सब प्रकारक संलाप हिनक रेडियो रूपकमे उपलब्‍ध होइछ। रेडियोपर हिनक नाटक सफलताक रहस्‍य ई अछि रेडियोक लेल जाहि संसिलष्‍ट कथानकक एकाग्रता निश्चिय दिशा आ सशक्‍त संलापक अपेक्षा हाेइत अछि। तकर निर्वाह हिनक रेडियो रूपकमे उपलब्‍ध होइछ। हिनक रेडियो रूपकमे वाचिक तीवताक प्रचुरता अछि। अति संक्षिप्‍त संलाप द्वारा कोना घटना विकास आ भाव व्‍यंजनाक काज भ’ सकैछ। तकर उदाहरण हिनक रेडियो रूपकमे उपलब्‍ध होइछ। ई रेडियो रूपकमे संलाप सहज बोलचालक भाषामे लिखलनि अछि। ओहिमे वाकपटुता देखयबाक हेतु भेटैहछ जे हास्‍य-व्‍यंग्‍यक सृजनक हेतु उपयुक्‍त अछि। संलापमे गति अछि। बातसँ बात क्रमिक रूपेँ ब‍हराइत अछि जे हिनक रेडियो रूपकक वैशष्‍ट्य अछि। संलाप लेखनमे हिनका कुशलता छनि जे रेडियो रूपककेँ नीरस नहि होमय दैछ। संलापमे पात्र, प्रसंग एवं भावक अनुरूप परिवर्त्तित होइत रहैछ। जाहिसँ रोचकता आबि जाइछ। भाषा : रेडियो रूपकक सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण विषय थिक भाषा आ ई भाषा‍त्‍रलिखलनि नहि, प्रत्‍युत भाषित होइछ। अतएवं एहन भाषाक प्रयोग हो सर्वसाधारण केँ बोधगम्‍य होइक। मायानन्‍दक रेडियो रूपकमेँ अप्रचलित शब्‍द जे साधारण जनमानससँ उठि जकॉं गेल अछि तकर प्रयोग अपन नाटकीय भाषा गन्ति कयलनि। ओ भाषाकेँ व्‍यावहारिक रूपकेँ रेडियो रूपकमे स्‍थान देलनि। इएह कारण अछि जे हुनक भाषा कतहु अव्‍यवस्थित नहि आ पौलाक। ओ शब्‍दकेँ तोडि़- ममोडि़ क’ कतलहु विकृत नहि कयलनि। हुनक भाषाक रसधार सर्वथा स्‍वच्‍छन्‍द आ स्‍वाभाविक रुपेँ प्रकाशित भेल। ओ सब प्रकारक भावक प्रकाशनक क्षमता हुनक भाषा मे अछि। परिस्थितक अनुकूल ओ शब्‍दक चयन कयलनि। लोकोक्ति आ मुहावराक सफल प्रयोग हुनक भाषाक सौन्‍दर्यमे अपूर्व अभिवृद्धि कयलक अछि। हिनक भाषा-नैसर्गिक रसाद्र आ भावपूर्ण अछि। ओहि मे तन्‍मयता, सार्थकता आ स्‍वाभाविकताक सहज समावेश अछि। मायानन्‍दक रेडियो रूपकक विशेषता थिक जे स्‍थल-स्‍थलपर ओ एहन मार्मिक लोकोक्ति आ मुहावराक प्रयोग कयलनि जकर फलस्‍वरूप हुनक रूपकक संवाद अत्‍यंत प्राणवन्‍त ब‍िबे गेल अछि। डा. नगेन्‍द्र आलोचक की आस्‍था मे हाली के काव्‍य मे एहि विषयकेँ स्‍पष्‍ट कयलनि अछि जे गदय हाे अथवा पद्य दुनूमे रोजमर्राक घ्‍यान राखब आवश्‍यक अछि। भावनाक संटीक अभिव्‍यक्ति लोकोक्ति आ मुहावरा द्वारा सम्‍भव अछि। भावनाक सहजताक कारणेँ ओकार अभिव्‍यक्तिकेँ लेल सहज, स्‍वाभाविक भाषा ओ एकरे माघ्‍यमे सम्‍भव अछि। मानवक अत्‍यधिक जीवन्‍त, भाव-प्रवण आ ऐन्द्रिय अनुअनिवार्यता ओहि भाषासँ सम्‍बद्ध होइत अछि जे यथार्थमे बजैत अछि। हिनक एकांकी सभ चौपालसँ प्रसारित भेल जकर जनसाधारणसँ सम्‍पर्क हैबाक कारणेँ अनलंकृत अर्थात् सजह स्‍वाभाविक आर सरल अछि, कारण एहन भाषामे कोनो प्रकारक आडाबरक स्‍थान नहि रहैत अछि। इएह कारण अछि जे हिनक भाषा सर्वसाधारणक हेतु बोधगम्‍य अछि। भाषापर हिनका अधिकार छनि। हिनक भाषा मुहावरेदार अंलकृत आ काव्‍यात्‍मक अछि हिनक भाषा व्‍यावहारिक जीवनक भाषा थिक। एहि तथ्‍यकेँ उदधाटित करबाक उददेश्‍यसँ हिनक प्रत्‍येक रेडियो रूपकमे प्रयुक्‍त लोकोक्ति आ मुहावरापर विचार करब आवश्‍यक प्रतीत भ’ रहल अछि। लोक भाषाक यथार्थ रूपकेँ ओ अपन रेडियो रूपकमे उपस्थित कयलनि जकरा पाछॉं हुनक उद्देश्‍य छलनि जे श्रोतापर एकर प्रभाव पड़य। अपन: आन रेडियो रूपकमे ई निम्‍नस्‍थ लोकोक्ति एवं मुहावराक प्रयोग कयलनि अछि यथा: चिकरब-भोकरब, नङाव्‍टे नाचने, घोडा पर चढल, कुर्सी-फुर्सी, मजिस्‍टर दरोगा, मन हनछिनआएब, चिकचाक, चुटट्ाक लोह तँ सोझे रहैछ, एक्‍केटा प्राण दूठॉं बाटल, बसुलाक धार वस्‍तुकेँ अपना दिस झीकब, जकरे पास खोइ तकरे पात भूर करब, ऑंखिक देखल-कानक ल, अनका घरमे आगि लगा क’ तपनिहारक कमी नहि, जकरे खयबैक तकरे गयबैक, ताल लागब,पॉंच हाथ तड़पब, ऑंखिलाल पीयर करब,‍ अनटोटल गप्‍प, मुँह ने कान बीच मे दोकान, सौँसे नगर घिनाएब, लारब-चारब, अपने मने पैघ, आगि झायब, बाभनक गाम मे राड़ पजिआड़, इनार मे, अतह करब, अनटोटल गप्‍प,भेङा महिसक कानि,कटांउझि करब,पाणडा आत्‍मा एकके, मुँह पुरुख बनब.नारुङटे नाचब, रसाताल मे पहुँचाएब, उजाहि उठब. मतिभ्रष्‍ट, नाककाब, अदगोइ-बदगोइ, पोलखुजब, कपार फारब. धोखा देब इत्‍यादि। एकके बापक बेटा मे काबुल मे गदहा होइछ, गदैस-मदौस, किचकिच-किचकिच करब, ऑंखि गड़रब, भटकल भौंह, बेलसक गप्‍प.पेट पोसब, भनभनायब. ललबबुआ बनब, रमा डोलबेनब, छिहइआछत रहब. बताह बनायब. बौआइत-ढ़हनाइत, ओलसन बोल, कान बरहीी, चूल्हि मे’ झोंकब. तम्‍मा ल’ कए माङव्‍ब, आगि लगाएवं.गुड चाउर मे विधवा हैत सात घर क मुद्दइ, ठीक पर मामु हँसी करब, हुथनूड़, निसा देब बनब, हक्‍कन कानब, अकान बनब, कोसलिया करब, बकलेल सन, मनोरथ पुरब. झुकादेब, फरिछौट करब. रङताल बजरब, खोंताक चोंचा जकॉं मुँ‍ह लटकायब, किकहारि काटब, अकच्‍छ करब. सूइघाक नोक बरोबरि, नवलोक: नवगप्‍प मे मार बारहैनि, बिठुआ काटब, सुगर क गवाही हरिन देल दुनू पडा क’ जंगल गेल, देह ढाहब, देह मे अागि लगायब, विसपिपरी, हाथी पर चढल एलाह आघोडा पर तैयार, घर उजारब, कडरीक थम्‍म पर सितुआ चोख, कपार फूटब, गलहथ्‍या देब, तथड़ाड़ा मे गारब, भाकसी झोंकब, कौआक नोरापे बेङ नैामरै. पार लागब, अन्‍हेड़ करब, नन्‍नो थान-बिहन्‍नबान, अपने कचिया सँ घेंट ततारब, भुकायब, चौहाठी हिलायब, अपन बडद कुड़हरिए नाथब, मुह पर जाभी लगाएब, चौहाठी हिलायब, अपन बड़द कुड़हरिए नाथब, मुह पर जाभी लगाएब, कोसिकाक दोखरा बालु फॉंकब, उकटा पैंची, खाधि मे खसायब, आगि उगलब, लथगोबर एवं इतिहासक बिसरल मे टकटकी लागब, संकल्‍प विकल्‍प मे ओझायब, छल करब आदि-आदि। वातावरण: मायानन्‍द घ्‍वनि आ शब्‍दक माघ्‍यमे वातावरण निर्माण कयलनि अछि। हिनक रेडियो रूपकक विशिष्‍टता अछि जे हमर ग्रामीण परिवेशक मघ्‍यवित्त परिवारक यथार्थ स्थितिकेँ उदघटित करबाक उपक्रम कयलनि अछि जे वर्त्तमान परिवेश मे खण्डित भेल जा रहल अछि तकरा कोना बचाओल जाय ताहि दिस संकेत कयलनि अछि। हिनक रेडियो रुपकमे परिवारकेँ तोड़बाक जे प्रयास सामाजिक परिवेशमे ज्‍वलन्‍त भ’ गेल तकरा ओ जोड़बाक प्रयास कयलनि अछि अपन आन, गुड़ चाउर, नवलोक: नवगप्‍प आ एक्‍के बापक बेटा मे। परिवारिक परिवेशमे रहि क’ लोक कोना एक दोसरापर टीका-टिप्‍पणी करैत अछि, किन्‍तु वास्‍तविकताक धरातलपर ओ कतेक सटीक उतरैत अछि तकरा स्‍पष्‍ट करब रूपककारक अभीष्‍ट परिलक्षित भ’ रहल अछि। इतिहासक बिसरलमे काल्‍पनिकताक विसक्षण प्रयोग क’ कए रूपककार एहन वातावरण सृजन कयलनि अछि जे कथानकक विकासमे कतहु व्‍यवधान नहि भ’ पबैत अछि। ई अपन रेडियो रूपकमे श्रव्‍य-माघ्‍यमे घ्‍यानमे रखलनि। शब्‍द आ घ्‍वनि द्वारा यथोचित वातावरणक निर्माण कयलनि वातावरणक अनुरूप छोट-छोट सब प्रकारक संपालक रचना कयलनि। घ्‍वनि-प्रभाव आ संगीतक माघ्‍यमे रेडियो रूपककार वातावरण-निर्माण प्रभावशील ढंगसँ प्रस्‍तुत करबाक प्रयत्‍न कयलनि अछि। उद्देश्‍य : मायानन्‍द उद्देश्‍यक एकतापर घ्‍यान केन्द्रित कयलनि अछि। ओ सभ स्थिति केँ एकहि दिशा दिस प्रेरित कयलनि। हिनक रेडियो रूपकक उद्देश्‍य मनोरंजन रहल अछि। किछु रेडियो रूपकमे ओ सामाजिक असंगतिपर तीक्ष्‍ण व्‍यंग्‍य कयलनि अछि। हिनक रेडियो रूपकमे उद्देश्‍य अपन कथ्‍यकेँ रोचक एवं आकर्षक रूपमे प्रस्‍तुत करबाक प्रयास थिक जाहिमे रुपककारकेँ पर्याप्‍त सफलता भेंटलनि अछि। रंग-शिल्‍य : हिनक रेडियो-रूपकमे रंग-संकेत आ दृश्‍य-विधानक अन्‍तर्गत प्रथम श्राव्‍य, द्वितीय श्राव्‍य तदनुप अछि। ओ मघ्‍य-वर्गीय सामाजिक जीवनक पृष्‍ठभूमि मे रेडियो-रूपकक रचना कयलनि। हिनक सभ रेडियो-रुपक मे पारि‍वारिक समस्‍याक उदघाटन कयलनि जे सामाजिक यथार्थपर आधारित अछि। समाजिक यथार्थपर आधारित रेडियो रूपकमे ओ वर्तमान आर्थिक वैषभ्‍य आ ओहिसँ उत्‍पन्‍न समस्‍या दिस संकेत कयलनि अछि। ओ रेडियोकेँ घ्‍यानमे राखि कएकर रचना कयलनि आ ओ ओहि मे सफल भेलाह।ई सभ सामाजिक समस्‍याकेँ अपन प्रतिपाद्य बनौलनि। ओ एकरा प्रभावोंत्‍पादक बनयबाक हेतु घ्‍वनि-प्रभावक उचित प्रयोगपर घ्‍यानकेँ केन्द्रित कयलनि। श्रव्‍य-संकेत आ घ्‍वनि-प्रभावक व्‍यवहारक प्रयोग कुशलतापूर्वक ओ अपन रेडियो रूपकमे कयलनि। बिनु कोनो नैरटरक सहायता नेने प्रसंगकेँ नाटकीय रूपमे, प्रस्‍तुत करबामे सफलता ओ प्राप्‍त कयलनि। दृश्‍य परिवर्तनमे नवीनता अनबाक ई प्रयास कयलनि। जिज्ञासा आ कुतूहलताकेँ प्रतिष्ठित करबाक उपक्रम कयलनि। मायानन्‍दक प्रत्‍येक रेडियो रूपक रेडियोपर ब्राडकास्‍ट भेल। रेडियोक माघ्‍यम थिक घ्‍वनि। ऑंखिक अपेक्षा ओ कानक लेल अधिक रहैत अछि। अतएव ओहिमे एक्‍शनक अभाव रहैत अछि। ई अपन रेडियो रूपकमे घ्‍वन्‍यात्‍मक मूल्‍य पर अधिक घ्‍यान देलनि अछि। ई अपन रेडिया रूपक मे कार्य-व्‍यापरक एकाग्रता आ पात्रक चरित्राकंनपर अधिक बल देलनि अछि। हिनक प्रत्‍येक रेडियो रूपकक अन्‍त प्रभावशाली रूपमे भेल अछि। दृश्‍य-परिवर्तनक कलात्‍मक प्रयोग देखबामे अबैछ। विषय प्रधानात्‍मक प्रभाव हिनक रचना शिल्‍पपर पड़ल अछि। विषय प्रधानाताक प्रभाव हिनक रंग शिल्‍पर पड़ल अछि। ई हास्‍य-व्‍यंग्‍य प्रधान, गम्‍भीर, रोमांचक, दुखान्‍त आदि रेडियो रूपक लिखलनि। ओ श्रव्‍य-शिल्‍पपर विशेष घ्‍यान रखलनि अछि। नि:सारण : रेडियो रूपक संक्षिप्‍त नाट्य रूप थिक। रेडियो रूपक मैथिली एकांकी एक शाखाक रूपमे स्‍वतत्र रूपसँ विकसित भेल अछि। मायानन्‍द अपन रेडियो रूपकमे नैरेशनक प्रयोग कतहु नहि कयलनि अछि। ओ श्रव्‍य-शिल्‍प सम्‍बन्‍धी कुशलताक परिचय एहि विधामे देलनि अछि। सर्वत्र श्रोताक द़ृष्टिसँ एकरा आकर्षक बनयबाक प्रयत्‍न कयलनि अछि। हिनक एहि कृतिमे घ्‍वनि-प्रभाव आ संगीतक व्‍यवहार कलात्‍मक रूपमे भेल अछि। भाषाशैली सब रुपकक अपन-अपन अछि। वातावरणक प्रसंग पात्रक अनुरुप अछि जहिसँ नाटकीय दृष्टिसँ प्रभावशाली बनि गेल अछि। जतेक दूर धरि मायानन्‍दक रेडियो-रूपकक अछि ओ रेडियो रूपक-नाट्य-शिल्‍पक कसौटीपर अक्षरस: सटीक उतरैत अछि। हिनक रेडियो-रूपक मे कथानक-निर्माण, चरित्र-चित्रण,संवाद, उद्देश्‍य ,वातावरण,भाषा-शैली, रंग-शिल्‍प, घ्‍वनि-प्रयोग आदि दृष्टिएँ, कुशलतााएँ निर्वाह कयलनि अछि। हिनक रेडियो रूपक भावी-विकासक दिशा-निर्देशक’ सकैछ। रेडियो-रूपक मैथिली एकांकी शाखा रूपमे स्‍वतंत्र विधाक रूपमे विकसित भ’ रहल अछि। मैथिलीमे विभिन्‍न प्रकारक रेडियो रुपकक रचना निरन्‍तर भ’ रहल अछि। मायानन्‍द पाश्‍चात्‍य नाट्य-शिल्‍प आ नाट्य कृतिसँ धनिष्‍ठ रूपेँ सम्‍पर्कित भेलाह। रेडियो रूपक एक पैध सशक्‍त माघ्‍यम,एक जीवित रंगमंच प्रदान कयलक अछि। रेडियोक प्रचार-प्रसार अधिक भेलासँ अनेक व्‍यक्तिकेँ एहि रूपक रचना करबाक हेतु प्रेरित कयलक। मैथिली रेडियो-रूपक लिखनिहारकेँ भारतीय अन्‍य भाषा सदृश अद्यापि सौविघ्‍य नहि उपलब्‍ध छनि तथपि जे रहन रचना उपलब्‍ध भ’ रहल अछि ओहि आधारपर रेडियो नाट्य-शिल्‍पकेँ जतेक विकसित हैबाक चाही ओ नहि भ’ सकल अछि। रेडियो,नाट्य-लेखनक लेल रेडियोकेँ निकटसँ देखबाक-समझबाक प्रयोजन अछि। प्रतिभा आ माघ्‍यमक धनिष्‍ट परिचय रेडियो-नाट्य-लेखन हेतु अनिवार्य अछि। आकाशवाणी सरकारी नियंत्रण मे अछि आ प्रतिभा सम्‍पन्‍न साहित्‍यकार ओतय पहुँचि क’ अपन प्रतिभाक। समुचित उपयोग नहि क’ पबैत छथि, कारण ओहि ठामक यान्त्रिकतासँ बन्‍हा जाइत छथि। हुनकासँ भेट भेल छल विगत अनेक शताब्‍दीसँ मैथिली भाषा ओ साहित्‍यक सुदीर्ध एवं समृद्धशाली साहित्यिक परम्‍परा अविछिल-अक्षुण्‍ण रूपेँ चलि आबि रहल अछि; किन्‍तु बीसम शताब्‍दीकेँ जँ एकर साहित्यिक विकास-यात्राकेँ स्‍वार्णयुगक संज्ञासँ अभिहित कयल जातँ एहिमे एक नव मोड़ आयल जे पत्र-पत्रिकाक उदय भेलैक तथा ओकर प्रकाशनक शुभारम्‍भ भेलैक जकर फलस्‍वरूप गद्यक विकासमे एक नव गति आयला गद्यक विभिन्‍न रूप-विधानक प्रादुर्भाव पत्र-पत्रिकाक प्रकाशनसँ शुभारम्‍भ भेलैक। विगत शताब्‍दी प्रधानत: गद्य रूपमे ख्‍याति अर्जित कयलक आ औकार प्रयोगक विविध रूप-विधानक रूपमे पाठकक समक्ष प्रस्‍तुत भेल। संघर्षमय युगक जीवनमे गद्यक मर्यादा एहि रुपेँ सपायित क’ देलक जे ओ अभिव्‍यक्तिक असाधरण साधन बनि गेल आधुनिक मैथिलीगद्य गंगाकेँ सम्‍पोषित करबाक उद्देश्‍यसँ साहित्‍य-पुरोधा लोकनिक सत्‍प्रयासँ ओकार परिष्‍कार आ परिमार्जन भेलैकागत शताब्‍दीमे आत्‍म-कथा, आलोचना, उपन्‍यास, कथा, गाल्‍च, जीवनी, डायरी निबन्‍ध, संस्‍मरण, साक्षात्‍कार आदि अनेक साहित्यिक विधाक जन्‍म देलक आ साहि‍त्‍यमे एक नव-स्‍पन्‍दन भरबामे महत्‍वपूर्ण भूमिकाक निर्वाह कयलक। ई श्रेय वस्‍तुत: पत्रिकादिकेँ छैक जे आधुनिक गद्यक आविर्भाव एवं विकास-यात्राकेँ गतिशील करबामे तथा साहित्‍यक श्रीवृद्धिक सहयोगमे अपेक्षित घ्‍यान देलक एहि निमित साहित्‍य-सृजननिहार लोकनि नव-नव प्रवृतिक रचनाक दायित्‍वक भार वहन कयलनि आ सम्‍पादक लोकनि ओकरा यत्‍न पुरस्‍कार प्रकाशित कयलनि जकर फलस्‍वरूप मैथिली गद्यक प्रवर्द्धन भेलैक आ ओकरा विविध रूप-विधानमे विन्‍यस्‍त कयल जाय लागल।पत्रिकादिक माघ्‍यमे सेहो नव-नव रचनाकारकेँ प्रोत्‍साहन भेटलनि तथा हुनका सभक घ्‍यान ओहि विधा दिस आकर्षित भेलनि जकर एहि साहित्‍यान्‍तर्गत सर्वथा अभाव छलैक। एहिसँ अतिरिक्‍त विगेत शताब्‍दीमे साहित्‍यक विकास,यात्रा मे अनेक उल्‍लेख्‍य योग्‍य काज भेल जकर ऐतिहासिक महत्व छैक। रचनाकारक भाव-प्रवणता, हार्दिकता, कल्‍पनाशीलता एवं स्‍वच्‍छनद प्रवृत्तिक परिणाम स्‍वरूप मैथिली गद्य अपनाकेँ नव पल्‍लवसँ पल्‍लवित कयनक विगत शताब्‍दीमे एकर सर्वतोमुखी विकास भेलैक जाहि आधारपर एकरा गद्ययुग कहबा समीचीन होयत, कारण मैथिली गद्य-गंगा शत-शत धारामे प्रवाहित रोडत एकर साहित्य सागरकेँ भरलक आ पूर्ण कयलक। उपर्युक्‍त पृष्‍ठभूमिक परिप्रेक्ष्‍यमे विगत शताब्‍दीमे एक अद्वितीय प्रतिभा सम्‍पन्‍न तप: सपूत रचनाकारक प्रादुर्भाव भेल आ अप्रतिम प्रतिभाक बलपर साहित्‍यक अनेक विधाकेँ संस्‍करित कयल‍िन आ ओकरा मिथिलाञ्चलक अभिज्ञान द’ कए भारतीय साहित्‍यक समकक्ष स्‍थापित कयलनि जे’ रचनाक प्रत्‍येक क्षेत्र मे, सर्जनाक यावतो प्रस्‍थानमे ओ अपन कृतिमे ने केवल परवर्त्ती पीढीक हेतु; प्रत्‍युत्‍ा समकालीन रचनाकार लोकनिक हेतु सेहो शिखर पुरुष आ प्रेरक स्‍तम्‍भ बनिरुगेलाह ओ रहथि डा. वजकिशोरवर्मा मणितप (1918-1986)। हुनक प्रकाशित साहित्‍य वैविघ्‍य-पूर्ण अछि, कारण साहित्यिक अभिव्‍यक्तिक कोनो विधा नहि बॉंचल रहल जकर सहज प्रयोगमे ओ उल्‍लेख्‍य योग्‍य सफलता नहि प्राप्‍त कयलनि। हुनका द्वारा रचित साहित्‍यक प्रचूरता आ विचित्रता आछी, किन्‍तु ओहिमे सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण तथ्‍य थिक जे एहि परिमाण-प्राचूर्य मे हुनक अधिकांश साहित्यिक कृति अत्‍यंत उच्‍च कोटिक थिक। जहिना हिनक रचनाक विशदता पाठककेँ चकित आ विस्मित क’ रहल अछि तहिना हुनक व्‍यक्तिक आघ्‍यात्मिक रहयमयता सेहो अधिक जोड़े पकड़लक। हुनक अयन्‍तरिक शक्ति हुनका निरन्‍तर चिर-नूतन रचनाक हेतु उत्‍प्रेरित करैत रहलनि तथा विश्राम करबाक लेल पलखति नहि देलकि‍ण ओ जीवनक विविध पथक पथिक र‍ि‍हथ तथा विषाद आ करुणाक बीच सौन्‍दर्यक अन्‍नेषण करब हुनक लक्ष्‍य छलनि। हुनक मन आ मस्तिष्‍कक क्षितिज जाग्रत छलनि। ओ जीवन आ प्रकृति पक्षधर रहिथ। ओ एक दूरदर्शी साहित्‍य-मनीषी रहिथ जे मैथिलीमे जाहि विधाक अभाव हुनका परिलक्षित भेलनि तकर पूत्‍यर्थ मनसा-वाचा-कर्मणा ओहिमे लागि गेलाह: हिनका द्वारा प्रयुक्‍त विधाहि साहित्यिक विधे नहि रहल,प्रत्‍युत आकर्षक विधाक रूपमे ख्‍याति अर्जित कयलक। चिर नूतनताक अन्‍वेषी मणिपदम। मैथिली साहित्यमे संस्‍मरण साहित्‍यान्‍तर्गत चारि नव-विधाक प्रवर्त्तन कयलनि जकर सम्‍बन्‍ध् अतीतसँ अछि, यद्यपि संस्‍मरणक संसार विषयक दृष्टिएँ व्‍यापक नहि, तथापि संवेदनाक गाम्‍भीर्य आ आत्‍मीय-स्‍पर्शक दृष्टिएँ अत्‍यंत श्रेष्‍ठ कोटिक साहित्‍य-विधाक अन्‍तर्गत अबैछ। भारतीय भाषा आ साहित्‍यमे एहि विधाक जन्‍म पाश्‍चात्‍य साहित्यिक संग सम्‍पर्क फलस्‍वरूप प्रारम्‍भ भेल जे अधुनातन सन्‍दर्भमे एक चर्चित विधाक रूपमे प्रचलित भेल अछि। एहि विधामे ओ विपुल परिमाण मे साहित्‍य-सृजन कयलनि, किन्‍तु अत्‍यन्‍त दुर्भाग्‍यपूर्ण स्थिति अछि जे मैथिलीक तथाकथित इतिहाकार लोकनिक ध्‍यान एहि दिस नहि गेलनि आ ओकर चर्चा पर्यन्‍त नहि कयलनि। भारतीय साहित्‍य निर्माता सिरीजक अन्‍तर्गत साहित्‍य अकादेमीसँ हिनकापर मणि पद्म (1996)नामे एक मोनोग्राफ प्रकाशित भेल अछि जे अत्‍यंत उपहासात्‍मक अछि। ओकर लेखक एहि सीरिजक रचनाकेँ बिनु पढ़नहि उपेन्‍द्र महारथीक संस्‍मरणकेँ रामलोचनशरणक नामोल्‍लेख कयलनि अछि। इएह तँ मैथिलीक लेखकक स्थिति अछि। भारतीय स्‍वतंत्रता-संग्रामक इतिहासमे सन् उन्‍नीस सौ बियालिसक अगस्‍त क्रान्तिक ऐतिहासिक दृष्टिएँ अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण स्‍थान अछि। एहि महाक्रान्तिमे बूढ-बूढानुस नेतासँ ल’ कए जुआन-जहानक रक्‍त बेसी गर्म छलैक आ अंग्रेजी शासन-व्‍यवस्‍थाक विरूद्ध ओकारा लोकनिक स्‍वर अधिक मुखर भेल छलैक। उत्तरविहार आ मिथिलाञ्चलक नवयुवक लोकनि एहि महायज्ञमे अपन प्राणक आहूति देलनि आ रक्‍तसँ तर्पण कयलनि। मणिपदम स्‍वयं सजग, सचेष्‍ट आ निर्भीक स्‍वतंत्रता सेनानी रहथि। एहि परिप्रेक्ष्‍यमे ओ मैथिली-संस्‍मरण प्रथमे-प्रथम डायरी शैलीक प्रवर्त्तन कयलनि अवश्‍य, किन्‍तु एकरा अतंर्गत ओ प्रचुर परिमाणमे रचना नहि क’ पौलनि बा कथनहु होयताह तँ ओ ने तँ प्रकाशित अछि आ आब अनुपलब्‍ध अछि।जँ कदाचित एहि विधामे प्रचुर परिमाणमे डायरी लिखने तिथि तँ ओ निश्‍चये मैथिली साहित्‍यक अभूतपूर्व कृति होइत। एहि सिरीजक अन्‍तर्गत हुनक बियालसीक फरारी सात दिन (मिथिला मिहिर, 5 दिसम्‍बर 1953 ) एवं फरारीक पॉंच दिन (मिथिली मिहिर 31 दिसम्‍बर 1961) प्रकाशित अछि जाहिसँ स्‍वतंत्रता आंदोलनक क्रममे ओ डायरी लिखलनि तकर दारूण पीड़ा दायक वर्णन कयलनि। एहिमे रचनाकार सद्य: स्‍फुटन भाव वा विचारकेँ अभिव्‍यक्ति देलनि वा अपन अनुभवक रेखाकंन वा विगत अनुभवक पुनार्मूल्‍यांकन कयलनि। एहिमे बियालसीक महाक्रान्तिमे फरारीक स्थितिमे परिस्थितिक चित्रण जाहि कयलनि जे नेपाल ओराइक जनजीवनपर प्रकाश देलनि। अपन दीर्घ सार्वजनिक जीवन मे ओ देशक राजनैतिक, साहित्यिक, सामाजिक आ सरकारीतंत्रमे कार्यरत व्‍यक्तिक सम्‍पर्कमे अयलाह, ओहि स्‍मृतिकणकेँ जोडि क’ हुनकासँ भेट भेल छल सन् 1953 ई. सँ लिखब प्रारम्‍भ् कयलनि जकर समापन 1986 ई. धिर अनवरत चलैत रहलनि जकरा एहि सिरीजक अन्‍तर्गत अभिव्‍यक्ति देलनि। हिनक उपर्युक्‍त संस्‍मरण मात्र लेखकीय मनीषापर नहि आधृत अछि, प्रत्‍युत प्रकृति-प्रेम, ईश्‍वर –प्रेम, स्‍वजातिप्रेम, महतक प्रति श्रद्धा, विनोदप्रियता आदिक समस्‍त वैशिष्‍ट्यक झलक एहिमे भेटैछ। ओ अपन दीर्घ साहित्यिक जीवनान्‍तर्गत जाहि-जाहि मातृभाषानुरागी आ साहित्‍यानुरागी साधक लाकनिक सम्‍पर्कमे अयलाह ओकरा संगहि अन्‍यान्‍य भाषानुरागी विद्वत् वर्गसँ अभिभूत भेलाह, जाहि रूपेँ हृदयंगम कयलनि, जाहि रूपेँ प्रभावित भेलाहि तनिके ओ श्रंृखलाक कडी़क आधार बनौलनि। हिनक संस्‍मरणात्‍मक आलेख यदययपि विवरणात्‍मक अछि तथ्‍ािप ओ सत्‍य घटनापर आधृत संगहि वर्णित व्‍यक्तिक मातृभाषानुराग आ साहित्यिक आन्‍दोलन परिचायक सेहो अछि। एहि सिरीजक अन्‍तर्गत प्रकाशित संस्‍मरण जीवनक एक पक्ष केँ उदघटित करैत अछि जे व्‍यक्ति अपन कियाकलापसँ आकर्षित कयलथिन तनिकेपर ओ लिखलनि। एकरा अन्‍तर्गत वर्णित व्‍यक्तिक व्‍यक्तित्‍व ओही वैशिष्‍ट्य तथा स्थितिकेँ जनमानासक समक्ष प्रस्‍तुत कयलनि जाहिसँ हिनक संस्‍मरण वास्‍तविक घटित घटनाक सन्निकट आ सम्‍भव भ’ सकल। ओ स्‍पष्‍ट रूपेँ अपन यथार्थ प्रतिक्रिया वर्णित व्‍यक्तिपर व्‍यक्‍त कयलनि जकर वर्त्तमान परिप्रेक्ष्‍यमे ऐतिहासिक महत्‍व भ’ गेल अछि। एहि श्रंृखलाक अन्‍तर्गत मैथिला भाषा आ साहि‍त्‍यक निम्‍नस्‍थ व्‍यक्तित्‍वक संग हुनका साक्षात्‍कार भेलनि तथा अमिट छाप छोड़लथिन यथा सीतारामझा (1891-1975) (मिथिलामिहिर, 26 दिसम्‍बर 1953), वैद्यनाथ मिश्र यात्री (1911-क1998) (मिथिलामिहिर, 26 दिसम्‍बर 1953), काव्‍चीनाथ झा किरण (1906-1989) (मिथिलामिहिर, 23 जनवरी 1954), चन्‍द्रनाथ मिश्र अमर (1925) (मिथिलामिहिर, 30जनवरी=1954), हरिमो‍हन झा (1908-1984), (मिथिलामिहिर, 13=मार्च=1954), कुलानन्‍द=नन्‍दन (1908-1980) (मिथिलामिहिर, 27= मार्च= =1954), सुधांशु= शेखर=चौधरी (1920-1990) (मिथिलामिहिर, 30=अपैल =1952), सोमदेव (1934) (10=अप्रैल1952), सुरेन्‍द्र झा सुमन (1910-2002)(मिथिलामिहिर,=17=अपैल1954),नरेन्‍द्रनाथदास(1904-1993) (मिथिालामिहिर 8 मई 1954), मायानन्‍द मिश्र (1) 1934 (मिथिलामिहिर,8 मई 1951)। भोलालाल दास (1894-1977) (मिथिलामिहिर, 15 मई 1954), लक्ष्‍मण झा (1916-2002) (मिथिलामिहिर, 22 मई 1954), गिरीन्‍द्रमोहनमिश्र (1890-1983) (मिथिलामिहिर, 14 अगस्‍त 1954), जगदीशवरी प्रसाद ओझा (?) (मिथिलामिहिर, 28=अगस्‍त,=1954)उमेश मिश्र(1895-1967) मिथिलामिहिर, 4सितम्‍बर, 1954) अमरनाथ झा (1897-1955) (मिथिला=मिहिर,=11= सितम्‍बर,=1954), सोमनसदाइ (?) (मिथिलामिहिर, 25 सितम्‍बर, 1954), नइँ बिसरब (मिथिला दर्शन, जनवरी 1954), नइँ बिसरब (मिथिला दर्शन, जनवरी 1954क), नंग्‍टू सॉंढ (मिथिलादर्शन, अगस्‍त 1960), कमला, यमुना आ गंगा (मिथिलादर्शन, जुलाई 1961), तीन गोट संस्‍मरण (वैदही, जुलाई-अगस्‍त 1961), सामा चकेबा (वैदेही, सितम्‍बर 1961), गोदपाडिनी नट्टिन (मिथिलामिहिर, 21 अप्रैल 1963), ई आषाढक प्रथम दिन (मिथिलामिहिर, 16 जून 1963) थानेदार (मिथिलामिहिर, 17 नवम्‍बर, 1963), राजकमल चौधरी (1929-1967) (मिथिलामिहिर, 30 जुलाई 1967), मिहिरोदय (मिथिलामिहिर, 1 मार्च 1970), रामकृष्‍ण झा किसुन (1923-1970), (मिथिलामिहिर, 2 अगस्‍त 1970), रमानथझा (1906-1971) (मिथिलामिहिर, 16 जनवरी, 1972), हजारीप्रसाद द्विवेदी (1907-1979) (मिथिलामिहिर, 27 मार्च 1973), बदरीनाथ झा (1893-1974) (मिथिला मिहिर, 30 सितम्‍बर 1973), ललितानारायण मिश्र (1922-1975) (मिथिलामिहिर, 19 जनवरी 1975), बलदेवमिश्र (1880-1979) (मिथिलामिहिर, 3 फरवरी 1975), विशालकाय महिला (?) (मिथिलामिहिर 2 नवम्‍बर 1975) राजाबहादुर विश्‍वेश्‍वर सिंह (1908-19) (मिथिला मिहिर, 25 अप्रैर 1975), पिताश्री चल गेलाह (मिथिलामिहिर, 3 अक्‍तूबर, 1976), राजेश्‍वर झा (1922-1977) (मिथिलामिहिर, मिथिलामिहिर 14 अक्‍तूबर 1979 3 जुलाई, 1977), लक्ष्‍मीपति सिंह (1907-1979) (मिथिलामिहिर, 25 मार्च 1979), जयप्रकाश नारायण(1902-1939) उपेन्‍द्र ठाकुर मोहन (1916-1980) (मिथिलामिहिर, 8 जून, 1980), चिरवत्‍सले (मिथिलामिहिर, 7 दिसम्‍बर 1980), उपेन्‍द्र महारथी (मृत्‍य 1981) (मिथिलामिहिर,=1=मार्च,=1981), योगेन्‍द्र मलिलक (?), (कर्णामृत, सितम्‍बर 1981), धर्मलाल सिंह (?) (मिथिलामिहिर, 29 नवम्‍बर 1981) सुभद्राझा (1911-82) (मिथिलामिहिर, 24 अक्‍तूबर 1982) राधाकृष्‍ण चौधरी (1924-1984) इत्‍यादि। कविवर सीतारामझा, बाबू भोलालाल दास एवं राधाकृष्‍ण चौधरी दुइ संस्‍मरण अपलब्‍ध होइछ जे एक तँ जीवितावस्‍था थिक आ दोसर मृत्‍यूरान्‍त जे क्रमश: मिथिलामिहिर, 20 जुलाई 1975, मिथिलामिहिर, 19 जून 1977 एवं कर्णामृत, जनवरी-मार्च 1986 मे प्रकाशित भेल। उपर्युक्‍त संस्‍मणान्‍तर्गत ओ हुनक जीवन वृतक इतिहासे नहि प्रस्‍तुत कयलनि; प्रत्‍युत हुनक साहित्यिक अभिरुचि एवं अवदानक संगहि-संग संगठनात्‍मक प्रवृत्तिक लेखा-जोखा प्रस्‍तुत कयलनि अछि जे मातृभाषाक विकासमे उल्‍लेख्‍य योग्‍य अवदानक कारणेँ चर्चित अछि। हुनकासँ भेट भेल छलक परिधि मात्र मैथिलीसाहित्‍य मनीषी लोकनि धरि सीमित नहि हरल, प्रत्‍युत ओकर फलक विस्‍तृत छल तकर प्रारूप भेटछै जे विरयक प्रख्‍यात भाषा शास्‍त्री विद्वत् वरेण्‍य सुनीतिकुमार चटर्जी, हिन्‍दीक प्रख्‍यात मनीषी आचार्य हजारी प्रसाद् द्विवेदी, महान राजनेता जयप्रकाश नारायण, मिथिलाक प्रख्‍यात चित्रकार उपेन्‍द्र महारथी, मिथिलाक यशस्‍वी राजनेता ललितनारायण मिश्र एवं महान् लक्षमीवान राजा बहादुर चिश्‍वेश्‍वर सिंह इत्‍यादि व्‍यक्तिक प्रसंगमे अपन निजी धारणाकेँ रूपाायित कयलनि। त्राहसॅं अतिरिक्‍त अपन पूज्‍य हपिताश्री आ पूज्‍याए माश्री सेहो संस्‍मरणक रचना कयलनि। एहि सिरीजक अन्‍तर्गत समाजक उपेक्षित आ तिरस्‍कृत वर्गक प्रति हुनकर हदयमे असीम श्रद्धा, अगाध प्रेम आ अपार सहानुभूति छलनि तकर यथार्थताक प्रतिरूप भेटैछ सोमन सदाय, गोदपाडि़़नी नट्टिन एवं नगटू सॉंढ मे जाहिमे ओकर वास्‍तविक पृष्‍ठभूमिक रेखाकंन कयलनि। सरकारी तन्‍त्रक परिवेश मे भ्रष्‍टाचारी थानेदारक संग कोन स्थितिमे साक्षात्‍कार भेलनि तकर यथार्थ क्रिया-कलाप दिस हुनक घ्‍यान केन्द्रित भेलनि तकरो एहि सिरीजमे समाहित कयलनि। व्‍यवसायसँ ओ होमिपैथ र‍हथि। ओ एक विशालकाय पहाडी रोगिकीक प्रसंगमे सेहो लिखलनि जे हुनकासँ इलाज कराबय आल छलीह। हुनकासँ भेट भेल छलक अन्‍तर्गत ओ स्‍मृतिकण आ साहित्यिक रिक्‍तताक जीवन परिचय, विचार-धारा, साहित्यिक प्रवृत्ति आ सामाजिक गतिविधिक परिचय प्रस्‍तुत कयलनि। एहि संस्‍मरणात्‍मक निबन्‍धमे ओ ने केवल प्राचीन परिपटीक परित्‍याग कयलनि, प्रत्‍युत नवजीवन दृष्टि आ नव पद्धतिक श्रीगणेश कयलनि। एहन अनुभूति परक कृति सभमे ओ अपन अतीतक ओहि प्रसंगक उद्भावना कयलनि जे हुनक साहित्यिक व्‍यक्तित्‍वक नियामक सिद्ध भेल। एहि सिरीजमे जतबे संस्‍मरण उपलब्‍ध अछि ततबे ओ तद्युगीन साहित्यिक गतिविधिक दस्‍तावेज थिक जे मैथिली साहित्‍येतिहासमे अंह भूमिकाक निर्वाह करैछ। भावनात्‍मक आ वैयक्तिताक संगहि-वैचारिकताक अद्भूत समन्‍वय एहिमे भेल अछि। सैद्धाान्तिक दृष्टिाएँ, हुनक संस्‍मरण-साहित्‍य साहित्यिक संस्‍मरणक विशिष्‍ट गुणसँ अलंकृत आ महत्‍वपूर्ण अछि। एहिमे कथात्‍मकताक दृष्टिएँ कथा, वैचारिकताक दृष्टिएँ निबन्‍ध आ भावनात्‍मकताक दृष्टिएँ कविता, एहि तीनू विधाक त्रिवेणीक अभूत पूर्व संगम भेल अछि। हिनक संस्‍मरणमे अनुभूति, वर्णन, विवरण, विचार, भाव, यथार्थ आ कल्‍पनाक अद्भभूत समन्‍वय भेल अछि। हिनक संस्‍मरणात्‍मक निबंधक मूलाधार थिक भावना जे काव्‍यात्‍मकताक गुणसँ अंलकृत अछि। एहि सिरीक संस्‍मरणक अनुशीलनसँ अवबोध होइछ जे हिनका भारतीय साहित्‍यक संगहि-संग पाश्‍चात्‍य साहित्‍यक सेहो गहन अघ्‍ययन छलनि। एहि वास्‍तविकताक परिचय हुनक उपर्युक्‍त संस्‍मरणान्‍तर्गत डेग-डेगपर उपलब्‍ध होइछ। ओ अपन एहि रचनान्‍तर्गत एहन वातावरणक निर्माण कयलनि जाहिसँ पाश्‍चात्‍य साहित्‍यचिन्‍तक लोकनिक विश्‍व प्रसिद्ध रचना सभक सेहो विवरण प्रस्‍तुत करबामे कनियो कुंठित नहि भेलाह जे ओहि अवसरक हेतु उपयुक्‍त छल। एहिमे गांधीवादक संगहि-संग मार्क्‍सवादक छौंक स्‍थल-स्‍थलपर भेटैछ। हुनकासँ भेट भेल छल मे तीव मानवीय संवेदना, व्‍यापक सहानुभूति, सजल करुणा, ममता आ आत्‍मीयता अछि जे अन्‍यत्र दुर्लभ अछि। एहिमे नोर आ तीव आवेगक गम्‍भीर चित्र तथा सामाजिक, राजनीतिक विचार-धाराक स्‍पष्‍ट छाप फराकाि‍हसँ चिन्‍हल जा सकैछ। एहिमे साहित्‍यकार, शिक्षाविद्, विद्वत वर्गसँ सम्‍बन्धित व्‍यक्तिक संग साक्षात्‍कार अछि जे वर्त्तमान परिवेशमे अतिशय ज्ञानवर्द्धक आ ऐतिहासिक पृष्‍ठभूमिक निर्माण करैछ। मरिणप एक पैघ यायावर र‍हथि। साहित्यिक यायावरकेँ एक अदभुत आकर्षण अपाना दिस आकर्षित करैछ, ओ मन्‍त्र मुग्‍ध भ’ कए ओहि दिस आकर्षित भ’ जाइछ। एहन साहित्‍य सर्जनमे ओ संवेदनशील भ’ कए निरपेक्ष रहथि। यायावरीक क्रममे हुनकर रस्‍तामे पड़निहार मन्दिर, मसजिद, मीनार, विजय स्‍तम्‍भ, खण्‍डहर, स्‍मारक, किला, कब्रिस्‍तान आ प्राचीन महलक संस्‍कृति, कला आ इतिहासकेँ एकत्रित क’ कए अपन यात्राक पृष्‍ठभूमि तैयार कयलनि। हिनक उपलब्‍ध यात्रा-साहित्‍य संस्‍मणात्‍मक थिक जाहिमे ओ एक सामान्‍य यात्री जकॉं अपन प्रभाव, प्रतिक्रिया आ संवेदनाकेँ महत्‍व देलनि। एहि सभ केँ ओ ओहिसम गेल छलहुँ नामे यात्रा वृतान्‍त प्रस्‍तुत कयलनि जकरा अन्‍तर्गत कोइहॉंस गढक सॉंझ (मिथिला-मिहिर, 21 अप्रैरल 1963), ई आषाढक प्रथमदिन (मिथिलारमिहिर, 16 जून, 1963) पुण्‍यभूमि सदिसवपाही (मिथिला मिहिर, 14 मार्च, 1968), कुलदेवी विश्‍वेश्‍वरी (मिथिलामिहिर, 11 अगस्‍त, 1968), त्रिशूलातट प्रवास (मिथिला मिहिर, 12 जनवरी, 1969 ), एकटा पावन प्रतिष्‍ठान (मिथिला मिहिर, 10 अक्‍तूबर, 1971), प्रसंग एकटा स्‍मारकक (मिथिलामिहिर, 10 अप्रैरल, 1975), महिषीक साधना केन्‍द्र (मिथिलामिहिर, 29 जून, 1975) एवं विसफीसँ वनगाम धरि (मिथिलामिहिर, 25 दिसम्‍बर 1983) आदि उल्‍लेखनीय अछि। ओहिठाम गेल छलहुँ मे ओ साहित्‍यक समग्र जीवनक अभिव्‍यक्ति रूपमे ग्रहण कयलनि। हिनका लेल प्रकृति सजीव अछि, यात्रामे जे पात्र भेटलथिन ओ हुनक आत्‍मीय आ स्‍वजन बनि गेलथिन। हिनक यात्राा साहित्‍य महाकाव्‍य आ उपन्‍यासक विराटत्‍व, कलाक आकर्षण, गीतकाव्‍यक मोहक भावशीलता, संस्‍मरणक आत्‍मीयता, निबन्‍धक मुक्ति सभ किछु आनायासहि भेटि जाइत अछि। ओ जे देखलनि, अनुभव कयलनि तकर यथार्थ चित्र एहिमे प्रस्‍तुत कयलनि। एकर सर्वोपरि वैशिष्‍ट थिक-औत्‍सुक्‍य जे पाठक एकबेर पढब प्रारम्‍भ करैछ तँ ओकर समप्ति जा धरि नहि भ’ जाइछ ता धरि हुनका चैन नहि होइत छनि। हुनका भूगोलक विशद ज्ञान छलनि तेँ कोनो स्‍थानक भौगोलिक वर्णन करबामे ओ निपुणता देखौलनि जकर यथार्थ परिचय एहिमे उपलब्ध करौलनि।एहि श्रृंखलान्‍तर्गत जे रचनादि उपलब्‍ध अछि ओकार चिन्‍तर-मननसँ स्‍पष्‍ट प्रतिभाषित होइत अछि जे वर्णित विषयक फिल्‍माकंन क’ कए पाठकक समक्ष प्रस्‍तुत कयलनि जे पाठकक समक्ष वर्णित विषय-वस्‍तुक समग्र चित्र सोझॉं आबि जाछि। हिनक यात्रा-वृतान्‍त शैलीपर औपन्‍यासिक शैलीक प्रभाव परिलक्षित होइत अछि जे ओहिमे स्‍थान विशेषक विस्‍तृत-चित्रण कयलनि जहिना ओ देखलनि तहिना तकर यथार्थ चित्रण पाठकक समक्ष प्रस्‍तुत कयलनि। पाठककेँ सहसा होमय लगैत छनि जेना ओहो ओहि यात्रााक सहयात्री होथि। हिनक वर्णन-कौशल चित्रात्‍मक होइत छलनि। एहन चित्रात्‍मक वर्णन निश्‍चये अप्रतिभ प्रतिभाक परिचायक थिक जे सामान्‍य रचनाकार द्वारा सम्‍भव नहि। ओ जाहि वस्‍तुक वर्णन कयलनि तकर रनिंग कमेन्‍ट्री ओहिना प्रस्‍तुत कयलनि जेना। काल्हि क्रिकेट खेलक मैदानसँ रेडियो वा रलिभीजनपर देल जाइह। यात्रा-विवरण मे रोचकता अपरिहार्य गुण मानल जाइछ, तकर सम्‍यक निर्वाह हिनक ओहि ठाम गेल छलहुँ मे भेल अछि। ओ अत्‍यन्‍त भावुक हृदयक व्‍यक्ति रहथि तेँ बिनु कोनो राग-द्वेषक ओकर यथार्थ वर्णन कयलनि। अपनाकेँ सत्‍य आ ज्ञाानक भण्‍डार नहि बुझि क’ नहि तथा पाठककेँ शिक्षित करबाक मनसा हुनकर कदापि नहि छलनि, जेना ओ पञ्चभूतसँ भिन्‍न-भिन्‍न चरितक सहायतासँ, भिन्‍न-‘भिन्‍न दृष्टिकोण उपस्थित कयलनि जाहि प्रकारेँ ओहिठाम गेल छलहुँ मे जेना ओ अपनहि संग तर्क करैत यात्राक समान कयलनि। एहि श्रृंखलान्‍तर्गतक रचनामे ओ जे किछु मैथिली पाठक केँ द’ पौलनि. ओ सभ हुनक आत्‍मपरीक्षणक स्‍वगत कथन थिक। मैथिलीक प्राचीन पत्रिकादिक अनुखीलनसँ ज्ञात होइछ जे हुनकर प्रबल इच्‍छा शक्ति छलनिछ ओ अपन व्‍यक्तिगत एवं साहित्यिक जीवनक आधारपर आत्‍मकथाक एक विस्‍तृत पुस्‍तकक रचना करथि तकर प्रतिमान उपलब्‍ध होइछ सांस्‍कृतिक समिति मधेपुर, मधुबनी द्वारा प्रकाशित स्‍मृति नामक स्‍मारिका तथा मैथिली प्रकाश- मे प्रकाशित बाटे-घाटे (1983) एवं अनजान क्षितिज (1983) मे। बाटे-घाटे पहिने प्रकाशित भेल स्‍मृतिमे जे पश्‍चात् जा क’ मैथिली प्रकाश मे पुन: प्रकाशित भेल। एहि दुनू आलेखसँ ई विषय स्‍पष्‍ट होइछ। वस्‍तुत: ओ आत्‍मकथा लिखलनि वा नहि से अनुसन्‍धेय अहि। मणिपद्यकेँ भाषापर जबरदस्‍त अधिकार छलनि। हुनक भाषाक चमक कहियो फिक्‍का नहि पड़लनि। अपन विलक्षण भाषाक कारणेँ ओ मैथिलीमे अनुपम उदाहरण रहथि। मैथिलीमे ओ अपन भाषा आ वर्णन-कौशल कारणेँ प्रख्‍यात र‍हथि। चाहे ओ प्रकृतिक दृश्‍य होव महानगरक कोलाहन पूर्ण वातावरण हो,ओ ओकर अत्‍यंत मनोहारी वर्णन अपन भाषाक बलपर कयलनि। हुनक डायरी, हुनकाएँ भेट भेल छल, ओहिठाम गेल छटैहुँ एवं आत्‍मकथा सभक भाषा-शैली अलंकृत अहि जाहिमे कतहु अस्वाभाविकताक आभास नहि भहैछ ।विस्‍ब-धार्मियता हुनक भाषाक सर्वाधिक वैशिष्‍ट्य थिक। एहन भाषामे संगीतात्‍मकताक लय आ धारा-प्रवाह अछि। भाषाक धनी मणिपद्य अपन विचार-वल्‍लरीक प्रत्‍याख्‍यान मे शब्‍दक एहन अनुपम विन्‍सास कयलनि जे हुनक भाषा मे द्वन्‍द्व रूप आ सुस्‍वादता अछि जे पाठकक संग हुनक व्‍यवहार. सौजन्‍य, आसाक्ति आ हास्‍य-व्‍यंग्‍यक बोध होइछ आ जगक संग ओकर व्‍यवहारमे राग ओ दूरदर्शी काल्‍पनिकताक पुट भेटैह। ओ तथ्‍यपूर्ण भाषाक प्रयोग कयलनि। उपर्युक्‍त रचनादिमे भाषा-काव्‍यमयी अछि जे स्‍थल-स्‍थलपर ओ अनुप्रास, उपमा, उत्‍प्रेक्षा आ रूपकक झड़‍ी लगा देलनि जे हिनक एहि साहित्‍यक अनुपम उपलब्धि थिक। हिनक भाषा मिथिलाञ्चलक लोक माटिक भाषा थिका हिनक भाषापर हिनक व्‍यक्तित्‍वक एतेक गम्‍भीर छाप छलनि जे सुगमतापूर्वक चिन्‍हल जा सकैछ। हिनक भाषामे एहन अद्भूत शक्ति सम्‍पन्‍न आ वैभव पूर्ण अछि जाहि कारणेँ हिनक रचना सभकेँ बारम्‍बार पढ़बाक उत्‍सुकता पाठकक मनमे सतत जागृत होइत रहैछ छाहे उपन्‍यास हो, कथा हो, नाटक हो, एकांकी हो, संस्‍मरण हो, यात्रा-वृतान्‍त हो, डायरी हो वा आत्‍म-कथा हो। एहिमे साधु भाषाक संगहि-संग ठेंठ चलन्‍त भाषाक स्रोतस्विनी प्रवाहित कयलनि। लोक-प्रचलित शब्‍दाबलीकेँ ओ मने-मन स्‍वीकार क’ लेने र‍हथि जकर यथार्थ प्रतिरूप हुनक समग्र साहित्‍यान्‍तर्गत प्रतिध्‍वनित होइत अछि। शास्‍त्रीय-भाषाक संगहि-संग ओ आंचलिक भाषाक अनु‍च्छिष्‍ट उपमाक प्रयोग प्रचुर परिमाणमे कयलनि। जनिका मिथिलांचलक ग्राम्‍य-शब्‍दाब्लीक उपमानक रसास्‍वान करबाक होइन ओ मणिपद्य-साहित्‍यक अवगाहण करथु जाहिमे हुनका एहन-एहन शब्‍दावलीक संग साक्षात्‍कार होयतनि तकर यथार्थ अर्थ-बोधमे अवश्‍य कठिनता होयतनि। अन्‍यान्‍य भारतीय भाषामे हिनक रचनादिक अनुवाद करबा काल कतिपय समस्‍या उत्‍पन्‍न होइछ जे ओकर समानार्थी शब्‍द सुगमतापूर्वक नहि उपलब्‍ध होइछ जाहि सन्‍दर्भमे ओ प्रयोग कयलनि। विषयगत विविधताक अनुरूप हिनक भाषा-शैली विविध रूपा थिक। संस्‍कृत गार्भित मिश्रित भाषा, काव्‍यात्‍मक आ भाव बहुल भाषा, सामान्‍य लोकक भाषाक संगहि-संग ओ आलंकारिक भाषाक के प्रयोग कयलनि। एहि श्रृंखलान्‍तर्गत रचनादिमे मिथिलाञ्चलक माटिपानिक अपूर्व सौष्‍ठव अछि। ई अत्‍यन्‍त छोट-छोट वाक्‍यक प्रयोग कयलनि जाहिसँ भाषासँ चमत्‍कार आबि गेल अछि। एहि रचना-समूहमे संलाप-शैलीक प्रयोग ओ कयलनि। काव्‍यक समानहि हिनक गद्यक भाषा-शैली सेहो अत्‍यन्‍त सरल, प्रवाह पूर्ण आ माघुर्य युक्‍त अछि। भाव, भाषा आ संगीतक त्रिवेणीक संगम बना क’ ओ गद्यक निर्माण कयलनि। हुनक शब्‍द-चयन अत्‍यन्‍त शिष्‍ट, भावानुकूल तथा सरल वाक्‍य-विन्‍यास अत्‍यन्‍त सुदृढ अछि। हुनक गद्य-भाषा मे सर्वत्र कविताक सरसता, तल्‍लीनता, तन्‍मयता आ तीवता अछि। फलत: पाठक कखनो कोनो स्‍थलपर अरुचिकर नहि अनुभव नहि करैछ, प्रत्‍युत कलाकारक भावक संग बहैत चल जाइत अछि। ओ भाव-प्रवण रचनाकार र‍हथि। अतएंव जाहि स्‍थलपर मार्मिक अनुभूति आ विलक्षण काल्‍पनिकताक समन्‍वय अछि ओतय भाषाक सौन्‍दर्य प्रेक्षणीय अछि। अपन भावुक अभिव्‍यक्तिमे ओ अत्‍यंत आलंकारिक एवं व्‍यंजनापूर्ण शैलीक प्रयोग कयलनि। हुनक शैलीमे कल्‍पनाक प्रौढ़ता, भावुकता, सजीवता आ भाषाक चमत्‍कार दर्शनीय अछि। हुनक भाषा-शैलीमे स्‍पोनन्‍द अछि, दृश्‍यकेँ मथबाक शक्ति अछि, सुकुमारता आ तरलता अछि जे मैथिलीमे अन्‍यत्र दुर्लभ अछि। मणिपद्य गद्यक उदत्तत रूप उपलब्‍ध होइछ हुनक डायरी, हुनकासँ भेट भेल छल, ओहि ठास गेल छलहुँ आ आत्‍मकथामे। ओ गद्यरचना कयलनि कविक समान, हुनक कविताक गुण थिक। एहि सिरीजक गद्य तकर प्रतिमान प्रस्‍तुत करैछ जे ओहिमे शब्‍दालंकारक संगहि अर्था लंकारक अपूर्व चमत्‍कार भेटैछ। हुनक गद्य-साहित्‍य वा पद्य-साहित्‍य हुनक व्‍यक्तित्‍वक अखण्‍डता केँ प्रमाणित करैछ। जहिना रिमतफान मलर्गछक पोलरीक गद्यक समानहि सांकेतिक होइत छलनि तहिना हिनक गद्य-साहित्‍य विषयोविशुद्ध आ भार रहित अछि। ओ अपन डायरी, संस्‍मरण,यात्रा वृतान्‍त आ आत्‍मकथामे एकरे आधार बनैलनि आ अपन भावनाक, अपन कल्‍पनाक, अपन मूल्‍यबोध आ मत पक्षक विस्‍तार कयलनि एहि सिरीजक गद्य-रचना एक रम्‍य रचनाक प्रतिभान प्रस्‍तुत करैछ। स्‍वातन्‍त्तायोतर मैथिली गद्य-साहित्‍यमे हिनक प्रवेश एक महत्‍वपूर्ण ऐतिहासिक घटना थिक जे ओ स्‍वातन्तयोत्तर गद्य-साहित्‍यक स्रष्‍टाक रूपमे ख्‍याति अर्जित कयलनि। गद्यक स्‍वरूप जाहि रूपेँ विवर्तित आ रूपान्‍तरित भेल जा रहल अछि तथा आधुनिक गद्य कहबासँ जकर बोध होइत अहि तकर साक्ष्‍य, प्रमाण आ उदाहरणक भण्‍डार थिक हिनक गद्य-साहित्‍य। हिनक गद्यमे साधु-भाषाओं चलन्‍त-भाषा, धरौआ, गोष्‍ठी ओ दरबारी रीतिक प्राचीन, आधुनिक आ आधुनातन शैली हुनक अक्षय गद्य-साहित्‍य एकर साक्ष्‍य थिक जकरा हम गद्यक अणु-विश्‍व कही तँ कोनो अत्‍युक्ति नहि हैत। हिनक गद्यमे सब किछु अछि भारी, हल्‍लुक, गम्‍भीर, चपल, तत्‍सम, तद्भव, देशज, विदेशज, समतल, उबड-खाबड, अत्‍युक्ति, वक्रोक्ति, स्‍वाभावोक्ति तथा ओहिसँ मिलल-जुलल राग-रागिणी अछि। सात्विक मिताचारक सन्निकट, ऐश्‍वर्यक आत्‍मविकिरण हिनक गद्यक सर्वोपरि उपलब्धि थिक। जीवन स्‍मृति, परिमि, यथोचित ओ स्‍वतन्‍त्र थिक हिनक गद्य। हिनक गद्यक अघ्‍ययनसँ मैथिली गद्य-धाराकेँ जानल जा सकैछ, जे ऐतिहासिक त अन्‍यान्‍य कारणेँ अन्‍य कोनो मैथिली गद्यकारक प्रसंगमे नहि कहल जा सकैछ। हिनक गद्यमे पद्य-छन्‍दक वाणी अनगुन्जित भ’ रहल अछि। हिनक वाक्‍य ऋजु अछि, शिक्षित सैन्‍य-दलक समान ओ कालवट्ट चरण मिला क’ चलैछ, आेकर श्रृंखला आ धाराहिकता युक्ति निर्भर अछि जे एक अभिप्रायक क्षमतासँ सम्‍बद्ध अछि। हिनक गद्यक कल्‍प वा यूनिट वाक्‍य नहि अनुच्‍छेद थिक। यदघपि हिनक गद्य महाकविक गद्य थिक तथापि ओ पद्य-गन्‍धी नहि। हिनक गद्य साहित्‍य अप्रतिभ प्रतिभाक हस्‍ताक्षर थिक जे बेगवान आ दीप्तिपूर्ण अछि। जे क्‍यो पाठक हुनक समग्र गद्य-साहित्‍यकेँ घ्‍यानसँ पढ़ने होयताह हुनक निश्चित धारणा होयतनि जे गद्य-शिल्‍पमे ओ मैथिलीक सर्वश्रेष्‍ठ-पुरुष र‍हथि तथा हुनक समकालीन गद्य-साहित्‍य अत्‍युच्‍च अछि। विशेषत: हुनक संस्‍मरणक गद्य तीव आ गम्‍भीर अछि। गद्य-शिल्‍पक एहन ऐश्‍वर्य, एहन वैभव अन्‍य कोनो गद्यकारक रचना मे प्रकट भेल अछि, ताहिमे सन्‍देह अछि। हुनकासँ भेट भेल छल, डायरी, ओहिठाम गेल छलहुँ एवं आत्‍मकथाकेँ प्रकाशन तिथिक अनुरूपहि एकहि संग विश्‍लेषण कयल अछि। चारू सिरीजक रचना समूह केँ समबेत रूपसँ हुनकासँ भेट भेल छल नाम देल अछि तकर दुह कारण अछि। प्रथमत: हुनकासँ भेट भेल छलक संख्‍या अधिक अहि आ द्वितीय जे साहित्यिक दृष्टिऍं सभ तँ संस्‍मरणेक श्रेणी मे अबैत अछि। अमरक एकांकी-प्रहसनक सामाजिक यथार्थ नाटक प्रकृत्‍या सामाजिक कला थिक। एकर आयोजन सँ ल’ कए अवलोकन धरि समस्‍त क्रिया समाजे द्वारा सम्‍पादिर होइत अछि।अन्‍तत:एकर प्रदर्शन समाज द्वारा सामाजिक लेल कयल जाइत अछि। अतएव एकर स्‍वर ससाज द्वारा सामाजिकतासँ अछि सम्‍पुष्‍ट।एकर संरचनाक मूल प्रेरणाक स्‍थल सामाजिक थिक। लेखक समाजगत प्रेरणासँ अनुप्राणित भ, कए नाथ य’ रचना दिस प्रवृत्त होइत छथि। समाजिक जीवनमे घटित अेनिहार विभिन्‍न क्रिया कलाण, वेष-भूषा, भाषा आदिक आधरपर नाटककार अपन नाट्य क्रिया कृतिमे कथानक, पात्र, रस, संवाद आदि विभिन्‍न नाट‍कीय तत्‍वक सथमावेश करैत छथि नाट्य-कर्त्ताक मानस पटलपर समाजपर समाज जे स्‍वरूप अंकित होइत छनि ओकरा ओ पुन: सामाजिकक समक्ष प्रदर्शित करैत छथि। कोनो देशक समामाजिक विकास नथा नाट्य-साहित्‍योनिहासिक तुलनात्‍मक विश्‍लेषणसँ स्‍पष्‍ट भ’ जाइछ नाटक संरचनामे सामाजिक प्रेरणाक स्‍वरूप रहल अछि। मैथिली नाट्य परम्‍पारक अवलोकनसँ सामाजिक प्रेरणाक स्‍वरूप पूर्ण पेण स्‍पष्‍ट भ, जाइछ जाइद। एहि मे समाजक यर्था‍थ स्थितिक चित्रण नाटककार अत्‍यन्‍त सूक्ष्‍मता सँ क’ रुप कए वाजविकताक परिचय देलनि अछि।प्रत्‍येक महत्‍वपूर्ष नाटककार एवं एकांकीकार ओ अपन कृतिक माध्‍यमे जीवनक कोनो ने कोनो अपन अन्‍त दृष्टिकेँ अपनसामाजिक, दार्शनिक, नैतिक, माननीय उपलब्धि केँ अभिव्‍यक्ति करैत छयि। प्रत्‍येक साहित्‍यकारक सामाजिक दायित्‍व होइत छनि; किन्‍तु दृश्‍य साहित्‍य लिखबाक कारणेँ नाटककार अन्‍यक अपेक्षा अधिक उत्तरदायी होइत छथि नाट्यकर्ता अपन सार्थकता तखने सिद्ध क’ सकैत छथि जरवन ओ सामाजिक चेतनाकेँ कर्त्ता अपन संस्‍पर्श करैत छथि। इएह कारण अछि जे नाटक वा एकांकी वा प्रहसन सामयिक होइत अछि। जीवनक जटिलता ओ गूढ़ रहस्‍यकेँ खोलि क’ देखबाक कारणेँ आधुनिक सन्‍दर्भ म जाहि द्रुत गतिएँ एकरा माध्‍यम जतेक सुगमता सँ भ’ सकैछ ततेक साहित्यक अन्‍य कोनो विघा सँ नहि। जनसमाजमे सामायिक स्थितिक ओ समाज प्रति चेतना उत्‍पत्‍यक करब नाटककारक प्रमुख दायिते होइत छनि। राष्‍ट्र व्‍याप्‍त निर्जीवता एवं यात्रिकता सँ पृथक् र‍िह क’ उदबुद्व करब ना‍टककारक घर्म हाेइत छनि। एहन पैघ उत्तरदायित्‍वक सफल निर्वाहिर्थ परमावश्‍यक अछि जे ओ वर्ग विशेष वा सिद्धान्‍त विशेष वा दल विशेष धरि अपना केँ सीमित नहि राखि; समाजक समग्रात केँ प्रत्‍येक ष्टठिटएँ सामाजिकक सम्‍मुख प्रस्‍तुत करथि। एहि लेल नाटककारकेँ अपन कृति मे परिस्थितिक व्‍याघतक विरुद्ध संघर्ष रतहोमय पड़ैत छनि क्षणिम ख्‍यातिक हेतु ओछपन मे नहि पडि़़ नाटककार सामाजिक शक्तिक गम्‍भीर अध्‍ययनक हेतु केन्द्रित होइत छथि। सामाजिक विवर्तनक फलस्‍वरूप नाटककारक दायित्‍व अधिक भ’ गेलनि अछि। आै सब ओकर विरोध करैत छथि। आधुनिक वैज्ञानिक आविम्‍पराक फलस्‍वरूप मासव्रजिक परिवेशमे तीव गतिएँ परिवर्त्तन भ’ रहल अछि। परगत घारणदि, प्रथादि, व्‍यवस्‍थादि, आदशोदि सँ लोककेँ धारणा शनै: शनै समाप्‍त होमय लागत अछि। अतीतक व्‍यवस्‍था आदि वर्त्तमान परिप्रेक्ष्‍यमे जीवन-यानक लेल पयाप नहि, रहि गेल अछि। समाजमे एक विचित्र स्थिति अत्‍पन्‍न मे, गेलैक अछि एहन अवस्‍था मे समाजसँ बनब तथा समाजकेँ बनायब नाट्य प्रक्रियाक आधार भूत हेतु बनि गेल अछि। तेँ नाटककारकेँ सामाजिकक रुचिसँ प्रभावित हैबाक होइत छनि। संगहि हुनका समाजकेँ सुरुचि सम्‍पन नबयबाक प्रयत्‍न करय पड़ैत छनि। नाटकमे नाटककारक मानकिताक विम्‍ब रहैत अछि ई प्रतिविम्‍ब आत्‍मनिष्‍ठ एवं स्वयं पूर्ण होइछ। नाटककारक‍ मानसिकता हुकक गृ‍हीत संस्‍कार तथा समाजमे घटित घटनादिक परिणाम होइत अछि। यदयले मैथिली साहित्‍यमे समस्‍त पूर्वाचालक भाषाक अपेक्षा नाट्य-साहित्‍य समृद्धशली परम्‍पराक दिग्‍दर्शन एकर प्रारम्भिकरवस्‍वथहिसँ इष्टिात होइत अछि तथापि एकांकी साहित्‍यपर दृष्टिपात करैत छी तँ एकर उदय ओ विकास बीसम शताब्‍दीक चतुर्थ दशाब्‍द सँ प्रारम्‍म होइत अछि। वर्तमान युगमे जीवनक व्‍यस्‍तता, अशांति, कार्याधिक्‍यक कारणेँ अवकाशाभाव तथा जीवनक बढ़ैत द्वन्‍द्व एकर विकासक मूलमे अछि। शिक्षा प्रचारिक फलस्‍वरूप विद्यालय, म‍हाविदयालय ओ विश्‍वविदालय मे अभिनियोपयोगी एकांकीक निन्‍तर माँग तथा रेडियो-टेलीभिजनक प्रचार-प्रसारक फलस्‍वरूप एकांकीक लोकप्रियत बढ़ैत अछि। द्वितीय विश्‍व युद्धक अवसरपर गद्य-साहित्‍यक प्रचारत्‍मक साधनक आवश्‍यकता भेलैक। फलत; एकांकीक अनेक रूपक विकास भेलैक जाहिमे रेडियो प्‍ले. फीचार. फेटेसी आदि प्रमुख अछि। किन्‍तु मैथिली एकांकीक विकास ओ प्रचार-प्रसार स्‍वातत्र्योर युग मे भेल अछि। बीसम शताब्‍दीक बिगत पाँच दशकसँ मैथिली साहित्‍यक गतिविधिपर दृव्टि निक्षेप कयानिहार सर्वाधिक चर्चित साहित्‍य-मनीषीमे जनिक गणना जाइत छनि ओ छथि अग्रगण्‍य साहित्‍य-चिन्‍तक, सशक्त कवि, उपन्‍यासकार, कथाकार, एकांकीकार, प्रहसनकार, इतिहासकार अनुवादक, सम्‍पादक, ओ आलोचकक रूपमे विशिष्‍ट स्‍थान रखनिहार चन्‍द्रनाथ मिश्र अमर (1925)।हिनक वास्‍तविक प्रतिभाक प्रस्‍फुटन भेल हास्‍य-व्‍यंग्‍यसँ संयुक्‍त काव्‍य-सृजनसँ1 एही कारणेँ मैथिली पाठकक सर्वाधिक चर्चिथ व्‍यक्ति रूपमे तख्‍याति अर्जित कयलनि। तथापि हुनक जतबहि एकांकी ओ प्रहसन अद्तापि उपलब्‍ध भ’ रहल अछि ओहि आधार पर हुनका श्रेष्‍ट एकंाकीकार ओ प्रहसनकारक रूप मे गणना कयल जाय तँ एहि मे कोनो अत्‍युक्ति नहि। हिनक र्वेशिष्‍ट्य एहि विषयकेँ ल’ कए अछि जे ओ एकांकी ओ प्रहसनमे जँ गंगा-यमुनाक धारा प्रवाहित कयलनि अछि तँ ओहिमे हास्‍य व्‍यंग्‍यक लुप्त सरस्‍वती सेहो दृष्टिटगत होइत अछि जे हिनक रचना धार्मियताक वैशिष्‍दय थिक। चन्‍द्रनाथ मिश्र अमर स्‍वंय एक कशुल अभिनेता, कुशल निर्देशकक रूपमे अपन यथार्थ प्रतिभाक परिचय अपन कार्य-कालमे देलनि, जकर फलस्‍वरूप समाज मे ओ प्रतिष्‍ठा अर्जित कयलनि। एस. एल. एकेडमी लहेरियासरायमे अध्‍यापक प्रारिम्‍मक कालहिसँ सेवा निवृति काल धरि भिन्‍न-भिन्‍न उत्‍सवपर नाटक, एकंाकी प्रहसनक मंचनमे निर्देशकक रूपमे सम्‍बद्ध रहलाह जकर प्रतिफल हमरा लोकनि देखि चुकल छी जे मैथिली फिल्‍मक आम्‍युत्‍थानार्थ कन्‍यादानमे लाल-काकामे अभिनय क’ कए मैथिली रंगमंचक विकासार्थ अभिनाक अवदान देलनि जकर फलस्‍वरूप ओ समस्‍त मिथिलांचलमे लोक प्रियता अर्जित कयलनि।इएह कारण अछि जे हिनकामेरगमे चोपयोगिता अदयोयिप अक्षुष्‍ण छनि, जकर प्रति फल ई भेल जे कपिपय नाटक एकांकी ओ प्रहसनक मंचन हिनक कुशल निर्देशन मे भेल। ओ समाजकेँ अतन्‍त समीपसँ देखलनि तथा ओकर सतीव चित्र अपन एकांकी ओ प्रहसनमे सामाजिक यथार्थक वास्‍तविक मूल्‍यांकन गेल अछि। ई अपन एकांकी ओ प्रहसनमे निथिलांचलक सामाजिक जीवनक यथार्थवादी स्‍वरुप पकड़ उपस्‍थापन कयलनि। ओ नव समाजक कल्‍पना कयलनि तथा अधुनिक जीवनसँ आयल विकृतिकेँ केन्‍द्र-विन्‍दु बनौलनि जे सामाजिक परिप्रक्ष्‍यकेँ जनबामे सहायक सिद्व भेल। मैथिलीक विभिन्‍न पत्रिकादीक अन्‍वेषण अनुसंधान ओ सर्वेक्षणोपरान्‍त अद्यापि हिनक जे एकांकी ओ दृव्टिपथपर आयल अछि औ थिक टोपी (वैदेही 1950) समाधन (1955) मे संग्र‍हीत प्रहसन आधुनिक पाठ्य प्रणाली दुइ एकांकी निरक्षता निवारक पाठशपाला एवं श्रमदान; घरैया लूरि (वैदे‍‍ही नवम्‍बर –दिसम्‍बर 1958). (मलरविमिथिला दर्शन (1965) बाइचान्‍स (मिथिला मिहिर14मार्च1965) ब्रहामस्‍थान (पटना रेडियो सँ प्रसारित) हाकिमक हाकिम वा ननदिओक ननदि, दिशा बोध (मिथिला मिहिर 16 जुलाइ 1978) पत्रिकादि एवं विभिन्‍न संग्रहमे संगृइीत अछि, एम्‍हर आबि क’ ओ समग्रँ एकाकी एवं प्रहसनक संग्रह प्रकाशित कयलनि अछि खजवा टोंपी (2005)क’ नामे जाहिमे कौआ ल’ गेल कान’ एक नव एकांकी इव्टिगन भेल अछि। एहि ट्टष्टि‍सँ हुनक कुल मिला क’ एगारह एकांकी प्रकाशित अछि जाहि दुइ प्रहसन अा शेष एकांकीक परिप्रेक्ष्‍यमे हिनक मूल्‍यांकन करबाक उपक्रम कयल जा रहल अछि। ओ मैथिलीक एहि बिधा‍न्‍‍तर्गत एक नव प्रतिमान उपस्थित करबामे सहायक भैलाह। हिनक, एकांकी ओ प्रहसन मे पाठक एवं दर्शककेँ मिथिलांचत्‍नक समाजक प्रतिविम्‍ब भेटैछ। ओ अपन एकांकी एवं प्रहसनमे समाजमे प्रचलित समस्‍यादिक स्‍पष्‍ट अंकन, सूक्ष्‍म निरीक्षण एवं विषय उपस्‍थापन अत्‍यन्‍त प्रभाव पूर्ण शैलीमे कयलनि। ओ जाहि समस्‍याकेँ उपस्थित कयलनि अछि ओ ओहि व्‍यजक सायेक्ष धरि सीमित नहि रहल; प्रत्‍नेन भविष्‍य कालीन परिणामक स्‍पष्‍ट अंकन करबामे सहायक भेल। हमर धारण अछि जे भविष्‍यमे सेहो हिनक एकाकी एंव प्रहसन ओहिना प्रभाव अनुभून हैत। यतिपय समस्‍या एहन अछि जे कोनो स्थितिमे कहियो नष्‍ट नहि हैन-जेना दलितपर भेनिहार अन्‍याय, अत्‍याचार, शोषण, पीड़न . शिक्षाक परिवर्त्तिन स्‍वरूप भ्रष्‍टचार, राजनीतिक भ्रब्‍टता, सामाजिक असमानता इत्‍यादिकेँ ओ एकांकी एवं प्रहसनमे युगीन सन्‍दर्भकेँ महत्‍व देलनि। ओ जीवन पर्यन्‍त अध्‍ययनअध्‍यापनसँ सम्‍बद्ध रहलाह आ समाजक विभिन्‍न स्‍तरक विद्यार्थी केँ अत्‍यन्‍त समपिसँ दैखलनि। अोकर कतिपय समस्‍यादि जे हुनक मनमे गड़लनि तकर ओ एकांकी एवं प्रहसनमे सजी रूपेँ प्रस्‍तुत करबाका उपक्राम कयलनि। जेना कोनो कानून बनैत अछि सर्वसाधारणकेँ न्‍याय दिअयबाक हेतु, किन्‍तु कखनो-कखबेसीबनों न्‍यायमे एतेक सी जड़त आबि जाइत छैक जे ओहिसै न्‍याय नहि भेटि पबैछ। अतएव परवर्त्तनशील समाजक लेल आवश्‍यकता अछि नहि भेटि पबैछ। अताएव परवर्त्तन शील समाजक लेल आवश्‍यकता अछि जे कानूनमे सेहा समय-समयपर परिवर्त्तन हो। कैंसर अत्‍यन्‍तपीड़ा दायक बिमारी छैक जकर औषध नहि छैक। एकमात्रा मृत्‍युक अतिरिक्‍त आन कोनो उपाय नहि छैक। तखान दोसर यथार्थ दयमरणक कानून हैबाक चाही। मैथिली हश्‍य काव्‍य मे चन्‍द्रनाथ मिश्र अमर दस्‍तक देलनि प्र‍हसनकारक रूप मे। हिनक पहिल प्रहसन प्रकशित भेल टोपी। एहि प्रहसन अनुशीलनसे अवबोध होइछ जे एहिपर व्‍यंग्‍यसम्राट हरिमोहन का (1908-1984) क प्रसिद्व प्रहसन बौआक दाम (1946) क स्‍पष्‍ट प्रभाव अछि। फेंच नाटककार मौलियर (1622-1673) जहिना अपन नाटकमे हास्‍यक आयोजनक हेतु कतिपय साधन केँ अपनौलनि हहिना चन्‍द्रनाथ मिश्र अमर अपन पोंप्र वेहसनमे सेहो एकर आयोजन कयलनि, किन्‍तु स्‍थल-स्‍थल पर एहि जार्ज बनाइ शाँ क समान गम्‍भीर व्‍यंग्‍यक रूप परिलक्ष्ति होइत अछि। अ‍ाधुनिक पाठ्य-प्रणाली (1955) मे प्रहसनकार सरकारक आधुनिक शिक्षा नीतिक परिप्रेक्ष्‍यमे एक शिक्षकक हैसियत सँ जे अनुभव कयलनि तकरे पृण्‍ष्‍टभूमिमे एकरा परिवर्त्तित सामाजिक परिवेशमे प्रस्‍तुत कयलनि अछि। मैथिलीक इतिहासकार एकर गणना एकांकीक क्षेणीमे कयलनि अछि, किन्‍तु ई विशुद्ध रूपेँ प्रहसन थिक, जाहिमे हास्‍य-व्‍यग्‍यक धारा प्रवाहित भेल अछि। प्राचीन ओ नवीन शिक्षा प्रणलीक परिप्रेयमे प्रहसनक्षर एकर कथाभिर्त्तिक निमाण कलननि अछि जे पाठक एवं दर्शककेँ मनोरंजन करबाक हेतु प्रचुर अवसर प्रदान करैत अछि। प्रचीन परनुसार जतय साले साल यौत परीक्षोतीर्ण पंडितलोकनि दरभंगा महाराजक ओतय गौरवान्विक होइत छलाह। ततहि आधुनिक पाठ्य-प्रणालीक परिप्रक्ष्‍यमे परीक्षा तँ सत्‍यनाराण पूजाक समान संकरञेँति संकरति भ’ रहल अछि। एतय प्रहसनकार समसामयिक समाजमे प्रचलित सरकारक आधुनिक पाठ्य-प्रणाली मे प्रचलित शिक्षा नीतिपर व्‍यँग्‍य करैत छथि जखन देश स्‍वतन्त्र भेल छल, नव-नव योजना कार्यान्‍व भेल जाहिसँ शिक्षाजगत सेहो बाँचल नहि रहि सकल। परिवर्त्तित परिवेशमे प्रहसनकारक व्‍यंग्‍य कतेक मर्मस्‍पर्शी थिक तकर अवलोकन तँ करू।: बचकानी : बापरे से धरि सत्ते, छोट-छोट नेना सब हक्‍कर पेलैत चढ़ले भानसमे सँ काँचे कोचिल खा क’ तीन-तीन कोस दौड़ल जाइत अादि अछि’ सुनैत छिऐक जे स्‍कूलपर एकरा सबसँ टकुरी- चरट करवीबैत जाइत छैक। (समाधान, निर्माण प्रकाशन, लहेथियासराय, 1955, पृष्‍ठ-15) स्‍वातन्‍त्र्थोत्तर भारतमे नवीन शिक्षा-नीतिक त‍हत स्‍कूलपर बुनिआदी शिक्षा केँ प्रश्रय देल गेलक तथा एकरा क्रियाचित करबाक हैतु पाठय-क्रममे अावश्‍यक परिवर्त्तन कयल गेल, जकरा समकाली सामाजिक परिपेश मे स्‍वीकार करबाक स्थिति मे समाज एकदम नहि छल। समाजक एहन मानसिकता पर प्रहसनकार हस्‍य-व्‍यंग्‍यसँ युक्‍त धारा प्रवाहित कय‍लनि अछि:। बुद्वन: हौ तौ मौसम्‍मान क बेटा बेटा चिकाह जे चरर्ण लेवह ओ तँ गाँधी बाबा एकटा रास्‍ता देखा मंलथिन्‍ह जे राडँ , मसोम्‍मान अपन गुजर करत, जकर जीवन पहाड़ छैक आ’ तोरा कथीक चिन्‍ता छह? कोने वस्‍तुक कम्‍मी छह? समाधान पृष्‍ठ-19) आधुनिक आठय-प्रणाली प्रहसनक वैशिपट्टा अछि जे प्रहसनकार सामाजिक परिवेशक यथार्थ गानसिकताक घटना चक्रक आधार पर रास्‍य ततहि दोसक भाग ओकरा माध्‍यमे मानसिक स्थिनि केँ परिवर्तिन करबाक सरायक वार्षि कोर्षिकोत्‍सवक अवसर पर भेल जतय तत्‍कालीन बिहार सरकारक शिक्षा मंत्री हिराथ मिर उपस्थित र‍हथि1 एकर निर्देशन प्रहसनकार स्‍वयं कयने रहथि। एकांकी : देशक पुनर्निमाणक आवश्‍यकता एवं सामाजिक चेतना ल’कए मैथिलीमे एकांकी लिखनिहारमे चन्‍द्रनाथ मिश्र अमर एक सजग एकांकीकारोंक रूपमे मैथिलिनी एकांकी द्वारपर दस्‍तक देलनि। एहि दृव्टिएँ हिनक निरक्षता निवारक पाठ्शाला, श्रमदान, घरैयालूरिन, ब्रहमस्‍थक, हाकिमक हाकिम वा ननदिओ क ननदि, मलरवि, दिशा बोध एवं कौआ ल’ गेल कान, इत्‍यादि मैथिलीमे उल्‍लेखनीय एकांकीक रूपमे चर्चित अछि जाहि आधारपर हिनका मैथिली क सफल एकांकीक पमे परिग्‍रुणिल कयल गेल छनि हिनक उपलब्‍ध ऐंकाकीक विश्‍लेषण नाटकीय तत्‍वक आधारपर करब समीचीन होयत। मनुष्‍य एक सामाजिक प्रणी थिक तेँ ओक मूल्लयांकन सामाजिक दृष्टिाटऐँ अपेक्षित अछि। वस्‍तु : नाकय तत्‍वक अन्तर्गत वस्‍तुक सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण स्‍थान अछि। वस्‍तु एकांकीक गतिशील होइत अछि। रस-निष्‍पति, चरित्रक सजीवता एवं गतिशील ताक लेल वस्‍‍तु‍क निर्माण कयल जाइत अछि। एहि दृलिटएँ वस्‍तु एकांकीक प्रमुख तत्‍वक रूपमे स्‍वीकारल गेल अछि। एकरा अन्‍तर्गत कार्यावस्‍था वा व्‍यापार तत्‍व एकांकीकेँ सफल ओ सप्राण बनबाक उद्देश्‍यसँ कयल जाइत अछि। कार्यक गाति दुतगतिएँ बढ़यबाक दिशामे वस्‍तु-विन्‍यास श्रेष्‍ठ माध्‍यम थिक, कार्य एकांकीक प्रमुख साध्‍य थिक1 नाटकीव सौष्‍ठवकेँ वस्‍तु-संगठन एवं व्‍यापाक समुचित योजनाक रूपमे देखल जाइत अछि। एहि प्रसंगमे पाश्‍चात्‍य आलोचक ई.एम. फार्स्‍टरक कथन छनि जे कथानक घटनाक ओ काल क्रमानुसार वर्णन थिक जहिमे कार्य-कारण-सम्‍बधपर विशेष बल रहैत अछि। नाटक वा एंकाकी मे संघर्ष वा द्वन्‍द्वक महत्ता सर्वेत्‍‍परि अछि। तेँ वस्‍तु विन्‍यासक वा एकांकीमे संधर्ष वा द्वन्द्वक महत्ता सर्वोपरि अछि। तेँ वस्‍तु विन्‍यासक अन्‍तर्गत कथानकपर दबाब ओकर प्रतिक्रियाक अंकन कयल जाइछ। वस्‍तु-विन्‍यास लेखकक उद्देश्‍यक अनुरूप क्रमबद्वता एवं विस्‍तार ग्रहण करैछ। अतएव एकांकीकार वस्‍तु-विन्‍यास करबा काल जीवनमे घटित भेनिहार समसामयिक जीवनसँ सम्‍बद्ध रहैत छथि, कारण मानव जीवत सँ विच्छिन्‍न कोनो साहित्‍य उत्‍कृष्‍ट नटि भ’ सकैछ। निरक्ष्‍ता नि‍वारक पाठशालाा(1955) मे एकांकीकार जाहि समसामाहिक समस्‍याक उपस्‍थापन एहिमे कयलनि अछि तकर संकेत ओ पचास वर्ष पूर्वहि कयने रहथि तकर प्रतिरूप बीसम शताब्‍दीक नवम दमक दशकमे सरकार माध्‍यमे निरक्षरकेँ साक्षार बनयबाक दिशामे प्रयास भेल अछि। सरकार वयस्‍क शिक्षा योजनापर करोड़क करोड़ रूपैया खर्च करैत जा रहल अछि जकर मूल उद्देश्‍य छैक ज कोहुना प्रत्‍येक भारतीयकेँ साक्षर बनाओल जाय। साहित्‍य-चिन्‍तक कतेक दूरर्शी होइत छथि तकर वास्‍तविकताक परिचय एहि एकांकीक प्रणयनसँ पाठक वा दर्शककेँ उपलब्‍ध होइत छनि। समसाम‍ियक परिवेशमे सरकार वयस्‍क शिक्षा नीतिकेँ क्रियन्वित करबाक हेतु नुक्‍कड़ नाटक आयोजन करैत अछि। जनसामान्‍यकेँ एहि दिशामे आकर्षित करबाक कतिपय प्रलोभन दैत अछि। तथापि ओकर कतेक परिणाम ओकरा भेटि रहल छैक तकरा स्‍पष्‍ट करबाक प्रयोजन नहि; प्रत्‍युत अनुभव करबाक योग्‍य थिक। किन्‍तु एकांकीकार समाजक एहि ज्‍वलन्‍त समस्‍याक सम्‍बन्‍धमे कतेक पूर्व ध्‍यानाव्‍यर्वित कयने छला‍ह तव्‍कर स्‍पटीकरण उक्‍त एकांकीक मननसँ स्‍पष्‍ट भ’ जाइत अछि। नेना बाबू तैना सोने झाकेँ शिक्षित करबाक निमित्त प्रयासरत भेलाह जकर फलस्‍वरूप ओ शिक्षित भ’ गेलाह। एकरा माध्‍यमे एकांकीकार एहि विषयकेँ उद्घारित करबाक उपक्रम कयलनि अछि जे देशक उन्नति तखने सम्‍भव अछि जखन प्रत्‍येक भारतीय शिक्षित क’ कए ज्ञानक ज्‍योति प्रज्‍वलित क’ कए एकर वास्‍तविक महत्‍व बुझथि। तखतृने मादभदभूमिक स्‍वतन्‍खनाक वास्‍तविक अर्थ बुकबाम तथा अपन अधिकार ओ कर्त्तव्‍यक पालनमे सक्षम भ’ सकताह अन्‍यथा सब प्रयास निरर्थक अछि। एहि निमित आवश्‍यक अछि जे जनसामान्‍यकेँ शिक्षत कयल जाय। एहि प्रसंग मे चनुर्भुजक कथन छनि: जतेक पढ़ल लिखल लोक छी से अछि पतिज्ञा करी आ कम सँ कम दस व्‍यक्तिकेँ शिक्षित बनाबी। एक सँ दस, दस सँ सै, हजार तुरन्‍त भ’ जैत। तैँ हेतु साँझखन जे समय घूड़लग बितबैत अछि से एही काज मे लागबी तँ कीने क्षति। (समाधान, पृष्‍ठ -7) उपर्युक्‍त वातावरणक पृष्‍ठभूमिमे एकांकीकार समाजक समक्ष एक प्रतिमान उपस्थित कयजनि अछि जे शिशित समात भ’ कए अपन सामाजिक दायित्‍व का संगहि-संग राष्‍ट्रीय दायित्वकेँ बुझि देशक प्रति अपन त्‍याग कर्तव्‍य केँ बुझथि1 ई तखने सम्‍भव भ’ सकैछ लोक अपन अधिकार कर्तव्‍यक प्रति पूर्ण साकांक्ष भ’ पौताह अन्‍यथा ई संभव नहि। एहि दृष्टिएँ एकर कथानक समाजकेँ अपन अधिकार औ कर्तव्‍यक प्रति दिशा-बोध करबैत अछि। आधुनिक परिवेशमे दिन प्रतिदिन समसामयिक समाजक व्‍‍यक्ति आराम तलब बनल जा रहल अछि। ओ जेना श्रमक महत्‍वसँ अपरिचित भ’ गेल अछि। व्‍यक्ति-व्‍यक्तिमेे एतेक वेशी ऊर्जा छैक जे ओ सम्‍भव कार्य सेहो सम्‍भव क’ सैकल अछि। तेँ मानव जीवन मे श्रम सर्वोपार साधन थिक। एकांकीकार श्रमदान (1955) एकांकीमे समाज केँ श्रमोन्‍मुख बनयबाक उद्देश्‍यसँ, शैशवावस्‍थहिसँ श्रमक महत्‍व केँ बुझयबाक देबाक उद्देश्‍यसँ श्रमदान करबाक प्रवृति जगयबाक हेतु एहि एकांकीक ओ रचना कयलनि। स्‍वातन्‍त्र्योत्‍तर भारतक सर्वतमुखी विकासक शिक्षाक नव नीति मे श्रुमादानक उपयोगिता के उदघाटित करबाक उद्देश्‍य सँ अ‍ाधुनिक पाठान्‍नतर्गत बुनियादी शिक्षाकेँ महत्‍व देवाक उद्देश्‍यसँ गेमदान करबाक प्रवृत्ति एकरा माध्‍यमे आर्थिक स्‍वतन्त्रता तँ आसानीसँ भेि‍ट‍ जा सकैछ। अतएव तन-मन. धन सँ अपन मातृभूमिक सेवामे तत्‍पर भ’ जयबाक प्रयोजन अछि। व्‍यक्ति-व्‍यक्तिमे एहि भावना केँ जगयबाक हेतु जे प्रयास भेल ओ तँ अपन स्‍थानपर रहल, किन्तु विदयालय, महाविद्यालय एवं विश्‍वदियालय स्‍तर पर ए.सी.सी. एवं एन.एी. सहसीश योजनाकेँ क्रियान्चित करबाक लेल स्‍थानपना कयल गंलैक जकर मूल उद्देश्‍य छलैक श्रामदान करबाक प्रवृति जगैबाक तथा भावी संतनिकेँ शेशवास्‍थाहिसँ अनुशासनक सूत्रमे बान्‍हल जाय जे भविष्‍यक हेतु लाभ प्रद भ’ तेँ तँ ज्ञान-धन कहैछ: देशक एक-एक गोटसँ निवेदन अछि जे निर्माण कार्यमे तन-मन-धनसँ सहायता करू। श्रमदानक भुखलि भारत माता अहाँक आहवान कै रहल अछि। (सामाधन, पृष्‍ठ -27)। एहि प्रवृत्तिक उदय भेलासँ देशक नव-निर्माण निश्चित रूपेँ हैबाक सम्‍भावना अछि। सरकार एहि शिक्षा नीतिक सराहना करैत छनि जे स्‍कूल एवं कालेजमे पढ्निहारपर दबाव या जनमानस उत्‍साहित भ’ कए एहि दिशा मे कार्यरत हैताह तखन सुन्‍दर लालक कथन छनि: ने सोचलक ई बात बड़ बुधियार छल। देखहक आब पढ़ैत छैक बारहो वर्णक धियापूता, सबकेँ नोकरी भेटतैक नहि. तखन सब बेकार भेल गामेपर एहि खोन्‍ही सँ ओहि खोन्‍ही ढहनाइत फिरैत छल से तँ नहि ने हैत। (समाधान, पुष्‍ठ-32)। अनादि कानलहिसँ समाज दुह वर्गमे विभाजित रहल अछि जकरा धनीक-गरीब वा शेषक-शोषित वा सम्‍पन्‍न-विपन्‍न आदि विविध संज्ञासँ विभिन्‍न समयमे सम्‍बोधित कयल जाइत रहल अछि। सामाजिक विषमता सबसेँ ज्‍वलन्‍त समस्‍या थिक जकर फलस्‍वरूप समाजक विभाजन भ’ गेलैक नया समाजन्‍क वर्त्तमान स्‍वरूप विरूपिन भ’ गेल। आर्थिक परिस्थिि‍त वा हित-सम्‍बन्‍धक आधारपर समाज मुख्‍यत: तीन श्रेणीमे विभाजित अछि –उच्‍च वर्ग, मध्‍य वर्ग ओ निम्‍न वर्ग। उपर्युक्‍त आधरपर समाजक अन्‍तार्गत वर्गवैषम्‍यक आगमन भेलैक। सामाजिक वातावरणक उपर्युक्‍त पृष्‍ठभूमि हिनक ब्रहमस्‍थान एक उल्‍ल्‍ेखनीय एकांकी थिक जाहिमे एकांकीकार शोषित वा गरीब वा विपन्‍न वर्गपर होइत अत्‍याचारक वास्‍तविकतासँ अवगत करौलनि अछि। ग्रामीण परिवेशमे एहन परम्‍परा रहल अछि जे गाम डिहबाक अर्थात ब्रहास्‍थान गामक न्‍यायलय प्रतीक मानल जाइत छल जतय नीक अधलाहक विश्‍लेषण क’ कए दोषीकेँ दण्‍ड देल जाइत छलैक, जकर ओ साक्षी होइत छलाह। समाजक आचार –संहिताक ओ प्रेतीक होइत छलाह,। ब्रहास्‍थान जतय गाममे रहनिहारक सुख-द:खक समान रुपेण सह भागी हाेइत छथि। समाज कल्‍याण जनिक सर्वप्रमुख वैशिष्‍ट्य छनि तथा सामाजिक कल्‍याणमे अपन कल्‍याण मानैत छथि।एहन न्‍यायालयमे बैसि क’ लोक दूधक दूध पानिक पानि न्‍याय करबा मे वस्‍तुत: सक्षम होइत छथि। बैह घिडबार समाजमे सतत पूजित होइत रहल छथि तथा समाज हुनक सम्‍मान करैत आयल अछि। बदलैत समाजिक परिवेशमे एहन मान्‍यतामे परिवर्त्तन भेल जकर परिणाम भेल अछि जे स्‍वातत्र्योत्तर भारतमे राम राज्‍यक स्‍थापनाक उद्देश्‍यसँ ग्राम पंचायाक स्‍थापना कयल गेलैक तथा ओकर प्रधान मुखियाक हाथमे हेल गेलनि। मुदा मुखिया न्‍याय की करैत छथि अन्‍यायक प्रतीक बनि क’ अपन राक्षसी प्रवृत्तिसँ समाजपर अत्‍याचार करैत छथि। ए‍ही यर्था‍थताक पृष्‍ठभू‍िम मे एकांकीकार ब्रहास्‍थान एकांकी कथा यित्तिक निर्माण कयलनि अछि। गामक मुखिया हरिवंश बाबकेँ युग-युगान्‍तरसँ दीन-हीन जनसमानसकेँ शोषित करबाक अभ्यास छनि। सुगियाक बेटा मखना विगत अठारह दिनसँ ज्‍वराक्रान्‍त छैक जे हुनक शोषण नीतिक फलस्‍वरूप अकस्‍मात् काल-क्‍वर्गति भ’ जाइत अछि सुगियाक मात्र एनबे अपराध छैक जाइत अछि, जे समयापर हुनका ओतय पानि भरबाक हेतु नहि जाइत अछि, जकर इनाम ओकरा भेटैत छैक मारि-गारि सुनबैत निर्ममतापूर्वक पीटब ओ अपमानित करब। सुगियाक अन्‍घ भक्‍त पलि पचकौड़ी अपन पुत्रक मृत्‍यसँ आहन भ’ परम्‍परागत न्‍यायालयक प्रतीक ब्रहास्‍थानक अस्तित्‍वकेँ मेटैयबाक लेल कटिकद्व अछि; किन्‍तु ठकाइक बात मानि अपन विचारकेँ बदलि दैछ। अन्तत: ओही ब्रहमस्‍थानमे गामक सब क्‍यो उपस्थित भ’ वर्त्तमान मुखिया हरिवंश बाबूकेँ पदच्‍युन क’ कए एक नव मुखियाक चुनावक नारा दैत अछि। एकांकीकार शोषित वर्गक बीच युगयुगान्‍तरसँ चल आबि रहल आक्रोश सँ कथानकक निर्माण कयलनि अछि। प्रतिपाद्य एकांकीमे मूलत: दुइ विचारधारा सँ संघर्षरत अछि। एक तेँ परम्‍परासँ चल अ‍ाबि रहल बाहियाक प्रति शोषक वर्गक नृशंस हत्‍या दोसर भाग समसामयिक सामाजिक परिवेशमे प्रचलित चुनाव-पद्धति तथा आधुनिक मुखियाक क्रियाकलापक वास्‍तविकतापर जे अन्‍हरजाली छल तकरा हटटयबाक उपक्रम कयल गेल अछि। परिवर्त्तित परिवेशमे समाजमे विद्रोहक स्‍वर अत्‍यन्‍त तीव्र भ’ गेल अछि तेँ सामाजिक परिवेशकेँ परिवर्त्तित करबाक प्रयोजन अछि। एकंाकीकार इएह प्रवृत्ति छनि। कतोक शनाब्‍दीक गुलमीक पश्‍चान् भारतकेँ स्‍वतन्‍त्रता प्राप्‍त भेलैक। देशक नव-निर्माणक हुतु कतिपय हेजनादि क्रियान्वित करबाक दिशामे सरकार प्रयासोन्‍मुख भेल। सरकारक दिससँ सेहो कतिपय योजनाकेँ कार्यरूप देबाक हेतु प्रयास कयल गेल । एकर एक मात्र उद्देश्‍य छलैक कोहुना व्‍यक्ति-व्‍यक्ति जे गरीबीक मारिसँ कुहरि रहल अछि ताहिसँ मुक्ति दिअयबाक दिशामे प्रयास कयल जाय। अधिकाशं ग्रामीण गामक परित्‍याग क’ शहरोन्‍मुख हैबाक दिशामे प्रयास करय लागल। तकर भीषण दुष्‍परिणाम भेलैक जे गामक गाम जनशून्‍यताक कगार पर पहुँचय लागल। समाजक समक्ष एक विषम स्थिति उत्‍पन्‍न होमय लगलैक। एहना स्थितिमे ग्रमीण परिवेशकेँ बचयबाक लेल जनमानसमे एहन वातावरणक निर्माण कयल गेल जे ओ ओही परिवेशमे रहि अपन जीकवको पाजनार्थ अपन कौलिक धन्‍धाकेँ पुन: स्‍वीकार करय। एकर दू टा प्रभाव पडि़़ तैक । एक तेँ लोक अपन गृह-उद्योग दिस उन्‍मुख होइत आर दोसर शहरी परिवेशपर अनावश्‍याक दबाक नहि पडि़तैक। एहि परिप्रेक्ष्‍यमे हिनक एकाँकी ‘घरैया लूरि’ (1958) एक महत्‍वपूर्ण उपलब्धि थिक। विसुनदेव ग्रामीण परिवेशक परित्‍याग क’ विसेस्‍सरक संग कलकत्ता सदृहश महानगरीय परिवेशमे रोजगारक तलाशमे जयबाक आकांक्षी अछि। मुदा विसेस्‍सर शहरी परिवेशसँ परिचित रहलाक कारणेँ ओकर वास्‍तविक कठिनासँ अपन बाल संगी मित्र विसुनदेवकेँ एहन निर्णय करबा सँ सर्वथा मना करैत अछि: हम सौचैत छिऔक जे तोरा की करक चाहिअउ तो हूँ नीक जकाँ सोचि ले। वैदही, नवम्‍बर-दिसम्‍बर 1958 पृष्‍ठ 407) विसेस्‍सर, अपन नेक सलाक दैत छैक जे अपन पुश्‍नैनी अथार्त् करधा चलासु क’ अपन परिवारक संग, तखी –सम्‍पन्‍न रहि सकै। अछि एकर औ समुचित प्रबन्‍ध सेहो क’ दैत छैक जकर परिणाम होइछ जे विसुनदेव गामहिमे रहि अपन रोजगार क’ कए सुखी-सम्‍पनन भ’ जाइत अछि। विसुनदेवक देखा-देखी गोविन्‍द मिस्‍त्री, सैनी ठडेेरी एवं झिंगुर चमार द्वारा निर्मित पलंग, झालि ओ ढोलक बाजारमे छुहुका उडि़ अछि। एकांकी कोरक मान्‍यता छनि जो आधुनिक शिक्षा प्रणाली व्‍यक्ति- व्‍यक्तिकेँ रोजगार मुहैया नहि करा सकैछ। जा धरि व्‍यक्ति पुश्‍तैनी धन्‍धाकेँ नहि अपना ओत ता धरि ओकर सामाजिक परिवेश कोनो तरहक सुधारक सम्‍भावना नहि दृष्टिगत होइछ। अतएवं एकांकीक मूलस्‍वर छैक अपन कौलिक धन्‍धाक अनुरूपहि प्रशिक्षित भ’ कए काज करब। तखने हमर सामाि‍जक परिवेश परिवर्तित भ’ सकैछ तथा व्‍यक्ति-व्‍यक्ति सुखी सम्‍पन्‍न बनबाक कामनाक पूर्ति भ’ सकैछ। राष्‍ट्रपिता महात्‍मा गाँधीक रामराज्‍यक सपना एकरे फलस्‍वरूप साकार भ’ सकैछ। हमर प्रचीन सामाजिक व्‍यवस्‍थामे प्रत्‍येक जातिक कार्य ओकर सामाजिक परिवेशानुसारेँ विभाजित छलैक, नेँ वेरोजगारीक समस्‍या नहि उत्‍पन्‍न होइत छलैक वर्णाश्रमक जे व्‍यवस्‍था हमर समाज मे कयल गेल छलैक तकर मूल परिकल्‍पना इएह छलैक। किन्‍तु परिवर्त्तित परिवेशमे लोक ओहिसँ विमुख भ’ अछि तेँ वे रोजगारीक समस्‍या समाज ओ सरकारक समक्ष्‍ा उपस्थित भ’ गेल गेल अछि। प्रतिपाद्य एकांकीमे एकांकीकार मूल रूपेँ कुटीर उद्योग एवं गृह-उदयोकभि जदस यन सामार्न्‍षक ध्‍यानार्कण कयलनि अछि। अत्‍याधुनिक परिवैशमे समाजमे, देशमे, पुनर्निर्माण तथा सामाजिक चेतनाक आवश्‍यकता अछि। एकांकीकार अपन व्‍यक्तिगत जीवनक व्‍यावहारिक अनुभवक आधारपर समाज ओ देश मे प्रचलित योजनान्‍तर्गत घरैया लूरिक केन्‍द्र-विन्‍दु मे निरूपित कयलनि अछि। ओ समाजक ओहि पक्ष दिस संकेत कय‍लनि अछि जे अत्‍याधुनिकताक चक्रवातमे पडि़़ कौलिक क्रिया- कलापके तलांजलि द’ कए शहरोन्‍मुख हैबाक आकांक्षी भ’ गेल छछि। किन्‍तु प्रयोजन अछि जनमानसमे दिशा-निर्देशनक जकर फलस्‍वरूप ओकर कायाकल्‍न्‍य कयल जा सकैछ। उचित दिशा बोधक फलस्‍वरूप विसुनदेव, गोविन्‍द मिस्‍त्री, सैनी ठठेरी ओ झिँगुर चमार समािजक परिवेशमै रहि क’ अपन आर्थिक स्थिनिकेँ सुधारबाखा मे सक्षम भ’ सकलाह आ उननतिक शिखरपर चढि़ समाजक अन्‍य व्‍यक्तिकेँ अपन कौलिक व्‍यवसाय दिस उन्‍मुख कयलनि। मलरवि मे एकांकीकार हास्‍य-व्‍यंग्‍यक अद्भभुत धारा प्रवाहित कयलनि अछि। जहिना काव्‍य क्षेत्रमे एहि प्रवृत्तिक प्रस्‍फुटन भेल अछि तहिना ओकर वास्‍तविक स्‍वरूप एहि एकांकीमे स्‍पष्‍ट अछि जे पण्डिेतच लोकनि झूठक प्रपंच रसिार सर्वरधाणक शोषण करैत आयल छथि। एहिमे राउत लोकनिक तथा पंडित लोकनिक घूर्त्तताकेँ अत्‍यन्‍त मनोरंचक ढंगे एकांकीकार प्रस्‍तुत कया‍लनि अछि। स्‍वातन्‍त्र्योत्तर भारतक प्रमुख प्रवृत्ति जनसामान्यक समक्ष्‍ा आयल अछि भ्रष्‍टाचार। भ्रष्‍टाचारी प्रवृत्ति हमर जीवनमे एहि प्रकारेँ प्रवेश क’ गेल अछि जे ओहिसँ मुवितक मार्ग नहि भेटि रहल अछि। जीवनमे डेग-डेगपर एकर नग्‍न रूप स्‍पष्‍ट अछि तथा समाजकेँ अछि मुक्तिक मार्ग नहि भेटि रहल छैक। जँ परिचमी-एवसर्ड नाटक लक्ष्‍य द्वितीय महायुद्वोत्तर विसंगतिक चित्रण करब छल तँ स्‍वातन्‍त्र्योत्तर भारतमे उपजल करब चरित्रहीनता, एवं भ्रष्‍टाचारक केन्‍द्र-विन्‍दु पर तीक्ष्‍य-व्‍यंग्‍यक प्रहार कयल गेल अछि। उपर्युक्‍त परिप्रेक्ष्‍यमे हिनक हाकिमक हाकिम वा ननदिओ क नान‍दि मे स्‍पष्‍ट झाँकी भेटैत अछि। एहिमे एक निर्धन संस्‍कृत पाठशालाक शिक्षक चित्रक माध्‍यमे एकांकी ओहि भ्रष्‍टचारी डिप्‍टीक चरित्रकेँ उपस्थित कयलगेल अछि जे आकंठ भ्रष्‍टाचारमे डूबल अछि। डिप्‍टी साहेब भ्रष्‍टाचारक प्रतीक छथि जनिक निर्दयतासँ शिक्षिक समुदाय बेचैन रहैछ, किन्‍तु ओ एहि विषयेँ केँ सर्वथा बिसरि जाइत अछि जे ओकरो ऊपर कोनो अधिकारी छैक। संस्‍कृत पाठशालाक शिक्षक विदयालयसँ अनुपस्थित रहलाक कारणेँ पाँच टाका घूस। डिप्‍टीकेँ गछैत छथि, किन्‍तु टाकाक अभावक कारणेँ शीघ्रहि अदा करबासँ वंचित रहैत छथि। स्‍कूलक वाषिकोत्‍सवमे पण्डित जी चेयरमेन साहेबक सोझॉं रूपैया दैत छथि। एहि घाटनासँ डिप्‍टी साहेब आहत भ’ जाइत छथि कारण ओ हुनक हामि क छथिन। जहिना पारिवारिक जीवनमे ननदिक छैक ओ अत्‍याचार करबामे कनेको कुंठित नहि होइछ। अतएत एकांकीकार अत्‍यन्‍त नियोजित ढंगे सामाजिक परिप्रेक्ष्‍यमे घटित भेनिहार घटनाक चित्रांकन कयलनि अछि एहि एकांकीमे। निर्धनता सामाजिक जीवनक अभिशाप थिक। जतय प्राचीन समयमे समाजवादी समाज छल ततय आधुनिक परिप्रेक्ष्‍यमे व्‍यक्तिवादी समाजक स्‍थापना शनै:-शनै भ’ रहल अछि। एकर श्रेय छैक पश्चिमी संस्‍कृति ओ सम्‍यताकेँ। वर्त्तमान शताब्‍दीक उत्तर्द्धहमे सामाजिक परिवेशमे एतेक शीध्रतसँ परिवर्तन भ’ रहल अछि जे सामाजिक स्‍वरूप परिवर्तित भ’ गेल अछि।व्‍यक्ति आब एतेक बेसी आत्‍मकेनिद्रत भ’ गेल अछि जे एमसम शताब्‍दीक प्रवेश करैत-करैत अपन प्राचीन परिवेशक परित्‍याग करबाक हेतु विवश भ’ गेल अछि। हमर सामाजिक परिवेश कतेक दूषित भ’ गेल अछि तकर वास्‍तविकताक चित्रण एकांकीकार कयलनि अछि दिशाबोध एकांकी मे। सुन्‍दर युवावस्‍थाक प्रचण्‍ड बिहाडि़मे सामाजिक परिवेश परिवर्त्तित भ’ जयबाक कारणेँ एहन दिग्‍ग्रमित भ’ गेलाह ने अपन वृद्ध माता पिता पर्यन्‍तकेँ अपन सुख-सुविधाक जिनगीमे बाधक मानैत छथि। किन्‍तु हुनक पत्‍नीपर परम्‍पराक छप एतेक वेशी छनि जे आधुनिक परिवेशमे रहितहुँ ओ अपन मर्यादाक पृष्‍ठपोषिकाक रूपमे जन सामान्‍यक समक्ष्‍ा प्रतिस्‍तुत होइत छथि। इएह कारण अछि जे हुनका अपन ससुर एवं सासुक प्रति असीम श्रद्धा ओ सदभावना छनि। एकर पालन करबाक हेतु ओ अपन पतिक विरोध करैत छथि: हम अहाँक गार्णिजन किऐक रहब, मुदा जे माय- बाप एतेक सिद्धति सहि क’ पोसलनि- पाललनि, लिखौलनि- पढ़ौलनि , ताहि मायक वास्‍ते दवाइ लय अहॉं कहैत छिएेक नूढ़ा भीटय चाहैत छथि आ सिनेमा मे पाइ फेकय जाइत छी से उचित थिकैक (मिथिलामिहिर. 16 जुलाई, 1978) सुन्‍दर पत्‍नीक मानसिक दशाक विश्‍लेषण करबामे सर्वथा असमर्थ छथि; कारण आधुनिकताक अन्‍हरजाली हुनका लागल छनि। तेँ पत्‍नीकेँ एकाकी छोडि केँ’ सिनेमाक लाथ घर सँ पड़ा जाइत छथि। एकांकीकार पति-पत्‍नीक वैचारिक भिन्‍नत्केँ यथार्थक घरातलपर आनि सामाजिक परिवेशमे बदलैत मानसिकताक विश्‍लेषण करबामे सफल भ’ पौलनि अछि। एतय ओ सामान्‍य पाठककेँ सोचबाक हेतु बाध्‍य करैत छथि जे अल्‍यवेतन –भोगी कर्मचारीक मानसिकता आधुनिक सामाजिक परिवेशमे केहन भेल जा रहल अछि। ई मानसिकता मात्र किरानीक नहि, प्रत्‍युत समपूर्ण समाजक भ’ गेल अछि। सुन्‍दर केँ परिस्थितिक वास्‍तविकताक ज्ञान तखन होइत छनि जखन ओ अपन बालसंगी केँ नूनूकेँ अपन वृद्ध माता-पिताक प्रति अगाध आत्‍मीयता ओश्रद्धा देखैत छथि जे वस्‍तुत: अनुकरणीय एवं सराहनीय अछि। पत्‍नीकेँ प्रताडि़़त क’ कए ओ नूनूक ओतय उपस्थित होइत छथि। नूनू एम्.ए. इन फिलॉसिपी छथि तथापि ओ नौकरीकेँ परामुखापेक्षी मानैत छथि, की इएह आधुनिक सम्‍यता वा सामाजिक परिवेशक उपज थिक। सामाजिक परिवेशमे एहन लोकक अभाव नहि जे वस्‍तुस्थितिक यथार्थत सँ बिनु अवगत भेनहि ओकर सत्‍यापनक पाछाँ अपस्‍याँत भ’ जाइत अछि। एकांकीकार कौआ ल’ गेल कनि मे एहने एक घटनाक नियोजन करबाक उपक्रम कयलनि अछि। डाक्टरक पुत्र मनोज तथा धन्‍नूक पुत्र मोहनक विवाहा अपहरण क’ कएकरबाक अपवाह सँ दुनू मित्र कि कर्त्तव्‍य विमृभूढ़ भ’ जाइत छथि; किन्‍तु वास्‍तविकताक रहस्‍योदघाटन होइत समग्र चिन्‍ता प्रसन्‍नता मे परिवत्तित भ’ जाइछ। हास्‍य-व्‍यंग्‍यसँ उब-डूब करैत हिनक एक एकांकी थिक वाइचान्‍स। शिक्षा प्रकाशसँ कोसो दुर रहलाक कारणेँ बिजलीकान्‍त कोना अपन पितोकँ ठकलनि तकयथार्थतासँ परिचय करौलनि सत्‍यनाराण पूजाक घूमधामसँ आयोजन कयलनि किन्‍तु यथार्थ वस्‍तु स्थितिसँ अवगत भेलापर हुनक मानसिक स्थिति कोन तरहक भ’ जाइत छनि तकरे एहि मे उदधारित कयल गेल अछि। पात्र : पात्र एकांकी प्रणेताक मानसिक सन्‍तान होइछ। आकेरामे रक्‍तबीच संचरण करैछ। ओहिमे संकल्‍प- विश्‍वासक गोत्रता तथा जीवन दर्शनमे वंशजता रहैछ। ओकर समस्‍त अभिजात्‍य कौलिक रहैछ जकर सम्‍पूर्ण वर्ण शुद्व सेहो रहैछ। समग्रत: अपन प्रणेताक जीवन्‍त रंग साक्षत्‍कारक जीवन्‍त रचना थिक। ओहिमे रागात्‍मकता, आसंग सृजन-संकल्‍पना, नाट्यानुमव, रंग- संस्‍कार तथा रंग-राशिक तात्विक संधातसँ उद्भभूत रंगपुत्र अछि। एकांकी प्रषेताक आन्‍तरिक रंगयज्ञक रंग कुण्‍डसँ उत्‍पन्‍न तथा वरदान रूपमे प्राप्‍त रंग सिद्धि रंगवंशी रंगकुमार अछि। एकांकी प्रणेताक रंग प्रक्रियामे रचनामे पात्र केहन होइछ? ओ रंग-प्रक्रियामे कतय सँ अबैत अछि ?एहि प्रश्‍नसँ वाचिक आगाँ जायब युक्ति संगत नहि होयत। एरवन धरि बहुधा पात्रक गुण-प्रकार वर्ग तथा ओकरा संगक बात होइत अबैत हो, अधिकांशत: पृष्‍ठपेषण होइत अछि। पात्रक रंगप्रक्रियापर बड़ कम विचार भेल अछि। पात्र तँ रचनाकारक मानसिक सन्‍तान होइछ। रचनाकारक जीवनगत प्रतिबद्धतामे पात्रक मर्यादा थिक। ओ सेहो जीवनक प्रति ओहिना प्रतिबद्ध होथि। हिनक पात्र योजनापर दृष्टिपात करैत छी तॅं स्‍पष्‍ट भ’ जाइछ जे ओ मध्‍य एवं निम्‍नवर्गीय सामाजिक परिवेशक प्रतिनिधित्‍व करैत देखल जाइत अछि जकरा समक्ष रोजी’-रोटीक संगहि-संग अपन जीवपको्णार्जनार्थ विविध समस्‍या सुरक्ष सदृश मुह बौने ठाढ़ छैक एहिट्टष्‍टिएँ स्‍थान एवं घरैब्रयल लूरिक अधिकांश पात्र निम्‍न गमैया सामाजिक परिवेशक प्रतिनिधत्‍व करैत अछि। मलनदिओ केँ ननादि, भरवि, दिशा बोध, वाइचान्‍स, कौआ ल’ गेल कानक अधिकांश पात्र सेहो ओही श्रेणीमे अबैत छथि।मध्‍यवर्गीटा श्रेणीमे घरैयालूरिक महेन्‍द्र बाबू ब्रहमस्‍थानक हरिवंश बाबू एवं ननदिओ केँ ननदकि चेयरमैन प्रतिनिधित्‍व करैत छथि। उच्‍च वर्गक पात्रक अभाव हिनक एकांकी मे अछि। वस्‍तुत: हिनक पात्रक संघर्षमे सामाजिक समायोजन (सोसल एडजस्‍टमेण्ाष्‍ट ) क भावना सन्निहित अछि। हिनक आत्‍मसम्‍मानी पात्र अपन प्रकृतिक विरोधी नकारत्‍मक प्रवृत्तिक सामाजिक प्रवत्तिसँ अपन मेल नहि बैसा पबैत अछि। अतएव समयायोजनक स्थितिमे ओ मानसिक आशांतिक अनुभव करैत अछि जे कोहुना ओहि मानसिक तनावसँ मुक्ति भेटय एकरा हेतु ओ अपन समायोजनक कारण भूत विरोधी प्रवृतिकेँ परास्‍त करय चाहैछ। एहि प्रयासमे ओकर समाज-विरोधी प्रवृतिसँ संघर्ष करय पड़ैत छैक। एहि प्रकारेँ आत्‍मसम्‍मानसी पात्रक संधर्ष सामाजिक समायोजनक दिशामे कयल गेल एक प्रयास थिक। इएह हुनक अन्‍त:स्‍थ सामाजिक प्रेरणाकेँ व्‍यावहारिक क्षेत्रमे आनि क’ अपस्थित क’ दैत अछि। एहन संघर्षमय प्रयासक फलस्‍वरूप आत्‍मसामनी पात्रक व्‍यक्तित्‍व निर्मित भेल अछि जे हिनक मिथिलांचलक समाजक एकांकीक अनुपम देन थिक। ब्रहास्‍थान क पचकौड़ी एही श्रेणीक पात्र अछि जे अपन आत्‍म-सम्‍मानक रक्षाचार्थ ब्रहाकास्‍थानकेँ कोडि क’ हुनक अस्तित्‍व केँ मेटैबाक लेल तैयार अछि। सत्ता आँखिक सोझॉं नव-दर्शक निर्माणक करैत अछि जहिमे एकमात्र स्‍व रहैत अछि। स्‍वार्थान्‍ध सत्ताकेँ जीवित रखबाक हेतु म‍दति कयनिहार व्‍यक्ति आत्‍मकेन्द्रित बति जाइत अछि। किन्‍तु ओकरा संधर्ष ओ करैत अछि जकरा लोकतन्‍त्रमे विश्‍वास एवं निष्‍ठा छौका। जे व्‍यक्ति सत्ताक विरोधमे नारा लगबैत अछि तकरापर विपत्तिक पहाड़ टूटि पड़ैत छैक। तथा नैतिकता आ सत्ताक बल पर व्‍यक्तिक मनोबल बढ़ैत छैक आ असत्त वृत्तिक संरक्षक कालजयी सेहो सदवृत सँ डेराय लगैत अछि। एहि प्रकारक जन-जागृतिक कार्य एकमात्र साहित्‍ये द्वारा संभावित अछि। हरिवंश बाबू गामक मुखिया छथि तेँ हुनक आज्ञाक बिना गामक एक पात पर्यन्‍त नहि हिलि पबैत अछि। ओ एतेक बेशी स्‍वार्थान्‍ध छथि जे ओ अपन स्‍व क पूर्तिक निमित्त निरीह सुगियापर प्रहार करबामे कनेको कुठित नहि होइत छथि, कररण ओ। हुनकर बेटा नूनू बचबाक आआक उल्‍लंधन कयलक अछि। जाहिसँ हुनका चोट पहुँचैत छनि यदयपि ओकाद बेहा मखना अठारह दिन सँ ज्‍वराक्रान्‍त छैक माया, मोह, तथा ममता नामक कोनो वस्‍तु हुनक अन्‍तरात्‍मामे नहि छनि। तेँ निर्द्वायता पूर्वक व्‍यवहार करैत छथि जकर परिणाम अत्‍यन्‍त भयावह हाेइछ। जाहि ग्रामांचलमे अशिक्षा एवं अन्‍ध श्रद्धाक प्रभाव रहत ओतय निर्घनिता तथा शोषराणक पराम्परा निशिचत रूपेँ रहौक। अधंश्रद्धाक प्रतीक छथि पंचकौडी तथा हुनक पत्‍नी सुगिया जे ब्रह्मस्‍थानपर कबुला पानी क’ कए मखनाक नीके होयबाक कामना करैत छथि। शोषित वर्गमे एकता अवश्‍य अछि तथा सदयपा छाप ओ अन्‍याय सँ डेरायल रहैत अछि, किन्‍तु ओहि मुक्‍त होयबाक इच्‍छा अवश्‍य रखैत अछि। मुदा सामाजिक परिवर्तित परिवेशमे से सम्‍मव नहि भ’ पबैत अछि। वर्त्तमान परिवेश मे एक दोसराक उपयोग करबाक पाछॉं बेहाल अछि। एहि लेल कोनो तरहक योग्‍यता अपेक्षित नहि प्रत्‍युत एक हथकण्‍डाक प्रयोजन अछि। मुदा एत्तबा निश्चित अछि जे लोक अपन लाभक लेल आेकर उपयोग दोसरापर करैत अछि। ई परम्‍परा समाजमे सतत चलैत रहैत अछि। एक बेर आक्‍टोपसक शिंजामे पडि़़ गेलापर वापसीक मार्ग अवरूद्व भ’ जाइत छैक। घरैचा लूरिक महेन्‍द्र बाबू आ ब्रहमस्‍थान क हरिवंश बाबू एही श्रेणीक पात्र छथि। जतय महेन्‍द्र बाबू अहि श्रेणीक प्रतिनिधि छथि जे शोषित वर्गक शोषण सूदिपर रूपैया लगा क’ करैत छथि। आसमाजक साइलॉक सट्टश छथि जे खदुकाक कोंढ़-करेज पर्यन्‍त खोरैैबामे कनियो कुठित नहि होइत छथि ततहि हरिवंशबाबू अहंकारी व्‍यक्ति छथिा जे शोक वर्ग पर अत्‍याचार करैत छथि। यद्यचप शोषित समाज हुनका सभक गतिविधि सँ पूर्णरूपेण परिचित अछि तथावि बेर-घड़ीपर वै‍ह काज अबैत छथिन तेँ विरोध करबाक प्रश्‍ने ने उठैछ। अत्‍यल्‍य पात्रक प्रयोग क’ कए दिशाबोध एकांकीक रचना एकांकीकार कयलनि। एहि मे कुल चारि पात्र अछि। नूनू, हुनक वृद्ध। पिता, सुन्‍दर तथा हुनक युवती पत्‍नी। हमर सामाजिक परिवेशक उक्‍त चारू पात्र मानसिक विश्‍लेषण करबामे सक्षम भेलाह अछि। आधुनिक सामजिक परिवेशक प्रतीक छथि सुन्‍दर जे भौतिकवदी युगमे अपन जीवनकेँ सुखी-सम्‍पन्‍नसानन्दित बनयाबामे निम्‍न सँ निम्‍न स्‍तरपर जा सकैत छथि। किन्‍तु युवती पत्‍नीक विद्रोही तेवर एतेक बेसी प्रखर अछि जे हुनका सोझाँमे ओ अँटकि हिि पबैत छथि। किन्‍तु नूनू कर्तव्‍यनिष्‍ठ पात्र छथि जे एम.ए. इन फिलॉसफी रहितहुँ अपन कर्त्तव्‍यपरायणता पाठ अपन व्‍यवहार सँ पढ़ा क’ दिशाबोध करबैत छथि। नूनूक चरित्र सँ शिक्षित भ’ कए सुन्‍दर अपन सग्‍न कायक इलाज कलेल तरपरला देखायब अपन पुनीत कर्तव्‍य बझैत छथि। एकांकीकार दिग्‍भ्रमित सामाजिक परिवेशक जे वास्‍त्‍वक माि‍नसकता भेल जा रहल अछि तकर यथार्थतासँ जन सामान्‍यकेँ परिचित करयबाक प्रयास कयलनि अछि जे आध्‍ाुनिक परिवेशमे उपेक्षणीय नहि प्रत्‍युत ग्रहणीय अछि। संवाद : रंग रचना चाक्षुष यज्ञ थिक तथा रङ्गनुष्‍ठान ओकर कर्मकाण्‍ड। संवादक ऋचा स्‍तवनसँ युग पुरुषकेँ साक्षात् कयल जाइत अछि। रंगानुभव यज्ञ पुरुषक एहि गायित्री गायनसँ अवगाहन पबैत अछि आर सम्‍पूर्ण रंगकर्ममे प्रत्‍यक्ष होइत अछि। अतएव संवादक मन्‍त्रोचारसँ रंग कर्मक साक्षात्‍कार होइत अछि। एहि ऋचागायनक निशिचत व्याकरण अछि। एहि प्रकारेँ संवादक प्रस्‍तुतनीकरणक सेहो एक संहिता अछि जे ओहिमे निहित अछि । संवाद रंगानुभवक आत्‍मज थिक। संवाद रंग कर्मक व्‍यवहार ओ आचारण थिक निर्देशक , सूत्रधार ओ रंगकमीर्रक संवादमे रंगकर्म मंचन आ अभिनयक दिशाक अन्‍वेषण करैत छथि। कारण संवादक प्रत्‍येक शब्‍द, वाक्‍य रंगसिद्धिमे रहैत अछि। अतएव पूर्ण संवाद रचना मे एक तँ प्रत्‍येक शब्‍दसँ रंगकर्मक किरण फुटैत अछि, दोसर सम्‍पूर्ण संवाद एहन रंगसिद्ध शब्‍दक अनुशासित समन्‍वय सँ एक एहन आलोक विम्‍ब प्रस्‍तुत करैत अछि जे रंगकर्मक दिशा संकेत करैत अछि। संवाद पात्रक बहुविधि व्‍यक्तित्‍वक दर्पण थिक, ओकर विधायिका चारिि‍त्रकताक समानुपातिक विकासक मानदण्‍ड थिक। संवाद रचनामे नाटक प्रणेताक अत्‍यन्‍त कठिन भूमिका रहैत छनि। हुनका एकहि संग विविध पात्रक भूमिकामे उतरिक’ ओकर मन: स्थितिक अनुरूप संवाद रचना करय पड़ैत छनि। कतहु संवाद आरोपित नहि लागय, पात्रक प्रकृति ओ रंगवेदनाक प्रतिकूल नहि हो जकरा सतत ध्‍यानमे राखय पड़ैत छनि। कहल उपर्युक्‍त परिप्रेक्ष्‍यमे हिनक संवाद योजनापर दृक्पात कयलापर स्‍पष्‍ट प्र‍तीत हाेइत अछि जे ओ प्रत्‍येक पात्रक संवाद-योजना ओकर परिस्थितिक अनुकूलहि निरूपण कयलनि अछि। प्रहसनमे जतय हास्‍य-व्‍यंग्‍यक प्रमुखता रहैत अछि ततय ओ तदनुरूपहि संवाद- योजना कयलनि अछि। हिनक प्रत्‍येक संवाद एहन बुझना जाइछ जेना ओ स्‍वयं पात्रक रूपमे उपस्थित भ’ कए अपन बात ओकरा मूहे कहल्‍यबाक प्रयास कयल‍नि अछि। हिनक एकांकी ओ प्रहसनक एक विशेषता अछि जे एकांकीकार ओहिमे पात्रोचित भाषाक संगहि-संग ग्राम्‍य भाषाक प्रयोग एतेक सहजताक संग कयलनि अछि जकर पछिणाम भेल अछि जे हिनक भाषा-शैली अत्‍यन्‍त मर्मस्‍वर्शी बनि गेल अछि। यदपिण ई संस्‍कृतक पण्डित छ‍थि जनिका तत्‍सम शब्‍दक प्रयोग करबामे विशेष आभिरुचि रहबाक चा‍ही; किन्‍तु ई भाषा प्रयोगमे एतेक, उदारचेता छ‍िथ जे हिनक चाहे काव्‍य भाष हो चाहे गदयभाष हो ओहि मे ठेंठ सँ ठेंठ शब्‍दावलीक एतेक प्रचुर परिमाणमे प्रयोग करैत छथि जे पाठकक मर्मकेँ स्‍पर्श करबामे सहायक होइत अछि।जतेकदूर धरि एकांकी ओ प्रहसनमे भाषा प्रयोग क प्रश्‍न अछि ओहि परिप्रेक्ष्‍यय मे निर्विवाद रूपेँ जा सकैछ जे लोकोवितक प्रयोग करबामे ई महारथ हासिल कयने छथि जे पाठक क ध्‍याना-कर्णित करैत अछि। प्रहसन ओ एकांकीक भाषाशैली वा संवाद योजना प्रस्‍तुत करबाक शौली एतेक सक्षम अछि जे नेपथ्‍यमे कोनो प्रकारक आडम्‍बर करबाकक प्रयोजन नीित पड़ैछ जे ओकर भूमिकाक नहि निर्माण करैछ। पात्र जखन परस्‍पर वार्तालय करैछ तखन अपन मौन, आवेग, स्थिर दृष्टिएँ, कखनो-कस्‍नो हँसि क’ कखनो- कखनो बीचमे रूकि क’ नाटकीय प्रभाव गम्‍भीर बना दैत अछि। एहि प्रकारेँ मंचीय सम्‍भावनासँ परिपूर्ण हिनक प्रहसन ओ एकांकी सामाजिक जीवनक विभिन्‍न समस्‍याकेँ जहिना-तहिना प्रस्‍तुत कयलक अछि। मिथिलांचालमे प्रचालित मुहावरा ओ लोकोकितक प्रयोगमे हिनक काव्‍य भाषाक संगहि-संग गद्यभाषाक वैशिष्‍ट्य अछि। हिनक एहि प्रवृत्तिक प्रतिफल प्रहसन ओ एकंाकीमे सेहो उपलब्‍ध होइत अछि जकर किछु बानगीक अवलोकन कयल जा सकैछ यथा पेट काटि क’ पोसल पूत सैह कहै फलनामा भूत परिलागब, दातँ नियोड़ब, हक्‍कर पेलब, जीक पातर, नङो- चङो करब, मनक मनोरथ मनहि बिलटल, आन करैत आन भेल हो रामा, गाल लगाययब, अमार लगायब, बहिरा नाचे अपने तालेँ, कुकुर माछी काटब, रनरनायब फिरब, बङौर लगाएब, भोथहा कलमय सनक सवार, मन लोहछब, गुमाने फाटब, पाँतरमे पड़ब, काछर काटब वंश कुड़हरि, मुडि़ऐल फिरब, कनहो गाके केॅं भिन्‍ने बथान, कटहर मे नेढ़ा लगाएब, भोँडो छुड़ल ओ पेटो नहि भरल, सोनक दोष की सोनारक दोष, पहाड़ ढाहब, छौड़ी सिखाबय बूढ़दादीकेँ ‘बुडि़सही, खोप सहित कबुतराय नाम:, रड़ धुम्‍मस करब, दम्‍म ने दुस्‍सा। खाली खोप सहित कबुतराय नम: रड़ धुम्‍मस करब, दम्‍म ने दुस्‍सर खाली बात पकठोस, गप्‍पी क खरिहान, दूर ढोल सा‍हओन, पेट छूटल गोनू झाक ढाकी, कनहा नक्ष्‍छर, नाक दम ठेकब, यमराज पित्ती, आँखि गुड़रब, कमला कातक दड़ारि जकाँ मुह बायन,या जीवइ छी ने मरइ छी हुकुर-हुकुर करइ छी, भोकना बिलाड़, सुखिक’ टिटही, फिफिआइत रहब, छुहुक्‍का उड़ब, खगल लोक, डाँर पीठ एक्‍कठा होयब, हकलिलो भेल फिरब , खगले लोक की ने करय, पेट पहाड़, सुरता लागब, घूड़ घूऑं करब, राही लागब, लते पत्त दौड़ब, जोगार धरायब, छप्‍पान छूरी चम कायब, कबुला करब, जिन्‍म पोसब, आँखि फुटब, एक बजा। सतरह आबे, अकाश ठेकब, साटिधट राखब, लटारहम करब, खेखनियाँ करब, कुर्रकाई करब, ऑंटागील करब, उत्तम खेती मध्‍यम वान, अधम चाकरी भीख निदान, हाथ पकड़ब, सेवा सँ मेवा पायब, कौआ ल’ गेल कान, इयादि। एहिसँ स्‍पष्‍ट भ’ जाइछ जे हिनका भाषापर अदभुत अधिकार छनि तथा पात्रक मुहे सुनैत देरी दर्शककेँ स्‍वयं आत्‍मबोध भ’ जाइत छैक। एकांकी एवं प्रहसनक भाषा अन्‍य साहित्यिक विधादिक तुलनामे एक पृथक संस्‍कारसँ संयुक्‍त अछि। यथार्थक आग्रह कारणेँ ओकरा सामान्‍य जीवनक बोली वर्णक भाषासँ निकट होयब अनिवार्य अछि।हिनक एकांकी ओ प्रहसन सामान्‍य भाषाक भीतरहिसँ संचरित संस्‍कारित भेल अछि। एहि रूपमे एकांकीक वस्‍तुक लेल तथ्‍ये नहि करैछ. प्रत्‍चुत सम्पूर्ण रचनातन्‍त्रक निर्माण सेहो करैछ। वस्‍तुत: हिनक एकांकी ओ प्रहसनक भाषा सम्‍पूर्ण सम्‍प्रेसणक भाषा थिक जाहिमे एक-एक शब्‍द कहल गेल अछि ओ महत्‍वपूर्ण नीिह महत्‍वपूर्ण अछि एक सम्र प्रभाव आर ओ जे नहि कहल गेल अछि, जे, ध्‍वनित-व्‍यंजित मात्रा कयल जाइत अछि। भाषा हिनक व्‍यक्तित्‍वमे रचल-बचल छनि जे सामजिक परिवेश, मान‍सिक चेतना सब मिलि क’ हिनक भाषिक प्रतिभाक निर्माण करबत्तमे सहायक भेल अछि। हिनक सर्जनात्‍मक वोध, चयन ओ संयोजनक सायास आग्रह सामान्‍यसँ विशिष्‍ट बना देलनि अछि। गीत: अमर मूल रूपेँ कवि छथि तेँ एकांकीमे सेहाे स्‍थल-स्‍थलपर हिनक काव्‍य प्रतिभाक प्रस्‍फुटन भेल छनि जकर प्रतिफल छरैथा लूरि, हाकिमक हाक्रिय एवं ‘ श्रमदानमे सेहो हिनक काव्‍य- प्रतिभा सँ पाठक एवं दर्शक परिचित होइत अछि धेरैयालूरिमेढोलक झालिपर गबैत एक मण्‍डली प्रवेश करैत अछि जकर विषय-वस्‍तु थिक राष्‍ट्रपिता महात्‍मा गाँधी द्वारा देखाओल गेल गृह-उद्ययोग एवं कुटीर उद्योग, तकर महत्तापर प्रकाश देल गेल अछि। एहि एकांकी मे प्रयुक्‍त गीतक महत्‍व मूलस्‍वर थिक जनसामान्‍यकेँ एहि दिस आकर्षित करब। हाकिमक हाकिम वा ननदिओक ननदिमे सहो उक्‍त परम्‍पराक पालन कथयल गेल अछि जखन मिडिल स्‍कूलक प्रागंणमे चेयर मैन साहेब उपस्थित भ’ छात्र लोकनिकेँ वार्षिकोत्‍सवक अवसरपर परितोषिक देबाक लेल जाइत छथि तखन हुनक स्‍वागतर्त्‍थ स्‍वागत गानके आयोजन कयल जाइत अछि। श्रमदान एकांकीमे सेहो एहि परम्‍पराक निर्वाह कयल गेल अछि। स्‍वंय सेवकक दल कान्‍ह पर कोदारि आर हाथमे छिट्टपा ल’ कए श्रमक महत्ताकेँ प्रतिदित करैत मातृभूमि भारत माताके आद्धान करैत छथि जे मानवतापर दानवताक स्‍पष्‍ट झाँकी भेटि रहल अछि। एहिन विषम स्थितिमे दलितक उद्धारक हेतु एहिसँ उत्तक साधन आर की भ’ सकैछ ? श्रमक मोध्‍यमे हमरा समक उद्धार संभावित अछि। एहिसँ प्रेहित भ’ कए गैआ सब मिलि क’ देशक निर्माण, अपन भाग्‍यक निर्माण तथा भावीप संतानक भविष्‍य निर्माणक हेतु कोशक वन्‍दना करैत देखल जाइत छथि जाहिमे मातृभमिक कल्‍याणार्थ क्रान्तिकारी डेग उठबैत विश्‍व बन्‍धुत्‍वक भावनासँ प्रेश्‍‍िरत भ’ कए आबाल-वृद्व वनिता देशक नव-निर्माणक हेतु सन्‍नद्ध भ’ जाइत छथि जे त्‍याग तस्‍पया , आलस्‍य, भय, आदिक परितगक , देशक निर्माण मे लागि जाथि। उपर्युक्‍त तीनू एकांकी गीतक शब्‍द-विन्‍यास संगीत परम्‍परानुरूप अछि। उद्देश्‍य : चन्‍द्रनाथ मिश्र ‘अमर’ क जतबे एकांकी ओ प्रहसन प्रकाशमे आलय अछि ओहिमे एकांकीकार मिथिलांचलक परिप्रेक्ष्‍यमे जाहि सामाजिक समस्‍यादिकेँ प्रस्‍तुत कयलनि अछि ओ मात्र मिथिलांचलेक समस्‍या धरि सीमित नहि अछि, प्रत्‍युत सम्‍पूर्ण भारतवर्षक ओहि सामाजिक परिवेशक समस्‍या थिक जाहि परिवेश मे भारतीय निम्‍न एवं ध्‍यीलवत परिवार गुजरबसर करैत अछि। हमरा जनैत एकांकी ओ प्रहसनक रचनाक पाछाँ एकांकीकारक सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण उद्देश्‍य रहलनि अछि जे एक‍रा माध्‍यमे मिथिलांचक सामाजकि परिवेक पुनर्निर्माणक संगहि संग समाजमे एक एहन चेतना अानब जाहिसँ जार्जरित समाजक कायाकल्‍य जा सकय । एक सफल शिक्षक होयबाक कारणेँ व्‍याव‍‍हािरक जीवनक अनुभवक आधारपर एक युगद्रष्‍टा साहित्‍कार सहृश ओ इएह सन्‍देश देबाक उपक्रम कयलनि जे शिक्षा जगतमे आमूल परिवर्तन, परिवद्धन ओ परिमार्जनक प्रयाेजन अछि। एहि पृ‍ष्‍ठभूि‍ममे ओ अपन एकांकी ओ प्रहसनक विषयवस्‍तुक चयन कयलनि जे व्‍यावहारिक जीवनमे जनसामान्‍यक हेतु लाभ प्रद सिद्व भ’ सकय। प्रत्‍येक व्‍यकितक जीवनक एक सुनशिचत उद्देश्‍य होइछ। ओहि ध्‍येयक प्रािप्‍तक हेतु व्‍यक्ति सब किछु तन-मन-धन समर्पित क’ दैत अछि। पुस्‍तक मनुव्‍यक गुरु एवं मित्रक संगहि सब किछु अछि। ओहिसँ फराक रहि क’ मनुष्‍य केँ सुखक अनुभूति नहि भ’ सकैछ। मृगतृष्‍णाक पाछाँ-पाछाँ दौड़लासँ मनुष्‍यकेँ मात्र थकाने होइत छैक। किन्‍तु पुस्‍तकमे व्‍यस्‍त रहलापर मानसिक समाधान ओ ज्ञानक संगहि सम्‍मान भेटैछ। अतएवं समाजसँ किछु माँगबाक लालसासँ नीक थिक जे अध्‍ययन- अद्यापनक सत्‍य दुनिया अपनायब राजमार्ग थिक। चन्‍द्र नाथ मिश्र अमरक विफुल साहित्‍य साधनाकेँ देखि प्रतिभाषित होइत अछि जे हिनक साहित्‍य साधना निशिचत रूपेँ हिनक राजमार्ग छनि जकरा अनुसरण क’ कए एतेक अवदान मैथिली साहित्‍यकेँ श्रीवृद्वि बनयबामे द’ पौलनि ओ जाहि सामाजिक परिवेशक प्रश्‍न एकांकी ओ प्रहसनमे उठौलनि ओ निश्चित रूपेँ मिशिलाक पृष्‍ठभूमिमे एक अभिशाप थिक। ब्रहास्‍थान एक उल्‍लेखनीय एकांकीक रूपमे पाठकक समक्ष अबैत अछि जाहिमे एकांकीकार निम्‍नवर्चय गमैया समाजक प्रतीक रूपमे सुगिया ओ पंचकौड़ीकेँ प्रस्‍तुत क’ कए ई जनयबाक उपक्रम कयसलनि अछि जे युग-युगसँ सीदित अछि, पीडि़त अछि, जकरा पर अत्‍याचार तँ अवश्‍य होइत छैक; किन्‍तु अपन आक्रोशकेँ गामक मुखिचा हरिवंश बाबू पर नहि प्रकट क’ कए ब्रहास्‍थान पर प्रकट करैत अछि जे भगवान सेहो शोषक वर्गक संग मिलि क’ अत्‍याचार करबा मे सहयोग देबामे कनेको कुंठित नहि होइत छथि। जाहि समाजमे अशिक्षा ओ अन्‍धश्रद्धाक प्रभाव छैक ओतय गरीब तथा मजदूरक शोषणक परम्‍परा बनि क’ रहि जाइत अछि। ओकर मानसिकता एहन छैक जे ओने तँ भगवानक विरोध क’ सकैत अछि आ ने शोषक वर्गक प्रति‍निधि बनि क’ मूक रहि सकैछ। ओ अन्‍यायसँ डेरायल अछि तथा ओहिसँ मुक्ति पयबाक आकांक्षी सेहो अछि। एतय संघर्ष दोसर पक्ष सेहो अछि जे मुखिया एहि अन्‍यायक एक पुर्जा मात्र अछि। सामाजिक यथार्थ विषयक चयन करबाक पाछाँ चन्‍द्रनाथ मिश्र अमरक मुख्‍य उद्देश्‍य छनि समाज-सुधार तथा जनसामान्‍यकेँ एहि दिस आकार्षित करब। एकांकीकार समाजक अन्‍यायपर प्रकाश द' कए जनसामान्‍यमे चैतन्‍य उत्‍पन्‍न कयलनि अछि। ओना तँ सभ देशक नाटककार सामाजिक विषयकेँ आधार बना क’ कतिपया नाटक एकांकी ओ प्रहसनकार रचना कयलनि अछि जे पाठक वा दर्शक क आक‍र्पणक केन्‍द्र बनल अछि। भारतीय एकांकीकार ओ प्रहसनकार सामाजिक यथार्थक पूर्ण उपयोग कयलनि। प्रस्‍तुत एकांकीकार सामाजिक विषयक अधार बना क’ सुधार करबाक दिशामे प्रयास कयलनि। ओ मिथिलांचलक क’ सामाजिक जीवन मे विस्‍तृत कुशीतिकेँ देखलनि तथा ओहिपर व्‍यंगयाताक शैलीमे प्रहार कयलनि। एकांकीकारक सुधारक वृत्तिक परिणाम सररूप समाजक जीवैत-गैत चित्र जनसाधरणक सोझाँ प्रस्‍तुत भेल तथा नवीन भारनाक विकास क लेल मार्ग प्रशस्‍त भेल। समाजक परिकार भावनासँ प्रेरित भ’ कए ओ एकांकी एवं प्रहसनक रचना कयलनि तथा सामाजिक परिवेशक अन्‍तरर्गत वर्गगत बिडम्‍बना केँ नष्‍ट करबाक अद्देश्‍सँ ओ हास्‍य-व्‍यंगयकेँ प्रमुख साधन बनौलनि। संभवत: एहि वास्‍तिवकतासँ अवगत नहि रहलाक कारणेँ डाॅ. दुर्गानाथ झाश्रीश () मैथिली साहित्‍यक इतिहास (1991) मे हिनकापर जे आरोप लगौलनि जे हिनक एकांकी जाहि प्रचार-प्रसारक स्‍वर अत्‍यन्‍त प्रमुख भेलासँ प्रत्‍येक एकांकी, सरकारी प्रचार साहित्‍य जकाँ लगैत अछि (पृ‍ष्‍ठ-301)। हमारा दृष्टिएँ दुर्गानाथ झा श्रीशक ई कथन सर्वथा दिग्‍भ्रमित विचार थिक, कारण साहित्‍यक प्रमुख उद्देश्‍य होइछ जे समाजमे घटित भेनिहार घटनाक यथार्थ पाठक ओ दर्शक केँ अवगत करायब समाजक अभावमे साहित्‍य महत्वहीन भ’ जाइछ। एकांकीकार चन्‍द्रनाथ मिश्र अमर समाजक यथार्थक चित्रण क’ वास्‍तविकतासँ अवगत करयबाक प्रयास कयलनि जे सर्वथा ग्रहणीय अछि, अनुकरणीय अछि, कारण हुन्‍नक एकांकी ओ प्रहसनक विषय-वस्‍तु समाजोमुखी तथा समयक जे माँग छल तकरा परिप्रेक्ष्‍यमे लिखल गेल अछि। नि:सारण : चन्‍द्रनाथ मिश्र अमर अपन प्रहसन ओ एकांकीमे हास्‍य-व्‍यंग्‍यक अवतारणा क लेल विविध पात्र एवं परिस्थिति कथा-वस्‍तुमे नियोजित कयलनि अछि, कारण हुनक समसा‍यिक सामाजिक परिवेशक अन्‍तर्गत एही प्रकारक ज्‍वलन्‍त समस्‍या छल जकर ओ अत्‍यन्‍त सूक्ष्‍मताक तगस विश्‍लेषण कय‍लनि। प्रहसनक कथा अतिरंजित होइत अछि आर प्रहसनक पात्रक विविध क्रिया कलाप सेहो दर्शककेँ हँसबैत अछि। यद्यपि प्रहसन उहपासात्‍क होइत अछि तथापि ओहिमे सुधारक भावना सन्निहित रहैत अछि जे हिनक प्रहसनक केन्‍द्र बिन्‍दु थिक। एकांकी मै सामाजिक समस्‍याक विभिन्‍न पहलूकेँ प्रभावोत्‍यादक शैलीमे प्रभावशली ढंगसँ प्रस्‍तुत कयलनि अछि। एकांकीकार यथास्‍थान सहज स्‍फूर्तिसँ मार्मिक विचारकेँ अभिव्‍यक्त कयनिहार ग्राम्‍य भाषाक माध्‍यमे प्रस्‍तुत कयलनि। हिनक एकांकी ओ प्रहसनक भाषा तथा ओकरा प्रस्‍तुत करबाक रौली एतेक सक्षम अछि जे नेपथ्‍यमे कोनो प्रकारक आयोजनक प्रयोजने नहि पड़ैछ। ई एकांकी ओ प्रहसनमे रंग-व्‍यवस्‍थाक एहन संकेत पात्रक माध्‍यमे देलनि अछि जाहि सँ एकर भूमिका र्नि‍माण स्‍वयं भ’ जाइछ। एक पात्र दोसरा संग वार्तालाय करैत अपन अ‍ावेग, मौन एवं स्थिर दृि‍टएँ बीच-बीचमे रूकि क’ नाटकीय प्रभावकेँ गम्‍भीर बना देलनि अछि। एहि प्रकारेँ मंचीच सम्‍मावनासँ परिपूर्ण हिनक ओ प्रहसनक सामाजिक जीवनक यथार्थरताक विभिन्‍न समस्‍याकेँ एहि प्रकारेँ रू-ब-रू प्रस्‍तुत कयलनि अछि जाहिसँ आ लोकित बिनु भेने नहि रहि सकैछ। हिनक एकांकी ओ प्रहसनक भाषामे सूक्ष्‍मता एवं प्रत्‍यक्षता अछि। चन्‍द्रनाथ मिश्र अमर अपन समसामिजक जीवनक दैनिक, आर्थिक सामाजिक समस्‍याकेँ विचार प्रधान ढंगसँ सोझरयबाक प्रयासकयलनि। ओ काल्पनिक जीवनसँ हरि क’ यथार्थक सहरजमीन पर यराह। कथानक’ पात्र चरित्र चित्रण’ भाषा वेशभूषा सबमे यथार्थताकप्रति अभिरुचि हिनक एकांकी ओ प्रहसनक विशिष्‍टता अछि। यथार्थवादीप्रगातिशीन समस्‍याकेँ ओ एकांकी एवं प्रहसन मे स्‍थान देलनि। ई नाटकीय भाषाक संस्‍कार कयलनि, नव भावक संजीविनी ओकरा देलनि एवं कलाक विभिन्‍न रूप मे सार्थक प्रयोग कयलनि तथा वर्त्तमान मैधिली गद्यकेँ दिशा देलनि। हिनक एकांकीओप्रहसनमे रस-निष्‍पति स्‍वयं होइत अछि। विशेषत: हास्‍य-व्‍यँग्‍यक ई मैथिलीमे सिद्धस्‍त लेखक छथि जकर प्रतिरूप हिनक समग्र साहित्‍यमे उपलब्‍ध होइत अछि। हिनक एकांकी ओ प्रहसन आभिनयोपयोगी अछि जकरा प्रस्‍तुत करबाक हेतु कोनो तामझामक आयोजनक प्रयोजन नहि पड़ैछ। हिनक एकांकी’- प्रहसन जहिना पठ‍नीय अछि तहिना अभिनेय सेहो। एहि प्रकारेँ हिनक एकांकी-प्रहसनक माध्‍यमे मिथिलांचलक सामाजक समस्‍त सामाजिक जीवनक झझक भटैत अछि जे विविध रूपमे प्रत्‍यक्षीककरण भ’ जाइत अछि। लोकगाथा ओ मणिपद्रम अक्षरक आविष्‍कारसँ दीर्घकालावधि धारि मिथिलांचलमे मौखिक लोक साहित्‍यक परम्‍परा अनुवर्तमान हल जकरा आधुनिक सन्‍दर्भमे हमरा लोकनि मात्र कल्‍पनाक ऑंखिए देखि सकैत छी, कारण कालक्रमेण लोक साहित्‍यक बहुलांश विलुप्‍त भेल जा रहल अछि। तथापि सुसंस्‍कृत रूपमे लिपिवद्ध साहित्‍यक संग-संग गीत. कविता, कथा, गाथा उपाख्‍यान, लोकोक्ति एवं मुहावराक विशाल भण्‍डार विद्यमान अछि आ ई परम्‍परा अनेकानेक शतक लोक साहित्‍यकेँ आगों संसारैत-पसारल होइत रहल, भनहि काल क्रमंण एहिमे किहु परिवर्त्तन होइत रहल अछि। मैथिलीक साहित्‍य चिन्‍तक आगवेषक एहि अनुँवाशिक सम्‍पदाक संकलन-परितुलन काजमे लागल छथि। वास्‍तव में ई परम्‍परा कतेक समृद्ध अछि तकर वास्‍तविकताक जानकारी हुनके होयतनि जनिका एकर अघ्‍ययनमे रुचि छनि वा ग्रामीण परिवेश मे जनसाधारणक जीवनसँ निकट सम्‍पर्की छथि। पीढी-दर-पीढी स्‍मृतिक परम्‍परामे प्रवाहमान विविध विधाक लोक साहित्‍य मनोरँजन करैत शिक्षा दैत अछि आ पाठक वा श्रोताकेँ कनबैत, हँसबैत आ चेतबैत रहल अछि। मैथिली लोक साहित्‍य अपन आन्‍तरिक गुण एवं वैविघ्‍यमे अत्‍यन्‍त समृद्धशाली अछि। मिथिलांचल वासी जहिना-जहिना संचारित भेल अछि से एकर लोक साहित्‍यक विविदाताकेँ नव आयाम देलक अछि। मिथिलांचल वासीक उदभव केँ क्रममे, विविध आर्य भाषाक रीति-नीति, कथा, गाथा आ रागरंगक जे अवदान अछि से एहि साहित्यकेँ आर समृद्धतर बना दोलक अछि। स्‍वभावत: एहि साहित्‍य मे एहन-एहन बात कहल गेल अहि जे दोसराकेँ अनसोहॉंत, जाति विशेषक वैच्त्रिय पर प्रहार करैत अछि, परन्‍तु एहिमे निन्‍दासँ देशी परिहासक पुट आदि आ जकरापर कोनो कहबी, कोनो गीत वा कोनो किंवदन्‍ती चोट करैत अछि ओ सभ एकरा विनोदमय मात्र बूझैत अछि। साहित्‍यक सर्वाधिक प्राचीनतम विधा लोक साहित्‍य थिक जाहिमे लोकगीत, लोकगाथा, लोकोक्ति, लोकना ट्यलोकनृत्‍य, लोक अपवाय, लोक ज्ञान, लोक यात्रा, लोक परम्‍परा, लोक प्रवाह, लोक मानस, लोक प्रतिमा, लोक वाडाष्‍मय, लोकवार्त्ता इत्‍यादि समाहित अछि। जहिना नदीक प्रवाह मान धारामे पाथरक छोट-छोट टुकडी सभ घसा क’ गोल आ सुन्‍दर आकार प्राप्‍त करैत अछि जे ककरो द्वारा प्रारम्‍भ भेल ओ लोक कंठमे युग-युग धरि प्रवाहित होइत नित नवीन रूप धारण करैत गेल आ ता धरि विकसित होइत रहैछ जा धारि पढ़त-गुनल व्‍यक्ति ओकरा संकलित क’ छाापि क’ ओकर रूप स्थिर नहि क’ सकैछ। लोकगाथा लोककंठ सँ उत्‍पन्‍न आ विकसित होइत अहि। लोकगाथाक सामान्‍य रूप-विधानकेँ ल’ कए कोनो विशेष कवि क’ द्वारा रचित होइह जाहिमे गीतात्‍मकता (लिरिकल क्‍वालिटी) आर कथात्‍मकता दुनूक मिश्रण होइछ जकर प्रचार जनसाधारणमे मौखिक रूपसँ एक पीढी दोसर पीढीमे होइत अछि। लोकगाथा मानव समाजक आदिम साहित्यिक रूप अछि। एकर उत्‍पत्ति तखन भेल जखन समाज अविभक्‍त आ एक इकाई क रूपमे छल। अतएव लोकगाथा प्रारम्‍भ मे सम्‍पूर्ण समाजक सम्‍पत्ति छल, सब एकरा गबैत छल आ अपना दिससँ किछु ने किछु जोडैत-घटबैत छल। एहि प्रकारेँ एक स्‍थानसँ दोसर स्‍थान आ एक पुश्‍त सँ दोसर पुश्‍त कंठानुकंठ यात्रा करबाक कारणेँ ओकर स्‍वरूप परिवर्त्तित होइत गेल। लोकगाथाक उत्‍पत्तिक सम्‍बन्‍धमे लोक साहित्‍यक विशेषज्ञ लोकनिक अनुसारेँ लोकनिर्मितवाद (कम्‍यूनल ऑथरशिप), व्‍‍यक्ति निर्मितवाद (इनडिविडुअल ऑंयरशिप) आ विकासवाद (इभोलुसन) क मुख्‍य हाथ थिक एकर प्रचार-प्रसार मुख्‍यत: ग्राम्‍यजीवनक क्षेत्रमे भेल अछि। एहि मे आत्‍मव्‍यंजक तत्‍क (सब्‍जेहिभएलीमेंट) अभाव आ अनिवार्यत वस्‍तु व्‍यंजक (आब्‍लेटिभ एलीमेंट) क प्रमुखता होइत अछि तथा श्रम साघ्‍य कलात्‍मकता नहि, प्रत्‍युत यथार्थ चित्रणक प्रवृत्तिक प्रधानता रहैछ। एहिमे अनावश्‍यक बाग्‍जाल नहि, परम्‍परा-प्रेम भावना, सहजोच्‍वास, भावात्‍मकता आ सरल कल्‍पनाक मात्रा अधिक होइछ जाहिमे बौद्धिकता, कल्‍पनाशीलता आ श्रम साघ्‍य कलात्‍मकताक नहि। एहिमे भाषाआ विचारक सरलता एवं नैसर्गिकता एहन रहैछ जे आरंभिक समाजमे उपलब्‍ध होइछ। एहि रूढ, अस्‍वाभाविक आ श्रमसाघ्‍य अलंकारक आ शब्‍दक अभाव होइछ। एहिमे प्रयुक्‍त अलंकार आ लोकाक्ति एवं मुहावराक बारम्‍बार आवृत होइछ। छन्‍द विन्‍यास सरल तथा तुकपर कोनो घ्‍यान नहि देल जाइछ। ओकर गेयता शास्‍त्रीय संगीतसँ भिन्‍न होइछ। मैथिली लोक साहित्‍यानार्गत लोकगाथाक वास्‍तविक संख्‍या कतेक अछि एहि प्रसंगमे निर्विवाद रूपेँ किछु कहब वर्त्तमान सन्‍दर्भमे अप्रासंगिक प्रतीत होयत, कारण ने तँ इतिहासकार आ ने लोक साहित्‍यक विशेषज्ञ लोकनि एहि सन्‍दर्भ मे सुनिश्चित आ ने सुविचारित मनतव्‍य देलनि अछि। जयकान्‍त मिश्र (1922) Introduction to the Folk Literature of Mithila (1950) मे लोरिक,सलहेस, दीनाभद्री एवं कमला मैया गीतक चर्चा कयलनि। ओ जकरा कमला मैयाक गीत कहलनि ओ वस्‍तुत: दुलरा दयाल लोकगाथा थिक जे नाम सम्‍भवत: उनका ज्ञान नहि छलनि, कारण एहि लोकगाथान्‍तर्गत कमला नदी जे मिथिलाक मुख्‍य नदी थिक ता‍हिपर केन्द्रित अछि तथा एकर गाथा नायक छथि महान साहसी वीर दुलरा दयाल। जेँ कमला नदीक आख्‍यान हुनका एहिमे उपलब्‍ध भेलनि तेँ ओ एकरा कमला मैयाक गीतक नामे अभिहित कयलनि। मैथिली साहित्‍य मे ई श्रेय डा. व्रजकिशोर वर्मा ‘मणिपद्य’ (1918-1986) केँ छनि जे लोकगाथाक वास्‍तविक स्‍वरूपक संकलनार्थ गहन भावें डुब्‍बी मारि क’ एहि दुलर्भ मोती सभक संग्रह कयलनि तथा हुनका अनुसारेँ लोरिक, सलहेस, नैका बनिजारा, दीनाभद्री, दुलरा दयाल, अनंग कुसुमा, रायरणपाल एवं लव‍हरिकुशहरि अि‍छ। परवर्त्ती कालमे कतिपय लोकगाथाक चर्चा भेल अछि, किन्‍तु ओकर एेतिहासिकता एवं प्रामाणिकतापर प्रश्‍न-चिहन अछि। उपर्युक्‍त लोकगाथान्‍तर्गत द्विजेतर जातिपर केन्द्रित रहलाक कारणेँ मैथिली साहित्‍यक अनुसंधत लोकि‍नि एहि गाथा सभक संकलनार्थ उन्‍मुख नहि भेलाहि, कारण एहि साहित्‍यक अधिष्‍ठाता लोकनिक मान्‍यता छलनि जे मैथिली मात्र ब्राहमण भाषा थिक। किन्‍तु मैथिली आइ जीवित अहि ओही ग्रामीण परिवेशमे रनि‍हार द्विजेतर जातिमे जनिक बोली-चालीमे पुश्‍त-दर-पुश्‍त एकरा अपना हदय मे अद्यापि संयोगि क’ रखने अछि। अन्‍यथा मैथिली तँ कहिया ने मारि गेल रहैत। द्विजेतर जातिसँ अभिप्राय थिक लोरिक गाथामे गोप समाजक, सजहेस गाथामे दुसाध समाजक, दुलरादयाल गाथामे मलाह समाजक, दीलाभद्रीगाथामे दलित मुसहर समाजक नैकाबनिजारा गाथामे वैश्‍य समाजक, छेछन गाथामे डोम समाजक, रायरणपाल एवं लव‍हरि कुशहरि गाथा में क्षत्रिय सूाजक चित्रण अि‍छ। एहि ऐतिहासिक विमूति लोकनिकेँ प्रकाशमे आनि मणिपद्य मैथिली भाषा आ साहित्‍यक आ मिथिलांचलक सामाजिक जीवनक संगहि भारतीय साहित्‍य एवं समाजक एहेन प्रकाश स्‍तम्‍भ आलोकिन कयलनि जे कोटि-कोटि जनमानसक अन्‍धकारमे टापर-टोइया द’ रहल छल। वस्‍तुत: मिथिलाक ई लोक महाकाव्‍यक ऐश्‍वर्य भारतीय लोकगाथाक अन्‍तर्गत अपन ऐतिहासिक, सांस्‍कृतिक, सामाजिक तथा साहित्यिक वैभवक गरिमा ओ दीपित छटाक कारणेँ अतुलनीय अछि। ई निर्विवाद सत्‍य थिक जे वजकिशोर वर्मा ‘मणिपद्य’ जतेक गहनता एवं तनायायताक संग लोकगाथा अघ्‍ययन-अनुशीलन, चिन्‍तन-मनन आ संचयन क’ कए ओहिमे हेरायल भुतिआयल मणि माणिक्यकेँ जनसाधारण पाठकक हेतु सर्व सुलभ करौलनि तकर श्रेय ओ प्रेय हुनकहि छनि। हुनक मान्‍यता छलनि जे जा घरि लोकगाथा सभाजेहिक मूल्‍य पाठ भ’ मिथिलांचलक विभिन्‍न क्षेत्रमे जनकंठ मे परिव्‍याप्‍त अछि तकर संकलन, सम्‍पादन आ प्रकाशनक पथ प्रशस्‍त नहि हैत ताहरि मिथिलांचलक लोक जीवनक इतिहासक रचना असंभव अछि। मैथिली लोकगाथाक प्रति मणिपद्य अपन जीवनकेँ समर्पित कयेन रहथि तेँ मिथिलांचलक दिव्‍य विभूतिक बिसभोर भेल जीवनगाथा केँ ओ अपन श्रम आ कलमसँ जन सामान्‍यकेँ सुबोध करौलनि। ओ एक-एक विलुप्‍त, भुतिआयल गाथा सभकेँ ताकि हेरि क’ जीवन्‍त कयलनि ताहिसँ अनुमान कयल जा एकैछ जे हुनक हृदयमे जेना प्रेम आ सुषमाक म्‍य वाटिका छलनि। हुनक रचनाक प्रधान उत्‍स थिक असीम मानवतावाद, पवित्र-प्रेम आ शीतल सौन्‍दर्य। हुनक भावनाक केन्‍द्रमे अधिष्ठित छल परम-पुरुषार्थी, लोक परायण. निंरुहकार आ कर्तव्‍यनिष्‍ठ आदर्शपुरुष आ सतत साधिका, लोकसेविका, प्रेरणा आ गरिमामयी आदर्श नारी। यद्यपि सौन्‍दर्यक प्रति ओ अत्‍यन्‍त संवेदनशील रहथि तथापि हुनक कल्‍पना, भावना आ विचारक परिधि कतहु अतिक्रमण नहि कयलक। मणिपद्यक भावना सौंदर्यकेँ स्‍पर्शक’ चेतनाक अन्‍तपुर रहस्‍यमय आवरणकेँ अनावृत क’ विश्‍व प्रेमक उन्‍मुक्‍त वातायनकेँ खोलि देलनि। हिनक रचनादिमे जवनक यथार्थ परिप्रेक्ष्‍यमे मानव प्रेमक अनिवार्यताक सहज आ निश्‍छल स्‍वीकृति थिक। हिंसामे प्रेम आ विप्‍लवमे शान्तिक रश्मि विकीर्ण करबामे ओ सफल र‍हथि। प्रवुद्ध चेतना, कोमल भावना, चित्रमयी कल्‍पनाक संगहि जननी जन्‍मभूमिक मर्यादा, प्रतिष्‍ठा, एवं गरिमा तथा महिमाक प्रति सतत जागरुकता हुनकामे वर्त्तमान छलनि। हिनका नदी, पहाड़, तुषार, शिकार, जंगल-झाड, चौर-चॉंचर, बाध-वोन, गामघरमे अशेष रुचि छलनि। ऐतिहासिक भग्‍नावशेष, देवस्‍थल, मूर्ति चित्र, नृत्‍य, संगीत, तन्‍त्रमंत्र, रत्‍न, पक्षी आ लोक साहित्‍यक हेरायल भुतिआयल अन्‍वेषण, सशक्‍त वक्‍त, विसल उपेक्षित मिथिलांचलक जन-जीवन तथा सामाजिक ओ सांस्‍कृतिक परम्‍पराकेँ युग-युगसँ प्रवाहित करैत आयल अछि तकरा ताकि होरि क’ अपन सरस, सरल ओ प्रवाहमय शैलीमे लिपि वद्ध क’ मैथिली भाषा आ साहित्यिक श्रृंगार कयलनि। ई श्रेय वस्‍तुत: मणिपद्यकेँ छनि जे मिथिलाक कंठसाहित्‍यमे युगयुगान्‍तरसँ रचल-बसल गाथा सबकेँ जगजियार करबाक स्‍तुत्‍य प्रयास कयलनि। मानवताक मणि आ लोकगाथाक पाणिडित्‍यक पद्यराग मणिपद्य मैथिली लोकगाथा केँ अमर बनवबाक दिशामे ओ एक एहन महापुरुष रहथि जनिक चिरचिरन्‍तनासँ ई विधा-विनय हिनक पोर-पोर मे भरल छलनि। ओ छहराइत गॉंधीवादी, उद्भट साहित्‍य-चिन्‍तक आ चतुर चिकित्‍सक रहथि। हिनक अन्‍वेषी प्रवृत्ति लोक-भाषा, लोक-कवि,लोकगाथा, लोकगीत कोन प्रकारेँ भारतक उतरीय खण्‍डमे भूखपियास त्‍यागि, वन प्रान्‍तक जतय-ततय लौह लैत, बनैया जीव-जन्‍तुक आक्रमणसँ निरापद्, कखनो-कखतो सामना करैत लोक साहित्‍यक प्रचुर संग्रह कयलनि। एहि विधाक प्रति दुनकामे एतेक वेशी लगनशीलता छलनि जकर परिणाम भेल जे ओ अपन औपन्‍यासिक कृति सभक कथा-संयोजनमे ओकरे आश्रय लाेकनि। एहि प्रसंगमे हुनक पिताक कथन छलनि, ‘कनकिरबा व्‍यर्थ सोचि रहलाह अछि। यदि ओ सेवा बुद्धया करथि तँ वेश, उपार्जन क’ परिवरक भरण-पोषण ले हमरा जीवैत कनेको चिन्‍ता नहि करथु, एतेक परिश्रम आ साहससँ लोक साहित्‍यक सामग्री ओ जे एक्कठा कयलनि अछि, तकर सर्जनात्‍मक कार्य करथु जे अक्षुण्‍ण रहि जयतनि। एहिसँ प्रतिभाषित होइछ जे मणिपद्य लोकसाहित्‍यक वास्‍तविक महत्‍वसँ अपन युवावस्‍थहिसँ परिचित रहथि तेँ ओ एकर अनवरत संग्रह कयलनि। हुनक मान्‍यता छलनि जे लोकसाहित्‍यक अपरिमित भण्‍डार छैक उपेक्षित जनजातिक कंठमे। ठेंठ मैथिली ओही चौर चॉंचरमे, वन्‍य जातिक करेजमे जीवित छैक। ओहि वन पहाड़क टोला-टप्‍परक स्‍त्री समाजमे, निर्गम्‍य स्‍थानमे ई निधि छैक जतयसँ साहसिक तपस्‍या क’ कए मरिआ पद्य बहरयलैक। तेँ ओ एकर उरखनन कयलनि। संभवत: तेँ अपन उपनाम मणिपद्य रखलनि आ साहित्‍य जगत मे प्रख्‍यात भेलाह। मैथिलीक ई वरद पुत्र मानवताक मणि रहथि आ प्रतिभाक पद्य रागकेँ प्रफुल्लित आ सुरभित कयलनि। हिनक वैशिष्‍ट्य थिक जे ओ साधना कयलनि लोककंठमे रचल-बसल साहित्‍यक, किन्‍तु जे हिनका संग वार्त्तालाप कयने होयताह तनिका ई अनुभव अवश्‍ये होयतनि जे ओ संस्‍कृत शब्‍दक प्रचुरताक संग प्रयोग करथि; किन्‍तु जखल ओ कलम धरथि तँ लोककंठमे व्‍यान्‍ज भाषा-प्रयोगक अवसर नहि चुकथि। यथार्थत: मैथिलीकेँ हिनका सदृश किछुओ साहित्‍यचिन्‍तक आर भेल रहितथि तँ एकर भण्‍डार आर पूर्ण आ समृद्धशाली बनैत। मणिपद्य जाहि मनविबता, तेजस्विता, गम्‍भीरता. तन्‍मयाताक संग मैथिली लोकगाथा ओकार संस्‍कृति, ओकर सभ्‍यताक अघ्‍ययन कयलनि ताहि गम्‍भीरताक संग मैथिलीक क्‍यो अनुसन्‍धाता अद्यापि नहि क’ पौलनि। प्रस्‍तुत प्रकाश्‍य ग्रन्‍थ एहि विषयक पुष्‍ट प्रमाण प्रस्‍तुत करैछ जे एहि कृतिक अघ्‍ययनसँ स्‍पष्‍ट भ’ जाइछ जे मिथिलाक संस्‍कृति आ सभ्‍यता कतय धरि विस्‍तृत छल। महाप्राण राहुल सांकृत्‍यायन(-1963) सदृश हिनको घुमक्‍कडीमे अत्‍यधिक रुचि छलनि जकर पुष्‍ट प्रमाण उपलब्‍ध होइछ हुनक प्रिय सिरीज ओहिठाम गेल छलहुँ जकरा सभकेँ एकत्रित क’ कए हम हुनका सँ भेट भेल छल (2004) मे प्रस्‍तुत कयल अछि जाहि मे हुनक एहि प्रवृत्तिक परिचायक थिक जे ओ जन-जीवनकेँ अत्‍यंत समीप जाय लोक जीवन में व्‍याप्‍त साहित्‍यकेँ संकलित क’ अमूल्‍य निधिक रहस्‍योदघाट्न क’ कए साहितय प्रेमीकेँ आँकर स्‍वरूपक रसास्‍वांदन करौलनि। वस्‍तुत: ई मणिपद्यक देन थिक जे मैथिली भाषा साहित्‍यकेँ एक नव विशेषण भेटलैक। मणिपद्य मैथिली जनकंठ साहित्‍यक अन्‍तर्गत लेरिकाइन, नैकाबनिजारा, दुलरा दयाल एवं लवहरि-कुशहरिक अनुसंधान वृहत् रूपेँ कयलनि। ओ लोक साहित्‍यक पाछाँ तपस्‍यामे दिवारात्रि लागल रहलाह जकर फलस्‍वरूप ओ अपन अन्‍वेषी प्रवृत्तिक परिचय देलनि। प्रस्‍तुत लोकगाथाक इतिहासक अन्‍तर्गत ओ अपन अमित प्रकट कयलनि ओ निश्‍चये मैथिली साहित्‍यक हेतु एक अविस्‍मरणीय घटना थिक। समयाभावक फलस्‍वरूप ओ अन्‍य गाथादिक प्रसंगमे नहि लिखि पौलनि। लोक-संस्‍कृतिक सुविख्‍यात शिल्‍पी व्रजाकिशोर वर्मा मणिपद्य अपन मधुस्राविणी भाषामे मैथिलीक एहि अमर गाथाक सुमनकेँ लोकगाथाक इतिहासमे गॉंथलनि अछि। एहि मणिमालामे कतिपय पुष्‍प-गुच्‍छक स्‍वरूप आ मौलिकताक पृष्‍ठभूमि ओ कथाक प्रगतिक आभास पाठककेँ अनायासहि उपलब्‍ध होयतनि। प्रतिपाद्यि कृति हुनक मॉंजल कलमक चमत्‍कार थिक जाहि दृष्टिकोणसँ विवेचन कयल जाय तँ मैथिली लोकगाथा इतिहास मैथिलीक अमूल्‍य निधि‍ थिक। प्रतिपाद्य लोकगाथाक इतिहासमे लेरिक गाथापर सोलह, दुलरा दयाल गाथा पर दस, नैका बनिजारा गाथापरसात एवं लवहरिकुशहरि गाथापर पॉंच लोकगाथा क इतिहासपर मणिपद्यक अनुसंधानात्‍मक आलेख एहिमे संग्रहीत जे विभिन्‍न पत्रिकादिमे आइ सँ तीन दशक पूर्व प्रकाशित भेख छल। एहि गाथा सभक वैशिष्‍ट्य छैक जे मिथिलामे परम्‍परासँ अबैत ग्रामीण लोकनि अत्‍यंत मनोयोग पूर्वक एकर श्रवण. रसारवादन युग-युगान्‍तरसँ करैत आबि रहल छथि तकर ई एकमात्र प्रामाणिक एलबम थिक। एहि कंठगाथा सभहिक अमूल्‍य उपलब्धि थिक जे एकरा मिथिलांचल वासी अपन कंठमे हजार-हजार वर्षसँ संयोग ने आबि रहल छथि। लोरिकाइन कंठ महाकाव्‍यकेँ लोक जागरणक प्रथम लोकगाथा कहब अधिक सभीचीन होयत आ एकर वास्‍तविक मूल्‍यांकन तखने सम्‍भव भ’ एकैछ जखन एकरा ब्राहमणक देवोन्‍मुख साहित्‍य आ बौद्धक संसार त्‍यागक साहित्यिक पृष्‍ठभूमि मे नहि मूल्‍यांकन क’ एकरा भारतीय जन समाजक लोक-चेतनाक विकास क्रममे देखबाक उपक्रम कयल जाय तखन साष्‍ट प्रतिभाषित हैत जे ई गाथा लोक क्रान्तिक प्रथम उन्‍मेषक एक सशक्‍त कलात्‍मक आ प्रवाहमान रचना थिक जकर ऐतिहासिक महत्‍व छैक। एहि महाप्राण कंठ काव्‍यमे षष्‍ठप्‍तम शताब्‍दक मिथिलाक एहन सप्राण वर्णन अन्‍यत्र कतहु नहि उपलब्‍ध भ’ रहल अछि। एहिमे मिथिलाक आघ्‍यात्मिक, भौगलिक, ऐतिहासिक, राजनीतिक, समाजिक स्थितिक अत्‍यन्‍त सशक्‍त विवरण उपलब्‍ध होइत अछि। एहि महाप्राण कंठ-महागाथामे साहित्‍यक रंग आ भासक अनुपम आयोजन छैक जकरा विश्‍लेषण कयलासँ सहजेँ स्‍पष्‍ट भ’ जाइछ जे कोन अमृद्धत्‍क बलेँ ई एतेक चिर नवीन आ एतेक चिरजीवी बनल रहि सकल अछि। एहि मे साहित्यिक, वैचारिक आ घटनात्‍मक एकात्‍मकताक एतेक सुधड़ संयोजन छैक जे मानवक आधारभूत संवेदनाकेँ तात लयसँ अलंकृत करैत आबि रहल अछि। एकरा संगहि अपन भूमिज मौलिकता प्रदान करैत अछि। एकर भाषा मैथिलीक उषाकालीन रूप थिकैक। एकर रचना कालण धरि मैथिलीक स्‍वरूप एतेक दृढ भ’ गेल छलैक जाहिमे एकटा सशक्‍त, प्रवाहमान, प्राञ्जस, रससिद्ध अभिव्‍यक्तिवला महाकाव्‍य रचल जा सकलैक जे हजार-हजार शताब्‍दीक झमार सहितो अद्यापि झमाननहि भेलैक आ लोरिकक खण्‍डा सदृश एखनो लहकलह क’ रहल छैक। प्रतिपाद्य महागाथामे सती मांजरि, चनैन, सुनयना, रणचण्‍डी, लुरकी, योगिनी कोसामालिन, महादेवी कोहरॉंस, महासुन्‍दरी दुहबी-सुहबी आ राजकुमारी संझा प्रमुख नायिका छथि। जतय मांजरि परिस्थितिक भोगनिहारि छथि ततय चनैन परिस्थिि‍त सृजननिहारि छथि। करुणामयी मांजरि भक्ति, शक्ति आ आत्‍मदृष्टि वाली छथि ततय भगवती चनैन प्रेरणा, स्‍फुरण आ ऊहिवाली छथि। मांजरि अपन सतीत्वक महिमासँ मण्डित छथि तँ चनैन अपन सौन्‍दर्य-गरिमासँ ओतप्रोत। नैराश्‍यक क्षणमे मांजरि भगवतीसँ खण्‍डाक याचना करैत छथि तँ चनैन रत्‍ना बनिजारिनक संग षड्यंत्रमे सहायता प्रदान करैत छथि। एकर रचयिता अपन नायककेँ प्रत्‍येक स्थितिमे मानवे रखलनि जकर सुघड़ताक फलस्‍वरूप ई महागाथा जनकंठमे अजार, अमर एवं अशुण रहि सकलाह। लोरिक गाछ तर बा गह्वरमे कोना समाड़क लाथे अपन सेवा-पूजा नहि लेलनि आ कोनो भगता वा वाहन नहि तकलनि जखन कि अधिकांश लोकगाथाक नायक मनुष्‍य देवा बनि क’ खीर-खॉंड आ बलिक भोग स्‍वादैत भगता सभक देहपर खा‍िलाइत छथि। एहि महागाथा-क पात्रढ़’चरित्र अपना-अपना स्‍थानपर सुदृढ़ता, सौन्‍दर्य आ कलात्‍मक रूपेँ सुसज्जित अछि। एहि मे पात्रक समन्‍वय अतयन्‍त मोहक छैके आ उच्‍च कोटिक साहित्यिक परिस्थिति प्रकार आ वातावरणक सृजन करैत अछि। लोरिकाइनक पशु-पक्षी यथा हाथी-घोडा़ आ कौआ आदिम कालसँ मनुष्‍यक सानिघ्‍यमे रहैत आयल अछि। एहि महागाथाक महाप्राण होयनाक कारणेँ कज्‍जल गिरि आ रणहुलास सन हाथी, कटरा आ बछेड़बा सन सन घोडा़ आ बाजिल कौआ सन पक्षीसँ मानवकेँ अत्‍यंत एकात्‍मकता स्‍थापित भ’ सकल अछि आ मनुष्‍यक संग अत्‍यंत सूक्ष्‍म संवेदना राखि सकल अछि। एकर वैशिष्‍ट्य थिक जे एहिमे युद्ध आ अखाड़ाक विशद् वर्णन भेल अछि। शान्तिकालीन एकान्तिकता आ समाज केँ दैत अछि। लेि‍कक खण्‍डा जेना हुनका सतत कहैत रहैत छनि रक्‍त दे, रक्‍त दे। एहिमे एहन आकर्षक स्‍थल अछि जतय मनकेँ चकित, विमुग्‍ध आ विमोर क’ देनिहार मनोवैज्ञानिक तथ्‍य सभकेँ अत्‍यंत सहजता आ स्‍वाभाविकताक एहिमे संयोगने अछि। एकर कतिपय कथान्‍तर्गत मानव अन्‍तर मे त्रिगुणक सन्‍तुजन-असन्‍तुलनक तत्‍व कथा अथवा मानक बुद्धिक संग रमण करैत विलास आ युद्ध एवं हदय संग रमण करैत शान्ति, पाश मुक्तिक कथा अछि जकरा सहज लोकवातावरणमे शक्ति पट भूमिपर अत्‍यन्‍त सूक्षमताक संग, मनोहारी शैलीमे इन्‍द्रधनुषी तान्त्रिक रंगसँ चित्रित कयल गेल अछि। एहिमे वर्णित नृत्‍य ओहिना सुशोभित अछि जेना विभिन्‍न वर्णक उत्‍फुल्‍ल कमलसँ सरोबर। लोरिकाइन मैथिली कंठ गाथाक एक अमूल्‍य उपलब्धिकथिक। जकरा मिथिलाक लोक अपना कंठमे हजार वर्षसँ अधिक समयसँ जोगौने आयल अछि। एहि लोक महाकाव्‍यक काव्‍य ओ कथा प्रबन्‍ध स्‍वयं पूर्ण अछि आ एहि बातक ज्‍वलन्‍त प्रमाण अछि जे मैथिली जनसाहित्‍य कतेक सप्राण, सशक्‍त आ समृद्धशाली अछि। ई महागाथा विश्‍वक कोनो लिखित आ अलिखित महाकाव्‍यसँ टक्‍कर ल’ सकैत अछि। प्रयोजन एहि बातक अछि जे एकर मूल्‍याकंन नवयुगक आलोकमे हो संगे मैथिली भाषीक ई पुनीत कर्तव्‍य भ’ जाइछ जे एहि महागाथा क सांगोपांग प्रकाशन हो। मिथिलाक उज्‍जवल अतीतक एक ज्‍योति स्‍तम्‍भ, शौर्य, शील आ त्‍यागक प्रतिमूर्ति एक जनप्रिय नायक लोरिक कीर्तिगाथा वस्‍तुत: अमरत्‍व प्राप्‍त करबामे सफल भ’ सकल अछि। मिथिलामे परम्‍परासँ चल अबैत लोरिक कथा ग्रामीण जन समुदाय अत्‍यन्‍त मनोयोग पूर्वक रुचिसँ श्रवण करैत छथि। ई एक एहन लोक काव्‍य थिक जे लोरिकाइन नाम सँ सात खण्‍डमे विभवल अछि आ अनेक रातिमे जागि क’ समाप्‍त होइत अछि। एहि लोक गाथाक वैशिष्‍ट्य थिक ई एगारह विभिन्‍न भाषामे लोककंठसँ गाओल जाइत अछि। एकर सात खण्‍ड मे जनम खण्‍ड, सती मॉं जरि खण्‍ड, चनैन-खण्‍ड, रण-खण्‍ड, सावर-खण्‍ड,बाजलि-खण्‍ड आ सझौती राजा खण्‍डक चर्चा कयल जाइछ। नेपाली-मैथिली स्‍वरूपमे आठस खण्‍ड उपलब्‍ध होइछ जकरा भैरवी-खण्‍ड कहल जाइछ। एहि लोक गाथामे एक भाग वीर रसक छटा छैक तँ दोसर भाग श्रृंगार रसक इन्‍द्रधनुष से‍हो दृष्टिगत होइत अछि। एकर श्रृंगारिक वातावरण मधुमय सुषमासँ परिपूर्ण अछि। एहिमे नारी एवं नायक अपहरणक वृतान्‍तसँ ओतप्रोत अछि। एकर सभ पात्र अपन-अपन क्षेत्रमे अद्वितीय अछि तथा मूक पात्र सभ सेहो मनुष्‍यक वाणीमे नहि बजाओल गेल अछि तथापि एकरा अमक आचार, अपनैती आ अभिव्‍यक्ति अत्‍यन्‍त मनोवैज्ञानिक सौन्‍दर्यसँ सफलतापूर्वक अभिव्‍यक्‍त भेल अछि। एहिमे साहि‍त्‍यक गंगा आ काव्‍य-सौन्‍दर्यक यमुना हिसोर ल’ रहल छैक ओही ठाम तान्त्रिक भावधाराक अन्‍त: सलिला सरस्‍वती सेहो प्रवाहित भेल अछि। मिथिलाक लोकगाथामे दुलरा दयाल एक प्राणवन्‍त लोकगाथा थिक। भारतीय भीकिंग (जलयोद्धा) क एहन स्‍वर्णिस गाथा सम्‍भवत: अन्‍यान्‍य साहित्‍यान्‍तर्गत नहि उपलब्‍ध होइछ। एहि लोकगाथामे जल-जीवनक ऐश्‍वर्य पूर्ण विवरण उपलब्‍ध होइछ। एहि लोकगाथाक वैशिष्‍ट्य थिक जे मिथिलासँ कामरूप आ बंगालक तान्त्रिक साधनाकेँ उजागर करैत अछि। ई महागाथा मानवक एक दुर्लभ आन्‍तरिक शक्तिक महिमाक आख्‍यान करैत अछि। एकर नायक राजा वा योद्धा नहि; प्रत्‍युत सिद्ध नर्त्तक आ सा‍हसिक सार्थवाह रहथि। एहि गाथाक घटना काल दोसर-तेसर-शताब्‍दी भ: सकैछ, किन्‍तु रचनाकाल अनुमानत: छठम-सातम शताब्‍दीक थिक। जतेक दूर धरि एकर भाषा-शैलीक प्रश्‍न अछि ओ अत्‍यन्‍त प्राँजरला अछि जे मैथिलीक आदिम स्‍वरूपकेँ उद्घाटित करैत अछि। एकर भाषापर सिद्ध कालीन मैथिलीक आदिम स्‍वरूपकेँ उद्घाटित करैत अछि। एकर भाषा पर सिद्ध कालीन मैथिलीक वेशी रंग आ एकरा आघ्‍यात्मिक यह भूमिपर बौद्ध महायान क वेशी प्रभाव। एहिमें वर्णित नृत्‍य सभ ठाम-ठाम गम्‍भीर तान्त्रिक रूप ल’ लैत अछि। एहि महागाथाक विशेष वैषिष्‍ट्य छैक एकर प्रकृति वर्णन। हिमागिरिसँ ल’ रकए गंगा आ गंगासँ ल’ कए सागर धारिक माछ-संस्‍कृतिक एतेक विश्‍ला परिसर जे मिथिला, असम, बंग, आ ओडि़सा धरिकेँ समेटने छैक। विभिन्‍न परिस्थितिमे एहन मोहक आ एतेक सूक्ष्‍म वर्णन-विन्‍यास एकरा उच्‍चकोटिक क्‍लणासिकक प्रभा प्रदान करैत छैक। एहि महागाथाक कथा-प्रवाह अत्‍याधिक क्रमबद्ध अछि जे तत्‍कालीन नौकाश्रय, घाट-बाट आ बजारक वर्णनसँ एकर छटा अपूर्व भ’ गेलैक । एहि महागाथाक पृष्‍ठभूमि मिथिलाक जल-जीवन छैक जकर नाभि भूमि में प्रवाहित होइत छथि महाकाली कोशी, हदय भूमिमे प्रवाहित होइत महालक्ष्‍मी कमला आ मस्‍तक भूमि मे प्रवाहित होइत छथि महासरस्‍वती बागमती। इएह कमला मलाह जातिक कुलदेवी छथि जनिक गाथात्‍मक परिचय एहिमे देल गेल अछि। एहि महागाथाक नायक छथि नृत्‍य-पिनुण दुलरा दयाल जे एक दिव्‍य नर्त्तक, एकधीर सार्थवाह, एकसाहसी सागर यात्री अथक अन्‍ने-ली रहधि। कमला शक्तिदा, धनदा, आवुद्धिदा, करुप मे विख्‍यात छथि दुलरा अपन सिद्धि प्राप्ति क निमित बड-बड तपस्‍या कयलनि जकर परिणाम भेल जे हुनक यशपताका हंसालय अर्थात् हिमालय, कमलालय अर्थात् मिथिला सँ ल’ कए महाशंखालय अर्थात् सागर धरि द्वीदप-दीपान्‍तर धरि पहरा गेलनि। एहिमे मिथिलाक संगहि भारत क ओहि कालक दृष्‍यांकन अछि जं भारतकेँ सुवर्णद्वीप, वालीद्वीप. जावा. सुमत्रा सँ सागर न्‍यापार चलैत छल तकर मला‍ही शौर्य आ सार्ववाह सबहक चमत्‍कार पूर्ण क्रिया-कलाप आ नदी व्‍यापारिक अनुपम वर्णन एहिमे भेल अछि। ई महागाथा मानवक एक दुर्लभ, अजेय आन्‍तरिक शक्तिक महिमाक आख्‍यान करैत अछि जकरा विकसित करबाक वर्त्तमान सन्‍दर्भमे लुप्‍त होइत-होइत अधिक गुप्‍त भ’ गेल अछि। दुलरा दयाल महागाथाक एक-एक पात्र जलन जीवी समाजक एक-एक विद्वान क सफल प्रतिनिधि करैत अछि संगहि ई गाथा तत्‍कालीन युगधाराकेँ काव्‍यक रस धारामे परिणत क’ कए युग-युगसँ तकरा लोक मानसमे प्रवाहित करबा मे सफल रहल अछि। एहि गाथामे जलजीवी. जलपथ, घाट, जलशासल ओ सुरक्षाक काव्‍यात्‍मक विवरणक संगहि-संग तुला लक्ष्‍मी, तरुआरिक विद्युद्धाम छटा आ करुआरिक अभियानक चित्र सभ अत्‍यन्‍त सम्‍मोक रूपेँ उभरैत चल आयल अछि जे इतिहासकारकेँ सौन्‍दर्यानन्‍दक विपुल अवसर प्रदान करैत अछि। एहि लोकगाथामे कमल ज्‍योति मिथिलाक बाध-बोन, चौर-चॉंचर, गाम-घर. पशु-पक्षी आ नर-नारीक कलात्‍मक आ सौन्‍दर्यमय छवि हंस शिखरसँ ल’ कए भागीरथी घरि मिलनक सौन्‍दर्यक विवरणसँ ओतप्रोत अछि। मिथिलाक लोकजीवनक अत्‍यन्‍त प्राणवन्‍त चित्र अछि जकर स्‍पष्‍ट प्रमाण एहि गाथामे उपलब्‍ध अछि। हंसालय हिमालय.कमलालय मिथिला आ शंखपाल सागरक अनुपम आ कलात्‍मक साहित्यिक सौन्‍दर्य निखरि आयल अछि। एहि महागाथामे मिथिला जल-जीवनकेँ आलोकित कयनिहार विख्‍यात मैथिलीलोक महाकाव्‍यक नृत्‍यमयी महायोगिनी उाइन बहुरा ठहुराइनक व्‍यक्तित्‍व चन्‍द्रलेखा, अभीनार्ता. मंगला. शेबारानी आ अपना वक्षोज मे सर्पदंश ल’ कए मृत्‍य आलिंगन कयनिहार क्लियोपैट्राक व्‍यक्तित्‍वसँ बहुत अधिक शक्तिशाली, रोमांटिक. रहस्‍यमय अथिभमानी आ ज्‍योतिर्मय छैक। एहि महागाथाक नारी पात्र सभ डााकिनी सँ ल’ कए याकिन धारिक योगिनक चरित्रक आधार पर प्रतीक रूपमे अपन सम्‍पूर्ण छवि-छटाक संग उपस्थित अछि। एहि लोकगाथा महाकाव्‍यक सार्थवाहक लोकनि मे उल्‍लेखनीय छथि दुलरा दयाल, विजयमल्‍ल. गोहिलमल्‍ल, कोयलावीर. रन्‍नूवीरक संकट ओ साहसिक क्षणक विवरणसँ ओतप्रोत अछि। एहि लोक महाकाव्‍यक साहित्यिक सौन्‍दर्य आ कलात्‍मक शिल्‍प रहि-रहि क’ जेना सोर पाडैे़त छैक मैथिलीक सांस्‍कृतिक वैभवसँ उल्‍लसित होयबा ले,। एकरा जँ नदी हाक कीही तँ अतिश्‍याकेक्ति नहि। हंसालय सँ गंगाधारिक कमलाक धारा-प्रवाहक यात्राक एक अत्‍यन्‍त भव्‍य आ कलात्‍मक साहित्यिक उपलब्धि अछि। एहि महागाथामे में सार्थ शब्‍दक प्रयोग तृअर्थक अछि-जलपोतक बेडा, थलपथक व्‍यापारीक गाडी-बड़द् आ लोकक हेँजक अर्थमे तथा सैनिक गल्‍मक अर्थमे तथा साहसिक नाविकक अर्थ मे। सार्थ सर्वतन्‍त्र स्‍वतन्‍त्र होइत रहथि जे शक्ति, साहस, शौर्य, सहिष्‍णुता आ शीलक आगर होइत छलाह। एहि महागाथामे साथ आ सार्थवाहक लोकनिक साहसक अत्‍यन्‍त मनोहारी विवरण उपलब्‍ध होइत अछि। भारतीय जलयोद्धाक एहन स्‍वर्णगाथा अन्‍यत्र कतहु नहि उपलब्‍ध होइछ। एहि में जल जीवनक बहुछवि दर्शी साहित्यिक छटा क प्रवाहमान क्र सँ साक्षात्‍कार होइत अछि। एकर सार्थवाह लोकति मे दयाल, विजयमाला, गोहिलसफल कोयलावीर आ रलू वीर क संकट ओ साहसिक क्षणक सभ विख्‍यात ग्रीक महकविक काव्‍य ओडैसीक महानायक युलीयसक एक कलात्‍मक उल्‍लास मैथिली परिवेशमे पसरिक’ गौरवान्वित क’ दैेत अछि। एकर सार्थवाह केँ सागर क संघर्ष, शैर्य. अभियान, अनुभव, महाकाव्‍यक गाथा थिक जकरा सुनला पर मलुष्‍यकेँ दिव्‍य, चेतावनी, चरित्र, चॉंकि, प्रेरणा आ विश्‍व द’ कए ओकरा अपना व्‍यक्तित्‍वकेँ गढिक’ जीवनक दिशा निर्देश करबामे सहायक होइत छैक। दुलरा दयाल महिमावान, शौर्य शाली, तेजस्‍वी आ यशस्‍वी सार्थवाह रहथि। ओ देश देशान्‍तरक विणय कयलनि। देशान्‍तरमे ओ मिथिलेक नहि, प्रत्‍युत भारतक विजय अध्‍यात्मिक विजय घ्‍वज लहरौलनि-आ अपन देश मिथिलाक यश सौरभ प्रसार लनि। तरुआरिक विजय कोनो विजय नहि होइछ कारण हिंसा. आतंक आ रक्‍तलिप्‍त विजय क्षणिक होइछ। दुलरा दयाल महागाथा अत्‍यन्‍त कलात्‍मक रूपेँ सप्‍तकमलक सप्‍तयोगिनी नृत्‍य पर आधारित अछि। एहिमे मिथिलाक पशु-पक्षी, पुष्‍पलता, ऋतुचक्र, तन्‍त्र-मंत्र, रीति-नीति, संगीत-नृत्‍य, देवी-देवता आ नर-नारी एतेक आलोकित विवरण अन्‍यत्र नहि उपलब्‍ध होइछ। ई गाथा एक प्रवाहमान महाकाव्‍य थिक जे तन्‍त्र-विद्याक आधार नेने जल जीवनक पृष्‍ठभमिमे युगयुगान्‍तर सँ प्रवाहमान आ द्युतमान अछि। प्रतिपाद्य लोकगा‍था ऐतिहासिक रसँ परिपूर्ण अछि, कारण दुलरा दयाल द्वारा निमित्त हिमगिरिसँ ल’ कए गंगाधार धरि सात मण्‍डप मूलाधार, स्‍वाधिस्‍थान, मरिशापुर, अनाहत, आज्ञाचक्र, सहस कमल आ सम्‍पूर्ण नृत्यक निमित्त निर्मित कतोक मण्‍डपक अवशेष अद्यपि वर्तमान अछि। एहि महागाथाक सर्वोपरि वैशिष्‍ट्य थिक जे एहिमे मिथिला, कामरूप आ बंगालक तान्त्रिक साधाक पृष्‍ठभूमिमे लिखल गेल अछि जाहिमे मानवक आन्‍तरिक शक्तिक महिमाक आख्‍यान कयल गेल अछि जे वैरवीकरणक फलस्‍वरूप आब लुप्‍त गेल जा रहल अछि। तन्‍त्रक एक अत्‍यन्‍त शक्तिशाली विद्या थिक ‘डायन विद्या’। ई विदया एक एहन विदया थिक जे विश्‍वक प्र‍त्येक देश मे विदयामान अछि। ऐहि विद्याक लेखनक क्रममे आङव्‍ल साहित्‍यक सर्वाधिक प्रभावशाली उपन्‍यास सी (SHE) क लेखक राइडर डेगर्ड. विश्‍वक प्रख्‍यात नाटककार शेक्सपियर (A Search in Secrtay of Esyft seerch) एसर्व इन सिक्रेट इणिया 1564-1616) क टेसपेस्‍ट (Tempest) (क1611-12) क गणना कयल जा सकैछ। पाल व्ंटत क ‘एसर्च इन सिक्रेट इजिप्‍ट’ (A Search in Secret & Egypt India) तँ तन्‍त्रक रहस्‍यमय अन्‍वेषणक हेतु विख्‍यात अछि। ब्राजीलक भुवन विख्‍यात लेखक चिक्‍को-जेवियरक भूत सभहक लिखनौल शाताधिक उपयास प्रकाशित छनि। प्‍लाइ माउथक एक मिस्‍चीक शरीरमे एक तिब्‍बती लामा प्रवेशक’ गेलनि, जाहि देशक भाषा एवं विद्याक नाम ओ सुनने छलाह तकर तिब्‍बत, तिब्‍बती भाषाक मटर्म सभ आ लामाका विद्यापर एक पुस्‍तकक रचना कयलनि थर्ड अहि (Third Eye)। ओहि आत्‍माका नाम छलैक लोव सांगरप्‍पा। प्रतिपाद्य गाथा में काया परिवर्तनक कतोक स्‍थल अछि। एहिमे डोइन विद्याक विलक्षण वर्णन भेल अछि। स्‍वेनहेण्डिन ट्रान्‍स हिमालया (Trans Himalaya) मे ।जाहि मानसरोवर आ राक्षस तालक विवरण देलनि अछि तकर यथार्थ प्रतिरूप एहि लोकगाथामे इजोरिया सरोवर आ आन्‍हरिया सरोवर कहि क’ सम्‍बोधित कयल गेल अछि। तन्‍त्र गाथाक वैशिष्‍ट्रय थिक जे प्रत्‍येक पात्रक चाहे ओ स्‍त्री होथि वा पुरुष अपन क्षेत्रमे अद्वितीय एवं अप्रतिम छथि जे अपन चमत्‍कारक बलपर जनसामान्‍यकेँ सतत चमत्‍कृत करैत रहैत छथि। एहि महगाथाक अनुशीलनसँ अवबोध होइछ जे दुलरा दयालक सा‍‍हसिक क्षण विख्‍यात ग्रीक महाकवि होमरक महाकाव्‍य ओडेसी (odyssey) क महानायक दुलीयसक अभियान, आपत्ति, धैर्य, शौर्य आ आनन्‍दक कलात्‍मक उल्‍लास मैथिली परिवेशमे पसारि क’ गौरवन्वित क’ दैत अछि। नोबेल पुरस्‍कार विजेता मिरवाइल सोलोखव (Mikhail Olokovh)क नदी जीवनपर आधारित उपन्‍यास ‘एण्‍ड क्‍वाइट फलोज द डनॅ (And quite Flows the Doha) तथा वाङव्‍ला साहित्‍यक उपन्‍यास शिल्‍पी माणिक वदोपाघ्‍याय ( 1906-1956) क ‘पद्यानदीर मांझी (1936) सेहो जलजीवनक एतेक ऐश्‍वर्य युक्‍त विवरण देबामे असमर्थ भ’ गेल छथि। मैथिली लोकगाथान्‍तर्गत प्राचीनकालीन मिथिलाक समाज व्‍यवस्‍था, राजव्‍यवस्‍था आ व्‍यापार व्‍यवस्‍थाक मर्मकेँ उदघाटित करैत अछि नैका बनिजारा। ई मिथिलाक परप्‍रागत स्‍वर्ण संस्‍कृतिक महान सम्‍पदा थिक जकरा अन्‍तर्गत तत्‍कालीन मिथिलाक इतिहास-संस्‍कृति. सामाजिक स्थिति, व्‍यापारिक व्‍यवस्‍था ओ लोक भावनाक मणिमुक्‍ताक समान द्युतमान अछि। जाहि कालमे एहि महागाथाक रचना भेल होयत ओहि समय साहित्‍य, युद्ध, रोमांस, स्‍टंट, चलाकी देवी-देवताक अलौकिक चरित्रसँ भरल अछि। एहि महागाथाक वैशिष्‍ट्य थिक जे बौद्ध कालीन मिथिलाक समाजक कलात्‍मक अभिव्‍यक्ति देनिहार आ लोक जीवनकेँ उद्भाषित कयनिहार साहित्‍य शायदे अन्‍याय भारतीय भाषा साहित्‍यमे उपलबध हो। एहिमे जे चित्र उपलब्‍ध होइछ ओ पॉंचम शताब्‍दीक थिक। नैकाक व्‍यक्तित्‍वमे अनेक प्रकारक विद्या आ कला सन्निहित छलनि। एक जीवनमे अनेक जीवनमे जीवैत छलाह ओ। एहि गाथामे ने तँ रोमांसक छटा अछि आ ने शस्‍त्र अलंकृत शौर्यक छटा। नैका बनिजारा एक एहन सामाजिक लोक गाथा थिक जकर रूमानियत अभियान आ मानवीय संवदेनाक सौरभक सुगन्धि जकॉं चिरस्‍थायी छैक (सहस्रवर्षसँ अधिक प्राचीन रहितहुँ ई महागाथा मिथिलांचलक वर्णिक समाज आ संस्‍कृतिक एक एहन भव्‍य छटा उपस्थित करैत अछि जे मूल्‍यवान मरिाा सदृश्‍य अद्यापि ओहिना द्यतनान अछि। मैथिली साहित्‍यक एहि महान धरोहरिमे सात भाषाक ऐश्‍वर्यकेँ म्‍लान कयनिाहार आ सात महाकाव्‍यक विभूतिकेँ झमान कयनिहार लोक महाकाव्‍य नैका बनिजारा एक दिव्‍य मणिमाला थिक आ बाछा तिलंगाक मनोहारी चरित्रक छटा ओकर जापज्‍ज्‍वलमान सुमेरू सदृश द्युतमान अछि। गोधन लोक जीवनक अत्‍यन्‍त ज्‍वलन्‍त आधार छल तथा ओकर चेतना अधिक विकसित रहैत छलैक तथा अपन पालकक प्रति ओकरा असीम आत्‍मीयता रहैत छल। बाछा तिलंगाक क्रिया कलाप अत्‍यन्‍त विश्‍वसनीय अछि। एहिमे एक धीर, वीर आ साहसिक व्‍यापारी नैका बनिजाराक वर्णन मेल अछि जे देश देशान्‍तरक मिथिलाक व्‍यापार व्‍यवस्‍थाकेँ उदघटित करैत अछि ई मिथिलाक सामाजिक एवं सांस्‍कृतिक ऐश्‍वर्यसँ परिपूर्ण पृष्‍ठभूमिक बनिजारा समाजक अलैकिक गाथा थिक। एहिमे मिथिलांचलक सांस्‍कृतिक ऐश्‍वर्यसँ परिपूर्ण पृष्‍ठभूमिक बनिजारा समाजक एक एहन सामाजिक लोक महाकाव्‍य थिक जकर रूमानियत अभियान आ मानवीय संवेदनाक सौरभक सुगन्धिसँ ज केॅं चिरस्‍थायी छैक। स्रहरा वर्ष सँ अधिक प्राचीन रहितहुँ ई महाकाव्‍य मिथिलांचलक वणिक समाज आ संस्‍कृतिक एक अनुपास छटा उपस्थित करैत अछि जे मूल्‍यवान मणि सदृश ओहिना द्युतमान अछि। ई महागाथा नैकाक व्‍यापारिक अभियानक गाथा थिक जे मैथिली साहित्‍यक एहि महान हधरोहरिमे सात भाषाक ऐश्‍वर्यकेँ म्‍लान कयनिहार लोक महाकाव्‍य दिव्‍य मणिमाला थिक। नैका बनिजारा जतय उच्‍च सभ्‍यताक उद्यभी, उच्‍च निष्‍ठाक कर्तव्‍य-परायण. धीर, वीर गम्‍भीर रहथि ततय हुनक विहोता पत्‍नी फुसेश्‍वरी अपन कुलमर्यादा. शलीनता एवं सतीत्‍वक रक्षा सती सीता-सावित्री सदृश कयलनि। नैकाक धन्तित्‍व में अनेक प्रकारक विद्या आ कला सन्निहित छलनि। हुनक व्‍यक्तित्‍वमे एक महान महायात्री, ज्‍योतिषी, वैद्य, अभियानी, खान-खोजी, संधि-विग्रहत्राता. सार्थवाह. वादक, रत्‍न-परखी आ पक्षीक वाणीक विशेषज्ञ रहथि। ओ कतोक खानक अन्‍वेशण कयलनि। हुनक व्‍यक्तित्‍व निरापद छलनि। ई मानवीय स्‍तरपर एक सतरंगी मोहक छटा उपस्थित करैत एक अमर रचना थिक जे मैथिली कंठ साहित्यक एक जाज्‍ज्‍वलमान मुकुट मणि बनि गेल अछि। एकर मुख्‍य नायिका छथि चदेशक राजाक एकमात्र सन्‍तान नैका बनिजारा क धर्म-पत्‍नी रानी फुलेश्‍वरी जे अभावमे सुभाव, विपन्‍नतामे सम्‍पन्‍नता आ विपति मे धैर्य रखैत छथि। हुनकामे सृजनात्‍मक प्रतिभा छलनि जकरा द्वारा ओ द्रोण नगरक महाकुबेरनीसँ प्रार्थित भेलीह। ओ द्रोणेश्‍रीकेँ पुत्र प्राप्तिक दिशा संकेत कयलनि । फुनेश्‍वरीकेँ प्राप्‍त क’ कए बनिजारा कुल तरि गेलैक। एहि प्रकारेँ तिलकेश्‍वरी सन दुष्‍टा आ लेश्‍वरी सन धर्म परायण दू ननदि आ फलेश्‍वरी सन एक महिमामयी भाउजक चित्रण एक कलात्‍मक त्रिकोण बनि गेल अछि एहि महागाथा मे। निस्‍सन्‍देह एहि महागाथाक अनमोल तीनू नारी वरित्र मिथिलांचल एवं मैथिली साहित्‍यक जाज्‍ज्‍वलयमान धरो‍हरि थिक। समकाली समाज मे नारीक स्थिति अत्‍यन्‍त दयनीय छल जकरा मात्र भोग्‍या बुझल जाइंत छलैक। समकालीन सामाजिक परिवेशमे महिलाक क्रयविक्रयक व्‍यापार अवाध गतिऍं चलैत छल तथा नारीक हाट लगैत छल जकरा देखतहि लोकक ऑंखिकेँ चकचोन्‍ही लागि जाइत छलैक। एहिमे वर्णित कुम्‍भा डोम द्वारा सुन्‍दरी-व्‍यापार तत्‍कालीन भारतीय नारीक हीन स्थिति आ नैराश्‍य पूर्ण जीवनक अतिथार्थपूर्ण चित्र प्रस्‍तुत करैत अछि। डोमराज कुम्‍भा नारीक क्रय-विक्रय कयनिहार वेश्‍या हाट लगौनिहार महादल छल। नारी समूहकजघर्न्‍य, बर्बर आ पाखिक उपयोग क ई एक विलक्षण दस्‍तावेज थिक जे एहि ठामक सामाजिक इतिहासक अमिट दग्‍ध पृष्‍ठ कहल जा सकैछ। एहि हाटमे राजा लोकनिक रूपसी रानी. राजकुमारी, अपहृता, उढ़रल. हता. परित्‍यक्‍ता, निर्वासिता, भ्रष्‍टा एवं पीडि़ता ललना सभ रहैत छलीह। कुम्‍भा उदण्‍ड, अवण्‍ड आ प्रमृत्त छल। एहि महागाथामे वर्णित कुम्‍भा डाेम द्वारा सुन्‍दरीक व्‍यापार. तत्‍कालीन भारतीय नारीक हीन स्थिति आ निराश जीवनक व्‍यथापूर्ण चित्र उपस्थित करैत अछि। डोमिन संग पुरुषक प्रिय होइत छलीह आ अपना जुडामे फूलक गुच्‍छा गुम्‍फत करैत छलीह। ई सभ मसान भैरव आ योगिनीक पूजक होइत छलीह एकरा सभक बीचमे किछु तान्त्रिक साधनाक प्रचलन छलैक वामा चार सिद्धि लेल डोमिनक उपयोग कापालिक भैरव द्वारा कयल जाइत छल। तका बनिजारा कालीन सामाजिक पृष्‍ठभूमिमे अड़ाेमक अतिरिक्‍त चाण्‍डाल एवं धाङण्‍ड़क सेहो विशेष चलती छलैक। चाण्‍डाल सतत अमानुषिक कार्यक लेल विख्‍यात छल। ओ ककरो हत्‍या सुपारी जकाँ कतरि क’ करैत छल। धाडड सभ युद्ध प्रिय होइत छल आ निपुण अश्‍वारोरी सेहो। समकालीन समाजक राजा लोकन अपन विपुल धन राशि द’ कए एकरा सभ शौर्यक उपयोग करैत छलाह। ओ सभ दस्‍युक काज करैत छल। ओहि कालक नागमणि पिछौटा धाडँड प्रख्‍यात छल। अनादि कालसँ मिथिलाक लोककंठमे लव‍हरि-कुशहरिक गाथा प्रचलित अछि। एहि गाथाक प्रसंग विवध पुराण एवं रामायणमे सेहो वर्णित अछि; किन्‍तु एहि गाथामे वर्णित वैदे‍हीक जे स्‍वरूप विधान अछि तकरा अन्‍तर्गत लव-कुशक उत्‍पत्ति कथाक जे स्‍वरूप विधान अछि, से मिथिलाक एहि अमर लोकगाथाक तुलनामे झूस-झमान अछि। भारतीय आदर्शक श्रेष्‍ठँतम नारीक व्‍यक्तित्‍वक एहन दिव्‍य उत्‍कर्ष जाहि ज्‍जवलताक संग एहिमे देदीप्‍यमान अछि ओकर स्‍वरूपक मौलिकता अन्‍यान्‍य अनगनितो इतिहास वा पुराण मे नहि उपलब्‍ध होइछ। एहि ज्नकंठ गाथामे जे उज्‍ज्वल आ अत्‍युच नारीक सृजन कयल गेल अछि ओ अन्‍यान्‍य नाडवमयमे दुर्लभ अछि। एहि गाथाक पृष्‍ठभूमिमे सीमा अपन मातृभूमि मिथिलाक स्‍वर्णिम साधना, परमपरागत सांस्‍कृ‍तिक एंश्‍वर्य आ लोकजीवनक सहज सौन्‍दर्य नेने विकसित भेल अछि। एहिमे मिथिलाक महान बेटीक अदम्‍य, सृजनात्‍मक प्रवृति आ प्रभमय आध्‍यात्मिक व्‍यक्तित्‍व आलोकित भेल अछि। एहि लोकगाथाक स्‍वरूपक मौलिकता अछि जे सहस्रमुख रावण-वध ओ वनवासक प्रसंग सीताकेँ देल गेल अदण्‍ड़दण्‍ड सेहो एक विचारणीय विषय थिक। सीता द्वारा सहस्रमुख रावण वध जेना सीता चरितकेँ सहसा मुख्‍य रामायणसँ फराक क’ अप्रत्‍याशित रूपेँ हुनका बहुत आगॉं आनि दैत छनि। सीताक जाहि जाज्‍ज्‍वलमान राममुक्‍त आ ऐश्‍वर्य मुक्‍त वैदेहीक व्‍यक्तित्‍वक विकास वाल्‍मीकि आश्रममे भेल, सहस्रमुख रावणनध आ वनवासक प्रसंग ओहि सशक्‍त कथाक पूर्वाभास वातावरणक रूपमे कलात्‍मक भावेँ चित्रित भेल अछि। एहिसँ आगू जे वैदेही-स्‍वरूप छविमय भेल, तकरा पाबि क’ संसारक कोनो साहित्‍य आ इतिहासक पन्‍ना अनायासहि स्‍वार्णिम भ’ सकैछ। सीताक जीवन-संघर्षक कथाक गर्भकेँ उदघाटित करबाक क्रममे सीताक लेल वाल्‍मीकि आश्रमक अत्‍याधिक महत्व अछि। सीताक जीवन-संघर्ष शारीरिक ओ मानसिक दुनू छनि। एहिमे लव-कुशक जन्‍म क कथाक परिप्रेक्ष्‍यमे जगत जनीक जीवन संघर्षकेँ एहिमे पुनर्जीवित करबाक उपक्रम कयल गेल अछि। लवहरि-कुशहरि लोक गाथामे सीताक ज्‍यातिर्मय आलम्‍बनसँ ई मिथिलाक स्‍वर्णिम परम्‍पराक माहात्‍म्‍य गाथा थिक। ई लोक गाथा मिथिलाक अनुसंधानक एक अभिनव क्षितिजकेँ आलोकित करैत अछि। मिथिलामे वैदेही साधनाक अधिक प्रचार-प्रसार छलैक जकरा अन्‍तर्गत दुइ सम्‍प्रदाय विकसित भेल-ब्रहमवादिनी सम्‍प्रदाय एवं भैरवी सम्‍प्रदाय। एहि गाथाक स्‍वरूप अदभुत छैक। किछु गीत पुन: कथा, पुन: गीत तखन कथा। एकर विषय आ क्रम अत्‍यन्‍त स्‍पष्‍ट अछि। राम कथाश्रित सीता आ लवहरि-कुशहरि लोकगाथाश्रित सीताक मौलिकतामे अन्‍तर छैक। जतय राम कथाश्रित सीता सतत अश्रुमयी छथि ततय लवहरि-कुशहरि कथाश्रित सीता एक साधारण नारी छथि। राम कथामे सम्‍पूर्ण कथा रामाश्रित अछि, किन्तु एहि गाथामे सीताश्रित अछि। ई गाथा तीन खण्‍डमे विभाजित अछि-आयोघ्‍या खण्‍ड, वन खण्‍ड एवं कमल खण्‍ड। लवहरि-कुशहरि मे मिथिलाक लोक मानस, अपन माटि-पानि, आघ्‍यात्मिक चिन्‍तन, परम्‍परा आ आचारक अनुकूल एक शक्तिमयी सीताक आराधना जे विदेह भूमि, विदेह जनक, विदेह गरिमा आ वैदेही दर्शनक पूर्ण प्रतिनिधिात्‍व करैत शक्ति-साधनाकेँ उदघाटित करैत अछि। एहिमे वणित सीता, लोक सीता छथि राजराजेश्‍वरी नहि। ई गाथा मिथिलाक स्‍वर्णिम साधना, परम्‍परागत सांस्‍कृतिक ऐश्‍वर्य तथा लोक जीवनक सहज सौन्‍दर्य विकसित भेल अछि। एहिमे मिथिलाक एहि महान बेटीक ज्‍वलन्त जीवन-संघर्षसँ शक्ति, अदम्‍य सृजनात्‍मक प्रवृत्तिय आघ्‍यात्मिक व्‍यक्तिव आलोकित भ’ उठत अछि। मिथिलाक लोक जीवनक आ लोक-संस्‍कारक अपूर्व छवि एहिमे उपलब्‍ध अछि। मिथिलाक लोक जीवनक आ लोक-संस्‍कार क अपूर्व छवि एहिमे उपलब्‍ध अछि। ई गाथा मिथिलाक स्‍वर्णिम साधना, परम्‍परागत, सांस्‍कृतिक ऐश्‍वर्य आ लोक जीवनक सहज सौन्‍दर्य विकसित भेल अछि। विश्‍व साहित्‍य मे एक साधारण नारी, राजा-रानीक अनेक गाथा उपलब्‍ध होइछ, किन्‍तु एक राजराजेश्‍वरी केँ सहसा एक साधारण नारी बनि क’ त्‍याग, चेतनामयी, ओजस्‍वी स्‍वाभिमान पूर्ण ओ सफल जीवनयापन करब एकमात्र एहि लोकगाथाक वैशिष्‍ट्य थिक। प्रतिकूल परिस्थितिकेँ धैर्यक संग अनुकूल बनालेबाक क्षमता एहि लोकगाथाक वैश्ष्ट्यि थिक। मणिपद्य मैथिली लोकगाथाकेँ अमर बनयबाक दिशमे जे हुनक अवदान अछि ओ निश्‍चये एहि साहित्‍यमे हुनका अमरत्‍व प्रदान कयलक ताहिमे संदेह नहि। लोकगाथाक विवरणात्‍मक वर्णनक बिनु परायण कयने एहिपर आधृत उपन्‍या सादिक अघ्‍ययन हमरा जगैत अपूर्ण हैत। ओ जाहि अंशक निवेश अपन उपन्‍यासदिमे नहि क’ फैलनि तकरा ओ लोकगाथाक इतिहासमे सन्निवेश कयलनि। प्रयोजन अछि एहि विषयक जे एहि लोकगाथा सभहिक सम्‍यक् रूपेँ संकलन, सम्‍पादन आ तकर प्रकाशन हो। किन्‍तु अद्यपि मैथिलीमे एहि दिशामे ने तँ अनुसन्‍धान भेल अछि आ ने अनुसंधिवित्‍सु एहि दिस उन्‍मुख भेलह जे चिन्‍तनीय विषय थिक। मिथिलाक स्‍वर्ण परम्‍परामे जटिल एहि गर्वरानी धरोहरिक अधिकाधिक अन्‍वेषण आ संकलन हो। चेतना समिति ओ नाट्यमंच सांस्‍कृतिक, साहित्यिक आ कलाक मुख्‍य केन्‍द्र रहल अछि बिहारक प्रशासनिक राजधानी पटना। जीवकोपार्जनार्थ मिथिलांचलवासी प्रचुर परिमाणमे एहि महानगरमे निवास करैत छथि। मैथिली भाषा-भाषीक एतेक विशाल जनसंख्‍या वाला महानगरक मातृभाषानुरागी लोकनिक सत्‍प्रयाससँ अपन भाषा आ साहित्‍य ओ रंगमंचक विकासमे महत्‍वपूर्ण भूमिका निर्वाह कयलक समानार्थी अछि, कारण एहि क्षेत्रमे जे किछु अवदान अछि ओ पटना आ चेतना समितिक योगदान एकहि बात थिक। आब ई प्रयोजनीय भ’ गेल अछि जे जनमानस ओहि अवदान केँ जानय आ जँ महत्‍वपूर्ण अछि ताँ ओकर मुक्‍त कण्‍ठे प्रशंसा क’ कए ओकरा स्‍वीकार करय। रंगमंचक क्षेत्रमे चेतना समितिक नाट्यमंचक अवदानक पूर्ण मिथिलाञ्चल एवं मिथिलेत्तार क्षेत्रक अवदानसँ परिचित होयबाक हेतु प्रेमशंकर सिंह (1942) क एवं नाट्यान्‍वाचय (2002) क अवलोकन कयल जा सकैछ। ई निर्विवाद सत्‍य थिक जे मिथिलाञ्चल आ मिथिलेतर क्षेत्रमे मैथिली रंगमंचक शौकिया रंगमंचक संख्‍या अत्यन्‍त सीमित अछि। यदयपि बीसम शताब्‍दीक तृतीय,चतुर्थ आ पंचम दशकमे समग्र भारतीय स्‍वतंत्रता-संग्राममे संलिप्‍त रहला, जाहि कारणेँ नाटक सदृश्‍य समवेदक कलात्‍मक सृजन विकसित नहि भ’ पौलक, तथापि पय-तत्र पौराणिक, ऐतिहासिक तथा सामाजिक नाटक मंचन होइत रहल। एहन प्रस्‍तुतिक मूल उद्देश्‍य छलैक राष्‍ट्र आ समाजक समक्ष एक उच्‍च कोटिक आदर्श प्रस्‍तुत करब। एहन शौकिया रंगमंच अत्‍यल्‍प संख्‍यामे समाजक संग जुड़ल आ एहिसँ आगॉं बढि क’ ओ ने तँ जीवनक अभिन्‍न अंगे बनि सकल आ ने सांस्‍कृतिक, साहित्यिक एवं कलात्‍मक विकासक माघ्‍य मे। स्‍वतंत्रात्‍मक पश्‍चात् व्‍यक्ति-व्‍यक्तिक दृष्टिकोणमे परिवर्त्तन भेलैक आसमाजमे सांस्‍कृतिक. साहित्यिक एवं कलात्‍मक विकासक अवरुद्ध द्वार खुजि गेलैक। स्‍वाधीनोत्‍तर युग मे सांस्‍कृतिक, साहित्यिक एवं कलात्‍मक स्थितिक यथार्थ चित्रण जानबाक, बुझबाक आवश्‍यकता महसूस भेलैक समाज एवं जनमानसकेँ। सामान्‍य जनमानसक सुख-दु:ख, आशा-निराशा, कुण्‍ठा संत्रास, असन्‍तोष, क्षोभ, क्रोध एवं जीजीविषा केँ वाणी देबाक हेतु नाटककारक अन्‍तर उद्रेलित भेलनि आ एहि दिशामे सोझे-सोझे स्थितिक वर्णन करबाक हेतु नाटक आश्रय लेलनि ।शनै:-शनै: रंगमंच सामाजिक जीवनक सन्निकट अबैतगेल आ वर्तमान स्थिति मे तँ ओ एक अभिवाज्‍य अंग बनि गेल अछि। एकर परिणाम एतबे नहि भेलैक जे शौकियाक संगहि-संग अर्द्ध व्‍यावसायिक वा व्‍यावसायिक स्‍तरपर जनमानस रंगमंचक महत्‍व केँ स्‍वीकारलक। एहिमे सबसँ क्रा‍न्ति परिवर्त्तन भेल जे महिला समुदाय एर्त्तहि मे अपन सहभागिता देब प्रारम्‍भ कयलनि। हुनका सभक सक्रिय सहभागिताक फलस्‍वरूप शनै:-शनै: ई मनवव जीवनक अविभाज्‍य अंग बनाय लाग ला किन्‍तु अत्‍यन्‍त दुर्भाग्‍य पूर्ण स्थिति थिक जे मिथिलाञ्चल वा मिथिलेतर क्षेत्रमे अद्यापि व्‍यावसायिक रंगमंचक प्रादुर्भावे नहि भेलैक। पटना सदृश महानगरमे चेतना समितिक तत्‍वावधानमे नाट्यभिनयक यात्राक शुभारम्‍भ भेलैक तकरे फलस्‍वरूप नाट्यांचनक परम्‍पराक सूत्रपात भेलैक जाहिमे गृहिणी महिला वर्गक सहभागितासँ एकर प्राणमे नव स्‍पन्‍दन भरलक जे अनुर्वर छल। चेतना समितिक स्‍थापनोपरान्‍त सांस्‍कृतिक गतिविधिक संगहि-संग रंगमंचक क्षेत्रमे नवजागरणक संचार भेलैक सन् 1954 ई. सँ। किन्‍तु आरम्भिक कालमे अनवरत एकाँकीक मंचन होइत जााकर विवरण्‍ा आगॉं प्रएतुत कयल जायत, मुदा सन् 1973 ई. सँ अद्यपर्यन्‍त एकाँकी वा नाटक मंचन होइत अ‍ाबि रहल अछि। भारतीय गणतंन्‍त्रमे एहन कोनो महानगर, नगर का कस्‍वा नहि अछि जतय नियमित रूपसँ नाट्य-प्रस्‍तुति नहि होइत अछि, किन्‍तु नाट्यमंच अपन प्र‍स्‍तुतिसँ एकरा मूर्त्त रूप प्रदान करबामे सक्षम सिद्ध भेल अछि। चेतना समितिक तत्‍वावधानमे आयोजित विद्यापति पर्वक प्रति शनै:-शनै:जनमानसमे एक प्रबल ज्‍वारक उद्भावना होइेत देखि एकर कार्यकारिणी समितिक अघ्‍यक्ष दिवाकर झा (1914-1997) एवं सचिव जटाशंकर दास (1923-2006) अनुभव कयलनि जे ई संस्‍था मात्र साहित्यिक गतिविधिपर केन्द्रित नहि रहय, प्रत्‍युत एकरामे अत्‍यधिक गतिशीलता अनबाक हेतु आ ओहन जनमानसक संग।जोड़बाक प्रयोजन बुझलनि जकरा हेतु मनोरंजनक किछु एहन कार्यक्रम सुनिश्‍चित कयल जाय जे अधिकाधिक संख्‍यामे जन्‍मानस एहि आयोजनमे सहभागी बनि सकथि तथा एकर क्रिया-कलापमे अपन उपस्थिति दर्ज करा सकथि। एहि सोचकेँ क्रिया रूप देबाक निमित कार्यकारिणी समिति एक उपसमिि‍तक गठन कयलक जाहि मे बाबू लक्ष्‍मीपति सिंह (1907-1979), आनन्‍द मिश्र (1924-2006), गोपाल जी झा गोपेश (1931-2007) एवं कामेश्‍वर झा केँ ई भार देल गेलनि जे एकरा कोना क्रियान्वित कयल जाय ताहि प्रसंगमे अपन ठोस विचार कार्यकारिणी समितिक समक्ष प्रस्‍तुत करथि। उपसमितिक सदस्‍य लोकनि एक स्‍वरेँ अपन विचार कार्यकारिणीक समक्ष प्रस्‍तुत कयलनि जे मिथिलांचलक गौरव-गरिमाक पुनर्राख्‍यान आ नाट्यसाहित्यिक पुरातन परम्‍पराकेँ पुनरूजीवित करबाक हेतु एहि मंचसँ नाट्यभिनयक परम्‍पराक शुभारम्‍भ कलय जाय। उपसमितिक विचारसँ सहसत भ’ कार्यकारिणी समिति जनमानसक हृदयमे मातृभाषानुरागकेँ जागृत करबाक निमित नाट्योजनक प्रयोजनीयताक आवश्‍यकता अनुभव कयलक तथा एकरा क्रियान्निवन करबाक दिशामे प्रयासरत भेल। समिति अपन प्रयोगवस्‍थामे नाट्ययोजनक शुभारम्‍भ नाटकासँ नहि क’ कए एकांकीसँ करबाक निश्‍चय कयलक, कारण ओहि समय मैथिलीमे अभिनयोपयोगी नाटक सर्वथा अभाव छलैक आ एकहि नाटककेँ बारम्‍बार अभिनीतकारबा समुचित नहि बुझल का उपसमितिक स्‍दस्‍य लोकनि अभिनयोपयोगी एंकाकीक अन्‍वेषसण करब प्रारम्‍भ कयलनि। अभिनयोपयोगी एंकाकीक हेतु मैथिलीक वरेण्‍य साहित्‍य-मनीषी लोकनिक संग सम्‍पर्क साधल गेल। एहि दिशामे उपसमितिकेँ सफलता भेटलैक जे समकालीन मैथिली साहित्‍यपर अपन अमिट छाप छोड़ निहार बहुविधावादी रचनाकार हरिमोहन झा (1908-1989) सँ सम्‍पर्क साधल गेल आ हुनकासँ अनुरोध कयल गेल जे एक एहन एकांकी अभिनेयार्थ समितिकेँ उपलब्ध कराबथि जाहिमे मिथिलाक विद्या-वदायन्‍ताक गौरव-गाथाक उल्‍लेख हो। ओ समितिक एहि आग्रहकेँ स्‍वीकार क’ मण्‍डन मिश्र (1958) एकांकीक रचना क’ कए ओकर पाण्‍डुलिपि समितिक तत्‍कानीन पदाधिकारी लोकनिकेँ उपलब्‍ध करौलथिन जे मिथिलाक अतीत केँ उद्भाषित करैछ जाहिसँ जनमासन रिचित भ’ सकथि। अभिनयोपयुक्‍त एकांकीक पाण्‍डुलिपि उपलब्‍ध भेलाक पश्‍चात् समितिक पदाधिकारी लोकनि अत्‍यधिक उत्‍साहित भ’ निर्णय लेलनि जे अद्यापि मैथिली रंगमंचपर महिला अभिनेत्रीक भूमिकामे मिथिलाञ्चल वा मिथिलेत्तर क्षेत्रमे पुरुष अभिनेतहि द्वारा अभिनेत्रीक भूमिकाक निष्‍पादन कराओल जाइत छल, ताहि परम्‍पराक खण्डित करबाक दिशामे समिति सोचब प्रारम्‍भ कयलक ई अनुभव कयल जाय लागल जँ महिला कलाकार उपलब्‍ध भ’ जाथि तँ नाट्य मंचन विशेष स्‍वाभाविक भ’ जायत। मुदा ई एक जटिल समस्‍या छल। महिला कलाकार औतीह कतयसँ ? कोनो मैथिलानी मंचपर आबि अभिनय करथि से सोचनाइयो साहसक काज छल, तखन प्रस्‍ताव राखब आ मना क’ हुनका मंचपर उतारब आओर कठिन छल। समिति मैथिली रंगमंचपर एक क्रान्ति अनबाक दिशामे प्रयासरत भेल, कारण समितिक सतत प्रयास रहल अछि ले एहि मंचसँ एहन अभिनव कार्य कयल जाय जकर सुपरिणाम हैत जे जनमानसक हृदयमे रंगमंचक प्रति आकर्षण भावनाक उदय होयतैक तथा नाट्यभिनयमे स्‍वाभाविकता आओत कोनो मैथिलानी रंगमंचार आबि अभिनय करथि ई सोचबो निराधार छल। ई अत्‍यन्‍त साहसक काज छल, तखन किनको समक्ष एहन प्रस्‍ताब रखबाक आ हुनका मना क’ मंचपर उतारब ओहूसँ कठिन छल। समिति सोचलक जे ओही मैथिलीनीक समक्ष प्रस्‍ताव राखल जाय जनिका हृदयमे मैथिल संस्‍कृतिक उत्‍कर्षमय परम्‍परामे आयोजित होइत सांस्‍कृतिक अनुष्‍ठनावा कार्यक्रमक प्रति आकर्षण आ आगाध श्रद्धा होइन। समिति एहि विषयसँ पूर्ण परिचित छल जे हरिमोहन झा उदारवादी प्रगतिशील विचार-धाराक साहित्‍य-मनीषी छथि तेँ समितिक पदाधिकारी लोकनि हुनक आश्रयमे उपस्थित भ’ अपन मनोभावनाकेँ रूपायित करबाक निमित हुनका सविनय साग्रह अनुरोध कयलक जे एहि योजनाकेँ क्रियान्वित करबाक निमित कृपया अपन धर्मपत्‍नी सुभद्रा झा (1911-1982) केँ अपन एकांकीमे भारतीक भूमिकामे अभिनय करबाक अनुमति प्रदान कयल जाय। किछु क्षणतँ ओ इनस्‍ततक स्थितिमे आबि गोलाह जे की कयल जाय ? ओ अपन रचनादिमे मिथिलाञ्चल नारी जागरणक गखनाद करैशं रहथि तेँ ओ अपन उदारवादी दृष्टिकोणक परिचय दैत सहर्ष सांस्‍कृतिक चेतना सम्‍पन्‍न, मैथिल समाजक समक्ष एहि चुनौतीकेँ स्‍वीकार क’ कए युग-युगसँ आबि रहल बन्‍धन केँ तोडि़ मंचपर अयलीह आ सुभद्राकेँ मण्‍डन मिश्रक पत्‍नी भारतीक भूमिकामे रंगमंचपर उपस्थित हैबाक अनुमति देलथिन जे सर्वप्रथम मैथिलानी रंगकर्मीकरूपमे मैथिली रंगमंचपर अवतारित भ’ एहि अवरुद्ध धाराक द्वारकेँ भविष्‍यक हेतु खोलि देलनि जकरा एक ऐति‍हासिक घटना कहब समुचित हैत आ मैथिल समाजक हेतु प्रकाश स्‍तम्‍भ बनि गेलीह। मैथिली रंगमंचपर सुभद्रा झा पदार्पण महिला रंगकर्मीमे एक क्रान्ति आनि देलक। चेतना समिति एवं रंगमंच हेतु ई एक ऐतिहासिक घटना भेलैक आ मैथिली रंगमंचक इतिहासमे एक नव अघ्‍यायक शुभारम्‍भ भेलैक। हुनकासँ अनुप्राणित भ’ पटना विश्‍वविद्यालक स्‍नातकोत्‍तर विभागक एक छात्रा पनिभरनीक भूमिकामे रंगमंचपर उपस्थिति दर्ज करौलनि ओ छलीह अहिल्‍या चौधरी। एहि एकांकी अभिनय भेल छल लेडी स्‍टीफेन्‍सस हाल मे। मण्‍डन मिश्रक भूमिकामे उतरल रहथि आविर्तक उपसम्‍पादक यदुनन्‍दन शर्मा आ हुनक पत्‍नी भारतीक भूमिकामे सुभद्रा झा। पनिभरनीक भूमिका कयने रहथि अहिल्‍या चौधरी आ ठिठराक भूमिकाक निर्वाह कथने रहथि इण्डियन नेशनक इन्‍द्रकान्‍त झा। विगत शताब्‍दीक षष्‍ठ दशकक उतरार्द्ध अर्थात् सन् 1958 ई. मे चेतना स‍मितिक रंगमंचपर एहि एकांकीक सफलतापूर्वक मंचस्‍थ कयल गेल तथा महिला रंगकर्मी अपन सहभागितासँ एकरा अधिक प्राणवन्‍त बनोलनि। सुभद्रा झा एवं अहिल्‍या चौधरीक मैथिली रंगमंचपर उपस्थिति आ हुनका सभक अभिनय कौशल एतेक बेसी प्रभावोत्‍पादक भेल जे महिला वर्ग एहि कलाक प्रदर्शनमे अपन कुशल कलाकारिताक परिचय देलनि जाहिसँ प्रोत्‍साहित भ’ अधुनातन रंगमंच एतेक विकसित भ’ सकल अछि तकर श्रेय आ प्रेय हुनके लोकनि केँ छनि। समाजक प्रति सोच, अपन उतरदरयित्‍वक प्रति प्रतिवद्धता, त्‍याग, सेवा-भावना आ कर्म निष्‍ठाक परिणाम थिक जे महिला रंगकर्मी सचेष्‍टता, तत्‍परता आ अपन अभिनय-कौशलक परिचय द’ रहल छथि। मैथिली रंगमंचक इतिहासमे एकर ऐतिहासिक महत्‍व छैक। समि‍ति द्वारा प्रस्‍तुत एंकाकीक मंचन अनेक दिन धरि पटनाक अतिरिक्‍त अन्‍यो स्‍थानपर चर्चित-अर्चित होइत रहल, जाहिसँ अनुप्राणित भ’ समितिक पदाधिकारी लोकनिक विचार भेलनि जे प्रतिवर्ष विद्यापति स्मृि‍त पर्वोत्‍सवपर कोना-ने-कोनो रुकांकीक मंचन अवश्‍य कयल जाय, कारण जनमानसक अभिरुचि नाट्यमंचन दिस विशेष जागृत भेल आ अधिकाधिक संख्‍यामे जनमानसक सहभागिनी होमयलागल। पुन: ऐतिहासिक पृष्‍ठभूमिपर अाधृत गोविन्‍द झा (1923) एकांकी वीर कीर्ति सिंहक मंचन कयल गेल जाहिमे कीर्ति सिंहक अग्रज वीर सिंहक राजतिलक कराय हुनके हाथे कीर्ति सिहंकेँ सिंहासनारूढ करयबाक जटिल समस्‍या छल जे मौलिक एवं मातृस्‍नेहक विलक्षण आदर्शकेँ रंगमंचपर प्रस्‍तुत करब कठिन समस्‍या छल। एहू एकांकीक मंचन स्‍थानीय लेडी स्‍टीफेन्‍सस हालक प्रागंनमे भेल छल। समितिक कालीन सचिव रुपनारायण ठाकुरकेँ आशंका छलनि जे ऐतिहासिकताक पृष्‍ठभूमिमे लिखित एकांकीक मंचन कठिन होइछ, तेँ बारम्‍बार ओकर असफलताक आशंका व्‍यक्‍त करैत रहथि, किन्‍तु संयोगसँ एकर प्रस्‍तुति अत्‍यन्‍त सफल भेल। दर्शकक मानस पटलपर एकर स्‍वस्‍थ प्राभाव पड़लैक। यद्यपि गणपति ठाकुरक महेँ असलानसँ दान रूपमे प्राप्‍त राज्‍य स्‍वीकार करयबासँ हुनक उज्‍ज्‍वल चरित्र धूमिल भ’ जाइछ तथापि निर्देशक हुनक चारित्रिक उत्‍कर्ष केँ एकशन सँ प्रस्‍तुत कयलनि। सा‍माजिक पृष्‍ठभूमिपर आधारित एकांकी गोविन्‍द झाक मोछसंहार (1965) कतोक घटना एहि रूपेँ विन्‍यस्‍त अछि जकरा मंचपर प्रस्‍तुत करब ओहि समय मे मंचीय-कौ-शलक अभाव रहितहुँ अत्‍यन्‍त सफलता पूर्वक ओकर मंचन भेल। एहि एकांकीमे महिला अभिनेत्रीक अभाव छल तेँ एकर प्रस्‍तुतिमे कोनो प्रकारक कठिनताक अनुभव निर्देशक केँ नहि भेलनि। एकर निर्देशन कथने रहथि गोपाल जी झा गोपेश।मिथिलाक प्रतिनिधि (1963) एकांकीक मंचन सेहो चेतनाक मंचपर भेल अछि जकर लेखक आ निर्देशन गोविन्‍द झा स्‍वयं कयलनि। एहिमे दू महिला अभिनेत्रीक छैक जकर अभिनयमे महिला अभिनेत्रीक भूमिकामे पुन: प्राचीन परम्‍पराकेँ स्‍थापित कयल गेल जे पुरुष द्वारा महिला अभिनेत्री भूमिकाक निर्वाह करओल गेल। सन् 1962 ई. मे चीनी आक्रमणक पृष्‍ठभूमि मे गोपालजी झा गोपेश लिखित गुडूक चोट धोकड़े जानय तथा भारत-पाक युद्धक समय विनु विवाहे द्विरागमक मंचन चेतनाक तत्‍वावधानमे विद्यापति स्‍मृति पर्वोत्‍सवपर मंचित भेल छल लेडी स्‍टीफेन्‍सस हालक प्रंतगनमे। एहि प्रस्‍तुतिमे भारती ब्‍लाक वर्क्‍सक प्रोफाइटर अर्जुन ठाकुरक संगहि-संग नगीना कुमर एवं निरंजन झा महिला अभिनेत्रीक रूपमे मंचपर उपस्थित भेल रहथि। पुरुष पात्रकेँ महिलाक भूमिकामे देखि क’ जनमानसँकेँ कोनो आश्‍चर्य नहि होइत छलैक एवं नायक-नायिकाक क्रिया-‍कलाप मे मर्यादाक वचनपर कोनो आश्‍चर्य वा व्‍यवधान नहि होइत छलैक। एहि अभिनयमे भाग लेनिहार अन्‍य कलाकारमे इण्डियन नेशनक बेचन झा, प्रियनारायण झा आ राजेन्‍द्र झा प्रभूति अपन-अपन भूमिकाक निर्वाह सफलता पूर्वक कयलनि। उक्‍त दुनू एकांकीमे गीतगाइनिक भूमिकामे कमला देवी एवं हुनक सखबी लोकनिक सहयोग चेतनाक मंचकेँ उपलब्‍ध भेल छलैक। चेतना द्वारा नियमित मंचक स्‍थापनाक पूर्व विद्यापति पर्वोत्‍सवपर जे एकांकी मंचित भेल ओ निम्‍नस्‍थ अछि: वर्ष एकांकी एकांकीकार 1958 मण्‍डनमिश्र हरिमोहन झा 1959 मोछ सहांर गोविन्‍द झा 1960 मिथिलाक प्रतिनिधि गोविन्‍द झा 1961 चंगेराक सनेस गोविन्‍द नारायण झा 1962 गूड़क चोट धाकडे़ जानय गोपाल जी झा गोपेश 1965 वीर कीर्ति सिंह गोविन्‍द झा 1966 बिनु वि‍नोद द्विरागमन गोपाल जी झा गोपेश उपर्युक्‍त परम्‍पराक जे शुभारम्‍भ भेल छलैक ताहिमे कतिपय अपरिहार्य कारणेँ व्‍यतिक्रम भ’ गेलैक तथा समिति द्वारा रंगमंचक दिशामे जे प्रयास भेल छल ओ किछु अन्‍तरालक पश्‍चात् अवरुद्ध भ’ गेलैक। किन्‍तु ताराकान्‍त झा (1927) जखत समितिक सचिवचक पद भार ग्रहण कयलनि तखन ओ एकर क्रियाकलापकेँ व्‍यापक फलक पर अनबाक प्रयास कयलनि। हुनक सोच छलनि समितिक विविध आयोजनादि एकहि स्‍थानपर केन्द्रित नहि रहय: प्रत्‍युत प्रचार-प्रसारक दृष्टिऍं पटनास्‍थ विभिन्‍न मुहल्‍ला सभमे एकर आयोजनकेँ मूर्त्त रूप प्रदान कयल जाय ओ अपन एहि योजनाकेँ क्रियान्वित करबाक निमित्त अमरनाथ झा जयन्‍तीक आयोजन कंकडबागन्‍क लोहिया नगरमे आयोजित करबाक निर्णय कयलनि जाहिमे समितिकेँ गजेन्‍द्र नारायण चौधरी, वासुकि नाथ झा, गणेशशंकर खर्गा सदृश्‍य कर्मठ कार्यकर्ता उपलबध भेलैक। नाट्यमंच : शनै:-शनै: चेतना समितिक अपन उतरोत्तर विकास-यात्राक उत्‍थान वा उत्‍कर्ष मे पहुँचि विविध रूपैँ मिथिलाक सांस्‍कृतिक एवं साहित्यिक विधाकेँ सम्‍पोषित करबाक दिशामे प्रयासरत भेल। ई अपन गौरवमय परम्‍पराक अनुरूप विद्यापति स्‍मृति पर्वोत्‍सवपर नाट्य मंचनक परम्‍परा पुर्नस्‍थापितकरबा क तत्‍कालीन अघ्‍यक्ष कुमार तारानन्‍द सिंह (1920-) एवं सचिव ताराकान्‍त झा सोचलनि जे समितिक गतिविधि अत्‍याधिक प्राणवन्‍त बनाओल जाय, कारण ओ लोकनि दूरदर्शी व्‍यक्ति रहथि जनिका कार्यकालमे समिति कतिपय नव-नव योजना केँ क्रियान्वित करबाक प्रयास कयलक। मैथिली नाटक ओ रंगमंच केँ विस्‍तृत एवं व्‍यापक रूप देबाक निमित्त कार्यकारिणी समिति एक अनौपचारिक समितिक गठन कयलक जकर थींक टैंकक सदस्‍य रहथि गजेन्‍द्रनारायण चौधरी, वासुकिनाथ झा (1940), छत्रानन्‍द सिहं झा (1946) एवं गोलकनाथ मिश्रकेँ अधिकृत कयल गेलनि आ एहि योजनाकेँ कोना मूर्त्त रूप देल जाय ताहि हेतु प्रस्‍ताव देबाक भार देल गेलनि ज‍कर सुपरिणाम भेल जे नाटक ओ रंगमंचक विकासार्थ रंगकर्मीक नाट्यमंच (1972) नामक एक प्रभावी प्रभागक स्‍थापना कयलक जकर उद्देश्‍य भेलैक नवीन टेकनिक नाटक अन्‍वेषण ओकर मंचन तथा प्रकाशन। नाट्यायोजनकेँ मूर्त्त रूप प्रदान करबाक उत्तरदायित्‍व देल गेलनि नवयुवक नाट्य कर्मी छत्रानन्‍द सिंह झाकेँ मूर्त्त रूप प्रदान करबाक उत्तरदायित्‍व देल गेलनि नवयुवक नाट्य कर्मी छत्रानन्‍द सिंह झाकेँ जे रेडियोसँ सम्‍बद्ध रहथि आ नाट्यमंचक तकनिकक सैद्धान्तिक एवं व्‍यवाहारिक पक्षक अधिकारिक जानकारी छलनि। अत्‍याधुनिक नाटक आ रंगमंचके दिशामे समिति क्रान्तिकारी डेग उठौलक जकर प्रयाससँ रंगमंचकेँ नव-दिशा भेटलैक तथा नाट्यमंचनक परम्‍पराक शुभारम्‍भ भेलैक समिति द्वारा। नाट्यमंचक स्‍थापनाक पश्‍चात् मौलिक नाट्य रचना हेतु प्राचीन एवं अर्वाचीन नाटककारक आह्रवान क’ कए नव-नव नाटक अन्‍वेषणक प्रक्रिया प्रारम्‍भ भेल। एहि प्रकारेँ रंगमंचक एक सुदृढ परम्‍पराक स्‍थापना भेल जे विद्यापति स्‍मृति पर्व समारोहक अवसरपर वा समिति द्वारा आयोजित कोनो महत्‍वपूर्ण अवसरपर नाट्यमंचनक एक सशक्‍त माघ्‍यम स्‍थापित भेल। समिति नाट्यमंच एक सार्थक भूमिकाक निर्वहण कयलक जकर लाभ नाटककारक संगहि-संग रंगमंचकेँ निम्‍नस्‍थ लाभ भेटलैक: 1. आधुनिक परिप्रेक्ष्‍यमे नवीन नाट्य-साहित्‍यक विकास यात्राक शुभारम्‍भ। 2. आधुनिक तकनिकक रंगमंचक स्‍थापना। 3. राष्‍ट्रीय एवं अन्‍तर्राष्‍ट्रीय स्‍तरपर मैथिली नाटक आ रंगमंचकेँ स्‍थापित करबाक प्रयत्‍न। 4. अभिनेता-अभिनेत्रीक संगहि-संग कुशल निर्देशकक अन्‍वेषण। 5. नाटय-लेखनक दिशामे प्रतिभान नाटककारकेँ प्रोत्‍साहन। 6. अमंचित एवं अप्रकाशित नाटक पाण्‍डुलिपिकेँ आमंत्रित क’ कए विशेषज्ञक अनुशंसा पर मंचन। 7. मंचनोपरान्‍त नाटक प्रकाशन। बीसम शताब्‍दीक सप्‍तदशकोत्तर कालावधिमे समितिक नाट्यमंच प्रभाग नाटक लेखक लोकनिसँ नव-नव प्रवृत्ति आ नव-शिल्‍पक नाट्य रचनाक अनुरोध करब प्रारम्‍भ कयलक तथा मंचोपरान्‍त ओकर प्रकाशनक भार वहन करबाक दायित्‍व स्‍वीकारलक। नाट्यमंच प्रभाग द्वारा विद्यापति स्‍मृति पर्वोत्‍सव वा अन्‍याय कोनो आयोजनोत्‍सवपर मौलिक, अनूदित वा उपन्‍यास वा कथाक नाट्य-रूप प्रस्‍तुत करबाक परम्‍पराक शुभारम्‍भ कयलक जे नाट्यलेखन आ मंचनक दिशामे ऐतिहासिक घटना थिक जे नव-नव प्रतिभाशाली नाट्य-लेखक लोकनिकेँ प्रोत्साहन भेटलनि तथा प्राचीन आ अर्वाचीन अभिनेता, अभिनेत्री आ निर्देशक लोकनि एकर प्रस्‍तुतिमे सहभागी बनलाह। अभिनयोपयोगी आ मंचोपयोगी नाटक जे अभाव साहित्‍यान्‍तर्गत छल तकर पूत्‍यर्थ समितिक नाट्य प्रभागक ई निर्णय निश्चित रूपेण नाट्य-लेखन ओकर मंचन तथा ओंकर प्रकाशेत्‍न मे नव-दिशाक संकेत कयलक। चेतना अपन कार्यक्रमकेँ व्‍यापक बनयबाक हेतु पूर्व निर्णयापनुरूप सन् 1973 ई. मे अमरनाथ झा जयन्‍तीक आयोजन कंकड़बाग कॉलनीक लोहियानगर मे इैबाक निर्णय भेलैक तथा इहो निर्णय भेलैक जे एहि अवसरपर एक नाट्याभिनयक आयोजन कयल जाय जाहिमे सहयोगी भेलाह वासुकिनाथ झा, गणेशशंकर सर्गा, अमरनाथ झा एवं छत्रानन्‍दसिंह झा। जखन ई प्रचार भेलैक जे एहि कौलनीमे अमरनाथ झा जयन्‍तीक अवसरपर नाट्यत्तभिनयक सेहो योजना छैक तखन कौलनीवासी सभक सहयोग पर्याप्‍ता =1भे मे त्राटय लागलनि। ओहि अवसरपर जनमानसक मनोरंजनाथ हवेली रानी नाटक मंचन भेल छल, जाहिमे रोहिणी रमण झा जे आब मैथिलीक नाटककार आ अभिनेताक रूपमे चर्चित छथि अभिनेत्री रूपमे रंगमंचपर उतरल रहथि। एहि नाट्य योजनामे कतिपय सहयोगीक बल भेटल जाहिमे उल्‍लेखनीय छथि इण्डियन नेशनक इन्‍द्रकान्‍त झा बेचन झा, आर्यावर्त्तक शिवकान्‍त झा एवं राजभाषा विभाग क महादेव झा मिथिलेन्‍दु एवं वेदानन्‍द झा जनसम्‍पर्क विभागक एहि आयोजनक ऐतिहासिक महत्‍व छैक जे विहारक तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री केदार पाण्‍डेय एही मंचसँ विहार पब्लिक सर्भिस कमीशनमे मैथिलीक स्‍वीकृति आ मिथिला विश्‍वविद्यालयक स्‍थापनाक उदघोषणा कयाने रहथि। प्रारम्भिकावस्‍थामे अभिनयोपयुक्‍त नाटक अभाव रहलैक ओकरा संगहि-संग रंगमंचकेँ नवरूप देबाक प्रयास भेलैक। समयाभावक कारणेँ समितिक नाट्यमंच प्रभाग द्वारा एकर प्रयोग प्रारम्‍भभेलैक दिगम्‍बर झा लिखित एकांकी टुटैत लोकसँ। पुन: समितिकेँ महिला अभिनेत्रीक अन्‍वेषणक प्रक्रिया प्रारम्‍भ कयलक जाहिमे ओंकरा कठिनताक सामना करय पडलैक, किन्‍तु संयोगसँ रेडियोक अभिनेत्री प्रेमलता मिश्र प्रेम, कुमारी भारती मिश्र तथा अभिनेकताक रूप मे छात्रानन्‍द सिंह झा, जगन्‍नाथ झा, नरसिंह प्रसाद आ वेदानन्‍द झाक अविस्‍मरणीय सहयोगक फलस्‍वरूप ई प्रदर्शन अत्‍यन्‍त सफल भेल जाहिसँ आयोजक संगहि-संग संयोगकक सेहो उत्‍साहवर्द्धन भेलनि। एहि एकांकीक निर्देशन कयाने र‍हथि गणेश प्रसाद सिन्‍हा तथा बिहार आर्ट थियेटर क संस्‍थापक अनिल कुमार मुखजर्णीक अपरिमित तकनिक सहयोग भेटलनि। एहि एकांकीक मंचनक संगप्रथमे प्रथम आधुनिक रंगमंचक अवधारणाक एकरा बानगी प्रस्‍तुतमे भेल। नाट्यमंचक विधिवत स्‍थापानोपरान्‍त जनमानसक मनोवृतिमे नाटक आ रंगमंचक प्रति प्रतिवक संगहि-संग नाट्यमंचनक हेतु प्रतीक्षानुसार रहब एक औत्‍सुकयक भावनाक उदय होइतहि समितिक पदाधिकारी लोकनि एकरा प्रति अपन सचेष्‍टता आ तत्‍पारता देखायब प्रारम्‍भ कयलनि तकरे परिणाम थिक जे नाट्य मंच मौलिक आ नव तकनिकक नाट्यक हेतु अन्‍वेषण करब प्रारम्‍भ कयलक नाट्यमंचक संयोगक छत्रानन्‍द सिंह झाकेँ ई गुरुतर भार देल गेलनि जे अग्रिम वर्ष चेतनाक नाट्यमंचक तत्‍वावधानमे समसामचिक समस्‍यासँ सम्‍‍बन्धित एहन मौलिक नाट्य लेखकसँ सम्‍पर्क क’ कए नव तकनिक क नाटक हेतु प्रयास करथि। एहि हेतु ओ हिन्‍दीक वरिष्‍ठनाटककार आ मिथिला मिहिरक तत्‍कालीन सम्‍पादक सुधाशु शेखर चौधरी (1920-1990) सँ सम्‍पर्क साधि हुनकासँ एक एहन नाटक अनुरोध कयलनि जे जनमानसक हृदयकेँ स्‍पर्श कयनिहार हो। एहि प्रसंगमे नाटककारक कथन छनि, ‘आकाशवाणी पटनाक बटुकभाइक आ चेतना समितिक वर्त्तमान सचिव गजेन्‍द्रनारायण चौधरी ठोंठ मोकि हमरासँ भफाइत चाहक जिनगी जिचा लेलनि आ हम मैथिली नाटककारक रूपमे चीन्‍हल आ जानल जा सफलहुँ।। भफाइत चाहक जिनगीक आत्‍म-कश्‍य) ओ इनक अनुरोधानि मैथिलीमे प्रथमे-प्रथस काल खण्‍डी नाटक लिखलनि भफाइत चाहक जिनगी जकरा नाट्यमंचक तत्‍वावधानमे सन् 1974 ई. मे शहीद स्‍मारकक प्रांगणमे प्रस्‍तुत कयल गेल जाहिमे प्राय: पैंतीस हजारसँ बेसी मैथिल समाजक छॉंटल-वीछल लोक दम साधि नाटकक एक-एक शब्‍द पीबैत रहल, एक-एक दृश्‍यकेँ अपलक देखैत रहल। एहि प्रदर्शानक सफलताक प्रमुख करण छलैक जे एहि प्रकारक नाट्यायोजन चेतना समिति द्वारा पूर्वमे नहि भेल छल तेँ दर्शककेँ ई सर्वथा नवीनताक आभास भेटलैक। नाटकक सफलता एहिमे रहलैक अपेक्षित घ्‍वनि प्रकाशअा। उपयुक्‍त प्रेक्षागृहक अभावोमे नाट्यमंच चुनल बीछल कलाकारक सक्रिय सहभागिताक फलस्‍वरूप एकरा रूपायित कयल जा सकल। अग्रिम वर्ष ओकर प्रकाशनक व्‍यवस्‍था कयल गेलैक जकर परिणाम भेलैक जे जनमानसक जन-मन-रंजनक साधनक संगहि समकालीन समाजमे व्‍याप्‍त बेरोजगारीक समस्‍याक हृदयस्‍पर्शी कथानक जनमानसक आकर्षणक केन्‍द्र बिन्‍दु बनि गेलैक। एहि प्रस्‍तुतिमे सहभागी रहथि छत्रानन्‍द सिंह झा, हृदयनाथ झा, वेदानन्‍दझा, अशर्फी पासवान आजनवी, बन्‍धु, फन्‍नत झा, परमानन्‍द झा, चन्‍द्रप्रकाश झा, मोदनाथ झा, मनमोहन चौधरी, शम्‍भुदेव झा, रामनरेश चौधरी, प्रेमलता मिश्र प्रेम, कुमारी रमाचन्‍द्र कान्ति, सुरजीत कुमार एवं सुनील कुमार। अपार जन समुदायक उपस्थितिमे ई नाटक प्रशंसिते नहि; प्रत्‍युत बहुतो दिन धरि चर्चाक विषय बनल रहल। नाटक सफलतामे नाटकमे कलाकार लोकनिक ओ अदम्‍य उत्‍साहक संग-संग बिहार आर्ट थियेटर जन सम्‍पर्क विभाग आ भारत सरकारक संगीत एवं नाटक विभागक कलाकार लोकनिक सहयोगकेँ अस्‍वीकारल नहि जा सकैछ। वस्‍तुत: एहि प्रस्‍तुतिक सफलतासँ समितिक पदाधिकारी लोकनि पुन: हुनकासँ एक नव नाटक रचनाक अनुरोध कयलक। आधुनिकताक सन्‍दर्भमे एक सेटक नाटकमे सुधांशु शेखर चौधरीक कथा-वस्‍तु मूल प्रवाह संग-संग एक वा एकसँ अधिक अन्‍तर प्रवाहक प्रयोग रहल अछि। ओ नाट्य मंचक संयोजक छत्रानन्‍द सिंह झाक प्रस्‍तुतिसँ एतेक प्रभावित भेलाह जे अपन दोसर नाटक ढ़हैत देवाल। लेटाइत आँचरक रचना क’ कए हुनका देलथिन प्रस्‍तुति करबाक हेतु। पुन: एहू काल-खण्‍डी नाटक प्रदर्शन एतेक प्रभावकारी भेल आ जनमानस नव नाट्य प्रस्‍तुतिक हेतु वर्षभरि प्रतीक्षातुर रहय लागल। एहि प्रकारेँ नाट्यमंच नाटक आ रंगमंच क दिशामे अपन डेग आगू बढबैत गेल। नाट्य-प्रदशिनक सफलताक पाछॉं नाट्यामंचक प्रतिवद्ध कलाकार लोकनिक अदम्य उत्‍साहक फलस्‍वरुप एकर नाट्याभिनय अपार जनमानसक समक्ष भेल। एहि नाटकमे प्रतिभगी कलाकार लोकनिमे हृदयनाथ झा, मोदनाथ झा, अशर्फी पासवान अजनबी, शंभुदेव झा, रामनरेश चौधरी, सत्‍यनारायण राउत, वीरेन्‍द्रकुमार झा, फन्‍नत झा, बालाशंकर कल्‍पनादास एवं प्रेमलता मिश्र प्रेम। एहि नाट्ययोजनक सब श्रेय कलाकार लोकनिक परिश्रमक संगहि-संग बिहार आर्ट थियेटर एवं जनसम्‍पर्क विभागक कलाकारकेँ रहलनि। चेतना समितिक ई अभिनव प्रयास भेलैक जे मिथिलाञ्चलक पुरातन सांस्‍कृतिक विरासत तथा नाट्य साहित्‍यक अविच्छिन्‍न स्‍मृद्धिशाली आ गौरवशाली परम्‍परामे एक नव प्राणक स्‍पन्‍दन भरबाक निमित नियमित रूपेँ प्राचीन एवं अर्वाचीन प्रतिभाशाली नाट्य-लेखकक आह्रवन क’ कए नाट्य –लेखनक दिशामे प्रोत्‍साहन, मंचोपरान्‍त औकर प्रकाशनक व्‍यवस्थित परम्‍पराक व्‍यवस्‍था कयलक सन् 1973 ई. सँ जे जनमानसक मनोरंजनक संगहि-संग नाट्य-साहित्यिक साबर्द्धनक दिशामे गतिशील भेल जे विद्यापति स्‍मृति पर्वोत्‍सवपर संगहि-संग अमरनाथ झा, हरिमोहन झा, ललितनारायण मिश्र एवं जयनाथ मिश्र जयन्‍तीक अवसरपर मौलिक, अन्‍य भारतीय भाषाएं अनूदित वा मैथिलीक प्रसिद्ध उपन्‍यास वा कथाक नाट्य रूपान्‍तरणक परम्‍पराक शुभारम्‍भ कयलक जे अद्यपर्यन्‍त अव्‍याहत रूपेँ चलि आबि रहल अछि। एकर सुपरिणाम एतबा अवश्‍य भेलैक जे अद्यापि निरस्‍थ नाटकक मंचन समितिक तत्‍वाधानमे भेल अछि जकरा ऐतिहासिक घटना कहब विशेष समुचित हैत, कारण भंगिमा (1984) केँ छोडि क’ मिथिलाञ्चल वा मिथिलेतर क्षेत्रक कोनो नाट्य संस्‍था अदयापि एतेक परिभाषामे नाट्यायोजन नहि क’ सकल अछि। एकरा द्वारा मंचित नाटककेँ विविध काल-खंडमे सुविधानुसार विभन्‍न दशकमे प्रदर्शित नाटक तिथिक अनुसारेँ कयल जा रहल अछि। अमरनाथ झा जयन्‍तीक आयोजनपर महेन्‍द्र मलंगिया (1946) क ओकरा आडन्‍नक बारहमासा, गुणनाथ झाक पाथेय, गंगेश गुंजन (1941) क चौबटियापर। बुधिबधिया एवं रोहिणीरमण झाक अन्तिम गहना, हरिमोहन झा जयन्‍तीपर हुनकहि द्वारा लिखित एकांकी अयाची मिश्र (1956), हुनक प्रसिद्ध कथा पॉंच पत्रक एकल अभिनय एवं छत्रानन्‍द सिंह झाक आदर्श कुटुम्‍बनाट्य रूपान्‍तरण, ललित नारायण मिश्र जयन्‍तीपर तन्‍त्रनाथ झा (1909-1994) क उपनयनाक भोज (1949) एवं अरविन्‍द अक्‍कू गुलाब छडी तथा जयनाथ मिश्रक जयन्‍तीपर हरिमोहन झाक प्रसिद्ध कथा कन्‍याक जीवनक नाट्य रूपान्‍तरण विभूति आनन्‍द द्वारा तितिर दाइ केँ मंचस्‍थ कयल गेल जकर विवरण निम्‍नास्‍थ अछि: विगतीत शताब्‍दीक अष्‍टम दशकमे मंचित एकांकी/नाटक: तिथि नाटक नाटककार अभिनीत स्‍थान स्‍थान अवसर निर्देशक 10 नवम्‍बर 1973 टुठैत लोक दिगाम्‍बर झा शहीद स्‍मारक विद्यापतिपर् गणेशप्रसाद सिन्‍हा 10 नवम्‍बर 1974 मफाइत चाह जिनगी सुधांशु शेखर चौधरी शही स्‍मारक विद्यापतिपर्ण गणेशप्रसाद सिन्‍हा 18 नवम्‍बर 1975 ढहैत देवाल/लेटाइत ऑंचर सुधोंशु शेखर चौधरी शहीद स्‍मारक विद्यापतिपर्व गणेशप्रसाद सिन्‍हा 6 नवम्‍बर 1976 पसिझैत पाथर रामदेव झा शहीद स्‍मारक विद्यापतिपर्व नवीनचन्‍द्रामिश्र 6 नवम्‍बर 1976 एक दिन एकराति सीतासमझा श्‍याम शहीद स्‍मारक विद्यापति पर्व रवीन्‍द्रनाथ ठाकुर 23 नवम्‍बर 1977 एकरा अन्‍तर्यात्रा जर्नादन राय शहीद स्‍मारक विद्यापति पर्व जनार्दन राय 25 नवम्‍बर1977 इन्‍टरव्‍यू जनार्दन राय शहीद स्‍मारक विद्यापति पर्व जनार्दन राय 25 नवम्‍बर 1977 सिहर्सल रवीन्‍द्रनाथ ठाकुर शहीद स्‍मारक विद्यापतिपर्व रवीन्‍द्रनाथ ठाकुर 25 नवम्‍बर 1977 ओझाजी दमन कान्‍त झा शहीद स्‍मारक विद्यापती पर्व रवीन्‍द्रनाथ ठाकुर 14 नवम्‍बर 1978 पाहि सॉंझ सुधॉंशु शेखर चौधरी शहीद स्‍मारक विद्यापतिपर्व अखिलेश्‍ाकर 14 नवम्‍बर 1978 हॉस्‍टल गेस्‍ट सच्चिदानन्‍द चौधरी शहीदस्‍मारक विद्यापति पर्व सच्चिदानन्‍द चौधरी 25 फरवरी 1979 ओंकरा आडव्‍नक बारहमासा महेन्‍द्र मलंगिया आइएमए.हॅल अमरनाथ झा जयन्‍ती अरिवलेरवर 4 नवम्‍बर 1979 ओंकरा आडव्‍तक बारहमासा महेन्‍द्र मंलगिया शहीदस्‍मारक विद्यापतिपर्व अखिलेश्‍वर 4 नवम्‍बर 1979 चानोदाइ उषाकिरण खाँ शहीदस्‍मारक विद्यापतिपर्व अखिलेश्‍वर 22 नवम्‍बर1980 एक कमल नोइ में महेन्‍द्रमजंगिया शहीद स्‍मार‍क विद्यापति पर्व अखिलेश्‍वर एहि दशक कालावधिमे कुल पन्‍द्रह एकांकी/नाटक प्रस्‍तुति कयल गेल जाहिमे पॉंच नाटक आ शेष दस एकांकी अछि। एहि दशाब्‍दक अन्‍तर्गत ख्‍याति अर्जित कयलक भफाइत चाहक जिनगी, ढहैत देवाल लेटाइत ऑचर पहिल सॉंझ एवं ओकरा आङव्‍नक बारहमासा, कारण नाटककार सामाजिक परिप्रेक्ष्‍यकेँ घ्‍यान मे राखि क’ एकर कथानक संयोजन कयलनि जे जनमानसपर अपन अमिट छाप छोड़वामे सहायक सिद्ध भेल। उपर्युक्‍त नाटकादिक कथानक द्रुतगामिता, घटना-उपघटनादिक विस्‍तारक संग समन्वित क’ कए नाटककार नाट्य साहित्‍यान्‍तर्गत तेहन मानदण्‍ड स्‍थापित क’ देलनि जे अन्‍यतम भ’ गेलाह। एहि संस्‍था द्वारा जखन-जखन नाट्यायोजन कयल गेल तखन-तखन दर्शकक रूप मे सम्‍पूर्ण मैथिल समाज उनटि आयल जे एकर लोक प्रियताक प्रतिमान थिक। विगत शताब्‍दा क नवम दशकमे संचित एकांकी/नाटक: तिथि नाटक नाटककार अमिनीत स्‍थान अवसर निर्देशक 22 फरवरी1961 पाथेय गुणनाथ झा आइ. एम. ए. हॉल अमरनाथझा जयन्‍ती रमेश राजहंस 11 नवम्‍बर 1981 अागिधधाक रहल छै अरविन्‍द अक्‍कू बाल उदद्यान प्रांगण विद्यापति पर्व मादनाथ झा 22 फरवरी ट 1982 चौबयिापर/बुधिबधिया गंगेश गंजन आइ. एम. ए. हॉल अमरनाथझा जयन्‍ती विभूति आनन्‍द 28 नवम्‍बर1982 अन्तिम प्रणाम गोविन्‍दझा बालउद्यानप्रांगण विद्यापतिपर्व जावेद अखतर खाँ 28 नवम्‍बर 1982 बेचारा भगवान अनुवादक शैलेन्‍द्रपटनिया बालउद्यान प्रांगण विद्यापति पर्व कौशलदास दास 28 नवम्‍बर 1983 भर्तृहरि अनुवादक शारदानन्‍द झा बालउद्यानप्रांगण विद्यापतिपर्व जावेद अख्‍तर खाँ 8 नवम्‍बर1984 प्रायश्चित छात्रानन्‍दसिंह झा बाल उद्यान प्रांगण विद्यापतिपर्व विनोद कुमार झा 8 नवम्‍बर 1984 नवतुरिया उषाकिरण खाँ बान उद्यान प्रांगण विद्यापति पर्व त्रिलोचन झा 8 नवम्‍बर 1984 टूलेट रवीन्‍द्रनाथ ठाकुर बाल उद्यान प्रागंण विद्यापति पर्व रवीन्‍द्रनाथ ठाकुर 26 नवम्‍बर 1985 एना कत्तेदिन ? अरविन्‍द अक्‍कू बाल उद्यान प्रांगण अमरनाथ झा जयन्‍ती प्रशान्‍त कान्‍त अन्‍हार जंगल अ‍रविन्‍द अक्‍कू बालउद्यान प्रांगन विद्यापति पर्व त्रिलोचन झा 5 नवम्‍बर 1987 जादूजंगल अनुवादक रोहिणीरमण झा बालउद्यानप्रांगण विद्यापतिपर्व अरविन्‍द रंजनदास 23 नवम्‍बर 1988 विद्यापति बैले सरोजा वैद्यनाथ बालउद्यान प्रांगण विद्यापतिपर्व सरोजावैद्यनाथ 23 नवम्‍बर 1988 जखते कहल कक्‍का हो रवीन्‍द्रनाथ ठाकुर बालउद्यानक प्रांगण विद्यापतिपर्व मनोज मनु 23 नवम्‍बर 1988 रुकमिणी हरण गोविन्‍द झा बालउद्यान प्रांगण विद्यापति पर्व कुणाल 18 सितम्‍बर 1989 अयाची मिश्र हरिमोहन झा विद्यापति भवन हरिमोहन झा जयन्‍ती रोहिणीरमण झा पॉंच पत्र हरिमोहन झा विद्यापति भवन हरिमोहनझा जयन्‍ती 13 नवम्‍बर 1989 आतंक अरविन्‍द अक्‍कू बाल उद्यानक प्रांगण विद्यापतिपर्व त्रिलोचनझा 2 फरवरी1990 अपनयनाकभोज तन्‍त्रनाथ झा विद्यापति भवन ललितनारासणमिश्र जयन्‍ती भवनाथ झा 4 मार्च 1990 तितिरदाइ रूपकार विभूति आनन्‍द विद्यापति भवन जयनाथमिश्र जयन्‍ती किशोर कुमार झा 18 सितम्‍बर1990 आदर्श कुटुम्‍ब रूपकार छात्रानन्‍द सिंह झा विद्यापतिभवन हरिमोहनझा जयन्‍ती उमाकान्‍त झा 2 नवम्‍बर 1990 राजा सल्‍हेस रोहिणीरमणझामिलरहाइस्‍कूल प्रांगण विद्यापतिपर्व प्रशान्‍तकान्‍त अपन अस्तित्‍वक एक दशक पूर्ण कमलाक पश्‍चात् नाट्यमंच द्वारा 26 नवम्‍बर 1984 ई. मे ई एक नाट्य प्रतियोगिताक आयोजन कयलक जाहि मे प्रतिभागी नाट्यसंस्‍थाहि नाट्याभिनय कयलक। पटनामे प्रादुर्भूत रंगकर्मी सहमागी बनल। भंगिमाक प्रस्‍तुति छल प्रायश्चित छत्रानन्‍दसिंह झा द्वारा लिखित आ विनोद कुमार झा द्वारा निर्देि‍शत ई नाटक अति प्राचीन कथ्‍‍थक संग मंचस्‍थ भेल। सीताक पाताल प्रवेश चिरपरिचित कथानन्केँ नारी-मुक्ति-आन्‍दोलन चश्‍मासँ देखलापर एहि नाटक कथानक प्रासंगिक छल अन्‍यथा गीत गाओत्‍व छल। नाटक सम्‍वाद अत्यधिक सशक्‍त रहलाक कारणेँ नाट्य प्रस्‍मुति प्राणवन्‍त वनि गेल एहि नारककनि-र्देशन कयने रहथि विनोद कुमार झा हुनक अथक परिप्रभक झलक भैटल दर्शककेँ। ओना राम गौरांग शरीर निर्देशकक राम-कथाक स्‍पष्‍ट अघ्‍ययन दिस प्रश्‍न चिंइन उपस्थित करैछ। एहि नाटककेँ दर्शनीय बनयबाक पाछॉं विशिष्‍ट चमत्‍कारिक संवाद-योजना। प्रकाश-परिकल्‍पना आ प्रभावोत्‍पादक घ्‍वनिक माघ्‍यमे सीताक पाताल प्रवेश देखाओ गेल। एकर मंच-सज्‍जा पटनामे अद्यापि मंचित मैथिली नाटकमे सर्वोत्‍कृष्‍ट छल। अरिपनक प्रस्‍तुति छल वैद्यनाथ मिश्र यात्रीक उपन्‍यास नवतुरिया (1954) क नाट्य रूपान्‍तरण कयने छलीह उषाकिरण खॉं जकर निर्देशन कयने रहथि त्रिलोचन झा। मृतपाय समस्‍यावला कथ्‍य आ छोट-छोट रेडियो टाइप दृश्‍यक रहितहुँ निर्देशक अपन प्रतिभाक बलेँ नीक प्रस्‍तुति कयने छलाहि। अभिनेता लोकनि मे चुनि-चुनि क’ संवाद बजबाक प्रवृत्ति छल। किछु कलाकारक अभिनय अतीब प्रभावशाली छल, किन्‍तु शेष कलाकार पिछडि़ गेलाह, मंच-सज्‍जा नाटक अनुरूप छल तथा पार्श्‍व-संगीत तथा प्रकाशयवस्‍था सामान्‍य छल। नवनिर्मित नाटय-संस्‍था अभिनव भारतीक प्रस्‍तुति छल टूलेट जकर लेखक आ निर्देशक रहथि रवीन्‍द्रनाथ ठाककु,। निर्देशककेँ कलाकार लोकनिपर कोनो नियंत्रण नहि छलनि आ ओ सभ मंचपरक फूलदानसँ अत्‍यन्‍त हल्‍लुक हास्‍य उत्‍पन्‍नकरबामे सफल भेलाह। एकर प्रस्‍तुति ग्रामीण मंच सदृश प्रहसनक श्रेणी मे आबि गेल। उपर्युक्‍त प्रतियोगितामे भंगिमाकेँ प्रथम, अरिपनकेँ द्वितीय आ अभिनव भारतीकेँ तृतीय घोषित क’ कए क्रमश: दूहजार एक सय, एकहजार पॉंच सय आ एकहजार एकसयक पुरस्‍कार चेतना समिति प्रदान कयने छल जे नाटक आ रंगमंचक क्षेत्रमे एक साहसिक प्रयास कहल जा सकैछ। विगत शताब्‍दीक अन्तिम दशक मे मंचित एकांकी/नाटक तिथि नाटक नाटककार अभिनीत स्‍थान अवसर निर्देशक 21 नवम्‍बर 1991 रक्‍त अरविन्‍द अटकूम मिलरहाइस्‍कूलप्रांगण विद्यापतिपर्व मनोजमनु 10 नवम्‍बर 1992 लीडर वनदेवी पुत्र भवनाथ मिलरहाइस्‍कूलप्रांगण विद्यापति पर्व रघुनाथ झा किरण 28 नवम्‍बर 1993 ओरिजन काम महेन्‍द्र मलंगिया मिलरहाइस्‍कूल प्रांगण विद्यापति पर्व महेन्‍द्र मलंगिया 17 नवम्‍बर 1994 अथअद्भुतानन्‍द संजय कुन्‍दन मिलर हाइ स्‍कूल प्रांगण विद्यापति पर्व कुमार शैलेन्‍द्र 6 नवम्‍बर 1995 एकरा चिनसा विनोद कुमार मिश्र बन्‍धुमिलरहाइ स्‍कूल प्रांगण विद्यापति पर्व प्रशान्‍त कान्‍त 29 नवम्‍बर 1996 केकर ? अरविन्‍द अक्‍कू मिलर हाइ स्‍कूल प्रांगण विद्यापति पर्व कौशन किशोरदास 27अगस्‍त 1997 बरेहर हम आ बाहरे हमरनाटक अरविन्‍द अक्‍कू विद्यापति भवन स्‍वतंत्रातक स्‍वर्णजयन्‍ती विनीतझा 14 नवम्‍बर 1997 पदुआ कक्‍का अयुल गाम अरविन्‍द अक्‍कू भारतीय नृत्‍यकला मंदिर विद्यापति पर्व विनीतझा 4 नवम्‍बर 1988 गुलाबछडी अरविन्‍द अक्‍कू मिलर हाइ स्‍कूल प्रांगण विद्यापति पर्व विनीत झा 2 फरवरी 1999 गुलाब छडी अरविन्‍द अक्‍कू विद्यापति-भवन ललित जयन्‍ती विनीतझा 23 नवम्‍बर 1999 अग्निपथक सामा कुमारशैलेन्‍द्र कृष्‍णमेमोरियलहॉल विद्यापतिपर्व किशोरकुमारझा 11 नवम्‍बर 2000 सेहन्‍ता रोहिणीरमण झा भारत स्‍काउट एण्‍डगाइड प्रांगण विद्यापतिपर्व-रघुनाथझा किरण नाटक ओ रंगमंचक प्रगतिक प्रारूप भेटैछ विगत शताब्‍दीक अन्तिम दशकमे प्रदर्शित नाटकादिमे। यद्यपि एहि दशाब्‍दमे मात्र बारह नाटक प्रस्‍तुति भेल। भारतीय स्‍वतन्‍त्रताक पचास वर्ष पूर्ण भेलापर विहार सरकारक कला संस्‍कृति एवं युवा विभाग 15 अगस्‍तसँ 1 सितम्‍बर 1977 धरि विद्यापति भवनमे नाट्य समारोहक आयोजन कयलक जाहि मे चेतना समितिक नाट्यमंचकेँ प्रतिभागीक रूपमे आमंत्रित कयलक जाहि प्रतिभागी भ’ मैथिली नाटक प्रस्‍तुति कयलक वाह रे हम आ वाह रे हमर नाटक । एहि सँ प्रमाणित होइछ जे सरकारी स्‍तरपर सेहो चेतनाक नाट्यमंचक स्‍वीकृति प्राप्‍त अछि। आधुनिक समाजमे ब्‍याप्‍त विभिन्‍न समस्‍यादिक परिप्रेक्ष्‍यमे नाटककार लोकनि कथानक संयोजन कयलनि जकरा जनमानसक हृदयकेँ स्‍पर्श कयलक। एकैसम शताब्‍दी क प्रथम दशक मे मंचित नाटक: 30 नवम्‍बर 2001 नवघर उठे कमल मोहल चुन्‍नू भारत स्‍काउटएण्‍ड गाइड प्रांगण विद्यापति पर्व रघुनाथ झा किरण 19 नवम्‍बर 2002 शपथग्रहण कुमार गगन भारत स्‍काउट एण्‍ड गाइड प्रांगण विद्यापतिपर्व किशोरकुमार झा 8नवम्‍बर 2003 राज्‍याभिषेक अरविन्‍द अक्‍कू भारत स्‍काउट एण्‍ड गाइड प्रांगण विद्यापति पर्व उमाकान्‍त झा 26 नवम्‍बर 2004 छूतहा घैल महेन्‍द्रमलंगिया भारत स्‍काउट एण्‍ड गाइड प्रांगण विद्यापति पर्व किशोर कुमार झा 15 नवम्‍बर 2005 जयजयजनताजर्नादन कुमार गगन विद्यापति भवन विद्यापति पर्व कुमार गगन 2 नवम्‍बर 2006 नदी गुगिआयलजाय मनोज मनु कॉपरेटिभफेडरेशन प्रांगण विद्यापतिपर्व मनोजमनु 24 नवम्‍बर 2007 अलखनिरंजन अरविन्‍द अक्‍कू कॉपरेटिभफेडरेशन प्रांगण विद्यापति पर्व कौशल किशोरदास वर्तमान शताब्‍दीमे अद्यापि सात नाटक मंचन भेल अछि जाहिमे सभक प्रस्‍तुति दिनप्रतिदिन प्रगतिक पथपर अग्रसर अछि। प्रत्‍येक नाटक अपन कथ्‍यक नवीनतासँ अनुप्राणित अछि तथा ओकर प्रस्‍तुतिमे शनै:-शनै: विकास भ’ रहल अछि जकर सुपरिणाम भेलैक जे अलख निरंजनक प्रस्‍तुति एतेक आकर्षक आ कथानकक नवीनता आ समसामियक रहबाक कारणेँ जनमानसक हृदयकेँ स्‍पर्श कश्‍लक । एहि प्रस्‍तुतिक सफलतासँ अनुप्राणित भ’ समितिक पदाधिकारी लोकि प्रतिभागी कलाकार लोकनि केँ पुरस्‍कृत करबाक निर्णय कयलना ई आयोजन 14 दिसम्‍बर 2007 केँ विद्यापति भवनमे आयोजित कयल गेल छल तथा नाटक ओ रंगमंचक लब्‍धप्रतिष्‍ठ विद्वान प्रोफेसर प्रेमशंकर सिंह द्वारा प्रतिभागी कलाकार लोकनि केँ नगदराशि एवं प्रमाण पत्रसँ सम्‍मानित कयल गेलनि जे हुनका सभक मनोबलकेँ बढ़यबाक दिशामे अंहभूमिकाक निर्वाह कयलक आ भविष्‍यक हेतु पाथेय सिद्ध हैत। प्रकाशन : रंगमंचक क्षेत्रमे चेतना समितिक नाट्यमंच प्रभाग एक प्रतिमान प्रस्‍तुत कयलक जे अद्यपि कुल मिला क’ सनतावन एकांकी/नाटक अपन तत्‍वावधानमे मंचित करौलक अछि जे उपर्युक्‍त विवरणसँ स्‍पष्‍ट अछि। नाट्यमंचक तत्‍वावधानमे जतेक नाटक अद्यपि मंचित भेल अछि तकर सूची वृहत्तर अछि जकरा देखलासँ अनुमान कयल जा सकैछ जे समिति नाट्य प्रेमीक समक्ष एक कीर्तिमान स्‍थापित करबामे पूर्ण सफल भेल अछि। समितिक ई प्रभाग द्वारा नवोदित नाट्यकारक नाट्य-कृतिकेँ प्रकाशित कयलक अछि जे अदयापि मैथिली जगतक कोनो संस्‍था द्वारा नहि कयल गेल अछि। नाट्य लेखन, मंचोपरान्‍त ओकर कमीवेसी केँ सुधारिक क’ प्रकाशित कयलक अछि यथा दिगम्‍बर झाक टूटैत लोक (1974), सुधांशु शेखर चौधरीक भफाइत चाहक जिनगी (1975) एवं ढ़हैत देवाल/लेटाइत ऑंचर (1976), महेन्‍द्र मलंगियाक ओकरा आडव्‍नक बारह मासा (1980), अरविन्‍द अक्‍कूक आगि धधकि रहल छै (1981), एनाकत्ते दिन ? (1985), अन्‍हार जंगल (1987), आतंक (1994), के ककर ? (1986), बाह रे हम बाह रे हमर नाटक (1998), पदुआ कक्‍का अएला गाम (1994), गुलाबछड़ी (1999) गोविन्‍द झाक अन्तिम प्रणाम (1982) एवं रुक्मिणी हरण (1989), रोहिणीरमण झाक अन्तिम गहना (1929) एवं राजा सलहेस (1990), विभूति आनन्‍द का तितिर दाइ (1994) वनदेवी पुत्र भवनाथक लीडर (1994), कुमार शैलेन्‍द्रक अग्नि पथक सामा (2000), कमल मोहन चुन्‍नूक नव घर उठे (2001), कुमार गगनक शपथग्रहण (2003) एवं विनोद कुमार मिश्रक एकटा चिनमा (2006) आदि। चेतनाक नाट्यमंचपर निम्‍नस्‍थ एकांकी/नाटक क मंच पर तँ अवश्‍य मंचित भेल, किन्‍तु ओ पुस्‍तकाकार रूपमे पाठकक समक्ष नहि आबि सकल अछि तकर एकमात्र कारण आर्थिक दवाब समितिक समक्ष रहल वा अन्‍यान्‍य भाषा सँ अनूदित वा उपन्‍यास केँ रूपान्‍तरित क’ कए मंचस्‍थ कयल गेल हो यथा सीताराम झा श्‍यामक एकदिन एक राति, जनार्दन रायक एकटा अन्‍तर्यात्रा एवं इन्‍टरव्‍यू, रवीन्‍द्रनाथ ठाकुरक रिहर्सल. टूलेट, एवं जखने कहल कक्‍का हो, दमनकान्‍त झाक ओझा जी, सच्चिदानन्‍द चौधरी क हॉस्‍टलक गेस्‍ट, उषाकिरण खाँ क चानोदाइ एवं नवतुरिया, शैलेन्‍द्र पटनियॉंक बेचारा भगवान, शारदानन्‍द झाक भर्तृहरि, रोहिणीरमण झाक जादू जंगल एवं सेहन्‍ता, छत्रानन्‍दसिंह आदर्श कुटुम्‍ब, संजय कुन्‍दनक अथ अदधदानन्‍द, कुमार गगनक जयजय जनार्दन, महेन्‍द्र मलंगियाक छूत घैल, मनोज मनुक नदी गोंगिआयल जाय एवं अखनीन्‍द अक्‍कूक अलखनिरंजन आदि। समिति द्वारा मंख्‍स्‍थ किछु नाटक एहनो उपलब्‍ध भ’ रहल अछि जकर प्रकाशनमे निरर्थक विलम्‍ब देखि नाटककार ओकरा अन्‍यान्‍य संस्‍थादिसँ प्रकाशित करयबाक सयत्‍न प्रयास कयलनि यथा सुधांशु शेखर चौधरी क पहिल सॉझ (मैथ्रिली अकादमी. पटना 1989) रामदेव झा क पसिझैत पाथर (संकल्‍य लोक, लहेरियासराय 1989) अरविन्‍द अक्‍कूक रक्‍त (शेखर प्रकाशन, पटना 1992) महेन्‍द्र मलंगियाक ओरिजन काम (ललित प्रकाशन, मलंगिया 2000) एवं छत्रानन्‍द सिंह झा क प्रायश्चित/सुनूजानकी (शेखर प्रकाशन, पटना 2007) आदि। चेतनाक नाट्य प्रभाग नाट्यमंच द्वारा प्रस्‍तुति एतेक बेसी लोकप्रियता अर्जित कयलक, जनमानसकेँ आकर्षित कयलक जे नाटक मे भाग लेनिहार अभिनेता मे अभिनेत्री केँ पुरस्‍कृत करबाक घोषणा नाट्यप्रेमी जनमानस द्वारा भेल जाहिसँ नाट्यत्‍योजना मे प्रतिभागी कलाकार लोकनिकेँ प्रोत्‍साहन भेटब प्रारम्‍भ भेलनि तथा ओ सभ अत्‍यन्‍त मनोसोग पूर्वक एहिमे प्रतिभागी बनब प्रारम्‍भ कयलनि। एहि प्रकरक दू पारितोषिक चेतनाक मंचसँ घोषित भेल जकर आर्थिक भार ओ वहन कयलनि जनिक स्‍मृतिमे एकर स्‍थापना कयलनि। शैलवाला मिश्र स्‍मृति पारितोषिक : मधुवनी जिलाक चानपुरा ग्रास निवासी साइन्‍स कॉलेज पटनाक प्राक्‍तन प्रधानाचार्य एवं विश्‍वविद्यालय सेवा आयोगक प्राक्‍तन अघ्‍यक्ष सूर्यकान्‍त मिश्र अपन दिवंगता धर्मपत्‍नीक स्‍मृतिमे हुनक सांस्‍कृतिक कार्यक्रमक प्रति अनुराग विशेषत: अभिनय मे अभिरुचि कलेल चेतना समिति क नाट्य प्रभाग नाट्यमंच द्वारा आयोजित विद्यापति स्‍मृति पर्वोत्‍सवपर अभिनीत नाटक अभिनयमे सर्वोतम अभिनयक लेल शैलवाला स्‍मृति परितोषिकक घोषणा कयलनि। एहि निमित्त 1984 वर्षक लेल एक सय एक एवं भविष्‍यक हेतु एक हजार एक टाका फिक्‍स डिपोजिटमे रखबाक हेतु समिति केँ समर्पित कयलनि। तदनुसार चेतना समितिक नाट्य प्रभाग नाट्यमंच द्वारा शैलवाला स्‍मृति पारितोषिक योजना प्रारम्‍भ कयलक जकरा अन्‍तर्गत निम्‍नस्‍थ सर्वोतम कलाकारकेँ सर्वोतम अभिनयक हेतु पुरस्कृत कयल गेल अछि, यथा : वर्ष नाटक नाटककार पुरस्‍कृत कलाकार 1984 नवतुरिया नाटयरूपकार उषाकिरण खॉं हेमचन्‍द्र लाभ 1985 एनाकते दिन? अरविन्‍द अक्‍कू त्रिलोचन झा 1986 अन्‍हार जंगल अरविन्‍द अक्‍कू अशोक चौधरी 1987 जादू जंगल रोहिणी रमण झा प्रशान्‍त कान्‍त 1988 रुकमिणी हरण गोविन्‍द झा प्रेमलता मिश्र प्रेम 1990 राजा सलहेस रोहिणीरमण झा सुनीलकुमार झा 1991 रक्‍त अरविन्‍द अक्‍कू शारदा सिंह 1992 लीडर वनदेवी पुत्र भवनाथ शरारदा सिंह 1993 ओरिजनलकाम महेन्‍द्रमलंगिया सुभद्रा कुमारी 1994 अथ अद्भुदानन्‍द संजय कुन्‍दन लक्ष्‍मीनारायण मिश्र 1995 एकटा चिनमा विनोद कुमार मिश्र शारदा सिंह 1996 के केकर ? अरविन्‍द अक्‍कू रघुवीर मोची 1997 पदुआ कक्‍का अएला गाम अरविन्‍द अक्‍कू अनीता मन्‍नू 1998 गुलाबछडी अरविन्‍द अक्‍कू अनीता मन्‍नू 1999 अगिनपथक सामा कुमार शैलेन्‍द्र रश्मि 2000 सेहन्‍ता रोहिणीरमण झा रश्मि 2001 नवघर उठे कमल मोहन चुन्‍नू कुमार गगन 2002 शपथ ग्रहण कुमार गगन मिथिलेश कुमार मिश्र 2003 राज्‍याभिषेक अरविन्‍द अक्‍कू कुमार गगन 2004 छूतहाघैल महेन्‍द्र मलंगिया रामश्रेष्‍ठ पासवान 2005 जय जय जनता जनार्दन कुमार गगन उमाकान्‍त झा 2006 नदी गोगिंआयल जाय मनोजमनु रामश्रेष्‍ठ पासवान 2007 अलख निरंजन अरविन्‍द अक्‍कू रामश्रेष्‍ठ पासवान कामेश्‍वरी देवी पुरस्‍कार : मिथिलाक सर्वांगीन विकासार्थ अपन जीवनक आहूति देनिहार मिथिलाक वरदपुत्र ललितनारायण मिश्रक धर्मपत्‍नी कामेश्‍वरी देवीक निधनोपरान्‍त हुनक स्‍मृतिमे हुनक ज्‍येष्‍ठ पुत्र विजयकुमार मिश्र चेतना समितिक वर्त्तमान अघ्‍यक्ष एवं हुनक परिवारक सहयोग सँ नाट्यभिनयमे प्रतिभागी कलाकारकेँ विद्यापति स्‍मृति पर्वोत्‍सवपर अभिनीत नाटक लेल सर्वश्रेष्‍ठ अभिनयक लेल पुरस्‍कृत करबाक परम्‍पराक शुभारम्‍भ भेल एकैसम शताब्‍दीक प्रथम दशक मे। 2002 शपथ ग्रहण कुमार गगन आरती 2003 राजयभिषेक अरविन्‍द अक्‍कू गुडि़या 2004 छूतहा घैल महेन्‍द्र मलंगिया गुडिया 2005 जय जय जनताजनार्दन कुमार गगन स्‍वाती सिंह 2006 नदी गुगुआएल जाय मनोज मनु सपनाकुमारी 2007 अलखनिरंजन अरविन्‍द अक्‍कू विजय लक्ष्‍मी मैथिली रंगमंचकेँ व्‍यवस्थित स्‍वरूप प्रदान करबामे चेतना समितिक मा पुत्र नाट्यमंच प्रभाग वर्तमान परिप्रेक्ष्‍यमे मिलक पाथर बनि गेल अछि जे जाहि दिशामे एकर प्रयास प्रारम्‍भ भेलैक आ ओकरा मूर्त्तरूप प्रदान करैत गेल तकर श्रेय आ प्रेय एकर समर्पित कलाकार लोकनकेँ छनि। समितिक ई प्रयास कतेक सार्थक भेलैक जे नाट्यमंचक स्‍थापनोपरान्‍त नव-नव तकनिकसँ संयुक्‍त कयक नवीनतासाँ संयुक्‍त एकसँ एक कलाकारकेँ मंचपर आनि हुनका अपन यथार्थ प्रतिभाक प्रदर्शनार्थ स्‍वर्णिम अवसर प्रदान कयलक। चेतना द्वारा नाटक ओ रंगमंचक विकास यात्राक मार्गकेँ प्रशस्‍त करबाक हेतु जे अभियान चलौलक ओ साहित्‍येतिहासमे स्‍वर्णक्षरमे अंकित होयबाक योग्‍य थिक। एकरा इहो श्रेय आ प्रेय छैक जे एकर समिर्पित कलाकार लोकनि अपन अभिनय कौशलक प्रदर्शनार्थ समितिक नाट्यमंचसँ अनुप्राणित भ’ कतिपय नव-नव नाट्य-संस्‍थादि स्‍थापित भेलैक अरिपन (1982), भंगिमा (1984), कलासमिति, आङन, भाव तरंग, अभिनव भारती आदि-आदि रंगकर्मी संस्‍थादिक जन्‍मक मूलमे चेतना समितिक नाट्यमंच प्रभाग अछि। चेतनाक नाट्यमंचक नियमित प्रदर्शनिक फलस्‍वरूप जनमानसकेँ नाटक देखबाक लुतुक पडि़ गेलैक अछि जाहिसँ दर्शकक संख्‍यामे अपार वृद्धि भेलैक ताहिमे सन्‍देह नहि। मैथिली रंगमंचीय गतिविधिक व्‍यौरा अछि जे रंग कर्मक क्षेत्र मे चेतनाक नाट्यमंच प्रभागक अवदानसँ हमरा परिचय करबैत अछि जे इति हासक दृष्टिऍं उल्‍लेखनीय अघ्‍याय थिक। एहिमे सन्‍देह नहि जे मैथिली रंगजगत केँ चेतनाक देनक चर्चा-अर्चा रंगमंचक इतिहासमे सतत स्‍मरणीय रहत, कारण एकरा स्‍थायित्‍व प्रदान करबाक दिशामे ई एहन ठोस कार्य कयलक अछि एकर नाट्य प्रभाग आ करैत आबि रहल अछि आ आशा कयल जाइत अछि जे भविष्‍य मे से हो उज्‍ज्वल आ कर्मरत हैत से विश्‍वास अछि। वस्‍तुत: चेतना समिति नाटक ओ रंगमंचक माघ्‍यममे मिथिलाक सांस्‍कृतिक, साहित्यिक आ कलाक प्रचार-प्रसारक सुकार्य करैत आबि रहस अछि। समिति रंगमंचक माघ्‍यमे सांस्‍कृतिक आ साहित्यिक आन्‍दोलन चलौलक जे जन चेतना जगयबामे सहायक सिद्ध भेल। एकर प्रयासक फलस्‍वरूप नाट्य-लेखन आ मंचनक विकासक दिशामे लोकक प्रतिवद्धता बढ़लैक। निजी निर्देशक, निजी तकनिशियन आ विशुद्ध मैथिल अभिनेता-अभिनेत्रीक सहयोगसँ नाट्य-प्रस्‍तुति करबामे निजी व्‍यक्तित्‍व निर्माण कयलक अछि संगहि अपन प्रदर्शनसँ राष्‍ट्रीय स्‍तरक कतिपय कलाकार बनलहि। समितिक सत्‍प्रयासक फलस्‍वरूप नव नाटक, नव-शैली आ नव-कथ्‍यक जन्‍म द’ कए नव जागरणक शंखनाद कयलक अछि। एकरासँ प्रेरित भ’ नव-नव संस्‍थादिक उदय अ विकास रंगमंचकेँ निस्‍सन्‍देह स्‍मृद्धि कयलक अछि। एकरा ई श्रेय आ प्रेय छैक जे नाट्यान्‍दोलनमे तीवता अनलक आ रंगमंचकेँ स्‍थायीतत्‍व प्रदान करबाक निमित्त अत्‍याधिक क्रियाशील अछि। जयकान्‍त मिश्र जीवन आ साहित्‍य–साधना मिथिलांचलक जयन भूमिमे कतिपच मातृभाषानुरागी जाज्‍ण्‍वलमान नक्षत्र उदित भँ सुधी साहित्‍य-मनीषी अनुवरन साधनारल रहलाह, किन्‍तु विगत शताब्‍दी कतृतीय दशक मे अपन अविरल साहित्‍य-साधना, आन्‍दोलनात्‍मक आ रचनात्‍मक शताब्‍दी कतृतीय दशक मे भवन अविरल साहित्‍य-साधना, आन्‍दोलनात्‍मक आ रचनात्‍मक सृजन द्वारा विश्‍व स्‍तर पर मैथिली केँ प्रतिष्ठिन करबामे, स्‍वावलम्‍बी बनयबामे, विधि अभावादिक पूत्‍यर्थ, मातृभाषा कमाध्‍यले प्राथमिक शिक्षा नीति लागू करवा मे सत संधर्बरत, वैज्ञानिक आलोचनात्‍मक ग्रन्‍थक प्रणयन करबामे, शोध एवं अनुसधन केँ नव दिशा मे, साहित्‍यक हेड़ायल-भुतिआयल विभूति केँ प्रकाश मे अनवाले, दिवारात्रि चिन्‍ताग्रस्‍त रहनिहार एक एहन दिव्‍य अक्षर पुरुष प्रादूर्भूत भेलाह जे अपन बहुआयामी व्‍यक्तिलक प्रभाव सँ सानूभावानुरागी निरन्‍तर एकर उत्‍थानार्थ कार्यरत रहलाह ओ रहथि प्रोफेसर डाक्‍टर जयकान्‍त मिश्र (1922-2009) , विगत लगधक सात दाशकक दीर्धा अन्‍तराल धरि अनबरत एक रस आ एक चित्त भ’ कए मान्हभाषाक निब्‍प्राण धमनी मे नव रक्‍तक संचार क’ अभिनव साहिथिक वातावरणक निमणि कार मे टापर-रोइया द’ रहल छल तखन अने अपन अनु संधान द्वारा एक अलोकक रश्लि विकीर्ण कयलनि। प्रथम दर्शन मैथिलीक अध्‍ययन-भनुशीलन मे निरल रहबाक कारणेँ बागवस्‍थहिसँ एहि अक्षर पुरुषक नाम सँ अवगल बलहुँ, किन्‍तु डनक दर्शन करबाक सुहावसर नहि भेटल छल। हिनक पहिल दर्शनक अवसर भेटल विहारक राजधानी पटनामे जलय ओ विहार पब्लिक सर्मिस कमीशनमे, विहार विश्‍वविदयालयक मैथिली वित्राग क रीडर एवं विभागध्‍यक्ष एक इन्‍टभ्‍यू दबाक हेनु आयल रहथि1 कमीशन आफिस मे हम अपन गुरुदेल प्रोफसर शैलेन्‍द्र मोहन झा (1929-1999) क दर्शनार्थ गेल छलहुँ । ई घटना थिक सन् 1963 ईo क जखन हम परना विश्‍वविद्यालय एमoएo मैथिलीक अनअन्तिम वर्षक छत्र दलहुँ । ओताह हुनका प्रथमे प्रथम देखलियनि आ हमर विक्ष्‍तृत परिचय शेलेन्‍द्र बाबू हुनका देलथिन। जखन हम भागजपरु विश्‍वविद्याल मे मैथिलीक लेक्‍चरर भ’ अचलहुँ आ शहर मे विद्यापति पर्वकेँ आयोजन मे सम्मिलिन दैबाक इेनु आभंभिल कयलियानितँ ओ सहष्र स्‍वीकार क’ कए आयोजन मे अपन सारगयिति गम्‍भीर व्‍याख्‍यान द’ कए जनमानसमे मा नुरागक वी जवपन कय हम जरवन शोध कर्य मे तल्‍लीन छलहुँ तँ मैथिली प्राचीन पत्रिकादि मेप्रकाश्जि कतिपच रचनादिक संकल नार्थ हुनक निजी पुस्‍तकालय देखबाक हेतु इलाहाबाद गेलहुँ। हमर मुख्‍य कार्य छल हरिमोहन झा (1908-1984) क बहुर्चार्चन उपन्‍यास कन्‍यादान (1933) एवं द्विरागमन (1943) पर श्रीकृष्‍ण मिश्र (1918-1991) क एक बहत समालांचना मिथिला मि‍हिर मे प्रकाशित भेल छल तकरा देखबाक हेनु ओनय गेलहुँ। हमर शोधकेँ सार-गर्भिल बनयबाक उद्देश्‍यसँ हमर इच्‍छत रूप आवश्‍यक सामग्री सभकेँ टाइप करबा देलनि, कारण ओहि समयमे जिसक्‍सक आवित्‍कार नहि भेल छलैका ओ टाइप काँपी अदयाधि हमर व्‍यक्तिगत पुस्‍तकाजय मे स्‍मृनिक धरोह एक रूपमे वर्त्तमान अछि। मेथिलीक एहन सम्‍मपन्‍न पुस्‍तकालय हम नहि देखने छलहुँ। हुनकासँ कतेक बेर भेट भेज तकर ठेकान नाह, किन्‍तु विश्‍वविदयालय अनुदान आयोग एवं विश्‍वविदयालय स्‍तर पर, चेतना समितिक संगोष्‍ठी मo मिथिला सांस्‍कृतिक संगम प्रयागक आयोजनोत्‍सव पर तथा व्रजकिशोर वमा्र (1918-1986) हुनकासँ भेटभेल छल (200A) पुस्‍तकक सम्‍पादनक क्रममे मैटर एकन्नित करबाक लेल सहसाधिक बेर हुनक दर्शन 311 सान्निद्ध प्रप्‍त करबाक अवसर हमरा भेटल तथा सतल अपन अशेष शुभकामना सँ उव्‍प्ररित करैत रहलाह मानृभाषक सेवार्थ। पृष्‍ठभूमि हिनक पारिवारिक पृष्‍ठभूमि मे संस्‍कृतक पठन-पाठनक प्रति अगाधि आस्‍था आ श्रद्धा छलान, कारण हिनक पितामह महामाहेपातध्‍याय पण्डित जयदेव मिश्र ( ) आ पिता ( ) आ पिता महामहोपाध्‍याय डाकर उमेश मिश्र (1895-1967) केँ संस्‍कृति शिक्षणक प्रति अनुराग छलान1 किन्‍तु उपर्युक्‍त वातावारणक विरीत हिनक पठन-पाठन पाश्‍चात्‍य-शिक्षानुरूप पिता एवं प्रोफेसर अमरनाथ झा (1897-1955) क छत्र छाया मे भेल निक्रारण ओहि समच सोमग्र उतर भारत वर्ष म इलाहाबाद आधुनिक यूरोपियन परम्‍पराक केन्‍द्र विन्‍दू छल जनच अमरनाथ झा सहश बहुभाषाविद अंग्रेजी विभागक सर्वेसर्वा रहथि यदचपि ओ पाश्‍यात्‍य –शिक्षा पद्धति सँ अवश्‍य शिक्षिन भेलाह, किन्‍तु हिनका छदयमे भालृभाषानुराग एतेवा बलवनी छलान जे जीवन पर्यन्‍त विभिन्‍न रूपेँ सक्रिय रहि आकर उत्‍थानार्थ सतल दत्तचिन रहजाहा। उप्रध्‍यापन प्रोफसर जयकान्‍त मिश्रक विलक्षण वैदुव्‍य आशैक्षगिक योग्‍यताकेँ ध्‍यान मे राखि मात्र 21 वर्षक अवस्‍थामे इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय मे स्‍टदीज एण्‍ड मार्डन यूरोपियन विभाग मे लेकचररक पदकेँ ई सुशोभिल कयलनि सन् 1944 ईo मे 1 उक्‍त विभाग मे रीडर, युनिगसिटी प्रोफेसर एवं विभागाध्‍यक्ष पद पर आसीन भ’ ओ सन् 1983 ईo मे अवकाश ग्रहण कयलनि। किन्‍तु अवकाशो परान्‍त हिनका अध्‍यापन कार्यसँ मुक्ति नटिअे टलनिकारण हुनक वैदुव्‍य सँ प्रभावित भ’ सागर विश्‍वविद्यालय हुनका भिजीटिंग फेलोक रूपमे चयन कयलकनि जलय ओ सन् 1985 सँ सन् 1988 धरि कार्यरत रहलाह। एही अवधिमे अर्थान् 1986 ई मे दुनक चचन आँल इण्डिया बोर्ड फार रिसर्च एवाड इन ध्‍यू मैनिटीजक हेतु मैसूर विश्‍वविदृयालय आमंत्रित कयलका अध्‍ययन-अध्‍यापनक प्रति ग्रामोदय विश्‍वविदयालय जतय ओ सन् 1992 सँ 1994 धरि डीन फैक्‍लरी आँफ लैंगवेजज एण्‍ड सोसल साइन्‍स विभाग मे अध्‍ययपन करैत रहलाह। उप्रनुसंधान-प्रेरणा निष्‍प्राण मैथिली साहित्‍य मे नव प्राणक रचन्‍दन भरनिहार प्रोफेसर जयकान्‍त मिश्र प्रथम मैथिल सरस्‍वतीक वरद पुत्र प्रादुर्भूत भेलाह जे मानृभाषाकैँ जीवनदान देलनि अपन गहन अनुसन्‍धान द्वारा । इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय क शैक्षणिक पृष्‍ठभूमि आ अध्‍यापन वृत्ति मे संलग्‍न रहजाक कारणेँ ओ अनुसन्‍धनक दिशामे उन्‍मुख भैजाई । हिनका छदय मे अनुसन्‍धनक तीव्र आकांक्षा छलनि जे हुनक अनुसन्‍धोनर कृतिक अवलोकान सँ स्‍पष्‍ट होइत अछि 1 जेँ अंग्रेजी विभाग मे अध्‍ययनक शुभारम्‍भ कयलनि तेँ आवश्‍यक छल जे ओ उपर्युक्‍त विषय पर शोध करथि एहि लेल विचार-विमर्श करबाक हेतु ओ अपन गुरुवर प्रोफेसर अमरनाथ झा क लग गेलाह। ओ अपन विचार व्‍यक्‍त कयलनि जे हम शेक्‍सपियरक ड्रामा पर काज करय चाहैत छी। एहि पर ओ कहल थिन ‘नहि काराक पढ़त7 शेवसपिचर पर विश्‍वक विभिन्‍न भाषामे हजारौ पोथी उलब्‍ध छैक1 ककरो ध्‍यान जयतैक अहाँक पोथी पर। भारतीय छात्रों आकसकोर्डक पब्लिकेशन पढ़ल ? इण्डियन राइटरक पोथी नहि पढ़य चाहन ।’ प्रोससर झाक एहन बात सुनिक’ ओ अवाक् झा गेलाह। हुनका साहस नहि भेलान जे झा सहिबक बात केँ काटथि।हुनका सँ ओ जिज्ञासा कयजथिन अपने कहज जाओ जे कोन विषय पर शोध करी।‘ ओ कहथिन, ‘मैथिलीक काज।’ ओ सन्‍नरहि गेलाह जे अडo रेजी साहित्‍यक शोध-प्रबन्‍धक विषय मैथिली कोना होयत ? हुनका किछु नहि फुरलान ओ पुन: साहस क’ जिज्ञासा कयलथिन, ‘मैथिली?’ डाo झा उत्तर देलथिन, ‘ हँ, मैथिली साहित्‍यक विषयमे अमैथिल भाषी जानकारी प्राप्‍त करत । अडo रेजी भाषा मे लिखल रहतैक तँ अडण्‍रेजीमे डीoफिलoक डिग्री प्राप्‍त होयता’ प्रोफेसर झा एक दूरदर्शी साहित्‍य-मनीषी रहथि तेँ उपयुक्‍त सलाह आ प्रेरणा हुनका देजथिन संगहि इहो कहलथिन जे इएह अहाँ केँ अजर, अमर आ अक्षुण्‍ण यशक भागी बनाओल जकर फलस्‍वरूप हुनक भाग्‍योदय भेलनि । हुनक ई अनुसन्‍धान वर्त्तमान परिप्रेक्ष्‍य मे मैथिली आ प्रोफेसर मिश्रक हेनु एक दोसराक पचार्य बनि गेल लछि। बिनु हुनक नामोल्‍लेख कयन मैथिलीक कृति अ नोन लगैछ। हिनक अनुसंधानत्‍मक कृति A hissory of Maitifi पर इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय हिनका सन् 1948 ईo डा o फिलoक अपाधि सँ अलंकृति कयलक। पश्‍चात् जा क’ हिनक कृति प्रकाशित भेल दुइ खण्‍डमे जे प्रकाशित होइतहि मैथिली साहित्‍यक अमूल्‍य निधक रूप मे उदधोषित भेला कारण हिनका सँ पूर्व मैथिलीक कोनो साहित्‍योतिहासि‍क ग्रन्‍थ नहि छल, लेँ हिनक अनुसंधान मैथिलीमे अनुसंधानकेँ दिशा-बोधक अनुसन्‍धान कहब तँ कोनो अत्‍युक्ति नहि हैल। हिनक अनुसंधान मात्र मैथिलीक हेतु नहि, प्रत्‍युन विरिवल विश्‍वमे आधुनिक भारतीय भाषा साहित्‍यान्‍नर्ग विशिष्‍ट अवदानक रूप मे चर्चित अर्चित अछि। हिनक अक्षय अनुसन्‍धानक फलस्‍वरूप अन्‍यान्‍य भाषाभाषीकेँ बोध भेलैक जे मैथिली साहितय एक सम्‍पन्‍न भाषा साहित्‍य थिक जकर क्रमवद्ध ऐतिहासिक पृष्‍ठभूमि नेरहक्ष शताब्‍दी सँ आवच्छिन्‍न रूपेँ चल आबि रहल अदि1 एहिऐतिहासिक अनुसन्‍धानक प्रथम खण्‍ड पर विश्रुन भाषा शास्‍त्री प्रोफेसर सुनीति कुमार चटर्जी (1890-1977) क कथन छनि जे पथमे प्रथम एहि भाषा साहित्‍यक इतिहास प्रकाशित भेल अछि तेँ ई स्‍वागलेअ थिक1 ई श्रेय आ प्रेय हिनके द्वितीय खण्‍ड पर प्रोफेसर शमरनाथ झा आमुख लिखलनि जाहि मे मान्‍हभाषानुरागी साहित्‍य मनीषीक शोध-प्रबन्‍धक निर्देशक दलथिन हुनक कथन छनि जे एहि विस्‍तृत साहित्‍य गौरवलच इतिहास आधु निकलाक परिप्रेक्ष्‍य मे मूत्त रिपमे प्रस्‍तुत क’ कए अत्‍यन्‍त साहसिक काज ई कयल निअछि। हिनक गहन अनुसन्‍धातमक प्रृत्तिक परिचय भेटैछ हिनक महत्त्वपूर्ण कीर्ति An Introduction to the folk leterafse of Mithila हाहि मे इ मिथिलांचलक परिसर मे उपलब्‍ध लोक साहित्‍यक विश्‍लेषण कयलनि अपन शोध साहितयक संचयनक क्रममे साहित्‍यक विश्‍लेषण कयलनि जतेक सामगी हिनका उपलब्‍ध भेलनि तकरा संकलिन कचलनि आ अंग्रजी मे विश्‍लेषण क’ प्रमाणिन कयलनि जे एकर समृद्धशाली विपुल; लोक साहित्‍य जनमान स मे छिडि़आयल अछि दिशामे अनुसंधानक प्रयोजन अछि। अपन अनुसन्‍धानक तीव्र आकांक्षाक पूत्‍यर्थ ओ दुइ बेर पड़ोसी शब्‍द नेपाल क यात्रा कयलनि। प्रथम यात्रा तँ ओ शोध-प्रबन्‍धक सामग्री संकलनार्थ गेलाह 311 द्वितीय यात्रा क हुनक उद्देश्‍य छलनि जे प्रथम यात्रा मे जाहि सामग्रीक पाण्‍डुलिपि नहि उपलब्‍ध ‘क’ पौलान नकरा मूर्लरूप प्रदानकरबाक निमित्त पुन: ओतय गेलाह। एहि क्रममे ओ मैथिली भाषा आसाहित्‍यक बहुमूल्‍य नाटकादिक पाण्‍डुलिपिक संचयन क’ कए प्रकाशित करौलनि जकर विवरण हुनक कृतित्‍वक अन्‍नगति कयल जायल। ओहि नाटकादि क प्रकाशनक फलस्‍वरूप भावी अनु सन्धिसुक पथ-प्रदर्शन कचलनि1 उक्‍त कृतिक सचादनक क्रममे ई सारगर्मित भूमिका अंग्रेजी आ मैथिली मे लिखित ओकर मूल्‍यांकनक सं‍गहि ओकर ऐतिहासिकता केँ उदधाटित कयलान जकर फलस्‍वरूप मैथिली क कतिवय क्षमपाद क ओझरौठ केँ ओ सो झरा देलान। हिनक अनुसधान सम्‍पूर्ण अवधारणा केँ बदलि देलक आ ओसकारात्‍मक भेल। आब मैथिली गम्‍भीर अध्‍ययनक विषय मानल जाय लागल ई अवधारणा एवं सकारात्‍मकता मैथिली साहित्‍यक बहु विधि मार्ग प्रशस्‍त कयलका एहि दिशा मे हुनका द्वाराकयल गेल प्रयास स्‍नुत्‍य अछि। साहित्‍य-याधना जयकान्‍त मिश्रक साहित्‍य-साधनाक अन्‍नर्गत मैथिलक , सम्पादिल एवं स्‍वतन्‍त्र आलेखदिक रचनावली पाठकक समक्ष ओ थिक अडo रेजी एवं मैथिली मे1 ओ मैथिली साहित्‍यकेँ नव दिशा देबाक निमित्त उपर्चुवत दुनू भावा मे समान रूपेण लेखन कयलनि जकरा पाछाँ हुनक उद्देश्‍य छलनि अमैथिल भाषी सेहो एकर गौरव-गरिमा केँ जानय, बुझय जकर विवरण एहि प्रकारेँ अछि: अडo रेजी मे मौलिक i. A History of Maithiki Literafuse Valume I 1949 ii. A History of Maithili Leterature Volume II 1950 iii. An Introduction to folk Leterature of Mithils volume I 1950 iv. An Introduotion to folk literature of Mithila Volume II 1951 v. A case of Maithili 1963 vi A History of Maithili Leterature 1976 मौलिक मैथिली i. कीर्त्तनिञा नाटक 1965 ii. तिरहुना ककहारा 1967 iii. मैथिली मे प्राथमिकशिक्षा 1969 iv. वृहन् मैथिली शब्‍दकोश खण्‍ड-1 1973 v. मैथिली साहित्‍यक इतिहास 1988 vi. वृहन् मैथिली शब्‍द कोश खण्‍ड- 2 1995 मौलिक अडo रेजी जीजको पार्जन अडo रेजीक प्रोफेसरक रूपमे भेलनि तेँ ओहू साहित्‍य मे रचनात्‍मक प्रव्‍हत्तिक परिचय देलनि: i. Leetures on Thomas Hardy 1955 एवं 1965 ii Leetoores on Four Poets 1957 एवं 1963 iii iComplez style in English Poetry 1977 vi Leetares on Four Poets (Romantic Poets)1987 v Leetorees on four Poets (Victoriam Poets) 1992 सम्‍यादित कृति नेपाल यात्रा मे हुनका मैथिलीक बहुमूल्‍य धरोहर नाटकादि एवं अन्‍य कृति उपलब्‍ध भेजनि नेपाल दरवार लाइब्ररी धूल-धूसरिन भ’ रहल छललकरा सयत्‍न आनि ऐतिहासिक भूमिका लिखि सम्‍पादित कयलनिआ प्रकाशित कयलनि: i. धूर्मसमागल – ज्‍योतिरीश्‍वर -1960 ii. गौरी परिणय – शिवदत्त- 1960 iii. गौरी स्‍वयंवर- कान्‍हाराम-1960 iv. गोरक्षविजय – विदयापति-1961 v. रुविकणी परिणय- रमापति-1961 vi. कृष्‍ण केलिमाला-नन्‍दीपति-1961 vii. श्री कृष्‍णजना रहस्‍य-श्रीकान्‍तगणक-1961 viii. गौरीस्‍वयंवर- लालकवि -1962 ix. विदया विलाप-भूपलीन्‍द्रभल्‍ल- 1965 x. Eneyelopadie of Indian Leteeahese Medieval & Modern Indian Leteratuse Maithili Seetion. Xi. आधुनिक गदयक निर्माता महामहोपाध्‍याय डाo उमेश मिश्र-2006 सह सभ्‍यादन कीर्तिपनाका-विदयापति-1960 अनुवाद जयकान्‍त मिश्र् सफल अनुवादक रहथि जे साहित्‍य अकादेमी द्वारा भारतक साहित्‍य निर्माता सिरीजक अन्‍नगति गोविन्‍द झा (1923) द्वारा मैथिली मे लिखित उमेश मिश्र ( ) मनोग्राफक अंग्रेजी मे अनुवाद कयलनि जे साहित्‍य अकादेमी द्वारा सन् इo मे प्रकाशित भेल। उपर्युक्‍त रचनाबजीक अतिरिक्‍त मैथिली मे हिनक निम्‍नस्‍थ निबंध मैथिली पत्रकादिमे प्रकाशित होइत रहल जे निम्‍नस्‍थ अछि: 1. प्रोफेसर गंगापति सिंहक सुशीला उपन्‍यासक समीक्षा, मिथिलामिहिर 1943 2. मिथिलाक जन साहित्‍य, चौ पाडि़ मधुमास 2011 3. मिथिलाक इतिहास सम्‍बन्‍धी किछु समस्‍या, प्रथम अखिल भारतीय लेखक सम्‍मलेन, रचना संग्रह प्रथम भाग, 1956 4. प्रथम अखिल भारतीय लेखक सम्‍मेलन, नाटक विभागक अध्‍यक्षीय भाषण 1956 5. आधुनिक मैथिली साहित्‍य पर अडoरेजीक प्रभाव, वैदेही नवम्‍बर-दिसम्‍बर 1957 6. हमर नेपाल यात्रा वैदेही जनवरी 1958 7. पूर्वाo चलीच भाषा, साहित्‍य एवं संस्‍कृतिक पारस्‍परिक प्रभाव, चतेना समिति संगोष्‍ठी 1972 8. आधुनिक मिथिलामे कीर्त्तनकचेतना, चेतना समिति संगोष्‍ठी 1973 9. परम्‍पराक परित्‍याग: साहित्‍यक अस्तित्‍वक प्रश्‍ना, चेतना समिति संगोष्‍ठी 1974 10. मैथिली नाटक ओ रंगमंच: वर्त्तमान स्थिति एवं भविष्‍य, चेतना समिति संगोष्‍ठी 1977 11. भारतीय सावधान: मैथिलीक समस्‍या, चेतनासमिति स्‍मारिका 1977 12. जीविन जातिक जीवित भाषा, मिथिला मिहिर 11 जून 1977 13. संगीन शास्‍त्र ओ पूर्वाग्‍चलीय गीति काव्‍य, चेतना समिति संगोष्‍ठी 1979 14. साहित्‍य ओ प्रतिवद्धना, चेतना समिति संगोष्‍ठी 1980 15. साहित्‍य मे परिवर्तनक स्‍वर, चेतना समिति संगोष्‍ठी 1984 16. राष्‍ट्रीय ओ आग्‍चलिक संस्‍कृति विकास, चेतना समिति संगोष्‍ठी 1986 17. साहित्यिक समालोचना: सन्‍दर्भ इतिहास लेखनक, चतेना समिति संगोष्‍ठी 1987 18. विदयापति पर्व कोनाकरी, स्‍मारिका चेतना समिति स्‍मारिका 1987 19. महाकाव्‍यमे युगीन संकेत , चेतना समिति संगोष्‍ठी 1988 20. मैथिली आन्‍दोलन: अदयनन स्थिति, चेतना समिति संगोष्‍ठी 1989 21. यात्रीक मूल्यांकन कविक रुपमे करबाक थिक, चेतना समिति संगोष्‍ठी 2000 22. मैथिली उपन्‍यास मे चित्रित समाज, चेतना समिति संगोष्‍ठी 2003 हुनक समग्र कृतिक अवलोकन सँ हुनक साहित्‍य-साधना क यथार्थ परिचय भेटि जाइछ जे ओ अपन मान्हभाषाक विकासार्थ सतत कार्यरत रहलाहा ओ अपन अक्षय कृति परवर्ती पीढ़ीक छोडि़ गेलाह तकर आलोक मे मैथिली साहित्‍यमे नव जीवन क संभावना दृष्टिगत होइछा ओ अपन अद्धितीय वैदुव्‍यक एक आदर्श प्रस्‍तु त कयलनि जे वर्त्तमान पीढ़ीक लेल पाथेय बनला सम्‍मान मानूभषानुरागी एवं साहित्‍यानुरागी कीर्ति पुरुष मिश्र जे मैथिलीक सम्‍मानार्थ जे योगदान देलनि ओहि सँ अनु प्राइज़ भ’ कए भारतक नेशनल एकेडेमी आँफ लेटर्सक संगहि विभिन्‍न मानृभाषा सेवी संस्‍यादि द्वारा समय-समय पर हिनका सम्‍मानित क’ गौपान्चित भेल। 1. भारतक आर्थिक राजधानी मुम्‍बाईक मिथिला मण्‍डल द्वारा आयोजित अखिल भारतीय मैथिली सम्मेलनक अवसर पर 31 दिसमबर 1996 मे सम्‍मान पत्र सँ अलंकृत कयलका 2. विहारक राजधानी पटनाक सांस्‍कृतिक एवं साहित्यिक संस्‍था चेतना समिति 1990 मे मान्हभाषाक अतुलित सेवाक कारणेँ मिथिला विभुति ताम्रपत्र सँ सम्‍मानित कयलका 3. मानृभाषा नुराग आ ओकर विकासार्थ हिनका द्वारा जे साहित्यिक, रचनात्‍मक आ आन्‍दोलनात्‍मक कार्य कयल गेल नाहि सँ अनुप्राणिन भ’ मिथिला सांस्‍कृतिक संगम प्रयाग-1995ईमे सम्‍मान पत्र समर्वित कयलका 4. झारखण्‍डक धनवाद स्थित विद्यापति समिति विगत शताब्‍दीक अवसान बेला मे अर्थान्‍द 1999 ईo मान्हभाषाक उत्‍थानार्थ कार्य सँ अनु प्राइज़ भ’ सम्‍मान पत्र समर्वित कयलका 5. विगल शताब्‍दीक अन्तिम वर्ष मे अर्थात् 2000 ईo मे नेशनल एकेडेमी आँफ लेटर्स अर्थात् साहित्‍य अकादेमी नई दिल्‍ली द्वारा कालजयी मध्‍यकाजीन मैथिली साहित्‍यक विशेषज्ञिक रुपमे भाषा समान सँ विभूषित कयजका 6. हिनक बहुमूल्‍य मान्हभाषाक सेवाक परिप्रेक्ष्‍यमे साहित्‍य अकादेमी नई दिल्‍ली एवं मिथिला सांस्‍कृतिक संगम प्रयागक संयुक्‍त तलावधान मे मीट द आथर अर्थात् लेाखक सँ भेट कार्यक्रम क आयोजन कयलक 28 मई 2000 मे। 7. बंगभूमिक जगता ज्‍योति संस्‍था मिथिला सांस्‍कृतिक परिषद कोलकाता 2006 अभिनन्‍दन कयलका संस्‍था – संस्‍थापक प्रयाग अति प्राचीन कालहिसँ मैथिल मानृभाषानुरागी मैथिलीक कार्य स्‍थल रहल अछि तकर दू कारण अछि। प्रशमत: धर्माम्‍बलवी मैथिल समाज गंगा-यमुना आविलुप्‍त सरस्वती नदीक संगम रहल आ द्वितीय एतय विदयाक केन्‍द्र हैबाक कारणेँ विदयानुरागी लोकनिक जमावड़ा रहल अछि। स्‍वाधीनता सँ पूर्व प्रयोग क मानृभाषानुरागी जयकान्‍त मिश्र एतय मैथिलीक विकासाथ्‍र्ज्ञ दू संस्‍थाक स्‍थापना कयलनि तीरमुक्ति पब्लिकेशनस आ अखिल भारतीय मैथिली साहित्‍य समितिक स्‍थापना सन् 1944 ई कयलनि जकर वर्त्तमान परिदृश्‍य ऐतिहासि‍ भ’ गेल अछि जे जनजागरण अनजक तत्‍कालीन साहित्‍यकार लोकनि पुस्‍तकक प्रकाश्‍न कयलकाजकर ऐतिहासिक महत्त्व अछि। एहि संस्‍थाक द्वारा मैथिली समाचार एक अनियतिकालीन पत्रिका मात्र सूचनात्‍मक समाचारक अतिरिक्त नव प्रकाशन सँ पाठक केँ अवगत करबैछ। वर्त्तमान परिदृश्‍य मे स्‍वतन्‍त्र मिथिला राज्‍यक समर्थन मे विभिन्‍न समाचार आ प्रयासक विभिन्‍न आयात पर विगत दुइ दशक सँ प्रकाशित करैत आबि आबि रहल अछि। एकर सचादन ओ स्‍वयं करथि। पीoईo एन मे मैथिली अन्‍तर्राष्‍ट्रीय एवं सा‍हित्यिक सोफिया वाडिया द्वारा संस्‍थापित साहित्यिक संस्‍था Poets, Essagist and Notelist जकरा संक्षेप मे पी.ईo एनo कहल जाइछ। उक्‍त संस्‍थाक ई सक्रिय सदस्‍य भ’ भारतीय भाषा साहित्‍यानुरागी लोकनिक ध्‍यान मैथिली भाषा आ साहितय दिस आकर्षित कयलनि 1 एकर अधिवेान मे ओ सहभागी भेलाह बड़ौदा (1957), भुवनेश्‍वर (1959) आ लखनड़ (1964) मे सम्मिलित भ’ कए मैथिली भाषा आ साहित्‍यक पुनराख्‍यान क’ कए ओहि संस्‍था द्वारा मैथिली केँ भारतक प्राचीनतम भाषाक रुपमे मान्‍यता दिऔलनि । एहि संस्‍था द्वारा मान्‍यता भेटलाक पश्‍चात् एकर अग्रिम योजना केँ क्रियाचित करवा मे अभूत पूर्वक सहायता भेटल। उक्‍त अधिवेशन मे पाठल हिनक भाषणादि ओकर कार्य विवारणी मे प्रकाशित अछि। पुस्‍तक प्रदर्शनी विहारक तत्‍कालीन राज्‍याल डा रंगनाथ रामचन्‍द्र दिवाकर आँल इण्डिया पर एक भाषणदेलनि जाहिमे दृश्‍य सँ अपन उदगार व्‍यक्‍त करैत उदधोषणा कयने रहथि जे मैथिली ज्ञान ग्रन्‍थस्‍थ प्राचीन भाषा थिकजे एकरविकास मे अति मत्त्वपूर्ण भूकिकाक निवहि कयलका जखन जयकान्‍त मिश्र ई ख्‍यान सुनलनि तँ ओ अत्‍यधिक उत्‍साहिन भ’ जोस्‍सोर सँ काज रब प्रारम्‍भ कयलनि। ईएक ऐतिहासिक परिदृश्‍य अछि जे मैथिलीक भविष्‍यक दिशा-निर्देश करैछ। पुरातन काल सँ इलाहाबाद विश्‍व विदयालय प्राच्‍य एवं प्रतीच्‍य उच्‍चशिक्षाक दृश्‍य स्‍थल अछि जतय साहित्यिक एवं सांस्‍कृतिक क्षेत्रक लब्‍ध प्रतिष्‍ठ विद्धत समाजक निवास स्‍थल रहजनि हिनक कर्मभूमि सेहो ओहो विश्‍वविदयालय मे रहलनि जतय गणतन्‍त्र भारतक प्रथम प्रधान मंत्री पण्डित जवाहरलाल नेहरूक जन्‍म भूमि छलनि। ओ अवकाश भेटला पर निश्चित रुपेँ ओतय अवेत्‍-जाइत रहथि। अखिल भारतीय मैथिली साहित्‍य समिनिक अध्‍यक्ष आ विश्‍वविदयालक 1960 ईo आनन्‍द भवन मे दर्शनाथी क रुपमे ओ तत्‍कालीन प्रधान मंत्री सँ सन् 1960 ईo आनन्‍द भव मे दर्शनाथी क रूपमे मैथिली दू पुस्‍तक वैदयनाथ मिश्र्र यात्री (1911-1998) क काव्‍य-संग्रह चित्रा आ गल्‍चात्र्जलि कया-संग्रह हुनका उपहार देलथिन, संहि अनुरोध कयलथिन जे मैथिली भाषा आ साहित्‍यक गौरवशाली साहित्यिक परम्‍परा तेरहल शताब्दी सँ उपलब्‍ध अछि, किन्‍तु सरकारी मान्‍यताक अभाव मे ई सर्वथा उपेक्षित अछि पण्डित नेहरू ध्‍यान सँ हुनक कथनकेँ स्‍नेहपूर्वक सुनलथिन आ कहलथिन Institutional recognization is not soul management of the rechness of a language we enjoy with sound literature एही क्रम मे हुनका ओनहि भेटलथिन इलाहाबाद हाईकोर्टक चीफजस्टिस न्‍याय पूर्ति बीo मल्चिका ओ कहल थिन एहि रूपेँ अहाँक मानृभाषा केँ मान्‍यता नहि भेटि सकैछ ओ सलाह देलथिन जे एहि लेल आन्‍दोलनक तरीका अपनाबय पड़त तरव‍नहि अहाँक मानृभाषा केँ मान्‍यता भेटि सकैछ। आन्‍दोलनक तरीका थिक जो अपन साहित्‍यक समृद्धशाली, गौरवशाली आ वैभवशाली परम्‍परा सूं जनमानसक संग्हिसंग साहित्‍य चिन्‍तक लोकनिक‍ ध्‍यानकर्षित करबाक उपक्रम करू। न्‍यायमूर्ति मल्लिक क सत्‍प्रेरणा आ विचारसँ उत्‍प्रेरित भ’ कए ओ इलाहाबाद मे सरगंगानाथ संस्‍कृति रिसर्च इन्‍सच्‍यूर मे 15 दिसम्‍बर 1961 ईo केँ मैथिली पुस्‍तक प्रदर्शनीक आयोजन कयलनि तथा ओकर उदधारन करबाक हेतु जस्टिस मल्लिक सँ अनुरोध कयलनि तथा ओकर उदधाटन करबाक हेतु भारत सरकार क कमीशन फाँर नाइनोरीटो लैग्‍वेणजक चेयर मैनक पद पर सुशोनित भ’ गेल रहथ। ई सुखद संयोग थिक जे उक्‍त पुस्‍तक प्रदर्शनीक उदधाटन जीस्‍टस मल्लिक स्‍वीकार कयलथिन जाहिमे आ‍ेहिठाम क प्रवृद्ध साहित्‍य चिन्‍तक लोकनि मैथिली भाषा आसाहित्‍यक प्राचीनतम गौरवशाली परम्‍परा सँ अवगत भैलाह जे हुनका सभ पर अपन अनिट छाप छोड़लका एहि अवसर पर यशस्‍वी कवि वैदयनाथ मिश्र यात्री मैथिली मे काव्‍यपाठ कयने रहथि। इलाहाबादक पुस्‍तक प्रदर्शनी सँ अनुप्राणित आ अनुप्रेरित भ’ कए ओसोचलनि जे एहन प्रदर्शनी क आयोजन गणतन्‍त्र भारतक राजधानी दिल्‍ली मे कयल जाय तेँ निश्चित रूपेँ मैलिली केँ सरकारी मान्‍यता भेटबामे कोनो वाधा नहि आबि सकैछ। एकर आयोजनार्थ ओ अपन प्रोमिडेण्‍ड फण्‍डसँ लोन ल’ कए 8 आ 9 जनवरी 1963 ईo मे दिल्‍लीक आजाद भवन मे ऐतिहासिक राष्‍ट्रीय पुस्‍तक प्रदर्शनीक आयोजन कयलनि जाहिमे मिथिलांचलक विभिन्‍न क्षेत्र सँ छदयाकर्षक छला बहुतायाद मे पुस्‍तकादि एकत्रित कयल गेल छल जाहिमे मिथिला इनटीच्‍यूर दरभंगा आ पटना विश्‍वविदयालय विशेष उल्‍लेखनीय अछि। सांसद रूपमे ललितनारायण मिश्र एवं यमुना प्रसाद मंडल सहभागी भेल रहथि। भारत सरकार संसदीय कार्य मंत्री बाबू सत्‍यनारायण सिंहक सहयोग सँ प्रधान मंत्री पण्डित जवाहर लाल नेहरू एकर उदधाटन कयलनि यदयाप ओ पन्‍द्रह मिनट विलम्‍ब सँ पहुँचलाह, किन्‍तु पुस्‍तकक अम्‍वार देखि जप्रद भ’ गेलाह। प्रोफेसर मिश्र केँ। भीजिरिंग रजिस्‍टर ओ टिप्परा कयल अनि IWas ray to inaygware Maithali Book Exibition and to see the large Colleetion of books and Manuseripts in Maithli . This domonst trated that Maitili hasd been for long time and is today a living among the people of that areas the Language deseirurs eneourgenmentप्रद्रर्शनी केँ सफल बनयबाक लेल रास्‍य-व्‍यंग्‍य सम्राट प्रोफेसर हरिमोहन झा मायानन्‍द मिश्र (1934), रामस्‍व रूप नटुआक अतिरिक्‍त अनेको गण्‍य-मान्‍य राजनैतिक , साहित्यिक मैथिली प्रेमी उनरिटक’ प्रदर्शनी सफलनय बाक हेतु उपस्थित भेलाहाएकर शानदार सजाबट क कारणेँ समग्र कार्यक्रमकझाँकी सिनेमा हाँल मे प्रदशित भेंल जे मिथिली क हेतु ऐतिहासिक घटना थिक। उपर्युक्‍त पुस्‍तक प्रदर्शनी एहि बालक सबल प्रमाण थिक जे ओ क सफल आयोजक रहथि मैथिली आन्‍दोलन एक डेग आगू बढ़ला साहित्‍य अकादेमीक सामान्‍य परिषद मे प्रवेश विश्‍वविदयालय अनुदान आयोग द्वारा मान्‍यता प्राप्‍त भारतक विश्‍वविर्दयालक अक्षरानुक्रम सँ बीस प्रतिनिधि पाँच वर्षक काला‍वधि हेतु साहित्‍य अकादेमीक सामान्‍य परिषदक सदस्‍य मनोनीत करबाक प्रक्रिया थिक, जकर नामक अनुशंसा सम्‍बद्ध विश्‍वविदयालयक कुलपति करैत छथि। जीवनक परिणन वयमे विहार सरकार निहक पिता श्री महा महोपाध्‍याय डाo उमेश मिश्र केँ सरकामेश्‍वर सिंह संस्‍कृति विश्‍वविद्रयालयक कुलपति नियुक्‍त कयलक। ई सुरवद संयोग छल जे: हुनक कार्य काल मे साहित्‍य अकादेमीक सामान्‍य परिषदक सदस्‍य नाम अनुशंसित करबाक सूचना उक्‍त विश्‍वविदयालयक कुलपतिकेँ भेटलनि। मानृभाषानुरागी कुलपतिक अतीव इच्‍छा छलनि जे एहन व्‍यक्ति क नाम अनुशंसित कयल जे मैथिलीक मान्‍यतार्थ एहि भाषाक पुरातन परम्‍पराक उपस्‍थापन सबल तर्क द्वारा प्रस्‍तुत क’ कए ओकर अध्‍यक्षि पण्डित जवाहर लाल नेहरू केँ कनमीन्‍स क’ सकथि अंग्रजी मेद्य कुलपति कार्यालय तीन केर प्रोफेसर जयकान्‍त मिश्रक नाम प्रस्‍तावित क’ हुनक अनुमोदनार्थ प्रस्‍तुत कयलका किन्‍तु कुलपति बारम्‍बार विनु कोनो टिप्‍परी कयने फाइल केँ वापस क’ देथि। हुनका एहिबालक आशंका छलनि जे जनमानस ई आरोप लगाओत जे अपन पुत्रक नाम अनुशंसिन कयलनि। अन्‍तन: सामाजिक दवाब क कारणेँ कुलपति जयकान्‍त मिश्रक अनुशंसनि कयलथिन आ ओ अकादेमीक सामान्‍य परिषदक सदस्‍य भ’ गेलाह सामान्‍य परिषदक सदस्‍य बनिनाह ओ मैथिलीक मान्‍यनार्थ आन्‍दोलन प्रारम्‍भ कयलनि जे एकर विकासक अवरुद्ध द्वारा शनै: शनै: खुजय लगलैक। अन्‍यान्‍य भाषा सदस्‍य लोतिक ध्‍यान मैथिलीक गौरवशाली साहित्यिक परम्‍परा क दिशामे ध्‍यान आकर्षित करब ओ प्रारम्‍भ कयलनि। मैथिलीक मान्‍यता मैथिली केँ मान्‍यता साहित्‍य अकादेमी दिअ, ताहि हेतु ओ फाँड़ वान्हि क’ एकरा पाछाँ पड़लनि तकरा पाछाँ हुनक त्‍याग आ बलिदानक इतिहासि जनमान सँ नहि नुकायल अछि। ओ सामान्‍य परिषदक मानानीय सदस्‍य लोकनिक ध्‍यान कर्षित करबाक आ मानृभाषा मैथिलीक महत्त्व निरुपित करबाक निमित्त अडo रेजी मे दू बुकलेट लिखलनि A cabe for Maithili एवं Cohal They say about Maitheili तकरा सदस्‍य लोकनिक बीच वितरित कयलनि। यदुयवि दिल्‍लीक पुसाक प्रदर्शनी मे पण्डित नेहरू जे अकादेमीक अध्‍यक्ष सेहो रहथ ओ एहि बालक संकेत देने रहथि जे एहि भाषाकेँ मान्‍यता भेटबक चाही1 किन्‍तु दुर्योग सँ हुनक मृत्‍यु अध्‍यक्ष बनलाह जे मैथिलीक गौरव-गारिमा आ महत्त्व सँ पूर्व परिचित रहथि। हुनका अध्‍यक्ष बनितहि ई अत्‍यधिक आशान्चित भ’ गेलाह ज आब मान्‍यता जाहि मे भाषाविद डाo सुकुमार सेन (1900-1992) प्रोफेसर हजारी प्रसाद द्विवेदी (1907-1979) आ डाo सुभद्र झा (1909-2000) केँ सदस्‍य मनोनीत कयल गेलनि जकर बैठक दिल्लीमे आहूत भेल। एहि सँ पूर्व कोलकाताक प्रवासी मानृभाषा सेवी संस्‍थादिक संग मिथिलांचल मे जनजागरण भ’ गेल ओ पोस्‍ट काई अभियान चला क’ एहि माँग क समर्थन कयलकजकर फल सवरूप भेटला एहि दिशामे प्रोफोसर मिश्रक सत्‍प्रयास ऐनिहासिक घटनाक रूपमे सतल चिरस्‍थरधीय रहल ताह। रितहुता लिपिकसंरक्षुक अन्‍य स्‍वतंत्र साहित्यिक आधुनिक भारतीय समान मैथिली भाषाकेँ अपन प्राचीन स्वतन्‍त्र लिपि छैक जकरा निरहुता वा मिथिलाक्षर वा मैथिलाक्षर वा मैथिली लिपि कहल जाइछ। तिरहुता नामसँ ज्ञान होइत अछि जे ई लिपि तिरहुत देशक थिका जहिना भाषा आ सभ्‍यता परस्‍पर अन्‍योन्‍याश्रित अछि तहिना लिपि आ भाषाक सम्‍बन्‍ध छैक1 अपन लिपि सँ जहिना-जहिना सम्‍बन्‍ध छूटल जायत तहिना-तहिना भाषाक प्रति ताहि अनुजात मे आकर्षण कम होइत जायत तकर प्रत्‍यक्ष प्रमाण थिक मैथिली । एहि लिपिक जाननिहारक संस्‍था दिनानुदिन नगव्‍य भेल जा रहल अछि ज मैथिली हेतु चिन्‍तनीय विषय थिक। एहि प्रश्‍न पर जयकान्‍त मिश्र गमभीरता पूर्वक विचार कयलनि जे एकर संरक्षणार्थ प्रयासक प्रयोजन अछि। साहित्‍य अकादेमी मैथिलीक मान्‍यताक प्रसंग मे एक प्रश्‍न उपस्थित भेल छल जे एकर स्‍वतन्‍त्र लिपिन्‍म अस्तित्त्व छैक वा नहि? ओएकर उत्तर मे तर्क देलथिनजेएकरा अपन स्‍वतन्‍त्र लिपि छैक जकर पुरातन इतिहास छैक। हुनक मान्‍यता छलनि जे मैथिली क स्‍वतन्‍त्र अस्तित्त्व स्‍थापित करबामे जे कठिनता लिपिक कारणेँ भेलनि आ वर्त्तमान परिप्रेक्ष्‍य मे भ. रल अछि सेक नहि होइत जँ हमरा लोकनि एकरा संरक्षित रखने राहत हुँ लँ ई प्रशन कथमणि नहि उठैता वार्तालापक क्रम मे ओ हमरा एक बेर कहने रहथि जे पुरानन काल मे समग्र मिथिलाग्‍चल मे तिरहुताक संगहि कैथी लिपिक प्रचलन छलैका दरभंगा राजक कार्य-कलाप मे सेहो तिरहुता लिपिक प्रयोग होइत छलैक किन्‍तु ओकरा बहितष्‍कृत क- कए हिन्‍दी बहुत देवनागरी लिपि केँ लादि दोम गेजैक जकर भयंकर दुव्‍मरिणाम भेलैक जे शनै:शनै: जनमानस सँ ई विलुप्‍त होइत गेल। एकर फलस्‍वरूप मैथिली सदृश प्राचीनत्तम भाषाकेँ वर्त्तमान परिप्रेक्ष्‍यमे हिन्‍दीक अंगक उदधोकषणा विद्धान लोकनि कयलनि जेनाव्रजभाषा आ अवधीक प्रसंग मे कहल जाइछ। जँ तिरहुता लिपि प्रचलित रहैत तथा एकर साहित्‍य एही लिपि मे लिखल जाईत तँ एहन विवादक उदभावना कथमपि नहि होइत। संस्‍कृतक हेतु वैकल्पिक रूपमे समस्‍त भारत मे देवनागरी लिपि व्‍यवहृत होमय तकर प्रभाव मिथिलाग्‍चल पर पड़ल आ मैथिली साहित्‍य निर्माता लोकान तिरहुताक स्‍थान पर देवनागरी लिपिक प्रयोग करय लग लाह। यदयपि एहि लिपिक संरक्षणार्थ कतिपय प्रयास अवश्‍य कयल गेल, किन्‍तु कोनो प्रयास सफल नहि भ’ सकला दरभंगासँ तिरहुता लिपि मे समाचार पत्र बहार करबाक प्रयास कयल गेलैक, किन्‍तु ओहोक विफल रहल। मैथिली भाषी जनमानस तिरहुता आ कैथी लिपि मे पढ़ैत-लिखैत छल आ एहि सँ अतिरिक्‍त कोनो लिपिक प्रयोगक ज्ञान लोक केँ नहि छलैका यदुयपि एकरा पुनर्जीवित करबाक नेयारभास पुस्‍तक भण्‍डार सँ जीवनाथ राय (1891-1964) बाडण्‍ला लिपिक प्रभाव काँटा अवश्‍य बनाओल गेल आ ओ ‘मैथिलीक प्रथम पुस्‍त्‍क’ क रचना अवश्‍य कयलनि, मुदा ओ सफल नहि भ’ सकल। जखन मैलिली कोश प्रकाशित करबाक प्रश्‍न उपस्थित भेलनि तखन ओ विशुद्ध तिरहुता लिपिक टाइप बनयबाक अथक प्रयास कयलनि कारण हुनक बलवली इच्‍छ। छलनि जे तिरहुता लिपि मे कोश प्रकाशित हो। एहि भाषना सँ ओ उत्‍पेरिल भ’ तिरहुता ककहारा (1967) नासक एक पुस्‍तक लिखिलनि1 दैव दुर्योग एहन भेल जे हुनक ओ प्रयास सफली भूत नहि भ’ पौलनि। हुनक मान्‍यता छजान जँ हमरा लोकनि एकरा उवपनौने रहितहुँ तँ मैथिलीक अस्तित्‍व, प्राचीन एवं मध्‍ययुगीन काल जयी साहित्‍यक रिसर्च अधिक सुकर होइता वर्त्तमान परिप्रेक्ष्‍य मे एकर पुररुत्‍थान करब प्रयोजनीय अछि रिसर्च आ सांस्‍कृतिक कायादि मे अलंकरणक रूपमे विशेष उपादेयहोयल । प्रत्‍येक मैथिली प्रेमी जनमानस सँ आ विशेषत: मैथिली षढ़निहार छात्र समुदाय केँ एहि लिपि केँ सिरबाँबाक प्रेरणा देल निओ। परामर्श माण्‍डलक संयोजक साहित्‍य अकादेमी द्वारा मैथिलीक मान्‍यता भेटलाक पश्‍चात् समग्र मिथिलाज्‍चल एवं प्रवासी मानृभाषानुरागी मे प्रसन्‍नताक लहार परिव्‍याव्‍त भ’ गेल। जनमानस आनन्‍दक सागरगे एक नव किरण विकोण अवश्‍य होयत। मैथिली परामश्र मण्‍डलक प्रथम संयोजक भेलाह रमानाथ भतर (1906-1971) क आकस्कि निधनोपरान्‍त जयकान्‍त मिश्र केँ एकर संयोजक बनओ लगेला। यदु‍यपि ओ दू खेय परामर्श मण्‍डलक संयोगक रहला’ किन्‍तु हुनक कार्यकाल मे कोनो एहन उललेखनीय प्रकाशन नहि भेल। हुनक कायनिधिमे निम्‍नस्‍थ पुस्‍तक प्रकाश मे आयल ओ थिक उमानाथ झा द्वारा सम्‍पादित विदयापति गीत शनी () आ जयधारी सिंह द्वारा संग्रहीत मैथिली कथा संग्रह ( ) इत्‍यादि। हिनकहि संयोजक कालक दुइ घटना मैथिलीक रस्‍मरणीय अछि। ओ थिक अकदिमी द्वारा मैथिलीक स्‍वीकृति पश्‍चात् इतिहासिकार प्रोफेसर राधाकृष्‍ण चौधरी (1924-1984) केँ अडण्‍रेजी मे मैथिली साहित्‍यक इतिहास लिखबाक दायित्‍व सौं पलका ओ यथा समय ओकर पाण्‍डुलिपि साहित्‍य अकादेमी मे समर्वित कयल निजकरा परामर्श मण्‍डल क समक्ष विचारर्थ पुस्‍तुत कयल गेल। किन्‍तु हुनक पाण्‍डुलिपि एहन बभन पेंच मे पड़ल जे कतिपय कारण सँ ओकरा प्रकाशन सँ वंचित क’ देल गेल। एकर प्रमुख कारण छल जे मैथिलीक इतिहास लेखन पर प्रोफेसर मिश्रक एकाधिकार छलान1 ओ अपन पूर्व प्रकाशति इतिहास प्रथम खण्‍ड आ द्धितीय खण्‍ड केँ कए अकादेमी द्वारा प्रकाशित करौलनि A History of Maithili Leterature (1976) । तचश्‍चात् ओकर मैथिली अनुवाद मैथिली साहित्‍यक इतिहास (1988) स्‍वयं कयलनि, कारण हनुका एहि विषयक शंका छलनि जे कदाचित अन्‍य अनुवादक एम्‍हर-ओम्‍हर ने क’ देत। किन्‍तु उपर्युक्‍त पाण्‍डुलिपि केँ प्रोफेसर चौधरी सेहो प्रकाशित करौलनि A Seervey of Maithili Leterature (1976) नामे । उक्‍त दुनू इतिहास मैथिली मे विवादा रचह रहल। हिनक कायनिधि मे अकादेमी एक पुस्‍तक प्रकाशित कयलक Indian Leterature Since Independence (1973) जाहि मे अकादेमी द्वारा स्‍वीकृत भाषादि स्‍वलन्‍त्र्योत्तर कालक प्रगतिक विकास-यात्रा क मूल्‍यांकन करबाक छलैका मैथिली भाषाक स्‍वातन्‍य्योत्तर काजक विकास गातिक प्रसंग मे प्रोफेसर मिश्र आलेश्‍व प्रस्‍तुत कयलनि जे प्रकाशनो परान्‍त साहित्‍य जगत मे एक वैध विवाद केन्‍द्र बिन्‍दू बनि गेल। स्‍वातन्‍त्र्योत्तर मैथिलीक साहित्‍यक यथार्थ मूल्‍यांक न करबामे अज्ञानलावश वा यथार्थ सूचनाक अभाव मे जे भाम्‍भक विचार प्रस्‍तुत कयलति तकर विरोध मे पटना सँ प्रकाशित मिथिला मिहिर क पचीस अंक क लगधक भिन्‍न-भिन्‍न लेखक द्वारा साहित्‍यक यथार्थता क मूल्‍यांकन कयल गेल। मिहिरक सचादक सुधांशु शेखर चौधरी (1920-1990) वादे-वादे जाचते तत्‍वबोध नामे एक सीरिज चलौलनि जाहि मे उक्‍त आलेसादि प्रकाशित भेल जाहि मे हुनक कटु आलोचना कयल गेल। दिशा बोत्‍धक समीक्षक यदयपि ओ जीवन पर्यन्‍त अडण्‍रेजी साहित्‍यक अध्‍ययन-अध्‍यापन निरल रहलाह जाहिमे समीक्षाक प्रचूर सामग्री उपलब्‍ध छैक, किन्‍तु मानृभाषामे समीक्षाक सर्वथा अभाव देखि ओकरा अभिवद्धित करबाक उद्देश्‍य सँ उत्‍प्रेरित भ’ मैथिली मे समीक्षा लिखबाक शुभारम्‍भ कयजनि। हिनक वृहत समीक्षात्‍मक कृति प्रकाश मे आयल प्रोफेसर गंगापति सिंह (1894-1969) क सद्रय: प्रकाशित उपन्‍यास सुशीला ( ( पर जे दरभंगा सँ प्रकाशित मिधिला मिहिर क साचादक सुरेन्‍द्र झा सुमन ( 1910-2002) प्रकाशित कयलनि । एकर महत्त्व एहि कारणेँ अछि जे उपन्‍यासकार उपन्‍यास मे कतिपय स्‍थल पर मैथिली शब्‍दक बदला मे हिन्‍दी शब्‍द-समूहक प्रयोग कयने रहथि तकर आ सर्तक प्रतिवाद कयलनि।इएह आलेख हिनका मैथिली आलोचना मे प्रवेशक द्वार खोललक तथा हिनका यशस्‍वी बनौलाका जनमानसक ई धारणा छलैक जे मैथिली मे जेलिखल जाहन छैक से ठीक छैक तकर आलोचना नहि होमक चाही एहि पर कलेक विवाद चण्‍डल । मैथिली कचुना साहित्‍य चिन्‍तक बाबू भुवनेश्‍वर सिंह भुषन (1907-1944) हिनका अत्‍यधिक प्रोत्‍साहित कयल थिना यदयाण हिनकहि सँ मैथिली मे इतिहास-लेखनक परम्‍पराक शुभारम्‍भ होइत अछि जे वस्‍तुत: समीक्षाक श्रेणी मे परिणत अछि। एहि ऐतिहासिक ग्रन्‍थक जे पयोगिता छैक ताहि प्रसंग मे हम विस्‍तर पूर्वक विवेचन कयल अछि हिनक अनुसंधान उपशीर्षकान्‍तगति। तेँ एतय गाओल गीत केँ गायब समुचित नहि। आधुनिक परिप्रेक्ष्‍य मे तथा कथित आलोचक क कथन छनि हुनक इतिहास मे कतिपय दोष अछि। किन्‍तु एहि बात केँ ओ सर्वथा बिसरि जाइत छथि जे हुनका समक्ष कोनो प्रतिमान नहि छलनि जकर आलोक मे ओकराव स्‍तृत विश्‍लेषण करितथि। अपन इतिहासि‍क अन्‍नठति ओ आहि विषय-वस्‍तुक विश्‍लेषण नहि क’ पौअनि तकर हमरा लोकनि अनु संधान क’ प्रकाश मे अनबाक प्रयास करी। जँ हुनक इतिहासकेँ मात्र डाँक मेहैशत कहबैक तँ ओकर आलोक मे ओ अनेक दिशा निर्देश कयलनि जाहि दिशामे वर्त्तमान परिप्रेक्ष्‍य मे गहन अनुसंधान क प्रयोजन अछि जे रवर्ती पीढ़ी केँ करबाक छैक। हिनक इतिहास मैथिली आलोचना साहित्‍य केँ दिशा बोध करौलक जाहि सँ आगाँ हमरा लोकनि नहि बढि़ पौजहुँ अछि जे चिन्‍तनीय थिक। मैथिली लोक साहित्‍य सँ सम्‍बन्धित हिनक An Introdution to Folk Literatuse of Mithila एहि विधाक प्रथम ग्रंथ थिक जाहि मे मिथिजाञ्चल मे हनुका लोक साहित्‍य सँ सम्‍बधित जतेक सूचना उपलब्‍ध भ’ पौजनि तकर लेखा-जोखा ओ दुइ खण्‍ड मे प्रस्‍तुत कयलनि1 प्रथम खण्‍ड मे लोक गीत सूं सम्‍बलिधत जतेक सूचना उपलब्‍ध भ’ पौजनि तकर लेखा-जोखा ओ दुइ खण्‍ड मे प्रस्‍तुत कयजनि। प्रथम खण्‍ड मे लोकगीत सँ सम्‍बधित प्रचुर सामग्री, लोकनाय्य सम्‍बधी गीत आदिक विवेचन ओ कयलनि । द्वितीय कथादि क चर्चा भेल अछि। आधुनिका परिप्रेक्ष्‍य मे लोक साहित्‍य पर जतेक कार्य भेल अछि वा भ’ रहल अछि तकर प्रेरणा स्रोत उपर्युक्त समीक्षा थिक जे परवर्ती पीढ़ी क लाक साहित्‍यकारक पाथेय बनल। वैदेही समिति द्वारा आयोजित प्रथम अखिल भारतीय लेंखक सम्‍मीलनक अवसर प्रकाशित रचना संग्रट मे मैथिली इतिहहास सम्‍बन्‍धी किछु समस्‍या दिस जनमान सक संगहि प्रवुद्ध वर्गक ध्‍याना कर्जिल कयलनि जे दिशा बोध करबैछ जे जाधरि उपर्युक्‍त समस्‍या दिक समाधान नहि होयत ताधरि इएह स्थिति रहता उपर्युक्‍त अवसर पर अपन अध्‍यक्षीय भाषणमे नाट्य साहित्‍यक भविष्‍य पर प्रकाश द’ कए कतिपय नव-बिन्‍दुक संकेत देलनि आ जोर देलनि जे एकरे माध्‍यमे मैथिली क भविष्‍य सुरक्षित रहि सकैछ जे हुनक आलोचनात्‍मक प्रवृत्तिक संकेत करैछ। हिनक सम्रह उपलब्‍ध आलेखक अनुशीलन सँ अबबोध होइछ जे ओ मैथिल संस्‍कृति, साहित्यिक परम्‍परा केँ अक्षुण रखबाक दिशा-बोध करौलनि। एहि प्रसंग मे हुनक अवधारणा छलनि जे भेष-भूषा, भाव-भाषा, कला-कौशल, चित्र-कला-संगीत केँ उद्धार करबाक प्रयोजन अछि। एहि उद्देश्‍य क पूतयर्थ अपन आलेखादि मे विस्‍तार पूर्वक विचार कयल-निआ संकेत देलान जे युवा पीढ़ी केँ अग्रसत भ’ कार्य करबाक प्रयोजन अछि। हुनक मान्‍यता छलनि जे मैथिली नारटक आ रंगमंचक माध्‍यमे एकर भविष्‍यकेँ सुनिश्चित कयल जा सकैछ । नाट्य साहित्‍य जीवित रहल-पढ़लाक ओ सुतबाक एवं देखबाक प्रक्रिया मे सजीवता छैक, मूर्नमय वस्‍तुकेँ उपस्थित करबाक क्षमता छैक तथा अभिनय मे सौन्‍दर्य ओ कलाक वास्‍तवितकता, मनुष्‍यता एवं सत्‍यता छैक, से साहितयक अन्‍यात्‍य विधा मे भेटब असम्‍मभव छैक। बीसम शताब्दी मे मैथिली साहित्‍य मे परिवर्त्तनक स्‍वर गुजित भेल तकर ओ समर्थक क रूपमे अयलाहा आधुनिक शिक्षाक प्रचार सँ लोकक ज्ञान ओकर दृष्टि विकसित भेलैक तथा मानृभाषानुरागी लेखक लोकनिकलेखनी ओहि परिवर्त्तन केँ अंकित करय लागल जे सा‍हित्‍य मे नवीनताक संचार भेलैक। परिवर्त्तनक स्‍वरक मुख रताक कारण अछि नूतन वैज्ञानि क आविस्‍कार क चमत्‍कार, औदयोगिकरब वृद्धि, एहि सँ उत्‍पन्‍न जन-जीवनक संकुलता, आर्थिक विचारक क्षेत्रमे माकर्सवाद क उदय, फ्रायडक सिद्धान्‍त बौद्धिकता वृद्धि। साहित्‍यक क्षेत्र मे एकर प्रभाव पड़ल आ परिवर्त्तन क स्‍वर गुंजित भेल तकर ओ पक्षपाती रहथि। उपर्युक्‍त परिप्रेक्ष्‍य मे हिनक समग्र रचनादि हिनका दिशाबोधक समीक्षक रूपमे प्रमाणित कयलक। कीत्तनिञा नाटक A History of Maithili Leterature क Volume I मे मिथिला मे उपलब्‍ध नाटकादि केँ ओ कीर्त्त निआ नामे साबोच्यित कयलनि जाहि प्रसंगमे आपत्ति प्रस्‍तुत कयलान रमानाथ झा अभिव्‍यज्‍जना क प्रथम अंक मे हुनका द्वारा स्‍थापित मनक खण्‍डन करैत ओकरा कीर्त्तनि ञा नाच कहलनि। एहि पर मैथिली आलोचना क क्षेतमे विवादक एक परस्‍मराक शुरुआत भेला। प्रोफेसर मिश्र हुनक मलक खण्‍डन कयल उक्‍त पत्रिककिजग्रिमअेक मे । तत्‍पश्‍चात् श्‍मानाथ झा प्रबन्‍ध संग्रह (137साल ) मे मैथिली नाटकपर एक बृहत् आलोचना कयलनि। इहो कीर्ननि ञा नाटक (1965) नामक एक रचतन्‍त्र पुस्‍तक अपन सतक समर्थन मे प्रकाशित कयलनि जाहि मे हुनक मलकखण्‍डन तर्क देलनि जे मैथिली मे शोध कोना हो, इतिहास मे परम्‍पराक नामकरण कीर्त्तनिआ नामक सार्थकता, नटुआ आ नटकियामे भेदा, नाच ओ नाटकक अभेद सम्‍बन्धी प्रमाण, नाटक शब्‍दक व्‍यापक अर्थ, मिथिलामे अभिनयक परम्‍परा, कीर्तनिञामे पात्रक प्रवेश-निष्‍क्रमण, पात्रक संख्‍या, योग्‍यता, मिथिला मे कीर्त निआक पराचरा, मिथिला मे नाटकक परचराक अभाव, कीर्तनिआ संस्‍कृत नाटक थिक तथा एकर नटुआक अयोग्‍यता आदि विषय पर प्रकाश देलनि। एहि प्रसंगमे हुनक मान्‍यता छलनि, जे ई नेपालक जगओल धनराशि थिक। इतिहास बुझबरक हेतु बड़ तह मे जाय पड़त। हुनक कथन छलनि जे इतिहासकार केँ इमानदार आ निष्‍पक्ष होयब परमावश्‍यर अछि। रमानाथ झा वाज ए कन्‍जरभेटिव इमैलनेरिव हिस्‍टोरियन। उपर्युक्‍त परिप्रेक्ष्‍य मे मैथिली आलोचक लोकनि दू भाग के विभक्‍त भ’ गेलाह1 किछु वर्षक पश्‍चात् प्रोफेसर प्रेमशंकर सिंह (1942) मैथिली नाटक ओ रंगमंच (1970) एक नव बिन्‍दु दिस संकेत्‍ कयलनि जे ई ने कीतिनिआ नाटक ओ रंगमंच मे एक नव बिन्‍दु दिस संकेत कयलनि जे ई ने कीत्तिनिआ नाटक थिक ने कीर्तनिआ नाटा, प्रत्‍युत एहि सब नाटकादिक केँ ओ लीला नाटक कहलनि । प्रोफेसर सिंह एहि दिशामे विचार करबाक एक नव दिशा क बोध कशैलनि जे विचारणीय थिक। आन्‍दोलनक सजग प्रहरी अनुसन्‍धानोत्तर एक नव प्रवृत्तिक जागरण हुनक मस्तिष्‍क मे भेलनि जे मैथिली क गौरव-गारिमाकैँ वर्त्तमा परि प्रेक्ष्‍य मे जागृत करबाक निमित्त ओ रचनात्‍मक आ आन्‍दोलनात्‍मक मार्गक अनुसरन कयजनि। एहि लेल ओ अकर्मण्‍य निष्टिकय , सुसुण्‍त, धार्मिक कट्टरता, रुढि़ मुस्‍त जीवनक अन्‍धकूप मे डूबल समाज मे जीवनक संचार करबाक हेतु जनजागरणक अभियानक सूत्रपात कयलनि जे मिथिलाक सामाजिका, सांस्‍कृतिक एवं साहित्यिक जीवन मे नव चेतना अनबाक हेतु ओ रचनात्‍मक आ आन्‍दोलनात्‍मक सरव अरिन्‍तयार कयलनि जकर प्रभाव: मिथिलावासी पर पड़ला हुनक आन्‍दोलनकारी स्‍वरूप पाहल परिचय भेटैछ जे साहित्‍य क समृद्ध शाली परम्‍परा केँ जनमानस केँ अवगत करयबाक हेतु ओ इलाहाबाद आ दिल्‍लीमे दुइ बेर अति उत्‍साहित भ’ पुस्‍तक प्रदर्शनीक आयोजन कयलनि। साहित्‍य अकादेमीक सामान्‍य परिषदक सदस्‍यक भाषाभाषी केँ एकर महत्त्व सँ अवगम करयबाक निमित्त ओ संधर्ष करब प्रारम्‍भ कयलनि। हुनक एहि सकारात्‍मक आन्‍दोलन केँ मूर्न रूप प्रदान कारण ऐ मिथिलाञ्चल आ प्रवासी मानृभाषानुरागी संस्‍थादि अपरिमित सहयोग भेटलनि जकर एनय पुनरास्‍यान क प्रयोजन नहि । एहि आन्‍दोलन मे मात्र हनके नहि, प्रत्‍युत समस्‍त मैथिली भाषी जनमानस क सहयोग केँ अस्‍वतकारल नहि जा सकैछकर परिणाम भेल भारतक सर्वोच्‍च साहित्‍यक संस्‍था नेशनल लेटर्स ऐकेडमी अश्‍वति साहित्‍य अकादेमी द्वारा सहि भाषा साहित्यिक परम्‍परा सँ अवगत भ’ मान्‍यता प्राप्‍त भेलैक। विहार एवं केन्‍द्र सरकारक उदासीनताक कारणेँ ई भाषा सर्वथा उपेक्षित देखि हुनका हृदयक आक्रेश भेलनि आओकविषर सीताराम झा (1891-1975) क निम्‍नस्‍थ पंक्ति सँ अनिशय प्रभावित भेलाह: अछि सलाइ मे आगि बरत की बिना रगड़ने। पायब निज अधिकार कतहुँ की बिना झगड़ने।। कविवर क उपर्युक्‍त पंक्तिक व्‍यापक प्रभाव जनमानस पर पड़लैक जाहिसँ अभिभूतओ जन जागरणक अभिध अभियान चलौलनि जे जनमानस अपन लेल मान्हभाषाक महत्त्व केँ जानय, बुझय आ अपन समुचित अधिकार प्राप्‍त करबाक दिशामे हुनका सहयोग देमक हेतु उनाहुल भ’ गेल। कारण ओ अनुभव कयलनि जे मिथिलांचल वासी मे भाषा चेतनाक सर्वथा अभाव छैक। भाषा चेतनाक अर्थ थिक मान्‍ह भाषाक प्रति प्रेम, दायिलबोध, कर्त्तव्‍य बोध, गौरव, बोध आदि समस्‍त विषय चेतना शब्‍दमे सन्निहित अछि, भाषाक उन्‍नति आविकास समस्‍त विषय चेतना शब्‍दमे सन्निहित अछि। भाषाक उन्‍नति आविकास ओहि भाषा भाषीक चेतना पर निर्भर करैछ म किन्‍तु मैथिली भाषी जनमानस मे अपन भाषा आ साहित्‍य क सर्वागीन विकासक अकाँक्षाक अभाव देखि ओ सर्वप्रथम भाषा चेतना जगायनाक निमित आन्‍दोलन कयजनि जे हम मैथिल छी, हमर मानृभाषा मैथिली थिक आ हम मिथिलावासी छी। एहि भावना सँ ओ उत्‍प्रेतिर भ’ मिथिलांचल वासी सँ अनुरोध कयजान जे जालि भेद, छिद्रान्‍चेषणक प्रवृतिक परित्‍याग क’ एक जुट भ’ मिलणुलिक भाषाक विकास काटकि प्रात सम्‍बद्ध भ’ आन्‍दोलन करी। ओ मैथिली आन्‍दोलनकैँ नव स्‍वरूप प्रदान करबाक आकांक्षी रहथि, कारण हुनक प्रबल इच्‍छा छलनिजेआन्‍दोलन समबन्‍धी काण्‍क्रम केँ रूपायित करबाक झुण्‍ड बान्हि क’ एहि लेल मुख्‍य-मुख्‍य महत्त्व आ तज्‍जनित विविध समस्‍यादि सँ जनमानसक ध्‍यान कर्वित करब। एहि भाषा पर एक जातक वर्चस्‍व केँ समाप्‍त करबाक लेल सेहो आन्‍दोलनक पर एक जातक वर्चस्‍व केँ समाप्‍त करबाक सेहो आन्‍दोलनक आवश्‍यकता अछि तकर अनुभव हुनका भेजनि। ओ मिथिलांचल क मुसलमान केँ आन्‍दोलनक संग जोड़ेबाक हुनक बलवती इच्‍छा छलनि । ओ एहन आन्‍दोलनक आकांक्षी रहथि जे सामान्‍य जनक वैह प्रतिनिधत्त्व क’ ओहि अंचलक, ओहि क्षत्रक, समाजक सर्वागीन उन्‍ननिक हेतु सतत सक्रिय रहथि। किन्‍तु हुनका पीड़ा एहि बालक छलनि जे मिथिलांचलवासी आन्‍दोलनक प्रति उदासरिन अछि। मैथिली आन्‍दोलन मे तीव्रता अनबाक हेतु जाधरि नहि भ’ सकैछ। किन्‍तु ओ एहि बात सँ अत्‍यधिक द:खी रहथि जे मिथिलांचल सँ निर्वाचित प्रतिनिधि लोकनिमे जागरणक अभाव परिलक्षित भेलनि। मैथिली आन्‍दोलन दधीचि बाबू भोला लाज दास (1894-1977) कथनछनि जे चुधचाप बैसने न्‍याय नहि भेटि सकैछ। मिथिलांचजक सर्वांगरिन विकास क हेतु मिथिलावासी केँ एकवद्ध भ’ सिंहनाद करबाक मचोजन अछि आ अपन अधिकार क लेल संघर्ष करबाक ओ आत्‍यानकटलनि यथा: अन्‍ययी सत्ता छी प्रलयगगन सम अति विषल। हमरहि लाधु हुँकार सँ महाप्रलय होइछ नियम। मैथिली आन्‍दोलनकेँ ओ नव रूप देबाक प्रयास कयलनि। इनक धारणा छलनि जे जाधरि राष्‍ट्रीय रूप एकरा नहि प्रदान कयल जायत ताधरि मैथिलीक विकास क सम्‍मभावना नहि। जहिना डोडि़या भाषी, असमिथा भाषी आ नेपाली भाषी केँ अपन भाषाक प्रति अगाध श्रद्धा छैक जे अपन चिर स्‍नेही ‘मार भाषाजननी’ क नारा लगबैत अछि तहिना मैथिली भाशी केँ अपन भाषाक प्रति स्‍नेह उत्‍पन्‍न करबाक लेल आन्‍दोलनक प्रयोजन अछि। जाहि-जाहि भाषा केँ साहित्‍य अकादेमी द्वारा मान्‍यता प्राइज़ छैना ओहि सब भाषा केँ भार तीय संविधानक अष्‍टम अनुसूची मे नहि सम्मिलित कयल जायत तकरा लेल राष्‍ट्रीय स्‍तर पर आन्‍दोलनक प्रयोजन अछि1 एहि लेल आन्‍दोलन केँ तीव्रतर करबाक लेल मिथिलांचलक गामक पद-यात्रा कयल जाय आ जिला-जिलामे जन आन्‍दोलन करबाक ओ आहवान कयलनि। मैथिली आन्‍दोलन तँ पत्र-पत्रिका, पत्रकार, साहित्‍यकार आ सहृदय मैथिली प्रमी धरि सीमित अछि तकरा व्‍यापक परिधि मे अनबाक आवश्‍यकता अछि। हुनक धारणा छलान जे जाधरि एकरा राष्‍ट्रीय रूप नहि देल जायल ताधरि एहि भाषाक कल्‍याणक सम्‍भावना हुनका नहि छलनि। जहिना पौल रोक्‍सन क लिखल जाहि गीत केँ लूथर किंग नाम निग्रो नेता अपन निग्रो आन्‍दोलन मे उपयोग कयलनि तहिना तकरा हमरा लोकनि केँ भाषा समूहक संग्रमाम गीत धोषित करबाक आवश्‍यकता अछि: We Shall OverCome, We Shall Over Come We Shall over come, Some day, o ! deep in my hewck I do seelieve, We Shall OverCome Someday We will have in peaee, We will go hand in hand जाधरि मिथिलांचल वासी केँ उपर्युक्‍त काव्‍यांश अनु प्राणित नहि हैलाइ ताधरि हमरा लोकनिक आन्‍दोलन सफलीभूत नहि भ’ सकैछ। जयकान्‍त मिश्र मैथिली नाम पर चलाओल आन्‍दोलनकेँ टिमटिमाइत दीप मानैत रहथि। मैथिली क नाम पर जतेक संघर्ष चलाओल जाइत ओ साधारणत: हमर आन्‍दोलनकेँ उजागर करैत अछि। छोट-छोट बातकेँ ल’ कए आन्‍दोलन करब तकरा कयलथि आन्‍दोलनक संज्ञासँ नहि अलंकृत कयल जा सकैछ। मैथिली भाषी द्वारा जे आन्‍दोलन चलाओज जा रहल अछि ओकरा एकर विकास नहि-प्रत्‍युत विनाश मानैत रहथि। मैथिली आन्‍दोलन क असफल भ’ जयबाक कारणक उल्लेख करैत हुनक कथन छलनि जे पंजाबी आ उर्दू सहश हमर भाषा कोनो धर्मक संगसम्‍बद्ध नहि अछि। मैथिली बजनिहार क संख्‍या भारत मे सातय अछि। एकर महान सांस्‍कृतिक परम्‍परा छेक। सांस्‍कृतिक अस्मिता क रक्षाक लेल आन्‍दोलन आजुक धर्म थिक। आन्‍दोलन मे तखने बल आओत जखन हम संस्‍कृतिक शंखनादकरब जन-जन भाषिक चेतनाक हुँ कार भरब। एहि प्रसंगमे ओ आरसी प्रसाद सिंह (1911-1996) क प्रसिद्ध काव्‍य बाजि गेल रनडेक उन्‍नलेख करैत रहथि: बाजि गेल नरडंक, ललकारि रहल अछि गरजि-ग‍रजि कय जनजन केँ परचारि रहल अछि आबहु की रहनीह , मैथिली बनलि वन्दिनी ? तस क छाँह मे बान उदासिनी जनकनन्‍दनी? मैथिली आन्‍दोलन सततगति शील रहल तकर परिणम अछि जे ओ नीचाँ सँ ऊपर ससरल अछि । ई एकरे परिणाम थिक जे साहित्‍य अकादेमी, भारतीय संविधानक अष्‍टम अनुसूची, संधलोक सेवा आयोग, विहार लोक सेवा आयोग, उच्‍चत्तर मैध्यिमिक, विश्‍वविदयालय स्‍तर पर अध्‍ययनक रूपमे स्‍वीकृत भेल। इएह तँ मैथिली आन्‍दोलनक अदयतन स्थिति अछि। जनेक सुविधा हमरा लोकनिकेँ उपलब्‍ध भेल अछि तकरा ओ उपयोग करबाक मंत्र देलनि। मैथिलीक वास्‍तविक विकासक हेतु अदयापि आन्‍दोलन अपेक्षित अछि। आवश्‍यकता अछि जे हमरा लोकनि आन्‍दोनोन्‍मुख भ’ प्रयास करबाक चाही जे राजभाषाक रूप मे एकरा स्‍वीकृति भेटैका जीवनक परिणत वय मे ओ मिथिला राज्‍य क स्‍थापनार्थ आन्‍दोलनक हेतु संघर्ष करबाक शुभारम्‍भ कयलनि। अपन सम्‍मानक रक्षार्थ ओ पुन: एहि अग्नि केँ प्रज्‍वलित कयलनि जे अदयाधि जनमानस संघर्षरत अछि। हुनक आकांक्षा छजान जे राष्‍ट्रक अखण्‍डता एवं एकता रहओ, किन्‍तु अपनाधरमे, अपना जिलामे, अपना प्रान्‍त वा राज्‍य मे अपन भाषा आ संस्‍कृति अक्षुष्‍ण राखि अग्रसर होइ। लोक भरिपोख, भरि मन जीवित रहि देशक उन्‍नति मे सहभागी हैत। कुंठित, कलुषित, हीन, व्‍यक्तित्‍वक विकास कहियो नहि सम्‍भव छैक। मान्हभाषाक माध्‍यमे प्राथमिक शिक्षा शिक्षा आ भाषा दुनूक विकास परस्‍पराश्रित अछि। शिक्षा मानव जीवनक मेरुदण्‍ड थिक। शिक्षाक उद्देश्‍य ज्ञानार्जन थिक। ज्ञानार्जनक हेतु भाषा माध्‍यम थिक। अत एवं कोना भाषाक सफलता एहि बातपर अवलम्वित अछि जे कोन सीमा धरि ज्ञानार्जन आ अर्जिन ज्ञानक अभिव्‍यक्ति मे सहायक होइछ जकरा द्वारा व्‍यक्तितत्त्वक निर्माण होइछ आ आन्‍तरिक शवितक विकास होइछ तथा ओ एक उत्तरदायी शिक्षा एक सिककाक दू पहलू थिक। अतएव प्रारमिमकावस्‍था मे जीवन मे मानृभाषा आ प्राथमिक शिक्षा दुनू मे प्राथमिकता अपेक्षित अछि। एहि प्रसंग भारतेन्‍दु हरिश्‍चन्‍द्रर (1850-1885) क कथन छनि: निज भाषा उन्‍नति अहै, सब उन्‍नति की मूल बिनु निज भाषा ज्ञानके मिटय न हृदयक सून। माध्‍यमे शिक्षा नहि दलाक कारणेँ हुनका हृदयमे अपार मान्हभाषाक कष्‍ट छलनि।एहि लेल ओ पृथक् सँ जन आन्‍दोलनक चलयबाक अभियान चलौलान, किन्‍तु हुनक ई स्‍वप्‍न साकार नहि भ’ पौलनि विहार सरकारक उदासीनताक कारणेँ। हमरा जनैत मिथिलावासी अपन मान्‍ट भाषाकामहत्त्व नहि बुझबाक ई दुखद परिणाम थिक। जँ लोक अपन नेना-भुटका केँ मान्‍टभाषाक महत्त्व सँ वस्‍तुत: अवगत करबितथि तँ एक एहन स्‍वस्‍थ वातावरणक निर्माण होइत जे विहार सरकारकेँ वाध्‍य भ’ कए शिक्षा नीति लागू करय पडि़तैक जखन जगन्‍नाथ्‍स मिश्र विहारक मुख्‍यमंत्री भेलाह तखन जयकान्‍त मिश्र विहारक मुख्‍यमंत्री भेलाह तखन जयकान्‍त मिश्र अत्‍यधिक आशाधित भैलाह, किन्‍तु ओकर कोनो फलाफज नहि बहरायला हुनक अवधारणा छलनि जे जँ प्राथमिक शिक्षा मैथिलीक माध्‍यमे होइत तँ मिथिलांचलक अधिकांश समस्‍याक समाधानस्‍वत भ’ जाइत। मान्हभाषाक माध्‍यमे शिक्षा नहि भेटबाक कारणेँ प्राथमिक स्‍तर नेना सभ केँ शिक्षा क प्रतिअरुचि भ’ जाइछ। तेँ प्राथमिक स्‍तर पर मानृभाषा क माध्‍यमे शिक्षा नहि भ’ जाइछ जकर परिणाम होइछ जे विदयालय सँ छात्र क पलायन भ’ जाइछ। तेँ प्राथमिक स्‍तर पर मानृभाषा क माध्‍यमे शिक्षाक कार्याययन क ईतुओ सतत संघर्ष करैत रहलाह। मैथिलीकेँ प्राथमिक स्‍तर पर यात्रा, बैसारा, प्रचार तँ करवे कयलनि, एतेक धरिओ कानूनी लड़ाई लड़बा सँ पाछू नहि रइलाइ। एहि प्रसंगमे हुनक कथन छनि आन-उद्धान देश उन्‍ततिक शिरवरपर पहुँचल अछि तकर प्रमुख कारण थिक जे ओ सव मान्हभाषाक महत्त्व सँ अवगत अछि। रुस, जापान, इंग्‍लैण्‍ड, अमेरिका आदि देश मे प्राथमिक शिक्षा ओकर मान्‍हभाषाक माध्‍यमे देल जाइछ जे प्रगतिक पथ पर दिनानुदिन अग्रसर भेल जा रहल अछि। किन्‍तु मिथिलांचल मे जन जागरण क अभान कारणेँ अभिभावक अपन भाषाक श्रीवृद्धि करवाक हेतु प्रयत्‍न नहि करैत छथि। मै‍थिली शिक्षक मैथिली पढ़यबाक हेतु प्रयत्‍न नहि करैत छथि। यावत मैथिल समाज एहि प्रश्‍नक समुचित उत्तर नहि देत, नावल मैथिली केँ आगाँ बढ़यबाक कोनो आन्‍दोलन सफल नहि भ’ सकत। सन् 1969 ईo मे मिथिला मण्‍डल मुम्‍बई द्वारा आयोजित अखिल भारतीय मैथिली सम्मेलत मे विचारणीय विन्‍दु मान्हभाषाक माध्‍यमे प्राथमिक शिक्षा ओहि सम्‍मेलन मे हमहुँ सम्मिलित भेल छल हुँ। जयकान्‍त मिश्र अपन विचार प्रस्‍तुत कयने रहथि जे निम्‍नस्‍थ अछि: 1. शैशधावरथा मे मान्हभाषाक माध्‍यमे शिक्षाक व्‍यवस्‍था रहला पर ओकर मस्तिष्‍क क विकास सहज, सुगम आ विषय-वस्‍तुक ज्ञान प्रारम्मिक संस्कार स्‍थायी होइछ। ओ सुगमता पूर्वक ग्रहण करैछ जे विषय-वस्‍तु बुझवामे सहायक होइछ। एहिमे कोना सन्‍देह नहि जे सुगमता सँ ओकर विकासक सम्भावना अछि। 2. प्रजातन्‍त्रक प्रथम शर्त थिक जे जनमानस केँ शिक्षित करब, जाहि सँ ओ कोनो कार्य सम्‍पूर्ण शक्ति क संग सहर्ष करता ओकर शक्ति विषय-वस्‍तु बुझबामे सहायक होइछ। जतय कोनो समस्‍या उत्‍पन्‍न हैत तँ ओकर समाधान ओ आसानी सँ क’ पबैछ। जीवित प्रजातन्‍त्रक मूल मन्‍त्र थिक प्राथमिक शिक्षा मानृभाषा क माध्‍यमे देल जाय। 3. एहि मे कोनो सन्‍देह नहि जे प्राथमिक शिक्षा मान्हभाषाक माध्‍यमे देल जाय, कारण मैथिली एक प्राचीनतर्म जीवित भाषा थिक तेँ एकरा अनिवार्य रूपेँ लागू करबाक दिशा मे प्रयासक प्रयोजन अछि आ सरकार पर एकरा लागू करबाक हेतु वाध्‍य करबाक प्रयोजन अछि। विहार एवं झारखण्‍ड राज्‍य क अधिकांश जिला मेईबाजल जाइत अछि ततय अनिवार्य रूपेँ एकरा लागू करबाक हेतु सरकार पर दबाव बनायाब आवश्‍यक अछि। किन्‍तु दुर्योग विषय थिक जे सरकारक उदासीनताक कारणेँ ने तँ मैथिली मे प्राथमिक शि‍क्षाक पुस्‍तक प्रकाशि‍त भेल आ ओकर अध्‍ययापन क व्‍यवस्‍था अछि जे चिन्‍तनीय विषय थिक। अतएवं आवश्‍यक अछि एकर विरोध मे जनमत संग्रह क’ कए संशक्‍त आन्‍दोलन क’ कए क’ बधिर सरकार केँ जगयबाक प्रयोजन अछि। सुसुप्‍त सरकार केँ जाधरि जगाओज नहि जायत ता धरि मिथिलांचल मे प्राथमिक शिक्षाक माध्‍यम मैथिली केँ मान्‍यता नहि भेटता मिथिलामा मैथिली क सर्वनो भावेन विकास आ विविछ समस्‍यादिक निदान ओकर निराकरण ताधरि सम्‍मावित नहि अछि जा‍धरि ओहि सँ लड़बाक शक्तिक लेल मान्हभाषाक माध्‍यमे प्राथमिक शिक्षा अपेक्षित अछि। जयकान्‍त मिश्र द्वारा चलाओल एहि आन्‍दोलन केँ साकार रूप देबाक हेतु घरघरमे बच्‍चा सभकेँ प्राथमिक शिक्षा देबाक दिशामे प्रयास अपेक्षित अछि। ई विषय बुझबा मे नहि अवैछ जे भारतीय संविधान, साहित्‍य अकादेमी आ अन्‍तर्राष्‍ट्रीय साहित्‍य क एवं साहित्‍यक संस्‍था, पीoइoएनo द्वारा एहि भाषा आ साहित्‍य केँ मान्‍यता प्राप्‍त तखन विहार सरकार प्राथमिक शिक्षाक रूपमे एकरा लागू किएकनहि करैत अछि ? कयला सँ सरकारक प्रतिष्‍ठा बढ़तैक। नि:सारण मैथिली साहित्‍यक प्राचीनतम परम्‍परा केँ सुदृढ़ करबाक दिशा मे जनजागरण क जयकान्‍त मिश्र द्वारा जे अभियान चलौलनि एकर मान्‍यनार्थ ओ जे संघष्र कयलनि, दधीयिक समान इही गलौलनि ननिक अक्षय अवदान केँ अक्षुष्‍ण रखबाक आ ओकरा अग्रगति करब प्रत्येक मैथिली भाषी जनमानसक पुनीत कर्त्तव्‍य थिक। एहि परिप्रेक्ष्‍य मे हुनक आलेखदि यज-तंत्र विविध संग्रहादि मे, पत्रिकादि मे प्रकाशित अछि वर्त्तमान मे धूलधूसरित भ’ रहल अछि तकरा संकलित क’ कए प्रकाशमे आनब प्रत्यक मैथिली भाषी क पुनीत कर्त्तव्‍य थिक। एहि युगपु रुषक प्रति वास्‍तविक श्रद्धा ज्जलि हैत जे हुनक मानृभाषानुरागक प्रति व्‍यक्‍त विचारदि वर्त्तमान परिप्रेक्ष्‍यमे प्रकाशित क’ कए परवर्त्ती एवं भावी पीढ़ीक दिशा बाधि करयबा मे सक्षम भ’ पाओत अन्‍यथा ओ अक्षय कीर्ति कालक ज्‍वाहमे गिरिगहवर मे विलीन भ’ जायत। ई श्रेय आ प्रेय हिनके धनि जे ओ अपन सत्‍प्रयास सँ मिथिली साहित्‍य केँ समृद्ध आ व्‍यापकस्‍वरूप प्रदान कयलनिजे मैथिजीक अस्तित्त्व सुरक्षित क’ सकल ‘हुनका समक्ष कोनो आदर्श नहि छजनि तथापि मान्हभाषाक सम्‍वर्द्धनार्थओ आदश्र पुरुष रहथि। ओ भार्गनिर्देशक बनि मान्हभाषानुरागक बीजक वपन कयलनि आ ओकर उन्‍नयनार्थ अति महत्त्वपूर्ण कार्य कयलनि। हुनक तप, त्‍याग, तपस्‍या, कर्मशीलता, वैचारिक स्‍तर पर सतत अटल-अडिग रहनिहार मैथिली प्रेमी जनमानस केँ चिरन्‍तन प्रेरणा-स्रोत बनल रहता षरवर्ती पीढ़ी पर रहिनक मान्‍हभाषाक बहुमूल्‍य साहित्‍यक अवदान सँ अतिशय प्रभावित भ’ विश्रुत भाषाशास्‍त्री प्रोफेसर सुनीति कुमार चटर्जी मैथिली शब्‍द कोशक प्रथम खण्‍डक फारवार्ड लिखलनि जे डo सर जार्ज अव्राहम ग्रियसनि (1850-1941) क पश्‍चात् भारत मे मैथिली क सब सँ पैघ चिन्‍तकक रूपमे अजर, अमर आ अक्षुष्‍ण रहता His name will loe handed down to Posterity in India as the gseatest bene faesor of Maithili at present day after that of illustrious geosge Abraham geierson, and will earn for him gratitude of sixteen millions of Maithili speakers in the first instance and of the Senolarly world of India, in the see and वस्‍तुत: हिनका हेतु इ सौभाग्‍यक बात रहलनि जे अपन जीवन काल मे ओ मैथिलीक विकास आ विस्‍तार देसि पौलनि। डॉo कैलाश कुमार मिश्र- समीक्षा- बनैत बिगड़ैत (कैलाश जी इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्रमे स्कॉलर छथि आ कतेक प्रदेशमे मानवशास्त्रीय फील्डवर्कक क्रममे घूमल छथि। फॉक म्युजिक ऑफ मिथिलापर पी. एच.डी. छथि आ मिथिला चित्रकलापर हिनकर आलेख एहि विषयपर सभसँ नीक प्रबन्ध मानल जाइत अछि।) श्री सुभाषचन्‍द्र यादव केर कथा संकलन आद्योपान्‍त पढ़लहुँ। लेखक महोदय अपन भावनाकेँ वेवाक रूपेँ प्रस्‍तुत कएने छथि। कथा पढ़ब तँ लागत जे केना एकटा निम्‍न-मध्‍यम-वर्गीय परिवारमे बढ़ल-पलल एक पढ़ल-लिखल मनुक्‍ख अपन जीवनक घटना, अनुभव आ सम्‍वेदनाक वर्णन अक्षरश: कऽ रहल अछि। परम्पराक नीक चीजसँ लेखक अपना-आपकें जोड़ने छथि आ परम्‍पराक पाखण्‍डक विद्रोह करबामे कख़नो नहि हिचकिचाइत छथि। गाम, घर, परम्‍परा, परिवेश, खेत, खरिहान, गामघरक आपसी कलह, समन्‍वय, कोसी नदीक कहर, सौन्‍दर्य, यात्रा वृतान्‍त आदिक वर्णन सोहनगर लगैत अछि। सुभाषजीक कथा-संग्रहकेँ हमरा जनैत दू दृष्टिकोण सँ विवेचित कएल जा सकैत अछि: (क) भाषा विन्‍यास आ शब्‍दावलीक दृष्टिकोण सँ , (ख) कथा-वस्‍तुक दृष्टिकोण सँ। आब उपरलिखित दृष्टिकोण पर विचार करी: भाषा विन्‍यास आ शब्‍दावलीक दृष्टिकोण सँ कथाकार बड्ड प्रशंसनीय कार्य केलन्हि अछि। प्रकाशक सेहो एहि तरहक रचनाकेँ प्रकाशित कए एक नीक परम्‍पराक प्रारम्‍भ केलन्हि अछि। मैथिली भाषाक सब सँ पैघ समस्‍या, हमरा एकटा मानवविज्ञानक छात्र हेबाक नाते, ई बुझना जाइत अछि जे जखन ई भाषा लिखल जाइत अछि तँ किछु तथाकथित संस्‍कृतनिष्‍ठ ब्राह्मण एवं कायस्‍थ लोकनिक हाथक खेलौना बनि रहि जाइत अछि। अनेरे संस्कृतक शब्‍दकेँ घुसा-घुसा भाषाकेँ दुरूह बना देल जाइत अछि। छोट जाति, एवं सर्वहाराक शब्‍द, विन्‍यास, व्‍यवहार आदि केँ नजरअंदाज कऽ देल जाइत छैक। सही अर्थमे भाषा माटिक सुगन्‍ध आ लोक परम्‍परासँ दूर भऽ जाइत अछि। सर्वहारा वर्गसँ कटि जाइत अछि। एहिना स्थितिमे छोट जाति, स्‍त्रीगण आदि अपना-आप केँ भाषाक तागसँ बान्‍हल नहि बुझैत छथि। भाषाक प्रति लोकक सिनेह कम भऽ जाइत छन्हि। बाजब धरि तँ ठीक परन्‍तु पढ़ब आ लिखब परमपरासँ ई लोकनि अपन नाता समाप्‍त कऽ लैत छथि। मैथिली भाषाक समस्‍या केवल जाति अथवा समुदाय मात्रसँ नहि छैक। विभिन्‍न सांस्‍कृतिक एवं भौगोलिक क्षेत्रक हिसाबे सेहो लोक भाषाकेँ ऊँच-नीच बुझैत छथि। सौराठ (मधुबनी) एवं सौराठ गामक चारु दिशामे पाँच कोस धरिमे उच्‍च वर्गक लोकक द्वारा प्रयुक्‍त मैथिलीकेँ सर्वाधिक नीक मैथिली , पुन: समस्‍तीपुर सँ कनीक दक्षिण दिस आगू गेलाक बाद प्रयुक्‍त मैथिलीकेँ निम्‍न श्रेणीक मैथिली बुझल जाइत अछि। दक्षिणमे जे मैथिली बाजल जाइत अछि, तकरा पंचकोसिला लोकनि दछिनाहा , पूबमे व्‍यवहरित मैथिलीकेँ पुवहा एवं पच्छिम, विशेष रूपसँ सीतामढ़ीमे प्रयुक्त मैथिलीकेँ पछिमाहा भाषा कहि ओकर अपमान करैत छथि। एहि सभ कारणसँ कुजरा मुसलमान, तेली, सूरी, यादब, बनिया, कोइरी, धानुख आदि अपना आपकेँ मैथिली भाषाक बाजय वला नहि बुझैत छथि। दक्षिण, पच्छिम केर लोककेँ एहन बुझाइ छनि जेना ई लोकनि भाषाक मुख्‍यधारासँ अलग-थलग होथि। लोकविद्या अथवा फॉकलोर एतेक सम्‍पन्‍नो होइतो एहि क्षेत्रमे बहुत नीक स्‍थान बनाबयमे मिथिला एखन धरि असमर्थ रहल अछि। नामकरणक उदाहरण जे ली तँ बुझायत जेना ब्राह्मण एवं कायस्‍थ लोकनि संस्‍कृतनिष्‍ठ नामक प्रयोग करबाक पूरा ठेका लऽ लेने छथि। जरवन कि पंजाबी भाषाक उदाहरण बहुत उल्‍टा अछि। पंजाबी भाषामे नाम आदि, लोक एवं सामान्‍य जनमानस केर हिसाबसँ निर्धारित होइत अछि। गुरु ग्रन्‍थसाहेबकेँ एखनहुँ धरि गुरग्रन्‍थ साहेब, कहल जाइत अछि। स्‍मरण आइयो सिमरन थीक। फॉकलोर जाग्रत छैक। एकर परिणाम ई होइत छैक जे की स्‍त्री, की पुरुष, की छोट, की पैघ सभ जातिक लोक अपना आपकेँ भाषा, संस्‍कार आ संस्‍कृतिसँ जुड़ल बुझैत अछि। सब भाषाकेँ अपन हृदयसँ सटेने रहैत अछि। अतेक सम्‍पन्‍न फॉकलोर रहितहुँ, मिथिलाक फॉकलोरपर किछु विशेष कार्य नहि भऽ सकल अछि। सुभाषजीक कथा-संग्रह एक उल्‍लेखनीय कदम थीक। एक तँ सुभाष जी पंचकोसिया नहि छथि आ दोसर ओ ब्राह्मण अथवा कर्ण कायस्थ सेहो नहि छथि। से अपन परिवेशक प्रयुक्‍त शब्‍द, वाक्‍य, परम्‍परा, नाम आदिक वेवाक वर्णन कयलन्हि अछि। किताबक सब पन्‍ना पढ़ि लेलाक बाद अपन ठेठ गाम, गामक परम्‍परा, लोक परिवेश इत्‍यादि स्‍मरण होबय लागत। लोकमे प्रयुक्‍त खांटी देसी नाम जेना कि मुनिया, कुसेसर, उपिया, बिहारी, बौकू, सिबननन, रामसरन, रघुनी, नट्टा, नथुनी, बैजनाथ, सकुन आदि पाठककेँ एकाएक गामक ठेठ परिवेशमे मानसिक रूपसँ लऽ जाइत अछि। भाषा सेहो अग्‍गब देसी। कुनो बनाबटीपन नहि। जेना सुभाषजी क्षेत्रक लोक बजैत अछि, तहिना ई लिखलन्हि अछि। एहि तरहक यथार्थवादी परम्‍पराक प्रारम्‍भ केलासँ मैथिली साहित्‍य सम्‍पन्‍न हैत। वेराइटी बनतैक। पाठकक संख्‍या बढ़त। अनेरे संस्‍कृतनिष्ठ बनि जेबाक कारण मैथिलीक पाठकक संख्‍या लगभग शून्‍य जकाँ अछि। स्थिति ई अछि जे लेखक एवं कवि लोकनि स्‍वयं किताब छपा मुफ्त बाँटैत छथि। तैयो कियोक पढ़यबला नहि। वेबवर्ल्‍डक विकास हेमाक कारणेँ किछु प्रवासी एवं मिथिलासँ बाहर रहनिहार मैथिल आब आइ काल्हि किछु सामग्रीकेँ सर्फ कय देखि लैत छथि। हालांकि इहो लोकनि सब सामग्री मैथिलीमे लिखल पढ़ैत नहि छथि। हिनका सबमे अधिकाधिक लोक अपन कथ्य अंग्रेजीमे व्‍यक्त करैत छथि। सुभाषजी जकाँ अगर आरो लेखक, कवि इत्‍यादि आगाँ आबथि तँ यथार्थवादी परम्‍परा समृद्ध हैत। मैथिलीमे नव-नव शब्‍दावली विकसित हैत। सब क्षेत्र, सम्‍प्रदाय, जाति, वर्गक लोक मैथिलीक संग सिनेह करताह। मैथिली पढ़बाक प्रति जाग्रत हेताह। कोसी, कमला, जीबछ, करेत, गंडक, बूढ़ी गंडक आ गंगाक बीच संगम हैत। मैथिली किछु विशेष केर हाथक खेलौनासँ ऊपर उठि सर्वहाराक भाषा बनत। आब सुभाषजीक कथा-संग्रहक कथा-वस्‍तु पर कनी विचार करब जरूरी। कथा-वस्‍तुक दृष्टियें सेहो लेखक अपन परिवेशसँ बान्‍हल छथि। कथा सभमे लेखककेँ परम्‍पराक नीक तत्वक प्रति सिनेह, पाखण्‍डक प्रति विद्रोह, एक निम्‍न-मध्‍यम वर्गक बेरोजगार शिक्षित युवक केर फ्रर्स्‍टेशन, एक युवकक सुन्‍दर नायिकाक प्रति आकर्षण, कोसीक कहर, गाममे परिवर्तन केर प्रवाह, गामक समस्‍या, यात्रा-वृतान्‍त, मोनक अन्‍तःद्वन्द, सुन्‍दरता आ सुन्‍दरताक प्रति मृगतृष्णा आदिक मनोवैज्ञानिक आ सहज वर्णन भेटत। ‘‘बनैत बिगड़ैत’’ कथामे माए-बापक मनोदशा, जकर संतान बाहर रहैत छैक, नीक वर्णन कएल गेल छैक। कथाक मुख्‍यपात्र माला टाँहि-टाहि करैत कौवाक आवाजसँ डरैत अछि। ओकरा हकार दैत उड़बै चाहैत छैक। लेकिन ‘‘टोकारा आ थपड़ी सँ नै उड़ै छै तऽ माला कार कौवा के सरापय लागै छै — “बज्‍जर खसौ, भागबो ने करै छै”। परदेसमे रहि रहल संतान सबहिक प्रति मालाक मनोदशा लेखक किछु ऐना लिखैत छथि: कौका कखनियें सँ ने काँव-काँव के टाहि लगेने छै। कौवाक टाहि सँ मालाक कलेजा धक सिन उठै छै। संतान सब परदेस रहै छै। नै जानि ककरा की भेलैक! ने चिट्ठी-पतरी दै छै, ने कहियो खोज-पुछारि करै छै। कते दिन भऽ गेलै। कुशल समाचार लय जी औनाइत रहै छै। लेकिन ओकरा सब लेखे धन सन। माय-बाप मरलै की जीलै तै सँ कोनो मतलब नै। “हे भगवान, तूही रच्‍छा करिहबु। हाह। हाह।”— माला कौवा संगे मनक शंका आ बलाय भगाबय चाहै छै।” आ मालाक बात पर हमरा जनैत लेखक सत्तोंक माध्‍यमसँ अपन विस्‍मय व्‍यक्‍त करैत छथि। मायक मनोविज्ञानक तहमे जयबाक प्रयत्‍न करैत छथि: माला सब बेर अहिना करै छै। सत्तो लाख बुझेलक बात जाइते नै छै। कतेक मामला मे तऽ सत्तो टोकितो नहि छैक। कोय परदेस जाय लागल तऽ माला लोटा मे पानि भरि देहरी पर राखि देलक। जाय काल कोय छीक देलक तऽ गेनिहार केँ कनी काल रोकने रहल। अइ सब सँ माला केँ संतोख होइ छै, तै सन्‍तों नै टोकै छै। ओकरा होइ छै टोकला सँ की फैदा ? ई सब तऽ मालाक खूनमे मिल गेल छै। संस्‍कार बनि गेल छै। सन्‍तोकेँ छगुन्‍ता होइ छै। यैह माला कहियो अपन बेटा–पुतौह आ पोती सँ तंग भऽ कऽ चाहैत रहै जे ओ सब कखैन ने चैल जाय । रटना लागल रहै जे मोटरी नीक, बच्‍चा नै नीक। सैह माला अखैन संतान खातिर कते चिंतित छै।” अही तरहें अपन खिस्‍सा ‘कनियाँ-पुतरा’ मे लेखक ट्रेनमे ठाढि़ एक बारह बर्षक लड़की आ लड़कीक निश्छल व्‍यवहारसँ आत्मविभोर भय, लड़की सँ एहन सम्‍बन्‍ध बना लैत छथि जेना जो लड़कीक भाय अथवा पिता होथि। ट्रेनक व भीर भरल बोगीमे ठाढि़ लड़कीक छाती जखन कथाक सुत्रधारक हाथ सँ सटैत छैक तँ लड़कीक निर्विकार मुद्रासँ एना बुझना जाइत छैक जेना ‘ ऊ ककरो आन संगे नै, बाप-दादा या भाय-बहीन सँ सटल हो।’ लड़कीक भविष्यपर लेखक द्रवित होइत सूत्रधारक माध्‍यमसँ सोचय लगैत छथि : “ओकर जोबन फुइट रहल छै। ओकरा दिस ताकैत हम कल्‍पना कऽ रहल छी। अइ लड़कीक अनमोल जोबनक की हेतै? सीता बनत की दरोपदी ? ओकरा के बचेतै ? हमरा राबन आ दुरजोधनक आशंका धेरने जा रहल ऐछ।” ‘ओ लड़की’ नामक कथामे सुभाष बाबू निम्‍नवर्गीय दब्‍बूपनीक मनोदशाक वर्णन करैत छथि। जखन एक आधुनिका अपन हाथक ऐँठ पात्र नवीनकेँ थमाबय चाहैत छैक, तँ सूत्रधार बाजि उठैत अछि: “सवाल खतम होइते नवीनक नजरि लड़कीक चेहरा सँ उतरि के ओकर हाथक कप पर चलि गेलै आ ओ अपमान सँ तिलमिला गेल। ओकरा भीतर क्रोध आ धृणाक धधरा उठलै। की ओ ओहि दुनूक अँइठ कप ल’ जायत ? लड़कीक नेत बुझिते ओ जवाब देलकै — ‘नो’। ओकर आवाज बहुत तेज आ कड़ा रहै आ मुँह लाल भ’ गेल रहै। ओकरा ओहि बातक खौंझ हुअए लगलै जे ओकर जवाब एहन गुलगुल आ पिलपिल किए भ’ गेलै। ओ कियैक नहिं कहि सकलै -हाउ डिड यू डेयर?’ तोहर ई मजाल ! मुदा ओ कहि नहिं सकलै। साइत निम्नवर्गीय दब्‍बूपनी आ संस्‍कार ओकरा रोकि लेलकै।” गजेन्द्र ठाकुर- समीक्षा- बनैत बिगड़ैत सुभाषचन्द्र यादवजीक “बनैत बिगड़ैत” कथा-संग्रहक सभ कथामे सँ अधिकांशमे ई भेटत जे कथा खिस्सासँ बेशी एकटा थीम लए आगाँ बढ़ल अछि आ अपन काज खतम करितहि अन्त प्राप्त कएने अछि। दोसर विशेषता अछि एकर भाषा। बलचनमाक भाषा ओहि उपन्यासक मुख्य पात्रक आत्मकथात्मक भाषा अछि मुदा एतए ई भाषा कथाकारक अपन छन्हि आ ताहि अर्थेँ ई एकटा विशिष्ट स्वरूप लैत अछि। एक दिस कथाक उपदेशात्मक खिस्सा-पिहानी स्वरूप ग्रहण करबाक परिपाटीक विरुद्ध सुभाषजीक कथाकेँ एकटा सीमित परिमितिमे थीम लऽ कए चलबाक, भाषाक शिल्प जे खाँटी देशी अछि पर ध्यान देबाक सम्मिलित कारणसँ पाठकक एक वर्गकेँ एहि संग्रहक कथा सभमे असीम आनन्द भेटतन्हि तँ संगे-संग खिस्सा-पिहानीसँ बाहर नहि आबि सकल पाठक वर्गकेँ ई कथा संग्रह निराश नहि करत वरन हुनकर सभक रुचिक परिष्करण करत। किछु भाषायी मानकीकरण प्रसंग- जेना ऐछ, अछि, अ इ छ । जाहि कालमे मानकीकरण भऽ रहल छल ओहि समय एहिपर ध्यान देबाक आवश्यकता रहए। जेना “जाइत रही” केँ “जाति रही” लिखी आ फेर जाति (जा इ त) लेल प्रोनन्सिएशनक निअम बनाबी तेहने सन ऐछ संगे अछि। मुदा आब देरी भऽ गेल अछि से लेखको कनियाँ-पुतरा मे एकर प्रयोग कए दिशा देखबैत छथि मुदा दोसर कथा सभमे घुरि जाइत छथि। मुदा एहिसँ ई आवश्यकता तँ सिद्ध होइते अछि जे एकटा मानक रूप स्थिर कएल जाए आ “छै” लिखबाक अछि तँ सेहो ठीक आ “छैक” लिखबाक अछि तँ “अन्तक ’क’ साइलेन्ट अछि” से प्रोनन्सिएशनक निअम बनए। मुदा से जल्दी बनए आ सर्वग्राह्य होअए तकर बेगरता हमरा बुझाइत अछि, आजुक लोककेँ “य” लिखल जाए वा “ए” एहिपर भरि जिनगी लड़बाक समय नहि छै, जे ध्वनि सिद्धांत कहैत अछि से मानू, आ नहि तँ प्रोनन्सिएशनक निअम बनाऊ। “नहि” लेल “नञि” लिखब तँ बुझबामे अबैत अछि मुदा नइँ (अन्तिका), नइं (एन.बी.टी.) आ नँइ (साकेतानन्द - कालरात्रिश्च दारुणा) मे सँ साकेतानन्दजी बला प्रयोग ध्वनि-विज्ञान सिद्धांतसँ बेशी समीचीन सिद्ध होइत अछि आ से विश्वास नहि होअए तँ ध्वनि प्रयोगशाला सभक मदति लिअ।(वैज्ञानिक आ मानक मैथिली वर्णमालाक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइवक (http://www.videha.co.in/) विदेह ऑडियो लिंकपर डाउनलोड/श्रवण लेल उपलब्ध अछि।) “बनैत बिगड़ैत” पोथीक ई एकटा विशेषता अछि जे सुभाषचन्द्र यादवजी अपन विशिष्ट लेखन-शैलीक प्रयोग कएने छथि जे ध्वन्यात्मक अछि आ मानकीकरण सम्वादकेँ आगाँ लए जएबामे सक्षम अछि। कथाक यात्रा- वैदिक आख्यान, जातक कथा, ऐशप फेबल्स, पंचतंत्र आ हितोपदेश आ संग-संग चलैत रहल लोकगाथा सभ। सभ ठाम अभिजात्य वर्गक कथाक संग लोकगाथा रहिते अछि। कथामे असफलताक सम्भावना उपन्यास-महाकाव्य-आख्यान सँ बेशी होइत अछि, कारण उपन्यास अछि “सोप ओपेरा” जे महिनाक-महिना आ सालक-साल धरि चलैत अछि आ सभ एपीसोडक अन्तमे एकटा बिन्दुपर आबि खतम होइत अछि। माने सत्तरि एपीसोडक उपन्यासमे उन्हत्तरि एपीसोड धरि तँ आशा बनिते अछि जे कथा एकटा मोड़ लेत आ अन्त धरि जे कथाक दिशा नहिए बदलल तँ पुरनका सभटा एपीसोड हिट आ मात्र अन्तिम एपीसोड फ्लॉप। मुदा कथा एकर अनुमति नहि दैत अछि। ई एक एपीसोड बला रचना छी आ नीक तँ खूबे नीक आ नहि तँ खरापे-खराप। कथा-गाथा सँ बढ़ि आगू जाइ तँ आधुनिक कथा-गल्पक इतिहास उन्नैसम शताब्दीक अन्तमे भेल। एकरा लघुकथा, कथा आ गल्पक रूप मानल गेल। ओना एहि तीनूक बीचक भेद सेहो अनावश्यक रूपसँ व्याख्यायित कएल गेल। रवीन्द्रनाथ ठाकुरसँ शुरु भेल ई यात्रा भारतक एक कोनसँ दोसर कोन धरि सुधारवाद रूपी आन्दोलनक परिणामस्वरूप आगाँ बढ़ल। असमियाक बेजबरुआ, उड़ियाक फकीर मोहन सेनापति, तेलुगुक अप्पाराव, बंगलाक केदारनाथ बनर्जी ई सभ गोटे कखनो नारीक प्रति समर्थनमे तँ कखनो समाजक सूदखोरक विरुद्ध अबैत गेलाह। नेपाली भाषामे “देवी को बलि” सूर्यकान्त ज्ञवाली द्वारा दसहराक पशुबलि प्रथाक विरुद्ध लिखल गेल। कोनो कथा प्रेमक बंधनक मध्य जाति-धनक सीमाक विरुद्ध तँ कोनो दलित समाजक स्थिति आ धार्मिक अंधविश्वासक विषयमे लिखल गेल। आ ई सभ करैत सर्वदा कथाक अन्त सुखद होइत छल सेहो नहि। वाद: साहित्य: उत्तर आधुनिक, अस्तित्ववादी, मानवतावादी, ई सभ विचारधारा दर्शनशास्त्रक विचारधारा थिक। पहिने दर्शनमे विज्ञान, इतिहास, समाज-राजनीति, अर्थशास्त्र, कला-विज्ञान आ भाषा सम्मिलित रहैत छल। मुदा जेना-जेना विज्ञान आ कलाक शाखा सभ विशिष्टता प्राप्त करैत गेल, विशेष कए विज्ञान, तँ दर्शनमे गणित आ विज्ञान मैथेमेटिकल लॉजिक धरि सीमित रहि गेल। दार्शनिक आगमन आ निगमनक अध्ययन प्रणाली, विश्लेषणात्मक प्रणाली दिस बढ़ल। मार्क्स जे दुनिया भरिक गरीबक लेल एकटा दैवीय हस्तक्षेपक समान छलाह, द्वन्दात्मक प्रणालीकेँ अपन व्याख्याक आधार बनओलन्हि। आइ-काल्हिक “डिसकसन” वा द्वन्द जाहिमे पक्ष-विपक्ष, दुनू सम्मिलित अछि, दर्शनक (विशेष कए षडदर्शनक- माधवाचार्यक सर्वदर्शन संग्रह-द्रष्टव्य) खण्डन-मण्डन प्रणालीमे पहिनहिसँ विद्यमान छल। से इतिहासक अन्तक घोषणा कएनिहार फ्रांसिस फुकियामा -जे कम्युनिस्ट शासनक समाप्तिपर ई घोषणा कएने छलाह- किछु दिन पहिने एहिसँ पलटि गेलाह। उत्तर-आधुनिकतावाद सेहो अपन प्रारम्भिक उत्साहक बाद ठमकि गेल अछि। अस्तित्ववाद, मानवतावाद, प्रगतिवाद, रोमेन्टिसिज्म, समाजशास्त्रीय विश्लेषण ई सभ संश्लेषणात्मक समीक्षा प्रणालीमे सम्मिलित भए अपन अस्तित्व बचेने अछि। साइको-एनेलिसिस वैज्ञानिकतापर आधारित रहबाक कारण द्वन्दात्मक प्रणाली जेकाँ अपन अस्तित्व बचेने रहत। आधुनिक कथा अछि की? ई केहन होएबाक चाही? एकर किछु उद्देश्य अछि आकि होएबाक चाही? आ तकर निर्धारण कोना कएल जाए ? कोनो कथाक आधार मनोविज्ञान सेहो होइत अछि। कथाक उद्देश्य समाजक आवश्यकताक अनुसार आ कथा यात्रामे परिवर्तन समाजमे भेल आ होइत परिवर्तनक अनुरूपे होएबाक चाही। मुदा संगमे ओहि समाजक संस्कृतिसँ ई कथा स्वयमेव नियन्त्रित होइत अछि। आ एहिमे ओहि समाजक ऐतिहासिक अस्तित्व सोझाँ अबैत अछि। जे हम वैदिक आख्यानक गप करी तँ ओ राष्ट्रक संग प्रेमकेँ सोझाँ अनैत अछि। आ समाजक संग मिलि कए रहनाइ सिखबैत अछि। जातक कथा लोक-भाषाक प्रसारक संग बौद्ध-धर्म प्रसारक इच्छा सेहो रखैत अछि। मुस्लिम जगतक कथा जेना रूमीक “मसनवी” फारसी साहित्यक विशिष्ट ग्रन्थ अछि जे ज्ञानक महत्व आ राज्यक उन्नतिक शिक्षा दैत अछि। आजुक कथा एहि सभ वस्तुकेँ समेटैत अछि आ एकटा प्रबुद्ध आ मानवीय (!) समाजक निर्माणक दिस आगाँ बढ़ैत अछि। आ जे से नहि अछि तँ ई ओकर उद्देश्यमे सम्मिलित होएबाक चाही। आ तखने कथाक विश्लेषण आ समालोचना पाठकीय विवशता बनि सकत। कम्यूनिस्ट शासनक समाप्ति आ बर्लिनक देबालक खसबाक बाद फ्रांसिस फुकियामा घोषित कएलन्हि जे विचारधाराक आपसी झगड़ासँ सृजित इतिहासक ई समाप्ति अछि आ आब मानवक हितक विचारधारा मात्र आगाँ बढ़त। मुदा किछु दिन पहिनहि ओ एहि मतसँ आपस भऽ गेलाह आ कहलन्हि जे समाजक भीतर आ राष्ट्रीयताक मध्य एखनो बहुत रास भिन्न विचारधारा बाँचल अछि। तहिना उत्तर आधुनिकतावादी विचारक जैक्स देरीदा भाषाकेँ विखण्डित कए ई सिद्ध कएलन्हि जे विखण्डित भाग ढेर रास विभिन्न आधारपर आश्रित अछि आ बिना ओकरा बुझने भाषाक अर्थ हम नहि लगा सकैत छी। मनोविश्लेषण आ द्वन्दात्मक पद्धति जेकाँ फुकियामा आ देरीदाक विश्लेषण सेहो संश्लेषित भए समीक्षाक लेल स्थायी प्रतिमान बनल रहत। सुभाष चन्द्र यादवक कथा-संग्रह बनैत बिगड़ैत: स्वतन्त्रताक बादक पीढ़ीक कथाकार छथि सुभाषजी। कथाक माध्यमसँ जीवनकेँ रूप दैत छथि। शिल्प आ कथ्य दुनूसँ कथाकेँ अलंकृत कए कथाकेँ सार्थक बनबैत छथि। अस्तित्वक लेल सामान्य लोकक संघर्ष तँ एहि स्थितिमे हिनकर कथा सभमे भेटब स्वाभाविके। कएक दशक पूर्व लिखल हिनक कथा “काठक बनल लोक” क बदरिया साइते संयोग हंसैत रहए। एहु कथा संग्रहक सभ पात्र एहने सन विशेषता लेने अछि। हॉस्पीटलमे कनैत-कनैत सुतलाक बाद उठि कए कोनो पात्र फेरसँ कानए लगैत छथि तँ कोनो पात्र प्रेममे पड़ल छथि। किनकोमे बिजनेस सेन्स छन्हि तँ हरिवंश सन पात्र सेहो छथि जे उपकारक बदला सिस्टम फॉल्टक कारण अपकार कए जाइत छथि। आब “बनैत बिगड़ैत” कथा संग्रहक कथा सभपर गहिंकी नजरि दौगाबी। कनियाँ-पुतरा- एहि कथामे रस्तामे एकटा बचिया लेखकक पएर छानि फेर ठेहुनपर माथ राखि निश्चिन्त अछि, जेना माएक ठेहुनपर माथ रखने होअए। नेबो सन कोनो कड़गर चीज लेखकसँ टकरेलन्हि। ई लड़कीक छाती छिऐ। लड़की निर्विकार रहए जेना बाप-दादा वा भाए बहिन सऽ सटल हो। लेखक सोचैत छथि, ई सीता बनत की द्रौपदी। राबन आ दुर्जोधनक आशंका लेखककेँ घेर लैत छन्हि। कनियाँ-पुतरा पढ़बाक बाद वैह सड़कक चौबटिया अछि आ वैह रेड-लाइटपर गाड़ी चलबैत-रोकैत काल बालक-बालिका सभ देखबामे अबैत छथि। मुदा आब दृष्टिमे परिवर्तन भऽ जाइत अछि। कारक शीसा पोछि पाइ मँगनिहार बालक-बालिकाकेँ पाइ-देने वा बिन देने, मुदा बिनु सोचने आगाँ बढ़ि जाएबला दृष्टिक परिवर्तन। कनियाँ-पुतरा पढ़बाक बाद की हुनकर दृष्टिमे कोनो परिवर्तन नहि होएतन्हि? बालक तँ पैघ भए चोरि करत वा कोनो ड्रग कार्टेलक सभसँ निचुलका सीढ़ी बनत मुदा बालिका ? ओ सीता बनत आकि द्रौपदी आकि आम्रपाली। जे सामाजिक संस्था, ह्यूमन राइट्स ऑरगेनाइजेशन कोनो प्रेमीक बिजलीक खाम्हपर चढ़ि प्राण देबाक धमकीपर नीचाँ जाल पसारि कऽ टी.वी.कैमरापर अपन आ अपन संस्थाक नाम प्रचारित करैत छथि ओ एहि कथाकेँ पढ़लाक बाद ओहि पुरातन दृष्टिसँ काज कए सकताह? ओ सरकार जे कोनो हॉस्पीटलक नाम बदलि कए जयप्रकाश नारायणक नामपर करैत अछि वा हार्डिंग पार्कक नाम वीर कुँअर सिंहक नामपर कए अपन कर्त्तव्यक इतिश्री मानि लैत अछि ओ समस्याक जड़ि धरि पहुँचि नव पार्क आ नव हॉस्पीटल बना कए जयप्रकाश नारायण आ वीर कुँअर सिंहक नामपर करत आकि दोसरक कएल काजमे “मेड बाइ मी” केर स्टाम्प लगाओत? ई संस्था सभ आइ धरि मेहनतिसँ बचैत अएबाक आ सरल उपाय तकबाक प्रवृत्तिपर रोक नहि लगाओत? असुरक्षित- ट्रेनसँ उतरलाक बाद घरक २० मिनटक रस्ताक राति जतेक असुरक्षित भऽ गेल अछि तकर सचित्र वर्णन ई कथा करैत अछि। पहिने तँ एहन नहि रहैक- ई अछि लोकक मानसिक अवस्था। मुदा एहि तरहक समस्या दिस ककरो ध्यान कहाँ छै। पैघ-पैघ समस्या, उदारीकरण आन कतेक विषयपर मीडिआक ध्यान छै। चौक-चौराहाक एहि तरहक समस्यापर नव दृष्टि अबैत अछि, एहिमे स्टेशनसँ घरक बीचक दूरी रातिक अन्हारमे पहाड़ सन भऽ जाइत अछि। प्रदेशक तत्कालीन कानून-व्यवस्थापर ई एक तरहक टिप्पणी अछि। एकाकी- एहि कथामे कुसेसर हॉस्पीटलमे छथि। हॉस्पीटलक सचित्र विवरण भेल अछि। ओतए एकटा स्त्री पतिक मृत्युक बाद कनैत-कनैत प्रायः सुति गेलि आ फेर निन्न टुटलापर कानए लागलि। एना होइत अछि। कथाकार मानव जीवनक एकटा सत्यता दिस इशारा दैत आ हॉस्पीटलक बात-व्यवस्थापर टिप्पणी तेना भऽ कए नहि वरण जीवन्तता देखा कए करैत छथि। ओ लड़की- एहि कथामे हॉस्टलक लड़का-लड़कीक जीवनक बीच नवीन नामक युवक एकटा लड़कीक हाथमे ऐंठ खाली कप, जे ओहि लड़कीक आ ओकर प्रेमीक अछि, देखैत अछि। लड़की नवीनकेँ पुछैत छै जे ओ केम्हर जा रहल अछि। नवीनकेँ होइत छै जे ओ ओकरा अपनासँ दब बुझि कप फेंकबाक लेल पुछलक। नवीन ओकरा मना कऽ दैत अछि। विचार सभ ओकर मोनमे घुरमैत रहैत छै। ई कथा एकटा छोट घटनापर आधारित अछि...जे ओ हमरा दब बूझि चाहक कप फेकबाक लेल कहलक? आ ओ दृढ़तासँ नहि कहि आगाँ बढ़ि जाइत अछि। एकाकी जेकाँ ई कथा सेहो मनोवैज्ञानिक विश्लेषणपर आधारित अछि। एकटा प्रेम कथा- पहिने जकरा घरमे फोन रहैत छल तकरा घरमे दोसराक फोन अबैत रहैत छल, जे एकरा तँ ओकरा बजा दिअ। लेखकक घरमे फोन छलन्हि आ ओ एकटा प्रेमीक प्रेमिकाक फोन अएलापर, ओकर प्रेमीकेँ बजबैत रहैत छथि। प्रेमी मोबाइल कीनि लैत अछि से फोन आएब बन्द भऽ जाइत अछि। मुदा प्रेमी द्वारा नम्बर बदलि लेलापर प्रेमिकाक फोन फेरसँ लेखकक घरपर अबैत अछि। प्रेमिका, प्रेमीक ममियौत बहिनक सखी रितु छथि आ लेखक ओकर सहायताक लेल चिन्तित भऽ जाइत छथि। एहि कथामे प्रेमी-प्रेमिका, मोबाइल आ फोन ई सभ नव युगक संग नव कथामे सेहो स्वाभाविक रूपेँ अबैत अछि। टाइटल कथा अछि बनैत-बिगड़ैत। तीन टा नामित पात्र । माला, ओकर पति सत्तो आ पोती मुनियाँ । गाम-घरक जे सास-पुतोहुक गप छै, सेहन्ता रहि गेल जे कहियो नहेलाक बाद खाइ लेल पुछितए, एहन सन। मुदा सैह बेटा-पुतोहु जखन बाहर चलि जाइत छथि तँ वैह सासु कार कौआक टाहिपर चिन्तित होमए लगैत छथि। माइग्रेशनक बादक गामक यथार्थकेँ चित्रित करैत अछि ई कथा। सत्तोक संग कौआ सेहो एक दिन बिला जाएत आ मुनियाँ कौआ आ दादा दुनूकेँ तकैत रहत।प्रवासीक कथा, बेटा-पुतोहुक आ पोतीक कथा, सासु-पुतोहुक झगड़ा आ प्रेम ! अपन-अपन दुःख कथामे पत्नी, अपन अवहेलनाक स्थितिमे, धीया-पुताकेँ सरापैत छथि। रातिमे धीया-पुताक खेनाइ, खा लेबा उत्तर भनसाघरक ताला बन्द रहबाक स्थितिमे पत्नीक भूखल रहब आ परिणामस्वरूप पतिक फोंफक स्वरसँ कुपित होएब स्वाभाविक। सभक अपन संसार छै। लोक बुझैए जे ओकरे संसारक सुख आ दुःख मात्र सम्पूर्ण छै मुदा से नहि अछि। सभक अपन सुख-दुःख छै, अपन आशा आ आकांक्षा छै। कथाकार ओहन सत्यकेँ उद्घाटित करैत छथि, जे हुनकर अनुभवक अंतर्गत अबैत छन्हि। आत्मानुभूति परिवेश स्वतंत्र कोना भए सकत आ से सुभाष चन्द्र यादवजीक सभ कथामे सोझाँ अबैत अछि। आतंक कथामे कथाकारकेँ पुरान संगी हरिवंशसँ कार्यालयमे भेँट होइत छन्हि। लेखकक दाखिल-खारिज बला काज एहि लऽ कऽ नहि भेलन्हि जे हरिवंशक स्थानान्तरणक पश्चात् ने क्यो हुनकासँ घूस लेलक आ ताहि द्वारे काजो नहि केलक। हरिवंशक बगेबानी घूसक अनेर पाइक कारण छल से दोसर किएक अपन पाइ छोड़त ? लेखक आतंकित छथि। कार्यालयक परिवेश, भ्रष्टाचार आ एक गोटेक स्थानांतरणसँ बदलैत सामाजिक सम्बन्ध ई सभ एतए व्यक्त भेल अछि। आइ काल्हि हम आकि अहाँ ब्लॉकमे वा सचिवालयमे कोनो काज लेल जाइत छी, तँ यैह ने सुनए पड़ैत अछि, जे पाइ जे माँगत से दए देबैक आ तखन कोनो दिक्कत होअए तँ कहब ! आ पाइक बदला ककरो नाम वा पैरवी लए गेलहुँ तँ कर्मचारी ने पाइये लेत आ नहिये अहाँक काज होएत। एकटा अन्त कथामे ससुरक मृत्युपर लेखकक साढ़ू केश कटेने छथि आ लेखक नहि, एहिपर कैक तरहक गप होइत अछि। साढ़ू केश कटा कऽ निश्चिन्त छथि। ई जे सांस्कृतिक सिम्बोलिज्म आएल अछि, जे पकड़ा गेल से चोर आ खराप काज केनिहार, जे नहि पकड़ाएल से आदर्शवादी। पूरा-पूरी तँ नहि, मुदा अहू कथामे एहने आस्था जन्म लैत अछि आ टूटि जाइत अछि। हरियाणामे बापो मरलापर लोक केश नहि कटबैत अछि, तँ की ओकर दुःखमे कोनो कमी रहैत छै तेँ ? पंजाबक महिला एक बरखक बाद ने सिनूर लगबैत छथि आ ने चूड़ी पहिरैत छथि मुदा पहिल बरख कान्ह धरि चूड़ी भरल रहैत छन्हि, तँ की बियाहक पहिल बरखक बाद हुनकर पति-प्रेममे कोनो घटंती आबि जाइत छन्हि ? कबाछु कथा मे चम्पीबलाक लेखक लग आएब, जाँघपर हाथ राखब। अभिजात्य संस्कारक लोक लग बैसल रहबाक कारणसँ लेखक द्वारा ओकर हाथ हटाएब । चम्पीबला द्वारा ई गप बाजब जे छुअल देहकेँ छूलामे कोन संकोच। जेना चम्पीवला लेखककेँ बुझाइय रहन्हि जे हुनका युवती बुझि रहल छलन्हि। लेखककेँ लगैत छन्हि जे ओ स्त्री छथि आ चम्पीबला ओकर पुरान यार। ठाम-कुठाम आ समय-कुसमयक महीन समझ चम्पीवलाकेँ नहि छइ, नहि तँ लेखक ओतेक गरमीयोमे चम्पी करा लैतए। चम्पीवलाक दीनतापर अफसोच भेलन्हि मुदा ओकर शी-इ-इ केँ मोन पाड़ैत वितृष्णा सेहो। फ्रायडक मनोविश्लेषणक बड्ड आलोचना भेल जे ओ सेक्सकेँ केन्द्रमे राखि गप करैत छथि। मुदा अनुभवसँ ई गप सोझाँ अबैत अछि जे सेक्ससँ जतेक दूरी बनाएब, जतेक एकरा वार्तालाप-कथा-साहित्यसँ दूर राखब, ओकर आक्रमण ततेक तीव्र होएत। कारबार मे लेखकक भेँट मिस्टर वर्मा, सिन्हा आ दू टा आर गोटेसँ होइत अछि। बार मे सिन्हा दोस्ती आ बिजनेसकेँ फराक कहैत दू टा खिस्सा सुनबैत अछि। सभ चीजक मोल अछि, एहिपर एकटा दोस्तक वाइफ लेल टी.वी. किनबाक बाद फ्रिजक डिमान्ड अएबाक गप बीचेमे खतम भऽ जाइत अछि। दोसर खिस्सामे एकटा स्त्री पतिक जान बचबए लेल डॉक्टरक फीस देबाक लेल पूर्व प्रेमी लग जाइत अछि। पूर्व प्रेमी पाइ देबाक बदलामे ओकरा संगे राति बितबए लेल कहैत छै। सिन्हा एहि कथामे ककरो गलती नहि मानैत छथि, डॉक्टर बिना पाइ लेने किएक इलाज करत, पूर्व प्रेमी मँगनीमे पाइ किएक देत आ ओ स्त्री जे पूर्व प्रेमी संग राति नहि बिताओत, तँ ओकर पति मरि जएतैक। आब बारसँ लेखक निकलैत छथि तँ दरबानक सलाम मारलापर अहूमे पैसाक टनक सुनाइ पड़ए लगैत छन्हि। प्राचीन मूल्य, दोस्ती-यारी आ आदर्शक टूटबाक स्थिति एकटा एकाकीपनक अनुभव करबैत अछि। कुश्ती मे सेहो फ्रायड सोझाँ अबैत छथि, कथाक प्रारम्भ लुंगीपरक सुखाएल कड़गर भेल दागसँ शुरू होइत अछि। मुदा तुरत्ते स्पष्ट होइत अछि, जे ओ से दाग नहि अछि, वरन घावक दाग अछि। फेर हाटक कुश्तीमे गामक समस्याक निपटारा, हेल्थ सेन्टरक बन्द रहब, ओतए ईंटाक चोरिक चरचा अबैत अछि। छोट भाइ कोनो इलाजक क्रममे एलोपैथीसँ हटि कए होम्योपैथीपर विश्वास करए लगैत छथि, एहि गपक चरचा आएल अछि। लोक सभक घावक समाचार पुछबा लऽ अएनाइ आ लेखक द्वारा सभकेँ विस्तृत विवरण कहि सुनओनाइ मुदा उमरिमे कम वयसक कैक गोटेकेँ टारि देनाइ, ई सभ क्रम एकटा वातावरणक निर्माण करैत अछि। कैनरी आइलैण्डक लारेल कथामे सुभाष आ उपिया कथाक चरित्र छथि। एतए एकटा बिम्ब अछि- जेना निर्णय कोसीक धसना जकाँ। ममियौत भाइक चिट्ठी, कटारि देने नाहपर जएबाक, गेरुआ पानिक धारमे आएब, नाहक छीटपर उतारब, छीटक बादो बहुत दूर धरि जाँघ भरि पानिक रहब। धीपल बालुपर साइकिलकेँ ठेलैत देखि क्यो कहैत छन्हि- “साइकिल ससुरारिमे देलक-ए? कने बड़द जकाँ टिटकार दियौक”। दीदी-पीसा अहिठाम एहि गपक चरचा सुनलन्हि, जे कोटक खातिर हुनकर बेटीक विवाह दू दिन रुकि गेल छलन्हि आ ईहो जे बेसी पढ़ने लोक बताह भऽ जाइत अछि।सुभाष चाहियो कऽ दू सए टाका नहि माँगि पबैत छथि, दीदीक व्यवहार अस्पष्ट छन्हि, सुभाष आश्वस्त नहि छथि आ घुरि जाइत छथि। तृष्णा कथामे लेखककेँ अखिलन भेटैत छन्हि। श्रीलतासँ ओ अपन भेँटक विवरण कहि सुनबैत अछि। पाँचम दिन घुरलाक बाद ट्रेनमे ओ नहि भेटलीह। आब अखिलन की करत, विशाखापत्तनम आ विजयवाड़ाक बीचक रस्तामे चक्कर काटत आकि स्मृतिक संग दिन काटत। छोट-छोट भावनात्मक घटनाक विश्लेषण अछि कथा “कैनरी आइलैण्डक लारेल” आ “तृष्णा”। दाना कथामे मोहन इन्टरव्यू लेल गेल अछि, ओतए सहृदय चपरासी सूचित करैत छै जे बाहरीकेँ नहि लैत छै, पी.एच.डी. रहितए तँ कोनो बात रहितए। मोहनकेँ सभ चीज बीमार आ उदास लगैत रहए। फुद्दी आ मैना पावरोटीक टुकड़ीपर ची-ची करैत झपटैत रहए।प्रतियोगी परीक्षाक साक्षात्कारमे बाहरी आ लोकल केर जे संकल्पना आएल अछि तकर सम्वेदनात्मक वर्णन भेल अछि। दृष्टि कथामे पढ़ाइ खतम भेलाक बाद नोकरीक खोज, गाममे लोकसभक तीक्ष्ण कटाक्ष। फेर दक्षिण भारतीय पत्रकारक प्रेरणासँ कनियाँक विरोधक बावजूद गाममे लेखकक खेतीमे लागब। ई सभ गप एकटा सामान्य कथ्य रहलाक बादो ठाम-ठाम सामाजिक सत्य उद्घाटित करैत अछि। एतए गामक लोकक कुटीचाली अछि, जे काजक अभावमे खाली समय बेशी रहलाक कारण अबैत अछि। संगमे आइ-काल्हिक स्त्रीक शहरी जीवन जीबाक आकांक्षा सेहो प्रदर्शित करैत अछि। नदी कथामे कथ्य कथाक संगे चलैत अछि आ खतम भए जाइत अछि। गगनदेवक घरपर बिहारी आएल छै। शहरमे ओकरा एक साल रहबाक छै। गगनदेवकेँ ओकरा संग मकान खोजबाक क्रममे एकटा लड़कीसँ भेँट होइत छै। ओकरा छोड़ि आगाँ बढ़ल तँ ई बुझलाक बादो जे आब ओकरासँ फेर भेँट नहि हेतइ ओ उल्लास आ प्रेमक अनुभूतिसँ भरि गेल। परलय बाढिक कथा थिक, कोसीक कथा कहल गेल अछि एतए। बौकी बुनछेकक इन्तजारीमे अछि। मुदा धारमे पानि बढ़ि रहल छै। कोशीक बाढ़ि बढ़ल आबि रहल छै आ एम्हर माएक रद्द-दस्तसँ हाल-बेहाल छै। माल-जाल भूखसँ डिकरैत रहै। रामचरनक घरमे अन्नपानि बेशी छै से ओ सभकेँ नाहक इन्तजाम लेल कहैत छै। बौकूक घरसँ कटनियाँ दूर रहै। मृत्यु आ विनाश बौकूकेँ कठोर बना देलकैक, मोह तोड़ि देलकैक। मुदा बरखा रुकि गेलैक। बौकू चीज सभकेँ चिन्हबाक आ स्मरण करबाक प्रयत्न करए लागल। बात कथामे सेहो कथाकार अपन कथानककेँ बाट चलिते ताकि लैत छथि आ शिल्पसँ ओकरा आगाँ बढ़बैत छथि। नेबो दोकानपर नेबोवला आ एकटा लोकक बीचमे बहस सुनैत लेखक बीचमे कूदि पड़ैत छथि। नेबोवलासँ एक गोटे अपन छत्ता माँगि रहल अछि जे ओ नीचाँ रखने रहए।दुखक गप, लेखकक अनुसार, बेशी दिन धरि लोककेँ मोन रहैत छै। रंभा कथामे पुरुष-स्त्रीक बीचक बदलैत सम्बन्धक तीव्र गतिसँ वर्णन भेल अछि। पुरुष यावत स्त्रीसँ दूर रहैत अछि तँ सभ ओकरा मेनका आ रम्भा देखाइ पड़ैत छै। मुदा जे सम्वादक प्रारम्भ होइत अछि तँ बादमे लेखक केँ लगैत छन्हि जे ओ बेटीये छी।रस्तामे एक स्त्री अबैत अछि। लेखक सोचैत छथि जे ई के छी, रम्भा, मेनका आकि...। ओकरा संग बेटा छै, ओतेक सुन्नर नहि, कारण एकर वर सुन्दर नहि होएतैक। ओ गपशपमे कखनो लेखककेँ ससुर जकाँ, कखनो अपनाकेँ हुनकर बेटी तुल्य कहैत अछि। पहिने लेखककेँ खराप लगलन्हि। मुदा बादमे लेखककेँ नीक लगलन्हि। मुदा अन्तमे ओकर पएर छूबए लेल झुकब मुदा बिन छूने सोझ भऽ जाएब नहि बुझिमे अएलन्हि। हमर गाम कथामे लेखकक गामक रस्ता, कटनियाँ सँ मेनाही गामक लोकक छिड़िआएब आ बान्हक बीचमे अहुरिया काटैत लोकक वर्णन अछि। कोसिकन्हाक लोक- जानवरक समान, जानवरक हालतमे। कटनियाँमे लेखकक घर कटि गेलन्हि से ओ नथुनियाँ एहिठाम टिकैत छथि। मछबाहि आ चिड़ै बझाबऽ लेल नथुनी जोगार करैत अछि। जमीनक झगड़ा छन्हि, एक हिस्सेदारक जमीन धारमे डूमल छै से ओ लेखकक गहूमवला खेत हड़पए चाहैत अछि। शन आ स्त्रीक (!) पाछू लोक बेहाल अछि। स्त्रीक पाछू बिन कारण लेखक पड़ि गेल छथि जेना विष्णु शर्मा पंचतंत्रमे कथा कहैत-कहैत शूद्र आ महिलाक पाछाँ पड़ि जाइत छथि। यावत सभ कमलक घूर लग कपक अभावमे बेरा-बेरी चाह पिबैत छथि, फसिल कटि कऽ सिबननक एतए चलि जाइ-ए। झौआ, कास, पटेरक जंगल जखन रहए, चिड़ै बड्ड आबए, आब कम अबैत अछि। खढ़िया, हरिन, माछ, काछु, डोका सभ खतम भऽ रहल छै- जीवनक साधन दुर्लभ भऽ गेल अछि। साँझमे जमीनक पंचैती होइत अछि।सत्तोक बकड़ी मरि गेलैक, पुतोहु एकर कारण सासुक सरापब कहैत अछि। सासु एकर कारण बलि गछलोपर पाठी सभकेँ बेचब कहैत छथि। सत्तोक बेटीक जौबनक उभारकेँ लेखक पुरुष सम्पर्कक साक्षी कहैत छथि आ सकारण फेरसँ महिलाक पाछाँ पड़ि जाइत छथि, कारण ई धारणा लोकमे छै। सत्तोक बेटी एखन सासुर नहि बसैत छै। सुकन रामक एहिठाम खाइत काल लेखककेँ संकोच भेलन्हि, जकरासँ उबरबाक लेल ओ बजलाह- आइ तोरा जाति बना लेलिअह। कोसी सभ भेदभावकेँ पाटि देलक, डोम, चमार, मुसहर, दुसाध, तेली, यादव सभ एके कलसँ पानि भरैत अछि। एके पटियापर बैसैत अछि। ककरा लेल कथा लिखी? वा कही? कथाक वाद: जिनका विषयमे लिखब से तँ पढ़ताह नहि। कथा पढ़ि लोक प्रबुद्ध भऽ जाएत ? गीताक सप्पत खा कए झूठ बजनिहारक संख्या कम नहि। तेँ की एहन कसौटीपर रचित कथाक महत्व कम भए जाएत ? सभ प्रबुद्ध नहि होएताह तँ स्वस्थ मनोरंजन तँ प्राप्त कऽ सकताह। आ जे एकोटा व्यक्ति कथा पढ़ि ओहि दिशामे सोचत तँ कथाक सार्थकता सिद्ध होएत। आ जकरा लेल रचित अछि ई कथा जे ओ नहि, तँ ओकर ओहि परिस्थितिमे हस्तक्षेप करबामे सक्षम व्यक्ति तँ पढ़ताह। आ जा ई रहत ताधरि एहि तरहक कथा रचित कएल जाइत रहत। आ जे समाज बदलत तँ सामाजिक मूल्य सनातन रहत ? प्रगतिशील कथामे अनुभवक पुनर्निर्माण करब, परिवर्तनशील समाजक लेल, जाहिसँ प्राकृतिक आ सामाजिक यथार्थक बीच समायोजन होअए। आकि एहि परिवर्तनशील समयकेँ स्थायित्व देबा लेल परम्पराक स्थायी आ मूल तत्वपर आधारित कथाक आवश्यकता अछि ? व्यक्ति-हित आ समाज-हितमे द्वैध अछि आ दुनू परस्पर विरोधी अछि। एहिमे संयोजन आवश्यक। विश्व दृष्टि आवश्यक। कथा मात्र विचारक उत्पत्ति नहि अछि जे रोशनाइसँ कागतपर जेना-तेना उतारि देलियैक। ई सामाजिक-ऐतिहासिक दशासँ निर्दिशित होइत अछि। तँ कथा आदर्शवादी होअए, प्रकृतिवादी होअए वा यथार्थवादी होअए। आकि एहिमे सँ मानवतावादी, सामाजिकतावादी वा अनुभवकेँ महत्व देमएबला ज्ञानेन्द्रिय-यथार्थवादी होअए ? आ नहि तँ कथा प्रयोजनमूलक होअए। एहिमे उपयोगितावाद, प्रयोगवाद, व्यवहारवाद, कारणवाद, अर्थक्रियावाद आ फलवाद सभ सम्मिलित अछि। ई सभसँ आधुनिक दृष्टिकोण अछि। अपनाकेँ अभिव्यक्त कएनाइ मानवीय स्वभाव अछि। मुदा ओ सामाजिक निअममे सीमित भऽ जाइत अछि। परिस्थितिसँ प्रभावित भऽ जाइत अछि। तँ कथा अनुभवकेँ पुनर्रचित कए गढ़ल जाएत। आ व्यक्तिगत चेतना तखन सामाजिक आ सामूहिक चेतना बनि आओत। शोषककेँ अपन प्रवृत्तिपर अंकुश लगबए पड़तन्हि। तँ शोषितकेँ एकर विरोध मुखर रूपमे करए पड़तन्हि। स्वतंत्रता- सामाजिक परिवर्तन । कथा तखन संप्रेषित होएत, संवादक माध्यम बनत। कथा समाजक लेल शस्त्र तखने बनि सकत, शक्ति तखने बनि सकत। जे कथाकार उपदेश देताह तँ ज्ञानक हस्तांतरण करताह, जकर आवश्यकता आब नहि छै। जखन कथाकार सम्वाद शुरू करताह तखने मुक्तिक वातावरण बनत आ सम्वादमे भाग लेनिहार पाठक जड़तासँ त्राण पओताह। कथा क्रमबद्ध होअए आ सुग्राह्य होअए तखने ई उद्देश्य प्राप्त करत। बुद्धिपरक नहि व्यवहारपरक बनत। वैदिक साहित्यक आख्यानक उदारता संवादकेँ जन्म दैत छल जे पौराणिक साहित्यक रुढ़िवादिता खतम कए देलक। आ संवादक पुनर्स्थापना लेल कथाकारमे विश्वास होएबाक चाही- तर्क-परक विश्वास आ अनुभवपरक विश्वास, जे सुभाषचन्द्र यादवमे छन्हि। प्रत्यक्षवादक विश्लेषणात्मक दर्शन वस्तुक नहि, भाषिक कथन आ अवधारणाक विश्लेषण करैत अछि से सुभाषजीक कथामे सर्वत्र देखबामे आओत। विश्लेषणात्मक अथवा तार्किक प्रत्यक्षवाद आ अस्तित्ववादक जन्म विज्ञानक प्रति प्रतिक्रियाक रूपमे भेल। एहिसँ विज्ञानक द्विअर्थी विचारकेँ स्पष्ट कएल गेल। प्रघटनाशास्त्रमे चेतनाक प्रदत्तक प्रदत्त रूपमे अध्ययन होइत अछि। अनुभूति विशिष्ट मानसिक क्रियाक तथ्यक निरीक्षण अछि। वस्तुकेँ निरपेक्ष आ विशुद्ध रूपमे देखबाक ई माध्यम अछि। अस्तित्ववादमे मनुष्य-अहि मात्र मनुष्य अछि। ओ जे किछु निर्माण करैत अछि ओहिसँ पृथक ओ किछु नहि अछि, स्वतंत्र होएबा लेल अभिशप्त अछि (सार्त्र)। हेगेलक डायलेक्टिक्स द्वारा विश्लेषण आ संश्लेषणक अंतहीन अंतस्संबंध द्वारा प्रक्रियाक गुण निर्णय आ अस्तित्व निर्णय करबापर जोर देलन्हि। मूलतत्व जतेक गहींर होएत ओतेक स्वरूपसँ दूर रहत आ वास्तविकतासँ लग। क्वान्टम सिद्धान्त आ अनसरटेन्टी प्रिन्सिपल सेहो आधुनिक चिन्तनकेँ प्रभावित कएने अछि। देखाइ पड़एबला वास्तविकता सँ दूर भीतरक आ बाहरक प्रक्रिया सभ शक्ति-ऊर्जाक छोट तत्वक आदान-प्रदानसँ सम्भव होइत अछि। अनिश्चितताक सिद्धान्त द्वारा स्थिति आ स्वरूप, अन्दाजसँ निश्चित करए पड़ैत अछि। तीनसँ बेशी डाइमेन्सनक विश्वक परिकल्पना आ स्टीफन हॉकिन्सक “अ ब्रिफ हिस्ट्री ऑफ टाइम” सोझे-सोझी भगवानक अस्तित्वकेँ खतम कए रहल अछि कारण एहिसँ भगवानक मृत्युक अवधारणा सेहो सोझाँ आएल अछि, से एखन विश्वक नियन्ताक अस्तित्व खतरामे पड़ल अछि। भगवानक मृत्यु आ इतिहासक समाप्तिक परिप्रेक्ष्यमे मैथिली कथा कहिया धरि खिस्सा कहैत रहत ? लघु, अति-लघु कथा, कथा, गल्प आदिक विश्लेषणमे लागल रहत? जेना वर्चुअल रिअलिटी वास्तविकता केँ कृत्रिम रूपेँ सोझाँ आनि चेतनाकेँ ओकरा संग एकाकार करैत अछि तहिना बिना तीनसँ बेशी बीमक परिकल्पनाक हम प्रकाशक गतिसँ जे सिन्धुघाटी सभ्यतासँ चली तँ तइयो ब्रह्माण्डक पार आइ धरि नहि पहुँचि सकब। ई सूर्य अरब-खरब आन सूर्यमेसँ एकटा मध्यम कोटिक तरेगण- मेडिओकर स्टार- अछि। ओहि मेडिओकर स्टारक एकटा ग्रह पृथ्वी आ ओकर एकटा नगर-गाममे रहनिहार हम सभ अपन माथपर हाथ राखि चिन्तित छी जे हमर समस्यासँ पैघ ककर समस्या ? हमर कथाक समक्ष ई सभ वैज्ञानिक आ दार्शनिक तथ्य चुनौतीक रूपमे आएल अछि। होलिस्टिक आकि सम्पूर्णताक समन्वय करए पड़त ! ई दर्शन दार्शनिक सँ वास्तविक तखने बनत। पोस्टस्ट्रक्चरल मेथोडोलोजी भाषाक अर्थ, शब्द, तकर अर्थ, व्याकरणक निअम सँ नहि वरन् अर्थ निर्माण प्रक्रियासँ लगबैत अछि। सभ तरहक व्यक्ति, समूह लेल ई विभिन्न अर्थ धारण करैत अछि। भाषा आ विश्वमे कोनो अन्तिम सम्बन्ध नहि होइत अछि। शब्द आ ओकर पाठ केर अन्तिम अर्थ वा अपन विशिष्ट अर्थ नहि होइत अछि। आधुनिक आ उत्तर आधुनिक तर्क, वास्तविकता, सम्वाद आ विचारक आदान-प्रदानसँ आधुनिकताक जन्म भेल । मुदा फेर नव-वामपंथी आन्दोलन फ्रांसमे आएल आ सर्वनाशवाद आ अराजकतावाद आन्दोलन सन विचारधारा सेहो आएल। ई सभ आधुनिक विचार-प्रक्रिया प्रणाली ओकर आस्था-अवधारणासँ बहार भेल अविश्वासपर आधारित छल। पाठमे नुकाएल अर्थक स्थान-काल संदर्भक परिप्रेक्ष्यमे व्याख्या शुरू भेल आ भाषाकेँ खेलक माध्यम बनाओल गेल- लंगुएज गेम। आ एहि सभ सत्ताक आ वैधता आ ओकर स्तरीकरणक आलोचनाक रूपमे आएल पोस्टमॉडर्निज्म। कंप्युटर आ सूचना क्रान्ति जाहिमे कोनो तंत्रांशक निर्माता ओकर निर्माण कए ओकरा विश्वव्यापी अन्तर्जालपर राखि दैत छथि आ ओ तंत्रांश अपन निर्मातासँ स्वतंत्र अपन काज करैत रहैत अछि, किछु ओहनो कार्य जे एकर निर्माता ओकरा लेल निर्मित नहि कएने छथि। आ किछु हस्तक्षेप-तंत्रांश जेना वायरस, एकरा मार्गसँ हटाबैत अछि, विध्वंसक बनबैत अछि तँ एहि वायरसक एंटी वायरस सेहो एकटा तंत्रांश अछि, जे ओकरा ठीक करैत अछि आ जे ओकरो सँ ठीक नहि होइत अछि तखन कम्प्युटरक बैकप लए ओकरा फॉर्मेट कए देल जाइत अछि- क्लीन स्लेट ! पूँजीवादक जनम भेल औद्योगिक क्रान्तिसँ आ आब पोस्ट इन्डस्ट्रियल समाजमे उत्पादनक बदला सूचना आ संचारक महत्व बढ़ि गेल अछि, संगणकक भूमिका समाजमे बढ़ि गेल अछि। मोबाइल, क्रेडिट-कार्ड आ सभ एहन वस्तु चिप्स आधारित अछि। एहि बेरुका (२००८) कोसीक बाढ़िमे अनलकान्तजी गाममे फाँसल छलाह, भोजन लेल मारि पड़ैत रहए मुदा क्रेडिट कार्डसँ ए.सी.टिकट बुक भए गेलन्हि। मिथिलाक समाजमे सूचना आ संगणकक भूमिकाक आर कोन दोसर उदाहरण चाही? डी कन्सट्रक्शन आ री कन्सट्रक्शन विचार रचना प्रक्रियाक पुनर्गठन केँ देखबैत अछि जे उत्तर औद्योगिक कालमे चेतनाक निर्माण नव रूपमे भऽ रहल अछि। इतिहास तँ नहि मुदा परम्परागत इतिहासक अन्त भऽ गेल अछि। राज्य, वर्ग, राष्ट्र, दल, समाज, परिवार, नैतिकता, विवाह सभ फेरसँ परिभाषित कएल जा रहल अछि। मारते रास परिवर्तनक परिणामसँ, विखंडित भए सन्दर्भहीन भऽ गेल अछि कतेक संस्था। एहि परिप्रेक्ष्यमे मैथिली कथा गाथापर सेहो एकटा गहिंकी नजरि दौगाबी। रामदेव झा जलधर झाक “विलक्षण दाम्पत्य” (मैथिल हित साधन, जयपुर, १९०६ ई.) केँ मैथिलीक आधुनिक कथाक प्रारम्भ मानलन्हि । पुलकित मिश्रक “मोहिनी मोहन” (१९०७-०८), जनसीदनक “ताराक वैधव्य” (मिथिला मिहिर, १९१७ ई.), श्रीकृष्ण ठाकुरक चन्द्रप्रभा, तुलापति सिंहक मदनराज चरित, काली कुमार दासक अदलाक बदला आ कामिनीक जीवन, श्यामानन्द झाक अकिञ्चन, श्री बल्लभ झाक विलासिता, हरिनन्दन ठाकुर “सरोज”क ईश्वरीय रक्षा, शारदानन्द ठाकुर “विनय”क तारा आ श्याम सुन्दर झा “मधुप”क प्रतिज्ञा-पत्र, वैद्यनाथ मिश्र “विद्यासिन्धु”क गप्प-सप्पक खरिहान आ प्रबोध नारायण सिंहक बीछल फूल आएल। हरिमोहन झाक कथा आ यात्रीक उपन्यासिका, राजकमल चौधरी, ललित, रामदेव झा, बलराम, प्रभास कुमार चौधरी, धूमकेतु, राजमोहन झा, साकेतानन्द, विभूति आनन्द, सुन्दर झा “शास्त्री”, धीरेन्द्र, राजेन्द्र किशोर, रेवती रमण लाल, राजेन्द्र विमल, रामभद्र, अशोक, शिवशंकर श्रीनिवास, प्रदीप बिहारी, रमेश, मानेश्वर मनुज, श्याम दरिहरे, कुमार पवन, अनमोल झा, मिथिलेश कुमार झा, हरिश्चन्द्र झा, उपाध्याय भूषण, रामभरोस कापड़ि “भ्रमर”, भुवनेश्वर पाथेय, बदरी नारायण बर्मा, अयोध्यानाथ चौधरी, रा.ना.सुधाकर, जीतेन्द्र जीत, सुरेन्द्र लाभ, जयनारायण झा “जिज्ञासु”, श्याम सुन्दर “शशि”, रमेश रञ्जन, धीरेन्द्र प्रेमर्षि, परमेश्वर कापड़ि, तारानन्द वियोगी, नागेन्द्र कुमर, अमरनाथ, देवशंकर नवीन, अनलकान्त, श्रीधरम, नीता झा, विभा रानी, उषाकिरण खान, सुस्मिता पाठक, शेफालिका वर्मा, ज्योत्सना चन्द्रम, लालपरी देवी एहि यात्राकेँ आगाँ बढ़ेलन्हि। मैथिलीमे नीक कथा नहि, नीक नाटक नहि? मैथिलीमे व्याकरण नहि? पनिसोह आ पनिगर एहि तरहक विश्लेषण कतए अछि मैथिली व्याकरण मे, वैह अनल, पावक सभ अछि ! मुदा दीनबन्धु झाक धातु रूप पोथीमे जे १०२५ टा एहि तरहक खाँटी रूप अछि, रमानथ झाक मिथिलाभाषाप्रकाशमे जे खाँटी मैथिली व्याकरण अछि, ई दुनू रिसोर्स बुक लए मानकीकरण आ व्याकरणक निर्माण सर्वथा संभव अछि। मुदा भऽ रहल अछि ई जे पानीपतक पहिल युद्धक विश्लेषणमे ई लिखी जे पानीपत आ बाबरक बीचमे युद्ध भेल। रामभद्रकें धीरेन्द्र सर्वश्रेष्ठ मैथिली कथाकारक रूपमे वर्णित कएने छथि, मुदा एखन धरि हुनकर कएक टा कथाक विश्लेषण कएल गेल अछि ? नचिकेताक नाटक आ मैथिलीक सेक्सपिअर महेन्द्र मलंगियाक काजक आ रामभद्र आ सुभाष चन्द्र यादवक कथा यात्राक सन्दर्भमे ई गप कहब आवश्यक छल। जाहि समय मैथिलीक समस्या घर-घरसँ मैथिलीक निष्कासन अछि, जखन हिन्दीमे एक हाथ अजमेलाक बाद नाम नहि भेला उत्तर लोक मैथिलीक कथा-कविता लिखि आ सम्पादक-आलोचक भए, अपन महत्वाकांक्षाक भारसँ मैथिली कथा-कविताक वातावरणकेँ भरिया रहल छथि, मार्क्सवाद, फेमिनिज्म आ धर्मनिरपेक्षता घोसिया-घोसिया कए कथा-कवितामे भरल जा रहल अछि, तखन स्तरक निर्धारण सएह कऽ रहल अछि, स्तरहीनताक बेढ़ वाद बनल अछि। जे गरीब आ निम्न जातीयक शोषण आ ओकरा हतोत्साहित करबामे लागल छथि से मार्क्सवादक शरणमे, जे महिलाकेँ अपमानित केलन्हि से फेमिनिज्म आ मिथिला राज्य आ संघक शरणमे आ जे साम्प्रदायिक छथि ओ धर्मनिरपेक्षताक शरणमे जाइत छथि। ओना साम्प्रदायिक लोक फेमिनिस्ट, महिला विरोधी मार्क्सिस्ट आ एहि तरहक कतेक गठबंधन आ मठमे जाइत देखल गेल छथि। क्यो राजकमलक बड़ाइमे लागल अछि, तँ क्यो यात्रीक आ धूमकेतुक तँ क्यो सुमनजीक, आ हुनका लोकनिक तँ की पक्ष राखत तकर आरिमे अपनाकेँ आगाँ राखि रहल अछि। यात्रीक पारोकेँ आ राजकमल आ धूमकेतुक कथाकेँ आइयो स्वीकार नहि कएल गेल अछि- एहि तरहक अनर्गल प्रलाप ! क्यो तथाकथित विवादास्पद कथाक सम्पादन कए स्वयं विवाद उत्पन्न कए अपनाकेँ आगाँ राखि रहल छथि। मात्र मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थक लेखनक बीच सीमित प्रतियोगिता जाहि कवि-कथाकारकेँ विचलित कए रहल छन्हि आ हिन्दी छोड़ि मैथिलीमे अएबाक बाद जाहि गतिसँ ओ ई सभ करतब कए रहल छथि, तिनका मैथिलीक मुख्य समस्यापर ध्यान कहिया जएतन्हि से नहि जानि ? लोक ईहो बुझैत छथि जे हिन्दीक बाद जे मैथिलीमे लिखब , तँ स्वीकृति त्वरित गतिएँ भेटत ? जे मैथिलीक रचनाकारेँकेँ एहि तरहक भ्रम छन्हि आ आत्मविश्वासक अभाव छन्हि, अपन मातृभाषाक संप्रेषणीयतापर अविश्वास (!), तखन एहि भाषाक भविष्य हिनका लोकनिक कान्हपर दए कोन छद्म हम सभ संजोगि रहल छी ? सेमीनारमे साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त एहन जुझारू कथाकार, सम्पादक आ समालोचक सभकेँ अपन पुत्र-पुत्री-पत्नीक संग मैथिलीमे नहि वरन् हिन्दी मे (अंग्रेजी प्रायः सामर्थ्यसँ बाहर छन्हि तेँ) गप करैत देखि हतप्रभ रहि जाइत छी। मैथिलीमे बीस टा लिखनहार छलाह आ पाँचटा पढ़निहार, से कोन विवाद उठल होएत? राजकमल/ यात्रीक मैथिलीक लेखन सौम्य अछि, से हुनकर सभक गोट-गोट रचना पढ़ि कए हम कहि सकैत छी। ताहि स्थिति मे- ई विवाद रहए एहि कवितामे आ एहि कथामे- एहि तरहक गप आनि आ ओकर पक्षमे अपन तर्क दए अपन लेखनी चमकाएब ? आ तकर बाद यात्रीक बाद पहिल उपन्यासकार फलना आ राजकमलक बाद पहिल कवि चिलना-आब तँ कथाकार आ कविक जोड़ी सेहो सोझाँ अबैत अछि, एक दोसराक भक्तिमे आ आपसी वादकेँ आगाँ बढ़एबा लेल। मैथिलीक मुख्य समस्या अछि जे ई भाषा एहि सीमित प्रतियोगी (दुर्घर्ष!) सभक आपसी महत्वाकांक्षाक मारिक बीच मरि रहल अछि। कवि-कथाकार मैथिलीकेँ अपन कैरिअर बना लेलन्हि, घरमे मैथिलीकेँ निष्कासित कए सेमीनारक वस्तु बना देलन्हि। तखन कतए पाठक आ कोन विवाद ! जे समस्या हम देखि रहल छी जे बच्चाकेँ मैथिलीक वातावरण भेटओ आ सभ जातिक लोक एहि भाषासँ प्रेम करथि ताहि लेल कथा आ कविता कतए आगाँ अछि ? कएकटा विज्ञान कथा, बाल-किशोर कथा-कविता कैरियरजीवी कवि-कथाकार लिखि रहल छथि। आ ओ घर-घरमे पहुँचए ताहि लेल कोन प्रयास भए रहल अछि ? सए-दू सए कॉपी पोथी छपबा कए , तकर समीक्षा करबा कए, सए-दू सए कॉपी छपएबला पत्रिकामे छपबा कए , तकर फोटोस्टेट कॉपी फोल्डर बना कऽ घरमे राखि पुरस्कार लेल आ सिलेबसमे किताब लगेबा लेल कएल गेल तिकड़मक वातावरणमे हमर आस गैर मैथिल ब्राह्मण-कर्ण कायस्थ पाठक आ लेखकपर जाए स्थिर भए गेल अछि। जे अपन घर-परिवार नहि सम्हारि सकलाह से ढेरी-ढाकी भाषायी पुरस्कार लए बैसल छथि, मिथिला राज्य बनएबामे लागल छथि , पता नहि राज्य कोना सम्हारि सकताह आ ओकर विधान सभामे कोन भाषामे बजताह, जखन हुनका ओतए पुरस्कृत कएल जएतन्हि। जे घरमे मैथिली नहि बजैत छथि से लेखक आ कवि बनल छथि (हिन्दी-मैथिलीमे समान अधिकारसँ) हिन्दीमे सोचि लिखैत छथि आ तखन अनुवाद कए मौलिक मैथिली लिखैत छथि ! मैथिली कथा-कविता करैत छथि!! मराठी, उर्दू, तमिल, कन्नड़सँ मैथिली अनुवाद पुरस्कार निर्लज्जतासँ लैत छथि , वणक्कम केर अर्थ पुछबन्हि से नहि अबैत छन्हि, अलिफ-बे-से केर ज्ञान नहि, मराठीमे कोनो बच्चासँ गप करबाक सामर्थ्य नहि छन्हि। आ मैथिलीमे हुनकर माथ फुटबासँ एहि द्वारे बचि जाइत छन्हि कारण अपने छपबा कए समीक्षा करबैत छथि, से पाठक तँ छन्हि नहि। पाठक नहि रहएमे हुनका लोकनिकेँ फाएदा छन्हि। आ एहि पुरस्कार सभमे जूरी आ एडवाइजरी बोर्ड अपनाकेँ आगाँ करबामे जखन स्वयं आगाँ अबैत छथि तखन एहि सीमित प्रतियोगी लोकनिक आत्मविश्वास कतेक दुर्बल छन्हि , सएह सोझाँ अबैत अछि । सारंग कुमार छथि, तँ बलरामक चरचा फेरसँ कथाकारक रूपमे शुरू भेल अछि । आ जिनकर सन्तान साहित्यमे नहि अएलाह हुनकर चरचा फेर कोना होएत, हुनकर पक्ष के आगाँ राखत ? जीबैत धरि ने सभ अपन पक्ष स्वयं आगाँ राखि रहल छथि ? मुदा मुइलाक बाद ? मैथिली साहित्यक एहि सत्यकेँ देखार करबाक आवश्यकता अछि । आँखि मुनि कए सेहो एकर समाधान लोक मुदा ताकिये रहल छथि। क्यो चित्रगुप्त सभा खोलि मणिपद्मकेँ बेचि रहल छथि तँ क्यो मैथिल (ब्राह्मण) सभा खोलि सुमनजीक व्यापारमे लागल छथि-मणिपद्म आ सुमनजीक आरिमे अपन धंधा चमका रहल छथि आ मणिपद्म आ सुमनजीकेँ अपमानित कए रहल छथि। कथा-कविता संग्रह सभक सम्पादकक चेला चपाटी मैथिलीक सर्वकालीन कथाकार-कविक संकलनमे स्थान पाबि जाइत छथि , भने हुनकर कोनो पहिले संग्रह आएल होइन्हि वा कथा-कविताक संख्या हास्यास्पद रूपसँ कम होइन्हि। पत्रिका सभक सेहो वएह स्थिति अछि। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षामे कटाउझ करैत बिन पाठकक ई पत्रिका सभ स्वयं मरि रहल अछि आ मैथिलीकेँ मारि रहल अछि। ड्राइंग रूममे बिना फील्डवर्कक लिखल लोककथा जाहि भाषामे लिखल जाइत होअए, ओतए एहि तरहक हास्यास्पद कटाउझ स्वाभाविक अछि। आब तँ अन्तर्जालपर सेहो मैथिलीक किछु जालवृत्तपर जातिगत कटाउझ आ अपशब्दक प्रयोग देखबामे आएल अछि। मार्क्सिस्ट आ फेमिनिस्ट बनि तकरो व्यापार शुरू करब आ अपन स्तरक न्यूनताक एहि तरहेँ पूर्ति करब, सीमित प्रतियोगिता मध्य अल्प प्रतिभायुक्त साहित्यकारक ई हथियार बनि गेल अछि। जे मार्क्सक आदर करत से ई किएक कहत जे हम मार्क्सवादी आलोचक आकि लेखक छी ? हँ जे मार्क्सक धंधा करत तकर विषयमे की कही, धंधा तँ सुमन, राजकमल, यात्री, मणिपद्म, धूमकेतु......सभक शुरू भेल अछि। आ तकर कारण सेहो स्पष्ट। राष्ट्रीय सर्वेक्षण ई देखबैत अछि जे संस्कृत, हिन्दी, मैथिली आ आन साहित्य कॉलेजमे वैह पढ़ैत छथि जिनका दोसर विषयमे नामांकन नहि भेटैत छन्हि, पत्रकारितामे सेहो यैह सभ अबैत छथि। प्रतिभा विपन्न एहने साहित्यसेवीकेँ साहित्यक चश्का लागल छन्हि आ हिनके हाथमे मैथिली भाषाक भविष्य सुरक्षित रहत? मुदा एहि वास्तविकताक संग आगाँक बाट हमरा सभक प्रतीक्षामे अछि। सुच्चा मैथिली सेवी कथाकार आ पाठक जे धूरा-गरदामे जएबा लेल तैयार होथि, बच्चा आ स्त्री जनताक साहित्य रचथि आ अपन ऊर्जा मैथिलीकेँ जीवित रखबा मात्रमे लगाबथि ओ श्रेणी तैयार होएबे टा करत। मैथिलीक नामपर कोनो कम्प्रोमाइज नहि। सुभाषचन्द्र यादवजीक ई संग्रह धारावहिक रूपमे “विदेह” ई-पत्रिकामे (http://www.videha.co.in) अन्तर्जालपर ई-प्रकाशित भए हजारक-हजार पाठकक स्नेह पओलक, ऑनलाइन कामेन्ट एहि कथा सभकेँ भेटलैक जाहिमे बेशी पाठक गैर मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थ रहथि, से हम हुनकर सभक उपनाम देखि अन्दाज लगाओल।एतए ईहो गप सोझाँ आएल जे शिक्षाक अभावक कारण सेहो, भाषाक उच्चारण आ वाचन मे अंतर अबै-ए। तकर ई मतलब नै जे बलचनमाक भाषा एखनो यादव जी बजैत छथि, आब जे ओ भाषा यादव पात्र लेल प्रयोग करब तँ शांकुन्तलम् केर संस्कृत नाटकक बीच जनसामान्यक लेल प्रयुक्त प्राकृत जेकाँ लागत, आ ओहि वर्गक लोककेँ अपमानजनक सेहो लगतन्हि।भाषा चलायमान होइत अछि आ लेखन परम्परा ओकर मध्य स्थिरता अनैत अछि। से सुभाषजीक भाषामे सेहो ई अन्तर स्पष्ट देखबामे अबैत अछि, हुनकर कथाक भाषा आ निबन्धादिक भाषा मध्य। मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थ तँ पाठक बनि रहिये नहि सकैत छथि, शीघ्र यात्रीक बादक एकमात्र जन उपन्यासकार आ कुलानन्द मिश्रक बादक एकमात्र सही अर्थमे कविक उपाधि लेल लालायित भए जाइत छथि। अपनाकेँ घोड़ा आ बाघ आ दोसरकेँ गधा आ बकरी कहबा काल ओ मूल दिशा आ समस्यासँ अपनाकेँ फराक करैत छथि। अपन कथा-कवितापर अपने समीक्षा कए आत्ममुग्धताक ई स्थिति समीक्षाक दुर्बलतासँ आएल अछि। एहि एकमात्र शब्दसँ हमरा वितृष्णा अछि आ तकर निदान हम मैथिलीकेँ देल स्लो-पोइजनिंगक विरुद्ध “विदेह” ई-पत्रिकाक मैथिली साहित्य आन्दोलनमे देखैत छी। एतए साल भरिमे सएसँ बेशी लेखक जुड़लाह तँ पाठकक संख्या लाख टपि गेल। बच्चा आ महिलाक संग जाहि तरहेँ गैर मैथिल ब्राह्मण-कर्ण कायस्थ पाठक आ लेखक जुटलाह से अद्भुत छल। हमर एहि गपपर देल जोरकेँ किछु गोटे (मैथिली) साहित्यकेँ खण्डित करबाक प्रयास कहताह मुदा हमर प्राथमिकता मैथिली अछि, मैथिली साहित्य आन्दोलन अछि, ई भाषा जे मरि जाएत तखन ओकर ड्राइंग रूममे बैसल दुर्घर्ष सम्पादक-कवि-कथाकार-मिथिला राज्य आन्दोलकर्ता आ समालोचकक की होएतन्हि। सुभाषचन्द्र यादवजीक कथाक पुनः पाठ आ भाषाक पुनः पाठ एहि रूपमे हमरा आर आकर्षित करैत अछि। आ एतए ईहो सन्दर्भमे सम्मिलित अछि जे सुभाषचन्द्र यादवजीक ई संग्रह धारावहिक रूपमे अन्तर्जालपर ई-प्रकाशित भेल, कथाक पुनः पाठ आ भाषाक पुनः पाठ लए। आ ई घटना सभ दिन आ सभ प़क्षमे मैथिलीकेँ सबल करत से आशा अछि। महाप्रकाश- सुभाष चन्द्र यादव पर आधुनिक मैथिली कथा-साहित्यमे एकटा नाम जे सर्वाधिक स्वीकृति आ प्रसिद्धि पौलक अछि, ओ थिक- सुभाष चन्द्र यादव। सुभाषक कथा-यात्रा पर दृष्टिपात करैत ई लगैत अछि जे ओ कथाक अन्वेषण कयलनि अछि। प्रायः लेखनक आरम्भ करिते ओ अनेक स्थान आ अनेक भाषाक यात्रा शुरू कयलनि। ई यात्रा वा भटकाव, जे हुनक नियति सेहो रहल अछि, हुनका अनुभव सँ लैस कयलक, तीक्ष्ण दृष्टि देलक आ अपन समकालीन सँ अलग विशिष्ट सांचामे ढालि देलक। ओ एकटा अलग भाषा-संस्कार, शब्द-संस्कार ग्रहण कयलनि जे अपन स्वरूप मे व्यासजन्य अछि। लेकिन ई स्वरूप कतहु सँ ओझराबैत नहि अछि, अपितु कलाक सहजता आ सहजताक कला केँ विलक्षण ढंगेँ उद्घाटित करैत अछि। ओ अपन कथा मे परिवेशक कोनो पैघ आयोजन कि पसारमे नहि फँसैत छथि; हुनक अनुभवसिद्ध भाषा, अविकल्प शब्द सहजहि अपेक्षित परिवेश आ यथार्थ केँ एकटा पैघ फलक दऽ दैत अछि। सुभाष कोनो राग-विरागक उत्तेजनामे जतेक लिप्त छथि, ओतबे निर्लिप्तो। सुभाषक जीवन आ साहित्य ऊपर सँ जतेक शांत आ स्थिर बुझाइत हो, भीतर सँ ओतबे अशांत आ अस्थिर अछि। हुनक अन्तर्दृष्टि स्याह आ सफेदकेँ निर्ममता सँ उद्घाटित करैत अछि। हुनक रचनाकार समयक समुद्र मे डूबि-डूबि मोती-माणिक ताकि अनैत अछि। एहि तरहेँ सुभाषक लेखन यथार्थक अमूल्य दस्तावेज बनि जाइत अछि। सुभाषन्द्र यादव- बनैत बिगड़ैत आ आन कथा भाइ साहेब (राजमोहन झा) केँ जे बहुत स्नेहसँ ‘घरदेखिया’ क आवरण बनौने छलाह- सुभाष चन्द्र यादव हमरा बुझाइत अछि जे हमर रचना और किछु नहि, देश-कालक प्रति हमर प्रतिक्रिया थिक। हम अपन समयक सार-तत्व केँ प्रतिबिम्बित करऽ चाहैत छी। जीवन लेल जे किछु नीक आ श्रेयस्कर अछि, हमर रचना तकरे हासिल करऽ चाहैत अछि। हम एहन मनुक्ख गढ़ऽ चाहैत छी जे सब सँ प्रेम करय। आ प्रेम वएह कऽ सकैत अछि जे सत्यक सर्वाधिक निकट हएत।- सुभाष चंद्र यादव अपन-अपन दुख ओहि राति पत्‍नी दुखित छलीह। पीठ मे दर्द होइत रहनि। घरक भितरिया बरंडा पर खाट पर पड़ल छलीह। निन्न नहि होइत छलनि। धीयापूता क आवाजाही, गपशप, खटखुट निन्न नहि होअय दनि। ओ अति ध्वनिग्राही छथि। सेंसिटिव माइक्रोफोन जकाँ छोट-छोट ध्वनि-तरंग सँ कम्पित भऽ जाइत छथि।धीयापूता केँ बरजैत छथिन—अनेरो टहल-बूल नहि, हल्ला-गुल्ला नहि कर, रेडियो नहि बजा। कतेको बेर अड़ोस-पड़ोस सँ अबैत टी.वी. या रेडियोक आवाज सुनि कऽ पुछैत छथिन—‘अपन रेडियो बाजि रहल अछि ?’ सभक अपन-अपन संसार होइत छैक। धीयोपूतोक अपन संसार छैक। ओ सभ कखनो मायक बात सुनैत अछि, कखनो नहि सुनैत अछि आ संसारक अपन कल्पनाक रमणीयता मे डूबल रहैत अछि। अवहेलना सँ पत्‍नीक खौंझ बढ़ऽ लगैत छनि। तनाव चरम सीमा पर पहुँचि जाइत छनि तऽ चिकरि उठैत छथि आ धीयापूता केँ सरापऽ लगैत छथि। धीयापूताक कोमल भावुक संसार आइना जकाँ चूर भऽ जाइत अछि। ओहि राति हम कनेक देरी सँ घर घूरल रही। देर सँ घुरब पत्‍नीकें पसिन्न नहि छनि। हमर ई दिनचर्या हुनका लेल घोर आपत्तिजनक आ विपत्तिजनक। देर सँ घुरबाक अर्थ अछि देर सँ सूतब आ देर सँ सुतबाक अर्थ अछि पत्‍नीकेँ देर धरि कम्पित करैत रहब। तऽ ओहि राति घर पहुँचला पर परिस्थिति बूझबा मे भांगठ नहि रहल जे भानस –भात नहि भेल अछि, पत्‍नी कोनो कारणे सूतलि छथि। एना कतेको बेर भेल अछि। सूतलि रहथु , विघ्‍न नहि होनि ई चेष्टा करैत धीयापूताक सहयोग सँ हम भानसक उद्योग मे लागि गेल रही। मुदा पत्‍नी निन्नमे नहि छलीह; कलमच पड़ल छलीह। एहि परिस्थितिक लेल जेना सफाइ दैत आ अपन जागरण तथा कष्‍ट केँ जनबैत पत्नी अचानक चनकि उठलीह—‘आब अखन सँ शुरू भऽ गेलैक गाँड़ि घुमौनाइ। हौ बाप, ई सभ कखनो चैन नहि दैत अछि। भगवान, मौगति दैह !’ एकटा सनसनाइत तीर सन शांति पसरि गेल। पत्‍नी उठि कऽ दोसर कोठली चल गेलीह। घंटा- दू घंटा बीतल। ओहि दिन बहुत थाकल रही। सोचलहुँ खा कऽ सूति रही। पत्‍नी केँ जखन निन्न टुटतनि, खा लेतीह। निन्न मे उठा देला पर हुनका फेर निन्न आयब कठिन होइत छनि। तेँ हुनक भिड़काओल केबाड़ केँ आस्ते-आस्ते ठेलि चद्दरि लेबा लेल भीतर गेलहुँ। मुदा हमर पदचाप आ उपस्थिति सँ हुनक निन्न टूटि गेलनि। हुनका जागल बूझि हम कहलियनि-खा लियऽ।’ ओ करोट फेरलीह, बजलीह किछु नहि। हम दोसर कोठली मे जा कऽ सूति रहलहुँ। पता नहि कतेक राति भेल हेतैक। हमरा क्यो जगा रहल छल। निन्न केँ ठेलैत हम अख्यास करऽ लगलहुँ के अछि, की कहि रहल अछि। ठीक-ठीक मोन नहि पड़ैत अछि, मुदा लगैत अछि हमर आँखि नहि खुजल रहय। कान मे पत्नीक स्वर आयल, लेकिन बुझायल नहि ओ की कहि रहल छथि। पुछलियनि –‘की कहैत छी?’ कहलनि—‘की भेल अछि? एना कियैक करैत छी?’ हम सोचय लगलहुँ , हमरा की भेल; हम कोना करैत रही। तखन ध्यान गेल, गला मे कफ फँसल अछि। खखारि कऽ ओकरा गीड़ैत अन्दाज कयलहुँ हम घर्राइत रहल होयब आ पत्‍नी डरि गेल हेतीह। हम फेर लगले निन्न पड़ि गेलहुँ। पता नहि कतेक समय बीतल हेतैक। घंटा कि आध घंटा। पत्नीक आवाज कानमे आयल-‘सुनै नइँ छिऐ ?’ पुछलियनि- ‘की?’ कहलनि—‘लोककेँ सूतऽ देबैक कि नहि ?’ देखलियनि चौकी सँ कने हटि कऽ ठाढ़ि छलीह। हमरा भेल हम फेर घर्राय लागल होयब। गरामे अटकल कफ केँ घोंटैत स्नेह सँ पत्नी केँ पुछलियनि-‘भोजन कयलहुँ?’ पत्‍नी कोनो जवाब नहि देलनि आ चल गेलीह। भेल जे खा लेने हेतीह तेँ नहि बजलीह। एहि बेर निन्न तुरन्ते नहि आयल। चिन्ता भेल कफ किएक बढ़ि गेल अछि। मोन पड़ल पत्नी कतेक डेरा गेल छलीह। फेर पता नहि कखन निन्न पड़ि गेल। भोरमे पत्नी सँ पुछलियनि—‘रातिमे दू-दू बेर किएक जगौने छलहुँ’, तऽ कहलनि-‘पारा जकाँ डिकरैत छलहुँ तेँ।’ हमरा एहि जवाबक आशा नहि रहय, तेँ एहि पर हठात विश्वास नहि भेल। पहिने एना कहियो नहि भेल रहय। हमर ठड़ड़ सँ अकच्छ भऽ कऽ ओ कहियो जगौने नहि छलीह। तखन हमर ओ कफ आ घरघरी कोनो भ्रम रहय ? हमरा भीतर जेना किछु कचकल। कने चुप रहि पुछलियनि—‘खयने छलहुँ कि नहि ?’ कहलनि—‘हँ, लोक ताला मारने रहैत छैक आ हम खा लैत छिऐक।’ हमरा बुझा गेल रातिमे धीयापूता खा-पी कऽ सूति गेल होयत आ भनसाघर मे ताला लगा देने हेतैक। पत्नी अपन भूख आ हमर फोंफसँ कुपित भऽ कऽ हमरा उठबैत छल हेतीह। हम उठि गेल रहितहुँ तऽ ओ खइतथि आ खइतथि तऽ निन्न पड़ि जइतथि। ओ तामसे भेर भेल भूखल रहि गेलीह। ठड़ड़ आ घरघरीक दू टा संसार अछि। सभक अपन-अपन संसार होइत छैक। संसारक अपन-अपन सुख होइत छैक, अपन-अपन दुख होइत छैक। असुरक्षित द्रेनसँ उतरि कऽ ओ स्टेशनमे टांगल घड़ी देखलक। पौने दू। ओ ठमकि कऽ सोचय लागल। की करय ? चलि जाय ? या राति एत्तहि बिता लिअय? भरि रस्ता ओ अही गुनधुन मे पड़ल रहल आ अखनो छ पाँच कऽरहल अछि। स्टेशन सँ घरक बीस-पच्चीस मिनटक रस्ता ओकरा बड्ड भारी लागि रहल छलै। जाड़क एहि निसबद राति मे सड़क़ एकदम सुनसान हेतै। समय साल बड्ड खराब छै। कखन की भऽ जेतै तकर कोनो ठेकान नहि। ओना ओकरा लग तेहन किछु नहि रहै। पचास-साठि टा टाका, एगो दामी चद्दरि आ पिन्हनावला कपड़ा। लेकिन जँ इहो सब छिना गेलै तऽ फेर ओ जल्‍दी कीनि नहि सकत। ओ स्टेशनक सिमटीवला ठरल बेंच पर बैसि गेल आ सोचय लागल। परसू खन जाइतो काल ओ रातिए मे गेल रहय। जतय गेल रहय, ओतुक्का सीधा गाड़ी रातिए मे भेटै छै आ ओतय सँ साँझमे चलि कऽ एतय अखन दू बजे रातिमे पहुँचल अछि। जहिया जाइत रहय, तहिया साँझे सँ ओकर मन भारी रहै। मनमे अनेक तरहक आशंका आ भय समा गेल रहै। ट्रेन एक बजे रातिमे रहै। एहि जड़कालामे एतेक रातिकेँ स्टेशन गेनाइ ओकरा पहाड़ बुझाइत रहै। ओना ओ जतेक बेर निकलैत अछि, ओकरा लगैत रहैत छैक भऽ सकैत छै ई ओकर अंतिम यात्रा होइ। जाइत काल ओ बहुत चिन्तित आ उद्विग्न रहय। घरक लोक ओकरा खा-पी कऽ थोड़े काल सूति रहऽ कहलकै। फेर बारह बजे उठत आ चल जायत। लेकिन ओ बुझैत रहय ओकरानिन्न नहि हेतै। जँ कदाचित निन्न पड़ियो गेल तऽ बारह बजे उठि जायत तकर कोन गारंटी। आ जँ उठियो गेल तऽ सीड़क तर गरमा गेला पर बिछौन छोड़ ऽ मे कतेक आलस आ कष्ट हेतै ! मुदा ई सब बात कोनो तेहन बात नहि रहै। ओकरा सबसँ बेसी चिन्ता एहि बातक रहै जे एतेक राति कऽ ओ जायत कोना? जाड़क एहि सुनसान रातिमे असकरे स्टेशन जायब ओकरा भयावह बुझाइत रहै। एतेक राति कऽ ने रिक्शा भेटै छै, ने सड़क पर एक्को टा आदमी। ओ तय केलक जे आठ बजे निकलि जायत। स्टेशनक बगल वला हॉलमे आखिरी शो सिनेमा देखत आ ट्रेन पकड़ि लेत। हॉलमे जाड़ो सँ बचल रहत। घरक लोक ओकर एहि निर्णय सँ अचंभित भेल। पहिने कहियो ओ एना नहि कयने रहय। ओकर चिंता आ डर देखि कऽ घरक लोक विरोध नहि केलकै। ओ अपन निश्चित कयल कार्यक्रमक अनुसार घरसँ आठ बजे निकलि गेल। सितलहरी तेहन रहै जे एतेक सबेरे सबटा दोकान बन्न भऽ गेल छलै। सड़क पर ओकरा दुइए टा आदमी भेटलै। एकटा के भेदी दृष्टि सँ तऽ ओ डेराइयो गेल रहय। हॉल पर ओ सवा आठ बजे पहुँचि गेल आ नौ बजे धरि टौआइत रहल। घर पर रहितय तऽ आराम करैत रहितय। हॉल पर बइसइयोक ठहार नहि रहै। ओ देबालक टेक लेने ठाढ़ रहल। आब ओकरा ट्रेन छुटबाक चिंता हुअय लगलैक। खोंचावला, पानवला अ गेटकी सँ पता लगेलक सिनेमा कखन खतम हेतै; फ़िलिम लंबा तऽ ने छै? शो टुटिते एक गोटय सँ टाइम पुछलक। सवा बारह। गाड़ी नहि छुटतै। तइयो ओ अपन चालि तेज केलक आ स्टेशन दिस जाइ वला रेलामे सन्हिया गेल। स्टेशन पहुँचि कऽ ओकरा पता चललै गाड़ी बहुत लेट छै। दू सँ पहिने नहि खुलतै। ओ टिकट कटेलक आ सिमटी वला बेंच पर बइस कऽ प्रतीक्षा करय लागल। भरिसक इएह बेंच रहै, जइ पर अखन बैसल सोचि रहल अछि। आ सोचि की रहल अछि, परसुक्‍का बात मोन पाड़ि रहल अछि। सोचबाक लेल छइहो की? गुंडा-बदमाशक डर। पहिने कोनो डर नहि रहै। ओ बहुत-बहुत राति कऽ कतयसँ कतय गेल अछि। नि:शंक। बेधड़क। लेकिन आब राति कऽ निकलबाक साहस नहि होइत छै। अखबारमे रोज लूटपाट आ हत्याक समाचार पढ़ि-पढ़ि कऽ आ लोकक अनुभव सुनि-सुनि कऽ जी मे डर समा गेल छै। ओ उधेड़बुन मे पड़ल किछु तय नहि कऽ पाबि रहल अछि जे की करय। घर चलि जाय कि स्टेशने पर भोर कऽ लिअय। रिक्शा भरिसक्के भेटतै। भेटियो जेतै तऽ रिक्शावलाकेँ गुंडा की गुदानतै ! जँ रिक्शेवला गुंडा निकलि गेल, तखन ओ की करत ? आब ककरो पर भरोस नहि रहलै। ढील पड़ि गेल मफ़लरकेँ ओ कसि कऽ लपेटलक आ चद्दरिसँ मूड़ी आ टांगकेँ नीक जकाँ झाँपलक। मुदा एहि झाँप-तोपसँ जाड़ नहि भागलै। निफ़ाह प्लेटफ़ार्म पर पछिया सट-सट लगै आ सौंसे शरीर केँ छेदने चल जाइत रहै। पोन ठरि कऽ पानि भऽ गेल छलै। ओ छने-छन अपन आसन बदलि रहल छल। पछिला दू राति सँ ओ सूति नहि सकल आ ट्रेनमे झमारल गेल \ थकनी आ जगरनामे और बेसी जाड़ होइ छै। घर चल जइतय तऽ सीड़कमे गरमा कऽ सूति रहितय। ओ विचारलक जे टहलि कऽ रिक्शा देख आबय। भेटलै तऽ चल जायत। लेकिन रिक्शा पड़ाव पर क्यो कत्तहु नहि रहै। अन्हारमे एकटा रिक्शा लागल छलै। देखलक सीट पर एक गोटय घोकड़ी लगा कऽ पड़ल अछि। ओ एक-दू बेर हाक देलकै। मुदा ओ आदमी नहि उठलै। ओ फ़ेर पेशोपेश मे पड़ि गेल। कनेक दूर पर एक आदमी असकरे चलल जाइत रहै। ओकरा पर नजरि पड़िते ओ झटकि कऽ विदा भेल जेना ओकरा पकड़ि लेत आ संग-संग घर धरि पहुँचि जायत। ओ थोड़बे दूर झटकल गेल होयत कि ओकर चालि मंद पड़ि गेलै। कोनो जरूरी नहि जे ओ आदमी ओम्हरे जेतै, जेम्हर ओकरा गेनाइ छै। लेकिन कोनो अज्ञात प्रेरणावश ओ धीरे-धीरे बढैत गेल। आगॉं जा कऽ एकटा मोड़ रहै। जखन ओ मोड़ पर घूमल आ हियासलक तऽ ओहि आदमी के दूर-दूर धरि कोनो पता नहि रहै। नहि जानि ओ आदमी कतय अलोपित भऽ गेलै। कतहु नुकायल ओकर प्रतीक्षा तऽ ने कऽ रहल छै ! अचानक ओकर देह डरसँ सिहरि उठलै। ई डर बेसी काल टिकलै नहि। ओ कनेक और आगाँ बढ़ल तऽ ओकर कलेजा थिर हुअय लगलै। जाड़क पीयर मलिन इजोरिया पसरल छलै। भरिसक पछियाक कारणे कुहेस नहि रहै। स्टैण्ड मे लागल भोरका बस दूरे सँ देखा रहल छलै। अपराधक एकटा अड्डा ईहो रहै। एहिठाम कैक बेर कैक आदमी के सामान छिनायल रहै। स्टैण्डक घेरा लग पहुँचिते ओकर आशंका बढ़ि गेलै। स्टैण्ड निर्जन आ सुनसान पड़ल छलै। राति कऽ ई जगह बड़ भयाओन लगैत रहै। स्टैण्ड सँ निकलि गेला पर ओकर डर कमि गेलै।लेकिन अखन ओ अदहे दूर आयल छल। बचलहा रस्ता बहुत दूर बुझाइत रहै। पुलिसो कतहु नहि छलै। सड़क कातक दोकान दौड़ी, घर-दुआर सब बंद रहै। एक्को टा कुकूरो नहि देखाइत रहै। जाड़मे ओहो सब दुबकल होयत।नमडोरिया सड़क पर ओ असकरे चल जा रहल छल। कैक बेर अपनो जुत्ताक आवाज सुनि क्ऽ लगै क्यो पछुअयने आबि रहल अछि आ जी सन्न सिन रहि जाइ। खट-खुट सुनि कऽ छाती धड़कि उठै। ओकर घर अदहोक अदहा रहि गेल छलै। ओकरा भरोस भेल चल जाइत रहै जे आब ओ बचि गेल।आब किछु नहि हेतै।ओ सकुशल घर पहुँचि जायत। ठीक तखने ओ आवाज सुनलक। आवाज पाछाँ सँ आयल छलै। क्यो किछु बाजल रहै।ओकर जी सनाक सिन उठलै। ओ पलटि कऽ ताकलक। मुदा क्यो देखेलै नहि। ओकरा भेलै क्यो अपन घरमे किछु बाजल होयत। ओ बढ़ैत गेल। के छी ?’-पाछाँ सँ क्यो पुछलकै। ओ घुमि कऽ देखलक। एक आदमी ठाढ़ छलै। ओ कोनो जवाब नहि देलक आ बढ़ैत रहल। 'अय के छिअय ? ठाढ़ रहऽ।’-ओकर एहि आदेशसँ ओ भयभीत भऽ गेल आ अपन चालि तेज कऽ देलक। ओ आदमी अपराधी बुझा रहल छलै। अखन जँ ओ आदमी आबिकऽ ओकरा घेरि लै तऽ ओ कतबो चिचिआयत क्यो नहि एतै। आब राति-बिराति मुसीबत मे पड़ल लोकक लेल क्यो नहि निकलै छै। ओ दसे डेग आगू बढ़ल होयत कि पलटि कऽ ताकलक। ताकिते ओ आतंकित भऽ उठल। ओ आदमी दौड़ल आबि रहल छलै। ओ भागल। ओ भागल जा रहल अछि। आतंक ओ कहियो हमरा संग बी. ए. मे पढ़ैत रहय। ओकरा सँ जँ फेर भेंट नहि होइत तऽ मनो नहि पड़ितय जे ओ कहियो संग-संग पढ़ैत छल। हम ओकरा चिन्हबो नहि कयलिऐक। वैह चिन्हलक आ नाम लैत टोकने रहय—'चिन्है छी ?' ओकर आत्मविश्वास आ मैत्रीपूर्ण स्वरसँ कनेक चकित आ प्रसन्न होइत हम मोन पाड़य लागल रही जे ओ के अछि। एम. पी. क एलेक्शन होमय बला रहैक। हम एलेक्शन ड्यूटीमे आयल रही।ओहो एलेक्शने ड्यूटी मे होयत। ढेरी लोक एहि काजसँ आयल रहय। ओ स्नेह-भाव सँ मुस्किआइत रहय जेना बिसरि जेबाक उलहन दैत हो। ओकर मुस्कीसँ हम अपनाकेँ असहज आ हास्यास्पद अनुभव करऽ लागल रही। एहन स्थितिमे ओकरा चिन्हब आ ठेकनायब मुश्किल छल। 'नहि चीन्हि सकलहुँ।'-हम हारि कऽ कहलिऐक। ओकरा नहि चीन्हि सकबाक हमरा ठीके अफसोस भेल रहय। 'हम हरिवंश !'-ओ अपन परिचय देलक। 'अरे, हरिवंश ! ओह, एकदम्मे नहि चीन्हि सकलहुँ। ततेक दिन भऽ गेलै आ एहि बीच अहाँ ततेक बदलि गेलहुँ जे चिन्हब कठिन छल। हम कहियो अंदाजो नहि कऽ सकैत रही जे अहॉं सॅं एतेक दिनक वाद आ सेहो एहिठाम भेंट भऽ जायत। कतऽ छी ?’-अपन न्यूनता केँ झाँपक लेल हम एक्के साँसमे ई सभ कहि गेल रही। हरिवंश हमर मित्रक मित्र रहय।ओकर संग-साथ मे कतेको समय बीतल होयत। मुदा ने हम ओकर आत्मीय बनि सकलिऐक ने वैह हमर आत्मीय बनि सकल। हमर आ हरिवंशक बीचक सम्बन्धकेँ फरिछायब कठिन अछि। ओकरा औपचारिके कहब बेसी ठीक होयत। भेंट तऽ होइत रहय, किन्तु भेंटक आवॄत्तिक अनुपातमे जे घनिष्‍ठता हेबाक चाही से नहि भेल। सिल पर पड़त निसान बला कहबी टा चरितार्थ भेल। हम एक-दोसराकेँ चीन्हि गेलहुँ फेर कहियो नहि बिसरबाक लेल। तखन ई सभ कोना घटित भेल ? हम कोना ओकरा बिसरि गेलिऐक ? भरिसक हरिवंश सँ भीतरी लगाव नहि हेबाक कारणे एना भेल हैत वा जीवनमे आयल अनेक परिवर्त्तनक कारणे भेल होइ। लेकिन तखन ओ किएक ने बिसरल ? ओकरा बिसरब भरिसक हमरे स्मॄति-दोषक परिणाम छल। हारिवंश जे कहलक ताहिसँ पता चलल जे ओ हमरे कामत वला ब्लॉकमे बी. डी ओ. अछि आ अखन एलेक्शनमे ट्रांसपोर्टबला काज सम्हारय आयल अछि। ई जनिते हमर स्वार्थ-बुद्धि सक्रिय भऽ उठल। कामतबला ब्लाकमे कैक सालसँ लसकल दाखिल खारिजबला काज मोन पड़ि गेल आ अखन जे ट्रांसपोर्टबला काजसँ आयल छी से हरिवंशक रहने कोनो बढ़ियाँ जीप भेटि जायत। नहि तऽ कोन ठेकान जे जीपक बदलामे ट्रेक्टरे दऽ दिअय। हमरा दिमागमे ईहो बात तुरंत आबि गेल जे आब एलेक्शनक एहि हूलिमालि आ बालु-गरदासँ जान बचत; जल्दिए छुटकारा भेटि जायत। अपन ई सभ फायदा देखि हरिवंशक प्रति जेनाअतिरिक्त स्नेह उमड़ि आयल। ओहि स्नेह-प्रवाहमे हम ओकरा कहलिऐक-'अरे वाह ! अहाँ तऽ हमर कतेको काज कऽ सकैत छी। एकटा तऽ ई जे अहींक ब्लाक मे हमर दाखिल-खारिज वला काज कैक सालसँ अटकल अछि आ दोसर जे हमरा नीक सन जीप दिआ दिअऽ।’ ई सभ सुनि हरिवंशक चेहरा पर जे स्नेहसिक्त दोस्ताना मुस्की रहैक से लुप्त भऽ गेलैक आ तकर बदलामे एकटा कामकाजी उबाऊ भाव आबि गेलैक। ओ बाजल—'कहियो ब्लाक आउ, भऽ जेतै।’ आ गाड़ीवला कागज हमरा हाथसँ लैत एकटा टेबुल दिस बढ़ि गेल।हम ओकर पछोर धऽ लेने रही। हरिवंशक मुँह-कान आ देह-दशा सम्पन्न लोक जकाँ गोल-ठोल आ भरल-पूरल रहैक।ओकर फूलपैंट-कमीज साफ झकझक आ क्रीजसँ तनल रहैक। जूता चमचमाइत रहैक। ओकर पहिरावा उच्चपदस्थ पदाधिकारीक अनुरूप दर्प आ प्रभुत्व बला प्रभाव छोड़ैत रहैक। टेबुल लग पहुँचि टेबुलक चारूकात घौदिआयल लोककेँ ठेलैत आ 'हटू’ कहैत हरिवंश कुरसी पर जा कऽ बैसि गेल।हम कुरसीक कातमे ठाढ़ भऽगेल रही। ओहिठाम और कोनो कुरसी नहि रहैक जे हरिवंश हमरा बैसऽ लेल कहैत। कागजी औपचारिकता पूरा केलाक बाद ओ हमरा जरूरी कागज सभ दऽ देलक। हम ओहि स्थान दिस विदा भऽ गेलहुँ जतय जेबाक लेल ओ कहने रहय। गाड़ीक ड्राइवर कोम्हरो चल गेल छलै आ ओकर प्रतीक्षा मे हमरा आध घंटा आरो बिलमय पड़ल। ओहि आध घंटामे हरिवंश सँ एक बेर और भेंट भेल आ कनेक काल घरौआ गपशप होइत रहल। बाल-बच्चा, ओकर पढ़ाइ-लिखाइ आ आन दोस्त मित्रक सम्बन्ध मे। वोटक गिनतीक समय हरिवंश सँ देखा-देखी भेल, गप्प नहि भऽ सकल। यद्यपि ओकरा देखिते हमरा भीतर बिजली जकाँ एकटा भावावेग चमकल , मुदा परिचय आ मित्रताक सुखायल स्रोतक कारणे ओ भावावेग बिला गेल। हरिवंश किछु नहि बाजल। ओ मौका अनौपचारिक गपशप लेल रहबो नहि करैक। ओ अपन वरिष्ठ पदाधिकारी सभक बीच बैसल रहय। एहि सुखायल भेंटक कैक मास उपरान्त एक दिन ओ बजारमे टकरा गेल। ओ हाथमे झोरा लेने तरकारी कीनय जाइत रहय।ओहि दिन ओ हमरा व्यस्त आ अन्यमनस्क बुझायल। जल्दी-ज्ल्दी मूर-टमाटर बेसाहलक आ चलि गेल। हम ओकरासँ हालचाल पूछितिऐक, लेकिन ओकर चेहरा देखि कऽ हालचाल पुछनाइ नीरस आ फालतू बुझायल। मुदा निरर्थकताक अनुभव करितो जे गप हम शुरू कयलहुँ सेहो निरानंदे छल। हम ओकरा कहलिऐक-'एहि बीच कतेको बेर सोचलहुँ जे ब्लॉक जाइ, लेकिन सोचिए कऽ रहि गेलहुँ।’ आउ। कोनो सोम वा बुधकेँ आउ, जहिया कर्मचारी रहैत छैक।’-नितान्त व्यावहारिक आदमी जकाँ कारोबारी अंदाजमे ई कहैत ओ चल गेल। बहुतो दिन बीतल। हम सोचि कऽ रहि जाइ। लेकिन एक दिन ठानि लेलहुँ जे आइ जेबाक अछि। ब्लॉक पहुँचैत छी तऽ हरिवंशक पते नहि। ओ राँची चलि गेल रहय। दुर्भाग्‍य ! बादमे जहिया कहियो ब्‍लाक जाय दिआ सोची तऽ हुअय जे नहि जानि हरिवंश ओतय होयत कि नहि आ एहि दुविधामे गेनाइ टरैत रहल। किन्तु एनामे काज कहियो नहि भऽ सकत, ई सोचि विदा भेलहुँ। भरि रास्ता मन भारी रहल ! ब्लॉकक गेट पर जे पहिल व्यक्ति भेटल तकरा सँ पुछलिऐक जे हरिवंश अछि कि नहि। हरिवंश अछि ई जानि मन हल्लुक भेल। हरिवंशकेँ ताकय लगलहुँ। ब्लॉक वला मकानक आगू मैदानमे हरिवंश कुरसी-टेबुल लगौने बैसल रहय आ करीब डेढ़ सौ आदमी ओकरा घेरने रहैक। ओ वृद्ध लोककेँ भेटय वला पेंशनक सत्यापनमे लागल रहय। एहन समयमे लोककेँ ठेलि- धकिया कऽ ओकरा लग पहुँचब कठिनाह छल आ उचितो नहि बुझाइत रहय। पता नहि ओहिठाम बैसक लेल फाजिल कुरसियो हेतैक कि नहि। तेँ प्रतीक्षे करब श्रेयष्कर बुझायल। चाह पीलहुँ , पान खेलहुँ आ तकर बाद भीड़ छँटबाक बेचैन प्रतीक्षामे एम्हरसँ ओम्हर टहलैत रहलहुँ। हरिवंश अपन चेम्बरमे बैसि गेल रहय। जखन हम ओकर चेम्बर मे प्रवेश केने रही तखन एक व्यक्ति और कुरसी पर बैसल छल। हाथ मिलबऽ लेल हाथ बढ़ाबी आ एकरा अपन हेठी बूझि जँ ओ हाथ नहि बढ़ौलक तऽ भारी अपमान होयत, ई सोचि हम एकटा हाथ उठा ओकर अभिवादन केलिऐक। जेना मोन पड़ैत अछि, जवाबमे ओ भरिसक हाथ नहि उठौने रहय ने बैसऽ लेल कहने रहय। अभिवादन करैत आ ओकर संकेतक प्रतीक्षा केने बिना हम बैसि गेल रही। स्निग्ध आ कोमल किंतु अल्पजीवी मुस्की संगे ओ हमरा सँ पुछने रहय-'कोना छी ?’ 'बस चलि रहल छै।,-हमर एहि शुष्क औपचारिक उत्तरसँ वार्त्तालाप भंग भऽ गेल। खाद-बीज, सीमेंट, पंपसेट आ बोरिंग बला आवेदक सभ एक-एक कऽ आयब शुरू कऽ देलकैक। 'खाता नंबर की अछि ?’-बोरिंग बला एकटा आवेदकसँ हरिवंश प्रश्न केलकै। 'नहि मोन अछि।' 'खेसरा नंबर ?' 'नहि मोन अछि।' 'कतेक रकबा अछि?' 'पता नहि।' 'भागू एतय सँ।'- कहैत ओकर आवेदनकेँ हरिवंश नीचा फेकि देलकै। ओ व्यक्ति हतप्रभ भेल किछु काल ठाढ़ रहलै आ दरखास्त उठा धड़फड़ाइत निकलि गेलै। लोक एहिना आबय, हरिवंश किछु पूछै आ ओकर दरखास्‍त फेकि दैक। एहि समस्त कार्य-सम्पादनमे ओकर आवाज अत्यन्त कर्कश आ चेहरा कठोर रहैक। ई देखैत-देखैत हमरा घबराहटि होअय लागल। बुझायल जेना हमहीं आवेदक छी आ हरिवंश हमरे डाँटि आ अपमानित कऽ रहल अछि। हरिवंश अज्ञात ढँगसँ भीतरे-भीतर हमरा आतंकित कऽ देने छल। अंत मे ई कहि दी जे हरिवंश दाखिल खारिज लेल सी. ओ. सँ हमर परिचय करा कऽ चल गेल, लेकिन ओ काज अखन धरि नहि भेल अछि। हरिवंशक आदमी हेबाक कारणे घूस नहि देत, भरिसक यैह सोचि सी. ओ. काज नहि कऽ रहल अछि। हम फेर जा कऽ हरिवंश केँ नहि कहलिऐक। हरिवंश सँ भेंट करबाक इच्छे नहि होइत अछि। ब्लॉकक नाम लैते हरिवंशक ओ रूप मोन पड़ैत अछि आ घबराहटि होअय लगैत अछि। ओ लड़की एक-दोसराक सोझा-सोझी बनल तीन टा होस्टल रहै, दू टा लड़काक आ एकटा लड़कीक। ओहि तीनूक बीचोबीच एक टा छोट सन मकान रहै।ओहि मकान मे छात्र-छात्राक मनोरंजन लेल टेबुल टेनिस, चाइनीज चेकर, शतरंज सन खेलक व्यवस्था रहै। मकानक अगुअइत मे चाह, पान आ फलक एक-एक टा दोकान रहै। होस्टल शहर सँ हटि क’ एक टा सुरम्य पहाड़ी पर बनायल गेल रहै। ओहिठामक वातावरण एकदम शांत आ अध्ययन-मनन के अनुकूल रहै। ओतय अबाध स्वतंत्रता रहै। कोनो चट्टान पर बैसि कए अहाँ घंटाक घंटा चिन्तन मे लीन रहि सकैत छलहुँ या प्रेमिका संगे रभसल सपनामे डूबल रहि सकैत छलहुँ। मुदा एहि आधिदैविक आ रूमानी वातावरण पर दिनकें उदासी पसरल रहैत छलै। लड़का-लड़की पढ़ै-तढ़ै लए निकलि जाइ आ होस्टल भकोभन्न आ सून पड़ि जाइ। मुदा साँझ पड़िते ओहिमे जीव पड़ि जाय। लड़का-लड़कीक चहल-पहल आ गनगनी कोनो पाबनि-तिहार सन लगै। हैलो, हाय आ हाउ आर यू सन कथनी हवामे उड़ैत रहै। धनीक घरक ई लड़का-लड़की बेसी कए अंगरेजी बाजइ आ तखन एहन लगै जेना अहाँ हिन्दुस्तान मे नहि, लंदन या न्यूयार्क मे होइ। साँझ पड़िते होस्टलक बीच ओहि छोटका मकानक चारूकात लड़का-लड़की जमा हुअय लागै। किछु ठाढ़े ठाढ़ आ किछु सिमटी वला बेंच पर बैसि कए गप्प करै आ बहस करै। कोनो-कोनो बेंच पर खाली प्रेमीक जोड़ा बैसल रहै। ई क्रम बड़ी राति धरि चलैत रहै। एहनो होइ जे साँझ पड़िते मोटरसाइकिल आ कार सँ शहरक लड़का आबै आ अपन –अपन प्रेमिका कें ल’क’कतहु निकलि जाइ आ दू-चारि घंटामे छोड़ि जाइ। क्यो-क्यो होस्टले लग कार लगा क’ कारे मे अपन प्रेमिका सँ गप्प करैत रहैत छलै। एहने कोनो साँझक गप्प छियै। ओहि दिन नवीन भरि दिन होस्टलक अपन कोठलीमे बैसल पढ़ैत रहल छल। पढ़ैत-पढ़ैत ओकर माथ भारी भ’ गेलै।गोसांइ डूबि गेल रहै आ पछबरिया क्षितिज पर ओकर लाली पसरल रहै। नवीन बिना स्वेटर पहिरने चाह पीबा लेल निकलि गेल। होस्टलक मेसमे खाली भोरे टा कें चाह भेटै। तें नवीन धीरे-धीरे ओहि मकान दिस बढ़य लागल, जतय चाहक दोकान रहै। होस्टल सँ बाहर निकलिते ठंढा हवाक झोंक सँ ओकर देह सिहरि उठलै। मुदा स्वेटर पहिरय ल’ ओ घूरल नहि। दलकी वला जाड़ नहि रहै। हवा सँ ओकरा ताजगी भेटलै आ माथ जे भारी रहै से हल्लुक होब’ लगलै। मकानक आसपास अखन भीड़ नहि रहै। बेंच पर किछु जोड़ा रहै आ दोकान पर किछु लोक। एकटा कार लागल रहै। कारमे एकटा लड़का आ एकटा लड़की बैसल चाह पिबैत रहै। भरिसक चाह खतम भ’गेल रहै आ ओ दुनू खलियाहा कप थामने बैसल रहै। बुझेलै जेना लड़काकें एकाएक ई बोध भेलै जे ओ अनेरे हाथमे खलियाहा कप ल’क’ बैसल अछि आ ओहि बेकारक बोझ हटाब’ लेल कपकें कारक सीट पर राखय चाहलक। लेकिन लड़की ओकरा एना करय नहि देलकै। ओ लड़का वला कप ल’ क’ अपन कप पर राखि लेलकै। नवीन कें लगलै जेना ओ लड़की आब कार सँ निकलतै आ अँइठ कप राख’ चाहक दोकान पर जेतैक। मुदा ओ ओहिना बैसल रहल। जखन कि सम्हारय खातिर ओ बेर-बेर कप दिस देखै आ एना कयलासँ ओकर ध्यान गप दिस सँ हटि जाय, तइयो जानि नहि कते रसगर गप्प चलैत रहै जे छोड़ल नहि जाय। कार लग पहुँचि क’ नवीन उड़ती नजरि सँ दुनूकें देखलक आ उदासीन भावें आगू बढ़ि गेल। 'एक्सक्यूज मी !'- पाछूसँ लड़कीक आवाज आयल।ओ नवीनकें बजबैत रहै।आवाज सुनि क’ नवीन कें आश्चर्य भेलै। कियैक बजा रहल छैक ई अपरिचित लड़की ? ओ पाछू घूमि क’ आश्चर्य सँ लड़की कें देखलकै। लड़की जींस आ उजरा कुरता पहिरने रहै।घूमिक' तकिते लड़की पुछलकै-'आर यू गोईंग टू दैट साइड ?' सवाल खतम होइते नवीनक नजरि लड़्कीक चेहरा सँ उतरि क’ ओकर हाथक कप पर चलि गेलै आ ओ अपमान सँ तिलमिला गेल। ओकरा भीतर क्रोध आ घृणाक धधरा उठलै। की ओ ओहि दुनूक अँइठ् कप ल’ जायत ? लड़कीक नेत बुझिते ओ जवाब देलकै-'नो'। ओकर आवाज बहुत तेज आ कड़ा रहै आ मुँह लाल भ’ गेल रहै। ओकरा एहि बातक खौंझ हुअय लगलै जे ओकर जवाब एहन गुलगुल आ पिलपिल किए भ’ गेलै।ओ कियैक नहि कहि सकलै-'हाउ डिड यू डेयर? ' तोहर ई मजाल! मुदा ओ कहि नहि सकलै। साइत निम्‍नवर्गीय दब्बूपनी आ संस्कार ओकरा रोकि लेलकै। नवीन पान वला दोकान पर जा क’ ठाढ़ भ’ गेलै। ओ ऊपर सँ शांत बुझाइतो भीतरे-भीतर बहुत उत्तेजित रहै। ओ खाली ठाढ़ रहै। बाहरी दुनिया सँ निर्लिप्‍त। 'क्‍या लोगे साहब ?’-विचित्र नजरि सँ तकैत पानवला पुछलकै त’ ओ अकबका गेल।ओकरा की लेनाइ रहै ? कनी काल धरि ओ किछु सोचिये नहि सकल। 'हँ, सिगरेट।’-ओ दोकनदार कें कहलकै। सिगरेट धराए क’ नवीन सोचय लागल ओकरा त’ चाह पिबै लेल जेनाइ रहै, फेर एतय कियैक रूकि गेल। की ई देखाब’ लेल जे देख हम ठीके ओम्हर नहि जा रहल छी ? कते फोंक आ डेरबुक अछि ओ ? तोरा हिम्मत कोना भेलौ ? कियैक नहि कहि सकलै ओ! की ओ ठीके दब्बू अछि ? आ दब्बूपनीए कारणे ओकरा मुँह सँ निकलि गेलै-नो ? भरिसक ई बात नहि छैक। मरजाद आ शालीनताक लेहाज नहि होइतै त’ चाहक बदला ओ पानक दोकान पर किए ठाढ़ होइत। मुदा ई शालीनताक ढोंग नहि भेलै ? नवीन बेचैन रहै आ जल्दी-जल्दी सिगरेटक सोंट मारैत रहै।ओकरा ई बात परेशान कयने रहै जे लड़कीक मनमे एहि तरहक प्रस्ताव करबाक विचार अयलै कियैक। की ओ अपनाकें श्रेष्ठ आ हमरा नीच आ तुच्छ बूझि लेने रहै ?हँ, साइत यैह बात रहै। नवीन सोच मे पड़ल रहै। सिगरेट जरि क’ आब ओकर अंगुरी जरबय लागल रहै। सिगरेट फेकि क’ ओ चाहक दोकान पर चलि गेल। नवीन एखनो क्षोभ आ तामसमे रहै। चाहक चुस्‍की संग ओकर नस कने ढील भेलै आ लड़कीक ओहि समयक चेहरा ओकर दिमाग मे अएलै, जखन नवीनक 'नो कहला पर ओ ठकुआ गेल रहै। ओकर बिधुआयल मुहेंठक लेल नवीन कें अफसोस भेलै। ओ सोचय लागल जँ कप लइये लितियै त’ की भ’ जइतियै। एहि सँ ओकर चरित्रक उदारता आ भद्रते सोझाँ अबितै। ओ छोट नहि भ’ जाइत, ई ओकर बड़प्पन होइतै। ओहिठामक जीवनमे ककरो कोनो छोट-मोट मदति करब आम बात रहै आ ई ककरो खराब नहि लागै। सहयोगक एहन भावना सँ नवीन अपरिचित नहि रहय। तइयो पता नहि की रहै जे ओ भड़कि गेल रहै। नवीन कें लगैत रहै ओकर दुनिया अलग छै आ ओहि लड़कीक दुनिया अलग। दुनूमे कोनो मेल नहि छैक। ओहि लड़कीक दुनिया चाहियो क’ नवीनक दुनिया नहि भ’ सकैत छलै आ नवीनक दुनिया लेल ओहि लड़की मे कहियो कोनो चाहत नहि भ’ सकैए। नवीन कें बुझेलै साइत सम्पन्नताक चिक्कन चाम आ रौद-बसातक सुक्खल चामक अन्तरे ओकरा भड़का देने होइ। ओ निश्चय नहि क' पाबैत रहै। कहीं एहन त ‘नहि जे ओ लड़की अकारण ओकरा नीक नहि लागल होइ आ ओ भभकि उठल हो ? मुदा से बुझाइत नहि रहै। भरिसक ओकर भंगिमा, ओकर स्वरमे किछु रहै। ओकर अनुरोध मे अधिकारक भाव रहै, याचनाक नहि। नवीन ओकर आकृतिकें मोन पाड़्य लागल। ओकर चेहरा मरदाना रहै। जनीजाति मे जे लाज आ कोमलता होइ छै, ओकरामे से नहि रहै। ओहि लड़कीमे किछु एहन रहै जे कठोर रहै आ विकर्षित करैत रहै। नवीन सोचैत रहल। ककरो ने ककरो गलती जरूर रहै। या त’ ओहि लड़की के प्रस्ताव ठीक नहि रहै या नवीनक प्रतिक्रिया उचित नहि रहै। दुनूमे क्यो दोषी रहल हेतै या दुनू दोषी हेतै या दुनूमे क्यो नहि। कोनो कारणो जरूर रहल हेतै। कारण आरो भ’ सकैत छल। ठीक-ठीक किछु नहि कहल जा सकैए। खाली एतबे साँच छै जे लड़की उदास भ’ गेल छलै आ नवीन दुखी रहै आ सोचने चल जाइत रहै। एकटा अंत समदियाकेँ देखिते माथ ठनकल। कतहु ससुरकेँ ने किछु भऽ गेलनि ! ओ बहुत दिनसँ दुखित रहथि। डाक्टरो जवाब दऽ देने रहनि। हम एक मास पहिने देखि आयल रहियनि। हमर पत्नी सात-आठ मास पहिने गेल छलीह। फेर आनो बेटी सभ भेंट कऽ अयलनि। सभ क्यो हुनक मृत्युक प्रतीक्षामे रहय। 'कका खतम भऽ गेलथिन’-समदिया बाजल। 'कहिया हौ ?'-पत्‍नी चकित होइत पुछलथिन आ जा समदिया 'चारि दिन पहिने’ बाजल ता पत्नीक क्रंदन शुरू भऽ गेलनि। ओ कनैत रहलीह आ बीच-बीचमे अपन उलहन, अपन पछतावा जनबैत रहलीह। बाकी सब शोकाकुल मौनमे डूबि गेल। बुझाइत अछि ससुर देह त्यागि एत्तहि चल आयल छथि आ हमर सभक मन-प्राणमे बसि गेल छथि। चेतनामे हुनक स्मृति निरन्तर चलि रहल अछि।खाइत-पिबैत, उठैत-बैसैत दिन-राति हुनके चर्चा होइत अछि। हमरासँ पत्नी केँ शिकायत छनि जे हमरे कारणे ओ अपन पितासँ अंतिम समयमे भेंट नहि कऽ सकलीह। हम कहि देने रहियनि जे ठीक छथि। आइसँ एक मास पहिने ओ ठीके नीक रहथि। लेकिन एकटा बात हम नहि कहने रहियनि। ओ कहऽ वला बात नहि रहै। मात्र एकटा पूर्वाभास। जखन हुनकासँ विदा लेबऽ गेल रही तऽ हुनकर आँखिमे ताकने छलियनि। ओहो हमर आँखिमे ताकने छलाह। आ हमरा दुनूकेँ बुझायल रहय जेना ई ताकब अंतिम ताकब थिक, जेना आब फेर कहियो भेंट नहि होयत। सएह भेल। ओ चल गेलाह। आब नहि भेटताह। लेकिन ओ दृष्टि मनमे अखनो ओहिनाक ओहिना गड़ल अछि आ हुलकी मारैत रहैत अछि। अइ अनुभव दिआ हम पत्नी केँ किछु नहि कहलियनि। गोपनीय नहि होइतो ई ततेक व्‍यक्तिगत रहै जे एकरा बँटबाक इच्छा नहि भेल। व्‍यक्तिक जीवनमे एहन बहुत रास अनुभूति होइत छैक जे ओ ककरो नहि कहैत अछि; जे ओकरे संग चल जाइत छैक। हमसभ ससुर संग बीतल समय आ प्रसंग मोन पाड़ैत रहैत छी; एक-दोसरकेँ सुनबैत छी। वात्सल्य स्नेह आ प्रेमसँ भीजल क्षणकेँ स्मरण करैत पत्नी भावुक भऽ जाइत छथि, कंठ अवरूद्ध भऽ जाइत छनि आ आँखि नोरा जाइत छनि। ओ बजैत छथि-'बाबू कहियो हमरा बेटी नहि कहलनि; सभदिन बेटा कहैत रहलाह। पछिला बेर चलैत काल भेंट करऽ गेलियनि तऽ पुछलथिन-चूड़ी नहि पिन्हलह ? आब के एतेक निहारि-पिहारि कऽ देखत जे चूड़ी नव अछि कि पुरान ?’ पत्नी सोगमे डूबि जाइत छथि। हमसभ हुनक अंतिम अवस्थाक कष्ट, उपेक्षा आ निराशाक चर्च करैत छी। परिवारक के कतेक सेवा केलकनि, के कतेक अवहेलना, तइपर टीका-टिप्पणी करैत छी आ सोचैत छी हमहीं सभ की केलियनि, किछु नहि। नह-केशसँ एकदिन पहिने सासुर पहुँचैत छी।मृत्यु जे शून्यता आ नीरवता छोड़ि गेल अछि, कन्नारोहटि तकरा तोड़ैत रहैत अछि। भोज-भातक गप आ ओरिआन चलि रहल अछि। हमरा लगैत अछि श्राद्धक कर्मकांडमे व्यस्त भऽ कऽ लोक सोग बिसरि जाइत अछि। कर्मकांडक और कोनो सार्थकता नहि छैक। हमर एकटा साढू अखने आयल छथि-केश कटेने। जहिया समाद गेल हेतनि, तहिये या अगिला दिन कटेने हेताह। हमरा सन सम्बन्धी लेल तीन दिन पर केश कटेबाक विधान अछि। हमरा चारि दिन पर खबर भेटल रहय आ हम सोचने रही जे केश नहि कटेबा लेल एकरा ढाल बनाओल जा सकैत अछि। लेकिन साढूक मूड़ल माथ देखि बुझायल जेना ई तर्क ठठऽ वला नहि अछि। हम चिन्तित भऽ जाइत छी।एहि लेल नहि जे बेलमुंड भऽ गेलापर देखऽ मे नीक नहि लागब। केश तऽ हम नहिए कटायब। तँइ बेलमुण्ड हेबाक तऽ प्रश्ने नहि अछि। लेकिन विरोध बहुत होयत। हम उठल्लू भऽ जायब। एकरे चिन्ता अछि। नह-केश दिन ठाकुर भोरे चल आयल अछि। केशकट्टी चलि रहल छैक। हम दू-तीन बेर टहलि कऽ एहि कर्मकेँ देखि आयल छी। एकबेर एक गोटय पुछबो केलक—'कटेबै ?’ हम हाथसँ अस्वीकृतिक मुद्रा बना घूमि गेलहुँ। ओ सोचने होयत बादमे कटेताह। हमर एकटा आर साढू आबि गेल छथि। आ केश कटवा रहल छथि। एकटा क्षण एहन अबैत अछि जखन घरक सभ पुरूखक माथ छिलायल अछि आ एकमात्र हम विषम संख्या सन बचल छी। आब कतेको गोटय पूछऽ लागल अछि-'केश नहि कटेबै ?' 'की हेतै ?' कहैत हम टरि जाइत छी। आब ककरा-ककरा बुझौने घुरियौ जे हमरा एहि कर्मकांडमे विश्वास नहि अछि। बुझेबो करबै तऽ क्यो बुझऽ लेल तैयार होयत ? लेकिन हमर केश सभक आँखिमे गड़ि रहल छैक ; अनटेटल आ अनसोहाँत लागि रहल छैक। हम दाढ़ी बना रहल छी। सोचने छी तकर बाद नह काटि लेब। सासुक नजरि हमरा पर पड़ैत छनि। बेटीसँ पुछैत छथिन-'दुल्हा केश नहि कटेलथिन ?’ हमर पत्नीकेँ खौंत नेस दैत छनि। हमरा दिस तकैत फुफकार छोड़ैत छथि—'आ गय, पापी छै, पापी। पता नहि बाप मरल रहै तबो केश कटेने रहै कि नहि !' हमरा तामस उठैत अछि; दुख होइत अछि, लेकिन चुप रहि जाइत छी। केश कटा कऽ हमर दुनू साढू निश्चिन्त छथि। एकटा तऽ पी रहल छथि आ कखनो आयोजन तऽ कखनो सारि-सरहोजिक आनंद उठा रहल छथि। केश कटा लेने रहितहुँ तऽ हमरो लेल सब किछु आसान आ अनुकूल रहितय।लेकिन विश्वास आ आत्माक खिलाफ कोनो काज करब हमरा बूते पार नहि लागि सकैत अछि। केश कटेने मृतात्माकेँ मुक्ति आ स्वर्ग भेटि जेतैक आ नहि कटेने नरक ? एहन विचार हमरा लेल हास्यास्पद अछि। तखन केश कटेबाक कोन तुक? की एहि लेल जे देखू हम हुनक सम्बन्धी छी आ शोकाकुल छी ? सम्बन्ध आ सोगक एहन प्रदर्शन हमरा बहुत अरुचिकर बुझाइत अछि। हमर वश चलितय तऽ सब कर्म आ भोज-भात बंद करबा दितियै।सोचि लेने छी जे लिखि कऽ चल जायब जे हमर मृत्युक बाद ई सभ नहि हो। बुझाइत अछि हमर पितिऔत सारकेँ क्यो हुलका देने छनि।ओ धड़धड़ायल अबैत छथि आ हमर डेन पकड़ि घीचने ठाकुर लग लऽ अनैत छथि—‘ठाकुर, छिलह तऽ।' ठाकुर आदेश सुनियो कऽ उठैत नहि अछि। सार हमर कनहामे लटकि जोर लगा कऽ हमरा बैसाबऽ चाहैत छथि। हम बूझि नहि पबैत छी जे ओ चौल कऽ रहल छथि कि गंभीर छथि।हम छिटकि कऽ एकटा कुर्सी पर बैसऽ चाहैत छी।लेकिन जा-जा बैसी ताहिसँ पहिनहि ओ कुर्सी खींचि लैत छथि आ हम खसैत-खसैत बचि जाइत छी। लोक हाँ-हाँ ‘ करैत अछि। हम क्रोध आ अपमानसँ तिलमिला उठैत छी—‘बहानचोद, चोट्टा, उल्लू !’ ‘ईह रे बूड़ि, बुधियार बनैत छथि !भोज परक पात छीन लेब सार।'- कहैत ओ चल जाइत छथि। क्यो कुर्सी पर बैसा दैत अछि। हम बैसि जाइत छी। भीतरसँ खौलैत। 'की भेलै ? की भेलै?’—पूछैत आँगनसँ कैक गोटय आबि गेल अछि। हम उठि कऽ आँगन चलि दैत छी। एकटा प्रेम कथा कहियो-कहियो ओहि लड़कीक फोन अबै। रिसीभर उठा कऽ 'हलो’ कहिते ओम्हरसँ आवाज अबै- 'कने, प्रेमी केँ बजा देबै ?’ ई सुनिते खौंझ आ तामस सँ जी जरि जाय।खौंझ आ तामस खाली ओही लड़कीक फोनसँ होइत हो, से बात नहि। तामस सब पर होइ जे ककरो बजा देबा लेल फोन करै। ओ तऽ कहुना लड़किए रहय। फोन जँ लड़की आ जनीजातिक हो तऽ मरद-पुरुखक रवैया ओहुना कने लरम आ मोलायम होइत छै। जहिया पहिल बेर ओकर फोन आयल रहै तऽ हम पुछने रहिअइ- 'अहाँ के छी ?’ हमर मतलब ओकर नामसँ रहय। लेकिन ओ अपन नाम नहि बतेलक। बाजल- 'हम नया बजारसँ बाजि रहल छी। खाली एतबे कहला सँ ओ बूझि जेतै।’ 'फोने पर रहब आकि फेर करब ?'-हम अनमनायल जकाँ पुछलिऐ। 'पाँच मिनटमे फेर करै छी।' –कहि कऽ ओ फोन राखि देलक। हम मन मारि कऽ ओहि कोठली गेलहुँ, जकर खिड़की सँ प्रेमीक कोठली देखाइत रहै। ओकर मकान हमर मकानक पंजरामे रहै। 'प्रेमी ! रे, प्रेमी !' हम दू-तीन बेर जोर सँ हाक देलिऐ। ओ कोठलीसँ बाहर निकलल तऽ कहलिऐ- 'नया बजारसँ फोन छौ।’ ओ हमर घर दिस आबय लागल। आब या तऽ ओ छहरदेवाली फानि कऽ चोट्टे चल आयत या कने आगाँ बढ़ि कऽ बिना फानने भीतर चल आयत किऐ तऽ ओहिठाम छहरदेवालीक ऊँचाइ भरिए ठेंगहुन छै। ओ घर ढुकिते रहय कि फोनक घंटी बजऽ लगलै। फोन सुनऽ लेल बाहर सँ क्यो अबै तऽ हम ओहि कोठलीसँ निकलि जाइ। आन लोकक फोन सूनब या ओकरा पर पहरेदारी करब हमरा शिष्ट आचरण नहि बुझाइत रहय। कोठलीसँ बाहर निकलैत आ घरक भीतर एम्हर सँ ओम्हर जाइत-अबैत जे सुनबा मे आयल ताहि सँ ई बुझायल जे प्रेमी साँझ खन ओहि लड़कीसँ भेंट करतै। ओ लड़की के छलै आ प्रेमी सँ ओकरा कोन काज छलै, से जनबाक इच्छा तऽ बड्ड रहय, मगर प्रेमी सँ ई सब पूछब मोसकिल छलै। ओ अठारह-बीस सालक जवान रहय आ हम ओकर बापक उमेर के। ओहुना ओ घुन्ना स्वभावक लड़का रहै। ओ इंटरक विद्यार्थी छलै, लेकिन पढ़ाइमे ओकर मन नहि लगै। ओ टी.भी. देखय, गाना सुनय, क्रिकेट खेलय आ दोस-महिम सँ गप्प लड़ाबय। नहि जानि ओहि दिन साँझकेँ प्रेमी ओहि लड़की सँ भेंट केलकै कि नहि; लेकिन दुइए-चारि दिनक बाद लड़की फेर फोन केलकै। वएह पुरान आग्रह। बाजक ओहने ढंग। कने संकोच, कने घबराहट आ कने डर। बेर-बेर पुछलो पर ने तऽ ओ अपन नाम बतेलकैआ ने काम। तखन एतबा जरूर कहलकै जे ओ प्रेमीक मामा कत’ सँ बाजि रहल अछि। तऽ की ओ प्रेमीक ममिऔत बहीन छिऐ? जँ ममिऔत बहीन छिऐ तऽ बेर-बेर वएह टा किऐ फोन करै छै ? क्यो दोसर किऐ नहि करै छै ? मामा, मामी, ममिऔत भाइ -एहि मे सँ क्यो तऽ कहियो करितइ। हमर मन मे कतेको सवाल आबय, मगर जवाब कोनो नहि। संदेह आ असमंजस उपलाइत रहय। आइ-काल्हि लड़कीक घरक लोक दिलफेक किसिमक लड़का सभक फोनसँ चिंतित आ फिरीशान रहैत अछि। मगर एतय मामला उन्टे छलै। कहियो काल हमरा बुझाय जेना प्रेमीक रुचि लड़कीमे नहि छै। फेर सोची जे से रहितइ तऽ प्रेमीक उदासीनता लड़कीसँ बहुत दिन धरि छिपल नहि रहितइ। जँ प्रेमी ओकरा नहि चाहितिऐ तऽ लड़की बेर-बेर फोन किऐ करितइ ? तकर बाद फोन आयब बन्न भऽ गेलै। किछु दिनक बाद पता लागल जे प्रेमी मोबाइल कीन लेलक अछि। आब ओ लड़की सीधे प्रेमीसँ सब तरहक गप्प करैत हैत। भरिसक इएह सोचि कऽ प्रेमी मोबाइल किनने हो। हमरा लागल जेना हमर किछु छिना गेल हो। हमरा लेल आब ई मामला सभ दिनक लेल अज्ञात आ रहस्यमय भऽ गेल रहय। लेकिन नहि, जीवनमे कोनो चीज अंतिम नहि होइत छै। भरिसक एक साल बीतल हेतै। एक दिन सांझुक पाँच बजे फोनक घंटी बजऽ लगलै। हेतै ककरो। हम अन्यमनस्क भाव सँ सोचलहुँ। कैकटा भटकल फोन अबैत रहैत छै। मगर नहि, ओम्हरसँ कोनो लड़कीक आवाज एलइ, पातर-मधुर आवाज आ फोन कटि गेलै। हम सोचमे पड़ल रही कि फोनक घंटी फेर बज्ऽ लगलइ। हलो !'-हम रिसीभर उठा कऽ कहलिऐ। ' कने, प्रेमीकेँ बजा देबै ?' अरे ! ई तऽ वएह लड़की छिऐ। अपन नाम आ काम बतेने बिना प्रेमीकेँ बजा देबाक अनुरोध करयवाली। ओ बहुत दिनक बाद फोन केनेछल, तैं खौंझ तऽ नहि भेल, लेकिन मनमे थोड़े उदासीनता पसरि गेल। 'देखइ छिअइ।'-हम कहलिऐ। 'पाँच मिनट मे हम फेर करै छी।' 'ठीक छै।'—हम विरक्त सन कहलिऐ। देखिऐ या नइँ देखिऐ, एहि दुविधामे पड़ल-पड़ल हम ओहि कोठलीमे पहुँच गेल रही, जाहि कोटलीक खिड़कीसँ प्रेमीक कोठली देखाइत रहै। लेकिन पहिने जकाँ हम प्रेमीकेँ हाक नहि देलिऐ। आइ-काल्हि प्रेमीक माय-बाप एतहि छै। खिड़की सँ ओहि पार तकिते ओ दुनू अभरल। मकानक मरम्मत होइत रहै। प्रेमीक कतहु अता-पता नहि छलै। भरिसक कोठलीक भीतर हो। हम ठाढ़ भेल देखैत रहलिऐ। भऽ सकैत अछि प्रेमी कोठलीसँ बाहर निकलि आबय। आयल तऽ फोन दिआ कहबै।एक बेर भेल जन सँ पुछिऐ प्रेमी छै कि नहि, फेर छोड़ि देलिऐ। सोचलहुँ फोन उठेबे ने करबै। लेकिन एहन भऽ नहि सकल। ओ पांच मिनटक अंदरे फोन केलकै आ हम उठाइयो लेलिऐ। 'प्रेमी नहि छै। कतहु निकलल छै। ओकर माय-बाप आयल छै। घरक काज चलि रहल छै।’—अपन निष्ठामे खोटक अनुभव करैत हम एक साँसमे ई सब कहि गेलिऐ। ओ निराशा आ सोचमे डूबल बाजल—'अच्छाऽ !’ हम पुछलिऐ-'अहाँ के बाजि रहल छी ?’एकर ओ सोझ जवाब नहि देलक। बातकेँ ओ जहिना घुमेनाइ-फिरेनाइ शुरू केलकै, हमरा बुझा गेल ओ पहिनहि जकाँ सवालकेँ टारि देत। लेकिन आब ओ बेसी अनुभवी, पटु आ सियान भऽ गेल छल। ओकरामे साहस आ निर्भीकता आबि गेल छलै। 'अकल, हम नया बजारसँ बाजि रहल छी।'-ओ आवाज सँ हमर उमेर ठेकना लेलक, तैं अंकल कहि रहल अछि;हम सोचलहुँ। ओकर अंकल कहनाइ कने खटकल, फेर लगले सामान्य भऽ गेलहुँ। 'ठीक छै, नया बजारसँ बाजि रहल छी, मगर छी के, से न बताउ ?’-अपन स्वरमे बहुत नरमी अनैत हम धीरे-धीरे कहलिऐ। 'हम प्रेमीक ममिऔत बहीनक सखी भेलिऐ।’-आब ओ सहज भेल जाइत रहय। तइयो अपन नाम तऽ ओ नहिएँ बतेने रहय। हमरा लागल ओ जरूर नाज-नखरावाली, शोख आ चंचल होयत। ओकर गप करबाक ढंग मोहक रहै। 'अहाँ अपन नाम नहि कहब ?’-हम जेना गोहारि केलिऐ। 'रितु।हमर नाम रितु अछि।’-हमर अभ्यर्थना सँ जेना ओ पघिल गेल रहय। आब ओकरा कोनो हड़बड़ी नहि छलै आ ओ निचेन सँ गप्प कऽ रहल छल। 'किछु कहबाक हो तऽ कहू, हम ओकरा कहि देबै।’-हम प्रेरित केलिऐ। ओ सोचमे पड़ि गेल फेर पुछलक- 'अहाँकेँ ओकर नवका मोबाइल नम्बर बूझल अछि?’ हम कहलिऐ- 'न्न, मगर हम पूछि कऽ राखब। 'ओकरा कहि देबै काल्हि एगारह बजे फोन करबै।’ मन पड़ल काल्हि तऽ हमरा दस बजे कतहु निकलबाक अछि, तैं कहलिऐ-'एगारह बजे नहि, दस बजे करब।’ 'ठीक छै।’-ओ कहि तऽ देलकै, लेकिन हमरा लागल जेना ओकरा अपन बात पर संदेह होइ। ओ फोन राखि देलक। फोन पर रहल ओकर संग आब छूटि गेल छल।आइ ओ बड़ी काल धरि आत्मीय जकाँ गप्प केने रहय। फोन राखि देलाक बादो हम ओत्तहि ठाढ़ रहि गेल रही, जेना किछु और कहबाक हो, किछु और सुनबाक हो। हमरा छगुन्ता भेल, ओहि लड़की लेल हम किऐ उदास भऽ रहल छी ? दस बजे। काल्हि दस बजे। कोनो मंत्र जकॉं इ हमर भीतर बजैत रहल आब प्रेमी केँ ताकय पड़त। काल्हि दस बजे सँ पहिने बतबय पड़त जे ओकर फोन आबऽ वला छै। साँझे मे कहि देनाइ ठीक हेतै। भोरमे छुट्टी नहि रहत।जँ ओ खिड़कीसँ देखा गेल, तखन तऽ कोनो बाते नहि, नहि तऽ ओकर खोजमे चक्कर काटय पड़त। साँझ केँ बेसी काल ओ किरानाक एकटा दोकानमे बैसल रहैत अछि। पहिने ओत्तहि देखबै।नहि भेटल तऽ ओकर घर जाय पड़त। लेकिन घर पर तऽ ओकर माय-बाप छै ! माय-बापकेँ लड़कीक फोन दिआ कहब ठीक नहि हेतै। खैर, देखल जेतै। अखन तऽ बहुत समय छै। भऽ सकैत छै ओ खिड़कीसँ देखाइए जाय। हम बेर-बेर खिड़की लग जाय लगलहुँ। ओतय जाइ, कनी काल ठाढ़ रही आ थाकि कऽ घूरि जाइ। अपन छाहे जकाँ ओ लड़की हमर संग-संग चलि रहल छल, प्रेमी नामक रौदमे कखनो पैघ आ कखनो छोट होइत। रितु आ प्रेमीक चुम्बकत्व हमरा आविष्ट कऽ लेने छल। ओहि दिन प्रेमी नहि भेटल। राति मे हम सपना देखैत छी जे ओ दुनू आयल अछि। घरमे हम असकर छी। दुनू केँ कोठलीमे बैसा कऽ हम बाहरमे टहलि रहल छी। कोनो चीजक खसला सँ निन्न टूटि जाइत अछि। रौद भऽ गेल छै। मन पड़ैत अछि आइ दस बजे रितुक फोन एतै। प्रेमीकेँ कहबाक अछि। हम बिछान छोड़ि उठि जाइत छी। एकाकी आब कोनो चीजक कोनो ठेकान नहि रहलै। कुसेसर सोचैत रहय जे डाक्टर राउण्ड पर एतै तऽ अस्पतालक एहि नरकसँ फारकती लऽ कऽ ओ घर चल जायत। भोरे सँ ओकर मन खनहन बुझाइत रहै। ओकरा दोसरे सन बुझाइत रहै जेना आब ओ नीके भऽ गेल हुअय। भर्ती भेल छल तखन बहुत तेज बोखार रहै आ होइ जे नहि बचब। जाधरि बेसोह रहल, घरनी रहलै। बोखार कने उतरलै तऽ चल गेलि। घर पर छोट-छोट बच्चा रहै। अस्पतालमे अटकब कुसेसरकेँ आब नीक नहि लागैत रहै। घर जेबाक आसमे बिछौन पर पड़ल-पड़ल पूरा दिन बीत गेलै। साँझ पड़ि गेलै तइयो डाक्टर नहि एलै। ओकरा बुझेलै जे आब आइयो ओकरा नहि जा भेलै। ओकर मन भारी आ उदास भऽ गेलै। भादोक स्याह अन्हार पसरि गेलै। सब चीज रहस्यमय आ भयाओन बुझाय लगलै। एकटा रोगी नहि जानि कहिया सँ बेहोस पड़ल छलै। ओकरा पानि चढ़ैत रहै। एकटा बूढ़, जकरा खाली हाड़े टा बचल रहै, अथबल भेल पड़ल छलै।पता नहि ओकरा कोन रोग रहै। घंटी भेलै। वार्डक मुँहथरि पर रोगी सभक खाइक एलै। एकटा असकरुआ रोगी दालि लेबाक खातिर कुसेसर सँ गिलास माँगि कऽ लऽ गेलै। सगरे ततेक घिनायल आ गंध टुटैत रहै जे कुसेसरकेँ अस्पतालमे मन नहि बसै। ओ खाइक नहि लेलक। बिछौन पर पड़ल रहल। ओकरा कमजोरी रहै। बेसी काल बैसने डाँड़ दुखाय लगै। कोनो चीज क्यो देखऽ वला नहि छै। ओ घर गेल कि नरक मे पड़ल अछि, ताहिसँ ककरा कोन मतलब छै। इएह सभ सोचैत ओ खौंझायल चल जाइत रहय कि तखने एकटा मित्र एलै। मित्र कैँ देखि ओकरा अतीव प्रसन्नता भेलै। मित्र कैक बेर जेबा ले उठलै, लेकिन कुसेसर ओकरा रोकि लैत रहै। ओकरा होइ मित्रक जाइते जेना सभ चीज छूटि जेतै। बैसल-बैसल मित्र अकच्छ भऽ गेलै। तखन मित्रक संग ओहो विदा भेल। सोचलक कोनो दोकानमे किछु खा-पी लेत आ ओतबा काल अस्पताल सँ दूर रहत। मित्रकेँ विदा कऽ कऽ जखन ओ दोकानसँ घूरल तऽ रातिक एगारह बजैत रहै। सभ सूति गेल छलै। दू-तीन गोटय जागल रहै। मेघौन आ गुमकी कऽ देने छलै। कुसेसर लोहाक पलंग केँ घीच कऽ खिड़कीक बीचोबीच केलक। बिछौन ठीक केलक। एतबे सँ ओ थाकि गेल आ ओकरा पियास लागि गेलै। पानि दूरसँ आनय पड़ैत रहै। अन्हार आ थाल-कीच मे ओतेक दूरसँ पानि आनब अबूह बुझाइत रहै। एहिठाम वार्ड मे ओ ककरा कहतै आ के आनि देतै। की करय-ओ सोचैत रहल। राति भरि पियासल रहि जाय ? ओकरा बुझेलै जेना ओ एकदम असकर पड़ि गेल हुअय। दोकान सँ जखन ओ घूरल रहय तऽ वार्डमे ढुकिते ओकरा भेलै ओ बेकारे अस्पताल मे रहि गेल। ओकरा तखने चलि जेबाक चाही छल जखन साँझ केँ डाक्टर राउण्ड पर नहि एलै। अस्पतालमे रहि कऽ ओ की कऽ रहल अछि। आब कोन बेमारी ओ ठीक कराओत ? डाक्टरसँ देखेने बिना जँ ओ चलि जाइत तऽ की भऽ जइतिऐक। ओ मरि थोड़े जाइत। ई सभ बात ओकरा पहिने किएक नहि फुरेलै ? कुसेसर बहुत पछताय लागल। ओकर घर डेढ़ कोस पर रहै।आब एतेक रातिकेँ घर जेबाक समय नहि रहलै। रिक्शो नहि भेटतै। कुसेसर कछमछ कऽ रहल छल। मच्छर कल नहि पड़य दैत रहै। पानि रहितैक तऽ निन्न वला गोटी खा कऽ ओ सूति रहैत। दू-तीन बेर मुँह-तुँह झाँपि ओ सुतबाक कोशिश केलक। लेकिन गुमार लागऽ लगैक आ होइ जेना दम औनाय जायत। कुसेसर वार्डसँ बाहर निकलि आयल। पानि-थाल टपैत कल पर गेल। पानि पीलक। फेर घूमल। लेकिन वार्ड दिस घुमिते ओकर मन भारी भऽ गेलै। ओ ठमकि गेल। चारू कात हियासलक। दूर एकटा रिक्शा अभरलै। कुसेसर बड़ी काल धरि ठाढ़ भेल सोचैत रहल। दू बजि गेल हेतै। तीन घंटामे भोर भऽ जेतै। आब एतबा काल ले की हेतै। ओकरा बिलमि जेबाक चाही। ओ वार्ड दिस घूमल। लेकिन ओकरा बुझेलै जेना क्यो पयर छानि लेने हो। घर जेबाके छै तऽ बिलमि कऽ की करत ? ओ रिक्शा लग पहुँचल। रिक्शावला रिक्शे पर घोंकड़ी लगेने निसभेर सूतल छलै। हिला—डोला कऽ जगेलक, लेकिन जेबा ले तैयार नहि भेलै। ओकरा भेलै पयरे चल जाय। सामान काल्हि आबि कऽ क्यो लऽ जेतै। एहि अन्हार गुज्ज रातिमे असकर एतेक दूर जायब ओकरा भयाओन बुझेलै। ओ दुविधामे पड़ल बढ़ल चल जाइत छल, लेकिन बहुत धीरे –धीरे जेना टहलि रहल हो। ओकरा अखनो विश्वास नहि रहै जे ओ ठीके घर चल जायत। सड़क कातक कोनो—कोनो दोकानमे ढिबरी बरैत रहै। दूरसँ बुझाइ जेना ओ सभ खूजल हो। लेकिन सभ निसबद आ बेजान रहै। अचानक पानि झिसिआइ लागलै। चेहरा पर पड़ैत फूही ओकरा बहुत शीतल आ सुखद बुझेलै। भेलै एकदम भिजैत चल जाय। लेकिन भीज गेला पर सर्दी भऽ जेतै आ ओ फेर दुखित पड़ि जायत। ओ आपस वार्ड चलि आयल। वार्डमे भिनसरबाक निस्तब्धता छलै। पानि झिसिआइत रहै आ हवा सिहकैत रहै। एक-आध टा मच्छर अखनो लागैत रहै। कुसेसर मूड़ी गोंति कऽ सुतबाक चेष्टा करऽ लागल। निन्न जेना अलोपित भऽ गेल रहै। पता नहि कते काल एना रहलै। क्यो कानब शुरू केलकै। कुसेसर अकानैत रहल। बुझाइत नहि रहै आवाज कतऽ सँ आबि रहल छै। क्यो मद्धिम स्वरमे कानैत रहै। ओकर कानबमे तेहन वेदना छलै जे कुसेसर विचलित भऽ गेल। जेना खिंचायल चल जा रहल हो तहिना बिछौन छोड़ि आवाजक दिशामे ओ विदा भऽ गेल। मद्धिम स्वरक कारणे बुझाइ जेना कतौ दूरमे क्यो कानि रहल हो। लेकिन ओ वार्डक मुँहे लग छलै। एकटा अधेड़ स्त्री कानैत रहै। मुँह-तुँह झाँपि कऽ ओ चित्त पड़लि छलै। देखने सँ लगै जेना सूतल हो। एहि स्त्रीकेँ की भेल छै ? वार्डक मुँहथरि पर ठाढ़ भेल कुसेसरकेँ छगुन्ता भेलै। बड़ी कालक बाद ओहि बाटे जाइत आदमी कहलकै---ओकर घरवला मरि गेल छै। ओकर झाँपल—तोपल लहास वार्डक गेटे लग कुसेसरक बगलमे पड़ल छलै। ओहि रोगीकेँ दिनमे एक बेर कुसेसर देखने रहै। ओकर जर्जर शरीर केँ देखिते कुसेसरकेँ अपन पिता मोन पड़ल छलै। जखन ओ दोकान चल गेल रहय ओही बीच ओ मरल हेतै। कुसेसरकेँ एकदम पता नहि चललै। एगारह बजे रातिमे जखन ओ घूरल रहय तखनो लहासक बगले देने गेल रहय, लेकिन ओकर ध्यान नहि गेलै। तखनो लहास झाँपल रहै आ नीचामे धूपबत्ती जरैत रहै। एना होइत छै। सोगमे लोग कानैत—कानैत सूति रहैत अछि आ निन्न टुटिते फेर कानय लगैत अछि। ओहि स्त्रीक विलाप एहने रहै। कुसेसर अवसन्न आ उदास भेल ठाढ़ छल। पानिमे तीतल जड़ौन हवाक झोंक आबि रहल छलै। स्त्रीक विलाप पानि—बुनी वला ओहि कारी स्याह भदवरिया रातिकेँ और भारी बना रहल छलै। स्त्रीक विलाप कुसेसरक कोंढ़क भीतरी तहमे पैसि रहल छलै आ ओकरा भेलै जेना आब ओ फाटि जेतै। ओ ओहिठामसँ हटि गेल। लेकिन अपन बिछौन धरि जाइत—जाइत ओकर बुक भांगि गेलै। ओ बिलखय लागल। फेर अपनाकेँ सम्हारलक। चुप भेल। भोर भऽ रहल छलै आ ओकरा घर जेबाक रहै। कनियाँ-पुतरा जेना टांग छानै छै, तहिना ऊ लड़की हमर पएर पाँज मे धऽ लेलक आ बादुर जकाँ लटैक गेल। ओकर हालत देख ममता लागल। ट्रेनक ओइ डिब्बा मे ठाढ़ भेल-भेल लड़की थाइक कय चूर भऽ गेल रहै। कनियें काल पहिने नीचे मे कहुना बैठल आ बैठलो नै गेलै तऽ लटैक गेल। डिब्बा मे पएर रोपै के जगह नै छै। लोग रेड़ कय चढ़ै-ए, रेड़ कय उतरै-ए। धीया-पूता हवा लय औनाइ छै, पाइन लय कानै छै। सबहक जी व्याकुल छै। लोग छटपटा रहल-अय। हम अपने घंटो दू घंटा सऽ ठाढ़ रही। ठाढ़ भेल-भेल पएर मे दरद हुअय लागल। मन करय लुद सिन बैठ जाइ। तखैनिये दूटा सीट खाली भेलै, जइ पर तीन गोटय बैठल। तेसर हम रही जे बैठब की, बस कनेटा पोन रोपलौं। ऊ लड़की ससैर कय हमरा लग चैल आयल। पहिने ठाढ़ रहल, फेर बैठ गेल। फेर बैठले-बैठल हमर टांगमे लटैक गेल। जखैन ऊ ठाढ़ रहय तऽ बापक बाँहि मे लटकल रहय। ओकरा हम बड़ी काल लटकल देखने रहिऐ। ओकर बाप अखैनियों ठाढ़े छै। छोट बहीन आ भाय ओकरे बगल मे नीचे मे बैठल औंघा रहल छै। ऊ जे टांग छानने ऐछ, से हमरा बिदागरी जकाँ लाइग रहल-अय। जाइ काल बेटी जेना बापक टांग छाइन लै छै, तेहने सन। ने ऊ कानै-अय, ने हम कानै छी। लेकिन ओकर कष्ट, ओकर असहाय अवस्था उदास कऽ रहल-अय। हम निश्चल-निस्पंद बैठल छी। होइए हमर सुगबुगी सऽ ओकर बिसबास, ओकर असरा कतौ छिना नै जाय। हाथ ससैर जाइ छै तऽ ऊ फेर ठीक सँ टांग पकैड़ लै अय। लड़की दुबर-पातर आ पोरगर छै। हाथ मे घड़ी। प्लास्टिकक झोरा मे राखल मोबाइल। लागै छै नौ-दस सालक रहय। मगर कहलक जे बारह साल के ऐछ। सतमा मे पढ़ै-अय आ ममिऔत भाइक बियाह मे जा रहल-अय। बेर-बेर जे हाथ ससैर जाइत रहै से आब ऊ हमर ठेंगहुन पर मूड़ी राइख देलक-अय। जेना हम ओकर माय होइ अइ। ओकर माय संग मे नै छै। कतय छै ओकर माय? जकर कनहा पर, पीठ पर, जाँघ पर कतौ ऊ मूड़ी राइख सकैत रहय। हम ओकर माथ पर हाथ देलिऐ। ऊ और निचेन भऽ गेल जेना। एक बेर गाड़ीक धक्का सऽ ऊ ससैर गेल; सोझ भेल आ ऑंइख खोललक। एक गोटय कहलकै- दादा कय कसि कय पकड़ने रह। अंतिम टीशन आइब रहल छै। सब उतरै लय सुरफुरा लागल-अय। अपन-अपन जुत्ता-चप्पल, कच्चा-बच्चा आ सामान कय लोग ओरियाबय लागल-अय। राइत बहुत भऽ गेल छै। सब कय अपन-अपन जगह पर जायके चिन्ता छै। बहुत गोटय ठाढ़ भऽ गेल ऐछ। ऊ लड़कियो। हमहूँ ठाढ़ भऽ कऽ अपन झोरा उतारै छी। तखनियें नेबो सन कोनो कड़गर चीज बाँहि सऽ टकरायल। बुझा गेल ई लड़कीक छाती छिऐ। हमर बाँहि कने काल ओइ लड़कीक छाती सऽ सटल रहल। ओइ स्पर्श सऽ लड़की निर्विकार छल; जेना ऊ ककरो आन संगे नै, बाप-दादा या भाय-बहीन सऽ सटल हो। ओकर जोबन फूइट रहल छै। ओकरा दिस ताकैत हम कल्पना कऽ रहल छी। अइ लड़कीक अनमोल जोबनक की हेतै ? सीता बनत की दरोपदी ? ओकरा के बचेतै ? हमरा राबन आ दुरजोधनक आशंका घेरने जा रहल ऐछ। टीशन आइब गेलै। गाड़ी ठमैक रहल छै। लड़की हमरा देख बिहुँसै—अय; जेना रुखसत माइंग रहल हो। ई केहन रोकसदी ऐछ! ने ऊ कानै छै, ने हम कानै छी। ऊ हँसै-अय, हमहँ हँसै छी। लेकिन हमर हॅसी मे उदासी अय। कबाछु ओ बेंच पर बैसल ट्रेनक प्रतीक्षा करैत रहय। 'शी-इ-इ।’ वला सिसकारी सुनिते ओकर छाती धक सिन उठलैक। बिन देखनहि ओकरा बुझा गेलैक, चम्पीवला आबि रहल छैक। आबिते नून—लस्सा जकाँ सटि जेतैक। चाहे अहाँ केहनो परिस्थितिमे रहू, ओ आबिते अहाँक हाथ या कनहा धऽ लेत। ओकर एहि चालि पर ओकरा खौंत नेस दैत छैक। एक दिन ओ बिख सनक बात कहि देने रहै। ओ तइयो अपन चालि नहि छोड़लकै। ई बुझितो जे चम्पीवला आबि रहल छैक ओ मटियेने रहल। पत्रिका पर आँखि गड़ौने सोचलक जे व्यस्त आ उदासीन देखि कऽ ओ चल जायत। लेकिन नहि। ओ आबि कऽ सोझा मे ठाढ़ भऽ गेलैक आ सिसकारी पाड़लकै--- 'शी-इ-इ! आब अनठेनाइ असंभव छलै। ओ मूड़ी उठा कऽ चम्पीवला दिस तकलकै। चम्पीवला पुरान यार जकाँ रभसल दृष्टिएँ ताकि रहल छलैक आ नजरि मिलते नि:संकोच हाथ धऽ लेलकैक। बेंच पर ओकर दुनू कात संभ्रान्त आ परिचित व्‍यक्ति सभ बैसल रहैक। एहन अवस्‍था में चम्‍पीवलाक धृष्‍टता बहुत अशोभनीय आ फूहड़ छलैक। चम्पीवला पर ओकरा बड्ड तामस उठलैक। 'की कऽ रहल छेँ ?’— ओ टिरसलै। चम्पीवला कोनो परवाह नहि केलकै आ ओ जे टांग पर टांग चढ़ेने बैसल रहय तकरा अलग करबाक जेना आदेश दैत जाँघ पर हाथ राखि देलकै। देहकेँ ढील छोड़ि देने चम्पी करबामे ओकरा सुविधा होइतैक। 'बेहूदा नहितन !’ – जाँघ पर राखल चम्पीवलाक हाथकेँ जेना ओ काछि कऽ फेकलकै। ओकर एहि व्यवहारसँ चम्पीवला हतप्रभ नहि भेलै, बल्कि ढीठ जकाँ कहलकै—'एक बेर छूबल देहकेँ फेर छूबऽ मे कथीक संकोच ?' चम्पीवला बहुत पैघ बात कहि देने रहैक जे साँच तऽ रहैक, किन्तु ओहिसँ ओ लजा आ खौंझा गेल। ओकरा बुझेलै जेना ओ स्त्री हो आ ई चम्पीवला ओकर पुरान यार। चम्पी आ मालिश करायब ओकरा बहुत अश्‍ली बुझेलै। देखै नहि छिही, कतेक गरमी छैक !’— चम्पीवलाक बातमे जे धार छलैक तकरा भोथरेबाक लेल ओ एकटा बहाना बनेलक। 'हँ ठीके, गरमी तऽ बहुत छैक।’— अपन निराशाकेँ नुकेबाक लेल चम्पीवला बजलै। चम्पीवलाक चलि गेला पर ओ अवग्रहसँ छूटल, मुदा चम्पीवलाक दीनताक लेल ओकरा अफसोस भेलैक। ठाम-कुठाम आ समय- कुसमय वला महीन समझ जँ चम्पीवला मे रहितिऐक तऽ एहनो गरमी मे ओ चम्पी करा सकैत रहय। लेकिन एहन बुधि सँ ओकर पेट नहि चलतैक। ओ एहिना फेर कहियो गाड़ीमे या स्टेशन पर भेटि जेतैक आ सिसकारी पाड़ि कऽ चम्पी करेबाक इशारा करतैक—शी-इ-इ ! जेना पटेबाक लेल कोनो छौंड़ा कोनो छौंड़ीकेँ कनखी मारैत हो। ई सोचिते चम्पीवलाक प्रति ओकर वितृष्णा बढ़ि गेलैक। कारबार ओ सभ अचानक सड़क पर भेटि गेल छलाह। हम अपन होटल घुरैत रही, तखने हुनका सभ पर नजरि गेल। ओ सभ चारि गोटय छलाह। दू गोटय केँ हम चिन्हैत रही। ओ दुनू हमर परिचित रहथि। हुनका दुनू केँ एतेक दिनक बाद देखि कऽ हमरा आश्चर्य आ प्रसन्नता भेल। वर्मा सँ तऽ घनिष्ठता रहय, मुदा दोसर नवयुवक सँ मात्र परिचय। हम वर्मा सँ पुछलिऐन—कहू-कहू , कुशल कि ने ? वर्मा हमर प्रश्‍नक कोनो जवाब नहि देलथि। कहलनि — अहाँ बढ़िया मौका पर भेटल छी। आउ, चलै छी। हम पुछलिऐन – कत्तऽ ? तऽ वर्मा कहलनि — चलू ने ! फेर डेग बढ़बैत कहलनि –हिनका सँ परिचय करू। ई छथि मिस्टर सिन्हा। आ हिनका तऽ अहाँ जनिते हेबनि। हम मिस्टर सिन्हा सँ हाथ मिलबैत ओहि चारिम व्‍यक्तिक बारेमे सोचय लगलहुँ जे एकरा सँ कहिया आ कतय भेंट भेल छल; मुदा किछु मोन नहि पड़ल। हम सभ फुटपाथ पर चलय लगलहुँ। हम छगुन्ता मे पड़ल ई जनबाक लेल व्यग्र छलहुँ जे हम सभ आखिर कतय जा रहल छी। हमर व्यग्रता जल्दिए खतम भऽ गेल। कनेक आगाँ बढ़ल रही कि देखलहुँ ओ सभ बार दिस घुमि गेल छथि। बारक गेट पर दरबान ठाढ़ छल आ भीतर जाइबला हरेक आदमीकेँ सलाम ठोकैत छल। ओकर सलामी हमरा अवढंगाह बुझायल। ओ बहुत जोरसँ सलाम ठोकैत छल। बार एयरकंडीशंड छलैक। भीतर घुसिते शीतल बुझायल। पूरा हॉल मे हल्लुक नील इजोत पसरल छलैक। मद्धिम आवाज मे कोनो पॉप गीत बाजि रहल छलैक। बार मे बेसी मर्दे रहैक। कोन मे एकटा स्त्री अपन छोट बच्चा आ घरवलाक संग छलि आ आब उठि कऽ विदा होबऽ बला छलि। ओकर मुँह साफ साफ नहि देखाइत रहैक। अपन अपन टेबुल लग बैसल लोक खाइत पिबैत गपशप कऽ रहल छल। गपशप सुनाइत नहि रहैक। वेटर अबैत – जाइत रहैक। बुझाइत रहैक जेना ओ सभ धुंधमे चलि रहल हो। हम सभ एकटा टेबुलक दुनू कात बैसि गेल रही आ शराब आ खेबा - पिबाक वस्तुक प्रतीक्षामे रही। हम अपना लेल बीयर आनय कहने छलिऐक। तखने वर्मा बजलाह — दस बिगिंस आवर बिजनेस डिनर। ओ सभ नव कारबार शुरू कऽ रहल छलाह आ ओही खातिर एतय आयल छलाह। कारबारक ओरिआओन पूरा कऽ लेला पर ओ सभ प्रसन्न छलाह आ उछाह मे डिनर कऽ रहल छलाह। एक-एक पैग पिलाक बाद जखन हमरा सभ पर निशांक फुरफुरी शुरू भेल तऽ सिन्हा बाजल — भाइ, बिजनेस मिंस बिजनेस। बिजनेस अलग छै, दोस्ती अलग। दोस्तीक रूपमे हम अहाँक एक बेर मदति कऽ सकैत छी, दू बेर कऽ सकैत छी। लेकिन जँ अहाँ बिजनेस मे हमर समय लेब तऽ हमर समयक तऽ मोल अछि। आ ओ अहाँ केँ देबहि पड़त। हमर एकटा नव दोस्‍त रहय। एक दिन ओ आयल आ कहलक — यार, वाइफ केँ टी.भी. किनबाक बड़ सेहन्ता छैक। किछु पाइ अछि, किछु तों दऽ दे तऽ कीनि ली। हम ओकरा एकटा नव सेट बेसाहि देलिऐक। किछु दिनक बाद ओ फेर आयल। कहय लागल यार, वाइफ फ्रिज लेल कहि रहल अछि। हम कहलिऐ — नाउ दिस इज टू मच। सिन्हा एक पैग और पीलक। सिगरेट धरेलक आ बाजय लागल — सभ चीजक मोल होइत छैक। एकटा खिस्सा सुनबैत छी। ध्यान सँ सुनबै आ कहब। एकटा स्त्री छलि। ओकर घरबला बेराम पड़ि गेलै। डॉक्टर लग लऽ गेलि। डॉक्टर कहलकै ऑपरेशन करय पड़तैक। ओहि स्त्री लग पाइ नहि छलैक आ डॉक्टर बिना पाइ लेने ऑपरेशन करक लेल तैयार नहि भेलै। ऑपरेशन नहि भेलासँ ओकर पति मरि जइतैक। ओ अपन पूर्व प्रेमी लग गेलि। ओकर पूर्व प्रेमी पाइ देबा लेल तैयार भऽ गेलै, मुदा ओकर एकटा शर्त्त रहै। शर्त्त ई रहै जे ओहि स्त्री केँ अपन पूर्व प्रेमी संगे एक राति बिताबय पड़तैक। हम सभ ई जनबाक लेल उत्सुक रही जे आब ओ स्त्री की करत। लेकिन तखने सिन्हा खिस्सा केँ ओत्तहि खतम करैत पुछलक — आब ई कहू जे गलती ककर रहै ? ओहि डॉक्टरक, पूर्व प्रेमीक या ओहि स्त्रीक ? हम सभ, जे एकटा मनलग्गू खिस्साक आनंद लैत रही, एकाएक चिन्ता मे पड़ि गेलहुँ आ सोचय लगलहुँ। बड़ी काल धरि क्यो किछु नहि बाजल। सभ नैतिकताक फाँस मे ओझरायल रहय। सिन्हा हमर सभक दुविधा केँ बूझि गेल आ बाजल –गलती ककरो नहि रहै। समस्याक एहि समाधान सँ हम सभ कने चौंकलहुँ, मुदा संतोषक अनुभव सेहो भेल। सिन्हा मामला केँ और स्पष्ट करैत बाजल – देखू , डॉक्टर जँ पाइ नहि लेत तँ ओकर रोजगार मारल जेतै आ ओकर पूर्व प्रेमी बिना किछु लेने एतेक पाइ किएक देतै ? आ ओ स्त्री जँ ओकरा संगे राति नहि बितायत तँ ओकर घरवला मरि जेतै। सिन्हाक स्पष्टीकरणक संगहि खिस्सा खतम भऽ गेल आ हमरा सभक भीतर चलैत उचित – अनुचितक उठा-पटक सेहो। हम सभ बार सँ निकलय लगलहुँ तँ दरबान फेर ओहिना जोर सँ सलाम ठोकलक। हमरा आब हरेक चीज मे पैसाक टनक सुनाय लागल, दरबानक सलामीयो मे। ओकर सलामी मे अवढँगपनी अखनो छलैक मुदा हम सभ ओकर अभ्यस्त भेल जाइत रही। बाहर आबि एहि डिनर लेल हम कृतज्ञता प्रकट कयलहुँ आ नव कारबारी सभ सँ विदा लऽ कऽ अपन होटल दिस चलि पड़लहुँ। मन भारी रहय। ओ स्त्री आ ओकर बेमार घरबला दिमाग मे चक्कर कटैत रहय। कुश्ती भोर धरि पता नहि चलल। ओ रातिये भऽ गेल छल। उठलाक कनेक कालक पछाति लुंगी पर नजरि गेल। कहियो कहियो सपना देखलाक बाद भऽ जाइत छैक, तेहने लागल। लूंगी दू तीन ठामसँ सूखिकेँ कड़ा भऽ गेल छलैक। सपना पर गौर कयलाक बादो कोनो ओहन सपना मोन नहि पड़ल। ओहुना ओकरा भेलापर निन्न खुजि जाइत छैक। निन्न राति खन नहि खुजल छल। तँइ कनेक आश्चर्य तखन धरि बनल रहल जखन धरि ठेहुन पर नजरि नहि गेल। पहिलो बेर एहिना भेल छल। सियाह दाग उभरलाक बाद पानिक गिरब आ फेर एकटा पैघ सन घाव। ओहि बेर दर्द नहि भेल छल। पपड़ीक कैक टा तह जमि कऽ उखड़ैत गेलैक आ करीब सप्ताहक भीतरे ठीक भऽ गेलैक। लुंगी पर पड़ल दागकेँ हम नुकबैत रहलहुँ। हम नहि चाहैत छलहुँ लोक एहन – ओहन पूछि देअय। दू-तीन बजे धरि हमर एकटा दोस्त आबि गेल। ओ हमरा संग लऽ कऽ हटिया जेबाक जिद करय लागल जे पछिला किछु दिनसँ हप्तामे दू बेर लगैत छलैक। ओहि ठाम ग्राम पंचायत दिससँ कुश्तीक आयोजन होइत छलैक। हटियाक प्रगतिक सभ टा दारोमदार कुश्तिये पर निर्भर करैत छलैक। लोकक एहन धारणा बनि गेल छलैक। ई बादमे मालूम भेल जे हटिया आरंभ करबा लेल गामक लोकक बीच खेतक गाछ लेल एकटा पैघ कुश्ती भऽ चुकल छलैक। कुश्ती बड़ दिलचस्प आ मजेदार छलैक। कइएक टा जोड़ामे गोटक एहन निकलिये अबैत छलैक जकर कलाबाजी पर लोक थपड़ी पाड़ैत छल। जनी – जातियो के एकाध झुंड मर्द सभ सँ फराक रहबाक कोशिश करैत कुश्तीक मजा लऽ रहल छलैक। कुश्ती करैत-करैत एक टा जोड़ा आगाँ बैसल लोक सभ पर अचानक खसि पड़लैक। लोक पाछू दिस पड़ाय लागल। हमर ध्यान दोसर दिस छल। समय पर सावधान नहि भऽ सकलहुँ। ठेहुनपर जोरसँ चोट लागि गेल आ हम खसैत-खसैत बचलहुँ। हम चिकरिकऽ भीड़केँ गरियाबऽ लगलहुँ। कपड़ा खराप भऽ गेल छल। घावसँ खून बहैत छल। दोस्त सहानुभूति देखओलक आ हेल्थ सेंटर पर चलबाक सुझावदेलक। 'एखन क्यो हेतैक ?'— ई पुछैत हमर सभटा तामस हेल्थ सेंटर पर केन्द्रित भऽ गेल। ओ सेंटर बन्ने रहैत छलैक। दू टा कर्मचारी छलैक, जे सप्ताहमे कोनो एक दिन चल अबैत छलैक आ फेर अपन –अपन गाम। जरूरतमंद लोक केँ भरि सप्ताह हेल्थ सेंटरक चक्कर लगबऽ पड़ैत छलैक किएक तँ ओ सभ कहियो मिनिस्टरक आकस्मिक दौड़ा जकाँ आबि सकैत छलैक। आइयो हम ओकर खुजल रहबाक उमेद लऽ कऽ नहि चलल छलहुँ। तँइ ताला देखि बेसी निराशा नहि भेल। सेंटरक उपयोगितापर गौर करैत क्यो लकड़ीक बोर्ड, जे सेंटरक अस्तित्वक प्रमाण छलैक , केँ उनटि देने छलैक। हमसभ घुरि रहल छलहुँ तखने देबालक पाछुसँ कोनो चीज खसबाक आवाज आयल। एक टा छौड़ा घर लऽ जेबा लेल ईंट जमा कऽ रहल छल। छौंड़ा पहिने कनेक सकपकायल, फेर सम्हरि के दाँत चियारैत सफाइ देबऽ लागल। घावसँ खूनक बहब बन्न भऽ गेल छलैक , मुदा नस फूलय लागल छल। साँझ धरि माथमे एकटा भारीपनक अनुभव हुअय लागल। देह टूटय लागल जेना बुखार अयबासँ पहिने होइत छैक। फेर कँपकँपी शुरू भऽ गेल। हम सीरक ओढ़ि बिछौनपर पसरि गेलहुँ। दोस्त अखनो घूर लग बैसले छल। फेर आरो लोकसभ आबि गेल छलैक। हुनका सभक बीच कोनहु गप्प कतहुसँ शुरू भऽ जाइत छलैक। कनेक पहिने हमर घावक बात शुरू भेल छलैक आ आब सेंटरक पछारी चलऽवला पालिटिक्सक पर्दाफास भऽ रहल छलैक। बेसी हल्ला-गुल्लाक कारणे हुनका सभपर हम खौंझाय लागल छलहुँ। हम अपन मूड़ी सीरक तर कऽ लेलहुँ आ काछसँ ऊपर बनल गिल्टी टोबऽ लगलहुँ। भोरे उठलापर ताजगीक अनुभव भेल। घावपर कपड़ा सटि गेल छलैक। घाव काल्हिए सन ताजा छलैक। छोट भाय तकलीफ दिया पूछिकेँ चलि गेल। छोट भाय् मायसँ घावक मादे किछु नहि कहने छलै। बता देने रहितै तँ माय परेशान भऽ कइएक बेर हमरा लग आबि गेल रहैत। ओना हम घावकेँ लऽ कऽ कनेको चिन्तित नहि छलहुँ। सोचि नेने छलहुँ जे पहिल बेर जकाँ सहजे ठीक भऽ जेतैक। कपड़ापर दाग उभरि अबैत छलैक आ ओइपर माछी भिनकऽ लगैत छलैक। हम मात्र अहीसँ परेशान रही। दुपहर धरि अड़ोस-पड़ोसक लोकसभ दाग देखि पूछताछ कयलक। हमरा क्रमिक रूपसँ घावक पूरा हुलिया दिअय पड़ल। लोकसभ एहने स्वभाववला घावक कइएक टा दृष्टान्त देलक। घावसँ सम्बद्ध व्‍यक्ति सभक पूरा खिस्सा सुनौलक फेर अपन अपन अनुभवक अनुकूल आ प्रमाणित निदान बतौलक। किछु सहानुभूति प्रकट कयलक, किछु कँ घृणा भेलै आ किछु तटस्थ भाव लेने चलि गेल। अपनासँ छोट उमिरक कइएक गोटेकेँ हम टारि देलियै। खाइत काल हमर छोट भाय संगहि बैसि गेल। एक तेहाइ हिस्सा खा लेबा धरि एक टा दाग फेर उभरि अयलैक आ माछी लागय लगलैक। छोट भायक नजरि प्रत्येक आध मिनटपर ओहीठाम चल जाइत छलैक। कनेक काल बाद ओकर खेबाक गति एकदम मंद पड़ि गेलै आ हमरा बुझायल जे ओकरा रद्द भऽ जेतै। हमरा पछतावा भेल जे ओ किएक हमरा संगे बैसि गेल। हम निर्णय लेलहुँ जे घाव रहबा धरि एहन समय संगे नहि बैसब। ओ बड्ड मुश्किलसँ ओहि भावकेँ मेटओलक। फेर ठंढ़ायल आत्मीय स्वरमे होमियोपैथ डाक्टर लग जेबा लेल कहलक। बहुत पहिने एकटा बीमारीक दौरान एलोपैथीपरसँ ओकर विश्वास खतम भऽ गेल छलै। ओना हमर एकटा मजकियल दोस्त ओकरे सोझाँ होमियोपैथीपर नमहर लेक्चर दैत कहने छलै जे एहि पैथीक पाउडरमे दबाइ कम पाइ बेसी चलैत छैक। खाकऽ उठैत-उठैत हमर घावक मादे जननिहारक संख्या किछु आर बढ़लैक। किछु गोटे घाव देखाबऽ लेल कहलक। एहि काजमे हमरा सभसँ बेसी हिचकिचा - हटि होइत छल। मायकेँ जाहि समय सूचना भेटलै, तखने हमर छोट भाय ककरोसँ झगड़ा कऽ रहल छल। माय बेसी ध्यान नहि दऽ सकल। कर्पूर आ नारियरक तेल लगाबऽ लेल कहि जिम्हर भाय झगड़ा करैत छल, ओम्हरे जाय लगल। भाय आब गारिपर उतरि लायल छल—'सार, हटियाक सभ कुश्ती घुसाड़ि देब !’ हमहूँ तेजीसँ ओम्हरे दौड़लहुँ। मालूम भेल आरि छाँटि-छाँटि करीब बीत भरि खेत ओ अपन खेतमे मिला लेने छलैक आ आब नापियो मानय लेल तैयार नहि। हम भायकेँ शांत कयलहुँ। बहुत राति धरि एहि तरहक कतेको समस्या पर गप्प सप्‍प होइत रहलैक जाहिसँ हमरासभकेँ निपटबाक अछि। माय हमरासँ शिकाइत करैत रहल जे हम बहुत लापरवाह भऽ गेल छी। बिछौनपर जाकऽ हमरा ध्यानमे आयल जे दुपहरियासँ एखनधरि सभ चर्च घावसँ हटिकऽ होइत रहलैक अछि आ एकाएक हम एक तरहक आरामक अबुभव करय लगलहुँ। फेर सोचय लगलहुँ हम एहि कोठलीमे सभ कपड़ा उतारि नग्न भऽ जाइ, घावक सभटा चेन्ह मेटा जाइक, अंग-प्रत्यंग निर्विकार आ सुन्‍दर देखाय लागय। मुदा तुरत्ते एहन हैब असंभव छलैक। आस्ते—आस्ते हम निन्नमे डूबैत गेलहुँ। हमरा लागल जेना हम कइएक गोटासँ लड़ि-झगड़ि रहल छी। ठेहुनपर ओहिठामसँ खून बेसी मात्रा मे निकलि रहल अछि। भोरमे घाव फेर ओहिना छलैक। हम ठीक ढँगसँ किछु तय नहि कऽ पबैत अलहुँ जे पहिने गामक सभटा झगड़ासँ निपटि ली वा घावसँ। एहि अनिर्णयसँ उत्पन्न थकनीक कारण हम बहुत सुस्त भऽ केँ पड़ल छलहुँ। माय फुर्तिआह डेग उठौने हमरा लग आयल आ घाव ओहिना ताजा देखि तमसाय लागल। हम कहलियै—'गामक झगड़ा...’ वाक्य पूरा हेबासँ पहिने माय बाजव शुरू कऽ देलक –’बेराबेरी निपटि लेब ! तोँ पहिने घावक इलाज करा आबह।’ हम झपटि कऽ अंगा उठओलहुँ आ विदा भऽ गेलहुँ। कैनरी आइलैण्डक लॉरेल तुलसियाही बहुत दूरस्त छैक। ई सोचिते ओकरा आलस आबऽ लगैत छैक। ओतऽ जयबाक निर्णय गिरगिट जकाँ रंग बदलऽ लगैत छैक। ताकति छीन भऽ गेलैक अछि। पयरेँ चलब पहाड़ बुझाइत रहैत छैक। ओकरा दू दिन धरि साइकिलक बाट देखऽ पड़लैक अछि। उपिया एखन दस बजे लऽ कऽ आयल छैक। बैसाखक रौद झट दऽ कपार पर चढ़ि गेलैक अछि। रौद दिस तकिते ओकर साहस निपत्ता भऽ जाइत छैक। चौकी पर ओठंगि जाइत अछि। उपिया कहैत छैक—'आइ नहि जा सुभाष बाबू।’ ओ बाहर ताकऽ लगैत अछि — रौद...बाध ...मालजालक हेंज...। सात बरस भऽ गेल छैक तुलसियाही गेना। ओकरा छगुन्ता नहि होइत छैक जे एतेक समय कोना बीति गेलैक। खाली समयक एकटा दूरीक अनुभव होइत छैक। दीदी कतेको बेर समाद पठौलकैक आबऽ लेल। दीदीक आग्रहमे ओकरा कहियो उत्कट गंभीरता नहि बुझयलैक। ओकर नहि जयबा मे तुलसियाहीक दूरस्त भेनाइ सेहो एकटा कारण रहल होयतैक। ओ एक मास सँ किछु टाकाक जोगाड़मे अछि , नहि भऽ रहल छैक। पाँच दिन पहिने निर्णय लेलक। दीदी धनीक छैक। मँगतैक तँ टाका सहजेँ दऽ देतैक। जँ नहि दैक तखन ? ई प्रश्न ओकर दिमागक सैकड़ो फेरी लगौलकैक अछि। आ सभ् बेर ओ सोचलक अछि जे टाका नहि देतैक तँ ओकर एतेक दूर गेनाइ व्यर्थ भऽ जयतैक। एहन सोचैत काल ओ उदास होइत रहल अछि। ‘ममियौतक आवाज ओकर तल्लीनता तोड़ैत छैक—'मर हो सुबहास ! जेबह तँ जाह ,रौद भेल जाइत छह। नै तँ आइ छोड़िये दहक। अन्हरगरे उठिहऽ आ चलि दिहऽ। ओ जयबा लेल तत्पर होइत अछि। उपिया हँसैत कहैत छैक—'जा ने, धारक ओइ कात बालु पर बुझियहक केहन होइत छैक मजा।’ ओकर निर्णय एकबेर फेर कोसीक धसना जकाँ खसऽ चाहैत छैक। एकटा निष्‍प्राण मुस्‍की ओकरा चेहरा पर अबैत छैक। ओ फेर चौकी पर बैसि जाइत अछि आ बाहर देखऽ लगैत अछि...रौद...दूरस्त... धार.... बालु आ रुपैया। ओकरा मे एकाएक स्फूर्त्ति आबि जाइत छैक। ओ बिहाड़ि जकाँ साइकिल उठबैत अछि आ चलि दैत अछि। उपिया कहैत रहि जाइत छैक—'नहि जा सुभाष बाबू हे हौ... औ !’ घाटक ठीकेदारक खोपड़ी लग ओ साइकिल ठाढ़ करैत अछि। खोपड़ीमे चारि –पाँच गोटे छैक। ठीकेदार गामक कोनो गंभीर घटनाक व्याख्या कऽ रहल छैक। ओकर मोन होइत छैक, खोपडीमे जा कऽ बैसय। फेर ई सोचि रूकि जाइत अछि जे कानमे झड़ पड़तैक। ओ ठीकेदारक नामे ममियौतक लिखल चिट्ठी हाथा—हाथी बढ़ा दैत छैक। ठीकेदार 'जाउ’ कहि भाषण चालू कऽ दैत छैक। ओ कटारि पर देने नाह दिस चलि दैत अछि। ओकरा कटारिक डर होइत छैक। कतहु खसि नहि पड़य। धारमे गेरूवा पानि आबि गेल छैक। नाह छीट पर उतारि दैत छैक। छीटक बाद बहुत दूर धरि भरि जाँघ पानि छैक। ओ साइकिल कनहा पर उठा लैत अछि। अधे लग्गा टपैत साइकिल जानसँ ऊपर भारी लागऽ लगैत छैक। ओ साइकिल हेला दैत अछि। बालु आगि जकाँ तबि गेल छैक। साइकिल ससरैत नहि छैक। डेग रखिते लगैत छैक, झरकि गेल। कपड़ाक जुत्ता हैंडिलमे बान्हल छैक। एहन धीपल बालु पर जुत्तो अगिया जाइत छैक। ओ जी-जान सँ साइकिलकेँ ठेलैत दौड़ऽ लगैत अछि। पाछाँ सँ एकटा मोसाफिर कहैत छैक—'साइकिल ससुरारि मे देलक-ए ? कने बड़द जकाँ टिटकार दियौक।’ ओ बान्ह टपि कऽ निर्मली बजार अबैत अछि। कंठ सूखि गेल छैक। घामसँ गंजी अंगा सभ भीजि गेल छैक। एकटा चाहक दोकानमे बैसि जिराय लगैत अछि। पीठपर फलिया बन्हने मोटिया सभ एहि गद्दी सँ ओहि गद्दी जाइत-अबैत छैक। 'रामेसर,चाह दहक दू टा।’- धोती-गंजी पहिरने एकटा दुब्बर-पातर आदमी कहैत छैक। 'उधार नहि हेतह।’ 'अरे, हीयाँ नकदी माल है बाबू-ह।’ ओकर उत्तरसँ ओकरा प्रसन्नता होइत छैक। ओ अपनो लेल चाहक ऑर्डर दैत अछि। थोड़े-थोड़े धुक्कड़ शुरू भऽ जाइत छैक। गरदासँ आँखि बचयबाक लेल ओ आँखि मूनि लैत अछि आ डेस्क पर माथ टिका दैत अछि। आँखि लागि जाइत छैक। किछु हड़हड़ाइत छैक। ओ हड़बड़ा कऽ तकैत अछि। बोरा जकाँ लोककेँ लदने एकटा मोटर मनक मन गरदा उड़बैत कुनौली दिस जा रहल छैक। भरिसक चारि सँ पहिने चलऽ वला समय नहि होयतैक। ओ प्रतीक्षा करैत रहैत अछि। लोकपेरिया पर, लीखपर धुक्कड़क विरूद्ध ओकर साइकिलक पहिया फेर संघर्षरत होबऽ लगैत छैक। ओकरा कतेको बेर लगैत छैक , आब साइकिल नहि हाँकल जयतैक। जाँघ लोथ भऽ गेलैक अछि। ओ कतेको ठाम बिलमि कऽ पूछैत अछि—तुलसियाही कतेक दूर होयतैक। जेना ओ माउण्ट एवरेस्टक चढ़ाइ कऽ रहल होअय। ओकरा जाइत –जाइत अन्हार भऽ जाइत छैक। ओ साइकिल ठाढ़ करैत अछि। ओकर पीसाक जेठका भाय पुछैत छैक— 'के छियह हौ ?’ ओ गोड़ लगैत कहैत छैक— 'हऽऽम सुभाष।’ 'सुबहास?’- ओ मोन पाड़बाक प्रयास करैत छैक। फेर कहैत छैक 'आब चीन्हि गेलियह। हे ओइ चौकी पर बैसह। ’ ओ ओकर पिसियौतकेँ हाक पाड़ऽ लगैत ऐक –’रेऽऽ उगना ऽऽ... उगना रे ऽऽ।’ उगना आबऽ लगैत छैक तँ ओ कहैत छैक-'देखही के अयलौ। 'उगना' के छियै’ बुदबुदाइत ओकरा लग आबि जाइत छैक। आ ओकर मुँह निहारऽ लगैत छैक। सात बरस पहिने उगना बड़ छोट छलैक। ओ आत्मीय ढँग सँ परिचय देबाक प्रयत्न करैत अछि। उगनाक चेहरा निर्विकार बनल रहैत छैक। दीदी आ पीसा खाइत काल एतेक दिन नहि अयबा पर आश्चर्य व्‍यक्‍त करैत छैक। ओ कमजोर हँसी हँसैत रहैत अछि। बिआओन पर निन्न नहि अबैत छैक। लालटेम हेट कऽ एकटा किताब उनटाबऽ लगैत अछि। पीसाक जेठका भाय मसहरीक तरसँ बिगड़ैत ककरो सँ पुछैत छैक 'लालटेम किएक जरैत छैक रे-ए?’ भोरमे ओ अबेर कऽ उठैत अछि। दीदी कहैत छैक– ' उगना चल गेलौ-ए इसकूल। कहने गेलौ-ए, कहि दिहैक भइयाकेँ हमरो आबऽ दै ले। बड़की पोखरि जयबैक। जँ बेसी अबेर भऽ जाइ तँ कहि दिहैक भैयाकेँ नहा लै ले।’ उगनासँ लगाव अनुभव करैत ओकरा प्रसन्नता होइत छैक। मुदा ओ ओकरा संगे नहि नहा पबैत अछि। पीसा चाँरि लगा कऽ पठा दैत छैक। खाइते काल टा ओकरा दीदी आ पीसासँ गप्प करबाक अवसर भेटैत छैक। आन समय ओ सभ व्यस्त रहैत छैक। दीदी पछिला सालक अपन बेटीक बियाहक चर्च विस्तारसँ करैत छैक जे कोना कोटक खातिर दू दिन धरि बियाह रूकि गेल छलैक। फेर प्रसंग बदलैत कहैत छैक ' आब नोकरी कऽले। बेसी पढ़ने आदमी बताह भऽ जाइत छैक। देखैत ने छीही मास्‍टरकेँ, बताह जकाँ करैत छैक।’ ओ चुपचाप सुनैत रहैत अछि। दुआरि पर ओकर पीसाक जेठका भाय बैसल छैक। 'ओ ओकरासँ पितियौत देया पुछैत छैक ’अनूपा गाम गेलौ, भेंट भेल छलौ की-ई ?’ अनूपाकेँ ओकर पित्ती दीदीये लग पठा देने छलैक जे एतऽ पढ़तैक। गाममे खरचहर होइत छलैक। सात-आठ दिन पहिने ओ मायसँ भेंट करऽ चल गेलैक। दीदी कहैत छलैक, अनूपा आ उगनामे कखनो ने पटैत छैक। पीसाक जेठका भाय फेर कहनाइ शुरू करैत छैक — 'छौंड़ा छलै तेज। मुदा तोहर दीदीये नहि पढ़ऽ दैत छैक। भैंसमे पठा देलक आ ताहूसँ नहि भेल तँ दुआरि परक ई टहल, ऊ टहल। तोहर पीसा कहबो करैत छैक जे 'पढ़ऽ दही, तँ ओ कहैत छैक, जे पढ़ऽ बेरमे पढ़तैक।' ओ किछु नहि बजैत अछि। ओकरा अनूपाक प्रति दुख होइत छैक। ओ चौकी पर पड़ि रहैत अछि। ओकरा काकाक क्लान्त चेहरा मोन पड़ैत छैक। काकीक कनैत कनैत फूलल लाल चेहरा, पितियौत बहिन सभक आँखिक असहाज दयनीयता। रातिमे ओ दीदीसँ कहैत अछि — 'हम भोरे चल जेबौ।' दीदीकेँ भरिसक प्रसन्नता अप्रसन्नता किछु नहि होइत छैक। टाका मँगबाक ओकर विचार नहि जानि कतऽ निपत्ता भऽ गेल छैक। दीदीक व्यवहार ओकरा धुंध जकाँ अस्पष्ट लगैत छैक। ओ चाहैत अछि बेसी सँ बेसी तटस्थ भऽ जाय। टाकाकेँ बीचमे ठाढ़ कऽ सम्बन्धक बारेमे नहि सोचय। भोरोमे दीदीक व्यवहार ओहिना रहैत छैक। जलखै खाइत काल दीदी गमछामे दू गो टाका बन्हैत कहैत छैक—'आइकाल्हि एक्को टा पैसा हाथपर नहि रहैत छैक।’ फेर जेना दुलार करैत जीवित स्वरमे पूछैत छैक। - 'बौआ, रस्ता लेल कने चूड़ा बान्हि दियौक ?’ ओ मना कऽ दैत छैक। 'उगना ,जो भैयाकेँ एकपेरिया देने सड़क पकड़ा दिहैक। सुभीता हेतैक। आ तोँ घूरि अबिहें।'- दीदी कहैत छैक। उगना अस्वीकार कऽ दैत छैक। ओ खाइ ले मँगैत कहैत छैक जे ओकरा स्कूल जेबाक छैक। उगनाक इच्छा छलैक जे ओ आइ रहि जाय। काल्हि एकबेर आग्रह कयने छलैक। ओ तुरन्त बात टारि देने छलैक। नहि टारितैक तँ बादमे असुविधा भऽ सकैत छलैक। ओ बड़ तीब्रतासँ अपना पर उगनाक स्थिर दृष्टिक अनुभव करैत अछि। दीदी की कहि रहलि छैक, ओकरा नहि बुझाइत छैक। ओकर सम्पूर्ण चेतना पर उगना पसरि गेल छैक। ओ पनिमरू चालिमे विदा भऽ जाइत अछि। गोहाली लग ओकरा अपना पाछाँ ककरो उपस्थितिक अनुभव होइत छैक। उगना थिकैक। 'जेबही सड़क धरि ?' ओ पुछैत छैक। किछु नहि पुछनाइ उगनाकेँ अप्रिय लागि सकैत छलैक। ओ कोनो उत्तर नहि दैत छैक। दुनू संग-संग चलैत रहैत अछि। दीदी नमहरगर डेग दैत एकाएक आबि जाइत छैक। एकटा रुपैया दैत कहैत छैक — 'ईहो राखि ले। सकुन्ती धेने छलैक।’ ओकरा सभ वस्तु कुरूप आ अधलाह बुझाय लगैत छैक। मात्र उगनाक एसकर होयबाक कल्पना ओकरा नीक लगैत छैक। दीदी उगनासँ पुछैत छैक — 'जेबही?’ ओ अपूर्ण आ अस्पष्ट शब्‍दमे प्रश्नक औपचारिकता पर खौंझाइत छैक। दीदी कहैत छैक —'जाह, रौद भऽ जेतह।’ ओकरा लगैत छैक जेना उगना जिंजीर भऽ गेल होइक। उगनाक समस्त मनोभाव चुप्पी मे बदलि गेल छैक। ओकर चेहरा शांत आ उद्वेगहीन लगैत छैक। मुदा सोचला पर ओकर स्थिरता बड़ उदास लगैत छैक। ओकर साइकिल एकपेरियापर ससरऽ लगैत छैक। रौद... धार... बालु... माउण्ट एवरेस्ट ...। तृष्णा हमरा लागल अखिलनकेँ किछु भेल छैक। जखन ओ कलकत्तासँ घुरि कऽ आयल रहय, हमरा तखने खटकल छल। मुदा ओ थाकल – झमारल रहय, तेँ हम किछु नहि पुछलिऐक। ओ बदलि गेल छल। कोनो गप्प नहि करय; चुप आ उदास रहय। ओकर चेहरा देखला सँ बुझाइ जेना ओ कोनो विचार या स्मृतिमे डूबल हेरायल हो। 'की भेल छौ?' पुछला पर ओ बाजल –'नहि, किछु नहि।' लेकिन ओकर स्वरमे आ ओकर चेहरा पर हमरा वेदनाक स्पष्ट अनुभूति बुझायल। फेर दिन भरि अखिलन सँ कोनो गप्प नहि भेल। रातिमे अचानक कोनो सपनासँ निन्न टूटि गेल। सपनाकेँ मोन पाड़ैत चाहलहुँ, जे सूति जाइ। ठीक तखने चौंकि गेलहुँ। अखिलन, जे बगल वला बिछौन पर सुतल रहय, कुहरैत बाजल—'ओह, श्रीलता !' लागल जेना ओकरा कोनो पीड़ा भऽ रहल हो आ सहायता लेल ओ श्रीलताकेँ सोर पाड़ैत हो। चकित भेल हम ओकर बिछौन दिस तकलहुँ। इजोरियाक् हल्लुक इजोतमे देखल मूड़ी तर पड़ल गेड़ुआकेँ अखिलन बेर-बेर हाथसँ मीड़ि रहल अछि। ओ निश्चय जागल छल आ कोनो बेचैनीमे छटपट कऽ रहल छल। ओहि राति फेर सूति नहि भेल। बहुत जिद्द कयला पर अखिलन जे खिस्सा सुनौलक ताहिसँ मन भारी आ उदास भऽ गेल। खिस्सा सुनबैत ओ रहि –रहि कऽ अपन छातीकेँ मुट्ठी मे पकड़ि लैत छल जेना छातीमे दर्दक हूक उठैत हो। अखिलन कहऽ लागल –भोरे –भोर कलकत्ता लेल गाड़ीमे सवार भेलहुँ तँ सामने वला बर्थ पर एकटा अधवयसू बैसल सिगरेट पिबैत रहय। बादमे जानल जे ओकर नाम संतोष कुमार मंडल छल। ओ बंगाली रहय आ शौकिया चित्रकार। हैदराबादमे कोनो नौकरी करैत रहय। ओ हमरा बहुत ध्यानसँ देखलक आ पुछलक जे हम कतऽ जायब। फेर अपने कहऽ लागल—गाड़ीमे सवार होइसँ पहिने हम रिजर्वेशन चार्टमे अगल –बगल वला यात्रीक नाम, उमर आ गंतव्य जरूर देखि लैत छी। ओकर ई सतर्कता पहिने तँ प्रभावित कयलक, मुदा लगले जासूसी सन बुझायल। धीरे धीरे आओर मोसाफिर आयल—एकटा नव दम्पत्ति, युवक सुधीर आ एकटा प्रौढ़ महिला। मंडल बहुत गप्पी आ सहमिल्लू रहय। ओ जल्दिए सभसँ परिचय कऽ लेलक आ गपसपमे लागि गेल। नव दम्पत्ति हनीमून लेल दार्जिलिंग जाइत रहय। सुधीर अपन भाइसँ भेंट करऽ कलकत्ता जाइत रहय। प्रौढ़ महिला पता नहि कतय जाइत रहय। ओ बेसी काल गंभीरे बनलि रहलि। खाली बीच-बीच मे कोनो हँसी वला गप्प पर मुसकाइत रहय। बादमे कोनो स्टेशन पर ओ एकटा तेलुगू पत्रिका कीनलक आ ओहिमे व्यस्त भऽ गेलि। स्थिर रहब मंडलक स्वभाव नहि रहैक। ओ कखनो पानि पीबा लेल उठय तँ कखनो चाह पीबा लेल। कखनो सिगरेट जराबऽ लेल सलाइ ताकऽ लागय तँ कखनो दोसर कातक बर्थपर बैसल बंगाली परिवार सँ गपसप मारि आबय। अही सभक बीच पता नहि कतय वारंगल कि विजयवाड़ामे एकटा युवती हमर सभक बर्थ लग आयलि। एकटा सामान्य साधारण युवती। हमर बर्थ पर बैसलि महिला सँ बैसबाक अनुमति मँगलक। बर्थ अपन नहि रहबाक कारणे महिला असमर्थता प्रकट केलक तँ हम ओहि युवतीकेँ बैसि जयबाक इशारा कयल। मंडल, जे ऊपरका बर्थ पर पड़ल छल, ओहि युवतीकेँ गौर सँ देखलक। युवती थोड़े काल धरि असहज बनलि रहलि, फेर सामान्य भऽ गेलि। जखन कंडक्टर टिकट जाँचय आयल तँ युवती कने आशंकित भेलि, मुदा जुरमाना दऽ कऽ फेर निश्चिन्त भऽ गेलि। ओ जुरमाना दैत रहय, ठीक तखनहि ओ पहिल बेर आकृष्ट कयलक। कंडक्टर नोट पकड़ि लेलक आ टिकट बनबैत रहल। टिकट देखला पर युवती चौंकि उठलि। अपन गलतीक अनुभव कयलक आ पर्स सँ आओर पाइ निकालि कंडक्टरकेँ देलक। 'लेकिन एहिमे आकृष्ट करऽ वला कोन चीज रहैक ?’- अखिलनसँ हम पुछलिऐक। अखिलन कहलक - 'भगिमा। ओकर भंगिमामे किछु एहन सौन्दर्य रहैक, जकरा मात्र अनुभव कयल जा सकैत अछि; कहल नहि जा सकैछ।’ अखिलन कने काल चुप भऽ गेल। हमरा लागल ओ श्रीलताक ओहि अदाकेँ फेर सँ पकड़बाक प्रयत्‍न कऽ रहल अछि जेओकर हृदयमे सीधे उतरि गेल रहैक। टोकि देलासँ खिस्साक प्रवाह टूटि गेलैक। ओकर छोर पकड़ि आगू बढ़ेबामे अखिलनकेँ थोड़े समय लगलैक। हमरा बुझेबाक प्रयास करैत ओ बाजल– 'युवतीक व्‍यक्तित्‍व मे किछु एहन लय आ गति छलैक, जे हमरा आकृष्ट कयने छल। ओ बहुत संवेदनशील आ सलज्ज छलि। खैर।’ हमरा लागल अखिलनक हृदय दर्दसँ टीसि उठल होइ। परिचय आ गप करबामे प्रवीण मंडल जखन नीचा उतरल तँ ज्ञात भेल ओहि युवतीक नाम श्रीलता छलैक। 'खूब भालो नाम।’ मंडल बाजल। श्रीलता बिजनेस मैनेजमेंटक कोर्स करैत रहय। ओकर हाथमे मैनेजमेंटक कोनो किताब रहैक जे सुधीर लऽ कऽ देखऽ लागल। मंडल दोसर कातक बंगाली परिवार लग चल गेल आ ओहि परिवारक एकटा किशोरीक चित्र बनबऽ लागल। अपन चित्र पर प्रसन्न होइत किशोरी बाजलि 'थैंक यू अंकल।' परिवारक सभ सदस्य चित्र देखलक आ मंडलक प्रति कृतज्ञ भेल। किशोरक माय बाजलि— ‘ओ माँ, आपनी तो खूब भालो स्केच तूल छेन।’ मंडल अपन बर्थ पर घुरि आयल। सिगरेट पीलक आ ओहि नव विवाहिताक चित्र बनबऽ लागल जे हनीमून लेल दार्जिलिंग जाइत रहय। नव विवाहिता मंडलक ठीक सामने बैसलि छलि। मंडल किछु रेखा खींचय आ रूकि कऽ नव विवाहिता दिस ताकऽ लागय। चित्रक प्रति सभ क्यो उत्सुक रहय। तैयार होइते ओ एक हाथसँ दोसर हाथ जाय लागल। जखन ओ हमरा लग आयल तँ चित्र देखि धक्का सन लागल। नव विवाहिताक चित्र एहन छलैक जाहिसँ ओकरा चिन्हल जा सकैत रहय। मुदा ओकर नीचा एकटा दोसरो चित्र रहैक—स्त्री–पुरुषक; पुरुष स्त्री दिस टकटकी लगा कऽ देखैत। यद्यपि चीन्हऽ योग्य स्पष्टता आकृतिमे नहि रहैक, तथापि हमरा बूझऽ मे भांगठ नहि भेल जे ई दुनू आकृति हमर आ श्रीलताक अछि। हम मंडल दिस तकलिऐक। ओ पहिनहि सँ हमरा दिस तकैत छल आ नजरि मिलिते बाजल –'इटस नोट यू।’ जेना ओकर मोनमे कोनो चोर होइ। श्रीलता खिड़की सँ बाहर तकैत छलि। साँझ पड़ि रहल छलैक। मंडलो सिगरेट पिबैत खिड़की सँ बाहरक दृश्य देखऽ लागल। तखने पता नहि कोम्हरसँ एकटा बंगाली युवक आयल आ मंडल संगे गपमे लागि गेल। ओ हैदराबाद विश्वविधालयमे नाम लिखा कऽ घर जाइत रहय आ बहुत उत्साहमे रहय। रवीन्द्र संगीतक चर्चा भेलै तँ मंडल श्रीलता सँ पुछलकै –'डू यू नो रवीन्द्र नाथ टैगोर?' ‘आइ एम अफ्रेड, आइ डोंट।'-श्रीलता कने संकुचित भेलि। ‘शी मस्ट बी नोयिंग पोतन्‍ना।’- जेना हम श्रीलता केँ सहारा देबा लेल बाजल होइ। ‘याह, आइ नो पोतन्ना वेरी वेल।’- श्रीलता उत्साहित भऽ उठलि। बंगाली युवक आ मंडल रवीन्द्र संगीत गाबऽ लागल। मंडलक गला नीक रहैक। हमरा भूख लागि गेल छल। दूपहरमे जे केरा किनने रही से पड़ले रहय। ओहि मे सँ दू टा छीमी तोड़ि हम श्रीलता दिस बढ़ाओल, मुदा ओ लेलक नहि। सुधीर, मंडल, युवक आ नव दम्पत्तिकेँ केरा देलाक बाद हम श्रीलता दिस फेर ताकल। ‘हैव इट श्रीलता। यू मस्ट बी हंग्री।’-हमरा स्वरमे किछु एहन उत्कट स्नेह आ याचना रहय, जे ओ चौंकि कऽ हमरा दिस देखऽ लागलि। फेर एकटा केरा लेलक आ संकोच तथा लज्जावश धीरे-धीरे खाय लागलि। श्रीलता विजयवाड़ामे पढ़ैत छलि आ अखन चारि दिनक छुट्टीमे घर विशाखापतनम जाइत छलि। ट्रेन लेट भेल जाइत रहैक आ ओहि संग श्रीलताक बेचैनी बढ़ल जाइक। श्रीलता सँ आओर गपसप भेल। ओ पाँचम दिन घूरति। ‘अहाँ कहिया घुरब ?'-ओ हमरासँ पुछने छलि। विशाखापतनम आबि रहल छलैक। ओ उठि कऽ ठाढ़ भऽ गेलि। परिचित शहर-घर आबि गेलाक निश्चिन्तता आ दिन नीक तरहेँ कटि जयबाक संतोषसँ ओकर चेहरापर प्रसन्नताक लहरि अयलैक। कृतज्ञता आ सदभावना प्रकट करैत ओ मुस्कुरायल आ सभसँ विदा मँगलक। मुदा ओकरा दिस क्यो ध्यान नहि देलकै। सभ गप्पमे बाझल छल। ओ हमरा दिस तकलक आ एकटा स्निग्घ कोमलताक भाव चेहरा पर लेने विदा भऽ गेलि। तीन-चारि मिनट बीति गेल। स्टेशन अखनो आयल नहि छल। हमरा आश्चर्य भेल ओ एतेक पहिनहि गेट पर किएक चल गेलि। हमरा अचानक एकटा विकलता घेरि लेलक। ओकरा देखबाक विकलता, गप्प करबाक विकलता। आ ठीके, हम सीटपरसँ उठि गेलहुँ। गेट लग पहुँचिते ओ हमरा देखलक आ देखते मुस्कुरायलि। ओकर मुस्की औपचारिकताक कारणे आनल गेल बलात् मुस्की नहि छल; ओ स्वत: स्फूर्त्त आ हार्दिक छल। मंत्रमुग्ध सन ओकरा दिस तकैत हम आगाँ बढ़लहुँ आ कनेक दूरी पर डिब्बासँ सटिकऽ ठाढ़ भऽ गेलहुँ। ठाढ़ होइते ओ पल भरिक लेल हमरा दिस मुस्कुराइत तकलक आ संकोच तथा लज्जावश मूड़ी झुका लेलक। फेर पता नहि कोन प्रबल आन्तरिक प्रेरणासँ अगिले क्षण हमरा देखऽ लागलि। आँखिमे आ ठोर पर वैह मधुर आ कोमल मुस्की लेने। ओकर माधुर्य आ कोमलतामे नहाइत हम निरन्तर ओकरा देखने चल जाइत रही। बुझाइत रहय हृदयमे प्रेमक स्रोत फूटि पड़ल हो आ हम ओकर अनन्त प्रवाहमे भसिआयल चल जाइत होइ। गेट लग श्रीलताक आसपास किछु आओर लोक ठाढ़ रहय। भरिसक अहीसँ घबरा कऽ श्रीलता बाजलि – 'इट वाज ए नाइस कम्पनी।' हम सहटि कऽ ओकर आओर लग चल अयलहुँ। कहऽ चाहलहुँ – 'आइ वांटेड टू हैव ए लास्ट लुक ऑफ यू। मुदा लोक-भयक कारणे कहा गेल –'आइ वांटेड टू सी यू ऑफ।' श्रीलता किछु नहि बाजलि। ‘अहाँ चारिम दिन नहि घुरि सकैत छी, श्रीलता ?' ‘नहि, हमरा कैकटा काज करऽ पड़त। मजबूर छी।' गाड़ी प्लेटफार्म पर लागि रहल छल। संग छूटि जेबाक आसन्न अवश्यम्भाविता सँ हम अस्थिर भऽ गेल रही। ‘अहाँकेँ स्टेशनक गेट धरि छोड़ि आबी ?'- हमर एहि प्रस्तावसँ श्रीलता डेरा गेलि। गेटपर ओकर भाइ प्रतीक्षा करैत हेतैक। ‘नो, नो। थैंक्स।’- श्रीलता घबराइत बाजलि आ एहि तरहेँ धड़फड़ायल चलिदेलक जेना हम ओकरा खेहारने अबैत होइएक। ओकर एहि व्यवहारसँ स्तम्भित आ विमूढ़ भेल कने काल हम ठाढ़े रहि गेल रही। फेर तेजीसँ चलैत जखन प्लेटफॉर्मक गेट लग पहुँचल रही तँ ओतय क्यो नहि रहय। श्रीलता चल गेल छलि। भारी मने धीरे – धीरे डेग उठबैत हम अपन डिब्बामे घुरि आयल रही। अचानक लागल जेना बहुत थाकि गेल छी। जा कऽ ऊपरका बर्थपर पड़ि रहलहुँ। पड़िते करेज टीसि उठल। नीचा गपसपसँ जे हल्ला होइत रहैक से असहनीय लागऽ लागल। होइत रहय सभकिछु निस्तब्ध आ शांत भऽ जाय। फेर लागल जेना हल्ला बहुत पाछू छूटि गेल अछि आ सामने श्रीलताक दिव्य आ कोमल चेहरा आबि गेल अछि –शीतल आ स्निग्ध ज्योत्सना सन निर्मल मुस्की छिटकबैत। फेर ओकर भयभीत आकृति मोन पड़ैत रहल। फेर श्रीलता ... शून्य प्लेटफॉर्मक गेट। भोरमे निन्न टुटिते श्रीलता मोन पड़ल आ बड़ी काल धरि उदासी आ अवसाद घेरने रहल। कलकत्तासँ हम चारिम दिन नहि घुरलहुँ। पाँचम दिन घुरल रही, जाहि सँ श्रीलतासँ फेर भेंट भऽ सकय। विशाखापतनम आबि हम हरेक डिब्बा आ प्लेटफॉर्म सगरे श्रीलताकेँ तकलहुँ ; एकबेर नहिकैक बेर। ओ कतहु नहि छलि। की भऽ गेलैक श्रीलताकेँ ? दुखित तँ ने पड़ि गेल? या हमरे कारणे काल्हिए चल गेलि ? हम खिन्न आ निराश भऽ कऽ अपन बर्थपर चल आयल रही। गाड़ी खुजैत काल लगैत रहल श्रीलता अखने दौड़लि आओति आ कूदिकऽ डिब्बामे चढ़ि जायत। विशाखापतनमक छुटैत हरेक घरक खिड़की आ बालकोनीकेँ हम एहि आशासँ देखने चल जाइत रही जे श्रीलताक झलक भेटि जाय। लेकिन ओ हमर दुराशा मात्र छल। पता नहि आब कहियो श्रीलतासँ भेंट होयत कि नहि। अखिलन ई कहि चुप भऽ गेल। हमरा किछु नहि फुरायल अखिलनकेँ की कहिऐक। हम सोचऽ लगलहुँ अखिलन आब की करत। भऽ सकैत अछि ओ विजयवाड़ा आ विशाखापतनमक चक्कर काटऽ लागय आ अखबारमे विज्ञापन बहार करबाबय। ओ आओर की कऽ सकैत अछि ? हमरा लागल अखिलन केँ श्रीलता नहियो भेटतैक, तइयो ओकर स्नेहक स्मृति रहि जेतैक आ अखिलनक आत्माकेँ आलोकित करैत रहतैक। दाना मोहनकेँ इंटरभ्यू देबाक रहै। ओ लस्त-पस्त आ घबरायल बससँ उतरल। विद्यार्थीक छोट-छोट समूह जैंह-तैंह छिड़िआयल गप्पमे लागल ठाढ़ छलै। एकटा विद्यार्थी सँ ओहि जगह दिआ ओ पुछारि केलकै जतय ओकर इंटरभ्यू रहै। विद्यार्थी हाथसँ इशारा कऽ कऽ बतेलकै जे ओकरा कोन-कोन बाटे जेबाक चाही। लेकिन जे नक्शा ओ बतेलकै से ततेक घुमान आ घुरची-फन्ना वला रहै जे मोहन बिसरि गेल आ ओझरी मे पड़ि गेल। असहाय आ नचार सन ओ फेर विद्यार्थीक मुँह देखय लागल। ओकरा उमेद रहै विद्यार्थी फेरसँ ओकरा रस्ता बतेतै। लेकिन ओकर निवेदनक प्रति छात्र कोनो रुचि नहि देखेलकै आ अपन संगी सँ गप्प करैत रहल। मोहन कने काल ततमतायल ठाढ़ रहल आ निराश भऽ कऽ विदे होइ वला रहय कि तखने ओ दुनू ओम्हरे चलि देलकै जेम्हर मोहनकेँ जेबाक रहै। ओ चुपचाप ओहि दुनूक पाछू-पाछू चलय लागल। कातिक बीति रहल छलैक आ उदास करय वला पछिया हवा बहैत रहै। ओहि दुनूक पाछू चलैत एक बेर ओकरा भेलै कतहु ओ सभ हँसी ने करैत हो। आशंका भेलै भटका ने दिअय। ओ थाकि गेल छल। ओ दुनू छात्र-आन्दोलन लऽ कऽ बहस करैत रहै। भरिसक गप्प खतम भऽ गेलै। ओ सभ पूछय लागलरहै जे ओ कतयसँ आयल अछि आ कथीक इंटरभ्यू छिऐ। फेर दुनू चुप भऽ गेलै आ चलैत रहलै। मोहन केँ ठीक – ठीक बुझा नहि रहल छलै ओ दुनू कतय जा रहल छै, ओकरा रस्ता बताबऽ या अपन कोनो गंतव्य दिस। एक ठाम आबि दुनू रूकि गेलै आ बतेलकै – इएह छिऐ। ओहि दुनूक एहि उदारता आ मदति सँ मोहन प्रसन्न भेल आ आभार व्‍यक्‍त केलक। ओ सभ चल गेलैक तऽ मोहन चारूकात हियासलक। ओकरा पियास लागल रहै। एकटा कूलर अभरलै आ ओ ओम्हरे चलि देलक। जखन ओ कूलर लग पहुँचल तऽ एकटा अधवयसू आदमी जगमे पानि भरैत रहै। ओ गोर रंगक स्वस्थ आ सुंदर व्‍यक्ति छलै। मोहनकेँ ठाढ़ देखि पुछलकै अपने जल पीब ? बस एक मिनट। गिलास अनैत छी। ओकर जग भरि गेल छलै। जग भरिते ओ तेजीसँ चलि देलकै आ अदृश्‍य होइसँ पहिने पलटि कऽ मोहन दिस देखलकै। मोहन केँ ओ व्‍यक्ति बहुत अस्थिर आ चंचल बुझेलै। देर भऽ गेलै तँ मोहन केँ ओहि आदमी पर संदेह हुअय लगलै। लेकिन ओहि आदमीक स्वरमे जे विनम्र आग्रह छलै से पानि पीबयसँ मोहन केँ रोकैत रहलै। ओ आदमी कने कालमे आबि गेलै। ओ गिलास केँ खूब चिक्कन सँ धोलकै, पानि भरलकै आ पेनी पकड़ि कऽ मोहनक खिदमतमे पेश केलकै — लेल जाय। ओकरा हाथसँ गिलास लऽ कऽ मोहन पानि पीबय लागल। ओ आदमी कूलरक टोंटी पकड़ने ठाढ़ छलै। आर लेल जाय तीन गिलास पिलेलाक बाद ओ आदमी जेना सवाल आ आग्रह दुनू केलकै। लेकिन ओकरा आब पानि नहि पीबाक रहै। मोहन चिन्ता मे पड़ि गेल जे एहि आदमीक प्रति आभार कोना प्रकट करय। धन्यवाद। - एकर अलावे कहबाक लेल ओकरा किछु नहि सुझलै। और ? ओकर एहि छोट सन सवाल सँ मोहन केँ लगलै जे ओकरा चाह लेल जरूर कहल जाय। चाह पीब ?-खाली धन्यवाद कहला पर जे कमी मोहनकेँ खटकल छलै से एहि प्रश्‍न सँ पूरा होइत बुझेलै। ‘बस, एखने चलैत छी।’- कहैत ओ आदमी बगल वला कोठलीमे घुसि गेलै। ओकर चंचल हावभाव पर, जे चार्ली चैपलिनक स्मरण करबैत रहै, मोहन मुस्कायल। बहुत देर धरि ओ नहि अयलै तऽ मोहनकेँ बेचैनी हुअय लगलै। ओ धीरे-धीरे कैंटीन दिस बढ़य लागल। कनेके आगाँ गेल हैत कि ओ आदमी नहि जानि कोम्हरसँ एलै आ 'तुरत' कहैत ओतने वेगसँ दोसर कोठली मे ढुकि कऽ अलोपित भऽ गेलै। मोहन फेर ओकर प्रतीक्षा करय लागल। पाँच मिनट बीति गेलै। मोहन आब खिन्न भेल जाइत रहय। तखने ओ आबि गेलै। ओहि आदमीक घर संगरूर जिला रहै आ ओ पहिने सेनामे छल। बीच – बीचमे ओकरा ओहने अंगरेजी बोलबाक आदत रहै जेना दिल्लीक जनपथ पर सामान बेचैत स्त्री बजैत अछि — 'लुक सर ... गुड क्वालिटी ... चीपेस्ट एंड वेरी-वेरी नाइस सर !' 'एतय अहाँकेँ नौकरी साइते भेटत।'- ई कहि कऽ ओ आदमी मोहनकेँ निराश केलकै। फेर तुरंत जोड़लकै–‘देखियौ, चांस छिऐ। ओना बाहर वलाकेँ नहि लैत छै। जँ पी-एच.डी.क डिग्री रहैत तऽ संभावना छल।’ चपरासी होइतो ओकरा हरेक बातक खबरि रहै। ओ दुनू कैंटीन मे बैसि गेल छल आ मोहन चाह आनय कहि देने रहै। 'किछु और लेल जाय, सर। नमकीन, मिठाई-तिठाई।’- ओहि आदमीकेँ जेना मोहनक बहुत चिंता होइ। 'न।' ओ बाजल। 'एकटा बर्फी ?' 'न, किछुनहि।' 'लेकिन सर, किछु खेने बिना हम चाह नहि पिबैत छी।'—ओ आदमी बनावटी आ कुरूप हँसी हँसल। 'ठीक छै, अहाँ लिअऽ।' 'खाली हमहीं टा कोना लेबै, सर। अपनो लियौ ने। कम सँ कम एकोटा बर्फी।' मोहनक जवाबक प्रतीक्षा केने बिना ओ आदमी नौकरकेँ बजेलकै आ मिठाई लाबऽ कहलकै। अखन मोहन चाह पीबते रहय कि ओ आदमी उठि कऽ ठाढ़ भऽ गेलै। ओ बहुत शीघ्रतासँ खा-पी कऽ तैयार भऽ गेल आ आब ओकरा लेट होइत रहै। 'अच्छा, तऽ आब हम चली ?'—विदा लैत काल ओकरा चेहरा पर कारोबारी उदासीनता पसरल छलै। ओ आदमी कखनिए ने चल गेल रहै। मोहनक चाहो खतम भऽ गेल छलै। लेकिन ओ बैसल रहल। ओकरा सब चीज बीमार आ उदास लागि रहल छलै। कैंटीनमे बहुत रास फुददी आ मैना आबि गेल रहै आ पावरोटीक छोट-छोट टुकड़ी पर चीं-चीं करैत झपटैत रहै; टेबुलक नीचा, टेबुल पर — सभतरि। दृष्टि रातिक दस बजल अछि। अन्दाज लगबैत छी डेरा पहुँचय मे कम सँ कम एक घंटा अबस्से लागि जायत। पाइ केँ जेबीये गनय लगैत छी। बड़ कम अछि। डेरा लग एकटा टुटपुजिया होटल छैक, जे सस्ते मे खुआबैत छैक। लेकिन ओतऽ जाइत-जाइत एगारह बाजि जेतैक। ताधरि ओ होटल बंद नहि भऽ जाय, ई सोचि एकटा होटलमे घोसिया जाइत छी। एकटा टिनहा बोर्ड टांगल छैक, जाहि पर सभ वस्तुक दर लिखल छैक। हम मनेमन पैसाक मोताबिक हिसाब बैसा लैत छी आ आधा प्लेटक आर्डर दऽ दैत छी। किछु पाइ बचि जाइत अछि। मोन सिगरेट पीबा लेल नुड़िआय लगैत अछि आ बचलाहा पाइक सिगरेट लऽ लैत छी। मोन हल्लुक जकाँ बुझाइत अछि आ चालि किछु स्थिर भऽ जाइत अछि। रस्ता मे बहुत बात मोन पड़ैत रहैत अछि 'ई हाले मे एम. ए. कयने छथि, बेचारा बड्ड गरीब छथि। कतहु कोनो नोकरी दिया दियौक।’ आब बड्ड घृणा भऽ गेल अछि एहि सभसँ। भरि दिन एम. एल. ए., एम. पी. सभक खुशामद, अपन हीनता-बोध आ सर्विस होल्डरक मौन व्यंग्यसँ मन कुंठित भऽ जाइत अछि। दिन भरि नोकरीक चक्करमे बौआइत छी आ राति केँ झमान भेल डेरा घुरैत छी। जीवनक यैह क्रम बनि गेल अछि। कहिया निस्तार होयत, तकर ठेकान नहि। कोठलीमे एकटा चिठ्टी फेकल अछि। चिठ्टी उठबैत छी। गामसँ आयल अछि। नोकरी भेटल कि नहि, से पूछल गेल अछि। मोन घोर भऽ जाइत अछि। बहुत उदास भऽ जाइत छी। चिठ्टी मे गाम अयबाक आग्रह सेहो अछि। गाम अयबाक बात मनकेँ सान्त्वना दैत अछि। मन होइत रहैत अछि गाम भागि जाय। एहिठामक भूख-प्यास, अपमान, दुख, निराशा कखनो काल बताह बना दैत अछि। ई शहर काटय दौड़ैत अछि। बुझाय लगैत अछि जे नोकरी एकटा मृगतृष्णा थिक। ओकरा पाछू बौआइत-बौआइत जीवन अकारथ चल जायत। गाम जेबाक निर्णय करैत छी। निर्णय पर दृढ़ रहय चाहैत छी लेकिन से होइत नहि अछि। गौंआ—घरूआक व्यंग्य आ उपहासक कल्पना कलेजामे भूर करैत रहैत अछि। 'देखही रौ, फलनाक बेटा बुड़िआय गेलै। एतेक पढ़ियो—लिखि कऽ नोकरी नहि भेलै। आब गाम मे झाम गुड़ैत छै।' 'धौ, पढ़तै कि सुथनी। पढ़ितिऐक तँ यैह हाल रहितैक।' 'अरे अबरपनी कयने घुरैत हेतै।' एहन-एहन बिक्ख सन बोल सुनि केँ मन होइत अछि लोकक मुँह नोचि ली। लेकिन मरमसि कऽ रहि जाइत छी। नोकरी। पढ़बाक—लिखबाक उद्देश्य लोक एक्केटा बुझैत अछि-नोकरी। जे नोकरी नहि करैत अछि, गाममे रहय चाहैत अछि, तकरा लोक उछन्नर लगा दैत छैक। कियैक ? मन मे बेर-बेर ई सवाल उठैत अछि। लोकक व्यवहारक प्रति मनमे क्रोधकं धधरा उठैत अछि। आइ भोर ओहि दक्षिण भारतीय पत्रकार सँ भेंट भेलाक बाद मन उद्वेगहीन आ शांत भऽ गेल अछि। सोचि लेने छी आब गामे मे रहब। खेती करब। पत्रकारक बात रहि-रहि कऽ मोन पड़ैत अछि- 'जँ आइ सभ पढ़ल-लिखल लोक नोकरिये करत तँ फेर खेतीक काज के करत। हमरा आश्चर्य होइत अछि जे आइ—काल्हिक शिक्षित वर्ग केँ खेती करबामे लाजक अनुभव होयत छैक। जीवनक कोनो क्षेत्र होअय-कृषि, उद्योग अथवा व्यापार, एकटा महान आदर्श उपस्थित करबाक चाही। जीवन प्राप्तिक उद्देश्य केवल पेटे टा भरब नहि, किछु आरो अछि। आ ई की जे बी. ए. वा एम. ए. पास करू आ तुरन्त पेट पोसबा लेल कोनो नोकरी पकड़ि लिअऽ। भूख पर विजय प्राप्त करू, तखनहि कोनो महत् आदर्श स्थापित कऽ सकैत छी नहि तँ भूखे मे ओझरा कऽ रहि जायब।' लेकिन भूख पर कतेक दिन धरि विजय प्राप्त कयल जा सकैछ?' हम शंका राखलियैक। ओ बहुत गर्वित होइत बाजल –'डू यू नो, डेथ केन नॉट कम ट्वाइस। आ जखन मृत्यु एक्के बेर भऽ सकैछ तँ हम सभ भूख सँ कहियो मरि सकैत छी?’ हमरा तखन बुझायल जेना इजोतक एकटा कपाट अचानक खुजि गेल हो। हम किछु आओर नहि सोचलहुँ आ गाम चल आयल छी। गाम आबिते एकटा निराशा घेरि लेलक अछि। ओहि पत्रकारक प्रेरणा फीका आ बदरंग भेल जा रहल अछि। गामक जीवन, बहुत कठिन आ दुर्वह बुझाइत अछि। एहिठामक गरीबी, अशिक्षा, दंगा-फसादमे हम ठठि सकब ? हमरा सन सफेदपोश एहिठाम नहि रहि सकैछ। हमर निर्णय गलत रहय। हमर फैसला सुनिकेँ ककरो खुशी नहि भेलै। पत्नी पर तँ जेना वज्रपात भेलै। ओकर सभटा सपना चकनाचूर भऽ गेलैक। कतेक आस लगेने छल सब। पढ़त-लिखत, नोकरी करत, परिवार केँ सुख देत। लेकिन सब व्यर्थ। अपन अस्तित्व आब निरर्थक आ अप्रासंगिक बुझाय लागल अछि। की करी ? शहर घुरि जाय ? लेकिन ओतय करब की ? बस एत्तहि आबि कऽ अटकि जाइत छी। बुझाइत अछि शहर आ गाम हमरा लेल कतहु जगह नहि अछि। गाम अबैत छी तँ भागि कऽ शहर चल जयबाक मन होइत अछि आ शहरमे रहैत छी तँ भागि कऽ गाम चल अयबाक इच्छा होइत अछि। भरिसक हम चाहैत छी जे बैसले-बैसल सभ किछु भेटि जाय। लेकिन से कतहु भेलै—ए। उद्यम तँ करय पड़त। हमरा मे चारित्रिक दृढ़ता सेहो नहि अछि। छोट-छोट बात पर उखड़ि जाइत छी आ निर्णय बदलय लगैत छी। क्यो कहिये देलक जे 'पढ़ि-लिखि' कऽ गोबर भऽ गेलै, तँ की हेतैक। कहैत छैक तँ कहओ। एहि सँ दुखी भऽ कऽ शहर पड़ा जायब कोन बुद्धिमानी हेतैक। आइए एक गोटे 'हरबाह' कहलक तँ कुटकुटा कए लागल। मन भेल कतहु पड़ा जाय। एहि तरहक क्षणिक आवेश आ भावुकतामे गलब ठीक नहि अछि। मनकेँ अनेक तरहेँ शांत आ स्थिर करबाक प्रयास करैत छी। लेकिन फेर कोनो एहन बात भऽ जाइत अछि जाहिसँ अन्हार आ निराशा पसरय लगैत अछि। क्यो कहैत अछि 'खेती मे कोनो लस छैक। कहियो रौदी, कहियो दाही....’ आ हमर मन डूबय लगैत अछि। भविष्यक चिन्ता आ डर खेहारय लगैत अछि। ई नहि सोचय लगैत छी जे सब जँ एहि डरेँ खेती छोड़ि दैक तँ अन्न एतै कतयसँ आ लोक खायत की ? आखिर एतेक आदमी तँ खेतीये सँ जिबैत अछि। पता नहि कियैक, मनमे खाली निराशाजनक भावना आ विचार अबैत रहैत अछि। साइत सुविधाभोगी हेबाक कारणे। हम श्रम सँ भागय चाहैत छी, सुविधाकामी छी तेँ भविष्य असुरक्षित आ अंधकारमय बुझाइत अछि। हरबाह-चरबाह आ जन-बोनिहार भविष्य सँ डेराइत नहि अछि। श्रमे ओकर भविष्य होइत छैक। श्रम, जे ओकर अपन हाथमे छैक। फेर कथीक चिन्ता आ कोन असुरक्षा। हम अचानक एकटा विचित्र तरहक आशा आ प्रसन्नताक अनुभव करय लगैत छी। नदी बिहारी परसू आयल रहय। एहि शहरमे गगनदेव केँ छोड़ि ओकर अओर क्यो परिचित नहि रहैक। तेँ ओ तत्काल गगनदेव लग टिक गेल छल। एहि शहरमे ओकरा एक साल रहय पड़तैक। एतेक दिन धरि गगनदेव लग टिकनाय व्यावहारिक दृष्टि सँ ठीक नहि रहै तेँ एतय अबिते बिहारी केँ किराया पर एकटा कोठली तकबाक चिन्ता लागि गेलै आ अगिले दिन ओ तलाशमे निकलि पड़ल। शहरसँ अपरिचित रहबाक कारणे ओ गगनदेवो केँ संग कऽ लेलक। दुनू काल्हिए सँ भटकि रहल छल आ अखनधरि कोनो ढँगगर कोठली नहि भेटल छलैक। पैदले एम्हर सँ ओम्हर भटकैत रहलाक कारणे ओ दुनू थाकि गेल छल आ मनमे निराशा पसरल रहैक। कनेक काल सुस्तयबाक लेल ओ दुनू चाहक दोकान दिस बढ़ि गेल। ओ इलाका ऊँच आ गाछ बिरिछसँ भरल रहैक। एक घंटा पहिने भेल बरखामे हरेक चीज धोआ –पोछा कऽ साफ आ चमकदार भऽ गेल रहै आ पूरा प्रकृति आकर्षक आभामे दमकैत रहय। पीपरक विशाल गाछक नीचा सड़कक दुनू कात देहाती जनानी सभ ढकिया-पथियामे सामान लऽ कऽ बैसल छलै आ लोक सभ दैनिक वस्तुजात बेसाहयमे लागल छल। ओ दुनू दोकान पर बैसल चाह पीबि रहल छल। तखने नौ-दस सालक एकटा लड़की गगनदेवक बगलसँ गुजरलै। दुनूक आँखि मिललै आ सरल जिज्ञासा मे एक-दोसर पर स्थिर भऽ गेलै। फेर ओ लड़की आगू बढ़ि गेलै। गगनदेव चाह पिबैत-पिबैत ओहि लड़कीकेँ बिसरि गेल। बिहारी चिन्तित आ उदास बुझाइत रहय। चाह पीलाक बादो ओ दुनू कने काल धरि दोकान पर बैसल थकनी मेटबैत रहल। फेर उठि कऽ पानक दोकान पर चलि गेल। पानक दोकान पर आबि कऽ गगनदेवकेँ परम आश्चर्य भेलै। ओ लड़की ओत्तहि ठाढ़ छलै। लड़कियो गगनदेवकेँ देखलकै। दोकान पर भीड़ रहै। नहि जानि ओहि लड़की कें की लेबाक छलै। ओ दुब्बर-पातर छलै आ अन्तर्मुखी लागि रहल छलै। ओकर कोमल चेहरा पर बाल-सुलभ निश्छलता आ सहजता रहै। ओ गगनदेवकेँ एकटक तकैत चल जाइत रहै। गगनदेवक नजरि कतहु आओर छलैक लेकिन एहि बातक प्रति ओ सचेत छल जे लड़की ओकरा एकटक देखि रहल छैक। गगनदेव बूझि नहि पाबि रहल छल जे लड़की कियैक ओकरा देखि रहल छैक आ ओकरामे ऐहन की छैक जे ओ ताकि रहल छैक। ओकर तीक्ष्ण दृष्टिसँ गगनदेव आहत आ बेचैन छल। ओ बड़ी मुश्किल सँ लड़की दिस ताकलक। लड़की अखनो ओकरा पर नजरि टिकौने ठाढ़ रहैक। ओकर दृष्टिक रहस्य बूझब गगनदेवकेँ असंभव बुझा रहल छलै। भरिसक ओकर पूरा व्‍यक्तित्‍व लड़की लेल स्पृहणीय भऽ उठल होइ’। गगनदेव ओकर गाल छुलकै। लड़की विडुँसलै आ लाजेँ मूड़ी गोंति लेलकै। ओहिठाम सँ विदा होइते गगनदेव केँ बुझयलै आब ओकरा सँ फेर कहियो भेंट नहि हेतैक। लेकिन एहि बातक लेल ओकरा दुख नहि भेलै। ओ उल्लास आ प्रेमक अनुभूति सँ भरि गेल रहय। परलय बुझाइत रहै जेना सतहिया लाधि देलकै। धाप परक पटियापर बैसल बौकू कखनसँ ने पानिक टिपकब देखि रहल छल। बैसल-बैसल ओकर डाँड़ दुखा गेलै। ओ नूआंक गेरूआकेँ सरिऔलक आ आँखि मूनि पड़ि रहल। माल-जाल भूखे डिरिया रहल छलै। बुनछेक होइतैक तऽ कने टहला-बुला अबितिऐक। माल-जाल थाकि-हारि कऽ निंघेसमे मुँह मारि रहल छलै आ बीच-बीचमे एकाध टा घास टोंगैत रहै। काल्हि दुपहरेसँ पानि पड़ि रहल छलै। बेरूपहर घास नहि आनि भेलै, ने माल खोलि भेलै। दुनू बड़द आ गाय आफन तोड़ि रहल छलै आ खुराठि कऽ कादो कऽ देलकै। थकनी आ चिंतामे डूबल-डूबल अचानक बौकूक भक टुटलै तऽ लागलै जेना बोह आबि गेलै। बोह एहने समयमे उठै छलै। साओन-भादोक एहने झाँटमे पानि बढ़य लगै आ जलामय कऽ दैक। ओ हाक पाड़ि पड़ोसिया सँ पुछलकै जे पानि तऽ ने बढ़ि रहल छैक। 'धार उछाल भऽ गेलैक ’-पड़ोसिया कहलकै। ओकर मन आशंकित भऽ गेलै। धार उछाल भऽ गेलै, एकर मतलब जे आब पानि पलड़तै। बाध-वन, खेत-पथार, घर-दुआर सभ किछु डूबि जेतै। माल-जाल भासि जेतै। लोक-बेद मरतै। समय तेहन विकराल छैक जे लोककेँ प्राण बचायब कठिन भऽ जेतै। भोरे सँ कार कौवा टाँसि रहल छैक। पता नहि की हेतै। 'बाबू हौ, माय कोना-कोना ने करै छैक।'-बौकूक बेटी पलसिया घबरायल आ व्याकुल स्वरमे ओकरा हाक देलकै। बौकूक कलेजा धकसिन उठलै। भेलवावाली केँ भोर सँ रद्द्-दस्त भऽ रहल छलै। बौकू धड़फड़ायल पानिमे तितैत आँगन गेल। भेलवा वालीक पेटमे आब किछु नहि छलैकजे मुँहसँ बाहर अबितिऐक। लेकिन जी फरिया रहल छलै आ ओ-ओ करैत कालबुझाइ जेना पेटक सभटा अँतड़ी बहरा जेतै। औक बन्न भेलापर ओ कहरय लगै। ओकर टाँग-हाथ सर्द भऽ गेल छलै। 'हाथ-गोरमे तेल औंस दही आ सलगी ओढ़ाय दही।’- भेलवा वालीक नाड़ी टेबैत बौकू पलसियाकेँ कहलकै। पलसिया मायक पैर ससारय लगलै आ बौकू चिंताक अथाह समुद्रमे डूबल बैसल रहलै। बौकूकेँ बुझेलै जेना ओकर घर आ बाहर दुनू छिड़िया गेलै आ ओकरा बूते आब कोनो चीज समटब पार नहि लगतै। भेलवा वाली सूति रहलै। नट्टा आ ललबा भूखसँ लटुआ गेलै। तीतल धुँआइत जारनिसँ पलसिया मकइक फुटहा भूजऽ बैसलै। दुनू छौड़ा चूल्हि लग बैसल खापड़ि दिस ताकि रहल छलै आ नीचामे खसैत लावा बीछि-बीछि खाय लगलै। 'उतरबरियाबाधमे पानि भरि गेलै।'- बाध सँ घूरल देबुआ हल्ला कऽ रहल छलै। सभ चीज नाश भऽ जेतै। बौकूकेँ एहि बेरूका लच्छन नीक नहि बुझाइत रहै। पछिया परक झाँट आ कोसीक बाढ़ि सभकेँ लऽ कऽ डूबि जेतै। एहि टोल कि पूरा गामेमे ककरो नाह नहि रहै \ माल-जाल, धीयापूता आ बिमरियाहि घरनीकेँ लऽ कऽ एहन विकराल समयमे ओ कतऽ जेतै ? बौकूकेँ किछु नहि फुराइ जेना ओकर अकिल हेरा गेल होइ। माल-जाल डिकरैत रहै। बौकू गठुल्लामे ढुकलै आ किछु फुफड़ी पड़ल मटिआइन ठठेर बीछि कऽ ओगारि देलकै। तीनू टा माल कतहु-कतहु सँ पात नोचऽ लेल मूड़ी मारऽ लगलै आ डाँटकेँ खुरदानि देलकै। पानि बढ़िते गेलै। बीच-बीचमे लोक सभ पानि बढ़बाक हल्ला करै। नाहक इंतजाम करबा लेल रामचन सभकेँ कहने फिरि रहल छलै। घरसँ निकलै वला समय नहि रहै। एहन समयमे के आ कतऽ नाहक इंतजाम करतै ? कखनो काल बौकूकेँ लगै जे रामचन बलौं लोककेँ चरिया रहल छैक। किछु नहि हेतै। धार खाली फूलि गेल छैक। थोड़ेक पानि अऔतै आ सटकि जेतै। रामचनक घरमे अनाज-पानि कनेक बेसी छैक तेँ ओकरा नाहक एतेक फिकिर छैक। लेकिन के कहलक-ए ! ओकर विश्वास कपूर जकाँ तुरन्ते उड़ि गेलै। मेघ पतरेलै आ कने कालक लेल बुनछेक भऽ गेलै। बच्चासँ लऽ कऽ बूढ़ धरि गामक समस्त लोक पानि देखबा लेल घरसँ बाहर आबि गेलै। उत्तरभर सगरे पानिए-पानि देखाइत रहै। बस्ती दिस जे पानि दौड़ल आबि रहल छलै, तकरा धीयापूता सभ हाथ आ बाँहि सँ रोकैत रहै। पानिक धार कने काल धरि बिलमिकेँ जमा होइत रहै आ तकर बाद हाथ आ बाँहिकेँ टपैत आगू बढ़ि जाइक। छौंड़ा सब आगू जा कऽ फेर पानिकेँ घेरै। बान्ह-छेककेँ टपैत पानि फेर आगू बढ़ि जाइक। पानिक ताकतक सोझाँ छौंड़ा सभ हारि नहि मानय चाहैत रहय। पानि खरहू सभक लेल कौतुक आ खेलक वस्तु बनि गेल छलै, लेकिन सियानकेँ आतंकित कऽ रहल छलै। 'बाप रे ! वेग देखै छिही ? ई पानि जुलूम करतै।’- करमान लागल लोक दिस तकैत भल्लू बुढ़बा बजलै। कोसीक उग्र रूपकेँ लोक सभ अनिष्टक आशंका आ आश्चर्यक भाव सँ देखि रहल छल आ अपना-अपना हिसाबेँ टिप्पणी कऽ रहल छल। बैकू माल खोलि दछिनबरिया बाध लऽ गेलै। थोड़बे कालमे बहुत चरबाह जुटि गेलै। बाढ़ि आबि गेलापर माल-जालक लेल कोन स्थान सुरक्षित हेतै, ओ सभ ताहि दिआ गप्प कऽ रहल छल। मुदा सभक नजरि उत्तर दिस जमल रहै, जेम्‍हरसँ पानि आबि रहल छलै। बरखा फेर हुअय लगलै। आब बाढ़ि आबि कऽ रहतै। ओ सभ दुश्चिन्ताक बोझ तर दबल आ बरखामे तितैत चरबाहि करैत रहल। गामपर हल्ला होमय लगलै। एकर मतलब जे घर-आँगनमे पानि ढ़ुकि रहल छलै। ओ सभ मालकेँ गाम दिस रोमलक। आगू बढ़ला पर देखलक पानि बहुत वेगसँ दौड़ल अबैत रहए आ जल्दिए दछिनबरियो बाधकेँ पाटि देतै। बौकू गाम पहुँचल तऽ देखलक दुआरि-अँगनामे भरि घुट्टी पानि लागि गेल छैक। छपछपाइत गोहालीमे मालकेँ जोड़ि ओ भेलवा वालीकेँ देखय आँगन गेल। साँझ पड़ि रहल छलै। झाँटमे अतिकाल रहलाक कारणे ओकर सौंसे देह भुटकल आ थरथराइत रहै। ओ धोती फेरलक आ चद्दरि ओढ़ि चूल्हि लग बैसि गेल। चूल्हि पर पलसिया मकइक खिचड़ी टभकाबैत रहै। घरमे धुइयाँ औनाइत रहै आ बाहर निकलऽ लेल अहुँछिया काटि रहल छलै। बौकूकेँ बुझेलै जेना कोसी तर मे रहनिहारो धुइयाँ छिऐ जे बाढ़िसँ घेरायल चकभाउर दैत रहैत छैक आ रस्ता नहि भेटला पर पानिमे बिला जाइत छैक। चूल्हि फुकैत-फुकैत पलसिया बेदम भऽ गेल छलै। 'आब की हेतै ?' भेलवा वाली पुछलकै। रद्द-दस्त बंद भऽ गेला सँ ओकर मन नीक भऽ गेल रहै। मगर कमजोरीक कारणे पड़लि छलि। 'आब की हेतै ?' कोनो जवाब नहि भेटला पर ओ फेर पुछलकै। 'जे सबहक हेतै, सैह हेतै, और की हेतै ? अखनि घर छोड़क कोनो बेगरता नहि छैक।’ पलसिया बाप दिस एकटक तकैत सुनि रहल छलै। 'सतबा सब परानीकेँ गोढ़ियारी लऽ गेलै।' भेलवा वालीक स्वरमे उलहन छलै। 'गोढ़िआरिए कोन ऊँच पर छैक।' बौकू खौंझाय गेलै। 'ओतय कटनियाँक डर तऽ नहि ने छैक।' भेलवा वाली फरिछाबैत कहलकै। 'भोर देखल जेतै।' चिंता करैत-करैत बौकूमे चिंतनीय निरपेक्षता आबि गेल छलै। 'पानि बढ़िए रहल छैक।' भेलवा वाली जेना अपनेसँ गप्प करैत बजलै। आँगनमे आब भरि ठेहुन पानि भऽ गेलै। धीयापूता मचान पर सूति रहलै। तीतयवला सब वस्तुकेँ पलसिया सीक आ मचानपर राखि देलकै। माल-जाल पानि मे ठाढ़ भेल डिरिया रहल छलै। साँप-कीड़ाक बहुत डर रहै। धार हहाइत रहै। निसबद रातिमे कोसीक गरजब विकराल आ डराओन लागि रहल छलै। ओकर एकपरतार हहासमे एकटा दोसरे सुर-ताल छलै। कखनो धैर्य आ कखनो बेचैनी संगे बौकू ई संगीत सुनि रहल छल। ओ तबाही आ मृत्युक संगीत रहै। ओकर निन्न उड़ि गेल रहै। ओ कखनो बढ़ैत पानिक अंदाज करैत रहय; कखनो आँखि निरारि माल-जालकेँ देखैत रहय। कखनो कान पाथि विनाशकारी हहास सुनैत रहय। ओकरा होइक जेना घर लऽ दऽ कऽ कखनो बैसि जेतै। ओ चेहाय कऽ उठय आ आँखि फाड़ि-फाड़िघरकेँ देखय। 'भागह हौ, बौकू भैया। घर कटि रहल छैक, भागह हौ।' कमल चिकरैत रहै। बौकूकेँ हूक पैसि गेलै आ समूचा देह थरथराय लगलै। आब ओ कोना की करतै ? कोना सभक जान बचेतै ? कमलक चिकरब सुनि भेलवा वाली हाकरोस कऽ उठलै—'हौ बाप ! ई घरेमे घेरिकऽ सभक जान मारि देतै। हे भगवान, रच्छा करह। हे कोसी माय, जान बचाबह। तोरा जीवक बदला जीव देबह। हे कोसी महरानी, बचाय लैह।’ बौकूकेँ भेलवा वालीक अगुताइ पर पित्त उठलै। लेकिन लगले भेलवा वाली आ धीयापूताक लेल ओकरा अफसोच आ दुख भेलै। भेलै जेना सभकेँ कन्हा पर लऽ कऽ उड़ि जाइ, ऊपर, बहुत ऊपर आकाशमे ठेकि जाइ आ धार आ समुद्र केँ ठिठुआ देखबैत रही। लेकिन ओकर देह सिहरि उठलैक। भेलै जेना खसि पड़ब। कटनियाँ अखन ओकरा घरसँ दूर रहै; लेकिन पानि घर ढुकि गेलै। कच्छाछोप पानि भऽ गेलै। पानिमे बहुत वेग रहै। अखन जँ ओ सभ केँ लऽ कऽ निकलै तऽ एहि रेत आ अन्हारमे सभ दहाय-भसिया कऽ मरि जेतै। आब भोरसँ पहिने किछु नहि भऽ सकतै। बौकूकेँ एको पलक लेल निन्न नहि भेलै। ओ दुनू ठेंगहुन केँ पजियाठने ओहि पर माथ टेकने बैसल रहय। उकस-पाकस आ कनेको हिलडोल करबाक कोनो इच्छा नहि भेलै। सभतरि मृत्यु आ विनाशक हाहाकार पसरल छलै। धीरे-धीरे ओकर आत्मामे विषण्ण शून्यता भरैत गेलै। मन पर उद्वेगरहित संवेदनशून्य शांति पसरि गेलै। आब ओकरा कोनो चीजक चिंता नहि रहलै \ भेलवा वाली, धीयापूता, मालजाल, कोसीक विध्वंस सभटा अर्थहीन भऽ गेलै। ओकर मोह टूटि गेल रहै। ओ कठोर पत्थर जकाँ अचल बैसल रहय। बरखा रूकि गेलै। आसमान साफ भऽ गेलै। किरिन फुटलै। ओकर फुटैत लाली देखि भेलवा वालीकेँ बुझेलै जेना कोसी महारानी ओकर गोहारि सुनि लेलकइ। ओ आशा आ उत्साहसँ भरि गेलि। ओ बौकू केँ हाक पाड़लक। बौकू कोनो उत्तर नहि देलकै जेना ओ अगम—अथाह पानिमे डूबल हो आ हाक सुनि ऊपर हेबाक जतन कऽ रहल हो। भेलवा वालीक दोसर हाक सँ बौकूमे स्पन्दन भेलै। ओ अकचकाइत मूड़ी उठौलक आ भकुआयल सन सभ चीजकेँ चिन्हबाक आ स्मरण करबाक प्रयास करय लागल। बनैत - बिगड़ैत “हाह। हाह”। टोकारा आ थपड़ी सँ नै उड़ै छै तऽ माला कार कौवा केँ सरापय लागै छै – “बज्जर खसौ, भागबो ने करै छै”। कौवा कखनियें सँ ने काँव-काँव के टाहि लगेने छै। कौवाक टाहि सँ मालाक कलेजा धक सिन उठै छै। संतान सब परदेस रहै छै। नै जानि ककरा की भेलै! ने चिट्ठी-पतरी दै छै, ने कहियो खोज-पुछारि करै छै। कते दिन भऽ गेलै। कुशल समाचार लय जी औनाइत रहै छै। लेकिन ओकरा सब लेखे धन सन। माय-बाप मरलै की जीलै तै सँ कोनो मतलब नै। “हे भगवान, तूहीं रच्छा करिहक। हाह। हाह”।– माला कौवा संगे मनक शंका आ बलाय भगाबय चाहै छै। “धू, छोड़ू ने। कथी मे लागल छी। ओ अपन बेगरतेँ कर्रइत छै। अहाँक की लइए’- सत्तो बुझबै छै। लेकिन मालाक मन नै मानै छै। अनिष्टक आशंका सँ डरायल ओ और जोर-जोर सँ होहकारा दै छै आ थपड़ी पाड़ै छै। माला सब बेर एहिना करै छै। सत्तो लाख बुझेलक, बात भीतर जाइते नै छै। कतेक मामला मे तऽ सत्तो टोकितो नै छै। कोय परदेस जाय लागल तऽ माला लोटा मे पानि भरि देहरी पर राखि देलक। जाइ काल कोय छीक देलक तऽ गेनिहार केँ कनी काल रोकने रहल। अइ सब सँ माला केँ संतोख होइ छै, तैं सत्तो नै टोकै छै। ओकरा होइ छै टोकला सँ की फैदा? ई सब तऽ मालाक खून मे मिल गेल छै। संस्कार बनि गेल छै। सत्तो केँ छगुन्ता होइ छै। यैह माला कहियो अपन बेटा-पुतौह आ पोती सँ तंग भऽ कऽ चाहैत रहै जे ओ सब कखैन ने चैल जाय। रटना लागल रहै जे मोटरी नीक, बच्चा नै नीक। सैह माला अखैन संतान खातिर कते चिंतित छै। सत्तो सोचै अय अइ मे मालाक गलती नै छै। माला केँ सख लागले रैह गेलै जे नेहाय कऽ आयल छी तऽ पुतौह परैस कऽ खाइ ले देत आकि कहियो केशे झाड़ि देत या गोड़े हाथ दाबि देत। पोती केँ टांगैत-टांगैत तऽ छातीक हाड़ दुखाइत रहै। अपन कोखिक जनमल बेटो कहियो ई नै पुछलकै- माय केना छें? कौवा उड़बै ले माला कखनो हाथ चमकाबैत अछि, कखनो मुँह चमकाबैत अछि। मगर ओकर धमकी-चमकी के कौवा पर कोनो असर नै भेलै। ओ ओहिना काँव-काँव करिते छै। कौवाक टाहि सँ सत्तोक जी सेहो धक रहि जाइ छै। मन मे तरह-तरह के शंका आ डर पैस जाइ छै। लेकिन ओ कहुना अपना केँ बुझा लैत अछि। सत्तो संगे ई सब बेर होइ छै। कोनो अपसगुन भेला पर आशंकित भऽ जाइत अछि। आशंका केँ बुधि आ तर्क सँ ठेल कऽ बाहर करैक कोशिश करैत अछि। कखनो संस्कारक फान मे लटपटाइत अछि। कखनो सम्हरैत अछि। फेर फँसैत अछि। फेर छुटैत अछि। ई सब बड़ी काल चलैत रहै छै। कार कौवा तेना एकपरतार टाहि लगेने जा रहल छै जे कान में झड़ पड़य लागलै। “देखियौ, ई कौवा तऽ केना-केना ने करै छै। नीक नै लागैए”।– माला व्याकुल भऽ जाइ छै। “ई अहाँक मनक भरम छी”।– सत्तो कहै छै आ एकटा रोड़ी जुमा कऽ कौवा दिस फेकै छै। कौवा उड़ि गेलै। उड़ल जाइत कौवा केँ सुना कऽ माला कहै छै- “हम ककरो कुइछ नै बिगाड़लिऐ अय। जा, चैल जा”। कौवा आगू वला छत पर बैठ रहै छै आ फेर कर्रय लागै छै। सत्तो केँ मोन पड़ै छै एक दिन बड़ी राति केँ माला ओकरा जगेलकै- “सुनै छिऐ? कुत्ता बड़ी काल सँ कानै छै। हमर जी छन-छन करैत अछि”। सत्तो अकानलक। ठीके ढेरी कुत्ता कानैत रहै। आशंका सँ ओकरो मन सिहरि गेलै। लेकिन ओ बाजल- “अरे, भूख सँ कानैत हेतै। देखै नै छिऐ आइ काल्हि कोय एक्को कर दै छै। “भूख सँ एगो दूगो ने कानितिऐ, आकि सब कानितिऐ”?- सत्तोक तर्क मानै ले माला तैयार नै रहै। “और सब केँ देखाउँस लागल हेतै”।– सत्तो दोसर तर्क देलकै। माला केँ सतोक तर्क नै सोहेलै। ओकरा झुझुआयल सन चुप बैठल देख सत्तो फेर बुझेलकै- “देखै नै छिऐ विदाइ बेर मे की होइ छै। जहाँ एगो मौगी कानल कि सभक आँखि मे नोर आबि गेल”। माला कने काल चुप रहल। फेर मूल बात पकड़ैत बाजल- “पहिने तऽ सब करे कर दैत रहै तबो किए कानैत रहै”? “कोनो कुत्ते मैर गेल हेतै, तकरे सोग मे कानैत हैत”। - सत्तोक बात सँ माला संतुष्ट तऽ नै भेल, मगर कुत्तो सब कते कनितय। एगो चुप भेल। दूगो चुप भेल। आस्ते-आस्ते कानब घटैत गेलै। फेर गोटेक आध कुत्ताक कानब कखनो कऽ सुनाइ। बाद मे ओहो बन्न भऽ गेलै। माला आ सत्तो सेहो कखनो निन्न पड़ि गेल। माला केँ कौवाक गुनधुन मे पड़ल देख सत्तो पुछै छै- “अहाँ कौवाक बोली बुझै छिऐ”? माला कने काल बात केँ ताड़ैत रहल। बातक मरम बूझि खुखुवा उठल- “दुनियांक काबिल अहीं टा तऽ छी। अहाँ सन बुझक्कड़ और कोय छै”! मालाक कटाह बोल सँ सत्तो केँ चोट लागलै। ओ चुप आ उदास भऽ गेल। ओकरा लागलै जे चीज पसिन नै पड़ै छै, तकरा प्रति लोग निष्ठुर आ अन्यायी भऽ जाइत अछि। कारी रंग आ टाँस आवाजक चलते कौवा केँ अशुभ बना देलक। सत्तो केँ अपन नौ मासक पोती मोन पड़ै छै- मुनियां। कौवा देख मुनियां चहैक उठै। आह-आह कहि ओकरा बोलाबै। मुनियां कानय लागै तऽ सत्तो कौवे केँ हाक दै- “कोने गेलही रे कौवा ऽ ऽ? मुनियाक कौवा ऽ ऽ ? कोने गेलही ई ई “? ई सुनिते मुनियां चुप भऽ जाइ आ मूड़ी घुमा-घुमा कौवा केँ ताकय लागै। कौवा बिलायल जाइ छै। कुइछ दिनक बाद तऽ साफे अलोपित भऽ जेतै। अखैन ई बात ने माला जानै छै, ने मुनियां। कौवा मुनियांक जिनगी मे समा गेल छै। मुनियां केँ बेर-बेर कौवा मोन पड़ैत रहतै, दादा मोन पड़ैत रहतै। ने ओ कौवा केँ बिसैर सकैत अछि, ने दादा केँ। मुनियां कौवा केँ ताकैत रहत, दादा केँ ताकैत रहत। कहियो ने कौवा रहतै, ने दादा रहतै। बात हरेक बातक पाछू कोनो ने कोनो खिस्सा होइत छैक।लेकिन सब बात खिस्सा नहि होइत अछि। जे बात हम कहब से नहि जानि खिस्सा हैत कि नहि, तखन ई गप्प अबस्स जे खिस्सो मे कोनो ने कोनो बाते होइत छैक आ हमहूँ बाते कहब। सुनलाक बाद भऽ सकैत अछि अहाँ कही धुर ईहो कोनो बात भेलै ! अहाँ लेल ई कोनो बात नहि हो, मगर हमरा लेल तऽ बड़ भारी बात भऽ गेल रहय। जँ साँच कही तऽ ओहि बात सँ हम बहुत डेराय गेल रही। बात की रहत। कोनो बात नहि। बिन बातक बात। लेकिन ओ तेहन तूल पकड़ि लेलक जे ओकरा सँ पिंड छोड़ायब मोसकिल भऽ गेल आ हमरा अदंक समाय गेल। कहियो काल एना होइत छैक, जे अनचोक्के अहाँ कोनो एहन बात बोलि दैत छी जइमे फँसि जाइ छी। फँसबाक अंदाज जँ पहिनहि सँ रहैत तँ अहाँ ओहन बात किन्नहुँ नहि बजितहुँ। हमरो संग एहिना भेल। हम घरसँ खुशी-खुशी तरकारी बेसाहय निकलल छलहुँ। साँझ पड़ैत रहैक। दिनमे बरखा भेला सँ मौसम सोहाओन लगैत रहैक। हम नेयारने रही जे झटपट तरकारी कीनि कऽ घर घूरि जायब। मगर भाग्य देखू; या भाग्य की, परिस्थितिक संजोग कहू। ओहि दिन घर घुरबामे हमरा बड्ड देरी भऽ गेल। देरी जे भेल, से भेल। देरी तऽ कतेको बेर कतेको मामला मे भऽ जाइत अछि। रच्छ रहल जे हम बचि गेलहुँ। नहि तऽ पिटा जइतहुँ या हमर हत्यो भऽ सकैत रहय। तऽ भेल ई जे हम साइकिलसँ जाइत रही। सब्जी बजार आबि गेल तऽ साइकिल पर सँ उतरि गेलहुँ। बरखा भेलासँ बजारमे थाले-थाल रहैक। थालमे चप्पल फँसि जाइ। साइकिल सम्हारैत, सम्हरि-सम्हरि पयर रखैत आ लोकबेद सँ बचैत जखन हम नेबोवला लग पहुँचल रही तऽ देखलहुँ जे ओ एकटा आदमीसँ बकझक कऽ रहल अछि। नेबोवला चौदह-पन्द्रह सालक गोर आ सुन्दर लड़का छल। ओ बीच सड़क पर ठाढ़ छल। नीचाँ छिट्टामे एक दिस धनिया पत्ताक छोट-छोट मुठ्ठी आ दोसर दिस नेबो राखल छलैक। बगलमे आठ-नौ सालक एकटा आर लड़का रहैक जे ओही लड़काक संगी लगैत रहैक आ चुपचाप ठाढ़ रहैक। लड़का जकरा संग बकझक करैत रहैक से चालीस-पचास सालक अधेड़ आदमी छल। ओकर हाथमे फाइल रहैक आ किछु छोट-मोट सामान, जेना नेबो, गमछी इत्यादि। लड़का कोन बात लऽ कऽ बकझक कऽ रहल अछि, ताहि पर ध्यान नहि दऽ कऽ हम ओकरा दू-तीन बेर जल्दी-जल्दी टोकलिऐक आ नेबोक भाव पुछलिऐक। लड़का हमरा देखलक, मुदा किछु बाजल नहि। हमरा तखने ओतयसँ चलि देबाक चाही छल। बाजारमे नेबोक कमी नहि रहैक। कतहु लऽ सकैत रही। लेकिन से भेल नहि। हम ओत्तहि ठमकल रहलहुँ। जानि ने किएक। आब सोचैत छी तऽ लगैत आछि आदमीक अन्दर जे जन्मजात जिज्ञासा होइत अछि, भरिसक तकरे कारणे ठमकि गेल होयब। फेर अपन एहि सोचलहा पर संदेह हुअय लगैत अछि। ई कोनो जरूरी नहि जे हम ओतए जिज्ञासावश रूकि गेल होइ। दोसरो कारण भऽ सकैत अछि। कैक बेर एहन होइत छैक जे ककरो वाक् चातुरी, ककरो सुधंगपनी, ककरो सुन्दरतासँ अहाँ बन्हा जाइत छी। साइत हमरो ओहि लड़काक सुन्दरता बान्हि लेने छल। ओकर चेहरा पर परेशानी आ चिन्ताक भाव रहै। भरिसक हम ओतय सहानुभूतिवश बिलमि गेल रही। ओहि आदमीकेँ हम गौरसँ देखल आ ओकर गप्प सुनय लगलहुँ।आदमी ओहि लड़काकेँ कहि रहल छल—तोंही लेने छें। - लेलिऐ तऽ कहाँ छै ? छै हमरा लग ?—लड़का बाजल। - कतौ राखि देने हेबही। - कतय राखबै ? एतय छै कोय हमर? - नइँ छै तऽ कतय चलि गेलै ? बोल कतय छै ? - हम लेलिऐ जे कहबह कतय छै ? - नइँ लेलही तऽ ओतयसँ भागि किऐ एलही ? - भागबै किऐ ? हम तऽ एतहि रहिऐ। बस, इएह ओ क्षण रहै जखन हम बातकेँ लोकि लेने छलहुँ। गप्प तऽ बुझा गेल रहए, मुदा मामला पूरा स्पष्ट नहि भेल। पुछलिऐ भाइसाहेब, बात की छिऐ? ओ आदमी बाजल- अरे, ई लड़का अखने दोसर ठाम छल। एकरा सँ हम नेबो किनलिऐ आ जेबी सँ पाइ निकाल ऽ लेल छत्ता नीचा राखि देलिऐ। पाइ दऽ कऽ हम चल गेलिऐ। छत्ता निच्चे रहि गेलै। तुरन्ते मन पड़ल आ घुरलिऐ तऽ देखै छी ई ओतयसँ गायब। ओहि आदमीक गप्प सुनि कऽ हम कहलिऐ — ई सभ तऽ एहिना घूमि-घूमि कऽ सामान बेचैत अछि। हम तऽ रोजे देखै छिऐ। अहाँक छत्ता कतहु दोसर ठाम छूटल होयत। ओ आदमी हमर गप्प सुनैत रहल आ जहिना हम चुप भेलहुँ, तहिना ओ ओहि लड़का सँ छत्ता मांगब शुरू कऽ देलक। जँ हम चाहितहुँ तऽ एहि लफड़ा सँ तखनहुँ छुट्टी छोड़ा लैतहुँ। की रहै ! ओतय सँ चलि दैतहुँ आ सामान किनैत घर घूरि अबितहुँ। लेकिन हमरो जिद देखू। हम नेबो कीनय चाहैत रही आ ओही लड़कासँ कीनय चाहैत रही। हमरा होइत रहय जे बस आब मामला खतमे होइ बला छैक। मगर ओ आदमी छत्ता मंगैत जा रहल छल आ ओ लड़का अपन दोकनदारी रोकने नासकार करैत जा रहल छल। आदमी लड़का पर दबाव बढ़ेने जाइत रहय। अनाड़ी आ अनुभवहीन हेबाक कारणे लड़काकेँ बुझाइत नहि रहै जे ओ की करय। ओ नचार आ बेबस देखाइत रहय। ओहि आदमीक लक्षण हमरा नीक नहि बुझाइत रहय्। ओ नीक लोक नहि बुझाइत रहय। ओहि आदमी मे ने तऽ छत्ता हरेबाक दुख रहैक, ने ओहि लड़का पर तामस। ओकर चेहरा पर चलाकी आ धूर्त्तताक भाव रहैक आ स्वरमे कठोरता रहैक। फेर छत्ता भुइयाँ पर रखबाक ओकर बातो हमरा जँचल नहि रहय। निच्चाँ मे ततेक थाल रहैक जे कोनो चीज रखबाक बात सोचल नहि जा सकैत रहय। देर हेबाक कारणे हम खौंझा गेल रही। हमर धैरज टूटि गेल। बमकि उठलहुँ — देखू, एकरा कमजोर बूझि केँ ठकिऔक नहि। - हम एकरा ठकै छिऐ ? – ओ आदमी विरोध करैत बाजल — अहाँ कोना बुझै छिऐ जे हम एकरा ठकि रहल छिऐ ? - हम ई नहि कहैत छी जे अहाँ एकरा ठकि रहल छिऐ। लेकिन जँ अहाँ एहन सोचैत होइ तऽ ई ठीक बात नहि अछि। ई सभ सीधा – साधा आ गरीब लोक अछि आ एहि सभक धंधा चोरी नहि छैक। - आ हमर धंधा ठकपनी अछि ? - हम कहाँ कहैत छी जे अहाँक धंधा ठकैती अछि। - तखन ? - तखन की ? किछु नहि। - तऽ अहाँ बीचमे पड़ैत किएक छी ? - हम बीचमे किएक पड़ब। हम तऽ एतने कहैत छी जे अहाँ एकरा तंग नहि करियौ। - ई अहाँक के होयत ? - हमर ? हमर के होयत ! कोय ने। - तऽ अहाँ किएक नाक घोसियाबै छी ? - एहि लेल जे हम एतय छी आ ई सब हमरा सोझा भऽ रहल अछि। अहाँ बाहरसँ आबि कऽ एकरा तंग कऽ रहल छिऐक। कतय घर भेल ? - हम बाहरक छी ? कोना बुझलिऐ हम अनतौका छी ? - किऐक तऽ अहाँ एतुक्का भाषा नहि बजैत छी। - हम एत्तहि रहैत छी। - कतऽ ? कोन ठाम ? - चाँदनी चौक। चलू हमरा संग। देखा दैत छी। - देखबाक कोनो बेगरता नहि अछि। - नहि-नहि, चलू देखाइए दैत छी। - हम देखि कऽ की करब ? - देखऽ तऽ अहाँकेँ पड़बे करत – कहि कऽ ओ हमर साइकिल पकड़ि लेलक। हमरा लागल डेरा लऽ जा कऽ ओ अपन संगी सभसँ पिटबायत आ संगमे जे किछु अछि, छीनि लेत। विरोध कयला पर ओ हमर हत्यो कऽ सकैत अछि। ई सभ सोचि कऽ हम डरि गेलहुँ। मुदा ओ डर क्षणिक छल। लोक जखन संकट मे पड़ि जाइत अछि तऽ ओकर डर भागि जाइत छैक आ ओकरामे साहसक संचार होइत छैक। हमरो हिम्मत आबि गेल। हम कड़कि कऽ कहलिऐक—हमरा कोन गरज अछि घर देखबा के ? - तऽ बीचमे टपकलहुँ किएक ? - एहि लेल जे तों ओकरा संग अन्याय करैत छलह। - न्याय करैत रही कि अन्याय, तों दखल दै बला के ? - अच्छा ! तों ठकबहक, अपराध करबहक आ लोक चुप रहतैक ? - ठीक छै। चलह घर देखि लएह। पता चलि जेतह, हम के छी ! - तोहर घर देखै के हमरा समय नहि अछि; ने कोनो बेगरता। साइकिल छोड़ह आ अपन रस्ता धरह। - आ हमर छत्ता के देतै ? - छत्ता हम देबह? - तब के देतै ? तों रोकलहक किऐ ? - ठीक छै, रोकलियह। लेकिन पकड़ने तऽ नहि छियह। छत्ता लेने छह, तऽ जा वसूलह गय। दिमाग नहि चाटह। फेर पता नहि ओ की सोचलक। साइकिल छोड़ि देलक। कहुना जान छूटल। हम आगू बढ़ि गेलहुँ। हमरा लागल ओ घूरि कऽ लड़का लग जायत। लेकिन आश्चर्य! ओ लड़का लग नहि गेल। कने आगू जा एकटा तरकारी बालासँ जखन हंम मोल-मोलाय करैत रही तऽ देखलहुँ ओ हमरे दिस आबि रहल अछि। हमर जी सन्न सिन रहि गेल। पता नहि आब ओ की करय आबि रहल अछि। हम ओकरा पर नजर टिकेलहुँ। ओहो हमरे ठिकिऔने रहय। हमर मोनमे आशंका आ भय समा गेल। हम चौचंक भेल ओकरा देखलहुँ। ओकर चेहरा पर हमरा कठोरता आ घृणाक भाव देखायल। लागल हमरा जल्दीसँ निकलि जेबाक चाही। बजार अबैत काल हम कतेक प्रसन्न रही ! आब घर घुरैत काल खिन्न आ दुखी छी। बात दुख के हो या सुख के, गुजरिए जाइत अछि। आदमी सुखबिसरि जाइत अछि, दुख मोन रहैत छैक। हमहुँ ओहि आदमी केँ बिसरि नहि पबैत छी। जखन कखनहुँ ओकर मोन पड़ैत अछि तऽ उदास आ खिन्न भऽ जाइत छी आ सोचय लगैत छी, की ओ ठीके ठक रहय ? रंभा एकटा सुंदर दीब स्त्री हमरे दिस आइब रहल ऐछ। हमर दुनू कात जगह छै। ऊ तकरे ठिकिएने आइब रहल ऐछ। ओकर गरहैन, ओकर रंग, ओकर कोमलता, माधुर्य आ स्मित अदभुत छै। स्त्री इंदरासनक परी लागै छै। की नाम हेतै ? उर्वशी, मेनका या रंभा ? पता नै। सुंदरताक देवी एहने होइत हेतै, जकरा एला सऽ इजोत भऽ जाइ छै आ हँसला पर फूल झड़ै छै। कोन फूल झड़ैत हेतै ? चम्पा-चमेली ? एहने कोनो फूल हेतै, जकर गंध सऽ लोग माइत जाइत हएत। से डिब्बा मे बैठल लोग ओइ रंभाक रूप पर लोभा गेल। ओकर स्वागत मे हम एक कात घुसैक गेलौं आ हाथक इशारा सऽ बैठ जेबाक अनुरोध केलिऐ। ऊ बैठबे कएल कि एकटा नौ-दस सालक लड़का ओकरा आगू मे आइब कय ठाढ़ भऽ गेलै। ऊ हमरा दिस घुसैक गेल आ ओकरा बामा कात बैठा लेलकै। ओकर सुंदरताक जादू तेहन रहै जे ओइ लड़का पर और ध्यान नै गेल। सबहक नजैर ओइ स्त्री पर रहै। ओइ सुंदरीक आगमन सऽ चतुर्दिक उल्लास पसैर गेल रहै, बुझाइ जेना वसंतोत्सव हो-प्रेमक विराट इजोत सऽ जगमगाइत। होइ ओकरा देखते रही। उत्सव कखनो खतम नै हो। हम जैहना ओकरा दिस ताकिऐ, ऊ बिहुँस दैत रहय। ओकर चेहरा पर मंद मधुर हास लहर जकाँ आबैत रहै। भुवनमोहनी मुस्की। तखनिए कुइछ भेलै। ऊ लड़का दिस घुमल—ओइ लड़का पर आब फेर हमर ध्यान गेल जे ओकर संग लागल आयल रहै आ बामा कात बैठल रहै। नौ-दस सालक ऊ लड़का देखै-सुनै मे एकदम साधारण रहै। सुखायल सन। चमड़ी पर कोनो चमक नै। गुमसुम बैठल। हमरा भेल लड़का ओकर नौकर हेतै। लेकिन नै। ऊ ओकर बेटा रहै। हमरा बिसबास नै होइत रहय जे इ ओकर बेटा हेतै। दुनू मे कोनो मिलान नै रहै। ने मुँह मिलैत रहै, ने रंग मिलैत रहै आ ने देहे-दशा एक रहै। भऽ सकैए लड़का बाप पर गेल होइ। ज ऊ बाप पर गेल हैतै तऽ ओकर बाप केहनो नै हेतै। एतेक सुंदर स्त्री कय एहन घरवला ! ओइ स्त्री लय हमरा अपसोच भेल। संदेह भेल-ऊ घरवाला सऽ प्रेम करैत हेतै ? तन आ मन दुनू मिलैत हो, तबे प्रेम होइ छै। कोनो एकटा भेटला पर लोग भटकैत रहैत ऐछ। उहो भटकैत हएत ? ओकरा सऽ रूइक-रूइक कऽ गप होइत रहल। हम पुछिऐ आ ऊ जवाब दिअय। ऊ कुइछ नै पुछलक। ई बात हमरा खटकल। भेल जे ओकरा रूप के घमंड छै। लेकिन एकटा बात और रहै। ओकर-हमर उमेर मिलानी मे नै रहै। दस-पनरह साल के फरक रहल हेतै। एना मे ऊ हमरा किए चाहत ? लेकिन तब ओकर ओइ हँसीक की मतलब ? आँइख मे झिलमिलाइत सिनेह ककरा लेल ? हम ओकर मुँह दिस ताकलिए जेना ओकर चेहरा सबटा भेद नुकेने हो। हमरा पर नजैर पैड़ते मुस्की सऽ ओकर चेहरा खिल गेलै। खिलैत गुलाब सन ओकर चेहरा देखै लय हम नव-नव सवाल सोची। हमर सवालक कोनो अंत नै रहय, ने ओकर चेहरा सऽ फूटैत मोहनी मुस्कीक कोनो सीमा। कतेको सुंदरी अपन रूपजाल मे फँसल लोग कय देख आनंदित होइतरहैत ऐछ। रूपक जादू देखब ओकर खेल होइ छै। ई रंभा हमरा संग वएह खेल तऽ ने खेला रहल ऐछ ? पता नै की रहस्य छै ! कतेक बेर स्त्रीक असली भावना बूझब बड़ कठिन होइ छै। सुंदरी माय सऽ भेंट करय हाजीपुर गेल रहय। आब कटिहार जा रहल ऐछ। कटिहार सौसराइर छै। घरवाला दोकान करै छै। ''कटिहार मे और के-के ऐछ ?''- पुछलिऐ। कहलक ''बस ससुर ऐछ, अही सन। फौज मे रहय। आब रिटायर कऽ गेलै।'' ओकर जवाब सऽ हमरा धक्का लागल। हम ओकर ससुर नै हुअय चाहैत रही। ई बात ऊ किए कहलक ? हम देखै मे ओकर ससुरे सन छिऐ ? ओकर ससुर आ हमर सोभाव मिलै छै ? या उमेर एक छै ? नै जाइन ओकर इशारा कोन दिस रहै। ओकर एगो और गप सऽ हमरा निराशा भेल। ऊ कहलक – ''हम कतेक बेर असकरे जाइ छी। अही सन कोय-ने-कोय भेट जाइ-ए। पते नै चलै-ए रस्ता केना कैट गेल।'' हमर बेगरता बस सफरे धैर छै। तकर बाद ऊ हमरा बिसैर जायत। हमरा मे कोन चीज छै, जकर ऊ हियास करत? ऊ टिकली ऐछ, उइड़ कऽ एतय, उइड़ कऽ ओतय। रूपवती क निष्‍ठा ओहुना संदिग्ध होइ छै। देखलिए ऊ फुसफुसा कय बेटा कय कुइछ कहैत रहै। बेटा नै-नै करैत रहै। पुछलिए – “की भेलै ?” कहलक- “एकरा बाहर के कोनो चीज खाय लय नै दै छिऐ आ संग मे छै, से खाय नै चाहै-ए।” “बाहर के तऽ हमहूं कुइछ नै खाय छी। भोर सऽ एक्को दाना मुँह मे नै गेल ऐछ। आब घरे जा कऽ खायब।” हम कहलिऐ। “हमरा लग खाय वला ढ़ेरी चीज छै। निकाइल कय दै छी।'' ऊ बाजल। “नै-नै। की हैतै ? छोइड़ दिऔ।” हम मना केलिऐ। मगर ऊ नै मानलक। कहलक –''बुझबै जे एगो बेटी भेटल रहय।'' ऊ ऊपर सऽ झोड़ा उतारलक आ अखबार पर पूड़ी, भुजिया आ अँचार सजबय लागल। ऊ ततेक पूड़ी देने जाइत रहै जे हम ओकर हाथ पकैड़ लेलिऐ। ऊ पूड़ी देनाय छोइड़ देलक आ पलैट कय हमरा दिस ताकलक। फेर पाइन दैत कहलक – “खा लिअ।'' ''बाद मे खा लेब।'' कहैत हम अखबार लपेट कय एक कात राइख देलिए। ओकर सिनेह सऽ मन भीज गेल। बेटी ! ओह ! ज ठीके ऊ हमर बेटी होइत ! आब ऊ उतैर जायत। बरौनी आइब रहल छै। ऊपर सऽ सामान उतारय लागल-ए। ओकर एकटा सामान हम उठा लै छिऐ। उतरैत काल कहै-ए “कहियो कटिहार आबी तऽ घर पर जरूर आयब।'' हमरा कुइछ बाइज नै होइ-ए। फेर कलेजा मे जेना हूक उठै-ए। कहै छिऐ- “पता नै अहाँ कय आब देख सकब कि नै।'' ऊ हमरा आश्‍चर्य सऽ देखै-ए। हम सब प्‍लेट फार्म पर उतैर गेल छी। पएर छूबै लय ओ कने झुकै-ए। फेर नै जाइन किए अपना कय रोइक लै-ए आ सीधा भऽ जाइ-ए। ओकर ई बेबहार हमरा नै बुझाइ-ए। हम बिरान छिऐ तैं की ? आकि हमरा पर अश्रद्धा भऽ गेलै तैं गोड़ नै लागलक ? लेकिन हम तऽ एहन कोनो बात नै कहलिऐ, ने एहन कुइछ केलिऐ जे अनसोहाँत हो। तब ऊ एना किए केलक ? जे होइ; मगर ओकर गोड़ नै लागब एक तरहें नीको लागल। हम ओकर सामान पकड़ा देलिऐ। ऊ विदा भऽ गेल। हम ओकरा जाइत देखैत रहलिऐ। सीढ़ी लग पहुँच कय ऊ ठाढ़ भऽ गेल आ घुइम कय हमरा देखलक। हम हाथ हिलेलिऐ। उहो हिलेलक। हमर गाम बसंत रितु बीत गेल अछि। गरमी धबल जाइत छै। लेकिन भोरमे आ साँझमे शीतल आ सोहाओन बसात मंद-मंद चलैत रहैत छै तऽ लगैत छै बसंत अखन गेल नहि अछि, विदा होइत-होइत अपन झलक देखा रहल अछि। एकटा एहने साँझ केँ हम गाम जा रहल छी। सुरूज एखन डूबल नहि छै। बुझाइत छै आध कोस जाइत-जाइत छिप जेतै। अखनुका रौदमे धाह नहि छै। सुरूज इजोतक विराट पिण्ड भरि लगैत छै, तापक प्रचंडतासँ रहित। हमर गाम सुपौलसँ डेढ़ कोस पच्छिम कोसी बान्हक भीतर अछि। आरि-धूर, बालु आ धार टपय पड़ैत छैक; तइँ हमर गाम धरि कोनो सवारी नहि जाइत अछि। पाँव-पैदल। दोसर कोनो उपाय नहि। हिस्सक छूटि गेलासँ आब गाम जायब अबूह बुझाइत अछि। कोनो टंटा ठाढ़ भऽगेल तखने हम जाइत छी। नहि तऽ बाल-बच्चा जाइत अछि, पत्नी जाइ छथि। आइ दू सालक बाद हम जा रहल छी। दू बर्ख पहिनो जमीनक ओझरी रहय आ आइ फेर वैह स्थिति अछि। गामक झंझट कहियो खतम नहि होइत अछि। हेबो नहि करत। सभ दिन किछु ने किछु लागले रहत। आइ क्यो जमीन धकिया लेलक तऽ काल्हि क्यो खढ़ काटि लेलक, परसू क्यो धान घेरि लेलक। एहि सभसँ हम कहियो पार नहि पाबि सकब। आइ धरि क्यो नहि पाबि सकल अछि। ई संसार एहिना चलैत आबि रहल छै। एहिना चलैत रहत। स्वार्थक क्षुद्रतामे डूबल। नाना प्रकारक छल-प्रपंच करैत, कखनो हँसैत, कखनो कनैत। अनन्त विस्तारमे पसरल सूर्यक प्रकाशमे भासमान होइत ई पृथ्‍वी अपन अनेकरूपता सँ हमर चित्तकेँ आकृष्ट करैत अछि। ग्राम्य दृश्यावलीक सुन्दरता हमर आत्मा केँ मुदित करैत अछि। किन्तु थोड़बे कालक लेल। मन भटकि कऽ अस्तप्राय सूर्य दिस चल जाइत अछि। गामक झमेलमे ओझराय लगैत अछि। कोसीक पुबरिया बान्ह आबि गेल। बान्ह जे अपना भीतर लाखक लाख लोककेँ घेरि कऽ अहुँछिया कटबैत अछि। बान्ह पर एक पल ठाढ़ भऽ कऽ हम पच्छिम भर नजरि खिरबैत छी। दूर-दूर तक कोनो बस्ती नहि। कोनो गाछ नहि। खाली माल-जालक खूरसँ उड़ैत धूरा। बान्ह पर सँ हमर गाम नहि देखाइत अछि। गामक काली मंदिर देखाइत अछि। मंदिर आइ डेढ़-दू सय बर्ष सँ स्थिर अछि। अस्थिर अछि बान्ह परसँ मंदिर धरिक रस्ता। कोसी कोनो चीजकेँ थिर नहि रहय दैत छै। रस्ता-पेरा, आरि-धूर, खेत-पथार, घर-दुआर, लोक-वेद डगराक बैगन जकाँ गड़कैत रहैत अछि। बान्ह पर पहुँचिते चिंता होइत अछि। कोन बाटे-जायब ? घाट कोन ठाम छै? नाह चलिते छै कि बंद भऽ गेलै ? बन्द भऽ गेलै तऽ कोन ठाम पार होयब? रस्ता हियासैत छी। दूर दू गोटय जा रहल छै। ओ दुनू निश्चिते धारक ओहि पार जायत। धारक एहि पार कोनो बस्ती नहि छै। हम ओहि दुनूक अनुगमन करय लगैत छी। चालि तेज भऽ गेल अछि। ध्यान झलफलाइत साँझ पर अछि। धार लग पहुँचि कऽ ओ दुनू अढ़ ताकि लेलक अछि। नाह नहि छै। दू-तीन टा भैंस अखने टपि कऽ ओहि पार पहुँचल छै। पानि देखि कऽ हम अटकर लगा रहल छी जे कपड़ा खोलय पड़त कि नहि। 'कपड़ा-तपड़ा खोलह।'- बगलसँ आबि कऽ सिबननन कहैत अछि आ एकटा पुरान मैल तौलिया हमरा दिस बढ़बैत अछि। अपन धोती ओ तेना कऽ समेटि लैत अछि जे बुझाइत छै जेना ओ बुट्टा पहिरने हो। जेना-जेना पानि बढ़ैत छै, तेना-तेना हम तौलिया ऊपर उठौने जाइत छी। सिबननन आगू अछि तइँ हम नि:संकोच तौलिया उठा कऽ नांगट भऽ जाइत छी। आब कने और आगू जा कऽ सटले-सटल तीन टा गाम छै – नरहैया, कदमटोल आ तकर पच्छिम हमर गाम मेनाही। हमरा पियास लागि गेल अछि आ हम ककरो ओहिठाम पानि पीबि लेबऽ चाहैत छी। मुदा सिबननन कहैत अछि- 'चलह, रामसरन ओतऽ पिबिहह। ' पता नहि कोन बात छै। रामसरन कनेक सुभ्यस्त अछि। कहियो सरपंच रहय। मुदा ओकर नाम सुनितहि हमरा पन्द्रह मन धान मोन पड़ि जाइत अछि जे ओकर पिता हमर पितासँ कर्ज लेने रहय आ कहियो घुरेलक नहि। सिबननन एहि ठामसँ फुटि जायत; उत्तर चल जायत, जतय पछिला साल उपटि कऽ बसल अछि। मेनाहीक लोक कटनियाक कारणे चारि ठाम छिड़िया गेल छै। सिबनन अपने दहियारी करैत अछि आ धीया-पूता खेती करैत छै; दिल्ली-पंजाब कमाइत छै। सिबननन हमर किछु खेत बटिया करैत अछि। ओही मे सँ एकटा कोलाक गहूम कमल घेरि लेने छै। तीस साल पहिने ई कोला हमरा बदलेन मे भेटल रहय। कमलक आधा हिस्सेदार बासदेव ई बदलेन कयने रहय। कमलकेँ दोसर ठाम हिस्सा दऽ देल गेल रहैक, जे अखन धारमे छै। हमर बला कोला उपजैत छै, तइँ ओकरा लोभ भऽ गेल छैक। 'काल्हि गहूम काटि लएह।'- ई कहैत हम सिबननन केँ विदा करैत छी। मोनमे फसादक भय अछि।अनेक प्रकारक आशंका अछि। मुदा गहूम तऽ खेतमे ठाढ़ नहि रहत। ओकरा तऽ कटनाइए छैक। चाहे क्यो लिअय। पाही आदमीक जमीनकेँ लोक मसोमातक जमीन बुझैत अछि। रघुनीक दुआर पर थ्रेसर चलि रहल छैक। रघुनी अपने मरि गेल। धीया-पूता छैक। दू टा बेटा दिल्ली मे छैक। तेसर जे गहूम तैयार कऽ रहल अछि, तकर नाम छिऐक नट्टा। नट्टा हमरा बैसय कहैत अछि। घरक एक कात दू टा चौकी लागल छै। चौकी पर मैल खट-खट भोटिया बिछाओल छै। चौकी सँ सटले दच्छिन गाय, भैंस, बकरी सब रहैत छै। नाकमे निरंतर गोबर आ गोंतक दुर्गन्ध अबैत रहैत अछि। कोसिकन्हाक अधिकांश लोक एहिना रहैत अछि। जानवरक संग। जानवरक समान। जानवरक हालतमे। हम ओहि मैल बिछौन पर आ दुर्गन्ध मे कनेक काल बैसल रहैत छी। थ्रेसर सँ उड़ैत गरदा आ भूसी भौक मारि कऽ हमरा दिस आबि रहल अछि। सोचैत छी ता कमलसँ गप कऽ ली। उठि कऽ कमल कतऽ चल जाइत छी। कमल अड़ल अछि। आधा गहूम कटबा कऽ ओ अपना ओतय लऽ आनत। हम क्षुब्ध भेल उठि कऽ नथुनी मुखिया ओहिठाम चल अबैत छी। नथुनिओ हमर बटेदार अछि। नौ कट्ठा मे तीन सेर मेथी हिस्सा दैत अछि। नथुनी अपन बेटीक खिस्सा सुनबैत अछि। एक मास पहिने कोना पाँच हजार कर्ज लऽ कऽ ओकर विवाह कयलक। दिल्लीमे दू मास रिक्शा चला कऽ कोना ओ कर्ज सधाओत। फेर ओ अचानक पुछैत अछि – 'खाना खेलहक?' 'न'। - हम कहैत छिऐ। 'कतऽ खेबहक ?' 'कतहु तऽ खेबे करबै।' ओ बेटी कें हाक दऽ कऽ हमर खाना बनबऽ कहैत छै। गाममे हमरा घर नहि अछि। अड़सठक बाढ़िमे घर जे कटल से फेर बनि नहि सकल। सभ बेर गाम अयला पर ई समस्या रहैत अछि जे कतऽ खायब, कतय रहब। भोजन करबैत काल नथुनी आश्वस्त करैत अछि जे ओ हमरा खातिर मछबाहि करत। अपन छोट भाइ धुथराकेँ ओ चिड़ै बझाबऽ कहैत छै। हम माछ आ चिड़ैक सुखद कल्पनामे डूबल सुतबाक चेष्टा करैत छी। निन्न नहि भऽ रहल् अछि। निन्न पर कल्हुका चिंता सवार अछि। गहूम जँ कमल लऽ गेल तऽ भारी बेइज्जती – जाइत-जाइत सिबननन बाजल रहय। हमर देयाद बैजनाथ, कमल पर सन-सन कऽ रहल अछि। धन आ स्त्री संसारक सर्वोपरि सुख अछि। लोक एहि दुनूक पाछू बेहाल रहैत अछि। धन आ स्त्रीक तृष्णा कहियो शांत नहि होइत छै। आदमी तइयो एहि मृगतृष्णाक फेरमे पडि. कऽ भटकैत अछि आ दुख उठबैत रहैत अछि। हम अवधारि लैत छी जे दंगा-फसाद नहि करबाक अछि। कमल गहूम लऽ जायत तऽ लऽ जाउक। भोरमे निन्न टुटिते मोन पड़ैत अछि जे गहूम कटैत हएत। मुँह-हाथ धो कऽ खेत दिस जाइत छी। गहूम कटि रहल छै। कमल पहिनहि आबि जनकेँ कहि गेल छै जे गहूम ओकरे ओहिठाम जेतैक। जन सभ असमंजसमे अछि। हम कहैत छिऐक गहूम सिबननन ओतय जेतैक। बोझ उठबाक घड़ी संघर्षक घड़ी होयत। हम घूरि कऽ टोल पर चल आयल छी। चाह पीबाक लेल रघुनाथकेँ तकैत छी। रघुनाथ दूधक जोगाड़मे गेल अछि। दूध आनत तखन चाह बनाओत। सिबननन अबैत अछि। ओ बहुत आशंकित आ बेचैन अछि। हमरा कमलसँ गप्प करय कहैत अछि। हम कमल आ ओकर दुनू बेटाकेँ बुझबैत छिऐ जे बकवाद आ दंगा-फसाद कयला सँ कोनो फायदा नहि छै। जाधरि फैसला नहि भऽ जायत, ताधरि गहूम तैयार नहि हएत। रघुनाथ दूध लऽ कऽ कमले ओतय चल आयल अछि। ओत्तहि चाह बनैत छै आ कपक अभावमे हम सभ बेराबेरी चाह पीबैत छी। चाह खतम होइते कमल उठि कऽ खेत दिस विदा होइत अछि। हमहूँ विदा होइत छी। हम सभ चाह पीबिते रही, तखने चारि-पाँच टा बोझ सिबननन अपना ओतय पठबा देने रहै। किछु और कने दूर पर जा रहल छै। कमल ई सब देखि क्रुद्ध भऽ जाइत अछि। मुदा आब तऽ खेल खतम भऽ गेल छै। हम जहिया कहियो गाम अबैत छी तऽ चाहैत छी धारमे नहाइ। हेलबाक मौका गामे मे भेटैत अछि। मेनाहीक पूब आ पच्छिम दुनू कात कोसी बहैत छै। पच्छिम कतका धारक पसार बहुत छै। पच्छिम, उत्तर दच्छिन जेम्हरे तकैत छी, तेम्हरे बालु आ धार। दूर-दूर धरि खाली दोखरा बालु जाहिमे पचासो बरखसँ किछु नहि उपजैत छै। मेनाही, परियाही आ भवानीपुर-एहि तीनू गामक लोक तबाह भऽ गेल अछि। पीढ़ी दर पीढ़ी हजारक हजार लोक कोसीक बालु फँकैत मेटा जाइत अछि। हाँजक हाँज सिल्ली पानि पर बैसल छै। पच्चीस-तीस टा लालसर भित्ता पर टहलि रहल छै। आब चिड़ै कम अबैंत छै। बहुत पहिने जहिया झौआ, कास आ पटेरक जंगल रहै, तहिया अनेक तरहक जल आ थल-चिड़ै अबैत रहै। पूर्णियाक शिकारी चिड़ै बझबैत रहै आ सुपौलमे बेचैत रहै। आब झौआ उकनि गेल छै आ कास-पटेर उकनल जा रहल छै। पहिने लोक झौआ, कास, पटेर बेचि कऽ किछु कमा लैत छल। जंगलमे झुंडक झुंड गाय-महींस पोसि कऽ जीविका चलबैत छल। खढ़िया, हरिन, माछ, काछु आ डोका मारि कऽ खाइत छल। आब सभ किछु खतम भऽ गेल छै आ जीबाक साधन दुर्लभ भऽ गेल छै। धारक बीचमे छीट पर एकटा मछवाह पड़ल अछि। बगलमे जाल आ डेली राखल छैक। हम हेलि कऽ छीट पर जाइत छी। फेकुआ अछि। नथुनी मुखियाक भाइ। डेलीमे पाव भरि रेवा छै। तीन घंटाक उपार्जन। समुद्रक कछेरमे जेना लोक पड़ल रहैत अछि, हम तहिना बालु पर पड़ि रहैत छी। एहि दुपहरियोमे धार कातक हवा ठंढ़ा छै। कोसीक पानि ठंडा छै। कनिको काल पानि मे रहला सँ जाड़ हुअय लगैत छै। दूर एक आदमी असकरे डेंगी लऽ कऽ मछबाहि कऽ रहल छै। और कतहु क्यो नहि छै। धार आ बालुक निर्जन विस्तार। कोसिकन्हाक लोक साहस आ धैर्यपूर्वक कोसीक प्रचंडताक मोकाबिला करैत अछि आ अपन प्राण-रक्षामे लागल रहैत अछि। कोसीक उत्पात सहैत-सहैत ओ सभ पितमरू भऽ गेल अछि आ सब तरहक दुख सहबाक अभ्यस्त भऽ गेल अछि। बेरियाँ मे हम सत्तो ओहिठाम चल अबैत छी। सत्तो हमर पाँच कट्ठा खेत करैत अछि। खेतमे दस बोझ गहूम भेल छैक जे तैयार करत। थ्रेसर अनलक अछि। सत्तोक माय अपन दुखनामा सुनबैत अछि। इलाजक अभावमे मरल बेटाक सोगमे ओ कनैत अछि। आब जे एकटा बेटा-पुतहु छैक तकर अभेलाक कथा सुनबैत अछि। दुख हम नहि बँटबैक, तइयो सुनबैत चल जाइत अछि। ओकर कथा के सुनत ? ककरो छुट्टी नहि छैक। तइँ हमरा सुनबैत रहैत अछि। सॉझ मे हम पंचैतीक ओरियान करैत छी। पंचक बुझेलो पर कमल तैयार नहि होइत अछि। फैसला होइत छै-ई खेत ओ लऽ लेत, बदलामे दोसर खेत लिखि देत। बैजनाथ कहैत छै जाधरि कमल लिखत नहि, ताधरि ई खेत छोड़बाक काज नहि छै। बैजनाथ खेत हथियाबऽ चाहैत अछि। जँ हम कहि दिऐक तँ ओ लाठीक जोरसँ खेत खाइत रहत। खेत पर कमलकेँ नहि चढ़य देत। एहि बात लेल ओ अनेक तरहेँ हमरा पर दवाब दऽ रहल अछि। कहैत अछि-तोहर पच्छ लेबाक कारणे कमल हमरा मरबेबाक लेल एकटा पिस्तौल बलाकेँ ठीक केने रहय। सत्तोक बकरी मरि गेल छैक। भोरमे निन्न टुटिते ओकर धरवालीक आवाज कानमे पड़ैत अछि। ओ सासुसँ पूछि रहल छै – बकरी कोना मरि गेलै ? ओकर सासु किछु बजैत नहि छै। चुपचाप बकरी लग जाइत छै। दुख आ आश्‍चर्य सँ बकरी कें देखैत रहैत छै। बकरी मुँह रगड़ि कऽ मरल छै। सत्तोक माय हमरा सुनाकऽ कहैत अछि-घुरघुरा काटि लेलकै की ! हम जाहि चौकी पर सूतल रही, बकरी ओकरे पौवामे बान्हल रहै। सत्तोक घरवाली ओकर गराक डोरी खोलि देने छै आ ऑगनमे जा कऽ सासु पर भनभना रहल छै-हद्दो घड़ी सरापैत रहै मरियो ने जाइत छैक ! सासु हमरा कहैत अछि-बहुत दिन पहिनहि बलि गछने रहै। कैक बेर पाठी भेलैक आ सब बेर बेचने गेलैक। अखनधरि चढ़ौलकै नहि। धुरि कऽ अबैत छी तऽ पता लगैत अछि बकरी डोमरा लऽ गेल छै। खाएत। सभ चीज पर मृत्युक छाया पसरल छै। पठरू माय लेल औनाय रहल छै। एम्हर सँ ओम्हर भेमिआइत दौड़ि रहल छै। दूइए-चारि दिन पहिने खढ़ धेने छै। सत्तो दुपहर मे दौन शुरू करैत अछि। पहिने अपन बोझ धरबैत अछि। आगू मे ओकरे बोझ राखल छैक। सत्तोक बेटी परमिलिया बोझ उठा-उठा थ्रेसर लग दैत छै। परमिलिया सतरह-अठारह सालक युवती अछि। स्वस्थ-सुगठित शरीर। ओकर जोबनक उभार पुरूष-सम्पर्कक साक्षी छै। ओ अखन सासुर नहि बसैत अछि। सूर्यास्त भऽ गेलाक बाद खुरपी-छिट्टा लऽ कऽ घास लेल जाइत अछि। संध्या-अभिसार। भोर मे अकचकाइत उठैत छी। क्यो आधा गिलास पानि ढ़ारि चानि थपथपा रहल अछि। आइ जूड़शीतल छै। सात-आठ बजे धरि चानि पर पानि पड़ैत रहैत अछि। ढ़लाय अपन छागर तकने फिरैत अछि। राति मे क्यो चोरा लेलकै। सोचने रहय बेचि कऽ कर्जा सधाओत। आब हताश भऽ गेल अछि। आइ धार मे मेला जकाँ लागल छै। लोक सभ मालजाल धो रहल अछि। छौड़ा सभ धारमे उमकैत अछि आ हो-हल्ला कऽ रहल अछि। गाम मे आब हमरा कोनो काज नहि अछि। साढ़े तीन मन गहूम जे हिस्सा भेल अछि तकरा सुपौल लऽ जेबाक ब्योंत केनाइ अछि। साइकिल भेटितय तऽ डोमा दू खेप मे पहुँचा दैत। ने साइकिल भेटैत अछि, ने माथ पर लऽ जायवला कोनो आदमी। गहूम पितम्बर लग छोड़ि दैत छिऐ। पाँच-सात दिनमे ओकर गाड़ी सुपौल जेतै। दुपहर मे नट्टा परबाक माउँस बनबैत अछि। माउँस सुकन राम ओहिठाम बनैत छै आ भात नट्टा ओहिठाम। नट्टा बजा कऽ लऽ जाइत अछि। पीढ़ा सुकनक धाप पर लागल छै। हमरा भीतर छूआछूतक कोनो भावना नहि अछि। लेकिन आइ अचानक गाममे सुकन रामक ओहिठाम खाइत पता नहि कोना पूर्व-संस्कार जाग्रत भऽ गेल अछि आ कनेक काल धरि विचित्र प्रकारक संकोचक अनुभव करैत रहैत छी। फेर संकोचसँ उबरैत बजैत छी – सुकन भाय! आइ तोरा जाति बना लेलिअह। सुकन कहैत अछि जे आब ओ माल-जाल नहि खालैत अछि। बादमे एक गोटय हँसीमे कहैत अछि- तोरा सभ भठि गेल छह। तोरा सभकेँ जातिसँ बारि देबाक चाही। कोसी सभटा भेदभावकेँ पाटि देने छै। डोम, चमार, मुसहर, दुसाध, तेली, यादव सब एके कल सँ पानि भरैत अछि। एके पटिया पर बैसैत अछि। आब सूर्यास्त भऽ जायत। हम गामसँ विदा होइत छी। संगमे नट्टा आ गनेस अछि। एकटा साइकिल पर थोड़े-थोड़े गहूम लादने ओ दुनू पुनर्वास जा रहल अछि। गामक विकट जीवन पाछू छूटि रहल अछि। संग जा रहल अछि अनेक तरहक स्मृति। ई स्मृति हमर अस्तित्वक अंश बनि जायत आ जीवनमे अनेक रूप-रंगमे प्रकट होइत रहत। विभा रानी (१९५९- ) मैथिली क ३ साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता लेखकक ४ गोट किताब "कन्यादान" (हरिमोहन झा), "राजा पोखरे में कितनी मछलियां" (प्रभास कुमार चाऊधरी), "बिल टेलर की डायरी" व "पटाक्षेप" (लिली रे) हिन्दीमे अनूदित छन्हि। २ गोट लोककथाक पुस्तक "मिथिला की लोक कथाएं" व "गोनू झा के किस्से"। मैथिली कथा संग्रह "खोहसँ निकसैत"। माउगि माउगि, माउगि, गे माउगि, गे माउगि! तों माउगि, हम माउगि, ई माउगि, ऊ माउगि - सभ किओ माउगे-माउगि। ऊँहूँ - सभ किओ भला माउगि हुअए। ई तय कर' बाली तों के? अएं गे? तोरा कहिया स' भेटलौ ई हक? ई सभ काज-धंधा हमरा आओरक अछि - हमरे आओर के करे दें। देख त' कने, तोहरो आओर के कतेक रंग-बिरंगा रूप दिया देलियौ! माउगि, गे माउगि, बुझै छैं कि नञि गै! हँ यो! तैं त' हम भेलहुँ माउगि - माने ओकलाइन, डाक्टराइन, मास्टराइन - आ हड़ही-सुड़ही सभ भेल मौगी, जनी जाति, हमरा आओर स' हीन। नञि बुझलियै। धुर्र जाऊ! हमरा आओर स' ऊपर भेलीह स्त्रीसभ, जेना किरण बेदी, मेधा पाटकर, फ्‌लेविया एग्नेस त' ई सभ, त' ओ सभ आ सभ स' ऊपर नारी - आदरणीया, परमादरणीया; जेना सीता, जेना सावित्री, जेना गांधारी, जेना कुंती, जेना द्रौपदी ... उँह! द्रौपदीक नाम नञि ली। हे! बड़ खेलायल मौगी छली। ओकरा नारीक पद पर प्रतिष्ठित केनाई! सत्तरि मूस गीड़ि के बिलड़ो रानी चललीह गंगा नहाए। ऋषि-मुनि आओर के कोन कथा - एतेक ताप-तेजबला साधु महातमा सभ आ माउगि के देखतही वीर्य चूबि जाइ छै; घैल में त' पात पर त' माछक पेट मे त' कहाँ दनि, कोम्हर दनि दान द' देइत छथि जेना हुनक वीर्य-वीर्य नञि भेलै कोनो रत्नक खान भ' गेलै। छोडू ई सभ कथा-पेहानी। आऊ असली बात पर - माने माउगि पर। की कहू, कतबो ई नारी, स्त्री, माउगि, मौगीक वर्गीकरण भ' गेल हुअए, मुदा वास्तविकता त' ई छै जे मूलत: हम सभ माउगे छी - माउगि। अहिना दू गोट माउगि छली, माने मध्यवर्गीय परिवारक दू गोट माउगि। अहाँ चाही त' सुभीता लेल हुनक नाम राखि सकै छी - दीपा आ रेशमा। दुनू पड़ोसिया। एकदम दूध मे चीनी जकाँ बहिनपा, दुनू के एक-दोसराक घरक हींग हरदिक पता, ई दुनूक घर में एक एकटा मौगी छल, कहि लिय' जे ओकर दुनूक नाम छल भगवती आ जोहरा आ ओ दुनू ई दुनूक ओहिठाम चौका बासन करैत छली। संयोग छल, जोहरा दीपा ओहिठाम काज करै छलै आ भगवती रेशमा ओहिठाम. हौजी, बड़का शहर मे ई सभ चलै छै। ओहिना, जेना आइ काल्हि शहर मे दंगा आ खून-खराबा फटाखा जकाँ फुटैत रहै छै आ लोक आओर तीमन-तरकारी जकाँ कटाएत रहै छै। की कहू जे जाहि शहर मे ई चारू माउगि रहै छली, ओहि शहर मे दंगा संठीक आगि जकाँ धधकि उठलै। आ सभ माउगि एके जकाँ भ' गेलै - मांगि आ कोखिक चिन्ता स' लहालोट। आब जेना दीपे के देखियौ। शहर मे तनाव छलै। तइयो लोग अपन-अपन ड्यूटी पर निकलि गेल छलै। मुदा बेरहटिया होबैत-होबैत पता लागलै जे शहरक स्थिति आओर खराब भ' गेलै त' सभ किओ 'जइसे उडि जहाज कौ पंछी, पुनि जहाज पै आयौ' बनि बनि अपन अपन जहाज दिस पडाए लागल। रेशमा स' दीपा के ई समाचार भेटलै, ओम्हर ठीक दू बजेक बेरहटिया मे मनोज बाबू घर स' बहिरा गेलाह। दीपा टोकबो कएलकै - 'शौकत भाइक फोन आएल छलै रेशमा कत' जे शहरक हालति आओर खराब भ' गेल छै। लोग-बाग घर घुरि रहल अछि आ अहाँ सभ किछु जानि-बुझिक' तहयो बाहरि निकलि रहल छी। जुनि जाऊ।' आब ओ मरद मरदे की जे अपना घरवालीक कहल राखि लियए। आ दीपा त' माउगि स' एक कदम आगां छली - स्त्री छली - पढ़ल-लिखल, सुंदर, स्मार्ट आ अपन बिजनेस सेहो चलब' बाली, जकरा मे सभटा आभिजात्य भरल रहनाइ अपेक्षिते नयिं, परम आवश्यक अछि। मुदा बावजूद एकटा सफल स्त्रीक, ओ छली त' माउगे। सत्ते, कहियो कहियो के मायक कहल ई कथा मोन पडिये जाइत अछि जे माउगि कतबो पढ़ल हुअए कि सुंदर कि स्मार्ट कि बिजनेसवुमन, रहत त' माउगे आ तैं चूल्हि त' फूंकैये पडतै आ घर वा घरबलाक चिंता मे सुड्डाहि होबैये पडतै ओकरा। तैं रातुक एगारह बाजि गेलाक बादो मनोज के नहिं घुरलाक कारणे ओ अत्यन्त चिंतित आ परेशान छलै। ओकरा रहि-रहि क' बुझाए जे कॉलबेल बजलै, खने दरबज्जा फोलए त' खने खिड़की पर जा क' ठाढ़ भ' जाए। सांस भांथी जकाँ चलि रहल छलै आ मोनक सभटा परेशानी मुंह पर लिखा गेल छलै। मना कएलो पर जहन मनोज नञि रूकल छलाह त' कहने छलै - जल्दीए आएब। जवाब भेटल छलै -'आइ त' फल्ना डेलीगेशन आएल अछि।' 'माने रातिक एक-डेढ़ बजे धरिक छुट्टी।' दीपाक माउगि ओकर भीतरे-भीतरे बाजलै। तहन कियैक एगारहे बजे स' एतेक बेचैनी छै? ओकरा त' दू बजे रातिक बाद परेशान होएबाक चाही। मनोज बाबू लेल दू बजे रातक घुरनाई कोनो नव कथा त' छलै नञि! मुदा दंगा जे नएं कराबए। हारि-थाकि क' ओ घर स' निकललै आ अपना बगले बला कॉलबेल दबेलकै। अहू मे एकटा माउगि छलै - रेशमा। परेशानी ओकरो संपूर्ण देह पर अक्षर-अक्षर लिखाएल। ओकरो घरबला घुरल नञि छलै। मुदा फोन कएने छलै -'हालति बड्ड खराब छै। दरबज्जा आदि नीक स' लगाक' राखने रहब। हाथ मे सदिखन एकटा चक्कू वा एहेने कोनो चीज सेहो राखने रहब। पतियाएब नञि ककरो पर चाहे ओ कतबो नजदीकी हुअए।' दुनू माउगि एक-दोसरा के देखि क' तेना चेहैली जेना एक-दोसरक सोझा मे दूध चीनी सनक संबंधवाली दीपा आ रेशमा नञि, गहुँमन आ बिज्झी हुअए। रेशमा एतेक देर राति मे ओकर आएब पर चेहैली त' दीपा रेशमाक गस्सा मे फंसल चक्कू देखि क'। माउगि त' माउगे होइत छै - एतेक अविश्र्वास स' काज थोडबे छलै छैक। आ ई स्त्री माने दीपाक त' सौंसे देहे पर परेशानी छपाएल छलै। शौकत त' फोनो क' देने छलाह। मुदा मनोज के त' तकर कोनो परवाहिए नञि छलै। रहितियैक त' एतेक प्रतिकूल परिस्थिति मे ओकरा मना करबाक बादो जयतियन्हि की? आ मानि लिय' जे बड्ड खगता छलैन्हे जेबाक, तें चलि गेलाह। मुदा चलि गेलाक माने ई त' नयिं जे एकदमे स' निश्चिन्त भ' क' बैसि जाइ; बेगर ई महसूस कएने जे दीपा कतेक चिंतित आ परेशान हेतीह। धुर्र? माउगि आओर लेल किओ एतके परेशान हुअए! दुनक दुनू माउगिक मुंह मे जेना बकार नञि छलै। अंतत: रेशमा सेहे चिनियाबदाम जकाँ एक-एक टा शब्द चिट चिट क' क' तोडैत-भांगैत बाजलै - 'बच्चे सो गए? मेरे तो अभी-अभी सोए हैं।' 'हँ! हुनका आओर के की पता जे दंगा-फसाद की सभ होइ छै। स्कूल नञि गेनाई त' ओकरा आओर लेल पिकनिक भ' गेलै'। भरि दिन ऊधम मचा-मचाक' थाकि-हारिक' एखने सूतल अछि।' 'मनोज भैया लौटे?' 'घुरि गेल रहितियन्हि त' हम की अईठां रहितहुँ?' स्त्री मोने मे बाजलै। प्रत्यक्षत: मूड़ी नयिं मे डोला देलकै।' 'ये भी अभी तक नहीं लौटे हैं। मगर फोन कर दिया है कि लौटेंगे। फिर भी गर हालात ज्यादा खराब हुए तो उधर ही कहीं किसी रिश्तेदार के यहाँ रूक जाएंगे।' माउगि बाजलै। स्त्री चुपचाप ओकर मुंह तकैत रहि गेलै। ओहि दीपा रूपी स्त्रीक चेहरा पल-पल बदलि रहल छलै। माउगि रेशमा कहलकै - 'उनका फोन नहीं आया है तो तू ही पता कर ले न?' 'कत'? ओ कत छथि, हमरा कहि के जाइ छथि जे कहै छी जे फोन करी आ की दनि करी, कहाँ दनि करी।' स्त्री अपन विवशता मे खौंझैली।' 'हौसला रखो। सब ठीक हो जाएगा।' मुदा सभ ठीक नञि भेलै। माउगिक मरद आबि गेलै। शौकत भाइ के देखि क' रेशमाक मुंह मुरझाएल फूल पर मारल पानिक छींटा जकाँ तरोताजा भ' उठलै। दीपाक चेहरा पर सेहो आंशिक आश्र्वस्तिक भाव उभरलै। बेस! एक गोट त' सकुशल आबि गेलाह। आब दोसरो आबि जाथि त' आ निश्चिंत भ' जयतियैक। अहिना सबहक सर समांग सकुशल अपना अपना बासा घुरथि जाथु त' सबहक घरक जनी जाति के कतेक आश्र्वस्ति भेंटतैक! ओ शौकत भाइ स' शहरक मूड पर कनेक गप सप कर' चाहै छलै। मोन मे छलै जे आकर परेशानी आ चिंता स' शौकत भाइ सेहो कनेक सरोकार राखति। पूछथि कनेक मनोजक मादे, कहथि कनेक शहरक हालचालि। मुदा शौकत भाइ त' तेहेन ने सख्त नजरि स' घूरि क' रेशमा के देखलनिह कि ओहि नजरिक कठोरता आ बेधकता दीपा सेहो बूझि गेलै आ कहलकै -'चलै छी रेशमा, बच्चा सभ असगरे छै।' बाहर मे दंगा आ घर मे भूकंप आबि गेलै। मर्द प्रतिवादक गाड़ी पर फर्राटा स' सवार भ' गेलै -'कहा था न कि किसी अपने कहे जानेवाले पर भी भरोसा मत करना। क्या जरूरत थी इतनी रात को इसे बिठाए रखना? इन काफिरों का कोई भरोसा है क्या?' 'रेशमा, ई कोफ्ता शौकत भाइ लेल। दिने मे बनौने छलहुं। हमरा बूझल अछि जे हिनका कोफ्ता बड्ड पसंद छै।' स्त्रीक फेर प्रवेश भेलै। माउगि फेर सहमि गेलै। मर्द फेर तनतना गेलै।ओ अई लल्लो-चप्पो स' प्रसन्न ¬नञि भेलै। स्त्रीक गेलाक बाद गरजलै -'फेंक दो इसे डस्टबिन में। क्या ठिकाना, कुछ मिला-विला कर लाई हो।' माउगिक करेज कनछलै -'अहीं सभ एक-दोसरा लेल दुश्मन भ' सकै छी। माउगि त' माउगे होइत छै। सभटा दुख त' ओकरे माथ पर बजरै छै। ओकर मरद के किछु भ' जेतै त' ओकरा अहिना अपन सगरि जिनगी काट' पड़तै। आ अहाँ आओरक घरवाली मरतै त' कब्र मे देह गललो ¬नञि रहतै कि दोसर निकाहक मुबारकबाद बरस' लागतै। यौ - माउगि हिन्दू-मुसलमान आ कि क्र्रिस्तान नञि होई छै। ओ खाली माउगे होइत छै।' मुदा नञि! माउगि खाली माउगे नञि होइ छै। ओ नारी, स्त्री, माउगि, मौगी सभ भ' जाइ छै। आ सेहो कठपुतरी बनिक'। आब देखियौ ने! शौकत भाइ एम्हर पहिने आगि जकां बररसलन्हि आ फेर कने प्रेमक फूंही खसबैत आस्ते आस्ते क' क' तेना ने बुझेलखिन्ह जे कि रेशमा सेहो पतिया गेलै आ तय क' लेलकै जे ई कोफ्ता काल्हि भिन्सर मे बर्तन मांजयबाली के द' देल जेतै। ओम्हर दू बजे राति मे घुरल मनोज बाबू नामक मरदक फरमान सेहो निकललै जे आओर कतहु जाइ त' जाइ, बगल बला घर मे कथमपि नञि। ठीक पुरना जमानाक राजकुमार बला कथा जकाँ - पूब जाउ, पच्छिम जाउ, उत्तर जाउ मुदा दक्षिण कहियो नञि जाउ आ अहि अतिरिक्त सावधानी मे ओ सभस' पहिल काज कएल जे अपन दरबज्जा पर साटल 'ऊँ' स्टिकर के नोंचि-चोथि क' उजाड़ि देलन्हि। आबी, कनेक एम्हर ईहो दुनू गोट मौगीक खोज खबरि ल' ली। ई दुनू मौगी ऊपरका दुनू स्त्री आ माउगि स' जुड़ल छली से त' अहां अओर के मोने हएत। ई दुनू छल भगवती आ जोहरा जे दीपा आ रेशमाक घर मे बर्तन चौका करै छल। ईहो एकटा संयोगे छल जे भगवती नामक मौगी रेशमा नामक माउगिक घर मे काज करै छलै आ जोहरा नामक मौगी दीपा नामक स्त्रीक घर मे। ईहो दुनू मौगी उपरकी दुनू माउगे जकां पड़ोसिया छलै। आइ भगवतीक घर मे भम्ह लोटै छलै। आध सेर आटा बांचल छलै। तकरे रोटी बनाक' अपन चारू धिया-पुता के खुआ देने छलै - भिन्सरे मे। आब बेरहटिया स' ई अधरतिया भ' गेलै। दोकान बंद आ पाइक खूँट खुल्ला। कोनो दिस स' रस्ता नञि! धिया-पुता के ठोक-ठाकि क', एक-दू चमेटा खींचि क' सुता देने छलै। आब जागल-जागल भरि पोख पहिने अपन मरद के गरियौलकै जे ठर्रा आ अढ़ाई सौ रूपैयाक लालचि मे दंगा फोड़'बला लेल काज कर' चलि गेल छलै। ओहि स्त्री दीपे जकाँ ईहो भगवती मौगी अपना मरद के रोकबाक प्रयास कएने छलै आ मनोजे बाबू जकाँ ओकरो मरद ओकर अक्किल के ओकर ठेहुन मे रोपैत चलि गेल छलै आ बाद मे चेथड़ी भेल देह ओकर अक्किल के ओकर ठेहुन मे स' निकालि क' माथ मे राखि देलकै। मुदा एखनि त' माथ मे राखल अक्किल सेहो भुतियाएल छलै। हारि थाकि क' ओ धिया-पुता लग ढेर भ' गेलै जे आब त' भिन्सरे मे भ' सकै छै किछु। करफू लागल रहौ कि किछु। पुलिसबला गोली मारौ कि डंडा। मेम साब ओहिठां त' जाइए पड़तै। दू गोट लोभ - पगार भेटबाक आ सदिखन जकाँ अहू बेर ततेक बचल-खुचल भेटि जेबाक आस जाहि स' चारू धिया-पुताक खींचखाचि क' जलखई त' भइये जाइ छै। मुदा भिन्सर त' हुअए पहिने! हे सुरूज महराज! जल्दी बहार आबथु!' सुरूज महाराज त' प्रकट भेलाह, मगर दोसर मौगी ई मौगीक रस्ता छोपि देलकै -'तुम बच्चावाली औरत! तुम किधर कू जाएगा ये आफत में। मेरे कू जाने दो। अपुन का क्या है? अकेला औरत। पुलिसबाला गोली मार भी दिया तो क्या हो जाएंगा। और जो नहीं मारा तो तेरा मेम साब का भी काम अपुन करके आ जाएंगा आउर तेरा पगार आउर खाने-पीने का जो कुछ भी देंगा वो सब लेके आ जाएंगा। ठीक?' आ अंचरा मे स' गरम-गरम चारि टा भाखरी निकालि क' थम्हा देलकै - एतबे बचल छलै, तैं एतबे ... जाबथि भगवती किछु सोचय, किछु बाजय, जोहरा नामक ई दोसरकी मौगी चिड़ै जकाँ फुर्र स' उड़ि गेलै। भगवती मौगी थकमकाएले रहि गेलै, जेना जोहराक मरद दंगा बलाक बीच मे फंसल थकमकाएले रहि गेल छलै आ पछाति मे अपन टूटल - भांगल फलक ठेला आ ओहि पर सजाओल सभटा फले जकाँ पिचा-पिचू के थौआ-थौआ भ' गेल छलै। दीन ईमानक पक्का, पाँचो बेरक नमाजी आ सभटा जनानी के दीदीए आ भाभी कहैबला ओकर मरद जोहरा हिरदै में जिनगी भर लेल कांट छोड़ि गेलै - ओकर देह भरि पोख देखबाक साध मोने मे रहि गेलै आ तहिये स' ई काँट कहियो ओकर पूरा देह मे गड़' लागै छै आ कहियो अपन मरदे जकाँ मौगीक अपनो सौंसे मोन आ देह थौआ-थौआ भेल बुझाए लागै छै। नुका-चोरा क', झटकारि क' जोहरा दुनू स्त्री आ माउगिक घरक काज कर' पहुँचि गेलै। वाह रे पुलिसबलाक चौकस नजरि! अल्लाह! जोहरा शुक्र मनौलकै। जाए बेर सेहो नञि पडए ओह दरिंदा सभक नजरि त' बेस। आएल त' असगरे छलै, जाएत त' भगवतीक दरमाहा आ खाए-पियक समान सेहो रहतै। खेनाइ-पिनाइ त' रोड पर चलि जेतै आ पाइ जानि नञि ककरा पाकिट मे - दंगाबलाक कि पुलिसबलाक। माउगि आ स्त्री कतेक बेर दुनू मौगी स' ठट्ठा केने छलै - "गै, दुनू अपन-अपन मेमसाब बदलि ले। मियां मियांक घर मे आ हिंदू हिंदूक घर मे। तहियाक मजाक आइ दुनू माउगि आ स्त्री के वास्तविक लागि रहल छलै - दुनू मरद जे झोटैंला पंचक ई मजाक पर कहियो कान नञि देलन्हि, आइ गंभीर फैसलाक तीर, कटार ई दुनू माउगि पर संधानि देलन्हि। फर्मान बंदूक स' गोली जकाँ बहिरा गेल छलै आ ई दुनू के आब ओहि गोली के अपना-अपना करेज मे धँसा क, धँसलाक बाद अपना-अपना के जीवित, चालू पुर्जा राखैत ओहि फर्मान पर अमल करबाक छलै। जहिया ठेला छलै, फल छलै आ फलक ताजगी जकाँ मुस्की मारैत ओकर मरद छलै, तहिया जोहरा के काजक कोनो दरकार नञि छलै। दीपा ओकर चेहराक मासूमियत आ खबसूरती देखि क' सोचै बेर-बेर - जे कोनो नीक घरक स्त्री रहितियैक त' रूप-रंग झाड़-फानूस जकाँ चमकतियैक। मुदा एखनि त' ओकर उदास मुंह, उड़ल रंग आ बेजान कपड़ा। हठात ओकरा जोहरा मे रेशमाक झलक भेटलै त' बड़ी जो स' ओ चेहा उठलै। मोने मोन अपना के लथाड़लकै। जतेक गारि अबै छल, सभटा अपना मोनक ऊपर खाली क' देलकै। जोहरा काज क' क' रेशमा ओहिठां चलि गेल छलै। मनोज बाबू सुतले छलाह। दीपा फ्रिज मे स' झब-झब समान सभ बाहर कर' लागलै। फेर कॉलबेल। फेर दीपाक मुंह। फेर रेशमाक बदलैत रंग। रेशमा स' कोनो औपचारिक रिश्ता त' छलै नञि! तै धड़ाधड़ि भन्से मे चलि गेलै -'जोहरा! ई खाए पियक समान सभ छै। भगवती के द' दिहें।' 'लेकिन मैं जो ये सब तुझे दे रही हूँ, ये सब केवल तेरे लिए हैं। किसी काफिर-वाफिर को नहीं देगी तू और सुन! कल से तू उधर नहीं, इधर काम करेगी। दस रूपए ज्यादे ले लेना। चलेगा। वो चाहे तो उधर करले। कल साहब यही कह रहे थे।' थकमक भेल स्त्री दीपा देखलकै - भन्साघरक स्लैब पर जोहराक देल खाद्य सामग्री मे रतुक्का कोफ्ता। ओम्हर कोफ्ता ओकरा अंगूठा देखा रहल छलै आ एम्हर रेशमाक गप्प ओकर करेज पर आड़ी चला रहल छलै। त', कतेक पतिव्रता स्त्री छै। पति जे कहलकै, तुरंत ओकर ताबेदारी मे लागि गेलै। आ ओ? दू बजे राति मे घुरल मनाज् बाबू स' फिरकापरस्ती पर बहस केलकै आ जोहरा भगवतीक प्रसंग पर मना क' देलकै जे ओ नञि करतै काज कर' बालीक अदला-बदली। मुदा आब? जौं ई मौगी मानि गेलै त' ओकरा त' डबल फैदा। आ ओम्हर बेचारी भगवतीक काजक नोकसान। तहन त' नीके छै ई अदलाबदली। तैं ओहो दही में सही मिलेलकै। ओना त' ओहो अदला-बदली के व्यावहारिकताक जामा त' पहिराइये देने छलै जहन कि फ्रिज से खाद्य सामग्री निकालि क' ओ भगवती लेल आनने छलै। कहियो ई नञि देखल-सुनल जे काज करए किओ आन आ खाएक पियक भेटै कोनो आन के। मुदा ई मौगी ! जोहरा मौगी! केहेन खरदार! केहेन जबर्दस्त! केहेन जोरगरि! ओ चकचक करैत दुनू माउगिक मुंह देखलकै। बाजलै किछु नञि। खाली रेशमा स' कहलकै -'करफू लगा हुआ है। भोत मुश्किल से आया मैं। कल आने को होएंगा कि नेई, मालूम नेई। भगवती अपना पगार वास्ते बोला है। आप दे देंगा तो मैं ले जाके उसकू दे देंगा।' 'बोल उसे वो खुद आकर ले जाएगी। जब तू आ सकती है तो वो क्यों नहीं। और अच्छा है न! पुलिस की नजर चढ़ गई तो एक काफिर तो घटेगा कम से कम।' कि माउगि गै माउगि! हम माउगि, तों माउगि, ई माउगि; ओ माउगि - सभ माउगे-माउगि! इहो चारो माउगे माउगि। मुदा ई मौगी - छोटहा लोग - मसोमात जोहरा त' जेना पुलिसक गोली आ दंगाबलाक ईंट, पत्थर, बोतल घासलेट तकरो सभ स' बेसी आक्रांत भ' उठलै। काली जकाँ, दुर्गा जकाँ, चंडी जकाँ ! 'मेम साब! आप दोनों अपना-अपना सामान रख लो। मेरे कू नेई चाहिए ऐसा खाना, जिसमें शैतानी खून बोलता हो। ई दंगा - आप दोनों का मन मे इतना फरक पैदा किएला है कि आप दोनों एक मिनट में अपना से गैर बना दिया। भगवती तो बच्चा लोग का खातिर आने को तैयार था। मईच रोका उसकू कि मेरा क्या! मइ अकेला माणस। पुलिस गोली मारेंगा तो भी क्या चला जाएंगा मेरा। पण उसकू कुछ होएंगा तो उसका बच्चा लोग यतीम हो जाएंगा, जैसे मइ हो गया अपना मरद का जाने से। आपलोग बड़ा लोग। इसलिए आपलोग का बड़ा बात। बड़ा समझदारी। मेरे कू तो खोपड़ी नेई। आपको भगवती को नेई रखना, मति रखो। उसका पगार नेई देने का, मति दो। लेकिन कल से मइ भी काम पर नेई आने का। लेकिन उसका पहिले अभी आपका घर मे मइ जो काम किया, वो पइसा मेरे कू अब्भी का अब्भी देने का। वो मेरा हक्क है। मइ उसकू लेके जाएंगा आउर जो मर्जी आएंगा, करेंगा। आपका ई भीख नेई चाहिए मेरे कू।' मौगियो आओर बाजि सकै छै, सोचि-समझि सकै छै! एहेन अजगुत कथा ! बाप रौ बाप! दुनू माउगि के साँप सुंघा गेलै। ई मौगी भ' क' एतेक नाटक! माउगिक सोझा मे एकर एतेक टनटनी छै ने। कनेक साहेबक सोझा मे पड़' दियौक। सभटा बिलाडिपन एके क्षण मे घुसडि जेतै आ ओ फेर केथरी जकां गुड़िया-मुड़िया जेतै। रेशमा सोच लागलै। यदि शौकत मियां उठि क' आबि जाथु त' एकर मुंहक टनटनी एखने बंद भ' सकै छै। नीक भेलै। शौकत मियां आबि गेलाह! भन्साघरक स' भोरुक्का चाहक गन्धक बदला ई खिच-खिचक गंध बर्दाश्त नञि भेलै आ अधकचरा भेल नीनक खौंझ स' भरल ओ बाहर निकललाह! 'क्या हुआ? सुबह-सुबह चाय देने के बदले घर को कर्बला का मैदान क्यों बना रखा है?' ड्राइंग रूम भड़कलै। रेशमाक चेहरा चमकलै। दीपा शरीर स' एम्हर छलै आ मोन स' मनोज कत'। तैं ओ संभ्रमित सेहो भेलै। मुदा जोहरा ओहीठां छलै - तन आ मोन दुनू स'। कतहु कोनो तरहक बनावटी चमक नञि, मुंह पर कोनो तरहक भ्रमक चेन्हासी नञि। ओ माथ पर ओढ़नी धेलकै आ भन्साघरक खिचखिच के ओतहि छोड़ैत ड्राइंगरूम में पहँुचि गेलै -'साब! मेरे कू बताओ, ये दंगा हम और आप कराया क्या? आओर जो कराया, उसका बदन का एक बाल भी गिरा क्या? भगवती का आदमी गया, मेरा मरद गया। तो क्या ये सब उसका, मेरा या आपका चाहने से हुआ? कल को खुदा न करे, आपको या वो साब को कुछ हो जाता तो वो सब आपका या आपका मेमसाब लोग का चाहने से होता था क्या? आओर ये मारामारी का फरक किसका पर गिरेंगा साब। हम औरत लोग पर। बेवा तो अपुन लोग होता है न साब! और बेवा खाली बेवाइच कहलाता - हिन्दू बेवा आ मुसलमान बेवा नेई। साब, मइ जाता। बस मेरा आज का काम का पइसा दे दो। उस पइसा से मेरे जो मर्जी करेंगा, जिसके लिए मन करेगा सामान खरीदेंगा।' ड्राइंगरूम गरजलै -'क्या बकवास लगा रखी है। रेशमा, तुम इनलोगों को यहाँ से भगाती क्यों नहीं? भन्साघर फेर डेराएल चिड़ई भ' गेलै। दीपा स' आब सहन नञि भेलै। ओ जाए लेल डेग उठेलकै। जोहरा एक पल भन्साघर मे मोजद दुनू माउगि के देखलकै। फेर ओकरो डेग उठलै। आ भन्साघर जेना भूकंप स' डोल' लागलै। आब कनेक स्थिर भेलै। स्वरक अरोह-अवरोह मे सेहो स्थिरता अएलै। उठल डेग स्वर स' मिलान कर' लागलै -'जोहरा, ये सब ले जाओ और भगवती की पगार भी। हालात ठीक होने पर ही उसे घर से निकलने देना और तुम भी तभी आना। और दीपा, बैठो न! चाहो तो तबतक शौकत मियां से बात करो या फिर यहीं किचन मे मेरे साथ। मैं तुरंत चाय बनाती हूँ। जोहरा, तुम भी पीकर जाना।' वाह रे तिरिया चरित्तर वाह! ऋषि मुनि सभ कहिये गेलैन्हिए जे देवो नञि जानि सकलाह त' पुरूषक कथे कोन? किन्तु अईठां एहेन कोनो गुंफित रहस्य नञि छलै, नञि त' काम केलिक कोनो नुका छिपी छलै, ने नैनक कटाक्ष आ बैनक मुस्कान छलै। अईठाँ त' एकेटा चीज पसरल छलै - चाह मे, पत्ती में, चीनी मे, कप मे - माउगे -माउगि। चाह, दूध, चीनी आगिक गरमी स' एके रंग ध' लेइत छै, एकमेक भ' जाएत छै। बनल चाह मे से चाहक रंग, दूध, चीनी के अलग-अलग करब मोश्किल। ईहो माउगि सभ चाहे जकाँ एक मेक भ' गेल छलै। शौकत साहब ड्राइंगरूम में चाहक चुस्की ल' रहल छलाह। चाहक भाफ ड्राइंगरूम ठरल, बर्फ भेल सर्दपना के तोड़लकै कि नञि, पता नञि; मुदा सौंसे भन्साघर मे भाफक नरम गरमी पसरि गेलै। आ ओहि नरम-गरम माहौल मे देखाई पड़लै जे एकटा मौगी चीज बतुस आ भगवतीक पगार ल' क' झटकल चलल जा रहल छै। एक गोट स्त्री आ दोसर माउगिक आँखिक पानि टघरि क' चाहक प्याली मे खसि रहल छलै। चाह नमकीन भेलै कि मीठे रहलै, सेहो नञि बुझेलै। खाली एक गोट स्वर ओहि भन्साघर मे बरकि गेलै - बरकैत गेलै - 'दीपा हम औरतों के दुख कितने एक समान होते हैं न!' 'भगवान नञि करथु ककरो माँगि आ कोखि उजड़ै।' 'आ श्मशानक मनहूसियत ककरो घर मे पैंसए।' लोक आओर कहे छै, माउगि-माउगि अलग होई छै - नारी, स्त्री, महिला, माउगि, मौगी, जनी - हौ जी ई एतेक नाम द' देने ओ सभ बदलि जाइ छै की ? कहू त' ! एहनो कतहु भेलैये ! भाग रौ (मैथिली नाटक) पात्र - परिचय मंगतू भिखारी बच्चा 1 भिखारी बच्चा 2 भिखारी बच्चा 3 पुलिस यात्री 1 यात्री 2 यात्री 3 छात्र 1 छात्र 2 छात्र 3 पत्रकार युवक पत्रकार युवती गणपत क्क्का राजू - गणपतक बेटा गणपतक बेटी गुंडा 1 गुंडा 2 गुंडा 3 हिज़ड़ा 1 हिज़ड़ा 2 किसुनदेव रामआसरे दर्शक 1 दर्शक 2 आदमी तांबे स्त्री - मंगतूक माय पुरुष - मंगतूक पिता दृश्य : 1 (ट्रेनक दृश्य। (ट्रेन नञि भ' क' ई कोनो हाट- बजार अथवा मेला-ठेला सेहो भ' सकैत अछि।) ट्रेन मे महिला आ पुरूष यात्री। भीख माँग' बला तीन टा बच्चा चढ़ैत अछि। एक के गला मे हारमोनियम, दोसराक हाथ मे पाथरक दू टा खपटा। तेसरक हाथ मे खँजड़ी। तेसर बच्चा उमिर में सभ स' छोट। तीनू क तीनू फाटल, चीकट कपड़ा मे अछि। बच्चा नं. 1 हारमोनियम पर सभ' स' नवीन फिल्मी गीतक धुन बजाक गाबि रहल अछि। दोसर बच्चा खपटा बजा-बजाक' ओकरा संगे गएबाक प्रयास क' रहल अछि। छोटका बच्चा खंजड़ी बजा रहल अछि आ गीतक पंक्ति पकड़बाक प्रयास मे आधा-छिया पंक्ति गबैत अछि। तीनूक स्वर; सुर-ताल में कोनो एकरूपता नञि अछि। सभस' छोटका; बच्चा नं. 3 सभ स' पाई मँगैत अछि। किओ देइत अछि, किओ डपटैत अछि, किओ कोनो दोसर दिस तकैत अछि, किओ ऑंखि मूनि लेइत अछि।) (ट्रेन रूकैत अछि। तीनू बच्चा उतरि जाइत अछि। मंचक एकटा कोन्टी मे तीनू ठाढ़ भ' क' दिनु भरका कमाई गिनैत अछि।) बच्चा 1 : कतेक? बच्चा 2 : साढ़े एगारह। बच्चा 1 : बस? भरि दिन ट्रेने-ट्रेने घूमल आ तइयो साढ़े एगारहे? अकरा मे त' अपना सभक लेल चाहो-मूढ़ी नञि। (सभस' छोटका बच्चा स') आँए रौ, खाए लेल भरि थारी आ माँग' मे सभ स' पिछारी! ठीक स' माँगै कियै नै छें रे? (बच्चा 3 बिटिर-बिटिर तकैत रहैत अछि।) मुंह की निहारि रहल छें? हम कोनो की गोविंदा छी कि रितिक रोशन। आ तोहों आमिर खान नञि छें। जतेक गरीब छें, तकरो स' बेसी गरीब बनल रह। तखने दू टा पाइ भेटतौ। बच्चा 3 : (सहमैत) ई पटना छै कि दानापुर? (दुनू बच्चा ई सुनि हठात ठठा पड़ैत अछि। छोटका फेर बिटिर-बिटिर मुंह तकैत रहैत अछि।) बच्चा 3 : रौ बूड़ि। ई पटना नञि छै, जकरा ककरो स' नञि पटै छै। दानापुर माने दाना स' पूरम पूरा। हमर आओरक पेट मे त' मरल सनकिरबो नञि अछि। की करबहीं रौ जानि क' की हम कत' छी? बच्चा 1 : भूख लागलए। बच्चा 2 : तकरा लेल पटना-दानापुर मे रहब जरूरी छै? भूख त' कखनो आ कतहु लागि जाइ छै। दम धर। बच्चा 3 : पटना सिटी? बच्चा 2 : ऊँ हूँ। पटना साहेब। सिटी त' कहिया ने बदलि गेलै। बच्चा 1 : रौ बता, सिटी स' साहेब भ' गेला स' की भ' गेलै? की बदलि गेलै? बच्चा 2 : बदलि गेलै ने? जनाना स' मर्दाना भ' गेलै। बच्चा 1 : माने? (गंभीर भ' क') बच्चा 2 : माने.. सिटी जनाना आ साहेब मर्दाना (दुनू हँसैत अछि। बच्चा 3 ओहिना बिटिर-बिटिर मुंह तकैत रहैत अछि) बच्चा 1 : नाम बदल' स' तकदीर सेहो बदलै छै की? सिटी स' साहेब भ' गेलै त' हमरा आओरक भूख-पियासक रंग बदलि गेलै की? अपना आओर के काज भेटलौ? पाइ भेटलौ? तहन कियैक एतेक मगजमारी? पटना कि दानापुर कि साहेब की फारबिस गंज.. हुँह! बच्चा 3 : (उसांस भरिक') भूख लागल अछि। बच्चा 1 : रौ सार! जो, कोनो हाथी पकड़ि ला आ घोंटि जो। सार.. भूख लागलए, भूख लागलए.. नकिया देलक ईत'.. बच्चा 2 : आजुक समाचार? बच्चा 2 : बच्चा बेमार। हजारो नेन्ना मरि गेलै, खाएक अभाव मे.. बच्चा 3 : हमरा खाए ला दे। नञि त' हमहू मरि जाएब। बच्चा 1 : त' मरि जो। प्रधानमंत्री छें जे मरि जेबें त' देसक काज-धंधा थम्हि जेतै। बच्चा 3 परधानमंत्री कोनो खायबला चीज होइ छै। केहेन होइ छै? कत' भेटै छै? बच्चा 2 : (ओकर बात पर धेयान देने बेगर) तों कोना बुझलही? तों त' अखबार नञि पढ़ै छैं। बच्चा 1 : टेसन मे टीबी छै ने। ओकरा मे देखलियै। बढ़िया स' बूझाब' लेल मँगतुआ त' अछिए। बच्चा 2 : ओकरा कोना बूझल छै? बच्चा 1 : ओ पढुआ छै। अखबार पढ़ै छै। बच्चा 2 : भिखमंगो सभ अखबार पढ़ै छै? बाप रौ! बच्चा 1 : ओ कीनै नञि छै। प्रेसक बाहर बैसै छै। चौकीदार ओकरा द' दै छै अखबार। बच्चा 3 : भीख मे अखबार! भीख मे चाह-मूढ़ी.. (बजैत-बजैत थम्हि जाइ छै: दुनू बच्चा ओकरा घूरै छै।) बच्चा 2 : मंगतू सभटा पढ़ि लेइत छै? बच्चा 1 : हँ, रौ। पूरा अखबार चाटि जाइत छै। पूरा दुनियाक हाल ओकरा बूझल रहै छै। ओ पढ़ल छै। बच्चा 3 : पढ़ल की होइ छै? पटना-दानापुर जकाँ कोनो टेसन छै की? बच्चा 2 : (स्नेह स') तो नञि बुझबे अखन। बच्चा 1 : पढ़ल बहुत पैघ चीज होइत छै। पढ़ि-लिखि क' लोक बहुत पैध-पैध लोक बनि जाइत अछि। मुदा अपना आओरक तकदीर मे ई नञि अछि। बच्चा 2 : (भरोस दियबैत) नञि छै त' नञि छै। मंगतुआ छै नें पढ़ल-लिखल। अपने बिरादरीवाला। अपना आओर स' गप्प-सप्प सेहो करै छै। दुनिया जहानक समाचार त' दइते छै। (अई बेर तेसरका बच्चा कएक बेर हाथ मुंह स' भूख लगबाक संकेत द' चुकल अछि। सभ बेर दुनू बच्चा ओकरा घूरैत अछि। तेसरका सभ बेर डेराक शांत भ' जाइत अछि।) बच्चा 1 : हे.. देख ओम्हर! अपन गोबिन्दा। बच्चा 3 : ई कोनो नव भिखमंगा ऐलै की? आब त' आओरो भीख नञि भेटत। .. भूख.. बच्चा 2 : मंगतुआ छै। बच्चा 3 : ई एतेक पैघ घर ओकर छै? आ तइयो भीख.. बच्चा 1 : धुरि बुडि.बक। ई अखबारक ओफीस छियै। अई ठाँ क सभस' पैध अखबारक ओफीस। बच्चा 2 : ऐं मारल! वो गुड्डी बकाट्टा। बुझा गेल जे ओकरा पढ़ब-लिखब कोना एलै। बच्चा 1 : अखबारक बगल में रहला स' किओ पढ़ि जाइ छै। मू.ढ़ीक दुकान लग रहला स' मूढ़ी भेटि जाइत छै? बच्चा 3 : मूढ़ी.. भूख.. दुनू : चोप! बच्चा 2 : कोनाक' ऊ पढ़ि गेलै तहन? बच्चा 3 : हमहू पढ़ब। बच्चा 1 : रौ, कुकुरक नांगरि। पढ़िक' की बनबही? सोनिया गांधी कि मनमोहन सिंह? बच्चा 2 : राबड़ी देवी। पढ़क जरूरते नञि। बच्चा 3 : (खिसिया क') पढ़ नञि देबें, खाए लेल नञि देबें, त' करब की? मूति! बच्चा 2 : पढ़ाईक गेरंटी नञि । खाएक गेरंटी त' आओरो नञि। बच्चा 1 : कोना पढ़बही रे? मंगतुआ गप्प दोसर छै। ओकरा लग टेम छै। ओकरा भीखो खूब भेटै छै? बच्चा 3 : पढ़ले सन्ते ने! हमहू पढ़ि लेब त' हमरो बेसी भीख भेटत। बच्चा 1 : चल, चल .. बच्चा 3 : कोम्हर? हमरा भूख लागलए। बच्चा 2 : मंगतुआ लग चल। ओकरा खेनाइयो-पिनाई बहुत रास भेटै छै? बच्चा 3 : पढ़िक' भीख मांगला स' खेनाइयो फ्री.. हमरा पढ.ा दे। बच्चा 1 : (दुनू क हाथ पकड़िक एक दिस ल' जाइत) चल, चल पानि सेहो बरस' बला छै। चल ओम्हर (दुनू रास्ता क्रॉस करबाक अभिनय करैत अछि। तेसरका पाछा रहि जइत अछि। दोसरका ओकरा पार करबाक इशारा करैत अछि। तेसरका डेराइत अछि। दोसरका फेर एम्हर अछि। ओकरा एक धौल लगाबैत अछि। फेर खींचिक' रोड पार करैत अछि। पार क' क' तीनू मंगतू लग पहुंचइत अछि। एक गोट मोटरी, एक गोट कटोरा, किछु पाइ ओकरा लग पड़ल अछि। प्रकाश तीनू बच्चाक संगे-संगे आब मंगतू पर।) बच्चा 1 : की रौ मंगतुआ। की भ' रहल छौ। मंगतू : के? ओह! चनरा, गोबरा, झुनमा रौ! आ बइस, केहेन चलि रहल छौ धंधा-पानी? बच्चा 2 : भीख माँगब धंधा पानी होइ छै? आ सेहो अई अंधड़ पानि में! बच्चा 1 : हमरा त' फूटलो आँखि नञि सोहाइये ई बरखा- बुन्नी। लोक आओर घर मे, आफिस में बन्न। दुकान दौरी सेहो ठप्प। लोक आओरक धंधा-पानी नञि त' हमरा आओर के भीख के देत? मंगतू : हमरा त' बड्ड नीक लगैय' ई बरिसात। चारू दिस हरियाली, मोन के बड्ड सोहाओन लगैत अछि। बच्चा 1 : पेट भरल रहला पर बनरनियो रानी मुखर्जी लागै छै। बच्चा 2 : अपना घर मे बइसक' चाह पकौड़ी उड़ाब' मे केकरा मजा नञि एतै? (चाह पकौड़ीक नाम स' बच्चा 3 फेर हाथ स' भूख बतबइत अछि।) बच्चा 1 : हमरा आओरक कोनो ठेकाने नञि! देखै छियै नें जे जहन पानि बरसै छै, तहन भिजैत माय कोरा मे भीजैत बच्चा के ल' क' बिल्डिंगे-बिल्डिंग, घरे-घर बउआ अबैत छै। मुदा कतहु-कोनो चौकीदार ओकरा अपना बिल्डिंग के नीचा आसरा नञि देई छै। मंगतू : छै। तइयो पानि बरसै छै त' नीक लागै छै। देह मे जिनगी सुरसुराय लागै छै। पानि छै तैं। जिनगी छै नै रौ..! (स्वर बदलिक') आ, तों सभ भिंगमे कियै। तोरा-आओर के त' घर छौ। हमरा जकाँ नञि छौ ने। बच्चा 1 : हं, सहीए । तोरा नाहित नञि छियै रौ। रहितियैक त' भरि दिन ई टरेन, ऊ बस, नञि करैत रहितहुँ। लोकक लात-बात नञि सुनतहुँ। ई गर्दनि देख.. चिकरि-चिकरि के बाँस जतेक पैध भूर भ' गेल अछि। बच्चा 2 : आ जे दू टा पाइ भेटै छै, ओहू में पुलिस, दादा सभक.. (ओ बाजिए रहल अछि कि एकटा पुलिस डंडा घुमबैत ओम्हर अबैत अछि। तीनू के देखिते तीनू पर ताबड़तोप. डंडा बरसाब' लगैत अछि। तीनू एम्हर-ओम्हर बचबाक प्रयास करैत अछि। ओही मे देह छीपि-छीपि के पुलिस से नञि मारबक नेहोरा करैत अछि। मंगतूक सेहो प्रयास। अई क्रम मे एक -दू डंडा ओकरो लागि जाइत अछि।) पुलिस : सार सभ! फेर एम्हर आबि गेलैं। चढ़बे बस ट्रेन में माँग' लेल भीख, आ करबें पाकिटमारी। बच्चा 1 : नञि साब! हम सभ त'.. पुलिस : चोप.. भोसड़ी के.. सार, बहिनक इयार! ई डंडा एम्हर स' घुसतौ त' मुंह दने निकलतौ। चल भाग, जो ओई गल्ली मे। (तीनू पुलिसक बताओल गल्ली मे भागि जाइत अछि। पुलिसबाला विजयी भाव स' बस स्टैंड पर ठाढ़ लोक आओर के देखैत अछि आ फेर मंगतू दिस।) मौज कर रो बाउ, मौज कर। तोहरे भाग मे मौज लिखल छौ। ऐहेन ने देह बना के आएल छें जे मौजे-मौज छौ। (कहैत ओ गल्ली दिस बढ़ैत अछि।) दृश्य : 2 (यात्री सभ आपस मे गप्प करैत अछि) यात्री 1 : एह! ई पुलिसवाला सभ त'.. यात्री 2 : राज-पाट त' एकरे सभक छै ने। कहबी छै ने जे जकरे लाठी, तकरे महीस। यात्री 3 : कतेक डंडा बरसौलकै ओहि बच्चा सभ पर। बुझाई छै जे ओकरा अपना धिया-पुता नञि छै। आ अईठांक लोग आओर! तमासे देखैत रहि गेल। बाज' लेल किओ नञि। यात्री 1 : सभक मुंह मे त' जाभी लागल छलै। अहीं कियैक ने बजलियै? यात्री 2 : अहाँ बाजतहुं त' हमरो सभक हिम्मति बढ़ितियैक ने। यात्री 3 : (मंगतू दिस) एकरो पर कम नञि बरसलै। हमरा आओर स' नीक त' इएह छल। एहेन देह- दसा होइतहुँ बचब' लेल त' गेलै। यात्री 1 : के छै ई? यात्री 3 : (चिढ़ क') अनिल अंबानी। यात्री 3 : खासियत छै एकरा मे। यात्री 1 : से की? यात्री 3 : पढ़ल लिखल छै। रोज अखबार पढ़ै छै। यात्री 2 : त' जहन पढ़ल छै त' कोनो काज-धंधा कियै नञि करै छै? यात्री 3 : एतेक अनटेटर गप्प किओ कएलए! अएँ यौ, ओकर देह नञि देखै छियै? के देतै ओकरा काज? अहीं द' दियऊ ने! ओ त' बड्ड प्रसन्न हएत। यात्री 2 : से कियैक यौ? यात्री 3 : कियैक त' भीख माँगब ओकरा बड्ड गर्हित कर्म बुझाइ छै। यात्री 1 : आब अहूं त'। एहेन अनसोहाँति गप नञि करू। यात्री 2 : अहाँ करी त' किछु नञि, हम करी त' जुलुम? यात्री 1 : हम कत' स' ओकरा काम देबै? हम त' अपने सेठ के ओहिठाँ बेगार खटै छी। यात्री 3 : त' खटू । मालिकक दया दृष्टि पर खेबैत रहू। हे, अहीं की, हम सभ किओ सेठक दया-दृष्टिक भीख जोहैत रहै छी। तमासा मे तमासा ई जे हमर सभक मेहनति पर मालिक सभ मौज करैत अछि। काला पानीक कैदी जकाँ माह भर हमरा आओर खटै छी। माहक आखिर मे भीखे जकाँ दस टा पत्ता हमरा आओर दिस फेंक देल जाइत अछि। (बस अयबाक ध्वनि। यात्री सभ मे हलचल। 'हमर बस आबि गेल', 'हमरो'। 'हमर एखनि धरि नञि।' 'फेर घर पहँुच' मे लेट भ' जाएत' - यात्री सभक उक्ति आ बस द्वारा प्रस्थान।) कुकुर जकाँ छी, सेठक पगारक सूखल हड्डी चुसैत हम सभ। (बस अबै छै। ओहो लपकि' क' चढ़ि जाइत अछि।) (प्रकाश तीनू बच्चा पर।) बच्चा 1 : रौ, जल्दी स' पचटकिया निकाल आ बाकी सभ एम्हर रख। रकसबा अबिते हैतौक। बच्चा 3 : ओकरा रकसबा कियैक कहै छहौक। बच्चा 2 : त' की भगवान कहियै? (बच्चा 3 स) तों एकदम किछु नञि बाजबें। कहि देइ छियौ (बच्चा 3 हं में मूंड़ी डोलबैत अछि। पुलिसक प्रवेश।) पुलिस : रौ हीरो। की भेलौ रौ? ब्रह्मा, विष्णु, महेश? आ कि सलमान खान, आमिर खान, शाहरूख खान। ओकरो.. ऊ लंगड़ा के सेहो पकड़ि ले त' आओर कोनो नाम द' दही नारद बाबा, कृष्ण जी, बलराम जी.. फिल्मी चाही त' जायद खान। एकदम टटका खान छौ। ऐं! कतेक माल बटोरले रे! लेडीज डिब्बा मे सेहो गेल छले ने! अरे, तोरा जकाँ हम रहितियौक ने, त' हम त' खाली लेडीज में जयतियौ। नञि भेंटतियैक भीख, नञि भेंटौ, मुदा मौगी सभके छुबाक अवसर त' भेटितियैक ने! (ठोर भिजबैत अछि) अच्छा चल, निकाल माल! देरी नञि । (बच्चा 1 पाँच टकाक रेजगी निकालि क' देइत अछि। पुलिस वाला गिनैत अछि।) पुलिस : सार! तोरा सभक संगे इएह सभ झंझट अदि। देबें चार गो छदाम आ गिनेबे एक घंटा जे गनैत-गनैत हाथ मे ऐंठी होब' लागय। बच्चा 1 : साब! आई कतेक पानि बरसलै अछि। देखियौ ने साब। कतेक घटाटोप बरिसाति छियै। भिन्सरे स' ट्रेने-ट्रेन घूमल, मुदा ई पाँच टका स' जास्ती नञि भेटल। साब, एकरा मे स' किछु हमरो सभक भेटि जाए। भिन्सर स' उपासले छी। ई छोटकाक त' अंतड.ी सुखा गेलैय'। (सलाम ठोकैत अछि।) (पुलिस निर्लज्ज हंसी हंसैत छै। फेर एक धौल बच्चा 1 के लगबैत अछि।) पुलिस : दलाल स' दलाली एकरे कहै छै ने। ऐ हीरो, बेसी एक्टिंग नञि। (दर्शक स') देखियौ छौड़ा सभक ढिठाई। देत पांच गो टाका, आ ओहि मे आपसो चाही। माने हफ्ता मे हफ्ता। (गब्बर सिंह स्टाइल मे बाजैत अछि) सोच, सोच। हमरा आओरक सोच। सरकार कहै छै, भीख नञि माँग' लेल। कानूनो बना देलकै। मुदा हमरा आओर के दया आबि जाइत अछि तोरा आओर पर। भीख नञि माँगबे त' खेबे कत स'? रौ, मेहरबानी बूझ, मेहरबानी। आ, आब ई पाँच टका स' किछु नञि होब बला छौ। रेट बढ.ा, रेट। देखै नञि छही, कतेक मँहगाई बढ़ि गेलैये। (डंडा घुमाबैत चलि जाइत अछि.. तीनू एक दोसरा के देखैत अछि। पुलिस के जाइत देरी कि तीनू पाथरक नीचा दबाक' राखल पाइ दिस लुझैत अछि।) बच्चा 3 : भूख लागलए हमरा। बच्चा 1 : (खिसिखा क' एक झांपड़ लगबैत अछि। ले, हमर देह काटि क' खा ले हे, ओम्हर जे पांच टका छै ने, तकरा मे बिसरियो के हाथ नञि लगबिहै। नञि त' ओ हाथे कन्हा स' अलग भ' जेतौ। दादाक हिस्सा छै, दादाक।) बच्चा 2 : त' आब बचलौ की? बच्चा 1 : डेढ़ टाका। जकरा मे एक गिलास सतुओ नञि एतौ। बच्चा 2 : तहन .. भूख त' लागल अछि। हमरो, तोरो। चल न फेर मंगतुए लग। ओकरा ल'ग खेनाइयो-पिनाईक समान सभ खूब रहै छै। (तीनू ओकरा दिस बढ़ैत अछि । मंगतू किछु बड़बड़ क' रहल अछि।) बच्चा 1 : की रौ मँगतुआ! की डैलोग मारि रहल छैं। नाना पाटेकर जकाँ। मंगतू : (चौेंकि क') अँए.. किछुओ त' नञि । बच्चा 3 : भूख .. बच्चा 1 : चुप सार, कुकुरक पोंछि। बच्चा 2 : मारि लें डैलोग। तोरे राजपाट छौ रौ। मौज छौ तोरे। ने कोम्हरो एनाइ ने गेनाई। एम्हरे बइसल-बइसल पाइ बरसै छौ तोरा पर। हमरा आओर के देख। भरि दिन ट्रेने-टेन घूमल, तइयो कतेक भेटल? साढ़े एगारह टाका। पाँच टाका पुलिस के, पाँच टाका दादा के। बचलौ कतेक? डेढ़ टाका? अब अई डेढ़ टाका मे की खाऊ हम आओर, जाहि स' पेट भरए? तोरा त' ई सभ नञि सोचबाक छौ ने। तैं कहलियौ जे बड्ड भगमंता छें। मंगतू : (तिक्त स्वर म') तोंहों भगमंता बनि सकै छें। ब. 1+2 : (एके स्वर म') हँ, कोना? बता कने! पाइ लेल किछुओ क' सकै छी हम सभ। मंगतू : किछुओ क' सकै छे ने! त' आ, तोहों बनि जो हमरे जकाँ लूल्हि, लांगड़ .. फिर तोरो लग बरसतो पानिक बदला मे पाइ .. आ .. आ .. बना दियौ .. आबि जो .. (खूँखार हाव-भाव स' ओकरा दिस बढ़ैत अछि। दुनू बच्चा चिचियाइत अछि। बच्चा 1 ओकरा मार' लेल हाथ उठबैत अछि। फेर नीचा क' लेइत अछि। बच्चा - 3 बच्चा 2 के हाथ स' भूख लगबाक इशारा क' रहल अछि। बच्चा 1 ओकरा देखि लेइत अछि आ मंगतू पर उठाओल हाथ, जे नीचा आबि रहल छलै, ओकरा बच्चा 3 पर जमा देइत छै।) (अंधकार । प्रकाश। सोझा स' दु गोट पत्रकार युवक-युवती अबैत अछि। युवती जींस आ बॉडी टाइट टी शर्ट मे अछि। कटल केश, कंधा पर शांतिपुरी झोरा, गर्दनि मे पेन आ मोबाइल लटकल। युवक सेहो जींस आ खूब ढोल ठक्कल टी शर्ट मे अछि। कन्हा पर पोर्टफोलियो बैग, गर्दनि मे कैमरा, मुंह मे सिगरेट। सिगरेट पिबैत धुआँ छोड़ैत छै। धुआं युवती दिस पहुँचै छै। युवती हाथस' धुआं हटबैत तेज नजरि स' युवक के देखै छै।) युवक : सॉरी, सॉरी। की करू। सभ ठाँ त' नो स्मोकिंग जोन बना देने छै। दफ्तर, पार्क, होटल, अस्पताल - कतहु नञि पीबि सकै छी। युवती : त' नञि पियू। पानि नञि छै ने, जे मरि जाएब। युवक : पानि नञि प्राण अछि। अनका लेल अपन प्राण गमाएब हमरा मंजूर नञि । (गप्प करैत-करैत युवतीक दृष्टि मंगतू पर पड़ैत छै। ओ भीख लेल सिक्का निकालैत अछि। युवती रोकि देइत अछि।) युवती : ऊँहू! युवक : (मजाकिया स्वर मे) त' ई सिगरेटे द' अबै छियै। युवती : सभ समय मजाक नञि । युवक : तहन? युवती : ओकरा पर चलू एकटा स्टोरी करै छी। युवक : फेदा। युवती : ओ पढ़ल-लिखल छै। शारीरिक रूप स' नचार । पढ़ल छै, तैं भ' सकैछ जे भीख माँगब ओकरा पसीन नञि हुअए। मजबूरी मे.. युवक : कह' की चाहै छी अहाँ? युवती : कर' चाहै छी स्टोरी । युवक : व्हाट? (किछु सोचैत अछि) हँू .. फिजिकली इनेबल, मेंटली शार्प, लिटरेट .. काज कएल जा सकैय'। युवती : छपला स' जे पाइ भेटत, तकरा मे स' आधा एकरा द' दबै। ओकरो लागतै जे भीख स' अलग किछु ओकरा भेटलैय'। आत्मविश्र्वास बढ़तै ओकर। युवक : यदि हम फिल्म धरि सोची त'? 'अ हैंडीकैप्ट लिटरेट'..। नीक बनि गेल त' अवार्ड-तवार्ड सेहो.. (अवार्डक नाम पर युवतीक ऑखि चमकैत छै।) युवती : नॉट अ बैड आइडिया। (दुनू मंगतू लग पहूँचइत छथि।) युवक : रौं, नाम की छौ तोहर। (मंगतू चेहाक' ओकरा दिस देखै छै। किछु बोलबाक होइ छै, मुदा दोसरे पल मुंह बन्न आ चेहरा कठोर क' लेइत अछि।) युवती : अहीं स' पूछि रहल छी जे की नांव भेल। (मंगतू एखनो चुप अछि। मुदा ओकरा मे एकटा नाराजगी भरल उत्तेजना बढ़ि रहल अछि।) युवक : सुन! हम सभ तोरा पर किछु काज कर' चाहै छी। अई में तोहर सपोर्ट चाही। माने सहायता। युवती : अहाँक नाँव, गाम, ठेकान। अहिठाँ कोना पहुंचलहुँ.. (मंगतू एखनो दुनू दिस ताकिए रहल छै। युवक मे रोष पैदा होई छै। युवती स') युवक : ही इज डफर। एक्टिंग। नोइंग हिज इंपोर्टेंस। लेट्स मूव। युवती : बी पेशेंट। ही विल टॉक। (मंगतू स') भाई, कनेक अहाँक सहयोग चाही। अहीं पर हम सभ काज कर' चाहै छी। दुनिया के बताब' चाहै छी जे अहाँ के छी, कोना छी। लोक-आओरक धेयान खींच' चाहै छी- अहाँक गुण पर, जे अई हालति में रहियो क' अहाँ पढ़लौं। मंगतू : (अकस्मात) अहाँ के कोना बूझल? युवती : देखै छियै ने। अबैत-जाइत। अखबार पढ़ैत, लोक आओरक चिट्ठी पढ़ैत। मंगतू : (एकटा धार मे बहैत जकाँ) हुँ बहुत लोक छै, जे पढ़' नञि जानै छथि। हुनका गाम आओर स' चिट्ठी अबै छै। ओ सभ हमरा लग अबैत अछि। हम पढ़ि दै छियै। हमरा लिखहू अबैय'। हे, (बाम हाथ देखबैत) देखियौ। पहिने त' अच्छर खराब होई छल। आब कने ठीक भ' गेलै। मुदा, अहाँ कियै पूछि रहल छी ई सभ? युवक : कहलियौ ने रे जे तोरा पर एकटा स्टोरी करबाक अछि। मंगतू : ओहि स' हमरा फेदा? हमरा भीख माँग' से' छुट्टी भेंटि जाएत? कोनो काज भेंटत हमरा? अहाँ त' अपन काज बना लेब आ लाति मारि क' चलि देब। चिन्हबो नञि करब। युवती : एहेन गप्प नञि छै.. मंगतू : त' केहेन गप्प छै? सभ किओ अपना मतलब साध' लेल अबैत अछि। अहूँ आओरक मतलब अछि। नञि त' .. अहाँ दुनू त' रोजे ई बिल्डिंग मे अबै छी। लोक आओर त' एक नजर एम्हर मारियो लेइत अछि, अहाँ दुनू त' सेहो नञि .. युवती : एहेन किछु नञि छै। कहियो न कहियो, ककरो न ककरो नजरि त' पड़बे करै छै। अहाँ पर आई गेल आ हमर दुनूक गेल। भ' सकै छै जे हमर लेख पढ़ि क' किओ अहाँ स' भेंट कर' आबथु, गप्प करथु। भ' सकै छै, जे अहाँ के अपना जिनगीक कोनो राह भेंटि जाए। मंगतू : कोनो एहेन नञि आओत जे हमरा बाट देखाओत। हँ, भीखक चवन्नी -अठन्नी बीग' लेल अबस्से आबि जाएत। काज कोनो नञि देत। की करब अहाँ सभ जानि क' जे हम के छी, कत' स' आएल छी.. युवक : एना मोन हारला स' किछु भेटै छै की? (युवती दिस) ई कहबे केली ने जे भ' सकै छै, हमर स्टोरी पढ़ि क' किओ तोरा कोना काज-धन्धा देइये दै। अरे आसे पर त' ई दुनिया ठाढ़ छै। तों नञि बाजबें त'.. युवती : ईहो भ' सकै छै ने जे अहांक कथा पढ़ि-सुन क' दोसरो लोक आओर मे नव जिनगीक संचार हुअए। अहां त' उदाहरण भ' जाएब। प्रेरणा पुंज.. मंगतू : कहबाक गप छै ई सभ। नञि किओ आएत, नञि हमरा काज देत। हम अहिना भीख मँगैत, मँगतुआ कहबैत मरि जाएब- अही ठाँ, अही फुटपाथ पर। मुन्सीपाल्टीबला आओत, अपना गाड़ी मे ल' जा क' कतहु देह के ठेकान लगा देत.. भिखमंगे बनल मरि जाएब। (युवक स') कहू त', हमर कोन कसूर जे जनमते हम मोरी मे बिगा गेलहुँ। मात्र अही लेल ने जे हम नजायज छी। मुदा कहू जे छोट-छोट, भोला-भाला बच्चा सभ कोना क' नजायज भ' गेलै। (तेज नजरि स' युवती के देखै छै।) युवती : सही। कोनो नवजात नाजायज कोना भ' सकै छै? मंगतू : सएह त'। नजायज त' हुनकर संबंध भेलै ने। आ सेहो नजायज कियैक? बच्चा जनमाएब कोनो नजायज कर्म छिकै ? तहन त' हे, ई पूरा दुनिये नजायज अछि। समाजक रीति-नीति नञि मानू त' सभ किछु नजायज.. ई समाज हमरा भिखमंगा बना देलक, ई नजायज नञि भेलै? युवक : हूँ, बात मे दम छौ तोहर! मंगतू : (जेना अतीत मे।) हम एहेन नञि छलहुँ। एकदम पूरा देह छल हमर, अहीं आओरक माफिक - दू टा पएर, दू टा हाथ। तीर जकाँ भगैत छलहुँ, लट्टू जकाँ नचैत छलहुँ.. घिर्र.. (लट्टू जकाँ गोल-गोल घुमबाक प्रयास करैत अछि।) युवती : फेर? मंगतू : फेर की? (रिजर्व होइत) छोड़ू! की रखल छै ऊ सभ मोन पाड़ि क'। नञि त' ऊ दिन घूरत आ ने हमर हाथे-गोर। युवती : एना नञि बाजी। कहलहुँ ने हम जे हमर स्टोरी पढ़ि क' कोनो मातबरि, दयालु पहुँचि सकैत छथि अहाँक मदति लेल। भ' सकैछ, जे ओ अहाँक पएरे बनवा देथु। आइ-काल्हि खूब चलल छै ने जयपुरी लेग। देखैयो में एकदम असली लागै छै आ काजो एकदम असलीये जकाँ करै छै। युवक : तों त' पढ़ल छें। पढ़नेही ही हेबें एकरा मादे। मंगतू : (अही प्रवाह मे) हँ, सुधा चंद्रनक पएर जकाँ। युवक : एकदम सही। यदि किओ तोरो पएर एना बनबा देलकौ त' तोहों हमरे सभ नाहीत चलि-फिरि सकबें.. मुदा ई त' बता जे ई सभ भेलौं कोना। जन्मे स' एहेन नै छें एखने कहलें.. मंगतू : (बीच ही मे) पूरा छलहँु हम' एकदम अहीं सभ जकाँ। नान्हि टा छलहुँ छौंड़ा सभक संग खेलाए छलहुँ। अकास मे गुड्डी देखल हे.. ऊ.. बकाट्टा सभ गुड्डी लूट लेल पड़ाएल। हमहूँ पड़ेलौ.. भागलहुँ, भगैत गेलहुँ, भगैत गेलहुँ- होस छोड़िक'। नञि बूझ' में आएल जे सोझा स' बस.. (कनेक स्थिर भ' क') ई गणपत काका (केलावाला दिस इशारा करैत) छथि, सएह हमर माय-बाप बनि गेलाह। अस्पताल ल' गेलाह, जतेक भ' सकलै इलाज पानी करौलन्हि! युवती : आ अहाँक माय-बाप? मंगतू : दाइ, कियैक कटल पर नून बुरकै छी? अरे हम भेलहुँ हरामी, सुअरक औलाद! हमरा आओरक माय-बाप कोन? एतबे हिम्मति रहितियैक त' जनम के बाद हमरा मोरी मे त' नञि ध' देने रहितियैक'ने। आब त' गणपते कक्का हमरा लेल माय-बाप सभ छथि। युवक : चलू, जान त' बांचि गेलौ ने! मंगतू : (फेर भड़कैत) ई जान? ई जिनगी? अहाँ के चाही एहेन जिनगी? त' ल' लिय' ने! खुशी-खुशी द' देब। मुदा नञि। अहीं के कियैक, ककरो नञि चाहीं एहेन जिनगी। ई कटल-भांगल, लोथ, अपाहिज जिनगी। अरे साहब, कहब बहुत आसान छै। अपन जीह छै ने। युवती : कह' सुन' स' मोन हल्लुक भ' जाए छै। मंगतू : नेनपने स' भीख मांगब हमरा बड्ड अक्खजि बुझाइत छल। नेनपनि मे, जाधरि हाथ-गोर सही सलामति छल, एम्हर-ओम्हर काज क' क', टिकुली-ककही बेचि क', कप प्लेट धो-धो क' जिनगी बसर केलहुँ। सुनने छलियै जे काज कर' बला धिया-पुता लेल राति मे स्कूल चलै छै.. सोचने छलहँु जे नाम लिखा लेब। पढ़ि-लिखि जाएब त' कोनो छोट-मोट काज भेटि जाएत। मुदा.. ऊ गुड्डी अपने की बकाट्टा भेलै, हमर जिनगी के सेहो बकाट्टा क' देलकै। आनक आसरे भ' गेलहुँ हम। मांगि-चाँगि क', खेनाई! छिया-छिया, कतेक गर्हित कर्म छै ई। कएक बेर सोचल, जे नञि माँगब भीख- लग मे फेंकल पाई सेहो नञि उठबै छी। घिन अबैय'। मुदा, ई पापी पेट घिन स' बढ़ि क' भ' जाइए। युवक : नाम की भेलौ तोहर! मंगतू : नाम त' ओकर होई छै ने यौ बाबू, जकर माय-बाप रहै छै! रोडबला लोकक कोनो नाम होई छै.., जे-जे कह' लागल, सएह नाम भ' जाइत छै.. माँगि-चाँगि क' खेने सन्ते लोक आओर हमरा मंगतू कह' लागल। मंगतू स' मँगतुआ। (करूण हंसी) (मंगतूक गप्प युवक-युवती नोट-बुक मे नोट करैत रहैत छथि।) मंगतू : आओर साब, हम जहन.. युवक : (अचानक नोट बुक बंद करैत) अच्छा मंगतू, फेर होइत अछि भेंट-घाट। (युवती सेहो नोट-बुक बंद क' देइत अछि। मुदा ओकर आँखि मे अथाह प्रश्न व आश्चर्यक भाव छै। मंगतू हतवाक युवक दिस देखिते रहि जाइत अछि। ओ किछु बाजबाक प्रयास करैत अछि, मुदा ओ दुनू ओहिठाँ से उठि जाइत छथि। ओ दुनू मंच स' प्रस्थान करैत, मंच क' दोसर भाग स' पुन: अबै छथि, गप्प-सप्प करैत। प्रकाश ई दुनू पर । मंगतू फ्रीज अवस्था में..) युवती : बाप रौ बाप! कतेक सीरियसली गप्प करैत छलै। कतेक कन्सर्नं भ' क! संबंध नजायज होई छै, बच्चा नञि! ..कतेक आसानी स' हम सभ अपन भूलक चद्दरि दोसराक माथा ओढ़ा अबैत छी। आ, बना लेइत छी अपना के पाक-साफ। ई मंगतू, कतेक भाव भरल छै एकरा भीतर। कतेक नीक जकाँ सोचै छै। आ हम सभ पढुआ लोक, मात्र एकटा भीखमंगा बूझि ओकरा टालि जाइ छी। युवक : हे! बेसी भावुक नञि बनी। स्टोरी कर' आएल छी, ओकर जिनगीक रामनामी चद्दरि ओढ़' नञि। बूझि पड़ैत अछि, किछु बेसीए प्रभावित क' देलक ओ लुल्हबा। कोनो चक्कर-उक्कर त' शुरू नञि भ' रहल अछि.. एकदम फिल्मी स्टाइल मे। युवती : शटअप! अहाँ सभ के एकरा अलावे आओर सूझबे की करत? (दुनूक प्रस्थान। प्रकाश मंगतू पर। ऊ ई दुनू के जाएत देखैत छै, किछु.. किछु असंतुष्ट, किछु-किछु संतुष्ट।) मंगतू : चलि गेलाह! भरि पोखि गप्प भेबो नञि कएल आ.. (संतुष्टि क भाव स) तइयो पहिल बेर आई कोनो पढ़ल लिखल लोक स' गप भेल। मोन त' होइ छल जे बतियबिते रही। मुदा.. बीचहि मे.. भ' सकै छै, जतेक सूचना चाही, भेंटि गल हुअए.. तइयो.. जतबे गप्प भेल, नीक लागल.. हम त.. हमरा त' मोन होइते रहैत अछि जे हम एहेन-एहेन लोक सभ स' गप्प करी - देस, दुनिया, समाज आ अपना पर। (उल्लसित स्वर मे) गणपत कक्का! देखलहुँ अहाँ। ओ सभ हमरा स' गप्प केलाह। पत्रकार सभ.. पढुआ लोक सभ। आब जरूर हमर जिनगी बदलि जाएत। हमरा पएर भेटत, काज भेटत.. कतेक सोहाओन समय हेतै ओ.. (गणपत काका केराक चंगेरी उठौने ओकरा लग अबैत छै आ सभ' स' उतरल केरा ओकरा दै छै।) गणपत : ले, खो! मंगतू : काका.. हमर गप्प नञि सुनै छी ! गणपत : सभ सुनै छी। पत्रकार छथि। हुनका आओरक काजे छै दोसरा आओरक जिनगी बनेनाइ। (केरा देइत) ले, खतम क' ले त' हम जाइ.. मंगतू : कत? गणपत : घर! बेटी बाट तकैत होएत। सीधा-पानी ल' क' जेबै, तहने ने चूल्हि मे आंच पजरतै। मंगतू : (नमगर सांस लेइत) हँ, घर! अई ठाँ सभ के नीक-बेजाय, पैघ, छोट- अपन घर छै, परिवार छै, धिया-पुता छै, ओकरा आओर लेल ओकरा सभ के घुरबाक छै। पच्छिम दिस डूबैत घुरैत सुरूज जकाँ। आरामक ओसांसि लेल, परिवारक बीच अपन सुख-दुख बाँट' लेल। गणपत : (ओसांसि भरिक') हँ रौ, घर आ परिवार! टिनाक चदरा, पोलथीन स' छारल चार बित्ताक घर, जाहि मे ठामें-ठाम भूरि। सेहो चार-छओ मास पर मुंसीपाल्टीबला खसा दै छै। सभ बेर के तोड़ि-फोड़ि में पांच मे स' टीन टा चीज गायब भ' जाइ छै। बेटी जवान भ' गेल। लोक आओर घूरैत रहै छै, हम किछुओ नञि क' पबै छी। (उठि क' बिदा होइत अछि। प्रकाश ओकरा पाछां। एक कोन्टा मे माथ पर स' चंगेरी उतारबाक अभिनय। संगहि पार्श्र्व स' 'ऐ चमेली', गै छप्पन छुरी, कोम्हर जाइ छैं करेजाक छप्पन टुकड़ी क' के', 'एम्हर आ, एक्कहि राति मे रानी बना देबौ' 'ऐ, आती क्या खंडाला' सनक स्वर।) .. बेटा जवान भ' गेल अछि। मुदा चारि टा पाइ कमेनाइ अपना इज्जत पर बट्टा बूझैत अछि। बेटा : (घुसैत) रौ बुढ़बा, भरि दिन सेठ जकाँ बइसल रहले कि किुछ बेचबो केलें। (नेपथ्य दिस मुंह क' क') किओ अछि? किछु छैहो खाए-पिय' लेल कि सभ ठुंसा देलही ई महाराजा के। (नेपथ्य दिस स' 18-19 वर्षक एकटा लड़की हाथ में थारी ल' क' अबैत अछि। एम्हर स' ऊ थारी ल' क' अबैत अछि आ दोसर दिस स' दू-तीन टा गुंडा सनक लोक अबैत अछि आ लड़की के अश्लील रूप स' घूरैत अछि। लड़की भाई के थारी देइत अछि। भाइ थारी देखिक' फेंक देइत अछि।) ई सूखल-टटाएल रोटी आ पानि जकाँ तीमन! ई खाएक छै? गुंडा 1 : रौ राजू! तोंहो कत' आबि जाइ छै मगजमारी कर' लेल। रौ मीता, चल हमरा संगे। तोरा तंदूरी चिकन खुएबौ। मुर्गीक टंगड़ी (बोतलक इशारा करैत) एकदम मेम चीज.. मोन खुस भ' जेतौ.. मुदा.. राजू : मुदा की? गुंडा 2 : किछु लेब' लेल किछु देब' पड़ै छै ने यार! राजु : हमरा लग अछिए की? ई बुढ़बा राखलए किछु हमरा लेल? गुंडा 3 : नगीना रौ नगीना। एकदम पटाखा छौ तोहर घर मे आ कहै छैं जे बुढ़ऊ किछु छोड़बे नञि केलकौ अछि? गुंडा 1 : एहेन मोट-ताज मुर्गी । कहियो हमरो टेस्ट करा यार! (निर्लज्ज हंसी। लड़की सुकुचाक' भीतर चलि जाइत अछि। गणपत खिसिया क' ओकरा दिस बढ़ैत अछि, मुदा बेटा बीचहि मे छेकि लेइत छै।) बेटा : हे हमर परम पूज्य पिताजी! कत' जा रहल छी अहाँ? ई सभ के छथि, बूझलए अहाँ के? .. ई सभ हमर दोस्त छथि आ हमरा तंदूरी मुर्गा खुआब' ल' जा रहल छथि। (चिचियाक') रौ बुढ़बा, ला, निकाल, जे छौ तोरा ल'ग। (जबर्दस्ती ओकर पाइ छीनैत छै। गणपत चिकरैत अछि। ओकर चिकराब सुनि लड़की भीतर स' अबैत अछि आ बाप के बचाब' लेल बाप दिस भगैत अछि। एक गुंडा ओकर गाल छुबि लेइत अछि, दोसर ओकर हाथ खींचिक' बाहर ल' जाइत अछि। ई देख गणपत पाइ छोड़ि बेटी के बचाब' भागैत अछि। बेटा पाछाँ स' एक लात ओकरा जमबैत अछि। गणपत मुंहक भरे खसैत अछि। बेटा समेत सभ कियो ठठाइत निकलि जाइत अछि। पार्श्र्व स' लड़कीक चिकरब आ गुंडा सभक अट्टाहास आ अश्लील प्रलाप सुनाइ दैत छै। तेज संगीत.. बेंजोक तेज ध्वनि हठात समाप्त होइत अछि। मंच पर घोर अंधकार आ सन्नाटा!) * * * दृश्य : 3 (प्रकाश मंगतू पर। ओ अखबार पढ़ि रहल अछि। पढ़ैत-पढ़ैत पसेने पसेने भ' जाइत अछि। ओ मुंह पोछैत, एम्हर-ओम्हर देखै छै.. फेर अटकि-अटकि क' पढ़ैत अछि..) मंगतू : नवयुवती के साथ बलात्‌.. चार युवक.. नशे में.. भाई भी.. दो गिफ्तार.. दो अभी भी फरार.. (पसेना पोछैत अछि। हकला क' घबड़ाहटि मे बजैत अछि) माने.. काल्हि.. कविता.. गणपत कक्का.. राजू.. (माथ पकड़ि लेइत अछि) बहीनक रखवार अपने स' ओकरा परोसि देलकै गिद्घक सोझा.. (चिकरैत अछि) .. कक्का, गणपत कक्का.. (आवाज सुनि किछु छात्र, किछु यात्री ओम्हर अबैत अछि सभ पूछैत अछि -- की भेलौ रौ? सपना देखै छही की? दिने मे सपना.. हँ, एकरा करैये के की छै? चौबीसो घंटा, आठो पहर सूतल रहौ,.. हमरा आओर जकाँ नञि छै ने.. छिछियाइत फिरू।) (मंगतू कानि रहलए। कखनो अखबार स' माथ पीटैत अछि, कखनो बेबसी मे अपन केस नोचैत अछि।) मरियो नञि जाइ छी हम। एहेन देह, एहेन जिनगी, एहेन समाज.. मरि कियै नञि जाइ छी हम। रे दैब.. आह रे दैब! कक्का यौ, गणपत कक्का..? (भीड़ के काटैत गणपत बहिराइत अछि। मंगतू ओकरा देखतही भरि पांज ध' लेइत अछि आ कनैत अछि। कक्का पीठ-माथ सोहरबैत ओकरा भरोस दियबैत अछि।) मंगतू : कक्का.. काल्हि.. काल्हि.. गणपत : की भेलौ बेटा? मंगतू : कक्का.. कविता.. काल्हि.. गणपत : कत्त' घुरलौ बाऊ। दुनू मे स' किओ नञि। आँखिए मे राति कटलए। मंगतू : कविता आब नञि आओत कक्का.. (गणपत प्रश्नवाची दृष्टि स' ओकरा देखैत अछि.. मंगतू अखबार ओकरा दिस बढ़ा देइत छै। गणपत अनपढ़क मुद्रा मे अखबार उनटैत-पुनटैत अछि.. एकटा यात्री अखबार ल' क' पढ़ैत अछि.. खबरि सुनि गणपत थहराक' खसैत अछि.. मंगतू फेर भरि पाँजि ओकरा ध' लइत अछि।) गणपत : (विक्षिप्त जकाँ) रौ दैब रौ दैब.. मौगत द' दे रो दैब.. आब हम जीबि क' की करब.. (मंगतू के झोरि क') कहै छले ने तों जे हम सभ घर-दुआर, बाल-बच्चेदार, परिवारबला आदमी सभ छी। देख लेले नें? ईहे अछि घर आ ईहे अछि धिया-पुता। गै कविता गै.. हमर सोन सन बेटी गै.. रौ रजुआ.. रौ तोरा नरको मे ठौर नञि भेटतौ रौ.. (पुलिसक सायरन बजै छै.. सभ यात्री ओत' स' हटि क' बस स्टैंड लग ठाढ़ भ' जाइत अछि। किओ घड़ी देखैत अछि, किओ मोबाइल करैत अछि, किओ चोर नजरि स' मंगतू-गणपत दिस देखैत अछि, किओ अखबार स' पंखा करैत अछि.. छात्रक एक गोट टोली मे खुसर-फुसर करैत अछि।) (पहिला दृश्यबला पुलिस अबैत अछि.. डंडा डोलबैत..) पुलिस : रौ, गणपत तोंही छें? गणपत : जी हुजूर। पुलिस : चल थाना.. गणपत : हमर कसूर हुज़ूर। पुलिस : सार नहिंतन! बेटी स' धंधा आ बेटा स' भड़ुआगिरी, आ पूछै छें.. चल थाना.. पता चलतौ जे की छौ तोहर कसूर.. (पकड़ि क' ठेलैत- ठालैत ल' जाइत अछि।) मंगतू : साब! साब, हिनका छोड़ि देल जाओ। ई निर्दोख छथि। पुलिस : (मंगतू के लात लगबैत) त' तोंही चल। रौ डाँड़ मे छौ बूता छौंड़ी सभ लेल! हट सार! (मंगतू फेर बीच-बचावक प्रयास करैत अछि। पुलिस डंडा बरसाबइत ओकरा ठेलि देइत अछि। मंगतू मुंहक भरे खसल रहि जाइत अछि। पुलिस गणपत काका के पकड़ि क' ल' जाइत अछि। यात्री, जाहि मे किछु छात्र सभ सेहो छथि, बिटर-बिटर तकैत रहैत छथि। पुलिस के गेलाक बाद) यात्री 1 : बाप रौ बाप! एहेन कलजुग! बापे बेटीबेच्चा। यात्री 2 : अहूँ त'! जे पुलिसबाला कहि देलकै, पतिया लेलहुँ ने! यात्री 3 : पुलिसक बात आ चूल्हिक पाद एक सन! छात्र 1 : एतेक घमर्थन क' रहल छी। जहन पुलिस बुढ़बा के पकड़ि क' ल' गेलै, एकरा (मंगतू दिस) एतेक मारलकै, तहन त' नञि फ़ूटल बकार॥ पुलिस के जाइते देरी कि सभक लोल एक-एक हाथ नमगर भ' गेलै। यात्री 1 : रौ, पुलिसक सोझा बाजक कोनो मतलब छै। छात्र 2 : त' एखनि बाजबाक कोन अर्थ? यात्री 2 : हे रौ, बूझल जे हम सभ किछु नञि बाजल। तों सभ त' छलें, युवा शक्ति, छात्र शक्ति! तोहें सभ कियैक ने बाजलें रे! यात्री 1 : (मंगतू दिस) हम सभ त' बाउ रौ, जिनगीक दोग मे फँसल बूँट छी। सेठ साहूकार कैंचीक मध्य फँसल कापड़ि। पुलिस-दारोगा करबाक समय कत'? छात्र 2 : जहन अपना पर आओत तहन? यात्री 3 : तहन देखल जेतै। छात्र 3 : माने अपना पर पड़ल मोसीबत पहाड़, आ आनक फूसि-फासि? यात्री 1 : तैं ने कहलियौ रौ भाय जे तों आओर त' छें छुट्टा बरदि। ने घर गिरस्थीक चक्करि ने नौकरी पातीक झंझटि, ने बाल-बच्चाक पिरसानी। ऊपर स' नेता बनबाक मोका फ्री-फंड मे। (बस देखैत.. हे हमर बस आबि गेल' कहैत चढ़बाक अभिनय करैत अछि। चढ़ि गेलाक बाद सोर पारिक' छात्र के कहैत अछि -) रौ, मोन राखिहें हमर गप्प। की ठेकान, छात्र नेता स' मुख्य मंत्री आ फेर केंद्रीय मंत्री भ' जेबें। घरोवालीक निस्तार भ' जेतौ। हे ले (पाइ फेंकैत अछि..) ऊ भिखमंगाक दबाई करबा दिहें। (छात्र सभ तमतमाएल ठाढ रहैत छथि, अन्य यात्री सभी हंसैत अछि। किओ ठहाका पारि क', किओ मुंह तोपिक! किओ मुसिकियाइत पेपर पढ़बाक त' किओ समय देखबाक अभिनय करैत अछि। सभक बस एकाएकी अबैत छै, सभ ओहि मे सवार भ' भ' चलि जाइत अछि। जाए स' पहिले सभ किओ चवन्नी, अठन्नी, सिक्का मंगतू दिस फेंकैत अछि आ छात्र आओर के इलाज क तगेदा करैत अछि।) छात्र 1 : ओह! रहब मोश्किल भ' रहल छै! मोन उजबुजाइय ई सभ देखि क'। छात्र 2 : सपना देखै छी, देखैत रहै छी। कहियो किओ सपना देखल त' आइ देश आजाद भेल। आजाद देश लेल सपना देखल जे सभके जीबाक, रहबाक, काज करबाक समान अधिकार अछि। किओ भूखल-पियासल, बेरोजगार नञि रहत। पढ़ाई रोटीए जकाँ अनिवार्य रहतै। मुदा भेटलै की? आजादीक एतेक बरखक बादो वएह भूख, गरीबी, बेरोजगारी.. छात्रा 1 : भ्रष्टाचार, बेईमानी, सत्ताक अपराधीकरण। जिनगी जीबाक विवश्ता.. मंगतू : (कने जोरगर आवाज मे, जाहि स' छात्र सभ सुन सकथि।) रौ हाथ-गोर रहितहु कियैक एना बाजि रहल छें। (छात्रक ध्यान ओकरा दिस जाइत छै। ओ सभ ओकरा ल'ग अबैत अछि) छात्र 1 : भाई, हाथे-गोर रहला स' समस्याक समाधान नञि भ' जाइ छै। छात्र 2 : सभ ठाँ पाई चाही, पैरवी चाही। देख भाई, लोक आओर हमरा सभ के कहै छथि जे हम सभ युवा शक्ति छी, देशक भविष्य छी। छात्र 3 : रौ, वास्तविकता त' अछि जे हमरा आओर के अपने नञि बूझल अछि अपन भविष्य। छात्र 1 : माय-बाप सपना काढ़ै छथि जे बेटा सभ पढ़ि-लिख क' हमर दुख दूर करत। छात्र 2 : हम सभ त' हुनकर दुखक भीजल चिपरी मे चिनगी लगाक' आबि जाई छी, रसे-रसे सुनगैइत रहू। छात्र 3 : करैत रहै छी - अपन अरमानक खून, माय-बापक सपनाक हत्या। रौ, तों त' खाली देहे स' अपाहिज छें। ई व्यवस्थाक हाथे हम सभ त' तन-मन दुनू स' अपाहिज छी। मंगतू : मुदा भाई, ई व्यवस्था की छै। ककर छै, के बदलत? छात्र 1 : (रोब स') हे, नेता जुनि बन। दू अच्छर अखबार पढ़िक' अपना के प्रधानमंत्री नञि बूझ। (पहिलुका पत्रकार युवक-युवतीक प्रवेश) युवक : अरे वाह, आई त' एकरा लग छात्र सभ सेहो अछि। गुड। चलू, एकरो आओर के कवर क' लेइत छी। युवती : हम त' आइ काल्हि रोजे देखै छी, किओ न किओ एकरा लग बनले रहैत छै। युवक : ई छैहे तेहेन कमालक चीज। हाथ नञि, पएर नञि, घर-परिवार नञि, शिक्षा-संस्कार नञि । तइयो पढुआ छै, अखबार पढ़ै छै। चिट्टी-पत्री लिखै-पढ़ै छै। (दुनू सटि क' ओकरा आओरक गप्प सुनैत छथि। छात्र सभ मंगतू लग स' हटि क' बस स्टॉप दिस बढ़ैत छथि।) छात्र 1 : कह' लेल जे कही। भने ओकरा झलकारि दही। हमर गप्प मे सेहो तों सभ दर्शन ताक' लाग। मुदा, कखनो लगैत अछि जे एकरे जकाँ हम आओर सेहो भेल जाइ छी। लोक आओर भेल जाइत अछि, देश-दुनिया बनल जाइत अछि। छात्र 2 : रौ बाप, हे, पहिनहीं परीक्षा खराब भ' गेल अछि। आब ई दर्शन-तरसन छाँटि क' माथ नञि खराब कर। छात्र 1 : सुन त'! एकरा देखिक' तोरा नञि बुझाइ छौ जे एकर देह-देह नञि, ई समाज आ ओकर व्यवस्था छै। ई समाज, ई व्यवस्थाक माथ छै, माथ मे दिमागो छै, जे सोचैत त' छै, मुदा किुछ करै नञि छै। करबाक लेल सक्रियताक हाथ-गोर चाही, जे एकरे जकाँ ओकरो नञि छै। तैं एकरे जकाँ पड़ल रहै छै - लोथ भेल। छात्र 3 : (छात्र 2 आ 3 माथ ठोकैत छथि।) गेलौ रौ गेलौ। पूरमपूर गलौ। आब ई हमरा आओर के त' पकेबे करतौ, तोरो आओर के नञि छोड़तौ। (युवक-युवती के देख) नीक भेल। आबि गेलहुँ। सुनू आब अरस्तूक गप्प। (दुनू तेजी स' निकलि जाइत अछि। छात्र 1 ओही ठाँ अछि।) युवक : देखू! पत्रकार छी हम आओर आ पत्रकार जकाँ बतियाइत छथि ई आओर। युवती : हमरा आओर त' छात्र सभक संगे ओकरा कवर कर' चाहै छलहुँ। युवक : से त' रहिए गेल। युवती : ई एकटा अछि ने! एकरे कवर क' लेइत छी। युवक : (चिढ़िक') त' निकालू साड़ी आ क' लिय' कवर। युवती : शटअप! फालतू गप्प नञि करी। हमर संग साथ नञि नीक लगैत अछि त' अहाँ जा सकै छी। हम अपन काज क' लेब। युवक : ककरा संगे? ऊ लोथक संगे की ई देशक भविष्यक संगे। युवती : (चिकरैत) बंद करू ई बकवास। अहाँ जर्नलिस्ट छी। बूझै छी जर्नलिस्टक माने? (ओही उत्तेजना मे) जर्नलिस्ट माने उन्नत विचारक स्वामी, खुलल दिल आ दिमागवाला व्यक्ति, जनताक विचार वहन कर' बला, व्यवस्थाक छेद मे आंगुर द' क' देखाब' बाला। मुदा अहाँ त' ईर्ष्या आ द्वेष स' जरैत संठी छी मात्र। दुर्गंध स' भरल तौला। दुनियाक चौथा आवाजक नाम पर भड़ुआगिरी कर' बला। छि:। (युवक नाराज भ' क' यवती दिस घूरैत अछि। युवतीक चिकरब सुनि बाहर गेल दुनू छात्र घूरि अबैत अछि। छात्र 1 पहिनही स' अकबकाएल बेरी-बेरी स' दुनू युवक-युवती के देखैत अछि। युवक-युवतीक हाथ घीचि क' मंच क दहिना भाग मे ल' जाइत अछि। छात्र सभ मंचक बाम दिस छथि आ मंगतू बीच मे। मंच पर अत्यन्त मद्घम प्रकाश। अचानक युवक-युवती पर हाथ उठबैत छै। सभ चौंकि उठैत अछि। युवती खसल अछि। मंगतू हड़बड़ाक' ओम्हर बढ़बाक प्रयास करैत अछि, मुदा खसि पड़ैत अछि। छात्र सभ युवकक चेहरा देखि ओहि ठाँ थकमकाएल रहि जाइत छथि। पार्श्र्व स' समवेत स्वर में ईको साउन्ड इफेक्ट मे ई पंक्ति चलैत अछि।) किओ किछु नञि क' सकैत अछि। किओ किछु नञि कहि सकैत अछि। बिकाएल बजार मे मानवताक मूल्य बंधक अछि माथ हाथ गोर भांगल, धड़ शिथिल जागू, जागू, तखने होएत विहान नव सूरज रचत इतिहासक नव काल खंड। (प्रकाश शनै: शनै: फेडआउट होइत अछि।) (मध्यांतर) अंक : 2 दृश्य : 1 (बाजारक दृश्य। फेरीबाला रूमाल, टिकुली, सेब, नारंगी, खिलौना सभ बेचबाक आवाज नेपथ्य स' - 'ऐ बच्चा के खेलौना, साढ़े बीस रूपैया, दौग-दौग क' ले, जाऊ, दीदी, काकी, भैया,' खसि गेल खसि गेल, पेंटक दाम खसि गेल', हरेक माल 30 रूपैया, 30 रूपैया, 30 रूपैया' आदि।) (प्रकाश शनै-शनै: मंगतू पर केन्द्रित होइत अछि।) मंगतू : ओह, ई हल्ला-गुल्ला! ई भीड़, ई धक्का-धुक्की!.. नीक लागै छै। जिनगी चलि रहल छै अई सभ मे.. ई जगह.. बरगदक नाहित.. हमरा सन-सन कतेक लोकक आसरा.. कखनो, कखनो त' हम सड़क पर नजरि जमा देइत छी.. ओह खाली पएरे-पैर.. दौगैत-भगैत गोरे-गोर.. कनेक ओकरा स' ऊपर त' दायाँ-बाम डोलैत हाथ.. कनेक ओकरा स' ऊपर त' माथे-माथ.. कारी-कारी केस, स्त्रीक माथ, पुरूषक माथ.. सभक लक्ष्य अपना-अपना गंतव्य धरि पहुँचबाक, रहि जाइ छी त' हमी - लोथ, नांगरि., लूल्हि.. अही के अही ठां.. लोक आओर कहैत रहैत अछि जे हम बड्ड भगमंता छी.. बइसल-बइसल पाइ भेंटि जाइत अछि.. कोना क' हम बुझाबी जे हमरा भीख नञि, काज चाही काज। .. (शून्य मे चिकरि क') रौ, हम भगमंता छी त' तोहो सभ कियैक ने बनि जाइ छें हमरे जकाँ भगमंता.. (विक्षिप्त जकां हंसैत अछि) .. अरे, सभ हमरे जकाँ बनि जाएत, त' फेर कमाएत के.. हमरा आओर पर भीखक नजरि आ चवन्नी, अठन्नी फेंकत के? .. हं, बूझल। ई सभ चलैत रहौक, तकरा लेल साबुत लोकक भेनाई जरूरी छै.. आ ओ सभ पुण्य कमाबैथि, तकरा लेल हमरा आओरक रहनाई सेहो .. (मंगतू जहन ई बाजि रहलए, दू-तीन टा हिज़ड़ा ओम्हर अबैत अछि। सभक नजरि मंगतू लग छिड़ियाएल पाई पर छै। सभक के आँखि मे लालच छै।) हिजड़ा 1 : की राजा! की भेलौ रौ? सूखल गरी जकाँ मुंह कियै बनेने छें? अरे हाय, हाय, तोरा देखि क' हमरा त' किछु किछु होबैत अछि (गबैत अछि) 'क्या करूँ हाय, कुछ-कुछ होता है।' मंगतू : (अपनही धुन मे) धिया-पुता सभ स्कूल-बैग ल' क' स्कूल जाइत अछि.. कतेक नीक लगै छै.. हम नान्हि टा स' जवान भ' गेलहुँ, मुदा स्कूलक मुंह.. हिजरा 2 : त' की भेलौ रौ राजा। अपना ओहिठां बहुत रास लोक स्कूलक मुंह देखने बेगर मरि जाइत अछि। हमरे आओर के देख। मुदा फ़िकिर नईं। हमरा आओर खुशो छी आ हे देख, तोरा लेल गीतो गाबि रहल छी।.. (गबैत अछि) ''सैंया दिल में आना रे, आके फिर ना जाना रे, हो आके फिर ना जाना रे, छम-छमा-छम-छम!'' (अथवा कोनो आधुनिक गीत)़ मंगतू : हमहू कहियो ई चाकर-चिक्कन रोड पर चलि सकब! बस- ट्रेन में चढ़ि सकब। अपना कमाई स' बसक टिकट कीनि सकब! .. भ' सकै छै.. कोनो मददगार आबि क'.. मुदा, की भेटत कोनो एहेन। हिजड़ा 3 : चल रौ, हम बनि जाइ छियौ तोहर खुदाई खिदमतगार। चल, चल, हम सभ तोरा ल' क' सनीमा जेबौ, चाट-पकौड़ी खुएबौ (गबैत अछि) ''चौपाटी जाएंगा, भेलपुरी खाएगा, पीछा न छोड़ेंगा हम, गाना बजाना, खाना-पीना, गाड़ी में होंगा सनम।'' (सभ मिलिक' मंगतू के झोरैत अछि। मंगतूक धेयान टूटैत छै।) हि. 1 : की रौ हीरो। एना अभिषेक बच्चन जकाँ मुंह कियैक लटकौने छे? हि. 2 : रौ, तों कोनो भीख थोड़बे मांगै छें। तोरा देखितही मातर लोक आओरक' हाथ अपने आपे अपन पॉकिट दिस बढ़ि जाइ छै। हि. 3 : हमरा आओर स' नीके छें रे। देख, तोहर हाथ-गोर नञि छौ, तइयो तों आदमी कहबैत छें - आदमी, मरद। हमरा आओर के अछि ई चारू हाथ-गोर! तइयो एक गोट पहिचान नञि अछि। तैं (ताली बजबैत अछि) कहबैत छी। हि. 1 : सिगनले-सिगनले, रोडे-रोडे भीख मंगैत फिरै छी। हमरा आओर के देखितही बाबू-मेम सभ सीसा चढ़ा लेइत छथि गाड़ीक। मंगतू : मुदा हमरा भीख नञि चाही। हमरा काज चाही। हि. 2 : (हंसैत) से तोरा भेंटतौ नञि! कह, त' स्टाम पेपर पर लिखि क' द' दियौ। (गबैत अछि) 'कोरे कागज पे मुझसे करा ले सही।' 'अरे हमर चिक्कन-चुनमुन राजा, हमर छैला, ई सनी देओल जकाँ डकरै स' तोरा काज भेंट जेतौ। भेंटल हमरा आओर के ? तोहर त' हाथ-गोर नञि छौ, हम्मर त' अछि। मुदा दोकानदार बाजल - रौ बाप रौ बाप! हे पानि मे आगि लगाब' लेल हमही भेटलियौ रौ? तोरा देखि क' त' गँहकी पराइए जेतौ। फेर बिक्री-बट्टाक की हएत। हि. 1 : हम ऑफिस-ऑफिस केहुरिया काटल। सभक एक्के टेर- पढ़ल-लिखल छें? डिग्री छौ? हि. 2 : सोचल, अपने कोना धंधा-पानी आरंभ करी त' -पूँजीए नञि (करूण हंसी) घर मे मुर्गी नञि, कीने चलल मसल्ला। हि. 1 : एखनि नीक भ' गेल अछि। रबि क रबि सभ दोकान पर रेट फिक्स अछि- एक रूपैया फी दोकान। (हंसैत अछि) फ़ी रूपैया, फ़ी दोकान, फ़ी छक्का । रौ, तोरा त' अठन्नी, रूपैया दू रुपैया डेली भेटै हेतौक। हमरा आओर के त' एक रूपैया फी हफ्ता, फी छक्का। देख, सभ किछु अछि-हाथ गोर, नाक-आँख, मूड़ी, दिमाग। हि. 2 : मुदा सभ किछु रहितहु किछु नञि छी हम सभ.. ने मनुक्ख, ने कुकुर। हि. 1 : बस एक रूपैया फी हफ्ता, फी छक्का (गबैत नचैत अछि। शेष दुनू ओकरा संगति देइत अछि) एक रूपैया मे.. एक रूपैया मे, पूड़ी खाऊं, जिलेबी खाऊं, नरेटी फाड़ि क' तान लगाऊ.. एक रूपैया मे। (नचैत गबैत ओ सभ मंगतूक माथ, बाल, मुंह छुबैत अछि, चूमैत अछि, नाच' लेल उठाबैत अछि। मंगतू सेहो प्रयास करैत अछि। पार्श्र्व स' नृत्य प्रधान संगीत तेज होइत अछि.. नाचबाक प्रयास करैत-करैत मंगतू खसि पड़ैत अछि। सांस सामान्य भेला पर।) मंगतू : हँ रौ, सही कहै छें तो सभ। अई ठाँ त' लोक-आओर अठन्नी - टाका, में पुण्य कीनैत छथि त' अपना आओर के काज द' क' किओ अपन पांच सौ, सात सौक खारा कियैक करत? लोक आओर त' इएह बूझैत छथि ने जे लोथ, लूल्हि-नांगड़ि. कोन काजक? तोरा आओर स्त्री-पुरूष नञि भेलें त' समाज मे तोहर गिनतीयो नञि! अरे किओ पूछल हमरा आओर स' जे हम सभ.. हम सभ की सभ क' सकै छी। अरे, किओ करबा के त' देखौ जे हम सभ की नञि क' सकै छी! हि. 2 : (हंसैत आ थपड़ी पीटैत) की सभ क' सकै छें रे? साला, दगेबाज, हमरा संगे प्रेम बना सकै छें! रौ सार.. (चिढ़बैत अछि। मंगतू पहिने खिसियाइत अछि, फेर हंसि पड़ैत अछि।) मंगतू : बनेबौ रौ, बनेबौ, मुदा पहिने अखबार त' पढ़' दें। भिन्सर स' नञि भेटल। नञि त' रामआसरे भाइ आ नहिए किसुनदेवे भाइ आइ अखबार देलैन्हि.. चली, अपनही स' ल' आनी। भ' सकै छथि, जे बेसी काज हुअए हुनका आओर के.. (मंगतू अखबारक औफ़िसक प्रवेश द्वार धरि अपना के ल' जाइत अछि। द्वार पर किसुनदेव आ रामआसरे अति सावधानक मुद्रा मे ठाढ़ छथि।) किसुन. : आई सीएमडी साहेब आब' बला छथि। राम. : हँ, तैं देखहक नें, सभकिछु कतेक चकाचक छै.. फिट-फाट.. फस्ट किलास। किसुन. : आई त' सभ स्टाफ सेहो आएल अछि। कोनो गैरहाजिर नञि । राम. : सुनल जे आइ सीएमडी साहेब सभ' स' भेंट करताह। मीटिंग करताह। किसुन . : तहन त' अपनो सभ स' भेंट करताह! राम. : भ' सकैत अछि। किसुन : एहेन हेतै त' हम पलखति निकालि क' हुनका पएर छुबि कहबै, जे साहब.. हमरा कनकिरबा के कोनो नोकरी.. राम. : सपना जुनि देख.. ई एतेक बड़का लोक सभ.. अर्जी दइयो देबही त' अई हाथ मे लेथुन्ह आ ओहि हाथ स'.. (अही बीच युवक आ युवती पत्रकार अबैत छथि। दरबानक मुंह पर पहिचानक मुस्की अबैत छै। दुनू ओहि दुनू के नमस्कार करैत छथि।) युवक : (भीतर जाइत) रामआसरे! की बात? वर्दी एकदम कलफदार। मूँछो-एकदम कड़क। मूछो के कलफ लगा देलही की? राम. : (लजाइत) ऊ साहेब, आइ.. ऊ.. सीएमडी साहेब.. युवक : ओ हो.. तोरा संगे हुनकर मीटिंग छौ की? बढ़िया, बहुत बढ़िया (दर्शक दिस) देख रहल छी ने प्रशासन के। ओ तखने चुस्त-दुरूस्त नजरि अबैत अछि, जहन ओकर माय-बाप सभ अबैत अछि.. वरना.. (रामआसरेक एक दिसक मोछ के नीचा क' देइत अछि आ भीतर चलि जाइत अछि। ओकरा गेलाक बाद रामआसरे अपन मोछ पूर्ववत करैत अछि।) (मंगतू ताबैत द्वार धरि पहुँचि जाइत अछि। दुनू दरबान के देखि क' मुस्काइत अछि। मुदा दुनू ओकरा दिस ध्यान नञि द' क' मुस्तैदी स' अपन ड्यूटी क' रहल अछि। मंगतू अपन एकलौता हाथ स' सलाम ठोकैत अछि।) मंगतू : रामआसरे भाई? किसुनदेव भाई? आई त' बड्ड जोरदार लगि रहल छी दुनू। (दुनू कोनो जवाब नञि देइत छथि) मंगतू : बेरहटिया भ' गेलै.. अखबार नञि भेटल.. मोन बेचैन भेल अछि.. आ रामआसरे भाई.. कहियो हमरो ई ओफिस भीतर स' घुमा दिय' ने। सुनै छी, बड्ड मोडन ओफिस छै.. कम्पूटर, त' की त' की सभ छै। अच्छा, अहीं सभक पुन्न परताप से पढ़ब सीखि गेलहुँ त' अहींक किरपे कोनो दिन ओफीसो.. (तखने गेट पर हलचल होइत अछि। 'साब आ गए'। 'हटो, हटो, रास्ता छोड़ो' आदि स्वर उभरैत अछि। सिक्यूरिटी अटेंशनक मुद्रा मे आबि जाइत अछि। रामआसरे आ किसुनदेव दुनू मंगतू के देखैत छथि, फेर पलखतिये मे दुनू मे जेना कोनो करार होइत अछि आ दोसरे पल मे दुनू मंगतू के घीचि क' गेट स' दूर ल' जाक' पटकि देत छथि आ झब स' अपना स्थान पर आबि क' ठाढ़ भ' जाइत छथि। एक गोट सूटेड-बूटेड साहेब कएक टा अधिकारी सभस' घेराएल अबैत छथि आ भीतर चलि जाइत छथि। दुनू हुनका खूब चुस्त, मुदा नमगर सलाम ठोकैत छथि। सीएमडी आ बाकी लोकके भीतर गेलाक बाद।) राम. : यार किसुनदेव! ई नीक नञि भेलै। किसु. : त' कइए की सकैत छलहुँ? सीएमडी साहेब आब' बला छलाह। ऐहेन स्थिति मे हम सभ एकटा लोथ.. नांगड़ि भिखमंगा स' गपियाइत रहितहँु त'.. अपन नोकरी त' सोझे.. राम : तइयो.. आराम स' ल' जा सकै छलियै.. एना बोरा जकाँ पटकि देलियै.. की जान' चोटो-तोटो लागल हेतै.. किसुन : चल, चल देखि लेइत छियै.. राम. : नराज हेतैक ओ.. किसुन : अरे अखबार ल' क' चलै छी। ओकर नराजगी दूर भ' जेतै.. अखबार त' ओकरा लेल चरसो-गाँजा स' बढ़िक छै.. राम : पढ़ियो कतेक जल्दी लइत छै। पढ़ै की छै, घोखि जाइ छै, (गर्व स') हमही त' सिखेलियै ओकरा, अहिना एक दिन आएल छल आ बाजल छल.. हमरो अखबार पढ़ाएब सीखा दिय' ने भाई जी। हम मजाक केलियै -'की रौ, पढ़ि क' की बनबें? शिक्षा मंत्री? ओ बाजल, मंत्री बन' लेल पढ़ब जरूरी थोड़बे छै। राम. : मंगतूक ई प्रश्न हमरा छुबि गेल। बड़का-बड़का लोक सभक धिया-पुता के पढ़ब नीक नयि लागे छै.. माय-बाप ओकर पढ़ाईक पाछा पागल बनल रहैत अछि आ धिया-पुता सभ हुनकर मंह पर पों-पों पदैत रहैत छथि.. आ ई एकटा लोथ.. भिखमंगा.. हम तय केलहुँ जे एकरा ओतेक त' पढ़ाइए देबै जे ई पेपर - तेपर पढ़ि सकय.. ई अ, ज आकारा जा.. ह उूकार हि.. आ आखर-आखर करैत ओ पढ़ब सीखि गेलै। आ आब त' ओ जतेक तेजी स' पढ़ैत अछि कि ओतेक तेजी से पढुओ सभ नञि पढ़ि सकत। किसुन : हिन्दी छै ने! तैं जीभ के लकबा मारि जाइ छै.. एना-एना मुंह बनाओत कि लागत जे कोनो लाटक नाती आबि गेल अछि बिलायत से। राम : कंपूटरो स' तेज ओकर दिमाग छै.. सभ किछु जेना जीहे पर राखल रहैत छै.. जेना कंपूटरक, की कहै छै... ऊ, मेमोरी में.. किसुन : अरे रामआसरे भाइ, ई मोरी तो सुने थे.. नाली। ई मेमोरी की छै? मोरीक बहीन की? राम : ननदि छै। रौ मेमोरी नञि बूझै छें.. कंपूटरक दिमाग। मुदा मंगतूआक दिमाग त' कंपूटरोक दिमाग स' बेसी तेज छै। एकदम फास्ट.. रौ, कंपूटर मे त' देख' लेल ओकरा पहिने फोलू, फ़ेर फाइल त' की दनि, कहाँ दनि फोलू.. तहनो सेभ माने दिमाग बचा क' राखने छी त' भेटत, नञि त'.. हवा.. लें सार.. गेल सभ.. आ जदि कोनो बेरामी घुसि गेल, तहन त' पूरे गुड्डी बकट्टा.. किसुन : अरे, ठीक इएह गप्प हमर साहेब कहै छथि। आ सएह सच्छात विराजमान छै मंगतुआक खोपड़ी में। ऊँहूँ, गलति बाजि गेलहुँ, ओकर मेमोरी त' ई कंपूटरोक मेमोरी स' फास्ट चलै छै। चालू कि बन्द करबाक झंझटि स' फ्री। कोनो घटनाक दिन, समय, साल, कारण पूछू, तत्काल हाजिर। पोलटिस पर पूछू कि सनीमा पर कि टीवी पर की मौगी सभक नवरंगा डरेस पर की ठोर पालिस पर। सभ कंठस्थ, हनुमान चलीसा जकाँ। भूत-पिचास निकट नहिं आबै.. राम : अरे, शुरू-शुरू मे लोक आओर बड्ड हैरान होइत छलै ओकरा अखबार पढ़ैत देखि क'। किओ-किओ त' मुंहो बिचकबैत छल जे एह, भेल भिखमंगा आ शान प्रधानमंत्री के। किसुन : ओकरा आओर के बुझले नञि छै ने जे मंत्री सभ अखबार नञि पढ़ै छथि.. पढ़ताह कोना.. फुर्सतिये कत' छै.. जन-सेवा स' (जनसेवा पर स्वर मे व्यंगात्मक जो।) (तखने पार्श्र्व स' तेज गति स' चलबाक ध्वनि अबैत छै। दुनू पुन: अटेंशनक मुद्रा मे आबि जाइत छथि। सीएमडी निकलैत छथि। दुनू खूब नमगर सलाम हुनका ठोकैत छथि। हुनका जाइते देर कि सभ किओ फक स' साँस छोड़ैत छथि आ फेर सभ-किछु ढील-ढाल भ' जाइत छै। रामआसरे आ किसुनदेव अपन वर्दीक कलफ ढीला करैत छथि, मोछो नीचा करै छथि।) राम : देखलही। साहेब के जाइते सावधानक कलफ मे लागल ई पूराक पूरा.. की कहै छै .. मैनेजमेंट ग्रुप.. सभ एकदम स' ढील-ढाल भ' क' लटकि गेलौ। एना (हाथ-गोर मूड़ी ढीला क' क' देखबैत अछि।) किसुन : चल आब मंगतुआ लग। द' आबी अखबार। (दुनू मंगतू लग पहुँचैत छथि। ओकरा अखबार देइत छै। मंगतूक चेहरा पर दुख, अपमान, नाराजगीक भाव छै। ओ अखबार लेब' लेल उत्सुक नञि देखाई पड़ैत अछि।) किसुन : रौ लाट साहेबक नाती। मंगबे भीख आ शान रखबें राजा-महाराजा के। (कनेक नरम भ' क') रौ, हम सभ त' अदना मोलाजिम छी। हुकुम नञि बजाएब त' नोकरी स' छुट्टी। देखलही ने आइ तों जे बड़का-बड़का हाकिम सभ सेहो कोना कुकुरक नांगरि जकाँ .. ले, राखि लें, काल्हि स' जल्दी आनि देबौ। (मंगतू ओकरा आओर दिस बेगर देखि क' अखबार ल' लैत अछि।) किसुन : की जानि एहेन कोन हीरा-मोती जड़ल रहै छै अई मे जाहि लेल ई एतेक पिरीसान फिरैत अछि। वएह त' खबरि होइत छै - हत्या, अपहरण, बलात्कार। लागै छै जे पूरा देस अई सभ' मे हाथ रोपि क' बइस गेल अछि। मंगतू : (अखबार मे डूबि गेल अछि।) ओहि दिन हम अखबार मे गिनती कएल.. 380 लोकक मरबाक समाचार। किओ अपन मौगत नञि मरलै.. किओ गोली स' त' किओ बस पलटी स, किओ बम स', किओ अपनही बेटा-पुतौहु द्वारा.. एखने त' खबरि छलै - बम फ़ुटबाक। खूब असमान चढ़ि रहल छै मौगतक ई धंधा। एखने त' लोक आओर निकलल छलाह, घर स', बजार स', काज स', हंसैत-खेलैत, सौंसे देहे आ एखने हाथ-गोर साफ.. भरि जिनगी लेल लोथ.. तहन एक दिन की ई पूरा दुनिये लोथ भ' जेतै? (ठेहुन मे मुंह नुका लइत अछि, दर्शक मे स' एक गोट बाजैत अछि। मंगतू चेहाक मूड़ी ऊपर उठबैत अछि।) दर्शक 1 : साँच कहल रौ भाई, साँच! ई देख (केहुनी धरि कटल हाथ देखबैत अछि) रौ, बम, दंगा, झगड़ा-फसाद - मरैये के? कोनो नेता? हुनकर बेटा-जमाय, नाती-पोता? ऊँहूँ - धूरि सन हम, तों, ई, ओ..। ओ सभ पैघ.. मातबर लोग.. पैघ लोक, पैघ गिनती.. पैघ गिनती मे छोट-छीन संख्याक मोजर नञि .. । दर्शक 2 : (महिला अछि) देखू हमर ई मुंह (झरकल मुंह) जहिया स' एना भेलए, ऐना देखब छोड़ि देलहुंए.. सुनैत छलहुं जे लोक प्रेम मे त्याग करैत छथि। आई प्रेमो जबर्दस्तीक चीज बनि गेलैय'! हमरा अहाँ स' प्रेम भ' गेलए तैं अहाँ के हमरा स' प्रेम करैये पड़त.. दोसर रस्ताक कोनो गुंजाइसे नञि.. वरना तैयार रहू.. परिणाम लेल.. आह.. हम शिकार भ' गेलहुँ एहेन प्रेमक। (चिकरैत) रौ, बिगाड़' त' आबै छौ, बनाब' आबै छौ? कोन हक्के तों एना केलें हमरा संगे.. (कनैत) आब ऊपरबला स' मौगत माँगै छी त' सेहो नञि भेटैय'.. दिन-राति ओढ़नी स' मुंह तोपैत चलैत रहू, अपना स' बेसी दोसर लोकक खेयाल करू जे हुनका हमर ई मुंह नञि देखाइ पड़य.. (ओत्तहि ठेहुन भरे बैसि जाइत अछि।) मंगतू : कहबी छै जे सात जनमक बाद मनुक्ख जनम भेटै छै। आ सएह मनुक्खक ई अवस्था? (विक्षिप्त जकाँ चिकरैत अछि) रौ, रौ सर्वशक्तिमान कहाब'बला भगमान! कत' छें तों? मनुक्ख बनेबाक बदले राक्षस कियैक बना रहल छें? एतेक फ़ुटानी कियैक रौ? आ सोझा मे, देखियौ तोहर हिम्मति.. रौ, बौक-बहीर छें की.. देखबही ई धरती के, किछु करबहीं एकरा लेल कि कान मे तेल ध' क' सुतल रहबें?.. रौ, किछु क' सकै छें त' कर.. नयिं त' हमरो मारि दे आ तोंहो कतहु डूबि-धँसि जों.. नञि जीबाक अछि.. मौगत.. द' दे.. भगवान, मौगत.. नञि जीब' चाहै छी राक्षस स' भरल अई दुनिया मे.. (भोकासी पारि क' कनैत अछि।) (जाहि समय मे मंगतूक प्रलाप चलैत अछि, ओहि समय ओम्हर स' पास होब बला लोक आओर ओकरा दिस देखैत चलि जाइत रहैत अछि। ककरो नजरि मे ओकरा लेल कोनो सहानुभूति नञि । ध्वनि सभ ऊभरैत अछि.. 'की भेलै रौ एकरा?', 'अरे, किछु नञि, पागल छै सार!','चोट्टा, भगवान के गरियबैत छै, पछिलो जनम मे गरियैने हेतै, तैं' अई जनम से सेहो..', 'रौ, बइसल बनिया की करय, ई कोठीक धान ऊ कोठी करय', 'काज ने धंधा, मौज-मस्ती ठंढा.. ', 'हमरा आओर जकाँ ट्रेन बस ट्रेन करितियइ, नौ स' पाँच मे जिनगी स्वाहा कर' पड़तियैत त' बुझितियइ.. गै चल, तोंहो कोन पगलेटक चक्कर मे फँसि गेलैं.. ', 'नञि रौ ई पगलेट नञि छै.. वाजिब गप्प कहै छै.. भीख माँगब एकरा नीक नञि लागै छै.. मुदा.. मजबूरी छै.. के काज देतै एकरा..' आदि - आदि । ..सभ पात्र एम्हर ओम्हर स' निकलि क' मंगतूक पाछा ठाढ़ भ' जाइत अछि आ समवेत स्वर मे कहैत अछि..) 'हम सभ.. मात्र पुतली भरि नियंताक अपन-अपन इच्छाक / कामनाक दीप लेसने हम सख्त अछि ताकीद देखू मात्र, बजाऊ कोर्निश गबैत रहू राग-दरबारी.. हे प्रभो, अन्नदाता बस कृपा करी एतबे जे बनल रही हम सभ पुतरी भरि.. डोरी अदृश्यक हाथ मे। (प्रकाश मंगतू पर केन्द्रित होबैत शनै: शनै: फेड आउट) -------- दृश्य : 2 (मंगतूक स्थान - भोरक बेला - मोटर गाड़ी स' एक गोट सेठ उतरैत अछि - गाड़ीक दरवाजा फोलब, बंद करबाक, जेब स' टाका निकालबाक अभिनय.. टाका निकालिक' ओ मंगतू दिस-बढ़ैत अछि..) आदमी : उठ, उठ, ऐ भाई.. भोर भ' गेलै। (मंगतू ओकरा दिस प्रश्नाकुल नजरि स' देखैत अछि। बाजैत किछु नञि अछि..) ई ले - एकावन टाका। राखि ले। मंगतू : एकावन टाका? मुदा कियैक? आदमी : आई हमर बाउजीक बरखी अछि। ब्राह्मण अथवा दरिद्रनारायण भोजन करेबाक फुर्सति अछि नञि तैं, आई पाँच लोक के दान क' देइत छियै। मंगतू : साब, हमर एक गोट विनती अछि.. साब, ई पाई अहाँ राखि लिय'.. आ एकरा बदला मे हमरा कोनो काज द' दिय.. पतियाउ साहब जी, हम काज क' सकै छी.. ई हमर हाथ देखियौ.. गोर देखू.. (विचित्र तरीका स' हाथ-गोर चलबैत अछि) साहेब जी.. हमरा अई नरक स' निकालू साहेब जी.. हमरा काज दिय'.. केहनो.. पैघ-छोट.. अहाँ के शिकायतक मोका नञि देब साहेब जी। (ओकर पएर-पकड़बाक अभिनय करैत अछि। आदमी घबड़ाक' पराएत अछि। गाड़ी मे बैसबाक, स्टार्ट करबाक अभिनयक संग खौंझाएल स्वर में..) आदमी : हुंह! काज चाही । देह न दशा, मुर्गी प्यारे फँसा। नीक-नीक लोक के त' काज भेटै नञि छै.. सभ ठॉ त' भर्ती पर रोक लागल छै.. चुनावक समय मे अखबार मे नौकरीक विज्ञापन भरि.. तकरा बाद फुस्स! सरकारक आमदनिए छै। ई विज्ञापन स'.. डीडी, पे-ऑर्डर.. एकरा देखियौ.. काज क' लेब.. कोनो काज.. जहन कोनो काज कइए लेबें त' माँग भीख! ईहो त' काजे छै आ बड्ड मेहनति आ हिम्मति बला काज छै। (गाड़ी चलेबाक अभिनय संगे मंच स' बाहर। बाहर जाइत काले मंगतू पर नजरि..) मंगतू : चलि गेलाह। सब चलि जाइत अछि। भीखक एक गोट अठन्नी, रूपैया फेंकि क'.. बस! साधे रहि गेल जे किओ हमरो सहारा दितियैक - अपना पैर पर ठाढ़ हेबा मे.. लोक आओर पतियाइ कियै नञि छथि जे हम ठाढ़ भ' सकै छी.. लिख-पढ़ि सकै छी.. ई देखू (हाथ स' जमीन पर किछु लिखबाक प्रयास करैत अछि) .. आ.. आ.. ई किसुनदेव आ रामआसरे भाई त' कहैत छथि जे हमर दिमागो बड्ड तेज अछि (कनेक मुस्काइत अछि।) तैं त' हुनकर बड़का साहेब हमरा लग आएल छलाह.. बाप रौ, की सूट-बूट, की शान.. (मंगतू पर स' फेड आउट) (फ्लैश बैक आरंभ) (एक अधेड़, रोबदाब बला व्यक्ति.. नाम तांबे.. मंच पर बेचैनी स' एम्हर-ओम्हर बूलि रहल छथि। रामआसरेक प्रवेश) राम. : साहेब जी? तांबे : (अनसोहांत स्वर मे) yes? राम. : साहेब जी किछु पिरीशानी मे बूझा रहल छथि। तांबे : परेसान नञि होइ त' की राग मल्हार गाबी? सभटा डाटा कलेक्ट कएल छल। पता नञि कोना हार्ड डिस्क सेहे उड़ि गेल। राम. : साहेब जी, कम्पलेन नञि लिखाओल की? तांबे : एंट्री त' क' देलहुँ। मगर तकरा स' की? इंजीनियर त' काल्हिए आओत। आ मैटर हरि हालति मे आइए देबाक अछि। तैं त' लेट बइसल छी.. मुदा.. (माथ पकड़ि लेइत अछि।) राम. : साहेब जी.. छोट मुंह पैघ गप्प.. अनसोहांत सन सेहो.. मुदा नीचाँ.. छै ने.. ओ लोथ.. मंगतू.. भ' सकैय' ओ बता दियए.. तांबे : (एक नजरि ओकरा देखि ठठा क' पेट पकड़ि क' ठठाएत अछि।) ऊ लोथ भिखमंगा, ऊ हमरा डाटा बताओत? रौ, तोहर दिमाग दुरूस्त त' छौ ने! जे डाटा कलेक्ट कर' मे हमरा एतेक समय लागल, एतेक - एतेक किताब कंसल्ट कर' पड़ल, ओ ओहि अनपढ़, लोथ, भिखमंगा.. राम. : साहेब जी, कम्पूटर त' अहाँ के अहिना.. इंजीनियर काल्हिए आओत। काज करबाक अछिए अहाँ के। आर कोनो उपाय त' अछि नञि! त' एक बेर टराइ करबा मे हर्जे की! हमरा ओना विश्र्वास अछि जे ओ अहाँक अबस्से बता देत। तांबे : कोन आधार पर तों कहि रहल छें एना? राम. : ओ पढ़' जानै छै। हमहीं आ किसुनदेव मिलिक' ओकरा अच्छर ज्ञान करैलियै। ओकर लगन आ मेहनति.. आई ओ अखबारक नाम स' ल'क' अंतिम पन्ना आ संपादकीय धरि पढ़ि जाइत अछि। सभकिछु सिलेट पर लिखल लाइन जकाँ मोन रहैत छै ओकरा। तैं हम.. बाकी त' अहाँक इच्छा..। (फ्लैशबैक समाप्त। प्रकाश मंगतू पर।) मंगतू : रामआसरे कहला सन्ते तांबे साहेब आएल छलाह! (हंसैत) बार रौ बाप! की गुमान मे फूलल छलाह। हमरा ल'ग ठाढ़ हेबाक विवशता, मुंह पर बहुत किछु जनबाक दर्प, जेना दुनियाक संपूर्ण ज्ञानक गठरी हुनके लग हुअए, हमरा लेल हुनक ऑखि मे लहराइत घिरनाक समुंदरि, संगही एकटा उपकारक भाव सेहो, जे देख - हमही छी, जे ऐलौं तोरा लग.. ले बिलइया के, हौ जी, ऐलौं त' कोनो हमरा लेल.. एलौं अहाँ अपना लेल.. ऐलौं, पूछलौं, हमरा मोन छल, बतेलौं, अहाँ लिखलौं, छपेलौं, आ बिसरि गेलौं। एकटा धन्यवादो धरि नञि। रामआसरे भाइ लेख देखाओल.. मुदा पढ़ि नञि सकलहुँ - अंग्रेजी सन्ता। हमर ज्ञानक उपयोग कोना भेलै.. ई हमरे नञि पता.. इएह त' अछि हमर तकदीर.. (विचित्र हँसी हँसैत अछि.. पत्रकार-युवक-युवतीक प्रवेश। ओकरा हँसैत देखि थम्हि जाइत छथि।) युवती : मुगतू? (मंगतूक हंसी थम्हि जाइत अछि।) की भेलौ? बड्ड हंसि रहल छे। मंगतू : (कनेक सकुचाइत) जी.. ओ किछु नञि.. बस.. तांबे साहेब बला बात.. युवक : (रूक्ष स्वर मे) सुनल जे ओ तोरा लग आएल छलाह आ तों एकदम टेपरेकॉर्डर जकाँ चालू भ' गेल छलें? मंगतू : (ओकर रूक्षपन के लक्षित नञि करैत अपनही प्रवाह मे) त' की करितियैक! एतेक बड़का साहेब! एतेक पिरीसान.. चांसे बूझल जाओ जे हमरा पता छल। - जे किछु पता छल, से सभ बता देलियइ.. देखलियइ हम लेख.. मुदा अंग्रेजी.. साब, अहाँ हमरा अंग्रेजी पढ़ब सिखा देब? युवती : (मोन पारैत) हे सुनु, हम सभ एकरा पर स्टोरी केने छलहुँ ने? युवक : अरे, ऊ त' पुरान कथा भ' गेलै। वंडरफुल एंड पावरफुल प्रोजेक्ट । युवती : एकरा किछु लाभ करेलहू की नञि? युवक : माने? (ऑफिस दिस बढ़ैत अछि।) युवती : (अनुसरण करैत) माने ई, जे ओहि समय गप्प भेल छल जे पेमेंट भेलाक बाद अहाँ ओकरा किछु देबै.. जस्ट फॉर ए नाइस जेस्चर.. मुदा, अहाँ त' हमरो किछु नञि बताओल। युवक : अहँू त'! ओ की केलकई जे ओकरा पेमेंट करियई? युवती : वएह त' धुरी छल। नञि बतेतियैक त' अहाँ काज क' सकै छलहुँ? नञि न! आब किछु ओहि गरीब के.. (दुनू ऑफिसक गेट धरि पहुँचइत छथि। रामआसरे आ किसुनदेव दुनूक गप्प सुनै छथि।) काज निकलि गेल त' बस, मुंह फेरि लेलहूँ! युवक : जमाने इएह छै डार्लिंग। देखलहुँ मि. तांबे के.. सभटा काज करबा लेलन्हि मुदा नामोक क्रेडिट नञि.. युवती : अहँू सएह बन' चाहै छी त' बनू.. मुदा हमर मानधन हमरा दिय'! हम ओही मे स' ओकरा.. राम. : नमस्कार साहेब। युवक : नमस्कार नमस्कार। किसुन: कोनो गंभीर गप्प सर? युवक: उंहूं, किच्च्छु नयिं। युवती : किछु कियैक नञि? अरे, हम दुनू ओहि मंगतू पर काज करै छलहुँ। तहन ई गप्प भेल छल जे पाइ भेटला पर हम किछु ओकरो देबै। मुदा.. ई त' हमरो पाइ घोखि गेलैन्हि.. युवक : (जेना भेद खुलि गेल हुअए) ओके बाबा ओके। अहांक पाइ अहां के द' देब। ओकरो द' देबै.. आब त' खुश? (फसफुसाइत) सभके सभ किछु कहब जरूरी छै की? (बाजैत भीतर चलि जाइत छथि। युवती पहिने जाइत अछि। पाछा स' युवक अपन तर्जनी माथ पर ल' जाक घुमबैत अछि -- माने युवती कनेक क्रैक अछि।) राम. : देखल भइया ई बड़का-बड़का लोकक खेल! पत्रकार छथि ई सभ। जनताक पैरोकार। जनताक रच्छक। रच्छक खुदे भच्छक.. हाँक' लेल कहू त' एकदम सूरूजे पर, देब' बेर मे पद-पद पाद' लगताह! हजारो टाका झिंटने हेतै मंगतुआक नाम पर। आ ओकरे किछु देबाक नाम पर .. किसुन : सटक सीताराम! सभ एक्के थरियाक भांटा रो भाइ! राम. : ऊ तांबे साहेब! ओकरे मदति स' ओ लेख लिखलन्हि। छपबो केलै। आब हमरा त' अंग्रेजी, फंगरेजी अबै नञि अछि। हम पूछ' गेलियै जे साहेब, अई मे मंगतूक कोनो जिकिर-उकिर..! किसुन : की बाजलन्हि? राम. : अरे, ओ तेहेन न आँखि गुरेरलन्हि जे एह -'ई लेख है रामआसरे, इन्टरव्यू नहीं कि सबका नाम देते रहें।' हम त' तइयो ढीठ बनल बजलहुँ जे साहेब, ओकर कोनो भला भ' जयतियन्हि। भिखमंगाक जिनगी स' ओकरा छुटकारा भेटि जइतियैक। ओ फेर आँखि तरेरलन्हि। हम फेरो थेथर जकाँ बाजलियैक जे ठीक छै, नाम नञि देलियै त' किछु दामे द' दियऊ। लगतै ओकरो जे हँ, आई अपना दिमागक कमाई भेटलए.. सभ सार चोर अछि- ऊ तांबे, ई छौंड़ा.. काम रहला पर बाबू-भैया आ निकलि गेला पर दू-दू लात। (पार्श्र्व स' सोगबला धुन। प्रकाश मंगतू पर। ओ चिकरैत अछि) मंगतू : किओ हमरा अई नरक स' निकालि क' ल जाऊ। रौ तकदीरक नाति, कत' मुंह मरा रहल छें। देह नञि त' तोहें नीक जकां रहितें हमरा लग। कोनो नीक, पाईबला घर मे देतें। माय-बाप लग। मुदा, जहन अपने माय-बाप अपन नञि भेल तहन.. (सोगबला धुन उत्सव धुन मे बदलि जाइत अछि। मंगतूक चेहरा फेड आउट होइत अछि। एक काल्पनिक लोकक आभास देइत लाल-नारंगी-पीयर रोशनी पसरइत अछि आ ओहि प्रकाश मे देखाइ पड़ैत अछि - एक गोट स्त्री, जकरा कोरा मे एकटा नवजात अछि। अन्य स्त्रीगण नाचि-गाबि रहल छथि!) रूपैया मांगे ननदी लाल के बधाई एके रूपैया मोरा ससुर के कमाई अठन्नी ले लो ननदी लाल के बधाई एके अठन्नी मोरा पिया के कमाई ओ ना मैं दूँ ननदी लाल के बधाई एक स्त्री : देखू भौजी। चान जइसन बेटा देलन्हि अछि हमर भैया अहाँ के। आब बेगर छत्तीस भरक डँड़कस के नञि मानब। (सभ हंसैत छथि। स्त्री लजाइत अछि। पुरूषक प्रवेश। हँसैत-नचैत स्त्रीगण विदा भ' जाइत छथि।) पुरूष : राधा, की नाम राखब एकर? स्त्री : (लजाइत) जे अहाँ कही। पुरूष : हमर मानी त' एकर नाम राखब चिरंजीवी। खूब पढ़ाएब, लिखाएब, कलक्टर बनाएब। स्त्री : हमरा मानी त' ओकरा पर अपन मर्जी नञि थोपी । अपना मर्जी स' ओ जे बनय, डाक्टर कलक्टर, एक्टर.. पुरूष : अच्छा भई, हम त' हुकुमक गुलाम छी। हुकुमक बेगम जे हुकुम देतीह, हुकुमक गुलाम बजा आनत (कोर्निश करैत अछि। स्त्री हंसैत अछि। पुरूष छेड़ैत अछि) गीत मे कहलियै - पिया के कमाई नञि देबै ननदि के, हमर बहीन के। ओ जीवित नञि छोड़ती अहाँ के! तहन? तहन हमर की हएत (आवाज रोमांटिक होइत अछि। स्त्रीक हंसी। अंधकार-प्रकाश मंगतू पर।) मंगतू : एहेन माय-बाप हमर करम मे कत'? समाजक सामना करबाक हिम्मत नञि भेलै। अई समाज मे श्राप भोग' लेल छोड़ि देलैन्हि। सोचल, जे अपने स' अपन तकदीरक किताब लिखब, मुदा ऊ बकट्टा गुड्डी हमरे जिन्दगी के बकट्टा क' गेल.. लोथ, लूल-लांगड. बनल ई जिनगी । मौगत की एकरा स' अधलाह हेतै?.. मुदा मौगतो त' नञि अबैत अछि। नञि घरक आसरा, नञि समाजक, नञि लोकक। कथी लेल जीब, ककरा लेल जीब, ई जीबाक कोनो अर्थ? (मंगतू भोकासी पारि कान' लागैत अछि। रामआसरे आ किसुनदेव ओकरा लग अबैत छथि।) राम. : अपन इ ऑफिसे मे त' कतेक विकलांग लोक काज करै छथि, भोइकर साहेब, लीना मैडम, सिन्हा जी.. मुदा .. एक दिस एहेन माय-बाप आ दोसर दिस ई समाज.. सभक फाटल मे आंगुर कर' बला। रौ, तोरा कोन मतलब छौ किओ किछु करए। ककरो चैन स' जीब' नञि देतै ई समाज.. (रामआसरे आ किसुनदेव मंगतू के धैरज बंधबैत छथि। पार्श्र्व स' कविता) 'जिनगी जुआ अछि सट्टा अछि, बजार अछि ताश अछि, पत्ता अछि रोशनीक बाढ़ि चोन्हियाएल लोक भीड़ अछि, एकान्त अछि भोरक तारा विश्रान्त अछि तारा टूटए नञि आस छूटए नञि (फेड आउट) दृश्य : 3 सांझुक समय। तेज बरिसाति आ मेघ बिजली गर्जन-तर्जनक स्वर। पहिलुका तीनू भिखमंगा' छौंड़ा मे स' सभस' छोटका आब रूमाल बेचैत अछि। ओ अपन समान सभ प्लास्टिक स' तोपबाक चेष्टा करैत बस स्टैंड दिस अबैत अछि। मंगतू अपना जगह बइसल पानि बरिसब देखि रहल अछि। ओकरा लग भीखक पाइ छितराएल छै। छौंड़ा दूरे स' मंगतू के देखैत अछि आ फेर अपना पेन्टक जेबी उन्टा क' देइत अछि। मंगतू लग पड़ल पाई दिस ओ चुंबक जकाँ आकर्षित होबैत बढ़ल चलैत अबैत अछि। मंगतू पानि छोड़ि ओकरा दिस देख' लगैत अछि। छौंड़ा दू-चार डेगक दूरी पर एकाएक थम्हि जाइत अछि। मंगतू : की रौ झुनमा, की भेलौ। झुनमा : किछु नञि । मंगतू : त' रूकि कियैक गेलें? झुनमा : अहिना। मुंगतू : मुंह एना छाउर जकाँ कियैक केने छें? माल-ताल नञि बिकलऊ की? झुनमा : ई बरखा-बैकाल मे लोक घर भागत की समान कीनत। मंगतू : (कनेक काल चुप रहिक' जेना बात बदलिक) ई त' तों नीक केलें, जे भीख मांगब छोड़ि काज पकड़ि लेलें। अच्छा झुनमा, ई बता, तोरा पानि नीक लागै छौ? झुनमा : पेट भरल रहला पर गदहियो करीना कपूर लगै छै। मंगतू : (जेना अपनही प्रवाह मे) हमरा बड्ड नीक लगैत अछि ई बरिसाति! आ, सुनबै छियौ, किताब आओर मे केहेन-केहेन गप्प सभ लिखल छै, बरिसाति लेल - कारी-कारी मेघ, झमझम बरिसति पानिक धार - चांनी जकाँ, भीजल धरतीक सोंन्हिपन, जेना कुम्हारक आबा मे बासन आओर पाकि रहल हुअए। हवा मे सिहकी आ मोन मे कामनाक ज्वार! प्रिय स' मिलनक इच्छा..। (पार्श्र्व स' कजरीक मद्घम स्वर) सखी हे आएल रात अंधियारी बदरा कारी-कारी ना झींगुर, मोर, पपीहा बोले दादुर दमके ना, सखि हे दादुर दमके ना, सखि हे आएल रात अंधियारी बदरा कारी-कारी ना। झुनमा : रह' दे रौ, रह' दे। पोथीक गप्प रह' दे। पोथी लिख' बला पढुआ लोक छै। ओकरा सभ के भरिसकि नञि बूझल छै जे पानि एला स' बाढ़ि अबै छै, घर, जान-माल डूबि जाइ छै, सभटा जमा पूँजी स्वाहा.. मंगतू : (फेर अपनही रौ मे) आ ओकरो स' त' नीक लागै छै बरिसातिक बादक रौद। एकदम नहाएल धोएल, स्वच्छ काया जकाँ। झुनमा : (खौंझा क') रौ सार! एतेक साहरूख खान कियै बनल जाए छें रे। एहेन बरखा-बैकाल मे तोरा सनीमा सूझै छौ, हमरा राहत बाँट'बला देखाई पड़ैत अछि। हे.. ऊ देख.. हवाई जहाज स' पाकिट सभ खसि रहल छौ, हे एम्हर.. हे ओम्हर.. हौ, हौ जी, एकटा एम्हरो खसाबहक ने! यौ भाई जी, भाई जी यौ, एकटा एम्हरो खसबियौ ने यौ। बड्ड भूख लागलए.. एको छदामक माल नञि बिकाएल..। मंगतू : रौ झुनमा। ओम्हर की चिकरि रहल छें। ले, ई पाइ ल' ले, आ ल' आन किछु.. गप-सप्प करैत खा-पी लेब। आ हे, सूत'क मोन करओ त' सुतियो जइहें। अही ठाँ स' धंधा पर निकलि जैहें। (झुनमा पाइ लेइत अछि आ चलि जाइत अछि। मंगतू फेर स' अपन दुनिया मे भुतिया जाइत अछि। ओ गबैत अछि..) 'बरसात में हमसे मिले तुम सजन तुमसे मिले हम, बरसात मे।' (झुनमा अबैत छै आ एकटा ठोंगा ओकरा थमा देइत छै। झुनमा : ले रौ हमर आमिर खान! खो। (दुनू खाइत अछि। मंगतू स्वाभाविक रूप स' आ झुनमा हबड़-हबड़ खाइत अछि।) मंगतू : चौप खूब नीक बनल छै ने। झुनमा : हूँ.. मंगतू : काल्हि कोनो आओर चीज आनिहें। झुनमा : हूं.. मंगतू : किछु बाजै कियै ने छें? (झुनमा हाथ स' थम्ह' के इशारा करैत अछि। मंगतू ओकरा देखैत रहैत अछि। झुनमा पूरा खेलाक बाद ढेकरैत अछि आ बजैत अछि।) झुनमा : हँ, आब बाज! पेट खाली रहला पर दुनिया बड़का अंडा देखाई छै। आब पेट भरि गेल अछि आ भरल पेट मे त' सुअरनिओ रबीना टंडन लागै छै। (गबैत अछि) तू चीज बड़ी है मस्त-मस्त। (खाए पीबि क' दुनू ठोंगा ओही ठाँ एक कोना मे बीगि देइत अछि। दुनू पानि पिबै अछि आ ढेकरैत अछि। दुनू एक-दोसरा के देखैत ठठाक' हॅँसि' पड़ैत अछि।) झुनमा : कतेक बाजल हेतै? मंगतू : दस स' कम की भेल हेतै! पानि त' कहैय' जे आइ छोड़ि काल्हि हम बरसबे नञि करब। झुनमा : (उदास होइा) एतेक पानि बरसतै त' रोड सभ टूटि जेतै। पटरी डूबि जेतै। बस ट्रेन चलल बन्न भ' जेतै। मंगतू : त' अई लेल तों मलिन कियैक भ' गेलें? झुनमा : रौ, बस-ट्रेन नञि चलतै त' पसिन्जर नञि ऐतै। ओ सभ नञि एतै त' हमर बिक्री-बट्टा.. बिक्री नञि त' पाइ नञि.. पाइ नञि त' दाना नञि। मंगतू : रौ झुनमा, एक बात बता। तों बस-ट्रेन स' कतेक दूर धरि गेल छें? पटना स' मुजफ्फरपुर धरि.. किऊल धरि.. दानापुर.. पटना साहिब.. केहेन सोहनगर लागैत हेतौक ने देख' मे.. हजारो लोकक एके संग चढ़ब, एके संगे उतरब। फर्र-फर्र भागैत बस- ट्रेन। सर्र-स' छूटैत लोक, घर, खेत, खलिहान, गोरू बरद.. । हमरो हाथ-गोर रहतियैक त' जएतहुँ ने तोरे आओर जकाँ। झुनमा : हँ, जेतें आ पुलिसक डंडा आ पब्लिक गारि-बात खेतें। बम फ़ुटनें जान गमबितें। एम्हर बम ओम्हर बम, एतेक मरलै, एतेक घायल.. याहि सभ त' आइ काल्हिक नूज छै। मंगतू : (दीर्घ साँस लेइत) जानक की। ऊ त' अई ठाँ बइसलो बइसलो जा सकै छै। के जानए, एगो बम एम्हरो फाटय आ हम सभ' लत्ता बनि उड़ि जाइ.. बम, गोली, दंगा- ई सभ त' आइ काल्हिक रीत भ' गेलैये। एगो बम फूटै छै आ सैकड़ो लोक एक्के मिनट मे अपाहिज, लोथ भ' जाइ छै। किओ पूछय हमरा स' लोथ भेलाक दर्द। रौ.. हम त' रोजे मनबै छी जे हमरा मौगत आबि जाए। ई लोथ जिनगी स' की फेदा! झुनमा : हमहँू सभ त' इएह बाजै छी।.. की सोचै छें? ऊपरवाला लग एतेक टेम छै हमरा आओरक गप्प-सुनबाक। नमगर लाइन हेतै रौ भाइ! (ओकासी मारैत अछि।) मंगतू : नींद आबि रहल छौ। सूति रह अही ठाँ। (दुनू मिलिक' मंगतूक चीकट कथरी ओछा ओठँगि जाइत अछि। कनेक देरी मे दुनू फ़ोंफ़ि काट' लगैत अछि। मंचक प्रकाश शनै:-शनै: लाल होब' लगैत अछि। नीने में मंगतू बड़-बड़ाइत अछि-'हम जीय' नञि चाहै छी, 'हमरा मौगत द' दिय!' 'हमरा मौगत कियैक नञि अबैत अछि।' झुनमोक अस्फुट स्वर बहिराइ छै -'हं', जिय' नञि चाहै छी।' 'ई केहेन जिनगी अछि! मरने बेसी नीक' आदि। प्रकाशक लाली मंगतू पर केन्द्रित। मंगतू नींने मे उठि क' बैसि जाइत अछि आ अलसाएल नजरि स' अपना के देखैत अछि। जेना-जेना ओ अपना के देखैत अछि, तेना-तेना ओकर आँखि स' नींद गायब भेल जाइत अछि आ ओहि स्थान पर आश्चर्य भर' लागैत छै।) मंगतू : अरे, ई की? हमर हाथ? आ पैर सेहो?.. जेना जमीन स' बीया फूटि रहल अछि - सुंदर, कोमल, नरम.. ई केहेन चमत्कार! भगवान, अहाँ सचमुच कृपालु छी.. (शनै: शनै: मंगतू मंच पर पूर्ण व्यक्तिक रूप मे ठाढ़ भ' जाइत अछि।) हम.. हम एक गोट पूरा-पूरा आदमी, दुनू हाथ, दुनू गोर.. पतियाऊ की नञि पतियाऊ। (अपने बांहि मे बिठुआ कटैत) नञि, पतियाएबला गप्प नञि छै। (फ़ेर अपने स') कियैक नञि छै? हमर हाथ गोर घुरि आएलए हमरा लग, त' अइ मे नञि पतियाएबला गप्प की भेलै? आब हम अपन हैसियत बदलि सकै छी.. नीक समांग़ बनि सकै छी। भीख माँगब .... ई गर्हित कर्म स' हमरा मुक्ति भेंटि जाएत.. भेटत की.. भेटि गेल! हे.. ई लिय'.. छोड़लहुँ हम भीख माँगब.. (हँसैत अछि।) आई स', एखनि स'। आब हमरा अई जिनगी स' कोनो सिकाइत नञि । (किलकि उठैत अछि। झुनमा ओकर आवाज सुनि उठैत अछि। मंगतू के अई रूप मे पाबि क' हैरान रहि जाइत अछि। मंगतू कनखी मारि क' खुशी प्रकट करैत अछि।) झुनमा : ई जादू छै। मंगतू : ऊँहूँ! सच। झुनमा : भइए नञि सकै छै। ई जरूर कोनो जादू छै अथवा नैना -जोगिन। मंगतू : अहँ! एकदम सच। छूबि के देख। (झुनमा ओकरा छुबै छै। अपन आँखि मलैत छै, फेर छुबै छै।) झुनमा : हँ, बुझा त' रहलए सचे सन! जौं ई सच छै, त' गुरू, कहू, आब की इरादा? मंगतू : इरादा? अरे, आब त' हम खुजल आसमानक मुक्त पंछी छी। (गबैत अछि) 'पंछी बनू उड़ती फिरूँ मस्त गगन में आज मैं आजाद हूँ दुनिया के चमन में' झुनमा : एतेक आजाद नञि छें, जतेक बूझै छें। मंगतू : माने?.. जीवन एतेक सुंदर भ' सकै छै, हम त' ई सोचबो नञि केने छलहँु। देख, ई रोडक बत्ती.. बरिसातक पानि मे केहेन सतरंगी किरण छोड़ैत अछि। ई चाकर रोड, एखन शांत अछि - भिनसर होइत होइत कतेक जगजियार भ' जाइ छै.. (गबैत अछि) 'ई सहर बहुत हसीन है।' (आगाँ बढ़ैत अछि।) झुनमा : कत' जा रहल छें। मंगतू : पता नञि। हम त' खाली बूझ' चाहै छी, ई पूरा-पूरा देहक सुख उठाब' चाहै छी। भगवान, हम अहाँ के कएक बेर गारि पढलहुँ। आई अहाँ के धनबाद दइ छी। हमरा माफी द' दिय'.. (आओर तेजी स' चलैत अछि) की करब! लोक आओर जहन दुखी होइ छै, अहिना बाजै छै.. (खूब तेज-तेज चलैत अछि।) झुनमा : रौ, हवाइ जहाज जकाँ कियैक उड़ल जा रहल छें? मंगतू : चल, चल (गबैत अछि) 'दो दीवाने शहर में, रात मे या दोपहर में, आबो दाना ढँूढ़ते हैं, इस आशियाना ढँूढ़ते है।' झुनमा : रौ, हम थाकि गेलहूँ। गमे - गमे चल। मंगतू : हमर त' मोन भ' रहलए जे हम ई पूरा-पूरा धरती मापि ली, बामन भगवान जकाँ.. पूरा संसार के अपन अंकबारि मे भरि ली.. खूब चिकरि-चिकरि के गाबी 'आज मदहोश हुआ जाए रे, मेरा मन, मेरा मन, मेरा मन। शरारत करने को ललचाए रे, मेरा मन, मेरा मन, मेरा मन।' झुनमा : (डेराइत) मंगतू, एना सनकाह - बताह जकाँ नञि कर। हमरा डर होइए। मंगतू : झुनमा, हमरा आइ केहेन लागि रहलए, बूझल छौ? झुनमा : .. .. मंगतू : आई हमरा मोन मे एकटा कामना, एक गोट इच्छाक मूर्ति बनि रहलए.. प्रेमक नरम अनुभूति.. आइए.. एखने.. लागि रहलए जे कोनो नरम, नाजुक अंचरा मे अपन मुंह तोपि ली.. ओकर प्रेम भरल स्पर्श हमर केश, देहक रग-रग मे पहुँचए आ अमृतक समुन्दर मे गहीर, खूब गहीर ल' जाए.. जत' प्रेम स' भरल संसार हएत..कियैक भ' रहल अछि एना? झुनमा : भ' गेल ई आमिर खान.. आब गाओत 'आती क्या खंडाला!' मंगतू : प्रेमक लालसा अई स' पहिने नञि भेल छल कहियो! झुनमा, सुन, तोहर भौजी.. (कनेक लजाइत अछि) झुनमा : भेल आब ई सलमान खान (गाबैत अछि) तेरे बिना, तेरे बिना.. (मंगतू आगॉं बढ़ैत अछि.. पाछू-पाछू झुनमा सेहो..) मंगतू : देख, ई श्रमक जीबैत रूप.. मेहनति स' लोक एतेक ने थाकि जाइत छै जे.. ओ कहबी छै ने जे 'नींन नञि जानै टूटल खाट।' हमहू.. एकरे आओर जकाँ खटब.. एतेक जे बस, खसिते फोंफ काटब शुरू। (फोंफ काटैत अछि।) झुनमा : मुदा तों काज की करबें रे! के देतौ काज तोरा? लूल्हि-नांगड़ि. मंगतुआ के सभ किओ जनैत छै.. मुदा आजुक ई नमगर, सोहनगर रितिक रोसन के काज के देतौ? जास्ती स' जास्ती उपदेस देतौ, जाहि स' पेट चलतौ नञि। (फोंफ काटबाक नकल करैत मंगतू एकदम स' चेहाइत अछि। फोंफ बीचहि मे रूकि जाइत अछि। मुंहक चमक, खुशी बिला जाइत अछि।) मंगतू : ऐं? की करब हम? (हँसैत अछि।) एकदम सही पकड़लें तों.. की करब हम?.. नञि, की क' सकै छी हम? ..रौ, तोंही बाज ने, की क' सकै छी हम? झुनमा : खाली भीख माँगि सकै छें। सेहो लोथ-नांगर भ' क! एहेन मुस्टंडा भ' क' नञि । मंगतू : एह! एना नञि बाज । एतेक दिन बाद हमरा ई सनेस भेटलए, ओकरा.. (हठात ओकर गर्दनि पकड़ि लेइत छै।) फेर जुनि बजिहें ई.. रौ तों त' चारि हाथ-गोर बाला आदमी भेलैं। तो की बूझबें लोथक पीर। झुनमा : (गर्दनि छोड़बैत) त' कलक्टरी कर। डाक्टरी कर। हम तोहर चपरासी, कंपोडर बन' लेल तेयार छी। मंगतू : तों हमर हौसला बढ़ेबाक बदले ओकरा खसा रहल छें। हमरा लग डिग्री अछि जे.. झुनमा : त' कोनो धंधा क' ले.. किरानाक दोकान, कपड़ाक दोकान.. किछुओ.. हमरा अपना दोकान पर राखि लिहें। मंगतू : कियैक मजाक क' रहल छें.. धंधा शुरू कर' लेल पूँजी चाही.. तों मदति की करबें, उन्टे.. चलि जो हमरा लग स'.. झुनमा : जाइ छी, जाइ छी। काल्हि फेर एबौ। अई बेर सिंघाड़ा खुअबिहें.. (जाए लागै छै। बीच-बीच मे मुड़ि-मुड़ि क' देखै छै जे मंगतू ओकरा बजा लियए। मंगतू ओकरा दिस ध्यान नञि देइत अछि। ई देखि ओ अपने स' एक कोन्टा में ठाढ़ भ' जाइत अछि आ मंगतू के देखैत अछि..) मंगतू : (जेना फेर अपना धुन मे) एह! एतेक सोहनगर समय। भोर भ' रहल छै..। हे, ई सुनू, पाखीक स्वर। भोरक मंद- मंद बेयार। हे देखियौ, ई सूतल अछि। एक उठल कि सभ किओ उठि जाएत.. बल्कि, देखियौ, जनीजात सभ त' उठियो गेलीह। ओ ओम्हर चूल्हि सुनगा रहल छै.. एम्हर ई अपना बच्चा के दूध पिया रहल छै.. आ ओकरा देखियौ, ऊ चाहक पानि सेहो चढ़ा देलकै.. ओम्हर एकटा बच्चा माय के देखि मुस्किया रहल अछि.. कतेक सोहनगर छै.. पाजेबक छुन-छुन जकाँ जिनगी छनकि रहल अछि.. मंगतू.. रौ.. हिम्मत जुनि हारि.. काज भेटतौ तोरा.. धैरज धर.. (ओ ई सभ बाजिए रहल अछि कि पाछू स' बम फ़ुटबाक भयंकर आवाज़ होइत छै। पलखतिए मे रोआ- कन्नटि, भागा दौड़ी मचि जाइत अछि। मंगतू किछु नञि बूझला सन्ते अकबकायल ओहि ठां ठाढेक ठाढ रहि जाइत अछि। दिग्भ्रमित भेल ऊ चारू दिस देखैत अछि, फेर माज़रा सभ बूझ' मे अबितही चिकर' लागैत अछि..) मंगतू : अरे, ई की भेलै.. ऊ दूध पियबैत माय! .... बच्चा ओकरा हाथ स' .... एतेक दूर खसि ..... आ ओ अपने गेंद जकाँ.. माथ फाटि गेलै.. ओ, ओ चूल्हि सुनगबैत स्त्री.. ओकर त' हाथे-गोर उड़ि .. अरे, ई निचिन्त सूतल लोक सभ.. कागज-पत्तर, खढ -पात जकाँ उड़िया.. (चिकरैत अछि) रौ, .. रौ रछसबा सभ.. जल्लाद, कसाइया सभ.. रौ, जिनगीक एक गोट साँस त' द' नञि सकै छें, मुदा.. कियैक छीन रहल छें हमर जिनगी? कियैक लोथ बना रहल छें हमरा? हमर अपराध की? (पार्श्र्व स' ध्वनि.. जन्म लेबक अपराध केने छें तों सभ.. आब भोग।) (चीख-पुकार एखनो मचल छै। मंगतू असहाय सन ठाढ़ अछि.. हठात ओकर कान में जोरदार आवाज अबैत छै ‘भाग रौ, बम.. भाग, जान बचो.. भाग रौ..' (भीड़क भागबाक ध्वनि। मंगतू, सेहो बिनु किछु बूझने बदहवास चिकरैत भाग' लागैत अछि.. ‘भाग रौ, बम.. भाग, जान बचेबाक छौ त' भाग.. भाग रौ..' रसे- रसे अई भगदडि. मे सभटा पात्र सम्मिलित भ' जाइत छथि.. सभ चिकरि. रहल छथि.. ‘भागू, जान बचाऊ.. भाग रौ.. भाग..' रसे- रसे स्वर शांत होइत अछि.. सभटा चरित्र एक-दोसराक हाथ पकड़ने मंचक एकदम अग्रभाग मे ठाढ़ भ' जाइत छथि। समवेत स्वर मे सभ बाजैत छथि।) समवेत स्वर : हुअए खाहे युद्घक विभीषिका वा खूनक बाजार गर्म मुदा नञि थाक' बला, हार' बला हम! ओ परम पिता, ओ काल.. अहीं सं', हँ, अहीं स' अछि टक्कर हमर.. हम खसब, लड़ब, मरब, मुदा फेर ठाढ़ भ' उठब साठि हजार सगर-पुत्रक भाँति ई संसार खल अछि, कामी अछि, दुष्ट अछि, पिशाच अछि, मुदा तइयो छै अई मे जीवनक आभा जे अछि सत्यो स' बढ़ि क' सत्य.. शिवो स' बढ़ि क' शिव अमरो स' अमर सुंदरतो स' सुंदर.. जीवन, नञि अछि एतेक सस्त जे बिछलि जाए मुट्ठी मे बंद बालु जकाँ हम जीयब, आ पारब रेघ कालोक सम्मुख ललकारब मौत के बढ़ब विजय पथ पर रचब नित नवीन अभियान नित नवीन विहान नित नवीन वितान (अंतिम पंक्ति बाजैत-बाजैत सभ किओ आधा-आधा हिस्सा मे बॅंटिक' मंचक दुनू ओर ठाढ़ भ' जाइत छथि। प्रकाश मंगतू पर.. ओ अपन पहिल स्थिति मे अछि.. आ निन्न मे बड़बड़ क' रहल अछि.. 'भाग रौ, बम.. भाग, जान बचेबाक छौ त' भाग.. भाग रौ..' । ओ नींने मे एम्हर स' ओम्हर भागबाक प्रयास क' रहल अछि। सभ पात्र वृत्ताकार मे ओकरा घेर लेइत अछि। फेर सभ एक दोसराक हाथ पकड़ि पाछू दिस झुकैत अछि, जाहि स' एकटा मानव-पुष्पक निर्माण होबैत अछि.. सभ कविताक अंतिम चार पंक्ति बाजि रहल छथि.. 'बढ़ब विजय- पथ पर, रचब नित नवीन अभियान.. ‘बाजैत-बाजैत सभटा पात्र फ्रीज भ' जाइत छथि। परदा खसैत अछि।) बलचन्दा ((मैथिली नाटक) (मंच पर अत्यन्त मद्घम प्रकाश.. मद्घम स्वर में एक गोट रहस्यमय संगीतक धुन, ब्रह्मांडक प्रतीत कराबइत.. प्रकाश सेहो समाप्त । मंच पर घोर अंधकार। लगभग एक मिनट धरि अंधकार आ पूर्ण शांतिक बाद एकगोट नवजातक क्रन्दन। क्रन्दन तेज होबैत-होबैत अंत में शनै.. शनै विलीन भ' जाइत अछि ..। मंच पर पूर्ण शान्ति आ एखनो अंधकार अछि। पुन: लगभग एक मिनटक बाद एकटा पातर लकीर सनक प्रकाश मंचक एक सीध स' दोसर सीध धरि अबैत अछि। ओ प्रकाश बढ़ैत-बढ़ैत एकटा वृत्त मे बदलैत अछि। एक स्त्रीक ओहि वृत्त मे कोरा मे एकटा गुड़ियाक संगे प्रवेश ..। गुड़िया के सोझा मे राखि ओ ओकरा पाछां ठाढ भ' जाएत अछि आ बाजैत अछि। ओकर स्वर मे प्रसन्नता आ आत्म-गौरवक भाव छै) स्त्री: हम धरिणी.. हम धरित्री सीता हम - हम सावित्री हम द्रौपदी - रम्भा, मेनका श्रद्घा हम, हमही इड़ा प्रेमक सुख, विछोहक पीड़ा समस्त विश्र्व मे हमरे स' त्राण देवी, माँ, सहचरी, प्राण देवी हम दुर्गा, काली, गौरी, शक्ति, बिनु हमरा, नञि ई सृष्टि (विद्यापतिक भजन आरंभ होइत अछि.. स्त्री कोरा मे बच्ची के ल' क' ई गीत गबैत अछि। गीतक संगे-संग ओ गुड़िया के दुलारैत-मलारैत अछि।) जय, जय भैरवि असुर भयाउनि पशुपति भामिनी माया.. सहज सुमति बर दिउऊ गोसाउनि अनुगति, गति तुअ पाया। (भजन समाप्त होइत-होइत ओ गुड़िया के मंचक पाछां राखि अबैत अछि आ फेर सासुक चरित्र मे आबि क' बाजैत अछि। स्त्री सासु, पति आदिक पात्र नेमाहइत अछि।) सासु : एक त' आनि जातिक माउगि आ ओहि पर स' पहिल बच्चा बेटी? किन्नहु नञि। पहिल संतान त' बेटे। पति : मां, किऐक अहां अतेक अपस्यांत होइत छी? अरे, निचिन्त रहू ने। जे अहां कहबै, सएह हेतै। स्त्री : रोहित, ई हमर आ अहांक प्रेमक प्रथम पुष्प अछि। एना जुनि करू। एना जुनि करू प्लीज़। पति : हमरा लेल मांकेर इच्छा सर्वोपरि। ..चलू, अहांक मोन राख' लेल एकटा बेटीक मंजूरी सेहो। मुदा पहिल बेर त' बेटे। स्त्री : (स्त्रीक नज़रि जेना अपन पिता पर पड़ैत छै। ओ चिकरइत अछि) बाउजी, हमरा बचा लिय'। हमर बेटी के बचा.. बाउजी : बेटी, चल हमरा संगे। एक बेर बच्चाक मुंह देखि लेतीह समधीनी जी त' अपनहि ममति उठि एतै। सासु : खबरदार समधि। बेटी के उकसाऊ जुनि। मुंहे देखला स' ममति उपजितिऐक त' अपनही हाथे अपनही तीन- तीनटाक नरेटी नञि टीपने रहितियहुं। ई हमर घर अछि। अहांक बेटी ओ जहिया छली, तहिया छली। आब ओ ई घरक पुतौहु छथि। हुनका अइठांक केदा- कानूनक मोताबिक चल' पड़त, वरना हमर बेटा लेल त' एखनो एकटा के बजाऊ त' दस टा दौगलि आएत। एह..एक त' जाने कत' स' उठा आनल आनि जातिक रांड़ि.. बाउजी : मुदा बेटा -बेटी त' अपना हाथक गप्प नञि छै ने? सासु : मर्र। तहन ककरा हाथ मे छै? बउ. : विज्ञानक हाथ मे। डाक्टर लग जाउ। ओ अहां के बता देत, जे बेटा बेटी बिधिक लिखलाहा नञि होइत छै। सासु : हे, हमरा ई डागदरी फ़ागदरी नञि सिखाऊ। बाउ : सीख' पड़त समधीनी जी। वरना भगवानक लेख मानि क' जनम जनम स' लोक आओर स्त्री के एकरा लेल दोषी बनबैत आएल अछि। आ जनम जनम धरि ओकरा बनबिते रहत। सासु : हमरा एतेक कपड़फ़ेंच मे पड़' नञि अबैत अछि। आइ काल्हि डाक्टर आओर के सभ बूझल रहैत छै। हाथ लगबितहिं बता दइत छै जे बेटा कि बेटी..। बाउ : त' समधीनी जी, वएह डाक्टर ईहो बता देत जे बेटा- बेटी जनमाब' मे स्त्रीक अपन कोनो विशेष भूमिका नञि होइत छै। ओ त' मात्र धरती अछि, बीज धारण करएवाली। आ जेहेन बीज, तेहेन फ़सील। (सासु किछु नञि बाजि कड़गर नज़रि स' बाउजी के आ फ़ेर स्त्री दिस देखैत अछि।) स्त्री : नञि, हम नञि हटाएब। (पति स') रोहित, बेटी स' एतबहि दुश्मनी छल त' कियै केलहुं हमरा स' विवाह? अरे, अहूं त' एक गोट स्त्रीएक कोखि स' जनम लेने छी। अहांक माइयो त' एक गोट स्त्रीए छथि ने.. आ सभ किओ जौं अहिना बेटी स' छुट्टी चाहत त' कोना चलतै ई सृष्टि? कहू ने, कोना क' चलतै ई सृष्टि? (स्त्री भहराक' खसि पड़ैत अछि। पार्श्र्व स' करूण संगीत। स्त्री रसे- रसे उठैत अछि आ रसे- रसे सामान्य लड़की सनक व्यवहार करैत अछि। ओकर व्यवहार में कॉलेज जाएवाली लड़कीक अभिनय अछि। ओ हड़बड़ी मे अछि। ओ स्कर्ट पहिरबाक, कंघी करबाक, किताब- कॉपी हेरबाक, चप्पल पहिरबाक, बैग कन्हा पर टँगबाक आदिक अभिनय करैत अछि- ई सभ करैत-करैत ओ हबड़ि हबड़ि बाजियो रहल अछि - स्त्री : माँ, हम कॉलेज जा रहल छी..। बाउजी के कहि देबन्हि आब' लेल..। आ अहँू आएब हमर नाटक देख'। आ हं मां, भौजी के सेहो नेने आयब.. माँ, भौजीक मुंह पर स' कनेक घोघ हटब' दियऊ ने! हे देखियौ- देखियौ, अन्हरिया मे पूर्णिमा भ' गेलीह.. (नकली डर) नञि.. मारू। नञि.. नञि, हम दूध नञि पीब.. बाप रौ, उन्टी होब' लागैत अछि.. बाउजी के कहि देबन्हि ने.. जे हम पी लेलहुँ दूध.. हमर सुन्नर- सुन्नर, नीक नीक मां.. अछा, आब हम चलै छी। हमरा देर भ' रहल अछि। (कहैत-कहैत मंच स' निकलि जाइत अछि। संगीत.. शहनाईक धुन..। मंच पर कोनो कार्यक्रम होयबा सनक हलचल। स्त्रीक उद्घोषिकाक रूप मे प्रवेश। ओ मंचक एक कोना मे ठाढ़ भ' क' उद्घोषणा करैत अछि।) स्त्री/पु. : नमस्कार। हमर कॉलेजक वार्षिकोत्सव मे अपने सभक हार्दिक स्वागत आ अभिनन्दन। मनोरंजन, आमोद आ आनन्दक संगे- संग अई वार्षिकोत्सव मे हम सभ सामाजिक सरोकार स' सम्बन्धित बहुत रास कार्यक्रम सेहो केलहुं अछि, जेना सड़क सफ़ाई अभियान, वृक्षारोपण, महत्वपूर्ण साहित्यकारक सम्मान, वंचित वर्गक नेन्ना लेल विभिन्न क्रिएटिव वर्कशॉप, आदि- आदि। आइ एकरे अगिला कड़ी मे प्रस्तुत अछि, समाजक एक गोट आओर ज्वलन्त समस्या स' अहां सभ के दू-चारि करबइत ई नाटक- बलचन्दा। (मद्घम अंधकार.. अंधकारे मे गीत ..) 'गै मैना, अंगना ओकरा जइहें रसे-रसे, कहिहें खिस्सा जोर स' जुनि बजिहें, गे मैना.. (स्त्री मंच पर अबैत अछि.. संवाद बजैत अछि, जेना मंच पर अभिनय क' रहल हुअए।) स्त्री : धिक्कार अछि ओहि समाज पर, जे बेटी के अस्तित्व मे ऐबाक पहिनही ओकरा नष्ट क' देब' चाहैत अछि.. ई धरती.. ई धरतीयो त' एक गोट स्त्रीए अछि।.. देखियौ एकरा, सभ किओ एकरा दिन-राति धांगैत रहैत छथि, एकर करेज कोढ़ि के काटि-काटिक' बड़का-बड़का इमारत बनबैत छथि.. अमृत स' भरल एकर नदीक धार के अपना मर्जी स' एम्हर स' ओम्हर क' देइत छथि.. एकर कामनाक ज्वार के बाँध मे बाँधि दइत छथि.. मुदा तइयो ई धरती, उन्टे हमरा रौद, पानि, छाँहरि, अनाज सभ किछु दइत रहैत अछि.. कहियौ, जे जौं ई धरती ई सभ नञि करतीह त' हमर सभक अस्तित्व रहत की? हम- कन्या, स्त्री, माय, बहीन, बेटी- हमहूँ त' धरतीए छी.. धारण करयवाली.. आ देखियौ, आइयो कएलहुँए धारण- अई परंपरा के आगाँ बढ़ाब'वाली के..। आब दियऊ एकरा अहि संसार मे- अहांके धारण कर' लेल, अहि सृष्टि के आगां बढाब' लेल। अरे, वीर-विहीन धरती से सृष्टि त' चलि जाएत, मुदा बेटी- विहीन धरती स' सृष्टि नष्ट भ' जाएत। आब दियऊ एकरा। हमरा लागल जे हमर अजन्मल संतानक संगे-संग अई धरती परक अनेक अजन्मल बेटी सभ सेहो अपना- अपना माता-पिता स' कहि रहल अछि (स्त्रीक कविता वाचन बालिकाक स्वर मे।) हे हमर भावी माता-पिता हमरा पर नञि त' करू हुनका आओर पर किरपा जिनगी जनिक आरंभ भ' क' हमरा स' समाप्त होइत अछि हमरे पर.. सोचू, जे नञि हएब हम त' के धोअत भरि-भरि छिट्टा ऐंठ बासन के खाएत भाईक अवशिष्ट भोजन कोना नेबाहेम हिंदू धर्मक महादान - कन्यादान! कोना मेटायत नोचनी हमर सासु, ननद, स्वामीकेर जौं नञि भेटत दहेज मे डिबिया माचिस केर। कोना चलत अखबारक कार्य-ब्यौपार जाधरि छपत नञि, नान्हि-नान्हिटा स' अपनही लोकक बलात्कार! आ सोचू कने, नञि हएब हम', त' कोना मनाएब अतंर्राष्ट्रीय महिला दिवस बालिका वर्ष, नारी सशक्तीकरण ककरा राखब पर्दा मे कि बुर्का मे ककरा जोखब सोनाक सिक्का मे? हमहीं त' छी अमीना वा सोनाबाई! तैं, आब' दिय' हमरा, आब' दिय' हमरा, जाहि स' बदस्तूर चलैत रहय अहाँक नाम-सुनाम आओर किछुओ नञि त' घरे-घर त' पूजल जाएब जहन लाल चूनर, भरि माँग सेनूर आ सोलह सिंगारक संग हमरा अहां रूप कुँवर बनाएब..’ (तेज संगीत आ तकरा बाद एकदम शान्ति.. स्त्री मंच पर आबि सभके नमस्कार करैत अछि.. हॉल मे थपड़ी..।) स्त्री : (जेना कोनो सम्मोहन मे) हमर जनम पर हमर बाउजी एतेक प्रसन्न भेल छलाह जेना तीनू लोकक राज-पाट हुनका भेटि गेल होइन्ह। सोहर, बधावा, पमरियाक नाच, भरि गामक भोज, मिठाई..। एह, एहेन कोनो वस्तु उठा नयिं रखलाह। हे, देखियौ, आइ-माइ-दाइ सभ सोहर गाबि रहल छथि आ बाउजीक हुनका सभक संगे रार- तकरार सेहो चलि रहल अछि। आ हम, हम त' अपना मायक कोरा मे आराम स' सुतल छलहुं। (शनै.. शनै.. प्रकाश बदलइत अछि.. स्त्री कोरा मे एक गोट नेन्ना के ल' क' बैसैत अछि आ गीत गबैत अछि। गीतक बीच मे ओकर अन्य देखभाल, काजल लगेनाइ, मालिश केनाइ, स्नान करबेनाइ, दूध पियेनाइ आदि कार्य-व्यापार करैत रहैत अछि।) कहँवा ही रामजी जनम लेले कहवाँ बधइया बाजे हो ललना किनकर हियरा जुड़ाएल खेले आएल अंगना हो अजोध्या मे रामजी जनम लेले मिथिला बधइया बाजे हो ललना दशरथ के हियरा जुड़ाएल खेले आएल अंगना हो स्त्री : सोहर समाप्त भेलै कि सभ किओ उठेलीह बधावा। (सोहरक धुन क्रमश: बधावा मे बदलइत अछि..स्त्री नेन्ना के ल' क' मंचक पाछां चलि जाइत अछि। फ़ेर चुन्नी उतारि अथवा पमरियाक रूप में बधावा गबैत अछि आ नचैत अछि) रूपइया माँगे ननदी, लाल के बधाई दसे रूपइया मोरा ससुर के कमाई पाँच ले लू ननदी, लाल के बधाई! बाउजी : बाउजी काकी स' बजलाह- ई की भउजी? रामजीक सोहर आ लालक बधाई? अरे, हमरा घर मे राम जी नञि, सीता जी, पार्वती जी, लक्ष्मी जी, सरस्वती जी.. दुर्गा जी सभटा देवी एकरूप भ' क' ऐलीहए! हुनका लेल सोहर गबियौ, हुनकर बधावा सुनबियौ! औरत : काकी कहलखिन्ह- अहूँ किसुनदेव बउआ, सठिया गेलहुँए की? अरे, बेटी लेल सोहर आ बधावा? ओकर जनम खुसनामा छै की? अरे, जनमाबी, पाली-पोसी, पढ़ाबी-लिखाबी, बियाह मे भरि-भरि ढाकी दान-दहेज दी, तकरा बाद परब-त्यौहार, बाल-बच्चा.. जिनगी भरि ई नेग त' ई रसम त' ई पाबनि त' ई तिहार। बाप रौ बाप.. भारी खर्चाक घर छै भारी खर्चाक घर..। एहेन मे के राग जै जैवन्ती सुनाओत? कहू त' भला। बाउजी : बाउजी काकी के बारैत कहलखिन्ह- एना नञि बजियौ भउजी। स्त्री भ' क' स्त्रीए लेल.. अहाँके नञि बूझलए.. रहिकावाली सभ बेर दगा द' जाइत छली.. अरे, बेटा सभक की? ओ सभ त' खानगी पढैत, एम्हर ओम्हर डोलैत-डालैत कोनो ने कोन जुगुत बैसाइये लेत। असली कथा त' छै बेटीक..। आ बिनु कन्यादाने हम सभ अई मनुक्ख जनम स' उऋण भ' सकै छी की? एक-एकक' सात..सात पूतक बाद.. अई देवीक आगमन.. धन्न भाग हमर.. गाऊ, गाऊ... ई देवीक स्वागत करू..(पार्श्र्व स' गीत.. स्त्रीक पूजा करबाक अभिनय) निमिया के डार मइया लागले हिंडोलबा कि रूनु झुनु मइया खेले ले सिकार कि रूनु झुनु खेलिते खुलिते मइया लागले पियसवा कि चली गेली मइया भगत के द्वार कि चली गेली पिता : बाउजी फ़ेर काकी के चेतेलखिन्ह- हमर कान मे बेटीक बधावा पड़बाक चाही भउजी, नञि त' अहाँ स' हमर बाजब भूकब बन्न! भउजी : काकी फ़ेर उपराग देलीह- देखियौ बताह के! बेटीक जनम पर जहन प्रसन्नते नञि त' केहेन सोहर आ केहेन बधावा .. मुदा के कहय अई बौराहा के?.. सात-सात गो बेटा भेल, किछु नञि कएल आ बेटी भेला पर अपने ताले नचने घुरैय'.. कत' स' आनी गै दाइ बेटीक सोहर आ बधावा?.. अबै जो गै, बेटाक ठाम पर बेटी क' दही आ गाबि दही..। भ' जेतै गीत बेटीक आ किसुनदेव बउआक जी सेहो जुड़ा जेतै.. रूपइया माँगे ननदी लाली के बधाई सौए रूपइया मोरा पिया के कमाई छदाम ना दँू ननदी लाल के बधाई! स्त्री : हमर पीसी तुनकि के बजलीह- 'वाह चाची वाह! लाल के बधाई त' दस टाकाक कमाई! लालीक बधाई त' सौ टाकाक कमाई आ ओहि मे स' पांच टाका ननदि के। आ लाली के बधाई त' सौ टाकाक कमाई .. आ तइयो एकोटा पाइ ननदि के नञि! एह।' भउजी : काकी बरजलीह- गै, बेटी भेलै भारी खर्चाक घर! बाप बेसी नञि कमेतै त' कोना ओकर घर भरतै.. चल, चल, गीत गो.. सुनू राजा, घर पइसा न कौड़ी सासु जे अइहें, देवता पुजइहें देवता पुजौनी के नेग-जोगा मंगिहें बाहर से पिया तुम ललकारो, भीतर से हम पिया मुक्का देखाएब। सुनू राजा.. स्त्री : भरि गाम मे सोर भ' गेलै जे बाउजी हमर माय के हमर जनमक खुशनामा मे ठोस सोनाक सीताहार देलखिन्हए। बाउजी माय से कहलखिन्ह- बाउजी : हे लिय' रहिकावाली! अहाँक सीताहार! कतेक सुन्दर बेटी देलहुँए अहाँ हमरा.. हम एकर नान्हि-नान्हि टा पएर मे पायल पहिराएब, एकर केश मे लाल-लाल फीता बान्हब, छोट-छोट हाथ मे रंग बिरंगा चूड़ी पहिराएब.. कन्हा पर ल' क' घूमब.. जतेक चाहत, जत' चाहत, ततेक आ तत' पढ़ाएब.. डाक्टर, इंजीनियर, कलक्टर, ई जे चाहत, बनाएब.. खूब धूमधाम स' एकर विवाह करब.. । स्त्री : (युवतीक स्वर व अभिनय मे) बाउजीक स्नेहक छांहरि मे हम पलैत गेलहुं, बढैत गेलहुं। हम इंजीनियर बन' चाहैत छलहुं। मुदा हमर माय मोहल्लाक आइ-माइ-दाइक कहब मे आबि गेलीह आ पड़ि गेलीह हमर विवाहक पाछां। हमर की? हमर त' एक्के गोट शरणस्थली कहियौ कि दाता दरबार- हमर बाउजी। से हम लगेलइयन्हि हुनका लग अपन गोहारि.. बाउजी, हम इंजीनियर बनब.. देखियौ ने! माय कहै छथिन्ह जे हमर बियाह.. बाउजी.. हम एखनि पढ़ब.. हम इंजीनियर बनब बाउजी प्लीज! हम एखनि बियाह नञि करब। बाउजी, प्लीज़... (स्त्रीक चेहरा पर पहिने अदंक आ फ़ेर प्रसन्नताक भाव अबै छै, जेना पिताक सहमति भेंटि गेल हुअए। ओ प्रसन्नता स' पूरा मंच पर घूमि जाइत अछि.. ) हं, हम इंजीनियर बनब.. अपना गामक पहिला लड़की.. जे इंजीनियर बनत.. आई धरि जे बनल से खाली डाक्टर कि टीचर अथवा नर्स.. हम इंजीनियर..बाउजी, अहां कतेक नीक छी। हम कतेक बड्ड सौभाग्यशाली जे अहां सन पिता भेटलन्हि हमरा। (प्रेमक अनुभूतिक अभिनय.. ओ प्रसन्नता स' नाचैत अछि आ विद्यापतिक गीत पढैत अछि- 'सखि की पूछसि अनुभव मोय, सेहो पिरीत अनुराग बखानति, तिल तिल नूतन होय। स्त्री : हम रोहित आ रोहित संगे अपन भविष्यक स्वप्न मे डूबल छलहुं कि एकदिन मा भरि घर के अपना माथ पर उठा लेलकन्हि। चिकरि-चिकरि के बाउजी स' कह लगलन्हि- माँ : नाक कटाक' आबि गेल ई अहाँक सुलच्छनी! जे कहियौ नञि भेल खन्दान मे, से आब ई क' रहल अछि। बेसर्मीक हद छै। प्रेम, एह, देह मे जेना आगि सन्हियाएल छलै.. बाउजी : रहिकावाली, आस्ते बाजू। ई बेटी हमर थिक। जेना हम कहब, तेना हएत। आखिर जिनगी हिनका आओर के संगे संगे नेमाह' के छैक। जाहि मे ई दुनु सुखी रहथु। आ लड़िका नीक छै, पढनुक छै। देखहु-सुनय मे कोनो राजकुमार स' कम नयि छै। अरे, हमहूं तकितहुं त' एकरा स' बेसी नीक वर भेटितय, ताहि मे संदेहे.. खाली जातिए कने दोसर छै ने..। मां : किन्नहुं नञि होब' देबै हम ई संबंध.. अहां स' हम कहि रहल छी।... गै दाइ गै दाइ, गै कियै जनमेलौं एहेन धिया के रौ बाप..जनितहुं त सोइरीए मे नून चटा क' मारि देने रहितियैक गै दाइ.. अरे, अहां ठाढ़ ठाढ़ हमर मुंह की देखि रहल छी? ताकू कोनो हरही सुरही, बूढ़, अधबयसू.. दुहेजू.. ककरो संगे.. भगाऊ एकरा.. बाउजी : से नयि हेतै रहिकावाली। विवाह त' ओही ठां हेतै, जत' हमर बेटी कहत। (वर्तमान। स्त्री मंच पर अबैत अछि।.... पार्श्र्व स' समदाओन चलैत अछि। स्त्रीक विवाहक बाद विदा लेबाक अभिनय। एकरा ओ अपन लाल ओढनी से प्रतिध्वनित करैत अछि। समदाओन सुनाइ पड़ैत अछि) बड़ा रे जतन स' सिया धिया पोसल सेहो सिया राम नेने जाए आगू आगू रामचन्दर, पाछू पाछू डोलिया तही पाछू लछुमन जे भाई लाल रंगे डोलिया, सबुज रंग ओहरिया लागि गेलै बत्तीसो कहार । (समदाओन धरि स्त्री मंचक एक ओर से दोसर दिसि जाइत अछि, जेना नइहर से सासुर पहुंचि गेल हुअए। स्त्री : सासुर पहुंचलाक बाद 'कनिया एलै', 'कनिया परीछू'क सोर भेलै। गाड़िये मे हमरा परीछि- तरीछि के सभ किओ हमरा आगं बढेलक। चंगेरी मे पएर दइत हम आगां बढलहुं। आइ-माइ-दाइ सभ फ़ेर गीत शुरु केलीह। गीत, धुन, बदलइत अछि। स्त्री जेना चंगेरी मे पएर राखैत आगां बढि रहल हुअए। गीतक स्वर) दुल्हीन धीरे-धीरे चलियऊ ससुर गलिया ससुर गलिया ओ भैंसुर गलिया तोरे घँूघटा मे लागल अनार कलिया स्त्री : चंगेरी-यात्रा के बाद हम पाओल जे हम सभ एक गोट दूरा पर ठाढ छी- दूर छेकाइ लेल। रोहित सभ के यथायोग्य नेग-तेग देइत आगां बढलाह, आ पाछू-पाछू हम। कोहबरक बिध-बेबहारक बीच फ़ेर गीत उठलै- (कोहबरक गीत। स्त्री द्वारा कोहबरक बिध, खीर खुअएबाक आदिक अभिनय ) आज फूलों से कोहबर भरा जाएगा आज दूल्हा ओ दुल्हन सजा जाएगा जरा सा तो टीका पहन मेरी लाड़ो तेरे बचवे पर सबका नजर जाएगा। (प्रेमक प्रसंग.. स्त्री द्वारा प्रेमक नाना अभिव्यक्तिक आ चरम संतुष्टिक बाद गहीर नींद मे सुतबाक अभिनय... नीने मे जेना नवजातक परिकल्पना।.. स्त्री ओकरा गसिया लइत अछि.. चुम्मा लइत अछि.. अपन पेट के सोहरबइत अछि.. सोहरबइत-सोहरबइत चेहाइत अछि.. हमरा स' नञि भ' सकत, एहेन अभिनय.. कल्पने मे बच्ची के बेर-बेर पँजियबैत अछि.... ओ कनेक नर्वस अछि.. स्त्रीक पतिक पएर पड़बाक, रूसबाक, मनेबाक अभिनय.. प्रताड़ित हेबाक अभिनय.. स्त्री डेकरैत अछि.. ) स्त्री : बाउजी! हमरा बचा लिय'..। हमर बेटी के बचा लिय'। आइ धरि अहां हमरा अपना पुतरी मे सन्हियाक' राखलहुँ.. मुदा हम.. हम अपन बच्ची के.. (पति स') रोहित, रोहित, प्लीज.. अरे, कोना अहाँ एतेक निष्ठुर भ' सकै छी..? की फेदा अई जिनगी स'? एहेन जिनगी? हमर पढ़ाई बिच्चहि मे छोड़बा देलहुँ.. गामक पहिल लड़की के इंजीनियर बनबाक स्वप्न.. अधरस्ते मे दम तोड़ि देल.. संगे छलहुं ने हम दुनू, एके क्लास मे। अहाँ स' कम त' किन्नहुं नञि छलहुँ.. कखनो अहाँ फर्स्ट आबी, कखनो हम.. विवाह स' पहिने एतेक रास चर्चा, डिस्कशन्स, ज्वाइंट स्टडी.. आ विवाहक बाद सभटा सुड्डाह.. पूछला पर एक्कहि टा वाक्य- मायक इच्छा.. हुनका नोकरीबला पुतौहु पसिन्न नञि.. अंग्रेजी बाज-भूक'बला लड़की हुनका नञि चाहीं । त' जहन इयैह सभ छल, तहन विवाह स' पहिने कियैक ने कहल? .. गामक पहिल लड़की हम, जे प्रेम कएल.. भौजी सभ की -की सभ नञि सुनौलन्हि। भौजी सभ माय के सुना सुना के कहितथिन्ह- 'हम सभ जौं एना कएने रहितहुं, त' हमर बाउजी त' हमरा सभ के जीबिते खाल खींचि के भुसि भरबा देने रहितियन्हि।' ..फ़ेर ओ सभ हमरा खोंचारैथि- 'अयं ये प्रेमा दाय, कॉलेज इंजीनियएरीक पढाइ पढ' जाय छलहुं कि प्रेमक इंजीनियरी पढ' लेल..? हं ये, राधा कृष्णक रास कत' नञि होइत छैक.. अयं ये प्रेमा दाइ, रास मे सभ किछु द' देलियन्हि कि किछु बचाइयो के राखलियन्हिए कि नञि.. नीके छै, विवाहक पहिनही विवाहक सभटा मज़ा लूटि लिय'। बाद मे फ़ेर ई कन्हैया नयिं त' कोनो आन कन्हैया, रास रचैया त' भेटबे करताह.. हुनका ट्रेनिंग अहीं द' देबैन्हि, कहबन्हि जे इंजीनियरीक ई खास कोर्स छलै... (कनैत) ई सभटा अपमान हम चुपचाप सहि गेलहुं।.. मात्र एक्कहि टा उमेद पर, जे एक बेर बस, एक बेर अहां लग आबि जाइ, तहन त' फ़ेर सुखे सुख.. धन्य हमर बाउजी। वएह हमर सखा, वएह हमर सहायक.. सभटा विरोध सहितहुं हमर अन्तर्जातीय विवाह लेल पूर्ण सहमति देलन्हि.. अहाँक मायक सभटा सौख सरधा हमर बाउजी तिगुना चौगुना क' क' पूर्ण कएलन्हि। मुदा.. हुनका लेल हम एखनो धरि आनि जातिएक छौंड़ी छी..। घर परिवारक मर्जाद आ बाउजीक मुंह देखि चुप छी..। भरि दिन कोल्हूक बरद जकाँ खटैत छी.. मुदा चुप छी..। अहाँ स' दूटा गप्प कर' लेल तरसि जाइ छी.. मुदा चुप छी..। कतेक अरमान छल.. स'ख सिहंता छल.. अहाँ स' दुनिया जहान पर चर्च करब.. डिस्कशन्स करब, मुदा..(स्त्री के लागैत छै जे कोनो छोट बालिका ओकरा ल'ग आबि कनफुसकियाइत अछि -माँ! हम आबि रहल छी! स्त्री : (स्त्री चेहाइत एम्हर-ओम्हर ताकैत अछि) के? के छी? कत' स' बाजि रहल छी? बालिका : हम! अहींक बेटी! अहींक पेट स'.. स्त्री : (पेट पकड़ि के) नञि बाजू! चुप भ' जाऊ! आ सूति जाऊ! ई कोनो गप्प करबाक बेर छै? ई त' सुतबाक बेर छै। सूति रहू। देखिऐ, हमरो नींन आबि रहलए। हम्हूं सूति रहलहुं। ई देखियौ। (फोंफ कटबाक अभिनय। स्त्रीक बच्ची रूप मे हंसि आ कथन..) बालिका : झूठ! बहन्ना! निन्नी नयिं। माँ! हम आएब, हमरा आब' दिय'। स्त्री : (पति स') रोहित, सुनू ने! प्लीज! ई अप्पन संतान अछि.. हमर-अहाँक प्रेमक प्रथम निशानी! ..बाउजी कहै छथि.. बेटा-बेटी में कोन फरक?.. मुदा नञि! बाउजी, फरक छै..। फ़रक नयिं रहितियन्हि त' हम एना अपने बच्चा लेल एतेक अंहुरिया कटितहुं? ओकरा अई धरती पर आन' में अपना के एतेक असहाय अनुभव करितहुँ..। हम सभ त' गुलाम छी । कहलो गेल छै- पराधीन सपनहुं सुख नाही। .. अम्मा जी.. मानि जाथु ने.. गोर पड़ै छी अम्मा जी, गोर पड़ै छी। अरे, आब अई मे हमर कोन दोख, यदि हमर कोखि मे बेटीए आएल त'? साइंस पढबइत काले टीचर हमरा सभ के बुझेलखिन्ह जे प्रजनन प्रक्रिया मे दू टा फ़ैक्टर होइत छै- एक्स आ वाई। स्त्री मे मात्र XXएटा होइत छै, आ पुरुख लग X आ Y दुनू। पुरुख X देलन्हि त' बेटी आ Y देलन्हि त' बेटा। अम्माजी, छोट मुंह, जेठ गप्प.. जदि हिनको पहिल बेर बेटीए भेल रहितियैक तहन.. सासु : (सासुक स्वर मे) तहन? तहन मारि देने रहितियैक। आ मारि देने रहितियैक नञि, मारि देलियई.. ओहो एकटा के नञि, तीन तीन टाके.. आ, ले, देख हमर हाथ.. देख, भगै कत' छें? ले देख, देख। (दुनू हाथ भयानक तरीका स' सोझा देखबइत अछि। स्त्री चेहाक' आ डेरा क' दूर भगैत अछि.... स्त्री विक्षिप्त जकाँ करैत अछि..) स्त्री : हा.. हा.. स्त्री.. अभागल..। शास्त्र मे कहल गेल छै, 'यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, रमन्ते तत्र देवा:!' फूसि, अनर्गल.. हम सभ त' मात्र दासी छी.. सेविका.. भूमिका मे बन्हल.. 'भोज्येषु माता, शयनेषु रम्भा:।' हम सभ मनुक्ख नञि, मात्र भूमिका छी.. भूमिका नीक.. हम नीक.. नीक-अधलाहक फ्ऱेम हुनकर.... त' जहन भूमिके छी, त' जीब' दिय' हमरा आओर के अपन भूमिका संग.. माँ.. माता.. जननी.. मुदा नयिं, हम सभ त' कठपुतरी भरि छी। डोरी आनक हाथ में आ नचै छी हुनका ताले। .... (स्त्री उन्मत जकाँ चिकरइत अछि) ले, ले, भोगि ले.. भोग्या छी हम.. आऊ, आऊ, आ मर्दन करू हमर इच्छा के, हमर मान के, हमर सम्मान के.. हे.. हे समस्त स्त्रीगण.. हे समस्त स्त्रीगण, आऊ, आऊ आ प्रस्तुत करू अपना के.., प्रस्तुत करू अपना के, प्रस्तुत करू अपना के, प्रस्तुत करू अपना के। (एक-एक वस्त्र उतारबाक अभिनय। अंतिम वस्त्र उतारैत मुंह नुका लइत अछि..) मात्र रम्भा, मात्र उर्वशी, मात्र मेनका.. अहिल्या, द्रौपदी, कुन्ती, तारा, मंदोदरी - ई प्रात: स्मरणीया पंचकन्या नञि.. रंभा, उर्वशी, मेनका-भोग्या। ..सीता..त्याज्या। ..नञि, द्रौपदी नञि। पति आ समाज स' प्रश्न पूछ'बाली द्रौपदी नञि चाही हमरा समाज के.. मात्र सीता चाही हमरा.. सीताक भूमि पर सीते-सीता.. प्रश्न नञि.. मात्र सहू.. आ नञि सहि सकी त' सन्हिया जाऊ.. । बच्ची : मां, मां, आब' द दिय' हमरा। हम आएब। मां, मां, हमरा बचा लिय', बचा लिय' हमरा। (बालिकाक चिकरनाइ) (स्त्री के होइत छै जे किओ ओकरा बचिया के ओकर कोखि से बाहर घींचि रहलए। स्त्री द्वारा बालिका के बचब' लेल ओकरा दिस दौगनाई कि बिच्चहि मे ठमकि जाइत अछि आ बेहोश भ' जेबाक अभिनय करैत अछि, जेना ईथर सुंघाएल गेल हुअए..। फ़ेर कने चैतन्य भ' क' एम्हर-ओम्हर करोट फ़ेरैत अछि।.. हठात ओ चिकरैत अछि, जेना किओ ओकरा घिसिया रहल हुअए.. ओ दौग-दौग क' चारू कात स' भागबाक प्रयास करैत अछि, मुदा सभ ओर स' ओकर रास्ता बन्न अछि.. चारू कात स' निराश ओ पाछा मंचक देवाल/पर्दा दिस भागैत अछि आ ओत' टकराक' खसैत अछि.. ओ एक पएर पकड़ि क' चिकरैत अछि, जेना किओ ओकर एक टाँग काटि देने हुअए.. 'माँ...' स्त्री एके पएर से अपना के घिसियबइत भागबाक प्रयास करैत अछि कि फेर दोसर पएर पर प्रहार.. ओकर पुन: चीख..। तेज संगीत.. स्त्री दुनू पएर स' अशक्त फेर दोसर दिस भगैत अछि.. आब एक हाथ कटबाक अभिनय.. ओकर कननाइ- 'ई की क' रहल छी? हमर बेटी के कत' ल' जा रहल छी? .. अरे, हमर बेटी अहांके की बिगाड़ने अछि?' स्त्रीक पुन: बच' लेल एम्हर-ओम्हर दौगनाई - एक हाथ आ दुनू पएर स' अशक्त.. कि दोसर हाथ कटबाक अभिनय आ ओकर चिकरनाइ.. 'एना जुनि करियउ हमर बेटी संगे। एना त' ओकर अंग-भंग क' क' नयिं मारियऊ हमर बेटी के। छोडि दियऊ हमर बेटी के।' .. (स्त्रीक बेचैनी बढ़ैत अछि.. ओ एम्हर स' ओम्हर दौगि रहल अछि.. लोथ-हाथ-गोर कटबाक अभिनय संगे.. अचानक जेना माथ पर प्रहारक अभिनय.. अभिनय स' पहिने जेना हथौड़ा माथ पर बरजैत देखने हुअए.. तदनुसार मां.. शब्दक चीख, छटपट आ भागबाक अभिनय.. 'माँ, मां, मां मां,.. देखब ई दुनिया.. हमरा आब' दे'.. कि माथ पर प्रहार आ ओ एकदम स' शांत.. स्त्री चक्कति खा के' खसि पड़ैत अछि। कनेक काल बाद ओकर शरीर मे हरकति होइत छै.. अशक्त भावे उठैत अछि आ विद्यापतिक गीत गबैत अछि।) 'कखन हरब दुख मोर हे भोलानाथ दुखहि जनम लेल दुखहि गमाओल नयन न तिरपित भेल', हे भोलानाथ.. (स्त्री लस्त पस्त अवस्था मे उठैत अछि.. ओ एखनो विभ्रम केर अवस्था मे अछि। अही अवस्था मे ओ अपना के निरेखइत अछि, पेट सोहरबइत अछि। पहिने लागै छै जे पेट मे किछु नयिं छै, मुदा फ़ेर पेट के सोहरबइत अछि। अई बेर ओकरा प्रतीत होइत छै जे ओकर गर्भ नष्ट नयिं भेलैये। ओ रसे- रसे अपना के सम्हारैत अछि ..कपड़ा, केश, विन्यास आदि सभटा ठीक करैत अछि.. मोन मे बेचैनी छै, जकरा एकटा दीर्घ श्र्वासक संगे बाहर करबाक प्रयास करैत अछि.. गमे- गमे चलि क' फ़ेर ओ ओहि स्थान पर पहुंचइत अछि, जत' ओ छलीह। ओकरा चेहरा पर फ़ेर विभ्रमक स्थिति अछि। ओ अपन शरीरक एक एक अंग देखैत अछि, फ़ेर अपन पेट के। वास्तविकताक भान भेला पर ओ अपन पेट के प्यार स' सोहरबैत अछि। एक गोट निश्चयक भाव ओकर चेहरा पर अबैत छै, जे भेलै बहुत, आब नञि। स्त्री रसे- रसे उठैत अछि, अपन संपूर्ण शरीर के निरखैत अछि, जेना ओकर संपूर्ण शरीरक एक एक टा अंग नव-नव हुअए। ....अपन स्वर के निश्चित बनबैत अछि। मुख पर दृढ़ निश्चयक भाव। ) स्त्री : नञि संभव अछि हमरा स' ई .. अपने हाथे अपन संतानक हत्या.. धरती पर जनमल संतानक हत्या करितहँु त' जेल जइतहुं, राक्षसी कहबितहुं, मुदा ई अजनमल संतानक.. सेहो हिनका आओरक प्रसन्नता लेल?.. हिनक तथाकथित.. परम्पराक रक्ष लेल?े.. हमरा स' विवाह कएला सन्ते जे मर्जाद टूटल छल, तकर अभिशाप दूर कर' लेल?'.. (दर्शक स') ई हमर इंजीनियर पति..कहबाक लेल आधुनिक, मुदा आधुनिकता स' कोसो दूर.. अरे, आधुनिक त' हमर पिता छथि- ग्रामीण, कमे पढल-लिखल, मुदा विचार स' कतेक आधुनिक.. परन्तु ई हमर अजुका जुगक पढुआ पति? प्रेमी रूप मे कतेक नीक, कतेक समर्पित- आ प्रेमी स' पति बनितहि सभटा सुड्डाह? हिनका लेल हम मात्र पत्नी, मात्र भोग्या..। .. अपने त' मातृभक्त कहाब मे ई बड्ड गौरव बुझै छथि, ..मुदा..हमरा मातृत्व सुख स' वंचित कर' लेल आएल छथि.. (जेना संपूर्ण सृष्टि के ललकारैत) त' सुनू, हे सृष्टि, हे बिधाता, हे अई धरतीक समस्त नर- नारी! सुनू, हम तैयार छी.. अपन बेटीक उत्तरदायित्व वहन कर लेल.. हे, सुनने छलहुँ.. ओकर धड़कन.. डाक्टर सुनौने छल..कतेक मीठ, कतेक सोहनगर.. धक-धक, धक-धक, छुक छुक, छुक- छुक..जेना रेलगाड़ी चलैत हुअए। एहेन मीठ आ सोहनगर धड़कन के हम अपने हाथे.. बन्न क' दी?..आ जौं दोसरो बेर बेटिए एलीह, तहन फेर डाक्टर.. फेर हत्या। फ़ेर इय्ह सभ नाटक?..न.., बहुत भेल।..प्रेमी स' पति रूप मे परिवर्तित तथाकथित मातृभक्त हमर परम प्रिय प्राणपति परमेश्र्वर.. हँ, हम.. अई धरतीक कोमल, अबला, कमजोर, असहाय स्त्री, आई समाजक देल ई परिभाषा स' अपना के मुक्त करै छी। मुक्त करै छी अपना के अई सभ बंधन स'.. आ धारण करै छी अपन स्त्रीत्व के.. स्त्रीत्वक मान के, ओकर मर्याद के आ शप्पथि लइत छी अई धरती माता के छूबि के जे आब नञि.. आब नञि त' हम मरब, नञि हमर बेटी.. (स्त्री उत्तेजना स थर थर कंपैत अछि। स्त्री के लागै छै जे ओकरा कान मे ओकर बेटी कुहुकि रहल अछि। ओकरा चेहरा पर प्रसन्नताक भाव अबै छै। ओ प्रथम दृश्य मे मंचक पाछां रखल गुड़िया के उठा क' ल' अबाय्त अछि। ओकरा कोरा मे नेने-नेने ओ मंचक बीच में बैसि जाइत अछि.. ओक्का-बोक्का खेल स्त्री आरंभ करैत अछि.. ) 'ओक्का बोक्का तीन तरोक्का लउआ लाठी चंदन काठी चंदना के नाम की? रघुआ खइल' कथी? दूध भात सुतल' कहाँ? बोन मे ओढ़ल' कथी? पुरइन के पत्ता ढोढ़िया पचक! ढोढ़िया पचक पर स्त्री अपन तर्जनी प्यार स' गुडिया दिस आ फ़ेर अपने नाभि पर खोपैत अछि.. दुनू खिलखिलाइत अछि.. पार्श्र्व स' मृदुल, मद्घम सितारक अथवा जलतरंगक धुन.. स्त्रीक नाना बाल-कौतुक / मातृ सुलभ गतिविधिक संगे प्रकाश शनै: शनै: फेडआउट होबैत अछि.... । डॉ शिव प्रसाद यादव द्वारा साहित्य मनीषी मायानन्द मिश्रसँ साक्षात्कार। डॉ. श्री शिवप्रसाद यादव, मारवाड़ी महाविद्यालय भागलपुरमे मैथिली विभागाध्यक्ष छथि। भागलपुरक नामी-गामी विशाल सरोवर ’भैरवा तालाब’। जे परोपट्टामे रोहु माछक लेल प्रसिद्ध अछि। कारण एहि पोख्रिक माँछ बड़ स्वादिष्ट। किएक ने! चौगामाक गाय-महींसक एक मात्र चारागाह आर स्नानागार भैरबा पोखड़िक महाड़। दक्षिणबड़िया महाड़ पर मारवाड़ी महाविद्यालय छात्रावास। छात्रावासक प्रांगणमे हमर (अधीक्षक) निवास। आवासक प्रवेश द्वार पर लुक-खुक करैत साँझमे बुलारोक धाप। हॉर्नक ध्वनि सुनि दौड़ि कए घरसँ बहार भेलहुँ। दर्शन देलनि मिथिलाक त्रिपूर्ति, महान विभूति- दिव्य रूप। सौम्य ललाट। ताहि पर चाननक ठोप, भव्य परिधान। ताहि पर मिथिलाक पाग देखितहि मोन भेल बाग-बाग। नहुँ-नहुँ उतरलनि- साहित्य मनीषी मायानन्द, महेन्द्र ओऽ धीरेन्द्र। गुरुवर लोकनिक शुभागमनसँ घर-आँगन सोहावन भए गेल। हृदय उमंग आऽ उल्लाससँ भरि गेल। मोन प्रसन्न ओऽ प्रमुदित भए उठल। गुरुवर आसन ग्रहण कएलनि, यथा साध्य स्वागत भेलनि। तदुपरान्त भेंटवार्ताक क्रम आरम्भ भए गेल। प्रस्तुत अछि हुनक समस्त साहित्य-संसारमे समाहित भेंटवार्ताक ई अंश:- प्र. ’मिथि-मालिनी’ केँ अपने आद्योपान्त पढ़ल। एकर समृद्धिक लेल किछु सुझाव? उ. ’मिथि मालिनी’ स्वयं सुविचारित रूपें चलि रहल अछि। स्थानीय पत्रिका-प्रसंग हमर सभ दिनसँ विचार रहल अछि जे एहिमे स्थापित लेखकक संगहि स्थानीय लेखक-मंडलकेँ सेहो अधिकाधिक प्रोत्साहन भेटक चाही। एहिमे स्थानीय उपभाषाक रचनाक सेहो प्रकाशन होमक चाही। एहिसँ पारस्परिक संगठनात्मक भावनाक विकास होयत। प्र. ’मिथिला परिषद’ द्वारा आयोजित विद्यापति स्मृति पर्व समारोहमे अपनेकेँ सम्मानित कएल गेल। प्रतिक्रिया? उ. हम तँ सभ दिनसँ मैथिलीक सिपाही रहलहुँ अछि। सम्मान तँ सेनापतिक होइत छैक, तथापि हमरा सन सामान्यक प्रति अपने लोकनिक स्नेह-भाव हमरा लेल गौरवक वस्तु भेल आऽ मिथिला परिषदक महानताक सूचक। हमरा प्रसन्न्ता अछि। प्र. अपने साहित्य सृजन दिशि कहियासँ उन्मुख भेलहुँ? उ. तत्कालीन भागलपुर जिलाक सुपौलमे सन् ४४-४५ मे अक्षर पुरुष पं रामकृष्ण झा ’किसुन’ द्वारा मिथिला पुस्तकालयक स्थापना भेल छल तकर हम सातम-आठम वर्गसँ मैट्रिक धरि अर्थात् ४६-४७ ई सँ ४९-५० ई.धरि नियमित पाठक रही। एहि अध्ययनसँ लेखनक प्रेरणा भेटल तथा सन् ४९ ई. सँ मैथिलीमे लेख लिखऽ लगलहुँ जे कालान्तरमे भाङक लोटाक नामे प्रकाशितो भेल सन् ५१ ई. मे। हम तकर बादे मंच सभपर कविता पढ़ऽ लगलहुँ। प्र. अपने हिन्दी एवं मैथिली दुनू विषयसँ एम.ए. कएल। पहिल एम.ए. कोन विषयमे भेल? उ. मैट्रिकमे मैथिली छल किन्तु सन् ५० ई. मे सी.एम. कॉलेज दरभंगामे नाम लिखेबा काल कहल गेल जे मैथिलीक प्रावधान नहि अछि। तैँ हिन्दी रखलहुँ। तैँ रेडियो, पटनामे काज करैत, सन् ६० ई. मे पहिने हिन्दीमे, तखन सन् ६१ ई. मे मैथिलीमे एम. ए. कएलहुँ। प्र. हिन्दी साहित्यमे प्रथम रचना की थीक आऽ कहिया प्रकाशित भेल। उ. हिन्दीक हमर पहिल रचना थिक, ’माटी के लोक: सोने की नया’ जे कोसीक विभीषिका पर आधारित उपन्यास थिक आऽ जे सन् ६७ ई. मे राजकमल प्रकाशन, दिल्लीसँ प्रकाशित भेल। प्र.अपनेक हिन्दी साहित्यमे १. प्रथम शैल पुत्री च २. मंत्रपुत्र ३. पुरोहित ४. स्त्रीधन ५. माटी के लोक सोने की नैया, पाँच गोट उपन्यास प्रकाशित अछि। एहिमे सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपन्यास कोन अछि आओर किएक? उ. अपन रचनाक प्रसंग स्वयं लेखक की मंतव्य दऽ सकैत अछि? ई काज तँ थिक पाठक आऽ समीक्षक लोकनिक। एना, हिन्दी जगतमे हमर सभ ऐतिहासिक उपन्यास चर्चित रहल अछि। अधिक हिन्दी समीक्षक प्रशंसे कएने छथि। गत वर्षसँ हिन्दीक सम्राट प्रो. नामवर सिंह जी हिन्दीक श्रेष्ठ उपन्यास पर एकटा विशिष्ट कार्य कऽ रहल छथि, जाहिमे हमर प्रथम शैल-पुत्री नामक प्रगैतिहासिक कालीन उपन्यास सेहो संकलित भऽ रहल अछि। एहि उपन्यास पर विस्तृत समीक्षा लिखने छथि जयपुर युनिवर्सिटीक डॉ शंभु गुप्त तथा हम स्वयं लिखने छी एहि उपन्यासक प्रसंग अपन मंतव्य। ई पुस्तक राजकमल प्रकाशनसँ छपि रहल अछि। असलमे प्रथम शैलपुत्री’ मे अछि भारतीय आदिम मानव सभ्यताक विकासक कथाक्रम- जे कालान्तरमे हड़प्पा अथवा सैंधव सभ्यताक निर्माण करैत अछि जकर क्रमशः अंत होइत अछि। हम स्वयं एकरा अपन सफल रचना मानैत छी, समीक्षको मानि रहलाह अछि। एना, पुरोहित अपना नीक लगैत अछि। ’स्त्रीधन’ मिथिलाक इतिहास पर अछि। प्र. मैथिली साहित्यमे प्रथम प्रकाशित पोथी कोन अछि आऽ कतएसँ प्रकाशित भेल? उ. हमर मैथिलीक प्रथम प्रकाशित पोथी थिक ’भाङक लोटा’ जे हास्य रसक कथा-संग्रह थिक। जकर प्रकाशन सन् ५१ ई. मे दरभंगाक वैदेही प्रकाशनक दिससँ भेल छल। ई सामान्य कोटिक रचना थिक, मुदा पहिल थिक। प्र. मैथिलीमे अपनेक लेल विशेष रुचिगर विधा कोन अछि आऽ किएक? उ. मैथिलीमे गीत, कविता, ओऽ गीतल लिखलहुँ आऽ ओऽ सभ मंचपर प्रशंसितो भेल। सन् साठि ई.मे मैथिलीमे नवीन काव्यांदोलनकेँ प्रोत्साहित करबाक लेल ’अभिव्यंजना’ नामक पत्रिकाक संपादन प्रकाशन सेहो कयल, स्वयं सन् ५९ ई.सँ एहि प्रकारक काव्यक रचना सेहो कयल। किन्तु हमर प्रिय ओ मनोनुकूल विधा रहल कथा साहित्य ओ उपन्यास, जाहिमे मानवीय संवेदनाक संगहि अन्तर्मनक सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करबाक लक्ष्य रहैत छल। तैँ हमर कथा-संग्रह ओ उपन्यास बेसी प्रकाशित भेल। प्र. मैथिलीमे अपनेक ११ गोट प्रकाशित पोथी उपलब्ध अछि, एहिमे सर्वाधिक संतुष्टि कोन पोथीसँ भेटल? उ. लेखककेँ अपन रचनासँ पूर्ण संतोष नहि होइत अछि, तैँ ओऽ नरन्तर लिखैत जाइत अछि, लिखबाक इच्छा निरन्तर बनल रहैत अछि। ओकर श्रेष्ठताक निर्णय तँ पाठक ओ समीक्षक होइत छथि। हमरा लगैत अछि जे हमर चरित्र कथा संग्रह जे एखन धरि अप्रकाशित अछि, हमर प्रिय रचना होयत। एना- एखन धरिक प्रकाशनमे ’चन्द्र बिन्दु’ कथा-संग्रह ओ ’मंत्रपुत्र’ उपन्यास अपेक्षाकृत अधिक संतोष दैत अछि। प्र. अपनेक पहिल उपन्यास कहिया आऽ कतएसँ प्रकाशित भेल? उ. हमर पहिल मैथिली उपन्यास थिक, “बिहाड़ि, पात आऽ पाथर” जकरा हम सन् ५४ ई.मे लिखलहुँ, आऽ जे सन् साठि ई.मे कलकत्ताक मिथिला दर्शनक मैथिली समितिक दिसिसँ प्रकाशित भेल। मैथिली समिति अन्य अनेक महत्वपूर्ण कृति सभक प्रकाशन केलक जे एकटा इतिहास बनि गेल। प्र. मंत्रपुत्रपर साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटल। की एकर पूर्वानुमान छल? उ. लेखक पुरस्कारक लेल नहि लिखैत अछि, ओऽ लिखैत अछि, ओऽ लिखैत अछि स्वान्तः सुखाय, अपन आत्म संतोष लेल। किन्तु काव्यक उद्देश्यसँ ’यशे अर्थकृते ...’ कहल गेल अछि। वस्तुतः हम पुरस्कारक लेल कहियो उत्सुक नहि भेलहुँ आऽ ने कोनो तकर चेष्टो कयलहुँ। तखन लोकसभ चर्च करैत रहैत छलाह, से सुनबामे अबैत रहैत छल, से फूसि कोना कहू, नीके लगैत छल। प्र. सुनैत छी जे पुरस्कार हेतु पोथी चयनमे गोलेशी चलैत अछि, कतए धरि अपने सहमत छी? उ. हौ! शिवप्रसाद! ई बात हमरहुँ सुनबामे अबैत अछि, एकाध बेर अखबारोमे ई बात देखबामे आयल अछि। बस, हमरहुँ एहि प्रसंग कोनो आधिकारिक ज्ञान नहि अछि, आऽ ने हम एहि सभमे समये दऽ पबैत छी। तैँ जहिना तोँ सुनैत छह, तहिना हमहूँ सुनि लैत छी। प्र. अपनेक अनुसारेँ मैथिली जगतमे की एहन कोनो साहित्यकार छथि? जे अहर्ता रहितहुँ साहित्य अकादमी पुरस्कार पएबासँ वंचित छथि? उ. विशिष्ट साहित्यकारकेँ तँ ध्यानमे राखले जाइत अछि, किन्तु पुरस्कार तँ कृति विशेषपर भेटैत अछि, जकर प्रकाशनक निश्चित अवधि निर्धारित रहैत अछि। कृति चयनक सेहो एकटा निश्चित निअम अछि। प्र. बिहार सरकारक ग्रियर्सन पुरस्कार कहिया भेटल आऽ कोन पुस्तक पर? उ. ई पुरस्कार हमरा ’मंत्रपुत्र’ नामक ऋगवैदिक कालीन उपन्यासपर सन् १९८८-८९ ई.मे भेटल छल। एहि उपन्यासमे आर्यावर्तक जनभाषाक संगहि आर्य अनार्यक संस्कृतिक मिलनक कथा अछि। एहिमे राष्ट्रीय एकता ओ भावात्मक एकताक सङहि विश्व शांतिक प्रसंग सेहो प्रासंगिक चर्च भेल अछि। प्र. मैथिली जगतमे बिहार सरकारक ग्रियर्सन पुरस्कार आओर किनका भेटल अछि? उ. पुरस्कार प्रसंग हम बहुत उत्सुक नहि रहैत छी, तैँ ई बात हमरा ज्ञात नहि अछि। प्र. १९६० ई. मे अपनेक सम्पादकत्वमे ’अभिव्यंजना’ पटना-सहरसासँ पत्रिका प्रकाशित भेल। चारि पाँचटा अंकक बाद बंद भए गेल। किएक? उ. हौ शिव प्रसाद। मिथि मालिनीक सम्पादन प्रकाशन तँ तोहूँ कऽ रहल छह, ग्राहक संख्या भेटबामे कतेक असुविधा होइत छैक ज्ञाते हेतह। ताहूमे तखन, जखन तोरा पीठपर एकटा अति उत्साहित ओ सुसंचालित मिथिला परिषद सन् संस्थाक हाथ छह। हमहूँ ग्राहक संख्या नहि बढ़ा सकलहुँ तैँ बन्द भऽ गेल। प्रायः यैह स्थिति मैथिली-पत्रकारिताक रहल अछि, तैँ अधिक पत्र-पत्रिका अल्पकालिके रहल। प्र. ’अभिव्यंजनवाद’ सँ की अभिप्राय अछि? उ. सन् साठि ई. मे ’अभिव्यंजना’ प्रकाशन-योजनाक पाछू हमर उद्देश्य छल मैथिलीमे नवीन काव्यान्दोलनकेँ गति ओ प्रोत्साहित करब। एहि प्रकारक काव्यकेँ मैथिलीक किछु विद्वान्, ’नव कविता’ अथवा प्रयोगवादी कविता कहऽ लागल छलाह, जे वाद-परम्परा हिन्दीमे चलि रहल छल। हम हिन्दीक अनुकरणक विरोधी रही वा छी। तैँ मैथिलीक एहि प्रकारक नवीन काव्यकेँ हम अभिव्यजनावादी काव्य कहलहुँ आऽ लिखलहुँ। एहि प्रसंग हम अभिव्यंजनाक सम्पादकीय ओ दिशान्तर भूमिकामे विस्तारसँ लिखनहुँ छी। संक्षेपमे एतबहि जे हमर अभिव्यंजनावादक संबंधमे क्रोचेक अभिव्यंजनासँ अछि आऽ ने अभिनवगुप्तक अभिव्यंजनावादसँ अछि। मैथिलीक एहि प्रकारक नवीन काव्यमे अभिव्यक्ति-शिल्प विशेषता रहैत अछि आऽ से अभिव्यंजना पत्रिका द्वारा प्रोत्साहित कएल गेल, तैँ अभिव्यंजनावाद। प्र. “दिशान्तर” आऽ “अवान्तर” कविता-संग्रहसँ की ध्वनित होइत अछि? उ. सन् साठि ई.क आसपास अनुभव भेल जे प्रचलित काव्य-लेखन-परम्परामे एकटा दिशा परिवर्तन भऽ रहल अछि, जे नवीनताक लेल ओ युगधर्मक लेल अनुकूल अछि तैँ दिशान्तर। पाछू अनुभव भेल जे अंततोगत्वा काव्यमे काव्यात्मकता तथा ओकर गीति-तत्व अति अनिवार्य तत्व थिक तैँ पुनः अवान्तर। आऽ तैँ ई दुनू संग्रह प्रकाशित कएल। अवान्तरमे हम गजलकेँ गीतल कहल अछि जे उर्दू ओ मैथिली भाषा संस्कारपर आधारित अछि। ई बात हम अपन अवान्तरक भूमिकामे विस्तारसँ लिखने छी। प्र. साहित्यिक रचना स्वान्तः सुखायक लेल करैत छी अथवा समाजक लेल? उ. साहित्यिक रचना “स्वान्तः सुखाय” क लेल होइत अछि, किन्तु अंततोगत्वा ओकर उद्देश्य भऽ जाइत अछि समाजे। साहित्य, समाजेक परिणाम थिक आऽ तैँ ओ समाजेक हित चिन्तनकेँ अपन लक्ष्यो मानैत अछि। प्र. कोशी अंचलमे जन्म भेल। कोशीक उत्थान-पतन देखल, कोशीक विनाश-लीला देखल, मुदा लिखल नहि? उ. लिखलहुँ नहि कोना? मैथिलीमे सन् ५९-६० ई.मे “माटिक लोक” नामक उपन्यास लिखलहुँ जे प्रकाशन-व्यवस्थाक अभावमे छपि नहि सकल, आब तँ ओकर पाण्डुलिपियो नष्ट भऽ गेल। पुनः ओकर हिन्दीमे पुनर्लेखन कयल “माटी के लोक: सोने की नैया” क नामसँ जे राजकमल प्रकाशन दिल्लीसँ प्रकाशित भेल आऽ व्यापक स्तरपर हिन्दीमे चर्चितो भेल। प्र. आकाशवाणी, पटनामे कतेक दिन सेवा कएल? उ. पटनाक आकाशवाणीमे हम सन् ५७ ई. सँ ६१ ई.क १४ नवम्बर धरि रहलहुँ। लगभग पाँच वर्ष। प्र. किछु मैथिली पत्रिकामे अश्लीलताक चित्रण भए रहल अछि। तकर की प्रतिफल? उ. साहित्यमे अश्लील चित्रण सर्वथा अवांछनीय।एहिसँ अप-संस्कृतिकेँ प्रोत्साहन भेटैत अछि, से ने काम्य आऽ ने क्षम्य। साहित्यक उद्देश्ये थिक सत्यम् शिवम् सुन्दरम्। जहाँ धरि पत्रिका सभक प्रश्न अछि ओहिमे आरो सतर्कताक प्रयोजन अछि। कारण, पुस्तकक अपेक्षा पत्रिका सभ जनजीवनमे अधिक प्रवेश करैत अछि, विशेषतः आजुक व्यस्त जीवन क्रममे। तैँ एहन साहित्यसँ अपसंस्कृतिये केँ प्रोत्साहन भेटत। प्र. भावी लेखन-योजना की अछि? उ. किछु लेखन-योजना एखनहुँ अछि, मुदा वार्धक्य आब बाधा देबऽ लागल अछि, तखन देखा चाही भविष्यमे की कऽ पबैत छी। मैथिलीमे किछु अप्रकाशित पांडुलिपि अछि। पांडुलिपि प्रकाशित होइत जाइत छैक तँ लेखनमे सेहो गतिशीलता अबैत रहैत छैक। पद्य खण्ड उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’, अन्तर्द्वन्द्व ज्वालामुखी केर तरजुमा करै कहै छी तऽ सोचमे पड़ि जाइ छी... जे कोना-कोनाकेँ जोड़ब छिन्न-भिन्न शब्दकेँ टुकड़ी-टुकड़ी भेल ध्वनि आ अर्थकेँ अहाँक नायिकाकेँ बना देलहुँ अछि अपन उपन्यासक मुख्य पात्र! ठीक जेना हमर खूँखार खूनी पात्रकेँ अहाँ बनौने छलहुँ अपन हीरो! नाग कन्याकेँ बजा कए लऽ अनलियनि हुनकासँ बियाह रचबा लय ता कि अगिला प्रजन्म संग जुड़ि जाय पाताल आ पृथ्वीक सबटा भीषणता आब अहाँ कहू ई सबटा गप जे कहलहुँ से कोना-कोना कए ज्वालामुखीकेँ अपन पेट आ हृदयक तर दबा कए शब्दमे उगरैत रही सबटा लावा कथा-पिहानी अन्य पृथ्वी केर आ जोड़ि अपनाकेँ क्रोधित विश्वकेर संग तनावकेँ लऽ आनी अपन कलम केर सियाही बना कए आ प्रयास करैत रही ता कि तरजुमा कऽ सकी ज्वाला केर, दहन केर, “आह” केर आ खोज कऽ सकी ओहि मुखकेँ जे हमरहुँ माटि पर उगि सकै छल मुदा कथा बनि कए जागि उठल छथि अनकर “जुबान” मे। (उदयपुर, १४.०७.२००८) शैलेन्द्र मोहन झा सौभाग्यसँ हम ओहि गोनू झाक गाम, भरवारासँ छी, जिनका सम्पूर्ण भारत, हास्यशिरोमणिक नामसँ जनैत अछि। वर्तमानमे हम टाटा मोटर्स फाइनेन्स लिमिटेड, सम्बलपुरमे प्रबन्धकक रूपमे कार्यरत छी। सपना सुतल रही दुपहरियामे तँ देखलौ हम एक सपना भयल विवाह हमर यै भौजी कनिया चान्द के जेना हम्मर, टुटि गेल सपना ये भौजी, भरल दुपहरियामे... जहन भेँट भेल हुनकर हम्मर, भेलहुँ हम प्रसन्न देखि कऽ हुनकर रूप हे भौजी, भय गेलौँ हम दङ नाम पुछलियनि हुनकर हम तँ कहलनि ओऽ जे रजनी स्वप्न सुन्दरी ओऽ बनि गेलि हम्मर हृदयक रानी हमरा पुछली कहु हे साजन केहन हम लगै छी? हम कहलियनि सुनु हे सजनी आहाँ चान्द लगै छी चन्दामे तँ दागो छञि, आहाँ बेदाग लगै छी आँखि अहाँक ऐश्वर्या जेहन नाक अछि जुही चावला केश अहाँक अछि नीलम जेहन गाल वैजन्तिमाला एहि के बाद पुछलियनि हमहू केहन हम लगै छी? कहय लगलि खराब छी, छी अहूँ ठीक-ठाक लेकिन एहि यौवनमे साजन भेलहुँ कोन टाक* कनिक लगै छी सन्नी जेना, किछु-किछु राहुल राय किछु-किछु गुण गोविन्दा बाला, यैह अछि हम्मर राय तहन कहलियनि चलु हे सजनि घुरए लेल दरभंगा आहाँ लेल हम सारी किनब, अपनो लेल हम अंगा दू टा टिकट अछि उमा टाकीजक, अगले-बगले सीट दुनू गोटे बैस कऽ देखब “ममता गाबय गीत”** हुनक हाथ लेल अपन हाथमे उठि विदाय हम भेलहुँ हुनक हाथ लेल अपन हाथमे उठि विदाय हम भेलहुँ तखने जगा देलक पिंटूआ, तखने जगा देलक पिंटुआ***, नीन्दसँ हम उठि गेलहुँ हम्मर टूटि गेल सपना ये भौजी, भरल दुपहरियामे...... *= हमर केश किछु बेशी कम अछि **= प्रसिद्ध मैथिली सिनेमा ***= हमर छोट भाई हम तऽ छी परदेशमे (किछु दिन पहिने हमर विवाह भेल छल आर ई गीत हम अपन कनियाँ लेल, जेना लिखल आर गायल बुझाइत छल, लिखि पठाओल। मुदा दुःखक गप ई जे प्रचंड बाढ़िक कारण हुनका प्राप्त नहि भेल।) हम तऽ छी परदेशमे, गामपर निकलल होएत चाँद अपन रातिके छतपर कत्तेक, असगर होयत चाँद यौ हम तऽ छी... जाहि आँखिमे काजर बनि कयऽ हेलै अन्हरिया राति ओहि आँखिमे, नोरक एकटा बूँदे होयत चाँद यौ राति तऽ ऐहन पेंच लगौलक, छूटल हाथसँ डोरि अपन आँगनक नीममे जा कयऽ अटकल होएत चाँद यौ चाँद बिना दिन अहिना बीतै जेना युग बितल हमरा बिना कोन हालमे होएत केहन होएत चाँद यौ हम त छी परदेशमे, गामपर निकलल होयत चाँद गे गे छौड़ी कनि तकिहैं गे, एम्हर कनि तकिहैं गे.... तोरा लऽ हृदय बेकरार गे ऽऽऽऽ केश छौ कारी-कारी ई यौवन भारी-भारी असगर सम्हरतौ कोनाऽऽऽऽ आँखि मदिराक प्याला ठोढ़ तोहर मधुशाला पीबय दे हमरो कनिऽऽऽ बातसँ मिसरी चूबै मन तऽ आँखिमे डुबै पार उतरबै कोनाऽऽऽऽ चाल छौ हिरणी जेहन जहर तोहर, बिढ़नी जेहन जहर उतरतै कोनाऽऽऽ गालमे सूरज उगै केशमे सूरज डुबै दिन राति बशमे तोराऽऽऽ गें छौड़ी कनि तकिहैं गे एम्हर कनि तकिहैं गें एम्हर कनि तकिहें गें तोरा लेल हृदय बेकरार गेऽऽऽ चलला मुरारी छौरी फ़ँसबय! एक दिनक गप्प अछि, हमर मित्रगण हमरा कहय लगला - शैलेन्द्र, अन्हां के कोनो गर्ल फ़्रैन्ड नहिं? हम कहलियनि - दोस, ई भारत अछि, इन्गलैन्ड नहिं! अखन गर्ल फ़्रैन्ड क जरूरत नहिं, अखन त पढय - लिखय के दिन अछि, प्रेम करय के मुहुरत नहिं!! सब मित्र कहय लगला, हम अनाडी छी जौं कोनो छौरी फ़ंसाबी, तहने हम खिलाडी छी ई सब हमरा सहल नहिं गेल, बिना ई दुस्कर्म कयने रहल नहिं गेल फ़ेर की छ्ल? हम ताकय लगलहुं एकटा फ़्रैन्ड, फ़्रैन्ड नहिं, गर्ल फ़्रैन्ड...... मुदा एकटा मुश्किल छ्ल - हमरा छौरी सब स लगैत छ्ल बड्ड डर जौं हुनक सैन्डल गेल पडि, त इज्जत जायत उतरि तैयो हमरा प्रमाणित करय के छ्ल, कहुना कय एकटा छौडी पटबय के छ्ल त कुदि पडलौं मैदान में, या ई कहु श्मशान में, कियाकि, पिटला के बाद ओत्तहि जायब, फ़ीरि क मुंह नहिं देखायब बन्हलहुं माथ पर कफन, कय सब डर के करेज में दफन निकलि पडलहुं हम बाट में, एक छौरी के ताक में सब सं पहिने प्रार्थना कयलहुं - हे किशन कन्हैया! आंहां त अहि कर्म में खिलाडी छी हमरो खिलाडी बना दिअ, हमरा सोलह हजार गोपी नहिं, केवल एकटा छौडी फ़ंसवा दिअ आंहाके बड्ड गुणगान करब, फ़ंसिते छौरी, सवा रुपैया के प्रसाद चढायब हम सोचलहुं, शायद आंखि मारला सं छौरी पटै छैक! हमरा कि बुझल छल, आंखि मारला सं छौरी पीटै छैक भागि कय घर अयलहुं, आर पहिल सप्पत खेलहुं फ़ेर कहियो आंखि नहिं मारब. फ़ेर सोचलहुं - पहिने बतियायब, फ़ेर घुमायब तहन फ़ंसायब हं, ई ठीक रहत! देखलहुं एकटा छौरी, त आंखि हमर फ़रकल.... फ़ेर की छ्ल? हम कहलौं- पोखरि सन आंखि तोहर, केश जेना मेघ, फ़ूल सन ठोढ तोहर, कहियो असगर में त भेट! कहलहुं हम एतबे की भय गेली ओ लाल, ओ मारलीह एहन थप्पड, भेल गाल हमर लाल कनबोज सुन्न भेल हमर, आंखि भेल अन्हार सूझय लागल तरेगन, भेल दुपहरिया में अन्हार सरधुआ, करमघट्टु, बपटुगरा आर अभागल देखू कपार हम्मर, ई विशेषण हाथ लागल एतबे नहिं........ ओ करय लगलीह हल्ला, जूटय लागल मोहल्ला हम कहलौं - ई कोन काज केलहुं? कियक गाम के बजेलहुं नहिं पटितौं हमरा सं, ई आफ़त कियक बजेलहुं फ़ेर की छल? पिटय लगलहुं हम आर पीटय लगला गौंआं मुंह कान तोडि देलक, अधमरु कय क छोरलक ई कोन काल घेरलक, मरय में नहिं छल भांगठ, हम भागि घर एलहुं, दुबारा सप्पत खेलहुं - फ़ेर आंखि नहिं मारब, नै गीत हम गायब, फ़ेर छौरी नहिं फ़ंसायब, नै जान हम गमायब, आर भूलि कय अंग्रेजी, हम मैथिल बनि जायब! आर भूलि कय अंग्रेजी, हम मैथिल बनि जायब!! जितमोहन झा भक्तिगीत मात पिता गुरु प्रभु चरणमे प्रणवत बारम्बार हमरा पर कएलहुँ बड़ उपकार, हमरा पर कएलहुँ बड़ उपकार। माताजी जे कष्ट उठेलखिन्ह ओऽ ऋण कहियो नञि चुकलऒ, आंगुर पकड़ि कs चलब सिखेल्खिन्ह ममताक देलखिन शीतल छाया, जिनकर कोरामे पलिकए हम कहेलहुँ होशिया॥ हमरा पर कएलहुँ बड़ उपकार, हमरा पर कएलहुँ बड़ उपकार। पिताजी हमरा योग्य बनेलथि कमा-कमा कऽ अन्न खुएलथि, पढा लिखा गुणवान बनेलथि, जीवन पथ पर चलब सिखेलथि, जोड़ि-जोड़ि अपन सम्पति केँ बनाऽ देलथि हक़दा। हमरा पर कएलहुँ बड़ उपकार, हमरा पर कएलहुँ बड़ उपकार। सत्य ज्ञान गुरूजी बतेलथि, अंधकार सभ दूर हटेलथि, ह्रदयमे भक्तिक दीप जरेलथि,हरी दर्शनक मार्ग बतेलथि, बिना स्वार्थ्क कृपा केला ओऽ कतेक पैघ उदार। हमरा पर कएलहुँ बड़ उपकार, हमरा पर कएलहुँ बड़ उपकार। प्रभु कृपासँ नर तन पेलहुँ संत मिलनक साज सजेलहुँ, बल बुद्धि आर विद्या दऽ कs सभ जीवमे श्रेष्ठ बनेलहुँ, जे कियो हिनकर शरणमे एल्खिन,भेलन्हि हुनकर उद्धार। हमरा पर कएलहुँ बड़ उपकार, हमरा पर कएलहुँ बड़ उपकार। प्रकाश झा, ग्राम+पो.- कठरा, भाया-पुटाई, थाना- मनीगाछी, दरभंगा, बिहार (भारत) हमर मिथिलाक दर्शन मैथिल छी हम, मैथिली बजबामे अछि कोन लाज देश हो वा परदेश ज्यो हम करै छी ओऽ तऽ काज मिथिला के याद करबैछ सदिखन, विद्यापतिजी माथपर शोभैत पाग। हमरा लोकनिक पिता जनक, बहिन सीता, बहनोइ छथि राम कमला-कोशी अछि चरण जकर पखारैत ओ अछि हमर मिथिला धाम। मैथिल कवि लोकनिक पोथीमे पढ़ैत रहए छी जे खिस्सा मनमे उठैत रहैत अछि जिज्ञासा जे आओर कतेक बाकी अछि प्रशंसा कोइलिक कु-कू राग सुनि मोन म मारऽ...लगैत अछि टीस तखने किछु काल बाद नम्र हृदय सऽ निकलैत अछि गोसाउनिक गीत विद्यापति, मण्डन, अयाची आऽ मैथिलपुत्र प्रदीप हिनकर लोकनिक सुन्दर लेखन पढ़ि मोनमे जड़ैत अछि शब्दक दीप एहि मातृभूमिपर पान, मखान, खराम कऽ अछि एकटा इतिहास बाढ़-बोन के आड़ि-धुरपर बैस, नीक लगैछ मड़ुआ रोटी- सागक स्वाद। चहु ओर हरियाली, घर फूसक, लच-लच करैत ओऽ खरहीक टाट। भोरे सुइत-उठि कए बाधमे सुन्दर लगैत अछि शीतल घास। घरक चारपर कुम्हर, कदीमा आओर सजमनिक अछि लत्ती पसरल नजरि नञि लागए कोनो डैनियाहीके, ताहि लऽ एकटा खापैड़मे कारी-चून लेपल राखल। पछबाड़ि कातक बारीमे राखल एकटा कटही गाड़ी पुरान बाबू-कक्का चौकपर बैसल, बाबा धेने छथि दलान। आब कतेक हम विवरण करबए, शब्दसँ अछि ठेक भरल मिथिलांचलमे मैथिली भाषाक लेल छी हम मैथिल भिड़ल मिथिला चित्रकला एखनो धरि केने अछि राज देश-विदेश संगहि प्रकाशझाक ई प्रस्तुति पढ़ि बुझबइ एकटा छोट सनेस। गंगेश गुंजन (१९४२- ), जन्म स्थान- पिलखबाड़, मधुबनी।श्री गंगेश गुंजन मैथिलीक प्रथम चौबटिया नाटक बुधिबधियाक लेखक छथि आ हिनका उचितवक्ता (कथा संग्रह) क लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटल छन्हि। एकर अतिरिक्त्त मैथिलीमे हम एकटा मिथ्या परिचय, लोक सुनू (कविता संग्रह), अन्हार- इजोत (कथा संग्रह), पहिल लोक (उपन्यास), आइ भोर (नाटक)प्रकाशित। हिन्दीमे मिथिलांचल की लोक कथाएँ, मणिपद्मक नैका- बनिजाराक मैथिलीसँ हिन्दी अनुवाद आ शब्द तैयार है (कविता संग्रह)।१९९४- गंगेश गुंजन (उचितवक्ता, कथा)पुस्तक लेल सहित्य अकादेमी पुरस्कारसँ सम्मानित । बाल कविता- आउ हनुमान माथे पर मैना चटक केलक हाथे पर लुधकल बगड़ा टाटे पर लुटकुन गेलाह पोखरिक घाट धोअ' अंगरखा दहिना हाथ । चितङ खसल दोस्त बाटे पर पोथी भेटल घरे मे कौपी भेटत हाटे पर टुनमुन कहल संगी के संग च’ल त कनिएं हाट से नहि गेल तं लेलनि ढौआ चलला असकरे हाट गोला कुकुर भेटल बीच बाट जए कि कहलखिन- आऽ तू आऽ त ऽऽ अएलनि लग ध' लेलकनि संग संगे संगे चलल दोकान कौपीक बदला कीनल मखान . खुशी सँ कुकुर उठौलक तान टोकल टुनटुन रह भ' चैन तोहर बस्तु सुअदगर लाइ आइ नहि किनबौ देबौ काल्हि पाइ खतम छौ घुरि चल आइ घुरती भेटल जिलेबी छनैत ठामहि तै लए ओ अड़ि गेल टुनटुन ओकरा फेर बुझाएल कुकूर लेब' उधार जिदिआएल बुझबैत कहलक टुनटुन बात- सौदा नै ली कखनो उधार नगदीएक राखी वेबहार काल्हिए तं कहलनि बाबा, भैया के सोझाँ क' ठाढ़ चरफर दोस्त कुकुर चलल टुनमुन ओकर माथ चूमल तखन दुनू फेर टोल घुरल कौपीक बदला कीनि मखान तइ गलती पर भाय कन्हुआएल करबौलक उठकी-बैसकी अपनो गलतीक टुनटुन फेर मललक झिटुके अपने कान मोने रहतै इहो दोकान कौपीक बदला किनब-मखान ओकरे देखसी करैत कुकूर अपने चाँगुरे पकड़लक कान । भेटताह अनन्त? हमरे थिक ओ मात्सर्य-अर्जक मुरूत। हमरे , हमर स्त्रीक ममताक चूर्ण द्रवित हृदयक अवयव ढेरीक पुनर्रचनाक प्रक्रिया थिक। खण्ड-पखण्ड भावत्वक ध्वस्त काया ,माया। भूमि पर जाहि घड़ी बलिप्रदानक छागर भेल छल- सीरा आ धर दू कात छर छर शोनितक फुचुक्का मे , ओ समस्त मनस्तत्व भेल छल-चूर चूर, धूरा गर्दा। तं ओकरे ढेरी पर ठाढ़ भ' क' दुनू गोटय माने हम आ हमर स्त्री, माने एकटा पिता आ माय, अपने दुख आ नोर सं चूर कें सानि-सानि, बना लेने रही कोनो गणेश दुर्गाक मूर्त्तिक माटि। बड़ मनोयोग सं गढ़ने रही, बैसल-बैसल ओहि माटिक मुरूत। हमरा दुनू गोटय दुनू गोटय भ' गेल रही ओही मे, सोझांक ,पएर तरक, आ मन महक सभटा ममताहत क्लेश कें, उपछि-उपछि क' बाहर करैत जीवन सं ,बड़ी काल अनुभवैत रहि गेल रही अपस्यांत, तथापि बना रखवा लेल संघात कें मुरूत, लागल रही लगातार लागल रही, केहन पागल रही ? अपनहि दर्पाहत अस्तित्वक तौला सं खसि पड़ल सबटा सुक्खा प्रसाद कें समेटि क' बैसि गेल रही माटि जकां बनाबय मुरूत। बुकनी-बुकनी क' देल गेल मन-प्राण-संवेदना कें समटैत, सानैत आ फेर गढ़ैत काल केहन भ' गेल रही तखन असकर-असहाय । आ आब आइ ? अपनहि ध्वस्त ममताक मुरूत रचि क' सोझां मे रखने, केहन छी निर्द्वन्द्व, निश्चिन्त, दुःख मुक्त ! उताहुल । करवा लेल फेर, नव मूर्त्तिक प्राण प्रतिष्ठा ! स्त्रीक रिक्त कोरा कें नवजात शिशु सं भरवा लेल थर-थर देहप्रयोग मे निसर्ग व्याकुल ! दिल्ली नगर बस मे तामस: एक मानल जे ई ६८० नंबर बस लोक सभ सं कोंचल भरल छैक, पैर ध्'क' निचैन ठाढ़ भ' सकवाक नहि छैक मिसियो भरि जगह, तों सीट पर बैसल निफिकिर-निश्चिन्त छ' ? जखन कि भरिसक अवस्से पेंशन उठाब' जा रहल ओइ बूढ़ कें एहन ध्क्कम ध्ुक्की खाइत, हाथक मैल कुचैल अपन झोरीक रक्षा करैत डगमग ठाढ़ बुढ़ा कें देखि रहलाक बादो, बैसले रहि जाय लगलहए तों आब गंगेश गुंजन ! नहि होअ' लगल'हए बूढ़ो लोक कें अपन सीट देबा लेल आब ठाढ़! सावधन, खबरदार ! दिल्ली नगर बस मे तामस: दू ई बस! नरको मे ठेल्लम ठेला ! आ ओ बुढ़ा कहुना करैत अपन प्राण-रक्षा पछिला कतोक स्टॉप सं क' रहल छथि दुर्बल पएर पर संतुलित करैत अपन ई कष्टक यात्राा ! ओ बालिग स्त्राी ! ठामहि बैसलि छथि निश्चिन्त, महिलाएंक सुरक्षित खास अपन सीट पर सुव्यवस्थित। सोझहिं मे संघर्ष क' रहल छथि वृद्ध्, बेचैन, अस्थिर कोनहुं अगिला ब्रेक पर ध्किया क' खसि पड़वा लेल चिंतित स्त्राी कें देखाइत नहि छनि बृद्ध्क लेल किछुओ टा कर्तव्य। आरक्षित स्त्राी-सीट पर निस्संग बैसि सकयवाली अपना अध्किार बोध्क एहन चेतना पर किएक ने उठओ क्रोध्, कोना ने होअओ फिकिर ? आयुर्दा ई बात नहि जे पकड़वाक प्रयास मे बात-बसात, छूटल के छुटले रहि जाइत अछि- अतीत जेबी-झोरा वा किताब-कॉपी पर दकचल झगड़ाक साक्षी। आब इहो नहि जकरा देब' पड़य मजूरी मामिला-मोकदमाक पक्ष आ विपक्ष मे गवाही देवाक दाम। दाम ल'क' ठाढ़ भइयो क' कहां भेटत बजारक आंखि, दोकानक आकृति, दोकानदारक आगत-भागत, पहिले पहिल बुझाइत छैक सब कें थिक सबटा बेकार। सबकिछु छोड़ि क' चलि गेल सुखाएल बालु पर पुरीक समुद्र। द' मुदा गेल केहन सुनिश्चित भरोस बूझल अछि मन अहांकें कनिके काल मे ओकर उद्दाम उत्ताल लहरिक घुरि क' फेर छू लेबाक धोखाड़ि क' छोड़ि जयवाक स्नेह। सबकिछु छुटलाहा, सभकिछु छुटिये नहि जाइत छैक जेना सब किछु बांचल सबटा बांचले मे नहि, भीतरे भीतर खिया गेल, चनकि गेल आ कए बेर रिक्त भ' गेल सरबा सं झांॅपल सुखाएल घैल जकांॅ भरि दुपहरिया बांचल खुचल-जएह जतवे से साफ देखार घैलची पर धएल रहैए। मन ! अहां की छी आब ? घैल, घैलची , कि दुपहर ? सांॅझ ? पुरीक समुद्र कि भुवनेश्वरक बजार ? कोणार्कक भग्न प्रस्तर पहियाक अवसादग्रस्त सूर्य, एकान्त मे बैसल गर्भगृहक पार्श्व मे लैंड स्केप बनबैत पटनाक युवक, बा सागरक बालु सं तट पर बना रहल बालुक शृंगार सौंदर्य दीप्त तरहत्थी पर गाल, आ केहुनी बले करोट पड़लि वज्रस्तनी मांसल स्त्री, गढ़ि रहल ओड़िया बालु-मूर्त्तिकार सुदर्शन पटनायक ? कनिको नहि उदास सूर्योदय मात्र धरिक आयुर्दाक अपन दिव्य कलाक अकाल काल कवलनक प्रसंग! ं की छी अहां मन ? कहियो ने छोड़लहुं हमरा एकहु क्षण ने भेलहुं जीवन कें एकहु पल आइ अहां छी- हेरायल कि भेटल ? परिवर्त्तन बदलू आंखि बाट बदलू गाछक छाहरि मार्ग चलू बहुत गोटय भेटत ओहि ठाम आदर्शक बाना त्यागू मात्र शब्द धरि ल' ओढ़ू मनपसिन्न सुविधा लोढ़ू बेमतलब थिक गुंजन जी, बाकी बेश रहओ सिद्धान्त पोथी मे किछु अवसर पर मंच, सभामे किन्तु ने घर सगरे शीतल-शीतल छैक रौद नहि बेश इजोरिया हैत ठहाठही उज्जर मखमल हरियर घनगर गाछे गाछ मंद पवन सुरभित सब बात जुनि झरकाउ, रहू सुस्थिर बड़ अमूल्य थिक इहो शरीर आत्मा तं पौतीक समान सन्नुक मे जाँतल सामान देश छोड़ि कत' गेल, देश छोड़ि कियेक गेलय? दिन केहन पहाड़ भेलय कत कहां ऋतु औनायल रस्ता अन्हार भेलय चाही से गेल गाम अनचाहल फेर आयल बीच बाट पर तेना आइ सूर्य ठाढ़ भेलय, आगां अन्हार भेलय कोनो ने समाद कानो किछुओ सनेस नहि जानि नहि केहन गँहींर उदेस की ओना तं अयवाक किछु विशेष रहय मन तें भदवरिया मेघक अकास भेलय, एखनहि बिन पानिक कहार गेलय कियेक एना कारी फूल कियेक एना कोकनल फल कियेक एना उष्ण बसात एना कियेक अपस्याँत गाम-घर,लोक, खेत-पथार लोकक स्तब्ध मुखाकृति डारि-पात हीन ठुठ्ठ गाछ एतेक एना कियेक अनचिन्हार भेलय हमर हृदय हमर प्राण केर आंगन छोड़ि-छाड़ि बिन कहने-सुनने कोन मृग मरीचिका मे आखिर से, चुपचाप घरसँ बहार भेलय देश छोड़ि कत' गेल, देश छोड़ि कियेक गेलय ? गाम चारि पाँती मातृभूमि मिथिलाक नाम पाँच फूल देश केर शहीदक नाम नोर चारि ठोप हमर श्रम केर स्मतृतिमे अव्यतीतक नाम माटि, मेघ, वायु, सौँस पर्वतकेँ नदी, वृक्ष, पक्षी आऽ निर्झरकेँ अपन सूर्य तारा आऽ चन्द्रमा, ग्राम नगर गली केर बसातक नाम गुंजनक सश्रु स्वाधीन प्रणाम गढ़ि रहल छथि फेरसँ एखन ओऽ मुरुत हुनक मन, बांहि आँखि अथक हौँसला चकचक देहक श्रमकणकेँ सादर प्रणाम हे हमर विवेक, हमर दुःख-सुख, हे हमर गाम! बीच बाट पर खसल लाल गमछा हमरा सं पहिने गेनहार लोक देखि , बढ़ि गेल हएत सड़क पर आगां। राजधानी जेना प्रतिदिन बढ़ि जाइत अछि अपनहि पिछड़ल प्रदेश सभकें छोड़ि क' प्रगति जकां अमूर्त्त आगां। हम देखलियैक चिन्हवाक कयलियैक यत्न कोनो दुर्घटनाक शिकार नेना जकां बुझायल - हवा मे छटपटाइत-उधियाइत-धूल धूसरित भेल। एक क्षण रुकि क' उठा लेवाक चाही एकरा, हमरा। मुदा पीठ पर , बामा दहिना पांतीक पांती गाड़ीक संहार प्रलापी चीत्कार करैत पथियाक पथिया सड़कक भड़ भड़ हल्ला पाछां सं ठोकर जे मारि दैत। सेकेण्डक दशांशो रुकवाक विचार कयलौं कि स्वयं भ' जायब, बीच सड़क पर ओहिना थकुचा-थकुचा। उठा लियैक ओकरा कोरा, मन मे आयलए- एना कोना पड़ल रहि जाय दियैक असहाय-अनाथ! असंभव बनल जा रहल, राजधानीक खुंखार व्यस्त सड़क पर। ममता आ चिन्ता आब ? आब ओ गाड़ी सभक गुड़कैत पहिया सभ सं आंदोलित हवाक दबाब मे दुर्घटना सं चोटायल बीच बाट पर ओंघड़ाएल छटपटा रहल अछि। मोड़ाइत-थकुचाइत-उधियाइत परिधि मे असकर बिरड़ो जकां घुरमैत। विचित्रे आयल अनचोखे एकटा विचार ओ हमरा सोवियत रूस बुझाय लागल। आब हमरा रूसे देखाइत रहल .... मुदा से कोना संभव अछि ? तखन की , थिक ई ढहल ओकर महान ध्वजा ? भू-लुंठित लाल ई ? की ? सोझां मे भूमि पर होइत लतखुर्दनि ! सभक लेखें धनि सन , बेशी सभ्य लोकनि कें एतवो ने फिकिर- जे पैर नहि पड़वाक चाही कथमपि ध्वजा पर । एतवो नहि ध्यान ! बहुत आगां धरि जा क' भ' पओलहुं कनीक धीमा, फेर ठाढ़, घुमैत पाछां,-चेष्टा, फेर चेष्टा मुदा, जाः आब तं ओ कोनो गाड़ीक पहिया संगे लेपटाइत-लेढ़ाइत कतहु आगां चलि गेल। आब ? सोचैत छी, मने मन मूड़ी झंटैत छी, छातीफाड़ पछताइत छी-नाभि लग सं नाक-श्वांस नली धरि औंनाइत छी, अपन कोन हाथ ? उठा क' माथ सं लगाब' चौहत छी , दिल्लीक एहि सड़क पर गामक मुरेठा जकां बान्ह'चाहैत छी ओकरा, सड़क पर खसल ई लावारिस लाल गमछा । मस्तके पर शोभैत छैक लाल रंग, ध्वजेक रूप मे रहैत छैक ओकर मान-मर्यादा । भने से कोनो हाड़तोड़ श्रम सं ड्यूटीक झमारल बस पर ओंघाइत जाइत मजूरक कान्ह पर सं उधिया क'खसि पड़ल हो, चलि गेल होइ खिड़की सं बाहर, बाट मे,लेढ़ा रहल ललका गमछा- सड़क पर धांगल जाइत राक्षस ट््रैफिक सं। आत्मा, झकझोरि एना कियेक क' गेल , उद्विग्न हमरा - माथ पर बान्हि लेबा लेए मुरेठा सड़क पर भू-लुंठित ई रक्तधूरि वर्ण गमछा ! गीत १

दुर दुर छीया छीया छीया अपना घर मे पैसारी क’ गेलय एक अनठीया

आन कोनो नहि बात लाभ कामनाक कारण ध्ुरखुर पर बाड़ल जाइए अनकर माटिक दीया

स्नेह प्रेम सौहार्द्र लगा देलौंहें सबकिछु भरना देखब बेचि घरारी एक दिन खेत-पथारो सबटा

प्रेमक मार्ग कांट कुश उपजल खद्ध-खुद्ध्ी लतखुर्दनि संबंध् स्वकीया अभिनन्दित परकीया

पिफरीशान छथि बेशी अपनहि स्वजन लोक सं पूछि-पूछि हलकान कहू जे-स्नेह काहे को कीया

आब समाजक रुचि रुझान अपने दोसर दिसि तुच्छ बात पर झगड़ा-झंझटि कतेक हो तसपफीया

तें हमरे नहि चित्त गंुजनोक आंदोलित छनि प्रति पल मन विरुद्ध् युग मे जरैत रहै छनि हीयक २ अहांक बात तं अहां जानी अनेरे भेल हमर बदनामी

ओना तं चुप रहबाक सप्पत छल बीत जाय किछु दःुख मे नहि कानी

से निबाहल नहि तें ई दुनिया गढै़ये नित्य नवे नब कहानी

जे भेल-भेल तमाशा एक रतीक रागा रागी तं ऐपर नै ठानी

तंग बड़ हाथ मोन विकल अहुंक बजार नित्य महग भेल की आनी

तैयो अनुरोध् अहांक दोखी हम वचन रहय ने ठोढ़ पर आनी बाढ़िक त्रासदीपर गजल सन किछु दु:खे टा चारू कात छै आ जी रहल-ए लोक ताकैत आसरा कोनो दुःख पी रहल-ए लोक ! घर-द्वारि दहि गेलैक सब बच्चा टा छै बांचल रेलवेक कात, बाट-घाट जी रहल-ए लोक ! सांझो भरिक खोराक ने छैक अगिला फसिल धरि जीबा लए ई लाचार कोना जी रहल-ए लोक ! सबटा गमा क' जान बचा आबि त' गेलय आब फेकल छुतहर जकां हद जी रहल-ए लोक ! जले पहिरना, बिछाओन जले छैक ओढना जबकल गन्हाइत पानि-ए खा पी रहल-ए लोक ! सब वर्ष जकां एहू बाढ़ि मे कारप्रदार रिलीफ नामें अपन झोरी सी रहल किछु लोक ! चलि तं पड़ल-ए जीप-ट्र्‌क-नावक से तामझाम आब ताही आसरा मे बस जी रहल-ए लोक ! कहि तं गेलाह-ए परसू-ए दस टन बंटत अन्न एखबार-रेडियो भरोसे जी रहल-ए लोक ! घोखै तं छथि जे देच्च मे पर्याप्त अछि अनाज सड़ओ गोदाम मे, उपास जी रहल-ए लोक ! उमेद मे जे आब आओत एन जी ओ कतोक द' जायत बासि रोटी, वस्त्र, जी रहल-ए लोक ! अछि कठिन केहन समय ई राक्षस जकां अन्हार किछु भ' रहल अछि तय , तें तं जी रहल-ए लोक ! गजल जेकाँ किछु- मैथिलीमे १ कोन एहन त्रुटि भ' गेल हमरा अहाँ जकर गीरह बन्हने छी ककरो कोनो समाद तं नहिएँ चिfठ;ks- पत्री बंद केने छी सबटा युगसंभव मानय मोन बज़ार कें हमहूँ चिन्हने छी ककर स्नेह आ कोन समर्पणक एहि युग मे निष्ठा धेने छी करी हिसाब तं की हासिल यौ ह्रदय अहाँ जेgu पओने छी सब अभाव-अभियोग कात मे मन जांति सब अनठkSने छी भरि संसार बस्तुएक बाज़ार किछुए मुदा हमहूँ किनने छी अपनो बस्ती ओहने शो-रूम किछु ने किछु अहूँ सजने छी दाम पास नहिं रहल आब तं पुरने सबटा अa¡गेजने छी मानल आहा¡ बहुत देलौन्हें किछु तं हम कहियो देने छी यैह नियति तं यैह हो सही अहांक देल सबटा धेऩे छी कहाँ एलनि गुंजन कें गन' अहूं तं भरिसक्के गनने छी. २ हम तं लाचार घेराएल रही अहां तं अपने रही की केलौं आन तं पहिनहि से छले आन मुदा अहां केहन अप्पन भेलौं सभ दिस ताकि क’ बोआ-बौआ अहींक पता भरि जनम तकलौं जाइत तं सब अछि कोनो कारण अहां मुदा ने जाइत किछु कहलौं अहाँक अनुरोध बड़े मोन पड़य हम सतत भावना मे बहलौं ओहन समाज मे हम करितौं की बाट नहि धरितौं ई तं कत’ जैतौं सब समाचार छल समाप्त वला हम तैयो कोना जहर खैतौं हमर तं प्राण छल एहिना जएबाक ओहि मरणों मे हम कोना मरितौं जे कहियो बूझल नहि मानल नहि कोना एकरा अपन प्रारब्ध बुझितौं हम एहि बाट पर अहां ओम्हर एक संग दू दिशा मे चलि गेलौं ३ कोनो एक क्षण कोना कखन इतिहास बनैत छै बूझल भेलय आब जीवनक एहि पहर मे सौंसे दुनिया अपन अपन आकांक्षाक अन्हड़ क’ रहलए निर्यात सोहनगर वस्तु घर घर मे लोकगुणक, बोधक विवेक सबहक परिभाषा गढ़ल जा रहल नव संस्कृति मधु मिलि जहर मे आब गाम सन गामो बनल धर्मक हिंसागृह सम्प्रदाय-दंगा-धर्मक छल जे बसल शहर मे निष्ठा-प्रेम-प्रसंग भेल गेलय राजनीतिक चर्या भोरे पहरक कैल प्रतिज्ञा बिसरल बेरु पहर मे सम्वेदना सड़ल अचार फूटल बोइयाम मे राखल सब स्वाद-रस-आस्वादन आश्रय लेलक अवसर मे कूटनीति आ राजनीति विश्वनैतिक तेहन प्रबंधन अफसर भेटत राजनीति मे नेता सब अफसर मे ओ छथि कतहु प्रवासी कोनो यू के-यू एसए मे जनिक भूमि ई से निष्क्रिय छपकल अपना घर मे बुद्धि काज ने करनि गुंजन के लागल ठकमूड़ी एहि षड्यंत्रक मोशकिल काटब जाल असकर मे समर्पित गजल सन किछु १ (कवि भीमनाथ झा कें समर्पित) अक्षर किएक भेल निस्तेज तेहनो तं नहि भेल अछि एज सद्यः जात अतीत- स्मृति मने अछि हरियरीक डेज़ मानल जे जीवन मे अबैछ ईहो अनुभव एहनो फेज़ काल्हि रहल जे सुपर स्टार लुप्त होइत छैक तकरो क्रेज़ ओना अवश्य युगक यैह रंग सब तरहें रफ्तार अछि तेज़ अनुभूतिके चमक संभव कम भेलए ई टुटल करेज करय ओना अभिभूत एखनो वैह सिंगार ओहने सुखसेज खयलक नहि खयलक दुनू पछताएबे जीवन केर फेज़ आइ समाजक भय सं भेंट क’ रहलौंहें तकरे प्रेज़ गुंजन रहला सतत विकल बचब’ मे बेकार इमेज़ २. (कवि रामलोचन ठाकुर कें समर्पित) यत्लब्धम् तत्लब्धम् दुनिया एके रती बेशी-कम दुनिया क्यो कत्तहु पूरय नहि जाय भने हकार पड़ल सबजनिया कनियां बड़क बर बनल अछि बड़ बनल कनियांकेर कनियां पलंगक युग मे खाट नेवाड़क के चीन्हय चैकी एक जनिया पुरना लोकक करैत उपेक्षा नबका पीढ़ी अछि बड़ बढ़िया बूढ़ि सासु कें कतिया-धकिया नवतुरिया निचैन नव कनिया बेशी तं बरियात भंगेरी भंगपीबे त्रिकाल लोकनिया ब्रह्मज्ञान औकाति पर उतरल एहि बजार मे छथि सब बनिया गंुजन दुःख बेकार करै छी ई संसार चलत किछु एहिना ३. (कवि-पत्रकार अजित आज़ाद कें समर्पित) अद्भुत हल्ला गुल्ला अछि नेता गणक मोहल्ला अछि झुग्गी -झोपड़ी यमुना मे हिनकर घर चरितल्ला अछि टोपी तं पहिरथि नहि आब भोटक मोन बेलल्ला अछि एहन समय एहि समाज मे बापो-माय तेहल्ला अछि मछहट्टाक विसाइन माहौल की संसद मे हल्ला अछि गंुजन खेलनि तेना शपथ जनु पिन्टुक रसगुल्ला अछि ४. (शेफालिका वर्मा जी कें समर्पित) बात किछु तं ज़रूर गुमसुम छी से थीक की बाजू की भेलय अछि बूझल हमर पछिला खिस्सा कोनो दोसर तं ने शुरू भेलय केना हेराएल कते चुप छी उदास फेर कहियो क’ ओ नै आएलए जे भेल भेल से बिसरी ने किए ओ अतीतक प्रसंग आब किए एहन व्यवस्थाक समाजो सएह घेंट काटय आ भभा क’ हंसए देत के आजुक संसार मे किछु उन्टे अहींक जे हड़पि लैए ई कोनो आब ने उदासीक बात बात जे फेर ने सस्नेह लिखय एतेक चलिक’ जीवनक सफर आब अंते मे ने चलल होइअए सब गछल कें करै मे पूरा ध्यान नै गेल लोक की दैए दैत जाएब हरदम देबेक सुख सेहो निसें आब बुझल भेलए एना उजड़ल-उपटल सन अहंक छोड़ि संसार ई के चलि गेलए भेल बड़ बेर राति बीति रहल आब की आओत ओ जे चलि गेलए कोन चैबट्टी पर गंुजन ठाढ़ बाट अपनो ने कएल तय होइअए ५. (प्रिय सकेतानंद कें समर्पित) एक बेर फेर सं जैतौं ओम्हरे चैन जाहि बाट मे हेराएल तिम्हरे ओ कतहु ठाढ़ हो एखनो ओहिना ओ कहीं ताकि रहल हो हमरे हमहूं निबाहि ने सकलौं जकरा ई कलेशो तं हमर अछि तकरे कत’ कहांक याद आएल बसात जाइ ओत्तहि आ श्वांस ली तकरे ओना सिलेट पर लीखल अक्षर से मेटाएल तं सेहो अछि तकरे बजा रहल छथि फेर अपना गाम एक बेर गाम जं जइतौं हुनके स्वतंत्रता-दिवस २०१० गुदरी-चेथरी सीबैये बड़ दिब जनता जीबैये जेहने ई पवित्र पावनि तेहन अछिन्जल पीबैये नब मलिकाना ढब पसरल घोड़ी-घास छीलैये कखनो राजा आ महराज एखन अंगरेज सँ मीलैये जखन चलय परिवर्तन चक्र सब सं अवसर छीनैये अपन बिलासी बजटक भार जनताक कान्ह पर धरैये सुनैत छी आब अपनो देश मंगल ग्रह पर चढ़ैये भरि संसारक यूरो-युद्ध लोकक भूखें लड़ैये दाना-दानाक लोक बेहाल गहुम गोदाम मे सड़ैये फुटपाथी दोकान मे ठाढ़ पुरने बस्त्र मौलबैये देशक नायक सभा समेत ध्वजा ऊँच फहरबैये लोकगीत-नादक नामे रॉक एन रॉल करबैये गाम भरिक अनेक घर मे दीपो कहाँ आब आब जरैये सब जेना मिझाएल मुरझल दिल्ली जगमग करैये संभव छैक पटनो हो इजोत गाम बिहारक कानैये ई महान राष्ट्रक त्योहार धरती रौद सं जरैये लोक कर्ज़ मे डूबल अछि किसान लोक सब मरैये अमेरिका मे जे डॉलर फ्राँस मे यूरो फरैये हमरा गामक बाध समस्त धहधह जेना कि धधकैये ओत' उमेद आ आश्वासन बाट देखैत लोक मरैये जानि ने कहियाक चलल रिलीफ हमरो बस्ती पहुँचैये छीन लेलक से बड़ सुभ्यस्त ठाढ़ रहल भीख माँगैये शहरक सब लाल बत्ती भीखक हाथ पसारैये आजुक दिनक खोराकीक खोज साधारण जन लड़ैये देश शीर्ष पर होइत परेड चैनल सब दरसबैये एक-एक पल डेगक झाँकी दुनिया के झलकबैये ई नहि अपने देखय ओ जे किछु सबटा करैये केहन विकट द्वन्द्व आगाँ जीअय लोक ने मरैये सोझाँक शक्ति विरुद्ध अछैत तैयो किएक ने लड़ैये भरिसक नैतिक दुबिधा-द्वन्द्व सब संबंधीए लागैये तहियाक समय छलय दोसर बूझल बिदेशी छ'लैये आइ तं ई नबका अंग्रेज़ सोदर-मसियौत लगैये तें एहनो महान ई दिन आत्मा मे नै उतरैये हो जिनकर ई देश रहओ हमरा तं नै अरघैये आब लागय गुंजन सब युग मुँह देखि मुँगबा परसैये ( १५ अगस्त, २०१० ई.) राधा (विदेह ई-पत्रिकामे धारावाहिक रूपेँ खेप १-३० ई-प्रकाशित) खेप १ राधा राधा कतेक दिनक बाद ई एहन क्षण कतेक युगक बाद ई अलौकिक मन कतेक दिनक बाद मन पड़ले सब टा कतेक दिनक बाद एहन हतल तन कोना क सम्हारल हो, कोना योगा क' राखी कहां ओहन बासन बाकस बा घैल, राखि दी निहारी; ताही मे एकरा ई सभटा दुर्लभ आ दिव्य बोध सभ-टटका सौंसे पृथ्वी, भरि ब्रह्‌‌माण्ड क्यो नहि जागल हो कत्तहु क्यो नहि, मात्र महाअनुभूति यत्न, स्वच्छ अनन्त नील मेघ मध्य हंसथि जेना दिनकर कनथि जेना आसन्ध्या दीनानाथ, आर कतहु किछुओ नहि दृश्य-श्रव्य मात्र अन्तहीन सुरक्षित एकान्त, मात्र सूर्य जकां, हुनके सन धधकैत एकसर एकटा हरियर फलगर गाछ, कात मे यमुना धार , अपन कदमक गाछ जकाँ रही ठाढ़ भरि जीवन कतेक युगक बाद ई एहन सन मन! हतप्रभ अछि मन भेल आ कि हत आस एना कियेक कंठ सुखाय, एतेक किये पियास ए ना कियेक वाक हरण भेल अनायास आंखिक सोझां पसरल ई केहन अन्हार कान सेहो भऽ गेलय बज्र-बहीर सबकिछु अछि बौक विकट निर्विकार ए ना कोना भऽ गेल निस्बद्द ई संसार बीच दुपहरि-दिन देखार बसातो अछि जत कतहु स्तब्ध ठाढ़ कत छी हम ककरा लग कथी लेल भने तँ निबहि रहल छल जीवन सोझ साझ! एहि हृदय कें ई की भेलैक हमरा संग ई की भेल ? ई जीवन की मात्र कालक गायक दूध एक रती ताक मे हो तल विचल औंट मे हो विलम्ब, फाटि जाय, बा रहि जाय जँ चूल्हि पर लगि जाय एको रती कि स्वाद सब बेकार रस सब बेरस तकर पौड़ल दही सेहो बेस्वाद ई एहन दुर्लभ मनुख-जीवनक एहनो सार! फाटल दूध जनमल दही सन बेकार स्वादक जबरदस्ती भोग आ दुखताह मने ऊघब एकेक पल, दिन आ मास वर्ष कांच जाड़नि सँ जरैत चूल्हि, धुंआइत आंखि कें नोरबैत निर्ममताक कर्मक कर्म सिज्झू-अधसिज्झू करैत भानस उतारैत तप्त बासन कछमछ करैत बदलैत ताकैत बैसवा लेल सुभीतगर आसन अति सीमित भूमि पर घुसकबैत फेर सरियबैत पोन तऽरक चटकुन्नी सम्हारैत देह पर आंचर, झंपैत मृदु अंग निज घामे नहायल ताप सिंचित सुकोमल आंगी विहीन यौवन कें झांपब मात्र बेर-बेर लोक केर आंखिक कौआ दुआरे भिजल नूआ सँ सटल यौवन देखाइत पार तकरा लोक लज्जे अनवरत नुकवैत झँपैत रहवाक क उपक्रम, ई की ओ कि ओ हमर सखि, हम एतेक टा ई महान मानुहन्ना-तन बनल की करय लेल भानस आ झांपय लेल युवा तन लोक-संबंधीक धाखें सम्हारैत रहबा लेल भरि जिनगी आंचर ! यैह सब टा अर्थ, बाकी ? समाज आ लोक लज्जा.... खेप २ राधा (दोसर खेप) देह भेल पिजड़ा केहन निर्मम कतेक लाचार ई मन सोन चिड़ै उड़वा लेल व्याकुल व्यग्र, प्रतिपल झांटि-झांटि क' पांखि करइत शोनिते-शोनिताम कोमल माधुरी फूल सदृश अपन देह। चांगुर सुकोमल, तुरंत जनमल नेना सन सुन्नर आ जीवन-सृष्टि केर सद्यःसृजित आशा मनोरथक नवीन मृदु माटि, पानि ,प्रकाश, पवन आ आगि धधकि रहले देह पहरक पहर एक-एक श्वांस केहन वज्रक देह केर पिजड़ा तथापि जरि छुटितय क' दिअय फेर सं मुक्त ओएह आकाश, मेघक श्याम स्निग्ध सतरंग मास धोअल फहराइत सघन कारी केशराशि झूमैत डारि-पातक हिड़ला-स्पन्दन ! स्वाधीन संगीतक मुक्ताकाश स्वच्छ धोअल वस्त्रसन ई तन जेना उधिया रहल वेग मे बहि रहल दिव्य बसात पर निर्बंध निर्भय मुक्त आत्मालीन किन्तु असह जे ई सब, स्वप्नवत भ' जाइत अछि सब बेर खुजय नहि पिजड़ाक ई फाटक से पर्यंत आ हमर ई मन ,कोमल पांखिक सामर्थ्य पर सहैत सबटा लोक-समाज-सम्बन्ध केर बोराक बोरा ऊघि रहल छी अनेरे जे अनन्त तेकर करय के हिसाब, इस्स कियेक नहि टुटैये पिजड़ा ने जरिये जाइत अछि एहि देहक मुक्ति केर अकांक्षा आ उताप! एकरा मे सं अनुपस्थित भ' गेलय की सबटा ज्वाला सबटा आगि ? एहि दुर्बल देह व्याकुल मनक ल' लेलक की आश्रय ? भ' गेलय निश्चिन्त चलि गेलय कुटमैती मे कोनो गाम तेहन भेल आब समय जे प्रकृति सेहो छोड़ि रहले धर्म जल करय नहि तृप्त प्यासल कंठ, करय ने शीतल बसातो तन अग्नि छोड़ल धर्म नहि तं जरा ने दितय हमर पिजड़ाकें, ई जीवन धन्य धरि आकाश अछि टीकल अनोन-बिसनोन, धनिसन महाश्वेती आक्षितिज नीलाभ छाता तनल अछि आद्यन्त, ककरा लेल कहि नहि ल' लेने अछि गंहीर दीर्घ शवासन ओहो नहि रहि गेल कोनो कार्यक एहि लाचार लेल बनि गेलए जेना कोनो अथबल माय, करैत विलाप मनेमन अपन असक्त ममता निष्प्रयोजन निरुपाय होयवाक नियति पर ... खेप ३ राधा (तेसर खेप) सौख केहन आखेटक .... अछि विकट की हाल एहि मनक, कही ककरा कहू की, के बनओ एहि प्राणक धुकधुकी सन अपन ठीक हमरे जकां आकुल चित्त एहिना बहा क' बैसलि सकल सुख मनोरथ जे भसा बैसलि हो, बिहुंसैत यमुना-धार मध्य हंसैत सब टा सभ किछु अर्पित काल मंदिर मे बनल हो प्राणहीना देह राखल भूमि पर कंकाल आंगन मे, जरैत दुपहरक रौद प्रचण्ड नुकायल लोक सब समाज घरे घर आ निस्बद्द सब आंगन स्वयं रौद-बसात अछि पर्यंत बैसल नुकायल जे लागि ने जाय कहीं हमरो-लू चिड़ै-चुनमुन्नी कहय के, माल-जालो बिन डकरने शान्त होयत कहां कोनो शब्द आबय कान धरि एहन मृतक समान एहि चुपचाप मे तं गाय-गोरुक पाजु लेवाक स्वर सेहो सुनाइत रहितैक तेहन आलस तेहन छैक ई सभक लेल जे बनल अछि सब बौक सौंसे सृष्टिये निःशब्द आ चुपचाप बैसलि, दुबकि क' कोन अदृश्यक महाबृक्षक अनन्त छाहरि मे। केहन ई अछि सभक, हमरो विडंबना जे सभ अपनहि गुण आ धर्मक सहि रहल अछि आगि स्वयं प्रकृतिक ई लीला जेना धधकैत हो बसात जे देखल ने जाइत हो ने सूनल जा रहल सबकिछु स्तब्ध धह-धह करैत सबटा चुपचाप कहां किछु सुनि पड़ैये, की भेलय हमरा भ' त' ने गेलौंहें हमही बहीर ? सखि-बहिनपा सेहो ने जानि गेल कोन धाम बिन बिदागरीये चलि जाइ गेलि की सासुर ? यदि से नहि त' कोना छी हम, जीवितो छी कि मरि गेलौं देख' लेल क्यो देलक हुलकियो पर्यंत एकहु बेर कए दिन बीति गेल, घाट, यमुना कात गेना बिना हुनके बनल छथि जे ब्रजक प्राण खेप ४ केने छथि बेश सनाथ सबकें, स्नेही-संबंधी सौंसे समाज कें ई जे छथि बनल लोकक गीलमल हार, यमुना कुंजक मायावी मुरलीक कलाकार बेफिकिर निश्चिन्त बनल अकान अनठा बैसल कतहु अपस्यांत अनमस्क चिबबैत अपन ठोढ़ गुलाबक कोंढ़ीक दुपत्ती सन मृदुल लाल टुहटुह अपने मे ध्यानस्थ सौंसे संसार कें अनुपस्थि क' दूरस्थ धरतीक कोर परक टुग्गर सन गाम बिसरि बैसल मथुरा सं चलबै छथि सरकार, धन्य छी अहूं कृष्ण, छी धरि अपरम्पार, बिहुंसि रहल छी, बड़ उतकीरना करैत छी हमर एहन मनकथाक करैत छी ठठ्ठा, बड़ दिव, धन्य छी बाबू, धन्य छी मुदा एहू गरीबिनीक दिन फिरतै कहियो, तखने पूछब हमहूं अहांक मनक हालचाल, एक युग सं बौक अहांक बंसुरीक बोलक नित्य निर्मल कालिन्दीक छल-छल बहैत अहंक हृदय-धार सुखा जयवाक समाचार, एखन मुदा लाचारी अछि, तैयो एतवा धरि कहि रहले हमर एहि प्राण मे बैसल सौंसे ब्रज बड़ उदास बड़ उदास, मुरलीधर! अहां कोना छी ?कतय ? एक युग सं कियेक चुप अछि एना बंसुरी ? खेप ५ अहां चुप छी चुप्प अछि संसार अहां नहि तं सब किछु चुपचाप ओना तं चलिये रहल सब नित्य मुदा नहि बूझब इयेह अछि सत्य मनहि मन लोकक मिझायल दीप राति तं राति, दिन सेहो भ' गेल छैक निष्प्राण नीरस आ उदास अन्हार ! बजैये बड़दिव चलैये-फिरैये लोक किन्तु नहि किछु लसि बोली मे ने रस करबा मे कोनो काज, हम तं सहजहिं पड़ल छी ओछाओन तें एकर अलावे जे अहंक मानस-संग मात्र अवलंब श्वांसक ओना सब टा बन्द, हमरा लेल आशा आ मनोरथ केर सब केबार ओना तं चलिये रहले समय भोर दुपहरि सांझ, रातिक चालि जगतक नित्य केर सब कारबार ! हमर सबकिछु बन्द अछि, सप्पत अधमृत ई संसार, प्राणाधार ! खेप ६ प्राणाधार, से ई सात इनार गहींर सं सबोधि रहलौंहें, बचाब' लोक लज्जा ! केहन ई मनक पराभव ल' सकी ने नाम अहांक पुकारि, भ' स्वच्छन्द लोकक सोझां मे निर्धोख आ साधिकार, सिनेहोक धरु केहन जरल कपार केहन भेल हमरो अदृष्ट अपरम्पार । मन कोना बौआइत रहैत अछि खुजल बाछी जकां एकसर बने-वन, तकैत माय, यमुनाक काते कात, हुकड़ैत व्याकुल भेल, वन-झांखुर सं चंछबैत देह तकैत मायक नेह , दुखबैत कांच-कोमल सीप सन-सन खूर अपन, आ मनुक्खक नेनेक ठोढ़ सन सुन्नर-सरस चुम्बन ल' लै योग्य कंपैत अपन शिशु-थुथून ई सोचि मन लाजो करैये जे केहन सन ई कामना हमरो बताहि, अहां तं अहां भेलौं, हमर कोनो की माय अहा? आ कि संतान हम आहांक, ने हम बाछी ने अहां गाय, कोना आयल-ए, भाव एहन हृदय मे, कत' सं जानि नहि, किछु ने ज्ञात, मुदा ई बात केहन दिव्य-विचित्र, एखनहि भ' रहल अनुभूतिक आनन्द जे हम स्वयं छी गौ अहां हमरा पर ओंगठल ठाढ़ भ' अपन परिचित विशेष भंगिमा मे एक दिसि केने गर्दनि टेढ़ दोसर दिसि दुनू हाथें ध' क' मुनने आंखि, लागल ठोर सं तन्मय भनें बंसुली रहल टेरि, हमर से देह गायकेर आ अहांक आत्मीय पीठक, इहो की संयोग केहन विचार, ईह मुदा हमहूं छी कतेक बकलेल केहन बताहि की सब भाव आबय आबि क' अन्हर उठाबय, हमर एहि असकर मनक पसरल ब्रजक भरि आंगन पड़ल सभ किछु जेना हो दुखित हो उदास जेना सुखा रहल हो कंठ कएक कए युग सं प्रतीक्षा मे प्रतीक्षा मे अशाबाटी मे, टंगल हो ताही पर गनि गनि क' देह-प्राणक एक-एक धुकधुकी आयुक सभटा उत्कंठ सीदित क्षण! सौंसे प्रकृति मे मात्र एक ई मन इयेह टा गुम्म गीत गबैत मिलनक भरि उमेरक वियोगी अंगना मे बैसलि, कुसमय कान मे घोरैत कौआ कुचरबाक मधु बोल! आशाक केहन तुन्नुक डोरि तहि पर टंगल हमर शरीर भारी, तथापि नहि टुटैये नहि टुटैये, धन्य आसक डोरि, एहि चित्तक प्रतीक्षा आशाबाटीक ई विलक्षण खेल देल सिखाय, केहन कारी हृदय भेल, कृष्ण ? किछु पड़ैये मन अहूं के एको मिसिया एको मिसिया स्नेह ,सम्बोधन ? अहीं कें टुटैत रहैत छल मुंह- अनन्तो नाम ल क' फुसफुसा क' कहब , गे ब्रजवासिन छौंड़ी !आदिवासिन कत' छलें नुकायलि? कोन जंगल-पहाड़ मे भ'गेल रहें अलोप भरि दिन, भ' गेलौंहें अकच्छ तोरा ताकि-ताकि... बा अचानक आबि पाछां कान मे कू-उ-उ क' देब ठोढ़ सटाय हमर जीवन कें देहक बाटे , भरि देब तेहन दुर्लभ अलौकिक झुरझुरी सर्वांग, जे बनि महातीर्थक भोरहरियाक दिव्य मंदिर गनगनाय लागय भक्त सबहक अनवरत बजाओल जाइत मंदिरक घंटी सं टनाटन हमर सम्पूर्ण अस्तित्वे निनादित क', पल खसिते ने जानि सत्ते कत' भ' जाइत रही अलोप... हमरा प्राण कें विकलताक एकपहिया टुटल बएलगाड़ी पर बैसा क' जेना कही-ताकू आब हमरा, ताकि लिय', हम छी कोन ठाम, कत्त ? केहेन बैसलि शान्तचित्त हमरा, अनेरे ई उपद्रव क' कोना क' दी अशान्त अछि किछु एको मिसिया यादि, एकहु रत्ती मन ? से कियेक हएत, आब ताहि सं अहांक कोन संबंध तकरा सं कोन अहां कें काज, विकल जे भेल, होइत रहओ।छटपटाइत रहओ, अहांक नाटक अपन अगिला-अगिला दृश्य सबहक करैत रहओ ओरियाओन, निरन्तर। नव-नव निर्मम रसक अनुसंधान मे लागल रही, बड़ दिव । कहां किछु लोक लेल चिन्ता कोनो मुंहछुआओनो एक बेर "कियेक छौ मन हूस छौंड़ी" ?'' छौंड़ी !'' नाम तं अछिये ने कोनो हमर राधा, केहन मायावी केहन अभिनय असंभव लोक अहां यौ, मोहि बैसब बेबस भेल अपनहि स्नेही, आप्तक अनवरत करब हरान हिनकर भ' गेलय हिस्सक, बड़े आबय मजा लोक के क' विकल अस्थिर कोनहुं प्रकारें क' दी किछु बेचैन आ अपने पार । नाटक अहुंक धरि अछि कृष्ण अपरम्पार, हे सरकार ! कखनो उठितो अछि मनक महासागरमे अपनेक, हमर नामक कोनो टा पोठीयोक तरंग ? कत' सं किछु छूटि जाइत छैक जीवन कोन क्षण मनक महल ढनमना ढहि जाइछ आ सब किछु बुझाय लागत-व्यर्थ, होयवाक अपन किछु मतलब सौंसे पृथ्वी पर भेटत ने तकने ,ने इच्छे रहत बांचल शेष जे ताकी अपन से संसार , पछिलो पहर धरि छल अपने संग मनक सजल सपना सब कें अप्पन मखमले सन आस-विश्वासें भरल आंचर सं झारैत ओकरा पर पड़ल अवहेला उपेक्षाक गर्दा सस्नेह बड़ मने बहुत भावें भरल संपूर्ण सभकें ल' चल जाए उधिया जेना अनचोखे कोनो बिहाड़ि, आंगन मे सुखाइत डोर पर कोनो आंगी जेकां नहि जानि कोन दिशा आ कोन ठाम, ने बूझल हो मुदा बिसरबो ने हो संभव ओहि आंगीक अर्थ जे नहि छल मात्र एकटा वस्त्र कुंडाबोर लाल स्नेह सिंचित कोनो छुच्छे देहक झंपना ओकर तानी भरनीक एक-एक ताग, तागक तंतु, लालीक संग आयुक छन अनन्त भरि भुवनक अनन्तो रंग-रस-भीजल आ आंगी अंगिये नहि, ल कृष्णक स्पर्श हुनके दिव्य आंगुर हाथ आ ठोढ़क कहैत किछु शब्द, बजैत बंसुरीक ध्वनि-प्रतिध्वनि, चेतनामे सतत लगबैत गुदगुद्दी ओ छल स्वर्गिक क्षणक संगक स्पर्श हुनकहि अमृत ओएह छथि हमर पहिरन , कृष्णें पहिरने रही हम, उड़ा देलक जे बिहाड़ि आंगनक डोरि सं नहि, जेना देहे सं, भेल छी उघार ,लाजें छी नुकायल, भेलि दोबरि एहि टटघर मंडैया मे, जे अछि स्वयं दस ठाम सं भूरे भूर अपने उघार हमर की देह झांपत, की करत लज्जाक रक्षा ? कहै लेल तं अपने मड़ैया ई खास मुदा सेहो भेल कोन कार्यक , मामूली विरड़ो-वसात सं पर्यन्त ने बचा सकल, केहन अजगुत ! तं कि कृष्णे छथि से हमर आंगी हरण कर्ता बिहाड़ि ? कियेक क' गेला एना उघार । भने धेलनिहें ई ढब नव, ककरो सतयवाक उपद्रव-उपाय... मुदा की भ' जाइछ एहि मन कें अनेरे ? के अपन, ककरा लेल एतेक उदास, श्रीकृष्ण ? खेप ७ राधा (सातम खेप) राधा ऑगी हेराएब कोनो तेहन दुर्घट बात नहि। राधा तें उदासो नहि भेलीह। उदास तं ओ आनो आन कए कारणें छलीह। जेना ,शरीरे दुखित पड़लि छलीह। कोनो टा सखि, क्यो बहिना कए दिन सं देख' पर्यंत नहि अयलनि। हुलकियो देब' नहि। दुखित कें होइत छैक आशा आग्रह। बल्कि स्पृहा। स्पृहा ई जे क्यो आबए, आबि क' दू क्षण लग मे बैसय, दःख पूछय। गप करय। किछु कहय, किछु सुनय। मन कें बहटारय। सैह तकरे अभाव आ संबन्धक जोर।जे अप्पन नहि तकरा पर अधिकारे कोन ? जे अपनो अछि आ अधिकारो बुझाइत अछि, वास्तव मे से कतेक अपन ? ई अधिकार आ प्रयोजनक प्राथमिकताक अपन-अपन वृत्त होइत छैक। मनुक्ख-मनक ई लाचारी छैक। ओकरा अपन एहि सीमाक ध्यान राख' पड़ैत छैक आ तहिना संपर्कित-संबंधित समस्त समाजक ध्यान राख' पड़ैत छैक। से जकरा बुतें एकर, एहि बुद्धिक संतुलन नहि रहल ,तकर जीवन कनीक आर मोशकिल।अर्थात्‌ जीवनक मोशकिली धरि अपरिहार्य। राधाक ई सोचब आ दुखी हएब स्वाभाविके जे जीवन मोशकिलीक सवारी थिक। चिक्कन चुनमुन बाट पर पहिया सब गुड़कैत आगां बढ़ैत रहल तं बड़ दिब। सबटा मन विरुद्धो अनुभव पाछां छुटैत गेल आ मनलग्गू अनुभव अपना संग आगां बढ़ैत रहल। कतहु कोनो ठाम पहुंचि गेलाक बाद कए तरहें संतुष्ट कयलक आ कए तरहें अतृप्त राखि देलक। आब फेर एत' सं अनुभवक अतृप्त प्रसंग जे एकहि क्षण पहिने मात्र नगण्य बुझाइत छल, से भ' जाइत अछि खोंचाड़ल मधुमाछी... खोंचाड़ल मधुमाछीमक खोंता । बिना बिन्हनहुं अनेरे ठेहुन सं मूड़ी धरि घनघनौने रहत बड़ी-बड़ी काल। हरदम डेरायल मन-काटत,आब काटत...। कोनो क्षण लुधकत आ काटि लेत। यद्यपि कि काटियो लेत तं कोन ओ अहांक गर्दनि छोपि लेत ? दंश देत। से मुदा भने मधु जकां नहि, विष विशाइत दंश। कोनो गर्दनिकट्ट नहि होइत अछि- मधुमाछी ! -बरु गर्दनियें काटब सुभीतगर, ओ सोचलनि। भने मनुक्ख कें छुटकारा तं भेटि जाइ छैक। आ दिन दिनक विस विसाइत भोग-अनुभूतिक अनवरत क्रम जे संपूर्ण अस्तित्वे के बेचैन कयने रहत। देह-प्राणक किछु टा आन वातावरण नहि बनब' देत। घिसियौर कटबैत रहत। ओही अपन स्वभावक परिधि आ तकर प्रयोजन मे बन्हने रहत। मात्र बन्हनहुं टा रहि जाय, तैयो सुकुर, मुदा ओ तं अहांक बुद्धि सं आर सब किछु कें काटि-बारि क' फराक क' देत। अहीं कें अपन तेहल्ला बना क' छोड़त। लैत रहू। आब एहि मन मे किछुओ क्षण रहि गेलौं कि ओ अहां सं अहींक परिचय तलब करत। यावत-यावत तैयार भ' क' अहां उपयुक्त सोचब आ बाजब, तावत-तावत ई बात, अहांक मनक ई मामूली घटना एकटा समाचार बनि जायत। ई समाचार बिना कोनो माध्यम कें रौद आ बसात पर सवार भ' क' पहुंचि जायत ओत' धरि जत' अहां सोचियो ने सकैत छी। आब बैसि क' कपार पीटैत रहू। ककरा-ककरा आ की-की बुझयबैक ? आ से जकरा बुझयबैक से कतेक दूर धरि ,की मानत ? जतवा मानियो लेत तकरा सं अहांक जीवन कें की सुभीता आ कोन सुख ? हॅं, सुख ? की थिक ? केहन होइत छैक ? कोना होइत छैक ? कतवा होइत छैक ? ककरा होइत छैक ? मुदा... मुदा, किछु छैक तं अवश्ये ई सुख! सुखक अनुभव अवश्ये छैक एहि पृथ्वी पर-मनुक्ख सं ल' क' सब जीवधारी मे।तें रहैए एकरा पाछां व्याकुल-बेहाल! परंतु से केहन छैक-लाल ,पीयर, हरियर ,उज्जर, कारी -केहन ? अर्थात्‌ सुखक कोनो रंगो होइत छैक ? कोनो खास रंग ? -की स्वाद छैक ? केहन स्वाद ? कोनो फलक स्वाद ? चाउर-दालि-गहूमक स्वाद ? तीमन-तरकारीक ?इनारक टटका जलक स्वाद ?एक संगे दू गोटेक इजोरियाक चन्द्रमा बा एकान्त अन्हरिया मे तारा गनवाक स्वाद ? कोनो अनचिन्हार चिड़ैक अपरिचित बोल अकानि चीन्हवाक कोसिसक स्वाद? बा भोरे भोरे जन्मौटी बच्चाक मिलमिलाइत आंखि जकां बाड़ीक कोनो नान्हि टा गाछ मे नव पनगल दिव्य ललाओन दुपत्ती कें देखि अह्‌लाद होयवाक स्वाद ?....घन अन्हार मे ककरो कंठ सं अपन नामक सम्बोधन सुनवाक ? कोनो गंध होइत छैक ? अत्तर-गुलाब सन, बेली-चमेली सन , तेजपात सं छौंकल दालि, कढ़ी पातक बा औंटवा काल लोहिया लागि गेल दूध सन, सोन्हायल डाबा सन,-कथी सन ? जन्मौटी बच्चा सन, तुरंत बियाहलि स्त्री सन आ कि बाध सं घुरल हरवाह-गृहस्थ सन, यमुना जल मे खीचल नूआ-वस्त्र सन बा पाकल कदंब सन बा श्रीकृष्णक सांस सन ? सांस मे केहन निसां छैक ! कृष्णक सांस मे केहन निस्सां छनि ? कृष्ण मे अपने केहन निसां छनि ! कृष्ण निस्सें छथि । कृष्ण माने निसां...। बेचैनी राधाक ,बेबस मनक प्रवाह मे, बहैत रहल, यमुना धार सन, राति, रातुक अन्हार काल मे । सब सूतल अपन-अपन ठाम। धेने सब रातुक विश्रामक स्थान। चिड़ै चुनमुन्नी अपन-अपन खोंता। माल जान अपन थैर-बथान। आ मनुक्ख अपन-अपन चौकी-खाट-मचान ! निसभेर निन्न मे डूमल जीयैत। मात्र ई एकटा एकसर मनक विकल नियति, चुपचाप सूतल रातिक अन्हार मे अपन निस्बद्द चलैत रहल-बहैत गेल! राधाक मनक प्रवाह यमुना भ' गेल। एतवो पर रच्छ छल , मुदा कहां बांचल समयक इहो एहनो सुभीता, सेहो तं आंजुरक जल भेल। कतबो यत्ने बचा क' रखवा मे कहां भेलहुं सकारथ ? सबटा बहि गेल। कनीक काल रहल भने भीजल तरहत्थी-माने स्निग्ध , सेहो अगिले पल ऋतुक उष्ण प्रभावक वेग मे निठ्ठाहे सुखा गेल। जानि नहि ओ आंजुर आ आंजुरक जल कोन क्षण अलोप भेल कोना बिला गेल, कत' गेल ? सूर्य लग गेल ? चन्द्रमा लग गेल कि तारा लग ? वा माटि मे, पोखरि-इनार-धार, कोनो मे फेर सं घुरि गेल, जा क' मीलि गेल जल- अपन उद्गम सं, उत्स सं वा भाफ बनि क' बन' गेल मेघ ? कर' गेल बरखा,? जल कत'गेल ? आंजुर भरि जल कत' गेल ? ई किछु विलाप जकां राधाक मनक परिताप अपनहि अभ्यंतर मे मुखर चलि रहल- अपनहि कहैत-अपने कें सुनैत । अपने सं सभटा पूछैत। ई केहन विचित्र आत्म सम्बोधन ? अपनहि मन सोर पाड़य अपने मन ! सौंसे गाम-टोल अछैत , टोलक लोक, संबंधी, सखि-बहिनपाक एहि पसरल समाज आ संसार मे कोनो एकटा मन, एहन असकर एतेक एकान्त काटि रहल व्याकुल पल-पल जीवन । अपनहि विडंबना कें स्वयं करैत आत्म सम्बोधन.... -"राधा'' ....!! एं ई की भेल कत' सं कोन आकाशवाणी -"आब केहन मन अछि अहांक राधा !'' के पूछल ? बाजल के ? के आयल पूछ'-कुशलक्षेम, ककर थिक ई प्राणबेधी वाणी ? दुर्लभ स्वर्गिक संगीत स्वर थिक ककर ? रातिक एहि निस्बद्द एकान्त अन्हार मे के बाजल, ककरा भेलैक हमर चिन्ता ? के आयल पूछय-हालचाल,... अच्छा, तं... ई थिक हुनके ताल ? राधा कें कानमे स्पष्टे क्यो पुछलकनिहें। किछुओ संदेह नहि, सत्य छैकः 'केहन मन अछि अहांक राधा...' ई थिक सद्य : अनुभव, कोनो टा भ्रम नहि। मुदा तखन राधा कें कियेक लगलनिहें ई जिज्ञासा, पुरुष-कंठक नारी-स्वर मे प्रतिध्वनि ? यदि पुछलनिहें कृष्ण तं पछाति सैह प्रश्न करैत स्त्री के छल ई जकर स्वर छल ? ई अछि कोना संभव ? मुदा थिक तं ई सत्य ,संदेह कथमपि नहि। सत्य तं होइत अछि सत्ये। ज्वरे परजरित एहि देहक ताप पर जमुना जल भीजल पीतांबरी जकां के एना पसरि रहल-ए, आलसे निनियाइल बसात... जमुना मे झिलहरि खेलाइत, निस्बद्द राति। खेप ८ राधा (आठम खेप) सत्य तँ होइत अछि सत्ये मन नहि माननि कोनो भावेँ कोनो तर्के, बेचारी राधिकाक, विकल प्राणे सोर कयलनि, त्यागि क सब टा लज्जा आ मर्यादा -कतऽ छी कृष्ण! कियेक ई कऽ रहल छी, एना माया? पुछैत छी यदि कुशल तँ सुनबो करब, भनहि एक्के क्षण बस। एना कियेक सिनेहकेँ खौला रहल छी लोहियामे (कड़ाही केर) दूध सन, विशाल कालक चूल्हिपर आब कतेक औंटब आर! कतेक बनायब गाढ़? रस आ वस्तु दुनू अपना अपना कऽ रहैछ संगे मुदा स्वाधीन, तखनहि दुनूक मर्यादा आ दुनूक स्वाद नहि तँ जे कनिक अव्वल हो से बर्बाद, अस्तित्व ध्वस्त ई नहि स्नेह केर निस्पत्ति, राधाक मनोदशा किछु तेहन जे कहल नहि जा सकय। एतेक युगसँ एतेक युगसँ आइ धरि मनुख जीवनक यात्रा सृष्टि-सृजनक महागाथा आ अनादि-अनन्त जीवनक अनुभव सब टा तँ मनुक्खकेँ परिचित छैक, जीवनक सर्वश्रेष्ठ आनन्द, जीवनक सर्वोच्च शोक। सब अनुभव नितान्त परिचित! प्रेम, घृणा, विश्वास, विश्वासघात, हिंसक व्यवहार! सब तँ परिचित अनुभव आ सभक अभिव्यक्ति परम्परे आ प्रथा जकाँ चिरन्तन् ! किछु टा अपरिचित आ प्रथम नहि। मुदा तथापि राधाक ई मनोदशा कियेक बुझा रहल अबूझ, पहिल बेर- बिल्कुल प्रथमे बेर जेकाँ ने व्याख्या संभव आ ने कोनो परिभाषा, ई केहन मनः स्थितिमे कोना पड़लि राधा : हारि पछताइत उत्कट व्यग्र भेलीह- चतुर्दिक् अन्हारकेँ छानल जे कतहु होथि कृष्ण, नुकायल, दिक् करबा लेल। कतहु नहि, कोनो नहि लक्षण, आभास! हारि पछता, अहुँरिया काटि बदललनि करौट अखियासऽ लगलीह ओ, स्वर: “-आब केहन मन अछि राधे अहाँक?’ : तं कृष्ण अहाँ -आब केहन मन अछि राधे अहाँक’? स्त्री स्वरमे इयेह प्रश्न&प्रतिध्वनि ! तँ की राधा केलनि ई आत्म संबोधन। हृदयमे कृष्णक आत्मस्थापन, छल की राधाक ई आत्मसंबोधन ! बड़ अशान्त बड़ व्याकुल, केहन दन मन.. खेप ९ राधा (नवम खेप) किछु ने उत्तर कतहुसँ सब किछु पड़ल अछि शान्त सब दिश रातुक अतल अन्हार आ निश्चिन्त निद्रालीन गामक लोक । सभ टा माल जाल, पंछी पखेरु चुप्प दबकल । अपन-अपन ठौर आ अपन ठेकान समय स्वयं बनि गेल हो जेना सबहक कान एक मात्र, एकमात्र, नाक आ एकहि मात्र आँखि सौंसे आबादीक भऽ गेल हो- जेना एकीकरण, एकहि एक चेतना करण, एकहि बोध एकमात्र अस्तित्वक भास सौंसे सब किछु भऽ गेल हो जेना आकाश से बूझि मनुषकेँ अब्बल-दुब्बल चुपचाप आकि सूति गेल हो स्वयं बनि पताल ! माने सब तारागण समेतक चन्द्रमा आ रंग, रसक बसात लऽ कऽ आ सूतल आकाश अतल तल मे जा कऽ ओहि पताल विलक्षण मनक ई प्रवाह आ बुद्धिक दिशा राधा, एहुक नहि कोनो टा अछि उत्तर, भला सोचू जे ई आकाश जाऽ कऽ कोना भऽ जायत पताल यदि सेहो तँ कतऽ जायत पताल, कोन बाटे उतरत ? वा चलि कऽ गेल होयत ? जँ भरि जायत एही अनन्त आकाशसँ ? दोसर जे, कोना आँटत एतेक टा आकाश ओतनी टाक पताल मे ? के अंटाओत आ फल की तकर ! हँ, से तं अछि ठीक मुदा हमरा लेल एकदम साफ कहाँ कत्तहु देखाइए एकहु टुकड़ी मेघ एक्कहु टा, एतय धरि जे कनियों लुकझुको तारा, कत्तहु कोनो कात ? कोनो कोन मे ? कहाँ सब टा तँ अछि भेल अदृश्य - अंतर्धान, सोझाँ जे विशाल विस्तारसँ पसरल महा अन्हार राति कहाँ किछु अछि शेष कोनो ध्वनि कोनो ज्योति कोनो स्पर्श कोनो बोध जे स्वाधीन, कहि आ बुझा सकय अहाँक होयबाक अर्थ सेहो सदेह आ जीवन्त प्राणक ? कहाँ किछु कतहु ? सब टा अछि बनि गेल समुद्र कि योजन योजनक अन्हार पताल । ककरो किछु ने सूझय, किछु ने भेटय, तथापि किछु ने किछु तकबे करी से मनुक्खक लुतुक आ अभ्यास तेँ, लागल अनेरे एहि अन्हारक सिन्धु सँ खसयबा मे मनक जाल – बझवै लेल जानि ने माछ केहन ? समस्त अस्तित्व फाटल पुर्जी सन उधिया रहल कृष्णक प्रथम पत्रक पुर्जी, सौंसे भेल, भरि पृथ्वी, अनन्त पताल धरि, चलि गेल, छूटि गेल अपना हाथ सँ, उधिया रहल ई मन स्वयं हुनकर प्रथम पत्रक फटल पुर्जी भेल, यद्यपि शब्द अछि कंठस्थ सभ टा किन्तु हुनक स्पन्दित उपस्थिति, हुनक होयवाक निरन्तर अनुभूति आभास केर स्वरूप तँ टूटि गेल ई की भेल ? हमरा संगे ई की भेल ? बड़ रही उदास एक दिन अहाँ माधव, कोनो टा ने करैत रही गप्प शप्प , खोंटैत मात्र दूभि हरियर, ताहू पर करैत जेना स्वयं के मने मन गंजन आ पश्चात्तापी आघात, -‘दूवि भेल तँ दूरि गेल ? अनेरे कियेक ओकर हो एना दुर्दशा आ सेहो अहाँ सदृशक हाथ सँ ? ई तँ थिक हिंसा एक प्रकारेँ हिंसा, अन्याय ! नहि ?’ भंगठल खेलौना ठीक भऽ गेलापर कोनो नेनाक आकृति पर जेहन, अबैत छैक स्वर्गसँ चलल काल हर्षक आभा मृदुल नान्हि टा ठोढ़ पर आ आँखि मे चमक आनन्दक, सएह अनमन सएह भऽ गेल रहय अहूंक समाचार ,मन अछि? केहन दुर्लभ विहुंसी छल ओ ? सौंसे भुवनक सुखक सूत्र बिहुंसी ! अहाँक, अछि मन ? ताहि दिव्य विहुंसी के देखिते हम ताकऽ लगलौँ अपन नूआक खूट बड़े व्यग्र बड़ उताहुल । -“की भेलौ राधा?” अहाँक एहि प्रश्न मे रही बाजल जेना । - खूटमे सरिया कऽ एकरा बान्हि कऽ धऽ लैत छी, अहाँक ई मुस्की, माधव ! अनन्त कालक चुप्पीक उपरान्त ; सौंसे सृष्टि जेना हम सत्ये लैत अहाँक ठोर सँ विहुंसी अपन आंजुर अभागल सब सँ बान्हि लेने रही खूट मे विहुँसीक गीरह ! बन्हितहिं रही कि अहाँ अनचोकहि हमर जुट्टी के घीचैत जोर सँ कहने बिना किछु- कष्ट देबा धरि- जोरे हमर मूड़ी पाछाँ देलौं झुका आ कृत्रिम क्रोध सँ कय गेलौं हमरे आँखि बाटे हमरे अभ्यंतर मे बलात् प्रवेश, स्वागत ! कहाँ बाँचल रहल हमरा बोध । नहि बाँचल । अहाँक हाथें घीचल जाइत अपन दुखाइत केशक । मात्र एतबे तँ रही कहने आधा तामस आ पूरा स्नेह सँ -‘करबें सैतानी फेर, हमरा संगे? बाज...बाज मोटकी?’ से पूछब बोल नहि छल - स्वयं छल अनंत प्रतिध्वनि – निनादित ब्रह्माण्ड अपने आप अहाँक ओहि बोल सँ गुंजित अनुगुंजित प्रतिगुंजित अनवरत एहि प्रक्रियामे बनि गेल छल महानादक एक टा त्रिलोक व्यापी आवर्त ! प्रत्यावर्त’ गनगनाय लागल छल हमर सृष्टि ! बहुत किछु तँ अहिना अनेरे होइत अछि जीवन मे, अनेरेक ओही आवृत्त पुनरावृत्त पड़ल पथार मे स सस्नेह आ श्रमपूर्वक ताकय पड़ैत छैक मनुक्ख केँ । मनुक्ख, ताही प्रकृति प्रक्रिया स मात्र तकबा लेल, जीवन-प्राण लेल उपयोगी, तत्व तकबा लेल आयल पृथ्वी पर । सएह कऽ रहल । तहिया सँ आइ धरि सएह क रहल । तहिया- तकर बादो बहुत युग धरि कहियो नहि भेल विरत- विरक्त ने एकहु रती उदासीन अपन एहि जीवन-गति सँ । लैत अपन एहि नियति केँ कौखन प्रेम, कौखन आदर्श, नैतिकता कौखन धर्म धर्मादेश कौखन आओर नहि तँ बेशी काल लोक लज्जा-मर्यादा । एतेक विस्तृत आ जटिल भेल चल जाइत मनुक्ख जीवनक अनादि अनन्त पथार मे सँ एतेक रास अकटा मिसिया बीछ कऽ करब फराक आ अपना योग्य अन्न कऽ लेब अपना दिस अपन पथिया- ढाकी- अर्थात् अपन वासन मे- केहन मोश्किल आ कए काल अकच्छाह सेहो तँ ! मनुक्ख भरि जन्म कि अन्नक पथारमे सँ इच्छित अकटा मिसिया बिछबाक लेल ! भेटल छैक लोककेँ एतबे लेल आयु ? -एतबे लेल नहि अवश्ये, मुदा इहो छैक आवश्यक राधिका ! एहनो नहि बुझियौ एहि बातकेँ व्यर्थ । कए बेर सुनि गेलाक आ चुप रहलाक बाद, कृष्ण अहाँ स्वभाव सँ एकदम अप्रत्याशित धीर-गम्भीर स्वरमे एतवा कहि कऽ आँगुर सँ सरिया देने रही हमर तेल बिन भऽ गेल जट्टा जट्टा केशक । एकटा कपार पर लटकल लट। -जेना ईहो तँ ! सौंसे ब्रजमे कतेक रास छैक लोक, कतेक रास गोपी सब । लोक गोपीक कतेक रास केश सुन्दर आ सुन्दर, बहुत रास.... तहिना बात, घटना आ धान-पान-मखान संगहि जनमल अनेरेक दूभि निफल लत्ती-कर्मीक महाजाल ! आदि तकरा बीचहि सं त अपना लेल’ उपयुक्त आनऽ पड़ैत छैक मनुक्ख कें । एहि मे एकहु रत्ती नहि छैक उदास आ विरक्त होयबाक बात । बल्कि उन्टे एकरा जीवन कें आगाँ लऽ जयबा लेल, सुख कें आगाँ बढ़यवा वास्ते आ दुःख सबकें बीछि-बीछि कऽ फराक करैत अपना सुभीताक बाट करवाक वास्ते सृष्टिक देल एकटा अवसर होयवाक चाही, से एकर उपयोग । एकरे तं राखऽ पड़ैत छैक ध्यान । ध्यान बड़ मूल्यवान छैक मनुक्ख-देहक रक्त-प्रवाह मे राधा ! मुदा आश्चर्य जे सेहो नहि छैक अंतिम अनिवार्य । ओकरो छैक अपन आयु आ अपनहि अर्थ, सीमा । मनुक्ख-मनुक्खक मोताविक छैक तहिना उपयोगिता सेहो ओकर । छूटय नहि बुद्धिक ई सूत्र । सैह चेतवैत रहैत अछि हमरा विवेक । सुख तं सुख, जे आनन्द पर्यन्त नहि होइत अछि तेहन पोखरि-धार जाहि मे सतत निर्मल जले टा छल-छल करैत रहय । प्रवाहित होइत रहय । थम्हलो रहय तं नहि भऽ सकैत अछि ओ एकदम्मे सेमार-करमी बा अन्य दृय-अदृश्य वनस्पति सभ सं सर्वथा मुक्त, मात्र जल शीतल सर्वथा मनुष्येक उपयोग आवश्यकता भरि । तें आनन्द सन आनन्द ! तकरो मुदा एकटा काल सीमा पर, यथा समय झाड़ऽ–पोछऽ पड़ैत छैक । ओकरा आनन्द बनल रखवाक वास्ते समय पर ध्यान सं स्नान करबऽ पड़ैत छैक, नव धोआ वस्त्र पहिराबऽ पड़ैत छैक । यमुना पर्यंत सतत् यमुना नहि रहि पबैत छैक राधा । ओकरो नहाबऽ पड़ैत छैक । एकरो वस्त्र बदलऽ पड़ैत छैक-नव धोअल वस्त्र ! सब लोक तें अपने-अपने आनन्दक माय होइत अछि । आनन्द ओकर शिशु-संतान ! तकरो लेल करऽ पड़ैत छैक भरि प्राण ताकुत राधा ! पोसऽ पड़ैत छैक... से सत्य । मुदा नहि बना दी आनन्द कें जुआन, परिपक्व ! कथमपि नहि। जनैत छें अपन आनन्दकें कदापि जुआन नहि होमऽ दी । रखने रही ओकरा कोरा-करेज आ बांहि धरि मे समेटि इच्छानुसार दुलार करबा लेल मोहक शिशु ! आनन्द बच्चे आनन्द ! जवान आनन्द, भऽ जाइत अछि किछु आन बात : बुझबा लेल कहैत छी ई जे हमर मित्र अभिन्न छथि अप्पन । महान । हिनकर आनन्द भऽ गेलनिहेँ जवान ! तकरे टा आब ई सब उपद्रव छनि भरि जीवन जगत, निर्गुण-सगुणक ज्ञान-ध्यान । सएह बनल छनि हिनक सामर्थ्य तेँ सैह बनौने छनि निरानन्द । यद्यपि सभक अपन-अपन बाट होइत छैक ! अपन डेग, अपन-अपन गति ! हम तँ भऽ गेल रही हतप्रभ ! वाह रे कृष्ण ! वाह रे अहांक ज्ञान ! ई केहन गप्प आ सुझाव ? आनन्द कें नेने रखने रही... जवान नहि होअ दी ...उद्धवक भऽ गेल छनि आनन्द जवान ! खेप १० गुंजन जीक राधा- दसम खेप कहानी बेश बढ़िया कथानक बेश चिक्कन मुदा सौँसे कथा मे हमर ने मन ने हम! कहल जे नेत की से बुझत जे लोक की से एही बीचहि मे तँ सभ फाँक टा रहि जाइछ बुझब बंद केवाड़ बुद्धि विवेक वा एकर किछु आओर अभिप्राय अपनहि सँ पुछैत-पुछैत अपनहि प्रश्न भऽ गेल मनक सेहो एकटा फराके दशा होइत छैक। राधाक सएह छनि। दुःखित छथि, दुखिते बनलि रहऽ चाहैत छथि, दुःख सँ निकलऽ चाहैत छथि। दुनू चाहबाक- इच्छाक अपन-अपन बेर होइत छनि। ईहो अनुभव विचित्रे कहबाक चाही। भोर मे मन कहैत रहैत छनि जे बात; दुपहर मे नहि रहि जाइत छनि से मनोदशा. साँझ होइत-होइत परिस्थिति किछु आर भऽ जाइछ आ अन्त मे एकटा चारिमे स्वभावक भऽ जाइत छनि राति अबैत-अबैत...मनक बात। स्वयं अपनहि हाथ सँ छहलि कऽ छुटि गेल डोलक डोरी जेकाँ गंहीर इनार। किछुओ टा कहाँ रहि जाइत छनि बुझवा योग्य, अपन सुभीता वला समाचार. सबटा जेना अनचिन्हार भऽ जाइनि, किछु टाने चिन्हार। कि तं मने बनि जाइत छनि समस्त ब्रजभूमि संसार । बा पड़लि-पड़लि रचि लैत छथि संसारे केँ अपन मन । एहना मे निश्चिते जल नहि, अन्न नहि आ स्वर नहि संगी साथी नहिँ तेँ नहि कोनो तरहक वाणी-बोलीक व्यवहार । सबहक कउखन बलात् -स्वयं राधा कृत अनुपस्थित आ कउखन स्वतः भऽ जाइत से ! अर्थात् ओना तँ अनुमान होइछ सब किछु चलिए रहल अछि लोकक दिनचर्या आ आ जरूरी समाचार । सबटा अपना गतियेँ अपन हिसाबेँ अछि व्यस्त ! आँगन निपनाइ, जाड़निक ओरिआओन सँ लऽ फूल-दूभि तुलसीक ब्योँत आ ठाँव-बाट धरिक प्रक्रिया, अथक अनवरत चलि रहल अछि। आ हम! राधाक प्रश्न राधाकेँ ! हम कतऽ छी? कतबा आ कियेक ? हम एहि दिन-राति आ चलैत बीतैत समय मे छी वा नहि छी? जँ छी तँ कोन अंश मे आ नहि तँ, तँ कियेक नहि छी? बाटक कात निस्सहाय ठाढ़ लोक जकाँ कियेक भऽ गेल छी हम ! सोझाँ सँ एक एक कऽ जा रहल गाड़ी, बटोही सँ लऽ कऽ वस्तु जात लादल बड़दक घंटी टुनटुनबैत गाड़ी, घोघ मे कनैत कनियाँ, आ कउखन घरहटक बाँस वा काठक सिल्ल लादल। सबटा तँ कोनो ने कोनो रूपेँ सृजनेक व्योंत। कनियाक विदागरी सँ लऽ बटोहीक चलब अपना-अपना गन्तव्य धरि आ बाँस-काठ सँ लदल गाड़ी घवाहो कान्ह पर ऊघैत बड़दक बेबस जोड़ा- किछु रचने मे अछि लागल! मन सँ बा कर्तव्य सँ , बा कोनो दबल आवश्यकता- विवशता सँ । कऽ तऽ रहल अछि रचने। श्रम-फल निर्भर परिवार-बालबच्चाक परोक्ष प्रतिपादन आ निर्माणक काज। प्रतिपल रचना होइत अछि। से बात तँ बूझल अछि। मुदा एहि रचना सँ भऽ वा कऽ देल जाइत अछि कोनो-कोनो मनुक्ख वंचित, तिरस्कृत तेकर तँ नहि अछि ज्ञान! ध्यानो कहाँ गेल पहिने कहियो... जे सोचितिऐक एकर मर्म, रचना क्रमक यात्रा सँ वंचित होयवाक अभाव आ तकर मनोभाव ! कहाँ गेल ध्यान। वंचित परन्तु करैत रहलैक अछि सतत् कोनो ने कोनो सत्ता। सत्ता माने प्रभुता। प्रभुता माने राजा, राजा माने राजा । कए टा राजाक राजा- महाराज! सत्ता माने महाराज। श्रीकृष्ण छथि की? हमरा कऽ देलनि सृजन सँ विरत, एक कात असकर ! की छथि ओ ? आ स्वयं हम केहन मूर्ति आ अकर्मण्य, चुपचाप . हुनकर देल समय केँ सहजहि स्वीकारि कऽ पड़लि छी दुखित। अपनो तँ नहि रमैये मन कदाचित् एही मे ? पड़ल-पड़ल अपन आ मात्र अपनहि मनोनुकूल संसार रचै मे, ताहि मे एते असकरे बSसै मे? कतहु चाहैत तँ नहि अछि मन - रही अहाँ एहिना रुसल किछु आर दिन, मास.. रुसले रही हमहूँ , नहि करी किछु टा काज नहि आबी, नहिये टा आबी अहाँक लग पास। रहू रुसले बरु किछु आर दिन... चीन्हि सकी हमहूँ अपना केँ आ भऽ सकय अहुँक चरित्र आ हृदयक परिचय किछु आर एहि बेर मन तैयार अछि, आब सह्य करबा लेल नहि बुझाइत अछि प्रस्तुत कऽ लेबऽ चाहैत अछि- एहि पार कि ओहि पार! आत्मीय चिन्हार हँसीक स्वर, बुझलनि, आकुल प्रश्न कहलखिन कृष्णकेँ मनकथाक एहि निर्णय-बिन्दु पर राधाक कान मे पड़ल कोनो आत्मीय चिन्हारक हंसी-स्वर! -अहाँ एना कियेक हँसलौँ एतेक जोर ठहक्का दऽ? -’बेकूफ, एहन विषयक की हेतैक एहि पार कि ओहि पार? ई की कोनो यमुना छै... यमुना तँ बड़ दयालु माय अछि राधा ! ओ तँ प्रस्तुत केने छैक सब लेल अपन सब किछु। ई परिस्थिति नहि यमुना। एकर कोनो नहि छैक ई कात ओ कात। ई धार निरन्तर आ निर्बंध छौक । चाहला सँ सेहो नहि छौक इच्छित परिणाम! कालधाराक आरम्भ आ अंत, स्वयं कालेधारा सखि! की करओ क्यो, तोहूँ की करबेँ आब यैह छौक तोरो गाम ! एहि सभ मनोभाव केँ गाम जकाँ मान आ बिनु तमसयने, कुंठित मोने सोच किछु-किछु काज, किछु लोकगर उपाय, नव बाटक संज्ञान! निकल घर-आंगन सँ, चुपचाप नहि रहै, आब बाज, राधा बाज... नहि कर चिन्ता निकल अपना मन सँ आत्मा केँ करऽ दे विचरण भरि वज्रभूमि, सौँसे संसार! जुनि हो एना जीवितहि मृत । जीवन मनुक्खक सामर्थ्य छैक । एही लेल होइत अछि मनुक्ख, तोँ बूझ ई बात । सृष्टि स्वयं मनुष्येs पर तँ जीबैत अछि। कात मे भरलो लोटा जल रहैत छौक राखल लागल रहैत छौक उत्कट पियास नहि पीयैत छेँ जल, करैत रहैत छेँ छट पट अपना केँ प्रताड़ित करैत, बुझाइत रहैत छौक उत्कीरना करैत छेँ ? नहि राधे! ई छैक एक प्रकारेँ आत्मदाह। स्वयंकेँ डाहैत मारैत रहैत छेँ! एहि मात्र अपनहिँ आत्मलिप्ततामे बूझल छौक जे अपने ओतेक नहि मरैत छेँ तोँ जतेक मृत्यु होइत रहैत छैक कतहु अन्तऽ आन आनक । आन-आन ठाम... एक बेर हमरा दिस ताकि ले । देख हमरा एक बेर.. खोल आँखि-आँखि खोल। बंद आँखि मे वास्तविक जीवन आ संसार अँटियेनहि सकैत छैक। बुझवाक चाही मनुक्ख केँ। बंद आँखिक सेहो मर्यादा छैक, मुदा कोनो मर्यादा सृष्टिक वास्तविक उत्तरदायित्व-मनुक्ख जीवनक उत्कर्ष सँ बेसी नहि । खेप ११ गुंजन जीक राधा- एगारहम खेप जड़ि से बुद्धि छैक। मनुखे सब मर्यादा थिक -समाज तकर प्रयोगधाम, सभक होइत छैक अपन-अपन खास बन्दाबन धाम हमरे-तोरे जकाँ! आँखि खुजले पर छैक देखब संभव बंद आँखि मे सृष्टि नहि, तकर भ्रम टा जीवित भेटैत छैक- सृष्टिक रस-स्वाद नहि, आँखि खोल... तखन बेचैनी मे राधा आँखि खोललनि। प्राण धक् रहि गेलनि. अरे श्रीकृष्ण ! हृदय आर्तनाद कऽ उठलनि- ‘अहाँ कतेक दुब्बर भ’ गेलौंहें कृष्ण! किएक? -’तों जे एतेक दुबरि भ’ गेलेंहें...’ राधाक कान मे कृष्णक मर्मबेधी हंसीक गूंज-अनुगूंज आ प्रतिगुंजनक अनन्त आवर्तनक खेल चलि रहल छल।बिरड़ो मे पड़ल कदमक एकटा टटका-टटका हरियर पात जकाँ चकभाउर द’ रहल छलीह। से राधा छलीह। अपन सर्वस्व कें कान्तिमय अनुभव करैत ताहि काल ओ स्वयं संॅ परिचय पात करैत लोक छलीह। रोम रोम सर्वांग भेलि छलीह एहन !! लाल रंग मे प्रेम लिखल हो ए घृणा लिखल जाय कारी मे सभ मनोरथ हरियर.पीयर मेघ रंग हो अंग वस्त्र पहिरल मोनक पाकल प्रस्फुटित विलास ए विकलताक चरम बिता क’ लेब’ आयल आश्रय त भेटलैक यैह मनुखक प्राण ! प्राण धारण कैने एउज्जर दप.दप परिधान। सब टा रंग तिरोहित मोनक रंगशाला मे मात्र बाँचि गेल एक रंग जे सत्य तं रंगे नहि थिकए सब रंग कें पोतिपाति क’ करय दिअय प्रस्थान कि सबकें तेहन करय ओ आत्मलीन जे बांचय नहिं अस्तित्व तत्वतः कोनो आनक। रंग सात टा, स्वर सातक बनि जाय स्वतः वाणीए ध्वनि एनाटक निःसृत होइत कतहु भरि पृथ्वी.बृंदाबन मे हुनकर मन मेए अहांक मन मेए हम्मर मन मे.सबहक मन मे असली यैह आ मात्र एतबे रंग. जे होइछ भरि संसार मनक रंग! बस। कतय भेटत आब से सबटा सोखल धरती जे... किंतु तथापि रंग नहिं भ जाइत अछि सब समाप्त कोनो एक बासन मे घोडल हेरा गेला पर माटि बहुत.बहुते बांचल रहैत अछि भरी सृष्टिक अनगिनित कार्य व्यापार मे कोनो ने कोनो तत्वक लेने रस. एक रती किछु कनिक रास धरतीक ऊपर सेहो बांचल रहि जाइत अछि रंगक आभास । चीन्ह लेल जे हेराएल से रंग लाल छल कि पीयर.हरियर ! रंग समाप्त नहिं होइत अछि संसारक हमर श्याम रंग अहांक गोर नहिं हएत ख़तम कियेक तं लोक आओत आ अबितहिं रहत निरंतर ई संसार अनवरत अछि अनन्त! यावत लोक रहत ताबत ई रंग रहत . हमर श्याम रंग राधा अहांक गोर रंग ! ई खिस्सा सब लोक कहत । भरि सृष्टि रहत आ सुनत !! खेप १२ फेर तं वैह संसारक गाथा! फेर सृष्टिक वैह सबदिना चर्च-वर्च। बीतल रातिक लेभरल बिसरल अनुभव सोझांक दिनक सब उद्योग उपाय मे अपस्यांत जीवन घाम चुअइत देह-माथक रेखा में फंसल पसेनाक अति सूक्ष्म जलप्राण-कण करैत चक चक अनमन जेना प्रोषित पतिकाक निर्धन सेहन्ताक चमचम ठोप! आँखि-भौंह मध्य भाल पर ठीक उूपर। यद्यपि जरल कपार अभागलिक तथापि । सौभाग्य-जगमग ठोपक विलास हो जाग्रत, थिक संभव ई बात स्त्रीक करुणा, लज्जा कें बचा रहल हो दया, महाभाव बन’ नहि दैत हो हीन-अभागिन। रक्षा मे हो सजल शस्त्र सन सोहागक ठोप ओकर। ओना ई एतेक दया आ एहन कृपा कथीक स्त्री लेल? कि तं दुर्गन्जने-दुतकार आकि किछु एहने मामूलियो दुःख पर सहानुभूति-सम्वेदनाक वर्षा, जे बनि जाय मनहि पर पहाड़! किएक से ? देह दशा नहि ओकर तइ जोग करय स्त्रीयो कृषि काज ? दूहि क दूध, पोसय बछड़ू चरबय गाय। ओ कि मात्र मक्खने टा मथि सकैए, रान्हि सकैए भात। एहि सं फाजुल नहि ? किएक नहि हर-बड़दक दिनचर्या सकैत अछि सम्हारि ? किएक नहि जोति सकय हर खेत करय आबाद हाॅंकि क ल’ जाय बैलगाड़ी बिदागरीक ? नहि रहि जाय पुरुषे बहलमान सब काल अनिवार्य। किएक नहि क’ सकय ओहो ई सब काज ? स्त्री-हम सक्षम नहि सब ? लिखी पोथी बोॅची सब शास्त्र ? किएक नहि संभव ई सब जेना पुरुष बुते ? बान्हि मूड़ी मे मुरेठा, ठेहुन धरि नूआंॅ समेटि ? नीपय जे आंगन-असोरा, नहि कोनो संकोच तं बाध जाय हर जोतबा मे की बाधा, की लज्जा आ व्यर्थक विचार? ‘‘ओहनहुं तं असकर पुरुष सदाय सं करैत श्रम कठोर जीवन यापनक उपाय जोतैत हर चीड़ि क’ जाड़नि, उूघैत बोड़ा-मोटा क’ क’ बहलमानी बड़य थाकल बुझाइत अछि। बड़ ठेहियायल, असोथकित। कठमस्त देह पर्यन्त भ’ गेलैये सिंगार-विलास विमुख।’’- कहने छलि रमकनियांॅ भौजी। बड़ छलि उदास, बनल छलि स्वयं भरि देह पियास! तथापि लाज सं सिहरलि।-कंठ आ देह प्राण अतृप्त, आगि लागल हो जेना सौंसं शरीर। ई अनुभव केहन विकट कतेक अनचिन्हार स्त्री-पुरुखक ओहनो भेटल से सुन्दर स्नेह-काल होयबाक छल जे शृंगार श्लथ रस धार स्नानक उद्दाम अवसर ! सेहो बनि जाय जं मरुथल-मरुथल चारू कात उड़ैत बालुक असकर एकान्त तरबा सं माथ धरि धहधह ताप करय की तेहन लोक अपना आप ? बुधिबताहि रमकनियाॅ भौजी ! खेप १३ केहन रंगक रमकनियां भौजीक दुःख, केहन रंगक बूझल से अभावक एहि सं पहिने कहां छल बूझल हम स्त्री, ओ आ ओ कतेको आन, कहां छल बूझल ई अनुभव जs चलि रहल देह मे सब देह मे, छैक जकर संबंध मात्र देहे सं पहिने । तकरा बाद मिलि जाइत अछि ओहि देह-गमन मे मन! घर सं असकर विदा भेलाक बाद जेना बाट पर आगां रस्ता चलैत कोनो एक ठां भेटि जाय अपनहि कोनो मित्र अनन्य आत्मीय। मुदा प्रथम तं ई देह ! एकर गीतक, भास होइत अछि बड़य मनोहर बड्ड मार्मिक, दुर्लभ स्वादक तेसरे स्वर्ग ! यद्यपि प्रतिदिन होइत अछि घर मे तथापि नव आ नव रसक भोजनक विन्यास जकां बदलल स्वादक एकटा अलगे स्वर्ग जकां। करैत अछि सृष्टि स्वयं सभ बेर यैह देह, एकर गाना ! मुदा तों एखन ओते नहि बुझि सकबें एक रती आओर फुलयतौ ई सुन्दर काया- बनबा लेल फल, देबा जोग गाछ ! सुगंधि उठतौक तं तकbत रहबें अपने पहरक पहर बौआइत ! कतहु ने कतहु अपनहि भीतर, कतेको ठाम मुदा भेटतौ कहाँ¡। से त फेर क्यो अपने कहतौ अनचोखे लग आबि- ‘ एना किए रहलेहें बौआइत रधिया !’ बिहुँ¡सतौ। जादू करतौ। मोहि लेतौ। मादक बना जेतौ। सुखक छटपटी लगा देतौ। आकुलताक टटका कबाछु मलि देतौ- अंग-अंग, कुरिआइयो ने सकबें लोक सभक बीच। तेहन सुख उत्सुक लाचारी! भेल नहि छौक अनुभव।’ ई सब की भ रहलए ? हमर मोन आ देह एना किएक क रहलए ? पुछबहीक आकंठ विकलतें। ओ फेर बिहुंसतौ। गाढ़ क देखतौ आंखि, तकर भाषा बेचैन बड़ बुधियार रंग मे कहतौ-‘ प्रेम !’ यैह छियै एकर आवेग , देहक आओर फुलाएब, बनैत जाएब अंग सभक अत्तर-गुलाब! बनबा वास्ते फलदार झमटगर गाछ। एखन तं छौ तोहर कदम्बक दू टा टिकुला। फूट’ दहीक होब’ पूरा-पुष्ट, प्रबल, पैघ ! सबटा वैह देतौ बुझा...अपने एकर रंग आ रस !’ चिहुंकि उठलि ओ, खोललक आंखि। तं कि सुतलि छल निसभेर ? मात्र मुनने आंखि नहि छल पड़लि एतबा काल ? रमकनियां भौजी कोना जगा गेलि। एतेक बरखक बाद, कोना क’ एहन दशा मे ? उढ़ड़ि गेलि जे, लोकक बोली मे-लोकक की, पुरुखक समाजक भाखा मे, कए बर्ख ने बीति गेलै…। आन पुरुखक संग बहुत दूर देस जाक’ ओ फेर बसौलक अपन घर! समाजक एहि गामक उढ़ड़ी रमकनियां भौजी ! कियेक देखलियै एना ई स्वप्न ओकर ? बा आएलए वैह स्वयं क’ क’ हमरा पर स्नेह, दया ? हो जे मुदा, हम तं कहियो नहि सोचलियौ तोरा द’ एहन बात, एत’ धरि जे बजैत जाइत गेलौ तोहर ब’र, सासु-ससुर-भाउज। कहां माफ कएलकौ तोहर नैहरोक लोक- माए-बाप-भाय ? तों तं ने सासुर ने नैहरे बसलें। कहां क्यो तोरा वास्ते भेलौ ठाढ़, होइतौ सहाय, भरितौ तागति तोहर डेग मे। कहां ? जे कएलें से अपने कएलें। मुदा नीक कएलें! अपन खराप अनसोहांत संसार कें त्यागि मनक अप्पन प्रिय गाम बसौलें, खूब नीक कएलें भौजी! तहियो कहैत छलए हमर मन यैह। आइ एते बरखक बादो मानैये मन यैह सत्य! मुदा बड़ कचोट होइए मन पाड़ि क’ ओ दुपहरिया! एकान्त मे बैसि तोरा संग गपसपक प्रसंग, भरिसक वैह भेल अपना दुनू गोटेक अंतिम भेंट रमकनियां भौजी! कहां देखने छलियौ आइ सं पहिने तोरा ओना ओहन विकल गै भौजी! -‘ आब त नहि होइत अछि सहल...’ बाजलि रहयं करैत निष्करुण करुणाक अन्त। -‘हम छोड़ि देबै ओकरा। रहय तोहर भाय अपन जेना रहय।’ -‘ कथी? हम तं चिकरिये जकां उठल रही की बजै छें भौजी ?’ -‘सत्ते कहि रहल छियौ-हिरदेक बात!’ -‘ एं से कोना छै संभव, कहतौ की लोक समाज ?’ -‘ ओकरो कहतै । कहौ। मुदा तें ई नहि बूझ जे हम छोड़बै ओकरा- -छुच्छी देह लेल। अपन अइ देह वास्ते-नइं- निर्लज्ज देखबैत दबैत अपन पुष्ट सुन्दर पुष्ट दलकैत दुनू छाती, अपनहि दुनू हाथ! से नइं। तोहर सप्पत।’ कहैत, भेलि जेना बताहि। हम त निर्वाक। बौक। घामे-पसेने त’र लेने अपन मन बेचैन। तकरा बादहु ओ आंगुर सं देखबैत डाँ¡ड़क नीचां अपन सर्वाधिक लाज-अंग बाजलि-‘‘ एकरो दुआरे नइं।’ छोड़बै जे, मनसा मुरुख आ निर्लज्ज है। पुरुख के आर किछुओ हो मुदा ई दुर्गुन नहि होना चाही, राधा! हम त अचंभित लाजे कठौत भ’ गेलौं। ओ कहैत रहलि आगां-‘ ई हमरा अपना काज मे नहि होअ’ दैये संग। नै बनबैए बनिहारिक संगी जे लोक की कहत! आ हम चाहने रही-एकर हर हमहूं जोती। हमहू । तामि दियै खेत, बीया बरु अपने छीटओ वैह, पटfबयै बाड़ी , से एकरा नइ पसिन्न। हमरा अछि बूझल बस अही बाटे- मिलि जुलि क’ काज करबै तही रस्ते भेटतै हमरा ओकर देह, पुरुखक सरीर ! हमरा बेसी काल चाही राधा, से सत्ये। एखन तों नहि बुझबहीक। कहियो हेतौ एकर ज्ञान। से, हमर देह -प्रान धधकैत रहय आ ई मनसा फोंफ काट’ लागय। बड़ी-बडी़ काल देहक जातना सं छोड़बैत मन बताह जेना कर’ लागए। तही बतहपनी मे एक राति… बड्ड जोर सं ओकरा झकझोरि क’ जगबैत उठौलियै तं चिहुंकि क’ उठल तं अबस्स, मुदा हमर ओहनो देह-मनक दशा मे रहल अनोन-बिसनोन। ई नहि जे छै ओ अपरुख। नै-नै खाली देहक श्रम झमारल हालति सेहे रहै कारन।-ओंघाएल पंजिया तं लेलक खूब गाढ़ क’क’ सक्कत सं हमरा मुदा जेना कल जोड़ैत कह’ लागल-‘‘ अखनी सूति र’ह...’ आ फेरो काट’ लागल फोंफ। माया आबि गेल। बड़ यतने अपने देह-छाती सं करैत अपने हाथे खेला बदलैत रहलौं करौट तहिना भेल भोर ! हमर सोचनाइ छल जे काज मे संग देबै तं ओकरो थकनी रहतै आधा, दोसर हमरो थाकत आधा देह। ओना जे टटका-टटका फुलाएल गेना- देह लेने दिन खेपैत रहि जाइ छी बिन मेहनति भरि दिन, से नहि रहब, तं भ’ सकत देह मनक झिलहरि सेहो एक रती दूर। मिलजुलि क’ चला सकब नाह मे करुआरि! तैयो हम सप्पत खा कहै छियौ-छुच्छे देह नहि, ओकरा लेल मास्चर्य आ अपना इज्जतिक रच्छा लेल। आ अइ लेल जे पुरुखो बूझौ जे ओकर स्त्री खाली ओछान पर सुतबे काल धरि नै, बाध-बोन खेत ख्रिहान माने भरि दिन छैक ओकर संग। से हमर दाबी हय। अधिकार। सास्त्र-पqरान की कहै है, हमरा नै पता। हम ई मानै छियै। हम तै दुआरे छोड़बै। बहरीयो जा काज करबा के अधिकार लेल आ बांकी स्त्रीगन-गामक बेटी-पुतहु सबके ई बात बुझाब’क लेल जे –तों भानस करब , आंगने नीप’ लेल नहि छें। तों ओहिना ओतबे छें पुरुख। ह’र जोतबा लेल, कुरहड़ि सं जाड़नि चीरबाक जोग... तोहूं छें। तै लेल छोड़बै। हमर हक नै मिलतै त छोड़ि नै देबै ? ई बात एत’ छै-सेहो पुरुखक छुच्छ ईड़ द्वारे जे बिन बुझनहि बजैत रहैये, तें। खेप १४ गुंजन जीक राधा- चौदहम खेप किछुओ कतबो कहैत जाओ संसार प्रेमहि थिक जीवनक एकमात्र आधार जीवनक सबटा ब्योंत-व्यवस्था रस, रसाभास सबहक थिक अपना-अपनी क ओएह समस्त प्रकार. जीवन सब तरहें अभिप्रेत मनुष्यक सृष्टि सेहो संरक्षक एकरे आदिकाल सँ दृष्टि,बुद्धि जाइत अछि जतबा दूर अतीतक उज्ज्वल अंश जतेक हो जेहने मुदा मात्र एकरे गाथा थिक सबहक प्राण,जीवनक आध्यात्मिको आधार. प्रेम परिभाषित जेना जतेक जाहि तरहें करैत आएल मनुक्ख गुणी-पंडितजन सहित युग-युगक समाज ओतबे आ ओतबे रंगक बा रसक रूप बा अनुभव-जगत अछि ने से अनुराग जकर चर्चा गायन मे बीतल आयु, जकर चर्चा मे अस्तित्वक कएल गेल आविष्कार ! प्रेम किछु तेहन चित्र नहि बालु, पानि, हो बसात बा घरेक देबाल पर। से अछि परम स्वतंत्र,स्वशासी आ तें स्वाधीनमना करय नहि कृपा जेना ककरो पर तहिना तहिना कोनो परिस्थिति मे नहि करय घृणा। मनुक्खक सर्वश्रेष्ठ अनुभव, लोकक सर्वोच्च सर्जना ताहि प्रेमक करैत आह्वान ताही प्रेमक करबा लेल स्मरण, हमर भेलय जन्म हमर हएत मरण प्रेम से जेना नचाबय, नाचब आ तहिना,जेना बजाओत बाजब ओ जे-जे कहत करब ओ जे-जे सहत ओकरे काया माया-मात्सर्यें हमहूँ रहब, सब किछु सहब प्रेम मे जीवन एही मे मरब हमरा जिआओत ई प्रेम हमरे प्राण एकरा जिया राखत- युगधार मे एकहि क्षण लेल सब किछु,एत धरि जे श्रीकृष्णक श्रीछवि पर्यन्त। बहुत काल धरि रहथि ने स्वयं सेहो संग बहुत काल नहिं संग दैत अछि मनुक्ख कें ओकर अपनो मोन ! ई संसारी सत्य,सत्य-सुन्दर-शिवकारी सेहो अन्यथा एतेक-एतेक वेदना सहल हो कोना मनुक्ख कें- कोन सामर्थ्य सँ, कोन उद्देश्ये आ केहन मनोरथ मे ? व्यक्ति माने श्रीकृष्ण, हिनकर सेहो होइत अछि अनुवाद- प्रेममय सब ह्रदय मे मूल कृष्ण तँ क्षणे-क्षणे भ जाइत छथि तिरोहित । नहि जानि कोन दिशा कोन परिस्थिति मे... काज चलय एहना मे हुनक अनुवादे सँ। तें मानी जे प्रेमोक हो अनुवाद यदि प्रेम मौलिक अनुभव तँ मौलिकताक अविकल अनुवाद आभासे थिक-प्रेम ! मूल आ अनुवादो थिक। ... कए रूप मे पड़ि जाइए मन रमकनियाँ भौजी जेहन बाट ओ एहि युग मे धेलक आ चलि पड़ल की जाने आइ कोन हालति मे कोना हो जीबहु देल गेल होइ ओकरा कि मरि गेल रमकनियाँ भौजी ? केहन विचित्र ! थिक नहि यद्यपि मुदा लोक मानैए अतत्तह एकरा भरि संसार मरैये पेटे आ देहक लेल किन्तु बाना धरत एहन जेना सब टा अध्यात्मे हो ! जल-अग्नि-आकाश-वायु आ पृथ्वी सबटा... सबटा के मानैत छी, बड़ दिब, मानू ईश्वर परन्तु तकर अभिप्राय-अर्थ, भीतरीयो आगाँ-पाछाँ सब के बुझू,चीन्हू-जानू ई सब थिक अस्तित्व हमर,हुनकर, समाज मे सबहक तथापि तकर आधार छुच्छ भावना नहि छैक ई सबटा अपरिहार्य तत्व जीवन धारण करबा मे तें ई सब अछि अभिन्न अकाट्य मनुक्ख सँ। छुच्छे उपयोगितो ने कही, कारण जे सब प्रकृति देल स्वयं प्रकृति भेल स्वतः आ कि निर्मित ककरो हाथें ! से विषय ने हमरा सब सन गामक छौंड़ी राधाक बूझल-गमल ने आनेक किछु । ओ भिन्ने थिक बुद्धि-विलासक विषय। ताहि पर चलि रहलए बड़े विचार, सुनै छी, क्यो ने क्यो बूढ़-पुरान लोक कहितहि छथि समय-समय हमरो भ गेल हएत सुनना सए बेर ! हम बा सखि सुखबरनी बा अपने श्रीमान ई कृष्ण कोना भेलहुं,बनि गेलहुं आ कि बनबाओल छी, मनुक्खक काया मे जीवित छी वस्तु कोनो ? बैसबा,सुतबा,खएबा,जीवाक कि बजयबाक बाजा सभक सब अनके उपयोगक लेल बनल अछि जेना बीनय सब वस्त्र जोलाह लोक कें पहिरय लए हमरा लोकनिक सेहो कि सैह निर्माणक खिस्सा ? मतलब, कुम्हारक घैल बनाओल माटिक बरतन-बासन भरि क रखबा लेल जल, चूल्हि चढ़ि भानस करबाक उपयोग केहन आ ककरा वास्ते बनलौं ? खेप १५ गुंजन जीक राधा- पन्द्रहम खेप बुझायल ता एतबे जे अयलौं माएक गर्भ मे नौ मास अपनहि निर्माणक नरक सहैत, माइयो के सहबैत प्रतिपल भरि जीवनक पीड़ा माएक एक-एक साँस दुर्घट करैत करैत ह अपनहि जन्म सँ कएल विकट पराभव ओकरा लेल। ओ यद्यपि कहैत छैक- सन्तानक जन्म महासुख ! हम तं सन्तान, की बुझी तकरा कही की ? ...मुदा पुनः-पुनः माएक गर्भ मे के रखलक हमरा ? भरिसक पिता...वैह हुनके राखल जे, होइत गेल विकसित बनैत गेल रधिया ! एक दिन...सुनै छी एहि गामक धरती पर ......खसल चेहों-चेहों करैत, यैह झरकलही देह। सेहो सुनै छी, माए तँ हर्षित किन्तु भेला बहुत सुख-चिन्तित पिता। भेलियनि जे बेटी, ककर दोख यदि दोखे त ? जेना देलनि हमरा माएक गर्भ तेना देने रहितथि कोनो बेटा । बाधा की ? तें अपन काज केर फल सँ असंतुष्ट माय पर थोपल दोख किएक, कथीक? ओना, जे हो आबि त गेबे केलियनि मायक कोरा- एहि छोटोछिन घर-असोरा-आङन मे, बाड़ीक ओलक गाछ जकाँ अपनहि टोंटी सँ विकसित होइत, सौंसे चतरल गेल हरियर गाछ समान। भ त गेवे कएलौं। जेहने भेलौं आब एतेक वर्ख धरिक भ गेलौं बेसी बेटी त ओहिनो ओले बुझल-कहल जाइए-कबकब, समाज । राधाक मन बड़े बौआइत छैक। एक क्षण एत, दोसरे क्षण नइं जानि कत ? मन खौंझाइत बड़ छैक जे ओ एहन आ एहने भेलि कियेक ? अपने भेल कि बना देल गेलि एना ? की ? दुनू मे की ? बा एहू दुनू कारण सँ फराक किछु कारण ? बा एहि दुनूक मिज्झर एकटा तेसर परिणाम थिक ओ ? बड़ व्याकुल होइत अछि- किये रूसल छथि कृष्ण ? आ कि हमहीं छियनि रूसलि हुनका सँ ! की ? के करओ पुरबा साही एकर- यदि रुसले अछि त ककरा सँ के ?... राधाक कंठ सुखाएल- ओह,जल पीबितौं दू घोंट ! पियास आकुल घैलची सँ ढारऽ गेली- घैल रिक्त ढन ढन करैत...! दिवस कही बा राति कही, हमरा कहला सँ की जीवन व्यर्थ कही सार्थक, हमरा कहला सँ की विषयो कहाँ हमर हमर सन लोकक ई सब यदि अनुभव किछु कहय त कहलो सँ की एहि समाज मे मोजर त छुच्छे पुरूख कें भने लुल्ह-नाङर बहीर बताह कनाहो कोतर पुरुखे हाँकत ई समाज निश्चयो करत दिशा केर एहना मे किछु उचित-अपेक्षित, हो आवश्यक आबय कोनो विचारो त हमरा कहला सँ की? अनठा देत अपनहुँ संगी-सखि-संबन्धी धरि करत अनेक उपहास सेहो सब सहला सँ की मन मे बड़ अन्हर-बिहाड़ि, पानि आ पाथर ...एखनहि ठाठ भेलय तैयार ऊठलय घर देखिते-देखैत दू पल मे ढनमना खसैये कम्मे लोक बचाबए दौड़ल लोक कहाँ अबैये ! इहो स्वभाव मनुक्ख-समाजक केहन विचित्र जे छल रहैत ठाढ़ विपति मे से छथि आइ तटस्थ । आब त लोकक दुःख अनठएबा मे भेल लोक अभ्यस्त तकर दुःख बूझी, क्लेश सही परन्तु यदि चर्चा चाही ककरो हेतैक ध्यान,हएत गंभीर कनिक एक रती अनुभव आ वातावरणक जे रूप अछि पसरल कतबो केहनो हो आवश्यक विषय आ अनुभव,चिन्ता ककरा कहबै ? कोन भाषा केहन बानी मे ? सबके अपने तेहन धरफरी पैसल छैक जे एक दिस सुनितो रहत, पड़ाएलो जायत अपन गन्तव्यक दिशा ! कतबो करबै सोर । अहाँक आत्मीय चिन्ता सँ कम रहलै लोक कें संपर्क-संवाद । सबके अपने स्वयं ततेक दाबी, संसारक अनुभव आ व्यवहारक, धर्म-शास्त्र सब सब कें जेना हो घोंटल । ज्ञान त यमुनेक जल जकाँ- भरि लेलहुँ घैल,तमघैल कि बड़का कलगोइयाँ लोटा । जत भेल इच्छा क लेलहुँ व्यवहार सहज-सुसके। बीच बाटहु पर हरा देने हो नहि एको मिसिया खेद, बाट के पिच्छड़ बना क लोक के पिछड़ि-पिछड़ि खसबाक दिक्कैत तैयार क देबाक। लोक के भरिसक्के होइत छैक भान--ओ की क रहलए, की क गेल ओ लोकविरुद्ध ज्ञान हेरायल बाट!-घाट भेटब केहन सहज भेल ! मनुक्ख सँ मनुक्खक परस्परक भाव, जानि नहि कत गेल ? पुछलिअनि एक दिन यैह प्रश्न त कृष्ण बिहुँसलाह तेना जेना ओ त अपने परम बूढ़-पुरान आ हम रही सोझाँ मे कोनो ! नेना नहि ध्यान देलनि हमर एहि जिज्ञासा पर त सहजहि भेल हएत हमर मुँह उदास, कनेक आहत सेहो। से अपन सधल बुधियारी आ कौशल सँ करैत तकर सम्हार कहए लगलाह-"बड़ बताहि छें! ई सब काज तोहर नहि।सोचब जीवन, एकर नित्य बदलैत-बढ़ैत-घटैत व्यवहार,तकर गूढ़ प्रक्रिया विषय होइत छैक जे छथि पंडित जन हुनकहि बुद्धि-व्यवसाय। तों किएक करैत रहैत छें विकल अपन ई सुन्दर मन ? हमरे देख कोना रहैत छी हिनका लोकनि सँ बाँचल-छिटकल, कए काल तं लैत पतनुकान, अपना तरहें अपन जीवन जीयैत। सत्त पूछ तं कतेक रहैए चिन्ता हमरो हिनका सभक ? हम तं रहैत छी तोरे मे लेपटायल, तों ही ने हमर प्रिय प्राण!" हुनक ई कहब बुझाएल सद्यः काकु उक्ति। कृष्णक ई सब कहि जाएब धर-धर। अति विशेष क अंत मे हमरा जोड़ि क कहब जे बात छल हुनकर।तें उचिते कहलिअनि-"जाउ-जाउ, बड़ हमरे मे लेपटाएल रहै वला अयलौंहें।आ हमरे मे रखनाहर ध्यान। अपने हुलकी द क देखियौ भरि आँगन-, बैसल आकुल उत्सुक के अछि अभागलि से मन ! जुनि परतारू,ठकू नहि हमरा एना। हम तं ऑहिनो अहाँक बिना कोनो कार्यक किछु नहि।" -" सैह तं कहलियौ बताहि, हमहूँ बिन तोरे कोनो कार्यक कहाँ छी? प्राणहीन देह आ तें गति-स्पन्दनहीन अस्तित्व भ जाइत, तोरा बूझल छौ।तथापि एना रूसै छें।किएक एना रूसि जाइ छें, मीत ?" कएलनि उन्टे अपने विलाप सेहो।-"वाह रे निसाफ । रूसल निपत्ता भ जाइ अपने आ दोख हम्मर। कहलिअनि हम तं उदास भ गेला-अनचिन्हार उदास ! संच मंच बैसल असकर एकटा बगड़ा जकाँ अनमन। निःशब्द।"... खेप १६ राधा-१६म खेप बुझायल त एतबे जे अयलौं माएक गर्भ मे नौ मास अपनहि निर्माणक नरक सहैत,माइयो के सहबैत प्रतिपल भरि जीवनक पीड़ा माएक एक-एक साँस के दुर्घट करैत हम अपनहि जन्म सँ कएल विकट पराभव ओकरा लेल। ओ यद्यपि कहैत छैक- सन्तानक जन्म महासुख ! हम तं सन्तान, की बुझी तकरा कही की ? ...मुदा पुनः-पुनः माएक गर्भ मे के रखलक हमरा ? भरिसक पिता...वैह हुनके राखल जे, होइत गेल विकसित बनैत गेल रधिया ! एक दिन...सुनै छी एहि गामक धरती पर ......खसल चेहों-चेहों करैत, यैह झरकलही देह। सेहो सुनै छी, माए तँ हर्षित किन्तु भेला बहुत सुख-चिन्तित पिता। भेलियनि जे बेटी, ककर दोख यदि दोखे त ? जेना देलनि हमरा माएक गर्भ तेना देने रहितथि कोनो बेटा । बाधा की ? तें अपन काज केर फल सँ असंतुष्ट माय पर थोपल दोख किएक, कथीक ? ओना, जे हो आबि त गेबे केलियनि मायक कोरा- एहि छोटोछिन घर-असोरा-आङन मे, बाड़ीक ओलक गाछ जकाँ अपनहि टोंटी सँ विकसित होइत, सौंसे चतरल गेल हरियर गाछ समान। भ त गेवे कएलौं। जेहने भेलौं आब एतेक वर्ख धरिक भ गेलौं बेसी बेटी त ओहिनो ओले बुझल-कहल जाइए-कबकब, समाज । राधाक मन बड़े बौआइत छैक। एक क्षण एत, दोसरे क्षण नइं जानि कत ? मन खौंझाइत बड़ छैक जे ओ एहन आ एहने भेलि कियेक ? अपने भेल कि बना देल गेलि एना ? की ? दुनू मे की ? बा एहू दुनू कारण सँ फराक किछु कारण ? बा एहि दुनूक मिज्झर एकटा तेसर परिणाम थिक ओ ? बड़ व्याकुल होइत अछि- किये रूसल छथि कृष्ण ? आ कि हमहीं छियनि रूसलि हुनका सँ ! की ? के करओ पुरबा साही एकर- यदि रुसले अछि त ककरा सँ के ?... राधाक कंठ सुखाएल- ओह,जल पीबितौं दू घोंट ! पियास आकुल घैलची सँ ढारऽ गेली- घैल रिक्त, ढन-ढन करैत... खेप १७ एना किएक बेशी अनुभव आब अनचिन्हार लगइये एना किएक लोको सब, सखि पर्यंत बुझाइत रहैए आन कौखन तं ई घरो-आँगन,टोलक सब गाछ-बृक्ष बाट-घाट,गाय गोरू फूल पात, इनार | सब किछु अनुभव होइत अछि दूर दूरस्तक बस्तु, तेहल्ला | कौखन क' कोना बुझाय लागलय आन गाम आब अपनहिं ई गाम | बेशी लोक देखितहिं करय लागैत बुझाय उपहास एना कोना मोन हमर बन्हा गेलय अपनहि लाचारिक ठाठ? मामूली मूक मालजाल जकां नियतिक सोझां मे निहुरल जीवित अछि देह-प्राण यद्यपि ई तैयो बुझाय लागय निष्प्राण | कौखन तं सबटा जे एखनहिं छल सोझां मे प्रत्यक्ष अर्थवान सौंसे घर एक संग मिझा गेल डिबिया जकां अकस्मात भ' जाइछ अन्हार सबटा व्यर्थ | सब अनुभव तकर गतिविधि बेकार से व्यर्थ मन-भार क' दैत अछि नवे तरह सं व्याकुल सबटा सब तरहक जतबा जे बुधि अपन लगा-लगा थाकि जाइत अछि इच्छा| सबटा जे अनसोहांत, अनिच्छित-अनपेक्षित परिस्थिति सब मे सं किछु ने किछु अंकुराय लगैत बुझाय लगइये दैत पेंपी, एक क्षण-दू क्षण जतबा धरि संभव ध्यान देब - से लगले ओ सबटा अंकुर सब अपन अपन दुपत्ति-तिनपत्ती बनि माटि पर पनगैत सघन जीवन स्पंदित वनस्पति भ' हरियर-हरियर लहलहाईत बुझाय लागैत अछि I सौंसे परिवेशक एहि एहि मनक सबटा व्यर्थ बोध , स्वयं सेहो जेना अपना स्वभावें अंकुराय लगैत अछि - देखितहिं देखैत बन' लागय अन्न,फल-फूलक से छोट-पैघ गाछ रमनगर, सभ टा अपना -अपना रंगक आशाक हरियरीक आभास सद्यः अभिभूत करैत, क' दैतछि देखबा लेल बाध्य | देखबा लेल माने ओकर परिचर्या -सेवा .... अनायास तकैत छी घैल पानि, सभ कें पटब' मे लगैत छी| सभ कें जल पिया-पिया जखन होइ छी तृप्त तखन अपनहु देब' लगैत अछि कंठ मे त्रास पियासक उत्कट इच्छा ... अहा ! कंठगत होइत एको आंजुर ज'ल !.. हा कृष्ण ! कत' छथि ? मुदा जँ पीयब तं श्रीकृष्णेक हाथें. खाहे छुटि ने जाओ ई प्राण . देखिअनि आखिर कहिया धरि नहि लैत छथि हमर कुशल-समाचार कहिया धरि सहैत रहैत छथि- हमर पियास अपन-अपन राधा १८म खेप ओना ई सबटा आत्मप्रतारणाक जे थिक हमर अपनहिं उपाय अंततः थिक कि एकर जड़ि आ आरंभ ? किएक बनल रहैत अछि हमर एहन दिन-राति-दिन? जीवन जगतक कोन आवश्यकता आ तकर उद्योग हेतु हमर ई निष्क्रिय जीवन-चर्या, आइ आइ भ' गेल कए दिन ।हम जे एना एहि तरहें सब सं कटि क', छूटि क' सबसं सौंसे समाज कें क' एक कात हम जे चलि रहल छी अपन आ अपनहिं एकान्त बाट तकर अर्थ की आ महत्व ? सबटा अछि गति विधि ठप्प, सब किछु ठाढ़ । गाछ-बृक्ष ठाढ़ से तं बेश, लगैत छैक बेजाय मेघक तारा पर्यन्त जे जानि नहि, चलैत छैक आ अपन-अपन स्थान बदलि लैत छैक बा नहिं, ज्ञात नहिं, धरतीक लोक कें तं बुझाइत रहैत छैक स्थिरे भने कौखन क' बुझाइत टिमटिमाइत जेकां मुदा ई मनुक्ख आन प्राणी ई नहिं रहबाक थिक ठाढ़ बेशी काल नहि चाही स्थिर ई थिक अधलाह, असुन्दर । कारण जे ठाढ़ रहब थिक निष्क्रिय कर्म । मनुष्यक महिमा तँ अछि-सकर्मके सकर्मक । भने ओ ठेहुन मोड़ने बैसल-बैसल बाँटि रहल हो साबेक जौर। बीच-बीच मे करैत सक्कत अपन मुरेठा, भने रोमि रहल हो कुकुर-बिलाड़ि, भने मोछे पिजबैत हो बड़ी-बड़ी काल-आत्मलीन ! भने मनुक्ख तोड़ैत बेलपात-फूल । लोढ़ा करैत कटनी भ' गेल खेत मे मनुक्ख । एत' धरि जे नीक लगैत अछि-नीक ! अर्थात सक्रिय किछु करैत । मुदा बच्चा कें करैत दुलार । बैसोने कान्ह पर अपना लगैत अछि लोक दिव्य आ विश्वासी । लगा रहल सानी-पानी माल जालक मनुष्य। आ तहिना पोखरि, धार मे गाय-गोरु-बाछी कें नूरी सं मलि मलि क' नहबैत। एहि सबटा परिस्थिति आ रूप मे मनुष्य सत्तेक मनुष्य बुझाइत अछि। स्त्रीयो तहिना लगैत अछि पिहुआ कें अपना स्तन सँ लगा पिआ रहल दूध ! सुन्दर, वास्तविक । स्त्रियो थिक तखनहिं मनुक्ख। ओहो नहि लगैत अछि बिनु किछु करैत, निष्क्रिय बैसलि बा सूतलि-नीक नहि लगैत अछि स्त्री। कम सं कम अयनाक सोझाँ बैसलि निंहारैत अपन देह-मुख । कम सं कम यत्न आ मन सँ दुनू आँखि केन्द्रित क' दर्पण मे सटैत भाल पर मोन पसिन्न टिकुली , स्त्री एतबा करैत नीक लगैत अछि।बैसलि आ चुप्प स्त्री कथमपि नीक नहि लगैत अछि। बैसलि स्त्री बुझाइत अछि-गृहस्थीक बस्तु जात, जेना-खाट-चौकी-चूल्हि-घैल आ हाँसू बाढ़नि इत्यादि...। स्त्री एहन आ एतबे कदापि ने नीक लगैत अछि। घोघ तनने डेराएल-धाखें दबल-सहमल बेमोनक मर्यादा ऊघैत सेहो नहि लगैत अछि-स्त्री। किछु मास,दिन कनियाँ-बौआसिन बनलि रहबाक अतिरिक्त बड़ दिब लगैत अछि ओ तथापि,घोड़ैत रंग, बनबैत फाहा करैत चित्रकला,बना रहलि धुरखुर पर कदमक गाछ सप्त पुरइन पात । सूर्य-चन्द्रमा-तारा आ नब नब कोहबरक करैत विन्यास,गबैत गौरी-पूजा काल गीत।अर्थवान सत्य आ तें बड़ विश्वसनीय लगैए स्त्री। सखिसंगीक हेंज मे माथ पर काँख तर लेने घैल पोखरि इनार सँ अबैत हँसी ठट्ठा करैत स्त्री। प्रेमासक्त पुरुष-मुख चुम्बित होइत लगैत अछि विलक्षण ।मुदा टटका घैल सदृश् भरल दूध-वक्ष धरौने नेना, बनि जाइछ स्वयं एकटा अनिर्वचनीय कलाकृति ।एक संग अपने कला आ अपने कलाकार! स्त्री-आँचर तर शिशु पल्लव मुख मे देने निज प्राण-रस थन, नीक लगैए।-दिव्य अलौकिक । -" से तों कोना क' बुझलहिक राधा ? तों ? ई तं छौक नहि तोहर अपन अनुभव। तखन...?" चिहुँकि उठली राधा-ऐं प्रश्न अछि कि ई कोनो आकाशवाणी ? एकान्तहु असकर मे सम्हारि लेलनि माथ पर नूआ, झाँपि लेलनि छाती। नख-शिख सम्हारैत आँचर भ' गेलीह अस्तव्यस्त। लाजें निहुंरि गेलीह। भ' गेलीह कठौत । ठकमूड़ी लागि गेलनि। सोझाँ मे ठाढ़ सद्यः श्रीकृष्ण ! सरस कुटिल मुस्किआइत, चाहैत जवाब एहि स्त्री रूपक। -" माधव अहाँ ?" एतबे तं बाजि सकलीह राधा। तत्क्षणें भ' गेलीह तुरन्ते स्पर्शित लजबिज्जी !- फेरो एक बेर धोखा ,पुनः कएल छल । जानि नहि ई कपटी सं कहिया भेटत कल ? ने सोझाँ अबैत छथि ने चल्ले जाइत छथि चित्त सँ । अपन-अपन राधा १९म खेप ने करथि बैसि क' एक क्षण दुटप्पी ने भैये जाथि हमरा अंतर मे चुप, शांत| मन तं बरु हो हमर, हमर अप्पन, अपने मे भेटैत खास अपना अधीन | कहाँ होइत अछी से ? कहाँ? कोनो उपायों कहाँ होइछ... उत्ताप दग्ध ह्रदय मे ई शीतल , निश्चिन्त, रौद-बसात सबटा जेना भेल अछि, जेना किछु नहिं | सब किछु भ' गेलय किछु ने | ई तं नबे पराभव थिक, नबे रूपक माया ! बेश नाचि रहलौन्हें आत्मलिप्त अपनहिं अरजल एहि स्वपीरण के बान क' जेना अनुष्ठान बेश भक्ति-स्वाहैत समर्पण सं क' रहल छी कए दिन सं होम! अपनहिं नहिं ,हुनको विरुद्ध ई कर्मकांड, जिनका भरि गोकुल कहैत छनि कन्हाई | ...ई करिया छौंरा नहिं जीब देत, नईं मर' देत| नै रह' देत, नईं कह' देत किछुओ टा... अपने रहत एहिना अलोपित | कतोक-कतोक दिन, आ बनल बौक राखत हमरो बना क' एहिना एही दशा| ...राधा दाई बड़ कठोर भ' जीह कूच' लगलीह-मनकथा मे एना श्री कृष्ण कें करैत गंजन, लगबैत अभियोग पर अभियोग कयना गेलनि घोर पाप से बोध क' देलकैन अस्तव्यस्त, अस्थिर-अशांत प्राण ! छ्टपट छटपट करय लगलीह, कए टा कृत्रिम व्यवहार-बात , जेना - धोअ' जल सं आंखि-मुंह-कपार-कान-गर्दैन गरदनि-हाथ-पैर आ नुआक आंचर सं पोछैत बेर-बेर फेर-फेर पोछैत अपन पोछलो देह-अंग जेना अपनहिं कें करबा लेल निस्संग क' गेलीह कतोक काल कैक टा एहने विषय , बनौटी काज | ई सब केहन राधाक कर्म आ कृष्णक की मर्म ? मुदा लिखत लिखितय राधा- एक टा नबे कर्मगीता सभक सौंसे समाज सब लोकक बुद्धि श्रमक करबा लेल नब तरहक प्रयोग-उपयोग, तकर लगाबितय अनुमान-विज्ञान | सभक श्रमें ठाढ़ करितेय सबहक एकहि समाज, तेहन लोक-बुद्धि नब सर्जित सृष्टि नूतन स्वाद सुखी लोक-श्रमिक-संसार ! बनाबितौं हमहीं हमहीं बनायब से स्वाधीन सुरक्षित सबहक समाज | कहिया मुदा ? कोना ? मुदा कि कोनो निर्माण थिक चूल्हि फूकबक सन सरल काज, राधा, बाज। छैक तेहन सोझ काज, नीपिया-बढ़िया आ एत' धरि जे मालजालक सेवा सन सहज-सरल ? से कथमपि नहिं, कथमपि, बनब' सं पहिने अपना कें किछु बनाब' पडैत छैक- बना सकबा योग्य ! से योग्य लोक होइत अछि एकटा बुद्धि, प्रेरणा,चेतना । अभ्यास-प्रयासक बलें बिनु थाकल अनवरत चलबाक- चलैत जयबाक संकल्प सँ मात्र कल्पना करैत छैक- मनुक्ख कें तैयार क' जयबा लेल, अपना अपन निजी परिवार छोड़ि सौंसे समाजक करबा वास्ते काज-उपकार । से कल्पना रूप धरैत अछि-कर्मक, मोन आ मेहनतिक निरन्तर कारबार मे,सुतैत-सुतैत-उठैत,चलैत-बैसैत मनक स्वप्न करबा मे यथाशीघ्र साकार जाय नहि दैतछि एकहु टा क्षण अनेरे-बेकार से क्रम क्रम सं धर' लगैत छैक रूपाकार । स्वप्नक साँचक आ गढ़बाक उपक्रम मे होअ' लगैत छैक ठाढ़ अनमन सभ भोर देखबा योग कोनो छोटछिन गाछ भने हो भाँटाक, एक रती आओर ऊँच मूड़ी ! पात सब ओकर आओर देखार देखबा-बुझबा योग्य से विकास, उन्नतिक लक्षण , समय कें सक्रिय-स्वतः चलैत-चलवैत रखबाक अथक स्वभावक दर्शन प्रेरित करबाक दायित्व-निर्वाह, बुझाइत छैक--राति बीतल तं एकहि ठाम अर्थात ओत' नहिं जतए सँ साँझ भेल रहय, ओ बीति क' बढ़ि गेलय आगाँ- भाँटा गाछक एक नह बढ़बा मे, भरि टोलक इनारक भोरका जल मे, आ कए पक्षीक बयस्क कलरव मे मिज्झर भेल किछु आओर चुनचुन करैत सद्यः जनमल चुनमुन्नीक बोल मे अनमन जेना मन्द्र आ तार सप्तकक लागि गेल हो कोनो- पँचम, बा मध्यम स्वर एक्के संग आ ध्वनित भ' गेल हो सबटा एकदम्मे सँ नब रूप-स्वाद मे अवर्णनीय ! काल एहिना एही सब गतिविधि-प्रकार मे आगाँ बढ़ैत अछि। सभक बयस मे एक दिन आरो जुटि जएबाक रूप मे, गत दिनक बाँचि गेल खेत कें जोति पूरा क' देबा मे काल बढ़ल अछि आगाँ। ओ नहिं ठहरल भरियो राति। लोक-पशु-पक्षी-मालजाल आ गाछ बृक्ष जकाँ भरि राति सुतबा-सुस्तएबा आ विश्राम करबा मे किंबा जगले स्वप्न बिद्ध! पडऽल एक ठाम कोनो सीमित स्मृति-सुख कामनाक स्वकेन्द्रित मोहक ठहरल संसार मे नहिं। समय तकरा अनठा क' बढ़ल गेलय आगाँ। पाछाँ घुरबाक ओकरा अधिकार नहि भेटलैक। नीके भेलैक। सोचि-बुझिये क' कएलखिन ई सृष्टि एहन विधान, काल नहि घूमि सकय पाछाँ, नहिं तं ओहो बनि जायत मनुक्खे जकाँ-अहदी,स्वार्थी आ तें आत्मसुख लीन जीव ! गबैत अतीतक कुरूप सँ कुरूप कटु सँ कटु गीत, मनेमन देखैत रहत मन माफिक बिन देखलो व्यतीत, तकर मृत अधमृत चित्र भेल आत्म विभोर। करैत रहत प्रात सं दुपहरिया, साँझ सं भोर.. मरल अतीत मे जीयब केहन व्यर्थक थिक इच्छा मनक ? काल टा बाँचल अछि एहन संक्रामक रोग सँ, रच्छ अछि। तें तं अछि साबुत निर्भीक निर्मम सेहो,तें ओ सतत तैयार ! अपन प्रगति आ कर्म लेल ओकरा ने चाही कोनो टा औजार, मनुष्य जकाँ,जकरा दातमनि पर्यन्त हेतु चाही एक टा छूरी, नह काट' वास्ते नहरनी...मनुक्ख कें दाँत खोधबाक लेल पर्यन्त चाही-नोकगर खड़िका। किछु ने किछु कोनो ने कोनो औजार मनुक्ख भेल गेल किंचित तें कालक्रमे हिंसक ! ई कोनो आत्मग्लानि करबा योग्य विषय नहि रहैक जतेक राधा कें बुझाय लगलनि। अपनएहि मनोदशा मे जीवैत एहन नोतल असकर एकान्त मे अपन आ भाव संग आइ कए दिन बीति गेल छलनि। कए दिन गाम,लोक,समाज सँ अदृश्य अपन उपार्जित एकान्त मे यद्यपि बुझाइत छनि सब किछु छनि उपस्थित, श्रीकृष्ण जत' सद्यः उपस्थित होथि ओतहि तं छनि हुनक ब्रह्मांड उपस्थित ! मुदा ई बोध राधा कें एक रूपें तेना समृद्ध कएने रहलनि आइ धरि जेना कठिनता सँ अर्जल पर्याप्त धन पर कोनो अकर्मक भ' गेल धनिक! एक समय निश्चिन्त सूति गेल हो। के पड़ओ आब किछु करबाक चक्र मे ? पर्याप्त तं अछि । सब टा मौज करी,जीवी,खाइ-पीबी । ई कोनो आत्मग्लानि करबा योग्य विषय नहि रहैक जतेक राधा कें बुझाय लगलनि। अपनएहि मनोदशा मे जीवैत एहन नोतल असकर एकान्त मे अपन आ भाव संग आइ कए दिन बीति गेल छलनि। कए दिन गाम,लोक,समाज सँ अदृश्य अपन उपार्जित एकान्त मे यद्यपि बुझाइत छनि सब किछु छनि उपस्थित, श्रीकृष्ण जत' सद्यः उपस्थित होथि ओतहि तं छनि हुनक ब्रह्मांड उपस्थित ! मुदा ई बोध राधा कें एक रूपें तेना समृद्ध कएने रहलनि आइ धरि जेना कठिनता सँ अर्जल पर्याप्त धन पर कोनो अकर्मक भ' गेल धनिक! एक समय निश्चिन्त सूति गेल हो। के पड़ओ आब किछु करबाक चक्र मे ? पर्याप्त तं अछि । सब टा मौज करी,जीवी,खाइ-पीबी ।...परन्तु जबकल बन्द धनक गति तं कर्पूर जकाँ होइछ, बिलाइत-बिलाइत निठ्ठाहे बिला जाइत छैक । यावत् याबत् ओ निश्चिन्त धनिक जगैए, बूझैए ताबत भ' रहल रहैत छैक ओकरा पर कालदण्डक गंहीर प्रहार। ताबत् भ' चुकैछ ओ अथबल-बेकार..हाथ मलैत-कछमछ उठैत-बैसैत... तथापि जेहन अमूल्य धन श्रीकृष्ण कें मानि राधा छथि स्वयं मे श्री सम्पन्न धन्य परन्तु से तकर स्वरूप की एही रूपे एहिना बहुत काल धरि राखल जा सकैत छैक- अनघट अक्ष्क्षुण्ण ? की एकरो नहि होअ' लगतैक दिनानुदिन क्षय ? घटतैक नहि एकरो प्रभाव आ गुण ? यदि ई एहिना एकरूप एकहि स्थिति मे, एकटा स्नेही प्रेमी, से भने राधे किएक नहि हो तकरा प्रेमक प्रताप सँ मात्र रहतैक सुरक्षित? एहि प्रेम मे विकास हेतैक अपन एहने असकर समर्पित परन्तु निजी एकान्थ मे ? ई बज्र एकान्तक उस्सर समय-भूमि मे प्रेमक लत्तीकतबा ऊँच कतबा ऐल फैल चतरि सकतैक ... भने कतबो पटाबथि राधा, जल नहि-अपना नोरे सँ तकरा। ओहनो वनस्पति प्रेमहुक वनस्पति कें नोर नहि, नीर स्वच्छ शीतल नीरे संवर्धित करैत छैक । बढ़बैत छैक ओकर शक्ति आ सौंदर्य आ बनबैत छैक अपना अस्तित्व सफल होयबा योग्य तैयार। ओकरा चाही नित्यक स्नेह संचारित गति विधि, व्यवहार । राधा किएक नहि सोचैत छी, किएक नहि सोचलिऐक ई बात ? जाहि प्रेम आ तकर अभिमान मे पड़ल रहि गेलहुं अनेरे एतेक दिन असकर निष्क्रिय, जाहि स्नेहक स्वाभिमान मे अड़ल रहि गेलहुं एते-एते समयक व्यर्थ दिन-राति, तकरा कि एहि बाटे कहियो पाओल जा सकैत अछि? बढ़ाओल जा सकैत अछि आगाँ? संभव छैक एहि रस्ते पहुँचब ओहि ठाम जतए रूसल बैसल छथि अपनेक बृन्दावन बिहारी लाल, किछु करबा मे लागल छथि। देखाइ नहि पड़ैए। देखाइ पड़ैए मात्र अहाँक अपन आत्म पीड़न, स्वयं के सीदित करबाक मोनक एक टा सुभितगर रोग सुभितगर पर उनटि उठली मने मन राधा ।आखिर रोगे थिक ई' बुझओलनि मन कें-' उठू, अपने आप कें करू तैयार। पड़ल नहि रहू केहुनी पर भार देने, तरहत्थी पर राखि क' ठोढ़ी अपन, एते-एते दिन-राति, राधा दाय ! की कहने रहथि ओहि सन्ध्या श्रीकृष्ण ? आ केहन साफ-साफ, जेना कहने नहि, गाबि क' सुनौने रहथि अपन विचार,आत्माक अपन उल्लास ! सत्ते, कहने नहि रहथि ताहि क्षण॒ गओने रहथि अहाँक लग अपन मनोराग । -केहन आनन्द छैक राधा, करबा मे कोनो उपकारक काज ? स्वयं कोनो कारणें अशक्य-असहाय जे भ' गेल हो, क्यो नहि हो जकरा देखनिहार, क' देबा मे ओकर बहुत जरूरी काज ? केहन लगैत छैक मोन कें खुशी? से करबा मे त्रुटि भ' गेने मन भ' जाइत छैक कतेक खिन्न, बुझाय लगैत छैक केहन अकर्मक, उदास ? अपन-अपन राधा २०म खेप -केहन आनन्द छैक राधा, करबा मे कोनो उपकारक काज ? स्वयं कोनो कारणें अशक्य-असहाय जे भ' गेल हो, क्यो नहि हो जकरा देखनिहार, क' देबा मे ओकर बहुत जरूरी काज ? केहन लगैत छैक मोन कें खुशी? व्यर्थ एतेक जे बौसलीयो छूबाक नहिं बाँचि जाइत छैक स्पृहा। तों दुक्ख नहि मान, एत' धरि जे बिसरि छें तों पर्यन्त राधा, तोहूँ हमरा। हमर आनन्द जकाँ भेटैत छें से बात ओही काज मे ओहिना... जेना मोन छौ-मनसुख दास कें बुढ़ारी मे जे बेदखल क' निकालि देने रहैक घर सँ बाहर अपन सहोदरे पहलवान भाय ? हाहाकार करैत असहाय मनसुख दास ! ओकर जीवन मे कतहु किछु ने बाँचल रहि गेलो उतर पहुँचि गेल रहीक तोंही, हँ तोंही ने आ मात्र एतबे तँ प्रबोधने रहीक ओकरा-' कका, नै दुख करू। एतबे टा नहि छैक ई संसार आ यैह टा नहि अछि एक टा भाय-सुन्नर दास।धैर्य धरू, नै दुख करू। बाँचल छै एखनो लोक आ समाज । स्वयं श्रीकृष्ण छथि एखन अपने गाम। चलू, आउ। दू घोंट जल पी लेब कका ? नहि हो तं विश्रामे क' लिअ' कनी काल। ऊपर सबटा देखै छथिन ईश्वर,करै छथिन निसाफ। तकैत छी हुनका, जानि नहि एखन कत' छथि, एहने बेर मे जखनि चाही समाज कें हुनकर हएब, अत्येब क' जेना भ' जएताह अलोपित ! कोना बिसरि गेलही राधा,अपने व्याकुलता अपन से काज? हम कोन्टा धेने रहियौ सब किछु सुनैत, देखैत तोहर अहुँछिया कटैत तोहर मातृ-भाव, राधा । किछुए काल पहिने तं फुरतीया दौड़ले गेल रहय, पहुँचि क' कहि चुकल छलय हमरा मनसुख दासक ई समाचार! कोना कहियौ नइं, तोरो मनक समाद तं सुनाएले रहय तत्काल । खौंझाइत-तमसाइत कोना रहें तिलबिखनी तों हमरा पर... दौगल-दौगल आएल रही...देखने रहियौ तोरा अपन काज करैत ! गछै छियौ देखैत ई सब दृश्य हृदय भ गेल पवित्र, चिन्ता-निश्चिन्त ! केहन बुधियारि अछि हमर ई बेकूफ राधा...। तें उपस्थित भेलियौ तोहर दासम दास । अएलियौ, प्रगट नहि भेलियौ राधा।...बिसरि गेलही ? हम तोरा प्रगट नहि, उपस्थित होइ छियौ राधा । तोरा लोकनि बूझ ई बात आ मानै जाइ जो। एहने एहने परिस्थिति मे बेर पर हमरा भरि संसार मे कत्तहु सँ आनि ले...हमर भाव-रथ केहन तेज आ केहन सुस्त चलैए, बुझले छौक ।.... अरे राधा, कनैत किएक छी ? की भेल, किएक कनै छी राधा ! कानब तं स्त्रीक नियति छैक। आँचर सँ नोर पोछब, जेना दैनिक काज। मुदा नोर खसबाक आशय बदलि रहलैये-प्रति पल। युगक अपन-अपन स्वभाव ! युग बदलि रहल छैक। युग बदलिते रहलैये। पण्डित जनक अपन-अपन बुद्धिक व्याख्या संग, आगत युगक स्थापना आ अतीतक बहिष्कार चलितहिं आएल छैक। कालगतिक ई एकटा अप्पन आ स्वायत्त प्रक्रिया छैक।सब मानैत छैक। सब के मान' पडैत छैक। कए बेर तेहन अभ्यागत जकाँ जे अभ्यागती कें बना लेने छथि-अकर्मण्यताक अभ्यास। स्वभाव, अतिथि देवो भव' कें हथिया लेने छथि बड़का नैतिकअधिकार हथकंडा औजार जकाँ। ओहन-ओहन हुनका हेतु परिवार भेदें अवस्से आब' लगलैये-सेवा भाव तत्परतामे किंचित उदासीनता सेहो, अवहेलना नहि,हुनक सेवा मे कतबा आ केहन आ केहन व्यवस्था लागति-समय सं ल' क' स्वागत-सत्कारक गृहस्थीक साधनक कतबा कएल जाय खर्च-वर्च ताहि पर होम' लगैत छैक विचार पर विचार । गरबैया पएर धोआ कम्मल-पटिया पर स्थापित क',आँगन जा भोजनादिक द' कहि,भ' जाइत अछि अपन दिनचर्या मे प्रवृत्त। अभ्यागत रहैत छथि दलान पर असकर स्थापित। युग सेहो, होइत छथि तेहने अभ्यागतो महराज। आब तं आरो, जखन बापो-माय बूझल जाय लागल तेहल्ला... कहू तं बेटा-भाय कतहु घर सं निकालि दिअय ? अपने बाप-भाय कें एना क' करैत तिरस्कार बनबैत असहाय ? ई एहन युग यैह एकर रंग ताल । आ से रहत जानि नै कतेक द्वापर-युग ? के जानय ! दुःख प्रगट करू तं कहताह बूढ़ पुरान, ज्ञानी-पंडित-' यैह थिकैक सृष्टि चक्र। कालगतिक यैह छैक प्रकृति-विधान ।अनादि काल सं चलि आबि रहल, अनन्त काल धरि चलैत रहत। मात्र यैह टा तं चलैत छैक-अमृत गतिक प्रवाह। नहिं मरैत छेक । मनुष्य समेत प्राणि मात्र तं अपना अपनी और्दें मरि जाइत अछि। जन्मे जकाँ मरण सेहो थिक अनिवार्य। मुदा ई कालचक्र जकर नाम युग कहैत छैक कतोक युग सँ लोक, समाज से अपने रहैत अछि अक्षुण्ण! अनथक चलैत, छलिते रहैत । किछु काल धरि लोकक जीवन मे आदरणीय अभ्यागत,आत्मीय, सर-सम्बन्धिक जकाँ...।तकरा बाद गृही कें अनुभव होम' लगैत छैक ओकर ओकर अभ्यागतीक छुच्छ कर्तव्य-निर्वाह। आगाँ सेहो स्थिति यदि एहने बनल रहि जाइछ तं अतिथि गृहस्थक करय लगैत अछि शोषण। अपन ताही कुटुम्बक, सम्बन्धक कर' लागि जाइत अछि उपयोग-उपभोग तें गृहस्थ, सम्बन्धी कर' लागि जाइत अछि ओकरा प्रति विचार अस्वीकार। तकरा पश्चात् ओकर अवहेला। यैह थिक प्रकृति इएह तकर तासीर।तखन बितैत वर्तमान जाइत- अबैत खारीक मध्य नव तरहें उठै छैक उद्वेग आ विचार-विमर्श ! अनन्तर विवाद । पिता-पुत्र पीढीक परस्पर विचार भेदक नऽवे यथार्थ जे दुहू कें अपन-अपन तर्क विश्वास मे कएने रहैत छैक लाचार, तैनात । होअ' लगैत छैक संघर्ष ! तकरा समाज आ समाजक विद्वत्समाज कहैत छथिन पीढ़ीक मनोभावनाक विभेद । विभेदक द्वन्द्व आ तज्जन्य दुविधा, तकरे प्रभाव, जीवन दशा आ परिवार-व्यवस्था कें कर' लगैत छैक देखार अनदेखार प्रेरित-प्रभावित।प्रारम्भ भ जाइछ युगक अन्तर्विरोध। स्वभावतः अन्तर्विरोधक कए टा नव नकारात्मक प्रतिफल ! एहि बीच नव सृष्ट शिशु पीढ़ीक होइत रहैत अछि एहि दुविधा-द्वन्द्वक घोर परिस्थितिक आगमन, दिनानुदिन विकास। बनैत-बढ़ैत अछि ओकरो मे अपन बुद्धि, दृष्टिकोण ! लगैये ओहो अपन पिता, पितामहक सोझाँ करय प्रश्न ठाढ़।जवाब चाही ओकरा । जे जवाब ओकर पिताक छलैक, आजुक आवश्यक ताहि सँ बहुत बेशी बढ़ि-चढ़ि क' चाही- नव खाढ़ी कें अपना प्रश्नक त्वरित समाधान ! समय अपने तं एकटा असमाप्त प्रश्न अछि। अपने पूछैत अपने जवाब दैत। अपने चलैत अपने ठाढ़ रहैत।ठाढ़े ठाढ़ चलैत, चलिते-चलिते ठाढ़ तहैत।पछिला क्षणक प्रश्न कें अगिला उत्तर लेल मथैत, आगाँक प्रश्न ठाढ़ करैत। पुनः वर्तमानक सोझाँ भविष्यक आकार-प्रकार, संवेदना आ तर्क तकैत-तैयार करैत-मनुष्य कें बनएबा मे तकर कहार। समय अंततः तँ होएत अछि-एकाधिकारी बुधियार ! अपना कें रखने सदति तटस्थ आ निर्विकार, करबैत रहैये सौंसे संसार लोक सँ आद्यन्तो कार्य व्यापार मुदा स्वयं रहैये यथायोग्य आत्मविश्वासी नाट्य कलाकार । अपन भूमिकाक प्रतीक्षा मे निश्चिन्त आ तैयार। मोह नहि किछु कोनो आग्रहो-दुराग्रह नहि किछु। मात्र अपन होएबाक आभास दैत देखैत रहैत अपन अस्तित्वक लक्षण सूक्ष्म सँ ल' क' बिकराल । निश्चिन्त विद्यमान रहैत अछि-लोककमोन मे। पृथ्वी,आकाश, प्रकाश सब मे स्थितिक मोताबिक जीवनक जल जकाँ सिक्त सूक्ष्म रंगें घुलल, मिज्झर । एक रती ने एम्हर एक रती ने ओम्हर। धर्मात्मा दोकानदार जकाँ तराजुक दुनू पल्ला बराबर। डंटी संतुलित ठीक मध्य मे। तौल बराबर। कतहु सँ कोनो पलड़ा कनियों लत नै, उठल नहि। तेहन पवित्र दोकानदार -ई समय ! कोना रहैये ललकारने,दुलारने आ हड़कौने मनुक्खक क्रिया कलाप कें? कतेक आवश्यक आ समयबद्ध प्रयोजन हेतु कएने रहैत अछि संसारी सुख-दुःखक आलाप-विलाप ! सबटा तँ लैत आखिर अपने मूड़ी पर बौक दास जकाँ सहैत चलि जाइत अछि- अनन्त काल। करैत रहेत अछि, प्रश्न, दैत चलैत अछि उत्तर । सजग अभिभावक सतत जेना चिन्तहि मे-साकांक्ष । ई तं भ' गेलैक आब ? अगिला... कालक कहार बनल मनुक्ख-जाति ओकरे भास पर नहि गबैत रहैये कर्मक गतिक गुणगान । कउखन उद् गार मे, कखनो दुःख-शोक मे मनुक्ख । कालक ई दुनू बोधे कें उघबा वास्ते तं लोक अछि। दुःख आ सुख । यैह दुनू टा तट आ बीच मे बहैत जलक धार । कउखन सरस्वती कखनो यमुना कतहु गंगा, कोशी कतहु कमला कल- कल धार ! जीवन ई धार थिक । मुदा ई धार कतोक दिन सँ अछि, स्थिर। अनपेक्षित। अनान्दोलित ठाढ़।आश्चर्य ! नदी होइतहुं स्थिर तेना जेना हो गामक पोखरि-इनार। यमुना मे कए दिन सँ किछुओ टा गतिविधि नहि। शान्त चुपचाप अछि धार। बड़ उदास । गुमसुम तकैत जानि नहि कोम्हर, ककरा कतेक काल... यमुनोक लेल काल ओहने निठुर। ओहिना बहीर अकान, मनुक्ख लेल बनल रहैत अछि जेना। कालक एतेक विराट विस्तार मे एक टा असकर प्राणि मात्र बाँचल रहि गेलय-नाम जकर राधा । अपन-अपन राधा २१म खेप किछु ने देखाइ पड़ैत किछु सुनाइ नहि पड़ैत किछु चलैत-फिरैत नहि भरि पृथ्वी भ' गेल अछि निःशब्द अनालोड़ित सात समुद्रक नील नील ! नीलेक अनन्त भीजल विस्तार। कतहु सँ कतहु किछु ने सुझाइत अछि वस्तुक कोनो आकार जल जेना बहि गेल हो महाब्रह्माण्डक अकथनीय अस्पर्शनीय,निष्क्रिय-निष्पन्द विस्तार एही क्षण पृथ्वी पएर धरैत एही क्षण जल | हाथ-पएर चलबिते ऊँच अदृश्य दुर्गम पहाड़- मन कें, चित्त कें चेतना केम कठोर पएर पंजा सँ ओंघड़बैत, गेन जकाँ गुड़कबैत । स्वयं गेन, स्वयं अनन्त विस्तार-महाकाल । तँ की भेल अछि एहि पल राधा स्वयं सेहो महाकाली शक्ति! नेनपनहि सँ सुनल वर्णन जकाँ ? हमर समय की थिक ? राधा राधा कें पूछैत छथि-हमर समय ? हम कोन समय मे छी? कोन रूप मे कतेक आ कथी लेल ? अर्थात् समयक निरन्तरता मे हमर ई एतेक दिन-राति,भोर-दुपहरिया-साँझक अबाध अनुपस्थिति कोन ठाम अछि ? एकर की स्थान छैक । हमर अस्तित्वक एहन नहि हएब, आधा हएब ,आधा नहि हएबब।होयबो करब आ नहियों हएब। एकर की हो आकलन ,के करय एकर हिसाब ? हिसाब कएलो उतर एकर की हो फलितार्थ ? अर्थ तं चाही सभक अस्तित्वक, कीड़ा-मकोड़ा सँ ल' क' चुट्टी-पिपरी, घास-पात लत्ती-बृक्ष सभक अस्तित्वक विहित अर्थे होइछ ओकर अस्तित्व, वैह ओकर औचित्य सौंसे पृथ्वीक सभटा सहजभूत पदार्थ आ तत्व अपन अर्थ ल'क' आएल अछि। अर्थे तं ओकर आयु बनैत छैक, देह अथवा काया नहि।' से कृष्ण कहैत छथि। एहि समस्तक मनुष्य कें होम' पड़ैत छैक-विज्ञ आ कर' पड़ैत छैक विवेक सँ एहि सभटाक मनुखोचित व्यवहार। विवेक-व्यवहारे थिकैक मुष्यक स्रैष्टिक अर्थ प्रसंग ! संवेदना बाटे अर्थक पुनर्जन्म आ पुनर्रचने होइछ मनुक्खक अर्थ निष्पत्ति । माने मानव-अस्तित्व मे सृष्टिक गूढ़ -जटिल जीवनक अग्रसर होइत क्रमक छैक ज्ञान , ज्ञानक अर्थवान सृजन तथा प्रयोगक उत्तरदायित्व | मनुक्खे कें राख' पडैत छैक एक-एक टा हिसाब - जीवनक जोड़-घटाव - गुणा-भाग...सबटाक राख' पड़ैत छैक बही-खाता, जबाबदेही | एखनो अल्प परिभाषित सृष्टिक जटिल कारबारक बहीखाता कें निष्पाप -राफ साफ |बिना डंडी मारने मनुखे कें तौल' पडैत छैक मनुक्खे कें समयक तराजू पर समाज आ संसार | मनुष्य अपने तें, अछि अपने तराजू अपने बस्तु आ तौलल जाइत विराट बजार -वस्तु -व्यापार | ई सब मनुष्ये, सबकिछु... ' हमर कोटि की ? हम की छी ?' राधा पूछैत छथि स्वयं कें ,अपन निष्क्रिय एकांत मे , एहन गंभीरता सं, एतेक दिनक बाद | -' हम की छी ? मनुक्खे तं स्त्री ? ब्रजबासिनी स्त्री ? कोन ब्रजक ? की ?' -' तों मात्र राधा छें | राधा ! तें हमर सबकिछु छें | तोहर उत्तर हमहूँ नहिं | ई तँ अछि बूझल जे राधा माने-जे निवारण करय कृष्णक बाधा ।' -'अहाँ सब बेर एहिना ठट्ठा मे उड़ा दैत छी कृष्ण हमर बात ।' खिसिया गेलखिन राधा- -ई नीक बात? कहू थिक नीक लोकक काज?' -तोरा के कहलकौ जे हम छी नीक लोक, तमसाहि छौंड़ी ?' बिहुँसैत कहैत कृष्ण लगब' लगलखिन राधा कें गुदगुद्दी । तकरे बरजैत काल घुरि अएलनि चेतना, जेना.... ई केहन दुविधा , मोनक ई की दशा ? एखन एहि पल दिन अछि कि राति तेकरो बोध नहि बांचल । अन्हार छी बैसलि कि इजोत मे तकरो अंदाज नहि। बैसलि छी बा ठाढ़ि, बुझाइओ नहि पड़ैछ। प्रगाढ़ निन्न मे छी देखि रहल कोनो स्वप्न बा पड़लि निःश्चेष्ट भूमि पर सद्यः ! भरि गाम भ' गेलए निःशब्द, निर्बसात, आ कि निसभेर किंबा साँठल भार जकाँ राखल भरि आँगन, से अंगने साँठि क' पठा देल गेलय कोनो गाम, भार समेत ? देह बड़ जरैए। जेठ-बैसाख मे आगि ताप' बैसि गेल होइ जेना । शरीर । मुदा ध्यान आएल यदि बुझा रहल अछि धाह आ ज्वाला तँ यथार्थे छी। देहक बोध बाँचल अछि।अर्थात् देह बाँचल अछि। देह, कतहु अछि।कोहनो स्थिति मे देह अछि। देह बुझा रहल अछि। भ' रहलए किछु संचार -बुझबाक, किछु करबाक उचाबच । देह अछि, बैसल, ठाढ़, सूतल-पड़ल जेना हो, अछि। तकबाक चाही। कोन स्थिति मे अछि केबल ताप-धाहक बोध देहक अनुभव नहि होइत अछि। हँ मुदा, धाहक-दुःखक माध्यमे देह-अनुभव मनुष्य-मन कें बेशी प्रत्यक्ष आ तें यथार्थ क' बुझा दैत छैक आ ओकर आयु सेहो होइत छैक अपेक्षाकृत बेशी । सुख बिलाई छैक, बिला जाइ छैक। दुख जीवन में रहि जाएत छैक। चुपचाप अपन कोनो कोन में उपेक्षा-सैंतल अपना के रूपांतरित करबाक मनोव्यनहार में भऽ जाइत छैक, मनुक्ख के आत्मसात...दुखऽक रूप में ओकर विलय चेतना में ताहि अनुपात औऱ शैली में होयत छैक जो स्वयं ओ शरीर अर्थात मन-मस्तिष्क-चेतना के पर्यंत नहि होइत छैक तेकर अनुमान , अनुभव, बा ठेकान...। सुख जेंका विला के नहि स्वय के मनुक्ख जोग्य. बना कऽ, दुख बनैत अछि उपयोगी, सृष्टा और अक्शुण्ण प्रेम मार्गक बटखर्चा । सदा संबल। दुख स्वयं संग लोकके बदलैत अछि तैं अपन अस्वीकार्यता-अग्राह्यता में पर्यंत वैह होइत अछि श्रेयस्कर, मनुक्ख बाट के लक्श्य धरि लो जेबाह में ओकरे दिशा निर्देश होइत अछि, बेशी उपयुक्त । चैन छीनब सतत चैन छिनबे नहिं थिक। चैन छीनब बैचेन करबाक एकटा प्राकृतिक उपाय थीक, ई उपाय तुच्छता सऽ विशेष संऽ संजोग आर मुक्तिक सीढी बनिकऽ अपन काज करति अछि । अपन काज करति रहैत अछि। दुख के माहुर जेकां केला से उपयोग दुख हेय भ जायत अछि। हेयता मनुक्ख स्वभावक अंहार पक्ष होयत अछि। उच्चता आ उत्थाने होयत अछि ओकर स्वाभाविक उत्कर्ष। मनुक्ख भौतिकता सऽ लऽ कऽ अध्यात्म पर्यंत करैत चलैये अपना -अपना रुचि, सुख आर कर्तव्य सं अपन पथक निर्धारण - निर्माण...एहि में सऽ कतहु प्रकट होयत अछि रचना ….अपन संपूर्ण शरीर मोनक स्पंदन लेने, भीजल-तीतल सर्वांग उल्लसित मुख मंडल लऽ...को खन अतिचिंतित विश्वबोध सऽ जेना कालिया दह में प्राण लेबाक चिंता आर क्लेश में छोड़ि जानि नहि कतेक काल डूबल रहि गेला, जमुना में श्रीकृष्ण।कतेक काल....!जेना कै जुग-आ जमुना तर सऽ नथने नाग जखेन ऊपर भेला उल्लसित मुखमंडल आर भीजल शरीर संग, तखन ते नहल-भीजल छल डांढ़ में खोंसल बंसुली सेहो हुनकर... शरीर। तं की हमर अपनो कोनो अछि कालिया, नितांत कोनो अप्पन ? मुदा ध्यान आयल यदि बुझा रहल अछि धाह आ ज्वाला तं यथार्थे छी। देहक बोध बाँचल अछि।अर्थात् देह बाँचल अछि। देह, कतहु अछि।कोहनोस्थिति मे देह अछि। देह बुझा रहल अछि। भ' रहलए किछु संचार -बुझबाक, किछु करबाक उचाबच । देह अछि, बैसल, ठाढ़, सूतल-पड़ल जेना हो, अछि। तकबाक चाही। कोन स्थिति मे अछि केबल ताप-धाहक बोध देहक अनुभव नहि होइत अछि। हँ मुदा, धाहक-दुःखक माध्यमे देह-अनुभव मनुष्य-मन कें बेशी प्रत्यक्ष आ तें यथार्थ क' बुझा दैत छैक आ ओकर आयु सेहो होइत छैक अपेक्षाकृत बेशी । सुख बिलाई छैक, बिला जाइ छैक। दुख जीवन में रहि जाएत छैक। चुपचाप अपन कोनो कोन में उपेक्शा सैंतल अपना के रूपांतरित करबाक मनोव्यनहार में भऽ जाइत छैक, मनुक्ख के आत्मसात...दुखऽक रूप में ओकर विलय चेतना में ताहि अनिपात औऱ शैली में होयत छैक जो स्वयं ओ शरीर अर्थात मन-मस्तिष्क-चेतना के पर्यंत नहि होइत छैक तेकर अनुमान , अनुभव, बा ठेकान...। सुख जेंका विला के नहि स्वय के मनुक्ख जोग्य. बना कऽ, दुख बनैत अछि उपयोगी, सृष्टा और अक्शुण्ण प्रेम मार्गक बटखर्चा । सदा संबल। दुख स्वयं संग लोकके बदलैत अछि तैं अपन अस्वीकार्यता-अग्राह्यता में पर्यंत वैह होइत अछि श्रेयस्कर, मनुक्ख बाट के लक्श्य धरि लो जेबाह में ओकरे दिशा निर्देश होइत अछि, बेशी उपयुक्त । चैन छीनब सतत चैन छिनबे नहिं थिक। चैन छीनब बैचेन करबाक एकटा प्राकृतिक उपाय थीक, ई उपाय तुच्छता सऽ विशेष संऽ संजोग आर मुक्तिक सीढी बनिकऽ अपन काज करति अछि । अपन काज करति रहैत अछि। दुख के माहुर जेकां केला से उपयोग दुख हेय भ जायत अछि। हेयता मनुक्ख स्वभावक अंहार पक्ष होयत अछि। उच्चता आ उत्थाने होयत अछि ओकर स्वाभाविक उत्कर्ष। मनुक्ख भौतिकता सऽ लऽ कऽ अध्यात्म पर्यंत करैत चलैये अपना -अपना रुचि, सुख आर कर्तव्य सं अपन पथक निर्धारण - निर्माण... एहि में सऽ कतहु प्रकट होयत अछि रचना अपन संपूर्ण शरीर मोनक स्पंदन लेने, भीजल-तीतल सर्वांग उल्लसित मुख मंडल लऽ...को खन अतिचिंतित विश्वबोध सऽ जेना कालिया दह में प्राण लेबाक चिंता आर क्लेश में छोड़ि जानि नहि कतेक काल डूबल रहि गेला, जमुना में श्रीकृष्ण। कतेक काल....! जेना कै जुग-आ जमुना तर सऽ नथने नाग जखेन ऊपर भेला उल्लसित मुखमंडल आर भीजल शरीर संग, तखन ते नहल-भीजल छल डांढ़ में खोंसल बंसुली सेहो हुनकर... राधा देहक पसेना अनेरे भ' गेलनि बर्फक बनल सरिसो दाना,मेंही-मेंही कण चकचक सटल ऊर्ध्वांग ।बनबैत देह-मन शीतल, दैत दुर्लभ चैन, शान्ति आ सहन करबा योग्य सम्पूर्ण अपार वर्तमान, जे एखनि किछए पल पहिने धरि छलनि अस्तित्व कें अनाथ छोड़ने, जानि ने कत'? घुरि क' आबि अंकबारने छनि गसिया क' परम प्रिय सखि गंगा सन प्रगाढ़। कनफुसकीए पूछि रहल छनि-श्रीकृष्णक विषय। राधाक सम्पूर्ण अस्तित्व मे ध्वनित, अनुध्वनित-प्रतिध्वनित छथि आब-वैह नाग नाथि एखनहि यमुना सँ बहार भेल-श्रीकृष्ण ।.... -' ई एना नोर किएक बहए लागल असोधार? ककर थिक ई दिव्य आँगुरक हाथ ? के पोछि रहलए हमर नोर ? कहाँ सँ ध्वनित भ' रहल लगातार- किएक कनैत छें राधा, किएक करैत छें एतेक दुःख ? नोर सेहो ओतेक निरर्थक नहि राधा। तोरा-कम सं कम तोरा तं बूझल छौक । तोहूं भ' जएबें तेहन साधारण-बुद्धि ? नहि कान राधा। शान्त हो, स्थिर । -' केऽऽऽ केऽऽऽऽऽ?' अपन-अपन राधा २२म खेप जखन-जखन पृथ्वी पर पसरैये अनर्थ-अन्यायक वातावरण, लोक प्राणिमात्र होअ लगैत अछि--अपमानित प्रताड़ित आ अपमृत! सबजन हाहाकार मे तिरोहित भ' जाइत अछि स'भ नैसर्गिक मृदु- मधुर वाणी,स्वर ,शब्द, भाषा तथा अंग भंग होअ' लागि जाइत अछि जीवन-छन्दक, प्रकाश इजोत आगि दितहुँ बनि जाइत अछि-क्रान्तिहीन व्यर्थ क्रिया आ अन्हार भ' जाइत अछि काल प्रमुख मुखिया, जनजीवनक बसात बनि जाइत अछि दास, मात्र किछु आ किछुए सत्ताक खास बाट सबजनियाँ बनि जाइत अछि सदाक बास्ते राजा कंसक कारागार, कारागार स्वयं बिन सेवा-सुश्रूषा, औषद-परिचर्याक प्राण लैत रोगीक अस्पताल, डाक्टर-वैद्य चलि जाइत अछि अपन कोनो सुभीता-सुरक्षाक पाछाँ दौड़ि क' नुकाय, लागि जाइछ करबा मे अपनहि प्राण रक्षाक उपाय.. .रोगी समुदाय-कष्टक गगन भेदी आर्त्तनाद पर्यन्त जखन अन्हर-बिहाड़ि मे उड़ैत धूरा् जकाँ अकारथ प्रभावहीन बनि जाइत अछि, दुर्घटना ग्रस्त माए-बाप जकाँ लोक कें अपन सकल स'र सम्बन्धी आप्त समाज क्यो नहि पूछैत छैक, एत' धरि जे-' पीयब ज'ल? कंठ सुखाइत हएत कैलौंहें बड़ी काल पीड़ा सहबा लेल चीत्कार...' नहि पूछ' औतैक कोय, नहि देखतैक आबि ओकर हालति, ओकर बाँचल खुचल देह-स्वास्थ्य| सौंसे स सौंसे होअ' लगतैक-टूट फूट, बाँचि ने जएतैक किछुओक कथूक मूल स्वरूप मनुक्ख सँ ल' क' वनस्पति पर्यन्त, आम भ' जेतैक नीमक गाछ, नीम बेल, बेल आक-धथूर आ आक धथूर भ' जयतैक-तिटपर्री, तिटपर्री स्वयं बनि जयतै सिक्कठिक बन-झाँखुर, बैर जामुन-लताम भ' जयतै झरकल दूभि, साबे-खड़ही,कमल पुरइन भ' जयतै करमी लत्ती सेमार, माछ सर्प, सर्प चुट्टी चुट्टी बताह हाथीक समूह, हाथी अपनो सँ पैघ दैत्याकारक नव बाघ-सिंहक बिकराल पतियानी... मयूर भ' जायत विलुप्त, आश्चर्य की ? कनैत-कनैत कोइली कौआ| कौआ उड़ैत-उड़ैत अहर्निश सुनइत अपनहि काँव-काँव क' बनि जायत टर्र टर्र करैत व्यर्थक अप्रिय स्वर। सूगा-मैना-बगड़ा कचबचिया- नीलकंठ नहि रहत अपन अपन स्वरूप भ' जाइ जायत गिद्ध-चिल्हो। बगुलो होइत तँ रच्छ, नहि भ' जायत कए प्रजातिक सुन्दर रूपाकृति मे-बाज ! किछु आओर हिंसक अपन चांगुर कएने-तीख आँखि के केने आओर खुंखार। पड़बा भ' जायत धरगर चक्कूक बर्छी वला चाँगुर महाकाल। मनुक्खक यैह राक्षसी रूपान्तरण आ सृष्टिक अधिकांश तत्व, पदार्थ प्राणिक विरुद्ध अस्वाभाविक अवतारणा- जीवन विरुद्ध कार्यकलापक मचि जायत त्राहि-त्राहि। सबटा बनि जाय लागत सहज स्वाभाविक। परिस्थितिक दासता मे मनुखक दबल कंठ अपन बौक होयबाक नियति के स्वीकारि लैत| आम-नीम भ' क' सिहकैत रहत आ मयूर-बाज बनि नोचैत रहत निरीह पड़बा सबकें चिबबैत रहत सपरिवार । नीलकंठ अपने नुकाएल फिरताह गाछ बृक्षक दोगे दोग। कतहु नहि भेटतनि सुरक्षा आ आश्रय। सब किछु भ' जाय लागत अपन-अपन अर्थ संकोच आ व्यवहार मे स्वाहा, समाप्त ।आ एहि प्रक्रिया मे आरंभ रहत कलियुगी पल-क्षण अति गतिक प्रवाह मे नव अपसृष्टिक होइत जाएत सत्ता-प्रतिष्ठा आओर तदनुरूप सम्राज्य.. ई सबटा प्रक्रिया समान्तर सृष्टिक ई समस्त गरल-प्रवाह मे जे झरकत, भ' जायत खकसियाह से मूलतः मनुखेक मन-प्राण। देह तँ बाद मे हएत मृतक स्वयं शिव सेहो गरल तं मने प्राण सँ कएलनि पान ! कोनो कि हुनकर देह ? भने भ' गेलनि गाढ़ नील वर्ण । घटित तं होइत छैक सबटा मने प्राण पर ने। एतहि होइत छैक विस्फोट, एतहि बजैत छैक-बाँसुरी।आ एतहि फुलाइत छैक कमल, कुहुकैत छैक कोइली, एतहि जन्मैत छैक विचार, एतहि सँ बनब प्रारम्भ होइत छैक-संसार। मोन प्राणक जेहन जाति गोत्र तेहने तं संसारक निर्माण आ स्वरूप| मनुखक मोनप्राण तं रचय मनुक्खेक संसार| से मन प्राण से सौंस मनुक्ख कें डाहि क' कएल जाइत मानव विहीन भूमिक भ' जाय लगैत छैक सर्वनाश- उपस्थित रहैत छैक सम्मुख संसारक महाकाल,तं सबटा भ' जाइत छैक अस्थिर, आतंकित आ असुरक्षा सँ बेहाल। मात्र आर्तश्वरें चिकरब, चतुर्दिक आर्तनाद भरि सृष्टि पूर्वाभ्यास परिपक्व कलाकार जकाँ जेना एकहि बेर कर' लगैत अछि अपन-अपन इष्ट अपेक्षित आ अपना देवताक पुकार| एक संग तँ तकरहि ब्रह्माण्ड भरिक एकत्र एक बेरक एहि वाणी-स्वरक ध्वनि प्रतिध्वनि सँ फूटि जाइत अछि टुकड़ी-टुकड़ी आकाश आ छिरिया जाइत अछि टूटि क' भरि पृथ्वी फूटल कोहा-खापड़ि जकाँ एहि कालक साक्षात्कार प्रायः मनुष्य- जीवन-यात्राक थिक सर्वाधिक अशुभ प्रारब्धक ठाम ! से ठाम की हम स्वयं ई अभागलि राधेहिक देह-प्राण- चित्त ? से खेत कि ई हमर -हमरे देह होअ' श्रीकृष्ण महराज ? यैह निसाफ ?' जानि ने ककरा पुछलखिन राधा ई प्रश्न बा मने मे उचरलनि, नहि जानि। जानथि श्रीकृष्ण !... अपन-अपन राधा राधा-२३म खेप (पछिला-२२ म खेप मे अपने पढ़ने रही-) .... भरि पृथ्वी फूटल कोहा-खापड़ि जकाँएहि कालक साक्षात्कार मनुष्य जीवन यात्राक थिक सर्वाधिक अशुभ प्रारब्धक ठाम ! से ठाम की हम स्वयं ई अभागलि राधेहिक देह-प्राण- चित्त ? से खेत कि ई हमर -हमरे देह होअ' श्रीकृष्ण महराज ? यैह निसाफ ?' जानि ने ककरा पुछलखिन राधा ई प्रश्न बा मने मे उचरलनि, नहि जानि। जानथि श्रीकृष्ण !... आब राधा-२३म खेप क्रमश: कोना शिथिल भेल चलि गेलय शरीरक सब अंग ? परलो मे करोट फेरैत पर्यंत होअ' लगैत अछि आलस, उठि क' बैसबा काल तं एड़ी सं ल' गरदनि पर्यंत होअ' लगैत अछि उद्वेलित | आ जँ कहुना उठि क' बैसि गेलहुं किछु काल , तं उठि क' ठाढ़ होयबा क्षण तं सद्य: बुझायित रहैत अछि जे ई देह मथुरा ककाक खोपड़ी भ' गेलय| कनिक एक रती बसातो बहि जाय तं डोल' लगैत अछि |खसबा-खसबा पर बिर्त जेना कोनो क्षण -मथुरा ककाक खोपड़ी ! संभव दू टा बांस, दू बोझ खरही-खढ़क तैयार कएल गेल अपने हाथें -खोपड़ी,खुट्टा समेत छारल पर्यंत एतबै सामग्रीक खोपड़ी, कोनो क्षण खसि पड़बाक हालत में टगल ठाड़ ! हमर शरीर सैह भ' गेलए...अनमन । की करी कतय जाय, कोना जाय या जाय किएक ? एत्तैक असल प्रश्न त यैह कि जयबै कियै करी केकरो समीप ? मुदा देहक तं अछि प्रतिपल एहि इच्छा कष्ट भरल दिन राति हमरे पर भार यैह भार त बनि गेलए आब जेना आनक धनक क' रहल होइ रक्षा आनक अमानतक रक्षा में ई संपूर्ण चेतना, अपने शरीर हाथ पैर आंगुरक शक्ति धरिक क' रहल अछि दिन दिन हरण। बनौने जा रहल अछि सब प्रात किछु आर दुर्बल आर बेसंभार| केहेन पालकी में बीच बाट कनिया के राखि चलिए गेलए सब कहार? ई देह-ठठरी देहक ओहार लागल सबारी राखल रहि गेलए। आब भ' गेलए कतेक दिन, एहिना, एकहि ठाम! बाट बटोही एक कात स निकलैत बढि जाइत अछि अपन अपन ठाम पहिने कौतुहल तखन करूणा, एक रती चिंता, आ अंतत: समाज के गारि पढ़ैत बढि जाइत अछि अपन गंतव्य| हम लज्जा में कुंठित असुरक्षित, बिदागरीक कनिया बीच बाट के पालकी में राखल पालकी| किछु करबाक स्पृहा नहि बांचल अछि, किछुटा करबाक नहि होइत अछि मोन | मोन-देह तेना असोथकित लगैत रहैये... जेना कै कट्ठा खेत जोति क' आयल हरबाह होइ | बिना स्नान केने गमछा सं घाम सुखबैत बैसल कोनो गाछ तर। एक रती आर सुस्ता ली, एके रती आर...|तखनि उठि धार, करवा लेल स्नान जे मोन हो थीर ताहि एक रती एक रती में बैसल बैसल निन्न स..झूक' लागल होय आ गाछे में लागि ओठंगि क' भ' गेल हो निन्न। माथ पर सुस्ताइत चिडै़-चुनमुन्नीक मृदुल कलरवक हरियर पात स झरैत होय जेना देह पर, आकि बुन्न | मुदा लागि गेल होय अनायास प्रिय |आंखि लागि गेल होय, आंखि लागि गेल होय आ कियो ताकहु नै आयल होय, बड़ी काल! एत धर जे भ' गेल हो मुन्हाइर सांझ | जखनि आंखि खुजल त बुझाय लागल भोर...एकदम स भोर एकर अर्थ जे आई भोर स दुपहरिया त भेल, तकर बाद सांझ,..आ राति नहि भेल । से कोना धरफरैलए दतिमन कर गेलौं...त हंस' लागल ठहाका मारि क' मनोरथा ! - ई की भेलैक, ई त बताह भ' गेलौ रौ, भरलो सांझ क' रहल छहु दतिमन| तेकर त मतलब जे लदतऊ कनी काल में हर आ बड़द हंकैत बिदा हेतऊ बाध! ई त बताह भ' गेलौ..हा हा हा!' लजा क' ओ फेकैत नहि अछि दतमनि| करिते रहि जाइत अछि | ई बुझैत कि भोरक ज़बर्दस्त भ्रम भैले छैक ओकरा | मुदा अखेन सांझे कहलकै- कि हैतै, कियैक बर्बाद करबै नीमक ई ठाड़ि, जेकर क रहल छी दातमिन दांते-मुंह साफ करवा लेल त, कैल जाइत छैक दतिमनि ज लोक कै दिन दू बेर नहा लियै त कोनो दोख नहि, त दू बेर दतमनि क लेबाक लेल एतेक कियैक हंसी जखन कियो नहि छै ल’ग पास, नितांत असकर अछि राधा त के हंसलै ये ओकरा पर, भोर भ जेबाक भ्रम में दतमनि कर लगवा पर के हंसलै ए ! कंठ त अवश्ये कोनो सखी अर्थात सखी बहिनपा के नहि छल, तखन हंसल के ई पुरूख चारू कात आंखि के किछु आर पसारत, तकबाक चिन्हबाक प्रयास करैत भ गेली नब व्याकुल बड़ी काल धैर माथ में छहक्का बजरैत रहलेन, मोन खिन्न, खौंजाईत रहलेन, आ होयत की अपन मुंह अपने नोचि ली, अपन झौंटा अपने उपारि ली। कहुना क' करैत कुल्ला स दांत, सांझक दात्मैन संपन्न, मैल कुचैल आंचर स पोछ लगली मुंह कि अपने हाथ पर बुझैलें दोसर एकटा परम शीतल अपनत्वक हाथ अपने आंगुरि भ गेलेन अचानक अनचिन्हार- हम पोछि दिय मुंह राधा ! बड सुस्त छओ तोहर शरीर...' स्नेह कोमल स्पर्श स पोछि रहल छथि हमर भीजल मुंह | ओह त सैह हाथ थिक ई ??? -छोडू छोड़ू बड आयल छी दया देखबय लेल । राखू अपन नाटकक ई स्नेह अपने लग| आन ठाम देत काज, अहां के कोन प्रयोजन राधाक ?अहां के एकर कोन चिंता!' .... मुदा झटकल कहां भ' रहल अछि तथापि हुनकर हाथ ? हमरे आंचर स पोछैत हमर मुख ? हाथक सामर्थ्य कियैक भ' गेल अछि सुन्न ! -बड चलाकी के दुलार माधब, नहि हमरे संगे ?' ..से की...से की राधा !.. -मुंहों पोछ' बेसलहुं त हमरे आंचर स...अपन पीतांबरी की दूरि भ' जैत ? नहि कैलहुं तेकरा एकोरती हमर मुंह स्पर्श स मलिन, बेस !' -बात से नहिं राधा, हमर पीतांबरी सं तोहर कोमल मुंह खोखरा जेतउ |हमरा तेकर ने चिंता भेल| देखैत नहि छहीं किदन कहां-दन टांकल छैक एहिमें सोना-रूपाक तार पन्नी सब- माता जसोदाजीक कृपा सं..केहेन छैक खौंचाह-खरखर ?' की त सुंदर लगैत छैन...मुदा तोहीं कह जकरा स हम तोहर मुंहौं नहिं पोछि सकी तेहन वस्त्रक कोन का़ज ? अकार्जक...' -छोड़ू-छोड़ू बूझल अछि अहांक लीला| हमरा जुनि सिखाउ | देखू एक रती, केहन खरखर अछि अहांक पीतांबरी, जाहि स चछां जायत हमर मुख ?' स्न्देहें राधा यत्नपूर्वक छूबैत घीचलखिन कृष्णक वस्त्र | त से बात झलफल अन्हारक प्राय: करामाति ! -ओ त से ने कहू। क' क' तं आयल छी कै पहर जमुना विहार ! सौंसे तीतल त अछि वस्त्र अहांक...' -नहिं राधा से बात नहिं, से नहिं, करै हमर विश्वास...' -त कोना अछि भीजल वस्त्र, खाउ त हमर सप्पत!' -कोना भीजल बस्त्र, जदि नहिं चुभकलउं हैं जमुना में भरि सांझ त ?' राधा पुछलखिन -तोहर सप्पत। ते नहिं। कारण किछु आन छैक राधा।' -की से त बूझी...' कृष्ण कठिन असमंजस में पड़ि गेलाह| की कहथिन्ह, कहथिन्ह बा नहिं... -कहैत नै कियैक छी ? सोचि रहल हएब कोनो बहाना, झुठ्ठे खेलहुं हैं हमर सप्पत, बुझलहुं हम| छूबिक कहू त हमर माथ, आर के रहै संग ?' -झूठ नहिं। सुनै। एकटा नेरू चरैत-चरैत जमुना में ओंघड़ा गेल रहैक| एखनि नहिं अबैत छैक हेल' ओकरा | कनिक काल आर होयतै त रघुनी काकाक ओ नेरू डूमिए जेतैक जमुना मे|... तैं जमुना में पैस' पड़ल राधा, अपनी कोरा में उठा क' ऊपर कैलिए.\.अवश्ये ओकर माय फकरैत छल हेते असहाय। बुझहिं मै पर्यंत, भ' जाइत अछि- एहि सृष्टि में कखनो काल केहन असमर्थ, अपन संतान लेल पर्यंत ओकरो कल्याणक नहि कैल भ' पबैत छैक कै बेर जरूरी स जरूरी उपाय। ताहू मै ओ भ' जाइत अछि केहेन निरुपाय। एत' धरि जे संतानो लेल, संतानक दु:खे मायक फकरब होयत अछि बड असह्य काल। बात ई छैक राधा, तैं भीजल अछि हमर देह आर वस्त्र।' आब भेलौ विश्वास बुद्धू !' राधा मातृ-व्याकुलता मे हुनकर देह-वस्त्र हँसोथ' लगलीह होइत रहलीह बिकल। कतेक काल सँ छी भिजल देहें अहाँ ? सर्दी नहि भ' जायत हएत नहि ज्वर ? हम कोन उपाय करी आब। अछयो तव नहि कोनो पुरुष-वस्त्र।बेचैन भ गेलीह। कहाँ छनि पुरुखक कोनो वस्त्र घर मे। बजलीह, बल्कि पुछलखिन-' की करू, की पहिराउ अहाँ कें एखनि, बाजू ने।' -से तं जानयँ तों, तोहर उपाय। हम की कहियौ ? बस्त्र तँ ठिके जहि छौक हमरा योग तोरा लग मे। किंचित करैत अभिनय एक रती भ' क' गंभीर एक रती हास कएलखिन-' एकटा उपाय छौक, करबें से ?' -'बाजू जल्दी, की ? कहू।' राधा व्यग्र भेलीह। प्रत्याशा मे ताक' लगलीह कृष्ण दिस। -अपने नूआ द' दे' खोलि क', हम सएह पहिरि ली...' ओहन झलफल अन्हार मे पर्यन्त स्पष्ट देखार देखलनि- श्रीकृष्णक ठोढ़क दुर्लभ कुटिल बिहुँसी, राधा। सर्वांग संगीत-सुन्न भ' गेलनि चेतना । एक्के क्षण लेल मात्र मुनएलैन राधाक दुनू आँखि। बजलीह- -'हर्जे की माधव ! लिय' अहाँ कें ने लागय बोखार, हो नहि एको मिसिया कष्ट...लिय',... सत्ते उतार' लगलीह राधा अपना देह पर सँ आँचर खोल' लगली-साड़ी...। देखितहि कृष्ण भेलाह राधहु सँ बेशी व्याकुल। -' ई की करै छें राधा ! बताहि ! पकड़ि लेलखिन राधाक हाथ। -' जुनि हो एना उद्विग्न। कह’ लगलखिन हमरा ज्वर नहि हएत।मोन खराप नहि हएत। कनियें काल मे तँ चलि जायब आँगन| बदलि लेब भिजलाहा ई वस्त्र । नहि कर तों चिन्ता ।' राधाक कोमल कृश हाथ कें स्नेह सँ दबैत कर' लगलखिन कृष्ण हँसी-'...मुदा एकटा क'ह, तोरो ई कोन चलाकी? देह परक साड़ी खोलि क' देबाक बदला राखल कोनो नइं द' सकैत छलेहें ? कि तं चिन्तो देखा देलौं आ कनियों हेतनि कृष्ण के लज्जा बाँचल तँ देह परहक साड़ी तं नहिये करता हरण। बूझल छौ । की सैह बुधियारी ने ? बाज..'. -' नहि माधव,एना नहि किचकिचाउ हमरा। नै करू ठठ्ठा। अहाँ कहाँ कहलौं राखल साड़ी देब' हमरा? से तँ कहलौं पहिरलहे दे। एको क्षण तखन किएक हो देरी ? एको क्षण किएक रह' पड़य भीजल अहाँ कें। आ जखन अहींक इच्छा से, तँ हमरा हेतु कोन बाट ? अहाँ जे मंगलौं सएह हम देलौं। हम द' रहल छी।' कहैत राधा शान्त,प्रकृतिस्थ। एको रती ने विचलित। बल्कि तकैत सम्मुख कृष्ण कें पीबैत...आंखि असोधार... -'मानि ले तोहर ई साड़ी पहिरने हम निकलितौं ..लोक देखितय..लोक की तोरे सखि-बहिनपा- तखन की होइतौक ? होइतौ नइं तोरा लाज? लोकक ?' ओ बिहुँसि रहल छलाह प्रेम कुटिल बिहुँसी । -‘से पक्ष अहाँक। हमर कोन मर्यादा आ लोक लज्जा। बनल रहय भरि समाज, से पक्ष आ दायित्व अहाँक कृष्ण, मात्र अहीक।‘ कृष्ण अपन हाथ कान्ह पर पुनः केश पर फेरैत राधा कें ललाट पर लैत अलौकिक चुम्बन, बाँहि कें करैत किछु आओर प्रगाढ़, अनचोखे हिचुक' लगलाह।हिचुक' लगलीह राधा हुनके संग-बड़ी काल बड़ी काल, आर बड़ी काल... एहिना चलैत बितैत रहल कएटा ने युग... अपन-अपन राधा राधा- २४म खेप  पछिला खेप अपने पढ़लहुं-- -'मानि ले तोहर ई साड़ी पहिरने हम निकलितौं ..लोक देखितय..लोक की तोरे सखि-बहिनपा-तखन की होइतौक? होइतौ नइं तोरा लाज ? लोकक ?' ओ बिहुँसि रहल छलाह प्रेम - कुटिल बिहुँसी | -से पक्ष अहाँक ।हमर कोन मर्यादा आ लोक लज्जा ।बनल रहय भरि समाज, से पक्ष आ दायित्व अहाँक कृष्ण, मात्र अहीक। कृष्ण अपन हाथ कान्ह पर पुनः केश पर फेरैत राधा कें ललाट पर लैत अलौकिक चुम्बन, बाँहि कें करैत किछु आओर प्रगाढ़! अनचोखे हिचुक' लगलाह । हिचुक' ल्ग्ली राधा हुनके संग-बड़ी काल बड़ी काल, आर बड़ी काल... एहिना चलैत बितैत रहल कएटा ने युग... आब पढ़ू - बड़ भ' जाइत छें बिकल राधा ।संसार मे मनुक्खक निजी संसारक बादो रहैत छैक बड़ पैघ-पैघ संसार। तकर कार्य कलापक-सुख राग-विराग, इजोत अन्हार सभटा ई सब अपन अपन सभक संसार चलितहि रहैत छैक।अपन संसारक संगति अपना सँ फराक अपनो सँ बहुत पैघ संसारक बैस' पड़ैत छैक मनुख कें। सएह छैक एकर नियति, मर्यादा बा कर्तव्य आदर्श राधा । तकर अवहेलना अपनो संसारक प्रेम कें डाहि दैत छैक। अपन संसारक प्रेम कें अविकल रखबा लेल पसरल संसारक कर' पड़ैत छैक चिन्ता आ स्नेह। राख' पड़ैत छै ताकुत ।यैह विवेक मनुष्यक सीमा थिकै आ एकरहि मे नुकाएल छै सामर्थ्य सेहो। अपनो संसार बहुत दूर धरि नहि होइत छैक खास अपने उपभोग लेल मात्र,स्वाधीन । 'बुझलहिक बुद्धू दाई?' एकटा ई देह एके मोन, कतेक दिन,मास,वर्ष मे पसरल अनिश्चित आयुर्दाक जीवन कोंढ़ फाड़ि कानि रहलए लोक मोनक जोर सँ लगबैत ठहक्का, एहन समयक कठिन रस्ता पर चलैत-सोचैत अपन होयबाक किछु प्रयोजन जे फराक किछु अर्थ-अभिप्राय द' सकय बौआ रहल व्याकुल समय कें बाट सबटा बाट जेना लेने हो एकाएक तेसरे-तेसरे लगै वला हाट रूप ध' लेने हो जेना सब दिने हाटक रूप ! आ ओइ बाटे चलब मनुक्खक भ' गेल हो महा मोश्किल। सबटा पथ भरल जेना बिक्री आ कीनबा लेल अनन्त बस्तु जात सँ सजाओल हाट, सौंसे बाट ! जेम्हर पड़य डेग, सोझाँ सजल देखाइछ-वस्त्राभू्षणेक दोकान जानि ने अचानक लोक कें कतेक चिन्ता भ' गेलैए- लज्जा झँपबाक सौंदर्यीकरणक सुख-विलास एक सँ एक आकर्षक, लोभा लै वला बे-जरूरी बस्तु सँ चकमक करैत जिनिस सँ सजाएल सोर पाड़ैत लोक कें जेना किनबा लए..गहिँकी के करैत पुकार सौंसे बाट सजि गेल हाट ! जे नहि क्रेता बा छनिहें ने जिनका क्रय-शक्ति, अर्थात् टेंट मे टाका, ओइ द' क' चलब छनि बन्द। अपने गाम सन आब भरि संसार- चाउर-दालिक स्थान ल' लेलकएकिदन-कहाँ नबका स्वाद। तकरे पसरल विन्यास... ई एकटा विस्मयकारी अनुभव जे-सबदिना जरूरी जीवन रच्छाक बस्तु सभ भेल जा रहलय दिनानुदिन जेना बेजरूरी। आ जकरा बिनु चलि जा सकैए काज से बनि रहलए प्रधान। ताही बस्तु जातक आब खुज' लागलए बेशी दोकान । भरि हाट सजाओल-पसरल, राखल जेकाँ एहन सन जे ओकरा लेबा लेल देबाक नहि हो दाम...बजारक ई अदा केहन नब आ मोहक अछि, क्रूर सँ क्रूर कर्जा लेबाक बाट अनेरे धरा दैत अछि-अशिक्षित गरीब लोकक बड़का समाज कें। कंतोर खोलि क' बैसा रखैत अछि-साहुकार...कखनो गामक जेठ रैयति-जिमिदार कखनो बैंकक कोषागार ! फराक-फराक दोकान से तेहन देखनुक मोहि लै वला ओकरा आगाँ सँ बढ़ैत काल हठात् ठढ़ भ' जाइक इच्छा होअ' लगैत छैक। अंकुराय लगैत छै किनबाक-पहिरि लेबाक दुर्दान्त स्पृहा ! आब गामक हाट एकटा नवे रूप आ स्वभाव मे पसारि रहलए अपन दोकान । हुनकर अरजल सम्पत्ति सँ आन करय सौख-मनोरथ, से किएक ? सौख-मनोरथ करय तँ ओकरा वास्ते देएय दाम। दोकानो वला नव काटक मधुर आ कटगर विन्यासिक आँगी-चोली, कंगन-पायल-गलाक हार मंगनीयें मे त नै द' दै छै। गहिंकी स दाम लैत छैक तकर। सेहो गंहिकीक इच्छा-लालिसाक जेहन वेगग ताहि मोताबिक। तँ हम किएक पानि जकाँ बहाबी अपन धनक उपकार ? तें आब से सुकाइ मरड़ ऋण लेनिहार सँ धरा लैत छथिन फी रुपिया दू आना मास,सूदि। पहिल खेप सूदिक टाका जोड़ि क' ह थ मे दै सँ पहिने निकालि क' राखि लैत छथिन,तखन दैत छथिन लोक कें कर्जा। तखन ओ कीदन तँ कहैत छथिन.........माने, जतेक मास पर रुपैया घुराएब ततेक दूअन्नी फी रुपैया बेसी देब' पड़त। तही शर्त पर देब कर्ज। से आश्चर्य जे ककरो नै बुझा रहल छै एना एतेक कड़ा सूदि पर ऋण लेब एको रती भारी।आश्चर्य ! सौख आ जीहक जे बढ़ि गेलैये एतेक चलाचली से कोनो एकाएक ? लोक दनादन पैसि रहलए एै दौड़ा दौड़ी मे। भने निश्चिन्त ... ओही दिन तँ बड़ नुका क' तितलिया देखबैत रहय, सत्ते एकदम नबे काटक भितर आँगी । तेहन मेंही-मेंही ताग-जाल सँ फूल पत्ती.. बनाओल केहन चक चक लाल-पीयर-हरियर-उज्जर रंगक केहन-केहन फेसनेबुल अन्दर बिलाउज ? मोन लोभा जाइ छै ठीके की । ई सबटा बजार आब जेना आँगन धरि पहुँचि गेलैए । घर तक। तें आब तँ गंहिकी के खाली इच्छे टा करबाक काज। किनबाक तँ सब सरंजाम ऋण भेटबा सं ल' क' बजार धरि सभक रचि देल गेल छै-प्रबन्धक जाल! से इच्छा त आब एहि नव-नव आकर्षक रूप सज्जा आ तकरा तुरन्त प्राप्त क' लेबाक आतुरताक अवसर तँ हाट-बजार सँ भ' जाइत छैक । बाकी तं किनबा लेल चाही-दाम,द्रव्य, माने धन। से तं तैयारे बैसल अछि-भरि कंतोर रुपैया रखने। आब तँ कएटा नव-नव सुकनी मरड़ सब। सुनै छी आब सैकड़ा चारि आना क' देलकैए सूदि-फी रुपैया। तथापि ऋण लेनहारक कमी नहि नहि भ' रहलैए। बल्कि बेशी बढ़ि गेलैये। इच्छा-मनोरथक बिहाड़ि मे पड़ि गेलय ई पूरा समाज, ई बिहाड़ि उठा देलकैये नबका वस्तु जातक नवे नवे उपयोगिता आवश्यकता बुझा क' किनबा लेल उसका रहल छै। लोक कें बजार अयबा लेल उत्प्रेरित आ लाचार करबा वास्ते प्रति दिन बढ़ि रहल ई हाट पर हाट ! पहिने कए गाम लगा क' कोनो एकटा हाट लागल करै कतबहि मे कतहु तेसरे-तेसरे...। आब पसरि क' बढ़ि गेल। तीन-तीनटा भ' गेल। एक रती परती छलैक मंदिर आगाँक स्थान, ओत'...सबसँ त धनिक मनोरथ बाबू दरबज्जाक आगाँक फैलहा धरती । ताही पर लाग' लागलए हाट। भरिसक तकर...भरिसक की सत्ते तकर ओ असूलै छथिन-अहगर क' बट्टी ! परतीक भाड़ा । अर्थात् तों मोनाफा कमेबें ताहि वास्ते हम देलियै भूमि, तों चुका तकर दाम। समय-समय पर मंगनीक किछु बस्तु जात तं ओहिना दैत रहैत छथिन,दोकानदार सब। नव तरहे भ' तहल छनि मनोरथ बाबू आरो समृद्ध होयबाक ।एक आध गोटय संकेतो कएलखिन जे-' ई की सरकार? एन डौढ़ीक सोझाँ मे हाट ? प्रतिष्ठा पर पड़त । हुनकर तेहन सन भाव चेहरा् पर जेना अहाँ महामूर्ख छी। नहि दिअ' ई सब परामर्श।परती पड़ल जमीन, देखैत छी बट्टी तरे देब' लागलए बारह-तेरह दिन केहन दिव्य उपजा...ठनठनौआ ! अहाँ कहैत छी-प्रतिष्ठा! औ एही नबका उपजाक किछु एक रती अंश समाज मे छिड़िया क' कीनैत रहब नबका प्रतिष्ठो । कोन अधलाह बाट भेल ई ?' मोसाहेब मित्र, परामर्शीक अकिल तँ एहि तर्क पर नंगड़ी सुटकंतङ जात जात खढ़ी...। गुम्मे भ' गेला। सुनै छी मनोरथ बाबू घोषणा कएलनिहें-बटोही-व्यापारी-दोकनदार सभक वास्ते जल्दिये बनबौता-नब धर्मशाला टाइप दस-बीस कोठलीक रैन बसेरा । एकदम आधुनिक जरूरतिक मोताबिक डी लक्स सुख-सुभीता वला। तेहन जे बिदेशक लोक के ठहरबा मे कोनो असौकर्ज नहि बुझाइ। आनन्द सँ ठहरय। पर्यटन-भ्रमण करय । घुरि क' अपना देस जाय तँ भारतक उन्नति-प्रगतिक प्रसंसा करय । दुनिया मे भारतक नाम होअय| पतक्का फहराय| एहि इलाका मे छेको कहाँ एकहु टा आश्रय भवन। दूर- दुरस्थ गेनिहार बटोही कें होइत छै कतेक कष्ट ? गौओं कें समस्या... कए काल तँ विपत्ति-विपत्ति । मनुखतोक रक्षार्थ ठहरबहि पड़ैत छनि घरबैया कें अभ्यागत । लत्ता सुत्ता कलकत्ता टाइप सर-संबंधीक लेल पर्यन्त कर" पड़ैये गौआँ के अकालो बिकाल बेर मे तरद्दूत। तिनका लोकनिक तँ प्राण बाँचत । तें मनोरथ बाबूक विचार मे हुनक ई योजना राष्ट्रहित मे अंतर्राष्ट्रीय तँ बुझले जएबाक चाही,जे अस्थानीय लोक कल्यानक सेहो मानक चाही । ' से एहन कल्यानी काजक, सुनै छी न्यों सेहो लिया गेलैए। से गल गुल छै समाचार, परोपट्टा मे। धन्य। ठीक तिनदिना हाटक प्राप्त बट्टी सँ धन क' रहलए केहन कमाल। धन पएबाक जेहने नब बाट तेहने नब प्रतिष्ठा उपार्जित करबाक आधुनिक तरीका-व्यवहार ! केहन दिब पहिने लग-पासक कए कए गामक लोक आबए एकहि ठाम लगैत एहि हाट किनबा लेल सौदा-सुलुफ-नोन-हरदि सं ल' गृहस्थीक जरूरी बस्तु जात। केहन होइत रहै मेला ! बल्कि केहन दिब भ' जाइक परस्पर भेंट घाँटक परिवारी उत्सव जकाँ अनमन ।एक गाम सं दोसर-तेसर आ चारिमो गाम वासीक एकदम सहज-सुलभ छलैक भेंट घाँटक संवाद-सम्मेलन ! दुख-सुखक गपसप आ मोन हल्लुक करबाक-प्लैटफारम । कतेक स्तर पर केहन-केहन संबंध-सृष्टिक अवसर । तेकर भरि जीवनी संबंध-अनुबंधक अनायास-आत्मीय व्यवस्था । जानि नहि कहिया सँ आरम्भ चलैत चलि आबि रहल छल । केहन दिब चलैत छल। चलि रहल छल सब काज। हाट-बजार-गँहिकी- दोकानदार, सबहक। बच्चाक खेलौना सँ ल' बच्छा-बाछीक रंग रंगक मुखारी-गरदानी तक...भ' जाइत रहै अनायासे कीन-बेसाह। दोकनदार-गहिंकीक केहन दिब रहै आपसी स्नेह, परस्पर विश्वास । धर्मी साहु तँ कहाँदनि करा दैत रहथिन कए टा विवाह-कन्यादान-तत्काल उधारी द' जरूरतिक बस्तु जात। -'एखनि निबाहि लिय' जजमान। सब संपन्न भ' जाय तँ द' देब, भ'जाय जखन इन्तिजाम। दुनू गोटय क्यो पड़ाएल् नै ने जाइ छी? हम त कत' कहाँ स आएल छी, बाबुओ के नहि छै आब तकर ठेकन- पता।...कोना बौआइत अही गाम ठमकलियै... आ आब तँ यैह हमरो ने गाम।जे पालन करय सैह ने माय, जे जीविका दिअय सैह ने गाम।' से दृश्य सबटा विद्रूप। बेशी पुरना दोकानदार सब माछी मारैत। न'व ढबक नव नव साज सज्जा मे आबि रहल, जानि ने कत' सँ कोन गामक दोकनदार ! अनचिन्हार । सजाबटि आ नव काटक आकर्षक मनोहारी बस्तुक अम्बार क' रहलए आयात।बेचि रहलए सब किछु पुरना शैली आ व्यवहारक सबटा आत्मीय आ परिवारी जकाँ रहल छल जे साहुकार। से हताश,दुखी आ विरक्त भ' रहल अछि। दुर्भाग्य तँ ई जे यदि आब ओकरा लग जाइतो छथि महानुभाव तँ उधार लेब' -जखन नहि रहैत छनि डाँड़ मे द्रब्य , आ किनबाक रहै छनि नबका अनचिन्हार दोकनदार सँ बस्तु, जे देनिहार ने कोनो बस्तु उधारी । हुनका तखनहि मन पड़ैत छथिन पुरना स्नेही, दुःख-सुख बुझनहार साहुजी। स्वाभाविक जे ओ आब हाथ उठा दैत छनि-' कहाँ सँ जजमान? बिक्री-बट्टा तँ देखिते छियै। बेसी काल बैसले बीतैये। अइ नबका युग मे तं दोकानदारी पराभब भ' गेलय। आब तं परिवारक पेट चलब दुर्घट भ' गेलै। कहाँ स लाउ उधारी? क'ल जोड़ेत छी। कहाँ स लाउ उधारी ? -'क'ल जोड़ेत छी। खाली हाथ घुरयबाक अधर्म नै करबाउ सरकार। कल जोड़ै छी।' -'पहिने त अहाँ नहि कहियो एना घुरबैत रही, सावजी ?' -अपनो तँ मोन पाड़ू, कए मास पर हयलौंहें हमरा दोकान। अइ बीच की किछुओ ने भेलै बेगर्ता-कोनो बस्तुक? ओहिना चलैत रहल गृहस्थी?' सरकार गहिँकी कें बुझबा मे किएक नहि औतनि ई विषय। मुँह लटका क' लज्जित, परास्त जकाँ घुरि जाइत छथि। करताह की? आमदनीक बेशी अंश त चुकब' पड़ैत छनि मासिक सूदि मे, नबका महाजन कें। डाँड़ तं भेल छनि ढील। ल' जे लेने छथि, साहुजी जकाँ महाजन सँ ऋण। दोसर जे, प्रायः सब गामे मे लाग'लगलैये आबनबका-नबका हाट । नबका नबका रंग बिरंगक हाट। ओहू सब गाम चलि पड़लैये यैह बसात- नब नब बस्तुक चमक दमक वला। एक हाथें ऋण लिय' दोसर हाथें कीनब बेशी तं अनेरेक इच्छा-सौखक बस्तु। प्रात सँ चुकबैत रहू कर्जाक सूदि। आब त सुनै छी नीक नीक लोक लगा रहल छथि जमीन अपन भरना। बेचि रहलए कए गोटय सोनक टुकड़ी अपन रौदीओ मे उपजै वला बला जमीन। कीनि रहल छथि नब धनपति सब। एवंक्रमे उठल अछि भयावह बिहाड़ि-उपभोगक बिहाड़ि ! जानि ने एहि मे कतेक घरक खाम्ह-खुट्टा उखरत-पुखरत। कतेक घर खसत आ भम पड़' लागत कतेक घरारी। तै घरारी पर चलत ह'र । क्यो नहि जनैत अछि। बेशी लोक बूझि नहि सकैये जे किएक भ' रहलैक ओकर मोन बेचैन? किएक भ' रहलैक ओकर परिवार मे अशान्ति ? किएक होअ' लगलैये-अपन स्त्री सँ बेशी काल बिवाद आ किएक रह' लगलैये ओकर जवान होइत धियापुता एतेक असंतुष्ट ? बुझहि मे ने आबि रहल छैक। लोक अबोध अछि। बयसें परिपक्व परन्तु अज्ञान। अपन-अपन राधा राधा-२५म खेप पछिला अंक मे अपने पढ़ने रही एते धरि-- ... बूझि नहि सकैये जे किएक भ' रहलैक ओकर मोन बेचैन? किएक भ' रहलैक ओकर परिवार मे अशान्ति ? किएक होअ' लगलैये-अपन स्त्री सँ बेशी काल बिवाद आ किएक रह' लगलैये ओकर जवान होइत धियापुता एतेक असंतुष्ट ? बुझहि मे ने आबि रहल छैक। लोक अबोध अछि। .................................... बयसें परिपक्व परन्तु अज्ञान आब पढ़ू -- दोसर दिसि अनेक तरहक परिस्थिति सभक भ' रहल अछि नित्यहु जन्म विकास। धीरे-धीरे घटि रहल अछि मनुष्यक प्रति मनुष्यक विश्वास । बेशी लोक बेशी काल बुझाएत उदास। चुप्प। हँसी ठहक्का गायब। भरि वातावरण मे दिनक कोनो असमय थकनी जकाँ पसरल जाइत।लगभग लुप्त भेल जा रहलए गामकगाम वासीक स्वाभाविक उल्लास। जखनि कि नित्य बड़ले जा रहलए दोकानक संख्या। दोकान मे चीज बस्तु आ गहिँक आबाजाही। हाटक संख्या। खिन्न खिलखिल क' रहलए जेना शान्त लयक बसात मे सन्ध्या कालक यमुना धार ! बाँचल खुचल बूढ़ पुरान कें ठकमूड़ी लागल अछि, अनमन ठुठ्ठ- ठुठ्ठ गाछ जकाँ। युगक मुखाकृति एक तरहें अछि उल्लसितआ कए तरहे बिखिन्न माथक सुख सं ल' तरबा धरिक सुभीताक अनेकानेक वस्तु जात दनादन बनि क' भर' लागल अछि हाट। सब टा तं सुन्दरे। सबटा तं काजेक बुझाइत। तं आवश्यके बुझाइत। यावत् धरि कोनोटा नहि भेटैत छैक लोक के पाइ-कैंचाक उपाय, ताबते धरि बड़ जी जाँति क' एहि नव सुभिताक सुन्दर बस्तु सभक करैये परहेज। जे कि ड्यौढ़ो-अढ़ैयो लगानी पर भेटि जाइ छैक कोनो गुन्जाइश चट सँ दौड़ रहलए बजार। कीन रहलए पसिन्नक बस्तुजात। भ' रहलय तृप्त सपरिवार ।जहिया जेना घुरब' पड़तै ऋण, तहिया देखल जएतैक। एखनि तँ नहि रहल गेलैक। नहियें रोकल गेलै इच्छा । एहन-एहन वस्त्र आ गहना, ... मामूली तनुकाक जनिजाति सौख सँ पहिरय आ हम जे छी चारि बिगहा भूमिक स्वामी से मोन मारि क' अपना धियापुता, स्त्रीक मनोरथ कें जाँति क' राखी? जोः त्तोरि के । किएक नहि हो हमरो परिवार के ओ से नीक बस्तु हमरो । जे भ' चुकल रहरहाँ भरि गाँव? एतबे दिन मे कए गोटय कए भाषा मे क' गेलय काकु..। -कहू तं जकरा धरिया पहिरक लूरि नहि, से औकाति वला लोक से सब क' रहलए एहि सब बस्तुक बेबहार..आ अहाँ अपना के पुरना मनें आ विचार-व्यवहार सँ जँतने छी। की त इच्छा अनन्त होइत छैक, कतेकक पूर्ति कएल जा सकैये ? तें विवेकी लोक नहि दौड़ऽ लगैये तकरा पाछाँ-पाछाँ। कहियो नै दौड़ल। आवश्यकता कें तें कएने रही सीमित। कम सँ कम।सैह कहि गेल छथि बाप-पितामह। तें ओही बाट के धेने छी। भनें से बाट आब चलितो नहि अछि समाजक बेशी लोक।तै बाट पर काँट कुश, जंगल झाड़, भङेरिक बोन जनमि गेलैये। कए ठाम खाधि-खूद...। पड़ल रहैये एकान्त। आब गौआँ सब कनी दूर भने पड़ै छै मुदा आबा-जाही लेल बना लेलकए एकटा दोसरे बाट। आब वैह व्यवहार मे छै। ध्वस्त आ उपेक्षित पड़ल छैक पुरना बाट। बेशी काल आवागमनक कारणें स्वाभाविके जे जीवन्त रहैत छैक। चहल पहल भरल। तहिना व्यवहार कम भ' गेला पर प्रयोग कम भ' गेला पर, व्यवहार आओर कम होइत गेला पर पुरनना बाट भेल जा रहल छैक सुन्न, एकान्त। बुद्धि ई छैक जे पुरना बाट पर कएटा भ'चुकलैये सर्पदंशक घटना आ राति-बिराति बटोहीक लोटा कम्मलक भ' गेलैये छिना छिनी। चोर उचक्काक आश्रय...। तैं नहि रहि गेलैकए आब ओ पुरना बाट पर चलब कनिको नै निरापद आ सुरक्षित । आब तें ई नबका बाट ! एकरो एकटा खिस्सा अछि- अइ नबका बाट चालू हेबाक खिस्सा... । असल मे जखन होअ' लगलैक बजार-हाटक खूब नफा वला प्रसार आ बनिया-व्यवसायी कें अपन माल ऊघि क' एत' सँ ओत' ओत' सँ एत' अनबा- ल' जयबा मे होअ' लगलै पुरना बाट घट्टीक सौदा, माने अनुपयुक्त--उत्पादन केन्द्र कारखाना ल, जएबा-अनबा मे अनुपयुक्त । यातायात मे असुविधा जनक , तें व्यवसायी समुदाय अपन मालक जल्दी आ किफायतीक संगहि सुरक्षित उघाइक इन्तिजाम मे रचलकए नब मार्गक ई व्यवस्था । गामक आ किचु लग-पास गामक किछु अबंड-लंठ छौंड़ा सब ठेकनाओल गेल एहि व्यवसायी-संगठन द्वारा । ओकरा सबकें कए तरहक लोभ-लाभ देखाओल गेलैक आ तैयार कएल गेल जे सब पढ़ल-अनपढ़ बेकार युवके सब छल। खेलाइत रहैत छल अपन-अपन रुचिक खेल बयसक मोताबिक। अनसमैया कबडी सँ ल'क' शतरंज धरि...।तेहन किछु के दाम द' क' कराओल गेल ओकरा सब सँ एकटा बनोत्री घटना...। जे फलाँ गामक बटोही कें डंसि लेलकै विषधर सर्प। अपना गाम पहुँचैत-पहुँचैत ओकर प्राण छुटि गेलै...। कोन गामक बटोही रहय, की नाम कोन समय से सबटा अज्ञात। तें जाहि व्यक्ति के सर्पदंश भेलैक से तेहन मूर्ख आ अपना जान सं तेहन बे-परवाह तं नहि रहल हएत जे ताकाहेरी नहि करितय। अपनो एही गाम मे जाहि बाटे जा रहल छल? एक सं एक सिद्ध ओझा-गुनी सं तं भरल अछि ई गाम। प्राण पर पड़ने तं मूर्खो कें फुराय लगैत छैक। आबि जाइ छै बुद्धि। ई एकदम मिथ्या समाचार थिक। एकटा बुढ़ा संदेह करैत कहलखिन। बात मे तर्क तं रहनि। मुदा समक्षे ठाढ़ एक युवक तमसा उठल। बुढ़ा के चेतब' लगलनि- ' जेना कि बीचे गाम द' क' छे ई रस्ता जे बटोही दौड़ि जैतै एम्हरे। औ बुढ़ा अपन मूर्ख ज्ञान नहि झाड़ू। ई बात सत्त छैक, हमहूँ जनैत छियै। हमरा आँखिक सोझाँक घटना थिक।' युवक तैश मे कहलखिन । ताहि पर बुढ़ा आओर संदेह ठाढ़ क' देलखिन । -‘ तखन तँ आर मोश्किल बात । कहलखिन- एँ हौ, एहन धोआ-काया रखने छ' आ लज्जा नहि भेल'? तोरा तँ बूझल रह' जे अपना गाम मे कएटा चाटी चलौनहार गुनी अछि। लादि क' कान्ह पर आनि नहि सकैत छलहक?... दोसर जे बटोहीक नामो गाम नहि पूछि भेल'? बिच बाट पर अपटी खेत मे प्राण जयबा लेल छोड़ि क' चल अयलहक?' बुढ़ा फेर तर्क कएलखिन कि युवक तड़ंगि उठलनि - -' जाबत धरि ई बुढ़बा सब याबत् काल धरि जीबैत रहत ताबत्काल गामक बिकास नहि होम' देत। सबटा प्रगति छेकने घिनाइत रहत। बाते ने बुझै छैत। बेर-बेर कहि रहल छियै जे हमरा सोझाँक बार छियै,तैयो बिस्वासे करय लेल तैयार नहि। बड़ अक्किल बला छी, जाउ ओम्हरे बाटे मरऽ। हमरा सब तँ ओइ दिनक बाद पकड़लौं कान। नहि हएब गाम सँ बाहर ओइ पुरना बाट द' क' ।' बाजल । बजिते-बजिते युवक ओत' सँ ससरि गेल। मुदा ओहि अभद्र भाखा मे बुढ़ा संगे बजितो गेला पर कोनो गोटे के साहस नहि भेलनि ओकरा टोकबाक। एहि घटनाक सौंसे गाम प्रचार भ' गेलै। जरूरियो रहैक। ई तं रचने सैह छलैक। एवं क्रमे पुरान बाट आ नव बाटक-बूढ़ पुरान नबका खाढ़ी आ बीच मे ई नव व्यवसायी वर्गक संगठनक प्रबन्धन प्रति दिन फुलाय-फर' आ बिकाय लगलै । एक सं एक अपरिचित नव रूप-शैली मे गामक जीवन बदल' लगलै। से ई बदलाव आ परिवर्तन तेहन उग्र छलैक जे बहुत जल्दीये लोक, संबंधी आ गामक जे किछु संस्थागत रचना छलैक ताहि सब मे खूब तेजी सं प्रकट होअ' लगलै। एकदम देखार। बेशी लोक तँ जेना विचित्र तरहक कछमछी मे पड़ल देखाइ देब' लागल। पुरना पीढ़ी तँ विशेष चिन्तित आ बेशी बेचैन ! एहि वर्गक लोक कें बुझा रहल छलनिहें जे दिन प्रतिदिन आश्रमक सामान्य व्यवस्था मे बड़ बेशी परिवर्तन भ' रहल अछि अप्रिय परिवर्तन। सौदा-सुलुफ कीनब-बेसाहब सँ ल' क' भोजनक विन्यास धरि मे तेहन परिवर्तन जे बुढ़ा लोकनि कें बड़ बेशी अखड़ऽ लगलनि। साफ-साफ आब ई परिस्थिति छल जे आब आश्रम, आमदनी सँ बहुत बेशी खर्चा पर चलि रहलए। से बे-सम्हार रूप मे। आश्रमी खर्च मे मामूली बृद्धि नहि, बहुत अधिक -ड्योढ़ाक लकधक बढ़ि चुकलए।जखन कि आमदनी घटबे कएलय। घटब स्वभाविको। जखन साधने कम हो तँ उपजो-बारी कम हेबे करत। अन्नक उपजा तँ बरखा पर निर्भर। आब नबका ऋतु-प्रकृतिक चलते मौसिमक नियम मे जेना अपने ढील ढाल हिसाब चलिरहल छैक । अधिक काल तँ बर्खा घोर अनिश्चित। विस्मय तं ई जे आब ऋतु अपने अहदी भ' गेल जकाँ बुझाइछ तं । नबका छौंड़ा-छौंड़ी सब जकाँ ऋतुओ अगरजित्त भ; गेलय । कथा के सुनय। जकर जे काज आ ताहि पर परिवार-समाज निर्भर, से आब सबटा काज बिसरि कतहु जीवन जगताक नव लहरि पर गपाष्टक क, रहलय। गरजम गरजा क' रहलय। से गाम आ जीवन मे भ' रहल परिवर्तनक पक्ष आ विपक्ष मे कंठ फाड़ि क' शास्त्रार्थ करबा मे भोर सँ दुपहरिया, दुपहरिया सँ साँझ कएल जा रहलए। मुदा बाड़ीक भाँटा आ मिरचाइ गाछ मे दू लोटा पानि नहि पटाओल जा रहलय, जे कि बेरा बेरी सुखा गेल। बाड़ीक एतबो तरकारी सँ आश्रमक बड़ मदति भ' जाइत रहय। से आब लोक के बेकार बुझाइ छै। लोक बाड़ी-झाड़ीक परिचर्या निठ्ठाहे छोड़ि देलक बुझाइए। कि तँ एतबा तरकारी तँ हाटो पर टटका भेटिए जाइए, तुरन्त। बिना कोनो तरद्दुतक। गाछ सँ तोड़ल तरकारी सब । सेहो भाँति भाँतिक। तरकारिक ई सुभीता कहियो देखल ने सुनल। काँचे तरकारी सब देखि क' जीह मे पानि आब' लागय, तेहन देखनुक ! ताहू पर अपना गाम मे? बनितो केहन सुअदगर-चहटगर छैक। घुरिते फिरते कीनू...आब तँ गाम पर सँ कोनो झोरा-गमछा ल' जयबाक सेहो झंझट नहि । बिसरि गेला पर अगत्या धोतीक ढट्ठा मे तरकारी बान्ह' पड़य, तकरो कोनो समस्या नहि। तरकारिये वला नब-नब रंग-रंगक प्लास्टिकक अत्यन्त हल्लुक-फुल्लुक झोरी मे साँठि क' ध' देत। कोनो बिशेख तरकारी कीन क' ल' जा रहल छी. जे एखनि ततेक महग जे साधारण लोकक वास्ते सपना, से झोरी मे झक-झक देखाइत जायत भरि बाट, लोको सिहाइत रहत! श्रेष्ठ आ सक्षम होयबाक ई मजा अलगे भेटत ।...एखन कोबी तँ फल्लाँ बाबू कत' सेहो नहि रन्हेलनिहें। आ अहाँ अगुआ गेलौं...। चूल्हि पर चढ़ल ने कि भरि टोल सुगन्धि पसरि क' बाज' लागत- जे लिअ' हम रन्हा रहल छी । कोनो काजो मे व्यस्त रहब तँ जीह चटपटाइत रहत। के करैये सविधि स्नानो-ध्यान ओइ दिन !...अपना बाड़ी सँ त भाँटा-ओल-खम्हारु खाइत-खाइत मुँह टुटि गेल। किछु टा स्वाद जेना लगबे बन्द भ' गेल रहय । शहर वला सबकें त बेश सुभिता तकर। मुदा साधन अछैतो हमरा लोकनि कहाँ सँ जाइ चारि कोस तरकारी कीनऽ? के जाय। तें जीहे सैंतने रही।...आब ई गामक हाट । बाह ! मुदा बुढ़ा वर्ग मे एहि विषय मे घोर आपत्ति छनि-ई जिह्वा कें बहसा क' राखि देत। भोगवादी प्रवृत्तिक प्रसार हएत समाज मे । जकरा नहि जुड़तै से कर्ज लेत। स्वादक कोनो एत्ता छैक। नियंत्रण राख' पड़ैत छैक ऐ खएबा-पीबाक प्रवृत्ति पर। देखल छैक गौआँ के जे प्रियदर्शन बाबू जीहेक पाछाँ साकिन भ' गेलाह-साकिन । मुदा नै चेतैये...आपत्ति पर बुढ़ा लोकनि कें चुप क' देल जापत छनि । परिवार मे बुढ़ा-बुढ़ी लोकनिक किछु जूति नहि चलैत छनि आब । द्रव्यक इंतिजाम करबाक टा मुदा एखनहुं बुढ़ेक कर्तव्य छनि। जिम्मेदारी । ताहि द्रव्यक कोन उपयोग आ की ब्यबहार कएल जाय तेकर नियंत्रणक अधिकार नहि हुनका । तैं ओ सब बेशी गोटय क्षुब्ध आ चिन्तित रहैत छथि। ई एहन आमदनी दू पाइ आ खर्चा पाँच पाइक नबका जीवन-शैली सँ बहुत दबाब आ दुःख मे छथि। कहल कोइ मानैत नहि छनि । आ उचितक त्याग कएल नहि होइत छनि । जे बात-ब्यबहार नहि अर्घै छनि, आ तकर आपत्ति करैत छथिन, किछु सुझाव देबाक चेष्टा करैत छथिन तँ कि तं ठाइं पठाइं जबाब द' दैत छनि बा अनठा क' तेना ससरि जाइत छनि जेना मेघ दिस मुँह क' क' टर्र-टर्र करैत रहू । एहि उपेक्षा सँ बुढ़ाक अंतरर्रात्मा थरथरा जाइत छनि । बेशी सँ बेशी अपन ई दुःख आ चिन्ता, बूढ़ही कें कहथिन। मन हल्लुक करबा लेल। बुढ़ी अपने तटस्थ। उन्टे हुनके बुझब' लगैत छथिन- -' जुनि अगुताउ। युगे सैह भ' गेलैये, की करबै? सब घरक तँ एक्के ढाठी देखैत छियै । आनो गाम आ सर-संबंधी द' जे सुनैत छियै तँ दाँती लगैये। मुदा उपाय ? नबकी बहुआसिन नैहरक खिस्सा तँ सुनितहि आदंक ल' लेत। छिया-छिया । आब तँ हुनका गाम मे भक्ष्य-अभक्ष्यक विचार पर्यन्त नहि बँचलनि । जेकरा जे मन, खाइत अछि । बुझले अछि एकहि ठाम कतेक धनिकक बास अछि ओ गाम । से जे इच्छा भ' गेल से हाटक कृपा सँ लक्ष्मी आ तिनकहि बलें नोकर-चाकरक सेवा सँ, तुरन्त उपस्थित भ' गेल। आब बहुआसिनो त एलीहय ओही संस्कार आ रहन सहनक वातावरण सँ , ने। अपना संगे सैह संस्कार ल' क' । हुनको चाहियनि यैह नबके मर-मसल्ला बला रान्हल अनदेसी तीमन-तरकारी। नहि तँ उठाओल नहि होइ छनि होइत कऽर । नब कनियाँ छै, भरि पेट खायको नहि देबैक त... कतेक निन्दा हएत-गाम गाम। तें ध्यान ने दियै। कर' दियौ नेना के जेना जे करैत जाइए आश्रमी इन्तिजाम कनी दिन। आँखि-कान मूनिये लेबा मे सुभीता। नहि सुनै जाइत अछि क्यो कथा बात। उपाय? सौंसे गामे यैह बसात बहि रहल छै। से बसात अपनो परिवार कें तव लगबे करत। तें बुझू जे कोनो अपने टा समस्या आ चिन्ता तँ नहि । भरि समाजेक चिन्ता। होअ' दियौ जे होइ छै ।‘ बुढ़ीक एहि विस्तृत परामर्श सँ बुढ़ा एकटा नवे प्रकारक अनुभव सँ आक्रान्त भ' जाइत छथि। कहू, कहाँ तँ आशा छलनि जे बुढ़ी हुनकर चिन्ताक परवाहि करथिन, कोनो प्रभावकारी समाधान सुझौथिन। मुदा ई तँ उनटे हिनके आजुक युग धर्म बुझाबऽ लगलखिन -जीवनक मर्म आ स्वरूप। ओ तँ हतप्रभ जकाँ भ' गेलाह। यद्यपि कि बुढ़ीक एकहु टा सुझाव अनर्गल बा अनुपयुक्त नहि रहनि। परन्तु बुढ़ा कें कतेक आघात । तमसा गेलखिन । कहलखिन- -' से तँ बड़ दिब । परन्तु हुनका लोकनिक एहि इलबासि लेल बित्त कत' सँ आबय- बित्त ? से के करत ब्यौंत ? हम? भरि जन्म हम ?' बुढ़ा आइ बड़ विचलित छथि। कोनो युगो तँ अंततः, भने अनादि-अनन्त मुदा थिक एकटा अँगने ! जेना पुरबा-पछबा बसात तहिना मनुक्खक जीवन-परिस्थिति मे सेहो समय-समय पर परिवर्तन घटित होइतहि आयल अछि। आगाँ सेहो परिवर्तनक ई प्रक्रिया चलिते रहतै। मनुष्य के अपन स्वभाव आ दिनचर्याक अभ्यासक चलते, परिवर्तनक एहन कोनो बसात तुरन्त स्वीकार करबा मे बहुत समस्या होइत छैक-बड़ तारतम्य। नबताक सहज स्वीकार मे असौकर्जे-असौकर्ज बुझाइत छैक। परन्तु बुद्धि आ चित्त पर जीवन मे गतिमान परिवर्तनक निरन्तर प्रभाव पड़ैत रहैत छैक। प्रत्यक्ष बा परोक्ष। मनुष्य तकर अनुभव करओ कि नहि करओ। बड़ मेंही प्रक्रिया मे चेतना मे प्रवेश करैत चल जाइ छैक। परिवर्तनक स्वरूप जतेक देखार रहैत छैक-प्रत्यक्ष, ताहि सँ बहुत बेसी अप्रत्यक्ष अर्थात् अदृशय । तें जेना बाट चलबा काल भूमिका मात्र दुनू पएर आँखिक होइत छैक मुदा थकनी सौंसे शरीर कें । कोनो बसात जखन बह' लगैत छै तं खास कोनो एकहि टा घर, आँगन-दलान धरि नहि रहिजाइत छैक। भरि टोल आ गाम भरि पर तकर प्रभाव पड़ैत छैक। कोनो एकहि गोटेक पसेना छूटैत देह के नहि, ओहन घर-आँगन-दलान मे रहैत सब लोक कें स्पर्श करैत छैक। हँ, बसातक प्रभाव आ तकर मात्रा मे भेद अबस्स भ' सकैत छैक। जेना बहि रहल पुरुबाक पहिल आ बेसी सघन अनुभव सीमान परक बासडीह के बेशी होइत होइ, संभव। मुदा ई नहि होइत छैक जे बसात ओतहि सँ घुरि क' चलि जाइत होय...। शरीर एहि प्रक्रिया मे मात्र संग रहैत छैक। चलैत तँ छैक पएरे दुनूटा तहिना देखैत छैक आँखि। अइ दुनू अवयब पर देह तँ गाड़ीक कठकी जकाँ ! से ई परिवर्तन सेहो युगक बह' लागल एकदम नवे बसात । से अपना-अपना बुद्धियें जन जीवन के प्रभावित क' रहल छैक। एकर सबसँ उग्र बा देखार प्रवृत्ति बा लक्षण बुझाइत छैक से छैक जे अकस्माते समजक बेसी लोक बित्तक संकट मे पड़ि गेलय। अपना स्वभावक गति व्यवस्था मे केहन दिब चलि रहल परिवार देखिते देखिते ढनमना रहलय। लोक बेसी मानसिक दबाब मे पड़ि गेलय। पहिने जतबा धन सँ गुजर क' लैत छल, ततबे मे आब इन्तजाम नहि भ' पबैत छैक जतबा मे घर चलि जाइत रहै से आब नहि भ' पबैत छैक। अर्थात् भनसा घर जतेक काल खुजल रहैत छलैक से ताहि सँ बहुत बेसी- बेसी काल ब्यबहार मे खुजल रहैत छैक। माने जे भोजनक विन्यास बे हिसाब बढ़ऽ लगलैये। लोकक जीह बेसी पातर भ' गेलैये जेना। जाड़नि बेसी जर' लगलैये। धुआँ बेसी उठ' लगलैये । सभ आँगन सँ। सीसी बोतलसँ भनसा घरक ताख कए क्षण टूटि क' खस' लगलैये आब। बस्तु भूमि पर बेसी हेराय लगलैये। जियान होम' लगलैये। भूमि पर खसला सँ ब्यर्थ होअ' लगलैये। तेल-घीउक टाड़ीक स्थान बेदखल भ' रहलैये। साधारण व्यबहारक मटकूड़ीक स्थान कनिक बेसी तिलिया-फुलिया वला मटकूड़ी ल' रहलैये। कुम्हार लोकनि बिनम्र बोली मे गृहस्थ कें चेता रहलनिहें- -‘अगिला अगहन मे बेसी खोरिस देब' पड़त गिरहत। सब बस्तुक दाम अकास ठेकि रहलैये । सब टा परिवारी सौदा जान सँ बेसी महग भेट' लागलए । सबहक दाम रोजे बढ़ि जाइ मने। जखन कि नब काटक बर्तन बनयबा मे बस्तु, समय आ माथा सबकिछु बेसी लगब' पड़ैये हमरा यौर के। से अगहन मे एकबैक नहि भ' जाइ जाएब अस्तव्यस्त- देबा मे बढ़ा क' सलियाना खोरिस। तें पहिनहीं कहि देब जरूरी बुझाएल । कहि देली।‘ अपना जीविकाक हेतु कुम्हारक ई सावधानी बहुत आवस्यक छैक। नबका-नबका फरमाइश सब तँ ओकरे ने पूरा कर' पड़ैत छैक। से दीपावलीक अवसरक शहरी काटक आकाशदीपक ढबक आपूर्ति हो बा विवाहक पुरहर-पातिल। ओहो दबाब मे अछि। दिन-राति चाक पर बैसल रहैये तैयो नहि भ' पाबि रहल छैक-नबका नबका फरमाइस सब । परन्तु जेना कि संसारक विचित्रता अछि परिवर्तनक एही दबाब मे कुम्हार-कर्म मे सेहो प्रवेश क' रहल छैक नब नब ढब केर माटिक कारीगरी। पुरना तं एक आधे टा, बेसी नबका पीढ़ीक कुम्हार कर' लागलय काज। गृहस्थ कें नीक लगनिहें ओ फरमाइश पर फरमाइश क' रहल छथिन-ओकरे, अनमन ओही काटक मटकूर बना देबा लेल जाहि मे गृहस्थक समधिआओन भार पठौताह । लोको तंबुझतैक जे बौआ सासुरक कुम्हार केहन सुन्दर बर्तन-बासन बना रहलए । दोसर स्तर पर गाम मे आयलि नब कनियाँ सब मे कएटा अछि जे अपना नैहरक बसात । रुचि, बस्तु आ ब्यबहारक बसात। एत' सासुर मे सेहो प्रयोग क' रहल अछि। कउखन तँ सुझाव दैत,मुदा बेसी काल सासुरक आलोचना करैत जे- एखनहुँ ई गाम कतेक पिछड़ल छैक! हमर गामक रहन-सहन कत' पहुँचि गेल, आ अइ गामक चलनि तँ वैह दू सए साल पुरना...।कोनो नबकी भौजी अपना नैहरक गौरव गान करतीह। देओर-ननदि अपना गामक निन्दा पर आपत्ति करतनि-' सर तँ ठीक भौजी !बड़ धनिक आ कुशल कलाकर कुम्हार-कमारक गाम अछि अहाँक गाम। परन्तु एकहुटा नामी पण्डित-विद्वानक नाम भेटत ? एकहुटा नाम जकरा गामक बाहरो चीन्हल जाइत हो? दस-बीस तँ छोड़ू, दुइयो टा तेहन प्रतिष्ठित लोक?' -'जाउ-जाउ, बड़ विद्वान अहाँक गाम। एहन विद्वान गाम भइए क' कोन काजक? दरिद्र छिम्मड़ि तँ अछि सब ।आ स्वयं पण्डित विद्वान। एहेन विद्याक कोन मतलबक? जे बित्त नइ बना सकय, जीवनकें सुख सुभीता नहि उपलब्ध कराबय? पंडिताइ कि लोक धो-धो क' चाटत ? स्वाभाविक जे अल्पबयसी ननदि-दरओर, भाउजिक एहि धिक्कार सँ चुप रहि गेलैक। मुदा ऐकटा नब कनियाँ कहैत रहथिन जखन समयक अपन ई उच्च विचार, सुनि गेलखिन बुढ़ीसासु। एँड़ी सँ मुड़ी धरि लेसि देलकनि हुनका ई बात। कि चोट्टहि ललकि क' बाज' लगलखिन- -'एं ऐ कनियाँ,की बजलौं ? की बजलौं अहाँ? एको मिसिया तकर बोध अछि? अहाँक बुद्धियें तँ, अहाँक ससुरक पण्डित हएब बेकुफिए भेल? धिक्कार ! केहन कुसंnस्कार ल' क' आयलि छी। केहन अछि अहाँक परिवार आ केहन संस्कार द' क' माय-बाप सासुर बिदा कएलनिहें , कहू त। हम तँ पुछबनि बौआ कें-केहन ठाम बेटा बियाहलौं ? मना करैत रहिअनि बेटा मे रुपैया नहि गनाउ। नीक कुलशील मे ई बड़ निषिद्ध बात बूझल जाइए एखनो। आब भोगू भरि जन्म। ससुरे के मूर्ख कहि रहलय, एकहु रती विचार नहि जे ककरा कहि रहल छियैक आ की? कहू तँ, जाहि कनियाँक भरफोड़ी पर्यन्त ने भेलय तकर बुद्धि आ भाखा एहन? दुर्गा दुर्गा।' नबकनियाँ कें एकर आशा नहि छलनि। जहबो करितनि ओ बजबे करितथिन अपन ई विचार तथापि।तखन तँ ओ एक रती माथ पर साड़ी राखि लेलनि, बैसलि रहली। बुढ़ी कहिते रहलखिन ठाढ़ि भ', बेग मे-' तथापि हमरा लोकनि तं विचारि क केने रही अपन सोन सन बौआक ई कथा जे परिवार जे आन तरहेंनहियों मुदा प्रतिष्टित- व्यवस्थित परिवार आ संस्कार वला घर छैक। से ताहि घरक बेटीक ई चर्या ? बिद्याक बिषय एहन बुद्धि? बौआ त हमर पढ़ुआ विद्वान छथि। एही बयस मे जेहन यश-प्रतिष्ठा अर्जित क' लेलनिहें ताहि पर नीक-नीक लोक के ईर्ष्या होइत छैक। जाहि विद्ये बलें एहि कुलक अदौ सँ जगत मे प्रतिष्ठा-मर्यादा, तकरे अहाँ क' रहल छी ई इज्जति ? एना खिधांस? एताबता जे अपनो स्वामी अहाँक मूर्ख ? धिक्कार कनियाँ, धिक्कार ! एहि घटना कें मामूली नहि बूझल-मानल गेल। बहुत दूर धरि उठलैक एकर ज्वारि...।बड़ी दूर तक पसरलै- पहुँचलै एकर समाद जे समाज मे विद्या कें आब डेगे डेग पर कएल जा रहलए बेदखल वृत्त। विद्वान भ' रहल छथि आब अस्तित्व मलिन। धनिकक बढ़ि रहलए प्रचण्ड रूपें प्रतिष्ठा प्रति दिन। ताहि अनुरूप अंकुरा रहल अछि, नबे एकटा फसिल। मनुष्य-मनक खेत मे उपज' लागल अछि एकटा नवे वनस्पति-लत्ती जे कि बेसि समाजक लेल छैक अपरिचित। परन्तु देखाउँस मे भ' रहल अछि बेश लोकप्रिय। एहिसं होइत नहि अछि उपज कोनो खास किछु, मुदा संवर्धित कएल जा रहल अछि, अपना अपनी । गतप्राय खढ़ी कें अनसोहाँत अप्रिय असह्य लगैत छैक, परन्तु करहि पड़ि रहल छैक सहन आ स्वीकार। एहि बेशी पुरान आ उग्र नवताक रुचि विचार प्रायः मुँहाँ ठुठी सँ आगाँ संघर्ष धरि पहुँचि चुकल छैक। बेशी परिवार भ' रहल अछि बेचैन आ क्रमेण स्वभाव सँ आक्रामक । काँट आब फराको सँ सौंदर्यबोधक, सुन्दर हतः स्पृहणीय आ काम्य भ' रहल।तें दलान- ड्राइंग रूमे नहि,आँगन-असोरो पर समवर्धित सुशोभित कएल जा रहल अछि। जाहि कैक्टस कोटि बनस्पति मे संवेदनशीन त्वचा मे गड़ि, बिसबिसयबा, कष्ट देबाक छोड़ि आओर किछु टा गुण नहि,से भ' गेल मनुक्खक नबका सौन्दर्य बोधक आग्रह-अनुराग। से समय आ विचार निठ्ठाहे बदलि रहलए जाहि मे सेहो काँट छल स्वीकृत जेना गुलाब सन फूल, फूलसंग काँटक प्राकृतिक देन- काँट गड़ब अपन धर्म संगे छल लोक कें स्वीकार, गुलाब सुन्दरताक रक्षार्थ सुन्दर, सुन्दर श्रेष्ठ नीकक रक्षा करबाक अपना कर्म गुणकारी स्वभावक कारणें छल काँट स्वीकार। कउखन नेना-सियान, ककरो देह-पएर मे पैघ फोंका घाव पाकि गेला पर असह पीड़ा यन्त्रणा द, रहल शरीर, अंगक फोंका बहा देबा मे छल लोकोपयोगी। तखनहुँ कएल जाइत छल स्मरण से गुलाबक काँट! घाव बहा क' करैत छल मनुक्ख कें कष्टमुक्त, पहुँचबैत छल आराम। मुदा ई नबका-नबका थोका वला सब विशाल विशाल काँट ? जेना काँटेक फूल ।अपन काँटक अपने बनल मालिक। गुण, गन्धहीन घमंडी ! राधा- २६ म खेप समय स्वयं सिरमा मे रखने जलक खाली बासन, अछि पियास सँ बिकल मुदा सबटा इनार आ पोखरि कोना जानि ने बिसरि गेल अछि तकर प्रयोग आ रक्षा प्रकृत जन्म भेल इच्छाक नहि क' रहलए लोक निबाह अछि समुद्र मे माछ जकाँ पर तृप्त ने छैक पियास केहन परिस्थिति केहन बुद्धि केर की बनलछि बिडंबना केकरो बुझबा मे नहि आबय ई नव युग केर रचना कि सब कोना कोन कोन विधियें पसरि रहलए घर-घर सलिलक स्वतः धार बहइत जे छल बहैत सब जीवन ठमकल ठमकल दुःक्ख मे भारी डेग-डेग पर क्षण-क्षण बिनु थकनीयें बैसि जाइत अछि सोच मे पड़ जाइत अछि बिलकुल्ले पसरल जाइत ई नबका मोनक रंग ढंग बिना युद्ध केर प्रतिदिन प्रति घर भ' रहलए जे हताहत घोर अशान्ति भरल बेशी मन चिन्तें अछि उद्विग्न-उन्मन कारण तेहन नुकाएल गोपन बूझि ने पाबि रहल लोक अधबयसे मे युगक ताल देखि भोगि नचारी गबइत लोक समय बनल जाइत अछि दिन-दिन स्वयं मूर्त्ति लाचारीक सभ शरीर सँ प्राण जेना सूखल जाइत अछि पल-पल अधिक लोक जेना बनि चुकलए बौक, कतोक बहीर शेष जीवनक नब ढर्रा सँ आतंकित आ अधीर आब परस्पर गौआँ-गौआँक रहि ने गेल आप्तता सब जेना सब सँ नुकाएल ताकय बचबा केर रस्ता तें अनेर मे आओर अकारण पसरि रहल अछि दूरी ककरो पर ककरो ने जेना बाँचल अछि आब विश्वास बहुत लोक गुम्म, बेशी दुखिया आरो बहुत उदास ई कोन युगक प्रवेश भेल अछि ओहन शान्त जीवन मे कर्मतृप्त मनुखक समाज मे केहन अशुभ से होएब बेशी हाथ कपार धेने चिन्तित बड़ ब्याकुल-ब्याकुल प्रत्यक्षें तँ शान्त जेना किछु भेले नहि हो किछुओ किन्तु लोक जीवनक अंतः उद्वेलित आगि जरैत'छि सब सहिये रहलए लेकिन व्यथा अपन ने कहैत'छि देह मोन आ प्राणक मध्य मे की अछि जीवन केर सू्त्र अछि दर्शन,आस्था बा युग सँ कहल-सुनल अनुबन्ध नहि बूझल होइछ बेशी क्षण एखन उठाएब प्रश्न देह विकलता मे अपना द' अनमन अपने सन मारि ठहक्का हँसय प्राण चकित चुपायल मोन सभ अछि सबमे तैयो अपना अज्ञाने लाचार जुड़य सभक अस्तित्व एकहि मे एक तंत्र संचार बोधक भिन्न स्थिति रहितहुँ अछि एक बिन्दु पर सम पूर्व गान केर हेतु जेना स्वर-शब्द लयक हो नियम बिना प्रयासे स्वतस्फूर्तित ओना होइछ सब क्रिया किन्तु आइ काल्हि ताहू मे होअय लागल व्यतिक्रम देह-मन आ प्राणक मध्य घटि रहल जेना हो समन्वय पहिने छल सब क्रिया बोध आ निष्पादनक सहजता आइ जेना टुटि गेल सूत्र हो आपसक तत्परता एक देह-मन-प्राणक सृष्टिक सुन्दर एहन महल मे आब जेना क' रहल वास हो तीनू एकसर एकसर तीनू ताकि लेने हो जेना अप्पन निष्क्रिय एकान्त तीनू मे बाजा भूकी नहि तीनू निपट अशान्त। ई अनुभव कि खसल एकाएक कोनो मेघ सँ पानि जकाँ ई अनुभव कि जीवन मे आएल नोतल कोनो नोथारी ई अनुभव कि आयल कोनो बनि समधियान केर भार मे ई अनुभव कि आबि रहलए कीनि क' हाट-बजार सँ ई अपनहि देह-मन-प्राण मे एतेक समाद हीनता सोझाँक सहज प्राप्त सुख पर्यन्त बनल जाइत अछि दुर्लभ कारण किछु प्रत्यक्ष कहाँ अछि कहाँ साफ किछु लक्षण मात्र अदृश्य संदेहक छाया सँ असुरक्षित आँगन दूरी बढ़ल जाइत अपना मे, बिन बातहिक परस्पर टूटल संबंधक स्थिति सम आँगन मे घर घर चौंकलि राधा, दुब्बरि गता उठलि चललि डगमग डग ई अनुभव आएल अवश्ये.बड़ बुधियारी बाटे। हँ बुझबा मे अबैत अछि आब ई आ'ल हाटे- हाटे इ आएल हाटे- हाटे। हाट बनल नब बाट जेना जीबाक सब तरहे। सभ बाट पर आब जनमि रहलए बन-झाँखुर। लोक लाचार । असमंजस मे - की करी, की नहि, कोन बाट चली एहि दुःख-दुविधा मे जे एक तँ ओहनहुँ छलैक कहाँ किछु विशेष हाथ आब तँ जेहो छलैक अपन अधीन, अपना योग्य, सभ भेल जा रहल छैक बेहाथ। किछु तं अपनहि घरक नवताक अन्हर-बिहाड़ि मे आ किछु भरि समाजक बदलि रहल दृष्टि आ व्यवहारो मे। यद्यपि कि सभक दुःख-दुविधा छैक रंग-रूप एक्के। मुदा से नहि बूझि पबैये लोक एकरा एना भ' क 'एहि रंग मे जे भ' रहलए सब किछु अंग-भंग। जीवन यापनक पारंपरिक बाट पर चलैत, सहैत जाइत सबटा नबका-नबका आघात जे प्रत्यक्ष मे तं छैक बड़ गंहीर स्नेहक स्पर्श, मुदा प्राण के थकुचि रहल छैक एक एक पल। कत' सँ ई कोन रोगाह वायु बहैत आयल छैक सभक बुद्धि बौआयल सभक हृदय घायल छैक। ताहू मे बेशी तं बनल छैक विडंबना ई, एहि सबक जड़ि छैक आन नहि, अपनहि सब ई यथा-पुत्र,पुत्रबधू, आ संगी-साथी सब। बहि रहल एहि बसात संग बेश गदगद अछि, बिनु बुझने एकर असरि। काल्हुक भविष्य पर अधिसंख्य नब लोक अपन-अपन फूकि रहलए घर। के बुझबय ? बूझक सेतु पुरना लोक सबकें राखल जा रहल अछि कतिया क'। नबके लोक सम्हारि रहल अछि नब युगक रासि। बढ़ा रहल गाड़ी के हाँकि क' एहि तरहें जेना कोनो दुपहियाक गाड़ी नहि, समस्त पृथ्वीये होथि गुड़का रहल, अपना सामर्थ्ये,अपनहि बुद्धि-ब्योंत सँ-आगाँ। समाज, बयसक पुरान ठकमूड़ी लगौने बैसल छथि चुपचाप, सबटा देखैत! तँ कि ई प्राण जे थकुचल जाइत बुझाइत अछि दिन राति से नहि थिक एकमात्र हमर?लोकोक बहुत छैक आन अपन। तँ कि छैक व्याकुल हमरा सँ पृथक किछु लोक, तँ कि ई संसार, समाज बनल छैक ओतहु आन? छोड़ि सर-संबन्धी कि ओतहु कएने छै असकर अपनहि दुःखक ज्वाला मे कि जरैत अछि आनो घर एहन विपत्ति नव प्रकारक आ पहिले पहिल स्वभावक, तँ कि अछि प्रारंभ ई अनुभव केर नबका आवक-जावक? चीन्हि ने पाबी हम यद्यपि एकरा कोनो आँखिक विचार सँ द्विविधे दुविधा अछि प्रति पल प्रश्न सोझ सन्सार सँ अछि एही मे शुरू मनुक्खक कोमल संवेदन सब मौलाएब, टूटि खसब गाछ सँ पात जेना सुखायल क्रमशः पातक संगहि डारि, ध'र आ पूरा गाछ, सुन्न कएल जाइत जीवन रस सँ धराशायी भ’ जाइछ गाछ तँ तथापि मरि-सुखा क' रहि जाइत अछि उपयोगी जाड़नि बनि जरि चूल्हि बनाबय, आबाल बृद्धक भोजन, जड़काला- हाड़कंपौआ ऋतु मे धधकि क' दिअय जीवनक ताप, मुदा मनुख-जीवन, ई देह- समस्त बिलक्षण, प्रकृतिक अनुपम सृष्टि पृथ्वी पर अनुपम जीवित सेहो एहन निरर्थक बनल अकार्यक देहक जीवन हो अंत तखन पर्यन्त लिअय फेरो समाज,परिवार,प्रकृति सँ काँच-सुखायल गाछ जे होइछ काठ, देह कें अंतिम परिणति धरि पहुँचाबय मे,शरीर-मृत मनुक्ख शरीर डाहै मे करबा लैत अछि खर्च जाइतो-जाइतो। -'हम-हम नहि राधा, तों..की सब सोचैत छें ...पुछैत राधा, कहैत राधा,सुनैत राधा..एखनहि केहन छल आत्म मुखर सक्रिय स्पन्दित ! मिझा गेल डिबिया जकाँ रहलए केना धुँआइत, प्रश्नक कोनो टा उत्तर नहि, कोनो टा ने बात-संवाद मात्र दीर्घ निश्वास-दीर्घ निश्वास-'कोना छी अहाँ कृष्ण, कहाँ छी, किएक छी ? एहन समय हमरे जीवन मे किएक एतेक रास जेहो नहि लेने ऋण तकरो भरि रहल छी सूदि, मूर धएल जसक तस अदृश्य कोनो बणिकक हमर पल, दिन, मास बर्ख चुकबैत अपन एक-एक साँस । एहन स्थान किएक बनि गेलय इएह हमर ई मन? भरि संसारक बस्तु, व्यक्ति, व्यक्तिक सब कार्यकलाप, क्रीड़ा आ सब कर्मक बनि गेल अछि सुलभ आँगन। जेकरा जखन सुभीता आबय क' लिअय व्यवहार। हमही आँगन हम मुदा ठकमूड़ी लेने ठाढ़ । कहि ने सकी केकरो निजताक बोझ, एकर संताप, बुझा सकी ने अपन एहि वर्तमानक कुटिल यथार्थ , हमर अर्थ छिड़ियाएल जेना कृषकक बीयाक छितनी-पथिया हो, बागु कर' खेत जाइत काल बाटे मे गेल हो हेराय, जतबा जे बिछि-समेटि सकलौं, हँसोथि-हँसोथि, खिन्न मन कर्माहत देहें यथोपलब्ध बीया कयलौं बागु ! घुरल हो ओहि प्रचण्ड रौद कें दैत ललकार घर आ बनल तथापि जीवन क्रम मे गाम मे स्थिर आशान्वित, फसिलक भावी उपलब्धिक दिस आश्वस्त, मुदा पुनि जतबो बीया छीटल गेल हो, घामे-पसेने खेत जोति तैयार कएल गेल मे तकरो सब कें चुनि क' ल' चल गेल हो चिड़ैक महा हेंज, एम्हर एक दिस निश्चिन्तता मे गबैत मनक भवितव्य, ओम्हर दोसर दिस सुन्न कएल बनि गेल हो खेतक गर्भ ! एम्हर निरन्तर बीया मे अंकुरयबाक , माटि के फोड़ि जन्मबाक-बढ़बाक, बढ़ि क' फसिलक गाछ विकसवाक अहो दिवस मर्मांतक प्रतीक्षा...ओम्हर जन्म सँ पहिनहि कोखि कें रिक्त करैत काल-गति, ई एहन हमरे टा किएक कर्माहत हमरे टा किएक वर्तमान ! आकि बोगि रहलए एहने आ यैह व्यथा आनो आन ?' सोचैत राधा छोड़लनि नमहर श्वाँस..। जानि ने कखन-कोना लागि गेल रहनि राधा कें आँखि। नहि जानि कखन बैसले बैसलि ओंघड़ा गेलीह ओ पटिया पर। ....जारी राधा- २७ म खेप "फसिलक गाछ विकसवाक अहो दिवस मर्मांतक प्रतीक्षा...ओम्हर जन्म सँ पहिनहि कोखि कें रिक्त करैत काल-गति, ई एहन हमरे टा किएक कर्माहत हमरे टा किएक वर्तमान ! आकि भोगि रहलए एहने आ यैह व्यथा आनो आन ?' सोचैत राधा छोड़लनि नमहर श्वाँस..। जानि ने कखन-कोना लागि गेल रहनि राधा कें आँखि। नहि जानि कखन बैसले बैसलि ओंघड़ा गेलीह ओ पटिया पर।" दऽकऽ ....(एत' धरि अपने पढ़ि चुकल छी) .आब आगाँ --- मुदा ई भेलनि बोध जेना देह भ' गेल डेंगी नाव! पटिया बनि क' यमुना मे हुनका कराब' लगलनि-झिलहरि बड़ी काल...एकसरि झिलहरि खेलाय मे रहली मस्त- बड़ी काल ! तखन होअ' लगलनि अगिले क्षण मोन विरक्त । आखिर यत्न क' नाव के घाट लगौलनि , भेलीह-संतुष्ट जे पहिल बेर नहि लेब' पड़ल श्रीकृष्णक सहयोग, आ खेपि सकलहुँ नाव, उतरि गेलौं पार ! अपन सुख लेल किएक करी केकरो नेहोरा ? भने कृष्णे किएक नहि होथि। एकहि मोन मे तुरन्त उपस्थित भ गेलनि-ग्लानि, छिया, कृष्ण पर निर्भरता तँ हमर नियति आ प्रारब्ध। कोना आयल मोन मे एहन बात ? धिक्कार मोन -धिक्कार... मुदा ई की ? घाट पर साक्षात् कृष्ण महराज ठाढ़ ! वैह खौंझबै वला बिहुँसैत, बढ़ा चुकल नाव सँ गमग उतरि रहलि राधा दिस अपन दहिना हाथ। सस्नेह, सार्द्र दैत अपन हाथ राधा भेलीह बिकल । मिला नहि सकलीह हुनका सँ आँखि । -' भरिसक मन मे हमरा बिनु यमुना मे नाव चला लेबाक छौक मन पर भार । अपन सुखक अपनहि कर्म-निर्भरताक सेहो छौक आत्म दीप्त विश्वास...राधा, तों केहन लागि रहल छें एहि अलौकिक क्षण , तोरो ने बूझल छौक। हमरो तँ थिक जीवनक ई प्रथमहि दुर्लभ दृश्य ! हम केना योगा क' राखी ई आनन्द राधा, कोन बिधि, तोंही देखा दे उपाय।' -' जाउ-जाउ, एत्तहु खौंझबैये लए हमरा आएल छी अहाँ । हम कएलए स्त्रीगन भ' क' अगरजितपना आ छी ताही मोने बेचैन, अहाँ के सुझैए विनोद एखन ।' राधा किन्चित स्नेह-क्रोधित भ' कहलखिन तँ कृष्ण भेलाह गंभीर। -' नहि राधा, हम तँ छी परम हर्षित-संतुष्ट। यैह त हमर कामना छल, तों बनि जायं-स्वयं आत्म निर्भर । नहि रह' पड़ौ तोरा हमरा पर निर्भर । तों कएलेंहें हमरे काज। हम तँ तें छी प्रसन्न।' -'किएक नहि, आब आओर रहब निश्चिन्त, मरओ राधा कि जीबओ, नहि राख' पड़त फिकिर ।' नाव सँ उतरि क' दरबनिया द' क' पड़यबाक छलनि विचार, मुदा ई तँ सर्वथा नवे परिस्थिति कएने छथि कृष्णजी ठाढ़ ! जानि ने एतबा काल एहि बीच की हएत आँगनक हाल। जे हो ... आब एहि क्षण तँ माधव-मायाजाल मे छी बाझलि हमहूँ । आगाँ देखी कोन नाटकक केहन दृश्य प्रस्तुत करय वला छथि-नटवर नागर...सकल गुण आगर ! बूलि क' राधा आँगन अयलीह तं आश्चर्ये ठकमूड़ी लागि गेलनि। बीच आँगन मे कृष्ण ठाढ़, सद्यः। हुनकर स.बोधनक कोनो टा ने जबाब दैत चलि गेलीह भीतर अपना कोठली दिस। धीरे-धीरे कृष्ण सेहो लागि क' पाछाँ राधाक पीठे पर पहुँचलखिन। एतनी काल मे पहुँचि जएथिन कृष्ण तकर नहि छलनि कनियों अनुमान। सरियाइयो कहाँ सकलीह आँचर पर्यन्त ...दुष्ट केहन जे पैसि गेलाक बाद कोठली मे खखसलनि कर्तव्य, कएलनि-राधा के साकांक्ष । अप्रत्याशित एहि कृष्ण-कृत्य पर भ' गेलीह क्रोधित । जेना तेना सरियबैत आँचर, तथापि घुरलीह पाछाँ दिस फेरलनि मुँह..कुटिल शृंगारोदीप्त भुवन मोहिनी बिहुँसी पसारने ठाढ़-श्रीकृष्ण । लग आबि क' खौंझाएल पोसुआ बिलाड़ि जकाँ राधा ! छड़पैत सन क्रमे ल'ग पहुँचि कृष्णक पीताम्बरी झीकैत’ 'हरण कर' लगलखिन.. . –‘'ई की, ई की करैत छें राधा । हमरा किएक करैत छें एना उघार ? देखत लोक हमर की रहत इज्जतिक हाल ! आखिर पुरुखोक होइत छैक इज्जति, मर्यादा लज्जा, पुरुखोक चीर हरण होइत छैक यदि नहि रहै पुरुषत्व...।' किन्तु हँसी-ठठा सँ राधा कनियों ने ठंढयलीह। कृष्णो बूझि ने सकलाह, राधा बजलीह किछु बा कनलीह..। स्नेहांक मे बन्हबाक हुनक मृदु प्रयास कें ताग जकाँ खुट द’ तोड़लनि। खौंझायलि ओ एतबा जे कृष्णक केश के पकड़ि घीच' लगलीह। ओ रहथि नहि प्रस्तुत, राधाक हेतनि एहेन स्नेहाघात। केश तिराइत मन छटपटबैत कननमुँह भ' गेलाह। मुदा राधा तँ जेना छलीह बताहि भेलि अपन तामस सँ। बूझल कृष्ण धैर्य सँ । सक्कत-बाँहि स्नेह सँ बन्हैत बुझब' लगलाह- -‘'भेलौ कि तोरा, की बात, की भेलौए बाज त किछुओ, हमरे सप्पत तोरा, भेलौए की से तँ कहै बताहि !... हमरो मन धधकैये कतेक दिन, मास-बरख सँ, कहाँ भेटैए शीतल स्नेहक छाहरि हमरो । तइ पर सँ तोरो यदि होउ एहिना हाल तँ हमर जीवन कोना चलत, कहिया धरि, कतबा दूर से तोंही क'ह कने ।...आखिर की भेलनिहें हमर बुधियारि राधिका जी कें , बुझियै त। से दोख जे भेलय हमरे बुते ? कोना-की। हिचुकैत राधिका कें करेज सँ साटि बड़ी काल कृष्ण अपनहुँ हिचकैत रहलाह निरन्तर ओतबा काल । दुहुक हिचुकब क्रमशः एकमेक बनल चलि गेलनि । राधा कें ई की भेलनि आ कृष्णहु कें ? दुनूक भाव आवेग एकात्म भ' चुपचाप बहिते गेल...जानि नहि एहि करुण चुप्पी मे जीवनक कतेक युग बीति गेल ! स्थिति मे एक ध्यान प्राण सेहो एक। -' निन्न भ' गेलौ राधा, सूति गेलें तों की ? ' कृ्ष्णक एहि पुछैत स्वर पर चिहुँकि उठलीह राधा । उठितहि भान भेलनि जेना होथि ओ श्रीकृष्णक आलिंगन मे माँझ आँगन मे ठाढ़ि । चारू कात सँ देखैत लोक, सर-संबन्धिक- सखि बहिनपा...। आकि लाज सँ व्याकुल एकहि बेर मे श्रीकृष्णक बाँहि सँ झकझोरि छोड़बैत स्वयं कें चिकरि उठलीह, पड़यलीह- लत्त॓-फत्त॓, निछोह... निन्न एतहि टुटि गेलनि । साँस फुलैत भेलीह बेसम्हार। जेना लोहारक भाँथी हो, ओहिना ताप जरैत उसाँसक भाँथी हो ई देह। आब भग्न स्वप्नक कर' बैसलीह भाग्यदशा विश्लेषण। पछताइत-पछताइत मन भेलनि अस्तम्व्यस्त । केहन दुर्लभ सुन्दर स्वप्नक क' देलियैक अपने दुर्दशा। कि अछि एतबो नहि लिखल , केहन भाग्य से कहि नहि, स्वप्नो जेना सुड़ाह होइत अछि, सोचथि राधा । मुदा ने जानि जखनि अबैत अछि किएक आधा , सौंस स्वप्न केहन दुर्लभ यदि हो मनोरथक । ओना तँ विकट भयावह स्वप्नक अंत नहि, व्यर्थक भरि- भरि राति बौआइत बन-झाँखुर मे बाधे बोने भरि संसार विकल भयभीत एकसर अनन्त मे लोक जेना पाछाँ सँ खेहारले जाइत कोनो राक्षसी सन असकर अब्बल नारीक पाछाँ लेने बर्छी-भाला कोनो डेग पर गाँथि सकैत अछि पीठहि दिस सँ त्रस्त जिजीविषा ग्रस्त प्राण छटपट दौड़ैत अनवरत जानि ने चल जाइत अछि कतोक योजन कतबा आगाँ आ कि ओही अपस्यांत दशा मे जत' धरैत अछि सुस्तयबा लेल एकटा डेग किंचित निश्चिन्त जे राक्षसी पाछाँ बहुत पाछहि छुटि गेलए, हम पहुचल छी आबि सुरक्षित अपन गामेक इलाका तें एक पल ल' ली दम । साँस करी स्थिर आश्वस्त, आकि जेना अवतार जेकाँ आगाँ मे आबि क' ठाढ़ कोनो भ' जाय विचित्र बिकराल भयावह हिंसक पशु मात्र एकटा ओकरा काया मे समाएल हो जेना कतोक बाघ-सिंह-हाथी-ऊँट आदि, सभ एकहि ठाम एक संग मुँह बाबि क' ठाढ़ जेना हो बड़का महलक सिंहद्वार केर फाटक जाहि मे एक संग पैसैत अछि सहस्रो सैनिक, अपन घोड़ा-हाथी रथ समेत से खुंखार जानवर सब केहन हँसैत लगैत अछि, जेना कि ओ गीड़य नहि, अहंक अएला पर अति प्रसन्न स्वागत करैत अछि केहन लगैत अछि एहन विशाल जानवर ई कोन थिक, ई जीव, जानि ने पहिले पहिल देखै छी- आगाँ एकटा डेग बढ़ौलक तँ सोझाँक धरती डोलैत बुझाएल, दोसर डेग पर देह-प्राण सौंसे संज्ञा जेना हेरायल, कोनो नहि बाँचल विकल्प कतहु पड़यबाक, सब दिशा मे हो जेना ओकरे पसरल पंजा,हाथ-पैर ओना तँ विकट भयावह स्वप्नक अंत नहि, व्यर्थक भरि- भरि राति बौआइत बन-झाँखुर मे बाधे बोने भरि संसार विकल भयभीत एकसर अनन्त मे लोक जेना पाछाँ सँ खेहारले जाइत कोनो राक्षसी सँ असकर अब्बल नारीक पाछाँ लेने बर्छी-भाला कोनो डेग पर गाँथि सकैत अछि पीठहि दिस सँ त्रस्त जिजीविषा ग्रस्त प्राण छटपट दौड़ैत अनवरत जानि ने चल जाइत अछि कतोक योजन कतबा आगाँ आ कि ओही अपस्यांत दशा मे जत' धरैत अछि सुस्तयबा लेल एकटा डेग किंचित निश्चिन्त जे राक्षसी पाछाँ बहुत पाछहि छुटि गेलए, हम पहुचल छी आबि सुरक्षित अपन गामेक इलाका तें एक पल ल' ली दम साँस करी स्थिर आश्वस्त, आकि जेना अवतार जेकाँ आगाँ मे आबि क' ठाढ़ कोनो भ' जाय विचित्र बिकराल भयावह हिंसक पशु मात्र एकटा ओकरा काया मे समाएल हो जेना कतोक बाघ-सिंह-हाथी-ऊँट आदि, सभ एकहि ठाम एक संग मुँह बाबि क' ठाढ़ जेना हो बड़का महलक सिंहद्वार केर फाटक जाहि मे एक संग पैसैत अछि सहस्रो सैनिक, अपन घोड़ा-हाथी रथ समेत से खुंखार जानवर सब केहन हँसैत लगैत अछि, जेना कि ओ गीड़य नहि, अहंक अएला पर अति प्रसन्न स्वागत करैत अछि केहन लगैत अछि एहन विशाल जानवर ई कोन थिक, ई जीव, जानि ने पहिले पहिल देखै छी- आगाँ एकटा डेग बढ़ौलक तँ सोझाँक धरती डोलैत बुझाएल, दोसर डेग पर देह-प्राण सौंसे सज्ञा जेना हेरायल, कोनो नहि बाँचल विकल्प कतहु पड़यबाक, सब दिशा मे हो जेना ओकरे पसरल पंजा, हाथ-पैर प्राण जेना चीत्कार क' उठय भय सँ आर्त्त अपन रक्षार्थ जोर ठहक्का पड़ल जेना ब्रह्माण्डे बिजलौका सं एक संग कड़कल चमकल आ सृष्टि भरिक मेघक समूह एकबेर गरजल, डरे भेल पसेना सं तरबतर थरथराइत सर्वांग बुझा रहलए जे जाइत होइ जेना ओहि जन्तुक बड़का फाटक सन खुजल कल्ला बाटे ओकर पोखरि सन पेटक सत्ते तखने उठल कंठ मोकल घिरघिरी भरल, आर्त्त पुकार मुदा के सुनय, सुनय के ? सुननहारक अपने भय-व्याकुल असकर ई वर्त्तमान स्वयं अपने ई प्रिय एकान्त, केहन असुरक्षित आ अशांत ! कोन जीव थिक आखिर एहन बिकराल आओर खुंखार सपनहुँ देखल तँ होयतै अवश्य अस्तित्व एकर पुछबनि हुनके, जँ भेटता तँ, कोन थीक ई जीव ? आइधरि देखल आ ने सुनल छल, माधव ! कोनो गतिमान पहाड़ कि सत्ये कोनो जीवे छल हुनका तँ हेबे टा करतनि एकरो बूझल परिचय। की नहि अछि हुनका एहि सृष्टिक जे किछु कोनो विषय अछि जानि ने कत्तेक ज्ञान कोना एतबहि बयसें पौने छथि सबटा ओ बूझैत छथि हुनका सबकिछुए सुझै छनि घ'न अन्हरिया मे पर्यन्त सबकिछु देखाइत छनि... कोना हमर खसि पड़ल कनपासा यमुना कातक घासक बन मे ओहन अन्हरिया राति मे से ओ ताकल एक्कहि क्षण मे कोन आँखि छनि केहन ताहि मे ज्योति विराजित दिव्य जत' जत' पड़ि जाइछ स्वतः भ' जाइछ ओत' इजोत ! हुनका सोझाँ तें अतिशय सम्हार' पड़इछ आँचर से सब सखि केर अनुभव वस्तुक भीतर वस्तु देखि लेबक अद्भुत कौशल छनि बिनु देखनहुँ श्रीमान जानि ने की की देखि ल' जाइत छथि सोचि स्मरण करैत लजयली एकान्तहु मे राधा... एखन कत' छथि कृष्ण ? समय स्वयं सिरमा मे रखने जलक खाली बासन, अछि पियास सँ बिकल मुदा सबटा इनार आ पोखरि कोना जानि ने बिसरि गेल अछि तकर प्रयोग आ रक्षा प्रकृत जन्म भेल इच्छाक नहि क' रहलए लोक निबाह अचि समुद्र मे माछ जकाँ पर तृप्त ने छैक पियास केहन परिस्थिति केहन बुद्धि केर की बनलछि बिडंबना केकरो बुझबा मे नहि आबय ई नव युग केर रचना कि सब कोना कोन कोन विधियें पसरि रहलए घर-घर सलिलक स्वतः धार बहइत जे छल बहैत सब जीवन ठमकल ठमकल दुःक्ख मे भारी डेग-डेग पर क्षण-क्षण बिनु थकनीयें बैसि जाइत अछि सोच मे पड़ जाइत अछि बिलकुल्ले पसरल जाइत ई नबका मोनक रंग ढंग बिना युद्ध केर प्रतिदिन प्रति घर भ' रहलए जे हताहत घोर अशान्ति भरल बेशी मन चिन्तें अछि उद्विग्न-उन्मन कारण तेहन नुकाएल गोपन बूझि ने पाबि रहल लोक अधबयसे मे युगक ताल देखि भोगि नचारी गबइत लोक समय बनल जाइत अछि दिन-दिन स्वयं मूर्त्ति लाचारीक सभ शरीर सँ प्राण जेना सूखल जाइत अछि पल-पल अधिक लोक जेना बनि चुकलए बौक, कतोक बहीर शेष जीवनक नब ढर्रा सँ आतंकित आ अधीर आब परस्पर गौआँ-गौआँक रहि ने गेल आप्तता सब जेना सब सँ नुकाएल ताकय बचबा केर रस्ता तें अनेर मे आओर अकारण पसरि रहल अछि दूरी ककरो पर ककरो ने जेना बाँचल अछि आब विश्वास बहुत लोक गुम्म, बेशी दुखिया आरो बहुत उदास ई कोन युगक प्रवेश भेल अछि ओहन शान्त जीवन मे कर्मतृप्त मनुखक समाज मे केहन अशुभ से होएब बेशी हाथ कपार धेने चिन्तित बड़ ब्याकुल-ब्याकुल प्रत्यक्षें तँ शान्त जेना किछु भेले नहि हो किछुओ किन्तु लोक जीवनक अंतः उद्वेलित आगि जरैत'छि सब सहिये रहलए लेकिन व्यथा अपन ने कहैत'छि देह मोन आ प्राणक मध्य मे की अछि जीवन केर सू्त्र अछि दर्शन,आस्था बा युग सँ कहल-सुनल अनुबन्ध नहि बूझल होइछ बेशी क्षण एखन उठाएब प्रश्न देह विकलता मे अपना द' अनमन अपने सन मारि ठहक्का हँसय प्राण चकित चुपायल मोन सभ अछि सबमे तैयो अपना अज्ञाने लाचार जुड़य सभक अस्तित्व एकहि मे एक तंत्र संचार बोधक भिन्न स्थिति रहितहुँ अछि एक बिन्दु पर सम पूर्व गान केर हेतु जेना स्वर-शब्द लयक हो नियम बिना प्रयासे स्वतस्फूर्तित ओना होइछ सब क्रिया किन्तु आइ काल्हि ताहू मे होअय लागल व्यतिक्रम देह-मन आ प्राणक मध्य घटि रहल जेना हो समन्वय पहिने छल सब क्रिया बोध आ निष्पादनक सहजता आइ जेना टुटि गेल सूत्र हो आपसक तत्परता एक देह-मन-प्राणक सृष्टिक सुन्दर एहन महल मे आब जेना क' रहल वास हो तीनू एकसर एकसर तीनू ताकि लेने हो जेना अप्पन निष्क्रिय एकान्त तीनू मे बाजा भूकी नहि तीनू निपट अशान्त। ई अनुभव कि खसल एकाएक कोनो मेघ सँ पानि जकाँ ई अनुभव कि जीवन मे आएल नोतल कोनो नोथारी ई अनुभव कि आयल कोनो बनि समधियान केर भार मे ई अनुभव कि आबि रहलए कीनि क' हाट-बजार सँ ई अपनहि देह-मन-प्राण मे एतेक समाद हीनता सोझाँक सहज प्राप्त सुख पर्यन्त बनल जाइत अछि दुर्लभ कारण किछु प्रत्यक्ष कहाँ अछि कहाँ साफ किछु लक्षण मात्र अदृश्य संदेहक छाया सँ असुरक्षित आँगन दूरी बढ़ल जाइत अपना मे, बिन बातहिक परस्पर टूटल संबंधक स्थिति सम आँगन मे घर घर चौंकलि राधा, दुब्बरि गता उठलि चललि डगमग डग ई अनुभव आएल अवश्ये.बड़ बुधियारी बाटे। हँ बुझबा मे अबैत अछि आब ई आ'ल हाटे- हाटे इ आएल हाटे- हाटे। हाट बनल नब बाट जेना जीबाक सब तरहे। सभ बाट पर आब जनमि रहलए बन-झाँखुर। लोक लाचार । असमंजस मे - की करी, की नहि, कोन बाट चली एहि दुःख-दुविधा मे जे एक तँ ओहनहुँ छलैक कहाँ किछु विशेष हाथ आब तँ जेहो छलैक अपन अधीन, अपना योग्य, सभ भेल जा रहल छैक बेहाथ। किछु तं अपनहि घरक नवताक अन्हर-बिहाड़ि मे आ किछु भरि समाजक बदलि रहल दृष्टि आ व्यवहारो मे। यद्यपि कि सभक दुःख-दुविधा छैक रंग-रूप एक्के। मुदा से नहि बूझि पबैये लोक एकरा एना भ' क 'एहि रंग मे जे भ' रहलए सब किछु अंग-भंग। जीवन यापनक पारंपरिक बाट पर चलैत, सहैत जाइत सबटा नबका-नबका आघात जे प्रत्यक्ष मे तं छैक बड़ गंहीर स्नेहक स्पर्श, मुदा प्राण के थकुचि रहल छैक एक एक पल। कत' सँ ई कोन रोगाह वायु बहैत आयल छैक सभक बुद्धि बौआयल सभक हृदय घायल छैक। ताहू मे बेशी तं बनल छैक विडंबना ई, एहि सबक जड़ि छैक आन नहि, अपनहि सब ई यथा-पुत्र,पुत्रबधू, आ संगी-साथी सब। बहि रहल एहि बसात संग बेश गदगद अछि, बिनु बुझने एकर असरि। काल्हुक भविष्य पर अधिसंख्य नब लोक अपन-अपन फूकि रहलए घर। के बुझबय ? बूझक सेतु पुरना लोक सबकें राखल जा रहल अछि कतिया क'। नबके लोक सम्हारि रहल अछि नब युगक रासि। बढ़ा रहल गाड़ी के हाँकि क' एहि तरहें जेना कोनो दुपहियाक गाड़ी नहि, समस्त पृथ्वीये होथि गुड़का रहल, अपना सामर्थ्ये,अपनहि बुद्धि-ब्योंत सँ-आगाँ। समाज, बयसक पुरान ठकमूड़ी लगौने बैसल छथि चुपचाप, सबटा देखैत! तँ कि ई प्राण जे थकुचल जाइत बुझाइत अछि दिन राति से नहि थिक एकमात्र हमर?लोकोक बहुत छैक आन अपन। तँ कि छैक व्याकुल हमरा सँ पृथक किछु लोक, तँ कि ई संसार, समाज बनल छैक ओतहु आन? छोड़ि सर-संबन्धी कि ओतहु कएने छै असकर अपनहि दुःखक ज्वाला मे कि जरैत अछि आनो घर एहन विपत्ति नव प्रकारक आ पहिले पहिल स्वभावक, तँ कि अछि प्रारंभ ई अनुभव केर नबका आवक-जावक? चीन्हि ने पाबी हम यद्यपि एकरा कोनो आँखिक विचार सँ द्विविधे दुविधा अछि प्रति पल प्रश्न सोझ सन्सार सँ अछि एही मे शुरू मनुक्खक कोमल संवेदन सब मौलाएब, टूटि खसब गाछ सँ पात जेना सुखायल क्रमशः पातक संगहि डारि, ध'र आ पूरा गाछ, सुन्न कएल जाइत जीवन रस सँ धराशायी भ’ जाइछ गाछ तँ तथापि मरि-सुखा क' रहि जाइत अछि उपयोगी जाड़नि बनि जरि चूल्हि बनाबय, आबाल बृद्धक भोजन, जड़काला- हाड़कंपौआ ऋतु मे धधकि क' दिअय जीवनक ताप, मुदा मनुख-जीवन, ई देह- समस्त बिलक्षण, प्रकृतिक अनुपम सृष्टि पृथ्वी पर अनुपम जीवित सेहो एहन निरर्थक बनल अकार्यक देहक जीवन हो अंत तखन पर्यन्त लिअय फेरो समाज,परिवार,प्रकृति सँ काँच-सुखायल गाछ जे होइछ काठ, देह कें अंतिम परिणति धरि पहुँचाबय मे,शरीर-मृत मनुक्ख शरीर डाहै मे करबा लैत अछि खर्च जाइतो-जाइतो। -'हम-हम नहि राधा, तों..की सब सोचैत छें ...पुछैत राधा, कहैत राधा,सुनैत राधा..एखनहि केहन छल आत्म मुखर सक्रिय स्पन्दित ! मिझा गेल डिबिया जकाँ रहलए केना धुँआइत, प्रश्नक कोनो टा उत्तर नहि, कोनो टा ने बात-संवाद मात्र दीर्घ निश्वास-दीर्घ निश्वास-'कोना छी अहाँ कृष्ण, कहाँ छी, किएक छी ? एहन समय हमरे जीवन मे किएक एतेक रास जेहो नहि लेने ऋण तकरो भरि रहल छी सूदि, मूर धएल जसक तस अदृश्य कोनो बणिकक हमर पल, दिन, मास बर्ख चुकबैत अपन एक-एक साँस । एहन स्थान किएक बनि गेलय इएह हमर ई मन? भरि संसारक बस्तु, व्यक्ति, व्यक्तिक सब कार्यकलाप, क्रीड़ा आ सब कर्मक बनि गेल अछि सुलभ आँगन। जेकरा जखन सुभीता आबय क' लिअय व्यवहार। हमही आँगन हम मुदा ठकमूड़ी लेने ठाढ़ । कहि ने सकी केकरो निजताक बोझ, एकर संताप, बुझा सकी ने अपन एहि वर्तमानक कुटिल यथार्थ , हमर अर्थ छिड़ियाएल जेना कृषकक बीयाक छितनी-पथिया हो, बागु कर' खेत जाइत काल बाटे मे गेल हो हेराय, जतबा जे बिछि-समेटि सकलौं, हँसोथि-हँसोथि, खिन्न मन कर्माहत देहें यथोपलब्ध बीया कयलौं बागु ! घुरल हो ओहि प्रचण्ड रौद कें दैत ललकार घर आ बनल तथापि जीवन क्रम मे गाम मे स्थिर आशान्वित, फसिलक भावी उपलब्धिक दिस आश्वस्त, मुदा पुनि जतबो बीया छीटल गेल हो, घामे-पसेने खेत जोति तैयार कएल गेल मे तकरो सब कें चुनि क' ल' चल गेल हो चिड़ैक महा हेंज, एम्हर एक दिस निश्चिन्तता मे गबैत मनक भवितव्य, ओम्हर दोसर दिस सुन्न कएल बनि गेल हो खेतक गर्भ ! एम्हर निरन्तर बीया मे अंकुरयबाक , माटि के फोड़ि जन्मबाक-बढ़बाक, बढ़ि क' फसिलक गाछ विकसवाक अहो दिवस मर्मांतक प्रतीक्षा...ओम्हर जन्म सँ पहिनहि कोखि कें रिक्त करैत काल-गति, ई एहन हमरे टा किएक कर्माहत हमरे टा किएक वर्तमान ! आकि बोगि रहलए एहने आ यैह व्यथा आनो आन ?' सोचैत राधा छोड़लनि नमहर श्वाँस..। जानि ने कखन-कोना लागि गेल रहनि राधा कें आँखि। नहि जानि कखन बैसले बैसलि ओंघड़ा गेलीह ओ पटिया पर। मुदा ई भेलनि बोध जेना देह भ' गेल डेंगी नाव! पटिया बनि क' यमुना मे हुनका कराब' लगलनि-झिलहरि बड़ी काल...एकसरि झिलहरि खेलाय मे रहली मस्त- बड़ी काल ! तखन होअ' लगलनि अगिले क्षण मोन विरक्त । आखिर यत्न क' नाव के घाट लगौलनि , भेलीह-संतुष्ट जे पहिल बेर नहि लेब' पड़ल श्रीकृष्णक सहयोग, आ खेपि सकलहुँ नाव, उतरि गेलौं पार ! अपन सुख लेल किएक करी केकरो नेहोरा ? भने कृष्णे किएक नहि होथि। एकहि मोन मे तुरन्त उपस्थित भ गेलनि-ग्लानि, छिया, कृष्ण पर निर्भरता तँ हमर नियति आ प्रारब्ध। कोना आयल मोन मे एहन बात ? धिक्कार मोन -धिक्कार... मुदा ई की ? घाट पर साक्षात् कृष्ण महराज ठाढ़ ! वैह खौंझबै वला बिहुँसैत, बढ़ा चुकल नाव सँ गमग उतरि रहलि राधा दिस अपन दहिना हाथ। सस्नेह, सार्द्र दैत अपन हाथ राधा भेलीह बिकल । मिला नहि सकलीह हुनका सँ आँखि । -' भरिसक मन मे हमरा बिनु यमुना मे नाव चला लेबाक छौक मन पर भार । अपन सुखक अपनहि कर्म-निर्भरताक सेहो छौक आत्म दीप्त विश्वास...राधा, तों केहन लागि रहल छें एहि अलौकिक क्षण , तोरो ने बूझल छौक। हमरो तँ थिक जीवनक ई प्रथमहि दुर्लभ दृश्य ! हम केना योगा क' राखी ई आनन्द राधा, कोन बिधि, तोंही देखा दे उपाय।' -' जाउ-जाउ, एत्तहु खौंझबैये लए हमरा आएल छी अहाँ । हम कएलए स्त्रीगन भ' क' अगरजितपना आ छी ताही मोने बेचैन, अहाँ के सुझैए विनोद एखन ।' राधा किन्चित स्नेह-क्रोधित भ' कहलखिन तँ कृष्ण भेलाह गंभीर। -' नहि राधा, हम तँ छी परम हर्षित-संतुष्ट। यैह त हमर कामना छल, तों बनि जायं-स्वयं आत्म निर्भर । नहि रह' पड़ौ तोरा हमरा पर निर्भर । तों कएलेंहें हमरे काज। हम तँ तें छी प्रसन्न।' -'किएक नहि, आब आओर रहब निश्चिन्त, मरओ राधा कि जीबओ, नहि राख' पड़त फिकिर ।' नाव सँ उतरि क' दरबनिया द' क' पड़यबाक छलनि विचार, मुदा ई तँ सर्वथा नवे परिस्थिति कएने छथि कृष्णजी ठाढ़ ! जानि ने एतबा काल एहि बीच की हएत आँगनक हाल। जे हो ... आब एहि क्षण तँ माधव-मायाजाल मे छी बाझलि हमहूँ । आगाँ देखी कोन नाटकक केहन दृश्य प्रस्तुत करय वला छथि-नटवर नागर...सकल गुण आगर ! बूलि क' राधा आँगन अयलीह तं आश्चर्ये ठकमूड़ी लागि गेलनि। बीच आँगन मे कृष्ण ठाढ़, सद्यः। हुनकर स.बोधनक कोनो टा ने जबाब दैत चलि गेलीह भीतर अपना कोठली दिस। धीरे-धीरे कृष्ण सेहो लागि क' पाछाँ राधाक पीठे पर पहुँचलखिन। एतनी काल मे पहुँचि जएथिन कृष्ण तकर नहि छलनि कनियों अनुमान। सरियाइयो कहाँ सकलीह आँचर पर्यन्त ...दुष्ट केहन जे पैसि गेलाक बाद कोठली मे खखसलनि कर्तव्य, कएलनि-राधा के साकांक्ष । अप्रत्याशित एहि कृष्ण-कृत्य पर भ' गेलीह क्रोधित । जेना तेना सरियबैत आँचर, तथापि घुरलीह पाछाँ दिस फेरलनि मुँह..कुटिल शृंगारोदीप्त भुवन मोहिनी बिहुँसी पसारने ठाढ़-श्रीकृष्ण । लग आबि क' खौंझाएल पोसुआ बिलाड़ि जकाँ राधा ! छड़पैत सन क्रमे ल'ग पहुँचि कृष्णक पीताम्बरी झीकैत’ 'हरण कर' लगलखिन.. . –‘'ई की, ई की करैत छें राधा । हमरा किएक करैत छें एना उघार ? देखत लोक हमर की रहत इज्जतिक हाल ! आखिर पुरुखोक होइत छैक इज्जति, मर्यादा लज्जा, पुरुखोक चीर हरण होइत छैक यदि नहि रहै पुरुषत्व...।' किन्तु हँसी-ठठा सँ राधा कनियों ने ठंढयलीह। कृष्णो बूझि ने सकलाह, राधा बजलीह किछु बा कनलीह..। स्नेहांक मे बन्हबाक हुनक मृदु प्रयास कें ताग जकाँ खुट द’ तोड़लनि। खौंझायलि ओ एतबा जे कृष्णक केश के पकड़ि घीच' लगलीह। ओ रहथि नहि प्रस्तुत, राधाक हेतनि एहेन स्नेहाघात। केश तिराइत मन छटपटबैत कननमुँह भ' गेलाह। मुदा राधा तँ जेना छलीह बताहि भेलि अपन तामस सँ। बूझल कृष्ण धैर्य सँ । सक्कत-बाँहि स्नेह सँ बन्हैत बुझब' लगलाह- -‘'भेलौ कि तोरा, की बात, की भेलौए बाज त किछुओ, हमरे सप्पत तोरा, भेलौए की से तँ कहै बताहि !... हमरो मन धधकैये कतेक दिन, मास-बरख सँ, कहाँ भेटैए शीतल स्नेहक छाहरि हमरो । तइ पर सँ तोरो यदि होउ एहिना हाल तँ हमर जीवन कोना चलत, कहिया धरि, कतबा दूर से तोंही क'ह कने ।...आखिर की भेलनिहें हमर बुधियारि राधिका जी कें , बुझियै त। से दोख जे भेलय हमरे बुते ? कोना-की। हिचुकैत राधिका कें करेज सँ साटि बड़ी काल कृष्ण अपनहुँ हिचकैत रहलाह निरन्तर ओतबा काल । दुहुक हिचुकब क्रमशः एकमेक बनल चलि गेलनि । राधा कें ई की भेलनि आ कृष्णहु कें ? दुनूक भाव आवेग एकात्म भ' चुपचाप बहिते गेल...जानि नहि एहि करुण चुप्पी मे जीवनक कतेक युग बीति गेल ! स्थिति मे एक ध्यान प्राण सेहो एक। -' निन्न भ' गेलौ राधा, सूति गेलें तों की ? ' कृ्ष्णक एहि पुछैत स्वर पर चिहुँकि उठलीह राधा । उठितहि भान भेलनि जेना होथि ओ श्रीकृष्णक आलिंगन मे माँझ आँगन मे ठाढ़ि । चारू कात सँ देखैत लोक, सर-संबन्धिक- सखि बहिनपा...। आकि लाज सँ व्याकुल एकहि बेर मे श्रीकृष्णक बाँहि सँ झकझोरि छोड़बैत स्वयं कें चिकरि उठलीह, पड़यलीह- लत्त॓-फत्त॓, निछोह... निन्न एतहि टुटि गेलनि । साँस फुलैत भेलीह बेसम्हार। जेना लोहारक भाँथी हो, ओहिना ताप जरैत उसाँसक भाँथी हो ई देह। आब भग्न स्वप्नक कर' बैसलीह भाग्यदशा विश्लेषण। पछताइत-पछताइत मन भेलनि अस्तम्व्यस्त । केहन दुर्लभ सुन्दर स्वप्नक क' देलियैक अपने दुर्दशा। कि अछि एतबो नहि लिखल , केहन भाग्य से कहि नहि, स्वप्नो जेना सुड़ाह होइत अछि, सोचथि राधा । मुदा ने जानि जखनि अबैत अछि किएक आधा , सौंस स्वप्न केहन दुर्लभ यदि हो मनोरथक । ओना तँ विकट भयावह स्वप्नक अंत नहि, व्यर्थक भरि- भरि राति बौआइत बन-झाँखुर मे बाधे बोने भरि संसार विकल भयभीत एकसर अनन्त मे लोक जेना पाछाँ सँ खेहारले जाइत कोनो राक्षसी सन असकर अब्बल नारीक पाछाँ लेने बर्छी-भाला कोनो डेग पर गाँथि सकैत अछि पीठहि दिस सँ त्रस्त जिजीविषा ग्रस्त प्राण छटपट दौड़ैत अनवरत जानि ने चल जाइत अछि कतोक योजन कतबा आगाँ आ कि ओही अपस्यांत दशा मे जत' धरैत अछि सुस्तयबा लेल एकटा डेग किंचित निश्चिन्त जे राक्षसी पाछाँ बहुत पाछहि छुटि गेलए, हम पहुचल छी आबि सुरक्षित अपन गामेक इलाका तें एक पल ल' ली दम । साँस करी स्थिर आश्वस्त, आकि जेना अवतार जेकाँ आगाँ मे आबि क' ठाढ़ कोनो भ' जाय विचित्र बिकराल भयावह हिंसक पशु मात्र एकटा ओकरा काया मे समाएल हो जेना कतोक बाघ-सिंह-हाथी-ऊँट आदि, सभ एकहि ठाम एक संग मुँह बाबि क' ठाढ़ जेना हो बड़का महलक सिंहद्वार केर फाटक जाहि मे एक संग पैसैत अछि सहस्रो सैनिक, अपन घोड़ा-हाथी रथ समेत से खुंखार जानवर सब केहन हँसैत लगैत अछि, जेना कि ओ गीड़य नहि, अहंक अएला पर अति प्रसन्न स्वागत करैत अछि केहन लगैत अछि एहन विशाल जानवर ई कोन थिक, ई जीव, जानि ने पहिले पहिल देखै छी- आगाँ एकटा डेग बढ़ौलक तँ सोझाँक धरती डोलैत बुझाएल, दोसर डेग पर देह-प्राण सौंसे संज्ञा जेना हेरायल, कोनो नहि बाँचल विकल्प कतहु पड़यबाक, सब दिशा मे हो जेना ओकरे पसरल पंजा,हाथ-पैर ओना तँ विकट भयावह स्वप्नक अंत नहि, व्यर्थक भरि- भरि राति बौआइत बन-झाँखुर मे बाधे बोने भरि संसार विकल भयभीत एकसर अनन्त मे लोक जेना पाछाँ सँ खेहारले जाइत कोनो राक्षसी सँ असकर अब्बल नारीक पाछाँ लेने बर्छी-भाला कोनो डेग पर गाँथि सकैत अछि पीठहि दिस सँ त्रस्त जिजीविषा ग्रस्त प्राण छटपट दौड़ैत अनवरत जानि ने चल जाइत अछि कतोक योजन कतबा आगाँ आ कि ओही अपस्यांत दशा मे जत' धरैत अछि सुस्तयबा लेल एकटा डेग किंचित निश्चिन्त जे राक्षसी पाछाँ बहुत पाछहि छुटि गेलए, हम पहुचल छी आबि सुरक्षित अपन गामेक इलाका तें एक पल ल' ली दम साँस करी स्थिर आश्वस्त, आकि जेना अवतार जेकाँ आगाँ मे आबि क' ठाढ़ कोनो भ' जाय विचित्र बिकराल भयावह हिंसक पशु मात्र एकटा ओकरा काया मे समाएल हो जेना कतोक बाघ-सिंह-हाथी-ऊँट आदि, सभ एकहि ठाम एक संग मुँह बाबि क' ठाढ़ जेना हो बड़का महलक सिंहद्वार केर फाटक जाहि मे एक संग पैसैत अछि सहस्रो सैनिक, अपन घोड़ा-हाथी रथ समेत से खुंखार जानवर सब केहन हँसैत लगैत अछि, जेना कि ओ गीड़य नहि, अहंक अएला पर अति प्रसन्न स्वागत करैत अछि केहन लगैत अछि एहन विशाल जानवर ई कोन थिक, ई जीव, जानि ने पहिले पहिल देखै छी- आगाँ एकटा डेग बढ़ौलक तँ सोझाँक धरती डोलैत बुझाएल, दोसर डेग पर देह-प्राण सौंसे सज्ञा जेना हेरायल, कोनो नहि बाँचल विकल्प कतहु पड़यबाक, सब दिशा मे हो जेना ओकरे पसरल पंजा, हाथ-पैर प्राण जेना चीत्कार क' उठय भय सँ आर्त्त अपन रक्षार्थ जोर ठहक्का पड़ल जेना ब्रह्माण्डे बिजलौका सं एक संग कड़कल चमकल आ सृष्टि भरिक मेघक समूह एकबेर गरजल, डरे भेल पसेना सं तरबतर थरथराइत सर्वांग बुझा रहलए जे जाइत होइ जेना ओहि जन्तुक बड़का फाटक सन खुजल कल्ला बाटे ओकर पोखरि सन पेटक सत्ते तखने उठल कंठ मोकल घिरघिरी भरल, आर्त्त पुकार मुदा के सुनय, सुनय के ? सुननहारक अपने भय-व्याकुल असकर ई वर्त्तमान स्वयं अपने ई प्रिय एकान्त, केहन असुरक्षित आ अशांत ! कोन जीव थिक आखिर एहन बिकराल आओर खुंखार सपनहुँ देखल तँ होयतै अवश्य अस्तित्व एकर पुछबनि हुनके, जँ भेटता तँ, कोन थीक ई जीव ? आइधरि देखल आ ने सुनल छल, माधव ! कोनो गतिमान पहाड़ कि सत्ये कोनो जीवे छल हुनका तँ हेबे टा करतनि एकरो बूझल परिचय। की नहि अछि हुनका एहि सृष्टिक जे किछु कोनो विषय अछि जानि ने कत्तेक ज्ञान कोना एतबहि बयसें पौने छथि सबटा ओ बूझैत छथि हुनका सबकिछुए सुझै छनि घ'न अन्हरिया मे पर्यन्त सबकिछु देखाइत छनि... कोना हमर खसि पड़ल कनपासा यमुना कातक घासक बन मे ओहन अन्हरिया राति मे से ओ ताकल एक्कहि क्षण मे कोन आँखि छनि केहन ताहि मे ज्योति विराजित दिव्य जत' जत' पड़ि जाइछ स्वतः भ' जाइछ ओत' इजोत ! हुनका सोझाँ तें अतिशय सम्हार' पड़इछ आँचर से सब सखि केर अनुभव वस्तुक भीतर वस्तु देखि लेबक अद्भुत कौशल छनि बिनु देखनहुँ श्रीमान जानि ने की की देखि ल' जाइत छथि सोचि स्मरण करैत लजयली एकान्तहु मे राधा... एखन कत' छथि कृष्ण ? राधा- २८ म खेप पछिला खेप अपने पढ़ि चुकल छी-- “हुनका सोझाँ तें अतिशय सम्हार' पड़इछ आँचर से सब सखि केर अनुभव वस्तुक भीतर वस्तु देखि लेबक अद्भुत कौशल छनि बिनु देखनहुँ श्रीमान जानि ने की की देखि ल' जाइत छथि सोचि स्मरण करैत लजयली एकान्तहु मे राधा...एखन कत' छथि कृष्ण ?” आब आगाँ पढ़ू- स्वयं जेना छी बिसरि गेल हम अपन गामक नाम स्वयं जेना छी बिसरि गेल हम अपनो जन्मस्थान स्वयं जेना छी बिसरि गेल हम प्रायः सबकिछु सब बात स्वयं जेना छी बिसरि गेल हम स्वयं अपन अस्तित्व स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी आँगन सँ यमुनाक बाट स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी प्रिय जमुना स्नान स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी सखि-बहिनपाक नाम स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी अपनहि मथुरा धाम स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी कदमक वनक छाया स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी सबटा जीवन कर्म स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी लोकक दुःखक मर्म स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी अपनो प्रतियें माया स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी देह दशा कें देखब स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी जीवित प्राणें रहब स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी अन्नक जलक स्वाद स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी ककरो किछुओ कह'ब स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी अक्षरक अभ्यास स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी मोसि-कलम, लीखब स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी प्रिय सँ प्रिय सम्बोधन स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी सबटा गीतक भास स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी जीवन केर मधुमास स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी सबटा हास-हुलास स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी संगी संग विलास स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी दशो दिशा केर ज्ञान स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी, के अप्पन अछि आन स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी सबकिछु के अस्तित्व स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी की थिक छोट महान स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी अन्हरिया आ इजोरिया स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी भेद सूर्य आ चन्द्रक स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी स्नेहसिक्त स्मृति-संयोग स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी जे सब किछु बिसरल छी किन्तु स्वयं यदि छी बिसरल सब तँ किएक बेचैन अछि प्राण ? पूछथि राधा विकल हृदय कियेक अबैत अछि कृष्णक ध्यान? झर झर झर झर अश्रुपात भदबारि जकाँ भ' जाइछ आरम्भ । सबटा ई मिथ्या अनुभूतिक छद्मजाल थिक सबटा ई मन कें पतिअयबाक करब प्रबोधन चित्त कहाँ स्थिर चिन्ता सँ कहाँ मुक्त अछि ई जे मोन महासंकटक ब्यूह-रचना सन कए तँ देल प्रवेश मुदा अज्ञात दिशा बीच बूझल नहि आरंभ अर्थात प्रवेश आ तहिना करी कोना क निकास द्वार सबटा बंदे बन्द एहन मनोभावक उद्दाम ज्वारि मे ई इच्छामृग डूबि-डूबि रहलय समुद्र मे जेना छोटछिन नाव एकहि क्षण मे ब्यूह मध्य जे प्राण हमर ई ऊँचे ऊँच समुद्र ज्वारि मे पड़ि जाइछ असहाय ककरा पारओ सोर होय के एहि स्थिति मे जे आबय जे सहाय संभव छथि से छथि अपने मे ध्यानस्थ हुनका कोन फिकिर ककरो, कथूक प्रकारक अपना मोनक महाशान्ति मे किएक हेतनि आन्दोलन भने स्नेह आक्रान्त बन्धु पर्यन्त मरैत हो व्याकुल किएक कोनो चिन्ता, जिज्ञासा किछुओ करब पुछारी भरिसक एहिना ,एही प्रकारे हमहूँ आब मरब जानब अपने हे माधव जानब, हम नहि आब सहब केहनो मोहिनी स्वर्गीय मधुरी वाणी अहाँ जे कहब नः अइ संसार मे आब हम नहियें टा र'हब किएक रहब,एतेकटा जीवन ऊघि-ऊघि कतबा दिन आरो ? बाजू आ किएक ककरा लेल ककर हित, मित्र ! कथी लए...? बहुत प्रतिष्ठा जीवन कें कारागृह बना दैये बहुत प्रतिष्ठा बना दैछ जीवन कें अवग्रह बहुत प्रतिष्ठा कुल-संबंध- समाज छोड़ा दैये बहुत प्रतिष्ठा जीवन कें संसार छोड़ा दैये बहुत प्रतिष्ठा कउखन तेहेन प्रतिष्ठित क' दैये बहुत प्रतिष्ठा भ'लो कें अ-लोक बना दैये बहुत प्रतिष्ठा बना राखि दय भथल इनार राधा- २९ म खेप पछिला खेप अपने पढ़ि चुकल छी-- बहुत प्रतिष्ठा जीवन कें संसार छोड़ा दैये बहुत प्रतिष्ठा कउखन तेहेन प्रतिष्ठित क' दैये बहुत प्रतिष्ठा भ'लो कें अ-लोक बना दैये बहुत प्रतिष्ठा बना राखि दय भथल इनार आब आगाँ पढ़ू- बहुत प्रतिष्ठा लोकक जीवन मरुथल क' दैए बहुत प्रतिष्ठा प्राणि मात्र से करैत-करैत उदास बहुत प्रतिष्ठा आखिर तँ क' दैत अछि अमर्मक बहुत प्रतिष्ठा सब किछु द' जा सकैत अछि से ठीक बहुत प्रतिष्ठा सब अछैत सभ व्यर्थ बना दैये बहुत प्रतिष्ठा सिन्धु जकाँ अति गंहिर आओर विस्तार बहुत प्रतिष्ठा लोक के लोक-असभ्य बना दैए बहुत प्रतिष्ठा एक तरहें होइत अछि वर्ग विभाजन बहुत प्रतिष्ठा एक समाज बाँटि बखरा क' दैये बहुत प्रतिष्ठा एकहि घर मे बनि जाइछ देबाल बहुत प्रतिष्ठा भाए कें भायक देयाद बना दैये बहुत प्रतिष्ठा निज श्रेष्ठ-बोध सँ कम कें हीन करैये बहुत प्रतिष्ठा एक परिवार अनेक बना दैये बहुत प्रतिष्ठा मधु माहुर बनि व्यक्ति मे भरय विकार बहुत प्रतिष्ठा विद्यो कें व्यापार बना दैये बहुत प्रतिष्ठा कखनो महल कउखन क वैभव बहुत प्रतिष्ठा जीवन-मूल्य दोकान बना दैये बहुत प्रतिष्ठा निबहय तं बना दिअय जन नायक बहुत प्रतिष्ठा ऊघि ने पाबी दैत्य बना दैये बहुत प्रतिष्ठा अपन स्वभावक अपनहि होइछ संघात बहुत प्रतिष्ठा अहंकार बनि पाथर बनबैये बहुत प्रतिष्ठा लेल आखिर लोक रहैछ बेहाल बहुत प्रतिष्ठे लोक मे लोक-दयार्द्र बना दैये सोची, बेर-बेर सोची सब क्यो कतबा क' चाही प्रतिष्ठा सोची आ तय करी प्रतिष्ठा केहन मनुख बनबैये ! बहुत-बहुत क' रखबाक-कहबाक तेहन भेलय रेवाज सब तँ सब सँ श्रेष्ठ धनिक ज्ञानी आ अछि विद्वान क्यो ककरो सँ छोट ने, बयसो मे बुद्धि मे सब तँ सब सँ श्रेष्ठ सबि सँ एवं बड़े महान ई संसार कोना बनलै विकसित भेलैक आ बढ़लैक तकरा लेल जे बुधि-विवेक चाही से सब हाजिर दुनुक बीच केर सेतु टुटल अछि धारे मे बहि गेल खुट्टा-खुट्टी व्यर्थ बात सन ठामक ठामे रहि गेल मुदा अपन एहू स्थिति मे गाम के सब कहि गेल गाम गुम्म अछि, कड़ाम मे गंथाएल बड़द सब जेकाँ एकटा मेहक चारू कात घूमि रहल अछि, अहल भोरे सँ जेना। साँझ धरि सब दिन जानि ने कोन अदृश्य अन्नक क' रहल अछि दाउन एक दिस लोकक देह पर नव-नव वस्त्रक झकाझकी चढ़ि गेलैक अछि। चमकैत रहै छै बेशी लोकक अंग वस्त्र। दोसर दिस बड़द-गाय, जकरा बलें बितैत अछि जीवन, आयुक दिन, मास बर्ख तकर गर्दनि क्रमशः भेल जा रहलए सुन्न । रिक्त, लाल-पीयर-हरियर गरदानी, पैघ-पैघ आकर्षक झमटगर फुदना पुरान मैल होइत एक एक क' सब माल जालक गर्दनि सँ उतरैत गेल आ आब तँ कोनो सौभाग्ये सँ देखाइ पड़ैए-तिनधारी-पंचधारी चित्ती कौड़ीक गाँथल हार। कहाँ देखाइछ नव फुदना सुन्दर गर्दनि वला बड़द कि बच्छा ! यद्यपि दुर्लभ परन्तु से सौख सौभाग्य हुक-हुक करैत जीवि रहल अछि, रच्छ अछि । कोनो गर मे घंटी नहि। कोना दन लगैत सुन्न चुपचाप गर्दनिक बड़द सब बेबस बेमोने क' रहल दाउन-भरि गाँव । एना किएक भेलय बेसी घरक लोक, हमर गाम ! गाम गुम्म अछि, लोकक जेहन अप्पन मोनक हो संसार, तहिना अनमन देखाइत अछि समाज ई संसार मोन खुशी हो सौंसे गाम गबैत लगैत अछि दुःख हो मन मे भरि समाज कनैत लगैत अछि ओना प्रकृति- पहिया नहि कहियो चलब बन्द हो यद्यपि मन ठहरल हो तं चक्र ईहो रूकल लगैत अछि तें पहिने उल्लास उछाह खुशी अंतर केर चाही तें पहिने आलोक-इजोत दिनक मन मे उपजयबाक चाही असल खेत तँ चित्त मनुष्यक जेहन उर्वर हो दुःख-सुख स्वप्न विचार आदर्शक उपजैत अछि तेहन फसील कर्मक जे हो सामर्थ्य जत' धरि अनथक कार्यक सैह बनैत अछि प्रेरक मोनक उर्वरता केर सब दिन परती ओना हरेक हृदय मे रहि आएल अछि सब दिन तहिना किंचित हरियर स्निग्ध क्षेत्र सेहो होइतहिं अछि मनुखक ध्यान मात्र हरियरी कें सम्हारि क' परती उस्सर भूमि विचार परोक्ष बना दैए बेशी काल एक प्रकारें तखनहि नोत पड़ि जाइत छैक दुर्दिन कें एक तरहें करें तखनहि सँ प्रारंभ होइछ अकाल। लोक बूझि नहि पाबय बेसी, जे बुझितो छथि दैनंदिन तुच्छ संतुष्टिक बाटे पर चलि पड़ैत अपन मोनक संसार साजै छथि अपन रहैत छथि ई समाज जेहि सरल सुलभ प्रवाहक अभ्यासी ताही मध्य बहैत चलैत बहैत छथि ओतबो मे संसार अवश्ये प्रिय थिक रहबा योग्य किन्तु मात्र ई नीक आ रहबा योग्य भ' गेने कथमपि नहि भ' जाइत अछि संसार एहन उपलभ्य जीवन, मनुखक जीवन कें चाही एकटा आदर्श जे यथार्थ जीवैत लोक रहैत अछि मने मगन से यथार्थ अंततः बालबोधी सुख मात्रक रूप जाहि प्रयोजन सँ भेलय स्त्री-पुरुषक ई सृष्टि तकरा सुन्दर मंगल क' जीवाक व्यवस्था करबाक मनुखेक अछि दायित्व से गंभीर विषय हल्लुक-फुल्लुक जीवन केर दैनिक किछु क्षण संभव हो भने मुदा सतत किछु शाश्वतक बोध पूरित काज सएह बनैत आयल अछि एहि संसारक प्रेय श्रेयस्कर श्रेयस्कर आर अधिक श्रेयस्कर मनुखक चिन्ता, मनुजक चेष्टा मनुखेक कर्मक यात्रा अति साधारण,साधारण सँ श्रेष्ठ श्रेष्ठतर सएह जीवनक निजता मुक्त पैघ समाजोन्मुख चेतना ताहि चेतना कें चाही तेहने मूल्यक आहार जीवन मूल्य स्वयं चेतनाक होइछ आत्मिक सामर्थ्य वैह यथार्थ केर भूमिक उपजल फसिलक करैत जाइत अछि नित्य उत्कर्ष, नवीन उत्कर्ष ,उदात्त उत्कर्ष गढ़ैत जाइत अछि टूटल- भग्न मनुष्यक जीवनक नव साँच साँच मे नव रूपाकार जकर नव प्राणस्पन्दने गढ़ैत अछि नव नव जीवन मूल्य, नव आदर्श बनबैत गौण अपन व्यक्तिगत दुःख-सुखक अनुभूति अपन एकान्ती जीवनक सीमित अनुभव यथार्थ तकर संवेदनाक प्रवाह बनैछ, उद्यत करैत अछि मनुखक एक वचन मनक बहु वचन समाज, समाजक बड़ विराट संसार प्रसारित करैत, बनबैत अपन कर्म सप्रसंग ! राधा ३०म खेप अखन धरि अहाँ पढ़ने रही... ..अपन एकान्ती जीवनक सीमित अनुभव यथार्थ तकर संवेदनाक  प्रवाह बनैछ, उद्यत करैत अछि मनुखक एक वचन मनक बहु वचन समाज, समाजक बड़ विराट संसार प्रसारित करैत, बनबैत अपन कर्म सप्रसंग ! आब आगाँ... कोनो प्रसंग मे की क' जाइछ मनुष्य कोनो प्रसंगें की भ' जाइछ मनुष्य सेहो एकटा विचित्र प्रहेलिका थिक देखबा मे जे यथार्थ बुझाइत अछि बेशी काल से नितान्त अपूर्ण आ भ्रामक निकलैत अछि तें तर्क निष्कर्ष प्रयत्न बड़ सार्थक कम संदेहास्पद अधिक होइत अछि ई सबटा मनुक्खेक द्वारा मनुक्खेक होइत अछि एही दशा दिशा मे लोक पर पीड़न सँ ल' आत्म पीड़नक रोगी बनि जाइत अछि उपचारक उपहास कर' लागि जाइत अछि आ दुःखक उपभोग कर' लगैत अछि। भोग नहि, उपभोग। सात रंग सुन्दर सृष्टि कें एक रंग पीयर-पीयर आ रुग्ण देख'-बूझ' आ कह' लगैत अछि, मनुक्ख नितांत अपन झीवन-भोगक आँखियें, भरि समाज संसार कें देख' आ बूझ' लगैत अछि, अपन सैह नियति बना लैत अछि, सबटा ओहन यथार्थ जे ओकरा अतिरिक्तो सौंसे समाजक लोकक किछु यथार्थ सेहो होइत छैक-भ' सकैत छैक तकरा पर ध्यान देब तँ भिन्न ओकर अस्तित्वे सँ अनभिज्ञ होइत चलि जाइत अछि प्रति पल,दिन,मास वर्ष, आयु स्वयं अपना चतुर्दिक एकटा रोगाह परिवेश निर्मित कर' लगैत अछि आ बाँचल अपन समस्त जिजीविषा-ऊर्जा कें एहि बुद्धिये दिशा मे सक्रिय क' लैत अछि मनुख्ख अपने विरुद्ध अपना चारू कात बन्धन बान्हि लैत अछि। अपन गति, अपन सहज जीवन-प्रवाह कें अनेरेक अवरोधक पहाड़ी चेखान सभक अपनहि निर्मित बाधा सब सँ कुंठित क' लैत अछि। अपन से कुंठा अपन स्नेही,संबंधी, सौंसे समाज पर उगलैत रहैत अछि। जत'-जत'सृजन छैक ओत' ओत' संहारक ब्यौंत-वातावरण बनब' लगैत अछि। अपन, नितांत अपन कुंठाक माहुर -मनें ओ अपना अतिरिक्त सभकें कलुषित, जीवन विरोधी आ अमानुष बुझबाक तदनुरूपे आचरण करबाक एकटा दुःस्वभाव बना लैत अछि, सबकें व्यर्थ ,बाहरी लोक बना देबाक अपनहि सक्रिय मनोदशा मे, अपनहि असकर एकान्त तथा दयनीय बनि क' रहि जाइछ, से ओकरा बुझबा मे अबैत नहिं छैक। नहि बुझबा मे अबैत छैक जे ओ भ' चुकल अछि -रोगी, मनोरोगी ! देह-रोग सँ बहुत बेशी, बहुत गंभीर मनोरोग...' -' तँ कि हम मनोरोगी भ' गेलौंहें, हम ?' अकस्मात् राधाक प्राण चौंकल। स्वयं के पूछ' लागल यैह टा प्रश्न ! गुंजित-अनुगुंजित-प्रति गुंजित... बड़ आर्त स्मरण कएलनि- ' हे कृष्ण' किछु नहि हएत, कृष्ण कें बजौलहु सँ हएत नहि किछु, आने जेकाँ हुनको छनि आब कम्मे फुरसति बहुत रास छनि कपार पर काज, उत्तर दायित्वक पैघ संसार हुनको आखिर चाहियनि अपन काज-कर्तव्य सँ अवकाश हुनको संसार मे बहुत किछु घटित भ' रहलनिहें न'व हुनको मोनक स्थिति आब नहि छनि स्वाधीन, ने छनि किछुओ नितांत मनमौजी-अपनहि सुखक संग रहब संभव नहि छनि हुनको लेल ओहो अपना प्रकार सँ फिफियाइत रहैत छथि, छुच्छ गाय चरायब आ बँसुरी बजायब नहि रहि गेलनिहें हुनक एकमात्र काज। माखन चोरायब भ' रहल छनि दुर्घट ! गाम मे कम दूध देब' लगलैक अछि सभ घरक गाय, दुब्बर भ' रहलैए नेरू-बाछी, गायक हुकड़ब नहि रहलै आब असंभव, भ' रहल छैक आइ काल्हि बेसी काल । सुन्नर कोमल गुड़कुनियाँ लैत नेरू पर्यन्त भ' रहलैक अकाल काल कवलित अपना मायेक सोझाँ देखैत गाय माय होइछ मनुक्ख नहि,                                          मनुक्कक माय कें पर्यन्त यद्यपि सह' पड़ि रहलैक अछि-संतान शोक ! चर-चाँचर सभक हरियरी जानि नहि कोन अदृश्य महापशु अन्हरिया, चरि क' चलि गेलय केकरो नहि ज्ञात। सौंसे फाटल शुष्क माटिक धरती पर पीयर-पीयर सुखएल खुट्टी-खुट्टी चलैत पएर सभक तरबा मे गड़ैत जे यमुना अपना कंठ धरि ऊपर आबि क' द' देत छलीह समय-समय पर हुलकी, स्वयं दूबरि गता, स्थिर भेलि स्तब्ध छथि। धार-कातक सघन रंग लता-वृक्ष ? केहन भेल श्रीहीन तट ! स्तब्धे अछि बेसी बस्तु। मथुराक बेशी घटना स्थल, लोक लोकक आचार-व्यवहार स्तब्ध' । कोनो परोक्ष बोझक त'र प्रतिपल दबायल जाइत .. ककरो नहि भ' पाबि रहलैये अंटकर एकर कोनो अनुमान। अपना-अपना घर मे सब क्षुब्ध बैसल। हेराएल छैक ज्ञान ! पूछ' चाहैत अछि सब एक दोसरा कें मुदा पड़ितहि ओकर आकृति अपना सोझाँ, बदलि जाइत अछि लोकक मन ओकर उदासीक ध्यान भम पड़ैत अछि मोन,मोनक उदासी सँ भरल सब दलान कृष्ण एही सब मे छथि ओझरायल करैत आवश्यक अनुसंधान कृष्ण छथि किन्तु अन्यथा सेहो हरन-फिरीसान जेना साँस कोनो आन देह ल' रहल हो अन्त' जेना देह कोनो आन नाक सँ घिचि रहल हो साँस    जेना देह हो कतहु, क्रिया आ स्पंदन होइत हो कतहु अन्त' जेना राधा छथि अपना आँगन एकान्त मे  कृष्ण अपना कर्म, क्रिया-कलापक संसार मे अपस्यांत होइत परस्पर एक दोसरा सन करैत क्रिया अप्पन-अप्पन काज कतहु कारण कतहु ओतहु सेह, सैह एतहु ककरा लेल के अछि विकल-बचैन ककरा लेल ककरा ननहि अबैत छैक कतेक दिन सँ चैन  निर्णय करब अछि असंभव। एना किएक एहि समय मे बेसी रास बात जे, नितांत छल सहज संभव, भ' गेलय निठ्ठाहे असंभव, हाथ सँ बाहर, बेहाथ ! स्थिति यैह यैह स्थिति दू टा पीठ दू टा विरुद्ध बेशी किछु विरुद्ध किएक भ' रहलय एहि युगक बेसी विषय भाव आ वस्तु एना विरुद्ध... विदेह सदेह:३२|| 1549 1550 || विदेह सदेह:३२

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