SADEHA — 33

Publication: SADEHA · Issue: 33
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ISSN 2229-547X विदेह सदेह ३३ रचनात्मक गद्य-पद्य लेखन भाग-२ (विदेह www.videha.co.in/ पेटार अंक १-३५० सँ) विदेह-सदेह शृंखला- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ गद्य आ पद्यक एकटा समानान्तर संकलन विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। काॅपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति‍एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादि‍त अथवा संचारि‍त-प्रसारि‍त नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- अद्यतन। सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर) केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ "विदेह" पड़लै।इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA (c)२०००- अद्यतन। सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि। सम्पादक 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऐ ई-पत्रिकामे ई-प्रकाशित/ प्रथम प्रकाशित रचनाक प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ मूल आ अनूदित आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। (The Editor, Videha holds the right for print-web archive/ right to translate those archives and/ or e-publish/ print-publish the original/ translated archive). ऐ ई-पत्रिकामे कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। ISSN: 2229-547X मूल्‍य : भा. रू. ६,०००/- संस्‍करण: २०२२ Videha Sadeha 33: A Collection (Vol.II) of Creative Maithili Writings in Prose and Verse e-published in Videha e-journal issues 1-350 at www.videha.co.in). अनुक्रम (टिप्पणी- सन्दीप कुमार साफी आ विन्देश्वर ठाकुरक रचनावली गद्य-पद्य मिश्रित छन्हि आ पद्य खण्डमे राखल गेल छन्हि, तहिना लल्लन ठाकुरक रचना गद्य-पद्य मिश्रित छन्हि आ गद्य खण्डमे राखल गेल छन्हि।) गद्य-खण्ड (पृ. १-४६५) गजेन्द्र ठाकुर- मैथिली हाइकू/ हैकू/ क्षणिका/ शेनर्यू/ टनका, हैबून, अपाला आत्रेयी, दानवीर दधीची, बालकथा- ब्राह्मण आ ठाकुरक कथा,राजा अनसारी, राजा ढोलन, बगियाक गाछ, ज्योति पँजियार, राजा सलहेस, बहुरा गोढ़िन नटुआदयाल, महुआ घटवारिन, डाकू रौहिणेय, मूर्खाधिराज, कौवा आ फुद्दी, नैका बनिजारा, डोकी डोका, रघुनी मरर, जट-जटिन, बत्तू, भाट-भाटिन, गांगोदेवीक भगता, बड़ सुख सार पाओल तुअ तीरे, छेछन, गरीबन बाबा, लालमैन बाबा, गोनू झा आ दस ठोप बाबा, संकर्षण (नाटक), सर-समाज, काल-स्थान विस्थापन, सर्वशिक्षा अभियान, जातिवादी मराठी, थेथर मनुक्ख, बहुपत्नी विवाह आ हिजड़ा , स्त्री-बेटी, बिआह आ गोरलगाइ, प्रतिभा, जाति-पाति, अनुकम्पाक नोकरी, नूतन मीडिआ, मिथिलाक उद्योग, मिथिलाक उद्योग-२, बाढ़ि, भूख आ प्रवास, नव-सामन्त, बाणवीर, तस्कर, सिद्ध महावीर, शब्दशास्त्रम्, दिल्ली, सहस्रबाढ़नि (उपन्यास), मायानन्द मिश्रक इतिहास बोध-प्रथमं शैल पुत्री च/ मंत्रपुत्र/ पुरोहित आ स्त्री-धन केर संदर्भमे, कृषि-मत्स्य शब्दावली (फील्ड-वर्कपर आधारित), विद्यापतिक बिदेसिया- पिआ देसाँतर, रमेश नारायणक “पाथरक नाव”-विनोद बिहारी वर्माक “बलानक बोनिहार ओ पल्लवी (तथा अन्य कथा)”, दूर्वाक्षत, मैथिली- सुरजापुरी- राजबंशी, बूच जीक कविताक -मार्क्सवाद, ऐतिहासिक दृष्टि, संरचनावाद, जादू-वास्तविकतावाद, उत्तर-आधुनिक , नारीवादी आ विखण्डनवाद दृष्टिसँ अध्ययन संगमे भारतीय सौन्दर्यशास्त्रक दृष्टिसँ सेहो अध्ययन, स्व. श्री वैद्यनाथ मिश्र “यात्री” (१९११-१९९८), जगदीश प्रसाद मण्डल, प्रेमशंकर सिंह, सिद्ध सरहपाद आ तिब्बती लिपि (पृ. २-२१३) विभा रानी- आऊ कनेक प्रेम करी माने बुझौअल जिनगीक (पृ. २१४-२२२) रामभरोस कापड़ि “भ्रमर”- बीहनि कथा- गंगाप्रसादक स्वायतता, हुगली पर बहैत गंगा (पृ. २२३-२२६) जितेन्द्र झा- अन्तर्राष्ट्रिय मैथिली परिषद, कोना बचाएब संस्कृतिक विरासत?, संस्कृति बचएबाक अभियान (पृ. २२७-२३०) उमेश कुमार महतो- बहादुरगंज स’ रिपोर्ट (पृ. २३१-२३१) अनलकान्त- कबइ-इच्छा, एत’ आ ओत’, असोथकित (पृ. २३२-२५२) मनोज झा मुक्ति- अवैद्य नागरिकताः सिक्कमीकरणक प्रयास, मनोज झा मुक्ति संग अन्तर्वाता ...आभाष लाभ, तराई/मधेशक आन्दोलनः लूटमे लटुवा नफ्फा (पृ. २५३-२५७) कुमार शुशान्त- छोटकी काकी (प्. २५८-२५९) श्यामसुन्दर शशि- आह उमा ! वाह उमा ! , विचार- मिथिलाक तवाही,सरकारी षडयन्त्र त ने अछि ??, दुलहा बनल श्रीराम हे ऽऽऽ (सन्दर्भ: राम—जानकी विवाह महोत्सव) (पृ. २६०-२६४) अंकुर काशीनाथ झा- नेताजी पर तामश कियैक उठैत अछि (प्. २६५-२६६) लल्लन ठाकुरक किछु रचना (पृ.२६७-२७४) साकेतानन्द- कालरात्रिश्च दारुणा (पृ. २७५-२७८) बृषेश चन्द्र लाल- आ ओ मारलि गेलि !, एकदन्त हाथी आ नौलखा हार(पृ. २७९-२८६) राजमोहन झा (प्रबोध सम्मान २००९) सँ विनीत उत्पलक साक्षात्कार- (पृ. २८७-२९३) रामाश्रय झा "रामरंग" प्रसिद्ध अभिनव भातखण्डे जी सँ साक्षात्कार डॊ. गगेश गुंजन द्वारा (पृ. २९४-२९८) शिव कुमार झा ‘टिल्लू’ - हरिमोहन झा- द्विरागमन (पृ.२९९-३०१) मुन्नाजी- साक्षात्कार- हम पुछैत छी (१.रवीन्द्र कुमार दास २.योगेन्द्र प्रसाद यादव ३.गोविन्द झा ४.राजेन्द्र बिमल ५.रामभरोस कापड़ि “भ्रमर” ६.रमेश रंजन ७.बृषेश चन्द्र लाल ८.धीरेन्द्र प्रेमर्षि ९.अनलकान्त १०.कुमार शैलेन्द्र ११.अमरनाथ १२.तारानन्द वियोगी १३.अनमोल झा १४.दुर्गानन्‍द मंडल १५.मिथिलेश कुमार झा १६.बेचन ठाकुर १७.धीरेन्द्र कुमार १८.सोमदेव १९.अशोक २०.ज्योति सुनीत चौधरी २१.जगदीश प्रसाद मण्डल २२.राजदेव मण्डल २३.देवशंकर नवीन २४.गजेन्द्र ठाकुर); प्रतीक- बीहनि कथा (अपन गप, अपन कहब रेवाज पडौ़आ टकटकी नियंत्रण गहना डोपिंग टेस्ट विनिमय सेजौट परमेश्वर पजेबा सफाई प्रिमियम मुखियैती लक्ष्य कौनचर आत्मानुभूति जनवाणी चश्मा उपहार काँट ओकाति जीवन चक्र रक्षक जमाना निर्धन आरक्षित नवयुग अवाक लिलसा खानदानी कुल्हइया दानक बौस्त जुनुन विजेता हरियर बत्ती- लाल बत्ती लगाम देखाउँस माँ विजातीय स्वरूप आ संभावना विकल्प रीलीफ जिनगी सेवक टवेन्टी-टवेन्टी नेओं बहुराष्ट्रीय कम्पनी विश्वासघात अन्तर-आत्मा कमरुनिसा ग्लोबल वार्मिंग सरकारी दलाल जिया जरए सगर राति भावना तंत्रमेल बेरपर दियाद गाँती बिढ़नी अगुआ साढ़े एकैसम सदी दुन्नू जना एकै धना रासि सड़क-छाप निवेश नपना उत्थर देश-भक्ति भूख डेग देह, मोन आ प्रेम) (पृ.३०२-४६५) पद्य-खण्ड (पृ.४६६-१८९१) (टिप्पणी- सन्दीप कुमार साफी आ विन्देश्वर ठाकुरक रचनावली गद्य-पद्य मिश्रित छन्हि आ पद्य खण्डमे राखल गेल छन्हि, तहिना लल्लन ठाकुरक रचना गद्य-पद्य मिश्रित छन्हि आ गद्य खण्डमे राखल गेल छन्हि।) गजेन्द्र ठाकुर- बड़द करैए दाउन ने यौ, बाल गजल, बेसी छुट्टी कम इसकूल, शामिल बाजाक दुन्दभी वादक, मोनक रंगक अदृश्य देबाल, मन्दाकिनी जे आकाश मध्य, पक्काक जाठि, निन्नक जीवन विचित्र, गंगा ब्रिज, हर आ बड़द, बिसरलहुँ फेर कर्णक मृत्युक छोट- छीन रूप, बड़का सड़क छह लेन बला, मिथिलाक ध्वज गीत, ट्रेनक गाड़ी, राजा श्री अनुरन्वज सिंह, दीयाबाती, क्रिकेट-फील्डिंग, त्वञ्चाहञ्च, असञ्जाति मन (पृ. ४६७-५७४) कोसी लोकगीत १-३ (पृ. ५७५-५७७) बैकुण्ठ झा- चलू देखैब अपन गाम अय, सिनेमा, दहेज, परदेश, सड़क, दुनियॉं (पृ. ५७८-५८३) प्रकाश झा- हाल बचपनसँ पचपन तक (पृ. ५८४-५८६) रामलोचन ठाकुर- हर्जे की, व्यवस्थाक नाम/ चेतौनी, अनुजक नाम/ काज अहींक थिक (पृ. ५८७-५८९) महेश मिश्र “विभूति”- बाबा-स्तुति, गङ्गा-स्तुति (पृ. ५९०-५९०) श्यामल सुमन- अभियान, आत्म-दर्शन (पृ. ५९१-५९२) नवीननाथ झा (नवनीत)- नारीये सतयुग आनत यौ, युगनिर्माणी संकल्प, जीव की छी? अहम् प्रश्न, गायत्री महामंत्र, प्रेम आनन्दक अभिव्यक्ति छी (पृ. ५९३-५९७) विद्यानन्द झा पञ्जीकार (प्रसिद्ध मोहनजी)- कोशीक ताण्डव, श्रृष्टि चक्र, दहेज दानव (पृ. ५९८-६०२) धीरेन्द्र प्रेमर्षि- चहकऽ लागल चिड़िया-चुनमुन, एमकीक जतरा, आजाद गजल १-११ (पृ. ६०३-६१५) बृषेश चन्द्र लाल- नजरि अहाँक चितकेर जूड़ा दैत अछि (पृ. ६१६-६१६) हिमांशु चौधरी- विष-वृक्ष (पृ. ६१७-६१८) रामभरोस कापड़ि- अन्हारक विरुद्ध, आजाद गजल (पृ. ६१९-६२१) जितमोहन झा- दिलक कलमसँ शेरो शायरी, जखन जनता जागि जाइत अछि! (पृ. ६२२-६२४) कृष्णमोहन झा- एक दिन (पृ. ६२५-६२५) अमरेन्द्र यादव- टमटमियाँ घोडा (पृ. ६२६-६२६) निमिष झा- जीवन एकटा दुरुह कविता, चिर्रीचिर्री भेल मोन, वेदनाक तरङ्ग, असमर्पित उन्माद, किछु हाइकु (पृ. ६२७-६३७) भालचन्द्र झा- अपन अस्तीत्वक असली मोल, हमर माय (पृ. ६३८-६४०) अंकुर काशीनाथ झा- पश्चाताप (पृ. ६४१-६४१) प्रकाश झा- बाल-बुदरुकक लेल कविता (पृ. ६४२-६४२) सुबोध ठाकुर- मनक तरंग, केना होएत मिथिलाक जीर्णोद्धार, शब्दक वाण चलेबए- नहि सहबए आब अत्याचार, पिया हमर परदेशिया, हम गामेमे रहबइ (पृ. ६४३-६४८) रूपेश कुमार झा 'त्योंथ'- आयल फेरो समय लगनक, जंगल दिस !, मैथिल के? (पृ. ६४९-६५२) मनीष झा "बौआभाई"- माय (पृ. ६५४-६५५) सतीश चन्द्र झा- मध्य वर्गक सपना, भ्रमित शब्द, नाव आ जीवन, मौनक शब्द, चुनाव, शब्द, हमर स्वतंत्रता, ई जीवन, अप्पन भाषा (पृ. ६५६-६७०) विवेकानंद झा- सिंगरहार (पृ. ६७१-६७२) अमित मिश्र- नव-अंशु (अपन गप, गजल १-९०, हजल-१-६, रुबाइ- १-१६) (पृ. ८७३-७७६) चंदन कुमार झा- मोनक बात [अपन गप, गजल (१-६६), हजल (१-२), बाल गजल (१-१५), रुबाइ (१-३३), कता (१)] (पृ. ७७७-८३९) विनीत उत्पल- हम पुछैत छी (अपन गप, ५० टा कविता) (प्. ८४०-८९६) ओम प्रकाश झा- कियो बूझि नै सकल हमरा (अपन गप, गजल १-८७, रुबाइ- १-८, कता- १-२) (पृ. ८९७-९८८) उमेश मंडल- निश्तुकी (अपन गप, किछु कविता, हाइकू-टनका, आ दूटा गजल) (पृ. ९८९-१०८२) उमेश पासवान- वर्णित रस (आमुख, कागज, समाज, रावण-कंश, भरल घैल, कलजुग, उमर-अवस्‍था-मन, पि‍यासल, हत्‍या, फाटल भवि‍ष्य, गेलहे घर छी, पलटन लाल, बाढ़ि, डेग डेगपर खतरा, कपुत, आशा, गामक चौअनि‍याँ, नेताजी नमस्‍कार, सतहि‍या, अज्ञानी, दलिदर, पोसि‍या, मैना, माछक तीमन, कवाड़ी, बरखाक मौसम, मि‍थि‍लाक नारी, रगड़ा, नेता, मनक बि‍सवास, केहेन वि‍धना, अपनेकेँ की कही, फुसि-फट्टका, हकिकत, पावन भूमि, एना नै कर, भुतहा मोड़, हमरो लेने चलू, अथाह, गारल मुर्दा, हाल-चाल, पथ ई केहेन, गृहस्थ सबहक हाल, मि‍थि‍ला महान, हेराएल, दुभर, वि‍डम्‍वना, दि‍यादी बॉट, पुर्णि‍मा, रि‍श्‍ता, अज्ञानी, कनी देखू, मास्टरक बहाली, फागुनमे, श्‍यामल मोहे, जीतक झंडा, युवा, हम युवा, पथिक, हमहूँ कनै छी, एना किएक, जि‍ति‍या, डगर, रमल छी, संत, बन्हन, संघर्ष जारी रखब, भरदुति‍या, गवहा संक्राति, कि‍मती भोट, असली-नकली, कोसी, मच्छर रानी, हरिजन, हम छी मैथि‍ली, बौकी, चौके-चौक,ठेँस, पेटक खातिर, जगदीश बाबू, उजरल घर, जीवनक नैया, डर, नटीन, बताह, ज्ञानक नव ज्‍योति, केहेन चालि, बसन्त, योद्धा) (पृ. १०८३-११८१) शिव कुमार झा “टिल्लू”- क्षणप्रभा (अपन गप, किछु पद्य, दूटा गजल, तीन टा हाइकू) (पृ. ११८२-१३२५) सन्दीप कुमार साफी (प्रसिद्ध किरण)- बैशाखमे दलानपर- गद्य-पद्य मिश्रित [आत्मकथा खण्ड (मैथिलीक पहिल दलित आत्मकथा), कविता खण्ड, विहनि कथा खण्ड, लघुकथा खण्ड, विचार बिन्दु खण्ड] (पृ. १३२६-१४२०) मुन्नाजी- माँझ आंगनमे कतिआएल छी (अपन गप, गजल- १-५०, रुबाइ- १-११) (पृ. १४२१-१५०१) विन्देश्वर ठाकुर- नेपालक नोर मरूभूमिमे (अपन गप, गजल खण्ड, शेरो-शाइरी खण्ड, लघुकथा खण्ड, विहनि कथा खण्ड, कविता खण्ड) (पृ. १५०२-१६४६) आशीष अनचिन्हार- मुन्नाजीक गजल, अनचिन्हार आखर (गजलक संक्षिप्त परिचय, ७८ टा गजल,३२ टा रुबाइ आ २ टा कता) (पृ. १६४७-१८९१) 2

गद्य खण्ड मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत् - हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम् अक्खर (अक्षर ) खम्भा तिहुअन खेत्तहि काञि तसु कित्तिवल्लि पसरेइ। अक्खर खम्भारम्भ जउ मञ्चो बन्धि न देइ॥ [कीर्तिलता प्रथमः पल्लवः पहिल दोहा।]माने अक्षररूपी स्तम्भ निर्माण कए ओहिपर (काव्यरूपी) मंच जँ नहि बान्हल जाए तँ एहि त्रिभुवनरूपी क्षेत्रमे ओकर कीर्तिरूपी लता (वल्लि) प्रसारित कोना होयत। गजेन्द्र ठाकुर मैथिली हाइकू/ हैकू/ क्षणिका/ शेनर्यू/ टनका, हैबून हैकू सौंदर्य आ भावक जापानी काव्य विधा अछि, आ जापानमे एकरा काव्य-विधाक रूप देलन्हि कवि मात्सुओ बासो १६४४-१६९४। एकर रचनाक लेल परम अनुभूति आवश्यक अछि। बाशो कहने छथि, जे जे क्यो जीवनमे ३ सँ ५ टा हैकूक रचना कएलन्हि से छथि हैकू कवि आ जे दस टा हैकूक रचना कएने छथि से छथि महाकवि। भारतमे पहिल बेर १९१९ ई. मे कविवर रवीन्द्रनाथ ठाकुर जापानसँ घुरलाक बाद बाशोक दू टा हैकूक शाब्दिक अनुवाद कएले रहथि। हैकूक लेल मैथिली भाषा आ भारतीय संस्कृत आश्रित लिपि व्यवस्था सर्वाधिक उपयुक्त्त अछि। तमिल छोड़ि शेष सभटा दक्षिण आ समस्त उत्तर-पश्चिमी आपूर्वी भारतीय लिपि आ देवनागरी लिपि मे वैह स्वर आ कचटतप व्यञ्जन विधान अछि जाहिमे जे लिखल जाइत अछि सैह बाजल जाइत अछि। मुदा देवनागरीमे ह्रस्व 'इ' एकर अपवाद अछि, ई लिखल जाइत अछि पहिने, मुदा बाजल जाइत अछि बादमे। मुदा मैथिलीमे ई अपवाद सेहो नहि अछि- यथा 'अछि' ई बाजल जाइत अछि अ ह्र्स्व 'इ' छ वा अ इ छ। दोसर उदाहरण लिअ- राति- रा इ त। तँ सिद्ध भेल जे हैकूक लेल मैथिली सर्वोत्तम भाषा अछि। एकटा आर उदाहरण लिअ। सन्धि संस्कृतक विशेषता अछि? मुदा की इंग्लिशमे संधि नहि अछि? तँ ई की अछि- आइम गोइङ टूवार्ड्सदएन्ड। एकरा लिखल जाइत अछि- आइ एम गोइङ टूवार्ड्स द एन्ड। मुदा पाणिनि ध्वनि विज्ञानक आधार पर संधिक निअम बनओलन्हि, मुदा इंग्लिशमे लिखबा कालमे तँ संधिक पालन नहि होइत छै, आइ एम केँ ओना आइम फोनेटिकली लिखल जाइत अछि, मुदा बजबा काल एकर प्रयोग होइत अछि। मैथिलीमे सेहो यथासंभव विभक्त्ति शब्दसँ सटा कए लिखल आ बाजल जाइत अछि। जापानमे ईश्वरक आह्वान टनका/ वाका प्रार्थना ५ ७ ५ ७ ७ स्वरूपमे होइत छल जे बादमे ५ ७ ५ आ ७ ७ दू लेखक द्वारा लिखल जाए लागल आ नव स्वरूप प्राप्त कएलक आ एकरा रेन्गा कहल गेल। रेन्गाक दरबारी स्वरूपक गांभीर्य ओढ़ने छल आ बिन गांभीर्य बला स्वरूप वणिकवर्गक लेल छल। बाशो वणिक वर्ग बला रेन्गा रचलन्हि। रेन्गाक आरम्भ होक्कुसँ होइत छल आ हैकाइ एकर कोनो आन पंक्त्तिकेँ कहल जा सकैत छल। मसाओका सिकी रेन्गाक अन्तक घोषणा कएलन्हि १९म शताब्दीक प्रारम्भमे जा कए आ होक्कु आ हैकाइ केर बदलामे हैकू पद्यक समन्वित रूप देलन्हि। मुदा बाशो प्रथमतः एकर स्वतंत्र स्वरूपक निर्धारण कए गेल छलाह। हैकू निअम १. हैकू १७ अक्षरमे लिखू ।ई तीन पंक्त्तिमे लिखल जाइत अछि- ५ ७ आ ५ केर क्रममे। अक्षर गणना वार्णिक छन्दमे जेना कएल जाइत अछि तहिना करू। वार्णिक छन्दक वर्णन क्रममे- संयुक्त्ताक्षरकेँ एक गानू आ हलन्तक/ बिकारीक/ इकार आकार आदिक गणना नहि करू। साहित्यक दू विधा अछि गद्य आ पद्य।छन्दोबद्ध रचना पद्य कहबैत अछि-अन्यथा ओ गद्य थीक। छन्द माने भेल-एहन रचना जे आनन्द प्रदान करए। छन्द दू प्रकारक अछि।मात्रिक आ वार्णिक। वेदमे वार्णिक छन्द अछि। वार्णिक छन्दक परिचय लिअ। एहिमे अक्षर गणना मात्र होइत अछि। हलंतयुक्त अक्षरकेँ नहि गानल जाइत अछि। एकार उकार इत्यादि युक्त अक्षरकेँ ओहिना एक गानल जाइत अछि जेना संयुक्ताक्षरकेँ। संगहि अ सँ ह केँ सेहो एक गानल जाइत अछि।द्विमानक कोनो अक्षर नहि होइछ।मुख्यतः तीनटा बिन्दु मोन राखू- १. हलंतयुक्त्त अक्षर-० २. संयुक्त अक्षर-१ ३. अक्षर अ सँ ह -१ प्रत्येक। आब पहिल उदाहरण देखू :- ई अरदराक मेघ नहि मानत रहत बरसि के=१+५+२+२+३+३+३+१=२० मात्रा आब दोसर उदाहरण देखू ; पश्चात्=२ मात्रा ; आब तेसर उदाहरण देखू आब=२ मात्रा ; आब चारिम उदाहरण देखू स्क्रिप्ट=२ मात्रा हैकू निअम २. व्यंग्य हैकू पद्यक विषय नहि अछि, एकर विषय अछि ऋतु। जापानमे व्यंग्य आ मानव दुर्बलताक लेल प्रयुक्त विधाकेँ "सेर्न्यू" कहल जाइत अछि आ एहिमे किरेजी वा किगो केर व्याकरण विराम नहि होइत अछि। हैकू निअम ३. प्रथम ५ वा दोसर ७ ध्वनिक बाद हैकू पद्यमे जापानमे किरेजी- व्याकरण विराम- देल जाइत अछि। हैकू निअम ४. जापानीमे लिंगक वचन भिन्नता नहि छै। से मैथिलीमे सेहो वचनक समानता राखी, सैह उचित होएत। हैकू निअम ५. जापानीमे एकहि पंक्त्तिमे ५ ७ ५ ध्वनि देल जाइत अछि। मुदा मैथिलीमे तीन ध्वनिखण्डक लेल ५ ७ ५ केर तीन पंक्त्तिक प्रयोग करू। मुदा पद्य पाठमे किरेजी विरामक ,जकरा लेल अर्द्धविरामक चेन्ह प्रयोग करू, एकर अतिरिक्त्त एकहि श्वासमे पाठ उचित होएत। हैकू निअम ६. हैबुन एकटा यात्रा वृत्तांत अछि जाहिमे संक्षिप्त वर्णनात्मक गद्य आ हैकू पद्य रहैत अछि। बाशो जापानक बौद्ध भिक्षु आ हैकू कवि छलाह आ वैह हैबूनक प्रणेता छथि। जापानक यात्राक वर्णन ओ हैबून द्वारा कएने छथि। पाँचटा अनुच्छेद आ एतबहि हैकू केर ऊपरका सीमा राखी, तखने हैबूनक आत्मा रक्षित रहि सकैत अछि, नीचाँक सीमा ,१ अनुच्छेद १ हैकू केर, तँ रहबे करत। हैकू गद्य अनुच्छेदक अन्तमे ओकर चरमक रूपमे रहैत अछि। हमर १२ टा हैकू १.वास मौसमी, मोजर लुबधल पल्लव लुप्ता २.घोड़न छत्ता, रेतल खुरचन मोँछक झक्का ३. कोइली पिक्की, गिदरक निरैठ राकश थान ४.दुपहरिया भुतही गाछीक सधने श्वास ५.सरही फल कलमी आम-गाछी, ओगरबाही ६.कोलपति आऽ चोकरक टाल, गछपक्कू टा ७.लग्गा तोड़ल गोरल उसरगि बाबाक सारा ८.तीतीक खेल सतघरिया चालि अशोक-बीया ९.कनसुपती, ओइधक गेन्द आऽ जूड़िशीतल १०.मारा अबाड़ डकहीक मछैड़ ओड़हा जारि ११.कबइ सन्ना चाली बोकरि माटि, कठफोड़बा १२.शाहीक-मौस, काँटो ओकर नहि बिधक लेल हमर एकटा हैबून सोझाँ झंझारपुरक रेलवे-सड़क पुल। १९८७ सन्। झझा देलक कमला-बलानक पानिक धार, बाढ़िक दृश्य। फेर अबैत छी छहर लग। हमरा सोझाँमे एकठामसँ पानि उगडुम होइत झझाइत बाहर अछि अबैत। फेर ओतएसँ पानिक धार काटए लगैत अछि माटि। बढ़ए लगैत अछि पानिक प्रवाह, अबैत अछि बाढ़ि। घुरि गाम दिशि अबैत छी। हेलीकॉप्टरसँ खसैत अछि सामग्री। जतए आएल जलक प्रवाह ओतए सामग्रीक खसेबा लए सुखाएल उबेर भूमिखण्ड अछि बड़ थोड़। ओतए अछि जन- सम्मर्द। हेलीकॉप्टर देखि भए जाइत अछि घोल। अपघातक अछि डर । हेलीकॉप्टर नहि खसबैत अछि ओतए खाद्यान्न। बढ़ि जाइत अछि आगाँ। खसबैत अछि सामग्री जतए बिनु पानि पड़ैत छल दुर्भिक्ष, बाढ़िसँ भेल अछि जतए पटौनी। कारण एतए नहि अछि अपघातक डर। आँखिसँ हम ई देखल। १९८७ ई.। पएरे पार केने कमला धार, आइ विशाल अपाला आत्रेयी पात्र: अपाला: ऋगवैदिक ऋचाक लेखिका अत्रि: अपालाक पिता वैद्य 1,2,3 कृशाश्व: अपालाक पति। वेषभूषा:- उत्तरीय वस्त्र (पुरुष), वल्कल, जूहीक माला (अपालाक केशमे), दण्ड। मंच सज्जा :- सहकार-कुञ्ज (आमक गाछी), वेदी, हविर्गन्ध, रथक छिद्र, युगक छिद्र, सोझाँमे साही, गोहि आ गिरग़िट। दृश्य एक (आमक गाछीक मध्य एक गोट बालिका आ बालक)। बालिका: हमर नाम अपाला अछि। हम ऋषि अत्रिक पुत्री छी।अहाँ के छी ऋषि बालक। बालक: हम शिक्षाक हेतु आयल छी। ऋषि अत्रि कतए छथि। अपाला: ऋषि जलाशय दिशि नहयबाक हेतु गेल छथि, अबिते होयताह। (तखनहि दहिन हाथमे कमंडल आ वाम हाथमे वल्कल लेने महर्षि अत्रिक प्रवेश।) अत्रि: पुत्री ई कोन बालक आयल छथि। अपाला: ऋषिवर। आश्रमवासीक संख्यामे एक गोट वृद्धि होयत। ई बालक शिक्षाक हेतु... बालक: नहि। हमर अखन उपनयन नहि भेल अछि। हम अखन माणवक बनि उपाध्यायक लग शिक्षाक हेतु आयल छी। ई देखू हमर हाथक दण्ड। हम दण्ड- माणवक बनि सभ दिन अपन गामसँ आयब आ साँझमे चलि जायब। हम वेद मंत्रसँ अपरिचित अनृच छी। अत्रि: बेश तखन अहाँ हमर शिष्यक रूपमे प्रसिद्ध होयब। दिनक पूर्व भाग प्रहरण विद्याक ग्रहणक हेतु राखल गेल अछि। हम जे मंत्र कहब तकरा अहाँ स्मरण राखब। पुनः हम अहाँक विधिपूर्वक उपनयन करबाय संग लऽ आनब। बालक: विपश्चित गुरुक चरणमे प्रणाम। (पटाक्षेप) दृश्य दू (उपनयन संस्कारक अंतिम दृश्य। अपाला आ किछु आन ऋषि बालक बालिकाक उपनयन संस्कार कराओल गेल अछि।) अत्रि: अपाला। आब अहाँक असल शिक्षा आ विद्या शुरू होयत।(पुनः आन विद्यार्थी सभक दिशि घूमि।) अहाँ सभकेँ सावित्री मंत्रक नियमित पाठ करबाक चाही। ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात्। सविता- जे सभक प्रेरक छथि- केर वरेण्य- सभकेँ नीक लागय बला तेज- पृथ्वी, अंतरिक्ष आ स्वर्गलोक-सर्वोच्च अकाश-मे पसरल अछि। हम ओकर स्मरण करैत छी। ओ हमर बुद्धि आ मेधाकेँ प्रेरित करथु। अपाला: पितृवर। “ॐ नमः सिद्धम” केर संग विद्यारम्भक पूर्व शिक्षाक अंतर्गत की सभ पढ़ाओल जायत। अत्रि: वर्ण, अक्षर-स्वर, मात्रा- ह्र्स्व, दीर्घ आ प्लुत, बलाघात- उदात्त, अनुदात्त, स्वरित, शुद्ध उच्चारण, अक्षरक क्रमिक विन्यास- वर्त्तनी, पढ़बाक आ बजबाक शैली, एकहि वर्णकेँ बजबाक कैकटा प्रकार, ई सभ शिक्षाक अंतर्गत सिखाओल जायत। साम संतान- जेकि सामान्य गान अछि- केर माध्यमसँ शिक्षा देल जायत। अपाला: गुरुवर। आश्रमक नियमसँ सेहो अवगत करा देल जाय। अत्रि: वनक प्राणी अवध्य छथि। आहारार्थ फल पूर्व-संध्यामे वन-वृक्षसँ एकत्र कएल जायत। प्रातः आ सायं अग्निहोत्र होयत, ताहि हेतु समिधा, कुश, घृत-आज्य, एवम् दुग्धक व्यवस्था प्रतिदिन मिलि-जुलि कय कएल जायत। हरिणकेँ निर्विघ्न आश्रममे टहलबाक अनुमति अछि। कदम्ब, अशोक, केतकी, मधूक, वकुल आ सूदकारक गाछक मध्य एहि आश्रममे यद्यपि कृषिक अनुमति नहि अछि, परञ्च अकृष्य भूमि पर स्वतः आ बीयाक द्वारा उत्पन्न अकृष्टपच्य अन्नक प्रयोग भऽ सकैछ। बालक: हम सभ एकहि विद्यापीठक रहबाक कारण सतीर्थ्य छी। गुरुवर। दण्ड आ कमण्डलक अतिरिक्त्त किछु रखबाक अनुमति अछि? अत्रि: कटि मेखला आ मृगचर्म धारण करू आ अपनाकेँ एहि योग्य बनाऊ जाहिसँ द्वादशवर्षीय यज्ञ सत्रक हेतु अहाँ तैयार भऽ सकी आ महायज्ञक समाप्तिक पश्चात् ब्रह्मोदय, विदथ परिषद आ उपनिषद ओ अरण्य संसदमे गंभीर विषय पर चर्चा कऽ सकी। (पटाक्षेप) दृश्य तीन (कुटीरमे ऋषि अत्रि कैक गोट वैद्यक संग विचार-विमर्श कए रहल छथि।) अत्रि: वैद्यगण। बालिका अपालाक शरीरमे त्वक् रोगक लक्षण आबि रहल अछि। शरीर पर श्वेत कुष्ठक लक्षण देखबामे आबि रहल अछि। वैद्य 1: कतबा महिनासँ कतेको औषधिक निर्माण कए बालिकाकेँ खोआओल आ लेपनक हेतु सेहो देल। अत्रि: अपाला आब विवाहयोग्य भऽ रहल छथि। हुनका हेतु योग्य वर सेहो ताकि रहल छी। वैद्य 2: कृशाश्वक विषयमे सुनल अछि, जे ओ सर्वगुणसंपन्न छथि आ वृद्ध माता-पिताक सेवामे लागल छथि। ओ अपन अपालाक हेतु सर्वथा उपयुक्त वर होयताह। अत्रि: तखन देरी कथीक। अपने सभ उचित दिन हुनकर माता-पितासँ संपर्क करू। दृश्य चारि (आश्रमक सहकार-कुञ्जमे वैवाहिक विधिक अनुष्ठान अछि। वेदी बनाओल गेल अछि आ ओतय ऋत्विज लोकनि जव-तील केर हवन कऽ रहल छथि।) अपाला (मोने मोन): माथ पर त्रिपुंडक भव्य-रेखा आ शरीर-सौष्ठवक संग विनयक मूर्त्ति, ईएह कृशाश्व हमर जीवनक संगी छथि। (तखने कृशाश्वक नजरि अपालासँ मिलैत छन्हि आ अपाला नजरि नीचाँ कए लैत छथि। मुदा स्त्रीत्वक मर्यादाकेँ रखैत ललाट ऊँचे बनल रहैत छन्हि।) अत्रि: उपस्थित ऋषि-मण्डली आ अग्निकेँ साक्षी मानैत, हम अपाला आ कृशाश्वक पाणिग्रहण करबैत छी। (अग्निक प्रदक्षिणा करैत काल कृशाश्वक उत्तरीय वस्त्र कनेक नीचाँ खसि पड़ल आ अपालाक केशक जूही-माला सेहो पृथ्वी पर खसि पड़ल।) दृश्य पाँच (अपालाक पतिगृह।वृद्ध माता-पिता बैसल छथिन्ह आ अपाला घरक काजमे लागल छथि।) अपाला: प्रिय कृशाश्व। एतेक दिन बीति गेल। पतिगृहमे हम कोनो नियंत्रणक अनुभव नहि कएलहुँ। हमरा प्रति अहाँक कोमल प्रेम सतत् विद्यमान रहल। मुदा श्वेत त्वकक जे दाग हमरा पर ज्वलन्त सत्ताक रूपमे अछि, कदाचित् वैह किछु दिनसँ अहाँक हृदयमे हमरा प्रति उदासीनताक रूपमे परिणत भेल अछि। कृशाश्व: हमर उदासीनता अपाला? अपाला: हँ कृशाश्व। हम देखि रहल छी ई परिवर्त्तन। की एकर कारण हमर त्वगदोषमे अंतर्निहित अछि? कृशाश्व: हे अपाला। हमरा भीतर एकटा संघर्ष चलि रहल अछि। ई संघर्ष अछि प्रेम आ वासनाक। प्रेम कहैत अछि, जे अपाला ब्रह्मवादिनी छथि, दिव्य नारी छथि। मुदा वासना कहैत अछि, जे अपालाक शरीरक त्वगदोष नेत्रमे रूपसँ वैराग्यक कारण बनि गेल अछि। अपाला: पुरुषक हाथसँ स्त्रीक ई भर्त्सना। कामनासँ कलुषित पुरुष द्वारा नारीक हृदय-पुष्पकेँ थकूचब छी ई। हम वेदक अध्ययन कएने छी। चन्द्रमाक प्रकाशक बीचमे ओकर दाग नुका जाइत अछि मुदा हमर ई श्वेत त्वक् दाग हमर विशाल गुणराशिक बीचमे नहि मेटायल। (कृशाश्व स्तब्ध भय जाइत छथि मुदा किछु बजैत नहि छथि।) अपाला: सबल पुरुषक सोँझा हम अपन हारि मानैत, अपन पिताक तपोवन जा रहल छी, कृशाश्व। दृश्य छ: (अपाला प्रातः कालमे समिधासँ अग्निकुण्डमे होम करैत इन्द्रक पूजा आ जपमे लागि गेल छथि। कुशासन पर बैसलि छथि।) अपाला: धारक लग सोम भेटल, ओकरा घर आनल आ कहल जे हम एकरा थकुचब इंद्रक हेतु, शक्रक हेतु।गृह-गृह घुमैत आ सभटा देखैत, छोट खुट्टीक ई सोम पीबू, दाँतसँ थकुचल, अन्न आ दहीक संग खेनाइ काल प्रशंसा गीत सुनैत। हम सभ अहाँकेँ नीक जेकाँ जनबाक हेतु अवैकल्पिक रूपसँ लागल छी मुदा क्यो गोटे अहाँकेँ प्राप्त नहि कऽ सकल छी। हे चन्द्र, अहाँ आस्ते-आस्ते आ निरन्तर ठोपे-ठोपे इन्द्रमे प्रवाहित होऊ। की ओ हमरा लोकनिक सहायता नहि करताह, हमरा लोकनिक हेतु कार्य नहि करताह। की ओ हमरा लोकनिकेँ धनीक नहि बनओताह? की हम अपन राजासँ शत्रुताक बाद आब अपना सभकेँ इन्द्रसँ मिला लिअ’। हे इन्द्र अहाँ तीन ठाम उत्पन्न करू- हमरा पिताक मस्तक पर, हुनकर खेतमे आ हमर उदर लग। एहि सभ फसिलकेँ ऊगय दियौक। अहाँ हमरा सभक खेतकेँ जोतलहुँ, हमर शरीरकेँ आ हमर पिताक मस्तककेँ सेहो। अपालाकेँ पवित्र कएल। इन्द्र ! तीन बेर, एक बेर पहिया लागल गाड़ी, एक बेर चारि पहिया युक्त्त गाड़ीमे आ एक बेर दुनू बरदक कान्ह पर राखल युगक बीच। हे शतक्रतु ! आ अपालाकेँ स्वच्छ कएल आ सूर्यसमान त्वचा देल। हे इन्द्र ! दृश्य सात (महायज्ञक समाप्तिक पश्चात ब्रह्मोदयक दृश्य।) अत्रि: एहि विशाल ऋत्विजगणक मध्य ऋकक मंत्रमे अपालाक ऋचाकेँ हम सम्मिलित कए सकैत छी, कारण ई स्वतः स्फुटित आ अभिमंत्रित अछि। अपालाक चर्मरोग एहिसँ छूटि गेल, एकर ई सद्यः प्रमाण अछि। अपाला एहि मंत्रक दृष्टा छथि। ऋषिगण: अत्रि, हमरा सभ सेहो एहि मंत्रक दर्शन कएल। अहो। सम्मिलित करबाक आ नहि करबाक तँ प्रश्ने नहि अछि। ई तँ आइसँ ऋकक भाग भेल। (एहि स्वीकृतिक बाद ब्रह्मोदय सभामे दोसर काज सभ प्रारम्भ भऽ जाइत अछि। कृशाश्व विचलित मोने अपालाक सोझाँ अबैत छथि।) कृशाश्व: अपाला। हम दु:खित छी। अहाँक वियोगमे। अपाला: हे कृशाश्व। इन्द्रक देल ई त्वचा योगक परिणाम अछि। अहाँक उपेक्षा हमरा एहि योग्य बनेलक मुदा आब एहि पर अहाँक कोनो अधिकार नहि। (दुनू गोटे शनैः-शनैः मंचक दू दिशि सँ बहराए जाइत छथि।) (पटाक्षेप) दानवीर दधीची मंच सज्जा: आम्र वन, पोखरि आ युद्ध स्थल वेष-भूषा: अधो वस्त्र- आश्रमवासीक हेतु आश्विनक हेतु वैद्यक श्वेत वस्त्र आ इन्द्रक हेतु योद्धाक वस्त्र रथ आ अस्त्र शस्त्रक चित्र पर्दा पर छायांकित कएल जा सकैत अछि। प्रथम दृश्य (महर्षि दध्यङ आथर्वन दधीचीक तपोवनक दृश्य। सूर्योदयक स्वर्णिम आभा, फूलक गाछक फूलक संग पवनक प्रभावसँ सूर्य दिशि झुकब। यज्ञक धूँआसँ मलिन भेल गाछक पात। महर्षि सूर्योदयक दृश्यक आनन्द लए रहल छथि। मुदा दृष्टिमे अतृप्त भाव छन्हि। ओहि आश्रमक कुलपति थिकाह महर्षि, दस सहस्र छात्रकेँ विद्यादान करैत छथि, सभक नाम, गाम आ कार्यसँ परिचित छथि। से ओ तखने प्रवेश करैत एकटा अपरिचित आगंतुकक आगमन सँ साकांक्ष भऽ जाइत छथि।) दध्यङ आथर्वन दधीची: अहाँ के छी आगंतुक? अपरिचित: हम एकटा अतिथि छी महर्षि आ कोनो प्रयोजनसँ आयल छी। कृपा कए अतिथिक मनोरथ पूर्ण करबाक आश्वासन देल जाय। दध्यङ आथर्वन दधीची: एहि आश्रमसँ क्यो बिना मनोरथ पूर्ण कएने नहि गेल अछि आगंतुक। हम अहाँक सभ मनोरथ पूर्ण होएबाक आश्वासन दैत छी। अपरिचित: हम देवता लोकनिक राजा इन्द्र छी। अहाँसँ परमतत्त्वक उपदेशक हेतु आयल छी।एहिसँ अहाँक कीर्त्ति स्वर्गलोक धरि पहुँचत। (दध्यङ आथर्वन दधीची सोचमे पड़ल मंच पर एम्हरसँ ओम्हर विचलित होइत घुमय लगैत छथि। ओ मंच पर घुमैत मोने-मोन, बिनु इन्द्रकेँ देखने, बजैत छथि जे दर्शकगणकेँ तँ सुनबामे अबैत अछि मुदा इन्द्र एहन सन आकृति बनओने रहैत छथि जे ओ किछु सुनिये नहि रहल छथि आ मंचक एक दोगमे ठाढ़ भऽ जाइत छथि।) दध्यङ आथर्वन दधीची: (मोने-मोन) हम शिक्षा देब तँ गछि लेने छी मुदा की इन्द्र एकर अधिकारी छथि। बज्र लए घुमए बला, कामवासनामे लिप्त अनधिकारी व्यक्त्तिकेँ परमतत्त्वक शिक्षा? मुदा गछने छी तँ अपन प्रतिज्ञाक रक्षणार्थ मधु-विद्याक शिक्षा इन्द्रकेँ दैत छियन्हि। इन्द्र: कोन सोचिमे पड़ि गेलहुँ महर्षि। दध्यङ आथर्वन दधीची: इन्द्र हम अहाँकेँ मधुविद्याक शिक्षा दए रहल छी। भोगसँ दूर रहू। नाना प्रकारक भोगक आ भोज्यक पदार्थ सभसँ। ई सभ ओहने अछि जेना फूल सभक बीचमे साँप। भोगक अछैत स्वर्ग अधिपति इन्द्र आ भूतलक निकृष्ट कुकुरमे कोन अंतर रहत तखन? (इन्द्र अपन तुलना कुकुरसँ कएल गेल देखि कए तामसे विख-सबिख भऽ गेल। मुदा अपना पर नियंत्रण रखैत मात्र एक गोट वाक्य बजैत मंच परसँ जाइत देखल जाइत अछि।) इन्द्र: महर्षि अहाँक ई अपमान तँ आइ हम सहि लेलहुँ। मुदा आजुक बाद ज्योँ अहाँ ई मधु-विद्या ककरो अनका देलहुँ तँ अहाँक गरदनि परसँ ई मस्तिष्क, जकर अहाँकेँ घमण्ड अछि, एहि भूमि पर खसत। दृश्य दू (ऋषिक आश्रम। आश्विन बन्धुक आगमन।महर्षिसँ अभिवादनक उपरान्त वार्त्तालाप।) आश्विन बन्धु: महर्षि। आब हम सभ अहाँक मधु विद्याक हेतु सर्वथा सुयोग्य भ’ऽ गेल छी। हिंसा आ भोगक रस्ता हम सभ छोड़ि देलहुँ। इन्द्र सोमयागमे हमरा लोकनिकेँ सोमपानक हेतु सर्वथा अयोग्य मानलन्हि मुदा हमरा सभ प्रतिशोध नहि लेलहुँ। कतेक पंगुकेँ पएर, कतेक आन्हरकेँ आँखि हमरा सभ देलहुँ। च्यवन मुनिक बुढ़ापाकेँ दूर कएलहुँ। आ तकरे उपकारमे च्यवन हमरा लोकनिकेँ सोमपीथी बना देलन्हि। दध्यङ आथर्वन दधीची: आश्विनौ। ब्रह्मज्ञानककेँ देब एकटा उपकारमयी कार्य अछि आ अहाँ लोकनि एहि विद्याक सर्वथा योग्य शिक्षार्थी छी। इन्द्र कहने अछि, जे जाहि दिन ई विद्या हम कहियो ककरो देब तँ तहिये ओ हमर माथ शरीरसँ काटि खसा देत। मुदा ई शरीरतँ अछि क्षणभंगुर। आइ नहि तँ काल्हि एकरा नष्ट होयबाक छै। ताहि डरसँ हम ब्रह्म विद्याक लोप नहि होए देबैक। आश्विनौ: महर्षि अहाँक ई उदारचरित ! मुद हमरो सभ शल्यक्रिया जनैत छी आ पहिने हमरा सभ घोड़ाक मस्तक अहाँक गरदनि पर लगाए देब। जखन इन्द्र अपन घृणित कार्य करत आ अहाँक मस्तककेँ काटत तखन अहाँक असली मस्तक हमरा सभ पुनः अहाँक शरीरमे लगा देब। (मंच पर आबाजाही शुरू भऽ जाइत अछि, क्यो टेबुल अनैत अछि तँ क्यो चक्कू धिपा रहल अछि जेना कोनो शल्य चिकित्साक कार्य शुरू भऽ रहल होअय। परदा खसए लगैत अछि आ पूरा खसितो नहि अछि आकि फेर उठब प्रारम्भ भऽ जाइत अछि। एहि बेर घोड़ाक गरदनि लगओने महर्षि आश्विन बन्धुकेँ शिक्षा दैत दृष्टिगोचर होइत छथि।) दध्यङ आथर्वन दधीची: एहि जगतक सभ पदार्थ एक दोसराक उपकारी अछि। ई जे धरा अछि से सभ पदार्थक हेतु मधु अछि आ सभ पदार्थ ओकरा हेतु मधु। समस्त जन मधुरूपक अछि। तेजोमय आ अमृतमय। सत्येक आधार पर सूर्य ज्योति पसारैत अछि एहि विश्वमे।चन्द्रक धवल प्रकाश दूर भगाबैत अछि रातिक गुमार आ आनैत अछि शीतलता। ज्ञानक उदयसँ अन्हारमे बुझाइत साँप देखा पड़ैत अछि रस्सा। विश्वक सूत्रात्माकेँ ओहि परमात्माकेँ अपन बुद्धिसँ पकड़ू। जाहि प्रकारेँ रथक नेमिमे अर रहैत अछि ताहि प्रकारेँ परमात्मामे ई संपूर्ण विश्व। (तखने मंचक पाछाँसँ बड्ड बेशी कोलाहल शुरू भऽ जाइत अछि। तखने बज्र लए इन्द्रक आगमन होइत अछि। एक्के प्रहारमे ओ महर्षिक गरदनि काटि दैत छथि। फेर इन्द्र चलि जाइत छथि। मंच पर आबाजाही शुरू भऽ जाइत अछि, क्यो टेबुल अनैत अछि तँ क्यो चक्कू धिपा रहल अछि, जेना कोनो शल्य चिकित्साक कार्य शुरू भऽ रहल होअय। परदा खसए लगैत अछि आ पूरा खसितो नहि अछि आकि फेर उठब प्रारम्भ भऽ जाइत अछि। एहि बेर महर्षि पुनः अपन स्व-शरीरमे देखल जाइत छथि। ओ बैसले छथि आकि इन्द्र अपन मुँह लटकओने अबैत अछि।) इन्द्र: क्षमा करब महर्षि हमर अपराध। आइ आश्विन-बन्धु हमरा नव-रस्ता देखओलन्हि। गुरूसँ एको अक्षर सिखनिहार ओकर आदर करैत छथि मुदा हम की कएलहुँ? असल शिष्य तँ छथि आश्विन बन्धु। दध्यङ आथर्वन दधीची: इन्द्र। अहाँकेँ ताहि द्वारे हम शिक्षा देबामे पराङमुख भए रहल छलहुँ। मुदा अहाँक दृढ़निश्चय आ सत्यक प्रति निष्ठाक द्वारे हम अहाँकेँ शिक्षा देल। हमरा मोनमे अहाँक प्रति कोनो मलिनता नहि अछि। इन्द्र: धन्य छी अहाँ आ धन्य छथि आश्विनौ। आब हम ओ इन्द्र नहि रहलहुँ। हमर अभिमानकेँ आश्विनौ खतम कए देलन्हि। (इन्द्र मंचसँ जाइत अछि। परदा खसैत अछि।) दृश्य तीन (स्वर्गलोकक दृश्य। चारू दिशि वृत्र आ शम्बरक नामक चर्चा करैत लोक आबाजाही कए रहल छथि। ओ दुनू गोटे आक्रमण कए देने अछि भारतक स्वर्गभूमि पर। इन्द्र सहायताक हेतु महर्षिक आश्रम अबैत छथि।) इन्द्र: वृत्र आ शम्बरक आक्रमण तँ एहि बेर बड्ड प्रचंड अछि। अहाँक विचार आ मार्गदर्शनक हेतु आयल छी महर्षि। दध्यङ आथर्वन दधीची: इन्द्र। कुरुक्षेत्र लग एकटा जलाशय अछि, जकर नाम अछि, शर्यणा। अहाँ ओतए जाऊ, ओतय घोड़ाक मूड़ी राखल अछि, जाहिसँ हम आश्विनौकेँ उपदेश देने छलहुँ। ब्रह्मविद्या ओहि मुँहसँ बहरायल आ ताहि द्वारे ओ अत्यंत कठोर आ दृढ़ भऽ गेल अछि। ओहिसँ नाना-प्रकारक शस्त्र बनाऊ, अग्नि आश्रित विध्वंसकक प्रयोग करू, त्रिसंधि व्रज, धनुष, इषु-बाण-अयोमुख-लोहाक सूचीमुख सुइयाबला आ विकंकतीमुख- कठोर, एहि तरहक शस्त्रक प्रयोग करू, कवच आ शिरस्त्राणक प्रयोग करू, अंधकार पसारयबला आ जड़ैत रस्सी द्वारा दुर्गंधयुक्त्त धुँआ निकलएबला शस्त्रक सेहो प्रयोग करू आ युद्ध कए विजयी बनू। इन्द्र: जे आज्ञा महर्षि। (परदा खसैत अछि आ जखन उठैत अछि तँ पोखरिक कातमे घोड़ाक मूड़ीसँ इन्द्र द्वारा वज्र आ विभिन्न हथियार बनाओल जा रहल अछि। फेर परदा खसि कऽ जखन उठैत अछि तँ अग्नियुक्त शस्त्र, जे फटक्का द्वारा मंचपर उत्पन्न कएल जा सकैत अछि, देखबामे अबैत अछि। मंच धुआँसँ भरि जाइत अछि। फेर परदा खसैत अछि आ मंचक पाछाँसँ सूत्रधारक स्वर सुनबामे अबैत अछि।) सूत्रधार: इन्द्रक विजय भेलन्हि आ दुष्ट सभ खोहमे भागि गेल। ईएह छल वैदिक नाटक बादमे एहि अर्थकेँ अनर्थ कए देलन्हि पौराणिक लोकनि, जाहिमे दधीचीक हड्डीसँ इन्द्रक वज्र बनएबाक चर्च कएल गेल अछि। (ओ ई असल बात अछि- केर फुसफुसाहटिक संग पर्दा खसले रहैत अछि आ लाइट क्षणिक ऑफ भेलाक बाद ऑन भए जाइत अछि।) बालकथा- ब्राह्मण आ ठाकुरक कथा देबीगंज एकटा नगर छल आ ओहि नगरमे एकटा ब्राह्मण रहैत छल। हुनका भगवान श्री सत्यनारायणक पूजाक निमंत्रण दूरसँ आएल रहए। ब्राह्मण असगर रहए आ जएबाक ओकरा दुरगर छल, से ओ अपन नगरक एकटा ठाकुरक बच्चाकेँ संग कएलक। ठाकुरक बच्चा बाजल, जे पंडीजी हम तँ अहाँक संग जाएब, मुदा एकटा गप अछि। जतए कतहु हमरा कोनो गप गलत बुझाएत, ओतए अहाँकेँ हमरा बुझा देमए पड़त, नहि तँ हम अहाँक संग नहि जाएब। पंडितजी कहलन्हि जे चलू बुझा देब। ब्राह्मण आ ठाकुर चलल। चलैत-चलैत ओ दुनू गोटे एकटा धारक लग पहुँचल। ओकरा सभकेँ धार टपबाक रहए से ओतए ठाढ़ भए ओ सभ कपड़ा खोलि तैयार भेल तँ ठाकुरक बेटा धारमे देखलक जे एकटा लहास धारमे मरल-पड़ल छै आ भाँसि रहल छै। ओ स्त्री छलि, ओ भँसना बालु-रेतक छल आ ओ ओजनसँ भाँसि रहल छलि। ठाकुरक बेटा ई देखि कए बाजल -– पंडित ओ देख, ओ लहास भाँसि रहल अछि, ओ तीन जान बहुत आश्चर्य अछि। पंडितजी अहाँ हमरा बुझा दिअ नहि तँ हम घुरि कए चलि जाएब। पंडितजी खिस्सा कहए लगलाह। देख बच्चा। अपन गाम लग के.नगरक राजा छल । ओहि राजाक एकटा बेटा रहए। ओकर बियाह ओही स्थानपर भेल, जतए हम सभ चलि रहल छी। बादमे अपन नगरक राजा मरि गेल । ओकर बेटा राजकेँ सम्हारि नहि सकल आ राजकेँ बन्हक लगा देलक। ओकर सासुरमे पता लगलैक, जे राजा राजपाट बन्हक लगा देने अछि आ आब द्विरागमन करेबा लेल ओकरा लग पाइ नहि छै, तँ बड्ड मोश्किल भए गेलैक। एक दिन ओकर सासुरमे भगवानक पूजा भए रहल छलैक। ओहि दिन ई गरीब राजा साँझमे पहुँचल तँ पूजा भए रहल छल। ई ओतए गेल तँ कियो ओकर खोज-पुछारी नहि कएलक। ओतहि ओ कातमे बैसि गेल। पूजा समाप्त भेल आ सभ कियो प्रसाद खा कए अपन-अपन घर गेल आ घरबारी सभ सेहो खा-पीबि कए सूति गेल। एहि बेचारोकेँ क्यो नहि पुछलक आ ओ ओही स्थानपर सूति गेल। रातिक जखन बारह बाजल तँ ओकर स्त्री उठि गेल आ अपन घोड़सनीयाँ लग गेल। ओतए सुतबाक कोनो ब्यबस्था नहि छल। एकटा खाट रहए जाहिमे ती टा टाँग रहए। एकटा टाँग कतएसँ लगाओत। लड़की आएल आ ओहि लड़कासँ पुछलक जे तूँ किछु खेने छह। लड़का कहलक नहि। बेचारा भूखक मारल बचल भोजन खएलक। ओहू समय लड़की अपन पतिकेँ नहि चिन्हलक। ओकरा कहलक जे चल आ जाहि खाटक एकटा टाँग टूटल छल ओही खाटमे एक दिस लगा देलक आ दुनू घोड़सनियाँ आ ओ लड़की सूति गेल। ओकर सुतलाक बाद लड़काकेँ कियो स्वप्न दैत अछि। ई राजाक बेटा, तूँ अपन घर जो, ओतए तोहर पिताक कोचक नीचाँ चरि घाड़ा द्रब छहु। ओहिमेसँ एक घाड़ा बेचि कए अपन राज छोड़ा लिअ। ई सपना सुनि राजाक बेटा स्थिरेसँ खाट राखि, अपन घर आपस आबि गेलि। ओ अपन राज बन्हकीसँ छोड़ा लेलक। पहिने जेकाँ भए गेल। जखन ओकर सासुरमे ई पता चलल, जे राजा पहिने सँ बेशी नीक भए गेल अछि तखन ओ सभ राजाकेँ खबरि कएलक जे अहाँ अपन द्विरागमन करबा लिअ। राजा दिन लए कए गेल आ ओही लड़कीकेँ गौना करा कए लए अनलक। राजा ओकरा एकटा खबासनीक संगे खेनाइक सभ समान दए एकटा कोठलीमे बन्न कए देलक। ओ खेनाइ खाइत छल आ ओही कोठलीमे रहैत छल, मुदा राजा ओतए नहि जाइत छल। जखन किछु दिन बीति गेल तँ एक दिन रानी खबासनीकेँ पठओलक, राजाकेँ बजेबाक लेल। राजा आएल तँ रानी कहलक जे अहाँ हमरा गौना करा कए अनलहुँ आ एहि कोठलीमे बन्न कए देने छी। अहाँ अबितो नहि छी। राजा कहलक जे ओ घोड़सनियाँ नहि छी, जे टूटल खाटक एक पएर वैह रहए। आ बाँचल भोजन हम खएने रही। आ फेर वैह ऐंठ खाए लेल हमरा कहलहुँ। ई सुनि लड़की बहुत लज्जित भऽ गेलीह। भोर भेल आ ओ खबासनीसँ कहलक जे तूँ रह, हमर व्रतक दिन अछि आ हम धारसँ नहा कए अबैत छी। ओ सभटा कपड़ा खोलि धारमे फाँगि गेल। भसना भाठी जे भसैत अछि, जान ई ठाकुर, वैह लड़की अछि। चलू हमरा सभ आगाँ। दोसर ब्राह्मण आ ठाकुर ओइ धारक कातसँ बिदा भेल। धारकेँ पार करैत आ चलैत-चलैत ओ सभ एकटा पैघ गाममे पहुँचलाह। ओहि गाममे बड्ड भीड़ लागल रहए। ठाकुरक लड़का जा कए देखए लागल तँ ओ देखलक जे एकटा बकरीक बच्चा बान्हि कए राखल छल आ जे कियो अबैत रहए से ओहि बकड़ीक बच्चाकेँ दू लात मारैत छल। ठाकुरक बच्चा सोचलक जे ओ बकड़ीक बच्चा कोनो एक-दू गोटेक फसिल खा लेने होएत, मुदा तखन सभ मिलि कए किएक ओकरा मारि रहल अछि। ओ ब्राह्मणसँ पुछलक जे ई गप बुझा कए कह, तखन हम सभ आगू बढ़ब। ब्राह्मण पहिने ई गछने छल, जे जखन ओ कहत ओकरा बुझा कए कहत। ओही स्थानपर बैसि कए ब्राह्मण खिस्सा कहए लागल। सुन ठाकुर हम आब खिस्सा कहैत छी। लोदीपुर एकटा नगर छल। ओहि नगरक राजा प्रताप सिंह रहए। हुनकर एकटा लड़का छल आ ओही गाममे एकटा ठाकुरक लड़का सेहो रहए। दुनूमे खूब दोसतियारी चलैत रहए। किछु दिनुका बाद दुनू दोस्त बिचार कएलक जे दुनू दोस्त घोड़ा कसा कए जंगल शिकार लेल जाए। तकर बाद दुनू दोस्त घोड़ापर सवार भए बिदा भेल आ घनघोर जंगल पहुँचि गेल। शिकार खेलाइत साँझ भए गेल आ दुनू दोस्त विचार कएलक जे आब हम सभ घर नहि जा सकब, से अही बोनमे राति काटि भोरमे घर चलि जाइ। ओतए एकटा बड्ड पैघ गाछ रहए, तकरे नीचाँमे ओ सभ रुकि गेल आ घोड़ाकेँ ओतए बान्हि दुनू दोस्त सूति गेल। सुतलाक बाद राति बारह बजे एक जोड़ा बीध-बीधीन ओहि गाछक ऊपर बैसि गेल। बीधीन मूड़ी उठा कए जे नीचाँ देखलक तँ ओहि दुनू दोस्तपर ओकर नजरि पड़लैक। बीधीन कहलक जे देखू कतेक सुन्दर अछि राजाक बेटा। बीध कहलक जतेक सुन्दर ई राजाक बेटा अछि, ततबे सुन्दर लालपरी कन्या अछि, दुनूक जोड़ी बड्ड सुन्दर होएत। बीधीन कहलक जे अहाँ तँ स्वयं विधाता छी। दुनूक जोड़ी लगेनाइ अहाँक काज छी। बिधाता ओहि दुनूकेँ ओतएसँ सुतलेमे उठा कए ओहि लालपरी कन्या लग पहुँचा देलक। राजा आ कन्या एक पलंगपर आ ठाकुर दोसर पलंगपर। भोर भेलापर निन्द टुटल, तँ लालपरी बगलमे राजाक लड़काकेँ देखलक, तँ खूब प्रसन्न भेल। ओकरा पलंगपर एकटा सिन्दूरक पुड़िआ राखल छल। परी कहलक जे ऊपरबला हमर आ अहाँक जोड़ी मिला देने अछि। आब देरी कोनो बातक नहि। राजाक लड़का आ लालपरी कन्या दुनूक ओतए बियाह भए गेल। किछु दिन धरि ओ ओतए रहल आ तकर बाद राजाक बेटा अपन ससुरारिसँ बिदा भेल । किछुए दूर आगाँ गेलाक बाद कन्याकेँ एकटा गप मोन पड़लैक। ओ अपन पतिसँ कहलक- हमर पिताकेँ चोला माने जीब बदल क मंत्र अबैत छन्हि। अहाँ हुनकासँ जा कए सीखि लिअ। ओतए दुनू डोली रोकि कए दुनू दोस्त ओकर पिताजी लग गेल आ जा कए कहलक जे हमरा सभकेँ चोला बदलबाक मंत्र सिखा दिअ। ओहि मंत्रकेँ दुनू दोस्त सीखि लेलक मुदा मंत्र सिखलाक बाद ठाकुरक बेटाक मोनमे खोट आबि गेलैक। तकर बाद एक डोलीपर राजाक बेटा आ परी आ दोसर डोलीपर ठाकुरक बेटा बिदा भेलाह। लालपरी पतिसँ पुछलक जे अहाँ चोला बदलबाक मंत्र सीखि लेलहुँ। तँ राजाक बेटा कहलक-हँ। तँ परी कहलक जे एकर परीक्षा करू। राजाक बेटा कहलक जे आगाँ चलू। चलैत-चलैत ओ सभ कनी आगाँ बढ़लाह। आगाँ एकटा सुग्गा मरल पड़ल रहए। ई सभ गप ठाकुर सुनैत जा रहल छल। जहिना राजाक बेटा सुगाक भीतर पैसल, ओही समय ठाकुर मंत्र पढ़ि राजाक पिंजरामे पैसि गेल। ई सभ परी देखलक। एक डोलीपर मात्र ठाकुरक लहाश पड़ल छै आ एक पर परी आ ओ ठाकुर राजा बनि जा रहल अछि आ राजाक जीव सुग्गा बनि उड़ि गेल। ठाकुरक लहाश फेकि ओ ठाकुर राजा बनि गेल आ ओकर पिंजड़ामे जा कए ओहि लालपरीकेँ दखल कए लेलक। लालपरी कन्या ई बुझि गेल, जे ई हमर पति नहि अछि। ठाकुर राजा अपन महलमे जा कए रहए लागल आ एहि विषयमे ककरो बुझल नहि रहैक। ठाकुर राजा कन्यासँ कहलक जे आब हम सभ सुखी निन्दक राति बिताएब। परी कहलक जे एखन नहि। एखन हमर एकटा कौल बाँकी अछि। ओ पूरा कए लेब तकर बाद। ठाकुर राजा कहलक जे की कौल अछि अहाँ पूर्ण कए लिअ। परी कहलक जे हमरा एकटा मन्दिर बनबा दिअ जबुनाक तटपर। हम बारह बरख सदाव्रत बाँटब। तकर बाद राजा सोचलक जे आब हमरा छोड़ि कए ककरो ई नहि होएत ताहि लेल हम एकटा उपाय करैत छी, कि एहि बोनमे जतेक सुगा अछि ओहि सभकेँ मारि दैत छी। ठाकुर राजा ई सोचि शिकारीकेँ मँगबेलक आ ओकरा कहलक जे एहि जंगलमे जतेक सुगा अछि, ओकरा पकड़ि कए आन हम तोरा एक सुगाक एक टाका देबहु। शिकारी सुग्गा बझबए लागल आ राजाकेँ देमए लागल। राजा सभ सुगाकेँ मारि कए फेंकि दैत छल। एक दिन शिकारी सुगा बझा कए ओही जबुनाक किनार धए आबि रहल छल, तँ परीक नजरि ओहि शिकारीपर पड़ल। ओकरा माथमे ओ गप मोन पड़लैक, तँ ओ शिकारीकेँ बजेलक आ पुछलक जे अहाँ ई सुग्गा ककरा दैत छी। ओ कहलक जे ई सभ सुग्गा हम अही राजाकेँ दैत छी। परी पुछलक जे राजा तखन एकर की करैत अछि। शिकारी कहलक जे ओ एकरा सभकेँ मारि कए फेकि दैत अछि। परीकेँ ई सुनि कए माथ दुखाए लगलैक। ओ शिकारीकेँ पुछलक जे राजा एक सुगाक कतेक कए पाइ दैत अछि। शिकारी कहलक जे एक सुगाक ओ पाँच टाका दैत अछि। परी कहलक जे आइसँ सभ सुगा हमरा देल कर, हम एक सुगाक दस टाका देल करब। ओहि दिनसँ सभ शिकारी परीकेँ सभ सुग्गा देमए लगलाह। परी सभ सुगासँ पूछथि जे अहाँ चोला बदलबाक मंत्र जनैत छी, एहि तरहेँ ओ बहुत रास सुगाकेँ पुछैत गेलीह आ छोड़ैत गेलीह। ओहिमे सँ एकटा सुग्गा बाजल- हँ, हम चोला बदलबाक मंत्र जनैत छी। ओहि सुगाकेँ परी अपना पिजरामे बन्न कए लेलन्हि आ एकटा छोट बकड़ीक बच्चा कीनि कए राखि लेलन्हि। कनेक दिनका बाद बारह बरखक समय पूर्ण भऽ गेल । ठाकुर राजा अपन डोली कहार पठेलक आ ओतएसँ परीकेँ अपन महलमे आपस अनलक। परी जतए रहैत छल, ओतए ओ बकरीक बच्चा राखि लेलक आ सुतबाक काल ओहि बकड़ीक बच्चाकेँ मारि देलक। खेनाइ धरि नहि खएलक आ कानए लागलि। राजाकेँ एहि गपक पता लागल जे रानी खेनाइ धरि नहि खएने छथि आ कानि रहल छथि। राजा आएल आ पुछलक जे अहाँ किएक कानि रहल छी। खेनाइ किएक नहि खएने छी। परी ठाकुर राजासँ कहलक- हम कोनाकेँ खाएब, ई जे बकरीक बच्चा मरि गेल, तँ हम आब जीवित नहि रहब। जाधरि ई बकरीक बच्चा नहि खाइत छल, ताधरि हम नहि खाइत छलहुँ। ई मरि गेल से आब हमहूँ मरि जाएब। ओम्हर सुगा देखि रहल छल, एम्हर ठाकुर राजा विचलित भऽ रहल छल। राजा सोचि कए कहलक जे अहाँ चुप रहू, बकरीक बच्चा जीवित भए जाएत। एतेक कहलापर परी चुप भए गेलि आ जहिना राजा अपन चोला बदलि ओहि बकड़ीमे पैसल तखने सुगा अपना राजाक पिंजरामे चलि गेल। सुगा जेहेने-तेहने पड़ल रहि गेल आ ठाकुर राजा ओही बकड़ीक पिंजरामे चलि गेल। सुनलहुँ, बकड़ीक बच्चा वएह ठाकुर राजा अछि आ जे क्यो अबैत अछि ओकारा दू लात मारैत अछि। तेसर ब्राह्मण आ ठाकुरक लड़का ओतएसँ चलल। चलैत-चलैत किछु दूर गेल तँ एकटा नगरमे पहुँचल। ओहि नगरक बीच चौबटियापर बड्ड भीड़ रहए। लोकक ई भीड़ देखि कए ठाकुरक लड़का दौगि कए गेल आ देखलक जे ओहि चौबटियापर एकटा अस्सी बरखक बुढ़ियाकेँ फाँसी देल जा रहल अछि। ठाकुरक लड़का सोचलक जे ओ बुढ़िया ककरो घरमे जा कए भूखमे कोनो अनाज वा भात रोटी खएने होएत, से ओकरा फाँसीक सजा भऽ रहल छै। ठाकुरक लड़का पुछलक- पंडितजी एहि गपकेँ हमरा कहि कए बुझा दिअ। पंडितजी कहलक जे चलू रस्तामे अहाँकेँ बुझा देब। बच्चा कहलक जे नहि, एतहिये हमरा कहि कए बुझा दिअ, नहि तँ अहाँक संग हम नहि जाएब। ब्राह्मण कहलक ठीक अछि। सुनू ठाकुरक बच्चा, बैसू, हम बुझबैत छी। -बिराटनगरक बिराट राजा छलए। हुनका एकटा मन्त्री छलन्हि। राजाक लड़का आ मन्त्रीक लड़काकमे दोस्तियारी चलि रहल छल। एक दिन दुनू दोस्त विचार कएलक आ जंगलमे शिकार खेलाइ लेल तैयार भेल आ घोड़ा कसेलक। बोनमे शिकार खेलाइत-खेलाइत साँझ भए गेल आ ओही बोनमे एकटा बड्ड पैघ गाछ छल। दुनू गोटे ओहि गाछपर चढ़ि कए सूति गेल। मंत्रीक बेटा सोचलक जे ई राजाक बेटा अछि। कहियो गाछपर नहि सूतल अछि, से ओ कतहु खसि नहि पड़ए, से सोचि ओकरा ओ गमछासँ बान्हि देलक आ ओ दोसर ठाढ़िपर चलि गेल। बारह राति बाजल तँ बोनमे एकटा बड़ पैघ साँप निकलल आ ओहि गाछक लग आबि अपन मणी निकालि कऽ राखि देलक आ ताहिसँ इजोत होमए लागल। सर्प चरए लागल। ओहि इजोतकेँ मन्त्रीक बेटा देखलक आ तकर बाद ओ आस्ते सँ गाछक जड़िमे अपन तलवार ठाढ़ कए देलक आ फेर ऊपर चढ़ि गेल। जाहि ठाम मणी जरि रहल छल ओकर सोझाँ ठाढ़िपर जा कए गमछा दोबर कए ओहि मणीपर खसा देलक। मणी झँपा गेल आ अन्हार भऽ गेल। साँप व्याकुल भए गेल आ ओ गाछक जड़िमे अपन पुच्छी पटकि-पटकि कए टुकड़ा-टुकड़ा भए गेल। भोर भेल तँ ओ अपन दोस्त राजाक बेटाकेँ जगेलक आ कहलक जे दोस अहाँ तँ सूति गेल रही। नीचाँ देखू की भेल अछि। नीचाँमे गमछा उघारि मणी लए ओ दुनू दोस बिदा भेल। ओहि बोनमे एकटा पैघ पोखरि रहए। दुनू दोस्त विचारलक जे अही पोखरिमे एकरा धोबि कए साफ कए ली। राजाक बेटा नीचाँ हाथ राखलक आ मन्त्रीक बेटा ऊपरमे हाथ राखि कए ओकरा साफ करए लागल। ओ मणी तखने दुनू दोसकेँ खेंचि लेलक आ ओतए लऽ गेल जतए नागवत्ती कन्या रहए। नागवत्ती कन्या ओकरा सभकेँ देखलक तँ कहलक जे अहाँ सभ हमर पिताकेँ मारि देलहुँ तँ हम कहिया धरि कुमारि रहब। कन्या कहलक जे अहाँ हमरासँ बियाह कए लिअ। मन्त्रीक बेटा राजाक बेटाक बियाह ओहि कन्यासँ करेबाक निर्णय कएलक तँ राजाक बेटा कहलक जे यावत ढोल बाजा पालकी नहि आनब, बियाह कोना होएत। मन्त्री-वजीरक बेटा ढोल-बाजा-पालकी अनबा लेल बिदा भेल। दोसर दिन १२ बजे दिनमे नागवती कन्याँ पोखरिमे नहा रहल छलीह, तखने ठगपुर नगरक राजाक लड़का शिकार खेलेबा लेल जंगलमे आएल रहए। गरमीक मास छल, ओकरा बड़ जोरसँ पियास लगलैक तँ ओ ओही पोखरिमे गेल। जखने ओ ओहि कन्याकेँ देखलक तँ मूर्च्छा खा कए खसि पड़ल आ कन्या पोखरिक भीतर चलि गेलि। जखन ओकरा होश अएलैक तँ ओहि कन्याकेँ ओ नहि देखलक। ओहि समयसँ राजाक बेटा अपन घर जा कए पागल भए गेल। ई समाचार ठगपुरक राजाकेँ पता चललैक तँ ओ बड्ड उपाय कएलक मुदा ओकर बिमारी नहि ठीक भेलैक। राजाकेँ बड्ड चिन्ता भऽ गेलैक। राजा अपन राज्यमे ढोलहो पिटबा देलक जे, जे क्यो हमर बेटाकेँ ठीक कए देत ओकरा राज्यक एक हीस दऽ देल जाएत आ डाला भरि सोनाक संग अपन बेटीक संग ओकर बियाह सेहो ओ करा देत। ई सुनि मारते रास लोक आएल मुदा ओ ठीक नहि भेलि। ओही गाममे एकटा बुढ़िया रहैत छलि, महागरीब। ओ करीब-करीब अस्सी बरिखक रहए। ओहि बुढ़ियाक एकटा बताह बेटा रहए। ओ बुढ़िया ओहि राजाक बेटाकेँ ठीक करबा लेल तैयार भेलि। राजा ओकरा आदेश देलक जे जो, आ हमर बेटाकेँ ठीक कर गऽ। तखन तोरे इनाम सेहो भेटतौक आ अपन बेटीक संग हम तोहर बेटाक बियाह सेहो करबा देबौक। बुढ़िया गेल आ राजाक लड़काकेँ एकटा कोठामे बन्न कए देलक आ अपने सेहो ओहि कोठामे चलि गेल। बुढ़िया राजाक बेटासँ पुछलक, मुदा ओ कोनो उत्तर नहि देलक। तखन बुढ़िया ओकर दुनू गालमे दू चमेटा मारलक आ तकर बाद ओ बाजल, जे हम जंगलमे शिकार खेलाइ लेल गेल छलहुँ। ओतए एकटा पोखरिमे पानि पीबा लेल गेलहुँ, तँ एकटा बड्ड सुन्दरि स्त्रीकेँ देखलहुँ आ हम बेहोश भए गेलहुँ। होश अएलापर देखलहुँ जे ओ लड़की बिला गेलि। तखनेसँ हमर मोन बताह भऽ गेल, जे कहिया ओ लड़की हमरा भेटि जाए। ओ बुढ़िया कहलक जे ओहि लड़कीकेँ हम आनब। एखनसँ तूँ ठीक रह, ओकरा आनब हमर काज छी। बुढ़ियाक कहलापर ओ चुप भऽ गेल आ बुढ़िया राजाकेँ कहलक जे हमर संग पाँच टा सखी-सहेली चाही आ ओहि बिमारीकेँ हम ठीक करब। राजा पाँच टा सखी देलक आ बुढ़िया ओकरा सभकेँ लऽ कए बिदा भेल। ओ बोन दिस गेल, जतए ओ पोखरि रहए आ ओकर चारू दिसन ओ सभ नुका गेल। जखन दिनक बारह बाजल तँ ओ लड़की पोखरिसँ निकलल आ ओहि पोखरिक महारपर बैसि कए नहाय लागल। बुढ़िया जंगलसँ बहार भेल आ कन्याक बगलमे नहाए लागल। बुढ़ियाकेँ देखि कए कन्या सोचलक जे ओ अस्सी बरखक बुढ़िया अछि, ओकर सेवा केनाइ जरूरी अछि। ओ ओहि बुढ़िया लग जा कए ओकर सौँसे देहकेँ साफ करए लागल। कहलक माँ आब फेर नहा लिअ। बुढ़िया कहलक लाऊ बेटी, अहूँक सौँसे देह साफ कऽ दैत छी। बुढ़िया कन्याक देह साफ करए लागल। साफ करैत बुढ़िया चुटकी बजेलक तँ ओकर सखी सभ चारू दिसनसँ ओकरा पकड़ि लेलक आ आपस ठगपुर गाम दिस बिदा भेल, जतए राजाक घर छल। ठग राजा इनाम देबा लेल तैयार भेल आ अपन लड़कीक बियाह ओकर बताह लड़का संग करएबा लेल तैयार भेल। राजा अपना गाममे जतेक बाजा आ पालकी रहए, अपना ओहिठाम अनबा लेल कहलक। ओहि गाम आ नगरक सभटा बाजा आ पालकी, सभटा राजा लग चल गेल। आब मन्त्रीक बेटा गाम-गाममे पुछैत अछि तँ सभ कहलक जे सभटा बाजा आ पालकी राजा ओहिठाम चलि गेल। ओतएसँ अएलाक बादे बाजा भेटत। ई सुनि मन्त्रीक बेटा कहलक जे ठीक अछि हम कनेक दिन रुकि जाइत छी। ओतए एम्हर बुढ़ियाक बताह बेटाक बियाहक दिन पड़ि गेलैक। मन्त्रीक बेटा ओहि गामक बच्चासँ पुछलक जे ई बरियाती कतए जाएत। बच्चा बाजल जे बरियाती कतहु नहि जाएत। हमर गामक एकटा बुढ़िया एहि बोनक पोखरिसँ एकटा कन्याकेँ पकड़ि कऽ अनने अछि। मन्त्रीक बेटाकेँ चिन्ता पैसि गेलैक जे ई वएह लड़की तँ नहि अछि। मन्त्रीक बेटा अपन सभटा पोशाक खोलिकऽ राखि देलक आ एकटा भिखमंगाक रूप धऽ कए राजाक आँगनमे गेल आ ओहि लड़कीकेँ देखलक आ इशारा कऽ देलक जे साँझ धरि हम आएब। ओहि ठामसँ बजीरक बेटा निकलि कऽ बाहर आएल आ ओहि बुढ़िया आ ओकर बताह बेटाक पता लगओलक। तँ देखलक जे ओ बताह बच्चा सभक संग गाए-महीस चरेबाक लेल बोन गेल अछि। मन्त्रीक बेटा सेहो बोन चलि गेल आ जतए पागल रहए, ओकरे संग खेलाए लागल। बच्चा सभकेँ जखन भूख लगलैक तँ मन्त्री-पुत्र आ ओहि बताह बच्चाकेँ छोड़ि कए चलि गेल। मन्त्रीक बेटा ओहि बताह बच्चाकेँ बोनमे भीतर लए जाए छोड़ि देलक आ ओकर सभटा कपड़ा लए लेलक। कनेक झलफल भेल महिसबार सभ गाए-महीस लए घुरए लागल, तँ मन्त्रीक बेटा सेहो बताह जेकाँ करैत घुरि आएल आ घरमे जा कए ओही लड़कीक चारू दिस घुरिआए लागल, जकरा संग ओकर बियाह होमए बला छलैक। ओहिना ओ ओहि घरमे सेहो चलि गेल जतए ओ नागवती कन्या रहए आ ओतए जा कए कहलक कि अहाँ एहि कपड़ाकेँ बदलि लिअ आ पोटरी बान्हि कए बगलमे दबा लिअ आ राजाक लड़कीबला कपड़ा पहिरि लिअ। आगाँ निकलू आ पाछाँ हम जाइत छी। कन्या आगाँ निकललि, पाछाँ मन्त्रीक बेटा बताह जेकाँ करैत, दुनू बाहर निकलि गेल। दुनू ओतएसँ बिदा भेल आ जतए पोखरि छल ओतए पहुँचि गेल। सुनलहुँ ठाकुरक बेटा। अही गपपर अस्सी बरखक बुढ़ियाकेँ फाँसी देल जा रहल अछि, राजा कहलक जे ई बुढ़िया हमर राज्यक हिस्सा लेबाक लेल ई षडयन्त्र रचने रहए आ तेँ ओकरा फाँसी दए रहल अछि। चारिम आब राजाका बेटा आ कन्या संग किछु समए बिता कए बजीरक बेटा फेर घुरि आएल पालकी आ बाजा लेल। ओहि दिन पालकी आ बाजा दुनू भेटि गेल आ बजीर ओकरा लए चलि आएल। बहुत नीक जेकाँ दुनुक बियाह भेल आ बरियातीक संग अपन घरक लेल बिदा भेल। चलैत-चलैत किछु दूर गेल तँ साँझ भए गेल। एकटा बड्ड पैघ गाछक लग ओ ठाढ़ भए गेल। सभकेँ खेनाइ खुआ कए सभ कियो सूति गेल। रस्ताक थकान रहए सभ कियो निन्नमे सूति गेल। रातिक बारह बाजल तँ बिध-बिधाता आएल आ ओहि गाछपर बैसि गेल। बिध बाजल- बड्ड नीक जोड़ी लागल अछि तँ बिधाता कहलक जे जोड़ी तँ ठीके बड्ड नीक अछि मुदा राजाक बेटा मरि जाएत। बीध पुछलक –किएक। तँ बिधाता बाजल हम तँ कहब मुदा एहि बरियातीमे सँ कियो सुनैत होएत, तँ ई बाँचि जाएत। ओहि समय नागवत्ती कन्या आ बजीर सुनि रहल छल। सभटा मिला कए पचीस टा संकट पड़त आ सभटा संकट ओ बतेलक। भोर भेल तँ नागवत्ती कन्या आ बजीर कहलक जे ई बरियाती सभकेँ एतएसँ आपस पठा दिअ आ हम तीनू गोटे एतएसँ चली। ओतएसँ तीनू गोटे बिदा भेल आ चलैत चलैत किछु दूर गेल तँ रस्ताक कातमे दू टा गाछ छल। मन्त्रीक बेटा आ कन्या कहलक जे हम तीनू गोटे हाथ पकड़ि कए चली। राजाक बेटाकेँ बीचमे लए दुनू गोटे दुनू दिससँ हाथ पकड़लक आ लग गेल आ कहलक जे हम तीनू गोटे एतएसँ दौगि कए चली। ई कहि कए ओ सभ दौगनाइ शुरू कएलक आ जहिना दौगि कए आगाँ गेल तँ दुनू दिसका गाछ खसि पड़ल। पाछाँ घुरि कए ओ सभ देखलक आ बाजल जे हम सभ दौगि कए जे आगाँ नहि अबितहुँ तँ ई हमरा सभक ऊपर खसि पड़ितए। ई कहि ओ सभ आगाँ बिदा भेल। ओतएसँ चलैत-चलैत किछु दूर आगाँ ओ सभ गेल तँ रस्तामे एकटा धार भेटि गेल तँ ओतहु ओहिना राजाक बेटाकेँ बीचमे लए दुनू दिससँ ओकर हाथ पकड़ि लेलक आ धारमे चलए लागल। बहुत तेजीसँ ओ सभ आगाँ बढ़ल आ जहिना ऊपर गेल तँ बीच पानिसँ निकलि गेल आ घुरि कए देखलक तँ बोचपर नजरि पड़लैक। ओ सभ बाजल जे हम सभ तेजीसँ नहि निकलितहुँ तँ बोच हमरा सभकेँ पकड़ि लैतए, आ तकर बाद ओ सभ ओतएसँ बिदा भेल। अपन कलम-गाछी होइत घर पहुँचैत गेल। मारते रास लोक ओतए जमा भए गेल आ राजाक बेटाकेँ देखए लागल आ कहए लागल जे बड्ड नीक जोड़ी मिलल अछि। ओ सभ महलक भीतर जेबाक पहिने अगुलका छत तोड़बा देलक। राजाक बेटाकेँ बजीरक बेटा आ कन्यापर ओहिहाम शक भेलैक। राजा आ कन्या महल गेल। आब राजा पुछलक जे हमर दोस बजीरकेँ बजाऊ। पूछए लागल जे दोस अहाँ दुनू गोटे रस्तासँ घर धरि एतेक रास बात केलहुँ, से हमरा बुझल नहि भेल, से अहाँ ओ सभ गप हमरा कहू। बजीरक बेटा बाजल जे दोस ई सभ कोनो गप नहि अछि। ई सभ हम सभ हँसी कए रहल छलहुँ, जे देखी जे हमर सभ राजा दौगि सकैत छथि आकि नहि , आ चलि सकए छथि आकि नहि। ताहि द्वारे हम सभ हँसी कए रहल छलहुँ। एहि गपपर राजाकेँ बिस्बास नहि भेलैक आ ओ कहलक जे जे यदि ई गप अहाँ नहि कहब तँ अहाँकेँ फाँसीपर लटकबा देब। एहि गपकेँ कन्या सेहो सुनि रहल छलीह। हारि कए बजीरक बेटा कहलक जे जतएसँ बरियाती आपस भेल छल। बिधाता जे कहने छल ओ सभ गप कहलक आ रस्तामे जे बितल सेहो कहलक। ई सभ कहिते बजीरक बेटाक अदहा अंग पाथरक भए गेलैक। आ जखन सभ गप पूर्ण भेल तँ बजीरक बेटा ओही कोचक बगलमे पहाड़ बनि गेल। किछु दिनुका बाद राजाकेँ एकटा बेटा रातिमे जन्म लेलक। कहल गपकेँ ओही समय ओ पूर्ण करए लागल आ ओही पहाड़पर ओहि बालककेँ राखि पघरियासँ दू टुकड़ी कए देलक। ओकर टुकड़ा होइतहि बजीरक बेटा फेरसँ तैयार भऽ गेल आ कहलक जे हमरा आब ओ लड़का दिअ। बजीरक बेटा ओहि बालककेँ लए अपन सासुर गेल। ओ बारह बजे रातिमे पहुँचल। कोनो तरहेँ अपन स्त्रीक लग पहुँचल आ सभ गप कहि बालककेँ आमक गाछक ठाढ़िपर लटका देलक। रातिमे अपन स्त्रीकेँ कलममे अनलक आ बालककेँ ठाढ़िपरसँ उतारि कए नीचाँ कएलक आ कहलक जे ई चक्कू लिअ आ अपन हाथक कँगुरिआ आँगुर काटि कए एहि बच्चापर छीटि दिअ। जखने ओ छीटलक तखने ओ बच्चा कानए लागल आ तखने ओ ओकरा लए जा कए राजाकेँ देलक। बजीरक बेटा कहलक जे आब आइ दिनसँ अहाँक संग हमर दोसतियारी समाप्त भेल। ई कहि बजीरक बेटा अपन घर घुरए लागल, तँ ओही समय राजाकेँ ज्ञान प्राप्त भेल आ जा कए अपन दोस्तकेँ गरा लागि ओ क्षमा मँगलक आ कहलक जे आइसँ एहन गलती हमरासँ कहियो नहि होएत आ ई दोस्ती बनल रहत। राजा अनसारी राजा अनसारी महान राजा छलाह। हुनकर राज्य १४ कोशमे पसरल रहए। ओ राजा अपन मनोकामनाक अनुसार राज्य करैत छलाह। जे हुनकर हृदयमे अबैत छलन्हि वैह करैत छलाह। हुनका तीन टा बेटा छलन्हि। एक दिनुका गप अछि। राजाकेँ कोनो वस्तुक कमी नहि छलन्हि। घर मकान, बंगला आ बाग-बगीचासँ भरल-पूरल छलन्हि। एक दिन राजा रातिमे सूतल छलाह कि अचानके ओ सपना देखलन्हि जे हमर घरमे हीरा-मोती झरि-झरि कए खसैत अछि आ मोजर चुनि-चुनि कए सभ खाइत अछि। भोर भेल तँ राजा अपन लड़काकेँ कहलक जे देखू हम रातिमे ई सपना देखलहुँ। लड़का उत्तर देलक जे पिताजी अहाँ एहि गपक चिन्ता नहि करू, हम ओकरा पूरा कए देब। तीनू भाए विचार कए भोरे घोड़ा कसेलक आ बिदा भेल। चलैत-चलैत एकटा भयंकर बोनमे ओ सभ पहुँचल। तीनू भाए ओहि बोनमे रस्ता बिसरि गेल आ तीन रस्तापर बिदा भऽ गेल। दू भाइ भटकैत रहल आ एहिना किछु दिन बीति गेल। छोट भाए बोनक रस्तामे भूख-पिआससँ थाकि गेल आ घोड़ाकेँ छोड़ि देलक आ पएरे चलए लागल। कनेक कालक बाद ओकरा रस्तामे एकटा इन्सान भेटल। ओकरासँ ओ पुछलक, हमर सोनारूपी गाछक ठाढ़िसँ मोती झरैत अछि आ मोजर चुनि कए खाइत अछि। हमरा ओतहि जएबाक अछि। ओ इनसान कहलक जे एहि रस्तासँ चलि जाऊ। आगाँ एकटा इनार अछि। ओही इनारक बाटे एकटा रस्ता अछि। छोटका भाए ओकरे कहल अनुसार चलैत रहल आ जखन ओहि इनारक लग गेल तँ देखलक जे रस्ता ओही बाटे रहए। ओ इनारमे जा कए खसि पड़ल। चलैत-चलैत ओ भैरवानन्द जोगी लग पहुँचल। ओ जोगी कहलक जे रे बच्चा तूँ एतए कतएसँ अएलँह, एतए तँ कोनो मनुख आइ धरि नहि पहुँचि सकल रहए। ओतए ओ बच्चा ओहि जोगीक सेवा करए लागल। सेवा करैत किछु दिन बीति गेल तँ जोगी ओहि बच्चापर बड्ड प्रसन्न भऽ गेल, बाजल-बच्चा माँग की मँगैत छँह। हम तोरा अवश्य देबौक। बच्चा बाजल-जोगी बाबा, हमरा सोनाक गाछ आ रूपाक ठाढ़ि जाहिमेसँ मोती झरैत अछि आ मोजर चुनि कए खाइत अछि, से चाही। ओ योगी ई गप सुनि कए बड्ड आश्चर्य व्यक्त कएलक। तूँ ई चीज कोना पता लगेलह । ठीक अछि। हम जखन वरदान दए चुकल छी, तँ अवश्य देब। तोरा कष्ट उठाबए पड़तह। भोर भेल तँ बच्चाकेँ एकटा जंत्र देलक आ कहलक जे जाऊ आ सात समुद्र पार ओतए एकटा अमर फलक गाछ अछि, ओहिमेसँ एकटा फल तोड़ि कए लए आनू। ओ बच्चा ओतएसँ बिदा भेल। सुग्गाक रूप धारण कएलक, उड़ैत-उड़ैत सात समुद्र पार गेल, जतए अमरफलक गाछ रहए। ओ फल तोड़ि ओतएसँ बिदा भेल जखन ओकरा पाछाँ तीन टा परी लागि गेल आ ओ सभ तखन अबाज देलक जे घुरि कए देख। एना कहैत, पाछाँ करैत, चलि आबि रहल छल ओ सभ। समुद्र टपलाक बाद सुग्गा घुरि कए देखलक आ ओतहि मरि गेल। जोगी ई सभ ध्यानमे देखि रहल छल। सुग्गा घुरि कए देखलक आ मरि गेल ! जोगी बिदा भेल अपन चुट्टा लए। चुट्टासँ मारि कए सुग्गाकेँ जिएलक आ कहलक जे आब जो। तूँ फल लए जे आब चलमे, तँ घुरि कए नहि देखिहँ। एना बुझा कए ओकरा जोगी पठेलक आ ओ चलि गेल। फल तोड़ि एहि बेर ओ उड़ैत रहि गेल, घुरि कए नहि देखलक आ जोगी लग पहुँचि गेल। जोगी लग ओ पहुँचि गेल आ ओ फल जोगीक हाथमे देलक। ओ अमर फलसँ किछु बच्चाकेँ खोआ देलक आ कहलक जे आब जाऊ अहाँ अमर भए गेलहुँ। फेर ओ कहलक जे ओही सात समुद्र पार एकटा कलम-गाछी अछि। ओही गाछीमे तीन बहिन रहैत छथि। ओकरे लग तोहर बात पूर्ण होएतौक। बच्चा बिदा भेल, फेर सात समुद्र पार गेल आ ओही गाछीमे पैघ बहिन लग जा कए कहलक तँ ओ ओकरा माँझिल लग पठा देलक। ओकरा लग गेल तँ ओ ओकरा छोटकी लग पठा देलक। जखन ओ छोटकी बहिन लग गेल तँ ओ हाथमे चक्कू लेने बड़की आ माँझिल बहिन लग आएल। तखन तीनू बहिन ओहि लड़कासँ पुछलक जे तोँ कतएसँ आएल छह। लड़का जवाब देलक जे जोगी बाबा हमरा पठेने छथि। अहाँ सभ हमरा संगे जोगीबाबा लग चलू। ओ चारू गोटे ओतएसँ जोगीबाबा लग अएलाह। जोगीबाबा कहलक-बेटी, आब अहाँ तीनू गोटेकेँ एकरा संग जेबाक अछि। ओ तीनू परी चलबा लेल तैयार भऽ गेलीह। जोगी बाबासँ बच्चा कहलक- हमरा गाछ नहि देखाइ पड़ल। ओहि समय जोगी बाबा आदेश देलक आ खेला देखेलक। तीनू परी एक लाइनमे ठाढ़ भए गेलीह आ लड़काक हाथमे चक्कू देलक आ कहलक जे एक्के संग तीनू परीक गरदनिमे चक्कू मारू आ अपन गरदनिमे सेहो मारू। एना कएलासँ सोनाक गाछ आ रूपाक ठाढ़िपरसँ मोती झरए लागल आ मोजर चुनि कए खाए लागल। बच्चाकेँ आब बिसबास भेलैक आ तखन किछु दिनुका बाद ओ चारू गोटे ओतएसँ बिदा भेल आ घर पहुँचल। ओ अब्बूकेँ कहलक पिताजी हम सोना-रूपाक गाछ अनने छी। राजा अनसारी कहलक- बेवकूफ! तूँ तीनटा औरत अनने छँह आ कहैत छँह जे गाछ अनने छी। बच्चा कहलक जे सौँसे नगरक लोककेँ बजाऊ आ तखन हम देखबैत छी। राजा सभकेँ बजेलक एकत्र कएलक। बच्चा तीनू परीक गरदनिमे चक्कू मारलक आ अपन गरदनिमे सेहो। सोनाक गाछ आ रूपाक ठाढ़ि सँ मोती झरए लागल आ मोजर चुनि कए खाए लागल। राजाक सपना पूरा भेल। राजा ढोलन गढ़ नारियलक राजा दक्ष रहए। ओ राजा बड्ड प्रतापी छल। मुदा ओकरा राज्यमे कोनो हाट-बजार नहि रहए। राजा सोचलक जे हमर राज्यमे हाट कोना लगत? से राजा अपन राज्यमे ढोलहो पिटबा देलक जे हमरा राज्यमे हाट लागत आ जकर जे समान नहि बिकाओत से हम कीनि लेब। सम्पूर्ण राज्यक लोक आबए लागल आ हाट लगबए लागल। एहि प्रकारेँ सभ दिन हाटमे जे समान बचि जाइत छल, तकरा राजा कीनि लैत छल। एहिना कतेक दिन बीति गेल। एक बेर एकटा सूतबला सूत बेचए लेल ओतए आएल मुदा तावत हाट उठि गेल रहए आ ओकर सूता नहि बिकाएल। राजा ओकर सूत सेहो कीनि लेलक। मुदा जहियासँ राजा सूता किनलक तहियेसँ ओकर अबस्था घटए लागल। किछु दिनुका बाद राजाक हालति गरीब जेकाँ भऽ गेल। राजा अपन स्त्रीसँ कहलक-अम्बिका सुनू। अपन राज्यमे गरीबी पसरि गेल अछि। आब अपन राज्य रहबा योग्य नहि रहल। ओतए सँ राजा बिदा भेल आ जाइत-जाइत कोनो देशमे पहुँचल। ओहि देशक नाम गढ़पिंगल रहए। ओतुक्का राजाक नाम सेहो देशक नामपर छल। गढ़पिंगल राजाक ओही नगरमे गढ़नारियल राजा घुमैत-घुमैत पहुँचि गेल आ कहए लागल जे हे भाइ हमरा कियो नोकरी राखत ? राजा कहलक-हँ। हमरा एकटा नोकरक जरूरी अछि। एकरा राखि लिअ। गढ़पिंगल राजाकेँ एक सए नोकर रहए आ ओकरा एकटा आर नोकरक आवश्यकता रहए कारण ओकरा लग १०१ टा घोड़ा रहए। ओ राजाक एहिठाम रहि गेल आ सभ दिन घोड़ाक घास लेल जाए लागल आ घास छीलि कए आनए लागल। गढ़नारियलक राजा दक्षक स्त्री गर्भवती रहए आ गढ़पिंगलक राजाक स्त्री सेहो गर्भवती रहए। आ संयोग एहन रहल जे दुनू राजाक स्त्री एक्के दिन जन्म दैत अछि। पिंगलक राजा ब्राह्मण बजा कए ज्योतिष देखेलक आ राजा अपन पुत्रीक नाम राखलक आ कहलक जे एकर नाम मडुवन किएक अछि। ब्राह्मण कहलक जे एकर बियाह छठी रातिकेँ होएत। राजा ओही दिनसँ अपन राज्यमे ताकैत-ताकैत थाकि गेलथि मुदा हुनका ओ नहि भेटल। राजाक खबासिनी कहलक जे अहाँ सभ चिन्ता किएक करैत छी। राजा साहब पछिला बेर जे नोकर रखने छथि हुनका एहिठाम एकटा लड़का जन्म लेने अछि। ओकरे संग बियाह करा देल जाए। ओहि बच्चाक नाम राशिक अनुसार राजा ढोलन राखल गेल छल। गढ़पिंगलक राजा सोचलक जे ई बड्ड नीक गप अछि, जखन ई लगेमे अछि तँ ओकरे संग बियाह करा देल जाए। दिन तँ ताकले रहए से ओही छठिक रातिमे बियाह भए गेल। किछु दिनुका बाद राजा दक्ष कहलक जे आब एतए रहबाक योग्य नहि अछि। आब अपन देश जएबाक चाही। राजा जाहि साढ़ीनपर चढ़ि कए आएल रहथि ओहि साढ़ीनकेँ कहलन्हि जे साढ़िन आब अपन देश चलू। आब साढ़ीपर चढ़ि कए राजा-रानी बिदा भेलाह। किछु दूर रस्तामे गेलाह तँ एकटा बोन भेटलन्हि। ओहि बोनमे रस्ताक कातमे एकटा पोखरि रहए। ओही पोखरिक महारपर दू टा बाघ-बाघिन रहैत छल। राजा सोचलक जे हमर सभक बच्चा जखन एहि रस्तासँ अपन सासुर जएताह, तखन ई बाघ हमर बच्चा सभकेँ खा जाएत। ताहि द्वारे एकरा मारि देनाइ ठीक होएत। राजा बाघकेँ मारि देलक आ आगाँ चलल तँ बाघिन कहलक जे राजा तूँ हमरा जेना राँड़ कए जा रहल छह, ओहिना तोहर बेटा जखन अपन सासुर जेतह तँ गढ़पीपली राजमे ओकर कनियाँकेँ हमहू राँड़ कए देबैक। बाघिनक ई अबाज मात्र राजा सुनलक। राजा अपन घर पहुँचि कए ई गप ककरो नहि कहलक। ओ अपन साढ़िनकेँ एकटा पैघ खधाइ खूनि कए ओहिमे धऽ देलक कारण बाहर रहलासँ ओ ई गप ओकर बच्चाकेँ सुना दैत। ओही समय छोट बालककेँ अपन फुलवाड़ीक रेखा-पेखा मालिनक संग दए देलक। ओकर दुनू बहिन ओकरा बड्ड नीक जेकाँ सेवा करए लगलीह। एहिना करैत किछु दिन बीति गेल तँ ई बच्चा समर्थ भऽ गेल आ तखनो ओकरा किछु बूझल नहि भेलैक। ओम्हर ओ मड़ुअन कन्याँ सेहो पैघ भऽ गेलि। कन्या युवा भऽ गेलि तँ ओहि सखी सभक घुमैत फिरैत हुनका कोनो संगी कहलक जे हे बहिन। आब अहाँ समर्थ भऽ गेलहुँ। अहाँक पिताजी अहाँक बियाहक विषयमे किछु नहि सोचि रहल छथि। ई बात सुनि कए कन्याँ बड़ चिन्तामे पड़ि गेलीह। अपन महलमे जा कए ओ पलंगपर पड़ि रहलीह आ खेनाइ त्यागि देलन्हि। एहिपर ओकर माए कन्या लग जाए कहलक, बेटी अहाँ खेनाइ किएक नहि खाइत छी ? कन्याँ बाजलि-माए। सखी सभ बड्ड किचकिचबैत अछि। ताहि द्वारे हमरा भूख नहि लगैत अछि। माए कहलक- अहाँकेँ की कहि किचकिचबैत छथि? कन्याँ बाजल-ओ सभ हमरा कहैत छथि जे अहाँक पिताजीकेँ कोन चीजक कमी अछि, जे अहाँक पिताजी अहाँक बियाह नहि करा रहल छथि? माए कहलक- – बेटी अहाँक बियाह छठीक रातिमे भए गेल अछि। अहाँक सासुर गढ़नारियलमे अछि। नहि जानि ओ किएक नहि अबैत छथि? ई सुनि कन्याँ कहलक जे हमरा जबुनाक कातमे एकटा मकान बना दिअ आ सभ वस्तुक व्यवस्था कए दिअ। हम बारह बरिख धरि सदाव्रत बाँटब। एतेक सुनि राजा ओहिना कएलक। मड़ुवन कन्याँ जबुनाक कातमे सदाव्रत बँटनाइ शुरू कए देलक। बनिजारा सभ वाणिज्य करबाक लेल गढ़नारियलसँ गढ़-पिन्गल जा रहल छलाह। बनिजारा सभ जखन गढ़-पिन्गल पहुँचलाह तँ जबुना धारक कातसँ होइत आगाँ बढ़ि रहल छलाह। जाइत-जाइत ओ सभ ओहिठाम पहुँचलाह जतए मड़ुवन कन्या सदाव्रत बाँटि रहल छलीह। ओ कन्याँ पुछलक-अहाँ सभ कतए जा रहल छी आ कतएसँ आएल छी। बनिजारा बाजल-हम सभ गढ़नारियलसँ आएल छी आ गढ़पिन्गलमे हीरा-मोतीक वाणिज्य करैत छी। कन्याँ बाजल-अहाँ वाणिज्य कए घुरब तँ हमर एकटा पत्र लए जाएब? बनिजारा बाजल-अहाँ पत्र लिखि कए राखब, हम जरूर लए जाएब। बनिजारा जखन घुरल तँ ओ पत्र लए चलि गेल आ जखन गढ़ नारियल पहुँचल तँ हरेबा-परेबा जे दुनू बहिन छलि-आ बड्ड पैघ जादूगरनी छलि- ओ जादूक जोरसँ पता लगा कए राजाकेँ खबरि कएलक आ बनिजारासँ ओ पत्र लऽ कऽ ओकरा आगिमे जरा देलक आ ओहि राजाक बेटाकेँ एकर पता नहि चलए देलक। कन्याँक ई पत्र मारल गेल। ओ बेचारी बाट तकैत रहल। किछु दिन बीतल। ओ कन्याँ एकटा सुग्गा पोसने छलीह। ओ सुग्गासँ पुछलक-की तूँ हमर पत्र लए जा सकैत छह। सुग्गा बाजल-हँ। हम पत्र राजाकेँ दए देब। कन्याँ पत्र लिखि कए सुग्गाक गरदनिमे लटका देलक आ कहलक- जाऊ। सुग्गा ओतएसँ बिदा भेल। सुग्गा आकासमे उड़ि बिदा भेल आ पहुँचल गढ़नारियल राज्य जतए हरेबा-परेबा आ राजा ढोलन रहथि। सुग्गा उड़ि कए ओकर कान्हपर बैसि गेल, ठोंठसँ सूता काटि कए खसेलक। ओहि समय हरेबा-परेबा राजा ढोलनक फुलवारीमे बैसल रहए। ठंढ़ीक मौसम छल। आगि पजारि कए बैसल छल। जखने ओ पत्र खसेलक तखने मालिन ओहि पत्रकेँ आगिमे धऽ देलक। राजा ढोलनकेँ बड्ड तामस उठलैक। दुनूकेँ दू-दू चमेटा मारलक आ कहलक जे तूँ दुनू गोटे एतएसँ चलि जो। दुनू बहिन पकड़ि कए ओकरा मनाबए लागल। कन्याँक ओहो पत्र खतम भए गेल। कन्याँ बहुत चिन्तामे पड़ि गेल। बहुत समय आर बीति गेल। एक दिन जबुनाक किनारसँ एकटा महात्मा जोगी रूपमे जा रहल छल। कन्याँक नजरि ओहि महात्मापर पड़ि गेल। कन्याँ बड्ड चिन्तित भए कानि रहल छलीह। ओ साधु महात्मा कन्याँक कननाइ सुनि अएलीह आ कारण पुछलक। कन्याँ सभटा हाल बतेलक । महात्मा कहलक जे तूँ एकटा पत्र लिखि कए हमरा दे आ हम ओ पत्र ओतए पहुँचाएब। कन्याँ पत्र लिखि कए महात्माकेँ देलक। महात्मा ओतएसँ बिदा भेल। कन्याँ महात्माकेँ गाँजा,भाँग आ हफीम देलक। महात्मा ओकरा खाइत-पिबैत ओतएसँ बिदा भेल। किछु दिनुका बाद महात्मा गढ़नारियल पहुँचल, जतए हरेबा-परेबा आ राजा ढोलन रहए। ओ फुलबारीक बीचमे अपन डेरा खसेलक। रातुक मौसम छल। भोर होइ बला छल। ओही समय महात्मा एकटा मोहिनी बाँसुरी निकाललक आ बजबए लागल। ओहि बाँसुरीक अबाज सुनि राजा ढोलन उठल आ चलबा लए तैयार भेल तँ दुनू बहिन ओहि बाँसुरीपर बहुत रास जादू-गुण चलेलक। मुदा महात्माक किछु नहि बिगड़ल। राजा ढोलन उठल आ दुनूकेँ दू-दू लात मारि महात्मा लग गेल। साधुजी ओहि पत्रकेँ निकालि कऽ राजा ढोलनकेँ देलन्हि। आर से पढ़ि राजा ढोलन तामसे विख-सबिख भए गेल आ ओतएसँ घर गेल आ एकटा तलबार लए पितासँ पूछए लागल जे बताऊ जे ई हमर बियाह कतए भेल अछि ? पिताकेँ ओ बाघिन मोन पड़ि गेलैक से ओ झूठ बाजल आ कहलक जे हम तोहर बियाह नहि करबेने छियहु। तामसे भेर भए ओ ओहि पत्रकेँ राजाक सोझाँ राखलक। राजा ओ पढ़ि बड्ड चिन्तामे पड़ि गेल। ओ अपन बेटाकेँ कहलक। देखू बेटा। अहाँक बियाह हम छठीक राति कएने छी आ गौना एहि द्वारे नहि कएलहुँ कारण अबैत काल हम एकटा बाघकेँ मारि देलहुँ। फेर ओ सभटा खिस्सा कहि सुनेलक आ कहलक, जे ओ डरे ओकर गौना नहि करेलक। ढोलन बाजल-हमर सवारी कतए अछि। हमर सवारी दिअ। राजा कहलक-साढ़नी तँ तरहाराक नीचाँ अछि। ओ जीवित अछि वा मरि गेल से नहि जानि। राजा ढोलन तरहराक नीचाँ सँ साढ़िनकेँ बहार कएलक तँ साढ़िनक देहमे पिल्लू लागि गेल छल। ओ ओकरा साफ कएलक आ ओकरा चना-चबेना खुअएलक। खुआबैत-खुआबैत ओ पहिने जेकाँ तन्दरुस्त भए गेल। राजा ढोलन बाजल-साढ़िन, तोहर पैर बहुत दिनसँ बान्हल छह। तूँ चौदह कोसक रस्ताकेँ एक दिनमे चारि चौखड़ लगा दिअ तँ हम बुझब। हम सभ फेरसँ गढ़पिंगल पहुँचब। साढ़िन अपन चालि एक दिनमे बना लेलक। राजा ढोलन अपन सासुर बिदा भेल। साढ़िनपर स्वार भए अपन कान्हपर बन्दूक लेलक आ बिदा भेल। चलैत-चलैत ओ ओही बोनमे पहुँचल। ओही रस्तासँ ओ सभ जा रहल छल, जतए ओ बाघिन रहैत छलीह। बाघिनकेँ राजा ढोलन देखलक आ ओहि बाघिनकेँ मारि देलक। फेर ओ अपन सासुर गढ़पीपली गेल आ फूल बगानमे डेरा खसेलक। साढ़नीकेँ ओ ओतहि छोड़ि फूल-बगानकेँ तोड़ि-तारि कए तहस-नहस कए देलक। मालिन कहलक जे तोरा राजासँ पिटान पिटबेबउ आ जतेक तोँ बरबादी कएने छँह तकर हरजाना लेबउ। राजा ढोलन बाजल- जो तोरा जे करबाक छौक कर। मालिन तामसे बिदा भेलि आ राजा लग गेलि। राजासँ कहलक। राजा पुछलक जे ओ कतुक्का अछि। मालिन कहलक जे ओ अपन घर गढ़नारियलक बतेलक अछि। राजा अपन सिपाही सभकेँ पठेलक। ओ सभ ढोलनकेँ पुछलक-अहाँ कतुक्का छी आ कतएसँ आएल छी। ढोलन बाजल- हमर घर गढ़ नारियल अछि आ हम अपन सासुर गढ़पिंगल- ओतहिसँ आएल छी। सिपाही सभ ई गप राजाकेँ जा कए कहलक। राजा प्रसन्नतासँ स्वागत कए डोलीमे बैसा कए ढोलनकेँ अपना घर अनलक। किछु दिनुका बाद राजा अपन बेटी-जमाएकेँ गढ़-पिंगलसँ गढ़ नारियलक लेल बिदा केलक। ओतए सँ राजा ढोलन आ ओ मड़ुवन कन्याँ अपन घर गेल आ अपन राज्य करए लागल। बगियाक गाछ एकटा मसोमात छलीह आ हुनका एकेटा बेटा छलन्हि। ओ छल बड्ड चुस्त-चलाक। एक दिनुका गप अछि। ओ स्त्री जे छलीह, अपना बेटाकेँ बगिया बना कए देलखिन्ह। ओहि बालककेँ बगिया बड्ड नीक लगैत छलैक। से ओ एहि बेर एकटा बगिया बाड़ीमे रोपि देलक। ओतए गाछ जनमि गेल। बगियाक गाछ, नञि देखल ने सुनल। माए-बेटा ओहि बगियाक गाछक खूब सेवा करए लगलाह। कनेक दिनमे ओहि गाछमे खूब बगिया फड़य लागल। ओ बच्चा गाछ पर चढ़ि कए बगिया तोड़ि कए खाइत रहैत छल। एक दिनुका गप अछि। एकटा डाइन बुढ़िया रस्तासँ जा रहल छलि। ओकरा मनुक्खक मसुआइ बना कए खायमे बड्ड नीक लगैत रहैक। ओ जे ओहि बच्चाकेँ गाछ पर चढ़ल देखलक तँ ओकर मोन लुसफुस करए लगलैक। आब ओ बुढ़िया मोनसूबा बनबए लागल जे कोना कए ओहि बच्चाकेँ फुसियाबी आ एकरा घर लऽ जा कए ओकर मसुआइ बना कए खाइ। बच्चाकेँ असगर देखि ओ लग गेलि आ बच्चाकेँ कहलक- “बौआ एकटा बगिया हमरा नहि देब? बड्ड भूख लागल अछि। बच्चा ओकर हाथ पर बगिया देबय लागल। “बौआ हम हाथसँ कोना लेब बगिया हथाइन भऽ जाएत”। बच्चा बगिया ओकर माथ पर राखए लागल। “हँ हँ माथ पर नहि राखू। मथाइन भऽ जाएत”। बच्चो छल दस बुधियारक एक बुधियार। खोइछमे बगिया देबए लागल। “ई की करैत छी बौआ। बगिया खोँछाइन भऽ जाएत, अहाँ झुकि कए बोरामे दए दिअ”। मुदा बच्चा तँ छल बुझू जे गोनू झाक मूल-गोत्रेक। बाजल- “नञि गए बुढ़िया। तोँ हमरा बोरामे बन्द कए भागि जेमह। माए हमरा ठग सभसँ सहचेत रहबाक हेतु कहने अछि”। मुदा बुढ़ियो छल ठगिन बुढ़िया। ठकि फिसिया कए बोली-बानी दए कए ओकरा मना लेलक। जखने बच्चा झुकल ओ ओकरा बोरामे कसि कए बिदा भेलि। बुढ़िया रस्तामे थाकि कए एकटा गाछक छाहरिमे बैसि गेलि। कनेक कालमे ओकरा आँखि लागि गेलैक। बच्चा मौका देखि कोनहुना कए ओहि बोरासँ बाहर बहरा गेल आ भीजल माटि, पाथर आ काँट-कूस बोरामे धऽ कए ओहिना बान्हि कए पड़ा गेल। बुढ़िया जखन सूति कए उठल आ बोरा लऽ कए आगू बढ़ल तँ ओकरा बोरा भरिगर बुझएलैक। मोने-मोन प्रसन्न भऽ गेलि ई सोचि जे हृष्ट-पुष्ट मसुआइ खएबाक मौका बहुत दिन पर भेटल छै ओकरा। रस्तामे भीजल माटिसँ पानि खसए लागल तँ ओकरा लगलैक जे बच्चा लगही कए रहल अछि। ओ कहलक जे- ”माथ पर लघुशंका कए रहल छह बौआ। कोनो बात नहि। घर पर तोहर मसुआइ बना कए खायब हम”। कनेक कालक बाद काँट गरए लगलैक बुढ़ियाकेँ। कहलक- ”बौआ। बिट्ठू काटि रहल छी। कोनो बात नहि कतेक काल धरि काटब”। बुढ़्याक एकटा बेटी छलैक। गाम पर पहुँचि कए बुढ़िया ओकरा कहलक जे आइ एकटा मोट-सोट शिकार अछि बोरामे। माए बेटी जखन बोरा खोललक तँ निकलल माटि, काँट आ पाथर। कोनो बात नहि। बुढ़िया भेष बदलि पहुँचल फेरसँ बगियाक गाछ तर। एहि बेर बच्चा ओकरा नञि चीन्हि सकल। मुदा जखन ओ झुकि कए बगिया बोरामे देबाक गप कहलक तँ बच्चाकेँ आशंका भेलैक। ”गए बुढ़िया। तोँही छँह ठगिन बुढ़िया”। मुदा बुढ़िया जखन सप्पत खएलक तँ ओ बच्चा झुकि कए बगिया बोरामे देबए लागल। आ फेर वैह बात। एहि बेर बुढ़िया कतहु ठाढ़ नहि भेलि। सोझे घर पहुँचल आ बेटी लग बोरा राखि नहाए-सोनाए लेल चलि गेलि।बेटी जे बोरा खोललक तँ एकटा झोँटा बला बच्चाकेँ देखलक। ओ पुछलक- “हमर केश नमगर नहि अछि किएक?”। “अहाँक माय अहाँक माथ ऊखड़िमे दए समाठसँ नहि कुटने होयतीह। तेँ ”। बच्चा तँ छल दस होसियरक एक होसियार से ओ बाजल। बुढ़ियाक बेटी अपन केश बढ़ेबाक हेतु अपन माथ ऊखड़िमे देलक आ ओ बच्चा ओकरा समाठसँ कूटए लागल। ओकरा मारि ओकर मासु बनेलक। बुढ़िया जखन पोखरिसँ नहा कए आयल तँ बुढ़ियाक आगू ओ मासु परसि देलक। जखने ओ खेनाइ पर बैसलि तँ लगमे एकटा बिलाड़ि छल से बाजि उठल- “म्याँऊ। अपन धीया अपने खाँऊ। म्याँऊ”। “बेटी एकरा मासु नहि देलहुँ की। तेँ बाजि रहल अछि”। ओ बच्चा बिलाड़िक आगाँ मासु राखि देलक मुदा बिलाड़ि मासु नहि खएलक। आब बुढ़ियाक माथ घुमल। ओ बेटीकेँ सोर कएलक तँ ओ बच्चा समाठ लऽ कए आयल आ ओकरा मारि देलक। फेरसँ बच्चा बगियाक गाछ पर चढ़ि बगिया खए लागल। बड्ड नीक लगैत छल ओकरा बगिया। ज्योति पँजियार ज्योति पँजियार छलाह सिद्ध। पम्पीपुर गामक। तंत्र-मंत्र जानएबला। धर्मराज रहथि हुनकर कुलदेवता। ज्योति पँजियारक पत्नी छलीह लखिमा। एक बेर साधुक वेष धऽ धर्मराज भिक्षाक हेतु अएलाह। ज्योति पँजियार लखिमाक संग गहबर बना रहल छलाह। माय सूपमे अन्न लए कऽ अयलीह। मुदा साधु कहलखिन्ह जे हम तँ भीख लेब ज्योति पँजियारक हाथेटा सँ। ज्योति पँजियार मना कए देलखिन्ह जे हम गहबर बनायब छोड़ि कए नहि आयब। साधु श्राप दए देलखिन्ह जे निर्धन भऽ जयताह ज्योति पँजियार, कुष्ठ फूटि जएतन्हि हुनका। आस्ते-आस्ते ई घटित होमए लागल। ज्योति पँजियार बहिनिक ओहिठाम चलि गेलाह। मुदा ओतय अवहेलना भेटलन्हि। ज्योति ओतय सँ निकलि गेलाह। ओइटदल गाम पहुँचि गेलाह अपन संगी लगवारक लग। एकटा तांत्रिक अएलाह। कहल- बारह वर्ष धरि कदलीवनमे रहए पड़त। धर्मराजक आराधना करए पड़त, गहबड़ बनाए करची रोपी ओतए। बाँसक घर बनाऊ धर्मराजक हेतु। धर्मराज दर्शन देताह, अहाँ ठीक भऽ जाएब। पँजियार चललाह। रस्तामे सैनी गाछ भेटलन्हि, ओकर छाहमे सुस्तेलाह पँजियार। मुदा ओ गाछ सुखा गेल, अरड़ा कए खसि पड़ल। कोइलीकेँ कहलन्हि जे पानि आनि दिअ। ओ उड़ल तँ बिहाड़ आबि गेल। कोइली मरि गेल। पँजियार उड़ि कए पहुँचि गेलाह कदली वनमे। एकटा महिसबार कहलकन्हि जे अछमितपुर गाम जाऊ। महिसबार छलाह धर्मराज, बनि गेलाह भेम-भौरा। एकटा व्यक्त्ति भेटलन्हि। ओ कहलकन्हि जे आगू वरक गाछ भेटत, ओकर पात तोड़ू।ओहि पर अहाँक सभ प्रश्नक उत्तर रहत। ई कहि ओ परबा बनि गेल। वरक पात तोड़लन्हि ज्योति तँ ओहि पर लिखल छल, यैह छी अछमितपुर। ओतुक्का राजाकेँ बच्चा नहि छलन्हि। ज्योति आशीर्वाद देलन्हि। कहलन्हि, एकटा छागर ओहि दिन पोसब जाहि दिन गर्भ ठहरि जाए। हम कदली वनसँ आएब तँ ई छागर स्वयं खुट्टासँ खुजि जाएत। १२ बरखक बाद ज्योति कदली वनसँ चललाह। कोइलीकेँ जीवित कए देलन्हि। सुखाएल धारमे पानि आबि गेल। सैनीक गाछ हरियर कचोर भऽ जीबि उठल। अछमितपुर गाममे राजा कहलन्हि जे छागर आ पुत्र दुनू एकहि दिन मरि गेल। पँजियार पाठाकेँ जिआ देलन्हि, कहलन्हि जो तोँ कदलीवनक धारमे नाओ पर चढ़ि जो, मनुक्ख रूप भेटि जएतौक। तावत राजाक पुत्र सेहो कदलीवनसँ शिकार खेला कए घोड़ा पर चढ़ि कए आबि गेल। ज्योति पँजियार गाम पहुँचि गेलाह गमछामे गहबर लेने। राजा सलहेस राजा सलहेस सुन्दर आ वीर छलाह। मोरंग, नेपालमे रहैत छलाह। ओ दुसाध जातिक छलाह आ दबना जे मोरंग राजाक मालिन छलि, सलहेससँ प्रेम करैत छलि। राजक वैद्य दबनासँ प्रेम करैत छलाह आ दबनाक अस्वीकृतिसँ ओ आत्महत्या कए लेलन्हि। सलहेस छलाह मोरंगक तालुकदार नौरंगी बहादुर थापाक सिपाही। सलेहस छलाह मोनक राजा। सभकेँ विपत्तिमे सहायता दैत रहथि। ताहि द्वारे दबना दिशि हुनकर कोनो ध्यान नहि छलन्हि। सभ हुनका राजा कहैत छलन्हि, से ई तालुकदारकेँ पसिन्न नहि पड़ल। एक दिन दरबारमे ओ सलहेसकेँ पुछलक- अहाँक नाम की? सलहेस कहलन्हि- हमर नाम छी राजा सलहेस। तखन थापा कहलकन्हि, जे अहाँ अपन नाममे राजा नहि लगाऊ। सलहेस कहलन्हि जे ई पदवी छी, जन द्वारा देल पदवी। कोना छोड़ब एकरा। हम छोड़ियो देब, लोक तँ कहबे करत। तखन थापा कहलखिन्ह जे लोककेँ मना कऽ दियौक। सलहेस कहलन्हि जे लोककेँ कोना मना करबैक। लोकक मोन जे ओ ककरा की बजाओत। निकलि गेलाह सलहेस ओतएसँ। आब नहि निमहत ई नोकरी। आइ कहैत अछि नाम छोड़ए लेल, काल्हि किछु आर कहत। पितियौत बहिन रहैत छलन्हि मुंगेरमे। बहिनोइ राज दरभंगाक नोकरीमे छलाह। एम्हर कुसमी दबनाकेँ कहि देलक जे सलहेस जा रहल अछि मोरंग छोड़ि कए। दबना छलि कमरू-कमख्यासँ तंत्र-मंत्र सिखने। ओ सलहेसकेँ कहलक जे हम राजाक दरबारमे सात सए सिपाहीक सरदार चूहड़मलकेँ हटबा कऽ अहाँकेँ सरदार बना देब। सैह भेल। बड़का जलसा देलक दबना, गेलक गीत- रौ सुरहा, बारह बरस तोरा लेल आँचर बन्हलौँ। मुदा, केलक चोरि चूहड़मल, चोरेलक नौ लाखक रानीक हार आ नुका देलक सलहेसक ओछैनमे। उनटे चूहड़मल राजाकेँ कहलक जे सलहेसक घरक तलासी लेल जाए।सलहेसक गेरुआक खोलसँ खसल हार। दबना काली मन्दिरमे तंत्र साधना शुरू कएलक। भूत-प्रेतकेँ नोतलक। खून बोकरबेलक चूहड़मलसँ। चूहड़मल सभटा बकि देलक। सलहेसकेँ जेलसँ छोड़ि देल गेल आ ओकर ओहदा बढ़ा देल गेल। चूहड़मलकेँ भेलैक जेल। दबना आ सलहेस विवाह कए खुशीसँ रहए लगलाह। बहुरा गोढ़िन नटुआदयाल एकटा छलि बहुरा गोढ़िन आ एकटा छलाह नटुआ दयाल। बहुरा गोढ़िन नर्त्तकी छलि आ ओकरा जादू अबैत छलैक। नटुआ दयाल बहुरा गोढ़िनक प्रशंसक छल, किएक तँ ओ छल प्रेमी, बहुरा गोढ़िनक पुत्रीक। छल मुदा ओहो तांत्रिक। कमला-बलानक कातक केवटी छलि बहुरा, बखरी, बेगूसरायक रहनिहारि। हकलि छलि, कमरू सँ सीखने छलि जादू। दुलरा दयाल छल मिथिला राज्यक भरौड़क राजकुमार, ओकरे नाम छल नटुआ दयाल। नृत्य जे ओ बहुरासँ सिखलक तँ सभ नामे राखि देलकैक ओकर नटुआ। नटुआ दयालक गुरू छलाह मंगल। सिद्ध पुरुष। अकाशमे बिन खुट्टीक धोती टँगैत छलाह, सुखला पर उतारैत छलाह। बहुरा गाछ हँकैत छलि, जकरासँ झगड़ा भेल ओकरा सुग्गा बना पोसि लैत छलीह। कमला कातमे रहैत छलाह आ भजैत छलाह- कमलेक आसन, ओहीमे बास हे कमला मैय्या। बहुरा वरकेँ मारि सीखने छल जादू। राजकुमारक विवाहक प्रस्तावकेँ नहि ठुकरा सकलि मुदा। बरियाती दरबज्जा लागल तँ भऽ गेलैक कहा सुनी आ सभकेँ बना देलक ओ बत्तु। मंत्री मल्लक एक आँखिक रोश्नी खतम। आहि रे बा। व्यापारी जयसिंह छल मोहित महुराक बेटी पर, ओकरे खड्यंत्र। आहि रे बा। गुरू लग गेल राजकुमार आ आदेश भेलैक, जो कामाख्या, सीखय लेल षट् नृत्य आ जादू। चण्डिका मंदिरमे योगिनीसँ षट्नृत्य सिखलक आ आदेश भेलैक सर्रैया ग्रामक भुवन मोहिनीसँ षट् नृत्यक एक अंग सीखबाक। ओहि गामक सिद्ध देवी रहथि वागेश्वरी। नरबलि चढैत छल ओतए। दैत्य अबैत छल ओतए। सिखलक राजकुमार सिद्ध नृत्य अनहद आ आज्ञा चक्र। करिया जादूकेँ काटय बला मंत्र फुकलक राजकुमारक कानमे। कमला बलान लग आएल राजकुमार। बहुरा सुखेलक धारक पानि। राजा पता लगेलक जूकियासँ, अनलक बहुराकेँ। मुदा ओ तँ लगा देलक दोष राजकुमार पर। यज्ञ भेल तैयो कमलामे पानि नहि आएल, नटुआ पठेलक सभटा पानिकेँ पताल? नटुआकेँ पकड़ि कय आनल गेल। ओ अपन नृत्यसँ जलाजल केलक कमलाकेँ।मुदा कहलक बहुराकेँ माफी दियौक। बहुरा कहलक आब तोँ भेलह हमर बेटीक योग्य। आबह बरियाती लऽ कए। नटुआ बरियाती लऽ कऽ पहुँचल। तीन टा पान अएलैक, एक कमलाक पानिक हेतु, दोसर बहुराकेँ माफ करबाक हेतु। आ तेसर ओकर बेटीसँ व्याह करबाक हेतु। तीनूटा पान उठेलक नटुआ आ शुरू भेल गीत-नाद। पियास लगलैक नटुआकेँ शिष्य झिलमिलकेँ पठेलक इनार पर। डोरी छोट भए गेलैक। अपने गेल नटुआ आ डोरी पैघ भऽ गेलैक। फूलमती छलि ओतए, पतिक प्रतिभासँ प्रसन्न छलि ओ। मल्लक आँखि ठीक कएलक बहुरा। कमला पहुँचल कनियाँक संग नटुआ। मुदा आहि रेबा। नटुआकेँ चक्कू मारलक बहुरासँ दूर भेल ओकर शिष्य। मुदा नटुआ चढ़ेने छल पटोर कमला मैय्याकेँ। कमलाक धार खूने-खूनामे। मुदा कामाख्याक जदूगरनी अएलीह आ जीवीत कएलन्हि नटुआकेँ। दुश्मनक बलि चढ़ेलक ओ कमलाकेँ। महुआ घटवारिन महुआ घटवारिन परी जेकाँ सुन्दरि छलीह जेना गूथल आँटामे एक चुटकी केसर, मुदा सतवंती छलीह। बाप गँजेरी शराबी आ माए सतमाय, नजरि चोर। घरमे सतमाएक राज छल। सोलह बरखक भए गेल रहथि मुदा हुनकर बियाहक चिंता ककरो नहि रहैक। परमान नदीक पुरनका घाटक मलाह प्र्रर्थना करैत छथि जे महुआक नावकेँ किनार लगा दियौक। साओन-भादवक, भरल धार, कम वयसक महुआ नहि जाऊ, एहि राति खेबय लेल नाह। एहने साओन-भादवक रातिमे सतमाए, घाट पर उतरल वणिक् केँ तेल लगेबाक हेतु महुआकेँ पठबए चाहैत अछि आ ओ जाए नहि चाहैत अछि। अपन माएकेँ मोन पाड़ैत अछि। नोन चटा केँ किए नहि मारलँह, पोसलँह एहि दिन खातिर। मुदा सतमाए साओन-भादवक रातिमे पथिककेँ घाट पार करबाबए लेल महुआकेँ पठा देलक। महुआ बिदा भेलि आ बीच रस्तामे अपन सखी-बहिनपा फूलमतीसँ भरि राति गप करैत रहलि। केहन माए अछि जे रातिमे घाट पार करेबाक लेल कहैत अछि। माय ईहो कहलक जे पथिक पाइबला होए आ बूढ़ होए तँ ओकरा तेल-मालिस करबामे कोनो हर्ज नहि। ओकर मोनमे जे होअए, भेल तँ ओ पिते समान।ओकरा जेबीसँ चारि पाइ निकालि लेल जाएय, अहीमे बुधियारी अछि। फूलमती कहलक- घबरायब नहि। जरेने रहू प्रेमक आगि, ओकरा लेल जे मोरंगमे आँगुर पर दिन गानि रहल अछि। मोरंगक नाम सुनि महुआ उदास भए गेलि। ओ फागुनमे आयत गऽ। भोरहरबामे ओ गामपर पहुँचल आ माए दस बात कहलकैक। बाप नशामे आएल तँ माए ओकरो लात मारि भगा देलकैक। तखने हरकारा आएल आ माएक कानमे संदेश देलक। महुआ माएकेँ कहलक जे अहाँ जे कहब से हम करब। वणिकक आदमी आयल छल, ओकरा संग महुआ घाट पर पहुँचलि। वणिक दू सिपाहीक संग नावमे बैसल। महुआ नाव खेबय लागलि। मुदा ओकरा नहि बूझल रहए जे ओकरा बेचि देल गेल छै। सिपाही ओकरासँ पतवारि छीनि लेलक। सौदागर ओकरा कोरामे बैसाबय चाहलक तँ ओ छरपटाय लागलि। सिपाही कहलक जे सभटा पाइ चुका देल गेल अछि, अहाँकेँ कोनो मँगनीमे नहि लए जा रहल छथि। महुआ स्थिर भए गेलीह। ओ सभ बुझलक जे महुआ मानि गेल अछि। तखने महुआ धारमे कूदि पड़लि। उल्टा धारमे मोरंग दिशि निकलि जाए चाहलक महुआ, जतय ओकर प्रेमी अछि। ओकरा लेल सात पालक नाव लेने। सौदागरक छोटका सिपाही महुआकेँ प्रेम करए लागल छल, ओहो कूदि गेल कोशिकीक धारमे, दूनू डूबि गेल। अखनो साओन-भादवक धारमे कोनो घटवारकेँ कखनो देखा पड़ैत छै महुआ। कोनो खिस्सा वचनहारकेँ देखा जाइत अछि ओ आ शुरू भए जाइत अछि- एकटा छलीह महुआ घटवारिन..............................। डाकू रौहिणेय मगध देशमे अशोकक पिता बिम्बिसारक राज्य छल। संपूर्ण शांति व्याप्त छल मुदा एकटा डाकू रौहिणेयक आतंक छल। रौहिणेयक पिता रहए डाकू लौहखुर। मरैत-मरैत ओ कहि गेल जे महावीर स्वामीक प्रवचन नहि सुनए आ ज्योँ कतओ प्रवचन होअय तँ अप्पन कान बन्द कऽ लए, अन्यथा बर्बादी निश्चित होएत। रौहिणेय मात्र पाइ बला केँ लुटैत छल आ गरीबकेँ बँटैत छल। ताहि द्वारे गामक लोक ओकर मदति करैत रहए आ’ ओ पकड़ल नहि जा सकल छल। एक बेर तँ ओ अप्पन संगीक संग वाटिकामे पाटलिपुत्रक सभसँ पैघ सेठक पुतोहु मदनवतीक अपहरण कए लेलक, जखन ओकर पति फूल लेबाक हेतु गेल रहए। जखन ओकर पति आएल तँ रौहिणेयक संगी ओकरा गलत जानकारी दऽ भ्रमित कएलक। ओकरा बाद सुभद्र सेठक पुत्रक विवाह रहए। बराती जखन घुरि रहल छल तखन रौहिणेय सेठानी मनोरमाक भेष बनेलक आ ओकर संगी नर्त्तक बनि गेल। नकली नर्त्तक जखन नाचए लागल तखन रौहिणेय भीड़मे कपड़ाक साँप छोड़ि देलक। रौहिणेय गहनासँ लादल वरकेँ उठा निपत्ता भए गेल। राजा शहरक कोतवालकेँ बजेलक। ओ तँ रौहिणेयकेँ पकड़बामे असमर्थता व्यक्त कएलक आ कोतवाली छोड़बाक बातो कएलक। मंत्री अभयकुमार पाँच दिनमे डाकू रौहिणेयकेँ पकड़ि कए अनबाक गप कहलक। राजा ततेक तामसमे छलाह जे पाँच दिनका बाद डाकू रौहिणेयकेँ नहि अनला उत्तर अभयकुमारकेँ गरदनि काटि लेबाक बात कहलन्हि। डाकू रौहिणेयकेँ सभ बातक पता चलि गेल छलैक। अभयकुमार जासूस सभ लगेलक। रौहिणेयकेँ मोनमे अएलैक जे सेठ साहूकार बहुत भेल आब किए नहि राजमहलमे डकैती कएल जाय। ओ राजमहलक रस्ता पर चलि पड़ल। रस्तामे वाटिकामे महावीरस्वामीक प्रवचन चलि रहल छल। रौहिणेय तुरत अपन कान बन्द कए लेलक। मुदा तखने ओकरा पैरमे काँट गरि गेलैक। महावीर स्वामी कहि रहल छलाह- “देवता लोकनिकेँ कहियो घाम नहि छुटैत छन्हि। हुनकर मालाक फूल मौलाइत नहि अछि, हुनकर पएर धरती पर नहि पड़ैत छन्हि आ हुनकर पिपनी नहि खसैत छन्हि।” तावत रौहिणेय काँट निकालि कानकेँ फेर बन्न कए लेलक आ राजमहलक दिशि बिदा भेल।राजमहलमे सभ पहरेदार सुतल बुझाइत छल। मुदा ई अभयकुमारक चालि रहए। ओकर जासूस बता रहल रहए जे डाकू नगर आ महल दिशि आबि रहल अछि। जखने ओ महलमे घुसैत रहए तँ पहरेदार ललकारा देलक। ओ छड़पिकय काली मंदिर मे चलि गेल। सिपाही सभ मंदिरकेँ घेरि लेलक। ओ जखन देखलक जे बाहरसँ सभ घेरने अछि तँ सिपाहीक मध्यसँ मंदिरक चहारदिवारी छड़पि गेल। मुदा ओतहु सिपाही सभ छल आ ओ पकड़ल गेल। राजा ओकरा सूली पर चढ़ेबाक आदेश देलकैक। मुदा मंत्री कहलन्हि जे बिना चोरीक माल बरामद केने आ बिना चिन्हासीक एकरा कोना फाँसी देल जाए। रौहिणेय मौका देखि कए गोहारि लगेलक जे ओ शालि गामक दुर्गा किसान छी। ओकर घर परिवार ओहि गाममे छै। ओ तँ नगर मंदिर दर्शनक हेतु आएल छल। ततबेमे सिपाही घेरि लेलकैक। राजा ओहि गाममे हरकारा पठेलक मुदा ग्रामीण सभ रौहिणेयसँ मिलल छल। सभ कहलकैक जे दुर्गा ओहि गाममे रहैत अछि मुदा तखन कतहु बाहर गेल छल। अभयकुमार सोचलक जे एकरासँ गलती कोना स्वीकार करबाबी। से ओ डाकूकेँ नीक महलमे कैदी बना कए रखलक। डाकू महाराज ऐश-आराममे डूबि गेलाह। अभयकुमार एक दिन डाकूकेँ खूब मदिरा पिया देलन्हि। ओ जखन होशमे आएल तँ चारू कात गंधर्व-अप्सरा नाचि रहल छल। ओ सभ कहलकैक जे ई स्वर्गपुरी थीक आ इन्द्र रौहिणेयसँ भेँट करबाक हेतु आबए बला रहथि। रौहिणेय सोचलक जे राजा हमरा सूली पर चढ़ा देलक। मुदा ओ सभतँ मंत्रीक पठाओल गबैया सभ छल। तखने इंद्रक दूत आएल आ कहलक जे रौहिणेयकेँ देवताक रूप मे अभिषेक होएतैक मुदा ताहिसँ पहिने ओकरा अपन पृथ्वीलोक पर कएल नीक-अधलाह कार्यक विवरण देबए पड़तैक। तखन रौहिणेयकेँ भेलैक जे सभटा पाप स्वीकार कए लिअए। मुदा तखने ओ देखलक जे दैव लोकक जीव सभ घामे-पसीने अछि, माला मौलायल छै, पएर धरती पर छै आ पिपनी उठि-खसि रहल छै। ओ अपन पुण्यक गुणगाण शुरू कए देलक। अभयकुमार राजाकेँ कहलक जे अहाँ ज्योँ ओकरा अभयदान दए देबैक तँ ओ सभटा गप्प बता देत। सैह भेलैक। रौहिणेय नगरक बाहरक अपन जंगलक गुफाक पता बता देलक। जतए सभटा खजाना आ अपहृत व्यक्ति सभ छल। राजा कहलन्हि जे किएक तँ ओकरा अभयदान भेटि गेल छै ताहि हेतु ओ सभ संपदा राखि सकैत अछि। मुदा रौहिणेय कोनोटा वस्तु नहि लेलक। ओ कहलक जे जाहि महावीरस्वामीक एकटा वचन सुनलासँ ओकर जान बचि गेलैक, तकर दीक्षा लेत आ ओकर सभटा वचन सुनि जीवन धन्य करत। मूर्खाधिराज एकटा गोपालक छल। तकर एकटा बेटा छल। ओकर कनियाँ पुत्रक जन्मक समय मरि गेलीह। बा बच्चाक पालन कएलन्हि। मुदा ओ बच्चा छल महामूर्ख। जखन ओ बारह वर्षक भेल तखन ओकर विवाह भए गेल। मुदा ओ विवाहो बिसरि गेल। बुढ़िया बाकेँ काज करएमे दिक्कत होइत छलन्हि। से ओ बुझा-सुझाकेँ ओकरा, कनियाकेँ द्विरागमन करा कए अनबाक हेतु कहलन्हि। बा ओकरा गमछामे रस्ता लेल मुरही बान्हि देलन्हि। रस्तामे बच्चाकेँ भूख लगलैक। ओ गमछासँ मुरही निकालि कए जखने मुँहमे देबए चाहैत छल आकि मुरही उड़ि जाइत छल। बच्चा बाजए लागल- आऊ, आऊ उड़ि जाऊ। लगमे बोनमे एकटा चिड़ीमार जाल पसारने छल। बच्चाक गप सुनि कए ओकरा बड्ड तामस उठलैक। ओकरा लगलैक जेना ई बच्चा ओकर चिड़ैकेँ उड़ाबए चाहैत अछि। चिड़ीमार बच्चाकेँ पकड़ि कए पुष्ट पिटान पिटलक। बच्चा पुछलक- हमर दोख तँ कहू? चिड़ीमार कहलक- एना नहि। एना बाजू। आबि जो। फँसि जो। आब बच्चा सैह बजैत आगू जाए लागल। आब साँझ भए रहल छल। बोन खतम होएबला छल। ओतए चोर सभ चोरिक योजना बनाए रहल छलाह। ओ सभ सुनलन्हि जे ई बच्चा हमरा सभकेँ पकड़ाबए चाहैत अछि। से ओ लोकनि सेहो ओकरा पुष्ट पिटान पिटलन्हि। बच्चा फेर पुछलक- हम बाजी तँ की बाजी? चोरक सरदार कहलक- बाज जे एहन सभ घरमे होए। आब बच्चा यैह कहैत आगाँ बढ़ए लागल। आब श्मसानभूमि आबि गेल। एकटा जमीन्दारक एकेटा बेटा छलैक। से मरि गेल छल आ सभ ओकरा डाहबाक लेल आबि रहल छलाह। ओ लोकनि बच्चाक गप पर बड़ कुपित भेलाह आ ओकरा पुष्ट पिटलन्हि। फेर जखन बच्चा पुछलक जे की बाजब उचित होएत तँ सभ गोटे कहलखिन्ह जे एना बाजू- एहन कोनो घरमे नहि होए। बच्चा यैह गप बाजए लागल। आब नगर आबि गेल छल आ राजाक बेटाक विवाहक बाजा-बत्ती सभ भए रहल छल। बरियाती लोकनि बच्चाकेँ कहैत सुनलन्हि जे एहन कोनो घरमे नहि होए तँ ओ लोकनि क्रोधित भए फेर ओहि बच्चाकेँ पिटपिटा देलखिन्ह। जखन बच्चा पुछलक जे की बजबाक चाही तँ सभ कहलक जे किछु नहि बाजू। मुँह बन्न राखू। बच्चा सासुर आबि गेल। ओतए नहिये किछु बाजल नहिये किछु खएलक। कारण खएबामे मुँह खोलए पड़ितैक। भोरे-सकाले सासुर बला सभ अपन बेटीकेँ ओहि बच्चाक संग बिदा कए देलन्हि। रस्तामे बड्ड प्रखर रौद छलैक। ओ सुस्ताए लागल। मुदा कलममे सेहो बड्ड गुमार छलैक। कनियाकेँ बड्ड घाम खसए लगलैक आ ताहिसँ ओकर सिन्दूर धोखरि गेलैक। बच्चाकेँ भेलैक जे सासुर बला ओकरासँ छल कएलक आ ओकरा भँगलाहा कपार बाली कनियाँ दए जाइ गेल अछि। एहन कनियाँकेँ गाम पर लए जाए ओ की करत। ओ तखने एकटा हजामकेँ बकरी चरबैत देखलक। ओकरासँ अपन पेटक बात कहबाक लेल अपन मुँह खोललक आ सभटा कहि गेल। हजाम बुझि गेल जे ई बच्चा मूर्खाधिराज अछि। ओ ओकरा अपन दूध देमए बाली बकड़ीक संग कनियाँक बदलेन करबाक हेतु कहलक। बच्चा सहर्ष तैयार भए गेल। आगू ओ बच्चा सुस्ताए लागल आ खुट्टीसँ बकड़ीकेँ बान्हि देलक। बकड़ी पाउज करए लागल तँ बच्चाकेँ भेलैक जे बकड़ी ओकर मुँह दूसि रहल अछि। ओ ओकरा हाट लए गेल आ कदीमाक संग ओकरो बदलेन कए लेलक। गाम पर जखन ओ पहुँचल तँ ओकर बा बड्ड प्रसन्न भेलीह। हुनका भेलन्हि जे कनियाँक नैहरसँ सनेसमे कदीमा आएल अछि। मुदा कनियाँकेँ नहि देखि तकर जिगेसा कएलन्हि तँ बच्चा सभटा खिस्सा सुना देलकन्हि। ओ माथ पीटि लेलन्हि। मुदा बच्चा ई कहैत खेलाए चलि गेल जे कदीमाक तरकारी बना कए राखू। कौवा आ फुद्दी एकटा छलि कौआ आ एकटा छल फुद्दी। दुनूक बीच भजार-सखी केर संबंध। एक बेर दुर्भिक्ष पड़ल। खेनाइक अभाव एहन भेल जे दुनू गोटे अपन-अपन बच्चाकेँ खएबाक निर्णय कएलन्हि। पहिने कौआक बेर आएल। फुद्दी आ कौआ दुनू मिलि कए कौआ-बच्चाकेँ खा गेल। आब फुद्दीक बेर आएल। मुदा फुद्दी सभ तँ होइते अछि धूर्त्त। “अहाँ तँ अखाद्य पदार्थ खाइत छी। हमर बच्चा अशुद्ध भए जायत। से अहाँ गंगाजीमे मुँह धोबि कए आबि जाऊ”। कौआ उड़ैत-उड़ैत गंगाजी लग गेल- “हे गंगा माय, दिए पानि, धोबि कए ठोढ़, खाइ फुद्दीक बच्चा”। गंगा माय पानिक लेल चुक्का अनबाक लेल कहलखिन्ह। आब चुक्का अनबाक लेल कौआ गेल तँ ओतएसँ माटि अनबाक लेल कुम्हार महाराज पठा देलखिन्ह्। खेत पर माटिक लेल कौआ गेल तँ खेत ओकरा माटि खोदबाक लेल हिरणिक सिंघ अनबाक लेल विदा कए देलकन्हि। हिरण कहलकन्हि जे सिंहकेँ बजा कए आनू जाहिसँ ओ हमरा मारि कए अहाँकेँ हमर सिंघ दऽ देमए। आब जे कौआ गेल सिंह लग तँ ओ सिंह कहलक- “हम भेलहुँ शक्त्तिहीन, बूढ़। गाएक दूध आनू, ओकरा पीबि कए हमरामे ताकति आयत आ हम शिकार कए सकब”। गाएक लग गेल कौआ तँ गाए ओकरा घास अनबाक लेल पठा देलखिन्ह। घास कौआकेँ कहलक जे हाँसू आनि हमरा काटि लिअ। कौआ गेल लोहार लग, बाजल- “हे लोहार भाए, दिअ हाँसू, काटब घास, खुआयब गाय, पाबि दूध, पिआयब सिंहकेँ, ओ मारत हरिण, भेटत हरिणक सिंघ, ताहिसँ कोरब माटि, माटिसँ कुम्हार बनओताह चुक्का, भरब गङ्गाजल, धोब ठोर, आ खायब फुद्दीक बच्चा”। लोहार कहलन्हि, “हमरा लग दू टा हाँसू अछि, एकटा कारी आ एकटा लाल। जे पसिन्न परए लए लिअ”। कौआकेँ ललका हाँसू पसिन्न पड़लैक। ओ हाँसू धीपल छल, जहाँने कौआ ओकरा अपन लोलमे दबओलक, छरपटा कए मरि गेल। नैका बनिजारा शोभनायका छलाह एकटा वणिकपुत्र। हुनकर विवाह तिरहुतक कोनो स्थानमे बारी नाम्ना स्त्रीसँ भेल छलन्हि। शोभा द्विरागमन करबा कए कनियाँकेँ अनलन्हि आ बिदा भए गेलाह मोरंगक हेतु व्यापार करबाक लेल। पत्नीक संग एको दिन नहि बिता सकल छलाह। रातिमे एकटा गाछक नीचाँमे जखन ओ राति बितेबाक लेल सुस्ता रहल छलाह तखन हुनका एकटा ध्वनि सुनबामे अएलन्हि। एकटा डकहर अपन भार्याक संग ओहि गाछ पर रहैत छल। दुनू गोटे गप कए रहल छलाह, जे ओ राति बड़ शुभ छल आ ओहि दिन पत्नीक संग जे रहत तकरा बड्ड प्रतिभावान पुत्रक प्राप्ति होएतैक। ई सुनतहि शोभा घर पहुँचि गेल भार्या लग। लोकोपवादसँ बचबाक लेल पत्नीकेँ अभिज्ञानस्वरूप एकटा औँठी दए देलन्हि आ चलि गेलाह मोरंग। ओतए १२ बर्ख धरि व्यापार कएलन्हि आ तेरहम बरख बिदा भेलाह घरक लेल। एम्हर ओकर कनियाक बड़ दुर्गति भेलैक। ओ जखन गर्भवती भए गेलीह, सासु-ससुर घरसँ निकालि देलकन्हि हुनका। मुदा ओकर दिअर जकर नाम छल चतुरगन, ओकरा सभटा कथा बुझल छलैक। ओतए रहय लगलीह ओ। जखन शोभा घुरल तखन सभ रहस्य बुझलक आ सभ हँसी खुशी रहए लागल। तब बारी रे कानय जार बेजारो कानै रे ना। दुर्गा गे स्वामी के लैके कोहबर घर लेवा ने केलही रे ना। कोहबर घर से हमरो निकालियो देलकइ रे ना दुर्गा गे केना बचबै अन्न-पानी बिन केना रहबइ रे ना। डोकी डोका एक टा छल डोका आ एकटा छल डोकी। दुनूमे बड्ड प्रेम। डोकी कहए तरेगण लए आऊ तँ डोका तरेगण आनएमे सेकेण्डक देरी भए जाए तँ ठीक मुदा मिनटक देरी नञि होमए दैत छल। सियारकेँ रहए ईर्ष्या दुनूसँ। से ओ कनही सियारिनसँ मिलि गेल आ एक दिन जख्नन डोका आ डोकी एक्के थारीमे भोजन कए रहल छल, तखन डोकाकेँ बजेलक। एम्हर-ओम्हरक गप कए ओकरा बिदा कए देलक। फेर डोकीकेँ बजेलक ओ सियरबा। पुछलक जे अहाँ दुनू गोटेमे बड़ प्रेम अछि मुदा डोका जे कहलक ताहिसँ तँ हमरा बड़ दुःख भेल। लागय-ए जे ओकर मोन ककरो आन पर छै। आर किछु पूछए लागल डोकी तावत ओ सियरबा पड़ा गेल। आब डोकी घरमे हनहन-पटपट मचा देलक। डोका लकड़ी काटय बोन दिशि गेल। घुरल नहि। भोरमे एकटा जोगी आएल तँ ओकरासँ डोकी पुछलक जे ई की भेल ? जोगिया कहलक जे ई अछि पूर्व जन्मक सराप। जखने अहाँ डोकी पर विश्वास छोड़ब डोका छोड़ि कए चलि जाएत मुदा सातम दिन भेटि जाएत। मुदा डोकी निकलि गेलि डोकाकेँ ताकए। बगुला भेटलैक डोकीकेँ कहलकैक-रुकि जाऊ एहि राति। फेर सियरबा, वटवृक्ष, मानसरोवरक रस्तामे बोनमे हाथी सभ कहलकैक जे एक एक राति रुकि कए जाऊ मुदा डोकी नहि रुकलि। फेर भेटल मूस। ओ कहलक जे हमरा संग चलू, हम महल लए जायब, खिस्सा सुनाएब छह रातिक बाद सातम राति बीतत आ डोका भेटत। खिस्सा सुनैत-सुनबैत महल दिशि विदा भेल दुनू गोटे। मूस कहलक जे अहाँ हँ-हँ कहैत रहब खिस्साक बीचमे। मूसक खिस्सा कनेक नमगर रहए। डोकी बीचमे हँ कहब बिसरि गेलि। आ तकर बाद मूस सेहो खिस्सा बिसरि गेल। कतबो मोन पाड़य चाहलक मुदा मोन नहि पड़लैक। फेर आगू बढ़ल दुनू गोटे। एकटा दीबारिमे भूर कए दुनू गोटे सुरंगमे पहुँचल तँ दू राति धरि चलैत रहल तखन महल आएल। ओतए डोकी हलुआ बनबए लेल लोहियामे समान देलक आ कनेक पानि आनए लेल बाहर गेल तँ मूसकेँ रहल नञि गेलैक आ ओ लोहियामे मुँह दए देलक आ मरि गेल। डोकी घुरि कए ई देखलक तँ कुहड़ि उठल। बगुला छोड़ल सियरबा छोड़ल छोड़ल वटक वृक्ष हाथी सन बलगर पकड़ल ई मूस। मूस भैयाक संग लेल बीतल छह राति, सातम रातिमे ओ प्राण गमेलन्हि आ ओकर साँस टुटए लगलैक, मुदा तखने दरबज्जा खुजल आ कुरहड़ि लेने डोका हाजिर। रघुनी मरर देवदत्त, काशीराम आ रघुनी मरर तीन भाँए। गाए चराबए जाथि। एक बेर अकाल आएल तँ रघुनी भागि कए सहरसाक बनमां प्रखण्डक बिदिया बरहमपुर गाममे अपन डेरा खसेलन्हि।एतए जमीन्दार रहथि जुगल आ कमला प्रसाद। जुगल प्रसाद एक बेर दंगल करेने छलाह ओहि दंगलकेँ जितने छलाह रघुनी। रघुनी हुनके लग गेलाह। एक सय बीघा जमीन देलन्हि जुगल प्रसाद हुनका। सुगमां गाममे बथान बनओलन्हि रघुनी। खेती करथि आ परिवारसँ दूर सुगमा गाममे रहथि। एम्हर जुगल प्रसादक घरमे कलह भेल आ अपन जमीन-जत्था ओ गागोरी राजकेँ बेचि देलन्हि। रघुनीकेँ जखन ई पता चललन्हि तँ हुनका बड्ड दुख भेलन्हि। एक दिन संगीक संग रघुनी नाच देखबाक लेल सिमरी गामक चौधरीक दलान पर गेल। चौधरी नाचक बाद नटुआकेँ औँठी आ दुशाला देलखिन्ह। रघुनी नटुआकेँ कहलखिन्ह जे बथान परसँ अपन पसिन्नक एक जोड़ी गाए हाँकि लिअ। नटुआ खुशीसँ दू टा निकगर गाय हाँकि अनलक आ खुशीसँ चौधरीकेँ देखेलक। मुदा चौधरीकेँ बुझेलए जे रघुनी हुनका नीचाँ देखबए चाहैत छथि। मुदा सोझाँ-सोँझी भिरबाक हिम्मत तँ छलए नहि। से चौधरी देवी उपासक जादूक कलाकार मकदूम जोगीसँ भेँट कएलक। ओ जोगीकेँ कहलक जे रघुनीकेँ हमर नोकर बना दिअ। जोगी सरिसओ फूकि छिटलक मुदा रघुनी छल देवी भक्त से जोगीक जादू नहि चललैक। चण्डिकाक सिद्धि कएलक जोगी आ रघुनी पर जादू सँ सए टा बाघसँ घेरबा कए मारि देलक। मुदा भक्त छल रघुनी से चण्डिकाक बहिन कामाख्या आबि रघुनीकेँ जिया देलन्हि। दोसर जादू लेल जोगी सरिसओ मन्त्राबए लेल जे सरिसओ मुट्ठीमे लेलक तँ मुट्ठी बन्दक-बन्दे रहि गेलैक। फेर चौधरीकेँ पता चललैक जे रघुनी गागोरी राजाक लगान नहि देने अछि। से ओ राजा लग गेल आ कहलक जे रघुनी ने तँ अपने लगान देने अछि आ उनटले लोक सभकेँ लगान देबासँ मना कए रहल अछि। गाम पर रघुनी नहि रहए आ सिपाही सभ ओकर भाए देवदत्त मरड़केँ लए विदा भए गेलाह। रस्तामे केजरीडीह लग देवदत्त रघुनीकेँ देखलन्हि, रघुनी सेहो देवदत्तकेँ देखलन्हि। मुदा सिपाही सभ रघुनीकेँ नहि देखि सकलाह। मुदा जखन राजा देवदत्तकेँ काल कोठरीमे दए सिपाही सभकेँ ओकरा मारबाक लेल कहलक तँ जे कोड़ा चलबय उनटे तकरे चोट लागए। राजा देवदत्तसँ कहलक जे गलती भेल आब अहाँ जे कहब सैह हम करब। देवदत्तक कहला अनुसार जे रैयत लगान नहि भरलाक कारणसँ जहलमे रहथि से छोड़ि देल गेलाह आ राजा रघुनी मररसँ सेहो घट्टी मँगलन्हि। जट-जटिन महाराज सिव सिंह (१४१२-१४४६) मिथिलाक राजा छलाह। विद्यापति हुनके शासनकालमे भेल छलाह आ राजा शिव सिंह आ हुनकर रानी लखिमारानी हुनकासँ बड़ प्रेम करैत रहथि। एक टा जयट वा जट नाम्ना बड़ पैघ संगीतकार सेहो छलाह ओहि समयमे। राजा शिव सिंह हुनकासँ विद्यापतिक गीतकेँ राग-रागिनीमे बन्हबाक लेल कहने रहथि। वैह जयट जट-जटिन नाटकक रचना कएलन्हि आ जटक भूमिका सेहो कएने छलाह। साओन-भादवक शुक्ल-पक्षक रातिमे ई नाटक स्त्रीगण द्वारा होइत अछि। जट छथि पहिरने पुरुष-परिधान आ जटिन पहिरने छथि छिटगर नूआ। आ देखू दुनू गोटे अपना संग अपन-अपन संगीकेँ लए आबि गेल छथि। बियाहक पहिल सालक साओन। जटिन जाए चाहैत छथि नैहर मुदा धारमे बाढ़ि छै, हे माय कोनो नौआ-ठाकुर-ब्राह्मण आकि पैघ भाए केर बदलामे छोटका भायकेँ पठबिहँ बिदागरीक लेल नञि तँ सासुर बला सभ बिदागरी आपिस कए देत। जाहि नवकनियाँकेँ नैहर नहि जाय देल गेल ओ अपन पतिकेँ कहैत छथि जे जट-जटिनक नृत्यमे तँ भाग लेबए दिअ। मुदा वर झूमर खेलएबासँ मना कए दैत छथि तखन ओ घामक बहन्ना बनाए दूर भए जाइत छथि। जट-जटिन बीचमे छथि आ दुनूक संगीमे बहस चलि रहल अछि। -चलू झूमर खेलाए। -कोन पातपर चढ़ि कए। -पुरैनीक। जट-जटिनमे विआह होए बला अछि मुदा जट किछु बातपर अड़ि गेल, जेना धानक शीस जेकाँ लीबि कए चलए जटिन, किछु देखावटी विरोधक बाद जटिन सभटा मानि जाइत छथि। फेर दुनू गोटे विआह कए लैत छथि। फेर भोर होइत अछि, जटिन कहैत छथि जे जाए दिअ। अँगना बहारबाक अछि मुदा जटा कहैत छथि जे अँगना माए-बहिन बहारि लेत। फेर दिन बितैत अछि तँ जटिन कहैत छथि जे गहना किएक नहि बनबाए रहल छी हमरा लेल आर बहन्ना करब तँ हम सोनारक घर चलि जाएब। जटिन ततेक खरचा करबैत छन्हि जे जटाक हाथी तक बिका जाइत छन्हि आ हाथीक सिकड़ि मात्र बचल रहि जाइत छन्हि। जटिन कहैत छथि जे हमरा नैहर जएबाक अछि तँ जटा कहैत छथि जे धानक फसिल तैयार अछि, तकरा काटि कए जाऊ। जटिन नहि मानैत छथि कहैत छथि जे एहि बेर जे हम जाएब तँ घुरि कए नहि आएब। मुदा सौतिनक गप सुनि कए डेराए जाइत छथि। बीचमे स्वांग जेना कोनो रोगीक इलाज आदि सेहो होइत रहैत अछि। जट मोरंग बिदा भए जाइत छथि कमाएबा लेल। जटिनकेँ सोनार प्रलोभन दैत छन्हि गहनाक मुदा जटिन जटाक सुन्दरताक वर्णन करैत छथि। फेर जटा घुरि अबैत अछि। एक दिन दुनू गोटेमे कोनो गप लऽ कए झगड़ा भए जाइत छन्हि। जट छौँकीसँ जटिनकेँ छूबि दैत छथि। जटिन रूसि कए घर छोड़ि दैत छथि। जटा गोपी, मनिहारिन आ आन-आन रूप धरि ताकैत छथि हुनका। जटाक घरमे झोल-मकड़ा भरि जाइत छन्हि आ अंगनामे दूभि जनमि जाइत छन्हि। तखन जटिन हुनका लग आबि जाइत छथि। फेर स्त्रीगण लोकनि बेंग सभकेँ एकटा खद्धा खुनि कए ओहिमे दए दैत छथि आ ऊपरसँ ओकरा कूटैत छथि आ मरल बेंगकेँ झगराहि स्त्रीक दरबज्जापर फेकि अबैत छथि। ओ स्त्री भोरमे मरल बेंगकेँ देखला उत्तर जतेक गारि पढ़ैत छथि, ततेक बेशी बरखा होइत अछि। बत्तू एकटा बकड़ी छलि। ओकरा एकटा बच्चा भेलैक। मुदा ओ छागर मात्र ४ मासक छल आकि दुर्गापूजा आबि गेल। दुर्गापूजामे छागरक बलि देबाक कियो कबुला केने छलाह। से बकड़ीक मालिकक लग आबि छागरक दाम-दीगर केलन्हि। संगमे पाइ नहि अनने छलाह से अगिला दिन पाइ अनबाक आ छागर लए जएबाक गप कए चलि गेलाह। बकड़ी ई सभ सुनैत छलि ओ अपन बच्चाकेँ कहलन्हि जे भागि जाऊ जंगल दिस नहि तँ ई मलिकबा काल्हि अहाँकेँ बेचि देत आ किननहार दुर्गापूजामे अहाँक बलि दए देत। छागर राता-राती जंगल भागि गेल। २-३ साल ओ जंगलमे बितेलक, मोट-सोट बत्तू भए गेल, पैघ दाढ़ी आ सिंघ भए गेलैक ओकरा। एक दिन घुमैत-घुमैत ओ दोसर जंगलमे चलि गेल। ओतए एकटा बाघ छल, बत्तू बाघकेँ देखि कए घबड़ा गेल। बाघ सेहो एहन जानवर नहि देखने छल, से ओ अपने डरायल छल। ओ पुछलक- नामी नामी दाढ़ी- मोंछ भकुला, कहू कतएसँ अबैत छी, नञि तँ देव ठकुरा। बत्तू कहलक- अर्चुन्नी खेलहुँ गरचुन्नी खेलहुँ, सिंह खेलहुँ सात। आ जहिया दस बाघ नञि होए, तहिया परहुँ ठक दए उपास। ई सुनि बाघ पड़ाएल। मुदा रस्तामे नढिया सियार ओकरा भेटलैक आ कहलकैक जे अहाँ अनेरे डराइत छी। चलू आइ तँ नीक मसुआइ होएत। ओ तँ बकड़ीक बच्चा अछि। बाघ डराएल छल से ओ सियारक पएरमे पएर बान्हि ओतए जएबा लेल तैयार भए गेल। आब बत्तू जे दुनूकेँ अबैत देखलक तँ बुझि गेल जे ई सियरबाक काज अछि। मुदा ओ बुद्धिसँ काज लेलक। कहलक- “ऐँ हौ, तोरा दू टा बाघ आनए ले कहलियहु आ तोँ एकेटा अनलह”। ई सुनैत देरी बाघ भागल आ सियरबा घिसिआइत मरि गेल। भाट-भाटिन एकटा छल भाट आ एकटा छलि भाटिन। भाटिन एकटा मणिधारी गहुमनसँ प्रेम करैत छलि। ओ साँप लेल नीक निकुत बनबैत छलि आ भाटकेँ बसिया-खोसिया दैत छलि। भाट दुबर-पातर होइत गेल। मुदा भाटिन ओकरा जिबए नहि दए चाहैत छलि से ओ साँपकेँ कहलक भाटकेँ काटि लेबाक लेल। आब साँप भाटकेँ काटए लेल ताकिमे रहए लागल। एक दिन जखन भाट धारमे पएर धोबए लेल पनही खोलि कए रखलक तखने साँप ओकर पनहीमे नुका गेल। भाट आएल आ पहिरबाक पहिने पनही झारलक तँ ओ साँप खसि पड़ल। भाट पनहीसँ मारि-मारि कए साँपक जान लऽ लेलक आ ओकरा मारि कए वरक गाछपर लटका देलक। भाट जखन गामपर पहुँचल तखन ओ अपन कनियाँकेँ सभटा खिस्सा सुनेलक। आब भाटिनक तँ प्राण सुखा गेलैक। ओ भाटक संग वरक गाछ लग गेल आ अपन प्रेमी साँपकेँ मरल देखि कए बेहोश भऽ गेल। भाट ओकरा गामपर अनलक। भाटिन दुखी भऽ असगरे वरक गाछपरसँ साँप उतारि ओकरा नौ टुकड़ा कए घर आनि लेलक। भाटिन साँपक चारि टा टुकड़ी चारू खाटक पाइसक नीचाँ, एकटा मचियाक नीचाँ, एकटा तेलमे, एकटा नूनमे, एकटा डाँरमे आ एकटा खोपामे राखि लेलक। फेर भाटकेँ कहलक जे खाट, मचिया, नून-तेल, डाँर आ खोपामे की अछि से बता नहि तँ भकसी झोका कए मारबौक। भाट नहि बता सकल आ ओ कहलक जे मरएसँ पहिने ओ बहिनसँ भेँट करए चाहैत अछि आ ताहि लेल दू दिनुका मोहलति ओकरा चाही। भाट अपन बहिन लग गेल तँ ओ अपन भाइक औरदा जोड़ि रहल छलि। सभ गप जखन ओकरा पता चललैक तखन ओ कहलक जे ओहो संग चलत ओकर। रस्तामे एकटा धर्मशालामे रातिमे दुनू भाइ-बहिन रुकल मुदा बहिन चिन्ते सुति नहि सकल। तखने धर्मशालाक सभटा दीआ एक ठाम आबि कए गप करए लागल। भाटक बहिनक कोठलीक दीआ कहलक जे भाटिन अपन वर भाटकेँ मारए चाहैत अछि आ ओ जे फुसियाहीक प्रहेलिका बनेने अछि, से ओकर प्रेमी जे मरल गहुमन छल तकरा ओ टुकड़ी कए ठाम-ठाम राखि देने अछि आ तकरे प्रहेलिका बना देने अछि। आब भोरमे जखन दुनू भाइ बहिन गामपर पहुँचए जाइ गेल तँ बहिन अपन भौजीकेँ कहलक जे ओ सेहो प्रहेलिका सुनए चाहैत अछि। भाटिन कहलक जे ज्योँ ओ प्रहेलिका नञि बुझि सकल तखन ओकरो भकसी झोँका कऽ ओ मारि देत। तखन ननदि कहलक जे यदि ओ प्रहेलिकाक उत्तर दए देत तखन भौजीकेँ भकसी झोका कए मारि देत। आब जखने भाटिन प्रहेलिका कहलक तखने बहिन सभटा टुकड़ी निकालि-निकालि कऽ सोझाँ राखि देलक आ भौजीकेँ भकसी झोका कऽ मारि देलक। गांगोदेवीक भगता गांगोदेवी मलाहिन छलीह। एक दिन हुनकर साँए, अपन भाय आ पिताक संग माछ मारए लेल गेलाह। साओनक मेला चलि रहल छलैक आ मिथिलामे साओनमे माँछ खएबा आकि बेचएपर तँ कोनो मनाही छै नहि। गांगोदेवीक वर सोचलन्हि जे आइ माछ मारि हाटमे बेचब आ साओनक मेलासँ गांगो लेल चूड़ी-लहठी आनब। धारमे तीनू गोटे जाल फेकलन्हि सरैया पाथलन्हि मुदा बेरू पहर धरि डोका, हराशंख आ सतुआ मात्र हाथ अएलन्हि। आब गांगोक वर अपन कनियाँक नाम लए जाल फेकि कहलन्हि जे ई अन्तिम बेर छी गांगो। एहि बेर जे माँछ नहि आएल तँ हमरा क्षमा करब। आब भेल ई जे एहि बेर जाल माँछसँ भरि गेल। जाल घिंचने नहि घिंचाए। सभटा माँछ बेचि कए गांगो लेल लहठी-चूड़ीक संग नूआ सेहो कीनल गेल। अगिला दिन गांगोक वर गांगोक नाम लए जाल फेंकलन्हि तँ फेर हुनकर जाल माँछसँ भरि गेलन्हि मुदा हुनकर भाइ आ बाबूक हिस्सा वैह डोका-काँकड़ु अएलन्हि। ओ लोकनि खोधिया कए एकर रहस्य बूझि गेलाह फेर ई रहस्य सौँसे मिथिलाक मलाह लोकनिक बीच पसरि गेल। गांगोदेवीक भगता एखनो मिथिलाक मलाह भैया लोकनिमे प्रचलित अछि। सभ जाल फेंकबासँ पहिने गांगोक स्मरण करैत छथि। बड़ सुख सार पाओल तुअ तीरे मिथिलाक राजाक दरबारमे रहथि बोधि कायस्थ। राजा दरमाहा देथिन्ह ताहिसँ गुजर बसर होइत छलन्हि बोधि कायस्थक। दोसाराक प्रति हिंसा, दोसरक स्त्री वा धनक लालसा एहि सभसँ भरि जन्म दूर रहलाह बोधि कायस्थ। आजीविकासँ अतिरिक्त जे राशि भेटन्हि से दान-पुण्यमे खरचा भऽ जाइत छलन्हि। भोलाबाबाक भक्त छलाह। जेना सभकेँ बुढ़ापा अबैत छै तहिना बोधि कायस्थक मृत्यु सेहो हुनकर निकट अएलन्हि आ ओ घर-द्वार छोड़ि गंगा-लाभ करबाक लेल घरसँ निकलि गेलाह। जखन गंगा धार अदहा कोसपर छलीह तखन परीक्षाक लेल बोधि कायस्थ गंगाकेँ सम्बोधित कए अपनाकेँ पवित्र करबाक अनुरोध कएलन्हि। गंगा माय तट तोड़ि आबि बोधि कायस्थकेँ अपनामे समाहित कएलन्हि। बोधि कायस्थकेँ सोझे स्वर्ग भेटलन्हि। बोधि कायस्थ विद्यापतिसँ पूर्व भेल छलाह कारण ई घटना विद्यापति रचित संस्कृत ग्रंथ पुरुष-परीक्षामे वर्णित अछि। फेर विद्यापति अपन मैथिली पद बड़ सुख सार पाओल तुअ तीरे लिखलन्हि- आ बोधि-कायस्थ जेकाँ गंगा लाभ कएलन्हि। छेछन डोम जातिक लोकदेवता छेछन महराज बड्ड बलगर छलाह। मुदा हुनकर संगी साथी सभ कहलकन्हि जे जखन ओ सभ सहिदापुर गेल छलाह, बाँसक टोकरी आ पटिया सभ बेचबाक लेल, तखन ओतुक्का डोम सरदार मानिक चन्दक वीरता देखलन्हि। ओ एकटा अखराहा बनेने रहथि आ ओतए एकटा पैघ सन डंका राखल रहए। जे ओहि डंकापर छोट करैत छल ओकरा मानिकचन्दक पोसुआ सुग्गर, जकर नाम चटिया छल, तकरासँ लड़ए पड़ैत छलैक। मानिकचन्द प्रण कएने रहथि कि जे क्यो चटियासँ जीति जाएत से मानिकचन्दसँ लड़बाक योग्य होएत आ जे मानिकचन्दकेँ हराएत से मानिकचन्दक बहिन पनमासँ विवाहक अधिकारी होएत। मुदा ई मौका आइ धरि नहि आएल रहए जे क्यो चटियाकेँ हरा कए मानिकचन्दसँ लड़ि सकितए। दिन बितैत गेल आ एक दिन अपन पाँच पसेरीक कत्ता लए छेछन महराज सहिदापुर दिश विदा भेलाह। डंकापर चोट करबासँ पहिने छेछन महराज एकटा बुढ़ीसँ आगि माँगलन्हि आ अपन चिलममे आगि आ मेदनीफूल भरि सभटा पीबि गेलाह आ झुमैत डंकापर चोट कए देलन्हि। मानिकचन्द छेछनकेँ देखलन्हि आ चटियाकेँ शोर केलन्हि। चटिया दौगि कए आएल मुदा छेछनकेँ देखि पड़ा गेल। तखन पनमा आ मानिकचन्द ओकरा ललकारा देलन्हि तँ चटिया दौगि कय छेछनपर झपटल मुदा छेछन ओकर दुनू पएर पकड़ि चीरि देलन्हि। फेर मनिकचन्द आ छेछनमे दंगल भेल आ छेछन मानिकचन्दकेँ बजारि देलन्हि। तखन खुशी-खुशी मानिकचन्द पनमाक बियाह छेछनक संग करेलन्हि। दिन बितैत गेल आ आब छेछन दोसराक बसबिट्टीसँ बाँस काटए लगलाह। एहिना एक बेर यादवक लोकदेवता कृष्णारामक बसबिट्टीसँ ओ बहुत रास बाँस काटि लेलन्हि। कृष्णाराम अपन सुबरन हाथीपर चढ़ि अएलाह आ आमक कलममे छेछनकेँ पनमा संग सुतल देखलन्हि। सुबरन पाँच पसेरीक कत्ताकेँ सूढ़सँ उठेलक आ छेछनक गरदनिपर राखि देलक आ अपन भरिगर पएर कत्तापर राखि देलक। गरीबन बाबा कमला कातक उधरा गाममे तीनटा संगी रहथि। पहिने गामे-गामे अखराहा रहए, ओतए ई तीनू संगी कुश्ती लड़थि आ पहलमानी करथि। बरहम ठाकुर रहथि ब्राह्मण, घासी रहथि यादव आ गरीबन रहथि धोबि। अखराहा लग कमला माइक पीड़ी छल। एक बेर गरीबनक पएर ओहि पीड़ीमे लागि गेलन्हि, जाहिसँ कमला मैय्या तमसा गेलीह आ इन्द्रक दरबारसँ एकटा बाघिन अनलन्हि आ ओकरासँ अखराहामे गरीबनक युद्ध भेल। गरीबन मारल गेलाह। गरीबनकेँ कमला धारमे फेंकि देल गेलन्हि आ हुनकर लहाश एकटा धोबिया घाटपर कपड़ा साफ करैत एकटा धोबि लग पहुँचल। हुनका कपड़ा साफ करएमे दिक्कत भेलन्हि से ओ लहाशकेँ सहटारि कए दोसर दिस बहा देलन्हि। एम्हर गरीबनक कनियाँ गरीबनक मुइलाक समाचार सुनि दुखित मोने आर्तनाद कए भगवानकेँ सुमिरलन्हि। आब भगवानक कृपासँ गरीबनक आत्मा एक गोटेक शरीरमे पैसि गेल आ ओ भगता खेलाए लागल। भगता कहलन्हि जे एक गोटे धोबि हुनकर अपमान केलन्हि से ओ शाप दैत छथिन्ह जे सभ धोबि मिलि हुनकर लहाशकेँ कमला धारसँ निकालि कए दाह-संस्कार करथि नहि तँ धोबि सभक भट्ठीमे कपड़ा जरि जाएत। सभ गोटे ई सुनि धारमे कूदि लहाशकेँ निकालि दाह संस्कार केलन्हि। तकर बादसँ गरीबन बाबा भट्ठीक कपड़ाक रक्षा करैत आएल छथि। लालमैन बाबा नौहट्टामे दू टा संगी रहथि मनसाराम आ लालमैन बाबा। दुनू गोटे चमार जातिक रहथि आ संगे-संगे महीस चराबथि। ओहि समयमे नौहट्टामे बड्ड पैघ जंगल रहए, ओतहि एक दिन लालमैनक महीसकेँ बाघिनिया घेरि लेलकन्हि। लालमैन महीसकेँ बचबएमे बाघिनसँ लड़ए तँ लगलाह मुदा स्त्रीजातिक बाघिनपर अपन सम्पूर्ण शक्तिक प्रयोग नहि केलन्हि आ मारल गेलाह। मनसारामकेँ ओ मरैत-मरैत कहलन्हि जे मुइलाक बाद हुनकर दाह संस्कार नीकसँ कएल जाइन्हि। मुदा मनसाराम गामपर ककरो ई गप नहि कहलन्हि। एहिसँ लालमैन बाबाकेँ बड्ड तामस चढ़लन्हि आ ओ मनसारामकेँ बका कऽ मारि देलन्हि। फेर सभ गोटे मिलि कए लालमैन बबाक दाह संस्कार कएलन्हि आ हुनकर भगता मानल गेल। एखनो ओ भगताक देहमे पैसि मनता पूरा करैत छथि। गोनू झा आ दस ठोप बाबा मिथिला राज्यमे भयंकर सुखाड़ पड़ल। राजा ढ़ोलहो पिटबा देलन्हि, जे जे क्यो एकर तोड़ बताओत ओकरा पुरस्कार भेटत। एकटा विशालकाय बाबा दस टा ठोप कएने राजाक दरबारमे ई कहैत अएलाह जे ओ सय वर्ष हिमालयमे तपस्या कएने छथि आ यज्ञसँ वर्षा करा सकैत छथि। साँझमे हुनका स्थान आ सामग्री भेटि गेलन्हि। गोनू झा कतहु पहुनाइ करबाक लेल गेल रहथि। जखन साँझमे घुरलाह तखन कनिञाक मुँहसँ सभटा गप सुनि आश्चर्यचकित हुनका दर्शनार्थ विदा भेलाह। एम्हर भोर भेलासँ पहिनहि सौँसे सोर भए गेल जे एकटा बीस ठोप बाबा सेहो पधारि चुकल छथि। आब दस ठोप बाबाक भेँट हुनकासँ भेलन्हि तँ ओ कहलन्हि- “अहाँ बीस ठोप बाबा छी तँ हम श्री श्री १०८ बीस ठोप बाबा छी। कहू अहाँ कोन विधिये वर्षा कराएब”। “हम एकटा बाँस रखने छी जकरासँ मेघकेँ खोँचारब आ वर्षा होएत”। “ओतेक टाक बाँस रखैत छी कतए”। “अहाँ एहन ढोंगी साधुक मुँहमे”। आब ओ दस ठोप बाबा शौचक बहन्ना कए विदा भेला। “औ। अपन खराम आ कमण्डल तँ लए जाऊ”। मुदा ओ तँ भागल आ लोक सभ पछोड़ कए ओकर दाढ़ी पकड़ि घीचए चाहलक। मुदा ओ दाढ़ी छल नकली आ ताहि लेल ई नोचा गेल। आ ओ ढ़ोंगी मौका पाबि भागि गेल। तखन गोनू झा सेहो अपन मोछ दाढ़ी हटा कए अपन रूपमे आबि गेलाह। राजा हुनकर चतुरताक सम्मान कएलन्हि। संकर्षण (नाटक) (एक-एक अंकक दू कल्लोल आ दू-दू अंकक तीनटा कल्लोल- माने पाँच कल्लोलक अन्तर्गत आठ अंकक मैथिली नाटक) पात्र परिचय संकर्षण- अभिनेता आ खलनायक दुनू- लिकलिक करैत भूत सन कारी रंग, कतेक कारी से ओहि खापड़िकेँ देखि लिअ ततेक। संकर्षणक बाबू संकर्षणक कनियाँ भाष्कर भाष्करक बाबूजीक संगी बंगाली बाबू कलक्टर कलक्टरक स्टेनो तीन टा कारी कुकूर- एकर अभिनय तीन गोटे कारी कपड़ा पहिड़ि कऽ सकैत छथि एकटा हलवाई- मधुरक दोकानक मालिक हिनका लग मिठाई छनबाक कराह, बड़का मोटगर बड़दामी, एकटा मोटगर लाठी आ एक गोटे कर्मचारी रहतन्हि तँ हिनका अभिनयमे सुविधा हेतन्हि। हलवाई जीक कर्मचारी लुत्ती झा तखन अबस्से एकटा शिवलिंग-मन्दिर, फेर कनेक उजरा दूध- चूनकेँ घोरि बना सकैत छी। एकटा पुजेगरी आ बड़ रास भक्त- किछु गोटे दर्शककेँ बजा कए सम्मिलित सेहो कए सकैत छी। गोनर भाइ नित्या काका जयराम लाल काका लाल काकी घटक दू टा पुलिस आ एकटा ओकर अफसर एकटा बूढ़ी- ट्रेनक पसिन्जर चोर बजारक दोकानदार, बजारमे आन दोकानदार आ भीड़-भरक्का पहिल कल्लोल- पहिल अंक (गाम। लगक जिला कार्यालय जतए गामक लोकक आँखिमे दुनियाँक सभसँ पैघ हाकिम कलक्टर बैसैत छथि। जकरा अभिनेता-अभिनेत्री कालिदासक “इति शरसंधानं नाटयति” जेकाँ सांकेतिक रूपमे देखा सकैत छथि। बादमे ट्रेनक यात्राक आ दिल्ली नगरक वर्णन सेहो अहिना कऽ सकैत छथि।) (भाष्कर अपन दलानपर बैसल छथि आकि ओम्हरसँ संकर्षण अबैत छथि।) संकर्षण: भाष्कर भाइ, सुनलहुँ कोनो काज अटकल अछि। भाष्कर: हँ भाइ। कलक्टर ऑफिसमे एकटा काज ओझरायल अछि। संकर्षण: कोनो काज पड़लापर हमरासँ कहब। कलक्टरक ओहिठाम भोर-साँझक बैसारी होइत अछि हमर। घंटाक-घंटा बैसल रहैत छी, आबए लगैत छी तँ रोकि कऽ फेर बैसा लैत अछि, दोसर-दोसर गप सभ शुरू कए दैत अछि। भाष्कर: ठीक छैक भाइ जी। कोनो जरूरी पड़त तँ कहब। नाम की छन्हि हुनकर सेहो नहि बुझल अछि हमरा। संकर्षण: बड्ड नमगर नाम छन्हि, भा.प्र.से. प्रशांत। आब भा.प्र.से. केर पूर्ण रूप हुनकासँ के पुछतन्हि, से प्रशांते कहैत छन्हि। भाष्कर: भारतीय प्रशासनिक सेवाक संक्षिप्त रूप छैक भा.प्र.से., ई हुनकर नामक अंग नहि हेतन्हि। संकर्षण: अच्छा तँ फेर सैह होयतैक। ताहि द्वारे नेम-प्लेट पर नामक नीचाँमे ई लिखल रहैत छैक, भा.प्र.से.। भाष्कर: ठीक छैक भाइ जी। कोनो जरूरी पड़त तँ अहाँकेँ कहब। (संकर्षण चलि जाइत छथि आ भाष्कर सोचए लगैत छथि जे परुकाँ जखन एकटा आन काज संकर्षणसँ पड़ल रहए तँ ओ की कहने रहथि, भाष्कर सोचिते छथि आकि कनेक दूरमे पछुलका गपक वर्णनक लेल नाटकक निर्देशक संकर्षणकेँ मंचपर कनेक दोसर कात बजा लैत छथि।) भाष्कर: (मोनहि मोन) ईहो कमाल छथि परुकाँ जे काज पड़ल रहए तँ बजैत रहथि जे... संकर्षण: परुकाँ साल किएक नहि कहलहुँ, ककर-ककर काज नहि करएलहुँ। मुदा एहि बेर तँ कोनो जोगारे नहि अछि। कहियो कोनो काज नहि कहने छलहुँ आ आइ कहलहुँ तँ हमरासँ नहि भऽ पाबि रहल अछि। आ से जानि कचोट भऽ रहल अछि। (संकर्षण फेर चलि जाइत छथि, भाष्कर सेहो जाइत छथि मुदा तखने संकर्षण फेर अबैत छथि।) संकर्षण: सत्यार्थीक बाल-बच्चा सभ बड़ टेढ़। कहियो घुरि कए नहि आयल छल भेँट करए। आ आइ काज पड़ल छैक तखन आयल अछि। (संकर्षण फेर चलि जाइत छथि, भाष्कर तखने अबैत छथि।) भाष्कर: (एकटा पुरान गप सोचैत- बाबूजीक संगी एक दिन वात्सल्यसँ एक बेर कोनो बङ्गाली बाबूकेँ, भाष्करक सोँझामे एक गोट बड़ नीक गप कहने छलाह।) भाष्करक बाबूजीक संगी: (मंचक दोसर कात कोनो बंगाली बाबूकेँ भाष्करकेँ देखबैत आ कहैत) देखू दादा। ई छथि भाष्कर। हमर अत्यंत प्रिय मित्र सत्यार्थीक बेटा। बंगाली बाबू: हुनकर बेटा तँ बड्ड छोट छल। भाष्करक बाबूजीक संगी: यैह छथि। अहाँ बड्ड दिन पहिने देखने छलियन्हि तखन छोट छलाह, आब पैघ भए गेल छथि। कहैत छलहुँ जे हिनकर पिता हिनका लेल किछु नहि छोड़ि गेलाह। मुदा हमर पिताक मृत्यु १९६० ई. मे भेल छल आ हमरा लेल ओ नगरमे १२ कट्ठा जमीन, एकटा घर आ एकटा स्कूटर ओहि जमानामे छोड़ि गेल छलाह। आ आब ज्योँ ई बच्चा ककरो लग कोनो काजक लेल जायत, तँ एकरा उत्तर भेटतैक जे परुकाँ किएक नञि अएलहुँ आ परोछमे कहतन्हि, जे काज पड़लन्हि तखन आयल छथि। बंगाली बाबू: ई तँ गलत बात। भाष्करक बाबूजीक संगी: मुदा एकरा जखन समस्या पड़लैक तखने अहाँकेँ पुछबाक चाही छल, मुदा से तँ अहाँ नहि पुछलियन्हि। आ अहाँक लग आयल अछि, तखन अहाँ उल्टा गप करैत छी। आ ज्योँ ई बच्चा सहायताक लेल नहि जायत आ अपन काज स्वयं कए लेत आ ओहि श्रीमानकेँ से सुनबामे आबि जएतन्हि, तँ उपकरि कए अओताह आ पुछथिन्ह जे काज भऽ गेल आकि नहि। कहलहुँ किएक नहि। आ तखन ई बच्चा कहत जे काज भऽ गेल, भगवानक दया रहल। से दादा क्यो कोनो काजक लेल आबए तँ बुझू जे कुमोनसँ आयल अछि आ समस्या भेले उत्तर आयल अछि आ तेँ ओकर सहायता करू। (भाष्करक बाबूजीक संगी आ बंगाली बाबू चलि जाइत छथि। भाष्कर सेहो चलि जाइत छथि।) पहिल कल्लोलक दोसर अंक (कलक्टरक ऑफिस। कलक्टरक चेम्बर। बाहर स्टेनो बैसल, मंचपर दोसर कातमे स्थान दऽ दियन्हु। भाष्कर कलक्टरसँ किछु गप कऽ रहल छथि। दू टा कुरसी तेना कऽ राखि दियौक जे भाष्कर जी आबथि तँ कलक्टरक मुँह सोझाँ पड़न्हि मुदा भाष्करक पीठ देखा पड़न्हि, मुँह नहि। भाष्कर कोनो काजे कलक्टरक ऑफिस गेल छथि। गपशप भइए रहल छन्हि आकि संकर्षण धरधड़ाइत चैम्बरमे अबैत छथि।) कलक्टर: (तमसा कए) बाहर जाऊ देखैत नहि छी गप भऽ रहल अछि। (संकर्षण बाहर रूमसँ निकलि स्टेनोक कक्षमे बैसि रहलाह। १०-१५ मिनटक बाद- जरूरी नहि एतेक काल भाष्कर आ कलक्टर गप करथि, घड़ी देखि १०-१५ मिनट १५ सेकेन्डमे खतम कएल जा सकैत अछि। जखन भाष्कर बाहर निकललाह तँ स्टेनोक रूमसँ संकर्षण बहराइत छलाह। एहि बेर संकर्षणक पीठ भाष्करक सोझाँ छलन्हि आ ताहि द्वारे एहि बेर सेहो दुनू गोटेमे सोझाँ-सोँझी नहि भऽ सकल। तखने पटाक्षेप करबाऊ । पटाक्षेपक बाद गामपर दुनू गोटे पहुँचैत देखल जाइत छथि) भाष्कर: कहू संकर्षण। कतएसँ आबि रहल छी। संकर्षण: ओह। की कहू कलक्टर साहेब रोकि लेलन्हि। ओतहि देरी भऽ गेल। भाष्कर: हुनकर स्टेनोसँ सेहो भेँट भेल रहय? संकर्षण: नहि। ओना बहरएबाक रस्ता स्टेनोक प्रकोष्ठेसँ छैक। मुदा ओ सभ तँ डरे सर्द रहैत अछि। (तखन भाष्करकेँ नहि रहल गेलन्हि आ एकटा खिस्सा सुनबए लगलाह ओ संकर्षणकेँ। आब एतए कारी वस्त्र पहिरने तीन टा अभिनेता भों-भों करैत जेना कुकुर होथि, मंचक दोसर कात आबि जाइत छथि।) भाष्कर: संकर्षण। सुनू, एकटा खिस्सा सुनबैत छी। तीन टा कारी कुकुर छल। एके रङ-रूपक। ओकरा सभकेँ मोन भेलैक जे गरमा-गरम जिलेबी मधुरक दोकान जा कए खाइ। से बेरा-बेरी ओतए जएबाक प्रक्रम शुरू भऽ गेल। (खिस्सा शुरू होइते भाष्कर आ संकर्षण मंच सँ हटि जाइत छथि। बीच-बीचमे भाष्करक अबाज मंचक पाछाँसँ अबैत अछि।) भाष्कर: (मंचक पाछाँसँ) पहिने पहिल कुकुर पहुँचल ओहि दोकान पर। (मधुरक दोकान। मालिक अपन कर्मचारी संगे झाँझसँ जिलेबी छानि रहल छथि। तखने मालिक देखलनि जे कुकुर दोकानमे पैसि रहल अछि, से बटखरा फेंकि कए ओकरा मारलक। पहिल कुकुर-बेचाराकेँ बड़ चोट लगलैक। मुदा जखन घुरि कए गाम पर- माने मंचक दोसर कात अपन दोसर दुनू संगी लग पहुँचल तँ पुछला पर सुनू की कहलक।) दोसर कुकुर: की भाइ केहन रहल। तेसर कुकुर: बड्ड अगराइत चलैत आबि रहल छी। पहिल कुकुर: (पीठपर बटखराक चोटपर हाथ दैत) एह की कहू। बड़ सत्कार भेल। बटखरासँ जोखि कए जिलेबी खएबाक लेल भेटल। बटखरासँ जोखैत गेल, दैत गेल, पैघ बटखरा, छोट बटखरा, सभसँ जोखि-जोखि दैत गेल। दोसर कुकुर: तखन हमहीं किएक पाछाँ रहब सत्कार कराबएमे। (आब दोसर कुकुर अपनाकेँ रोकि नहि सकल आ अपन सतकार करएबाक हेतु पहुँचि गेल मधुरक दोकान पर। रूप-रङ तँ एके रङ रहए ओकरा सभक, से मधुरक दोकानक मालिककेँ भेलैक जे वैह कुकुर फेरसँ आबि गेल अछि। ओ पानि गरम कए रहल छल।) मधुरक दोकानक मालिक: (भरि टोकना धीपल पानि ओहि कुकुरक देह पर फेकैत) देखू ई फेर आबि गेल। पछिला बेर बटखारा फेंकि कए मारलियैक तकर बाद जे आएल तँ यैह टा ने उपाए बाँचल रहए। (बेचारा कुकुर जान बचा कए भागल। आब गाम पर- माने मंचक दोसर कात पहुँचला पर ओकरा तेसर कुकुर पुछलकैक-) तेसर कुकुर: केहन सत्कार भेल। दोसर कुकुर: की कहू। (पीठपर गरम पानिसँ जरल स्थानकेँ छुबैत) गरमा-गरम जिलेबी छानि कए खुएलक। बड़ नीक लोक अछि मधुरक दोकानक मालिक। छनैत गेल आ गरमागरम खुआबैत गेल। (तेसर कुकुरक मोन लसफसा जाइत छैक। ओ निकलैत अछि अपन सत्कार कराबए लेल।) तेसर कुकुर: तखन हमहूँ चलैत छी अपन सत्कार कराबए। (दोकानपर हल्ला भऽ रहल छैक जे शिवलिंग दूध पीबि रहल छथि, सोर भऽ रहल अछि।) मधुरक दोकानक मालिकक कर्मचारी लुत्ती झा: महादेव भगवान दूध पीबि रहल छथि, चलू ने कनेक अपनो सभ दूध पिया आबी। मधुरक दोकानक मालिक: सत्ते लुत्ती झा। चलह देखी। (तेसर कुकुर दोकानमे पैसैत अछि आकि मालिक आ लुत्ती झा सटर खसा दैत छैक। बेचारा बन्न भऽ जाइत अछि। मालिक आ लुत्ती झा मन्दिर पहुँचैत छथि, एकटा लोटामे दूध लऽ कए।) मधुरक दोकानक मालिक: (मन्दिर लग भीड़ देखैत) एक्के लोटा दूध अछि, तोँ जेबह आकि हम जाइ। लुत्ती झा: अहीं जाऊ ने। एक्के गप ने छैक। (मालिक दूध चढ़ा कए देखैत छथि, सभटा दूध नाली बाटे बाहर निकलि जाइत छन्हि।) मधुरक दोकानक मालिक: (स्वतः सोचैत बाहर निकलैत) भगवान सभक हाथे दूध पीलन्हि मुदा हम जे सभकेँ कहबैक जे हमरा हाथे नहि पीलन्हि तँ सभ कहत जे हम पापी छी तेँ भगवान हमरा हाथे दूध नहि पीलन्हि। लुत्ती झा: की मालिक। महादेव दूध पीलन्हि। मधुरक दोकानक मालिक: हँ हौ लुत्ती झा। एतेक प्रतिष्ठित जीवन बिता रहल छी से महादेव सभक हाथे दूध पीलन्हि तँ हमरो हाथे पीलन्हि। (दुनू गोटे दोकान खोलैत छथि तँ फेरसँ कारी कुकुर देखैत छथि। मालिकक सौँसे देह पित्त लहरि गेलन्हि।) मधुरक दोकानक मालिक: लुत्ती झा। भागए नहि पाबए ई। दू बेरमे मोन नहि भरलैक। रस्सा ला, लाठी लाबह। (दुनू गोटे रस्सामे बान्हि कऽ कुकुरकेँ लाठीसँ पुष्ट पिटान पिटैत छथि। फेर बेचारा कोहुना बन्हन छोड़ा कऽ लँगड़ाइत गाम दिस पड़ाइत अछि। ओतए पहिल आ दोसर कुकुर छथि।) पहिल कुकुर: अहाँकेँ तँ बड्ड काल लागि गेल, की की सत्कार भेल। दोसर कुकुर: हँ ठीके। बड़ी काल लागल, दोकान तँ बन्न नहि रहए। तेसर कुकुर: बड्ड सत्कार भेल। आबैये नहि दैत रहथि। कहैत रहथि जे आर खाऊ, आर खाऊ। कोहुना कऽ जान बचा कऽ आएल छी जे आब नहि खाएल जएत, पेट फाटि जएत। (लङराइत) देखैत नहि छी जे चलियो नहि भऽ रहल अछि। (तीनू कुकुर जाइत छथि आ भाष्कर आ संकर्षण मंचपर अबैत छथि।) भाष्कर: सुनलियैक संकर्षण ई खिस्सा। से जखन कलक्टर अहांकेँ दबाड़ि रहल छल तखन ओकरा सोझाँ हमही बैसल छलहुँ। हमर पीठ अहाँक सोझाँ छल तेँ अहाँ हमरा नहि देखि सकलहुँ। फेर अहाँ स्टेनोक प्रकोष्ठमे किछु काल बैसलहुँ आ जखन ओतएसँ बाहर निकललहुँ तँ लोक सभकेँ भेल होएतैक, जे अहाँ कलक्टरसँ ओतेक काल धरि गप कए रहल छलहुँ। मुदा कोनो बात नहि। हम ई गप ककरो नहि कहबैक। मुदा आजुक बाद मिथ्या कथनसँ अहाँ अपनाकेँ दूर राखू। (संकर्षण मुँह गोतने बैसल रहलाह।) भाष्कर: आउ, मुरहीक भुज्जा बनबैत छी। (दुनू गोटे भुज्जा फाँकय लगैत छथि।) दोसर कल्लोल पहिल अंक (पुरनका गामक दृश्य। जयराम दौगल-दौगल अबैत छथि। संकर्षण सोझाँ छथि।) जयराम: संकर्षण। नीक भेल भेटि गेलहुँ। नित्या काका लग जाइत रही मुदा ओतए जाइत-जाइत देरी भऽ जएत। ननकिड़बाक मोन बड्ड खराप छैक। बोखार, रद्द-दस्त सभ एक्के-बेर शुरू भऽ गेल छैक। संकर्षण: धुर बताह, पसीझक काँटक रस पिआ ने दहीं। हम जाइत छी महीँस चरेबाक लेल डीह दिशि। कोनो चिन्ता जुनि करब। जुल्मी दबाइ छैक। एक्के चोटमे सभ बेमारी खतम। (संकर्षण एक दिस आ जयराम दोसर दिस जाइत छथि। फेर नित्या काका एक दिससँ आ जयराम दोसर दिससँ अबैत छथि।) नित्या काका: की जयराम? कलम दिससँ की आनि रहल छी। जयराम: की कहू काका। ननकिड़बाकेँ बोखार, रद्द-दस्त सभ एक्के-बेर शुरू भऽ गेल छैक। संकर्षण कहलन्हि जे पसीझक काँटक रस पिआ देबा लेल सभ बेमारी खतम भऽ जएतैक। सैह आनए लेल गेल रही। नित्या कक्का: ई संकर्षण बड़ बुरि अछि। परुकाँ पसीझक काँटक रस पोखरिमे दऽ कए सभटा माँछ मारि देने रहए ई। ई जहर बच्चाकेँ पिएबन्हि तँ मोन ठीक नहि होएतन्हि, सोझे प्राण निकलि जयतन्हि। चलह दबाइ-दोकान दिस, दबाइ दिअबैत छिअह। (दुनू गोटे जाइत छथि आ ओम्हर डीहपर महींसक पीठपर संकर्षण बैसल देखबामे अबैत छथि। दोसर दिससँ एकटा दोसर महिसबार गामपरसँ आबिये रहल छथि।) संकर्षण: की भाइ, गामेपरसँ आबि रहल छी। महिसबार: हँ भाइ। संकर्षण: जयरामक टोलसँ कन्नारोहटो सुनबामे आएल रहए। महिसबार: कन्नारोहट तँ नहि, मुदा डिहबारक स्थानपर पंचैती बैसल अछि, अहाँकेँ बजाबए लेल हम आएल छी। (महिसबार संकर्षणकेँ लेने मंचसँ जाइत छथि। फेर पंच सभक लग सभ फेरसँ अबैत छथि आ संकर्षणपर सभ थू-थू करैत छथि। घोँघाउज होइत अछि आ संकर्षणपर दण्ड सेहो लगैत छन्हि।) संकर्षण: हम अपन घट्टी मानैत छी आ आइ दिनसँ कंठी लऽ रहल छी। दण्ड सेहो काल्हि साँझ धरि दऽ देब। (पटाक्षेप होइत अछि।) दोसर कल्लोल दोसर अंक (संकर्षण भोरे- भोर खेत दिशि कोदारि आ छिट्टा लए बिदा भेल छथि। बुन्ना-बान्नी होइत छल। तखने आरिकेँ तरपैत एकटा पैघ रोहुकेँ देखि कए संकर्षण कोदारि चला देलन्हि। आ रोहु दू कुट्टी भऽ गेल।) संकर्षण: आरौ तोरी के। आब दोसर काज छोड़ी आ गामपर चली। (दुनू ट्कड़ीकेँ छिट्टामे राखि माथ पर उठा कए विदा भेलाह संकर्षण गाम दिशि। तकरा देखि हुनकर समवयस्क गोनर भाए गाम पर जाइत काल गामक बाबा दोगही लग ठमकि कए ठाढ़ भए गेलाह।) गोनर भाइ: (मोनमे सोचैत छथि ) वैष्णव जीसँ रोहु कोना कए लए ली। (प्रत्यक्ष भऽ) यौ संकर्षण भाइ। ई की कएलहुँ। वैष्णव भऽ कए माछ उघैत छी। संकर्षण: रौ गोनर। हमर बतारी छह मुदा तैयो हम तोहर भाइ कोना भेलियह। तोरा बुझल नहि छह जे जतए तोँ ठाढ़ छह से कहबैत छैक बाबा दोगही। एतए जनमलो बच्चा गामक लोकसँ सम्बन्धमे बाबा होइत अछि। गोनर भाइ: ठीके कहलहुँ संकर्षण। मुदा हम कहैत रही जे...... संकर्षण: (गप काटैत) रौ माछ खायब ने छोड़ने छियैक। मारनाइ तँ नञि ने। (अपन सनक मुँह लए गोनर भाइ विदा भए गेलाह। फेर दुनू गोटे मंचसँ जाइत छथि आ फेर अबैत छथि। गोनर झा टेलीफोन डायरी देखि रहल छथि।) संकर्षण: की देखि रहल छी। गोनर झा: टेलीफोन नंबर सभ लिखि कए रखने छी, ताहिमे सँ एकटा नंबर ताकि रहल छी। संकर्षण: आ ज्योँ बाहरमे रस्तामे कतहु पुलिस पूछि देत जे ई की रखने छी तखन। गोनर झा: ऐँ यौ से की कहैत छी। टेलीफोन नंबर सभ सेहो लोक नहि राखय। संकर्षण: से तँ ठीक। मुदा एतेक नंबर किएक रखने छी, ई पुछला पर ज्योँ जबाब नहि देब तँ आतंकी बुझि पुलिस जेलमे नहि धए देत? गोनर झा: से कोना धए देत। एखने हम एहि डायरीकेँ टुकड़ी-टुकड़ी कऽ कए फेंकि दैत छियैक। (गोनर भाइ ओहि डायरीकेँ फाड़ि-फूड़ि कए फेंकि दैत छथि।) तेसर कल्लोल (संकर्षणक बाबू दलानपर बैसल छथि। एक गोट घटक चूड़ा-दही-मधुर सरपेटने जा रहल छथि।) घटक: मीतक चेहरापर जे पानि छन्हि से लोक नञि देखैत अछि। कारी टुहटुह छथि संकर्षण कारी-खटखट नहि। चन्सगर छथि। संकर्षणक बाबू: हे एकटा आर मधुर लियौक ने। घटक: दियौक। यौ लाइन लागि जएत लड़की बलाक। धरफराऊ धरि जुनि। (ओ घटक जाइत छथि आकि दोसर घटक अबैत छथि आ ओहो इशारामे गप करैत चलि जाइत छथि।) संकर्षणक माए: हे एकटा कन्यागत अओताह आइ। लाल काकीक फोन आएल छन्हि दिल्लीसँ। संकर्षणक बाबू: शरबत घोरि कए राखू तखन। कागजी नेबो तँ घटक सभकेँ शरबत पियाबैत-पियाबैत खतम भऽ गेल देखैत छी गाछमे जमीरी नेबो सेहो बाँचल अछि आकि नहि। (मंचसँ सभ जाइत छथि आ बुझना जाइत अछि जे संकर्षण सासुरसँ आएले छथि, कनेक मोट भऽ गेल छथि। गोनर भाइ रस्तामे भेटि जाइत छथिन्ह।) गोनर भाइ: मीत यौ, कनिया केहन छथि, पसिन्न पड़लथि ने। संकर्षण: हँ, हँ जगन्नाथ भाइ। बड़ सुन्दर छथि। हेमामालिनीकेँ देखने छियन्हि? एन-मेन ओहने। गोनर भाइ: अच्छा। संकर्षण: मुदा रंग कनेक हमरासँ डीप छन्हि। (गोनर भाइ मुँह बाबि दैत छथि। दुनू गोटे मंचसँ जाइत छथि आ फेर अबैत छथि। संकर्षण हाथमे लोटा लेने पोखरि दिशि जा रहल छथि तँ गोनर गोबर काढ़ि छथि। बगलमे गोनर भाइक कनियाँ ठाढ़ि रहथिन्ह।) गोनर भाइ: यौ मीत, हमरे जेकाँ अहूँ सभकेँ भोरे-भोर गोबर काढ़य पड़ैत अछि? (संकर्षण देखलन्हि जे गोनरक कनिञा सेहो बगलमे ठाढ़ि छलखिन्ह। से एखन किछु कहबन्हि तँ लाज होएतन्हि। से बिनु किछु कहने आगू बढ़ि गेलाह। जखन घुरलाह तँ.........) संकर्षण: भाइ, पहिने बियाहमे पाइ देबय पड़ैत छलैक, से अहाँकेँ सेहो लागल होएत। ताहि द्वारे ने उमरिगरमे बियाह भेल। गोनर भाइ: हँ से तँ पाइ लागले छल। संकर्षण: मुदा हमरा सभकेँ पाइ नहि देबय पड़ल छल आ ताहि द्वारे गोबरो नहि काढ़य पड़ैत अछि, कारण कनियाँ ओतेक दुलारू नहि छथि ने। (गोनर भाइ मुँह बाबि दैत छथि। दुनू गोटे मंचसँ जाइत छथि आ फेर अबैत छथि।) गोनर भाइ: सर्दमे गुरसँ खूब लाभ होइत छैक, ई ठेही हँटबैत अछि। गूरक चाह पीब मीत। मीत भाए: (स्वगत) किछु दिन पहिने गोनर एहि गपक चर्च कएने छलाह जे ओ जोमनी छोड़्ने छलाह तीर्थस्थानमे आ तैँ जोम खाइत छलाह। हरजे की एहिमे। अधिक फलम् डूबाडूबी। (प्रत्यक्ष) परुकाँ जे पुरी जगन्नाथजी गेल छलहुँ, से कोनो एकटा फल छोड़बाक छल से कुसियार छोड़ि देलहुँ। आ कुसियारेसँ तँ गुर बनैत छैक। चुकन्दरक पातर रसियन चीनी बला चाहे ने पिआ दिअ। (गोनर भाइ मुँह बाबि दैत छथि। दुनू गोटे मंचसँ जाइत छथि आ फेर अबैत छथि। लगैत अछि जे पन्द्रह बरिखक बादक गप अछि। दुनू गोटे उमरिगर भऽ गेल छथि।) संकर्षण: यौ,लोक सभ यौ लोक सभ। लाल काका बियाह तँ करा देलन्हि मुदा तखन ई कहाँ कहलन्हि जे बियाहक बाद बेटो होइत छैक। जबान बेटा घर छोड़ि भागि गेल। आब की करब ? गोनर भाइ: हो नहि हो दिल्लीये गेल होएत। सभ ओतहि जाइत अछि भागि कऽ। संकर्षण: आब बेटाकेँ ताकए लेल आ बेटाक नहि भेटला उत्तर अपना लेल नोकरी तकबाक हेतु हमरो दिल्लीक रस्ता धरए पड़त। (निर्देशक पाछाँ सँ बजैत छथि- दिल्लीक रस्तामे संकर्षणक संग की भेलन्हि हुनकर बुधियारी आकि कबिलपनी काज अएलन्हि वा नहि, एहि लेल कनेक धैर्य राखए पड़त। कारण ट्रेनक सवारी अछि आ मंच कलाकार उत्साहित छथि मुदा देखिनहार थाकल बुझि पड़ैत छथि। पटाक्षेप होइत अछि।) चारिम कल्लोल (ट्रेनक दृश्य। संकर्षण जनकपुरसँ जयनगर अबैत छथि से जनकपुर आ जयनगरक बोर्ड लगा कए मंचित कएल जा सकैत अछि। जयनगर मे ट्रेनपर संकर्षण चढ़ैत छथि । ट्रेन खुजैत अछि आ संकर्षण ट्रेनमे कोनहुना बैसैत छथि।) एकटा बूढ़ी: (संकर्षणसँ) बौआ कनेक सीट नञि छोड़ि देब। संकर्षण: माँ। ई बौआ नहि। बौआक तीन टा बौआ। (बूढ़ी मुँह बाबि लैत छथि। ट्रेन आगाँ बढ़ैत अछि अलीगढ़मे पुलिस आयल बोगीमे। संकर्षणक झोड़ा-झपटा सभ देखए लगलन्हि। चेकिंग किदनि होइत छैक से। ताहिमे किछु नहि भेटलैक ओकरा सभकेँ। हँ खेसारी सागक बिड़िया बना कए संकर्षणक कनियाँ सनेसक हेतु देने रहथिन्ह, लाल काकीक हेतु। मुदा पुलिसबा सभ एहिपर हुनका लोकि लेलकन्हि।) सिपाही एक: ई की छी। संकर्षण: ई तँ सरकार, छी खेसारीक बिड़िया। सिपाहीक अफसर: अच्छा, बेकूफ बुझैत छी हमरा। मोहन सिंह बताऊ तँ ई की छी। सिपाही दू: गाजा छैक सरकार। गजेरी बुझाइत अछि ई। सिपाहीक अफसर: आब कहू यौ सवारी। हम तँ मोहन सिंहकेँ नहि कहलियैक, जे ई गाजा छी। मुदा जेँ तँ ई छी गाजा, तेँ मोहन सिंह से कहलक। संकर्षण: सरकार छियैक तँ ई बिड़िया, हमर कनियाँ सनेस बन्हलक अछि लाल काकीक.......... सिपाही एक: लऽ चलू एकरा जेलमे सभटा कहि देत। (संकर्षणक आँखिसँ दहो-बहो नोर बहय लगैत छन्हि। मुदा सिपाही छल बुझनुक।) सिपाही दू: कतेक पाइ अछि सँगमे। (दिल्लीमे स्टेशनसँ लालकाकाक घर धरि दू बस बदलि कए जाए पड़ैत छैक। से सभ हिसाब लगा कए बीस टाका छोड़ि कए पुलिसबा सभटा लऽ लेलकन्हि। हँ खेसारीक बिड़िया धरि छोड़ि देलकन्हि। पाइक आदान प्रदान भेल। पुलिसबा सभ उतरि गेल। संकर्षण सेहो कनेक कालक बाद दिल्ली स्टेशनपर उतरि गेलाह। फेर मंचपर लाल काका, लाल काकी आ संकर्षण ड्राइंग रूममे बैसल छथि।) लाल काका: (फोनपर) अच्छा। ई तँ नीक खबरि सुनेलहुँ। मीत तँ रहैत छथि, रहैत छथि की सभटा गप सोचा जाइत छलन्हि आ कोढ़ फाटि जाइत छन्हि। (फोन राखैत) सुनलियै यै। मीतक बेटा गाम पहुँचि गेलन्हि। लाल काकी: बाह। रच्छ भगवान। मुदा बौआ ई सप्पत खाऊ जे आब पसीझक काँट जेहन हँसी नहि करब। (लाल काका दिस मुँह कए) हिनकर नोकरीक की भेलन्हि। संकर्षण: नोकरी-तोकरी नहि होयत काकी हमरासँ। सप्पत खाइत छी जे पसीझक काँट बला हँसी आब नहि करब। आब तँ गाम घुरबाक तैयारी करए दिअ। लाल काकी: दिल्ली तँ घुमि लिअ। लाल किला देखि लिअ। पाँचम कल्लोल पहिल अंक (दिल्लीक लाल किलाक पाछूमे रवि दिन भोरमे जे चोर बजार लगैत रहए ताहिमे संकर्षण अपन भाग्यक परीक्षणक हेतु पहुँचैत छथि। संकर्षणकेँ एहि बजारसँ, सस्त आ नीक चीज किनबाक लूरि नहि छन्हि से सभ कहैत छलन्हि। से गामक बुधियार संकर्षण पहुँचलाह एतए।ओहि परीक्षणक दिन, संकर्षणक ओतय पहुँचबाक देरी छलन्हि आकि एक गोटे संकर्षणक आँखिसँ नुका कय किछु वस्तु राखय लागल आ देखिते-देखिते ओतएसँ निपत्ता भय गेल। संकर्षणक मोन ओम्हर गेलन्हि आ ओ ओकर पाछाँ धय लेलन्हि। बड्ड मुश्किलसँ संकर्षण ओकरा ताकि लेलन्हि।) संकर्षण: की नुका रहल छी ? चोर बजारक दोकानदार: ई अहाँक बुत्ताक बाहर अछि। संकर्षण: अहाँ कहू तँ ठीक, जे की एहन अलभ्य अहाँक कोरमे अछि। चोर बजारक दोकानदार: (झाड़ि-पोछि कय एक जोड़ जुत्ता निकाललन्हि) कोनो पैघ गाड़ी बलाक बाटमे छी जे गाड़ीसँ उतरि एहि जुत्ताक सही परीक्षण करबामे समर्थ होएत आ सही दाम देत। संकर्षण: दाम तँ कहू। चोर बजारक दोकानदार: अहाँ कहैत छी तँ सुनू। चारि सए टाका दाम अछि एकर। हँ। संकर्षण: हमरा लग तँ मात्र तीन सए साठि टाका अछि। चोर बजारक दोकानदार: हम पहिनहिये ने कहने छलहुँ। कतए घर भेल अहाँक। संकर्षण: जनकपुर। चोर बजारक दोकानदार: पड़ोसिया छी तखन तँ। अहाँसँ की लाभ कमाएब। दस टाका तँ डी.टी.सी. बसक किरेजा सेहो लागत। चलू साढ़े तीन सय दिअ। संकर्षण: चलू आइ काल्हिक युगमे अहाँ सन लोक अछि जे पड़ोसीक कदर करैत अछि। चोर बजारक दोकानदार: दिल्लीमे सभ अपने लोक अछि। एतए तँ थूको फेकैत छी तँ अपने लोकपर पड़ैत अछि। पाँचम कल्लोल दोसर अंक (संकर्षण गाम घुरलाह। जाहि दिनसँ ई जुत्ता आयल, एकरामे पानि नहि लागय देलन्हि। गोनर भाइ आ संकर्षणक मंचपर पदार्पण।) गोनर भाइ: यौ मीत जुत्ता किएह हाथमे उठेने छी। संकर्षण: हौ गोनर। पानि कोना लागए देबैक एकरा। पैरक चमड़ा सड़त तँ फेर नवका आबि जएत। मुदा ई सड़ि जएत तखन कतए सँ अएत। (दुनू गोटे जाइत छथि आ फेर आबि जाइत छथि। संकर्षण जुत्ता सिअबा रहल छथि।) गोनर भाइ: ई की कऽ रहल छी मीत। एतेक नीक रंग रूपक जुत्ताकेँ सिअबा रहल छी। संकर्षण: हौ गोनर। बड्ड ठकान ठकेलहुँ। कतओ पानि देखी तँ पैरके सड़ा दैत रही आ एहि जुत्ताकेँ हाथमे उठा लैत छलहुँ। चारिये दिनतँ पहिरने होएब। आइ जुत्ताक पूरा सोल, करेज जेकाँ, अपन एहि आँखिक सोझाँ जुत्तासँ बाहर आबि गेल। गोनर भाइ: अहाँकेँ के ठकि लेलक। अहाँक नाम तँ बुझनुक लोकमे अबैत अछि। संकर्षण: मित्र की कहू? क्यो बुझनुक कहैत अछि आकि एहि जुत्ताक बड़ाइ करैत अछि, तँ कोढ़ फाटय लगैत अछि। कोनहुना सिया-फड़ा कय पाइ ऊप्पर करब। बड्ड दाबी छल, जे मैथिल छी आ बुधियारीमे कोनो सानी नहि अछि। मुदा ई ठकान जे दिल्लीमे ठकेलहुँ तँ आब तँ ओतुक्का लोककेँ दण्डवते करैत रहबाक मोन करैत अछि। एहि लालकिलाक चोर-बजारक लोक सभ तँ कतेको महोमहापाध्यायक बुद्धिकेँ गरदामे मिला देतन्हि। अउ जी, भारत-रत्न बँटैत छी, आ तखन एहि पर कंट्रोवर्सी करैत छी। असल भारत-रत्न सभ तँ लालकिलाक पाँछाँमे अछि, से एक दू टा नहि वरन् मात्रा मे। गोनर भाइ: भारत रत्न सभ! संकर्षण: आन सभतँ एहि घटनाकेँ लऽ कय किचकिचबैते रहैत अछि, कम सँ कम यौ भजार, अहाँ तँ एहि घटनाक मोन नहि पारू। (पटाक्षेप) सर-समाज “एकटा प्लम्बर, एकटा पेन्टर आ तीन टा जोन लागत। सात दिनमे घर चमका देब। अहाँक काजमे कमाइ नहि करबाक अछि हमरा। अहाँक अहिठाम एतेक रास लोक अबैत छथि, लोक देखत तँ पूछत जे ई काज के कएने अछि। तहीसँ हमरा चारि ठाम काज भेटि जएत तेँ। अपन एरियाक लोक दिल्लीमे कतए पाबी”- नबी बकस नाम रहए ओकर। “अपन एरियाक लोक छी, कतए घर अछि”? “कटिहार। हम तँ कहब जे बाथरूम आ किचनक काज सेहो करबाइए लिअ”। “अहाँ तँ पोचारा आ पेन्ट करैत छी, संगमे राजमिस्त्रीक काज सेहो करैत छी की”? “हम नहि करैत छी मुदा हमर गौआँ ई काज करैत अछि। ओ कहैत रहए जे साहबसँ पुछू काजक लेल। ओना ओकर काज बड्ड ठोस होइत छैक। हम बजबैत छी, मात्र भेँट कऽ लियौक। नहि तँ हमरा कहत जे तूँ साहबसँ पुछनहिये नहि हेबहुन्ह”। ओ मोबाइलपर फोन मिलेलक आ कोनो सर्फुद्दीनकेँ बजेलक। सर्फुद्दीन किचेन बाथरूम सभक मुआएना केलक आ करणीसँ देबालपर मारलक तँ प्लास्टर झहरि कऽ खसि पड़लैक। नलक टोटीकेँ घुमेलक तँ ओ टूटि कऽ खसि पड़लैक। फेर ओ बाजल- “सरकारी काज छियैक। नीव तँ मजगूत होइत छैक मुदा फिनिसिंग नहि होइत छैक। आ भइयो गेलए २० साल पुरान ई सभ। देखू एहि देबाल सभक हाल। सभटा अन्डरग्राउन्ड पाइप सभ सरि-गलि गेल अछि। तकरे लीकेजसँ देबाल सभक ई हाल अछि। सभटा पाइप बदलए पड़त से सीमेन्ट तँ झाड़इये पड़त। ओना सीमेन्टमे कोनो जान बाँचलो नहि छैक। तखन देबालमे पाथर सेहो लगबाइये लिअ। ई बम्बइया-मिस्त्री गणेशीसँ जे अहाँ बरन्डा रिपेयर करेने छलहुँ तकर बालु देखियौक कोना झड़ि रहल अछि। टेस्ट करए लेल एहि सीमेन्टकेँ हम झाड़ि कऽ नव सीमेन्ट लगबैत छी, पाथर नहि बनि जाए तँ कहब। तखन मोन हुअए तँ काज देब आ नहि तँ नहि देब”- से कहि ओ बरन्डाक किछु हिस्साक सीमेन्ट झाड़ि कऽ करिया सीमेन्ट लगा देलक आ चलि गेल। “ई नबी बकसक छोट भाए छियैक। बड्ड काजुल। दिन भरि लागले रहैत अछि, नाम छियैक ओकील। नबी बकस तँ आब ठिकेदार भऽ गेल अछि, करणीकेँ हाथो कहाँ लगबैए। ओकील बुझु मजदूरी करैए अपन भाए लग। आ ठीकेदारक भाएक ओहदासँ आन मजदूर सभपर नजरि सेहो रखैए”- फेर कनेक काल धरि, ई जे प्लम्बर मिस्त्री रहए, खलील जकर नाम रहैक, से चुप रहल। खलील हरियाणाक रहए आ बुझू जे नबी बकसकेँ हमरासँ भेँट करेनिहार ईएह रहए। एकटा छोट भङ्गठी करेबाक रहए ताहि द्वारे एकरा बजेने रही। बरंडाक एकटा कोनक मरम्मतिक काज रहए। खलीलकेँ कहलियैक तँ ओ एकटा गणेशी मिस्त्री, जकरा सभ बम्बइया कहैत रहए, केँ बजा कए काज करा देलक। फेर पोचारा बला आकि पेंटबला नबी बकसकेँ ई बजेलक। आब ई पोचारा-पेन्टबला नबी बकस ओहि सर्फुद्दीन राज-मिस्त्रीकेँ बजा लेने अछि। सर्फुद्दीन पाइप सभक काज खलील प्लम्बरकेँ दिआ देलक से खलीलकेँ बिन मँगने काज भेटि गेलैक। आ एक दोसराकेँ परिचय करबैत आब तँ लकड़ी बला आ बिजली मिस्त्री सेहो घरमे पैसि गेल छल। “दुनू गोटे -नबी बकस आ सर्फुद्दीन- संगे राज-मिस्त्री रहए। मुदा नबी-बकस लाइन बदलि लेलक। आ आब एक-दोसराकेँ काज दिअबैत रहैत अछि”। फेर खलील हमरा दिस ताकि बाजल- “अहाँ दिसका लोक सभमे बड्ड एकता होइत छैक”। ओकील आ खलीलमे काजक बिचमे गप-शप होइत रहैत छलैक। “हमरा सभक पुरखा मुसलमान बनबासँ पूर्व राजपूत रहथि मुदा ई सभ राजमिस्त्री रहए-धीमान, एखनो हरियाणामे होइत अछि”- खलील इशारासँ ओकील दिस देखैत हमरा सुना कए कहलक। “हम सभ तँ धीमान छलहुँ मुदा तोरा सभ के छलँह से तोरा एतेक फरिछा कए कोना बुझल छौक”- बहुत कालसँ ओकील बिन बजने काज कए रहल छल। मुदा पहिल बेर ओकरा उत्तर दैत सुनलियैक। ओकर सभक बीच गप आ हँसी ठट्ठा चलैत रहैत छलए। एक दिन सर्फुद्दीन मुँह लटकेने आएल। कहलक जे गणेशीसँ झगड़ा भए गेल। “से कोना”? “कहैए जे तोँ साहेबक घरक काज हमरासँ छीनि लेलँह, इलाकाक लोकक नाम पर। बुझू, अहाँ हमर काज देखि कऽ ने हमरा काज देने छलहुँ। आ ई तँ छोड़ू, ईहो कहैत रहए जे...”। “की? कहू ने”। “कहैत रहए जे मुसलमानपर कहियो विश्वास नहि करबाक चाही”। हमर तँ तामसे देह लहरि गेल। कहलियैक जे तुरत ओकरा बजा कए आनू गऽ। मुदा ओ थोम्ह-थाम्ह लगा देलक। फेर बादमे एक दिन गणेशीकेँ बजा कए हम बुझा देलियैक- “एहि महानगरमे हम आ सर्फुद्दीन एके भाषा बजैत छी, ई मात्र एकटा संजोग अछि। एकर काज देखियौक आ अपन काज देखू, फेर अहाँकेँ बुझा पड़त जे सर्फुद्दीनसँ अहाँ किएक पाछाँ रहि जाइत छी”। ओम्हर एक गोटे वूडेन फ्लोरिंग केर विचार देलक ताहिपर सर्फुद्दीन ओकरासँ लड़ि गेल जे नीचाँ मे पाथरे नीक होएत । बाथरूम आ किचनमे पाथर अछि तँ सभ ठाम ईएह रहबाक चाही। रूममे किएक वूडेन फ्लोरिंग होएत? मुदा वूडेन फ्लोरिंग बला कहलक जे एक दिनमे लगा देब आ पाइयो सस्त कहलक से हम ओकरे हँ कहि देलियैक। भरि दिन अनघोल होइत रहैत छल। नीचाँक फ्लोर बलाक बेटाक बारहम कक्षाक परीक्षा रहए से ओ जे राजमिस्त्री सभक आबाजाही देखलक तँ कहए लागल, जे रूम सभमे तँ पाथर नहि लागत ? हम कहलियन्हि जे नहि वूडेन फ्लोरिंग काल्हि कए जएत, तँ हुनका साँसमे साँस अएलन्हि। ”पाथर लगाबएमे तँ माससँ ऊपर ई सभ लगबितए, हमर बेटाक परीक्षा अछि, से हम तँ पाथर सभ पसरल देखि कए चिन्तित भए गेल रही”। “नहि मात्र बाथरूम आ किचेन लेल ई पाथर सभ अछि”। सर्फुद्दीन, खलील आ नबी बकससँ अबैत जाइत काजक अतिरिक्त घर-द्वारक गप सेहो होमए लागल। नबी बकस कटिहारसँ दिल्ली आएल, छह भैयारीमे सभसँ पैघ, एकटा बहिन सेहो रहैक। अपन हमशीरा(बहिन)क वर आ ओकर सासुरक विषयमे नबी बकस प्रेमपूर्वक सुनबैत रहैत छल। सर्फुद्दीनक शागिर्दीमे ओ राज मिस्त्रीक काज सिखलक। आस्ते-आस्ते चारि भाँएकेँ दिल्ली बजा लेलक। ओकील तँ ओकरे संग रहैत छैक, आन भाए सभ बियाह करैत गेल आ अलग होइत गेल। मुदा ओहो सभ आसे-पासमे रहए जाइए। बियाह तँ ओकीलोक भेल छैक, मुदा अछि ओ सुधंग। से आन भाए सभ कहैत-कहैत रहि गेलैक जे नबी बकस मँगनीमे खटबैत रहैत छौक, अलग भए जो गऽ, मुदा ओ तँ भाएक भक्त अछि। भाएक सोझाँमे एको शब्द की बाजल होइत छैक? एक दिन ओकीलकेँ बोखार भेल रहए आ दोसर भाए सभ ओकरा काजपर अएबासँ मना कएने रहैक। मुदा ओ नहि मानल। ओकर सुधंगपना देखि हमर माँ, पत्नी, बच्चा सभ ओकरा खूब मानए लागल रहथि। ओहि दिन काजक बीचमे ओ खएबा लेल माँगलक आ बालकोनीमे सूति रहल। फेर बेरिया पहरसँ काज शुरू कएलक। साँझमे घर जएबाक बेरमे जखन हम कहलियैक जे डेरा जएबाक बेर भए गेल तँ कहलक जे नहि, आइ काज लेटसँ शुरू कएने रही से खतम कइये कऽ जाएब। आ आस्तेसँ बड़बड़ाइत बाजल जे देखैत छियैक जे आइ क्यो बजबए लेल आबैए आकि नहि। आठ बजे करीब मोटरसाइकिलपर दू गोटे आएल। ओकील कहलक जे ई दुनू ओकर छोटका भाए सभ छैक। दुनू गोटे तेसर तल्ला स्थित हमर फ्लैटपर आएल आ ओकीलकें गप करबा लेल बजेलक। ओकर सभक गपमे आपकता मिश्रित क्रोध रहैक। ओकील ओकरा सभकेँ कहैत रहए जे ओहेन कोनो गप नहि छैक, आइ आधा दिन सुतल रहए तेँ सोचलक जे काज पूरा कइए कए जाए। तावत नबी बकस सेहो ओतए पहुँचि गेल आ ओकीलकेँ लए गेल। दोसर दिन नबी बकस भोरे-भोर आएल। “देखियौक ई भाए सभ।... -“बेटा जेकाँ बुझलियैक एकरा सभकेँ आ हमरापर कलंक लगबैत अछि जे तूँ दू रंग करैत छह। तीनू भाँए काल्हि हमरासँ खूब झगड़ा करए गेल जे तूँ ओकीलकेँ नोकर जेकाँ रखैत छहक। बुझू ! ई ओकील अछि सुधंग। कतबो कहैत छियैक जे नीकसँ कपड़ा लत्ता पहिर, तँ ओहो झोलंगे जेकाँ रहैत अछि। -“काल्हि हमरा तँ ओकीलसँ भेँटो नहि अछि। सर्फुक काज दोसर साइटपर चलि रहल छैक, ओतहि गेल छलहुँ जे कोनो स्कीमसँ काज भेटि जइतए तँ अहाँक एहिठाम काज खतम भेलापर ओतहि लागि जइतहुँ। बिल्डर अंसल बलाक ऑफर आएल रहए जे हमरा एहिठाम आबि जाऊ मुदा भाए सभक द्वारे हम मना कए देलियैक। आ ई सभ.. ओना ई सभटा हमर पटना बला भाए मंडलबाक करतूत छी”। “मंडल!!”, हमरा किछु पुरान गप मोन पड़ल, -“अहाँक गाममे एकटा जयशंकर सेहो छथि की”? “हँ! हँ! अहाँ कोना चिन्हैत छियन्हि हिनका सभकेँ। ओना असली नाम तँ हमर भाएक सलीम छियैक। ऑफिसक नाम मंडल। घरक सलीम। सरकारी ड्राइवर अछि। घरमे सलीम कहने ओकर अहलिया (कनियाँ) बड़ घबड़ाइ छैक”। “सभटा बुझल अछि हमरा”। अपन विद्यार्थी जीवनक एकटा घटना मोन पड़ि गेल हमरा। पटनामे पढ़ैत रही। पड़ोसमे एक गोटे जयशंकर रहैत छलाह। भाइ-भाइ कहैत छलियन्हि। दू बियाह। पहिल बियाहक हुनकर बेटा भागि गेल छलन्हि। ओना दोसर बियाह पहिल पत्नीक मुइलाक अनंतर भेल छलन्हि। किछु दिन दिल्ली-बम्बइ घुमि पहिल बियाहक ओ बेटा आपस अएलन्हि। सभ ओकरा पुछलकै जे की करमे? ओ कहलक जे सभ काज हमरासँ होएत मुदा पढ़ाइ छोड़ि कए। फेर सभ मिलि कए ओकरा ड्राइवरीक लाइनमे जएबाक लेल कहलक। ओकरो मोन रहैक ड्राइवरी सिखबाक। भोरे-भोर एक दिन जयशंकर कहलन्हि जे आइ एक ठाम चलबाक अछि। “बेटा कहैत अछि जे ड्राइवरी सीखब। ड्राइविंग स्कूल बड्ड महग। एक गोटे गौआँ सलीम अछि ड्राइवर, सरकारी ऑफिसमे। गाममे एहि बेर छुट्टीमे भेटल रहए। ओकरो सभक ईद पाबनि छलए, से आएल रहए गाम। कहलक जे रवि दिन कऽ ओकरा छुट्टी होइत छैक ऑफिसमे आ आन दिन पाँच बजे भोरेसँ सिखा सकैत अछि। दू सए टाकामे एकटा सेकेंड हैंड साइकिल बेटाकेँ कीनि देने छियैक। -“ओकर डेरा ऑफिसे लग छैक। ऑफिस बजेने अछि, ओतहिसँ घर देखाओत”। “ऑफिस देखल अछि?” “हँ, कताक बेर गेल छी”। ऑफिसक बेरमे हम सभ गाँधी मैदानक बगलक कचहरी सन ऑफिस पहुँचैत गेलहुँ। “मं‍डलजी ड्राइवर साहेब छथि?” - जयशंकर एक गोट हाकिमक ऑफिसक बाहर ठाढ़ चपरासीसँ पुछलन्हि। “हँ, ओम्हर छथि”। हम जयशंकरकेँ पुछलियन्हि जे हमरा सभ तँ सलीमसँ भेँट करबा लेल आएल छी, ई मंडल के छथि? ओ इशारामे हमरा चुप रहए लेल कहलन्हि आ ईहो मुखर रूपमे कहलन्हि जे एहिमे कोनो बात छैक, बादमे कहताह। आब जे मंडलजीसँ हुनका गप होमए लगलन्हि तँ बीच-बीचमे ओ सलीम भाइ, सलीम भाइ कहि हुनका सम्बोधन करैत रहलाह। फेर हुनका संगे हम सभ हुनकर डेरा पहुँचलहुँ। फेर बिदा होइत काल सलीम भाइ जयशंकरकेँ हमरा दिश इशारा करैत कहलन्हि जे हिनका कहि देलियन्हि ने। जयशंकर कहलखिन्ह जे कहि देबन्हि। ओतए सँ निकललाक बाद जयशंकर कहलन्हि जे कटिहार लग जयशंकरक गाम छन्हि। मारते रास भाइ बहिन छैक सलीमक। सलीम हुनकर लंगोटिया यार, संगे पढ़लन्हि। फेर रोजगारक क्रममे दुनू गोटे दूर चलि गेलाह। सलीम कोनो हाकिमक घरपर काज करए लागल। ड्राइवरी कहिया कतए सँ ओ सीखि लेने छल, से हुनरबलाकेँ नोकरीक तँ ओहुना दिक्कत नहि होइत छैक। बादमे एकर स्वभाव देखि कए ओ हाकिम एकरा कोनो दोसर आदमी जकर नाम मं‍डल रहए, आ कतहु मरि-खपि गेल रहए, केर नामपर टेम्परोरी राखि लेलकैक। फेर किछु दिनमे ओ पर्मानेन्ट भए गेल। जयशंकर हमरासँ कहलन्हि - “एकर ऑफिसमे वा एकर संगी साथी लग- ओना अहाँसँ फेर कहिया एकर भेँट हेतए- एहि गपक धोखोसँ चरचा नहि करब। ओना पर्मानेन्ट भए गेल छैक मुदा लोक सभ केहन होइ छैक से नहि देखइ छियैक। क्यो किछु लिखि पढ़ि देतैक तँ मंगनीमे बेचारकेँ फेरा लागि जएतैक”। मोनमे घुमरल एहि गपकेँ नबी बकसकेँ हम कहलियैक। ताहिपर ओ बाजल- “ओहो स्कीम धरेनिहार हमहीं छी। एकटा कम्प्लेन कऽ देबैक तँ जाहि नोकरीपर एतेक फुरफुरी छैक से घोसरि जएतैक। मुदा सोचैत छी जे ओकर नोकरी जएतैक तँ हमरे माथपर आबि खसत। तेँ अल्ला पर सभटा छोड़ि देने छियैक”। नबी बकस ओना तँ बड्ड व्यस्त रहैत छल मुदा ओहि दिन लागैए हमरे सँ गप करबा लेल समय निकालि कए आएल रहए। जखन लोक मानसिक फिरेशानीमे रहैत अछि तँ अपन दुखनामा दोसराकेँ सुनबए चाहैत अछि। मुदा तकर श्रोता भेटब मोश्किल। मुदा हम अपन मानवविज्ञानक कॉलेजिया पढ़ाइक प्रभावक कारण सभ काज छोड़ि अनायास श्रोता बनि जाइत छी से नबीकेँ बुझल रहैक। भदबरिया लधने छल से हमहूँ कतहु बाहर जएबाक हरबड़ीमे नहि छलहुँ। से ओ अपन खिस्सा शुरु कएलक। “कतेक कष्ट कटने छी से की बयान करू। आ मदति के सभ कएलक ? एकटा खालू-खाला (मौसा-मौसी) आ खलेरा भाए आ खलेरी बहिन मोन पड़ैए आर क्यो नहि। अब्बूक मरलाक बाद बड़ा अब्बू (बड़का काका), छोटा अब्बू (छोटका काका) सभ पराया भए गेल। शौहरक मरलाक बाद अम्मीक हालत की रहैक से ई भाए सभ की बुझत-गमत? -“खाला दिल्लीमे रहैत रहथि। अम्मीक मृत्युक बाद हमर पढ़ाइ छुटि गेल। कटिहारमे पढ़ैत रहितहुँ, फूफीजाद भाए (पिसियौत) कहनहियो रहए जे तोरा जतेक पढ़बाक छौक पढ़, मुदा ई सभ तखन गाममे ईँटा उठबितए से हमरा देखल होइतए? आ ई गप एकरा सभकेँ हम बुझैयो नहि देने छियैक। -“आ ई सभ की कहैये जे हम अपन अहलिया (स्त्री) आ सारि-हमजुल्फ(सारि-साढ़ू)क पाछाँ एकरा सभपर ध्यान नहि दऽ रहल छियैक? दू रंग करैत छियैक? -“दिल्लीमे आएल रही गाम छोड़ि कए तँ पहिने नोएडामे पितरिया बर्त्तनक दोकानमे ब्रासोसँ बर्तन साफ करैत रही। अल्लाहक करमसँ सर्फू भेटि गेल। खालाजाद भाए (मौसेरा भाए) केर संगी रहए सर्फू। ओकरेसँ सभ ईलम सिखलहुँ। मुदा ई कहि दिअए जे हम कहियो ओकरा दगा देने होइयैक। सर्फूक स्वभाव तँ अहाँकेँ बुझले अछि। कनियो अन्याय आ बेइमानी ओकरा पसन्द नहि छैक, सभसँ बतकही भेल छैक, मुदा हमरासँ आइ धरि कोनो मोन मुटव्वल नहि भेल छैक। हमर से नीयत रहितए तँ ओकरो संग ने हमर संबंध टुटितए। आ एहि शहरमे ओ आन भए हमरा अप्पन बुझलक आ ई सभ ? ओ तँ गौआँ छी, मुदा खलील? ओकरोसँ पुछियौक। -“माएक मोन पड़ि जाइए जहिया ई भदवरिया लाधैए। मोन नहि पाड़ए चाहैत छी, आ ताहि लेल व्यस्त रहैत छी। मुदा आइ माएक ओ मृत्यु रहि-रहि कोढ़ तोड़ि रहल अछि। नबी बकसक कंठ कहैत-कहैत भरिया गेलैक। मुदा कनेक पानि पीबि फेर ओ माएक स्मरण करए लागल। -“नबी साहेबजादे, कनेक ओहि कठौतकेँ खुट्टाक लग कए दिऔक। बड्ड पानि चूबि रहल छैक ओतए। ई बादरकाल सभ साल दुःख दैत अछि। सोचिते रहि गेलहुँ जे घर छड़ायब। मुदा नहि भए सकल। घरोक कनी मरोमति कराएब आवश्यक छल, मुदा सेहो नहि भए सकल। ठाम-ठाम सोंगर लागल अछि। फूसोक घर कोनो घर होइत छैक? ठाम-ठाम चुबि रहल अछि, ओतेक कठौतो नहि अछि घरमे। खेनाइ कोना बनत से नहि जानि। ओसारापरक चूल्हिपर तँ पानिक मोट टघार खसि रहल अछि। एकटा आर अखड़ा चूल्हि अछि, मुदा जे ओ टूटि जएत, तखन तँ चूड़ा-गुड़ फाँकि कए काज चलबए पड़त। समय-साल एहेन छैक जे चूल्हि बनाएब तँ सुखेबे नहि करत। जाड़नि सेहो सभटा भीजि गेल अछि। भुस्सीपर खेनाइ बनाबए पड़त”। -“पइढ़िया उजरा नुआक आँचर ओढ़ने, थरथराइत करीमा बेगम माने हमर माए, चौदह बरखक अपन बेटाक माने हमर संग, कखनो सोंगरकेँ सोझ करथि तँ कखनो कठौतकेँ एतएसँ ओतए घुसकाबथि। जतए टघार कम लागन्हि ओतएसँ घुसकाकए, जतए बेशी लागन्हि ओतए दए दैत छलीह। सौँसे घर-पिच्छर भए गेल छल। कोनटा लग एक ठाम पानि नञि चूबि रहल छल, ततए जाए ठाढ़ भए गेलीह। -“कतेक रास खढ़ चरमे अनेर पड़ल छल। पढ़ुआ काकाकेँ कहलियन्हि नहि। घर छड़बा लेने रहितहुँ”। -“यौ बाबू। घर छड़एबाक लेल पुआर तँ भेटनिहार नहि। आ गरीब-मसोमातक घर खढ़सँ के छड़ाबए देत”। -“हमरा खढ़सँ आ पुआरसँ घर छड़बयबामे होमयबला खरचाक अन्तर तहिया नहि बुझल छल। -“से तँ अम्मी, खढ़सँ छड़ाएल घरक शान तँ देखबा जोग होइत छैक। पढ़ुआ काकाक घर देखैत छियन्हि। देखएमे कतेक सुन्दर लगैत अछि आ केहनो बरखा होअए, एको ठोप पानि नहि चुबैत अछि”। -“से तँ सभसँ नीक घर होइत अछि कोठाबला”। -“एह, की कहैत छी? गिलेबासँ आ सुरखीसँ ईँटा जोड़ेने कोठाक घर भए जाइत अछि? आ नेङराक घर तँ सीमेन्टसँ जोड़ल छैक, मुदा परुकाँ ततेक चुबैत छल से पूछू नहि”। -“से?” -“हँ यै अम्मी। सभ बरख ज्योँ छड़बा दी, तँ ओहिसँ नीक कोनो घर होइत छैक?” -“चारिम बरख जे छड़बेने छलहुँ तकर बादो पहिल बरखामे खूब चुअल छल”। -“पहिलुके बरखामे चुअल छल ने आ फेर सभ तह अपन जगह धऽ लेने होएत। तखन नहि चुअल ने बादमे”। -“हँ, से तँ तकरा बाद तीन बरख नहि चुअल”। -“तखने काकी बजैत अएलीह- -“जनमि कए ठाढ़ भेल अछि आ की सभ अहाँकेँ सिखा रहल अछि। कनेक उबेड़ जेकाँ भेलैक तँ सोचलहुँ जे बहिन-दाइक खोज पुछारि कए आबी”। -“बुन्नी रुकि गेल छल। हम काकाक घर दिस गेलहुँ आ दुनू दियादनीमे गप-शप शुरू भए गेलन्हि। -“साँझक झलफली शुरू भेल, भदबरिया अन्हारक, तँ काकी बहराइत कहैत गेलीह- -“बहिन दाइ, आगिक जरूरी पड़य तँ हमर घरसँ लए जाएब”। -“नञि बहिनदाइ। सलाइमे दू-तीन टा काठी छैक। मुदा मसुआ गेल छैक। हे, ई डिब्बी दैत छियन्हि, कनेककाल अपन चुल्हा लग राखि देथिन्ह तँ काजक जोगर भए जएत। नबी दिआ पठा दिहथि”। -“देखिहथि। उपास नञि कऽ लिहथि से कहि दैत छियन्हि, बच्चा सभ तँ हमरा एहिठाम खा लेत”-दियादिनी कहैत बिदा भेलीह। -“करीमा बेगम माने हमर माए ओसारापर खुट्टा भरे पीठ सटा बैसि गेलीह। -“की सोचि रहल छी अम्मी। कहू ने ?” -“यैह फुसियाही गप सभ, अहाँक अब्बूक पहलमानीक। काका हुनका जे कहैत रहथिन्ह सैह। -“खुट्टा पहलमान छथि ई”। -“से नहि कहू काका। जबरदस्तीक मारि-पीटि हम नहि करैत छी, ताहि द्वारे ने अहाँ ई गप कहि रहल छी”। -“रहमान काका आ हुमायूँ भातिज। पित्ती-भातिजमे ओहिना गप होइत छलन्हि, जेना दोस्तियारीमे गप होइत छैक। अखराहामे जखन हुमायूँ सभकेँ बजाड़ि देथि तखन अन्तिममे रहमान हुनकासँ लड़य आबथि। काका कहियो हुनका नहि जीतए देलखिन्ह। -“हुमायूँक कनियाँ माने हम नवे-नव घरमे आएल छलहुँ। कोहबर लहठी सभ होइत छलैक ओहि समयमे। आब ने जानि मुल्ला सभ किएक एकर विरोधी भए गेल अछि, तैयो लोक करिते अछि की ? मुल्ला सभक गप जे मानए लागी सभ ठाम तखन तँ भेल ! -“आ एहि तरहक वातावरण घरमे देखलहुँ तँ मोन प्रसन्न भऽ गेल। घरक दुलारि छलहुँ आ सासुरो तेहने भेटि गेल। समय बीतए लागल। मुदा हुमायूँक विधवा एतेक जल्दी कहाय लागब से नहि बुझल छल तहिया। आब तँ सभ प्रकारक विशेषणक अभ्यास भऽ गेल अछि। झगड़ा-झाँटिक बीच क्यो ईहो कहि दैत अछि- वरखौकी, वरकेँ मारि डाइन सिखने अछि ! -“हुमायूँक जिवैत जे सभक दुलारि छलहुँ तकर बाद सभक आँखिक काँट भए गेलहुँ। इद्दतक बाद नैहरसँ दोसर बियाह करएबा लेल सेहो भाए सभ आएल मुदा अहाँ सभक मुँह देखैत रहबाक इच्छा मात्र रहल”। नबी बकस बाजल-“उजरा नूआ, बिन चूड़ी-सिन्दूरक माएक वैधव्य बला चेहरा एखनो हमरा मोने अछि। फेर ओहि भदबरिया रातिमे माए आगाँ कहए लगलीह। -“रहमान काका हमर पक्ष लए किछु बाजि देलखिन्ह एक बेर, तँ हमर सासु-ससुर कहए लगलखिन्ह जे हमर पुतोहुकेँ दूरि कए रहल छी। आ ईहो जे मुद्दीबा सभक अपना घरमे घटना हेतैक, तखन ने बुझए जएत। -“आब तँ ने रहमाने चाचू छथि आ ने सासु ससुर से मरल आदमीक की खिधांश करू। मुदा एकोटा झूठ गप ई सभ नहि अछि। -“लोक कहैत छैक जे सुखक दिन जल्दी बीति जाइत अछि, मुदा हमर दुखक दिन जल्दी बीतैत गेल, सुखक दिन तँ एखनो एक-संझू उपासमे खुजल आँखिसँ हम देखैत रहैत छी, खतमे नहि होइत अछि। -“विधवा भेलाक अतिरिक्त आन घटनाक्रम अपन नियत समयसँ होइत रहल। हमर अब्बू-अम्मीक मृत्यु भेल, सास-ससुर आ पितिया ससुर रहमान कका तँ पहिनहिये गुजरि गेल छलाह। -“घरमे जखन बँटबारा होमय लागल तखन सम्पत्तिक आ खेत-पथारक बखरा, चारि भैयारीमे मात्र तीन ठाम होमय लागल। हुमायूँक हिस्सा तीनू गोटे (जिबैत भैयारी सभ) बाँटि लेलन्हि। हम किछु कहलियन्हि जे हमर गुजर कोना होएत, छह टा बेटा आ एक टा बेटी अछि तँ हुमायूँक मृत्युक दोष हमरा माथपर दए हमर मुँह बन्न कए देल गेल। -“तीनू भाँएक मुँह हुमायूँक समक्ष खुजैत नहि छलन्हि मुदा हुनकर मृत्युक बाद हुनकर विधवाकेँ हिस्सा नहि देबऽ लेल तीनू भाँय सभ तरहक उपाय केलन्हि। हम नैहर जा कए अपन भायकेँ बजा कए अनलहुँ। पंचैती भेल आ फेर अँगनाक कातमे एकटा खोपड़ी अलगसँ तीनू भाँय बान्हि देलन्हि, हमरा आ हमर बच्चा सभक लेल। धान, फसिल सभ सेहो जीवन निर्वाहक लेल देबाक निर्णय भेल। हम चरखा काटए लगलहुँ। से कपड़ा-लत्ता ओतएसँ तेना निकलि जाए। -“लिअ सलाइ”। दियादिनी आबि कहलन्हि। “हँ”- भक टुटलन्हि करीमा बेगमक माने हमर माएक। दियादिनी सलाइ पकड़ाए चलि गेलीह। -“एहि बेर बाढिक समाचार रहि रहि कए आबि रहल अछि। बाट घाट सभ जतए ततए डूमि रहल छलए, खेत सभ तँ पहिनहि डूमि गेल छलए। अहाँक पढ़ुआ काकी पहिनहिये सुना देने छथि जे एहि बेर वार्षिक खर्चामे कटौती होएत। काल्हि कहैत रहथि जे कनियाँ सभटा फसिल डूमि गेल, एहि बेर वार्षिक खरचामे कटौती हेतन्हि। हम कहलियन्हि जे एँ यै । जहिया फसिल नीक होइए तँ हमर खरचामे कहाँ कहियो बेशी धान दैत छी ? ई गप अहाँक पढ़ुआ काका सुनि रहल छलाह। बजलाह-राँड़ तँ साँढ़ भए गेल। अहाँक पढ़ुआ काकीक इशारा केलापर ओ ससरि कए दलान दिशि बहरा गेलाह आ हम नोर सोंखि गेलहुँ। आइ गप निकलल तँ.......”। माएक खिस्सा कहैत-कहैत नबी फेर रुकि गेल। आँखि आ कंठ दुनू संग छोड़ि रहल छलैक ओकर। किछु काल चुप रहि बाजल। “ई खिस्सा भाए सभकेँ हम कहबो नहि कएने छियैक। सोचलहुँ जे कहबैक तँ मँगनीमे प्रतिशोध जगतैक। जे काज करबाक से नहि कएल होएतैक। आ सुनलियैक अछि जे हमर ओ मंडलबा भाए ओहि पढ़ुआ काकाक कहलमे आबि गेल अछि”। नबी बकस फेर चुप रहल। भाए सभक प्रति ओकर प्रेम ओकरा सभक विषयमे बेशी बजबासँ ओकरा रोकैत छलैक। फेर ओ माएक खिस्सा शुरू कएलक। -“माए आगाँ बजैत रहलीह। -“धुत्त दिनमे तँ खेनहिये छलहुँ, एहि अकल-बेरमे केना खेनाइ बनाएब। कनियाँ-मनियाँ छलहुँ तखने विधवा भऽ गेलहुँ आ अहू वयसमे तैँ सभ कनियाँ-काकी कहैत अछि। हुमायूँ कतेक मानैत छल अपन भाए सभकेँ। अपन पेट काटि भागलपुरमे राखि पढ़ओलन्हि छोटका भाइकेँ आ आब ओ पढ़ुआ बौआ एहेन गप कहैत छथि। -“ सोचिते-सोचिते नोर भरि गेलन्हि माएक आँखिमे। -“हमरा संग एकबेर हज करए लेल गेल रहथि माए। धन्य भारत सरकार जे हमरा सनक गरीब-गुरबाक माए सेहो हज कए आएल। आ अपन बड़की दियादिनीकेँ सुनबैत रहथि खिस्सा जे बहिनदाइ, ततेक भीड़ छलए ट्रेनमे, गुमार ततबे। गाड़ीमे बेशी मसोमाते सभ छलीह। एक गोटे कहैत छलीह जे जतेक कष्ट आइ भेल ततेक तँ जहिया राँड़ भेल छलहुँ तहियो नञि भेल छलए। हवाइ जहाजकेँ अम्मी गाड़ी कहैत छलीह। -“फेर ओहि भदबरियाक रातिमे हमर अम्मी करीमा बेगमक मुँहपर बाड़ीक हहाइत पानि आ चारसँ टपटप चुबैत पानिक ठोपक आ घटाटोप अन्हारक बीच कनेक मुस्की आबि गेलन्हि। हमरा काकाक दलानपर जाए लेल कहलन्हि जतए आर भाए बहिन सभ छल। -“फेर सोचिते-सोचिते खाटपर टघरि गेलीह करीमा बेगम, माने हमर माए । भोर होइत-होइत बाड़ीक पानि बान्हपरसँ अँगना दिस आबि गेल।तीनू भैयारी अपन-अपन हिस्साक आंगन भरा लेने छलाह से सभटा पानि सहटि कऽ हमर सभक धसल आँगनसँ खोपड़ी दिस बढ़ि गेल। घरमे चारि आँगुर पानि भरि गेल। भोरमे किछु अबाज भेल आ जे उठैत छी तँ खाटक नीचाँ पानि भरल छल, एक-कोठी दोसर कोठीपर अपन अन्न-पानिक संग टूटि कऽ खसल छल। आब की हो, बड़की दियादनीक बेटा सभसँ पहिने आबि कऽ खोज पुछाड़ि केलकन्हि, अबाज दूर धरि गेल छलए। सभटा अन्न-पानि नाश भऽ गेलन्हि। अन्न पानि छलैन्हे कोन? दू-टा छोट-छोट कोठी, ओकरे खखरी-माटि मिला कऽ दढ़ करैत रहैत छलीह हमर आम्मी। -“मुदा भोर धरि ओ हहा कऽ खसल आ मसोमातक जे बरख भरिक बाँचल मासक खोरिस छल तकरा राइ-छित्ती कऽ देलक। करीमा बेगम माने हमर अम्मी सूप लऽ कऽ अन्नकेँ समटए लेल बढ़लीह, हमर आँखिक देखल अछि। -“मुदा बाढ़िक पानिक संग पाँकक एक तह आबि गेल छल घरमे। सौँसे टोल हल्ला भऽ गेल जे देखिऔ केहन भैंसुर दिअर सभ छैक, अपना-अपनीकेँ अपन-अपन अँगना भरि लए गेल अछि। मसोमातक अँगना तँ अदहासँ बेशी धकिआ लऽ गेल छलैहे, जे बेचारीक बचल अँगना अछि से खधाइ बनि गेल अछि। बड़की दियादिनी सहटि कऽ अएलीह कारण दिआद टोलक लोक सभ आबए लागल रहथि। करीमा बेगमक सोंगरपर ठाढ़ घरक दुर्दशा देखि सभ काना-फूसी करए लागल रहए। अँगनाक एक कोनसँ दोसर कोन, अपन घरसँ दोसराक घर ! -“पानि पैसबाक देरी रहैक आ आस्ते-आस्ते हमर घरक एक कातक भीतक देबाल ढहि गेल। टोलबैया सभ हल्ला करए लागल जे करीमा बेगम भितरे तँ नञि रहि गेलथि। बड़की दिआदिनी खसल घर देखि हदसि गेलीह। बजलीह जे अल्ला रक्ष रखलन्हि जे सुरता भेल आ नबीक भाइ-बहिनकेँ घर लए अनलियैक नहि तँ दियादी डाह नहि बुझल अछि। सभ कलंक लगबितए अखने। -“मुदा दियादिनी”! -“दियाद सभ सभ गप बूझि अपन-अपन घर जाए गेलाह। हम अम्मी लग अएलहुँ। मार्क्सवादी विचारक रही, कटिहारमे पढ़ैत छलहुँ। विधवा-विवाह, जाति-प्रथा सभ बिन्दुपर पढ़ुआ काकासँ भिन्न विचार रखैत छलहुँ। घरक नाम नबी छल मुदा स्कूल कॉलेजक नाम नबी बकस।गाममे भोजमे खढ़िहानक पाँति आ बान्हपरक पाँति देखि विचलित होइत छलहुँ। जोन-बोनिहारकेँ बान्हपर बैसा कऽ खुआबैत देखैत छलहुँ आ बाबू-भैयाकेँ खढ़िहानमे। खढ़िहानमे बारिक लोकनि द्वारा खाजा-लड्डू कैक बेर आनल जाइत छल । बान्हपरक पाँतीमे एक बेर आ नहियो। मुदा घरमे कोनो मोजर नहि छल, कहल जाइत रहए जे पहिने पढ़ि-लिखि कऽ किछु करू। -“अम्मीसँ कतेक गमछा-झोड़ा भेटैत छल, चरखाक सूतक कमाइक। जय गाँधी बाबा, विधवा लोकनि लेल ई काज धरि कऽ गेलाह। -“मुदा हमर अम्मी। की भेलन्हि हुनका। भाए बहिन सभ तँ ओम्हर अछि!” -“अम्मी!!!!!!!!!!!!!! -“हमर चित्कारसँ सौँसे टोलमे थरथड़ी पैसि गेल रहए। नबी कहियो कनैत नहि अछि, कानल अछि तँ कोनो गप छैक। -“नञि अम्मी। ई कोनो गप नहि भेल। किएक हमरापर अहाँ भरोस छोड़ि देलहुँ। नबी बकस नाम छी हमर। पाँचो भाए आ छोटकी बहिनक भाए नहि बाप छियैक हम। मुदा अहाँ हमरापर भरोस छोड़ि चलि गेलहुँ। या अल्ला!!!!!!!!!!!” -“टोल जुटि गेल मैयतक चारू दिश। के की सभ कएलक से नहि बुझलहुँ। अम्मीकेँ गुसुल (नहाओल) कराओल गेल। कफन पहिराओल गेल। जनाजाक खाट आएल। ताहिपरसँ माएक गाँधी चरखासँ बनाओल चादरि ओढ़ाओल गेल। तीनू काका आ हम जनाजाक खाटकेँ कान्ह देलहुँ। कब्रिस्तान लग ठाढ़ भए जनाजाक नमाज पढ़लहुँ आ अम्मीकेँ दफन कएलहुँ। नबी बकस फेर चुप भए गेल। हम ओकरा टोकए नहि चाहैत छलहुँ। दस मिनट धरि ओ चुप्पे रहल आ हम बैसल रहलहुँ। फेर ओ बाजल। -“अम्मीक मृत्युक चालीस दिन धरि शोक मनओलहुँ। आ वैह चालीस दिनक आराम हमरा एहि जोग बनेलक जे फेर पएरमे घिरणी लागि गेल। अम्मीक मृत्युक बाद पढ़ाइकेँ नमस्कार कए खाला लग आबि गेलहुँ, दिल्ली नगरियामे । नबी बकस अपन आँखि पोछि रहल छल। फेर दस मिनट ओ चुप रहल। “नबी बकसकेँ अम्मीक इन्तकालक दिन लोक पहिल आ अन्तिम बेर कनैत देखने रहए। मुदा ई सभ आइ फेर हमरा आँखिसँ नोर चुआ देलक। ओकीलक तँ बियाहो नहि होइत रहए। सभ कहैत छल जे बुरबक छैक। मुदा जेना भीष्म पितामह धृतराष्ट्रक बियाह करेलन्हि तहिना हम एकर बियाह करबओलहुँ आ ई सभ कहैत अछि जे हम ओकरा नोकर जेकाँ रखैत छियैक”। तावत कॉलबेलक घंटी बाजल रहए। ओकील नबी बकसक सोझाँमे आबि ठाढ़ भऽ गेल। “भैया, सभ कहैत अछि जे हम बुरबक छी। काल्हि अहलिया (कनियोँ) केँ ई सभ यैह गप कहि देलकैक। ओ कहलक जे तोहर चिन्ता ककरो नहि रहए छैक, मुदा हम नहि मानलहुँ। से काल्हि हम कनेक लेट भए गेलहुँ। सरकेँ कहबो केलियन्हि जे देखैत छी जे ओ सभ आबैए आकि नहि। कनियो तँ सुधंगे ने अछि। आइ ओहो दियादिनीक गरा पकड़ि कऽ खूब कानल अछि। बुधियार सभ ने अहाँकेँ छोड़ि चलि गेल, मुदा ई बुरबकहा अहाँकेँ छोड़ि कहियो नहि जएत, भाए”। काल-स्थान विस्थापन “सुनू। प्रयोगशालाक स्विच ऑफ कए दियौक”। चारि डाइमेन्शनक वातावरणमे अपन सभटा द्वि आ त्रि डाइमेन्शनक वस्तुक प्रयोग करबाक लेल धौम्य प्रयोगशालामे प्रयोग शुरू करए बला छथि। हुनकर संगी-साथी सभ उत्सुकतासँ सभटा देखि रहल छथि। “दू डाइमेन्शनमे जीबए बला जीव तीन डाइमेन्शनमे जीबए बला मनुक्खक सभ कार्यकेँ देखि तऽ नहि सकैत छथि मुदा ओकर सभटा परिणामक अनुभव करैत छथि। अपन एकटा जीवन-शैलीक ओ निर्माण कएने छथि। ओहि परिणामसँ लड़बाक व्यवस्था कएने छथि। तहिना हमरा लोकनि सेहो चारि डाइमेन्शनमे रहए बला कोनो सम्भावित जीवक वा ई कहू जे तीनसँ बेशी डाइमेन्शनमे जिनहार जीवक हस्तक्षेपकेँ चिन्हबाक प्रयास करब”। धौम्य कहैत रहलाह। एक आ दू डाइमेन्शनमे रहनिहारक दू गोट प्रयोगशालाक सफलताक बाद धौम्यक ई तेसर प्रयोग छल। एक विमीय जीव जेना एकटा बिन्दु। बच्चामे ओ पढ़ैत छलाह जे रेखा दू टा बिन्दुकेँ जोड़ैत छैक। नञि तऽ बिन्दुमे कोनो चौड़ाइ देखना जाइत अछि आ नहिये रेखामे। रेखा नमगर रहैत अछि मुदा बिन्दुमे तँ चौड़ाइक संग लम्बाइ सेहो नहि रहैत छैक। एक विमीय विश्वमे मात्र आगाँ आ पाछाँ रहैत अछि। नञि अछि वाम दहिनक बोध नहिये ऊपर नीचाँक। मात्र सरल रेखा, वक्रता कनियो नहि। आब ई ने बुझि लिअ जे अहाँ जतए बैसल छी, ओतए एकटा रेखा विचरण करए लागत। वरण ई बुझू जे ओ रेखा मात्र अछि, नहि कोनो आन बहिः। “द्वि बीमीय ब्रह्माण्ड भेल जतए आगू पाछूक विहाय वाम दहिन सेहो अछि मुदा ऊपर आ नीछाँ एतए नहि अछि। बुझू जे अहाँक सोझाँ राखल सितलपाटीक सदृश ई होएत, जाहिमे चौड़ाइ विद्यमान नहि अछि।” “मुदा श्रीमान् ई चलैत अछि कोना। गप कोना करत, एक दोसरकेँ संदेश कोना देत”। “आऊ। पहिने एक विमीय ब्रह्माण्डक अवलोकन करैत छी”। धौम्य एक विमीय प्रयोगशालाक लग जाइत छथि। ओतए बिन्दु आ बिन्दुक सम्मिलन स्वरूप बनल रेखा सभ देखबामे अबैत अछि। ई जीव सभ अछि। एक विमीय ब्रह्माण्डक जीव जे एहि तथ्यसँ अनभिज्ञ अछि जे तीन विमीय कोनो जीव ओकरा सभकेँ देखि रहल छैक। “देखू। ई सभ जीव एक दोसराकेँ पार नहि कए सकैत अछि। आगू बढ़त तँ तावत धरि जा धरि कोनो बिन्दु वा रेखासँ टक्कर नहि भए जएतैक। आ पाछाँ हटत तावत धरि यावत फेर कोनो जीवसँ भेँट नहि होएतैक। एक दोसराकेँ संदेश सेहो मात्र एकहि पँक्त्तिमे दए सकत कारण पंक्त्तिक बाहर किछु नहि छैक। ओकर ब्रह्माण्ड एकहि पंक्त्तिमे समाप्त भए जाइत अछि। “आब चलू द्वि बीमीय प्रयोगशालामे”। सभ क्यो पाछाँ-पाछाँ जाइत छथि। “एतय किछु रमण चमन अछि। पहिल प्रयोगशाला तँ दू तहसँ जाँतल छल, दुनू दिशिसँ आ ऊपरसँ सेहो। मात्र लम्बाइ अनन्त धरि जाइत छल। मुदा एतय ऊपर आ नीचाँक सतह जाँतल अछि। ई आगाँ पाछाँ आ वाम दहिन दुनू दिशि अनन्त धरि जा रहल अछि। ताहि हेतु हम दुनू प्रयोशालाकेँ पृथ्वीक ऊपर स्वतंत्र नभमे बनओने छी। एतुक्का जीवकेँ देखू। सीतलपाटी पर किछुओ बना दियौक। जेना छोट बच्चा जे आधुनिक चित्र बनबैत छथि। एतए ओ सभ प्रकार भेटि जएत। मुदा ऊँचाइक ज्ञान एतए नहि अछि। एक दोसरकेँ एक बेरमे मात्र रेखाक रूपमे देखैत अछि ई सभ। दोसर कोणसँ दोसर रेखा आ तखन स्वरूपक ज्ञान करैत जाइत अछि। लम्बाइ आ चौड़ाइ सभ कोणसँ बदलत। मुदा वृत्ताकार जीव सेहो होइत अछि। जेना देखू ओ जीव वाम कातमे। एक दोसराकेँ संदेश ओकरा लग जा कए देल जाइत अछि। पैघ समूहमे संदेश प्रसारित होयबामे ढ़ेर समय लागि जाइत अछि”। “श्रीमान, की ई संभव अछि, जेना हमरा सभक सोझाँ रहलो उत्तर ओ सभ हमरा लोकनिक अस्तित्वसँ अनभिज्ञ अछि तहिना हमरा सभ सेहो कोनो चारि आ बेशी विमीय जीवक अस्तित्वसँ अनभिज्ञ होइ”। “हँ तकरे चर्चा आ प्रयोग करबाक हेतु हमरा सभ एतए एकत्र भेल छी। अहाँमे सँ चारि गोटे हमरा संग एहि नव कार्यक हेतु आबि सकैत छी। ई योजना कनेक कठिनाह अछि। कतेक साल धरि ई योजना चलत आ परिणाम कहिया जा कए भेटत, तकर कोनो सीमा निर्धारण नहि अछि”। पाँच टा विद्यार्थी श्वेतकेतु, अपाला, सत्यकाम, रैक्व आ घोषा एहि कार्यक हेतु सहर्ष तैयार भेलाह। धौम्य पाँचू गोटेकेँ अपन योजनामे सम्मिलित कए लेलन्हि। “चारि बीमीय विश्वमे तीन बीमीय विश्वसँ किछु अन्तर अछि। तीन बीमीय विश्व भेल तीन टा लम्बाइ, चौड़ाइ आ गहराइ मुदा एहिमे समयक एकटा बीम सेहो सम्मिलित अछि। तँ चारि बीमीय विश्वमे आकि पाँच बीमीय विश्वमे समयक एकसँ बेशी बीमक सम्भावना पर सेहो विचार कएल जएत। मुदा पहिने चारि बीमीय विश्व पर हमरा सभ शोध आगाँ बढ़ाएब। एहिमे मूलतः समयक एकटा बीम सेहो रहत आ ताहिसँ बीमक संख्या पाँच भए जायत। समयकेँ मिलाकए चारि बीमक विश्वमे हमरा सभ जीबि रहल छी। जेना वर्ण अन्धतासँ ग्रसित लोककेँ लाल आ हरिअरक अन्तर नहि बुझि पड़ैत छैक ताहि प्रकारसँ हमरा सभ एकटा बेशी बीमक विश्वक कल्पना कए सकैत छी, अप्रत्यक्ष अनुभव सेहो कए सकैत छी”। धौम्य बजलाह। व्याख्यान समाप्त भेल आ सभ क्यो अपन-अपन प्रकोष्ठमे चलि गेलाह। सैद्धांतिक शोध आ तकर बाद ओकर प्रायोगिक प्रयोगमे सभ गोटे लागि गेलाह। धरातल पर त्रिभुज खेंचि कए एक सय अस्सी अंशक कोण जोड़ि कए बनएबाक अतिरिक्त्त पृथ्वीकार आकृतिमे खेंचल गेल त्रिभुज जाहि मे प्रत्येक रेखा एक दोसरासँ नब्बे अंशक कोण पर रहैत अछि । मुदा एतए रेखा सोझ नहि टेढ़ रहैत अछि। ओहिना समय आ स्थानकेँ टेढ भेला पर एहन संभव भए सकैत अछि जे हमरा सभ प्रकाशक गतिसँ ओहि मार्गे जाइ आ पुनः घुरि आबी। प्रकाश सूर्यक लगसँ जाइत अछि तँ ओकर रस्ता कनेक बदलि जाइत छैक। श्वेतकेतु आ रैक्व एकटा सिद्धान्त देलन्हि । जेना कठफोरबा काठमे, वृक्षमे खोह बनबैत अछि, तहिना एकटा समय आ स्थानकेँ जोड़एबला खोहक निर्माण शुरू भए गेल। अपाला एकटा ब्रह्माण्डक डोरीक निर्माण कएलन्हि, जकरा बान्हि कए प्रकाश वा ओहूसँ बेशी गतिसँ उड़बाक सम्भावना छल। सत्यकाम एकटा एहन सिद्धान्तक सम्भावना पर कार्य शुरू कएने छलाह, जकर माध्यमसँ तीन टा स्थानिक आ एकटा समयक बीमक अतिरिक्त्त कताक आर बीम छल जे बड़ लघु छल, टेढ छल आ एहि तरहेँ वर्त्तमान विश्व लगभग दस बीमीय छल। घोषा स्थान समयक माध्यमसँ भूतकालमे पहुँचबासँ पूर्व देशक कानून-विधिमे ई परिवर्त्तन करबाक हेतु कहलन्हि जाहिसँ कोनो वैज्ञानिक भूतकालमे पहुँचि कए अपन वा अपन शत्रुकेँ जन्मसँ पूर्व नहि मारि दए। घोषा विश्वक निर्माणमे भगवानक योगदानक चरचा करैत रहैत छलीह। ज्योँ विश्वक निर्माण भगवान कएलन्हि, एकटा विस्फोट द्वारा आ एकरा सापेक्षता आ अनिश्चितताक सिद्धांतक अन्तर्गत छोड़ि देलन्हि बढ़बाक लेल तँ फेर समयक चाभी तँ हुनके हाथमे छन्हि। जखन ओ चाहताह फेरसँ सभटा शुरू भए जायत। ज्योँ से नहि अछि, तखन समय स्थानक कोनो सीमा, कोनो तट-किनार नहि अछि, तखन तँ ई ब्रह्माण्ड अपने सभ किछु अछि, विश्वदेव । तखन भगवानक कोन स्थान? घोषा सोचैत रहलीह। आब धौम्यक लेल समय आबि गेल छल। अपन पाँचू विद्यार्थीक सभ सिद्धांतकेँ ओ प्रयोगमे बदलि देलन्हि। आ आब समय आबि गेल। पहरराति। पुष्पक विमान तैयार भेल स्थान-समयक खोहसँ चलबाक लेल। ब्रह्माण्डीय डोरी बान्हि देल गेल पुष्पक पर। धौम्य सभसँ विदा लेलन्हि। प्रकाशक गतिसँ चलल विमान आ खोहमे स्थान आ समयकेँ टेढ़ करैत आगाँ बढ़ि गेल। ब्रह्माण्डक केन्द्रमे पहुँचि गेलाह धौम्य। पहरराति बीतल छल। आगाँ कारी गह्वर सभ एहि समय आ स्थानकेँ टेढ़ कएल खोहमे चलए बला पुष्पकक सोझाँ अपन सभटा भेद राखि देलक। भोरुका पहरक पहिने धौम्यक विमान पुनः पृथ्वी पर आबि गेल। मुदा एतए आबि हुनका ई विश्व किछु बदलल सन लगलन्हि। श्वेतकेतु, अपाला, सत्यकाम, रैक्व आ घोषा क्यो नहि छलाह ओतए। विमानपट्टी सेहो बदलल सन। विश्वमे समय-स्थानक पट्टी सभ भरल पड़ल छल। “यौ। समय बताऊ कतेक भेल अछि”। “कोन समय। सोझ बला वा स्थान-समय विस्थापन बला। सोझ बला समय अछि, सन् ३१०० मास...”। ओ बजिते रहि गेल छल मुदा धौम्य सोचि रहल छलाह जे स्थान-समय विस्थापनक पहररातिमे हजार साल व्यतीत भए गेल। ककरा बतओताह ओ अपन ताकल रहस्य। आकि एतुक्का लोक ओ रहस्य ताकि कए निश्चिन्त तँ नहि भए गेल अछि? सर्वशिक्षा अभियान “हे हम डोमाकेँ पढ़ा लिखा कए किछु बनबए चाहैत छी” । बुधन पासवान बाजल । चण्डीगढ़मे ओ रिक्शा चलबैत छथि । आब गाममे खेती बारीमे किछु नहि बचलैक । छोटका भाए सभ जनमिते मरि जाइत रहए। से बुधनक एकटा छोटका भाएकेँ माए-बाप जनमलाक बाद डोमक हाथसँ बेचलन्हि आ फेर पाइ दऽ कए किनलन्हि । ई सभटा काज ओना तँ सांकेतिक रूपेँ भेल मुदा एहिसँ ग्रह कटित भऽ गेलैक। आ छोटका भाए जे बुधन पासवानसँ १२ बरिख छोट रहन्हि बचि गेलाह । आ ताहि द्वारे ओकरा सभ डोमा कहि सोर करए लागल । बुधन अपन बाप-माएक संग हरवाही करथि मुदा भाएकेँ पढ़ेबाक बड्ड लालसा रहन्हि । “सुनैत छिअए जे हमरा सभमे कनिओ पढ़ि-लिखि लेलासँ नोकरी भेटि जाइत छैक। एकरा जरूर पढ़ाएब, चाहे ताहि लेल पेट काटए पड़ए आकि भीख माँगय पड़ए”। भीख तँ नहि माँगलन्हि मुदा चण्डीगढ़क रस्ता धेलन्हि बुधन। भरि दिन रिक्सा चलाबथि आ साँझमे जखन दोसर संगी-साथी सभ देसी ठेकामे अपन ठेही दूर करबाक लेल जाथि तखन दस तरहक गप सुना कए बहन्ना बना कए बुधन अपन घर दिस घुमि जाथि। “की रे मीता। बामा-दहिना करै छेँ, निन्द नहि होइ छौ”। “नञि रौ भाइ। भरि दिन तँ बाइ मे रिक्सा घिचैत रहैत छी मुदा साँझ होइते अंगक पोर-पोर दुखाए लगै-ए”। “रौ भाइ। कहैत छियौक जे ठेकापर चल तँ दस बहन्ना बना कए घुरि जाइ छिहीँ। देख हमरा आउर केँ, पीबि कए फोँफ कटैत रहैत छी। एक्के निन्नमे भोर आ सभ ठेही खतम”। कोरइलाक सभ गप सुनि कऽ गुमकी लाधि दैत छथि बुधन। मोनमे ईहो होइत छन्हि जे किंसाइत डोमा पढ़ए आकि नहि पढ़ए। तखन जे आइ सभ गप पेटसँ निकालि देतथि तँ यैह सभ संगी-साथी सभ काल्हि भेने अही गपकेँ लऽ कऽ हँसी करतन्हि। दू चारि-टा पाइ जे बचत तकरा गामपर पठाएब। आ ताहिसँ डोमा पढ़त। मुदा गाममे जे स्कूल रहए ओतय किओ टा दलित आकि गरीबक बच्चा नहि पढ़ैत रहथि। सरकार एकटा योजना चलेलक, दलितक बच्चा सभकेँ बिना पाइ लेने किताब बाँटबाक । किताब लेबाक लेल घर-घर जा कए यादव जी मास्टर साहेब बच्चा सभकेँ स्कूल बजेलन्हि। नाम लिखलन्हि, बिना फीसक, मासूलक । सभ हफता-दस दिन अएबो कएल स्कूल। दुसधटोलीसँ, चमरटोलीसँ, धोबिया टोलीसँ सभ। डोमा सेहो। सभकेँ किताब भेटलैक आ सभ सप्ताह-दस दिनक बाद निपत्ता भऽ जाइ गेल । देखा –देखी कमरटोली आ हजामटोलीक बच्चा सभ सेहो अएलाह पढ़ए, किताब मँगनीमे भेटबाक लोभे । मुदा ओतए ई कहल गेल जे अहाँ सभ पैघ जातिक छी, मुफ्त किताब योजना अहाँ सन धनिकक लेल नहि छैक । “बाबू ई काटए बला गप छैक की, छोट-छोटे होइत छैक आ पैघ-पैघे । स्टेटक आइ धरिक सभसँ नीक चीफ-मिनिस्टर कर्पूरी ठाकुर भेल छैक, की नञि छै हौ असीन झा” । जयराम ठाकुर अपन खोपड़ीक टूटल चारसँ हुलकैत सूर्यक प्रकाशक आसनीपर असीन जीक केश कटैत बजलाह। “से तँ बाबू ठीके”। असीन बजलाह । से गाममे फेर ब्राहाण आ भूमिहारके छोड़ि आर क्यो स्कूलमे पढ़एवला नहि बचल । अदहरमे सभटा किताब ई लोकनि किनैत गेलाह । “हे अदहरसँ बेसीमे नहि देब, मानलहुँ किताब नव अछि, मुदा अहाँ सभकेँ तँ मँगनीयेमे ने भेटल अछि”। आ दुसध टोली, चमरटोली आ धोबिया टोलीसँ सभटा किताब सहटि कऽ निकलि गेल । आ पता नहि डोमा पढ़लक आकि नहि। जातिवादी मराठी “ऐँ यौ ई की देखैत छी, ऑफिसमे अफसर सेहो मिथिलाक आ बिहारक आ रिक्शाबला, खेनाइ बनबए बला सेहो सभ मिथिलाक आ बिहारक । से कोन गप भेल”। पुणे मे सिंहजी केँ एक गोट मराठी सज्जन पुछलखिन्ह। बात सेहो ठीक रहए मुदा बाहरी लोककेँ बुझबामे नहि आबए । सिंह साहेब भारतीय पुलिस सेवा मे रहथि आ हुनकर सहोदर भिखना-पहाड़ीमे प्रिंटिंग प्रेसमे क-ट सभ जोड़ैत छलाह, से हुनका कनेको अनसोहाँत नहि लागलन्हि। मैथिली साहित्यमे देखैत आएल छथि मात्र मैथिल ब्राहाण आ कर्ण कायस्थक लेखनीकेँ चमकैत। रिक्शाबला तँ दरभंगाक होए आकि कटिहारक, खेनाइ बनबएबला झौआ रहबे टा ने करैत अछि। ई मराठी सभकेँ पता नहि किएक अनसोहाँत लगैत छैक। बड्ड जातिवादी सभ अछि ई मराठी सभ। थेथर मनुक्ख दू दिनसँ परबा असगरे बैसल रहए । ओकर कनियाँ उढ़रि कए कतहु चलि गैलैक । बच्चा सभ कतेको बेर ओकर खोपड़ीमे पानि आ दाना दऽ आएल रहए। मुदा आइ भोरे ओ खोपड़ी उजारि कतहु चलि गेल”। “किए यै नानी । ओहो किएक नहि दोसर बियाह कऽ लेलक । बेशी प्रेम करैत रहए कनियाँसँ”। “अहाँ नेना छी । ई कोनो थेथर मनुक्ख थोड़े छी जे कनियाँ मरए, माय-बाप मरए, बेटा-पुतोहु मरए, सर-समाज मरए, चारि दिन मुँह लटकाएत आ पाँचम दिनसँ फेर थेथर मऽ जएत “। बहुपत्नी विवाह आ हिजड़ा “मरि गेलि बेचारी “। गौआँ सभ फलना बाबूक तेसर कनिआँक मुइलापर कहलन्हि । “फलना बाबू तेसर कनियाँक गरदनि काटि लेलन्हि”। एक गोटे कहलान्हि। “से ठीके कहैत छी । पहिल कनियाँमे बच्चा नहि भेलैक तँ दोसर बियाह कएलक । मुदा जखन दोसरोमे बच्चा नहि भेलैक तँ बुझबाक चाही छलए ने”।- दोसर गोटे कहलन्हि । “हँ आ उनटे तेसर कनियाँकेँ कहैत रहथि जे भातिज सभकेँ नहि मानैत छिऐक तेँ भगवान बच्चा नहि देलन्हि । बुझू”?-तेसर गोटे कहलन्हि । “हिजड़ा सार”।- चारिम गोटे सभा समाप्त करैत बाजल । मुदा चारि गोटेक ई महा-सम्मेलन एहि गपपर सहमति मे छल जे पहिल दू टा बियाह करब उचित रहए। स्त्री-बेटी “बाबूक संगे खाएब”।-बुचिया बाजलि । “हे आब तूँ छोट नहि छेँ, एम्हर बैस”। माए कहलन्हि । फेर भाए सभ खेनाइ खेलक आ आब बुचिया आ बुचिया माएक बेर आएल । तरकारी सठि जेकाँ गेल रहए, दूध तँ बाबू आ भाएकेँ मात्र भेटलैक । माए बुचियाकेँ सठल जेकाँ तरकारी लोहियामे सँ छोलनीसँ जेना –तेना निकालि कए देलन्हि आ अपने भात आ नून –तेल लए बैसलीह। दूधक बर्तनसँ दाढ़ी खखोड़ि कए बादमे बुचिया खेलक। - ई खिस्सा सुनबैत मनोहर बजलाह जे हमरा सभ आब ई कऽ सकैत छी की ? पहिने खेनाइ-पिनाइसँ लऽ कऽ पढ़नाइ-लिखनाइ धरि बेटीक संग अन्याय होइत रहए। अपाला-गार्गी-मैत्रेयीक समय तँ आब जा कऽ फेरसँ आएल अछि । बिआह आ गोरलगाइ जमाय पएर छूबि कए प्रणाम कएलन्हि तँ ससुर सए टका निकालि एक टाकाक नोटक सिक्काक लेल कनियाँकेँ सोर केलन्हि। खूब खर्च-बर्च कएने छलाह बेटीक बियाहमे पाइ अलग गनने छलाह आ नगरक चारि कठ्टा जमीन सेहो बेटीक नामे लिखि देने छलाह। “नञि बाबूजी। ई गोर-लगाइक कोन जरूरी छैक”? तावत कनियाँ आबि गेल रहथिन्ह, एक टकाक सिक्का लऽ कए। एक सए एक टाका जमायक हाथमे रखैत ससुर महराज बजलाह- – “राखू-राखू । ई तँ पहिनहियो ने सोचितियैक”। प्रतिभा मसूरीमे आइ.ए.एस. आ आइ. पी. एस. प्रोबेशनर सभक दारु पार्टी चलि रहल छल । “हम सभ एतेक तेज छी एक सय प्रश्नक सेट बना कऽ तैयारी कएलहुँ तखन जा कए सफल भेलहुँ । के अछि हमरासँ बेशी तेज?”। “रौ दिनेसबा । सतमामे तूँ पास नहि भेलँह, अठमामे सेहो एक बेरे पास नहि भेलँह । दसमामे द्वितीय श्रेणी भेलापर तोरा स्कूलसँ निकालि देलकऊ। प्रश्नक पैटर्नक हम आ तूँ प्रैक्टिस केलहुँ आ सफल भेलहुँ तँ एहिमे तेजी केर कोन बात आएल”। जाति-पाति हैदराबाद पुलिस एकेडमीमे दारूक पार्टी चलि रहल छल । “क्यो किछु नहि बाजत, बस हमही टा बाजब”। छाती पिटैत- “राजपूतक छाती छी ई, क्यो किछु नहि बाज “। “:भाइ यैह तँ अंतर छैक, दुनू गोटे आइ.पी.एस. छी, दुनू गोटे पीने छी। मुदा की हम ई कहि सकैत छी छाती पीटि कए- जे हम डोम छी, क्यो किछु नहि बाज”!: अनुकम्पाक नोकरी “बड्ड दर्द भऽ रहल अछि बाबू, आब बर्दास्त नहि भऽ रहल अछि” । पता नहि कोन घाव रहैक । पुकार कुहरि रहल छथि । पिता स्वतंत्रता सेनानी रहथि, जखन डाक्टर आ कम्पाउन्डर मना कऽ देलक घाव छुबएसँ तँ अपने हाथे सेवा कऽ रहल छथि । उजरा पाउडरकेँ नारिकेरक तेलमे मिला कऽ घावक खपलौइया हटा कऽ ओहिमे लगाबथि। पीजकेँ पोछथि। बाप आ छोट भाए दुनू सेवामे लागल रहथि । परूकाँ प्रथम श्रेणीमे उत्तीर्ण भेल छलखिन्ह पैघ बेटा, सत्यनारायण भगवानक पूजा भेल रहए। बूढ़ बापक पैघ आश रहथि बड़का बेटा। छोटका बेटा कोनो तेहन तेजगर नहि रहथिन। मुदा रोग एहन रहए जे एक दिन बड़का बेटाक प्राण लए लेलक। अंग्रेजसँ लड़ैत खुशी-खुशी जेल गेल रहथि मुदा तखन युवा रहथि। बुढ़ारीमे ई शोक हुनका तोड़ि देलकन्हि । गुमशुम आ अपनेमे मगन रहए लगलाह । स्वतत्रता सेनानी पेंशनसँ घर चलाबथि । हँ छोटका बेटा पैघ भाएक सटिर्फिकेट लऽ कलकता गेलाह आ ओहि सटिर्फिकेटक आधारपर हुनका एकटा प्राइवेट कम्पनीमे नीक नोकरी भेटि गेलन्हि। माने मात्र नाम बदलि गेलन्हि। लोककेँ बाप मरलापर नोकरी भेटैत छैक, हुनका भाएक मरलापर भेटलन्हि । नूतन मीडिआ नगरमे डकैतीक घटना भेल । नूतन मीडिया अपन-अपन चैनलमे -सर्वप्रथम ओकरे चैनलपर एकर सूचना देल जा रहल अछि- ई ब्यौरा दैत, दू-दिनमे एकोटा गिरफतारी नहि होएबाक आ ताहि द्वारे पुलिसक अक्षमताक चर्च करैत गेल। पुलिस हेडक्वार्टरमे बैठकी भेल । सभ टी.वी. चैनल कहि रहल छल जे चारि गोटे मिलि कए डकैती केलन्हि मुदा एखन धरि एको गोटेक गिरफतारी नहि भेल अछि। एनकाउन्टर स्पेशलिस्ट बजाओल गेलाह। जेना सभ बेर होइत रहए एहि बेर सेहो ओ एक गोटेँ पकड़ि कए अनलन्हि। चारि डाँग पड़बाक देरी छल आकि ओ अपन डकैत होएबाक गप स्वीकार कए लेलक। फेर एनकाउन्टर स्पेशलिस्टक संग ऑफिसर लोकनि कैमराक सोझाँ फोटो खिचबेलन्हि। ओ डकैत अपन डकैत होएबाक गप सेहो स्वीकार कएलक। चारि दिन आर बीतल। सभ दिन तरह-तरह सँ ओहि कथित डकैतकेँ पीटल जाइत रहल, -“बता अपन तीन संगीक नाम जकरा संगे डकैती कएने छलह”। -“सरकार चारिए डाँगमे अपन डकैत होएबाक गप स्वीकार कए लेलहुँ, हम डकैत रहितहुँ तँ ई करितहुँ ? मुदा आर तीनटा संगीक नाम कतए सँ आनू आ ककरा फुसियाहींकेँ फँसाबी”। सप्ताह भरिक बाद मीडिया एकटा बम विस्फोटक अन्वेषणमे बाँझि गेल । मुख्य डकैत तँ पकड़ाइये ने गेल से आब डकैतीक कॉवरेज दर्शक नहि ने देखए चाहैत छथि! पब्लिक डिमान्ड नहि छैक से ओहि डकैतकेँ बेल भेटलैक आकि नहि से कोनो समाचार नहि आएल। मिथिलाक उद्योग गाममे चौधरीजीक बड्ड रूतबा, डरे सभ सर्द रहैत छल । ककर दीन अछि जे हुनकर गम्हरायल धान काटि लेत आकि ... । ओ एकटा बस खोललन्हि- “दरभंगासँ गाम धरि चलत । सेकेंड हैंडमे भेटल अछि । पुरनका मालिकक लाइसेंस काज देत। संगमे बसक पुरनका मालिक तीन मासक लेल अपन ड्राइवर आ खलासी सेहो देलक अछि, तकर बाद अपन ताकि लेब”। चौधरीजी मन्दिरपर बसक पूजा करैत काल गौआँ सभ़सँ बजलाह । “सुनैत छिऐक बस-स्टैण्डमे बड़ बदमस्ती करैत जाइत छैक”- एक गोटे गौआँ बजलाह “धुर, चौधरीजीक बस आ आदमीकेँ के छुबाक साहस करत”? दोसर गोटे प्रसाद लैत बजलाह। बसक रूट आकि रस्ता यात्रीगणक लेल सुभितगर रहैक से ओहि गाड़ीमे पैसेन्जर भरि जाइत रहए। दोसर बसबला सभ दबंग सभ। शाहीजी आ मिश्राजीक स्टाफ सभ बड़ सञ्जत! से चौधरीजीक स्टाफकेँ गरगोटिया दऽ बस स्टैण्ड सँ बाहर निकालि देलकन्हि। पोखरिक महारपरसँ चौधरीजीक बस खुजए लागल तँ ओतहु यात्री पहुँचए लगलाह। आब तँ बस-स्टैण्डक दादा सभकेँ बड्ड तामस उठलन्हि । दुनु ड्राइवर आ खलासीकेँ पुष्ट पीटल गेल आ ईहो कहल गेल जे फेर एहि रूटपर चलताह तँ बसक एक्सीडेन्ट करबा देल जएतन्हि। शाही आ मिश्रा जीक तँ पचासो टा गाड़ी छन्हि एकटा थानामे एक्सीडेन्टक बाद पड़ले रहत तँ की ? गामक रोआब –दाब बला कौधरीजी बस-स्टेण्डक दादा सभक सोझाँ जेना बकड़ी बनि गेलाह। गाममे मन्दिरपर गाड़ी ठाढ़ छन्हि, ओहि पर कदीमाक लत्ती चढ़ि गेल अछि पैघ-पैघ कदीमासँ बस झपा गेल अछि। खूब फड़ल छैक। गौआँसभ हँसीमे कहि रहल छथि- “चौधरीजीक बसक पाइ तँ एहि बेर कदीमा बेचिये कऽ उप्पर भऽ जएतन्हि”। “दरभंगाक इन्डस्ट्रीयल स्टेटमे सेहो फैक्ट्री सभ एहिना बन्द अछि आ ओकर देबाल सभपर एहिना तर-तीमनक लत्ती सभ भरल छैक”- दोसर गौआँ बाजल। मिथिलाक उद्योग-२ मिथिलाक बोनमे रहनिहार जीव-जन्तु सभ आपसमे विचार कएलक- – “अपन क्षेत्रक दादा सभ उद्योगक विनाश कएने अछि, ओतुक्का भीरू लोक सभ उद्योग लगेबासँ परहेज करैत अछि”- गीदड़ बाजल। “तखन अपनहि सभ किएक नहि फैक्टरी खोलैत छी, कोन दादाक मजाल जे हमरा सभ लग आओत”।-बाघ कड़कल। प्रस्ताव पास भेल जे आब जंगलमे फैक्ट्री खुजत आ नगर जा कए उद्योग विभागसँ एकर पंजीकरण करबाओल जएत। ओतए भीरू मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थ सभक राज अछि, ओ सभ बड्ड ओस्ताज होइत अछि। गीदड़, बानर, लोमड़ि, नीलगाय सभक संग गदहा सेहो पंजीकरण लेल अपन सेवा देबाक लेल अगू बढ़लाह। सभसँ पहिने लोमड़िकेँ मौका भेटल कारण ओ सेहो जंगलक ओस्ताज अछि। किछु दुनुका बाद दौग-बरहा केलाक बाद ओ हारि मानि लेलक। “यौ बाघ महाराज। बड्ड कोन-कोन तरहक दस्तावेज मँगैत अछि नहि भऽ सकत हमरा बुते”। फेर एक एक कए सभ जाइत गेलाह आ घुरि कए अबैत गेलाह । गदहा कहैत रहल जे एक मौका हमरो देल जाए । मुदा सभ सोचथि जे बुझू, एहेन पेंचीला सभ विफल भऽ आबि गेलाह मुदा फैक्टरीक पंजीकरण नहि करबाए सकलाह आ ई गदहा जे मूर्खताक लेल आ बोझ बहबाक लेल प्रसिद्ध अछि, की कऽ सकत ? “ठीक छैक”- अन्तमे हारि कए बाघ कहलन्हि- – “जाउ अहूँ देखि आउ एक बेर”। मुदा ई की ? साँझ होइत देरी गदहा महाराज जे छलाह से फैक्ट्रीक पंजीकरण प्रमाणपत्र लऽ सोझाँ हाजिर भऽ गेलाह। बाघ पुछलन्हि- –“औ जी गदहा महाराज ! एतेक कलामी जन्तु सभ जतए विफल भऽ गेलथि ओतए अहाँक सफलताक मंत्र की”? गदहा महाराज उत्तर देलन्हि- “महाराज एकर मंत्र अछि जातिवाद आ भाइ-भतीजावाद। उद्योग विभागमे हमर सभ सरे-सम्बन्धी लोकनि छथि ने”! बाढ़ि, भूख आ प्रवास एहि बेरक बाढ़ि पछिला जेकाँ सन नहि । सभटा सुड्डाह कऽ देलक आगियोसँ जल्दी। खेत पथारमे रेत आ बालुमे खाली अल्हुआक खेती। दुनू साँझ पप्पू भाइ अल्हुआ खाइत अकच्छ भऽ गेल छथि। वैदिक थिकाह, मुदा एहि कोसिकन्हामे ... मुदा देखू भाग्य! हरिद्वार सँ भातिजक चिठ्टी अबैत अछि- “आबि जाऊ काका, एतए वैदिक लोकनिक बड्ड पूछि अछि। भरि दिन हस्त-सन्चालन आ उदात्त, अनुदात्त आ स्वरित स्वरक मेलसँ वेदक पाठ करू आ साँझमे नीक – निकुइत मिष्टान्न, खीर-पूरी खाऊ”। वैदिक जी ट्रेन धेलन्हि आ पहुँचि गेलाह हरिद्वार । ओतए पहुँचि स्नान-ध्यान कऽ भरि दिन कंठ फाड़ि आ हाथ घुमाए वैदिक मंत्रक पाठ केलन्हि । साँझमे मनसूबा बान्हि खेनाइपर बैसलाह जे आब बड्ड दिनुका बाद खीर-पूड़ी खएबाक अवसर भेटत। मुदा एम्हर हिनका हरिद्वार पहुँचबासँ पहिनहि दोसर पंडित लोकनिमे विचार-विमर्श भेल कारण ओ लोकनि खीर- पूड़ी खाइत-खाइत अकच्छ भऽ गेल छलाह। से सर्वसम्मतिसँ विचार कएल गेल जे आइसँ किछु दिनक लेल खेनाइक मेन्यू बदलल जाए। विचार भेल जे आइसँ वेदपाठक बाद अल्हुआ आ दूध किछु दिन धरि देल जाए। वैदिक जी खाइ लेल मनसूबा बन्हने बैसल छलाह जे आइ जे खेनाइ अएत तँ ओहि खेनाइकेँ हिस्सक छोड़ा देबैक। मुदा तखने वज्रपात भेल, –सोझाँ अल्हुआ महाराज विद्यमान । वैदिक जी हाथ जोड़ैत अल्हुआ महराजसँ बजलाह- “सरकार हम तँ ट्रेनसँ आएल छी मुदा अहाँ कोन सवारीसँ अएलहुँ जे हमरासँ पहिनहिसँ विराजमान छी ।“ नव-सामन्त संगीक छोट भाए गाममे रहथि। गाममे मारि-पीट करैत छलाह से हुनका दिल्ली बजाओल गेल । एतहु गप-गप पर झगड़ा करए लागथि। हमरा सोझेँमे एक गोटेकेँ धमकी दऽ रहल छलाह- “दस मिनटमे पहुँचि जाह नहि तँ गोली मारि देबह। बीस किलोमीटर दूरमे छह आकि चालीस किलोमीटर दूर हमरा ओहिसँ कोनो मतलब नहि अछि”। हम हुनका विषयमे सुनिते रही मुदा आइ देखलहुँ । हमर संगी बुझबए लगलखिन्ह- “ठीक छैक, हम नहि कहैत छी जे नहि मारियौक। मुदा एकटा गप कहू जे दिल्लीमे बीस किलोमीटर दूरसँ आबएमे तीन मिनट प्रति किलोमीटरक हिसाबसँ साठि मिनट लगतैक से ओ दस मिनटमे कोना आओत”? विद्यार्थी भीतर चलि गेलाह। हम संगीकेँ पुछलियन्हि- “विद्यार्थी तँ कतहु गुड़गाँवमे नोकरी ने करैत रहथि” ? “हँ एक ठाम दस हजारक नोकरी धरेने रहियन्हि मुदा छोड़ि देलन्हि। कहलन्हि जे हमर लेबलक पुरान सामन्त जोकर ई नोकरी नहि। आब हिनकर लेबल कहैत छी- कताक प्रयास कएलहुँ जे मैट्रिक पास भए जाथि मुदा मध्यमोसँ पास नहि कए सकलाह”। बाणवीर साढ़े तीनसँ चारि फीटक बीच लेटराक लम्बाइ छल। सभ कहैत छैक जे ओकर माए-बाप दोसराक बच्चाकेँ देखि कए भुट्टा-भुट्टा कहैत रहैत छलथि।से पता नहि की भेलैक लेटरा तकरा बादसँ बढ़िते ने अछि, ओकर लम्बाइ एकदम्मेसँ बढ़ब रुकि गेलैक। “धुर! माए-बापक कतहु नजरि लगैत छैक बच्चाकेँ”। “नञि यौ, माएक तँ लगिते छैक, देखियौ ने लेटराकेँ”। गौआँ सभ आपसमे गप करथि। जे से, सभ बच्चा पैघ भेल। बढ़ए लागल । मुदा लेटरा घुटमुटाएले रहल। सभ क्यो ओकरा परोक्षमे लेटरा आ मुँहपर लेटरबम कहए लगलाह। लेटरबमक माए-बापकेँ जमीन-जाल ततेक नहि। से महीसेपर निर्भर छलन्हि हुनकर सभक जीवन। लेटरा महीसक सेवामे भोरेसँ लागल रहैत छल। भोरमे भोरहा कातमे रगड़ि-रगड़ि कऽ चिक्कन बना दैत छल महीसकेँ। पुआरक नूरीसँ साफ करैत काल गोट-गोट अठौरी निकालि दैत छल। बेरू पहर बौआ-चौड़ीमे महीस चरबैत काल निसभेर भऽ सूति रहैत छल महीसक पीठपर। लोक सभ हँसीमे कहितो रहए जे लेटरबम बौआ-चौड़ी हाइ स्कूलसँ मैट्रिक पास कएने अछि। महीसो लक्ष्मी रहए ओकर। आन माल-जाल सिंह लड़ाबए तँ लेटरबमक महीस घास चरबामे लागल रहए। से साँझमे घर-घुरैत काल जखन आन सभ गोटेक महीसक पेट पाँजरमे धसल रहैत छल, लेटराक महीसक दुनू पेट दुनू दिसन फूलि कए लटकि जाइत छल। बिना परिश्रम पन्हाइत छलैक महीस। लेटरा अपन माए-बापकेँ तैयो प्रसन्न कए सकल की? ओ दुनू गोटे लेटराक गुजर कोना चलतैक, ओकरासँ बियाह के करतैक- एहि बात सभकेँ लऽ सोचिते रहैत छलाह। गाममे बैतरणी नाटक आएल रहैक। कठपुतली सभ, मनुक्खक मरलाक बाद बैतरणी धार पार करबाक दृश्य, जे भयावहे-भयावह छल, खूब नीज जेकाँ प्रदर्शित करैत छलाह। लेटरबम सेहो माए-बापक संग नाटक देखि अएलाह। आ एतहिसँ लेटराक जीवन एकटा दिशा लए लेलक। लेटराक बाबूक पाछाँ बैतरणी नाटक कम्पनीक मालिक लागि गेल। धरोहि दऽ देलक, साँझ-भोर ओकर घरपर पहुँचए लागल। लेटरा अपन महिसबारीमे मगन रहैत छल। मुदा ओ अनुभव करए लागल जे आइ-काल्हि माए-बाप ओकरापर किछु बेशीए ममता राखए लागल छथि। सभ कहैत रहओ जे लेटराक जीवन कोना के चलतए, से की ओकर माए-बाबूपर आब कोनो असरि थोड़बेक पड़तए। मुदा बैतरणी नाटक कम्पनीक मालिक लेटराक बापक पाछाँ पड़ि गेल। कहए लागल जे ओ तँ लेटराकेँ नीक नोकरी दियबा रहल अछि। लेटरबमक बाबू सभसँ पुछथि जे की करी? सभ यैह कहैत रहन्हि जे ओ लेटराकेँ कीनि रहल अछि, नोकरी नहि दऽ रहल अछि। ई नाटक कम्पनी सभ बणवीर सभकेँ गामे-गाम तकने फिरैत अछि आ शहरी सर्कस कम्पनी सभकेँ बेचि दैत अछि। फेर एक बेर जे बेटा जएत तँ की घुरिकऽ अएत? बेटा धन छी, बाणवीरे सही! अकश-तिकश करैत एक दिन माए-बाप लेटरसँ पुछलन्हि- “भगवानक इच्छा सर्वोपरि। भगवान पेट दइ छथिन्ह तँ ओकरा पोसबाक जोगार सेहो करैत छथिन्ह। लोक सभ कहैत रहल जे लेटराक गुजर कोना चलतए तँ ककरो गपक हम मोजर नहि दैत छलियैक। मुदा ई बैतरणी नाटक कम्पनी बला तँ पाछूए पड़ि गेल अछि। लोकसभ कहए-ए जे ई सभ शहरी सर्कस कम्पनीक लेल बाणवीर सभक ताकिमे गामे-गाम फिरैत अछि आ ओहि कम्पनी सभमे ओकरा सभकेँ बेचि दैत अछि। मुदा ई कहए-ए जे से नहि छैक। सभ दिनुका दिनचर्जा छैक। शहरे-शहरे घुमैत अछि ई सभ। जखन कतहु सर्कस नहि लगैत छैक तँ छुट्टिओ भेटिते छैक। आर के नोकरी देत एतेक कम लम्बाइ बलाकेँ? से हम अहींसँ पुछैत छी जे की कएल जाए”। लेटराक तँ आँखिसँ दहो-बहो नोर खसए लगलैक। गौआँ सभ ठीके कहैत रहए। माए-बाप तँ लागैए निर्णय कऽ लेने छथि। “माए-बाबू। हमरा बुझल अछि जे हमर बियाह-दान नहि होएत। मुदा अपन पेट तँ कोहुना हम गाममे भरिये लैत छी। गुजर तँ कइए लैत छी। लोक सभ कहैत रहए जे तोहर माए-बाप तोरा बेचि देलकउ, से ठीके अछि की”? आब तँ कन्नारोहट उठि गेल। माए-बापक संग लेटराक कानबसँ अँगनामे अनघोल मचि गेल। जेना सुति कऽ उठलाक बाद ढेर-रास गप महत्त्वपूर्ण कोटिसँ उतरि कऽ अमहत्वपूर्ण वा ततेक महत्वपूर्ण नहि रहि जाइत अछि, तहिना दिन बितैत लेटरा सेहो अपन मोन मना लेलक। कनी देखियैक बाहरक दुनियाँ केहन होइत छैक। माए-बाप तँ बेचिए लेने छथि, ओतेक सिनेह रहितन्हि तँ बेचबे करितथि? तँ हमहीं किएक अधभगिया सिनेह राखी? बैतरणी कम्पनीबला लेटराकेँ एकटा सर्कस बला लग लऽ गेल। ओतए ई लगैत रहए जे जेना सभ बाणवीरक नोकरीक ओतए जोगार होअए। दुनियाँक सभ बाणवीरक नोकरी ओकरा लग पक्का रहए। लेटरा जेना बाणवीरक देशमे पहुँचि गेल छल। मोँछबला, निमोछी, पातर-मोट, नव-बूढ़- मुदा सभ धरि बाणवीर। लेटरा ओकरा सभक बीच रहए लागल। किछु दिन धरि तँ ओकरा लगैत रहए जे ओ कोनो विशिष्ट व्यक्ति अछि आ तेँ बेशी दुखी अछि आ दोसर बाणवीर सभ तँ अही योग्य अछि। मुदा आस्ते-आस्ते जखन संगी-साथी सभसँ ओकरा गप होमए लगलैक, तखन ओकरा बुझबामे अएलैक जे सभक एक्के खेरहा छैक। फेर ओहि जेलरूपी घरमे हँसी-खुशीसँ, छोट-छीन झगड़ा-झाँटी आ मान-मनौअलक संग ओ आगाँ बढ़ए लागल। अपन जिनगीक ई रूप ओकरा एहन सन लगैत छलैक जेना ओ नोकरिहारा होअए। ओहो घुरि जएत गाम आ फेर आपस अएत नोकरीपर। गामक दोसर नोकरिहारा सभकेँ ओ देखैत छल। गाम अबैत काल जतबे उल्लसित रहैत छलाह, नोकरीपर घुरैत काल सभक घुघना लटकि जाइत छलन्हि। धुर, माए-बाप हमरा बेचलक थोड़बेक अछि। हमरा सन बाणवीरकेँ एहिसँ नीक आर कोन नोकरी भेटतैक। सर्कसमे जखन हम कला देखबैत छी तँ बच्चा सभ कोना पेट पकड़ि हँसैत अछि, कतेक थोपड़ी पड़ैत अछि। थोपड़ीक अबाज तँ निसाँ आनि दैत अछि। काल्हि ओ दु जुट्टी बला बचिया, केहन लगैत रहए जेना अपने लोक रहए। गाममे बड़का कक्काक बेटीक बियाह नौगछिया भेलन्हि तँ हुनको दिआ तँ लोक सभ उरन्ती उड़ेने छल जे बेटी बेचि लेलन्हि। कतेक दुरगर बियाह करा देलन्हि! ई लोको सभ, बुझु इनारक बेङ सभ छी। दिल्ली-मुम्बइ घुमत गऽ तखन ने बुझबामे अओतैक जे भागलपुर-नौगछिया कोनो ततेक दुरगर नहि छैक। माए-बाप हमरा बेचि लेत?....आ ई सोचिते लेटराक कंठ सुखा गेलैक आ आँखि पनिया गेलैक। “रे भाइ, चल । तैयारी करबा लेल घण्टी बाजए बला छैक। ओहिसँ पहिने किछु खा-पीबि ली”। तस्कर १ शालिग्राममे छिद्र होइत अछि, कारी पाथर मात्र नर्मदामे भेटैत अछि। जमसम गाममे सभ किछु बदलल अछि, ग्रामदेवताक डिहबार स्थानसँ लऽ कऽ सभ ठाम मुदा किछु ने किछु लाक्षणिक वस्तु देखिये रहल छी। मुदा हमर गाथाक कोनो लक्षण एतए नै अछि। गाछी आ बाध बोन सभटा पतरा गेल अछि। सए बर्ख। बिज्झू आमक ओ गाछी। बीहरि सभसँ भरल। भाँति-भाँतिक चिड़ै-चुनमुनी आ छोट पैघ जीव-जन्तु। नेना रही। जेठसँ अगहन खुरचनिञा लत्ती लग गप करैत हम आ मालती। कहियो फागुन-चैतमे जाइ तँ लवङलताक लत्ती लग गप करी। मलकोका, कुमुद, भेंट, कमलगट्टा कन्द, रक्ताभ बिसाँढ़क ताकिमे कादो-पानिमे घुमैत हम आ ओ। खुल्ले पएर, काँट-कूसक बीच तड़पान-तड़पि कऽ कुदैत। आमक कलममे सतघरिया खेलाइत। हम आ मालती। करबीरसँ बेढैत अपन काल्पनिक-घर। एकहरा, दोहारा, जटाधारीक बीआ भरि साल जोगबैत मालती। मालती सेहो होएत हमरे बएसक। माए कहैत छल जे मालती छह मासक जेठ छल हमरासँ मुदा पिता कहैत छला जे छह मासक छोट अछि मालती हमरासँ। आ पिता से किएक कहै छलाह से बादमे जा कऽ ने बुझलिऐ। भरि आमक मास आमक गाछीक दिनुका ओगरबाहीक भार हमरे दुनू गोटेपर छल। मुदा साँझ होएबासँ पहिने हमर मामा बछरू आ मालतीक बाबू खगनाथजी कलम आबि जाइत छलाह, रातिक ओगरबाहीक लेल। मुदा हमर सभक गाथाक कोनो लक्षण एतए सेहो नै अछि। हमर सभक माने केशव आ मालतीक। मुदा ओहि पक्काक डिहबार स्थान लग कारी रंगक शालिग्राम हम ताकि रहल छी। छिद्रयुक्त शालिग्राम। एकटा नुका कऽ रखने छलहुँ एत्तै कतहु। गौँआ सभ धरि खूब खर्चा कएने अछि एहि डिहबारक स्थानक मंडप बनएबामे। पहिने तँ किछुओ नञि रहै। राजा जे बनेलक पोखरिक घाट आ तकर कातमे पक्काक मन्दिर सएह। मुदा बेचारो पूजा कैयो नञि सकलाह। लाजक द्वारे हमर एहि गाममे आबियो नञि सकलाह। २ हम केशव, गाम मंगरौनी, नरौने सुल्हनी, पराशर गोत्र, कवि मधुरापतिक पुत्र। मालती- माण्डर सिहौल मूलक काश्यप गोत्री खगनाथ झा, गाम जमसमक पुत्री मालती। खगनाथजी आ हमर मामा बछरूमे भजार लागल। जमसममे हमर मामा गाम। मामागाम धरि सुखितगर, हम सभ तँ दरिद्रे। से हम एक मास गरमी तातिल आ पन्द्रह दिन दुर्गापूजासँ छठि धरि मामेगाममे रहैत रही। गरमी तातिलमे सपेता पकबासँ लऽ कऽ कलकतिया आम पकबा धरि गाछी ओगरी। आ दुर्गापूजामे खष्ठीसँ लऽ कऽ भसान धरि दुर्गापूजा देखी। फेर दीयाबातीमे कनसुपती जराबी आ छठिमे गाम घुरि जाइ। आ बीच-बीचमे तँ जाइत रहबे करी। मालती संगे खूब झगड़ा सेहो होइ छल। चौथामे रही प्रायः। गरमी तातिलमे मामा गामक आमक गाछी गेल रही। कोनो गपपर मालतीसँ रूसा-फुल्ली भऽ गेल। धरि बौसलक मालतीये। आ बौसबो कोना केलक। -हम अहाँसँ घट्टी मानै छी ओहि गपक लेल। -कोन गप। -जइ गपपर अहाँसँ झगड़ा भेल। आ ओ गप नञि हमरा मोन पड़ल आ ने मालतीकेँ। मुदा फेर मालतीसँ कहियो कोनो गपपर हम झगड़ा नञि केलहुँ। वएह मुँह फुलाबए तँ हमही पुछिऐ जे कोन गपपर मुँह फुलेलहुँ से तँ मोन नहिये हएत तखन अनेरे ने झगड़ा करै छी। गरमी तातिलक बाद दुर्गापूजा आ दुर्गापूजाक छुट्टीक बाद गरमी तातिलक बाट जोहै लगलहुँ। से कहियासँ से की मोन अछि ? ३ पिता गाममे बटाइ करथि। मिडिल स्कूलक बाद कोनो स्कूल नहिये रहै आस-पड़ोसमे। संस्कृत पाठशाला सभ बन्ने भऽ गेल रहै। से तातिल बला कोनो बात आब रहबे नञि करए। भरि साल बुझू काजे आकि तातिले। नाना-नानी जिबिते रहथि। माएक लियौन कराबए लेल कियो ने कियो आबिये जाइ छल। हमहुँ दू चारि मासमे मामा गाम कोनो लाथे भइये अबैत छलहुँ। गामपर कएक टा समस्या। नञि जानि कोन भाँज रहै जे पाँजिक रक्षाक गप पिताक मुँहे सुनैत रहैत छलहुँ। आ से हमर बियाह मालती संगे भेने टा सँ सम्भव, सेहो हुनका मुँहे उचरैत छलन्हि। मालती हमर संगी मुदा एहि गप-शपसँ ओकर हमर दूरी बढ़ि जेकाँ गेल। जे सहजता हमरा आ ओकरा मध्य छल से खतम होअए लागल। जेना ओकरा देखिते हमर मोनमे पत्नीक छवि नजरि आबै लागल छल, तहिना तँ ओकरो मोनमे ने अबैत होएतैक। ४ हमर गाम आएल रहथि बछरू मामा। मधुरापति- “बछरू आब अहींक हाथमे हमर सभटा इज्जत अछि। खगनाथक पुत्री केशवक लेल सर्वथा उपयुक्त। सुन्दरि सुशील अछि तँ केशव सेहो जबर्दस्त अछि। एक्के बतारीक अछि मुदा किछु दिनुका छोटे अछि मालती। हे। अहाँकेँ तँ ई बुझले अछि जे ७०० टाका लड़कीबलाकेँ दए हमर विवाह करा हमर पिता पाँजि बनाओल। मुदा आब जमीन जत्था नै अछि। काल्हि घोड़ीकेँ चिलम पियाए ओहिपर चढ़ि आएल छलाह पञ्जीकार। साफे कहि देलन्हि जे मात्र खगनाथेक पुत्रीसँ अधिकारमाला बनैत अछि। आ से नै भेने पुबारिपार श्रोत्रियक श्रेणीसँ चुत भऽ जाएब हम”। बछरू- “हम पुछै छियन्हि खगनाथसँ। संगी तँ छथि मुदा हुनकर मोनमे की छन्हि से वएह ने कहताह”। आ ने जानि किएक प्रेमसँ भरि गेल छल हमर मोन। बिदा भऽ गेल रही हुनका संगे। ५ मालती- “केशव। तोहर कत्तौ दोसर ठाम बियाह भऽ जएतौक तखन हमरासँ भेँट कोना होएतौक”। केशव- “आ तोहर ककरो दोसरासँ बियाह भऽ जएतौक तँ एहन अनर्गल प्रश्न सभ ककरासँ करमे”? मालती- “मुदा एकटा गप बुझलहीं। काल्हि तोहर मामा हमर पितासँ हम्मर-तोहर बियाहक चरचा कऽ रहल छलाह”। केशव- “तखन”। मालती- “नञि, सभटा तँ ठीके मुदा तखने दरभंगा राजाक दूत बनि एक गोटे आबि गेलाह आ कहए लगलाह जे राजाक समाद अछि”। केशव- “राजाक कोन समाद”। मालती- “कियेने गेलिऐ। मुदा हमर पिताकेँ ओ दूत कहलन्हि जे बेटीक बियाहक चर्च किछु दिन रुकि कऽ करबाक लेल”। केशव- “तोहर सुन्दरताइ तँ छौहे तेहने। राजोक नजरिमे तोरा लेल कोनो लड़का अभरल छै की”? मालती- “कियेने गेलिऐ”। ६ राजाक मन्त्रीक सवारी खगनाथक दरबज्जापर! दुइये दिनमे कीसँ की भऽ गेल। ओ दूत जा कऽ किछु कहि तँ नञि अएलै जे खगनाथ अपन बेटीक बियाह लेल धरफरायल छथि। से सतर्की देखियौ। लोक सभ गर्दमगोल करैत। सभ स्वागतमे जुटल। आ हमहुँ सभ चीजक जाएजा लैत रही। साँझ होइत-होइत हमर पिता सेहो आबि गेल छलाह। ओम्हर राजाक मन्त्रीक स्वारी गेल आ एम्हर हमर पिता माथपर हाथ रखने गुम्म रहि गेलाह। खगनाथ सेहो मौन। राजा अपन बियाह मालतीसँ करबाक प्रस्ताव खगनाथ लग पठेने छलाह। महाराज बीरेश्वर सिंह। कहू तँ। अपने चालीससँ उपरे होएत आ एहि तेरह-चौदह बरखक बचियासँ बियाहक प्रस्ताव। खगनाथक की ओकाति जे ओकरा मना करितथिन्ह। हमर पिता चिन्तित जे आब पाँजि नै बाँचत। ओहि दिन साँझमे कोनटा लग मालतीसँ हमर भेँट भेल। करजनी सन-सन आँखि फुलल, जेना हबोढ़कार भऽ कानल होअए। की सभ गप केलहुँ मोनो नञि अछि। हँ आखिरीमे हम कहने धरि रहिऐ जे सभ ठीक भऽ जाएत। ७ जमसममे बीरेश्वर सिंह लेल लड़की निहुछल गेल! जमसम गाममे पोखरि खुनाओल गेल। ओतए मन्दिर बनल जे राजा दोसराक मन्दिरमे कोना पूजा करताह। मुदा हमहुँ रही मधुरापति कविक पुत्र केशव। बियाहक दिन लगीचे रहै आ दोसर कोनो दिन सेहो नञि रहै। आ ओहि दिन मालतीसँ सभ गप भइये गेल छल। कटही गाड़ीमे आगूक चाप आ पाछूक उलाड़, आगाँक चाप नीक कारण पाछाँ उलाड़ भेलापर गाड़ी उनटि जाएत। मुदा हम ओहिना गाड़ीकेँ उलाड़ केने बँसबिट्टी लग मालतीक इन्तजारीमे रही। ओ आयलि आ गाड़ीपर बैसि गेलि। जे कियो रस्तामे देखए से डरे नञि टोकए जे गाड़ी ने उनटि जाइ एकर। एकटा पतरंगी चिड़ै देखि उल्लसित होअए लागलि मालती तँ आँगुरसँ हम ओकर ठोढ़ बन्न कऽ देलिऐ। मालतीकेँ लऽ कऽ गाम आबि गेलहुँ, धोती रंगाइत छल। फेर जे मालतीक पता करबाक लेल आएल रहए तकरा पकड़ि राखल। आ ’कन्यादान के करत’क अनघोल भेलापर ओकरा सोझाँ अनलहुँ जे कन्यादान यएह करबाओत। सलमशाही चमरउ जुत्ता उतारि धोती पहीरि हम विवाह लेल विध सभ पूर्ण केलहुँ। मालतीक सीथमे सिनुर हमरे हाथसँ देब लिखल जे रहै। ८ तकर बाद राजा बीरेशवर सिंह की करताह? पञ्जीकारकेँ बजा कऽ हमर नाममे तस्कर उपाधि लगबाओल। मुदा मधुरापति अपन पुत्रक प्रति गर्वोन्नत्त। बाघक बेटा बाघ। पाञ्जि आ पानि अधोगामी मुदा खगनाथ झा- श्रीकान्त झा पाँजि, तस्कर केशवक श्रोत्रिय ओहिठाम विवाह कएलापर श्रोत्रिय श्रेणी विराजमान रहतन्हि। आ सए बर्खक बाद आइ एहि गाममे कोनो नाटक होएतैक। सुल्ताना डाकू। आ हम तस्कर केशव, मंगरौनी नरौने सुल्हनी- पराशर गोत्र, कवि मधुरापतिक पुत्र अपन गाथाक कोनो एकटा लक्षण एतए जमसम गाममे ताकि रहल छी। मुदा राजा बीरेश्वर सिंहक वएह पोखरि आ आब ढ़नमनाएल मन्डिल देखै छी, बेचारो घुरि कऽ लाजे एहि गाममे एबो नै केलाह। यएह पोखरि आ ढ़नमनाएल मन्दिर हमर प्रेमक अछि अवशेष। सिद्ध महावीर १ बान्हक कातमे अनमना दीदीक घर। घर नै झोपड़ी कहू। गामक मोटामोटी सभ अँगनामे एकटा विधवाक घर रहैत छै। मुदा जखने परिवार पैघ होइत अछि तँ क्यो अपन घरक मुँह घुमा लैत अछि तँ क्यो बेढ़ बना दैत अछि। आ कखनो काल ओहि राँड़-मसोमातक घरक स्थान परिवर्तन भऽ जाइत अछि, आ से तेहने सन स्थिति छल अनमना दीदीक घरक। मुदा अनमना दीदीक घर बान्हक कातमे छन्हि। सोझाँक मजकोठिया टोलक छथि मुदा घुसकि कऽ हमर घर लग आबि गेल छथि।समङगर लोक सभ। आस-पड़ोसक धी-बेटी दिनमे, दुपहरियामे जाइत छथि। ढील-लीख बिछबाक लेल। ककर ओ लगक छथि, से मरलाक बाद पता चलत। श्राद्धक समए जे लगक अछि से आगि देत आ तकरा घरारी भेटतैक। मुदा सेहो सम्भावना आब नै। झंझारपुरमे सासुर छलन्हि अनमना दीदीक। ओतए अपन बहिनिक बेटाकेँ अपन बेटा बना राखि लेने छथि। मुदा नैहरक मोह नै छूटल छन्हि। खोपड़ीमे अबैत छथि। मासमे एक बेर तँ अवश्ये। अपनेसँ खेनाइ-पिनाइ, भानस-भात। मुदा झंझारपुरमे बेस पैघ घर, आँगन। बेटा-पुतोहुकेँ कहियो मुदा एतए नै आनलन्हि। सौँसे गाम विधवाकेँ दीदी कहैत अछि जे ओ नैहरमे रहैत छथि। आ फलना गाम बाली काकी जे ओ सासुरमे रहैत छथि। से सौँसे गाम हुनका अनमना दीदी कहैत छलन्हि। खोपड़ीक कातमे एकटा भगवानक मन्दिर बनेने छथि। महावीर बजरंगबलीक। शुरुहेसँ ई कोठाक रहै से नै, मुदा बना देलन्हि ओकरा कोठाक। अन्न-पानि बेचि कऽ। पहिने तँ खोपड़िये रहै। जहिया अनमना दीदी झंझारपुर जाइत रहथि, अपन खोपड़ीक फड़की भिरका कऽ जाइत रहथि। बादमे ताला आ सिक्कड़िसँ बन्न सेहो करए लागल रहथि। मुदा बजरंगबलीक मन्दिर ओहिना खुजल रहैत छल। लोक सभक लेल..चौपहर। धी-बेटी गामक, साफ-सफाई, झाड़ू-बहारू करैत रहथि। पक्काक मुदा बादमे भेल, छात ढलाइ आर बादमे। पिटुआ रहए पहिने। जमीनक प्लास्टर करबए चाहैत रहथि, मुदा एस्टीमेट बेशी भऽ गेलन्हि। भगवानक घर चुबैत रहत? मुदा ढलाई आ प्लास्टर लेल पाइ कतएसँ आओत? आइ हमरा लगैए जे हम सभ खूब मेहनति करैत छी। ककरोसँ सरोकार नै अछि। ओह, समैए नै भेटैत अछि। मुदा अनमाना दीदीक दिनचर्या, भोरसँ साँझ भगवान लेल समर्पित। मुदा पोसपुत्र लेल सेहो समए निकालैत छथि। बीच-बीचमे झंझारपुर बजार लग स्थित अपन गाम जाइत छथि। ओतुक्को ब्योँत लगबैत छथि। फेर गाम अबैत छथि..नैहर। देखू..गीता पढ़ि स्थितप्रज्ञ बनबाक अहाँक प्रयास। मुदा अनमना दीदी। गोर लगै छी दीदी। निकेना रहू। नहिये खुशी, नहिये कोनो दुखे। ने कोनो आवभगतक लालसा आ ने कोनो तरहक सहयोग प्राप्तिक आकांक्षा। जोन ताकै लेल जाइत छथि धनुकटोली, दुसधटोली। ओतुक्का लोक इज्जतियो दै छन्हि, कोन हुनकर घरारी लेबाक छन्हि हिनका सभकेँ। ओतए हँसितो देखै छियन्हि। अपन टोलक लोकसँ हट्ठे कोनो काज लेल कहितो नै छथि। एकटा काज करत आ कनियाँकेँ जा कऽ कहत। आ फेर दस साल धरि ओकर कनियाँ सुनबैत रहत। -दीदी, हनुमान जीक काज छै, सड़कक कातमे छथि। हमहूँ सभ तँ जाइत-अबैत माथ झुका कऽ पुजबे करबन्हि। से बिनु बोनि लेने हम ई काज करब। - नै यौ तीर्थ-बर्त आ भगवानक काज मँगनीमे नै करबाक-करेबाक चाही। हम कोनो रानी-महरानी छी जे बेगारी खटा कऽ मन्दिर बनबाएब आ पोखरि खुनाएब। मुदा ढलैय्या आ प्लास्टर! २ सड़कक कातक भगवानक एहि मन्दिरक सटल एक बीघा खेत, सभटा अनमना दीदीक। ढलैय्या भऽ गेलाक बाद भगवानक नामसँ लिखि देतीह। जे अन्न-पानि होएतैक ओहिसँ भगवानक घरक चून-पोचारा आ सफाई होइत रहत। कतेक दिनसँ पड़ोसी पछोड़ धेने छन्हि। “दीदी। तोहर सभसँ लगक भातिज हमहीं छियौ। ई जमीन हमर घरसँ सटल अछि। पहिलुका लोक बान्ह-सड़कक कातमे छोट जाति आ मसोमातकेँ घर बना दैत रहै। मुदा आब जमाना बदलि गेल छै।आब तँ सड़कक कातक घर आ जमीनक मोल बढ़ि गेल छै। तूँ आइ ने काल्हि मरि जएमे। तखन ई जमीन हमरा सभ पटीदार लेल झगड़ाक कारण बनत। ” तूँ आइ ने काल्हि मरि जएमे- कहि कऽ देखियौक कोनो सधवाकेँ। मुदा मसोमातसँ कहि सकै छिऐ- भने ओकर पोसपुत्र- पुतोहु- नैत-नातिन होइ। ठीक छै बाबू। “भगवानक लेल निहुछल अछि ई जमीन। अहीसँ तँ हमर गुजर चलैए। जे किछु पेट काटि कऽ बचबैत छी से कोशिल्या- भगवानक घरक ढलैया आ प्लास्टर लेल। झंझारपुरक जमीन-जालक पाइ सभ बेटा पुतोहुक छन्हि। से हम कोना.. ” “फेर दीदी। तूँ गप बुझबे नै कएलेँ। जा जिबै छेँ राख ने। कर ने गुजर। हम तँ कहै छियौ जे तोरा मरलाक बाद जे पटीदार सभ आपसमे लड़त से तोरा नीक लगतौ। आ हम तोहर सभसँ आप्त भातिज...।” देखियौ, कहै छै जे। भातिज बाहरमे नोकरी करै छथि। जे गाममे रहैए से तँ भेँट करएमे संकोच करैए जे किछु देमए नै पड़ए। ई मुदा जहिया गाममे अबैए आ हम गाममे रहै छी तँ भेँट करबाक लेल अबिते अछि। आ एहि बेर तँ हम झंझारपुरमे रही तँ ओतहु आएल रहए। सैह तँ कहलियै जे ई कोना कऽ फुरेलै। से आब बुझलिऐ। मुदा ई ढलैय्या कोना कऽ होएत। प्लास्टर तँ बादोमे करबा देबै। ततेक चुबैए, एहि साल तँ आरो बेशी चुबए लागल अछि। पिटुआ छत, दुइयो साल नै चलल। ओकरा ओदारि कऽ ढ़लैय्या करत करीम मियाँ आ लछमी मिस्त्री, तखने ठीक होएत। देखै छी। भातिजक आबाजाही बढ़ि गेल अछि आइ-काल्हि। “ठीक छै दीदी, अदहे जमीन दऽ दिअ। दस कट्ठामे अहाँक भातिजक बसोबासक संग भगवानक लेल सेहो जमीन बचि जाएत।” “मुदा बान्हपर अहाँक घरारीक लागि तँ नहिये होएत। तखन की फएदा होएत अहाँकेँ।” “छोड़ू ने। एखनो तँ टोल दऽ कऽ अबिते ने छी। चौक-चौबटिया आ बान्हक कातमे घर बनेबाक तँ आब ने चलन भेल अछि। आ आब चौबटिया आ बान्हक कातमे तँ भगवानेक घर ने शोभतन्हि। दस कट्ठाक दस हजार जहिया कहब हम दऽ देब। रजिस्ट्री बादेमे बरु होएत।” “ठीक छै। तखन हम सोचि कऽ कहब। एक बेर बेटा पुतोहुसँ पूछि लैत छी।” कोन उपाए। भगवानक घरक देबाल सभमे कजरी लागि गेल अछि। देबाल छोड़ू, बजरंगबलीक मूर्तिमे सेहो कजरी लागि गेल अछि। अनमना दीदी सोचिते रहि गेलथि। आ सोचिते-सोचिते भोर भऽ गेलन्हि। दऽ दै छिऐ जमीन। आर उपाय की। नञि। बेटा-पुतोहु कहलखिन्ह जे माए। ओतुक्का जमीन तँ भगवानक छन्हि। आ हम सभ से शुरुहे सँ बुझै छी। मुदा देखब। ओ कोनो चालि तँ नै चलि रहल अछि। “कोन चालि। पाइ तँ किछु बेशीए दऽ रहल अछि।” भगवानक मन्दिरक लेल, दस कट्ठा कम थोड़बेक होइ छै। पाइ जुटबैत-जुटबैत मरि गेलहुँ। ई अधखरु मन्दिर ओहिने रहि जाएत ? गप करै छी लछमी मिस्त्री आ करीम मिआँ सँ। दस हजारमे ढलैय्या, प्लास्टरक संग चहरदिवारी सेहो बनि जाएत। एस्टीमेट बनि गेल। रजिस्ट्रीक अगिले दिनसँ काज आरम्भ। आ भादवक पहिने समापन। ३ चलू रजिस्ट्री भऽ गेल। दासजी कागज-पत्तरमे बड्ड माहिर लोक। पुछबाक काज छै! - धुर। पकिया कागज बनल हएत। “भगवानक लेल कागज बनेबाक पहिल अवसर भेटल अछि दीदी”- दासजीक गपसँ अनमना दीदी दासोदास भऽ गेलीह। लोक कहै छै झुट्ठे जे लोकक श्रद्धा भगवानपर सँ कम भेल जाइ छै। ई दासजी। कहियो ने भेँट आ ने जान पहिचान। दू टा रजिस्ट्रीक कागत- एकटा दसकठिया भातिजक नाम आ दोसर भगवानक नाम, मुदा एक्के फीसमे बना रहल छथि। साफे कहि देलखिन्ह- दीदी भगवानक जमीनक रजिस्ट्रीक पाइ हम एकदम्मे नै लेब। जे बेर-बखतपर काज आबए सैह ने अप्पन लोक। ठीके बूढ़-पुरान कहि गेल छथि। यैह सभ देखि कऽ ने कहने छथि। अनमना दीदी बाइमे छथि। पएरे गाम अएलीह।सोहमे किछु नै फुराइत छन्हि। मन्दिरकेँ अजबारू, काल्हिसँ काजक आरम्भ अछि। लछमी मिस्त्री अपन तेगारी, डोरी, करणी सभ राखि गेल अछि। डब्बुक सभ पानि भरबाक लेल अनमना दीदी जोगा कऽ राखनहिये छथि। पोखरि बगलेमे अछि। लीढ़सँ भरल, मुदा कातमे महीस सभकेँ पानि पिएबाक लेल लोक सभ कनेक साफ कइए देने अछि। मुदा भोरेमे घोल-फुचुक्का। करीम मिआँकेँ काज करबासँ रोकि देल गेल। के रोकलक? भातिजकेँ खबरि दियौक। मुदा ओ तँ काल्हि झंझारपुरसँ सोझे नोकरीपर चलि गेलाह। रजिस्ट्रीक कागत ओना तँ अनमाना दीदी लग सेहो छन्हि। भातिजक सार रोकने अछि काज। चहारदिबारी नै बनबए देत। मुदा काल्हि रजिस्ट्री काल तँ रहए ईहो। तखन? कहैत अछि जे बान्हक कातबला जमीन मेहमानक छियन्हि, ऐँ यौ। तखन तँ ई मन्दिरो ओकरे हिस्सामे भऽ गेलै। कोनो बुझबामे गलती तँ नै कऽ रहल अछि। भातिज मासक शुरुहेमे जा कऽ तँ अओताह, दरमाहा लैए कऽ ने। मास भरि अनमाना दीदी गाम आ झंझारपुर करैत रहलीह। बेटा पुतोहु कहन्हि जे ई भातिजेक चालि तँ नै अछि। नञि, से नै कहू। दासजी तँ नीक लोक रहए। देखू। ४ “दीदी। अहाँकेँ कोनो धोखा भऽ रहल अछि।” “तखन तँ ई मन्दिरो अहींक भेल ने।” “नञि दीदी। ई मन्दिर तँ भगवानक छियन्हि। हुनके रहतन्हि। आ पाछूक जमीनक मालिक सेहो भगवाने।” “आ तखन तँ हमर ई खोपड़ी सेहो अहींक भेल ने।” “नञि दीदी। अहाँ जहिया धरि जीब तहिया धरि रहू। के मना करत? ” “बौआ बड्ड उपकार अहाँक। आ पाछू दिसका जमीनक लागि तँ नञि बान्ह दिससँ अछि आ नहिये टोल दिससँ।” “दीदी। अहाँ हमरा जमीन बाटे जाऊ ने के मना करत? आ आरिपर बाटे खेतमे सभ जाइते अछि। जकर खेत बान्हक कातमे नै छै से की अपन खेतपर नै जा सकैए। अहाँ तँ नबका लोकक भिन्न-भिनाउज बला गप कऽ रहल छी।” “मुदा ई सभ अहाँ पहिने कहाँ कहने रही।” “दीदी, अहाँकेँ सभटा कहने रही। मुदा लगैत अछि जे अहाँकेँ धोखा भऽ रहल अछि। नै विश्वास होइए तँ दासजीकेँ बजा दैत छी। ओ तँ तेहल्ला अछि।” “अच्छा तँ ओहो मिलल अछि।” “दू रजिस्ट्रीक कागत बना कऽ बेचारा एक रजिस्ट्रीक पाइ लेलक आ अहाँ कहि रहल छी जे मिलल अछि।”- भातिजक स्वर तीव्र भऽ गेलन्हि। हाँफए लगलाह आ जोर-जोरसँ बजैत बिदा भऽ गेलाह। ५ अनमाना दीदीक लेल नैहरक ई भोर सासुरक ओहि भोर जेकाँ रहन्हि जाहि दिन ओ विधवा भेल रहथि। आइ गामक धी-बेटी ढ़ील-लीख बिछबा लेल नै अएलीह। अनमाना दीदीक राति भरिक वार्तालाप- बजरंग बलीक संग। एखने एहि भोरमे खतम भेल अछि। लोक सभ अँगनामे बच्चाकेँ ठोकि कऽ सुता रहल रहए। भोरमे किछु गोटे आबि पंचैती करेबाक सुझाव दए गेलन्हि। मुदा अनमाना दीदीक रोष तँ बजरंगबलीसँ छलन्हि। “भगवानक जमीन अदहा बेचि कऽ भगवानक घर बनबितहुँ, मुदा मन्दिरक सटल जमीन रजिस्ट्री करा लेलक आ जे जमीन बचल ओहिसँ मन्दिरक लागिये नै रहल। लागि तँ छोड़ू ओहि पर जएबाक रस्ते बन्न कऽ देलक। आ ई बजरंगबली। महावीर। कोन शक्ति छैक एकरामे ? चालीस साल पेट काटि कऽ हिनका खोपड़ीसँ पक्काक घरमे अनलहुँ। ढलैय्या भऽ जइतए, चहरदिवारी बनि जइतए सैह टा मनोरथ रहए, आ सेहो हिनके लेल। हा... ” ६ एहि भोरमे भातिजक द्वारिपर ठाढ़ अनमाना दीदी। लोक सभक मोने जे आब आर बाझत झगड़ा। मुदा ई की भऽ रहल अछि। लछमियाँक भाए रिक्शा अनलक अछि। अनमाना दीदी भातिजक संग झंझारपुर जा रहल छथि। के कहलक? हुनकासँ तँ ककरो गपो नै भेल रहै। हम कहनहियो रहियन्हि पंचैती कराऊ, मुदा मना जेकाँ कऽ देने रहथि। अच्छा, लछमीक भाए कहलक। हँ, रिक्शा बजबै लेल जे गेल रहए, से कहने हएत जे झंझारपुर जेबाक अछि। दासजीकेँ एकटा आर रजिस्ट्रीक कागत बनबए पड़लन्हि। अनमाना दीदीकेँ देखि ओ सर्द भऽ गेल रहथि जे जानि नै बूढ़ी की सभ सुनओथिन्ह। मुदा अनमाना दीदी ततेक ने तामसमे छलीह जे किछु नै बजलीह। तामस पीबि गेलीह। ओहो पाछू बला जमीन भातिजकेँ रजिस्ट्री कऽ देलन्हि। आ झंझारपुर-स्टेशनसँ घुरि कऽ झंझारपुर बजार दिस बेटा पुतोहु लग पएरे बिदा भेलीह। लछमीक भाए घुरि आएल। दू सवारीकेँ लऽ गेल रहए मुदा मात्र एक सवारी लऽ कऽ घुरि आएल। संगमे संदेश लेने गेल। लछमी मिस्त्री आ करीम मिआँ लेल संदेश। काल्हि भोरेसँ काज आरम्भ। फेरसँ? ७ चहरदेबाली बनल। भगवानक मन्दिर आ अनमाना दीदीक घरकेँ बारि कऽ। कहि देने छियन्हि दीदी केँ। हुनका जिबैत क्यो छूतन्हि नै हुनकर घर। घर आकि खोपड़ी, एक साल कनेक टूटल। दोसर भदबरियामे खुट्टा सरि कऽ खसि पड़ल। मुदा अनमाना दीदी नै अएलीह। समाद देने रहन्हि नैहरक एक गोटे। ढलैया नहिये भेलन्हि बजरंगबलीक। अनमना दीदी हरिद्वारसँ घुरि अएलीह। लोक पुछलकन्हि- की माँगलहुँ गंगा माएसँ। “यएह जे अंधविश्वास हमरा मोनसँ हटा दिअ”। “आ की देलियन्हि गंगा माएकेँ ?” “अपन तामस दऽ देलियन्हि”। अनमाना दीदी यएह कहथि- की करबन्हि। कोनो शक्तिये नै छन्हि बजरंगबलीमे। खसए दियौक खोपड़ी। सोंगर लागल घर कतेक दिन काज देत। ८ कैक बरख बीतल। कैक बरख नै पाँचमे साल तँ। भातिज गामपर आएल रहथि। दरमाहा उठा कऽ। पोखरि दिससँ चप्पाकलपर। लोटा लेने बैसलाह आकि छातीमे दर्द उठलन्हि। नै बचि सकलाह। लोक सभ कहए, देखू अनमाना दीदीक श्राप, बड्ड कानल रहथि दीदी ओहि दिन। ओहिसँ पहिने बजरंगबलीक मूर्तिमे ठीके शक्ति नै रहए। मुदा हृदयसँ देल श्राप लागै छै। ओही दिन जागृत भऽ गेल रहथि बजरंगबली। आ आइ शक्ति देखा देलखिन्ह। मुदा समदियाकेँ अनमाना दीदी कहलखिन्ह जे पाथरोमे जान होइ छै। हर्ट अटैक भेल होएतैक। परसू एतहि एकटा मारवाड़ीकेँ अटैक भेल रहै। चिन्ता-फिकिरसँ होइत छैक एकर अटैक। एतए डाकडर सभ रहै, मारवाड़ी बाँचि गेल। गाममे देरी भेने जान नै बचै छै। तेँ ने हमहूँ एहि बुढ़ारीमे बेटे पुतोहु लग झंझारपुरमे रहि रहल छी। ९ गाम अछि महिसबार ब्राह्मणक गाम। सुखरातिक दिन हूड़ा-हूड़ीक खेल जे एहि महिसबाड़ ब्राह्मण सभक देखलहुँ तँ पोलोक खेलमे कोनो रुचि नै रहल। समियाक डोमसँ कीनल सुग्गरकेँ भाँग पिआए मातल महीस द्वारा हूड़ा लेब। चरबाह जे महीसक पहुलाठ पकड़ि कलाकारीसँ बैसल छल सेहो अद्भुते। डोमक काज पाबनि-तिहारमे तँ होइते अछि। पेटार बनेबासँ सूप, बीअनि सभ किछु बनेबामे डोमक काज आ पाहुन परख लेल आ बरियाती लेल जे खस्सी काटल जाएत ताहि लेल मिआँटोलीक काज। खस्सीक मूड़ा दुर्गापूजाक बलिमे कमिटी लऽ लैत अछि। धुर कतए भाँसि गेलहुँ। से मिआँ जे खस्सी काटैत अछि से हलाल कऽ कऽ। गरदनि अदहा लटकले रहैत छै, मुदा माउस बना-सोना कऽ गरदनि लऽ जाइये आ खलरा सेहो। तखन महिसबार ब्राह्मणमे सँ जे हनुमानजी मन्दिरपर भजन आ अष्टजाम करैत छथि से ओही खलरासँ बनल ढोलक किनैत छथि। आ से कीर्तन भइयो रहल छल। सिद्ध महावीरजीक मन्दिरक आगाँ। रामनवमी दिन गाड़ल बड़का धुजा। टनटनाइत घड़ीघण्ट आकि आर किछु। हनुमानजीक धूजा फहरा रहल अछि। साँझक काल। महिसबार सभक आगम भऽ गेल अछि। कोनो पाबनि हुअए, हूड़ाहूड़ी आकि रामनवमी सिद्ध हनुमानजीक आगाँ कीर्तन होइते अछि। से बाबू गौँआक श्रद्धाक गप छिऐ। से आइयो भऽ रहल अछि। घूरक धुँआ माल बिठौरीकेँ मालक देहसँ अलग करबाक प्रयासमे अछि। एक गोटेक संग दोसर गोटे अएल छथि, सप्पत खएबाक लेल। हनुमानजीक मन्दिर गौँआ सभ प्लास्टर करबा देने छथि। ढलैय्या सेहो भऽ गेल अछि। मन्दिरक बरण्डा छूबि कऽ ऋण पचेनहारक संख्या नगण्य, तैयो एकटा अपवाद तँ अछिये- ओ कहै छथि- सप्पत तँ तोड़बा लेल खाएल जाइ छै। हँ भाइ, एक बेर सप्पत खेने जे ऋणसँ विमुक्ति भेटि जाए तँ हर्जे कोन। मुदा एकेटा अपवाद। अनमाना दीदीकेँ आब सभ अनमाना बाबा सेहो कहैत छन्हि। कएक बरख भेल मुइना हुनकर। घुरि कऽ नहिये अएलीह। भातिजक घरारीक दोष निवारणार्थ कोनो पंडितक कहलापर खुट्टापर एकटा गाए बान्हि देल गेल छै, जकरा एनहार-गेनहार सदिखन घास खाइत देखैत छथि, तहिसँ घरारीकेँ नजरि-गुजरि नै लगतैक। हनुमानजीक धुजा फहरा रहल अछि। साँझक काल। गोनर भाए कीर्तनमे ढोलकक थापपर थाप लगा रहल छथि। अनमाना बाबाक गप आब किछु लोको सभ मानलक। ठीके। हनुमानजीक मूर्तिक आगाँ भक्त दूटा गोल बनि गेल अछि। एक गोलक विचार कनेक वैज्ञानिक छैक- अनमाना दीदी जे बाँचल दस कट्ठाक रजिस्ट्री कऽ देलखिन्ह सएह ने पैसा देलकै चिन्ता-फिकिर भातिजक छातीमे। नै सम्हारि सकल अनमाना दीदीक ई आक्रमण ओ। ठीके पाथरमे कोनो शक्ति थोड़बेक होइ छै। मुदा दोसर गोल महावीर हनुमानजीक सिद्ध आ जागृत होएबामे विश्वास कऽ रहल अछि- यौ, चुट्टीकेँ माटि दऽ दियौ तँ ओहो मड़ि जाएत मुदा बिकुटि कऽ जे काटत से छोड़त नै। आ ई माटि अनमना दीदी महावीरजी केँ देलखिन्ह तँ ओ कोना छोड़ि दितथिन्ह। गोनर भाए कीर्तनमे ढोलकपर थापपर थाप लगा रहल छथि, बुझू सिद्ध महाबीरजीकेँ मनाइये कऽ छोड़ताह, भाँगक गोला असरि कऽ रहल छन्हि, आँखि तँ चढ़ले छन्हि, हाथ सेहो रुकै कऽ नाम नै लऽ रहल छन्हि, आ हुनकर नजरिसँ देखी तँ सिद्ध महावीरक पाथरक मुरुत जागृत भऽ गेल देखा पड़त, जेना ओहिमे जान आबि गेल हो! शब्दशास्त्रम् सिंह राशिमे सूर्य, मोटा-मोटी सोलह अगस्त सँ सोलह सितम्बर धरि। किछु सुखेबाक होअए तँ सभसँ कड़ा रौद। सिंह राशिमे मितूक पिताक तालपत्र सभ पसरल रहैत छल, वार्षिक परिरक्षण योजना, जे एहि तालपत्र सभमे जान फुकैत छल। आनन्दा मितूक पिताजीक एहि तालपत्र सभक परिरक्षण मनोयोगसँ करैत रहथि। कड़गर रौदमे तालपत्र पसारैत आनन्दा, मितूकेँ ओहिना मोन छन्हि। मितू संग जिनगी बीति गेलन्हि आनन्दाक। मुदा एहि बरखक सिंहराशि अएलासँ पूर्वहि आनन्दा चलि गेलीह... आ आब जखन ओ नै छथि तखन जीवनक परिरक्षण कोना होएत। मितूक आ ओहि तालपत्र सभक जीवनक.. भ्रम। शब्दक भ्रम। शब्दक अर्थ हम सभ गढ़ि लैत छी। आ फेर भ्रम शुरू भऽ जाइत अछि। लुकेसरी अँगना चानन घन गछिया तहि तर कोइली घऽमचान हे कटबै चनन गाछ, बेढ़बै अँगनमा छुटि जेतऽ कोइली घऽमचान हे कानऽ लगली खीजऽ लागल, बोन के कोइलिया टूटि गेलऽ कोइली घऽमचान हे जानू कानू जानू की, जोबोन के कोइलिया अहि जेतऽ कोइली घऽमचान हे जहि बोन जेबऽ कोइली रहि जेत तऽ निशनमा जनू झरू नयना से लोर हे सोने से मेढ़ायेब कोइली तोरो दुनू पँखिया रूपे से मेरायेब दुनू ठोर हे जाहे बोन जेबऽ कोइली रुनझुनु बालम रहि जेतऽ रकतमाला के निशान हे कोनो युवतीक अबाज चर्मकार टोलसँ अबैत बुझना गेल..आनन्दाक अबाज। मुदा आनन्दा तँ चलि गेली, कनिये काल पहिने ओकर लहाश देखि आएल छथि बचलू। मितूकेँ समाचार कहि डोमासी घुरि गेल छथि। आ आनन्दा, ओ तँ बूढ़ भऽ मरलीहेँ। तखन ई अबाज, युवती आनन्दाक। भ्रम। शब्दक भ्रम। कहैत रहथि मितूक पिता श्रीकर मीमांसक मारते रास गप शब्दशास्त्रम् पर। शब्दक अर्थ हम सभ गढ़ि लैत छी। आ फेर भ्रम शुरू भऽ जाइत अछि। I शब्दशास्त्रम् गर्दम गोल भेल छल। अनघोल मचि गेल छलै। बलान धारमे कोनो लहाश बहल चलि जा रहल छल। धोबियाघाट लग कात लागल छल। कतेक दूरसँ आएल छल से नै जानि। कोनो बएसगर महिलाक लहाश छल। धोबिन लहाशकेँ चीन्हि गेल रहथि। गौआँकेँ कहि दै छथि ओकर नाम आ पता। गौआँ के, ओहि गामक डोमासीक बचलूकेँ। मृतकक घरमे खबरि भऽ गेल छलै। एसकरे एकटा बुढ़ा रहैए ओहि घरमे...मितू। मितूक टोलबैया गौँआ सभ लहाशकेँ डीहपर आनि लेने छल आ फेर मितू ओकर दाह-संस्कार कऽ देने रहथि। गाममे अही गपक चर्चा रहै। बचलू बुढ़ाकेँ बुझल छन्हि किछु आर गप। चिन्है छथि ओ ओहि लहाशक मनुक्खकेँ। नवका लोककेँ बहुत रास गप नै बुझल छै। आनन्दाक लहाश.. -आनन्दा बड्ड नीक रहै। बुझनुक। ओकर बचिया सभ सभटा सुखितगर घरमे छै..बेटा सेहो विद्वान। मितू, आनन्दाक वर सेहो उद्भट..श्रीकर मीमांसकक पुत्र..। मुदा कहियो मितू आकि आनन्दा कोनो खगतामे ककरो आगाँ हाथ नै पसारने छथि। बचलू सेहो आब बूढ़ भऽ गेल छथि, झुनकुट बूढ़। हिनकासँ पैघ मात्र मितू छथिन्ह। लोक सभ दुनू गोटेकेँ बुढ़ा कहि बजबै छन्हि। आ एहि बचलू बुढ़ाकेँ बुझल छन्हि ढेर रास गप। ..... मितू आ श्रीकरक वार्तालाप। किछु बुझिऐ आ किछु नै। -मितू। भामतीमे वाचस्पति कहै छथि जे अविद्या जीवपर आश्रित अछि आ विषय बनि गेल अछि। आत्मसाक्षात्कार लेल कोन विधि स्वीकार करब? असत्य कथूक कारण कोना भऽ सकत? कोनो बौस्तुक सत्ता ओकरा सत्य कोना बना देत, त्रिकालमे ओकर उपस्थिति कोना सिद्ध कऽ सकत? जे बौस्तु नै तँ सत्य अछि आ नहिये असत्य आ नै अछि एहि दुनूक युग्मरूप; सैह अछि अनिर्वाच्य। बिना कोनो वस्तु आ ओकर ज्ञान रखनिहारक शून्यक अवधारणा कोना बूझऽमे आओत? -मितू। कुमारिल कहै छथि आत्मा चैतन्य जड़ अछि, जागलमे बोध आ सूतलमे बोधरहित। -मितू। भामतीमे वाचस्पति कहै छथि जे आत्मसाक्षात्कारसँ रहित शास्त्रमे कुशल व्यक्ति सर-समाजसँ पशुवत व्यवहार करैत छथि, लाठी लैत अबैत व्यक्तिकेँ देखि भागि जाइ छथि, घास लैत अबैत व्यक्तिकेँ देखि लग जाइत छथि। माने डरसँ घबड़ाइ छथि। “आत्मसाक्षात्कारसँ रहित शास्त्रमे कुशल व्यक्ति सर-समाजसँ पशुवत व्यवहार करैत छथि, लाठी लैत अबैत व्यक्तिकेँ देखि भागि जाइ छथि, घास लैत अबैत व्यक्तिकेँ देखि लग जाइत छथि। माने डरसँ घबड़ाइ छथि।” ई गप मुदा सरिया कऽ बूझबामे आएल रहए हमरा। .... आमक मास रहै। बानर आ बनगदहा खेत सभकेँ धांगने अछि आ पारा बारीकेँ। “सभटा नाश कऽ देलकै बचलू। रातिमे तँ नञि सुझै छै। भोरे-भोर कलम जा कऽ देखै छी। बनगदहा सभटा फसिल खा लेलक आब ई बानर आमक पाछाँ लागल अछि।” हमरा बुझल अछि जे आमक मासमे बानर आ बनगदहा ओहि बरख एक्के संग आएल छलै। आमेक मास रहै। से मितू ओगरबाहीमे लागत आब। आमक टिकुला पैघ भऽ रहल छै। मचान बान्हबाक रहै मितूकेँ। हमहूँ संगमे रहियै। बाँस काटि कऽ अबैत रही। डबरा कात दऽ कऽ अबि रहल छलहुँ। भोरहरबा छल। अकास मध्य लाल रेख कनेक पिरौँछ भेल बुझना गेल छल। -लीख दऽ कऽ चलू बचलू। खेतक बीचमे लीख देने आगाँ बढ़ऽ लागलहुँ। तखने हम शोणित देखलहुँ। हमर देह शोनित देखि सर्द भऽ गेल। मुदा निशाँस छोड़लहुँ। बाँसक तीक्ष्ण पात एकटा बालिकाक हाथ आ मुँहकेँ नोछड़ैत गेल रहै। मितूक बाँसक नोछाड़ ओकरा लागल रहै। मितू हाथसँ बाँस फेकि कऽ ओहि बालिका लग चलि गेल छल। नोराएल आँखिक ओहि बालिकाक शोणित पोछि मितू ओकर नोछारपर माटि रगड़ि देने रहै। -की कऽ रहल छी। -शोनित बन्न भऽ जाएत। बालिका लीखपर आगाँ दौगि गेल छलीह। -की नाम छी अहाँक। -आनन्दा। -कोन गामक छी। -अही गामक। -अही गामक? हम दुनू गोटे संगे बाजल रही। हँ, आनन्दा नाम रहै ओकर। आ मितूक पहिल भेँट वैह रहै। ... मचानो बन्हा गेल रहए। मुदा आनन्दा फेर नै भेटल रहए। मितू पुछैत रहए। -कोन टोलक छी ओ। नहिये मिसरटोलीक अछि, नहिये पछिमाटोलीक आ नहिये ठकुरटोलीक। -डोमासीक रहितए तँ हम चिन्हिते रहितिऐ। -तखन कोना अछि ओ अपन गामक। आ अपन गामक अछि तँ आइ धरि भेँट किए नै भेल रहए ओकरासँ। मुदा बिच्चेमे संयोग भेल छल। मितूक टोलमे फुदे भाइक बेटाक उपनयन रहै। बँसकट्टी दिन पिपहीबलाकेँ बजबैले हम गामक बाहर चर्मकार टोल गेल रही। -हिरू भाइ, हिरुआ भाइ। -आबै छथि। कोनो बालिकाक अबाज आएल रहए। अबाज चिन्हल सन। -अहाँ के छी। -हम हिरूक बेटी। की काज अछि? -पिपही लऽ कऽ एखन धरि अहाँक बाबू नै पहुँचल छथि। बजबैले आएल छियन्हि। -तही ओरियानमे लागल छथि। -अहाँक नाम की छी? तखने टाट परक लत्तीकेँ हँटबैत वैह बालिका सोझाँ आबि गेलि। -हम आनन्दा। हम अहाँकेँ चीन्हि गेल रही। अहाँक की नाम छी? हम तँ सर्द भेल जाइत रही। मुदा उत्तर देबाके छल। -बचलू। -आ अहाँक संगीक। -मितू, पंडित श्रीकरक बेटा। मितूक पिताक नाम सेहो हम आनन्दाकेँ बता देलिऐ। पुछने तँ नै छलि ओ, मुदा नै जानि किएक..कहि देलिऐ। तखने हिरुआ पिपही लेने आबि गेल रहथि। हुनका संगे हम टोलपर आबि गेलहुँ। रस्तामे हिरुआकेँ पुछलियन्हि- आनन्दा अहाँक बेटी छथि। मुदा कहियो देखलियन्हि नै। -मामागाममे बेशी दिन रहै छलै। मुदा आब चेतनगर भऽ गेल छै। से गाम लऽ अनने छिऐ। -फेर मामागाम कहिया जएतीह। -नञि, आब ओ चेतनगर भऽ गेल अछि। आब संगे रहत। पंडितजीक बेटा मितू, हमर संगी मितू, ई गप सुनि की होएतैक ओकरा मोनपर। कैक दिनसँ ओकर पुछारी कऽ रहल छल। हम सोचने रही जे भने मामागाम चलि जाए आनन्दा आ कनेक दिनमे मितूक पुछारीसँ हम बाँचि जाएब। मुदा आब तँ आनन्दा गामेमे रहत आ पंडित श्रीकरक बेटा मितू.. धुर..हमहीं उनटा-पुनटा सोचि लेने छी। ओहिना दू-चारि बेर मितू आनन्दाक विषयमे पुछारी केने अछि। तकर माने ई थोड़बेक भेलै जे.. मुदा जे सैह भेलै तखन ?.. पंडितक बेटा आ चर्मकारक बेटी.. पंडित श्रीकर मानताह?..गौआँ घरुआ मानत? धुर। फेर हम उनटा-पुनटा सोचि रहल छी। पिपही बाजए लागल रहए आ लीखपर देने हम आ मितू, भरि टोलक स्त्रीगण-पुरुषक संगे बँसबिट्टी पहुँचि गेल रही। रस्तामे ओहि स्थलकेँ अकानने रही। मितू आ आनन्दाक पहिल मिलनक स्थलकेँ- कोनो अबाज लागल अबैत..मात्र संगीत..स्वर नै। बरुआ बाँस सभपर थप्पा दऽ देने रहै आ सभ बाँस कटनाइ शुरू कऽ देने रहथि। मड़बठट्ठी आइये छै। घामे-पसीने भेने कनेक मोन तोषित भेल। कन्हापर बाँस लेने हम आ मितू ओही रस्ते बिदा भेल रही..ओही लीख देने। … मुदा मितू हमरा सदिखन टोकारा देमए लागल। कारण कोनो काज हम एतेक देरीसँ नञि केने रहिऐ। ओ हमर राम रहए आ हम ओकर हनुमान। मचानपर एहिना एक दिन हम मितूकेँ कहि देलिऐ- -मितू, बिसरि जो ओकरा। कथी लेल बदनामी करबिहीं ओकर। हिरुआक बेटी छिऐ आनन्दा। ओना तोहर नाम हमरासँ ओ पुछलक तँ हम तोहर नाम आ तोहर पिताजीक नाम सेहो कहि देलिऐ। -हमर पिताजीक नाम ओ पुछने रहौ? -नै पुछने रहए। मुदा.. -तखन किए कहलहीं? -आइ ने काल्हि तँ पता लागबे करतै.. -जहिया लगितै तहिया लगितै..आब ओ हमरासँ कटत..हमर मेहनति तूँ बढ़ा देलेँ.. -कोन मेहनति। तूँ पंडित श्रीकरक बेटा आ ओ हिरुआ चर्मकारक बेटी। कथीले बदनामी करबिहीं ओकर। -बियाह करबै रौ। बदनामी किए करबै। -ककरा ठकै छिहीं ? -ककरो नै रौ। एहिना अनचोक्केमे निर्णय लैत छल मितू। श्रीकर मीमांसकक बेटा मितू नैय्यायिक। ओकरा घरमे तालपत्र सभ पसरल रहैत देखने छलिऐ। से भरोस नै भऽ रहल छल। -गाममे कहियो देखलिऐ नै ओकरा। -तूँ गाममे रहलेँ कहिया। गुरुजीक पाठशालासँ पौरुकेँ तँ आएल छेँ। -मुदा तूँहीं कोन देखने रहीं। -मामा गाम रहै छल ओ। -फेर मामा गाम घुरि कऽ तँ नै चलि जाएत। -नै, से पुछि लेलिऐ। आब गामेमे रहत। पौरुकाँ गामेमे मितूक माएक देहान्त भऽ गेल छलन्हि। श्रीकर मीमांसक सेहो खटबताह सन भऽ गेल छथि- ई गप हुनकर टोलबैय्या सभ करैत छल। तालपत्र सभक परिरक्षण कोना हएत एहि सिंह राशिमे? यैह चिन्ता रहन्हि श्रीकरक, आ तेँ ओ खटबताह सन करए लागल रहथि.. ईहो गप हुनकर टोलबैय्या सभ करैत छल। ... हिर्र..हिर्र…हिर्र.... डोमासीसँ सूगरक पाछू हम आ मितू हिर्र-हिर्र करैत चर्मकार टोल पहुँचि जाइ छी। आनन्दा मुदा सोझाँमे भेटि गेलीह। सुग्गर संगे हम आगाँ बढ़ि जाइ छी। घुमै छी तँ आनन्दा आ मितूक गप सुनैले कान पाथै छी। हिर्र..हिर्र एहि बेर आनन्दा हिर्र कहैत अछि आ हम मुस्की दैत सूगरक आगाँ बढ़ि जाइ छी। ई घटना कैक बेर भेल आ ई गप सगरे पसरि गेल। हिरू कताक बेर हमरा लग आएल रहथि। हीरू उद्वेलित रहए लागल रहथि। हीरूक पत्नी बेटीक भाग्यक लेल गोहारि करए लगलीह। कए कोस माँ मन्दिलबा कए कोस लुकेसरी मन्दिलबा कए कोस पड़ल दोहाइ कनी तकबै हे माइ कए कोस पड़ल दोहाइ कनी तकबै हे माइ दुइ कोस मन्दिलबा चारि कोस लुकेसरी मन्दिलबा पाँचे कोस पड़ल दोहाइ कनी तकबै हे माइ पाँचे कोस पड़ल दोहाइ कोन फूल माँ मन्दिलबा कोन फूल बन्दी मन्दिलबा कोन फूल पर पड़ल दोहाइ कनी तकबै हे माइ कोन फूल पर पड़ल दोहाइ कनी तकबै हे माइ ऐली फूल माँ मन्दिलबा बेली फूल लुकेसरी मन्दिलबा गेन्दे फूल पड़ल दोहाइ कनी तकबै हे माइ गेन्दे फूल पड़ल दोहाइ कनी तकबै हे माइ ......... हिरू डोमासी आबए लागल रहथि। -की हेतै, कोना हेतै। -झुट्ठे.. हम गछलियन्हि जे हम हिरु संगे श्रीकर पंडित लग जाएब। आ हम हिरूकेँ श्रीकर मीमांसक लग लऽ गेल रहियन्हि। श्रीकरक पत्नीक मृत्यु गत बरखक सिंह राशिक बाद भऽ गेल छलन्हि। आ तकर बाद हिरू मीमांसक खटबताह भऽ गेल छथि- लोक कहैत छलन्हि। लोक के? वैह टोलबैय्या सभ। गामक लोक, परोपट्टाक विद्वान लोक सभ तँ बड्ड इज्जत दै छलन्हि हुनका। आँखिक देखल गप कहै छी.. “आउ बचलू। हिरू, आउ बैसू..। ”- गुम्म भऽ जाइत छथि श्रीकर। पत्नीक मृत्युक बाद एहिना, रहैत रहथि, रहैत रहथि आकि गुम्म भऽ जाइत रहथि। “कक्का, आँगन सुन्न रहैत अछि। कतेक दिन एना रहत। मितूक बियाह किए नै करा दै छियन्हि”? “मितू तँ बियाह ठीक कऽ लेने छथि”। “कत्तऽ?” -हम घबड़ाइत पुछै छियन्हि। हिरू हमरा दिस निश्चिन्त भावसँ देखै छथि। “आनन्दासँ, समधि हीरू तँ अहाँक संग आएल छथिये।” हाय रे श्रीकर पंडित। आ बाह रे मितू। पहिनहिये बापकेँ पटिया लेने छल। मुदा बान्हपर जाइत कोनो टोलबैय्याक कान एहि गपकेँ अकानि लेने छल। हम सभ बैसले रही आकि ओ किछु आर गोटेकेँ लऽ कऽ दलानपर जुमि गेल छल। श्रीकर मीमांसकसँ हुनकर सभक शास्त्रार्थ शुरू भेल। शब्दक काट शब्दसँ। “श्रीकर, अहाँ कोन कोटिक अधम काज कऽ रहल छी”। “कोन अधम काज”। “छोट-पैघक कोनो विचार नै रहल अहाँकेँ मीमांसक?” “विद्वान् जन। ई छोट-पैघ की छिऐ? मात्र शब्द। एहि शब्दकेँ सुनलाक पश्चात् ओकर शब्दार्थ अहाँक माथमे एक वा दोसर तरहेँ ढुकि गेल अछि। पद बना कऽ ओहिमे अपन स्वार्थ मिज्झर कऽ...”। “माने छोट-पैघ अछि शब्दार्थ मात्र। आ तकर विश्लेषण जे पद बना कऽ केलहुँ से भऽ गेल स्वार्थपरक”। “विश्वास नै होए तँ ओहि पदमे सँ स्वार्थक समर्पण कऽ कए देखू। सभ भ्रम भागि जाएत”। “माने अहाँ मितू आ आनन्दाक बियाह करेबाले अडिग छी”। “विद्वान् जन। रस्सीकेँ साँप हम अही द्वारे बुझै छी जे दुनूक पृथक अस्तित्व छै। आँखि घोकचा कऽ दूटा चन्द्रमा देखै छी तँ तखनो अकाशक दूटा वास्तविक भागमे चन्द्रमाकेँ प्रत्यारोपित करै छी। भ्रमक कारण विषय नै संसर्ग छै, ओना उद्देश्य आ विधेय दुनू सत्य छै। आ एतए सभ विषयक ज्ञान सेहो आत्माक ज्ञान नै दऽ सकैए। आत्माक विचारसँ अहंवृत्ति- अपन विषयक तथ्यक बोध एहिसँ होइत अछि। आत्मा ज्ञानक कर्ता आ कर्म दुनू अछि। पदार्थक अर्थ संसर्गसँ भेटैत अछि। शब्द सुनलाक बाद ओकर अर्थ अनुमानसँ लग होइत अछि”। “अहाँ शब्दक भ्रम उत्पन्न कऽ रहल छी। हम सभ एहिमे मितू आ आनन्दाक बियाहक अहाँक इच्छा देखै छी”। “संकल्प भेल इच्छा आ तकर पूर्ति नै हो से भेल द्वेष”। “तँ ई हम सभ द्वेषवश कहि रहल छी। अहाँक नजरिमे जातिक कोनो महत्व नै?” “देखू, आनन्दा सर्वगुणसम्पन्न छथि आ हुनकर आ हमर एक जाति अछि आ से अछि अनुवृत्त आ सर्वलोक प्रत्यक्ष। ओ हमर धरोहरक रक्षण कऽ सकतीह, से हमर विश्वास अछि। आ ई हमर निर्णय अछि”। “आ ई हमर निर्णय अछि।”- ई शब्द हमर आ हिरूक कानमे एक्के बेर नै पैसल रहए। हम तँ श्रीकर आ मितूकेँ चिन्हैत रहियन्हि, एहिना अनचोक्के निर्णय सुनबाक अभ्यासी भऽ गेल रही। मुदा हिरु कनेक कालक बाद एहि शब्द सभक प्रतिध्वनि सुनलन्हि जेना। हुनकर अचम्भित नजरि हमरा दिस घुमि गेल छलन्हि। फेर श्रीकर मीमांसक ओहि शास्त्रार्थी सभमेसँ एक ज्योतिषी दिस आंगुर देखबै छथि- “ज्योतिषीजी, अहाँ एकटा नीक दिन ताकू। अही शुद्धमे ई पावन विवाह सम्पन्न भऽ जाए। सिंह राशि आबैबला छै, ओहिसँ पूर्व। किनको कोनो आपत्ति?” सभ माथ झुका ठाढ़ भऽ जाइ छथि। श्रीकर मीमांसकक विरोधमे के ठाढ़ होएत? “हम सभ तँ अहाँकेँ बुझबए लेल आएल छलहुँ। मुदा जखन अहाँ निर्णय लैये लेने छी तखन...।” मीमांसकजीक हाथ उठै छन्हि आ सभ फेर शान्त भऽ जाइ छथि। हम आ हीरू सेहो ओतएसँ बिदा भऽ जाइ छी। हीरू निसाँस लेने रहथि, से हम अनुभव केने रही। ... ई नै जे कोनो आर बाधा नै आएल। मुदा ओ खटबताह विद्वान तँ छले। से आनन्दा हुनकर पुतोहु बनि गेलीह। आ हुनक छुअल पानि हमर टोल आकि मितूक टोल मात्र नै सौँसे परोपट्टाक विद्वानक बीचमे चलए लागल। ..... आनन्दाक नैहरमे विवाह सम्पन्न भेल छल। ओतुक्का गीतनाद हम सुनने रही, उल्लासपूर्ण, एखनो मोन अछि- पर्वत ऊपर भमरा जे सूतल, मालिन बेटी सूतल फुलवारि हे उठू मालिन राखू गिरिमल हार हे पर्वत ऊपर भमरा जे सूतल, मालिन बेटी सूतल फुलवारि हे उठू मालिन राखू गिरिमल हार हे कोन फूल ओढ़ब लुकेसरि के कोन फूल पहिरन कोन फूल बान्धिके सिंगार हे उठू मालिन राखू गिरिमल हार हे बेली फूल ओढ़ब बन्दी चमेली फूल पहिरन अरहुल फूल लुकेसरि के सिंगार हे उठू मालिन गाँथू गिरिमल हार हे उठू मालिन गाँथू गिरिमल हार हे .... श्रीकर मीमांसक आनन्दाकेँ तालपत्र सभक परिरक्षणक भार दऽ निश्चिन्त भऽ गेल रहथि। पत्नीक मृत्युक बाद बेचारे आशंकित रहथि। दैवीय हस्तक्षेप, आनन्दा जेना ओहि तालपत्र सभक परिरक्षण लेल आएल रहथि हुनकर घर। अनचोक्के.. मितू कहि देलक हमरा जे कोना ओ श्रीकर पंडितकेँ पटिया लेने रहए। ब्राह्मणक बेटी सराइ कटोरा आ माटिक महादेव बनबैत रहत आ तालपत्र सभमे घून लागि जाएत.. नै घून लागए देथिन तालपत्र सभमे, आनन्दा आएत एहि घर। श्रीकर मीमांसक निर्णय कऽ लेने रहथि। मितू तँ जेना जीवन भरि अपन लेल एहि निर्णयक प्रति कृतज्ञ छलाह। श्रीकरक आयु जेना बढ़ि गेल छलन्हि। श्रीकर आ आनन्दाक मध्य गप होइते रहै छल ओहि घरमे। आनन्दा बजिते रहै छलीह आ गबिते रहै छलीह। बारहे बरिस जब बीतल तेरहम चढ़ि गेल हे बारहे बरिस जब बीतल तेरह चहरि गेल हे ललना सासु मोरा कहथिन बघिनियाँ बघिनियाँ घरसे निकालब हे ललना सासु मोरा कहथिन बघिनियाँ बघिनियाँ घरसे निकालब हे अंगना जे बाहर तोहि छलखिन रिनियाँ गे ललना गे आनि दियौ आक धथूर फर पीसि हम पीयब रे ललना रे आनी दियौ आक धथूर फर पीसि हम पीयब रे बहर से आओल बालुम पलंग चढ़ि बैसल रे बहर से आओल बालुम पलंग चढ़ि बैसल रे ललना रे कहि दियौ दिल केर बात की तब माहुर पीयब रे ललना रे कहि दियौ दिल केर बात की तब माहुर पीयब रे बारह हे बरिस जब बीतल तेरह चहरि गेल रे ललना रे सासु मोरा कहथिन बघिनियाँ बघिनिया घरसे निकालब रे सासु मोरा मारथिन अनूप धय ननदो ठुनुक धय रे सासु मोरा मारथि अनूप धय ननदो ठुनुक धय रे ललना रे गोटनो खुशी घर जाओल सभ धन हमरे हेतै हे ललना रे गोटनऽ खुशी घर जाओल सभ धन हमरे हेतै हे चुप रहू, चुप रहू धनी की तोहीँ महधनी छिअ हे चुप रहू, चुप रहू धनी की तोहीँ महधनी छिअ हे धनी हे करबै हे तुलसी के जाग, की धन सभ लुटा देबऽ हे ललना हे करबै मे पोखरि के जाग, की सभ धन लुटाएब हे श्रीकर मीमांसक हँसी करथिन- आनन्दा, अहाँकेँ तँ सासु अछि नै, तखन ओ बेचारी अहाँकेँ बघिनियाँ कोना कहतीह? -तेँ ने गबै छी, सभ चीज तँ भरल-पूरल मुदा..। आँखि नोरा गेल छलन्हि आनन्दाक। हमरा अखनो मोन अछि। -हम अहाँकेँ दुःख देलहुँ ई गप कहि कऽ। -कोन दुःख? सासु नै छथि तँ ससुर तँ छथि। श्रीकरकेँ प्रसन्न देखि मितूकेँ आत्मतोष होइन्ह। ....... आ श्रीकर मीमांसकक मृत्युक बादो आनन्दा तालपत्र सभमे जान फुकैत रहैत छलीह। फेर मितूकेँ दूटा बेटी भेलन्हि वल्लभा आ मेधा। आनन्दाक खुशी हम देखने छी। नैहर गेल रहथि ओ। ओतहि दुनू जौँआ बेटी भेल छलन्हि- लाल परी हे गुलाब परी लाल परी हे गुलाब परी हे गगनपर नाचत इन्द्र परी हे गुलाबपर नाचत इन्द्र परी आ फेर भेलन्हि बेटा। पैघ भेलापर बेटा मेघकेँ पढ़बा लेल बनारस पठेने रहथि मितू। आ दिन बितैत गेल, बेटी सभ पैघ भेलन्हि आ दुनू बेटी, मेधा आ वल्लभाक बियाह दान कऽ निश्चिन्त भऽ गेल छलाह मितू। बेटाक परवरिश आ बियाह दान सेहो केलन्हि। मेघ बनारसमे पाठन करए लगलाह। मेघ, मेधा आ वल्लभा तीनू गोटे सालमे एक मास आबथि धरि अवश्य। लोक बिसरि गेल मारते रास गप सभ। II भामती प्रस्थानम् आनन्दा मितूक पिताजीक एहि तालपत्र सभक परिरक्षण मनोयोगसँ कऽ रहल छथि। कड़गर रौद, मितूकेँ ओहिना मोन छन्हि। मितू संग जिनगी बीति गेलन्हि आनन्दाक। आ आब जखन ओ नै छथि तखन मितूक जीवनक परिरक्षण कोना होएत।.. मितू प्रवचनक बीचमे कतहु भँसिया जाइ छथि। प्रवचन चलि रहल अछि। मितू गरुड़ पुराण नै सुनताह। मितू मंडनक ब्रह्मसिद्धि सुनताह, वाचस्पतिक भामती सुनताह, जे सुनबो करताह तँ। जँ बेटी सभक जिद्द छन्हिये तँ आत्मा विषयपर कुमारिलक दर्शन सुनताह। आ सैह प्रवचन चलि रहल अछि। भ्रम। शब्दक भ्रम। कहैत रहथि श्रीकर मारते रास गप शब्दशास्त्रम् पर। भामती प्रस्थानम् पर। शब्दक अर्थ हम गढ़ि लैत छी। आ फेर भ्रम शुरू भऽ जाइत अछि। -गुरुजी। हम पत्नीक मृत्युक बाद घोर निराशामे छी। की छिऐ ई जीवन। कतए होएत आनन्दा। - मितू। धीरज राखू। ब्रह्मसिद्धिक हमर ई पाठ अहाँक सभ भ्रमक निवारण करत। ब्रह्मसिद्धिमे चारि काण्ड छै। ब्रह्म, तर्क, नियोग आ सिद्धि काण्ड। ब्रह्मकाण्डमे ब्रह्मक रूपपर, तर्ककाण्डमे प्रमाणपर, नियोगकाण्डमे जीवक मुक्तिपर आ सिद्धिकाण्डमे उपनिषदक वाक्यक प्रमाणपर विवेचन अछि। - मितू। मुक्ति ज्ञानसँ पृथक् कोनो बौस्तु नै अछि। मुक्ति स्वयं ज्ञान भेल। मानवक क्षुद्र बुद्धिक कतहु उपेक्षा मंडन नै केने छथि। कर्मक महत्व ओ बुझैत छथि। मुदा ताहिटा सँ मुक्ति नै भेटत। स्फोटकेँ ध्वनि-शब्दक रूपमे अर्थ दैत मंडन देखलन्हि। से शंकरसँ ओ एहि अर्थेँ भिन्न छथि जे एहि स्फोटक तादात्म्य ओ बनबैत छथि मुदा शंकर ब्रह्मसँ कम कोनो तादात्म्य नै मानै छथि। से मंडन शंकरसँ बेशी शुद्ध अद्वैतवादी भेलाह। -मितू। मंडन क्षमता आ अक्षमताक एक संग भेनाइकेँ विरोधी तत्व नै मानैत छथि। ई कखनो अर्थक्रियाकृत भेद होइत अछि, मुदा ओ भेद मूल तत्व कोना भऽ गेल। से ई ब्रह्म सभ भेदमे रहलोपर सभ काज कऽ सकैए। -देखू। वाचस्पतिक भामती प्रस्थानक विचार मंडन मिश्रक विचारसँ मेल खाइत अछि। मंडन मिश्रक ब्रह्मसिद्धिपर वाचस्पति तत्वसमीक्षा लिखने छथि। ओना तत्वसमीक्षा आब उपलब्ध नै छै। -तखन तत्व समीक्षाक चर्चा कोना आएल। -वाचस्पतिक भामतीमे एकर चर्चा छै। -मुदा मंडनक विचार जानबासँ पूर्व हमरा मोनमे आबि रहल अछि जे जखन ओ शंकराचार्यसँ हारि गेलाह तखन हुनकर हारल सिद्धान्तक पारायणसँ हमरा मोनकेँ कोना शान्ति भेटत। -देखियौ, मंडन हारि गेल छलाह तकर प्रमाण मंडनक लेखनीमे नै अछि। मंडन स्फोटवादक समर्थक रहथि, मुदा शंकराचार्य स्फोटवादक खण्डन करैत छथि। मंडन कुमारिल भट्टक विपरीत ख्यातिक समर्थक रहथि, मुदा शंकराचार्यक जाहि शिष्य सुरेश्वराचार्यकेँ लोक मंडन मिश्र बुझै छथि ओ एकर खण्डन करै छथि। -से तँ ठीके। मंडन हारि गेल रहितथि तँ हुनकर दर्शन शंकराचार्यक अनुकरण करितन्हि। -आब कहू जे जाहि सुरेश्वराचार्यकेँ शंकराचार्य श्रृंगेरी मठक मठाधीश बनेलन्हि से अविद्याक दू तरहक हेबाक विरोधी छथि मुदा मंडन अपन ग्रन्थ ब्रह्मसिद्धिमे अग्रहण आ अन्यथाग्रहण नामसँ अविद्याक दूटा रूप कहने छथि। मंडन जीवकेँ अविद्याक आश्रय आ ब्रह्मकेँ अविद्याक विषय कहै छथि मुदा सुरेश्वराचार्य से नै मानै छथि। शंकराचार्यक विचारक मंडन विरोधी छथि मुदा सुरेश्वराचार्य हुनकर मतक समर्थनमे छथि। ....... बानर आ बनगदहा खेत सभकेँ धांगने अछि आ पारा बारीकेँ। आब हमरा दुआरे गामक लोक महीस पोसनाइ तँ नै छोड़ि देत। बानर आ बनगदहा बड्ड नोकसान कऽ रहल अछि। “चारिटा बानर कलममे अछि। धऽ कऽ आम सभकेँ दकड़ि देलक। हम गेल रही। साँझ भऽ गेलै तँ आब सभटा बानर गाछक छिप्पी धऽ लेने अछि। साँझ धरि दुनू बापुत कलम ओगरने रही, झठहा मारि भगेलहुँ, मुदा तखन अहाँक कलम दिस चलि गेल”।–- हम मितूकेँ हम कहै छियन्हि। “सभटा नाश कऽ देलकै बचलू। रातिमे तँ नञि सुझै छै। भोरे-भोर कलम जा कऽ देखै छी। बनगदहा सभटा फसिल खा लेलक आब ई बानर आमक पाछाँ लागल अछि। करऽ दियौ जखन...”। “बनगदहा सभ तँ साफ कऽ उपटि गेल छलै। नै जानि फेर कत्तऽ सँ आबि गेल छै। गजपटहा गाममे जाग भेल छलै, ओम्हरेसँ राता-राती धार टपा दै गेल छै”। “से नै छै। ई बनगदहा सभ धारमे भसिया कऽ नेपाल दिसनसँ आएल छै। आबऽ दियौ जखन...”। “हम बानर सभ दिया कहने रही”। “से हेतै”। “हेतै भाइज, तखन जाइ छी”। हमरा बुझल अछि जे आमक मासमे बानर आ बनगदहा ओहि बरख एक्के संग निपत्ता भऽ गेल रहै जाहि बरख आनन्दा आ मितूक भेँट भेल रहै। आ आनन्दाक गेलाक बाद बानर आ बनगदहा नै जानि कत्तऽ सँ फेर आबि गेल छै, आनन्दाक मृत्युक पन्द्रहो दिन नै बीतल छै... ....... बचलू गेलाह आ मितूक कपारपर चिन्ताक मोट कएकटा रेख ऊपर नीचाँ होमए लगलन्हि, हिलकोरक तरंग सन, एक दोसरापर आच्छादित होइत, पुरान तरंग नव बनैत आ बढ़ैत जाइत। अंगनामे सोर करै छथि। “बुच्ची, बुचिया। जयकर आ विश्वनाथ आइ गाछी गेल रहए। आबि गेल अछि ने दुनू गोड़े। सुनलिऐ नै जे बानर सभक उपद्रव भऽ गेल छै। काल्हिसँ नै जाइ जाएत गाछी, से कहि दियौ। आइ बानर सभ कलम आएल छल, से कहबो नै केलहुँ। कहिये कऽ की होएत जखन...”। “कहि तँ रहल छलहुँ बाबूजी मुदा अहाँ तँ अपने धुनमे रहै छी, बाजैत मुँह दुखा गेल तँ चुप रहि गेलहुँ”। हँ, धुनिमे तँ छथिये मितू। ई आम सेहो आनन्दाक मृत्युक बाद पकनाइ शुरू भऽ गेल अछि। आ एतेक दिनुका बाद फेर ई बानर आ बनगदहा कोन गप मोन पारबा लेल फेरसँ जुमि आएल अछि। ... जयकरक माए वल्लभा आ विश्वनाथक माए मेधा। दुनू बहीन कतेक दिनपर आएल छथि नैहर। कतेक दिनपर भेँट भेल छन्हि एक दोसरासँ। आनन्दाक दुनू बेटी आ दुनू जमाए आएल छथि। वल्लभाक पति विशो आ मेधाक पति कान्ह। मेघ अपन पत्नी आ बच्चा सभक संगे आएल छथि। मितू पत्नीकेँ आनन्दा कहि बजा रहल छथि। फेर मोन पड़ै छन्हि जे ओ आब कत्तऽ भेटतीह। फेर कत्तऽ छी वल्लभा, कत्तऽ छी मेधा, जयकर आ विश्वनाथ कतए छथि..सोर करए लागै छथि। वल्लभा आ मेधा अबै छथि आ मितू गीत गबए लगै छथि। आनन्दाक गीत। आनन्दा जे गबै छलीह वल्लभा आ मेधा लेल- लाल परी हे गुलाब परी लाल परी हे गुलाब परी हे गगनपर नाचत इन्द्र परी हे गुलाबपर नाचत इन्द्र परी रकतमाला दुआरपर निरधन खड़ी हे रकतमाला दुआरपर निरधन खड़ी माँ हे निरधनकेँ धन यै देने परी माँ हे निरधनकेँ धन जे देने परी लाल परी हे गुलाब परी माँ हे रकतमाला दुआरपर अन्धरा खड़ी माँ हे अन्धराकेँ नयन दियौ जलदी माँ हे अन्धराकेँ नयन दियौ जलदी बाप आ दुनू बेटी भोकार पाड़ए लगै छथि। ... -मितू। आनन्दाक मृत्यु अहाँ लेल विपदा बनि आएल अछि। अहाँ ब्राह्मण जातिक आ आनन्दा चर्मकारिणी। मुदा दुनू गोटेक प्रेम अतुलनीय। हुनकर मृत्यु लेल दुःखी नै होउ। ब्रह्म बिना दुखक छथि। ब्रह्मक भावरूप आनन्द छियन्हि। से आनन्दा लेल अहाँक दुःखी होएब अनुचित। ब्रह्म द्रष्टा छथि। दृश्य तँ परिवर्तित होइत रहैए, ओहिसँ द्रष्टाकेँ कोन सरोकार। ई जगत-प्रपंच मात्र भ्रम नै अछि, एकर व्यावहारिक सत्ता तँ छै। मुदा ई व्यावहारिक सत्ता सत्य नै अछि। -मितू। चेतन आ अचेतनक बीच अन्तर छै मुदा से सत्य नै छै। जीवक कएकटा प्रकार छै, आ अविद्याक सेहो कएकटा प्रकार छै। अविद्या एकटा दोष भेल मुदा तकर आश्रय ब्रह्म कोना होएत, पूर्ण जीव कोना होएत। ओकर आश्रय होएत एकटा अपूर्ण जीव। अविद्या तखन सत्य नै अछि मुदा खूब असत्य सेहो नै अछि। -मितू। एहि अविद्याकेँ दूर करू आ तकरे मोक्ष कहल जाइत अछि। वैह मोक्ष जे आनन्दा प्राप्त केने छथि। आ मितूक मुखपर जेना शान्ति पसरि जाइ छन्हि। ........ मितू जेना भेँट करबा लेल जा रहल छथि। मोन पड़ि जाइ छन्हि आनन्दा संग प्रेमालाप। -आनन्दा। अहाँसँ गप करैत-करैत हमरा कनीटा डर मोनमे आबि गेल अछि। पिताक सभसँ प्रधान कमजोरी छन्हि हुनकर तालपत्र सभक परिरक्षण। से ई सभ मोन राखू। पिता जे पुछताह जे ताल पत्रक परिरक्षण कोना होएत तँ कहबन्हि- पुस्तककेँ जलसँ तेलसँ आ स्थूल बन्धनसँ बचा कऽ। छाहरिमे सुखा कऽ। ५००-६०० पातक पोथी सभ। हम कोनो दिन देखा देब। एक पात एक हाथ नाम आ चारि आंगुर चाकर होइ छै। ऊपर आ नीचाँ काठक गत्ता लागल रहै छै। वाम भागमे छिद्र कऽ सुतरीसँ बान्हल रहै छै। -पिता मानताह। -नै मानताह किएक। ब्राह्मणक बेटीसँ बियाह कराबैक औकाति छन्हि? हम एक गोटेकेँ दू टाका बएना देने रहियै खेतिहर जमीन किनबा लेल। मुदा पिता जा कऽ बएना घुरा आनलन्हि। एक-एक दू-दू टाका जमा कऽ रहल छथि। ७०० टाका लड़कीबलाकेँ देताह तखन बेटाक विवाह हेतन्हि आ पाँजि बनतन्हि। आ से ब्राह्मणी अओतन्हि तँ तालपत्रक रक्षा करतन्हि? मितूक माएक मृत्युक बाद श्रीकर खटबताह भऽ गेल छलाह। टोलबैय्या सभ कहै छथि। आ फेर बेमारी अएलै, प्लेग। गामक दूटा टोल उपटिये गेल, मिसरटोली आ पछिमाटोली। परोपट्टाक बहुत रास गाममे कतेक लोक मुइल से नै जानि। मितू पिताकेँ आनन्दासँ भेँट करा देलखिन्ह। श्रीकर तालपत्र परिरक्षणक ज्ञानसँ परिपूर्ण आनन्दामे नै जानि की देखि लेलन्हि। मितू जीति गेल। नैय्यायिक मितू मीमांसक श्रीकरसँ जीति गेल आ मीमांसक श्रीकर अपन टोलबैय्या सभकेँ पराजित कऽ देलन्हि। आ आनन्दा आ मितूक विवाह सम्पन्न भेल। मोन पड़ि जाइ छन्हि आनन्दा संग प्रेमालाप। मितू जेना भेँट करबा लेल जा रहल छथि। आनन्दाक मृत्यु भऽ गेल अछि। बलानमे पएर पिछड़ि गेलन्हि आनन्दाक। ओहिना पिछड़ैक चिन्हासी देखबामे आबि रहल अछि। मितू ओहि चिन्हासीकेँ देखै छथि आ हुनकर मोन हुलसि जाइ छन्हि, पिछड़ि जाइ छथि भावनाक हिलकोरमे.. आनन्दा आ मितूक एक दोसरासँ भेँट-घाँट बढ़ए लागल छल, खेत, कल्लम-गाछी, चौरी आ धारक कातक एहि स्थलपर। आ दुनू गोटे पिछड़ैत छलाह, खेतमे, कल्लम-गाछीमे, चौरीमे आ धारक कातमे सेहो। धारमे फाँगैत नै छलाह मितू। यएह ढलुआ पिच्छड़ स्थल जे आइ-काल्हिक छौड़ा सभ बनेने अछि, से मितूक बनाओल अछि। एहिपर पोन रोपैत छलाह आ सुर्रसँ मितू धारमे पानि कटैत आगाँ बढ़ि जाइत छलाह। “हे, कने नै पिछड़ि कऽ तँ देखा।” “से कोन बड़का गप भेलै।” “देखा तखन ने बुझबै।” आनन्दा अस्थिरसँ आगाँ बढ़बाक प्रयास करथि मुदा..हे.हे..हे.. नै रोकि सकलथि ओ अपनाकेँ, नहिये खेतमे, नहिये कल्लम-गाछीमे, नहिये चौरीमे आ नहिये एहि धारक कातमे.. आ की करए आएल होएतीह आनन्दा एतए..जे पिछड़ि गेलीह आ डूमि गेलीह.. कोनो स्मृतिकेँ मोन पड़बा लेल आएल होएतीह.. - हँ आनन्दा आएल अछि बचलू। देखियौ ई गीत सुनू- घर पछुवरबामे अरहुल फूल गछिया हे फरे-फूले लुबुधल गाछ हे उतरे राजसए सुगा एक आओल बैसल सूगा अरहुल फूल गाछ हे फरबो ने खाइ छऽ सुगबा, फुलहो ने खाइ छऽ हे डाढ़ि-पाति केलक कचून हे फुलबो ने खाइ छऽ सुगबा, फरहु ने खाइ छऽ हे डाढ़ि-पाति केलक कचून हे घर पछुवरबामे बसै सर नढ़िआ हे बैसल सूगा दिअ ने बझाइ हे एकसर जोड़ल सोनरिया दुइसर जोड़ल हे तेसर सर सूगा उड़ि जाइ हे सुगबो ने छिऐ भगतिया तितिरो ने छिऐ येहो छिऐ गोरैय्या के बाहान हे -भाइ अहाँ ई गीत नै सुनि पाबि रहल छी की? -भाइ सुनि रहल छी। देखियो रहल छी। आनन्दा भौजी छथि। जहिया ओ मुइल छलीह तहियो सुनने रही- वएह रहथि- गाबै रहथि- लुकेसरी अँगना चानन घन गछिया तहि तर कोइली घऽमचान हे -शब्द भ्रम नै छल ओ। माँछ-मौस आ सत्यनारायण पूजाक बाद अगिले दिनक गप अछि। ने चानन गाछ कटेने रहथि आ ने अँगना बेढ़ने रहथि आनन्दा। दोसर दिन ओहि चानन गाछक नीचाँ चर्मकारटोलमे गौआँ सभ दुनू गोटेक लहाश देखलन्हि। आ ईहो शब्द गगनमे पसरि गेल, सौँसे गौँआ सुनलक- आनन्दाक अबाजमे- जाहे बोन जेबऽ कोइली रुनझुनु बालम रहि जेतऽ रकतमाला के निशान हे शब्द भ्रम नै छल ओ। (ई कथा “शब्दशास्त्रम्” श्री उमेश मंडल गाम-बेरमा लेल।) दिल्ली १ पोस्टमार्टम कएल शरीर, सातटा मोटका शिल्लपर, जड़त कनीकालमे। गोइठामे आगि जे अनलन्हिहेँ सुमनजी, राखि देलन्हि नीचाँ। कनकनाइत पानिमे डूम दऽ गोइठाक आगिसँ आगि लऽ शरीरकेँ गति-सद्गति देबा लेल। आ कऽ देलन्हि अग्निकेँ समर्पित। तृण, काठ आ घृत संग। घुरि गेला सभ। लोह, पाथर, आगि आ जल नांघि, छूबि; डेढ़ मासक बच्चाकेँ कोरामे लेने छलि माए, तकड़ा छोड़ि। सभ घर घुरैत छथि। २ दिल्ली। ३१ दिसम्बरक राति। आब एक तारीख भऽ गेलै। रतुका शिफ्टमे हम छी। कोरियासँ आएल एकटा स्त्री हमरासँ पुछैए, ई नव एयरपोर्ट अछि की? हम कहै छिऐ- हँ। आ पुछै छिऐ- किए? ओ स्त्री कहैए- नै, हमरा लागल, किए तँ छह मास पहिने आएल रही। -हँ पहिने टर्मिनल दू पर अहाँ आएल हएब, ई नव टर्मिनल छिऐ, टर्मिनल- तीन। नीक लागल अहाँकेँ?-– हम पुछै छियन्हि। -बड्ड नीक लागल। एयरपोर्ट नै, होटल सन लागि रहल अछि। इण्डिया आब मजगूत भऽ रहल अछि।-– महिला बजै छथि। रतुका शिफ्टमे हम छी। तखने गामसँ एकटा फोन हमर मोबाइलपर अबैए। हमर महिला सहकर्मी हँसी करै छथि- गामसँ फोन आएल हेतन्हि, आब फेर ई मैथिलीमे गप करता, हम सभ भाषा बुझै नै छिऐ, मीठ भाषा छै, तेँ हमर सभक खिधांशो करैत हएता तँ हमरा सभकेँ पता नै चलैए। ३१ दिसम्बरक राति छिऐ। आब एक तारीख भऽ गेलै। मुदा दुर्घटना बारह बजे रातिक पहिने भेल छलै। लहाशक जेबीमे मोबाइल रहै। तीन चारिटा अंतिम बेर डायल कएल गेल फोन नम्बरपर पुलिस ओही मोबाइलसँ फोन केलकै आ सूचना देलकै जे जकर फोनसँ पुलिस फोन कऽ रहल अछि, से आब ऐ दुनियाँमे नै रहल। मध्य रात्रि। एक्स-रे मशीन आ स्निफर डॉगकेँ छोड़ि ऑफिससँ छुट्टी लऽ हम बिदा होइ छी। ई एयरपोर्ट बाहरसँ कोनो सजल-धजल नवकनियाँ सन लागि रहल अछि। रातिमे बाहरसँ हमहूँ नै देखने रहिऐ ऐ नवकनियाँकेँ। ठीके कहै छल ओ महिला। होटले लागि रहल अछि, प्रकाशमे चमचमाइत। गाड़ी आगाँ बढ़ि रहल अछि। दिल्लीक रोड एतेक चाकर कोना भऽ गेलै। दिनमे तँ तीन मिनट प्रति किलोमीटरक गति रहै छै ऐ सड़कपर। मुदा रातिमे खाली रहने चकरगर लागि रहल अछि। मुदा फेर जमुनापार अबैए, रोड पातर होइत जाइए। भजनपुरा, खजूरी खास। दिनमे तँ गाड़ी एतऽ आबियो नै सकितए। बिजली सेहो कटि गेल छै। सड़कक दुनू कात गन्दा पसरल। गाड़ी गलीक कोनमे लगा कऽ आगाँ बढ़ै छी। गली पार कऽ हिलैत सिरही बाटे अमरजीक घर पैसै छी। कन्नारोहट उठल छै। दिल्ली.. इण्डिया, मजगूत इण्डियाक राजधानीक ईहो एकटा इलाका अछि। कोरियन महिला एतऽ नै आबि सकत, भजनपुरा, खजूरी खास। भजनपुरा, खजूरी खास, एतुक्के लोक दिल्लीक चमचमाइत घर, ऑफिस, आ व्यापारक पाछाँ अछि, एकर सभक अगिला खाढ़ी भऽ सकैए फएदामे रहतै.. तै आसमे जान अरोपने अछि। पता चलैए जे लहाश गुरु तेग बहादुर अस्पतालमे राखल छै। ओतऽ सँ बिदा होइ छी। बोल भरोस देबा योग्य परिस्थिति नै छै। गुरु तेग बहादुर अस्पतालक मुर्दाघरमे मोहित बाबूक बेटाक लहास ओकर रक्तसम्बन्धीकेँ देल जेतै। पुलिस कहने रहए- पिता जीवित छथिन्ह तखन दोसराकेँ देबाक बाते नै छै, नै जिबैत रहितथिन्ह तखन देल जा सकै छल- उच्च न्यायालयक आदेश छै। पछिला बेर दऽ देल गेल रहै आ जखन असली रक्त-सम्बन्धी आबि कऽ केस कऽ देलकै तँ तीनटा पुलिसबला निलम्बित भऽ गेलै। आ कने काल लेल मानि लिअ जे पुलिस दैयो देत, मुदा डॉक्टर पोस्टमार्टमे नै करत। ३ अमोदक घरमे हरबिर्रो उठि गेलै। दिल्लीसँ एक बजे रातिमे फोन आएल छै, मोहित बाबूक बेटा अमर मरि गेलै। दिल्लीमे सड़क दुर्घटनामे मरि गेलै। अमोदक फोनपर फोन आएल छै। अमोद मोहित बाबूकेँ कोना की कहतै। तत्ता-सिहर कटा कऽ एक्केटा बेटा मोहित बाबूकेँ, चारिटा बेटीपरसँ। परुकेँ बियाह भेल छलै। अमोद मोहित ककाक दरबज्जा लग पहुँचैए। हाक दैए। काकी अबै छथि। मोहित बाबू गाममे छथिये नै। बहनोइक मृत्यु-संस्कारमे भाग लैले गेल छथि। अमोदकेँ ई गप काकी कहै छथिन्ह। -से की भेलै एतेक रातिमे?- काकी चिन्तित भऽ पुछै छथिन्ह। -नै भोरमे अबै छी।–काज छल। अमोद मोहित बाबूक घरसँ पुछारी कऽ बहरा जाइए। अमोद आगाँ बढ़ि जाइए। सरवनक दरबज्जापर जाइए। हँ एकरे कहि दै छिऐ, काकीकेँ भोरमे कहि देतन्हि। सरवन चौकीपर सूतल अछि। अमोद ओकरा उठाबैए आ सभ गप कहैए। सरवन भोरमे काकीकेँ कहि देतै आ काकाकेँ सेहो भोरेमे फोन कऽ देतै। भोरमे भरि गाम हाक्रोस ….। काकी तँ बताह भेल जाइ छथि। मोहित बाबूकेँ फोन गेलन्हि जे जहिना छी तहिना आबि जाउ, काकीक मोन बड्ड खराप छन्हि। मोहित बाबू गामपर एलाह तँ दोसरे गप। दिल्लीमे टोलक बड्ड लोक छै, मुदा पुलिस लहास ककरो नै देतै। रक्त-सम्बन्धीकेँ लहास भेटतै। मोहित बाबू दिल्ली नै जेताह, संताप देखैले नै जेताह। मुदा पुलिस लहास दोसराकेँ नै देतै। मोहित बाबूकेँ पंडितजी भरोस दै छथिन्ह। ओतऽ के कोना दाह संस्कार करतै, से पण्डीजी संगे जेताह। साँझमे पटनासँ दिल्लीक ट्रेनमे रिजर्वेशन भऽ जेतै। विधायक जीसँ अमोद गप कऽ लेने छथि, टिकट कटा, रिजर्वेशन करा कऽ अमोदक भातिज टिकटक संग पटना जंक्शनपर भेटत। दिल्लीमे पीअर बच्चाक बेटा कार लऽ कऽ स्टेशनपर आएत, करोलबागमे कैकटा दोकान छै पीअर बच्चाक बेटाक। ओ सोझे ओतऽसँ मोहित बाबूकेँ मुर्दाघर लऽ अनतन्हि … पण्डीजी आ मोहित बाबू पटनाक बस पकड़ै छथि। साँझमे दिल्लीक ट्रेन छै। काल्हि भोरमे मोहित बाबू दिल्ली पहुँचि जेताह आ बेटा जे काल्हि धरि जिबिते रहै आ आइ जे लहास बनल दिल्लीक मुर्दाघरमे राखल छै- तकर मृत शरीरकेँ लेताह। ४ ट्रेन आशाक नगरी दिल्ली पहुँचैबला छै, चिमनीक धुँआ आ फैक्ट्री सभ खतम भेलै आ बड़का-बड़का स्टेडियम, प्रगति मैदान आ की-की आबि गेलै। मोहित बाबूकेँ ई सभ बौस्तु पहिने नीक लागै छलन्हि। दिल्ली हाटमे गमैआ बौस्तु सभक स्टॉलपर बड़का गाड़ीबला सभ उतरि कऽ समान कीनै छल। मोहित बाबूकेँ हँसी लागै छलन्हि। गाममे ई सभ बौस्तु अनेरे पड़ल रहै छै, कियो किननिहार नै। ऐ परदेशी सभकेँ गामक लोक सभ एत्तऽ अनेरे ठकै छै। मुदा आइ ई दिल्ली हुनका लेल मुर्दाघरक पता बनि गेल छन्हि। गुरु तेग बहादुर अस्पतालक मुर्दाघरमे हुनकर बेटाक लहास ओकर रक्तसम्बन्धीकेँ देल जेतै। पिता रक्तसम्बन्धी बनि पहुँचैबला छथि। मोहित बाबू मुर्दाघर पहुँचि जाइ छथि, पहिने बुझलो नै छलन्हि जे दिल्लीमे सेहो मुर्दाघर होइ छै, बिजली-बत्तीबला शहर दिल्लीमे..... ५ दिल्ली। के बसेलकै, कोना बसेलकै। अंग्रेज जहिया कलकत्तासँ दिल्ली राजधानी बनेबाक विचार केलक तखन तँ एकोटा गामक लोक एतऽ नै हेतै। आ आब … मोहित बाबू पहुँचि जाइ छथि। हबोढेकार भऽ कानऽ लगै छथि। हम भरि-पाँज कऽ पकड़ि कऽ बैसि जाइ छियन्हि। -गामक छोड़ू कोन टोलक, कोन घर लोक एत्तऽ नै छै। सड़क दुर्घटना सेहो भेल छै। मुदा बचि-बचि जाइ छलै। अमरो बचि जैतै तँ कत्ते नीक होइतै। अपंगो भऽ कऽ रहितै तँ देखबो तँ करितिऐ। हे कनियाँकेँ आगि नै देबऽ देबै, डेढ़मासक बच्चा छै। बच्चा लीलो भऽ जाएत। नै, हमहीं देबै आगि.. आन देबो करतै तँ अन्तिम दिन तँ उतरी कनियाँक गरामे आबिये जेतै। तेँ हमहीं देबै आगि। -एह.. एक्कैसे बरखक तँ छै, छौंकी सन शरीर छै कनियाँक। चारिटा भाइ छै, सभ एकरासँ पैघ। ओकर जीवन कोना बिततै। ऐ बूढ़ शरीरसँ बच्चाकेँ हम कोना पोसबै। कतबो धनीक रहै छै, नोकरी लेल पठबैते छै.. पीअरो बच्चा तँ पठेने छथि अपन बच्चाकेँ। ओकरासँ बेसी के छै धनीक गाममे? हमरा तँ दस कट्ठा जमीनो नै पुरत... रौ दैब... कहै छलिऐ जे हम नै जाएब दिल्ली...... संताप देखैले की जाएब? मुदा कहलकै जे लाशे नै देत। आ आब आबि गेल छी तँ हमहीं देबै आगि। -नै, से नै हएत, बाप कतौ आगि देलकैहेँ... अहाँकेँ अश्मसानघाटो नै जेबाक अछि। सभ पुरना गप बिसरि जाउ... ओकर पितियौतकेँ देबए दियौ आगि... ऐ परिस्थितिमे पुरान गप बिसरि जाउ। -नै, से भातिजक प्रति हमरा कोनो तेहन आन भावना नै अछि। ठीक छै... सुमनजी दौ आगि। ६ एक्कैसम शताब्दीक पहिल दशकक अन्तिम रातिक घटना, आ ओकर बादक भोर। मुदा नै छै कोनो अन्तर। पहिराबा आ पुरुखपातकेँ छोड़ि दियौ। महिला तँ वएह…। ऐ कनकनाइत बसातसँ बेशी मारुख। हाड़मे ढुकल जाइत अछि। कमला कात नै यमुनाक कात। हजार माइल दूर गामसँ आबि। मिज्झर होइत अछि खरड़खवाली काकीक श्वेत वस्त्र। साइठ साल पूर्वक वएह खिस्सा, वएह समाज, मात्र पहिराबा बदलि गेल, मात्र धार बदलि गेल। गोपीचानन, गंगौट, माला, उज्जर नव वस्त्र, मुँहमे तुलसीदल, सुवर्ण खण्ड, गंगाजल, कुश पसारल भूमि, तुलसी गाछ लग उत्तर मुँहे पोस्टमार्टम कएल शरीर आनल जाइए। फेर ओतऽसँ यमुना कात… कनकनी छै बसातमे, हाड़मे ढुकि जाएत ई कनकनी, पोस्टमार्टम कएल शरीर जे राखल अछि, सातटा मोटका शिल्लपर, कमला कात नै यमुनाक कात, जड़त कनीकालमे। सुमनजी सेहो नव उज्जर वस्त्र पहीरि, जनौ, उत्तरी पहीरि, नव माटिक बर्तनक जलसँ, तेकुशासँ पूब मुँहे मंत्र पढ़ै छथि आ ओइ जलसँ मृतककेँ शिक्त करै छथि, वामा हाथमे ऊक लऽ गोइठाक आगिसँ धधकबैत छथि, तीन बेर मृतकक प्रदीक्षणा कऽ मुँहमे आगि अर्पित होइत अछि। लकड़ी कोना राखल जाए तइपर दू गोटेमे बहसा-बहसी भऽ रहल अछि। लगैए झगड़ा भऽ जेतै। पहिल गोटे कहि रहल छथि- एना लकड़ी नै तोपल जाइ छै, कतबो घी कर्पूर देबै आगि नै धरत। मुदा किछु काल आर। सातटा शिल्लपर राखल ओ शरीर, अग्नि लीलि रहल सुड्डाह कऽ रहल। एकटा परिवार फेरसँ बनत आ तीस बर्खक बाद देखब ओकर परिणाम। ताधरि हाड़मे ढुकल रहत ई सर्द कनकनी, ऐ बसातक कनकनीसँ बड्ड बेशी सर्द। सभ दिल्लीयेमे रहता, दिल्लीसँ लड़बा लेल, इण्डियाकेँ महाशक्ति बनेबा लेल, अपन प्रगतिक आशामे, अगिला खाढ़ी लेल एतेक तँ बलिदान देबैए पड़त, ई सोचैत। कपास, काठ, घृत, धूमन, कर्पूर, चानन कपोतवेश मृतक। पाँच-पाँचटा लकड़ी सभ दैत छथि। कपोतक दग्ध शरीरावशेष सन मांसपिण्ड भऽ गेलापर, सतकठिया लऽ सातबेर प्रदक्षिणा कऽ, कुरहरिसँ ओहि ऊकक सात छौ सँ खण्ड कऽ, सातो बन्धनकेँ काटि सातो सतकठिया आगिमे फेकि बाल-वृद्धकेँ आगाँ कऽ एड़ी-दौड़ी बचबैत नहाइले जाइ छथि, तिलाञ्जलि मोड़ा-तिल-जलसँ, बिनु देह पोछने, मृतकक आंगनमे द्वारपर क्रमसँ लोह, पाथर, आगि आ पानि स्पर्श कऽ सभ घर घुरि जाइ छथि। सहस्रबाढ़नि (उपन्यास) “एक दिन कलितकेँ देखलहुँ जे ठेहुनियाँ मारने आगू जा रहल छथि । आँगनसँ बाहर भेला पर जतए आँकर-पाथर देखलन्हि ततए ठेहुन उठा कऽ, मात्र हाथ आ पएरपर आगू बढए लगलाह”, पत्नीकेँ मोन पड़लन्हि। “एक दिन हम देखलहुँ जे ओ देबालकेँ पकड़ि कऽ खिड़की पर ठाढ़ हेबाक प्रयासमे छथि । हमरो की फूरल जे चलू आइ छोड़ि दैत छियन्हि। स्वयम प्रयास करताह । दू बेर प्रयासमे ऊपर जाइत-जाइत देवालकेँ पकड़ने-पकड़ने कोच पर खसि गेलाह । हाथ पहुँचबे नहि करन्हि । फेर तेसर बेर जेना फाँगि गेलाह आ हाथ खिड़की पर पहुँचि गेलन्हि आ एकदम्मे ठाढ़ भऽ गेलाह”, झिंगुर बाबूकेँ एकाएकी मोन पड़लन्हि। “एक दिन हम एक-दू बाजि कऽ हिसाब कऽ रहल छलहुँ । हम बजलहुँ एक तँ ई बजलाह, हूँ । फेर हम बजलहुँ दू तँ ई बजलाह, ऊ । तखन हमरा लागल जे ई तँ हमर नकल उतारि रहल छथि”। “एक दिन खेत परसँ अएलहुँ आ नहा-सोना भोजन कऽ खखसि रहल छलहुँ। अहाहाऽ केलहुँ तँ लागल जेना कलित सेहो अहाहाऽ केलथि । घुरि कऽ देखलहुँ तँ ओ बैसि कऽ गेंदसँ खेला रहल छलाह । दोसर बेर खखसलहुँ तँ पुनः ई खखसलाह । हम कहलहुँ जे आर किछु नहि, ई हमर नकल कऽ रहल छथि । दलान पर सभ क्यो हँसऽ लागल । फेर तँ जे आबए कहए- कलित ऊहुहूँ, तँ जवाबमे ईहो ऊहूहूँ कहथि, एकटा दोसरे तरीकासँ।” जाहि बालककेँ झिंगुरबाबू पहिल-पहिल अन्यमनस्क पड़ल आ मात्र सपनामे हँसैत देखलखिन्ह से तकर बाद ठेहुनिया मारैत, फेर चलैत आब शिक्षा-दीक्षा प्राप्त कऽ रहल छन्हि । हुनका अखनो मोन पड़ि रहल छलन्हि जे कोना ठेहुनिया दैत काल नेनाक हाथ आगू नहि बढैक आ ओ बेंग जकाँ पाछूसँ सोझे आगू फाँगि जाइत छल । पूरा बेंग जकाँ- अनायासहि ओ हँसि उठलाह । पत्नी पूछि देलखिन्ह –“कोन बात पर मुस्की देलहुँ ?”, तँ पहिने तँ ओ ना-नुकुर केलन्हि, फेर सभटा मोनमे सोचल-घुरमल गप कहि देलखिन्ह आ सुनि लेलन्हि । आब तकरा बाद गपसँ गप निकलऽ लागल। सन् १८८५ ई.। झिंगुर ठाकुरक घरमे एकटा बालकक जन्म भेल रहए । ई वर्ष कांग्रेस पार्टीक स्थापनाक कारण बादक समयमे एकटा महत्त्वपूर्ण घटनाक रूपमे वर्णित होमएबला छल । अंग्रेजी राज अपनाकेँ पूर्णरूपसँ स्थापित कऽ चुकल रहए । राजा-रजवाड़ासभ अपनाकेँ अंग्रेजक मित्र बुझवामे गौरवक अनुभव करैत छलाह । शैक्षिक जगतमे कांग्रेस शीघ्रहि उपद्रवी तत्वक रूपमे प्रचारित भए गेल रहए । संस्क़ृतक रटन्त विद्याक स्वरूप खतम होअएबला छल । सरकारी पद बिना आङ्ल सिखने भेटब असंभव छल । सरकारी पदक तात्पर्य राजा-रजवाड़ाक वसूली कार्यसँ संबंधित आ ओतबहि धरि सीमित छल । तखन बालककेँ संस्क़ृत शिक्षाक मोहसँ दूर राखल गेल । परिवारमे अंग्रेजीक प्रवेश प्रायः नहियेक बराबर छल आ ताहि कारणसँ परिवार एक पीढ़ी पाछू चलि गेल रहए । मुदा झिंगुर बाबू अपन पुत्रक लेल एकटा कलकतियाबाबू मास्टरकेँ राखि शिक्षाक व्यवस्था कएलन्हि । तदुपरांत दरिभङ्गामे एकटा दोसर बंगालीबाबू बालककेँ अंग्रेजीक शिक्षा देलखिन्ह । बालक कलित शनैः शनैः अपन चातुर्यसँ मंत्रमुग्ध करबाक कलामे पारंगत भऽ गेलाह। “हम जे सुनेलहुँ तखन हिनकर वयस होएतन्हि, छह आकि सात मास”। “हम जे सुनेलहुँ तखन उमरि कतेक हेतन्हि, बड़ बेसी तँ नौ आकि दस मासक”। पत्नी सासु-ससुर वा बाहरी सदस्य नहि रहला पर सोझे -‘गप सुनलहुँ’ आकि ई करू वा ओ करू बजैत छलीह । मुदा सासु-ससुरक सोझाँ बजैत रहथि- सुनैत छथिन्ह, फलना कहैत छलैक । आ फेर झिंगुर बाबू की कम छलाह. ओहो ओहिना गीताक दर्शन-काजक लेल काजक अनुकरणमे उत्तर देथि । मुदा एकांतमे फेर सभ ठीक । पुनः मुस्कुरा उठलाह झिंगुर बाबू, ई प्रण मोने-मोन लेलथि जे कलितकेँ एहि जंजालसँ मुक्त करेतथि, ओहो तँ बूझथु जे पिता कोनो पुरान-धुरान लोक नहि छथिन । पत्नी पुनः पुछलथिन्ह जे आब कोन बात पर मुस्की छूटल । मुदा एहि बेर झिंगुर बाबू कन्नी काटि गेलाह । मुस्की दैत दलान दिस बहरा गेलाह, ओतए किछु गोटे अखड़ाहाक रख-रखाबक बात कऽ रहल छलाह । भोरहा कातक अखड़ाहाक गपे किछु आर छल । भोरे-भोर सभ तुरियाक बच्चा सभ, जवान -सभ पहुँचि जाइत छल । एकदम गद्दा सन अखड़ाहा, माटि कऽ कोरि आ चूड़ि कऽ बनाएल । बालक कलितकेँ छोड़ि सभ बच्चा ओतए पहुँचैत छल । झिंगुर बाबूकेँ एहि गपपर कचोट होइन्हि तँ आन लोक सभ कहथिन्ह, जे से की कहैत छी । अहाँ हुनका कोनो उद्देश्यक प्राप्ति लेल अपनासँ दूर रखने छी तँ एहिमे कचोट कथीक । एकौरसँ ठाकुर परिवारक मात्र एक घर मेंहथ आएल आ आब ओहिसँ पाँचटा परिवार भऽ गेल अछि । डकही माँछक हिस्सामे एकटा टोलक बराबरी ठकुरपट्टीकेँ भेटि गेल छैक। कलितक तुरियाक बच्चाकेँ लऽ कऽ आठटा परिवार अछि ठकुरपट्टीमे । अखनेसँ बच्चा सभकेँ मान्यता दऽ देल गेल छैक । तखने एकौरसँ एकटा समादी अएलाह आ भोजपत्रपर तिरहुतामे लिखल संदेश देलखिन्ह । झिंगुर बाबू अँगनासँ लोटा आ एक डोल पानि हुनका देलखिन्ह आ पत्र पढ़ए लगलाह । प्रायः कोनो उपनयनक हकार छलन्हि । ‘परतापुरक सभागाछी देखि कऽ जाएब, ई आदेशपूर्ण आग्रह झिंगुर बाबू समादीकेँ देलखिन्ह । एकटा पूर्वजसँ मूल-गोत्रक माध्यमसँ जुड़ल दियादक प्रति अनायासहि एकत्वक प्रेरणा भेलन्हि । फेर आँगनमे पत्र पढ़ब प्रारंभ कएलन्हि। ॥श्रीः॥ स्वस्ति हरिवदराध्यश्रीमस्तु झिंगुर ठाकुर पितृचरण कमलेषु इतः श्री गुलाबस्य कोटिशः प्रणामाः संतु । शतं कुशलम् । आगाँ समाचार जे हमर सुपुत्र श्री गड़ेस आ चन्द्रमोहनक उपनयन संस्कारक समाचार सुनबैत हर्षित छी । अहाँक प्रपितामह आ हमर प्रपितामह संगहि पढ़लन्हि । अपन गोत्रीयक समाचार लैत-दैत रहबाक निर्देश हमर पितामह देने गेल छलाह । हर्षक वा शोकक कोनो घटनाक सूचना हमरा गामसँ अहाँक गाम आ अहाँक गामसँ हमरा गाम नहि अएने आ विशेष कऽ अशोचक विचार नहि कएने भविष्यमे अनिष्टक डर अछि । संप्रति अपने पाँचो ठाकुर गुरुजनक तुल्य पाँच पांडवक समान समारोहमे आबि कृतार्थ करी । अहींकेँ अपन ज्येष्ठ पुत्रक आचार्य बनेबाक विचार कएने छी । परतापुरक सभागाछीक पंचकोशीमे अपने सभ गेल छी, तेँ बहुत रास लोक गप-शपक लेल लालायित सेहो छथि । अगला महिनाक प्रथम सोमकेँ ज्योँ आबि जाइ तँ सभ कार्य निरन्तर चलैत रहत । बुधसँ प्रायः प्रारम्भिक कार्य सभ शुरु भऽ जएत। इति शुभम् । बलान धारक कातमे परतापुरक चतरल-चतरल गाछ सभ आ तकर नीचाँ सभागाछी । बलानक धार खूब गहींर आ पूर्ण शांत । ई तँ बादमे हिमालयसँ कोनो पैघ गाछ बलानमे खसल आ पिपराघाट लग सोझ रहलाक बदला टेढ़ भऽ धारकेँ रोकि देलक आ एकटा नव धार कमलाक उत्पत्ति भेल । बलान झंझारपुर दिस आ कमला- मेंहथ, गढ़िया आ नरुआर दिस । बलान गहींर आ शांत, रेतक कतहु पता नहि; मुदा कमला फेनिल, विनाशकारी । बाढ़िक संग रेत कमला आनए लगलीह । ग्रीष्म ऋतुमे बलान अपन पूर्व रूप धेने रहैत छथि, बिना नाहक पार केनाइ कठिन । किंतु एहि मासमे कमलामहारानीकेँ पएरे लोक पार करैत छथि । सभागाछीक सभटा चतरल गाछ बाढ़िक प्रकोपमे सुखा गेल । चारू दिस रेत । आ सभागाछी उपटि गेल । चलि गेल सभटा वैभव सौराठ । झिंगुर बाबूक कालमे परतोपुरक ध्रुवसँ पंचकोशी नापल जाइत छल । कलित दरिभङ्गासँ परसू आबि जएताह, तखन हुनका लऽ कऽ एकौर जाएब । बेचारे बहुत दिन तपस्या कएलन्हि । एहि बेर मामा गाम, दीदी गाम सभ ठाम घुमा देबन्हि । सभकेँ मोन लागल छैक। पिता-पुत्र एकौर पहुँचलाह । ई गाम कोनो तरहेँ आन जकाँ नहि लगलन्हि । जेना जमघट लगला पर शास्त्रार्थक परम्परा रहल अछि, तहिना विद्वतमण्डलीमे विभिन्न विषय पर चर्चा हुअए लागल । चर्चामे अंग्रेजी शासन आ भारतवासीक सैन्य अभियान सेहो रहल । मँगरूबाबू लाल कोट पहिरि कए कतेक लड़ाइ लड़ल छलाह । १८६७-६८ क अबीसीनिया युद्धमे सर चार्ल्स नेपियरक संग कोनाकेँ अभियानमे ओ गेल छलाह, तकर वर्णन विस्तृत रूपमे देबए लगलाह मँगरूबाबू । द्वितीय अफगान-युद्धमे कोना समयक अभावमे सेनाकेँ लालक बदला मलिछह वर्दी लगबए पड़्लैक तकर वर्णन सेहो देलन्हि । यैह वर्दी बादमे खाकी रंगक रूपमे प्रसिद्ध भऽ गेल । एनफील्ड रायफलक खिस्सा जे १८५७ क स्वतंत्रता संग्राममे परिणत भेल, केर बदलामे बेश नमगर स्नाइडर रायफल जे १८८७ मे देल गेल । मँगरू बाबू कांग्रेसक चर्चा सेहो केलन्हि ।ओम्हर झिंगुर बाबू भोज-भातक फेहरिस्ट आ एस्टीमेट बनबए लगलाह । कलित सेहो अपन तुरियाक विद्यार्थी सभक संग मगन भऽ गेलाह । ओहि भीड़मे राजे गामक फन्नू बाबू सेहो आएल छलाह । एकौरमे हुनकर बहिन-बहिनोइ रहैत छलखिन्ह । ताहि द्वारे एतए एनाइ-गेनाइ ओ किछु बेशी करैत छलाह । कलितकेँ एहिसँ पहिने ओ नहि देखने रहथि । एकाएक उत्सुकता भेलन्हि आ कलितक विषयमे पूछपाछ केलन्हि । ई जानि जे कलित झिंगुरबाबूक सुपुत्र छथि, क्षणहिमे झिंगुरबाबू लग घुसकि कऽ चलि अएलाह । वार्त्तालापक क्रममे झिंगुर बाबू सँ ईहो पता लगलन्हि जे जमीन्दारीक पर्मानेन्ट सेटलमेन्टक बाद दरिभङ्गा राजकेँ वसूलीक लेल परगनाक आधारपर मिथिला क्षेत्रसँ कर वसूलीक अधिकार प्राप्त भेल आ पढ़ाइक बाद कलित कटिहारमे कर वसूलीक कार्यक हेतु जएताह । एम्हर अंग्रेजीक शिक्षा कलित पूर्ण कऽ लेने छलाह । पता लागल जे फन्नू बाबू अपन बचियाक हेतु योग्य वरक ताकिमे छथि । तखन विचार भेल जे परतापुरक सभागाछीमे अगिला महिनामे फन्नू बाबू आबथि आ झिंगुर बाबूकें आतिथ्यक अवसर भेटन्हि । मुदा बीचहिमे दियाद सभ झिंगुर बाबूकँ तेना ने घेरलकन्हि जे कलितक विवाह फन्नू बाबूक बचियासँ ठीक करैत आ भराममे सिद्धांत करेनहि ओ गाम पहुँचलाह । डरो होइन्हि जे कनियाँ ने कतहु रपटा दऽ देथि । मुदा विवाहक बात सुनितहि कनियाँ खुशीसँ बताहि जकाँ भऽ गेलीह । पछिला चारि दिनसँ जतेक गुनधुनी लागल रहन्हि सभटा खतम भऽ गेलन्हि। पाँव-पैदल किंवा कटही गाड़ी यैह छल यातायातक साधन । महफा सेहो सबारी छल सेहो बेश नक्काशीवला आ भरिगर । वर महफा पर आ बरियातीमे जे युवा रहथि से पएरे । आ जे कनेक उमरिगर रहथि से कटही गाड़ीपर विदा भेलाह । दरबज्जापर स्वागत भेलन्हि । सुगन्धि, फूल, जलपान । ई सभ बरियातीमे किछु गोटेकेँ अनसोहाँत लगलन्हि । बरियाती लोकनिक गप्प सरक्का चलैत रहल । शास्त्रार्थ आ चुटुक्का । अँगनामे परिछनि आ विधि-व्यवहार तँ दलान पर गप्पक फूहारि । बीच-बीचमे क्यो आबि कऽ किछु ताकथि-बाजथि आ फेर कतहु जाथि । गहना कतए छैक । घोघट के देथिन्ह । घोघटाही नूआ नहि भेटि रहल अछि । एहिसँ विवाहक क्रम आ प्रगतिक विषयमे बरियाती लोकनिकेँ सेहो पता चलैत रहैत छलन्हि। एवम् प्रकारे आँगन आ दरबज्जा दुनू ठाम विवाहक कार्यक्रम भोरक पाँच बजे धरि चलैत रहल । वर आ कनियाँक हाथमे ब्रह्मचारी डोरी बान्हि देल गेल, जे चारि दिन धरि रहत । तकर बाद विवाह पूर्ण भेल । विदाइक दिन तका कए झिंगुर बाबू पठेलखिन्ह आ कलित अपन गाम आबि गेलाह । आब हुनकर कटिहार जएबाक तैयारी कएल गेलन्हि । अश्रुपूरित नेत्रसँ माए आ ग्रामीणसँ विदा लेलाक बाद कलित अपन रोजगार पर गेलाह। कोशीक विभीषिकासँ त्रस्त क्षेत्र होइत कटिहार पहुँचि कऽ कलित अपन काजमे शीघ्रहि पारंगत भऽ गेलाह । काजक अधिकता भेलापर अपन पितियौत भाए आ भातिजकेँ सेहो बजा लेलन्हि। एहि क्षेत्रक लोकक बीचमे थोड़बेक दिनमे अपन प्रतिष्ठा बढ़ा लेलथि कलित । एतए जमीन्दारीक परमानेंट सेटलमेन्टक विषयमे पुरान अनुभव बड़ खराप छल । वसूली पदाधिकारीक भ्रष्ट तरीका सभकेँ कलित बदलि देलखिन्ह । मुदा कालक लग किछु आरे लिखल रहए । कलितक द्विरागमनक पहिनहि हुनकर माए गुजरि गेलखिन्ह । बड्ड रास सौख-मनोरथ लेने चलि गेलीह माए । कखनो कलितकेँ कहैत छलखिन्ह जे तोरा कनियाँसँ खूब झगड़ा करबौक तखन देखबौक जे तूँ हमर पक्ष लैत छँह आकि कनियाँक। आब झिंगुर बाबू सेहो अन्यमनस्क रहए लगलाह । कलित कहबो केलखिन्ह जे सँगहि चलू, मुदा भरि जन्म जतए रहलाह ओहि ठामकेँ छोड़थु कोना ? तेसर साल कलितक द्विरागमन भेलन्हि आ तकरा बादे झिंगुर बाबू निश्चिंत भऽ सकलाह । जाइत-जाइत कलितकेँ कहैत गेलखिन्ह जे तोँ तँ बेशीकाल गामसँ बाहरे रहलह । हमरा सबहक सेवा तँ ई बुचिया केलक । अपन बहिनक भार आब तोहीँ उठाबह । हम सोचने छलहुँ जे एकर विवाह दान करबाइए कऽ निश्चिंत हएब । मुदा तोहर माए हमरा तोड़ि देलन्हि । आब तूँ अपना जोगर भइए गेल छह । पाँच बरखक बेटा रहैत छैक तखनो लोक केँ लोक कहैत छैक जे अहाँ केँ कोन बातक चिंता अछि, पाँच बरखक बेटा अछि । तूँ तँ आब पढ़ि लिखि कऽ अपन जीवन यापन करैत छह । फेर पुतोहुकेँ बुचियाक हाथ पकड़ा कऽ एहि लोकसँ छुट्टी लेलन्हि झिँगुर बाबू । कलित हुनका एतेक हरबड़ीमे कहियो नहि देखने छलखिन्ह । स्थिर, शांतचित्त आ फलक चिंता केनिहार किसान सेहो अपन जीवन-संगीक संग छुटलाक बाद अधीर भऽ गेल छल । कलितकेँ कटिहार घुरलाक बादो एकेटा चिन्ता लागल रहैत छलन्हि । से छल बुचियाक विवाहक । पिताक रहैत ओ कोनो परेशानीसँ चिन्तित नहि होइत छलाह । मुदा हुनका गेलाक बाद आब लोकोकेँ देखेबाक छलन्हि जे क्यो ई नहि कहए जे बापक गेलाक बाद बहिन पर ध्यान नहि देलन्हि कलित । पिताक बरखी धरि विवाहक प्रश्न उठेबो कोना करितथि । मुदा समय बितबामे कतेक देरी लगैत छैक । पूरा गामक भोज कऽ कलित बुचियाक विवाहक लेल वर ताकएमे लागि गेलाह । परतापुरक सभागाछीमे गेलाह मुदा कोनो वर पसिन्न नहि पड़लन्हि जे बुचियाक हेतु सुयोग्य होअए । पन्द्रह दिनक छुट्टी बेकार गेलन्हि । पुनः कटिहार पहुँचि गेलाह । कार्यक क्रममे गिद्धौर, बाढ़ इत्यादि गंगाक दक्षिण दिसक परिवार सभसँ सेहो परिचय भेलन्हि । ओहिसँ हुनका बाढ़ नगरक लगक गामक एकटा लड़काक विषयमे पता चललन्हि जे गिद्धौर स्टेटमे कार्य कऽ रहल छलाह । चोट्टहि ओ लड़कासँ भेँट करबाक लेल गिद्धौर पहुँचि गेलाह । बालक अत्यंत दिव्य छलाह । पता लऽ बाढ़ पहुँचि कऽ बालकक पितासँ गप केलन्हि । पंचकोशीक कथा कतबा दिनक बाद बाढ़ नगरक लगक एहि क्षेत्रमे आएल छल से एहि कथाकेँ काटब कठिन रहए । सभटा गपशप कऽ पुनः भराममे सिद्धांत करेने मेंहथ पहुँचलाह । बूढ़- पुरान जे क्यो सुनलन्हि से आश्चर्यचकित रहि गेलाह । बढ़ए पूत पिताक धरमे- झिंगुर बाबू जेना कलितक सिद्धांत करेनहि पहुँचल छलाह तहिना कलित केलन्हि, वाह…। कथा ओनातँ दूरगर भेलन्हि, मुदा कलित स्वयम् नेनेसँ दूरदेशक बासी छलाह, ताहि द्वारे हुनका सभ चीजक अनुभव छलन्हि, यैह सोचि सभ संतोष कएलक । पूरा टोल विवाहक तैयारीमे लागि गेल । बुचियाकेँ कोनो दिक्कत नहि होएतैक । सर्वगुण संपन्न अछि बुचिया । गीत-नाद लिअ आकि सराय-कटोरा, दसो हजार महादेव सुगढ़ पातर-पातर छनहिमे बना दैत अछि । जाहि घरमे जएत तकरा चमका देत । विवाह विधि-विधानसँ संपन्न भऽ गेल । वरपक्ष संगहि द्विरागमनक प्रस्ताव राखलन्हि, मुदा कलित तैयार नहि भेलाह, तखन बुचियाक हाथक छाप लऽ कऽ वरपक्षकेँ जाए पड़लन्हि । कलितक पत्नी छलीह पूर्ण शुद्धा । बुचियासँ बहिनापा छलन्हि । बुचियो भौजी-भौजी कहैत नहि थकैत छलीह । तेसर साल द्विरागमनक दिन भेलैक । बुचियाक संग जे खबासनी गेल छलीह से आबि कऽ गंगा आ गंगा पारक दृश्यक वर्णन करए लगलीह तँ भाउजक आँखिसँ दहो-बहो नोर चुबए लगलन्हि । कलितसँ कतेक बेर पुछलथिन्ह जे ई बाढ़ छैक कतए । समयक संग सभ किछु सामान्य भऽ जाइत अछि । बुचिया जखन एक-दू बेर अएलथि-गेलथि तखन भाउज आरो निश्चिन्त भऽ गेलीह । एवम् क्रमे कलित पुनः एकाकी भऽ गेलाह । फेर आएल भूकम्प । सन् चौंतीसक भूकम्पमे महादेव पोखरिपर पत्नी आ दुहु पुत्री आ एकटा पुत्रक संग बिताओल रातिक बाद परिवार सहित किछु दिनुका लेल कटिहार गेलाह । कारण छल महिना भरि चलल छोट-छोट भूकंपक तरंग । मुदा पत्नीकेँ घरक पीड़ा सतबए लगलन्हि । घर तँ भूकम्पमे ढहि गेल छलन्हि, से कलित भूमिक ओहि टुकड़ाकेँ छोड़ि गामक फुलवारीक कातमे नव घरक निर्माण केलन्हि । अपन पुरान डीह अपन दियादकेँ दऽ एहि नबका डीहपर घरहट कएलन्हि । तकरा बाद एकटा पुत्र एवम् एकटा पुत्रीक प्राप्ति आओर भेलन्हि । पुनः एकटा पारिवारिक चक्रक प्रारंभ भऽ गेल । अपन बचिया सभ सेहो आब विवाह योग्य लागए लगलन्हि । अपन बच्चा तँ सदिखन बच्चे लगैत छैक मुदा तेँ की । पहिल बचियाक विवाह कछबी आ दोसरक खररख करेलखिन्ह । कछबीक परिवार सेहो राज-दरबारक कर्मचारी छलाह । घोड़ा, महफा, चास-बास….। मुदा बच्चा होएबाक क्रममे कलितक प्रथम पुत्रीक देहांत भऽ गेलन्हि मुदा ओकर ननकिरबी बचि गेल आ ओ मातृके मे रहए लागल । मुदा ओहो पाँचे वर्षक होएत आकि एक दिन पेटमे दर्दक शिकाइत भेलैक आ ओहो भगवानक घर माएक सेवामे चलि गेल । कलित जीवन आ मृत्युक एहि संग्रामकेँ देखैत रहलाह । कहियो गाममे हैजाक प्रकोप पड़ए लागल छल तँ कहियो प्लेग आ की की ? एक गोटाकेँ लोक जरा कऽ आबए तँ दोसर गोटाक मृत्युक समाचार भेटए । मुदा कलितक परिवार अक्षुण्ण रहलन्हि। कलितक कटिहारमे पदोन्नत्ति आ प्रतिष्ठा बढ़ैत रहलन्हि । भातिज सभ पूर्व रूपेण ओतए रहैत छलन्हि । दुहू पुत्र केजरीवाल हाई स्कूल, झंझारपुरमे पढ़ए लागल छलथिन्ह । कालक मंथर गतिमे कखनो काल गति आबि जाइत अछि । अपन तेसर पुत्रीक विवाह तमुरिया लग आमारूपी गाममे करबा कए कलित जेना निश्चिंत भऽ गेलाह । अपन पैघ पुत्रक विवाह करेलन्हि आ छोट पुत्रक अकादमिक प्रतिभाक प्रति निश्चिन्त भेलाह । मुदा छोट पुत्रक अंधविश्वासी होएबामे सेहो हुनका कोनो संदेह नहि छलन्हि । आ एकर कारण छल जे एक दिन हल्ला उठलैक, जे घनगर चन्ना-गाछीमे, जतए दिनोमे अन्हार रहैत छैक, कोनो गाछक नीचाँ चाटी उठैत छैक । तखन हुनकर ई पुत्र चाटी उठाबए ओतए पहुँचि गेल छलन्हि । से जखन आठम वर्गमे विज्ञान वा कला चुनबाक बेर अएलैक, तखन पुत्रक विज्ञान विषय लेबाक निर्णयमे हाँ मे हाँ मिला देलखिन्ह कलित बाबू । कतेक गोटे कहलखिन्ह जे सत्यनारायण बाबू आ के-के साइंस लऽ फैल कऽ गेलाह, बादमे पुनः आर्ट्स विषय लेबए पड़लन्हि । मुदा नन्द नहि मानलथि । साइंसोमे गणित लेलन्हि । कलित सोचलथि जे विज्ञान विषय पढ़ि अदृश्यक प्रति स्नेहमे नन्दक रुचि कम हेतन्हि । पता नहि किएक एकर बाद कलित निश्चिंत जकाँ भऽ गेलाह । कटिहारसँ एक बेर गाम आएले रहथि । भोरमे नित्यक्रियासँ निवृत्त भऽ कलित हाथ मटियाबए लेल चिकनी माटिक ढ़ेर दिशि बढ़ि रहल छलाह आकि पता नहि की भेलन्हि, हाथक लोटा दूर फेका गेलन्हि । ओ नीचाँ खसि पड़लाह । कनियाँ दौगल अएलीह । मुदा जीवनक खेल एक बेर भेटैछ आ एक्के बेर चलियो जाइछ । नन्द पिताक मृत्युक साक्षी छलाह । मृत्युक ई प्रकार हुनका लेल सर्वथा नवीन आ सर्वथा रहस्यमयी छल । अदृश्यक शक्ति विज्ञानक सर्वोच्चताकेँ नन्दक जीवनमे दबाबए लागल। वृत्तक गोलाकार आकृति केंद्रक परिधिमे घुमैत एकटा चक्र पूरा केलक । अदृश्य केंद्रक फाँसमे फँसल । नन्द अपन यशोदा माएक छत्रछायामे बढ़ए लगलाह, उमरियोमे आ पढ़ाइयोमे । अपन शिक्षक लोकनिक प्रिय पात्र भऽ गेलाह नन्द । हुनकर प्रैक्टिकलक कॉपीक साफ-सुथरा रूपक चर्चा सर्वत्र शिकक्षहु वर्गमे होमए लागल । फूल-सन अक्षर हुनकर शारीरिक सौन्दर्यसँ मेल खाइत छल । एहि बीच एकटा आर घटना घटित भेल । यशोदा माएक दुहु पुत्र भगवत्ती घरक सोझाँमे नीचाँमे सुतल छलाह । भोरमे माए देखलन्हि जे गहुमन साँप चारि टुकड़ा भेल पड़ल अछि आ बिज्जी बच्चा सभक माथ लग ठाढ़ पहरा दऽ रहल अछि । प्रायः बिज्जीक मारि पड़लैक गहुमनकेँ आ दुहु पुत्र सुरक्षित रहलन्हि यशोदा माएक । नन्द एहि घटनाक स्मृतिक संग आगू बढ़ए लगलाह । बीचमे बँटवारा भेल । घरारी सभ, निकहा खेत सभ सभटा दू-दू टुकड़ा होमए लागल । बाहरी लोक सभ कहैत छल जे दुनू भाएक संग अन्याय भऽ रहल अछि । स्कॉलरशिप प्राप्त कऽ नन्द आर.के.कॉलेज मधुबनीमे अंतर-स्नातक विज्ञानक गणित शाखामे नामांकन लेलन्हि। शुरूमे गणित बुझबामे दिक्कत भेलन्हि तँ रटए लगलाह । गणितकेँ रटबाक बुद्धि ई सोचिकेँ लगेलथि जे बादमे लोक ई नहि कहए, जे की सोचि कऽ विज्ञानक चयन कएलक । मुदा किछु दिनका बाद रटैत क्रममे बुझबामे सेहो आबए लगलन्हि। गामक फुटबॉल मैदानक स्मृतिए शेष रहलन्हि, खेलेबाक अवसरे नहि भेटन्हि । गणितक शिक्षक तीन सए प्रश्नक सेट परीक्षाक पहिने दैत छलखिन्ह आ कहैत छलखिन्ह जे, जे क्यो साठि प्रतिशत प्रश्नक सही-सही उत्तर बना लेताह ओ प्रथम श्रेणीमे निश्चित रूपसँ उत्तीर्ण होएताह । नन्द सत्तरि प्रतिशत प्रश्नक उत्तर तैयार कऽ शिक्षककेँ देखा देलखिन्ह । आशानुरूप बादमे परीक्षाक परिणाम अएलापर प्रथम श्रेणी भेटलन्हि । १९५९ मे इंजीनियरिंगमे नामांकनक हेतु आवेदन दऽ देलखिन्ह । अंकक आधार पर सर्वोच्च अंक अएला उत्तर मुजफ्फरपुर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलोजीमे नामांकन लऽ लेलथि । ओहि समय मात्र सिविल इंजीनियरिंग शाखाक पढ़ाई ओहि संस्थानमे होइत छलैक, से ओहि शाखामे नामांकन लऽ धोती-कुर्त्ता पहिरि कऽ ओतए पहुँचि गेलाह । प्रोफेसर दीक्षित साहेब वर्कशॉपक मशीन देखा कहलखिन्ह जे एहिमे धोती फँसि जएत । से फुलपैंट आ शर्ट पहिरि कऽ आऊ । दू टा फुलपैन्ट आ शर्ट कीनए पड़लन्हि नन्दकेँ । कपड़ा कीनि सिएबितथि तँ ढ़ेर दिन लागि जएतन्हि से रेडीमेड कीनए पड़लन्हि । मुदा गाम जाथि तँ गामसँ दूर बिदेसरे स्थानमे फुलपैन्ट-शर्ट बदलि कऽ धोती कुर्त्ता पहिरि लैत छलाह । कहियो गाम फुलपैंट पहिरि कऽ नहि गेल छलाह । सन् १९५९ सँ १९६३ धरि इंजीनियरिंगक पढ़ाइ चललन्हि आ तखन बिहार सरकारमे इंजीनियरिंग असिसटेंन्ट आ एक सालक बाद १९६४ सँ सहायक अभियन्ताक रूपमे बहाली भेलन्हि । इंजीनियरिंग पढ़ाइ विशेष खर्च बला छल से एहि शर्त्तनामाक संग विवाह भेलन्हि जे पढ़ाइक खर्चा ससुर उठेथिन्ह । मुदा गर्मी तातिलमे एक मास आ दुर्गापूजामे पंद्रह दिनक छुट्टी कॉलेजमे रहैत छलैक से एतेक दिनुका पाइ ससुर काटि लैत छलथिन्ह आ सालमे बारह मासक बदला मात्र साढ़े दस महिनाक खर्चा दैत रहथिन्ह । बादमे ज्योँ सासुरक लोक कहियो ई उपराग दैत छलन्हि जे हमही सभ इंजीनियरिंग करबेलहुँ अछि तँ नन्द सेहो हँसि कऽ उपर्युक्त बातक खुलासा कऽ दैत छलखिन्ह । वृत्तक परिधि जेना पैघ भेल जा रहल छल । कालक परिधि पहिने पूर्ण चक्र पूरा कएलक आ आब परिधिक विस्तार शुरु भऽ गेल । दुःख-सुख आ उत्थान-पतनक खिस्सा । स्वतंत्रता दिवसक दिनक उमंग, झंडा लऽ कऽ स्कूलक बच्चाक संग १५ अगस्त १९४७ केँ घुमैत छलाह । कांग्रेसक भक्ति संगमे रहलन्हि । मुदा १९६२ क चीनी आक्रमणक बाद भारतीय सेनाक पाछू हटबाक दुःस्वप्न । वायुसेनाक उपयोग नहि करबाक भारतक आश्चर्यजनक निर्णयक बादक मनःस्थिति छल पलायनक आ हारिक । ऑल इंडिया रेडियोक घोषणा जे हमर सेना गर्वसँ पाछू हटि रहल अछि - सुनि नन्दक हृदय रुकि सन जाइन्हि । से जखन १९६५ क युद्धक बेर इंजीनियरक भर्त्ती सेनामे कैप्टनक रूपमे शुरु भेल तखन नन्द आ साहा साहेब आवेदन दऽ देलखिन्ह । साहा साहेबक कनियाँ तँ कानए लगलीह आ साहा साहेबकेँ रुकि जाए पड़लन्हि । नन्दक पत्नी एको बेर प्रतिरोध नहि कएलन्हि । मुदा ओजनमे बेशी भेलासँ छँटा गेलाह नन्द । मसोसि कऽ रहि गेलाह । तकर बाद जे शरीर घटेबाक सूर चढ़लन्हि, से बढ़िते गेलन्हि । एकेटा सपना छलन्हि - गाममे कोठाक घर । से सभटा सर्वे सभक नक्शा ऊपर कऽ घरक कुर्सी देलन्हि जे सड़कमे घरक कोनो भाग नहि जाए । मकानक डिजाइनक मात्र आधे भाग पूरा भऽ सकलन्हि । जतए-जतए ट्रांसफर होइन्हि एकटा नव अनुभव भेटन्हि । ओहि समय कनियाँकेँ तृतीय पुरुषक रूपमे संबोधित करबाक प्रचलन छलैक, मुदा नन्द द्वितीय पुरुषमे संबोधन शुरु केलन्हि । एकर आलोचना होएबाक बदला गाममे आनो लोक सभ ई संबोधन अपना घरमे शुरु करैत जाइत गेलाह । स्थानान्तरणक क्रममे डेहरी-ऑन-सोनमे विकास कार्यमे ग्रामीण आदिवासीक पूर्ण सहयोग भेटलन्हि । कहियो पाइ देखि कऽ अंतरात्मा नहि डिगलन्हि । जी-जानसँ जीप उठा कऽ अपन कार्यकेँ पूर्ण करथि । कखनो जीप तेज होइन्हि तँ मोन पड़न्हि जे कोनो बच्चा ने पिचा जाए । मुदा कहियो कोनो दुर्घटना नहि भेलन्हि । गामक सभ जातिक लोककेँ कतहु ने कतहु मस्टरे रॉल पर नोकरी देलन्हि । स्थानीय लोककेँ सेहो नोकरी करबाक हेतु प्रोत्साहित करैत छलाह । स्थानीय गरीब आदिवासी नन्दकेँ देवता बुझैत छलाह । एतहि दमाक पहिल बेर अटैक भेलन्हि नन्द पर । स्थानीय वैद्य दिन-राति एक कऽ जंगलसँ बीट आनि कऽ देलकन्हि । दमाक इलाज एलोपैथीमे नहि अछि मुदा एहि बूटीक एकमात्र खोराकी सँ अगिला कतेक साल धरि नन्द दमासँ दूर रहलाह । सँगी सभ भोलेनाथ नाम राखि देलथिन्ह । कतेक कमाइ-धमाइक तरीका सभ सिखेबाक प्रयास सेहो केलखिन्ह । मुदा ग्रामीण जनक लाचारीकेँ ततेक लगसँ देखने छलाह नन्द जे एहि सभ गप दिस ध्यानो नहि जाइत छलन्हि । ताहुमे गरीबीक बादो जे आपकता स्थानीय जनसँ भेटैत छलन्हि, तकरा बाद ? एहि बीच एक पुत्रीक प्राप्ति सेहो भेलन्हि । दोसर बेर पुत्रक प्राप्ति भेलन्हि । पुत्री मामा गाममे जन्म लेलथिन्ह आ पुत्र अपन गाममे । बच्चा सभक स्थितप्रज्ञ भाव, फेर हँसब फेर ठेहुनिया...... बच्चाक बढ़बाक प्रक्रियाक दर्शन ओहिना अछि जेना विश्वक निर्माण ओ ओकर चेतनाक विकास । हुनकर एकटा भातिजक देहांत नेनेमे भऽ गेल रहन्हि आ तकर बाद एहि दुनू बच्चाक प्रति स्थितप्रज्ञताक भाव, सुखमे सुखी नहि आ दु:खमे दुखी नहि क अवतरण भेल नन्दमे । नन्द दिल्ली कोनो ट्रेनिंगमे गेल छलाह । एक राति सपना देखलन्हि जे हुनकर भातिज नवीन गाममे फूसक घरक ओसारा पर बैसल छथि । ओ नेना जकरासँ नन्दकेँ बड्ड आपकता छलन्हि, उठि कए खेलाइ लेल जाइत अछि । कनेक कालक बाद पेटमे दर्दक शिकाइत करैत अछि । सभ क्यो जमा भऽ जाइत छथि । बूढ़-पुरान अपन-अपन नुस्खा देबए लगैत छथि । मुदा कनिए कालक बाद बच्चाक मृत्यु भऽ जाइत अछि । नन्दक आँखि खुजि गेलन्हि । हुनका अपन बड़की बहिनक बचिया मोन पड़लन्हि । एहने घटना छल ओहो । बचियाकेँ क्यो बूढ़ी पेट पर हाथ दऽ देने छल आ ओ कनेक कालक बाद संयोगवश पेट दर्दसँ काल कवलित भऽ गेल छलीह । नन्दकेँ अदृश्य, भूत-प्रेत, राकश आ डाइन जोगिन एहि सभपर असीम विश्वास छलन्हि । ई सभ सोचिते ओ जोर-जोरसँ कानए लगलाह । संगी सभ हड़बड़ा कऽ उठैत जाइत गेलाह । जखन सभ समाचार ज्ञात होइत गेलन्हि तँ किछु गोटे कहलखिन्ह जे भातिजक अउरदा बढ़ि गेल । नन्दक मुँह लटकल देखि कऽ क्यो-क्यो हुनक अभियंताक वैज्ञानिक दृष्टिकोणकेँ मोन पाड़ए कहलखिन्ह । मुदा नन्दकेँ बोल-भरोस क्यो नहि दऽ सकलाह । नन्द ट्रेनिंग छोड़ि कऽ सपनेक गपपर गाम बिदा भऽ गेलाह । तेसर दिन गाम पहुँचलाह तँ भैयाकेँ केश कटेने देखि कऽ सशंकित भऽ गेलाह । गामक सीमांतेसँ जे क्यो भेटन्हि से कनेक दु:खी स्वरमे गप करन्हि । आँगन पहुँचलाह तँ माय जोर-जोरसँ कानए लगलीह । सपनाक सभटा गप सत्य बुझेलन्हि, अक्षरशः सत्य । भातिज हुनका केश कटाबए लेल सही समय पर बजा लेलखिन्ह । नवीनक फोटोक पाछाँमे अंग्रेजीमे ओकर जन्मक आ मृत्युक तिथिक संग ओकर तोतरायल बोलीमे काका-कका कहबाक बात फाउंटेन पेनक सियाहीसँ नन्द लिखलन्हि । कोठाक घर बनबाक पहिनहि ओ चल गेलाह, गेलाक बादो मुदा स्वप्नमे काकाकेँ नहकेशक दिन बजा कए । पुत्रीक जन्मक बाद कोठाक घरो बननाए शुरु भऽ गेलन्हि । पुत्री जखन पैघ भेलन्हि तँ मोन पाड़बाक क्रममे कहैत छलीह जे घरक कुर्सी पड़बाक लेल जे खधाइ खुनल गेल छल से बड्ड गँहीर छल । मुदा पिता मोन पाड़थिन्ह जे काका अहाँकेँ हाथसँ पकड़ि कऽ खधाइमे पात सभ साफ करबाक लेल नीचाँ कऽ दैत छलाह, तखन खधाइ बहुत गँहीर कोना भेल । पुत्री बा केर कोरामे एकर समाधानक हेतु पहुँचि जाइत छलीह जे खधाइ तँ बहुत गँहीर बुझाइत छल, तखन ईहो बात सही जे काका हाथेसँ खधाइमे उतारि दैत छलाह । नन्दक माए बच्चा सभक बा भऽ गेलीह । नन्दक पुत्रकेँ बा नन्दक नन्द कहैत छलीह । कखनो गोपाल तँ कखनो राजकुमार कहैत छलीह, ओकर हँसी, औँठिया कारी घनगर केश । बा क कोठाक घर बनि गेलन्हि तँ पेटक दर्द शुरु भेलन्हि । मुदा नन्द एहि बेर अपन घरक पेटक दर्दक दू टा मृत्युकेँ अदृश्यक निर्देशपर होइत देखलाक उत्तर माएकेँ इलाजक हेतु कैक ठाम, एलोपैथिक डाक्टरक लग पैघ-पैघ नगरमे, लऽ गेलाह । डायगनोस भेलन्हि कैंसर नामक दु:खदायी रोग । एहि बीमारीक इलाज रोगोसँ बेशी दुःखदायी छल । रेडियमसँ ट्यूमरकेँ जरेनाइ । बा टूटि गेलीह । पटनेमे मृत्यु भऽ गेलन्हि । ओतहि दाह संस्कार गंगा-तट पर भेलन्हि कारण ओतए मान्यता छल जे गंगा तटपर गाएक बोली जतेक दूर धरि सुनाइ पड़ैत अछि ततेक दूर मगहक क्षेत्र नहि मानल जाइत अछि । तदंतर श्राद्ध कर्म गाममे भेल । बा चलि गेलीह, नन्दक द्वितीय पुत्रक जन्मक पहिनहि । मुदा बा क चरचा घरमे होइते रहल । बा केर फोटो बा केर नाति सभक प्रेरणा श्रोत बनल रहल । जे सपेताक गाछ बा केर श्राद्धमे उसरगल गेल छल तकर आम हुनकर नाति-नातिन नहि खाइत छलन्हि । जे आम खसैत छल से बाबाक सारा पर राखि देल जाइत छल । गोदान आ वैतरणी पार करेबाक विधिमे जे गाएकेँ दागल गेलैक तकरा देखि बा केर दुहु पुत्र प्रण लेलन्हि जे आब ई काज भविष्यमे कहियो नहि कएल जएत । अपन धैर्यसँ मृत्युसँ पहिने बा अपन परिवारकेँ पुनः अपन पूर्व प्रतिष्ठा आ सरस्वतीक भक्तक रूपमे प्रतिष्ठित करबामे सक्षम भेलीह । मृत्युसँ पहिने बुचिया सेहो बाढ़सँ अपन भौजीकेँ भेंट करए लेल पटना अएलीह । दुनू ननदि आ भौजी पुरान-पुरान गपशपमे अपना- अपनाकेँ बिसरबैत गेलीह । भौजी भऽ गेल छलीह बच्चा सभक बा आ ननदि भऽ गेल छलीह बच्चा सभक बुढ़िया दीदी । बुढिया दीदीक खिस्सा बच्चा सभक मध्य बड्ड लोकप्रिय भऽ गेल छल । बृहत्कथाक खिस्सा सन नमगर-कैक रातिमे खतम होअएबला । खिस्सा सुनबाक क्रममे एक बच्चा सुति जाइत छल, फेर ओहिसँ पैघ बच्चा सुतैत रहए आ सभसँ पाछाँ सभसँ पैघ बच्चा सुतैत छल । अगिला राति मारि शुरु, सभसँ पैघ बच्चा कहन्हि जे जतए सँ खतम केलहुँ ततए सँ शुरु करू । ई सभ पहिने सुति गेलथि तँ ई सभ अपन बुझथु । मुदा बुढ़ियो दीदी कम नहि छलीह । अपन खिस्सा कनेक आओर आगूसँ शुरू करैत छलीह । जखन सभसँ पैघ बच्चा कहए जे एकर पहिनेक खिस्सा हम कहाँ सुनलहुँ, तँ बुढ़िया दीदी कहथिन्ह जे हम बताहि जकाँ खिस्सा कहिते रहि गेलहुँ आ अहूँ सुति गेल छलहुँ । तखन हम खिस्सा कहब बन्द कए देलहुँ । तखन निर्णय भेल जे जतएसँ सभसँ छोट बच्चा चाहैत अछि, ततहिसँ खिस्सा शुरु कएल जाए । बड़का कोला बला खेतमे नन्द बोरिंग गरबेलन्हि जाहिसँ पानिक लेल ललाएल ई बाध सिंचित भऽ जाए । मुदा कतेको दिनुका जोन मजदूर- मिस्त्री-कारीगर सभक परिश्रमक बाद ई पता लागल जे नीचाँमे पानिक अभाव रहए । लेएर नहि भेटबाक कारणसँ पाइप खेतेमे लागल रहल आ सुखाएल बिन पानिक ओतहि गाड़ल रहल । बच्चा सभक लेल ई खेत बोरिंग बला खेतक नामसँ प्रसिद्ध भेल । बादमे ओहि गाममे सरकारी बोरिंग गाममे लगबाक घोषना भेल । मुदा नन्दक भैयाकेँ पता लगलन्हि जे ई बोरिंग ओहि पानि विहीन बाधमे नहि गड़ाएत वरन् ओहि बाधमे गड़ाएत जाहिमे बारहोमास पानि लागल रहैत अछि । ओ किछु गोटेकेँ लऽ कऽ पटना पहुँचि मुख्यमंत्रीकेँ आवेदन देलन्हि । तखन जा कऽ ओहि सुखाएल बाधक जीर्णोद्धार भेल । सात हाथक उज्जर अंग्रेज इंजीनियर कोन-कोन मशीन लऽ कऽ आएल आ दुइये दिनमे बोरिंग गारि कऽ चलि गेल । मुदा बादमे क्यो कहलन्हि जे ओ अमेरिकन छल आ कारण सेहो देलन्हि जे सभटा उज्जर लोक अंग्रेज होअए से जरूरी नहि । फेर कमला बलानक दुनु कात छहरक निर्माण भेल । किछु दिन धरि ठीक रहल मुदा किछु दिनुका बाद स्थिति ई भेल जे दुनु छहरक बीचमे बालु भरैत गेल आ जतेक छहरकेँ ऊँच करू ततेक कम । झंझारपुर पुलक नीचाँ धरि बालु भरि गेल । कनियो पानि आबए तँ पानि खतराक चेन्हसँ पार भऽ जाइत रहए आ फाटकसँ बाहा बाटे पानि पोखरि-खेतकेँ डुमा दैत छल । जे खेत बहुत ऊँच आ दू पाइ मोलक छल से नीक भऽ गेल आ निकहा खेतमे खेती बन्द भऽ गेल । दुनू छहरक बीचक बलुआही जमीनमे तीन-तीन बेर रोपनी करए पड़ैत छल । लोककेँ आब परोर आ अल्हुआक खेती एहि बलुआही जमीनमे शुरू करए पड़ल । डकही पोखरिक चारू कातक बढ़मोतरमे छिटुआ धानक खेती करए पड़ल कारण रोपनी उपजक हिसाबसँ महग भऽ गेल । पूर्णाहा बाध पानिसँ भरल रहैत छल । कोठिया-मेहथक बीचमे एकटा भोरहा छल-गँहीर पट्टी- प्रायः कोशीक कोनो पुरनका छिटकल धार । मुदा अखुनका कोशीक भौगोलिक दूरीक कारण एहि पर संदेह कएनिहारक संख्या सेहो बेश । एहि भोरहा कातमे मेहथक आ कोठियाक बीच भेल पुरान संघर्षक खिस्सा….पछिमा-भुमिहार टोलक एकटा आन्हर बूढ़क करतब । बूढ़केँ सभ बान्हि कऽ रखलकन्हि जे ओ मारि करए नहि पहुँचि जाथि । मुदा केबाड़ी तोड़ि आ बड़का बाँसमे फरसा-भाला लगा कऽ ओ पहुँचि गेलाह लड़बाक लेल । सवा मोन चूड़ी कोठियामे फूटल ओहि मारिमे । आ मारि कोन गप पर..सूगरक सीराक लेल ।……एकटा आर कथा - बूढ़ा काकाक झठहाक कथा, सभटा बानर सभ डरक लेल कलम-गाछी छोड़ि पड़ा गेल छल । आइ काल्हिक छौरा सभकेँ देखियौक, झठहा कियो मारि कऽ देखाबय जे जोमक फुनगीकेँ छूबि लए । सभटा अखराहा लोक सभ जोति लेलक, तखन शरीर कोना बनैत जएतन्हि । नन्दक डेरा पर बुढ़िया दीदी एक बेर बाढ़सँ अपन बेटाकेँ लऽ कऽ अएलीह, बेटाक नोकरीक लेल । बाढ़क लाइ केर स्वाद बच्चा सभ बुढ़िया दीदीक पटना आकि गाम अएले पर चिखैत जाइत छल । जमीन्दारी प्रथाक समाप्तिक बाद नौकरीक चलती भऽ गेल छल आ दिक्कत सेहो । ताहिमे सरकारी नोकरीक । जयराम नौआ तखन ने कहैत छथि जे नन्द सभ जातिकेँ सरकारी नोकरी देलखिन्ह मुदा नौआ-ठाकुर टा बचि गेल । से नन्द नहि तँ हुनकर बेटेसँ अपन बेटाक लेल नोकरी माँगताह । सभकेँ नोकरी भेटलैक मुदा बुढ़िया दीदीक बेटाकेँ नोकरी नहि भेटलन्हि । किछु समय-साल सेहो बदलल, नहि तँ पहिने तँ लोक नोकरी करैयो नहि चाहैत छल । पुबाइ टोलक गुलाब झा कहैत छलाह जे नोकरीक माने भेल नहि करी आ करी तँ की पाबी-वेतन माने बिना तन आ तनखा माने तनकेँ खा । बुढ़िया दीदीक आनल बाढ़क लाइ आ कतेक राति धरि चलए बला खिस्सा । गाम घरमे कखनो काल शुरु भऽ गेल आन आन प्रकारांतरक खिस्सा, इनार, पोखरि,करीन,बाहा,खत्ता,गाछी-पोखरिक बीच आ एहि सभक लेल होबएबला छोट-मोट झगरा-झाँटी आकि रमण-चमनक मध्य नन्दक नन्द सभ बढ़ए लगलाह । नन्द अपन बच्चा सभकेँ गामसँ दूर नहि कएलन्हि। गर्मी तातिल, होली आ दुर्गापूजा, तीन बेर कमसँ कम साल भरिमे समस्त परिवार जएबेटा करैत छल । बच्चा सभ आम खएबाक हेतु दीदीक गाम जाइत छल । पएरे-पएर दूर-दूर धरि, कहियो कमलाक रेतक बीच तँ कहियो आमक गाछीक मध्य चलैत चलबाक अनुभवे किछु भिन्न छल । आमक मासमे आमक कलममे रात्रिक माछ-भातक बनभोज, खुरचनसँ आमक खोइचा हटएबाक अनुभव, ती-ती, ‘जकरे नाम लाल छड़ी’ आ सतघरिया खेलेबाक अनुभव, संठीमे आगि लगा कए धुँआ निकालबाक अनुभव आकि काँच आममे चून लगाकए खएबाक उपरांत ओकर मीठ भऽ जएबाक अनुभव, ई सभ अनुभव आइ काल्हिक बच्चाकेँ कोना भेटतैक यावत ओकरा सभकेँ गाम एनाइ जेनाइ नहि कराएब । नन्द तँ एकबेर अपन जमायकेँ कहनहियो रहथि जे आगाँक सात जन्म शहर दिशि घुरि कय नहि आएब । सन् १९७५ क पटनाक बाढ़िक समय नन्द गंगाक उत्तर गंगा पुल परियोजनामे आबि गेल छलाह। नन्द दुइ पुत्र आ एक पुत्रीक संग अपन परिवार चला रहल छलाह । तीनू बच्चा स्कूलमे पढ़ाइ-लिखाइ करैत जाइत छलाह । तखन ककरा बुझल छलैक जे ई बरख नन्द आ हुनकर बच्चा सभक जीवनक एकटा विभाजन रेखा बनत आ जीवनक धारकेँ बदलि देत। आरुणिक वृत्तांतक सारांश यैह अछि जे हुनक जन्मक समय हुनकर पिताकेँ क्यो कहि देलकन्हि जे बचिया भेल अछि । दू-तीन दिन धरि हुनका दिमागमे छलन्हि जे बेटिये भेल अछि । छठिहारिक एक दिन पहिने हुनका पता चललन्हि जे बेटा भेल छन्हि । एहि अनिश्चितताक उपरांत यैह सिद्ध भेल जे यावत सत्यक जे रूप बूझल अछि सैह तावत धरि सत्य रहत । सत्यक विभिन्न रूप, जे असत्य तँ नहि अछि, तकरे प्रतिकीर्तिक रूपमे आरुणिक व्यक्तित्वक प्रादुर्भाव भेलैक। जन्मेसँ एहि आभाषित सत्यक विभिन्न रूपक साक्षी रहलाह आरुणि । आरुणिक जन्मक पहिनहि बा केर देहांत भऽ गेलन्हि। बादो मे जखन-जखन बा केर चर्चा अबैत छल, आरुणि ध्यानसँ सुनैत छलाह आ अपन जिज्ञासा बढबैत छलाह। एवम क्रमे बा हुनकर जीवनक अंग भऽ गेलीह । बा हुनकर जन्मक पहिनहि सँ शरीररूपे नहि छलीह, मुदा हुनकर अवस्थिति एहि घरमे सदिखन छलन्हि । आरुणिक कथा आ नन्दक कथाक बीचक तारतम्य पहिने तँ नहि बुझि पड़ि रहल छल । मुदा प्रकृतिक संगहि आरुणि सेहो अपन प्रतिभा देखाबए लगलाह । मनुष्यक प्रवृत्तिये होइछ समानता आ तुलना करबाक, साम्य आ वैषम्यक समालोचना आ विवेचनमे कतेक गोटे अपन जिनगी बिता दैत छथि । आरुणि आ नन्दक बीच सेहो अनायासहि साम्य देखल जा सकैत अछि । दुहु गोटेक ऊपरी प्रतिभा आ तथाकथित वैचारिक मतभेदक रहितहु जे मूल व्यक्तित्वक साम्य होइत छैक, से दुनू गोटेमे वर्त्तमान अछि । एहन सन बुझना जाइत छल । मध्य वर्गक बच्चाक लालन-पालन आ पोषण जाहि आशा ओ आकांक्षासँ होइत अछि, तकर अपवाद आरुणि नहि छलाह । जेना सभ माता-पिता अपन नेनाक छोटो छोट बातमे प्रतिभाक छाप देखैत छथि तहिना आरुणिक माता-पिता विशेष कए पिता नन्द, आरुणिक व्यक्तित्वमे विशेष प्रतिभा देखए लगलाह । आरुणि केँ खूब स्वप्नसभ अबैत छलन्हि । तहिना दाँत सेहो सूतलमे कटकटाइत छलन्हि । सपनामे नीक आ अधलाह दुनू प्रकारक तत्व रहैत छलन्हि मुदा डराओन तत्व विशेष रहैत छलन्हि । बहुत दिन धरि आरुणि एहि प्रयासमे रहथि जे कोना कए सपना आकि दुःस्वप्न अएनाइ बन्द भए जएत । बीच रातिमे ओ घामे-पसीने भए जाइत रहथि आ जखन निन्न खुजनि तऽ देखथि जे माता-पिता पंखा होँकि रहल छथिन्ह । सभसँ पहिने ककर जन्म भेल आ तकर पहिने ककर, आ सभकेँ भगवान बनओलन्हि तँ भगवानकेँ के बनोलकन्हि । ई सभ सोचि-सोचि कए आरुणि चिंतित भए जाइत छलाह। रातिमे स्वप्नमे हुनका होइत छलन्हि जे इनाररूपी प्रकृतिमे ओ गामक छातपर घूमि रहल छथि । फेर ओ छतक कातमे जाए लगैत छथि । फेर जेना पोखरिक कछेर अछि, तहिना छतक काते कात बिन इच्छेक जाइत रहैत छथि, फेर चाहैत छथि, जे कातसँ हटि कए बीच छतपर आबि जाइ । किंतु इनार रूपी प्रकृतिक गुरुत्वमे ओ खिचाइत चलि जाइत छथि । आ खसि जाइत छथि । अनायासहि निन्न खुजैत छन्हि तँ खुशी आ दुःख दुनू प्रकारक भावना मोनमे अबैत छन्हि । खुशी एहि बातक जे स्वप्ने छल ई, यथार्थ नहि । दुःख एहि बातक जे फेर ने कतहु एहि प्रकारक दुःस्वप्न फेर आबए । पितासँ पूछथि जे अहाँ सेहो एहन सपना सुनैत छी, नहि नहि देखैत छी तँ ओ कहथि जे नहि आब नहि। हँ जखन ओ बच्चा रहथि तँ सपना देखथि, बड़का झोटाबला सहस्रबाढ़निक । आगि बोकरैत तमसाएल, जेना पृथ्वीकेँ गीरि लेत । सपना तँ सपने छी जे अहाँ सोचब से रातिमे अएत। नहि जानि के बूढ़-पुरान सहस्रबाढ़निक खिस्सा हमरा सुना देलन्हि। की सभ कहि देलन्हि जे सहस्रबाढ़निक आगमन अनिष्टक संकेत अछि जे ई जाहि बरख आएल ताहि बरखसँ कैक साल धरि बीमारी अकाल पड़िते रहल। यैह सभ हमर सपनामे अबैत छल। मुदा से बच्चामे आब तँ निन्ने कम अबैत अछि तँ सपना कतएसँ अएत। आ आरुणि सोचथि जे कतेक नीक होइत जे हुनको निन्न कम्म अबितन्हि। एहि बीच आरुणि कखन निन्न अबैत अछि आ कखन स्वप्न एहि सभ पर जेना शोध करए लगलाह। फेर अगिला दिन मोन पाड़थि, जे नौ बजे धरि जागल छलहुँ, दसो बजे यावत जागले छलहुँ, तखन कखन सुतलहुँ । फेर किछुए दिनमे ओ अपना मोनके बहटारि लेलन्हि, जे ज्योँ हुनका ई मोन पड़ि जाइन्हि जे निन्न कखन आएल तखन तँ ओ जागले रहि जएताह । हुनकर नाम कतेक बेर बदलल गेल । पुरातन ग्रंथ सभक अध्ययन नंद एहि हेतु कएलन्हि । फेर हुनक पढ़ाइ-लिखाइक कार्य शुरु भेलन्हि। श्री गणेशजीक अंकुश छह ढ़ंगसँ लिखनाइ सिखाओल गेलन्हि आरुणिकेँ आ एहि आकृतिक संग गौरीशंकरक अभ्यर्थना-सिद्धिरस्तु। साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादांतस्य धूर्जटेः जाह्णवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला ॥ पशुपतिः पतिः कहि आरुणि खूब हँसथि । एहिसँ हुनकर तोतरेनाइ सेहो समाप्त भए गेलन्हि । एक सँ सए धरिक पाठमे आरुणिकेँ पशुपतिःपतिः बला तारतम्य मोन पड़ैत छलन्हि । दस सँ उन्नैस आ फेर बीस सँ उनतीस । नन्दक छोट पुत्र आरुणि शुरुअहिसँ नन्दक आशा आ आकांक्षाक प्रतीक बनए लागल छलाह । एकर किछु कारण सेहो छलैक । एकसँ सए धरि लिखब नन्द हुनका सिखा रहल छलाह । नन्द हुनका एकसँ दस धरि लिखनाइ आ बजनाइ सिखेलखिन्ह आ एगारहसँ आगाँ सेहो सिखाबए लागलखिन्ह । पुनः ई सोचि कए जे बालक पर एतेक बोझ लदनाइ ठीक नहि अछि ओ रुकि गेलाह । परंतु बालककेँ एगारहसँ बीस, फेर एक्कैससँ तीस जएबा धरि एहि बातक पता भऽ गेलन्हि जे ई तँ एक सँ दस तकक पुनरावृत्ति मात्र छैक । ओ एकर औचित्यक अपन पितासँ चर्चा केलन्हि तँ पिता हुनका एकसँ सए धरि लिखबाक चुनौती दऽ देलखिन्ह । बालक से लिखि कए जखन देखा देलखिन्ह तकरा बाद प्रत्येक शब्दकेँ कोन नाम देल जाए तकर समस्या आएल । नन्द एगारह, एक्कैस, उन्नासी आ नबासीक विशेष रूपसँ चर्चा केलन्हि । माँ जखन आधा घंटाक प्रगतिक समीक्षाक हेतु अएलीह तखन हुनका पता लगलन्हि जे पाठ्यक्रम तँ पिता-पुत्रक बीच पूर्ण भऽ चुकल अछि । पिता गदगद भए गेलाह आ माँ एहि घटनाक चर्चा बहुत कम गोटेसँ केलन्हि जे कतहु ककरो नजरि नहि लागि जाए । एहने-एहन ढेर रास उदाहरण पिताक हृदयमे पुत्रक कोनो गलती नहि केनिहारक छवि अंकित करबामे सक्षम भऽ गेल। आरुणिकेँ अप्पन पुरना बात सभकेँ मोन रखबाक धुनि जेकाँ छलन्हि । कोन ईस्वी मे की भेल, कोन ईस्वी सँ की-की भेल से कोना यादि होएत । हम बच्चामे की सभ कएलहुँ –अप्पन पिता-माता आकि आनो बूढ़-पुरान सभक जीवनक घटनाक्रमक सभ गप बुझबाक लालसा हुनकामे छलन्हि। कखनोकालकेँ हुनका एहि गपक छगुंता होइत रहन्हि जे बिना हुनकर देखनो, एहि विश्वमे सभ गोटे सभ काज कोना कए रहल अछि । माने ई जे जखन आरुणि सुतल छथि तखनो विश्व चलि कोना रहल अछि । हुनका बच्चाक दुइ-चारिटा घटना मात्र मोन रहन्हि । जेना कि सिनेमा हॉलमे बॉबी सिनेमाक स्मरण, स्टुडियोमे माता-पिताक संग मुंडनक पहिने केशबला फोटो खिचेबाक स्मृति । फेर कोनो गप पर माँ द्वारा ध्यान नहि देलाक उपरांत भरि घरक चाभीक झाबाकेँ सोँझाक डबरामे फेंकि देबाक स्मृति । गाममे कोनो काज-उद्यमक भीड़क दृश्य । फेर आरुणि एहि सभपर सोचलाक बाद यैह निष्कर्ष निकाललन्हि जे १९७६ ई.सँ हुनका सभ किछु मोन छन्हि, कारण तखन ओ ५-६ बरखक होएताह आ एहि वर्षसँ माँ हुनका अखबार पढ़बाक हिस्सक धरा देने छलखिन्ह । बहुत दिनुका बाद एक दिन नन्दकेँ आरुणिक डायरी हाथ लागि गेलन्हि जाहिमे आरुणि अपन स्मृतिक घटनाक्रमक इतिहासकार जेकाँ वर्णन देने रहथि। हम, आरुणि, सन् १९७६ ई.केँ अपन जीवनक विभाजन रेखा मानैत छी । कारण एहिसँ पहिने हमरा अपन जीवनक घटनाक्रम किछु टूटल कड़ीक रूपमे बिना तारतम्यक बुझना जाइत अछि । कखनोकेँ हमरा ईहो होइत अछि जे एहि मे सँ किछु पूर्व जन्मक कोनो घटनाक्रम तँ नहि अछि ? सन् १९७६ ई.। हम गंगाब्रिज प्रोजेक्टक गंगाक उतरबारी कातमे हाजीपुरमे बनाएल कॉलोनीमे अपन माता-पिता आ पैघ भाए-बहिनक संग रहि रहल छी । पिताजी व्यवसायसँ सरकारी अभियंता छथि मुदा होम्योपैथिक चिकित्सामे सेहो एम.डी.(गोल्ड मेडेलिस्ट) छथि आ हुनकर ई एक तरह सँ हॉबी छन्हि । भरि कॉलोनीक लोक चंदा एकत्र कए होम्योपैथिक दबाइ कानपुरसँ मँगबैत छथि । बाबूजीक संग एकाध गोटे कानपुर जा कए दवाइ सभ लेने अबैत छथि । हमरा सभक सरकारी क्वार्टरक ड्रॉइंग रूममे एकटा अलमीरा, दू टा कुर्सी आ एकटा टेबुल चिकित्सकीय कार्यक हेतु समर्पित अछि । हमर एकटा छोटका टेबुल सेहो एहि रूममे रहैत अछि, जाहिमे तीस पाइक आर्यावर्त्त अखबार हम अप्पन माँकेँ पढ़ि कए सुनबैत छियन्हि । जतए धरि हमरा मोन अछि, एहि कॉलोनीक दूटा भाग छल । चारू दिशि चहरदिवारी छल, एहि कॉलोनीक बीचमे सेहो एकटा दिबारि छल जे एहि कॉलोनीकेँ ‘रहएबला’ आ ‘गोदामबला’ एहि दू हीसमे बँटैत छल । गोदामबला इलाकामे मारि रास लोहाक छड़, जोखय बला मशीन आ ट्रक सभक संग एकटा कदम्बक गाछक स्मृति हमरा अछि । जोखय बला एकटा मशीन ततेक पैघ छल जाहि पर हम जखन ठाढ़ होइत छलहुँ तँ ओकर काँटा हिलबो धरि नहि करैत छल । हमरा बताओल गेल छल जे एहि पर भरिगर चीज सभ मात्र जोखल जा सकैत अछि । पन्द्रह-सत्रह किलोक पाँच सात बर्षक बच्चाक भार एकरा हेतु नोँसिक समान अछि । एहि गङ्गा-ब्रिज कॉलोनीक रहएबला क्षेत्रमे एकटा पैघ आ एकटा छोट मैदान छल । दुनूक बीच एकटा पैघ पानिक टंकी आ पम्प हाउस छल । पम्प हाउसमे पानि जाहि बाटे अबैत छलैक से बेस मोटगर पाइप छलैक आ हमरा अखनो मोन अछि जे ओ ओहिना खुजल रहैत छलैक । हम ओहिमे आँखि दए कऽ तकनहियो रही मुदा दोसर बेर डरसँ पाछू हँटि गेलहुँ, जे कतहु खसि पड़लहुँ तखन की होएत । ओ पाइप एकटा बोरासँ झाँपल रहैत छल । पैघ क्रीडांगणक उतरबारी कातमे एकटा कोटाबला दोकान रहैक । ओहिसँ पछबारी कातमे एकटा हनुमानजीक मूर्त्ति आ मंदिर बनि रहल छल जे बहुत पहिनहि बनि गेल रहैत मुदा कारीगर हनुमानजीक नाक ठीकसँ नहि लगा पाबि रहल छल । हनुमानजीक नाक चाहे तँ सामग्रीक समुचित मत्राक अनुपात नहि रहलाक कारण वा ककरो बदमाशीक कारण टूटि जाइत रहए किंतु किछु दिनुका बाद हनुमानजीक मूर्त्ति बनि कए तैयार भऽ गेल रहए । मंगल दिनकेँ आरती होमए लागल छल, पूरा कॉलोनी जेना भक्ति-भावसँ भरि उठल रहए । किछु दिनुका बाद सभक उत्साहमे कनेक कमी आबए लागल, जेना आन संस्थाक संग होइत अछि, प्रारम्भिक उत्साह क्रमशः कम होइत गेल आ मंदिरक संग जुटल सभटा सामाजिक कार्यक्रमक योजना योजने रहि गेल । हम कॉलोनीसँ दूर एकटा स्कूलमे पढ़बाक हेतु जाए लागल छलहुँ । हमर पैघ भाइ आ बहिन सेहो ओहि स्कूलमे पढ़ैत रहथि । एक दिनका गप्प अछि जे स्कूलमे हमरा कोनो दोसर बच्चाक संग झगड़ा भए गेल । दुनु गोटेक संग स्लेट रहए । हम आ ओ दोसर बच्चा एकरा हथियारक रूपमे प्रयोग करए लागलहुँ । हम सोचए लगलहुँ जे ज्योँ स्लेटकेँ दोसर बच्चाक माथ पर मारबैक तँ शोनित निकलए लगतैक । ताहि द्वारे हम स्लेटकेँ रक्षात्मक रूपेँ प्रयोग केलहुँ । मुदा ओ दोसर बच्चा मचंड छल… ….खच्च….हमर माथसँ शोनितक धार निकलए लागल । टीचर सभ हमरा प्रिंसपलक रूममे लए गेलथि । रुइयामे सेवलोन वा डिटॉल नहि किछु दोसरे छल, ओकर रंग आ सुगंध हमरा अखन धरि मोन अछि, फर्स्ट-एडक बाद साँझ होएबाक आ छुट्टीक बेर नहि ताकल गेल । स्कूलक रिक्शा जाहि पर “सावधान बच्चे” लिखल छल केर बाट नहि जोहि एकटा दोसर रिक्शामे हमरा दीदीक (बहिनक) संग घर पठा देल गेल । हम दीदीकेँ पुछलियैक, जे “सावधान बच्चे” केर अर्थ की भेल । हमरा लगैत छल जे एकर अर्थ छल जे सभटा बच्चा जे ओहि रिक्शामे बैसल अछि, से सभ सावधान अछि, आ एहि बातसँ ओ दोसर छौड़ा असहमति देखा रहल छल आ ताहि गप्प पर झगड़ा बजरि गेल छल । दीदीक उत्तर रहए जे ई लिखबाक उद्देश्य चेतावनी छैक, जे कोनो दोसर गाड़ी पाछू सँ ठोकर नहि मारि दैक आ सम्हरि कए चलए । “मुदा किएक”- हम संतुष्ट नहि होइत पुछलियन्हि । एहने प्रश्न आ उत्तरक संग हम बढ़ए लागल छलहुँ । आ बढ़ैत- बढ़ैत कहियो काल खिसियेला पर माँ कहथि, जे सोचैत रही जे कहिया पैघ होएत आ पैघ भेल तँ नाकमे दम कए देने अछि। कॉलोनीक बाहरक क्रिश्चियन संतक नाम पर बनल स्कूलमे हम सभ भाइ-बहिन जाइत रही । स्लेटसँ कपार फोड़बएलाक बाद बाबूजी कॉलोनीमे ऑफिसर सभक मीटिंग करबओलन्हि । फैसला भेल जे खेलाक मैदान आ उत्तरबरिया सीमंतक देबालसँ सटल कोटाक दोकान (सार्वजनिक वितरण प्रणालीक दोकानकेँ कोटाक दोकान कहल जाइत छल) अपन आवश्यकतासँ बेशी पैघ घरमे छल । ओहि कोटाबलाक लाइसेंस सेहो कोनो कारणसँ समाप्त भए गेल छलैक, से ओहि एसबेस्टस बला ३-४ कोठलीक घरकेँ प्राथमिक विद्यालय बनएबाक निर्णय लेल गेल आ दू-चारिटा शिक्षकक बहाली कए, दू चारिटा लोकक कमेटी बनाए स्कूल शुरु कए देल गेल । पड़ोसक गंडक कॉलोनीकेँ सेहो छह महीना बाद नोत देल गेल जे अहूँ अप्पन कॉलोनीक बच्चा सभकेँ एतए पढ़ा सकैत छी । उत्तरबरिया देबाल पर बाहर दिशिसँ स्कूलक नाम लिखल गेल जे किछु दिनक बाद मलिछोँह होइत गेल । मुदा स्कूलक प्रतिष्ठा बढ़ैत गेल । क्यो गोटे ज्योँ अप्पन बच्चाक नाम लिखाबए अबैत छलाह तँ हुनकर बच्चाकेँ एक किंवा कखनो कालकेँ दुइ वर्ग नीचाँ नामांकन लेल जएबाक गप्प शिक्षकगण करैत छलाह । अप्पन स्कूलक स्तर कनेक ऊँच होएबाक गप्प करैत छलाह । बेशी जिद्द केला पर हमरा बजा कए टेस्ट लैत छलाह आ जाहि प्रश्नक उत्तर तेसर वर्गक नामांकनक अभिलाषी नहि दए पाओल छलाह से प्रश्न हमरा सँ पुछैत छलाह आ हम्मर सही उत्तर पर ओ कुटिल मुस्कान दैत नामांकनक हेतु आएल बालकक अभिभावक दिशि मुँह करैत छलाह । मोटा-मोटी बुझु जे ओहि स्कूलक हम सभसँ उज्जवल विद्यार्थी छलहुँ-जकर सोझाँमे, ओहि गामसँ आएल विद्यार्थीक अएलाक पहिने, क्यो ठाढ़ नहि भए सकल छल । पढ़ाइक प्रति एकटा विशिष्ट लगाव छल हमरामे, जे बादमे क्रमशः उदासीनतामे बदलए लागल । से एक बेर जखन बोखारसँ बड़बड़ाइत छलहुँ तहिया परीक्षाक दिन रहैक । बड़बड़ा रहल छलहुँ जे परीक्षा ने छूटि जाए । घरपर प्रश्न आ कॉपी आएल आ तखन अप्पन परीक्षा दऽ सकलहुँ हम । स्कूल छल छोट-छीन मुदा ओकर सभ गतिविधिमे कॉलोनीक निवासीगण सोत्साह भाग लैत छलाह । क्रीडाक्रिया होअए आकि सांस्कृतिक । क्रीड़ामे दू विद्यार्थी एक-एक पएर डोरीसँ बान्हि कए तीन टाँग बनाए दौगैत छलाह । दौगि कए मैदानक दोसर छोड़पर राखल ब्लैक बोर्डपर लिखल हिसाबकेँ बनाए दौगि कए आपस अएबाक खेलमे शारीरिक आ मानसिक दुहुक परीक्षा होइत छल जाहिमे हम अग्रणी अबैत छलहुँ । हमरा दू गोट घटना आर मोन पड़ि रहल अछि । पहिल घटना एक गोट बच्चाक गामसँ आएब । ओ हमरा हेतु किछु दिन पढ़ाईमे चुनौतीक रूपमे रहल कारण ओकर गाम बला किताबमे किछु नवीन जानकारी रहैक मुदा तकर कोटा पूरा भेलाक बाद हम ओकर चुनौतीकेँ खतम कए देलहुँ । दोसर घटना छल एक गोट बच्चाक एक्सीडेंट जकर बाद हम सभ खेलाइ कालमे टाइम निकालि ओकरा खिड़कीसँ देखि अबैत रहियैक । बादमे कहियो काल ओकर रूम मे जा कए ओकर डायरी सेहो देखि अबैत रही । ओकर किछु अंश हमरा मोन अछि से एना अछि । “अप्पन सभक गप्प करबा लेल हमरा लगमे समयक अभाब रहए लागल । किछु तँ एकर कारण रहल हम्मर अप्पन आदति आ किछु एकर कारण रहल ह्म्मर एक्सीडेंट, जकर कारण हम्मर जीवनक डेढ साल बुझा पड़ल जेना डेढ दिन जेकाँ बीति गेल । किछु एहि बातक दिस सेहो हमर ध्यान गेल जे डेढ सालमे जतेक समयक नुकसान भेल तकर क्षतिपूर्ति कोना कए होएत । किछु तँ भोरमे उठि कए समय बचेबाक विचार आएल मुदा आँखिक निन्न ताहि मे बाधक बनि गेल । तखन सामजिक संबंधकेँ सीमित करबाक विचार आएल । एहिमे हमरा बिन प्रयासक सफलता भेटि गेल छल । एकर कारण छल हमर नहि खतम प्रतीत होमएबला बीमारी । एहिमे विभिन्न डॉक्टरक ओपिनियन, किछु गलत ऑपरेशन आ एकर सम्मिलित इम्प्रेसन ई जे आब हमरा अपाहिजक जीवन जीबए पड़त । आनक बात तँ छोडू हमरा अपनो मोनमे ई बात आबए लागल छल । लगैत छल जे डॉक्टर सभ फूसियाहिँक आश्वासन दए रहल अछि । एहि क्रममे फोन सँ लऽ कए हाल समाचार पुछनहारक संख्या सेहो घटि गेल छल । से जखन अचानके बैशाखी आ फेर छड़ीपर अएलाक बाद हम कार चलाबए लगलहुँ तँ बहुत गोटेकेँ फेर सँ हमरा संग सामान्य संबंध बनाबएमे असुविधा होमए लगलन्हि । जे हमरासँ दूर नहि गेल रहथि तनिकासँ तँ हम जबर्दस्तीयो संबंध रखलहुँ मुदा दोसर दिशि गेल लोकसँ हमर व्यवहार निरपेक्ष रहैत छल से पुनःसंबंध बनेबासँ लोक हतोत्साहित रहए लगलाह । दुर्दिनमे जे हमरापर हँसथि तनिकर प्रति ई व्यवहार सहानभूतिप्रदहि मानल जएत । एहिसँ समयधरि खूब बचए लागल। शुरुमे तँ लागल जेना ऑफिसमे क्यो चिन्हत आकि नहि । मुदा जखन हम ऑफिस पहुँचलहुँ तँ लागल जेना हीरो जेकाँ स्वागत भेल होअए । मुदा एहिमे ई बात संगी-साथी सभ नुका लेलक जे हमर छड़ीसँ चलनाइ हुनका सभक भीतर हाहाकार मचा रहल छलन्हि । सभ मात्र हमर हिम्मतक प्रशंसा करैत रहैत छलाह । जखन हम छड़ी छोड़ि कए चलए लगलहुँ आ जीन्स शर्ट-पैंट पहिरि कए अएलहुँ तखन एक गोटे संगी कहलक जे आब अहाँ पुरनका रूपमे घुरि रहल छी । एहि बातकेँ हम घरपर आबि कऽ सोचए लगलहुँ । अपन चलए कालक फोटोकेँ पत्नीक मदति सँ हैण्डीकैम द्वारा वीयोडीग्राफी करबएलहुँ । एकबेर तँ सन्न रहि गेलहुँ । चलबाक तरीका आबो नेँगड़ा कए दौगबा सन लागल छल । पहिने तँ आर बेशी होएत मुदा संगी सभ एको रत्ती पता धरि नहि चलए देलक । बादमे घरक लोक कहलक जे ई तँ बड्ड कम अछि, पहिने तँ आर बेसी छल । तखन हमरा बुझबामे आएल जे संगीसभ आ ओ सभ जे हमरासँ लगाव अनुभव करैत छलाह, तनिका कतेक खराब लगैत होएतन्हि । तकरा बाद हमरा हुनकर सभक प्रोत्साहन आ हमर हिम्मतक प्रशंसा करैत रहबाक रहस्यक पता चलल । अपन प्रारम्भिक जीवनक एकाकीपन आ नौकरी-चाकरी पकड़लाक बाद सार्वजनिक जीवनमे अलग-थलग पड़ि जएबाक संदेह, आशा, अपेक्षा किंवा अहसास-फीलिंगक बाद जे एहि तरहक अनुभव भेल से हमर व्यक्तित्वक भिन्न विकासकेँ आर दृढ़ता प्रदान केलक”। ओ तँ छल हमरे संगी मुदा कल्पना कऽ रहल छल जेना कोनो पैघ वियाहल व्यक्ति होअए आ काल्पनिक रूपसँ ठीक भेलाक बादक वर्णन अपन डायरीमे कएने छल । मजदूरक टोल आ साँझमे ठेलागाड़ी पर हुनका लोकनि द्वारा अपन कपड़ा सुखाएब, एहि सभकेँ देखि कऽ हम विचलित भऽ जाइत छलहुँ । ई देखलाक बादो जे हुनका लोकनिक मुँहपर हँसी छन्हि, बिन घर रहलो उत्तर । छोट-छोट बच्चा सभकेँ भीख मँगैत देखब, हम सभ जखन खेलाइत रही तँ ओकरा सभक हमरा सभक दिशि कातर दृष्टिए देखब । लोक सभक दुत्कार, कहियो हमरो पर ई विपत्ति आबि जाए तखन ? फेर दोसर क्यो हुनका लोकनिक दिशि तकबो नहि करन्हि, तँ की हमही टा आन बच्चासँ भिन्न छी आ ई सभ सोचनी लागल रहैत छल । हम ई सोचैत रही जे जखन हम कोनो स्थान पर नहि रहैत छी तखनो तँ सभ कार्य गतिसँ चलैत अछि । किताबमे हम पढ़ने रही जे किछु जीव जंतु मात्र दू डाइमेंसनमे देखैत अछि । हमरा सभ तीन डाइमेंसनमे जिबैत छी, तँ ई जे भूकंपक आ आन-आन विपत्ति सभ अबैत अछि से कोनो चारि डाइमेंसनमे कार्य करए बलातँ नहि कऽ रहल अछि जे कल्पनातीत अछि । पाँच पाइमे लालछड़ी बलाकेँ देखा कऽ बाबूजी कहैत रहथि जे देखू ईहो लोकनि अपन परिवारक गुजर पाँच-पाँच पाइक ई लालछड़ी बेचि कए कऽ रहल छथि । पाइक महत्व आ ओकर आवश्यकता जतेक बढ़ाऊ ततेक बढ़त । अपन-अपन वातावरणक आ जीवनक बादक जीवनक - एहि सभक संग जीनाइ, रातिमे बड़बड़ेनाइ ई सभ गोट कार्यक संग पढ़ाइ आ पिताक नौकरीक परेशानी सभ चलैत रहल । हमरा मोन पड़ैत अछि जे एक दिन भोरे-भोर एक गोट ठीकेदारक सूटकेशपर हमर बाबूजी जोरसँ लात मारने छलाह । सूटकेश जा कऽ दूर खसल आ ओहिमे राखल रुपैय्या सौँसे छिड़िया गेल । हमर एक गोट पितियौत भाइ छलाह जे सभटा पाइकेँ उठा सूटकेशमे राखि वापस ठीकेदारकेँ दऽ वापस कए देलखिन्ह आ ईहो कहलखिन्ह जे जल्दीसँ भागि जाऊ नहि तँ पुलिसकेँ पकड़बा देताह । माँ हमरा भीतरका कोठली लऽ गेलीह । हम बच्चा छलहुँ मुदा हमरा बुझबामे आबि गेल छल जे ई पाइ हमरा बाबूजीकेँ गंगा-ब्रिजक ठीकेदारक दिशिसँ अपन इंजीनियरिंग छोड़ि कऽ बिना कोनो भाङठक कार्य होमए देबा लऽ देल जएबाक प्रयास छल । बाबूजी बहुत काल धरि बड़बड़ाइत रहलाह । कखनो दालिमे नून कम रहला उत्तर आकि आन कोनो कारणसँ बर्त्तनकेँ फेंकबाक स्वरसँ देह सिहरि जाइत छल । फेर किछु क्षणक चुप्पीक बाद सभ बच्चाकेँ बजाओल जाइत छल आ दुलार मलार होइत छल । हम वर्गमे प्रथम अबैत छलहुँ आ परिणाम निकलबाक दिन एकटा कॉलोनीक सिन्हा चाची सभ बेर लट्ठा खोआबैत रहथि । प्रायः गुर आ आटासँ बनल एहि लट्ठाक स्वाद हम बिसरि नहि सकल छी । ओहि चाचीक एकटा अर्द्ध-पागल दिअर छलन्हि जे सितार बजबैत रहैत छल । एक बेर गंगामे स्टीमरसँ हमरा सभ ओहि पार जाए रहल छलहुँ तँ ओ ओहि स्टीमर परसँ अपन भाएकेँ फेंकबा लेल ओ उद्यत भऽ गेल छल । ओहि चाचीकेँ एकटा बेटी रहन्हि रजनी । पता नहि कोन बिमारी भेलैक, बेचारी एलोपैथिक दवाइक फेरमे ओछाओन धऽ लेलक । हम सभ कताक बेर हुनका देखबा लेल जाइत रही । हमरा दोसराक अहिठाम जाएमे धाख होइत रहए मुदा ओतए ककरो संगे पहुँचि जाइत रही । हुनका सभ क्यो दीदी कहैत रहियन्हि । हमरा सभसँ बड्ड पैघ रहथि । मुदा किछु दिनक बाद हुनकर मृत्यु भऽ गेलन्हि । मृत्युसँ हमर मानसिक द्वंद, एहि घटनाक बाद आब आर लग बुझाए लागल । हुनकर मृत्युक बादो ओ चाची अपन बेटा सभकेँ अगिला दिन स्कूलक हेतु तैयार कए पठेलन्हि जे कॉलोनीक एकगोट दोसर दबंग चाचीकेँ पसिन्न नहि पड़लन्हि आ एकर चर्चा बहुत दिन धरि कॉलोनीमे होइत रहल । चाचीक भाइ मुजफ्फरपुर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलोजीमे व्याख्याता रहथि। एहि कॉलेजसँ हमर बाबूजी सेहो इंजीनियरिंग पास कएने रहथि । ओ हाजीपुरमे गंगा-ब्रिज कॉलोनी स्थित हमर सभक घर पर आएल रहथि आ अपन बहनोइकेँ बड्ड फझ्झति कएने रहथिन्ह । पटना जा कए नीक इलाज करेबामे असफल रहबाक कारण पाइकेँ बतेने रहथिन्ह । हमरा मोनमे ई विचार आएल रहए जे पटनामे पैघ डॉक्टर रहैत अछि जे मृत्युकेँ जीति सकैत अछि । मुदा एक दिन हमरा सभक संग रहएबला गामक पितियौत भाए जखन परमाणु युद्धक चर्चा कए रहल छलाह आ ईहो जे ओहि समयमे पृथ्वी पर एतेक परमाणु अस्त्र-शस्त्र विद्यमान रहए जाहिसँ पृथ्वीकेँ कताक बेर नष्ट कएल जा सकैत अछि, तखन हमर ईहो रक्षा कवच टूटि गेल छल । हमर पुरान जीवनक ई एकटा नीक अनुभव छल। बादमे दुर्घटना तँ हँसी-खेल भऽ गेल । नहि तँ एकरासँ कोनो दुःख होइत छल नहिये कोनो लक्ष्यक प्रति तेना भऽ कए पड़ैत छलहुँ । खेल सेहो वैह नीक लागए जाहिमे टीम नहि वरन व्यक्तिगत स्पर्धा रहैत छल कारण टीममे दोसराक प्रदर्शन हारिक स्थितिमे बहन्ना बनि जाइत अछि । एकर कारण सेहो छल, किएक तँ एहिमे टीमक प्रदर्शन पर व्यक्तिगत प्रदर्शन निर्भर नहि करैत छल आ जे बड़ाइ आकि बुराइ भेटैत छल से व्यक्तियेकेँ भेटैत छल । अहाँ ई नहि कहि सकैत छी जे ओकरा कारण हम हारलहुँ, हम तँ नीक प्रदर्शन कएने रही । स्कूल आ पढ़ाइक अतिरिक्त ओना क्रीड़ाक स्थान न्यूने छल । लक्ष्यक प्रति जे निरपेक्षता बादमे हमरामे आएल छल से ओहि समयमे नहि छल । ओहि समयमे तँ जगतकेँ जितबाक धुनि छल । द्वितीय स्थानक तँ कोनो प्रश्ने नहि छल । द्वितीय स्थानक माने छल अनुत्तीर्ण भेनाइ । खेलोमे, पढ़ाइयोमे, मारि-पीटमे सेहो । गाम आन-जान खूब होइत रहए । गाम जाइत रही तँ महादेव पोखरि परका स्कूलमे काका शिक्षककेँ कहि अबैत छलाह आ हम छुट्टीयो मे स्कूल जाइत रही । कबड्डी, सतघरिया, लाल-छड़ी ई सभ खेलक नामो तँ शहरक बच्चाकेँ बूझल नहि होएतैक । अस्तु ओतुक्का पढ़ाइक सभ प्रणाली अलग छल । प्रतिदिन करची कलमसँ लिखना लिखएमे देह सिहरि जाइत छल आ रोजनामचा सेहो एहि प्रकारे लिखैत रही-भोरे-सकाले उठलहुँ नित्य कार्यक उपरांत जलखइ कऽ पढबाक लेल बैसलहुँ, फेर स्कूल गेलहुँ, ओतए सँ एलहुँ, पुनः खेनाइ खेलहुँ । फेर स्कूल गेलहुँ, फेर गाम पर एलहुँ आ फेर जलखै कएलहुँ । फेर खेलाइ लेल गेलहुँ । फेर आबि कऽ लालटेनक शीशाकेँ साफ केलहुँ, फेर पढ़लहुँ आ फेर भगवानक नाम लऽ सूति गेलहुँ । रवि दिनक छुट्टीक बदला सोम दिन दू दिनक रोजनामचा लिखि कए लऽ जाए पड़ैत छल । ओतए १५ अगस्तक उत्साह सेहो दोसरे तरहक छल । साँझ-आ भोरमे १५ अगस्त- स्वतंत्रता दिवस, भारत माताक जय केर संग सभ महापुरुष लोकनिक जय करैत जाइत छलहुँ । मुदा मास्टर साहेबक ई गप नहि बुझना गेल छल जे मारि-पीट नहि करैत जइहऽ । मुदा जखन भोरमे जयक नाद गामक सीमान पर सँ जाए काल सुनलहुँ तखन पता चलल जे ई गप मास्टर साहब किएक कहने छलाह । महिनाथपुरक स्कूलक बच्चा सभ जखने ओम्हरसँ अबैत रहए आकि तखने मारि बजरि गेल । कोनहुना झोप-ताप कएल गेल । फेर गामपर जे अएलहुँ तखन पुरनका बैचक विद्यार्थी सभ अपन खिस्सा शुरू कएलक जे कोना पोखरिमे पैसा-पैसाकेँ केराक थम पानिमे दऽ कए स्वतंत्रता दिवस दिन मारने रहए गेल छलथिन्ह अनगौआँ केँ । फेर ओहो सभ दोसर साल बदला लेबाक ताकिमे छल मुदा ताहू बेर…। दोसर साल फेर वैह मीटिंग, दुनू गामक स्कूलक मध्य मुदा एहि बेर दोसर गाम बला टीम रस्ता बदलि लेलक । मारि बझब गाममे एकटा पर्व जेकाँ छल । दुर्गास्थानमे चॉकलेटक बुइयामक फूटब आ कोनो कटघरा किंवा टाटक खुट्टा उखाड़ि कए मारि-पीट शुरू करब । आ बादक जे गप्प होइत छल से मनोरंजक । एक बेर एकटा अधवयसू एक गोट नव-नौतारकेँ दू-चारि चमेटा मारि देलन्हि । बादक घटनाक हेतु हम कान पथने रही तँ हमर पितियौत ओहि गौआँकेँ पुछलखिन्ह जे वैह बात रहए ने । सभ क्यो एकमत रहथि जे वैह बात रहए । एहि बेर हम हारि कऽ पुछलियन्हि जे वैह कोन बात अछि जे सभकेँ बूझल अछि मुदा हमरा नहि बूझल अछि । ओ कहलन्हि जे एहि युवापर अपन बचियाक घटकैतीक हेतु ओ अधवयसू गेल रहथि मुदा कथा नहि सुतरलन्हि । ओहि युवकक विवाह दोसर ठाम भए गेलन्हि, से तकरे कैन लऽ कए कोनो फुसियाहीक लाथ लऽ आइ ओकरा कुटलन्हि अछि । हम पुछलियन्हि जे ज्योँ विवाह भऽ जाइत तँ ससुर जमाएक संबंध रहैत । तखन एहि फुसियाही गप पर मारि बजरैत ? सभ कहथि जे अहाँ तँ तेसरे गप पर चलि गेलहुँ । रातिमे नाटक देखैत अकासमे डंडी-तराजू देखब, खाली डंडी छैक तँ तराजू कियैक कहैत छियैक? फेर ओहि नाटकोमे अनगौँआ सँ मारि बझेबाक हमर संगीक एकटा चालि । भेल ई जे नाटक देखए काल ओ एकटा अनगौँआकेँ खौँझा रहल छलाह । मारि अंट-शंट बकैत छलाह । आ ओ किछु बाजए तँ कहैत छलाह जे अखने नरेण भैयाकेँ बजाएब । ताहिपर ओ कहलन्हि जे जाऊ अहाँक नरेण भैयाक डर हमरा नहि अछि । आब आगू सुनू । हमर मित्र अनायासहि जोरसँ कानए लगलाह, दहो-बहो नोर खसए लगलन्हि । भोकारि पाड़ैत नरेण लग पहुँचलाह जे एकटा अनगौँआ मारलक अछि आ कहैत अछि जे के नरेण ओकर हमरा कोनो डर नहि अछि, आरो अण्ट- शण्ट । आब नरेण भैया पहुँचलाह जे बता तँ ओ के छी ? जखने टॉर्च ओहि व्यक्तिपर देलन्हि, बजलाह, भजार यौ । अहाँ छी । जरूर अही छौड़ाक गल्ती छी । अनका विषयमे कहैत तँ पतिया जइतहुँ । मुदा अहाँक विषयमे । आ ईहो नहि कहलक ई छौड़ा जे अहाँ तमसेलियैक वरन् ई जे मारलन्हि अछि । आ नेप की चुआ रहल छल जेना कतेक मारि पड़ल होअए । हमरा सँ नरेण पुछलन्हि जे भाए किछु एकरा कहबो कएलन्हि तँ हम कहलियन्हि जे नहि । एहि पर हमर मित्रक नोर जतएसँ आएल छलन्हि, ततहि चलि गेलन्हि । फज्झति मूड़ी झुका कए सुनलन्हि आ नरेण भाइक गेला पर सभकेँ कहलन्हि, जे ई नरेण काकाक संगी छथिन्ह, क्यो हिनका किछु कहबहुन्ह तँ बेजाए भऽ जाइत जएतहु । आ आस्तेसँ कहलथि जे बचि गेल आइ ई । गामक प्राइमरी स्कूलमे सभ कलाक परीक्षा होइत छल । संगीत, चित्र, नाटक । गाममे हारमोनियम, ढ़ोलक बजेनहार खूब रहथि । पहिने दुर्गा पूजाटा मे नाटक होइत छल मुदा पछाति जा कऽ कृष्णाष्टमी, काली पूजा इत्यादिमे सेहो नाटक खेलेनाइ शुरू भऽ गेल । हरखा रामलीला पार्टी सेहो एक महिना खेला कऽ गेल छल । अहूमे दू चारि दिनपर रामलीलाक बीचमे नाटक होइत छल । खेल शुरू भेल रामलीला पार्टीक बिना बजेनहि । मुदा दू चारि दिन धरि माला क्यो ने क्यो उठबैत गेलाह । रामलीला पार्टीक सभ कलाकारक एक दिनक खेनाइक खरचाकेँ माला उठेनाइ कहल जाइत छल । दू-चारि दिन तँ माइक पर क्यो न क्यो जोशमे जा कऽ हम माला उठाएब तँ हम उठाएब कहैत गेलाह मुदा दू चारि दिनुका बाद रामलीला पार्टीक आर्द्र अनुरोधकेँ देखैत गौँआ सभ टोलक अनुसार माला उठेबाक एकटा क्रम बना देलखिन्ह । ओहि समयमे अभिनय देखनाइ एकटा चमत्कार सन बुझाइत छल आ हम अपन कैरियर बादमे अभिनेताक रूपमे बनेबाक मोने-मोन इच्छा रखैत छलहुँ । ओहि समय एक शनि स्कूलमे नाटक खेलेबाक प्लान शिक्षकगणक स्वीकृतिसँ बनल । नाटकक किताब कतएसँ अएत ताहि द्वारे हम एकटा नाटक दानवीर दधीची लिखलहुँ । स्कूलक कलाकार सभकेँ एकत्र कएलहुँ । आब कलाकार सभक नाम तँ सुनू । पोटहा, लुल्हा, नेँगड़ा, पोटसुड़का, लेलहा, ढ़हीबला, कनहा, अन्हरा, तोतराहा, बौका, बहिरा ई सभ हमर बाल कलाकार रहथि । कारण जे अपनाकेँ शुभ्र-शाभ्र बुझथि से किएक नाटक खेलेताह । दहीकेँ तोतराकेँ कहियो क्यो ढ़ही बाजल तँ ओकर नाम ढ़हीबला भऽ गेलैक। सर्दीमे कहियो पोटा चुबैत रहि गेलैक तँ पोटहा भऽ गेल आ दोसर एहन भेल तँ दुनूमे अन्तर कोना करी । से ओ जे पोटा खसैत काल सुरकितो अछि से तकर नाम भऽ गेल पोटसुरका । आगाँ आऊ । ककरो अन्हरिया रातिमे ठेस लागि गेलैक तँ कोन अतत्तः भेलैक ? हँ ओकर नाम अन्हरा भऽ गेलैक । बच्चामे देरीसँ बजनाइ शुरू कएने छलहुँ तँ अहाँ भऽ गेलहुँ बौका । सोझगर छी तँ लेलहा । गपकेँ अनठबैत छी तँ भेलहुँ बहिरा । नव घड़ी पहिरलाक बाद (घड़ी पाबनि दिन वनस्पतिक घड़ी) हाथ कनेक सोझ राखि लेलहुँ तँ भेलहुँ लुल्हा । तोतराइत तँ सभ अछि मुदा कबियाठी टोलक छी तँ लोक नाम राखि देलक तोतराहा । कनेक डेढ़ भऽ ताकि देलहुँ आकि पिपनीकेँ उनटा कऽ ककरो डरेलहुँ तँ भेलहुँ कनहा । ठेस लगलाक बाद कनेक झखा कऽ चललहुँ तँ भेलहुँ नेंगड़ा । आ ज्योँ कनेक पाइ बलाक बेटा छी आकि माए कनेक दबंग छथि तँ कनाह रहलो उत्तर क्यो कनहा कहि कऽ देखओ ! अस्तु एहि बाल कलाकार सभक संग शनि दिन होएत हमर नाटक दानवीर दधीची। आ नियत तिथिकेँ शुरू भेल दानवीर दधीची नाटक । स्कूल खुजबासँ किछु काल पहिनहि हम सभ पहुँचि गेलहुँ स्कूल । बरण्डाक एक कोनमे गाम परसँ आनल चद्दरिक पर्दा बनल । रस्सी ठीकसँ नहि लागि सकल से ईएह निर्णय भेल जे चद्दरिकेँ ऊपर उठा-खसा कए काज निकालल जएत । तकरा बाद कलाकार सभ अपन-अपन ड्रेस पहिरए लगलाह । ड्रेस की छल मात्र पाउडर लगा कए आ गमछा-धोती पहिरि कए, सभ सभ तरहक ड्रेस पहिरि लेलक । जाहि मास्टरसाहेबक ड्यूटी लागल छल नाटकक संचालनक हेतु, हुनका कोनो आवश्यक कार्य मोन पड़ि गेलन्हि से ओ ओहि दिन छुट्टी मारि देलन्हि । गामक पैघ तुरियाकेँ तावत बुझबामे आबि गेलैक जे प्राइमरी स्कूलक छौड़ा सभ नाटक कऽ रहल अछि । से तुरत्तेमे दस टा पैघ बच्चा सभ जूटि गेल आ पिहकारी देनाइ शुरू कऽ देलक । हम सभ कलाकारकेँ कहलियन्हि जे ई सभ उत्तेजित कऽ कए हमर सभक नाटककेँ दूरि करत । मुदा छोटे भाइ भीड़ि गेलाह ।कहए लगलाह जे हे बौआ सभ, हम नाटकक ड्रेसमे छी तेँ ई नहि बुझू जे मारि नहि करब। एखने ड्रेस फेकि-फाइक कऽ हम सभ कर्म कऽ दइ जाएब अहाँ सभक। मुदा पिहकी पाड़नहारक संख्यामे घटती नहि भेल । आ छोटे भाइ बाजि उठलाह जे छोड़ू आइ एहि नाटककेँ । हिनका सभक बदमस्ती हम एखने ठीक करैत छी। आ खुट्टा उखाड़ि कऽ दौगलाह । तावत थाम्ह-थोम्ह करए बलाक जुमान भऽ गेलैक आ तकरा संगहि नाटक दानवीर दधीची जे हमर लिखल छल आ जकर मंचनक निर्देशन हम करए बला छलहुँ, बीचहिमे खतम भऽ गेल । किछु दिन धरि छोटे भाइसँ मूहा-फुल्ली रहल । ओ आबथि आ कहथि जे की करू, तामस उठि गेल छल । ओहो सभ अतत्तह कऽ देने छल । फेर किछु दिनुका बाद सभटा सामान्य भऽ गेल । रामलीलाक आ नाटकक भूत सेहो एहि घटनाक बाद हमरा परसँ उतरि गेल । गणित आ विज्ञानक अतिरिक्त्त कोनो आन विषयकेँ नहि तँ हम एक बेरसँ दोसर बेर पढ़ैत छलहुँ आ नहिये एहि हेतु मास्टर साहेबे कहैत छलाह । कोनो विद्यार्थीकेँ मास्टर साहेब इतिहास आ नागरिक शास्त्रक किताबकेँ एकसँ दोसर-तेसर बेर पढ़ैत देखि जाइत छलाह तखन तँ ओहि विद्यार्थीक नामे ओहि विषयसँ पड़ि जाइत छल । आब ओ गणितो पढ़त तँ ओकरा सुनए पड़तैक जे बाबू ई इतिहास नहि छियैक जे कंठस्थ कए रहल छी । सैया-निनानबे अनठानबे- सन्तानबे-छियानबे-पनचानबे कहैत-कहैत आ बोराक आसनीकेँ बरखाक समयमे छत्ता बनओने पाँच-चारि-तीन-दू-एक-एक-एक करैत भागैत विद्यार्थी सभ । कहियो छुट्टीक दिन ज्योँ कबड्डी खेलाइ काल मास्टर साहेब साइकिल पर चढ़ल देखा पड़थि तँ कबड्डी-कबड्डी, मास्टर साहेब प्रणाम, कबड्डी-कबड्डी कहैत भागैत रहथि विद्यार्थी । आ एहने एकटा घटनामे हम मास्टर साहेबकेँ ठाढ़ भऽ कए साँस तोड़ि कए प्रणाम कएने रहियन्हि आ एहि क्रममे विपक्षी पार्टी द्वारा लोकि लेल गेल छलहुँ तँ एहि पर कोइलख बला मास्टर साहेब प्रसन्न भेल रहथि आ तकर चर्चा स्कूलमे सभक समक्ष कएने रहथि । बुझु जे गामक प्रवास, बादक समयमे एकटा पैघ संबल सिद्ध भेल छल । खड़ाम पहिरि कए गतिसँ दौगैत रही फेर बर्षामे आरि पर पिच्छड़ पर खड़ाम पहिरि कए दौगैत रही । पिच्छड़ पर खड़ाम नहि पिछड़ैत छल । बादमे हवाइ चप्पलक आगमन भेलाक बाद कतेक गोटे खसि-खसि कए डाँरपर गरम पानिक भाप लैत छलाह । अगिलही, किरासन तेलक लाइन, रोशनाइक गोटी, लबनचूस, रबड़क बॉल, ओधिक गेंद, पसीधक रसक विषसँ पोखरिमे माछ मरलाक बाद भेल दू टोलक बीचमे बाझल मारि, बाढ़िक दृश्य देखबाक लेल जुटल भीड़, छोट-छोट गप पर होइत पंचैती, आमक मासमे आमक जाबीसँ बहराइत गछपक्कू आमक छटा, ई सभ टा अलोपित तँ नहि भऽ जएत । “काका यौ, हम नहि लगेलिअन्हि कबकबाउछ”। ई गप कहैत हमर आँखिमे नोर आबि गेल छल । बनाइकेँ किछु गोटे छौड़ा सभ दलान पर सुतलमे कबकबाउछ लगा देने छलन्हि । कलम दिशिसँ खेला-कुदा कए सभ आबि रहल छल । महारक कातमे कबकबाउछक पात तोड़लक आ एकर पातकेँ चमड़ा पर रगड़लासँ होअएबला परिणामपर चर्चा होमए लागल । क्यो अपन चमड़ा पर लगेबाक हेतु तैयार नहि छल से दलान पर बनाइकेँ सुतल देखि हुनके देह पर पात रगड़ि देलकन्हि । पाछाँसँ हम अबैत छलहुँ आ सभ छौड़ा तँ निपत्ता भए गेल, बनाइक नजरि हमरा पर पड़लन्हि । से ओ काकाकेँ कहि देलखिन्ह । काका हमर कोनो गप नहि सुनलन्हि आ दस बेर कान पकड़ि कए उट्ठा-बैसी करबाक सजा भेटल । संगहि साँझमे संगी सभक संग खेलेबाक बदला काका आ हुनक भजार सभक संग खेत पथारक दिशि घूमबाक निर्णय भेल जाहिसँ हमर बदमस्ती कम होअए । बाढ़िक समय छल, नाओपर बाढिक दृश्य आ सिल्लीक शिकार । बादमे तँ एकर शिकारपर सरकार प्रतिबंध लगा देलक । मुदा मोन हमर टाँगल रहल गाम परक कल्पित खेल सभक दिस, जे हमर सभक संगी सभ खेलाइत होएताह । ई छल पहिल दिन । दोसर दिन बेरू पहर धरि हम एहि प्रत्याशामे छलहुँ, जे आइ फेरसँ काकाक संग जाए पड़त । ओना संगी सभकेँ हम ई भास नहि होमए देलियैक जे हम एको रत्ती चिन्तित छी आ ओ सभ नाओ आ सिल्लीक खिस्सा तन्मयतासँ सुनैत रहलाह । मुदा हमर मुखाकृति देखि कए काका पुछलन्हि, जे आइ हमरा सभक संग जएबाक मोन नहि अछि ? तँ हम नञि नहि कहि सकलियन्हि । मुदा फेर अपनाकेँ सम्हारैत कहलियन्हि जे मोन तँ गामे पर लगैत अछि । तखन काकाकेँ दया लागि गेलन्हि आ एहि प्रतिबन्धक संग जे हम आब गामपर बदमस्ती नहि करब हमरा गाम पर रहबाक छूटि भेटि गेल । गाममे डेढ़ साल धरि रहलहुँ आ जखन बाबूजीक ट्रांसफर पटना भऽ गेलन्हि, तखन बड़का भैयाक संगे पहलेजाघाट आ महेन्द्रूघाट दऽ कए पटना आबि गेलहुँ। ओतए स्कूल सभमे प्रवेश परीक्षा होइत छल आ बाबूजी भाएकेँ छठासँ सतमाक हेतु आ हमरा पचमासँ छठा आ सतमा दुनू वर्गक हेतु प्रवेश परीक्षामे बैसओलन्हि। आ तकर बाद हमरा ई बुझबामे आएल जे किएक हमरा बाबूजी पचमेमे छठाक विज्ञान आ गणित पढ़ि लेबाक हेतु कहने छलाह । प्रवेश परीक्षामे ईएह दुनू विषय पूछल जाइत छल । अस्तु हमर छठा आ सतमा दुनू वर्गक लेल आ भाएकेँ सतमाक लेल चयन जिला स्कूलमे भए गेल । फेर शहरक सरकारीयो स्कूलमे ड्रेस छलैक, से आश्चर्य । से दुनू गोटे बाबूजीक संग दोकान गेलहुँ आ ड्रेस सियाओल गेल, दू-दू टा हाफ पैंट आ एक-एकटा अंगा । स्कूलक पहिलुके दिन मारि होइत-होइत बचल । एकटा छौड़ा हमरा देहाती कहलक तँ से तँ हमरा कोनो खराप नहि लागल । ओहि उमरिमे देहाती शब्द हमरा नीके लगैत छल, मुदा आइ सोचैत छी तँ लगैत अछि जे ओ ई शब्द व्यंग्यात्मक रूपेँ कहने छल। फेर जखन ओ देखलक जे ई तँ नहि खौँझाएल तखन बंगाली-बंगाली कहनाइ शुरू कएलक । हम दुनू भाइ पातर दुबर आ शुभ्र-शाभ्र चिक्कन-चुनमुन लगैत छलहुँ, ताहि द्वारे ओ हमरा सभकेँ बंगाली बुझि रहल छल। हम ई व्यंग्य नहि सहि सकलहुँ आ ओकरा दिशि मारि-मारि कए छुटलहुँ । भाए बीच-बचाओ कएलक । आब ओ छौड़ा कानय-खीजय लागल आ पैघ वर्गक कोनो बदमाश विद्यार्थीकेँ बजाबए लेल गेल । फेर घुरि कए जे आयल तँ ओकर कानब-खीजब बन्न भए गेल छलैक, हमरा कहलक जे हमर भाग्य नीक अछि जे जकरा ओ बजाबए गेल छल से आइ स्कूल नहि आएल अछि । दू तीन दिन धरि हम ई गुन-धुन करैत रहलहुँ जे ओ ओहि बदमाशकेँ बजा कए नहि आनि लिअए । ओहिना किछु दिनुका बाद ओकरा फेर कोनो दोसर छौड़ासँ झगड़ा भेलैक आ ओहि दिन ओ हीरो छौड़ा स्कूल आएल छल । हमरे सोझाँमे ओ हमर कक्षामे आएल आ दोसर विद्यार्थीकेँ एक फैट पेटमे मारलकैक । क्यो बचबए लेल तँ नहि गेलैक मुदा बादमे जखन एकटा क्लासमे शिक्षक नहि अएलाह आ विद्यार्थी सभ खाली गप-शप कए रहल छल तखन एहि बातक निर्णय भेल जे आब ओहि विद्यार्थीसँ क्यो गप नहि करत आ क्लास टीचरसँ एहि गपक शिकाइत कएल जएत जाहिसँ ओ ओहि बदमाश विद्यार्थीक क्लास टीचरकेँ एहि घटनाक विषयमे बताबथि । आब ओ पिनकाह विद्यार्थी शुक-पाक करए लागल । फेर ओ ओहि विद्यार्थीक लग गेल, ओकरा कान भरि आएल जे सभ ओकरा विरुद्धमे चालि चलि रहल अछि । ओ बदमाश आबि कए सभकेँ उठबाक लेल कहलक मुदा क्यो नहि उठल । तकन ओ हमरा कहलक जे उठू । हम उठि गेलहुँ आ तखन ओहिना एक-एक कऽ कए तीन चारि गोटेकेँ उठेलक आ फेर सभकेँ उठबाक लेल कहलक । सभ उठि गेल । तखन सभकेँ धमकी देमए लागल । मुदा एहि बेर हमर सभक क्लास मोनीटर किछु हिम्मतसँ काज लेलक आ ओकरा ओहि छौड़ाक विषयमे कहए लागल । हमरा देखा कए कहलक जे एकरा देखैत छी? कनियो बदमाश लगैत अछि, एकरो अहाँक नाम लऽ कए दबाड़ि रहल छल । ओ छौड़ा तँ हुण्ड छल से ओकर पारा चढ़ि गेलैक आ हमर वर्गक पिनकाहा छौड़ाकेँ चेतौनी देलकैक जे आइ दिनसँ कनैत-खिजैत ओकरा लग नहि आओत आ ओकर नाम लऽ कए ककरोसँ झगड़ा नहि करत । एहिना स्कूल चलि रहल छल आकि एक दिन एकटा छौड़ा वर्गमे पिहकी मारि देलकैक । ओ छौड़ा बीचहिमे बम्बई भागि गेल छल बाल कलाकार बनबाक लेल । घुरि कए आएल तँ वर्ग शिक्षक पुछलन्हि जे किएक घुरि अएलहुँ । तँ ओ हुनका कहलकन्हि जे सभ ओतए कहलक जे एतए तँ सभ बी.ए., एम.ए. अछि, अहाँ कमसँ कम मैट्रिको कए लिअह । आब पिहकीक बाद वर्ग शिक्षक पढ़ाइ छोड़ि कए ओकर अन्वेषणमे लागि गेल । पिहकी कोन दिशिसँ आएल । बहुमतक आधार पर एक कातकेँ छाँटि देल गेल । आब आगूसँ आएल आकि पाछूसँ । ताहि आधार पर सेहो एकटा बेंच निर्धारण भए गेल । ओहि बेंच पर छह गोटे छलाह । आब ई निर्धारण होमए लागल जे बाम कातसँ आयल आकि दहिनसँ । फेर छहमे सँ दू गोटेक निर्धारण बहुमतक आधार पर कएल गेल । ओहिमेसँ एकटा हमरा लोकनिक बम्बइया हीरो छलाह, जनिकर बम्बइक खिस्सा टिफिनसँ लऽ कए लेजर क्लास धरि चलैत रहैत छल । मुदा एहि दुनू गोटेमे १:१ केर टाइ भए गेल कारण क्यो मानए हेतु तैयार नहि जे पिहकी के मारलक” । एकर बाद डायरी खाली छल । नन्द बेटाकेँ बजा कए डायरी दए देलन्हि आ मात्र ई कहलन्हि जे पढ़ाई पर ध्यान दिअ । एहि बात पर लज्जित होएबाक कोनो बात नहि छल मुदा आरुणिकेँ हुनकर भाए बहिन एहि गपक लेल बहुत दिन धरि किचकिचाबैत रहलखिन्ह । अस्तु एक दिन ओ डायरीकेँ फाड़ि देलन्हि आ ई आत्मकथात्मक उपन्यास पूर्ण होएबासँ पहिनहि खतम भए गेल । नन्दक अव्यव्स्थाक विरुद्ध शुरू कएल गेल संघर्ष किछु दिनका विराम लेने छल । गाममे बच्चा सभ डेढ़ साल रहल छलन्हि, दरमाहा बहुत दिन धरि बन्द छलन्हि । गाममे पैघ भाए एकटा भावी राजनीतिज्ञकेँ कहि कए नन्दक पदस्थापन क्षेत्रीय काजसँ हटा कए ऑफिसमे चित्र परियोजना आकि डिजाइनमे करबाए देने छलखिन्ह । संगे ईहो कहने छलखिन्ह जे अपन ऑफिस जाऊ आऊ आ बच्चा सभ पर ध्यान दिअ । सभसँ मिलि जुलि कए रहू । नन्द पटना आबि कए भाएक सभ गप पर ध्यान देने छलाह । पटनामे बेटीक कॉलेजमे नामांकन करबाए महाविद्यालयक पार्श्वमे किरायापर घर ताकलन्हि । दुनू बेटाक नामांकनक हेतु प्रवेश परीक्षा केर फॉर्म सभ भरबाए सभकेँ पटना बजा लेलन्हि । भातिजकेँ कहलखिन्ह जे सभकेँ लए कए आबि जाऊ आ पहलेजाघाटमे बच्चा बाबू बला नहि वरन बिहार सरकारक स्टीमर पकड़बाक आदेश देलखिन्ह । कारण एकटा निजी स्टीमर बच्चा बाबूक सेहो चलैत छल मुदा ओ बेशी पसेन्जर लए कऽ चलैत छल, संगहि सरकारी स्टीमर अपन समयसँ चलैत छल, ओहिमे पैसेंजर रहए वा नहि । सरकारी स्टीमरमे यात्रीक संख्या सीमित छल ताहि हेतु टिकट केर नियमित हिसाब छल आ सभ यात्रीक बीमा होइत छल, ई बात निजी स्टीमरमे नहि छल। भातिजक संग पत्नी आ पुत्र-पुत्री सभ आबि गेलखिन्ह । गंगा ब्रिज कॉलोनीमे नन्द एकाकी रहैत छलाह । परिवारक लोककेँ सेहो आसपड़ोससँ बेशी मेल-जोल करबाक अनुमति नहि देने छलाह । मुदा पटनामे सभटा उनटि गेल छल । पड़ोसमे एकटा रिटायर्ड फौजी छलाह, एकटा बिहार सरकारक पुलिस छलाह आ एकटा बिहार सचिवालयक कर्मचारी । नन्द दुनू बेटाकेँ लए अगिला दिन तीनू गोटेक घर गेलाह आ सभसँ नमस्कार-पाती करबओलखिन्ह । बेटा-बेटी सभ स्कूल जाए लागल छलन्हि । नन्द पाँच किलोमीटर ऑफिस पएरे जाथि आ घुरती काल घरक काज-उद्यम सेहो करैत आबथि । जेना बृहस्पतिकेँ हाट लगैत छल तँ ओतएसँ हरियर तरकारी, चाउर दालि इत्यादि आनब, ई सभ । हाट रविक छुट्टीक दिन सेहो लगैत छल आ ओहू दिन अपने जा कए सभटा घरक काज करैत छलाह । बच्चा सभक काज मात्र पढ़बा धरि सीमित छल । दूध पैकेट बला अबैत छलन्हि कारण उठाना दुहबा कए अनबामे बच्चा सभक पढ़ाइमे भाँगठ पड़ैत । बड़का बेटा जे गंगा ब्रिज कॉलोनीमे कहियो ककरो फूल उखाड़ि लैत छल आ कहियो ककरो खिड़की पर गिट्टी फेंकि दैत छल, डेढ़ सालक ग्राम प्रवासक बाद शान्त भए गेल छलन्हि । नन्दकेँ मोन छन्हि जे कॉलोनीमे एक बेर बेटाकेँ लए पड़ोसीक ओहिठाम गेल छलाह आ पड़ोसीक पत्नीसँ बेटा क्षमा याचना कएने छलखिन्ह । कारण कार्यालयसँ अएला उत्तर ज्ञात भेल छलन्हि जे बेटा हुनका पर गिट्टी फेँकने छलखिन्ह, जखन ओ बेचारी खिड़की लग ठाढ़ि बाहर दिशि किछु देखि रहल छलीह । आ छोट बेटा एक बेर कोनो पैघ बच्चाकेँ पाथर फेंकि कए मारने छलखिन्ह, जखन ओ बच्चा साइकिल पर चढ़ल छल । भेल ई छल जे ओ पैघ बच्चा कॉलोनीक एक चक्कर काटि कए साइकिल लौटेबाक अपन वचनक पालन नहि कएने छल आ घुरलाक बाद -दोसर चक्कर लगा कए अबैत छी- ई बजैत-बजैत साइकिल लए आगू बढ़ि रहल छल । छोटका बेटा क्षमा याचना करबासँ सेहो मना कए देने छलखिन्ह कारण ओ सोचैत छलाह जे हुनकर कोनो गलती नहि छलन्हि । बेश तखन एहि बेर बच्चा सभकेँ जखन नन्द पड़ोसी सभसँ भेँट करबाबए लेल गेल छलाह तावत धरि बड़का बेटा तँ पूर्णतया अपन चञ्चल स्वभावक विपरीत स्वभावक भए गेल छलाह मुदा छोट बेटा अपन स्वभावपर दुराग्रह करैत स्थिर छलाह । नन्दक दुनू बेटा वर्गमे प्रथम अबैत छलन्हि । किछु दिन धरि सभटा ठीक-ठाक चलैत रहल । पुरनका सभटा चिन्ता-फिकिर लगैत छल जेना खतम भए गेल होअए । गामक एक दू गोटे सेहो पटनामे रहैत छलाह । महिनामे एकटा रवि निश्चित छल, जाहि दिन सभ गोटे कतहु घुमए लेल जाइत छलाह । एक रवि कोनो गौँआक अहिठाम तँ कोनो आन बेर चिड़ियाखानाक यात्रा । एक बेर चिड़ियाखाना गेल रहथि सभ गोटे तँ आरुणि नन्दकेँ पुछलखिन्ह- “हमरा सभ आएल छी चिड़ियाखाना, बाहरमे बोर्ड लागल अछि बोटेनिकल गार्डेनक आ गेटक ऊपरमे लिखल अछि बायोलोजिकल गार्डेन”। “पहिने सोनपुरमेला सभमे अस्थायी चिड़ै सभक प्रदर्शन होइत छल आ लोकक जीह पर ओकरा लेल चिड़ियाखाना शब्द आबि गेल । मुदा एतए तँ कताक बीघामे वृक्ष सभ लागल अछि, प्रत्येक वृक्ष पर ओकर नाम आ वनस्पतिशास्त्रीय विवरण सेहो लिखल अछि आ ताहि द्वारे एकर नाम अंग्रेजीमे वनस्पति उद्यानक लेल बोटेनिकल गार्डन पड़ि गेल । मुदा बादमे अनुभव कएल गेल जे जन्तु आ वनस्पतिक रूपमे दू तरहक जीवविज्ञान अछि । एहि उद्यानमे वनस्पति, चिड़ै आ बाघ-सिंह इत्यादि सेहो प्रदर्शित अछि । ताहि द्वारे एकर नाम बायोलोजिकल गार्डन वा जैविक उद्यान दए देल गेल । पुरनका बोर्ड जतए-ततए रहिये गेल”। एक बेर सभ गोटे गेल रहथि एकटा गौँआक अहिठाम । ओतए चर्चा चलए लागल जे गंगा पुल केर उद्घाटन दू तीन सालसँ एहि साल होएत- अगिला साल होएत एहि तरहक चरचा अछि । नन्दसँ ओ लोकनि पुछलखिन्ह- “अहाँक बुझने कहिया धरि एहि पुलक उद्घाटन भए जएतैक । मुख्यमन्त्री तँ कहने छथि जे एहि साल एकर उद्घाटन भए जएतैक”। “कहियो नहि होएतैक । दू-तीन सालसँ तँ सुनि रहल छियैक। यावत एकटा पाया बनैत छैक तँ ओहिमे ततेक ने बालु देने रहैत छैक जे किछु दिनमे दरारि पड़ि जाइत छैक । फेर राता-राती ओकरा तोड़ि कए फेरसँ नव पाया बनेनाइ शुरू करैत जाइत अछि”। गंगा पुलक चरचा सुनि नन्दक सोझाँ पाया परसँ गंगाजीमे खसैत जोन-मजदूर सभक चित्र नाचि जाइत छलन्हि । नन्दक विवाद ठिकेदार आ संगी अभियन्ता सभसँ काजक संबंधमे होइत रहैत छलन्हि । एकटा पायाक कार्यक संबंधमे नन्द अपन विरोध प्रकट कएने छलाह, किछु दिनुका बाद ओ पाया फाटि गेल, एकटा पैघ दरारि पड़ि गेल छल बीचो-बीच । राता-राती ठिकेदार-अभियन्ता लोकनि ओकरा तोड़बेलन्हि । राति भरिमे कतहुसँ ओतेक विशाल पाया कोना टूटि सकैत छल, कैक दिन लगैत? से अगिला दिन दरारिक स्थान पर तिरपाल बिछाओल गेल, जे ककरो नजरि नहि पड़ि जाइ । एहि घटनाक चरचा बहुत दिन धरि होइत रहल । नन्दक आदर अपन नीचाँक कर्मचारीक बीच एहि घटनासँ बढ़ि गेल छलन्हि मुदा आब ठिकेदार आ अभियन्ता लोकनिक बीच नन्द रावण बनि गेल छलाह । सभ टा काज ठीक-ठाक चलि रहल छल । नन्दक बच्चा सभ गणित आ विज्ञानक अंकगणितीय प्रश्न सभ जनबरीसँ मार्च धरि बना लैत छलन्हि । मुदा घरक सभ काज किएक तँ नन्द स्वयं कए लैत छलाह, नन्दक बच्चा सभ स्कूल गेनाइ आ घर अएनाइक अतिरिक्त्त बाहरी दुनियासँ अनभिज्ञ छलाह । कतओ घुमए जाथि तँ नन्दक संगे, एक तरहेँ बुझू जे नन्दक बच्चा सभक व्यक्त्तित्व एकटा अलगे रीतिसँ निर्मित भए रहल छलन्हि । नन्द सामान्य जीवन व्यतीत कए रहल छलाह मुदा गंगा पुलक कोनो चरचा हुनकर अन्तरमनमे हुलिमालि शुरू कए दैत छलन्हि । आ ताहि द्वारे शनैः-शनैः गौँआ-घरुआक आ दोस्त-महीम लग जएबाक क्रम कम होमए लागल । फेर नञि तँ कोनो दोस्त-महीम, नञि तँ कोनो दोस्तक घर अएनाइ-गेनाइ । ओहि समयमे मीडिअम वेभक एकटा जापानी ट्रांजिस्टर नन्दक घरमे छलन्हि, वैह मनोरंजनक एकमात्र साधन छल । हुनकर बच्चा सभ एकरा रेडियो कहैत जाइ छलाह, आ नन्द बुझबैत छलखिन्ह जे रेडियो बड्ड पैघ होइत अछि, ट्रांजिस्टर आकारमे छोट होइत अछि । नन्द जखन नोकरी शुरू कएने रहथि तँ बुश कम्पनीक एकटा रेडियो गाम लए गेल छलाह । सौँसे टोलबैय्याक भीड़ जुमि गेल छल रेडियो सुनबाक लेल । मुदा ई जापानी मीडिअम वेभ रेडियो मझोला आकारक बैटरीसँ चलैत छल आ खूब बैटरी खाइत छल, माने ई ट्रांजिस्टर । बैटरी प्रायशः महिनाक दस तिथि धरि चलैत छल । बैटरी एक महिनामे एक बेर अबैत छल, महिनबारी किरानाक वस्तुजातक संग । से नन्दक बच्चा लोकनिक मनोरंजनक ओ साधन महिनामे बीस दिन काज नहि करैत छल । आ ताहि द्वारे बच्चा सभ पलंगक दुनू कात दू टा गोल पोस्ट बनबैत छलाह। ई गोल पोस्ट प्लास्टिकक एक-दोसरामे जुड़य बला खेल सामग्रीसँ बनैत छल, ई खेल सामग्री पता नहि कतेक दिनसँ घरमे पड़ल छल, प्रायः गंगा ब्रिज कॉलोनीमे कोनो संगी देने छलखिन्ह । नन्दक दुनू बेटा दुनू दिशि ककबाक स्टिकसँ खेलाइत छलाह। ए बी सी डी क कचकाराक खेल-सामग्री बॉल बनैत छल । खेलक निअम सेहो भिन्न छल। मात्र एक शॉटमे एक गोल पोस्टसँ दोसर गोल पोस्टमे गोल करए पड़ैत छल । एहि तरहक कैकटा नूतन क्रीड़ाक जनक छलाह नन्दक दुनू पुत्र। एहि तरहेँ समय बितैत गेल । बाहर एनाइ-गेनाइ किछु कम भैये गेल छल । तकर बाद दूटा घटना भेल । एक तँ छल गङ्गा पुलक उद्घाटन । आ दोसर छमाही परीक्षामे नन्दक दुनू बेटा पहिल बेर प्रथम स्थान प्राप्त नञि कए सकल छलाह । एकर बाद नन्द असहज होमए लगलाह । ओना एहि दुनू घटनामे कोनो आपसी सम्बन्ध नहि छल मुदा नन्दक अन्तर्मनक जे हुलिमालि छलन्हि से बढ़ए लगलन्हि । आब ओ किएक तँ सरकारी तन्त्रसँ न्याय नञि पाबि सकल छलाह आ पुत्र लोकनि सेहो पढ़ाइमे पिछड़ि गेल छलन्हि, से अदृश्य शक्तिक प्रति हुनक आसक्ति फेरसँ बढ़ए लगलन्हि । सभ परिणामक कारण होइत छैक आ कारणक निदान जखन दृश्य तन्त्र द्वारा नञि होइत अछि, तखन अदृश्यक प्रति लोकक आकर्षण बढ़ि जाइत अछि । आ नन्द तँ अदृश्यक प्रति पहिनहिसँ, बाल्यकालेसँ आकर्षित छलाह । “नन्द छथि”? एक गोट अधवयसू, मुँहक दाँत पान निरन्तर खएलासँ कारी रंगक भेल, पातर दुबर पिण्डश्याम रंगक, नन्दक घरक ग्रील खटखटा कए पुछलन्हि । “नहि । ऑफिससँ नहि आएल छथि मुदा आबैये बला छथि । भीतर आउ, बैसू”- नन्दक बालक कहलखिन्ह । “हम आबि रहल छी कनेक कालक बाद”। किछु कालक बाद नन्द सुरसुरायल अपन धुनमे, जेना ओ अबैत छलाह, बिना वाम-दहिन देखने, घर पहुँचलाह । पाछाँ लागल ओहो महाशय घर पहुँचलाह। नन्द हुनका देखि बाजि उठलाह- “शोभा बाबू। कतेक दिनुका बाद”। “चिन्हि गेलहुँ”- शोभा बाबू बजलाह । आ एकर उत्तरमे नन्द बैसि गेलाह आ हुनकर आँखिसँ दहो-बहो नोर चुबए लगलन्हि । “एह बताह, अखनो धरि बतहपनी गेल नञि अछि”। शोभाबाबूक अन्तर्मन एहि तरहक आदर पाबि गदगद भए रहल छल। शोभाबाबू छलाह कछबी गामक । नन्दक सभसँ पैघ बहिनक दिअर । बहिन बेचारी तँ मरिए गेल छलीह, भगिनी मामागाममे - नन्दक गाम मेहथमे- पेट दुखएलासँ अकस्माते काल-कवलित भए गेल छलीह । नन्दक बहिनौउ बढ़िया चास-बास बला घोड़ापर चढ़ि लगान वसूली लए निकलैत छलाह । मुदा भगिनीक मुइलाक बाद बहिनौउसँ सम्बन्ध कम होइत गेल छलन्हि । कोनो जानि बुझि कए नहि वरन् अनायासहि । आ आइ पचीस सालक बाद शोभाबाबूसँ पटनामे भेँट भेल छलन्हि । “ओझाजी कोना छथि। हमरासभ बहुत कहलिअन्हि जे दोसर विवाह कए लिअ मुदा नहि मानलन्हि”। “आब ओ पुरान चास-बास खतम भए गेल । जमीन्दारी खतम आ चास-बास सेहो । मुदा खरचा वैह पुरनके । से खेत बेचि-बेचि कतेक दिन काज चलितए। सभ बाहर दिस भागए लागल । मुदा हम कहलिअन्हि जे अहाँ हमरा सभसँ बहुत पैघ छी, बहुत सुख देखने छी, से अहाँ बाहर जाए कोनो छोट काज करब से हमरा सभकेँ नीक नहि लागत”। शोभा बाबू कंठमे पानक पात आबि जएबाक बहन्ना कए चुप भए गेलाह, मुदा सत्य ई छल जे हुनकर आँखि आ कंठ दुनू भावातिरेकमे अवरुद्ध भए गेल छलन्हि। किछु काल चुप रहि फेर आगाँ बाजए लगलाह- “से कहि बिना हुनकर औपचारिक अनुमति लेने घरसँ चूड़ा-गूड़ लए निकलि गेलहुँ । रने-बने सिमरिया स्नान कए नाओसँ गंगापार कएलहुँ आ सोहमे पटना पहुँचि गेलहुँ । पहिने एकटा चाहक दोकानपर किछु दिन काज कएलहुँ । ओहि दिनमे पटनामे अपन सभ दिसका लोक ओतेक मात्रामे नहि रहथि । अवस्थो कम छल । फेर कैक साल ओतए रहलहुँ, बादमे पता चलल जे एहि बीच गाममे तरह-तरहक गप उड़ल । जे मरा गेल आकि साधु बनि गेल शोभा । फेर जखन अपन चाहक दोकान खोललहुँ तखन जा कए गाम एकटा पोस्टकार्ड पठेलियैक । आब तँ बीस सालसँ बी.एन.कॉलेजिएट स्कूल लग चाहक दोकान चला रहल छी । ओतहि पानक स्टॉल सेहो लगा देने छियैक”। “सभटा दाँत टूटि गेल शोभा बाबू”। “चाहक दोकानमे रहैत-रहैत चाह पीबाक हिस्सक भए गेल । मुदा ताहिसँ कोनो दिक्कत नहि भेल । मुदा जखन पानक दोकान आबि गेल तखन गरम चाह पिबियैक आ ताहिपरसँ ठंढ़ा पान दाँत तरमे धए दियैक से ताहिसँ गरम-सर्द भेलासँ सभटा दाँत टूटि गेल”। एहि गपपर नन्द आ शोभा बाबू दुनू गोटे हँसि पड़लाह । फेर गप-शप चलए लागल । शोभाक भौजी तँ मरि गेल छलीह मुदा ज्योँ भतीजी जिबैत रहितथि तँ मेंहथ कछबीक बीच संबंध जीवित रहैत, मुदा बिपति जे आएल तँ सभटा एके बेर । नन्दकेँ मोन पड़लन्हि जे भगिनी खेलाइत छलीह पड़ोसमे आ आबि कए नन्दक माएकेँ कहलन्हि, जे फलना-अँगनाक फलना गोटे पेटपर हाथ राखि देलकन्हि आ तखने तेहन पेट-दर्द शुरू भेलन्हि जे कतबो ससारल गेलन्हि तैओ नहि ठीक भेलन्हि आ नन्दक आँखिक सोझाँमे बचियाक रहस्यमय मृत्यु भए गेलैक । शोभाबाबू कहलन्हि- “ओ बचियो टा जे जीबति रहितए तँ सम्बन्ध जुड़ल रहितए”। मुदा नन्द जेना कतहु दोसर ठाम चलि गेल छलाह । अपन ओहि विषयपर जे हुनका प्रितगर छलन्हि, बच्चेसँ । ई जे पारिवारिक जंजाल, हाटसँ तरकारी आनब, बच्चाक परीक्षाक परिणामक चिन्ता करब, ई सभ अपन अग्रजक कहलासँ कुमोनसँ कए रहल रहथि । गंगा ब्रिजक उद्घाटन भए गेल आ दुनू पुत्र वर्गमे प्रथम नहि केलकन्हि । फेर पुत्री सेहो विज्ञान लेने छलीह, अन्तर स्नातकमे, ताहूमे जीवविज्ञान । मुदा शनैः-शनैः छमाही आएल, वार्षिक परीक्षा आएल मुदा सभकेँ अंक तँ नीक आबन्हि, मुदा प्रथम स्थान नहि प्राप्त होइत छलन्हि । गंगा-ब्रिज आ परीक्षाक अंकमे तँ कोनो परस्पर संबंध नहि छल । मुदा नन्दक विश्वास माता-पिताक कर्मसँ पुत्र-पुत्रीक आगाँ बढ़बापर छल । गंगा-पुल निर्माणमे जे भ्रष्टाचार छल ओकर विरुद्ध अभियानमे हुनकर विफलता आ अग्रजक कहलापर पारिवारिक उत्तरादायित्व पूरा करबाक प्रयास एकर कारण छल । एहि बीच एक बेर बच्चा सभक काका आ नन्दक अग्रज पटना डेरापर अएलाह। नन्द गोर लागि कए कहलन्हि- “गंगा पुल देने आएल छी आकि स्टीमरसँ”। “आएल तँ छी स्टीमरसँ, बुझले नहि छलए जे गंगा पुलक उद्घाटन भए गेल छैक । से घुरब तँ पुलक रस्ते जाएब । सुनैत छियैक जे नबका-नबका डीलक्स कोच सभ ढेरक-ढेर खुजल छैक”। “नहि कोनो जरूरी नहि अछि पुलसँ जएबाक । बड्ड गड़बरी भेल छैक एकर निर्माणमे । कहियो धसि जएतैक”। अग्रजकेँ किछु बुझि नहि पड़लन्हि जे की भेल अछि नन्दकेँ । “मोन ठीक रहैत छह ने । दमा बेशी तंग तँ नहि कए रहल छह”- दुनू भाँए दमाक रोगी छलाह। “नञि से सभ ठीक अछि । मुदा अहाँक कहलासँ सभटा पुरान गप बिसरबाक चेष्टा कएलहुँ । ओहि पुल निर्माणमे जे सभ भेल, मजदूर सभक पायापर सँ घुरछाही खा कए खसब देखैत रहलहुँ, सैकड़ामे मजदूरसभ मरि गेल। आ भ्रष्टाचारसँ अपन घर भरलन्हि अभियन्ता लोकनि । आब जखन पुलक उद्घाटन भेल तखन मात्र ३० टा मजदूरक नाम शिलापर लिखि कए टाँगि देलन्हि आ सभ अभियन्ताकेँ पुरस्कारक घोषणा भए गेल । कहिया ई पुल टूटि कए खसि पड़त तकर कोनो ठेकान नहि । हम संघर्ष शुरू कएलहुँ तँ दरमाहा बन्द करा दइ गेल । सभ स्थानांतरणक बाद दरमाहा बन्द भए जाइत अछि आ परिवारकेँ गाममे छोड़ए पड़ैत अछि । अहाँक कहलासँ संघर्षकेँ छोड़ि एहि स्थानांतरणमे अएलहुँ । बिसरए चाहलहुँ सभटा । खसैत लहास, कनैत हुनकर सभक परिवार । सपनामे अबैत रहल ई सभ सहस्रबाढ़निक रूप बनि कए । हमरे सन कोनो शापित आत्मा अछि ओ सहस्रबाढ़नि जे अपन संघर्ष अधखिज्जू छोड़ि मरि गेल होएत आ आब ब्रह्माण्डमे घुरिआ रहल अछि । आब देखू तीनू बच्चाक परीक्षा परिणाम, सभदिन प्रथम करैत अबैत रहथि, आब की भए गेलन्हि। हम जे संघर्ष बीचेमे छोड़लहुँ तकर छी ई परिणाम”। नन्द हबोढ़कार भए कानए लगलाह । “धुर बताह । जे भ्रष्टाचार कएलन्हि से ने जानताह । जे मजदूर लोकनिक अधिकार मारलन्हि तिनका ने फल भेटतन्हि । अहाँ तँ अपना भरिसक संघर्ष करबे कएलहुँ । आ अपन पारिवारिक जीवन के नञि चलबैत अछि । दोसराक गलतीक द्वारे अपन बच्चासभकेँ बिलटऽ देबैक । एहिमे एकर सभक कोन कसूर छैक?” फेर दुनू भाएँक गाम-घरक गप-शप शुरू भेलन्हि । नन्द बजैत-बजैत कतहु बीचमे गुम भए जाइत छलाह । अग्रजकेँ बुझल छलन्हि जे ई बिहारि आब नहि थम्हत । बोल-भरोस दैत रहलाह मुदा बच्चेसँ देखने छथि नन्दक जिदपना, नहि जानि आब की करत । भाबहुसँ सोझाँ-सोँझी गप नहि होइत छलन्हि । मुदा अपरोक्ष सम्बोधन कए कहलन्हि- “कनियाँ आब अहींपर अछि । बच्चा सभपर ध्यान राखब”। नन्द अग्रजकेँ संग लऽ जा कए महेन्द्रूघाटमे स्टीमरपर छोड़ि अएलाह, कारण हुनका डर छलन्हि जे कतहु ई बीचेमे बससँ पुलक रस्ते नहि बिदा भए जाथि आ पुल तँ आइ नहि तँ काल्हि धसबे करत । तकर बाद ज्योतिष कुण्डली इत्यादिक खोज-बीन प्रारम्भ केलन्हि नन्द । भिन्न-भिन्न तरहक पाथर सभ, रत्न सभ बच्चा सभक हाथमे देलन्हि आ अपन आँगुरमे पहिरए लगलाह । एक बेर हनुमान चलीसा कीनि कए अनलन्हि तँ जतेक गोटे घरमे छल सभक लेल एक-एकटा आनि लेलन्हि । पाँच-दस टा फाजिले घरमे रहैत छल, लोक सभक लेल । जे बाहरसँ आबथि हुनका एक-एक टा हनुमान चलीसा पकड़ा देल जाइत छलन्हि । एहि धोखा-धोखीमे एक दिन नन्दकेँ एकटा ठक तान्त्रिकसँ भेँट भए गेलन्हि । नन्दक मनोविज्ञानकेँ ओ तेनाकेँ पकड़लक जे नन्द हुनका भगवानक दूत बुझए लगलाह । ओ तांत्रिक अपना लग सभ वस्तुक समाधान रखने छल, भ्रष्टाचारीकेँ दण्ड दिआ सकबाक, बच्चा सभक रिजल्ट नीक करेबाक, सभकेँ स्वस्थ रखबाक आ आर आर तरहक समस्या सभक । ई सभटा समस्याक समाधानक आधार छल तंत्र विज्ञान, जकर विश्वसनीयतापर कोनो प्रकारक अविश्वास नन्दकेँ कहियो नहि छलन्हि । ओ तान्त्रिक नन्दसँ गुप्त पूजा-पाठ लेल पाइ-कौड़ीक माँग करए लागल । ओ तान्त्रिक कहियो कहन्हि जे माता सपना देलन्हि अछि जे आब दुष्टक नाश होएत। आबए दिऔक आसिन, शारदीय नवरात्रमे सम्पूर्ण सिद्धि भए जएत । फेर मारि रास पूजा पाठक विधि, शवासन-योग आदि बता देलकन्हि नन्दकेँ आ नन्द ओहि सभ विधिक अनुसरण ओहिना करए लगलाह जेना एकटा विद्यार्थी अपन गुरुक पाठक अभ्यास निअमक अनुरूप करैत अछि । आसिन भरि सभ काज छोड़ि नन्द एहि सभमे लागल रहलाह मुदा आसिन आएल आ चलिओ गेल मुदा नञि किछु हेबाक छल आ ने किछु भेल । आसिनमे कहल गेल जे आब भ्रष्ट अभियन्ता सभकेँ सजा भेटबे करतैक, आबए दिऔक बरखा । एहिना साल बीति गेल मुदा सजा दिअएबाक जे समय सीमा छल से आगाँ बढ़ैत रहल । पंडितजीकेँ किछु आर्थिक समस्या सेहो अएलन्हि आ नन्दकेँ तकर भार वहन करए पड़लन्हि । घर-द्वारपर पंडितजीक बच्चा सभ सेहो तांत्रिक विद्या शुरू कए देलक। पलंगक नीचाँ भगवती- ई शब्द पंडितजी वा तांत्रिकजीक बच्चा बाजथि आ नन्द पलंगक नीचाँ भगवतीकेँ ताकए लागथि । फेर पंडितजी विवाह-दानक प्रस्ताव अपन पुत्र-पुत्रीक राखए लगलाह, नन्दक इंजीनियर भातिजसँ अपन पुत्रीक आ अपन पुत्रसँ नन्दक पुत्रीक । आब नन्दक मोन उचटि गेलन्हि, यावत अपना धरि गप सीमित छलन्हि तावत धरि स्वीकार छलन्हि मुदा बाल-बच्चाक अहित हुनका कहियो स्वीकार नहि भेलन्हि । एम्हर गामक एक-दू गोट नन्दक भातिज आ नन्दक भैया सेहो तांत्रिककेँ घरपर जाए रबाड़ि देलखिन्ह, से ओहो अन्तमे स्वीकार कए लेलक जे ओकरा कोनो तंत्र-मंत्र नहि अबैत छैक आ नहिये ओ एहि विधिसँ ककरो सजा दिआ सकैत अछि । नन्दसँ लेल पाइ ओ घुरा देत ओ ई गप सेहो कहलक, मुदा कहियो पाइ घुरा नहि सकल । नन्दक लेल ई एकटा पैघ आघात छलन्हि। भक्षी गामक ओहि तांत्रिकक घरक बगलसँ जाथि मुदा नहि तँ वैह टोकैत छलन्हि आ नहिये नन्द ओकरा टोकैत छलखिन्ह । एम्हर नन्दक पुत्रीक विवाह भए गेलन्हि आ नन्द जेना सभ दिससँ आसरा छोड़ि बिना लक्ष्यक जिनगीक पथपर आगाँ बढ़ए लगलाह । पएरे ऑफिस गेनाइ-एनाइ, साँझमे सोचैत रहनाइ । किछु ग्रंथ सभक जे पठन होइत छलन्हि सेहो बन्न भए गेल छलन्हि । बच्चा सभक संग बैसि कए जे पढ़ैत छलाह सेहो आब कहाँ भऽ पबैत छलन्हि । फगुआ आ दुर्गापूजामे गाम जेबाक जे क्रम छलन्हि सेहो आब टूटि रहल छलन्हि । पूरा परिवार आब मात्र दुर्गापूजामे गाम जाइत रहथि । मुदा नन्द फगुआमे असगरे गाम जेनाइ नञि बिसरैत छलाह । एहिना गाम जाइ आबएमे नन्द गाममे एकटा दूरक पीसाक एहिठाम जाए आबए लगलाह । पीसा कालीक भक्त रहथि । हुनकर गाम नन्दक गामक बगलमे छलन्हि । बेचारे नीक लोक । नन्द हुनका लग जाथि आ प्रवचन सुनथि । फेर हुनकासँ दीक्षा सेहो लेलन्हि । काली-सहस्रणामक पाठक अतिरिक्त आर किछु नञि, नन्द भरि दिन ओही पाठमे लागल रहथि । नन्दक मोनमे डाइन-जोगिन सभक विचार अबैत रहैत छलन्हि । आस-पड़ोसक लोककेँ शंकाक दृष्टिएँ देखैत रहैत छलाह । बच्चा-सभक संग परीक्षा दिआबय जाइत छलाह, शंकित मोने जे हुनकर कोनो शत्रु हुनकर बच्चा सभकेँ हानि नञि पहुँचाबए । मुदा पीसाजीसँ दीक्षा लेलाक बाद हुनकामे विरक्तिजनित आत्मविश्वास आएल छलन्हि । फेर सभटा काज मन्थर गतिसँ होमए लागल । बच्चा सभक पढ़ाइ-लिखाइ, ओकर सभक नोकरी-चाकरी । वैह मध्यम वर्गक जोड़ल पाइ, वैह मध्यमवर्गीय आकांक्षा । बिआह-दानक झमेला । घरक आ बाहरक छोट-मोट वाद-विवाद । बच्चा सभक विश्वसँ प्रतियोगिता करबाक साहस देखि नन्द जेना आर आश्वस्त भऽ गेल छलाह । कारण घरसँ बाहर कहियो हुनकर बच्चा सभ निकलैत नहि रहए । घर अएलाक बाद दोस-महीम सभ सेहो नहि । बाहरक दुनियाँसँ तैयो प्रतियोगिता कए रहल छल । प्रतियोगिता परीक्षाक लिखित परीक्षामे उत्तीर्ण भऽ जाइत छलाह मुदा साक्षात्कारमे भाषा आ प्रान्तक गप आबि जाइत छलन्हि । नन्द बच्चा सभक कहियो ओहि तरहक वातावरणमे पालन नञि कएने छलाह से बच्चो सभ आश्चर्यचकित भऽ जाइत छलाह जे ई कोन नव परिवेश अछि । मुदा फेर नन्दक दुनू पुत्र नोकरीमे लागि गेलाह । आरुणिसँ नन्दकेँ जतेक पैघ पदक आशा छलन्हि से तँ ओ नञि पाबि सकल रहथि मुदा भारत सरकारक बी ग्रुपक नोकरी भेटि गेल छलन्हि हुनका । जमाय सेहो अभियन्ता छलखिन्ह ओ सेहो सरकारी सेवामे लागि गेलाह । दोसर बेटा सेहो बैंकमे अधिकारी बनि गेलन्हि । सिनेमा हॉलमे १० बरखसँ सिनेमा नहि देखने रहथि नन्दक बच्चा सभ । पटनाक पूजाक मेला, पटनदेवी, गोलघर किछु नहि देखने छलाह नन्दक बच्चा सभ । एहि विषयपर पहिने तँ लोक हँसी करन्हि मुदा बादमे सभकेँ लागए जे ईएह तँ नन्दक परिवारक विशिष्टता तँ नहि बनि गेल अछि ? नन्दक घरमे टेलीविजन सेहो नहि छलन्हि ई सेहो लोक सभक लेल आश्चर्यक विषय छल । नन्द आ हुनकर सम्पूर्ण परिवार भारतीय टेलीविजनपर प्रसारित भेल रामायण धारावाहिकक एकोटा एपीसोड नहि देखने छलाह । कारण नन्दक घरमे टेलीविजन छलन्हि नहि आ क्यो गोटे दोसराक घर ओहुना नहि जाइत रहथि, टी.वी. देखए लेल जएबाक तँ प्रश्ने नहि छलए । नोकरी पकड़लाक बाद आरुणि घरमे एकटा टेलीविजन अनलन्हि । ओतए महाभारतक प्रचार देखि नन्द एक दिन पत्नीकेँ कहलखिन्ह- “अपन टी.वी.मे महाभारत किएक नहि दैत अछि ?” “अपना टी.वी.मे खाली डी.डी.१ अछि । ऊपरमे एक गोटे रहैत छथि से कहैत रहथि जे हुनका घरमे बेटा एकटा ३०० टाकामे मशीन अनलन्हि-ए । ओकरा टी.वी.मे लगा देलासँ डी.डी.मेट्रो अबैत छैक । ओहीमे महाभारत अबैत छैक । बेटा तीन हजारमे टी.वी.कीनि देलन्हि । आब तीन सए टाका अहाँ लगा कए ओ मशीन अगिला मासक दरमाहासँ आनि लेब”। “जिनकर टी.वी.छन्हि सैह तकर मशीनो अनताह”। आरुणिकेँ एहि गपक जखन पता लागलन्हि तँ हुनका हँसी लागि गेलन्हि । अगिले दिन ओहि मशीनकेँ लगबेलन्हि । अगिला रवि पिताजी जखन महाभारत देखलन्हि तँ सभ गोटे बड्ड प्रसन्न भेलाह । ओही मासमे आरुणि आर्म्स आकि हथियारक ट्रेनिंग लेल पटनासँ बाहर गेलाह । एहि एक मासक ट्रेनिंगक बीचमे दुर्गा पूजा पड़ैत रहए । पिताजी पहिल बेर दुर्गापूजामे गाम नहि गेल रहथि। आरुणि सेहो बीचमे शुक्र-शनि-रविक दुर्गापूजाक छुट्टी देखि पटना आबि गेलाह । रवि दिन रहए । महाभारत चलि रहल रहए । आरुणिक एकेटा संगी रहन्हि । ओकरा संगे आरुणि बिन खेने-पीने कोनो काजसँ बाहर गेल छलाह । संगीक संगे घरपर अएलाह। माँ दुनू गोटे लेल खेनाइ अनलखिन्ह । “बाबूजी खा लेलथि”। “हँ तऽ । तीन बजैत अछि । महाभारत देखलाक बाद खा कए सूतल छथि । अहाँ सभ खाऊ, तावत हम हुनका चाह बना कऽ दैत छियन्हि, तखने निन्न टुटतन्हि”। आरुणि दू-तीन कौर खा कऽ उठि गेलाह । हुनकर संगी कारण पुछलखिन्ह- “की भेल”? “पता नञि। घबराहटि भऽ रहल अछि”। “काल्हि ट्रेनिंगपर जएबाक अछि ने । ताहि द्वारे”। “पता नञि”। तावत भीतरसँ अबाज आएल । सभ क्यो दौगलाह। “की भेल माँ”। “देखू ने । चाह आनि कऽ देलियन्हि-हँ, मुदा आँखि खोलि कऽ देखिये नञि रहल छथि । आन दिन तँ चाहक नाम सुनिते देरी उठि कए बैसि जाइत छलाह”। नन्दक शरीर अकड़ि गेल छलन्हि । कन्ना-रोहट सुनि ऊपरमे रहनिहार एकटा डॉक्टर आला लऽ आएल छलाह आ नन्दक मृत्युक घोषणा कए देने रहथि। आरुणि अवाक गुम्म भेल ठाढ़ भऽ गेल रहथि । हुनकर संगी नञि जानि कोन बाटे अपन संगी सभकेँ बजा कऽ लऽ अनने छलाह । सभक ड्यूटी लगा देलन्हि । ककरो गेटपर तँ ककरो ड्रॉइंग रूममे । लोकक भीड़ लागए लागल छल । हुनकर संगी सभ समान बिछाओनमे समेटि बिछौना मोड़ि आरुणि लग अएलाह । “क्रिया-कर्मक तैयारी करए पड़त आरुणि । बाँसघाट धरि लऽ जएबाक व्यवस्था करए पड़त । हम जाइ छी गाड़ीक व्यवस्था करए”। “बाबूजीकेँ गामसँ बड्ड लगाव रहन्हि। कहैत रहथि जे अगिला सात जन्म धरि नगर घुमि कए नहि आएब । ओना बा केर दाह संस्कार बाबूजी पटनेमे कएने रहथि । मुदा ओहि समयमे पटनाक ई गंगा-ब्रिज नहि रहए । आब तँ गाड़ीसँ हिनका लऽ गेल जा सकैत अछि, तखन दाह-संस्कार भोरमे गामेमे भऽ जएत”। “हम व्यवस्था करैत छी”। आरुणिक ओ संगी हनुमाने छल । कनी कालमे गाड़ी आबि गेल । रस्तामे पुलिस लाश देखि रोकत से समस्या आएल। “अहाँ लग वर्दी बला परिचय-पत्र तँ हएत ने”। “हँ, अछि”। “ओना दिक्कत अएबाक तँ नहि चाही मुदा ज्योँ रस्तामे पुलिस टोकए तँ देखा देबए”। घर खाली भऽ गेल । ताला लागि गेल । दुनू भाए आ माए मृत पिताक संग शुक्लपक्षक ओहि रातिमे पटना नगरसँ निकलि गेलाह । गंगा-ब्रिजपर गाड़ी ठाढ़ भेल । मृत व्यक्तिक एकटा सूची टाँगल छल, जोन-मजदूरक । ई सभ पुल बनेबामे खसि कऽ मरि गेल छलाह । आरुणि गाड़ीसँ उतरि सूची देखैत छथि । उराँव, झा आ आर मारते रास मजदूर। एकटा “झा” उपाधिक मजदूर, बेशी आदिवासी उपाधिक! बहुत रास मूइल छलाह, कताक सैकड़ामे मुदा राता-राति पुलिसक मदतिसँ अभियन्ता-ठिकेदारसभ लहास भसिया दैत छलाह। ३० गोटेक नाम मुदा छल एतए । “पायाक ऊपरसँ घुरिया-घुरिया कऽ खसैत मजदूर, कतेक ठाम हम सूचना देने रही, कोनो सुनबाहि नञि भेल । ओकरा सभकेँ न्याय नञि दिआ सकलहुँ तँ लगैत अछि जे दोषी हमहू छी”। नन्दक डायरीक ई अंश एक बेर आरुणि पढ़ने छलाह । ओ सोचलन्हि जे चलू घुरि कऽ आएब तखन बाबूजीक डायरी ताकब, कतए छन्हि। फेर गाड़ी आगाँ बढ़ल । गंगा ब्रिज पाछाँ छुटि गेल । आगाँ गंगा-ब्रिज कॉलोनी आएल । आरुणिक बालकथाक साक्षी । स्कूल, घर आ खेलेबाक मैदान। सटले गंगा ब्रिजक गोडॉन । कताक बेर चोरिक समान ट्रकसँ एतएसँ निकलैत छल, एकाध बेर धरायल छल । बड़का धराएल ट्रक, कतेक चक्का बला, लोक गुमटीलग मेला जेना देखए पहुँचैत छलए । बच्चा-सभ ट्रकक चक्का गनैत छलाह, १४ चक्का बला अछि वा १६ चक्का बला। जीवनक प्रतियोगितामे सभटा जेना बिसरि गेल छलाह आरुणि । भ्रष्टाचार, जोन-बोनिहारक मृत्यु, पिताक संघर्ष सभटा सोझाँ आबि रहल अछि मुदा आब। “फेरसँ सोझाँ आएल ई सभटा, पिताक स्मृति बनि कऽ मुदा पिताक हारि बनि कए तँ नञि । ई नाम आरुणि किएक हमरा लेल चुनने छलाह बाबूजी”। “की बजलहुँ बेटा”- माँ पुछलखिन्ह। “नहि । ई कॉलोनी देखि कऽ किछु मोन पड़ि गेल”। “नहि देखू ई पपियाहा कॉलोनीकेँ”। गंगा-ब्रिजक चरचा घरमे टैबू बनि गेल रहए । आरुणिकेँ बुझल छन्हि ई । मुदा एकटा आर प्रारम्भ तँ नञि भऽ जएत । आरुणिक प्रश्नसँ माँ भीतरसँ घबरा गेल छलीह । आब जे चुप्पी पसरल से गामेमे जा कए खतम भेल । रस्तामे एकटा प्रकाश खण्ड टूटि कए खसल सहस्रबाढ़नि नहि ओकर न्यून रूप, छाड़नि । अग्रज मृत भाएक मुँह पकड़ि कानए लगलाह । “एहन भैयारी ककर हेतए । धुर बताह, पैघ भायकेँ क्यो छोड़ि कऽ पहिने चलि जाइत अछि । कहियो नहि कनेने छलह तँ आइ किए कनबा रहल छह”। सौँसे टोल जुटि आएल छल । समाचार सुनलाक बाद ककरो घरमे खेनाइ नहि बनल छलैक । पता नञि के ककरा टेलीफोन कऽ देने रहैक जे समाचार एतए पहुँचि गेल रहए । “कलममे बाबूक सारा लग दाह हेतन्हि”, अग्रजक एहि इच्छाक बाद लहास ओतए गेल । कान्हपर उठा कए सभ पहुँचलाह कलम-गाछी । “देखियौ, केना मूँहपर हँसी छैक, एको रत्ती मूइल लगैत अछि”- नन्दक अग्रज बजलाह। आरुणिक पैघ भाए जखने अपन आगि लेल हाथ पिताक दिस बढ़ेलन्हि आकि ओ विचलित सन भऽ गेलाह । काका भरोस देलखिन्ह । आगिमे मिलैत गेल ओ मृत शरीर, पुनः घुरि अएबाक कोनो सम्भावनाकेँ खतम करैत । सभटा विध-व्यवहार, लगैत रहए जेना ककरो मृत्युक नहि वरन् कोनो पाबनिक इन्तजाम-बात भऽ रहल अछि, धूम-धामसँ । महापात्र आकि कंटाहा ब्राह्मणक निर्देशानुसार होइत श्राद्धकर्म आ साँझक पाठ गरुड़-पुराणक अविश्वसनीय विवरणक । सभ सम्पन्न भऽ गेल । परम शांति आ कि घोर कोलाहल । अपन अतीतक पुनर्विश्लेषणमे रत रहबाक घटनाक्रम हुनका मोन पड़ि जाइत छन्हि । आरुणि ठाकुर किछु अस्वस्थ रहथि आ कलकत्तामे वुडलैण्ड नर्सिंग होमक समीपस्थ स्थित विशालकाय अपार्टमेंटक अपन फ्लैटमे असगरहि अस्वस्थ स्थितिमे अध्यावसनमे लीन । अशांतिक क्षण हुनका रहि-रहि कए अनायासहि मोन पड़ि रहल छन्हि । जखन ओ अपन समस्या सभ अपन हित-संबंधी सभकेँ सुना कए अपन मोनक भार कम करैत रहथि । शनैः-शनैः समस्या सभ बढ़ैते चल गेल एतेक धरि जे आब दोसरकेँ सुनेलापरांत मोन आर उचटि जाइत छलन्हि । ताहि द्वारे आब ओ अपने धरि सीमित रहए लगलाह । हित संबंधी सभ बुझय लगलाह जे आरुणि समस्यासँ रहित भए गेल छथि । बच्चेसँ सपनामे भयावह चीज सभ देखाइ पड़ैत छलन्हि आरुणिकेँ । अखन धरि हुनका मोन छन्हि कोना आध-आध पहर रातिमे ओ घामे-पसीने भऽ जाइत रहथि आ हुनकर माता-पिता चिंतित भऽ बीयनि होकैत रहैत छलखिन्ह । पिताक-पिता आ तकर जन्मदाता के? भगवान ज्योँ सभक पूर्वज तखन हुनकर पूर्वजके ? लोकसभ एहि प्रश्न सभकेँ हँसीमे उड़ा दैत छलाह, किन्तु बादमे जखन आरुणि दर्शनशास्त्र पढ़लन्हि तखन हुनका पता चललन्हि जे एकर उत्तरक हेतु कतेक ऋषि-मुनि सेहो अपन जीवन समर्पित कए चुकल छथि, मुदा ई प्रश्न एखनो अनुत्तरिते अछि । अस्वस्थताक स्थितिमे फेरसँ ई सभ अनुत्तरित प्रश्न हुनका समक्ष स्वप्न बनि आबि गेल छन्हि । कखनोकेँ निन्दमे हुनका लगन्हि जे ओ घरक छत पर छथि आ नहि चाहितो शनैः-शनैः छतक बिन घेरल भाग दिशि गेल जा रहल छथि । गुरुत्वक कोनो शक्ति हुनका खीचि रहल छन्हि सहस्रबाढ़नि सन बड़का झोँटाबलाक देहक गुरुत्व शक्ति । तावत धरि जावत ओ नीचाँ नहि खसि पड़ैत छथि । की ई छल कोनो प्रारब्धक दिशानिर्देश आकि कोनो भविष्यक दुर्घटनासँ बचबाक संदेश ? किछु दिन धरि तँ आरुणि सुतबाक सही समयक पता लगबैत रहलाह परंतु शनैः-शनैः हुनका ई पता लागि गेलन्हि जे स्वप्न आ निन्न एहि जीवनक दूटा एहन रहस्य अछि जे नियम विरुद्ध अछि आ अनुत्तरित अछि । आ आरुणि पैघ भेलथि, फेर हुनकर पढ़ाइ शुरु कएल गेल- अगस्त्यक स्तोत्र- सरस्वति नमस्तुभ्यम वरदे कामरूपिणी, विद्यारम्भम् करिष्यामि सिद्धिर्भवतुमे सदा । श्रीगणेषजीक अंकुशक संग गौरिशंकरक अभ्यर्थना सिद्धिरस्तु । साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वसिनी, उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिःपतिः,सिद्धिःसाध्ये सतामस्तु प्रसदांतस्य धूर्जटेः, जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला । एहि श्लोककेँ बजैत काल प्रायः आरुणि पशुपतिःपतिःक सामवेदीय तारतम्यक बाद अनायासहि हा हा कऽ कए जोरसँ हँसए लगैत छलाह आ बीचहि मे रुकि जाइत छलाह । पिता सोचलन्हि जे कम वयसमे पढ़ाइ शुरु केलासँ आरुणिक कुर्सी पर बैसि कऽ माथपर हाथ राखि कऽ बैसबाक आदति तँ खतम होएतन्हि । माएक एकटा गप्प हुनका पसिन्न नहि छलन्हि। ओ बिच्चमे गप्प करैत-करैत आरुणिक बातकेँ अनठिया दैत छलथिन्ह। एकबेर माएक कोनो संगी आएल छलीह। आरुणिक कोनो बातपर माए ध्यान नहि दऽ रहल छलीह। आरुणिक हाथमे भरि घरक चाभीक झाबा छलन्हि तेँ ओ कहलखिन्ह जे ज्योँ हुनकर बात नहि सुनल जएतन्हि तँ ओ झाबाकेँ सोझाँक डबरामे फेकि देताह। माए सोचलन्हि जे हाँ-हाँ केलापर झाबा फेकियेटा देताह तैँ आर अनठिया देलखिन्ह। परिणाम दुनु तरहेँ एके हेबाक छल। चाभी बहुत खोज केलो पर नहि भेटल। एखनो घरक सभ अलमीरा आदिक चाभी डुप्लीकेट अछि। एतेक दिनक बाद ई सभ सोचि आरुणिक मुँहपर अनायासहि मुस्की आबि गेलन्हि।सिद्धांतवादी पिताकेँ नोकरीमे किछु ने किछु दिक्कत होइते रहैत छलन्हि ताहि द्वारे ओ आरुणिकेँ जल्दी सँ जल्दी पैघ देखए चाहैत छलाह। तेसर सँ सोझे पाँचम वर्गमे फनबा देल गेलन्हि।फेर भेल ई जे होलीक छुट्टीमे निअमानुसार सभ गोटे गाम गेल छलाह। होली आ दुर्गापूजामे सभ बेर गाम जएबाक नियम जेकाँ छलैक। पिताजी सभकेँ छोड़ि कए वापिस भए गेलाह। फेर दरमाहा बन्द भऽ गेल छलन्हि प्राय़ः यैह चिट्ठी गाम आएल छल जे आब सभकेँ गामहि मे रहए पड़तन्हि। माए तँ कानए लगलीह मुदा आरुणि खूब प्रसन्न भेलाह। मुदा सरकारी स्कूलमे ओहि समय वर्गक आगाँमे नवीन- ई लगा कए एक वर्ग कममे लिखबाक गलत परम्परा नवीन शिक्षा नीतिक आलोकमे लेल गेल छलैक कारण नवीन नीतिमे आर किछुओ नवीन नहि छल। पिताजीकेँ जखन एहि बातक पता चललन्हि तँ ओ तमसायलो छलाह आ एकर प्रतिकार स्वरूप पाँचम क्लासक बाद जखन ओ सभ शहर वापस अएलाह तँ आरुणिकेँ फेर एक वर्ग तरपा कए सोझे छठम वर्गक बदलामे सातम वर्गमे नाम लिखवा देलन्हि। छठम वर्गक विज्ञान आ गणितक पढ़ाइ पाँचमे वर्गमे कए लेबाक पिताक निर्देशक उद्देश्यक जानकारी आरुणिकेँ तखन जा कए भेलन्हि जखन प्रवेश-परीक्षामे यैह दुनु विषय पूछल गेल आ आरुणि छट्ठा आ सतमा दुनु वर्गक प्रवेश परीक्षामे बैसलाह आ सफल भेलाह। बहुत दिन बाद धरि जखन क्यो आनो संदर्भमे छठम वर्गक चर्चा करैत छल तँ आरुणिकेँ किछु अनभिज्ञताक बोध होइत छलन्हि।गामक प्रवासमे एकबेर आरुणि पिताकेँ चिट्ठी लिखने छलाह कारण हुनकर जुत्ता शहरेमे छूटि गेल छलन्हि। जुत्तातँ आबिये गेलन्हि संगहि चिट्ठीमे आरुणिक लिखल तीन टा शाब्दिक गलतीक विवरण सेहो आएल आ ईहो मोन पाड़ल गेल जे एकबेर दौगि कए गणितक प्रश्न हल करबाक प्रतियोगितामे तीनक बदला हरबड़ीमे दुइयेटा प्रश्नकेँ हल कऽ कए आरुणि कोना अपन कॉपी जमा कए देने छलाह। हुनकर स्वभावमे क्रोधक प्रवेश कखन भेलन्हि से तँ हुनको नहि बुझबामे अएलन्हि मुदा पिताजी हुनका “क्रोधक समान कोनो दोसर रिपु नहि” एहि संस्कृत श्लोकक दस बेर पाठ करबाक निर्देश देने छलखिन्ह- से धरि मोन छन्हि। एकटा घटना सेहो भेल छल जाहिमे स्कूलमे एकटा बच्चा झगड़ाक मध्य सिलेटसँ हुनकर माथ फोड़ि देने छलन्हि। आरुणि सेहो सिलेट उठेलथि मुदा ई सोचि जे ओकर माथ फूटि जएतैक हाथ रोकि लेने छलाह। एकर परिणामस्वरूप हुनकर पिता दू गोट काज केलन्हि। एक तँ हुनकर सिलेटकेँ बदलि कए लोहाक बदला लकड़ीक कोरबला सिलेट देलखिन्ह जकर कोनो ने कोनो भागक लकड़ी खुजि जाइत छलैक आ दोसर जे कॉलोनीमे समकक्ष अधिकारीक बैठक बजा कए कॉलोनी-अहिमे स्कूल खोलि देल गेल जतए आरुणि पढ़ए लगलाह। बादमे क्यो पंडित जखन वाल्मीकि रामायणक सुन्दरकाण्डक पाठ तँ क्यो ज्योतिष कँगुरिया आँगुरमे मोती आ कि मूनस्टोन पहिरबाक सलाह क्रोध कम करबाक लेल देबए लगैत छलाह तँ ओ संस्कृत श्लोक हुनका मोन पड़ि जाइत छलन्हि। बाल संस्कारक अंतर्गत सहायता माँगबामे आ समझौता करबामे अखनो हुनका असहजता अनुभव होइत छन्हि। मुदा हारि आ जीत दुनुकेँ बराबर बूझि युद्ध करबाक विश्वास हुनकामे नहि रहलन्हि। आ विजय हुनकर लक्ष्य बनैत गेलन्हि शनैः-शनैः। जकर ओ जी-जानसँ मदति कएलन्हि सेहो समयपर हुनकर संग देलकन्हि। समय-समय पर कएल गेल समझौता सभ हुनकर संघर्षकेँ कम केलकन्हि। जतेकसँ दोस्तियारी छलन्हि तकरे निभेनाइ मुश्किल भए रहल छलन्हि। फेर तँ नव शहरमे नव संगीक हेतु स्थान नहि बचल। महत्वाकांक्षाक अंत नहि आ जीवन जीबाक कला सभक अद्वितीय अछि। आरुणि ई नाम आब कखनो-कखनो घरमे सुनाइ पड़ैत छल। कलकत्ता शहर प्रतिभाक पूजा करैत अछि। मुदा व्यवसायी होएबामे एकटा बाधा छल - अंग्रेजीक संग बाङलाक ज्ञान जे ओ बाट चलैत सीखि गेलाह। व्यस्त जीवनमे बीमारीक स्थिति-अहिमे हुनका आराम भेटैत छलन्हि। बीमारियेमे सोचबाक आदति मोन पड़ैत छलन्हि। आ ई फ्लैट किनलाक बाद माएकेँ सेहो बजा लेलखिन्ह। ओना हुनका बुझल छलन्हि जे माए एहि सभसँ प्रभावित नहि होएतीह। कारण ओ अधिकारी पत्नी छलीह आ पुत्रकेँ सेहो ओहि रूपमे देखबाक कामना छलन्हि। ई नव शहर हुनक पुत्रक व्यक्तित्वमे सैद्धांतिकताक स्थानपर प्रायोगिकताक प्रतिशतता बढ़ा देने छलन्हि। आब समयाभावक कारण स्वास्थ्य खराब भेलेपरांत सोचबोक समय पुत्रकेँ भेटैत छलन्हि।व्यवसायमे सफलता प्राप्तिक पूर्व आरुणि एकटा कागजक प्रिंटिंग प्रेसमे काज केनाइ शुरु केलन्हि। अपन मित्रवत प्रिंटिंग प्रेस मालिकसँ दरमाहाक बदला पर्सेंटेज पर काज करबाक आग्रह केलन्हि। ऑर्डर आनि बाइंडिंग आ प्रिंटिंग करबाबथि आ आस्ते-आस्ते अपन एकटा प्रिंटिंग प्रेस लगओलथि। किछु गोटे हिनका अहिठामसँ छपाइ करबा कए ग्राहककेँ बेचथि। हुनका जखन एहि बातक पता चललन्हि तँ ओ एकटा चलाकी केलथि जे सभ बंडलमे अपन प्रेसक कैलेंडर धऽ देलखिन्ह। जखन अंतिम उपभोक्ताकेँ पता चललैक जे ओ सभ अनावश्यके दलालक माध्यमसँ समान कीनि रहल छलाह तँ ओ सभ सोझे आरुणि प्रिंटिंग प्रेसकेँ ऑर्डर देबए लागल। आरुणिकेँ घरमे अपन नाम कखनहुँ काले सुनि पड़न्हि। किताबक ऊपर छपल हुनकर नाम तँ कोनो कंपनीक छलैक- आ ओ ओकरासँ निकटता अनुभव नहि कऽ पाबि सकैत छलाह। संसारक कुचालि हुनकर पिताक संघर्षक अंत केने छलन्हि मुदा आरुणि व्यावसायिक युद्ध मस्तिष्कसँ लड़ैत आ जितैत गेलाह।माएक अएलाक बाद आरुणि ई नाम बीसो बेर दिन भरिमे सुनाइ पड़ए लागल। ओकर संगी लोकनि उपरोक्त व्यावसायिक सफलताक घटना सभकेँ जखन आरुणिक माएकेँ सुनबैत रहैत छलाह, ई सोचि जे ओ अपन मित्रक बड़ाइ कऽ रहल छलाह तँ आरुणि असहजताक अनुभव करए लगैत छलाह आ गप्पकेँ दोसर दिशि मोड़ि दैत छलाह। हुनकर माए तँ जेना हुनक विवाहक हेतु आएल छलीह। माय जखन जिद्द ठानलन्हि तँ हुनका आश्चर्य भेलन्हि कारण घरमे जिद्दक एकाधिकार तँ हुनकेटा छलन्हि। मुदा माए बूझि गेल छलीह जे हुनकर बेटा प्रैक्टिकल भए गेल छन्हि आ जिद्द केनाइ बिसरि गेल छन्हि। आरुणि सोचलन्हि जे छोटमे बड्ड जिद्द पूरा करबओने छथि तेँ आब हिनकर जिद्द पूरा करबाक समय आएल अछि। विवाह फेर बच्चा। माए अपन नातिमे पतिक रूप देखलन्हि। पतिक मृत्युक पहिनहि बेटा प्रैक्टिकल बनि गेल छलन्हि। मुदा आब ई नहि होएत। जे काज बेटा नहि कए सकल से आब नैत करत। नातिक नाममे बेटा आ पति दुहुक नामक समावेश केलन्हि- आरुणि नन्द। फेर पढ़ाइ शुरु- सिद्धरस्तु-श्री गणेशजीक अंकुश आ वैह उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिःपतिः। हुनकर बेटाकेँ पति पढ़ेलखिन्ह ओ तँ घर सम्हारैत छलीह। आब पुतोहु घर सम्हारलन्हि, बेटाकेँ तँ फुरसतिये नहि। आब बा पढेतीह नातिकेँ। उतपत्स्येत हिमम कोऽपि समानधर्मा कालोह्यम निरवधिर्विपुला च पृथ्वी। पृथ्वी विशाल अछि आ काल निस्सीम,अनंत, एहि हेतु विश्वास अछि जे आइ नहि तँ काल्हि क्यो ने क्यो हमर प्रयासकेँ सार्थक बनाएत। आरुणि अपनाकेँ अपन माएसँ दूर अनुभव केलन्हि, किछु अस्वस्थ सेहो छथि आ वुडलैण्ड नर्सिंग होमक समीपस्थ स्थित विशालकाय अपार्टमेंटक अपन फ्लैटमे असगरहि अध्यावसनमे लीन अपन अतीतक पुनर्विश्लेषणमे रत छथि। प्रतियोगिता परीक्षा सभक उमरि बाकी छलन्हिये से दू चारिटा परीक्षामे बैसि गेलाह आ केन्द्र सरकारक ई ग्रुप बी वर्दीबला अधिकारी बनि गेलाह। माँकेँ कनेक संतोख भेलन्हि जे क्लास वन नहि मुदा सरकारी नोकरी तँ केलक, ई बिजनेस-तिजनेस तँ छोड़लक। “चलह कनेक खा लैह, एना केने काज नहि चलतह”। आरुणिक छोटका मामा प्रेमपूर्वक दबाड़ि कए कहलन्हि। क्रिया-कर्म खतम भऽ गेल छल आब घुरबाक बेर आबि गेल छल, नोकरीक संग पिताक मार्गपर घुरबाक सेहो। १९९५ क नवम्बरक मास। केश कटायल मुँहेँ गामसँ दरिभङ्गा आ ओतएसँ पटनाक बस पर चढ़लाह आरुणि। किछु किताब बेचिनहार अएलाह, तुक मिलेने सभ किताबक विशेषता कहि सुनओलन्हि।खिस्सा-पिहानी, उपचार, फूलन-देवी सँ लए मनोहर पोथी धरि सभ यात्रीगणकेँ एक-एक टा पड़सैत गेलाह।ओहिमे सँ किछु मोल-मोलाइ कएलाक उत्तर बिकएबो कएलन्हि आ सभटा वापस लए जाइत गेलाह। बससँ उतरैत काल कंडक्टरसँ वाद-विवाद सेहो भेलन्हि। फेर नेबोक रस निकालबाक यंत्रक आविष्कारक चढ़लाह, रस निकालि देखओलन्हि, खलासीसँ वाद-विवादक उपरांत ओहो उतरि गेलाह।फेर ककबा बला, पेन बला आ पेचकश बला सभ चढ़ि कए उतरैत गेलाह। पुछलाक उपरांत पता लागलन्हि जे गाड़ी साढ़े दस बजे खुजत, ई गप्प बस बला झुट्ठे बाजल छल। पछुलका बसक सवारीकेँ सीट नहि भेटल छलन्हि, से बेशी अबेरो नहि होएत आ सीटो भेटि जएत, एहि तर्कक संग मार्केटिंगक उपकरणक रूपमे ई शस्त्र छोड़ल गेल छल। गाड़ी खुजबाक समय छल ११ बजे मुदा ११ बाजि कए पाँच मिनट धरि बहस होइत रहल जे घड़ीमे ११ बाजल अछि आकि नहि। पाछाँ एगारह बाजि कए दस मिनट पर जखन बादमे जाएबला बसक कंडक्टर, अशोक मिश्रा आ शाहीक बसक बीचक भिड़ंतक बात कए झगड़ा बजारि देलक -जे एको सेकेंड ज्योँ लेट होएत तँ जे बुझु से भए जएत- तखन ड्राइवर अकस्माते हॉर्न बजाबए लागल। आरुणिक बगलक सीट पर बैसलि एकटा बूढ़ि बेटाकेँ जोरसँ बजाबए लगलीह, पाँच मिनट गरदम गोल होइत रहल। सभ यात्री चढ़ि गेलाह आ दू-चारिटा यात्री जे अखने रिक्शासँ उतरल छलाह, जोर-जोरसँ बाजए लगलाह। पछुलका बस बला हुनकर मोटा-चोटा उठा कए अपना बसमे लऽ जाए चाहैत छलन्हि मुदा ओ लोकनि पढ़ल लिखल छलाह आ अगुलके बससँ जाए चाहैत छलाह। ओ लोकनि दू-चारिटा चौधरी-कुँअरक नाम-गाम गनओलन्हि, तखन ओहि बस बलाकेँ बुझओलैक जे ई सभ फसादी लोक सभ अछि- से कहलक जे टू बाइ टूक बदला ओहि टू बाइ थ्री धक्कागाड़ीमे ठाढ़े जएबाके ज्योँ इच्छा अछि तँ हम की करू- किरायो ओ एको पाइ कम नहि लेत। से दू-चारि गोट बेशी यात्री लेबाक मनसूबा पूरा भेलाक बाद ड्राइवर गाड़ी हाँकि देलक। ओहि रिक्शा-सभ परसँ एक गोट अधवयसू व्यक्ति चढ़ल छलाह ।संयोग ई भेल जे आरुणिक दोसर बगलमे बैसल व्यक्ति गुनधुन करैत छलाह जे फलनाँ बड़ा बूड़ि अछि, एखन धरि नहि आएल। गाड़ी खुजलाक बाद अगिला चौक पर असकसा कए ओ उतरि गेलाह आ तकर बाद ओहि टू बाइ थ्री ग़ाड़ीक तीन सीट बला हीसमे आरुणिक बगलमे ओहि सज्जनकेँ जगह भेटि गेलन्हि। आरुणिक मोन स्थिर छलन्हि आ बेशी बजबाक इच्छा नहि छलन्हि। मुदा बगलगीर पहिने अप्पन भाग्यकेँ धन्यवाद देलन्हि जकर प्रतापे हुनका सीट भेटलन्हि। पटनामे आवश्यक कार्य छलन्हि तेँ लेट जाएबला बससँ गेला उत्तर काजमे भाङठ पड़ितन्हि। फेर अप्पन परिचय असिस्टेंट डायरेक्टरक रूपमे देलाक उपरांत ई सूचना देलन्हि जे दरिभङ्गाक संग पटनोमे हुनकर मकान छन्हि। दुनू घर अप्पन पुरुषार्थसँ बनएबाक गप्पक संग, दुनू घरक दुमहला आ मारबल आ ग्रेनाइटसँ युक्त होएबाक बातो कहलन्हि। बजबैका लोक केँ सुनिनिहार लोक बड्ड पसिन्न पड़ैत अछि से ओ आरुणिकेँ पसिन्न करए लगलाह। आ तेँ पुछलन्हि- “पटनामे अपनेक मकान कोन महल्लामे अछि”। आरुणि कहलखिन्ह- “अप्पन मकान नहि अछि,किराया पर छी”। किछु कालक शांतिक पश्चात ओ सज्जन पनबट्टीसँ पान बहार कए आरुणिसँ पुछलन्हि जे- “पान खाइत छी”। “नहि”। एहि उत्तरक पश्चात अप्पन विशेषज्ञता देखबैत ओ कहलन्हि, जे- “हम तँ अहाँक दाँते देखि कए बुझि गेल छलहुँ”। पान खेलाक बाद अप्पन बेटी सभक सासुरक चर्चा कएलन्हि। बेटाक आइ.ए.एस. केर तैयारी करबाक गप्प कएलन्हि आ कोनो ग्रुपक चर्चा सेहो कएलन्हि जे विद्यार्थी लोकनिक बीच एहि तैयारीक हेतु तैयार भेल छल आ ओहि ग्रुपमे प्रवेश मात्र प्रतिभावान लोकनिक हेतु सीमित छल। फेर आखिरीमे ईहो कहलन्हि जे ओहि प्रतिभावान ग्रुपक सदस्यता हुनकर पुत्रकेँ सेहो प्राप्त छन्हि। आगाँ बढ़ैत-बढ़ैत गाड़ी एकटा लाइन होटल पर ठाढ़ भेल। किछु यात्री एकर विरोध कएलन्हि। एक गोटे कहलन्हि जे ई ड्राइवर-कंडक्टर खेनाइ खएबाक द्वारे एहि घटिया लाइन होटलमे गाड़ी रोकैत अछि। एकर सभक खेनाइ एतए मुफ्तिया छैक आ संगहि सूचना भेटल जे मुफ्तिया की रहतैक ओकर सभक बिल यात्रीगणसँ परोक्ष रूपमे लेल जाइत छैक आ बुझु जे एकर सभक बिल यात्री सभ भरैत छथि। हुनकर ईहो अपील छलन्हि जे क्यो गोटे नहि उतरए आ हारि कऽ बसकेँ स्टार्ट करए पड़तैक। किछु कालक उपरांत एकाएकी सभ गोटे उतरैत गेलाह आ ओ सज्जन सेहो खिसियाएल उतरि फराक भऽ ठाढ़ भए मिथिलांचलक दुर्दशाक कारणक व्याख्यामे हुनकर गप्प नहि मानबाक मनोवृत्तिकेँ सेहो दोषी करारि देलथिन्ह। गाड़ी फेर खुजल आ किछु दूर आगू जा कए धक्काक संग ठाढ़ भए गेल। कंडक्टर कहलक जे सभ उतरैत जाऊ। गाड़ी पंक्चर भए गेल। लाइन होटल पर गाड़ी नहि रोकबाक अपील केनिहार सज्जनक मत छलन्हि जे लाइन होटलपर जे गाड़ी ठाढ़ भेल, तखनेसँ जतरा खराब भए गेल अछि। आब आगू देखू की-की होइत अछि। नीचाँ उतरलाक बाद चारि-चारि, पाँच-पाँच गोटेक गोला बनि गेल। ई जगह प्रायः वैशालीक आसपास छल। एक गोटे खेतक विस्तारक दिशि ध्यान देलन्हि। घर सभक ऐल-फैल होएबाक सेहो चर्चा भेल। संगहि हुनकर सभक गाम दिशि घर पर घर आ चार पर चार चढ़ल रहैत अछि आ से झगड़ाक कारण अछि, अहू पर चर्चा भेल। आरुणिक बगलमे जे अधवयसू व्यक्ति रहथि से किछु औंघायल सन छलाह किएक तँ एहि व्यवधानसँ हुनका जे कनी-मनी भक्क लागल छलन्हि से टूटि गेल छलन्हि। हुनकर बकार लाइन होटल पर आकि नीचाँ ठाढ़ भेलापर मन्द भऽ गेल छलन्हि, से आरुणि अनुभव कएलन्हि। फेर बस चलि पड़ल आ ओ सज्जन पुनः शुरू भए गेलाह। हाजीपुर शहर अएलापर तँ हुनक स्मृति आर तीक्ष्ण भऽ गेलन्हि। किछु काल बस चलल तँ एकटा कॉलोनीक दिशि इशारा कए ओ कहलन्हि- “ई छी गंगा ब्रिज कॉलोनी, की छल आ आब की भऽ गेल अछि। एक भागमे रहबाक हेतु क्वॉर्टर आ दोसर भागमे गिट्टी-छड़-सीमेंट सभ भरल रहैत छल। आब तँ कॉलोनीक मेंटेनेंसो नहि भए रहल अछि”। आरुणि चौँकि गेलाह। कहलन्हि- “एतय एकटा स्कूलो तँ छल”। ओ सोझाँ इशारा दैत देखेलन्हि- “देखू, ओतए नामो लिखल अछि। बरखा बुन्नीमे नाम अदहा-छिदहा मेटा गेल अछि”- फेर ओ चौँकि कए पुछलन्हि- “अहाँकेँ कोना बुझल अछि”। -हम एहि स्कूलमे पढ़ने छी। -मुदा एहि कॉलोनीमे तँ गंगा पुल निर्माणक अभियंता लोकनि मात्र रहैत छलाह आ स्कूलमे हुनके बच्चा सभकेँ पढ़बाक हेतु एहि स्कूलक निर्माण भेल छल। -हम सभ अही कॉलोनीमे रहैत छलहुँ। -अहाँक पिताक नाम की छी। -श्री नन्द ठाकुर। पिताक मृत्यु पंद्रह दिन पहिनहि भेल रहन्हि से स्वर्गीय कहबाक हिस्सक नहि पड़ल छलन्हि। -अहाँ ठाकुरजीक पुत्र छी। ई कहि आरुणि दिशि ओ अपनत्वसँ बेशी ममत्वक दृष्टि देलन्हि। “अहाँक नाम की छी”। आरुणि पुछलखिन्ह। “आइ.ए.आजम” - ओ उत्तर देलन्हि। तखन आरुणि हुनकर सभटा बच्चाक नाम गना देलखिन्ह। हुनकर एकटा बेटा नेहाल आजम आरुणिक क्लासमे पढ़ैत छल। आब हुनकर स्वर बदलि गेलन्हि। -कॉलोनीमे दू गोटे खूब पूजा करैत छलाह। एकटा पाण्डे जी आ दोसर अहाँक पिताजी। पाण्डेजी तँ पूजाक संग पाइयो कमाइत छलाह। मुदा अहाँक पिताजी छलाह पूर्ण ईमानदार आ दयालु। चंदा कए होम्योपैथिक दवाइ कानपुरसँ अनैत छलाह, आ मुफ्त इलाज कॉलोनी बलाकेँ दैत छलाह। हमर बेटीक माथमे बड़का गूर भए गेल छलैक। कोनो एलोपैथिक बलासँ ठीक नहि भेल छलैक। अहींक पिताजी ओकरा ठीक केने छलखिन्ह। इंजीनियर रहितहुँ होम्योपैथीक डिग्री हुनका रहन्हि। ड्राइंग रूममे होम्योपैथीक छोट-पैघ, सादा-रंगीन शीशी सभ आरुणिक आँखिक सोझाँ आबि गेल। -आइ काल्हि कतए पोस्टेड छथि। बहुत दिनसँ सम्पर्के टूटि गेल। एतुक्का बाद कतहु संगे पोस्टिंग सेहो नहि रहल। बुझू भेँट भेना पन्द्रह सालसँ ऊपर भए गेल अछि। -पन्द्रह दिन पहिने हुनकर मृत्यु भए गेलन्हि। आरुणिक कटायल केश दिशि देखि ओ कहलन्हि- -हमरे सँ गल्ती भेल। केश कटेने देखियो कऽ नहि पुछलहुँ। तेँ अहाँ भरि रस्ता गुम्म छलहुँ। फेर कहए लगलाह- -मजदूरक प्रति बड्ड चिंता रहैत छलन्हि। तावत बस गंगा पुल पर आबि गेल छल। आगाँ फाटक पर बसकेँ टिकट कटेबाक हेतु ठाढ़ कऽ देल गेलैक। क्यो गोटे संवादो देलक जे आगू वन-वे जेकाँ अछि। एक कातमे रिपेयरिंग चलि रहल अछि। आरुणिक आगाँ दृश्य घूमि गेलन्हि। एहि पुलक निर्माणकालक पाया सभक। कॉलोनीक टूटल देबालक पजेबा सभ। ओ देबाल सभ साल टूटैत छल। पिताजी कहैत छलखिन्ह जे इंजीनियर आ ठेकेदार सभ मिलल अछि। फेर मोन पड़लन्हि सूटकेस भरल रुपैय्या। आरुणिक पिताजी एक लात मारने छलाह आ सूटकेस दूर फेका गेल रहए। एक गोट पितयौत भाए रहैत छलखिन्ह घरमे, से सभटा रुपैय्या ओहि सूटकेसमे राखि ओहि ठिकेदारकेँ देलन्हि। माँ सभकेँ भितरिया कोठली दिशि लऽ गेलीह। एक बेर नन्द पुलक पाया सभक लग आरुणिकेँ स्टीमरसँ लऽ गेल छलखिन्ह आ कहने रहथिन्ह- -देखू। एहि पायाक निर्माणमे कतेक गोट मजदूर ऊपरसँ घिरनी जेकाँ नाचि कऽ गंगामे खसि पड़ल। सएसँ ऊपर। कतेक हमरा आँखिक सोझाँ। ओहिमेसँ मात्र किछुए परिवारकेँ कंपेनशेसन देल गेलैक। आन सभक ने लिस्टमे नाम छैक, ने क्यो पता लगेलकैक। तैयो सभ अभियंता लोकनि ठिकेदारसँ मिलल अछि। भक्क टूटलन्हि आरुणिक। बससँ उतरि ओहि पुलक निर्माणमे शहीद मजदूरक लिस्ट फेर देखलन्हि। बहुत कम लोकक नाम छल-प्रायः बिन कंपेंनसेशन बलाक नाम नहि रहैक। बस शुरू होएबाक सूरसार कएलक तँ आरुणि आ आजम साहब बस पर धड़फड़ा कऽ चढ़लाह। ओ पुनः बाजए लगलाह। -पटनामे अहाँ कहलहुँ जे किरायाक मकानमे रहए जाइत छी। -हँ। पिताक क्रियाकर्मक हेतु गाम गेल छलहुँ, पिताक मृत्युक उपरांत माँ केर मोन ओहि घरमे नहि लगतन्हि, ताहि हेतु ओ गामेमे रहि गेल छथि। आब पटना पहुँचि कऽ दोसर डेरा ताकब। ओना हम तँ कलकत्तामे नोकरी करैत छी। -बुझू। तीस बरख पी.डबल्यु.डी. मे ईमानदारीसँ कार्य कएलाक उत्तर एकटा घरो नहि बना सकलाह। लोक की-की नहि कए गेल। हमहुँ १९८१ क बाद अहींक पिताजीक लाइन पर चलए लगलहुँ। दू टा घरो जे बनेने छी से नामे-मात्रक दू-महला। अधखिज्जू, ऊपरमे एक-एकटा कोठली अछि। अहाँक पिताकेँ की देलकन्हि सरकार ? आ की भेटलन्हि। रिटायरमेण्टक पहिनहि मृत्यु। ने कोनो सम्मान। पुलक उद्घाटन पर दू-दू हजार सभ अभियंताकेँ सरकार देलक। ओ तँ अल्ला-भगवानक रूप छलाह। सम्मानक लालसाक हेतु काज नहि कएलन्हि। सभ वर्क्स डिवीजनमे जएबाक हेतु पैरवी करए आ ई नन-वर्क्समे जएबाक हेतु पैरवी करथि। फेर ओ आरुणिसँ पुछलन्हि जे- -अहाँ की करैत छी। -पिता,माए आ भाए पटनामे रहैत छलाह, हम कलकत्तामे इंटेलीजेन्स विभागमे छी, कहियो वरदी रहैत अछि कहियो मनाही रहैत अछि। -दरभंगोमे आ पटनो मे आउ। मायोकेँ अनियन्हु। हमर पत्नीकेँ बड्ड नीक लगतन्हि। नेहाल तँ पटनेमे अछि। फेर अपन पटना आ दरभंगा दुनू ठामक पता अपन स्नेहिल हाथसँ पकड़बैत पटनाक हार्डिंग पार्क बस स्टैण्ड पर उतरलाह। बाहरसँ पटना अएलापर होर्डिंगकेँ देखि आरुणि प्रसन्न भए जाइत छलाह। मुदा पिताक छायाक दूर भेलाक बाद आब एहि नगरसँ लगाव नहि प्रतियोगिता करए पड़तन्हि हुनका। ई कोन संयोगपर संयोग भऽ रहल छल। आजम साहेब आइये कोना भेटि गेलाह। पन्द्रह सालसँ किएक क्यो नहि भेटल रहथि आ अकस्मात् नियति की चाहए छन्हि हुनकासँ। रिक्शा पकड़ि घरक लेल निकललाह। फेर सोचनी लागि गेलन्हि। एक बेर बाबूजीकेँ कटहरक कोआ खेलाक बाद पेट फूलि गेलन्हि, दू बजे रातिमे। ईहो नहि फुराइत छलन्हि, जे बगलमे श्रवनजीक बाबूकेँ बजा लियन्हि जे कोनो डॉक्टरकेँ बजा देताह। फुरायल तँ छलन्हि मुदा कहियो गप नहि छलन्हि तँ आइ काज पड़ला पर कहितथिन्ह से हियाऊ नहि भेलन्हि। माए केबाड़ पीटि कए पड़ोसीकेँ उठेलन्हि, कनैत खिजैत रहलीह। पड़ोसी डॉक्टरकेँ बजओलक, तखन जा कए बाबूजीक जान बाँचलन्हि। माय श्राप सेहो दैत रहलखिन्ह आ ईहो कहैत रहलखिन्ह जे पाँच वर्षक बेटा रहैत छैक तँ सभ भरोस दैत छैक जे कनैत किएक छी, अहाँकेँ तँ पाँच वर्षक बेटा अछि। आ ई सभ .....जाह, अपने भोगबह हम तँ दुनियासँ चलि जाएब। बहिन कॉलेजमे पढ़ैत छलखिन्ह। कॉलेजक रस्ता पएरे जाए पड़ैत छलन्हि। आ कॉलेजसँ आगाँ स्कूल छलन्हि आरुणि दुनू भाँएक। बहिन कहलखिन्ह जे अहूँ सभ हमर संगे चलू। एक दिन दुनू भाँय संग गेबो कएल रहथि। मुदा गप बिनु केने दुनू भाँय आगू-आगू झटकैत चल गेलाह। मोनमे ईहो भय छलन्हि जे छौड़ा सभ चीन्हि नहि जाए जे हमरा सभक ई बहिन छथि। आब ई सोचैत छथि जे चिन्हिये जाइत तँ की होइत। अपन व्यक्तित्त्वक विकासमे कमी छलन्हि ई ? बादमे पैघ भेलाह तँ माँ-बापकेँ उकटैत छथि जे घरघुस्सू आ मुँहचुरूक संज्ञा जे देलहुँ अहाँ सभ, कहियो ई सोचलहुँ, जे कोनो पड़ोसीसँ गप्प नहि करबाक, संगी-साथी नहि बनएबाक, घूमब-फिरब नहि करबाक उपदेशक पाछू -जे अहाँ सभ उपदेश देलहुँ- ओकर पाछाँ इच्छा समाजक बुराइसँ दूर करबाक छल, परंतु यैह तँ बनेलक मुँहचुरू आ घरघुस्सू सभकेँ।रातिमे माए-बापक झगड़ाक सीन सपनामे देखैत छलाह आ डरा कए उठि जाइत छलाह। पैघ भाए बहिनसँ अरुणिकेँ खूब झगड़ा होइत छलन्हि मुदा एक बेर माए-बापक झगड़ाक बाद, खूब कानल छलाह, खूब बाजल छलाह। ओहि घटनाक पहिने किछु दिनसँ भाए-बहिनसँ झगड़ाक बाद टोका-टोकी बन्द छलन्हि। सभ बेर वैह लोकनि आगाँ भऽ टोकैत छलाह। मुदा एहि बेर आरुणि कानैत-कानैत बहिनकेँ टोकलन्हि आ फेर कहियो बहिनसँ झगड़ा नहि भेलन्हि। भाए पिठिया छलन्हि, संगे पढ़ैत छलखिन्ह, ताहि हेतु ओकरासँ तँ झगड़ा होइते रहलन्हि, मुदा कम-सम।एहि सभ गपक हेतु माँ पिताजीकेँ दोषी कहथि। माँ सभसँ- पड़ोसी-संबंधी, जान-पहचानसँ गप करबासँ कहियो नहि रोकलन्हि आ कहथिन्ह जे सभटा दोष पिताक छलन्हि।एक बेर ग्लोब किनबाक जिद्द कएलन्हि आरुणि। कएक बेर समय देल गेलन्हि जे आइ अएत- काल्हि अएत। आरुणि पढ़ब छोड़ि देलन्हि। आ तखन जा कए ग्लोब अएलन्हि। बहिन अखनो कहैत छथिन्ह जे ग्लोब अनबाक जिद्दक पूरा भेलाक बाद अरुणिक पढ़ाइक लय टूटि गेलन्हि। वर्गमे स्थान प्रथमसँ नीचाँ आबि गेलन्हि आ पिताजी एकर कारण तंत्र-मंत्रमे ताकए लगलाह। एकटा तांत्रिकसँ भेँट भऽ गेलन्हि।कतेक दिन सभ गाममे रहैत जाइत गेलाह। गंगा ब्रिज कॉलोनीमे एकटा एकाउन्टेंट बाबू छलाह। ओ बाबूजीकेँ कहलखिन्ह जे अहाँ तँ घूस नहि लैत छी मुदा अहाँक पत्नी अहाँक नाम पर घूस लैत छथि। तकर बाद सभ गाम पहुँचा देल गेलाह। सभ ट्रांसफरक बाद बिहार सरकारक नौकरीमे दरमाहा बंद भऽ जाइत छैक। आ ताहि द्वारे सभ ट्रांसफरक बाद नन्द सभकेँ गाम पठा दैत छलाह। एहि क्रममे एक बेर सभ गाममे छलाह। नन्दक चिट्ठी माँक नामसँ गाम आएल छलन्हि। आरुणि पढ़ने रहथि। नन्द आरुणिक माएकेँ लिखने छलाह जे ज्योँ अहाँ घूसक पाइ लेने छी तँ लौटा दियौक। हम विजीलेंसकेँ लिखने छी, छापा पड़त, तखन पाइ निकलत तँ बड्ड बदनामी होएत। एहि सभ परिस्थितिमे स्कूलमे आरुणि घरक परिस्थितिकेँ बिसरि जएबाक प्रयास करए लगलाह। झुट्ठेकँ हँसए लगलाह। ई आदति पकड़ि लेलन्हि। घरक बड़ाइ करए लगलाह। लोक सभ नन्दक ईमानदारीक तँ चर्चा करिते रहए। आरुणि घरक कलहक विषय घरक बाहर अनबासँ परहेज करए लगलाह, लोक बुझत तँ हँसत। आ बुझू जे ईमानदारीक ग्लैमरकेँ जिबैत जाइत गेलाह। सोचबाक आ गुनधुनीक आदति एहन पड़लन्हि जे सुतैत सपनामे आ जगैत लिखबा-पढ़बा काल धरि ई सहस्रबाढ़नि जेकाँ पाछाँ नहि छोड़लकन्हि। दसमामे छमाही परीक्षा किछु दिन पहिने देने रहथि। कॉमर्सक परीक्षामे एकटा प्रश्न बनेलन्हि। मुदा ओ गलत बनि गेलन्हि, फेर दोसर आ तेसर बेर प्रयास केलन्हि। सभटा प्रश्नक उत्तर अबैत छलन्हि मुदा पहिले प्रश्नक उत्तर पूरा नहि भऽ रहल छलन्हि। कॉपीकेँ अंगाक नीचाँमे नुका लेलन्हि। आ पानि पीबाक बहन्ने जे बहरेलाह तँ घर पहुँचि गेलाह। पढ़ैत-पढ़ैत सोचए लगैत छलाह। एक्के पन्ना उनटेने घंटा बीति जाइत छलन्हि। चिड़ियाखाना गेल रहथि एक बेर। किछु गोटे हुनकर सभक सर-संबंधी लोकनि ओतए हुनका सभकेँ भेटि गेलखिन्ह। बड्ड हाइ-फाइ सभ। ओना तँ कहलखिन्ह किछु नहि मुदा हुनकर सभक बगेबानी देखि कए आरुणिमे हीन भावना अएलन्हि। चुप्पे भीड़मे निकलि घरक लेल पहुँचि गेलाह। जेबीमे पाइ नहि रहन्हि से पएरे निकलि गेलाह। ओतए चिड़ियाखानामे सभ डराइत रहल जे कतए हरा गेल। सभ घर पहुँचल तँ सभकेँ फुसियेँ कहलन्हि जे सत्ते भोथला गेल रहथि। सत्त बात ककरो नहि बतेलन्हि।सभ लोक जे भेटथिन्ह यैह कहथिन्ह जे अहाँ फलनाक बेटा छी। बेचारे भगवाने छथि। ऑफिसमे पिताक दरमाहाक लेल पे-स्लिप बनबाबए पड़ैत रहन्हि। एक बेर आरुणि पे-स्लिप बनबए गेल छलाह। किरानी बाबू बाजल- हिनकर पिताक पे-स्लिप बिना पाइ लेने बना दियन्हु। पिताजीसँ नहि तँ सहकर्मी खुश छलन्हि नहिये ठीकेदार सभ। सहकर्मी एहि लऽ कए जे नहि स्वयं कमाइत अछि, नहिये दोसराकेँ कमाय दैत अछि। पैघभायक गिनती बच्चामे बदमाशमे होइत छलन्हि। एक बेर ट्रांसफरक बाद जखन सभ गाम गेलाह, तँ पैघ भाय जे सभक फुलवाड़ीसँ नीक-नीक गाछ उखाड़ि कय अपना घरक आगाँ लगा लैत छलाह, से आब एकहि सालमे दब्बू, सभसँ पाछू बैसनिहार विद्यार्थीक गिनतीमे आबि गेलाह। ओहि बेर ट्रांसफरक बादक गाममे निवास किछु बेशी नमगर भऽ गेल छलन्हि। फेर मुख्यमंत्री पदक दावेदार एकटा नेताजी जखन गाममे वोट मँगबाक लेल अएलाह तखन काका हुनकासँ भेँट कएलन्हि आ कहलखिन्ह जे हमर भाएकेँ वर्क्ससँ नन-वर्क्स मे ट्रांसफर कए दियौक, बच्चा सभ पोसा जएतैक।नेताजी कहलन्हि जे ज्योँ हम जीति गेलहुँ तँ ई काज तँ हम जरूर करब। वर्क्समे जएबाक पैरवी तँ बहुत आएल मुदा नन-वर्क्समे जएबाक हेतु ई पहिले पैरवी छी।संयोग एहन भेल जे ओ नेताजी जीति गेलाह आ मुख्यमंत्री सेहो बनि गेलाह। ओ शपथ ग्रहण केलाक बाद ई काज धरि केलन्हि जे पिताजीक ट्रांसफर कए देलखिन्ह। आ नन्दक परिवार पुनः शहर आबि गेल रहन्हि । गाममे रहथि तँ एक गोटे जे आरुणिक भाएक संगी छलाह, ककरो अनका प्रसंगमे कहने छलाह।हुनकर अनुसार- संगीक माएक स्वभाव तीव्र छलन्हि आ ओ खेनाइ खाइते काल झगड़ा करए लगैत छलीह। मुदा ओहि दिन ककरो अनका ओ आर तीव्र स्वभावक देखने छलाह।खराब आर्थिक स्थितिक उपरांत होअएबला कलहक परिणाम आरुणि देखि रहल छलाह। दू टा घटना हुनका विचलित कए दैत छलन्हि। एकटा तँ इनकम टैक्स कटौतीक मास- मार्च मास। ई घटना तँ सभ साले होइत छल, मुदा कटौती बढ़ैत-बढ़ैत एक साल आबि कए पूरा मार्च मासक दरमाहा काटि लेलक। माँ कहैत छलखिन्ह जे आब भोजन कोना चलए जयतौह। आब भीख माँगए जइहँ गऽ सभ गोटे। मुदा नन्द एकटा गामक भातिजकेँ पोस्टकार्ड पठेलन्हि आ ओ आठ सय टाका आनि कय दऽ गेलखिन्ह तखन जा कए असुरक्षाक भावना खत्म भेल छल। भीख मँगैत अखनो आरुणि ज्योँ ककरो देखैत छथि तँ मोन कलपय लगैत छन्हि। दोसर घटना छल जखन हुनकर घरक आँगा एकटा एक्सीडेंट भेल छल आ ओकरा बाद हुनकर भाइ खेनाइ छोड़ि देने छलाह आ कानि-कानि कए आँखि लाल कए लेने छलाह। नन्द जखन बुझबए लगलाह तँ ओ जवाब देलन्हि- -अहाँकेँ ज्योँ किछु भऽ जएत तखन हमरा सभक की होएत। पिताजी इंश्योरेंस बेनीफिट, जी.पी.एफ., ग्रेच्युटी आदिक हिसाब लगाय पुत्रकेँ बुझेलन्हि जे ९९००० रुपय्या तँ तुरत भेटत आ फेर महिने-महिने पेंशनो भेटत। लगभग एक घंटा तक बाबूजी पैघ पुत्रकेँ बुझबैत रहलाह। एक बेर आरुणिक ओहिठाम एक गोट पीसा आयल छलाह। आइयो घरमे क्यो अबैत छथि तँ सभ सुरक्षित अनुभव करैत छथि। नन्द पीसाक सार भेलखिन्ह से एहि ओहदासँ हँसी सेहो चलि रहल छल।ओ कहलन्हि जे नन्दे जेकाँ ईमानदार एकटा बी.डी.ओ. साहेब झंझारपुरमे छलाह। पिताजी हुनकर मलाह छलखिन्ह, कष्ट काटि अफसर भेलाह। मुदा नन्दक जेँका हुनको घरमे खाटे टा छलन्हि। पीसा हुनका कहलखिन्ह जे कथी ले अफसर भेलहुँ, गाममे रहितहुँ आ मचान पर बैसि माछ भात खएतहुँ। माछक कारबारमे फायदा होइत। आरुणिक बहिनक विवाहक बाद घरमे कखनो काल बहिनोइ अबैत छलखिन्ह। जमायक अबिते देरी आरुणिक माँक झगड़ा पिताजी सँ शुरू भऽ जाइत छलन्हि, किएकतँ घरमे इंतजाम तँ किछुओ रहिते नहि छल। ट्रांसफरक बाद पिताजीक अभियान घूसखोरकेँ सजा देबय पर चलल। आ जखन सरकारी तंत्र परसँ विश्वास खतम भए गेलन्हि तखन ओहि तांत्रिकक फेरमे पड़ि गेलाह। घरमे माता-पिताक बीच कलह बढ़ि गेल। एक दिन पिताजीसँ आरुणिक बहसा-बहसी भए गेलन्हि आ तीनू भाय बहिन गरा लागि कऽ कानय लगलाह। तकरा बादसँ अरुणिक भाय-बहिन सभसँ झगड़ा होयब समाप्त भऽ गेलन्हि। आरुणि अनेर गुनधुन करैत घरपर पहुँचलथि। दू-तीन धरि दोसर किरायाक मकान ताकए लेल निकलल करथि आ साँझमे वैह गुनधुनी। एक बेर घर आबि रहल छलाह स्कूलसँ। घर अबैत काल मोन कोना दनि कऽ रहल छलन्हि। स्कूलसँ घर आबि रहल छलाह। रस्तामे सभ क्यो एक दोसरा सँ किछु असंभव घटित होएबाक गप कऽ रहल छलाह। आरुणि दुनू भाए सातम कक्षामे पढ़ैत रहथि, संगहि-संग। मुदा आइ पैघ भाएक पेटमे दर्द छलन्हि से ओ टिफीनक बाद छुट्टी लऽ घर चलि गेल छलाह। स्कूलमे सभकेँ हँसैत देखैत रहथि, तँ अपन घरक स्थिति मोन पड़ि जाइत छलन्हि। ईर्ष्य़ा सेहो होइत छलन्हि आन बच्चाक भाग्य पर। फेर मोनमे ईहो होइत छलन्हि जे हुनके सभ जेकाँ परिस्थिति होएतैक एकरो सभक। मुदा झुट्ठे प्रसन्नताक नाटक करैत जाइत अछि। घरमे माए-बापक कलहक बीच डरायल सन रहैत रहथि। लगैत रहैत छलन्हि जे ई सभ परिस्थिति कहियो खत्म नहि होएतैक। नहि तँ दोसरसँ गप्प कए सकैत छथि, नहिये ककरो अपन मोनक गप्पे कहि सकैत छथि। बेर-बखत कहियो अपन सहायताक हेतु सेहो सोर नहि कऽ सकैत छथि। माय ठीके घरघुसका, मुँहदुब्बर आदि विशेषणसँ विभूषित करैत छलखिन्ह। साँझमे घुमनाइ आकि दुर्गापूजाक मेला गेनाइ ई सभ बात हुनका सभक जीवनसँ दूर छलन्हि। एक बेर भूकम्प जेकाँ आयल छल, सभ क्यो ग्रील तोड़ि कय बहरायल, मुदा आरुणि खाट पर पड़ले रहि गेलाह। किछु तँ अकर्मण्यतावश आ किछु ई सोचि कय, जे की होयत घर टूटि देह पर खसत तँ, समस्यासँ मुक्तियो तँ भेटत। ओहि दिन स्कूलसँ घुरैत काल घरक लगमे पहुँचलाह तँ भीड़ देखि मोन हदसि गेलन्हि जे बाबूजीकेँ तँ किछु नहि भऽ गेलन्हि। घरमे पहुँचलाह तँ माँ-बहिनसँ पूछय लगलाह, जे की भेल? सभ बोल भरोस देबए लगलथिन्ह तँ आरो तामस उठए लागलन्हि।जोरसँ कानि कय बाजय लगलाह- -बाबूजी मरि गेलाह की? कतए छन्हि हुनकर मृत शरीर। ताहि पर बहिन कहलखिन्ह- -नहि, हुनका किछु नहि भेलन्हि। अहाँक संगी जे मकान मालिकक बेटा अछि से ओ ओकर छोट भाए, ओकर पिता आ रिक्शाबला, चारू गोटे रिक्शापर जाइत छलाह। बेचारा रिक्शा बला विवाह कऽ कए कनियाँकेँ अननहिये छल। एकटा विशाल ट्रक रिक्शाकेँ धक्का मारि देलकैक। ठामहि मरि जाए गेलाह। आरुणिक कानब खतम भए गेलन्हि। ई जे आफत आएल छलैक से आइ ककरो अनका घरमे । ओना ओ जे मृत भेल छल प्रतिदिन प्रातः आरुणिक संग डेढ़ सालसँ स्कूल जा रहल छल । सभ दिन प्रातः सीढ़ीपर ओ कॉलबेल बजबैत छलाह आ ओ सीढ़ीसँ उतरैत छल आ संगे सभ स्कूल जाइत छलाह। मोन पड़लन्हि जे काल्हि सेहो सभ दिन जेकाँ ओ कॉलबेल बजेने छलाह तँ ओकर बहिन जे चश्मा लगबैत छलि आ झनकाहि छलीह, से ऊपरसँ तमसाकेँ कहलकन्हि जे कतेक जोरसँ आ देरी धरि कॉलबेल बजबैत छी, आ सेहो जे बेर-बेर किएक बजबैत छी, आबि रहल अछि। काल्हि तँ ओ आएल मुदा आरुणि तखनहि कहि देलखिन्ह जे काल्हिसँ हम कॉलबेल नहि बजायब, अहाँकेँ हमरा संगे जयबाक होअए तँ नीचाँ उतरि कऽ आऊ आ संग चलू। ओ नहि आएल तँ आरुणि किएक कॉलबेल बजबितथि। डेढ़ सालमे पहिल बेर भेल छल जे आरुणि कॉलबेल नहि बजेने छलाह आ ओ डेढ़ सालमे पहिल बेर स्कूल नागा कएने छल। आब आरुणिक मोनमे होमए लगलन्हि जे कतहु ओ बाजि तँ नहि देने होएत जे आरुणि काल्हिसँ कॉलबेल नहि बजओताह। मुदा किंसाइत ओकर कोनो आनो कार्यक्रम होएतैक। किएक तँ छोट भाए आ पिताक संग रिक्शासँ कतहु जा रहल छल। अस्तु आरुणि चिंतित छलाह मुदा दुःखी नहि। मोनक गप कियो बुझए नहि तेँ मुँह लटकेने ठाढ़ रहथि। ओ तँ मात्र सोचने रहथि जे काल्हिसँ एकरा संगे स्कूल नहि जएताह, जएत ई असगरे। मुदा ओ तँ असगरे नहि जएत से सत्य कए देखा देलक। अरुणिक माएक आँखिमे नोर छलन्हि मुदा अरुणिक भीतर प्रसन्नता, किएक तँ हुनकर पिताजीक मृत्यु जे टरि गेल छलन्हि। दोसर किरायाक घर तकलाक बाद दुनू भाँए सभटा समान नवका घरमे राखि माँकेँ गामसँ आनि लेलन्हि। आरुणि अपन नोकरी पर चलि गेलाह। “नहि एहन कोनो बात नहि अछि”, ई तँ हमर सभक कार्यक अंतर्गत करइए पड़ैत छैक”। “मुदा अहाँकेँ ई नहि बुझि पड़ैत अछि जे एहि बेर किछु बेशी क्रूर भऽ गेलहुँ अहाँ सभ?” “क्रूरताक तँ कोनो बात नहि अछि। हमरा सभ तँ कोनो विशेष सूचनाक आधार पर कार्य करैत छी”। “मानि लिअ जे हमरा ककरोसँ दुश्मनी अछि आ ओहि आधार पर विभागकेँ ओ अपन व्यक्त्तिगत स्वार्थ आ झगड़ाक हेतु प्रयोग कए सकैत अछि”। “अहाँकेँ ककरोपर शंका अछि?” “नहि हम तँ उदाहरण दए रहल छलहुँ”। “नहि हमरा सभ कोनो सूचनाक आधार पर सोझे बिदा नहि होइत छी। पहिने ओकर गंवेषणा करैत छी आ तकरे बाद एतेक ठाम सर्च करबाक अनुमति भेटैत अछि”। “मुदा आब अहाँ ई कहियो देब जे अहाँक कोनो गलती नहि अछि तँ की हमर इज्जत लौटि कए अएत”। “एना तँ हमरा सभकेँ हाथ-पर हाथ दए बैसि जाए पड़त। मुदा अहूँक गप ठीक अछि। अहाँक प्रति ज्योँ द्वेषवश क्यो कार्य कएने होएत तँ ओकरा पर कार्यवाही कएल जएत।” “की कार्यवाही होएत। हमरा पर तँ कार्यवाही भऽ गेल। हमर सभटा बायर टूटि जएत। हम सभ एतेक पुरान छी, तीन पुस्तसँ एहि कार्यमे लागल छी। करबो करब तँ क्लेंडेस्टाइन रिमूवल करब ? सभ बायरपर तँ रेड भऽ गेल, किछु कतहु नहि भेटल से के पतियायत ?” ओकर बातो ठीक छलैक। ई प्लाइवुडक व्यापारी एक नंबरक काजक हेतु जानल जाइत छल मुदा आरुणिकेँ जे सूचना प्राप्त भेल छलन्हि से ओकर विपरीत छल। मुदा ई रेड तँ खाली गेल। फैक्टरी, घर, डीलर सभ ठामसँ टीम खाली हाथ आएल। मुदा आब ऑफिसरकेँ की जवाब देताह। नामी कंपनी छल, अधिकारीगण डरा कऽ रेडक अनुमति आरुणिक व्यक्त्तिगत प्रतिष्ठाकेँ देखैत देने छलाह। हेडक्वार्टरसँ फोनपर फोन आरुणिकेँ आबि रहल छलन्हि, भोर तँ रेडमे भइये गेल छल, दस बजे ऑफिसमे रिपोर्ट देबाक हेतु कहल गेल छलन्हि। फैक्टरीक मालिक सेहो एम्हर-ओम्हरक बात लऽ कऽ दस बात सुना देलकन्हि। स्वर्णप्लाइ नाम्ना ई कंपनीक दिल्ली धरि पहुँचि छलैक। अकच्छ भऽ कऽ आरुणि भोरमे डेरा पहुँचि मोबाइल ऑफ कऽ कए ९ बजेक अलार्म लगा कऽ सुतबाक प्रयास करए लगलाह। काल्हि भोरेसँ रेड चलि रहल छल, ई कोना भेल, कोनो क्लेंडेस्टाइन रिमूवलक कच्चा पर्ची किएक नहि भेटल। केस लीक तँ नहि भऽ गेल। मुदा केसक विषयमे आरुणिकक अतिरिक्त्त डायरेक्टर विजीलेंसकेँ मात्र बुझल छलन्हि। ई सभ बिछौन पर सोचिते रहथि, तावत निन्द तँ नहि लगलन्हि मुदा ९ बजेक अलार्म बाजि उठल। ऑफिसमे सभ क्यो जेना हिनके बाट ताकि रहल छलाह। कतेक गोटे ईहो सुना देलकन्हि, जे एहि केसक इंटेलिजेंस हुनको सभक लग छलन्हि मुदा एहि तरहक केसमे क्लेंडेसटाइन रिमूवलकेँ सिद्ध केनाइ मुश्किल होइत छैक, ताहि हेतु ओ लोकनि एहिमे हाथ नहि देलन्हि। कानाफूसी होमए लागल जे बड्ड हीरो बनैत छलाह आब ट्रांसफर ऑर्डर लऽ कए निकलताह डायरेक्टरक ऑफिससँ। आरुणि डायरेक्टरक ऑफिसमे गेलाह आ सोझे किछु दिनक समय माँगि लेलन्हि। की प्लान छन्हि, एहि विषयमे गप-शप घुमा देलथि। एहि बेर कोनो प्रकारक कोनो भ्रम नहि राखए चाहैत छलाह। आब आरुणि स्वर्ण प्लाइक फैक्टरीसँ आ ओकर डीलरसँ हटि कऽ कार्य करए लगलाह। सभटा दस्तावेजकेँ घोखि गेलाह। किछु जानकारी कागज पर सेहो लिखए लगलाह। फेर अपन प्लानक हिसाबसँ कलकत्तासँ पटना आ ओतएसँ अररियाक हेतु बिदा भऽ गेलाह। पान तँ खाइत नहि रहथि आ चाह सेहो घरे टा मे पिबैत रहथि। मुदा लोकसँ किछु जनबाक हो तँ बिना चाह आ पानक दोकान गेने कोना काज चलत। से ओ चाह पान शुरू कएलन्हि। बाबुल दादाक गुलकन्द बला पान नीको बड्ड लागन्हि। तकरा बाद बाबुल दादा अररियाक लग पासक सभटा प्लाइवुडक फैक्टरीक लिस्ट दऽ देलकन्हि। मुदा फैक्ट्री सभक पहुँचबाक रोड सभक भगवाने मालिक रहथि। धूल-धक्करमे कहुना जा कए एकटा फैक्टरीक पता चललन्हि जे स्वर्णप्लाइकेँ सप्लाइ दैत छल, ओतुक्का दरबान आरुणिकेँ कहलकन्हि जे मालिक दोसर फैक्टरीमे बैसैत छथि, से दू टा फैक्ट्रीक पता चलि गेलन्हि आरुणिकेँ। आरुणि थाकल-हारल ओहि फैक्टरीमे पहुँचलाह। एक गोट मारवाड़ी सज्जन बैसल रहथि। “कतएसँ आएल छी”। “आएल तँ पटनासँ छी मुदा घुरब कोना से नहि बुझि पड़ैत अछि”। “हँ, एक गोट नेताक जेलसँ बाहर गोली मारि कए हत्या कऽ देल गेल अछि। नेताजी रहथि तँ जेलमे मुदा घुमए फिरए पूर्णियाँ जेलसँ बाहर बिना निअमक निकलल रहथि। जेलर की करताह। पिछला मास एक गोट कैदीकेँ पुरनका जेलर घुमए हेतु नहि देने छलथिन्ह तँ भट्टा बजारमे गोली मारि देलकन्हि। एहि बेर जे घुमए देलखिन्ह तँ सरकार सस्पेन्ड कऽ देलकन्हि नवका जेलरकेँ। ताहि हत्याक बाद बन्दक आह्वान अछि। हमरा संगे रहू। एतए हमहू अपन गेस्ट हाउसमे रहैत छी। परिवार सिलीगुड़ीमे रहैत अछि। विवाह नहि भेल अछि। भोरमे हमरा कलकत्ता जएबाक अछि। पहिने सिलिगुड़ी अपन गाड़ीसँ जाएब तँ रूट बदलि कऽ पूर्णियाँ बस स्टैण्डमे अहाँकेँ छोड़ैत जाएब”। युवा बजक्कर रहथि से आरुणिकेँ नीक लगलन्हि। रातिमे गेस्ट हाउसमे बहुत गप्प भेलन्हि। नेताक रंगदारीक, चन्दा बला सभ जबर्दस्ती रसीद काटि जाइत छलन्हि। “एनामे तँ बिना क्लेनडेस्टाइन कएने घाटा भऽ जएत, हँ मजबूरी छैक। आ तकर दोषी तँ ई नेता सभ छथि। व्यापारी की करओ”। आब मारवाड़ी युवा जकर नाम नवल छल कनेक कनछिया कऽ आरुणि दिशि देखलक। आरुणिकेँ भेलन्हि जे ओकरा कोनो शंका तँ नहि भेलैक। “नहि क्लेंडेस्टाइन नहि करबाक तँ सिद्धांत अछि हमरा सभक। हँ किछु एडजेस्टमेंट करए पड़ैत अछि”। आरुणिकेँ मोन पडलन्हि जे कोना स्वर्ण प्लाइक मालिको बजैत-बजैत बाजि देने छल जे करबो करब तँ क्लेनडेस्टाइन रिमूवल करब। तखन करैत की जाइत अछि ई सभ। ओना अररियाक ई फैक्टरी स्वर्ण प्लाइक हेतु जॉब वर्क करैत छल, आ ताहि हेतु सरकारी ड्यूटीक सभ भार स्वर्ण प्लाइ पर रहैक। ई क्लेनडेस्टाइन करियो कऽ की करत। टैक्स तँ दोसराकेँ देबाक छैक। तखने एकटा फोन अएलैक। रिंग नमगर रहैक से आरुणिकेँ बुझबामे भांगठ नहि भेलन्हि जे ई बाहरक एस.टी.डी.कॉल अछि। ओहि कॉलक बाद एकाएक ओ युवा आरुणि दिशि ताकि कए चुप्पी लगा गेल। भनसिया जकरा नवलजी झा कहि संबोधित कऽ रहल छलाह, खेनाइ बनि जेबाक सूचना देलकन्हि। आरुणि आ नवलक बीच मात्र औपचारिक गप भेल। फेर दुनू गोटे सूति गेलाह। भोरमे अपन वचनक अनुसार ओ युवा आरुणिकेँ पूर्णियाँ बस स्टैण्ड छोड़ि देलकन्हि। उतरबासँ पहिने आरुणि नवलसँ पुछलन्हि। “कलकत्तामे स्वर्ण प्लाइक ऑफिस छैक। ओतहि जा रहल छी की ?” ओ युवा हँसल। “अहाँ विजिलेंससँ छी। हमरा काल्हि जे एस.टी.डी. आएल छल से स्वर्ण-प्लाइक कलकत्ता ऑफिससँ आएल छल। अहाँक विभागेक क्यो गोटे हुनका सभकेँ अहाँक अररिया यात्राक विषयमे सूचना देलखिन्ह। देखू हम कहने छी जे हम मात्र एडजेस्टमेंट करैत छी। आ ताहिसँ हमरा कोन फाएदा होइत अछि? टैक्स तँ हमरा लगैत नहि अछि। हँ, ताहिसँ हमरा काज भेटैत अछि। आ बाहरी छोट-मोट खर्चा, विभागक, पुलिसक, नेताक निकलि जाइत अछि। तखन बेश”। ई कहि ओ सज्जन आरुणिकेँ हतप्रभ करैत चलि गेलाह। आब कलकत्ता पहुँचि कए आरुणि जखन ऑफिस पहुँचलाह तँ सभकेँ बुझल रहैक जे आरुणि ताहि फैक्ट्रीक विजिट सरकारी खर्चा पर कएलन्हि अछि जकरा पर सरकार टैक्सक माफी देने छैक। डायरेक्टरसँ भेँट कएलाक बाद आरुणि पहुँचि गेलाह पटना आ फेरसँ कलकत्ता। पुलिस थानामे घुमैत रहलाह आ पता करैत रहलाह जे स्वर्ण-प्लाइ आकि ओकर कोनो कर्मचारीक विरुद्ध कोनो केस छैक तँ नहि। मुदा ओतए तँ स्वर्ण प्लाइ बड्ड नीक छवि शुरुएसँ बनेने छल। आब आरुणि सोचमे पड़ि गेलाह। इनपुट-आउटपुट केर अनुपातसँ ई कंपनी करोड़ो रुपयाक टैक्सक चोरि कए रहल अछि। मुदा प्रमाण कोनो नहि। आरुणि थाना सभमे अपन पता आ फोन नंबर छोड़ि देलन्हि जे ज्योँ कोनो केस एहि कंपनी किंवा एकर कर्मचारीक संबंधमे होअए तँ तकर सूचना हुनका देल जाइन्ह।अपन डायरेक्टरसँ कहलखिन्ह जे क्लोजर रिपोर्ट अखन नहि देब। देखैत छी किछु जानकारी कतहुसँ भेटैत अछि आकि नहि। छह मासक बाद। भोरमे रिंग भेल। “हम कलकत्ता, साल्ट लेक थानासँ बाजि रहल छी। एक गोटे एकटा कमप्लेन लिखेने छथि जे स्वर्ण-प्लाइ ऑफिससँ पेमेन्ट लऽ कऽ घुरैत काल हुनकर सूटकेस ऑटो बला छीनि लेलकन्हि जाहिमे किछु कैश आ चेक छलन्हि”। “कतेक कैस आ कतेक चेक”। “१.७९ लाख कैस आ १.८३ लाखक चेक, प्रायः कैसक कोनो इनस्योरेंस रहन्हि, ताहि द्वारे एफ.आइ.आर. करओलन्हि अछि। चेकक तँ पेमेंट स्टॉप भऽ जएत”। आरुणि टीमक संग ओहि गोटेक घर पर छापा मारलन्हि जकर पाइ आ कैस ऑटो बला छीनि लेने छल। छापाक बीचमे आरुणिकेँ एकटा डायरी भेटलन्हि। तकरा बाद पटना फोन कऽ अररियाक फैक्टरीसँ नवीनतम रिमूवलक रिटर्न मँगा लेलथि। फेर ओ सज्जन जिनका घरपर छापा पड़ल छल, केँ ऑफिस अनलन्हि। रस्तामे पता चलल जे ओ सज्जन नवलक बहनोइ छलाह आ अररियाक फैक्टरीक एकाउन्टेन्ट होएबाक संगहि स्वर्ण-प्लाइमे लाइजन अधिकारी सेहो छलाह। आब सभ तथ्य सोँझा छल। जे डायरी भेटल छल ताहिमे कैस आ चेकक कॉलम बनल छल। तिथि सहित विवरण छल। चेकक भुगतानक कॉलम अररिया फैक्टरीक क्लियरेंससँ मिलि गेल छल आ ईहो सिद्ध भऽ गेल जे सभ ट्रांजेक्सनमे लगभग अदहाक पेमेंट स्वर्ण-प्लाइ द्वारा कैसमे देल जाइत छल। आ तकर विवरण नहि तँ स्वर्ण-प्लाइक खातामे रहैत छल आ नहिये अररियाक फैक्टरीमे। स्वर्णप्लाइ टैक्स सेहो मात्र चेक (पकिया) द्वारा गेल अदहा रिमूवलक पेमेंट पर दैत छल। आरुणि ई रिपोर्ट डायरेक्टर केँ दऽ देलन्हि। एकाउन्टेन्टक अपराध बेलेबल छलैक। कोर्ट ओकरा बेलपर छोड़ि देलकैक। “नवलक समाचार कहू। बड्ड नीक लोक अछि। मुदा किछु बतेलक नहि”। “ओकर काल्हि अररियासँ सिल्लीगुड़ी जाइत काल सड़क दुर्घटनामे मृत्यु भऽ गेलैक किंवा करा देल गेलैक। जमाय बाबूक संग एतएसँ सोझे हमरा सभ ओतहि जाएब”। एक गोट उत्तेजित स्वर बला व्यक्ति जे एकाउन्टेन्ट बाबूकेँ लेबाक हेतु आएल छल बाजि उठल । “मुदा ई बूझि लिअ जे अहाँक ई सफलता हमर बुरबकीसँ भेटल अछि। ज्योँ हम कैसक इनस्योरेंस क्लेमक लालचमे नहि पड़ितहुँ तँ ई सभ नहि होइत”- जमाय बाबू बाजि उठलाह। डायरेक्टर स्वर्णप्लाइक विरुद्ध कार्यवाहीक लेल ऑर्डर देलन्हि। स्वर्ण प्लाइक विरुद्ध करोड़ोक रुपैयाक टैक्स घोटालाक शो-कॉज नोटिस सेहो पठा देल गेल। आरुणि चिंतामग्न छलाह। “ठीके तँ कहलक नवल। एडजेस्टमेंटे तँ कऽ रहल छल। चोरि तँ क्यो आन कऽ रहल छल। ओ तँ मात्र माध्यम छल। हमहू तँ कतहु नहि बनि गेल छी माध्यम, नवलक मृत्युक ?” आरुणिक व्यवसायिक सफलताक बाद नोकरी मध्य सेहो सफलताक शुरुआत भऽ गेल। माध्यम बनथि वा नहि मुदा पिता जेकाँ हारताह नहि। मोन पड़ैत रहन्हि हुनका सभटा गप बीच-बीचमे । “कहलहुँ सुनैत छियैक। बेटी पैघ भऽ रहल अछि। बेटा सभक लेल किछु नहि कएलहुँ। अपन घरो नहि बनल। रिटायर भेलाक बाद कतए रहब ?” “बेटीक चिन्ता नहि करू। बेटा बला अपने चलि कए अएत। हमरा सभकेँ जतेक सुविधा भेटल छल, ताहिसँ बेशी सुविधा हिनका सभकेँ भेटि रहल छन्हि। तखन पढ़्थु वा नहि से ई सभ जानथि। रिटायरमेन्टक बाद गाम जा कए रहब। सात जन्म शहर दिशि घुमि कए नहि आएब”। “क्यो सर-कुटुम अबैत छथि तँ हुनका सत्कार करबा लेल घरमे इंतजामो नहि रहैत अछि”। “इंतजाम करबाक की जरूरति अछि। एक पैली बेशी लगा दियौक अदहनमे”। आरुणि माए-बापक एहि तरहक वार्त्तालाप सुनि पैघ भेलथि। एक बेर हॉस्पीटलमे पिताजीकेँ देखए लेल एक गोट कुटुम्ब आएल रहथि। हुनकर गप सेहो किछु एहने बुझा पड़लन्हि। “की कऽ लेलहुँ शरीरकेँ। ई बच्चा सभकेँ देखि कए मोहो नहि भेल। कतए पढ़ैत जाइत ई सभ। आ कोनो टा सुविधा, नहिये कोनो टा चिन्ते छल अहाँकेँ। अपनो आ एकरो सभक जिनगी बर्बाद कएलहुँ।” तखने व्यवधान भेल। पत्नी कहलखिन्ह जे एकटा फोन होल्ड अछि- “आरुणि। एकटा पैघ राजनीति चलि रहल अछि ऑफिसमे। अहाँक विरुद्ध षड्यंत्र चलि रहल अछि। अहाँकेँ चेतेनाइ हमर काज छल। मुदा अहाँ तँ कोनो तरहक प्रतिक्रिया दैते नहि छी”- फोन पर हुनकर वैह एकमात्र संगी रामभक्त-हनुमानक अबाज सुनि रहल छलाह आरुणि। “आरुणि। की भऽ गेल। बाबूजी जेकाँ डराएल रहब। किछु दिनुका बाद हारि मानि ऋषि भऽ जाएब। आकि दुष्टक संहार करब। एहि दुनूमे की चुनब अहाँ”। “चिन्ता नहि करू”- हँसैत बजलाह आरुणि फोन पर आ फोन राखि देलन्हि। ऑफिसक एकटा लॉबी आरुणिक पाछाँ पड़ि गेल छल। ट्रांसफर-पोस्टिंग केर बाद आरुणिक ऊपर दवाब आबि गेल छल। किछु गोटे हुनकर विरुद्ध बिना-कोनो आधारक किछु कम्प्लेन कए देने छलन्हि। एकटा ऑफिसर शशांक केर हाथ छलैक एहिमे। ओकर खास-खास आदमीक पोस्टिंग मोन-मुताबिक नहि भेल रहए आ ओ प्रोमोशनमे आरुणिकेँ पाछाँ करए चाहैत छल। एहि बीचमे आरुणिक फोन किछु दिन डेड छलन्हि। तकरा बाद हुनकर फोनसँ अबुधाबी आ दुबइ फोन कएल गेल छल। मुदा ओहि समयमे सरकारी फोनमे आइ.एस.डी. केर सुविधाक हेतु टेलीफोन विभागकेँ सूचित करए पड़ैत छल। हुनकर ऑफिसक एकटा प्रशासनिक अधिकारी टेलीफोन विभागकेँ चिट्ठी लिखि कए ई सुविधा आरुणिक जानकारीक बिना करबाए देने छल। विजीलेंसक जाँचमे ओ बयान देने छल जे आरुणि एहि ऑफिसक मुख्य छथि आ हुनकर मौखिक आदेशोक पालन करए पड़ैत छन्हि हुनका। से आइ.एस.डी. केर सुविधाक लेल टेलीफोन विभागकेँ ओ आरुणिक मौखिक आदेश पर चिट्ठी लिखने छलाह। माफिया ओकरा तोड़ि लेने छल आ ओहिमे ओ प्रशासनिक अधिकारी अपनाकेँ सेहो फँसा लेने छल। सोम दिन फैक्स आएल आ आरुणिक ट्रांसफर भऽ गेल। “रिप्रेजेंट करू एहि आदेशक विरुद्ध”- वैह चिरपरिचित स्वर, मणीन्द्रक। “अहूँ कोन झमेलामे पड़ल छी। सभ ठीक भऽ जएत”- बजलाह आरुणि फोन पर। शशांकक घरपर पार्टी भेल। “मिस्टर आरुणि रिप्रेसेन्ट तक नहि कएलन्हि। रिलीव भऽ कए चलि गेलाह। बुझू सरेन्डर कए देलन्हि अपनाकेँ ”। “प्रोमोशन बुझू जे दस साल धरि रुकल रहतन्हि। सीनियरिटी मारल जएतन्हि। बदनामी भेलन्हि से अलग। सुनैत छी जे फोनपर दुबइक स्मगलर सभसँ गप करैत छलाह”। ओम्हर आरुणिकेँ अपन बाबूजीक ट्रांसफर, ईमानदारीक लेल कएल संघर्ष, संघर्षक विफलता आ तकर बाद हुनकर तंत्र-विद्या आ पूजा-पाठक दिशि अपनाकेँ ओझराएब आ घर-द्वार, ऑफिस आ सांसारिकतासँ विरक्त्ति मोन पड़ि गेलन्हि। एहि सभ घटनाक्रमक बाद हुनकर मुँहपर एकटा चिन्ताक रेखा आएल छलन्हि। मुदा से बेशी दिन धरि नहि रहलन्हि आरुणिक मोन पर। हारिकेँ जीतमे कतोक बेर बदलने छलाह ओ। नोकरीयोमे आ ओहिसँ पहिने व्यवसायमे सेहो। “की यौ मणीन्द्र। कोनो फोन-फान नहि। हमर ट्रांसफर भऽ गेल तँ अहाँ सभ तँ बिसरिये गेलहुँ”। “हम की, सभ क्यो बिसरि गेल अहाँकेँ एतए”। “अहाँ की बुझलहुँ। जे हम सेहो बिसरि गेल छी। अहाँकेँ मोन अछि। हम जखन इंटरक बाद बाबूजीक इच्छाक विरुद्ध विज्ञान छोड़ि कए कला विषय लेने छलहुँ। विज्ञानक सभटा किताब ११ बजे रातिमे पोखरिमे फेंकि देने छलियैक। कोनोटा अवशेषो नहि छोड़ने छलहुँ ओहि विषयक अपन घरमे। आ जखन कला विषयमे प्रथम श्रेणी आएल छल तखन गेल छलहुँ गाम। तकरा पहिने कतेक बरियाती छोड़ने छलहुँ, कतेक जन्म-मृत्यु। मुदा गाम नहि गेल छलहुँ”। “एह भाई। अहाँकेँ तँ सभटा मोन अछि। हमरा तँ भेल जे अहूँ काका जेकाँ भऽ गेलहुँ। ई सभ क्षमाक योग्य नहि अछि। कनेक देखा दियौक। आब हमरा विश्वास भऽ गेल जे किछु होएत”। “फेर वैह गप। जखन अहाँ नहि बदललहुँ तखन हम कोना बदलब। छोड़ने छलहुँ किछु दिन अपनाकेँ। आब सुनू। जे कहैत छी से टा करू। बेशी बाजब जुनि। जाहि समयक कॉल हमर टेलीफोनसँ बाहरी देश कएल गेल छल ओहि समयमे तँ हमर टेलीफोन खराब छल, ई तँ अहाँकेँ बुझले अछि। घरसँ टेलीफोन विभागकेँ कम्प्लेन सेहो लिखबाओल गेल छल। मुदा से टेलीफोने पर लिखबाओल गेल छल। कोनो लिखित पत्र आ ओकर प्राप्ति रशीद तँ अछि नहि। मुदा ई पता करू जे एहि तरहक कम्प्लेनक कोनो रेकार्ड टेलीफोन विभागक लग रहैत छैक आकि नहि”। किछु दिनुका बाद मणीन्द्रक फोन आएल जे फोन विभाग एक महीनाक बाद कम्प्लेन नंबर फेरसँ शुरुसँ देब शुरू कए दैत छैक। से ई काज नहि भेल। “बेश तखन ई पता करू जे हमर नंबरसँ ककरा-ककरा कोन-कोन नंबर पर विदेश फोन कएल गेल छल। आ ओहि विदेशीक फोन कोन-कोन नंबर पर आएल अछि”। “हँ। एहि गपक तँ हमरा सुरते नहि रहल”। आब मणीन्द्र जे टेलीफोन नंबरक सूची अनलन्हि, से सभटा टेलीफोन बूथ सभक छल। मुदा कोनो टा कॉल आरुणिक नंबर पर नहि आएल छल। विजीलेंसक सुनबाहीमे ई सभ वर्णन जखन आरुणि कएलन्हि तखन शशांक हतप्रभ रहि गेल। ई तँ नीक भेल जे शशांकक आदमी सभ बूथ बलासँ संपर्क रखने छल, नहि तँ ओहो सभ फँसैत आ संगहि शशांकोक नाम अबैत एहि सभमे। अस्तु आरुणि जाँचसँ बाहर निकलि गेलाह। “भाइ। हम मणीन्द्र। ओकरा सभकेँ तँ किछु नहि भेलैक।“ “हमर ट्रांसफर दिल्ली भेल अछि। देखैत छी। अहाँ निश्चिंत रहू”। “हम तँ ओहि दिन निश्चिंत भऽ गेलहुँ जहिया अहाँ पुरनका गप सभ सुनेलहुँ। काकाक अपमानक बदला अहाँकेँ लेबाक अछि। मात्र व्यक्त्ति सभ बदलल अछि। चरित्र सभ वैह अछि”। दिल्लीमे आरुणि विजीलेंस विभागक सूचना-प्रौद्योगिकी शाखामे पदस्थापित भेलाह। एहि विभागकेँ शंटिंग पोस्टिंग मानल जाइत छल। विजीलेंसक एनक्वायरीसँ बाहर निकललाक बादो आरुणि एहि पोस्टिंगके चुनलन्हि से एहिसँ तँ ईएह सिद्ध होइत अछि जे आरुणि थाकि गेलाह। पाँच साल कोनमे बैसल रहताह। शशांकक ग्रुप प्रफुल्ल छल। एम्हर आरुणि अपन विज्ञानक छोड़ल पाठ फेरसँ शुरू कएलन्हि। भरि दिन कम्प्युटर आ ओकर तकनीकी विशेषज्ञ सभसँ भिड़ल रहथि। ओहो लोकनि बहुत दिनक बाद एहन अधिकारी देखने छलाह जे भिड़ल अछि, काजसँ। दोसर लोकनि तँ कोहुना टर्म पूर्ण कए भागैत छथि। ओना देखल जाए तँ ई विभाग बड्ड संवेदनशील छल। आब आरुणिक अपन विभागक सभ कर्मचारीसँ बेश निकटता भऽ गेल छलन्हि। सभक आवेदन समयसँ आगू बढ़ैत छल। सभटा ऑफिसक इक्विपमेंट नव आबए लागल। पहिलुका ऑफिसर सभ तँ समय काटि भागए केर फेरमे रहैत छल आ ऑफिसक आवश्यक आवश्यकता सेहो पूर्ण नहि करैत जाइ छल। ऑफिसमे एकटा इक्विपमेन्ट आएल छल, करप्शन रोकए लेल। एहिमे स्मगलर सभक फोन टेप करबाक सुविधा छल। किछु दिन समय व्यतीत होइत रहल। “मणीन्द्र। कोनो फोन-फान नहि”। “हम तँ आब निश्चिन्त छी भाइ”। “हँ समय आबि गेल अछि। एकटा काज करू, स्मग्लरक संग शशांकक संबंधक संबंधमे एकटा न्यूज निकलबा दियौक अखबारमे। आगाँ सभ चीज तैयार अछि”। ओम्हर अखबारमे खबरि निकलल आ मंत्रीक जन संपर्क पदाधिकारी जकर काज विभागक खबरिकेँ अखबारसँ काटि कए मंत्री धरि पहुँचायब छल ओहि क्लिपिंगकेँ मंत्रीजी लग पहुँचाए देलन्हि। समय समीचीन छल कारण विभागीय मंत्रीजीपर ढेर आरोप ओहि समय आएल छलन्हि, संसदक सत्र चलि रहल छल से ओ कोनो तरहक रिस्क नहि लेलन्हि। इंक्वायरीक ऑर्डर दए देलन्हि। विजिलेंस विभागमे केश आएल। ओकर आंतरिक बैठकी होइत छल जाहिमे सूचना-प्रौद्योगिकी विभागकेँ सेहो बजाओल जाइत छल। सभ केशमे मोटा-मोटी प्रौद्योगिकी विभाग अनाधिकार प्रमाण पत्र दए दैत छल। आ केश इंक्वायरीक बाद समाप्त भऽ जाइत छल। मीटिंगक तिथि तय भेल। मीटिंगमे आरुणि विजिलेंस कमेटीक सदस्यक रूपमे शामिल भेलाह। “शशांक पर कोनो तरहक कोनो आरोप सिद्ध नहि होइत छन्हि। आरुणि अहाँक विभागकेँ टेलीफोन टैपिंगक उपकरण उपलब्ध करबाओल गेल छल। मुदा अपन ऑफिसमे तँ फैक्स मशीनो ६ मास किनाकए राखल रहलाक बाद लगाओल जाइत अछि, तखन ई मशीन एखनो राखले होएत आकि किछु कंवर्शेशन रेकार्डो भेल अछि”। “श्रीमान। ई मशीन एहि मासक पहिल तिथिकेँ आएल आ ओहि तिथिसँ एकर उपयोग शुरू भऽ गेल। एहि केशमे जाहि स्मगलरक नाम आएल अछि ओकर नाम ओहि सूचीमे अछि जकर कॉल रेकॉर्ड करबाक आदेश हमरा भेटल छल। शशांकक कंवर्शेशन एहि व्यक्त्तिसँ नहि केर बराबर अछि। आध-आध मिनटक दू टा कंवर्शेशन। दोसर कंवर्शेशन नौ बजे रातिक छी आ एहि कंवर्शेशनक बाद ओहि स्मगलरक फोन अपन कर्मचारीकेँ जाइत छैक आ ताहूमे मात्र आध मिनट ओ लगबैत अछि”। “ई कोन तारीखक अछि”। “पाँच तारीखक”। “छह तारीखक भोरमे एहि स्मगलरक ओहिठाम रेड भेल छल आ किछु नहि भेटल छल। ई सभ फोनक डिटेल दिअ आरुणि”। “पहिल कॉलमे शशांक कहैत छथि जे साढ़े आठ बजे घर पर आबि कए भेंट करू। बड्ड जरूरी गप अछि। ओ नौ बजे दोसर कंवर्शेशनमे तमसाइत कहैत छथि जे नौ बाजि गेल आ अहाँ एखन धरि नहि अएलहुँ। एहिमे उत्तर सेहो भेटैत अछि जे ओ स्मगलर शशांकक गेट पर ठाढ़ अछि”। “तेसर फोनमे की वार्त्तालाप अछि”। “तेसर फोन ओ स्मगलर अपन ऑफिस स्टाफकेँ साढ़े नौ बजे करैत अछि। ओ कर्मचारीकेँ आदेश दैत अछि जे तुरत ऑफिस आऊ, हमहुँ पहुँचैत छी। बस एकर अतिरिक्त किछु नहि। कोनो एवीडेंस नहि भेटि सकल एहि केसमे। कहू तँ हम नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट दए दिअ”। “आरुणि। की कहैत छी अहाँ। अहाँक विभाग तँ आइ धरि कोनो काज नहि कएने छल मुदा आइ तँ सभटा कड़ी जोड़ि देलहुँ अहाँ। शशांक फोन कएलक जे भेंट करू। दोसर फोन पर ओ व्यक्त्ति ओकर गेट पर ठाढ़ छल। तेसर फोनमे ओकर कर्मचारी ऑफिस ओतेक रातिमे की करए जाइत अछि। रेडक खबरि शशांक लीक कएलन्हि। ओ कर्मचारी सभटा कागज हटा देलक आ हमर विभागक ऑफिसर भोरमे छुच्छ हाथ घुरि कए आबि गेलाह। आब एकटा फोन आर करू। शशांकक नंबर टेप तँ नहि भऽ सकल छल मुदा प्रक्रियाक अनुसार ओकर आवाजक सैंपल मैच करबाक चाही। ओ फोन उठायत तँ गलत नंबर कहि काटि दियौक”। “सैह होएत”। तखने ई प्रक्रिया कएल गेल। “ई तँ ओपन आ शट केस अछि”- विजीलेंस कमेटीक अध्यक्ष महानिदेशककेँ बतओलन्हि। महानिदेशक शशांककेँ बजबओलन्हि आ ओकरा दू टा विकल्प देलन्हि। “शशांक, एहि सभ घटनाक बाद अहाँ लग दू टा विकल्प अछि। विभागसँ कंपलसरी सेवा निवृत्ति लेबए पडत अहाँकेँ। नहि तँ इंक्वायरी आगाँ बढ़त”। शशांक कंपलसरी सेवानिवृत्ति लए लेलन्हि। विभाग छोड़ि कए चलि गेलाह। “भाइ मणीन्द्र। कोनो फोन-फान नहि”। “भजार। हम तँ ओहि दिन निश्चिंत भऽ गेल छलहुँ जाहि दिन हमरा बुझबामे आओल जे अहाँकेँ बच्चाबला सभटा गप मोन अछि। काका आ अहाँमे कोनो अंतर नहि। मार्ग मात्र दू तरहक रहल। एहि विजयक मार्ग पर अहाँ चली ताहि हेतु कतेक कहैत छलहुँ अहाँकेँ, से मोन अछि ने। मुदा ओहि दिन जखन हमरा अहाँ बच्चाक गप सभ कहए लगलहुँ तहिये निश्चिन्त भऽ गेल छलहुँ हम”। आरुणिक पढ़ाइक ग्राफ पिताक मोनक संग बनैत-बिगड़ैत रहैत छलन्हि। मुदा घुरि कए पुनः लक्ष्य प्राप्त करैत छलाह। नोकरीमे रहितहु ई घटना एक बेर फेर भेल छल। आ फेर एकटा सरकारी यात्राक बाद आरुणिक भेल एक्सीडेन्ट । १५ दिन धरि वेंटीलेटर पर फेर एक साल धरि बैशाखी पर रहलाक बाद पुनः अपन पैर पर ठाढ़ भऽ गेलाह आरुणि । ओ बच्चा जे डायरी लिखैत छल कतए होएत । ओ काल्पनिक कथाकार सभटा सत्ते लिखने छल, आरुणिक भविष्यक वक्तव्य कऽ रहल छल ओ । आरुणिक डायरीमे सेहो यैह अंकित भेल- “अप्पन माने हमर –-आरुणिक- विषयमे गप्प करबा लेल हमरा लगमे समयक अभाब रहय लागल । किछु तँ एकर कारण रहल हम्मर अप्पन आदति आ किछु एकर कारण रहल ह्म्मर एक्सीडेंट, जकर कारणवस हम्मर जीवनक डेढ साल बुझा पड़ल जेना डेढ़ दिन जेकाँ बीति गेल । किछु एहि बातक दिस सेहो हमर ध्यान गेल जे डेढ सालमे जतेक समयक नुकसान भेल तकर क्षतिपूर्ति कोना कए होएत । तखन सामजिक संबंधकेँ सीमित करबाक विचार आएल । एहिमे हमरा बिन प्रयासक सफलता भेटि गेल छल । एकर कारण छल हमर नहि खतम प्रतीत होमएबला बीमारी । एहिमे विभिन्न डॉक्टरक ओपिनियन, किछु गलत ऑपरेशन आ एकर सम्मिलित इम्प्रेसन ई, जे आब हमरा अपाहिजक जीवन जीबए पड़त । आनक बात तँ छोडू हमरा अपनो मोनमे ई बात आबए लागल छल । लगैत छल जे डॉक्टर सभ फूसियाहिँक आश्वासन दए रहल अछि । एहि क्रममे फोनसँ लऽ कए हाल समाचार पुछनिहार धरिक संख्या सेहो घटि गेल छल । से जखन अनचोक्के बैशाखी, फेर छड़ीपर अएलाक बाद हम कार चलाबए लगलहुँ तँ बहुत गोटेकेँ फेर सँ हमरा संग सामान्य संबंध बनाबएमे असुविधा होमए लगलन्हि। जे हमरासँ दूर नहि गेल रहथि तनिकासँ तँ हम जबर्दस्तीयो संबंध रखलहुँ मुदा दोसर दिशि गेल लोकसँ हमर व्यवहार निरपेक्ष रहैत छल, से पुनःसंबंध बनेबासँ लोक हतोत्साहित रहए लगलाह । दुर्दिनमे जे हमरापर हँसथि तनिकर प्रति ई व्यवहार सहानभूतिप्रदहि मानल जएत । एहिसँ समयधरि खूब बचए लागल। शुरुमे तँ लागल जेना ऑफिसमे क्यो चिन्हत आकि नहि । मुदा जखन हम ऑफिस पहुँचलहुँ तँ लागल जेना हीरो जेकाँ स्वागत भेल होअए । मुदा एहिमे ई बात संगी-साथी सभ नुका लेलक जे हमर छड़ी सँ चलनाइ हुनका सभक भीतर हाहाकार मचा रहल छलन्हि । सभ मात्र हमर हिम्मतक प्रशंसा करैत रहैत छलाह । जखन हम छड़ी छोड़ि कए चलए लगलहुँ तखन एक गोटे संगी कहलक जे आब अहाँ पुरनका रूपमे घुरि रहल छी । एहि बातकेँ हम घरपर आबि कऽ सोचए लगलहुँ । अपन चलए केर फोटोकेँ पत्नीक मदति सँ हैण्डीकैम द्वारा वीयोडीग्राफी करबएलहुँ । एकबेर तँ सन्न रहि गेलहुँ । चलबाक तरीका आबो नेँगड़ा कए दौगब सन लागल छल । पहिने तँ आर बेशी होएत मुदा संगी सभ एको रत्ती पता धरि नहि चलए देलक । बादमे घरक लोक कहलक जे ई तँ बड्ड कम अछि, पहिने तँ आर बेसी छल । तखन हमरा बुझबामे आएल जे संगीसभ आ ओ सभ जे हमरासँ लगाव अनुभव करैत छलाह, तनिका कतेक खराब लगैत होएतन्हि । तकरा बाद हमरा हुनकर सभक प्रोत्साहन आ हमर हिम्मतिक प्रशंसा करैत रहबाक रहस्यक पता चलल । अपन प्रारम्भिक जीवनक एकाकीपन आ नौकरी-चाकरी पकड़लाक बाद सार्वजनिक जीवनमे अलग-थलग पड़ि जएबाक संदेह, आशा, अपेक्षा किंवा अनुभवक बाद जे एहि तरहक अनुभव भेल से हमर व्यक्तित्वक भिन्न विकासकेँ आर दृढ़ता प्रदान केलक”। कैकटा ऑपेरेशन भेलन्हि आ अनेस्थिशियासँ बाहर अबैत काल आरुणिकेँ लागन्हि जे ओ झोँटा बला सहस्रबाढ़नि झमारि कए एहि विश्वमे फेंकि दैत छन्हि हुनका ।मृत्यु पर विजय कएलन्हि आरुणि। मुदा डेढ़ बरख बाद जखन ऑफिस अएलाह तखन लोककेँ विश्वासे नहि भेलैक। मुख पर वैह चिरपरिचित हँसी। लोक सभ तँ ईहो कहैत छल जे ई एक्सीडेंट भेल नहि छल वरन् करबाओल गेल छल। कारण नवलक एक्सीडेंट जेकाँ छल ई एक्सीडेंट। मायानन्द मिश्रक इतिहास बोध-प्रथमं शैल पुत्री च/ मंत्रपुत्र/ पुरोहित आ स्त्री-धन केर संदर्भमे एहि प्रबन्धमे मायानन्दजीक स्त्रीधन, पुरोहित, मंत्र-पुत्र आ प्रथमं शैलपुत्री च- एहि चारि पोथीक जे कथा-विधान आ साहित्यिक विवेचन छल तकरा यथा संभव नञि छुअल गेल आ मात्र इतिहास-बोधक सन्दर्भमे विवेचना अछि। प्रबंधमे मायानान्द जीक १.प्रथमं शैल पुत्री च २.मंत्रपुत्र ३.पुरोहित आ ४. स्त्री-धन एहि चारि ऐतिहासिक उपन्यास सभक आधार पर लेखक द्वारा लगभग दू दशकमे पूर्ण कएल गेल इतिहास यात्राक समीक्षा कएल गेल अछि। एहिमे प्रयुक्त पुस्तकमे, मंत्रपुत्र मैथिलीमे अछि आ शेष तीनू उपन्यास हिन्दीमे, तथापि यात्रा पूर्णताक दृष्ट्वा आ श्रृंखलाक तारतम्य आ समीक्षाक पूर्णताक हेतु चारू किताबक प्रयोग अनिवार्य छल। कालक्रमक दृष्टिसँ प्रथमं शैल पुत्री च प्रथम अछि । एहिमे १५०० ई.पू.सँ पहिलुका इतिहासक आधार लेल गेल अछि। मंत्रपुत्रमे १५०० ई.पू. सँ १२०० ई.पू. धरिक इतिहास उपन्यासक आधार अछि। ई सभ आधार भारत युद्धक पहिलुका अछि। पुरोहितमे १२०० ई.पू.सँ १००० ई.पू. धरिक इतिहास अछि- एकरा ब्राह्मण साहित्यक युगक इतिहास कहि सकैत छी। स्त्रीधनक आधार अछि सूत्र-स्मृतिकालीन मिथिला। मुदा रचना भेल मैथिली मंत्रपुत्रक पहिने -नवंबर १९८६ मे। प्रथमं शैल पुत्री च एकर दू सालक बाद रचित भेल आ ताहिमे मायानन्द जी चारू किताबक रचनाक रूपरेखा देलन्हि मुदा ई हिन्दीक संदर्भमे छल। एकर बाद सभटा किताब हिन्दी मे आएल। हिन्दी मंत्रपुत्र आएल जाहि कारणसँ तेसर पुस्तक पुरोहित किछु देरीसँ १९९९ मे प्रकाशित भेल। स्त्रीधन जे एहि श्रृंखलाक अंतिम पुस्तक अछि, २००७ ई. मे प्रकाशित भेल। “प्रथमं शैल पुत्री च” केर प्रस्तावनाक नाम कवच छल।मंत्रपुत्रक प्रस्तावनाक नाम ऋचालोक छल आ ई पुस्तकक अंतमे राखल गेल, किएक तँ ई लेखकक प्रथम ऐतिहासिक रचना छल, प्रस्तावनाकेँ अंतमे राखि कय रहस्य आ रोमांचकेँ बनाओल राखल गेल । पुरोहितक प्रस्तावनाक नाम विनियोग छल आ एकरासँ पहिने दूर्वाक्षत मंत्र राखल गेल जे भारतक आ विश्वक प्रथम देशभक्ति गीत अछि। मिथिलामे एकरा आशीर्वादक मंत्रक रूपमे प्रयोग कएल जाइत अछि जकर पक्ष-विपक्षमे विस्तृत चरचा बादमे होएत। स्त्रीधनक प्रस्तावनाक नाम लेखक पृष्ठभूमि रखने छथि जे उपन्यासक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि प्रदान करबाक कारण सर्वथा समीचीन अछि। मायानन्दक इतिहास-बोधक समीक्षा हम श्रुति, परम्परा, तर्क आ भाषा-विज्ञानक आधार पर कएने छी। पाश्चात्य विद्वान सभक उच्छिष्ट भोज सँ निर्मित भारतीय इतिहास-लेखन सँ बचि कए इतिहासक समीक्षा भेल अछि आ मध्य एशिया आ यूरोपक कनियो प्रभाव समीक्षा पर नहि पड़ए से प्रयास कएल गेल अछि। १. प्रथमं शैल पुत्री च- कवच रूपी प्रस्तावनाक बाद ई पुस्तक १. अग्ना, २.अग्न-शैला, ३. शैला- कराली, ४. कराली- महेष, ५. महेष- पारवती, ६. गणेष, ७. हरकिसन, ८. किसन, ९. हरप्पा : मोअन गाँव, १०. गणेष का श्रीगणेश, ११. किश्न, १२. महाजन, १३. मंडल, १४. किश्न मंडल, १५. मंडल : मंडली, १६. पतन: पुरंदर आ १७. उपसंहार : पलायन खंडमे विभक्त अछि। १. अग्ना- २००० ई. पू. सँ आरम्भ होइत अछि ई उपन्यास। खोहमे रहएबला मनुष्यक विवरण शुरू होइत अछि। बा एकटा दलक सर्वाधिक बलिष्ठ मनुष्य अछि। पूर्वज बा सेहो बलिष्ठ छल। एतेक रास बच्चा सभक बा। एकटा छोट आ एकटा पैघ पाथरक आविष्कार कएने छलाह पूर्वज बा। अम् दलाग्राकेँ कहल जाइत छल। बा भयंकर गंधवला पशुक नाम सेहो छल। हाथक महत्व बढ़ल आ बढ़ल वृक्षसँ दूरी। सर्पकेँ मारि कए खाएल नहि जाइत अछि, से गप पूर्वजसँ ज्ञात छल। प्राचीन देव वृक्ष, दोसर नाग देव आ तेसर नदी देव छलाह। अम्बासँ बा संतान उत्पन्न करैत आएल छलाह। नव कुठार आ नव काताक आविष्कार भेल। अः आः अग अग्ग केर देखि कए वन्य पशुकेँ भागैत देखि एकर जानकारी भेल। मानुषी हुनकर संख्या वृद्धि करैत छलि। प्रथम मानुषीक नाम पड़ल अग्ना। ओकर मानुष-मित्र छलाह अग्ग। अग्ना दलाग्रा बनि गेलीह आ हुनकर नेतृत्वमे दल उत्तर दिशि बढ़ल। फेर लेखक लिखैत छथि जे पृथ्वीक उत्पत्ति लगभग २०० करोड़ वर्ष पूर्व भेल जे सर्वथा समीचीन अछि। कर्मकाण्डमे एक स्थान पर वर्णन अछि- “ब्राह्मणे द्वितीये परार्धे श्री स्वेतवाराह कल्पे वैवस्वत मन्वंतरे अष्ठाविंशतितमे कलियुगे प्रथम चरणे” आ एहि आधार पर गणना कएला उत्तर १,९७,२९,४९,०३२ वर्ष पृथ्वीक आयु अबैत अछि। रेडियोएक्टिव विधि द्वारा सेहो ईएह उत्तर अबैत अछि। यूरोपमे सत्रहम शताब्दी धरि पृथ्वीक आयु ४००० वर्ष मानल जाइत रहल। ईरानक विद्वान १२०० वर्ष पहिने पृथ्वीक उत्पत्ति मानलन्हि। ई दुनू दृष्टिकोण वैज्ञानिक दृष्टिकोणसँ देखलापर हास्यास्पद लगैत अछि। अग्ना-शैलासँ शुरू होइत अछि दोसर भाग। १०००० ई.पू.। भाषाक आरंभक प्रारंभ मायानन्द मिश्र एहिमे प्रकट कएने छथि। एहिमे बड्ड नीक जेकाँ, संकेत भाषासँ ध्वनिक संबंध परिलक्षित कएल गेल अछि। चलंत सँ स्थिर जीवनक शुरुआत सेहो देखायल गेल अछि। तकर बाद शैला कराली अध्यायक प्रारंभ होइत अछि, ७५०० वर्ष पूर्वसँ। गौ पालनक चर्चा होइत अछि, गायक संख्यामे पर्याप्त वृद्धि भेल छल। सभ रहथि चरबाह, चर्मस्त्र्धारी। आ कटिमे पाथरक हथियार। भेड़, बकरी आ सुग्गर छल, किछु आन पोसिया जंतु जात सेहो रहए। घासक रस्सी, त्रिशूल आ नागदेवक चर्चा होइत अछि। बाक नाम आब भऽ जाइत अछि, ओजा। दलाग्राक नाम पड़ैत अछि शैला कराली। पशुक संख्या बढ़ल तँ पशुक चोरि सेहो शुरू भऽ गेल।पीपरक गाछक नीचाँ बैठकीक प्रारम्भ भेल। करालीक नाम अंबा पड़ल। कराली-महेष अध्यायमे ५००० ई.पू. मे कृषिक प्रारम्भ देखाओल गेल अछि। महेष बीया बागु कए रहल छथि। जवकेँ पका कऽ खयबाक चर्चा होइत अछि। आब धारक नाम सेहो राखल जाए लागल। महेष कुल द्वारा पोस केर माँस खेनाइ तँ एकदम निषिद्ध भऽ गेल।ओजा लिंग स्थानमे बैसल रहैत छलाह। तकर बाद महेष-पारवती अध्याय शुरु होइत अछि ४ सँ ५ हजार वर्ष पूर्व। धानक फसिलक प्रारंभ भेल। पारवती जहिया अएलीह तहिया ओतुक्का प्रथाक अनुसार लाल माटि माथमे लगा देल गेल। पुत्रक नाम गणेष पड़ल। एहिसँ पहिने संतानक परिचय नहि देल जाइत छल। गणेष- ई अध्याय ४००० वर्ष पूर्वसँ शुरू होइत अछि। स्त्री-पुरुष संबंध आ पितृ कुलक आरंभक चर्चा शुरू भेल। नून अनबाक आ खेबाक प्रारंभ भेल। नून अनबासँ कुलक नाम नोनी पड़ल। जव आ गहूमक खेतीक प्रारंभ आ दूध दुहबाक आरंभ देखाओल गेल अछि। हाथीक पालनक प्रारंभ आ अदला-बदलीसँ विनिमयक प्रारंभ सेहो शुरू भेल। शिश्न देव पर जल आ पात चढ़ेबाक प्रारंभ सेहो भेल। यवकेँ कूटब आ बुकनी करबाक प्रारंभ भेल। गहूमकेँ चूरब आ पानिमे भिजा कए आगिमे पकाएब प्रारंभ भेल। पक्षिपालन करएबला एकटा भिन्न दल छल। मृतक-संस्कार आ मृत्यु पर कनबाक प्रारंभ सेहो भेल। लिपिक प्रारंभ सेहो भेल। हर- एहि अध्यायक प्रारंभ ३५०० ई.पू. देखायल गेल अछि। नूनक व्यापार आ सुगढ़ नावक निर्माण प्रारंभ भेल। पइलीक कल्पना नपबाक हेतु भेल। हर आ बड़दक सम्मिलन प्रारंभ भेल। इनार खुनबाक प्रारंभ आ जनक लंबवत केर अतिरिक्त चौड़ाइमे बसबाक प्रारंभ सेहो भेल। घर बनएबाक प्रारंभ सेहो भेल।कारी, गोर आ ताम्रवर्णी कायाक बेरा-बेरी आगमन होइत रहल। हरकिसन अध्यायक प्रारम्भ ३४०० वर्ष पूर्व होइत अछि। कृषि विकासक संग स्थायी निवासक प्रवृत्ति बढ़य लागल। तकरा बाद परिवारक रूप स्पष्ट होमय लागल। कृषि-विकाससँ वाणिज्य विस्तारक आवश्यकता बढ़ल। ऊनक वस्त्र, चक्की, भीतक घर आ इनारक घेराबा बनए लागल। किसन अध्यायक प्रारम्भ ३३०० ई.पूर्व भेल। श्रम-बेचबाक प्रारम्भ भेल। पटौनीक प्रारम्भक संग कृषि-विकास गति पकड़लक। भूगोलक जानकारी भेलासँ वाणिज्य बढ़ल। अलंकारक प्रवृत्ति बढ़ल। हड़प्पा: मोहनगाँव अध्याय ३२०० वर्ष पूर्व देखाओल गेल अछि।श्रम-बेचबाक हेतु काठक टोलक उदाहरण अबैत अछि। अलंकार प्रवृत्ति बढ़ल। गोलीक मालाक संग कुम्हारक चाक सेहो सम्मुख आयल। समाजमे वर्ग विभाजनक प्रारम्भ भेल। गणेषक श्रीगणेष अध्याय ३१०० ई. पूर्व प्रारम्भ भेल। दक्षिणांचल लोकक आगमनक बाद हड़प्पा हुनका लोकनि द्वारा बनेबाक चर्च लेखक करैत छथि। मोहनजोदड़ो, लोथल आ चान्हूदोड़ोक विकास व्यापारिक केन्द्रक रूपमे भेल। लिपि, कटही गाड़ी आ मूर्त्तिकलाक आविष्कार भेल आ वस्तु विनिमयक हेतु हाट लागए लागल। मेसोपोटामियाक जलप्लावन आ सुमेरी आ असुरक आगमनक चर्चा लेखक करैत छथि। किश्न अध्यायक प्रारम्भ ३००० ई.पू. सँ भेल। विदेश व्यापारक आरम्भ भेल। तामक आविष्कार भेल। कृषि दासत्वक सेहो प्रारम्भ भेल। बाढ़िसँ सुरक्षाक हेतु ऊँच डीह बनाओल जाए लागल। महाजन अध्याय २८०० ई. पू. प्रारम्भ होइत अछि। नगरक प्रारम्भ वाणिज्यक हेतु भेल। नहरि पटौनीक हेतु बनाओल जाए लागल। डंडी तराजूक आविष्कार आवश्यकता स्वरूप भेल। प्रकाश-व्यवस्थाक ब्योँत लागल। मंडल अध्यायमे चर्च २६०० ई.पू.क छै। संस्था निर्माण, विवाह व्यवस्था आ दूरगर यात्राक हेतु पाल बला नावक निर्माण प्रारम्भ भेल। किश्न मंडल अध्याय २४०० ई.पू. केर कालखण्डसँ आरम्भ कएल गेल अछि। एहिमे वर्षाक अभावक चरचा अछि। आर्यक पूर्व दिशामे बढ़बाक चर्चासँ लोकमे भयक सेहो चर्चा अछि। मंडल:मंडली अध्याय २२०० ई.पू.सँ प्रारम्भ भेल। आर्यक आगमनक आ वर्षाक अभाव दुनूकेँ देखैत लोथल वैकल्पिक रूपसँ विकसित होमए लागल। पतन:पुरंदर: एहि अध्यायक कालखण्ड २००० ई.पू.सँ प्रारम्भ भेल अछि। आर्यक राजा द्वारा पुरकेँ तोड़ि महान केंद्र हड़प्पाकेँ ध्वस्त करबाक चर्चासँ मायानन्द जी अपन पहिल किताब ‘प्रथमं शैल पुत्री च’ केर समापन करैत छथि। आर्य हड़प्पाकेँ हरियूपियासँ संबोधित कएल, आर्य बाहरसँ अएलाह प्रभृत्ति किछु सिद्धांतक आधार पर रचित ई उपन्यास ऐतिहासिक उपन्यास होएबाक दावा करैत अछि। आ एहिमे २०,००० ई.पू.सँ १८०० ई.पू. धरिक इतिहासोपाख्यानक चर्चा अछि। मुदा मौलिक ऐतिहासिक विचारधारा आ नवीन शोधक आधार पर एकर बहुतो बात समीचीन बुझना नहि जाइत अछि। अग्नासँ शुरू भेल ई कथानक बड्ड आशा दिअओने छल। लेखक पहिल अध्यायमे लिखैत छथि जे पृथ्वीक उत्पत्ति लगभग २०० करोड़ वर्ष पूर्व भेल जे सर्वथा समीचीन अछि। कर्मकाण्डमे एक स्थान पर वर्णन अछि- “ब्राह्मणे द्वितीये परार्धे श्री स्वेतवाराह कल्पे वैवस्वत मन्वंतरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे प्रथम चरणे” आ एहि आधार पर गणना कएला उत्तर १,९७,२९,४९,०३२ वर्ष पृथ्वीक आयु अबैत अछि। रेडियोएक्टिव विधि द्वारा सेहो ईएह उत्तर अबैत अछि। ई अनुमानित अछि जे यूरेनियमक १.६७ भाग १०,००,००,००० वर्षमे सीसामे बदलि जाइत अछि। विभिन्न प्रकारक पाथर आ चट्टानमे सीसाक मात्रा भिन्न रहैत अछि। एहि प्रकारसँ गणना कएला पर ई ज्ञात होइछ जे रेडियोएक्टिव पदार्थ १,५०,००,००,००० वर्ष पहिने विद्यमान छल। एहि प्रकारेँ कोनो शैलक आयु २,००,००,००,००० वर्षसँ अधिक नहि भऽ सकैछ। यूरोपमे सत्रहम शताब्दी धरि पृथ्वीक आयु ४००० वर्ष मानल जाइत रहल। ईरानक विद्वान १२०० वर्ष पहिने पृथ्वीक उत्पत्ति मानलन्हि। एहि तरहक पाश्चात्य शोधकेँ लेखक पहिल अध्यायमे तँ नकारि देलन्हि मुदा अंत धरि जाइत-जाइत ओ - आर्य लोकनि हड़प्पाकेँ हरियूपिया कहैत छथि - एहि प्रकारक पाश्चात्य दुराग्रहक प्रभावमे आबि गेलाह। पश्चिमी विद्वानक उच्छिष्ट भोजसँ बचि श्रुति परम्पराक परीक्षा तर्कसँ नहि कए सकलाह। एहि प्रकारे ‘प्रथमं शैल पुत्री च’ निम्न आधार पर अपन इतिहासोपाख्यान साहित्यिक रूपसँ नहि बना पओलक :- पुरातात्विक, भाषावैज्ञानिक आ साहित्यिक साक्ष्य एहि पक्षमे अछि जे आर्य भारतक मूल निवासी छलाह। आर्य भाषा परिवारक नामकरण मैक्समूलर द्वारा कएल गेल छल। द्रविड़ परिवारक नामकरण पादरी रॉबर्ट काल्डवेल द्वारा कएल गेल छल।आर्यक आक्रमणक सिद्धांत आएल ग्रिफिथक ऋग्वेदक अनुवादमे देल गेल फूटनोटसँ। पहिने तँ ई नामकरण विदेशी विद्वान द्वारा कएल गेल छल ताहि द्वारे ओकर अपन उद्देश्य होएतैक। सरस्वती नदी, जल-प्रलय, मनु आ महामत्स्यक कथा, गिल्गमेश कथा काव्य, प्राणवंतक देश गिल्गमेशक खोज, सृष्टिकथा आ देवतंत्रक विकास एहि सभटा समाजशास्त्रीय विकासक विश्लेषण आर्य लोकनिक भारतक मूल निवासी होएबाक साक्ष्य प्रस्तुत करैत अछि। ऋग्वेदमे मातृसत्तात्मक व्यवस्थाक स्मृतिक रूपमे बहुवचन स्त्रीलिंगक प्रयोगक बहुलता अछि। सघोष आ महाप्राण ऋग्वेदिक आ भारतीय भाषाक ध्वनिक प्रतिरूप, नहि तँ ईरानी आ नहिये यूरोपीय भाषा सभमे भेटैत अछि। सरस्वती आ सिन्धु धारक बीचक सभ्यता छल आर्यक सभ्यता। सरस्वती धारक तटवर्ती भरत, पुरु आ अन्य गण सभ मिलि कए ऋगवेदक रचना कएलन्हि। सरस्वतीमे जल-प्रलयक बाद ई सभ्यता सारस्वत प्रदेश सँ हटि कए कुरु-पांचाल आ ब्रह्मर्षि प्रदेश-मध्यदेश- पहुँचि गेल। इतिहासमे भरत लोकनिक महत्व समाप्त भऽ गेल। एहि जल प्रलयक बाद आर्यजन लोकनिक वंशज मोहनजोदड़ो आ हड़प्पा नगरक निर्माण कएने होएताह सेहो सम्भव। हड़प्पा सभ्यताक ८०० मे सँ ५३० सँ ऊपर स्थान एहि लुप्त सरस्वती धारक तट पर अवस्थित छल। सिन्धुक धार पर एहि स्थल सभक बड्ड कम निर्भरता छल आ जखन सरस्वतीमे पानिक प्रवाह घटल तँ एहि सभ केन्द्रक ह्रास प्रारम्भ भऽ गेल। पहिने सरस्वतीमे जल-प्रलयसँ आर्यक पलायन भेल (ऋगवेद आ यजुर्वेदक रचनाक बाद) आ फेर सरस्वतीमे पानिक कमी भेलासँ दोसर बेर आर्यक पैघ पलायन भेल (अथर्ववेदक रचनाक पहिने)। अरा-युक्त रथक वर्णन वेदमे भेटैत अछि। नहि तँ ई पश्चिम एशियामे छल आ नहिये यूरोपमे। भारतीय देवनाम, शिल्प, कथा, अश्वविद्या, संगीत, भाषिक तत्व आ चिंतनक संग ई उद्घाटित होमए लागल पश्चिम एशिया, मिश्र आ यूनानमे। दोसर सहस्राब्दी ई.पूर्व अरायुक्त्त रथ, भारतीय देवनाम, भारतक धार, ऋगवेदिक तत्वचिंतन, अश्वविद्या, शिल्प-तकनीकी आ पुरातन् कथा भारतसँ पच्छिम एशिया, क्रीट-यूनान दिशि जाए लागल। कालक्रमसँ मिश्र, सुमेर-बेबीलोन, आदि सभ्यता आ मित्तनी आ हित्ती सभ्यतासँ बहुत पहिनहि ऋगवेदक अधिकांश मंडलक रचना भऽ गेल छल। मायानन्दजीक एहि सीरीजक दोसर रचना मंत्रपुत्र अछि। एहिमे ऋगवैदिक आधार पर जीवन-दर्शनकेँ राखल गेल अछि। ऋगवेद १० मंडलमे (आ आठ अष्टकमे सेहो) विभक्त्त अछि। मायानन्द मिश्रजी मंडलक आधार पर मंत्रपुत्रक विभाजन सेहो १० मण्डलमे कएने छथि। एहि पुस्तकक भूमिकाक नाम अछि ऋचालोक आ ई पुस्तकक अंतमे १०म मण्डलक बाद देल गेल अछि। प्रथम मण्डलमे काक्षसेनी पुत्री ऋजिश्वाक चर्च अछि संगहि ऋतुर्वित पुत्री शाश्वतीक सेहो। जन सभा आ जन-समिति द्वारा राजाकेँ च्युत करबाक/ निर्वासन देबाक आ दोसर राजाक निर्वाचन करबाक चर्चा सेहो अछि। नेत्रक नील रंग रहबाक बदला श्यामल भऽ जएबाक चर्चा आ एकर कारण खास तरहक विवाहक होयबाक चर्चा सेहो भेल अछि।वितस्ता तटसँ कृष्ण सभक निरन्तर उपद्रवक चर्चा सेहो अछि। सुवास्तु तटसँ रक्त्त मिश्रणक प्रक्रियाक वर्णन अछि। गोमेधकेँ वर्जित कएल जाय, ई विचार विमर्श कएल जाए लागल। दासक चर्चा सेहो अछि। हरियूपिया पतन आ ओकर विभिन्न नगर सभक उजड़ि जएबाक चर्चा अछि आ पश्चात्, बल्बूथ द्वारा अनार्य सभक ध्वस्त वाणिज्य व्यवस्थाकेँ संगठित करबाक चर्चा अछि। द्वितीय मण्डलमे राजाकें समिति द्वारा एहि गपक लेल पदच्युत कएल जएबाक चर्चा अछि, कि धेनुक चोरिक बादो गव्य-युद्ध ओ नहि कएलन्हि। अभिषेकक सङ्ग राजा सेहो प्रायः निश्चित होमए लगलाह आ कौलिक परम्परा चलि गेल। पहिने समितिक निर्णयक बादे क्यो समर्थन-याचनामे जाइत छलाह, राजदण्ड सम्हारैत छलाह। धेनुक हरण कएने छल अनास दस्यु सभ। सुवास्तु, क्रुमु, वितस्ता आ अक्खनीक तट पर श्रुति अभ्यास आ युद्ध-कार्य संगहि चलैत छल, एके संग ब्राह्मण, क्षत्रिय आ वैश्य कर्म करैत छथि। मुदा सरस्वतीक तट पर बात किछु दोसरे भऽ गेल, ऋषिग्राम फराक होमय लागल। सभटा अनास दस्यु दास बनि गेल आ दासीसँ आर्यगणक संतान उत्पन्न होमए लगलन्हि। दासीपुत्र लोकनिकेँ तँ गाममे घर बनेबाक अनुमति छलन्हि मुदा अनास दस्युकेँ ओ अनुमति नहि छलन्हि। एहि गपक चर्चा अछि, जे आर्य चर्म वस्त्र पहिरैत छलाह आ अनास दस्यु लोकनिक संपर्कसँ सूतक वस्त्र आ लवणक प्रयोग सिखलन्हि। एहि दुनू चीजक आपूर्त्ति एखनो अनास लोकनिक हाथमे छलन्हि। अनार्य लोकनिक संपर्कसँ अपन शब्द कोश बिसरबाक आ तकर संकलनक आवश्यकताक पूर्त्तिक हेतु निघण्टुक संकलनक चर्चा सेहो अछि। गंधर्व विवाहक सेहो चर्चा अछि। तृतीय मण्डल अग्निष्टोम यज्ञक चर्चा अछि। छागर आ महीसक बलि केर चर्च अछि। माँस-भात महर्षि लोकनिकेँ प्रिय लगलन्हि, तकर चर्चा अछि मुदा भातक बदला गहूमक सोहारीक प्रचलन एखनो बेशी होएबाक चर्चा अछि। चतुर्थ मण्डल राजाक अभिषेक यज्ञक चर्चा आ ओहिमे अरिष्टनेमिक ब्रह्मा बनबाक चर्चा अछि। ग्रामणी, रथकार, कम्मरि, सूत, सेनानी सेहो यज्ञमे सम्मिलित छलाह। “अति प्राचीन कालमे सृष्टि जलमय छल”! एकर चर्चा मायानन्द मिश्रजी नहि जानि ऋगवेदिक युगमे कोना कए देलन्हि। पञ्चम मण्डल अश्वारोहण प्रतियोगिताक चर्चा अछि। अनास दास-रंजक नाट्यवृत्तिक चर्चा सेहो अछि। राजा द्वारा एकर अभिषेक कार्यक्रममे स्वीकृति आ एकर भेल विरोधक सेहो चर्चा अछि। दासकेँ स्वतंत्र कृषि अधिकार आ एकरा हेतु विदथक अनुमति राजा द्वारा लेल जाए आकि नहि तकर चर्चा अछि। षष्ठ मण्डल महावैराजी यज्ञक चर्चा अछि। समस्त दस्यु-ग्रामक दास बनि जएबाक सेहो चर्चा अछि आ ओ सभ पशुपालन आ पणि कार्य कऽ सकैत छथि। नग्नजितक प्रसंग लए मंत्र गायन केनिहार ब्राह्मण, गविष्ठि युद्ध कएनिहार क्षत्रिय आ एकर अतिरिक्त्त जे कृषि विकासमे बेशी ध्यान दैत छलाह से विश- सामान्य जन छलाह मुदा एहिमे मायानन्द जी वैश्य शब्द सेहो जोड़ि देने छथि। सप्तम मण्डल बर्बर उजरा आर्यक आक्रमणक चर्चा आब जा कए भेल अछि। प्रायः विदेशी विशेषज्ञक एक भागक संग मायानन्द जी सेहो पैशाची आक्रमणकेँ बादमे जा कए बूझि सकलाह आ एकरा सेहो आर्यक दोसर भाग बना देलन्हि। आर्य हरियूपियाकेँ डाहि कए नष्ट कए देने छलाह एकर फेर चर्च आबि गेल अछि। मोहनजोदड़ो आतंकसँ उजड़ि गेल फेर भूकम्पो आयल ताहूसँ नगर ध्वस्त भेल। आब मायानन्दजी ओझराएल बुझाइत छथि। वर्षा कम होएबाक सेहो चर्चा अछि। अष्टम् मण्डल ऋषिग्रामक चर्चा अछि। कुलमे दास आ दासी होएबाक संकेत अछि। वृषभ पालनक सेहो संकेत अछि। मंत्र-पुत्रक ग्रामांचल चलि जएबाक आ विशः-वैश्य बनि जएबाक सेहो चर्चा अछि। मुदा आगाँ मायानन्दजी ओझराइत जाइत छथि। कश्यप सागर तटसँ प्रस्थान-पूर्व द्यौस आ त्वराष्ट्री केर गौण देव भऽ जएबाक चर्चा अछि। ब्राह्मण आ क्षत्रियक विभाजन नहि होएबाक चर्च अछि आ क्यो कोनो कर्म करबाक हेतु स्वतंत्र छल। देवासुर संग्राम आ हेलमन्द तटक युद्ध आ पशुपालनक चर्चा अछि। पश्चात ब्रह्मण आ क्षत्रियक कर्मक फराक होएब प्रारम्भ भए गेल। पश्चात् मंत्र-द्रष्टा ऋषि द्वारा मंत्रमे देवक आ अपन नाम राखब प्रारम्भ भेल- एकर चर्चा अछि।श्रुति अभ्यासक प्रारम्भ होएबाक चर्चा अछि कारण मंत्रक संख्या बढ़ि गेल छल। नवम् मण्डल वस्तु विनमयक हेतु हाट व्यवस्थाक प्रारम्भ भेल। हाटमे मृत्तिका प्रभागमे दास-शिल्पी पात्रक उपस्थिति आ वस्त्र प्रभागक चर्चा अछि। मृत्तिका, हस्ति-दन्त, ताम्र सीपी आदिक बनल वस्तुजातक चर्चा अछि। शिशु-रंजनक वस्तुजात - जेना हस्ति, वृषभ आदिक मूर्त्तिक, लवणक, अन्नक, काष्ठक आ कम्बलक बिक्रीक चर्चा अछि। दशम् मण्डल श्वेत-जनक आगमनक -बर्बर श्वेत आर्य- सूचना नागजनकेँ भेटबाक चर्चा अछि। नाग जन द्वारा अपन दलपतिकेँ राजा कहल जाएब, नागक पूर्व-कालमे ससरि कए यमुना तट दिशि आएब आ ओतुक्का लोककेँ ठेल कए पाछाँ कए देबाक सेहो चर्चा अछि।कृष्ण जनक काष्ठ दुर्ग आ नागक संग हुनका लोकनिकेँ सेहो अनास कहल गेल अछि। मुदा ओ लोकनि दीर्घकाय छलाह आ नागजन कनेक छोट। एहि मण्डलमे दासक संग शूद्रक आ गंगा तटक सेहो चर्चा आबि गेल अछि। आर्य, दास आ शूद्रक बीचमे सहयोगक संकेत अछि। अंतमे ऋचालोक नामसँ भूमिका लिखल गेल अछि। देवासुर संग्रामक बाद इन्द्र असुर उपाधि त्यागलन्हि, हित्ती मित्तानी चलल आ आर्य पूर्व दिशा दिशि बढ़ल- एहि सभ तथ्यक आधार पर लिखल ई मंत्रपुत्र ऐतिहासिकताक सभटा मानदण्ड नहि अपना सकल। मायानन्द मिश्रजी साहित्यकारक दृष्टिकोण रखितथि आ पाश्चात्य इतिहासकारक एक भाग द्वारा पसारल गॉसिपसँ बचितथि तँ आर्य आक्रमणक सिद्धांतकेँ नकारि सकितथि। सरस्वतीक धार ऋगवेदक सभ मंडलमे अपन विशाल आ आह्लादकारी स्वरूपक संग विद्यमान अछि। सिन्धु आकि सरस्वती नदी घाटीक सभ्यता तखन खतम आकि ह्रासक स्थितिमे आएल जखन सरस्वती सुखा गेलीह। अथर्ववेदमे सेहो सरस्वती जलमय छथि। ऋगवेदमे जल-प्रलयक कोनो चर्च नहि अछि आ अथर्ववेदमे ताहि दिशि संकेत अछि। भरतवासी जखन पश्चिम दिशि गेलाह, तखन अपना संग जल-प्रलयक खिस्सा अपना संग लेने गेलाह। जल-प्रलयक बाद भरतवासी सारस्वत प्रदेशसँ पूब दिशि कुरु-पांचालक ब्रह्मर्षि प्रदेश दिशि आबि गेलाह। सरस्वती रहितथि तँ बात किछु आर होइत मुदा सुखायल सरस्वती एकटा विभाजन रेखा बनि गेलीह, आर्य-आक्रमणकारी सिद्धांतवादी लोकनिकेँ ओहि सुखायल सरस्वतीकेँ लँघनाइ असंभव भऽ गेल। सिन्धु लिपिक विवेचन सेहो बिना ब्राह्मीक सहायताक संभव नहि भऽ सकल अछि। ग्रिफिथक ऋगवेदक अनुवादक पादटिप्पणीमे पहिल बेर ई आशंका व्यक्त्त कएल गेल जे आर्य आक्रमणकारी पश्चिमोत्तरसँ आबि कए मूल निवासीक दुर्ग तोड़लन्हि। दुर्गमे रहनिहार बेशी सभ्य रहथि। १९४७ मे ह्वीलर ई सिद्धांत लऽ कए अएलाह जे विभाजित पाकिस्तान सभ्यताक केन्द्र छल आ आर्य आक्रमणकारी विदेशी छलाह। एकटा भारतीय विद्वान रामप्रसाद चंद ताहिसँ पहिने ई कहि देने रहथि जे एहि नगर सभक निवासी ऋगवेदक पणि छलाह। मुदा मार्शल १९३१ ई मे ई नव गप कहने छलाह जे आर्यक भारतमे प्रवेश २००० ई.पूर्व भेल छल आ तावत हड़प्पा आ मोहनजोदड़ोक विनाश भऽ चुकल छल। १९३४ मे गॉर्डन चाइल्ड कहलनि जे आर्य संभवतः आक्रमणकारी भऽ सकैत छथि। १९३८ मे मकॉय मोहनजोदाड़ोक आक्रमणकेँ नकारलन्हि, किछु अस्थिपञ्जड़क आधार पर एकरा सिद्ध कएनाइ संभव नहि। डेल्स १९६४ मे एकटा निबन्ध लिखलन्हि ‘द मिथिकल मसेकर ऑफ मोहंजोदाड़ो’ आ आक्रमणक दंतकथाक उपहास कएलन्हि। तकर बाद ह्वीलर १९६६ मे किछु पाछाँ हटलाह मुदा मकॉयक कबायलीक बदलामे सभटा आक्रमणक जिम्मेदारी बाहरी आर्यगणक माथ पर पटकि देलन्हि। आब ओ कहए लगलाह जे आर्य आक्रमणकेँ सिद्ध नहि कएल जा सकैत अछि मुदा ज्योँ ई संभव नहि अछि तँ असंभव सेहो नहि अछि। स्टुआर्ट पिगॉट १९६२ धरि ह्वीलरक संग ई दुराग्रह करैत रहलाह। पिगॉट आर्यकेँ मितन्नीसँ आएल कहलन्हि। नॉर्मन ब्राउनकेँ सेहो पंजाब प्रदेशक शेष भारतक संग सांस्कृतिक संबंधक संबंधमे शंका रहलन्हि। संस्कृत आ द्रविड़ भाषाक अमेरिकी विशेषज्ञ एमेनो लिखलन्हि जे सिन्धु घाटी कखनो शेष भारतसँ तेना भऽ कए सांस्कृतिक रूपसँ जुड़ल नहि छल। जे आर्य ओतए अएलाह सेहो ईरानी सभ्यतासँ बेशी लग छलाह। मुदा पॉर्जिटर १९२२ मे साहित्यिक परम्परासँ सिद्ध कएलन्हि जे भारत पर आर्यक आक्रमणक कोनो प्रमाण नहि अछि। ओ सिद्ध कएलन्हि जे भारतसँ आर्य पश्चिम दिशि गेलाह आ तकर साहित्यिक प्रमाण उपलब्ध अछि। लैंगडन सेहो कहलन्हि जे आर्य भारतक प्राचीनतम निवासी छलाह आ आर्यभाषा आ लिपिक प्रयोग करैत छलाह। ब्रिजेट आ रेमण्ड ऑलचिन आ कौलीन रेनफ्रीव आदि विद्वान प्राचीन भारतक इतिहासक प्रति पूर्वाग्रहक विश्लेषण कएने छथि। मितन्नी शासक मित्र, वरुण, इन्द्र आ नासत्यक उपासक छलाह। हित्ती राज्यमे सेहो वैदिक देवता लोकनिक पूजा होइत छल।आलब्राइट आ लैंबडिन सेहो दू हजार साल पहिने दक्षिण-पश्चिम एशियामे इंडो आर्य भाषा बाजल जाइत छल आ संख्यासूचक शब्द सेहो भारतीय छल, एहि तथ्यकेँ मानलन्हि। ई लोकनि भारतीय छलाह आ ऋगवेदक रचनाक बाद भारतसँ बाहर गेल छलाह। बहुवचन स्त्रीलिंग रूप, ऋगवेदक देवगणक विशिष्ट रूप अन्यत्र उपलब्ध नहि अछि। इंडो योरोपियन देवतंत्रमे भारतीय देवीगणक विरलता पूर्ववर्त्ती भारतीय मातृसत्तात्मक व्य्वस्थाक बादक योरोपीय परवर्त्ती पितृसत्तात्मक व्यवस्थाक परिचायक अछि। आब आऊ सुमेरक जल प्रलयपर जेकि ३१०० ई.पू. मे मानल जाइत अछि। भारतीय कलि संवत ३१०२ ई.पू. मानल जाइत अछि। अतः एहि तिथिसँ पूर्व ऋगवेदक पूर्ण रचना भऽ गेल छल। देवासुर संग्रामक बाद इन्द्र असुर उपाधि त्यागलन्हि आदि गप पोथीक समाप्ति पर ऋचालोकमे मायानन्द जी लिखैत छथि। किछु पाश्चात्य विद्वान सेहो ऋगवेदक दार्शनिक महत्वकेँ कम करबाक लेल ई गप कहैत छथि जे यूनानमे देवतंत्र पूर्ण रूपसँ पल्लवित छल मुदा ऋगवेदिक समाज घुमंतु छल आ देवतंत्र ताहि द्वारे विकसित नहि छल। ओ लोकनि ई सेहो कहैत छथि जे ऋगवेदक रचना अश्व पर घुमंतु जीवन यापित केनहार पश्चिमी आक्रमणकारी कएने छथि। ऋगवेदिक कवि लोकनि आरंभिक सामूहिक संपत्ति आ रक्त्त संबंध आधारित गणसमाज दुनूसँ परिचित छलाह मुदा स्वयं ओहिसँ बाहर आबि गेल छलाह आ व्यक्त्तिगत आ कुटुम्बक संपत्तिक आधार बला व्यवस्था शुरू कए देने छलाह। संपत्ति पुरुष केंद्रित आ परिवार पितृसत्तात्मक छल। मुदा मातृसत्तात्मक व्यवस्थाकेँ ओ बिसरल नहि छलाह कारण ओ आपः मातरः कहि बहुवचनमे जलदेवीक उपासना आ स्मरण करैत छथि, संगहि मरुतगण सदिखन गणक रूपमे स्मरण आ उपासना करैत छथि। आब जा कए एंगेल्स कहैत छथि जे यूनानमे मातृसत्तासँ पितृसत्ता प्राचीन कालक सभसँ पैघ क्रान्ति छल। ई क्रान्ति ऋगवेदिक कालमे घटित भए गेल छल। श्रमक वैशिष्टीकरणसँ उत्पादनमे गोत्रक भूमिका घटि जाइत अछि आ कुटुम्बक बढ़ि जाइत अछि। गण, गोत्र, कुल आ कुटुम्बक क्रमशः विकास सामूहिक भूसंपत्तिक संगठनसँ होइत अछि। ऋगवेदमे कुम्भकार, कमार (काष्ठकार), लोहार आ धातु शिल्पक चर्च अछि। प्राचीन ईरानमे असुरक प्रतिरूप अहुरक प्रयोग भेल। ओ लोकनि एकर उपासक छलाह मुदा असुर-उपासक भारतीय जनक प्रभाव ईरान धरि सीमित छल, आगाँ एकर प्रसार नहि भेल। भारतमे असुर दुष्ट छथि मुदा ईरानमे देव दुष्ट छथि। असुरक गरिमा सम्पूर्ण ऋगवेदमे अछि। कोनो मण्डल एहन नहि अछि जाहिमे कोनो एक वा आन देवताकेँ असुर नहि कहल गेल होअए। मुदा एहनो असुर छथि जे देवक विरोधमे छथि आ इन्द्रसँ एहन अदेवाः असुराः केर नाशक हेतु आह्वाण कएल गेल अछि।इन्द्रक समान अग्नि सेहो असुरक नाश करैत छथि आ इन्द्र आ बृहस्पति दुनू गोटे स्वयं असुर छथि। असुर देवताक उपाधि छल। ऋगवेदमे देव आ असुरक सदृश असुर एकटा भिन्न वर्ग छल असुर श्वास लैत छलाह मुदा देव नहि। देवसँ असुर बेशी प्राचीन छथि ताहि द्वारे असुर वरुण देव आ मनुष्य दुहूक राजा छथि। पैशाची त्वग् त्वचा भारतमे कहियो तेहन आह्लादसँ नहि देखल गेल । ओहिनो आर्य आक्रमण पोषक सिद्धान्तकार जे ई तथ्य उदाहरणार्थ देखथि जे दक्षिण भारतीय ब्राह्मण, कश्मीरी ब्राह्मण आ नेपालक ब्राह्मण मे त्वचा नहि वरण रूप सेहो भिन्न अछि, ई सिद्ध करैत अछि जे ई सभ स्थानीय जन छथि आ जाति-व्यवस्थामे ताहिरूपेँ सम्मिलित भेल छथि । कारण पाँच-सए आ हजार बरखमे मानवशास्त्रीय आ वैज्ञानिक रूपेँ ओतेक रूप-रंगक अन्तर सम्भव नहि। जे यूरोपवासी दक्षिण अमेरिका-अफ्रीकामे छथि तिनको, आ जे नीग्रो-रेड इन्डियन अमेरिका-अफ्रीका-यूरोपमे छथि तिनको रूप रंगमे कोनो परिवर्तन पाँच सए बरखमे नहि आएल छन्हि। ई लाख बरखक आवाससँ सम्भव होइत अछि जे गरम प्रदेशक निवासी कारी आ ठंढ प्रदेशक गोर होइत छथि । पुरोहित पुरोहित हिन्दीमे अछि आ श्रृँखलाक तेसर पोथी थीक। दूर्वाक्षत जकरा मायानन्दजी सुविधारूपेँ आशीर्वचन सेहो कहि गेल छथि सँ एकर प्रारम्भ भेल अछि। पुरोहित केर आरम्भ दूर्वाक्षत आशीर्वचन मंत्रसँ होइत अछि। शुक्ल यजुर्वेदक अध्याय २२ केर मंत्र २२ “ॐ आब्रह्मन…” सँ “नः कल्प्ताम्” धरि अछि। मिथिलामे एहि मंत्रक संग अन्तमे “ॐ मंत्रार्था सिद्धयः संतु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव”। एकर सेहो मंत्रोच्चार होइत अछि आ एहि चारि पादसँ ई मंत्र आशीर्वचनक रूप लए लैत अछि। यजुर्वेदीय २२/२२ मंत्र सौसेँ भारतमे देशभक्त्ति गीतक रूपमे मंत्रोच्चारित होइत अछि। दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बड़द भार वहन करएमे सक्षम होथि आ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होअए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बड़द ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/ संरक्षित करी। तकर बाद लेखकीय प्रस्तावना जकरा पुरोहितमे विनियोगक नाम देल गेल अछि, केर प्रारम्भ होइत अछि। पुरोहित शतपथ ब्राह्मणकालीन समाज पर आधारित अछि। विनियोगमे पूर्व आ उत्तर वैदिक युग, महाभारत काल इत्यादिक काल निर्धारण पर चरचा कएल गेल अछि। संन्यास आ मोक्ष धारणाक प्रवेश, सूत्र साहित्य, आरण्यक आ उपनिषद आ ब्राह्मण ग्रंथक रचनाक सेहो चरचा अछि।कर्मणा केर बदलामे जन्मना सिद्धांतक प्रारम्भ आ शूद्र शब्दक उद्भव, नगरक, आहत मुद्राक, उद्योगक सुदृढ़ीकरणक आ लोहाक प्रयोगक सेहो चरचा भेल अछि। फेर मायानन्द जी ई लिखि जाइत छथि जे दाशरज्ञ युद्ध ई.पू. १८०० मे भेल- भरत आ कुशिक-कस्साइटक सम्मिलित समूह सरस्वती तटसँ व्यास नदी पार करैत इलावृत पर्वत प्रदेश होइत ; आ ओ लोकनि कोशल मिथिलाक राजतंत्रक, कुरु-पांचालक संस्कृतिक विकसित होएबासँ पूर्वहि, स्थापना कएने छलाह। पुरोहित तेरह टा सर्गमे विभक्त्त अछि आ एकर अन्त उपसंहारसँ होइत अछि। प्रथम सर्ग दक्षिण पांचालक कांपिल्य नगरसँ शुरू होइत अछि। अथर्वणपल्लीक पशुशालामे साँझ होइत देरी उठैत धुँआक चरचा अछि। मेधा आ कुशबिन्दुसँ कथा आगू बढ़ैत अछि। ऋषि गालबक आश्रममे ऋगवेदकेँ कंठाग्र कराएल जएबाक आ बादमे जा कए कृषि संबंधी शिक्षा देल जएबाक वर्णन अछि। दोसर सर्गमे राजा प्रवाहण जैबालिक मूर्ख पुत्र द्वारा ब्राह्मणक अपमानक, प्रथम श्रोत्रिय आ दोसर पुरोहित ब्राह्मणक वर्णन अछि। तेसर सर्गमे आचार्य चाक्रायणक अपमानक कारण पुरोहित वर्ग द्वारा पौरहित्य कर्म नहि करबाक निर्णयसँ प्रजाजनक दैनिक अग्निहोत्र कार्य आ बिना लग्नक कृषि आ वाणिज्य कार्यमे होअए बला भाङठक वर्णन अछि। चतुर्थ सर्गमे व्यास कथा आ भारत युद्धक चर्चा अबैत अछि आ एतए मायानन्द जी पाश्चात्य दृष्टिकोणक अनुसरण करैत छथि। जय काव्यकेँ भारत युद्धकथाक रूप दए देल गेल- ई वक्त्तव्य अनायासहि दए रहल छथि मायानन्द मिश्र। पाँचम सर्गमे वैश्य द्वारा उपनयन संस्कार छोड़बाक चरचा अछि मुदा क्षत्रिय पुत्र आ पुत्री दुनूक उपनयन करैत छलाह। वैश्य कन्या शिक्षासँ दूर जा रहल छलीह आ ब्राह्मण कन्या गुरुकुलक अतिरिक्त पितासँ शिक्षा लए रहल छलीह। ब्राह्मणकेँ पौरहित्यसँ कम समय भेटैत छलन्हि। छठम सर्गमे ब्राह्मण पुरोहित द्वारा अथर्व वेदकेँ नहि मानबाक चरचा अछि। सातम सर्गमे अथर्वनपल्लीमे अथर्ववेदीय संस्कारक शिक्षा आ प्रथम श्रेणीक ब्राह्मण द्वारा ओतए नहि जएबाक चरचा अछि। आठम सर्गमे इद्रोत्सवमे रथदौड़, अश्वारोहण, मल्लयुद्ध, असिचालन, लक्ष्यभेद आ विलक्षण अनुकृतिक चरचा अछि आ व्यासपल्लीक लोक द्वारा अनुकृति करबाक चरचा अछि। व्यासपल्लीमे व्रात्य करुष भारत युद्धक कथा कहि रहल छलाह। भारत युद्धक बहुत पूर्व भरत, त्रित्सु, किवी आ सृंजय मिश्रित जनक आर्यवर्तमे शूद्र नामसँ सुमेरियाक जियसूद्रक स्मृतिमे अपनाकेँ गौरव देबाक हेतु सूद्र कहबाक वर्णन अछि। नवम सर्गमे तन्तुवाय द्वारा स्त्री निमित्त वस्त्रमे तटीयता देल जएबाक कारण भेल अन्तरक चरचा अछि, पहिने ई अन्तर नहि छल। अथर्वण आ याज्ञिक ब्राह्मणमे भेदक चरचा अछि। दशम् सर्गमे शिश्नदेवक पूजा अनार्य द्वारा होएबाक आ अथर्वण पुरोहित द्वारा एकर अनभिज्ञताक चरचा अछि। व्यासपल्लीमे अक्षर लिपिक प्रयोग आ आचार्य गालबक श्रुति आश्रममे अंक लिपिक अतिरिक्त्त किछु अन्य देखब वर्जित होएबाक गप कहल गेल अछि। एगारहम सर्गमे गालब आश्रममे दण्डनीति पर चरचा निषिद्ध होएबाक बादो दक्षिण पांचालक सभासदक आग्रह पर एतद संबंधी चरचा होएबाक गप अछि। राजा शिलाजित द्वारा राजपद प्रधान पुरोहितकेँ देबाक चरचा अछि। बारहम सर्गमे भारत युद्धक बाद नियोग प्रथाक अमान्य भऽ बन्द भऽ जएबाक बात अछि। शिश्नदेवक शिवदेवसँ एकाकारक चरचा सेहो अछि। तेरहम सर्गमे क्रैव्यराजक अभिषेक उत्सवक चरचा अछि। दूर्वाक्षत मंत्रमे “ॐ मंत्रार्था सिद्धयः संतु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव” आ दीर्घायुर्भव केर मेल शुक्ल यजुर्वेदक २२/२२ मंत्रसँ कए दूबि अक्षत लए, विशेष लए ताल गति यति मे गएबाक वर्णन अछि। एकर अनुवाद सेहो मायानन्द जी देने छथि, जे ग्रिफिथक अनुवादसँ प्रेरित अछि:- समस्त विश्वमे ब्राह्मण विद्याक तेजक वर्चस्व स्थापित करए बला, सर्वत्र, वाण चलएबामे निपुण, निरोगि, महारथी, शूर, यजमान राज्य सभक जन्म होए, सर्वत्र अधिकाधिक दूध दएबाली धेनु होए, शक्तिशाली वृषभ होए, तेजस्वी अश्व होए, रूपवती सध्वी युवती होथि, विजयकामी वीरपुत्र होथि, जखन हम कामना करी पर्जन्य वर्षा देथि, वनस्पतिक विकास होए, औषधि फलवती आ सभ प्राणी योगक्षेमसँ प्रसन्न रहथि।राजन शतंजीवी होथि। क्रैव्यराजक अभिषेकक लेल ई मंत्र हाथमे अक्षत, अरबा, ब्रीहि आ दूर्वादल लए आ मंत्र समाप्ति पश्चात राजा पर एकरा छीटबाक आ फेर दहीक मटकूरीसँ दही लए महाराजक भाल पर एहिसँ तिलक लगएबाक वर्णन अछि। एहि प्रकरणमे मायानन्द जी लिखैत छथि जे एहि मंत्रक, जकरा मिथिलामे दूर्वाक्षत मंत्र कहल जाइत अछि, रचना याज्ञवल्क्य द्वारा वाजसनेयी संहिताक लेल कएल गेल। एहि मंत्रक उपयोग मिथिलामे उपनयनक अवसर पर बटुकक लेल आ विवाहक अवसर पर वर-वधुककेँ आशीर्वचनक रूपमे प्रयुक्त होअए लागल। पुरोहितक अन्त होइत अछि उपसंहारसँ। एतय वर्णित अछि, जे काशीक रस्ताक अनार्य ग्रामक आर्यीकरण भेल आ व्रात्यष्टोम यज्ञ भेल। शिश्नदेवाः पर चरचा अछि, शुनःशेप आख्याण आ भारत कथाक कहबाक परम्पराक प्रारम्भ आ मगध द्वारा आर्य धर्मक प्रति वितृष्णाक चर्च सेहो अछि। मायानन्दजी महाभारतक समस्याक समाधानमे सेहो पाश्चात्य विचारक लोकनिक अनुसरण करैत बुझना जाइत छथि। प्रोफेसर वेबर पहिल बेर एहि सिद्धांतकेँ लए कए आएल छलाह। ओ अपन विचार व्यक्त कएने छलाह जे ८८०० पद्यक जय संहिता छल आ पहिने युद्ध पर्व (१८ पर्व मे चारि पर्व भीष्म, द्रोण, कर्ण आ शल्य पर्व) मात्र छल। ओकर आधार ओ बनेने छलाह एकटा श्लोककेँ- अष्टौश्लोक सहस्राणि..... अहं वेद्मि शुको वेत्ति सञ्जयो वेत्ति वा न वा संजय, व्यास आ शुक तीनू गोटे ८८००-८८०० प्रत्येक कए भारतक श्लोक मात्र स्मरण कए सकल छलाह। माने भारत एतेक विशाल छल जे प्रत्येक गोटे सम्पूर्ण स्मरण नहि कए सकल छलाह आ ताहि दृष्टिसँ भारत कहियो २६४०० श्लोकसँ कम नहि छल, जकरा व्यास लिखने छलाह। जय संहिता भारत आ महाभारत दुनूकेँ कहल जाइत छै। युद्ध पर्व (१८ पर्व मे चारि पर्व भीष्म, द्रोण, कर्ण आ शल्य पर्व) तेना ने परस्पर दोसर पर्व सभसँ जुड़ल अछि जे बिना पछिला पर्व पढ़ने अगिलाक कोनो भाँज नहि लगैत छै। इलियडक युद्ध १० साल धरि चलल छल मुदा इलियड मात्र ट्रॉयक घेरा धरि सीमित छल। मुदा महाभारत बहुत पहिने सँ १८ दिनुका युद्धक कारणसँ शुरु होइत अछि। भीष्म पर्व छठम पर्व अछि, द्रोण पर्व सातम, कर्ण पर्व आठम आ शल्य पर्व नवम। तकरा बाद ९ टा पर्व आर अछि। किएक तँ कैक बैसारीमे महाभारत केर पाठ सुनाओल जाइत छल ताहि द्वारे ई स्वाभाविक अछि जे पुरान पाठ सभ जे भए चुकल छल केर फेरसँ पुनःस्मरण बेर-बेर कएल जाइत छल। ताहिसँ ई अर्थ निकालब जे ई क्षेपक अछि, अनर्गल होएत। तहिना गीता सेहो पाश्चात्य विद्वान लोकनिक लेल क्षेपक अछि कारण ओ लोकनि भारतीय संस्कृति, साहित्य आ कलाक अनुभव विदेशी मानसिकतासँ करबाक कारण गलती करैत छथि। विदेशी विद्वान ई मानबामे कष्ट अनुभव करैत छथि जे महाभारत ओतेक पुरान भेलाक बादो ओतेक वृहत् अछि आ इलियड ओकर सोझाँ किछु नहि अछि। से एक गोट पद्यक वेबर द्वारा कएल गेल मिथ्या व्याख्याक आधार पर जय संहिता केर संकल्पना आएल। मात्र भारत आ महाभारत केर रूपमे एहि महाकाव्यक विकासकेँ बिना कोनो कारणसँ जय संहिता, भारत आ महाभारत रूपी तीन चरणमे प्रस्तुत कएल गेल। महाभारत केर सभसँ छोट रूपमे सेहो २४६०० सँ कम श्लोक नहि छल आ जय संहिता भारत आ महाभारतकेँ सम्मिलित रूपसँ कहल जाइत छल। स्त्रीधन ई ग्रन्थ मायानन्द बाबूक इतिहास बोधक अन्तिम कड़ी अछि। प्रागैतिहासिक “प्रथम शैलपुत्री च”, ऋगवेदिक कालीन “मंत्रपुत्र”, उत्तरवैदिककालीन “पुरोहित” केर बाद ई पुस्तक सूत्र-स्मृतिकालीन अछि, ई ग्रंथ हिन्दीमे अछि। आ ई सूत्र-स्मृतिकालीन उपन्यास मिथिला पर आधारित अछि। ई पोथी प्रारम्भ होइत अछि मायानन्दजीक प्रस्तावनासँ जकर नाम एहि खण्डमे “पॄष्ठभूमि” अछि। एतए मायानन्दजी रामायण-महाभारत केर काल गणनाक बाद इतिहासकार लोकनिक एकमात्र साक्ष्य शतपथ ब्राह्मणक चर्च करैत छथि। मिथिलाक प्राचीनतम नाम विदेह छल, जकर प्रथम वर्णन शतपथ ब्राह्मणमे आएल अछि। सार्थ-गमनक प्रक्रियाक विस्तृत वर्णन एहि ग्रन्थमे अछि, से मायानन्द जी कहैत छथि। ई ग्रन्थ प्रथम आ द्वितीय दू अध्यायमे अछि आ अन्तमे उपसंहार अछि। प्रथम अध्यायमे प्रथमसँ नवम नौ टा सत्र अछि। द्वितीय अध्यायमे प्रथमसँ अष्टम ई आठ टा सर्ग अछि। प्रथम अध्याय प्रथम सत्र एहिमे सृंजय द्वारा कएल जा रहल धर्म-पश्चात्ताप स्वरूप भिक्षाटनक, पत्नी-त्यागी होएबाक कारण छह मास धरि निरन्तर एकटा महाव्रत केर पालन करबाक चरचा अछि। “द्वितीय वर” केर सेहो चरचा अछि। द्वितीय सत्र राजा बहुलाश्व जनकक ज्येष्ठ पुत्र कराल जनककेँ राजवंशक कौलिक परम्पराक अनुसार सिंहासन भेटलन्हि, तकर वर्णन अछि। तृतीय सत्र एतए पुरान आ नवक संघर्ष देखबामे अबैत अछि। वारुणी एक ठाम कहैत छथि जे जखन पूज्य तात हुनकर विधिवत उपनयन करबओलन्हि, ब्रह्मचर्य आश्रममे विधिवत प्राचीन कालक अनुसार श्रुतिक शिक्षा देलन्हि, तँ आब हमहूँ भद्रा कन्या बनि अपन वरपात्रक निर्वाचन स्वयं कए विवाह करए चाहैत छी। चतुर्थ सत्र एतए कराल जनकक विरुद्ध विद्रोहक सुगबुगाहटिक चरचा अछि। कृति जनक आ बहुलाश्व जनकक कालमे भेल न्यायपूर्ण आ प्रजाहितकारी कल्याणकारी कार्यक चरचा भेल अछि तँ संगहि सीरध्वज जनकक समयसँ भेल मिथिलाक राज्य-विस्तारक चरचा सेहो अछि। बहुलाश्व मरैत काल अपन पुत्र करालकेँ आचार्य वरेण्य अग्रामात्यखण्ड केर उपेक्षा-अवहेलना नहि करबाक लेल कहने छलखिन्ह मुदा कालान्तरमे वैह कराल जनक अग्रामात्यक उपेक्षा-अवहेलना करए लगलाह। आचार्य वरेण्य-खण्ड मिथिलासँ पलायन कए गेलाह। पंचम सत्र प्रणिपात, आशीर्वचन आ कुशल-क्षेमक औपचारिकताक वर्णन अछि आ स्त्रीधनक चरचा सेहो गप-शपक क्रममे आएल अछि। ईहो वर्णन आएल अछि जे वैशाली किछु दिन कौशलक अधीन छल आ भारत-युद्धमे ओ मिथिलाक अधीन छल। वन्य भूमिकेँ कृषि-योग्य बनेबाक उपरान्त पाँच बसन्त धरि कर-मुक्त करबाक परम्पराकेँ राजा कराल जनक द्वारा तोड़ि देबाक चरचा अछि। षष्ठ सत्र पांचाल-जन द्वारा अंधक वृष्णिक नायक वासुदेव कृष्णकेँ जय-काव्यक नायक मानल जएबाक चरचा अछि। जय-काव्य आ भारत-काव्यक पश्चिमक उच्छिष्ट भोज मायानन्दजीक मोनसँ नहि हटलन्हि आ जय-काव्यमे मुनि वैशम्पायन व्यास द्वारा बहुत रास श्लोक जोड़ि वृहतकाय भारत काव्य बनाओल जएबाक मिथ्या तथ्यक फेरसँ चरचा अछि। जयकाव्यक लेखक कृष्ण द्वैपायन व्यासकेँ बताओल गेल अछि। आ एकर बेर-बेर चरचा कएल गेल अछि जेना कोनो विशेष तथ्य होअए। फेर देवत्वक विकासपर सेहो चरचा अछि। सरस्वती धारक अकस्मात् सूखि जएबाक सेहो चरचा अछि। सरस्वतीक मूर्तिपूजनक प्रारम्भक आ मातृदेवीक सेहो चरचा भेल अछि। सप्तम् सत्र सरस्वतीकेँ मातृदेवी बनाकए काल्पनिक सरस्वती प्रतिमा-पूजनक चरचा अछि। मिथिलामे पतिक नाम नहि लेबाक परम्पराक सेहो चरचा भेल अछि। अष्टम् सत्र राजाक अत्याचार चरम पर पहुँचि गेल अछि। अपूर्वा द्वारा विवशतापूर्वक गार्हस्थ्य त्याग आ स्त्रीधन सेहो छोड़बाक चरचा भेल अछि। नवम् सत्र सएसँ बेशी ग्राम-प्रमुख द्वारा सम्मेलन-उपवेशनक चरचा अछि। पाँच वसन्त धरि कर-मुक्ति आ ताहिसँ वन्यजन आ शूद्र जनक सम्भावित पलायनक चरचा अछि। सीरध्वज जनकक पश्चात् धेनु-हरण राज्याभिषेकक बाद मात्र एकटा परम्परा रहि गेल, तकर चरचा अछि। मुदा कराल द्वारा अपन सगोत्रीय शोणभद्रक धेनु नहि घुमेबाक चरचा अछि। कराल द्वारा बीचमे प्रधान पुरहितकेँ हटेबाक चरचा अछि। चिकित्साशास्त्रक नवोदित चिकित्सक बटुक कृतार्थकेँ राजकुमारीक चिकित्साक लेल बजाओल जाइत अछि, संगमे राजकुमारीक सखी आचार्य कृतक पुत्री वारुणीकेँ सेहो बजाओल जाइत अछि। ओ अपन अनुज बटुकक संग जाइत छथि आ कराल बलात् अपन कक्ष बन्द कए हुनकासँ गांधर्व-विवाह कए लैत छथि। प्रजा विद्रोह आ राजाक घोड़ा पर चढ़ि कए पलायनक संग प्रथम अध्यायक नवम आ अन्तिम सत्र खतम भए जाइत अछि। द्वितीय अध्याय प्रथम सर्ग सित धारक चरचा अछि। वारुणिकेँ वरुण सार्थवाह सभक संग अंग जनपद चलबाक लेल कहैत छन्हि। आ संगे वरुण ईहो कहैत छथि जे अंग जनपदक आर्यीकरणक कार्य अखनो अपूर्ण अछि। द्वितीय सर्ग सार्थक संग धनुर्धर लोकनि चलैत छलाह, अपन श्वानक संग। सार्थक संग सामान्य जन सेहो जाइत छलाह।वरुण आ वारुणी हिनका सभक संग अंग दिशि बिदा भेलाह, एहि जनपदक राजधानी चम्पा कहल गेल अछि आ एकरा गंगाक उत्तरमे स्थित कहल गेल अछि। तृतीय सर्ग अंग क्षेत्रमे धानसँ सोझे अरबा नहि बनाओल जएबाक चरचा अछि, ओतए उसीन-सुखा कए ढेकीसँ बनाओल अरबाकेँ चाउर कहल जएबाक आ ब्रीहिकेँ धान कहबाक वर्णन भेल अछि। पूर्वकालक श्रेष्ठी द्विज वैश्य आ अद्विज नवीन वैश्यक चरचा भेल अछि। चतुर्थ सर्ग आर्यीकरणक बेर-बेर चरचा पाश्चात्य विद्वानक मायानन्दजी पर प्रभाव देखबैत अछि। आर्य आ द्रविड़ शब्द दुनू , पाश्चात्य लोकनि भारतमे अपन निहित स्वार्थक लेल अनने छलाह। कोशल आ विदेहक प्रसारक, देवत्वक विकासक सम्पूर्ण इतिहास एतए देल गेल अछि। मिथिलाक दही-चूड़ाक सेहो चर्च आएल अछि। पञ्चम सर्ग दिनमे एकभुक्त आ रातिमे दुग्धपान मिथिला आ पांचाल दुनू ठाम छल। तथाकथित आर्य आ स्थानीय लोकनिक बीच छोट-मोट जीवनशैलीक अन्तर- आ मायानन्दजी आर्यीकरण कहैत छथि ओकरा पाटब ! षष्ठ सर्ग अंगक गृह आर्यग्राम जेकाँ सटि कए नञि वरन् हटि-हटि कए होएबाक वर्णन अछि। हुनका सभ द्वारा छोट-छोट वस्त्र आ पशु चर्म पहिरबाक सेहो वर्णन अछि। वन्यजनक बीचमे नरबलि देबाक परम्पराक संकेत आ निष्कासित वन्यजनसँ भाषाक आदान-प्रदान सेहो मायानन्दजी पाश्चात्य प्रभावसँ ग्रहण कए लेने छथि। विक्रय-थान खोलबाक जाहिसँ भविष्यमे नगरक विकास संभव होएत, तकर चर्च अछि। सप्तम सर्ग उसना चाउरक अधिक सुपाच्य होएबाक आ ताहि द्वारे ओकर पथ्य देबाक गप कएल गेल अछि।लौह-सीताक लेल लौहकार, हरक लेल काष्ठकार, बर्तन-पात्रक लेल कुम्भकार इत्यादि शिल्पीक आवश्यकता आ ताहि लेल आवास-भूमि आ भोजनक सुविधा देबाक गप आएल अछि। अष्टम सर्ग कृषि उत्पादनक पश्चात् लोक अन्नक बदला सामग्री बदलेन कए सकैत छथि, वृषभ-गाड़ीसँ सामग्रीक संचरण, एक मास धरि चलएबला यज्ञक व्यवस्था भूदेवगण द्वारा कएल जएबाक प्रसंग सेहो आएल अछि। भाषा-शिक्षण क्रममे ब्राह्मणगामक अपभ्रंश बाभनगाम आ वनग्रामक वनगाम भए गेल। भाषा सिखा कए घुरैत काल वारुणीपर तीरसँ आक्रमण भेल आ फेर वारुणिक मृत्यु भए गेल। उपसंहार दोसर वसन्त अबैत मिथिलामे गणतंत्रक स्वरूपक स्थापना स्थिर भए गेल। वैशाली आ मिथिलाक बीच परस्पर सम्वाद एक गणतांत्रिक सूत्रमे जुड़बाक लेल होमए लागल। सितग्राम स्थित राजधानीमे पूर्वमे मिथिलाक सीमा-विस्तारक चरचा भेल। राजधानी सितग्राम आ पूर्वी मिथिलाक जितग्रामक बीच एकटा महावन छल। एकरा ब्राह्मणग्राम आ त्रिग्राम द्वारा मिलिकए जड़ाकए हटाओल गेल। भाषा विज्ञान प्रसंग - ऋगवैदिक ऋचामे प्राकृतक किछु विशेष शब्द, ध्वनि, प्रत्यय आ वाक्य रचना भेटैत अछि। पाणिनी संस्कृतकेँ मानक भाषा आ प्रादेशिक तत्वसँ मुक्त भाषाक रूप देने छलाह। कर्णाटकमे पानिकेँ नीरू आ उत्तर भारतमे जल कहल जाइत अछि। पानिक ई दुनू रूप संस्कृतमे भेटत। प्राकृतिक तत्वसँ मुक्त भाषा बनेबाक लेल पाणिनी कोनो क्षेत्रक अवहेलना नहि कएने छलाह वरण सभ क्षेत्रक शब्दकोष लए उच्चारणक भेदकेँ खतम कएने छलाह। बहुत रास प्राकृत शब्द संस्कृतमे ध्वन्यात्मक संशोधन कए लेल गेल आ ताहिसँ बादमे ई धारणा भेल जे प्राकृतक शब्द सभ तद्भव छल। संस्कृतमे तद्भव ताहि कारणसँ नहि देखबामे अबैत अछि। तहिना अपभ्रंश आ प्राकृत भाषा सौँसे देशमे घुमए बलाक भाषा छल। भारतमे देवतंत्रक विकास पानि संबंधी धारणासँ जुड़ल अछि। यावत विश्व अव्यक्त अछि तँ अन्धकारमय अछि, अकास अछि, व्यक्त भेलापर ओ जल बनि जाइत अछि। अकास आ जल दुनू भारतीय चिन्तनमे तत्व अछि। मूर्तिपूजनक जे चित्र मायानन्दजी चित्रित करैत छथि ओ सरलीकरण अछि। भाषा-प्रसारक जे विधि ओ स्त्रीधनमे देखबैत छथि सेहो अति सरलीकरण अछि। श्रवण द्वारा परम्पराक निर्वहण साहित्यमे देखल गेल छल आ से महाभारतमे किछु ठाम बेर-बेर देखबामे अबैत अछि , से ताहि कारण कतेको पर्वकेँ क्षेपक कहल जाएब सम्भव नहि। वेदक प्रतिशाख्यकेँ ओना देखलापर ई ज्ञात होएत जे लिखबाक परम्पराक अछैत ई सम्भव नहि छल मुदा महाभारत अबैत-अबैत कट्टरता बढ़ल। महाभारतमे वर्णन अछि: वेदविक्रयिणश्चैव वेदानांचैवदूषकः। वेदानांलेखकश्चैव तेवै निरयगामिनः॥ (वेदक विक्रेता, गलत-व्याख्या कएनिहार आ लेखक, सभ नरकक पथपर गेनिहार छथि।) कराल प्रसंग : कराल जनकक कुकृत्यक वर्णन अर्थशास्त्रमे एना आएल अछि: (१.६ विनयाधिकारिकेप्रथमाधिकरणे षडोऽध्यायःइन्द्रियजये अरिषड्वर्गत्याग) : तद्विरुद्धवृत्तिरवश्येन्द्रियश्चातुरन्तोऽपिराजा सद्यो विनश्यति- यथा दाण्डक्यो नाम भोजः कामाद् ब्राह्मणकन्यायमभिमन्यमानः सबन्धराष्ट्रोविननाश करालश्च वैदेहः,...। भिक्षु प्रभामतीक जयमंगल भाष्य एहिमे जोड़ैत अछि जे कराल योगेश्वर तीर्थमे भीड़ दिशि देखैत काल एकटा सुन्दर ब्राह्मण-स्त्रीकेँ देखलक आ ओकरा अपन राज्य जबर्दस्ती लए गेल। ओ ब्राह्मण ओकर राजधानी गेल आ कानि खीजि कए कहलक जे ई धरती किएक नहि फटैत अछि जतए एहन कुकर्मी राजा रहैत अछि। धरती फाटल आ ओहिमे कराल परिवार समेत धसि कए मरि गेल। एकटा ब्राह्मण स्त्रीक अपहरण करालक पतनक कारण छल ई चरचा अश्वघोषक बुद्धचरितमे सेहो आएल अछि जेना कौटिल्यक अर्थशास्त्रमे आएल अछि। मुदा दीपवंश कराल जनकक बाद ओकर पुत्र आ पौत्रक राजा होएबाक वर्णन करैत अछि। ब्राह्मण ग्रंथ सभ विदेहकेँ राजशाही आ बौद्ध ग्रन्थ सभ गणतंत्र (राजा समिति द्वारा चुनल) कहैत अछि आ मत विभिन्नताक से कारण। एहि प्रकारें मायानन्द मिश्रजीक ऐतिहासिक यात्रा बहुत रास एहन तथ्य अनलक जे कोनो तरहेँ तर्कसँ पुष्ट नहि भए सकल। कृषि-मत्स्य शब्दावली (फील्ड-वर्कपर आधारित) माँछ वंशीसँ सेहो मारल जाइत अछि। छोट माँछक लेल जाल- भौरी जालक प्रयोग होइत अछि। भिरखा- हाथसँ उठा कए फेंकल जाइत अछि। एहिमे सूत आ लोहाक गोली प्रयोग होइत अछि, २५-२५ ग्रामक लोहाक गोली लगभग २-१/२ सँ ५ किलो धरि प्रयोगमे आनल जाइत अछि। अन्ता जाल छोट होइत अछि आ कछारमे रातिमे लगाओल जाइत अछि। कोठी जाल पैघ होइत अछि आ एहिमे बाँसक प्रयोग होइत अछि। बिसारी जाल- दिनमे माँछ हरकि जएतैक से रातिमे खुट्टी लगा कऽ रातिमे माँछ मारल जाइत छै। चट्टी जाल- प्लास्टिकक, पैघ-छोट दुनू, दिनमे प्रयुक्त, आषाढ़-साओन दुनू मे। ५-१० मिनटमे उठाओल जाइत छै। सूतक मोट पैराशूट जाल, सूत आ नाइलनक मिश्रणक करेन्ट जाल, सूतक बड़का हाटा जाल होइत छै। पैराशूटसँ छोटकी माँछ उड़ि जएतैक। पैघ मछली बड़का वंशीसँ, बड़का चट्टी जालसँ, सूताक महाजालसँ मारल जाइत अछि। पैघ छोट दुनू माँछ बाँसक जंघासँ मारल जाइत छै। एकरा ४ हाथ खड़ा नारियल आ नाइलोनक डोरीसँ बान्हल जाइत छै। बाँसक करचीक छीपसँ सेहो माँछ मारल जाइत छै। पटुआक सण्ठीक १००-२०० पुल्ली एक संग लगा कए सेहो माँछ मारल जाइत छै। हाटा जाल किलोमीटर धरि पैघ होइत अछि आ सूताक बनैत अछि। चाँच कहड़ा बाँसक होइत अछि।धार/ बदहाल घेरकेँ मारल जाइत अछि। पानिकेँ फुला कए डगरी लगाओल जाइत छै, चाँच फहड़ासँ घेरल जाइत अछि। माँछक प्रकार डाँरा मछली (डेरका मछली), मूँहा मछली, पोठी, लत्ता (पिआ माँछ), गड़इ, पलवा, टेंगड़ा, सिंघी, माँगुड़, चपड़ा, पैना, रेवा, गड़ही, उरन्था, मोहुल, बुआरी, बामी, बगहार, चेलवा, कौअल, गोर्रा, सौल, भौरा, कजाल, कलबौस, चित्तल, भोइ, कत्ती, भौकुड़ी, सिलोन, रेहू, मिरका, बिलासकप, सिल्वरकप, चाइना माँगुर, कबइ, चाइना कबइ। दरबा- छोट, पातर- २-३ इन्चक, पीठपर कारी, बगल सफेद गड़ई- कारी चोपड़ा- चाकर, कारी, मलिन पलबा- दुनू दिस काँट, पीठपर सेहो काँट, रंग- पीयर-उज्जर, मोंछ सेहो होइत छै। टेंगड़ा- पैघ माँछ, एकरो तीन टा काँट, मुँहपर मोँछ। सिंघी- पातर, दू टा काँट दुनू दिस, लाल रंगक आ लाल आ हल्का कारी मँगुरी- मोट आ महग सेहो।एकरो दू टा काँट, लाल आ हल्का कारी पैना- सफेद रंगक, पीठपर काँट रेवा- सफेद, पौआ-आधा किलोक डढ़ी- पीठपर काँटा, सफेद उरन्था- पीठपर काँट, नीचाँ गामे झुकल, सफेद भालु- लम्बाइ मुँह, सफेद- खड़ा(पीयर), ऊपरमे काँटा, नाभिक लग काँट (सभ माँछमे) बोआली- पैघ मुँह- २० किलो धरि, सफेद, पीठपर काँट, पखना दुनू दिस (सभ माँछमे) बामी- लम्बा, बिलमे रहैत अछि, मुँह आगू, गोल मुँह, सूआ जकाँ लम्बा, पीठपर काँट, नाभिपर दू टा काँट बघार- छोट, १ पौआसँ क्विंटल भरिक, कारी-खैरा (पीयर), काँट- पीठपर एकटा, बगलमे दू टा, पुच्छी-चाकर, मुँह चापट, चकड़ाई- बेसी। चेलबा- उज्जर, काँट नहि होइत छै। चलैक लेल दुनू दिस पखना, माँछमे तेजगर। कौअल- सफेद, मुँह नमगर। गोर्रा- मोँछ, दाढ़ी, काँटा, आगाँमे टेढ़ साउल- लाल आ पीयर, नमगर, २-३-५ किलोक भौरा-(गजाल), साउल, चितफुटरा, पैघ २०-२५-४० किलो तक, गोल-गोल उज्जर, हरियर आ कारी कलबौस- रंग हल्का कारी अंदाजी माँछ चित्तल- चकरगर बेसी, २०-२५ किलोक, २-३ फीट चकरगर सिलोन- पालतू,३-४ किलोक,पोखरिमे पोसल जाइत अछि। रोहु-पीयर, हल्का उज्जर, पीठपर काँट मिरका- हल्का लाल सफेद सिल्वरकप- पालतू चैना माँगुर- चलानी (पालतू), दुनू दिस काँट चैना कबइ- पालतू (चलानी), पीठपर जहाँ-तहाँ काँट कबई- कनफर आ पीठ दुनू ठाम काँट चेंगा माँछ- सुखायलोमे दूर धरि चलि जाइत अछि, कबई जकाँ । आब किछु दोसर जलजीव:- सौंस- पानिमे माँछ खाइत अछि, आदमीकेँ नोकसान नहि, आदमी संगे खेलाइत अछि, सीटीक अवाज (डोलफिन) घड़ियाल- कुर्सेला लग गंगामे, मुँह लम्बा, एक-डेढ़ हाथ,दाँत- आँगुर जेकाँ, रंग लाल, पुछरी नमगर, ३ हाथ बोँछ- आदमीक रंग रूप, कारी, माथपर चूल- केश पकड़िकेँ डुमा दैत छै आ कृषि शब्दावली:-- जोड़ा बैल/ हर ईश- हरमे जोड़ि कऽ पालोमे बान्हल जाइत छै। लगना पालो- कन्हापर पालोमे दू टा कनैल दुनू बगल बड़दकेँ एने- उने (एम्हर-ओम्हर) नञि होमए दैत छै। कनैलसँ हटि कऽ एक सवा फीटक डोरी बान्हल जाइत छै। समैल (पौन फीटक लकड़ीक/ बाँसक) मे डोरी बान्हल जाइत छै। ईशक नीचाँमे पेटार ईशकेँ खुजए नहि दैत छै, ऊँच-नीच करए दैत छै। हलमे पुट्ठी, नीचाँमे दू-फीटक अगल फल्ली पुट्ठीमे सेट कएल जाइत छै, माटि उखाड़ैत छै। परहत (लगना)- हरवाह एहिपर हाथ धरैत अछि। तीन फीटक/ ६ इन्चक मुट्ठी पकड़ैबला लगनामे ठोकल जाइत छै (मुठिया)। नाधा- पालो-ईशमे बान्हिकेँ जोड़ल जाइत छै, डोरी होइत छै ४-५ फीटक। दू टा मैडोर (डोरी)- १०-११ फीटक दू टा- एकरा चौकीमे बान्हि कऽ बड़दमे बान्हि कऽ हरवाहा चौकी दैत अछि। चौकी- (बाँस/ लकड़ीक) ६-७ फीटक - एहिपर हरवाह चढ़ि कऽ चौकी दैत अछि। हरवाहाक हाथमे एक टा झूर/ ज्वोली/ लाठी बड़द हाँकए लेल रहैत अछि। गेहूँक जोताई ३ इन्च गहरा कऽ ४-५ टा चास दऽ होइत अछि। मक्कइ लेल ४-५ इन्च गहराइ करए पड़ैत अछि। बीया- एक एकड़ (१०० डिस्मिल) मे २ मन गहूमक बीया, १० किलो मक्कइक बीया। खाद- एकड़मे २० कि. डी.ए.पी., ५ किलो पोटाश, ५ किलो यूरिया, ५ किलो जिंक गहूम बाउग करबा काल देल जाइत अछि। मकइमे डेढ़ सँ दू फीटक भेलाक बाद माटि चढ़ाओल जाइत अछि। २ कतार २ फीट चौड़ाइसँ। एकड़मे २ क्विंटल खाद देल जाइत अछि। १०० किलो डी.ए.पी., ५० किलो यूरिया, २० किलो साल्फिक, १२० किलो पोटाश, १० किलो जिंक। पानि पटवन समयमे खाद दऽ कऽ माटि चढ़बैत छियैक, फेर पानि पटबैत छियैक। पानि पटेलाक बाद यूरिया एक एकड़मे एक क्विंटल देल जाइत अछि। आब तर-तरकारीक प्रकार :- सिंघिया करैला- बड़ा- हाइ ब्रेक/ प्लेन छोटकी करैला- हजरिया/ जुल्मी सफेद करैला- पटनिआ (नजली- मध्यम खुटक) तारबूज- नामधारी-स्वादिष्ट- भीतरमे लाल, ऊपरमे सफेदी/ चितफुटरा (हरियर-उज्जर) माइको- हल्का कारी पहुजा- माइकोसँ बेशी कारी राजधानी- कारी रंगमे महाराजा- पैघ छोट कारी रंगमे सैनी आ सुगरदीबी- कारी रंगक नाथ- हल्का चितफुटरा (उज्जर/ हरियर) गंगासागर- कुम्हर जेकाँ उज्जर साफ सोरैय्या- चितफुटरा खीरा जुल्मी- छोट हाइब्रीड माइको- नमगर/ हरियर/ पीअर महाराजा- खीरा खेतीबारी- हरियर रंगक, नमगर कम, पाछाँमे मोट बेशी आगाँ कम। विद्यापतिक बिदेसिया- पिआ देसाँतर भोजपुरीक साहित्य मैथिलीसँ कम समृद्ध अछि मुदा से अछि मात्र परिमाणमे, गुणवत्ताक दृष्टिमे ई कतेक क्षेत्रमे आगाँ अछि। भोजपुरीक भिखाड़ी ठाकुरक बिदेसियाक सन्दर्भमे हम ई कहि रहल छी। भिखाड़ी ठाकुर कलकत्तामे प्रवासी रहथि, घुरि कय अएलाह आ भोजपुर क्षेत्रमे अपन कष्टक वर्णन जाहि मर्मस्पर्शी रूपसँ गामे-गामे घुमि कए आ गाबि कए सुनओलन्हि से बनल बिदेसिया नाटक। मिथिलामे प्रवास आजुक घटना छी, गामक-गाम सुन्न भऽ गेल अछि। मिथिलाक बिदेसिया लोकनि देशक कोन-कोनमे पसरि गेल छथि। मुदा पहिने भोजपुर इलाका जेकाँ प्रवासक घटना मिथिलामे नहि छल। प्रवास मोरंग धरि सीमित छल जे नेपालक मिथिलांचल क्षेत्र अछि। आ ताहिसँ मैथिलीमे लोकगाथाक सूक्ष्म विवरणक बड़ अभाव, जे अछियो से लोकगाथा नायकक विवरण नहि वरन महाकाव्यक नायकक मैथिलीमे विवरण जेकाँ अछि, आ बोझिल अछि, भिखाड़ी ठाकुरक बिदेसियाक जोड़ नहि। सलहेसक कथाक विवरण लिअ, क्षेत्रीय परिधि पार करिते सलहेस राजासँ चोर बनि जाइत छथि आ चोरसँ राजा। तहिना चूहड़मल क्षेत्रीय परिधि पार करिते जतए सलहेस राजा बनैत छथि ओतए चोर बनि जाइत छथि, आ जतए सलहेस चोर कहल जाइत छथि ओतुक्का राजा/ शक्तिशालीक रूपेँ जानल जाइत छथि। मुदा एहि सभपर कोनो शोध नहि भए सकल अछि। एहि क्रममे विद्यापतिक पदावलीक पद सभमे तकैत हमरा समक्ष विभिन्न प्रकारक गीत सभ सोझाँमे आएल। एहिमे जे अधिकांश छल से रहए प्रेमी-प्रेमिकाक विरहक विवरण आ बिदेसियाक जे मूल कनसेप्ट अछि- रोजी-रोटी आ आजीविका लेल मोन-मारि कए प्रवास, ताहिसँ फराक। तखन जा कए हमरा किछु विशुद्ध बिदेसिया जकरा विद्यापति पिआ-देसाँतर कहैत छथि भेटल। एहिमे स्वाभाविक रूपेँ अधिकांश विद्यापतिक नेपाल पदावलीसँ भेटल आ एकटा नगेन्द्रनाथ गुप्तक संग्रीहीत पदावलीसँ। मोरंग नेपाल स्थित मिथिलाक भाग अछि आ प्रवास लेल प्रसिद्ध छल, से एकर सम्भावित कारण। ताहि आधारपर ई संकल्पित नाटिका प्रस्तुत अछि। विद्यापतिक पिआ देसाँतर दृश्य १ स्टेजपर हमर बिदेसिया बिदेस नोकरीक लेल बिदा होइत छथि आ जुवती गबैत छथि- गीतक बीचमे एकटा पथिक अबैत छथि । मंचक दोसर छोड़पर चोर लोकनि धपाइत नुकायल छथि। मंचक दोसर छोरपर कोतवाल आ शुभ्र धोतीधारी पेटपर हाथ देने निफिकिर बैसल छथि। धनछी रागे (नेपालसँ प्राप्त विद्यापति पदावली)- हम जुवती, पति गेलाह बिदेस। लग नहि बसए पड़उसिहु लेस। हम युवती छी आ हमर पति बिदेस गेल छथि। लगमे पड़ोसीक कोनो अवशेष नहि अछि। सासु ननन्द किछुआओ नहि जान। आँखि रतौन्धी, सुनए न कान। सास आ ननदि सेहो किछु नहि बुझैत छथि। हुनकर सभक आँखिमे रतौँधी छन्हि आ ओ सभ कानसँ सेहो किछु नहि सुनैत छथि। जागह पथिक, जाह जनु भोर। राति अन्धार, गाम बड़ चोर। हे पथिक! निन्नकेँ त्यागू। काल्हि भोरमे नहि आऊ। अन्हरिया राति अछि आ गाममे बड्ड चोर सभ अछि। सपनेहु भाओर न देअ कोटबार। पओलेहु लोते न करए बिचार। कोतबाल स्वपनहुमे पहरा नहि दैत अछि आ नोत देलोपर विचार नहि करैत अछि। नृप इथि काहु करथि नहि साति। पुरख महत सब हमर सजाति॥ ताहि द्वारे राजा ककरो दण्ड नहि दैत छथि आ सभटा पैघ लोक एके रंग छथि। विद्यापति कवि एह रस गाब। उकुतिहि भाव जनाब। विद्यापति कवि ई रस गबैत छथि। उकतीसँ भाव जना रहलीह अछि। विद्यापति कविक प्रवेश होइत छन्हि। कोतवालक लग शुभ्र-धोतीधारी आ एकटा गरीबक आगमन होइत अछि। कोतवाल आभाससँ धोतीधारीक पक्षमे निर्णय सुनबैत छथि आ मंचक दोसर कोनपर बैसलि जुवती माथ पिटैत छथि। गीतक अन्तिम चारि पाँती विद्यापति कवि गबैत छथि। दृश्य २ जुवती एकटा दोकान खोलने छथि, सांकेतिक। मंचक दोसर कातसँ सासु आ ननदिकेँ जएबाक आ क्रेता पथिकक अएबाक संग युवती गेनाइ शुरू करैत छथि आ सभ पाँतिक बाद विद्यापति मंचपर अबैत छथि अर्थ कहैत छथि आ अंधकारमे विलीन भऽ जाइत छथि। मुदा अन्तिम पाँती विद्यापति गबैत छथि आ जुवती ओकर अर्थ बँचैत छथि। मालवरागे (नेपालसँ प्राप्त विद्यापति पदावली)- बड़ि जुड़ि एहि तरुक छाहरि, ठामे ठामे बस गाम। एहि गाछक छाह बड्ड शीतल अछि। ठामे-ठाम गाम बसल अछि। हम एकसरि, पिआ देसाँतर, नहि दुरजन नाम। हम असगरि छी, प्रिय परदेसमे छथि, कतहु दुर्जनक नाम नहि अछि। पथिक हे, एथा लेह बिसराम। हे पथिक! एतय विश्राम करू। जत बेसाहब किछु न महघ, सबे मिल एहि ठाम। जे किछु कीनब, किछुओ महग नहि। सभ किछु एतए भेटत। सासु नहि घर, पर परिजन ननन्द सहजे भोरि। घरमे सासु नहि छथि, परिजन दूरमे छथि आ ननदि स्वभावसँ सरल छथि। एतहु पथिक विमुख जाएब तबे अनाइति मोरि। एतेक रहितो जे अहाँ विमुख भए जाएब तँ आब हमर सक्क नहि अछि। भन विद्यापति सुन तञे जुवती जे पुर परक आस। विद्यापति कहैत छथि- हे युवती! सुनू जे अहाँ दोसराक आस पूरा करैत छी। दृश्य ३ एहि गीतमे विद्यापति नहि छथि। जुवतीक ननदि पथिककेँ दबारि रहल छथि, से देखि जुवतीकेँ अपन पिआ देसाँतर मोन पड़ि जाइत छन्हि। ओ ननदि आ सखीकेँ सम्बोधित कए गीत गबैत छथि। गीतक अर्थ सखी कहैत छथि, सभ पाँतीक बाद। धनछीरागे (नेपालसँ प्राप्त विद्यापति पदावली)- परतह परदेस, परहिक आस। विमुख न करिअ, अबस दिस बास। परदेसमे नित्य दोसराक आस रहैत अछि। से ककरो विमुख नहि करबाक चाही। अवश्य वास देबाक चाही। एतहि जानिअ सखि पिअतम-कथा। हे सखी ! प्रियतमक लेल एतबी कथा बुझू। भल मन्द नन्दन हे मने अनुमानि। पथिककेँ न बोलिअ टूटलि बानि। हे ननदि! मोनमे नीक-अधलाहक अनुमान कऽ पथिककेँ टूटल गप नहि बाजू। चरन-पखारन, आसन-दान। मधुरहु वचने करिअ समधान। चरण पखारू, आसन दियौक आ मधुर वचन कहि सान्त्वना दियन्हु। ए सखि अनुचित एते दुर जाए। आओर करिअ जत अधिक बड़ाइ। हे सखी पथिक एतयसँ दूर जायत से अनुचित से ओकर आर बड़ाई करू। दृश्य ४ जुवती आ ननदि नगर आबि ठौर धेने छथि। एकटा पथिक आबि आश्रय मँगैत छथि तँ जुवती गबैत छथि आ ननदि सभ पाँतीक बाद अर्थ कहैत छथि। बीचमे चारि पाँती बिना अर्थक नेपथ्यसँ अबैत अछि। फेर जुवती आगाँ गबैत छथि आ ननदि अर्थ बजैत छथि। अन्तमे अन्तिम दू पाँती विद्यापति आबि गबैत छथि। दृश्यक अन्तमे ननदि कहैत छथि जे हम जे ओहि दिन पथिककेँ दबारि रहल छलहुँ से अहाँकेँ नीक नहि लागल रहए, मुदा आइ पथिककेँ आश्रय किएक नहि देलियैक। कोलाररागे (नेपालसँ प्राप्त विद्यापति पदावली)- हम एकसरि, पिअतम नहि गाम। तेँ मोहि तरतम देइते ठाम। हम एकसरि छी आ प्रियतम गाममे नहि छथि। ताहि द्वारे राति बिताबए लेल कहबामे हमरा तारतम्य भऽ रहल अछि। अनतहु कतहु देअइतहुँ बास। दोसर न देखिअ पड़ओसिओ पास। यदि क्यो लगमे रहितथि तँ दोसर ठाम कतहु बास देखा दैतहुँ। छमह हे पथिक, करिअ हमे काह। बास नगर भमि अनतह चाह। हे पथिक क्षमा करू आ जाऊ आ नगरमे कतहु बास ताकू। आँतर पाँतर, साँझक बेरि। परदेस बसिअ अनाइति हेरि। बीचमे प्रान्तर अछि सन्ध्याक समय अछि आ परदेसमे भविष्यकेँ सोचैत काज करबाक चाही। मोरा मन हे खनहि खन भाँग। जौवन गोपब कत मनसिज जाग। चल चल पथिक करिअ प... काह। वास नगर भमि अनतहु चाह। सात पच घर तन्हि सजि देल। पिआ देसान्तर आन्तर भेल। बारह वर्ष अवधि कए गेल। चारि वर्ष तन्हि गेला भेल। घोर पयोधर जामिनि भेद। जे करतब ता करह परिछेद। भयाओन मेघ अछि, रतुका गप छी सोचि कए निर्णय करू। भनइ विद्यापति नागरि-रीति। व्याज-वचने उपजाब पिरीति। विद्यापति कहैत छथि, ई नगरक रीति अछि जे कटु वचनसँ प्रीति अनैत अछि। दृश्य ५ अहू दृश्यमे विद्यापति नहि छथि। एकटा पथिक अबैत छथि मुदा सासु-ननदि ककरो नहि देखि बास करबासँ संकोचवश मना कए आगाँ बढ़ि जाइत छथि। जुवती गबैत छथि। घनछीरागे (नेपालसँ प्राप्त विद्यापति पदावली)- उचित बसए मोर मनमथ चोर। चेरिआ बुढ़िआ करए अगोर। कामदेव रूपी चोरक लेल हमर अवस्था ठीक अछि। बुढ़िया चेरी पहरा दऽ रहल छथि। बारह बरख अवधि कए गेल। चारि बरख तन्हि गेलाँ भेल। बारहम बरखक रही, तखन ओ गेलाह आ आब चारि बर्ख तकर भऽ गेल। बास चाहैत होअ पथिकहु लाज। सासु ननन्द नहि अछए समाज। सास आ ननदि क्यो संग नहि छथि आ पथिक सेहो डेरा देबासँ लजाइत छथि। सात पाँच घर तन्हि सजि देल। पिआ देसाँतर आँतर भेल। ओ कामदेव लेल घर सजा कए देशान्तर चलि गेलाह आ हमरा सभक बीचमे अन्तर आबि गेल। पड़ेओस वास जोएनसत भेल। थाने थाने अवयव सबे गेल। पड़ोसक बास जेना सय योजनक भऽ गेल सभ सर-सम्बन्धी जतए ततए चलि गेलाह। नुकाबिअ तिमिरक सान्धि। पड़उसिनि देअए फड़की बान्धि। लोकक समूह अन्हारमे विलीन भऽ गेल, पड़ोसिन फाटकि बन्न कए लेलन्हि। मोरा मन हे खनहि खन भाग। गमन गोपब कत मनमथ जाग। हमर मोन क्षण-क्षण भागि रहल अछि। कामदेव जागि रहल छथि गमनकेँ कतेक काल धरि नुकाएब। दृश्य ६ एहि दृश्यमे सेहो, नहि तँ ननदि छथि, नहिये सासु आ नहिये विद्यापति। एकटा अतिथि अबैत छथि आकि तखने मेघ लाधि दैत अछि आ जुवती गबैत छथि। धनछीरागे (नेपालसँ प्राप्त विद्यापति पदावली)- अपना मन्दिर बैसलि अछलिहुँ, घर नहि दोसर केवा। अपन घरमे बैसल छलहुँ, घरमे क्यो दोसर नहि छल, तहिखने पहिआ पाहोन आएल बरिसए लागल देवा। तखने पथिक अतिथि अएलाह आ बरखा लाधि देलक। के जान कि बोलति पिसुन पड़ौसिनि वचनक भेल अवकासे। की बजतीह ईर्ष्यालु पड़ोसिन से नहि जानि, बजबाक अवसर जे भेटि गेलन्हि। घोर अन्धार, निरन्तर धारा दिवसहि रजनी भाने। दिनहिमे रात्रि जेकाँ होमए लागल। कञोने कहब हमे, के पतिअएत, जगत विदित पँचबाने। हम ककरा कहब आ के पतियायत। कारण कामदेवक ख्याति तँ जगत भरिमे अछि। दृश्य ७ मंचक एक दिससँ सासुक मृत्युक बाद हुनकर लहाश निकलैत छन्हि आ मंचपर अन्हार होइत अछि। फेर इजोत भेलापर ननदिक वर हुनका सासुर लए जाइत छन्हि। पथिक रस्तापर छथि दर्शकगणक मध्य आ दर्शकगणकेँ इशारा करैत जुवती गीत गबैत छथि आ विद्यापति सभ पाँतिक बाद अर्थ कहैत छथि। अन्तिम दू पाँतिमे विद्यापति गीत आ अर्थ दुनू बजैत छथि- विद्यापति अन्तिम दू पाँति आ ओकर अर्थ कैक बेर दोहराबैत छथि। नगेन्द्रनाथ गुप्त सम्पादित पदावली- सासु जरातुरि भेली। ननन्दि अछलि सेहो सासुर गेली। सासु चलि बसलीह, ननदि सेहो सासुर गेलीह तैसन न देखिअ कोई। रयनि जगाए सम्भासन होई। क्यो नहि सम्भाषणक लेल पर्यन्त, एहि पुर एहे बेबहारे। काहुक केओ नहि करए पुछारे। एतुका एहन बेबहार, ककरो क्यो पुछारी नहि करैत अछि। मोरि पिअतमकाँ कहबा। हमे एकसरि धनि कत दिन रहबा। हमर पिअतमकेँ कहब, हम असगरे कतेक दिन रहब। पथिक, कहब मोर कन्ता। हम सनि रमनि न तेज रसमन्ता। पथिक हुनका कहबन्हि, हमरा सन रमणिक रसक तेज कखन धरि रहत। भनइ विद्यापति गाबे। भमि-भमि विरहिनि पथुक बुझाबे। विद्यापति गबैत छथि, विरहनि घूमि-घूमि कए पथिककेँ कहि रहल छथि। विद्यापति गबैत-गबैत कनेक खसैत छथि- अन्हार पसरए लगैत अछि तँ एक गोटे जुवती दिस अन्हारसँ अबैत अस्पष्ट देखना जाइत छथि। की वैह छथि पिआ देसान्तर!! हँ, आकि नहि!!! पिआ देसान्तरक घोल होइत अछि आ मंचपर संगीतक मध्य पटाक्षेप होइत अछि। पिआ देसान्तरक ई कन्सेप्ट सुधीगणक समक्ष अछि आ मैथिल बिदेसिया लोकनिक वर्तमान दुर्दशाक बीच ई महाकवि विद्यापतिक प्रति ससम्मान अर्पित अछि। रमेश नारायणक “पाथरक नाव”-विनोद बिहारी वर्माक “बलानक बोनिहार ओ पल्लवी (तथा अन्य कथा)” मैथिली कथा संग्रह सभमे १.रमेश नारायणक “पाथरक नाव” २. विनोद बिहारी वर्माक “बलानक बोनिहार ओ पल्लवी (तथा अन्य कथा)” ई दुनू कथा संग्रह अपन किछु खास विशिष्टताक कारण विशेष स्थान रखैत अछि। रमेश नारायणक “पाथरक नाव” १९७२ ई. मे उपासना प्रकाशन, ९०, श्रीकृष्णानगर, पटना-१ सँ छपल। विनोद बिहारी वर्माक “बलानक बोनिहार ओ पल्लवी (तथा अन्य कथा)” १९९४ ए. मे मैथिली प्रतिभा. एल.एफ. १/३, युनिट-३, कोहाउसिङ्ग कालोनी, भुवनेश्वर-७५१००१ सँ छपल। रमेश नारायणक “पाथरक नाव” रमेश नारायण अपन कथा-संग्रहक समर्पण करै छथि ---अथाहो पानिमे ऐना जकाँ झलकैत/ अपना गामक ओहि थाल-कादोकेँ,/ जाहिमे हमरे लेल/ एक गोट रक्तकमल/ जनमि कए फुलेबाक हमर आस/ अटकल अछि.... आ अपना दिससँ कहै छथि- इएह, जे/ एहि संग्रहक कतेको कथा आकाशवाणीक पटना केन्द्रसँ प्रसारित अछि,/ तैं आकाशवाणीक सौजन्यों सँ। ऐ कथा संग्रहमे ई सभ कथा संकलित अछि:- १.ठेहियायल मोन घुमाओन बाट, २.काजरक रेख, ३.आँजुर भरि नोर, ३.काँच निन्न टुटैत स्वप्न, ४.सइँतल सेज निहुँछल निन्न, ५.तेजि गेल बिदेस..., ६.काँट कुसक छाहरि, ७.एक पोस्टकार्ड: सरोजिनी आ’ हम ८.चीरल पन्ना जोड़ल पाँती। विनोद बिहारी वर्माक “बलानक बोनिहार ओ पल्लवी (तथा अन्य कथा)” विनोद बिहारी वर्मा अपन कथा-संग्रहक समर्पण करै छथि:- बहु विद्या विद् / पूज्य लाल भाइ,/ डा. ब्रज किशोर वर्मा “मणिपद्म” क/ पुण्य स्मृतिमे/ श्रद्धापूर्वक समर्पित- विनोद। ऐ संग्रहमे १४ टा कथा अछि जइमे सँ ३ टा कथा मिथिला मिहिर मे छपल छल आ ११ टा कथा वैदेही मे। ऐ कथा संग्रहमे ई सभ कथा संकलित अछि:- १. बलानक बोनिहार ओ पल्लवी, २. कुन्ती, कर्ण ओ परशुराम, ३.सुलोचनाक चटिसार, ४. साहेब, ५. ब्रह्मा-बिसुन-राति, ६.हम पान खेलहुँ, ७.फूलक कथा, ८.अन्तर्मुखी बसुन्धरा, ९. काशक फूल, १०. माछक पिकनिक, ११.जीवन-नाओ, १२.कापुरुष, १३.गोनौर-बाबू, १४.आकाश-फूल दूर्वाक्षत यजुर्वेदक अध्याय २२ मंत्र २२ केँ विश्वक पहिल राष्ट्रभक्ति गीत होएबाक गौरव प्राप्त छै। मुदा मिथिलामे दूभि-अक्षत छीटि कऽ ऐ मंत्रकेँ दूर्वाक्षत मंत्र बना देल गेल। बिहार स्टेट टेक्स्ट बुक पब्लिशिंग कॉरपोरेशन लि. दूर्वाक्षत नामसँ नवम वर्गक किताब छपने अछि। ऐ पोथीमे मिथिला आ मैथिलीकेँ पछुएबाक षडयंत्र पूर्ण रूपसँ दृष्टिगोचर होइत अछि। अठारह पन्नामे मिथिलाक एकटा जिलाक स्थायी बन्दोबस्तीबला जमीन्दारक जीवनी पढ़ाओल गेल अछि!! मैथिली लिपिक संरक्षणपर डेढ़ पन्नाक पचास बर्ख पुरान लेख अछि जकर आइक तकनीकी युगमे कोनो महत्व नै छै, प्रवासी मैथिल समाज लेख पुरातनपंथी अछि आ अखुनका बच्चाकेँ ई हास्यास्पद बुझेतै, प्रवासक अर्थ, मैथिलक अर्थ आ प्रवासक कारण सभ किछु बदलि गेल अछि। तँ की ई बच्चा सभकेँ गुलामीक पाठ पढ़ेबाक षडयंत्र नै अछि? लोक नवम वर्गक हिन्दी, अंग्रेजी, बांग्ला आ आन भाषाक पोथीसँ एकर तुलना करैए तँ स्थिति आर भयावह भऽ जाइए। शिक्षकसँ आग्रह जे जमीन्दारक जीवनी बच्चा सभकेँ नै पढ़ाबथु, प्रश्न-पत्र सेट केनिहारसँ आग्रह जे ओ जमीन्दारक जीवनीबला अध्यायसँ प्रश्न नै पुछथि। मैथिली- सुरजापुरी- राजबंशी मैथिली बाबूकेँ अपन ऐ राजनैतिक जमीनक अनुभव ओइ दलमे रहितो नै भेल हेतन्हि, जकरा कहियो ओ रामक संग पटेने रहथि। दलमे एकटा प्रभावी नेता कहै जाइबला बाबूकेँ कहियो पिछड़ल वर्गक नेताक रूपमे प्रस्तुत नै कएल गेल। मुदा राजनैतिक जमीनसँ बेशी जोड़तोड़मे माहिर बाबू दलसँ निकालि देल जाइते प्रतिपक्षी-दलक नजरिमे एना चढ़लाह जे हुनका प्रतिपक्षी-दल अपना दिससँ प्रदेशमे पिछड़ल वर्गक गद्दीपर विराजमान कऽ देलक। एकरा सुरजापुरीमे (भारत दिसुका किशनगंज आदि क्षेत्रमे) एना लिखल/ बाजल जाएत:- बाबूक अपना यहार राजनीतिक जमीनेर अहसास उस दलात रहले नी होबे। जहाक कोईखुन वहाय रामेर संगे सीचे छीले। दलात एक कद्दावर नेता कहा जनवार बाबू कोईखुन पिछवाड़ नेतार लखा पेश नी करील। लेकिन राजनीतिक से बेसी जोड़तोड़ोत माहिर बाबू दलार से निकलाते ही प्रतिपक्षी-दलाड़ नजरोत हिरंगदी चढ़ील कि वहाय पाटी अपनार बीती से प्रदेशोत पिछड़ार नेतार गद्दीत विरजमान करील। एकरा राजबंशी (नेपाल दिस सुरजापुरीकेँ राजबंशी भाषा कहल जाइ छै, झापा, सरनामति, चकमकी, मेची, ताधंडुवा आदिमे- राजबंशी आ सुरजापुरीमे मामूली अन्तर छै) मे एना लिखल बाजल जाएत:- बाबूर अपनार इर राजनीतिक जमीनेर ऐहसास उखान दल त रहते हुए भी नी होल, जइर कोधोय उम्हा रामेर संगे छिले। दलात एक कद्दावर नेता कहवार बाबूर कोधोय पिछड़ा नेतार लाखा पेश नी करे। माने राजनीतिक जमीनत भेल्ला जोड़तोड़ माहिर बाबू दल से निकलाले ही प्रतिपक्षी-दलार नजर एनंतिंज चढ़िल कि अम्हा पार्टीत अपनार तरफ से प्रदेशत छट जातिर नेतारक गद्धी पर बठाइ दिल। सुरजापुरी- भारतमे बिहारक किशनगंज आ पूर्णियाँ आदिमे गामे-गाम राजबंशी (महादलित) जाति द्वारा ई भाषा बाजल जाइत अछि। किशनगंजमे मुस्लिममे स्वामी जाइत खोट्टा आ सेवक जाति कुल्हिया कहल जाइत छथि। कुल्हिया जाइत सेहो सुरजापुरी भाषा बजैत छथि। राजबंशी आ जे आन जाइत सभ कुल्हियाक आसपास रहै छथि से सुरजापुरी बजैत छथि। ई भाषा मैथिली आ बांग्लाक मिश्रण अछि। कियो कियो बंगालक कूच बिहारक बाहे बंगाली आ नेपालक राजबंशी भाषाकेँ सेहो सुरजापुरी भाषा कहै छथि। किछु गोटेक मत छन्हि जे बांग्लादेशक लोकक भाषाक क्षेत्रीय भाषासँ मिश्रणक परिणामस्वरूप सुरजापुरी भाषा निकलल। पूर्णियाँ आ किशनगंजमे एक्के गाममे कुल्हिया आ राजबंशी लोकनि सुरजापुरी बजै छथि, संथाल लोकनि संथाली बजै छथि, बंजारा लोकनि बंजारा भाषा बजै छथि जखन कि शेष सभ गोटे मैथिली बजै छथि। जँ मिथिला राज्यमे ऐ क्षेत्र सभकेँ लेल जाए तँ हुनका सभकेँ हुनकर भाषाक विकासक गारन्टी देबऽ पड़त। की मिथिला राज्य अभियानकर्मी सभक सोच एतऽ धरि पहुँचलनि अछि? बूच जीक कविताक -मार्क्सवाद, ऐतिहासिक दृष्टि, संरचनावाद, जादू-वास्तविकतावाद, उत्तर-आधुनिक , नारीवादी आ विखण्डनवाद दृष्टिसँ अध्ययन संगमे भारतीय सौन्दर्यशास्त्रक दृष्टिसँ सेहो अध्ययन जेठी करेह: बूच जीक कविता जेठी करेह कवितामे कवि कहै छथि जे ई भोरमे उधिआइ अछि, बर्खा हेठ भेलोपर उपलाइत अछि। ओकर खतराक बिन्दु बड्ड ऊपर छै तखन ओ किए अकुलाइत अछि। आ आखिरीमे कहै छथि जे बान्ह तोड़ि ई प्रलय मचाओत से बुझाइत अछि।ई भेल ऐ कविताक सामान्य पाठ। आब एतए एकरा संरचनावादी दृष्टिकोणसँ देखी तँ लागत जे करेह सवेरे उधिआइ अछि तँ आशा करू जे आन बेरमे ई नै उधिआइत होएत। बरखा हेठ भेने उपलाइत अछि मुदा से नै हेबाक चाही। इन्होर पानिक चमकब, मोरपर भौरी देब आ तकर परिणाम जे डीहक करेजकेँ ई अपनामे समा लैत अछि।ओकर रेतक बढ़लासँ कविक धैर्य चहकै छन्हि। आब कने संरचनावादसँ हटि कऽ एकर ऐतिहासिक विश्लेषणपर आउ। ई नव युगक लेल एकटा नव अर्थ देत। खतराक बिन्दु जे कविक समएमे ऊँचगर लगैत हएत आब बान्हक बीचमे भेल जमा धारक मवादक चलते ओतेक ऊँच नै रहि गेल। से नव पीढ़ी लेल कविक कविता कविसँ फराक एकटा नव स्वरूप लऽ लैत अछि। आब कने संरचनावादसँ हटि कऽ विखण्डनवाद दिस आउ। विखण्डनवादी कहत जे संरचनावादीक ध्रुव दार्शनिक स्वरूप लैत अछि। बर्खा हेठ भेलै, तैयो उपलायब, बान्ह बनबैबला इंजीनियरक करेहकेँ बान्हबाक प्रयासक बुरबकीक रूप लेब आ कविक करेह द्वारा बान्ह तोड़ि प्रलय मचेबाक भविष्यवाणी स्वयं कविक ध्रुवीकरणक स्थायी वा क्षणिक होएबापर प्रश्नचिन्ह लगेबाक प्रमाण अछि। आब फेर कने कविताक ऐतिहासिकतापर जाउ। जादू-वास्तविकतावादी साहित्यमे भूतकालमे गेलापर हम देखै छी जे ६०क दशकमे बान्ह बनेबाक भूत सवार रहै, बान्ह, ऊँच आ चाकर, जे धारकेँ रोकि देत आ मनुक्ख लेल की-की फाएदा ने करत। ओइ स्थितिमे जादू-वास्तविकताबला साहित्यक पात्र लग ई कविता जाएत तँ ओ ऐ कविताक तेसरे अर्थ लगाओत। कविक अस्तित्व ओतए खतम भऽ जाएत आ शब्दशास्त्र अपन खेल शुरू करत। जादू-वास्तविकताबला साहित्यक ओ पात्र जे भविष्यमे जीयत तकरा लेल सेहो ई एकटा अलगे अर्थ लेत, ओ धारक खतराक निशानक ऊँच होमयबला गप बुझबे नै करत आ कविक कविताक भावक ताकिमे रहत। मुदा विखण्डनवाद तकरा बाद अपने जालमे फँसि जाएत, बहुत रास बात नै रहत मुदा बहुत रास बात रहत। बरखा रहत, धार सेहो परिवर्तित रूपमे रहबे करत, रौदमे ओकर पानि इन्होर होइते रहत।उधियेनाइ आ उपलेनाइ रहबे करत। स्वागत गान: स्वागत गानक सामान्य पाठ- कवि सभक स्वागत कऽ रहल छथि मुदा मिथिलाक उपटैत धरतीक करुण क्रन्दनक बीच उल्लासक गीत कोन होएत। भ्रमर पियासल, फलक गाछ मौलायल तखन ई समारोही गोष्ठीसँ की होएत? कविताक संग लाठी आ रसक संग खोरनाठी लिअए पड़त। कविताक नीचाँमे सूचना अछि- विद्यापति स्मृति पर्व समारोह १९८४, ग्राम-बैद्यनाथपुर, प्रखंड-रोसड़ा, जिला-समस्तीपुरमे आगत अतिथिक स्वागत। ओ कालखण्ड मिथिलासँ पड़ाइनक प्रारम्भ छल। हाजीपुरमे गंगा पुल बनि गेल छल। विकासक प्रतिमान लागल जेना विफल भऽ गेल। पैघ बान्हक प्रति मोहभंग भऽ गेल छल। कृषिक आ कृषकक दुर्दशाक लेल बाढ़िक विभीषिका छल तँ स्थानीय फसिल आधारित औद्योगीकरण निपत्ता छल आ शिक्षाक अभियान कतौ देखबामे नै आबि रहल छल। आ ताइ स्थितिमे समारोही गोष्ठीक स्वागतक भार कविजी सम्हारने रहथि। ध्वनि सिद्धान्त: आनन्दवर्धन ध्वन्यालोकमे साहित्यक उद्देश्य अर्थकेँ परोक्ष रूपेँ बुझाएब वा अर्थ उत्पन्न करब कहैत छथि। ई सिद्धान्त दैत अछि परोक्ष अर्थक संरचना आ कार्य, रस माने सौन्दर्यक अनुभव आ अलंकारक सिद्धान्त।आनन्दवर्धन काव्यक आत्मा ध्वनिकेँ मानैत छथि। ध्वनि द्वारा अर्थ तँ परोक्ष रूपेँ अबैत अछि मुदा ओ अबैत अछि सुसंगठित रूपमे। आ ऐसँ अर्थ आ प्रतीक दूटा सिद्धान्त बहार होइत अछि। ऐसँ रसक प्रभाव उत्पन्न होइत अछि। ऐसँ रस उत्पन्न होइत अछि। न्याय आ मीमांसा ऐ सिद्धान्तक विरोध केलक, ई दुनू दर्शन कहैत अछि जे ध्वनिक अस्तित्व कतौ नै अछि, ई परिणाम अछि अनुमानक आ से पहिनहियेसँ लक्षणक अन्तर्गत अछि। आ से सभ शब्द द्वारा वर्णित होएब सम्भव नै अछि। स्वागत गानक ध्वनि सिद्धान्तक हिसाबसँ पाठ: विद्यापति शिव स्वरूप मृत्युंजय मऽरल छथि कहि कवि अर्थ आ प्रतीक दुनू सोझाँ अनै छथि। ध्वनि सिद्धान्तक न्याय दर्शन विरोध केलक मुदा उदयनक गाम करियनक कवि बूच जी दार्शनिक नै, कवि छथि। ओ ध्वनिक जोरगर संरचना सोझाँ अनै छथि- हमरा सबहक अभाग अजरो भऽ जऽड़ल छथि, आ मात्र ई समारोही गोष्ठी सँ की हेतै ? आगाँ ओ कहै छथि- काव्य पाठ करू मुदा कान्ह पर लिअ लाठी, एक हाथ रसक श्रोत दोसर मे खोर नाठी। ऐ प्रतीक सभसँ भरल ई कविता सुगठित रूपे आगाँ बढ़ैत अछि आ अभ्यागतक स्वागत करैत अछि। मार्क्सवादी दृटिकोणसँ देखलापर लागत जे कविक काजकेँ ऐ कवितामे काव्यपाठसँ आगाँ भऽ देखल गेल अछि। ऐमे सकारबाक भावक संग ओकरा फुसियेबाक, पुरान आ नव; आ विकास आ मरण दुनूक नीक जकाँ संयोजन भेल अछि। स्वागत गान अपन परिस्थितिसँ कटि कऽ आह-बाह करऽ लगैत तँ मार्क्सवादी दृष्टिकोणसँ ई निम्न कोटिक कविता भऽ जाइत (जकर भरमार मैथिलीक स्वागत आ ऐश्वर्य गान गीत सभमे अछि), मुदा कवि एकरा एकटा गतिशील प्रक्रियाक अंग बना देलन्हि आ ई मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ स्वागत गान बनि गेल। बेटी बनलि पहाड़: बेटी बनलि पहाड़ कविताक सामान्य पाठ: दुलरैतिन बेटी घेंटक घैल बनल छथि। बेटी अएलीह तँ उड़नखटोला चढ़ि कऽ मुदा हरि गरुड़ त्यागि कार माँगि रहल छथिन्ह। पैंतीस ग्राम सोना पुड़ेलन्हि मुदा आब बियाह रातिक खर्चा चाही आ बरियाती दस गाही अओताह; सौँसे बल्ब जड़ि रहल अछि मुदा माझे ठाम अन्हार अछि। दशरथ एको पाइ नै मँगलन्हि, रामो किछु नै बजलाह। इतिहास तँ कृष्णक लव मैरेजक छल मुदा तैसँ की। जनक वर्तमानमे हाहाकार कऽ रहल छथि। बेटाक कंठ बाप पकड़ने अछि आ घरे-घर बूचड़खाना बनल अछि आ गामे-गाम बजार लागल अछि। बेटी बनलि पहाड़ कविताक समाजशास्त्रीय समीक्षा पद्धतिक दृष्टिसँ पाठ: ई कविता काटर प्रथाक विरोधक कविता अछि। समाजमे ओइ कालमे (अखनो) काटर प्रथाक कारण उड़नखटोलापर चढ़ि कऽ आयलि दुलरैतिन बेटी बाप अपस्यांत छथि। करूण गीत: करूण गीत कविताक सामान्य पाठ: कोकिलक करुण गीत सुनि श्रवित लोचनसँ कुसमित कानन देखब! सुवर्णक सौर्य शिखरपर शान्ति सागरक सुलभ जीत! जहिना किछु आलिंगन करै छी अनेको वक्रशूल भोका जाइत अछि। सुषमा दू क्षणक लेल आयलि, (आ चलि गेलि!) प्रेमक मधु तीत भऽ गेल। रजनीक रुदन विगलित प्रभात! करूण गीत कविताक रूपवादी दृष्टिकोणसँ पाठ: कुसुमित काननक श्रवित लोचन द्वारा देखब, श्रृंगार सेज पर ज्वलित मसानक रौद्र रूपक आएब आ सुवर्णक शौर्य शिखर पर - शांति सागरक सुलभ जीत केँ देखू। भाषाक अनभुआर पक्षकेँ कवि नीक जकाँ उपयोग करै छथि। आ अहीसँ हुनकर कवितामे कवित्व आबि जाइत अछि। विरोधी शब्द सभक बाहुल्य आ संयोजनक अनभुआर प्रकृति शब्दालंकारसँ युक्त भाषा ऐ कविताकेँ विशिष्ट बनबैत अछि। फूलक शूल सन ढुकब आ एहने आन संयोजन ऐ कविताकेँ रूपवादी दृष्टिकोणसँ श्रेष्ठ बनबैत अछि। गामे मोन पड़ैए: गामे मोन पड़ैए कबिताक सामान्य पाठ: गाममे रोटी एकोण रहए आ बथुओ साग अनोन रहए मुदा तैयो कलकत्तामे गामे मोन पड़ि रहल अछि। करेहक पानि पटा कऽ मोती उपजाएब तँ बच्चा सभ बिलटत? हुगलीक बाबू रहब नीक आकि कमला कातक जोन रहब? ईडेन गार्डनसँ नीक कमला कातक बोन अछि, पति पत्नीकेँ ईडेन गार्डनमे माला पहिरा रहल छथि मुदा कमला कातक बोनमे तिरहुतनी अपन भोला लेल धतूर अकोन ताकि रहल छथि! नारीवादी दृष्टिकोणसँ गामे मोन पड़ैए कविताक पाठ: प्रवासक कविता अछि ई। तिरहुतनी अपन भोला लेल धतूर अकोन ताकि रहल छथि, आ भोला प्रवासमे छथि। अस्तित्ववादी दृष्टिकोणसँ देखी तँ ई भोला अपन दशा लेल, असगर जीबा लेल, चिन्ता लेल अपने जिम्मेदार छथि। सोन दाइ: सोन दाइ कविताक सामान्य पाठ: सोन दाइक जीवनमे ने हास रहतन्हि आ ने विलास, मुदा से किएक? बाल वृन्द जा रहल छथि, नव युवको चलल छथि आ तकरा बाद बूढ़-सूढ़ गलि गेल छथि। तैयो किए विश्वास छन्हि सोन दाइकेँ? ऐ सभक उत्तर आगाँ जा कऽ भेटैत अछि, देसकोस बिसरि ओ प्रवास काटि रहल छथि। आ जौँ-जौँ उमेर बढ़तै कहिया धरि सोन दाइक घरमे वास हेतै।नारीवादी दृष्टिकोणसँ सोन दाइ कविताक पाठ: नारीक लेल वएह सिद्धान्त, किए ने ओ काव्येक सिद्धान्त होए, जे पुरुष केन्द्रित समाजमे पुरुष लोकनि द्वारा बनाओल गेल अछि, समीचीन नै अछि। सोन दाइ देसकोस बिसरि ककरा लेल प्रवास काटि रहल छथि? अकाल: अकाल कविताक सामान्य पाठ: अकालक वर्णनमे कवि नाङरिमे भूखक ऊक बान्हि ओकर चारपर ताल ठोकबाक वर्णन करैत छथि।अनावृष्टिसँ अकाल आ तइसँ महगीक आगमन भेल, तइसँ जड़ैत गामक अकास लाल भऽ गेल। भारतमे लंका सन मृत्युक ताण्डव शुरू भेल अछि मुदा ऐबेर विभीषणक घर सेहो नै बाँचत कारण ओकर मुंडमाल डोरी-डोरीसँ बान्हल अछि। माए भरि-भरि पाँज कऽ धरती पकड़ि रहल छथि। दशानन अपन बीसो आँखि ओनारि माथ हिला रहल छथि। औचित्य सिद्धान्त: क्षेमेन्द्र औचित्यविचारचर्चामे औचित्यकेँ साहित्यक मुख्य तत्व मानलन्हि। आ औचित्य कतऽ हेबाक चाही? ई हेबाक चाही पद, वाक्य, प्रबन्धक अर्थ, गुण, अलंकार, रस, कारक, क्रिया, लिंग, वचन, विशेषण, उपसर्ग, निपात माने फाजिल, काल, देश कुल, व्रत, तत्व, सत्व माने आन्तरिक गुण, अभिप्राय, स्वभाव, सार-संग्रह, प्रतिभा, अवस्था, विचार, नाम आ आशीर्वादमे। कंपायमान अछि ई ब्रह्माण्ड आ ई अछि कंपन मात्र। कविता वाचनक बाद पसरैत अछि शान्ति, शान्ति सर्वत्र आ शान्ति पसरैत अछि मगजमे। अकाल कविताक औचित्य सिद्धान्तक हिसाबसँ पाठ: ई अकाल नहि, महाकाल अछि, भूखक ऊक बान्हि नाड़रि सँ, चारे पर ठोकैत ताल अछि मिथिलाक काल-देशमे अकालक ई वर्णन कविक कविताक औचित्य अछि। रावण तँ उपटबे करत, विभीषण सेहो नै बाँचत। तोहर ठोर: तोहर ठोर कविताक सामान्य पाठ: पानक ठोर आ सुन्नरिक ठोर। सुन्नरि द्वारा बातक चून लगाएब आ कऽथक सन लाल बुन्न कपोल सजाएब। मुदा प्रेमक पुंगी कतए? भोरक लाली सुन्नरिक ठोर सन, बिनु सुन्नरि व्याकुल साँझ जेकाँ। बधिक जे बनत सुन्नरिक वर तँ हम बनब विखण्डित राहु। स्वर्गोमे सुधा कम्मे अछि, तहिना सुन्नरिक ठोर सेहो कतऽ पाबी। सकरी मिल महान बनत जे हम विश्वकर्मासँ विज्ञान सीखब। आ ओइ मिलसँ बहार होएत माधुर्य। कुसियारक पाकल पोर सन सुन्नरिक ठोर अछि। पुनर्जन्ममे सेहो धान आ चिष्टान्न बनि सुन्नरि हम अहाँक लग आएब। मुदबा एतबा बादो शब्दसँ उद्देश्य कहाँ प्रगट भेल। अलंकार सिद्धान्तक हिसाबसँ तोहर ठोर कविताक पाठ: भामह अलंकारकेँ समासोक्ति कहै छथि जे आनन्दक कारण बनैए। दण्डी आ उद्भट सेहो अलंकारक सिद्धान्तकेँ आगाँ बढ़बै छथि। अलंकारक मूल रूपसँ दू प्रकार अछि, शब्द आ अर्थ आधारित आ आगाँ सादृश्य-विरोध, तर्कन्याय, लोकन्याय, काव्यन्याय आ गूढ़ार्थ प्रतीति आधारपर। मम्मट ६१ प्रकारक अलंकारकेँ ७ भागमे बाँटै छथि, उपमा माने उदाहरण, रूपक माने कहबी, अप्रस्तुत माने अप्रत्यक्ष प्रशंसा, दीपक माने विभाजित अलंकरण, व्यतिरेक माने असमानता प्रदर्शन, विरोध आ समुच्चय माने संगबे। बातक चून लगाएब अप्रस्तुत, कऽथक सन लाल बुन्न कपोल, पानक ठोर आ सुन्नरिक ठोर, भोरक लाली सुन्नरिक ठोर सन, कुसियारक पाकल पोर सन सुन्नरिक ठोर ई सभ उपमा कवि द्वारा प्रयुक्त भेल अछि। मुदा कतऽ छह प्रेमक पुंगी हूक? मे सादृश्य-विरोध अछि। अहाँ बिनु व्याकुल वाटक माँझ मे रूपक प्रयुक्त भेल अछि। काव्यक भारतीय विचार: मोक्षक लेल कलाक अवधारणा, जेना नटराजक मुद्रा देखू। सृजन आ नाश दुनूक लय देखा पड़त। स्थायी भावक गाढ़ भऽ सीझि कऽ रस बनब- आ ऐ सन कतेक रसक सीता आ राम अनुभव केलन्हि (देखू वाल्मीकि रामायण)। कृष्ण भारतीय कर्मवादक शिक्षक छथि तँ संगमे रसिक सेहो। कलाक स्वाद लेल रस सिद्धांतक आवश्यकता भेल आ भरत नाट्यशास्त्र लिखलन्हि। अभिनवगुप्त आनन्दवर्धनक ध्यन्यालोकपर भाष्य लिखलन्हि। भामह ६अम शताब्दी, दण्डी सातम शताब्दी आ रुद्रट ९अम शताब्दी एकरा आगाँ बढ़ेलन्हि। रस सिद्धान्तक हिसाबसँ तोहर ठोर कविताक पाठ: रस सिद्धान्त:भरत:- नाटकक प्रभावसँ रस उत्पत्ति होइत अछि। नाटक कथी लेल? नाटक रसक अभिनय लेल आ संगे रसक उत्पत्ति लेल सेहो। रस कोना बहराइए? रस बहराइए कारण (विभाव), परिणाम (अनुभाव) आ संग लागल आन वस्तु (व्यभिचारी)सँ। स्थायीभाव गाढ़ भऽ सीझि कऽ रस बनैए, जकर स्वाद हम लऽ सकै छी।भट्ट लोलट:- स्थायीभाव कारण-परिणाम द्वारा गाढ़ भऽ रस बनैत अछि। अभिनेता-अभिनेत्री अनुसन्धान द्वारा आ कल्पना द्वारा रसक अनुभव करैत छथि। लोलट कविकेँ आ संगमे श्रोता-दर्शककेँ महत्व नै दै छथि। शौनक:- शौनक रसानुभूति लेल दर्शकक प्रदर्शनमे पैसि कऽ रस लेब आवश्यक बुझै छथि, घोड़ाक चित्रकेँ घोड़ा सन बूझि रस लेबा सन। भट्टनायक कहै छथि जे रसक प्रभाव दर्शकपर होइत अछि। कविक भाषाकेँ ओ भिन्न मानैत छथि। रससँ श्रोता-दर्शकक आत्मा, परमात्मासँ मेल करैए। रसक आनन्द अछि स्वरूपानन्द। आ ऐसँ होइत अछि आत्म-साक्षात्कार। रस सिद्धान्त श्रोता-दर्शक-पाठक पर आधारित अछि। ई श्रोता-दर्शक-पाठकपर जोर दैत अछि। बार्थेज संरचनावाद-उत्तर-संरचनावादक सन्दर्भमे लेखकक उद्देश्यसँ पाठकक मुक्तिक लेल लेखकक मृत्युकेँ आवश्यक मानै छथि- लेखकक मृत्यु माने लेखक रचनासँ अलग अछि आ पाठक अपना लेल अर्थ तकैत अछि। लगौलह बातक पाथर चून । आ सजौलह कऽथ कपोलक खून । विभाव अछि आ ऐ कारणसँ देखि कऽ लहरल हमर करेज अनुभाव माने परिणाम बहार होइत अछि। स्फोट सिद्धांत: भर्तृहरीक वाक्यपदीय कहैत अछि जे शब्द आकि वाक्यक अर्थ स्फोट द्वारा संवाहित अछि। वर्ण स्फोटसँ वर्ण, पद स्फोटसँ शब्द आ वाक्य स्फोटसँ वाक्यक निर्माण होइत अछि। कोनो ज्ञान बिनु शब्दक सम्बन्धक सम्भव नै अछि। ई भारतीय दर्शनक ज्ञान सिद्धान्तक एकटा भाग बनि गेल। अर्थक संप्रेषण अक्षर, शब्द आ वाक्यक उत्पत्ति बिन सम्भव अछि। स्फोट अछि शब्दब्रह्म आ से अछि सृजनक मूल कारण। अक्षर, शब्द आ वाक्य संग-संग नै रहैए। बाजल शब्दक फराक अक्षर अपनामे शब्दक अर्थ नै अछि, शब्द पूर्ण होएबा धरि एकर उत्पत्ति आ विनाश होइत रहै छै। स्फोटमे अर्थक संप्रेषण होइत अछि मुदा तखनो स्फोटमे प्राप्ति समए वा संचारक कालमे अक्षर, शब्द वा वाक्यक अस्तित्व नै भेल रहै छै। शब्दक पूर्णता धरि एक अक्षर आर नीक जकाँ क्रमसँ अर्थपूर्ण होइए आ वाक्य पूर्ण हेबा धरि शब्द क्रमसँ अर्थपूर्ण होइए।सांख्य, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा आ वेदान्त ई सभ दर्शन स्फोटकेँ नै मानैत अछि। ऐ सभ दर्शनक मानब अछि जे अक्षर आ ओकर ध्वनि अर्थकेँ नीक जेकाँ पूर्ण करैत अछि। फ्रांसक जैक्स डेरीडाक विखण्डन आ पसरबाक सिद्धान्त स्फोट सिद्धान्तक लग अछि। स्फोट सिद्धांतक आधारपर तोहर ठोर कविताक पाठ: आब उदयनक करियनक धरतीपर रहबाक अछैतो न्याय सिद्धान्तक स्फोट सिद्धान्तकेँ नै मानब कविक कविताकेँ नै अरघै छन्हि। मने मे रहल मनक सब बात कहि ओ अलभ्य चित चोर सँ सुन्नरिक ठोरक तुलना कऽ दै छथि। उदयनक गामक कवि बूच कहै छथि भऽ रहल वर्ण - वर्ण निःशेष, शब्द सँ प्रगटल नहि उद्य़ेश्य; एतए शब्दसँ नै मुदा स्फोटसँ अर्थक संप्रेषण कवि द्वारा तोहर ठोर आ ऐ संग्रहक आन कविता सभमे जाइ तरहेँ भेल अछि, से संसारक सभसँ लयात्मक आ मधुर भाषा मैथिली मे (यहूदी मेनुहिनक शब्दमे) विद्यापतिक बादक सभसँ लयात्मक कविक रूपमे बूचजी केँ प्रस्तुत करैत अछि आ मैथिली कविताकेँ ऐ रूपमे फेरसँ परिभाषित करैत अछि। स्व. श्री वैद्यनाथ मिश्र “यात्री” (१९११-१९९८) स्व. श्री वैद्यनाथ मिश्र “यात्री” केर जन्म १९११ ई. मे अपन मामागाम सतलखामे भेलन्हि जे हुनकर पैतृक गाम तरौनीक लगेमे अछि। यात्री जी अपन गामक संस्कृत पाठशालामे पढ़ए लगलाह, फेर वाराणसी आ कलकत्ता सेहो गेलाह आ संस्कृतमे “साहित्य आचार्य” क उपाधि प्राप्त केलन्हि। तकर बाद ओ कोलम्बो लग कलनिआ स्थान गेलाह पाली आ बुद्ध धर्मक अध्ययनक लेल। ओतए ओ बौद्ध धर्ममे दीक्षित भऽ गेलाह आ हुनकर नाम पड़लन्हि -नागार्जुन। मुदा बादमे पुनः गाममे यज्ञोपवीत कऽ ब्राह्मण धर्ममे घुरलाह। यात्रीजी मार्क्सवादसँ प्रभावित छलाह, १९२९ ई. क अन्तिम मासमेमे मैथिली भाषामे पद्य लिखब शुरू कएलन्हि। १९३५ ई.सँ हिन्दीमे सेहो लिखए लगलाह। स्वामी सहजानन्द सरस्वती आ राहुल सांकृत्यायनक संग ओ किसान आन्दोलनमे संलग्न रहलाह आ १९३९ सँ १९४१ धरि ऐ क्रममे विभिन्न जेलक यात्रा कएलन्हि। हुनकर बहुत रास रचना जे महात्मा गाँधीक मृत्युक बाद लिखल गेल छल, प्रतिबन्धित कऽ देल गेल। भारत-चीन युद्धमे कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा चीनकेँ देल समर्थनक बाद कम्युनिस्ट पार्टीसँ मतभेद भेलन्हि। जे.पी. अन्न्दोलनमे भाग लेबाक कारण आपात्कालमे हिनका जेलमे ठूसि देल गेल। यात्रीजी हिन्दीमे बाल साहित्य सेहो लिखलन्हि। हिन्दी आ मैथिलीक अतिरिक्त बांग्ला आ संस्कृतमे सेहो हिनकर लेखन आएल। मैथिलीक दोसर साहित्य अकादमी पुरस्कार १९६९ ई. मे यात्रीजीकेँ हुनकर कविता संग्रह “पत्रहीन नग्न गाछ”पर भेटलन्हि। १९९४ ई.मे ओ साहित्य अकादमीक फेलो -हिन्दी आ मैथिली कविक रूपमे- भेलाह। यात्रीजी जखन २० वर्षक छलाह तखन १२ वर्षक कान्यासँ हिनकर विवाह भेल। हिनकर पिता गोकुल मिश्र अपन समाजमे अशिक्षितक गनतीमे रहथि आ चरित्रहीन छलाह। यात्रीजीक बच्चाक स्मृतिमे छन्हि जे हुनकर पिता कोना हुनकर अस्वस्थ आ ओछाओन धएल मायपर कुरहड़ि लऽ मारबाक लेल उठल छलाह, जखन ओ बेचारी हुनकासँ कुमार्ग छोड़बाक गुहारि कऽ रहल छलीह। यात्रीजी मात्र छह वर्षक छलाह जखन हुनकर माए हुनका छोड़ि प्रयाण कऽ गेलीह। यात्रीजीकेँ अपन पिताक ओ चित्र सेहो रहि-रहि सतबैत रहलन्हि जइमे हुनकासँ मातृवत प्रेम करएवाली हुनकर विधवा काकीक, हुनकर पिताक अवैध सन्तानक गर्भपातमे, लगभग मृत्यु भऽ गेल छलन्हि। के एहन पाठक होएत जे यात्रीजीक हिन्दीमे लिखल “रतिनाथ की चाची” पढ़बाक काल बेर-बेर नै कानल होएत। पिता-पुत्रक ई घमासान एहन बढ़ल जे पुत्र अपन बाल-पत्नीकेँ पिता लग छोड़ि वाराणसी प्रयाण कए गेलाह। कर्मक फल भोगथु बूढ़ बाप हम टा संतति, से हुनक पाप ई जानि ह्वैन्हि जनु मनस्ताप अनको बिसरक थिक हमर नाम माँ मिथिले, ई अंतिम प्रणाम! (काशी/ नवंबर १९३६) काशीसँ श्रीलंका प्रयाण, “कर्मक फल भोगथु बूढ़ बाप” ई कहि यात्रीजी अपन पिताक प्रति सभ उद्गार बाहर कऽ दैत छथि। १९४१ ई. मे यात्रीजी अपन पत्नी, अपराजिता, लग आबि गेलथि। १९४१ ई. मे यात्रीजी दू टा मैथिली कविता लिखलन्हि- “बूढ़ वर” आ “विलाप” आ एकरा पाम्फलेट रूपमे छपबाए ट्रेनक यात्री लोकनिकेँ बेचलन्हि। जीविकाक ताकिमे सौँसे भारत दुनू प्राणी घुमलाह। पत्नीक जोर देलापर बीच-बीचमे तरौनी सेहो घुमि कऽ आबथि। आ फेर आएल १९४९ ई., अपना संग लेने यात्रीजीक पहिल मैथिली कविता-संग्रह “चित्रा”। १९५२ ई. धरि पत्नी संगमे घुमैत रहलथिन्ह, फेर तरौनीमे रहए लगलीह। यात्रीजी बीच- बीचमे आबथि। अपराजितासँ यात्रीजीकेँ छह टा सन्तान भेलन्हि, आ सभक भार पत्नी अपना कान्हपर लेने रहलीह। यात्रीजी दमासँ परेशान रहैत रहथि। हम जखन दरभंगामे पढ़ैत रही तँ यात्रीजी ख्वाजा सरायमे रहैत छलाह। हमरा मोन अछि जे मैथिलीक कोनो कार्यक्रममे यात्रीजी आएल छलाह आ कम्युनिस्ट पार्टीबला सभ एजेन्डा छीनि लेने छल। अगिले दिन यात्रीजी अपनाकेँ ओइ धोधा-धोखीमे गेल सभाक कार्यवाहीसँ हटा लेलन्हि। एमर्जेन्सीमे जेल गेलाह तँ आर.एस.एस. क कार्यकर्ता लोकनिसँ जेलमे भेँट भेलन्हि आ जे.पी.क सम्पूर्ण क्रान्तिक विरुद्ध सेहो जेलसँ बाहर अएलाक बाद लिखलन्हि यात्रीजी। यात्रीजी मैथिलीमे बैद्यनाथ मिश्र "यात्री" आ हिन्दीमे “नागार्जुन” क नामसँ रचना लिखलन्हि। “पृथ्वी ते पात्रं” १९५४ ई. मे “वैदेही”मे प्रकाशित भेल छल, हमरा सभक मैट्रिकक सिलेबसमे छल। यात्रीजी लिखैत छथि- “आन पाबनि तिहार तँ जे से। मुदा नबान निर्भूमि परिवारकेँ देखार कए दैत छैक। से कातिक अबैत देरी अपराजिता देवीक घोघ लटकि जाइन्हि। कचोटेँ पपनियो नहि उठा होइन्ह ककरो दिश! बेसाहल अन्नसँ कतउ नबान भेलइए”? यात्री एकटा मिथ छथि? की यात्री एकटा मिथ छथि? ओ मुख्यतः हिन्दीक लेखक रहथि, मैथिलीमे ओ हिन्दीक दशमांशो नै लिखलन्हि। जे लिखबो केलन्हि तइमे सँ बेशी स्वयं द्वारा हिन्दीसँ अनूदित। मैथिली आ मिथिला क्षेत्रक शब्दावली आ संस्कृति हिन्दीक लोककेँ अबूझ आ तेँ रुचिगर लगलै मुदा तइमे सेहो ढेर रास कमी रहै जेना एकटा उदाहरण यात्री समग्रसँ- । यात्री समग्र-पृ.२२० जेठ सुदी चतुर्दशी कऽ रहनि पीसाक वर्षी। पहिले वर्षी..पृ.. २२२- ..कहाँ जे एको दिनक खातिर जाइ, कर्ता बना, अषाढ़ बढ़ि तृतियाक तिथिपर पहिल। एहेन बेमारी आनो मैथिली-हिन्दी लेखकमे छन्हि। ई ऐतिहासिक लिखित तथ्य अछि जे गोनू झा १०५०-११५० मे भेलाह मुदा उषा किरण खान विद्यापतिसँ हुनकर शास्त्रार्थ करबै छथि (हिन्दीक ऐतिहासिक उपन्यास सिरजनहार, भारतीय ज्ञानपीठ, मे) वीरेन्द्र झा कहै छथि जे गोनू झा ५०० साल पहिने भेला आ तारानन्द वियोगी गोनू झा केँ ३०० साल पहिने भेल मानै छथि (दुनू गोटेक हिन्दीमे प्रकाशित गोनू झापर पोथी, क्रमसँ राजकमल प्रकाशन आ नेशनल बुक ट्रस्टसँ प्रकाशित) तँ विभा रानीक गोनू झापर हिन्दी पोथी (वाणी प्रकाशन) मे कुणाल गोनू झाकेँ भव सिंहक राज्यमे (१४म शताब्दी) भेल मानैत छथि। जखन पंजीमे उपलब्ध लिखित अभिलेखन गोनू झाकेँ विद्यापतिसँ दस पीढ़ी पहिने अभिलेखित करैत अछि, तखन ई हाल अछि। मिथिला क्षेत्रक शब्दावली आ संस्कृतिक- जे हिन्दीक लोककेँ अबूझ आ तेँ रुचिगर लगैे छै- तथ्यमे ई मैथिली-हिन्दी लेखक सभ अपन अज्ञानतासँ ढेर रास गलत तथ्य पड़सि रहल छथि, साम्प्रदायिक लेखक लोकनि गोनू झाक कथामे मुस्लिम तहसीलदारक अत्याचार घोंसिया रहल छथि (मुस्लिम लोकनि मिथिलामे गोनूक समए मे रहबे नै करथि)! यात्री समग्रमे बलचनमा नै लेल गेल कारण ओ हिन्दीक कृति अछि, ओकर मैथिली अनुवाद सेहो भ्रष्ट अछि लगैए जेना अदहा अनुवाद केलाक बाद मैथिली लेल हुनका लग समयाभाव भऽ गेल होइन्ह। यात्री समग्रमे नवतुरिया लेल गेल, ओहो मूल हिन्दी अछि, किए मूल मैथिली कहि कऽ लेल गेल तकर जबाब सम्पादक देताह। मैथिलीमे प्रूफ रीडरकेँ सम्पादक कहेबाक सख छन्हि आ लोक ग्रियर्सन धरिक रचनाक रिप्रिन्ट अपन सम्पादकत्वमे करबा रहल छथि। एकटा दोसर उदाहरणमे पी.सी.रायचौधुरीक दरभंगा जिला गजेटियरक तेसर अध्यायक चारिटा उपशीर्षकक अंग्रेजी रचनाकेँ मोहन भारद्वाज अपन सम्पादकत्वमे रमानाथ झा रचनावलीमे -किनको कहलासँ सत्य मानि- रमानाथ झाक रचना मानि घोसिया देलन्हि, जखन की लिखित आ वैयाकरणिक शिल्पक आधारपर ओ रचना पी.सी.रायचौधुरीक अछि। यात्री स्वयं कहै छथि जे ओ मैथिली बलचनमा पहिने लिखलन्हि आ तकर हिन्दीमे अनुवाद केलन्हि। मुदा हिन्दी बलचनमामे ओ ई नै लिखै छथि आ ओकरा हिन्दीक पहिल आंचलिक उपन्यास कहै छथि। ई बेमारी आइयो मैथिलीक लेखककेँ गरोसने अछि आ यात्री जीक ऐ मे सायास-अनायास योगदान दुखदायी अछि। राजकमल यात्रीकेँ अमर-सुमन सन पुरान ढर्राक कवि कहै छथि, प्रायः यात्रीक छन्दक प्रति सजगतासँ राजकमलकेँ ई भ्रम भेल छलन्हि। रामविलास शर्मा आ यात्रीजीक मैथिली बोली अछि आकि भाषा, ऐ विषयक सम्वादक भाषा विज्ञानक दृष्टिएँ कोनो खास महत्व नै छै। रामविलास शर्मा बहुत पैघ साम्यवादी चिन्तक रहथि आ हुनकर कविता, आलेख सँ बेसी प्रभावी हुनकर कएकखण्डक भारतक इतिहास विवेचन अछि.। मैथिलीकेँ भाषाक रूपमे स्थापित करबामे सुभद्र झा, रामावतार यादव, योगेन्द्र यादव, सुनील कुमार झा आदि भाषाशास्त्री काज केने छथि, रामविलास शर्मा आ यात्रीजीक सम्वाद गपाष्टक मात्र अछि। चतुरानन मिश्र आ जगदीश प्रसाद मंडल कम्यूनिस्ट आन्दोलनसँ जुड़ल छथि, प्रायोगिक रूपमे, पार्टी स्तरपर, मुदा हिनकर दुनू गोटेक उपन्यास देखला उत्तर हमरा ई कहबामे कनेको कष्ट नै होइत अछि जे जइ रूपमे यात्री आ धूमकेतु मार्क्सवादक बैशाखी लऽ उपन्यासकेँ ठाढ़ करै छथि तकर बेगरता एहि दुनू उपन्यासकारकेँ नै बुझना जाइत छन्हि। मार्क्सवादक असल अर्थ हिनके दुनूक रचनामे भेटत। कतौ पार्टीक नाम वा विचारधाराक चर्च नै मुदा जे असल डायलेक्टिकल मैटेरियलिज्म छैक तकर पहिचान, जिनगीक महत्वपर विश्वास, द्वन्दात्मक पद्धतिक प्रयोग आ ई तखने सम्भव होइत अछि जखन लेखक दास कैपिटल सहित मार्क्सवादक गहन अध्ययन करत आ प्रायोगिक मार्क्सवादपर कताक दशक चलत। आ अन्तमे यात्रीजीक संस्कृत पद्य:- वासन्ती कनकप्रभा प्रगुणिता पीतारुर्णेः पल्लवैः हेमाम्भोजविलासविभ्रमरता दूरे द्विरेफाः स्ता यैशसण्डलकेलिकानन कथा विस्मरिता भूतले छायाविभ्रमतारतम्यतरलाः तेऽमी “चिनार” द्रुमाः॥ -बसंतक स्वर्णिम आभा द्विगुणित भऽ गेल अछि पीयर-लाल कोपड़सँ। स्वर्णकालक भ्रममे भौरा सभ एकरासँ दूर-दूर रहैत अछि। नन्दनवनक विहारकेँ जे पृथ्वीपर बिसरा दैत अछि, छाह झिलमिल घटैत-बढ़ैत जकर डोलब अछि चंचल आ तरल। ओइ चिनारकेँ हम देखने छी अडिग भेल ठाढ़। जगदीश प्रसाद मण्डल १९४२-४३ क बंगालक अकालक विषयमे अमर्त्य सेन लिखै छथि जे एहि अकालमे बंगालमे लाखक लाख लोक मुइलाह (फेमीन इन्क्वायरी कमीशनक अनुसार १५ लाख) मुदा अमर्त्यक एकोटा सर-सम्बन्धीक मृत्यु ओहिमे नहि भेल। तहिना मिथिलाक १९६७ ई.क अकालमे भारतक प्रधानमंत्रीकेँ देखाओल गेलन्हि जे कोना मुसहर लोकनि बिसाँढ़ खा कऽ अकालसँ लड़ि रहल छथि, मुदा एहिपर कथा लिखल गेल २००९ ई.मे। २००९ ई. मे जगदीश प्रसाद मंडलजी बिसाँढ़पर मैथिलीमे कथा लिखलन्हि। आ एहि विलम्बक कारण सेहो स्पष्ट अछि। मैथिली साहित्यमे जे एकभगाह प्रवृत्ति रहल अछि, ताहि कारणसँ अमर्त्य सेन जेकाँ हमरो साहित्यकार सभ ओहि महाविभीषिकासँ ओतेक प्रभावित नहि भेल होएताह। आ एतए जगदीश प्रसाद मंडल जीक कथा मैथिली कथा धाराक यात्राकेँ एकभगाह होएबासँ बचा लैत अछि। एहि संग्रहक सभटा कथा उत्कृष्ट अछि, रिक्त स्थानक पूर्ति करैत अछि आ मैथिली साहित्यक पुनर्जागरणक प्रमाण उपलब्ध करबैत अछि। जगदीश प्रसाद मण्डल शिल्पी छथि, कथ्यकेँ तेना समेटि लैत छथि जे पाठक विस्मित रहि जाइत अछि। मुदा हिनका द्वारा कथ्यकेँ (कथा, उपन्यास, नाटक, प्रेरक-कथा सभमे) उद्देश्यपूर्ण बनेबाक आग्रह आ क्षमता हिनका मैथिली साहित्यमे ओहि स्थानपर स्थापित करैत अछि, जतएसँ मैथिली साहित्यक इतिहास “जगदीश प्रसाद मण्डलसँ पूर्व” आ “जगदीश प्रसाद मण्डलसँ” एहि दू खण्डमे पाठित होएत। समाजक सभ वर्ग हिनकर कथ्यमे भेटैत अछि आ से आलंकारिक रूपमे नहि वरन् अनायास, जे मैथिली साहित्य लेल एकटा हिलकोर अएबाक समान अछि। हिनकर कथ्यमे कतहु अभाव-भाषण नहि भेटत, सभ वर्गक लोकक जीवन शैलीक प्रति जे आदर आ गौरव ओ अपन कथ्यमे रखैत छथि से अद्भुत। हिनकर कथ्यमे नोकरी आ पलायनक विरुद्ध पारम्परिक आजीविकाक गौरव महिमामंडित भेटैत अछि, आ से प्रभावकारी होइत अछि हिनकर कथ्य आ कर्मक प्रति समान दृष्टिकोणक कारणसँ आ से अछि हिनकर व्यक्तिगत आ सामाजिक जीवनक श्रेष्ठताक कारणसँ। जे सोचैत छी, जे करैत छी सएह लिखैत छी- ताहि कारणसँ। यात्री आ धूमकेतु सन उपन्यासकार आ कुमार पवन आ धूमकेतु सन कथा-शिल्पीक अछैत मैथिली भाषा जनसामान्यसँ दूर रहल। मैथिली भाषाक आरोह-अवरोह मिथिलाक बाहरक लोककेँ सेहो आकर्षित करैत रहल आ ओही भाषाक आरोह-अवरोहमे समाज-संस्कृति-भाषासँ देखाओल जगदीशजीक सरोकारी साहित्य मिथिलाक सामाजिक क्षेत्र टा मे नहि वरन् आर्थिक क्षेत्रमे सेहो क्रान्ति आनत। विदेह मे हिनकर पाँचटा उपन्यास, एकटा नाटक आ दू दर्जनसँ बेशी कथा, नेना-भुटका-किशोर लेल सएसँ ऊपर प्रेरक कथा ई-प्रकाशित भऽ विश्व भरिमे पसरल मैथिली भाषीकेँ दलमलित करैत मैथिली साहित्यक एकटा रिक्त स्थानक पूर्ति कऽ देने अछि। प्रेमशंकर सिंह मैथिली भाषा साहित्य : बीसम शताब्दी - प्रेमशंकर सिंहजीक एहि निबन्ध-प्रबन्ध-समालोचना संग्रहमे मैथिली साहित्यक २०म शताब्दी आ एक्कैसम शताब्दीक पहिल दशकक विभिन्न प्रिय-अप्रिय पक्षपर चर्चा भेल अछि। अप्रिय पक्ष अबैत अछि एहि द्वारे जे राजनैतिक-सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक समस्या-परिवर्तन आ एकीकरणक प्रक्रिया कखनो काल परस्पर विरोधी होइत अछि। मैथिली साहित्यक पुरान सन्दर्भ मैथिली भाषा आ साहित्यमे वर्णित अछि। लोकगाथा मे मणिपद्मक लोकगाथाक क्षेत्रमे अवदानकेँ रेखांकित करैत लोकगाथाक चर्चा भेल अछि । लोकनाट्य मे मैथिली लोकनाट्यक विस्तृत उल्लेख अछि। बीसम शताब्दी- स्वर्ण युगमे मैथिली साहित्यक सए बर्खक सर्वेक्षण अछि। पारंपरिक नाटक मे मैथिलीक आ मैथिलीमे अनूदित पारम्परिक नाटकक चर्चा अछि।सामाजिक विवर्तक जीवन झा मैथिली नाट्य साहित्यमे हुनका द्वारा आनल नूतन कथ्य-शिल्पकेँ रेखांकित करैत अछि। हरिमोहन झाक परवर्त्ती रचनाकारपर प्रभाव हरिमोहन झा पर समीक्षा अछि। मैथिली आन्दोलनक सजग प्रहरी जयकान्त मिश्रक अवदानक आधारित अछि। संस्मरण साहित्य मे मणिपद्मक हुनकासँ भेँट भेल छल क सन्दर्भमे संस्मरण साहित्यपर चर्चा भेल अछि। अमरक एकांकी: सामाजिक यथार्थ मे अमरजीक एहि विधा सभक तँ मायानन्दिक रेडियो शिल्पु मे मायानन्द मिश्रक एहि विधाक सर्वेक्षण अछि। चेतना समिति ओ नाट्यमंच मे चेतना समिति द्वारा कएल रचनात्मक कार्यक विवरण अछि। एहि सभ आलेखमे सत्यक आ कलाक कार्यक सौंदर्यीकृत अवलोकन, संस्था सभक निर्माण वा वर्तमानमे संपूर्ण समुदायक धर्म-नस्ल-पंथ भेद रहित आर्थिक आ सामाजिक हितपर आधारित सुधारक आवश्यकता, महिला-लेखन आ बाल-साहित्यक स्थान-स्थापर चर्चा, यथासंभव मेडियोक्रिटी चिन्हित करबाक प्रयास, मूल्यांकनमे ककरो प्रति पूर्वाग्रह वा घृणा नहि राखब- ई सभटा समीक्षाक आवश्यक तत्वक ध्यान राखल गेल अछि। एक पाँतिक वक्तव्य कतहु नहि भेटत, पूर्ण विवेचन भेटत। सिद्ध सरहपाद आ तिब्बती लिपि राधाकृष्ण चौधरीजीक पोथीक डिजाइनमे हम जखन सिद्ध सरहपादक फोटो देलौं तँ ओकर नीचाँमे लिखल तिब्बती लिपि, जे चीनी लिपिसँ एकदम्मे फराक अछि आ सिक्किमक लेपचा आ लिम्बू (सुब्बाभाषा) सँ लग, दिशि अनायास ध्यान आकृष्ट भेल। सिक्किमक राजा चोग्याल बौद्ध छलाह, ओ सभ आ हुनकर वंशज सभ सिक्किमी कहल जाइ छथि, जेना डेम्जोंगपा, ओ सभ भुटिया भाषा बजै छथि, मुदा जखन भूटान तिब्बत आदिसँ राजा लग भुटिया भाषी सभ एलाह तँ दुनूमे अन्तर देखाबए लेल सिक्किमी आ भुटिया ई दू भेद भेल। मोटा-मोटी सिक्किमक लोकसँ गप करब तँ ओ तिब्बती आदि सभ भाषा जे नेपालीक अतिरिक्त अछि, केँ भुटिया कहि दै छथि। गंगटोकमे भरत सुब्बा कहै छथि जे ओ शुद्ध नेपाली छथि आ सुब्बाभाषा (लिम्बू) लिपि छी, अपन दादाकेँ ओ पढ़ैत देखने छथि मुदा हुनका ई भाषा नै अबै छन्हि। लेपचाक मुदा भाषा आ लिपि दुनू अलग अछि। दिनेश खरका नेपाली ब्राह्मण छथि, ओ कहै छथि जे सिक्किममे नेपाली पढ़ू, भुटिया पढ़ू वा लेपचा पढ़ू, कोनो रोक नै छै। लेपचा एतुक्का आदिवासी छथि। भुटिया पढ़लासँ पर्यटन विभागमे नोकरी भेटबामे आसानी होइ छै। ओ कहै छथि जे नेपालक नेपाली आ एतुक्का नेपालीमे सेहो अन्तर छै। लड़का-लड़की हम सभ कहै छी मुदा नेपालमे लड़काकेँ बाबू आ लड़कीकेँ नानी कहल जाइत अछि। कान्छा-कान्छी घरक सभसँ छोट लड़का-लड़कीकेँ (बाबू-नानीकेँ) कहल जाइत अछि। उरगेन भुटियाक माता नेपाली छथिन्ह से हुनका भुटिया नीक जकाँ नै अबै छन्हि, ओ सिक्किममे नै रहै छथि, दार्जिलिंगमे रहै छथि जे पश्चिम बंगालमे छै, से ओतुक्का शिक्षा व्यवस्था बांग्ला आ नेपालीक अतिरिक्त दोसर भाषाक विषयमे अनुदार अछि, बिहारे सभ जेकाँ जकर शिक्षा व्यवस्था हिन्दीक अतिरिक्त दोसर भाषाक प्रति असहनशील अछि, से भुटिया भाषा एतए खतमे बुझू। सिक्किम मुदा ऐ मामिलामे उदार अछि। छिरिंग पहिने हमरा कहै छथि जे ओ भुटिया (जकरा ओ तिब्बती कहै छथि) बजै छथि, फेर उत्तर सिक्किमक लाचुंगक रस्तामे खेनाइ खाइले एकठाम ओ रुकै छथि, महिला कहै छथि जे ओ तिब्बती छथि। हुनका लग देहरादूनसँ एकटा लामा आएल छथिन्ह जे हमरा तिब्बती लिपि सिखबै छथि। लाचुंगक बगलमे छै लाचेन। आब छेरिंग याककेँ देखि कऽ असल भेद खोलै छथि। ओ कहै छथि जे भेड़पालककेँ डोंगपा कहल जाइ छै। लाचुंगक जे लोक अछि से लाचुंगपा उपाधि राखै छथि आ ओ बगलक लाचेनक छथि आ तेँ हुनकर नाम छन्हि छेरिंग लाचेनपा। सभ लाचुंगपा डोंगपा नै छथि मुदा बेसी डोंगपा लाचुंगपा उपाधिबला छथि। डेंगजोंगपा लोकनि गंगटोकमे रहै छथि, व्यापार करै छथि। टोक माने ऊँचपर, जेना एकटा जगह छै गणेश टोक। ओ कहै छथि जे भुटिया भाषासँ लाचेनपा आ लाचुंगपाक भाषा अलग होइत अछि। ओ बौद्ध छथि। लाचुंगपा आ लाचेनपा भाषामे शॉर्टकट/ लॉन्गकटक अन्तर अछि। लाचुंगसँ आगाँ जीरो धरि सड़क छै जतए गाछ-बृच्छ खतम भऽ जाइ छै आ ऑक्सीजनक कमी भऽ जाइ छै, मुदा एतए मई- आरम्भक जून मास धरि बरफ देखबामे आओत। रस्तामे आ मोनेस्टरी लग सभ ठाम तिब्बती भाषामे मंत्र लिखल “प्रेयर ह्वील” देखबामे आएत। मोनेस्टरी जेबा काल एकटा बाल भिक्षु प्रेयर ह्वील घुमेबासँ मना करै छथि आ कहै छथि जे घुरबा काल एकरा घुमाएल जाइ छै आ सेहो घड़ीक सुइयाक दिशामे। रस्ता सभमे १०८ टा झण्डामे तिब्बती भाषामे मंत्र लिखलभेटत। जँ ई सभटा उज्जर रंगक अछि तँ कोनो मृतकक स्मृतिमे हुनकर परिजन लगेने छथि आ जँ ई सभ विभिन्न रंगक अछि तँ बुझू जे ग्रह शान्ति लेल ई फहराएल गेल अछि। छिरिंग कहै छथि जे जावत झण्डामे लिखल मंत्र नै मेटाइत अछि तावत हवा एकरा नै खसा सकैए, जखन ई मलिच्छ पड़ि जाइए तखने हवा एकरा उड़ा सकैए। सांगू झील जे नाथूला (अकानैबला कानक दर्रा) क रस्तामे अछि (पूर्व सिक्किम), ओतए प्रदीप तमांग याकक संग भेटै छथि, पहाड़क पाछाँ हुनकर गाम छन्हि। ओ कहै छथि जे तिब्बती आ भुटिया भाषामे अन्तर छै, मुदा समानतो छै। नाथूला चौदह हजार फीटपर अछि आ प्राचीन कालसँ भारत-तिब्बतक बीच व्यापार लेल ऐ दर्राक उपयोग होइत रहल अछि। एतौ जीरो जकाँ ऑक्सीजनक कमी अहाँकेँ बुझा पड़त। ऐ दर्रासँ आइयो तिब्बती व्यापारी रेशम लऽ कऽ शेराथांग गामक शेड लागल हाट-बजार अबै छथि आ एतएसँ बदलामे बिस्कुट आ डलडा लऽ जाइ छथि। दिनेश तमांग गंगटोकमे कहै छथि जे ओ नेपाली बौद्ध छथि। मुदा बंगालमे जन्म छन्हि। गोरखालैण्डक मांग नै मानल जाएत से हुनकर कहब छन्हि कारण से मानलासँ जलपाइगुरीक कान्तापुरी (कामतापुरी) आ कूच बिहारक अलग प्रान्तक मांग सेहो मानए पड़तै, ओ ऐ दुनू जगहक भाषाकेँ बांग्लासँ अलग कहै छथि आ ओकरा “वाया बंगाली” (बाहे बंगाली- बंगाली आ बाहे बंगालीमे भाषाक अतिरिक्त शारीरिक गठन सेहो बंगालीसँ भिन्न ओ कहलन्हि, दोसर ओ ईहो कहलन्हि जे सत्य पूछी तँ यएह बाहे बंगाली असली प्रारम्भिक बंगाली छल) कहै छथि। विभा रानी (१९५९- )लेखक- एक्टर- सामाजिक कार्यकर्ता-बहुआयामी प्रतिभाक धनी विभा रानी राष्ट्रीय स्तरक हिन्दी व मैथिलीक लेखिका, अनुवादक, थिएटर एक्टर, पत्रकार छथि, जिनक दर्ज़न भरि से बेसी किताब प्रकाशित छन्हि आ कएकटा रचना हिन्दी आ र्मैथिलीक कएकटा किताबमे संकलित छन्हि। मैथिली के 3 साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता लेखकक 4 गोट किताब "कन्यादान" (हरिमोहन झा), "राजा पोखरे में कितनी मछलियां" (प्रभास कुमार चाऊधरी), "बिल टेलर की डायरी" व "पटाक्षेप" (लिली रे) हिन्दीमे अनूदित छन्हि। समकालीन विषय, फ़िल्म, महिला व बाल विषय पर गंभीर लेखन हिनक प्रकृति छन्हि। रेडियोक स्वीकृत आवाज़क संग ई फ़िल्म्स डिविजन लेल डॉक्यूमेंटरी फ़िल्म, टीवी चैनल्स लेल सीरियल्स लिखल व वॉयस ओवरक काज केलन्हि। मिथिलाक 'लोक' पर गहराई स काज करैत 2 गोट लोककथाक पुस्तक "मिथिला की लोक कथाएं" व "गोनू झा के किस्से" के प्रकाशनक संगहि संग मिथिलाक रीति-रिवाज, लोक गीत, खान-पान आदिक वृहत खज़ाना हिनका लग अछि। हिन्दीमे हिनक 2 गोट कथा संग्रह "बन्द कमरे का कोरस" व "चल खुसरो घर आपने" तथा मैथिली में एक गोट कथा संग्रह "खोह स' निकसइत" छन्हि। हिनक लिखल नाटक 'दूसरा आदमी, दूसरी औरत' राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली के अन्तर्राष्ट्रीय नाट्य समारोह भारंगममे प्रस्तुत कएल जा चुकल अछि। नाटक 'पीर पराई'क मंचन, 'विवेचना', जबलपुर द्वारा देश भरमे भ रहल अछि। अन्य नाटक 'ऐ प्रिये तेरे लिए' के मंचन मुंबई व 'लाइफ़ इज नॉट अ ड्रीम' के मंचन फ़िनलैंडमे भेलाक बाद मुंबई, रायपुरमे कएल गेल अछि। 'आओ तनिक प्रेम करें' के 'मोहन राकेश सम्मान' से सम्मानित तथा मंचन श्रीराम सेंटर, नई दिल्लीमे कएल गेल। "अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो" सेहो 'मोहन राकेश सम्मान' से सम्मानित अछि। दुनु नाटक पुस्तक रूप में प्रकाशित सेहो अछि। मैथिलीमे लिखल नाटक "भाग रौ" आ "मदद करू संतोषी माता" अछि। हिनक नव मैथिली नाटक प्रस्तुति छन्हि- बलचन्दा। विभा 'दुलारीबाई', 'सावधान पुरुरवा', 'पोस्टर', 'कसाईबाड़ा', सनक नाटक के संग-संग फ़िल्म 'धधक' व टेली -फ़िल्म 'चिट्ठी'मे अभिनय केलन्हि अछि। नाटक 'मि. जिन्ना' व 'लाइफ़ इज नॉट अ ड्रीम' (एकपात्रीय नाटक) हिनक टटका प्रस्तुति छन्हि। 'एक बेहतर विश्र्व-- कल के लिए' के परिकल्पनाक संगे विभा 'अवितोको' नामक बहुउद्देश्यीय संस्था संग जुड़ल छथि, जिनक अटूट विश्र्वास 'थिएटर व आर्ट-- सभी के लिए' पर अछि। 'रंग जीवन' के दर्शनक साथ कला, रंगमंच, साहित्य व संस्कृति के माध्यम से समाज के 'विशेष' वर्ग, यथा, जेल- बन्दी, वृद्ध्राश्रम, अनाथालय, 'विशेष' बच्चा सभके बालगृहक संगहि संग समाजक मुख्य धाराल लोकक बीच सार्थक हस्तक्षेप करैत छथि। एतय हिनकर नियमित रूप से थिएटर व आर्ट वर्कशॉप चलति छन्हि। अहि सभक अतिरिक्त कॉर्पोरेट जगत सहित आम जीवनक सभटा लोक आओर लेल कला व रंगमंचक माध्यम से विविध विकासात्मक प्रशिक्षण कार्यक्रम सेहो आयोजित करैत छथि। श्रीमति विभारानी सम्प्रति मुम्बईमे रहैत छथि। प्रस्तुत अछि विभाजीक कथा आऊ कनेक प्रेम करी माने बुझौअल जिनगीक। एहि कथापर हिन्दीमे विभाजीक नाटक लिखल गेल "आओ तनिक प्रेम करें" जकरा २००५ ई. मे मोहन राकेश सम्मानसँ सम्मानित कएल गेल। आऊ कनेक प्रेम करी माने बुझौअल जिनगीक 'हे ये..., कत' गेलहुँ? आऊ ने एम्हर।' 'की कहै छी? एम्हरे त' छलहुँ तखनी स'। कहू, की बात?' 'किछु नञि! मोन होइय' जे अहाँ अईठाँ बैसल रही।' 'धुर जाऊ! अहूँ के त' ... एह! एतेक काज सभ पसरल छै। बरखा-बुन्नीक समय छै। दिन मे अन्हार भ' जाइ छै। तइयो अहाँ कहलहुँ त' बैसि गेलहुँ आ देखियौ जे लग मे बैसल-बैसल अनेरे कएक पहर निकलि गेलै। ताबतिमे त' हम कतेको काज छिनगा नेने रहितह।ँ!' 'आहि रे बतहिया ! सदिखन काजे-काज, काजे-काज ! यै, आब के अछि, जकरा लेल एतेक काज करै छी। सभ किओ त' चलि गेल हमरा-अहाँ के छोड़ि के, जेना घर स' बाहर जाएत काल लोग घरक आगू ताला लटका दै छै। हे बूझल अछि ने ई कहबी जे सभ किओ चलि गेल आ बुढ़बा लटकि गेल। तहिना हम दुनू लटकि गेल छी अई घर मे।' 'एह! छोड़ू आब ओ गप्प सभ। आ हे, अपना धिया-पुता लेल एहेन अधलाह नञि बाजबाक चाही। आखिर हुनको आओरक अपना-अपना जिनगी छै। बेटी के त' अहां ओहुनो नञि रोकि क' राखि सकै छी। आनक अमानति जे भेलै। बाकी बचल दुनू बेटा त' बूझले अछि जे जामुन तडकुन खेबाक आब हुनकर उमिर नञि रहलन्हि। एहेन-एहेन गप्प पर त' ओ सभ भभा क' हँसि पड़तियैक।' 'नञि! से हम अधलाह कत' सोचलहुँ आ कियैक सोचब। एतेक बूड़ि हम थोड़बे छी। मुदा, जे मोनक पीड़ा अहूँक संगे नञि बाँटब त' कहू, जे हम कोम्हर जाइ।' 'कतहु नञि! अहि ठाँ बैसल रहू। हम अहाँ लेल चाय बना क' आनै छी। अहाँ जाबति चाय पियब, ताबति हम भन्सा-भात निबटा लेब।' 'ठीक छै, जाऊ! अहाँ आओर के त' चूल्हि-चौकी आ भन्सा भात स' ततेक ने फैसिनेशन अछि जे किओ किछु कहैत रहय, अहाँसभ स' ओ छूटि नञि सकैय'। 'से नञि कहू। आई कोनो लड़की कि जनीजात चूल्हि मे सन्हियाय नञि चाहै छै। मुदा ओकरा आओर के त' जन्मे स' पाठ पढ़ाओल जाइ छै जे गै बाउ, बेटी भ' क' जनमल छें त' चूल्हि स' नाता त' निभाबहि पड़तौ। कतबो पढ़ि-लिखि जेबें, हाकिम-कलक्टर भ' जेबें, मुदा भात त' उसीनही पड़तौक। आब हमरे देखि लिय'। हम की पढ़ल-लिखल नञि छी कि नौकरी मे नञि छी। माय-बाउजी भने पाइ स' कने कमजोर छलाह, मुदा मोन स' बहुत समृद्घ। तैं त' पढ़ौलन्हि-लिखौलन्हि। नौकरी लेल अप्लाई केलहुँ त' नीके संयोगे सेहो भेंटि गेल। आर नीक कही अपन तकदीर के जे अहाँ सन जीवन साथी सेहो भेटल जे डेगे-डेग हमर संग रहलाह। मुदा तइयो देखियौ जे बेसिक फर्क जे छै, से अहूँ की बिसरि सकलहुँ? आइ धरि कहियो कहलहुँ जे सपना, रह' दियऊ अहाँ भानस-भात । हम क' लेब कि घर ठीक क' लेब कि धिया-पुता के पढ़ा लेब।' 'आब लगलहुँ अहूँ रार ठान'। ताइ स' नीक त' सएह रहितियैक जे अहाँ किचन मे जा क' अपन काज करू। हँ, चाय सेहो द' दिय'।' 'से त' अहाँ कहबे कहब। बात लागल जे छनाक स'। अहिना त' अहाँ आओर हमरा आओरक अबाज के बंद करैत एलहुँए।' 'सपना, अहाँ एना जुनि सोचू। आई तीस बरख स' हम दुनू एक संगे छी। पूर्ण भरोस स', संपूर्ण आत्मसमर्पण, विश्र्वास आ सहयोग स'। हमरा बुते जे भ' सकल, कहियो छोड़लहुँ नञि। ठीक छै जे हम कहियो एक कप चायोटा नञि बनेलहुँ, मुदा आदमी आओरक सहयोग देबाक माने की खाली भन्से मे घुसनाई होई छै? अहाँ मोन पाडू, हम कहियो कोनो बात पर टोकारा देलहुँ? अहाँ जे पकाबी, जे खुआबी, जे पहिराबी, जेना अहाँ राखी। कहियो कोनो आपत्ति कएल की।' 'हमरा हँसी आबि रहलए अपन एहेन समर्पित पति पर।' 'मुदा हमरा नञि आबि रहलए। हमरा गर्व अछि अपन एहेन सहयोगी पत्नी पर जे हमर कन्हा स' कान्हा मिला क' हमरा संगे-संगे चललीह। मुदा, आई ई सभ उगटा-पुरान कियैक?' 'टाइम पास कर' लेल आ अहाँ जे कहलहुँ, अई ठाँ बैस' लेल, त' बैसि के अहाँक मुंह त' नञि निरखैत रहि सकै छी ने।' 'निरेखू ने, किओ रोकलकए अहाँ के कि टोकलकए अहाँके।' 'धुर जाऊ, अहूँ त...! आब ओ सभ संभव छै की? अरे, जहिया उमिर छल, जहिया समय छल, तहिया त' कहियो हमर मुंह निरेखबे नञि कएलहँु आ नहिए निरखही देलहुं। चाहे हम किछुओ पहिरि-ओढ़ि ली, चाहे बाहर स' हमरा कतेको प्रशंसा भेटि जाए, अहाँक मुंह स' तारीफक एकटा बोल सुन' लेल तरसि गेलहुँ। बोल त' बोल, एकटा प्रशंसात्मक नजरियो लेल सिहन्ता लागले रहि गेल। आ तहिना अहांक पहिरल ओढ.ल पर कहियो एपी्रशिएट कएलहुँ, तइयो मुंह एकदम एके रस - शून्य, भावहीन ...' 'एह! एना जुनि कहू। अहाँक सज-धज देखिक' हमरा जे प्रसन्नता होइत छल, से हम कहियो ¬नञि शेयर कएलहुँ अहाँ स', से कोना कहि सकै छी। दिनभर अहाँक रूप आँखिक सोझा नचैत रहैत छल आ राति मे ओ सभटा प्रशंसा रूपाकार लेइत छल। तहिना अहांक मुंह स' अपन, प्रशंसाक बोल भरि दिन चानीक घंटी जकाँ मोन मे टुनटुन बाजत रहैत छल आ मोन के उत्फुल्ल बनौले रहै छल। मुदा, अहाँ कहियो ओहि समय कोनो सहयोगे नञि देलहुँ या कहियो संग देबो केलहुँ त' बड्ड बेमोन से'। हम कहियो पूछलहुँ जे अएं यै, एना कियैक करै छी अहाँ? अहींक मर्जी मुताबिक हम ओहूठाँ चलैत रहलहुँ।' 'हे! सरासर इल्जाम नञि लगाबी। देखियौ, हमरा लेल जेना अहाँ महत्वपूर्ण छी, तहिना अहाँक प्रत्येक बात हमरा लेल महत्वपूर्ण अछि। हम अहाँक संग नञि देलहुँ अथवा बेमोन स' देलहुँ त' कियैक ने अहाँ पूछलहुँ कहियो, अथवा हम झँपले-तोपले किछु कहबो केलहुँ त' कियैक ने तकरा पर बिचार केलहुँ, कहियो खुलिक' चर्च केलहुँ.। ... हे लिय'..., चाय लिय'... अपनो लेल बना लेलहुँ। भन्साघर स' चिकरि चिकरि क' बाज पड़ै छल। किओ सुनितियैक त' कहतियैक जे बतहिया जकाँ एकालाप क' रहल छै कि ककरो संगे झगड़ि रहल छै।' 'चाय त' बड्ड दीब बनलए।' 'एह! याहि टा गप्प पहिनहुँ कहियो कहने रहितहुँ। अई तीस बरख में आइए नीक चाय बनलैय' की?' 'छोड़ू ने पुरना गप्प सभ! आब धीया-पुताक घर में ई सभ कथा-पेहानी नीक लागतियैक की?' 'कियैक ने नीक लागतियैक? ई सभ त' जीवनदायी धारा सभ छै जाहि स' जीवनरूपी वृक्षक डाल-पात सभके भिन्न भिन्न स्रोत स' जीवनशक्ति भेटैत रहै छै। अरे, धिया-पुताक सोझा अहाँ कहिये दितहुँ त' अई मे कोनो ऐहन अधलाह कर्म त' नञि भ' जइतियैक जाहि स' ओकरा आओरक आगाँ हमरा आओर के शर्म कि झेंप महसूस होयतियैक!' 'अहाँ बात के तूल द' रहल छी।' 'नञ! स्थितिक मीमांसा क' रहल छी। चीज के रैशनलाइज क' रहल छी।' 'हमरो दुनूक जिनगी केहेन रहलए। नेना छलहुँ त' पढ़ाई, पढ़ाई, पढ़ाई! माय-बाउजी कहैत छलाह जे बाउ रौ, इएह त' समय छौक तपस्याक। एखनि तपस्या क' लेबें त' आगाँ एकर मधुर फल भेटतौ। पढ़ बाउ, खूब मोन लगाक' पढ़ ! आ हम पढ़ैत गेलहुँ - फर्स्ट अबैत गेलहुँ। नीक नोकरीयो लागि गेल। बाउजी सत्यनारायण भगवानक कथा आ अष्टयाम सेहो करौलन्हि। हुनका बड्ड सौख छलै जे हुनकर पुतौहु पढ.ल-लिखल, समझदार आ मैच्योर्ड हुअए। तकदीरक बात कहियौ जे हुनकर ईहो सेहन्ता पूर्ण भ' गेलै। हुनका अहॉँ सन पुतौहु भेटलै, रूप आ व्यवहारक गरिमा स' परिपूर्ण। 'चाय त' सठि गेल। आओरो ल' आबी की?' 'नञि! हमरो जिनगी सोगारथ भेल अहाँ के पाबि क'। कतेको परेशानी भेल, अहाँ सभस' निबटैत गेलहुँ, एकदम स' धीर थिर भ' क'।' 'त' की करितहुँ! जहन हम दुनू प्राणी एकटा बंधन में बंधा गेलहुँ त' तकर मान मरजाद त' निभाबही पड़तियैक ने! आ कथा खाली हमरे आ अहाँटाक संबंध धरि त' सीमित नञि रहै छै। एकर विस्तार अहाँक परिवार, हमर परिवार आ फेर अपन बाल-बच्चा धरि होइत छै, आ हे, एहेन नञि छै जे हम सीता-सावित्री जकाँ मुंह सीने सबकुछ टॉलरेट करैत गेलहुँ। कएक बेर हम अपन टेम्पर लूज केलहुँ। मुदा अहाँक तारीफ, अहाँ अपन टेम्पर कहियो नञि लूज केलहुँ।' 'महाभारत स' बच' लेल। आह! पत्नीक आघात स' कोन एहेन मनुष्य अछि जे बाँचि सकलए।' 'मजाक जुनि करू! अहँू सीरियस छी त' हमहूँ सीरियस छी। हमर अपन इच्छा छल नान्हिटा स' जे पढ़ब-लिखब। पढ़ि लिखिक' अपना पएर पर ठाढ़ होएब। आर्थिक परतंत्रता अस्वीकार्य छल। हमरा अई बात पर पूर्ण संतोख अई जे हमर ई इच्छाक पूर्ण आदर आ सम्मान भेटल अहां स'। हमर नौकरी पर हमरा स' बेसी प्रसन्नता अहाँक बाउजी के भेल छल। हमर एकगोट संगी हमरा चेतौने छल जे देखब, बुढ़बाक खुशी अहाँक पगार ओसुलबा स' त' नञि अछि। हमरो लागल छल। मुदा धन्न कही हुनका, नञि कहियो पुछलन्हि जे हमरा की आ कतेक दरमाहा भेटैय' आ नञि कहियो ओकरा मादे कोनो खोजे-पुछारी कएलन्हि। सएह अहँू संगे भेल। अहँू कहियो नञि पूछलहुँ जे हम की सभ करै छी। अपन पगार के कोना खर्चै दी॥ हमरा त' कएक बेर इएह होइत रहल जे अहाँ पूछै छी कियैक ने? तहन ने हम अपन आमदनी आ आमद स' बढ़ल खर्चाक हिसाब अहाँ के दितहुँ। नतीजा, आर्थिक स्वतंत्रता हासिल कएलो सन्ता कहियो आर्थिक रूपे स्वतंत्र नहिं भ' सकलहुँ। कहियो अपना मोने अपना ऊपर किछु खर्च नञि क' सकलहुँ। अहाँ संगे ई नञि छल। अहाँ त' 'ईट, ड्रिंक आ बी मेरी' मे यकीन करैत एलहुँ आ एखनो करै छी।' 'अई मे अधलाहे की छै? मनुक्खक अई जिनगी मे अछिए की? खाई, पीबि, मस्त रही।' 'भने ओहि मे सभ किओ सफर करी।' 'से कोना? कहियो अहाँके हम कोनो कष्ट देलहुँए?' 'किऐक ने? कोनो समय एहेन नञि भेल जे कोनो खास खास बेर पर हमर नोर नञि खसल हुअए। कहियो कोनो काज-परोजन भेल, कि तीज तेवहार कि ककरो बर्थ डे कि वेडिंग, सभठाँ त' पल्ला झाड़ि लेइत अएलहुँ जे पाई नञि अछि।! तहन हम की लोकक ओहिठाँ खाली हाथे पहुँचतहुं आ कहितहुं जे हमर हस्बैंड कहै छथि जे हुनका लग पाइ नञि छै तैं हम आओर हाथ झुलबैत चलि ऐलहुँए। किओ पतियैतियैक।' 'अहाँ लग त' रहै छल ने।' 'हँ, कियैक ने कहब। ई बुझलहुँ जे ई 'छल' के मेंनटेन करबा लेल हम कतेक बेर अपन मोन के मारि-मारि के राखलहुँ।' 'एह छोड़ू ई सभ गप्प। खाएक लेल की बनाएब?' 'जे कही अहाँ? हमरा आओर के त' ईहो कहियो स्वतंत्रता नञि रहल जे अपना मोने, अपन पसीनक खाना बनाबी।' 'फेर ब्लेम! आइ अहाँ के भ' की गेलए?' 'अहाँ संग लड़ियाएबक खगता। जिनगी भर जकरा लेल अहां पलखतियो भरि समय नञि देल।' 'हम अहाँके संतुष्ट नञि क' सकलहुँ कहियो, अहाँ से कह' चाहै छी?' 'हँ, सएह कह' चाहै छी?' 'बाई एवरी पॉसिबल वे?' 'यस, बाइ एवरी पॉसिबल वे?' 'फिजिकली, मेंटली, मौनेटरली, सेक्सुअली।' 'हँ, सभतरहें।' 'अहाँ हमरा कमजोर बना रहल छी।' 'अहसास करा रहल छी।' 'अपन परिस्थिति पर गौर नञि क' रहल छी। हम बिजी, अहां बिजी। हमर अएबाक-जेबाक कोनो निश्चित समय नञि। अहाँके ऑफिसक संगे-संगे घरक, धिया-पुताक जिम्मेवारी। बखत कत' छल जे प्रेम-मुहब्बतक मादे सोचितहुँ।' 'तैं त' जीवन झरना सुखा गेल ने? व्यस्तता त' जिनगीक अभिन्न अंग छियै। तैं, अई व्यस्तताक कारणे हम आओर कहियो की नहाएब-धोएब आ कि कपड़ा पहिरब छोड़ि देलियै, वा बिसार गेलियै?' 'धिया-पुताक घर मे, आई कुंड बी सो फ्रैंक ...' 'व्यर्थ इल्जाम द' रहल छी। फ्रैंकनेसक माने ई नञि जे अहाँ हमरा कोरा मे बैसेने रहू सभ समय। फ्रैंकनेस माने छै फुल व्यवहारक, फुल अप्रोचक फ्रैंकनेस। अहाँ से फ्रैंक नञि भेलहुँ, नतीजा हम नञि भ' सकलहुँ, नतीजा धिया-पुता सभ नञि भ' सकल।' 'धिया-पुता के त' बड्ड नीक जकाँ राखलहुँ। बेटीयो जीन्स आ मिनी पहिरि क' घूमल, फ्रेंड्स सभक संगे सिनेमा गेल, पार्टी कएल, कहियो टोकारा नञि केल।' 'मुदा, कहियो फ्रैंक भ' क', खुलिक' गप्प-सप्प सेहो त' नञि कएल। एकदम फॉर्मल फैमिली बनिक' रहि गेल अपन परिवार। ई हमर कहबा नञि, अहाँक बेटीयेक कहब अछि।' 'अही स' सभ किओ सभ किछु कियैक कहैत अछि। हमरा स' त' आइ धरि किओ किछु नञि कहलक?' 'अहाँ से मोके कोम्हर देलियै? तैं त' कहलहुँ, बेहद फॉर्मल फैमिली।' 'चलू छोड़ू, आब फेर स' शुरू करब जिनगी - सभटा शौख पूरा क' देब।' 'जिनगीक ओ बीति चुकल 30 साल आ तीस वर्षक पल-पल पहिने घुरा दिय'।' 'जे भ' सकै छै से कहू।' 'त' कहू जे भन्सा की बनाबी? छीमीक खिचड़ी कि छीमीक परोठा।' 'आब जे अहाँ खुआबी। बजला पर कहब जे हम अहाँ के मौके नञि देइ छी।' 'से त' कहबे करब। अपरोक्ष रूप स' अहाँक पसीन-नापसीन पूरा घर पर हावी रहलै।' 'से कोना?' 'चलू, भन्से से शुरू करी। अहाँ के सौंफ देल मलपुआ पसीन नञि, इलाइची देल खीर, सेवई पसीन नञि। आ हमरा आओर के ओ सभ बड्ड पसीन। हमरा बिन सौंफक पुआ आ बिनु इलाइचीक खीर सेवई बनेबाक आदत पार' पड़ल।' 'त' ई त' नञि कहलहुँ जे अहाँ आओर नञि खाई।' 'ईहो त' नञि कहल जे ठीक छै, कहियो-कहियो हमहूं सौंफ-इलायचीबला पुआ, खीर, सेवई खा लेब, तहन ने बुझितहुं? आ अपना स्वादक अनुसारे अलग स' चीज बनाबी, ई कोनो जनीजात स' पार लागलैये जे हमरा स' लागितियैक।' 'अच्छा, आगां बढू।' 'बढ़ब, पहिने भन्सा चढ़ाइए आबी।' 'आइ उपासे पड़ि जाइ त' केहेन रहत। तखनि स' अहाँक मुंह स' भानस-भानस सुनि क' कान पथरा गेल आ पेट अफरि गेल।' 'उहूँ! एखनि त' डिनर गोल क' देब आ अधरतिया के हाँक पाड़ब जे हमरा भूख लागलए। उठू, किछु अछि बनल त' दिय'। किछु नञि अछि त' ऑमलेटे ब्रेड सही।' 'जाऊ तहन, जे मर्जी हुअए, करू।' 'हे, हम एखने गेलहुँ आ एखने एलहुँ। ताबति अहाँ बउआक ई मेल पढ़िक' ओकरा जवाब पठा दियऊ।' 'हँ, ओहो लिखलकए जे बड्ड नीक लागि रहलए। अपन देश स' एकदम अलग, सभकिछु एकदम व्यवस्थित। मर्यादित, संतुलित। आखिर अमेरिका छियई ने। धन्न कही आईटी बूम के जे बच्चा सभक रोजगारक नव अवसर भेंटि रहल छै। भारतीय कंप्यूटर इंजीनियर्स के कतेक डिमांड छै फॉरेन कंट्री मे। देखबै जे दस मे स' तीन टा इंजीनियर अमेरिका त' आन आन देशक रूख क' रहल अछि।' 'प्रतिभाक पलायन थिकै ई। इंर्पोटेस ऑफ टेक्नॉलाजी संगे इंपोटेंसी ऑफ अवर टैलेंट छै। बाहरी टेक्नॉलॉजी पर बिढ़नी जकाँ लूझै छी। ओ सभ रोटी देखबैत अछि, हम सभ कुकुर जकाँ बढ़ि जाइ छी।' 'अहाँक बेटो बढ़ल अछि, से जुनि बिसरी।' 'हम इन जेनरल कहि रहल छी। अपन देशक त' ई स्वभावे बनि गेल छै, घरक जोगी जोगड़ा, आन गामक सिद्घ। इंटर्नल टैलेंट के पहिचान' लेल, रिकग्नाइज कर' लेल पहिने कोनो बुकर प्राइज, ऑस्कर अवॉर्ड, नोबल प्राइज चाही, नञि त' सभ किओ फ्रॉड, धोखेबाज ...' अपने ओहिठां त' लोक आओर एतेक तरहक एक्सपेरिमेंट करैत अछि। लोक कतेक महत्व दइत छै।' 'से सभ त' छै। ई नियति हमही आओर बनाक' राखल अछि। तैं त' आइ अनिमेष हमरा आओर लग नञि अछि। अमेरिका मे अछि। पता नञि कहिया घुरत? 'आ जौं नञि घुरलै आ ओम्हरेक मेम ल' आनलक तहन?' 'तहन की? अहाँ सासु पुतौहु रार मचाएब। हमर काज त' आशीर्वाद देबाक धरि अछि। से भूमिका हम निबाहि लेब।' 'त' सभटा सासु अपना पुतौहु स' रारे मचबै छै? हमही दुनू सासु-पुतौहु मे ई देखलहुँ कहियो? आब अनिमेष जकरा स' विवाह करौ, हमरा लेल धन सन! हमरा कोना आपत्ति नञि!' 'भन्सा भ' गेल त' दइए दिय'। खाअक' सूतब।' 'एतेक जल्दी? 'थकान लागि रहल अछि।' 'पहिल बेर एतेक बतियौलहुँए ने? हरारति त' लागबे करत। घरवाली संग एतेक बेसी गपियेनाइ कोनो मजाक बात छै!' 'हे, एके प्लेट मे निकालू ने।' 'आई एतेक प्रेम कथी लेल ढरकि रहल अछि?' 'सभटा पिछला हिसाब रफा-दफा कर' लेल।' 'त' पुरनका तीस बरख पहिने घुराऊ!' 'से त' नञि भ' सकैय', मुदा पुरना तीस बरख के अगिला तीस बरख मे मिलाक' जिनगीक ताग के आओर मजबूत करबै। आऊ! बैसू एम्हर। हे, लिय। हमरा हाथे खाऊ!' 'हमरा डर होइयै जे हमर हार्ट फेल नञि भ' जाए।' 'नञि होएत। आ हेएबो करत त' हमहूँ संगे-संगे चलि जाएब। हे, लिय' ने। खाऊ ने। अहींक हाथक बनाओल त' भोजन अछि।' 'हम अपने हाथे खाएब। दोसराक हाथे खएला स' पेट नञि भरत।' 'मोन भरत। आई पेट भर' लेल नञि', मोन भर' लेल खाऊ।' 'तहन त' आओरो नञि खाएब। मोन जहन भरिए जाएत त' जीबि क' की करब? मोनक अतृिप्त त' जिनगी जिबाक बहाना होइ छै।' 'ई सभ फिलॉसफी छोडू आ खाना खाऊ। अरे, अरे, दाँति कियैक काटलहुँ।' 'भोजन में चटनी नञि छल नें, तैैं...' हे, भ' गेल। आब नञि खाएल जाइत हमरा स'।' 'ठीक छै। चलू तहन।' 'कत'।' 'चलू त' पहिने। आई चलू, हमर कन्हा थाम्हि क' चलू। अइ्‌ दुनू बाँहक घेरा मे चलू।' 'व्हाई हैव यू बीकम सो रोमांटिक?' 'कहलहुँ ने जे पछिला तीस बरख के अगिला तीस बरख मे शामिल कर' जा रहल छी। हे, इमानदारी स' कहब', अहां के नीक लागि रहलए हमर ई स्पर्श!' 'कोनो भावना नञि उमड़ि रहलए। अहाँ ईमानदारीक प्रश्न उठाओल, तैं कहि रहल छी।' 'आब?' 'ऊँहूँ।' 'आब? मोनक दरवज्जा बंद क' क' नञि राखू। कनेक फाँफड़ि छोड़ि दियौक। भावनाक बयार के घुस' दियौक।' 'हमरा रोआई आबि रहलए।' 'त' कानि लिय' अई ठाँ, हमर छाती पर माथ राखिक'। मोन हल्लुक भ' जाएत।' 'बेर-बेर सोचना आबि रहल अछि पुरना दिन। तखन कियैक ने ... एतेक व्यस्तताक की माने भेलै जहन हमही दुनू अपना के अपना दुनू स' अलग ल' गेलहुँ।' 'माने छलै ने? अपन जिनगी बनेबाक। धिया-पुताक जिनगी बनेबाक। ई सभ लक्ष्य छल आ अर्जुन जकाँ हम सभ ओहि लक्ष्यक प्राप्ति लेल चिड़ैक आँखिक पुतली धरि तकैत रहलहुँ।' 'हमर पलक मिझा रहलए।' 'मिझाए दियऊ। बन्द पलक, फुजल अलक। एखनो अहाँक केश ओतबे नरम, आ मोलायम अछि।' 'आब त' सभ टा' झड़ि गेलै।' 'जे छै से बहुत सुंदर छै। आह! मोनक कोन्टा मे ठेलि-ठूलि क' राखल सुषुप्त भावना सभ... जेना छोट-छोट फूँही बनिक' रोम-रोम के भिजा रहल अछि। रोम-रोम भुलुकि रहल अछि। ई की अछि?' 'अहसास। हमहँू अई अहसासक फूंही मे भीजि रहल छी। अहाँक तन स' माटिक सोन्हपनि आबि रहल अछि। थाकल दकचाएल जिनगी मे एकगोट नव संचार आबि रहलए। नस-नस वीणाक तार जकाँ झंकृत भ' रहलए। सृष्टिक ई अमूर्त आनंदक क्षण अछि, दिव्य, भव्य, अलौकिक !' 'एक-एक साँस स' बजैत स्वर्गीय संगीत। आइ धरि कहियो नञि अनुभव कएने छलहुँ। आई अनुभव क' रहल छी।' 'आऊ, अई अनुभव सागर मे डूबि जाइ- गहीर, आओर गहीर, कामनाक सीपी फोली! भावनाक मोती बटोरी। आसक ताग मे ओइ मोती के गँूथि माला बनाबी आ दुनू एकरा पहीरि ली।' 'जिनगी एतेक सुंदर नञि लागल पहिने कहियो।' 'मौने मुखर रहल सदिखन। आई शब्द मौनक देबाल के ढाहि रहल अछि।' 'ढह' दियऊ ! सभटा वर्जना ढह' दियऊ !' 'जिनगीक बदलइत रूप किओ नञि बूझि सकलए। अहाँक रोम-रोम स' झरैत ओस बुन्न ! एक-एक श्र्वास स' अबैत जुही, गुलाब, मौलश्रीक सुगंधि। आऊ, डूबि जाइ अइ मे!' '---------' '---------' '---------' '---------' 'जिनगी पहेली अछि, बुझौअल अछि।' 'ऊँहूँ! जिनगी जिनगी अछि।' 'माने?' 'माने की? एखनि धरि मतलबे बूझ' मे लागल छी? धुर जाऊ! अहाँ बड्ड ओ छी।' 'ओ छी, माने केहेन छी?' 'ओ माने ओ। आओर किछु नञि!' 'अहूँ एकदम नेन्ना जकाँ करै छी।' 'नेन्ना त' बनिये गेलहुँ। अहाँ नञि बनलहुंए की?' 'बनलहुँए ने।' 'तहन?' 'तहन की?' 'तहन माने जिनगीक रूप देखी आ मस्त रही।' रामभरोस कापड़ि “भ्रमर”(१९५१- ) बीहनि कथा - गंगाप्रसादक स्‍वायतता ओ अपन घरक ओसारामे एकटा पीजडामे सुग्गा लाबि क रखने रहथि ।सिखौने छलाह सीताराम कहु गंगाप्रसाद। सुग्गा रटने रहए सीताराम,सीताराम।घर मालिक प्शन्‍न भेल लिअ, आब हमर सुग्गा पढुआ भ गेल अछि ।दोसरोके गर्वस स ुनबैत छलाह देखह, हमरा संगे पढ बला सुग्गा अछि ।कतेक नीक जकां राम नाम लैत अछि ।भोरेभोर उठलापर जखन सीताराम सीताराम जपैत अछि त मन प्रशन्‍न भ जाइत अछि । ई क्रम काफी दिन धरि चलल ।घरमालिक प्रशन्‍न,ओम्‍हर सुग्गा सेहो नीक जकां रामनाम जपबाक कारणें मजास बदाम, फलफुल, हरियरमिरचाइ लोलस कतरि कतरि मस्‍ती करए लागल । समय परिवर्तन भेलै ।घरमालिक विपतिमे फंसि गेलाह ।ओ सुग्गा के मालिकके बचाउ, मालिककेबचाउ सन वाक्‍य सिखब चाहलक । सुग्गा अपना जनिते बुद्धि आ क्षमता प्रयोग क ओ वाक्‍य सिखबाक प्रयास कएलक ।एक-दू बेर उच्‍चारण सेहो कएलक मुदा ओ स्‍मरण नहि रहि सकल आ तएं अपन घरमालिककें बचा नहि सकल । पैघ बबण्‍डर उठल । सभ किछु परिवर्तन भ गेलै । घर सभक स्‍ँवरुप बदलल ।बाट घाट नव बनएबाकप्रयास भेल, चौडगर आ पक्‍की । घरमालिक सेहो बदलि गेल । ओसारामे टांगल पिजडाक आकार प्रकार सेहो बदलि गेलै मुदा सुग्गामे कोनो परिवर्तन नहि भ सकल । ओ एखनो सीताराम सीताराम पढि रहल छल । नवका घरमालिकके सुग्गाक ओ रटब नीक नहि लगलैक ।ओ नयां वाक्‍य सिखाब चाहलक जय गणतंत्र कहु गंगाप्रसाद । सुग्गा जतेक प्रयास कएलक तैयो सीताराम, सीतारामसं आगा बढिए नहि सकल। घरमालिक अकच्‍छ भ नव पिजडा आ सुग्गा लओलक।सिखब चाहलक जयगणतंत्र, जयगणतंत्र कहु गंगाप्रसाद।नवका सुग्गा किछु बजितए ताहिस पुर्बे पुरना सुग्गा बाजि देलक गोपीकृष्‍ण,गोपीकृष्ण कहु गंगाप्रसाद। घरमालिकके आश्‍चर्य भेलै ई गोपीकृष्‍ण कत्तस आयल। पुरना त सीताराम कहैछ,नवकाके जयगणतंत्र सिखाओल जाइछ, तखन ई नयां शब्‍द गोपीकृष्‍ण अएबाक त बाते नहि भेल । सुग्गाके जे पढाओल जाइछ, जे सिखाओल जाइछ सएह ने ओ बाजत । बातके तहमे जएबाक लेल घरमालिक एक दिन ढुक्‍का लागल।देखी के नवका सुग्गाके ई नयां शब्‍द सिखबैत अछि। एक्‍के क्षणमे ओ जे दृश्‍य देखलक, आश्‍चर्यमे पडि गेल। एक गोटे करिया पोशाकमे, देह भरि रंगविरंगक हथियार लटकौने, अनुहार पर कारी कपडा लपेटने कोम्‍हरोसं तेजी सं आयल । सुग्गाके आदेशात्‍मक भाषामे कहलक कह त गोपीकृष्‍ण, गोपीकृष्‍ण। खबरदार, फरक शब्‍दक उच्‍चारण नहि । दुनू सुग्गा डरसं थरथर कांप लागल ।एक दोसराके हताश नजरिसं देखैछ,मनेमन किछ संकल्‍प करैछ आ बजैत अछि गापीकृष्‍ण,गोपीकृष्‍ण । साबास कहि आकृति कोम्‍हरो हेरा जाइछ। अच्‍छा त कथा ई छिऐक। घरमालिक सतर्क भ जाइछ ।घरके आ सुग्गाके सेहो स ु रक्षा घेरा बढा देल जायछ ।एकटा आओर नवका पिजडा सुग्गा सहित लाओल जाइछ ।मुदा आहो सहयात्री स सुग्गा सभक देखांउसे गोपीकृष्‍णटा रट’ लगैछ ।घरमालिक लाख सतर्कता अपनौलक,मुदा सुग्गा अपन रट नहि छोडलक ।पिजडा आ सुग्गा बदलैत रहल, रटमे परिवर्तन नहि आयल ।ओसारामे झुलैत पच्‍चीसो पिजडाक सुग्गा एक्‍के स्‍वरमे बाजय गोपीकृष्‍ण कहु गंगाप्रसाद । अन्‍तमे आजीत भ घरमालिक पच्‍चिसो पिजडाक आगां हारल जुआरी जकां निरिहभावें ठाढ भ पुछलक कह, की छौ तोरा सभक ईच्‍छा ।हम तोरा सभकें सिखब नहि सकलहुं, ने नियंत्रणें क सकलहुं ।आब जे तों सभ चाहबिहि सएह सभ हएतै । पच्‍चीसो पिजडाक सुग्गासभ एक दोसराके देखैत अछि, ठोढेमे मुस्‍काइत अछि आ गरदनि उठा क घरमालिकके आंखिमे आंखि गडाक आत्‍मसम्‍मानक संग नारा लगबैछ जयगणतंत्र । घरमालिक ओकरासभके एकटक्‍क देखिते रहि जाइत अछि। हुगली पर बहैत गंगा हीरामन आइ फंसि गेल अछि ठेठर बाली बाईक संग। ओहि ठाम तं हीरामनक प्रेम एक तरफा रहैक, ठेठरबाली बाई मात्र सहानुभुति देखौने रहैक। एत्त तं बात बीगड़ि गेल छै। दुनू दिश आगि लागि गेल छै आ हीरबाके भितर छट-पट्टी उठि गेल छै- आब कोना कऽ रहत ग सोनाबाईके विना ओ...। कएकटा सिनेमा देखने रहय जाहिमे बाइक प्रेम बरोवरि असपल होइत गेलै आ कतेक त एहि संसारे सं विदा भऽ गेल रहय। आ तएँ एम्हर टपबासं पहिने ओ कएक बेर सोचने रहय। कतौ मन मीलि गेल तं...। दुत्-हमरा सन सनके के पतिअएतै। कनी मनोरंजन करब आ घुरि आएब- हीरा मनके तोष दैत...स्ट्रीटक वंगला नं.४ मे पैसि गेल रहय। समय अपरान्हक तीन बजेक रहैक। दरबज्जा पर एकसरि ठाढ़ि सोना ओकरा किए नीक लागल रहैक। सम्भवतः एहु दुआरे जे आन दरबज्जाक बाई सभ बटोहीकेँ जवर्दस्ती हाक पाड़ैक। नहि आब चाहवलाक देहमे रगड़ा लैक, जेबीमे हाथ धरैक, धक्का मारैक मुदा जखन ओ एहि दुहारि पर आएल त गुम सुम ठाढ़ अठार- उन्नैस वर्षक पीण्डश्याम सन अत्यन्त सुभग हीरा ओकरा अपना दिश आकर्षित कऽ लेलकै आ ओ ओत्त ठमकि गेल रहय। हीराके एखनो मोन गुद-गुदा जाइछै सोनाक तखनका मुस्कीके स्मरण करैत। ओ लोटपोट भऽ गेल रहय आ आंखिक दरबज्जा दऽ सोनाक हृदयमे जेना पैसि जाए चाहने रहय। सोना ओकरा लऽ दू महला पर सजाओल एकटा कोठरीमे लऽ गेलै। ओ कोठरीमे जएबासं पूर्व घरक वातावरणके जंचबाक लेल नजरि खिरौने रहय- आठ, दश कोठरी आर रहैक, जाहिमे हंसी, मजाकक स्वर आबि रहल छलैक। माने ग्राहक ओम्हरो फंसल रहैक। सोना वांचल छलीह एहु दुआरे जे ओकर रंग ओतेक साफ नहि रहैक, आ ने आन छौड़ी जकां लब-लब ओ करैत छल। ग्राहककें बुझाइक एहि मन्हुआएल छौड़ीमे कोनो जान नहि हयतैक सम्भवतः, तएं ओ चुपचाप ग्राहकक प्रतीक्षामे सभसँ अन्त धरि बैसल करए। बादमे ओकरा सोना सँ पता चललै, सभ के ग्राहक भेटि गेलाक वादे हारल-फुरल लोक ओकरा लग अबैक। एहिसं एक बात त जरूर रहैक- सोना आन बाई जकां तोड़ल-मचोड़ल नहि गेलि रहय, वांचल छलीह। ओकर अनुहारक तेज एखनो दपदप करैक आ सएह तेज हीराके ओकरा दिश आकर्षित कएने रहैक। पहिल सांझ सोनाक संग महज ग्राहक भऽ वीतबऽ चाहैत रहय हीरा। थाकि हारि गेल छल एहि महानगरमे। बाप मायके कमाएक नाम पर दू हजार टका लऽ कलकत्ता आबि गेल रहय। ओकर गौंआ सभ एत्त कमाइ छै, कहने रहैक कोनो सेठक बंगलापर लिखापढ़ी के काम छै दिआ देबौ। मन त रहै जे विदेशे उड़ि जाइ, बड़ लोक ओकरो गामके अरब गेलैए। विदेशमे पाइ त होइ छै, मुदा कष्टो कम नहि छैक। घर-परिवार सँ दूर। ओ सोचने रहय- उड़ानक बात बादमे देखल जएतै। एक बेर गौंएँ सभक बातके भजा ली आ कलकत्ता चलि आएल, से आइ पन्द्रह दिन भऽ गेल छै, मुदा ओइ सेठक ओइ ठाम काम नहि भऽ सकल। ओ आबे-आबे ताबे दोसरके रखि लेने रहय। ओ बौआ गेल रहय आ फेरसं सरिआ कऽ काम खोजऽ पड़ि रहल छलैक। रहबालेऽ गौआक खोली रहैक आ खएबा ले सेहो कहियो काल ओकरे सभके ओहि ठाम खा लैक। मुदा कलकत्तामे खर्च त होइते छैक। काम नहि भेटौक त कतेक दिन टिकत ओ...। सोना बाई टोकैत छै त ओकर तंद्रा भंग भऽ जाइत छै- की सोचऽ लगलहु। आउने, आनो ग्राहक खोज पड़तै ने। हीरा बच्चेसं भावुक स्वभावक रहल अछि। चौबीस-पच्चीस वर्षक उमेर भऽ गेलै, बाप-माय कतबो वीआहक लेल कहैत छैक ओकरा अपन मनमे की फुरै छै की नहि, वरोबरि मना करैत आएल अछि। नारीक प्रति अत्यन्त सम्मान रखैत अछि हीरा...। आइ उएह नारीक संग...। “की भेल बाबू साहेब, आउ सेज पर”- कहैत सोना अपन साड़ी खोलऽ लागल। साड़ी खोललाक बाद ब्लाउज खोललक आ निचांक साया सेहो। हीरा एखनो चुपचाप ठाढ़ सोनाक देहयष्टि निहारि रहल छलै। ओ भरल। बजैत अछि- ओहने हवसी सभ अबैत अछि। दारु पीबैत अछि, सिकरेट जड़बैत अछि आ ठुठ्ठा कखनो कऽ सम्वेदनशील अंग पर रगड़ि छिलमिला दैत अछि। नोचैत अछि, निछोड़ैत अछि आ घंटो तबाह कएने रहैछ। ओकरा ने हम किछु कहि सकैत छिऐक ने हमर बाई। मोट पाइ देने रहैछ ओ। इएह छै एहि गल्लीक जीवन आ सत्य...।’ कनेक काल चुप्प भऽ सोना हीरा दिश तकैत बजैत अछि- अहाँ एहि थालो कादोसँ भरल विशाल दलदली मैदानमे अपना वैसबाले एक हाथ सुक्खल ठाम खोजऽ आएल छी- ई अहांक भोलापन अछि आ अहांक इएह भोलापन हमरा भितर धरि हिला देलक अछि। हम एखन धरि सिहरन महशूस कऽ रहल छी। ई सुखानुभूतिक सिहरन थिक जे आइ धरि हमरा नहि भेटल छल, पता नहि अहाँमे की अछि, आइसँ अहाँ हमर गहिंकी छी, हम चाहब अहाँ नित्य आबी, कमसँ कम एक बेर। हीरा त आर सर्द भऽ जाइत अछि। ई की भऽ रहल छैक। उनटा हुगली बहऽ लगलै एत्त। हम कोना एत्त आबि सकै छी। आइ एक दिन अएबाले कतेक हिम्मत जुटौने छी, ई त सभ दिन कहैत अछि। नहि, कतहु फेर सँ त्रिया चरित देखाओत त ने ई...। सोना हीराके गुनधुन करैत देखि फेर टोकैत छैक- अहाँ सोचैत हयब, हमर फीश दिनहुं कोना दऽ सकब। बाबूजी, हमरा लेल आनो ग्राहक सभ छैक ने। हम ताहि महक अपन हिस्सासँ बाइके अहाँक हिस्साक पाइ दऽ देबै, अहाँ ओहिना अबियौ, हमरा नीक लागत। आब हीराके मोन मानि जाइत छैक जे कोनो लाइ-लपेट सोनाक मनमे नहि छै। सांचे ओ बाघ, सिंहक हेंजक विच कोनो अपने सन हरिन खोजऽ चाहैत अछि, जकरा संग सुख दुखक गप कऽ सकए, मोनक पीड़ाकेँ बाँटि सकए। ओ आश्वस्ति दऽ दैत छैक। ओकर नोकरी, संगमे घटल जाइत पाइ, किछु सुधि नहि रहैछ ओकरा। ओ सोनाकें छातीसँ सटा लैत अछि। पहिल बेर सोनाकें छातीसँ लगा ओकरा अपनत्वक बोध होइत छैक, राहत भेटैत छैक। जितेन्द्र झा- जनकपुर अन्तर्राष्ट्रिय मैथिली परिषद अन्तर्राष्ट्रिय मैथिली परिषद अपन बिभिन्न माग सहित भारतक राजधानी नयां दिल्लीस्थित जन्तर मन्तरमे धर्ना देलक अछि । सोमदिन देल गेल एहि धर्नामे भारतक विभिन्न स्थानसं आएल मैथिल आ संघ संस्थाक प्रतिनिधि सहभागी रहथि । जन्तर मन्तरमे भेल एहि धर्नामे मिथिला क्षेत्रक विकासक लेल अलग मिथिला राज्य बनाओल जाए से माग कएल गेल । अन्तर्राष्ट्रिय मैथिली परिषद एहि अवसरपर राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिलके ज्ञापन पत्र सेहो बुझौलक । ज्ञापन पत्र बुझेनिहार प्रतिनिधि मण्डलमे डा भुवने·ार प्रसाद गुरमैता, डा रबिन्द्र झा, डा धनाकर ठाकुर,डा कमलाकान्त झा, चुनचुन मिश्र, भवेश नन्दनसहितके सहभागिता छल । परिषदक धर्नामे दिल्लीमे रहल विभिन्न राजनीतिक दलसं सम्बद्ध नेतालोकनि सेहो सहभागी रहथि। परिषदक नेपालक पदाधिकारी आ कार्यकर्ता सेहो धर्नामे सामेल रहथि । धर्नामे भीख़ नंहि अधिकार चाही हमरा मिथिला राज्य चाही से नारा लगाओल गेल रहए । परिषद मैथिली भाषाक आधारपर राज्य बनएबाक माग करैत आएल अछि । कोना बचाएब संस्कृतिक विरासत? मिथिलाक परम्परा आ धरोहरिके मौलिक विशिष्टता गुमिरहल कहैत विज्ञसभ चिन्ता ब्यक्त कएलनि अछि । संस्कृतिक अपन अलग स्थान बांचल रहए से डा गंगेश गुन्जक कहब छन्हि । मैथिली संस्कृतिक विभिन्न पक्षपर नयां दिल्लीमे २५ दिसम्बरक' सम्पन्न गोष्ठीमे बजैत गुन्जन मैथिली संस्कृतिक संरक्षणपर जोड देने रहथि। नाटककार महेन्द्र मलंगिया मिथिलाक लोकसंस्कृतिमे रहल टाना टापर, घरेलु उपचार, शकुन सहितके विषयके फ़रिछियाक' प्रस्तुत कएने रहथि । मैथिली संस्कृतिक संरक्षणलेल एहिमे समाहित गुणके उजागर करब आवश्यक रहल मलंगिया कहलनि । मिथिलामे सातो दिन सात तरहक वस्तु खाक' यात्रा गेलासं शुभ यात्रा हएबाक चलन आ एहने चलनमे रहल वैज्ञानिकता दिश ध्यान जाएब आवश्यक रहल ओ कहलनि । साहित्यकार देव शंकर नविन मैथिली भाषा संस्कृतिके मुल भावना विपरित होबए बला काजके अपमानित कएल जाए से कहलनि । मैथिलीक मौलिकताके लतियाक' कएल जाए बला कोनो काजके बहिष्कार कएल जाए नविनक विचार छन्हि । गायक, साहित्यकार सहित सभके मैथिली गीत संगीत, भाषा संस्कृतिके प्रतिकुल असर होब बला काज नई करबालेल ओ आग्रह कएलनि । नक्कल आ स्तरहीन प्रस्तुतिके अपमानित करबालेल नविन आग्रह कएलनि । मैथिली भोजपुरी एकेडमीक अध्यक्ष अनिल मिश्र मिथिलाक सांस्कृतिक विरासतके विकासक सम्भावना बढाओल जाए से कहलनि । साहित्य, लोक संस्कृतिके समॄद्ध कएल जाए से कहैत ओ मैथिली भोजपुरी एकेडमी एहिदिशसं एहिलेल काज हएबाक प्रतिबद्धता ब्यक्त कएलनि । मिथिला संस्कृति लेल कएल जाएबला काज आपसमे बांटि लेल जाए से मिश्रक सुझाव छन्हि । संस्कृतिक विरासतके रेखाङकित करैत रोड मैप बनएबापर ओ जोड देलनि । संचारमाध्यममे मैथिलीके स्थान भेटए ताहिलेल प्रयास कएल जएबाक ओ जनतब देलनि । दिल्ली प्रसारित सरकार दुरदर्शनमें मैथिलीक स्थानलेल दिल्लीक मुख्यमन्त्री शीला दीक्षितके ज्ञापन पेश कएल जएबाक आश्र्वासन देलनि । श्याम भद्र मैथिली भाषाक अपन संचारमाध्यम हुअए से माग कएलनि । एहिलेल संगठित प्रयास करबालेल ओ कार्यक्रममे आग्रह कएलनि । बिहारमे अतिरिक्त भाषाके श्रेणीमे मैथिलीके राखल गेल कहैत भद्र रोष प्रकट कएलनि । मातृभाषाक श्रेणीमे मैथिली नई भेलासं विद्यार्थी मैथिली नई पढि रहल हुनक दाबी छन्हि । रंगकर्मी प्रमिला झा मेमोरियल ट्रष्ट घोंघौरक ट्रष्टी श्रीनारायण झा मैथिलमे प्रतिबद्धताक कमी हएबाक विचार व्यक्त कएलनि । हिन्दीमे लिखनिहार मैथिल स्रष्टा अपन मैथिली भाषामे किया नईं लिखैया नारायणक प्रतिप्रश्न रहनि । मैथिलीके समांग आ समान दुनु रहैत स्थिति सन्तोषजनक नइ रहल ओ कहलनि । अष्ट्‌म अनुसूचिमे मैथिली आबि गेलाक बाद आब सहज रुपे भाषा संस्कृतिक काज आगु बढए नारायण कहलनि । गोष्ठीमे मैथिलीलेल काज कएनिहार संस्थाक वर्तमान भूत भविष्यपर सेहो वक्तासभ बाजल रहथि । मैथिलीमे रंगकर्मक विकासके बात होइतो एहिमे काज कएनिहारके प्रोत्साहनलेल कोनो पक्षसं ध्यान नई देल गेल कहल गेल । प्रमिला झा नाटयवृति शुरु भेलाक बादो एक्कोटा नव पुरस्कार/वृत्तिक शुरुवात नई भ' सकल मैलोरंगक प्रकाश झा कहलनि । तहिना झा एकगोट मैथिल दोसर मैथिल पर विश्र्वास करए त सभ तरहक समस्या समाधान हएत कहलनि । मैथिलबीचके आपसी विश्र्वासके ओ विकासक मूलमन्त्रके संज्ञा देलनि । अन्तर्राष्ट्रिय मैथिली परिषदक कृपानन्द झा सरकारी स्तरपर मैथिलीके संरक्षण नई भेट रहल कहैत रोष प्रकट कएलनि । मैथिलीक संरक्षण लेल मिथिला राज्य स्थापना हुअए - झा कहलनि । मैथिली भाषा संस्कृतिदिश लागल संस्था आर्थिक संकटसं ग्रस्त रहल कहैत ओ गोष्ठीमे सहभागीके ध्यानाकर्षण करौने रहथि । विद्यापति संगीत संरक्षणलेल योजनाबद्ध काज हएब आवश्यक रहल गायिका अंशुमालाक विचार छन्हि । दिल्ली युनिवर्सिटीमे संगीतसं एम फ़िल क' रहल अंशुमाला विद्यापति संगीतले स्थापित करबालेल व्याकरणक आवश्यकता पर जोड देलनि । मैथिलीमे लोकसंगीत आ युवाबीचके दुरी बढब चिन्ताक विषय रहल ओ कहलनि । 'लोकसंगीत नई बुझनिहार लडकीसं वियाह नई करब एहन चलन हएबाक चाही' मैथिली संस्कृति संरक्षणलेल अंशुमाला सुझाव दैत बजलिह । गोष्ठीमे सहभागी रंगकर्मी अपन कथा ब्यथा सेहो सुनौने रहथि । दिल्लीमे रहिक' रंगकर्म क' संघर्षरत कलाकार बाध्यताबश गुणस्तरहीन काज क' रहल मैलोरंगक दीपक झा कहलनि । एहिद्वारे कलाकारके अपमानित करबाक काज कियो नई करए दिपकके आग्रह छन्हि । संस्कृति बचएबाक अभियान मिथिलाक सांस्कृतिक विरासतके संरक्षण सम्बर्द्धनक लेल योजनाबद्ध काज करबा पर जोड देल गेल अछि । मिथिलाक सांस्कृतिक विरासत : संरक्षण आ विकासक सम्भावना विषयपर बजैत वक्तासभ एहन विचार रखलनि अछि । मैथिली लोक रंग दिल्लीक आयोजनमे २५ दिसम्बरक' सम्पन्न मैथिलोत्सवमे बजैत वक्तासभ मैथिली संस्कृति रक्षाक लेल ठोस कार्ययोजना बनाओल जाए से कहलनि । मैथिलोत्वसमे भेल संगोष्ठीमे लोक नाटय, खानपान, हस्तशिल्प, लोक नॄत्य, लोक विश्र्वास, पुरातात्विक संरक्षण, चित्रकला, पाण्डूलिपि, पावनि तिहार, देवी देवता, रीति रिवाज, मठ-मन्दिर, पहिरन-ओढन, लोकसाहित्य, लोकवाद्य, शिष्टाचार,मेला सहितक विषयपर वक्तासभ बाजल रहथि । गोष्ठीमे कथाकार अशोक, कमलमोहन चुन्नु, नाटककार महेन्द्र मलंगिया, मोहन भारद्वाज, सीयाराम झा सरस, सुभाष चन्द्र यादव, गंगेश गुन्जन, मैथिली भोजपुरी एकेडमीक उपाध्यक्ष प्रो अनिल मिश्र, डा अनिल चौधरी, देवशंकर नविन सहित वक्तासभ मिथिलाक सांस्कृतिक विरासतक विभिन्न विषयपर बाजल रहथि । भारतीय भाषा संस्थान मैसुरक सहयोगमे मैलोरंग नयां दिल्लीक राष्ट्रिय नाटय विद्यालयमे कार्यक्रम आयोजन कएने छल। मैथिलोत्वसमे मैलोरंग रंगकर्मी प्रमीला झा नाटयवृत्ति सेहो वितरण कएलक । एहिबेरक नाटयवृत्तिक पओनिहारिमे पहिल मधुबनीक मधुमिता श्रीवास्तव, द्वितीय कोलकाताक वन्दना ठाकुर आ तृतीय दिल्लीक नेहा वर्मा छथि। रंगकर्मी प्रमीला झा नाटयवृत्तिक स्थापना प्रथम महिला बाल नाटय निर्देशक प्रमीला झाक स्मृतिमे भेल अछि । प्रमीलाक स्मृतिमे स्थापित प्रमीला मेमोरियल ट्रष्ट,घोंघौर एहि नाटयवृतिक स्थापना कएने अछि । मैथिलोत्वसमे संगोष्ठी, वृति वितरणक बाद सांगीतिक कार्यक्रम आयोजन कएल गेल छल । सांगीतिक कार्यक्रममे सुन्दरम, घनश्याम, दिवाकर, प्रभाकर, गुन्जन, अंशुमाला, कल्पना मिश्रा, राखी दास,रीतेस सहितक कलाकार दर्शकके मनोरन्जन करौने रहथि । उमेश कुमार महतो- पुत्र श्री केशव महतो, बहादुरगंज बहादुरगंज स’ रिपोर्ट बाढक स्थिति बडे खतरनाक रहल, आब कोना के ओ बीत गेल। हमर सभक गाममे कोनो राहत कर्मी नै अएला, नेता सभ चुनाव मे अबै छथ, मुदा रौदी दाही मे नै। गाममे सरकारी स्कूल अछि, सप्ताहमे दू दिन खुजल रहै ये, कशीबारी मे। चारि दिन बन्दे रहै ये, अहा पत्रकार छी हितेन्द्र भैया ई मुद्दा तैं भेजी रहल छी। गामक लोक खेती बारी करै ये , धान,गेहूँ परवल खीरा, करैला, कद्दू ,तारबूज ,गोभी, बैगन आ मछली मारै ये। विराटनगर नेपाल मे सेहो लोक सभ सम्बन्धी सभ छथि, 20 किमी दूर बहादुरगंजमे हास्पीटल अछि, गाममे झोलाछाप हास्पीटल अछि जे झोलाछाप डाक्टरक झोरामे रहै ये। पिछला साल एक गोटे के बहादुर गँज हास्पीटल् ले गेलौ, डाक्टर सभ पानी चढा देलकै , तीन दिन तक पानी चढैते रहलै, कियो खेनाइ नै देलकै, ओ पेट फूलि क मरि गेल। घर सभ फूसक आ घासक, धानक पुआरक बनल छै, अगिलग्गेमे से सभ जरैत रहैत छै। एक-एक्अ आदमी के 5-6 टा बच्चा जिबैत रहैत छै, 9-10 बच्चामे। विराटनगर लग गाम मे मौसाक घर गेलौ, ओतए सरकार मैथिली या नेपाली बाजय लेल कहने अछि, सभ गोटे ओत मैथिली बाजै छथि, भारतमे स्थिति खराप। नेपालमे मैथिली के नीक स्थितिक कारन अछि ओतुक्का मैथिली मात्र मैथिल ब्राह्मन आ कर्न कायस्थ मे सीमित नै अछि, ओतय महतो यादव सभ मैथिली के अपन बुझैत छथि. भारतमे कतेको ठाम मात्र दू जातिमे सीमित अछि, तेसर के अशुद्ध कहल जै छै से ओ अपनाके मैथिली से दूर केने छथि,जाति-पाति से अपन उन्नति जे हुए मुदा समाजक उन्नति नै हैत,जाति-पाति से मैथिलीक उन्नति नै हैत,जाति-पाति से मिथिला के उन्नति नै हैत जाति-पाति से कुंठाग्रस्त लोक नीक रचना नै लिखि सकताह आ घृनामे जरैत रह ताह। नेपालमे घर फूसोके छै मुदा बेसी लकडी आ टीना के छै। ओत खेती बारी भारते जेका छै। ओतहुओ हास्पीटल दूरे छै। ओते रिक्शा टेम्पू नै चलै छै, खाली बस चलै छै। ओत गाम्मे सेहो बिज्ली छै, गाममे मुदा रोड नै छै, ऊबर खाबर छै, बरसातमे कीचड्क्ष भे जाइ छै। शहरमे रोड ठीक छै। विराटनगर से 20 किलोमीटर दूर नया बजार हटियामे आधा बजार मे बजार आ आधामे दारू बिकाइत छै, जतए छोट से पैघ बच्चा सभी दारू पीबै छै। आर समाचार बाद मे। अनलकान्त (१९६९- ), मैथिली त्रैमासिक "अंतिका"क सम्पादक। हिन्दीमे दूटा कथा संग्रह प्रकाशित। कबइ-इच्छा अगस्त, १९९२ श्रीकान्तक दोकान मे सभ साँझ छोट-मोट महफिल जमैत छलै । जाहिमे ओहि बीच लगातार तीन दिन धरि आरएल उर्फ रतन लाल सेहो, सँझुका पहर बुलै लेल बहराय तँ, शामिल भ’ जाइ छल । साल-दू साल पर आरएल जहिया कहिया कहियो एम्हर अबै छल, एहि महफिलक शोभा बड़ेबाक अवसरि ओकरा प्राय: भेटि जाइ छलै । एहि बेर कने बेसी आ नियमित छल । से एहू लेल जे एक तँ बेसी दिन पर आयल छल, दोसर सासुरक स्थिति सेहो बदलि गेल छलै । दुनू सारक बीच बाँट-बखरा भ’ गेल छलै । करजाईन बजारक पुरना दोकान जाहि मे रेडियो-टीवी मरम्मतिक काज होइ छलै जेठका श्रीकान्तक फाँट मे आयल छलै । छोटका मदन अपन नव आ भव्य इलेक्ट्रॉनिक्सक दोकान नवे जिला बनल शहर सुपौल मे शुरू कयलाक बाद सपरिवार ओतहि रह लागल छल । करजाईन बजारक सटले गाम गोसपुर सँ मदनक सम्बन्ध टूटि जकाँ गेल छलै। साल मे दू-एक बेर आम-कटहर आकि उपजाक हिस्सा लेव’ सन काज सँ अबैत रहै । श्रीकान्तक परिवार गामे छलै । ओ नित्य भोरे घर सँ दोकान अबैत आ खूब राति केँ घर घुरैत । इलाहाबाद मे बैसि गेल आरएल सन खानदानी दरभंगिया बिना प्रयोजने एते दूर सासुर जाइवला कहाँ ! ई तँ ओकर सासुक अचानक गंभीर रूपेँ असक पड़ब आ कनियाँ विभाक फालतू जिदक कारणेँ आब’ पड़ल रहै । ओना विभाक जिदक मोकाबिला क’ सकबा जोग बहाना तँ बना सकैत छल ओ, मुदा एक टा गलती उत्साहवश अनजाने मे ओकरे सँ भ्’ गेल छलै । भेलै ई जे एक दिन ऑफिस विदा होइ काल वोभा एक किलो एअसगुल्लाक फरमाइश क’ देलकै । तत्काल तँ ओ कोनो ढंगक उतारा धरि नइँ द’ सकलै, मुदा साँझ मे घुरल तँ दू किलो रसगुल्लाक संग !... महँगी आ तंगी सँ गड़बड़ गणितक चलते जे आर्थिक किच-किच आ कृपणता स्थाइ भाव बनि गेल छलै ओहि मे आरएलक ई अप्रत्यशित उदारता दुर्घटना साबित भ’ गेलै । बहस आ आरोप-प्रत्यारोप मर्यादाक सभ सीमा नाँघि गेलै आ आधा राति धरि कानब-खीजब, रुसब-फुलब संग चलैत वाक्-युद्धक कारणेँ रातुक भोजन सेहो स्थगित भ’ गेलै । ई सभ सहि क’ भुखलो सुति सकै छल ओ, मुदा सुतैत काल विभा तेना ने नाक सुड़कैत हिचकब शुरू कयलकै जे ओकरा आत्म-समर्पण करहि टा पड़लै । एहने क्षण मे कयल करारक कारणेँ सासुक जिज्ञासा मे सासुएअक ई यात्रा आरएलक कपार बथायल छलै । देह-धर्म लेल निरोध-सम्बन्धी खर्च पर जे बीस बेर मनन करैत हो, तकरा लेल एहि यात्राक खर्च !... जे-से, सासुर अबै आकि एहि सँ पहिनेक घटना सभ आरएल लेल रहल-खेहल छलै । सार सभक बीच भेल बाँट-बखरा आकि सासुक असक पड़लाक बाद श्वसुरक रंग-रभस मेभेल प्रगति सेहो कोनो नव बात नइँ छलै । विभा तँ कीर्तिमान बनेबे कयलक, मुदा ओकरा बुझैक शक्ति, नव ऊर्जा आ उत्तेजना जाहि स्त्री सँ आरएल केँ भेटलै तकरा ओ कखनो बिसरि नइँ सकल । भेलै ई जे आरएलक पहुँचला पर पहिल साँझ दारू आ मुरग फ्राइक खर्च उठब’वला जाहि दू टा चिक्कन मुल्ला केँ फँसाक’ श्रीकान्त अनने छल, ओ दुनू दूए पेग मे बहक’ लगलै । दू पीस पहिनहि एक टा खाकी लिफाफ मे फराक क’ कतहु पठा देने छलै श्रीकान्त । बाकी मे सभ कने-कने टोंगने छल कि प्लेट मे बचल अंतिम टुकड़ी लेल सभ एक-दोसरा केँ ’अहाँ लिअ’ अहाँ लिअ’?...’क अनावश्यक आग्रह कर’ लागल । ताहि पर पहिल मुल्ला दोसर सँ कहलकै, “एखने एक प्लेट आरो आबि जाइ तँ सभ सँ पहिने टाँग तोकीं घीचमें!” “खाय नइँ सकै छी, से तँ नइँ कहलियौ हम ? आधा किलो तँ आराम सँ आरो खा सकेते छी!” दोसर गुल्ला बजलै । “हम तीन पाव आरो ख सकै छी ।“ पहिल कहलकै । “हम तँ सवा किलो मे एक्को टुक नइँ छोड़ि सकै छी ।चाटि-पोछि क’ खत्म क’ देबौ । नइँ खा सकबौ तँ एक सय टाका जुर्माना ! जाँच कर’क हौअ ककरो तँ ऑर्डर द’ सकै छें!” श्रीकान्त कहलकै । “हम दू किलो मे एक्को टा पातर सन दड्डी धरि नइँ फेकब । नइँ खाय सकलौ तँ पन्द्रह दिन मुफ्त खटब ।...चलू पूरा महीनाक दरमाहा काटि लेब ।“ मेवालाल चहकैत बाजल । “चुप हरामी! दू किलो मुरगा एक थारी मे परसल कहियो देखबो केलही ?” श्रीकान्त डाँटि केँ बरजलक । सभक अतृप्त क्षुधाक ध्यान राखि आरएल सन मक्खीचूसोक मन कयलकै जे एक प्लेट अपना दिस सँ मँगवा दै । मुदा नमरी बहरेला पर एक्को पाइ वापस नइँ भेटबाक आशंका सँ ओ चुप्पे रहल । दोसरो केओ साहस नइँक’ सकल ।...सभक मन छोहायलै रहलै । दोसर साँझ एक टा बूढ़वा मुल्ला केँ फँसौने छल श्रीकान्त आ दारूक संग डेढ़ किलो रेवा-बचबा माछ फ्राइ करबाओल गेल छलै । आरएल अझक्के देखलक, किछु माछ एक टा खाकी लिफाफ मे राखिक’ श्रीकान्त स्वयं दोकानक पछुआड़ दिस गेल छल । घरिक’ पेग बनौलक आ सभ गोटे कौआ-चिल्हा जकाँ बेसी सँ बेसी माछ झपटैत दारूक घोंट लेब लागल । जखन गिलास-प्लेट साफ भ’ गेलै, तँ काज-धंधाक संग गप्प हँकैक दौर शुरू भेलै । गप्पक विषयक ओना तँ कोनो सीमा नइँ छलै—गाम-घर आ बजारक बदहाली सँ राजनेताक दलाली धरिक चर्चा एक समान भ रहल छलै—मुदा बेसी बात घुमि-फिरिक’ खायबे-पीब पर आबि जाइ छलै । सहसा तखने सभ सँ बेसी माछ उदरस्थ क चुकल खूस्सट बूढ़वा कहलकै, “एहि पर सँ रसगुल्ला भेटि जाइत, तँ आनन्द आबि जाइत !...पचास तँ एक साँस मे गटकल जा सकै छै ।“ “हम तँ पचहत्तरि धरि एम्हर-ओम्हर नइँ ताकब ।“ श्रीकान्त लेर खसबैत बाजल । “हम एक सय नइँ खाय गेलौ तँ एक मास मुफ्ते खटब ।“ मेवालाल उत्साह सँ भरिक’ कहलकैओ । “चुप हरामी ! हरदम हमरा सँ बढ़िए क’ बाजत !...कहियो एक सय रसगुल्ला देखबो कयलही?” श्रीकान्त दहाड़लक । आरएल गौर कयने छल जे एहन गप्प जखन-जखन छिड़ैत, मेवालाल सरिपहुँ सभ सँ बड़िक’ बाजी लगबै छल आ श्रीकान्त कखनो डाँटब बिसरैत नइँ छल । ओहि साँझ घर घुरैत काल रस्ता मे मेवालालक मादे श्रीकान्त सँ फैल सँ पूछताछ कयने छल आरएल । शुरू मे तँ श्रीकान्त गुम्मी लाधने रहलै, मुदा फेर नीक जकाँ बतौनहुँ छलै, “आसल मे मेवालाल आदमी तँ बड़ काजक यए! खूब हुनरमंद सेहो, मुदा व्यवहार सँ तेहने चटोर आ अहदी!...चलबैऐ भरि दिन रिक्शा, मुदा दारू आ नीक-निकुत तरल-बघारल रोज चाहीएकरा । घरवाली आ तीन-तीन टा बेटी छै, तकर चिन्ते ने एक्कोरत्ती !...ई तँ मदनक कृपा जे आइ ओ हमरा संग ऐश क’ रहकऐ !...” किछु क्षण बिलमि ल’ भेद खोललक, “भेलै ई जे एक दिन ओ हमरा दोकान आयल आ एक टा एहन रेडियो जकरा ठीक करैत हम हारि गेल रही, ओ पाँचे मिनट मे चालू क’ देलकै । हम पुछलिऐ, ई काज कहिया सीखलही ?’ तँ बतेलक जे मदनक दंग उठैत-बैसैत किछु गुण पाबि गेलिऐ भैया!’...असल मे पहिने हम तँ कमे दोकान पर बैसैत रहिऐ । बाबूजीक बाद मदने सम्हारने रहै ई पूरा कारबार । बीन भेलाक बाद कपार पर अयलै, तँ...। तैयो की? हम तँ एखनो कमे काज ठीक-ठीक क’ सकै छिऐ । एहि हरामी मेवालाल केँ हमरा सँ बेसी इल्म आ अनुभव छै, मुदा से पता आ विश्वास नइँ छै ओकरा ।“ एही संग अनायास खूब जोरगर ठहाका मारलक श्रीकान्त आ धनुखटोलीवला मोड़ पारक फेर कह’ लागल, “...तेँ हम साँझ टा केँ तीन घंटा अपना संग बैसायब शुरू कयलहुँ, र्तान-चारि मास सँ । पन्द्रह टके रोज, उपर सँ दारू-नाश्ता फ्री!...मंगल-मंगल हाटरोज एकर घरवाली एक सय पाँच टाका ल’ जाइ छै । दिन भरि रिक्शा सँ जे होइ छै, सेहो दारू मे नइँ उड़ै छै आब! दिन घुरि रहल छै ।...” “तीन घटा मे अहाँ केँ ई रोज कतेक लाभ दै यए?” आरएल पूछलकै । “रोज एक्के रंग तँ नइँ होइ छै, तखन ई बुझियौ जे डेढ़-दू सयक एकन कज क’ए दै छै जकरा पहिने हम घुरा दै छलिऐ ।“ श्रीकान्त सहज ढंगेँ कहलकै । “तखन होलटाइम किऐ नइँ राखि लै छिऐ?” तह धरि जयबा लेल आरएल आरो कुरेदलक । “असल मे तक्लर कैक टा कारण छै । एक तँ छोट बजार, ओतेक काजे नइँ अबै छै । दोसर, सभ सँ पैघ बात ई जे दिन भरि काज कयने एकरा पता चलि जयतै जे ई हमर कतेक काज करै छै। आ ईहो जे कतेक जनै छै । तखन भ’ सकै छै जे बेसी पाइ माँगय आकि मदन सँ मीलिक’ अलग काज शुरू क’ दिअ’ आकि ओकरे लग चलि जाय तेँ हम एकरा ग्राहक सँ नइँ बतियाब’ दै छिऐ, नइँदिन मे काज लै छिऐ आ बिना दारूक सेहो नइँ। दारू पीबि ई की बाजै आ करै छै से हमरा जनैत बाद मे एकरा मन नइँ रहै छै ।...” आरएल आरो किछु पूछ’ चाहै छल, ताबत घर आबि गेल रहै । तेसर साँझक महफिल मे थानाक हवलदारक संग एक टा स्थानीय नेता सेहो छलै जे विधानसभाक टिकट लेल एक संग कतेको पाटी मे जोर अजमाय रहल छलै । एहि साँझक खर्च श्रीकान्ते केँ उठब’ पड़ल छलै। एहू साँझ आरएल ध्यान देने छल जे जलखै मे मँगाओल आमलेट-भूजा आ सलाद-पकौड़ी मे सँ किछु अंश ओही लिफाफ मे अलग क’ पैकेट श्रीकान्त स्वयं पछुआड़ दिस ल’ गेल छल महफिल समाप्त भेला पर पान खयलाक बाद नेता आ हवलदारक संग लागल श्रीकान्त जखन थाना दिस चलि गेल, तँ मौका पाबि ओ मेवालाल सँ पूछलक, “अहाँ सँ एक-दू टा बात पूछ’क मन होइ यए । जँ अहाँ बेजाय नइँ मानी तँ...? “यौ मेहमानजी, अहाँ तँ चौहद्दीबान्ह’ लागलिऐ ! सोझे मुँहेँ पूछू ने, जँ फूसि कही तँ बहिन चोद होइ, देह काज नइँ आबय!” मेवालाल कड़कि क’ बाजल । “तीनू साँझ देखलहु मुरगा, माछ, अंडा जे किछु आयल, तकर एक हिस्सा एक टा लिफाफ मे अलग क’ श्रीकान्तजी पछुआड़ ल’ गेलथि। से ककरा लेल ?” आरएल नहुए पूछलकै । अगिला प्रश्न पर जाइ लेल शुरुआत यैह ठीक लगलै ओकरा । मेदालाल कान लग फुसफुसाक’ बाजल, “एहि मकानक मालकिन पछिला साल भरल जवानी मे विधवा भ’ गेलि । पति फौज मे रहै, बोर्डर पर बर्फ मे गुम भ’ गेलै । बेचारी ब्राहाणी ई सभ कोना बना-खाय सकतै?तेँ श्रीकान्त जी चोरा-नुका...” आओ मुस्किआब’ लागल । किछु क्षण बाद फेर हीं-हीं करैत ओ आरएल दिस तकलक, “एक टा बात कही, प्रेम मे कमीना सँ कमीना प्राणी सेहो मनुक्ख भ’ जाइ छै!...नइँ बुझलिऐ मेहमानजी?” “बुझलहुँ-बुझलहुँ!” प्रकटत: तँ आरएल मुस्किआ देने छलै, मुदा भीतर सँ सरकि गेल रहय । किछु क्षण पहिने धरि ओहिस्त्रीक प्रति आरएलक भीतर जे भाव छलै, से अनायास बदलि गेलै । सहसा ओहि स्त्रीक प्रति सम्मान सँ भरि गेल छल ओ । फेर पूछने छल, “अच्छा, एक टा आर बात कहू ! तीनू दिन हम देखलहुँ जे अहाँ मुरगा, माछ, रसगुल्ला सब मे सभ सँ बेसी खाइक बाजी लगा लैत छी । ई कहू जे घर मे रोज कते खाइ छिऐ ?” अचानक मेवालाल गंभीर भ’ गेल ! किछु क्षण चुप रहिक’ ओ बाजल “मेहमानजी हमहू अही सभ जकाँ खाइ छी । कने भात कि एकाध टा रोटी बेसी !...सैह, कोनो हाथी-घोड़ा नइँ ! अहाँ ईहो बुझ चाहै हैबै जे घर मे हमर पेट भरै छै कि नइँ ? भरै छै मेहमानजी, भरै छै! हमहू भरि पेट खाइ छी, हमर घरवाली आ बच्चा-बुतरू सब सेहो ।...कहियो-कालक बात छोड़ि दियौ, से बहुतो केँ होइ छै। हँ, रसगुल्ला आकि मुरगा सन चीज भरि मन कहियो नइँ खेलिऐ । नइँ जानि कहिया सँ ई लौलसा लागल यए, से कहियो-काल निसाँ मे भरमिक’ किछु बोलि दै छिऐ । मुदा कैथ-बाभन आरू केँ देखियौ, बराती मे जते खायत नइँ तते छुतायत । तैयो हरदम खाइ लेल लेर चूबबैत डिंग हाँकैते रहत !” आरएल चुपे रहल । आक्रोश सँ भरल मेवालांलक ठोर काँप’ लगलै । सोझाँ मे खुजल रेडियोक पोइन्ट्स चेक करैत, राँगा हटबैत-लगबैत, रेडियो पर आबि रहल गीत बजैत आ बंद होइत रहलै । ओहि रेडियोक काज पूराक’ सहसा ओ फेर बाज’ लागल, “मेहमानजी, खाइ केँ ल’क’ हम गपो मारै छिऐ तँ एक मासक दरमाहा दाव पर लगा क’ । कियो हिम्मती कखनो तैयार भ’ गेल आ हम किनसाइत हारियो जायब, तँ एक बेर भरि मन रसगुल्ल खाइक मनोरथ तँ पूर भ’ जायत ने !” “चलू हम खुआबै छी । देखै छी, कते खाइ छी अहाँ ?” “नइँ मेहमानजी, बिना बाजी लगौने नइँ खायब हम । फेर आइ सयवला भूखो नइँ यए, नइँ तेहन मूडे ।...” ओ रेडियो मे नजरि गड़ौने बाजल । आरएल केँ अफसोच जकाँ भेलै जे ओ बेकारे ओकर घ कोड़ि आहत क’ देलक । तेँ संयत स्वर मे पूछलकै, “आइ कते ? पचास तँ खाय लेब ने, बिना रस गारने ?” “साठि खाय् लेब, मेहमानजी!” “चुप हरामी!” तखने घुरिक’ आयल श्रीकान्त अनचोके दहाड़लक । मुदा आरएल हस्तक्षेप कयलक, “श्रीकान्तजी अकाँ शान्त रहू । आइ हम खुएबे एकरा । मँगबाउ सामनेक दोकान सँ ।” “शर्त की छै?” श्रीकन्त सेरायल स्वर मे पूछलकै । “तय क’ लिअ’!” ओ डराइते-डराइत बाजल । “जँ नइँ खाय सकल तँ एक सय बीरा रसगुल्लाक दास एकरा दरमाहा सँ काटिक’ अपना सभ दारू-मुरगा आ रसगुल्ला खायब । आ, जा धरि अपन सभ खायब? एकरा कान पकड़िक’ उठ-बैसि करैत रहय पड़तै ।...पुछियौ, शर्त मंजूर छै?” श्रीकान्त नजरि फेरिक’ बाजल। “मंजूर छै!” मेवालाल पूर्ववत गंभीर आ कड़क आवाज ने बाजल, “जँ खाय गेलौ, तँ ...?” “इनाम मे स्पेशल पान!” श्रीकान्त मुश्किल सँ तामस दबवैत कहलक । आरएल किछु बाज चाहैतो पत्नीक जेठ भाइक लिहाज क’ चुप्पे रहल । मेवालाल सात मिनट मे छप्पन रसगुल्ला खयने छल कि ओकरा आँखि सँ नोर झहर’ लगलै । आरएल पूलकै, “कि भेल मेवालाल?” “मेहमानजी, पछिला दशहरा दिन हमर जेठकी बेटी रसगुल्ला लेल जिद पकड़ि लेलकै । तमसा क’ हम दू-तीन चाट मारि देलिऐ । पाइक तेहन दिक्कति रहै जे...। से ओकर माय राति भरि झगड़ैत रहलि जे अपना दारू लेल एकरा पैसा होइ छै, बेटी केँ एक टा रसगुल्लाक बदला पबनियो-तिहार केँ थपड़े ! अपना जीह पर साँप नइँ कटा होइ छै!...तहिया सँ कते बेर सोचलिऐ जे कहियो ल’ जायब रसगुल्ला । सात मास बीति गेलै, नइँ ल’ जा सकलिऐ । जेना भेलै, हम तँ गपागप गिड़िए रहल छिऐ!...” एते कहैत-कहैत ओकर हिचकी जोर पकड़ि लेलकै आ नोर झहरब आरो बढ़ि गेलै । प्लेट मे बचल चारो रसगुल्ला अखाद्य वस्तु जकाँ पड़ल ओत’क वातावरण केँ भारी बना देने छलै । “खा नइँ सकलें ने तों! बाजी हारि रहल छें । आब चुर्माना लागि जयतौ ।” श्रीकान्त ओकरा जरल पर नोन छिटैत बाजल । मुदा तखने दोकानक बाहर देबालक निकट अचानके आबिक’ ठाढ़ि भेलि आमक फाड़ा सन-सन आँखि वाली गोर-नार युवा स्त्री केँ देखतहि ओकर पारा नरम भ’ गेलै । आरएल केँ सहसा खाकी लिफाफ सभक स्मरण अयलै !... एखनो ओकरा प्रति सम्मनक भाव सँ भरल छल ओ । “नइँ, हारलौं नइँ! ई चारि टा की, खा तँ सकै छी पाँच-दस टा आरो। हम प्रेम सँ कहलौं, जँ हारि नइँ मानी तँ ई चारो रसगुल्ला घर लेल ल’ जाइ । तीन टा तीनू बेटी आ एक टा...।“ मेवालालक बोली लड़खड़ा गेलै आ सरिपहुँ हिचकि-हिचकिक’ कानय लागल ओ । ओत’ ठाढ़ि कोशी-कमलाक बाढ़ि जकाँ दलमलित करयवाली स्त्री आब दोकानक भीतर मेवालालक लग आबि गेलि छलि आ किछु बाज’ जा रहलि छलि...! ...कि ठीक ओही क्षण गाम सँ एक टा छौंड़ा दौड़ल हाँफैत अयलै आ हकलाइते जेना-तेना श्रीकन्तक कान मे किछु कहलकै । फेर श्रीकान्त आरएल दिस तकलकै—एक संग तामस, घृणा, धिक्कार, दया आ प्रार्थना भरल नजरि सँ ! आरएल तखन किछु बुझि तँ नइँ सकल छलै, मुदा कोनो पैघ अनहोनीक आशंका जरूर ओकरा कँपाब’ लागल छलै । तुरंत मेवालाल केँ चाभी थमा, दोकानक सभ टा जिम्मेदारी ओकरा पर सौंपि, श्रीकान्त बाहर भेल छल । श्रीकान्तक पाछू-पाछू संशयग्रस्त डेगेँ आरएल सेहो बहरायल रहै । गाम सँ आयल छौंड़ा केँ रोकिक’ ओत’ ठाढ़ि स्त्री घटनाक मादे खोदबेद कर’ लागलि छलि । मुदा झट-पट सभ बात उगलि छौंड़ा सेहो दौड़िक’ हुनके सभक पछोड़ ध’ लेने छलै। दौड़िक’ आयल छौंड़ाक पयरक धमक पर आरएल पाछाँ तकलक । ओकर नजरि छौंड़ा केँ पार क’ दोकान मे ठाढ़ि स्त्री पर गेलै—ओ स्त्री मेवालालक आरो लगीच जा गप्प करैत रोमांचक मुद्रा मे फ्रीज भ’ गेलि आरएलक स्मृति-पटल पर । किछुक काल बाद आरएल केँ गामक घटना मादे जानकारी देने छलै श्रीकान्त ।...जे विभा अपन मोटरकार वला बहनोइक संग हुनका गाम माछ खाय लेल भागि गेल !... आरएल केँ एतबे मन पड़ल छलै तखन जे ओकर साढ़क गामक कबइ बड़ मशहूर छै । वैह कबइ जे पानि सँ बहराय गाछ पर चढ़िक’ हवाखोरी करैत छै!...वैह जीवट कबइ!...मुदा...। आ यैह सभ सोचैत कखन घर पहुँचल आ कोना बेहोश भ’ गेल छल आरएल, से सभ किछुओ मन नइँ छै ओकरा !.... ११ अगस्त, २००२ आरएलक छोटकी बेटी नीनाक पहिल बर्थ-डे छलै । साँझ उतरि रहल छलै—एखन ओते सघन अन्हार नइँ भेल छलै, मुदा बाहरक ओसरा मे अन्हारक आभास होअय लागल छलै । ओसराक आगाँ लॉन मे आरएलक पिता एकसरे बैसल खाँसि रहल छलाह । नै सालक बेटी नीरा आ पाँच सालक बेटा रून्नू अपन दोस्त सभक संग भीतरका कोठली मे चहल-पहल मचौने छल जत’ बर्थ-डेक सजावटिक संग नीनाक साज-श्रृंगार सेहो भ’ रहल छलै । पड़ोसक एक टा सहेलीक संग किचन मे व्यस्त रहलाक बादो विभा गुनगुना रहलि छलि। मुदा बाहरक ओसरा मे कतेको साल बाद भेटल अपन एक टा पुरान मित्रक संग रहलाक बादो आरएल उदास छल । दस साल पुरान कैसेट जहिना समाप्त भेलै, आरएल चुप भ’ कतहु दूर हेरायल-हेरायल जकाँ भटक’ लागल छल । सहसा ओ दोस्त आरएलक ध्यान भंन करैत चुप्पी तोड़लक, “मीत, ई कह’ जे एहन की बात भेलै तकरा बाद जे तों ओहि घटनाक सदमा सँ आइ धरि उबरि नइँ सकलह? एहि सँ बढ़ियाँ तँ ई होइतह जे तों ओही समय तलाक ल’क’ अलग भ्’ जयतह । एना घुटु-घुटि क’ तिले-तिले मरैत रहब...?” किबीचे मे दोस्त केँ रोकिक’ आरएल बाजल, “नइँ-नइँ, तों नइँ बुझलह मीत ! तों बुझियो नइँ सकै छह! बिलकुले ने बुझि सकलह तों हमर पीड़ा!...” फेर किछु क्षण रुकिक’ ओ कहलकै, “असल मे महत्त्वपूर्ण ई नइँ छै जे माछ खाय लेल ओ भागलि आ भागिक’ कत’-कत’ गेलि !...आकि एकसरे भाइक बुतेँ किऐ नइँ घुरलै आ घुराब’ लेल के-के गेलै आ कोन-कोन तरहक शक्तिक जरूरति पड़लै?...ई सभ कोनो बात नइँ...महत्त्वपूर्ण ई छै जे घुरिक’ अयलाक बाद ओकरा अपन कयल पर पछतावा आकि हीनताबोध नइँ भेलै । महत्त्वपूर्ण ई छै जे हम दबिक’ रहलहुँ तँ रहलहुँ, ओकर ठसक बरकरार छै!...हम ओकरा छोड़’क बात निश्चिते सोचि सकै रही, मुदा नइँ सोचलहुँ! जनै छह, किऐ?” क्षणभरि बिलमि फेर वैह कह’ लगलै, “श्रीकान्तक दोकान मे जे विधावा भेटलि छलि, ओ हमरा ई अकील देलक जे मनुक्ख सरिपहुँ जीवित अछि तँ ओ अपन भूखक कारणेँ । आ भूखक सम्,मान लेल जरूरी छै ओहि दिशा मे रुचि आ कबइ सन इच्छा । हमरा तँ एहि बातक गौरव अछि जे हम ओहि स्त्रीक पति छी जे बदनामीक हद धरि जाक’ ओ अपन भीतरक मनुक्खक रुचि आ इच्छाक पाँखि कतरब नइँ जानलक । दुख मात्र एतबे जे हम एहि गौरव केँ भीतर सँ स्वीकार करैतो व्यवहार मे नइँ आनि सकलहुँ, तेँ अपन इच्छाक पाँखि उठेबा मे असमर्थ होइक दंड भोगै छी।“ फेर एक टा पैघ सन चुप्पी पसरि गेलै जकरा तोड़बाक इच्छा दुनूक भीतर जीवित होइतो, साइत अपन सामर्थ्य गमा चुकल छलै। आ, दुनूक बीच टेबुल पर राखल खाली कपक अलावा नाश्ताक प्लेट मे दू तिहाइ सँ बेसी बचल पकौड़ी सेराय गेल छलै । एत’ आ ओत’ आइ-काल्हि कनाट प्लेस मे चलैत-चलैत हमरा लगैत अछि, अपना गामक दशहरा·मेला मे घूमि रहल छी। नइँ, ओत’ मेला मे रंग-बिरही चीज कीनि पबैत रही, नइँ एत’ शो-रूम मे ढुकि पयबक साहस क’ पबै छी। किलोक किलो रसगुल्ला-जिलेबी तौलबैत आकि मारते रास खिलौना ल’क’ जाइत लोककेँ डराइत-ललचाइत देखैत रही ओत’ आ एत’ विशाल-भव्य मॉल आ नेरुलाज-मैकडोनाल्ड सँ चहकैत फुदकैत बहराइत अर्द्धनग्न अप्सरा केँ इन्द्र-बेर संग रभसैत, डेटिंग फिक्स करैत ईर्ष्या आ क्रोध सँ देखै छी। राष्ट्रपति भवनक पिछुआडक जंगल मे एक दिन एक टा बेल गाछ लग कनेकाल ठमकल रही। ओकरा जडि़ मे किछु माटिक महादेव फेकल छल, किछु निर्माल्य आ कातक झोंझि मे कोनो साँपक छोड़ल केंचुआ पुरबाक सिहकीमे डोलि रहल छल। हमर आँखि क्षणभरिक लेल मुना गेल। ओत’ एहने सन एकटा बेल गाछ तर हमर बालपनक प्रियाक गर्दनि भूत मचोडऩे छलै। ओकरा मौनी मे कामधक चूड़ा ओहिना नजरि पड़ै अछि!... मुदा हम कतहुँ हेरायल-भोतिआयल नइँ रही।हम राष्ट्रपति भवनक पिछुआडि़क जंगल मे ओही बेल गाछ लग ठाढ़ रही। हमराओही आसपास मे एक टा अस्तबलक रिपोर्टिंग करबाक छल जत’ सँ करिया घोड़ाक नालक स्मगलिंग होइत छलै। से ओहि बेरहट-बेरा मे भुखायल सन हम अपन रिपोर्ट पूरा करबाक ओरिआओन क’ रहल छलहुँ कि अचानक एक टा गमक हमरा विचलित क’ देलक। गाम मे नवका धान-चूड़ा कुटैकाल जे गमक बहराइत छल, एकदम वैह गमक छल! आसिनक बसात अगहनी भ' गेल छलै।... मुदा हमर मन बताह हेबाक सीमा धरि अवसादग्रस्त भ' गेल। ओहिना एक साँझ कुतुब मीनार लग सँ गुजरि रहल छलहुँ। एक टा छौंड़ी अपन संगी छौंड़ा केँ जोर-जोर सँ बता रहल छलै जे ओकर सपना मीनारक एकदम ऊपर सँ दिल्ली देखैत रहबाक छै। हम सर्दिआयल भुइँ पर लगाओल पुआरक सेजौट परक सपना मन पाडय़ लगलहुँ कि तखने हमरा मोबाइल पर बीड़ी साँग बाजल। छोटकी मामक फोन छल। ओ कनैत-कनैत बाजलि, ''देखियौ यौ भागिन बाबू, आब हम की करबै!... बैमनमा सब हुनका सी.बी.आई. सँ पकड़ा देलकनि। फुसियेपाइ लेबाक नाटक मे ओझराक'...।" हमर मामा इनकम टैकस कमीशनर। हम एक-दू बेर गेल छी हुनका 'रेजीडेंस' पर, मुदा हमरा डेरा मोबाइल पर हुनका लोकनिक सर्दिआयल स्वर आ किछु एसएमएस टा आयल अछि। तखन अपना भीतरक भाव नुकबैत हम की आ कोना बाजल, से मन नइँ अछि। हमर अदना-सन पत्रकार काज नइँ अयलनि, अपने पाइ वा जे कथुक एकबाल!... से बात जे-से। मोबाइल स्वीच-ऑफ क' हम जेब मे रखनहि रही कि हमर मन-प्राण एक टा टटका गमक सँ सराबोर भ' गेल। धनिया, सरिसो सभ देलाक बाद झोर मे टभकैत माछक तीमन सँ घर-आँगन मे जे गमक पसरि जाइत छै, सैह गमक हमरा मतौने जा रहल छल। हम अगल-बगल हियासल जे कतहु ककरो घर वा झुग्गी मे रन्हा रहल होयतै, मुदा ओहि झोलअन्हारी मे हमरा चारूभर जंगल-झाड़ आ करकटक अम्बार छाडि़, किछु तेहन नइँ देखा पड़ल जत' ओहि गमकक स्रोत ठेकानि सकितहुँ। अंतत: हम अपन जेब मे हथोडिय़ा देब' लगलहुँ जे माछक इंतजाम भ' सकै छै वा नहि!... हाले मे हम अपन सेठक कृपा सँ महीनबारी गुलामी सँ मुक्त कयल गेल छलहुँ। आब हम तथाकथित 'स्वतंत्र' दिहाड़ी मजदूर छी। आ दिहाड़ी पर खट'वलक कपार मे जे बौअयनी लिखल रहै छै, से हमरो संग छल। आ तेँ ओत' सँ एत' आयल मैथिल लोकनि सँ भेंटघाट सेहो किछु बेसी भ' रहल छल। से एक टा एहने भेंट मे हमर एक ग्रामीण कहलनि, ''बाउ, ई नगर तेजाबक नदी थिक जाहि मे अपन मैथिले टा नहि, कोनो मनुक्ख बाढि़ मे भसिआइत माल-जाल, घर-द्वार आ लोकवेद जकाँ निरुपाय अछि।" कि मधेपुरा-सिंहेश्वर दिस सँ आयल एक टा युवक बाजल, ''हौ भैया!,बाजार, मशीन आ सीमेंट तर दबैत-मरैत लोकक नगर छियह ई।" ''हँ, भाइ, ठीक कहलह! मुदा ओत' दलदलो मे जकरा जगह नइँ भेटलै, ओ एत', बारूदक ढेरी पर सही, एक टा नव मिथिला तँ बसबै छै!..." बजैत-बजैत हम हकम' लागल रही आ भीतर पसेना-पसेना भ' गेल रहय। से लगातार एहने सन मन:स्थिति सँ गुजरि रहल छलहुँ हम। आ, यैह पछिला पखक गप्प थिक। एक साँझ विद्यापति बाबाक बरखीक हकार पूर' हम नोएडा गेलहुँ। ओत' बहुत दिन पर भेटलाह, बतौर कलाकार दरभंगा सँ आयल मिथिला नरेशक अंतिम पुरोहितक परपौत्र महानंद झा। आयोजक सँ पूरापूरी विदाइ असूलि अटैची डोलबैत फराक भेले छलाह कि हम नमस्का कयलियनि। बहुत बरखक भेंटक बादो चिन्हलनि आ एक कात ल' जाक' हाल-चाल पूछ' लगलाह। गप्पक क्रम मे ओ बेर-बेर एम्हर-ओम्हर ताकथि। कि हम पुछलियनि, ''किनको तकै छी की?" ''हँ यौ! दरभंगक कमीशनर साहेबक बेटा एत' प्रोफेसर छथि। ओ हमरा अपना ओत' ल' जाइवला छलाह। देखियौ ने, हुनकर आग्रह देखि हम अपन सभ प्रशंसककेँ निराश क' देलियनि। सांसद जी धरि सँ लाथ क' लेलहुँ। असल मे होटल मे हमरा जहिना जेल बुझाइ अछि, तहिना नेता सभक ठाम मेला बुझाइछ। तेँ हम कतहु जाइ छी तँ अपने कोनो समाँगक घर रहै छी।" चेहराक बेचैनीक बादहु महानंद जीक स्वर समधानल छलनि। ''से तँ नीके करै छी!" हुनक बेचैनी कम करबाक लेल हम आश्वस्त कयलियनि, ''कहने छथि, तँ अबिते हेताह!" ''से आब नइँ लगै अछि। चारिए बजेक टाइम देने रहथि। कोनो मीटिंग मे फँसि गेल हेताह। ...देखियौ ने, हम ने पते लेने छी, ने फोन नंबर। आब तँ अवग्रहमे पडि़ गेलहुँ।" हुनक परेशानी आब सभ तरहेँ प्रकट भ' रहल छल।" हमरा साफ लागि रहल छल जे ओ होटलक खर्च बचब' लेल ठहार ताकि रहल छथि। एम्हर हमरा ई डर किछु बजबा सँ रोकै छल जे नइँ जानि कते दिन धरि मेहमानी डटाओताह। अंतत: पुछलियनि, ''कहियाक वापसी अछि?" ''परसू साँझ स्वतंत्रता सेनानी एक्सप्रेस पकड़बाक अछि। टिकटो आर.ए.सी. 27 सँ कन्फर्म भेल वा नइँ, मालूम करबाक अछि।" आ हमरा हाथ मे मोबाइल देखि झट जेब सँ टिकट बहार कयलनि, ''देखियौ तँ मोबाइल सँ, टिकटक स्टेटस की छै? दुइए दिनक बात निश्चित जानि हम हिम्मत कयलहुँ, ''ई कोना देखै छै, से हमरा नइँ पता! हमर कनियाँ देखि सकै छथि। आ से तखने हैत जँ अहाँ हमरो अपने समाँग बुझी आ हमरे घर दू दिन लेल चली।" ''आ से की कहै छिये! अहाँ तँ अपनो सँ अपन समाँग छी। हम तँ घरेक लोक बुझै छी अहाँ केँ। ठीक छै, अहींक घर जायब। ओ प्रोफेसर आब आबियो जयताह तँ हम नइँ जायब हुनका ओतय। ओ तँ कमीशनर साहेब अपनहि फोन क' कहलनि चलै काल तेँ सोचल!!... धौर, छोड़ू आब ओहि गप्प केँ। आ ओ हमरा संग चलबा लेल अगुआयले सन छलाह। हम नइँ चाहैतो अपना परतारि रहल छलहुँ जे एतक पैघ कलाकार दू दिन हमरा घर रहताह। से बसक भीड़ो मे ठाढ़ हम हुनके स्वागत-सत्कार मादे सोचि रहल रही। किछु काल बाद हम सब यमुना विहारक स्टैण्ड पर बस सँ उतरलहुँ। मेन रोड छोडि़ अपना गली मे ढुकले रही कि गलक ओहि छोर परक चाह दोकानवला छौंड़ा गणेश पाछाँ सँ चिकरिक' सोर पाड़लक। ओकरा दोकान मे हमर अबरजात किछु बेसी छल। अपन भाषा भाषीवला लगाव सेहो रहय। आ ओ छौंड़ा एक तरहेँ हमर मुँहलगुआ जकाँ भ' गेल रहय। हम ओकरा गाम-घर सँ भले परिचित रही, मुदा हमरा मादे ओ नइँ जानि सकल रहय। मुदा तखन हमरा पाछाँ घुरिते ओ पुछलक, ''अहाँक घर सहरसा लग, बिहरा छी ने!" ''से के कहलकौ?" हम अकचकाइत पुछलिऐ। ''अहीं गामक भोला कामति। ओ हमर मामा छिये।" गणेश बिहुँसि रहल छल, जेना ओ कोनो बडका जानकारी हासिल क' लेने छल। ''कत' छौ भोला?" ''भोर मे आयल रहै। दुपहरिया मे चलि गेलै। भोरे अहाँ केँ बस पकड़ैत अचानके देखलकै ने तँ बाजल, ''ई तँ धीरू भैया लागै छौ रे गणेसबा!" हम कहलिऐ, ''हँ, धीरजी...बड़का पत्रकार छिये! तों कोना चिन्है छक?... " आ तखन ओ मारते सब टा कहलक।... आगाँक बात ओ छौंड़ा हमरा संग मे अपरिचित देखि नइँ बाजल। ''गेलौ कत' भोला?" हम बात केँ भोला दिस मोड़लहुँ। ''ओ बदरपुर मे रहै छै। काल्हि-परसू धरि फेर अयतै। एत्तै दोकान शुरू करैवला छै! " एते काल मे हम ओकरा दोकानक भीतर राखल बेंच पर बैसि चुकल रही।महानंद जी सेहो। गणेस चाह बनब' लागल छल। सहसा महानंद जी बजलाह, ''एत' तँ डेग-डेग पर अपन मैथिल भेटि रहलाह अछि आ से मैथिली मे बजैतो छथि। अपना दरभंगा-मधुबनी मे चाह-पानवलाक कोन कथा, रिक्सावला धरि केओ मैथिली मे जवाब नइँ देत। हमरा किछु बाजब जरूरी नइँ बुझायल। चाहक पानि एखन खदकिए रहल छलै कि गणेश पुछलक, ''किछु खयबो करबै, सर? " ''हँ! कहि हम महानंद जी दिस तकलहुँ, ''अंडा लैत छी की?... लैत होइ तँ आमलेट-टोस्ट बनबा ली!" ''हँ, लिय!" क्षणभरि बिलमक' ओ बजलाह, ''यौ धीरजी, आब दूध-दही लोक केँ भेटै नइँ छै। सागो-पातक दाम नइँ पुछू, आगि लागि गेल छै।तिलकोड़क तरुआ कते साल भ' गेल, जीह पर नइँ गेल। तखन ईहो सब नइँ खाइ तँ जीबी कोना? फेर विज्ञानो कहै छै जे ई पोष्टिक चीज छिये।" हमरा हँसी जकाँ लागि गेल। तत्काल किछु बाजल नइँ। चलै काल गणेश केँ लग बजा किछु तिलकोड़क पात पार्ककक कात सँ आनि देब' कहलहुँ। महानंद जी उछलि गेलाह, ''अयँ! एत तिलकोड़क पात! आब तँ दरभंगो मे नइँ देखाइ छै!" आ तहिना हमरा कनियाँ हाथक दर्जन सँ बेसी तरुआ चट क' बजलाह, ''असली मिथिला तँ आब दिल्ली आबि गेल। दरभंगा मे आब कहाँ छै ओ बात, कहाँ छै ओत' ई मैथिलानीवला हाथ!..." हम सभ दू दिन हुनक खूब स्वागत-सत्कार कयल। ओ ओहि अंतराल मे अनेक बेर, अनेक तरहेँ, एहन-एहन अनेक बात बजलाह। हमसभ कृत-कृत! जयबा काल हमर कनिया हुनक आर.ए.सी. वला आधा बर्थक नंबर सेहो पता क' देलकनि आ बाट मे खयबा लेल पराठा-भुजियक एक टा पैकेट पकड़ौलकनि। ओ खूब-खूब आशीष दैत बहार भेलाह। हुनका अरियातैत हम गली सँ गुजरि रहल छलहुँ। गणेशक दोकान लग एखन पहुँचले रही कि भोला पर हमर नजरि गेल। तखने ओहो हमरा देखलक आ बाढि़क सोझाँ आयल। हम दुनू गोटे एक-दोसरा सँ लिपटि गेलहुँ। कि तखने ओकरा पाछाँ लागलि एक स्त्री सेहो मुस्किआइत लग आयलि।अबिते ओ हमर पयर छूबि लेलक। हम तुरत चिन्हि नइँ सकलहुँ। हमरा अकचकायल देखि वैह बाजलि, ''हमरा नइँ चिन्हलहक कका!... हम मीरा!" ''ओ!... सैह तँ हम अँखियासै रही।.. " हमरा सोझाँ ओकर अठारहक बयस वला विधवा-जीवन नाचि गेल छल। आगाँ भोला बाजल, ''हमरा दुनू आब संगे छियह। कयाह तँ सिंहेसरे मे केलिऐ, लेकिन गाम जाइ के हिम्मत नइँ भेलह।" हमरा अतिशय प्रसन्नता भेल। मुदा तकरा व्यक्त करबा लेल शब्द नइँ भेटि रहल छल, ''बड़ बढिय़ाँ! चलह दुनू गोटे पहिने डेरा। बगले मे छै।... हम झट हिनका बस मे बैसा केँ अबै छियह।" कि भोला पनबट्टी खोलि अपना हाथक लगाओल पान देलक। महानंद जी सेहो खयलनि। फेर महानंद जीक संग मेन रोड दिस बढ़लहुँ। बस· प्रतीक्षा मे ठाढ़ महानंद जी सँ हम कहलहुँ, ''ई मीरा हमर पितिऔतक बेटी छी। बचपने मे विधवा भ' गेल छलि।... आइ तकरा सोहागिनि देखि मन पुलकित भ' गेल।" सहसा महानंद झा पुछलनि, ''ई भोला कोन जातक थिक?" हमरा कनपट्टी पर जेना चटाक द' बजरल! ''कीयट"... ''अयँ यौ, ओत'क सब टा गौरव-गाथा बिसरा गेल? बाप-दादक नाँ-गाँ...पाग-पाँजि-जनेउ सब? ...ब्राह्मणक विधवा बेटी कीयट संग! ...दुर्र छी!" आ महानंद झा भोलक देल पान बगलक नाली मे थुकडि़ देलनि। हमर मन घिना गेल। हम नहुँए, मुदा कठोर स्वर मे बजलहुँ, ''अहाँ केँ पता अछि हमर कनियाँ कोन जातक थिकी? ...जकरा अहाँ सभ मलेछ कहै छिऐ!..." महानंद झाक मुँह लाल भ' गेलनि, मुदा बकार नइँ फुटलनि। तखने बगल मे आबिक' रुकल एक टा ऑटो मे झट द' बैसैत 'स्टेशन' शब्दक उच्चारण करैक संग मुँह घुमा लेलनि। ऑटो आगाँ बढि़ गेल। हमर मन कहलक, ''ओ तत्काल एत' सँ भागबकक· लेल हवाइ जहाज पकडि़ लेथि, मुदा हमर कनियाँ देलहा पराठा-भुजिया नइँ फेकि सकताह। सहसा दुर्गंधक तेज भभक्का लागल। जेना ओत'क कोनो सड़ल पानिवला पोखरि गन्हा रहल हो!... असोथकित प्राइवेट वार्डक बिस्तर पर पड़ल-पड़ल ओ सामनेक टेबुल पर राखल एक मात्र खाली गिलास मे बड़ीकाल सँ ओझरायल छल। काँचक ओ मामूली सन गिलासओकरा देखैत-देखैत रूप बदल' लागल छलै। एक बेर ओकरा लगलै जे ओहि खाली गिलास मे नीचाँ सँ अनायास पानिक सतह ऊपर उठ' लगलै आ अगिले क्षणगिलासक चारूभर पानि खसैत सेहो ओकरा प्रत्यक्षे जेना बुझेलै! ओ झट आँखि मूनिलेलक। बड़ीकाल पर आसते-आसते फेर ओ आँखि खोललक। गिलास पूर्ववत खाली छलै। ओ फेर निश्चेष्ट गिलास पर नजरि गड़ा देलक। कोठली मे देबालघड़ीक टिक्-टिक् केर हल्लुक-सन आभास छलै। किछुए क्षण बीतल हैत कि ओ देखलक गिलासक आकृति एक लय-क्रम मेपैघ होअय लगलै! एक बेर ओकरा लगलै, ई तँ कुंभकरणक पेट थिक! तत्क्षणे फेरबुझेलै, ई विशाल बखारी थिक!...भरि पेट भात लेल रकटल मोन-प्राण मे पेटक संग बखारीक स्मृति ओकरा नेनपने सँ खेहारने आबि रहल रहै। परेशान जकाँ भ'क' ओ अपन नजरि ओकहर सँ हटाब' चाहलक कि ओकरा बुझेलै जे माथ मे किछु चनकि रहल छै आ देह मे तागति सन किछुओ ने रहि गेल छै। ओ अपना केँ बड़असहाय-असोथकित बुझि फेर आँखि मूनने रहय कि तखने एक टा सर्द-सन हाथओकरा माथ पर बलबला आयल घाम पोछ' लगलै। कोठली मे तखन ओकर पत्नीमात्र छलि, मुदा ओकर हाथ ओहन सर्द हेबाक अनुमान नइँ छलै ओकरा। ई फराक जे ओकर आत्मा मे खरकटल खरखर हाथक धन्नी-हरदि वला गमक आँखि नइँ खोल' देलकै। हठात् हल्लुके सँ केबाड़ ठकठका क' ककरो भीतय अयबाक आभास भेलै,तँ नइँ चाहैतो ओ आँखि खोलि देलक। नर्स छलि। नर्सक आगू-आगू ओकर मुस्कीछलै। ओकरा मन मे स्फूर्ति जकाँ अयलै। नर्सक मुस्कीक उतारा मुस्किए सँ देलक।एक नर्से टा तँ छलै जकर आयब ओकरा बड़ सोहाबै छलै। डाकटरो सँ बेसी। एक टामधुर-सन धुन ओकर धिरछायल मोन केँ छुबलकै। एक खास किसिमक निसाँ मेआँखिक पल झपा गेलै। कनेकाल बाद 'मनोहर कहानियाँ' मे डुबलि पत्नीक पन्ना पलटबाक स्वरओकरा कर्कश जकाँ लगलै। भीतर सँ कचकचा गेल छल। पत्रिका मे डुबलि पत्नीदिस तकबा सँ बचैत, नइँ चाहैतो फेर सामनेक टेबुल पर राखल खाली गिलास दिसताक' लागल। किछुए क्षण बीतल हैत कि गिलास फेर रंग-रूप बदल' लगलै। ओकराअपन दिमाग पर बेस दबाव बुझेलै। ओ नइँ चाहैतो बाजल, ''टेबुल पर सँ एहिगिलास केँ हटाउ!...'' पत्नी पछिला तीन दिन सँ बेसी खन ओकरा संग छलि। पहिल दिन तँ मारतेफजहति करैत भरि दिन ओ बड़बड़ाइते रहि गेल छलि। कतेको केओ बुझारति कि अनुनय-विनय कयलकै, ओकरा पर तकर असरि नइँ भेलै। एकदमे झिकने जाइतरहलि, ''सब हमरे घर बिलटाबै पर लागल यए। धियापुता केँ के देखतै? अयँ! जकरा कपार पर दू-दू टा अजग्गि बेटी रहतै तकर ई किरदानी?... काज-धंधाक चिंते ने! हरखन दोसे-मीत! सब दिन नाटके-साहित्य आ दरुबाजीक मोहफिल! देखौ, आइ केओ ताकहु अयतै!...'' एहने-सन मारते रास बात! मुदा ओ एको बेरमुँह नइँ खोललक। दोसर दिन पत्नीक बाजब स्वाभाविके रूपेँ कने कम भेलै, मुदा ओकर मुँह सिबले रहलै। तेसरो दिन ओकरा ओहिना गुमसुम देखि पत्नीक भीतरआतंक जकाँ किछु पैस' लगलै। से ओहि दिन गुकमी जकाँ लधने ओ ओकराबजबाक बाटे ताकि रहल छलि। एहन खन पतिक आदेश ओकरा नीक लगलै। ओ उठलि आ गिलास हटा बगलक अलमारी मे रखै सँ पहिने पानि लेल पूछलक। ओमुड़ी डोला नासकार कयलक। पत्नीक भीतर किछु कचकि जकाँ उठलै। आँखि डबडबा गेलै।... एकरा एहि अस्पताल मे भर्ती दोसे-मित्र सभ करौने छलै। ओकरे सभक समाद पर ओ बताहि जकाँ छोटकी बेटीक संग भोरे-भोर भागलि आयलि छलि।ओकर लाख फजहति आ बड़बड़ाहटिक बादो इलाजक सभ टा व्यवस्था वैह सभ क' रहल छल। ओकरा बेसी बजबाक साफल ई भेलै जे कैक गोटे बाहरे सँ हालचाल ल', सभ टा व्यवस्था बुझि-गमि, घुरि जाइ छल। से थाह पाबि गेलि छलि ओ। क्षण भरिक लेल तँ ओकरा अपन कड़ैती आ बजबाक प्रभाव पर गौरवे जकाँ भेलै। ओकरा लगलै जे एहि तरहेँ ओ अपन घरवला केँ मुट्ठीमे क' सकै अछि। मुदापतिक पीयर चेहरा देखिते ओकरा भीतर पैसल अदंक आशंकाक झड़ी लगा देलकै। ओ चोट्टे उठलि। पयर मारि आस्ते सँ बाहर भेलि। पैघ सन गलियारा पार क' ओ रिसह्रश्वशनक आगूक गुलमोहर लग ठाढ़ भेलि। अस्पताल प्रांगणक सामनेवला छोर पर बेरू पहरक रौद मे बैसल किछु गोटे पर ओकर नजरि गेलै। ओ दूरे सँ चिन्हैक प्रयास क' रहलि छलि कि ओकहर सँ दू गोटेलपकि क' ओकरा लग अयलै, ''की, कोनो बात?" ई दुनू ओकरा पतिक सब सँ पुरान मित्र छलै। ओकरा बियाहो सँ पहिनेक सहमना, लंगोटिया!...जकरा सभक ताधरि किछुओ फराक नइँ छलै। बियाहक बादो चौदह-पंद्रह वर्ष धरि प्राय: ओहिनारहलै। शुरूक पाँच साल तँ आश्रमो संगे रहलै जावत् अलग-अलग ठाम चाकरी नइँ भेटलै। एहि मे पहिल ओ छल जे ओकरा 'कनियाँ गै' कहै छलै आ 'वर बाबू' कहैत जकरा सँ ओ हँसी-मजाक मे सदति साँय-बौहुक अदला-बदली करबाक गपशप करै छलि। मुदा तखन ओकरा मुँह सँ बहरायल वाकय संबोधनहीन छलै। दोसर, छात्र-जीवन मे भनसाघरक इंचार्ज रहबाक कारणेँ शुरूहे सँ ओकरा सौतिन कहै छल। मुदा तखन तीनूक संबंधक कोनो टा पहिचान नइँ छलै। ई स्थिति ओकराबड़ दारुण जकाँ बुझेलै। एक बेर ओकरा मोन मे अयलै जे वैह ओहि संबोधन सँ पुकारय, मुदा से भेलै नइँ। ओ अपन भावना पर कठोरता सँ लगाम लगौलक, ''की करबै आब, हमर तँ घरे बिलटि गेल। तै पर सँ ओकर गुमसुम रहब!..." सेरायलआ घबड़ायल सन स्वर बहरेलै। कनेक असमंजसक बाद पहिल दोस्त जे कह' चाहैत छल, से नइँ कहिओहिना किछु बाजि देलक, ''ठीक भ' जयतै। डॉकटर सँ हमरा गह्रश्वप भेल यए।" ''नइँ! ...कोनो चिंताक बात नइँ!" दोसर तोस देब' चाहलक। एहन जवाब ओ नइँ सुन' चाहने छलि। मुदा ओकरा बस मे किछु ने छलै।आब ओ पहिनेक स्थिति मे नइँ घुरि सकै छलि जकरा सँ कहियो पिण्ड छोड़बैतनीक लागल छलै। ओकरा मुँह सँ बहरेलै, ''घुटनाक अलावा डॉकटर तँ कहै छै, सब कुछ नॉर्मल है! ''हँ, सैह तँ! ..." पहिल जल्दी सँ जवाब ताकलक, ''रसेरस सब ठीक भ' जयतै।' ''हँ! हँ!..." दोसरक चेहरा पर टार'क भाव बेसी साफ छलै। हारिक' ओ वार्ड दिस घुरलि, ''आउ ने, कनेकाल हुनके लग.." गाछ ओकरा लगीच अयलै। सिरमा लग। दुनूक नजरि मिललै। ओ निहालभ" गेल। ओ किछु बाज' चाहलक, तँ ओकरा अपन पत्नीक उपस्थितिक भान भेलै। गाछ सेहो किछु बाज' चाहलक, मुदा कोठली मे ओकरा मीतक कयाहता छलि। गाछओकरा बेडे पर सटिक; बैसि रहल। दुनूक हाथ एक-दोसराक हाथ मे छलै। दुनूक हाथ गरम छलै। ''चाह-ताह बाहर सँ एत' आबि सकै छै ने?" दोसर बुदबुदायल। तखने ओकर पत्नी उठलि, ''लगले अबै छी"' आ कोठली सँ बाहर भ'गेलि। ओकरा पाछाँ लागल दोसर मीत सेहो बहरायल। किछु पल बीतल कि ओ पड़ले-पड़ल फुसफुसायल, ''ककर्यू मे ढील बुझाइ छौ!.." ''नइँ-नइँ!... अपना सब घर-परिवार लेल सही समय पर किछु ने सोचलौं।तकर सब टा दु:ख एकरे सब केँ भेलै।" गाछ आब झुकि जकाँ आयल छल। ओ किछु क्षण चुपचापे रहल। फेर एकहर-ओकहर ताकि बाजल, ''रौ बुडि़! हमरा सभक लेल अपने टा घर कहिया घर छल? हमसभ तँ सभक घर-परिवार केँ अपने बुझैत रहलौं।" बेड पर पड़ल देह जेना मोन संग उड़' चाहै छल। ''जँ सैह रहि जाइत शुरू सँ अंत धरि तँ कोनो दु:ख नइँ छल मीत! मुदा एक एहन मोड़ पर आबि हम सभ अपन आरि बेराब' लगलौं जत' पछिलुको कयलधयल सभ टा पर पानि फिरि गेल। ने घरक रहलौं ने घाटक।..." आब गाछ साक्षात मनुकख भ' गेल छल। ''ई तों की कहै छें?... हम तँ एखनो एकरे पाछू सब किछु न्योछावर कयनेछी। के अछि आइ हमरा सँ बेसी कयनहार?' ''यैह!... यैह भेलौ सीमा! दोसर केओ तोरा सँ बढि़ नइँ किछु करै यए तेँ तों आगू किएक बढबें!... आ ई त्याग-न्योछावर-कथा मंचे टा सँ शोभै छै। हम-तों जतेक ने न्योछावर करबाक गपशप करै छी, से सब वास्तव मे आब कैरियर चमकाबैक साधन भ' गेल यए। जेँ केओ दोसर हमरा सब सँ आगू बढि़ सक्रिय नइँ अछि, ते हमरासभक ई अधकचरा प्रयास पैघ अभियान कहाबै यए। मुदा ई जानि ले जे हमरासभक ई प्रयास एक टा बिजुका सँ बेसीक ओकाति नइँ रखै अछि जकरा सँ बड़ीकाल पर ओ आँखि फोललक। सामनेक खाली टेबुल पर ओकर नजरि गेलै, तँकिछु चिड़ै-चुनमुनी डराइत होइ तँ होइ, सुग्गर-हरिन आकि नीलगाय पर कोनोओकरा टेबुलक सतह सहाराक रेगिस्तान बुझेलै। टेबुलक पार बैसल लोकक आकृति असरि नइँ पड़ै छै।' मीत आवेश मे आबि गेल छलै।रेगिस्तानक छोर परक गाछ लगलै। ओ ओहि गाछक हरिअरी पर नजरि टिकौलक। जवाब मे एखनो ओ बहुत रास तर्क द' अजेय रहि सकै छल। यैह तँ ओकरआँखि तृप्त भ' गेलै। शकित छलै। मुदा एक तँ ओहि बातक कने असरि पड़ल छलै आ दोसर, पत्नीक घुरिक' आब' सँ पहिने ओकरा किछु आर जरूरी बात पूछबाक छलै। से शांत होइतमद्धिम स्वर मे बाजल, ''एखन से सब बतायब जरूरी नइँ छै। कहले बात कते कहबौ? ...सुन, एक टा जरूरी बात!..."आ फुसफुसायल, ''ओत' रंगशालाक हॉल मे हमर किछु भेटबो कयलौ?" ''की?" गाछक पात-पात खिलखिला क' हँसल। ''हमर कुञ्जी?" ''हँ! ...ओ कत' जायत? मंचक काते मे छल।" ''दे!..." ''बाकस मे बंद क' राखि देने छियौ। पहिने ठीक तँ हो!" ''शहर मे कोनो चर्चा?" ''हँ, कल्पना मंचक छौंड़ा सब एक टा रीमिकस तैयार कयलक अछि— कुञ्जी हेराय गेल भाँगक बाड़ी मे..." क्षणभरि बिलमि फेर नहुँए बाजल, ''आचार्यक 'मुसल आ मुसलमान" कथाक मंच प्रस्तुति आइ मुजकफरपुर मे छिऐ जत' सहरसा सँ जनकपुर धरिक लोक जमा भ' रहल छै। एत' सँ कल्पनो वला सभ गेल छै!.." ओकरा पर तनाव जकाँ बढि़ गेलै। क्षणेभरि कोठली मे भारीपन रहलै! तखने चाहक ट्रे लेने एक टा छौंड़ाक संग ओकर पत्नी आ दोसर मीत घुरि अयलै। रसेरस फेर टेबुल पर रेगिस्तान पसरि गेलै आ गाछ तकर ओहि पार चलि गेल। ओ दोसर मीतक मदति सँ गेड़ुआक सहारें ओठङि गेल छल। पत्नीक हाथ सँ कप पकड़लक। फेर एक टा बिस्कुट लऽ नहु-नहु कुतरैत कतहु हेरा गेल छल। चाहक घोंट लैत ओतऽ शुरू भेल बाल-बच्चाक पढ़ाइ-लिखाइ, कयाह-दान आमहँगाइक संग-संग क्रिकेटक गह्रश्वप ओकरा जोडि़ नइँ पाबि रहल छलै। साँझक अन्हार जखन बाहरक वातावरण केँ गाढ़ कर' लागल छलै आ साँझुक राउण्ड पर आयल डॉकटर देखिक' जा चुकल छलै, घर सँ टिफिन बॉकसवला झोड़ानेने एक टा नवोदित कवि मित्र आबि गेल छलै। राति मे ओहि नवतुरिए केँ रुकबाक छलै। किछु काल बाद ओकरा पत्नीक संगे ओकर दुनू मीत घर विदा भेल।नवतुरिया कवि सेहो पानिक बोतल आन' लेल बहरायल छल कि पहिल मीत गेटक बाहर सँ घुरिक' ओकरा लग अयलै आ एक टा कने पैघ सन कुञ्जी हाथ मे दैत कहलकै, ''ले! ...एकरा बिना तोरा नीन नइँ हेतौ!" आ झट बहराय गेल। ओ एक बेर ठीक सँ ओहि कुञ्जी केँ देखलक। बड़ पुरान होइतो सब तरहें नव छलै। पुलक सँ भरि तुरंत जेब मे राखि लेलक। पानि ल'क' घुरल नवतुरिया प्रेम सँ भोजन लगौलकै। नवतुरियाक आवेशभोजन मे रुचि बढ़ा देलकै। तेँ खाय क' पड़ल तँ नवतुरियाक दू गोट कवितोसुनलक। चाबसी द' सब चिंता सँ ध्यान हटा आगू मे जे फिल्म छलै तकरसफलताक कल्पना मे झिहरि खेलाय लागल। नीन किछु जल्दिए आबि गेलै। ओ देखलक जे ओकर किताब लोकसभ लाइन लगाक' कीनि रहल छै।मारते रास चैनलवला सभ घेरने छै। ओ जल्दी-जल्दी किछु बाजि एक टा उज्जररंगक कार मे बैसि जाइ अछि। कार अज्ञात दिशा मे जा रहल छलै कि नीन टूटि गेलै। ओ फेर आँखि मूनि जल्दी सँ जल्दी ओहि सपना मे जयबाक चेष्टा कर' लागल। एहि बेर ओ देखलक जे ओकरा ढाइ लाखक कोनो पुरस्कार भटलै। ओकरासकमान मे पुरस्कार प्रदाता नौकरशाह सभक दिस सँ रंगमंडलक समस्त सदस्यक संगहि वरिष्ठ पत्रकार आ साहित्यकार लोकनिक बीच भव्य पार्टी चलि रहल छै।...अचानक ओहि बीच ठाढ़ एक टा अद्र्धविक्षिह्रश्वत सन युवक चिचिया लगै छै, ''अहाँ सभ अवसरवादी छी! पूजीपतिक दलाल छी!..." कि तमसाक' ओत' जमा सभ केओ अपना-अपना गिलासक दारू ओहि युवक पर फेकि दैत छै।... आ ततेक दारू ओकरा पर खसै छै जे ओ युवक बगलक नाली मे बहि जाइ छै!... अचानक फेर ओकर नीन टूटलै। एहि बेर ओकर छाती जोर-जोर सँ धड़कि रहल छलै।कनेकाल मे ओकर मोन स्थिर भेलै, तँ ओ नवतुरिया कवि दिस ताकलक। ओओकरा बेडक दहिना कातक सोफा पर नीन छलै। ओकर बामा हाथ अनायास पेंटक जेब मे गेलै आ अगिले पल कुञ्जी ओकरा आँगुरक बीच छलै। बड़ीकाल धरि ओ ओहि कुञ्जी केँ देखैत रहल। कुञ्जीदेखैत-देखैत ओकरा अपन वियारंगक ओ अन्हार मोन पडि़ अयलै जे ओकर कुञ्जी तँ गिडऩहि छलै, ओकरा एहि बेड धरि पहुँचा देलकै। वियारं ओहि विद्यापति यात्रीरंगशालाक संक्षिह्रश्वत नाम छलै जकर ओ अध्यक्ष आ निर्देशक छल। जतऽ पछिला दससाल मे सभ सँ बेसी नाटक ओकरे निर्देशन मे भेल छलै। जतऽक ओ सभ सँ सकमानित आ सर्वेसर्वा छल। जत' पहिल मंजिल पर ओकरा एक टा पैघ सन कक्ष भेटल छलै। ओहि कक्ष सँ नइँ मात्र वियारंक सभ टा गतिविधि संचालित करैत छलओ, ओकर समस्त हित-मीतक चौपाल वैह छलै। मुदा ओहि रातुक अन्हार!... ...असल मे ओइ दिन बेरू पहर अशोका मे बालीबुडक एक टा पैघ प्रोड्यूशरसंग ओकर मीटिंग सफल भेल छलै। भूमि समस्या आ सशस्त्र आन्दोलन सन विषय पर ओ एक टा मसालेदार फिल्मक लेल स्क्रीह्रिश्वटंग आ सह-निर्देशनक एग्रीमेंट साइन कयने रहय। तकरा बाद शैकपेनक दौर जे शुरू भेलै से प्रोड्यूशरक उड़ान-समयक कारणें सँझुका आठे बजे धरि चललै। ओतऽ सँ ओ बाहर भेल तँ ऑटो मे बैसैतअपन सभ सँ करीबी कॉमरेड दासक मोबाइल पर पहिल सूचना देलक। दास नगरक सभ सँ बेसी प्रसार संकयावला दैनिक समाचार पत्रक कयूरोचीफ रहय। ओ तत्कालओकरा अपन दकतर बजा लेलकै। दासक केबीन मे ओकरा पहुँचिते तय भेलै जे एहि उपलकिध केँ खास दोस्तसभक बीच सेलिब्रेट कयल जाय। से ओतहि सँ फोन कऽ चारि-पाँच गोट 'हमह्रश्वयालाऽसाहित्यकार-पत्रकार-रंगकर्मी केँ साढ़े दस बजे धरि वियारं पहुँचबाक सूचना देल गेलै। फेर ओ दासेक खटारा एलएमएल वेस्पा पर पाछाँ बैसि विदा भेल छल। रस्ता मे महात्मा गांधी चौक पर चारि-चारि ह्रश्वलेट चिकन आ पनीर फ्राइ पैक करबौलक। काजू, मूँगफली आ दालमोटक संगे सलादक व्यवस्था कऽ चारि डिकबासिगरेट सहित दू टा पैघ-पैघ पॉलिथीन पैकेट मे लेलक। दासक डिककीक झोड़ा मेरमक बड़का-बड़का बोतल रखैत आधा सँ कमे बचल अद्धा टकरेलै। ओकराबगलक जूस दोकानक पाछाँ दुनू मीलि खाली करैत अमेरिकन पॉलिसीक चर्चा करऽलागल छल। अपन-अपन सिगरेट जराय जखन ओतऽ सँ विदा भेल, तँ साहित्यअकादेमी आ मनुवादक व्याकया शुरू भेल छलै। कनेक तेज सन चलैत बसात जाड़क प्रभाव बढ़ाबऽ लागल छलै। मुदा ओ दुनूमौसम केँ ठेङा देखबैत वियारं दिस जाइत अपना मे मस्त छल। तेहन मस्त जे साँझेसँ शुरू झिस्सी केँ 'इन्जॉयऽ कऽ रहल छल। तखन ओ सभ वियारं सँ किछुए दूर नेहरू स्टेडियम वला मोड़ पर छल कि दूटा घटना एक संग घटलै। एक, बुनिआयब तेज हेबाक संगे बसात बिहाडि़ जकाँ रूपलऽ लेलकै आ दोसर, दासक जेब मे राखल मोबाइल अंग्रेजी धुन पर चिचियाबऽलगलै। कात मे स्कूटर रोकि दास एको मिनट सँ कमे गह्रश्वप कयलक आ पाछाँ घुमिबाजल, ''रौ, समान सभ लऽकऽ तों जो वियारं। एखन साढ़े नौ भऽ रहल छौ। हम एक घंटा मे अयबौ। संपादकक आदेश छै, की कऽ सकै छी?... चल गेटक बाहरछोडि़ दै छियौ।" खराब मौसमक बादो गेट सँ दूरे पॉलिथीन पैकेट आ झोड़ा थमा दास स्कूटरमोडि़ फुर्र भऽ गेलै। ओ वियारं बिल्डिंग दिस तकलकै। सभ किछु अन्हार मे डूबल छलै। गेटक दुनू कात स्थित विद्यापति आ यात्री बाबाक प्रतिमा धरि देखा नइँ पडि़ रहल छलै, तँ कालिदास-शैकसपीयर सन-सन मारते रास नाटककारक देबाल मेजड़ल छोट-छोट पाषाण मूर्ति कतऽ लखा दैतै। हवा प्रचंड भऽ गेल रहै आ बुन्नीआर तेज। ओ धतपत आगू बढ़ल। ग्रील-गेट फोलि अन्हार पैसेजक मुँहथरि परठमकल। चिकरिकऽ रमुआ चौकीदार केँ दू-तीन बेर शोर पाड़लक। मुदा कोनो उतारा नइँ भेटलै। एहन मौसम मे राति-बिराति ककरो नइँ अयबाक अनुमान कऽ ओसरबा साइत घर पड़ा गेल रहय! बिजली नइँ रहै आकि स्वीचे लग सँ काटि देनेछलै ढोहरीक सार, से नइँ कहि। ओकरा अपना हाथक पॉलिथीन पैकेट धरि नइँ सुझि रहल छलै। आखिर कहुनाकऽ सीढ़ी तकबाक साहस कऽ ओ एक टा पयर आगू बढ़ौनहि रहय कि गेटक सटले कतेको युग सँ ठाढ़ बडग़ाछक एक टा पैघ सनडारि टूटिकऽ हड़हड़ाइत गेट पर खसलै। ओकरा लगलै, पृथ्वी दलमलित भऽ गेलैआकि ओहि गाछ संग पूरा वियारं बिल्डिंग भरभराकऽ खसि पड़लै! कतऽ गेलै पॉलिथीन पैकेट सभ, कतऽ खसलै झोड़ा आ कोकहर अपने ढनमनायल; तकर कोनो ठेकान नइँ रहलै!...बड़ीकाल बाद होश अयलै, तँ ओ कराहि जकाँ रहल रहय। ओकरा पयरलग भीजल सन किछु डारि-पात बुझेलै आ माथ लग सर्द देबाल। देबाल टोबऽक क्रम मे ओकर हाथ अपना माथ पर गेलै। ओतऽ लसलस सन किछु सटल जकाँ बुझेलै। ओ ओकरा रगडि़कऽ पोछबाक प्रयास कयलक, तँ भीतर सँ पातर सन दर्दहुल्की मारलकै। तखन ओकरा ई बुझबा मे भाँगठ नइँ रहलै जे ओकर कपार फुटि गेलै आताहि पर शोणितक थकका जमि गेल छै। मुदा तैयो ओकरा ई भान नइँ भऽ रहल रहैजेे ओ कतऽ, किऐ आ कोन परिस्थिति मे पड़ल छलै।... किछु क्षण आरो बीतलै तखन ओकरा नीचाँ सीमेंटक सतहक भान भेलै। कि पयर मोडि़ हड़बड़ाकऽ बैसल आ घबड़ाकऽ चारूकात हथोडिय़ा मारऽ लागल।अचानके ओकरा हाथ मे काँचक एक टा चोखगर टुकड़ी गड़लै आ दर्द सँ सिसिया उठल। मुदा क्षणे बाद ओ फेर हथोडिय़ा दऽ रहल छल। हथोडिय़ा मारैत ओबदहवाश छल। कि एक ठाम फर्श पर किछु तेजगंधवला तरल पदार्थ बुझेलै। ओहि गंध केँ परखऽ मे थोड़ समय लगलै, मुदा जहिना ओकरा गंधक पहिचान भेलै कि सभ किछु स्मरण भऽ अयलै।आब ओ जल्दी-सँ-जल्दी सीढ़ी ताकबा लेल व्यग्र छल। ओकरा कोनोहालति मे शीघ्र पहिल मंजिल पर स्थित अपन कक्ष मे पहुँचबाक छलै। ओहि कक्षमे जतऽ इजोतक कैक टा वैकल्पिक साधन रखने छल ओ। ओकर कुञ्जी ओकराजेब मे छलै। बामा जेब मे हाथ दऽ कुञ्जी छूबिकऽ ओ आश्वस्त भेल। कि ओकरा कोना क्षण अपन संगी सभक आबि जयबाक आशंका भेलै। अन्हार मे घड़ीअकाजक छलै, से झट ओ दहिना जेब मे राखल मोबाइल निकालऽ चाहलक जाहिसँ अन्हारो मे समयक ज्ञानक संग क्षीण-सन इजोत सेहो भेटि सकै छलै। मुदा जेबसँ बहरेलै दू-तीन भाग मे अलग-अलग भेल मोबाइलक पार्ट-पुर्जा! आब ओकरघबड़ाहटि आरो बढि़ गेल छलै। अन्हारक सोन्हि मे ओ तेना भुतिया गेल जे दिशाक कोनो ज्ञाने ने रहि गेल छलै। आरो किछु काल धरि बौअयलाक बादो जखन थाह नइँ लगलै, तँ अन्हारक कोनो अज्ञात स्थल पर ओ सुस्ताबऽ लागल छल। सुस्ताइत-सुस्ताइत ओकरा भीतरहँसी जकाँ किछु फुटलै। ओकरा मोन पड़लै जे एतबे टा जिनगी मे ओ कतेक बिहडि़धाँगि आयल छल। लगभग एक दशक तँ अण्डरग्राउण्डे रहल छल। केहन-केहन कठिन ऑपरेशन सफल कयने छल। कतेक मुठभेड़, कतेक काउन्टर मे बमगोलीक बीच सँ निकलि आयल छल ओ!... ओकर ई इतिहास आइयो कतेको युवा केँ प्रेरणा दैत छलै।अपन स्वर्णिम अतीतक स्मरण सँ ओकरा भीतर साहसक संचार भेलै।उठिकऽ सावधान मुद्रा मे ठाढ़ भेल आ दृढ़ निश्चय कऽ एक सीध मे थाहि-थाहिकऽबढ़ऽ लागल। किछुए क्षण बाद सहसा ओकरा ठेहुन सँ किछु टकरेलै। हाथ सँ छूबिकऽ ओ परखलक—आगू मे कुर्सी छलै। फेर हाथ बढ़ाय कऽ ओ एकहर-ओकहर टटोललक—कुर्सीक पतियानी लागल छलै। तत्काल ओकरा बुझबा मे आबि गेल छलै जे ओ फुजले रहि गेल दुआरि सँ मेन हॉल मे आबि गेल छल। तखन कुर्सीदर-कुर्सी पकड़ैत ओ बीचक रस्ता धऽकऽ सभ सँ आगूक कुर्सी धरि पहुँचि गेल।एतऽ पहुँचि ओकरा सब किछु सुरक्षित जकाँ बुझेलै। से ओ ततेक आश्वस्त भऽ गेलजे आराम सँ ओहि कुर्सी पर बैसि पयर पसारि देलक।आब ओकरा मेहमान मित्र सभ सँ पकड़ेबाक कोनो चिंता नइँ रहलै। तेँ धीरे धीरे ओ ओकरा सभ केँ बिसरय लागल छल। कि तखने सेलिब्रेट करबाक अवसरक महकाा मोन पड़लै। मोन मे कनेक कचोट भेलै। मुदा एते पैघ नाट्य-अनुभव ओकरासभ स्थिति मे तालमेल बैसायब सिखा देने छलै। आब ओ सहज भऽ जयबाक स्थिति मे आबि रहल छल कि ठीक तखने मंचक बीचोबीच खसैत प्रकाशक एक फाँक मे ओकर प्रतिरूप ठाढ़ देखा पड़लै।क्षणभरि मुरुत जकाँ ठाढ़ रहलाक बाद प्रतिरूप अचानक बाजल, ''रौ मीत, किऐदु:खी छें?” ''अयँ!... तों के?" ओ अकचकाइत पूछलकै। ''नइँ चिन्हले हमरा?... कोनो बात ने! चिंता नइँ करय, दुनिया एहिना चलै छै!" प्रतिरूप मुस्किआइत कहलकै। ''मुदा छें के तों?" ओ फटकारैत पूछलकै आ उठिकऽ ठाढ़ भऽ गेल। ''हमरा चिन्हि कऽ की करबें? दुनिया तोरा चिन्है छौ! दोसर खेमाक लोक के गरियाबैत रह! ओ सभ पतीत छै, कुपमंडुप छै, समाज केँ पाछाँ लऽ जायवला छै।ओकरा ई सभ कहला मात्र सँ समाज बदलि जयतै आ तों महान भऽ जयबै! फेरअंग्रेजी बोहु-बेटी घर अयतौ। स्टेटस बदलि जयतौ! बेचारी बहिन हिंदी बड़अलच्छी, बाड़हनि झाँट!...” प्रतिरूपक स्वर संयत छलै। ''तों हमरा पर व्यंग्य करै छें?" ओ फेर बिगड़लै। ''व्यंग्य?... एहि सभ पर तँ तोरा महारत छौ। बस लिखैक फुर्सति नइँ छौ। नेतँ आलोचक जीक गुरुद्वारा मे माथ टेकिते कोर्स मे लागि गेल रहितौ। आचार्यक प्रसाद पबिते साहित्य अकादेमी भेटि गेल रहितौ!" ''हम कोर्सक भूखल नइँ छी। आचार्य आ आलोचक जी केँ ठिठुआ!... साहित्य अकादेमी चाहबे ने करी हमरा! हम ओहि पर थुको फेकऽ नइँ जायब। हमतँ व्यापक सामाजिक परिवर्तनक आकांक्षी छी। समातामूलक वैज्ञानिक सोचक आग्रही। सदिखन जनते टा हमरा नजरि मे रहै अछि।" ओ आक्रोश सँ भरल स्वर मे गरजलक। प्रतिरूप थपड़ी पाडय़ लगलै, ''वाह! वाह! कतेक कर्णप्रिय लगैत अछि ईसब! अद्भूत!... जँ सरिपहुँ एना होइतय!...सय मे निन्यानबे टा मैथिली भकत दुमुँहेबहराइतय?..." ओ छड़पि कऽ मंच पर चढि़ गेल छल, ''तोरा बुझल नइँ छौ, मंच परडायरेकटरक इच्छाक विरुद्ध केओ एको क्षण ने रहि सकै अछि! जल्दी भाग! हम की कऽ सकै छी से बुझले ने छौ तोरा!" ''डायरेकटर छें तों?... धुर्र! अपन कोठलीक ताला तँ खोलिए ने सकै छें! जोतँ अपन कोठली?..." प्रतिरूप ओहिना ठाढ़ रहलै। ओ तामसे कँपैत कुञ्जी निकालि लेलक, ''देख, देख कुञ्जी हमरा हाथ मेअछि। देख!..." कि तखने ओरा हाथ सँ छिटकि क' दर्शकदीर्घा दिस गेल कुञ्जीअन्हारक समुद्र मे डूबि गेलै। अचानक प्रतिरूप जोर-जोर सँ हँसैत ठहाका लगब' लागल। अपमान सँ माहुर होइत ओ प्रतिरूप केँ मारै लेल दौड़ल। प्रतिरूप अलोपितभऽ गेलै। मुदा अन्हार मंच पर ओ बताह जकाँ दौडि़ रहल छलै। कि हठात चारि फुटनीचाँ मंचक आगू मे ओ अरर्रा कऽ खसल—धड़ाम! ... अस्पतालक बेड पर पड़ल-पड़ल ओकरा लगलै, भीतर सँ ओ खुकख भऽ गेल, एकदम कोढि़ला!... देह पसेना-पसेना छलै! कंठ सुखाय लागल छलै। बामा हाथक कुञ्जी दहिना जेब मे नुकबैत बड़ प्रयास कऽ ओ बगलक सोफा पर सूतल नवतरिया कवि केँ आवाज देलक। अकचकाइत जागल ओ कवि ओकरा संकेत पर गिलास मे पानि भरि आनलक।ओकरे सहारा पाबि माथ अलगा कऽ ओ दू घूट पानि पीबि असोथकित जकाँ पडिऱहल। नवतुरिया दया भरल नजरिएँ एकटक ओकरा देखैत रहलै। सामनेक खिड़कीक साफ होइत काँच भोरक आभास दऽ रहल छलै। मनोज झा मुक्ति अवैद्य नागरिकताः सिक्‍कमीकरणक प्रयास नेपालमे नागरीकता वितरण बहुतो वर्ष पहिने सँ चर्चित विषय बनल अछि । खास कऽ पहिल मधेशवादी दलक रुपमें जानल जाइत नेपाल सदभावना पार्टी अपन स्‍थापने कालसँ नागरीकताके अपन प्रमुख मुद्दाक रुपमे रखैत आएल छल । प्रजातन्‍त्रक आगमनकबाद २०४८ सालमे बनल सरकारक समयमे सेहो नागरीकताक प्रश्‍न सदन गर्मओने छल ।सदभावना पार्टीक अडान रहैक बहुतो मधेशी जनता नागरीकतासँ बञ्‍चित अछि, सबके नागरीकता देल जाए । सदभावना पार्टीक एहि अडानपर जनमोर्चा लगाएतक दलसब एकरा भारतक विस्‍तारवादी नीति कहैत विरोध करैत छल । हूनकर सबहक कहब रहैनि जे मधेशीसबके नागरीकता दऽदेलासँ नेपाल सिक्‍कमीकरण भऽ जायत । जनआन्‍दोलन २०६२/०६३ सँ पहिने सेहो नागरीकता वितरणकलेल आयोग सब बनैत रहल, अपन प्रतिवेदन बुझवैत रहल । कोनो बेर जौं नागरीकता देलोगेल त “सबै भारतीयहरुलाई नागरीकता दियो, देशमा अब विखण्‍डन हुन्‍छ” कहैत, रिट दायर कऽ मधेशमे देल जाचुकल नागरीकताके बदर सेहो कराओल गेल । एकटा विदेशी नागरीकके नेपालक नागरीकता देनाई वास्‍तवमे बहुत बडका षडयन्‍त्र होइत छैक, देशक हीत विपरीत काज होइत छैक । देश हीतक विपरीत काज कयनिहार ककरो नईं छाडल जएबाक चाही । ताहुमे नागरीकता सन सँवेदनशील विषयमें त सबहक नजरि रहब ओतबे जरुरी होइत छैक । मुदा जोर जोरसँ गरजनिहार सबहक मानसिकता एहिबेरक नागरीकता वितरणक समयमे देखागेल । नागरीकता वितरणक तथ्‍याँक अनुसार लगभग २४ लाख नागरीकता समुच्‍चा देशमे वितरण कायलगेल । जाहिमे लगभग ११ लाख तराई मधेशमे आ १३ लाख पहाड हिमालमें । कि वास्‍तवमें नागरीकता प्रप्‍त केने चौबिसो लाख व्‍यक्‍ति नागरीकता लेबाक हकदार रहथि ? ई एकटा पैघ प्रश्‍न अछि । हँ सदनमे बहुत हँगामा कायलगेल, अपनाके देशक ठिकदार कहनिहार देखावटी देशभक्‍त पार्टीसबद्धारा । अहु हँगामा सबहक एकहिटा कहब छल जे तराई मधेशमे सबटा भारतीय सबके नेपाली नागरीकता द कऽ देशके सिक्‍कमीकरण करबाक तैयारी कायल जाऽरहल अछि । मुदा कि नागरीकता वितरण कयनिहार अधिकारीमे कएटा व्‍यक्‍ति तराई या मधेशी मूलक रहथि ? आँगुरपर गनल जा सकैया । अवैद्य रुपसँ वितरण कायलगेल नागरीकता मधेशक विरोधमें बहुत पैघ षडयन्‍त्र अछि । मधेशमें जाऽक गैर मधेशी अधिकारीसबद्धारा जे किछु मात्रामे विदेशी सबके मोटगर पाई ल कऽ नागरीकता वितरण कायलगेल अछि से मधेशीसबके अपने धर्तीमे गुलाम बनयबाक चालि अछि । एकर दू टा पक्ष अछि, जौ नागरीकता लेने विदेशी भुख्‍खे मरत त उदारवादी मधेशी अपनो हिस्‍साक भोजन देबऽमे पाछा नई रहत, आ मानसिक एवं शारीरिक यातनाक पीडा मेलैत रहत । जौ पाइके बलपर नागरीकता लेने कोनो धन्‍निक विदेशी गाममे रहत त गामक जिमदार बनिकऽ सबके फेरसँ कमैया बनालेत जेना पश्‍चिमी तराई मधेशमे थारु सबके पहाड सँ विस्‍थापित पहाडी सबद्धारा कमैया बनालेल गेल । ताएँ एहि बातपर मधेशीसब सचेत रहथि आ विदेशी सबके नागरीकता लेबऽसँ सकभर रोकलथि । मुदा तैयो पाइयक भुखल आ द्धेष भावनासँ कुटिकुटिकऽ भरल गैर मधेशी अधिकारीसबद्धारा मधेशोमे किछु नागरीकता अवैद्यरुपसँ वितरण कायलगेल । दोसर दिश पहाड आ हिमालमे जे जनसँख्‍यो सँ बेसी नागरिकता वितरण भेल ताइके विषयपर सदनमे ककरो बकार धरि नहि फुटल । कत चलिगेल ओई देशभक्‍त नेता सबहक देशभक्‍ति ? ई अहिने प्रष्‍ट कऽदैत अछि जे ओइ खोखला देशभक्‍तसबक नियति, ओसब कि चाहैत अछि, आ कत सँ सञ्‍चालित अछि ? वास्‍तवमे अवैद्य नागरीकता वितरण क कऽ नेपालके सिक्‍कमीकरण करबाक प्रयाश सोंचल समझलरुपमें शुरु भऽगेल अछि । नेपालमे लाखोके सँख्‍यामें तिब्‍बती, भुटानी आ भारतीय(दार्जिलिङ्ग) नागरीकके नागरीकता द कऽ वैद्य नागरीक बनयबाक खेल शुरु भऽगेल अछि, आ तकरा सब मधेश विरोधी मानसिकताक लोक भितरिया मोन सँ स्‍वागत करैत गदगद भऽ रहल अछि । एकर कारण एक्‍कहिटा अछि जे नागरीकता लेनिहार तिब्‍बती, भुटानी आ भारतीय(दार्जिलिङ्ग) लोकके मुँहकान आ प्रायःके भाषा नेपालक ओइ बेतुक्‍का देशभक्‍त नेता सबसँ मिलैत जुलैत अछि । ई सिक्‍कमीकरण नईं त कि अछि ? देशक सम्‍पूर्ण सचेत नागरीकके सोंचबाक चाही । मनोज झा मुक्ति संग अन्‍तर्वाता ...आभाष लाभ (२०२८ सालमे डा.राजेन्‍द्र विमल आ श्रीमति विणा विमलक सन्‍तानक रुपमें जनकपुरक देवीचौकक निवासमें जन्‍म लऽ २२ वर्ष पहिने सँ निरन्‍तर मैथिली गीत सँगितक आकाशमें ध्रुवतारा जकाँ चमकैत रहऽबला एकटा मिथिलाक बेटा छथि, गायक आभाष लाभ। बाल्‍येवस्‍था सँ विभिन्‍न मँच सबपर अपन आवाज सँ दर्शक श्रोता सबके हृदयमें वास कयनिहार आभाष लाभ, मैथिली आ मिथिला सँ सम्‍बन्‍ध रखनिहारकलेल चीरपरिचीत नाम अछि । प्रस्‍तुत अछि, गायक आभाष लाभ सँगक भेल बातचीतक प्रमुख आश) १. आभाष जी गीत सँगीतमें कहिया सँ लगलहुँ? कहिया सँ लगलहुँ से त नईं बुझल अछि, मूदा बच्‍चे सँ जनकपुर आ लऽग परोसक गाँव सबहक एकौटा मञ्‍च हमरासँ नई छुटैत छल । २. पहिलबेर आहाँक रेकर्डेड गीत कोन अछि - पहिलबेर हम नेपाल सँ बहराएल अशोक चौधरीक मैथिली क्‍यासेट पानस में गीत गएने छलहुँ । ३. मैथिली गीत सँगीतक अवस्‍था केहन बुझा रहल अछि? जतेक होयबाक चाही ओतेक सँतोष जनक नहि अछि । नव नव प्रतिभा जाई तरहें एबाक चाही, नई आबि रहल छैक । दोसर बात अखन प्रविधि एतेक परफेक्‍ट भऽगेल छैक जे पाइ सेहो वड खर्च होइत छैक । ४. की बुझाइया, मैथिली गीत सँगीतमें लागिकऽ अखनुक युगमें बाँचल जा सकैया एकदम नीक जकाँ बाँचल जा सकैया एही क्षेत्रमें लागिकऽ । मैथिलीक क्षेत्र बहुत पैघ छियै । जौं मेहनतिसँ नीक काज कायल जाए त मैथिलीयो सँगीतक क्षेत्रमें बहुत पाई छै । उदाहरण लऽ सकैत छी, हमरे सबहक क्‍यसेट “रे छौंडा तोरा बज्‍जर खसतौ”के जे १५ लाख प्रति बिकाएल छल । तहिना “गीत घरघर के” जे जहिया सँ बहरायल तहिया सँ आइयोधरि बिकाइते अछि । हँ, काज नीक होयबाक चाही । ५. प्‍यारोडीके प्रभाव केहन पडि रहल छैक मैथिली गीत सँगीत पर? प्‍यारोडी मौलीकताके साफ साफ खतम कऽ दैत छैक । गीत सँगीतक क्षेत्रमें लागल श्रष्‍टा सबके मनोवलके तोडिकऽ राखिदेने छैक प्‍यारोडी गीतसब । ६. प्‍यारोडी गीत सँगीत सँ पिण्‍ड छुटबाक उपाय की देखियौ, जखन अपन सँगीत या गीत नई हुए तखन प्‍यारोडीके किछु हद धरि पचाओल जाऽ सकैया,मूदा मैथिलीमे अपन मौलीक सँगीतक आभाव त कहियो नई रहलै । जहातक प्‍यारोडी गीत सँगीत सँ पिण्‍ड छुटेवाक बात छई त अइमे आम जे श्रोता सब छथि, जे वास्‍तविक रुपमें चाहैत छथि की अप्‍पन मौलीक सँगीतक विकास होइ, हूनका सबके प्‍यारोडी गीतके निरुत्‍साहीत करबाकलेल ताई प्रकारक क्‍यासेट किनऽसँ परहेज करऽ पडतन्‍हि आ सँचार माध्‍यम सबके सेहो ओहन गीत बजेवा सँ बचऽ पडतन्‍हि, तखने ई सँभव अछि । ७. नेपालीय आ भारतीय मिथिलाञ्‍चलमें मैथिलीक बहुत रास काज भऽ रहल छैक, की अन्‍तर बुझाऽ रहल अछि दूनु देशक मैथिलीक काजमे हम त मात्र एतबा बुझैत छियै जे एकटा हमर सहोदरा विदेशमे कमाऽरहल अछि आ हम नेपालमे । दूनु ठाम अपना अपना तरहें काज भऽरहल अछि एतबे बुझु । ८. अखन सऽभ भाषाक गीतमे रिमिक्‍सके बाढि आएल बुझाति छई, एकरा कोन रुप सँ आहाँ देखैत छियै? बहुत नीकबात छई रिमिक्‍स गीत औनाई । समय अनुसार आधुनिकीकरण होयबाके चाही । समाजकलेल आ बजारकलेल गीत गौनाई दूनु दूटा बात छियै, ताहिमें गीत सँगीतक व्‍यावसायीकरणमे रिमिक्‍स बहुत नीक सँकेत छई । रिमिक्‍स गीत बहरेवाक चाही बशर्ते अपन सँस्‍कार नई लुप्‍त भऽ जाई ताइके ध्‍यानमें रखैत । ९. अखनधरि कतेक गीत गएलहुँ जे रेकर्डेड अछि? अखनधरि लगभग साढे तीनसय गीत हम गाबि चुकल छी जे रेकर्डेड अछि । १०. क्‍यासेटके अलावा कोन फिल्‍ममें अपन स्‍वर देने छी आहाँ ? मैथिलीमे दहेज,ममता,प्रितम,आशिर्वाद फिल्‍ममे, तहिना भोजपुरी फिल्‍मसब सजना के आगना, ममता, तहार गलिया आदिमे । ११. स्‍टेज शो के सीलसीलामे कतऽ कतऽ गेलहुँ? अपन देश नेपालक लगभग सबठामके अलावा, कतार (४बेर),दूवई(२बेर),मलेशिया,पाकिस्‍तान,बंगलादेश, भारतक विभिन्‍न शहरमें अखन धरि जाऽचुकल छी । १२. नव की आबि रहल अछि मैथिल श्रोता सबहक लेल? बहुत जल्‍दिए निखिल राजेन्‍द्रक सँगीतमे भेनस क्‍यासेट सँ रिलिज भऽ रहल अछि.... तराई/मधेशक आन्‍दोलनः लूटमे लटुवा नफ्‍फा संयुक्‍त लोकतान्‍त्रिक मधेशी मोर्चाक नामपर भेल तराई/मधेशक आन्‍दोलन अन्‍तोगत्‍वा सातदलक सरकारके फागुन १६ गते वाध्‍य कऽदेलक आ सातदलक सरकारके तरफसँ प्रधान मन्‍त्री गिरिजाप्रसाद कोइराला, तात्‍कालीन नेकपा एमालेक मुखिया माधव नेपाल आ नेकपा माओवादीक अध्‍यक्ष पुष्‍प कमल दहाल “प्रचण्‍डक” उपस्‍थितिमे आठबुँदे सम्‍मझौता पत्रपर हस्‍ताक्षर कएलक । सम्‍मझौता लागू कायल जाएत ताहि शर्तपर मधेशवादी दलसब तत्‍काल आन्‍दोलन स्‍थगित कएलक आ संविधान सभाक चुनाव संभव भऽसकल । तराई/ मधेशक आन्‍दोलनके विखण्‍डनकारीक आन्‍दोलन, संविधान सभा विरोधीक आन्‍दोलन एवं राजावादीक आन्‍दोलनके आरोप लगौनिहार, देखावटी कऽरहल आ अपनाके गणतन्‍त्रवादी कहऽबला एवं द्वेषक मानसिकतासँ कुटिकुटिकऽ भरल नेपालक सञ्‍चारकर्मीके मुँहपर पैघ झापड लागल जखन शान्‍तिपूर्णरुपसँ तराई मधेशमे संविधान सभाक चुनाव सम्‍पन्‍न भेल । संविधान सभाक चुनाव सम्‍पन्‍न भेलाकवादमें जहन संविधान सभाक पहिल बैसार भेल त तराई/मधेशक विरोधमे सबदिनसँ मेंहक काज करैत आएल राजतन्‍त्रक समाप्‍ति भेल जे तराई/मधेशक जनताके सबसँ पैघ विजय छल । जखन संविधान सभाक काज आगु बढल त मधेशी जनताक भोंटसँ जितिकऽ आएल मधेशी सभासदसब विगतके सम्‍मझौताके सुनिश्‍चित करबाकलेल अन्‍तरिम संविधानमे लिखएबाक माँग सहित सदन अवरुद्धक काज करऽलागल । अवरुद्धक काजके फेरसँ, नेपालके अपन बपौटी सम्‍पति बुझनिहार विभिन्‍न दलक नेतासब आ संकिर्णतासँ भरल प्रयः छोटसँ पैघ सँचारकर्मीसब( अपवादकरुपमे किछु छोडिकऽ) सदन अवरुद्धक काजके विदेशीक ईशारापर कराओल जाऽरहल, देशके विखण्‍डनकेलेल कायल जाऽरहल लगाएत नाना प्रकारक आरोप लगेबाक शुरु कऽदेलक । आरो त आरो तराई/मधेशक जनताक भोंटसँ जितिकऽ आएल आन–आन पार्टीक तराई/मधेशक ठिक्‍कालेने मधेशी नेतासबसँ विरोध करौनाई शुरु कऽ देलक । ओना विरोधक मोहराक रुपमें किछु नेता आगा आबिकऽ अपन मालिकके मन जितबामे सफल सेहो रहलाह आ मधेशीदलक नेता मात्र मधेशक हीत नई सोचत, हमहुँसब मधेशेकलेल लडव, कहिकऽ जितल मधेशवादी दल बाहेकके नेतासब सेहो अपन पद बँचेवाक डरसँ मौने रहऽमे भलमन्‍साहत बुझलथि । एम्‍हर, कहियो अञ्‍चलाधिश रहल राप्रपाक नेता नरेन्‍द्र चौधरी अध्‍यक्ष रहल थारु कल्‍याणकारिणी सभा थरुहट स्‍वायत्त प्रदेशक माँग करैत मधेशीदल आ सरकार सँगभेल सम्‍मझौताके लागु नई करबाकलेल दबाव स्‍वरुप जुलुश,बन्‍द आ चक्‍काजामके आयोजना करऽलागल । ओना जौ एहि आन्‍दोलनक नेता सबहक विगतके पृष्‍टभूमि देखि त किछु सोंचबाकलेल विवश भेल जाऽसकैया । अखन एहि आन्‍दोलनक अगुवाई कऽरहलछथि– राजकुमार लेखी, जे एमालेमे बहुत दिनसँ लगितो टिकट पएवामे असफल रहल अछि । आब राजनीतिक विश्‍लेषकके मानी त एमालेसँ राजकुमार लेखीक टिकट पक्‍का–पक्‍की अछि एहि विरोध प्रदर्शनक बाद । किशोर विश्‍वास, जे विशुद्धरुपसँ मधेशीके पार्टीक नामसँ जानल जाएबला नेपाल सदभावना पार्टीसँ अपन राजनीतिक जिवनक शुरुवात कएलक । माघ आन्‍दोलकबाद मधेशी जनाधिकार फोरममे सक्रिय भेल, फोरमद्धारा निष्‍कासित भऽ भाग्‍यनाथ गुप्‍ताके अध्‍यक्षतामे मधेशी जनाधिकार फोरमक दर्ता करौलक जकर उपाध्‍यक्ष किछुदिन रहल आ पुनः निष्‍कासित कऽदेलगेल । एहि थरुहटके आन्‍दोलनसँ हुनको एकटा प्‍लेटफार्म भेंटगेल अछि, आब देखबाक ई अछि जे एहि प्‍लेटफर्मपर हूनकर गाडी कतेक दिन धरि रुकत आरो जे हुए, थारुसब नेपालक आदिवासी अछि एहिमे कोनो शंका नहि । सबके अपन–अपन अधिकार भेंटवाक चाही । मूदा अपन अधिकारकलेल दोसरके अधिकारक हनन कायल जाए, कतेक ऊचीत गप्‍प अछि मधेश हुए, तराई हुए, थरुहट हुए या कोनो अन्‍ये नाम किया नई दऽदेल जाए ओहि प्रान्‍तके जनताकेँ समान अवसर, पहिचान, अधिकारक ग्‍यारेन्‍टी एवं स्‍वायत्तता भेंटवाक चाही । एकटा बात जे सबके आश्‍चर्य कएने अछि– मधेशी चोर देश छोड, एक मधेश एक प्रदेश नई थरुहट चाही ! ई कहिकऽ कायलगेल विरोध प्रदर्शनमें मगर सँघक व्‍यानरके, चुरे भावरक लोक सबके । मानिलेल जाए जे मधेश शब्‍दके बदलिकऽ तराई या थरुहट राखिदेल जाए त ताईमें मगरके आ चुरे भावरके कोन तरहक फायदा भेटतैक जौं मधेश स्‍वायत्त भऽ जएतैक त झलनाथ खनाल लगाएतके कोन श्रीसम्‍पति हरण कऽदेल जेतैक किया ओ सब एकर विरोध कऽरहल अछि ऊत्तर ताकब जरुरी अछि । सबदिन सँ तराई/मधेशके चरणकेरुपमे बुझने, महेन्‍द्रक फूटक नीति अनुरुप पहाडसँ तराईमें आबि सोझसाझ आदिवासी थारुके सम्‍पति हडपिकऽ ओकरा हरुवा आ कमैया बनेने एहि तरहक शोषक मानसिकताके पृष्‍टपोषक झलनाथसब किया चाहतैक जे ओतुक्‍का थारु लगाएत आन समुदाय सुखी आ सम्‍पन्‍न बनय आ जाधरि तराई/मधेशके स्‍वायत्तता नई भेटतैक ई सम्‍भव नहि से ओकरा सबके बुमल छैक । अन्‍तमे संघीयता या स्‍वायत्तता देलो जाए तराई/मधेशके त अपना अनुसारके बाँटिकऽ जे कहियो तराई/मधेशक जनता शक्‍ति सम्‍पन्‍न आ सामर्थवान नहिं भऽ सकय । ओकरा सबके नींक जकाँ बुमल छैक जे सम्‍पूण तराई/मधेश या थरुहट कोनो नामपर एक प्रदेश भऽगेल त हमरा सबहक कोनो चारा नई चलत ओतऽ । दोसरदिस अपनाके जनताके आवाज कहनिहार नेपालक सँचारकर्मी आ नागरिक समाज लगाएत बुद्धिजिबीपर पैघ प्रश्‍न उठाओल जाऽरहल अछि– सातदलक शिर्षस्‍थ नेताक सहमति/उपस्‍थितिमे,सातदलक सरकारक प्रमुख एवं राष्‍ट्राध्‍यक्ष रहल व्‍यक्‍तिद्धारा हस्‍ताक्षरित सम्‍मौताके लागु करबाकाल आयोग निर्माण आ विभिन्‍न बहाना कायल जाति छैक से हूनका सबके नई सुमाति छन्‍हि आ भेल सम्‍मौताके कार्यान्‍वयनके सुनिश्‍चितताक माँगमे हुनका सबके विदेशीक ईशारा आ विखण्‍डनके बात सुमाति छन्‍हि ।कि सम्‍मौताके सँग भऽरहल मजाकक बाद कोनो समूह सरकार या ककरो सँगे वार्ता करत ? माधव नेपालक सम्‍मौतामे रहल सहमति एमालेक सहमति छल की माधव नेपालक व्‍यक्‍तिगत,जे मलनाथ सम्‍मौताक पुनःविचारक बात करैत छथि ?जौं से बात छैक त हूनका पार्टीक नाम सेहो बदलि लेबाक चाही ।एहि बातपर किया नागरिक समाजके मूँह बन्‍द भऽगेल अछि, किया सँचारकर्मीक कलम ठमहि गेल अछि ? हूनका सबके ई नई बुमल छन्‍हि, जे देशक कोन पार्टी आ नेता कत–कतऽसँ सञ्‍चालित अछि ?निश्‍चित रुपसँ बुमल छन्‍हि, मूदा कोनो वर्ग विषेशके पकडमें रहल सँचारकर्मीसब अपना अनुसारे विश्‍लेषण करैत अपन मनमर्जी अनुसार नङ्गा नाँच कऽरहल अछि आ आम जनमानसमे मिडियाक छविकेँ तहसनहस कऽ रहल अछि । बजतैक केँ ? जौं एक ठाम कोनो अदना तराई/मधेशक लोक देशक विखन्‍डनक गप्‍प करैत छैक त सब मिडियाक प्रमुख समाचारकरुपमे ओकरा परसल जाइत छैक,मूदा सदनसन सर्वोच्‍चठाममे जहन एकटा प्रतिष्‍ठित मधेशी नेता सरकारमे सहभागि सबके दोष प्रमाणित करैत देशमे विखण्‍डनके बीजा रोपणक गप्‍प करैत छथि त ओ नाहियोंटा समाचार नई बनि सकैया ? अन्‍तोगत्‍वा जौं राष्‍ट्रप्रमुखद्धारा कायलगेल सम्‍मौता लागू नईभेल त देशमे केओ ककरो पर विश्‍वास नई करत आ एतेक पैघ सँकटके ई जन्‍मदेत से सबके बुमितो मौन अछि । आ दोसर बात तराई/मधेशक जनताके ई बात बुझनाई जरुरी अछि कि तराई/मधेशक जनताके अधिकार सम्‍पन्‍नता चाही आ स्‍वायत्तता चाही । तराई/मधेशक जनता अधिकार सम्‍पन्‍न नई भऽजाए आ सबदिन दास बनल रहय से मानसिकतासँ जे अपना घरमे फूट कराओल जाऽरहल अछि तकरा समयेमे बुझनाई जरुरी अछि । ओतुक्‍का जनताके एकैहिटा प्रदेश चाही या १०टा, तकर निर्णय ओतहिक जनता करत नई कि फूटाकऽ राज करबाक सोंचनिहारसब । जौं अपनाके मधेशवादी कहऽबला दलसब सेहो कोनो तरहक गलत निर्णय करैत छथि त हूनको सबहक विरोध होबहिक चाही । कुमार शुशान्‍त छोटकी काकी गामक माटिक सुगन्‍ध, गामक बसमे बैसिते लागऽलागल । चौबीस वर्षक विछोडक बाद आइ ई सौभाग्‍य भेटल । जौं कही चौबीस वर्षक बनवासक बाद तहन कोनो अतिश्‍योक्ति नई, हमरालेल त बनवासे अछि गाम सँ दूर । जेना–जेना आन–आन गामके पार करैत बस अपन गामक लगमे अबैत गेल, तहीना–तहीना हृदयमे एकटा हटले प्रकारक उमँगक सँचारके अनुभूति होबऽ लागल । हौजी, गाममे प्रवेश आ अपन घरक दूरी दश डेगक, मूदा दू मिनट पहाड सन लगैत छल । उठल डेग रुकिगेल जहिना एकटा आवाज कानके स्‍पर्श कैलक, “छोटकी काकी गै, पाइ दहिने धान कुटबऽ ले ।” एहने बिसराह छलथि हमर छोटकी काकी । पुछलाबाद ओहो अपन परिचय “छोटकीए काकी” कहिकऽ दैत छलीह । हूनक नाम त हमरो सबके नहि बुमल अछि, लगतीह दाइ मूदा बजवैत छलियैन्‍हि “छोटकी काकी” नाम सँ । ओना हमर अपने नई भऽ पटिदारीक दाइ छलीह “छोटकी काकी”, मूदा अप्‍पन एतेक कि आँखि खुजिते छोटकी काकीक हँसैत चेहरा देखैत छलहुँ आ बाल सुलभ हठ शुरु भऽ जाए “छोटकी काकी गै ?” “बउवा ?” “नीन्‍नी( चीनी )बला रोटी बनएने कि नई ?” “बाबु हमर बिसराह भऽ गेलहुँ, बिसरि गेलऊँ, नेन्‍ना हमर अखने बना दैत छी ।” वाह रे शब्‍दक अमृत, एतेक मधुरता ! छोटका बबा परदेश कमाइत छलथि, बड सलज लोक । एही पृष्‍ठभूमिमे छोटकी काकीक धियापुताक चर्चा नई देखि अपने पाठक लोकनि जरुरे बुमिगेल हायब कि “भगवानो सँ चूक होइत छन्‍हि”, मूदा जौं हमर विचार पुछि त हम एकरा न्‍याय कहब भगवानके, छोटकी काकी सन लोक जे उपमा छथि स्‍नेहक, प्रेमक, हुनकर घेरा सिमीत नई होए ताँए । सत्‍ते कहबी छैक, बचपनके घटना जे बच्‍चाके मानस पटल पर आकीत भऽ जाइत छैक ओ मेटौला सँ नई मेटाऽ सकैया । प्रित दीदी नइहर आएल छलिह, हमर छोटकी काकी बेचैन, “गै छोटकी काकी किया बेचैन छें ?” “नेन्‍ना रे प्रित वऊआ आएल छथिन्‍ह ।” “गै छोटकी काकी, ओतेक पैघ आजन, हूनकर माए प्रित दीदी तखन बऊवा कोना भेलखुन्‍ह ?” मोतीसन बतीसो दाँत छोटकी काकीक चमकल, कहलीह, “हमर त बऊवे छथि ।” “कि कहलहुन प्रित दीदी ?” “बऊवा रे जतऽ रहैत छथिन्‍ह प्रित बऊवा ओतऽ ताजा माछ नईं भेटैत छैक” एहि बातक मर्म तखन हमरा बुमबामे नई आएल छल, मूदा वेसी समय सेहो नई लागल । सुतली रातिमे छोटकी काकीके हिंचकी हमरा भित्तर सँ मकमोरिकऽ जगा देलक । छोटकी काकी कनैत छलीह । “किया कनैत छें छोटकी काकी ?” “नई किछ, सोना सुति रहू” “नईं जो कह नेऽ ?” नोर पोछैत अपन अनुरोध रखलहुँ । “नेन्‍ना रे, प्रित बऊवा काल्‍हि जाइ छथिन्‍ह, हुनका माछ खुअवितहुँ । पैंच नेने छलहुँ, किछु पाई बाकसमे रखने छलहुँ, हरा गेल ।” “छोटकी काकी गै नई कान, हम कमाएब त तोर खूब पाई देबऊ तू हूनका माछ खुवा दियहुन”, भरि पाँज धऽ कऽ माथ चुमि लेलथि छोटकी काकी । वात्‍स्‍ल्‍यक छहारीमें समय कोना कटल नई बुमाएल । कखनो काल बाबुजी, माँपर बड तमसाथि, “बिगडि रहल अछि, देखू ध्‍यान दियऊ”। ई शब्‍द, शब्‍द नई सँकेत छल, भेंटऽबला सजायके । किछु दिनमे परिणाम देखाई देलक, हम जिद्दपर अडि गेल छलहुँ “नई कि नईं जाएब”, जिद्द निरर्थक नई छल, हमरा हिसाब सँ, बात छल छोटकी काकी सँ दूर होयबाक । पढऽवास्‍ते बेबी दीदी ठाम जएबाक । “बच्‍चा के बल कानव ” एहि कहविके चरितार्थ करैत, छोटकी काकीके कोरामें माथ राखिकऽ खूब कानी । नोर नुकवैत छोटकी काकी कहथि,“नई “जाएब त हाकिम कोना बनव ?” “हमरा नई बनवाक अछि हाकिम” फेर सँ हिचकी लैत सवाल पुछि बैसियैन,“हमरा कोन जरुरी अछि हाकिम बनऽके ?, नीक बला पैन्‍ट शर्ट पहिरलाकबाद तोहीं त कहैछें कि हमर नेन्‍ना हाकिम सन लगैया”, शब्‍द नोरक बान्‍ह तोडि देलक, भरि पाँज कऽ धऽ दुनु गोटा फफक्‍का मारिकऽ कानऽ लगलहुँ । फेर कहलथि,“आहाँके हम्‍मर सपत जौं नई गेलहुँ त हम्‍मर मरल मुहँ देखब ।” पट सँ कोरा छोडि उठलहुँ आ प्रस्‍थान कऽ गेलहुँ अपना घर दिस, ओइ घर दिस जकरा काल्‍हि धरि हम मदनबाबुक घर कहियैन (हमर बाबुजीक नाम मदनबाबु अछि )। चारिए डेग आगु बढल छलहुँ की फेर सँ सुनाई परल छोटकी काकीक आवाज “घुरब तखने जखन हाकिम बनि जाएब ।” माँ सँग सूतब माँके आश्‍चर्यमे रखने छलन्‍हि, बेरबेर पुछथि, “कि भेल बाऊ ?” “नई किछु, हम जाएब बेबी दीदी ओतऽ पढऽ ।” भ्‍ाोर सँ भोर बाबुजी सँगे तैयार भ कऽ विदाह भेलहुँ पढि लिखिकऽ हाकिम बनवाक लेल । विदाह बेर बाबुजी कहलथि, छोटकी काकीके गोर लागि कऽ आबऽलेल । हम अपन हिसाबक बहन्‍ना बना लेलहुँ, मूदा गेलहुँ नई । बसमे बैसति काल बाबुजी कहलथि, “देखु वाएह छथि छोटकी काकी” तका गेल, सत्‍त्ते छोटकी काकी छलीह । “किया आएल छथिन्‍ह एत्त ?” बाबुजी सँ पुछलिऐन्‍हि । प्रश्‍नक जबाव बाबुजी नई देलथि, हमरा चाहबो नई करैत छल बाबुजीक जबाव, किया त हम बुमैत छलहुँ छोटकी काकीके अएबाक कारण । हँ, ई नई बुमल छल जे छोटकी काकीके अन्‍तिमबेर देखि रहल छी । जौं ई बुमल रहैत त जतेक देर बस रुकल छल ओतेक देर कम सँ कम हुनके देखितहुँ । “शुश भाई एतऽ किया रुकल छी ?, कखन अएलहु” चचेरा भाईएक ई शब्‍द हमर तन्‍द्रा तोडलक । जे नोर छोटकी काकीके सँग रहलापर हमरा सँग छल, हूनका बिदाह भेलाकबाद विदा भऽगेल छल । अखन..... हूनकर याद फेर सँ नेने आबिगेल छल..नो...र... । श्‍यामसुन्दर शशि आह उमा ! वाह उमा ! ठिक्‍क डेढ वर्ष पूर्व रेडियो टुडेक वास्‍ते कार्यक्रम संचालक आ समाचार वाचकके छनौट प्रकृयाक क्रममे पहिल बेर जनकपुर उद्योग वाणिज्‍य संघके सभाकक्षमे हमरा ओकरासंग भेंट भेल छल । ऊ प्रतिष्‍पर्धीक रुपमे हमरासभक सामने खाढ छलीह आ हम, जनकपुर टुडेक सम्‍पादक बृजकुमार यादव,संचारकर्मी तथा साहित्‍यकार रमेशरंजन झा,रेडियो टुडेक प्रवन्‍ध निर्देशक अनुराग गिरी एवं पत्रकार महासंघ धनुषाक वर्तमान सभापति उमेश साह परीक्षकके रुपमे छलहुँ । तहिया ओ २३वर्षक छलीह मुदा आधुनिक युगक एहि युवतीमे आधुनिकताक नामोनिसान नहि छल । मलिछांह रंगक समीज—सलवार,सामान्‍य चप्‍पल ,मेकअप विहीन सादा मुदा चमकैत मुखमण्‍डल,नदी किनारमे लत्तरिक फूलल अनेरुवा गुलाव जका लागि रहल छलीह ओ । ओकर सुख्‍खल देहयष्‍टि ओकर भीतरके पीडाके बखान क रहल छल । स्‍नातकके अन्‍तिम वर्षक परीक्षाक वाद ओ व्‍यावसायिक जीवनमे प्रवेश करए चाहैत छलीह । यद्यपि एहिसँ पूर्व सेहो ओकर संचार जगतसंग प्रत्‍यक्ष आ परोक्ष सम्‍बन्‍ध रहैक ।छापा आ विद्युतीय संचार सम्‍बन्‍धी अनेकौ तालिम,सभा सेमिनारआदिमे सहभागी भ चुकल ओहि युवतीक सपना रहैक—रेडियोक लेल समाचार संकलन करबाक आ अपन भाषा मैथिलीमे समाचार वाचन करबाक़़़़। हमरालोकनि ओकरा ई मौका सेहो उपलब्‍ध कराओल । साँच कही त ई अवसर हमरालोकनि दयासँ नहि ओकरा अपनहि प्रतिभाक वलपर प्राप्‍त भेलैक । हमरालोकनि निमित्त मात्र बनलहुँ । आओर बेसी कही त प्रतिष्‍पर्धीसभमध्‍य ओ सर्बोत्तम छलीह ।लगभग तीन वर्ष पूर्व माओवादीद्वारा पिता आ भैयाके वेपत्ता बनौलाक बादसँ ओकरा बहुत किछु कहवाक छलैक । सम्‍भवतः अपन बात कहवाक वास्‍ते ओ संचारक्षेत्रमे आवए चाहैत छलीह । अएवो कएलहि । एहि तरहे अपन सादगी आ प्रतिभाक वलपर पहिलहि भेंटमे हमरामात्र नहि सभ परीक्षकके प्रभावित करएवाली ओ युवती छलीह हमर सहकर्मी आ विद्यार्थी उमा सिंह । तकराबाद एक महिने तालिम आ करीव ९महिना ओकरासंग काज करबाक मौका भेटल । हमर आठ महिने कतार प्रवासक क्रममे सेहो उमासंग बेर बेर ईन्‍टरनेट मार्फत बात चित भेल अछि । एहि बीच ओकर एकगोट उलहन रहैत छलनि—सर अहाँक गेलाक वाद हमर भाषाक शुद्धा शुद्धी केओ नहि देखि दैत छथि । ओएह उमासिंहक विषयमे सोमदिन भोरे अत्‍यन्‍त अशुभ समाचार सुनलहुँ । भोरे ओछानेपर छलहुँ तखने जनकपुरक एक गोट सहृदयी मित्र फोन कऽकऽ ई अशुभ समाचार सुनौने छलाह । मोन घोर भ गेल छल । एक गोट फूलके नीकसँ फूलवासँ पहिनहि निचोरि देल गेल अछि । कोन अधमके कुदृष्‍टि पडि गेलै एहि सम्‍भावनावान मज्‍जरिपर ? भोरेसँ घटनाक विवरण आ कारणपर गंथन मन्‍थन क रहल छी । मुदा एक्‍कहीगोट निचोडपर पहुचैत छी । जे भेल से बड अधलाह भेल । एकगोट अक्षम्‍य अपराध । उमामे एकगोट संचारकर्मीमे होवएवला सभ गुण छल । ओ अध्‍ययनशील छलीह,मेहनती छलीह,निडर छलीह आ पेसाप्रति निष्‍टावान सेहो । सम्‍भवतः हुनकर ईहे गुण ,हुनकर मृत्‍युक कारण बन्‍ाल । लगभग तीन वर्ष पहिने माओवादी कार्यकर्तासभ उमाक पिता रंजीत सिंह आ भैयाके सिरहाक रामनगर मिर्चैयासँ अपहरण कऽ बेपत्ता बनौने छल । दुनूगोटेक एखनोधरि कोनो अत्ता—पत्ता नहि छनि । घरक मुखियासभ बेपत्ता बनौलाक वाद उमा अपन घरक एसगर मुखिया छलीह । बेसहारा माय,भाउज,बहिन आ भतिजा—भतिजीक देखभाल आ अपहरित पिता तथा भैयाक खोजीक पहल करब हुनके जिम्‍मामे आवि गेलै । बाबू आ भैयाक अपहरण पश्‍च्‍यात् घरक बिगरैत आर्थिक संकटके भार सेहो ओकरे पर छलै । पारिवारिक जिम्‍मेवारी वोधक कारणे ओ एखनधरि विवाह पर्यन्‍त नहि कएने छलीह । अपन पिता आ भैयाक मुक्‍तिक लेल ओ राष्‍ट्रिय तथा अन्‍तरराष्‍ट्रिय निकायसभमे हार गुहार करैत आएल छलीह । जाधरि ओ सिरहामे छलीह हुनका बेर बेर धमकी देल जाईत छलनि । धमकीक कारणसँ सेहो ओ सुरक्षित वसोवासक वास्‍ते जनकपुर आएल छलीह मुदा एतहु सुरक्षित नहि रहि सकलीह । करीव दू वर्षसँ ओ जनकपुर नगरपालिका १४,रजौल स्‍थित एक साथीक घरमे भाडापर रहैत आएल छलीह । रविदिन सन्‍ध्‍या सात वजे ओ अपन एहि डेरामे छलीह तखने हतियारधारीक एक समूह आएल आ हुनका उपर अन्‍धाधुन्‍ध खुकुरी प्रहार कएलक । जाहिसँ ओ गंभीररुपसँ घायल भेलीह । रेडियो टुडेेमे कार्यरत महिला पत्रकार उमाके उपचारार्थ काठमाण्‍डु ल जाईत काल बाटेमे मृत्‍यु भेल छल । समाचारक बिषय ल क हुनक हत्‍या भेल हाएवाक प्रारम्‍भिक अनुमान अछि । नेपालमे हत्‍या कएलगेल उमा पहिल महिला पत्रकार अछि । दोषीके पहिचान आ गिरफ्तारी नहि होएवाधरि उमासिंहके हत्‍याक वास्‍तविक कारण पत्ता लागव कठिन अछि । वर्तमान सरकार दोषी पत्ता लगा दोषीके दण्‍डित करत तकर सम्‍भावना बहुत न्‍युन अछि मुदा पत्रकार उमासिंहक बलिदान बेकाज नहि जाएत कारण कलमके धार अवरुद्ध करएवला कहियो जिवीत नहि रहि सकल अछि । कलमके नीव तोडएवलासभक अस्‍त्‍वि समेत नस्‍ट भेल घटनाक साक्षी ईतिहास अछि । अपन देशक रक्षा वास्‍ते रणक्षेत्रमे मृत्‍यु वरण करएवला सैनिकके शहीद कहल जाईत अछि । ओ मृत्‍यु आदरण्‍ीय होईत अछि जे देशक हितमे भेल रहैत अछि । उमा ! अहाँ सौभाग्‍यशाली छी । समाचार लिखवाक आ पढवाक कारणसँ अहाँ प्राण गेल । मनुक्‍खक नैसर्गिक अधिकारक वकालत करैत प्राण देनिहारि हे बीराङ्गणा ! अहाँ दुनियाभरिक कलमजिवीसभक मनमानसमे रहव । आह उमा ! वाह उमा ! अन्‍तमे गुरुवर डा़धीरेन्‍द्रक एहि पंक्‍तिद्वारा श्रद्धा सुमन व्‍यक्‍त करए चाहव स्‍वीकार करु । हे ! हमर सहकर्मी आ शिष्‍या । नोरक टघारेसँ जीवन जँ निर्मित आशाकेर कमल अछि हृदयकेर दहमे कठिन युद्ध अछि ई त लडिए रहल छी । हारव ने कहियो अहंक (हमर) जीत निश्‍चित । विचार- मिथिलाक तवाही,सरकारी षडयन्‍त्र त ने अछि ?? संविधानसभाक निर्वाचन पश्‍च्‍यात् मधेस चैनक स्‍ाांस लेत ,मिथिला आरामसँ अपन विकास आ कला—संस्‍कृतिक संरक्षण सम्‍बर्द्धनमे जूटि जाएत,तेहन विश्‍वास राजनितिक वृत्तमे ब्‍याप्‍त छल । राजनितिक विश्‍लेषकसभके कहब छलनि जे अधिकार वास्‍ते मधेसभरि उठल पसाही निर्वाचन पश्‍च्‍यात् संसदमे धुधुआएत आ सडक शान्‍त भ जाएत । सशस्‍त्र समूहक बन्‍दुक सेहो सहज निकास पाओत । मुदा से धरि भेल नहि । मधेसक अन्‍यान्‍य भाग थोर बहुत शान्‍तो भेल मुदा मिथिलाक अवस्‍था बद्सँ बद्त्तर होईत गेल । खासकऽ मिथिलाक सीमामे पडएवला धनुषा,महोत्तरी,सर्लाही,सिरहा आ सप्‍तरीक अवस्‍था त बेहाल भ गेल । तथ्‍यांक दिस दृष्‍टिगत करी त विगत तीन महिनामे एहि क्षेत्रमे लगभग एक सय सर्वसाधारणकेँ हत्‍या भेल अछि । अपहरण,लूट,चोरी,डकैती आ मारि पिटक त लेखा जोखा करब मुस्‍कील । सडकसँ संसदधरि पहुचिनिहार मधेसी जनअधिकार फोरमकेँ नेतालोकनि उपराष्‍ट्रपति, उपप्रधानमन्‍त्री,मन्‍त्री आ कि—कहाँदनके पाछाँ पडि, सडककेँ भावना बिसरि गेलाह अछि । किछुकेँ पाछाँ नहि पडवाक नाटक कएनिहार तराई मधेस लोकतान्‍त्रिक पार्टी, काँग्रेसकेँ नव संस्‍करण जकाँ प्रतीत भ रहल अछि । जेकरा अशान्‍त होएवाक चाहैत छल से अर्थात संसद, शान्‍त अछि । सडककेँ शान्‍तिपूर्ण आन्‍दोलनकारीसभ एखनो संसददिसि आशाक नजरिसँ ताहि रहलाह अछि जे कखन हमरालोकनिकेँ अधिकार भेंटत ? अपन सहनशीलताके उत्‍कर्षधरि आम मधेसी आ मैथिल अपन नेता आ संविधान सभासदसभक शुभसंकेतक प्रतिक्षा करबाक प्रण जकाँ कएने अछि । सम्‍भवत ः तें सडक शान्‍त अछि । मुदा ई खामोसी विहायडिक संकेत सेहो भ सकैत अछि । तेँ मधेसी दल,सशस्‍त्र समूह आ सरकार विहाडिक संकेत समयमे अकानथि त वेस । अन्‍यथा आब उठएवला पसाहि जूटक नहि फूटक हएत । साढे तीन करोड जनताक ६सय सभासद्, साढे छ महिनाधरि राजकोषक दानापानी चैनसँ हजम करैत रहलाह,मन्‍त्री—जन्‍त्री आ कि—कहाँदन बनवाक जोगाडमे लागल रहलाह । आब हुनकासभकेँ आँखि खुजलनि अछि जे—बापऱ़़ेसंविधान कहिया लिखब ? हमरालोकनि त संविधान लिखवा वास्‍ते पठाओल गेल छलहुँ । आ आब बनल अछि विभिन्‍न समितीसभ । जे से, पुजारीके जेना देरीसँ मोन पडलनि जे हम पुरुष छी तहिना हमरासभक सभासद्लोकनिकेँ देरिएसँ सहि मोन त पडलनि जे हमरालोकनि संविधान सभासद् छी,सांसद नहि । हमरालोकनि बात कऽ रहल छलौं ,मिथिलामे व्‍याप्‍त अशान्‍तिक विषयमे । जेनाकि पूर्वमे अनुमान लगाओल जा रहल छल जे संविधानसभाक निर्वाचन पश्‍च्‍यात् मधेस शान्‍त भऽजाएत आ संसद अशान्‍त होएत । से भेल नहि । राजनितिक शास्‍त्रक सिद्धान्‍तकेँ औठा देखबैत मधेसक सशस्‍त्र समूहसभक सकृयता आओर बढि गेल । मिथिला भरि हत्‍या,हिंसा,लूट,अपहरण,चन्‍दा असुलीलगायतके घटनामे अपेक्षाकृत बृद्धिए भेल । सरकारद्वारा वार्ताक आह्वानक बाबजुदो हत्‍या हिंसाक घटनामे कमि नहि आवि रहल अछि । आम नागरिक मात्र नहि राजनितीक विष्‍लेशक लोकनि सेहो खोजी क रहलाह अछि जे आखिर एकर पाछाँ की कारण भ सकैछ ? राजनितिज्ञलोकनि सेहो छगुन्‍ता मे छथि । दोसर दिस आम नागरिककेँ मोनमे एक गोट प्रश्‍न उठि रहल छैक जे निर्वाचनकेँ क्रममे चुपचाप बैसल मधेसक सशस्‍त्र समूहसभ,फेरसँ किया आ कोना सकृय भ उठल ? संगहि किछु शंका उपशंकाक जन्‍म सेहो भेल अछि । एक गोट सहज सवाल जे सभकेँ झकझोडि रहल अछि ओ ई जे—कि माओवादी नेतृत्‍वक वर्तमान सरकार नितिगत रुपसँ मधेसकेँ अशान्‍त राखए चाहैत अछि, मधेसक अशान्‍तिक फायदा उठा पुनः औपनिवेसिक शासन त ने करए चाहैत अछि ??यदि से नहि त मधेसमे व्‍याप्‍त हिंसाके किए नहि रोकल जा रहल अछि । मधेस आन्‍दोलनकेँ क्रममे कएल गेल समझौताक कार्यान्‍वयन किए नहि कएल गेल ? फेरसँ मधेसी जनताकेँ ठकबालेल ? एक दिस सशस्‍त्र समूहसंग वार्ताक नाटक करब आ दोसर दिस कार्यकर्ताकेँ हत्‍या करब ,कराएव । एहना स्‍थितीमे वार्ताक वातावरण केाना बनत ? दोसर दिस मधेसक सशस्‍त्र समूहक ताजा गतिविधी सेहो प्रश्‍नक घेरामे अछि । की मधेसमे उत्‍पात मचा रहल दू दर्जनसँ अधिक समूह मधेसेक वास्‍ते काज क रहल अछि ? यदि ई समूहसभ मधेसक वास्‍ते काज क रहल अछि तँ संविधानसभाक निर्वाचनकेँ बेरमे कत्त छल ?ओ समूहसभक मांग की अछि ?सैन्‍य संरचना केहन छैक ?आ ओ समूहसभ कोन ठाम सरकारसंग लडाई कएलक अछि ? आ सभसँ महत्‍वपूर्ण जे मधेसक वास्‍ते संघर्षरत्त ओ समूहसभ मधेसमे चोरी,डकैती,हत्‍या,हिंसा,अपहरण क रहल आपराधिक समूहसंग केहन व्‍यावहार क रहल अछि । मधेसक मसिहा कहएवला एहि समूहसभक काज मधेसके सुरक्षा देब सेहो होएवाक चाही ने ? एहि तरहे देखल जाय तँ मधेसप्रति वर्तमान सरकार आ मधेसक नामपर सशस्‍त्र संघर्ष करएवला समूह, दुनूक दृष्‍टिकोण नकारात्‍मक छैक । दुनू मिलीक मधेस आ मधेसीकेँ शोषण,दोहन आ तवाह करवाक काज क रहल अछि । मधेसक नामपर सशस्‍त्र संघर्ष करएवला किछु समूह सर्वसाधारण व्‍यक्‍तिकेँ अपहरण करैत अछि,फिरौती लैत अछि आ पुलिससंगे आधा आधा भाग बण्‍डा लगवैत अछि । सशस्‍त्र समूहसभ पहिने हथियार खरीद करबाक नामपर चन्‍दा असुली अभियान चलबैत छल । आब त ईहो कहल जाईत छैक जे —हमरा कार्यकर्ताके पुलिस पकडने अछि ,ओकरा छोडएवाक वास्‍ते चन्‍दा चाही । धनुषाक महेन्‍द्रनगरमे एक गोट घटना हालहि घटल अछि—अपहरणकारीके पकडल जएवाक मांग सहित उमाप्रेमपुर आ किसाननगरके ग्रामीणसभ महेन्‍द्रनगर ईलाका प्रहरी कार्यालय घेराउ कएने छल । स्‍थिती बेसम्‍हार भेलाक बाद पुलिसके गोली चलावए पडलैक आ एहि क्रममे संजय कुमार साहनामक एक युवक घायल सेहो भेल । एहि तरहे यदि पुलिस अपहरणकारीके संरक्षण दैत छैक त अपराध कोना नियन्‍त्रण हेाएत ? जनकपुरमे एक सरकारी कर्मचारीके हत्‍याक बाद सरकार मिथिलाक एहि पाच जिल्‍लामे विशेष सुरक्षा रणनिती बनौलक अछि । एहि सरकारी रणनितिससँ अपराध घटओ वा नहि मुदा मिथिलाक जनता आओर तवाह हएत से धरि पक्‍का अछि । दुलहा बनल श्रीराम हे ऽऽऽ (सन्‍दर्भ: राम—जानकी विवाह महोत्‍सव) अगहन शुक्‍ल पञ्‍चमी । दुनिया भरिक हिन्‍दुसभक वास्‍ते प्रतिक्षाक दिन । कारण एहि शुभ तिथीमे मार्यादापुरुषेात्तम श्रीराम आ आदर्श नारी सीताक विवाह भेल रहनि । जाहि तिथीक एतेक बिकलतासू प्रतिक्षा कएल जाईत हो,ओ स्‍थान कतेक पवित्र होएत ?कल्‍पना कएल जा सकैत अछि । स्‍वाभावत ः राम—जानकीक विवाह भेल धरतीकेू स्‍पर्श कऽ लोक धन्‍य धन्‍य होवए चाहैत छथि । सोचियौं जे जनकपुरवासी कतेक भाग्‍यमानी छथि,जनिकर जन्‍म एहि पावन धरतीपर भेल छनि । ओ पावन धरती आ एहि धरतीक प्रतिपालकसभ एहि सप्‍ताह अपन प्रिय सीता आ पूज्‍य श्रीरामक विवाह धूमधामसू कएलनि अछि । एक सप्‍ताह धरि चलल एहि विवाह महोत्‍सवमे ने मात्र जनकपुर आ मिथिलावासी अपितु भूगोलक कोना कोनाक हिन्‍दुसभ अपन अराध्‍य देवक विवाहमे सहभागी भेलाह । मिथिलामे सीताके बेटी आ बहिनक रुपमे मान—सम्‍मान कएल जाईत छनि । स्‍वाभावत ःदुलहा रामके जयाय आ बहिनोक रुपमे । ईतर मिथिलावासीके आश्‍चर्य लागि सकैत छनि जे जहन श्रीरामके डोला(प्रतिमा) विवाह वास्‍ते जानकी मन्‍दिर प्रवेश करैत अछि त मैथिलानी गितिगाईनसभ हुनका गाडी पढैत छनि आ पुछैत छनि— रामजीसू पुछय मिथिलाक नारी बतावऽ बबुवा एक गोर ,एक कारी बतावऽ बबुवाऽऽऽ अर्थात हे राम । जवाफ दिय,एक भाय गोर(लक्ष्‍मण)आ एक भाय कारी(राम) कोना भेलौं । यदि एके गोट पिताक दुनू पुत्र छी त एके रंगक होएवाक चाही ने ??? मैथिलानीसभक पुछवाक तात्‍पर्य छनि जे अहाूक दूगोट पिता त ने छथि ?राम सीताक विवाह एहन विलक्षण आ मनोरम वातावरणमे होईत अछि । राम जानकी विवाह महोत्‍सवके प्रशंगमे जानकी मन्‍दिरके महन्‍थ रामतपेश्‍वर दास वैष्‍णव सीताक पिता अर्थात जनकके रुपमे प्रस्‍तूत भेल करैत छथि आ राम मन्‍दिरके महन्‍थ राम गिरी रामक पिता अर्थात दशरथके रुपमे । सात दिवसीय एहि विवाह महोत्‍सवमे धनुष यज्ञ,तिलक,मटकोर,सेनुरदान आ मर्यादी भोज(राम कलेवा)सेहो होईत अछि । दुलहा पक्षीय श्रीराम युवा कमिटीक युवा—युवती एवं सरकारी कार्यालयके प्रमुखलोकनि बरियातीक रुपमे सहभागी भऽ ढोल पिपही एवं अंग्रेजी वाजाक धूनपर डिस्‍को सेहो कएलनि । जनकपुर नगर पालिकाक पदाधिकारी आ नागरिक समाजक अगुवालोकनि सरियातिक रुपमे बरियातिसभके स्‍वागत कएलनि । हूसी मजाक आ रंग अविरक मर्दन त मिथिलाक वैवाहिक विधिक अभिन्‍न अंङ्गे अछि । सेहो भेल । माने सीता दाईके विवाहमे ओ सभ किछु भेल जे हम अहाू अपन बेटी,बहिन वा भतिजीक विवाहमे करैत छी । मिथिलाक वैवाहिक रितिरिवाजके सभसू आह्लादक पक्ष अछि, एहिमे गाओल जाएवला गीत । साूच कही त मैथिलके विवाहमे पोती पतरा लऽ उपस्‍थित पुरोहितोसू बेसी महत्‍वपूर्ण होईत छथि,गितगाईन दाई—माईलोकनि । आ जहन राम सीताक विवाह भऽ रहल होईत अछि त मैथिलानीलोकनि बड आवेशसू गाओल करैत छथि— मिथिलाक धिया सिया जगत जननि भेलि दुलहा बनल श्रीराम हेऽऽऽ अंकुर काशीनाथ झा, गाम -- कोइलख, मिथिलांचल नेताजी पर तामश कियैक उठैत अछि॥ विगत किछु दिन सऽ नेता के प्रति लोकक सोच बदैल गेल अछि। नेता सबहक जे छवि सामने ऐल अछि ओ लोक के प्रभावित कम केलक। एहि मे नकारात्मक संदेश बेसी अछि। जिनका लोक सब एक दिन समाज के मार्गदर्शित करबाक लेल आगू आनई छैथ। एकटा पहचानक संग ठाढ़ करई छैथ। आई हुनका वैह लोकसब गरिया रहल छथिन। आब प्रश्न उठैत अछि जे एकटा जिम्मेवार आ पथ प्रदर्शक व्यक्ति के प्रति लोकक मोन में नकारात्मक सोच कियैक घूसि गेलैन अछि ? दरअसल एकाएक ऐना नहि भेल अछि। बल्कि पछिला किछु साल में नेता सबहक हावभाव, विचार, स्वभाव आ काज करबाक नीति में ऐल परिवर्तनक ई दुष्परिणाम अछि। एकरा लेल नेता स्वयं हद तक जिम्मेवार छथि। ओ सब नेता शब्दक परिभाषा के बदैल कऽ राखि देलैन अछि। ओ सब राजनीति के मात्र एटा व्यवसाय बुझऽ लगला अछि। ओ सब चुनाव के एकटा व्यवसायिक परीक्षा जंका प्रयोग करैत छैथ। समय के संग परीक्षा में भीड़ बढ़ि गेल अछि। तांहि भीड़ सऽ आगू निकलबाक लेल आ खबरि मे रहबाक लेल मजबूर भऽ कऽ नेता जी सब विकासक काज छोड़ि फालतू आ तर्कविहीन बयान दैत रहैत छैथ। हुनका सब के एहि गप सऽ कोनो मतलब नहि छैन जे हुनकर वक्तव्यक असरि कते दूरगामी आ घातक भऽ सकैत अछि। ई घटना ककरो सऽ नुकैल नहि अछि, जे राज ठाकरे एकटा चुनावी परीक्षा में फेल भेला के बाद अपन मुखारबिन्दू सऽ एहेन शिगुफा छोड़लैन जे महारष्ट्र के हालात बदैल गेल। गैर जिम्मवारपूर्ण बयानवाजी केला पर कोनो तरहक सख्त सजै नहि भेटबाक कारण नेताजी सबहक हौसला आरो बढ़ि जैत छैन। यैह कारण अछि जे देशक केन्द्रीय मंत्रीजी सब आतंकी घटना में लिप्त संगठन सिमी पर सअ प्रतिबंध हटेबाक वकालत करैत छैथ। हुनकर सबहक निर्लज्जता तऽ तखन आर हद फानि जैत अछि जखन अमर सिंह आ अंतुले साहब एक टा शहीदक शहादत पर प्रश्नचिह्न लगा दैत छैथ। एहिना एक बेर तऽ एहेन लागल जे केरल के मुख्यमंत्री जी सठिया गेला अछि। मुख्यमंत्री जी एकटा शहीदक परिवार के गारि दई सऽ परहेज नहि केलनि। एकर सबहक ऐके टा कारण छै। वोट इकट्ठा कऽ चुनावी परीक्षा में पास भेनाई। ई सब कऽ कऽ जखन नेताजी सब चुनावी परीक्षा पास करैत छैथ तऽ ओकर बाद हुनकर सबहक एक टा मात्र लक्ष्य रहैत छैन। कोनो तरहे बेसी सअ बेसी रूपया कमेनाई। जखन गप पैसा के आगू पाछू घूमअ लागैत अछि तखने एहि तरहक खेला होयत अछि। ऐना में सार्वजनिक तौर पर एकटा सवाल उठैत अछि जे एहि स्थिति में आम लोक की करैथ। जे सब किछु देखई आ सहै लेल मजबूर छैथ। मुंबई में भेल आतंकी हमला के बाद अचानक हुनकर सबह ओ तामस जे सालो सअ मोन में दबल छलैन, बारह निकैल गेलैन। किछु गोटे मीडिया के सामने आबि कऽ अपन तामस निकालला तऽ किछु गोटे एकबद्ध भऽ किछु कालक लेल सड़क पर उतरला। एहि सअ बेसी कओ की सकैत छलाह। लोक लाचार छैथ। विवस छैथ। कियैकि विकल्पहीन छथि। हुनका ककरो नै ककरो तऽ नेता बनेबाक छैन्हे। लोकतांत्रिक ढ़ांचा एहेन छैक, जई में नेता जरूरी छई। आ ओ नेता आम जनता द्वारा चुनेवाक छई। बेसी सऽ बेसी आम जनता एक के बदैल कऽ दोसर के चुनि सकैत छथि। मुदा रहता ओहो नेता। मात्र शरीर बदलैत छैक। शरीर बदलला सऽ कृत्य मे कोनो बेसी बदलाव नहि होयत छैक। किछु बदलाव के जॉ उम्मीद कैल जैत अछि तऽ जरूरी नहि अछि जे ओ बदलाव सकारात्मके हुवै। नेता केनो विशेष व्यक्ति नहि होयत छैक। बल्कि ई नाम अछि ओ विशेष वर्ग के, जकर अलग धर्म होयत छैक। अलग इमान होयत छैक। आ अलग पहचान होयत छैक। एकरा लेल एकटा गप अकाटय अछि, आ ओ अछि जे एहि विशेष वर्ग के भ्रष्टता आ विवेकहिनता के हद तक पहुंचाबई में हमर, अहां के आ हमरा सब के कनी कनी योग्दान अछि। कियैकि जान अनजान मे जॉ कियौ एहि सऽ कनी अलग हटि कऽ काज करैयो चाहैत छैथ तऽ हुनका सहजतापूर्वक स्वीकार नहि कैल जैत छैन। ओहि समय लोकक मोन में परिवारवाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद आ पार्टीवाद एहेन किटाणु घोसिंया जैत छैन जे तत्काल हुनका पथ विचलित कऽ दैत छैन। आ एकरे परिणाम दूरगामी आ घातक होएत अछि। फलस्वरूप बाद मे हम सब पछतैत रहैत छी। जे आई सबहक समने अछि। लल्लन ठाकुरक किछु रचना श्रीमती सुभद्रा देवी आ श्री हीरानंद ठाकुरक द्वितीय बालक श्री लल्लन प्रसाद ठाकुरक जन्म ५ फरबरी १९५१, नरकनिवारण चतुर्दशी कs मुंगेर मे भेल छलैन्ह।हिनक ग्राम- समौल,जिला-मधुबनी, आ कर्म स्थली जमशेदपुर छैन्ह। स्कूल-वॉट्सन हायर सेकेंडरी स्कूल ,कॉलेज -एम .आई .टी मुजफ्फरपुर। स्कूली शिक्षा मधुबनिक वॉट्सन स्कूल सs केलाक बाद मुजफ्फरपुर इंजीनियरिंग कॉलेज सs सिविल इंजीनियरिंग केलाह। नेन पनि सs हिनक अभिरुचि कला आ साहित्य कs प्रति रहलैंह आ अनेको कार्यक्रम मेभाग लैत रहलाह। अपनहीं लिखल नाटकक मंचन ओ अपन स्कूले सs करैत रहलाह। कॉलेज कs पहिले बरख मेअपन कॉलेजक सांस्कृतिक कार्यक्रमक भार हिनका दs देल गेलैंह। कॉलेजक द्वितीय बरख सs लs कs अन्तिम बरख तक अपन कॉलेजक छात्र संघक जेनेरल सेक्रेटरी रहलाह। कॉलेजक पढ़ाई पूर्ण भेला पर टाटा स्टील मेकार्यरत भेलाह। ऑफिसक व्यस्तताक बावजूद ओ अपन साहित्यिक गतिविधि कs आगू बढ़ाबति रहलाह। ओ सदिखन अपने लिखल नाटकक मंचन करैत छलाह आ ओहि मेहुनक मुख्यभूमिका रहैत छलैन्ह। प्रकाश झा कs फ़िल्म "कथा माधोपुर की "मेमुख्य भुमिका सेहो केने छथि। हुनक लिखल सब नाटक मिथांचल मेअखैनो खेलायल जायत छैक। हुनक लिखल किछु प्रसिद्ध मैथिलि नाटक छैन्ह:१ - बडका साहेब २ - मिस्टर निलो काका ३ - लोंगिया मिरचाई ४ - बकलेल ५ - आदि वा अंत लल्लन ठाकुर जीक किछु रचना पाठक लोकनिक समकक्ष प्रस्तुत अछि। साढूनामा (कव्वाली, तेसर कड़ी ) कैयक साल सौराठ सभा गेलाक बाद बsरक विवाह भs जायत छैन्ह, आ ओकर बाद होली मे हुनक साढू सब सेहो पहुँचति छथि। होली मे सब साढूक जुटान होइत छैक। विवाहक बादक साढूक व्यथा : साढूनामा सासुर थिक कैलाशे ........दूर हो कि पासे , सारि सारक गप्प कोन सास ससुर दासम दासे। तs अहीं कियाक अघुतायल छी यौ साढू , एखैन्ह तs भेल एके मासे। बहुत जतन सs होइत छैक विवाह मनुख के, सुखक आरम्भ आ अंत दुःख के। आ...भक्तक लेल जेना मन्दिर -मस्जिद गुरुद्वारा, मैथिलक लेल मोहिनी मुरतिया संs सुशोभित ससुर द्वारा। तs प्रेमक व्यापार करू, छप्पन तरहक व्यंजन मुफ्तहिं उदरस्थ करू। लगैत नहिं छैक कोहबर घरक कोनो भाड़ा, संठी सन जे अबैत छथि, मोटा कs मोटा कs भs जायत छथि पाड़ा। तs अहीं कियैक अघुतायल छी .......................एके मासे। नय गाम परहक झंझट , नय बाबू के फटकार , बाबू खुश भेला लय हजारक हजार। ........2 जिन्दगी मे आयल बहारे बहार, चान सनक सारि आ फूल सनक सार। स्वर्णिम अक्षर संs लिखायत ऑ चातुर्थिक राति, जखन नॉन देल भोजन पर सोन सन मुखराक दर्शन भेल छल। मोन मे इ झंकार भेल छल आ ह्रदय मे ई गर्जन भेल छल। की गर्जन भेल छल ? हमरा तs लूटि लिया मिलके हुस्न वालों ने, गोरे गोरे गालों ने, काले काले बालों ने। हम छोरि चलल छी सासुर के, हमरा कथि लेल रोकय छी। मुश्किल सs कतेक जतरा कयलहुं, पाछू सs कथि लेल टोकय छी। नय चान सनक सारि, नय सार गुलाबक फूल, विवाह जे कs लेलहुँ, से भेल भारी भूल। नय छप्पन तरहक भोजन, ससुर के लाचारी, यौ डेढ़ आंखि वाली सासु गाबथी नचारी। यौ कठ्खोधी सन मुँह वाली हमर घरवाली, सड़क पर जोँ चलती तs कहतैन मदारी। बच्चों बजाओ ताली ....२ नय चतुर्थिक राति नय होली नय बरसाति, यौ कर्मक लिखल कहल गेल छय सुआति। जिन्दगी संs साढू हम मानि गेलौं हारी, गेलौं नेपाल सँग गेलय कपार । पहिने सs अधिक दुखी छी हम, छूरा कथि लेल भोंकय छी। हम छोरि चलल छी सासुर के .................पाछू सs कथि लेल टोके छी........ । गीतकार : लल्लन प्रसाद ठाकुर संगीतकार : लल्लन प्रसाद ठाकुर सभागाछी सौराठ (कव्वाली, दोसर कड़ी) एकटा बsरक बाप सब साल अपन बेटा के लs कs सौराठ सभा जायत छथि मुदा ओहिना आपस भs जायत छथि।विवाह नहि भs पबैत छैन्ह।बsर के इ नीक नय लागैत छैन्ह। इ ओहि बरक व्यथा छैन्ह। : सभागाछी सौराठ बsर - आ ...आ...आ... चारिम बरख थिक जे आपस जायब ,जायब जं आपस त फेर नय आयब सुनि लिय बाबू यो सुन लिय भैया , जतबो भेटैया नय भेटत रुपैया मुदा हमरे ....तs हमरे करम कियाक एहेन भs गेल ......२ सब - चारि बेर एला बियाहे नय भेल .........2 पिता - आ ....आ....आ....अगुताउ जुनि,घबराऊ जुनि अगुताउ जुनि घबराऊ जुनि हेबे करत , क्यो नय क्यो माल देबे करत .......2 बौआ एकरे कहे छय कर्मक खेल, कहेनो ठाम कोना दिय ढकेल अगुताउ जुनि .........................................................माल देबे करत.... सहयोगी - मुदा हिनके .......मुदा हिनके करम .................बियाहे नय भेल.........२ बsर - कोना नय अगुताइ अहिं सब कहू, तिसम बरख वयस अछि, आब कते दिन असगर रहू । चतुर्थिक सौजन स्वप्न बनल जाइत अछि ,छप्पन तरहक व्यंजन कोना लोक खाइत अछि, बाबू अहांक गप्प आब नय सोहाइत अछि , हाय रे हमर करम नय जानि कतs ओ बौआयति अछि। सहयोगी- मुदा हिनके ...................................................................बियाहे नय भेल ..........२ बsर - कहलियै करम के रे कहने तो आन, आंखि से आन्हर हो कि बहिर हो कान कहेनो तो देबैं सब अछि कबूल, पैर सs नांगुर हो वा हो कोनो लूल मुदा हमरे ...................................................... बियाहे नय भेल......१ सहयोगी- मुदा हिनके ......................................बियाहे नय भेल.......२ पिता - एतेक जे अगुतायल छी जे आन्हर बहिर, जेहेन तहेन कनियाँ चाहैत छी, जीबैत जीबैत जाँ नर्क भोगs चाहैत छी, तs उढ़डि जाउ ककरो संग हमरा किछु नय कहू, बुझि लिय जे बाप मरि गेला,माय मरि गेली ओकरे संग कतौ जा कs रहू .............. सहयोगी - मुदा हिनके ..............................................बियाहे नय भेल-.....२ पिता - आ.........आ.......आ.......... हमारा सs पैघ शुभ चिन्तक के भs सकैत अछि जे टाकाक संग -संग नीक लोक नीक घsर तकैत अछि आ.....आ....ससुर एहेन जे खूब मालदार हो, कोनो छोट मोट थानाक हवालदार हो। एक अदद मात्र दुलरुआ सार हो सुंदर सुंदर सारिक जतय भरमार हो ..... सहयोगी- मुदा हिनके ..........................................................बियाहे नय भेल......२ बsर - मुदा हमरे ......................................................................बियाहे नय भेल ......२ पिता - सासु अहांक चलवा फिरवा मे लाचार हो, अहींक कनियाँक हाथ मे घरक सब कारोबार हो, कहैत छियैन्ह भगवान् के जल्दी पठा दिय, जेकरा लग रुपैया पचास हजार हो .... बsर - आ....आ....बाप हमर खुश होथि आ ...स्वप्न हमर साकार हो मुदा हमरे ...................................................................बियाहे नय भेल ...२ सहयोगी - मुद्दा हिनके ............................................................बियाहे नय भेल....२ (एक घटकक प्रवेश ) बsर - बाबू..... बाबू...कियो आबि रहल अछि, बचि कs ई जा नय पाबय सभा सेहो आब उठि रहल अछि, आबि रहल अछि....बाबू.... ... आबि रहल अछि। पिता - चोप ...चोप गधा चोप .... घटक - नमस्कार पिता - चोप घटक - की? पिता - नमस्कार घटक - हे हे हे हे नमस्कार ......नमस्कार की पढ़ल छी ? पिता - ABCD घटक - की करय छी ? बsर - EFGH घटक - हूँ ....हूँ....कतेक टाका...? पिता - पचास हजार ..... घटक - बाप रे बाप ......बहुत महग अछि ..... बहुत महग अछि .......बाप रे बाप ...बाप रे बाप ...(प्रस्थान ) बsर - इहो चलि गेल .....सभा उठी गेल .... प्राण पर हमर बनल बाबू ......अहांक लेल खेल .... सहयोगी - इहो चलि गेल .....सभा उठि गेल, प्राण पर हिनक बनल अहांक लेल खेल ... इहो चलि गेल ..... पिता - चोप ...चोप....गधा चोप ...... बsर - तमसाउ जुनि,.... खिसाउ जुनि ... तमसाउ जुनि , खिसिआउ जुनि बाप हमर .....क्यो नय फंसैया की ई दोख हमर.....२ कनियाँ ............हे ये कनियाँ कतय छी हमर हुजूर .... लोक तकैत अछि बsर के हम तकय छी ससुर ... सहयोगी - कनियाँ...हे यै कनियाँ कत छी हमर हजूर लोक तकैत अछि बsर के ई तकै छथि ससुर .........ई तकै छथि ससुर .... । गीतकार : लल्लन प्रसाद ठाकुर संगीतकार : लल्लन प्रसाद ठाकुर ठाकुर घटकैती (पहिल कड़ी) "श्री लल्लन प्रसाद ठाकुर" रचित कव्वाली जे कि तीन श्रृंखला मे छैक, आ गीत नाटिका के रूप मे प्रस्तुत कायल जा सकैत अछि : 1-ghatakaiti (घटकैती) 2-sabhagachhi(सभागाछी) 3-sadhunama(साढूनामा) घटकैती : एक व्यक्ति अपन बेटा के लs कs सौराठ सभा जायत छथि। ओ घटकैती कोना करैत छथि से अहि गीत नाटिका मे छैक। : घटकैती घटक- पॉँच हजार पिता - नय। घटक - दस हजार पिता - नय नय। घटक - बीस हजार पिता - कनि आगू बढू। घटक - पचीस हजार पिता -हाँ ........ पिता - अपने एलियै तकरे विचारि कs पच्चिसे पर हम कहलहुं हाँ, हमरा बौआ सन क्यो नय मिथिला मे दियो लs कs ताकब जं। मैट्रिक पढ़लकय, आई ए केलकय, सोँचलों विवाह कs दियै त। ससुर पढोथिन, नोकरी दिओथिन बेटी सs अपन स्नेह हेतैन्ह जओं, पच्चिसे पर तैं कहलौं हाँ । घटक - आगू पढेबय नोकरी दिएबय, हमरे ऊपर मे भार हेतय जं। अपने की केलियय, कोन बाघ मारलियय, बौआ के सिर्फ़ जन्मेला सs। एतेक टका के मांग करयछी, सोचियो कने तs अपने सs। माथ मे दर्द कोनाक होइछय, बुझतीये होइत बेटी जं।, मानि जइयो कने कम्मे सं........। पॉँच हजार ................................2 पिता - हम की केलियय, कोन खर्च केलियय, तकर हिसाब देखबय जं। हॉस्पिटलक खर्चा दूधक पाई, मास्टर स्कूल के दिलियय जे। लमनचूस किताब आ कोपी, हजार हजार के किनलौं जे। आ बौआ के माय के कष्ट जे भेलैंह, तकर हिसाब करतय के । पच्चिसे पर हम कहलों हाँ ..............२ घटक - अपने महान अर्थशास्त्रक विद्वान, सबटा हिसाब जोड़ने छी। हमर सलाह मानि लिय, आब जे हम कहय छी। अपनहूँ माय के कष्ट भेल हेतैन्ह, अपनहूँ के जनमेवा मे। तकरो हिसाब जोड़ी लिय, बेटा के सूली चढेबा मे। गप्प बेकार , जी सरकार, हमरा बूते नय लागत पार, अपने के बडका व्यापार, हम चलैत छी नमस्कार....नमस्कार ......... । गीतकार : लल्लन प्रसाद ठाकुर संगीतकार : लल्लन प्रसाद ठाकुर साकेतानन्द (१९४१- ), वरिष्ठ कथाकार, गणनायक (कथा-संग्रह) लेल साहित्य अकादेमी पुरस्कारसँ सम्मानित। प्रकाशित कृति: गणनायक (कथासंग्रह), सर्वस्वांत (उपन्यास)। कालरात्रिश्च दारुणा “ की कहैत रही..? छोडू घरक माया_मोह...भागि चलू...?” हुनकर स्वर मे प्राण_भय भरल रहनि. ”ओह, तखनि तक तक त’ बौअनिक ट्रैक्टरो चलिते रहै...जरलाहा के अक्किल पर पाथर पडि गेल रहय...” ओ सिसक’ लागल रहथि. ”आब पछताइये क’ की हैत..? हे एना कानू नंई ! मोन आर घबडा जाइ छै.” “ कानू नंइ त’ की करू यौ ? घर देने धार बहैयै...अहां कहै छी कानू नंहि ?” बंटू झाक हाथ मे एकटा हरवाही पैना रहनि. दू टा जोडल चौंकी, जाहि पर दुनू गोटे बैसल छला, तै पर स’ हाथ लटका क’ पैना पानि मे देलखिन ! कत्तौ नंहि ठेकलनि. ” सांझ स’ डेढ फीट बढि गेलै! निचला चौंकी बुझू डूबि गेल !” ” दैब हौ दैब ! आब हम कोन उपाय करबै ?” ओ विलाप कर’ लगै छथि. घौना करैत बांधक ठीकेदार, इंजीनियर के सराप’ लगै छथिन. बंटूझा नंहि रोकै छथिन. रोकैक आब एकदम इच्छा नंहि छनि.हुनकर पत्नी; बरसाम बालीक घौना आ अई कोठली, ओई कोठली देने बहैत कोसीक कलकल, एकटा अद्भुत स्वर_ श्रृष्टि क’ रहल छलै. जं’ जं’ सांझ गहराय लागल छलै___तौं_तौं कोसीक हाहाकार बढ’ लागल छलै. एत्ते तक जे बगल मे बैसल पत्नी स’ आब चिकडि क़’ गप्प’ कर’ पडै छलनि. ओ कानिये रहल छली__ ” कत्त’ पडेलें रे ठीकेदरबा सब ? कत्त’ छ’ हौ सरकार साहेब ? बान्ह तोडबाक छलौ त’ कहितें ने रे डकूबा सब...पडा क’ चल जैतौं डिल्ली ! अपन बौआ लग चल जैतौं...कहिते किने रे ... आब के बचेलकै हमरा सब के रौ दैब ?” ओ बच्चा सब जेकां भोकाडि पाडि क’ कान’ लागल रहथि. “ आइ तेसर राति छियै... आब की हेतै रौ दैब !” ” हे, कहने रही ने, कनै छी त’ मोन सुन्न भ’ जाइये.” ” कियैक ने भागि क’ वीरपुर चल गेलौं, किछु छियै त’ शहर छियै; ओइ ठाम स’ कत्तौ भागि सकै छलौं...माथपर कोन गिरगिटिया सवार भ’ गेल रहय यौ...गाम स’ कैक बेर ट्रैक्टर गेलै.” हुनका ई नहि बूझल छलनि जे वीरपुर आब वैह रहलै ? ओ आब सुन्न, मसान, भकोभन्न भ’ गेल छै. ओहि ठाम भरि छाती पानि बहि रहल छै. सब किछु के उपर देने, सब किछु के चपोडंड करैत कोसी बहि रहल छै. ओत्तुक्का लोक ? ओत्ते टा कस्बाक ओत्ते लोक कत’ गेलै ? कत’ गेल हेतै लोक सब हौ भोलेनाथ ? बंटूझा के किछु नहि बूझल छनि, किछु नहि. लोक त’ बेर पडला पर चिडैयो स’ बेसी उडान भरि सकैये...मखानक लाबा जकां छिडिया सकैये, देश्_विदेश पडा सकैत अछि.वीरपुर मे आब ध्वंस हेबाक प्रक्रिया मे सब किछु छै. अही बीच लक्ष केलखिन त’ पत्नीक कपसनाइ बन्द बुझेलनि. शाइत सुति रहली की...जं सूति रहल होथि..त’ हुनका नल राज जकां छोडि क’ गेल हेतनि ? छिः छिः की सोचि रहल छथि ओ ? मुदा बात मोन मे घुमडैत रहै छनि जे ई नंहि रहितथि त’ बंटूझा के पडाइक कैक टा बाट रहनि. अगल_बगलक कैकटा उंच स्थान सब मोन पडलनि...नेपाले भागि जैतथि. डेढ_दू किलोमीटर दूर परहक कैक टा ऊंच डीह सब मोनमे चमकि उठलनि. असकर रहितथि त’ कैक टा उपाय रहै... तैं तीन दिन स’ यैह चौंकी भरि सुखायल स्थान पर लटकल छथि दुनू व्यक्ति ! सत्ते माया चंडाल होई छै. मुदा ककरो की पता रहै जे एत्ते भरबा क’ ऊंच पर बनल घरक ई गति हेतै ! हे एकरा क्यो बाढिक पानि नहि कहै जेबै कहियो, ई प्रलयक प्रबल प्रवाह छियै, बलौं स’ बान्हल बान्ह तोडि क’ निकलल पानि छियै कोसिक, सब के रिद्द_छिद्द कइयेक’ छोडतै, बेरबाद क’ देतै सबके, अइ बेर नहि छोडतै. बंटूझा के साफ लागि रहल छलै जे कोसी अइ बेर नहि मानतै, बदला लइयेक’ रहतै . “ सुनै छियै, कत्ती राति भेल हतै ? भूख नहि लागल अछि ?” ”लागल त’ अछि, त’ देब खाइलय ?” हुनकर स्वर खौंझायल रहनि, जेना चैलेंज क’ रहल होथिन. ” कने ज’ साहस करी, त’ भंसाघरक ताख पर चाउरक टिन धैल छै, ताख डूबल छै की ?” ”ओह, चुप रहूने, जँ नहियो डूबल छै त’ भंसाघर गेल हेतै, अइ अन्हार रातिमे जखन घर देने कोसी बहि रहल हो...” ”घर कहाँ रहलै यौ, अपन घर देने त’ कोसी बहैये आब.” ”बीच नदी मे यै ?” ”हँ यौ, नदीक गुंगुएनाइ नहि सुनै छियै ?” ”सब सुनै छियै, तखन कहै छी जाइ लए ?” ”चाउरक टिन ज’ नहि आनब... आइ तेसर दिन छियै. टिन टा आबि जाय ने कोनो तरहे, दैब हौ दैब ! वेगो बढल जा रहल छै... एहन ठोसगर पक्को घर के तोडि सकयै कोसी ?” ”किछु घंटा लगतै ओकरा, डीह पर घर नहि सौ दू सै ट्रक राबिश पडल रहत.” ई कहि ओ चुप भ’ गेला. दुनू वेकती बडी काल तक चुप छला. ”अच्छा, नहि आनब त’ खायब की ?” “अहीं उतरू ने.” ”नै हौ बाप, वेग देखै छियै ? हम त’ एक्के डेग मे लटपटा_सटपटा क’ चपोडंड.... देखियौ, दरबज्जे_दरबज्जे, कोठलिये_कोठलिये कोना खलखला क’ बहि रहल छै !” ”नै उतरब त’ दुनु गोटे भूखे मरब!” ”मरि जायब, अही कोसी मे भांसि जायब! भांसि क’ कोपरिया कुर्सेला मे लहास लागत...गिध्ध_कौआ खायत!!” “ओह, चुप रहू ने!” बंटूझा बडी कालक बाद चौंकी आ छतक बीच हवा के संबोधित करैत बजला_” आइ तेसर दिन छियै ! आइ तक पटनां_डिल्ली के हमरा सबहक सुधि नहि एलै ?” “अहूं त’ हद करै छी...अहि बोह मे बौआ अबिते हमरा सबके बचबैलय ?” हुनका दिल्ली सुनिते अपन बेटा टा मोन पडै छनि, आर किछु नहि.सत्ते, हुनका लोकनि सनक हजार_दस हजार नहि लाखों लोक, आइ तीन__दिन स’ फंसल अछि, एकर खबरि ककरो नहि लगलैयै ? एहनो कत्तौ होई ? ओ जेना पत्नीक बात नहि सुनने होथि, भोर मे आंटा सानि क’ ओकर गोली खेने रहथि. आइ, तेसर बेर राति गहरा रहल छनि. हिनका दुनू व्यक्तिक अतिरिक्त कोनो चिडियो_चुनमुनीक आवाज़ कहां सुनै छियै ? एखन त’ कुसहा मे बान्ह तोडि क’ बहैत कोसियेक आवाज़ छै चारू भर...बान्ह, छहर, नहर, सडक, रेल, गाछी_बिरछी के मटियामेट करबाक स्वर ! सब किछु के ध्वस्त करबाक घुमडल मौन स्वर__गडर_गडर_गडर...ह’ ह’ ह’..हहा_हहा_हहा; विजयिनी कोसीक अट्टहास स’ हिनका दुनूक कान तीन दिन तीन राति स’ बहीर भेल छनि ! …मोबाइल. इंटरनेटक युगमे तीन दिन बीत गेल आ क्यो सुधि लै बला नंहि ? ..... काल्हि तक त’ दुनू व्यक्ति छत पर चादरि टांगि क’ रहथि . जखन सोपाने बरिस’ लगलनि, आ ओत्ते मेहनति स’ उपर आनल सब वस्तु जात भीज’ लगलनि; अपनो दुनू गोटे सनगिद्द भ’ गेला त’ भगि क’ कोठली मे एला त’ अपन कोठरी मे भरि जांघ रहनि.. चौंकिक ऊपर चौंकी धयलनि; त’ तखन स’ ओही पर बैसल छथि. आब त’ निचला चौंकी डूब’ लागल छलनि ! “दैब रौ दैब ! काल्हि मंचेनमाक नाव के की हाल भेलै हौ दैब...सत्तरि अस्सी गोटे, बाले बच्चा व्मिला क’ हेतै, नाव पलटिते कोना हाक्रोश करैत बेरा_बेरी डुबैत....हौ दैब, कोना हाथ उठाउठा जान बचेबाक गोहारि करैत रहै यौ !” ओ पुक्का फाडि क नेना सब जेकां कान’ लगली. पानिक हहास मे हुनकर रुदन बडा भयौन लगैत रहै. ” जुनि मोन पाडू यै... असहाय लोकके डुबबाक दृष्य नहि मोन पाडू !” ”मोन होति रहय ओत्तेटा कोनो रस्सा रहिते की आने कोनो ओत्तेटा वस्तु__त’ फेक दितियै...मुदा किछु नहि क’ भेल... ओत्ते लोक चल गेलै आ जा रहल छै, से छै ककरो परवाहि...बज्जर खसतौ रे पपियाहा सरकार बज्जर !” ”यै ई कयैक ने सोचै छी जे हमरा सब जीविते छी, जं मंचेनमाक नाव पर हमरो सब चढि गेल रहितौं त’ आइ कोन गति भेल रहिते ? अपना सब नहि चढलहुं त’ प्राण बांचि गेल ने !” ”देखैत रहियै, लोक कोना छटपटाइत रहै...? छत पर स’ त’ स्पष्ट देखाइ पडैत रहै!” ”सब टा देखैत रहियै ! बगल मे चुनौटी हैत दिय” त’ !” ”कत्ते खैनी खायब ?” ”भूख लागल यै.” ”तैं त’ कहैत रही... कनी साहस करू. भंसाघर मे घुसिते, सामने ताख पर चाउरक टिन छै; बगल मे नोनो छै.” ”अहां आयब पीठ पर ?” ”नै यौ, हमरा बड डर लगैये. हे ओ भीतर बला चौकठि के देखियौ त’... देवाल छोडने जाइ छै ?” ”हँ यै बरसामबाली! ई त’ देवाल छोडि देलक.” ”त’ आब घर खसतै की यौ ?” ..चुप्पी, संगहिं नदीक हहास! पानि मे कोनो जीव के कुदबाक छपाक ध्वनि ! ने त’ सगरे पसरल पानि... तै पर अन्धकार. ”किछु बजै कियैक ने छी ? सुनू , आब हमरो बड्ड भूख लागि गेल अछि...” ”देखै छियै, करेंट स’ आब चौंकीक पौआ सब दलकै छै; एखनो हम चाउरक टिन आनि सकैत छी. आयब हमर पीठ पर, उतरी हम ?” फेर चुप्पी. दुनू चुप छथि. बीच मे वैह अलगटेंट हरजाइ बाजि रहल अछि__कोसी बाजि नहि डिकरि रहल अछि ! “ठीक छै, हम उतरै छी...आब जे हुए, आब नहि सहल जाइये...!” ”नै यौ! हम अहांके ऐ अन्हार राति मे पानि मे नहि पैस’ देब. सांझ मे ओ सांप के देखने रहियै...मोन अछि कि नहि ?” ”ओ एत्तै हेतै ? नहि हम उतरै छी, किछु भेल हुए, आखिर अपने घर ने छियै यै ?” ”उतरबै ?”कहि बरसामबाली कनी काल चुप भ’ जाइ छथि; फेर कहै छथिन__”बुझलौं यौ, मोन होइयै गरम_गरम चाह पिबितौं; एकदम भफाइत.” “अच्छा, कत्ते राति भेल हेतै ?” ”देवाल पर घडी त’ लटकले छै, देखियौ ने.” ”एंह, ओहो साला बन्द भ गेल छै.” ”ठहरू, कने पानि के देखियै ! अरौ तोरी के, निचला चौंकी त’ डूबल बरसामबाली.” ”हे यौ, कने एम्हर आउ, हमरा डर लागि रहल अछि. हमरा लग आउ ने.” ”छीहे त’ ?” ”नै हमर लग आउ सब चिंता_फिकिर बिसरि क’ दुनू गोटे सूति रही. जे हेतै से परात देखल जेतै.!” ”भने कहै छी, दलकैत चौंकी आ भसकैत घर मे निश्चिंत भ’ क’ सुतै लए कहै छी...नीचा कोसी बहि रहल अछि ! भने कहैत छी.” ”खिडकी स’ देखियौ, भोरुकवा उगलै ? घडियो जरलाहा के बन्द भ’ गेलै....” ”कथी लए कचकचाइ छी, ई कालरात्रि छियै, अइ मे क्यो ने बचत...” ”ठीके कहै छियै यौ; ऐ बेर क्यो ने बचतै.” ”मारू गोली. जत्ते बजबाक हेतै, बाजल हेतै. सुनै छियै?सुति रहलियै ?” ”धुर जो, एहन परलय मे पल लगतै ? हम कहैत रही डिल्ली ठीक छै ने ? ओकरा खबरि भेल हेतै ? ओत्त’ बौआ अंगुनाइत हेतै...हे अइ बेर नहि अनठबियौ, अगिला सुद्ध मे करा दियौ. नहि करब आड्वाल; नहि गनायब. मुदा पुतहु चाही हमरा पढलि_लिखलि. एकदम स्मार्ट, अपन बौए जेकां.” बंटूझा के लगलनि जे एहन समय आ ताहि मे बियाहक गप, जरूर हिनकर दिमाग भांसि रहल छनि. कल्हुका भोर देखती की नहि तकर ठेकाने ने, चलली है बेटाक बियाह नेयार करै लए.मुदा बरसामबालीक त’ टाइम पास रहनि__बेटाक बियाहक प्लैन बनायब. हुनको मोन भेलनि जे ओ कथाक मादे कहथिन जे हाले मे यार अनने रहथिन. मुदा ओ चौंकी आ छतक दूरी के एकटक देखैत रहला. पानिक स्वर हुनकर कान के बहीर बना रहल छलनित त’ माथ मे कोनो धुंध, कोनो धुआं सन भरल बुझाइ छलनि. बरसामबालीक बुद्धि ठीके भांसि गेल छलनि, नहि त’ एहन मे बेटाक बियाहक नेयार करब ! ”से चाहे जे हुए, पुतहु हमरा सुन्नरि आ पढल चाही.” ”अहां के बड्ड भूख लागि रहल अछि की ?” ”हं यौ !” ”सुनू, अहां घबडायब नहि ! हम यैह चाउरक टिन नेने अबै छी ! ”नै जाउ यौ...नै उतरू यौ...नै जाउ यौ !”बरसामबाली अनघोल करिते रहली, जाबे तक हुनकर मुंह मे गर्दा नहि उडियाय लगलनि. मुदा बंटूझा फेर कोनो उतारा नहि देलखिन. बृषेश चन्‍द्र लाल आ ओ मारलि गेलि ! तखनेसँ खदकैत भातक माड़ सुखा गेलैक आ भात जड़य लगलैक । ओकर तीब्र गन्‍ध जखन चारुभर पसरि गेलैक तँ फुलियाक तन्‍द्रा टुटलैक । ओ पित्ते चुल्‍हिमे पानि झोंकि देलकि — ‘दुर्रऽऽ़़़ ! आब खएबे के करतैक ?! ़़़ इहो भात त फेकएबे करतैक उ’ फुलिया मोनेमन पटपटाएल रहय । ठीके, आब किछु ओकरा कोनो खाएल जएतैक ? आब तँ एकहिटा बात होएतैक — सभक चलि गेलाक बाद ओ मोनसँ कानति आ ताधरि कानति जाधरि नोरक बासनसँ अन्‍तिम ठोप नहि टघरि जएतैक । ओकर गड़ तखनेसँ भारी छैक । आँखिसँ रहि–रहि कऽ टघरैत नोरकेँ ओ कहुना नुकबैति आबि रहलि अछि । कान्‍ह उचकाकए साड़ीसँ गालपर ससरैत नोरकेँ पोछैैति फुलिया देाकानमे बैसलि सिपाहीसभकेँ अपनाकेँ भानसमे तल्‍लीन देखएबाक प्रयत्‍नमे लागलि अछि । मुदा आब ओकरामे आओर सामर्थ्‍य नहि रहि गेल छैक । अपन भोकासीकेँ रोकब मुश्‍किल भेल जाइत छैक । कखनो ठोह पड़ा जएतैक । एम्‍हर इसभ मस्‍तसँ पिअयमे लागल छैक । ़़़ तुरत्ते शायदे जाएत । सभ दिन जकाँ रहि–रहि कए फुलियासँ ठिठोलियो करैत छैक । फुलिया दाँत निकालि हँसक अभिनय करैति अपनाकेँ धुआँसँ पिडि�़त देखबक प्रयत्‍न कए रहलि अछि जे कहुना मुँहझौंसासभ बुझैक नहि । ओ बारी जाएक बहन्‍ने उठि जाइति अछि आ बीच्‍चे बारीमे बैसि कए सिसकि–सिसकि कए कनेक काल कानि लैति अछि । समयक मारि ओकरा सभ किछु सिखा देने छैक । ओ जनैत अछि जे केओ आ खासकय ओकरे दोकानमे बैसकय पिअयबलासभ यदि ओकरा कनैति देखि लेतैक तँ ओकरोपर शंका करए लगतैक आ नहि जानि ओकरा कोन लिखलाहा भोगय पड़तैक । ़़़ ओ फेर अपनाकेँ संयत करैति अछि आ कलपर आबि कुरुड़ कए हाथ–मुँह धोए अपन पीढ़ी पकड़ि लैति अछि जेना किछु भेले ने होइक आ आजुक घटनासँ ओकरा कोनो मतलबे ने होइक । ओ अपनाकेँ ने हर्ष ने विष्‍मादक सजीव अभिनय दिस लगा दैति अछि । एतेक दिनक अभिनय जे से ़़़ कहुना काज चलैत अएलैक मुदा आजुक अभिनयपर ओकर जीवन/मरण निर्भर करैत छैक । ओना मृत्‍युसँ ओकरा ततेक डर नहि छैक, मुदा यातना आ क्रूरतामादेँ जे ओ सुनैति आएलि अछि तकर पीड़ाक कल्‍पनासँ ओ हलाल होइत छागर जकाँ सिहरि जाइत अछि । एखन आओर किछु नहि अभिनयेटा ओकरा एहि त्रासदीसँ बचा सकैत छैक । तैँ ओकरा अपन भावनाकेँ कहुना मसोड़य पड़तैक । ़़़ ओ अपन छातीकेँ फुलाकय एकबेर नाम साँस लैति अछि आ दोकानमे पैसि जाइति अछि । ‘ की भेलौअऽ फुलिया ? ़़़ आँखि लालतेस छौक ?’ — हवल्‍दार भूलोटन ठाकुर झुमैत पुछलकैक । ‘ किछो नहि !’ — ओ हडबडा जाइति अछि — ‘धुआँ आ पिआउज हरान कएने अछि । ़़़ तेहन जरना–काठी किना गेल जे ़़़ । ’ ओ आगाँ सफाई देबक कोशिश कएलकि । ‘ हमरा तँ लागल मोन–तोन खराब छौक ! ़़़ जे होउक, मुदा एखन गाल बड्ड नीमन लगैत छौक । ़़़आ आँखि ! ़़़ एकदम लालतेस, रसाएल ़़़ दारु पिअल जकाँ !! ’ — हवल्‍दार जेना दागि देने होइक । फुलियाक एँडीसँ कनपट्टीधरि जेना झनझना गेल होइक । मोन भेलैक जे चुड़की पकडि कए दू थापर जमा दैकि मुदा ओ संयत रहलि, आ स्‍थिरसँ बाजलि — ‘अहाँकेँ तँ सदिखन ़़़ ़़़ !’ हवल्‍दार भूलोटनक मोन खुशीसँ लहराए गेलैक । गालपर मुस्‍की पसरि गेलैक । काँस्‍टेबल बलराम सहनी हवल्‍दारकेँ प्रोत्‍साहित करैत कहलकैक — ‘ठीके तँ कहैति अछि साहेब, सदिखन कोनो एना कएलकैअऽ ! ़़़ टाइमपर ने करक चाही ।’ पित्ते फुलियाक देह जड़ि गेलैक । लगलैक जेना केओ गरमाएलमे खौलल पानि ढ़ाड़ि देने होइक । ़़़ मुदा ओ करओ की ? एखन तँ सहहि पड़तैक । आई रातिमे कोनो बाट निकलतैक की ? कोनो ने कोनो उपाय तँ करही पडतैक । बाँचब तँ इज्‍जतसँ ़़़ नहि तँ मरबे नीक । ओ स्‍थिरसँ जबाब देलकैक — ‘दुर्र, खाउ जल्‍दी ! ़़़ मुँहो नइ दुखाइअऽ ? तीमन नीमन अछि कि ने ?’ बलरामकेँ जेना मौका भेटि गेलैक, हँसैत कहलकैक —‘ ऐंह, तीमन बड्ड नीमन छैक । जेहन फुलिया तेहन तीमन ! हमहूँसभ आदमी चिन्‍हिकए अबैत छी ने ? तोरहिं जकाँ तीमनो तेज छौक । ’ ‘ बेशी मिरचाई पड़ि गेलैक की ?’ — ओ सरिआबक प्रयत्‍न कएलकि । तैयो ओकर भौंह अनजानमे सिकुड़िये गेलैक । ओकरा लगलैैक, पुलिसबासभ कहूँ घुमाकए तँ बात नहि करैअऽ ? ‘ नइ, ठीक छैक । तीमन कनी तेजे नीक ।’ — बलराम सहनी दाँत निपोड़ैत कहलकैक । मुदा फुलिया किछु नहि बाजलि । ओ कनेक ससरि कए दूर मोचियापर बैसि रहलि । पुलिसबासभ बडी कालधरि खाइत रहलैक । हाँ–हाँ हीं–हीं करैत रहलैक । बीच–बीचमे कनखिया कए तकितो रहलैक । ़़़ ओकरसभक गप्‍प ओ आइ बुझि नहि सकलैकि । रहि–रहि कए मन व्‍याकुल भ’ जाइक । बैचैनी कटने ने कटाइक । मोन होइक अहुँरा जाए आ खूब जोड़सँ कानए । ओ मनेमन गोसाईंकेँ गुहारलकि — ‘ हे भगवान ! ़़़ केहन बिपत्ति !! ़़़ पुलिसबासभ जएबो नहि करैत अछि !’ स्‍थिति आब ओकर सम्‍हारमे नहि छैक । ़़़ कतहु बेहोश भ’ क’ ने खसि पड़ए । यदि एना भ’ गेलैक तँ सभ भेद खुजि जएतैक । नहि जानि कोन–कोन यातना भोगए पड़तैक । ओ जोड़सँ दम खिचलकि आ अपनाकेँ संयमित करक प्रयत्‍न कएलकि । ़़़ पुलिसबासभ बैसले रहलैक । कने–कने कालपर दारु म्‍ँागबैक आ पिबैत जाइक । कनखिया कए ताकक क्रम जारीये रहैक । ़़़ फुलियाकेँ शंका होमए लगलैक । ओ सोचए लागलि — ‘ एतेक दारु तँ ई हवल्‍दार कहियो नहि पिबैत छल । एकरासभकेँ शंका तँ नहि भ’ गेल छैक ?’ ़़़ फुलियाकेँ भेलैक जेना हाथ–पैर फुलि गेल होइक । मुदा, करो की ? दोसर कोनो उपायो तँ नहि छैक । भागत तँ मारलि जाएत । होइत–होइत कहुँ अहिना पकड़ि कए ल’ गेलैक तँ क्रूर यातनामे पड़ि जाएत । नहि जानि की की भोगए पड़तैक ? ़़़ फुलिया आँचरसँ अपन गाल पोछैति अछि । ओकरा आशाक किरण देखाइत छैक । ओकरा लगैत छैक एकरासभकेँ किछु मालूम नहि छैक । मालूम रहितैक तँ कखन ने पकड़ि कए ल’ गेल रहितैक । ़़़ ओ फेर स्‍थिर भ’ जाइत अछि । कनेक आओर देखति । आ फुलिया औंघाएक अभिनय करए लगैत अछि । ‘ फुलिया सबेरे औंघाए लगलेँ ?’ — हवल्‍दार टोकि दैत छैक । ‘आब अबेर नइ भेलैक ?’ — फुलिया दुनू हाथ माथक उपर ल’ जाइत देह–हाथ झारक अभिनय करैति कहैति अछि । ़़़ पुलिसबासभ उठि जाइत छैक । ओकरा लगैत छैक ठीके एकरासभकेँ किछु मालूम नहि छैक । कोनो शंको नहि छैक । बुझाइत छैक जेना हेराइत दम किछु पलटलैकअऽ ! ओ ठाढ भ’ जाइत अछि । मनेमन हिसाब जोड़ए लगैति अछि । ‘ कतेक भेलौक ?’— हवल्‍दार भूलोटन पुछैत छैक । ‘ तीन सय बाबन । ’ — फुलिया संयत होइत कहैति अछि । हवल्‍दार पनसहिया दैत छैक आ फुलियासँ फिर्ता लए आगाँ बढि जाइत अछि । पाछाँ–पाछाँ दोसर पुलिसबासभ सेहो बढि जाइत छैक । फुलिया दोकानक केबाड़सभ बन्‍द करैति अछि । केबाड़ बन्‍द होइते लगैत छैक जेना ओ पताकए खसि पड़ति । ओ बैसि जाइत अछि । आँखिसँ दहोबहो नोर टघरए लगैत छैक । ओ कोशिश करैति अछि जे कोनो आवाज नहि निकलैक । कनेको आवाज ओकरा बड़का संकटमे ढ़केल देतैक । ओ दुनू पएर पसारिकए टाटमे अङ्गोठि कए कानए लगैत अछि । पूरा खुलिकए स्‍थिर भ’ गेल पसरल आँखिसँ नोरक दू धार ओकर गालपर टघरैत टप–टप खसए लगैत छैक । ओ सोचए लगैति अछि, ओकरापर ठीके बज्रपात भेल छैक मुदा ओहि बज्रपातक कारण के ? ओ स्‍वयं अथवा केओ आओर ? ओ ककरालेल कनैत अछि ? ओकरालेल अथवा स्‍वयं अपनालेल ? ओकरा लगैत छैक जेना आ कोनो तेज बहावक नदीक मोइनमे फँसि गेलि होए आ पताइत–पताइत ओ मोनिमे आब समा जाएति । ओतए ओकरा बचाबएबला आ ओहिसँ उबारएबला केओ नहि छैक । शायद आब भगवानो नहि ! प्रकृतिक नियममे ओ ओझराए गेलि अछि । ़़़ ओ अतीतमे ठेला जाइति अछि । शायद ओकरालेल काल पाछाँ घसकि गेल छैक, वर्त्तमानसँ अतीतमे ़़़ ! फुलियाक अतीतक सम्‍पूर्ण परतसभ एक–एक क’ खुजए लगैत छैक !! पूर्णे आ ओकरि सम्‍बन्‍ध नेनपनेसँ छैक । पूर्णे नङ्टे डड़ाडोरि पहिरने ओकरासंगे गोली–गोली खेलैक । देहपर किछु नहि, डड़ाडोरिमे मलहाक जालक घुँघरु, बनेलक दाँत आ ललका मूँगा । फुलियोक देहपर कथु थोड़े रहैक । बस, ठेहुनसँ उपर जाँघतक ओकरि मायक फटलाहा साड़ीक टुकड़ा रहैत छलैक । डाँड़सँ उपर पूरा खालीये । हँ, गर्दनमे अवस्‍से करजन्‍नीक ललकामाला लटकैत रहैत छलैक । जखन ओ गोली फेकैति छलि घुच्‍चीमे तँ माला झुलि कए पाछाँ लटकि जाइत छलैक । घुच्‍चीमे गोली पिलतहिं यदि पूर्णे हारैत रहैत छल तँ खौंझाबए लगैत छलैक — ‘फुलिया, माला पाछाँ चलि गेलौक ! ़़़ छाती उदास भ’ गेलौक ?’ ओहो थोड़े छोड़ैत छलैकि — ‘ आ तोँ जखन फेकैत छाँ तखन जे तोहर डाँड़ा झुलैत छौक, ढ़उसा बेङ्गक मुँह जकाँ ़़़ ढ़प–ढ़प !’ ़़़ तकरबाद दुनूमे झगड़ा भ’ जाइक आ खेल भँड़ा जाइक । दुनू अपन गोली समेटैत कनैत बिदा भ’ जाय । फुलिया आ पूर्णेक घनिष्‍टता बढ़िते गेलैक । भिनसरसँ साँझधरि दुनू संगहिं रहए । झगड़ो होइक मुदा कहियो पूर्णे इशारासँ हँसाहँसाकए मना लैक तँ कहियो ई अपने मुँह फुलाकए पुरनी पोखरिक भीड़परक पीपरतर बैसि जाय । पूर्णेकेँ आबहिं पडैक । पूर्णे महीष चराबए लागल तँ ओ बकरी । संगक क्रम कहियो नहि छुटलैक । पूर्णे स्‍कूल जाए लागल तँ कने ओकरा बुझाएल रहैक । ओ अपन बाउकेँ कए दिन कहलकैक जे ओहो स्‍कूल जाएति मुदा कोनो सुनबाई नहि भेलैक । ़़़ बाप भरि दिन दारुमे मस्‍त रहैक । लोक कहैक चौधरी थारु दारुमे बर्बाद भ’ गेल । ओकर बाप–दादाक दरबज्‍जापर चरि–चरिटा महीष रहैत छलैक । कहाँदोन, कार्कीसभ पहाड़सँ मधेशमे गाय चराबए आएल रहैक आ एतहिं बैसि गेलैक । एकर बाप कार्कीसभक संग मगरसभक दारु पिअए लागल । अपनो पिअए आ कार्कीसभकेँ पिअएबो करए । बस, बर्बादी शुरु भ’ गेलैक । कर्जा बढ़लैक आ खेत बिकाए लगलैक । धूर्त कार्कीसभ खेत किनएलेल बिलाई जकाँ कान थपने रहैत छलैक । ़़़ धीरे–धीरे सभ किछु बिकाइत चलि गेलैक । कार्कीसभ धनीक भ’ गेल आ चौधरी थारु हरबाह । आब ओकरेसभमे हरबाही करैत अछि ! फुलियाकेँ पूरा याद छैक । ओ तखन दोसर जुक्ति निकालने रहए । मायकेँ कहने रहैक जे ओ आब घास काटति । मालजालक देखभाल करत । माय बड्ड खुश भेल रहैकि । बाउकेँ कहने रहैक जे बेटी आब नम्‍हर भ’ गेलि अछि आ घरक विचार करए लागलि अछि । जखन पूर्णेक स्‍कूल जाएक समय होइक फुलिया सभ दिन छिट्टी ल’ कए निकलि जाय । बतिआइत जाए आ बेरियामे संगहिं घुरए । स्‍कूलक गप्‍प–सप्‍प ओकरा नीक लगैक । पूर्णे सभ खेसरा सुनबैक । ओकरा लगैक, कहुना ओहो स्‍कूलमे पढ़ैति । ओ मायसँ कए बेर कहने रहैक जे स्‍कूलमे कहुना नाम लिखा दौक । ओ घासो काटि कए सभ दिन अनबे करति । मुदा माय नहि मानलकैक । कहाँदोन बेटी पढ़ि कए करतैकि की ? अन्‍तमे ओ थाकिहेरि गेलि । आई ओ पढ़लि रहैति तँ की एना होइतैक ? ओ फफकए लागलि । लगलैक जेना करेज उनटि जएतैक । पूर्णेसँ फुलियाक संगत छुटलैक नहि । धरमपुरसँ जखन ओकरा माँगए अएलैक तँ फुलियाक बिआहक चर्च बढ़लैक । ओ पूर्णेसँ सलाह कएने रहए । पूर्णे कहलैक जे ओ मुक्ति अभियानमे लागल अछि । समय अनुकूल होइते ओकरा ल’ क’ जएतैक आ धूमधामसँ बिआह करतैक । ओ डटलि रहए । पूर्णेक स्‍वर फुलियालेल गोसाईंक आदेश जकाँ होइक । ओकरा बड्ड नीक लगैक । जाहि अधिकारसँ पूर्णे फुलियाकेँ निर्देशित करैक तकर गर्मी ओकरा गद्गदा दैक । ़़़ ओ डटलि रहलि । मायकेँ साफ–साफ कहि देलकैकि । पहिने तँ माय बुझओलकैकि जे ओ मगर अछि आ फुलिया थारु । कहियो मेल नहि हएतैक । माइनजन ओकरासभकेँ बाड़ि देतैक से अलगे । मुदा फुलिया पूर्णेक बातपर अड़लि रहलि । ़़़ एक दिन ओकरा बाउ बड्ड पीटलकैक । जखन पूर्णेकेँ मालूम भेलैक तँ ओ तमतमा गेल रहए आ बाउकेँ मारए जाइत रहए । फुलिया कहुना कानिखिचि कए मनओने रहैकि । तखन तय भेलैक जे ओ घरसँ भागति । ढल्‍केमे चायक दोकान खोलिकए बैसति मुदा एकदम गुपचुप, जाधरि समय अनुकूल नहि भ’ जएतैक । ़़़ ओकरा लगलैक जे ओ तहिया गल्‍ती कएने रहए । मारि खाइयो कए घरेमे रहैति तँ एना नहि होइतैक । ओ फेर फफकए लगैति अछि । कहाँदोन पूर्णे जनयुद्धमे लागल रहए । महीना दू महीनापर ओकरा लग अबैक । मौका भेटैक तँ दू बात बतिआइक । फुलिया कए बेर कहैकि जे ओ कोन चीजमे लागि गेल अछि ? एहिसँ की हएतैक ? शुरु–शुरुमे तँ पूर्णे बड्ड जोशमे रहए मुदा बादमे ओकरो लागि गेल रहैक जे एहिसँ मुक्ति नहि भेटतैक । मुक्तिक लेल समाजेमे लड़ए पड़तैक । लोककेँ सम्‍झाबए पड़तैक । समय तँ जरुर लगतैक मुदा एक्‍केटा यएह उपाय छैक । मारकाटसँ किछु हएतैक नहि । फुलिया कए बेर कहलकैक जे ओ घरेमे घुरि जाएति । आब एतए ओकरा रहल नहि जाइत छैक । मुदा, पूर्णे कहैक जे जल्‍दीये ओहो निकलत आ ओकरा ल’ कए कतहु चलि जाएत । ओ इहो कहैक जे ओ ओ फँसि गेल अछि । सोझे निकलनाइ सम्‍भव नहि छैक । फुलिया कनेक आओर प्रतिक्षा करौक । फुलिया ओकर संगक लोभ संवरण नहि कए सकलि । प्रतिक्षा करिते रहलि । काश, ओ घर घुरि गेल रहैति । बरु असगरे जीवन बिता दित । एहि ब्‍ाीच ओकर बाउ मरि गेल रहैक । मालूम भेलैक, मुदा मन मसोसिकए रहि गेल । घर नहि गेल । कहाँदोन ओकरि माय गोबर बिछिकए जीवन चला रहल छैकि । भाय अलगे कमाइखाइ छैक । ओ जाइत तँ मायोकेँ उसाँस होइतैक । कहुना रहैति ! ़़़ फुलिया अपन माथ ठेहुनपर राखि सिसकए लगैति अछि । आई बेरियामे ओकरा मालूम भेलैक जे पूर्णे एतए आएल रहय । कहाँदोन बनिनियाँक कुसियारक खेतमे नुकाएल रहैक । पुलिसकेँ खबरि भेट गेल रहैक आ चारु भरसँ घेरि कए गोली बरखा देने रहैक । पूर्णे मारल गेल रहय । फुलियाकेँ लगैत छैक जेना ओ ओकरेसँ भेटए आएल रहैक । शायद एहि बेर ओ साँचे ओकरा ल’ क’ भागए चाहैत रहए । दूर बहुत दूर जतए कोनो भय आ त्रास नहि होइक । खाली ओकर संग आ रंगबिरंगक रंग होइक । मुदा ओ असगरे अपने चलि गेल । कहाँदोन ओकर देह लाल खूनसँ रंगा गेल रहैक । ़़़ फुलिया अपन झोंटा नोचए लगैत अछि । आँखिसँ नोरक धार जोड–जोड़सँ टघरए लगैत छैक । ओकर फाटक खटाक् आवाज करैत खुलि जाइत छैक । हवल्‍दार भूलोटन प्रवेश करैत अछि । सकपकाएलि फुलिया ठकमका कए ठाढ़ भ’ जाइति अछि । ओकरा लगैत छैक भेद खुलि गेल छैक । आब ओकरा कोई नहि बचाबए सकतैक । अवर्णनीय यातनाक दौरसँ गुजरए पड़तैक । एहिसँ मुक्तिक एकहिटा उपाय छैक जे ओ पूर्णे लग चलि जाय । मुदा कोना ? आब एकरो बेर नहि छैक । ओ परिछाइत छागर जकाँ काँपि जाइत अछि । ़़़ भूलोटन आगाँ बढ़ैत छैक । मुँहपर हाथ धए ओकरा चुप रहक इशारा करैति फुसफुसाइत छैक — ‘ फुलिया, ़़़ ई तोहर साड़ी छौक । ़़़ बिआहक लाल जोड़ा ! ़़़ पूर्णेक जेबीमे रहैक । हम सभसँ पहिने लाश लग पहुँचल रहिऐक । ई निकालि लेलिऐक । ़़़ दोसर जनौक नहि जनौक, हम तँ सभ किछु जनै छिऔक । ़़़ तोँ छापामार तँ नहि मुदा पूर्णेक प्रेमिका अवस्‍से छह ! ़़़ तोँ एखने भागि जाह । ़़़ नहि तँ काल्‍हि भोरे तोरा पकड़ि लेतौक । ़़़ मुदा एहि सभलेल तोरा एक बेर ़़़ खाली एक बेर ़़़ हमरा भोगए देबए पडतौक ! ’ भूलोटनक आँखिमे जेना पिशाच चढ़ल रहैक । ओ साड़ी फैलाए देलकैक । फुलियाक मन भेलैक ओ साड़ी छिनि लेअए मुदा से सम्‍भव नहि रहैक । ़़़ भूलोटन मुस्‍काइत आगाँ बढ़ैत गेलैक । फुलिया टाटदिस घसकैति गेलि । ओकरो आँखिपर जेना देवी चढ़ि गेल होइक । मुँह सेहो बिकराल बनैत चलि गेलैक । ओ सोचि लेलकि आई मुक्ति लैये क’ रहत । ओ पूर्णेलग अपन चुनल स्‍थानपर चलि जाएति । ़़़ ओकर नजरि स्‍टूलपरक नवका छुरीपर गेलैक । ओ छुरी उठा लेलकि आ सोझे भूलोटनक पेटमे भोंकि देलकि । एक, दू, तीन, चारि ़़़ । भूलोटन घबराए गेल । ओ साड़ी पुलिया देहपर फेक देलक । आ अपन दहिना हाथसँ पेस्‍तौल निकालि ताबड़तोड़ गोली दागि देलक । एक, दू, तीन, चारि ़़़ । दुनू हहाकए खसल । ़़़ भूलोटन मुँहे भरे आ फुलिया साड़ीमे ओझराइत ! परात भेने सभ अखबार घटनाक विविरणसँ भरल रहैक । किछुमे लिखल रहैक जे छापामार वीराङ्गना फुलिया शहादत प्राप्‍त कइलीह, अन्‍तिम धरि लड़ैत–लड़ैत । तँ दोसरसभमे लिखल रहैक महिला छापामारसँ मुठभेड़मे हवल्‍दार भूलोटन शहीद भेल । ़़़ छापामार फुलिया चौधरी मारलि गेलि । एकदन्‍त हाथी आ नौलखा हार कछमछी छुटिते नहि छैक । जखनसँ मकवानपुरक सेनगढ़ी दरबार देखिकए फिरलि अछि ओकर मस्‍तिष्‍कपर इन्‍द्रकुमारी छाएलि छैकि । १४ बर्षक इन्‍द्रकुमारी बाल राजकुमारी । लगैत छैक जेना ओ सभकिछु प्रत्‍यक्ष देखि रहलि हुअय । सोन।चानीक महीन कढ़ाईसँ युक्त चमकैत नीच्‍चातक सोहराइत घघरा, नितम्‍बतक लटकल कारी केशमे कलात्‍मक गुहल चोटीसँ सज्‍जित माथपर हीरा जड़ित मुकुट, डरकशसँ नापल गोल गिरहसनक डाँड़, बाँहिपर चमकैत बाजुबन्‍द, हीरा। मोती आ रंगबिरंगी रत्‍न जड़ित हारसँ सुशोभित कनेक्‍के उठल वक्ष, कानमे झुमैत झुमका आ कर्णफूल आदि।आदि । राजकुमारीक जाज्‍वल्‍य सौन्‍दर्यक काल्‍पनिक प्रतिमूर्त्ति ओकर मानसपटलपर निरन्‍तर बिम्‍बित भ। रहल छैक । ओहि राजकुमारीक दैवी सौन्‍दर्यक चर्च कोना गोरखा पहुँचल हएतैक ? सभकिछुमे राजकीय सत्ता तथा शस्‍त्र।शक्तिक बढ़ोत्तरीक योग।ह्रास देखि निर्णय लेबएबला धूर्त्त गोरखा युवराज पृथ्‍वीनारायण शाह आ ओकर सशस्‍त्र मण्‍डली एहि मादेँ कोना अपन प्रतिक्रिया देखओने होेएतैक ? कोना पहिने राजाक खोपीसभारुरुआ फेर तकरबाद भारदारीसभामेरुे मकवानपुरक राजा हेमकर्ण सेनक सुता राजकुमारी इन्‍द्रकुमारीसँ पृथ्‍वीनारायणक विवाहक प्रस्‍तावक योजना बनल हएतैक ? । आदि।इत्‍यादि प्रकरणसभक दृश्‍यसभ ओकरा आगाँ जेना सजीव भए एक।एक कए आबए लागल छैक ओ फेर करोट बदलैति अछि । ओही कोठरीमे लगले मायसंगहिं दोसर चौकीपर सुतलि आ कनेक्‍के काल पहिनेतक फुसुर।फुसुर बतिआइत बड़की भौजी ओकर कछमछी पकड़ि लैति छथिन्‍ह, । “मणिदाइ, निन्‍न नहि होइअ ? किछु होइअ की ?” “नहि, किछु नहि उ” । भाउजक प्रश्‍नसँ ओ अकचका जाइति अछि । “ तँ ओना किआ अहुरिया कटैति छी ?”। बड़की भौजी जेना कछमछी ठेकानि नेने रहथिन्‍ह । “नहि, किछु नहि होइअ । खाली वहए मकवानपुरगढ़ीक दृश्‍य आगाँ चलि अबैत अछि । ़़़ हेमकर्ण, इन्‍द्रकुमारी आ दिगबन्‍धन सेनक खिस्‍सा मोन पड़ि जाइत अछि उ” । ओ अपनाप्रति भाउजक चिन्‍ताकेँ हटाबक कोशिश करैति अछि । मुदा बड़की भौजी अपन स्‍वाभाविक व्‍युत्‍पन्‍नता छोड़यबाली नहि छथिन्‍ह । चट् दागि दैति छथिन्‍ह, ।“ आ की केओ ओतय मोनमे उतरि गेल अछि ? माय, देखथुन्‍ह , मणिदाइक मोनमे केओ चढ़ि गेल छन्‍हि बेटासभकेँ शिघ्र वर खोजय कहथुन्‍ह । देखै छथिन्‍ह, कोना करोट पर करोट फेरै छथिन्‍ह उ” माय बुझाइअ औंघा गेलि छथिन्‍ह । ननदि।भाउजक गप्‍पमे ओ कोनो उत्तर नहि देलखिन्‍ह । मणिकेँ भौजीक एखुनका परिहास नीक नहि लगलैक । चुप्‍पे आंखि मुनि लेलकि । सोचय लागलि, ।“खाली बिआहेटा कोनो जीवन छैक ? बिआह तँ मुदा प्रारम्‍भ अछि । बिआहक बादक सहयात्रा ने थिक जीवन उ की नारी सभदिन अनचिन्‍हारे सहयात्रीक प्रतीक्षा करैति रहति ? आ कतेको इन्‍द्रकुमारी अहिना जीवनक यात्राक पहिलुके पड़ाओपर अपन सहयात्रीक प्रतिक्षा करैति त्रासदीक खाढ़िमे ढ़केलि देलि जाएति ।आ ओकर सहयात्रीसभ ओकरा अनभुआर जंगलमे एसगर ठाढ़कए भगैत रहत । संग नहि देबकलेल अनर्गल आ अनसोहाँत असम्‍भव शर्तसभ आगाँ बढबैत रहत ? बेटीसभ अहिना चीज।वस्‍तु जकाँ निर्जीव नारी बनि तील।तील क। जड़ैति रहति ?” आक्रोश जेना मणिकेँ भीतरसँ आओर छटपटा दैछ । ओ एकबेर फेरो करोट फेरैति अछि । बड़की भौजी प्रायः सुति रहलि छथिन्‍ह । राति बेशी चढ़ि गेल छैक । ओहो अपनाकेँ शून्‍य करक यत्‍न करैति अछि । निन्‍नहेतु मनसँ बल करैति आँखि मुनि लैति अछि । राजकुमारी इन्‍द्रकुमारीक कक्ष । पलंगपर बैसलि राजकुमारी । उदास मुदा आंखि आक्रोशित लालतेस उ मुहँ लड़कओने ४/५ सखीसभ चारुकात घेरने । ककरो पदचापक ध्‍वनि अबैछ । सभ साकांक्ष भ। जाइछ । राजकुमार दिगबन्‍धन सेन प्रवेश करैत अछि । फिकिरसँ गलल मोनपर उदासी स्‍पष्‍ट छैक । सखीसभ् स्‍थिरसँ बहरा जाइछ । दिगबन्‍धन । बहिन उदास नहि होअअ उ निर्णय भ। गेलैक । हमरासभ अपन बहिनकहेतु सभ किछु न्‍योछावर क। देब । बहिनक भविष्‍य आ एहि क्षेत्रक मर्यादाक आगाँ एकदन्‍त हाथी आ नौलखा हार मूल्‍यहीन आ तुच्‍छ अछि । इन्‍द्रकुमारी । ( दौड़िकए अपन भायक छातीमे माथ सटाए कनैति ) नहि, भाई नहि । आब सेन राज्‍य आओर मानमर्दित नहि हएत ।बहुत भ। गेलैक । एकदन्‍त हाथी आ नौलखा हार हमरा।आहाँक नहि एहि राज्‍यक सम्‍पत्ति छैक । जनताक सम्‍पत्ति एकगोट राजाक बेटीकेँ दहेजमे नहि दिआ सकैत अछि । ओ सभक धरोहर छैक । एकदन्‍त हाथी केओ कमाएल नहि अछि , एहि क्षेत्र विशेषक हेतु प्रकृतिक विशेष आ अनुपम उपहार थिकैक । एहन गल्‍ती जुनि करब । दिगबन्‍धन । अपन जमायकेँ संतुष्‍ट नहि करय सकब एहि महाभारतक आगोसक सम्‍पूर्ण मध्‍यक्षेत्रक मर्यादाक विपरित हएत । इतिहासमे हमरासभकेँ कोसल जाएत बहिन जे सेन राजा अपन बेटीक बिरागमन दहेजक आभावमे ८ राजा, रानी, युवराजक व्‍यक्तिगत कोठरीके पहिने नेपाली दरबारी भाषामे खोपी कहल जाइक । ट्ट दरबारक सल्‍लाहकारसभके भारदार कहल जाइक । नहि क। सकल । जीवनधरि बेटी विवाहोपरान्‍त नैहरेमे रहि गेल । नहि बहिन नहि आब समय नहि छैक तैयारी मे लागलजाय । इन्‍द्रकुमारी । आ ई नहि जे सेन राजा अपन अबुझ जमायक अनर्गल माँगक आगाँ झुकि गेल जे सम्‍पूर्ण राज्‍यक सम्‍पत्ति सेनवंश एकगोट बुनल षड़यन्‍त्रक कारणेँ गोरखाक राजाकेँ विवश भ। चढ़ा। देलकैक ।हम नहि जाएब । हमहुँ अपन सम्‍पूर्ण जीवन न्‍योछावर क। देब दुनियाँकेँ देखा देबैक जे एहि क्षेत्रक नारी चीज नहि सृष्‍टिक बीज अछि । मानक माथ आ त्‍यागक शिर्ष अछि । दिगबन्‍धन । आह, बहिन उ एहन जीद्द जुनि करु । भ। सकैछ , एहिसँ एहि राज्‍यक सुरक्षापर सेहो असर पड़य । इन्‍द्रकुमारी । तँ करु युद्ध राज्‍यक अस्‍मिताक लेल युद्ध करब, आवश्‍यक पड़लापर शहीद हएब आहाँक धर्म थिक । राज्‍यक सुरक्षापर कोनो असर पड़ैत अछि तँ उठाउ तरुवारि हम नारी छी । नारीक अस्‍मिताहेतु , अपन पवित्रताहेतु अपनाकेँ न्‍योछावर करब हमर धर्म थिक ।नारी सभ किछुसँ दबि जाएत मुदा ओकर पवित्रता ओकर स्‍वाभिमान आ नारीत्त्‍व ओकर प्राणेासँ बढ़िकए थिकैक । हमरा उपहारक वस्‍तु नहि बनाउ, भाई उ दिगबन्‍धन कक्षक चारुकात आहत बाघ जकाँ धुमय लगैत अछि ।धम्‍म द। बहिनक पलंगपर बैस जाइत अछि आ ओकर माथ झुकि जाइत छैक । इन्‍द्रकुमारी । आहाँ तँ अँड़ल रहिऐक भाई कोना झुकि गेलिऐक ? कर्त्तव्‍यपर बहिनक ममताक छार पड़ि गेल अछि । सेन राज्‍यक राजकुमारकेँ राज्‍यक गौरव रक्षा करब पहिल काज छैक । बहिनक ममता नहि ।हम तहिये कहने रही । गोरखाक रितिरिवाज, राज्‍य प्राप्‍तिकहेतु किछु करक चलन, ठगी संस्‍कारक बारेमे सोचि लिअ । लिगलिगक चौरीमे चोरी क। बनल राजाक प्रस्‍तावमे जरुर किछु षड़यन्‍त्र हएत । मुदा हम तँ १४हे बर्षमे आहाँसभक बोझ बनि गेल रही । शायद कोनो त्रुटि भेल रहय तैँ एहन खानदानमे हमरा फेकक निर्णय कएल गेल । दिगबन्‍धन । नहि , बहिन उ अनजानमे भेल गल्‍तीक कारणेँ हृदयमे आओरो प्रहार नहि करु । अपन गल्‍तीक आगिसँ ई अपने दग्‍ध आ तप्‍त अछि । आहाँ हमरासभक गौरव छी । हमसभ तँ उत्तरक सभसँ शक्तिशाली राज्‍यक रानीक रुपमे आहाँकेँ देखय चाहलहुँ । इन्‍द्रकुमारी । शक्तिये प्राप्‍त कएलाक कारणेँ केओ नीक नहि भ। जाइछ, भाई । गुम्‍बजपर बैसल कौआ सभसँ नम्‍हर नहि भ। जाइत अछि । दिगबन्‍धन । इन्‍द्रकुमारी , हमर सोनसन बहिन उ (स्‍वरमे किंकर्त्तव्‍य विमूढ़ता स्‍पष्‍ट अछि ।) इन्‍द्रकुमारी । एकदन्‍त हाथी आ नौलखा हार दैये देलापर आहाँक बहिन खुश रहत ? निर्बाध सासुर भोगत तकर कोनो निश्‍चित ठेकान छैक ? काल्‍हि कतहुँ आओर किछु नहि माँगि लेअय ? सबसँ पहिने ओसभ विवाह होइते चतुर्थीयोसँ पहिने बरिआतीये संग बिदागरीक माँग कएने रहए । हमरासभक रितिरिवाजपर अपन चलन लादक कोशिश कएने रहए । एकरा संस्‍कृति आ परम्‍परापरक आक्रमण बुझू । आब दहेज मँगैत अछि । अड़ाकए । काल्‍हि फेरो कोनो नया बहन्‍ना खोजि लेत । भाई, हमरा तँ बुझाइत अछि ओ एहि औपचारिक वैवाहिक सम्‍बन्‍धक लाभ उठाए राज्‍यपर चढ़ाई क। देत ।एखन झुकक नहि तनक समय थिकैक, भावनामे नहि कर्त्तव्‍यमे बहक बेर छैक ई । बहिनसँ पहिने मातृभूमिक रक्षाक चिन्‍ता करु दिगबन्‍धन उठि जाइत अछि । ओकर गाल लाल भ। गेल छैक । बान्‍हल मुठि उपर उठि जाइत छैक । दिगबन्‍धन । एकदम ठीक कहलहुँ बहिन उ आहाँक साहससँ हम गौरवान्‍वित आ प्रेरित छी । बाबूसँ एखने निवेदन करैत छिअन्‍हि । ( तिब्र डेगेँ बहरा जाइत अछि । ) इन्‍द्रकुमारीक आँखि क्रोध आ आक्रोशसँ लाल भ। गेल छैक । बुझाइत छैक जेना बाहर निकलयलेल आरत होइक । ओ अपन कसल मुठिसँ घघरा उठाकए दाँत कटकटअबैति झारि दैति अछि । ङ्ग ङ्ग ङ्ग ङ्ग मणि धड़फड़ाकए उठलि । मुठि ओकरो कसल रहैक । बड़की भौजी तखने प्रवेश करैति रहथिन्‍ह । अपना हिसाबेँ अर्थ लगाइये लेलखिन्‍ह, । “मणिदाई, सपनाइत छलहुँ ? सुतलमे कसैत देह देखिते हमरा बुझा गेल छल ।देह दुःखाइत हएत ” । फेर हँसैत कहलखिन्‍ह, । “बादक इन्‍तजाम तँ भायसभ करताह । छोटकी चाय बना नेने अछि । नेने अबैत छी ।” मणि किछु नहि बाजलि । बड़की भौजी बाहर निकलि गेलि रहथिन्‍ह । ओ पलंगसँ चुपचाप उतरि ब्रसमे पेष्‍ट लगाबए लागलि । राजमोहन झा (प्रबोध सम्मान २००९) सँ विनीत उत्पलक साक्षात्कार खुलल दृष्टिसँ नहि भऽ रहल अछि समीक्षा : राजमोहन झा साहित्यकार भाइ-साहेब राजमोहन झाक कैक टा कथा संग्रह आ चारि टा समालोचनात्मक पोथी लिखल छन्हि। मैथिली भाषामे हुनकर एहि योगदानकेँ देखैत २००९ सालक प्रबोध सम्मान हुनका देल जाऽ रहल छन्हि। हुनकासँ मैथिलीक भूत, वर्तमान, भविष्य आ समीक्षाक गप, संग-संग पारिवारिक आ सामाजिक जिनगीक ताना-बानाक गप वरिष्ठ पत्रकार विनीत उत्पल बातचीत मे बुनलन्हि। • विनीत उत्पल : अहांक जन्म कतय भेल, दिन-वर्ष की छल? • राजमोहन झा : हमर जन्म गाम मे भेल, कुमार बाजितपुर (वैशाली)। साल छल १९३४, अगस्त माहक २७ तारीख। • विनीत उत्पल : आ प्रारंभिक लालन-पोषण ? • राजमोहन झा : प्रारंभिक लालन-पोषण गाम मे भेल। किछु दिनक बाद पटना आबि गेलहुं, आगू पटनेमे भेल। • विनीत उत्पल : शिक्षा-दीक्षा कतय भेल ? • राजमोहन झा : प्रारंभिक शिक्षा तँ गाममे भेल। पटना अएलाक बाद टी.के. घोष एकेडमी मे आठवां मे नाम लिखेने रहि, जतय सs मैट्रिक पास केलहुं। एकर बादक पढाई पटना कालेज, पटनासँ भेल। हमर विषय मनोविज्ञानक संग-संग लाजिक, हिन्दी आ अर्थशास्त्र छल। • विनीत उत्पल : पितामह कतेक मोन छथि ? • राजमोहन झा : हमर पितामह जनार्दन झा संस्कृतक विद्वान छलाह। हुनकर मृत्यु १९५१ मे भेलनि। गाम मे हमर पढाई हुनकर संरक्षण मे भेल छल। मिडिल स्कूल तकक पढाई तँ हम गाम मे केने रहि। ओ मैथिली मे सेहो लिखैत रहथि। ताहि लेल हमहूँ मैथिलीमे लिखबाक लेल प्रेरित भेलहुँ। मैथिली साहित्य मे रूचि जागल। ओ कतेक ठाम घुमि-घुमि कs रचना केलथि। महावीर प्रसाद द्विवेदीक सरस्वतीक संपादन करैक संग ओ मिथिला मिहिरक संपादक सेहो रहथि। करीब एक सौ टा बंगला उपन्यासक हिन्दी मे अनुवाद केलथि, जाहि मे विषवृक्ष, देवी चौधराइन उपन्यास प्रमुख अछि। • विनीत उत्पल : साहित्यक प्रारंभिक प्रेरणा केकरा सँ भेटल ? • राजमोहन झा : प्रारंभिक प्रेरणा तँ पितामह सँ भेटल। पितामहे शिक्षाक आरम्भ करोलथि। गाममे मिडिल तक पढाई काल तक पितामहे गार्जियन रहथि। पटना एलहुं तs बाबूजीक (हरमोहन झा) संग रहलहुं। • विनीत उत्पल : घर मे किनका सँ अहां बेसी नजदीक रही ? • राजमोहन झा : पितामह संग पितामहीक सबसँ नजदीक रहि। • विनीत उत्पल : संस्कृत परंपरा सँ अंगरेजी परंपरा दिस कोना प्रवृत भेलहुँ ? • राजमोहन झा : समय बदलैत गेल, पहिने लोक संस्कृत पढैत रहथि। संस्कृत धीरे-धीरे लुप्त होइत गेल। अंगरेजी शिक्षा स्थान लेलक आओर प्रभाव बढ़ैत गेल। तखन अंगरेजी आ हिन्दी दिस लोक झुकए लागल। हमहुं ओही दिस प्रवृत भेलहुँ। • विनीत उत्पल : साहित्य कए अतिरिक्तेक की पेशा छल ? • राजमोहन झा : इम्प्लायमेंट आफिसर रही। आब रिटायर्ड छी। • विनीत उत्पल : कोन-कोन शहर मे रहल छी ? • राजमोहन झा : जमशेदपुर, मुजफ्फरपुर, रांची, बोकारो, पटना, दिल्ली मे नौकरी काल रहलहुं। पॉँच साल दिल्ली मे जनशक्ति भवन मे डिप्युटेशन पर रही। • विनीत उत्पल : कनि भाई-बहिनक संबंध मे बताऊ ? • राजमोहन झा : चार भाई आ एक बहिन छलहुं। दू भाईक मृत्यु भए गेल आ दू भाई छी एखन। सबसे पैघ हम छी। हमारा सs छोट कृष्ण मोहन झा रांची विश्वविद्यालय मे मनोविज्ञानक शिक्षक रहथि। तेसर भाई विश्वमोहन झा गाम मे रहथि। सबसे छोट मनमोहन झा सी.एम.कालेज, दरभंगा मे मनोविज्ञानक शिक्षक छथि। सबसँ जेठ बहिन ऊषा झा छलीह, जे दरभंगा मे छथि। बहनोई शैलेन्द्र मोहन झा १९९४ मे दिवंगत भए गेलाह । ओ ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालयक मैथिली विभागक अध्यक्ष छलाह। • विनीत उत्पल : बाल-बच्चा कए टा आ की करैत अछि ? • राजमोहन झा : तीन टा बेटी अछि। ब्याह केकरो नहि भेल अछि। सबसे छोट मिनी झा टीचर छथि। जेठ बेटी ग्रेजुएशन क संग ब्यूटी-आर्ट एंड क्राफ्टक- ट्रेनिंग लेने छथि। • विनीत उत्पल : अहांक मनपसंद रचनाकार के छथि ? • राजमोहन झा : एकर निर्णय करब मुश्किल अछि। ललित, मायानंद, राजकमल चौधरीक लिखब लोक पसिन कए रहल अछि। आधुनिक मैथिली कए प्रारम्भ ओतहिसँ मानल जाइत छैक । • विनीत उत्पल : अहांक अपन नीक रचना कोन ? • राजमोहन झा : सेँ तँ आने लोक कहत। एकर निर्णय करब मुश्किल अछि। रचनाकार कोनो रचना करैये तँ अपन तरहे बेस्ट करैत अछि। जेकरा दिलसँ करब कहबै, ओ करैत छैक। सबसँ नीक देबाक कोशिश करैत छैक। कोनो रचना सुपरसीड करैत छैक, कोनो नहि करैत छैक। ई सब बहुत रास फेक्टर पर निर्भर करैत छैक। • विनीत उत्पल : अहांक पहिल रचना कोन छल ? • राजमोहन झा : रचनाक शुरुआत हम कविता सँ कएने रही। तखन हम बी.ए. मे रही, १९५४ क ई गप छी। ओकर बाद कविता लिखब एक तरहेँ बंद भए गेल। कविता लिखब छुटि गेल। हमर लेखकीय जीवनक दोसर फेज १९६५सँ शुरू भेल। एखन कथा हमर मुख्य विधा भए गेल अछि। • विनीत उत्पल : कोनो कविता सुनेबई ? • राजमोहन झा : कविता कए मन पारब नहि चाहब। ओहि ट्रेडिशन मे हम लिखैत रही जे ओहि समय मे लिखल जाइत रहय। हमर लेखनक शुरुआती दौर छल, ओहि समयक जे साहित्य प्रभाव सँ लिखल गेल, से रहए। अपने हमरा बुझाएल जे ई कोनो कर्मक नहि छैक, तकरा बाद हम ई लिखब बंद कए देलहुं। • विनीत उत्पल : कविता कोनो पत्रिका मे छपल ? • राजमोहन झा : कविता 'वैदेही' मे छपल। 'मिथिला मिहिर' आ 'मिथिला दर्शन' मे सेहो छपल. • विनीत उत्पल : आ कहानी ? • राजमोहन झा : मिथिला मिहिर मे मुख्यतः कहानी छपल। मिथिला दर्शन मे सेहो। • विनीत उत्पल : अपनेक रचना लिखब आ छपल मे बाबूजी (हरिमोहन झा) कए कतेक सहयोग रहल? • राजमोहन झा : बाबूजीक सहयोग किछु नहि रहल, प्रभाव रहल। बाबूजीक संग रचनाक गप करबाक प्रश्न नहि उठैत छल। हमर लेखन हुनकर प्रभावक अंतर्गत नहि छनि। हुनकर लेखन सँ इतर हमर लिखब शुरू भेल। एकरा मे दूनू गप अछि। हुनकर प्रभाव रहल आ नहियो रहल। हुनकर क्षेत्र सँ हम अपना कए अलग कए लेलहुं। ओना प्रभाव सँ अलग कोना कए सकैत छी। • विनीत उत्पल : 'आई-काल्हि-परसू' पर अकादमीक पुरस्कार ठीक समय पर भेटल वा नहि? • राजमोहन झा : ठीके समय पर भेटल। ई महत्वपूर्ण नहि छल की पहिने भेटबाक चाही छल या बाद मे भेटबाक चाही छल। मन मे एहन कोनो गप नहि छल। • विनीत उत्पल : साहित्यक अभियान मे पत्नीक कतेक सहयोग रहल ? • राजमोहन झा : साहित्य सँ ओतेक संप्रक्ति नहि छन्हि। सहयोग-असहयोग कए ताहि द्वारे प्रश्न नहि छैक। • विनीत उत्पल : हुनकर नहियर कतए भेलन्हि ? • राजमोहन झा : हमर सासुर तँ दिल्ली भेल। ससुरक पिता अलवर महाराजक चीफ जस्टिस रहथि। विवाह हमर दिल्ली मे भेल। • विनीत उत्पल : अहां कोन-कोन भाषा मे रचना केलहुं आ कतेक पोथी लिखलहुं ? * राजमोहन झा : हिन्दी आ मैथिली मे हमर लेखन भेल। दस टा पोथी कथा संग्रह आ चारि टा समालोचनात्मक पोथी छैक. • विनीत उत्पल : भविष्यक की योजना अछि ? • राजमोहन झा : संस्मरण लिखबाक अछि। सुमनजी आ किरणजी पर लिखबाक बाकी अछि। • विनीत उत्पल : साहित्यक दावं-पेंच कए कतय तक बुझलियइ ? • राजमोहन झा : दांव-पेंच मैथिली मे नहि सभ भाषा मे चलैत रहैत छैक। ई कोनो नब गप नहि छी। एहि अर्थ मे प्रभावित भेलहुँ। ई तँ स्वाभाविक प्रक्रियाक रूप अछि। ओहिनो ई गप बेसी मेटर नहि करैत छैक। • विनीत उत्पल : कोन रचना एहन अछि जेकरा मे अहां केँ अपन आत्मकथ्य हुअए ? • राजमोहन झा : सभ रचना मे जीवनक अंश आबिए जाइत छैक। किया कि अनुभवक आधार पर लोक लिखय यै। अनुभवक अंश तँ रहबे करत। आत्मकथात्मकता तँ आबिये जाइत छैक। • विनीत उत्पल : 'निष्कासन' कथा तँ नहि छी आत्मकथात्मक ? • राजमोहन झा : स्पेशिफिक नहि करए चाहब। सभटा कथा मे कोनो-ने-कोनो रूपेण आत्मकथा भेटत। • विनीत उत्पल : समीक्षा लेल की कहब अछि ? • राजमोहन झा : समीक्षा खुलल दृष्टि सँ नहि भऽ रहल अछि। लोक अपन ईर्ष्या-द्वेष सँ रचना कए समीक्षा कए रहल अछि। निष्पक्ष व निर्भय भए कए समीक्षा नहि भए रहल अछि। आई-काल्हि जे समीक्षा भए रहल अछि ओहि मे धैर्यक अभाव अछि। ऑब्जेक्टिव नहि रहैत छैक लोक। जकरासँ रूष्ट रहए छथि तकर ठीक सँ समीक्षा नहि करैत छथि आ जकरा सँ नीक संबंध छैक ओकर प्रसंग खूब उठाबैत छथि। समीक्षा लेल दृष्टि काज करैत छैक। • विनीत उत्पल : की समीक्षा करबा मे व्यक्तिगत आक्षेप आवश्यक अछि ? • राजमोहन झा : समीक्षक बुझैत छथि, जे हम समीक्षा कए रहल छी, तँ लेखक पर उपकार कए रहल छी, हुनका हम उपकृत कए रहल छी। एकांगी दृष्टिकोण बड़का फेक्टर अछि। समीक्षा मे रचनाक समीक्षा होएबाक चाही नहि कि व्यक्तिगत आक्षेप। • विनीत उत्पल : ई गप कहिया सँ छैक ? • राजमोहन झा : पहिनो रहए, आबो छैक। संकीर्णता बेसी भए गेल अछि। हमर विचारे पहिने एतेक नहि छल जे एखन भए रहल छैक। अपन लोक कए घुसाबैक लेल मारामारी भए रहल छैक। हालत जेहन भए रहल छैक तकर विरोध होएबाक चाहि। • विनीत उत्पल : नवतुरुआक लेखनकेँ कोन दृष्टि सँ देखैत छी ? • राजमोहन झा : नबका लोक भाषाक दिस उदासीन छथि। बेसी लोककेँ भाषाक प्रति मोह नहि छनि, अपनत्व नहि छनि। जहिना-जहिना जेनरेशन आगू भेल, भाषाक उदासीनता बढ़ल गेल। बेसी लोक मैथिली बाजब छोडि देने छथि। • विनीत उत्पल : मैथिली मे दलित साहित्य लेल अहांक मंतव्य की ाछि ? • राजमोहन झा : साहित्य मे वर्गीकरण प्रवृति जे भए रहल अछि, ओ विखण्डित कए रहल अछि। साहित्य सृजनात्मकता सँ ध्यान हटा कए विशेष वर्ग पर ध्यान देबासँ साहित्य विखण्डित होएत। दलित कए लेखन मे अएबाक चाही। • विनीत उत्पल : स्त्री लेखक लेल की कहब अछि ? • राजमोहन झा : स्त्रीगण कए साहित्य लेखन मे जरूर अएबाक चाही। कोनो वर्गक लेल समग्र साहित्य कए विखण्डित नहि करबाक चाहि। खंडित दृष्टि नहि हेबाक चाहि। एकरा लेल चाही समग्र दृष्टि। • विनीत उत्पल : मैथिली भाषा मे स्त्री लेखकक संख्या किएक कम अछि ? • राजमोहन झा : सबहक मूल मे शिक्षा अछि। मिथिला मे स्त्री शिक्षाक प्रचार-प्रसार नहि भेल। सहभागिता आ सहृदयताक कमी रहल। • विनीत उत्पल : मैथिली केँ संविधानक आठम अनुसूचीमे शामिल हेबासँ विकासक लेल की कहब अछि ? • राजमोहन झा : जतय तक भाषाक प्रश्न छैक, संविधान संगे यूपीएससी परीक्षा मे शामिल होयबाक गप छैक, एकरा सँ किछु खास बल भेटहि बला नहि छैक। भाषाक समृद्धिक लेल समर्पण चाही। तकर ह्रास भए रहल अछि। • विनीत उत्पल : तखन की कएल जाए ? • राजमोहन झा : मूल गप भाषामे प्रवृत बच्चा सभ हुअए। स्कूल सँ पहिने परिवार छैक। परिवार मे भाषाक समुचित स्थान देल जाए, तखने बच्चा सबहक विकासक संग भाषाक विकास होएत। ई गप धीरे-धीरे कम भए रहल अछि। • विनीत उत्पल : नवलोकक लेल कि कहब अछि ? • राजमोहन झा : हुनका सभ कए साहित्य सँ ओ लगाव नहि छनि जे पहिलुका लोक कए छल। जखन धरि नवलोक कए साहित्य सँ लगाव नहि होएत तखन धरि किछु नहि होइत। एकर बादे मैथिली कए उज्ज्वल भविष्य छैक। • विनीत उत्पल : एखुनका समीक्षा लेल की कहब अछि ? • राजमोहन झा : मूल वस्तु लोक छैक। समीक्षाक लेल यैह छैक। जाऽ तक लोक नहि बदलत, दृष्टिकोण नहि बदलत, ऑब्जेक्टिव नहि होएत, तखन धरि किछु नहि होएत। समीक्षाक लेल तटस्थता चाही, निरपेक्षता चाही। • विनीत उत्पल : मैथिली भाषाक प्रचार-प्रसार लेल की करबाक चाही ? • राजमोहन झा : ई निर्भर करत सरकार पर, ई काज बेसी नीक जकाँ कए सकैत अछि। सामूहिक प्रयास लोकक होएत, संस्था आगू आएत, तखन होएत। मैथिलीक नाम पर जे तमाशा होइत अछि, ओकरा बंद कई पड़त। लोक रुचि जगाबक लेल काज करए पड़त। • विनीत उत्पल : प्रचार-प्रसार लेल नवलोककेँ कोन दृष्टि सँ देखैत छी ? • राजमोहन झा : समय-समय पर सभ किछु बदलल। नव जनरेशन आयल। समय मे परिवर्तन भेल। अपन संस्कृति लेल, भाषाक लेल पहिलुक लोक मे समर्पण बेसी छल। जेना-जेना जनरेशन बदलल, समर्पण कम भए गेल। एक तरहे कहि सकैत छी जे वैश्विक सम्पूर्णता दिस बेसी बढ़ल गेल अछि, स्थानीयक विशिष्टता पाछु छुटि रहल अछि। ग्लोबल बेसी हुअए लागल लोक, लोकल गौण भए गेल। एकरा मे सामंजस्य रखबाक चाही। एकरा बूझए पड़त। विशिष्टता आ सारभौमता स्थानीयता मे छैक। सभ संग हेबाक चाही। अपन जे विशिष्टता छैक तकरा बिसरि जाइ सेहो उचित नहि छैक। सबहक संग-संग चलैत अपन विशिष्टता नहि छोड़बाक चाही। • विनीत उत्पल : लेखन में जीवनानुभवक की स्थान छैक ? • राजमोहन झा : जीवनानुभव लेखनक समस्त आधार छैक। अनुभव पक्ष शून्य रहत तँ अहां की लिखब। अहांक लिखब साहित्य नहि रहत। • विनीत उत्पल : आजुक युगक बाजारवादी दुनिया आ साहित्यक लेल की कहब अछि ? • राजमोहन झा : जावत अहां बेसिक नीड्स मे अपना कए सीमित राखब तखन की होएत। साहित्य आगूक चीज छैक। भौतिक साधना मे अपनाकेँ सीमित राखब तँ साहित्य दिस विमुखता उत्पन्न हेबे करत। ई मूल जरूरत छैक, ई आवश्यक छैक, तकरा संग-संग नैतिक मूल्य साहित्यक लेल आवश्यक छैक। नैतिक मूल्यों उपेक्षित नहि रहए, ई पक्ष सबल हुअए। मूल जरूरत दिस लोकक बेसी ध्यान छैक, ई ट्रेंड चलि रहल छैक आ आगुओ ई रहत। जहिना-जहिना भौतिक सुख-सुविधा बढ़ल उच्च मूल्य मे ह्रास होइत गेल। ओहि दिस सँ देखब तँ राजनीति प्रमुख होइत गेल। दोसर पक्ष ई जे अध्यात्म पक्षक ह्रास होइत गेल, जखन विकास बढ़ल। भाषा मे तकनीकक विकास तँ भेल, मुदा जे मूल्य बेसी रहनि ओहि्मे ह्रास भए रहल अछि। बाहरी विकास बढ़ला सँ जे विशिष्टता, जे स्मिता छैक ओ कम भेल। बहुत लोक कहि रहल छथि जे भाषा मरि रहल अछि, से ठीक कहैत छथि। घर सँ निष्कासित भए रहल छैक ई भाषा। पारिवारिक भाषा नहि रहल ई, मरबाक लक्षण छैक। • विनीत उत्पल : एकर उपाय की ? • राजमोहन झा : समयक धार कए कोनो प्रयास सँ बंद नहि कए सकैत छी। शिक्षाक विकास भेल अछि। पढ़ए बलाक संख्या बढ़ल। स्कूलक संख्या बढ़ल। जाहि अनुपात मे ई बढ़ल ओहि अनुपात मे आंतरिक मूल्य घटल। जानकारी तँ बेसी बढ़ि गेल अछि, सूचनात्मक ज्ञान बच्चामे जतेक बेसी छैक, ओहि उम्र मे ओहि जमाना मे नहि रहै। मुदा, ज्ञान धरले रहि गेल। शिक्षा मे जे विकास भेल अछि, ई वृद्धि संख्यात्मक अछि, गुणात्मक विकास नहि भेल अछि। ई बात सही छैक, जतेक स्कूलक संख्या बढ़ल, ज्ञान ओतबेक कम भए गेल। • विनीत उत्पल : तखन विकास ख़राब गप अछि ? • राजमोहन झा : स्त्री शिक्षा पहिने नहि रहए, काफी वृद्धि भेलए। मुदा, बहुत रास साइड इफेक्ट भेल। दवाई बढ़ल, साइड इफेक्ट मे वृद्धि भेल। ओकरा रोकबाक कोनो उपाय नहि भेल अछि। • विनीत उत्पल : अहां श्रेष्ट रचना ककरा कहब ? • राजमोहन झा : सर्वश्रेष्ट रचना ओ होयत अछि, जे ओहि युग बीत गेलाक बादो श्रेष्ट रहत अछि। कालजयी छैक। कायम रहैक छैक पोथी आ रचनाकार। सुमनजी, किरणजी, आरसी बाबू श्रेष्ट रचनाकार रहथि। हुनकर रचना एखनो श्रेष्ट मानल जाइत अछि। • विनीत उत्पल : एहन कोन रचना छैक जकरा फुर्सत भेटला पर अहां बारंबार पढैत छी ? जखन मानसिक परेशानी रहैत अछि तखनो ? • राजमोहन झा : एहन कोनो पोथी नहि अछि। जखन जे भेट जाइत छैक, तकरे पढैत छी। मानसिक सुधाक शांति लेल जे पोथी उपलब्ध रहैत अछि सैह भऽ जाइत अछि। • विनीत उत्पल : मानसिक शांति लेल की करैत छी ? • राजमोहन झा : एहन कोनो काज नहि छैक। उपलब्धता पर हम कोनो काज करैत छी। लिखबाक मन होइत अछि तँ लिखियो लैत छी। मनक अनुरूप काज ताकि लैत छी। • विनीत उत्पल : साहित्यक रचनाक लेल की योजना अछि ? • राजमोहन झा : बाबूजीक रचनावली निकालबाक लेल सोचने छी। तीन खंड निकालि चुकल छी आ तीन खंड बाकी अछि। अपन तीन टा पोथी दिमाग मे अछि। पहिल- संस्मरण संग्रह आ दोसर आलोचनात्मक/समीक्षात्मक लेख संग्रहित करबाक अछि। तेसर ई जे कथा सभ छूटल छैक, लेख सभ सेहो छूटल छैक, ओकरा निकलबाक अछि। • विनीत उत्पल : जीवनक लेल की योजना अछि ? • राजमोहन झा : प्लानिंग क हिसाब सँ जीवन नहि चलैत छैक। पानि जहिना बाट ताकि लैत छैक, तहिना जीवन चलैत छैक। प्लानिंग सँ बहुत काजो नहि होइत अछि। एकर आवश्यकता सेहो नहि होइत अछि। प्लानिंगक अनुसार सभ काज भए जाइत, एहनो नहि होइत अछि। Men proposes God disposes. हम तँ सोचैत छी जे propose नहि कएल जाएत। एहिना जीवन छैक। • विनीत उत्पल : जीवन आ सहित्यक दृष्टि सँ अपनेक कोन समय सभसँ बेसी नीक छल? • राजमोहन झा : 1965 सँ 1975 धरि समय सबसँ नीक रहल, साहित्य दृष्टि सँ सेहो आ सामान्य दृष्टि सँ सेहो। ओकरा बाद खराबे कहि सकैत छी. कहिया धरि चलत नहि जनैत छी। • विनीत उत्पल : रचना करैत काल की ध्यान रखबाक चाही ? • राजमोहन झा : कालजयी रचना लेल कोनो सिद्धांत वा प्रशिक्षण नहि होइत अछि। साहित्य रचनाक लेल कोनो पाठ नहि होइत अछि। एकर कोनो उपयोगिता नहि होइत अछि। आन कलाक लेल स्कूल छैक। साहित्य लेल नहि छैक। कोनो एहन ट्रेनिंग स्कूल नहि छैक जे साहित्यकार बनायत। कोनो विज्ञापन नहि छैक जे छह मास मे ई चीज सिखा देत। • विनीत उत्पल : मैथिली सहित्य मे नव लेखक केँ की सुझाव देब ? • राजमोहन झा : मार्गदर्शन आ सुझावक पक्ष मे हम नहि छी। जिनका मे ओ प्रतिभा/योग्यता होएत, ओ अपन बाट ताकि लेताह। सिखओने सँ कियो सीखबो नहि करत। मूल वस्तु अनुभव छैक. अनुभव संपन्न छी, अनुभवक संवेदनाक पकड़बाक हुनर अछि। से लेखक मे अंतर्निहित रहैत छैक । रचनाक लेल अनुभव करबाक तागति जरूरी छैक। तकरा बिना लेखन नहि होएत। अभिव्यक्तिक देबाक लेल कौशल आ भाषा हेबाक चाही। जतय ई विकास होएत, सफ़ल होएत। प्रशिक्षण वा मार्गदर्शनक जरूरत नहि छैक। *विनीत उत्पल : प्रबोध सम्मान 2009 प्राप्त करबाक लेल बधाई। रामाश्रय झा "रामरंग" प्रसिद्ध अभिनव भातखण्डे जीक १ जनवरी २००९ केँ निधन भऽ गेलन्हि। डॊ. ग‍गेश गु‍जन मृत्यु पूर्व हुनकासं साक्षात्कार लेने छलाह। प्रस्तुत अछि ओ अमूल्य साक्षात्कार- पहिल बेर विदेहमे। पं. रामाश्रय झाक इन्टरव्यू । प्रश्ननः1. अपनेक दृष्टि सं विद्यापति गीत-संगीत परंपरा कें कोन रूप मे देखल-बूझल जयवाक चाही? विद्यापति-संगीत परिभाषित कोना कएल जयवाक चाही? एतत्संबंधी कोनो स्वर-लिपि उपलब्ध अछि ? उत्तर ः हमरा विचार सँ विद्यापतिक अधिकांश गीत पद; भजनबद्धगायन शैली एवं किछु गीत ग्रामीण गीत शैलीक अंतर्गत् बूझल जयवाक चाही। उदाहरण स्वरूप पद-गायन शैली मे- 1. नन्दक नन्दन कदम्बक तरुतर धिरे धिरे मुरली बजाव । 2. जय जय भैरवि असुर भयाउनि। एवं अन्य श्रृंगार रस सँ सम्बन्धित पद। जेना- क. कामिनी करय असनाने ख. सुतलि छलौं हम घरवा रे ग. अम्बर बदन झपाबह गोरी घ. ससन परस खसु अम्बर रे, इत्यादि । टइ तरहक पद व गीत मिथिला प्रदेश मे लगभग 60 व 70 वर्ष सं जे गाओल जाइत अछि एकर धुन अर्धांशस्त्रीय संगीतक अंतर्गत् एवाक चाही। परन्तु अइ पदक जे मिथिला मे गायन शैली छैक ओकर एक अलग स्वरूप छैक। जेकरा प्रादेशिक संगीत कहवाक चाही। जहांतक लोक संगीत तथा ग्रामीण संगीत सं संबंधित विद्यापतिक गीत अछि, जेना- क. आगे माइ हम नहि आजु रहब एहि आंगन जो। बुढ़ होयता जमाय, ख. हे भोलानाथ कखन हरब दुख मोर, ग. उगना रे मोर कतय गेलाह, घ. आज नाथ एक व्रत मोहि सुख लागत हे, इत्यादि । ई गीत सब लोक संगीतक धुनक अंतर्गत गाओल जाइत अछि। यद्यपि अहू लोकधुन मे रागक दर्शन छैक मगर राग शास्त्र केर अभाव छैक। तें हेतु ई सब गीत लोक संगीत शैली मे अयवाक चाही। उत्तर-1-ए. विद्यापति संगीतक कोनो भिन्न स्वरूप नहि अछि, केवल विद्यापति गीत मिथिला प्रादेशिक संगीत शैलीक अंतर्गत गाओल जाइत अछि। राग आओर ई अर्धांशस्त्रीय एवं धुन प्रधान लोक संगीत राग गारा,राग पीलू, राग काफी, राग देस, राग तिलक कामोद इत्यादि राग सं सम्बन्धित अछि। अभिप्राय ई जे जेना सूर, तुलसी, कबीर इत्यादि संत कविक पद भिन्न-भिन्न तरह सं गाओल जाइत अछि अइसंत कवि सबहक कोनो खास अपन संगीत नहि छैन्हि जे कहल जाय जे ई सूर व तुलसी तथा कबीरक संगीत थीक, एही रूप सं विद्यापति संगीतक रूप मे बुझवाक चाही। प्रश्नन-2. विद्यापति संगीत-परंपराक विषय मे आइध्रिक स्थिति पर अपनेक की विचार-विश्लेषण अछि ? उत्तर-2. विद्यापति पदक सम्बन्ध मे हमर ई विचार अछि जे विद्यापतिक पद मैथिली भाषा मे अछि तें हेतु केवल मिथिला प्रदेश मे अइ पदक गायन प्रादेशिक संगीतक माध्यम सं होइत अछि। हॅं, यदा कदा बंगाल प्रदेश मे बंगला कीर्तन मे अवश्य प्रयोग हाइत अछि। कहवाक अभिप्राय ई जे कोनो प्रादेशिक भाषा मे लिखल काव्य केर गुणवत्ताक आकलन ओइ काव्यक श्रृंब्द व साहित्य तथा भाव पर निर्भर करैत छैक। संगीत आकइ काव्य के रसमय एवं सौंदर्यवर्धन करइक हेतु परम आवश्यक तत्व अवश्य थिक परन्तु प्राथमिकता पदक थिकइ। मैथिली भाषा अत्यन्त सुकोमल भाषा अछि एवं अइ मे लालित्य अछि ।आर संगीत सुकोमल भाषा मे अधिक आनन्द दायक होइत छैक।अही हेतु विद्यापति पद संगीतक माध्यम सं मिथिलाक संस्कृति मे विद्वान जन सं ल’ क’ जनसाधारण तकक मानस के प्रभावित क’ क’ अपन एक सुदृढ़ परम्परा बनौने अछि एवं मिथिलावासीक हेतु परिचय पत्र समान अछि। तें हेतु समस्त मैथिल समाजक ई परम कर्तव्य थीक जे अइ अमूल्य धन कें धरोहर जकां जोगा क’ राखी। प्रश्न-3. विद्यापति-संगीत आओर विद्यापति-गीत कें एकहि संग बूझल जयवाक चाही बा फराक क’? यदि हं तं किएक आ कोना ? उत्तर : एहि प्रश्नक उत्तर उपरोक्त पहिल तथा दोसर क्रमांक मे लिखल गेल अछि।कृपया देखल जाय। प्रश्नन-4. विद्यापति-संगीतक प्रतिनिधि गायक रूप मे अपने कें कोन-कोन कलाकार स्मरण छथि आ किएक ? उत्तर : विद्यापति पदक गायक आइ सं किछु वर्ष पूर्व बहुत नीक नीक छलाह, जेना पंचोभक पं0 रामचन्द्र झा,पंचगछियाक श्री मांगन, तीरथनाथ झा, बलियाक पं0गणेश झा, लगमाक पं0 अवध पाठक, श्री दरबारी ; नटुआ द्ध श्री अनुठिया ; नटुआद्ध पं0 गंगा झा बलवा, श्री बटुक जी, आर पं0 चन्द्रशेखर खांॅ, अमताक पं0 रामचतुर मलिक, पं0 विदुर मलिक, लहटाक पं0 रामस्वरूप झा, खजुराक पं0 मधुसूदन झा एवं नागेश्वर चैधरी, बड़ा गांवक पं0 बालगोविन्द झा, लखनौरक पं0बैद्यनाथ झा इत्यादि। वर्तमान मे जे गायक छथि हुनका सबहक नाम अइ प्रकार छनि-पं0 दिनेश झा पंचोभ, श्री उपेन्द्र यादव, अमताक पं0 अभयनारायण मलिक, पं0 प्रेमकुमार मलिक इत्यादि। उपरोक्त जतेक गायकक हम नाम लिखल अछि ई सब गायक अधिकारपूर्वक विद्यापतिक पद कें गबै वला छलाह एवं वर्तमान मे छथि। कियेक तं ई सब मिथिलावासी छथि। विद्यापति पदक अर्थ भाव पूर्ण रूप सं बूझि क’ तहन प्रश्नकरैत छलाह व वर्तमान मे करैत छथि। तें हेतु ई सब गायक स्मरण करवा योग छथि। प्रश्नन-5. पं0 रामचतुर मल्लिक, प्रो0 आनन्द मिश्र प्रभृत्ति तं इतिहास उल्लेखनीय छथिहे । किछु अन्यो गायकक नाम अपने कह’ चाहब ?ओना मल्लिकजी तथा आनन्द बाबूक विद्यापति-गीत गायकी मे की किछु विशेष लगैत अछि जे अन्य गायक मे नहि ? उत्तर ः हम जतेक गायक क नाम लिखल अछि सब अपना-अपना स्तर सं नीक छलाह एवं नीक छथि। विद्यापतिक पद गायन मे राग गायकीक जेना बड़का बड़का आलाप व तान तें गाओल नहि जाइत छैक। विद्यापति पद गायन मे पदक अर्थ भाव ध्यान मे राखि सरसतापूर्वक गाओल जाइत छैक। अइ सम्इन्ध मे एक सं दोसर गायकक तुलना करइक आवश्यकता नहि। तथापि पं0रामचन्द्र झा व श्री मांगनजी तथा पं0 रामचतुर मलिकजी,श्री बटुक जी,पं0 रामस्वरूप् झा,श्री दरबारी इत्यादि गायक बहुत प्रसिद्ध छलाह। चूंकि प्रोफेसर आनन्द मिश्रजीकें हम कहियो गायन नहि सुनल तथा मिथिलाक गायक पंक्ति मे हुनक नाम हम नहि सुनल तें हेतु हुनका संबंध मे किछु लिखइ सं असमर्थ छी। प्रश्न-6. विद्यापति-गीत मैथिली लोकगीत ध्रि कोना पहुंचल हेतैक ?एहि विषय मे अपनेक विश्लेषण की अछि? उत्तर ः विद्यापति गीत मैथिलीक दू तरहक भाषा मे रचल गेल अछि।एकटा मैथिलीक परिष्कृत भाषा मे रचल गेल अछि जेना- 1.नन्दक नन्दन कदम्बक तरुतर 2.अम्बर बदन झंपावह गोरी 3. उधसल केस कुसुम छिड़िआयल खण्डित अधरे । इत्यादि। अइ तरहक मैथिलीक परिष्कृत भाषा मे जे गीत छैक से लोकगीत ;ग्रामीण अंचलद्धधरि बहुत कम पहुँचलै। जे गीत ग्रामीण भाषाक माध्यम सं रचल गेल छैक।जेना- 1. आ गे माइ हम नहि आजु रहब एहि आंगन जं बुढ़ होयता जमाय.... 2. हे भोलानाथ कखन हरब दुख मोर 3. जोगिया भंगिया खाइत भेल रंगिया हो भोला बउड़हवा. 4. उगना रे मोर मोरा कतय गेलाह. इत्यादि। अइ तरहक जे गीत छैक से लोकगीत;ग्रामीण अंचलद्धधरि अधिक सं अधिक पहुँचलए।एक बात आर ई जे लोकभषाक अधिक समकक्ष छैक तकरा जनाना सब अधिक गबैत छथि। हमरा बुझने विद्यापति गीत कें लोकगीत ;ग्रामीण अंचलद्धधरि पहुँचइके यैह कारण थीक। दोसर बात ई जे अपन मातृभाषा स्वभावतः बहुत प्रिय होइत छैक आर अपना मातृभाषाक माध्यम सं जे काव्य रचल जाइत छैक आर ओइ मे लालित्य आ आकर्षण छैक तं ओ अपनहि आप विद्वान जन सं ल’ क’जनसाधारण तक प्रचारित भ’ जाइत छैक। आर विद्यापति पद तं लौकिक व पारलौकिक दुनू ृदृष्टिसं अत्यन्त उच्च कोटिक रचल गेल अछि, तथा सब तरहक गीत रचल गेल अछि जेना-भक्ति, भक्ति श्रृंगार, लौकिक श्रृंगार, श्री राधाकृष्णकें विलासक अत्यन्त मधुर गीत, भगवान श्रृंंकरक विवाह सं सम्बंधित जनसाधारण भाषाकके गीत एवं नचारी, समदाउनि, बटगवनी,तिरहुत इत्यादि तरहक गीतक रचना केने छथि जे लोकरंजनके हेतु उच्चकोटिक एवं गायन के वास्ते बनल छैक। ई तंे बिना प्रयासहिं लोक मानस एवं लोकगीत धरि पहुँचि गेल गेल हेतैक। प्रश्न-7.विद्यापति पदक मैथिली व्यवहार-गीत मे विलय होयवाक प्रक्रिया अपनेक दृष्टियें कोना आ की रहल हेतैक ? उत्तर ः हमरा बुझने इहो प्रश्न 6ठमे प्रश्न सं संबंधित अछि। तें ओही पर विचार कएल जाय। प्रश्न-8. विद्यापतिक पद यदि मिथिलाक सर्वजातीय माने-सभ वर्ग आ समाजक लोक मे स्वीकृत छैक ? तं तकर कारण विद्यापति-पदक साहित्यिक गुण बा ओकर सांगीतिकता छैक आकि एकरा मे निहित कोनो आन तत्व आ विशेषता छैक ? उत्तर ः विद्यापति पद जे मिथिला समाजक सब वर्ग मे स्वीकृत छैक तकर मुख्य कारण विद्यापति पदक साहित्यिक गुण एवं सांगीतिक गुण दुनू छैक।मिथिला मे कवि विद्यापतिक पहिनहुं तथा बादहु मे बहुत कवि भेलाह मगर जनसाधारण मे तं हुनकर क्यो नाम तक नहि जनैत अछि। परंतु विद्यापति एवं विद्यापति गीत के तं एहेन क्यो अभागल मिथिलावासी हेताह जे नहि जनइत हेताह। विद्यापति पदक प्रचार-प्रसार मे साहित्यिक व संगीतक गुण के अतिरिक्त आन कोनो तत्व व कारणक जे अपने चर्चा कएल अछि, अइ सम्बन्ध मे हम ई कहब जे कवि विद्यापति भगवान के परम भक्त छलाहं हुनका भक्ति सं प्रभावित भ’ क’ भगवान शंकर जिनका घर मे नौकर के काज करैत रहथिन एहेन भक्त कविक कावय मे तं प्रचार-प्रसार हेबाक सब सं महत्वपुर्ण तत्व एवं कारण हुनका आराध्यदेवक कृपा बुझवाक चाही। भगवानक भक्ति सं हुनकर हृदय ओतप्रोत छलन्हि तें ओ अपन काव्य मे लिखैत छथि- क. बड़ सुख सार पाओल तुअ तीरे , ख. हे भोलानाथ ;बाबाद्धकखन हरब दुख मोर , इत्यादि । ग. खास क’ भगवान राधाकृष्णक भक्ति व भक्ति-श्ाृंगार रस जे ओ अपना काव्य मे दरसओ -लन्हि अछि ओ अत्यन्त हृदयस्पशर््ाी तथा संगीतमय अछि। प्रश्न-9.लोकगीत एवं व्यवहार-गीत मे तत्वतः की-की भेद मानल जयवाक चाही ? उत्तर ः लोकभाषा एवं लोकधुन मे जे गीत गाओल जाइत छैक तकरा लोकगीत कहल जाइत छैक। आर व्यवहार गीत क जे अपने चर्चा कएल अछि इउ सम्बन्ध मे हमर कहब ई जे एकरा अंतर्गत संगीतक सब शैली आबि जाइत छैक।परंतु हमरा बुझना जाइत अछि जे व्यवहा गीत सं अपनेक अभिप्राय संस्कार गीत सं अछि। हमरा विचार सं लोकगीत एवं व्यवहार गीत दुनू के लोकसंगीत कहल जाइत छैक, अइ मे कोनो विशेष अंतर नइ छैक। प्रश्न- 10.विद्यापति-संगीतक वर्तमान जे निश्चिते निराश कयनिहार अतः खेदजनक अछि। अपने कें तकर कारण की सब लगैत अछि ? जखन कि बंगालक रवीन्द्र-संगीत-कला मे विद्यापति संगीत जकां कोनो प्रकारक पतनोन्मु -खता आइ पर्यन्त देखवा मे नहि अबैत अछि । तकरो कारण की आजुक उपभोक्तावाद, ब्जारवाद भू-मण्डलीकरण मात्रकें मानल जयवाक चाही बा आनो आन ऐतिहासिक, समाजा -आर्थिक परिस्थि ति आ सामाजिक कारण आ परिवर्तन कें? उत्तर ःअइ सम्बन्ध मे हम ई कहब जे संपूर्ण भारत मे अपना संस्कृति के छोड़ै मे जतेक मैथिल अगुआयल छथि तेना अन्य कोनो प्रदेश नहि। जे मैथिल मिथिला सं बाहर अन्य प्रदेश मे आबि गेलाहय सब सं पहिने ओ अपन मातृभाषाक प्रति उदासीन भ’ जाइत छथि आ अत्यंत हर्षपूर्वक ई कहैत छथि जे हमरा बच्चा के तं मैथिली बाजहि नहि अबैत छैक। अपना घर मे मैथिली नहि बजैत छथि। जखन अपना मातृभाषाक प्रति एहेन उदासीन छथि तहन अपना संस्कृति सं अपनहि आप दूर भ’ जेताह। अपना मॉं-बा पके डैडी व मम्मी अन्य के अन्टी व अंकल कहैक रेवाज भ’ गेलै अछि तं हिनका सब सं की आश कयल जाय जे ई अपना संस्कृतिक रक्षा करताह। बंगाली,मद्रासी,पंजाबी,मराठी इत्यादि प्रदेशक लोक सब अपना संस्कृति के एखनहुं धरि संजोय क’ रखने अछि। मगर पश्चिमी सभ्यताक प्रभाव सब सं अधिक मैथिल पर छन्हि ते हेतु मिथिला संस्कृति मे एहेन हानिकारक परिवर्तन देखाय पड़ैत अछि। प्रश्न-11.अपनेक स्मृति मे कोनो गायकक गायन बा अन्य कोनो संदर्भ हो जेकर वर्णन अपने कर’ चाही? हुनक विषय मे किछु सुनयवाक इच्छा हो।वर्तमान समेत आगां पीढ़ीक लाभ हेतैक। संगहि अपनेक किछु विशेष अभिमत जे देब’-कह’ चाही। उत्तर ःहम शास्त्रीय संगीतक उपासक छी आर अत्यंत उदासीन भ‘ कहि रहल छी जे अपन मिथिला वर्तमान समय मे शास्त्रीय संगीत सं शून्य भ’ रहल अछि। वर्तमान समय सं पहिने पं0रामचतुर मलिक, पं0 बिदुर मलिक, पं0सियाराम तिवारी,;चूंकि पं0 सियाराम तिवारीक शिक्षा अमता गाम मे भेलन्हि तें हेतु हुनका मैथिल मानइ छियनि। पं0 चन्द्र शेखर खां,पं0 रघू झा, ई सब बहुत उच्च स्तरक गायक छलाह। खास क’क’ पं0 रामचतुर मलिक, व पं0 सियाराम तिवारी तं इतिहासिक गायक छलाह ध्रुवपद शैलीक गायन मे। भावी पीढ़ीक शिक्षार्थी एवं जिज्ञासु के अइ गायक सबके जानइ के प्रयास व हिनका गायन व कार्यक सम्बंघ मे श्रृंोध करवाक चाही ताकि भावी पीढ़ी लाभान्वित एव धु्रुवपद शैली गायनक विशेषता सं परिचित होथि। जय मिथिला जय मैथिली, जय जय जानकी अम्ब । जेहि रज मे मन्डन भेला, हरलन्हि शिव के दम्भ ।। शि‍व कुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’ (१९७३), पिताक नामः स्व. काली कान्त झा ‘बूच’, माताक नामः स्व. चन्द्रकला देवी,जन्म तिथिः ११-१२-१९७३,शिक्षाः स्नातक (प्रतिष्ठा),जन्म स्थानः मातृक- मालीपुर मोड़तर, जि. - बेगूसराय, मूलग्रामः ग्राम-पत्रालय - करियन, जिला - समस्तीपुर, पिन: ८४८१०१,संप्रतिः प्रबंधक, संग्रहण,जे. एम. ए. स्टोर्स लि.,मेन रोड, बिस्टुपुर जमशेदपुर - ८३१००१, अन्य गतिविधिः वर्ष १९९६ सँ वर्ष २००२ धरि विद्यापति परिषद समस्तीपुरक सांस्कृतिक ,गतिवधि एवं मैथिलीक प्रचार-प्रसार हेतु डॉ. नरेश कुमार विकल आ श्री उदय नारायण चौधरी (राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक) क नेतृत्वमे संलग्न। हरिमोहन झा - द्वि‍रागमन आत्‍मासँ जीबाक प्रवृति रखेबला लोककेँ जखन परि‍स्‍थि‍ति‍वश अवि‍रल स्‍नात जीवन शैलीकेँ जीवाक अनर्गल प्रयत्न करए पड़ैत छैक तँ जीवनक शैलीमे परि‍वर्त्तन अवश्‍यंभावी भऽ जाइत छैक। इहए दशा मौलि‍क रसास्‍वादन करैत अपन साहि‍त्‍य साधनासँ समाजकेँ अनुशासि‍त स्‍वस्‍थ मनोरंजन देबाक प्रयत्न करैबला आशुकथाकारकेँ सेहो होइत अछि‍। हरि‍मोहन बाबू हास्‍य सम्राट छथि‍। मैथि‍ली कथाकेँ जनप्रि‍य बनेबाक दृष्‍टि‍ऍं हि‍नक प्रयास अतुलनीय मानल जाइत अछि‍। गंभीर चि‍न्‍तन हेतु अनुशीलन करबाक लेल सामाजि‍क अर्न्‍तद्वन्‍द्व ओ वि‍डम्‍बनाकेँ अपन सरल शैलीमे आरोहन कऽ मैथि‍ली साहि‍त्‍यकेँ मनोरम रसास्‍वादन प्रदान केलनि‍। कि‍छु व्‍यति‍क्रमक क्रममे हास्‍य सम्राट ई बि‍सरि‍ गेलथि‍‍ जे गंभीर वि‍षय हास्‍यक छाल्हीक तरमे पानि‍-पानि‍ भऽ गेल छल। जकर प्रत्‍यक्ष प्रमाण हि‍नक चर्चित उपन्‍यास “कन्‍यादान” मानल गेल। सगरो आलोचनाक बाढ़ि‍ आबि‍ गेल छलनि‍। “बुच्‍ची दाइ”केँ एहेन अवस्‍थामे आनि‍ कऽ कि‍एक छोड़ि‍ देलनि‍? ओना ई कोनो असहज नै। मि‍थि‍लाक तथाकथि‍क भलमानुषक परि‍वारमे अखनो बहुत ठाम “बुच्‍ची दाइ” कानि‍ रहल छथि‍। अपस्‍याँत छथि‍ कतौ अपन सासुरक पीड़ासँ तँ कतौ अपन नैहरक देल लावण्‍य दुखमयी अश्रुसरि‍तासँ। जौं वि‍धवा भऽ जेतीह तँ समाजकेँ स्‍वीकार्य भऽ जाएत कि‍एक तँ उज्‍जर साड़ीमे वाला सवल समाजकेँ मान्‍य छैक। मुदा शि‍क्षा वि‍हीन बुच्‍ची दाइकेँ छोड़ि‍ पाश्चात्‍य जरदगब सी.सी. मि‍श्रा केना भागि‍ सकैत छथि‍...? बेटी दोसरक लाज होइछ। ओकरा इस्‍कूल नै पठा कऽ लालकाकी केना गलती नै केलखि‍न...। हरि‍मोहन जीक ऐ उद्देश्‍यहीन उपन्‍यासक आलोचना हि‍नका समस्‍याक तत्काल समाधान करबाक लेल प्रेरणा देलक। आशु कथाकार समाजक देल उपहासकेँ बर्दाश्त नै कऽ सकल आ तत्क्षण एकर समाधान लि‍खबाक लेल उद्यत भऽ गेल। शीर्षक देल गेल “द्वि‍रागमन”। स्‍वाभावि‍क छैक बेटी कोनो ढोलनाक ताग तँ नै जे सड़ि‍ गेला बाद नि‍कालि‍ कऽ दोसर तागमे गाँथल जाए। तँए द्वि‍रागमन दोसर केना करत। सी.सी. मि‍श्र पाश्चात्‍य जोकर बुच्‍ची दाइकेँ मॉडर्न वाला बना कऽ द्वि‍रागमन करत। कोनो न्‍यायाधीशसँ साक्ष्‍यक अभावमे नै चाहैत ि‍नर्दोषकेँ सजा दैत छैक तँ ओकर शब्‍द-शब्‍दक तादात्‍म्‍य अनर्गल लगैत। तहि‍ना हरि‍मोहन जीक द्वि‍रागमनमे जइ-जइ समाधानक वि‍न्‍दुक उत्‍कर्ष भेल ओ वएह प्रमाण नै दऽ सकल जकर हरि‍मोहन अधि‍कारी छथि‍। द्वि‍रागमन अपन मोनकेँ जवरदस्‍ती मनौअल करा कऽ हरि‍मोहन लि‍खलनि‍। एतेक तँ ि‍नश्चि‍त अछि‍ नैसर्गिक प्रति‍भाक धनी उपन्‍यासकार कतौ ऐ कचोटकेँ प्रत्‍यक्ष नै कएलनि‍। संग-संग कोनो पारखी ई दु:साहस नै कऽ सकैत अछि‍ जे ऐ उपन्‍यासक मान्‍यतापर प्रश्नचि‍न्ह लगाओत। द्वि‍रागमन सेहो कन्‍यादाने जकाँ अध्‍यायमे वि‍भक्‍त अछि‍। प्रयोगवादि‍ताक एहेन प्रमाण मैथि‍ली साहि‍त्‍यक महाकाव्‍य वि‍धामे मनबोध आ प्रवासी तथा काव्‍य वि‍धामे नचि‍केताकेँ छोड़ि‍ संभवत: आनठाम नै भेटत। मि‍स वि‍जली वि‍श्व-वि‍द्यालय अज्ञात यौवना आ मुग्‍धा छथि‍। सी.सी. मि‍श्रा हुनक फैन भऽ गेल छथि‍। सम्‍पूर्ण भाषणमे आर्यक मूल भाषक श्‍लोकक तार्किक वि‍वेचन वि‍श्व वि‍द्यालयक संग-संग चण्‍डीचरणकेँ झकझोकरि‍ देलक। वि‍द्योत्तमा “कालीदास” केँ कुमारसंभवमक नायक बना देने छलीह तँ ऐठाम चण्‍डीकेँ अपन “बुच्‍ची दाइ”मे सुयोग्‍य पाश्चात्‍य वालाक आश जागव उपन्‍यासक यथार्थवादी क्रांति‍ मानल जाए। जे मैथि‍ली साहि‍त्‍यक लेल तत्‍क्षण तँ बेछप्‍प अवश्‍य छल। मि‍स वि‍जलीक भाषणमे जे आधुनि‍कताक लेब उपन्‍यासकार देखेबाक प्रयास केलनि‍ ओ पुरुष प्रधान संकुचि‍त मानसि‍कतासँ भरल कथाकथि‍त मि‍थि‍लाक सवल अर्थात सवर्ण समाज वि‍शेष कऽ कऽ ब्राह्मणमे अखनो स्‍वीकार्य नै ओहि‍ काल तँ सर्वथा असंभव छल। अखनो हमरा सबहक समाजमे स्‍त्रीकेँ सहचरी नै अनुचरी मानल जाइत अछि‍। अपन वेवाक हास्‍यसँ हरि‍मोहन तत्‍कालीन सार्मथ्‍यवान सबल मैथि‍लक अर्न्‍तदशापर तीक्ष्‍ण प्रहार केलनि‍, मुदा हास्‍य समागम मि‍श्रि‍त रहबाक कारणे ओ समाज एकर मर्मकेँ बूझि‍ नै सकल। जौं सभटा गप्‍प शुष्‍क दार्शनि‍क अंदाजमे लि‍खल जाइतए तँ हरि‍मोहन जीक द्वि‍रागमन ओहि‍ना अक्षोप भऽ जइतए जेना साम्‍यवादी जगदीश प्रसाद मण्‍डल जीक “मौलाइल गाछक फूल” आ सुभाष चन्‍द्र यादव केर “घरदेखि‍या” आ “बनैत वि‍गड़ैत”क अछि‍। एकटा ब्रह्मण साहि‍त्‍यकार द्वारा मनुवादी प्रवृति‍पर प्रहार समाज द्वारा मान्‍य तँ भेल मुदा मात्र हास्‍य आ रोचकताक कारणे। जौं हास्‍य नै रहि‍तए तँ चतुरानन ि‍मश्रक “कला” जकाँ दुति‍याक चान मानल जेबाक संभावनाक वि‍शेष छल। “अकाण्‍डताण्‍डव”मे लालकाकी, आवेश रानी, तारादाइ आ दुलारमनि‍क संवाद रूचि‍गर लगैत अछि‍। ऐठाम मि‍थि‍लाक परम्‍परावादी दृष्‍टि‍कोणकेँ उत्तम देखेबाक मूल कारण उपन्‍यासकार नारी शि‍क्षा ओ चेतनाक संग-संग अनुशीलनक अभाव मनैत छथि‍। एतेक तँ स्‍पष्‍ट अछि‍ जे रेवती रमण सन शि‍क्षि‍त भाइक कारणे सकल ग्राम्‍य नारी पात्रा बुच्‍ची दाइकेँ आधुनि‍क बनेबाक लेल तैयार भऽ जाइत छथि‍। पति‍ परमेश्वर होइत अछि‍। ओकर इच्‍छाकेँ केना नै पूर्ण कएल जाएत। ब्राह्मण परि‍वारक स्‍त्री केना दोसर बि‍आह करतीह? ऐ प्रकारक कल्‍पना हरि‍मोहन करबाक साहस नै कऽ सकलाह। ओ स्‍वयं परम्‍परावादी समाजक अंग छथि‍। तँए परम्‍परा आ आधुनि‍कतामे सामंजस्‍य स्‍थापि‍त कराबाक इच्‍छाशक्‍ति‍केँ नवल रूपेँ सजा कऽ बुच्‍ची दाइकेँ आधुनि‍क बना देलनि‍। कन्‍यादानमे उद्देश्‍यहीन अंति‍म यात्राक परि‍णति‍ इहए भेल जे एकटा मूर्ख वालि‍काकेँ जबरदस्‍ती ततेक आधुनि‍क बना देल गेल जे वर्तमान परि‍स्‍थि‍ति‍मे सेहो ग्राह्य नै भऽ सकैत अछि‍। ओइ कालक लेल तँ सर्वथा अनुपयुक्‍त भेल हएत। जे बुच्‍ची दाइ पहि‍ल राति‍ सी.सी. मि‍श्राक “नार्सिग” शब्‍दकेँ नरसि‍ंह लगा कऽ गारि‍ बूझि‍ गेली ओ आब डलसीक स्‍थानपर “क्रोटन”क गमला मंगवाक प्रेरणा अपन माएकेँ दैत छथि‍- ई तँ सर्वथा अपच्‍च मानल जाए। ओना “देशी मुर्गी वि‍लायती बोल” परि‍स्‍थि‍ति‍ वश संभव छैक मुदा प्रकृति‍ ओहूमे गाममे रहि‍ कऽ वयस भेल मुरुख वालाकेँ शि‍क्षि‍त बना कऽ एहेन परि‍वर्तन करबाक चेष्‍टा उपन्‍यासकारक अदूरदर्शिता मानल जाए। अशि‍क्षि‍त पुरुष वा नारी जखन परि‍स्‍थि‍ति‍वश पाश्चात्‍य संस्‍कृति‍ आरोहण करैत अछि‍ तँ चालि‍मे परि‍वर्तन संभव छैक। मुदा ऐठाम बुच्‍ची दाइमे शि‍क्षाक क्रमि‍क वि‍कास देखाओल गेल। पति‍क आलि‍ंगन आ सि‍नेहसँ वि‍मुख नारीकेँ परीक्षास्‍वरूप आधुनि‍क बनए पड़ल ऐ प्रसंगमे तँ बुच्‍ची दाइकेँ आर गंभीर बना देबाक आवश्‍यकता छल। मात्र लोकप्रि‍यता आ छद्म साहि‍त्‍य लोलपताक कारणे एतेक अलौकि‍क परि‍वर्तनकेँ समाजक लेल कोनो रूपेँ दि‍शा ि‍नर्देशि‍त नै मानल जा सकैछ। हरि‍मोहन सन पारखी रचनाकारक लेखनीक कमाल मानल जाए जे शैली ओ प्रवाहक संग-संग रोचकताक कारणे “द्वि‍रागमन” लोकप्रि‍य भऽ गेल अन्‍यथा जौं सामान्‍य साहि‍त्‍यकारक ई प्रयास रहि‍तए तँ कोनो रूपे साहि‍त्‍यक लेल उपयुक्‍त नै मानल जइतए। भाषा शैली ओ प्रवाहमे द्वि‍रागमन अभूतपूर्व कृति‍ थि‍क ऐमे कोनो संदेह नै। सरल ग्राम्‍य समाजक शब्‍द “धी-डाही”सँ लऽ कऽ पाश्चात्‍य उपक्रम धरि‍ कतौ ई नै बुझना जाइत अछि‍ जे हरि‍मोहन ओइ समाजक अंग नै छथि‍ जइ समाजक लेल संवाद लि‍खल गेल। अर्थात अज्ञसँ लऽ कऽ वि‍ज्ञ धरि‍ गामक “जरलाही” सन शब्‍द बाजैवाली महि‍लासँ लऽ कऽ मि‍स वि‍जलीक भाषण धरि‍ एकरूपता देखा कऽ ई प्रमाणि‍त तँ अवश्‍य कएलनि‍ जे हुनकासँ पैघ रोम-रोममे पुलकि‍त “मैथि‍ली पुत्र” ताधरि‍ तँ अवश्‍य नै भेल छल। मुन्ना जी, (मुन्ना जी-उपनाम, एहि नामे मैथिलीमे लेखन), मूलनाम मनोज कुमार कर्ण, जन्म–27 जनवरी 1971 (हटाढ़ रूपौली, मधुबनी), शिक्षा–स्नातक प्रतिष्ठा, मैथिली साहित्य। वृत–अभिकर्त्ता, भारतीय जीवन बीमा निगम। पहिल विहनि कथा–‘काँट’ भारती मण्डनमे 1995 पकाशित। पहिल कथा–कुकुर आ हम, ‘भरि रात भोर’मे 1997मे प्रकाशित। एखन धरि कएक दर्जन विहनि कथा, लघु कथा, क्षणिका, गजल आ विहनि कथा सम्बन्धी आलेख प्रकाशित। विशेषः- मुख्यतः मैथिली विहनि कथाकेँ स्वतंत्र विधा रूपेँ स्थापित करवाक दिशामे संघर्षरत। साक्षात्कार- हम पुछैत छी (१.रवीन्द्र कुमार दास २.योगेन्द्र प्रसाद यादव ३.गोविन्द झा ४.राजेन्द्र बिमल ५.रामभरोस कापड़ि “भ्रमर” ६.रमेश रंजन ७.बृषेश चन्द्र लाल ८.धीरेन्द्र प्रेमर्षि ९.अनलकान्त १०.कुमार शैलेन्द्र ११.अमरनाथ १२.तारानन्द वियोगी १३.अनमोल झा १४.दुर्गानन्‍द मंडल १५.मिथिलेश कुमार झा १६.बेचन ठाकुर १७.धीरेन्द्र कुमार १८.सोमदेव १९.अशोक २०.ज्योति सुनीत चौधरी २१.जगदीश प्रसाद मण्डल २२.राजदेव मण्डल २३.देवशंकर नवीन २४.गजेन्द्र ठाकुर). १ हम पुछैत छी: विहनि कथाकार आ विदेह-ई-पत्रिकाक सहायक सम्पादक श्री मुन्नाजीक श्री रवीन्द्र कुमार दास (युवा चित्रकार आ दिल्लीक मैथिली-भोजपुरी अकादमीमे मैथिली परामर्शदातृ समितिक सदस्य) सँ गपशप रवीन्द्र कुमार दास रवीन्द्र कुमार दास अपन पत्नी संजू दासक संग मुन्नाजी: कलाक दुनियाँमे प्रवेश कोना भेल। एकर आधार की छल प्रवेशक पछाति ई दुनियाँ की अनुभूति देलक। रवीन्द्र कुमार दास: हम नेनेसँ कलामे रुचि लैत रही, पहिने देबालपर आ तकर बाद कागचपर भगवान आ स्वतंत्रता-सेनानीक चित्र बनबैत रही। हमर बाबा अमीन छलाह आ नक्शा बनबैत छलाह तेँ ड्रॉइंग बोर्ड आ रंगक प्लेट हम नेनेमे देखने रही। पटना आर्ट कॉलेजक पाछाँमे बाबूजी मन्दिरी मोहल्लामे डेरा लेने छलाह। फुटबॉल खेलेबाक लेल आर्ट कॉलेजक सोझाँक मैदानमे जाइत रही तँ कलाकार लोकनिक काज आ प्रदर्शनी देखी। बाबूजीक बड्ड मान मनौअल केलाक बाद आर्ट कॉलेजमे एडमिशन लेबाक अनुमति भेटल। तइ दिनसँ कलाक दुनियाँमे प्रवेश भेल आ आइयो कलाक सेवा कऽ रहल छी। कलाकारकेँ पाइ भेटै वा नै सम्मान जरूर भेटै छै। मुन्नाजी: साहित्य आ चित्रकलामे कोनो सम्बन्ध स्थापित होइछ? एकर एकरूपताकेँ अहाँ कोन तरहेँ देखै छी? रवीन्द्र कुमार दास: साहित्य आ चित्रकला दुनू एक मायक बेटी छथि। साहित्ये टा नै कलाक जतेक विधा छै, सभटा एक दोसरासँ जुड़ल अछि। जेना फिल्ममे संगीत, नृत्य, साहित्य, चित्रकला आ अभिनय सभ जुड़ल अछि। तहिना चित्रकारोकेँ सभ विषयक अध्ययन-मनन करए पड़ैत छन्हि। कवि चित्र आ मूर्ति-शिल्पकेँ देखि कऽ कविता लिखैत छथि। जेना प्रयाग शुक्ल, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, हेमन्त कुकरेती आ ऑक्टोवियो पाज कतेक कविता लिखने छथि। मुन्नाजी: अहाँक नजरिये साहित्यकार आ चित्रकार, दुनूमे के बेशी सूक्ष्मदर्शी होइछ आ कोना? की एकटा चित्रकार ओइ सभ बिन्दुकेँ छू सकैत अछि जकरा कि साहित्यकार उठबैत रहल अछि। रवीन्द्र कुमार दास: साहित्यकार आ चित्रकार दुनू सूक्ष्मदर्शी होइत छथि मुदा के कतेक सूक्ष्मदर्शी छथि से से हुनकर ज्ञान, तर्कशक्ति आ काल्पनिकतापर निर्भर करैछ। आम आदमीकेँ आधुनिक कलाक भाषा दुरूह लगैत छै कारण सभ कलाक अपन-अपन व्याकरण होइत छै। ओकर आनन्द लेबाक लेल ओकर व्याकरण बुझनाइ जरूरी छै। साहित्य आम आदमीक भाषामे लिखल जाइत अछि तेँ बेशी असरिकारक होइत अछि। चित्रकार कोनो विषयक चित्रणमे कलाक आर बहुत रास तत्व जकरा शिल्प कहैत छी, सेहो शामिल करैत अछि। मुन्नाजी: जेना साहित्यकारक कोनो विशेष पहिचान नै बनि पबै छै (किछु अपवादकेँ छोड़ि कऽ), ओ साहित्यकेँ अर्थोपार्जनक आधार नै बना पबै अछि, तइ सन्दर्भमे चित्रकारक की अस्तित्व छै? रवीन्द्र कुमार दास: साहित्यकार पहिचान तँ बनैत छनि मुदा सेलेब्रिटी जेकाँ सम्मान नै भेटैत छनि। चित्रकार आइ-काल्हि पेज-थ्री पर पसरल रहैत छथि। ओना कोनो साहित्यकार आ कलाकार दर्शक, पाठक आ आलोचकक स्वीकृतिक बादे सम्मान पबैत छथि। अर्थोपार्जन सेहो तहीपर आधारित छै। साहित्यकारक आमदनी प्रकाशकक रॉयल्टीपर निर्भर करैत छनि। चित्रकारक चित्रक दाम बढ़ैत रहैत छै। एक शैलीक कोनो चित्रक नीलामीमे गेलाक बाद ओइ शैलीक सभ चित्र बिका जाइत छै। एक चित्र पचास बेर बिका सकैत अछि। कलाकृतिक मूल्य ग्राहकक कलाज्ञान आ कलाकृतिक ऊपर कएल गेल खर्चपर निर्भर करैत छै। मुन्नाजी: बहुत रास कलाकार हुनर रहितो कला माध्यमे अपन दशा-दिशा नै तय कऽ पौलक, की कहब अहाँ? रवीन्द्र कुमार दास: जेना दू लाइनक कविताकेँ तुकबन्दी कऽ देलासँ बहुत लोक अपनाकेँ कवि बूझऽ लगैत छथि तहिना चित्र बनेनाइ मात्र सिखलासँ चित्रकार नै भऽ जाइत छथि। अपन रचनाक गुणवत्ताक आ समकालीनताक सदिखन समीक्षा करऽ पड़ैत छै। तेँ जिनकर रचनामे दम होइत छनि तिनका दशा-दिशा भेटि जाइत छनि। मुन्नाजी: फाइन आर्ट आ मिथिला आर्ट (मधुबनी पेण्टिंग) मध्य कतेक समता आ विषमता अछि? फाइन आर्टक सोझाँ मिथिला आर्ट कतऽ अछि? रवीन्द्र कुमार दास: फाइन आर्ट आ मिथिला आर्टक स्तर तँ समान छै। फाइन आर्टकेँ आधुनिक कला आ मिथिला आर्टकेँ लोककला कहलासँ ई आसानीसँ बूझल जा सकैत छै। दुनू कलाक अपन-अपन इतिहास आ विकास यात्रा छै। मिथिला आर्ट सिर्फ मिथिलाक कलाकार करैत छथि मुदा आधुनिक कला सम्पूर्ण विश्वक कलाकार रचैत छथि। बिहारक परिप्रेक्ष्यमे जँ देखल जाए तँ मिथिला कलामे बेसी उपलब्धि भेटल छै। अखन धरि १५ टा कलाकारकेँ राष्ट्रीय पुरस्कार आ चारिटा केँ पद्मश्री भेटल छनि मुदा आधुनिक कलामे सात-आठटा कलाकारकेँ तँ राष्ट्रीय पुरस्कार भेटल छनि मुदा पद्मश्री एको गोटेकेँ नै भेटल छन्हि। गंगा देवी, सीता देवी, जगदम्बा देवी आ महासुन्दरी देवीक नाम जेना अन्तर्राष्ट्रीय स्तरपर लेल जाइत छन्हि तहिना सुबोध गुप्ताक अन्तर्राष्ट्रीय स्तरपर पहिचान छन्हि। मुन्नाजी:अहाँ मैथिली-भोजपुरा अकादमीक सदस्य हेबाक नाते साहित्यक तँ सेवा कऽ रहल छी, की कलाकार लेल सेहो कोनो योजना अछि? रवीन्द्र कुमार दास: हम कलाकार छी तँए कला आ कलाकारक सेवामे लागल रहैत छी। अकादेमीक माध्यमसँ जँ कलाक विकास होइ तँ खुशीक बात हएत। हिन्दी अकादेमी नृत्य नाटक करबैत छल तहिना इहो अकादेमी चित्र प्रदर्शनी आ कलापर सेमीनार करौलक। बिहार सरकारक कला अकादेमी पहिल बेर राष्ट्रीय कला शिविरक आयोजन कएलक तहूमे हमरा आमंत्रण आएल। हम भाग लेलौं, बड्ड मोन खुश भेल जे आब बिहारमे सरकार कलापर ध्यान देनाइ शुरू केलक। संस्कृति मंत्री सुखदा पाण्डेयकेँ हम सभ कएकटा सुझाव देलियन्हि। मुन्नाजी: किछु बर्खसँ देखा रहल अछि जे मैथिली-भोजपुरी अकादमीमे भोजपुरिया सदस्यक वर्चस्वे स्थापित भाषा मैथिलीकेँ आजुक चर्चित भेल भोजपुरी भाषा गरोसने जा रहल अछि? रवीन्द्र कुमार दास: अकादेमीक उपाध्यक्ष आ सचिव जइ भाषाक प्रयोग करता सएह भाषाक वर्चस्व भऽ गेल से कहनाइ उचित नै। साल भरिक कार्यक्रमकेँ देखलाक बाद ई स्पष्ट भऽ जाइत अछि जे दुनू भाषाकेँ बराबर स्थान भेटि रहल छै। मुन्नाजी: अहाँ सबहक प्रयासे किएक ने मैथिलीक स्वतंत्र मैथिली अकादमी हेबा लेल कदम उठाएल जाए, जइसँ मैथिली लेल स्वतंत्र भऽ कऽ काज कएल जा सकत? रवीन्द्र कुमार दास: हम काजमे विश्वास करैत छी, छुच्छे आन्दोलनमे नै। हमरा लोकनि लड़बे बड्ड करैत छी, कतौ जाति-पाइतक नामपर तँ कतौ क्षेत्रकेँ लऽ कऽ। कतेक लोक छथि जे गामसँ निकललाक बाद अपन बाल-बच्चाकेँ मैथिली सिखबैत छथि। क्तेक कार्यक्रम, सम्मेलन आ सेमीनार मैथिलीमे होइत अछि राष्ट्रीय आ अन्तर्राष्ट्रीय स्तरपर, अखन धरि मिथिला कलाक एक्कोटा संग्रहालय भारतमे नै बनि सकल अछि। मुन्नाजी: अकादमी द्वारा गद्य-पद्य दुनू विधामे मूलतः कथा आ कवितापर काज होइछ। किएक ने दुनू विधाक आनो प्रतिरूप जेना गजल आ विहनि कथा, जे अविकसित अछि, अग्रिम योजनामे शामिल कएल जाए, जइसँ ऐ सबहक विकास भऽ सकए? रवीन्द्र कुमार दास: अहाँक विचारसँ हम सहमत छी, कविताक अलाबे साहित्यक अन्य विधामे कार्यक्रम हेबाक चाही। कथाक पाठ तँ कएल गेल अछि मुदा आर कार्यक्रम हेबाक चाही। मुन्नाजी: किछु कथित व्यक्ति द्वारा ठाम-ठीम ई आरोप लगाएल जा रहल अछि जे ई मैथिली-भोजपुरी अकादमी एकटा जाति विशेषक मुट्ठीक संस्था बनि काज कऽ रहल अछि। की स्वतंत्र विचार देब अहाँ? रवीन्द्र कुमार दास: साहित्य आ कलामे कोनो जाइत नै होइत छै। ई महज एकटा घटिया राजनैतिक सोच अछि। जँ अपने अकादेमीकेँ एकटा राजनैतिक मंच बुझैत होइ तँ ई पूछब उचित अछि अन्यथा महज एकटा बहन्ना। ऐमे मैथिली भाषी सदस्य कम नै छथि, हमरा उम्मीद अछि जे दिनोदिन विकास हएत। मुन्नाजी: अहाँ सशक्त युवा सदस्य रूपेँ जुड़ल छी, तँ युवा रचनाकारक लेल कोनो अग्रिम योजना अछि? रवीन्द्र कुमार दास: हमरा लोकनि एकटा चित्र प्रदर्शनी आयोजित करौने रही “रंगपूर्वी”, ओइमे बेसी युवा कलाकारकेँ चुनल गेल रहनि। तहिना कवि सम्मेलनमे सेहो लगातार देखि रहल छी जे बेसी युवा लोकनि आमंत्रित रहैत छथि। २ श्री योगेन्द्र प्रसाद यादव, पिएचडी (भाषाविज्ञान), तथा        आजीवन सदस्य प्रोफेसर तथा प्रमुख (रिटायर्ड), त्रिभुवन विश्वविद्यालय नेपाल प्रज्ञा-प्रतिष्ठान, कीर्तिपुर, काठमांडु, नेपाल, कमलादी, काठमांडु संग मुन्नाजीक साक्षात्कार प्रश्न: १.    अपनेकेँ मैथिलीक अनुराग सँ आह्लादित होइछी हमसब केहेन अनुभव करैछी तत्सम्बन्धी काजसबक केँ ? हमर विशेषता भाषाविज्ञानक सैद्धान्तिक, प्रकारात्मक,व्यावहारिक क्षेत्रमे अछि जाहि अनुसार हम मैथिलीपर बिशेष जोड़ दैत नेपाललगायत दक्षिण-एशियाक विभिन्न भाषासभक अध्ययन-अनुसन्धानमे अभिरूचि रखैत आएल छी । हमरा एहि तरहक कार्यसँ प्रसन्नता अछि किन्तु अखनो बहुतरास करनाइ बाँकी अछि । हमर मैथिलीक अनुरागसँ अपने आह्लादित भेलौंह ताहिसँ हमरा प्रसन्नता भेल; धन्यवाद ! २.    अपने प्राज्ञी छी ओहि स्तरसँ मैथिली लेल की सब केलहुँ ? कोनो अग्रिम योजना अछि एहि प्रतिष्ठान सँ अहाँ माध्ये मैथिलीक लेल ? भाषाविज्ञानक दृष्टिकोणसँ हमर मैथिली भाषापर अध्ययन-अनुसन्धान १९७९ ई.सँ प्रारंभ भेल अछि । सर्वप्रथम अंग्रेजी आर मैथिली भाषाक fricative consonants क व्यतिरेकी विश्लेषण सम्पन्न भेल (Fricatives in Maithili and English: a contrastive analysis, Hyderabad: Central Institute of English and Foreign Languages, 1979)। तत्पश्चात् मैथिली भाषाक काल-पक्षक अध्ययन पूरा भेल (Tense-Aspect system in Maithili and English: a comparative study, Hyderabad: Central Institute of English and Foreign Languages, 1979)। हमरा विचारसँ सबसँ महत्वपूर्ण कार्य भेल हमर पि.एच.डी.क विषय । एहिमे विश्वप्रसिद्ध अमेरीकी भाषावैज्ञानिक नोम चौम्सकीद्वारा  १९८१ ई.मे प्रतिपादित रूपान्तर व्याकरण सिद्धान्तक नवीनत्तम संस्करण Government-Binding (GB) Theory क आधारपर मैथिली वाक्य-संरचनाक विभिन्न पक्षक विश्लेषण करबाक प्रयास कएल गेल अछि जे  Lincom Europa (Germany) सँ प्रकाशित भेल (Issues in Maithili Syntax:A  GB Approach, Munchen (Germany): Lincom Europa, 1998.)। एहि कार्यमे मैथिली वाक्य-संरचनाका तथ्यक आधारपर भाषाविज्ञानक सैद्धान्तिक नियम कतेक यथार्थ अछि से देखबाक प्रयास भेल अछि । यदि यथार्थ नहि अछि तँ कोन तरहक सैद्दान्तिक परिमार्जनक आवश्यकता अछि तकर निरूपण सेहो कएल गेल अछि । दक्षिण एशियाक कोनो भाषाक आधारपर एहि भाषिक सिद्धान्तक मूल्यांकण करब ई सर्वप्रथम कार्य भेल छल आर तत्पश्चात् दक्षिण एशियाक अन्य भाषाक विश्लेषणमे सहायक सिद्ध भेल । एहि भाषावैज्ञानिक सिद्धान्तक परिपेक्ष्यमे मैथिली वाक्य-विन्यासक विभिन्न पक्षक अनुसन्धान कएल गेल तथा Contemporary issues in Nepalese linguistics (“Sequential converb in Indo-Aryan”, Kathmandu: Linguistic Society of Nepal), Indian Linguistics ("Question Movement in Maithili and binding Conditions" 42.1:1-9, 1982a ; "Maithili Sentences: a Transformational Analysis" 43.3 7-28, 1982b; " Constituent Structure and Discourse Strategies  in Maithili",  58. 1-4, 89-99, 1997), Contributions to Nepalese Studies ("The Word Order Phenomenon in Maithili Simple Sentences a TG Approach"  , 12.1: 1-14, 1984),  The Yearbook of South          Asian Languages and Linguistics ("The Complexity of Maithili Verb Agreement". In R. Singh, ed., 1999, Delhi: Sage Publishers), Tribhuvan University Journal ("Resumptive Pronoun Strategy and Island Constraints". xiii.2:77-86, 1987),  Annual Review of South Asian Language and Linguistics, Nonnominative subjects ( “Nonnominative case in Maithili”. In Bhaskararao and Subbarao, eds, Amsterdam: John Benjamins, 2005), Linguistic theory and South Asian languages ( “Anaphoric relations in Maithili and linguistic theory",  Amsterdam: John Benjamins, 2007) आदि राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय Journals एवं पुस्तकमे प्रकाशित कएल गेल । विश्व भाषासभक सन्दर्भमे मैथिली क्रिया संगति (Verb Agreement) अत्यन्त जटिल मानल जाइत अछि । एकर सूक्ष्म विश्लेषण Levinson आर Kuno क Face vs. Empathy क pragmatic theory क आधारपर कए  Linguistics Journal ("Face vs. Empathy: the Social Foundation of Maithili Verb Agreement" ( co-authored with Balthasar Bickel and Walter Bisang), 1999) मे प्रकाशित कएल गेल । मैथिली व्याकरणमे उपलब्ध उदेश्य, कर्म आदि व्याकरणिक प्रकार्य (Grammatical relations/functions) क निरूपण विभिन्न भारतीय-आर्य भाषासंगे तुलननात्मक अध्ययन (comparative/typological studies) कए Lingua ("A fresh look at grammatical relations in Indo-Aryan", (with B. Bickel), 2000) मे प्रकाशित कएल गेल । हालेमे Encyclopedia of World's Languages ("The Maithili Language". Also in  Paul van der Velde, ed., New Aspects of Asian Studies, Leiden:   International Institute of  Asian Studies. ) एवं Languages of the World (Moscow) मे मैथिली भाषापर प्रविष्टि प्रकाशित भेल अछि । नेपालमे सञ्चालित वहुभाषिक शिक्षा कार्यक्रम अंतरगत मैथिली भाषाकेँ प्राथमिक शिक्षामे कार्यन्वयन करबाक हेतु मैथिली भाषी समुदायमे सचेतना वृद्धि करबाक हेतु मैथिलीमे सामग्री निर्माण कए गोष्ठीमे छलफलक लेल प्रस्तुति कएल गेल । तहिना, मैथिली भाषाक माध्यमसँ प्राथमिक शिक्षा प्रदान करबाक हेतु एहि भाषामे स्थानीय परिवेश आर संस्कृतिक अनुकूल पाठ्यसामग्री निर्माण कएल गेल । भाषिक विविधता रहल नव नेपालक निर्माणमे मैथिली लगायत अन्य भाषासभक समुचित स्थान प्रदान कए समावेशी भाषा नीतिक प्रस्तावनाक लेल विभिन्न अध्ययन-अनुसन्धान कएल गेल । फलस्वरूप, नया संविधानमे मैथिली एकगोट वैकल्पिक सरकारी कामकाजक भाषाक रूपमे स्थापित होएबाक संभावनादिस सेहो हम प्रयासरत छी । ओना त आब मैथिली भाषामे प्राय: सम्पूर्णरूपेण देवनागरी लिपिक प्रयोग प्रचलनमे आबि गेल अछि, परञ्च मिथलाक्षर अथवा तिरहुता लिपिक ऐतिहासिक आ सास्कृतिक महत्वकेँ नहि बिसरल जा सकैत अछि । ताहि हेतु आजुक सूचना प्रविधिक युगमे कम्प्युटरमे  देवनागरी संगसंगे मिथिलाक्षर लिपि सेहो उपलब्ध होबाक चाहि । एहि आवश्यकताकेँ ध्यानमे राखि हम नेपाली (देवनागरी) युनिकोडपर आधारित मिथिलाक्षर 'जानकी' फन्टक निर्माणक व्यवस्था कएलौंह । नेपालक परिवर्तित संदर्भमे  United Nations Mission to Nepal (UNMIN) द्वारा २००८-९ मे विभिन्न भाषामे सञ्चालित सचेतनामूलक रेडियो कार्यक्रमक मैथिली भाषाक सल्लाहकार भ' कतिपय रेडियो सामग्री निर्माण कारबामे हमर सक्रिय योगदान रहल । वहुभाषिक राष्ट्र नेपालमे भाषिक विविधताक सम्बन्धमे विभिन्न अनुसन्धान कार्यसभ सम्पन्न भेल अछि । ताहिमे निश्चित रूपसँ नेपालमे दोसर सबसँ बेसी वक्तासभ रहल भाषा मैथिलीक विशेष महत्व देल गेल अछि । ईसभ अध्ययन-अनुसन्धानमे हमर महत्वपूर्ण योगदान रहल अछि । कतिपय राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय भाषावैज्ञानिक सम्मेलनसभमे हम मैथिली वाक्य-विन्यासपर निबन्धसभ प्रस्तुत क' Journals मे प्रकाशित कएलौंह। नेपाल प्रज्ञा-प्रतिष्ठानमे प्राज्ञक रूपमे हम अनेक पुस्तकसभक प्रकाशन आर सम्पादन कएलौंह । वहुभाषिक पत्रिका सयपत्री  क संस्थापक प्रधान सम्पादकक हैसियतमे अपन कार्यकालमे एकर विशेषांक प्रकाशित कएलौंह । एहि अतिरिक्त, मैथिली भाषा, साहित्य आर संस्कृतिसम्बन्धी निबन्धक संकलन क' नेपाल प्रज्ञा-प्रतिष्ठानद्वारा हमर सम्पादकत्वमे Readings in Maithili language, literature and culture (1998) नामक पुस्तकक प्रकाशन भेल । मैथिली भाषाक क्षेत्रमे समकालीन भाषावैज्ञानिक दृष्टिकोणसँ बहुतरास कार्य करबाक बाँकी रहल अछि । ताहि हेतु एहि कमीसभक किछु पूर्ति करबाक लेल भविष्यमे ईसभ कार्य करबाक हमर योजना रहल अछि: १    मैथिली व्याकरण            (आधुनिक भाषावैज्ञानिक सिद्धान्तपर आधारित) २    मैथिली-नेपाली-अंग्रेजी शब्दकोष (शिक्षा आर अनुवादमे सहयोगी; ई शब्दकोषक करीब आधा तैयारी भ' चुकल अछि । ) ३    प्राथमिक शिक्षाक लेल प्रत्येक विषयक पाठ्यपुस्तकक निर्माण (निर्माणाधीन) ४    मैथिली भाषामे भाषाविज्ञानक पाठ्यपुस्तकक निर्माण ३.    मैथिली-नेपाली मध्य स्तरक माहे ककर केहन वर्तमान भविष्यक आकलन करs चाहब ? नेपालक संघीय राज्यमे परिणत भेलापश्चात मैथिली निश्चित रूपसँ सरकारी कामकाज, शिक्षा आर सञ्चारक माध्यम हएत आर फलत: मैथिलीक भविष्यमे प्रगति हएत । दोसर दिस, नेपालीक अत्यधिक विकास भ' चुकल अछि आर केन्द्रीय सरकारक सरकारी कामकाजक भाषा रहत । किन्तु, ई स्पष्ट अछि जे नेपालीक एकाधिपत्य नहि रहत । ४.    मैथिली भाषा आ मिथिलाक संस्कृतिक माहेँ अपने विदेशी भाषा मे लिखलौं एहि सँ मैथिली भाषा संस्कृतिक कतेक प्रसार /उपकार भ' सकल ? हमर अधिकांश कृति अंग्रेजी भाषाक माध्यममे लिखल गेल अछि । एकर प्रमुख कारण अछि जे हम सैद्धान्तिक भाषाविज्ञानक ढाँचामे मैथिली भाषाक विश्लेषण कएने छी आर विज्ञान-प्रविधिजकाँ सैद्धान्तिक भाषाविज्ञानमे प्राविधिक शब्दावली (technical vocabulary) क प्रयोग होइत अछि जे मैथिलीमे एखनधरि उपलब्ध नहि अछि । मैथिलीमे लिखनाइ असमर्थता छल । अन्य लोकनिसभकेँ सेहो अंग्रेजी भाषाक सहारा लिअ पडलन्हि । एकर अतिरिक्त, हम त्रिभुवन विश्वविद्यालयमे २००८ ई.धरि सर्वप्रथम अंग्रेजी आर तत्पश्चात् भाषाविज्ञान विभागमे प्राध्यापन करैत रहलौंह, जाहि विभागक शिक्षण अंग्रेजी भाषाक माध्यमसँ होइत अछि । एहिसँ मैथिली भाषाक प्रसार प्रचुर भेल । उदाहरणक लेल, मैथिली क्रिया मेल (Maithili verb agreement) पर लिखल हमर निबन्ध एहि विषयपर अनुसन्धान करैबला विश्वमे प्रत्येक शोधार्थी अध्ययन करैत अछि । एकर अतिरिक्त, अंग्रेजी भाषामे प्रकाशित हमर आर अन्य व्यक्तिलोकनिक कृतिसभ मैथिली भाषा-संस्कृतिक प्रसारमे बहुत योगदान कएने अछि । एहिसँ ५.    मिथिलाक प्रति मैथिली मे लिखब अपना के केहेन अनुभव करै छी ? हमर किछु रचनासभ मैथिलीमे सेहो प्रकाशित भेल अछि किन्तु तुलनात्मक रूपसँ अंग्रेजीसँ कम ।मैथिली भाषामे लिखब स्वाभवत: हमरा गौरव लगैत अछि ।   सवानिवृत (retired) भेलापर आब हम यथाशक्य मैथिलीमे लिखबाक प्रयास करैत रहब; तइयो प्राविधिक रूपेँ किछु एहन विषयवस्तु अछि जे अंग्रेजीमे मात्रे प्रस्तुत कएल जा सकैत अछि । ६.    वर्तमान मैथिली सहित्यक विदेशी भाषाक समक्ष कत' ठाढ क' सकैत छी ? अपन अनुभव कही । वर्तमान मैथिली साहित्यक समृद्ध परम्परा रहल अछि दुनू देशमे । किन्तु किछु विदेशी भाषाक समक्षमे पछाड़ि पड़ल अछि । साहित्यिक विविधताक अभाव देखल गेल अछि ; जेना मैथिलीमे वैज्ञानिक आख्यान (science fiction) नहि पाओल जाइत अछि । ७.    मिथिला मैथिलीसम्बन्धी विचार दोसर भाषा माध्यमे प्रेषित करैत रहलौं । विदेशी भाषा साहित्य वा संस्कृतिक मैथिलीभाषी मध्य रखबाक कोनो योजना अछि ? विदेशी भाषा साहित्य वा संस्कृतिक किछु कृतिसभ दुर्लभ आ महत्वपूर्ण अछि; एहेन कृतिसभक मैथिलीमे अनुवादक विचार हम कएने छी । ८.    मैथिली मे वर्तमान भाषिक (वा शाब्दिक) मानकता के कतेक शुद्ध मानै छी ? की एहि भाषा मे भाषिक स्तर पर कोनो सुधारक संभावना देखाइत अछि ? मैथिलीमे स्तरीय साहित्यिक कृतिसभ पर्याप्त अछि आ ईसभक लेखन शैली शुद्ध आ मानक अछि । विदेह online magazine मे प्रकाशित मैथिलीक मानक शैली आ मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम अत्यन्त सराहनीय अछि; हम स्वयं मैथिली लिखैत काल एकर मदद लएत छी । हम एकरा अत्यन्त वैज्ञानिक आर प्राज्ञिक मानैत छी; किन्तु एहि वर्णविन्यासकेँ कतेकगोटे प्रयोगमे लबैत अछि । ई विचार करनाइ युक्तिसंगत हएत जे की ई अंग्रेजीक Received Pronunciation (RP) जकाँ 'political anachronism त नहि ? अत:, हमरा विचारमे मैथिली लेखनक स्तरीय शैलीक निर्धारण आर सुधार करबाक लेल सम्बन्धित व्यक्तिलोकनि आर संस्थासभक सहभागितामे एहि प्रस्तावपर विचार-विमर्श होमय आर एकगोट समावेशी शैलीक निर्माण कएल जाय । ९.    ठाम-ठीम मैथिली रचनाकारक अगडी-पिछडी दुनू समूह वा पाँतिक शब्द विषमता के बहस क' दुनूके मानक हेबाक वात राखल जाइए । अहाँ एहि सँ कतेक सहमति असहमति  छी ? एहि विषयमे हमर दूगोट मत अछि: १ साहित्यिक लेखनमे दुनू समूहक अपन-अपन भिन्नता राखल जा सकैत अछि, किएक त कथा, उपन्यास, कविता आदि साहित्यिक विधामे सामाजिक परिवेश आर पात्रक अनुसार भाषिक भिन्नता हएब स्वाभाविक अछि । २ औपचारिक लेखन (जेना कानून, सरकारी दस्तावेज, नियम, साहित्यिक समालोचना आदि)मे भाषिक एकरूपता अपरिहार्य अछि । एहेन एकरूपता मानक शब्दकोष, व्याकरण, शिक्षामे मैथिली भाषाक प्रयोग आदिसँ प्राप्त कएल जा सकैत अछि । विश्वक कतिपय भाषामे एहेन स्थिति देखल गेल अछि । १०वर्तमान मे मैथिली मध्य पिछडी जातिक वहुसंख्यक सक्रिय रचनाकारक रूपे प्रवेश के मैथिली सहित्यक भविष्य के कत' देखै छी ? एकरा हम सकारात्मक रूपमे लैत छी । एहिसँ विभिन्न तरहक सामजिक परिवेशक अनुभव आर भावनाकेँ समेटि क' मैथिली समृद्ध आर समावेशी साहित्यिक दिशादिस अग्रसर हएत से हमरा विश्वास अछि । दोसर वात जे एहि तरहक प्रयाससँ मैथिली भाषाकेँ सव समूहसभ अंगीकार (own) करत । एहि ठाम हम नेपालक एकगोट घटना उद्धरण कर' चाहैत छी । सम्प्रति नेपालक मैथिली भाषी क्षेत्रमे किछु समुदायसभद्वारा मैथिलीकेँ अस्वीकार (disown) क' अन्य भाषाकेँ अपन मातृभाषाकेँ रूपमे स्वीकार करबाक स्थिति श्रृजित भ' रहल अछि । हरेक भाषाजकाँ मैथिली भाषामे सेहो भिन्नता रहब स्वाभाविक अछि; ताहि हेतु  सब तरहक भिन्नताकेँ स्वीकार क' एक समग्र मैथिलीक अस्तित्वक स्थापना करी । ३ ११ दिसम्बर २०११ केँ विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान पं. गोविन्द झा जीकेँ पटनामे श्री मुन्नाजी देलन्हि। बहुआयामी व्यक्तित्वक शिखर पुरुष श्री गोविन्द झा जीसँ मुन्नाजीक भेल मुखोतरिक अंशसँ अहाँ सभक जनतब कराएल जा रहल अछि। मुन्नाजी: विदेह सम्मान [विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार २०१० श्री गोविन्द झा (समग्र योगदान लेल)] लेल बधाइ। मैथिली भाषा साहित्यक वर्तमान परिदृश्य की अछि। एकरा मरबासँ बचेबामे अखनुक विदेह साहित्य आन्दोलन कतेक कारगर सिद्ध भऽ रहल अछि। पं. गोविन्द झा: स्थिति पहिने एकभगाह सन छल। आब सभ तुरक आ सभ जातिक रचनात्मक प्रवेशे ई भाषा चिरायु वा ई कही जे अमरत्वकेँ प्राप्त करबाक सामर्थ्यवान भेल देखाइए। मुन्नाजी:मैथिली कथा साहित्य भारतीय अन्यान्य कथा साहित्य मध्य कतऽ टिकल अछि। एकर सम्भावना केहेन देखाइए? पं. गोविन्द झा: ई संतुष्टि दैबला बात अछि जे मैथिलीमे अखन सभ प्रकारक कथा आबि रहल छै। ओना मैथिलीमे हमरा जनतबे नारा साहित्यक प्रचलन रहल। मोन कहियो साम्यवादी तँ कहियो नारी केन्द्रित कथा एवं आलेख बेशी देखना जाइए। मुदा एकोटा नारी कल्याणक लेल सशक्त नै अछि। अही सभ कारणे मैथिली कथा भारतीय स्तरकेँ नै प्राप्त कऽ सकल। आगू ऐमे विकेन्द्रीकरणक सम्भावना देखा पड़ैए। मुन्नाजी: वर्तमान मैथिली नाटकक की स्तर अछि। कोन नाटककार ऐ स्तरकेँ प्राप्त केने बुझाइत छथि? पं. गोविन्द झा:मैथिलीकेँ आम जनतासँ जोड़बाक साधन अछि प्रदर्शन। आ जकर मुख्य माध्यम अछि नाटक। वर्तमानमे नाटकक स्तर कमतर अछि। आब लोक पैघ नाटक देखबासँ अगुताइ-ए।ऑडियेन्स सटिस्फाइड नै भऽ पबैए किएक तँ नाटकमे कोनो मोड़ नै अबै अछि। रचना सभ नारी सशक्तिकरणक उल्लेख करैए मुदा नारीक सही चित्रण नै दैए। बसात नारी केन्द्रित पहिल मैथिली नाटक छल। जकरा देखियौ आइयो प्रासंगिक अछि। थियेटरक नाटक तकनीकी दृष्टिए ऊपर गेल अछि। मुदा गाममे नाटक देखबा लेल आइयो लोकक संख्या हजारक करीब भऽ जाइए। “अन्तिम प्रणाम” नाटकक प्रदर्शनमे गाममे ५००० लोक जुटल छल। आब आवश्यकता छै उच्च कोटिक कथा सभक नाट्यरूपान्तरणक, जइमे मैथिली बहुत पछुआएल अछि। जखन की आन सभ भाषामे ई काज खूब भऽ रहल अछि। वर्तमानमे जे नाटककार अपन भाषाक श्रेष्ठता साबित कऽ रहल छथि ओ छथि, महेन्द्र मलंगिया आ अरविन्द अक्कू। मुन्नाजी: भाषिक रूपमे मैथिलीक वर्तमान स्थिति की अछि? की ऐमे ह्रास वा क्षीणता एलैए? पं. गोविन्द झा: भाषाक स्तरपर बहुत फर्क एलैए, आबक लोक पढ़ैए कम, लिखऽ चाहैए बेशी। रचनाकारक शब्द सामर्थ्य घटि रहल छै। नवका धियापुता अंगरेजिया भऽ रहल छै। तखन तँ मैथिलीक दुर्दशा स्वाभाविके छै। मुन्नाजी: मैथिलीमे आब विहनि कथा धुरझार लिखा रहल अछि। एकर वर्तमान अस्तित्व आ सम्भावना की देखाइछ? पं. गोविन्द झा: विहनि कथा पूर्ण रूपेँ कविताक समकक्ष अछि। आ वर्तमानमे ठोस कविता आंगुरपर गनबा जोकरक अछि। तखन लघुकथो बुझनिहार कमे छथि। हँ नव लिखनिहार बढ़ल-ए। तेँ एकर भविष्य नीक भऽ सकैए। मुन्नाजी: नवतुरिया रचनाकारक लेल कोनो सनेस? पं. गोविन्द झा:नव लेखक सभ पहिने अध्ययन तखन अभ्यास, तखन लेखनी करताह तँ अवश्य सफल हेताह। ४ नेपाली साहित्यक विज्ञ व्याख्याता (सेवा निवृत्त आ मैथिलीक प्रबुद्ध रचनाकार श्री राजेन्द्र बिमलसँ हुनक रचना यात्रा मादेँ गप केलनि विहनि कथा रचनाकार श्री मुन्नाजी। हम पुछैत छी: मुन्नाजीसँ राजेन्द्र बिमलक अन्तर्वार्ता मुन्नाजी: नमस्कार राजेन्द्र बिमलजी। राजेन्द्र बिमल: मान्यवर मुन्ना जी, जय मैथिली। मुन्नाजी:बिमलजी, अपनेक मातृभाषा मैथिली रहलाक पछातियो अपने नेपाली भाषा साहित्यमे उच्च अध्ययन आ अध्यापनमे अग्रसर रहलौं, एकर कोनो विशेष कारण? राजेन्द्र बिमल:    मैथिली मातृभाषा रहलो संता “नेपाली भाषा – साहित्यक अध्ययन – अध्यापनमे जीवन समर्पित करबाक अन्तःप्रेरणा उद्भूत भेल दू गोट प्रमुख उद्दीपनसँ” – (क) प्राथमिक कक्षासँ “स्नातकोत्तर कक्षाधरि नेपाली (राष्ट्रभाषा) अध्येताक संख्या नेपालमे सर्वाधिक होएबाक कारणे “राष्ट्रीय स्तरधरी अपन परिचिति स्थापित करबाक अवसर अपेक्षाकृत सहज अनुभव करब। उल्लेखनीय थिक जे राष्ट्रभाषा नेपालीक अध्ययन नेपालमे प्रवेशिका कक्षाधरि अनिवार्य थिकै । मैथिलीक अध्ययन – अध्यापन नेपालक मात्र दू गोट महाविद्यालय धरि सीमित अछि आ ताहूमे विद्यार्थीक संख्या नगण्य भेल करैछ । नेपालमे मैथिली अध्ययन – अध्यापनक अवस्था भारतमे उर्दू अध्ययन  अध्यापनक अवस्थासँ “सेहो ऋणात्मक अछि । (ख) मैथिली अध्ययन – अध्यापनमे अपन आधारभूत आर्थिक भविष्य नितान्त असुरक्षित अनुभव करब । मुन्नाजी:मैथिली साहित्य रचनाक शुरुआत कोना केलौं आ पहिल बेर की लिखि कतऽ छपलौं: राजेन्द्र बिमल:    किछु साहित्यप्रेमी गुरुलोकनिक प्रेरणासँ “दसे वर्षक आयुसँ” किछु ने किछु जोरती जोरैत रहबाक लेल प्रेरित होइत रहलहुँ। मुदा, हमर यत्किञ्चित प्रतिभावल्लरीक जाहि स्तम्भकेँ पाबि पल्लवन पुष्पन भेल तिनक नाम थिक डा. धीरेन्द्र । अध्ययनकालसँ अध्यापनकालधरि प्रायः नित्य हुनकासँ भेंट होइत छल आ प्रत्येक भेंटमे ओ किछु नव लिखबाक लेल प्रेरित करैत छलाह। हमर पहिल मैथिली कथा “मुइल बच्चा” १९६२ (१) ई.क “मिथिला मिहिर”मे प्रकाशित भेल छल । मुन्नाजी: अहाँ नेपाली साहित्यक व्याख्याता रहलैं अछि। की अहाँ नेपालीमे सेहो रचना केलौं? ओकर नेपाली साहित्यकार वा पाठक मध्य कतेक महत्व भेटल? राजेन्द्र बिमल:प्रकाशन – सुविधाक दृष्टिए मैथिली साहित्य – संसार एक गोट विराट मरुस्थल थिक जाहिमे एकाध छोटछोट मरु – उद्यान प्रकट होइत अछि, विलुप्त भए जाइत अछि। जएह हरियर गाछ देखैत छी से निसर्गक चमत्कार बूझू । राजकीय संरक्षणसँ सिंचित नेपाली भाषा साहित्यक संसार हरियर कचोर अछि, उर्वर आ नित्य सम्बर्धनशील । तेँ नेपालीमे हमर दर्जनधरि पोथी प्रकाशित भए सकल । पाठकके संख्या बेसी थिकै । तँ छोटो छिन कथा प्रकाशित भेल नहि कि पत्रक पथार लागि जाइत अछि । मैथिलीक पाठक संख्या से हो कम (लगभग जतबे लेखक, ततबे पाठक) आ हुनकामे “रिस्पोन्स” करबाक प्रवृत्ति से हो तेहन जीवन्त नहि । नेपाली भाषा साहित्यमे योगदान हेतु देल जाएबला पुरस्कारमे सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार “जगदम्बा श्री” सँ सम्मानित होएब हमर सौभाग्य थिक । लगभग तीन दर्जन संस्थासँ सम्मानित/ पुरस्कृत भेल छी । मुन्नाजी:नेपाली आ मैथिली साहित्यक स्तरक आधारपर दुनूमे कतेक समता वा विषमता छै: राजेन्द्र बिमल: संख्यात्मक आ गुणात्मक दुनू दृष्टिए नेपाली साहित्यक अवस्था घनात्मक अछि । प्रभाववादी, प्रतीकवादी, विम्ववादी, घनत्ववादी, आस्तित्ववादी, उत्तरआधुनिकतावादी, विनिर्माणवादी, नारीवादी, उत्तरऔैपनिवेशिकतावादी प्रभृत अत्याधुनिक लेखनशैली आ विषयवस्तुसँ समृद्ध नेपाली साहित्य सरिपहुँ विश्व साहित्यसँ प्रतिस्पर्धा करबाक तैयारीमे अछि । १९६० क दशकसँ एखनधरि मैथिली साहित्यक विकासमे शिल्प वा कथ्यक दृष्टिए बहुत गतिशील विकासक्रम परिलक्षित नहि होइत अछि । विश्व साहित्यमे उठि रहल अनेक प्रवृत्ति लहरिक आरोह-अवरोह, आलोड़न – विलोड़नसँ अधिकांश लेखक आ पाठक अपरिचित जेकाँ लगैत छथि । मृत्तिका मोह वा “नास्टाल्जिया” कने बेसिए गछेरने अछि। मुन्नाजी:अपनेक मैथिलीमे टटका गजल संग्रह “सूर्यास्तसँ पहिने” प्रकाशित भेल अछि। एकर अतिरिक्त आर की सभ प्रकाशन लेल तैयार अछि। राजेन्द्र बिमल:    मैथिलीमे लीखल अनेक पाण्डुलिपि प्रकाशनक बाट ताकि रहल अछि (क)  लगभग पाँच गोट कथा संग्रह (ख)  एक गोट उपन्यास (चान अहाँ उदास छी – १९६३ ई.) (ग)  एक गोट गीत संग्रह (घ)  एक गोट कविता संग्रह (ङ)  एक गोट निबन्ध संग्रह (च)  दू गोट आलोचना संग्रह (छ)  एक गोट भाषा विज्ञानक पोथी (ज)  एक गोट नाटक – संग्रह आदि (A comparative study of the Morphology of Maithili Nepali and Hindi Language) आदि । मुन्नाजी:मैथिली साहित्य मध्य वर्तमान समयमे गजलक की दशा अछि, एकर भविष्यक की दिशा देखाइछ? राजेन्द्र बिमल:    गजल अत्यन्त लोकप्रिय विधा थिक । मैथिलीमे से हो खूब लीखल जा रहल अछि आ पढलो जा रहल अछि । बहुत गजलकार एकर व्याकरणसँ कम परिचित छथि । मुदा भविष्य उज्जवल छैक । मैथिली गजलमे अपन निजात्मकताक विकास शुभ संकेत थिक । मुन्नाजी:मैथिलीक प्रकाशित गजलक संगोर (कतेको गजल संग्रह) आ मायानन्द मिश्रक गजलकेँ गीतल कहि प्रकाश्यक मादेँ गजेन्द्र ठाकुर एकरा अस्तित्वहीन कहि अपन सम्पादकीय आलेख माध्यमे अवधारणा स्पष्ट केलनि।अहाँक ऐपर अपन स्वतंत्र विचार की अछि? राजेन्द्र बिमल: संगोर सभ नहि देखल अछि । आदरणीय मायाबाबूक गीतल (गीत-गजल) एक गोट प्रयोग थिक । हम कोनो सृजनकेँ निरर्थक नहि बूझैत छी आ लेखन स्वतंत्रतामे विश्वास रखैत छी । मुन्नाजी:नेपाल आ भारतक मैथिली रचनाकारक मध्य कखनो कऽ फाँट देखाओल जाइछ। ऐ फाँटकेँ भरबाक लेल अहाँक की विचार? राजेन्द्र बिमल:    भाषा, साहित्य, संस्कृतिक कोनो राजनैतिक भूगोल नहि होइत छेक – जेना  आकाशमे इन्द्रधनुष वा धरतीपर जलप्रवाहक कोनो सीमा स्तम्भसँ छेकल नहि जा सकैत अछि । हमर आकांक्षा रहल अछि जे सरकारी/ गैरसरकारी स्तरपर एहन साझा मञ्चक निर्माण हो जे मैथिली भाषा, साहित्यक सम्बर्धन हेतु मीलिजूलि कए नीति आ कार्यक्रमक निर्माण करए, तकरा कार्यान्वित करए । मैथिली आन्दोलनक हेतु सेहो एहन मंचक अपरिहार्यताक अनुभव करैत छी । भैयारी विभेद आ बँटबारा जातीय अस्मिताकेँ छाउर करबाक लेल शत्रुशक्तिक हेतु लंकादहनक मार्ग प्रशस्त कए दैत छैक । जमीन बँटि जाइत छैक, भाय – भायक हृदय नहि बटबाक चाही, ई बोध जगाएब इतिहासक वर्तमान कालखण्डक मैथिली सर्जक आ चेतनासम्पन्न मैथिलक हेतु नैतिक दायित्व थिक । मुन्नाजी: अपने रचनामे सक्रिय रहलहुँ अछि तखन प्रकाशित पोथी एते विलम्बे किएक आएल? सेवा निवृत्तिक पछाति पहिल संग्रहमे गजले संग्रहकेँ किए प्राथमिकता देलौं, एकर कोनो विशेष कारण? राजेन्द्र बिमल:    जनकपुरमे रहि स्थानीय स्तरपर पोथी प्रकाशन करब असहज । टङ्कणक असुविधा, प्रेसक असुविधा (कतबो प्रूफ पढब, अशुद्धि जहिनाक तहिना) स्वयं से हो शारीरिक रुपैं एहि दिशामे बहुत सक्रिय रहबाक अवस्थामे नहि छलहुँ आ एखनहु नहि छी । तेँ ............... । “गजले” छपलहुँ, तकर कारण हमर प्रिय सहयोगी प्रो.परमेश्वर कापडिक जोर । मुन्नाजी: मैथिली साहित्यक रचना मादेँ अगिला पीढ़ीकेँ की सनेस देबऽ चाहब? राजेन्द्र बिमल:    “कीर्तिलता” मे मैथिल कुलपुरुष, मंत्रदष्टा महाकवि विद्यापतिक एक गोट ऋचा थिकैन्हि, जकर अर्थ थिक जे कालक अखण्ड प्रवाहमे ओही जातिक कीर्तिक लता पसरैत अछि जे अक्षरक खम्भा दए अक्षरेक मचान बन्हैछ । एकर मर्म बूझि मिथिलाक भविष्णु सपूत–सुपुत्री लोकनि अथक अक्षर–साधनाद्वारा बारल अपन गौरवदीपक अमर आलोकसँ विभ्रान्त विश्वक हेतु मंगल–पथ सदैव उद्भासित करथि, से शुभ कामना । ५ हम पुछैत छी : विदेह ई-पत्रिकाक सहायक सम्पादक श्री मुन्नाजीक संग रामभरोस कापड़ि “भ्रमर”क बातचीतक अंश: मुन्नाजी: रामभरोस जी नमस्कार। रामभरोस कापड़ि “भ्रमर”: नमस्कार। मुन्नाजी: अपने अपन साहित्यिक यात्राक प्रारम्भिक परिदृश्यक विवेचनमे की कहए चाहब? रामभरोस कापड़ि “भ्रमर”: मुन्नाजी, हम जाहि परिवारसँ आएल छी ओ धन-वीत्तमे समाजमे अग्रणी तँ छल, मुदा भाषा, साहित्यक ओतऽ नामोनिशान नै छलै। बाबूजी गाम विकास समितिक मुखिया, प्रधान पंच होइत रहलाह, क्षेत्रमे नीक प्रतिष्ठा, नाम छलनि। मुदा घरमे पत्र-पत्रिका, पुस्तक पढ़बाक माहौल नहि छलै। ताहुमे मैथिली! जखन हमरा दुनू भाइकेँ बघचौरासँ जनकपुरक हाई स्कूलमे शिक्षाक हेतु पठाओल गेल, तखन स्थिति बदललैक। हमरा पत्र-पत्रिका पढ़बाक लत लागल, रुचि बढ़ल आ तखन किछु लिखी से मनमे होबऽ लागल। हमर सम्पर्क डॉ. धीरेन्द्रसँ भेल जे रा.रा.कैम्पसमे मैथिली पढ़बैत छलाह। हुनका संगतिसँ लेखन दिश सक्रियता बढ़ल। ओना हम अपन पहिल कथा “इमानदार बालक” हिन्दीमे लिखने रही आ डॉ. धीरेन्द्रकेँ देखौने रहियनि। ओ तत्काल हमरा अपन भाषा मैथिलीक प्रति आकर्षित करौलनि आ तकर अनुवाद कऽ लएबा लेल कहलनि। हम कथाक अनुवाद मैथिलीमे कऽ देलियनि, जकर शुद्धि करैत काल एक्को पंक्ति एहन नहि छल जाहिमे लाले लाल नहि लागल होइ। जखन उतारि कऽ देलियनि तँ हुनक चिट्ठीक संग मिहिरमे पठा देबाक लेल कहलनि जे कथा नेना भुटकाक चौपाड़िमे १९६४ ई. मे छपल। तहिया हमर उमेर १३ वर्षक छल। बस, तकरा बाद हमर साहित्यिक यात्रा जे चलल, आइ धरि निरन्तर जारी अछि। एखन धरि विभिन्न विधाक तीससँ ऊपर पुस्तक प्रकाशित भऽ चुकल अछि। मुन्नाजी: साहित्यक अतिरिक्त अहाँ आर कोन गतिविधिसँ जुड़ल रलौं अछि? रामभरोस कापड़ि “भ्रमर”: हमर प्राथमिक झुकाउ साहित्ये दिश रहल। खूब लिखलौं- खूब आनन्दित भेलौं। दोसर हम पत्रकारितामे सेहो निरन्तर लागल छी। नेपालक पहिल मैथिली समाचारपत्र “गामघर साप्ताहिक”क विगत तीस वर्षसँ सम्पादन-प्रकाशन कऽ रहल छी। एहि विच “अर्चना”, “आंजुर” मासिक, द्वैमासिक, सेहो निकाललहुँ। एकर अतिरिक्त सामाजिकशोध संस्थामे सेहो सक्रिय रहलहुँ। मुन्नाजी: मैथिली साहित्यक परिधि छोट आ सीमित अछि। मुदा ऐ भाषाक रचनाकार सभ अपने कुकुर कटाउझ करैत पाओल जाइत छथि। ई समस्या किएक उत्पन्न होइत अछि आ एकर निदान की? रामभरोस कापड़ि “भ्रमर”: मैथिली भाषा, साहित्यक क्षेत्रमे लाभक अवसर कम छैक। जे छै तकरा अपना दिश कोना हँसोथल जाए, एहि फिराकमे मित्रगण सभ लागल रहैत छथि। एक आर्थिक लाभक लोभ, दोसर अपन वर्चस्व कायम रखबाक लौल- दुनू कुकुर कटाउझक कारण मानल जा सकैछ। निदान कहब कठिन- ई स्वभाव, प्रकृति आ आचरणसँ सम्बद्ध छैक। धैर्य राखब मात्र एकर उपाय थिक। मुन्नाजी: देखल जाइत अछि जे सामान्यतः मैथिलीमे दू चारिटा रचना वा एक दुइ साल रचनाक पछाति एकटा पत्रिका निकालि ओ रचनाकार स्वयंकेँ सम्पादक घोषित कऽ दैत छथि। वास्तवमे सम्पादनक की मानदण्ड अछि आ ओइपर कतेक सम्पादक अटकल रहि पबैत छथि? रामभरोस कापड़ि “भ्रमर”: ई-प्रश्न मोनकेँ गदगद कऽ देलक। साँच बात इहो छैक- एखन मैथिलीमे ई समस्या बड़ जोड़ पकड़ने अछि। दू चारिटा कथा, कविता लिखने, छपने अपनाकेँ साहित्यक सिरमौर बुझबाक भ्रम सभतार होइछ। दशकूंक लगानीकेँ छाउर बूझि मुँहक फुकसँ उड़िया देबाक भयावह आत्मरति भाव मैथिली लेखनक सहज परम्पराकेँ भ्रमित कऽ रहलैक अछि। सम्पादन स्वयंमे एकटा कला छै, विज्ञान छैक। एक-आध अंक बहार कऽ अपनाकेँ सम्पादक काह मठोमाठ बनने हमरा जनैत ताही प्रतिभाक हेतु नोक्शानीक बात छैक। सुधांशु शेखर चौधरी, डॉ. हंसराज, डॉ. भीमनाथ झा, बाबू साहेब चौधरी, कृष्णकान्त मिश्र, डॉ. सुधाकान्त मिश्र, डॉ. धीरेन्द्र, सम्प्रतिमे रामलोचन ठाकुर आदि किए सम्पादक कहौलनि! अहाँ मानदण्डपर अटकलक बात करै छी, पत्रिकाक कए गोट अंकपर ओ अटकल रहि पबैत छथि? मुन्नाजी: नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानक प्राज्ञ भऽ प्रतिष्ठासँ केहन अनुभव कऽ रहल छी, ऐसँ जीवन आ लेखनमे केहन परिवर्तन आएल अछि, की जीवन आ लेखनमे ई सहायक भेल अछि? रामभरोस कापड़ि “भ्रमर: निश्चय प्रज्ञा प्रतिष्ठानमे प्राज्ञ भऽ आएब हमर सपना रहए। कोनो साहित्यकारक हेतु ई सभसँ उच्च सम्मान छैक। हम नेपाल सरकारक एकरा लेल आभारी छी। एहिसँ हमर जीवन शैलीमे किछु परिवर्तन तँ भेबे कएल अछि। हम जनकपुरमे रहैत छलहुँ, आब काठमाण्डूमे रहऽ पड़ैत अछि। हम स्वतंत्र, खुशफैल रहऽ बला लोक, आब नियमित ऑफिस जाए पड़ैत अछि। मुदा स्वतंत्र आ आह्लादकारी काज तँ छैहे प्रतिष्ठानमे। लेखनमे कोनो फरक नै, बस बेसी जगजिआर भेल अछि। पत्रकारिता बस लेखनकेँ बाधित करैत छल। हम काठमाण्डू अएलाक तीन वर्षमे छः गोट पुस्तक प्रकाशित कऽ सकलहुँ आ दर्जनों निबन्ध, कथा, कविता, नाटक आदि। मुन्नाजी: नेपाली साहित्य मध्य मैथिली साहित्यक केहेन जुड़ाव छैक? आ दुनू भाषा मध्य कोन साहित्य बेशी समृद्ध अछि आ किएक? रामभरोस कापड़ि “भ्रमर: नेपाली आ मैथिली अपन-अपन बाटपर चलैत अछि। एक राज्योपोषित रहलै, दोसर साहित्यकार पोषित। प्राचीन साहित्य मैथिलीक, लेखनमे समृद्ध नेपाली। मुन्नाजी: मैथिलीक सीमामे फाँट कएल (नेपाल आ भारत) साहित्यिक गतिविधिक तुलनात्मक परिदृश्ये कतुक्का साहित्यक केहेन दशा-दिशा देखा पड़ैए? रामभरोस कापड़ि “भ्रमर: भारतीय साहित्यकार, ओतुक्का साहित्यिक प्रतिष्ठान, सरकारी वा गएर सरकारी एहि तरहक फाँट-बखरा कऽ कऽ रखने अछि। एम्हरका लोक साहित्य अकादमीक पत्रिका, पुरस्कार, लेखन, गोष्ठीमे सामेल नहि कएल जाइत छथिनेपालमे तेहन कोनो बन्देज नै छैक। प्रज्ञा प्रतिष्ठानक कार्यक्रममे हमहीं निरन्तर बजबैत छिऐन्हि, डॉ. प्रफुल्ल कुमार सिंहक “नेपालक मैथिली साहित्यक इतिहास” नेपालक अर्ध सरकारी प्रकाशन संस्था साझा प्रकाशन छपलक अछि। हँ, ओम्हरका साहित्यक लेखन परम्परा निरन्तर चलैत रहल- समृद्ध अछि। प्राचीनताक दृष्टिएँ, ऐतिहासिक उपलब्धिक दृष्टिएँ नेपाल ओम्हरसँ समृद्ध अछि। “वर्णरत्नाकर”, सिद्ध साहित्य, मल्ल काल, सभ मैथिली साहित्यक आधार थिकै- ज्कर स्रोत नेपाले अछि। मुन्नाजी: वर्तमानमे अपन गतिविधि कोन दिशामे जारी अछि? साहित्यिक-सांस्कृतिक कोनो अग्रिम योजना अछि? रामभरोस कापड़ि “भ्रमर: एखन प्रज्ञामे लागल छी। देखू, साझा प्रकाशनमे अध्यक्ष भऽ कऽ तँ ओ मात्र नेपालीक पुस्तक छपैत छल, हम मैथिलीक शुरुवात कएलहुँ। एक बालपोथी “बगियाक गाछ”, दोसर “मैथिली साहित्यक इतिहास”। प्रज्ञामे पहिल बेर साधारण सदस्य भऽ आएल रही तँ पहिल बेर मैथिलीक पत्रिका बहार कएलहुँ “आंगन”। जे एहि बेर अएलाक बाद हमरे सम्पादनमे निरन्तर प्रकाशित अछि। एखनो बेसीसँ बेसी मैथिली दिश ध्यान दितो हमर विभाग “संस्कृति विभाग” सम्पूर्ण देशक हेतु देखैत अछि। तथापि जट जटिन, सलहेस, दीनाभद्रीक लोकगाथा, नृत्य संयोजन, संकलन, ऑडियो विडियोग्राफीक सुरक्षित कऽ देने छिऐक। हम ग्रन्थक रूपमे बहार करबाक नियारमे छी। मैथिलीमे एम्हर नाट्य क्षेत्रमे किछु नव संस्था, कलाकार सभ अपन प्रतिभा देखौलनि अछि, हम हुनका सभकेँ उचित मंच भेटौक ताहि दिश प्रयत्नरत छी। मुन्नाजी: साहित्य लेखक एवं सम्पादकक नव तूरकेँ की सनेस देबऽ चाहब? रामभरोस कापड़ि “भ्रमर: जे लिखथि मोनसँ लिखथि। अपनेसँ अपन मूल्यांकन नहि करथि। अपन अग्रज साहित्यकारक सम्मान करथि। सम्पादक महज लौलसँ अथवा अपनाकेँ स्थापित देखएबा लेल नहि करथि। एहिसँ अपन पूर्वूक छविकेँ धुमिल भऽ जएबाक डर होइछ। मुन्नाजी: साहित्य मध्य साहित्यकारक राजनीतिक उठापटककेँ अहाँ कोन परिप्रेक्ष्यमे देखै छी? की साहित्यकारक लेल ऐ प्रकारक क्रियाकलाप उचित अछि? रामभरोस कापड़ि “भ्रमर: हमरा लगैत अछि शुरुएक प्रश्नमे किछु बात आबि गेल अछि। साहित्यकारकेँ राजनीतिसँ दूरे रहने नीक। मुदा कतेको अवस्थामे ई सम्भव नहि बुझाइत छै। पटना आ दरभंगाक साहित्यिक मंचपर राजनीतिकर्मीक वर्चस्व एकर प्रमाण अछि। मुन्नाजी: शुरूहेसँ मैथिली भाषा पिछड़ल जातिक धरोहरि जकाँ रहल अछि। मुदा साहित्य मध्य (रचनाकारक रूपेँ) ओइ वर्गकेँ अवडेरि कऽ (कतिया कऽ) राखल गेल। की ऐसँ भाषाक हीनता आएल अछि? वा ई भाषा मृत्यु शय्या धरि पहुँचि गेल अछि। अहाँक नजरिये की कहब ऐपर? रामभरोस कापड़ि “भ्रमर: ई प्रश्न हमरा जनैत मैथिली भाषा, साहित्यक क्षेत्रमे सभसँ अहम अछि। मैथिली भाषाकेँ संस्कृत जकाँ “हम्मर भाषा” कहि विगत डेढ़-दू सय वर्षसँ अपन पोथी-पतरामे जाँति कऽ रखनिहार मुट्ठी भरि वर्ग नब्बे प्रतिशत बजनिहारकेँ एकरासँ दुरे रखबाक काज कएलनि। आब जखन ई जपाल भऽ गेल छन्हि तँ भाषाक विस्तारीकरणमे लागल छथि। एखनो मैथिलीक मंचपर नमूनाक हेतु किछु गोटे अभरताह, मुदा तकर पुछ कोन रूपेँ? साहित्यमे कतेक चर्च? गोलैसी कऽ कात करबाक, नीचाँ देखएबाक कोन प्रयत्न छुटल अछि? एहिमे कोन सन्देह जे जे वर्ग मात्र मैथिलीएटा बजैत अछि, तकर भाषा छीनि कऽ अहाँ महन्थ बनल छिऐ, आ अपने अंग्रेजी, हिन्दी, नेपाली बजैत समाजमे रोब दैत छिऐ। परिणाम तँ साफ छै,- एहि बेरका जनगणनामे नेपालमे मैथिलीक ठामपर मगही, बज्जिका लिखाओल गेलैए। किछु लाख तँ अबस्से बजनिहारक संख्या कम भेल हएतै। लिखौनिहारक साफ तर्क छलै, ई भाषा हमर अछिए नहि, ई तँ…। हमरा सन लोक एहिमे लागल छी, स्वयं हम एकर प्रतिपादमे किछु जिल्ला घुमलहुँ। मुदा हमरा सभकेँ अपवाद बुझैत अछि। आ जे नाटक एखनो धरि कएल जा रहल छैक, ताहिसँ मोन हमरो सभक दग्ध अछि औ मुन्नाजी! किएने मैथिलीक पुस्तक बिकाइए, पत्रिका बिकाइए? जे लेखक सएह पाठक! हमरा लगैत अछि- आब सम्हरबोक समय नहि अछि! ई भाषा मृत्यु धरि पहुँचि गेल अछि से हम नहि कहब, मुदा कए खाढ़ीमे विभक्त आ छिन्न-भिन्न धरि अवश्य भऽ गेल अछि। जकरा जोड़बाक ककरो ने रुचि छैक आने पलखति! तखन?! रामभरोस कापड़ि "भ्रमर" पहिल रचना प्रकाशित हेबा कालक फोटो ६ मुन्नाजीसँ रमेश रंजनक अन्तर्वार्ता रमेश रंजन १. अहाँक रचनात्मक प्रवृति कोना जागल ? पहिल बेर की लिखल, कि छपल ? हम लेखकसँ पहिने रंगकर्मी छलहुँ । मिनाप जनकपुरसँ संलग्नता छल । नाटक, ताहूमे अभिनयमे रमल रहै छलहँु । मिनापक वातावरण साहित्यिक सेहो छलै । डा. धीरेन्द्र, डा. विमल,महेन्द्र मलंगिया सन गुरुक सानिध्य भेंटल । मिनापक तात्कालीन अध्यक्ष योगेन्द्र साह नेपालीक अभिभावकत्व । ओहि कालखण्डमे श्यामसुन्दर शशि, धर्मेन्द्र झा, धीरेन्द्र प्रेमर्षि,सुनील मल्लिक सन समकालीन मीत्र रचना करऽ लागल छलाह । हुनका लोकनिक दवाबसँ हमहूँ किछु–किछु लीखऽ लगलहुँ । हमर पहिल रचना छल, कविता जकर शिर्षक छलै– कचोट, आ हमर पहिल कविते प्रकाशितो भेल छल जकर शिर्षक छलै–साकार । अइ कविताक नेपाली अनुवाद तात्कालीन नेपाल राजकीय प्रज्ञा–प्रतिष्ठानक पत्रिका समकालीन सहित्यमे प्रकाशित भेल छल । २. शुरुआतेसँ कथा लेखन केलहँु ? आओर कि सभ लिखलहँु अछि ? नइ, कथा तँ हम बहूत बादमे लीखऽ लगलहुँ । सगर राति दीप जरए साहित्कि क्षेत्रमे जागरण लाबि देने रहै । जर्वदस्त चर्चा भऽ रहल रहै । मुदा मैथिलीक केन्द्र जनकपुरमे आयोजन नइ भऽ सकल रहै । जनकपुरमे आयोजन लएबाक हेतु हमरा कथा लीखऽ पड़ल रहए । पन्द्रहम् समारोह पैटघाटमे हम कथा लीख कऽ सहभागी भेंलहुँ आ सोलहम समारोह जनकपुरमे हमरा संयोजकत्वमे सम्पन्न भेल । आओर विधामे लिखबाक बात छै तँ हम सभ ओहिठामक लोक छी जाहिठाम संख्यात्मक रुपें लिखनिहारक अभाव रहलै । तें आवश्यकता अनुसार लिखबाक विवशता सेहो रहल । ओना कविता, कथा, नाटक, उपन्यास, आलोचना, वृतचित्र, फिल्म आ टेलीसिरियलक लेखन सेहो कऽ रहल छी । ३. अहाँक कथा कथानक कि रहैछ, आ ओकर मूल ध्येय की रहैछ ? हमरा कथाक विषयवस्तुक लेल बौआए नइ पड़ैए । अपन परिवेश आ आहि भितरक द्वन्दके चिन्हित करै छी । ओकर सुख, दुःख, आन्नद, पीड़ा, संधर्षके भोक्ताक रुपमे अनुभूति करै छी । एकटा चेतना हमरा निर्देशित करैत अछि – ओ छै माक्र्सवादी सौन्दर्य चेतना । हमरा बुझने हमर साहित्यक ध्येय के आओर स्पष्टीकरण्क अवश्यकता नइ छै । ४. अहाँ अपन कथा लेखनक प्रारम्भिक दौरसँ अखन धरिक यात्रामे की परिवर्तन पबैत छी ? विचारक स्तरपर खास नइ । प्ररम्भमे आवेश छल– अनियन्त्रित आवेश, आब थोड़े नियन्त्रणमे अछि । कहन शैली पहिनेसँ थोड़े परिपक्व बूझारहल अछि । अर्थात शिल्प आ भाषाक स्तरपर थोड़े प््रभावशाली लेखन कऽ रहल छी, सन बुझाइए । ५. नेपाली आ मैथिली कथा साहित्य मध्य मैथिली कथा कतऽ अछि ? दुनूमे समानता आ भिन्नता की छै । जे भारतीय मैथिलीमे हिन्दीक आगू मैथिलीक अवस्था छै । नेपाली राज्य संरक्षित भाषा छै । राज्य अपार संभावना बनौलकै ओहि भाषामे तें संख्यात्मक आ गुणात्मक दुनू रुपें पर्याप्त लेखन भऽ रहल छै । मैथिलीमे सेहो समकालीन कथा साहित्यिक प्रतिनिधि कथा लेखन होइ छै, मुदा संख्या अत्यन्त न्यून छै । समानता आ भिन्नताक बात जहाँ तक छै तँ देश भितरक औपनिवेशिकताके भोगिरहल अछि मिथिलाक लोक । ओ समानता चाहैए, नागरिक अधिकार चाहैए, मुक्तिक छटपटी छै मैथिली साहित्यमे, नेपाली शासक वर्गक भाषा छै । मुदा नेपाली कथामे नेपालक प्रतिनिधि कथाक अभाव छै, जातीय कथाक संकीर्ण घेरासँ बाहर नइ निकलि सकल अछि । ६. अहाँ रंगकर्मसँ सेहो शुरुएसँ जुड़ल रहलहुँ अछि । कि कोनो नाटको लिखलहँु अछि ? अहाँक विचारमे लेखन आ रंगकर्ममे शुलभ आ सम्प्रेषनीय ककरा मानैत छी ? हँ, से तँ हम अपनो स्पष्ट कऽ चूकल छी । नाटक लिखलहुँ अछि । आधा दर्जनसँ बेसी मंचीय नाटक, ओतबे नुक्कड़ नाटक आ रेडियो नाटक सेहो खूबे लिखलहुँ अछि । हमर विचार कि ? सर्वमान्य विचार छै जे नाटक शुलभ आ सम्प्रेषानीय होइ छै । श्रव्य आ दृश्य गुणक कारण । ७.अहाँ अपन रंगकर्म मध्य अपनाके कतऽ मानै छी ? अहिमे मिनापक योगदान कत्ते मानै छी ? अपना विषयमे मूल्याङकन करब कठीन होइ छै । नाटक अहूना समूह कार्य छै । तें समूहक सफलता–विफलतामे व्यक्तिक सफलता–विफलता जुड़ल रहैत छैक । जँ मिनाप सफल छै तँ हमहूँ सफल छी । हमरा रंगकर्मक प्रारम्भमे हमर गाम परवाहा आ हमर रंग–यात्राके एतऽ धरि पहुँचाबऽमे सम्पूर्ण योगदान मिनापे के छै । ८. नेपाली रंगकर्मसँ मैथिली रंगकर्म स्तरीयताक मादे कत्तेक लग आ दूर अछि ? विश्व रंगमंचक प्रयोग आ प्रविधिसँ नेपाल परिचित भऽ रहल अछि । नेपालसँ हमर अर्थ अछि कोनो खास भाषा नइ सम्पूर्ण नेपाल । जकरामे जहिना व्यावसायिक दृष्टिकोण छै, तकरामे रंगमंचीय ज्ञानक विस्तार ताही रुपें भऽ रहल छै । समकालीन नेपालक रंगमंच मध्य मैथिली अत्यन्त सम्मानित अवस्थामे अछि । मुदा नेपालीक तुलनामे मैथिलीक रंग समूह कम छै । नेपालीमे सेहो स्थायी स्वरुपक समूह बहूत थोड़ छै । मुदा एम्यचोर थिएटर कएनिहारक संख्या बहूत छै । तखन मिनाप मात्रक प्रतिनिधित्वसँ गर्व कएल जा सकैए । ९. मिनापसँ एखन सरिपहुँ अहाँक अटूट जुड़ाब देखल जा रहल अछि, एखन धरि अहाँ मिनापके कि देलियै आ मिनाप अहाँके की देलक ? जरुर ! मिनाप हमरा सभकिछु देलक । व्यक्तिगत प्रगति आ सार्वजनिक जीवनमे सम्मानक अन्तर कारण मिनाप अछि । देशक नाट्य सङ्गीत क्षेत्रक सर्वोच्च संस्था नेपल सङ्गीत तथा नाट्य प्रज्ञा–प्रतिष्ठानक प्राज्ञ परिषद सदस्य आ नाट्य विभाग प्रमुखक नियूक्तीमे मिनापक सेहो मुख्य भूमिका छै । हम की देलियै तकर मूल्याँकन अन्य मीत्र लोकनि करथि । हँ, एतेक जरुर कहव जे अपना जीवनक सर्वाधिक उर्जाशील समय मिनापके देलियैक अछि । १०. अहाँ अपना अगिला पिढ़ी (बेटी प्रियंका ) के अहिसँ जोड़बाक कि ध्येय अछि ? कि मिनापक कलाकार मिनापसँ (यथा फिल्म अभिनय ) आगू जा सकल अछि ? ( अपनाके बाड़ि कऽ कहू ) ओकरो हमरे जकाँ रंगकर्म करबाक इच्छा भेलै, हम रोकलियै नइ बड़ु प्रोत्साहित कएलियै । समान्यतः ई कहल जाए जे हम रंगकर्मके नइ तँ अछूत कार्य मानलियै ने निकृष्ट तें नइ रोकलियै । मिनापक कलाकार मिनापसँ आगू ? ई कोना हतै ? मिनापक कोनो कलाकारक मिनापसँ आगूक ध्येय नइ छै । कलाक सम्पूर्ण साधना आ क्षमतमके मिनापक हेतु समर्पित करऽ चाहैए मिनापक कलाकार । मिनापसँ आगू अपने फिल्म दिश संकेत केलहुँ अछि, तँ ई मान्यता हम स्वयं नइ रखै छी । नाट्य अभिनयसँ पैघ फिल्म अभिनय नइ भऽ सकैए । चर्चा आ व्यावसायिक सफलता आगू जएबाक मापदण्ड नइ छियै । ओना फिल्मसँ परहेज नइ छै मिनापक कलाकारके । ओहो अभिनये छै । मिनापक अधिकांश कलाकार फिल्म क्षेत्रमे सेहो स्थापित अछि । मुदा मिनापक अधिकांश कलाकार फिल्मसँ बेसी नाटकके प्रथमिकता दैए । ११.मैथिली रंगकर्ममे तकनिकी सुलभताक कारण चूनौती आओर बढ़ि गेलैए ? रंगकर्मक भविष्य कि छै ? जतऽ चूनौती छै ओत्तै संभावना छै । तकनिकक सुलभता तँ छै, मुदा मैथिली रंगमञ्च ओहिसँ परिचित भऽ रहल अछि कि नइ ? समान्यतः मैथिली रंगकर्म मध्कालीन अवस्थामे अछि । भौतिक पूर्वधारक अभाव छैके । मिथिलाक मूल भूमिमे रंग गतिविधि शून्य छै । अप्रवासी रंगकर्म कृतिम स्वाँस आपूर्ति मात्र छै । तें पाठ आ मंच दुनूक तकनिकी वैशिष्ठ्यक निरन्तर अन्तरघुलन मैथिली रंगमञ्चक भविष्य निर्धारण करतै । १२. नेपालमे मैथिली सहित्यक भविष्य केहन देख रहल छियै, कत्ते दिन टिक पाओत ? भविष्य बेजाए नइ छै । भाषिक चेतनाक स्तर उठलैए । खतरो ओतबे बढ़लैए । मुदा समग्रतामे बहूत चिन्ताजनक अवस्था नइ छै । कत्ते दिन टिक पाओत ? एखन भविष्यवाण्ी नइ करी । ई मृत्यूक समय निर्धारण जकाँ भऽ जाइ छै । भाषाके मूर्त बनबै छै साहित्य कला तें ई मरब तँ स्वयंके मृत्यू छै एकर कल्पना नइ करी । १३. मैथिली साहित्यपर शुरुसँ जाति विशेषक बर्चस्व रहलै । आब झूण्डक–झूण्ड सक्रिय पिछड़ल समूदायक लोकक प्रवेशसँ एकर भविष्य केहन मानिरहल छी ? ई यर्थाथ छै । मिथिलाक सामाजिक संरचना सामन्ती रहलै । कर्मकाण्डीय लोकक बर्चस्व । संस्कृतक विरुद्ध आम लोकक भाषाके सिर्जनात्मक अभिव्यक्ति देबाक लेल मैथिलीक जन्म भेल छलै । मुदा संस्कृत पूनः अजगर जकाँ गछेर लेलकै । आम लोक अहि भाषासँ दूर होइत गेल । खाँटी मैथिली पिछड़ल वर्ग संगे छै । अधिकांश गाममे रहनिहार अहि वर्गक संग अभिव्यक्तिक हेतु दोसर भाषा नइ छै । संस्कारमे मैथिली छै । पूजा, पाठ, अनुष्ठान, गाथा सभमे मैथिली छै । कथित देव भाषाक प्रभावसँ बँचल अछि ओ समूदाय । तें सूच्चा मैथिल जँ मैथिलीके नेतृत्वमे आँगा अबैत अछि तँ अहिसँ आह्लादकारी आओर की हेतै । १४.कि मिनाप जाति–पाँतिक फाँट मध्य टीकल अछि ? कि ओहो कोनो द्वन्दक शिकार अछि ? नेपालमे अखन ई विषय प्रवेशे कएलकै अछि । समान्यतः ई वहशक विषय छै । वहश करब समस्याके निरुपण करब छियै । कानो गम्भिर द्वन्द नइ छै मिनापमे । १५.अन्तमे अपन पछिला आ नवका रचनाकार , रंगकर्मी कि कहऽ चाहब अहाँ ? कोनो खास नइ । बहूत किछु कहि चूकल छी, आब कहब आवश्यक नइ छै । अनेरो उपदेश नइ छाँटल जाए । ७ हम पुछैत छी- बृषेश चन्द्र लालजी सँ मुन्नाजी पुछैत छथि ढेर रास गप १.अपने अपन साहित्यिक यात्रा मादेँ कही जे एकर शुरुआत कतऽसँ आ कोना भेल ? हम अपनाकेँ साहित्यकार नहि मानैत छी । कारण, हमरा ज्ञानेँ साहित्यकारक औसत पंक्तिमे ठाढ़ हुअएवास्ते भाषा आ साहित्यक औपचारिक नहि तँ किछु अनिवार्य अध्ययन अवश्य हएबाक चाही जे हमरामे नहि अछि । हँ, हमरा अपन मातृभाषामे लिखएमे मोन लगैत अछि । एकर कएटा कारण छैक —प्रथमतः, हमरा लगैत अछि जे हम मैथिलीमे सहजतासँ अपन अभिव्यक्ति कऽ सकैत छी आ एहिलेल कोनो अनुवादक अभ्यास नहि करए पड़ैत अछि । दोसर, हम जीवनभरि आत्मसम्मान, व्यक्तिक स्वतन्त्रता, सभक अपन खास परिचय सहितक सम्मानित विविधता आ बहुलवादी समाजक निर्माणहेतु लड़ैत अएलहुँ । मैथिलीमे लिखैत काल हमरा लगैछ जेना हम ओही लड़ाईकेँ आगाँ बढ़ारहल छी । तेसर, इहो जे लोक लिखैत अछि लोककेँ सुनाबए–बुझाबएलेल आ भाषा वएह प्रयोग कएल जाइत छैक जे एहि कार्यलेल सभसँ उपयुक्त होइक । ओना हम जहिआ आठ कक्षामे पढ़ैत रही, मैथिलीक कक्षादिस छात्र–छात्राक ठहक्का सुनि कऽ आकर्षित भेलहुँ । पं. सच्चिदानन्द झा मैथिली पढ़बथिन्ह । हुनक शिक्षणक शैली एतेक रोचक आ हँसीठट्ठाबला रहन्हि जे विद्यार्थीसभ सोझहिं आकर्षित भऽ जााइक । दोसर कक्षाक विद्यार्थीसभ सेहो आबिकए बैसि रहैक हुनकर गप्प सुनएलेल । हमरो बड्ड नीक लागल । रोचक, जानकारीमूलक, मनोरंजक आ सहजेँ बुझएमे आबएबला विषय के नहि चुनत ? हमहुँ मैथिली विषय लऽ लेलहुँ । ओ मिथिला मिहिरक चर्च बरोबरि करथिन्ह । हमर अग्रज गरिश चन्द्र लाल आ शिबेन्द्र लालजी मिथिला मिहिरक प्रेमी, तैँ हमरा ओतए मिथिला मिहिर नियमित अबैक । बस पढ़ए लगलहुँ । नेनाभुटका स्तम्भ हमरा बेस आकषर््िात कएलक आ इच्छा भेल जे हमहुँ लिखतहुँ । मुदा साहस नहि हुअए । कहुना कऽ बतहु मामापर एक गोट कथा लिखलहुँ आ डेराइत–डेराइत गुरुजीकेँ ( पं. सच्चिदानन्द झा) देलिअन्हि । ओ पढ़लखिन्ह, नीक लगलन्हि आ बड्ड खुश भेलाह । मैथिलीक कक्षामे हमर खूब प्रशंसा कएलन्हि आ ओ अपनेसँ मिथिला मिहिरमे पठा देलखिन्ह । एना, हमर पहिल रचना आईसँ ४३ वर्ष पहिने प्रकाशित भेल छल । लेखनक शुरुआत एतहिंसँ बुझू । तकरबाद हमर आत्मविश्वास बढ़ि गेल । हमरासभक स्कूलमे (श्री सरस्वती बहुउद्देश्यीय माध्यमिक विद्यालय, जनकपुर) प्रत्येक शुक्रदिन १ घण्टा सांस्कृतिक कार्यक्रम होइक । ओहिमे जरुर भाग लिऐक हमसभ । कहियो कविता तँ कहियो प्रहसन लऽ कऽ । हम आ परमेश्वर कापड़ि जे एखन मैथिली विभागक प्राध्यापक छथि जनकपुरमे, लेखनक काज करिऐक । हम खास कऽ हास्य–व्यङ्गक कविता प्रहसन तैयार करी । परमेश्वर बेसी रचनात्मक रहए । २. अहाँ एकटा राजनेता सेहो छी तँ कहू जे साहित्य आ राजनीति मध्य की समानता वा विषमता देखाइए ? बहुत मुश्किल प्रश्न अछि । एहिमादेँ हम कहियो सोचबे नहि कएलहुँ । हमरा लगैत अछि राजनीतिसँ साहित्य अलगो नहि भऽ सकैत अछि आ दुनू एकदम अलग सेहो अछि । वास्तवमे कही तँ ई सोचपर निर्भर करैत छैक । यदि साहित्य समाजक झरोखा अछि तँ ई राजनीतिसँ कोना पृथक रहि सकत ? राजनीति समाजक एकटा अङ्ग छैक ने ! फेर अहाँ झरोखासँ जे देखैत छी सएह अभिव्यक्त करैत छी । कोनो राजनैतिक उद्देश्यसँ परिचालित वा पूर्वाग्रही नहि छी तँ तखन निश्चय ओ रचनासभ राजनीतिक उद्देश्यसँ अलग भऽ जाइत छैक । ओना कही तँ हमरा जनिते समाजमे गुणात्मक परिवत्र्तनवास्ते यदि राजनीतिक उद्देश्योसँ अभिप्रेरित भऽ रचना रचित होइत अछि तँ ओ स्वागतयोग्य अछि । आखिर साहित्यमे प्रगतिशीलता एकरे ने कहतैक ! बहुतो महानुभावसभ निरन्तर घोषित करैत रहैत छथि जे हुनक साहित्य राजनीतिसँ अलग छनि मुदा तरेतर वएह पूर्वाग्रही रहैत छथि, कोनो स्वार्थसँ परिचालित रहैत छथि । एहन अवस्थामे साहित्यक स्वतन्त्रताप्रति बलात्कार होइत छैक । एहिसँ नीक जे ओ अपन राजनीतिक उद्देश्यकेँ घोषित करथि आ फेर रचैथ । एहिसँ आम जनताकेँ आ पाठककेँ मूल्याङ्कन करएमे आ रचनाक भीतरतक जाएमे सुगम हएतैक । ३. राजनीतिक रुपेँ अपनाकेँ कतेक सफल बुझैत छी वा राजनीतिमे अपनाकेँ कतऽ पबैत छी ? हम फेर कहब जे सफलताक सम्बन्धमे सेहो अपन–अपन दृष्टिकोण होइत छैक । बहुतो राजनीतिमे सफलताकेँ पद प्राप्तिसँ जोड़ि कऽ देखैत छथि । ताहि हिसाबेँ हम एहि क्षेत्रमे अपनाकेँ ओतेक सफल नहि बुझैत छी । हमरासभ जहिआ राजनीतिमे अएलहुँ तहिआ पदक बारेमे कोनो सोच नहि रहैत छलैक । हमसभ राजाशाहीक अन्त्य आ लोकतन्त्रकक स्थापनाक लेल राजनीतिमे कूदल रही । हमसभ राजनीति शब्दो नहि बुझिऐक । संघर्ष, बलिदान आ त्यागक मात्र गप्प–सप्प होइक । एहि क्षेत्रमे प्रवेशक अर्थ रहैक कखन मारल जाएब वा कखन पकड़ाकए जेलमे जाएब से अनिश्चित मुदा पूर्ण सम्भावनायुक्त । पूर्ण रुपसँ अनुशासित रहए पड़ैक । हमर शिक्षा सेहो नेपालेमे भेल । स्नातक आ स्नातकोत्तर हम जेलसँ कएलहुँ तैँ भारतमेक लोकतन्त्रक सियासी जोड़तोड़सँ सेहो परिचय नहि भेल । किछु मित्रसभ एहि मामिलामे अनुभवी छलाह तैँ जोड़तोड़मे हम सभ दिन पाछाँ रहलहुँ । बेसी परिवत्र्तनकामी आ मुहँफट भेलाक कारणेँ सेहो बहुतो सहए पड़ल । मुदा, हम सन्तुष्ट छी । लोकतन्त्रलेल लड़ल आ एखन नेपालमे लोकतन्त्र छैक । ज्ञानेन्द्रक समयमे लोकतन्त्रपर ग्रहण लागि गेल छलैक । हम प्रतिगमनक विरुद्ध सेहो वएह लगनसँ लड़लहुँ । हमरासभक कतेक मित्र काठमाण्डूक रत्नपार्कमे दिन देखारे हमरासभकेँ छोड़ि कऽ ज्ञानेन्द्रक (तत्कालिन राजा) कित्तामे चलि गेलाह मुदा हम कहिओ सम्झौता नहि करएबलामे समूहमे रहलहुँ । तैँ राजनीतिमे हमरा कहिओ हीन भावना वा पश्चाताप नहि भेल । हम जे कऽ रहल छी ताहिमे हमरा नीक लगैत अछि । तैँ करैत छी । एहि दृष्टिकोणेँ हम राजनीतिमे पूर्ण सफल छी । ४. प्रश्न ः लोकतन्त्रक हेतु संघर्षमे कतेक दिन जेल रहलहुँ । कतेक यातना भोगए पड़ल ? हम लोकतन्त्रक लडाईमे १७ बेर गिरपm्तार भेल छी । बहुतबेर दिन वा महीनामे जेलमे रहलहुँ । ५ बेर नाम अवधि तक किछु वर्षकलेल । लगभग ८ वर्ष जेलजीवन बिताबए पड़ल अछि । १९७३–१९९० धरि बेसी काल जेलमे बीतल । फेर ज्ञानेन्द्रक समयमे । ........ जेल जेलेसन होइत छैक । हरीसमे ठोकि दैक । चित्त सुतए पड़ल । करोट नहि फेर सकैत छी । किछु बजलिऐक कि सटकासँ मारि–मारि सोझ कऽ दैक । पेशाप लागल तँ लोटामे करु । उड़िस आ कीराक प्रकोप अलगे । भेँट नहि करए देत परिवार वा मित्रजनसँ । वर्षातमे चुअएबला घरमे कोंचि दैक । कतेक कहू । हमरा तँ जेलेसँ दू बेर हत्या करक योजना बनल । १९७५मे हमरा, बिमलेन्द्र निधि, महेन्द्र मिश्र आ रामप्रसाद गिरिकेँ काठमाण्डूक केन्द्रिय कारागारसँ मारकलेल निकालल गेल मुदा पता नहि फेर की भेलैक घुमाकए नखुजेलमे पहुँचा देल गेल । साँझमे गोकर्ण, ठगी सहित ४ गोटेक नखुक कातमे हत्या कऽ देलकैक । दोसर बेर हमरा, रामचन्द्र तिवारी, स्मृतिनारायण आ युवराज खातीकेँ जलेश्वर जेलसँ सिन्धुली लऽ जा कऽ मुदा हत्याकलेल पुलिसकेँ अनुकूलता नहि भेलैक । हत्यासँ पहिने भारतीय दैनिक आजमे समाचार छपि गेलैक  आ फेर आन्दोलन लगले सफल सेहोभऽ गेलैक । सिन्धुलीसँ हमरासभकेँ रिहा कएल गेल ।  ........ बहुतोकेँ अहूसँ विकट–विकट यातना भोगए पड़ल छन्हि । ५. साहित्य लेखन आ राजनीति, पहिल शुरुआत अहाँकेँ कै सँ भेल आ दोसर दिस कोना उन्मुख भेलहुँ ? ओना सालक गणना करी ता लेखनक शुरुआत पहिने भेल । मुदा राजनीतिमे संलग्नता अपनेआप होइत गेलैक । वस्तुतः हाइस्कूलेसँ हम राजनीतिमे लागि गेलहुँ मुदा प्रत्यक्ष आ पूर्ण संलग्नता ३९ वर्ष पहिने भेल । हम काठमाण्डूक अमृत साइन्स कलेजमे छात्र यूनियनक चुनाव लड़ल रही । हम तहिआ नेपाली काँग्रेसक नेता बोधप्रसाद उपाध्याय, सरोजप्रसाद कोइराला आ महन्थ ठाकुरक निर्देशनमे काज करी । बादमे वीपी कोईराला, कृष्णप्रसाद भट्टराई, गिरिजाप्रसाद कोईराला, महेन्द्रनारायण निधि, महेश्वर प्रसाद सिंह आदिक प्रत्यक्ष सम्पर्क आ संगे काज कएलहुँ । लेखन निरन्तर चलैत रहल । हमर बहुतो रचना संग्रहित नहि अछि । वास्तवमे कही तँ हम एहिदिस ओतेक गम्भीर नहि रही । लिखी सुना दिएैक, हँसि ली मुदा प्रयोगक बाद ओकर संरक्षण नहि होइक । ई हमर जीवनक बहुत बड़का कमजोरी रहल । बहुत संगी एखन स्मरण करबैत छथि — स्कूलिया जीवनक रचनासभ, जेलक गीत, प्रहसन, व्यङ्ग आदि । हम वास्तवमे एकटा छोड़ि दोसरदिस उन्मुख नहि भेलौं । हमरा कनेको समय भेटैत अछि वा असगर रहैत छी तँ लिखए लगैत छी । बड्ड आनन्द अबैत अछि । हम पूर्णतः अपन आनन्दलेल लिखि लैत छी । हमर रचनासभक कहिओ कोनो उल्लेख्य समीक्षा नहि भेल । हम एहिलेल कहिओ प्रयत्नशील सेहो नहि रहलहुँ । हमरा बस आनन्द अबैत अछि । मुदा एकटा गप्प कहब, मैथिलीमे साहित्यकारलोकनि एको अहं के रोगसँ ग्रसित छथि । एकरा एकटा समूहक जातिक धरोहर बुझैत छथिन । अपनेसभमे समीक्षा करब, अपनेसभक चर्च करब, अपनेसभ पुरस्कार लऽ लेब — एकटा प्रवृति छैक । हम अपन आदतिसँ मजबूर छी मित्रगण क्रोधित भऽ जएताह । तैया,े हम एखनतक नहि बुझए सकलिएैक जे एहिसँ लाभमे के रहैत छथि ? साहित्यकेँ तँ पूरा हानि होइत छैक ने ! ई मानसिकता जे हटि जएतैक तँ मैथिलीक विकास अत्यन्त दु्रत गतिसँ होइतैक । नव पीढ़ीमे एहि मादेँ किछु परिवत्र्तन देखएमे आएल अछि । ..... कतेक बेर तँ इहो देखएमे अबैत अछि जे नव साहित्यकार किछु दिनतक एहन मानसिकतासँ मुक्त रहैत छथि मुदा जेनाजेना स्थापित होइत जाइत छथि वएह भायरससँ संक्रमित भऽ जाइत छथि । ६. अहाँँक पार्टीक मुख्य ध्येय की अछि ? ई पार्टी जनहितमे कतेक निकटतम देखाइए ? एखन हम तराई–मधेश लोकतान्त्रिक पार्टीमे छी । हम एकर प्रथम ९ संस्थापक सदस्यमेसँ एक छी । हमर राजनीति नेपाली काँग्रेससँ प्रारम्भ भेल । लोकतन्त्रलेल लडैत अएलहुँ । दिर्घ संघर्षक बाद लोकतन्त्रक स्थापना सेहो भेलैक आ अभ्यास सेहो । मुदा हमसभ महशूस कएलिऐक जे लोकतन्त्र यदि समावेशी नहि अछि , विविधताक सम्मानमे विश्वास नहि करैत अछि तँ ओहन लोकतन्त्र किछु लोकक लोकतन्त्र भऽ जाइत छेक । एहिसँ पिछड़ल, विभेदमे पड़ल लोक आ समुदायक कल्याण सम्भव नहि छैक । नेपालमे मधेशीक प्रति राज्य प्रायोजित विभेद होइत आएल छैक । तराई–मधेश लोकतान्त्रिक पार्टी एकर समाधान चाहैत अछि । संघीयताक अभ्यास सँ सभ प्रकारक विभेदक अन्त्य चाहैत अछि । हमर पार्टी संघीयतामे अपन क्षेत्रमे स्वशासन आ फेर केन्द्रमे सहशासनलेल प्रतिवद्ध अछि । हमरा लगैत अछि मधेशमे विभेद अन्त्य करक यएह एक गोट उपयुक्त उपाय छैक । ७. की अपन विचारक विस्तार वास्ते साहित्यक उपयोग करैत छी ? से हमरा नहि बुझल अछि भऽ सकैछ जे हमर लेखनमे एकर प्रभाव होइक मुदा हमर ध्येय से नहि रहैत अछि । हमरा जे लगैत अछि हम लिखए चाहैत छी । हम पहिनहिं कहलहुँ जे हम एकदम अपना सुखलेल लिखैत छी आ हमरा अपना जे महशूस भेल रहैत अछि लिखएमे आनन्द अबैत अछि । हमर कथा संग्रह माल्होमे बेसी कथा राजनीतिक आसपड़ोसक छैक । एकर कारण कएटा — १. हम राजनैतिक व्यक्तिसभक समुदायसभक पीड़ा उगलए चाहलहुँ, २. हमरा अही क्षेत्रक बेसी अनुभव अछि जे हम व्यक्त करए चाहलहुँ ३ं राजनीति सेहो समाजेक अङ्ग छैक एकरा अछूत किआ मानी । ...... हमर किछु कवितासभ गुणात्मक परिवत्र्तनवास्ते, समाजकेँ सचेत करकलेल राजनीतिक उद्देश्यसँ प्रेरित सेहो अछि । ई कोनो अपराध नहि थिकैक । मैथिलीमे सभ किछु रहौक सेहो चाहना रहैत अछि । तैँ कहिओ मैथिलीक डिस्को तैयार करैत छी तँ कहिओ अन्य किछु । कहिओ बालगीत आदि आदि । ई हमर अपन शौख अछि । हमरा नीक लगैत अछि । ८. नेपालमे मैथिली साहित्य आ अन्यान्य रानेताबीच अपनाकेँ कतऽ ठाढ पबैत छी ? हम पहिनहिं कहलहुँ जे हम अपनाकेँ साहित्यकार नहि बुझैत छी । साहित्यकार हुअएलेल किछु जानकारी आवशयक छैक । साहित्यकलेल प्रतिवद्ध रहब सेहो जरुरी मानैत छी हम । साहित्य जिविकोपार्जनक सहयोगी हएब आपत्तिजनक नहि मुदा साहित्यककेँ वा अपनासभक सन्दर्भमे कहू तँ मैथिलीप्रतिक अनुरागकेँ अपन नफाक हेतु दोकानदारीमे प्रयोग करब हम नीक नहि मानैत छी । बहुतोकेँ देखैत छिअनि जे ओ एना करैत छथि । साहित्यमे माफियाक निर्माण करएमे रुचि रखैत छथि । दोसर केओ उभरि ने जाओ ताहिसँ डेराएत छथि । लगैत छन्हि जे केओ दोसरो दोकान थापि लेत तँ हमर बिक्री कमि जाएत । ....... ठीक एहिना राजनीतिमे सेहो होइत छैक तैँ हम दुनू ठाम अपनाकेँ एकहि ठाम पबैत छी । हमरा अपन स्थानसँ पूरा संतुष्टि अछि । लेखन हम आत्मतुष्टिलेल करैत छी , कोनो दोसर आकांक्षा नहि अछि तैँ संतुष्ट छी । राजनीति अपन विचारलेल करैत छी जाहिसँ कहियो सम्झौता नहि कएलहुँ , तैँ संतुष्ट छी । ९. अपनेक एहि कथ्यसँ जे राजनीति आ साहित्य दुनू एकटा समूह विशेषमे बन्हल अछि , हमहुँ सहमत छी । अहाँ दुनूमे अपनाकेँ कतेक नफा÷नोक्सान होइत पबैत छी ? व्यक्तिगत नफा नोक्सानक सवाल नहि छैक । एहिसँ समाज आ साहित्य नोक्सानमे अछि । क्रान्तिकारिता अथवा प्रगतिशीलता जे कहिऔक, अपने मुहेँ मियाँ मिट्ठूसँ सम्भव नहि हएत । एहिलेल गुणात्मक परिवत्र्तनक निरन्तरता जरुरी छैक । क्रान्तिकारी वा प्रगतिशील वएह जे गुणात्मक परिवत्र्तनलेल प्रतिवद्ध होथि । राजनीति वा साहित्यकेँ समूह विशेषमे बान्हएमे जे जिममेवार होथि ओ समाज आ साहित्यक विकाशक बाटमे अवरोधक आ प्रतिगामी छथि । नव प्रतिभासभकेँ छेकक कार्य करैत छथि । १०. अहाँक पार्टी सत्तामे आबि  जाएत तँ मैथिली साहित्यकेँ कतेक फायदा पहुँचा सकत ? तराई–मधेश लोकतान्त्रिक पार्टी व्यक्ति–समुदायक परिचय, स्वाभिमान आ आत्मसम्मानक प्रतिष्ठापन चाहैत अछि । विविधताक सम्मान अर्थात् असली बहुलवादक समर्थक अछि ई पार्टी । कहिओ मैथिली नेपालमे राजभाषाक रुपमे सम्मानित छल । काठमाण्डू उपत्यकाक राजामहाराजा मैथिलीमे साहित्यिक रचना कऽ अपनाकेँ धन्य बुझैत छलाह । तेहन स्थिति छल । जौँ हमरासभक पार्टी प्रभावकारी ढंगसँ सत्तामे आओत तँ निश्चिते मैथिली भाषा आ साहित्यकेँ सम्मान भेटतैक । एखनो संविधानसभामे बहुतो मैथिलीमे शपथ ग्रहण कएलनि । अन्तर्राष्ट्रिय मैथिली सम्मेलनक आयोजनमे हमर पार्टीक लोकसभक प्रत्यक्ष आ खुला सहभागिता छल । ..... राज्यक यदि सहयोग रहैक तँ भाषा आ साहित्यक प्रभाव बढैत छेक । छोट उदाहरण अछि — १९ वर्ष पहिने जखन हम जनकपुर नगरपालिकाक प्रमुख पदपर विजयी भेल रही तँ मैथिलीक सम्मान आ प्रतिष्ठा बढाबएलेल बहुत किछु कएल गेल रहैक । नगरपालिका अपन सभ प्रमुख अपील मैथिलीमे सेहो छापय । तिरहुत रनिंग शिल्ड प्रतियोगिताक आयोजन प्रारमभ भेल रहैक । प्रत्येक वर्ष मैथिलीमे गीत रचना, गायन, संगीत आदि विधापर नगरपालिका पुरस्कार दैक । रश्मि, सुनील मल्लिक, अशोक दत्त आदि एहिसँ नीक परिचय प्राप्त कएलनि । होरीसँ १५ दिन पहिनेसँ आयोजन आ प्रस्तुतिक क्रम जारी रहैत छलैक । ... तँ असर तँ पड़िते छैक ने । ११.  एखन अपने बालकविता÷गीतपर बेसी ध्यान देने छिऐक ? हँ, एखन हमरा बालगीत आकर्षित कएने अछि । हमर मित्र परमेश्वर हमरा एम्हर घुमाबक बरोबरि प्रयत्न कएलाह अछि आ तकरे प्रभाव थीक । बालगीतक रचनामे वृद्धि हएबाक चाही । नेनभुटकाक गीतसभकेँ संगीतवद्ध सेहो करबाक चाही जाहिसँ बच्चासभकेँ ई नहि लगैक जे ओकर अपन मातृभाषामे एकर आभाव छैक । ..... हम एहि दिशामे प्रयत्नशील छी । हमरासभद्वारा सञ्चालित जानकी एफ.एम.क स्टूडियो नीक छैक । शिघ्र एकगोट बालगीतक एल्बम निकालक योजनापर काज भऽ रहल छैक । १२. एखनतक अपनेक कएगोट पोथी प्रकाशित भेल अछि ? ह्मर एकगोट छोटछिन कविता संग्रह आन्दोलन, वीपी कोइरालाक प्रसिद्ध उपन्यासिका मोदिआइन जे महाभारतपर मिथिलाञ्चलक परिवेशमे लिखल अछि तकर मैथिली रुपान्तरण, माल्हो कथा संग्रह, संघीयताक सम्बन्धमे स्वीस विद्वान डा.निकोल टपरविनक लेखसभक मैथिली अनुवाद — एतेक मैथिलीमे । ट्रेड यूनियनः एक परिचय, संघीय स्वशासनतिर नेपालीमे । सभ मिलाकए छ टा । धन्यवाद ! अपन बहुमूल्य समय दऽ उतारा देबएलेल । ८ धीरेन्द्र प्रेमर्षिसँ मुन्नाजीक अन्तर्वार्ता. बहुआयामी युवा श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि जी सँ विहनि कथाकार मुन्नाजीक भेल गपशपक प्रमुख अंश प्रस्तुत अछि। मुन्नाजी: धीरेन्द्र जी नमस्कार। स्वागत अछि विदेहक आंगनमे। मैथिली साहित्यमे प्रवेश कोना केलहुँ। कोनो विशेष कारण वा किछु आओर। धीरेन्द्र प्रेमर्षि: सर्वप्रथम धन्यवाद अछि मुन्नाजी जे हमरा विदेहक आङनमे आमन्त्रित कएलहुँ। ई प्रश्न हमरा नीक लागल जै मैथिली साहित्यमे प्रवेश कोना कएलहुँ? असलमे हमर साहित्यमे प्रवेश लौलसँ भेल छल। सेहो नेपाली भाषाक माध्यमे। ई लगभग वि.सं. २०४४ साल अर्थात् १९८७ ईस्वीक समय छल। लौल ई जे हमरो नाम पत्र-पत्रिकामे छपए। ओना मात्र किछु लिखनाइकेँ जँ साहित्य कहल जाए तँ हमर कलमसँ जिनगीमे सभसँ पहिल कोनो रचना मैथिलीएमे लिखाएल छल, जे एकटा फटीचर टाइप गीत रहए। छोटे वयससँ सरकारी नोकरीमे प्रवेश कऽ चुकल हम जखन बदली भऽ कऽ जनकपुर गेलहुँ तँ अपन गीत-सङ्गीतक प्रेमकेँ मूर्त्त रूप देबाक लेल कोनो जगहक खोज करबाक क्रममे मिथिला नाट्यकला परिषद् पहुँचलहुँ। ओहिठाम जखन डा. धीरेन्द्र, महेन्द्र मलङ्गिया, डा. राजेन्द्र विमल, योगेन्द्र साह ‘नेपाली’ सन विभूति सभसँ भेट भेल तखन जा कऽ असलमे हमरा मैथिली भाषाक अवस्था आ महत्ताक बोध भेल। तकरा बाद हमहूँ अपन लेखन प्रतिक लौलकेँ मैथिली साहित्यक अभियान दिस मोड़ि देलहुँ। वि.सं. २०४६ सालमे मिनाप द्वारा आयोजित मैथिली विकास दिवसक कविगोष्ठीक लेल कन्हि-कूथिकऽ एकटा कविता लिखलहुँ। ओहिमे डा. धीरेन्द्र द्वारा लाल रोसनाइवला कलमसँ जे सुधारात्मक परिवर्तन-चिह्न सभ लगाएल गेल छल, सएह हमरा लेल मैथिली वर्ण विन्यासक गुरुमन्त्र बनि गेल आ हम मैथिलीमे लिखैत चलि गेलहुँ। मुन्नाजी: अहाँक सभ तरहक रचनामे तीक्ष्ण नजरिया जगजिआर होइछ। एकर की स्रोत वा ऐलेल रचनात्मक ऊर्जा कतऽ सँ वा कोना प्राप्त होइए? धीरेन्द्र प्रेमर्षि: एकर जवाबमे हम अपने गजलक एकटा शेर कहऽ चाहब– मनमे ने कनियोँ चोर अछि तेँ गजलो हमर अङोर अछि देश, समाज आ अपना प्रति इमान्दारी लोकमे सहजहिँ तीक्ष्णता आनि दैत छैक। हम 'खुर्पी छुआ बोनि हुआ' मे कहियो विश्वास नहि कएलहुँ। हमर रचनात्मकताक स्रोत अपन समाजे अछि। खास कऽ समाजमे रहल छद्मवेषी परिपाटी हमरा बेसी झकझोड़ैत अछि आ उएह हमरा लिखबितो अछि। एखनो विशुद्ध कर्मशीलतापर विश्वास कएनिहार जे किछु लोक छथि तिनका सभक निष्ठा आ लगनशीलता हमरा सृजनात्मक ऊर्जा दैत अछि। मुन्नाजी: की मैथिलीक अतिरिक्त आनो भाषामे रचना केलहुँ अछि? मैथिली आ अन्यान्य (विशेष कऽ नेपाली) भाषा मध्य मैथिलीक अस्तित्व केहेन वा कोन ठाम नजरि अबैए। धीरेन्द्र प्रेमर्षि: हँ, हम मैथिलीक अतिरिक्त नेपाली भाषामे सेहो यथेष्ट मात्रामे लिखैत छी। नेपालक स्नातक स्तरक अनिवार्य नेपालीक पाठ्यपुस्तकमे हमर गजल सेहो पढ़ाओल जाइत अछि। छिटफुट हम हिन्दीमे सेहो लिखैत छी। खास कऽ नेपाली साहित्यक सङ्ग जखन हम मैथिलीक तुलना करैत छी तँ सोच, संवेदना आ शैलीगत रूपमे हमरा मैथिली कनेको झूस नहि बुझाइत अछि। मुदा सङ्ख्यात्मकता आ व्यापकताक हिसाबेँ मैथिली सीमित अछि। नेपाली साहित्यमे मैथिलीजकाँ व्यापक गोलैसीक वातावरण सेहो नहि छैक, जाहिसँ ओकर विकास-गति तीव्रतर बुझाइत छैक। ओ सभ वर्तमानकेँ उपलब्धिपूर्ण बनएबामे अधिक दत्तचित्त बुझाइत अछि मुदा हम सभ इतिहासक झुनझुन्ना बजबैत मस्त रहबामे बेसी आनन्दित होइत छी। मुन्नाजी: अहाँ रचनाक अलाबे सम्पादनमे सेहो सक्रियता देखा चुकल छी। अहाँक नजरिये सृजनकर्ता आ सम्पादकक मध्य की फरक हेबाक चाही। धीरेन्द्र प्रेमर्षि: हम पल्लव, मैथिल समाज, कामना सिनेमासिक (नेपाली) आदि पत्रक सम्पादन सेहो कऽ चुकल छी। रचनाकार आ सम्पादक दुनूमे फरक की होएबाक चाही से हम नहि कहि सकैत छी। मुदा समान की होएबाक चाही से हम अवश्य कहब। दुनूमे मातृगुण अनिवार्य रूपेँ होएबाक चाही। हँ, मुदा मुखरताक दृष्टिएँ रचनाकार देवकी रहए आ सम्पादक यशोदा तँ सृजनरूपी सन्तान नीक जकाँ फौदएतैक, से निश्चित। मुन्नाजी: सम्पादनमे भाइ-भैयारीबला नजरिया देखाइत रहल अछि। जखन की सम्पादककेँ निरपेक्ष आ दृष्टि फरीछ हेबाक चाही, की कहब अहाँ? धीरेन्द्र प्रेमर्षि: सम्पादनमे भाइ-भैयारीवला नजरियाक बात जे अहाँ उठौलहुँ अछि से सही भऽ सकैत अछि। मुदा एकर सापेक्षता देखब जरूरी अछि। मैथिली पत्रकारिता एहन नहि अछि जे साधन-स्रोतसँ सम्पन्न भऽ कऽ चलैत होइक। लोक अनेक तरहक भाँज भिड़ा कऽ मैथिलीमे पत्रकारिता करैत अछि। एहनमे बाहरसँ स्वतन्त्र रूपेँ यथेष्ट सहयोग नहि भेटि पएबाक कारणे सेहो सम्पादककेँ भाइ-भैयारीक सहयोग लेबऽ पड़ैत होएतनि। मुदा सम्पादन जेँ कि समीक्षा, समालोचना आदि कार्यक दायित्व सेहो निमाहैत चलैत अछि, तेँ यथासम्भव एहिसँ एकरा दूर राखब उचित। कचोट तँ तखन होइत अछि जखन समालोचना भाइ-भैयारीवला नजरियासँ कएल जाइत छैक। मुन्नाजी: अहाँ विभिन्न तरहक कार्यक्रम (आकाशवाणी वा दूरदर्शन) माध्यमे प्रस्तुति दैत रहलौं, की ऐमे रोजगार छै। अपनाकेँ ऐमे कतऽ पबै छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षि: नीकजकाँ समर्पित भऽकऽ लगलापर आजुक समयमे सभ क्षेत्रमे रोजगारी छैक। तखन आकाशवाणी वा दूरदर्शन तँ आओर बहुतो लोकक स्वप्न-संसार सेहो छियैक आ आजुक समयक सर्वाधिक सशक्त हथियारो। एहिमे रोजगारी नहि होएबाक बाते नहि अबैत अछि। हम पूर्ण रूपेँ एहिसभ क्षेत्रमे कहियो आश्रित नहि रहलहुँ। हम नेपालक सरकारी आकाशवाणी रेडियो नेपालमे १३ वर्ष धरि मैथिली, हिन्दी आ नेपालीक समाचार वाचनमे संलग्न रहलहुँ। तहिना पछिला एक दशकसँ नेपालक सभसँ पैघ रेडियो नेटवर्क रेडियो कान्तिपुरसँ जुड़ल छी आ हेल्लो मिथिला सहित किछु कार्यक्रमक सञ्चालन करैत आएल छी। तहिना समय-समयपर टेलिभिजनक विभिन्न कार्यक्रम आ सिरियल सेहो करैत आएल छी। हमर रेडियो नेपालसँ जुड़ाव तँ एकटा सरकारी नोकरीक रूपमे छल। मुदा एहि सभ काजमे हमर अभीष्ट मैथिली भाषा-संस्कृतिक सम्मान आ सम्बर्द्धन रहैत अछि। एकरे ध्यानमे राखि १० वर्ष पहिने हम सभ रेडियो कान्तिपुरमे हेल्लो मिथिलाक शुरुआत कएने रही। एहिमे हमर आवद्धता लगभग स्वयंसेवकीय छल। मुदा हम लागल रहलहुँ। तकर परिणाम ई छैक जे हमर रोजगारीमे आंशिक सहायक तँ ओ भेले अछि, आइ नेपालमे कमसँ कम पाँच सय गोटे खालि मैथिलीएमे बाजिकऽ रोजीरोटी कमा रहल छथि। तेँ एहि मादे हम एतबए कहब जे पूर्ण लगनशीलताक सङ्ग जँ हमसभ बालुओ पेरैत रहब तँ एक ने एक दिन ओहिमेसँ तेल बहरएबे करतैक। मुन्नाजी:अहाँ विभिन्न प्रकारक क्रियाकलाप वा गतिविधिमे लागल रहैत छी। अपनाकेँ समेटि रखबामे किछु बाधक तँ नै होइछ? धीरेन्द्र प्रेमर्षि: कहियो काल अवस्था एहन अवश्य भऽ जाइत अछि जे पीठकेँ झँपैत छी तँ माथा उघार आ माथा झँपैत छी तँ पीठ उघार। मुदा समयक सीमित चादरिक व्यवस्थापन करैत माथ आ पीठ दुनू झाँपि लेबामे जे आनन्द अबैत छैक से वर्णनातीत होइत अछि। तेँ बेसी दिस छिड़िअएनाइकेँ सेहो हम अपन सफलताक द्योतक मानैत छी। हँ, एहिदिस साकांक्ष जरूर रहैत छी जे बेसीदिस छिड़िआकऽ कहीँ हमर अभियान तँ लचर नहि भऽ रहल अछि! हम ओ सभ काज करैत रहैत छी जाहिसँ बुझाइत अछि जे ई काज कएलासँ हमर मैथिली एको डेग आगाँ ससरत। जहिया हमरा ई बुझबामे आएत जे ई काज कएने हमर मैथिलीकेँ क्षति भऽ रहल छैक तँ ओ काज हम ठामहि रोकि देबैक। हमरा एखन धरि किछु विशुद्ध पूर्वाग्रही वा अपरोजक-अपाटक सभकेँ छोड़ि केओ एहन सङ्केतो नहि देने अछि, तेँ अपनाकेँ चहुँदिस सक्रिय रखने छी। मुन्नाजी:रूपा भौजी, धीरेन्द्र भैयाक कार्यक्रम सभमे सेहो अर्द्धांगिनी बनि देखार भेलीह अछि। एकर सभक अतिरिक्त अहाँसँ स्वतंत्र कोन-कोन गतिविधिमे सक्रिय रहैत छथि। धीरेन्द्र प्रेमर्षि: स्वतन्त्र रूपेँ सभसँ प्रमुख तँ रूपा एक कुशल गृहिणी छथि। कविता-कथा लिखैत छथि। कम लिखैत छथि, मुदा हुनकामे समाज आ संवेदनाकेँ धरबाक जे कला आ सामर्थ्य छनि से विलक्षण। गीत गबैत छथि, सेहो हुनक स्वतन्त्र क्षेत्र छनि। नेपालक वर्तमान राष्ट्रगानक एक गायिका रूपा सेहो छथि। मैथिल महिला समाजक सचिव आ विभिन्न महिला समाजक सल्लाहकार भऽ कऽ ओ अनेक काज कऽ रहल छथि। नारी जागृति सम्बन्धी कतेको काजमे ओ नेतृत्वदायी भूमिका निर्वाह कऽ रहल छथि। मुन्नाजी: मिथिला (बिहार) आ नेपालमे कोनो मैथिली गतिविधिक रासि अगड़ा जातिक हाथमे रहल अछि। मुदा नवम सदीमे पिछड़ल जातिक धर्रोहिक सक्रिय प्रवेश भेल अछि। एकरा भविष्यमे कोन नजरिये देखै छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षि: अहाँ बिहारक नजरियासँ देखैत ई बात कहने होएब। मुदा नेपालक अवस्था किछु भिन्न अछि। नेपालक मैथिली गतिविधिक जँ बात करब तँ एहिठाम अगड़ी-पछड़ीवला बात हमरा बेतुका बुझाइत अछि। नेपालमे तँ बहुत पहिनहिसँ मैथिली गतिविधिक रासि अहाँक आशय रहल तथाकथित पछड़ी जातिक डा. रामावतार यादव, डा. योगेन्द्रप्रसाद यादव, डा. रामदयाल राकेश, डा. गङ्गाप्रसाद अकेला, रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’, योगेन्द्र साह ‘नेपाली’, परमेश्वर कापड़ि, रामाशीष ठाकुर, मदन ठाकुर, रामनारायण ठाकुर, महेन्द्र मण्डल ‘वनवारी’ सँ लऽकऽ नवतुरियोमे अमरेन्द्र यादव, अमितेश साह, नित्यानन्द मण्डल, शीतल महतो सदृश लोकक हाथमे छनि। जँ संस्थागत गतिविधिक बात करब तँ मात्र सप्तरी जिलामेटा पचाससँ अधिक मैथिलीसँ सम्बन्धित सङ्घ-संस्था भेटत, जकर पदाधिकारी सभ कथित पछड़ा वर्गक छथि। प्रायः इएह कारण छैक जे नेपालक मैथिली गतिविधि जतबए छैक, जड़ि धएने छैक। प्रायोजित नहि बुझाएत एहिठामक मैथिली गतिविधि। अधिकांश भारतीय मैथिली अभियानी सभ जकाँ नहि जे कहब मैथिलीक कार्यकर्ता आ हिन्दीक कनेक अक्षत भेटि जाए तँ ओहीपर तर-उपर होइत रहनिहार वा घरमे हिन्दीक प्रयोगकेँ प्रतिष्ठा बुझनिहार। रहल बात एहि सदीमे जँ बिहारो दिस ब्राह्मण आ कायस्थेतर जाति जँ मैथिली गतिविधिमे आगाँ आबि रहल छथि तँ ई मिथिला-मैथिलीक लेल सौभाग्यक बात छियैक। कारण यथार्थमे जँ देखबैक तँ कथित अगड़ीसभ तँ मैथिलीकेँ रङ्गटीप मात्र करैत आएल छथि, अपन दैनन्दिनीमे मैथिलीकेँ यत्र-तत्र-सर्वत्र प्रयोग करैत यथार्थमे एकरा जीवन देनिहार तँ कथित पछड़े सभ छथि। ओ सभ जँ पूर्ण सचेष्ट भऽ कऽ लागि जाथि तखन तँ मैथिलीक लेल ककरो नोर बहबैत रहबाक कोनो प्रयोजने नहि रहि जएतैक। मुन्नाजी: अहाँ द्वारा प्रस्तुत कार्यक्रम सभ सतही वा व्यावसायिक पूर्ति मात्रकेँ इंगित करैए, की कहब अहाँ? धीरेन्द्र प्रेमर्षि: अपन गायकी वा सङ्गीत, अभिनय वा कार्यक्रम सभकेँ हम साहित्य वा रचना मानैत छी आ ताही भावसँ ओकरा हम कार्यरूप सेहो दैत छियैक। एहनमे हम अहाँक प्रश्नसँ कने असमञ्जसमे पड़ि गेल छी। दोसर नम्बर प्रश्नमे अहाँ ई कहैत छी जे ‘अहाँक सब तरहक रचनामे तीक्ष्ण नजरिया जगजियार होइत अछि’। फेर किछु आगाँ चलिकऽ अहाँ कहैत छी जे ‘अहाँक कार्यक्रम सतही होइत अछि’। चलू जँ सतहीयो होइत अछि तैयो हम एहि बातसँ प्रसन्न छी जे अहाँ सन गम्भीर व्यक्ति एक सतही कार्यक्रम चलबैत मात्र व्यावसायिक पूर्ति करऽ वलाकेँ एहन गूढ़ प्रश्न पुछबाक योग्य व्यक्ति मानलहुँ। हमरा लेल इएह सभसँ पैघ उपलब्धि अछि। मुन्नाजी: अपन अगिला योजना की अछि? कोनो विशेष क्रियाकलापक योजना हुअए तँ उल्लेख करी। धीरेन्द्र प्रेमर्षि: निकट भविष्यक मूलतः तीनटा प्रमुख योजना अछि। पहिल पल्लव पत्रिकाक पुनर्प्रकाशन। दोसर नेपालमे महाकवि विद्यापतिकेँ राष्ट्रिय विभूति घोषणा करएबाक लेल अभियानक सञ्चालन आ तेसर अपन मैथिली गजलसङ्ग्रहक प्रकाशन। मुन्नाजी:मैथिली क्रिपाकलापसँ जुड़ल युवा/ युवतीक लेल की सन्देश देबऽ चाहब। धीरेन्द्र प्रेमर्षि: जे युवा मैथिली क्रियाकलापसँ जूड़ि गेल छथि तिनका किछु कहबाक प्रयोजने नहि अछि। किएक तँ वर्तमानमे बाँकी सभ दिस अवसरक झमाझम वर्षा भऽ रहल समयमे सेहो जँ केओ स्वेच्छासँ मैथिली सन सूखाग्रस्त क्षेत्र चुनैत छथि तँ अनेरे नहि किछु सोचिए कऽ, किछु बूझिए कऽ। ओहुना एखनुक युवा बहुत बुझनुक अछि। हँ, किनको-किनकोमे ई देखबामे अबैत अछि जे सोचल सन उपलब्धि चटपट हासिल नहि भेलापर कने निराश भऽ जाइत छथि। बस अहीठाम कने हिम्मत बन्हने रहबाक जरूरति छैक। हम सभ मैथिलीमे जँ लागल छी तँ अपन माटिक प्रबल प्रेमसँ वशीभूत भऽ कऽ। एहि प्रेममे सरिपहुँ आन कोनो प्रेमसँ बेसी डूबि जाइ। मुदा प्रेम शब्द सुनबामे जतेक सहज छैक, निमाहऽ मे ओतेक किन्नहु नहि छैक। तेँ ने एकटा हिन्दी गीतमे कहल गेल छैक¬ ये इश्क नहीं आसाँ  इतना तो समझ लीजै, एक आग का दरिया है  और डूब के जाना है। बस एतबा बात जँ बूझि गेलहुँ आ एतबा धीरज सेहो धारि लेलहुँ तँ हम सभ तरहत्थीमे सेहो दूभि जनमा सकैत छी। मुन्नाजी:धन्यवाद धीरेन्द्रजी अपन स्वतंत्र विचार देबाक लेल। धीरेन्द्र प्रेमर्षि: एहि अवसरक लेल मुन्नाजी अहाँक सङ्ग-सङ्ग विदेह परिवारक सेहो हम आभारी छी। ९. हम पुछैत छी- मुन्नाजीक अनलकान्त सँ गप्प-सप्प मुन्नाजी: अहाँक सृजनरथ कथायात्रासँ प्रारम्भ भेल छल, प्रारम्भसँ एखन धरि अपन कथायात्राकेँ कोन दृष्टिये देखै छी। ऐ बीच कथा आ कथानकमे कोन बदलाव देखबामे आएल? अनलकान्त: अपन कथायात्राक बारे मे हम पहिनहि कहलहुँ जे स्‍वयं किछु नै कहब। एकर सही मूल्‍यांकन दोसर लेखक, पाठक वा आलोचक कऽ सकै छथि। ओना मैथिली मे आलोचक तँ छथिये नै तहन सहृदय पाठक आ दोसर लेखक एकर निर्णायक भऽ सकै छथि। ओना मैथिली कथामे बदलावक गप्प कहबै तँ समएक जे दवाब छै से तँ अबै छै मुदा जतेक एबाक चाही से हमरा मैथिली साहित्यमे नै देखबा मे अबैए। मुन्नाजी: अहाँ अपनाकेँ साम्यवादी रूपेँ स्थापित करबाक प्रयास केलौं। सातम-आठम दशकमे उठल साम्यवादी विचारधाराक हो-हल्लाक बाद एहेन कोनो विचारधारा मैथिली मध्य बनि सकल? अनलकान्त: नै हमरा ई गलत लगैए जे सातम आकि आठम दशकमे हो हल्ला भेल। बाबा नागार्जुन जखन रचनात्मक शुरुआत केलनि आजादीक पूर्वे, ओइ समयक जे हुनकर लेख देखबनि ओ जे राजघरानाक विरुद्ध प्रश्‍न उठेलनि, से की छल ? ओ किसान आन्दोलन, कम्यूनिस्ट आन्दोलनक समर्थक ताहि जमाना सं छलाह। जहिया मार्क्सवादी विचार नै छलै तहिया न्‍यायक प्रश्‍न नै छलै की ? हँ, सातम-आठम दशकमे नक्सलबाड़ी आन्दोलनक बाद मैथिलीमे अग्नि पीढ़ी आगू भऽ एलै आ तहिया  जे सामाजिक दवाब छलै- ओइमे रामलोचन ठाकुर, अग्निपुष्प, कुणाल, नरेन्‍द्र आदि हस्‍तक्षेप कयलनि। हँ ओ एहेन दवाब छलै जाइमे जे ओइ धाराक समर्थक नहियो रहयवला अनेक दृष्टिसंपन्‍न लेखक एहि पीढि़क संग समानधर्मे टा नै, सहमना रूप मे सेहो सोझा अयलाह। आइ ओहि धारा मे कुमार पवन, सारंग कुमार, विद्यानंद झा, कामिनी आदि सन अनेक युवा रचनाकार भेटताह। मुन्नाजी: अहाँ मैथिली-हिन्दी मध्य समान रूपेँ सक्रिय छी, दुनू मध्य की समानता-भिन्नता अनुभव करै छी? अनलकान्त: एकटा हमर मातृभाषा छी, दोसर हमर रोजी-रोटीक भाषा। हमरा दुनू मे कोनो द्वैध नै बुझाइ अछि। मुन्नाजी: अहाँ प्रकाशकीय गतिविधि (प्रकाशन आ वितरण)मे सेहो सक्रिय छी। तँ कहू मैथिलीमे श्रेष्ठ रचनाक की स्थिति अछि, पाठकक भेल वृद्धि कते महत्व रखैत अछि? अनलकान्त: पाठकक मैथिलीमे अभाव भेलैए। १९९९-२००० मे जतेक पत्रिका-किताब बिका जाइत छलै आब से स्थिति नै छै। मुन्नाजी: अहाँ अपना जनतब कहू जे मैथिली पत्रकारिता वा प्रकाशन कतऽ अछि, ई आर्थिक लाभमे जा सकैए? अनलकान्त: निश्चित रूपसँ आर्थिक लाभ भऽ सकै छै, ओइ लेल आवश्यक छै पैघ प्रकाशन संस्थाक, जतऽ पर्याप्‍त पूजी संग व्‍यावसायिक सूझ-बूझ सेहो होइ। हमरा सभकेँ ओते संसाधन नै अछि। हमरा सभकेँ आर्थिक लाभ नै भेल, मुदा घाटामे सेहो नै रहलौं। ओइ रूप मे हम बजारकेँ गलत नै कहै छिऐ। आब हम एक बेर कतौसँ विज्ञापन आनि लेलौं तँ हमरा लाभ भऽ गेल, मुदा तकरा एहि व्‍यवसायक स्‍थायी भाव तं नै कहबै ? हमसभ किछु खास नै केलहुं, एकदम छोट प्रयास अछि हमरासभक... मुन्नाजी: अहाँ अंतिकासँ किछु रचनाकारकेँ बेरा कऽ रखैत रहलौंहेँ, तकर की कारण, विचारधाराक अभाव की रचनाक स्तरक अभाव? अनलकान्त: हमरा नै कोनो नाम मोन पड़ैत अछि, जिनका हमसभ बेराकऽ रखने होइ। अंतिका मे हमरासभ जते लोककेँ छपने छी तकर नाम नुकायल नै छै। तकर अलाबे के बारल छथि तकर नाम अहीं कहि सकैत छी... मुन्नाजी: अपन समतुरिया रचनाकारकेँ कतऽ राखऽ चाहब, ओइ भीड़ मध्य अपनाकेँ कतऽ पबै छी? अनलकान्त: हम अपन समकक्ष सभ रचनाकार केँ अपना सँ आगू मानै छी। ओइ भीड़ मे हम सब सं पाछू छी। मुन्नाजी: मैथिली साहित्य बभनौटी (ब्राह्मणवादक) शिकार रहल अछि। मुदा नव सदीमे सक्रिय गएर ब्राह्मण रचनाकारक प्रवेशकेँ अहाँ कोन तरहेँ देखै छिऐ? अनलकान्त: ब्राह्मणेत्तर जे छथि, हुनका लग भोगल पीड़ा छनि तें हुनके स्‍वर सभसँ विश्‍वसनीय हैत। मुन्नाजी: अपन अमूल्य समए दऽ उतारा देबा लेल बहुत-बहुत धन्यवाद। अनलकान्त: अहूँ के धन्‍यवाद। १० कुमार शैलेन्द्रसँ प्रतिनिधि युवा विहनि कथाकार एवं समालोचक मुन्नाजीक भेल गपशप बहुआयामी व्यक्तित्वक व्यक्ति एवं सौभाग्य मिथिला चैनलक कार्यक्रम प्रभारी कुमार शैलेन्द्रसँ प्रतिनिधि युवा विहनि कथाकार एवं समालोचक मुन्नाजीसँ भेल गपशपक अंश अहाँक सोझाँ राखल जा रहल अछि।– मुन्नाजी: पहिल बेर मैथिलीमे कोन विधासँ वा कोना प्रवेश भेल आ ओकर की कारण छल? कुमार शैलेन्द्र: सन १९६४ ई. मे राजेन्द्र नगर पटनामे हमर जन्म भेल। हमर पिता शिवकान्त झा ओइ समए हिन्दी दैनिक आर्यावर्तमे समाचार सम्पादक रहथि। घरमे कएकटा अखबार, मैथिली पत्रिका शुरूहेसँ पढ़बा लेल भेटल। ओइ समएमे पटनामे ठाम ठीम विद्यापति पर्व समारोह हुअए, मैथिलीक रुचि हमरा ओतएसँ जागल। तकर बाद जखन हम कॉलेजमे पहुँचलहुँ तँ हरिमोहन झाक साहित्य पढ़ि हमरा आभास भेल जे मैथिली साहित्य बड्ड समृद्ध अछि। तकर परिणाम भेल जे हम इण्टरमीडिएटमे अनिवार्य भाषा (१०० अंकक) हिन्दीक बदलबा कऽ मैथिली राखि लेलौं। तकर पछाति हम मैथिलीयेमे ऑनर्स आ एम.ए. केलहुँ। हम कॉलेजमे रही तखने उत्सुकता रंगमंच दिस भेल। हमरा मोन पड़ैछ रवीन्द्रनाथ ठाकुर, जिनका द्वारा पटनामे मैथिलीक पहिल रंगमंचक गठन भेल, “रंगलोक” जे ओहि समएमे एकटा नाटक मंचन केलक जकर समीक्षा लिखि हम आयावर्तमे देलिऐ। ओहि समय गोकुलनाथ झा आ भीमनाथ झा कहलनि, समीक्षा हमर रिपोर्टर लिखत, अहाँक समीक्षा नै हएत। फेर गोकुल बाबू कहलनि, समीक्षा नीक अछि, लिखैत रहू। ओ हमर पहिल समीक्षा छल, नै छपल मुदा तकर बाद समीक्षा लिखैत रहलौं आ छपैत रहलौं। हमरा पता चलल जे कौशल किशोर दास पटनामे एहेन युवक सभकेँ ताकि रहल छथि जिनका रंगमंचमे रुचि होइन। कौशलजी आइसँ पहिने कलकत्तामे रंगमंचसँ जुड़ि सफल रहल छलाह आ आब पटना आबि गेल रहथि। हम हुनकासँ भेंट केलौं आ तकर पछाति सबहक विचारे १८ फरबरी १९८२ ई. केँ एकटा मीटिंग राखल गेलै जाहिमे हम, कौशल किशोर दास, प्रमोद भाइजी, अरुण कुमार झा आ गोकुलनाथ दास कुल पाँच गोटे, ओइ मीटिंगमे उपस्थित भेल रही। हमरा प्रस्तावे “अरिपन” नामक संस्थापर सहमति बनल २८ फरबरी १९८२ केँ। मैथिलीक प्रतीक “अरिपन” क रूपमे एकर प्रस्ताव रखलौं। कौशलजी एकर समर्थन केलनि। तकर बाद विचार भेलै नाटक मंचनक। बहुत रास मैथिली नाटकक किताब जमा भेल जैपर कौशलदास सहमत नै भेला। हमरा कहलनि- पु.ल. देशपाण्डे लिखित मराठी नाटक- बेचारा भगवान चर्चित आ पुरस्कृत एवं लोकप्रिय अछि। अहाँ मैथिली जनै छी ओकरा हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद करू। ईएह मैथिली अनुवाद ओही नामे “अरिपन”मे पहिल बेर मंचित भेल। तकर पछाति हमर भातिज अरुण कुमार झा कहलनि जे अशोकनाथ “अश्क” मैथिलीमे नाटक लिखने छथि। ओ ओहि समएमे छात्र रहथि आ हुनक लिखल नाटक “विद्रोह” हमरा सभकेँ पसिन्न पड़ल, ई “अरिपन”क दोसर पुष्प छल। हम सभ “अरिपन”क अध्यक्षक लेल बहुत वरिष्ठ गोटे लग गेलौं, कियो अध्यक्षता लेल तैयार तँ नहिये भेला जे कहलनि- अहाँ सभ बेकार फिरिसान होइ छी, मैथिली रंगमंच कहियो अस्तित्वमे नै आबि पाओत। ओही क्रममे हम सभ जटाशंकर दासजी सँ भेंट कएल, ओ एकमात्र व्यक्ति हमरा सभकेँ सभ तरहेँ संग देलनि, अध्यक्षता केला। शेष बुजुर्ग सभ बादमे अरिपनक छोट-छोट पदाधिकारी धरि भेला, हम आब नाम नै लेबऽ चाहब, हुनका सभकेँ अपमान बुझेतनि। दू वर्षक क्रियाकलापकेँ सभ कियो सराहऽ लगलाह आ शेष सभ गोटेकेँ मैथिली रंगमंचक भविष्य देखाए लगलनि। तेसर वर्ष ओही संस्थाक अध्यक्ष भेलाह श्री मंत्रेश्वर झाजी आ क्रमे हमरा सभकेँ विलगा देल गेल। मुन्नाजी: अहाँ प्रारम्भमे मैथिलीमे नाटकक योगदाने आगाँ एलौं मुदा फेर पत्रकारिता दिस उन्मुख भऽ गेलौं, नाटकसँ कोनो असोकर्ज तँ नै बुझना गेल? कुमार शैलेन्द्र: पत्रकारितामे- अहाँकेँ कहलौं जे पिताजी पहिनेसँ ऐ काजमे लागल छलाह। तँ हमरो रुचि छले। उदयचन्द्र झा “विनोद” आ विभूति आनन्द दुनू गोटे माटि-पानि नामक पत्रिका बहार करैत छलाह। विनोदजी तँ जॉबमे छलाहे समयाभाव छलनि, विभूतिजीकेँ सेहो मिथिला मिहिरमे नोकरी लागि गेलनि। तखन माटिपानिक ८० प्रतिशत काज -यथा मुरलीधर प्रेसमे जा टाइप सेटिंग कराबी, प्रूफरीडिंग कॉपी एडिट आदि-आदि काज करी- फाइनल टच विभूतिजी आबि कऽ दैथि। हमर नाम नै रहै छल, हँ अन्तिम दू अंकमे सहयोगी शैलेन्द्र कुमार झा जोड़ल गेल। तकर पछाति ओ बन्न भऽ गेलै, जेना आन मैथिली पत्रिकाक दशा होइत छैक। पत्रकारिता तँ हमर पारिवारिक कारोबार वा रोजगार बनि गेल छल। हमर पिताजी सेवानिवृत्त भऽ गेल रहथि। हमरा आर्यावर्तमे प्रशिक्षु संवाददाताक रूपमे नोकरी भेल। हम सभ कोनो डिप्लोमा डिग्री लेनाइ तँ दूर सुननेहो नै रही, विशेष कऽ पटनामे जे पत्रकारितामे कोनो डिप्लोमा डिग्री होइत छैक। हँ, जँ हमरा पहिने बुझल रहैत जे नाटकक लेल एन.एस.डी. (राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय) प्रशिक्षण दैत अछि तँ हम जरूर प्रयास करितौं, मुदा पटनामे ऐ तरहक कोनो माहौल नै छलै। हमर पिताजी आर्यावर्त ज्वाइन करबासँ पहिने पुणेमे पेशेवर रंगकर्मीक रूपेँ जुड़ल रहथि। १९५५ मे आकाशवाणी पटनासँ जुड़लाह आ तहियेसँ मैथिली नाटकमे अपन स्वर दैत रहलाह। ई क्रम १९८५ धरि चलल। हमरा जनैत ओ पहिल व्यक्ति छथि जे अनवरत एतेक दिन धरि मैथिली नाटकसँ जुड़ल रहलाह। १९७०-७२ क बाद प्रेमलता मिश्र “प्रेम”, बटुक भाइ सभ जुड़लाह, नीक योगदान देलनि, मुदा हमर पिता शिवकान्त झाजी, आनन्द मिश्र, मायानन्द मिश्रक समकक्ष रहलाह। नाटकमे हमरा रुचि ओतैसँ जागल। ओइ इलाकामे (हनुमाननगर, मधुबनी)मे हुनकर मंचीय काजकेँ एकटा किंवदन्तीक रूपमे जानल जाइए। मुन्नाजी: अहाँक अन्तिम नाटक उगना हॉल्टक मंचन मिथिलांगन (दिल्ली) द्वारा २००९ मे भेल, जे पूर्णतः आजुक परिप्रेक्ष्यमे प्रासंगिक आ मनोरंजक छल। एहिसँ पूर्व अहाँक कोन-कोन आ कोन तरहक नाटक सोझाँ आबि गेल अछि? लेखन आ मंचन दुनू दृष्टिएँ? कुमार शैलेन्द्र: पहिल बेर हम मंचपर एलौं मराठीक अनूदित नाटक- बेचारा भगवान लऽ कऽ। तकर बाद बहुत रास नीक नाटकक अनुवाद केलौं। हमर पहिल मैथिली नाटक अछि- मोर मन मोर मन नै पतिआइ-ए। दोसर ३१-१२-१९९६ केँ उत्तरायण हास्य व्यंग्यपरक नाटक अछि, एकर बाद लोरिकायन, अग्निपथक सामा (चेतना समितिसँ प्रकाशित), ई मैथिलीक पहिल नाटक छल जकरा बिहारक सभसँ पैघ श्री कृष्ण मेमोरियल हॉलमे मंचित कएल गेल ०४.०८.२००१ केँ। गीतात्मक देसिल बयना २००७ मे, मिथिलांगन (दिल्ली)क आग्रहपर नैकाबनिजाराक गीतात्मक नाट्यरूपान्तरण केलौं जाहिमे १०टा गीत छै, जकर मंचन २००७ ई. मे व्रजकिशोर वर्मा “मणिपद्म” जयन्तीपर मिथिलांगन द्वारा संजय चौधरीक निर्देशनमे मंचित कएल गेल। २००८ ई. मे मिथिलांगन द्वारा आजुक प्रसंगमे लिखल हास्य व्यंग्य नाटक “उगना हॉल्ट”क मंचन भेल। मुन्नाजी: अहाँक नाट्य मंचन मूलतः गमैया नाटकसँ प्रारम्भ भेल छल, आजुक परिप्रेक्ष्यमे गमैया नाटक कतऽ अछि। गमैया आ थियेटरमे मंचित नाटकक तुलनात्मक स्थिति की अछि? कुमार शैलेन्द्र: गमैया नाटक जतऽसँ शुरू भेल छल आइयो ओतै अछि आ ऐसँ ऊपर उठबाक आशा सेहो नै देखा पड़ैत अछि। थियेटर नाटक आधुनिक साज-सज्जा ओ प्रकाश व्यवस्थासँ संतुलित रहैत अछि। मुदा गमैया नाटक जेना अछि ओहिसँ सुधरि नै सकैत अछि जकर मूल कमी अछि बिजली वितरणक अभाव। गाममे एखनो नाटक पेट्रोमेक्सक इजोतमे होइत अछि, जतऽ जेनेरेटरक व्यवस्था होइत छै, ओहो समुचित नै कहल जा सकैछ, किएक तँ ओतौ डिमरक प्रयोग नै भऽ सकैत अछि। थियेटरमे आयोजित नाटक प्रारम्भसँ अंत धरि नाटकक क्रमिक दृश्य देखाइछ। मुदा गमैया मंचपर एखनो दृश्य परिवर्तनक बीच कॉमिक वा नाच देख सकैत छी। गाममे ताधरि स्थिति खराब रहत जाधरि दृश्य परिवर्तन उठौआ परदासँ हेतै। गामक मेकपमे एखनो मुर्दा शंखक उपयोग होइत छै। गामक नाटक कहियो ऊपर नै उठि सकैत अछि। कहियो थियेटरक नाटकक बरोबरि नै भऽ सकैए, किन्नो नै भऽ सकैए। मुन्नाजी: हमरा जनतबे आइयो नाटकक लेल दर्शकक अभाव नै छै, हँ समयाभाव जरूर भऽ गेलैए, ताहि हेतु एकांकी सभकेँ मंचित करब शुरू भेल अछि। अहाँक नजरिये एकांकीक रुखि केहेन अछि, एकर भविष्य केहेन बुझना जाइत अछि। कुमार शैलेन्द्र: आधुनिक रंगमंचपर भलहिं एकांकीक प्रचलन बढ़लैए मुदा एकांकीक आधार वा सम्भावना नै छैक से मैथिलीये नै अन्यान्य भाषाक एकांकी संग सेहो छैक। अखन जे नाटक लेखन भऽ रहल अछि ओइमे साहित्यिक नाटक कम अछि। नाटक ऐ रूपक प्रारम्भ सुधांशु शेखर चौधरीक नाटक सभसँ भेल। नाटक अपन परम्परामे आबि अलग अलग शिल्पक प्रयोगे लिखल जा रहल अछि। प्राचीन जे प्रदर्शन कला छलै तकरासँ जोड़ि कऽ आधुनिक प्रदर्शन कलाक प्रस्तुति कएल जा रहल अछि। मुन्नाजी, एकांकीक अस्तित्व मैथिली सहित सभ भाषामे खसि गेलैक अछि। भविष्य कोनो नीक नै बुझना जाइछ। मुन्नाजी: वर्तमानमे किछु बीछल कथाकेँ एकांकी रूपेँ प्रस्तुत कएल जाए लागल अछि, की कथाक मूल एकांकीमे समाहित भऽ पबैए वा नै? आ कथाक एकांकी रूपान्तरण कतेक उचित वा अनुचित अछि? कुमार शैलेन्द्र: कथाक नाट्य रूपान्तरणक प्रारम्भ केलनि हिन्दीमे देवेन्द्रराज अंकुर। कथा मंचनक सभ भाषामे अयोजन कएल जा रहल अछि। कथाकेँ नाट्य रूप दिऐ तखने ओ सार्थक भऽ सकैछ, मुदा से अछि कठिन। हम धूमकेतुक कथा “अगुरवान”क नाट्यरूपान्तरण कएने रही तँ ओइमे कथाक मूल स्वरूपकेँ यथावत रखने रही। ओना तँ ताहि हेतु कठिन परिश्रम करऽ पड़ल छल। आगू म. मनुज ओइ अगुरवानक रूपान्तरण काफी लिफ्ट लैत केलनि तँ ओकर मूल आत्मे मरि सन गेलै। किएक तँ ओइ नाटकमे बहुत रास दृश्य एहेन जोड़ल गेल छैक जे कथामे छहिये नै। कथा मंचन हेबाक चाही, ओकर प्रतिरूप नै जेना हमर नैका बनिजारा छल। ओतेकटा पोथीकेँ डेढ़ घंटाक कलेवरमे समेटि देनाइ बड कठिन छल। मुदा हम ओइमे सफल भेलौं। कथाक मंचन तँ सही छैक मुदा जखन नव आयाम जोड़ल जाइ छै तखन कथाक आत्मा आहत होइत छैक। देवेन्द्रराज अंकुर जेना कथाक नाट्यरूपान्तरणमे कथाक मूल रूपकेँ प्रस्तुत कऽ पबै छथि तहिना मैथिलीयोमे कएल जाए तँ नीक बात अन्यथा लौल करब व्यर्थ अछि। मुन्नाजी: अहाँ लेखनक अतिरिक्त अभिनयसँ सेहो जुड़ल रहलौं। हम सभ फिल्म सिन्दुरदानमे अहाँक सुन्दर अभिनय देखने छी। ऐसँ पूर्व अहाँ कोन-कोन फिल्म वा धारावाहिकमे अभिनय केने छी आ एकर केहेन अनुभव केलहुँ? कुमार शैलेन्द्र: जँ अहाँ कही छोटकी परदा हम ओकरा कहै छी- नन्हकी परदा आ सिनेमाकेँ कहै छी बड़की परदा। बड़की परदाक बात करी तँ “सिन्दुरदान” हमर दोसर फिल्म अछि। पहिल फिल्म अछि रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा निर्मित आ निर्देशित हिन्दी फिल्म “आयुर्वेद की अमर कहानी”- ऐमे हम अभिनय केने रही, ललितेश ऐमे हीरो रहथि आ संगमे रहथि दिलीप झा। राँटी, मधुबनीमे एकर सूटिंग भेल रहै। हमरे सन चारि-पाँच गोटे आरो प्रतिभावान कलाकार रहथि। सिन्दुरदानमे १६-१७ बर्खक पछाति चरित्र अभिनेताक रूपमे आएल रही, आब तँ हमर चेहरो बदलि गेलहेँ। ऐमे हमर भूमिका नायिकाक पिताक रूपमे छल। एकर बाद सौभाग्य मिथिला मैथिली चैनलक लेल बनाओल मुख्य धारावाहिक “दियर-भाउज”क डेढ़ सए कड़ीसँ बेसीमे षडयंत्री ककाक भूमिकामे काज कएलौं। तकर अतिरिक्त रविन्द्रनाथ ठाकुर नन्हकी परदापर एकटा काउन्टडाउन शो केने रहथि, जैमे कविक भूमिकामे एकटा प्रस्तोताक रूपमे हम अभिनय केने रही। ईएह हमर नन्हकी-बड़की परदाक अभिनय यात्रा अछि जे एकटा प्रसन्न करैबला अनुभव रहल। मुन्नाजी: अहाँ बहुत दिन धरि मैथिली पत्रकारिता विशेषकऽ आकाशवाणीसँ जुड़ल रहलौं, की भविष्य छै एकर? एकरा छोड़ि अहाँ दूरदर्शनसँ किएक जुड़लहुँ? कुमार शैलेन्द्र: हमर रोजगार यात्रा पत्रकारितेसँ शुरू भेल, विशेष कऽ प्रिन्ट मीडिअमसँ। ओइ संग आकाशवाणीसँ सेहो जुड़ल रहलौं। आकाशवाणी पटनासँ प्रसारित किछु नाटकमे काज केलौं। आ एतऽसँ प्रसारित चौपालमे “बम-बम”भाइक भूमिकाक निबहता करैत रहलौं। तकरा संग-संग नौ साल धरि आकाशवाणी पटनासँ शैलेन्द्र कुमार झाक नामे समाचार वाचन करैत रहलौं। एकर अतिरिक्त नै जानि कतेको रेडियो नाटिकामे अपन स्वर देलौं। एकटा महत्वपूर्ण काज छल ओतऽसँ प्रसारित “सिंहासन बत्तीसी” धारावाहिकक- चौंतीसम कड़ी धरि राजा भोजक भूमिकामे रही जे महत्वपूर्ण काज छल। तकर बाद ई.टी.वी. हैदराबादमे छः घण्टाक लिखित आ दू घंटाक मौखिक परीक्षाक पछाति हमर चयन भेल। हम ओतऽ एक सप्ताह मात्र काज केलौं। ओहीमे हमर वरिष्ठ रहथि गुंजन सिन्हाजी जे एखन मौर्या टी.वी. पटनामे वरिष्ठ पदाधिकारी छथि। हमरा ओतऽ मोन नै लागल वा मोन नै मानलक। हाम आपस चल एलौं। तकर बहुत पछाति “सौभाग्य मिथिला” मैथिली चैनलसँ जुड़लौं, जैमे समस्त कार्यक्रमक निर्माण देखैत रहलौं। छोड़बासँ पहिने समाचार संपादक रूपमे कार्यरत रही। सौभाग्यसँ जहिया जुड़लौं तँ हम पहिल मैथिल व्यक्ति रही ओ सौभाग्य नामक एकटा डिवोशनल चैनल छल आ ओइमे सभ हिन्दीभाषी कार्यरत छलाह। मुन्नाजी: अहाँक नाटक पत्रकारिताक अतिरिक्त एकटा सकल मंच संचालकक रूप सेहो सोझाँ आएल। अहाँ ओहूमे खूब जमलौं।की मैथिलीमे स्वतंत्र संचालकक अस्तित्व आ भविष्य देखा पड़ि रहल अछि? कुमार शैलेन्द्र: मंच संचालन हमर महत्वपूर्ण लोकप्रिय विधा रहल अछि। पटनाक चेतना समितिक मंचसँ विद्यापति समारोहमे बहुत दिन धरि मंच संचालन करैत रहलौं। सत्य पूछी तँ ओइमे आनन्द अबैत छल, किएक तँ ओ जे भीड़ होइ छलै एक लाख डेढ़ लाख लोकक आ शालीनतापूर्वक सभ सुनैत रहै छल। तकर पछाति कतेको मंचपर बजाएल जाए लगलौं। मैथिलीमे मंच संचालकक वा उद्घोषकक कोनो पेशेवर रूप टिकाऊ नै भऽ सकैछ। एखन एकर कोनो सम्भावना नै छैक। हँ हमर जे समिति सबहक उद्घोषक भेलाह हुनक रूप बदलि गेल छनि, माने ओ आब एकटा कन्ट्रैक्टर वा एरेन्जरक रूपमे छथि। समस्त कलाकारक व्यवस्था ओ करथि आ ओही व्यवस्थापर कार्यक्रम आयोजित होइत अछि। ओना एहेन जे उद्घोषक सेहो सिजनल भऽ सकैत छथि। हम जखन उद्घोषक रही तँ ई बात पहिने सोझाँ आबए जे जँ विद्यापति पर्व समारोह अछि तँ ओइमे विद्यापति आ मिथिलाक सांस्कृतिक आधारकेँ केन्द्रित कऽ कार्य कएल जाए। आब गीत-संगीतमे फूहड़ता एलैए तँ कैक ठाम संचालकक स्तर खसि रहल छैक। मुन्नाजी: मैथिलीक पहिल चैनल “सौभाग्य मिथिला”सँ पूर्ण रूपेँ जुड़ि अपन सर्वस्व ऊर्जा ऐमे खर्च कऽ रहल छलौं। मुदा एखनो बहुत रास कमी अछि जेना डी.टी.एच.पर ऐ चैनलक प्रसारण नै हएब? ठोस वा मनोरंजक कार्यक्रमक अभाव किएक? कुमार शैलेन्द्र: निश्चित रूपे मुन्नाजी अहाँक जे सवाल अछि तैसँ हम सहमत छी। हम जहिया जुड़लौं ऐसँ तँ असगर मैथिल छलौं। एकर सभ कार्यक्रम चैनल आइ.डी.सँ लऽ समस्त कार्यक्रमक आधारभूत संरचना तैयार केलौं। हमर बाद जे किछु लोक जुड़ल से सभ चैनल माध्यमे चिन्हल गेल मुदा हम पहिनेसँ मिथिलाक सभ क्रियाकलाप कला संस्कुति आदि सँ सर्वथा जुड़ल रहलौं। हमरा प्रारम्भमे कहल गेल जे ऐमे दू घंटाक मैथिली कार्यक्रम हएत मुदा कालक्रमे २४*७ क प्रसारण -यानी चौबीसो घंटा आ सातो दिन- होमऽ लागल। हम एकरा कहल बुद्धिवाद, जे ई जोगाड़ डॉट कॉम पर टिकल रहल, किएक तँ एकरा फाइनेन्सरक पूर्णतः अभाव रहलै। मुन्नाजी: ऐ चैनलक बहुत रास कमी एहेन अन्यान्य भाषाक चैनलक समक्ष एकरा ठाढ़ नै होमऽ दऽ रहल छै। एनामे एकर अस्तित्व समाप्त तँ नै भऽ जाएत। कुमार शैलेन्द्र: एकरा लग प्रतिभा, लोक, अभिनेता, गीत-संगीत गौनिहारक कमी नै छै। साहित्य-संस्कृतिक कमी नै छै। योग्यताक अभाव नै छै। कमी छै तँ धनक, चैनलक मार्केटिंग केनिहार लोकक। अभाव छै तँ जे सभ मालिक वा पार्टनर छथि हुनकामे, जे कोना बजारसँ धन उगाहिकेँ आनल जाए। से सभ जहिया भऽ जाएत तहिया ऐ चैनलसँ स्तरीय कार्यक्रम सभ प्रस्तुत होमऽ लागत आ ई सभ तरहेँ आन भाषाक चैनलक समक्ष ठाढ़ भऽ जाएत। चैनलसँ आब जे जुड़ल छथि, जहिया हमहूँ सभ जुड़ल रही प्रोग्रामसँ, जे जुड़ल लोक अछि तकरा प्रोग्रामक भार रहै आ मालिक लोकनि एकर व्यापार प्रभागक संचालन करथि। ई भेद कऽ के काज हेतै तखन ई जरूर सफल हएत। नै मालिके सभटा काज करता तखन स्थिति दुःस्थितिये बनल अहत। मुन्नाजी: ऐ सभक अतिरिक्त मैथिली गजलक उपयोग अहाँ सेहो करैत रहलौं अछि। मैथिलीमे गजलक की स्थिति छैक आ एकर केहेन सम्भावना देखा पड़ैत छैक? कुमार शैलेन्द्र: मैथिली गजल अपन लोकप्रियता बहुत पहिने हासिल कऽ लेने अछि, कलानन्द भट्ट, बुद्धिनाथ मिश्र, रविन्द्रनाथ ठाकुर आदि श्रेष्ठ गजलकार छथि। मायानन्द मिश्र सेहो अही श्रेणीमे गानल जाइत छथि। हुनकर “रूप एक रंग अनेक” नामक संग्रह चर्चित रहल छनि। ओ ऐ सभ गजलकेँ गीतल कहै छथि। एम्हर आबि कऽ पत्रिका सभमे गजलक अभाव पाओल जाइत अछि। देखियौ मुन्नाजी, एकटा खास बात छै जे गजल एहेन विधा छै जे कोनो भाषामे लिखल जाए अपन जमीन तैयार कऽ लैत अछि। मैथिलीयोमे राम चैतन्य धीरज, तारानन्द वियोगी, रमेश आदि आ सरसजी गीत आ गजलमे नव-प्रयोग केलनि। कविताक जे प्रकार छै तैमे मैथिली गजलक सेहो अस्तित्व छैक आ भविष्य सेहो। गजल जतऽ जै भाषामे जाइ छै ओहीमे समाहित भऽ जाइ छै। गजलमे गेय तत्व छै जे ओकरा लोकप्रिय बना देने छै। मुन्नाजी: शैलेन्द्रजी, एकटा सवाल व्यक्तिगत जिनगीसँ जुड़ल। अहाँ अपन एकल जिनगी जीबाक प्रयास कऽ रहलौं अछि- माने अविवाहित रहि- एकर कारण रोजगारपरक व्यावसायिक अवरुद्धता अछि वा कोनो व्यक्तिगत विशेष कारण। अहाँकेँ नै लगैछ जे एहन जीवन अधूरा वा व्यर्थ भऽ जाइत अछि? कुमार शैलेन्द्र: देखियौ, ई अहाँक हमरासँ जुड़ल वैयक्तिक, पूर्ण व्यक्तिगत प्रश्न अछि। मुदा हम एकर उतारा देबासँ परहेज नै करब। वरन एगदम सहज आ स्वाभाविक उतारा देब। हम जखन यंग रही तखन पिताजी चाहैत रहथि जे हम बियाह कऽ ली, मुदा हम आर्थिक रूपेँ सक्षम नै बुझी अपनाकेँ। किएक तँ आर्यावर्तमे काज करैत रही, ओ ओही समएमे बन्न भऽ गेलै। हम बेरोजगार भऽ गेलौं आ बियाह नै करबाक मूल कारण छल हमर अर्थ विपन्नता। हम परिवार चलेबा लेल जतेक अर्थक प्रयोजन बुझलौं ततेक हम कहियो नै कऽ सकलौं। लोकक अपन-अपन रहबीपर निर्भर छै। ककरो लगै छै जे हम पाँच हजारमे गुजारा कऽ ली। हमरा लगैछ जे बीस हजार खर्च भऽ सकैछ। हम आइयो ओहिना छी जे अपना अर्थे विपन्न बुझै छी। हमरा मैक्सिम गोर्कीसँ जीवन्त प्रेरणा भेटैत रहल अछि। ओना हम मानै छी जे गोर्कीकेँ जीवनमे जतेक कष्ट सहऽ पड़लनि ऐसँ बहुत कम कष्ट हम उठेलहुँ अछि। हम जखन संकटमे अबै छी तँ हमरा गोर्की मोन पड़ै छथि आ हुनके प्रेरणासँ हम अपनाकेँ सम्हारि लैत छी। हँ, हम ईमानदारीपूर्वक कहब जे एतेक साहस कहियो नै आएल वा हमरा कियो भेटबो नै कएल। जे अपना ओइठाम जे पारम्परिक विवाह छै तैमे हमरा विश्वास नै रहल अछि। जँ हम ओना बियाह कऽ ली आ तेहेन कोनो जोड़ीदार आबि जाए जे अहाँक जीवनकेँ नर्क बना दिअए तँ हमरा कोनो शिकाइत नै अछि जे हम एकसर छी। हम विवाह नै केलौं तैं हेतु कतौ कोनो लोक, एम्प्लॉयरसँ कहियो कोनो कम्प्रोमाइज नै करऽ पड़ल। हमरा जतऽ जहिया जेना मोन भेल काज करैत रहलौं। हमर जे संगी नोकरिहारा, तकरा लेल लड़ैत रहलौं। आ तैँ हमर एम्प्लायर डरैत रहल अछि। ओ मानैए जे हम यूनियनबाजी करै छी, जखनकि सत्य अछि आइ धरि कोनो यूनियनसँ कोनो सम्बद्धता नै रहल अछि। असगरूआ रहब हमर सम्बल रहल अछि। काल्हि की हेतै एकरो गारंटी हम नै दऽ रहलौंहेँ। कतेको गोटे कहैए, आब अहाँ बूढ़ भऽ गेलौं, आब बियाह कऽ की हएत? मुदा हमरा अखनो वा आगूओ जँ अपन सोचक कियो भेटि जेती तँ हम बियाह कऽ सकैत छी। मुन्नाजी: भाइ, एतबा बहुमूल्य समए दऽ अपन विचार देबा लेल धन्यवाद। ११ अमरनाथ जीसँ मैथिलीक प्रतिनिधि विहनि कथाकार एवं समालोचक मुन्नाजी द्वारा भेल गप्पसप्प कथा साहित्यक स्थापित रचनाकार एवं साहित्य अकादमीक (मैथिली परामर्शदातृ समिति) सदस्य माननीय अमरनाथ जीसँ मैथिलीक प्रतिनिधि विहनि कथाकार एवं समालोचक मुन्नाजी द्वारा भेल गप्प-सप्पक अंश प्रस्तुत अछि:- मुन्नाजी: अहाँक मोनमे मैथिलीक रचनात्मक विचार कोना प्रस्फुटित भेल, पहिल रचना (लिखल) आ पहिल प्रकाशित रचना कोन अछि, आ कतऽ कहिया छपल? अमरनाथ: हमर जन्म एक एहन परिवारमे भेल, जतय अनेक तरहक विविधता छलैक। किछु घोर कर्मकाण्डी रहथि, तँ किछु शास्त्र-पुराणक विपरीत आचरण करथि खाद्य-अखाद्यमे विचार नहि करथि। भारत-चीनक युद्ध आ युद्धक चर्चा सँ आहत बाल मन आ १९६२ मे ज्यौतिषी द्वारा खण्ड प्रलय भूकम्प अथवा विनाशक भविष्यवाणीक कारणे घरक बाहर छोट-छोट शेडमे रहबाक विवशता मनकेँ उत्सुक बनौने रहए। तत्कालीन समाजमे अधिकांश तथाकथित समाज लोककेँ सोंगरपर ठाढ़ देखियनि। अर्थात् एकटा नौकर आ टहलू चाहियनि। आश्चर्य ई लागय जे जखन सभ मनुक्खे, तखन सम्बोधनमे यौ, हौ, रौ, हरौ अछि किएक? जे घाम चुबबैत अछि से न्यून किएक? एहन विडम्बनापूर्ण परिस्थितिमे हमर रचनात्मक विचार प्रस्फुटित भेल रहए।मिथिला शोध संस्थान, दरभंगा सँ मैथिलीक लेखिका राजलक्ष्मीपर आधारित पुस्तक प्रकाशित भेल छल जाहिमे हुनक लिखल पोथीपर मुख्यतया अभिमत संकलित छल। ओहि पोथीमे आचार्य रमानाथ झा आदिक विचार छपल अछि। हमर अभिमत कवितामे छपल अछि, हमर वैह पहिल छपल रचना थिक। मुन्नाजी: अहाँ सभक रचनाक प्रारम्भिक कालमे मैथिली साहित्यक स्थिति की छल? अहाँक रचनात्मक प्रभाव केहेन रहल? अमरनाथ: १९७४ ई. मे पटनासँ प्रकाशित ‘मिथिला मिहिर’क फगुआ अंकमे हमर पहिल हास्य व्यंग्य कथा ‘स्वर्ण युग’ छपल रहए। १९७५ ई. मे ‘क्षणिका’ विहनि कथा संग्रह छपल, आचार्य सुरेन्द्र झा ’सुमन’ ओहि पोथीक भूमिका लिखने छथि जाहिमे विहनि कथाक औचित्यपर प्रकाश देने छथि। किरण जी, अमर जी, श्रीश जीक विचार छपल छनि। पछाति जयकांत मिश्र लिखलनि जे एहि संग्रहक प्रकाशन सँ मैथिली साहित्यक विकास भेल अछि। ‘मिथिला मिहिर’, ‘द इण्डियन नेशन’, ‘आर्यावर्त्त’, ‘मैथिली प्रकाश’ (कोलकाता) मे ‘क्षणिका’क समीक्षा छपल रहए। ताहिसँ ई अनुभूति भेल रहए जे कथाकारक रूपमे हमरा स्वीकार कऽ लेल गेल अछि। १९७४ ई. मे ‘चाही एकटा द्रोपदी’ (कथा संग्रह) तथा १९७५ ई. मे ई ‘क्षणिका’ (विहनि कथा संग्रह) छपल रहए। हमरा अधिकांश श्रेष्ठ लेखक यथा रमानाथ झा, हरिमोहन बाबू, यात्री जी, किरण जी, सुमन जी आदिक सानिध्य आ स्नेह प्राप्त भेल रहए। मुदा हम बेशी हरिमोहन बाबूक लग रही आ तकर कारण रहए जे हम दर्शन शास्त्रक अध्ययन करैत रही आ मैथिलीमे लेखन दिस उन्मुख भेल रही। हरिमोहन बाबू संग बीतल क्षण हमर साहित्यिक जीवनकेँ गति प्रदान करबामे अत्यंत सहायक भेल छल। मुन्नाजी: छठ्ठम/सातम दशकमे किछु रचनाकार मैथिलीमे साम्यवादी विचारक हो-हल्ला केलनि। अहाँक नजरिमे सत्यतः मैथिलीमे एहेन कोनो विचारधारा बनलै? अहाँपर एकर केहेन प्रभाव पड़ल? अमरनाथ: एकटा समय आयल रहैक जाहिमे संसारक जन समुदाय साम्यवादी विचार धारा दिस आकर्षित भेल रहए। सम्पूर्ण विश्वमे पक्ष-विपक्षमे बहस प्रारम्भ भेल रहैक। कतहु-कतहु क्रांतियो भेलैक, क्रांति सफलो भेलैक। मुदा मैथिली साहित्यिक परिप्रेक्ष्यमे अहाँ ठीके कहलहुँ जे ‘हो-हल्ला’ भेलैक। हमहुँ मानैत छी जे मैथिली साहित्यमे साम्यवादी विचारधाराक जड़ि नहि जमि सकलैक। मैथिलीमे जे केओ अपनाकेँ साम्यवादी कहि कऽ प्रचारित करैत छथि से पाखंडी छथि। ई बात कने कटु अछि मुदा सत्य अछि कारण हुनक जीवनक सूक्ष्म निरीक्षणसँ परिलक्षित होएत जे ओ जातीय अहंकारसँ मुक्त नहि भेल छथि आ परम्परागत संस्कारमे लिप्त छथि। जनिकामे साम्यवादी चिंतन धारामे अग्रसर होएबाक अर्हते नहि छनि से भला वर्ग-संघर्ष, सर्वहारा, मैनिफेस्टो आ दास कैपिटल धरि कोना पहुँचताह। हँ, मैथिली साहित्यमे साम्यवादकेँ संगठित प्रचारक लेल आ आत्म-विज्ञापनक लेल हथकंडाक रूपमे इस्तेमाल कयल गेल अछि। मैथिली साहित्यमे हमरा जनैत कोनो ठोस विचार धारा नहि पनपि सकलैक आ तकरा कारण ई भेलैक जे बीसम शताब्दीक महत्वपूर्ण लेखक लोकनिपर, संस्कृत अथवा बांग्ला साहित्यक प्रभाव पड़ल रहनि। किछु लेखकपर अंग्रेजी साहित्यक प्रभाव सेहो पड़ल रहनि। स्वतंत्रताक पश्चात् मैथिली साहित्य बहुलांशमे हिन्दी साहित्यक छत्र छायामे चलि आएल। मैथिलीक साहित्यकार नामवर सिंह आ मैनेजर पांडेय दिस देखय लगलाह। ई दु:खद स्थिति अछि, मुदा सत्य यैह अछि। मात्र तीन गोट साहित्यकार हरिमोहन झा, यात्री आ राजकमल विचार धाराक दृष्टियेँ टिकल रहलाह। यात्री समतामूलक समाजक स्थापना लेल अग्रसर भेलाह आ ‘परम सत्य’ धरि पहुँचि अस्तित्ववादी भऽ गेलाह। मानववाद हुनक कवितामे अंतर्निहित छनि। यात्री लिखैत छथि- सत्य थिक संसार सत्य थिक मानव समाजक क्रमिक उन्नति क्रमिक वृद्धि-विकास सत्य थिक संघर्षरत जनताक ई इतिहास सत्य धरती, सत्य थिक आकाश परम सत्य मनुक्ख अपनहि थिक तहिना राजकमल साहित्य वर्जनाकेँ तोड़ैत तथाकथित ‘धर्मात्मा’ आ ‘पाखंडी’ सभक प्रताड़नासँ कुहरैत, नोरसँ भीजल मिथिलाक नारीक जीवंत चित्रण केलनि। एही सन्दर्भमे हरिमोहन झाक नाम उल्लेखनीय अछि। ‘खट्टर कका’क तरंग बुद्धिवादी चिंतन धाराक लेल ‘गीता’ सदृश अछि। सभसँ महत्वपूर्ण बात ई अछि जे हरिमोहन झा, यात्री जी आ राजकमलक मोसि कमला-गंडकी-वाग्मती-कोसीक पानिसँ बनल छलनि तेँ हुनकर साहित्यमे मिथिलाक सोहनगर माटिक सुगंधिक अनुभव होइत अछि। बीसम शताब्दीक वृहत्रयीमे यैह तीन साहित्यकार हरिमोहन झा, यात्री जी आ राजकमल छथि जे कालजयी छथि। हमरापर कोन विचार धाराक प्रभाव पड़ल तकर विवेचन आ मूल्यांकनक दायित्व अहाँ सन युवा रचनाकारपर छोड़ि दैत छी। मुन्नाजी: अहाँ अपन रचनाकालक प्रारम्भसँ एखन धरि लेखनक निरंतरता बनौने छी, मुदा आइ धरि ककरो द्वारा कोनो ठोस मूल्यांकन आ पुरस्कृत नञि भेलासँ केहेन अनुभव करैत छी? अमरनाथ: मुन्ना जी, मैथिलीमे मूल्यांकन होइ नहि छै, करबऽ पड़ैत छै। ओहि लेल मैनेजमैंट चाही। ई मैनेजमैंट ने करय अबैत अछि आ ने हम सीखय चाहै छी। रहल गप्प पुरस्कारक। एकर अपन गणित छै। मैट्रिक धरि गणित आ विज्ञान रहए। प्रथम श्रेणी भेटल रहए। मुदा दर्शनशास्त्र प्रिय लागल। गणित छोड़ि देलिऐ। फेरसँ सीखल होएत? तखन अहीँ कहूँ, पुरस्कार कोना भेटत? मुन्ना जी, हम कहि सकैत छी जे देशक विभिन्न भागसँ हमरा पाठकक स्नेह भेटल अछि। ई की पुरस्कार नहि भेलै? हमर पोथीक तीन-तीन संस्करण भेल अछि। चारिम संस्करण प्रेसमे अछि। मैथिली लेखकक लेल ई की कम भेलै? मुन्नाजी: कथा साहित्यमे अहाँ द्वारा विहनि कथापर जमि कऽ लेखन भेल। मैथिलीक पहिल विहनि कथा संग्रह ‘क्षणिका’ देलाक बाबजूद अहाँ विहनि कथाकारक रूपमे हेराएल आ बेराएल रहलौं, एकरा पाछू समूहवाजी आ आर किछु कारण अछि? अमरनाथ: एहिमे हमर अपन दोष अछि। १९७५ ई. मे ‘क्षणिका’ छपल रहए। हाथो हाथ बिका गेल। एहि घटनाक पैंतीस वर्ष भेलैक। हमरा दोसर संस्करण करएबाक चाहै छल। से नहि भेलैक। मैथिली पुस्तकक हेतु कोनो नीक पुस्तकालय नहि छैक। जखन पोथी नहि उपलब्ध होएतैक, तखन कोन आधारपर चर्चा लोक करतैक? तथापि जे नीक समालोचक होइत छथि से अंवेषण करैत छथि, पोथी उपलब्ध करैत छथि आ तखन मूल्याकंन करैत छथि। से कयलनि मैथिलीक सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. रामदेव झा, पटना विश्वविद्यालय द्वारा यू.जी.सी.क सौजन्यसँ आयोजित सेमिनारमे। अपन आलेखमे ‘क्षणिका’क सम्बन्धमे स्पष्ट विचार रखलनि। मुदा मैथिलीमे कतेक रामदेव झा छथि। मुन्नाजी: अहाँक प्रारम्भिक रचनाकालमे मूलतः कथा कविता लेखन पर ध्यान देल जाइत छल। अहाँक ओइसँ इतर विहनि कथा लेखनक प्रति उत्सुकता आ रचनाशीलता कोना आएल। अमरनाथ: हम १९७३ ई.क गर्मीमे एक मास औद्योगिक नगरी बोकारो रहि बितौने रही। ओतए हम पहिल बेर लगसँ मशीनक घरघड़ाहटिकेँ सुनने रहियैक, लोककेँ दोगैत देखने रहियैक। हमरा लागल रहए जे आब जे समय आबि रहल अछि, ताहिमे मनुष्यकेँ समयक प्रबन्धन करए पड़तैक। कहि सकैत छी जे ‘समय’ लोकक वैह अत्यंत महत्वपूर्ण भऽ जयतैक। एहन स्थितिमे महाकाव्य अथवा दीर्घ कथा/ उपन्यास पढ़ऽ लेल समय नहि रहतैक। मुदा तथापि लोक साहित्य पढ़ऽ चाहत। आ तैँ पैघसँ पैघ बात कहबा लेल हम छोट-छोट कथा लिखय लगलहुँ। पछाति सकल ‘क्षणिका’ ‘विहनि कथा’ संग्रहक रूपमे प्रकाशित भेल। मुन्नाजी: अहाँ चारि दशक पहिने विहनि कथाक प्रति एतेक क्रियाशील रहिऐ, आइयो ई निरंतरता बनौने छी। तहन अहाँक अकादमीमे स्थान पौलाक पछाति विहनि कथापर कोनो काज किएक नञि भेल, अकादमीक स्तर पर उदासीनता किए? आगामी समयमे विहनि कथाक लेल अकादमी द्वारा कोनो स्वतंत्र क्रियाकलापक (यथा-विहनि कथा संग्रहक प्रकाशन/कोनो कार्यशालाक आयोजन) योजना अछि आ समायोजन करबाक विचार अछि? अमरनाथ: एकरा उदासीनता नहि, प्राथमिकता कहबाक चाही। अकादमी द्वारा कतेक कार्य भेल अछि, भऽ रहल अछि। अगिला परामर्शदातृ समितिक बैसकमे विहनि कथापर विशेष ध्यान देल जाएत। विहनि कथाक सन्दर्भमे विमर्श, पुस्तक आदिक प्रकाशनपर विचार होएत, आ से एहि द्वारे नहि जे हम स्वयं विहनि कथा लिखैत छी। ई आवश्यक एहि हेतु अछि जे एहिपर एखन धरि विचार नहि भेल अछि। मुन्नाजी: मैथिलीक क्षेत्र छोट छै। तैयो रचनाकारक समूहबाजी एकरा गरोसने जा रहल अछि। ई एखनो सार्वभौमिक नञि अछि। आ से चीज पुरस्कारक हेतु चयन आ वितरणमे सेहो देखार होइत अछि। अहाँ एहिसँ कतेक धरि सहमत वा असहमत छी? अमरनाथ: मुन्ना जी, हमहुँ अहीँ जकाँ लेखक छी। जे केओ समूहमे नहि छी, स्वतंत्र लेखक छी, स्वाभिमानक संगे लिखि रहल छी, एहि यंत्रणाक दंशकेँ सहि रहल छी। मुदा मैथिलीक संसार आब छोट नहि। श्री ‘गजेन्द्र ठाकुर’जी मैथिलीकेँ “विदेह” पत्रिका द्वारा सम्पूर्ण संसारमे पहुँचा देलनि। ‘मिथिला दर्शन’ मैथिलीक भविष्य बाँचि रहल अछि, आ अहाँ सन संघर्षशील युवा रचनाकारक हाथमे मशाल अछि। आब अहीँ कहूँ, ‘कूप-मंडुक’क आवाज कते दूर धरि जाएत? मुन्नाजी: साहित्य अकादमी द्वारा बड्ड रास पुरस्कार (विभिन्न विधा पर) देबाक घोषणा कएल गेल अछि, मुदा ओहि सभ विधा आ स्तरपर उत्कृष्ट रचना आ रचनाकारक अभाव सन अछि तथापि पुरस्कार दऽ देल जाइत अछि। तकर पछाति एहि निर्णयपर पक्षपातक आरोप लगैत रहल अछि किएक? अमरनाथ: अहाँक पीड़ा हम बुझैत छी। वैह पीड़ा हमरो मनमे अछि। एहन-एहन पुरस्कृत पोथी जँ आन-आन भाषामे अनूदित होएत तँ लोक हँसत हमरा सभपर, मैथिली साहित्यपर। तेँ हमर स्पष्ट मंतव्य अछि जे उत्कृष्ट पोथी नहि रहैक तँ उचित थिक जे ओहि वर्ष मैथिलीकेँ पुरस्कार नहि भेटैक। मुन्नाजी: साहित्य अकादमी पुरस्कारक चयनक आधार की अछि, व्यक्तित्व आ कृतित्व आकि भाय-भैय्यारीमे लिप्त भऽ एकरा परोसि/ बाँटि देल जाइत अछि। अमरनाथ: बहुलांशमे जे होइत रहलैक अछि, सैह अहाँ कहलहुँ अछि। परंतु से ने उचित अछि आ ने मैथिलीक हितमे अछि। निश्चित रूपसँ लेखकक कृतिपर पुरस्कार भेटबाक चाही। ई ध्यान राखब आवश्यक अछि जे अकादमीक पुरस्कार पुस्तकपर भेटैत छैक। अकादमी ने तँ ‘लाइफ टाइम एचीवमेंट’ पुरस्कार दैत छै आ ने सांत्वना पुरस्कार। एहि सम्बन्धमे साहित्य अकादमीमे मैथिलीक प्रतिनिधि डॉ. विद्यानाथ झा ‘विदित’केँ विशेष साकांक्ष रहबाक चाहियनि। मुन्नाजी: आ अमरनाथ बाबू अंतमे अपने सँ साहित्य आ अकादमी दुनू अनुभवक आधार पर नवरचनाकारक वास्ते कोनो संदेश चाहब जाहिसँ आगू निश्शन रचना आ रचनाकारे मैथिलीमे उपलब्ध हुअए। अमरनाथ: अकादमीक अनुभव कोनो नीक नहि अछि। मैथिलीक विकासक सुनियोजित योजनाक प्रारूप नहि बनि सकलैक। तखन संघर्ष करैत छी, ठठै छी, मान-अपमानपर ध्यान नहि दैत छी। तकर परिणाम अछि जे मैथिलीक व्यापक हितमे किछु काज भेल अछि आ किछु काज भविष्यमे होएत। मैथिलीक प्रतिनिधि डॉ. विद्यानाथ झा ‘विदित’क नेतृत्वमे एतबा भेल अछि जे ई आब मुट्ठी भरि लोकक परिक्रमा नहि कऽ विशाल जनसमुदाय आ लेखक बीच ई पहुँचल अछि। साहित्यिक जीवनक अनुभवसँ हम उत्साहित होइत रहलहुँ अछि। तकर कारण अछि जे पाठकक स्नेह हमर मनकेँ लिखबा लेल प्रेरित करैत रहल अछि। तखन सन्देश! युवा लेखकक प्रति हम आस्थावान छी। आलोचककेँ ध्यानमे राखि कऽ साहित्य नहि लिखबाक चाही आ ने आन भाषा-साहित्यक अनुकरण होएबाक चाही। युवा लेखककेँ विभिन्न भाषाक महत्वपूर्ण ग्रंथ पढ़बाक चाहियनि, विश्वमे आबि रहल साहित्यक विभिन्न धारासँ परिचित होइत रहबाक चाहियनि आ बीच-बीचमे पर्यटन-परिभ्रमण करैत रहबाक चाहियनि। मुन्ना जी, जे किछु लिखैत छी तकरा आत्मसात कऽ लिखबाक चाही। कथा, कविता, उपन्यास, नाटक अथवा कोनो आन विधाक रचना कल्पित नहि होइत छैक आ ने गढ़ले जाइत छैक। लेखन सेहो ईमानदारी मंगैत छै। क्षमा करब मुन्ना जी, हम उपदेशक नहि बनय चाहै छी, मुदा अहाँक प्रश्ने तेहन छल! १२ डॉ. तारानन्द वियोगीसँ मुन्नाजीक भेल गप्प-सप्प          मैथिली विहनि कथाक सशक्त हस्ताक्षर डॉ. तारानन्द वियोगीसँ मुन्नाजीक भेल गप्प-सप्प मुन्नाजी:अपनेकेँ सर्वप्रथम बाल साहित्यपर अकादेमी पुरस्कारक लेल बधाइ। अहाँ जहिया विहनि कथा लेखन प्रारम्भ केलहुँ मैथिली विहनि कथा कतऽ छलै, अहाँक विहनि कथा लेखन दिस कोना प्रवृत्ति जागल। तारानन्द वियोगी:हम जहिया विहनि कथा लिखब शुरू केने रही, एक विधाक रूपमे मैथिली विहनि कथाक कोनो मोजर नै रहैक। ई बात जरूर छल जे छोट-छोट कथा सभकेँ विहनि कथा मानि कऽ “मिथिला मिहिर”क विशेषांक सेहो बहार भ गेल छल। अनियतकालीन पत्रिका सभमे छोट-छोट कथा सभ यदा-कदा प्रकाशित होइत रहैत छल। मुदा एकर सभक औकाति “बोझ परहक आँटी” सँ बेसी किछु नै छल। पत्रिका सभ, “मिथिला मिहिर” सेहो, एहि कोटिक रचनाकेँ खाली बचल जगहकेँ भरबाक लेल “फीलर”क रूपमे उपयोग करै छल। कथाकेँ अंग्रेजीमे शॉर्ट-स्टोरी कहल जाइ छै। तकर शब्दानुवाद “विहनि कथा” मैथिलीक विद्वान लोकनि, आलोचक लोकनिमे प्रचलित छल। आचार्य रमानाथ झा शॉर्ट-स्टोरीकेँ विहनि कथा की कहि देलनि जे मैथिलीमे भेड़ियाधसान परिपाटी चलि पड़ल। ओहुनो भारतीय कथा-साहित्यक तुलनामे मैथिली कथाकेँ जँ देखबै तँ पाएब जे आकारक दृष्टिमे मैथिलीक कथा छोट होइत अछि। आचार्य लोकनिक मतेँ यएह भेल विहनि कथा। तखन आइ जाहि साहित्यकेँ अहाँ विहनि कथा कहैत छिऐक तकरा लेल मैथिली लगमे कोनो स्पेस नै छलै। ने साहित्यमे, ने विद्वान लोकनिक मगजमे। विभिन्न देशी-विदेशी विहनि कथा सभकेँ यत्र-तत्र पढ़ैत-गुनैत हमरा कथा आ विहनि कथाक पार्थक्यक अवगति भेल। हम देखलौं जे एहि दुनू रचना विधामे ने मात्र आकारमे, अपितु उत्स, स्वभाव आ प्रभावमे सेहो एक दोसरासँ सर्वथा भिन्न अछि। मैथिलीक भंडार दिस ताकलहुँ तँ देखल जे अनेक वरेण्य साहित्यकार जानैत-अनजानैत एहि क्षेत्रमे किछु सर्जनात्मक काज कऽ गेल छथि। हमरा सभसँ पहिने ई जरूरी लागल जे विहनि कथा विधाक संरचना, स्वरूप आ स्वभावपर किछु बात स्पष्ट करी। एहि सन्दर्भमे हम कएकटा लेख लिखलहुँ। स्वयं हम मूलतः एक सृजनात्मक लेखक छी, तेँ अपनहुँ विहनि कथा लिखऽ लगलहुँ। ताहि समय (१९८३-८५) मे हम “कोसी-कुसुम” पत्रिकाक संग जुड़ल रही। बातकेँ स्पष्ट आ जगजिआर करबाक लेल हम “कुसुम”क एक विशेषांक विहनि कथापर सम्पादित कएल। बादमे “हालचाल”क संग जुड़लहुँ, तँ ई क्रम आर आगू बढ़ल। मुन्नाजी:विहनि कथाक स्वभाव की अछि? ओहि सन्दर्भमे मैथिली विहनि कथा कतऽ देखाइए? कथाकार-कवि लोकनि विहनि कथा रचना आन्दोलनक प्रारम्भमे जुड़लाह मुदा समयान्तरे हुनकर ऐ सँ दूर होइत गेनाइ की प्रदर्शित करैत अछि? तारानन्द वियोगी:विहनि कथा आत्यन्तिक रूपमे एक “प्रो-एक्टिव” विधा थिक। ओहुनो अहाँ देखबै जे, जे रचना जतेक सरल आ संप्रेषणीय होइत अछि, ओकरा पाछू लेखककेँ ओतबे बेसी परिश्रम करऽ पड़ैत छैक। विहनि कथाक तँ एतेक “सेन्सिटिव” मिजाज होइत छैक जे एक वाक्य जँ अहाँ फालतू लिखि गेलहुँ तँ ओ दूरि भऽ जाइत अछि। एतेक परिश्रम के करत, जँ करत तँ ताहिमे निरन्तरता कोना बनौने राखि सकत? एखनो अहाँ देखिते छिऐक जे एक सुव्यवस्थित विधाक रूपमे विहनि कथाकेँ मैथिलीमे प्रतिष्ठा नै भेटि सकलैक अछि। फल अछि जे लोक दोसर-दोसर विधामे, जे प्रतिष्ठित अछि आ जाहिसँ ओकरा सहज रूपेँ स्वीकृति भेटि सकैक, ताहिमे कलम अजमबैत छथि। यएह मुख्य कारण भेल जे लेखक लोकनि विहनि कथा-लेखनमे निरन्तरता नै बनौने राखि सकलाह। विहनि कथापर केन्द्रित एक पत्रिका जँ मैथिलीमे हो तँ एहि स्थितिकेँ पार कएल जा सकैत अछि। हमर अप्पन स्थिति अछि जे चहुँ दिस हमरा काजे-काज देखा पड़ैत अछि, अपन सक्क भरि तकरा सभकेँ सम्हारबाक, स्थिति स्पष्ट करबाक, जतबा जे प्रतिभा अछि तदनुरूप एक मानदंड गढ़बाक काजमे लागल रहैत छी। अहाँ सभ आगू बढ़ब तँ निश्चिते हमरा संग लागल पाएब। ओहुनो, हमर सोच अछि जे “जो पीछी आ रहे उन्हीं का, मैं आगे का जय-जयकार”। मुन्नाजी:२०म सदीक अन्तमे अहाँ सभ (प्रदीप बिहारी सेहो) मैथिली विहनि कथाक संग्रह आनि अपन निश्सन उपस्थिति दर्ज केलहुँ, मुदा कथा आलोचक द्वारा एकर निङ्गेश बुझि टारि देल गेल, एकर की प्रमुख कारण छल? तारानन्द वियोगी:देखू मुन्नाजी, हमरा सभक पीढ़ी बहुत संघर्ष कऽ कऽ आगू बढ़ल अछि। पुरातनपंथी लोकनि सेहो हमरा सभक विरुद्ध आ कम्यूनिस्टकेँ सेहो हमरा सभसँ दुश्मनी। साहित्यमे नवाचार दुनूकेँ समान रूपेँ नापसिन्द। एहना स्थितिमे किनकासँ हम मोजर मांगब आ के हमरा मोजर देताह? मैथिली आलोचना बहुतो तरहेँ अनेक सीमासँ घेराएल रहल अछि। एहि कारणेँ बहुतो लोक एकरा अविकसित धरि कहैत छथि। एहि सीमा सभक अतिक्रमण आब शुरू भेल अछि। हमहूँ ठोड़े काज “कर्मधारय”मे आ आनो ठाम केलहुँ अछि। हमरा पीढ़ीमे प्रदीप बिहारी विहनि कथा लिखलनि, देवशंकर नवीन, विभूति आनन्द लिखलनि। शिवशंकर श्रीनिवास, अशोक, रमेश लिखलनि। हिनका सभक रचनाकेँ आइ पढ़ब तँ अहाँकेँ आक्रोश हएत जे ताहि दिनमे किएक ने एकरा बूझल-गुनल गेलै? खएर, जे भेल से भेल। आइ आरो सघनता-गम्भीरताक संग काज करबाक बेगरता छैक। अहाँ सभ आब उल्लेखनीय काज करब तँ अवश्ये मोजर हएत। बदलल परिस्थितिक अहसास अहूँ सभकेँ जरूरे होइत हएत। मुन्नाजी:२१म सदीक प्रारम्भमे मध्यम पीढ़ीक रचनाकार द्वारा ठाढ़ कएल आधारकेँ आगू करैत नव पीढ़ी एकरा जगजियार कऽ रहल छथि। अहाँ एकर वर्तमान दशा आ आगूक दिशा मादे की कहब? तारानन्द वियोगी:विहनि कथाक क्षेत्रमे गम्भीरताक संग काज करएबला लोकक एखनहुँ अभाव छैक, से हमरा प्रतीत होइत अछि। किनकहुँ एक रचना जँ सुन्दर देखैत छियनि तँ लगले दोसर रचना औसतसँ नीचाँक देखा पड़ि जाइत अछि। एना किएक होइत छैक? स्पष्ट अछि जे बोध आ श्रमक मानक ओ लोकनि बनौने नै राखि पाबि रहल छथि। दोसर बात जे हमरा जरूरी लगैत अछि- भने बत्तीसे पेजक किएक ने हो- प्रत्येक रचनाकारक एक संग्रह जरूर एबाक चाही। कोनो उत्साही लोक एहि दिस सचेष्ट होथि तँ विहनि कथापर एक लेखन-कार्यशालाक आयोजन कएल जाए। तात्पर्य जे सांस्थानिक उत्साहक संग एहि दिशामे काज करबाक बेगरता छैक। मुन्नाजी:मैथिलीये विहनि कथाक समकालीन पंजाबीक “मिन्नी कथा”, ओड़ियाक “क्षुद्र कथा”, तमिलक “निमिषा”, मलयालमक “क्विन्तेर” राष्ट्रीय स्तरपर स्थापित होइत देखाइए मुदा मैथिली एहि पगपर अन्हराएल सन? एकर पाछाँ की कारण अछि, वा कमी अछि? तारानन्द वियोगी:मैथिलीमे मानक काजक अभाव नै छै, आ ने भाषामे वा भाषाकर्मी लोकनिमे क्षमताक अभाव छै। सांस्थानिक रूपसँ थोड़बे दिन काज कऽ कऽ देखियौ ने, भारतीय साहित्यक उपवनमे मैथिली विहनि कथाक फूल सेहो तेहने भकरार लागत जेना पंजाबी, उड़िया वा मलयालमक। मुन्नाजी:जहिना अहाँ सभकेँ (अहाँ आ बिहाईजी केँ) उपेक्षित रखबाक प्रयास भेल, तहिना आइयो कथालोचक द्वारा नवका पीढ़ीक ऊर्जावान रचनाकार वा विहनि कथाक प्रति समर्पित रचनाकारक कोनो नोटिस नै लेल जा रहल अछि। एहिमे कोनो कुटीचालि अछि वा आर किछु? तारानन्द वियोगी:एहि प्रश्नक उत्तरमे हम दूटा बात कहब। पहिल तँ ई कहब जे के लेत अहाँक नोटिस? ककरा मोजर देने अहाँ मोजरबला लोक हएब? एतेक विवेकी आ क्रान्तिदर्शी लोक अहाँकेँ के देखाइत छथि? हम तँ साँच-साँच कहै छी मुन्नाजी जे हमरा एहन लोक क्यो नै देखाइत छथि। पहिने गुलामीक समय रहै तँ महाराज दरभंगाक मोजर देने राताराती लोक मोजरबला भऽ जाइ छला। आब ई भिन्न बात छै जे एहि भ्रममे महाराजक विवेकसम्पन्नता जिम्मेवार होइ छल आकि कोनो आन स्वार्थ? साहित्य अपन स्वभावेसँ क्रान्तिकारी होइत अछि। जँ ओ वास्तवमे एक सही साहित्य हो। एहेन साहित्य किछु लेबाक लेल नहि अपितु सदैव देबाक लेल लिखल जाइत अछि। दोसर बात हम ई कहब जे अहाँ मोजर वा नोटिसक ख्याल केने बिना काज करू। कोनो सार्थक रचना जँ कलमसँ बहराए तकर संतोषकेँ सेलिब्रेट करू जे “जइ धरतीक अन्न-तीमन खेलिऐ तँ ओकरा लेल काजो केलियै”। ओना ईहो कहि दी जे हमरा सभक लेखनारम्भ कालमे जतेक कुहेस आ जाली पसरल रहैताहिमे आब बहुत परिवर्तन भेलैए। आलोचनोक परिदृश्य बदललैए आ पाठकक व्याप्ति सेहो बढ़लैए। इन्टरनेटक तँ एहिमे कमाल केने अछि। मुन्नाजी:वर्तमानमे रचनाकार सबहक मैथिली विहनि कथाक प्रति रुझानक बादो मैथिलीक विभिन्न समिति-संस्थाक प्रतिनिधि सबहक एकरा प्रति विरोध की दर्शाबैए? मैथिली विहनि कथाकेँ आर समृद्ध करबा लेल आर की सभ काज कएल जाए? मैथिली विहनि कथाक भविष्य की देखैत छी? एकरा स्थापित करबा लेल कोनो विशेष रुखि? तारानन्द वियोगी:विहनि कथाक भविष्य हम बहुत नीक देखै छी। मैथिली विहनि कथाक सेहो। अहाँ पुछब जे तकर कारण? कारण ई नै जे लोक आब बड्ड व्यस्त भऽ गेलैए तेँ छोट रचना बेसी पठनीय साबित भऽ सकत। वास्तविकता तँ ई अछि जे एखनो दुनियाँ भरिमे सभसँ बेसी उपन्यासे विधाक रचना पढ़ल जा रहल अछि। विहनि कथाक भविष्य वस्तुतः एकर स्वभावक कारणेँ उज्जवल छैक। एहिमे निहित व्यंग्य आ मार्मिकता आजुक सन्दर्भमे अति प्रासंगिक अछि। आजुक लोकक संवेदना क्षमता जाहि हिसाबे भोथ भेल अछि, एक सही विहनि कथाक ओज ओकर ओंघी उतारि सकैत अछि। १३ अनमोल झा सँ युवा विहनि कथाकार एवं समालोचक मुनाजीक अन्तरंग गपशप राग द्वेष, भेदभाव, मैथिलीक उठापटकसँ दूर एकान्त भऽ अपन प्रारम्भिक रचना समएसँ आइ धरि अनवरत विहनि कथा लेखनमे लीन श्री अनमोल झा सँ युवा विहनि कथाकार एवं समालोचक मुनाजीक अन्तरंग गपशप: मुन्नाजी: भाइ नमस्कार। सामान्यतः रचनाकार सभ कथा-कवितासँ लिखब शुरू करैत छथि मुदा अहाँ विहनि कथासँ रचना लिखब प्रारम्भ कऽ विहनि कथेकेँ प्रमुखतासँ लिखैत रहलौंहेँ। एकरा प्रति रुचि वा आदर कोना जागल? अनमोल झा: नमस्कार भाइ। बहुत-बहुत नमस्कार। शुरू तँ हम केने रही- “बाबा कहथिन महरानी” कथासँ जे हमर पहिल रचना छल। मुदा तकरा बादेसँ हम विहनि कथा लिखऽ लगलौं। जहाँ धरि रुचि आ आदरक प्रश्न अछि भाइ, से निश्चित रूपसँ हम कहब जे ऐ लेल हम “सगर राति दीप जरय” (कथा गोष्ठी) सँ बहुत उपकृत होइत रहलौंहेँ। हम दोसर कथागोष्ठी जे २९.०४.१९९० ई. मे श्री जीवकान्तअ जीक संयोजनमे भोला उच्च विद्यालय, डेओढ़मे भेल रहए, तहियासँ जुड़ल छी। आ ओइसँ लुरि-भास सभ सिखैत रहलौंहेँ। ओना कथा गोष्ठीमे कथाक प्रधानता रहैत अछि। एम्हर आबि कऽ थोड़-थोड़ विहनि कथा सभ सेहो पढ़ल जाइत अछि, जकर हमरा आतुरताक संग प्रतीक्षा रहैत अछि। अन्य भाषामे विहनि कथा चिन्हार भऽ स्थापित भऽ गेल अछि। मैथिलीयोमे कथाक संगे-संग भारतक सभ भाषा लग ई ठाढ़ हो, स्थापित हो, तँए हम विहनि कथेकेँ प्रमुखता दऽ रहलौं अछि। मुन्नाजी: विहनि कथाक अतिरिक्त कथो लिखलौं आ से छपबो कएल। दुनूक मध्य की समानता आ भिन्नता अछि? दुनूमे सँ जे एकटा पसिन्न करए लेल कहल जाए तँ ककरा पसिन्न करब आ किएक? अनमोल झा: हमर एखन धरि १६० टा विहनि कथा मैथिलीक विभिन्न पत्र-पत्रिका आ संकलनमे प्रकाशित अछि, जकर सभ पत्र-पत्रिका आ संकलन हमरा लग उपलब्ध अछि। एकर अतिरिक्त आरो कतौ छपल अछि आ से हमरा सूचना नै अछि से सभ छोड़ि कऽ। आ तहिना सतरहटा कथा सेहो प्रकाशित अछि। कथा आ विहनि कथाक मध्य समानता आ भिन्नताक बात पुछैत छी से हमरा जनैत उपन्यास आ कथामे जे समानता वा भिन्नता अछि सएह कथा आ विहनि कथामे अछि। दुनूमे सँ निश्चित रूपे हम विहनि कथाकेँ पसिन्न करब। कारण ऐमे जे मारक क्षमता होइत अछि से आन कोनोमे नै। आ सफल विहनि कथाक ईएह गुण अछि जे ओ पाठककेँ बिना मर्माहत केने नै छोड़ि सकैत अछि। मुन्नाजी: विहनि कथाक अतिरिक्त बाल कथा सेहो लिखैत रहलौं अछि, आर की की लिखैत छी? सभ तरहक लेखनक की उद्देश्य? अनमोल झा: बाल रचना लिखैत हमरा नीक लगैत अछि तैं लिखैत छी। जखन हम ई लिखैत छी तँ अपना-आपकेँ बालपनमे अनुभव करैत छी जे नीक लगैत अछि। एकर अतिरिक्त कथा, कविता, रिपोर्ताज लिखैत रही आ एखनो हल्का-फल्लक लिख लैत छी। एकर सबहक पाछाँ कोनो तेहेन उद्देश्य नै अछि। मुदा विहनि कथा हमर प्राण छी आ तैं एकरे सभटा समर्पित अछि। मुन्नाजी: मैथिलीमे विहनि कथाक कोनो मोजर वा पुछारि नै छै। विहनि कथाकारक तँ कोनो नामे निशान नै बुझल जाइछ। एहन स्थितिमे जगजियार हेबासँ बेसी हेरा जएबाक सम्भावना अछि। ऐ स्थितिमे अपनाकेँ कोना पबै छी? अनमोल झा: हम जतऽ छी ठीक छी। मैथिलीमे ओनाहो बड़ पेंच-पाँच छैक। बिना पैरबी, पाइ वा पदक किछु नै होइत छैक आ से हमरा लग नै अछि तैं हेरा जाएब वा जगजियार होएब ई बिना माथामे रखने विहनि कथा लिखैत छी आ लिखैत रहब। मुन्नाजी आब मैथिलीमे विहनि कथाक मोजर वा पुछारि नै छैक से नै कहियौ। यदि अहाँ सन समर्पित लोक आर थोड़बो भेटि जाइ मैथिलीकेँ तँ अपने ने मोजर भऽ जेतै एकर। मुन्नाजी: अहाँ एखन धरि ढेर रास विहनि कथा लिखि गेल छी। संख्यात्मक बलेँ बड्ड मजगूत छी। मुदा किछु रचना कमजोर बनि सोझाँ आएल अछि। तँ अहाँकेँ नै लगैछ जे बेसी लिखबासँ बेसी आवश्यक अछि जे कम्मे आबए मुदा ठोस रचना आबए? अनमोल झा: अहाँक कहब यथार्थ अछि भाइ। ओना धान कुटलापर चाउरमे खुद्दी हएब स्वाभाविक अछि। खुद्दीमे चाउर नहि ने देखाइ अछि अहाँकेँ। ओना अहाँक सुझावक स्वागत अछि। हम एकर ध्यान राखब। मुन्नाजी: अहाँकेँ डेढ़ दशकक अपन विहनि कथा यात्रामे की अनुभव रहल। तहियासँ आइक स्थितिमे की अन्तर छै। अनमोल झा: डेढ़े दशक किएक कहैत छी मुन्नाजी। दू दशक ने कहियै। हमर पहिल प्रकाशित रचना २ टा विहनि कथा घृणा-स्नेह आ विवश चेतना समितिक स्मारिका विद्यापति स्मृति पर्व १९९१ ई. मे छपल अछि। खएर छोड़ू, काजक गप करी। विहनि कथा यात्राक मादे की कहू भाइ, हमरे सन थेथर लोक अछि जे १९, २० बरख सँ एकरा पकड़ि कऽ लेखन करैत रहल। बड़ दुरूह रस्ता छल तखन (एखन नै) आ तैं बहुत गोटा ऐ विधामे आबि कऽ फेर अपन कथा-कविता दिस चल गेलाह। देखलन्हि जे नाम ने जस तँ की करब एतऽ। ऊपरसँ उपहासे। ओना आब पुछबनि तँ कहता ओ सभ एकर जन्मदाते हम छी तँ हम छी। मुदा हमरा ऐ विधामे मोन लगैत अछि आ ऐ बले लोक चिन्हतो अछि हमरा। एखन पहिलुका सन स्थिति नै रहलै। विहनि कथा मैथिलीमे अपन स्थान बना लेने अछि, जकर प्रमाण पत्र-पत्रिकाक विहनि कथा विशेषांक आ सभ पत्र-पत्रिकामे विहनि कथाक रहब अछि। एकर भविष्य नीक अछि। लोककेँ कथा-उपन्यासकेँ पढ़बाक पलखति नै छैक एखन। एहन स्थितिमे ओ सभ बात विहनि कथामे कनिये कालमे भेटि जाइत छै। तैँ एकर पाठको वर्ग तैयार भऽ गेल अछि। दिनानुदिन विहनि कथाकारो सभ उभरि कऽ आबि रहलाहेँ आ से सतति रचनाशील छथि। आजुक परिप्रेक्ष्यमे विहनि कथाक तुलनात्मक स्थिति नीक अछि, बहुत नीक जे रचनाकार सभ थोड़े लिख कऽ पड़ा नै जाइत छथि आन विधा दिस। मुन्नाजी: अहाँ अपन सर्वस्व ऊर्जा विहनि कथामे लगा रहल छी। ऐ यात्रामे आर के सभ सहभागी छथि आ हुनकर सभक की रुखि छनि। अनमोल झा: हमर ऐ यात्रामे श्री सत्येन्द्र कुमार झा, श्री गजेन्द्र ठाकुर, श्री मुन्नाजी, श्री अमलेन्दु शेखर पाठक, श्री मिथिलेश कुमार झा, श्री रघुनाथ मुखियाक संग आर कतेको नव लोक हमरा संग आ सहभागी छथि। आ हिनका सभसँ मैथिली विहनि कथा बहुत आशा रखैत अछि। हिनका सभक रुखि नीक छनि। ऐमे श्री सत्येन्द्र कुमार जीक तँ एकटा विहनि कथाक संग्रह प्रकाशितो छनि आ दोसर प्रकाशनार्थ ओरियाओल छनि। मुन्नाजी: अन्यान्य कथा साहित्य मध्य मैथिली विहनि कथा कतऽ देखाइछ आ एकर की भविष्य छै? अनमोल झा: अन्यान्य कथा साहित्य लग मैथिली विहनि कथाक पहुँच प्रायः एखन धरि नै भेल अछि। कारण अछि एकरा घरेमे आ अपने लोक मोजर दैक लेल तैयार नै छथि। जे शुरू-शुरूमे सभ भाषामे विहनि कथा अपन जगह पाबै लेल झेलने आ भोगने छल यएह बात एकरो संग भऽ रहल अछि। मुदा एकर भविष्य उज्जवल अछि। दिनपर दिन नीक-नीक विहनि कथा सभ सामने अबैत अछि जे अपन मजगूतीक बात कहैत अछि। मुन्नाजी: अहाँक विहनि कथा संख्याक बलेँ मजगूत होइतो एकर कोनो संगोर सोझाँ नै आएल अछि, आगामी योजना की अछि? अनमोल झा: हमर धरि कोनो संग्रह नै निकलल अछि तकर प्रमुख कारण अछि अर्थ। हम एकटा प्राइभेट कम्पनीमे काज करैत छी। ततएसँ नून-तेलसँ बेसी नै किछु होइछ जे ई सभ किछु करब। कोनो संस्था, प्रकाशक वा व्यक्ति ओकरे पोथी प्रकाशित करैत छथिन जे अपने सम्पन्न हो वा जकर पहिलेसँ पोथी प्रकाशित होनि। हम तहूमे छटा जाइत छी। ओना हमर तीनटा विहनि कथाक पाण्डुलिपि तैयार अछि, तीनटा फाइल कऽके। पहिल विहनि कथाक संग्रहक पाण्डुलिपि जे तीन साल पहिने डॉ. विद्यानाथ झा “विदित” जीकेँ देने रहियनि। ओ कहलनि जे चालीस बर्खसँ कम उमेरक साहित्यकारकेँ साहित्य अकादेमीमे पोथी छापैक प्रावधान छैक, तइमे छपि जाएत। दू सालक बाद कहलनि प्रेसमे अछि। तकरो आब एक सालक करीब भऽ गेलै। कत्तौ पता नै, कोनो सूचना नै। दोसर संग्रहक प्रकाशन लेल श्री गजेन्द्र ठाकुर जीकेँ निवेदन कएल जे श्रुति प्रकाशन बहुत मैथिली पोथी छपैत अछि। एकटा हमरो विहनि कथाक संग्रह छपवा दिअ। ओहो स्पष्ट रूपे नै तँ नै कहलनि, हँ भऽ जेतै आश्वासन देने रहथि। ओकरो कतेक दिन भऽ गेलै। कोनो बात फेर आगाँ नै बढ़ल। तेसर विहनि कथा संग्रहक प्रकाशन लेल कोलकाताक “मिथिला सांस्कृतिक परिषद” लग पाण्डुलिपि जमा कएल अछि। देखियौ की होइत अछि। जखने कतौसँ छपत तखने बुझवै जे छ्पल। आगामी योजनाक मादे पुछैत छी से योजना की रहत भाइ। हमरा सन साधारण लोक लेल कोन योजना आ कथीक योजना? हँ एकटा योजना धरि अवश्य अछि जे विहनि कथा लिखैत रहब, से सदति लिखैत रहब। छपय तँ सेहो नीक, नै छपय तँ सेहो नीक। संग्रह आबए तँ सेहो नीक, नै आबए तँ सेहो नीक। धरि लिखैत रहब विहनि कथा अवश्ये हम। मुन्नाजी: दू दशकक विहनि कथा यात्रामे अपनासँ वरिष्ठ (पुरान वा मध्यम पीढ़ी)क केहेन सहयोग/ विरोधक आभास भेल, हुनकर सभक योगदानक विषयमे की कहबै? अनमोल झा: हमरासँ वरिष्ठ (पुरान वा मध्यम) पीढ़ीक साहित्यकार सभक सहयोग सदति भेटैत रहल अछि। बीच-बीचमे उठा-पटक सेहो ओ सभ खूब करथि। हमर विहनि कथा लऽ कऽ मुँहो-कान खूब घोकचाबथि। हमरा मोन अछि जे विराटनगर कथा-गोष्ठी (१४.०४.१९९२ ई.) मे हमर विहनि कथाकेँ सभ लोकि कऽ हवामे उड़ा देलनि। तकरा बाद सभकेँ खारिज करैत गुरुवर पं. श्री गोविन्द झा हमर ओइ विहनि कथाक प्रशंसा केलनि। हमरा बल भेटल आ हम विहनि कथा लिखिते रहलौं। ओना निश्चय रूपेँ कहए पड़त जे ऐ ठोक-ठाक उठा-पटकमे हमरा हतोत्साह नै, एक प्रकारक बले भेटैत रहल, जे एना नै एना लिखलासँ नीक विहनि कथा बनत। आर एखन वएह लोक सभ पटना कथा-गोष्ठी (२१.०२.२००९) मे हमर विहनि कथा टेक्नोलोजी आ युद्ध क प्रशंसे नै केलनि, भरि रातिमे कएक बेर ओकर बड़ नीक हेबाक चर्चा करैत रहलाह। हमरा ऐ विधामे श्री प्रदीप बिहारी, श्री तारानन्द वियोगीक सहयोग आ योगदान निश्चय रूपसँ भेटल। आ हम हुनका सभसँ आ हुनक विहनि कथा संग्रह सभसँ बहुत किछु सिखलौंहेँ। अस्तु, धन्यवाद भाइ। १४ प्रखर दृष्‍टि‍दर्शी एवं फरि‍छाएल कथाकार श्री दुर्गानन्‍द मंडलजी सँ युवा विहनि कथाकार मुन्नाजीक भेँटवर्ता हम पुछैत छी- मुन्नाजी शब्‍दक जादूगर मैथि‍ली समीक्षाक प्रखर दृष्‍टि‍दर्शी एवं फरि‍छाएल कथाकार श्री दुर्गानन्‍द मंडलजी सँ युवा विहनि कथाकार मुन्नाजीसँ भेँटवर्ताक सारांश अहाँ सबहक आगाँ राखल जा रहल अछि- मुन्ना जी- अहाँ मैथि‍लीक रचना कोना आ कहि‍या प्रारंम्‍भ केलौं, एतेक दि‍न धरि‍ हेराएल वा नुकाएल कि‍ए रहलौं? दुर्गानन्‍द मंडल- जी हम मैथि‍लीक रचना श्री जगदीश प्रसाद मंडल जीक स्‍नेहाशील अजस प्रेरणाक बले 2009मे शुरू कएलहुँ। जहाँतक नुकाएल वा हेराएलक भाव अछि तँ हम कहए चाहब जे हम नै तँ नुकाएल रही आ ने हेराएल रही, हँ तखन अल्हुआ जकाँ झपाएल जरूर रही। मुन्ना जी- अहाँक कथाक गढ़नि‍ बड्ड ठोस होइछ जेना सोनारक एक-एक गॉथल मोती जकाँ अहाँ एहेन शब्‍द प्रयोग कोना कऽ पबै छी, स्‍वभावि‍क रूपेँ वा शब्‍द संगोर मात्र कऽ रचना करै छी? दुर्गानन्‍द मंडल- कथाक गढ़नि‍ प्रयुक्त शब्‍द स्‍वभावि‍क रूपेँ रहैत अछि। संगोरसँ ततबेक दूर जते की गदहाक माथमे सींग। मुन्ना जी- अहाँ कथा पाठ करबाकाल सेहो एक-एक शब्‍दकेँ फरि‍छा श्रोताक सेझाँ राखि‍ ओकर अस्‍ति‍त्‍वकेँ फरि‍छा दैत छी एकर की ध्‍येय? दुर्गानन्‍द मंडल- कथा पाठ करबाकाल एक-एक शब्‍द श्रोता बन्‍धूक सोंझा राखब ओकरा अस्‍ति‍त्‍केँ फरि‍छा देब, कथाकेँ सोझरा दैत अछि। कथा श्रवणीए भऽ जाइत अछि आ श्रोता बन्‍धू श्रवण करैमे सेहो आनन्‍दक अनूभव नि‍श्‍चि‍त रूपेँ होइत छन्‍हि‍। जे एकटा फरि‍छाएल कथाकारक कथाक सार्थकता थि‍क। मुन्ना जी- गैर बाभन वर्गसँ कति‍एल रचनाकारक कति‍येवाक वा नुकएल रहवाक की कारण अपन रचनाक सामर्थ्‍यहीनता वा आर कोनो वि‍शेष कारण? दुर्गानन्‍द मंडल- गएर बाभन वर्गक कति‍आएल रचनाकारक कति‍येबाक वा नुकाएल रहबाक कोनो एक-आधटा कारण नै अछि‍। जँ वि‍स्‍तृत रूपसँ चर्च कएल जाए तँ मैथि‍ली साहि‍त्‍यक क्षेत्र वा ओकर वि‍स्‍तार मात्र एकटा जाति‍ वा वर्ग वि‍शेषसँ देखल जाइत रहल। जेकरा ओ लोकनि‍ अपन पूर्वजक धरोहरि‍क रूपमे अमानति‍ बुझैत रहलाह। मुदा आइ मैथि‍ली साहि‍त्‍यक वि‍स्‍तार ओ अपन सभ परि‍सि‍मनसँ बहरेबाक लेल औना रहल छलीह। मुदा वर्ग वि‍शेषक खि‍ंचल एकटा सीमा-रेखा जेकरा लांघि‍ कऽ बाहर भऽ जाएब बड्ड कठीन छल। ने ि‍सर्फ छल आइयो अछि‍। जेना जँ कोनो गएर-ब्रह्मण-कर्ण-कायस्‍थ वर्गक लोककेँ साहि‍त्‍यसँ अनुराग होइ तँ सभसँ पहि‍ने अपन मातृभाषाक प्रति‍ हेबाक चाही। मुदा जखन ओ मातृभाषा (मैथि‍ली)मे लि‍खए लेल कलम उठबैत छथि‍ तँ बैरि‍अर जकाँ ओहन-ओहन शब्‍द सभ आबि‍ ठाढ़ भऽ जाइत अछि‍ जे ओ अपना जीवनमे तँ अपने नहि‍ये बाजल छलाह अपि‍तु कि‍नको मुँहेँ कखनो-कहि‍यो सुननहुँ नै छलाह। तँ हमर कहबाक भाव मुन्नाजी अपने करीब-करीब बुझि‍ गेल हएब। एतबे नै समए-कुसमए मैथि‍ली साहि‍त्‍य लेखनमे नीकसँ नीक कथाकारक पदार्पण भेल मुदा ओइ कथाकार लोकनिमे सँ अधि‍कांशकेँ वर्ग-वि‍शेष पर्दाक पाछाँ रखलनि‍। मात्र कि‍छु गि‍नल-चुनल कथाकार लोकनि‍केँ पर्दापर आनल गेल। जे वर्ग-वि‍शेषक कोनो ने कोनो रूपमे पछि‍लग्‍गु वा मुँहलग्‍गु बनि‍ हुनकहि‍ शब्‍द आ बोलीकेँ (जे मात्र लि‍खल जाइत, बाजल नै) प्रश्रय दैत रहला। ओना ई अलग बात जे आजुक परि‍स्‍थि‍ति‍ थोड़ैक बदलल सन बुझाइत अछि‍। तहु लेल हमर कहब हएत जे बदलैत परि‍स्‍थि‍ति‍केँ देख गएर ब्राह्मण वा जि‍नका दऽ अपने कहऽ चाहै छी ओ सभ आगाँ आबि‍ रहला अछि‍। आ आरो एता से वि‍श्‍वास अछि‍। मुन्ना जी- अहाँ समीक्षा सेहो लि‍खै छी, समीक्षाक प्रमुख आधार की रखै छी, रचनाकारक व्‍यक्‍ति‍त्‍व वि‍श्‍लेषण वा कृति‍त्‍व वि‍वेचन? दुर्गानन्‍द मंडल- मुन्नाजी, ओना हम कोनो समीक्ष नै छी। आ ने समीक्षा करबाक हमरा सामर्थ्‍य अछि‍। समीक्षा जगतमे एकसँ एक, पैघ समीक्षक सभसँ अपनेक भेँट-घाँट भेल हएत। जे प्रखर समीक्षकक रूपमे जानल जाइत रहलाहेँ। तखन समए पाबि‍ जे कि‍छु एक-आधटा लि‍खलौं। तैसँ हमरा समीक्षक नै मानल जाए। तखन, अपनेक प्रश्‍न- समीक्षामे व्‍यक्‍ति‍त्‍व वि‍श्‍लेषण वा कृति‍त्‍व वि‍वेचन- तँ वि‍चारनीय अछि‍। समीक्षाक प्रमुख आधार कोनो एकटाकेँ नै मानि दुनूकेँ आधार बनाओल जाए।‍ कि‍एक तँ कथाकारक कोनो कथाक समीक्षाक आधार जतबए हुनकर व्‍यक्‍ति‍त्‍व वि‍श्‍लेशन रहै छन्‍हि‍ ततबाए कृति‍त्‍व वि‍वेचन सेहो। तखन खगता ऐ बातक अछि‍, जे कि‍छु ओ कथाक मादे पाठककेँ देमए चाहै छथि‍न ओकरा ओ अपना जीवनमे कतेक अनुशरण करै छथि‍? मुन्ना जी- अहाँक कथाक मुख्‍य वि‍न्‍दु की होइछ, कोनो कथाक कथानक कतए केन्‍द्रि‍त रहैछ? दुर्गानन्‍द मंडल- कथाक मुख्‍य बि‍न्‍दु गाम-घर, सर-समाजसँ जुड़ल समस्‍या आ नि‍दानक संग अपन सभ्‍यता-संस्‍कृति‍केँ यथावत रखनाइ। आ से सभ बि‍न्‍दुपर। मुन्ना जी- गैरबाभन रचनाकारक उपस्‍थि‍ति‍क भवि‍ष्‍य अहाँ केहेन देखै छी, बाभन वा जमल रचनाकारसँ उखरि‍ हेरा जाएब वा अपन फरि‍छएल दृष्‍टि‍ऍ ओइसँ आगु डेग बढ़ा स्‍थापि‍त हएब सन? दुर्गानन्‍द मंडल- हि‍नकर सबहक भवि‍ष्‍य एकदम सवर्णि‍म अछि‍। कारण अहाँ नीकसँ जनै छी जे अपन समाजमे अखनो वैदि‍क व्‍यवहार-चालि‍-चलन ि‍वद्यमान अछि‍ आ से हुनके सबहक बीच अहाँ देखब। नि‍श्‍चि‍त रूपेँ अपने ऐपर वि‍श्‍वास करी जे जँ ओ इमानदारी पूर्वक रचना करता तँ सत्‍यक समीप रहैक कारणे ओ कि‍नकोसँ फरि‍छाएल दूष्‍टि‍ऍं सोझा औताह। तखन खगता ऐ बातक अछि‍ जे ऐ कर्मकेँ अो अपन तपस्‍या बुझथि‍। पूर्ण नि‍ष्‍ठा आ लगनसँ लेखनीकेँ अनवरत रूपेँ साधथि‍। मुन्ना जी- अहाँक कथेपर केन्‍द्रि‍त रचनाक मूल उद्देश्‍य की अछि, एकर अति‍रि‍क्‍त आर की सभ रचना करैत छी? दुर्गानन्‍द मंडल- कथापर केन्‍द्रि‍त रचनाक मूल उद्देश्‍य पाठक बन्‍धुकेँ पूर्ण मनोरंजनक संग समाज बीच व्‍याप्‍त आराजक्‍ता, अंधवि‍श्‍वास, जाति‍-पाति‍ आदि‍केँ दूर करैत एकटा मानवीय मूल्‍यकेँ स्‍थापि‍त करब। जहाँधरि‍ आर-आर रचनाक प्रश्‍न अछि‍। मुन्ना बाबू तै सम्‍बन्‍धमे हम ई कहब जे शुरूहेँसँ अर्थात् जहि‍यासँ पाटीपर लि‍खब छोड़लहुँ पोथीक अध्‍ययन करब शुरू केलहुॅँ तहि‍येसँ साहि‍त्‍यक वि‍धा- कथा, उपन्‍यास, कवि‍ता आदि‍सँ बड्ड सि‍नेह रहल। कहि‍यो काल विहनि कथा, कवि‍ता सेहो लि‍खैत रहलौं। वि‍श्‍वास अछि‍ जे आगाँ और लि‍खब। वि‍देह पत्रि‍काक सम्‍पादक श्री गजेन्‍द्र ठाकुर जीक सि‍नेहसँ हमरा अपनामे सृजनात्‍मक शक्‍ति‍क संचार भेल। बहुत रास एहेन शब्‍द सभ जे मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे अप्रयुक्‍त छल। जेकरा ठेंठ कहल जाइ छलै ओ जखन ठाकुर जीक लि‍खल पोथी कुरूक्षेत्रम अन्‍तर्मनक पढ़ि‍ देलखहुँ आ जनलहुँ तँ आरो वि‍श्‍वास भऽ गेल। मुन्ना जी- भवि‍ष्‍यमे अपन जाति‍-बि‍रादरी (पि‍छड़ल कोनो जाति‍क) लोकक उपस्‍थि‍ति‍क नि‍रन्‍तरता बनेने रहबाले अहाँ कोनो डेग उठाएब वा एकरा अनठि‍या देब उचि‍त बुझब? दुर्गानन्‍द मंडल- भवि‍ष्‍यमे अपन जाति‍-बि‍रादरी (पि‍छड़ल जाति‍क) उपस्‍थि‍ति‍क नि‍रन्‍तरता बनौने रहबा लेल एकरा अनठि‍या देब उचि‍न नै अपि‍तु समए-समएपर नवसँ लऽ कऽ पुरान कथाकार लोकनि‍क बीच ठाम-ठाम चर्चा, परि‍चर्चा, पाँच-दस कथाकार मि‍ल कथा गोष्‍ठि‍क आयोजन, कथा-पाठ आदि‍पर उचि‍त समीक्षादि‍ करब। जइठाम मैथि‍ली पत्र-पत्रि‍काक अनुपलब्‍धता अछि‍ ओइठाम दस-बीस पाठक बना पत्र-पत्रि‍का वा पोथी आदि‍ मंगाएब। ओकरा अपनहुँ पढ़ि‍ दोसरोकेँ पढ़़बाक आग्रह करब। कि‍छु लि‍खबा-पढ़बाक प्रेरणा देब हम उचि‍त बूझब। मुन्नाजी अपने हमरा...... बुझलहुँ। ऐ लेल धन्‍यवाद। १५ श्री मिथिलेश कुमार झासँ हुनक साहित्यिक यात्रा मादेँ मुन्नाजीक भेल गप्प सप्पक मुख्य अंश युवा पीढ़ीक दृष्टि फरीछ निश्शन विहनि कथाकार एवं निबन्धकार श्री मिथिलेश कुमार झासँ हुनक साहित्यिक यात्रा मादेँ मुन्नाजीक भेल गप्प सप्पक मुख्य अंशकेँ अहाँ सबहक सोझाँ राखल जा रहल अछि। मुन्नाजी- अहाँ सक्रियताक संग मैथिली विहनि कथाकेँ अपन रचनाक आदर्श मानि रचनारत छी, कहू जे अपन साहित्यिक रचनाक प्रारम्भ कोना कएल? मिथिलेश कुमार झा- सतमामे पढ़ैत रही । हिन्दी सहित्यक कोनो कविताक अंतमे प्रश्नमालाक बाद भाषा-विस्तारक गतिविधिमे एकटा शीर्षक देल रहै-‘आँधी आई-आँधी आई ’ आ ताहिपर कविता बनेबाक रहै। ततहिसँ हमर साहित्यिक रचनाक आरम्भ अछि। नवम-दशममे आबि मातृभाषाक रूपमे मैथिली रखलहुँ आ रचनाक भाषा स्वभावत: मैथिली भऽ गेल । मुन्नाजी- अहाँ विहनि कथाक अतिरिक्त सुन्दर बाल साहित्य सृजन आ निबन्ध लेखन करैत छी। सभसँ बेशी संतुष्टि कोनो विधाक कोन प्रकारक रचनासँ भेटैछ? मिथिलेश कुमार झा- कोनहु रचनाकारकेँ संतुष्टि तखन भैटै छै  जखन ओ अपन मोनक बात ठीक-ठीक अपन रचनामे कहबामे सफल भऽ जाइत अछि आ ओहि बातकेँ पाठक ठीक ओही रूपमे बुझि जाइत छैक । विधाक बात कही तँ हमरा बुझने भिन्न-भिन्न बातक हेतु भिन्न-भिन्न विधाक खगता होइत छै । सभटा बात एकहि टा विधामे कहब मोसकिल। तैं, कोन विधा हमरा संतुष्टि दैए से कहब कठिन । हँ तखन , कविता हमर प्रिय विधा अवस्स थिक । ओना हम बहुत कम कविता लिखि पबैत छी। मुन्नाजी- अहाँ वर्तमानमे बांग्ला परिवेशमे गुजर कऽ रहल छी, तँ कहू जे बांग्ला मध्य मैथिलीक की अस्तित्व लगैछ, दुनूमे की घटी बढ़ी देखाइछ? मिथिलेश कुमार झा- मैथिली आ बांग्ला दुनू बहिनि थिकीह । पहिने बंगलाकेँ मैथिलीसँ प्राण भेटल छलै । एखन मैथिलीकेँ बंगलासँ प्रेरणा भेटै छै । सम्प्रति रचनाक मात्राक स्तर पर , पाठकक संख्याक स्तरपर , पत्र-पत्रिकाक संख्याक स्तरपर , मातृभाषाक हेतु समर्पित व्याक्तिक संख्याक स्तरपर बंगला मैथिलीसँ  बड्ड बेसी आगाँ ठाढ़ अछि। बंगभाषी आनहु ठाम बसि गेने अपन भाषा नहि छोड़ैत अछि। मैथिलीभाषी अपनहु घरमे हिन्दी छकरै छथि। भाई , कतेक कहब…. बड़ अन्तर छै । मुन्नाजी- अहाँ अपन एकान्त सृजनमे सृजनरत छी, जखन की मैथिली साहित्य मध्य समूहबाजी डेग-डेगपर देखा पड़ैछ। एनामे अहाँक एतेक निश्शन रचना देबाक पछातियो साहित्यपट सँ हेरा जेबाक वा वेरा देबाक सम्भावनाक शंका नै देखाइए? मिथिलेश कुमार झा- हमरा ने तँ गोलैसी करऽ अबैत अछि आ नै ओइमे विश्वास अछि। एकटा सुच्चा रचनाकारकेँ अपन रचनाकर्मसँ सरोकार राखक चाही सन्तकेँ सन्त कहक चाही-बस्स। हेरा जेबाक किंवा वेरा देल जेबाक मादें कोनो शंका हमरा नहि अछि । किएक तँ जे सुच्चा लोक छथि से तँ एना नहिए टा करताह । आ जे गोलैसी केनिहार आ तबेदारी प्रकृतिक स्वार्थी लोक छथि से ककरो नहि, कोन गड़े कखन केम्हर बैसताह से बूझब ब्रह्मो लेल असंभव । तैँ हुनकर चिंता बेकार ! मुन्नाजी- महानगरक व्यस्त जिनगी मध्य अहाँक सोच सामाजिक उकस-पाकसकेँ बड्ड गहींरसँ नापि सृजन करबामे सफल होइत देखार भेल अछि। एकर कोनो विशेष मूल-मंत्र तँ नै अछि। मिथिलेश कुमार झा- महानगरमे रहितो हमर आत्मा गामेमे बसैए । संगहि जीवन-संघर्ष आ सामाजिक सरोकारक अनेक तीत-मीठक अनुभवकेँ हमर मूल-मंत्र अहाँ कहि सकैत छिऐ। मुन्नाजी- अहाँ पत्रकारितामे सेहो अपनाकेँ अजमेलौं मुदा आब ओइसँ विमुखता देखाइछ, ओकर की मूल कारण अछि? मिथिलेश कुमार झा- हम पत्रकारितामे अपनाकेँ एखनहु अजमा रहल छी । के कहलक जे हम ओइसँ विमुख भऽ गेलहुँ ? ‘मिथिला चैम्बरक सनेस’, ‘श्री मिथिला’, ‘मिथिला समाद’, मिथिला दर्शन’, ‘कर्णामृत’ आदि मैथिलीक पत्र-पत्रिकामे हमर आलेख आ रिपोर्ट सभ पत्रकारिता नहि तँ आर की थिक? हँ , तखन वृत्तिक रूपमे सहायक संपादक , रिपोर्टर आदि क्षेत्रमे (हिन्दी पत्रकारितामे) हम फिट नहि भऽ सकलहुँ । श्री संतोष सिंह झा हमरा गौहाटी बजेबो केलाह तँ कतिपय कारणे हम नहि जा सकलहुँ , से बात फराक । मुन्नाजी-मैथिली पत्रकारिताक वर्तमान दशा आ भविष्यक दिशा अहाँक नजरिमे केहेन देखाइछ? मिथिलेश कुमार झा- मैथिलीमे साहित्यिक पत्रिका सभक संगहि ‘समय-साल’ सन समाचार केन्द्रित पत्रिका आ ‘मिथिला दर्शन’ सन पारिवारिक पत्रिका बहार भऽ रहलए । किंतु , बहुत रास  रुचि ओ विषय छैक जाहिपर पत्रिका बहार कएल जेबाक चाही –से धरि कोना हो , विचारणीय। सर्वाधिक आवश्यक बाल-पत्रिका अछि जे नहि बहार भऽ रहल अछि । माने, पत्रिकाक स्तरपर पत्रकारिता एक-भगाह अछि । दैनिक पत्रक नाम पर ‘मिथिला समाद’ निकलि तँ रहलए अवस्स उदा मजगूत नहि भऽ सकलए । सभ मिला कऽ मैथिली पत्रकारिताक वर्तमान संतोषजनक नहि कहल जाए । तखन, एकर भविष्यक प्रति आशा राखि सकैत छी । मुन्नाजी- मैथिली विहनि कथा (विहनि कथा)पर वर्तमान क्रियाकलापेँ एकर वर्तमान आ भविष्य केहेन देखा पड़ैछ। एकरा फरीछ हेबा लेल आओर की सभ कमी देखाइछ? मिथिलेश कुमार झा- मैथिली विहनिकथाक मोजर आरंभ भऽ गेल अछि । वर्तमानमे ई विधा जड़ि जमा लेलक अछि । एकर भविष्य खूब नीक छै आ ई सर्वाधिक पढ़ल जाएबला साहित्यिक विधि बनि जाएत से हमरा पूर्ण विश्वास अछि । एहि विधाकेँ आओर लोकप्रिय बनेबाक लेल आ निस्सन करबाक लेल रचनाकार लोकनिकेँ सचेत भऽ कऽ मेहनति करक चाहियनि। एकर एक-एकटा शब्दक अपन ओजन होइत छैक, तैं धरफरा कऽ विहनि कथा नहि लिखल जेबाक चाही । धरफरी मे रचना कएने ई चुटुक्का बनि जा सकैछ आकि निंगहेस भऽ फेका जा सकैछ। मुन्नाजी- विहनि कथापर पूर्वक पीढ़ी (पुरान आ मध्य) द्वारा कएल गेल काजकेँ अहाँ कोन रूपेँ मूल्यांकन करब। ओकर निरन्तरतामे नवका पीढ़ीक योगदानकेँ कोना सोझाँ आनऽ चाहब? मिथिलेश कुमार झा- विहनि कथापर पुरनका पीढ़ी जे काज कएलनि से आरंभिक काज छलै। ओ लोकनि न्यो तैयार कएलनि, दाबा जतलनि आ ताहिपर नवका पीढ़ी देबाल ठाढ़ कऽ रहल छथि। आबऽ बला खाढ़ी ओइपर महल बनाओत । पुरनका पीढ़ीक समय आ परिवेशसँ एखनुका पीढ़ीक समय आ परिवेशमे बेस अन्तर एलैए। आ तै’, ई अन्तर विहनिकथाक कथ्यक विविधताक रूपमे सोझाँ देखार भऽ रहलए । एना कही जे एखन एकर कथ्य ओ शैलीमे स्वाभाविक रूपें नवीनता ओ विविधता एलैए । जीवन ओ अनुभवक प्रत्येक क्षेत्रमे हुलकी दैत सन लगैए वर्तमानक विहानिकथा। मुन्नाजी- मैथिली बाल साहित्यक स्थिति केहेन देखाइछ। अकादेमी द्वारा बाल साहित्यक घोषणासँ एकर भविष्य कतेक प्रभावित हएत (घटी-बढ़ी दुनू दृष्टिएँ)? मिथिलेश कुमार झा- मैथिली बाल साहित्यक स्थिति दयनीय ओ चिंतनीय अछि। तथापि एहि क्षेत्रमे ऋषि वशिष्ठ, महाकान्त ठाकुर, जीवकान्त, अनमोल जी, वियोगी जी आदि नीक काज कऽ रहलाहेँ। बाल-साहित्यक क्षेत्रमे हम अपनहुँ सचेष्ट रहैत छी। आर अधिक प्रयासक बेगरता अछि। साहित्य अकादेमी द्वारा बाल साहित्य पुरस्कारक घोषणासँ बाल साहित्यकार प्रोत्साहित होएताह। पोथी सभ प्रकाशित होएत। बाल साहित्यक मोजर बढ़त । बाल साहित्यक रचनाकार अपनाकेँ अबडेरल नहि बुझताह । किंतु ,पुरस्कारक लोभमे बाल साहित्यक नामपर अँक‍टा-मिसिया ने छपय लागय से चिंता स्वाभाविक रूपें उभरि आयल अछि । एहि हेतु सभ गोटे सतर्क रही । १६ हम पुछैत छी: बेचन ठाकुरसँ मुन्नाजीक गपशप हम पुछैत छी: विदेह मैथिली समानान्तर रंगमंचक संस्थापक मैथिली नाटक आ रंगमंचक आइ धरिक सभसँ पैघ नाम बेचन ठाकुरसँ मुन्नाजीक गपशप गमैया नाटकक परि‍वेशजन्य आधुनिक मैथिली समानान्तर नाटक आ रंगमंचक सृजनकर्त्ता एवं नि‍स्वा‍र्थ भावनासँ रचनारत श्री बेचन ठाकुर जीसँ हुनक रचनात्मक प्रक्रि‍या मादे युवा विहनि कथाकार मुन्नाजी द्वारा कएल गेल वि‍भि‍न्न प्रश्नक उतारा अहाँ सबहक समक्ष देल जा रहल अछि‍। मुन्नाजी- प्रणाम ठाकुरजी! बेचन ठाकुर- प्रणाम मुन्ना भाय! मुन्नाजी- साहि‍त्यक मुख्य‍: दू गोट वि‍धाक एतेक रास प्रकारमे सँ अपने नाटकक सर्जनकेँ प्राथमि‍कता देलौं कि‍ए? एकर कोनो वि‍शेष कारण तँ नै अछि‍? अहाँक समानान्तर रंगमंच जे आन्दोलन शुरू कएने अछि ओकर मादेँ किछु कहए चाहब। बेचन ठाकुर- मुन्नाजी, अहाँकेँ तँ बुझले हएत जे मैथिलीमे जातिवादी रंगमंच, खास कऽ महेन्द्र मलंगिया (ओकर आंगनक बारहमासासँ लऽ कऽ छुतहा घैल धरिमे ई जातिवादी शब्दावली भरल अछि) आ हुनकर विचारधाराक लोक, कोन तरहेँ पत्र-पत्रिकाक माध्यमसँ आ सरकारी आ गएर सरकारी फण्ड आ सहयोगक माध्यमसँ गएर सवर्णक प्रति गारि आदिक प्रयोग कऽ रहल छथि, ओकर संस्कृतिकेँ तोड़ि कऽ प्रस्तुत कऽ रहल छथि, ओकरा लेल एहेन मैथिलीक प्रयोग कऽ रहल छथि जकरासँ ई सिद्ध हुअए जे ओ सभ मैथिली भाषी छथिए नै, कतौ बाहरसँ आएल छथि। आब मलंगियाक संस्था ई काज हिन्दीसँ मैथिलीमे अनूदित नाटकमे सेहो केलक, रामेश्वर प्रेमक नाटकक मैथिलीमे “जल डमरू बाजे” रूपमे घृणित अनुवाद आ मंचन भेल, गएर सवर्ण लेल तथाकथित छोटहा मैथिलीक प्रयोग कएल गेल, हिन्दीमे रामेश्वर प्रेम ऐ तरहक प्रयोग नै केने छथि, रामेश्वर प्रेम सेहो ई हेबऽ देबा लेल दोषी छथि। हिन्दी सन कोनो भाषा आ मैथिलीकेँ मिश्रित कऽ ओ लोकनि ई सिद्ध करबामे लागल छथि जे ईएह मिश्रित भाषा मिथिलाक भाषा छी, आ ऐ तरहेँ मैथिलीकेँ मारबा लेल बिर्त छथि; किछु थोपड़ीक लोभेँ सेहो ओ ई कऽ रहल छथि। ओना तँ जइ पत्रिका आ सरकारी-गएर सरकारी माध्यममे एकर चर्च होइए ओकर पढ़निहारक संख्या तँ शून्ये अछि मुदा ओ सभ जँ अहाँ पढ़ू तँ लागत जे जे अछि से जातिवादी रंगमंचे अछि, ओना ओ वास्तविकतामे मैथिली रंगमंचक दसो प्रतिशत नै अछि। आ यएह सभ कारण शुरूसँ विद्यमान छल जइ कारणसँ हम समानान्तर रंगमंच पछिला २५ सालसँ चलबैत रहलौं। मुदा एकर कोनो विवरण मैथिलीक जातिवादी पत्रिकामे नै आएल। मुदा जखन पहिल विदेह मैथिली नाट्य उत्सव २०१२ भेल तँ ९०% लोकक समानान्तर रंगमंचक धाह ओइ जातिवादी रंगमंचकेँ/ मानसिकताकेँ बुझा पड़ऽ लगलै। रामदेव झा अपन दूटा पुत्र विजयदेव झा आ शंकरदेव झाक संग मैदानमे आबि गेलाह आ अपशब्दक प्रयोगक शुरुआत केलन्हि। मलंगिया जी अपन दुनू पुत्र ललित कुमार झा आ ऋषि कुमार झाक संग मैदानमे आबि गेलाह आ अपशब्दक प्रयोगक शुरुआत केलन्हि। तँ दुनू गोटेमे (रामदेव झा आ महेन्द्र झा मलंगियामे) समानता फेर सोझाँ आबि गेल। जातिवादी रंगमंच साहित्य अकादेमी पुरस्कारक लेल मलंगियाक नाम उठेलक, कमल मोहन चुन्नू नाटककारकेँ नाटक लेल पुरस्कार देबाक गप केलन्हि आ महेन्द्र मलंगिया लेल ऐ पुरस्कारक अनुशंसा केलन्हि, ओ कहलन्हि जे आइ धरि ई नै भेल अछि जे मैथिलीमे नाटककारकेँ नाटक लेल पुरस्कार भेटल अछि, ओ रामदेव झाकेँ भेटल पुरस्कारकेँ खारिज करैत कहलन्हि जे रामदेव झाकेँ जइ नाटक- एकांकी लेल पुरस्कार भेटलन्हि से कथाकेँ कथोपकथनमे लिखल मेहनति मात्र अछि (मिथिला दर्शनमे हुनकर लेख)। आ जखन महेन्द्र मलंगियाकेँ जातिवादी रंगमंचक “मैथिली एकांकी संग्रह”क ठेका साहित्य अकादेमीसँ चन्द्रनाथ मिश्र “अमर”-रामदेव झा (ससुर-जमाएक जोड़ी)क अनुकम्पासँ भेटलन्हि तँ ओ मैथिलीक (जातिवादी रंगमंचक) १९ टा सर्वश्रेषठ एकांकीमे रामदेव झाक “पिपासा” लेने रहथि, आब लिअ, रामदेव झा सर्वश्रेष्ठ नाटककार भऽ गेलाह!! आ ओइ पोथीक भूमिकामे ओ चन्द्रनाथ मिश्र “अमर”-रामदेव झा केँ खुश रखबा लेल गोविन्द झा आ सुधांशु शेखर चौधरीक मजाक तँ उड़ेनहिये छथि संगमे राधाकृष्ण चौधरी आ मणिपद्मकेँ किए ओ ऐ संग्रहमे शामिल नै केलन्हि, ओइ लेल हास्यास्पद तर्क सेहो देने छथि। गुणनाथ झाकेँ ओ शामिल किए नै केलन्हि!! सर्वहाराक रंगमंचकेँ ओ शामिल किए करितथि, ई संकलन तँ जातिवादी रंगमंचक छल किने!! आ जँ अहाँ जातिवादी रंगमंचक विरोध करब तँ मलंगिया जीक दुनू बेटा ललित कुमार झा, ऋषि कुमार झा फोन नम्बर +२३४८०३९४७२४५३ सँ अहाँकेँ धमकी देत जेना ललित कुमार झा उमेश मण्डल जी केँ देलन्हि वा विजयदेव झा +९१९४७०३६९१९५ नम्बरसँ धमकी देत जेना ओ उमेश मण्डल जी केँ २६ अगस्त २०१२ केँ धमकी देलन्हि। आ आब अहाँ सोचमे पड़ि जाएब जे ई लोकनि कखन एक दोसराक पक्षमे आबि जाइ छथि आ कखन विरोधमे, कखन रामदेव झा नाटककार बनि जाइ छथि आ कखन खारिज भऽ जाइ छथि। जातिवादी रंगमंच आपसमे खण्ड-पखण्ड अछि, मुदा विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन आ विदेह मैथिली समानान्तर रंगमंचक विरोधमे ई सभ एक भऽ जाइत अछि। कमल मोहन चुन्नूकेँ नाटककार जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ लघुकथा संग्रह “गामक जिनगी” लेल टैगोर साहित्य सम्मान भेटलासँ एतेक कष्ट भेलन्हि जे ओ एक बेर फेर “घर-बाहर”मे मलंगिया जीकेँ साहित्य अकादेमी पुरस्कार भेटए, से फतवा जारी कऽ देलन्हि ई कहि कऽ जे मलंगिया जी मैथिलीक (जातिवादी रंगमंचक दृष्टिकोणसँ) सर्वश्रेष्ठ नाटककार छथि, मुदा ऐबेर ओ ई सतर्की केलन्हि जे सर्वश्रेष्ठ समालोचक, लघुकथाकार आ कविक नाम सेहो जोड़लन्हि, आ हुनको सभकेँ साहित्य अकादेमी भेटए से चर्च कऽ देलन्हि, जे आरोप नै लागए। कहबाक आवश्यकता नै जे ऐ लिस्टक सभ समालोचक, लघुकथाकार आ कवि चुन्नू जीक ब्राह्मण जातिक छथि आ दोसरक हुनका पढ़ल नै छन्हि। सर्वहारा वर्ग नीक जेकाँ बुझि गेल जे ई साहित्य आ ई रंगमंच ओकरा लेल नै अछि, से ओ अपनाकेँ ऐसँ कात कऽ लेलक, आ जँ विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन आ विदेह मैथिली समानान्तर रंगमंच नै अबितए तँ मामिला खतमे छल। हम आगाँ २५ साल धरि ई समानान्तर रंगमंच चलबैत रहब। पछिला २५ सालमे जतेक सफलता भेटल अछि ओइसँ हम उत्साहित छी, अगिला पचीस सालमे जँ हम जातिवादी रंगमंचक किरदानीक कारण मैथिलीसँ भागल सर्वहारा वर्गक किछु आर गोटेकेँ मैथिलीसँ जोड़ि सकब आ जे काज हमरासँ छूटि जाएत से अगिला पीढ़ी करत। जातिवादी रंगमंच आब सरकारी आ गएर सरकारी संस्थाक हथियार बनि कऽ रहि गेल अछि, ई ढहब शुरू भऽ गेल अछि, किछु ऊपरी सुधार, नामे लेल सही, ई कऽ रहल अछि। हमर लक्ष्य अछि जे अगिला पचीस सालमे ई जड़िसँ खतम भऽ जाए। मुन्नाजी- अहाँक नाटकक कथानकमे केहेन स्थिति वा परि‍वेशक समावेश रहैए। बेचन ठाकुर- जखन हम परि‍वारक संग वा पड़ोसीक संग गमैया नाच वा नाटक देखैले जाइत रही तँ हुनके सभसँ प्रेरि‍त भऽ नाटकक प्रति‍ अभि‍रूचि‍ जागल आ दि‍नोदि‍न बढ़ैत रहल आ तँइ हमर नाटकक कथानकमे समाजक स्थिति-परि‍स्थिति आ ओकर यथासंभव समाधानक परि‍वेश रहैए। मुन्नाजी- अहाँ जहि‍या नाटक लेखन प्रारम्भ केलौं, कहू जे तहि‍या आ आजुक सामाजि‍क, सांस्कृिति‍क उपस्थापन वा बदलावक प्रति‍ अहाँक नजरि‍ये केहेन स्थि़‍ति‍ देखना जाइछ? बेचन ठाकुर- कओलेज जीवनसँ कि‍छु-कि‍छु लि‍खैक प्रयास करैत रहलौं जैमे नाटक मुख्य रहल। नाटकक दृष्टि‍एँ प्रारंभि‍क सामाजि‍क आ सांस्कृतिक स्थिति तथा आजुक स्थितिमे बड्ड अंतर देखना जाइए। गमैया नाटक जस-के-तस पड़ल अछि‍, कनी-मनी आगू घुसकल अछि‍। मुदा शहरी नाटक अपेक्षाकृत आगू अछि, मुदा ओतए सोचक अभाव अछि‍। मुन्नाजी- आइ नाटक कथानक, शि‍ल्प एवं तकनीकी दृष्टिकोणे उम्दा स्तरक प्राप्तिक संग थि‍येटरमे आबि जुमल अछि‍, अहाँ थि‍येटरमे प्रदर्शित आ गमैया नाटकक बीच कतेक फाँट देखै छी। आ कि‍ए? बेचन ठाकुर- कथानक, शि‍ल्प एवं तकनीकी दृष्टिएँ थि‍येटर आ गमैया नाटकमे बड्ड फाँट देखै छी। दर्शकक आ कलाकारक साक्षरता, स्त्री-पुरूषक भूमि‍का, साज-बाजक ओरि‍यान, इजोतक जोगार इत्यादि‍मे बड्ड फाँट अछि‍। फलस्वरूप गमैया नाटक अपेक्षाकृत पछुआएल रहि‍ गेल अछि मुदा विषय वस्तुमे ई आगाँ अछि‍। मुन्नाजी- गाममे आइयो बाँस-बत्ती आ परदाक जोगारे नाट्य प्रदर्शन होइछ आ दर्शक सेहो जुटैछ तँ अपने गमैया नाटक अतीतक दशा आ भवि‍ष्यक दि‍शा मादे की कहब? बेचन ठाकुर- गमैया नाटकक प्रदर्शनमे दर्शकक भीड़ रहैए। कारण गाम-घरमे मनोरंजनक साधनक सामूहि‍क स्तरपर अभाव छै। शहरक देखादेखी आब गामो-घरक स्थितिमे सुधार भऽ रहलैए। तैं गमैया नाटकक दशा भवि‍ष्यमे अवश्य सुधरत, वि‍श्वास अछि‍। मुन्नाजी- अहाँ एतेक रास वि‍भि‍न्न तरहक नाटक लि‍ख मंचन कैयौ कऽ हेराएल वा बेराएल रहलौं, कि‍ए? मलंगिया जीक रंगमंचक एकटा निर्देशक प्रकाश झा हमरा कहलन्हि जे अहाँ भरि दिन केश कटैत रहैत छी, रंगमंच अहाँ किए ने गेलिऐ! बेचन ठाकुर- हम एकटा नि‍जी शि‍क्षकक दृष्टिएँ अपन वि‍द्यार्थीक बौद्धि‍क वि‍कास हेतु अपन कोचिंगक प्रांगणमे कोनो वि‍शेष अवसरपर, तैमे खास कऽ सरस्वती पूजामे, रंगमंचीय सांस्कृति‍क कार्यक्रमक बेबस्था‍ करै छी जैमे अपन निर्देशनमे वि‍द्यार्थी द्वारा कार्यक्रम संपादि‍त होइए। ओइ तरहेँ दर्जनो नाटकक मंचन सराहनीय ढंगसँ भऽ चुकल अछि‍। मलंगियाजीक जातिवादी रंगमंचक विरोधमे समानान्तर रंगमंच अछि तँ अहाँ हुनका लोकनिसँ की आशा करै छी! (हँसैत) ओना हमर ठाकुर टाइटिल सँ हुनका लोकनिकेँ भेल हेतन्हि जे हम नौआ ठाकुर छी, तेँ ओ ई बाजल छथि। मुदा जँ किओ ई काज कऽ रहल छथि आ अपन संस्कृतिक रक्षा कऽ रहल छथि, जेना नौआ ठाकुर लोकनि, तँ की हर्ज। विद्यापति ठाकुर, जे बिस्फीक नौआ ठाकुर रहथि, केँ बिदापत नाचक माध्यमसँ जिआ कऽ राखलन्हि नौआ ठाकुर लोकनि, विद्यापति आ मैथिलीकेँ हजार साल धरि जिआ कऽ राखलन्हि, तँ ऐमे ककरो किए कष्ट छै? आब तँ ओ लोकनि विद्यापतिकेँ ब्राह्मण बनेबामे लागल छथि। ओना हम बरही जातिक छी, से महेन्द्र झा मलंगिया जी आ प्रकाश झा जीकेँ अहाँ भेँट भेलापर कहि देबन्हि। सूत्रक अभावमे हम हेराएल रही।  मुदा आब प्राप्त सूत्र आ बेबस्थाक कृतज्ञ छी। मुन्नाजी- अहाँ नाटकक अति‍रि‍क्त अओर की सभ लि‍खै छी, सभसँ मनलग्गू कोनो वि‍धाक कोन प्रकारक अहाँ प्रेमी छी आ कि‍ए? बेचन ठाकुर- हम नाटकक अति‍रि‍क्त विहनि कथा, लघुकथा, राष्ट्रीय गीत, भक्तिगीत, कवि‍ता, टटका घटनापर आधृत गीत इत्यादि‍ लि‍खबाक प्रयास करैत रहै छी। गोष्ठीमे उपस्थित भऽ कऽ कथा पाठो केलौंहेँ। सभसँ मनलग्गू वि‍धा  हमर संगीत अछि‍। ओना हमर प्रति‍ष्ठाक वि‍षय गणि‍त अछि‍। मुन्नाजी- जाति‍-वर्ग वि‍भेद अहाँक रचनाकेँ कतेक प्रभावि‍त कऽ पौलक अछि‍, अपने ऐ जातीय वि‍षमताक टापर-टोइयामे अपनाकेँ कतऽ पबै छी? बेचन ठाकुर- जाति‍-वर्ग वि‍भेद हमर रचनाकेँ अंशत: प्रभावि‍त केलक। ऐमे हम अपनाकेँ अपन जगहपर अड़ल पबै छी। मुन्नाजी- नाटक वा अन्यान्य रचनात्मक सक्रि‍यताक मादे अपनेक अगि‍ला रूखि‍ की वा केहेन रहत? बेचन ठाकुर- नाटक वा अन्यान्य रचनात्मक सक्रि‍यताक मादे अपन अगि‍ला रूखक संबंधमे कि‍छु नि‍श्चि‍त नै कहल जा सकैए, समानान्तर रंगमंच तँ चलिते रहत। इच्छा प्रबल अछि‍। जतए धरि‍ संभव भऽ सकत करब। मुन्नाजी- अपनेक अमूल्य उतारा हेतु बहुमूल्य समए देबाक लेल हार्दिक धन्यवाद! बेचन ठाकुर- अपनेक प्रश्नक यथासंभव जबाबसँ अपनाकेँ गौरवान्वित बुझि‍ अपनेकेँ हार्दिक धन्यवाद ज्ञापि‍त करैत हमरो अपार हर्ष होइए। १७. हम पुछैत छी: मुन्नाजी पुरनके जमानासँ लि‍खैत, नव कालमे देखार भेल दि‍ग्‍गज कथाकार श्री धीरेन्‍द्र कुमार जीसँ मुन्नाजी पुछलनि‍ हुनक संपूर्ण कथा यात्राक तीत-मीठ अनुभव जे प्रस्‍तुत अछि‍ अपने सबहक सोझा- (1) मुन्नाजी- धीरेन्‍द्रजी प्रणाम! अहाँ आइसँ कतेक दशक पहि‍ने “मि‍थि‍ला मि‍हि‍र‍”क माध्‍यमे कथा-यात्रा प्रारम्‍भ केलौं। पहि‍ल कथा कोन आ कहि‍या छपल? धीरेन्‍द्र कुमार- नमस्‍कार मुन्नाजी, हम सतरि‍ दशकसँ लि‍खब शुरू केने रही। रमानंद रेणुक सानि‍ध्‍य भेटल छल। मि‍थि‍ला मि‍हि‍रक सम्‍पादक भीमनाथ झा पहि‍ल पहि‍ल कथा प्रकाशि‍त केने छलाह। पहि‍ल कथा कोन अछि‍ से मोन नै अछि‍। (2) मुन्नाजी- एतेक पहि‍ने प्रारम्‍भ भेल कथायात्रा आगू चलि‍ कि‍एक ठमकि‍ गेल ओकर कोनो वि‍शेष कारण तँ नै? धीरेन्‍द्र कुमार- 92क बाद हमरा लागल छल हम जे लि‍खै छी ओकर पढ़ुआ कम लोक छथि‍ आ कथामे जे कथ्‍य होइ छै ओ समाजक प्रत्‍यक्ष स्‍तर कम अबैत अछि‍। ओकर बाद भारतीय कम्‍युनि‍ष्‍ट पार्टीसँ प्रभावि‍त भेलौं आ ए.आइ.टी.सी.सँ सम्‍बद्ध भ' जमीनपर काज करए लगलौं। 1995-96मे आकाशवाणीसँ कथा-वाचनक आमंत्रण भेटल छलए, जत' अधि‍कारीसँ वाद-वि‍वाद भ' गेल। ओ अधि‍कारी के छलाह मोन नहि‍ अछि‍। हँ, सीताराम शर्माजी ऐ गप्‍पक संकेत पहि‍ने द' देने छलाह। हमरा प्रतीत भेल छल जे अन्‍याय आ भ्रष्‍टाचारक वि‍रूद्ध जँ कि‍छु क' सकी सएह सार्थक। (3) मुन्नाजी- अहाँ जहि‍या कथा लि‍खब शुरू केलौं तहि‍या आओर आजुक कथा रचनाक तुलनात्‍मक परि‍वेश केहेन देखना जाइछ? धीरेन्‍द्र कुमार- भाषा जीवंत होइ छै। तै समैमे अधुनातन प्रयोगक आभाव छल मुदा आइ साहि‍त्‍य समाजक संगे ताल मि‍ला क' चलि‍ रहल अछि‍। तै लेल आजुक रचना सभ दृष्‍टव्‍य अछि‍। (4) मुन्नाजी- अहाँ एखन धरि‍ कतेक कथा लि‍खलौं आ कतए-कतए छपल, पुन: रचनात्‍मक मुख्‍यधारामे जुड़बाक सुत्र की छल? धीरेन्‍द्र कुमार- करीब पचास कथा प्रकाशि‍त अछि‍। मि‍थि‍ला मि‍हि‍र, मि‍थि‍ला दर्शन वैदेही आदिमे‍। वि‍भूति‍ आनंदक तगेदा आ उमेश मण्‍डलजीक सम्‍पर्क हमरा कलम पकड़ा देलक। (5) मुन्नाजी- अहाँक कथाक रचनात्‍मक प्रक्रि‍या केहेन कथानकपर केन्‍द्रि‍त रहैछ आ तकर की कारण? धीरेन्‍द्र कुमार- उदात-प्रेम आ समाजक छोट-छोट दुख जे प्रत्‍यक्षत: देखबामे कम अबैत अछि‍। हम समाजक नि‍म्नवर्गमे तथाकथि‍त समाजसँ गि‍नल जाइ छी ओहो गरीब परि‍वारमे जन्‍म। गरीब संगे उठनाइ-बैसनाइ। ऐमे ग्‍लानि‍ नै आनि‍ कमजोर बुझै छी। (6) मुन्नाजी- अहाँ मैथि‍ली रचना आन्‍दोलनमे जाति‍वादी वा समूहवाजी फाँटकेँ कोन नजरि‍ये देखै छी, की ऐसँ प्रभावि‍त भऽ अहाँक रचनात्‍मक धारासँ पुन: हेरा जेबाक वा बि‍ला जेबाक संभावना तँ नै देखाइछ? धीरेन्‍द्र कुमार- मैथि‍ली रचनामे आ प्रोत्‍साहनमे गुटबंदी, राजनीति‍ अवस्‍य अछि‍। हि‍ंदी साहि‍त्‍योकेँ इति‍हास देखल जा सकैत अछि‍। मुदा हम ऐ गुटबंदीसँ प्रभावि‍त कहि‍यो नै भेलाैं। हमरा संगे, अग्‍नि‍ पुष्‍प, नरेन्‍द्र झा, उदय मि‍श्र, वि‍भूति‍ आनंद, शैलेन्‍द्र, रति‍नाथ, साकेतानंद, प्रभास कुमार चौधरी, मोहन भारद्वाज, ज्‍योति‍वर्द्धन, शैवाल सभ संगे रहलौं। रचनात्‍मक स्‍तर आ व्‍यक्‍ति‍गत स्‍तरपर हम कहि‍यो उपेक्षि‍त नै भेलाैं। दमदार रचना आत्‍मतोष अवस्‍स पहुँचबैत अछि‍। ओकरा कोनो गुटबंद सदाक लेल झांपि‍ नै सकैत अछि‍। हँ तखन कि‍छु समए तँ जरूर अपना प्रभावमे दाबि‍ वा कति‍या सकैत अछि‍ जे बेबस्‍थाक दोष भेल। ओना हमरा एकर कोनो भय नै अछि‍। रचना हमरा लेल स्‍वांत:सुखाय अछि‍। (7) मुन्नाजी- गएर बाभनक रचनाकारक समूहक सक्रि‍य उपस्‍थि‍ति‍सँ अहाँ अपनाकेँ कतेक प्रभावि‍त मानै छी, ओकरा माध्‍यमे अपन गातक मजगुती देखाइछ वा प्रति‍द्वन्‍दि‍ता? धीरेन्‍द्र कुमार- एे प्रश्‍नक जबाब ऊपर आबि‍ गेल अछि‍। (8) मुन्नाजी- कथाक अति‍रि‍क्‍त आओर की सभ लि‍खै छी, तकर की कारण? धीरेन्‍द्र कुमार- रचनाकार कोनो वि‍धा कि‍ए लि‍खै छथि‍ ई ि‍नर्भर अछि‍ अभ्‍यास, कुशलता आ सहजतापर। जँ कौशल अछि‍ तँ कि‍छु लि‍ख सकैत। एम्‍हर नाट्य वि‍द्यालय दि‍ल्‍लीसँ सम्‍पर्क भेलापर नाटक दि‍स रूझान भेल। नाटकमे परि‍स्‍थि‍ति‍जन्‍य गीत होइत छैक- तँए कवि‍ता। (9) मुन्नाजी- नवतुरक रचनाकारक प्रति‍ केहेन अभि‍व्‍यक्‍ति‍ रखैत छी ऐसँ केहेन आशा देखाइछ? धीरेन्‍द्र कुमार- नवतुरि‍या रचनाकारसँ आशा अछि‍। पहि‍ने ज्ञानवर्द्धन, शास्‍त्रक ज्ञान, समाजक अनुभव, जटि‍ल मनोवृत्ति‍क अध्‍ययन आ अन्‍य भाषाक साहि‍त्‍यक ज्ञान प्राप्‍त करताह। जि‍ज्ञासु हृदेसँ दुनि‍याकेँ देखताह, नवीन प्रयोगसँ कथ्‍यक प्रस्‍तुि‍तकरण करताह। तै दि‍स नवतुरक रचनाकारमे कि‍छु प्रयत्‍नशील छथि‍। १८ आचार्य श्री सोमदेवजीसँ हुनक दीर्घकालीन सृजन निरन्तरताक मादे विहनि कथाकार मुन्नाजीसँ सोझाँ-सोझी भेल विस्तृत गप्प हिन्दी-मैथिलीक विज्ञ कवि आचार्य श्री सोमदेवजीसँ हुनक दीर्घकालीन सृजन निरन्तरताक मादे विहनि कथाकार मुन्नाजीसँ सोझाँ-सोझी भेल विस्तृत गप्पक सारांश: मुन्नाजी: सर्वप्रथम अपनेकेँ प्रबोध सम्मान प्राप्ति हेतु बधाइ। सामान्यतः मैथिली रचनाकार किछु कालावधिमे रचनारत रहि पुरस्कारक व्योंत वा प्राप्तिक प्रतीक्षारत रहि सुस्ताए लगैत छथि। मुदा अपने ऐ सभसँ ऊपर उठि प्रारम्भसँ एखन धरि एक्के सक्रियताक संग जुड़ल छी। ऐ निरन्तरताक पाछाँ की सोच वा कोन रहस्य! वा ई विशेष ऊर्जावान हेबाक परिणाम अछि? सोमदेव:पुरस्कार आत्मबल दैत छैक। मुदा हमर माथमे सदिखन नव विचार घुरघुराइत रहैए, जकरा हम अपन लेखनीमे उतारलाक पछातिये संतुष्टि पबै छी। सम्प्रति लिख नै पबै छी, शारीरिक अक्षमताक कारणसँ। मुदा लिखबाक उद्देश्य अपन विचारकेँ दोसर धरि पहुँचेबाक रहैए। मुन्नाजी: अपने अपन प्रारम्भिक रचनाकालक क्रियाकलाप वा मैथिली साहित्य सृजनमे प्रवेशक जनतब दी। सोमदेव:हम लिखब हिन्दीमे प्रारम्भ केने रही। समयान्तरे हिन्दीमे हेरा जेबाक डर आ माइक भाषाक प्रति प्रेम हमरा मैथिली दिस अनलक आ ऐ भाषामे रचनारत रहि टिकल रहि गेलौं। संगहि अपन स्पष्ट विचारकेँ संप्रेषणीयताक स्तरपर मैथिलीमे बेसी फरीछ कऽ पबैत छी, हिन्दीमे नै। मुन्नाजी:अहाँ हिन्दी आ मैथिली दुनू भाषामे समान रूपेँ सृजनरत रही, एकर की कारण? उपरोक्त दुनूक अस्तित्वक फराकसँ कोना चिवेचन करब? सोमदेव:रचनाक आरम्भमे दुनू भाषामे रचना केलौं मुदा बादमे मैथिली मात्रमे लिखलौं। दुनू उपरओँजक भाषामे गिरल जा रहल अछि। मैथिलीकेँ हिन्दीक आच्छादन आ हिन्दी अंग्रेजीक घोघ काढ़ल कनियाँ जकाँ भऽ घोंटल जा रहल अछि। बेगरता छै अपन अस्तित्वक रक्षार्थ अपन भाषा मात्रक रचना होइत रहए। दोसरा भाषाक देखाऊँसे वा वैशाखीक बलेँ ठाढ़ हेबाक चेष्टा नै हुअए। मुन्नाजी:अहाँ अपन प्रारम्भिक रचना कालसँ आजुक अवधि धरि ऐ भाषाक रचनाकारमे रचनामे वा भाषा मध्य केहेन परिवर्तन वा टकरावक अनुभव केलौं आ से की सभ छल? सोमदेव:प्रारम्भमे छन्दक प्राथमिकता छलै। बादमे छन्दमुक्त काव्य सभ एलै। हमहूँ एहेन रचना केलौं। मुदा पहिलुका जे स्तर छलै से अर्थपूर्ण छलै, आब अर्थहीन रचना बेसी आबि कऽ भरि गेलैए, जइसँ स्तर नीचाँ जा रहल छै। तकर मूल कारण रचनाकार द्वारा अध्ययन आ अध्यापनक अभाव छैक। मुन्नाजी:मैथिली भाषाक एतेक प्राचीन आ स्वतंत्र अस्तित्व रहितो ओ आइयो अपन अस्तित्ववास्ते घैहैर काटि रहल अछि। एकर की मूल कारण वा अवरोध अछि? सोमदेव:सत्य अछि जे दक्षिण एशिया, विशेष कऽ भारतमे संस्कृतक समकक्ष जँ कोनो भाषा छै तँ से अछि मैथिली भाषा आ तिरहुता लिपि (बादमे कैथी लिपि सेहो)। मुदा शास्सकक वैविध्यताक संग एकरो भौगोलिक रूपेँ टुकड़ी कऽ देल गेलै। आइ गुजराती, बांग्ला, असमी, ओड़िया,कुमाऊँ-गढ़वाली आदि एकरे टुकड़ी अछि, बेगरता छै एकाकार देबाक से भऽ जाए तँ एकरापन अस्तित्व छै से मरतै नै। मुन्नाजी: अहाँ सबहक प्रारम्भिक रचनाकालमे गद्य आ पद्य दुनू विधाक जे स्वरूप से आजुक सन्दर्भमे बहुत बदलल अछि। समयान्तरे ऐ दुनू विधाक किछु आओर प्रतिरूप सोझाँ आएल यथा गजल आ विहनि कथा। ऐ सबहक भविष्य केहेन देखाइए? सोमदेव:देखियौ मुन्नाजी, व्यक्ति, स्थान, भाषा वा रचना सबहक बदलाव समयानुसार स्वाभाविक छै। गजलकेँ कोनो भाषाक मूलमे निहित कएल जा सकैए, बशर्ते कि रचनाकार ओकर जड़िमे डूमल होथि। वर्तमान रचनामे एकर अभावे फूहड़पन वा गीजल चीज बेसी देखा पड़ैए। विहनि कथामे अहाँ किछु गोटे नीक काज कऽ रहलौं अछि, से ठाम-ठीम देखै छी। भविष्यमे बदलैत समयानुसार पाठकक श्रेष्ठ खोराक बनत से विश्वास अछि। मुन्नाजी: छठम-सातम दशकमे मैथिली साहित्यमे साम्यवादी विचारधाराक बिरड़ो उठलरहै। ओकर की प्रभाव भेलै आ आइ ओ कतऽ छै? सोमदेव:यौ बौआ, कहियो एहेन बिरड़ो नै उठलै। तहिया कांग्रेसक शासन रहै आ ओ सभ मैथिलीकेँ दबौने रहलै। ऐ मे कोनो स्वतंत्र विचार वा वादतँ सपना मात्र रहै। हँ किछु गोटे अपनाकेँ हाइलाइट करबा लेल एहने विचारे उधियेबाक प्रयास केलनि। हमहूँ समाजवादी विचारक समर्थक रही, मुदा की गरीब वा गरीबीपर लिख देने समाजवादी कहाए लागब, किन्नहुँ नै। रूसक मार्क्सवादी विचार मिथिलाक कठकोकांइड़ बाभनवादमे कतौ सन्हिया सकै छै। नै, कहियो नै। मार्क्सवाद वा कोनो वादमे हमर समकक्ष वा श्रेष्ठ रचनाकार सेहो वादसँ जुड़बाक नामपर विचारहीन देखाइत रहलाह। मुन्नाजी: मैथिली-हिन्दी मध्य साहित्यिक वर्णसंकरता पसरलै। मुदा मैथिलीकेँ पूर्णतःजातिवादिता गरोसने रहलै आ ई जाति विशेषक मुट्ठीक बौस्तु भऽ गेल। की ऐ सँ कहियो अहूँ सभ आच्छादित वा प्रभावित भेलौं? ऐ सँ रचनाकार वा साहित्यकेँ कोनो नोकसान भेल? सोमदेव:ई किछु (मात्र किछुए) लोकक, जे रचनाकार नहियो छथि, तिनकर कुटिचालि अछि जे अदौसँ आबि रहल अछि। हँ ई सत्य जे कमाइक आस देखेलापर बाभन लोकनि अपन मूल भाषा संस्कृत छोड़ि गएर बाभनक मूलभाषा मैथिलीकेँ गरोसि लेलनि। तइमे गएर बाभन लोकनि ओतबे जिम्मेवार छथि, जे अपनाकेँ पूर्णतः कतियौने रहलाह। मुन्नाजी: अहाँ निस्वार्थ सृजना वा साधनारत रहलौं। आ समय-समयपर ऐ सेवाक हेतु पुरस्कृत होइत रहलौं, एकर केहेन अनुभूति भेल? सोमदेव:यौ , पहिनहियेँ कहलौंहेँ जे ऐ सँ आत्मबल भेटैछ। हमर अपन विचार लेब तँ जहिया जे पुरस्कार भेटल ओ राशि धीया-पुताकेँ दैत रहलौं। अकादेमी पुरस्कारक राशि बेटाकेँ पढ़बामे आ प्रबोध सम्मानक पाइ नातिनकेँ दऽ अपनाकेँ कृतार्थ बुझै छी। हँ एकटा बात जे सभ संतान, बेटा-जमाए, पोता-पोती, नाति-नातिन नीक पदपर छथि। हमर जीवनक सर्वश्रेष्ठ पुरस्कारक सर्वस्व अनुभूतिक रूपमे ईएह अछि। मुन्नाजी: नवका दशकमे गएर बाभनक झुण्डक सक्रिय साहित्यिक प्रवेशकेँ मैथिली साहित्यक नजरिये कोना देखै छी। एकर भविष्यक संकेत की अछि? सोमदेव: आब किछु लोक जे सक्रिय छथि से संघर्षमे पाछाँ नै होथि तँ सफल अपनो हेता आ भाषाक भविष्य सेहो उज्जवल हएत, जै हेतु धैर्य आ सक्रियता चाही (दू-तीन दशकधरि), नै तँ ई भाषा पूर्णतः मरि जाएत। मुन्नाजी: मैथिली आब कागज मोइससँ बहरा अन्तर्जालपर आबि वैश्विक स्तरपर पसरि गेल अछि, एकरा मैथिलीक वर्तमान वा भविष्यसँ कोन रूपे जोड़ि कऽ देखऽ चाहब? सोमदेव:ई प्रसन्नताक बात अछि जे आब ककरो कोनो विचार (प्रत्यक्ष वा अप्रत्यक्ष) सेकेण्डेमे सभक सोझाँ अबैए आ अहाँ पाछाँ अपन वक्तव्यसँ मुँह नै मोड़ि सकै छी। दोसर जे अहाँक विचारकेँ वैश्विक मंच भेटल अछि, अगिला समएमे ओ जगजियार हएत। मुदा कागज मोइसक जमाना लदल नै अछि, ऐ मे सक्रिय रहबे करू। मुन्नाजी: मैथिली साहित्यमे ललनाक प्रवेश निषिद्धता वा महिला रचनाकारक अभावक की मूल कारण अछि? एकर निदानार्थ की कहब? भविष्यमे एकर की प्रभाव भऽ सकैए? सोमदेव:अहाँक ई सुन्दर सोचक प्रश्न अछि, तै लेल धन्यवाद। पहिने नारी घोघ तरक बहुरिया आ चहरदिवारीमे नुकाएल बान्हल मुट्ठीक चीज मात्र छल, तेँ ओकर विचार दबल रहि जाइत छल। आइ मैथिल ललना सभ मानसिक, शारीरिक आ तकनीकी सभ स्तरपर उच्च भऽ रहल अछि। विचार सेहो सद्भावपूर्ण,ठोस, राग-द्वेष रहित छै। ई पीढ़ी जुड़ि गेल तँ ई आर फरिछाएत, जे स्वच्छ चिन्तन आ चित्रण सोझाँ आओत। मुन्नाजी: अन्तमे अपने नवका धीया-पुता (रचनाकार) केँ उज्जवल साहित्यिक भविष्यक वास्ते की सनेस देबऽ चाहब? सोमदेव: नवका धीया-पुताक मगज थोरेक आर आगू छै। एकर रचनात्मक विचार ठोस आ दिशा सूचक अछि। ई सभ जुड़थि तँ मैथिलीक कल्याण हएत। हँ, अपन संस्कार नै बिसरथि बस ! एतबे। अहाँ आ गजेन्द्रजी दुनू गोटेकेँ अन्तर्जालक जालमे हमरो लपेट अपन विचार रखबाक अवसर देबालेल हृदैसँ धन्यवाद। मुन्नाजी: हार्दिक आभार! बहुमूल्य समय आ विचार देबाक वास्ते। १९ त्रिकोणक एक कोणसँ अशोकसँ मुन्नाजीक साक्षात्कार मुन्नाजी: अपने मैथिली रचना प्रारम्भक प्रेरणा कतऽ सँ पौलहुँ। एकर प्रारम्भ कहिया आ कोना भेल? अशोक: हम मैथिलीमे रचनाक प्रेरणा काशीमे ग्रहण केलहुँ। साते वर्षक अवस्था सँ पिता संग काशीमे रहऽ लगलहुँ, पढ़बाक लेल। मायाअ भाइ-भाउज लोकनि गाममे रहैत रहथि। काशीमे राम मन्दिरपर रही। ओतऽ हमर पिता स्व. उमापति झा मन्दिरक व्यवस्थापक रहथि। राममन्दिरपर मैथिल छात्र संघ द्वारा अनेक साहित्यिक ओ सांस्कृतिक कार्यक्रम होइ। नेनेसँ सभ देखऽ सुनऽ लगलहुँ। कानमे मिथिला, मैथिल ओ मैथिली शब्द सभ जाय लागल। एही क्रममे हमहूँ कविता सभ लिखऽ लगलहुँ। वर्ष १९६८ मे “वटुक” पत्रिका मे डॉ. सुधाकान्त मिश्र (जे “वटुक” पत्रिकाक सम्पादक रहथि) हमर पहिल कविता “शशि चन्दाके समान” छपने रहथि। ई कविता हम चन्दा झा जयन्तीक अवसरपर लिखने ओ पढ़ने रही। ओहि जयन्तीक अध्यक्षता मैथिलीक प्रसिद्ध कवि चन्द्रनाथ मिश्र “अमर” केने रहथि। तकर बाद कविता सभ लिखऽ लगलहुँ। जखन दर्जन भरि कविता लिखल भऽ गेल तँ अपन जेठ भाइ स्व. सुशील झा (प्रधानाचार्य, एल.एन. जनता कॉलेज, झंझारपुर) केँ देखौलियनि। ओ हमरा ओहि कविता सभकेँ डॉ. धीरेन्द्र (हमरे गामक प्रसिद्ध साहित्यकार) केँ देखेबाक लेल निर्देश देलनि। डॉ. धीरेन्द्र कविता सभ देखलनि आ ओहिमे सँ किछुकेँ मिथिला मिहिरमे पठेबाक लेल कहलनि। ओहि कवितामे सँ दूटा कविता मिहिर मे छपल। जाहिमे पहिल “ई न्यू लाइटक फैसन थिक” वर्ष १९६९ मे मिहिरमे छपल रहय। मुन्नाजी: त्रिकोणक शेष दू कोण माने शिवशंकरजी/ शैलेन्द्रजी संग कोना जुड़लौं? पहिल संग्रह त्रिकोणक प्रकाशनक नियार कोना भेल? अशोक:काशीसँ गरमीक छुट्टीमे गाम आबी। अही क्रममे वर्ष १९६७-७० मे गाममे दुनू गोटेसँ भेँट भेल। दुनू गाममे रहैत छला आ दुनूमे नेनेसँ मित्रता रहनि। तीनूकेँ जखन भेँट भेल तँ बुझलहुँ जे तीनू एक्के रस्ताक पथिक छी। तीनू कविता आ गीत लिखैत छी। कविता लिखब हमरा तीनूकेँ एक-दोसरासँ जोड़ि देलक। तकर बादसँ तँ तेहेन मिलान भेल जे लगबे नहि करय जे कहियो अपरिचित छलहुँ। कविताक संग तीनू गोटे हम, शिवशंकर आ शैल (शैलेन्द्र आनन्द) कथा सेहो लिखऽ लगलहुँ। कथा सभ पत्रिका सभमे छपऽ लागल। शैल गामेसँ “आहुति” पत्रिका सेहो निकालऽ लगलाह। तखन नियार भेल जे तीनूक एक कथा-संग्रह निकलय। हम तावत् नोकरीमे पटना आबि गेल रही। पटनेसँ तीनू कथाकारक पाँच-पांच टा कथाक संग्रह निकलल “त्रिकोण” नामसँ। मुन्नाजी: त्रिकोणसँ कतेक पूर्व अहाँ सभ लेखन प्रारम्भ केलहुँ। फेर एक पटलपर कोना एलौं आ तकर की फाएदा आ नोकसान भेल? अशोक: मोटामोटी कही तँ हमरा तीनू गोटे एक्के संग लेखन प्रारम्भ केलहुँ। हम काशीमे रही। ओतहि कविता लिखऽ लगलहुँ १९६७-६८ ई. सँ। शिवशंकर श्रीनिवास आ शैलेन्द्र आनन्द गाम लोहनामे रहथि। ओही ठाम रहि ओही समयसँ लिखऽ लगला। लिखब शुरू करबाक बाद करीब दू-तीन बरखक भीतरे तीनूकेँ गाममे भेँट भऽ गेल। तकर बाद तँ संग-संग तँ संग-संग साहित्यमे जीबऽ लगलहुँ। हम १९७१ ई. मे गाम चल अयलहुँ। सरिसब कॉलेजमे आइ.एस.सी. करबाक लेल। १९७२ ई. मे आइ.एस.सी. केलहुँ। ओहो दुनू सरिसबे कॉलेजमे पढ़थि। तीनू लगभग संगहि कॉलेज जाइ आ आबी। मित्रता प्रगाढ़ होइत गेल। बी.एस.सी. करबाक लेल हम सीतामढ़ी गेलहुँ १९७२ ई. मे। मुदा फेर १९७५ मे गाम चल अयलहुँ। दू वर्ष गामे रहलहुँ। बी.पी.एस.सी. क प्रतियोगिता परीक्षाक तैयारीक क्रममे। फेर एक संग तीनूक जुटान भऽ गेल। कोनो नव रचना करी तँ तीनू एक दोसराकेँ सुनाबी। तकर बाद हमरा नोकरी लागि गेल। पटना आ अररिया, बक्सरमे रहलहुँ। वर्ष १९८३ मे पटना आबि गेलहुँ। त्रिकोण १९८७ मे छपल। ई सहयोगी प्रकाशन तीनूकेँ कथाकार रूपमे परिचय स्थापित करबामे सहायक भेल। कथाकारक रूपमे लोक चीन्हय लागल। एहिसँ नोकसान नहि फाएदे भेल। मुन्नाजी: अहाँ जहिया लेखन प्रारम्भ केलहुँ तहिया आ आजुक परिस्थिति (साहित्यिक) मे की समानता वा भिन्नता देखाइछ? अशोक:हमरा लोकनि जहिया १९६७-६८ मे लेखन प्रारम्भ केलहुँ तकरा आइ चालीस वर्षसँ बेसी भऽ गेल अछि। एहि चालीस वर्षमे बहुत परिवर्तन भेल अछि। से परिवर्तन व्यक्तिगत आ साहित्यिक दुनू रूपमे भेल अछि। तीनू आब एक संग नहि रहैत छी। भेंटो-घाँट कमेकाल भऽ पबैत अछि। मुदा साहित्य लेखन चलि रहल अछि। तीनूक पोथी सभ प्रकाशित भेल अछि। तखन जे जोश-खरोश ओहि समय रहय से आब नहि रहि गेल अछि। से दुनू स्तरपर। व्यक्तिगत रूपमे पारिवारिक कारण सभसँ आ साहित्यिक परिदृश्यमे सामाजिक कारण सभसँ। जँ जँ मैथिलीकेँ सुविधा प्राप्त भऽ रहलैक अछि तँ तँ साहित्यकारमे लगनशीलता घटि रहलैक अछि। मैथिली लेल ओ जोश खरोस नहि देखाइत अछि जे तीस-चालीस वर्ष पहिने छल। आइ मैथिलीक लेल सभसँ पैघ समस्या नव-नव प्रतिभाशाली लोकक साहित्य क्षेत्रमे नहि जायब थिक। एहन बात नहि छैक जे नव लोक आबि नहि रहल छथि, आबि तँ रहल छथि मुदा जे लगाओ, जे निष्ठा चाही से नहि देखाइत अछि। एहि बातक अनुभव ओहि सभ व्यक्तिकेँ भऽ रहलनि अछि जे कोनो पत्रिका निकालि रहल छथि वा साहित्यक विकास लेल प्रयत्नशील छथि। मुन्नाजी:अहाँक लेखनक मध्य साम्यवादी विचारधाराकहवा मैथिलीयो साहित्यमे बहलै। की मैथिली साहित्यमे कोनो एहन स्वतंत्र विचारधारा बनि पौलै। अहाँ ओइसँ कतेक लग वा दूर रहलौं! अशोक:साम्यवादी विचारधाराक प्रभाव तँ मैथिली साहित्यमे एकदम देखार अछि। से यदि नहि देखार भेल रहैत तँ ओहिपर एतेक आक्रमण जे बढ़लैक अछि से नहि बढ़ितैक। साम्यवादी विचारक प्रभाव तँ मैथिलीमे कंचीनाथ झा “किरण” आ यात्रीक साहित्येसँ दृष्टिगोचर हुअ लगैत अछि। १९६०क बाद ओहिमे तेजी अयलैक। १९७१ ई.सँ १९८० क दशकमे वातावरणमे पसरल नक्सलवाड़ी आन्दोलनक प्रभाव मैथिली साहित्यमे पुरजोर रूपेँ पड़लैक। अनेकानेक कविता, कथामे एकरा देखल आ चिन्हल जा सकैत अछि। बादमे ई विचारधारा क्रमशः महीन होइत गेल छलैक। तैं आब, जेना अहाँ कहलौं, हवा जकाँ नहि लगैत अछि। आब ई विचारधारा कोनो फैसन जकाँ नहि अछि, जीवनक अंग भऽ कऽ आबि रहल अछि साहित्यमे। मुन्नाजी:अहाँ गद्यक लेखनमे विहनि कथा सेहो लिखलहुँ। विहनि कथा लिखब केहेन लागल, एकर सोच कतऽ सँ आयल? अशोक: विहनि कथा हम मित्र विभूति आनन्दक कहलापर लिखलहुँ। ओ माटि-पानि पत्रिकाक सम्पादक रहथि। वएह पत्रिका लेल विहनि कथा लीखि कऽ देबाक लेल कहलनि। किछु विहनि कथा माटि-पानि आ आन पत्रिकामे छपबो कयल। सगर रातिमे सेहो किछु विहनि कथा पढ़लहुँ। एम्हर बहुत दिनसँ कोनो विहनि कथा नहि लिखलहुँ अछि। जहिया लिखलहुँ तहिया लिखबामे खूब आनन्द आयल। मुन्नाजी: अहाँक नजरिमे आजुक परिप्रेक्ष्यमे मैथिली विहनि कथाक की स्थिति छै? की मैथिलीमे ओ स्वतंत्र स्थान पाबि सकत? अशोक:मैथिलीमे आइयो विहनि कथा खूबे लिखा रहल अछि। विहनि कथाक पोथी सेहो प्रकाशित भेल अछि। तारानन्द वियोगी, प्रदीप बिहारी, मधुकर भारद्वाज, अनमोल आ अहाँक विहनि कथा सभ हम पढ़ने सुनने छी। मोन पड़ैत अछि जे श्रीधरम सगर रातिमे पहिले पहिल अपन विहनि कथासँ हमरा सभकेँ आकर्षित केने रहथि। विहनि कथाक एक संग्रह स्व. ए.सी.दीपकजी बहार केने रहथि। मैथिलीमे विहनि कथाक तँ स्वतंत्र स्थान छैके। तखन एक संग्रहक प्रयोजन तत्काल हमरा अवश्य बुझा रहल अछि। मुन्नाजी:वर्तमानमे अन्यान्य भाषा-साहित्य मध्य मैथिली साहित्यक की स्थिति देखा पड़ैछ। अशोक:मैथिलीमे कविता आ कथा आन भाषा साहित्यसँ पाछू नहि अछि। उपन्यास अवश्य पछुआएल अछि। उपन्यासक खगता अवश्य मैथिलीकेँ छैक। एहन उपन्यासक जे आन भाषाक उपन्याससँ टक्कर लऽ सकय। आन अनेक विधामे सेहो स्तरीय पोथी नहि आबि रहल अछि। आन भाषा साहित्य सन वैचारिक लेखन सेहो नहि भऽ रहल अछि। हँ, तारानन्द वियोगीक “तुमि चिर सारथि” हिन्दीमे अनुवाद भऽ खूब धूम मचौलक अछि। चर्चित प्रशंसित भेल अछि। मैथिलीकेँ एहिसँ गौरव भेटलैक अछि। मुन्नाजी:एखन धरि अहाँ द्वारा जतेक काज भेल ताहि हेतु कोनो ठोस मूल्यांकन वा पुरस्कारसँ वंचित रहि केहेन अनुभूति होइए? अशोक: वस्तुतः पूछी तँ हम जतेक काज केलहुँ अछि तकर खूबे मूल्यांकन भेल अछि। हमरा मूल्यांकनक कोनो अभाव नहि बुझाइत अछि। काजे नहि कऽ पाबि रहल छी जते करबाक चाही। आन अनेक प्रकारक व्यस्तता लेखन नहि करऽ दैत अछि। तकर अनुभूति बरोबरि होइत रहैत अछि। जहाँ धरि पुरस्कारक गप अछि तँ तेहेन कोनो काजे हम आइ धरि नहि केलहुँ अछि। एखन तँ बहुत काज करबाक अछि। बहुत लिखबाक अछि। मुन्नाजी:अपन तीनू कोणक मध्य अहाँ अपनाकेँ कतऽ पबै छी? अशोक:तीनू कोणक अपन फूट-फूट महत्व आ विशिष्टता होइत छैक। मुदा तीनू मिलिए कऽ त्रिकोण बनैत अछि। तखन आइ एकटा कोण लोहनामे, एकटा कोण दरभंगामे आ एकटा कोण पटनामे अछि, एहि स्थानक भिन्नताक प्रभाव तँ पड़िए रहल छैक। तीनू कोण जखन फेरसँ एक संग लोहनामे जुटब तँ सोचब जे के, कोना आ कतऽ छी। त्रिकोणक यात्रा तँ एखन चलिये रहल अछि। मुन्नाजी:नव पीढ़ीक रचनाकार वास्ते अपन विचार की देब? अशोक: औ मुन्नाजी, हम तँ एखनहुँ अपनाकेँ नबे मानैत छी। किछु लिखैत छी तँ होइत रहैत अछि जे बनलैक की नहि। कोंढ़ कपैत रहैत अछि। हमरा तँ अपने बेर-बेर विचारक आवश्यकता होइत रहैत अछि। एहनामे हम विचार की देब? २० मिथिलासँ दूर आ अंग्रेजी माध्यमे शिक्षित मैथिली अनुरागी आ जगजियार होइत मैथिली कवियित्री श्रीमति ज्योति सुनीत चौधरीसँ मुन्नाजी द्वारा भेल अंतरंग गप्प-सप्पक बानगी अहाँ सभक सोझाँ राखल जा रहल अछि। मुन्नाजी: ज्योतिजी, अहाँक शिक्षा-दीक्षा अंग्रेजी माध्यमे भेल। संस्कारगत सम्भ्रान्त वा आधुनिकतामे पलि-बढ़ि कऽ अहाँकेँ मैथिली भाषाक प्रति एतेक अनुराग कोना जनमल? ज्योति सुनीत चौधरी: सभसँ पहिने नमस्कार मुन्नाजी। असलमे मैथिलसँ दूर हम कखनो नहि रहलहुँ।जमशेदपुरमे मैथिल सबहक अपन बड़का टोली छनि आ बड्ड शानसँ ओ सभ विद्यापति समारोह मनाबैत छथि। हमर परिवारमे जे कियो बेसी नजदीकी छलथि सभ मैथिल छलथि। फेर सालमे एकबेर गाम अवश्य जाइत छलहुँ। ओतए पितियौत-पिसियौत भाइ-बहिन सबहक पुस्तक पढ़ै छलहुँ। से मैथिली भाषासँ अनुराग बच्चेसँ अछि। भाग्यसँ सासुरो खॉंटी मैथिल भेटल अछि। हँ, मैथिलक विकासक विचार हमरामे हमर स्वर्गीय बाबासँ आएल अछि। हमर पितामह जखन मरणासन्न रहथि तखन करीब एक मास हम हुनका लग अस्पतालमे दिनमे अटेण्डरक रूपमे रहेैत रही। हम अपन कॉस्टिंगक तेसर स्टेज ओहि अस्पतालमे पढ़ि कऽ पास केने छी। ओहि बीच हुनकासँ बहुत बात भेल आ मिथिलाक विकासक बात सभ मस्तिष्कमे आएल। मुन्नाजी: मैथिलीमे लेखन प्रारम्भक प्रेरणा कतऽसँ वा कोना भेटल। पहिलुक बेर अहाँ की लिखलहुँ आ की/ कतऽ छपल। ज्योति सुनीत चौधरी:  यद्यपि हम पहिल मैथिली कविता विद्यालयकालमे भारतवर्ष पर लिखने रही जे बड़हाराबला मामाजी (चाचीजीक भाय) केँ देने रहियनि आ किछु कारणवश ओ प्रकाशित नहि भेल। परन्तु मूल रूपसँ मैथिलीमे लेखनक प्रेरणा सम्पादक महोदय गजेन्द्रजी सँ भेटल। बादमे ज्ञात भेलजे गजेन्द्रजी बहुतो लेखकक खोज केलन्हि आ बहुतोसँ मैथिलीमे लिखबा लेलन्हि। हमहुँ ओहिमे सँ एक छी। हमर पहिल कविता ‘हिमपात’ अछि जे विदेह डॉट कॉम क पॉंचम अंकमे १ मार्च २००८ केँ प्रकाशित भेल। मुन्नाजी: कविता तँ लोकक स्वाभाविक जीवनधारासँ प्रस्फुटित होइत रहैत छैक आ चिन्तनशील लोक ओकरा लयवद्ध वा अक्षरवद्ध कऽ लैए। अहाँक पद्य-संग्रह अर्चिस् मे कविताक संग अहाँक हाइकू देखि आह्लादित भेलहुँ। हाइकू लिखबाक सोच कोना/ कतऽसँ बहराएल। ज्योति सुनीत चौधरी:  बहुत-बहुत धन्यवाद जे अहॉंकेँ हमर हाइकु नीक लागल। पहिने पोइट्री डॉट कॉम मे सभ दिन एकटा प्रााकृतिक दृश्यक फोटो देल जाइत छलै आ ओहि फोटोसँ प्रेरित भऽ हाइकू लिखक प्रतियोगिता होइत छल। अहुना हमरा प्राकृतिक सुन्दरतापर लिखनाइ पसिन छल से भोरे अपन घरक काज समाप्त कऽ जखन हम कॉफी लेल बैसै छलहुँ तँ मेल चेक करैकाल हम ओहि साइटपर जाइ छलहुँ आ सभ दिन एकटा हाइकू लिखैत छलहुँ। ओहि क्रममे चारि मासमे सएटा हाइकू जमा भऽ गेल जे विदेहक बारहम अंक (१५ जून २००८), जे हाइकू विशेषांक छल, मे छपल। मुन्नाजी: मिथिले नै भारतसँ दूर लंदनमे मैथिली पढ़बा-लिखबाक जिज्ञासा कोना बनल रहैए। अहाँ गृहणी रहैत- घर द्वार सम्हारैत कोना रचनाशील रहैत छी? ज्योति सुनीत चौधरी:  एक गृहिणी लेल स्वतंत्र लेखिकासँ बढ़िया आर कोन काज भऽ सकैत छै आर विदेहमे कखनो हमरापर कोनो विषय विशेषपर लिखए लेल वा समयक बन्धनक दवाब नहि छल। फेर ई तँ सौभाग्य अछि जे अन्तर्जालपर मैथिलीक प्रवेशसँ आब विदेशोमे रहिकऽ अपन भाषा साहित्यसँ नजदीकी बनल रहैत अछि। ईश्वरक आशीर्वादसँ बच्चा आब पैघ भऽ गेल अछि आ विद्यालय जाइत अछि। सासुर दिससँ कोनो जिम्मेदारी नहि अछि। पतिदेव सेहो घरक कार्यमे सहयोग दैत छथि तैं गृहिणी भेनाइ लेखन कार्यमे अवरोधक नहि बनैत अछि। मुन्नाजी: मैथिल संस्कृतिक तुलनामे अंग्रेजक संस्कृतिक बीच अपनाकेँ कतऽ पबै छी। दुनूक संस्कृतिक की समानता वा विभिन्नता अनुभव करैत छी? ज्योति सुनीत चौधरी:  दुनूमे किछु नीक आ किछु खराबी अछि। विदेशमे व्यवहारमे बेसी खुलापन छै मुदा हम अकरा विकसित रूप नहि मानैत छी। हम बच्चामे महात्मा गॉंधीजी द्वारा रचित एकटा हिन्दी-कथा पढ़ने रही “जब मैं पढ़ता था”, गान्धीजी इन लण्डन सँ प्रेरित; बहुत सत्य लागल ओ कथा जखन हम विदेशी सभ्यताकेँ बुझैक प्रयास केलहुँ। अपन संस्कृति बहुत धनी, तर्कसंगत आ मौलिक -original- अछि। बस हम सभ आर्थिक रूपेँ पिछड़ल छी, जकर नैतिक समाधान शिक्षाक विकास अछि। हमर इच्छा अछि जे भने मिथिलाक विकासमे कनी समय लागए मुदा अपन कला, संस्कृति, पाबनि, गीतनाद आदि सभ मलिन नहि होअए। हँ कतहु-कतहु सामाजिक कुरीति जेना दहेज, विधवाक जीवनशैली, स्त्री-शिक्षा आदिमे बदलाव चाही। अहि सभ समस्यामे दहेज समस्या बड्ड बड़का कैंसर अछि जे शिक्षित वर्गकेँ सेहो धेने अछि अन्यथा बॉंकि समस्या शिक्षाक विकासक संगे विलीन भऽ रहल अछि। मुन्नाजी: मैथिलीसँ इतर अहाँकेँ अंग्रेजीमे पोएट्री डॉट कॉम सँ एडीटर्स चॉएस अवार्ड (अंग्रेजी पद्य लेल) भेटल अछि। की अंग्रेजीमे पोएट्री लेखनक निरन्तरता बनौने छी। ज्योति सुनीत चौधरी:  नहि। हम जहियासँ विदेहमे लिखए लगलहुँ तहियासँ अंग्रेजीमे लिखबाक समय नहि निकलि रहल अछि। इहो कहल जा सकैत छै जे हमरा मैथिलीमे बेसी रूचि अछि अन्यथा “where there is will there is a way” अर्थात् जतए चाह ततए राह। मुन्नाजी: अहाँक नजरिमे मैथिली पद्य विधा आ अंग्रेजी पद्य विधामे की फराक तत्व अछि। दुनू एक दोसरासँ कोन बिन्दुपर ठाढ़ अछि? ज्योति सुनीत चौधरी:  अंग्रेजी पद्य विधा बहुत समृद्ध अछि कारण ओ विश्वव्यापी भाषा अछि। मैथिली पद्य विधा विशेषतः गीतक सेहो अपन अद्भुत आ अनेक रूप अछि जेना कि खिलौना, नचारी, सोहर, गोसाउनि, भगवति, ब्राह्मण, समदाओन, होरी, चुमाउन, छठि आदिक लेल विशेष पद्धति छै। मुदा एहि सभकेँ ढ़ंगसँ परिभाषित कऽ व्यवस्थित रूपे संग्रहित राखैक अभाव अछि। मुन्नाजी: ज्योतिजी, अहाँक माध्यमे मैथिली रचनाकारक किछु रचना सभक अंग्रेजी अनुवाद आ प्रकाशन भेल अछि। किए नै व्यापक स्तरपर मैथिलीकेँ अंग्रेजी पत्र-पत्रिकाक माध्यमसँ वैश्विक पटलपर अनबाक प्रयास करै छी? ज्योति सुनीत चौधरी:   हमरो ई इच्छा अछि। हम लन्दनक एक अंग्रेजी कवि समुदायसँ जुड़ल छलहुँ जे बाङ्ग्लादेशी आ डच समुदायक छथि मुदा हुनकर सबहक अत्याधुनिक  रहन-सहन (पबमे मीटिंग़-ड्रिंक्स) हमरा ओतेक नीक नहि लागल। तैयो हम एक व्यक्तिसँ मेल आ फेसबुकक माध्यमसँ सम्पर्कमे छी। जौं कुनो सुझाव अछि तँ दिअ हम यथासम्भव अपन योगदान देब। ओना इंगलैण्डमे बहुत मैथिल डाक्टर आ आई.टी. क लोक छथि, ओ सभ जरूर पुस्तक किनता। आ बॉलीवुडमे प्रकाश झा जी तँ छथिये। कहियौन हुनका किछु चलचित्र बनाबए मिथिला संस्कृति पर, मिथिला कलाकृतिपर। गामक हाल चाल तँ बहुत देखाओल गेल अछि। कनी बाहरक मैथिलपर सेहो काज करथि जाहिसँ जे धनी मैथिल सभ बाहर बैसल छथि से अपन संस्कृति दिस आकर्षित हेता। कहियौन जे अपन फिल्ममे मिथिला पेण्टिंग प्रदर्शित करथि। मुन्नाजी: अहाँ साहित्यक संग मिथिला चित्रकला आ ललितकलामे निष्णात छी। अहाँ साहित्य आ कला दुनूक बीच की फाँट देखैत छी। दुनूमे केहेन ककर अस्तित्व देखा पड़ैछ? ज्योति सुनीत चौधरी:   धन्यवाद। हम मास्टर तँ नहि छी, हँ हम अभिलाषी छी एकर उन्नतिक। साहित्यकेँ बहुत नीक मंच भेट गेल अछि मुदा कला लेल अखनो संकलित आ विश्व स्तरीय ठोस भूमिक आवश्यकता अछि। हम एक बिजनेस प्लैन बनेने छी मुदा ओहि लेल बढ़िया निवेशक आ विपणन कर्ताक आवश्यकता अछि। हम अहॉंके अटैचमेण्ट पठा रहल छी ओहि बिजनेस प्लैनक। कतहु गुंजाइश होअए तँ कृपा कऽ उपयोग करू।(नीचाँमे देल अछि) मुन्नाजी: अहाँ आइ.सी.डब्लू.ए.आइ.डिग्रीधारी छी, अहाँक नजरिमे राष्ट्रीय आ अन्तर्राष्ट्रीय फलकपर मिथिलाक वित्तीय स्थिति की अछि? एकर दशा कोना सुधारल जा सकैछ, एहि हेतु कोनो दिशा निर्देश? ज्योति सुनीत चौधरी:   अकर जवाब हम बहुत विस्तृत रूपमे देब। अहॉंकेँ धैर्यसँ सुनए पड़त। भारतमे  विकासशीलताक दोसर स्थानपर अछि बिहार राज्य। आइसँ १०-१५ साल पहिने बाहर रहैवला बिहारीकेँ लाज होइत छलै। एक अशिक्षित आ बेरोजगारीक बहुलतावला राज्यकेँ विकासक लेल एक शिक्षित आ उन्नत सोचबला मुख्यमंत्री चाही। चलू बिहार तँ रस्ता पकड़लक मुदा मिथिलाञ्चलक विकास ओहि रूपे नहि देखाइत अछि। विश्वबैंकसँ जे कोसी लेल कर्ज भेटल छै तकर जौं सदुपयोग भऽ जाए तँ मिथिलाक पचास प्रतिशत प्रााकृतिक समस्याक समाधान भऽ जेतै। बिहारमे नितिश जी एक निअम बना रहल छथि जाहि अन्तर्गत सरकारी कर्मचारी जौं निश्चित समयमे कार्य नहि करता तँ जनता हुनकर शिकाइत दर्ज कऽ सकैत छथि। अहि तरहक रूपान्तरण किछु आशाक किरण जरूर दऽ रहल अछि। मिथिलाक औद्योगिक विकासक लेल सरकारी सहयोगक आवश्यकता अछि। किछु बेसिक इन्फ्रास्ट्रक्चरक विकास जेना सड़क निर्माण, बॉंध निर्माण, पुल निर्माण आदि चाही जे सरकारकेँ करए पड़तनि, तकर बादे बाहरी लाभिच्छुक निवेशक सभ अपन पाइ लगेता। भारी उद्योगक सम्भावना कम अछि। अहिठाम सर्विस सेक्टर, कृषि उद्योग़, वस्त्र उद्योग, फैब्रीक इण्डस्ट्री, खाद्य सामग्री, प्रोसेस्ड फुड आदिक बड्ड सम्भावना अछि। अड़िकोंचक मिठ रूप मराठी स्टायलक़ समोसा, कचोरी, खीर, फिरनी आदि विदेशक बजारमे भड़ल अछि, तखन मिथिलाक व्यञ्जन किऐक नहि। किऐक नहि हम सभ मिथिलाक अड़िकोंचक तरकारी, मखानक खीर, अपन दिसका माछक मसाला सभकेँ विकसित कऽ एक्सपोर्ट करैत छी। गुजरातक मोदक विश्वप्रसिद्ध अछि, अपन सबहक बगिया किऐक नहि। तकर बाद आम, लीची, केरा, तारकून, कुसियार, खजूर आदिक विभिन्न ड्रिंक बना कऽ बेचल जा सकैत अछि। मधुबनी पेण्टिंगक व्यवसायिक उपयोग करू। अहि पैटर्नकेँ आधुनिक आ पारम्परिक दुनु तरहक परिधानमे बना कऽ फैशन शो करू। घरक क्रॉकरी, फर्नीचरसँ लऽ कऽ कम्प्यूटरक वालपेपर  आ लैपटॉपक कवरपर मिथिला पेण्टिंग छापू। घरक वाल पेपर, मोजाइक, मार्बल सभपर मिथिला पेण्टिंगक समावेश करू। पेंटिंगक किट बनाऊ जेना सैण्ड पेंटिंग, इम्बॉस पेण्टिङ्ग आदिक किट बजारमे उपलब्ध अछि। अनन्त सम्भावना छै। मिथिलांचलक उन्नतिक पथपर एकटा बाधा छै जकरा फानै लेल सरकारी कोष आ सरकारक ईमानदारीक आवश्यकता छै। एकबेर ई बाधा फना जाइ तँ मिथिलांचलकेँ स्वर्णिम रूप पाबैसँ कियो नहि रोकि सकैत अछि। मुन्नाजी: अहाँ लंदनमे रहि अपन नवका पीढ़ी (विशेष कऽ अपन पुत्रकेँ) मिथिला-मैथिलीसँ जोड़ि कऽ रखनाइ पसिन्न करब आकि एकरा अछूत सन बुझबाक शिक्षा देबै? ज्योति सुनीत चौधरी:    हम अपन नबका पीढ़ीकेँ अपन संस्कृतिसँ जोड़ि कऽ राखऽ चाहब। लन्दनमे विद्यार्थी ताकि रहल छी, मधुबनी पेटिंग सिखाबै लेल। हम अपन पुत्रकेँ मैथिलक सभ विशेषतासँ ज्ञात राखए चाहैत छी, संगमे ईहो चाहैत छी जे ओ अहि सभ्यताकेँ स्वेच्छासँ स्वीकार करथि। अछूत व्यवहारक तँ प्रश्ने नहि छै। भने ओ अहि संस्कृतिकेँ अंगीकृत करथि वा नहि मुदा सम्मान तँ देबहे पड़तनि। मुन्नाजी: मिथिला-मैथिलीक प्रति अनुरागकेँ अहाँक पति सुनीत चौधरीजी कोन रूपेँ देखै छथि, अहाँकेँ एहि कार्यकलापक प्रति प्रेरित कऽ वा बाधित कऽ? ज्योति सुनीत चौधरी:    हमर पति हमर काजमे दखल नहि दैत छथि आ कुनो तरहक दवाब नहि रहैत अछि जे हम की लीखू आ की नहि। घरक काजमे बहुत योगदान दैत छथि आ बाधित कखनो नहि करैत छथि ओना हमहुँ हुनकर इच्छाकेँ प्रााथमिकता दैत छियनि। प्रेरणा हम अपन मॉं, बहिन आ भौजीसँ लैत छी। हम हुनका सभसँ अपन सभ बात करैत छी। मुन्नाजी: ज्योतिजी अहाँ अपन नजरिये अंग्रेजी साहित्यक मध्य मैथिली साहित्यकेँ कतऽ पबै छी आ किएक? ज्योति सुनीत चौधरी:    हम अंग्रेजी साहित्यकेँ सागर मानैत छी आ मैथिली साहित्यकेँ मानसरोवर। अंग्रेजी साहित्यकेँ विश्वभरिमे काफी पहिने मान्यता भेटल छै तैं ओ बहुत समृद्ध अछि। सागर रूपी अंग्रेजी साहित्य अपन परिपूर्णतापर अछि मुदा मैथिली साहित्य प्रााचीन रहितो अखन उत्पत्तिक परमशुद्धि बिन्दुपर अछि आ ओकर सिंचन आ संरक्षणक भार सम्प्रति आ भावी लेखकगणपर छनि। मुन्नाजी: अहाँ अपन समक्ष समकालीन नवतुरिया रचनाकारकेँ कोनो संदेश देनाइ पसिन्न करब? ज्योति सुनीत चौधरी:  हम हुनका सभसँ कहए चाहबनि जे कृप्या सामने आऊ आ लेखकक रूपमे समाजक प्रति अपन जिम्मेदारीकेँ निमाहैत मैथिली साहित्यकेँ सुकृतिसँ सम्पन्न करू। मुन्नाजी: बहुत-बहुत धन्यवाद ज्योतिजी। ज्योति सुनीत चौधरी:  बहुत-बहुत धन्यवाद हमरा अहि योग्य बुझए लेल। हम एक बिजनेस प्लैन बनेने छी मुदा ओहिलेल बढ़िया निवेशक आ विपणन कर्ताक आवश्यकता अछि। हम अहॉंके अटैचमेण्ट पठा रहल छी ओहि बिजनेस प्लैनक। कतहु गुंजाइश होअए तँ कृपा कऽ उपयोग करू।- ज्योति सुनीत चौधरी Mithila Painting Nature of Business Selling printout and original MadhubaniPaintings on paper, fabric, tiles, ceramic and other media. Purpose: Expanding scope of MadhubaniPaintings without losing its originality. Sources (Purchases): Original artworks on paper and other media and digital copies Supplier: Artists and media resources for tiles, wallpapers etc. Sales: Online sales. Customers: Art lovers, Restaurants, Saloons, Interior desighners, fabric Designers, book printers for cover page design, card printers, Stationary printers etc. Cost required: Web designing cost Site subscription cost Collborationwith banks and other payment modes Purchasing art works from the artists Preparing good digital copies Postage (post sales cost)For web designingMain category MadhubaniPaintings •Mythological •Scenes of Ramayana •Scenes of Mahabharata •Stories of Puran •Gods and Goddesses •Festivals and Sanskara: •Kohbar •Vivah •Chhathihar •Muran •Upanayan •Kojagara •Barsait •Madhushravani •Diwali •Holi •Bhagwaanpuja •AkharhiPuja •Village Life : scencesof day to day works, cattle etc. •Wild Life: Different birds and animals, scenes of forest, desert •Story based: Based on popular stories •Flora and Fauna : Different flowers portrayed in madhubanipainting style •Contemporary : Based on city life, new experiments. •Natural scenes २१ दुर दृष्‍टि‍संपन्न गमैया संसाधनसँ दूर होइत गामक लोकक मन:स्‍थि‍ति‍केँ गहींरताक संग सोझाँ अननि‍हार श्री जगदीश प्रसाद मंडलजी हुनक समस्‍त साहि‍त्‍यि‍क क्रि‍या-कलापक मादे मुन्नाजी द्वारा कएल गेल गप्‍प-सप्‍पकेँ अहाँक सोझाँ प्रस्‍तुत कएल जा रहल अछि‍- मुन्नाजी- जगदीश बावू शि‍क्षाक पूर्ण डि‍ग्रीधारी भऽ अहाँकेँ एतेक देरीसँ मैथि‍ली लेखनक प्रवृति‍क की कारण? जगदीश प्रसाद मंडल- अपनेक प्रश्‍नक उत्तर दैइसँ पहि‍ने मुन्नाजी कि‍छु अपन बात कहि‍ दैत छी। केजरीवाल हायर सेकेण्‍ड्री स्‍कूल झंझारपुरमे स्‍पेशल नाइन्‍थसँ लऽ कऽ स्‍पेशल एलेबुन धरि‍ एक सय नम्‍वरक एक वि‍षय मैथि‍ली पढ़ने छी। मुदा कओलेजमे नहि‍ पढ़लौं। हि‍न्दी पढ़लौं। साहि‍त्‍यसँ सि‍नेह सभ दि‍न रहल। लि‍खै दि‍स दू हजार ईस्‍वीक बादे बढ़लौं। ऐठाम ि‍सर्फ एतबे कहब जे जमीनी संघर्षक उपरान्‍त वैचारि‍क संघर्ष जोर पकड़ैत अछि‍ तँए लि‍खब अनि‍वार्य भऽ गेल। जहि‍सँ जीवनमे आरो मजबूती अएल। सभकेँ माने हर मनुष्‍यकेँ अपने लगसँ जि‍नगी शुरू करक चाहि‍एनि‍। कर्मक क्षेत्र अपन गाम रहल जहि‍ठामक भाषा मैथि‍ली छी तँए हि‍न्‍दीक वि‍द्यार्थी रहि‍तहुँ मैथि‍लीमे लि‍खै छी। देरीसँ लि‍खैक कारण इहो भेल जे १९६७ई.मे जखन बी.ए.क वि‍द्यार्थी रही, वामपंथी राजनीति‍मे जुड़लौं। काजसँ जते समए बँचए ओ सेवामे लगबए लगलौं। बी.ए. धरि‍ जनता कओलेज झंझारपुरमे आ आगू सी.एम. कओलेज दरभंगामे पढ़लौं। ओना लि‍खैक आरो कारण अछि‍ जे उम्रक संग शरीरक शक्ति‍यो कमए लगल। मुन्नाजी- एतेक डि‍ग्रीक (एम.ए.क) पछाति‍ तँ अहाँ समएमे नोकरी भेटव बेशी असोकर्ज नै छलै। नोकरी नै कऽ खेती-बारीक ि‍नर्णय अहाँक कोन मानसि‍कताक द्योतक ऐछ? ज.प्र.मं.- आजुक दृष्‍टि‍ये जरूर बुझि‍ पड़ैत हएत जे ओहि‍ समए नोकरी सस्‍ता छलैक मुदा से बात नहि‍। एहि‍ परि‍पेक्ष्‍यमे कि‍छु कहि‍ ि‍दअए चाहै छी। झारखंड लगा बि‍हार राज्‍य छल। अखन जते जि‍ला, सवडि‍वीजन आ ब्‍लौक आइ खंडि‍त बि‍हारमे देखै छि‍ऐ ओते पूर्ण (सौंसे) बि‍हारमे नहि‍ छल। संग-संग जते काजक वि‍वि‍धता अखन धछि‍, सेहो नहि‍ छल। अखन छत्तीस-सैंतीसटा जि‍ला खंडि‍त बि‍हारमे अछि‍ जखन कि‍ ओहि‍ समए ि‍सर्फ सत्तरहटा जि‍ला छल। जहि‍ मधुबनीमे पाँचटा सवडि‍वीजन अछि‍ ओ अपने सवडि‍वीजन छल। तहि‍ना शि‍क्षो वि‍भागमे छल। गनल-गूथल कओलेज आ हाइ-स्‍कूल रहए। आइक मधुबनी (प्रोपर)मे चारि‍टा कओलेज- झंझारपुर, सरसो, पंडौल आ बाबूबरहीमे खुजल। बाबूवरहीक कओलेज (जे.एन.) मधुबनी चलि‍ गेल। ओहि‍सँ पूर्व आर.के. काओलेज आ भरि‍सक एकटा आरो छल। बाकी सभ बादक छी। जखन जनता कओलेज झंझारपुर खुजल, ओहि‍ समए अधासँ अधि‍क शि‍क्षक (प्रोफेसर) आने-आन जि‍लाक छलाह। तँए कि‍ एहि‍ क्षेत्रमे पढ़ल-लि‍खल लोक नहि‍ छलाह से बात नहि‍। बैंकक शाखा जते आइ देखै छि‍ऐ ओते नहि‍ छल। भरि‍सक मधुबनीमे एकटा रहए बाकी नहि‍ये जकाँ छल। तहि‍ना ब्‍लौकोक छल। एक तँ संख्‍या कम दोसर एकटा बी.डी.ओ. रहैत छलाह। जखन कि‍ बी.डी.ओ; सी.ओ. आ पी.ओ. तीनि‍टा अखन छथि‍। कल-कारखाना नाओपर एकटा चीनी मि‍ल (लोहट) ओ गोटि‍ पङरा चाउरक मि‍ल छल। ओना आरो बहुत बात अछि‍ मुदा मोटा-मोटी कहलौं। आब अहीं कहु जे नोकरी कत्त छल। ओहि‍ अनुपातमे अखन बेसी अछि‍। खेती करैक कारण- जखन हम तीनि‍ये बर्खक रही पि‍ता मरि‍ गेलाह। हमरासँ तीन बर्ख पैघ भाय छलाह। ओना परि‍वारमे दूटा पि‍सि‍औत भाय रहैत छलाह। हुनका रहैक कारण छल हुनकर घर फुलपरास वि‍धानसभा क्षेत्रक घोघरडि‍हा ब्‍लौकक अमही पंचायतक हरि‍नाही गाम छनि‍। जखन कोसी पश्‍चि‍म मुँहे जोर केलक तँ गाम उपटि‍ गेल। सभ कि‍यो बेरमा चलि‍ एलाह। जे घटना १९३५-४०क बीचक छी। फेर जखन कोसी पूव मुँहे ससरल तखन १९६०ई.मे पुन: ओ दुनू भाँइ चलि‍ गेलाह। हुनका सबहक गेने गि‍रहस्‍तीक संग-संग पढ़वो करी। तहि‍येसँ खेतीसँ जुड़ाव भऽ गेल। जे जीवि‍काक साधन रहल। मुन्नाजी- प्रारम्‍भमे अहाँ अपनाकेँ साम्‍यवादी कहि‍ सामंतवादक वि‍रूद्ध हो-हल्ला मारि‍-झगड़ामे सक्रि‍य रहलौं बादमे अइसँ वि‍मोह कि‍एक? एे सँ की फायदा वा नोकसान उठएल? ज.प्र.मं. - जहि‍ना छलौं तहि‍ना छी। मुदा परि‍स्‍थि‍ति‍केँ ऑकि‍ देखए पड़त। सामंतवादमे मनुष्‍यक बुनाबटि‍ जाहि‍ रूपक रहै छै ओ सामंतवादपर चोट पड़लासँ बदलैत छैक। खि‍स्‍सा-पि‍हानी आ नाटकक स्‍टेज सामाजि‍क वि‍कास आ सामाजि‍क जीवन नहि‍ होइत छैक। नाटकक स्‍टेज होइत छैक- तीन घंटामे रामक जन्‍म, जनकपुरक धनुषयज्ञ, बनमे सीताक हरण आ रावणक मृत्‍युक उपरान्‍त वि‍सर्जन। तहि‍ना खि‍स्‍सा पि‍हानीमे सेहो होइत छैक। मुदा समाजक मंच बहुत जटि‍ल होइत छैक। जहि‍क लेल समयो लगै छै आ संघर्षो होइत छैक। तहूँसँ जवर्दस्‍त वैचारि‍क संघर्ष सेहो होइत छैक। संक्षेपमे- आर्थिक वि‍कासक क्रममे खेतीक लेल जखन नवका माने उन्नति‍ कि‍स्‍मक बीआ आएल तँ सामंती सोचक लोक वि‍रोध केलनि‍। हुनकर आरोप छलनि‍ (१) वस्‍तुमे सुआद नहि‍ होइत छैक, (२) पावनि‍-ति‍हारक दृष्‍टि‍ये अशुद्ध होइत अछि‍, (३) स्‍वास्‍थ्‍यक दृष्‍टि‍सँ खाद देल अहि‍तकर होइत अछि‍ जहि‍सँ बीमारी बढ़त। तहि‍ना दरभंगा अस्‍पताल खुललापर सेहो वि‍रोध भेल। गाम-घरमे एलोपैथक वि‍रोध भेल। आरोप छलैक- गाइयक खूनक इन्‍जेक्‍शन आ सुगरक मांसक बनल दवाइ। साधारण इनारक जगह पानि‍क कल भेने सेहो वि‍रोध भेल। आरोप लगैत छल जे कलक वासर चमड़ाक होइ छै, तहि‍सँ पूजा कोना हएत आ अशुद्ध पानि‍ लोक पीति‍ कोना? कते कहब। एहि‍ परि‍स्‍थि‍ति‍केँ संक्रमण काल कहल जाइ छै। सामंतवाद टुटलाक बाद पूँजीवादी आ समाजवादी दि‍शा अबैत छैक। हमरा गामक नब्‍बे प्रति‍शत जमीन बहरवैयाक छलनि‍। ओना तीनि‍टा जमीनदार छलाह वाकी दूटा मास छलाह। जनवादी लड़ाइ शुरू होइते दूटा मालि‍क (जमीनदार) अपन जमीन बेच लेलनि‍। एक गोटेक संग जवर्दस्‍त लड़ाइ भेल। जमीन्‍दारक संग सूदखाेर महाजन सेहो छलाह। हुनको संग लड़ाइ भेल। अखन ने कि‍यो बाहर जमीन्‍दार छथि आ ने महाजन। गाममे कि‍नको अधि‍क जमीन नहि‍ भेलनि‍। ऊपर दस बीघा आ वाकी नि‍च्‍चाँ छथि‍। एहि‍ दौरमे करीब तीस बर्ख लड़ाइ गाममे चलल। सत्तरि‍-एकहत्तरि‍क उठल तूफान शान्‍त होइत-होइत ५.५.२००५ई.केँ अंति‍म मुकदमाक अन्‍त भेल। वि‍कासोक प्रक्रि‍या छैक। आइक भारी मशीन (कमप्‍यूटर) देखि‍ नव पीढ़ीक लोककेँ सहजहि‍ वि‍श्‍वास नहि‍ हेतनि‍। मुदा हाथक काज हाथसँ चलैबला औजारक संग लघु मशीनमे बदलल। लघुमशीन परि‍मार्जित होइत भारी आ तेज मशीन बनि‍ ठाढ़ अछि‍। मुन्नाजी- कहल जाइछ जे अहाँक साम्‍यवादीक वि‍द्रोह छवि‍ तखन दवि‍ गेल जखन की अहाँ सामंती द्वारा देल प्रलोभनकेँ स्‍वीकारि‍ लेलौं की सत्‍य अछि‍? ज.प्र.मं. - चारि‍म प्रश्‍नक उत्तर भेट गेल हएत मुन्नाजी। जँ से नहि‍ तँ अनठेकानी गोला फेकब हएत। मुन्नाजी- उग्रवादीसँ रचनावादी प्रवृति‍ कोना जागल कोनो एहेन वि‍शेष घटना जे अहाँक रचनात्‍मक सोचकेँ प्रेरि‍त केने हुअए? ज.प्र.मं. - पाँचम प्रश्‍नक उत्तर सेहो आबि‍ गेल अछि‍। दुनि‍याँक नक्‍शामे जकरा शीतयुद्ध (cold war) कहल गेल अछि‍ वएह वैचारि‍क संघर्ष छी। जकरा लेल साहि‍त्‍य प्रमुख अस्‍त्र छी। मुन्नाजी- मैथि‍ली रचनाकारक प्रवृति‍ अछि‍ जे एक-दु रचना कऽ अपनाकेँ मैथि‍लीधारामे जोड़वामे जुटि‍ जाइछ मुदा अहाँ एकर उलट चि‍न्‍तनशील आ रचनाशील रहि‍ नुकएल सन रहलाैं? ज.प्र.मं.- छठम प्रश्‍नक संबंधमे स्‍पष्‍ट समझ अछि‍ जे जहि‍ना उत्तरबरि‍या पहाड़सँ नि‍कलल छोट-छीन धारा सभ दछि‍न मुँहे टघरैत नदी-नालामे मि‍लैत आगू बढ़ैत गंगामे पहुँच समुद्रमे समाहि‍त भऽ जाइत अछि‍ तहि‍ना जँ साहि‍त्‍यक (रचनाक) दशा-दि‍शा नीक रहत तँ साहि‍त्‍यक धारा बनवे करत। ई वि‍सवास अछि‍। जना आन-आन गोटे शुरूहेँसँ रचना दि‍स बढ़लाह से नहि‍ भेल। कारण ऊपर आबि‍ गेल अछि‍। मुन्नाजी- वि‍योगीजी अहाँ कि‍तावक आमुखमे अहाँकेँ २०गोट कथा, ५गोट उपन्‍यासक पाण्‍डुलि‍पि‍ लऽ भेँट करवाक क्रममे अहाँक दृष्‍टि‍ फरीछ दू साल बाद पुन: भेँटमे हेबाक बात कहलनि‍हेँ ऐपर अहाँक की वि‍चार? ज.प्र.मं.- मैथि‍ली साहि‍त्‍य जगतक वि‍योगीजी पहि‍ल साहि‍त्‍यकार छथि‍ जि‍नकासँ पहि‍ल भेँट छी। ओना एक-दू बेर फोनपर गप भेला बाद उमेश मंडल पटना गेल रहथि‍ तँ भेँट केलकनि‍। कि‍छु रचना सभ लऽ कऽ सेहो गेल रहथि‍। दू-चारि‍ पन्ना पढ़ि‍ कऽ सुनेवो केलकनि‍। मुदा डेढ़-दू घंटाक बात चीतमे जाने-पहचानक बात बेसी भेलनि‍। हुनकासँ हमर पहि‍ल भेँट मधुबनीमे छी जखन ओ मधुबनी अएलाह। ओही क्रममे रहुआ कथा-गोष्‍ठीक जानकारि‍यो देलनि‍ आ चलैइयोले कहलनि‍। हुनक सम्‍पादनमे देशज पत्रि‍का २००३ई.मे ि‍नर्मलीक कि‍तावक दोकानमे भेटल। जाहि‍मे यात्रीजी आ कि‍रणजीक संग गप-सप्‍प सेहो नि‍कलल। वि‍चारक दृष्‍टि‍सँ यात्रीजी सँ वि‍द्यार्थीये जीवनसँ प्रभाि‍वत छलौं। पत्रि‍का पावि‍ आरो प्रभावि‍त भेलौं आ वि‍योगी जीक संग आकर्षण सेहो बढ़ल। तहि‍ना कि‍रण जीक जि‍नगीसँ सेहो बहुत प्रभावि‍त कओलेजे जीवनसँ छलहुँ। लगसँ हुनका देखने रहि‍एनि‍। जखन हम सी.एम. काओलेजमे पढ़ैत रही तखन ओ प्रोफेसर छलाह। गप-सप्‍पक क्रममे ओ बजलाह जे जहि‍ना बजै छी तहि‍ना ि‍लखब मैथि‍ली छी। हुनकर ई वि‍चार तहि‍ये नहि‍ अखनो रग-रगमे समाएल अछि‍। मुन्नाजी- उपरोक्त आमुखमे ओ कहने छथि‍ जे अहाँ हुनकर (वि‍योगीजीक) एहेन अंधभक्त छी जे हुनकर कि‍ताबकेँ ताकि‍-ताकि‍ कऽ पढ़ैत रही एकटा कि‍ताबकेँ तकबाक क्रममे पटना धरि‍ गेलौं मैथि‍ली साहि‍त्‍यक पाठक शुन्‍यता (कीनि‍ कऽ पढ़ैबला)मे जँ ई सत्‍य छै तँ एकर की कारण? ज.प्र.मं.- अहू प्रश्‍नक उत्तर आबि‍ गेल अछि‍। ई बात हुनकामे जरूर छन्‍हि‍ जे उपकरि‍-उपकरि‍ कतेक कि‍ताब देलनि‍। भक्‍त आ भगवान साम्‍प्रदायि‍क भाषा छी। कि‍यो अपन कर्मसँ बढ़ैत-घटैत अछि‍ मुदा आगूसँ अधला सोचब आ करबकेँ अधला बुझै छी। मुन्नाजी- कि‍छुए समयान्‍तरलमे वि‍वि‍ध वि‍धापर अहाँक ८गोट पोथीक प्रकाशनसँ केहेन अनुभूति‍ भऽ रहल ऐछ अगि‍ला लक्ष्‍य की ऐछ? ज.प्र.मं.- पोथी प्रकाशि‍त भेलापर जहि‍ना आन गोटेकेँ अनुभूति‍ होइत छन्‍हि‍ तहि‍ना भेल। लक्ष्‍यक जहाँ धरि‍ प्रश्‍न अछि‍ तँ प्रसादजीक पाँति‍ मन पड़ैत अछि‍- “जीवन का उद्देश्‍य नहि‍ है शान्‍त भवनमे टि‍क जाना और पहुँचना उन राहो पर जि‍नके आगे राह नहि‍।‍” मुन्नाजी- एतेक पोथी प्रकाशनक पछाति‍यो अहाँक ठोस मूल्‍यांकन वा पुरस्‍कारक हेतु चयन नै भेलासँ अप्‍पन परिश्रम नि‍रर्थक सन तँ नै लगैए। ज.प्र.मं.- कोनो रचनाक मूल्‍यांकन समए करैत अछि‍। समयानुकूल रचना छी वा नहि‍ ई समए आँकि‍ कएल जा सकैत अछि‍। रहल पुरस्‍कारक बात? प्रेमचन्‍द सन उपन्‍यास सम्राट आ कलमक जादूगरकेँ कोन पुरस्‍कार भेटलनि‍। मुदा ओ अपना श्रमकेँ नि‍रर्थक कहाँ बुझलनि‍। अंति‍म साँस धरि‍ सेवा करैत रहलाह। अपन पचहत्तरि‍म जन्‍म दि‍नक अवसरपर नामबर भाय (डॉ. नामबर सि‍ंह) बाजल छलाह- “जते काज अखन धरि‍ केलहुँ ओते पाँच बर्खमे करब।‍” हुनकर कते सेवा छन्‍हि‍ सर्ववि‍दि‍त अछि‍। जखन पचहत्तरि‍ बर्खक बूढ़क एहेन वक्‍तव्‍य छनि‍ तखन तँ हम अपनाकेँ जवान वुझै छी। मुन्नाजी- मैथि‍लीमे प्रारम्‍भेसँ बनल जाति‍-पॉति‍क फाॅटकेँ अहाँ कोन दृष्‍टि‍ए देखै छी। आ स्‍वयं अहाँ ओइ बीच अपनाकेँ कतऽ पबै छी। ज.प्र.मं.- शुरूहेसँ वर्ण नहि‍ वर्गमे वि‍श्‍वास अछि‍। जहि‍ आधारपर काज करैत एलौं आ करि‍तो छी। समाजमे जे जाति‍-धर्मक (सम्‍प्रदायक) खेल चलैत अछि‍ ओ राजनीति‍ केनि‍हारक चालि‍ छी। मुन्नाजी- पि‍छड़ावर्गसँ आगाँ (रचनात्‍मक रूपेँ) अबैत लोकक अहाँ उपर उठेवा लेल कोनो सहयोगी बनव पसि‍न्न करब? हुनका सबहक लेल कोनो संदेश? ज.प्र.मं.- जाहि‍ठाम व्‍यवस्‍था बदलैक प्रश्‍न अछि‍ ओ ने एक दि‍नमे हएत आ ने एक गोटे बुते हएत। सबहक कल्‍याण हएत आ सभकेँ करए पड़त। तँए सभकेँ कहैत छि‍अनि‍ जे जागू, उठि‍ कऽ ठाढ़ होउ। आगू बढ़ू। मि‍थि‍ला सबहक मातृभूमि‍ आ मैथि‍ली सबहक भाषा छी तँए अपन बुझि‍ सेवामे लागि‍ जाउ। २२ मैथि‍ली आ हि‍न्‍दीमे सझि‍या आ धुरझार लेखनसँ परिपक्‍व। मैथि‍लीमे एकटा ठोस वि‍चार आ   दुर दृष्‍टि‍ लऽ स्‍थाि‍पत होइत कवि‍ श्री राजदेव मंडलजी सँ हुनक लेखनीपर गहींर रूपे मैथि‍लीक सशक्‍त युवा विहनि कथाकार आ समालोचक मुन्नाजीक बीच भेल गप-सप्‍पक अंश प्रस्‍तुत ऐछ- मुन्नाजी- अहाँ खाँटी मि‍थि‍लाभुमि‍क पानि‍ माटि‍मे रचल बसल रहि‍ हि‍न्‍दीमे उन्‍मुख रहलौं। मैथि‍लीमे कि‍एक नै? राजदेव मं. -  देश-दुनि‍याँ/ चाहे जतेक बदलि‍ जाए/ अपन भाषा अपन माए/ कहुँ बि‍सरल जाए/। माएक द्वारा सि‍खाओल भाषा के बि‍सरत? रचनाक प्रारम्‍भ मैथि‍लीमे कएलहुँ। कि‍न्‍तु प्रकाशनक अभाव आ प्रकाशक, सम्‍पादक लग कोनो पहुँच नै। अर्थसँ की नै होइत छै। हम अर्थाभावमे रही। मैथि‍लीक कोनो रचना प्रकाशि‍त नै भेल। फुलाइत मन मुरझा गेल। ओइ‍‍ समएमे हि‍न्‍दीसँ एम.ए.क तैयारीमे जुटल छलहुँ। हि‍न्‍दीमे लि‍खनाइ सुवि‍धाजनक सन लगल। लि‍खब आ छपेबाक उत्‍कट इच्‍छााक कारणे हि‍न्‍दी दि‍स कनछी काटए पड़ल। मुन्नाजी- मैथि‍ली लेखनीक प्रारम्‍भ कहि‍या कोनो कएलहुँ? एखन धरि‍ मैथि‍लीमे हेराएल वा वेराएल सन रहवाक की कारण? राजदेव मं. -  मैथि‍लीसँ एम.ए. केलाक उपरान्‍त १९८६ई.क कोनो राति‍, नीक जकाँ स्‍मरण नै ऐछ- ओ तारीख। ओइ‍ राति‍ मानसि‍क स्‍तरसँ बड्ड दुखी रही। एतेक दुखी जे सुतएकालसँ पूर्व कतेको बेर मुँहसँ नि‍कलल रहए- हे भगवान हमरा धरसीसँ उठा लि‍अ। हमरा मृत्‍यु चाही। हम मरऽ चाहै छी। ई वाक्‍य सभकेँ दोहराबैत निन्नमे डूबि‍ गेल रही। अधरति‍यामे जखन नि‍न्न टूटल तँ मन कि‍छु हल्‍लुक सन बुझाएल। ओसारपर मि‍झाइत दीयाकेँ बड़ी काल धरि‍ एकटक देखैत रहलहुँ। कतेक काल धरि‍ से स्‍मरण नै ऐछ। कि‍न्‍तु ओ मि‍झाइत दीया प्रथम मैथि‍ली कवि‍ता बनि‍ गेल। जे संग्रह अम्‍बरा'मे संकलि‍त ऐछ। भऽ सकैत ऐछ ऐ‍‍सँ पूर्व मैथि‍लीमे अपूर्ण रचना सभ हएत। आब सवाल हेराएल आ बेराएल ऐछ। हेराएल ओ रहैत ऐछ जे अनचि‍न्‍हारक बीच रहैत ऐछ आ अनजान स्‍थानपर रहैत ऐछ। हम तँ अपनहि‍ जन्‍म स्‍थानपर छी आर चि‍न्‍हार लोकक बीच छी। ओकरा की कहबै जे चि‍न्‍हार लोकक बीच अनचि‍न्‍हार बनल हेराएल ऐछ। ओ बेराएल जाइत ऐछ जेकरा द्वारा अधलाह काज भेल हुअए। हम अपना जनैत नीक काज करैत अहाँक लगमे ठाढ़ छी। तइयो बेराएल सन। तँ एकर कारण की कहब? मुन्नाजी- अहाँक कवि‍ता गाम समाजक लोकक प्रति‍ अहाँक वि‍चार मि‍थि‍लाक पारम्‍परि‍कताकेँ संजोगने बुझाइत ऐछ। जखन कि‍ वर्त्तमानमे तकनीकी वि‍कासे लोकक जीवन आधुनि‍क सोचमे डुबि‍ रहल ऐछ। अहाँ अपनाकेँ सँ दूर कोना रखने छी? राजदेव मं. -  हम कोनहुँ पारम्‍परि‍कताकेँ संजोगने नै छी आ नै आधुनि‍क जीवन सोचसँ अपनाकेँ दूर रखने छी। हँ कि‍छु सरस शब्‍दकेँ जोड़बाक प्रयास कएलहुँ जाहि‍सँ रमणीय अर्थ नि‍कलि‍ सकए। की छुटल आ की जुड़ल ऐछ। नीक वा अधलाह भेल तेकर ि‍नर्णए तँ अहीं सभ करब। मुन्नाजी- एखन धरि‍ अहाँक मैथि‍ली लेखनीमे कवि‍ते टा जगजि‍यार भेल ऐछ की, अहाँ कोनाे आनो वि‍धामे लि‍खैत छी? राजदेव मं. -  कि‍छु कथा लि‍खने छी। एकटा उपन्‍यास लि‍ख रहल छी। मुन्नाजी- अहाँ हि‍न्‍दी भाषामे कतेको पोथीक सर्जक छी, जे छपि‍ कऽ सोझाँ आबि‍ चूकल ऐछ। मैथि‍लीमे एतेक पाछाँ कि‍एक छी कि‍एक छी एकर कोनो वि‍शेष कारण तँ नै ऐछ? राजदेव मं. -  हि‍न्‍दीमे तीनटा उपन्‍यास प्रकाशि‍त भऽ चूकल ऐछ। जि‍न्‍दगी और नाव, पि‍ंजरे के पंछी, दरका हुआ दरपन। मैथि‍लीमे लि‍खैत छलहुँ कि‍न्‍तु प्रकाशि‍त नै भेलाक कारणे पाछाँ छलहुँ। उमेश मंडल आ गजेन्‍द्र ठाकुर जीसँ सम्‍पर्क भेलाक उपरान्‍त मैथि‍ली ई पत्रि‍का वि‍देहमे प्रकाशि‍त हुअए लगल। श्रुति‍ प्रकाशन द्वारा वि‍देह मैथि‍ली पद्य २००९-१०मे सेहो प्रकाशि‍त भेल। वास्‍तवमे ओ सभ धन्‍यवादक पात्र छथि‍। एकर उपरान्‍त अंति‍का आ मि‍थि‍ला दर्शनमे सेहो कि‍छु कवि‍ता सभ अाएल। मुन्नाजी- मैथि‍ली भाषाकेँ अप्‍पन कि‍छु मैथि‍ल सभ बाभन मात्रक भाषा कहि‍ गैर बाभन लोक सर्जक वि‍चार वा भाव रखि‍तो अपनाकेँ कति‍या लैत छथि‍। अहाँ एकरा कै परि‍पेक्ष्‍यमे देखै छी? राजदेव मं. -  भाषाकेँ कोनो बन्‍धनमे बान्‍हि‍ कऽ नै राखल जा सकैत ऐछ। जाति‍क बन्‍धन तँ आओर खराब। भाषा तँ सबहक होइत ऐछ। तँए सभ जाति‍ आ वर्गक लोककेँ अपना भाषा उत्‍थानक लेल प्रयास करबाक चाही। सहयोगक भावना सेहो हेबाक चाही। प्रारम्‍भमे कि‍छु बाधा होइते ऐछ। तै कारणे कति‍या जाएब से नीक नै। मुन्नाजी- बाभनसँ इतर अहाँक समकक्ष सर्जक श्री जगदीश प्रसाद मंडलजी जे अपन लेखनीए कतेको स्‍थापि‍त रचनाकारकेँ पाछाँ छोड़ि‍ अल्‍प समएमे शीर्षपर अबैत देखाइत छथि‍। ऐ माध्‍यमे छोटका-बड़का जाति‍क फाॅटकेँ अहाँ कोना परि‍भाषि‍त करब? राजदेव मं. -  ऐ‍‍मे छोटका आ बड़का जाति‍क फाँट की कएल जाए। कि‍छु रचनाकार द्रुतगति‍सँ लि‍खैत छथि‍। जेना श्री जगदीश प्रसाद मंडल। स्‍वभावि‍क ऐछ जे ओ अल्‍पकालहि‍मे बेसी लि‍खताह। कि‍यो मन्‍थर गति‍सँ रचना करै छथि‍। लि‍खबाक अपन-अपन शैली आ गति‍ होइत ऐछ। ओहि‍ना शीर्ष दि‍स बढ़बाक गति‍ होइत ऐछ। मुन्नाजी- अपन मैथि‍ली लेखनयात्राक क्रममे कहि‍याे अपनाकेँ गैर बाभन हेवाक कारणेँ अनसोहाँत वा उपेक्षि‍तक अनुभव तँ नै पौलहुँ? राजदेव मं. - सवेंदनशीलकेँ तँ उपेक्षाक अनुभव होएबे करतैक। समाज आ परि‍वारकेँ प्रत्‍यक्ष रूपेँ कि‍छु नै दैत छि‍ए। ओ सभ उपेक्षाक भाव राखबे करता। अपनासँ आगू कोनो जाति‍केँ देख‍ इर्ष्‍या होएबे करत। ई तँ मनुक्‍खक गुण ऐछ। भऽ सकैत ऐछ जे हमरोसँ पाछाँबलाकेँ कि‍छु एहने अनुभव होइत हेतै। ऐ‍‍ गप्‍पपर अपने लि‍खल पॉति‍ यादि‍ अबैत ऐछ- “उपेक्षाक दंश/ हमरहि‍ अंश/ नै ऐछ चि‍न्‍ता/ नै छी त्रस्‍त/ भेल छी अभ्‍यस्‍त.../‍” मुन्नाजी- मैथि‍ली समीक्षक लोकनि‍ रचनाकारक कोन मन:स्‍थि‍ति‍केँ समीक्षाक रूपेँ परि‍भाषि‍त करैत छथि‍? की ओइमे जाति‍वादि‍ताक नजरि‍या सेहो परि‍लक्षि‍त होइत ऐछ? राजदेव मं. - समीक्षाक बहुत अधि‍क पुस्‍तक हम नै पढ़ने छी। ऐ‍ तरहक गप्‍प सोक्षा नै अाएल ऐछ। ओना समीक्षाक कार्य बहुत दायि‍त्‍वपूर्ण होइते ऐछ। रचनाकार आ पाठकक मध्‍य मि‍लनबि‍न्‍दूपर समीक्षक रहैत छथि‍। ओ कोनो रचनाकेँ दोष-गुणक अन्‍वेषण करैत छथि‍। जँ हुनक नजरि‍या जाति‍वादी हेतैक। तँ ऐ‍‍सँ भाषाक क्षति‍ हेतैक। मुन्नाजी- अहाँ समीक्षा सेहो करै छी अपन समीक्षाक माध्‍यमे अहाँ रचनाकारक व्‍यक्‍ति‍त्‍वकेँ परि‍लक्षि‍त करैत छी, वा रचनाकारक कृति‍त्‍वकेँ सोझाँ अनवाक प्रयास करै छी की जाति‍क फाँटकेँ भरि‍ रचनाकारक देखार करब उचि‍त बुझै छी? राजदेव मं. -  समीक्षा तँ होइत ऐछ रचनाकेँ। तँए व्‍यक्‍ति‍त्‍व आ कृति‍त्‍वकेँ अलग-अलग राखल जएबाक चाही। समीक्षाक कार्यमे तँ तटस्‍थ भऽ रचनाक दोष गुणक चर्चा न्‍याय-संगत ढंगसँ हेबाक चाही। हँ, कि‍छु साहि‍त्‍यकारक सर्वोत्‍कृष्‍ट कार्य देख धन्‍यवाद देबाक लेल बेवश होमए पड़ैत ऐछ। ऐ‍‍ कार्यमे जाति‍क फाँट केनाइ नि‍तान्‍त अनुचि‍त गप्‍प थि‍क। मुन्नाजी- अन्‍तमे अहाँ गैर बाभनक मैथि‍लीमे अनुपस्‍थि‍ति‍केँ कोन तरहेँ अनुभव करै छी। ऐ‍‍मे गैर बाभन वर्गक सर्जककेँ वेशीसँ बेशी उपस्‍थि‍ति‍क लेल कोन संदेश वा वि‍चार देब। राजदेव मं-  पूर्णरूपेण भाषाक वि‍कासक लेल सभ जाति‍ आ वर्गक रचनासँ भाषाकेँ परि‍पूर्ण होएबाक चाही। तँए जे पाछाँ छथि‍ हुनका सभकेँ अध्‍ययन, मनन आ अभ्‍यास करबाक चाही। बेसीसँ बेसी रचना करबाक चाही। सहयोगक भावना रहक चाही। अधि‍कार प्राप्‍त करबाक लेल तँ आगू बढ़ै पड़त। २३ हम पुछैत छी- देवशंकर नवीनसँ मुन्नाजी पुछैत छथि ढेर रास गप। 1.         अहाँक साहित्यिक लेखन-प्रक्रिया कोना आ कत’ए प्रारम्भ भेल? पहिल बेर कोन विधाक कोन रचना कत’ आ कहिया छपल पूर्ण जनतब दी। नेनमतिएसँ फकड़ा जोड़बाक चसक सवार भ’ गेल छल। एक बेर ओ फकड़ा किनकहु भावनाकें आहत केलकनि, ओ हमर पिता लग शिकायत केलनि। ओइ दिन चमरौधा जूतासँ हमर पिटाइ भेल छल। कैक दिन धरि ज’र लागल रहल।... सन् 1972मे हम अठमा क्लासमे रही। ठीक-ठीक मोन नइँ पड़ै’ए, मुदा ओही लगाति नौमा-दसमा क्लासमे अबैत-अबैत फिल्मी गीतक ओजन पर पैरोडी गीत लिखए लागल रही, जकर गायन हमर गामक कीर्त्‍तन मण्डलीमे भेल करए। ओही क्रममे गाम भरिमे प्रचार होअए लागल। क्रम आगू बढ़ैत गेल। तै समयमे साहित्यक माने कोनो विचित्र आ विलक्षण भाव-बोधक तुकबन्दी बुझैत रही।... सन् 1976मे मैट्रिक पास केलहुँ। सहरसा कॉलेज, सहरसामे नाम लिखाओल। सन् 1978-80 सत्रमें बी.एस-सी.मे पढ़ैत रही। कॉलेज-पत्रिकामे हमर एकटा कविता मैथिलीमे छपल छल। पहिल प्रकाशन ओएह थिक, मुदा ओ कविता कतए गेल, पता नइँ! ता धरि सय के लगाति पैरोडी आ फकड़ा लिखि चुकल रही। ओही दिनमे हमर लिखल एकटा पैरौडी गीत सुनिकए हमर कक्का प्रो.नारायण झा(एखन ओ वीरपुर कॉलेजमे अंग्रेजीक अध्यापक छथि) हमरा महादेवी वर्माक पोथी सब पढ़बाक सलाह देलनि। किछु-किछु पढ़ए लगलौं। सन् 1981-82क मध्य सहरसामे पाँच विषयमे एम.ए.क पढ़ौनी शुरुह भेलै। मैथिलीमे एम.ए. करबाक रुचि हमर जागि उठल। मिथिला मिहिर पत्रिका पढ़ए लागल रही। एम.ए.मे नामांकन भ’ गेल। क्लासमे पढ़ौनी शुरुह भ’ गेल। कक्षामे हमर अलावा स’ब गोटए विधिवत् ऑनर्स आ साहित्यक पोथी पढ़ि-पढ़ि आएल छलाह। एकटा हमहीं रही, जकरा किछुटा बोध नइँ छलैक। साइन्सक छात्रकें भाषाक बोध नइँ रहै छै--अइ किम्बदन्तीक आधार पर शुरुह-शुरुहमे आन सहपाठी लोकनि कोनो मानि-मोजर नइँ दैथि, मुदा क्रमे-क्रमे से सहज होअए लागल। ओही बीच सन् 1983मे सहरसा कॉलेजमे विद्यापति समारोह आयोजित भेल छल। ‘मैथिली लोकसाहित्य’ पर लेख प्रतियोगिता आयोजित भेल छल। बिहारक तत्कालीन राज्यपाल अखलाख-उर-रहमान किदवईक हाथें पुरस्कृत भेल रही। हौसला बढ़ि गेल छल। सहरसा परिसरक मैथिलीक विद्वान लोकनिक बीच पहचान बनए लागल छल। पैरोडी लेखन पाछू छूटि गेल। साहित्यिक पोथी-पत्रिका पढ़बाक खगता होअए लागल। सन् 1983मे मिथिला मिहिरमे एक टा कविता प्रकाशित भेल--मिथिलाक वासी।...तखनहुँ धरि तुकबन्दी मात्रकें हम कविता बुझैत रही। ओही बीच राजकमल चौधरीक दू टा मैथिली कथा--‘ननदि भाउजि’, ‘एकटा चम्पाकली: एकटा विषधर’ आ एकटा हिन्दी कथा ‘जलते हुए मकान में कुछ लोग’ पढबाक अवसर लागल। ई तीनू कथा हमर दुनियाँ बदलि देलक। यात्री आ राजकमल चौधरी अही समयमे सम्मोहित केलनि। सम्मोहन बढै़त गेल, पाठ्य-पुस्तकक क्षेत्र बढै़त गेल। लिखैत-पढै़त रहलहुँ... इएह कथा अछि। समवयस्की साहित्यिक बन्धु लोकनिमे सबसँ पहिल परिचय आ प्रगाढ़ता तारानन्द वियोगीसँ भेल।... 2.         मैथिलीमे सतरि के दशक वा ओकर पाछू जुड़ल रचनाकार द्वारा बहुत रास विधा(दुनू विधाक बहुत रास प्रकार) पर काज भेल, अहाँ अइ मध्यम पीढ़ीक रचनाकारक क्रियाशीलताकें कोन नजरिएँ देखै छी? अहाँ प्रायः ई पूछए चाहै छी जे बीसम शताब्दीक सातम आ आठम दशकक रचनाकारक क्रियाशीलता केहन रहलनि? जँ सएह सत्य, तँ हम सबसँ पहिने अइ बीस बर्खक अन्तरालमे क्रियाशील प्रमुख रचनाकारक नाम गनबए चाहब। अइ अन्तरालक अमूल्य विशेषता ई छल, जे पछिला पीढ़ीक कतोक रास नव-पुरान(वयस आ विचार दुनूसँ) रचनाकार लोकनि एक संग सक्रिय छलाह। ओहिमेसँ प्रमुख छथि--सीताराम झा, कांचीनाथ झा’ किरण, हरिमोहन झा, तन्‍त्रनाथ झा, काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’, सुरेन्द्र झा ‘सुमन’, वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’, आरसी प्रसाद सिंह, ब्रजकिशोर वर्मा ‘मणिपद्म’, गोविन्द झा, रामकृष्ण झा ‘किसुन’, चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’, राजकमल चौधरी, ललित,मायानन्द, सोमदेव, धीरेन्द्र हंसराज, लिलि रे, बलराम, रामदेव झा आदि। सातम दशकमे अपन प्रखर ऊर्जाक संग जे झमटगर पीढ़ी ठाढ़ भेल, ताहिमे प्रमुख छथि--धूमकेतु, रमानन्द रेणु, राजमोहन झा, गंगेश गुंजन, प्रभास कुमार चौधरी, कीर्तिनारायण मिश्र, वीरेन्द्र मल्लिक, मार्कण्डेय प्रवासी, साकेतानन्द, जीवकान्त, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, रामानुग्रह झा, कुलानान्द मिश्र,भीमनाथ झा, मन्त्रेश्वर झा, उदयचन्द्र झा ‘विनोद’, उपेन्द्र दोषी, सुकान्त सोम, महाप्रकाश, महेन्द्र मार्कण्डेय, सुभाष चन्द्र यादव, उषाकिरण खान,रामलोचन ठाकुर, उदयनारायण सिंह ‘नचिकेता’, बुद्धिनाथ मिश्र आदि। अइ पीढ़ीक पाछुए लागल अगिला पीढ़ी ढाढ़ भ’ गेल। अहाँ मानि सकै छी, जे आठम दशकक नामे जाहि पीढ़ीक नामकरण होइत अछि, तकर कतोक रचनाकार सातमे दशकक अन्तिम समयमे चैंचक होइत अपन, ऊर्जाक संकेत देबए लागल छलाह। अइ पीढ़ीक महत्त्वपूर्ण नाम थिक--विभूति आनन्द, शिवशंकर श्रीनिवास, अशोक, पूर्णेन्दु चौधरी, ललितेश मिश्र, विनोद बिहारी लाल, अग्निपुष्प, केदार कानन प्रदीप बिहारी, सियाराम सरस,तारानन्द वियोगी, विभारानी, नारायणजी, शैलेन्द्र आनन्द, रमेश, नीता झा, शैलेन्द्र कुमार झा, ज्योत्स्ना चन्द्रम, सुस्मिता पाठक, आदि। हमर प्रवेश अपेक्षाकृत देरीसँ भेल। अइ अन्तरालक रचना-कर्म पर चर्चा करबा लेल किछु महत्त्वपूर्ण बात पर ध्यान देब आवश्यक होएत। सन् 1947मे भारत देश स्वतन्‍त्र भेल आ सन् 1949मे महाकवि वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’क कविता संग्रह चित्रा प्रकाशित भेल--ई मात्र संयोग नइँ  थिक। प्रथम स्वाधीनता संग्रामसँ स्वाधीनता प्राप्ति धरिक नब्बे बर्खक अन्तरालमे मैथिलीक पूर्वज रचनाकार लोकनि मातृभाषाक प्रति परम अनुराग रखितहु कोनो क्षेत्रीय धारणासँ प्रेरित नइँ भेलाह, स्वाधीनता संग्रामक लक्ष्य पूर्तिमे लागल छलाह। स्वाभाविक छल जे सन् 1930-35क लगाति रचनारत लोक सभक मुख्य चिन्ता सेहो ओएह बनल। मुदा, ओहि कालक मिथिलाक स्थानीय समस्या सब सेहो प्रबल छल। विद्यापति, गोविन्द दाससँ होइत मनबोध, चन्दा झा धरि मैथिली भाषा साहित्यक स्वरूप तँ बड़ आगू आबि गेल छल, मुदा अंग्रेजी शिक्षाक प्रचार-प्रसार बढ़ि गेने स्थानीय अस्मिता संकटपूर्ण देखाए लागल छल। स्वाधीनता प्राप्तिक बादहु मैथिली कोनहुँ जनपदक राजभाषा नइँ  बनल। मातृभाषाक माध्यमे शिक्षा-दीक्षाक व्यवस्था मैथिल लेल नइँ  भेल। मातृभाषाक प्रति अनुराग आ ममता रखनिहार मिथिलाक जनसाधारण तथा प्रतिबद्ध रचनाकर्मीकें अइ बातक आघात लगलनि। चन्दा झासँ ल’ क’भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’ आ कांचीनाथ झा ‘किरण’ धरिक जे रचनाकार लोकनि समस्त आग्रह छोड़ि, निष्ठासँ स्वाधीनता संग्राममे अपन योगदान देने छलाह, हुनका आ हुनकर अनुवर्ती पीढ़ीक रचनाकार लोकनिकें ई झटका अत्यधिक आहत केलकनि। एकर अलावा वंशवाद, जातिवाद, आ धार्मिक पाखण्डक कारणें जते कुसंस्कार मिथिलामे ओहि समयमे पोनकि क’ भकरार भ’ गेल छल, से जनजीवनकें एकदमसँ आक्रान्त केने छल। बाल विवाह, बहु विवाह, बेमेल विवाह आदि वंशवादक सहारचरण छल। किशोरावस्था आ युवावस्थामे अंसख्य कन्या विधवा भ’ जाइ छलीह; स्‍त्रीकें स्‍त्रीधन कहल जाइ छल; ओ पुरुख-पात्रक अथवा खानदानक सदस्य नइँ , इज्जत होइ छली; चाही तँ माथ पर, चाही तँ बजारमे, चाही तँ पैर त’र राखि लिअ’। अइ दुरवस्थाक कारणें मिथिलाक सृजनधर्मी वातावरणमे स्तब्धताक माहौल आबि गेल छलै। अइ समयमे मिथिलाक जनपदीय भाषाक रूपमे कमासुत लोकनिक बीच विकासमान भाषा तँ मैथिलीए छल। वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’ कमासुत आ काजुल लोकनिक अइ विकासमान भाषामे कमासुत लोकनिक स्वप्न देखए लगलाह। सन् 1941मे रचित कविता ‘कविक स्वप्न’मे देखल बिम्ब ओही कमासुत लोकनिक स्वप्न थिक। कहि सकै छी जे महाकवि वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’क कविता संकलन ‘चित्रा’ ओइ कालक सामूहिक भावनाक उद्घोष साबित भेल। यद्यपि, एकर सूत्रपात पहिनहि, हुनकर पूर्ववर्ती कवि सीताराम झा, कांचीनाथ झा ‘किरण’, काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’, भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’द्ध हरिमोहन झा आदि क’ चुकल छलाह। देशदशा आ मिथिला समाजक दयनीय स्थिति पर व्यंग्य, धिक्कार आ क्रोधसँ परिपूर्ण अभिव्यक्ति हुनका लोकनिक रचनामे आबि चुकल छल। जीवन झा, यदुनाथ झा ‘यदुवर’, छेदी झा ‘द्विजवर’, पुलकित लाल दास, रघुनन्दन दास, भोला लालदास, ईशनाथ झा आदिक नामोल्लेख सेहो अइ क्रममे उचित थिक, जिनकर रचनाधारामे राष्ट्रीय चिन्ता आ आम नागरिकक सपना अंकित छल। महाकवि यात्रीक सृजनात्मक जीवनक फलक तँ पैघ छनिहें, ओहिसँ बेसी विराट हुनकर रचनाक फलक छनि। स्वातन्त्र्योत्तरकालीन मिथिला समाजक जीवन-क्रमकें जड़तासँ चेतनोन्मुख होइत अपना आँखिएँ देखैत रहलाह। अपन रचनाक प्रभावक परिणाम हुनका क्रमे-क्रमे देखाइत रहलनि। रचनात्मक सन्धानमे ओ योजनाबद्ध पद्धति अपनौने छलाह। सम्मुख ठाढ़ विकराल अन्हारकें मेटएबा लेल हुनकर समकालीन कवि ‘सुमन’आ ‘आरसी’क अपेक्षा कनेक बेसिए तीक्ष्ण ध्वनिसँ पूर्व पीढ़ीक सीताराम झा आ कांचीनाथ झा ‘किरण’ तत्पर रहथिन। हमरा लोकनिक जाहि मानवीय सम्बन्ध-सरोकार आइ जातिसँ चीन्हल जा रहल अछि; आ जाहि वर्गहीन समाजक सपना हम आइयो देखि रहल छी, से सपना सीताराम झा तहिए देखलनि, कहलनि--भेदहीन मानव-समाज एक जाति हएत।...जाहि धर्मान्धता आ पाषाण-मूर्ति पूजनमे मिथिलाक सशक्त हाथ जुटल रहै छल, तकर शक्तिक घोषणा आ अन्धविश्वासक खण्डन कांचीनाथ झा ‘किरण’ तहिए क’ देलनि। पूजा पबैत माटिक महादेवकें कहलनि--बलवान मानवक हाथक बलसँ बैसल छह तों सराइ पर... सुमन आ आरसी ओहि कालक बेस प्रशस्त कवि छथि; प्रगति आ विकासक प्रति, राष्ट्रक उन्नतिक प्रति हिनका लोकनिक बेस आस्था छलनि। श्रमशील लोकनिक प्रति पर्याप्त सम्मान रखै छलाह; मुदा कोनो नव बाट तकबा लेल अथवा बनएबा लेल कोनो सामान्यो उत्साह आ आग्रह नइँ  छलनि। यात्री जकाँ पुरानकें तोड़ियो क’ न’वकें स्थान देबाक उत्साह नइँ  छलनि; अभिप्रेत छलनि जे न’व आबथु, अवश्य आबथु, मुदा पुरानक अधीनता स्वीकार करैत। अकारण नइँ  थिक जे वर्षा ऋतुमे जखन--मेघ पड़ै छै, बुन्न झरै छैतँ आरसी प्रसाद सिंहक ‘मन मोर’ नाच’ लगै छनि आ कोनो प्रियाक कजराएल दृगसँ नोर खसैत बुझाइ छनि, मुदा यात्रीकें जखनहि-- गरजल इन्द्रक हाथीèछाड़ि नचारी गाबए लगला गिरहथ लोकनि मलार प्रमुदित दूबिक सीर-सीरèअछि पुलकित कूशक पेंपी...। अही बीच ब्रजकिशोर ‘मणिपद्म’, गोविन्द झा, रामकृष्ण झा ‘किसुन’, चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’ आदि लोकनि प्राणपणसँ लेखनमे जुटलाह। स्वातन्त्र्योत्तर कालक असन्तोष मुदा किनकहु रास नइँ अएलनि। चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’, गाँधीजीकें उलहन देबए लगलाह--देखहक हौ गाँधी बाबा तोरो स्वराजमेè...धरती से बाँझ पड़ल बनि परतीèकरती बहुआसिन की चुलहा जरा क’नेना करै’ छनि खाँहि-खाँहि हौ!... ओम्हर रामकृष्ण झा ‘किसुन’ बाँझी लागल वृद्ध जर्जर गाछक उखड़ि गेने आश्वस्त होअए लगलाह। कह’क चाही जे वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’क चित्रा(1949) आ राजकमल चौधरीक स्वरगन्धा(1959)क बीच रामकृष्ण झा ‘किसुन’ मैथिलीक जबर्दस्त सूत्र रूपमे काएम रहलाह। अगिला पीढ़ीक नायक कवि राजकमल चौधरी भेलाह। एतए धरि अबैत-अबैत मैथिली सकारात्मक रूपसँ बेस मुँहजोर भ’ गेल। जे कहबाक छलै, ताहिमे कोनो धरी-धोखा नइँ । स्वरगन्धाक प्रकाशनसँ पूर्वक मैथिली कविताक विकास-क्रममे आन भाषा जकाँ कोनो टोप-टहंकारसँ घोषणा अथवा दलबन्दी आदि नइँ भेल। मुदा ई बिसरबाक नइँ  थिक जे किरण, भुवन, मधुप, यात्रीक प्रयासें बनल अइ मन्दिरमे भकरार इजोतक टेमी राजकमल चौधरीए लेसलनि। पछाति मायानन्द मिश्रक कविता संग्रह ‘दिशान्तर’क कविता आ ओकर भूमिकासँ, आ फेर राजकमल चौधरीक निबन्ध ‘हमरा लोकनिक युग आ आधुनिक मैथिली कविता’सँ बात आओर फरीछ भेल। सन् 1949सँ सन् 1959 धरि;आ तकर बाद फेर आइ धरिक युगान्तकारी मैथिली साहित्य तकर उदाहरण थिक। एहि अन्तरालक समस्त ऊर्जावान रचनाकार लोकनि अपना-अपना समयक मैथिल नागरिक(स्‍त्री-पुरुष, सवर्ण-अवर्ण, हिन्दू-मुसलमान, शिक्षित-अशिक्षित, पालक-पालित, चाकर-स्वामी, दाता-याचक, भुक्त-भोगी...)कें अपना-अपना पक्ष लेल अर्थ-तन्‍त्र, समाज-व्यवस्थाक व्यूह आ पारम्परिक सम्बन्धक दुर्गसँ टकराइत देखलनि अछि; आ तकरा अंकित केलनि अछि। मोटे कहल जएबाक चाही जे सन् 1931सँ 1959 धरिक समय मैथिलीमे पुनर्जागरणक समय थिक, अही अवधिमे उद्भूत चेतना, समय आ सुविधा पाबि कर्त्ता-धर्त्ता लोकनिक विवेक आ कौशलकें उर्ध्‍वोन्मुखी केलकनि; आ तकरे परिणाम आगू धरिक साहित्यमे परिलक्षित भेल। व्यवस्थाक विरोध करैत, स्थापित काव्यधारासँ पृथक बाट धरैत आगू बढ़बाक उद्यम सब कालक नवोन्मेषमे देखल गेल अछि। अही नवोन्मेषमे विलाप,निस्सहाय, अशक्य अवस्थाक चित्रण छोड़ि रचनाकार लोकनि जनशक्तिक जागृतिक प्रति आस्था व्यक्त केलनि। घोषणा भेल जे--अहिल्याक डरें गौतम ऋषि कँपै छथि थरथर आब नइँ मुनि शापें हेतीह ओ पाथर(राजकमल चौधरी); फूटल घैलक खपटा जकाँ हम अपन अतीतकें इतिहासक गलीमे फेकि आएल छी(मायानन्द मिश्र); चेतना रहल ताकए हमर माथमे घी-दूध नहिओ जुटओèमुदा दालि रोटी के छीनत?(धीरेन्द्र)...सन् 1960क बाद देखल गेल जे ई प्रवंचना बढ़ले जा रहल अछि, स्थापित विचार-व्यवस्थाक प्रति विमुखता, व्यवस्थाक निरर्थकता आ व्यर्थताबोध, एसगरमे भीड़ आ भीड़मे एसगर हेबाक जटिल प्रक्रिया, निषेध-नकारक भाव...असीम छल। नव मोहावरा, नव शब्दावाली,जीवन-व्यवस्थाक विविध गतिविधिक नव बिम्ब, जनोन्मुख भाषा विधान, प्रहारोन्मुख ध्वनि, आत्मालोचन धरिमे निर्ममता आदि...अइ कालक रचनाक मुख्य प्रवृत्ति बनल। रचनाकार लोकनिकें विशिष्ट कहएबाक अपन महत्वाकांक्षा केर दाह संस्कार करब उचित (कीर्तिनारायण मिश्र) बुझेलनि; जिनगीक उत्ताप आ मनुष्यक शाश्वतता पर प्रश्न उठेनिहार पर अँगुरी उठेलनि--जिनगीक आगिमेèमृत्यु जरि गेलèके कहलक जे मनुक्ख मरि गेल?(रामकृष्ण झा ‘किसुन’)। घोषणा केलनि जे हम अपन सपना तोड़ि लेलèआब हम ओकर सपना देखए लगलहुँ जे हमरा लेल खेतमे भातक गाछ रोपैत अछि(मायानन्द मिश्र); कहलनि जे इच्छुक छी काल्हि प्रात छीन ली टीन किरासिन दीप बुतबए आओत जे, तै मशालचीसँ(सोमदेव)। अर्थात सन् 1960क पश्चात, पीढ़ीसँ पीढ़ीमे अपन गुण-सूत्र पसारैत मैथिली साहित्य अद्यतन भेल। नक्सलबाड़ी आ तेलंगानामे भेल किसानक जागृतिसँ जे कृषक क्रान्ति भेल, तकर असर भारतक सब भाषाक साहित्य पर पड़ल; नगरोन्मुखक साहित्य ग्रामोन्मुख भ’ गेल; कृषक चेतना पसरि गेल; मैथिलीमे सेहो एकर प्रभाव स्पष्ट हेबाक चाही छल। सातम आ आठम दशकमे क्रियाशील समस्त न’ब आ पुरान पीढ़ीक रचनाकर अपन विषय-बोध आ रचना-कौशलक परिचय देलनि। अपन पूववर्ती पीढ़ीक रचनात्मकतासँ प्रेरणा लैत अइ अन्तरालक रचनाकार लोकनि अइ समस्त दायित्वक संग आगू बढ़लाह। सन् 1966क बिहार, उड़ीसाक दुर्भिक्ष, सन् 1967क चुनावक पश्चातक सम्विद सरकारक गठन, आ सन् 1967क नक्सलबाड़ी आन्दोलनक सफलतासँ भारतक समस्त भाषाक सृजनकर्मीक संग-संग मैथिलीक जाग्रत चेतनाक रचनाकार लोकनि चौंचक भेलाह। सन् 1947सँ 1977 धरिक तीन दशक भारतीय नागरिक लेल छल-प्रपंच, दमन-उत्पीड़न, अभाव-कुभावे टाक नइँ ; अनिश्चय, दिशाहीनता, विचार शून्यता, संशय, पाखण्ड, अराजकता, दानवतासँ सेहो भरल रहल। स्वार्थपूर्ति हेतु देशक विवेकहीन नागरिक,दुनियाँ भरिक दुर्वृत्तिमे फँसैत गेल, प्रभुत्व जुटएबा लेल समस्त शील-सभ्यता, मानवता बिसरैत गेल। बिसरबाक एहि क्रममे लोक इहो बिसरि गेल जे प्रभुत्वक पहिल आ अन्तिम पहचान सभ्यता थिक, मानवता थिक। राजनीतिक-सामाजिक चेतना एतए सूक्ष्मसँ सूक्ष्मतर होअए लागल। बारम्बार पड़ोसी राष्ट्रक संग सीमा-संघर्ष, पार्टी विभाजन भेल, राजनीतिक मतभिन्नता, आपातकालक घोषणा भेल, राजनीतिक पतन, अपराध, आ आपराधिक राजनीतिक शृंखला, मन्दिर मस्जिद विवाद, लूट-पाट, हत्या, राहजनी, अपरहण, बूथ कैप्चरिंग, घपला, घोटाला, साम्प्रदायिक दंगा आ जातीय द्रोह...सबटा अही अवधिक उपज थिक। ई समस्त दुर्वृत्ति रिले रेशक करतब जकाँ बढै़त रहल। आम चुनाव, मध्यावधि चुनावक शृंखलासँ देश पर अपव्ययक बोझ लादैत गेल। अकाल, दुर्भिक्ष, बाढ़ि, सुखाड़, भूकम्प, अतिवृष्टि, अनावृष्टि आदि-आदि प्राकृतिक आपदा सबसँ तँ समाज तबाह छलहे,मनुष्य द्वारा सृजित तबाही लोककें आओर त्रस्त क’ देलक। विज्ञानक विनाश आ विध्वंसकारी परिणति सेहो कम उत्पाती साबित नइँ  भेल। अन्तर्राष्ट्रीय फलक पर आर्थिक उदारीकरण भेल। विश्वग्रामक अवधारणा बढ़ल। बहुराष्ट्रीय कम्पनीक आगमन आ नव शिक्षा नीतिक कारणें व्ययसाध्य रोजगारोन्मुख डिग्री-डिप्लोमा शुरुह भेल, शिक्षाक परिदृश्य बदलि गेल। अन्तर्राष्ट्रीय चिन्तन फलकसँ सम्पर्क भेने साहित्यिक क्षेत्रमे नव-नव विचार पद्धतिक प्रवेश भेल। साहित्यालोचनक उपस्कर समाज-व्यवस्था भ’ गेल। जीवन-क्रम आधुनिकसँ उत्तर आधुनिक भ’ गेल। भारतीय साहित्यमे दलित प्रश्न, स्‍त्री-विमर्श, उत्तर उपनिवेशवाद, वंशवादक विरोध आदि विचार-बिन्दु प्रमुख भ’ गेल। जे विभूति आनन्द ‘चूल्हि महक छाउरसँ चिनगी बीछि रहल’ माइकें देखि प्रमुदित’ होइ छलाह, से ‘आस्ते-आस्ते गाममे पक्की सड़क’ अबैत देखि प्रसन्न भेलाह, तहिआ नइँ  बूझि सकल छलाह जे‘एक दिन एही सड़क द’ क’èहमर अपन गामसँ गाम भागि जाएत ल’ जाएत भगा क’ हमरो...।’ तारानन्द वियोगीकें अनुभव भेलनि जे‘अहीं ठीक कहै छी बाबा, अन्यायक विरुद्ध लड़बाक उमेर कहिओ नइँ बीतै छै...’ मैथिलीमे सातम आ आठम दशकक रचनात्मक उद्यमकें हम अही अभिप्रेरणा आ दायित्वक नजरिसं देखै छी। 3.         सतरि के दशक मध्य मैथिलीमे समाजवादी अवधारणा मूड़ी उठेबाक प्रयास केलक ओकर की स्थिति रहलै, अहाँ सब ओइसँ कतेक प्रभावित-अप्रभावित रहलौं? जेना कि पछिला प्रश्नक उत्तरमे कहलहुँ, कोनहुँ भाषाक साहित्यमे कतबो क्रान्तिधर्मी पीढ़ी आबि जाथु, हुनका अपन पूर्ववर्ती द्वारा कएल-धएल महत्त्वपूर्ण काजक सम्मान करबाक चाहिअनि। परम्परासँ विछिन्न भ’ कए कोनहुँ टा प्रगति व्यवस्थित नइँ होइत अछि। तें हम मानै छी, जे हमरा पीढ़ी द्वारा साहित्यमे जते काज भ’ रहल अछि, ओ पूर्ववर्ती द्वारा कएल गेल महत्त्वपूर्ण काजक विकास-सूत्र थिक। ई पीढ़ी अपन पूर्ववर्तीक तुलनामे जे किछु बेहतर क’ सकल अछि, ताहिमे अइ पीढीक ऊर्जा, प्रतिभा आ रचनात्मकताक संग-संग पूर्ववर्ती पीढ़ीक महत्त्वपूर्ण काजक प्रेरणा आ समय-चक्रक अवदानक महत्त्वपूर्ण भूमिका अछि। हमर अइ धारणासँ सब गोटए सहमत होथु, से कोनहुना आवश्यक नइँ। हम व्यक्तिगत रूपें अपन पूर्ववर्तिए टा नइँ, कतोक बेर अपन समवर्ती आ अनुज पीढ़ीसँ से सेहो प्रेरणा ल’ लै छी। हमर ई दृढ़ मान्यता अछि जे दुनियाक स’बो टा काज हम नइँ क’ सकै छी। खाहे समयक अभावमे, खाहे प्रतिभा आ ऊर्जाक अभावमे। तें कोनो बिन्‍दु पर जँ व्‍यक्ति कोनो महत्त्वपूर्ण काज क' रहलाह अछि, तँ हुनकर सराहना कएल जएबाक चाही। थुक्‍कम-फजहतिमे लागल रहब अपन प्रतिभा आ ऊर्जा दुनूक अपमान थिक। 4.         अहाँ सभक प्रारम्भिक कालमे जुड़ल साहित्यिक मित्र-मण्डलीकें एकटा विशेष समूहबाजी लेल जानल जाइत अछि। किछु गोटए द्वारा ओतबे गोटएक बीच चर्चा परिचर्चा वा सब उकस-पाकस (साहित्यिक) केन्द्रित रहल। किएक? अइ ‘समूहबाजी’क उत्खनन के केलनि, हमरा से नइँ बूझल अछि। समूहबाजीमे के-के लागल छथि, सेहो हमर चिन्ताक विषय नइँ थिक। हम किनकर समूहमे छिअनि, से हमरा ज्ञात नइँ अछि। एतबा जनै छी जे मैथिली साहित्यक वयोवृद्ध रचनाकार पं. गोविन्द झा, पं. चन्द्रनाथ मिश्र‘अमर’ सँ ल’ कए अजित आजाद, कामिनी, धीरेन्द्र प्रेमर्षि धरिक पीढ़ीक एकटा समूह अछि, हमहूँ ओकर एकटा सदस्य छी। हमर आलोचनात्मक निबन्ध सब पर जँ अहाँक नजरि पड़ल हो, तँ अहाँ अनुभव क’ सकल होएब जे कोनो बाबिएँ हमरा समूहबाजी पसिन नइँ अछि। व्यक्तिक रूपमे किओ फुटली नजरि नइँ सोहाइ छथि, निजी तौर पर हमरा अपूरणीय क्षति दुख पहुँचौने छथि, तथापि साहित्यमे हम से मोन नइँ पाड़ै छी। साहित्यमे हुनकर योगदानकें ईमानदारीसँ अंकित करै छी। अपराधीकें माफ क’ देब हम अशक्यता नइँ मानै छी। अइ माफी लेल नमहर कलेजा चाही। माफी देलासँ शत्रुता आ प्रतिशोधक भावना समाप्त होइ छै। प्रतिशोधक भावनासँ काज करब साहित्‍यकारक नइँ, डकैतक काज होइत अछि। डकैत आ अपराधी स्‍वभावक साहित्यिक जीवकें माफ करब, आ गुटबाजी द्वारा साहित्यमे दाखिल-खारिज करबाक धन्धाक विरोध करब हमर मूल स्वभाव थिक। प्रायः इहो कारण हो, जे परोक्षमे अहाँकें हमर प्रशंसा केनिहार लोक नइँ भेटताह। कोनो खास समूहक करतूत पर किछु पूछए चाहै छी, तँ साफ-साफ पूछू। सत्य कहबामे हमरा कोनो दुविधा नइँ होइ'ए। साहित्य हमरा लेल सुविधा जुटेबाक साधन नइँ थिक। आत्‍मस्‍थापन आ उपलब्‍धि‍क माध्‍यम नइँ थि‍क। तें हमरा किनकहु भय नइँ होइत अछि। 5.         अहाँक पीढ़ीक रचनाकारक मध्य अपनाकें देखार करबा लेल पछिला वा स्थापित रचनाकारकें धकिएबाक वा गरिएबाक(साहित्यिके भाषाक माध्यमे) प्रवृत्ति जगजियार भेल रहै। तकर की उद्देश्य छलै? आ तै माध्यमे कते गोटए सफल भ’ सकलाह? ई आँकड़ा तँ हमरा नइँ बूझल अछि‍ मुन्नाजी, जे के कते सफल भेलाह? के कि‍नका कते धकि‍याबै छनि‍, मैथि‍लीमे इहो नेर्धारि‍त करब बहुत कठि‍न अछि‍। अइ शोध-कार्यसँ हम एख धरि‍ बचैत रहलहुँ अछि‍। जि‍नका ई काज पि‍यरगर लगै छनि‍, से करथु।... दोसर प्रश्नक-उत्तरमे हम स्पष्ट केने छी, जे हमर गनती जाहि पीढ़ीमे होइत अछि, तै मे हमर प्रवेश बहुत बादमे भेल। ता धरि अइ पीढ़ीक करीब-करीब रचनाकार अपन परिचय बना चुकल छलाह। ओहि काल फणीश्वरनाथ रेणुक धारणासँ हम सहमत भेल रही जे साहित्य मनुष्यकें सामाजिक बनबैत अछि, आ समाजकें मानवीय। मुदा क्रमे-क्रमे से धारणा भंग होअए लागल। लक्षण-गन्थ आ आलोचनात्मक पोथी आ आन साहित्यिक कृति पढ़ि कए साहित्य सृजनक उद्देश्य-अभिप्राय पर एक सँ एक वाक्य देखी, आ एम्हर मैथिलीक रचनाकार लोकनिक चर्या देखी, मोन घोर होइत रहए। क’ किछु नइँ पाबी, से तामसें अपनहिमे जरैत रही। अपना तुर’क अधिकांश रचनाधर्मी आ किछु वरिष्ठ लेखक लोकनिक बीच ‘साहित्य अकादेमीमे मैथिली’ प्रकरण पर चर्चा सुनि-सुनि दंग रहैत रही। मुदा सबटा चर्चा मुखविलासे टा होइत छल। देखार भ’ कए सोझाँ अएबाक चेष्टा वा साहस किओ नइँ करथि। सन् 1993मे जखन ‘हंस’ पत्रिकामे ओहि प्रसंग पर हम विरोध दर्ज केलहुँ, त’ हरबिरड़ो मचि गेल। हमरासँ कनिष्ठ पीढ़ीक नवगछुली सब हमर प्रशंसक बनि गेल, समवयस्की लोकनि पंचैती करए लगलाह, आ वरिष्ठ लोकनि विरोध। ओएह हमरा जीवनक एहेन घटना थिक, जे हमरा नजरिमे मैथिलीक समस्त रचनाकारक चरित्र स्पष्ट क’ देलक। वस्तुतः हम ओ काज केने रही व्यवस्था-परिवर्तन लेल, मुदा ओकर उपयोग मैथिलीक अग्रमुखी रचनाकार लोकनि अपन लाभ-लोभ लेल करए लगलाह। हमरा हुड़बा बना कए अपन काज सुतारए लगलाह। ओही दिन हम अपनाकें हुनका लोकनिक ओहि आचरणसँ काटि कए अलग करैत ई विचार केलहुँ जे विरोधमे जिआन कर’ बला ऊर्जाकें बचा कए विकासमे लगाबी, तँ सकारात्मक परिणाम सोझाँ आओत। आनक बात हम नइँ कहब, मुदा अपना मादे जनै छी, जे आइ धरि हम किनकहु चरित्र हनन नइँ केलिअनि अछि। किनकहु अधलाह लेखनक प्रशंसा, आ नीक लेखनक निन्दा नइँ केलहुँ अछि। कोनो उदाहरण होअए तँ साफ-साफ कहू। अपन समस्त नेतकें सबसँ पहिने हम अपना नजरिमे ठाढ़ क’ कए आ आनक काज बूझि कए निर्णय करबाक अभ्यासी छी। अपन पूर्ववर्ती पीढ़ीक समर्थ रचनाकारक अवहेलना आइ धरि कोनो समझदार व्यक्ति नइँ केलनि अछि। व्यक्ति-निन्दा आ रचनात्मक मूल्यांकन अलग-अलग बात थिक। महान भक्त कवि रसखान शुरुह-शुरुहमे परम लम्पट छलाह, महाकवि तुलसीदास घनघोर विषयी छलाह, कालिदासक कथा बूझले अछि...जँ हुनका लोकनिक जीवनक अइ प्रसंग पर चर्चा करी, तँ एकर की अर्थ निकालब, जे हुनकर रचना निंहेस थिक? 6.         अहाँ द्वारा एन.बी.टी.क माध्यमे मैथिली भाषा साहित्य लेल बहुत रास निस्सन काज भेलै। मुदा किछु लोक आरोपित करैत रहलाह जे सब काज अहाँ सबहक साहित्य-मित्र मण्डली मध्य घुरियाइत रहल। की सत्य छै एकर? मुन्नाजी, एन.बी.टी.ए टा नइँ प्रकाशन विभाग(भारत सरकार), आ सी.आई.आई.एल, मैसूरमे सेहो मैथिलीक नेंओं हमरे राखल थिक। मैथिल लोकनिक ई सबसँ पैघ समस्या थिक जे सामान्य स्थितिमे नइँ रहताह, अहाँ जिनका लेल हितकारी साबित भेलिअनि से अहाँकें पाग बना लेताह,जिनका लेल नइँ, से पनही। एन.बी.टी.मे अपन सेवाकालमे मैथिलीक चारि गोट पोथी हम प्रकाशित करौलहुँ, चारूक हिन्दी अनुवाद सेहो प्रकाशित अछि। मैथिलीक एकहु टा सम्मानित आ प्रतिभावान नव-पुरान रचनाकार ई नइँ कहि सकताह जे हुनका एन.बी.टी.क राष्ट्रीय मंचसँ आमन्त्रण नइँ देल गेलनि। सोलह बर्ख हम एन.बी.टी.मे हिन्दी लेल काज केलहुँ, हिन्दीक दिग्गज लोकनि आइयो हमर कएल-धएलकें रखांकित करै छथि‍, ओहू समयमे करै छलाह। मैथिलीक रचनाकार लोकनि लेल तीन बर्खमे जे किछु केलहुँ तकर घिर्ता-घिन्न अहाँ देखि चुकल छी। मैथिलकें अइ बातक प्रसन्नता नइँ भेलनि जे मैथिलीमे ई काज भेल, से देवशंकर नवीनक उद्यमक बिना सम्भव नइँ छल। देवशंकर नवीनकें किछु आओर काज करबा लेल सहयोग करिअनि। ओ लोकनि ई देखए लगलाह जे अइ काजसँ व्यक्तिगत रूपें हमरा कोनो लाभ कहाँ भेल? एते धरि जे किछु लाभन्वित व्यक्ति सेहो ओहि दुष्कर्ममे लिप्त भ’ गेलाह। हुनका लोकनिकें प्रायः ई बोधगम्य नइँ भेलनि, जे ओ लोकनि जे किछु प्राप्त क' सकलाह, से हुनकर अधिकार नइँ छलनि, हमर प्रयासक परिणाम छल। ओएह एन.बी.टी. तँ पहि‍नहुँ छल, कए टा मैथि‍ल लेखक चौकठि‍ नाँघि‍ सकल छलाह? दोसर बात जे हमरा रहैत मैथिलीक एकहुटा प्रस्ताव एन.बी.टी.मे आएल हो, तकर कोनो उदाहरण अहाँकें नइँ भेटत। जे किछु भेल, से हमरहि प्रस्ताव छल, सक्षम अधिकारीक स्वीकृति पर काज पूर्ण भेल। ओ नइँ केने रहितहुँ तँ हमर दरमाहा घटा नइँ देल जइतइ आ ओहि काजक संगोरमे जतबा समय लगौलहुँ, आ गारि-गज्जन सुनि कए जतबा व्यथित भेलहुँ, ताहिमे थोड़ेक अपन मौलिक काज क’ सकै छलहुँ। मुदा...ओना एकटा जानकारी अहाँकें द’ दी जे एन.बी.टी.मे हमर काजक निन्दा ओएह लोकनि क’ रहलाह अछि, जे अपनाकें बड़े भारी लेखक बुझै छथि, मुदा हम हुनका मनोनुकूल स्थान नइँ देलिअनि। हमर धारणा अछि जे हम कोनो विधाता तँ छी नइँ, हमर निर्णयसँ कोनो व्‍यक्‍ति‍ किऐ एते तिलमिलाइ छथि‍?दुनियामे एते रास विद्वान छथि, जँ कि‍नकहुमे प्रतिभा छनि‍, तँ कि‍ओ ने कि‍ओ मान्यता देबे करतनि‍! दोसर बात जे जाहि चारि टा पोथीक प्रकाशन एन.बी.टी. द्वारा भेल तकर सम्पादक तँ चारिए गोटए भ’ सकै छलाह! अइ चारिमे एक त’हम स्वयं छी, शेष तीन गोटएक स्थान पर कोनो दोसर तीन गोटएक नाम राखि कए देखू, तँ की सब सन्तुष्ट भ’ जेताह? अहाँकें उदाहरण दी, जे एन.बी.टी. द्वारा डोगरीमे जखन एकटा किताब छापल गेल, तँ महाराजा कर्ण सिंह मंच पर आबि कए कहलखिन जे ‘एन.बी.टी. के अध्यक्ष,निदेशक, सम्पादकों का मैं सम्पूर्ण डोगरा समाज की ओर से आभारी हूँ कि उन्होंने हमारी मातृभाषा को यह सम्मान दिया है।’ मैथिलीक लोककें सबटा चीज अपनहि नामे चाहिअनि। सब ठाम रहए चाहताह, प्रतिभा कथूक नइँ। भ’ सकए तँ पता लगा लिअ’ दिसम्बर 2010मे सी.आई.आई.एल.मैसूर, द्वारा अनुवाद पर पटनामे एकटा आयोजन भेल छल, ओहिमे अधिकांश आमन्‍त्रि‍त विद्वान(?) लोकनि अपन कोन प्रतिभाक प्रदर्शन हेतु आएल छलाह, आ की बाजि-भूकि कए गेलाह, से हुनका स्वयं नइँ बूझल हेतनि। एन.बी.टी.क काजक प्रसंग हमरा पर जे आरोप लगबै छथि, हुनकासँ तीन टा प्रश्न पूछल जाए, जकर उत्तर ओ ईमानदारी सँ दैथ— अइ आरोपक संग अहाँ कोनो स्वार्थसँ तँ प्रेरित नइँ छी? अइ काज लेल नियोजित व्यक्तिकें अहाँ अपना तुलनामे अयोग्य बुझै छी? अहाँक योग्यतासम्मत कोनो प्रस्ताव कहियो एन.बी.टी. द्वारा निरस्त कएल गेल अछि? अइ तीनू प्रश्नक जवाब सम्पूर्ण परिदृश्यकें सोझरा देत।...बात बहुत भ’ सकैत अछि। मैथिल सभाक कोनो नागरिक मंच हो तँ बैसाउ, हम सब बातक खोंइचा छोड़ा देब। ओना के जानत? इएह जे जवाब द’ रहल छी, तकर की परिणाम हएत? कते गोटए पढ़त? अहाँ सन-सन दस गोटए पढ़ि कए बूझि लेताह! से अहाँ लोकनि ओहुना पि‍हनि‍हसँ बुझिते छी! मैथिलीक कए गोटए सकारात्मक दृष्टिएँ कोनो बात पढ़ै छथि? 7.         अहाँ हिन्दी आ मैथिली दुनू भाषामे समान रूपें सृजनरत रहलौं अछि। दुनूक अपन स्वतन्‍त्र  अस्तित्व छै। ककर केहेन अस्तित्व छै? दुनूमे की समानता-भिन्नता देखाइछ? मुन्नाजी, हिन्दीसँ पहिने हम मैथिलीएमे एम.ए., पी.एच-डी.क’ कए बहुत दिन धरि रोजगारक बाट तकैत रहलहुँ। मुदा हिन्दीमे रोजगार भेटल। आत्मस्थापन, अन्न-वस्त्र-आवास-सुविधा-पहचान हिन्दी देलक। मिथिलांचलसँ उपटि गए जखन दिल्ली प्रवास करए लगलौं, ताहिसँ पहिने शुद्ध रूपें मैथिलीएमे लिखैत रही। कहियो कियो एकटा पोस्टकार्डो नइँ लिखलनि। ‘स्वान्तः सुखाय’क अपन महत्त्‍व भने होउ भाइ, मुदा जीवन जीबा लेल त’पाइ चाही। सन् 1991-93 धरिक हमर संघर्षमय जीवन हिन्दीमे लेखन, हिन्दीमे अनुवाद, आ दसमसँ बारहम  कक्षाक छात्र-छात्रा लोकनिकें फिजिक्स, कैमेस्ट्री, मैथमैटिक्स पढ़ा कए चलै छल। ओही दौरान एन.बी.टी.मे हिन्दीमे सम्पादनक कार्य हेतु नोकरी भेटि गेल। तकरा अछैत सन्1996मे मैथिलीक अध्यापक बनबा लेल इण्टरव्यू देबए पटना गेल रही; उनटे पैर वापस एलहुँ। मजबूरीमे जीवन-बसर हेतु हिन्दीमे लेखन आ अनुवाद काज शुरुह केने रही, आब ओएह मजबूरी भ’ गेल। बहुत रास सम्पादक लोकनि मित्र भ’ गेलाह अछि। दबाव दैत रहै छथि। सम्बन्ध-रक्षा हेतु लिखए पडै़ए। मोनो लगैए। हिन्दीमे आइ धरि जते चीज छपल अछि, सैकड़ो फोन आ दर्जनो पत्रसँ प्रशंसा होइत अछि, नीक लगैए। मुदा तैयो मातृभाषा तँ मैथिलीए थिक। साहित्यमे प्रवेश तँ ओही बाटए भेल अछि। पहचान मैथिलीएक रचनाकारक रूपमे अछि। सएह रहैयो चाहै छी। हम अपन परिसीमा एतबा अवश्य जनै छी जे जँ कोनो दिन किछु महत्त्‍वपूर्ण लिखि सकलहुँ, तँ से मैथिलीएमे लीखि सकब, कारण, मैथिली हमर मातृभाषा थिक, आ मातृभाषामे कएल काज निर्विवाद रूपें बेहतर होइत अछि। माइकेल मधुसूदन दत्त सेहो चारू दिससँ बौआ कए मातृभाषामे घुरि आएल छलाह। सत्य थिक जे मैथिली हमर मातृभाषा थिक, आ हिन्दी हमर राष्ट्रभाषा। दू मेसँ ककरहु मूल्य पर हम ककरहु प्रति अभद्र कथा नइँ सुनए चाहै छी। हमरा जीवनमे दुनू वरेण्‍य अछि‍, पूजनीय अछि‍। 8.         बहुत रास मैथिलीक रचनाकार हिन्दीमे लेखन क’ कए अपन अस्तित्व तकै छथि, असफल भ’ मैथिली दिस उन्मुख होइ छथि आ मैथिली रचनाकार मध्य अपनाकें पण्डित हेबाक स्वांग रचै छथि। एना किएक? एहेन काज के करै छथि, से हम नइँ जनै छी। हम स्वीकार करै छी जे हम मैथिलीमे लिखै छी। लोक हमरा मैथिलीक लेखक मानै छथि कि नइँ,से लोक जनैत हेताह। लोक मानि-मोजर देताह त’ लेखक कहाएब, अन्यथा अइ आत्मसुखक संग मरि जाएब जे जाहि काल जे नीक लागल, से केलहुँ! हि‍न्‍दीमे रीति‍‍-कालक प्रसि‍द्ध कवि‍ भि‍खारीदासक पद अछि‍--'आगे के सुकवि‍ रीझि‍हैं तो कवि‍ताई, नाही तो राधा कन्‍हाई के सुमि‍रन को बहानो हैं।' एतबा तय अछि रचनाकारक कोनो भाषा नइँ होइत अछि। भाषा तँ अनुवाद क’ कए बदलल जा सकैत अछि, विचार नइँ बदलल जा सकैत अछि। मैथिली कविता पर, कथा पर, आ नाटक पर हिन्दीमे जखन लेख लिखने रही, आ ओहि पर तमिल, तेलुगु, पंजाबी भाषाक लोक अपन-अपन विचार व्यक्त करए लगलाह, तँ प्रसन्नता भेल। आ हम सोचलहुँ जे ई काज हम मैथिली लेल केने छी। कविताबला लेख तँ हू-ब-हू पंजाबीमे केओ अनुवादो केने छलाह।... पाँच टा हिन्दी अंग्रेजीक पोथी पढ़ि कए जँ किओ मैथिलीक रचनाकार मध्य पण्डित कहबए चल जाइ छथि, तँ हुनका अपन ज्ञान-लोकक इलाज करेबाक चाहिअनि। कोनो रचनाकार भाषाक करणें नइँ, अपन रचनाक गुणवत्ताक कारणें पूजल जाइ छथि। कन्नड़ जानने बिना अहाँ यू.आर.अनन्तमूर्तिकें जनै छिअनि, रूसी भाषा जनने बिना अहाँ अन्तोन चेखब, दोस्तोयवस्कीकें जनै छिअनि! किऐ जनै छिअनि?...भाषाक कारणें नइँ। विविध भारतीय भाषा, आ विदेशी भाषामे जतेक अनुवादक मि‍त्र हमर छथि, हम एक रती सुगबुगा उठी, तँ हुनकर सहयोगसँ दुनियाक पचासो भाषामे हमर समस्त रचनाक अनुवाद छपि जाएत। मुदा ताहिसँ हम महत्त्वपूर्ण रचनाकार भ’ जाएब? जे किओ एहेन किरदानी करै छथि, हुनका करए दिअनु, साओन मासमे तँ इनार लग’क नालियो भरि जाइत अछि! समय हुनकर न्याय क’ देतनि। 9.         मैथिलीक किछु रचनाकार एके विषय पर एके रचनाकें हिन्दी-मैथिली दुनू भाषामे प्रकाशित करा क’ दुनू भाषामे ओइ रचनाकें ओहि भाषाक मूल रचना कहबाक गौरवक भान करैत छथि। एकरा अहाँ कोन रूपें देखै छी? ई कते उचित वा अनुचित थिक? हमरा जनैत अइ काजमे लेखक आ विवेचक--दुनू गोटएकें विवेक आ मर्यादासँ काज लेबाक चाहिअनि। लेखक जँ हू-ब-हू अपन रचना दोसर भाषामे छपबै छथि, तँ उनका पहिल प्रकाशनक भाषासँ अनूदित हेबाक उल्लेख करबाक चाहिअनि। ई लेखकीय विवेक तँ स’ब रचनाकारमे हेबाक चाहिअनि। मुदा जँ ओही विषय पर दोसर भाषामे ओ पुनर्सृजन थिक, तँ विवेचक लोकनिकें सेहो हंगामासँ बचबाक चाहिअनि। कोनो रचनाक विषये टा महत्त्वपूर्ण नइँ होइत अछि, सब भाषामे ओइ विषयकें उपस्थापित करबाक शिल्प आ वातावरण अलग होइत अछि। द्विभाषी रचनाकारक किछु खास समस्या अवश्य होइत अछि, मुदा तकर अतिरिक्त छूट लेखककें नइँ लेबाक चाहिअनि। विवेचक सेहो थोड़ेक धैर्यवान होथु। हम ओना एहन काज नइँ करै छी।... एकटा महत्त्‍वपूर्ण बात दिश अहूँके विचार करबाक नोत दै छी। रचना-कर्मक कोनो भाषा पहिनेसँ बेराएल नइँ होइ छै। मनुष्यक जीवनमे भाषा,अभिव्यक्तिक साधन मात्र नइँ थिक। जनपदीय संस्कृतिक सरणि आ मनुष्यक सोचबा-बुझबाक साधन सेहो थि‍क। मैथिलीमे जखन अहाँ ‘मातृका-पूजा’ कहै छिऐ, तँ की ओ एकटा शब्द मात्र होइत अछि? अहाँ जखन सोचै छी जे हमरा चिट्ठी लिखबाक अछि, तँ से सोचब कोनो भाषाक बिना सम्भव अछि? तें हमरा लोकनिकें इहो सोच’क चाही जे रचबा काल कोनो रचनाकारक समक्ष जनपदीय जनजीवनक कोनो घटने टा नइँ रहै छनि। आम नागरिकक जीवन-यापन, रीति-रिवाज, सोच-समझ, आहार-व्यवहार, व्यवस्था-संस्कृतिकें अंकित करबाक दायित्व सेहो रहै छनि। स’ब भाषाक अपन निजी वातावरण, आ संस्कार होइत अछि! शीतला माइक कोप, कोशी महरानीक प्रकोप, परशुरामजीक क्रोध, आ भीखन साहुक तामसमे की अन्तर होइत अछि, आजुक रचनाकर्मी नइँ सोचै छथि। अइ समझदारीक संग रचनारत द्विभाषी अथवा बहुभाषी रचनाकार वस्तुतः पशोपेशमे रहै छथि, जे रचना कोन भाषामे करथि? जिनकर रचनाकर्म एतबा सुविचारित नइँ रहै छनि, तिनका लेल चिन्तित हएबाक की प्रयोजन? 10.       मैथिली-भोजपुरी अकादेमीक आयोजनमे मैथिलीकें गरोसि लेल जाइए। एहेनामे भोजपुरीक न’ब उठल बिहारि द्वारा स्थापित भाषा मैथिलीकें उधिया जेबाक सम्भावना त’ नइँ बनि रहल अछि? अइ पर अहाँ सभक समूह अपन कोनो सक्रियता नइँ देखा रहल छथि। की भविष्य हेतै एकर? मुन्नाजी, हमर कोनो समूह नइँ अछि। जाहि दिनमे किछु अपात्र-कुपात्र लोक जहाँ-तहाँ हमरा गरिऔने फिरै छल, एखनहुँ गरिअबै अछि, हमरा विरुद्ध अपमानजनक लेख अमर्यादित भाषामे लिखि कए छपबै छल, आ हमर नियोजक धरि पहुँचबै छल; हमरा पर इन्क्वायरी बैसल, ओ इन्‍क्‍वायरी मैथि‍ली लेल काज करबाक दण्‍ड छल। अन्‍यथा देवशंकर नवीन पर अँगुरी उठएबा काल देवतो-पि‍तरकें सोचए पड़ि‍तनि‍।... ओहू समयमे कोनो व्यक्ति हमरा संगें ठाढ़ नइँ छलाह। जहाँ धरि मैथिली-भोजपुरी अकादेमीक प्रश्न अछि, ओकर शासी निकायक हम प्राथमिक सदस्य मनोनीत कएल गेल रही। अइमे हमर कोनो अपराध नइँ छल, हम अपना दिससँ कोनो टा उद्यम नइँ केने रही। किछु मैथिलीप्रेमी लोकनि अखबारबाजी करए लगलाह जे हम ओतए सचिव बनए चाहै छी। कतेक लज्जास्पद लगैत अछि कहबामे, जे ओहू समयमे हम ओहिसँ अधिक सम्मानित पद पर कार्यरत रही। अकादेमीक बैसकमे जाइत रही, मैथिली भाषा लेल जे अभद्र आचरण होइ छल, तकर विरोध करैत रही। मुदा हमरा कोनो सूचना देने बिना ओकर सदस्यतासँ समयपूर्व मुक्त क’ देल गेल। हम विरोध क’ सकै छलहुँ, मुदा जें कि किछु उत्साही मैथिल अइमे सक्रिय छलाह, हम से काज नइँ केलहुँ। आब ओतए की भ’ रहल अछि, से मैथिलीक ओ उद्धारक लोकनि जानथु। हम त’ मैथिलीमे लिखै छी, लिखैत रहब। मैथिली-भोजपुरी अकादेमीक कोनो कार्यक्रमक सूचना हमरा निमन्‍त्रण-पत्र अथवा फोनादिसँ नइँ, अखबारहिसँ भेटैत अछि। अखबारक सूचना पर दौड़ल जाइ, आ अपना लेल जगह ताकी, तेहेन स्‍वभाव हम वि‍कसि‍त नइँ क' सकल छी। सोन्हिया क’ कतहु बैसबा लेल एक बीत जगह ताकि लेब हमर काम्य नइँ थिक। ‘भोजपुरीक न’ब उठल बिहारि’ पदबन्धक उपयोग अहाँ केने छी। अइसँ अहाँक आवेशक अनुमान होइत अछि। हम अहाँक व्यथाक अनुमान क’सकै छी, तथापि एकटा निवेदन करै छी, जे एहेन शब्दावलीक प्रयोगसँ बचबाक चाही। उचित लागए तँ अइ सम्वादकें सार्वजनिक करबासँ पूर्व अइ प्रसंगकें सम्पादित क’ लेब। बल्कि ई आक्रोश तँ अहाँकें अपन मैथिल भाइ-बन्धु पर हेबाक चाही, जे आठम अनुसूचीमे जगह पाबि गेलाक बादहु अपन भाषाक गरिमाकें बचा नइँ पाबि रहल छथि‍। भोजपुरीभाषी लोक जँ अपन भाषाक विकास लेल उद्यमशील छथि, अपन लाभ लेल बानर जकाँ लड़ै नइँ छथि, त’ ई हुनकर अपराध थोड़े छिअनि? मैथिलीक लोककें तँ बल्कि प्रेरणा लेबाक चाही जे समृद्ध साहित्यिक विरासतक वंशज भेलाक बावजूद ओ भोजपुरीभाषीक सोझाँ पछलगुआ बनल ठाढ़ छथि। 11.       इग्नूमे बिहारि जकाँ आएल भोजपुरीक स्वतन्‍त्र भाषाक रूपमे पढ़ाइ भ’ रहल अछि। मुदा मैथिलीक लेल घोषाणा मात्र भ’ क’रहि गेल। एकरा लेल किओ सुगबुगेला धरि नइँ? की कारण? मुन्नाजी, हम आब गोनू झाक बिलाड़ि भ’ गेल छी। मैथिलीक भद्र-अभद्र लोक सबसँ तेना ने झड़कि गेल छी, जे कोनो सांस्थानिक काजमे हाथ दैत अबूह लगैत अछि। मैथिलीभाषी हेबाक कारणें हमरा पर टिप्पणी करबाक हक ओहेन-ओहेन लोककें भ’ गेल छनि, जिनकर हैसियत हमर पी.ए.,एटेण्डेण्टक बराबरीक नइँ छनि। आर्थिक आ बौद्धिक दुनू तरहें। जखन इग्नू ज्वाइन केलहुँ, तखन हमरा अइ काजक दायित्व-नि‍मन्‍त्रणक संग कहल गेल छल जे मैथिली लेल हम किछु काज करी, मुदा समकुलपतिक सोझाँ हाथ जोड़ि हम माफी माँगि लेलहुँ। ओइ कुण्डमे फेरसँ कथी लए खसि‍तौं। दायि‍त्‍व लेबाक अर्थ छल काज केनाइ, ओइ काजमे मैथि‍लीक कि‍छु वि‍द्वान आ कि‍छु कार्यकर्त्ता लोकनि‍कें काजमे जुटाएब। से जुटान हम अपन पसि‍नसँ करि‍तहुँ आ तखन फेर मैथि‍ल कुकूर सब कुप्‍फर मचबि‍तए, जे हमरा त' ई खैरात भेटबे नइँ कएल, नवीनजी सबटा धन अपन कुटुमकें द' देलि‍खन। अहीं कहू, जे ऐना तलवार पर गरदनि‍ हम कथी लेल रखि‍तहुँ? जाहि‍ दायि‍त्‍व लेल हमर बहाली नइँ छल, तै पर समर्पण-भावसँ काज क' क' एक बेर एन.बी.टी.मे स'ब दुर्गति‍ भोगि‍ चुकल छी। अइ अति‍रि‍क्‍त कार्यभारकें हाथमे ल’ कए अपना लेल मैथिलजनसँ गारि सुनबाक स्रोत फेरसँ किऐ जुटबि‍तहुँ? साफ-साफ कहि‍ देलि‍अनि‍--जे करै छथि, तिनका करए दिअनु, हमर सम्पूर्ण सहयोग हुनका संग रहतनि। जखन जे मदति मँगताह, हम तत्पर रहबनि। ओना अहाँक सूचना लेल ऑफ द’ रिकार्ड कहि दी जे फाउण्डेशन कोर्सक तैयारी पूर्ण भ’ गेल छै, ओ शीघ्रे छपि क’ आबि रहल छै। इग्नूक उत्साही वाइस-चान्सलर बहुत किछु क’ सकै छलाह, अइ बिन्दु पर हुनका कन्विन्स करब बहुत आसान छल, मुदा फेर ओहिमे जा कए मैथिल लोकनिक किरदानीसँ अपन जीवन हम अशान्त किऐ करितहुँ?...लोक अँगुरी उठबै छथि, जे हम अपन पदक दुरुपयोग क’ कए लेखक बनए चाहै छी, हुनका लोकनिकें किओ ई त’ पूछनि‍ जे हम जे किछु छी, से अपना बलें, अथवा ओहने कोनो अपात्र-कुपात्र मैथिलक बलें?...अहाँक अनुमान सत्य अछि, इग्नूमे पछिला दू बर्खक समय एतबा अनुकूल अवश्‍य छल जे प्रयास केला पर ‘मैथिली भाषा एवं संस्कृति शोध केन्द्र’ आरामसँ बनाओल जा सकै छल, मुदा...। हमही टा नइँ, अहाँ चाही तँ गजेन्‍द्र ठाकुरसँ पूछि‍ सकै छि‍अनि‍, मैथि‍लक अही स्‍वभावक कारणें एकाध टा एन.आर.आई. सेहो मैथि‍ली-सेवासँ अपन मुँह मोड़ि‍ लेलनि‍। 12.       अहाँ दुनू भाषामे कतेको प्रकारक रचना कएल, जाहिमे बीहनिकथा(विहनि कथा)क सेहो प्रमुखता छल। आब अहाँ सब एकरा बेरा किऐ देलौं? वर्तमानमे मैथिली मध्य बीहनिकथा (विहनि कथा)क की अस्तित्व अछि, आ एकर केहेन भविष्य अहाँकें देखाइ अछि?एखनुक रचनाकार सबमे किओ अइ पर सक्रिय देखाइ छथि? ठीके कहै छी अहाँ। एक समयमे विहनि कथा खूब लिखलहुँ, आब त’ कविता आ कथा सेहो नइँ भ’ पबै’ए। बेसी काल आलोचनात्मक निबन्ध लिखाइत अछि। मैथिलीक सम्पादक लोकनिकें हमर कोनो खगता नइँ बुझाइ छनि, तें ओहो कम्मे लिखाइत अछि। जीवनक तैस बर्ख राजकमल चौधरीक रचनावली तैयार करबामे लागि गेल। हमरा सन निराश्रित लोक लेल आत्मस्थापन लेल स्वावलम्बी शिक्षार्जन करैत-करैत, जीवन-यापनक साँगह जुटबैत एते समय लागब उचिते छलै। कारण, ई काज व्ययसाध्य, श्रमसाध्य आ समयसाध्य छलै। से अहाँ लोकनिक शुभकामनासँ आब पूर्ण भेल अछि। सम्भवतः अगिला दू-चारि मासमे छपि कए आबि जाए।...मुन्नाजी, हमर जीवनक बड़-बड़ समस्या अछि, देखब तँ अजगुत लागत। विज्ञानक छात्र छलहुँ, छिप्पी पर आबि कए साहित्य धेलहुँ। मातृभाषा मैथिलीमे लिखब शुरुह केलहुँ। हिन्दीमे रोजगार भेटल। एन.बी.टी.क काज करैत प्रकाशन-उद्योग आ बाल-साहित्य तथा अनुवादक कार्य पर चिन्तन करब विवशता बनि गेल। आब अनुवाद अध्ययनक आचार्य बना देल गेलहुँ अछि। एते तरहक दायित्वमे ओझराओल व्यक्तिकें कोनो चतुराइ, धूर्त्तता आ कूटनीति नइँ अबै छै, तें मारिते रास कुकूर पाछू-पाछू भूकि रहल छै,किछु नोछरियो लै छै। तें कोनो ठाम सम्पूर्णतासँ नइँ राखि‍ पबै छी। आखिर एक मनुष्यक क्षमताक तँ कोनो सीमा हेतै ने? विहनि कथा लेखनकें ओइ समयमे जीवकान्त सनक थोड़ेक बोधगर लोक सब चुटकुला कहने रहथिन। मुदा लोककें बुझबाक चाहिअनि जे विहनि कथा लेखन बहुत मेहनति आ जोखिमक काज थिकै। ई कथा कम आ कविता बेसी होइ छै। एकर काया छोट आ व्यंजना विराट होइ छै। नबका पीढ़ीक बहुत रास लोकक बहुत किछु पढ़ब एखन शेष अछि, तें एखनुक रचनाकारमे के-के सक्रिय छथि, से घोषित करबामे हम अक्षम छी। अहाँ चाही त’ अइ बातकें हमर आयोग्यता मानि सकै छी। मुदा बहुत रास नवतुरि‍या बहुत उत्‍साहसँ काज क' रहलाह अछि‍। एतबा धरि‍ अवश्‍य अछि‍ जे जे किओ स्तरीय विहनि कथा लिखैत हेताह, हुनका अइ बातक अनुमान हेतनि जे विहनि कथा लेखनक काज ‘कठिन भूमि कोमल पगगामी’काज थिक। 13.       मैथिलीमे क्रियाशील रहि अहाँ सदिखन किछु नव-नव काज करैत रहलौं, आगामी एहेन कोनो योजना अछि? सोचै छी जे हमरे नइँ, किनकहु प्रयासें ‘रचना: पाठ-प्रक्रिया’, ‘मैथिलीक अनुवाद परम्पराक अध्ययन एवं अनुशीलन(वैश्विक सिद्धान्तक कसौटी पर)’,‘मैथिली साहित्यक सांस्कृतिक उदग्रता(उत्तर उपनिवेशवाद, उत्तरआधुनिकता, स्‍त्री-विमर्श, दलित-प्रश्नक प्ररिप्रेक्ष्यमे)’ आ ‘तुलनात्मक साहित्यक सम्भावना आ स्वरूप’ पर मूल मैथिलीमे पोथी आबए, आ तकरा पढ़ि कए लोक विचार-विमर्श करए। हम यथासाध्य अइ दिशामे काज करैत रही से तय केने छी। अहाँ लोकनि शुभकामना दिअ’ जे सफल भ’ सकी। मैथिल लोकनिक आघातसँ बचल रहलहुँ तँ कदाचित भ’ओ जाइ। मुदा ई बड़ पैघ काज छै, तें अइ दिशामे बेसी लोकक योगदानक अपेक्षा छै। के अग्रसर हेताह से नइँ बूझि रहल छिऐ। ओना आगू अएनिहार कोनो व्यक्तिकें हमर जाहि कोनो मदतिक प्रयोजन पड़तनि, हम तत्पर रहबनि। 14.       अहाँक पीढ़ीक कतेको गोटएकें पुरस्कार सम्मान भेटि गेलनि। मुदा एते काज केलाक पछातियो अहाँ एखन धरि कतिआएल छी। एकरा कोन तरहें देखै छी अहाँ? हमरा जनैत मान्यताक एक मात्र कसौटी पुरस्कारे टा नइँ होइत अछि। आ मैथिलीमे पुरस्कारो त’ एके दू टा देल जाइ छै प्रति वर्ष! कते गोटएकें देल जेतै? ओना एक बात तय अछि जे निर्णायक लोकनिकें हमरासँ बेसी योग्य ओ लोकनि बुझाएल हेथिन। जहिया हुनका लोकनिकें हम सर्वोपरि लगबनि, हमरहु द’ देताह। निर्णय तँ हुनके लोकनिकें करबाक छनि। एकटा पुरस्कार समितिक खिस्सा कहै छी--समितिमे कैकटा सदस्य रहथि। हम मायानन्द मिश्रक नामक प्रस्ताव देलिअनि। किछु गोटए किछु आओर नामक प्रस्ताव केलथि। हम प्रश्न केलि‍अनि, जे अहाँ जिनकर नाम प्रस्तावित करै छी, हुनकर भरि जीवनक रचनात्मकतासँ मायानन्दक रचनात्मकताक तुलना करैत किछु कहू! हुनका मायानन्द मिश्रक कोन कथा, जिनकर नाम प्रस्तावित केने रहथि, हुनकहु पाँच टा कथा,दस टा कविताक शीर्षक मोन नइँ छलनि।...एहेन तरहक निर्णायक समिति जँ अहाँकें कोनो पुरस्कार द’ओ दैथ, तँ कोन प्रसन्नता होएत? 15.       अपन सम्पूर्ण साहित्यिक यात्रामे प्राप्त अनुभवकें नवतुरिया रचनाकारक संग की कहि बाँट’ चाहब? ओना तँ हम एखनहुँ धरि अपनाकें नवतुरिए मानै छी। मुदा तें हमर उमेर तँ घटि नइँ जाएत! अपन अइ तीस-बत्तीस बर्खक साहित्यिक यात्रामे अनुभव केलहुँ अछि(मैथिली, हिन्दी दुनू भाषाक इतिहासकें देखैत कहै छी) जे कोनो पुरस्कार, सम्मान, पद, मद, काज नइँ करै छै, काज करै छै रचना। अहाँक रचनामे अहाँकें जीवित रखबाक औकाति नइँ रहत, तँ सब किछु अहाँक देहावसानक संगहि छाउर भ’ जाएत। आ, अहाँक रचना अहाँकें तखनहि जीवित राखि सकत, जँ ओहिमे कोनो सार्थक जीवन-दृष्टि हो। तें सार्थक किछु रचैत रहबाक प्रयासमे हम लागल रहै छी। रचि पाबै छी कि नइँ, से हम कोना कहू। अपन स’ब मित्र लोकनिसँ आग्रह करबनि जे गहन अध्ययन, चिन्तन, मनन, आदिसँ जे समय बचि जाए ताहिमे अपन रचनाकें ईमानदार, सम्वेदनशील, ठोस, आ प्रभावी बनेबाक चेष्टा करी। आचार्य भवभूति जकाँ ई सोचैत रचना करी ते अइ अनन्त-अपार समय-संसारमे कहियो किओ निश्चये हेताह, जे हमर रचनाक संज्ञान लेताह। 16.       मैथिली साहित्य सब दिन बभनौतीक(बाभनवादक) शिकार भेल रहल। मुदा अहाँ सभक समूह एकर अपवाद बनि सोझाँ आएल। बाभनक समूह मध्य गैरबाभन रचनाकारक स्वतन्‍त्र  अस्तित्व की अछि? एकरा साहित्यिक समरसता कही वा सामाजिक समरसाक प्रतीक वा किछु आओर? असलमे मैथिलीक मध्यकाल आ आधुनिक कालक प्रारम्भिक अन्तरालमे मैथिलीमे जतेक लोक रचनाशील भेलाह, से ब्राह्मण आ कायस्थ छलाह। स्वभावतः रचनामे अही दुनू जातिक जीवन-यापनक सांस्कृतिक वर्चस्व बनल, जे बादक समयमे आबि कए रूढ़ि आ पाखण्डक रूप ध’ लेलक। क्रमे-क्रमे ब्राह्मण आ कायस्थ बूझए लगलाह जे हम जे बजै छी, से मैथिली भाषा भेल, आ आन जे बजैए से छोटहा लोकक बोली। ब्राह्मणेतर आ कायस्थेतर लोक सहजहिं बूझए लगलाह, जे मैथिली वस्तुतः ब्राह्मण आ कायस्थक भाषा थिक। मुदा ई प्रसंग एतेक आसान नइँ अछि। अइ पर गम्भीरतापूर्वक विचार-विमर्श करबाक प्रयोजन छै। हम उल्लेख करए चाहै छी, जे पर्याप्त तर्कक संग प्रो.रमानाथ सिद्ध क’ चुकल छथि, जे भारतीय साहित्यमे कैक भाषाक लोक ‘सिद्धसाहित्य’कें अपन भाषाक प्रारम्भिक सामग्री मानै छथि, मुदा सत्य बात ई थिक, जे ओ मैथिली साहित्यक आदिकालीन सामग्री थिक आ ‘सिद्धसाहित्य’क अधिकांश रचनाकार दलित छलाह।... भाषाशास्‍त्रीय दृष्टिसँ देखी, तँ एक देश-राज्य-जिला-गामक बात तँ दूर, एक परिवार धरिक समस्त सदस्यक भाषामे भिन्नता रहैत अछि। ओहिमे कोन सदस्यक भाषा मानक हो, तकर निर्णय करब कठिन होएत। तें कोन जाति आ वर्गक भाषाकें मानक मानि साहित्यमे जगह देल जाए, अइ विवादमे पड़ब उचित नइँ थिक। मुदा ई सत्य थिक जे मैथिलीमे ब्राह्मण आ कायस्थ वर्गक वर्चस्व रहल अछि। हमरा जनैत मैथिली साहित्यमे ब्राह्मणेतर आ कायस्थेतर वर्गक अनुपस्थितिक दू तरहक प्रसंग छल--एक तँ ई जे मिथिलाक अइ विशाल वर्गक लोक अइ भाषामे साहित्य सृजनसँ जुड़ल नइँ छलाह; दोसर जे ओइ वर्गक जीवनक्रमक वाजिब चित्रांकन एतए नइँ होइ छल। सीताराम झा, कांचीनाथ झा ‘किरण’, यात्री, राजकमल होइत किछु आगू धरिक साहित्यमे जँ ओहि वर्गक किछु चित्र अएबो कएल, तँ पर्याप्त ईमानदार चित्रणक अछैत सम्वेदनात्मक स्तर पर ओहि गहन जीवनानुभूतिक चित्रण नइँ भेल। ई बात हम तेना जकाँ नइँ कहि रहल छी जे साहित्यमे मृत्युक वर्णन करबा लेल मरब आवश्यक अछि। मुदा एकटा बाँझ स्‍त्री निःसन्तान हेबाक जाहि सामाजिक तिरस्कारकें भोगैत अछि, तकरा कोनो सन्तानवती स्‍त्री ओहिना नइँ  बूझि सकैत अछि, जेना कोनो बाँझ स्‍त्री प्रसव वेदनाकें नइँ बूझि सकैत अछि। तें, अइ इतर वर्गक सक्षम प्रतिनिधित्वसँ साहित्य सम्पन्न होएत, आ सम्पूर्ण मैथिल समाजक चित्र, मैथिली साहित्य प्रस्तुत क’ सकत, से विश्वास कएल जा सकैए। मुदा समस्या ई अछि मुन्नाजी, जे व्यवस्था-क्रम बड़ विकट अछि। असलमे ब्राह्मणवाद आब कोनो जातिवाद नइँ रहि गेल अछि, ई एकटा व्यवस्था बनि गेल अछि। अहाँ देखैत होएब जे कोनो ब्राह्मणेतर व्यक्तिकें प्रतिपक्षमे ठाढ़ हेबाक इच्छा होइ छै, त’ ओ जनौ पहिरए लगैए,लोककें अइसँ बचबाक चाही। कोनो व्यक्तिकें पहचान उपस्थित करबा लेल काज करब जरूरी होइ छै। काज होइत रहतै, मान्यता भेटबै करतै। अइ स्थापित रहस्य अथवा मिथ अथवा वर्चस्वक गढ़, गत शताब्दीक सातम दशकसँ टुटैत रहल अछि, आगुओ टुटैत रहत। वर्तमान समयमे कतोक रास ब्राह्मणेतर आ कायस्थेतर लोक मैथिलीमे रचना क’ रहलाह अछि, आ बढ़िया क’ रहलाह अछि। 17.       अहाँ सब मैथिली समीक्षाकें एकटा न’ब बाट धरौने रही। वर्तमानमे मैथिली समीक्षाक केहेन अस्तित्व छै? किओ-किओ त’एकरा ओलि सधेबाक साधन जकाँ बुझै छथि। अहाँ की कहब? मैथिली समीक्षे टा नइँ, आनो विधाक हाल-सूरतिमे थोड़-बहुत काँय-कचबच छै। जहिआसँ मैथिलीकें आठम अनुसूचीमे जगह भेटलै, झंझट आओर बढ़ि गेलै। लोककें मैथिली कोनो धन्धा बुझाए लगलै। सी.आई.आई.एल. मैसूरमे आलोचनात्मक पोथी कीनल जाएत, ताहि लेल की कहाँ छापि-छापि लोक तैयार भ’ गेलाह। सालो भरि लोक मैथिलीमे किताब छपबैत रहै छथि, किऐ छपबै छथि, देखि कए छगुन्ता लगैए, आखिर किऐ ई लोकनि कागज दूरि करै छथि? अहाँ लेखनक गप करै छी, ‘आधुनिक साहित्यक परिदृश्य’ शीर्षक अपन पोथीमे हम सन् 2000मे मैथिलीक बाइस टा रचनाकारक रचना-संसार पर एक-एक टा लेख लिखने रही, ओहिमे सँ पन्द्रह टा रचनाकार जीवित रहथि आ एखनहुँ छथि। आनक कथा तँ जाए दिअ, ओ आलोच्य रचनाकारो धरि ओहि पोथीक, कम सँ कम अपना पर लिखल लेख’क संज्ञान नइँ लेलनि, निन्दो करबा लेल किओ एकटा पोस्टकार्ड नइँ लिखलनि। हँ, थोड़ेक आन साहित्यप्रेमी ओइ पोथीक पर्याप्त प्रशंसा केलनि। अहाँ जाहि समूहबाजीक गप करै छी, जँ सत्ते हमर कोनो समूह अछि, तँ तकरहु सदस्य सब ओइ पोथीक चर्चा अपन कोनो भाषण, आलेखमे नइँ केलनि, कोनो पत्रिका ओइ पोथीक समीक्षा नइँ छपलक...आओर बहुत रास बात अछि, मुदा से एकालाप भ’ जाएत। ओलि सधेबा लेल जे समीक्षा लिखल जाइत अछि, से हमरा जनैत साहित्य नइँ होइत अछि। पाठक बूरि नइँ होइ छथि। पाठक आ समय के अदालत, रचनाकारक न्याय अवश्य करै अछि। आलोचनाकर्म लेल बहुत बेसी ईमानदारी, मेहनति, आ निर्लिप्तताक प्रयोजन पड़ै छै। हमरा जनैत तत्काल यशःप्रार्थी लोककें साहित्य-कर्ममे नइँ अएबाक चाही। एतए दीर्घ आ निर्लिप्त साधनाक प्रयोजन होइ छै। अन्तमे अहाँक माध्यमे हम अपना पर टिप्पणी केनिहार समस्त लोककें सूचना द’ दिअनि जे राजकमल चौधरीक साहित्य पर काज केनिहार देवशंकर नवीनक नेतमे खोट तकनिहारकें सोच’क चाहिअनि, जे हम ओस आ अंगारमे दाग ताकि रहल छी। मारिते रास भाग्य-विधाता सभ साहित्यमे छथि, किनकहु कीर्तन क’ कए हम किछु प्राप्त क’ सकै छलहुँ। सब जनै छथि, जे ई काज हमरा लेल कते सुलभ छल। मुदा मनुष्यकें मरै काल कहाँ दन अपने टा कएल काज शान्ति दै छै। २४ बहुविधाविध रचनाकार युवा पत्रकार श्री गजेन्द्र ठाकुरजी सँ युवा प्रतिनिधि विहनि कथाकार एवं समीक्षक मुन्नाजीसँ भेल गप्प सप्प प्रस्तुत अछि:- मुन्नाजी:गजेन्द्र जी नमस्कार। युवावर्गमे अहाँक कार्य देखि आह्लादित होइत रहलौं अछि, ताहि हेतु अहाँसँ ऐ पर विस्तृत चर्चा करऽ चाहब। गजेन्द्रजी अहाँक बेशी रहनाइ आ शिक्षा मिथिलासँ बाहर भेल। उच्च शिक्षाक माध्यम अंग्रेजी रहल तखन मिथिला/ मैथिलीसँ एतेक लगाव कोना? गजेन्द्र ठाकुर: बच्चामे १९७९-८०मे चौथा-पँचमा हम अपन गामक प्राइमरी स्कूलसँ केने छी। हमर पिताजी बिहार सरकारमे कार्यपालक अभियन्ता रहथि जखन कार्यकालहिमे हुनकर मृत्यु भऽ गेलन्हि। मुदा ई गप ओहिसँ पुरान अछि, ओहि समयमे हमर पिताजी सहायक अभियन्ता रहथि आ पटना-हाजीपुरक गंगापुल बनि रहल रहए। पिताजी इमानदार रहथि से ठिकेदार सभ आ अभियन्ता सभ रोलरसँ पिचबाक धमकी देने रहन्हि, बच्चा सभकेँ मारबाक धमकी देने रहन्हि। अपने तँ ओ पलायन नहि केने रहथि मुदा हमरा सभकेँ गाम पठा देने रहथि। भऽ सकैए यएह डेढ़ सालक गामक निवास मैथिलीसँ आ मिथिलासँ हमर लगावक कारण रहल हुअए। फेर बादोमे सालमे दू बेर पिताजीक संग गाम जाइते छलहुँ, एक बेर होलीमे आ दोसर बेर दुर्गापूजामे। पिताजीक मुँहे एक बेर सुनने छलहुँ जे एहि जन्ममे तँ नगरमे रहि रहल छी मुदा अगिला सात जनम गाम नै छोड़ब। मुन्नाजी:पहिल बेर रचनाक प्रेरणा कोना/ कतऽसँ आ कहिया भेल। पहिल रचना (लिखल) कोन छल आ पहिल प्रकाशित अचना कोन (विधा सहित कही) कतऽ कहिया छपल। गजेन्द्र ठाकुर: वएह १९७९-८०क गप अछि। गामक स्कूलमे एकटा बाल नाटकक भार हमरा कान्हपर वीरभद्रजी नवका मास्टर साहेब आ बड़हराबला मास्टर साहेब देलन्हि। नाटकक पोथी कत्तऽ सँ भेटत? तँ दानवीर दधीची लिखलहुँ। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनकमे ई ढेर रास सुधारक संग प्रकाशित अछि २००९ ई. मे। २००० ई. मे जे हम मैथिलीक देवनागरीक साइट याहूसिटीजपर बनेलहुँ ओहिसँ हमर पाण्डुलिपि टाइप भऽ अन्तर्जालपर नियमित रूपे आबए लागल, बादमे याहू अपन जियोसिटीज बन्न कऽ देलक मुदा ५ जुलाइ २००४ केँ “भालसरिक गाछ” नामसँ बनाओल हमर मैथिलीक अन्तर्जाल पहिल मैथिली उपस्थितिक रूपमे एखनो विद्यमान अछि। यएह भालसरिक गाछ १ जनवरी २००८ सँ विदेह पाक्षिक ई-पत्रिकाक रूपमे नियमित रूपेँ आबि रहल अछि, आब तँ एकर ७० टा विदेह रूप आ ४ टा सदेह रूप आबि गेल छै। प्रिंट पत्रिका/ दैनिकक जतऽ धरि गप अछि तँ भारती-मंडन, समय साल, घरबाहर, अंतिका, आँकुर, पूर्वोत्तर मैथिल, जखन तखन, मिथिला डट कम (जनकपुर), परमेश्वर कापड़ि जीक पत्रिका (जनकपुर), मिथिला समाद, मिथिला दर्शन आदिमे रचना सभ छपल अछि। भारती-मंडन लेल पूर्णियाँसँ हम रचना पठेने छलियनि २००१-०२ मे केदार कानन/ तारानन्द झा “तरुण”केँ,  जे बादमे छपबो कएल, ओहि कालमे हम सासुरमे रही एकटा दुर्घटनाक बाद, बैशाखीपर डेढ़ बरख धरि रही(२००१-०२)। भऽ सकैए ओहो कालावधि हमरा समय देलक आ हमर दिशा निर्धारित कएलक। मुन्नाजी:एक संग एतेक विधामे रचना करबामे असोकर्ज नै होइछ? एक संग बहुविधाक संगोर प्रकाशित करबाक की उद्देश्य? गजेन्द्र ठाकुर: एतेक विधा माने कतेक विधा? विधा तँ दुइये टा छैक गद्य आ पद्य। हमर कथा शब्दशास्त्रम् मे ढेर रास गीत छै। तस्कर कथा पंजीमे वर्णित तस्कर केशवक तहमे गेलाक उपरान्त फुराएल। आब पंजीक मिथिलाक्षरसँ देवनागरीमे लिप्यन्तरण नै करितहुँ तँ लैला-मजनू आ हीर राँझाक कोटिक मैथिली प्रेमकथा मैथिलीमे नै अबितए। मैथिली अंग्रेजी डिक्शनरी रहै मुदा इंग्लिश-मैथिली डिक्शनरी नै रहै, से ओ बनएबाक क्रममे हम ब्लॉगकेँ जालवृत्त लिखै छी आ इन्टरनेटकेँ अन्तर्जाल, तँ से कोना होइतए, हमर विज्ञान कथा काल-स्थान विस्थापन, आ अन्तर्जाल आ प्रबन्धनपर आलेख, मैथिलीक लेल SWOT अनेलिसिस मैथिलीमे कोना लिखाइत? तँ सिद्ध भेल जे हमर गद्य-पद्य एक दोसराक लेल ऋणी अछि, हमर पाण्डुलिपिक लिप्यन्तरण/ अंकण आ शब्दकोषक निर्माण सेहो हमर गद्य-पद्यक विशिष्टतामे योगदान देलक। हमर मैथिली-संस्कृत शिक्षाक कार्य मूल संस्कृत कथा-काव्यक अन्वेषणमे हमर सहायता केलक, आ ताहि कारणसँ “दानवीर दधीची”क पौराणिक दन्तकथा जाहिमे दधीची हड्डी दान दै छथि केँ हम नै मानलहुँ आ वैदिक कथा मानलहुँ जाहिमे आश्विनौ हुनका (दधीचीकेँ) घोड़ाक मुँह लगा दै छथि आ ओहि गरदनिकेँ इन्द्र काटै छथि आ फेर आश्विनौ दधीचीक असल मुँह लगा दै छथि, आ ओहि काटल घोड़ाक मुँहक हड्डीसँ इन्द्रक हथियार तैयार होइ छै, दधीचीक हड्डीसँ नै। त्वञ्चाहञ्च (मूल संस्कृत महाभारतपर आधारित)आ असञ्जाति मन (संस्कृतमे अश्वघोषक बुद्धचरितपर आधारित) ई दुनू गीत प्रबन्धमे आएल मूल विशिष्टता सेकेन्डरी सोर्सक अध्ययनसँ सम्भव नै छै, आ नहिये दूर्वाक्षत मंत्रक वा आन वैदिक युगक कथ्यक विश्लेषण (ग्रिफिथक अंग्रेजी अनुवादक सेकेन्डरी सोर्सक विपरीत) बिना मूल अर्थ बुझने सम्भव, से मायानन्द मिश्रक प्रथम शैल पुत्री च, मंत्रपुत्र, पुरोहित आ स्त्रीधनक समीक्षामे सेहो काज आएल।  तँ हमर संस्कृत-मैथिली शिक्षा एतए काज आओल। हमर दर्शन शास्त्रक मूल वाचस्पति/ कुमारिल/ मंडनक ओ भामती आ ब्रह्मसिद्धिक दार्शनिक तत्व शब्दशास्त्रम् मे आओल। तँ हमर अंग्रेजी साहित्यक शिक्षा हमर आलेख मैथिली साहित्यपर अंग्रेजी साहित्यक प्रभावक आधार बनल। हमर ऋगवैदिक संस्कृत आ अवेस्ता क मूल अध्ययन मैथिलीक गजलशास्त्रक आलेखमे प्रयुक्त भेल तँ हैकू आ हैबून- मूल जापानी काव्यशास्त्रक अनुवादक आधारसँ विशिष्टता प्राप्त कऽ सकल। सहस्रबाढ़निक ब्रेल वर्सन, कैथी आ मिथिलाक्षर यूनीकोडक निर्माणमे योगदान हमर कम्प्यूटर विशेषज्ञताक बिना सम्भव नै छल तँ हमर लेबर इन डेवेलपमेन्टक कोर्स हमर बाल-श्रमपर आधारित बाल कविता लेल अपरिहार्य छल। एक संग ई सभटा रचना हार्डबाउन्डमे कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक नामसँ एहि द्वारे प्रथमे-प्रथम छपल कारण हम एकरा परिवारक सभ सदस्य लेल लिखने छी। शिशु/ बाल साहित्य सेहो एहिमे अछि कारण छोट बच्चा स्वयं ओ रचना नै पढ़त वरन् अहाँ ओकरा पढ़ि कऽ सुनेबै, कविता यादि करेबै, अंकिता वर्णमाला शिक्षा देखू, नाटक करबबियौ। मूड अछि तँ कथा पढ़ू, नै तँ कविता-समीक्षा/ नाटक पढ़ू खेलाऊ। महाभारत/ बुद्धचरित पढ़बाक पलखति नै अछि तँ त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन पढ़ू। मोन अछि तँ उपन्यास पढ़ू आ नै तँ दीर्घकथा-विहनि कथा पढ़ू। बादमे ई सातो खण्ड पेपरबैकमे सेहो सात खण्डमे आएल। हार्डबौन्डक हजार कॉपी तँ गोट-गोट बिका गेलै। मुन्नाजी:एक संग बहुविधाक रचना प्रकाशनसँ अहाँक अपन अस्तित्वकेँ खतरा नै बुझाइत अछि? एहेन केलासँ भऽ सकैछ जे समीक्षक अहाँक कोनो मूल्यांकन नै कऽ सकैथ? गजेन्द्र ठाकुर: मुदा से भेलै नै। कारण लीखपर चलैसँ हमरा परहेज नै अछि जे ओ कत्तौ धरि पहुँचाबए, आ नै तँ नव लीख बनेबामे सेहो कोनो असोकर्ज नै। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक हमर २००९ धरिक समस्त कृतिक (पंजी आ डिक्शनरीकेँ छोड़ि जे अलगसँ प्रकाशित भेल) संकलन अछि। ई पाठक लेल लिखल गेल अछि, समीक्षकक लेल नै, मैथिलीक ओहेन समीक्षकक लेल नै जिनका मिथिलाक्षर नै अबैत छन्हि आ कम्प्यूटर इलिटेरेट छथि से पंजी आ कम्प्यूर/ प्रबन्धन विषयक आलेखक समीक्षा नै कऽ सकताह से हम बुझै छी, करबाको नै चाहियन्हि; ऋगवैदिक संस्कृतक ज्ञान नै छन्हि तँ हमर ताहि सम्बन्धी समीक्षापर ओ समीक्षा नै कऽ सकताह से हम बुझै छी, आ से करबाको नै चाहियन्हि। मुदा जाहिपर ओ कऽ सकै छथि ताहिपर करथु, कतेक समीक्षक केबो केलन्हि अछि, जेना प्रेमशंकर सिंह, शिव कुमार झा आ राजदेव मंडल। पक्ष-विपक्षमे सएसँ बेशी चिट्ठी सेहो आएल अछि। मुदा जे पाठक छथि हुनकर प्रतिक्रिया आह्लादकारी अछि, प्रिंटक अतिरिक्त हजारसँ बेशी डाउनलोड विश्वभरिमे पसरल मैथिलीभाषी द्वारा हमर सभ पोथीक भेल अछि। बिना कोनो सरकारी साहित्यिक संस्थाक सहयोगसँ हमर उपन्यास सहस्रबाढ़निक अनुवाद अंग्रेजी, संस्कृत, तुलु, कन्नड़, मराठी आ कोंकणीमे कएल गेल। एहि उपन्यासकेँ ब्रेलमे लोक पढ़ि रहल छथि। खिरदमंदों से क्या पुछूँ कि मेरी इब्तिदा क्या है कि मैं इस फिक्र में रहता हूँ मेरी इन्तिहा क्या है, (इकबाल) (बुधियारसँ हम की पूछू जे हमर आरम्भ की अछि, हम तँ एहि चिन्तामे छी जे हमर ओरछोर की अछि।-इकबाल) खुदी को कर बुलन्द इतना, के हर तकदीर से पेहले खुदा बन्दे से खुद पूछे, बता तेरी रज़ा क्या है ? (इकबाल) (अपन निःस्वार्थताकेँ ओहि स्तर धरि लऽ जाऊ जे ककरो भाग्य बनेबाक पहिने भगवानकेँ ओकरासँ ई पूछए पड़न्हि जे बता केहन भाग्य चाही तोरा।- इकबाल) मुन्नाजी:अहाँ निश्शन रचनाकार आ समीक्षकक अतिरिक्त मैथिली पत्रिकाक एकटा आधार स्तम्भ भऽ देखार भेलौं अछि। “विदेह ई पाक्षिक” प्रारम्भ करबाक विचार कोना भेल? आइ एकरा आ एकरा माध्यमेँ अपनाकेँ कतऽ पबै छी? गजेन्द्र ठाकुर: मैथिली पत्रिका सभकेँ रचना पठाएब तँ दू बraखक उपरान्त नम्बर आएत, नहियो आएत। अतिथि सम्पादक रचना मंगबा कऽ गीड़ि गेलाह, सेहो उदाहाण अछि। नव रचनाकार हतोत्साहित रहथि। से विदेह प्रकाशनक नियमितता लऽ कऽ आएल, वितरणक समस्या एकरा नै रहै , कारण ई अन्तर्जालपर छल। भारत आ नेपालक मैथिली भाषीक बीचक जे बोर्डर छलै, देशक बोर्डर, से विदेह लेल नै छलै। भारतक नै वरन विश्वक बीच पसरल मैथिली भाषी मध्य विदेह लोकप्रिय भेल। मैथिलीमे पाठक नै छै, नीक लेखक नै छै, युवा लेखक नै छै, गएर मैथिल ब्राह्मण-कर्ण कायस्थ- गएर सवर्ण लेखक नै छै, ई समस्त धारणा विदेह तोड़ि देलक। आइ धरि विदेह ई पत्रिकाकेँ १०७ देशक १,५७१ ठामसँ ५१,०७७ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी. सँ २,७२,०८२ बेर देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डेटा)। विदेह: सदेह:१ मे ११८ टा लेखक (१८ बर्खसँ ८८ बर्ख धरि) छलाह। विदेह मैथिलीक एकमात्र अन्तर्राष्ट्रीय शोध जर्नल अछि जकरा पेरिस स्थित अन्तर्राष्ट्रीय संस्था मान्यता देने छै। विदेह अही सभ उद्देश्यसँ शुरू भेल आ अपन सभटा उद्देश्य प्राप्त कएलक। मुदा एतेक भेलाक पश्चातो हम कहब जे ई तँ एखन मात्र प्रारम्भ अछि। विदेहक कारणसँ बहुत गोटे नीक-अधलाह लोक भेटलाह, बेशी नीके। विदेहक कारणसँ हमरा पाठक भेटल, स्नेह भेटल। विदेहक कारणसँ एकटा दवाब रहैत अछि, रचना करबाक दवाब आ रचनाकारकेँ जोड़बाक दवाब। मुन्नाजी: ब्राह्मण वर्ग अपन हितपूर्ति लेल मैथिलीक दुरुपयोग केलनि वा मैथिलीकेँ गरोसि गेला। गएर ब्राह्मण वर्ग निङ्घेस जकाँ टारि पलथी मारने रहला, एकर की कारण, ऐ सँ मैथिलीकेँ कतऽ धरि लाभ वा हानि भेलै? गजेन्द्र ठाकुर: मैथिलीक दुरुपयोग वा कोनो भाषाक दुरुपयोग कोना सम्भव अछि? ई तखने सम्भव अछि जखन लोकक आर्थिक दशा तेहन होइ जे ओ भोजन लेल झखैत हुअए वा सरकार ओकर शिक्षा-व्यवस्थामे दोसर भाषा घोसिया दै, भारतमे हिन्दी आ नेपालमे नेपाली घोसियाओल गेल। ब्राह्मण वा कायस्थ-वर्ग शिक्षामे आगाँ छलाह (देशक दोसर भागक ब्राह्मण वा कायस्थसँ हम तुलना नै कऽ रहल छी- हुनका सभसँ तँ ई लोकनि बड्ड पछुआएल छथि।), माने मिथिलाक दोसर जातिसँ। से साहित्यमे सेहो यएह सभ अएलाह। ने मिथिलामे राममोहन राय भेलाह जे विधवा लेल लड़ितथि, ने गेब्रियल गार्सिया मार्क्विस भेलथि जे “ए हन्ड्रेड ईयर्स ऑफ सोलिट्यूड” लिखबा लेल कार बेचि देलथि जे ओहि पाइसँ परिवारक साल भरिक खर्चा चलतन्हि आ ओहि अवधिमे ओ ई उपन्यास लिखताह! मुदा ई दुनू गप पूर्णतः सत्य नै अछि, बहुत गोटे अपन सर्वस्व बेचि मैथिली लेल झोकलन्हि, मुदा गुटबन्दीक कारण हुनकर चर्चा नै भेल। कतेक गोटे विवादमे घसीटल गेलाह तँ ओ तथाकथित पतनुकान लऽ लेलन्हि। पंजीमे कमसँ कम तीनटा सर्वस्वदाताक विवरण अछि जाहिमे एक गोटे अपन जीवनमे तीन बेर सर्वस्व दान केलन्हि। पंजीमे सैकड़ामे अन्तर्जातीय विवाहक विवरण अछि आ से ब्राह्मण आ दलितक बीच। तस्कर केशव राजाक निहुछल लड़कीसँ विवाह केलन्हि, लक्ष्मीश्वर सिंह किछु नै कऽ सकलाह। मुदा ई सभ दू साल पहिने धरि अभिलेखित नै भेल। १९४२ ई.क आन्दोलनमे पंचानन झा आ पुरन मंडल झंझारपुरमे संगहि अपन बलिदान देलन्हि मुदा से अभिलेखित नै भेल, आब २००९ ई. मे जगदीश प्रसाद मण्डल ओहि घटनाकेँ अपन पछताबा कथाक आधार बनेलन्हि। गएर ब्राह्मण वर्गक जगदीश प्रसाद मण्डल/ राजदेव मण्डल/ बेचन ठाकुर/ महेन्द्र नारायण राम/ मेघन प्रसाद/ बिलट पासवान “विहंगम”, हिनका सभक अतिरिक्त जे साहित्यकार छथि ओहिमेसँ बेसी वएह आगाँ बढ़ि सकलाह जे टोना-टापर जानै छथि आ ब्राह्मण- कायस्थ मध्य सेहो बेशीकाल टोना-टापर जानैबला आगाँ बढ़लाह, से ककरा दोष देबै। ने पाठक रहै, जे जेबीसँ खर्चा केलन्हि से विवादित कएल गेलाह, जे प्रतिभावान रहथि से हतोत्साहित कएल गेलाह आ जे टोना-टापर जानैबला रहथि से आगाँ बढ़लाह। कारण सेहो स्पष्ट अछि जे मैथिलीमे पाठक नै छल तेँ ई भेल आ ईहो सत्य जे एहि सभ कारणसँ पाठक नै बढ़ल, चिकन एन्ड एग प्रोब्लम। गएर ब्राह्मण वर्गक राजनीतिज्ञ बेसी दोषी छथि, ओ वोट माँगैले आबै छथि मुदा जितलाक बाद मैथिली नै बजताह जे हम अहाँक भाषा नै बाजै छी, से हमरासँ दूर रहू। विदेहक आगमन एहि सभ पक्षकेँ सोझाँमे राखि कऽ भेल, मैथिलीकेँ देल स्लो-प्वाइजनिंगक प्रभाव दूर भेल अछि। मुन्नाजी:मैथिली विशेष कऽ गएर ब्राह्मणेक मूल भाषा छल। ब्राह्मणक मूल भाषा तँ संस्कृत रहल, बोली चालीमे सभक भाषा मैथिलीये रहल। मुदा ब्राह्मण लोकनि हुनका सभकेँ पूर्णतः दूर रखलनि। अहाँ हुनका सभकेँ जोड़ि लेलौं? कोना? गजेन्द्र ठाकुर: मानुषीमिह संस्कृताम् – ई उक्ति हनुमान जीक छन्हि जे सीतामैयाक नैहरक भाषा मानुषीमे हुनकासँ अशोक वाटिकामे गप केलन्हि (वाल्मीकि रामायण- सुन्दरकाण्ड)। मैथिलीमे बहुत रास शब्द अछि जे वैदिक संस्कृतमे अछि मुदा लौकिक संस्कृतमे नै, से मैथिल खास कऽ गएर ब्राह्मण वर्ग वैदिक संस्कृतक बेशी लग छथि तँ पढ़ल लिखल मैथिल (ब्राह्मण आ कायस्थ) लौकिक संस्कृतक। मुदा लोक कंठमे बसल साहित्य गएर ब्राह्मण वर्गमे अछि, उमेश मंडल १२-१४ जातिक एहेन साहित्यक संकलन केने छथि तँ महेन्द्र नारायण राम/ विश्वेश्वर मिश्र/ मणिपद्मक पोथी सेहो छपल छन्हि। ई अवश्य जे विदेहक अएबासँ पूर्व एकभगाह स्थिति छल नब्बै प्रतिशत ब्राह्मण आ १० प्रतिशत कायस्थ साहित्यकार छलाह। अन्य नगण्ये छलाह, विदेह सभक मध्य भरोस उत्पन्न कऽ सकल ताहिमे ओ सभ गोटे शामिल छथि जे विभिन्न कालावधिमे विदेहसँ जुड़ैत गेलाह आ एकरा शक्ति प्रदान कएलन्हि। पहिने ज्योतिजी, फेर विद्यानन्द झा, नागेन्द्र कुमार झा, रश्मि रेखा सिन्हा, उमेश मंडल, शिव कुमार झा आ मनोज कुमार कर्ण, जया वर्मा आ राजीव कुमार वर्मा विदेहसँ जुड़लाह। हमरा आ सम्पादक मंडलक सदस्यकेँ मानसिक रूपेँ प्रतारित करबाक घृणित प्रयास सेहो किछु टोना-टापर जानैबला साहित्यकारक इशारापर कएल गेल, मुदा एहिसँ हमरा सभकेँ झमेलासँ बाहर अएबाक कला सिखबाक अवसर भेटल। मुदा उत्साहवर्धन करएबलाक तुलनामे ई सभ बड्ड कम मात्रामे रहथि, राखू पाँच प्रतिशत। हम सभ लोककेँ जोड़लहुँ आ ओ सभ जुड़लाह, दुनू सत्य अछि। हमर ई प्रयास एहि अभाव-भाषणकेँ खतम कऽ देलक- यौ बड्ड प्रयास केने छिऐ, नै सम्भव छै यौ..आदि...आदि; आ एहि अभाव भाषणमे ब्राह्मण-कायस्थ तँ शामिले रहथि, गएर ब्राह्मण-कायस्थ साहित्यकार आ राजनीतिज्ञ सेहो शामिल रहथि, आ ओ सभ बेशी दोषी छथि। दोसर आबि जएताह तँ हमर चलती कम भऽ जाएत, माने प्रतियोगितासँ दूर भागब, ई जेना ब्राह्मण-कायस्थ आ गएर ब्राह्मण-कायस्थ साहित्यकार- दुनुक मनोभावना बनि गेल छल; ओना एहिमे अपवादो सभ छथि। मुन्नाजी:अहाँ स्वयं ब्राह्मण वर्गसँ रहि पुरना बभनौटी (ब्राह्मणवाद) सँ अलग बाभनवादसँ दुखी वा कतिआएल रचनाकार, सभ जाति-धर्मक नव-पुरान रचनाकारकेँ एक मंचपर एक संग जगजियार कऽ रहलौंहेँ, एकरा पाछाँ की मानसिकता वा रहस्य अछि? गजेन्द्र ठाकुर: मैट्रिकक सिलेबसमे पढ़ै छलहुँ जे सभ जातिक मैथिलीभाषी मैथिल छथि, मुदा वास्तविक धरातलपर, विद्यापति पर्व आदिमे ई मैथिल विशेषण मुख्यतया दू जातिक भऽ जाइत छल। माने कथनी आ करणीक अन्तर। हमर पालन-पोषण आ शिक्षा-दीक्षामे कथनी आ करणीक अन्तर नै रहल, प्रायः सएह कारण होएत। दोसर प्रतियोगिता बढ़त तँ अहींक साहित्य ने मजगूत होएत, बेशी लोक आएत तखन ने नीक लोक बेशी आएत। जातिक नामपर वा सर-सम्बन्धीक नामपर हमर सहयोग क्यो मँगबाक हिम्मत नै केने छथि, कमसँ कम ओ लोकनि जे हमर पिता आ हमरा चिन्हैत छथि। ने कोनो रचनाक चोरकेँ हम जातिक नामपर बकसैबला छियन्हि। आ जे ओहि प्रवृत्तिक छथि से सभ जाति-धर्मक लोक एकट्ठा भऽ जाथु जाहिसँ पीठमे छूरा भोंकेबासँ तँ हमरा सभ बचि जाएब। आ हमर मानसिकताक लोक जे एक मंचपर एक संग जगजियार भऽ रहल छथि तँ हम सएह कहब जे हमर काज हुनका सभमे हमरा सभक प्रति विश्वास देने छन्हि- से हुनका सभकेँ धन्यवाद। मुन्नाजी:कोनो एहेन विशेष क्रियाकलाप वा घटना जे अहाँकेँ बाभनक वा बभनौटीक प्रति आक्रोश आ गएर बाभनक प्रति लगाव बढ़ेलक। गजेन्द्र ठाकुर:कोनो एक घटनाक आवश्यकता कत्तऽ छै। दरभंगाक दोकानमे मैट्रिकक सिलेबसक गाइडक अतिरिक्त कोनो मैथिली पोथी नै भेटै छलै, कोनो एक साहित्यकारक मुँहसँ दोसराक प्रति आदर वचन नै निकलै छलै, कियो अतिथि सम्पादक बनि अहाँक रचनाक चोरि केलक तँ ओकरा अहाँ पकड़ी तँ ताहिपर एकमत नै होइ जाइ छलाह उन्टे दोषीकेँ पीठ ठोकै जाइ छलाह, शब्दशः चोरि आ आक्रान्त वा प्रभावित भेल रचनाक अन्तर ककरा नै बुझल छैक आ ओहि आरिमे शब्दशः चोरि केनिहारक पीठ ठोकब! विदेहक आगमनक बाद एहि सभमे परिवर्तन आएल, एकरा के नकारि सकत। सत्यक प्रति लागव रहत आ अन्यायक प्रति विरोध तँ सभ किछु अनायासे आबि जाएत, कोनो विशेष क्रियाकलाप वा घटनाक आवश्यकता नै पड़त, कोनो घटनासँ फाएदा उठेबाक आवश्यकता नै पड़त। मुन्नाजी:अहाँक मैथिली पत्रकारिताकेँ दूरि हेबासँ बचेबाक वा सत्यक खोजक कारणेँ गारि-गंजनक पछातियो एक स्टंपपर अड़ल रहबाक दृढ़ संकल्प कतेक दिन धरि निमहता हएत? गजेन्द्र ठाकुर: कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक समर्पणमे हम लिखने रही- पिताक सत्यकेँ लिबैत देखने रही स्थितप्रज्ञतामे तहिये बुझने रही जे त्याग नहि कएल होएत रस्ता ई अछि जे जिदियाहवला। आ ई पढ़ि गामक बहुत गोटे कानए लागल छलाह। हुनका सभकेँ बुझल छन्हि, मुदा अहाँकेँ हम यएह कहि सकै छी जे एकर निर्धारण भविष्य़ करत, अपन विषयमे बढ़ा-चढ़ा कऽ की कहू। मुन्नाजी:किछु सम्पादक- “अहाँ हमर छापू वा हमरापर लिखू आ हम अहाँक छापब”बला नियतिपर छथि। ओ किछु चुनल-बीछल लोककेँ छपै छथि वा परिवारवादमे लेपटाएल रहै छथि। मुदा अहाँ ऐ सँ इतर सभकेँ स्थान दै छियैक- ई की सोच जाहिर करैए? गजेन्द्र ठाकुर:मैथिलीमे समस्या रहै जे पाठक नै रहै, तेँ ओना होइ छलै। हम सभ सभकेँ स्थान दैत छिऐ तँ एहिसँ पाठक बढ़ल, मैथिली मृत होएबासँ बचि गेल। आ आब दोसरो पत्रिका सभ सभकेँ स्थान देनाइ शुरू कऽ देने छथि- कारण अभाव-भाषण जेना लेखके नै छै, दोसर जाति लिखिते नै छै, नव लोक मैथिलीमे आबिये नै रहल छै, ई सभ मिथ विदेह द्वारा ध्वस्त कऽ देल गेल छै। मुन्नाजी:मैथिलक मानसिक अतिक्रमणसँ अहूँ अपन विचार बदलि ओहिना रहरहाम तँ नै भऽ जाएब, जेना मैथिली पत्रकारितामे आइ धरि चलि आबि रहलैए? गजेन्द्र ठाकुर:मैथिलक मानसिक अतिक्रमण हमरापर होएत कोना? प्रतियोगितासँ, मेहनतिसँ हम दूर नै भागै छी। मैथिली पत्रकारितामे प्रतिभावान लोकक संख्या कम छलै से ओहन अतिक्रमण होएब स्वाभाविक रहै। मैथिली किएक, सभ भाषाक पत्रकारितामे/ विश्वविद्यालय शिक्षणमे भाषा विषयमे कम मार्क्समे नामांकन होइ छै, तेँ एहन अतिक्रमण बेशी होइ छै। मुदा विदेहक आगमनक बाद दोसर विषयक जेना इतिहास, भूगोल, कम्प्यूटर साइन्स, चाटर्ड एकाउन्टेन्सी, डॉक्टर आदिक संख्या मैथिली साहित्यमे बढ़ल अछि; साहित्य विषयमे सेहो प्रतिभावान लोक सभ छथि, सेहो सोझाँ आएल छथि। हमर मृत्युक बादो ई रक्तबीज सभ हमर उद्देश्यकेँ आगाँ बढ़बैत रहताह। मुन्नाजी:ठाम-ठीम ई चर्च उठैत अछि जे अहाँ आ श्रुति प्रकाशन, व्यक्ति विशेषकेँ छपबामे अपन आर्थिक-मानसिक ऊर्जाक बेशी अंश लगा रहल छी, ताहि हेतु अहाँ की कहब? गजेन्द्र ठाकुर:विदेहमे आइ धरि ई नै भेल अछि। हमर “प्रोविडेन्ट फन्ड आ एरियरक पाइ” आ माँक पेंशनक सीमित संसाधनक बावजूद जे मानसिक संसाधन अछि, जेना बुक डिजाइन, साइट-डिजाइन, टाइपिंग ई सभ विदेहक सम्पादक मंडल द्वारा मुफ्त उपलब्ध कराओल जाइत अछि। कोनो मैथिलीक पत्रिका वा संस्था वेबसाइट निर्मांण, पत्रिकाक रजिस्ट्रेशन आदि लेल विदेहसँ सम्पर्क केने होथि आ से हुनका नै भेटल होइन्ह, से नै भेल अछि। श्रुति प्रकाशनक मैथिली पोथीक लेल सेहो हम कैमरा-रेडी-कॉपी धरि तकनीकी सहायता दैत छियन्हि। हमर देल सलाहपर श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जीक आठ टा किताब आ स्व. राधाकृष्ण चौधरी जीक मिथिलाक इतिहास छापल जा रहल अछि/ छापल गेल अछि, ई सभटा पोथी विदेह आर्काइवपर  मुफ्त डाउनलोड लेल उपलब्ध छै, एकरा सभकेँ अहाँ पढ़ू आ स्वयं निर्णय करू जे गुणवत्ताक आधारपर ई सभ छपबा योग्य अछि वा एकर छपबाक निर्णय व्यक्ति विशेषक आधारपर कएल गेल छै। बहुत रास हमर सलाह प्रकाशक द्वारा नहियो मानल गेल, सभ संस्थाक आर्थिक संसाधनक सीमा छै। श्री जगदीश प्रसाद मण्डल आ स्व. राधाकृष्ण चौधरी जीक पाण्डुलिपि कतेको सरकारी मैथिली संस्थासँ जुड़ल पुरोधा लग गेलन्हि मुदा ओ लोकनि अपन पोथी छपेबाक जोगारमे छलथि, छपबेबो केलन्हि, भने ओकर कोनो ग्राहक/ पाठक नै होइ। मुदा एते धरि होएबाक चाही जे गुणवत्ता आधारित पोथी सभक हजारक हजार डाउनलोडक संग प्रिंट वर्सनक पाइ दऽ कऽ किननिहार संख्या देखि ई मैथिली सरकारी-गएर सरकारी संस्था सभ आब अपन विचार बदलथि। कारण आब हम मात्र विदेहपर केन्द्रित भऽ काज कऽ रहल छी आ प्रकाशक सेहो सीमित मात्रामे पोथी प्रकाशित करबामे समर्थ छथि तेँ जे ई लोकनि आगाँ आबथि तँ विदेह आर्काइवमे अमूल्य आ ढेर रास अद्भुत रचना/ रचनाकार उपलब्ध अछि/ छथि। कैमरा रेडी कॉपी धरि बनेबाक काज हम मुफ्तमे कऽ देबन्हि। मुन्नाजी:अहाँसँ एकटा व्यक्तिगत जीवनक पहलूसँ जुड़ल प्रश्न पूछब जे अहाँ नोकरीक संग सभसँ नियमित सम्पर्क, नियमित रचनारत रहि नियमित पत्रिकाक संचालनक अतिरिक्त पारिवारिक समन्वयन कोना कऽ पबैत छी? गजेन्द्र ठाकुर:पत्नी प्रीति ठाकुरक सहयोग छन्हि, ओहो मैथिली चित्रकथाक चित्रकारीमे लागल रहै छथि, बच्चो सभ, ओम आ आस्था, शान्त प्रकृतिक छथि, से अतिरिक्त सुविधा प्राप्त अछि। विदेहक दूर-दूर प्रान्त देशमे बसल सम्पादक मंडलक सहयोग छन्हि, जे कतेक मेहनति करै छथि आ हुनका सभसँ कम मेहनति जे हम करी तँ हम कथीक सम्पादक। कोनो बौस्तु लेल हृदयमे अग्नि रहत तँ सभटा समन्वयन भऽ जाएत। मुन्नाजी:एतेक काज केलाक पछातियो एखन धरि अहाँक कोनो मूल्यांकन (व्यक्तित्व आ कृतित्व दुनूक) नै भऽ सकल। अइ सँ अपनाकेँ प्रभावित तँ नै पबै छी? गजेन्द्र ठाकुर: नै, एहिसँ हम सहमत नै छी। हमरा प्राप्त ई-पत्र आ चिट्ठी सभ, पाठकक प्रशंसापत्र, पाण्डुलिपि सभक परिरक्षणक हमर योजनाक सफलता आ भाषा-विज्ञानक हमर शोध ई सभ हमरा संतुष्टि देने अछि। खराब लोक सेहो अहाँकेँ नीक कहत से कोना सम्भव? से हमरा चाहबो नै करी। व्यक्तित्व आ कृतित्व दुनूक मूल्यांकन मैथिली की आनो भाषामे मृत्युक बादे होइ छै। मन ऐसो निर्मल भयो जैसे गंगा नीर। पीछे पीछे हरि फिरें कहत कबीर कबीर।। (कबीर) (मोन एहन निर्मल भऽ गेल जेना ई गंगाक जल अछि। पाछाँ-पाछाँ भगवान कबीर-कबीर कहैत पछोर धेने छथि।-कबीर) मुन्नाजी:मैथिलीमे समीक्षाक स्तर की अछि, समीक्षाक वास्तविक प्रतिरूप की अछि, आ ओ मैथिलीमे कत्तऽ अछि? गजेन्द्र ठाकुर:मैथिली समीक्षाक समक्ष वास्तविक समस्या रहै। पहिल रहै पाठकक संख्या शून्य रहब आ दोसर रहै लेखक आ समीक्षकक एक दोसराक सर-सम्बन्धी/ दोस- महीम होएब। से एहि स्थितिमे गपाष्टक आधारित समीक्षाक चलती भेलै। मुदा आब से नै अछि। जे पुरनका समीक्षक लोकनिकेँ अपन अस्तित्व बचेबाक छन्हि आ दुर्गानन्द मंडल, शिव कुमार झा, राजदेव मंडल, धीरेन्द्र कुमार आ मारते रास राक्षसी प्रतिभा सम्पन्न समीक्षकसँ टक्कर लेबाक छन्हि तँ बिना पढ़ने समीक्षा लिखबाक आह-बाह आकि छी-छी बला विपरीत ध्रुवक समीक्षा छोड़ए पड़तन्हि। मुन्नाजी:अन्तमे अहाँ अपन समकक्ष रचनाकर्मीकेँ कतऽ ठाढ़ देखै छी, हुनक दशा-दिशाक मादेँ की कहब? गजेन्द्र ठाकुर:आश्चर्य लगैत अछि जे कत्तऽ ई लोकनि नुकाएल छलाह, सभ अपन सामाजिक-पारिवारिक जिम्मेदारी निमाहैत मैथिलीक लेल जतेक कऽ रहल छथि से आन भाषामे सम्भव नै छै, किछु अपवादो छथि आ से तँ रहबे करताह। मुन्नाजी:अपनेक स्वतंत्र विचार आ एतेक समय देबा लेल बहुत-बहुत धन्यवाद। प्रतीक- बीहनि कथा (अपन गप, अपन कहब रेवाज पडौ़आ टकटकी नियंत्रण गहना डोपिंग टेस्ट विनिमय सेजौट परमेश्वर पजेबा सफाई प्रिमियम मुखियैती लक्ष्य कौनचर आत्मानुभूति जनवाणी चश्मा उपहार काँट ओकाति जीवन चक्र रक्षक जमाना निर्धन आरक्षित नवयुग अवाक लिलसा खानदानी कुल्हइया दानक बौस्त जुनुन विजेता हरियर बत्ती- लाल बत्ती लगाम देखाउँस माँ विजातीय स्वरूप आ संभावना विकल्प रीलीफ जिनगी सेवक टवेन्टी-टवेन्टी नेओं बहुराष्ट्रीय कम्पनी विश्वासघात अन्तर-आत्मा कमरुनिसा ग्लोबल वार्मिंग सरकारी दलाल जिया जरए सगर राति भावना तंत्रमेल बेरपर दियाद गाँती बिढ़नी अगुआ साढ़े एकैसम सदी दुन्नू जना एकै धना रासि सड़क-छाप निवेश नपना उत्थर देश-भक्ति भूख डेग देह, मोन आ प्रेम) अपन गप विहनि कथा संसार अदौ कालसँ चलि आबि रहल अछि कहबाक परिपाटी। कहबाक लेल समाद होइ छै। मुदा ओ क्षणिक सूचना मात्रा होइछ। कहबाक बेगरताक मूलमे यदि कथ्य वा कथानक हुअए। कहबाक लेल समादक विस्तार हुअए ओ कोनो फलकपर विस्तार लऽ कहऽ बलाक पूर्ण विचारकंे संप्रेषित करए, सएह कथाक नाम पबैछ। कथा एक लोकसँ दोसरा लोक धरि एक पीढ़ीसँ दोसरा पीढ़ी धरि मौखिक रूपेँ हस्तान्तरित होइत रहल। से तहिया भेल जहिया लिखबाक जनतब वा सरंजामक अभाव छल। कथा लेखनक प्रारम्भमे कथ्यकेँ सोझाँ-सोझी राखि देल जाइत छल। ओकर मूल बातकेँ बढ़ा-चढ़ा प्रस्तुत कएल जाइत छल, मुदा हुबहु। जेना पहिने मौखिक हल तकरे प्रतिरूप। ई प्रतिरूप समायन्तरे क्रमिक स्तरपर परिवर्तित होइत रहल। कथाक लेल अंग्रेजीमे स्टोरी शब्द अछि। आगू एकरा गढ़बाक प्रक्रिया आ पछाति मढ़बाक प्रक्रिया शुरू भेल, जे शैलीक रूपेँ सोझाँ आएल। फेर विकासक क्रमे एकरा अगिला चरणमे एकटा औसत सीमामे बान्हल जाए लागल, ओहो कथा रहल मुदा अंग्रेजी शब्द परिवर्तन कऽ नाम फरिछाएल शॉर्ट स्टोरी। मैथिली सहित अन्यान्यो भाषामे शॉर्ट स्टोरीक शाब्दिक अर्थ लघुकथा कहि प्रारम्भ भेल छोट-छोट कथा रचना। आ ओइ लघुकथाक छोट आकारकेँ सेहो लघुकथाक नामे लिखल आ प्रकाशित कएल जाए लागल। आब लोककेँ व्यस्ततामे ई छोट-छोट कथा सोहाए लगलै। आ पाठकीय उत्साह रचनाकार मनोबल बढ़बैत आत्मविश्वासकेँ दूना केलक। परिणाम स्वरूप ध्ुरझार लिखाए लागल अतिलघुकथा। ‘लघुकथा’ अछि हिन्दी भाषासँ लेल गेल शॉर्ट स्टोरीक उधारी शब्दकोषीय अनुवाद। तकर कारण रहल-पहिल, एकटा नव विधा देखिते मैथिली रचनाकार सब देखाउँसे लिखऽ लगला छोट अकारक कथा। दोसर, जेना हिन्दी साहित्य लेखन अंग्रेजी साहित्यसँ प्रभावित हेबाक संकटसँ उबरि नै पबैए तहिना मैथिली साहित्य रचना, विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलसँ पहिने, बहुत लग धरि (पूर्णतः नै) हिन्दी साहित्य लेखनसँ आच्छादित छल। तेँ मैथिली रचनाकारकेँ कखनो एकर मैथिली शब्द जेना हिन्दीक ‘कहानी’ मैथिलीमे ‘कथा’ अछि, (हिन्दीयोमे ठाम ठीम स्टोरीकेँ ‘कथा’ शब्देँ प्रयुक्त देखल जाइए) से नै फुराएल हेतन्हि। तेँ ओ अपने अतिलघुकथाकेँ लिखैत रहलाह लघुकथा। ईहो सोलह आना सत्य अछि जे ई नव विधा जहन मैथिलीमे हस्तान्तरित भेल तखन सनातनीये अतिलघु आकार-मात्राक कथा छल । एकर विकसित रूप तँ बीसम सदीक अन्तिम दशकमे देखाए लागल। जहन कि तकनीकी शिक्षा वा व्यावसायिक शिक्षासँ लगीच एवं वैश्विक परिवर्तनसँ प्रभावित नवका लोकक नव सोच विकसित भेल। अइ विधाक स्वतंत्र रूपक फरिछौट भेलाक पछाति बेगरता भेल ऐ विधा लेल अपन माटि-पानिसँ जुड़ल, अप्पन भाषिक शब्दक। “विहनि कथा” विहनि अर्थात् बीआ। हम एकरा मैथिलीक स्वतंत्र नामेँ आगू बढ़ेबाक प्रयास १९९५ ई. मे मैथिली मासिक “विचार” (सहयात्री प्रकाशन, लोहना, मधुबनी) द्वारा केने रही। वर्ष १९९५ मे ‘सहयात्री मंच’ लोहना, मध्ुबनीक साहित्यिक विमर्श प्रस्ताव रखलौं। जकरा हुलसैत सहृदये मैथिलीक कवि, कथाकार श्री राज द्वारा समर्थन कएल गेल। उपस्थित सम जन समवेते स्वीकार कएलनि। उपस्थित जन छलाह- श्री शैलेन्द्र आनन्द, भवनाथ भवन, कुमार राहुल, विजयानन्द हीरा, सच्चिदानन्द सच्चू एवं अन्यान्य। विहनि कथा (सीड स्टोरी), बीज कथा; स्वयंमे कथाक पूर्ण रूप अछि विहनि कथा। ई ने छोट अकारक कथा छी, आ ने कोनो कथाक छेँट। सामान्येतया कथा कतेको बिन्दुकेँ छुबैत बिरड़ो जकाँ उधियाइत पाठककेँ अपन उद्वेश्य कहबामे सक्षम भऽ पबैए। मुदा विहनि कथा माने बीज कथा स्वयंमे संपूर्ण कथा अछि। जे पाठककेँ एक मात्र अपने खुटापर खुटेसल सन राखि अपन उद्देश्यक पूर्णताकेँ एक क्रममे बिकछा लेखकीय मनस्थितिकेँ फरिछा दैए। आ पाठक ओइ सोचकेँ हुबहु मगजमे समा स्थिर भऽ जाइए। विहनि कथा एकटा बीया सन छोट की पैघ संपूर्ण गाछ हेबाक सामर्थ्य रखैए। तहिना विहनि कथा आकारेँ लघु होइतो कथाक सभ पक्ष, कथ्य, शिल्पकेँ एक खास बिन्दुपर समेटि कथाक संपूर्णता प्रदर्शित करबामे सक्षम अछि। जेना बीया पारबाक पछाति अँकुराइए, फेर दुपतिया सन देखाइत एकटा गाछक रूपमे अपन संपूर्णता पबैए तहिना विहनि कथा भूमिका, कथ्यक स्पष्टीकरणक संग सोद्देश्ये गढ़ल आ मढ़ल जाइए आ लेखकक समस्त विचारकेँ छोट आकारमे सोद्देश्यपूर्ण बना उजागर करबामे सक्षम होइए। जेना कोनो बीया अंकुरा कऽ गाछक सभ पक्ष यथा डारि, पात आदिसँ युक्त होइछ एकटा ठुट्ठ गाछ मात्र नै। तहिना विहनि कथा समस्त गुणेँ भरल-पूरल कथा छी। एहेन कथा नै जे दृष्टांत मात्र भऽ ठमकि जाए। एहेन कथा नै जकर कोनो ओर-छोड़ नै हुअए। विहनि कथा एहनो कथा नै अछि जकरा पूरा पढ़लाक पछाति लेखकक लेखन उद्देश्य बुझबाक लेल कात-करोट मुरियारी देबऽ पड़ए। एकर उद्देश्य सोझाँ सोझी फरिछाएल होइछ। विहनि कथा लघु अकारे शुरू भेल। आइ ई लघुकायमे ओइ लघुकथाक एकटा विकसित रूप अछि जे संभवतः मैथिलीमे बीसम सदीक अन्तिम दशकमे अपन स्वतंत्र रूपक वा विधाक फरिछौट करबामे सक्षम भऽ सकल। विहनि कथाक संपूर्णताकेँ ऐ तरहँे कहल जा सकैछ- विहनि कथा कथाक संपूर्ण गुणक संग ओइसँ ऊपर उठि, अपन लघुकायमे समेटल एक निश्चित बिन्दुपर ठाढ़ भेल लेखकक उद्देश्यक पूर्ति करबाक संग पाठकक मगजक भरपूर खोराक अछि। विहनि कथा २१म सदीमे रचनाकार, सम्पादक संग-संग पाठकक बीच सेहो फरिछाएल अछि। तकरे कारण अछि जे आब विहनि कथा छोट गातमे अपन सभ संपूर्णता नेने कागजपर उतरि सोझाँ अबैए। आबक समयमे दृष्टि विहीन नै, दृष्टि सम्पन्न रचनाकार सभ अइ विधाक विकासमे लागल छथि। तेँ ई आब नहिये चुटुक्का कहाइए आ नहिये कथाक छेँट वा दृष्टांत। हम पुनः ई स्पष्ट करैत कहब जे- विहनि कथा ठोस कथ्य, माँजल शिल्पमे कोनो विषयपर वर्णित ओ वौस्तु थिक जे पाठकक मन-मस्तिष्कपर चोट कऽ ओकरा सम्वेदित कऽ चिरकालिक छाप छोड़ि सकबामे सामर्थ्यवान होइए। विहनि कथा, मात्र गुदगुदी करैबला वा चुट्टी काटि बिसबिसी दैबला वौस्तु नै रहि गेल आब। ई रचनाकार आ पाठकक मोनमे समा स्थिर भऽ जाइ बला कथा थिक। आजुक व्यस्त जीवन मध्य लोककेँ कखनो ओतेक पलखति नै भऽ पबै छै जे ओ आब घंटा-घंटा भरि बैसकी लगा एके रचना पढ़ि मोनकेँ सांत्वना देत। क्षण-क्षण बदलैत परिस्थिति, बदलैत छेब-छटा आ तइ हेतु अधिकसँ अधिक अर्थक जोगार मध्य कटि जाइछ लोकक जिनगी। आजुक लोककेँ मीडियासँ क्षण-क्षण नव आ रोमांचित करएबला खोराक भेटि जाइत अछि तेँ साहित्यक प्रति बहुत रूचि नै बाँचब स्वाभाविक अछि। ओना आइयो उपन्यासकेँ खूब पढ़ल जाइछ। मुदा ओकरा आम पाठक मात्रक खोराक नै कहि सकै छी। तेँ रचनाकारकेँ सेहो आब सम्हरि कऽ सशक्त आ अल्प पलखतिक बीच सामंजस्य बैसाबऽ बला रचना करब आवश्यक अछि। रचनाकार, विशेष कऽ विहनि कथाकारक ई पहिल दायित्व बनैए जे ओ समयक संग चलि पाठकक समय संग भेल व्यस्तताकेँ देखि ओज आ सरल भाषिक रचनासँ विहनि कथा संसारमे योगदान सामर्थ्य हासिल करथु। पाठकक आजुक क्षण-क्षण बदलैत परिस्थिति मध्य विहनि कथाकारो जिबैत छथि। तँ ओ यदि आजुक बेहाल अर्थ तंत्र, मशीनी युगक मध्य लोकक मशीन सन हएब परिस्थितिकेँ गसिया कऽ पकड़थु। आ अही परिस्थितिकेँ पाठकक सोझाँ परसि कऽ पाठककेँ मजगूती देबामे अपनाकेँ सक्षम करबाक शक्ति अर्जित कऽ रचनारत रहथु। तहन विहनि कथा, विहनि कथाकार आ पाठकक मध्य सामंजस्य बैसि पाओत। पाठकक प्रत्येक क्षणक व्यस्तता, किछु नव करबाक सनक, अर्थोपार्जनक पाछाँ भगैत रहलासँ उपजल तनावसँ मुक्तिक साधन सेहो अछि विहनि कथा। पाठक जखन सभसँ विलग अल्पावधिक लेल खाली भेटल समयक उपयोग करऽ चाहैए तँ ओकर संग देबामे सक्षम अछि विहनि कथा। ऐ सभ बेगरता पूर्ति करबामे सक्षम विहनि कथा अपन फराक जगह छेकबामे सक्षम भेल अछि। आब विहनि कथाकार जखन समय संग चलि पाठकक मनोस्थितिक अनुकूल रचना देबामे सामर्थ्यवान छथि। ओ अपन पहिल दायित्व पाठकक मोनकेँ भाँपि तदनुकूल रचनासँ पाठककेँ बन्हवामे सक्षम भेल छथि। तहन बेगरता उठै छै एकर मूल्यांकनक। वर्तमानमे एहेन कोनो दृष्टि फरिच्छ समीक्षक वा समालोचक देखार भऽ ऐ विद्यापर काज करबामे सक्षम नै भऽ पौलाह अछि। तकर ठोस कारण अछि बदलैत समय आ परिस्थिति मध्य ओहने सोचक सामंजस्य। जे स्थापित समीक्षक छथि से दू तीन दशक पछातिक नजरिये रचनाकेँ देखबाक प्रयास करताह। हुनका ऐ मे भऽ सकैए किछु नै देखाइन। कारण जे ओ सभ कथाक जइ मूलकेँ देखैत भोगैत एलाह अछि विहनि कथा ओइसँ ऊपरक सोच आ फराक शैलीमे अछि। एकर सत्य आ पूर्ण गात तहिया फरिछाएल जहिया मठाधीश समीक्षक सबहक सोच ओइ कथा, ओकर प्राचीन चरित्र मध्य सन्हिया बैसि गेल। समाजक एकटा समस्या मँहगाइ उदाहरण स्वरूप सनातनी आ चिरायु अछि। ई कहियो खत्म होइबला चीज नै अछि। मुदा तैयो एकर चरित्र आ चेहरा सीढ़ी दर सीढ़ी बदलैत रहैए। आ ओइ संग ओइ मँहगाइक प्रतिफल सेहो ओहिना बदलैत नजरि अबैए। यथा यात्रीजीक कवितामे वर्णित मँहगाइ साहित्यमे चर्चित अछि। आइ ओहेन कोनो नव ठोस रचना मँहगाइपर नै अछि। तहिया लोक भूखे मरैत छल, पेट काटि कऽ जिबैत छल। गदैली ओढ़ि सर्दी कटै छल। आजुक मँहगाइ मध्य कियो भूखे नै मरैए। आ सामान्यो वर्गक लोक कम्मल ओढ़ि आ हीटर जरा सर्दी बितबैए। की ई फर्क सनातनी समीक्षक फरिछेबामे सफल भऽ सकताह? किन्नहुँॅ नै। किएक तँ अइ बदलल स्थितिपर ध्यान देबाक पलखति कहाँ छनि। ओ तँ प्रतिक्षा करै छथि रचनाकारकेँ जुएबाक, रचना चाहे खिज्जा रहि जाउन। कथासँ जुड़ल लोक विहनि कथा मादे विचार कऽ सकैत छलाह। मुदा हुनकर सभक दृष्टि ‘विहनि कथा’क प्रति फरिच्छ नै छनि, उदाहरणतः रंगकर्मी कुणाल, जे नाटकक संभ्रान्त, परिपक्व ज्ञाता छथि ओहो कथापर लिखबा काल विहनि कथाकेँ अस्तित्वहीन कहि बेरा दै छथि। मायानन्द मिश्र मैथिली कथा धाराक मजगूत खाम्ह छथि, ओ लघुकथा (विहनि कथा)केँ चुटुक्काक संज्ञा देलनि। माया बाबूक सोच समीचीन अछि किएक तँ ओ जइ दशकक सोचक लोक छथि तइमे लघुकथा (विहनि कथा) विद्या फरीछ नै छल। तेँ हुनको ऐ प्रति दृष्टि फरीछ नै हएब स्वाभाविक। ओ कथा विकासक आलेखमे लघुकथा (विहनि कथा)क चर्चे केलन्हि सएह बहुत अछि। [मैथिली कथाक विकास नामक आलेख, साहित्य अकादमी दिल्ली सँ प्रकाशित पोथी -‘मैथिली कथाक विकास’- सं वासुकी नाथ झा, २००३]. विहनि कथा वा कथाकारक मूल्यांकन हेतु विहनि कथाकार स्वयं ऐ दिशामे कान्ह उठाबथि तँ सही मूल्यांकन संभव भऽ पाओत। मैथिली समीक्षाक एकटा कमजोर तत्व ईहो रहल जे ओ रचनात्मक दृष्टियेँ सड़क छाप होइत छथि। फरिछेबाक ई जे ओ अपन गुणगान मात्रा सुनऽ चाहै छथि। आलोचनामे कमी नै वाह वाही हेबाक चाही। जँ समीक्षक द्वारा हुनकर रचनात्मक दोष वा कमीकेँ उघारि सभक सोझाँ कऽ देल गेल तँ समीक्षक भऽ गेला हुनक कट्टर दुश्मन। आ तकर पछाति हुनका, रचनाकारक मुँहे, अज्ञानी, उदण्ड, स्वार्थी आदि संज्ञासँ जानए लागब। ईहो सोलह आना सत्य अछि जे मैथिली समीक्षामे किछु गोटे कृतित्वसँ पहिने व्यक्तित्वकेँ प्राथमिकता दऽ समीक्षा लिखि रइल छथि। तँ जा धरि रचनाकारमे आलोचनात्मक विचार वा कमी सहबाक सामर्थ्य नै हएत, स्वथ्य आलोचना कतऽ सँ टंाग पसारि सकत वा अपन बैसकीपर बैसि अराम कऽ सकत? ओहने किछु रचनाकार सभ द्वारा समीक्षाकेँ ओलि सधेबाक सूत्रक रूप सेहो ठाम-ठीम प्रयुक्त होइत देखाइत रहल अछि। आजुक विहनि कथा पहिने हिन्दी भाषासँ उधारी लेल शब्द ‘लघुकथा’ नामे लिखाइत रइल। अखन धरिक मौखिक जनतब अनुसारे लघुकथा शब्द प्रयोगे छपल पहिल कथा १९६८ मे मिथिला मिहिर मे काली कुमार दास लिखित ‘बुड़िबक वर’ छल। अइसँ पहिने छेँट कथा, कटपीस कथा, मिनी कथा, फिलर कथा........आदि नामे ई छपैत रहल छल। एकर पछाति जे रचनाकार विहनि कथामे सक्रिय भेला ओ नाम अछि- डॉ हंसराज, ए. सी. दीपक, तकर पछाति लिली रे, राजमोहन झा, एम. मणिकान्त, अमरनाथ, रामलोचन ठाकुर आदि। अइ नाममे सँ बेशी गोटे विहनि कथा लिखबाक प्रयोगधर्मिता मात्रक निर्वहन केलनि। हँ एम. मणिकान्त मिथिला मिहिरक माध्यमे कतेको वर्ष धरि विहनि कथा लेखनक नियमितता बनौने रहला। मुदा दुखद वा हास्यास्पद बात ई जे वर्त्तमानमे हुनक एको टा रचना उपलब्ध नै अछि। डा. हंसराज जी क मैथिलीक पहिल विहनि कथा संग्रह ‘जे की ने से’ (प्रकाशित १९७२ ई.) मैथिली विहनि कथा पेटारक पहिल सनेस कइल जा सकैए। ऐमे हास्य व्यंग्यसँ भरल लघुकायक कुल ३५ गोट विहनि कथा संग्रहित अछि। पन्नापर अंकित वर्षक अधारे एकर सभ रचना १९६३ सँ १९७२ मध्य लिखल रचना अछि। एकर कथा सभ तत्कालीन राजनैतिक सामाजिक कुव्यवस्थापर चोट करैत लिखल गेल अछि। किछु रचना आइयो प्रासंगिक अछि। हंसराज निश्चित रूपसँ विहनि कथा आन्दोलनक बीया बाउग केलनि आ तेँ आइ विहनि कथाक गाछ झमटगर होइत देखाइए। किछुए वर्ष पछाति हिनकर अगिला पीढ़ीक श्री अमरनाथ अपन ‘क्षणिका’ विहनि कथा संग्रह प्रस्तुत केलन्हि (वर्ष १९७५ ई. पुर्नप्रकाशन २०११ ई.) आ एकरा एक सीढ़ी आओर ऊपर लऽ जेबाक ठोस प्रयास केलनि। ऐ संग्रहक कथा सभ खलील जिब्रानक कथाक लगीच बुझाइए आ सभ बिन्दुकेँ छुबैत रचना कएल गेल बुझाइए। एकर अधिकांश रचना आइयोक समयसँ मेल खाइत बुझाइए। मुदा लेखकसँ दूरभाषिक वार्तालापक अनुसार राजहंस जकाँ हिनको कोनो रचना तत्कालीन पत्रिकामे प्रकाशित नै भऽ सोझे संग्रहित अछि। वर्ष १९७५ विहनि कथाक स्वर्णिम शुरूआत वर्षक रूपमे देखार भेल बुझाइए जखन ‘मिथिला मिहिर’ (पाक्षिक) अपन विहनि कथा विशेषांक (लघु कथा विशेषांक नामसँ) निकालि मोकाम तँ नै मुदा बाट अवश्ये देखार केलक। ई साहसिक काज भेल कविक द्वारा ऐ नव विधाक लेल। मिथिला मिहिरक अइ विशेषांकक समय सम्पादक छलाह आदरणीय भीमनाथ झा। ओना तँ ‘अन्हरीक गाए बियेलै तँ सभ डाबा लऽ कऽ दौड़ल’ बला कहावत चरितार्थ होइत देखाएल। फेर २३ बर्ख बीति गेल। खएर! बाँझ गाए गाभिन तँ भेबे कएल.....। कथानकक नब्जक सुन्नर पकड़ि रखनिहार श्री विभूति आनन्द जी जेबी पत्रिका ‘कुश’ क नवम अंक वर्ष-१९७८ मे पत्रिकाक गातक अनुसार छओ गोट विहनि कथाक समावेश कऽ निकाललनि विहनि कथा विशेषांक (लघुकथांक विशेषांक नामसँ)। अही वर्ष १९७८ जुलाइमे साहित्य अकादमी, दिल्ली द्वारा कथापर आयोजित सेमिनारमे परिचित कथाकार श्री रामदेव झा, कथापर प्रसंगे विहनि (लघु) कथाकेँ शामिल कऽ एक अनुच्छेद लिखि एकर विशिष्टता जतौने छलाह। जइमे विहनि (लघु) कथाक वैश्विक पटलपर खलील जिब्रानक चर्चा आ तुलना एवं मैथिली विहनि (लघु) कथाकार मे सँ अमरनाथ जीक योगदानक चर्चा कएने छलाह। आठम दशक विहनि कथाक संगोरसँ वंचित रहल। मुदा ई विहनि कथा लिखनिहारक एक टा पैघ हेँज तैयार केलक, जइमे प्रमुख नाम अछि- विभूति आनन्द, शैलेन्द्र आनन्द, श्रीराज, प्रेमकान्त झा, वैकुण्ठ झा, देवशंकर नवीन, प्रदीप बिहारी, ताराचन्द्र वियोगी, चण्डेश्वर खाँ आदि। ई समूह रचनाक दृष्टिये नव अँाखि पाँखिबला छल। साम्यवादी विचारसँ प्रभावित मुदा आपत कालक दुर्दशासँ प्रेरित आ पीड़ित। विहनि कथाक पहिल संग्रह १९७२ मे बहराएल दोसर १९७५ ई. मे आ तकर पछाति अकाल! किएक? २२ वर्षक एहेन खालीपन विहनि कथाक इतिहासकेँ ठमकि जेबाक लेल बाध्य केलक। एकर बाधक छलाह तत्कालीन संपादक, सरकारी आ निजी समिति-संस्था आ प्रकाशक। मुदा तहूँसँ बेशी जिम्मेवार ऐ पीढ़ीक रचनाकार छला जे अपनाकेँ दुनू विधापर कलम चला भरमा लेलनि वा गद्यक ऐ प्रकारक उस्सर खेत देखि डरि कऽ अपनाकेँ कतिया लेलनि। अइ पीढ़ीक कतिपय रचनाकार ऐ विहनि कथा विधाक राशि नवका रचनाकार सभकेँ पकड़ा निश्चिन्त भऽ सुस्ताए लगलाह। कारण छल जे एकर फरिछाएल रूप मध्य अपन अस्तित्व वा कोनो लाभक जोगार वा प्रतिष्ठिा नै नजरि एलनि। अही बीच आएल तन्त्रनाथ झा समग्र, ओइमे सेहो किछु विहनि कथा संकलित अछि। मैथिली साहित्यक जिरात मध्य विहनिकथाक प्रसंस्कृत बीया नव रूपे बाउग केलनि अइ पीढ़ीक नवतुरिया। जइमे नाम छल ज्योति सुनीत चौधरी, दुर्गानन्‍द मंडल, कपि‍लेश्वर राउत, धीरेन्‍द्र कुमार, राजदेव मंडल, बेचन ठाकुर, राम प्रवेश मंडल, भारत भूषण झा, मानेश्वर मनुज, उमेश मण्‍डल, जगदीश प्रसाद मण्‍डल (बाल विहनि कथा संग किछु सुन्दर विहनि कथा जेना थल-कमल/ घरडीह/ खाता-खेसरा/ सबूत/ कौआक मैनजन), रामकृष्‍ण मण्‍डल ‘छोटू', परमेश्वर कापड़ि, रघुनाथ मुखिया, ऋषि वशिष्ठ, शिव कुमार झा “टिल्लू”, मिथिलेश कुमार झा, सत्येन्द्र कुमार झा, नवनीत कुमार झा, कौशल कुमार, अनमोल झा, कुमार मनोज कश्यप, विनीत उत्पल, धनाकर  ठाकुर, आशीष अनचिन्हार, सतीश चन्द्र झा, गजेन्द्र ठाकुर, भवनाथ भवन, राम वि‍लास साहु, मुन्‍नी कामत, शंभु कुमार सिंह, संजय कुमार मंडल, मि‍थि‍लेश मंडल, लक्ष्‍मी दास, अमित मिश्र, जगदानन्द झा 'मनु', चन्दन झा, ओमप्रकाश झा, सन्दीप कुमार साफी, जवाहर लाल कश्यप, मिहिर झा, रामदेव प्रसाद मण्डल झारूदार, प्रेमचन्द्र पंकज, अखिलेश मंडल, अमलेन्दु शेखर पाठक, मध्ुकर भारद्वाज, श्रीधरम, देवेन्द्र झा, सच्चिदानन्द सच्चु, मिथिलेश कुमार झा, कुमार राहुल, दिलीप कुमार झा “लूटन”, मुन्नाजी आदिक। ऐ पीढ़िक समूह द्वारा विहनिकथा पर ध्ुरझार काज भेल। अइ ठामसँ असली फरिछौट भेल विहनि कथाक। आ हिन्दीक उधारी शब्द लघुकथा सँ विलग खाँटी शब्द- विहनिकथा स्थापित भेल। बीसम सदीक अन्तिम दशकक पहिल काज भेल स्व. ए. सी. दीपक जी द्वारा ‘विविध विहनि (लघु) कथा विशेषांक (मार्च-१९९४ मे)। तकरा पछाति नवका पीढ़ी सेहो कान्हपर वीरा उठेलक आ शुरू भेल वैश्विक बदलल सामाजिक परिदृश्य, तकनीकीय भेल नव-नव क्रान्तिक संग जनमल नव अवधरणाक संग विहनि कथा लेल नव-नव काज। १९७५ ई.मे आएल ‘क्षणिका’ क दू दशक बाद १९९५ ई. केँ विहनि कथाक स्मृतिवर्ष कहि सकैत छी। २० फरवरी १९९५ केँ मुन्नाजी एवं मलयनाथक संयोजनमे हटाढ़ रूपौली, मध्ुबनीमे आयोजित भेल विहनि कथा गोष्ठी, जकर अध्यक्षता केलनि पं यन्त्रनाथ मिश्र आ एकर मंच संचालन कुमार राहुल द्वारा भेल। ऐ अवसरपर उपस्थित विहनि कथा पाठ केनिहार छलाह- भवनाथ भवन, मलययाथ मण्डन, प्रेमचन्द्र पंकज, मुन्नाजी, शैलेन्द्र आनन्द, प्रभु कुमार मंडल, मतिनाथ मिश्र, उमाशंकर पाठक, श्यामाचन्द्र ठाकुर, कुमार राहुल, मीरा कर्ण, ललन प्रसाद, सुनील कर्ण, सच्चिदानन्द सच्चु एवं करणजी। पढ़ल गेल रचना सभपर समीक्षीय टिप्पणीकार छलाह- शैलेन्द्र आनन्द, मुन्नाजी, भवनाथ भवन एवं प्रेमचन्द्र पंकज। हमरा जनतबे विहनि कथाक ई पहिल गोष्ठी छल। ५ मार्च १९९५ केँ सहयात्री मंच लोहना, मध्ुबनी द्वारा मुन्नाजीक विहनि कथा ‘नामरद’ क एकल पाठ आ अइ पर ‘बहस’ क आयोजन कएल गेल। अइमे प्रमुख विचारक छलाह- श्रीराज, शैलेन्द्र आनन्द, विजयानन्द हीरा, भवनाथ भवन एवं प्रेमचन्द्र पंकज। हमरा जनतबे विहनि कथा आ कथाकारपर एहेन ‘बहस’ केर ई पहिल आयोजन छल। जुलाइ १९९५ मे कानपुर सँ बहराइत नवतुरिया त्रैमासिक पत्रिकाक विहनि कथा विशेषांक आएल, संपादक छलाह- प्रेमकान्त झा एवं वैकुण्ठ झा। अइमे १९ गोटेक कुल १९ गोट विहनि कथाक समायोजन छल, आ अइ विहनि कथा विधाक फरिछौट कऽ एकरा नव दिशा देखेबाक प्रयास करैत मुन्नाजीक आलेख अछि, जे कि कोनो विहनि कथा विशेषांकमे ऐ तरहक पहिल आलेख थिक। अही दशकमे प्रारम्भ भेल कथा गोष्ठी सेहो विहनि कथाक बाट बनेबा वा फरिछेबामे उत्प्रेरकक काज करैत रहल। कथा गोष्ठीक जुलाइ १९९७ क महिषीक आयोजनमे एके संग दु गोट पोथीक लोकार्पण भेल, ‘खंड-खंड जिनगी’ (प्रदीप बिहारी) आ ‘शिलालेख’ (तारानन्द वियोगी, जइमे कुल ३५ गोट रचना संकलित भेल अछि)। २१म सदीमे समय आ परिस्थितिकेँ अकानैत सभ रचनाकार खुलि कऽ विहनिकथा दिस जुमल छथि। पत्रिकाक संपादक सभ किछु कोना अइ लेल समर्पित करऽ लगलाह। अइ नव सदीक नव सोचक पहिल विहनि कथा संग्रह आयल- ‘बुझनूक’ (२००२ ई.), एकर रचनाकार श्री वैकुण्ठ झा जी अपन ३६ गोट रचना लऽ ऐ विधाकेँ बाट देखेबाक ठोस प्रयास केलन्हि। एकर बाद तँ संग्रहक झड़ी लागि गेल बुझू। अगिला संगोर हिन्दी मैथिलीक संयुक्त रचनाकार विहनिक कथाक दिशावाहक श्री देवेशंकर नवीन जी अपना कथा संग्रह-‘हाथी चलय बजार’ (२००४ ई. मे ३१ गोट विहनि कथाक संगोर) संग उपस्थिति दर्ज करौलनि। तँ २००५ ई. मे पुरान सोचक ठोस कथाकार श्री मनमोहन झा जी अपन विहनि कथाक संगोर, मिथिलाक निशापुर मे’ आनि एकरा एक डेग आओर आगाँ बढ़ेबाक प्रयास कएलनि। एकर आमुखमे श्री विजय मिश्र जी एकरा गद्य काव्यक संज्ञा देलनि अछि। वास्तवित रूपेँ तँ गद्य काव्य, काव्यक गद्यात्मक शैली थिक। ईहो सत्य अछि जे विहनि कथा गद्य रहि कविताक पूर्णतः लगीच मानल जाइए। मुदा अइमे संकलित २४ गोट रचना विहनि कथे थिक, आन किछु नै। वर्ष २००७ मे “अहींकेँ कहै छी” (सत्येन्द्र कुमार झाक ५१ गोट विहनि कथाक संग्रह) आएल। ई संग्रह विहनि कथाक प्रति पूर्ण सोझराएल आ दृष्टि फरीछ रचना सबहक संगोर थिक। युवा पीढ़ीक बहुविध, प्रतिभा संपन्न लेखक ओ संपादक श्री गजेन्द्र ठाकुर अपन रचना समग्र- कुरूक्षेत्रम् अर्न्तमनक- मे लघुकथाक संग १६ गोट ठोस आ कथ्य ओ शिल्पगते फरिछाएल विहनि कथा आनि विहनिकथा संसारमे श्रीवृद्धि केलनि अछि। अखन धरि एक लिखे चलैत विहनि कथाक लिख सँ हँटि २०१० ई. मे श्री जगदीश मण्डल जी सभसँ इतर बाल मनोवैज्ञानिक विहनि कथा संग्रह ‘तरेगन’ क संग आन रचनाकार केँ सम्मोहित केलनि। २१ म सदीक पहिल दशकक अन्तिम चरणमे मैथिली ई पाक्षिक ‘विदेह’ अइ विहनि कथाक नव इतिहास लिखबा वा बनेबामे अग्रणी मानल जाएत। अपन ६७म अंक विहनि कथा समायोजनमे देशी आ विदेशी ठोस रचनाक संगोर, एवं अइ विहनि कथाक शास्त्रीय विवेचन कऽ अएना स्वरूप झलका एकर बाटकेँ मोकामक लगीच अनबामे ई पूर्णतः सफल भेल अछि। अइ अंकमे कुल ३२ रचनाकारक ७९ गोट रचना अइ विधाकेँ पूर्णतः फरिछा, सभक सोझाँ अनबामे सौ प्रतिशत सक्षम भऽ देखार भेल अछि। संपादकक अलाबे एकर सफलताक श्रेय छन्हि अइ अंकक अतिथि संपादक-मुन्नाजीकेँ। मुन्नाजी जी बड गम्भीरता पूर्वक सभक समायोजन एवं अपन आलेखेँ दोसरो रचननात्मक प्रकृतिकेँ फरिछेबाक सफल प्रयास केलनि अछि। लगभग दू दशकसँ अइ विधामे रचनात्मक उपस्थिति दर्ज करबैत रहलाह, आ परिणाम “समय साक्षी थिक” २०११ मे आएल, ई संग्रह श्री अनमोल झा जीक कुल १५० रचनाक अपन जिनगीक भोगल यर्थाथक अएना थिक। २०१२ मे “टेक्नलजी” (अनमोल झा) एवं “टीस” (मिथिलेश झा) संग्रह सेहो विहनि कथाक बखारी भरबामे समर्थ बुझना जाइछ। अनमोल जीक १४९ रचनाक संग्रह सनातनी यथार्थ परसैए। ततै मिथिलेश झा जीक ‘टीस’ क ४५ गोट रचना पाठकक मानसिकताकेँ झंकृत करैए। जे कि विहनि कथाक थाती वा धराउ सदृश अनुभव करैए। १० दि‍सम्बर २०११केँ ‘सगर राति‍ दीप जरय’क ७५म कथा गोष्ठीक आयोजन पटनामे कएल गेल, ऐ अवसरपर मुन्नाजी द्वारा मैथिलीक पहिल विहनि कथा पोस्टर प्रदर्शनी कएल गेल छल। ऐ तरहंे विहनि कथा संसारक परिदृश्य पूर्णतः भरल पूरल भऽ गेल अछि। आइ सभ दिन कियो ने कियो स्वाभाविक रूपेँ जुड़ि अपन योगदान दैत एकरा मोकामक ड्योढ़िपर आनि पट खुलबाक प्रतिज्ञामे ठाढ़ देखाइत छथि। मोकाम भेटि गेलै तँ घर पैसैमे समय नै लगतै। -- मुन्नाजी रेवाज रूक....। ऊँक नै लगा सकै छँ तोँ। रामरीत पासवानक मुइलाक पछाति, भरि गामक लोक ओकर अंगनासँ दुरा धरि सोहरल छल। विधवाकेँ सांत्वना देबाक लेल। मुदा ओकर दियादवादकेँ लगलै कठाइन। दरअसल मालिक मुत्तारक ई भीड़ तँ जुटल रहै बजरंगीक सहयोगमे। बजरंगी, रामरीतक छोट भाए, मालिक-मुक्तारक पाछु चटुआ आ अखनुक वार्ड सदस्य। ओ भैयारी निभेबाक नै, घराड़ी हड़पबाक फेरमे छल, किएक तँ रामरीतकेँ बेटा नै छलै। ओकर नजरि रहै रामरीतक छः कट्ठा घरारी पर, तेँ सभकेँ जुटा लेने छल, गवाहक रूपमे, भविष्यक लेल। आ लहास उठेबासँ पहिने फरमान सुना देेने छल- आगि जे देतै आ श्राद्ध जे करतै, घरारीक अधिकारी तँ उएह ने हेतै। समवेत स्वीकृतिये मुड़ी डोलल छल- हँ...। चलु-चलु लहास उठबै जाउ, बेशी विलम्ब नीक नै। बजरंगी, कोहा उठाबऽ। -नै, किन्नहुँ नै। विधवाक आक्रोशक स्वरकेँ सुनि सभ शांत भऽ गेल। मंजुला, कोहा उठा आ आगि ले। अपन पिताक हृदयक एक मात्र टुकड़ी अछि ओ। आगि उएह देत। ठीक छै, चलु...। मुखाग्नि हमहीं देब पिता हमर छथि, हुनक अंश हम छी, बजरंगी कक्का तँ हुनक सम्बन्धी मात्र छथिन। ईह... जेना रामरीतक बेटा रहथिन, अधिकार जताबऽ एलीहे। दबल स्वर भीड़क बीचमे सँ सुनाएल। बेटा नै छी तेँ कि, हम तँ हुनके रक्तबीजक पदार्पण छी। ओ निपुत्र छथि, मुदा निःसंतान नै। आइ सँ अही रेवाजक शुरूआत बुझू। आ संग के देतौ? निपुतराहा सभ। पडौ़आ सुयाल आ कैथरिन भारतक यात्रा पर जखन आएल तँ पहिल प्रवेश मिथिलामे भेलै। दरअसल मैथिलेजन ओकर जानक रक्षक सिद्ध भेल रहथि। सत्य छल जे ओ जोड़ी प्रेमक समुन्दर मे डुमकुरिया कटैत मिथिला धरि आबि गेल छल। किएक तँ ईसाई आ पारसी दू धर्मक जोड़ाक प्रेम जर्मनीक डच समुदायक विरूद्ध छल। मिथिल प्रवासक क्रममे ओ एतुका एकटा बिआह स्थानीय रीतिये होइत देखि भाव विह्वल भऽ उठल। अगिला दिन लहँगा चुनरी आ शेरवानीमे सजल वर कनिया सभटा सुधि हेरा अपनाकेँ स्वर्गक वासी बुझि आनन्दविभोर भऽ मैथिल मन्त्रे एक दोसराक हेबाक शपथ लेलक। जोड़ा बाजि उठल, आह! हमर देश मानवक आ दानवक देश अछि, ऐठाम तँ सभ जन देव स्वरूप लगैछ। ओकरा एखन धरि आतिथ्यक भान होइत रहलै। एतुका सत्य नै जानि पौने छल जे एतौ विजातिय विआह छओड़ा छओड़ीक प्रेमक सभसँ पैघ शउत्रु बनि ठाढ़ भेल रहैछ। किछुए दिनक पछाति ओ जोड़ा मैथिल जनक मुखबिरीसँ हथकड़ीमे बन्हा गेल। टकटकी बेरा बेरी लोकक जमा भेल भीड़क सोझाँ ठेहि पाड़ि कऽ कानए लागल छल ओ छओड़ी। कियो किछु पुछै तँ उतारा नै दऽ सबहक दिस टुकुर-टुकुर तकैत रहैत छल। भीड़ बढै़त जा रहल छल.... मुदा सभ मूक दर्शक बनल। निशब्द भीड़मे सँ आब शब्द बहरेलै – “’गै, ई कह, तोहर नाम ठेकान की छौ?’’ -यौ, छोड़ू की करब नाम ठेकान बुझि? -तोरा घर तक पहुँचा देबौ। -यौ, हमर नै आब कियो सहारा बचल आ ने कोनो ठेकाना, हम तँ दंगा पीड़ित शिविरमे सँ भागि एलौं अछि। -किए भगलीही अपन जान बचेबा लेल? -नै यौ, अपन संपत्ति बचेबा लेल। -आँय, तहन तो अपन गाम-घर जो ने अपन संपैतक रक्षार्थ। -गाममेे किछु कहाँ बाँचल अछि। जे किछु संपत्ति शेष अछि ओ तँ हमरे लग अछि आ तकरे बचेबा लेल तँ गामसँ भगलौं। -‘कत्तौ कियो रक्षक नै देखाएल?’ -के पुरूष राखत तोरा? जे राखत ओहो बदनाम भऽ जाएत। ठठा कऽ हँसैत - यौ, जँ पुरूष सभकेँ बदनामीक कनिको डर होइतै तँ गामसँ परदेश धरि हमर संपैतक नोचा-नोची नै ने करितए? भीड़ उछहि गेल। नियंत्रण माइकल घर मे वापिस अबिते छितराएल चीज सभ देखि चित्कारि उठल- ओह गॉड! -द्रौपदी, जकर सबहक किरदानीक फल छौ ई तीन टा बच्चा, ओकरे सभ लग अइ तीनोकेँ छोड़ि कऽ आएल कर काज करबाक वास्ते। नै जानि कतेक दुरखा लागि जनमओने हएत एतेक बच्चा! -चुप्प रहू मालिक, बहुत बजलौं। हमर सबहक घरबला एखनो धरि मुट्ठीयेमे रखै छै हमरा सभकेँ। मालकिन जकाँ छुट्टा हम सभ नै छिऐ। -गै, देखै छीही अपना मलकीनीकेँ एके टा बेटीमे प्रसन्न। इएह तँ फाँट देखबैए बड़कबा आ छोट घरक बेटी-पुतौहमे। -नै मालिक, दुनू घरक पुतौह, पुतौह जकाँ नै रहै छै। अन्तर छै दुनूमे। छोटकाक पुतौह जन्मा लैछै, आ बड़काक पुतौह ... खसा लै छै। गहना -दीदी प्रणाम! -प्रणाम, प्रणाम। केना छी? -ठीक छी। “लिअ, आबि गेली मक्खीचूस”।, मौगीक समूहमे सँ स्वर बहराएल। पूरे गलीक मौगी सभ जहन एक ठाम जुटए, तहन अनुपस्थित मौगी सभपर कएल गेल हिनताय मात्रे ओकर सबहक समयक कटना छल। अओर ई रेणुकाजी तँ ओकर सबहक हिट लिस्टमे छलीह। उपस्थित मौगी सभ समवेते एक दोसराक संग पुरैत कहए लागए- देखियौ ने, भगवान पाइयक कोन कमी देने छथिन? मुदा ओ ने कोनो चीज खरीदैत छथि आ ने महग कपड़े लत्ता पहिरै छथि आ नै कोनो किट्टी पार्टी ज्वाइन करैत छथि। देश परदेश घुमबाक तँ नामे नै लैत छथि। आ अहाँ आइ धरि हुनका कोनो गहना किनैत देखलौं? -हमर आन मालकिन सभ हमरा बड़ चिढ़बैए जे तोँ रेणुका मालकिन लग कोना काज कऽ लैत छेँ? ओ तँ मक्खीचूस छथि। -पूरे कंजूस हम तँ लड़ि गेल रही लता मैडमसँ, नै भाभी? -ओ तँ समयपर हमर दरमाहा चुकता कऽ दैत छथि। अओर हमरा मानबो बड्ड करैत छथि, कहियो कोनो गलतीपर खिसियाइत नै छथि। व्यवहारमे बडड उच्च विचारक छथि हमर रेणुका मालकिन। -देख गुड़िया, हमर वास्तविक गहना अछि एक बेटी आई.आई.टी. कानपुरमे, दोसर बेटा एम्स मे आ तेसर तँ संघ लोक सेवा आयोगक अभियंत्रण परीक्षा दऽ कऽ आवश्वस्त भऽ परिणामक प्रतीक्षारत अछि। हम सभ पाइ लगा रहल छी अपना तीनू संतानकेँ सर्वोच्चपद पर बैसेबाक योग्य बनेबामे। ओकर ई ओहदा, उच्च शिक्षा, संस्कार, व्यवहार अपन माये-बाप नै समाज आ देशक नाम जगजियार करत। आ तखन हमर कोइखक ई तीनू मोती हमर सुन्दर गहना बनि हमरा सुशोभित करत। डोपिंग टेस्ट चित्कार! -नै, नै, किन्नौ नै? नै मास्टरजी, हमरा नै चाही कोनो पदक। नै चाही बाप-पुरखाक, देशक इज्जति। हम, आ माय-बाप, सर-समाज सभ कल्पना करैत छलौं जे पदक तालिकामे हमर नाम सभसँ ऊपर आबए। मुदा कहाँ छलै ककरो ऐ सत्यक पता जे अहाँ नशामे सुइया दऽ पदक लेबासँ पहिने इज्जति लऽ लेबाक प्रयास करब। नै, हमरा नै चाही माय-बाप, सर-समाज, देशक इज्जति। हमर अपन इज्जति हमरे लग बाँचल रहए, ईएह जिनगीक सभसँ पैघ पदक हएत। -तोँ डोपिंग टेस्टमे फेल भऽ अप्पन आ देश दुनूक इज्जति निलाम कऽ देमऽ।’ -हमरा ई मंजूर अछि। मुदा अन्तरात्माकेँ ठेंस नै पहुँचाएब गुरूसँ इज्जति गमा कऽ। विनिमय मोन गम्भीर, चेहरा उदास! कत्तौंसँ कथाक स्थिर नै भेलापर बेटी बलही बोझ सन लगैत छनि। नै जानि कतको अनकट्ठल गप्प सुनि एलापर क्षणिक निर्णय कऽ लैत छलाह- जतए जेहने लड़िका भेटल हाथ धरा कऽ रहब ऐबेर। मुदा जहन बेटीक सिरखारीपर नजरि जानि, तहन बेटाक समकक्ष बेटीकेँ रखबाक सपना दिनक तरेगन नहैत लागनि। स्कूल धरि पढे़बासँ इंजीनियरी करेबा धरि बेटा-बेटीमे तँ फर्क नै केलौं कहियो। तहन आब एकटा सहयोगी आ दोसर बोझ सन कोना भऽ सकैए। -नै किन्नौ नै, एहेन-ओहोन घर नै बिआहब आ नै दब लड़िका करब, चाहे जतेक खर्च करए पड़ए। -ऐं यौ, एतेक खर्च....। कतऽ सँ कऽ सकब? -यै की करू? ईएह सभ जानि बेटा-बेटीपर एके रंग खर्च कऽ दुनूकेँ सुयोग्य बनेलौं। जे बेटा बुढ़ारीक लाठी बनि पितृऋणसँ उऋण हेबाक लेल जीवनक सहचर बनि चलत। आ बेटी... सेहो आत्मनिर्भर रहत। हम सभ एकरा सभकेँ आधुनिक समाजक अंग बनाबऽ चाहै छी। यथा - परम्परासँ दूर आधुनिक रहन-सहन, आधुनिक सोच माने कि दहेजमुक्त समाज, सुशिक्षित परिवार ... आदि। -मुदा लड़िकाबला सभ से नै करऽ देमऽ चाहैए! मजबूर करैए परम्परे निवहताक लेल। -एंे यौ, ऐ बदलैत वैश्विक परिवेशमे परम्पराक निवहता कोना कऽ सकब अहाँ? -‘बेटा बिआहक दहेजसँ बेटी बिआह संपन्न करा कऽ।’ (घर-बाहर जन. मार्च ’१२) सेजौट पाकिस्तानक कूटनीतिक उठापटकसँ त्रस्त भारतकेँ चीन द्वारा अरूणाचल प्रदेशक अपन क्षेत्रमे घुसपैठीसँ भारतीय अधिकारीमे औनाा-पथारी शुरू भऽ गेल। मंत्री सबहक बयानबाजी, पक्ष-विपक्षक कुकुर कटाउज चलैत रहल। अमेरिका सेहो चीनक सामरिक शक्तिसँ डराइत रहल अछि। मुदा ओकर टांग अड़ौव्वल कुचालि सोझाँ आएल- चीन द्वारा भारतक कोनो हिस्सापर अतिक्रमण एक अनुचित दखलंदाजी मानल जाएत। अमेरिका ऐ तरहेँ गोइठा सुनगा कऽ मुँह दोसर दिस घुमा लेलक। चीन ऐ मुद्दाकेँ गरमा, ऐ मुद्दाक गरमीपर निश्चिंत भऽ सूति गेल। भारतक प्रधानमंत्री कार्यालय, रक्षा मंत्रालय आ विदेश मंत्रालयमे उकस पाकस होइत रहल। परिणाम शून्य सन। भारतीय अधिकारी चीनक दोसर कुचालिकेँ अखियासैत प्रतीक्षारत रहल। ऐ बेर तँ भऽ गेल। आब.......... किछु कऽ कए देखाबथु........। किन्नौ नै छोड़बनि चैन सँ रहऽ देबाक बाट। परमेश्वर करमान लागल लोकक बीच पंचैती शुरू भेल। पहिल पुरुष पंच- अइ छौंड़ा-छौंड़ीकेँ तँ भकसी झोंका कऽ मारि दिअ। छोड़ू नै। ई प्रेमक नामपर सगरो समाजकेँ कलंकित केलक अछि। दोसर पुरुष पंच- नै, एकरा ऐ पड़ौआ छौंड़ासँ मुक्ति दिआ बिआहि दिऔ। कोनो लुल्ह, नाङर, घेघाह वा कनाहसँ अपन कुकर्मक सजाए एतै भोगि लेत ई। मौगी पंच- ऐ उढ़री-ढ़ररीसँ कोन गामक लोक बिआह करत? एकरा तँ तरहड़ा खूनि गाड़ि दिऔ। ऐ घोंघाउजक बीच छौंडीक कुहरल आवाज आएल- हम अहाँ सबहक पएर पकड़ै छी। हम उढ़री नै छी। हम एकरासँ प्रेम करै छी। हमरा जे चाही से सजाए दिअ। मुदा हमरा सभकेँ जिनगी दिअ। आ चोट्टे मुखिया जी छौड़ी माएकेँ बजा कहलखिन्ह- लिअ, एकरा झोंट पकड़ि लऽ जाउ आ बान्हि राखू। तखने सभ पंच समवेत स्वरे बाजल- मुखिया जी, अपने तँ परमेश्वर छिऐ, तखन फेर एकर सजाए- बस एतबे। मुखिया जी बजलाह- नेतृत्वक काज छै जे जँ कतौ पसाही लागल देखए तँ ओइमे पानि ढ़ारि दै नै की घी। पजेबा रामसेवक छल निसंतान। तँए दर्जनो देवता-पित्तरकेँ सुमिरलक ओ। निहोरा पाँतीसँ लऽ कऽ कबुला-पाती धरि केलक। खाली उद्देश्य एतबे जे कनियाँक सुन्न कोरा भरै। आ दुनियाँमे भगवान छथिन्ह तकर सबूत भेटलै रामसेवककेँ। मुदा तैओ मन्हुआएल छल ओ। -यौ, घरमे लछमी अएलीहए। भोज-भात हेबाक चाही। लाल भाइक ई गप्प सबहक देहमे जेना टेमी लेसि देलकै। -यौ लाल भाइ, अहूँ घापर नून किए छिटै छी? लाल भाइ बातकेँ गमैत बजलाह- हम तँ बेटाकेँ पढ़ेबा-लिखेबापर ओतेक खर्च केलौं। मुदा ओ विदेशमे जा बसल। फोनेपर भेल गप्पक अलावे हमर सबहक कोनो सुधि नै छै ओकरा। हमरा सभकेँ मुइलाक पछाति लगैए दोसरे कर्ता बनत या नै तँ लहास सड़ैत रहत। आब अहीं सभ कहू जे एहन बेटाक जरुरते कोन? लाल भाइ ई कहि चुप्प भेलाह। सफाई -गै सुनीता। हे सुन। तोरा रखलियौ बासन, लत्ता आ घरक सफाई वास्ते, ऐ दुआरे नै जे अपन चारू बच्चाकेँ ढंगेरने ला, आओर पुरे घरकेँ अजायबघर बना कऽ राखि दे। -दुनू बेकती रह एकठाम, कोनो बात नै। मुदा नियंत्रण राख अपना पर। -देख तँ हमरा, एकटा बेटी अछि बस। -यै मालकिन, हम सभ तँ माय-बाप जकरासँ गठबन्धन कऽ देलकै, एकेटा लग रहि जतेक चाही जनमबै छी। आ जे किछु करी, पालनो-पोसन कऽ लै छी। मुदा अहाँ सभ नै जानि जे ककरा-ककरा लग जा रंग रभस कऽ अबै छी। हमरा जनतबे तँ अहूँ नै जानि पबैत हएब जे अहाँक बच्चाक असली बाप के अछि? -हे चुप्प! हमर सोसाइटी देखै छेें। -हँ मालकिन, अहाँ सभ कतेको पुरूषक गात लागि अबै छी सोसायटी मेन्टिनेसक लेल। वापिस अपन घरमे आबि अपनाकेँ सभसँ पैघ सतबरती देखबै छी। प्रिमियम -कहू तँ, छः हजार टाका पठबैत छी ऐ छओंड़ा केँ। तखन फोन करत जे आइ ई खर्चक पाइ चाही तँ काल्हि ओ फीस देबाक अछि। पाइ पठा दिऐ। एतेक पाइमे तँ हम पूरा परिवार एतऽ गुजारा कऽ लैत छी। मुदा ओ सदिखन खगले रहैत अछि। -यौ की करबै, कहुना डिप्लोमा डिग्री पाबि लिअए जइसँ नोकरी सुरक्षित भऽ जाए। हैं यै, हमरो सएह मोन अछि। हम कहुनाकेँ तँ ओकर खाँहिस पूर्ति कइये ने देबै। -हमर बाबूजी डेढ़ सए टाका मासमे पठबैत छलाह। ओहीमे सभ खर्च चला कऽ कहियो काल सिनेमा देख लैत छलौं। कहियो दोबारा पाइ मंगबाक खगता नै बुझाएल। -यौ, अहाँ कोन डिप्लोमा डिग्री केलौं, से ने कहू। डिप्लोमा डिग्री केला मात्रे किछु नै होइत छैक। देखै छिऐ, हमर सबहक जतेक पेंशन अछि ततेक तँ अझुका लोकक दरमाहो नै भऽ पबै छै। यौ, पेंशनक पछातियो उमेर खसलासँ आश धिये पूताक होइ छै, से नै बुझे छिऐ। -है यै, तेँ ने मासे-मासे पाइ भरै छी। जे ओकर बदला चुकबैत रहए, जिनगीक संग आ जिनगीक पछातियो। मुखियैती विद्यालयमे मध्यान्हमे भेल पलखतिमे नेना सभ खेल खेलेबा लेल अपन-अपन तुरियाक धिया-पुताकेँ संगोर केलक। -गै कंचन, तूँ तावत बौआकेँ देखैत रह, पड़ा नै जाउ। रूची आ लाली, तूँ जो घास लऽ गायक नादिमे खसा आ, भोरेसँ भुखाएल हएत बेचारी। -रौनक आ सत्यमकेँ तावत तूँ झूला झुला दही। -हम सभ कोनो काज नै करबौ जावत हमरा सभकेँ किछो देमऽ नै। -रुक....., हम तोरा सबहक लेल किछु चीज लऽ कऽ अबै छी। -ले गै लाली, रूची बिस्कुट। रौनक सत्यम लोली पॉप। कंचन तूँ सभ सोन पापड़ी लऽ ले। -तोरा अपना लेल तँ किछु नै बचलौ .... रौ। -कोनो बात नै, तोँ सभ खुश रहमे तँ हमरो खुशी हएत। - ईह! नान्हिटा छओड़ा, कहैए कोना जेना हमरा सबहक बाबा रहए। लक्ष्य -गोत्र.....। गोत्र नै, हमरा लेल तँ सउत्र अछि। -हम तँ बुझै छी जे हियासँ हिया मिलि गेल तँ शेष फोंक। -मुदा हम अहाँ तँ विजातीय छी, तहूमे छोट-पैघ जातिक। -नै यौ, हमर अहाँक प्राकृतिक जाति एके अछि, मानव जाति। -ओना तँ प्रेम पशु-मानव आ मानव-पशुक बीच सेहो होइत अछि। मुदा ओ निमित्तिक लेल होइछ। वैचारिक प्रेम तँ मानव-मानव मात्रक बीच होइछ। -अओर स्त्री-पुरूषक बीच भेल प्रेम सांसारिक संपूर्णता भऽ स्थापित होइत अछि। -आब अहीं कहू जे अहाँ हमरासँ कोन प्रेम करै छी? -निमित्तिक की वैचारिक? -यौ, हम अहाँसँ एहेन प्रेम मात्र चाहै छी जइसँ हमर माथानूआ भऽ जाए। (जखन-तखन, प्रेम कथांक) कौनचर “मिडिया तंत्रमे उल्टा-पुल्टा देल मौखिक बयानक हम भर्त्सना करैत छी, भारत हमरा पर्याप्त सबूत दिअए तँ हम दोषीपर कार्रवाइ अवश्य करब।”, पाक विदेशमंत्रीक बयान आएल। -हम पहिने पूर्ण सबूत पाकक समक्ष प्रस्तुत कऽ चुकल छी। पाक एखन धरि ओइपर की कार्रवाइ केलक, से कहए? -दुनू देशक राजनयिक वा प्रतिनिधिक बयानबाजी कुकुर कटाउजसँ वेशी किछु नै छल। दुनू देशक जनता अइ कटाउज पर बहीर आ आन्हर सन लगैछ। अपना टा बुत्ते दुनूमे सँ कोइ ठाढ़ हेवा योग्य नै अछि। आब सबहक नजरि दुनूपर कान पथने महाजन अमेरिका पर छै। भारतीय राजनयिक- ई हमर आपसी मामिला अछि, ऐपर कोनो तेसर देशक हस्तक्षेप हम किन्नहुँ बर्दाश्त नै करब। पाक सामरिक शक्तिकेँ आर्थिक मदति वास्ते अमेरिका दू सौ करोड़क पैकेजक घोषणा करैत कहैछ – भारत, पाक आतंकवादसँ ग्रसित अछि। ऐ दुनूक बरोबरि सहयोगक आशा अमेरिका रखैछ। भारतीय राजनयिक असहाय महिला जकाँ छटपटा कऽ मुँह बन्ने रखैछ किएक तँ उहो मुँह बौने अछि ओही महाजनक कारा वास्ते। साँप-सीढ़ीक खेल चलैत रहल। आत्मानुभूति सर्वोच्च न्यायालयक समलैंगिक सबंधक मान्यताक घोषणा सँ निन्जा आ डोल्फीक जोड़ी आइ वेशी उल्लसित भऽ उठल छल। छात्रावासक ओइ महिला, छात्रा जोड़ीक हर्षित मोन कतेको विषम लिंगी जोड़ीक कटाक्षक शिकार होइत रहल। ऐ जोड़ी द्वारा स्थानीय गिरजाघरमे जीवन पर्यन्त संग-संग जीवाक सप्पत लेल गेल छल। जे किछुये मास पछाति लुत्ति भऽ उड़ैत देखाएल। छात्रावासक प्रभारी सहित अन्यान्य छात्र-छात्राक भेल जुटानक सोझाँ ऐ जोड़ीक एक संगी निन्जा चित्कार पाड़ि रहल छल- -नै, किन्नौ नैं। हमरा छोड़िदे। नै चाही गॉड, नै चाही स्वर्ग। प्रभारी जी पुछलनि- की चाहियौ तोरा, से ने बाज? -हमरा चाही जीवन! -जीवन, माने ...............? -माने जे मर्द, जीवनक संपूर्णताक खातिर। जनवाणी दर्जनों कविक सोझाँ दर्शक कविगोष्ठीक आनन्द एना उठा रहल छल जेना कवि सभ हुनकर सबहक सभ आस अपन-अपन कविते सँ पूर कऽ लोककेँ गुदगुदी कऽ रहल छल। रातुक पहिल अधरतिया धरि तँ उपस्थित श्रोता हँसैत-हँसैत बिता लेलक। लेकिन राति जेना-जेना बितैत जा रहल छल, श्रोतामे हास्य रसक अनुभूति कम भेल जा रहल छलै। आ ओ सभ अपन-अपन कुर्सीयेपर बैसल ओंघए लागल छल। जकर मुख्य कारण छल जे कवि सबहक कविता आब हास्य व्यंग सँ आगू बढै़त अपन परम्परागत रूप यानी रोटी आ भूख दिस धूमि गेल छल। संचालक आ आयोजक दुनू गोटे कनफुसकी केलक आ मंचसँ उद्घोषणा भेल- आब अहाँ सबहक सोझाँ आबि रहल छथि अपन जमानाक नामी हास्य कवि श्री आजाद जी। मुदा आजाद जी केँ कविता सुनेबासँ पहिने हम ओकर अवलोकन करऽ चाहब जे कि हुनक कविता हास्ये-व्यंग्यक कसौटी पर ठाढ़ भऽ पाओत कि ओ जगैत श्रोताकेँ गुदगुदी करबाक आ सुतैत श्रोताकेँ जगेबाक काज कऽ सकत? आजाद जी ठाढ़ भऽ हाथ जोड़ि माइक पर जा कहलनि- हम आयोजक आ श्रोता दुनूसँ माफी चाहब, किएक तँ हमर कविता हास्य-व्यंग्यक नै अछि। ओकर संबंध तँ पेटक भूख आ रोटीसँ जुड़ल अछि। किछु जागल श्रोता जे हास्य मे रमल छलाह हो हल्ला मचाबऽ लागल, वापिस जाउ... वापिस जाउ। मंचेपर सँ आयोजक महोदय आजाद जी केँ हुथैत कहलनि - आजाद जी, हम तँ अहाँकेँ वरिष्ठ कवि मानि ऐ दुआरे बजेलहुँ जे अहाँक नाम सुनि अधिकसँ अधिक श्रोता आबए आ हमर कमाइ दु गुणा भऽ सकए। परंच अपने तँ रंगमे भंग कऽ देलौं। सोझाँ देखियौ- कोनो श्रोता अहाँक घसाएल-पिटाएल कथानक, भूख आ रोटी, सुनबाक लेल तैयार नै अछि। -हम सभ सुनबाक लेल तैयार छी। सभ सूतल श्रोता जगैत समवेत रूपेँ कविक स्वरकेँ बल देलक आ ओइ भीड़मे अपन-अपन कुर्सी ग्रहण केलक। आयोजक उत्साहित, गंभीर चकित होइत- अरे ई की? श्रोता- हमरा सभकेँ भूखल पेटे निन्न कोना आओत सरकार! हम सभ सूतल नै छलौं, बोर भऽ ओंधा रहल छलौं। -हास्य-व्यंग्य क्षणिक तृप्ति दैछ। ओ तँ धारक ओहन लहरि जकॉं अछि जे उठैत-खसैत रहैत अछि आ धार शान्त रहैछ। मुदा रोटी, ई तँ पुरे जिनगी दैत अछि। जे हास्य, रौद्र, भयानक सभ रसक सर्वग्राही होइत अछि। चश्मा एक टा चित्रकार बड़ मनोयोग पूर्वक एक टा आधुनिक पुरूषक चित्र बनौलक। शुट-बुट, हाथमे मोबाइल, कन्हासँ लटकल लैपटापकबैग आ आँखिपर चश्मा चढ़ल। ऐ चित्रक समीक्षा-प्रशंसा वास्ते लगा देलक म्युजियमक दुआरिक बाहर, आ कात मे ठाढ़ रहल परिणामक प्रतीक्षा मे। किछु क्षणक पछाति एकटा दर्शक ओइ चित्रकेँ गौरसँ उपरसँ नीचाँ धरि निहारि कऽ बाजल - बड्ड सुंदर। जे कियो एकरा बनेलनि ओ धन्यवादक पात्र छथि। मुदा ई अओर सुन्नर होइत जँ आँखिपर चश्मा नै चढ़ल रहैत। कातमे ठाढ़ चित्रकार उत्सुक होइत पुछलनि- चश्मा चढ़लासँ चित्रमे विकृति आएल अछि की? -हँ, लगैए आँखिक पानि जेना कम भऽ गेल हुअए। चित्रकार खुशी सँ कुदि उठल। -अहाँ हमर सत्यकेँ पकड़लौं। -माने? चित्रकार स्पष्ट करैत - पानि सँ भरल आँखि बला लोक तँ ओल्ड मॉडल भऽ गेल। यानी बेकार सन। -आधुनिक लोकक आँखिमे आब ओतबे पानिक बेगरता थम्हल छैक जते सँ ओकर खाँहिस पूर भऽ जाए। उपहार भाय दुनूक दू सोच। पहिल ऐय्याशी आधुनिकतावादी। मुदा दोसर संयमी, परम्पराक निवहतामे विश्वासी। पिता पुरे दार्शनिक विचारक। माय नैहरसँ सासुर धरि साक्षात देवी बुझू। परोपट्टा भरिमे ऐ समन्वित विचारधाराक सोरहा छल। जे भरल-पुरल परिवारमे बुधिगर ठेकनगर, परोपकारी जन हितैषी, नै जानि कतेको एहने मौखिक सम्मानसँ सम्मानित छल ई परिवार। आब खगता भेलै परिवारक दोसर पीढ़ीक संपूर्णता आ तेसर पीढ़ीक हेतु सीढ़ीक। घोषणा कएल गेल- दुनू एके लग्नमे बेटाक विआहबाक। नीक कुलशील आ समकक्ष, समदर्शी कनिया ताकल जाए लागल। धरड़ोहि लागि गेल कनियागतक। सभ अपन-अपन बेटीक सुन्दर बखान वरागतक सोझाँ रखलनि। कतेको दर्जन कान्यामे सँ दूगोट कान्याक चयन कऽ दुनूटा घर बसेबाक दुआरि खोलि देल गेल। दुनू कनियाँक एके दिन भेल द्विरागमनक आइ सोरहम दिन। स्वर्गसन परिवारमे नरकक बाट खूजल- दुनू कनियाँ झोँटा-झोँटौव्वल ...राँड़ी-बेटखौकीक मध्यमे खोललनि भिन भिनौजक बाट। जेठकी कनियाँक उलहन उपराग सुनैत कान-आँखि मुनने रहली छोटकी। किएक तँ जेठकी जमीन्दारक बेटी, छोटकी कुलीन मुदा गरीब परिवारक बेटी। जेठकी कनियाँ - हमर बाप माय तँ एक दिस पाइ आ दोसर दिस वर तौलि अनलनि। आ द्विरागमनमे देलनि कतेको पीढ़ी धरि घर सम्हारबाक जोगार लेल पेटार। छोटकी कनियाँ- हमर माय बाप देलनि कुलीनक संस्कार जे अबबला कतेको पीढ़ी धरि निवहता करबाक शालीनताक पाठ पढ़बैत रहए। काँट बाप रे बाप.... बाप रे बाप, गीदड़ लऽ गेलै बौआकेँ। साँझ खन बाध बोनसँ घूमि रहल चरवाहाक भीड़मे सँ बफाड़ि काटि रहल एकटा चरवाहाक ई स्वर गूंजि रहल छलै। जे जेम्हरे सुनलक से एक-दोसराकेँ कहैत दौड़ि पड़ल खड़बोना दिस। ता जीतन राम सेहो परीक्षण बाबूक ओतऽ दौड़ल जाइत रहए कि रस्तेमे परीक्षण बाबू बन्दुक लऽ अबैत भेटि गेलखिन। मालिक....। हँ हँ हम बुझलियौक। चल-चल। आ सभ खड़बोनाक चारूकात ठाढ़ छल कि जीतनराम चिचिया उठल- हैया यौ मालिक ईएह हमर कंटीरवी छी। मारू गीदरकेँ। -कंटीरवी... , ई शब्द जेना परीक्षण बाबूकेँ वाण सदृश भेदि देलक, ओ तमतमाइत बाजि उठला- रौ स्सार। अही कंटीरवी लेल भरि गामकेँ जुटएलेँ तोँ। हम तँ बुझलियौ जे बेटा छौ? (भारती मंडन- १९९५) ओकाति हाकिम, किरानी आ चपरासी कार्यालयमे डयुटीपर। -सर! दरमाहा तँ बन्न अछि, मुदा घरक खर्ची नै बना अछि। आइ छोटकी बेटी बिमार पड़ि गेल। डाक्टरसँ देखेलिऐ। मुदा हाथपर एकोटा पाइ नै अछि, जँ किछु मदतिमे दितौं तँ उपकार मानितौं। - किरानी अनुनयात्मक स्वरे बाजल छल। -हौ, हमर दरमाहा तँ चालू अछि मुदा कर्ज बलही बोझ सन। पाइ की हाथ पर एको दिन रहऽ पबैए। -हूँह। ऐ सँ तँ नीक हम, जे सुखीसँ परिवारक खर्ची चला लैत छी। पहिल दिन तँ हाथ पसारऽ पड़ल अछि ककरो सोझाँ। सरकार! धन्य छिऐ अपने सभ। अहाँ अपने हाकिम, बेटा डाक्टर, फेर कर्जा। अहाँसँ नीक तँ बड़ा बाबू। जे अपन परिवारक खर्ची असगरे सुखीपूर्वक चला लैत छथि। एक टा दबंग चपरासी बीचमे टपकि पड़ल- चुप्प रह, तोहर की ओकाति छौ? वेवकूफ कहीं के। हाकिम, हमर बेटीकेँ छात्रवृत्तिसँ ततेक पाइ भेटै छै जे अपनो पढै़ए आ ओइ पाइमे सँ घरोक खर्ची चलि जाइ छै। हाकिम दराज खोलि ओकर सेवा पुस्तिका ताकऽ लगला। (मिथिलांगन- २००४) जीवन चक्र ओ कल्पित भावें उगैत सुर्यकेँ देखलक, तकर पछाति अपन दिनचर्यासँ निवृत भऽ अपन कर्मशाला (दोकान) मे लागि भिरल। गाँहैक केँ निपटाबऽ लागल छल कि उधारी लागब शुरू भऽ गेलै। सुर्य दिश तकलक- ओकर प्रखरता मलिन होइत बुझेलै। ओकरा काल्हि भोजन रूचिगर लागल रहै, मुदा आइ ओइपर अरूचि पसरि गेलै। सुर्यपर नजरि गेलै, ओ पश्चिम भर जाइत बुझेलै। महाजन एलै-गेलै। गँहिकीक मन्दी, तगेदापर तगेदा आबि गेलै। अनट-सनट गप्प सुनबा लेल कान खुजल छोड़ि देलक। गल्ला खोललक तँ नजरि अन्हरा गेलै। सुर्य बिला गेल छलै। चिन्तनशील, मुदा मध्यपानक चाह जोर पकड़ि लेलकै। बन्न भऽ गेलै दोकानक सभटा पट्टा। राति अमावश्याक छलै। रक्षक राजनेताक सुसज्जित पण्डालमे करमान लागल लोक। सत्ताधारी दलक बड़कासँ छुटभैया नेता धरि माइकपर अपन-अपन स्वतंत्र विचार व्यक्त कऽ रहल छला। सभक अभिव्यक्तिक केन्द्र विन्दु छल - ‘महिला दिवस’। बीच-बीचमे मौगी सबहक समवेत स्वर- ‘सभठाम हमरा सभकेँ ३३ प्रतिशत आरक्षण हुअए, आरक्षण हुअए... आरक्षण हुअए। कामकाजी महिलाक सुरक्षा हुअए, सुरक्षा हुअए... सुरक्षा हुअए । माइकपर सँ आश्वासनक स्वर फुटले रहै कि चारू कातक भीड़ एक दोसराकेँ थकुचइत पड़ाए लागल। पण्डाल नै जानि उखड़ि कऽ कतऽ गेलै। क्षणेमे मंच सहित संपूर्ण मैदानमे सन्नाटा पसरि गेल। सभ नेता निपत्ता भऽ गेल। लोक सभ अपन-अपन घर पड़ाएल। की भेलै से बुझवा वा बुझेवा लेल किओ उपरिथत नै। संवाद तँ लोककेँ साँझखन प्रसारित आकाशवाणीक समाचार “महिला दिवस पर आयोजित सम्मेलनमे बुधिया आ चुनियाक सामुहिक बलत्कारक आरोपमे दु गोट वर्दीधारी गिरफ्तार” सँ प्राप्त भेल। जमाना -बहुत राति भेल, बन्न करू आब गप्प। लाउ खेनाइ। हँ, एकटा गप्प तँ कहबे नै केलौं। आवश्यक हुअए तँ कहू। आ लगाउ खेनाइ। भोरमे जल्दी उठबाक अछि। -कने शर्मा जीक जिज्ञासा कऽ अबितियनि। -किए, की भऽ गेलनि? -हुनकर जेठकी बेटीक अपहरण भऽ गेलनि। -अपहरण भऽ गेलनि, की उड़हैर गेलनि? -जाए दियौ जे भेलनि। आब की ओ समय छै जे लोक लोककेँ तकने फिरतै। -मोन अछि, पछिले दिन अपना घर मे चोरी भेल तँ के सभ आएल छल? -मात्र भोरूका चाह पिनहार, पेट पोसुआ सभ। (पल्लव - फरवरी – ९४) निर्धन कार्यालय सँ बहराइते मोन छोट भऽ गेल। लगातार भोरेसँ कार्यालयक ड्युटी, फेर ऐ तिक्ख रौदमे जाएब मुश्किल। ‘पण्डासराय’ नाम सुनिते रिक्शाबला बाजि उठल- दस टाका लागत मालिक। दस टाका। रौद नै देखा दैए, केहेन जान मारूक छैक। अपन जेबीकेँ तौलैत पएर आगू बढ़ा लेलनि किरानी बाबू- ओह। आइ जँ साइकिल रहैत? परंच हएत कोना, परिवारक भरण-पोषण! ई तँ जोंक जकाँ चूसि रहल अछि। -नै मालिक, सातसँ कममे नै जाएब। चलबासँ असक्क भऽ जेबीक हालतपर चित स्थिर कऽ गाछक छाहरि तर बैस गेलाह। -सभक एके हाल छऽ हौ? चारि टाका देबऽ, गरीबो केँ तँ ध्यान रखहक। कार्यालयमे ओम्हर हाकिम चुसैत छथि, घरमे परिवार आ सड़कपर तोँ सभ। -देखै नै छिऐ, मँहगी कते बढ़ि गेल छै। चाउर अठारह टाका किलो छैक। -तँ लूटऽ मिल मालिक केँ। -मालिक, लूटल तँ हम गरीब जाइ छी, सड़कसँ संसद धरि। हुनकर सभक तँ खालियो गाड़ीकेँ सलामी बजैत छनि। (मिथिलांचल संपर्क १९९७) आरक्षित सभ एक दोसराकेँ जिज्ञासा भरल आँखिये निहारि रहल छल। करमान लागल छलै लोकक, मुदा कियो ककरोसँ किछु पुछि नै पाबि रहल छल। आ ने कियो किछु बाजि रहल छल। खूब सुन्नर, लाल चमकैत साड़ीमे एकटा पुतला धू-धू कऽ जरि रहल छल। “की भेलै? के छलै ई?”, भीड़मे सॅँ एकटा मुँह खुजल। -रौ फेकना, चल-चल, काज भऽ गेलौ। -सर! मजदूरी? -मजदूरी! एखन तँ काज शुरूहे भेलैए। आब चल राजीव चौक, पटेल चौक, बड़ा बजार। -बड़ा बाजार? ऐ चारि पाँच स्थान पर जखन मुख्यमंत्री क पुतला फुकेतै तखन ने आरक्षण विरोधी स्वर सत्ताधिकारीक नजरि मे जेतै। -मुदा, सर! ऐ सँ अहाँकेँ की भेटत? -नाम, पहिचान। अगिला चुनावसँ पहिने बना देल जाएब पार्टीक अध्यक्ष। आ तखन ओसुला जाएत एके बेरमे ऐ सभ पुतलाक पाइ। आ आरक्षित भऽ जाएत हमर कमाइ। आ तखन तोरो सभकेँ भेटि जैतौ स्थायी काज, अगुताइ किए छेँ? -सर! आइक बोनि नै भेटतै तँ बच्चा सभ की खेतै? -की खेतै? राति कहुना बिता लेतै, भोरेसँ फेर सभ लागि जइहेँ मजदूरीमे, जेना बोइन कऽ कए आइ धरि खाइत एलेँहेँ। रौ! कहियो आइ धरि पेट भरलैए बोनिहारक, जे आइ भरै कऽ गप्प करै छैं? सुन! तोँ सभ तहिया सोचिहेँ पेट भरै कऽ जहिया आरक्षित कऽ लेमऽ अपन मजदूरी। -आ तहिया, अहाँ सभ की करबै? -हम सभ कुरसीक रंग बदलि लेबै। नवयुग महिना रहै अषाढ़क, सावनक आगमन होमैएबला रहै। मुदा... । खेत सभ पनिया गेल रहै। रोपल नै रहै धान, भेल नै रहै कादो, मुदा... मुदा तैयो भुतिया गेल रहै खढ़ पात। हरकम्प मचि गोल रहै, गृहस्थ सबहक बीच। ‘कोने रोग तऽ नै लागि गेलैए ऐबेर अइ माटि मे?’, सभ किसान अर्जी केलक कृषि पदाधिकारी लग। खेतक माटिक भेलै परीक्षण। भेटलै संवाद, रासायनिक खादक बेशी प्रयोग जमीनकेँ कऽ देलक अछि खराप। एकर उपाय जनबाक जिज्ञासा गृहस्थ द्वारा कएल गेल तँ भेटलै सरकारी निर्देश। अहाँ सभ अपन-अपन खेतमे पुश्तैनी बीआ नै मात्र दोगला (हाइब्रीड) क रोपनी करू, तखने टा किछु फसिल पाएब। -सर! एकर दामो तँ घरैया बीआसँ कतेक गुणा बेशी लगा कऽ पछिला बेर लेलौं, मुदा सभटा खखरी भऽ गेल। -ठीक छै, सभ गृहस्थ अपन-अपन सभटा खेत राखि लिअ परती। गृहस्थ सभ भूखे मरू! (मिथिलांगन २००८) अवाक -बचाउ, हे भगवान! , कहैत अपन दुनू आॅंखि मुनि लेने छल ओ। निस्तब्ध! -केहेन माय छी अहाँ से नै जानि? बेटीक इज्जत लुटाइत देखिकऽ चुप्प चाप मुँह बन्न केने रहि गेलौं। -की कहब हम आब समाजकेँ? -बेटी, हम तँ तखन अवश्ये आँखि मुनि लेने रही, जे एखनो मुँह आँखि बन्न केने छी। चिचियाइत डर लागल, जे कहीं दुनू गोटेक जिनगीयो नै छीनि लिअए ओ वनमानुष सभ। गलतीये सोच सही, जीबाक अधिकार तँ रहए देलक ओ भेड़िया सभ। कहू भला आँखि बन्न करबाक सिवाय अओर हम कइये की सकैत छलौं? एखनो धरि स्त्रीमे ओ शक्ति कहाँ एलैए जे पुरूषसँ ऊपर भऽ सकैए, आइधरि स्त्रीक संपूर्ण शक्ति, जिजीविषा पुरूषेक मुटठीमे बान्हल अछि। आ मौगी जाबीमे जकड़ल मुँहे रहैए। लिलसा कएक दिनक वर्षाक जबकल पानिसँ कजरिया गेल रहए सौंसे अंगना। ओइ कजरिआएल पजेबा सभपर पएर दऽ चलबाक हिस्सक पड़ि गेल रहै सबहक। बाप रौ.... शब्दक चित्कार सुनि बेरा बेरी सभ दौड़ल अंगनाकेँ, कि देखैत अछि निमिषक माय बेहाश पड़ल छथि, सौंसे देह पानिसँ भीजल आ हाथ पएरमे कजरी लागि गेल छल। अस्पतालमे भरती करबाओल गेल। ‘‘एक्स रे सँ पता चलैत अछि जे हिनक पएरक हड्डी टूटि गेल छनि, पलस्तर करऽ पड़त’’, डाक्टरक सलाह छल। ‘‘बाबूजी, निमिषाक माँ अंगनामे खसि पड़ली, हुनक पएरक हड्डी टूटि गेलन्हि अछि। एतऽ तुरन्त डाक्टर उपलब्ध भऽ गेलाह, इलाज चलि रहल अछि। अहाँ, हिनका सभकेँ कहै छलौं गामेमे रहऽ देबाक लेल कि पाइयो खर्च केलापर डाक्टर उपलबध भेनाइ निश्चित नै छल।” ‘‘बौआ हम फेर कहै छी जे आबो गामेमे आनि लियौन। जँ गाममे रहितथि तँ कजरिआएल पजेबापर खसबे नै करितथि। डाक्टरक प्रयोजने कोन?’’ खानदानी -अहाँकेँ एतेक मना केलौं परंच नहिये मानब अहाँ, तँ जाउ, लेकिन रौद बड़ कड़गर छै, बचिये कऽ रहब। नै तँ....। -भैया, विभिन्न प्रकारक सांस्कृतिक कार्यक्रम छै स्कूलमे। हे उद्घाटन सत्र तँ बेजोड़ हैतै, की कहू... एकदम धमगिज्जर। अहूँ एबै ने भइया? हम मौन रहि गेल रही। लाउडीस्पीकरक अवाज, ओइपर विभिन्न वाद्ययंत्रक पें... पो... आ शिक्षा मंत्रीक भाषण। हमर सबुरक बान्ह तोड़ि देलक। विदा भेलौं स्कूल दिस। विद्यालयक प्राङनमे पएर रखिते हमर शरीर थरथरा उठल। समवेत स्वरे नेना सबहक ई गायन सुनि- आवारा ..... आवारा…, चोट्टहि घुरि गेलौं घर दिस। मोनमे उमड़ए लागल- ‘‘कि ईएह थिकैक स्कूली सांस्कृतिक कार्यक्रम आ ईएह दैत छथिन्ह गुरूजी शिक्षा। वाह रे भविष्य। दोसर दिन गुरूजीकेँ शिकाइत कएलापर उतारा भेटल- जे जेहेन धरनदार छै तेहने तैयारीयो रहैत छैक। आ अहूँ सभ की करै छिऐ? हम सभ तँ प्रोत्साहन दैत छिऐ। (विदेह अंक- ६२ मे प्रकाशित) कुल्हइया -चुप्प रहै जाउ, चुप्प तँ होउ। अहूँ सभसँ अनुरोध जे कृपया शान्ति बना कऽ राखू। मंत्री जी, करमान लागल लोकक बीच अपन भाषण निर्बाध गतिये चालू रखने रहलाह। -अहाँ सबहक दुख आ दरिद्रताकेँ हम नेनेसँ अनुभव करैत एलौंहेँ। पहिल बेर तँ अवसर भेटत अहाँ सबहक कुल्हइया समाजकेँ ऊपर उठेबाक। अहाँ सभ एकजुट भऽ हमरा जिता दिअ, हम सप्पत खा कऽ कहै छी, अहाँक सम्पुर्ण कुल्हइया समाजकेँ जे कतेको सए बरखसँ पिछरल अछि, उद्वार कऽ देब। -हाकिम, हमर सबहक पुरखा एतेक पछुआएल कहाँ रहै। पिछाड़लक तँ सत्ता, हमरा सभकेँ। दरअसल हम सभ सत्ताक शिकार बनलौं मुगल कालमे। कहै छलै हमर बाबा। हमर पुरखा जुम्मन शाह जे पहिने जमुना छलै। मोगल बादशाह सभ हट्टा कट्ठा शरीर देखि ओकरा कुरहड़ि थमा देलकै। छीनि लेलकै जमीन-जायदाद आ ठाठ बाट। कालान्तरे ओ भऽ गेलै कुरहरिया। अपभ्रंशमे लोक कहऽ लगलै- कुल्हइया। यौ बाबू, हमर सबहक कोनो जाति आ मजहब नै छल। हमर पुर्वज पेट भरै लेल झारखण्डमे जा मोगलक आदेशे मुण्ड कटैक (बलि) काज केलकै तँ ओ कहेलै जनजाति मुण्डा। हम सभ मिथिलांचलक कोशी पेटमे समैल एतेक पिछड़ि गेलौं जे आइयो मजदुरीसँ उपर नै सोचै छिऐ। उपरी शिक्षा आ हाकिम- हुकूम तँ जगलेमे देखल सपना बुझू। बाबू, अहाँ सभ मोनकेँ जते भरि दी, पेट कियो भरनिहार नै। पेट भरतै, तखैन ने दुनिया सुझेतै। पेट रहै छै खाली, जिनगी देखाइत छैक अन्हार। सपना तँ संजोगले संग चलि जाइत छैक। यौ बाबू, कि रंग-रंगक हमरा आरी जिनगी बितवै छिऐ से अल्ले-मियाँ टा बुझैत हेथिन। अहाँ अओर कि जानऽ गेलिऐ? अहाँ अरू तँ गरीबकेँ भोटक साधन मात्र बुझै छिऐ, गरीबक जिनगीकेँ नै। सत्ते कहै छी, जहिया अहाँ आरू गरीबक जिनगीकेँ बुझबै, कुरसी तँ ओकरे दुरखा लागि जेतै। दानक बौस्त जाइ जाउ, जाइ जाउ। अहाँ सभ घर घुरू, बरियाती सभ आबि रहल अछि, खाइ लेल। बिजो भऽ गेल हेँ, एम्हर बैसै जाउ .... ओहो ओसारा तँ खालीये अछि, चलू...। कोबरा घरक ओसारा दिस बरियातीकेँ बढै़त देखि, लाल कक्काक ध्यान कोबरा घरक खुजल केबाड़ दिस गेलनि। अपन हाथ बाझल रहनि तेँ ममताकेँ कहलनि – हे, कने झटकि कऽ जा आ कोबराक पट्टा बन कऽ दहक। जुआन ममताकेँ बरियातीक उपस्थितिमे आंगनमे उतरैत सरियाती सभ चारू भरसँ अपन-अपन विचार देबऽ लगला। ता ममता कोबर घरक केबाड़ ओंगठा, फेर भण्डार घरमे बैसल लाल कक्का लग चल गेल, मुदा ब्रम्हदेव बाबूकेँ आगि लेस देलकनि, कहलनि- कोबर घर खूजल छल तँ कोन जुलूम भऽ गेलै, हम कन्यादान कऽ उत्तीर्ण भऽ गेलौं। आब सभटा छार-भार बरियातीये सभपर। मुदा ऐ कुमारि जुआन-जहानकेँ जे बरियातीक सोझाँ टहलाबै छी से उचित नै। सभ बिरयाती ठहक्का मारलक, -जखन जुआन भइये गेली तँ कतेक दिन रखबनि खुटेस कऽ। एकटा आर दान कऽ पुण्यक भागी बनू। जुनुन आतंकवादसँ प्रभावित क्षेत्र। राति सुतबा काल घरमे बेटा आ माय। बेटा मायसँ कहैत अछि- माँ ई बन्नुक अहांॅ कोठीक दौगमे किए रखै छी? -मानवक रक्षाक लेल। -जँ ई मानवक रक्षार्थ अछि तँ एकरा मानवक संग रहबाक चाही। -नै बेटा, ई मानवक रक्षा ओकर प्रयोजन कालमे करैत अछि। ताधरि ओ दुरे रहए तँ मानव स्वयंकेँ बेशी सुरक्षित राखि पबैए। -माँ, जँ बन्नुक मानवक रक्षा करैए तँ मानव सभ की करैए? -ओहो सभ बन्नुक मात्रकेँ सिरमा लग लऽ सुतैए। माय निसभेर! मुदा ओ सोचि रहल अछि- अपन आ समाजक रक्षार्थ! अधरतिया.........। आंगनमे भेलै पएरक आहटि, घरक दोगसँ हुलकी दऽ देखलक, साकांक्ष भऽ उठल निसभेर माय चौकलि, निन्न उड़ि गेलै। बन्नुकसँ निकलल एक-एक गोलीक चमकपर शोणिताएल लहास चमकि उठै। गौंआ सभ बन्नुक लऽ घरे-घरे घुसल रहल अपन रक्षार्थ। (वैदेही - जुलाई – ९५) विजेता पाटीक बैसार प्रारम्भ भऽ गेल रहए। अग्रिम पंक्तिमे वर्तमान, निवर्तमान अध्यक्ष अपन-अपन समर्थकक संग अड्डा जमौने छलाह। -सुनै जाउ.... ध्यान दियौ। कुल सीट अछि- एक आ टिकटार्थीक आवेदन अछि- २७, सत्ताइसो सदस्यक साक्षात्कारें पूर्ण विवरण जनलाक पछाति एक गोट उम्मीदवारक घोषणा कएल जाएत। -यौ, ई तँ पिछला बेर साइकिल पार्टीसँ ठाढ़ भऽ हमर पाटीक विरोध केने छल। -हे यौ किछु दिनक लेल चन्द्रशेखर जी केँ प्रधानमंत्री बनेबा लेल हुनको पाटीमे सहयोगी रहल। दल-बदलू कहीं के। -कानाफुसी बन्न करू...। शान्त! शान्त! एका एकी कऽ सभ अपन विवरण दिअ। -नै सर! पहिने तँ ऐ बाहरी व्यक्तिकेँ ऐ पाँतीसँ अलग कएल जाए। ई रामेश्वर यादव तँ दल बदलू अछि। पक्का दल बदलू यानी पूर्ण स्वार्थी। -रामेश्वर जी! -जी सर! -अहाँकेँ हमर पाटी कोन आधारपर टिकट देत? अहाँकेँ हमरा पाटीमे एवाक की उद्देश्य? -सर! हम चाहे कोनो पाटीमे जाउ, हमर एक मात्र उद्देश्य रहैए - ई कुर्सी प्राप्त केनाइ। आ आब पाटीयो तँ अहींक मात्र बाँचल अछि, जँ अहाँ सभकेँ हमरा प्रति एतराज हुअए तँ कोनो बात नै अछि, हम निर्दलीय भऽ चुनाव लड़ि लेब, से कोना मना कऽ सकैत छी अहाँ। सर! सभटा इलम जनै छी हम.... कुर्सी पएबा लेल। पएर पकड़बासँ खुन बहेबा लेल तक सक्षम छी हम। टाकाक तँ कोनो कमिये नै। हमरा टिकट देबाक अर्थ भेल- अहाँक एक सीट पक्का। -सुन्दर, अति सुन्दर। अहाँ चयनित भेलौं। हरियर बत्ती- लाल बत्ती ‘‘डरेवरीये (ड्राइवरी) सही, नौकरी तँ भेट गेल। पहिल बेर बहरेलौं गामसँ, केहेन सनगर नौकरी पड़ि लागि गेल, दरमाहा पाँच हजार। ओकर अतिरिक्त खेनाइ- पिनाइ मुफ्त। ठीके लोक कहै छल, गामक डरेवरीसँ पेट नै भरतौ, सभ दिन मालिकक बहिये भेल रहमे।’’, सुन्दर लाल गामसँ बहरएबाक पछाति पहिल पत्रमे गामपर सूचित कएने छल। हिनके बुढ़वा-बुढ़िया खातिर तँ गाम छोड़लकै, नै तँ केहेन बढ़ियाँ दूनू बेकती गामेपर कमा लैत रही, पेट काटि किछु बलू बचाइयो लैत रही। -हेलो....। रामसागरसँ गप्प करा दिअ। -लाइने पर रहू.....। -हेलो .......... के छी? -हम छी अहींक सतवरती। रामसागरक गाममे ककरो अंगना जा, कोनो मौगी मेहरिसँ गप्प करैत रहलापर जँ ई प्रतिरोध करए तँ राम सागर खिसिया कऽ कहै - सतबरती कहीं के। -हे दुख नै करब, फुरसतिक अभावमे छः मास सँ चिट्ठी-पतरी नै लिख सकलौं। -ऐं .... आब की चिट्ठीक जमाना धएल रहलै? लौ ई फोन नम्बर, फोन करैत रहतै, जेठका भइया मोबाइल लेलखिनहेँ। साल भरि बीत गेलै। नै कोनो चिट्ठी आने कोनो फोन एलै। हँ, बीच-बीचमे हजार दू हजार टाका जरूर आबि जाइ छलै। -माँ यै....., हमर मोन दू-तीन दिनसँ कोना दन करैए ओकरे पर सदिखन ध्यान लागल अछि। -हूँ यै, किछु भऽ तँ नै गेलै छओंड़ा के? -धुर, माँ ओहोन कठगर हाड़, माउसबला देह हइ, की हेतै ओइ शरीरकेँ। -माँ यै, हमरा तँ शक अछि ओकर मोनपर। छुलाह तँ छले, कहीं मोन तँ नै भटकि गेलै? -माँ यै, दुलरा काल्हि बम्बइ जाइ छै, ओ कहलक जे रामसागरक कोठी हमरा देखल अछि, जतए ओ काज करैए। ई कहथु तँ हम ओकरे संग लागि जाइ। -हे भगवान! माय गै माय। केहेन चकेठे सनक देह छै, तै मे कोन बीमारी भऽ गेलै हे भगवान। डाक्टर साहएब, एकर कोन इलाज छै से कहू, हमरा जेना हएत हम एकर इलाज कराएब। -सुनू घबराउ नै। गाम पर लऽ जाउ, जे कहथि से नीक-निकूत खाइ पीबै लेल दैत रहबनि। -मुदा इलाज.....। -एड्स लाइलाज बीमारी छैक। लगाम नारीक प्रकृति प्रदत्त कोमलांगी हेबाक कारणे पुरुष सदिखन ओकर मान मर्दन करैत रहल अछि। सभ रूपेँ। कोनो मानवीय मूल्यक ख्याल नै रहलै। आब जमाना करोट लेलकै। पुरुष सभ बेसी निक्कमा होमए लगलै। आब एहन पुरुष सभ पुरुखाह कम कटाह बेसी भए गेल। मौगी सभकेँ रोजगार भेटलै। सभ शर्तपर रोजगार देल गेलै। मुदा ऐ अवसरकेँ पुरुष अपना तरहेँ भजौलक। तेँ आइ महिलाक सत्ताधीश होइते.... पुरुषे सत्ता चलबैए। आ मौगी सोझाँमे राखल मुरुत बुझू आ पुरूषकेँ पुजारीक भेषमे मालिक। देखाउँस कूकुरक समूह मनुखक बीच रहि मनुखाह भऽ गेल। ताकए लागल मनुखे जकाँ खान-पान आ ऐय्याशी। मनुख स्वभावे कुकुरक चालि अंगिऔलक। ओकर भोग-विलास आ ऐय्याशी तँ सनातनिए रहल। मुदा ओ परिवर्तन शीलताक चक्रमे ओझरा गेल। मनुख पहिने बरदासी छल। बेसी आक्रोश भेलापर घोंघाउज कऽ लैत छल। मुदा आब---- आब तँ छोटो गप्पपर कुकूरकटाँउझ करैत रहैए। माँ एतऽ हम-अहाँ, प्रेम-घृणा, परिवर्तन-रेवाज किछु नै बाँचल अछि। जन्म-मृत्यु, सुख-दुख सभ सुन्ना भेल जा रहल अछि। बाँचल अछि आ बचलो रहत तँ खाली ओ जे पेटमे नौ मासक दुखकेँ सहि सृष्टिकेँ पूरा करए बला जालक एकटा डोरि अछि। एतैसँ संतुलित आ संचालित अछि स्वर्ग-नर्क आकि पूरा ब्रम्हाण्ड। जकर एकसर बिन्दु अछि जन्मदात्री। विजातीय पूरा पहाड़ी पर शून्यता पसरि गेल छल। उपर मेघमे स्याहपन, बसातक साँय-साँय ऐ नव जोड़ीकेँ आरो बेसी मजेदार समयक आनंद दए रहल छल। -यौ ठीके कहै छलिऐ। हम तँ एतेक दूर धरि कल्पनो नै केने छलौं जे पहाड़ आ बोन जिनगीकेँ एतेक खुशनुमा बना सकैए। आह, कतेक मजेदार क्षण। पहिल जे बिआह जिनगी दैछ। दोसर बिआहक दिन-राति ऐ सपनाकेँ ऐ प्रकृतिक कोरामे जीवनक संपूर्णताक अनुभव दए रहल अछि। -हे यै... अहाँकेँ ई बुझल अछि जे समाजसँ चोरा कए कएल गेल बिआह आनंदक संग स्वर्गक बाट सेहो खोलिकेँ छोड़ैए। कोनो बात नै, हिया अहाँसँ मिलल। समाजसँ मिलए की नै मिलए, ओइसँ कोन फर्क पड़त। संग हम देब मुदा वास तँ समाजे देत। कोनो बात नै, समाज जँ जीबाक बाट नै छोड़त तँ ओइ क्षणकेँ अंतिम क्षण बना लेब। जइसँ सोहाग अचल रहि जाए। खाली अहाँ संग दैत रहू। स्वरूप आ संभावना एकैटा पाथर कतेक स्वरूप पबैछ आ स्वरूपक गुण पबैछ अपन महत्व। पाथरे ओछा कए बनैछ बाट। जकर स्वाभव होइछ लतमर्दन हएब। पाथरे जोड़ि बनैछ घर। जे लोकक जानक रक्षा करैछ। पाथरक टुकड़ीसँ बान्ह आ ने जानि कतेको प्रकारक लोक कल्याणकारी वस्तुक निर्माण होइछ। पाथरेक लोढ़ी-सिलौट या चक्की जीवात्माकेँ बचेबाक साधन बनि घसाइत रहि जाइए। पाथरेकेँ तरासि कए मूर्त रुप जखन देल जाइत छै तखन ओ दूध-फूल-अक्षत-नैवैद्यसँ पूजित होइछ। ईश्वरक प्रति आस्था रखनिहार लेल तँ हियामे नुका जाए बला ईश्वरक प्रतिरूप होइछ पाथर आ ओकरे पूजि-पूजि लोक सर्वस्व प्राप्तिक आशमे समर्पित भऽ जाइए। विकल्प देवता-पितरक नाम पर सभ एक-दोसरासँ अपनाकेँ विलगा लैए। मुदा चंदा मामा कतेको धर्मावलंबीकेँ प्रिय छथिन्ह जकर स्पष्ट उदाहरण अछि- चान देखलाक पछातिये होइछ मुसलमानक रमजान। चाहे ओ रोजा रखनिहार लोकक दृश्यावलोकनसँ होइ कि इमाम साहेबक घोषणासँ। हम सभ तँ तिथियोसँ काज चला लै छी, जेना भरदुतियाक चान देखाउथ की नुकाएल रहौथ, हमरा सभ लेल धनि सन , हँ चौठचंद्र पावनि जे कि मिथिलेवासी द्वारा मनाओल जाइछ, मे चौठचंद्रक दर्शन अवश्य करै छी। आ पूर्णिमाक चानक निमित्त तँ देशक सगरो भागक लोक रक्षाबंधन मनबैछ। चानक सौम्यता आ शीतलतासँ प्रभावित लोक एखन हुनक निमित्त मात्र पूजन करैछ। किएक तँ एखन जमीन आ असमानमे असीम दूरी अछि। मुदा जखने चान धरि पहुँचबाक रस्ता रहरहाम भऽ जेतै तखने लोक ताकए लागत ओइठाम जा कऽ जीबाक साधन। आ सभटा सुविधा होइते ओतौ एहिना उकवा उठतै। तखन लुंगी, धोती, पैजामा आ पैंटबला छेकत अपन-अपन जगह आ ओतौ दऽ देत सीमान। आ तखन एतौ पूजा छोड़ि हएत धमगिज्जर। फेर तँ पूजित चानकेँ बँटबाक वा कटबाक लेल शुरु भऽ जाएत कटा-काटी। आ संगे-संग धूमिल भऽ जाएत चानक शीतलता, आ एतौ सगरो बहैत देखाएत गरम शोणितक टघार। चान ओहिना रहत हँसैत-खेलाइत, टुक-टुक देखैत हमर सबहक किरदानी। मुदा हम सभ.... हम सभ ओतौ बेपर्द भऽ जाएब एहिना चानक सोंझा। तखन ताकब कोन बाट? रिलीफ मर बँहि, ई भीड़ तँ खतमे नै होइ छै। पूरा मियानीमे दर्जी टोल, जोलह टोली सभ मिला कऽ छह सए मरद-जनानी-बच्चा छल पछिला बेर। पछिला सालक खैरातमे एतबे गहूमसँ सगरो टोल महो-महो भऽ गेल छल। "मालिक, गर कऽ नवका लिस्ट बनबितिऐ तखन ने देखतिऐ जे हमर दुनू भाँइक तँ नामे नै अछि।" "रौ, सभ घरक लिस्ट तँ अछिए हमरा लग।" "नै मालिक, एतए तँ छह मासमे दू-चारि बाप-पुतकेँ फुटने कतेक घर बढ़ि जाइत अछि।" "रे चनेसरा, ई हँजेड़ तँ बढ़ले जाइ छौ रौ।" "हँ मालिक, गहूम आब सधै पर अछि, की करबै?” "हे ई ले एक सए रूपैया।" "मालिक, एकै सएमे कतेक गहूम एतै?” "रौ चनेसरा, ई गहूम लेल नै छौ, ऐ रूपैयासँ कंडोम आनि बाँटि दही मियानीमे।" जिनगी एम्बुलेन्स दरबज्जा पर लागि गेल छलै। सभ बेटा-पुतौहु बूढ़ाक चारूकात तैयारीपूर्वक ठाढ़ भऽ गेल छल। "कतएसँ अनलौं एतेक रास पाइ।" "बाबूजी, जिनगीसँ पैघ पाइए नै छै। कतएसँ अनलौं, कोना अनलौं? से प्रश्न करब व्यर्थ।" "हम नै कराएब आपरेशन। घुमा दिऔ लोकक पाइ। चालीस हजार टका परिवारक भरण-पोषण लेल राखि लेनाइ नीक। हम तँ आब मरणासन्न छीहे।" एम्बुलेन्सक दरबज्जा खोलैत बेटा बाजल- "बाबूजी, अहाँकेँ एखन जिवितो रहनाइ तँ आवश्यक अछि, परिवारक भरण-पोषण आ प्रकृति-प्रदत जिनगीक नाम पर।" (पल्लव-जुलाइ-९६मे प्रकाशित) सेवक ओकर डाँड़मे खोंसल असलाहा देखि डेरा गेल छल सभ। बेरा-बेरी कऽ अनचिन्हार लोक सभ आबि ओकरा हाथ जोड़ए आ गोटा-गोटी कऽ मोटर साइकिलपर आगाँ बढ़ि जाए। चौक-बजारक गप्प गाम भरिमे पसरल आ सौंसे गाम दलमलित भऽ गेल। गोटा-गोटी कऽ लोक चौकपर जुटि गेल। सभ अपनेमे घोंघाउज करैत रहल- ई डकैत छौ। हँ, ई तँ जेना डकैतक सरदार बुझाइए। अनहोनीक शंकासँ सभ ग्रस्त छल। किछु जुबक जीवटता देखबैत पुछलक- “अहाँ के छी ?”, आ ओ मुस्किया देलक। "अहाँ के छी, बजै किए नै छी?" “यौ, ओना नै सुनत ई, मारू एकरा, लऽ चलू पुलिस लग।” “पुलिस.....”, पुलिसक नाम सुनिते असलाहा खोँसल युवक हँसि देलक आ बाजल- “हमही तँ छी ऐ थानाक नवका प्रभारी पद्मश्री सोमदत्त।” अचानके सभ स्तब्ध भऽ गेल। सम्हरैत, हाथ जोड़ि प्रणाम केलक सभ। आ पुछलक- “ई सभ के छल?” "ई सभ पहिने उग्रवादी छल। पुलिस मुठभेड़मे मारल जाइत, हमहीं बचेलिऐ एकरा सभकेँ।” "अहाँ गद्दार छी, देशद्रोही छी।" एकटा युवक आँखि तरेड़ि सोमदत्तसँ बाजल। "नै, समाजसेवी आ राष्ट्रभक्त दूनू छी हम।" “से कोना?” "एकर सबहक प्राण बचेलौं, एकरा सभकेँ समाजक मुख्यधारामे जोड़बाक लेल।" "मुदा ई सभ तैयो वएह काज करत।" "हम अभ्यास करा रहल छी समाजक मुख्यधारामे जोड़बाक लेल।” "मुदा फेरसँ समाजिक हेबा धरि ई सभ एक-दू वारदात तँ कैए लेत।" "तँ अहाँ सभ वारदातकेँ रोकू ने।" "नै, हमर कमीशन रुकि जाएत।" टवेन्टी-टवेन्टी -नै किन्नहुँ नै। पुरुख मात्र पैघत्व देखाएत से कोना हेतै ? गामक बीच भरल पंचायतमे मूँह खोलए वाली पहिल महिला छलीह स्मृति। पंचैती ऐ लेल बैसाओल गेल छल जे महिला आ पुरूषमे के उन्नैस आ के बीस। आधार बीसकेँ मानल गेल छल। पुरुष पंच- मौगीक सभ चीजक पूर्तिदाता पुरुख होइछ, तँए पुरुष मौगीक आश्रयदाता भेल। तँए पुरुष बीस आ मौगी उन्नैस। मौगी पंच- मौगी पुरुष पर आश्रित नै ओकर सहचर होइत छै। जँ से नै तँ सभ पुरुष पुरुषे संग जीवन बिता लिअ। जँ पुरुष बाहरक देबाल होइछ तँ मौगी घरक रक्षक। पुरुष मात्र कमा अनैत अछि। शेष घर-दुआरि, बाल-बच्चा सभक देखभाल तँ मौगिए करैछ। सत्य तँ ई अछि जे पुरुषक जीवन संपूर्ण तखने होइछ जखन मौगी सहचारिणी बनैछ। -एकदम सत्य, तँए दुनूक अधिकार बरोबरि।- प्रधान बाजल। नेओं जनता आब बेसी चालाक भऽ गेलैए। विशेष कऽ चुनावी मदमे। सत्य। ई मात्र कहबी नै छै, देखबोमे अबैए। नै..। दरबज्जापर अबैबला कोनो उम्मेदबारकेँ नै, नै ने कहैए। सभकेँ गप्पसँ खुश राखि सबहक चर-चित लैत रहैए। मुदा मतदान ओकरे लेल करैए जे कि बेसीसँ बेसी तात्कालिक लाभ दए। जनता आब गमि लेलक नेता सभकेँ। सभटा जीत कऽ जाइ छौ जनहित वास्ते आ कहबैए जन-प्रतिनिधि। मुदा ओतए जा कऽ लगैए अपन पेट कुड़िआबए। एक-एक गोटे वा छोट-छीन पार्टीक शर्तपर बनबैए सरकार। आ जखन बेर अबै छै जन कल्याणक, भारतक विकासक, तखने सहयोगी सभ घीचए लागैत छै टांग, अपन स्वार्थपूर्ति वास्ते। जनताक धेआने नै रहै छै या ई कहू जे जनता लेल किछु बाँचिये नै जाइ छै। आ ताधरि पाँचम बरख बीति जाइ छै, सरकारकेँ अपन कुर्सीक पौवा स्थिर करैमे। ता आबि जाइ छै अगिला चुनाव। जे सरकार पुनः कुर्सी स्थिर नै कऽ सकैए ओइ सरकारकेँ पलखति कहाँ छै जनहित देखवा बास्ते। “ठीक छै सरकार बदलतै तँ मँहगाइ घटतै।" (झारखंड सनेस-सितम्बर २०१०) बहुराष्ट्रीय कम्पनी नवका-नवका मशीनकेँ देखबाक लेल धर्रोहि लागि गेल छलै गाम भरिक लोकक। मौगी पुरुष सभ उत्साहित। काल्हि साँझे ठिकेदार आबि कहि गेलै- तोरा गामकेँ आब शहर जकाँ बना देल जेतौ। ऐ ठाम बनतै नवका कम्पनी। विदेशक कम्पनी। -तँ की हम सभ उजाड़ि देल जेबै? -नै, तोरा सभकेँ अगिला गामक परतीमे बसा देल जेतौ आ काज करबा लेल तोरे सभकेँ पहिने बजाओल जेतौ। -बाह। ई तँ बहुत खुशीक बात हमरा आरु लेल। मजूरी करऽ परदेश नै जाए पड़तै। साँझ होइत-होइत सभटा हरियर गाछ खसा देल गेल। सौंसे गाम, सुन्न जकाँ लागए लागल। किछु दिन प्रतीक्षारत गौंआ जखन ऐ भूमिक अवलोकन करबा लेल आएल तँ चारूकात तारक घेरा देल छलै आ लगा देल गेल छलै कैक्टस। हाँ.... हाँ, ओकरा छुबही कने। -हाँ..... हमर सबहक बसल-बसाएल जमीन उपटा देलक आ लगा देलक खाली काँट। ओ काँट जे भोगब तँ दूर छुअब सेहो कठिन। (मिथिला सृजन- अगस्त-सितम्बर २०१०) विश्वासघात माए-बाबूक नै चाहितो रिंकी अपन दोस भाएकेँ संग कऽ परीक्षा देबा लेल बोकारो गेल। ओ अटूट बन्हन एवं पवित्र सबंधपर विश्वास कऽ ओकरा संग गेल छल। करबो की करैत, अपन कोनो भाए जे नै छलै। संग जाइत के? ओकरा संग नै जाइत तँ अइ बेरक परीक्षा छोड़ए पड़तैक, मुदा ओ अइ बहुमूल्य अवसरकेँ नै छोड़ए चाहैत छल। अधरतिया... युवराज होटलक एकटा कोठरीसँ चिचिएबाक स्वर-"भइया, ई की कऽ रहलहुँ अहाँ? छोड़ि दिअ हमरा। भइया...। ऐ बेरक स्वर बेस कड़गर छल। "हम अहाँक भाइ नै छी। हम अहाँक पति सेहो भऽ सकैत छी।" "भइया, पति तँ भऽ सकैत छी मुदा पतित नै होउ।” श्याम अपन दार्शनिक अंदाजमे बाजल- "लोक सभ अनचिन्हार बूढ़ा-बूढ़ीकेँ कक्का-काकी, जवान लड़कीकेँ सिस्टर, जवान लड़काकेँ भाए कहैए। तँए की हम अहाँक भाए भऽ गेलौं?” फेर स्वर आएल- "हमरा अहाँक बीच भाए-बहीनक नै, युवक-युवती मात्रक संबंध शेष अछि।" सगरो कोठरी अन्हरिया गेल..... अन्तर-आत्मा -अहाँक मुँह केना लगैए जेना चाने हो। -कने घुरि तकिऔ ने सजनी हमर नजरि गड़ैए। छौंड़ाक हूजूममे सँ छौंड़िक हुजूमक एक गोट छौंड़ीकेँ चौल करैत जा रहल छल। दोसर पल -एक गोट चुम्मा देबै फ्रीमे? -हे सम्हारू अपन मुँहकेँ। -जँ नै सम्हरत तँ......... -तँ हे लिअ… पएरक सैण्डिल हाथमे लए क छौंड़ाक मुँहपर। -चौल केना करै छथि... जेना हम हिनकर सारि रहिअन्हि। -ऐ एना खौझाइ छी किएक? ऐ बेर छौंड़ा जीवट देखबैत अपन बानि पर अड़ल रहि बाजल- ऐ, अहाँकेँ मोन नै करैए जे हमरा मोनमे अछि ? छौंडी कनडेरिए ताकि नजरि मिलेलक। छौंड़ा गदगद भऽ बाजल -सारि नै छी तँ की हेतै, कुमारि तँ छी ने। छौंड़ी बिहुँसैत तकलक। दुनूक नजरि सोंझा-सोझी भऽ ठमकि गेलै। छौंडीक जीवटते दुनूक बिआह बिन दहेजक संपन्न भेल। कमरुनिसा -माए गै, तिकोनमा पाथर लगा दिऐ। बड़ सुन्नर लगतै। -धुर बताहि, छोड़ि दही। बापकेँ कहै छलियौ तँ कहियो काने-बात नै देलकौ आ तूँ कोन छँए एखन। -गे माए, ई पोला दए दे हमरा, ऐपर मोती हम चढ़ेबै। -यै मैयाँ, की देखै छी निहाड़ि-निहाड़ि कऽ। नीक नै लगै छै की? -गे माए, गै माए। बीत भरिकेँ छौंडी तँ बूढ़ो-बुढ़ानुसकेँ कान कटैए। यै कनियाँ हमरा वएह लहठी दिअ जे अहाँक कमरूनिसा बनौलक अछि। केहन छोलल छै। केहन सजाएल लगै छै। हमर कनियाँकेँ बड़ पसिन्न पड़तै। अपन पहिल कमाइ स्वरूप पाओल बीस रुपैयासँ हुलसि उठल आ ओइसँ बेसी खुशी तँ ओकरा एहन भेल रहै जखन की खराजपुर वालीक भाउज ओइ लहठीकेँ देखि हैदराबादसँ आडर्र पठेने रथिन्ह। कमरुनिसाक अब्बा, रहमानक बनाओल लहठीसँ मिथिलांचलक नाम देशक कतेको भागमे चर्चित भऽ गेल छलै। मुदा आब ओ नै रहल। समूचे लहेरियासरायमे असगरे आबि बसल छल ओ। आ तकरा बाद लहेरी जातिक पारंपरिक व्यवसायक परंपरा जकाँ बनि गेल रहमान। कमरुनिसा कोनो कनियाँ-बहुरियाक हाथमे लहठी देखि बिहुँसि पड़ए-- हमरो बिआह हेतै। अपन बिआहमे लहठी हम अपने बनाएल पहिरबै। रहमान दम्मासँ मरि गेल छलै। लहठीक काज जकाँ दम्मा सेहो ओकर पुश्तैनी चीज छलै। -आँए गे छौंड़ी, दिन भरि खों-खों किए करैत रहै छैं? -मैयाँ, आगि फुकैत-फुकैत कतेको सालसँ दम फुलैत रहैए। अही बेमारीसँ पहिने हमर अब्बा, फेर अम्मी हमरा छोड़ि चलि गेलै। -कहू तँ, लहठीक मीणा सनक ठोर लाह सन स्याह लगै छै। एनामे के बिआहतौ तोरा। बिन बिआहले रहबे तों। -नै यै मैयाँ, हमहूँ एक दिन लहठी पहिरबै। अपन बनाओल करजनियाँ लहठी। जे की नहेरियासरायक अलावे राजस्थानक जोधपुरे टामे भेटै छै। -यै मैयाँ, ऐ बेरुक लहठी तँ केहन दन छै घिनाएल जकाँ । आब एहनेसँ काज चलबए पड़तै। -किए, की भऽ गेलै बजारमे? -आब कमरुनिसा नै रहलै। -की भेलै ओकरा? -लहठी बनेबा लेल आगि फूकए पड़ै ने, सएह लहठी सेकैबला आगि ओकर जिनगीक चिनगी बनि गेलै। ग्लोबल वार्मिंग बहुतो सरंजामसँ बनाओल गेल छल घर। घर पक्का तँ बनाएले गेल छलै मुदा ऐ महँक आधुनिक सुख-सुविधा आ एकर साज-बाज एकरा परोपट्टामे दर्शनीय चीज बना देने छल। टोल-पड़ोसमे फूसक घर बला सभकेँ कचोट लागै अपन कमाओल पाइ आ बनाओल घर पर। जाड़मे साहेब द्वारा विदेशी ब्राण्डक हीटर, गीजरक उपयोग चकित करैत रहल अपन पड़ोसी सभकेँ। आ तइपरसँ ओ सभकेँ सुनबथिन्ह जे ऐ बेर प्रचंड गर्मी हएत। तखन देखब हमर सुख-चैन। आ ई कहि मोने-मोन खूब प्रसन्न होइत छलाह। मुदा ई सभ सुननिहारक मोन मन्हुआ जाइत छल। सत्ते.. ऐ बेरक गर्मी.. आ रौदसँ लोक छटपटाए लागल। आ कनेकबे दिनक बाद अकाल पड़ि गेलै। असक्त भऽ गेल सभ वातानकूलित यंत्र। पंखा आ बिजली। साहेबक छटपटीक कोनो विकल्प नै छल। पड़ोसिया, गौंआ-घरुआ सभ कछमछाइतो आशक संग दिन कटैत रहल। गमैया लोक सभ अपन-अपन प्रकृति प्रदत बाँस आ खढ़क घरमे संतुलित जीवन जीबैत रहल। किएक तँ जीवन भरिक भोगल यथार्थ शक्ति ओइ तापकेँ सहबाक क्षमता दऽ देने छल। आ वएह जीबाक बाट देखा रहल छल। मुदा देखू जे ओ सौखपूर्ति, जे ग्लोबल वार्मिंगसँ बचबाक फेरमे आरो उष्मीय तापकेँ बढ़ा रहल छल। गौंआ सभ रौद आ ताप सहितो हरियर मोने जीबि रहल छल, मुदा साहेब पानसँ निकलल माछ जकाँ भऽ गेल छलाह। ईश्वर कोनो चीज सबहक लेल बनबै छथि आ मनुख अपन सुख-सुविधाक लेल निर्माण करैए। सरकारी दलाल -की तहूँ ऐ काजमे संग छलही। स्सार...... बजै किए नै छँए। दरोगा जी ओकरा हुरपेटैत गरिया रहल छलाह, मुदा ओ चुप्प छल आ बीच-बीचमे मुस्कियाइत छल। असलमे ओ ऐ परोपट्टाक चर्चित समाजसेवी आ एकटा संस्थाक संचालक छल। ओकर अपराध एतनीए छलै जे ओ दरोगा जीकेँ कुचालिमे संग नै दै छलै। ओ चुप्पी सधने बेरा-बेरी कनडेरिए आँखिये सबहक मूँह ताकि रहल छल। करमान लागल छलै लोकक मुदा केओ बाजए नै, कारण दरोगा विरुद्ध जे बाजल से... धड़ाधड़ पहुँचि रहल छल बंदूकधारी सभ। आइ भोरे-भोर एही थानाक सिपाहीक बेटीक बलात्कार भऽ गेलै, सेहो कि तँ थाने परिसरमे। -के छै रे ई फेकना स्सार। तों सभ बौक-बहीर किए बनल छेँ। दरोगा पर साहबी झारैत एस.पी. साहेब बजलाह। दबले जुबानमे दरोगा जी सूचित केलाह- "सर, तिन-टोलियाक छै। -अरे फेकन सिंह? ओकरा पर तँ १०००० रुपैयाक इनाम रखने अछि सरकार। ओ सरबा तँ बड़का उचक्का आ तस्कर अछि। फेर कने रुकि एस.पी. साहेब आदेश दैत बजलाह- जाउ पता करू। कतौ नुकाएल हुअए। जिन्दा कि मुर्दा हाजिर करु। ऐ आदेश केर सूचना सौंसे पसरि गेल छलै। सभ अपस्याँत। -हे.... ओइ घरमे अछि। एकटा बच्चा इसारा दैत बाजल। इसाराकेँ फौलो केलाह एस.पी साहेब तँ देखैत छथि जे फेकन सिंह दरोगा जीक चौकी पर बैसल। बस सिपाहीकेँ आदेश देलाह.... -एकरा पकड़ आ लऽ चल थानामे। सिपाही मुँह नुड़िआबैत बाजल -सर दरोगा जीकेँ कहिऔन्ह ने। एस.पी. बजलाह -ई स्सार दरोगा की पकड़त? घरमे कुकुर पोसने अछि। एकरो लाइनमे ले। तावत् दरोगा जी एस.पी. साहेब लग आबि हुनका एकात लऽ गेल आ बाजल -सर, परसूए ई अट्ठारह लाखक तस्करी केलक जइमे एक लाख तेरह हजारक लाभांश दऽ गेल अछि। एस.पी. साहेब थोड़ेक नरम होइत दरोगा जीसँ बजलाह -ठीक छै, ऐ थानाक तँ अहीं मालिक छिऐ। अपराध नियंत्रित करबापर कने आरो बेसी धेआन दिऔ। आ ई कहि एस.पी. साहेब स्पेशल टास्क फोर्सक आपात मीटिंग लेल विदा भऽ गेलाह। जिया जरए सगर राति अहा.. मुँह तँ लगै जेना चाने हुअए आ आँखि तँ बुझू जे मृगनयनी सन। कने मूड़ी तँ उठाउ। एक बेर नजरि मिला कऽ तँ देखिऔ। -आँ...... एहन झटका तँ बिजुरियोसँ नै लागल छल। कोनो बात नै, बिआहक पछाति पहिल राति एहने संवेदनशील होइत छै। -हे यै....की भेल। एना आँखिसँ गंगा-जमुनाक धार किए? हमरासँ कोनो गलती भेल की। -नै गलती तँ हमरासँ भेल जे अपन गलतीक सजा अहाँकेँ दऽ देलौं। -केहन गलती आ केहन सजाए? किशोरी होइतहिं हम यौवनक मधुमासमे डुब्बी लगेबाक सोचि उतरए लगलौं। अमीरीमे पोसाइत, जुआनीकेँ पबिते मोन बान्ह-सिकड़ीकेँ तोड़ि बहार हेबाक लेल औनाए लागल छल। हम कइए की सकैत छलौं। किशोर वयमे भटकबाक एकमात्र कारण छल- ई भरल-पुरल देह जे जौबनक चरम पर जा टिकल छल। जकरा अमीरी आ जुआनीक बीचसँ निकलल संक्रमण घेर लेलक। बिआहो तँ अहाँ संग वएह सभ करेलक जे हमर बाँचल संपतिक पहिल उपभोग केने छल। हमर माए-बाप अपन बेटे जकाँ बुझि सभ सुख-सुविधासँ पूर्ण छुट्टा छोड़ि देलनि। कारण जे माए-बापक एक मात्र संतान रही हम। -यै, हम बड्ड उम्मेदसँ आजुक रातिक प्रतीक्षा करैत रही। हमरा सोझाँ उपस्थित कएल गेल बहुत रास कथा स्थगित भऽ गेल छल। कारण छल हमर सोच- जे हम शहरुआ छौड़ीक लिव-इन-रिलेशनशिपक फैसन वालीकेँ अपनासँ दूर राखए चाहैत छी। -यौ, हमर बिआह भऽ गेल। हमर कुमारिक पद छुटि गेल। मुदा हम अहाँक जिनगी खराप नै करऽ चाहैत छी। किछु बर्ख पहिने लागल एड्सक बेमारी हमरा जिनगीक सीमा देखा देलक अछि। -सत्ये, बेमारीक कोनो विश्वास नै, मुदा अहाँ एकटा रोगी मात्र नै अहाँ तँ चरित्रहीनसँ बेसी किछु नै देखाइ छी हमरा। जँ एतेक निष्ठावान छी जे अपन रोग हमरामे नै देखए चाहैत छी तँ अपन मुँह पर पोतल करिखासँ हमर जिनगी स्याह किए केलौं? -यौ, ऐ समाजक परंपरा निमाहैत लोक-लाज आ अपन रक्षार्थ पुरुषक गात लागब आवश्यक बुझलौं। बस। बाहर रौदक धाह देखाएल। मुदा मोनमे अन्हारे-अन्हार पसरि गेल छल। उजासक बाट सेहो अन्हराएल। भावना ट्रेन दुर्घटनाक खबरि सुनिते चारू वर्णक गामक लोक घटनास्थल पर जुमि गेल। सभ अपना-अपना हिसाबें पीड़ित लोकक सहायतार्थ सरंजाम जुटा काज करए लागल। स्वयंसेवकक भीड़ बेरा-बेरी अपना सरंजाममे घाइल भेल व्यक्तिक मरहम-पट्टी वा अन्यान्य आवश्यक सेवा देबए लागल। स्वयंसेवकक दल ऐ तरहें सेवा करैत आगू बढ़ैत गेल। आलोक जीकेँ आगू बढ़ैक क्रममे नजरि एकटा युवती, जे खिड़कीक टूटल तख्तीक तरमे दबि कुहरि रहल छल, पर पड़ल। छौंड़ीक कपड़ा शोणितसँ भीजल छल। समीजक बट्टम सभटा टूटल। उठबासँ सेहो असोथकित। ओ मात्र टुकुर-टुकुर तकैत देखाएल। आलोक जी युवा समाजसेवी जे आइ धरि समाज सेवाक खातिर एकसर जीवन जीबि रहल छथि, छौंड़ी पर नजरि गड़ौने रहि गेलाह। छौंड़ी उकसुकाएल। मुँहसँ किछु बजबाक असफल प्रयास केलक। हाथो उठेबाक प्रयास केलक मुदा से ने भेलै। देहसँ हारल मुदा जीबनसँ नै हारबाक कुलबुलाहटि। जोर दैत मुँह खोललक -भैया.... यौ... कुर्ताबला भैया। आ..... वासनासँ अभिभूत समाजसेवी भाइ साहेबक भक खुजल। बजलाह..... की......की कहै छी। -हमर कुर्तीक बट्टम लगा दिअ। आ भइया अपन सेवा पूर हेबाक अनुभव केलनि। मुदा छौंड़ी तख्ती तर दबल ओहिना टुकुर-टुकुर तकैत रहल। तंत्रमेल एक-एक पाँती पढ़बामे रसगर लगै। आ लिखनिहार रभसगर। गढ़ि-गढ़ि कऽ पाँती बनौनौ सन बुझाइत छल। बुझाइ जेना ओकरा ऐ तंत्र-कन्याक अलावे कोनो छौंड़ीसँ आइ धरि भेटे नै भेल होइ। एखन धरिक पाँती-पाँती ओकरे समर्पित रहै। सोझाँ-सोझी कोनो गप्प कहाँ भऽ पाएल रहै एकरा सभकेँ। गप्प तँ दूर, भेटो नै छलै आइ धरि दुनूक। -बुच्ची परीक्षा तँ पूरा भऽ गेलौ मुदा देखै छिऔ जे कम्प्यूटर पर भरि-भरि राति लागल रहै छँए। परीक्षाक समयमे तँ सकाले सूति जाइत छलह। की-की करै छीही आइ-काल्हि ? -पापा एन्जवाइ। -हँ..हँ, से नीक बात। वर्गक पढ़ाइ आ परीक्षाक बाद बोझ तँ हल्लुक भेलौए किछु दिनक लेल। चल, मोन सेहो हल्लुक कऽ ले। -पापा, आब एकटा लैपटाप लेबए पड़त। -किएक? कंप्यूटरमे ओ सभ चीज नै छै की जे तोरा चाही काज करबाक लेल। -पापा, लैपटापसँ कहियो केखनो लोकक संपर्कमे रहि सकै छी। -माँ .......गै माँ..... -की भेलौ, कोनो खराप सपना देखलही की? -नै गे माँ, सपना नै सत्ये छलै। तों मना करै छलएँहऽ तँ लगै छल अनसोहाँत। मुदा आइ सत्यसँ भेंट भऽ गेल। हम तँ ओइ युवकक प्रति जीवन न्योझावर कऽ देबाक सपनामे रही। मुदा अजुका समाचार हमर निन्ने नै आँखियो खोलि देलक। -की देखलिही समाचारमे? -ओ युवक जकरा हम अपन जीवनक आधार मानि लेने रही कंप्यूटर पर, ओ फुसिआहा छल। -मतलब? एखने समाचारमे देखेलक जे पुलिस ओइ युवककेँ जेलमे लऽ जाइत छलै। आ समाचार कहऽ बला कहैत छल.. मेलक करामातसँ फीमेल उपभोग करए बला पुलिसक गिरफ्तमे। -हँ गै.... तंत्रमेलसँ मोनक शुद्धि भऽ सकै तखन ने। बेरपर -हम सभ पहिने एलौं मुदा खैरात पहिने नवटोलिया बलाकेँ बाँटल जा रहल छै। ओ मंत्रीजीक गाम छै तँए। हम सभ मंत्री जीकेँ भोट नै दै छिऐ की? -ऐ, बहुत बकर-बकर करै छी अहाँ, खैरात लेबाक अछि तँ रहू ठाढ़ लाइनमे। मंत्री जीक पिछुलका सभ रोब झाड़ैत बाजल आ एकटा बुढ़बाकेँ धकिया देलक। -मंत्री जी मुर्दाबाद... मुर्दाबाद। -खैरात नै तँ भोट नै। -अहाँ सभ मुँह की तकै छी। चला गऽ बन्नुक, बर्दी पहीरि कऽ प्रदर्शनी लगबए एलौंहेँ? -नै सर.. गोली चला देबै तँ लखीमपुर बला सभ नै छोड़त हमरा। -यौ, खालियो बन्नुक फांयरिंग कऽ देबै तँ पड़ा जाएत ई सभ। -आ भोटक बेर? -भोटक बेर नोट छै ने। बन्नुक बल पर छापि लेबै। ई भुच्चर सभ एहिना मूँह देखैत रहि जाएत। -यऔ मंत्री जी, बन्नुक तँ नामर्द लऽ कऽ चलैए, जकरा बुत्ता नै हइ छै लड़बाक। हम सभ तँ सभ तरहक बुत्ता रखै छी, बन्नुक किनबाक, रखबाक आ चलेबाक सेहो। कोनो नेताकेँ जितेबासँ लऽ कऽ हरेबा धरि सेहो। आ सभ लखिम पुर बला अपन बोरिया उठबैत बाजल -हम लखीमपुर बला चैलैंज दै छी, जँ अहाँकेँ बुत्ता हुअए तँ अगिला भोटमे हमरा गाम आबू भोट मँगबाक लेल। दियाद पनही केर चमकी आ ओकर उपरका बनाबटि पर हमर नजरि पड़िते हमर मोन लोभा गेल। पहीरि कऽ भजारलाक बाद नाप सेहो फिट भऽ गेल। मुदा जखन पहीरि चलए लगलौं तँ इहो पनही तरे-तर पएर काटब शुरू केलक। ठीक ओहिना जेना फरीक सभ तरघुस्कीमे लागल, सदिखन सतबैमे लागल रहलाह। हमरा सोझाँ छुच्छ दुलार आ पीठ पाछाँ हिनताइमे थाकथि नै। हम अपन अगौत-पछौत पड़ोसी सभसँ बच्चेसँ परेशान रही। मुदा अपन संस्कारवश हुनकर सबहक सभ काजकेँ अनठा अपन बाटपर बढ़ैत रहलौं। -हौ, चिरंजीव पएरक एहन दुर्दशा कोना भेलह? हम सभ तँ खराम पहिरै छी तँए पएर उदाम रहैए, मुदा तों तँ राजा-महराजा बला पनहीमे पएर घुसिऔने रहे छह ? -यौ कक्का, ओ पनही तँ राजे-महराजे लेल छै जकरा पएर नै उठबए पड़ैत छै। हमरा सन बोनिहारक लेल तँ ओ काले बनि गेल। बाहरसँ जतेक चिक्कन-चुनमुन भीतरसँ ओतबे खलओदार केने जाइए..... कक्का सूनि चलि गेल छलाह। गाँती परोपट्टामे सोरहा भऽ गेलै जे ऐ बेरक बी.डी.ओ. पिछड़े जाति एलैए। कतेको गामक लोकक आशा जागि गेल। सभ सतेलहा जाति सभ प्रसन्न भऽ गरीबी रेखासँ कटल नाम जुड़ि जेबाक, अधखड़ घर पूरा हेबाक सपनाकेँ यथार्थमे बदलबाले सोचए लागल। चपरासी जा कऽ बी.डी.ओ. साहेबकेँ कहलक -सर, बड़का मालिक आएल छथि कोनो काजक लेल। अहाँसँ भेंट करताह। -बड़का मालिक? -हँ सर, मने हरहर बाबू। -हरिहर बाबू ? अच्छा कहिऔन भीतर एताह। दरअसल पुरना बी.डी.ओ. नवका बी.डी.ओ. केँ कान फुकि गेल रहथिन्ह -ऐ ठाम जाति-पातिकेँ बिसरि जाएब। परोपट्टाक मालिक हरिहर बाबूकेँ धेने रहब। आ नवका बी.डी.ओ. दहला फेकैत बजलाह पुरना लग -तँए ने छह लाख दऽ कऽ बदली करबेलौं हए हम। -जी मालिक प्रणाम। -की रौ प्रमोदवा, तोहरो आँखि चढ़ि गेलौए जतियारी बी.डी.ओ. केँ देखलासँ। -नै मालिक, की कहै छी अहाँ? काज नै भेल की? प्रमोद एकै संग दूटा प्रश्न केलक। -हमर काज नै हएत? हमरा संग खचरै करत तँ तेहन ठाम पठा देबन्हि सरबेकेँ जे मुइलाक बादो मोन रखताह तोहर जाति भाइ। -हे रौ, रुक... कहाँ जाइ छेँ झुंडक-झुंड साहेबक चेम्बरमे? -आँइ रे प्रमोद, पहिने नै डेराइ छलेहँ। आब तँ अपन जाति-भाइ साहेब एलखुनहँ। की काज छलौ से कह ने सोंझा-सोंझी। -इंदिरा अवासक पाइ छै बाँकी। -जते गोटेक पाइ बाँकी छह, सभ गोटे छह सए रुपैया जमा करह। -आँए यौ, सुनै छिऐ जे साहेब छोटका लोकक उपकारी छथिन्ह, तखन ओ पाइ लेथिन्ह। -पाइ ओतए नै हमरा लग जमा कर, सभ फाइल पास भऽ जेतौ। आ हे एकटा बात बुझ.... साहेब तोरा सभसँ नै हमरासँ पाइ गिनबै छथि। बिढ़नी गुत्थम-गुत्था भेल जा रहल छलै लोक, रेलगाड़ीक आरक्षित डिब्बामे। भीतरसँ बाहर धरि सोहरल लोक। देखबासँ बुझना जाइत छलै गाड़ीक जेनरल डिब्बा सन। गाड़ी खुजि चुकल छल, मनुखपर मनुख खसै। की मनसा, की मौगी, की बच्चा, सभ पिस्तम-पिस्त। सुतए बला सीटपर सुतब तँ दूर, बैसबाको जगह नै रहै। उपरको सीट सभ समानसँ भरल। निच्चा तँ आरो बेसी समान। हम मोने-मोन खौंझाइत रही सरकार वा की रेलवे बलाक किरदानी पर। प्रतीक्षारत लोकक सूची एतेक नमहर बनेबाक कोन प्रयोजन। अपन आरक्षित सीट पर बैसल सहयात्रीकेँ पुछलिअन्हि -अहाँ सभ गोटेँ केँ वेटिंग टिकट अछि की? धखाइते मुदा नजरि मिला कऽ जबाब देलाह -वेटिंग टिकट कहाँ अछि केकरो। हम सभ जेनरल टिकटपर फाइन दऽ जा रहल छी। अपने डिब्बामे किछुए आगूसँ सुनबामे आएल- हम सभ बैसबे करब। हम सभ कतए जाएब। हमर सबहक कोनो सीट नै अछि की? एकटा आर स्वर –-भाइ, हम तीन मास पहिने सीट लेलौं अपन सुविधा लेल। आब एखन की हम ठाढ़े जाएब? हमर सीट खाली करै जाउ। -नै करब सीट खाली। अहूँ आब अहीमे गुंजाइस करू। -नै, हम गुंजाइश नै करब। -नै करब तँ जाउ, जे करबा अछि से करू। हम सभ एतऽ बैसले रहब। -टी.टी साहेब, जगहसँ बेसी लोक, कहू ई केहन नाइंसाफी छै। वेटिंग बला तँ चलू अंतिम स्थान धरि जाएत। मुदा फाइन टिकट बला कतौ केकरो समान उतारि कऽ जाएत। ओकरासँ हमरा सभकेँ के बचाएत? -सुनू, हम सुरक्षा बलकेँ फोन करै छिऐ, मुदा ओहो की कऽ सकत ऐ गजबज भीड़मे। पहुँचियो तँ नै पाएत। -तँ शिकाइत करी हम रेलवे विभागमे? -यौ, श्रीमान् ओकरा आमदनी पहिने चाही, लोकक सुरक्षा तँ हाथीक दाँत छै, खाली देखबैत रहत। अहाँ शिकाइत कराउ, जँ किछु हेबो करत तँ वएह, जे अधिकारी बेर-बेर अहाँकेँ बजा ओइ घटनाक बारेमे खाली पूछत। अगुआ अमेरिकी संस्था युनेस्कोक आवाहनपर गरीबी भगेबाक मादे एकटा साधारण बैसारक आयोजन कएल गेल छल जइमे संपूर्ण गामवासी उत्साहपूर्वक उपस्थित भेल। बैसारमे आएल लोकमे सँ अस्तित्वक अनुसार दू फाँट बनि गेल छल। दुब्बर गामक लोककेँ पाछू आ धोधिगर गामक लोककेँ आगूमे स्थान देल गेल छलै। रोनाल्डो एरिक्सन बैसारक उद्देश्यकेँ फरिछबैत बजलाह -भारत गरीब देश अछि, से सुनि-सुनि युनेस्को दुखी भऽ अहाँ सबहक मदति वास्ते आगू आएल अछि। अहाँ सबहक नीक भविष्यक वास्ते धनक एकमुश्त राशि अहाँक पंचायतक मुखियाकेँ देबाक निर्णय कएल गेल अछि। ऐ पाइसँ अहाँ सभ गामेमे रोजगार कऽ आर्थिक रूपेँ समृद्ध हइ जाउ। -नै किन्नहुँ नै, हमर सबहक विकासक लेल आएल पाइ सोझे हमरे सभकेँ देल जाए। नै तँ अहू बेर वएह हेतै जे होइत एलैए। आ रोनाल्डो अवाक् छलाह ई सुनि। आ सोचि रहल छलाह, वास्तवमे भारत गरीब नै अछि बल्कि एकरा नकली रूपें गरीब बना देल जाइ छै किछु लोक द्वारा। सभ खत्म भऽ गेल छल। साढ़े एकैसम सदी -हेलो..... हाय। -की हाल छै ? -फाइन। -ई कोनो एबाक समय छै। डेढ़ घंटा लेटसँ । -खिसिया किए गेलौं। रस्तामे सौरभ भेटि गेल। सटि गेल हमरासँ। कहू, हम भागि जइतौं? केहन एक्सपिरिएन्स गेन करैत ओ? मुदा अहूँ तँ समए पर नहिए आएल हएब। -हँ, रियाकेँ गोल्डेन पार्कमे तते ने मोन लगै छै जे घेंटा-जोड़ी कए लेने छल। छोड़िते नै छल। -जखन रियासँ एते घेंटा-जोड़ी अछि तखन हमर कोन काज? अहाँसँ नीक सौरभे जे हमर बाट जोहैए। -ओ नामरद अछि की जे अहीं टाक बाट जोहैए। -हम जाइ छी। -कत? -सौरभ लग। -कथी लेल। -इन्जॉय करबा लेल। हेलो जुगनू कतऽ छी? बुढ़बा गाइड लग। की करै छी। हर्षक संग छलौहें की? आब फ्री छी? आबि जाउ हमरा लग। कतए छी अहाँ? डीयर पार्कमे। आबै छी? -तँ करू प्रतीक्षा जुगनू केर हम चलै छी। -खिसिआइ छी किए? आब की केओ केकरो पर आश्रित छै। एक जँ केलक मना तँ दोसर तैयार छै। आब बिआह तँ केकरोसँ कतौ कऽ लैए। मुदा भोगैए केओ, कतौ केकरो दोसराकेँ। पहिने प्रथा छल घर बदलबाकेँ, मुदा आब तँ घरबला बदलबाक परंपरा छै। (विदेह अंक-७८मे प्रकाशित) दुन्नू जना एकै धना काल्हि तँ भरिपोख गरिएने रहथिन्ह यशोदा बाबूकेँ मुदा आइ तँ एकेठाम चाह......... शंकर बाबू लग जाइ छी, जिनका लगसँ केओ निराश भऽ कऽ नै अबैत अछि। -मालिक, रोका-टोकी तँ साधारण बात भऽ गेलैए। ई तँ सभ दिन रहैत आएल अछि। मुदा आइ... आइ तँ ई बनमानुख सभ हमर इज्जत..... -हँ यौ... एखने चौक पर चर्चा भऽ रहल छलै। छी.. छी, आब लोककेँ अपनो समाजमे इज्जत आ प्रतिष्ठा दाँव पर लागि गेलैक अछि। जे भेलै से उचित तँ नहिए। मुदा आगू फेर एहन नै दोहराओल जाए। तँए कुकर्मीकेँ छोड़ल नै जाए से हमर कहब। आइ ओ अहाँ संग केलक... काल्हि केकरो संग कऽ सकैत अछि। गंगा बाबूकेँ कहिऔन्ह ने, जे ओइ टोलमे जँ केओ मोकाबिला कऽ सकैए तँ मात्र गंगा बाबू। यशोदा बाबूक बेटाक विरुद्ध जँ केओ कल्ला अलगा सकै छथि तँ इएह गंगा बाबू। -उहूँ... दुन्नू जना एकै धना। -मतलब? -मतलब जे काल्हि गंगा बाबू जे यशोदा बाबूकेँ गरिअबै छलखिन्ह सएह दूनू गोटे आइ एकै चौकी पर बैसि चाह पिबै छलाह। ई किछु नै करथिन्ह मालिक। -यौ, ई हमर वशसँ बाहरक गप्प अछि। -बुझि गेलौं। गाम भरिमे यशोदा बाबू आ हुनकर कपूतकेँ छोड़ि सभ नामरद अछि। ठीक छै, निसाफ आब कोरटेमे मंगबै हम। -नै किन्नहुँ नै.. हमर बाबू जीक बीत-बीत खेत बिका गेलन्हि। घराड़ी धरि बिका गेलन्हि। निसाफक आसमे तरबा सेहो खिया गेलन्हि। निसाफ नै भेटलन्हि। भेटलन्हि तँ खाली तारीख। एते तारीख कियो नै उठा सकत। आ किछुए दिनक बाद यशोदा बाबूक धुधुआइत घरमे चिचिआइत हुनक बेटा मरि गेल। रासि आधा भरल घैलसँ छिलकैत पानि जकाँ हालतिमे पहुँचि गेल छल ओ। सबहक सोझाँ मोछपर ताव दैत कहए -केओ कतबो उधिआएत ऐ चुनाबक बेर, मुदा ऐ बेर तँ हमहीं....... जइ टोल जइ गाममे जाइ, सभ ठामक लोक कहए जे भोट ओकरे देब। किएक तँ कतेको बर्खसँ ओ सबहक निस्वार्थ भावे सेवा करैत आएल अछि। गामक अल्पसंख्यक बला भागमे बैसक भेल। ऐ बैसारमे लोककेँ उकसाबैत कहल गेल जे प्रभुदयाल तेना ने मोछ पर ताव दैए जइसँ लगै छै जे वएह टा मोछ बला छै, बाद-बाँकी निमोछिया। मुदा प्रभुदयाल केर सेवा लऽ छोटका-बड़का तेना ने दबल रहए जे केओ ओकरा विरुद्ध चुनाबमे नै ठाढ़ भेल। -इंजीनियर साहेब, आब मोछक सबाल छै। अहीं किछु कऽ सकै छिऐ। आन सभ गोटेँ पाछाँ हटि गेलाह। अहाँ विक्कीकेँ एक बेर कहि कऽ देखि लिऔ चुनाब लड़बाक लेल। -आँए यौ, गामक गोलैसीक कारणेँ हम ओकरा ऐ धधरामे किए पाकए दिऐ? कतेको पाइ खर्च कऽ ओकरा पायलट बनेलौं अछि हम। ओना जँ हम कहबै तँ तैयार भऽ जाएत, मुदा प्रभुलालकेँ छोड़ि अहाँ सभ ओकरा भोट देबै की? आ आब रंग-ताल शुरू भेल। प्रभुदयाल -हम चुनाब जीती कि हारी, अहाँ सबहक हम सेवा करैत रहब। बस खाली एतबा अनुरोध अछि जे चुनाब जिता हमरा पक्का सेवक बना दिअ। इंजीनीयर साहेब -हम सभ कहियो राजनीतिमे नै रुचि रखलौं। मुदा ऐ बेरुक चुनाब हमरा अनसहाज लागल जे बिनु पढ़ल आ कुकर्मी उम्मेदवार अहाँ सबहक बीच अछि। आब अंतिम फैसला अहीं सभ करब जे अहाँकेँ की चाही। -मालिक मुँह सम्हारू। प्रभुदयाल बड़का-छोटकाक सभ दिन सेवक रहल अछि। ओकरा लेल कोनो अनसोहाँत बात बरदास्त नै कएल जाएत। अहाँक विक्की जरूर पढ़ल अछि मुदा ओ कतेक लोकक उपकार केलक अछि? -यौ जनता लोकनि, प्रभुदयालकेँ सरकारी पाइ शोधबाक आदत लागि गेल छै। जखन जन-प्रतिनिधिक ठप्पा लगतै तखन अहाँ सबहक लेल आएल पाइक खजाना धरि खाली कऽ देत। दोसर जे गाछी बला कांड छलै तइमे तँ ओकर नाम एखन धरि छै ओकर। आ विक्की बाबू एक मतसँ भोट जीति गेलाह। प्रभुदयाल भोट देबाक आभारक संग अनुरोधे बाजल -जनता लोकनि, हमरा तँ प्रखंडसँ जिला धरिक बाट देखल अछि अपन गुजर-बसर लेल। मुदा अहाँ सभ ताधरि पिछड़ल रहब जाधरि सत्ताक रासि अपना हाथमे नै लेब। सभ हँ मे हँ मिलबैत अगिला चुनाबक बाट जोहए लागल। सड़क-छाप -सरदार भाइ, कने एम्हर देखहक। सुन्न भेल बाट पर एकटा एकसर जाइत छौड़ीकेँ देखि छौंड़ा सभ चौल करए लागल। छौड़ी पहिने सकुचाएल, डेराएल, एम्हर-ओम्हर तकलक। केओ कतौ नै देखेलै। हिम्मत बन्हलक आ ससरि कऽ गेल छौड़ाक समूह लग। -रौ, वस्तु बड्ड चिक्कन लगैए। कने नाम पुछि अबहीने। समूहक एक सदस्य अपन दार्शनिक टोनमे बाजल। -गै की नाम छौ ? -तान्या... -बापक नाम की छौ? -मयंक.... -हे रुक.. सरदार भाइ कने एम्हर आबह। -भाइ .... छौंडी बाजल, -ओ अहूँ सबहक भाइ छथि। -हँ हमर सबहक सरदार भाइ छथि ओ। -ओ तँ हमरो भाइ छथि। ऐ बेर छौंड़ा सभ अकचकाएल। ताबत सरादर आबि गेलै। -भइया... गोड़ लगै छी। हाथ जोड़ैत छौंडी बाजल। सरदार भाइ अकचकाइत बाजल.... हम नै चिन्हलौं अहाँकेँ। -यौ, अहाँ हमर बटोही भइया छी। -हमरा कनिको मोन नै पड़ैए .... खएर चल हमरा सबहक संग। -नै यौ बटोही भाइ। भाइक रूपमे चिन्हार तँ कऽ लेलौं हम। मुदा मनुखक रूपमे अनचिन्हार छी अहाँ। -मतलब? -मतलब जे मनुखक पेटेसँ निकलल सभ मनुख नै होइ छै, जकरामे मनुखताइ होइ छै सएह मनुख भेल। बाँद बाँकीकेँ दानव बुझू जेना अहाँ लगै छी। निवेश -कते दिन हमही काज एबौ। किछु अपनो तँ सोच। सुनिते बिजुली जकाँ लागल रहै ओकरा। मोन स्थिर करैत बाजल -बाबू जी किछु दिन आरो खर्च दिअ। हम विश्वाससँ कहै छी जे अहाँक पाइकेँ हम सार्थक करब। -आरो कते दिन हम ताकू तोहर आशा? सोलहमे बर्खसँ तों हमरा ठकि रहल छँए। आब तँ बीसम गीड़ि गेलें तों। हम तँ अठारहम बर्खेमे जमा लेने रही मालिकाना। -बाबू जी अहाँक जमाना दोसर छल। तहिया बेरोजगारीक ई विकट समस्या नै रहै। -हँ, से तँ चिन्ता होइए जे तोरापर खर्च कएल धनक वापसी हेबो करत की नै। जँ भइयो गेल हमरा मरलाक बाद, तँ ओइसँ लाभ की? हम तँ अल्पकालिक निवेश आ आपसीमे विश्वास रखैत छी। बेटा बकर-बकर मुँह देखि रहल छल। नपना एकटा मार्केट रिसर्च कंपनीक दिससँ एकटा लोककेँ प्रश्न पूछल गेलै -घरक मुख्य कमेनिहार की करै छथि? -मुख्य कमेनिहारक माने की? प्रश्न केनिहार फरिछबैत कहलकै -मने घरमे बेसी के कमाइत छथि? -अच्छा... हम दुनू गोटे बैंकमे छी आ दुनूक दरमाहा बरोबर अछि। पत्नी बजलीह। पति बीचमे बजलाह -घरक मुख्य कमेनिहार तँ पुरुषेकेँ मानल जाइत छै। चाहे पत्नी कमाइत होथि वा नै। पत्नी तमतमाइत बजलीह -हम एखनो कमाइत छी। आ भविष्यक कमाए बालाकेँ सेहो आश्रय दैत छिऐ। -से कोना? -हम नौकरीक अलावे घरक सभ काज करै छी जे पुरुषक वशक बात नै छै। तखन अहीं कहू जे मुख्य कमेनिहारमे हमही आएब ने। पति उतारा लेल मार्केट रिसर्च कंपनीक आदमी दिस देखए लागल। मुदा ओइ कंपनीक आदमीक मुँह लटकि गेल छलै..... कारण ओकरो पत्नी दिन भरि काज करै छलै आ घरक काज सेहो करै छलै। उत्थर -मर बँहि, आब कथी कमी छै कोनो बड़कासँ। हमरो अओरिक धिया-पूता स्कूल-कलेज पास करऽ लागल अछि। बेटा मैट्रिक पास कऽ कओलेजमे गेल, भातिज सेहो स्कूल जाइत अछि। पाइमे देखाउ तँ कोनो बड़कासँ कम छी की। हँ ओ सभ सरकारी नोकरी करै छै, हाकिम-हुकुम छै, से दीगर बात। मुदा हमहूँ सभ दिन-राति खटि पाइ जोगा लेलौंहँए। हँ एक बात जनै छिऐ, ओ सभ कतबो कमाइ छै तँ पूरा नै होइ छै। काल्हि जोगिन्दर मालिक अपने हमरा दूरा पर आबि पचास हजार रुपैया सूदि पर लऽ गेलाह। कहलखिन्ह जे बेटीकेँ इंजीनीयरिंगमे नाम लिखेबाक अछि। भाइ आब अहीं कहू जे बड़का हम सभ भेलौं की हुनकर सभहँ लग बड़का धएले छन्हि। -हौ सुनह.... हुनकर सबहक सभ बाट बनल छन्हि। आ ओ सभ अपन अगिला पीढ़ीकेँ बढ़ेबाक ब्योंतमे तोरा सभकेँ ब्याज दै छथुन्ह। आ तों सभ पाइ हेबाक अन्हरमारिमे ब्याज कमा अपनाकेँ पैघ बुझै छह। कहियो एतेक सोचलहक जे हमर अगिला पीढ़ी कतऽ जा रहल अछि? कोन ठाम पहुँचि अटकत? की हेतै ओकर भविष्य? बड़काकेँ बेटा पढ़तै तँ हाकिम हेतै, तोहर पाइ-पाइ चुका देतह। आ तोहर धिया पुता कोनो तरहें नौकरी पाबियो जेतह तँ ओकर पिछलगुए बनल रहतह। जा धरि ई फाँट नै भरि सकबह ताधरि एहिना उधिआइत रहबह अकासमे। देश-भक्ति सीमाक एकसर, स्वतंत्र आ मस्ती बला जिनगी ओकरा आलोचनाक पात्र बना देने छल। मुदा ऐ सबहक परवाहि केने बिना ओ अपन जिनगी जी रहल छल। बिआहक पछाति एक बेर फेरसँ ओ समाजिक आलोचनाक पात्र बनि गेल छल आ एकरा कारण छलै जे ओकर घरकेँ खुजैत केओ नै देखने छल। आइ पतिक जेबाक चारिम मास बीति रहल छलै आ ओ एकटा सुन्दर बेटाकेँ जनम देलक। मुदा एकर बापकेँ सूचना कोना भेटतै से सोचि ओ व्याकुल भऽ गेल। फेर मोन एलै जे चिट्ठी लीखि दै छिऐ, मुदा डाकघर के जाएत? हालति तँ ओकर छलै नै जाए बला। से सोचिते छल कि बाहरसँ कोनो आदमीक अवाज एलै... चिट्ठी अछि। ओहनो हालतिमे ओ गेट पर आएल। चिट्ठी खोलि पढ़लक-------हमरा खेद अछि जे अहाँक पति शहीद भऽ गेलाह..... आगू नै पढ़ सकल ओ। मुदा पत्रकार सभकेँ उत्तर ओ एना देलक... ओ मरलथिहँए नै, बल्कि अपन दोसर रूपमे आएल छथि। आ सीमा अपन बेटाक लेल सैनिक स्कूलक नाम ताकए लागल। भूख सतबरतीक मोहर अपना उपर लगेबाक लेल नै जानि कतेको सासु आ माएकेँ आरोपित केलक। एतेक धरि जे कनियाँ-बहुरियाकेँ सेहो नै छोड़लक। ओकरा पर शंका तँ भरि गौंआ करै मुदा ओइ मौगीक छुटल मुँहक सोझाँ सभ अपन-अपन मुँह बन्द राखए। असलमे ओकर घरबला सेनाक नौकरीमे छल। छुट्टीक कमी। तइ पर ओ मौगी गजबकेँ सुन्दर रहै। तँए ओ गामे नै अनगौंआक नजरिमे आबि गेल रहै। एक दिन गाम भरिक मौगी सभ ओकरा बैसार कऽ कऽ खूब ज्ञान देलक। ओ मौगी खूब आक्रोशित स्वरें बाजल -ऐ गामक कोन घरक बेटी-पुतोहु हाट-बजार आ मेला जा कऽ नै घुमि अबैए। मुदा हम तँ कहियो अपन घरसँ बहरा कऽ दूरो पर नै जाइ छी। आब केओ पाहुन-परक एतै तँ हम ओकरा कोना कऽ भगा देबै। -यै कनियाँ, नै बरदास भेल तँए मुँह खोलै छी। पाहुन-परककेँ नै भगा देबै मुदा ओकरा संग करै बला रंग-रभसकेँ तँ रोकि सकै छी ने। देखिऔ, सबहक बेटी-पुतोहु अपन सासु-माए केर संग जा कतौ घुमैए आ फेर चलि अबैए। केकरो किछु भेलैए आइ धरि। अहाँ तँ घरेमे रहि पेट कऽ लेलौं अछि। घरबला जे अगिला मासमे आएत तकरे लेल ई रखने छिऐ ई अनजनुआ चिलका। -बुझा ने देथुन्ह ईएह सभ। हम तँ फोन पर फोन कए हारि गेलौं। नौकरी तँ बुढ़ारी धरि हेतै मुदा जबानी की धराउ राखल छै। ओ तँ आबि घुरि जेतै, फेर दियाबातीमे एबाक बचन दऽ कऽ। ऐ बीचमे हमरा जखन मोन हएत संग रहबाक, तकर कोन बाट हेतै। अहिना कुहरि कऽ मरबै की? आकि एकरा शांतिक लेल दोसर बाट तकबै हम। भूख लगला पर भोजन चाही खाली बचन नै। आ सभा खत्म भऽ गेल छल। डेग हम अपन जिनगीक पहिल डेग मायक हाथे उठौने रही आ दोसर डेग बाबा अंगुरी धरा दियेने छला। तकर पछाति नै जानि पएरक डेगकेँ आगॉंं बढ़ेबामे कतेक गोटेक हाथ लागल हएत। आ बाबूजी, हुनके प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष छाया हमर साँसकेँ उघैत रहल। -बौआ कतऽ छलौं एतेक राति धरि? -सिनेमा हॉल मे। -आ ई के अछि? -हमर सहपाठिनी, नम्रता। -अहॉंं के कनेकों चिन्ता अछि अपन जिनगीक, कनियो सोचै छी अपन भविष्यक? -बाबूजी, बहु बड़बड़ेलौं, बन्न करू मुँह! अहाँसँ बेशी चिन्ता अछि हमरा अपन भविष्यक। अहॉंकेँ तीन दिनसँ कहि रहल छी, लाउ दिअ हमरा तैयारी वास्ते दस हजार रूपैया। -नै पार लागत आब हमरासँ ई सभ। चोरी करू हम? जतेक पार लागल पढ़ा लिखा कऽ पुर्ण केलौं। -अहाँकेँ उघैए पड़त हमर भार, जम्मदाता जे छी। बाबूजीकेँ कहियो शिकाइत करबाक अवसर नै भेटलनि हमर व्यवहार आ नैतिक विचारक प्रति। देह, मोन आ प्रेम सबीना आ मोहसिनक जोड़ी सौंसे जोलह टोलीमे प्रसिद्ध छल। किएक तँ मोहसिन सभ साँझ पोलिथिन पीबि कए आबए आ सबिनाकेँ खूब मारै गरियाबै। मुदा सबिना चुपचाप पाथर बनि जाए। लोककेँ आशचर्य लागै। जखन की ओकर टोलक आर मर्द-जनानी मीलि हपनामे खूब उठा-पटक, भागादौड़ी करए, हरबिर्रो मचि जाए टोल भरिमे। कहियो काल सबिना सेहो मोहसिनसँ मुँह लगा लिए आ मोहसिन भरि इच्छा कूटि दै ओकरा। बाजा-भुक्की बन्न भए जाइ दूनूमे। तखन सबिनाक बाप अबै। सबिनाक बाप बड़का मौलबी छल। सबिनाकेँ सिखाबए पढ़ाबए जे अपन अल्ला मियाँ नराज भए जाइ छथिन्ह जँ केओ मौगी अपन पतिपर हाथ छोड़ैए तँ। अब्बाक कहल बात सुनि अपन नोरकेँ नूआक खूँटमे सुखा लिए। सम्मान करए अल्ला आ कुरानकेँ। मोहसिनकेँ मुइना आइ तेसर दिन भए गेल रहै। ओ सभ दिन भोर-साँझ ओकर कब्र लग जा भेसै छल। कब्रक उपर बेना डोलबैत छल। देखहो बला लोककेँ आशचर्य लगै।एकरासँ बेसी प्रेम तँ कोनो मौगी अपन पतिकेँ नै केने हेतै। मुदा..........मुदा सत्य छल जे ओकरा मोहसिनसँ प्रेम नै रहै। ओकरा मगजमे खाली कुरान शरीफक ओ बात घुसल रहै जाहिमे कहल गेल रहै जे" साँच मुसलमान वएह अछि जे कुरानक तहरीरकेँ मानैए" आ सबिना कहियो सुनने रहए जे " जाबत धरि पतिक साराक माटि नै सुखाइत छै तावत दोसर बिआह वा परपुरुख संपर्क कुरानक नजरिये अवैध मानल जाइत अछि" आ....आब आस्ते, आस्ते मोहसिनक कब्र केर गिल्ल सारा सुखा सक्कत भेल जा रहल छलै। पद्य खण्ड गजेन्द्र ठाकुर बड़द करैए दाउन ने यौ हाथी अगत्त, पिछू, थाइत, माइल बिरि हिर्र-हिर्र सुग्गर चलू संग घर घुरि ती-ती परबा उड़ि गेल ऊपर लिह लिह बकरी घास तूँ खो बड़द करैए दाउन ने यौ अतू कुकुड़ कुत-कुत डॉगी कैटी पिसू-पिसू आएत की? चेहै-चेहै सुनि पारा दौगल, भागी छोड़ि बाट हम ताकी अर्र बकरी घास तूँ खो बड़द करैए दाउन ने यौ ढेहै-ढेहै कऽ नहि खौंझाबू साँढ़ आओत खरिहानमे यौ आव ठामे रे हे, हौरे हौ बड़द करैए दाउन ने यौ बाल गजल कनियाँ पुतरा छोड़ू आनू बार्बी जँ रंग गुलाबी छै तँ जानू बार्बी बोने-बोने फिरैए जे दैता सभ वनसप्तो लऽ घूरलि मानू बार्बी सात रंग लऽ भोर भेले गाममे परी रहैए गाम अकानू बार्बी कननी दूर हेतै बच्चा सभमे भरल आँखि बिसरी ठानू बार्बी पानि अकास धरती जा-जा घूमी पंख लगा टिकुली अकानू बार्बी धम्म गुड़िया संग खेलू कूदू राति सपनाउ निन्न आनू बार्बी सुता दियौ ऐ गुड़ियाकेँ आ सुतू चढ़ि ऐरावत दिन गानू बार्बी बेसी छुट्टी कम इसकूल बेसी छुट्टी कम इसकूल खेली-धूपी आरि-धूरपर रौद-बसाते घूमी खूब मम्मी-पापा बाबी-बाबा ताकि--थाकि कऽ आबथि घूरि बाड़ी-झाड़ी कल्लम गाछी मेला ठेला गामे-गाम भरि दिन भागा-भागी पाछू बौका बुधनी संग रसूल बेशी छुट्टी कम इसकूल। कनियाँ-पुतरा बना सजाबी खर-पात सँ घर बनाबी बेंतक छड़ी बनाबी घोड़ा चढ़ी ताइपर आ दौगाबी झुट्ठे लोक कहैछ उकाठी देखए धीया-पुता कऽ भूल बेसी छुट्टी कम इसकूल। इसकूलोमे गलती केने मास्टर साहेब बड्ड डेराबथि बेंट पकड़ने छड़ी घुमाबथि टेबुलपर ओ पटकि बजाबथि सुतलोमे सपनाइत छी हम कहीं हुअए नै कोनो भूल बेसी छुट्टी कम इसकूल। कनियाँ-पुतरा चलू घुमाबी बेंतक छड़ी हम किए बनाबी? घर बनाबी बत्ती-कड़चीसँ करची कलमसँ लिखी खूब चित्र लिखि टांगी स्कूलमे, आ सपना देखी खुब्बे-खूब बेसी छुट्टी कम इसकूल। बोने-बोन बिसरी रस्ता तँ वनसप्तो घर घुराबै छथि इसकूलमे गलती केने मुदा जे मास्टर साहेब मारै छथि बेंट पकड़ने छड़ी घुमाबथि मास्टर साहेब बड्ड डराबथि मोन बेकल अछि भय भागल नै छड़ी-बेंत सपनाइत छी हम छड़ी-बेंत सभ फेकथि दूर आ साँझ घूरि घर सूती हम खूब बेशी छुट्टी कम इसकूल। शामिल बाजाक दुन्दभी वादक देखैत दुन्दभीक तान बिच्चहि शामिल बाजाक सुनैत शून्यक दृश्य प्रकृतिक कैनवासक हहाइत समुद्रक चित्र अन्हार खोहक चित्रकलाक पात्रक शब्द क्यो देखत नहि हमर चित्र एहि अन्हारमे तँ सुनबो तँ करत पात्रक आकांक्षाक स्वर सागरक हिलकोरमे जाइत नाहक खेबाह हिलकोर सुनबाक नहि अवकाश देखैत अछि स्वरक आरोह अवरोह हहाइत लहरिक नहि ओर-छोर आकाशक असीमताक मुदा नहि कोनो अन्त सागर तँ एक दोसरासँ मिलि करैत अछि असीमताक मात्र छद्म घुमैत गोल पृथ्वीपर चक्रपर घुमैत अनन्तक छद्म मुदा मनुक्ख ताकि अछि लेने एहि अनन्तक परिधि परिधिकेँ नापि अछि लेने मनुक्ख ई आकाश छद्मक तँ नहि अछि विस्तार एहि अनन्तक सेहो तँ ने अछि कोनो अन्त? तावत एकर असीमतापर तँ करहि पड़त विश्वास! स्वरकेँ देखबाक चित्रकेँ सुनबाक सागरकेँ नाँघबाक समय-काल-देशक गणनाक सोहमे छोड़ि देल देखब अन्हार खोहक चित्र सोहमे छोड़ल सुनब हहाइत सागरक ध्वनि देखैत छी स्वर सुनैत छी चित्र केहन ई साधक बनि गेल छी शामिल बाजाक दुन्दभी वादक *राजस्थानमे गाजा-बाजावलाक संग किछु तँ एहेन रहैत छथि जे लए-तालमे बजबैत छथि मुदा बेशी एहन रहैत छथि जे बाजा मुँह लग आनि मात्र बजेबाक अभिनय करैत छथि । हुनका ई निर्देश रहैत छन्हि जे गलतीयोसँ बाजामे फूक नहि मारथि, यैह छथि शामिल बाजा । मोनक रंगक अदृश्य देबाल ढहैत भावनाक देबाल खाम्ह अदृढ़ताक ठाढ़ आकांक्षाक बखारी अछि भरल प्रतीक बनि ठाढ़ घरमे राखल हिमाल-लकड़ीक मन्दिर आकि ओसारापर राखल तुलसीक गाछ प्रतीक सहृदयताक मात्र मोन पाड़ैत अछि इनार-पोखरिक महार स्विमिंगपूलक नील देबाल बनबैत पानिकेँ नील रंगक मोनक रंगक अदृश्य देबाल ढहैत खाम्ह अदृढ़ताक ठाढ़ बहैत मन्दाकिनी जे आकाश मध्य देखल आइ पृथ्वीक ऊपर बद्री विशाल केदारनाथ अलकनन्दा मन्दाकिनीक मेल हरहड़ाइत धार दुनू मिलैत मेघसँ छाड़ल ई ककर निवास ! बदरी गेलाह जे नहि घुरलन्हि ओदरी हुनक ताहि आइ बाटे-बाट आएल शीतल पवनक झोंक खसि रहल भूमि स्खलन भेल जन्तु सबहिक हिम छाड़ल ई ककर वास ! हृदय स्तंभित देखि धार पर्वत श्रेणीक नहि अन्त एतए कटि एकर तीव्र नीचाँ अछि धार दुहू कात छाड़ल पर्वतसँ ई अलकनन्दे ई सौन्दर्य अहींक मन्दाकिनी जे आकाश मध्य देखल आइ पृथ्वीक ऊपर हरहड़ाइत ई केहन फेनिल स्वच्छ निर्मल मनुक्ख निवसित नव दृष्टि देलक देखबाक आइ शीतल पवनक छाड़ल ई सृष्टि पक्काक जाठि तबैत पोखरिक महार दुपहरियाक भीत पस्त गाछ-बृच्छ-केचली सुषुम पानि शिक्त जाठि लकड़ीक तँ सभ दैछ पक्काक जाठि ई पहिल कजरी जे लागल से पुरातनताक प्रतीक दोसर टोलक पोखरि नहि अछि डबरा वैह बिन जाठिक ओकर यज्ञोपवीत नहि भेल कारण सएह सुनैत छिऐक मालिक ओकर अद्विज छल पोखरिक यज्ञोपवीतसँ पूर्वहि प्रयाण कएल पाइ-भेने सख भेलन्हि पोखरि खुनाबी डबरा चभच्चा खुनेने कतए यश पाबी ! देखू अपन टोलक पक्काक जाठि ई कंक्रीट तँ सुनैत छी पानियेमे रहने होइछ कठोर लकड़ीक जाठि नहि जकर जीवन होइछ थोड़ निन्नक जीवन विचित्र डैनियाही दुपहरियाक घामक बीच सपनाइत सहस्रबाढ़निक दानवाकार आकृति प्रेयसीपर झपटैत ओकर कंठ मचोड़ैत प्रेमी पकड़ैत अछि सहस्रबाढ़निक झोंट पोखरिमे अछि खसबैत प्रेमीकेँ पएर बान्हि लेलक झोंटासँ डैनियाही दुपहरियामे पोखरिक झोंटाबला पनिडुब्बी तांत्रिक-सहस्रबाढ़निक झोँझसँ निकलि अपन प्राणान्त करैत प्रेयसीकेँ बचबैत प्रेमीक निन्न अछि खुजैत रौदसँ घमैत घामसँ नहाएल घोर निद्राक तृप्ति रहैछ मुदा हेराएल देखैत देशवासीकेँ पछाड़ैत मंत्र-तंत्रयुक्त दुपहरियामे जागल गुनधुनी बला स्वप्न बनैत अछि सभसँ तीव्र धावक अखरहाक सभसँ फुर्तिगर पहलमान दमसाइत मालिकक स्वर तोड़ैत छैक ओकर एकान्त कारिख चित्रित रातिक निन्न टुटैत-अबैत-टुटैत निन्न आ स्वप्नक तारतम्य बनि राजनेता करैत देशक समस्याक अन्त बड्ड थोपड़ी अछि बजैत न्यायक डंका गुंजैत धर्म-जाति-आतंकवाद समस्या-समझौता करैत प्राणघातक प्रहारकेँ छातीपर सहैत- जितइत निन्न अछि टुटैत मुदा तकर अछैत घोर-निद्रा तृप्तिक अनुभूति अछि छुटैत निन्नकेँ आस्ते-आस्ते देलक माहुर् मिलि कए सभ मित्र कएलक निन्नक जीवन विचित्र गंगा ब्रिज मोन पड़ैत अछि मजूर सभक मृत्यु चक्करि खाइत खसैत नीचाँ पानिमे पचास टा मृत्युमे सँ दस टाक भेल रिपोर्ट चालीस गोटेक कमपेनसेसन गेल खाय नेता ठीकेदार आ अफसर एहि खुनीमा ब्रिजक हम इंजीनियर कहैत छी हमरा ईमानदार घूस कोना लेल होएत देखैत गुनैत ई सभ यौ सरकार स्थितप्रज्ञतामे लिबैत सत्यक प्रति पिताक छल आश असत्यक सर्वदा त्याग सभ होअए समृद्ध उत्तम विचारक बीच देशक लेल जे जाए प्राण अन्तिम इच्छा होअए सएह करैत पालन देखल जे नहि बुझैत अछि लोक नहि बुझैत अछि सत्यक मोल आ समृद्धिक अर्थ स्वतंत्रता आ देश नहि कोनो मोल छैक लेने स्वार्थक आगाँ तँ की बदली ? अपन शिक्षाक अर्थ ! त्यागि रस्ता मुदा वैह लक्ष्य आ रस्ता जिदियाहवला ! मुदा बजने की ? मात्र करैत रहू सोझाँवलाकेँ बुझए दियौक जे अछि बुझैत बुझए दियौक आ करए दियौक खलनायककेँ महिमामण्डित महिमामण्डित आ शक्तिशाली बुझए दियौक दुराचारीकेँ जावत बुझत भऽ जएतैक हारि ! पिताक सत्यकेँ लिबैत देखने रही स्थितप्रज्ञतामे तहिये बुझने रही जे त्याग नहि कएल होएत रस्ता ई अछि जे जिदियाहवला हर आ बड़द मोन गेल भोथियायल जोति बड़द सोचिमे पड़लहुँ एतय-ओतय केर बात हर जोतने भेल साँझ हरायल बड़द ताकी चारू कात कहबय ककरा ई गप्प सुनि हँसत हमरा पर आइ मोने अछि भोथियायल अप्पन सप्पत कहय छी भाय बिसरलहुँ फेर कर्णक मृत्युक छोट- छीन रूप खूब ठेकनेने जाइत जे नहि बिसरब आइ मुदा गप्प पर गप्प चलल कृत्रिमता गेल ढ़हाइत फेर काजक बेर मोन नहि पड़ल पड़ैत-पड़ैत मोन कर्णक मृत्युक छोट- छीन रूप आ तकरा बाद मसोसि कय रहि जाइत छी गुम्म बड़का सड़क छह लेन बला माए ! माए धानक खेत लग जे बड़का सड़क बनल अछि छह लेनक तीन टा आबएबला आ तीनटा जाइबला ओतए आइ कतेक नीक लाल रंगक कार सीसा खुजल नहि रहए जकर रहए बन्न देखलहुँ आइ जखन बेचैत रही हम चिड़ै एकटा बच्चा जिदिया गेल खोलबेलक कारक शीसा आ कीनि लेलक हमर सभटा चिड़ै पानि रहए ओहि बच्चाक मूहपर सीसा खुजिते बहार भेल ठंढ़ा हबा कार ए.सी. बलासँ कार जे रहए लाल रंगक माए ! माए ई जे धानक खेत लग जे बड़का सड़क बनल अछि छह लेनक रंग-बिरंगक गाड़ी सभक लेल तीनटा आबएबला आ तीनटा जाइबला ओतहि माए ! ई तँ अपने गामक सड़क भेल ने मुदा अपन गामक तँ सभ गोटे गेलाह जाइ गेलाह कमएबाक लेल दिल्ली आ पैंजाब गाममे माटिक घर फूस आ खपड़ाक चार मुदा धानक खेत लग जे बड़का सड़क बनल अछि पक्काक चिक्कन आ घरोसँ बेशी सुन्नर ई सड़क ओतहि देखलहुँ ई आइ माए ! सुनै छिऐ बनल अछि कोनो वर्ल्ड बैंकक फंडसँ पकिया चिक्कन-चुनमुन ई सड़क छह टा लेनबला सीसा सन अछि ई चमकैत ! माए ! जे परुकाँ साल काकाक घर जे काकाक बनल रहए पक्काक गिलेबा बला जे कनिये दिनमे खसि गेल रहए ओहो कोनो सरकारी फन्डसँ बनल रहए ! कहाँ छल चमकैत ओ शीसा सन ओहिमे रहितो लोक छल डराइत भने खसि पड़ल मुदा होएत ओ कोनो नकली फन्डसँ बनल आइ तँ ओहि कारक शान देखलहुँ वर्ल्ड बैंकक फन्डसँ बनल अप्पन गामक एहि छह लेनबला सड़कपर ! माए ! ई वर्ल्ड बैंक बला फन्ड कोनो नीक फन्ड अछि ! एहि निकहा फन्डसँ घर नहि बनैत छैक की ? खेनाइ भोजन आ रोजगार जे दैतैक ई निकहा फन्ड तँ तँ किएक लोक पड़ाइत दिल्ली आ पैंजाब किएक सुनितए राज ठाकरेक गारि किएक जाइत गए खुनाहनि होइ लेल असाम सुनै छिऐक पढ़ै जाइ छै बिहारी कहि गारि माए ! एहि वर्ल्ड बैंक बला निकहा फन्डसँ जे बनि जइतैक अपन गामक घर आँगन तँ ओ थोड़बेक रहितैक गिलेबा बला पक्काक कोठा सन ! ओ तँ रहितैक ओहने सुन्नर सीसा सन चिक्कन आ ठोस छह लेनक धानक खेतक कात बला एहि सड़क सन आ जे रोजगारो ओहि फन्ड सँ भेटितैक तँ लोको सभ रहितैक घरमे गामक घर सभ एखन जेकाँ भकोभन्न थोड़बे रहितैक चुहचुही रहितैक अपनो गाममे आ तखन जे देखबा जोग रहितैक शान अपन गामक ! आ देखबा जोग रहितैक शान एहि छह लेन बला सड़कक सेहो ! हमरो सभक अंगपर रहितए जे वस्त्र ओहने वस्त्र जेहन ओहि लाल कारमे बैसल बच्चाक रहए ! माए! हमरा तँ लगैत रहैए जे अपन गामक ई सड़क ओहि लाल परदेशीक ओहि लाल कारसँ बेशी अछि लग दुनू टा लगैए बिदेशी सन लागल आइ जे जे ओहि लाल कारक हबा सेहो अपन हबा नहि लागल जेना ओ हबा आ ओ कार हमरासँ छुता गेल होअए छुता गेल होअए हमर स्पर्शसँ अपन गाम अछि मयूर आ ओ छह लेन बला सड़क अछि एकर पाँखि आ हम सभ छी पएर ओहि मयूरक ई सड़क अप्पन गामक रहितो लागैए फॉरेनर माए ! सभ दिन बकड़ी चरबैत देखैत रहैत छी हम शान अप्पन गामक ओहि सड़कक जे अछि छह लेन बला ! मिथिलाक ध्वज गीत मिथिलाक ध्वज फहरायत जगतमे माँ रूषलि भूषलि दूषलि देखल हम अकुलाइत छी भँसियाइत अछि मन छी विद्याक उद्योगक कर्मभूमि सँ पछाड़ि आयत सन्तति अहाँक पुनि बुद्धि चातुर्यक आ शौर्यक करसँ विजयक प्रति करू अहँ शंका जुनि मैथिली छथि अल्पप्राण भेल ज्योँ सन्ध्यक्षर बाजि करब हम न्योरा वर्ण स्फोटक बनत स्पर्शसँ हमर ध्वज खसत नहि हे मातु मिथिला ट्रेनक गाड़ी छुक छुक छुक भरल सवारी ट्रेनक गाड़ी पोखरि गाछी दौगल जाइ छी ट्रेन गाड़ी ठाढ़ सवारी पोखरि गाछी दौगल जाइ छी!! ट्रेन गाड़ी धारक कातमे आएल स्टेशन छुटल बातमे ट्रेन चलल दौगल भरि राति सुतल गाछ बृच्छ भेल परात राजा श्री अनुरन्वज सिंह एक सुरमे बाजि देखाऊ नहि अरुनन्वन नहि सिंह पूरा एकहि बेर सुनाऊ राजा श्री अनुरन्वज सिंह दीयाबाती अन्हरिया भगेलक इजोरिया बजेलक दीयाबाती हम्मर तरेगण बजेलक अकाससँ उतारि रखलहुँ अप्पन द्वारि क्रिकेट-फील्डिंग हम बाबा करू की पहिने बॉलिंग आ कि बैटिंग बॉलिंग कय हम जायब थाकि बैटिंग करि खायब की मारि ? पहिले दिन तूँ भाँसि गेलह से सुनह बात ई बौआ बैटिंग बॉलिंग छोड़ि-छाड़ि पहिने करह गऽ फील्डिंग हथौआ त्वञ्चाहञ्च ई भारत ग्रंथ जयक जाहिमे गान तखन कहियासँ भेलाह एतुक्का लोक, कर्महीन, संकीर्ण, कोना हारैत गेलाह सैन्यबलसँ आ दर्शनहुसँ, के घोसियाबैत गेल असमानताक पाठ एकर बिच। के केलन्हि शुरू ई त्वञ्चाहञ्च। गांधर्व, एकलव्यक वीरतासँ भरल, घृणा-प्रेम, सत्य-असत्यक धरातल, आह पाराशर पुत्र भगवान व्यास, नमन-नमन शत नमन। प्रसन्नवदनकेँ लिखबाक कहि बात, वाणी नहि रुकत अहाँक गणेशक शर्त, कविक कल्पनाक ई उत्कर्ष, मुदा बनाओल किएक अहाँ होअए जेना धर्मग्रंथ। व्यास लेखक होइतहुँ छथि एहिमे एकटा पात्र, केहन नव रस, नव छल वाद ! गणेशक गति अति तीव्र, देखि व्यास कएल श्लोक जटिल। श्लोकक भाष्य बूझि शीघ्र, विघ्नकर्ता लिखताह ई। श्लोकक जटिलताक लेल ई तर्क ! पुत्र शुकदेव नारदमुनि देवगण गंधर्व राक्षस यक्ष व्यास शिष्य वैशंपायन आ परीक्षित पुत्र जनमेजयक निस्तार। पौराणिक सूतजी रहथि, तत मध्य। करि ऋषिसभा नैमिषारण्यमे, महर्षि शौनक अध्यक्ष। सूतजी कएल शुरु,संहिता सतसहस्त्र। आइ ई मन कहए अछि, ई सत्य देखी, कविक कल्पना मध्य छल की सीखि परखी। अर्थ केर अनर्थ क्षेपक सभ केलक जे, हर्ष आ श्रमसँ कनेक देखाबी देखी । हस्तिनापुर सम्राट शांतुनु, गंग तट भ्रमण करि रहल। युवती बनि देवि गंगा, तट जकर छलि ठाढ़ निश्चल ! तेँ पड़ल होअए नाम हुनकर, धार गंगाजीक नामपर भए अभिभूत कहल हे सुन्दरि, करु प्रेम स्वीकार हमर। पत्नी बनि करु राज, राज्य-धन-प्राण पर। अछि समर्पण सभ अहाँ पर, किंतु अछि किछु बंधन हमर। क्यो पूछय नहि परिचय हमर, नहि करय रोक-टोक हमर कार्य पर। प्रेम-विह्वल शांतुनु, करि स्वीकार बंधन सकल। आनल महल मानव-गंगाकेँ, समय बितल बितिते रहल। भेल बात विचित्र ई जे, सात पुत्र शांतुनुकेँ भेल। युवती फेकल सभकेँ गंगधारमे, राजाने किछु पुछि सकल। कविक छल ई कल्पना ई युवती के अछि, बुझि परैछ क्षण कोमल, क्षण क्रूर-क्रूरतम जे, अबोध बालक केर प्राणक हेतु विकल ! पूछल राजा शांतनु, आठम बेर अपनाकेँ नहि रोकि सकल। देलक युवती परिचय सकल, हम गंग आ ई आठ वसु छल। देलन्हि महर्षि वशिष्ठ शाप तनिका, मर्त्यलोकक जन्म लेबाक। आठम पुत्रकेँ राखब हम किछु दिन, देवव्रत देब स्वरूप सेवक। महर्षि वशिष्ठक नन्दिनीकेँ, देखि पत्नी वसु प्रभासक, मर्त्यलोकक सखी हेतु, प्रयास नन्दिनीक हरणक । ऋषि ताकल गौ-देविकेँ, ज्ञान-चक्षुसँ। देलक शाप वसुगणकेँ भय-क्रोधित, कएल प्रार्थना वसु सभ शापित। हमर शाप नहि घूरि सकत परञ्च, सात वसु भय जायत मुक्त तुरत। प्रभासकेँ रहय परत ततय, किछु दिन धरि मर्त्यलोकक शरण होयत यशस्वी ई बहुत, घुरि आयल वसुगण गंग लग। हे देवि बनू माता हमरा सभक, दिअ’ मुक्ति तखन आस अहींक। कवि-कल्प्नाक डोरी देखल, मानव-गंग केर औचित्य लेल! शांतुनु भए गेल विरक्त, छूटि गेल गंगक सानिध्य। समय बीतल तँ गेल ओ एक दिन, तट, धारक समक्ष। दिव्य बालककेँ ओतए देखल, करि रहल केलि ओतए। रोकि रहल वाणक धारसँ, गंगधारकेँ जतए। प्रस्तुत भेलीह गंग तखन, सौंपि देल देवव्रतकेँ कहल। महर्षि वशिष्ठ सँ लए शिक्षा, वेद-वेदांगक निखिल। शास्त्र-ज्ञान शुक्राचार्य जेकाँ, शस्त्रमे परशुराम सन। भेटि गेलन्हि पुत्र तेजस्वी घुरि अएलाह शान्तनु, देवव्रतकेँ बनाएल राजकुमार, आइ अछि ई सम्भव, अपन दोसर ठाम पोसलाहा पुत्रकेँ, करत ई संकीर्ण समाज! किएक नहि होए देवव्रत सन यशस्वी तखनहु? कैक वर्ष बीतल एना, पुनि एक दिन आएल, शान्तनु देखलन्हि यमुना तट तर अद्भुत सुवास, आबि रहल तरुणी सत्यवती मलाहक बेटी, आइ जखन गोत्र-मूल, पाइ-कौड़ीक बान्ह, तहिया राजासँ विवाहक लेल सेहो, राखल शर्त्त मल्लाहक सरदार। बनत हमर नातियेटा, हस्तिनापुरक राजा, तखने होएत ई विवाह। शान्तनु ई वचन दितथि कोना, से घुरि अयलाह नगर अपन । चिन्ता घून बनि काटए लागल शरीरक कान्तिकेँ। देवव्रत पूछलन्हि पितासँ, की भेल पिताश्री, हे पुत्र की कहू, अछि एकटा चिन्ता, की होएत राज्यक जे होएत होएत युद्धमे किछु अहाँकेँ, ककर आश, के बढ़ाओत, वंश हस्तिनापुरक । कुशाग्र बुद्धिक देवव्रत बुझलन्हि जे बात किछु आर अछि, पूछलन्हि सारथीसँ सभ गप, गेलथि केवटराज लग, आ राजपाट त्यागि अएलाह। केवटराज परञ्च राखल एकटा शंका, की होएत जे अहाँक, पुत्र अहाँक जे छीनि लए, हमर नातिसँ राज्य। अप्रत्याशित प्रश्नक उत्तर, सेहो अप्रत्याशित । इतिहास बनत, ई प्रतिज्ञा। नहि करब हम विवाह आजन्म, गार्हस्थ्य आश्रम छोड़ब, रहब आजन्म ब्रह्मचारी, छोड़ब वानप्रस्थ आश्रम, हस्तिनापुर सिंहासनक मात्र रक्षा, करब हम आजन्म। संन्यास आश्रम सेहो छोड़ब, संतान बूझब हस्तिनापुर सिंहासनकेँ। क्यो नहि छूबि सकत तकरा, हमरा जिबैत-जीबैत। धन्य-धन्य दिगान्त बाजल, पुष्प वर्षा कएलन्हि देवतागण, मंचसज्जाक लेल उपयुक्त कवि ब्यासक कथन बुझु एतए। भीष्म-भीष्म धन्य-धन्य, बाजि उठल लोक सभ। केवटराज केलन्हि विदा, सत्यवतीकेँ सानन्द। कालांतरमे पुत्र दू, पाओल विचित्रवीर्य आ चित्रांगद । बालक दुनू छोटे छल, शांतनुक प्रयाण भेल। चित्रांगदक भीष्म, तखन राज्याभिषेक कएल। घमंडी से छल एहन की देव की दानव बुझय, की गंधर्व की मानव ककरो नहि टेर करय। आ देह छोड़ल, युद्ध संग गंधर्वक कए| विचित्रवीर्यक आएल राज्य, भीष्मकेँ पड़ल सम्हारए, सभटा भार कारण विचित्रवीर्य रहथि छोट। फेर जखन ओ भेलाह विवाह योग्य, काशीराजक कन्या सभक स्वयंबरमे, भीष्म विदा भेलाह काशी, जतए पहुँचल छलाह राजा शल्व, काशीराजक ज्येष्ठ पुत्री, अम्बा छलीह हुनकापर अनुरक्त । अम्बा,अम्बिका,अम्बालिका, दृष्टि फेरल भीष्म दिशि। बढि गेलीह आगू तखन, भीष्म क्रोधित भए दहोदिश, ललकारिकेँ कहलन्हि तखन ओ समस्त राजा सुनि लिअह ई, जे पराजित कए सकी तँ, स्वयंबरक भागी बनू फेर। सभकेँ हराकए भीष्म जखन, चललाह काशीराजक कन्या समेत। शल्व रथक पाछू पड़ल आ, ललकारल युद्धक लेल। धनुष-विद्या धनी भीष्मसँ, काशीराजक कन्यासभ कएल प्रार्थना, भीष्म छोड़ल प्राण शल्वक, मुदा अम्बा कहलन्हि भीष्मसँ एकांतीमे, हे गंगेय धर्मज्ञ, हमरा मोनमे अछि एक गोट शंका, मानि लेल सौभ देश राजाकेँ, पति हम अपना हृदय-बिच, धर्मात्मा, महात्मा,भीष्मक निर्णय, जाथु अम्बा शल्व लग। कराओल विवाह विचित्रवीर्यक, अम्बा-अम्बालिकाक संग। शाल्व छलाह वीर, भीष्म हराओल लोक सभक बिच, जीति लए गेल अहाँकेँ, एहि अपमानक बाद की ई, बात हमरा स्वीकार हो? विचित्रवीर्य कहल सेहो अम्बासँ विवाह अक्षत्रियोचित, अम्बा कहलन्हि भीष्मकेँ विवाह करू अहाँ हमरासँ। हरि अनलहुँ, बीतल छह वर्ष हस्तिनापुर-सौभक बीच, भीष्मक प्रतिज्ञा मुदा बीचमे ठाढ़, गेलीह युद्धदेव कार्तिकेय लग। अम्बा भरि उठलीह प्रतिशोधसँ । देलन्हि ओ नहि मौलायबला कमलक माला, हे अम्बे! लिअ ई शस्त्र, जकर गार पहिरायब सैह करत भीष्मकेँ नष्ट। भीष्मक भय परञ्च छल ततेक, नहि तैयार भेल पहिरय ई माला क्यो एक। सुनलन्हि छथि द्रुपद वीर पांचाल, सेहो तैयार नहि भेलाह पहिरए ई माल। घुरलीह अम्बा अंतमे हारि, निराश हताश लटकेलन्हि द्रुपदक महलक द्वारि। गेलीह ओ तपस्वीक शरण। सभ तपस्वी कए विचार कहलन्हि, जाऊ अहाँ परुशरामक आश्रम। क्षत्रिय-दमन छथि ओ देथिन्ह दण्ड भीष्मकेँ, जे कष्ट देलन्हि अकारण। परशुराम लग पहुँचि केलन्हि प्रार्थना, सुना कए अपन अभ्यर्थना। परशुराम कहल शल्व अछि प्रिय हमर, बात नहि काटत विवाह शल्वसँ करक लेल छी तैयार अहाँ ? अम्बा कहल हम आब विवाह नहि करए चाहैत छी। अछि हमर आब ई इच्छा मात्र, करू भीष्मसँ युद्ध अहाँ। परशुराम कए स्वीकार ई प्रार्थना, देलन्हि भीष्मकेँ ललकारा, जितेन्द्रीय,ब्रह्मचारी छलाह दुनू, धनुर्धारी-योद्धा मध्य युद्धघोष बरु। हारि-जीतक प्रश्न नहि छल ज्योँ, अनिर्णायक युद्ध बनल, अम्बा हारि कैलाशक दिशि प्रयाण कएल, गेलीह शम्भूक शरणमे। पाबि वर पुनर्जन्मक बाद, भीष्मक मृत्यु मे होएत अहींक हाथ। अम्बाक संयमक सेहो छल सीमा, कूदि चितामे पुनर्जन्मक लौलसामे। मृत्यु पाबि जन्म लेल तखन, कन्या बनि द्रुपदक महलमे। खेल-खेलमे माला पहिरल अपन टाँगल, द्रुपद सोचल होएत एकटा फेर, वैर भीष्मक अएत गऽ झमेल। निकालि राजमहलसँ कन्याकेँ, जंगल दिशि ओ गेलि तपस्या कएल, पाओल पुरुष रूप धरल शिखण्डी नाम, ओकरा छल सभटा मोन। विचित्रवीर्यक राज सेहो चलल बड्ड थोड़ दिन। क्षयक बीमारी छल अल्पायु मे मृत्युक अदिन। धृतराष्ट्रक आ पांडुक जन्मो नहि भेल। अंबिकाक पुत्र धृतराष्ट्र,अंबालिका पुत्र पाण्डु छल। विधिक विधान छल, ज्येष्ठ पुत्र अंध भेल, अम्बिका सँ पुत्र धृतराष्ट्र, काल छिनलक आँखि, आ काल बनओलक कहबीक पाँति अम्बालिका पुत्र पाण्डु, पौण्ड्र रोग ग्रसित तेँ ब्यास देल नाम ई, आकि हुनकेँ सँ रोगक पड़ल नाम ई। पौण्ड्र ग्रस्त पाण्डुकेँ राज्य-काज गेल देल । अंबिकाक दासीसँ विदुरक भेल जन्म छल। शिक्षा होमय लागल सभक भीष्मक संरक्षणमे, भीष्मकेँ चिंता भेल विवाह कोना होयत गए, धृतराष्ट्रक हेतु ताकल एक कन्याकेँ। शिवक वरदान छल गांधारीके सए पुत्रक, बढ़त वंश शोचल ई प्रयत्न से प्रारम्भ कएल। गांधार नरेश सुबल भेलाह कथा लेल तैयार जखन, विवाह धृतराष्ट्रक भेल छलीह ओ शकुनिक बहिन। सुनि पतिक अंधताक गप्प पट्टी बान्हल, आँखि रहितहु नेत्रहीनक जिनगी गुजारल। सय पुत्रक माता छल दुःशला एक पुत्री, सिंधु नरेश जयद्रथ भेल जिनकर पति। कृष्णक पिता वासुदेवक बहिन छलि पृथा, शूरसेनक पुत्री छलीह रहलीह जाए मुदा, पिताक पिसियौत कुंतीभोज छल संतानहीन, हुनके स्नेह भेटल पृथा भेलि कुंती पुनि। कृष्ण-सुदर्शन, बलरामक दीदी भेलीह, सत्कार विप्रवरक करैत छलीह। एहिना एक बेर दुर्वासा देल मंत्र एकटा, पढ़ब मोनसँ देव अएत बजेबनि जिनका। ब्यासक ई कवित्व मोनक बात कहलक, वर-मंत्र-पुनर्जन्म सबहक तत्त्व तकलक। नेनमति बुद्धि छल कुन्तीक, सूर्यकेँ बजाओल, पुत्र-प्राप्ति भेल से बाधक छल लोकलाज, बहा देल बच्चाकेँ बिच गंगधार। कौरवक सारथी अधीरथकेँ भेटल ओ, कर्ण राधेय माए राधा पोषित सूतपुत्र पराक्रमी, शरीर कवचयुक्त कान कुंडलसँ शोभित। पाण्डुक फेर कुंतीसँ विवाह भेल, मद्रनरेशक पुत्री माद्री दोसर पत्नी भेलि। पाण्डु युद्ध-कार्य मात्र कएल जीति राज, दूर रहि राज-काज भोगल सुख मात्र ! कुंती-माद्रीक संग वन-विचरण मे रत। शिकार खेलाइत वनमे, एक मुनि श्राप देल संतानविहीनताक। पाण्डुक संतान प्राप्तिक इच्छा देखि कुंती, खोललन्हि दुर्वासाक देल मंत्रक भेद। यमसँ धर्मराज,भीमसेन वायुसँ, इंद्रसँ अर्जुन कुंतीक पुत्र तीन भेल। कुंतीक मंत्रसँ माद्रीकेँ भेल पुत्रक आश। अश्विनद्वय सँ भेल नकुल-सहदेव प्राप्त। पाण्डुक मृत्यु पंचपाण्डव जन्मक बाद, भेलीह सती पतिक संग माद्री वनहिमे। पाण्डव ओ कुंतीकेँ बोनसँ हस्तिनापुर, अनलन्हि नगरमे सभ वनक मुनिवर सभ। पंच पाण्डवक संग आयलि कुंती नगर। जुमि गेल सभ नर नारी ठाम-ठामे। ऋषि-मुनि वन प्राणीक संगतिमे शील। मुग्धित सुशील पाण्डवकेँ मोन भरि देखि-गुणि। कृपाचार्यक आचार्यत्वमे शिक्षा, पाबि रहल दुर्योधन कौरव, पाबि सकए छथि हुनके लग रहि, पाण्डव जन सभ शिक्षा ई सभ । धृतराष्ट्र सोचि ई तखन कएल, ताहि तरहक व्यवस्था, दुर्योधन-कौरवक संग रहताह पंच पाण्डव भ्राता। भीम छलाह बलशाली सभमे, दुर्योधनमे छल इरखा बड़। करए लागल दुर्योधन भीमक, मृत्यु योजना गंगे तट ! जल क्रीड़ाक हेतु गेल लए, तट दुर्योधन पाण्डवकेँ। खाद्य मध्य मिलाओल विष, खोआओल भोजन भीमहिकेँ। सभ गेल नहाबए गंगमध्य, नशा भीमकेँ आयल, कात अबैत खसलाह ओतए भीम अड़रा कय । दुर्योधन बान्हल लताकुञ्ज सँ । फेकल धारमे ओकरा निश्चिंत, त्रास मुक्त कौरवघुरि आयल। गंग मध्य डँसलक एक नाग, विष कटलक विषकेँ ! से देखू काटत के पाण्डवक भाग। विषक प्रभाव भेल दूर, भीम चललाह घरकेँ, उठलाह झुमैत होइत मदमस्त, कथा सुनाबए भ्राताकेँ। युधिष्ठिर घरमे सोचथि, भीम पहुँचि गेल होएताह। नहि देखल घर भीम, माथ पर बल अएलन्हि कनेटा। तावत भीम झूमि अएलाह, षडयंत्रक कथा सुनाओल । कुंती चिंतित भेलि विदुरसँ, पूछल भेल ई उचित ! विदुर बुझाओल पाण्डव छथि बलशाली किञ्चित। हुनकर दुर्योधन करि पाओत, नहि कोनो अहित। भीमकेँ जिबैत देखि दुर्योधन-भ्राता, मोन मसोसि रहि गेल ओ दुष्ट दुरात्मा। कौरव पाण्डव लीन कंदुक खेलि रहल। कंदुक खसल इनारमे नहि निकलि रहल। सोझहि छल एक शिअक बाटे आबि रहल, तेज जकर ओकर महिमा छल गाबि रहल। बाणक वार पुनि पुनि कएल फेर ऊपरसँ, खेंचि कय निकालल गेंद धनुर्विद्याकौशलसँ। भीष्मकेँ सुनाएल बालवृन्द कलाकारी ओकर, द्रोण नाम्ना कृपाचार्यक छल जे बहिनि वर। अश्वत्थामा पुत्र जनिक सहपाठी द्रुपद छल। द्रुपद देल एकवचन राज देब आध हम। देल वचन बिसरलसे राजा बनला उत्तर। अपमानित कएल से फूटि, राजा ओ दंभी। प्रतिशोधक बाट ताकि रहल द्रोण बनि प्रतिद्वन्दी। निर्धनताक जिनगी जिबैत छलाह घूमि रहल। अश्वत्थामाक संग आजीविकाक ताकिमे पड़ल। हस्तिनापुरक आग्रह छलाह नहि टारि सकल। कृतज्ञताक भारसँ अश्वत्थामा-द्रोण हस्तिनापुरक। धनुर्विद्याक पाठ शुरु कएल कौरवक आ पाण्डवक। पाठक उपरांत समय आएल छल लक्ष्य भेदक। परीक्षाक चातुर्यक संगहि कुशलताक रण-कौशलक। लक्ष्य बनल एकटा गोट-बेश ऊँच वृक्ष पर, राखल काठक चिड़ै आँखि जकर लक्ष्य छल। सभकेँ पूछल द्रोण बाजू की छी देखि रहल? सभ क्यो गाछ वृक्ष पक्षिक संग देखि रहल। पार्थकेँ पूछल अहाँ छी कथी देखि रहल सकल। माथ पक्षिक अतिरिक्त नहि किछु छी देखल। अर्जुनक बाण पक्षिक शिरोच्छेदन कएलक। अर्जुन भेलाह प्रिय-स्नेहिल द्रोणक हृदयक। बीतल समय शस्त्र-प्रदर्शनक छल आएल। समय बीतल प्रदर्शन-शस्त्रक छल आयल। भीष्म पूछल द्रोणसँ की-की सिखाओल, युद्ध-कौशल,व्यूह रचना आ शस्त्रकौशल। प्रदर्शनक व्यवस्था भेल जनक बीचहि, एकाएकी सभ भेलाह परीक्षित संगहि। भेल भीम-दुर्योधनक गदा-युद्धक प्रदर्शन। भीष्म-धृतराष्ट्रक हृदय-बिच वातसल्यक, जखन छल द्वंदकबीच अर्जुक बेर आयल। एकानेक बाण-विद्यासँ रंगस्थली गुंजित, घोष अर्जुनक भेल बीचहि कर्ण आएल। परशुराम शिष्य कर्ण कएलक विनय, कए छी सकैत हम प्रदर्शन सभक जे, विद्या जनैत छथि अर्जुन सकल सभ, पाबि सह दुर्योधनक, ललकारा देलक, अर्जुन द्वंद हमरासँ लड़ू से प्रथमतः। कृपाचार्य कहल सारथीपुत्र छी अहाँ, राजकुमारसँ द्वंदक अधिकारी कहाँ? द्वंदता नहि अहाँसँ फेर बात द्वंदक, द्वंद-युद्धक गप आएल ओना-कोना? हा ! हा! हा! चित्कार हृदयक, कर्णक हृदयक चित्कार दुर्योधनेटा सुनलक। ई सुनि दुर्योधन केलक ई घोषणा, बात ई अछि तँ सभ सुनैत जाऊ, अंग-देशक नृप कर्णकेँ बनबैत छी, योद्धाक परीक्षण करैत अछि बाहु, ई बाहु ! पकड़ि कर्णक बाहु कहलक । अंग देशक नृप कर्णकेँ बनबैत छी। कहि ई अभिषेक कएल सभागारेमे, अंकमे लेल कर्ण भेल कृतज्ञ ओकर। उठि अर्जुन तखन ई बात बाजल, हे कर्ण अहाँ जे क्यो छी, सुनू ई, हम द्रोण शिष्य अर्जुन ई कहए छी, बुझू नहि जे ई वीरताक वरदान टा, नहि भेटल अछि से अहीँक सभटा। गुरु नहि सिखओलन्हि हारि मानब, प्रतिद्वंदीसँ द्वंद करब जखन चाहब। करतल ध्वनिसँ सभागार भेल फेर गुंजित, भीष्म उठि कएल संध्याक आगमन सूचित। अर्जुनक गर्वोक्ति सुनि कर्णक हृदय छल, मोन मसोसि नृप अंगक गामपर पहुँचल। शिष्टताक हेतु पाण्डव भेलाह प्रशंसित। भेल एहिसँ दुर्योधनक मोन शंकित। शकुनि दुःशासन छल ओकर भक्त, कर्णसँ भेँट उत्तर ओ भेल आश्वस्त, धृतराष्ट्रकेँ सभक कनफुसकीसँ कए त्रस्त। पिता छलहुँ अहाँ सिंहासनक अधिकारी, जन्म-अंधताक रोकल राजसँ अहाँकेँ, हमरा तँ नहि अछि एहन लाचारी। युधिष्ठिरकेँ सभ मानय लागल, सिंहासनक अधिकारी किएक ? अहँक सेहंता की भए पाएल, फलाभूत कोना अहुना ईएह। युधिष्ठिर ज्येष्ठ हमरासँ अछि, परंतु अछि अहाँक अनुजक पुत्र सएह। कएल आग्रह जएबाक मेला वारणावतक, पाण्डवसँक करू। ता सुधारब व्यवस्था सभ, कल्याणकारी कार्य सभसँ, बिसरि जएत पुत्र कुंतीक, जन सकल हस्तिनापुरक। धृतराष्ट्र मानल सभटा बात, आदेश देल वारणावत जाथु, कुंति देखि मेला-ठेला आउ। विदुर भेल साकंक्ष भेद ई की, सचर रहब युधिष्ठिर, कहल ई। विदुरक नीति कएल साकंक्ष, दुर्योधनक काटल सदि प्रपंच। मंत्री पुरोचनसँ मिलि दुर्योधन, लाखक महल बनबओने छल, विदुर लगेलन्हि एकर पता, संवाद सेहो पठओने छल। वाहक संदेशक छल कारीगर, निर्माण सुरँगक कएल। लाखक महलक भीतर छल, निर्माण से क्षणहिमे भएल। पाण्डवकेँ निर्देश भेल छल, खोह सुरँगहिमे सूतइ जाउ, आगिक पूर्ण शंका से छल, लगिते भीतरसँ बाहर अबै जाउ। कृष्ण चतुर्दशीक छल ओ दिन, पुरोचन भेल से अतिशय चंचल, आगि लगाएत आइ ओ छल सँ, युधिष्ठिर छल ई सभ बूझि रहल। कए सचेत अपन माता-भ्राताकेँ, यज्ञ कएलन्हि ओहि दिन से, भात-भोज देलन्हि नगरवासीकेँ, पंचपुत्र छलि भीलनी सेहो एक। आह बेचारी ! कालक मारल वा मारल, दू गोट द्वन्दतामे तेसर? कालक सोझाँ ककर चलल जे, सूतलि राति ओतहि सभ तेँ। पुरोचन सेहो सुतल ओतहि, बाहर दिश छल कोठली एक, आगि लगाओल भीम तखन, बीच रातिमे मौका केँ देखि। लाक्षागृह छल बन से ओतए, अग्नि देवता अहि केर लेल। घरक सुड्डाह होइमे लागत, से एकहु क्षण किएक? नहि बिलमि माता- भ्राता, प्रणामअग्निदेवकेँकए। निकलि कुंति कालक गालसँ, बचलि दुर्योधनक कुचालिसँ। पुरोचन अग्नि मध्य से उचिते भेल, किन्तु भीलनि जरलि बेचारी, पुत्र सहित से सूतल, ककरो बुझना छल नहि गेल ई छल। नगरवासी बुझलन्हि जे जरलि, कुंती पाँचो पुत्र सभहिक संगे। नगर शोकसँ भेल शोकाकुल, खबरि हस्तिनापुर ज्योँ गेलेँ। दुर्योधन छल अति प्रसन्ना आ, धृतराष्ट्र प्रसन्न छल मोने-मोने। परंतु विदुर सभसँ बेशी प्रसन्न, किएक तँ सत्य बूझि छल गेले। से ओ कहल भीष्मकेँ सभटा, बात रहस्यक जा कए ओतए। भीष्मक चिंता दूर कएलन्हि, ई सभ गप जाय बुझा कए । अकाबोन पहुँचैत गेलाह गए, पाण्डव-जन कष्ट उठा कए। नाविक नावक संग प्रतीक्षा, करि छल रहय विकल भए। कहलन्हि विदुर पठेलन्हि हमरा, आज्ञा दी गंगतट सेवा करबाक। गंगा पार भेलथि पाण्डव जन, पाछू छूटल कतेक भभटपन। धृत्राष्ट्रक,दुर्योधन आ शकुनीक, आ दुःशासन कर्ण सबहीक। संग मुदा लागल प्रतिशोध, हस्तिनापुरक छल ई दुर्योग। नहि जानि जएत कई पथ ई, पथ न जतए छल ओहि वनमे, डेग दक्षिण दिशा दिश दी, गंतव्यक छल नहि ज्ञान कोनो जे ! दैत डेग बढ़ैत आगू, भूखल-पियासल थाकल ठेहिआयल, आह दुर्दशा देखू ! कुंतीक ई दशा देखि, भीमसँ नहि छल गेल रहल, वट-वृक्षक नीचाँ बैसा कए, चढल देखल सजग भऽ। पक्षी किछु दूर छल ओतए, भीम जाए पहुँचल जलाशय, पानि पीब आनि पियाओल, सुतल सभ कुम्हलाय ओतए। भीमकेँ नहि गेल देखल, करथि की हूसि मोन होअय, पोखरिक गाछक ऊपर छल राक्षस नाम हिडिंब जेकर। हिडिंबा बहिनक संग छल, ताकि रहल अपन भोजन। मनुक्ख-गंध सूंघि कए, चलल नर-मांस ताकिमे ओ, हिडिंबे जो मौस-मनुक्खक, आन जल्दी ओतए जाकए। देखि कुंती-पुत्र संग सूतल, दुःखित हिडिंबा छल ताकैत, भीमक हृष्ट-पुष्ट शरीर देखि, ठाढ नेत्रे रहलि ताकए। धरि धारण रूप सुन्दरीक, कहल भीम जाऊ उठाऊ, अपन माता बन्धुकेँ, दूर सुरक्षित हिनका पहुँचाएब। मोहित छी हम अहाँ पर, चाह हमरा अछि विवाहक, मायासँ हम बचाएब, बलवान क्रूर हिडिम्बक मारिक। भीम कहल हम किए उठाएब, बंधु केँ सुतल अपन, बलवान अछि हिडिंब एहन, बल देखए हमरो तखन। हिडिम्ब पहुँचल ओतए, हिडिम्बा छलि सुन्दरीक रूप बनओने, भीमसँ करि रहलि छलि गप, क्रोधसँ क्रोधित हिडिम्बकेँ कएने। ओ दौड़ल हिडिम्बा पर मारक हेतु, भीम पकड़ल बिच्चहिमे, मल्लयुद्ध पसरल ओतए से, विकट द्वंदक हुँकार छल गूँजैत। वन्यप्राणी भागए लागल आ उठलि कुंती-पांडव ओतए, पहुँचैत गेल दौगैत ओतए, रणभूमि साजल छल जतए। मारि देलक भीम तावत, भेल हिडिम्ब शवरूप यावत। भीमक वीरतासँ हिडिम्बा भेलि छलि आनंदित, वाकचातुर्यसँ कएने छलि कुंतिकेँ प्रसन्न किंचित्। युधिष्ठिर सेहो देल स्वीकृति माता कुंतीक विचार जानि, विवाह करि कए रहए लागल, भीम हिडिम्बाकेँ आनि। घटोत्कच उत्पन्न भेल, पिता तुल्य पराक्रम जकर छल। दिन बीतल पाण्डव वन छोड़ि कए आगाँ जाए लागल, जाएब हिमालय दिशि पुत्रक संग ई हिडिम्बा बाजलि। घटोत्कच कहल पितु माताक हम सदिकाल संगे रहब, होएत कोनो कार्य अहाँक, बजाबएमे नहि संकोच करब। जाइत काल ब्यास भेटलाह कुंती कानलि हाक्रोस भए, भारतक लेखक आएल बनि काव्यक पात्र भए !! ब्यास कहल नहि कानू दिन छोट पैघ होएबे करय। दुःख आकि सुखमे अपना पर नहि छोड़ए अछि नियंत्रण, धर्मपथ पर जे चलए,तकरे कहए छी मनुष्य तखन। गर्वित सुखे नहि होए, दुःखमे धैर्यक न अवलंब छोड़ए, कुंती आ अहँक पुत्र छथि, तेहन जेहन ई मनुष्य होमए। ब्यास काव्यक पात्रकेँ देखाए रस्ता सोझ किन्तु, पात्रक चरित्रमे नहि अड़ाओल अपन आकांक्षा एको रति । धन्य तेँ ओ कवि आ ओकर कृति !! पाण्डवजन पाबि ई संबल, पहिरल मृगचर्म वल्कल, ब्रह्मचारी केर भेष बनाओल, एकचक्री नगर पहुँचल। रहल बनि अतिथि ओतए, आतिथ्य ब्राह्मणक पाओल, भाइ सभ जाथि आनथि सभ राखथि माताक समक्ष। कुंती देथि आध-भीमकेँ आधमे शेष सभ मिलि खाथि, भीमक तैयो भूख मेटाइन्हि नहि भुखले ओ रहि जाथि। भुखले छलाह भीम एक दिन गेलाह नहि भिक्षाटनमे, सुनल घोर कन्नारोहट घरमे, पूछल कारण जानल से। बकासुर राक्षस ओतए छल नगर बाहर निवास जकर, राजा असमर्थ छल, राक्षस करए अत्याचार बड़-बड़। छल निकालल समाधान जे सभ परिवारसँ प्रतिदिन एक, कटही गाड़ी भरि अन्न मदिरा मौस, जाथि बहलमान। बक खाइत छल सभटा भोजन संग बहलमानहुकेँ से, कन्नारोहट मचल छल घर ब्राह्मण परिवारक मध्ये। पार छल परिवारक आइ सभ परिवार दुःखित छल, कुंती कहल पाँच पुत्र अछि, भीमक बल सुनाएल। भीमक बलक चर्च सुनि-सुनि कए ब्राह्मण मानल, कृतज्ञ भेल भीमकेँ ओ गाड़ीक संग खोह पठाओल। खोह राक्षसक ताकि भीम खेलक, छल ओ भुखाएल, तृप्त स्वयं भीम छल देरी सँ अतृप्त बकासुर आएल। तामसे आक्रमण कएलक किंतु लात-मुक्का मारि कए, भीम प्राण लेलक ओकरा खींचि नगर द्वार आनि कए। भेल प्रसन्न सभ जन मनओलक पूजा-पर्व ओतए, कुंती चललीह आर किछु दिन ओहि नगर रहि कए। सुनल पांचालक स्वयंबरक, कथा पांचालीक द्रुपदक, एकचक्रा नगरीसँ ढेरक-ढेर ब्राह्मण पहुँचैत ओतए। पाण्डवजन लए रहल आज्ञा मातृ कुंतीसँ रहथि, ब्यास पहुँचि कहल जाउ स्वयंबर ओतए देखए ! मार्गमे ऋषि धौम्य भेटलाह छलाह पंडित ज्ञानी, बढ़ल आगू तखन मिलि संकल्पित भऽ सभ प्राणी। सुनि कथा प्रशंसा यज्ञसँ निकललि याज्ञसेनीक, मत्स्यभेद करताह जे क्यो द्रौपदी वरण करतीह। स्वयंबरक स्थानक रस्ता तकलन्हि पांचालमे जा कए, कुम्भकारक घर डेरा देलन्हि विचार कुंतीक मानि कए। कर्ण आएल छल दुःशासन, दुर्योधनक संग सज्जित, देश-देशक राजा आएल छल रंगभूमि वीरसँ खचित। तखन आयलि द्रौपदी भाइ धृष्टद्युम्नक संग सुसज्जित, पुष्पमाल लेने आयलि केलनि सभक नजरि आकृष्ट। बीच स्वयंबरक भूमिक ऊपर मत्स्य एकटा लटकल, ओकर नीचाँ चक्र एकटा तीव्र गतिये छल घूमि रहल। नीचाँ पानिमे छाह देखि जे चक्रमध्य पातर भुरकी तर, दागि सकत मत्स्य आँखिकेँ पुष्पमाल पड़त तकरे गर। सभटा राजा हारि थाकि कए भेल विखिन्न थाकल छल, कर्ण देखि जन बाजि उठल सूत पुत्र किए आएल छल? द्रौपदी बाजलि गाँथियो देत ज्योँ कर्ण मत्स्य-लोचनकेँ, नहि पहिराएब वरमाला नहि करब वरण ओकराकेँ। विवश कर्णकेँ बैसल देखि ऋषिवेश अर्जुन आएल छल, एकहि शर-संधानसँ बेधल मत्स्य सुयश पाओल छल। ब्राह्मण-मंडली कएने छल बुझि ओकरा ब्राह्मण जय-जयकार ओतए, क्षत्रिय राजा सभ कएल विरोध, तैयार अर्जुन पुनि संधान कए। बिद्ध मत्स्य भू खसल भूमि बलराम कृष्ण आगाँ आओल, सभ राजाकेँ बुझाए सुझाए छल सहटाय ओतएसँ हटाओल। कृष्ण एकांती कहल दाऊ सुनू ई, सुनल छल एक उरन्ती, वारणावत आगि बिच बचल पांडव, बचल छलि कुंती दीदी। भीम तखने उखाड़ि वृक्ष छल भेल ठाढ़ सहटि अर्जुन कए, कृष्ण कहल हे दाऊ कालचक्र अनलक एतए भीम अर्जुनकेँ। देखि पराक्रम हतोत्साहित भेल राजा सभ प्रयाण कएने छल, पांडव लए चललाह द्रौपदीकेँ व्यग्र एहि सभसँ ओ भेलि छलि। अर्जुन खोलि अपन रहस्य, खिस्सासँ द्रौपदीकेँ कएल विह्वल, धृष्टद्युम्न चुपचाप सुनए छल, घुरि पिताकेँ कथा ई कहलक। कुम्भकारक घर पहुँचि पांडव कहल देखू की हम सभ आनल, कुंती कहल आनल अछि जे सभ तकरा बाँटू पाँचू पाण्डव !! कहल अर्जुन हे माता होएत नहि व्यर्थ अहाँक ई बात, संग द्रौपदीक होएत विवाह पाँचू-पाण्डवक संग- साथ। द्रुपद पठेलन्हि पुरहितकेँ धृष्टद्युम्नक संग ओतए, कुंतीकेँ नोतल आ सभकेँ लए गेल संग अपन । द्रुपद सुनल जे पाँचू-पाण्डव करताह विवाह द्रौपदीसँ, तखनहि ई कथा अछि पूर्वजन्महिक ब्यास आबि सुनाओल!! भेटल छलन्हि वरदान शिवसँ जे पाँच पति अहाँ पाएब, सुनि सभ द्रौपदी विवाह द्रुपद रीति वैदिक सँ कराओल। सभ किछु दिन रहल ओतए कुशलसँ द्रुपद केर महलमे, पसरल ई चर्चा सगरो धरि गेल गप हस्तिनापुर महलमे। लोकलाजसँ बाह्य प्रसन्नता धृतराष्ट्र छल ओतए देखओने, मानि भीष्म-द्रोणक विचार पठाओल समाद अगुतओने। आनी अनुज पत्नी पुतोहु ओ अनुज पुत्र सभकेँ आदरसँ, दुर्योधनक कर्णक विरोध पर कएल विचार विदुरकेँ बजाकय, शास्त्रानुसार विचार देलन्हि आधा राज्य देबाक ओ जाकए। विदुरहिकेँ पठाओल धृतराष्ट्र आनए राजमहलसँ द्रुपदक, सभकेँ लए आनल पहुँचल ओ जन ठाढ़ करए स्वागत। धृतराष्ट्र कहल हे युधिष्ठिर गृह कलहसँ ई नीक होयत, जाए खाण्डवप्रस्थ बसाउ नव नगर आध राज लऽ कए। खाण्डवप्रस्थ अछि बोन एखन पहिने छल राजाक नगरी, मानि युधिष्ठिर गेल ओतए बनाय नव घर द्वार सज्जित। इन्द्रप्रस्थ छल पड़ल नाम आ तेरह वर्ष धरि केलन्हि राज, यश छल सुशासनसँ आ छल जन-जीवन अति संपन्न। छल अहिना दिन बीति रहल अएलाह नारद एकदिन जखन, स्वागत भेलन्हि खूब हुनकर ओहो रहथि आनंदित तखन। देखल शील-गुण पांडवक मुदा कहल द्रौपदीसँ सुनू बात ई, छी पत्नी पांडवक मुदा निवासक निअम किए नहि बनेने छी ? नारदक बात समीचीन छल से निअम बनेलथि पाँचो गोटे, एक-एक मास रहथु सभ लग द्रौपदी निअम नहि भंग हो ! बारह वर्ष पर्यंत छोड़ए पड़त गृह त्रुटि भेल ज्योँ, पालन निअमक होमए लागल किछु काल धरि ई । कनैत अएलाह विप्र एक अर्जुन पुछलन्हि बात की ? चोर छल चोरेने गौकेँ हाक्रोस विप्र छल करि रहल, शस्त्र छल गृहमे द्रौपदी संग युधिष्ठिर जे रहि रहल। विप्रक शापसँ नीक सोचि मूरी झुकेने गेल अर्जुन, शस्त्र आनि छोड़ायल गौकेँ घुरि आएल गृह तखन। माँगल आज्ञा युधिष्ठिरसँ दिअ गृहत्यागक आज्ञा, निअम भंगक कएल हम अपराध, की बाजल अहाँ ? अर्जुन ई अपराध लागत जखन पैघक द्वारा होएत, छोट भाए कखनो अछि आबि सकैत बड़ भाय घर। मुदा निकलि गेलाह अर्जुन आज्ञा लए माता भाएसँ, भ्रमण देश-कोसक करैत पहुँचल हरिद्वार गंग तट, स्नान करैत काल, नजरि छल नाग कान्याक ज्योँ, कोना बचि सकैत पहुँचि गेलाह पातालक निकट। विवाह प्रार्थना स्वीकारल अर्जुन ई छल वरदान भेटल, जलमे रस्ता बनत चलि सकब अहाँ व्यवधान बिन। मणिपुर पहुँचि जतए चित्रांगदा राजकन्या छलि रूपवती, विवाहक प्रस्ताव अर्जुनक स्वीकारल मानल राजा सशर्त, दौहित्र होएत हमर वंशज भेल ई विवाह तखन जा कए। चित्रांगदाक पुत्र भेल बभ्रुवाहन नाम राखल गेल जकर ई, परम प्रतापी पराक्रमी योद्धा बनल बालक पाछू सुनए छी। फेर ओतएसँ निकलि अर्जुन पहुँचल प्रभास तीर्थ द्वारका निकट, शस्त्र-प्रदर्शनक आयोजन केलन्हि कृष्ण निकट पर्वत रैवतक। प्रेम देखि सुभद्रासँ कृष्ण छलाह सुझओने नव उपाय ई, अपहरण करब जीतब युद्ध यादवसँ बनत तखने बात ई। बनलि सारथी वीर सुभद्रा संग्राम छल बजरल जखन, बुझा-सुझा मेल छल करओने कृष्ण जा कए तखन। विवाह भेल तदंतर अर्जुन संग सुभद्रा गएलाह पुष्कर, पुरल जखन ई वनवास कृष्णक संग पहुँचल इंद्रप्रस्थ। देखि नववधू प्रसन्न कुंती आनंद नहि समटा रहल, द्रौपदीसँ पाँच पुत्र, आ अभिमन्यु सुभद्रासँ भेल छल। बीति छल रहल दिन जखन अएलाह जीर्ण शरीर अग्नि, रोगक निदान छल खांडव वन रहए छल ओ सर्प तक्षक। इंद्रक अछि मित्र ओ जखन करैत छी जरेबाक हम सूरसार, नहि जरबए दैत छथि इंद्र, करू कृपा अहाँ हे इंद्र अवतार । छी प्रस्तुत मुदा अस्त्र अछि नहि हमरा लग ओतेक, इंद्र युद्धक हेतु चाही योग्य शस्त्रक मात्रा जरूरी जतेक। देल गांडीव धनुष तूणीर अक्षय वरुणक रथ नंदिघोष, चलल डाहबाक हेतु अग्नि पेलाक बाद अर्जुनक तोष। इंद्र मेघकेँ पठओलन्हि कृष्ण कएल सचेत जे, वायव्यक प्रयोग कएल अर्जुन मेघ बिलाएल से। तक्षकक मृत्योपरान्त इंद्र भेलाह प्रकट ओतए, माँगल अर्जुन दिव्यास्त्र हुनकासँ मौका देखि कए। जाऊ शिवक उपासना करू दए सकैत छथि वरदान ओ, छल मय आयल अग्निक कोपसँ बचि लग अर्जुनक ओ। सेवा करबाक बात छल मोनमे लेने कृतज्ञ छल ओ, बनाऊ सभा भवन अनुपम नहि बनल जे कतहु होऽ। मय दानव छल कए रहल नव निर्माण, सभा भवनक दिन-राति लागि उत्थान। स्फटिकसँ युक्त शीसमहल सन कौशल, युधिष्ठिर ओतहि तखन सिंहासन बैसल। ऋषि नारदक आगमन भेल ओतए जाए, देलन्हि करबाक यज्ञ जे राजसूय कहाय। बजाओल द्वारकासँ कृष्णकेँ समाद पठाय, कृष्ण कहलन्हि सभा भवनमे आबि कए, जरासंध मगधक नरेश रहत गए यावत, राजसूय सफल नहि होमय देत तावत। बंदी बनेलक राजा लोकनिकेँ ओ हराय, आक्रमण ओकर भेल मथुरा पर बड्ड, हारि द्वारका राजधानी बनाओल हम जाए । युधिष्ठिर बात सुनैत भेलथि हतास सन, भीम अर्जुन आशा बन्हेलन्हि भ्राता सुन। क्षत्रिय-धर्म अछि शत्रुकेँ वशमे करए, कृष्ण,अर्जुन-भीम संग राजगृह चलल। ऋषि वेशधारी राजगीरक प्राचीर लाँघि, पहुँचल सभ सोझे सभा-भवन जी-जाँति। सत्कार करए चाहलक जरासंध बुझि विप्र, ललकारा देलक किंतु भीम द्वंद-युद्धक शीघ। दिन बीतल खत्मक नाम नहि लैछ ई युद्ध, कृष्णक संकेत पाबि चीरल ओ शरीर संधिसँ, भीम तोड़ल शरीर जरासंधक उनटि फूर्त्तिसँ, शरीर फेंकल दुहू दिशि उनटि एम्हर-ओम्हर, मुक्त कएल कारागारसँ बंदी गण राजा सभकेँ। जरासंध-पुत्र सहदेवकेँ दए मगध राजक गद्दी, आपस भेलाह इंद्रप्रस्थ घुरलाह तीनू व्यक्त्ति। पूर्व दिशि भीम उत्तर अर्जुन नकुल दक्षिण, सहदेव पश्चिम दिशा दिशि दिग्विजय खातिर। विजय रथ नहि क्यो रोकि सकल हुनकर, धन-धान्यसँ परिपूर्ण सभ आबि कएल तैयारी, राजसूय यज्ञक भेल राजा सभक इन्द्रप्रस्थमे बजाही। राजा लोकनि केँ दय समुचित कार्यक भार, भीष्म-द्रोणकेँ यज्ञ-निरीक्षणक देल प्रभार। कृष्ण विप्र चरण-धोबाक लेलन्हि काज । हस्तिनापुरसँ भीष्म, द्रोणक संग भेल आगमन, धृतराष्ट्र विदुर कृप अश्वत्थामा दुर्योधन दुःशासन। बीच यज्ञमे उठल छल प्रश्न अग्र-पूजाक, भीष्मक सम्मति युधिष्ठिर पुछलन्हि जाए, भीष्म कहल छथि श्रेष्ठ कृष्ण नृप बीच, सहदेव सुनि वचन चरण पखारय लाग। चेदिराज शिशुपालसँ सहल नहि भेल, अपशब्द कृष्ण-भीष्मकेँ देबए लागल, दुर्योधन-भ्राता प्रसन्न छल भेल, भीमक क्रोध बढ़ल छल ओ झपटल, भीष्म रोकि शांत छल ओकरा कएल। शिशुपालक गारि सुनियो छल कृष्ण प्रशांत, छलाह किएक तँ ओ पिसियौत कृष्णक, दिन बीतल कृष्ण देलथि वचन दीदीकेँ एक, सए अपराध क्षमा हम करब ओकर। सए गारि सुनलाक उपरांत चलल सुदर्शन, चक्र कएलक चेदिराजक शिरोच्छेद तखन, सभा मध्य शांति – पसरल छल जाए, शिशुपाल पुत्रकेँ चेदिक गद्दी पर बैसाय। यज्ञक क्रिया निर्विघ्न संपन्न छल भेल, सभ राजाकेँ ससम्मान विदा कएल गेल। सभा भवनक चामत्कृत्य भेल चर्चित, दुर्योधन-शकुनि भवनकेँ देखल चकित। नीचाँ देखि मृग-मरीचिका बान्हल फाँढ़, पानि नहि छल हसलि द्रौपदी ई जानि, अएना सोँझा पारदरर्शी नहि ई देखल, ओ चोटिल भीमक अट्टहाससँ विकल। आँगा स्फटिक फर्श छल जकरा बुझल, पानि भरल भीजल छल सभ हँसल। अपमानित छल लए युधिष्ठिरसँ आज्ञा, चलल हस्तिनापुर शीघ्रहि सभ भ्राता। क्रोधित हृदय ईर्ष्याक वशमे छल दुर्योधन, शकुनि संग मंत्रणा कए कऽएकटा विचारल, सोझे युद्धमे पांडवकेँ हरेनाइ अछि मोश्किल, सोचि ई दोसर व्यूह रचलन्हि दुष्ट शकुनि। भव्य सभा भवन एकटा हम सभ बनाएब, पाण्डव-जनकेँ देखबा लेल सेहो बजाएब, द्यूत खेलक छी महारथी हम गांधारवासी, धृतराष्ट्रकेँ कहि आमंत्रित कराऊ बजाऊ। भवन बनि कए तैयार भेल एके निसासी। द्यूत खेलक आमंत्रणक हेतु धृतराष्ट्र विचारल। विदुर कहल राजन् खेल करत विनाश सभकेँ, दुर्योधनक अंधप्रेममे धृतराष्ट्र मुदा नहि मानल। स्वयं विदुर गेलाह देबए निमंत्रण इंद्रप्रस्थ, पाण्डव जनकेँ अएला पर भेल प्रेम-मिलन। मुदा हृदयक विष बहराइत जल्दी कोना कए, दुर्योधन लए गेलाह युधिष्ठिरकेँ सभा भवनमे। द्यूतक चर्च सगरय होमए लगल छल ओतए, शकुनि माटि फेंकि कहल युधिष्ठिर भऽ जाए, सकुचाइत छी क्षत्रिय भऽ करए छी अनुचित। युधिष्ठिर तैयार जखने भेलाह, दुःशासन कहल, ई खेल होएत यधिष्ठिर आ दुर्योधनक बिच, मामा शकुनि पास फेंकताह दुर्योधनक दिशिसँ, हुनक हारि जीत मानल जईत दुर्योधनक से, दोसर दिन खेल भेल सभा भवनमे भारतक हे!! सभा भवन दर्शकसँ छल भरल,छल ओतए, भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, विदुर, धृतराष्ट्र उपस्थित। पहिने रत्नक बाजी फेर चानी-सोनक लागल, फेर छल सभक अश्व-रथ लागल जुआ पर । मुदा जखन तीनू टा बाजी युधिष्ठिर हारल, सौँसे सेना लगाओल दाँव पर ओ अभागल। फेर बेर आएल राज्यक फेर चारू भाँय केर, युधिष्ठिर बाजल नहि बचल लग हमरा लेल। शकुनि कहल छथि द्रौपदी अहाँक बिचमे। एहि बेर ज्योँ जीतब अहाँ, दए देब हम सभ, भाइ,राज्यसेना,अश्व-रथ,रत्न चानी सोन सभ। युधिष्ठिर सुनि ई भऽ गेल छल तैयार जखने, हा। धिक्। पापकर्म की भए रहल अछि ई। सभा बिच उठि पड़ल सभक नाद ई सभ। युधिष्ठिर सेहो कहल हम कएलहुँ की ई ? आनन्द मग्न कौरव छल, मुदा संतप्त एकेटा, दुर्योधन-भ्राता युयुत्सु छल शोकाकुल सएह टा, शकुनि आब एहि सभक बीच, फेकलक पासा, ई बाजी हमर, हुंकारलक शकुनि हारल युधिष्ठिर !! द्रौपदीकेँ हारि ठकाएल ठाढ़ छल सभा बिच। भय मदान्ध दुर्योधन कहल हे विदुर, जाऊ समाचार ई द्रौपदीकेँ जाए सुनाऊ। छथि ओ हमर दासी झाड़ू-बहारू करथि, महलमे आबि हमर ई आदेश सुनाऊ। विदुर कहल औ दुर्योधन घमण्ड छोड़ू, स्त्रीक जुआरी अहाँ हमरा नहि बुझु। देखि विदुरक ई रूप पठाओल विकर्णकेँ, जाऊ दासी द्रौपदीकेँ जाए आनू गए, विकर्ण ई द्रौपदी लग कहि सुनाओल। चकित द्रौपदी कहल स्वयंकेँ जे हारल, युधिष्ठिर कोनाकेँ अधिकार ई पाओल, अपन हारिक बाद होएत क्यो सक्षम, दोसरकेँ हेतु जुआमे लगाबए केहन। ई प्रश्न जखन राखल विकर्ण सभा बीच आबि, दुर्योधन कहल दुःशासन जाऊ पकड़िकेँ लाऊ। बुझाओल द्रौपदी दुःशासनकेँ, जखन ने मानल, भागलि गांधारीक भवन दिशि, दौगल दुःशासन, खूजल केशकेँ पकड़ि घिसिअओने छल आनल। हा! भारत ! ब्यास मुदा नहि अहाँ कोनो तथ्य नुकाओल । सम्बल उदार भावनाक देल, तुष्टि पाओल!! सभा भवन महापुरुष नहि थोड़ जतए छल। भीष्म, विदुर, द्रोण, कृपा लाजक लेल गोँतने, गारि माथ देखि रहल द्रौपदीक अश्रुपात। सिंहनादमे भीम तखन ई बाजल, सूर्य देवतागण रहब साक्षी अहाँ सभ, हाथसँ दुःशासन केश द्रौपदीकेँ धएने, उखाड़ि फेंकब हाथ ओकर ओ दूनू। कौरव भए सँ भीत भेलाह नादसँ भीमक, दुर्योधन देखल मुदा देखि ई छल बाजल, जाँघ पर दैत थोपड़ी करैत घृणित इशारा, द्रौपदीकेँ बैसबा लए ओतए कहैत छल। गरजि कहल भीम अधम दुर्योधनसँ, तोहर जाँघकेँ तोडब प्रचण्ड गदासँ। खिसियाकेँ दुर्योधन देलक ई आज्ञा पुनः ई, चीर-हरण करू दुःशासन द्रौपदी दासी छी। द्रौपदी कएलन्हि नेहोरा श्रेष्ठ लोकनिसँ विनय ई अछि लाज बचाऊ करैत छी विनती। सभ क्यो झुका माथ अपन ओहि सभामे, कृष्णा छोड़ल सभ आश सभ दिशासँ, भक्त्त वत्सल अहाँसँ टा अछि ई आशा, कोहुना राखू हमर ई लाज अछि प्रत्याशा। आर्द्र-स्वरसँ छलि रहलि पुकारि द्रौपदी, गोहाड़ि खसलि सभा-बिच, मूर्च्छित । लागल खीचय द्रौपदीक वस्त्र दुःशासन, सभासद देखल चमत्कार ई प्रतिपल, यावत रहल खिंचैत वस्त्रकेँ दुःशासन, बढ़ैत रहल वस्त्र द्रौपदीक तावत तखन। थाकि-हाँफि बैसल जखन दुःशासन, कहल भीम सुनू सभ एहि भवनमे, यावत फाड़ि छाती दुःशासनक ऊष्म रुधिरकेँ, पीयब, नहि पियास मेटत मृत्यु भेटत नहि। सुनि प्रतिज्ञा ई सभ भयसँ थड़थड़ाए लागल छल। धृतराष्ट्र देखि दुर्घटना द्रौपदीकेँ लगमे बजाओल, सांत्वना दए शांत कएल युधिष्ठिरसँ छल बाजल, बिसरि जाऊ इन्द्रप्रस्थ सुख-शांतिसँ रहए जाउ, जे हाड़लहुँ, से बुझू देल हम ठामहि लौटाएल । संतोष भेलन्हि पाण्डव-जनकेँ ई सुनि, कथा धृतराष्ट्रक घुरलाह इन्द्रप्रस्थ पुनि। दुर्योधन दुःखित मंत्रणा कएल शकुनिसँ, संग दुःशासन कर्णक मंत्रणा फेर जुआक, विनाशक हस्तिनापुरक छल बेर खराप। एहि बेरक निअम राखल हारत जे से करत, बारह वर्षक वनवास आ एक वर्ष अज्ञातवास। धृतराष्ट्र दूत पठाओल हस्तिनापुर फेर। युधिष्ठिर घुरलाह भाएक संग बेर-अबेर, सुनाओल गेल शर्त्त सभ रोकल एक बेर। मुदा भाग्यराजक आगाँ ककर अछि चलल, नहि मानल कएल युधिष्ठिर भाग्यक खेल! चलि फेर पासा दुर्योधनक, वैह खेरहा, फेंकि गोटी जिताओल शकुनि ओकरा। हारि हारल राज्य, पाओल छल बनबास, युधिष्ठिरक भाग्य चालि कुचालिक जीत, राज्यक निर्णय जुआक गोटीक संगीत, की होएत से नञि जानि सुन्न अकास। धर्मराज सभ हारि, चलल फेर वैह पथ, धर्मक आ शान्तिक, छोड़ि सभ बिसारि। माता कुन्ती छलि वृद्धा भेलि कहल, कहल धर्मराज नञि जा सकब अहाँ, विदुर काक केर घर जा रहब, जाएब कर्म भोगए हम सभ। द्रौपदीक पाँचू पुत्र आ पुत्र अभिमन्युक, सुभद्रा जएतीह अपन नैहर द्वारकापुर। धौम्य पुरहित संग द्रौपदी आ चारू भाए, काटब हम संग तेरह वर्षक वनवास जाए। नगरवासी सुनि गमनक ई समाचार, कएलन्हि दुर्-दुर दुर्योधनक अत्याचार। जाएब हमहुँ सभ संग, धर्मराज आइ, धर्मराज घुराओल सभकेँ बुझाए जाए। सभ घुरि गेल मुदा, नहि घुरल विप्र जन, पुरहित कएलन्हि उपासना सूर्यक एहि क्षण। वैह दैत छथि अन्न-फल समग्र आर्य, उपासनाक उपरान्त प्रगट भेलाह सूर्य। देलन्हि अक्षय पात्र नहि कम होएत अन्न, द्रौपदी सभ विप्रकेँ आ पाण्डवकेँ खोआबथि, फेर खाथि, सभ अघाथि, नञि होए खतम, जखन नञि होए खतम पात्रसँ खाद्यान्न। युधिष्ठिर पहुँचि सरस्वती धारक कात, काम्यक वनमे कएलन्हि निवास। एहि बीच सुनैत पाण्डव-प्रशंसा मुँहसँ विदुरक, धृतराष्ट्र निकालि हटाओल विदुरकेँ दरबार-मध्य। ओहो आबि लगलाह रहए काम्यकवनमे, पुनि पठाओल धृतराष्ट्र ओतए संजयकेँ। पाण्डव-जनक बुझओला उत्तर विदुर, धृतराष्ट्र सँग गेलाह पुनि दरबार घुरि। ऋषि-मुनिक सत्संगसँ लैत शिक्षा आ दीक्षा, अगस्त्यक, ऋषि श्रृंग, अष्टावक्रक, लोपामुद्राक, सुनैत छलाह कथा सरिता नल दमयन्तीक । कृष्ण आबि बुझाओल ब्यास अएलाह !! ब्यास कहल युद्धक हेतु करू तैय्यारी, बिनु इन्द्रक अमोघ शिवक पाशुपत्याह, कोना लड़ब संग भीष्म द्रोण महारथी ? पाबि युधिष्ठिरक आज्ञा चललाह अर्जुन, पर्वत कैलास पर पार कए कऽ गंधमदन। तूणीर आ धनुष हुनकर संगमे छल, साधु जटाधारी तपस्वी अर्जुनसँ पुछल। ई छी तपोभूमि शस्त्रक काज नहि कोनो, अर्जुन कहल हम क्षात्र धर्म कहाँ छोड़ल। तावत शस्त्र सेहो ताहि द्वारे राखल अछि, प्रसन्न भए इन्द्र अपन असल रूप धरल। माँगू वत्स वर हमरासँ प्रसन्न छी हम, शिक्षाक संग दिव्यास्त्र भेटए एहि क्षण। अर्जुन अहाँक ई लालसा पूर्ण होएत मुदा, जाऊ शिवकेँ प्रसन्न कए पाशुपत पाऊ। फेर देवगण देताह दिव्यास्त्र अहाँकेँ, ई शस्त्र सभ मानव पर चलाएब अछि वर्जित, कहू अहाँ पाबि करब की दिव्यास्त्र सभ ई। शक्त्ति-संचय अछि हमर उद्देश्य मात्र देव, कौरव छीनल अछि राज्य छलसँ परञ्च, नहि करब एकर कोनो कुप्रयोग नहि हम। इन्द्रक अन्तर्धान भेलाक उत्तर अर्जुनक, शिव तपस्या कठोर छल होमए लागल। तखन पार्वती संग शिव चललाह तपोभूमि, अर्जुन पुष्प बीछि रहल छलाह अबैत क्षण, वाराह वनसँ निकलि कए सम्मुख आएल। जखनहिँ तूणीर धनुष राखि संधान कएलक, किरात वराहकेँ लक्ष्य कएने दृष्टि आएल। दुनू गोटे चलाओल वाण वाराह मारल, एहि बात पर दुहू गोटे झगड़ा बजारल। अर्जुनक गप पर जखन ठठाइत किरात, अर्जुन ओकरा पर तखन वाण चलाओल, परञ्च देखि नहि घाव कोनो प्रकारक, अर्जुन किरात पर छल तलवार भाँजल। मुदा किरातक देहसँ टकाराइत देरी, भेल अर्जुनक खड्गक टुकड़ी छुबैत देरी। मल्ल युद्ध शुरू भेल भेल अचेत अर्जुन, उठल जखन शुरू कएल पूजन कुलदेवक ओ, पुष्प पहिराए शिवकेँ उठल गर छल ओ माला, किरातक गरदनि मध्य, देखि साष्टांग कएल तहिखन। किरात वेशधारी शिव कहल वर माँग अर्जुन, पाशुपत अस्त्र माँगल, छोड़ब रोकब एकरा सीखल पुनि। शिव कहल बुझू मुदा ई तथ्य अछि जे, मनुष्यक ऊपर एकर प्रयोग कखनहु करब नञि। तखन अर्जुन निकलि गेल इन्द्रलोक दिशामे, पाबि दिव्य अस्त्रक शिक्षा मारल असुर ओहिसँ। एक दिनुक गप उर्वशा आयलि करैत याचना प्रेमक, अर्जुन कहल अहाँ तँ छी अप्सरा गुरु इन्द्रक। माता तुल्य भेलहुँ ओहि संबंधसँ अहाँ हमर, आएल छी हम एतए शिक्षा प्राप्तिक लेल शस्त्रक, तपस्या नृत्यक आ संगीतक करए भोग नहि, ताहि दृष्टिये अहाँ भेलहुँ हमर माता गुरु दुनु। उर्वशी तखन देलक ओकरा शाप ई टा, कामिनीक अहाँ शाप सुनू निर्वीर्य रहब अहाँ । वर्ष भरि मुदा किएक तँ कहल माता, शाप ई पुनि बनत वरदान नुकाए सकब अहाँ। पाण्डव जन सेहो पाबि रहल ऋषि मुनिसँ शिक्षा, समाचार देलन्हि नारद अर्जुनक कहल अएत, लोमश ऋषि आबि समाचार अर्जुनक सुनाएत। किछु दिनमे लोमश ऋषि अएलाह ओतए, कहल प्राप्त कए पाशुपत शिवसँ कैलासमे, अर्जुन देवलोकमे प्राप्त दिव्याशस्त्र कएल, नृत्य संगीतक शिक्षा अप्सरा गंधर्वगणसँ लए रहल शिक्षा अर्जुन देवलोकमे सनजम सँ। तखन ऋषि तीर्थाटन कराऊ हमरा लोकनिकेँ, लोमश तखन गेलाह नैमिषारण्य पाण्डव संग। प्रयाग गया गंगासागर पुनि टपि कलिंग पहुँचल, पच्छिम दिशि प्रभासतीर्थ यादवगण जतए छल। स्वागत भेल ओतए सुभद्रा मिललि द्रौपदीसँ, बलराम कृष्णक सांत्वना पाबि बढ़ल आगाँ, सरस्वती पार कए कश्मीर आ गंधमादन पर्वत, पार कए चढ़ल पर्वत वर्षा आ शिलापतन बिच। पहुँचि गेलाह बदरिकाश्रम विश्राम कएल ठहरि। ओतहि दुःशला पति जयद्रथ काम्यक वनसँ, छल जा रहल देखल द्रौपदीकेँ असगर ओतए, पाण्डवगण गेल छल शिकारक लेल तखन। बैसल कुटीमे विवाह प्रस्ताव देल द्रौपदीकेँ, नीचता देखि द्रौपदी कठोर वचन जखन कहल, रथमे लए भागल अपहरण कए दुष्ट जयद्रथ। आश्रम आबि पाबि समाचार भीम ओकरा पर छुटल, तखनहि अर्जुन सेहो आएल पाछू जयद्रथक गेल, युधिष्ठिर कहल प्राणदान देब पति दुःशलाक छी ओ, जयद्रथ देखल अबैत दुनू भाएकेँ द्रौपदीकेँ छोड़ि भागल, भीम पटकि बान्हि आनल ओकरा द्रौपदीक सोझाँ, द्रौपदी अपमानित कए छोड़बाओल ओकरा। शिवक तपस्या कएल जयद्रथ वरदान माँगल, जितबाक पाँचू पाण्डवसँ कहल शिव ई, नहि हारब अहाँ कोनो भाएसँ अर्जुनकेँ छोड़ि। ब्यास परिश्रमकेँ तपस्याक नाम देल, आँखि मूनि मुदा ई पश्चात् मञ्चित भेल !! कर्ण छल तपस्या कए रहल अर्जुनकँ हरएबा लेल, इन्द्र सोचल शरीरक कवच कुण्डल अछैत ओ, हारत नहि ककरहुसँ दानवीर पराक्रमी ओ छल। सोचि ओकरासँ हम माँगब कवच कुण्डल, देखि ई सूर्य कएलन्हि होऊ सचेत कर्ण, आबि रहल इन्द्र छद्म वेषमे याचना करत ई, कवच कुण्डल छोड़ि किछु माँगत नहि ओ। कहल कर्ण याचककेँ हम नहि नञि कहब प्रण, प्रण हमर नहि टूटत चाहे जे परिणाम होमए। तखनहि विप्र वेशमे इन्द्र आबि दुहु वस्तु माँगल, ठोढ़ पर मर्मक मुस्की कर्णक हाथ शस्त्र आएल, काटि देहसँ कवच कुण्डल समर्पित कएल तखनहि, इन्द्र देल वर माँगू छोड़ि ई वज्र हमर आर किछुओ, अमोघ शक्त्ति माँगल कर्ण इन्द्र देलन्हि कहि कए, मारत जकरा पर चलत पुनि घुरत लग हमर अएत। शनैः-शनैः छल बीति रहल बारह वर्ष एहिना, एक वर्षक अज्ञातवासक विषयमे विचारि रहल, विचारि युधिष्ठिर रहल भाए आ द्रौपदीक संग, तखने कनैत खिजैत एकटा विप्र आएल । कहल अरणीक लकुड़ी छल कुटीक बाहर टाँगल, हरिण एक आबि कुरयाबए लागल ओहिसँ, जाए काल सिंहमे ओझरायल अरिणी ओकर, विस्मित भागल ओ लए हमर लकुड़ी, कोना कए होमक अग्नि आनब चिन्तित छी। विप्रक संग पाँचो भाँए हरिणकेँ खेहारल, मुदा छल ओ चपल भए गेल ओझल। वरक गाछक नीचाँ ओ सभ लज्जित पिआसल, ठेहिआएल बैसल नकुल गेल सरोवर पानि आनए। एकटा ध्वनि आएल ई चभच्चा हमर छी, उत्तर हमर प्रश्नक बिनु देने पानि नञि भेटत ई। नहि कान देल ओहि गप पर हकासल पिआसल, पानि जखने पिएल अरड़ा कए मृत ओ खसल। सहदेवक संग सेहो एहने घटना घटल छल, अर्जुन जखन आएल फेर वैह ध्वनि सुनल । शब्दभेदी बाण छोड़ल मुदा नहि कोनो प्रतिफल, पानि पीबैत देरी ओहो मृत भए खसल छल। युधिष्ठिर भए चिन्तित भीमकेँ पठाओल ताकए, पानि पीबि मृत भए नहि घुरल ओतए। युधिष्ठिर जखन वन बीच सरोवर पहुँचल, मृत भाए सभकेँ देखि व्याकुल पानिमे उतरल। वैह ध्वनि आएल उत्तरक बिना प्यासल रहब, होएत एहि तरहक परिणाम ज्योँ धृष्टता करब। ई अछि कोनो यक्ष सोचि युधिष्ठिर बाजल, पुछू प्रश्न उत्तर सम्यक देब शुरू भेल यक्ष। मनुष्यक संग के अछि दैत? प्रथमतः ई बाजू, धैर्य टा दैछ संग मनुक्खक सदिखन सोकाजू। यशलाभक अछि कोन उपाय एकटा? दान बिनु यश नहि भेटैछ कोनोटा। वायुसँ त्वरित अछि कोन वस्तु? मनक आगाँ वायुक गति नहि कतहु । प्रवासीक संगी अछि के एकेटा ? विद्याक इतर नहि संगी एकोटा। ककरा त्यजि कए मनुक्खकेँ भेटैछ मुक्त्ति? अहं छोड़ल तखन भेटत विमुक्त्ति। कोन वस्तुक हराएलासँ नहि होइछ मन दुःखित? क्रोधक हरएलासँ किए होअय क्यो शोकित। कोन वस्तुक चोरिसँ होइछ मनुक्ख धनिक? लोभक क्षति बनबैछ पुष्ट सबहिँ। ब्राह्मण जन्म, विद्या, शील कोन गप पर अवलम्बित? शील स्वभाव बिनु ब्राह्मण रहत नहि किछु। धर्मसँ बढ़ि अछि की जगतमे? उदार मनसि उच्च पदस्थ सभसँ। कोन मित्र नहि होइत अछि पुरान? सज्जनसँ कएल गेल मित्राताक कोना अवसान। सभसँ पैघ अद्भुत की अछि एहि जगमे? मृत्यु सभ दिनु देखनहु अछैतो जीवन लालसा, एहिसँ बढ़ि अद्भुत आश्चर्य अछि की? प्रसन्नचित्त भए यक्ष कहल युधिष्ठिर कहू, कोनो एक भाएकेँ हम जीवित कए सकब। तखन नकुलकेँ कए दिअ जीवित, सुनि यक्ष पूछल कहब तँ भीम अर्जुन कोनोकेँ, जीवित करब जकर रण कौशल करत रक्षा। धर्मराज कहल धर्मक बिना नहि होइछ रक्षा, कुन्ती पुत्र हम युधिष्ठिर जिबैत छी, माद्री मातुक पुत्र जिबथु नकुल सैह उचित। सुनि कहल हिरण वेशधारी यमराज हे पुत्र, पक्षपात रहित छी अहाँ तेँ सभ भाए जीबथु। पुत्रकेँ देखि मोन तृप्त भेलन्हि यमक, पाण्डव गण तखन घुरि द्रौपदीक लग गेलाह। पूर्ण भेल वनवासक वर्ष बारह अतीत, एक वर्षक छल अज्ञातवास बड़ कठिन, दुर्योधनकेँ यदि हुनक संकेतक चलए पता, पुनि द्वादश वर्षक वनवासक छल प्रथा। प्रातःकाल सभ विदा भेलाह विराट नगर दिशि, धर्मराज कंक नाम्ना ब्राह्मण वेश धारित मिलि। कौड़ी आ चतुरंग गोटीसँ विराटराजक मोन लगाएब, भीम बनि पाचक नाम वल्लभक पाकशाला सम्हारथि। विराटक पुत्रीकेँ संगीत नृत्य अर्जुन, नारी वृहन्नला बनि सिखाबथु, ग्रंथिक नामसँ नकुल अश्वक करए रखबारि, सहदेवक नाम तंत्रपाल भेल करथि चरबाहि। रानीकेँ सजाबथि द्रौपदी नाम धरि सैरन्ध्रीक। सभ ई सोचि नुकाओल अस्त्र-शस्त्र, शाखा बिच शमी-वृक्ष एकटा विशाल मध्य। जखन वेश धरि पहुँचलाह विराट राजा लग, स्वीकारलन्हि ओ सभटा प्रार्थना स्वतः। दिन छल बीति रहल मुदा रानी सुदेष्णाक, भाए छल कीचक दुष्ट देखि सैरन्ध्रीक भेल मुग्ध। बहिनसँ पूछल कोन देशक राजकुमारी छथि, कहल बहिन नहि छी निकृष्ट दासी ई। मुदा कीचक पहुँचि द्रौपदी लग बाजल, सुन्दरी दास बनाऊ हम मुग्ध पागल। सैरन्ध्री कहलन्हि, हम विवाहिता एक दासी, अहाँक पालिता छी नहि पुनि गप ई बाजी। मुदा कीचक बहिनिसँ पुनि अनुरोध कएलक। पर्व दिन सुदेष्णा किछु वस्तु अनबा हेतु कहलक, सैरन्ध्रीकेँ कीचक लग जाए तकरा आनए पठेलक। मुदा ओतए देखि वासनाक आँखि भागलि, भीमसँ जाए बाजलि धिक कहलि पाण्डवकेँ । भीम बाजल आब जे ओ भेँट होअए, नाट्यशालामे बजाऊ आध राति सोचब फेर ई, हमरा की करबाक अछि ओहि दुष्टकेँ ओतए। कीचक विराटक सेनाक प्रमुख सेहो छल, सैरन्ध्रीक आमंत्रणकेँ नहि बूझि पहुँचल अभागल। स्त्री वेष धरने भीम ओतए प्रतीक्षित, केश पकड़ि पटकल, लात-हाथ मारल कीचककेँ ओतहि। भोर होइत ई गप पसरि गेल चारू दिशि, कीचककेँ मारल गंधर्वपति सैरंध्रीक। सैरन्ध्रीक प्रति भय-श्रद्धा दुनू पसरल, दुर्योधन छल बुझल अज्ञातवासक कथा, छल ताकिमे तकबाक पाण्डवक पता, छी ई द्रौपदी सैरन्ध्रीक भेषमे अभरल। पाण्डव छद्म-भेष बनओने छथि गांधर्वक, कीचकसँ अपमानित राजा त्रिगर्त देशक, मिलि दुर्योधनसँ कए गौ-हरणक विचार विराट राजसँ ओ लेत बदला आब। दुर्योधन लए संग भीष्म, द्रोण, कृप, कर्ण, आक्रमण विराट पर लए अश्वत्थामा संग। त्रिगर्त राज सुशर्मा घेरि गौ-विराटराजक, बान्हि विराटकेँ जखन ओ सोझाँ आएल। ललकारि कएल भीमकेँ सोर युधिष्ठिर-कंक, वल्लभ-भीम ग्रंथिक-नकुल तंत्रिपाल-सहदेव। खोलि बन्धन विराटक बान्हि देल सुशर्मन्, वृहन्नला बनि सारथी पुत्र विराटराज उत्तमक। रथ आनल रणक्षेत्र उत्तमकुमार भेल घबराएल, गेल अर्जुन शमी गाछ लग उतारि शस्त्र आएल, गाण्डीव अक्षय तुणीर आनि परिचय सुनाओल। उत्तमकुमार बनल सारथी वृहन्नला-अर्जुनक संग, वेगशाली रथ देखि दुर्योधन पुछल हे भीष्म। अज्ञातवासक काल भेल पूर्ण वा न वा कहू, भीष्म कहल पूर्ण तेरह वर्षक अवधि भेल औ। अर्जुन उतारल अपन रोष कर्ण पुत्र विकर्ण पर, मारि ओकरा बढ़ल आगाँ कर्णकेँ बेधल सेहो। द्रोण-भीष्मक धनुष काटल मूर्च्छित कएल सेना सकल, द्रोण-कृप-कर्ण-अश्वत्थामा-दुर्योधनक मुकुट वस्त्र सभ, उत्तमकुमार उतारल सभटा गौ लए नगर तखन घुरल। मूर्च्छा टूटल सभक जखन कहल करब युद्ध पुनः, भीष्म नहि मनलाह दुर्योधन घुरु बहु भेल आब अः। उत्तमकुमार नहि करब प्रगट भेद हमर अर्जुन कहल, विराट भेल प्रसन्न वीरता सुनि उत्तमक आबि घर। पञ्च पाण्डव द्रौपदीक तखन परिचय हुनका भेटल, प्रस्ताव कएल पुत्री उत्तराक विवाह अर्जुनसँ करब। अर्जुन कहल पढ़ेने छी हमर शिष्या अछि ओ रहलि, पुत्र अभिमन्युसँ होएत विवाहित उत्तरा ई प्रस्ताव छल। वाह ब्यास वाह, बाल-अमेल विवाह विरोध, की चतुरता कौशल कवित्वक कएल औ। कृष्ण-बलराम द्वारकासँ बरियाती अभिमन्युक लए अएलाह, उत्तराक विवाह अभिमन्युक संग भेल बड़ टोप-टहंकारसँ। छलाह आएल राजा वृन्द अभिमन्युक विवाह पर, भेल राजाक सभा जतए कृष्ण कएल विनती ओतए। द्यूत खेल शकुनीक, अपमान द्रौपदीक कएल जे, दुर्योधन छीनल राज्य युधिष्ठिरक अधर्मसँ से। बाजू प्रयत्न राज्य-प्राप्तिक कोना होएत वा, दुर्योधनक अत्याचार सहैत रहथु पाण्डव सतत। द्रुपद उठि कहल दुराचारी कौरवकेँ सभ जनए छथि, कर्तव्य हमरा सभक थिक सहाय बनी पाण्डव जनक। करए लगलाह पांडव युद्धक तैयारी विराट द्रुपदक संग पाबि लगाए कुरुक्षेत्र लग पांडव रुकलाह शिविर पसारि। दुर्योधनकेँ जखन लागल खबरि ओहो कएलक तैयारी, संदेश पठाओल राजा सभकेँ कौरव पांडव तखन, अपन पक्षमे करबा लेल युद्ध शुरु होएत जखन। कुरुक्षेत्रक स्थलीमे सभटा जुटान लागल होए शुरू, यादव गणकेँ पक्ष करबा लए दुर्योधन द्वारका गेल स्वयं। पहुँचि दुर्योधन गेल देखल कॄष्ण छलाह सुतल ओतए, अर्जुन सेहो पहुँचल पैर दिशि बैसि गेल ओ ओतए। कृष्ण जखन उठि देखल अर्जुन छल ओतए, कहू वत्स की चाही अहाँ आएल छी एतए। युद्धमे संग अहाँक हमरा चाही हे नारायण, अर्जुनकेँ बजिते दुर्योधन टोकल अएलहुँ पहिने एतए। कृष्ण कहल हम शस्त्र नहि उठाएब युद्धमे, नारायणी सेना चाही वा हमरा करब अहँ पक्षमे। दुर्योधन नारायणी सेना चुनि भेल संतुष्ट आ, अर्जुनकेँ नारायण भेटल छल प्रफुल्लित सेहो। पांडव मामा छलाह शल्य माद्रीक भाए जे, आबि रहल युद्धक लेल दुर्योधन सुनि गेल ओतए। रस्तामे व्यवस्था-बात कएल तेहन छल, शल्य कहल अछि मोन पुरस्कृत करी काज जकर। दुर्योधन भेख बना जाए रहल छल ओतए, प्रकट भए माँगल युद्धमे होऊ साहाय्य हमर, एहि सभ व्यवस्थाक छी हमही निर्माण कएल। शल्य दए स्वस्ति पहुँचलाह जखन कुरुक्षेत्र, युधिष्ठिर सुनू छल भेल हमरा संग अतए। कौरवक पक्षमे युद्ध करबा लए वचन बद्ध, कहू कोन विध होए साहाय्य अहाँक वत्स। युधिष्ठिर कहल बनू सारथी कर्णक आ करू, हतोत्साहित कर्णकेँ गुणगान गाबि पांडवक। शल्य कौरवक शिविर दिशि चललाह तखन, युद्ध सन्निकट अछि कृष्ण अएलाह जानि सेहो, एतए सुनल द्रुपदक पुरहित गेल छल धृतराष्ट्र लग। संधिक प्रस्ताव पर देलक क्यो नहि टेर ओतए, दुर्योधन कहल राज्य छोड़ू सुइयाक नोक देखने छी? नहि भेटत पृथ्वी ओतबो राज्यक तँ छोड़ू बात ई। ई सुइयाक नोँक भरि पृथ्वीक नहि देबाक बिम्ब छल, दुर्योधनक हठक ई आ धृतराष्ट्रक आकांक्षाक प्रतीक छल। युधिष्ठिर कहल श्रीकृष्णकेँ आध राज्य छोड़ैत छी, जाऊ कृष्ण पाँच गाम दुर्योधन देत ज्योँ राखू प्रस्ताव ई, ओतबहिमे करब हम सभ भाँए माएक संग निर्वाह। सात्यकीक संग कृष्ण हस्तिनापुरक लेल चलला जखन, द्रौपदी कहलन्हि देखू केश फुजले अछि ओहिना धरि एखन, कानि कहल संधि होएत युद्ध बिन खुजले रहत वेणी तखन। कविक बिम्ब सुइया बराबड़ि जे नहि छोड़त हठ अपन, पाँच गामकेँ तँ बुझत ब्रह्माण्ड ओ हठी सदिखन। कृष्ण कहल मानत नहि संधिक गप कखनहुँ दुर्योधन, युद्ध अछि अनिवार्य मनोरथ पूर्ण होएत द्रौपदी अहँक। कृष्ण जखन गेलाह हस्तिनापुर सभ प्रसन्न छल, धृतराष्ट्र, दुःशासन-दुर्योधनक संग स्वागत कएल। मुदा कृष्ण ओतए नहि ठहरि दीदी कुन्तीक लग गेलाह, विदुरक गृहमे छलीह ओतए गप विस्तृत भेल आब। कहल कुन्ती दीदी अहाँ जा कए कर्णकेँ परिचए दिअ, आबि जएत भ्रातृ-पाण्डव लग सत्य ओ जानि कए। दोसर दिन सभामे पहुँचलाह कृष्ण, छल छल ओतए मुदा, दुर्योधन विचारल बान्हि राखब कृष्णकेँ अएताह ज्योँ। भीष्म धृतराष्ट द्रोण कृप कर्ण शकुनि दुःशासन ओतए, कृष्ण कहल शकुनिक चौपड़ दुर्योधनक दिशिसँ फेकब, अन्यायपूर्ण छल ओहिना द्रौपदीक अपमान छल करब। विराट पर आक्रमण पाण्डवकेँ सतेबाक उपक्रम बनल, आध राज्य ज्योँ दए दी तखनो शान्तिसँ रहि सकैछ सभ। सभ कएल स्वागत एकर दुर्योधन मुदा क्रोधित बनल, कृष्णकेँ बन्हबाक आज्ञा देलक भीष्म तमसयलाह बड़। तेज कृष्णक मुखक देखि कौरव भयसँ छल सिहरल। दुर्योधन कहल पिता ज्येष्ठ हमर अंध छलाह से राज्य नहि भेटलन्हि, हुनक पुत्र ज्येष्ठ हम से अधिकार हस्तिनापुर पर अछि सुनलहुँ। पाण्डव अन्यायसँ लए राज्य करए छथि करैत तैय्यारी युद्धक, कृष्ण अछि पाछाँ ओकर हम तँ रक्षा राज्यक करए छी। कृष्ण कहलन्हि तखन पाँच गाम दिअ करबा लए निर्वाह, मुदा दुर्योधन कहल राज्यक भाग नहि होएत गए आब। कृष्ण बाजि जे हे दुर्योधन मदान्ध छी बनल अहाँ, पाण्डवक शक्त्तिक सोझाँ नाश होएत निश्चित बुझू अहाँक। कुन्ती बादमे गेलीह कर्णकेँ कहल दुर्वासाक मंत्र भेटल, पढ़ल सूर्यकेँ स्मरण कए पुत्र हमर भेलहुँ अहाँ तखन। प्रणाम कएल माताकेँ कर्ण तखन बजलीह सुनू ई, ज्येष्ठ पाण्डव छी अहाँ, राज्य युधिष्ठिर देत अहीकेँ। जखन नहि मानल कर्ण कुन्ती पुछल मातृऋणसँ, उबरब कोना, कर्ण बाजल हे माता तखन सुनू ई। अर्जुनकेँ छोड़ि चारू पाण्डवसँ नहि लड़ब पूर्ण शक्त्तियेँ, अर्जुनकेँ मारब तखन बनब पुत्र अहीकेँ। वा मरब हम पुत्र तैयो पाँच टा रहबे करत, ई प्रतिज्ञा हम करए छी माता कुन्ती अएलीह घुरि। कृष्ण आबि घुरि पहुँचि शिविर पाण्डवक जखन, पाण्डव युद्धक कएल प्रक्रिया शुरू ओतए तखन। सात अक्षौहिणी सेना घोड़ा, रथ, हाथी, सैनिकक, अर्जुन भीम सात्यिकि धृष्टद्युम्न द्रुपद विराट लग। कौरव सेहो एगारह अक्षौहिणी सेना कृपाचार्य शल्य भूरिश्रवा, भीष्म द्रोण कर्ण अश्वत्थामा जयद्रथ कृतवर्मा भगदत्त छल। धृष्टद्युम्न सेनापति पाण्डवक भीष्म कौरवक बनल, कर्ण शस्त्र नहि उठेबाक कएल प्रतिज्ञा भीष्म यावत युद्धक्षेत्रमे रहताह गए। भीष्म कहल मारब नहि पाण्डवकेँ एकोटा, सेनाक संहार करब यथा संभव होएत। ब्यास धृतराष्ट्रक लग गेलाह कहल ब्यासजी सुनू, अंधत्व भेल वर हमर कुल संहार देखब नहि किएक। मुदा वीरक गाथा सुनबाक अछि इच्छा बहुत, ब्यास देल योगसँ दिव्यदृष्टि संजयकेँ कहल, बैसले-बैसल देखि संजय वर्णन करताह युद्धक, बाजि ई ब्यास बिदा भए गेलाह ओतएसँ। भेल भोर रणभूमिमे कौरव-पाण्डव जुटल सेना सहित आगाँ भीष्म कौरवक आ पाण्डवक अर्जुन-कृष्ण रहथि। भीष्मक रथक दुहुओर दुःशासन दुर्योधन छलाह, पार्श्वमे अश्वत्थामा गुरु द्रोणक संग भाग्य आह। युद्ध कए राज्य पाएब मारि भ्राता प्रियजनकेँ, सोचि विह्वल भेल अर्जुन गांडीव खसत कृष्ण हमर। कर्मयोग उपदेश देल कृष्ण दूर करू मोह-भ्रम, स्वजन प्रति मोह करि क्षात्रधर्मसँ विमुख न होऊ। अधर्मसँ कौरवक अछि नाश भेल देखू ई दृश्य। विराटरूप देखि अर्जुन विशाल अग्नि ज्वालमे, जीव-जन्तु आबि खसथि भस्म होथि क्षणहि, कौरवगण सेहो भस्म भए रहल छलाह, चेतना जागल अर्जुनक स्तुति कएल सद्यः। फलक चिन्ता छोड़ि कर्म करबाक ज्ञानसँ, आत्मा अमर अछि शोक एकर लेल करब नहि उचित। युधिष्ठिर उतरि रथसँ भीष्मक रथक दिस गेल, गुरुजनक आशीर्वाद लए धर्मपालन मोन राखल। भीष्म द्रोण कृपाचार्य पुलकित विजयक आशीष देल, धृतराष्ट्र पुत्र युयुत्सु देखि रहल छल धर्मनीति छोड़ि कौरव मिलल पाण्डव पक्षमे तत्काल, युषिष्ठिर मिलाओल गर ओकरसँ भेल शंखनाद। अर्जुन शंख देवदत्त फूकि कएल युद्धक घोषणा, आक्रमण कौरवपर कए रथ हस्ति घोटक पैदल, युद्धमे पहिल दिन मुइल उत्तर विराटक पुत्र छल। भीष्म कएल भीषण क्षति साँझमे अर्जुनक शंख, बाजि कएल युद्धक समाप्ति भीष्म सेहो बजाओल अपन। पहिल दिनक युद्धसँ पाण्डव शोकित दुर्योधन हर्षित। दोसर दिनक युद्ध जखन शुरू भीष्म आनल प्रलय। कृष्ण एना भए हमर सेना मरत चलू भीष्म लग, हँ धनञ्जय रथ लए जाइत छी भीष्मक समक्ष। दुहुक बीच जे युद्ध भेल विकराल छल थरथराएल सकल। भीम सेहो संहारक बनल भीष्म छोड़ि अर्जुनकेँ ओम्हर दौगल, सात्यिकीक वाणसँ भीष्मक सहीसक अपघात भेल, खसल भूमि तखन ओ भीष्मक घोड़ा भागल वेगमान भए, साँझ भेल शंख बाजल युद्ध दू दिनक समाप्त भेल। तेसर दिन सात्यिकी अभिमन्यु कौरवपर छूटल, द्रोणपर सहदेव-नकुल युधिष्ठिर आक्रमण कएल, दुर्योधनपर टूटल भीम वाण मारि अचेत कएल, ओकर सहीस दुर्योधनकेँ लए चलल रणक्षेत्रसँ, कौरव सेना बुझल भागल छल ओ युद्ध छोड़ि कए। भागि रहल सेनापर भीम कएलन्हि आक्रमण, साँझ बनि रक्षक आएल दुर्योधन कुपित भएल। भीष्मकेँ रात्रिमे कहल अहाँक हृदय अछि पक्षमे पांडवक, भीष्म कहल छथि ओ अजेय परञ्च युद्ध भरि सक करब। सक भरि युद्ध करबाक बात कहल भीष्म दुर्योधनकेँ, चारिम दिन कएल आक्रमण प्रबल वेगेँ, अर्जुन कएल प्रयत्न रोकबाक हुनका व्यर्थ, पाँचम छठम आ सातम दिन एहिना सेहो बीतल। आठम दिनक युद्ध भेल घनघोर, अर्जुनक दोसर पत्नी उलूपीक पुत्र इरावान, युध्य मध्य मरल अर्जुन भेल अधैर्य। कएल युद्ध भयंकर भीष्मकेँ नहि टेरल, दुर्योधन छल चिन्तित कर्णक ठाम गेल, घुरि भीष्मकेँ कहल अहाँ छी अन्हेर कएल। एहन रहत तखन बनाएब कर्णकेँ सेनाध्यक्ष, भीष्म कहल बताह छी अहाँ भेल, कर्णक वीरता विराटयुद्धमे नहि देखल? नवम दिनक युद्ध छल भयङ्कर, अर्जुनक रथकेँ भीष्म वाणसँ तोपल, कृष्ण-अर्जुन अपघात रथ क्षतिग्रस्त, घोटक रुकल अर्जुन शिथिल पस्त। कौरवक उत्साह छल देखबा जोगर, कृष्ण क्रोधित रथक पहिया लए छूटल, मारब भीष्म खतम करब ई युद्ध। अर्जुन पैर पकड़ि कए कहल हे कृष्ण शस्त्र नहि उठएबाक कएने प्रतिज्ञा छी लज्जित रथसँ कूदि छी हम आएल, भीष्म सेहो देखल भए भाव-विह्वल। रूप तेजमय शस्त्र लेने कृष्ण। कृष्णक क्रोध भेल जा कए शान्त, साँझक शंख कएल दिनक युद्धांत। रातिमे युधिष्ठिर पुछलन्हि हे नन्दक नन्द, भीष्मक पराजयक अछि की रहस्य, भीम कहल अर्जुन नहि जानि किएक, नहि प्रयोग कए रहल दिव्यास्त्र भीष्मपर। कृष्ण कहलन्हि चलू पाँचू भाँए, पूछि आबी हुनकहिसँ हुनक उपाय। सभ पहुँचि पूछल बताऊ हे भीष्म, अहाँक रहैत नहि हारत कौरव कथमपि। सत्य धर्म दुहु भए जएत अलोपित, भीष्म कहल छी देखि रहल भए त्रस्त, अर्जुन नहि करि रहल प्रयोग दिव्यास्त्र, मुदा हस्तिनापुरक सिंहासनसँ कटिबद्ध, हा दुर्भाग्य! असत्यक मर्यादाक रक्षार्थ ! अछि शिखण्डी द्रुपदक पुत्र अहाँक पक्ष, पूर्वजन्मक स्त्री अछि शिवक कएल व्रत, हमर वधक लेल अछि सतत प्रतिपल। द्रुपदक घरमे स्त्रीक रूप जन्म छल लेल, दानवक वरसँ पुरुष रूप बनि गेल। गुण स्त्रीत्वक अछि ओकरामे पार्थ, स्त्रीगण हमर वाणक नहि छथि पात्र। शिखण्डीकेँ सोझाँ कए जे वाण अहाँ चलाएब, पूर्ण विवश तखने हम पार्थ भए जाएब। भए आस्वस्त प्रणाम कए भीष्म पांडवगण, घुरल दसम दिनुका युद्धक छल आयोजन। आइ सेहो भीष्मक वाणक भेल बरखा, मुदा शिखण्डी आएल सोझाँ हुनकर। राखल अस्त्र भीष्म चलाओल वाण शिखण्डी, मुदा कोनो नहि जोड़ ओकर वाणक छल किन्तु, कृष्ण कहल लए अढ़ शिखण्डीक अर्जुन, भीष्मक देहकेँ गाँथू करू नहि चिन्तन। अर्जुनक शंका सुनि कहल तखन कृष्ण, अस्त्र-शस्त्र संग जीतत क्यो नहि भीष्म, अपनहि छथि ओ उपाय एहन बताओल, बिनु विलम्ब कए वाण अहाँ चलाऊ। अर्जुनक वाणक शुरू भेल बरखा, खसल भीष्म पृथ्वी शय्या छल वाणक, शरशय्यापर खसैत भीष्मक देरी छल, युद्ध खतम भेल ओहि दिनक तत्काल। कौरव पाण्डव जुमि अएलाह समक्ष, भीष्म कहल दिअ गेरुआ माथतर। अह। महग गेरुआ लए प्रस्तुत दुर्योधन छल, ताकल भीष्म अर्जुन दिस अर्जुन भए साकांक्ष, तीन वाण चलाओल आधार माथक भेल । प्यासल भीष्म जलक लेल कहल पुनः ई, दुर्योधन स्वर्ण-पात्रमे जल अनबाओल, ताकल भीष्म अर्जुन दिस फेर पार्थ चलाओल, वाणसँ सोत निकलल जलक ऊपर दिस, पानि खसल मुख भीष्म भेलाह फेर तिरपित। सूर्य छथि अखन दक्षिणायणमे जाऊ सभ क्यो, प्राण त्यागब हम उत्तरायणमे पहुँचल कर्ण सेहो। करबद्ध प्रणाम कए लए आशीर्वाद ठाढ़ ओतए, भीष्म कहल हे कर्ण युद्धकेँ रोकू कुन्तीपुत्र अहाँ छी, अर्जुनकेँ नहि हरा सकब अहँक तुच्छ इच्छा ई। कोन युद्धमे अर्जुनसँ छी बलशाली देलहुँ प्रमाण? अहाँ बुझाएब दुर्योधन मानत छी हम जानि। कर्ण कहल हम सारथीपुत्र दुर्योधनक पाओल सम्मान, राजा भेलहुँ दुर्योधनक ऊँच उठाओल हमरा, पाण्डव पौत्र अहाँक रहथि शस्त्र उठाओल किएक? कौरवगणकेँ अहाँ किएक नहि बुझाओल, युद्ध बढ़ल अछि आगाँ, कोना हम छोड़ब दुर्योधन मजधार। दस दिनक युद्ध भेल बाद, द्रोण बनलाह सेनापति आब। दुर्योधन कहल करू एक काज, युधिष्ठिरकेँ पकड़ि करू युद्ध समाप्त। मुदा अर्जुन अछि ओतए सतत, दूर हटएबाक करू कोनो अर्थ, दुर्योधन बजाओल राजा देश त्रिगर्त, राज सुशर्मा संस्पतक संग चलत, लए अर्जुनकेँ दूर युधिष्ठिरक। ओम्हर पाण्डव कएल युधिष्ठिरक रक्ष उपाय, रक्षक रहत अर्जुन-भीम दुहु ओर दुहु भाए। होएत किं कारणसँ कनिको दूर ज्योँ क्यो, नकुल सहदेव सात्यिकी लेत स्थान रिक्त ओ। द्रोणक संग छल कर्ण अशवत्थामा, जयद्रथ कृप,कृतवर्मा, कलिंग नरेश। त्रिगर्तराज सुशर्मा देलक ललकारा, अर्जुन देखि सतर्क कएल सात्यिकी केँ। गुरुशिष्य बिच आब शुरु होएत युद्ध, तीर दुइ टा छोड़ि अर्जुन कएल आरम्भ, खसल पदपर द्रोणक अर्जुनक ई दुहु वाण। आह ब्यास प्रणाम !! कए प्रणाम लए आशीष गुरुक आइ अर्जुन, भिन्न रीतिक प्रेम नहि छल नुकाएल कहाँ। कएल आक्रमण पाण्डवपर सोझाँसँ द्रोण पार्श्वसँ कर्ण, सुशर्माक पाछाँ अर्जुन शल्य आबि गेल लड़बा लए भीमसँ, कर्ण कएल आक्रमण सात्यिकी छल त्वरित ओतए। सहदेवसँ भिड़ल शकुनि नकुल टा बाँचल ओतए, द्रोण बढ़ल सोर भेल पकड़ल द्रोण युधिष्ठिरकेँ, अर्जुन छोड़ि त्रिगर्त नरेश घुरि आएल जे, द्रोण छोड़ल आशा पकड़बाक युधिष्ठिर, साँझ भेल युद्ध बन्दीक शंखनादक बिच। बारहम दिन सेहो त्रिगर्त सभ देल ललकारा, मुदा वेगसँ आक्रमण कए अर्जुन कएल संहार, घुरि बढ़ल देखल भगदत्त छल हाथीपर सवार, हाथीक-अंकुश फेंकि कएल ओ अर्जुनपर प्रहार, कृष्ण रोकल अंकुश, अर्जुन लेलक ओकर प्राण, अर्धचन्द्र वाणसँ। द्रोण बढ़ल युधिष्ठिर दिस सत्यजित रक्षक छल आइ, मारि अश्वकेँ द्रोणक सत्यजित रथक पहिआ देल काटि। द्रोणक अर्धचन्द्रवाणसँ सत्यजितक गरदनि खसल अरड़ाए। युधिष्ठिर मरितहि देखि सत्यजितकेँ घुरल रणसँ अविलम्ब, अर्जुन नहि पाबि युधिष्ठिर भेल बताह मारल जन अथाह, द्रोण देखि अर्जुनक ई रूप भेलाह हताश संध्याक शंखक आश। दिन बितल दुर्योधन कहल हे गुरु द्रोण, स्नेह अछि अहाँक पाण्डवक प्रति तेँ ई दोष, द्रोण भेल क्षोभित कहल बनाएब चक्रव्यूह जकर तोड़, अर्जुनक अतिरिक्त युधिष्ठिरक लग अछि नहि व्योँत। फेर तेरहम दिनक युद्ध भेल शुरु जखन, संसप्तक आ त्रिगर्तकेँ पछुआबैत गेल अर्जुन। तखनहि युधिष्ठिरकेँ पता चल चक्रव्यूहक, अभिमन्यु देखि चिन्तित काकाकेँ कहल, गर्भमे सुनल पिता माताकेँ वर्णन सुनबैत छल, च्क्रव्यूहक छह द्वारकेँ तोड़बाक सभटा, स्मरण युद्धक वर्णनक विधि बचल नहि कोनोटा। मुदा सातम द्वारक युद्धक वर्णन सुनल नहि, माता सुतलि तखने बचल एकेटा द्वार सैह। कवि ब्यासक पेटमे सीखि अएबाक बिम्ब, शब्दार्थ नहि वीरक अछि ई प्रतीक । सोझाँ तखन बढ़ल अभिमन्यु ककरो नहि बुझाएल, कतए अछि द्वार कतए प्रवेश जयद्रथ रक्षक जतए, आउ भीम काक ई अछि प्रवेश द्वार पैसब एतहि। अभिमन्यु कए प्रहार जयद्रथपर वाणसँ गेल भीतर, भीम दोसर सेनानीकेँ रोकि जयद्रथ ठाढ़ ओतहि। दोसर द्वारपर द्रोण ठाढ़ जखने वाण चलाबथि, काटल धनुष द्रोणक व्यूह भेदि बढ़लाह आगू। तेसर द्वारपर चकित कर्णपर कए वाण बरखा, बढ़ल चारिम द्वारपर अश्वत्थामा जतए छल, युद्ध भेल घनघोर एतए मुदा रोकि सकल नहि, अभिमन्युक रथ बढ़ल दुर्योधन भेल चिन्तित, कर्ण आब करब की बाजू पराजय बुजाइछ निश्चित। कर्ण बाजल सभ मिलि सातो महारथी हम सभ, रोकि सकब एहि बालककेँ नहि क्यो सकत असगर। सभ रथी आ पुत्र दुर्योधनक नाम लक्ष्मण जेकर, पहुँचि गेल सातम द्वार पहुँचल अभिमन्यु तावत। अभिमन्युक सारथी देखि ई दृश्य ओतए कहल, ई सभ अधर्मी अछि जुटल, कहू तँ रथ घुराएब, अर्जुन पुत्र हम नहि छोड़ब युद्ध हम एना देखू, पार्थ-पुत्रक शौर्य रथ घुमाऊ चक्राकार कए अहँ। तखन लक्ष्मण आएल सोझाँ अभिमन्युक ओतए, वाणसँ काटल मस्तक लक्ष्मणक, द्रोण कहल, अजेय ई अछि अभेद्य एकर कवच करू प्रहार सिरसि आ तखनहि सारथि अभिमन्युक खसल टूटि गेल रथ । नीचाँ आबि तरुआरि चक्र गदा लए ओतए ओ चलल, दुःशासनक पुत्रसँ गदा युद्ध भेल दुनू ओतहि खसल । पहिने उठि दुःशासनक पुत्र प्रहार कएलक मस्तकपर, सप्तरथीक बीच खसि पड़ल सुभद्रापुत्र पति उत्तराक। सुभद्रा उत्तरा पहुँचि गेलीह सातम द्वार विलखैत, उत्तरा कहलन्हि माता मृत्युक आज्ञा दिअ एतहि। मुदा गर्भ छल उत्तराक पेटमे सुभद्रा बुझओलन्हि, ओम्हर त्रिगर्त संसप्तककेँ करि पूर्णरूपेँ संहार, अर्जुन घुरल सोचैत युधिष्ठिर होथि सुरक्षित । सुनि मृत्युक समचार विचल कृष्ण कहल अर्जुन, कारण मृत्युक अछि मात्र बहनोइ-जयद्रथ, कए शिवक तपस्या भेटल वर ओकरा ई, अर्जुन छोड़ि आन पाण्डव नहि जीतताह ओकरा। प्रथम द्वारपर ठाढ़ ओ रोकल चारू भाँएके ओतहि। सुनतहि ई अर्जुन कएल वध करब काल्हि सूर्यास्तक पहिने, जयद्रथक वध करब नहि तँ करब अग्निकेँ समर्पित ठामहि। चौदहम दिनक युद्ध भेल प्रारम्भ, शकट-व्यूह द्रोणक झाँपल जयद्रथ । द्वारपर व्यूहक प्रहरी द्रोण छलाह ठाढ़, विकट युद्ध कृष्ण लेल रथ कनछियाह । द्रोण ललकारि कहल अर्जुन युद्धसँ रहल छी भागि, मुदा अर्जुनकेँ आइ छल दोसर धुनि सबारि । कृष्ण रथ लए भीतर व्यूहमे पैसलाह, बेरू पहर चिन्तित युधिष्ठिर पठाओल सात्यिकी भीम, जाऊ अर्जुनक सहायार्थ कहि दुनू बढल आगाँ । भूरिश्रवा कएलक आक्रमण सात्यिकीपर तखन, वाण अर्जुनक बढ़ल ओकर दिस दुहु हाथ कटल ओकर । की कएल अर्जुन अहाँ हम लड़ि रहल छलहुँ सात्यिकीसँ, हमर हाथ काटल अहाँ अछि कोन न्याय बताऊ फरिछाकेँ। अर्जुन कहलन्हि अभिमन्युक वध कएल अहाँ सभ कोना, न्यायक बात करए छी, रक्षा कएल हम सत्यिकीक जेहाँ। भूरिश्रवा खसल अचेत सात्यिकी काटल मूड़ी भूरिश्रवाक । अर्जुन देखि भीम सात्यिकीकेँ भेल चिन्तित घुरल, युधिष्ठिरक मोन छलन्हि हुनका पड़ल । तखने सूर्यास्त भेल अर्जुन उतारि देल गाण्डीव, चिता छल सोझाँ आगि धहधह, करैत पाण्डवक आँखि झिलमिल। बढ़ल अर्जुन बिना शस्त्र-अस्त्र चिता दिस, बाजल कृष्ण क्षत्रिय अर्जुन लए अस्त्र जाऊ चितामे, अक्षय तूणीर गाण्डीव नहि त्यागी मृत्यु संग जएत। मुदा जखने अस्त्र लेलन्हि अर्जुन सूर्य निकलल घटासँ, सोझाँ छल जयद्रथ अपटी खेतमे मरल ओतहि अर्जुनक हाथेँ। मुदा कृष्ण कहलन्हि आब दुर्योधन करबाओत कर्णक अमोघ अस्त्रक प्रयोग, भीमपुत्र घटोत्कचकेँ बजाऊ राक्षसी युद्ध रातिक करत ओ भयङ्कर, आएल रातिमे घटोत्कच कए बरखा पानि आँकड़-पाथरक तत्क्षण । दुर्योधन देखि रूप ई विकराल भागैत कौरव सेनाकेँ देखल, कर्ण मारू एकरा नहि तँ युद्ध निकलल जाइत अछि सकल। विवश भए कर्ण छोड़ल अमोघ मरल घटोत्कच तखन, पाण्डव दुखित भएल छल कर्ण सेहो चिन्तित। रातिक भेल आक्रमणसँ क्षुब्ध क्रुद्ध कौरव आ द्रोण अएलाह, युधिष्ठिरक रक्षार्थ एक दिस द्रुपद छल दोसर दिस विराट तकरा। देखितहि द्रुपदकेँ द्रोणक खून छल खौलि गेल दिव्यास्त्रसँ लेल प्राण, द्रुपद पुत्र धृष्टद्युम्न पांचाल सेनाक संग आएल बिच बरखाक वाण। प्रचंड रूप देखि द्रोणक कृष्ण कहल हे युधिष्ठिर अवन्तिराजक हस्ति, नाम अछि अश्वत्थामा ओकरा मारल अछि भीम सद्यः। पूछथि द्रोण जे अश्वत्थामा अछि मरि गेल तखन अहँ, कहू हँ, मरि गेल अछि भीम मारल एखन तुरत। तखनहि सोर भेल मरबाक अश्वत्थामाक सौँसे, द्रोण अधीर रथ अगुआए पूछल युधिष्ठिर, की अछि बात सत्य मरल अश्वत्थामा रणक बिच? कहल युधिष्ठिर हँ मरल अछि ओ नर नहि, छल ओ कुञ्जर, मुदा नर युधिष्ठरक कहितहि बजल छल शंख कृष्णक। शोक-विह्वल द्रोण फेकि शस्त्रार्थ ध्यानमग्न बैसलाह रथपर, धृष्टद्युम्न काटल हुनक मस्तक खड्गसँ अश्वत्थामा भेल व्याकुल। छोड़ए लागल दिव्यास्त्र पाण्डवपर अर्जुनकेँ छोड़ि नहि छल क्यो सक्षम, साँझ धरि अर्जुन-अश्वत्थामा दुहु मध्य होइत रहल ई युद्ध निरन्तर। रात्रिमे दुर्योधन कएलक प्रण अर्जुनक मृत्युक भेल आवाहन, कर्णकेँ सेनापति बनाए कएलन्हि कौरवक गण सोलहम दिनक युद्धक प्रारम्भ। कर्णक शंखध्वनिसँ भेल युद्ध शुरू, कर्णक तापसँ युद्धभूमि स्तब्ध, नकुल सोझाँ पाबि अपघात कए छोड़ल प्राण कुन्तीक देल कर्णक वर प्राणदान। कृष्णक आवाहन अर्जुन अहाँकेँ छोड़ि, क्यो नञि कए सकत विजय कर्णक ऊपरि, वेगसँ जे बढ़ल अर्जुन आगाँ भेल शुरु बरखा, बरखा वाणक कौरवगणक अर्जुनक समक्ष, मुदा अर्जुनक सोझाँ सभ भेलाह पस्त, मुदा तखने भेल सोलहम दिनक सूर्यास्त। रात्रिमे कर्ण कहलन्हि हे मित्र दुर्योधन, अर्जुनक रथमे होइछ ढेर-रास शस्त्रक अटावेश, गाण्डीव आ अक्षय तूणीरक नहि कोनो जोड़, हुनकर अश्वक गति नहि कोनो थोड़, कृष्ण सन सारथी। शल्य बनथि हमर सारथी यदि, होएताह ओ कृष्णक तोड़, मुदा शल्य कहलन्हि अछि हमर मुँहपर नहि जोड़, कर्णकेँ से होए स्वीकार तँ हमरा कोनो हर्ज नहि। सत्रहम दिनुका युद्ध भेल शुरू कर्णक आक्रमण शुरू, अर्जुन बढ़ल आगू शल्य कहल भिरू महाप्राक्रमी अर्जुनसँ, कर्ण देखलन्हि भीमकेँ करैत संहार चलू शल्य ओहि पार, भीमक रूप आइ प्रचण्ड छोड़ल वाण चीड़ि कवच कर्णक गाँथल देह, अचेत कर्णकेँ लए भगलाह शल्य रणभूमिक कात-करोट। देखि ई दृश्य भीम भेलाह आर तीव्र, दुर्योधन हुनकर सोझाँ पठाओल दुःशासन वीर। गदा युद्ध दुहुक मध्य छल भेल भयङ्कर, भीमक मस्तक प्रहार खसल मूर्छित दुःशासन। भीम हाथ उखाड़ि पीबए लागल छातीक रक्त, भागल कौरवसेना देखि दृश्य एहि तरहक। आब सोझाँ-सोझी अर्जुन कर्णक युद्ध आइ शुरू, कर्ण काटल गांडीवक प्रत्यंचा यावत दोसर चढ़ाबथि, कएल वाणसँ आक्रमण अर्जुन कोहुना कए प्रत्यंचा चढ़ाए, वाण-वर्षा अर्जुनका जखन भेल शुरू, कर्ण शल्य भेलाह चोटिल, कर्णक सहायक सेना भेल नष्ट कर्ण अति व्याकुल। छोड़ल कर्ण वाण दिव्य अर्जुनपर कृष्ण कएलन्हि अश्वकेँ ठेहुनपर ठाढ़, अर्जुनक मुकुटकेँ छुबैत ओ अर्जुनक प्राणक संकट भेल पार। तखनहि कर्णक रथक पहिया धँसल युद्ध मध्य, कर्णक पुकार कनेक काल वाण नहि चलएबाक धर्मक ई युद्ध, विराटक गौअक चोरि अर्जुन कहलन्हि आ अभिमन्युकेँ मारैत काल, धर्म आ धर्मयुद्धक बिसरल छलहुँ अहाँ पाठ । प्राणक भिक्षा मँगैत लगितहुँ अछि नहि लाज। कर्ण उतरि लगलाह रथक पहिया निकालए, अर्जुनक वाण काटल मस्तक कौरवमे हाहाकार भारी। दुर्योधनक सभ भाँयकेँ मारने छालाह भीम तावत, एगारह अक्षौहिणीमे सँ बड़ थोड़ कौरव छल बाँचल, कृपाचार्य बुझओलन्हि दुर्योधन आबो करू सन्धि, मुदा ओ कहल हम अहाँ कृतवर्मा अश्वत्थाम आ शल्य अछैत, सन्धिक गप छी अहाँ करैत। शल्य बनथि सेनापति युद्ध अठारहम दिन रहत जारी। शल्यक भेल उद्घोष ओकर बढ़ल पग युधिष्ठिर छल रोकल। शल्य जखनहि काटल हुनकर एक धनुष, युधिष्ठिर उठाए दोसर धनुष मारल शल्यक अश्व आ सहीस । भेल तखन घमासान युधिष्ठिर लेलन्हि शल्यक प्राण, सहदेव छुटलाह शकुनि आ ओकर पुत्र उलूकपर, लेलन्हि बाप-बेटाक प्राण जुआरीक प्राणान्त। गदा लए दुर्योधन निकलि गेलाह छोड़ि रण, एकटा सरोवर मध्य छल स्तंभ, नुकाएल ओतए दुर्योधन, देखलन्हि जाइत हुनका किछु ग्रामीण। ग्रामीणक चर्च ब्यास केलहुँ कृतार्थ । पाण्डवक संग कृष्ण पहुँचलाह ओतए, किछु ग्रामीण जे देलन्हि पता ओतएक। भीम देलक ललकारा दुर्योधन निकलि आएल, तीर्थसँ घुरैत बलराम सेहो पहुँचलाह ओतए। शिष्य दुर्योधनकेँ दए आशीर्वाद कएल गदा युद्धक शुरुआत, भीम दुर्योधनक बीच बाझल युद्ध घनघोर, कृष्ण देल जाँघपर थपकी मोन पाड़ल भीमकेँ ओकर प्रतिज्ञाक, तोडि जाँघक हड्डी कए मस्तकपर दुर्योधनक गदा-पएरसँ प्रहार । भीमक ई कृत्य छुटलाह बलराम ओकरा पर मार-मार, कृष्ण रोकि दाऊकेँ मोन पाड़ल द्रौपदीक अपमान, भीमक प्रण। छोड़ि दुर्योधनकेँ असहाय, गेलाह सभ पाण्डव भाए। संध्या समय कृतवर्मा कृपाचार्य आ अश्वत्थामा पहुँचि देखल दुर्योधनक दुर्दशा आ प्रलाप । भीमक पादसँ दुर्योधनक मस्तकपर प्रहार, सुनि ई कथ्य अश्वत्थामा लेल पाण्डवक वधक व्रत । दुर्योधन कएल अश्वत्थामाक सेनापति रूपमे अभिषेक, कृतवर्मा कृपाचार्य आ अश्वत्थामा बढ़लाह पाण्डव-शिविर समक्ष। कृष्ण लए पांचो पांडवकेँ गेलाह कतहु अन्यत्र। पाण्डव-शिविरक समक्ष एकटा वृक्ष, नीचाँ सुतलाह कृपा आ कृत । अश्वत्थामाक आँखिमे निन्नक नञि लेष, देखल एकटा पक्षी अबैत, ओहि वृक्षपर कौआसभ सुतल मारि रास, केलक ओ पक्षी सभक ग्रास। देखि ई दृश्य अश्वत्थामा उठाओल कृपाचार्य ओ कृत, भोरक बाट ताकब नहि सुबुद्धि, ई अधर्म कहल कृप । मुदा अश्वत्थाम चलि पड़ल शिविर दिश, हारि पहुंचल पाछाँ-पाछाँ कृत-कृप, हम पैसैत छी भीतर शिविर । बाहर होइत सभकेँ प्राण लिअ अहाँ दुनू गोटे, एतए ठाढ़ लग द्वार। सभ पांचाल धृष्टद्युम्न शिखण्डी समेत, द्रौपदीक पाँचू पुत्रकेँ बुझि पाण्डव देल मारि, अश्वत्थामा देल शिविरकेँ आगिसँ जराए। फेर पहुँचि लए द्रौपदीक पाँचू पुत्रक माथ, दुर्योधन देखि माँगल भीमक मस्तक, ओकर मुष्टिकाक प्रहारसँ मस्तक भेल फाँक, नहि ई नहि भीमक माथ । भोरमे देखल द्रौपदीक पाँचू पुत्रक माथ, कानैत हाक्रोश करैत भेल दुर्योधनक प्राणान्त। भोरमे कॄष्ण पहुँचलाह पाण्डव-द्रौपदीक संग, देखि विनाश भीम चलल अश्वत्थामाक ताकिमे, छल ओ गंग तटपर ब्यासक समक्ष । युधिष्ठिर-अर्जुन संग कृष्ण पहुँचल जाए, पाण्डवक नाशक संकल्प संग अश्वत्थामा छोड़ल ब्रह्मशिरा अस्त्र, अर्जुनक छोड़ल पाशुपत महास्त्र अग्नि वृष्टि सँ सृष्टिक विनाश, बीचमे अस्त्र केर अएलाह नारद आ ब्यास । वाह ब्यास । महाभारतक लिखनिहार । आग्रह करैत जे दुनू गोटे लिअ अपन-अपन अस्त्र सम्हारि, अर्जुन लेलन्हि अपन अस्त्र सम्हारि मुदा, अश्वत्थामा कहल नहि घुरि सकत हमर अस्त्र आइ । ऋषिक प्रतिकार ब्रह्मशिरासँ होएत उत्तराक गर्भक नाश, मुदा अश्वत्थामकेँ देमए पड़त मस्तकक मणि, भेल ओ निर्बल तपस्वी, ब्यासक आश्रममे बिताओल जीवन सकल। दुर्योधनक पत्नी भानुमति छलि अचेत, गांधारी करथि विलाप, धृतराष्ट्र मूर्छित विदुरक हाक्रोश, पाण्डव घुरल अश्वत्थामाक मणि संग । कृष्ण लेलन्हि लौहक भीमक स्वांग धृतराष्ट्र पहुँचल कुरुक्षेत्र वधू सभक संग। भीमकेँ गर लगाए कएल ओकरा चूर्ण फेर भीम-भीम कहैत प्रलाप, कृष्ण कहल नहि कानू हे धृतराष्ट्र, छल ई लौहक भीम मात्र । गांधारी देल कॄष्णकेँ शाप, जेना कएल अहाँ हमर वंशक नाश, होएत अहूँक कुल नष्ट। मृतकक दाह संस्कारक संग एक पक्ष समाप्त। युधिष्ठिरक मोन विखिन्न, छोड़ल राज-पाटक विचार, ब्यास आबि देलन्हि उपदेश, पलायन नहि अहाँक मार्ग। धौम्य कए वेद मंत्रक गाण राजतिलक युधिष्ठिरकेँ लगाओल। फेर पहुँचि भीष्मक समक्ष लेल अनुशासनक शिक्षा, राजधर्म,लोकधर्म मोक्षधर्मक ज्ञान, प्रजापालन, उठि प्रदेश जातिक विचारसँ ऊपर, राजाक व्रतक करू परिपालन। आएल ओ काल जखन सूर्य भेलाह उत्तरायण, पहुँचलाह युधिष्ठिर संग माता-गांधारी-कुन्ती, धृतराष्ट्र भ्राता मिलि, अट्ठावन दिनक शर-शय्याक अन्तिम उपदेश आ महाप्रयाण, चाननक चितापर भीष्मकेँ युधिष्ठिर देल आगि सभ आक्रान्त। हस्तिनापुरक राज्यमे आएल सुख समृद्धि, युधिष्ठिरक कौशल कएल आशाक वृद्धि, उत्तराकेँ तखने भेल मृत-पुत्रक प्राप्ति, सुभद्रा खसलि कृष्ण लग जाए। कृष्ण उठाए बालकेँ कहल हम नहि कएल पलायन, सत्यसँ सम्बन्ध रहल बनल, पराजित शत्रु कए नहि भेलहुँ हिंसक, यदि ई सत्य तँ बालक जीबि उठथि। ई सुनितहि शिशु भेल जीवित नाम पड़ल परीक्षित। फेर कएल युधिष्ठिर यज्ञ अश्वमेध, सिलेबी अश्वक गरमे स्वर्णपत्र, जिनका युधिष्ठिरक राज्यसँ परहेज, से पकड़ि घोटक करथि एकर विरोध। मुदा घुरि आएल अश्व निष्कंटक, यज्ञ भेल समाप्त निर्विघ्न। बरख पन्द्रह बीतल तखन अएलाह ब्यास, देल उपदेश धॄतराष्ट्र लेल वानप्रस्थ धर्मक ज्ञान, गांधारी, कुन्ती, विदुर, संजयक संग हिमालय प्रयाण, विदुर लेलनि वनहिमे समाधि, दावाग्नि लेलक शेष सभक प्राण। कृष्ण युद्धक बाद गेलाह द्वारका, छलथि प्राप्त कएने सम्मान, मुदा यादव राजकुमार, करथि विद्वानक अपमान । मारि-काटि करथि आपसमे खत्म, देखि दुखित बलराम प्रभासतीर्थ जाए, ओतहि लेल दाऊ समाधि, कृष्ण पहुँचि देखि हुनकर प्राणान्त, गाछ पकड़ि रहथि ठेहिआए । ब्याध जकर छल जरा नाम, हरिण बुझि पैरक तलवामे मारल वाण, भेल कृष्णक प्राणान्त । सुनि ई समाचार मृत्युक वसुदेवक, पिता वासुदेव सेहो कएल जीवनक अन्त। कृष्णक मृत्युक समाचार, पाण्डवराज युधिष्ठिर देल परीक्षितकेँ राज, सुभद्रा केँ दए उपदेश, संग द्रौपदी पहुँचल द्वारका पाँचू भाए। ओतए डूबल समुद्रमे छल ओ नगरी, घुमैत फिरैत चललाह हिमालय सभ गोटे। एक कुकुड़ छल संग चलैत ओतए, हिमालय वृहदाकार हिमपातक मारि, द्रौपदी खसलि मरलि, फेर सहदेव, नकुल अर्जुन भीम खसि मरल फेर-फेर। आगाँ देवलोकक रथ छल ठाढ़, इन्द्र कहल चलू असगर सशरीर युधिष्ठिर, ई कुकुड़ नहि रहए साथ। युधिष्ठिर नहि मानल घुरि जाऊ इन्द्र, बिन एकर नहि जाएब ओतए होए स्वर्ग अहि। छल ओ कुकुड़ यमराज स्वयं, प्रकट भए देल ओ आशीर्वाद ओतए। पहुँचि स्वर्ग देखल कौरव गण सभ ओतए, इन्द्र हमर भ्राता छथि कतए। तखन एकटा दूत लए गेल हुनका नर्कक द्वारिपर, द्रौपदी संग पाँचू भाए छलाह ओतए। कहल युधिष्ठिर हम रहब एतहि हे दूत, छोड़ि हिनका जाएब नहि कतहु। इन्द्र यम पहुँचि गेलाह ओतए। यम कहल यक्ष कुकुड़ बनि हम अहाँ परीक्षा लेल, आइ एहि तेसर परीक्षामे सेहो अहाँकेँ उत्तीर्ण कएल। ई अछि देवलोक मुदा सदेह राजाकेँ, एतुक्का कष्ट देखक लेबाक चाही शिक्षा तेँ, किछु कालक कष्ट हम अहाँकेँ देल। छोड़ू ई शरीर लिअ दैवी रूप आब, कहैत यमक भेल ई परिवर्तन, कर्ण सेहो ओतए बारह आदित्यक संग, रत्नजटित सिंहासनपर छल विराजमान, भारतक युद्धक काव्यक समापन। त्वञ्चाहञ्च सभ आपसक लड़ाई, अछि एखनो पसरल ई महामारि। जाति-धर्म परिवार पुत्र केर मोह, यावत रहत प्रतिभा पिचाएत आह। त्वञ्चाहञ्च मचत धृतराष्ट्र जतए करत अराड़ि, दुर्योधन करत प्रारम्भ युधिष्ठिरक दोष की थोड़? असञ्जाति मन ई पुरातन देश नाम भरत, राज करथि जतए इक्ष्वाकु वंशज। एहि वंशक शाक्य कुल राजा शुद्धोधन, पत्नी माया छलि, कपिलवस्तुमे राज करथि तखन। अश्वघोषक वर्णन ई सकल, दैत अछि सम्बल असञ्जाति मनक। माया देखलन्हि स्वप्न आबि रहल, एकटा श्वेत हाथी आबि मायाक शरीरमे, पैसि छल रहल हाथी मुदा, मायाकेँ भए रहल छलन्हि ने कोनो कष्ट, वरन् लगलन्हि जे आएल अछि मध्य क्यो गर्भ। गर्भक बात मुदा छल सत्ते, भेल मोन वनगमनक, लुम्बिनी जाए रहब, कहल शुद्धोधनकेँ। दिन बीतल ओतहि लुम्बनीमे दिन एक, बिना प्रसव-पीड़ाक जन्म देलन्हि पुत्रक, आकाशसँ शीतल आ गर्म पानिक दू टा धार, कएल अभिषेक बालकक लाल-नील पुष्प कमल, बरसि आकाश। यक्षक राजा आ दिव्य लोकनिक भेल समागम, पशु छोड़ल हिंसा पक्षी बाजल मधुरवाणी। धारक अहंकारक शब्द बनल कलकल, छोड़ि “मार” आनन्दित छल विश्व सकल, “मार” रुष्ट आगमसँ बुद्धत्वप्राप्ति करत ई? माया-शुद्धोधनक विह्वलताक प्रसन्नताक, ब्राह्मण सभसँ सुनि अपूर्व लक्षण बच्चाक, भय दूर भेल माता-पिताक तखन जा कऽ, मनुष्यश्रेष्ठ पुत्र आश्वस्त दुनू गोटे पाबि कऽ। महर्षि असितकेँ भेल भान शाक्य मुनि लेल जन्म, चली कपिलवस्तु सुनि भविष्यवाणी बुद्धत्व करत प्राप्त, वायु मार्गे अएलाह राज्य वन कपिलवस्तुक, बैसाएल सिंहासन शुद्धोधन तुरत । राजन् आएल छी देखए बुद्धत्व प्राप्त करत जे बालक। बच्चाकेँ आनल गेल चक्र पैरमे छल जकर, देखि असित कहल हा मृत्यु समीप अछि हमर, बालकक शिक्षा प्राप्त करितहुँ मुदा वृद्ध हम अथबल, उपदेश सुनए लेल शाक्य मुनिक जीवित कहाँ रहब। वायुमार्गे घुरलाह असित कए दर्शन शाक्य मुनिक, भागिनकेँ बुझाओल पैघ भए बौद्धक अनुसरण करथि। दस दिन धरि कएलन्हि जात-संस्कार, फेर ढ़ेर रास होम जाप, करि गायक दान सिंघ स्वर्णसँ छारि, घुरि नगर प्रवेश कएलन्हि माया, हाथी-दाँतक महफा चढ़ि। धन-धान्यसँ पूर्ण भेल राज्य, अरि छोड़ल शत्रुताक मार्ग, सिद्धि साधल नाम पड़ल सिद्धार्थ। मुदा माया नहि सहि सकलीह प्रसन्नता, मृत्यु आएल मौसी गौतमी कएल शुश्रुषा। उपनयन संस्कार भेल बालकक, शिक्षामे छल चतुर, अंतःपुरमे कए ढेर रास व्यवस्था विलासक, शुद्धोधनकेँ छल मोन असितक बात, बालकक योगी बनबाक। सुन्दरी यशोधरासँ फेर करबाओल सिद्धार्थक विवाह, समय बीतल सिद्धार्थक पुत्र राहुलक भेल जन्म। उत्सवक संग बितैत रहल दिन पल, सुनलन्हि चर्च उद्यानक कमल सरोवरक, सिद्धार्थ इच्छा देखेलन्हि घुमक । सौँसे रस्तामे आदेश भेल राजाक, क्यो वृद्ध दुखी रोगी रहथि बाट ने घाट। सुनि नगरवासी देखबा लेल व्यग्र, निकलि आएल पथपर दर्शनक सिद्धार्थक । चारू कात छल मनोरम दृश्य, मुदा तखने आएल पथ एक वृद्ध। हे सारथी, सूतजी के अछि ई, आँखि झाँपल भौँहसँ, श्वेत केश, हाथ लाठी, झुकल की अछि भेल? कुमार अछि ई वृद्ध, भोगि बाल युवा अवस्था जाए अछि भेल वृद्ध आइ । की ई होएत सभक संग, हमहू भए जाएब वृद्ध एक दिन? सभकेँ अछि बुझल ई खेल, फेर चहुदिस ई सभ करए किलोल ? हर्षित मुदित बताह तँ नहि ई भीड़ ? घुरि चलू सूत जी आब, उद्यानमे मोन कतए लाग ! महलमे घुरि-फिरि भऽ चिन्तामग्न, पुनि लऽ आज्ञा राजासँ निकलल अग्र । मुदा एहि बेर भेटल एकटा लोक, पेट बढ़ल, झुकल लैत निसास, रोगग्रस्त छल ओ पूछल सिद्धार्थ, सूत जी छथि ई के, की भेल? रोगग्रस्त ई कुमार अछि ई तँ खेल, कखनो ककरो लैत अछि अपन अधीन । सूत जी घुरू भयभीत भेलहुँ हम आइ फेर। घुरि घर विचरि-विचरि कय चिन्तन, शुद्धोधन चिन्तित जानि ई घटनाक्रम। आमोद प्रमोदक कए आर प्रबन्ध, रथ सारथी दुनू नव कएल शुद्धोधन। फेर एक दिन पठाओल राजकुमार, युवक-युवती संग पठाओल करए विहार । मुदा तखने एकटा यात्रा मृत्युक, हे सूतजी की अछि ई दृश्य, सजा-धजा कए चारि गोटे धए कान्ह, मुदा तैयो सभ कानि रहल किए नहि जान ? हे कुमार आब ई सजाओल मनुक्ख, नहि बाजि सकत, अछि ई काठ समान। कानि-खीजि जाथि समस्त ई लोक, छोड़ए ओकरा मृत्यु केलन्हि जे प्राप्त। घुरू सारथी नहि होएत ई बर्दाश्त, भय नहि अछि एहि बेर, मुदा बुझितो आमोद प्रमोदमे भेर, अज्ञानी सन कोना घुमब उद्यान। मुदा नव सारथी घुरल नहि द्वार, पहुँचल उद्यान पद्म खण्ड जकर नाम। युवतीगणकेँ देलक आदेश उदायी, पुरोहित पुत्र, करू सिद्धार्थकेँ आमोद-प्रमोदमे लीन । मुदा देखि इन्द्रजीत सिद्धार्थक अनासक्ति, पुछल उदायी भेल अहाँकेँ ई की? हे मित्र क्षणिक ई आयु, बुझितो हम कोना गमाऊ ? साँझ भेल घुरि युवतीसभ गेल, सूर्यक अस्तक संग संसारक अनित्यताक बोध, पाबि सिद्धार्थ घुरल घर चिन्ता मग्न, शुद्धोधन विचलित मंत्रणामे लीन। किछु दिनक उपरान्त, माँगि आज्ञा बोन जएबाक, संग किछु संगी निकलि बिच खेत-पथार, देखि चास देल खेत मरल कीट-पतंग । दुखित बैसि उतड़ल घोड़ासँ अधः सिद्धार्थ, बैसि जोमक गाछक नीचाँ धए ध्यान, पाओल शान्ति तखने भेटल एक साधु। छल ओ मोक्षक ताकिमे मग्न, सुनि ओकर गप देखल होइत अन्तर्धान। गृह त्यागक आएल मोनमे भाव, बोन जएबाक आब एखन नहि काज। घुरि सभ चलल गृहक लेल, रस्तामे भेटलि कन्या एक, कहल अहाँ छी जनिक पति, से छथि निश्चयेन निवृत्त। निवृत्त शब्दसँ निर्वाणक प्रसंग, सोचि मुदित सिद्धार्थ घुरल राज सभा, रहथि ओतए शुद्धोधन मंत्रीगणक बिच। कहल - लए संन्यास मोक्षक ज्ञानक लेल, करू आज्ञा प्रदान हे भूदेव। हे पुत्र कएल की गप, जाऊ पहिने पालन करू भए गृहस्थ । संन्यासक नहि अछि आएल बेर, तखन सिद्धार्थ कहल अछि ठीक, तखन दूर करू चारि टा हमर भय, नहि मृत्यु, रोग, वृद्धावस्था आबि सकय, धन सेहो नहि क्षीण होए। शुद्धोधन कहल अछि ई असंभव बात, तखन हमर वियोगक करू नहि पश्चाताप। कहि सिद्धार्थ गेलाह महल बिच, चिन्तित एम्हर-ओम्हर घुमि निकललि बाह्य । सूतल छंदककेँ कहल श्वेत वेगमान, कंथक घोड़ा अश्वशालासँ लाऊ । सभ भेल निन्नमे भेर कंथक आएल, चढा सिद्धार्थकेँ लए गेल नगरसँ दूर । नमस्कार कपिलवस्तु ! घुरब जखन पाएब जन्म-मृत्युक भेद ! सोझाँ आएल भार्गव ऋषिक कुटी उतरि सिद्धार्थ, लेलन्हि रत्नजटित कृपाण काटल केश । मुकुट मणि आभूषण देल छंदककेँ। अश्रुधार बहल छंदकक आँखि, जाऊ छंदक घुरु नगर जाऊ । नहि सिद्धार्थ हम नहि छी सुमन्त, छोड़ि राम घुरल अयोध्या नगर। घोटक कंथकक आँखिमे सेहो नोर, तखने एक व्याध छल आएल, कषाय वस्त्र पहिरने रहए, कहल सिद्धार्थ, हमर शुभ्र वस्त्र लिअ दिअ ई वस्त्र, अदलि-बदलि दुनु गोटे वस्त्र पहिरि, छंदक देखि केलक प्रणाम गेल घुरि। सिद्धार्थ अएलाह आश्रम सभ भेल चकित, देखि नानाविध तपस्या कठोर, नहि संतुष्ट कष्ट भोगथि पाबय लेल स्वर्ग, अग्निहोत्रक यज्ञ तपक विधि देखि । निकलि चलल किछु दिनमे सिद्धार्थ आश्रम छोड़ि, स्वर्ग नहि मोक्षक अछि हमरा खोज । जाऊ तखन अराड मुनि लग विंध्यकोष्ठ, नमस्कार मुनि प्रणाम घुरू सभ जाऊ, सिद्धार्थ निकलि बढ़ि पहुँचलाह आगु। एम्हर कंथकक संग छंदक खसैत-पड़ैत, एक दिनमे आएल मार्ग आठ दिनमे चलैत, घरमुँहा रस्ता आइ कम नहि, अछि भेल अनन्त । घुरि सुनेलक खबरि कषाय वस्त्र पहिरबाक सिद्धार्थक, गौतमी मूर्छित, यशोधरा कानथि बाजि-बाजि, एहन कठोर हृदय सिद्धार्थक मुखेटा कोमल रहए, ओकरो सँ कठोर अछि हृदय हमर जे फाटए अछि नञि । शुद्धोधन कहथि दशरथक छल भाग्य, पुत्र वियोगमे प्राण हमर निकलए नञि अछि। पुरहित आ मंत्रीजी निकलि ताकू जाय, भार्गव मुनिक आश्रममे देखू पूछू ओतए। जाय जखन सभ ओतए पूछल भार्गव कहल, गेलथि अराड मुनिक आश्रम दिस मोक्षक लेल बेकल। दुनू गोटे बढ़ि आगाँ देखैत छथि की, कुमार गाछक नीचाँ बैसल ओतए। पुरोहित कहल हे कुमार पिताक ई गप सुनू, गृहस्थ राजा विदेह, बलि, राम आ बज्रबाहु, केलन्हि प्राप्त मोक्ष करू अहाँ सेहो। मुदा सिद्धार्थ बोनसँ घुरताह नहि, मोक्षक लेलन्हि अछि प्रण तोड़ताह नहि। हे सिद्धार्थ पहिनहु घुरल छथि बोनसँ, अयोध्याक राम, शाल्व देशक द्रुम आ राजा अंबरीष । हे पुरहित जी घुरू व्यर्थ समय नष्ट छी कए रहल, राम आ कि आन नहि उदाहरण समक्ष । नहि बिना तप कोनो क्यो बहटारि सकत, ज्ञान स्वयं पाएब नव रस्ता तकैत। घुरल दुहु गोटे गुप्त-दूत नियुक्त कए। सिद्धार्थ बढ़ि आगाँ कएल गंगाकेँ पार, राजगृह नगरी पहुँचि कए भिक्षा ग्रहण, पहुँचि पाण्डव-पर्वत जखन बैसलथि, राजा बिम्बसार आबि बुझाओल बहुत । सूर्यवंशी कुमार जाऊ घुरि, मुदा सिद्धार्थ कहल हर्यंक वंशज, मोहकेँ छोड़ल घुरि जाएब कतए ? राजा सेहो होइछ कखनहुँ काल दुखित, दास वर्गकेँ सेहो कखनहुँ भेटए छै खुशी ? करू रक्षाक प्रजाक संग अपन सेहो, सिद्धार्थ वैश्वंतर आश्रम दिश बढ़लाह, मगधराज चकित ! अराडक आश्रममे ज्ञान लेल, गेलाह शाक्य, कहल मुनि अविद्या अछि पाँचटा, अकर्मण्यता आलस्यक अछि अन्हार, अन्हारक अंग अछि क्रोध आ विषाद, मोह अछि ई वासना जीवनक आ संगक मृत्यु, कल्याणक मार्ग अछि मार्ग मोक्षक । मुदा सिद्धार्थ कहल हे मुनिवर ! आत्माक मानब तँ अछि मानब अहंकारकेँ, अहाँ गप नहि रुचल बढ़ल आश्रम उद्रकक से। नगरी गेलाह राजर्षिक जे आश्रम छल, मुदा नहि उत्तर भेटल ओतहु सिद्धार्थक। गेलाह तखन नैरंजना तट पाँचटा भिक्षुक भेटल, छह बरख तप कएल मुदा प्रश्न अनुत्तरित छल। स्वस्थ तनमे भेटत मनसक प्रश्नक उत्तर, प्रण कएल ई निरंजनामे कएल स्नान ओ, बाहर बहराए अएलाह तखने कन्या गोपराजक, श्वेत रंग नील वस्त्रमे नन्द बाला जकर नाम छल । आयलि पायस पात्र लेने तृप्त भए सिद्धार्थ भोजन कएल। पाँचू संगी देखि ई सिद्धार्थक संग छोड़ल । मुदा ओ भेलाह सबल बोधिसत्वक प्राप्तिक लेल, दृढ़ प्रण लए पीपरक तर ओ आसन देलन्हि । काल सर्प कहल देखू ई नीलकंठक झुण्डकेँ, घुमि रहल चारू दिस अहाँक, प्रमाण अछि जे बोधिसत्व प्राप्त करब अहाँ। सुनि ई तृण उठाए कएल प्रतिज्ञा तखन, सिद्धार्थ पाओत ज्ञान आ तखने उठत छोड़ि आसन। ब्रह्मांड छल प्रसन्न मुदा दुष्ट मार डरायल, कामदेव, चित्रायुध पुष्पसर नाम मारक, सिद्धार्थ प्राप्त कए ज्ञान जगकेँ बताओत। हमर साम्राज्यक होएत की तखन, पुत्र विभ्रम,हर्ष, दर्प छल ओकर, पुत्री अरति, प्रीति, तृषा के सेहो कए संग। चलू ई लेने ढाल प्रतिज्ञाक, सत् धनुषपर बुद्धिक वाण चढ़ाए, जीतत से की जीतए देबए हमरा सभ आइ ? हे सिद्धार्थ यज्ञ कए पढ़ि कए शास्त्र, करू इन्द्रपद प्राप्त भोगू भोग, छोड़ू आसन देब वाण चलाए। नहि देलन्हि सिद्धार्थ एहिपर ध्यान, मार तखन देलक वाण चलाए, मुदा भेल कोनो नहि परिणाम। शिवपर सेहो चलल रहए ई वाण, विचलित भेल रहथि ओ सेहो, के अछि ई से नहि जान !! हे सैनिक हमर विकराल-विचित्र, त्रिशूल घुमाए, गदा उठाए, साँढ़क सन दए हुंकार, आऊ करू विजित अछि शत्रु विकराल। राति घनघोर अन्हरियामे कतए छथि चन्द्र ? तरेगणक सेहो कोनो नहि दर्श ! मुदा सभ गेल व्यर्थ पदार्पण भेल अदृश्य, मार जाऊ होएत नहि ई विचलित। देखू एकर क्षमा प्रतीक जटाक, धैर्य अछि एकर जेना गाछक मूल, चरित्र पुष्प बुद्धि शाखा धर्म फलक प्रतीक। स्थान जतए अछि आसन पृथ्वीक थिक नाभि, प्राप्त करत ई ज्ञान सहजहि आइ । पराजित मार गेल ओतएसँ भागि। रातिक पहिल पहरिमे शाक्य मुनि, पाओल वर्णन स्मरण पूर्व जन्मक सहजहि । दोसर पहरमे दिव्य चक्षु पाबि, देखल कर्मक फल वेदनाक अनुभूति । गर्भ सरोवर नरक आ स्वर्ग दुहुक, पाओल अनुभव देखल खसैत स्वर्गहुसँ, अतृप्त भोगी जन्म, जरा, मृत्यु। बीतल तेसर पहरि चारिममे जाए, पाओल ज्ञान बुद्ध भए पाओल शान्ति। शान्त मन शान्त छल पूर्ण जगत !!! धर्म चारू दिस बिन मेघ अछार !! सूचना देल दुन्दभि बाजि अकाश ! सकल दिशा सिद्धगणसँ दीप्तमय छल, स्वर्गसँ वृष्टि पुष्पक इक्षवाकु वंशक ई मुनि छल। बैसल एहि अवस्थामे सात दिन धरि मुनि शाक्य, विमान चढ़ि अएलाह तखन देवता दू टा, करू उद्धार जगतक दए मोक्षक शिक्षा। आ भिक्षुपात्र लए अएलाह फेर एक देव, कएल स्मरण अराड आ उद्रकक बुद्ध, मुदा दुहु छल छोड़ल जगत ई तुच्छ। आब जाएब वाराणसी भिक्षु पाँचो संगी जतए, कहल देखि बोधिक गाछ दिस स्नेहसँ। बुद्ध चललाह असगरे रस्तामे भिक्षु एक भेटल, तेजमय अहाँ के गुरु के छथि अहाँक ? हे वत्स गुरु नहि क्यो हमर प्राप्त कएल निर्वाण हम, सभ किछु जानल जे अछि जनबा योग्य लोक कहए छथि हमरा बुद्ध ! जा रहल छी काशी दुखित कल्याण लेल दूर सँ देखल वरुणा आ गंगाक मिलन आ गेलाह बुद्ध लगहिमे मृगदाव वन। पाँचू संगि हुनक रहथि ओतहि देखैत अबैत विचारल क्यो नहि करत अभिवादन हुनक मुदा पहुँचिते ई की गप भेल ? सभ हुनक सत्कारमे छल लागि गेल? आसन दए जखन बैसेलन्हि हुनका सभ क्यो, उपदेश देब शुरु करितथि मुदा तखने बाजल कियो, अहाँ तँ तत्वकेँ नहि छी बुझैत, तप छोड़ि बीचहि उठल छलहुँ किएक ? बुद्ध कहल घोर तप आ आसक्ति दुनुक हम त्याग कएल मध्य मार्गकेँ पकड़ि बोधत्व प्राप्त कएल । एकर सूर्य अछि सम्यक दृष्टि आ एकर सुन्दर रस्तापर चलैए सम्यक संकल्प । ई करैए विहार सम्यक आचरणक उपवनमे सम्यक् आजीविका अछि भोजन एकर। सेवक अछि सम्यक व्यायाम, शान्ति भेटैए एकरा सम्यक स्मृति रूपी नगरीमे आ सुतैए सम्यक समाधिक बिछाओनपर ई। एहि अष्टांग योगसँ अछि सम्भव ई जन्म, जरा, व्याधि आ मृत्युसँ मुक्ति। मध्य मार्ग चारिटा अछि ध्रुव सत्य दुख, अछि तकर कारण, दुखक निरोध आ अछि उपाय निरोधक । कौंडिन्य आ ओकर चारू संगी सुनल ई, प्राप्त कएल सभ दिव्यज्ञान । हे नरमे उत्तम पाँचू गोटे भेल ज्ञान अहाँ लोकनि के? कौंण्डिन्य कहलन्हि हँ, भेल भंते, कौंडिन्य भेलाह तखन प्रमुख धर्मवेत्ता तखनहि यक्षसभ पर्वतपरसँ कएलक सिंहनाद, शाक्यमुनि अछि कएलक धर्मचक्र प्रवर्तित !!!! शील कील अछि क्षमा-विनय अछि धूरी, बुद्धि-स्मृतिक पहिया अछि सत्य अहिंसासँ युक्त, एहिमे बैसि भेटत शान्ति ई बाजल सभ यक्ष, मृगदावमे भेल धर्मचक्र प्रवर्तित। फेर अश्वजित आ ओकर चारि टा आन भिक्षु कएल निर्वाण धर्ममे बुद्ध दीक्षित, फेर कुलपुत्र यश प्राप्त कएल अर्हत पद यश आ चौवन गृहस्थकेँ कएल बुद्ध सद्धर्ममे प्रशीक्षित । घरमे रहि कऽ भऽ सकै छी अनाशक्त आ वनमे रहियो प्राप्त कऽ सकए छी आशक्ति । एहिमेसँ आठ गोट अर्हत प्राप्त शिष्यकेँ बिदा कए आठो दिशामे चललाह बुद्ध । पहुँचि गया जितबाक रहन्हि इच्छा सिद्धि सभसँ युक्त काश्यप मुनिकेँ। गयामे काश्यप मुनि कएलन्हि स्वागत बुद्धक, मुदा रहबाक लेल देल अग्निशाला रहए छल महासर्प जतए । रातिमे मुदा ओ सर्प प्रणाम कएल बुद्धकेँ भोरमे काश्यप देखल सर्पकेँ बुद्धक भिक्षापात्रमे । कए प्रणाम ओ आ हुनकर पाँच सए शिष्य संग अएलाह काश्यक भाए गय आ नदी । कएल स्वीकार धर्म बुद्धक प्राप्त कएल गय उत्तुंगपर निर्वाणधर्मक शिक्षा लए सभ काश्यपकेँ संग बुद्ध पहुँचल राजगृहक वेणुवण । बिम्बसार सुनि आएल ओतए देखल काश्यपकेँ बुद्धक शिष्य बनल पूछल बुद्ध तखन काश्यपसँ, छोड़ल अहाँ अग्निक उपासना किएक भंते ? काश्यप कहल मोह जन्म रहि जाइछ देने आहुति अग्निमे कएने पूजा पाठ ओकर तँहि । बुद्धक आज्ञा पाबि कएल काश्यप दिव्य शक्तिक प्रदर्शन आकाशमध्य उड़ि अग्निक समान जरि कए । तखन बिम्बसारकेँ देल बुद्ध अनात्मवादक शिक्षा विषय, बुद्धि आ इन्द्रिक संयोगसँ अबैछ चेतनता शरीर इन्द्रिय आ चेतना अछि भिन्न आ अभिन्न सेहो। बिम्बसार भऽ प्रसन्न दान बुद्धकेँ वेणुवन देल तथागतक शिष्य अश्वजित नगर गेल भिक्षाक लेल । कपिल संप्रदायक लोक देखि तेज पूछल अहाँक गुरु के? कहल अश्वजित सुगत बुद्ध छथि जे इक्षवाकुवंशक। सएह हमर गुरु कहए छथि बिन कारणक नहि होइछ किछुओ उपतिष्य ब्राह्मणकेँ प्राप्त भेल ज्ञान कहलक ओ मौद्गल्यायनकेँ मौद्गल्यायनकेँ सेहो प्राप्त भेलैक सम्यक दृष्टि सुनिकेँ। सुनि वेणुवनमे उपदेश त्यागल जटा दंड पहिरि काषाय कएल साधना प्राप्त कएल परम पद काश्यप वंशक एकटा धनिक ब्राह्मण छोड़ल पत्नी परिजन प्रसिद्धि भेटल हिनका महाकाश्यप नामसँ। कोसलक श्रावस्तीक धनिक सुदत्त आएल वेणुवन गृहस्थ रहितो प्राप्त भेल तत्वज्ञान ओकरा । उपतिष्य संगे सुदत्त गेल श्रावस्ती नगर जेत केर वनमे विहार बनएबाक कएल निश्चित् । जेत रहए लोभी ढेर पाइ लेलक जेतवनक मुदा देखि दैत पाइ हृदय परिवर्तित भेल ओकर सभटा वन देलक ओ विहारक लेल विहार शीघ्रे बनि गेल उपतिष्यक संरक्षकत्वमे। बुद्ध फेर राजगृहसँ चलि देलन्हि कपिलवस्तु दिस ओतए पिता शुद्धोधनकेँ देल बौद्ध रूपी अमृत कोनो पुत्र पिताकेँ नहि देने रहए ई। कर्म धरए अछि मृत्युक बादो पछोड़ कर्मक स्वभाव, कारण, फल, आश्रयक रहस्य बुझू, जन्म, मृत्यु, श्रम, दुखसँ फराक पथ ताकू । आनन्द, नन्द, कृमिल, अनुरुद्ध, कुन्डधान्य, देवदत्त, उदायि कए ग्रहण दीक्षा छोड़ल गृह सभ । अत्रिनन्दन उपालि सेहो कएल ग्रहण दीक्षा शुद्धोधन देल राजकाज भाए केँ रहए लगलाह राजर्षि जेकाँ ओ । फेर बुद्ध कएल प्रवेश नगरमे न्यग्रोध वनमे बुद्ध पहुँचि चिन्तन कल्याणक जीवक करए लगलाह। फेर ओ ओतए सँ निकलि गेलाह प्रसेनजितक देस कोसल श्रावस्तीक जेतवन छल श्वेत भवन आ अशोकक गाछसँ सज्जित सुदत्त कएल स्वर्णमालासँ स्वागत बुद्धक कएल जेतवन बुद्धक चरणमे समर्पित। प्रसेनजित भेल धर्ममे दीक्षित तीर्थक साधु सभक कए शंकाक समाधान कएल बुद्ध हुनका सभकेँ दीक्षित। ओतएसँ अएलाह बुद्ध फेर राजगृह ज्योतिष्क, जीवक, शूर, श्रोण,अंगदकेँ उपदेश दए, कएल सभकेँ संघमे दीक्षित। ओतएसँ गंधार जाए राजा पुष्करकेँ कएल दीक्षित विपुल पर्वतपर हेमवत आ साताग्र दुनू यक्षकेँ उपदेश दए अएलाह जीवकक आम्रवन। ओतए कए विश्राम घुमैत-फिरैत पहुँचल आपण नगर, ओतए अंगुलीमाल तस्करकेँ कएल दीक्षित प्रेमक धर्ममे। वाराणसीमे असितक भागिन कात्यायनकेँ कएल दीक्षित देवदत्त मुदा भए ईर्ष्यालु संघमे चाहलक पसारए अरारि। गृध्रकूट पर्वतपर खसाओल शिलाखंड बुद्धपर राजगृह मार्गमे छोड़ल हुनकापर बताह हाथी सभ भागल मुदा आनन्द संग रहल बुद्धक लग आबि गजराज भए गेल स्वस्थ कएल प्रणाम झुकि कए उपदेश देल गजराजकेँ बुद्ध। देखल ई लीला राजमहलसँ अजातशत्रु भए गेल ओहो शिष्य तखन बुद्धक। राजगृहसँ बुद्ध अएलाह पाटलिपुत्र मगधक मंत्री वर्षाकार बना रहल छल दुर्ग, बुद्ध कएल भविष्यवाणी होएत ई नगर प्रसिद्ध तखन तथागत गेलाह गौतम द्वारसँ गंगा दिस। गंगापार कुटी गाममे देल उपदेश धर्मक फेर गेलाह नन्दिग्राम जतए भेल छल बहुत रास मृत्यु। दए सान्त्वना गेलाह वैशाली नगरी निवास कएल आम्रपालीक उद्यानमे। श्वेत वस्त्र धरि अएलीह ओ बुद्ध चेताओल शिष्य सभकेँ, धरू संयम रहब स्थिरज्ञानमे लऽ बोधक ओखध प्रज्ञाक वाणसँ शक्तिक धनुषसँ करू अपन रक्षा। आम्रपाली आबि पओलक उपदेश भेलैक ओकरा घृणा अपन वृत्तिसँ माँगलक धर्मलाभक भिक्षा, बुद्ध कएलन्हि प्रार्थना ओकर स्वीकार, संगहि आएब भिक्षाक लेल अहाँक द्वार । सुनि ई गप जे आएल छथि बुद्ध आम्रपालीक उद्यान लिच्छवीगण अएलाह बुद्धक समीप बुद्ध देलन्हि शीलवान रहबाक सन्देश। लिच्छवीगण देलन्हि भिक्षाक लेल अपन-अपन घर अएबाक आमन्त्रण, पाबि आमन्त्रण कहलन्हि बुद्ध मुदा जाएब हम आम्रपालीक द्वार कारण हुनका हम देलियन्हि अछि वचन। लिच्छवीगणकेँ लगलन्हि ई कनेक अनसोहाँत, मुदा पाबि उपदेश बुद्धक, घुरलाह अपन-अपन घर-द्वार। पराते आम्रपालीसँ ग्रहण कए भिक्षा बुद्ध गेलाह वेणुमती करए चारि मासक बस्सावास। चारि मास बितओला उत्तर, रहए लगलाह मर्कट सरोवरक तट। ओतहि आएल मार, कहलक हे बुद्ध नैरंजना तटपर अहाँक संकल्प जे निर्वाणसँ पूर्व करब उद्धार देखाएब रस्ता दोसरोकेँ, आब तँ कतेक छथि मुक्त, कतेक छथि मुक्ति पथक अनुगामी, आब कोनो टा नहि बाँचल अछि कारण करू निर्वाण प्राप्त। कहलन्हि बुद्ध, हे मार नहि करू चिन्ता, आइसँ तीन मासक बाद, प्राप्त करब हम निर्वाण, मार होइत प्रसन्न तृप्त गेल घुरि। बुद्ध धऽ आसन प्राणवायुकेँ लेलन्हि चित्तमे आ चित्तकेँ प्राणसँ जोड़ि योग द्वारा समाधि कएल प्राप्त। प्राणक जखने भेल निरोध, भूमि विचलित, विचलित भेल अकास !! आनन्द पूछल करू अनुग्रह लिच्छवी सभपर, किएक ई धरा आ आकास, दलमलित मर्त्य आ दिव्यलोक !!! बुद्ध कहलन्हि आबि गेल छी हम बाहर, छोड़ि अपन प्रकोष्ठ, मात्र तीन मास अनन्तर छोड़ब ई देह, निर्वाण मे रहबा लेल सतत !!!! आनन्द सुनि ई करए लागल हाक्रोस, सुनि विलाप लिच्छवी गण जुटि सेहो, विलापमे भऽ गेलाह संग जोड़ । बुद्ध सभकेँ बुझा-सुझा, चललाह वैशालीक उत्तर दिशा। पहुँचि भोगवती नगरी, देल शिक्षा जे विनय अछि हमर वचन, जे बोल अछि विनयविहीन, से अछि नहि धर्म। तखन मल्लक नगरी पापुर जाए, अपन भक्त चुंदक घरमे कएल भोजन बुद्ध, दए ओकरा उपदेश बिदा भेलाह कुशीनगरक दिस। संगे चुन्दक पार कएल इरावती धार सरोवर तटपर कए विश्राम, कए हिरण्यवती धारमे स्नान, कहल हे आनन्द, दुनू शालक गाछक बीच करब हम शयन। आजुक रातिक उत्तर पहर, करब प्राप्त निर्वाण। हाथक बनाए गेरुआ, दए टाँगपर टाँग, लऽ दहिना करोट कहल हे आनन्द, बजा आनू मल्ल लोकनिकेँ, भेँट करबा लेल निर्वाण पूर्व। शान्त दिशा, शान्त व्याघ्र-भालु, शान्त चिड़इ शान्त सभटा जन्तु। आबि मल्ल लोकनि कएल विलाप, मुदा बुद्ध दए सांत्वना घुरेलन्हि सभकेँ। आएल सुभद्र त्रिदंडी संन्यासी तकर बाद, पाबि अष्टांग मार्गक शिक्षा, कहल सुभद्र हे करुणावतार अहाँक मृत्युक दर्शनसँ पहिने हम करए चाहैत छी निर्वाण प्राप्त । बैसल ओ पर्वत जेकाँ आ जेना मिझा जाइत अछि दीप हवाक झोँकसँ, तहिना क्षणेमे कएलक निर्वाण प्राप्त। छल ई हमर अन्तिम शिष्य ! सुभद्रक करू अन्तिम संस्कार ! बीतल आध राति, बुद्ध बजाए सभ शिष्यकेँ, देल प्रातिमोक्षक उपदेश, कोनो शंका होए तँ पूछू आइ । अनिरुद्ध कहल नहि अछि शंका आर्य सत्यमे ककरो। बुद्ध तखन ध्यान कऽ एकसँ चारिम तहमे पहुँचि, प्राप्त कएल शान्ति। भेल ई महापरिनिर्वाण ! मल्ल सभ आबि उठेलक बुद्धकेँ स्वर्णक शव-शिविकामे, नागद्वारसँ बाहर भए कएलन्हि पार हिरण्यवती धार, मुदा शवकेँ चन्दनसँ सजाए, जखन लगाओल आगि, नहि उठल चिन्गारि । शिष्य काश्यप छल बिच मार्ग, ओकरा अबिते लागल चितामे आगि ! मल्ल लोकनि बीछि अस्थि धऽ स्वर्णकलशमे, आनल नगर मध्य, बादमे कए भवन पूजाक निर्माण, कएल अस्थिकलश ओतए विराजमान। फेर सात देशक दूत, आबि मँगलक बुद्धक अस्थि, मुदा मल्लगण कएल अस्वीकार, तँ बजड़ल युद्ध-युद्ध । सभ आबि घेरल कुशीनगर, मुदा द्रोण ब्राह्मण बुझाओल दुनू पक्ष। बाँटि अस्थिकेँ आठ भाग, द्रोण लेलक ओ घट आ गण पिसल छाउर बुद्धक । सभ घुरलाह अपन देश आब। अस्थि कलश छाउर पर बनाए स्तूप, करए गेलाह पूजा अर्चना जाए, दसटा स्तूप बनि भेल ठाढ़, जतए अखण्ड ज्योति आ घण्टाक होए निनाद। फेर राजगृहसँ आएल पाँच सए भिक्षु, आनन्दकेँ देल गेल ई काज, बुद्धक सभ शिक्षाकेँ कहि सुनाऊ, होएत ई सभ समग्र आब। हम ई छलहुँ सुनने एहि तरहेँ, कएल सम्पूर्ण वर्णन नीके। कालान्तरमे अशोक स्तूपसँ लए धातु कए कए कऽ सए विभाग, बनाओल कएक सए स्तूप, श्रद्धाक प्रतीक। जहिया धरि अछि जन्म, अछि दुख, पुनर्जन्मसँ मुक्ति अछि मात्र सुख, तकर मार्ग देखाओल जे महामुनि, शाक्यमुनि सन दोसर के अछि शुद्ध। असञ्जाति मनक ई सम्बल, देलहुँ अहाँ हे बुद्ध हे बुद्ध हे बुद्ध । कोसी लोकगीत १.(कोसी लोकगीत)(बिहार की नदियाँ, सहृदय, १९७७, पृ.३७२-७३) मुठी एक डँड़वा गे कोसिका अलपा गे बयसवा गे भुइयाँ लौटे नामी-नामी केश कोसी मय लोटै छौ गे केश॥ केशवा सम्हारि कोसी जुड़वा गे बन्हाओल कोसी गे खोपवा बन्हाओल ओहि खोपवा कुहुकै मजूर। उतरहि राज से एलेँ हे रैया रनपाल से कोसी के देखि-देखि सूरति निहारै सूरति देखि धीरज नै रहै धीर॥ किये तोरा कोसिका चेकापर गढ़लक किये जे रूपा गढ़लक सोनार॥ नै हो रनपाल मोहि चेकापर गढ़लक नै रूपा गढ़लक सोनार अम्मा कोखिया हो रनपाल हमरो जनम भेल सूरति देलक भगवान गाओल सेवक जन दुहु कर जोरि गरुआक बेरि होउ न सहाय, गे कोसी मैया होउ न सहाय॥ २. (कोसी लोकगीत, मोरंग, नेपाल)(नदियाँ गाती हैं, ओमप्रकाश भारती, २००२, पृ.१०८) सगर परबत से नाम्हल कोसिका माता, भोटी मुख कयेले पयाम आगू-आगू कोयला वीर धसना खभारल, पाछू-पाछू कोसिका उमरल जाय नाम्ही-नाम्ही आछर लिखले गंगा माता, दिहलनि कोसी जी के हाथ सात रात दिन झड़ी नमावल चरहल चनन केर गाछे ये चानन छेबि-छेबि बेड़ बनावल, भोटी मुख देव चढ़ी आय ये गहिरी से नदिया देखहुँ भेयाउन तहाँ देल झौआ लगाय रोहुआक मूरा चढ़ी हेरये कोसिका, केती दूर आबैय छे बलान मार-मार के धार बहिये गेल, कामरू चलल घहराय पोखरि गहीर भौरये माता कोसिका, कमला के देल उपदेस माछ-काछु सब उसरे लोटाबय, पसर चरयै धेनु गाय गाइब जगत के लोक कल जोरी, आजु मइआ इबु न सहाय। ३.(कोसी लोकगीत)(कोसी लोकगीत- ब्रजेश्वर,१९५५) रातिए जे एलै रानू गउना करैले, कोहबर घरमे सुतल निचित! जकरो दुअरिया हे रानो कोसी बहे धार सेहो कैसे सूते हे निचित॥ सीरमा बैसल हे रानो कोसिका जगाबै सूतल रानो उठल चेहाय॥ काँख लेल धोतिया हे रानो मुख दतमनि माय तोरा हंटौ हे रानो बाप तोरा बरजौ जनु जाहे कोसी असनान॥ हँटलौ ने मानै रानो दबलौ ने मानै चली गेलै कोसी असनान॥ एक डूब हे कोसी दुइ डूब लेल तीन डूब गेल भसियाय॥ जब तुहू आहे कोसिका हमरो डुबइबे आनब हम अस्सी मन कोदारि॥ अस्सी मन कोदरिया हे रानो बेरासी मन बेंट आगू आगू धसना धसाय॥ बैकुण्ठ झा,पिता-स्वर्गीय रामचन्द्र झा, जन्म-२४ - ०७ - १९५४ (ग्राम-भरवाड़ा, जिला-दरभंगा),शिक्षा-स्नात्कोत्तर (अर्थशास्त्र),पेशा- शिक्षक। मैथिली, हिन्दी तथा अंग्रेजी भाषा मे लगभग २०० गीत कऽ रचना। गोनू झा पर आधारित नाटक ''हास्यशिरोमणि गोनू झा तथा अन्य कहानी कऽ लेखन। अहि के अलावा हिन्दी मे लगभग १५ उपन्यास तथा कहानी के लेखन। (१०/०२/९१) चलू देखैब अपन गाम अय ये बम्बई के कनियाँ देखल अहाँ दुनियाँ चलू देखैब अपन गाम अय- गाम ये तूबय जतय महु-आम ये। ये बम्बई... पहिरी तऽ बेल बाँट ओढ़ी नई ओढ़नी घोघमे अहाँ सँ सुन्नर नोकरनी वैह थिक सीताक गाँम अय-गाँम ये। तूबय... भेटत जौं पोखरि मन्दिर देखू ओतय भावहु भैंसुरसँ छुआई छै जत्तय लै नञ पतिक केउ नाम अय- नाम ये। तूबय जतय... भैंसुर ससुर देवर बुझि नञ पड़ै एतय देखबै पुरनियों मरौतो काढ़ै ओतय पीबै छै भाँग, नई जाम अय, भाँग अय। तूबय.. जकरा कही रोटी ओ छै सोहारी तीमन कही हम अहाँ तरकारी पहिरै छै पुरुख खराम अय- खराम अय। भरिमन कनियाँ घुमू अहाँ बम्बई आँगनसँ ओतय त कोनटामे जे बई चलबै निहुरि नई, उदाम अय, उदाम अय! तूबय... सिनेमा २०.०९.९१ अछि प्रभाव पसरल सगरो, डिस्को धुनमे नाचय नङरो। भारत भूषण के रोल एखन, होइछ पसन्द, ककरो-ककरो। अछि प्रभाव... अछि देखा रहल अमिताभ नाच, गाबय जहिना हो झूठ साँच। अभिनेत्रीक कपड़ा बनल नाप, दू-दू मिलि कय भय जाइछ पाँच। मुक्का , लोटा, सोटा सँ नई बाँचि कय होय आब झगड़ो अछि.. भारत नाट्यम बिसराय रहल, बाजा एहनो केकियाय रहल स्रोताकेँ कान उड़ाय रहल, बुझू ओहिना जे वज्र खसल मुदा सुनत के अहाँक बात? भय रहल प्रशंसा तऽ ओकरो। अछि प्रभाव... हमर सभ्यता जाय रहल, पाश्चात्य सभ्यता छाय रहल, संग एक टेबुलपर बैसि देखू , अछि खाय रहल भावहु भैंसुरो। अछि प्रभाव.. दहेज १८.०९.९१ प्रण तऽ कयल बार-बार, पाओल अहाँक मधुर प्यार। संग छोड़ि मझधार, गेलउँ कतय, कतय गेलउँ। कतय गेलउँ कतय गेलउँ गेलउँ कतय कतय गेलउँ रे जो हवा तोँ कहि कऽ आ, संवाद किछु जरूर ला, छी अवला तऽ नारी हम, की यैह छी हमर बला? कहब ई दर्द ककरा हम, कहब सुनत हँसत भला। कहिहैं ई जरूर तूँ, एहन केना निठुर भेलउँ। निठुर भेलउँ निठुर भेलउँ कतय गेलउँ कतय गेलउँ दहेज तऽ दहेज छै, की प्रेमसँ प्रहेज छै। कमलकेँ रौँदि कऽ कतउ , की वीर केउ बनल ओ छै। बालु के दिवाल जौँ बनल, ढहल ओ छै। करू प्रयास खुद अपन, दहेज लय की प्रण केलउँ। कतय गेलउँ कतय गेलउँ गेलउँ कतय कतय गेलउँ होइछ विवाह प्यार लय, उठबय घरक तऽ भार लय, सोचनहुँ नञ छल हमर तऽ मन, छोद्अब अहाँ तँ कार लय, हवा ठिठकि मुसकि कहय, नञ छल असल प्रणय। दोष अछि तँ ई कार केँ, जगत के भार हम भेलहुँ कतय गेलउँ कतय गेलउँ गेलउँ कतय कतय गेलउँ परदेश- २७.१२.८९ एवं ८.१.९० पाहुन बनि निज गृह त्यागि अहाँ कतबा दिन रहबै परदेशी। बाबा बाबू सब छला वैह होयत बेटा पुनि परदेशी॥ निज उद्यमके उत्थान करू, मिलि शासक लग अभियान करू। होयब गरीब नईं कोना हम? हमरो श्रमपर अभिमान करू॥ भूमिक महिमा गुणगान केने दुनियाँमे ककरा की भेटल? गुणगान आर श्रमदान करू वनि वीर जगतमे नाम करू। सब किछु रहैत हम छी गरीब, की बनल रहत एहिना नशीब? पढ़ि-पढ़ि बच्चा ठोकर खायत लय नाम अयाचिक जल पीब? दुनियाँमे ककरा के देलक? यदि देलक तऽ ओ भिक्षा थिक। आश्रित बनि रही अगर सब दिन थिक नई यथार्थ, नईं शिक्षा थिक॥ जागू-आ’ जगा दियौ सबकेँ सुनू आ सुना दियौ सबकेँ। निज पौरुष जे नईं चीन्हि सकल ओऽ तऽ जगमे कायरता थिक सड़क १९.०९.९१ हम छी सड़क स्वतन्त्र भारतक मिथिला हो मद्रास मगध मथुरा मदुरै मुम्बई (बम्बई) रोहतक। हम छी कानी हकन्न मीलि कऽ हम सब ढेकरि-ढेकरि ओ पीबय आशक, मना रहल अधिकारी उत्सव। जकरा घर लागल छल फाटक, उड़ा रहल ओ मजा तऽ महलक, हम छी सड़क स्वतन्त्र भारतक। के देखैत अछि हमर ई दशा टायर हो या लोकक आँगुर- फटि-फुटि कय भय रहल दुर्दशा। जनताकेँ तऽ अछि ई शोचक, हम छी सड़क स्वतन्त्र भारतक। परतन्त्र देश छल हमर मान छल, छी चिक्कन हमरा गुमान छल, स्नान करी नित हमर शान छल अस्सी प्रतिशत भाग एखन हमरा बनबयमे अछि चोरक। हम छी सड़क स्वतन्त्र भारतक। घरबैया जौं जागि जाईत अछि, चोर फुर्र सँ भागि जाइत अछि, आन्हरो बाजी मारि जाईत अछि। जनतामे हिम्मत नई शोरक, हम छी सड़क स्वतन्त्र भारतक। दुनियॉं दुनियॉं कृतघ्नक डेरा छै, पापी - अधमक इ बसेरा छै। उपकार करु अपकार करत, खायत मधुर कुप्रचार करत। बाजय जे झूठ सगरो - सदिखन, स्वयं सत्यक ओ अवतार कहत॥ देखू जे सत्य अछि बाजि रहल, ओकरे खातिर ई घेरा छै। दुनियॉं कृतघ्न के डेरा छै, पापी - अधमक ई बसेरा छै। पापी - कृतघ्न के देखि देखि, दुनियॉं नहि एखनो चेत सकल। सत्‌युग, त्रेता, द्वापर, कलियुग मे, देखि रहल छी वैह विकल। धन शांति क्‌ऽ माध्यम होयत कोना, त्रेता मे देखलहुं सोन जरल। विद्या - बल सत्य सं दूर रहल, रावण - कौरव बेमौत मरल। जे दूर सत्य सं भागि रहल, दुनियॉं इ कांट क घेरा छै। दुनियॉं कृतघ्न के डेरा छै, पापी - अधमक ई बसेरा छै। प्रकाश झा, ग्राम+पो.- कठरा, भाया-पुटाई, थाना- मनीगाछी, दरभंगा, बिहार (भारत) हाल बचपनसँ पचपन तक ॐ छोट-छोट धीया पुताक चंचलता, पूरा परिवारक प्रसन्नता, देख-देख खुशीक नयनसँ खसए अछि नोर बुझबामे नञि आबए अछि कखन भेल साँझ कखन भेल भोर, • * * नाना-नानी, मामा-मामी, बाबा-मैञा, कक्का-काकी, हिनकर लोकनिक एकटा प्यार मा-पिता, संग पूरा समाज मिल रखने छथि हजारो नाम कियो कहए नवनीत-निराला, कियो कहे मिकुन्द कुमार, हिनकर छोट भऽ कनिओ कम नञि हिनकर नाम छन्हि दर्शन पढ़ाईमे छथि एकदम जीरो पैघ भऽ बनता डॉक्टर एन्डरसन। बचपनमे तोतराइत बोली सुनबालेल लगेने रहए छथि सभ आस मुदा एहि युगक नेना जनमैते पहिलेसँ रहए यऽ बी.ए. पास। हाट-बजार लगेने बौआक फरमाइस रहए छनि सभसँ भिन्न भात-दालि सभसँ पैघ दुश्मन सदिखन खएता मैगी-चौमीन जिन्स पैन्ट कारी चस्मा पहिरि अपनाकेँ बुझए पैघ हीरो अपन आगूमे दोसर बच्चाकेँ बुझता एकदम जीरो स्कूलक चरचा ज्यौँ करियौ तँ हिन्दी मीडिअमसँ नञि पढ़ताह अंग्रेजी स्कूलमे पढ़ि ओऽ इन्जीनिअर-डॉक्टरक सपना देखताह आइ काल्हिक बच्चाकेँ छञि स्कूल जाइ लेल एसिसटेन्स आऽ कार पापा कपड़ा, जूता पहिराबथि माँ केक टॉफी भरि कऽ रहल छथि टिफिन तैयार बौआ स्कूलमे पढ़ए छथि बुझिऔ सभटा भगवान भरोसे परीक्षामे फेल भेलाऽ पार पेरा-लड्डू भेटए छनि सौँसे बच्चाक असफलता देखि माँ-बाप पित्ते कपार एखन तँ शुरुआते भेल अछि पैघ भऽ पिअत शराब बेटा कहिआ रुपैआ कमाएत तकर रहए छनि , सभ गोटेकेँ इन्तजार नीक पुतोहु, नीक परिवार आर पाँच लाख दहेज लेबा लेल बरका रहए छनि बोगली तैयार जखन आबए छनि, पुतोहु हेमामालिनी सन देखबनि हुनकर साज-शृंगार थोर लिपिस्टिक, आँखिमे काजर बिच अँगनामे माथ-उघार एखन आबि गेल मोबाइलक जमाना मिनटे-मिनटे घण्टी बाजए अपने-कमाइत छथि दिल्ली-मुम्बई बिन बात केने किए छनि भेटे बुरहारीमे माँ-बाप के कहए अहाँ सभ बनल छी कण्ठक घेघ अर्द्धांगिनीकेँ प्रसन्न रखबाऽ लेल पकड़ाबथि हस्ताक्षर कएल ब्लैंक चेक आब कतेक वर्णन करी जमानाक सभ मिलि दुयओ बातपर ध्यान माँ-बाप भगवानोसँ पैघ हुनका लोकनिक करियन्हु सम्मान सभक एक दिन आएत बुरहारी जेहने करबए तेहने फल पाएब स्वर्ग नरक एतए भेटत कतबू करब तीर्थ वा गंगा नहाएब लिखते-लिखिते कलम रुकए कऽ नञि लए कखनो नाम प्रकाशक बातपर ध्यान देलापर अहाँ कहब मिथिला महान रामलोचन ठाकुर, जन्म १८ मार्च १९४९ ई.पलिमोहन, मधुबनीमे। वरिष्ठ कवि, रंगकर्मी, सम्पादक, समीक्षक। भाषाई आन्दोलनमे सक्रिय भागीदारी। प्रकाशित कृति- इतिहासहन्ता, माटिपानिक गीत, देशक नाम छल सोन चिड़ैया, अपूर्वा (कविता संग्रह), बेताल कथा (व्यंग्य), मैथिली लोक कथा (लोककथा), प्रतिध्वनि (अनुदित कविता), जा सकै छी, किन्तु किए जाउ(अनुदित कविता), लाख प्रश्न अनुत्तरित (कविता), जादूगर (अनुवाद), स्मृतिक धोखरल रंग (संस्मरणात्मक निबन्ध), आंखि मुनने: आंखि खोलने (निबन्ध)। हर्जे की चलू तिरंगा कने उड़ा ली हर्जे की। आजादी के रश्म पुरा ली हर्जे की॥ आजादी के अर्थ कोश मे जुनि ताकी। आजादी के जश्न मना ली हर्जे की॥ शुल्क-मुक्त आयात स्कॉच-सैम्पेन होइछ। शिक्षा स्वास्थ्यक शुल्क वृद्धि मे हर्जे की॥ देशक प्रगति विकास विदेशी पूँजी स। संसद हैत निलाम होउक ने हर्जे की॥ सौ-हजार भसि गेल बाढ़ि मे भसए दिऔ। राता-राती शेठ बनत किछु हर्जे की॥ रौदी-दाही सबदिना छै रहए दिऔ। जनता बाढ़ि अकाल मरत किछु हर्जे की॥ गाम-देहातक बात बैकवार्डक लक्षण। मेट्रो प्रगति निशान देश के हर्जे की॥ नेता जिन्दावाद रहओ आवाद सदा। देश चलै छै एहिना चलतै हर्जे की॥ (२६.१०.२००८) व्यवस्थाक नाम/ चेतौनी बिना कुनू संकेतक वा समयक प्रतीक्षा कें सूतल ज्वालामुखी कखनहुं गरजि सकैछ गिरि शिखरक आरोही कखनहुं पिछड़ि सकैछ अनुजक नाम/ काज अहींक थिक खएबामे जत्ते किएक ने होउक तीत औषध फल होइते छैक नीक रोगी कें बुझा देब ई बात काज अहींक थिक महेश मिश्र “विभूति” (१९४३- ),पटेगना, अररिया, बिहार। पिता स्व. जलधर मिश्र, शिक्षा-स्नातक, अवकाश प्राप्त शिक्षक। बाबा-स्तुति बाबा बटेश पूजित वशिष्ठ, अपनेक सदिखन दरकार औ। औढ़रदानी गङ्गाधर बाबा, जन-जनके सरकार औ॥...॥ बाबा बटेश, गङ्गातटवासी, दुःखियाके सुनू पुकार औ। जन्मल-बाढ़ल, दुःखदैन्य भेटल, मनमे गङ्गाक दरकार औ॥ औढ़रदानी दरजू झट दऽ, भक्तक करु उद्धार औ। जाकड़-जमा कतहि कछु नाहिं, चाहक अछि भरमार औ॥...॥ विमल “विभूति” दऽ के बाबा, करु विलटल उपकार औ। होयत हँसारति जगमे बाबा, विश्वम्भर सरकार औ॥ औढ़रदानी अर्थ घटे नहिं, एतवहि अछि दरकार औ। आशुतोष-औढ़रदानी भऽ, भक्तक करु उद्धार औ॥...॥ गङ्गा-स्तुति जय माँ गङ्गे, जय माँ गङ्गे, जय माँ गङ्गे। बड़ भागी नर, कल्पवास कर, नित दिन सुलभ विमल तरङ्गे।। जय माँ गङ्गे.. सदिखन दर्शन, नित दिन मज्जन, नित दिन निर्मल काया अङ्गे। मानस विमल वो निर्मल काया, चिन्तन, मनन, भजन नित सङ्गे॥ जय माँ गङ्गे... कथा-श्रवण , कीर्तन मनमोहक, पल-पल कटते अनुपम ढङ्गे। चिन्तन, मनन, भजन सुखदायक, निशिवासर लभते बहुरङ्गे॥ जय माँ गङ्गे... मन-मल-रेचन, भव-भय-मोचन, त्रिविधताप भवसागर भङ्गे। विमल “विभूति” मोक्षदायिनी, सादर सुलभ; होहु नहिं तङ्गे॥ जय माँ गङ्गे... श्यामल सुमन , श्यामल किशोर झा, लेखकीय नाम श्यामल सुमन, जन्म १०।०१।१९६० चैनपुर जिला सहरसा बिहार, स्नातक । शिक्षा:अर्थशास्त्र राजनीति शास्त्र एवं अंग्रेजी, विद्युत अभियंत्रणमे डिपलोमा, प्रशासनिक पदाधिकारी,टाटा स्टील, जमशेदपुर,स्थानीय समाचार पत्र सहित देशक अनेक पत्रिकामे समसामयिक आलेख, कविता, गीत, गजल, हास्य-व्यंग्य आदि प्रकाशित, स्थानीय टी वी चैनल एवं रेडियो स्टेशनमे गीत गजल प्रसारण, कैकटा कवि सम्मेलनमे सहभागिता ओ मंच संचालन। अभियान देश-प्रेम के भरल भाव सँ, नित निर्माण करै छी! सहज-भाव सँ संविधान के, हम सम्मान करै छी! तखनहुँ पिछड़ल कियै हमर मिथिला, पूछै छी हम दिल्ली सँ!! सड़क, रेल, बिजली जुनि पूछू, बाढ़ भेल सौभाग्य हमर! विद्यालय बिनु पढ़य नै बच्चा, छी बड़का दुर्भाग्य हमर! आजादी सँ भेटल की हमरा, सब किछु ध्यान धरै छी! बिना विकासक कष्ट मे रहितहुँ, राष्ट्रक गान करै छी! तखनहुँ पिछड़ल कियै हमर मिथिला, पूछै छी हम दिल्ली सँ!! सब चुनाव के बेर मे पूछथि, बाकी सब दिन रहता कात! आजिज छी आब सुनि-सुनिकय, हमसब हुनकर मीठका बात! एक अंग मिथिला भारत के, व्यंग्यक बाण सहै छी! सहनशीलता हमर एहेन जे, एखनहुँ मान रखै छी! तखनहुँ पिछड़ल कियै हमर मिथिला, पूछै छी हम दिल्ली सँ!! हरेक साल मिथिलावासी मिलि, जाइछी जेना बाबाधाम! तहिना चलू एक बेर संसद, किछु नै किछु भेटत परिणाम! उन्नत मिथिला के खातिर हम ई अभियान करै छी! राश्ट्र-भक्ति मे मिलिकय श्रद्धा-सुमन प्रदान करै छी! तखनहुँ पिछड़ल कियै हमर मिथिला, पूछै छी हम दिल्ली सँ!! आत्म-दर्शन ठोकलहुँ अपन पीठ अपने सँ, बुझलहुँ हम होशियार! लेकिन सच कि एखनहुँ हम छी, बेबस आउर लाचार! यौ मैथिल जागू करू विचार ! यौ मैथिल सुनि लिय हमर पुकार!! गाम, जिला के मोह नहि छूटल, नहि बनि सकलहुँ हम मैथिल! मंडन के खंडन केलहुँ आउर, बिसरि गेल छी कवि कोकिल! कानि रहल छथि नित्य अयाची, छूटल सब व्यवहार! बेटीक बापक रस निकालू, छथि सुन्दर कुसियार!! यौ मैथिल जागू करू विचार ! यौ मैथिल सुनि लिय हमर पुकार!! मिथिलावासी बड़ तेजस्वी, इहो बात अछि जग जाहिर! टाँग घीचै मे अपन लोक के, एखनहुँ हम छी बड़ माहिर! छटपट मन करय किछु बाजी, सुनवा लय क्यो नहि तैयार! मुखिया नहि मानथि समाज के, एक सँ एक बुधियार!! यौ मैथिल जागू करू विचार ! यौ मैथिल सुनि लिय हमर पुकार!! ''संघे शक्ति कलियुगे'' के, कतेक बेर सुनलहुँ हम बात! ढंगक संघ बनल नहि एखनो, हम छी बिल्कुल काते कात! सुमन हाथलय बिहुँसल मुँह सँ, स्वागत वो सत्कार! हृदय के भीतर राति अन्हरिया, चेहरा पर भिनसार!! यौ मैथिल जागू करू विचार ! यौ मैथिल सुनि लिय हमर पुकार!! नवीननाथ झा (नवनीत)- जन्म २०.०१.१९४०, बी.ए.ऑनर्स सह एल.एल.बी., पिता- श्री बैद्यनाथ झा, गाम- भटोत्तर (चकला), जिला पूर्णिया नारीये सतयुग आनत यौ अपन पीयुष अनुदानसँ, जन-जनकेँ पान करायत औ, आबि रहल अछि वो पवित्र ब्रह्म मुहुर्त, जखनहि नारीये सतयुग आनत औ। उषाकालक उद्भव भऽ रहल अछि, अरुणोदयक पावन मुहुर्त अछि, कल्याणक वेदी सजल कतो, नर समूहक मेला अछि कतो, एहेन सुन्दर उपवनमे, युग-परिवर्तनक बिगुल बजाओत औ। आएल वो पवित्र ब्रह्म मुहुर्त, जखन नहि नारीये सतयुग आनत औ॥१॥ करलक जीव सृष्टिक संरचना, चेतनाक संचार लाएत औ, प्रसव-वेदनाकेँ सहलक, माँ बनिकेँ प्यार देलक औ, श्रद्धा, प्रज्ञा, निष्ठा बनि, ई अनुकम्पाक परम्परा निभौलक औ, आबि रहल अछि वो पवित्र ब्रह्म मुहुर्त, जखनहि नारीये सतयुग आनत औ॥२॥ देव युग्मोमे प्रथम नारी, तत्पश्चात् नरक नाम आएल औ यथा-उमा-महेश, शची-पुरन्दर, राधा-कृष्ण, किया नै हुएवो सीता-राम मानुषी रूपमे देवी थीकि, ई तथ्यकेँ ज्ञात कराएत औ। आबि रहल अछि वो पवित्र ब्रह्म मुहुर्त, जखनहि नारीये सतयुग आनत औ॥३॥ नारी-हृदय अछि निर्मल-कोमल, प्रेमक भंडार छुपल अछि सभटा, मानवताक सिंचन करवा लेल, निकलल अहिसँ अमृत-धारा, मुर्छित बसुन्धरा पर पुनः जागृति अवश्मेष आएत औ, आबि रहल अछि वो पवित्र ब्रह्म मुहुर्त, जखनहि नारीये सतयुग आनत औ॥४॥ युगनिर्माणी संकल्प आइ कमर कसिकेँ आएल अछि, दुनियाक युगनिर्माणी, बहुत भऽ चुकल, आब नञि हुअए देबए मनमानी। धनक लेल वासना भड़काबैवला, सुनू औ! दुराचार-अपराधकेँ, उकसावैवाला सुनू औ, केविल, टी.वी. आओर सिनेमामे सुधार आब होएत, ई विनाशकारी शैली आब हमरा सभकेँ अपनावैक नहि अछि, बहुत भऽ चुकल आओर नञि होमे देबए हम मनमानी॥१॥ जे किशोरक मनकेँ भड़कावै,ई कोन मनोरंजन भेल? जे अपराधकेँ उकसावै, ई कोन मनोरंजन थीक? लूट-पाट, हिंसा, हत्या, अहिलेल होएत अछि, दुराचारक घृणित क्रिया, अहि लेल होइत अछि, ईएह महामारी समाजक लेल, जड़िसँ मिटेबाक दृढ़प्रतिज्ञ छी, बहुत भऽ चुकल, आब नञि हुअए देबए हम मनमानी॥२॥ घर-घर जे अश्लील चित्र अछि, तकरा जरा कए हम दम लेब, बच्चा सभकेँ भड़कदार वस्त्र नञि पहिराएब हम, बुक स्टॉलपर जहरीला साहित्य नञि बिकाय लए देबए, मानवीय मूल्यक आगू नञि गलत भावकेँ टिकए लेल देबए, कतो नञि रहए लेल देबए कोनो कुत्सित कथा-कहानी। बहुत भऽ चुकल आओर नञि होमए देबए हम मनमानी॥३॥ आन्तरिक कविक भाव पत्र-पत्रिकामे पुनः होएत प्रेरक गाथाएँ अपराधक लेल प्रमुखताक नञि होएत प्रथाएँ सहज विधेयात्मक होएत पुनः दृष्टि कलाकारक हुनका नञि होएत चिन्ता, मात्र धन वा बजारक। माँक बिसरल प्रतिष्ठा पुनः बढ़त ई अवश्य जानू। बहुत भऽ चुकल आओर नञि होमए देबए हम मनमानी॥४॥ फिल्म नैतिक मूल्यकेँ उकसाबएवाली होएत, कविता नारीक मान-प्रतिष्ठा बढ़ावैवाली होएत। कतहु नहि होएत मादक-धुनपर नृत्य सिहराबएवाली, मानव-चिन्तनक विष भरए लेल नञि होएत संचार कनेको, पुनः प्रतिष्ठापित करबाक अछि, पुरान गरिमामयी कहानी, बहुत भऽ चुकल आओर नञि होमए देबए हम मनमानी॥५॥ व्यक्तित्व पाठक आओर दर्शकक सत्चिन्तनकेँ उभारए लेल पड़त आवश्यक छी, शुभ समाजक लेल समर्पित जँ व्यक्तित्व नञि होएत, ओऽ कवि कलाकारक नवयुगमे अस्तित्व नञि होएत, आए ईएह संकल्प लऽ केँ बढ़ि चलू सृजन-सेनानी। बहुत भऽ चुकल आओर नञि होमए देबए हम मनमानी॥६॥ जीव की छी? अहम् प्रश्न उत्तर जीवन एक जोखिम छी, जीवन एक समर छी। जीवनकेँ एहि रूपमे स्वीकार करब, तकर अलावे कोनो चारो तेँ नहि अछि। सत्ये कहैत छी, जीवन एक तथ्यपूर्ण रहस्यमयी भाव छी। जीवन एक तिलस्मी छी, जीवन एक भूल-भुलैया छी। एक तरहेँ ई एक गोरख धंधा सेहो छी। जिनकर जिम्मा गंभीर पर्यवेक्षण करबाक दृष्टि छैक (अछि) ओ जन जोहि भावनाक तहतक पहुँच सकैत अछि, जीवनसँ जुड़ल भ्रान्ति, कुहासा सेहो, मिटाएल जाऽ सकैत अछि, अनेकानेक खतरासँ सेहो बाँचल जाऽ सकैत अछि जेना ९यथा)- हँसैत, हँसाबैत, हलका, फुलका रंगमंच, मानिकेँ, विनोदपूर्वक मंचन करैत, आनन्दपूर्वक समय व्यतीत करबाक दृढ़ निश्चयी-भाव, लऽ केँ चली तँ- जे कि पूर्णानन्दक सर्व इच्छा छी॥ जीवन एक जोखिम छी॥ जीवन एक गीत छी, जे गीतकेँ हम पंचम स्वरमे गाबि सकैत छी, कल्प विशेषज्ञ बनल जाऽ सकैत अछि॥ जीवन एक जोखिम छी॥ जीवन एक अवसर छी! एहि अवसरकेँ हाथसँ गँवा नहि देबाक अछि, कारण ई शुभ अवसर जीवनमे ईश्वरक अनुकम्पासँ, कमसँ कम एक बेर अवश्यमेव भेटबेटा करत ई निःसंदेह अछि॥ जीवन एक शुभावसर सेहो छी॥ गायत्री महामंत्र प्रार्थना करैत छी हुनकासँ (परमात्मासँ) ओऽ प्राणस्वरूप, दुखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्माकेँ हम अपन अन्तरात्मामे धारण करी। ओऽ परमात्मा हमर बुद्धिकेँ सन्मार्गमे प्रेरित करताह, जे अवश्यंभावी अछि। ओऽ परमात्मा हमर बुद्धिकेँ सन्मार्ग, सत्मार्गपर चलबालेल सुबुद्धि देथि॥ गायत्रीकेँ भारतीय संस्कृतिक जननी कहाएल अछि॥१॥ गायत्री भारतीय धर्मशास्त्रक ओऽ समस्त दिव्यज्ञानक प्रकाश अछि, गायत्रीकेँ बीजाक्षरक विस्तार मानल गेल अछि। गायत्री माँकेँ आँचर पकड़एबला साधक, कखनो निराश भऽ नहि सकैत अछि। ई मंत्रक चौबीस अक्षर , चौबीस शक्तिक एवं सिद्धिक मार्ग अछि, गायत्री मंत्रक उपासना करएबला साधकक-मनोकामना, अवश्यमेव सफलीभूत होइत अछि।। गायत्रीकेँ भारतीय संस्कृतिक जननी कहल गेल अछि॥२।। गायत्री वेदमाता कहल जाइत अछि, गायत्री मानव-मात्रक पाप-नाशनी थिकी, अक्षर चौबीस परम पुनीत अछि, एहिमे बसल शास्त्र, श्रुति, गीता- महामंत्रक जतेक जगमाहि, एकोटा गायत्री सम नञि अछि। गायत्री भारतीय संस्कृतिक जननी कहल गेल अछि॥३॥ ॐ अव्ययवाचक शब्द छी। अतः ई शब्द परमात्माक अतिरिक्त कोनो, प्राणीकेँ प्रयोजित नहि होइत अछि, ॐ शब्दकेँ ब्रह्म सेहो कहल जाइत अछि। भू: भुवः स्वः- ब्रह्मा, विष्णु एवं महेशक द्योतक अछि॥४।। तत्- परमात्माकेँ भाव ध्यानक दिस आकर्षित करैत अछि॥ सवितुः – सविता वै प्रसवनामीशे निश्चयेव समस्त सृष्टिक ईश्वररे सविता अछि थीक। प्रेम आनन्दक अभिव्यक्ति छी प्रेम जगतमे सार वस्तु होइत अछि। प्रेम सत्ये अर्थमे जीवन छी। प्रेम जीवनक सत्यरूपमे नियामक छी। जीवन आओर जगक विकासक सोपान छी। हर क्षेत्रमे प्रेमक विशिष्टताकेँ नकारल नहि जाऽ सकैत अछि प्रेम, धर्म, विज्ञान, मनोविज्ञान, समाजशास्त्र तकमे- समाओल गेल अछि, पिराओल गेल अछि। प्रेम मानव जीवनक अनिवार्य एवं अपरिहार्य अंग मानल गेल अछि, से सत्ये जानू॥ प्रेम सत्ये अर्थमे जीवन छी॥ प्रेम एक सार तत्व अछि, जे अणुसँ अणुमे, परमाणुकेँ परमाणु मिलाबैत अछि। पैघ-पैघ ग्रहकेँ एक दोसरसँ आकृष्ट कराबैत अछि, पुरुषकेँ स्त्रीक ओर, स्त्रीकेँ पुरुषक ओर, मनुष्यकेँ मनुष्यक ओर, पशुकेँ पशुक ओर, मानू तँ समस्त संसारकेँ एक केन्द्रक ओर खिचैत अछि प्रेम सर्वोपरि सुख आओर आनन्द छी। प्रेम जीवनक सार वस्तु छी॥ प्रेम यथार्थमे निःस्वार्थक भावनाक प्रतीक छी, प्रेमकेँ दैवी भावनाक संज्ञा सेहो दऽ सकैत छी, प्रेममे सदैव आदर्शक चरमोत्कर्ष अछि॥ प्रेम जीवनक महानतम धरोहर छी॥ प्रेम पुरस्कार नञि चाहैत अछि, प्रेम सदैव प्रेमक वास्ते होइत अछि, प्रेम प्रश्नकर्ता नञि अछि, प्रेम भिखमंग नञि, प्रेमक प्रथम सिद्धान्त जे याचना नञि करैत अछि प्रेम सत्ये अर्थमे आत्माक पुकार छी, प्रेम जगतमे सार वस्तु होइत अछि प्रेम सत्ये अर्थमे जीवनक सार छी॥ विद्यानन्द झा पञ्जीकार (प्रसिद्ध मोहनजी) जन्म-09.04.1957,पण्डुआ, ततैल, ककरौड़(मधुबनी), रशाढ़य(पूर्णिया), शिवनगर (अररिया) आ’ सम्प्रति पूर्णिया। पिता लब्ध धौत पञ्जीशास्त्र मार्त्तण्ड पञ्जीकार मोदानन्द झा, शिवनगर, अररिया, पूर्णिया|पितामह-स्व. श्री भिखिया झा। पञ्जीशास्त्रक दस वर्ष धरि 1970 ई.सँ 1979 ई. धरि अध्ययन,32 वर्षक वयससँ पञ्जी-प्रबंधक संवर्द्धन आऽ संरक्षणमे संलग्न। कृति- पञ्जी शाखा पुस्तकक लिप्यांतरण आऽ संवर्द्धन- 800 पृष्ठसँ अधिक अंकन सहित। गुरु- पञ्जीकार मोदानन्द झा। गुरुक गुरु- पञ्जीकार भिखिया झा, पञ्जीकार निरसू झा प्रसिद्ध विश्वनाथ झा- सौराठ, पञ्जीकार लूटन झा, सौराठ। गुरुक शास्त्रार्थ परीक्षा- दरभंगा महाराज कुमार जीवेश्वर सिंहक यज्ञोपवीत संस्कारक अवसर पर महाराजाधिराज(दरभंगा) कामेश्वर सिंह द्वारा आयोजित परीक्षा-1937 ई. जाहिमे मौखिक परीक्षाक मुख्य परीक्षक म.म. डॉ. सर गंगानाथ झा छलाह। ॐ ॥श्री गणेशाय नमः॥ कोशीक ताण्डव पूर्व मिथिला कोशी कातक चहुँदिशि करै किलोल। अन्न-वस्त्रसँ वंचित भए बसथि केम्प धनजोर॥ नेना-भूटका ओ समरथुआ क्यों नहिं रहल सरपोक। पतिएँ पत्नी, पुत्र पौत्रसँ छिन्न-भिन्न चहुँओर।। विपदा मारल देह नचारी गेल अन्न-अन्न बेहाल। जल विचि बसिकऽ प्यास मरै अछि प्राण पावि दुत्कार॥ नर ओ नर रिपु संग निभै किनको मुख नहिं मपान। विधिना स्पलैन्हि अपर विधान हुनकर नहिं परिमाण॥ कष्टक अन्त नहिं कहुखन देखलहुँ कष्टहिं वितय प्राण। भूखक ज्वाला दग्ध करै अछि- स्नेह-प्रेम-सम्मान॥ पिता पुत्रसँ झपटि खाए छथि- रोटी-नोन महान। जठरानल धधकल अछि सभतरि नहिं बुझथि संतान॥ सर्व स्वांत कएलैन्हि कोशी माता नहिं किछु बांचल जोर। पूर्व मिथिला कोशी कातक चहुँ दिशि करए किलोल॥ एहि विचि देखलहुँ अद्भुत “ देखना” “मारिचक” भरमार। मौका पावि लूटि रहल अछि सेवा भेल व्यापार॥ दुनियाँ दौड़ल बाँहि पसारिक, बैसोलक घड़जोड़ि, अन्न-वस्त्र ओ आलिङ्गन दए, कएलक भाव-विहोर॥ सचमे! दुनियाँ एखनहुँ बाँचल- सत्य भेल नहिं थोड़। श्रृष्टि विधाता रक्षा करता, नहिं होउ कमजोर- नहिं होउ कमजोर। १.केम्प- शिविर २.धनजोर- सम्पन्न, धनी ३.सरपोक- खतरा मुक्त, चिन्तामुक्त ४.नर-रिपु- सर्प इत्यादि ५.मारिच- मायावी राक्षस ६.घड़जोड़ि- एक संग श्रृष्टि चक्र आदिमे शुन्य छल शुन्यसँ शान्ति छल। शुन्य केर सत्ता दिग-दिगन्त व्याप्त छल। शून्यक विधाता शून्यसँ आक्रान्त छल। शून्यसँ प्रारम्भ भए शून्यहिसँ विराम छल। विधिना विधान कएल रचना संसार कएल। खेत पथार पोखरि ओ जीवक संचार कएल। दिति ओ अदितिसँ श्रृष्टिक विस्तार कएल। कर्म सभक बान्हि बान्हि धरतीपर आनि धएल। शुन्यक विखंडनसँ वृत्तक विस्तार भेल। पोखरि ओ झांखड़ि पर्वत पहाड़ भेल। नदी-नद तालाब ओ वनस्पति हजार भेल। जीव जङ्गम स्थावर ओ गतिमान संसार भेल। चन्द्र सूर्य नक्षत्र ओ वायु वारिद नीर। धरा-गगन धरि व्याप्त भेल विद्युत ओ समीर। सभतरि पसरल तेज पुञ्ज चकाचौंध गम्भीर। तम-तम करइत दिन दुपहरिया नयन भरल ओ नीर। जल चर- थलचर- नभचर नाना। अप्पन-अप्पन धएलक बाना। विविध भेष ओ भाषा नाना। कएलक निज-निज गोत्र बखाना। विष ओ अमृत संग जनमि गेल। स्नेह-प्रेम-आघात प्रगट भेल। दोस्त-महिम कुटुम्ब अमरबेल। चतरि-चतरि चहुँओर पसरि गेल। एक दिशि जनमल चोर-उचक्का। दोसर दिशि भलमानुष सुच्चा। श्रृष्टि हेतु- समधानल सभटा। प्रभु सभ करथि हुनक ई छिच्छा। गोङ बधिर बजबैका नाङ्गर। श्वेत-श्याम सत्वर ओ अजगर। दीर्घकाय ओ दुव्वर पातर। सभटा रचलैन्हि ओ विश्वम्भर। भूख रचल प्यास रचल। श्रम ओ संधान रचल। रोग रचल व्याधि रचल। औषध अपार रचल। काम भूख दाम भूख वासनाक उग्रभूख। शान-मान-दान भूख भूखक हजार रूप। ई भूख ओ भूख भूखक विद्रूप रूप। भूख मुदा बढ़िते गेल धधकैत विकराल रूप। शाम-दाम-दण्ड भेद शासन कुशासन। काम-क्रोध-लोभ-मोह विरचल “महाशन”। राग-द्वेष-प्रेम-वैर पसरल हुताशन। श्रृष्टि चक्र चलैत रहल वैदिक ऋचा सन।....। घर बनल गाम बनल नगर ओ धाम बनल। जनता जरल सन नेता भगवान बनल। देशक खेवैया झुठ्ठा बेइमान बनल। भक्तिक भभटपन पण्डा शैतान बनल। श्रृष्टि चक्र चलैत रहल वैदिक ऋचा सन।... पाद-टिप्पणी: १.वारिद-मेघ २.समधानल-ओरियाकऽ ३.छिच्छा-स्वभाव ४.संधान-अन्वेषण,खोज ५.महाशन-विष्णु ६.हुताशन-अग्नि. दहेज दानव पुत्र हुनक अभियन्ता छन्हि। मनमे बहुत सेहन्ता छन्हि। बेटी बापक टिक पकड़िकऽ। शोणित चूषक इच्छा छैन्हि। विन दामक नहिं बेटा वियाहब। वरु कुमार रहि जाथि। व्यापारी छी व्यापार करब। वरु बेटे विक जाथि। वरक बाप ओ ओढ़ङ्गल वैसल। क्षण-क्षणमे फुचियाथि। जे किछु मङ्गलनि से बड़ कम अछि। कन्या दाता स्वयं विकाथि। कन्यादाता अरमान करथि। भलमानुष भेटि जाथि। माय बन्धु ओ कुटुम वेरागन। द्वार-द्वार घुरियाथि। की मांगी ओ की नहिं मांगी। एहिपर नहिं किछु सोच-विचार। जे फूरय ओ सब किछु मांगी। माँगक अन्त नहि, कतऽ उदार। लोलूप जीव किछु नहिं वूझय। सब बूझय- धनपोषनिहार। अनकर धनपर लूटि मचावथि। संसारक सब चोषनिहार। कन्या दाता भए वेगर्तित। अंट-शंट गछि लेथि। मिथ्यालाप कखनहुँ नहिं हितकर। तकर करथि निर्लेख। विवाह एक धर्म थिक विवाह एक कर्म थिक। धर्म-कर्म राखि सकी समाजक ई मर्म थिक। दहेज एक लोभ थिक दहेज एक रोग थिक। लोभ-रोग छोड़ि सकी हमर ई धर्म थिक। हमर ई धर्म थिक... धीरेन्द्र प्रेमर्षि चहकऽ लागल चिड़िया-चुनमुन पसर खोललकै चरबाहासुन नव उत्साहक सनेस परसैत करै कोइलिया सोर उठह जनकपुर भेलै भोर दादीक सूनि परातीक तान तोड़ल निन्न सुरुज भगवान सूतलसभकेँ जगबऽ लए पुनि गूँजि उठल महजिदमे अजान कहैए घण्टी मन्दिरक मनमे उठबैत हिलोर उठह जनकपुर भेलै भोर हम्मर-तोहर इएह धुकधुक्की फैक्ट्रीक साइरन, ट्रेनक पुक्की खालि कर्मक जतऽ भरोसा दुख-सुख जिनगीक चोरानुक्की घरसँ बहरैहऽ पाछाँ जा ता मन करह इजोर उठह जनकपुर भेलै भोर अन्यायक संग लड़बालए तोँ प्रगतिक पथपर बढ़बालए तोँ मिथिलाकेर अम्बरपर बिहुँसैत चानक मुरती गढ़बालए तोँ गौरवगाथा सुमिरैत अप्पन हिम्मत करह सङोर उठह जनकपुर भेलै भोर एमकीक जतरा भाइ रे, एमकीक जतरा निम्मन छै देखही सालक पहिलही दिनमे, रोटीपर आइ तिम्मन छै निसफिकरी भऽ खटलि बहुरियो, एमकी चौरी-चाँचरमे कोनो गिरहतबा हाथ ने देलकै, ओइ लजबिज्जीक आँचरमे चिल्हका मूहसँ छीनल दूधक, शिवमठमे ने टघार भेलै बहु-बेटीके इज्जति मीता, देख, ने कतौ उघार भेलै भोरे नन्हकू इसकुल गेलै, जलखै कऽ बस्ता लेने कएल काजके बोनि जे पेलकै, धुथरो आइ विन खेखिएने सबके भेटलै सुपत मजुरी, एमकीके बोनिहारीमे ककरो सपना उधिएलै नइ, फेन भोँटक पैकारीमे कोनो मजूरक एमकी भाइ रे, अपटी खेतमे गेलै ने जान लाश गनाकऽ कोनो हकिमबा, बनलै नइ रौ कतौ महान दुःख-दलिदरा जते छलै से, टिशनेपर जनु छूटि गेलै खुशहालीक जेँ टेन ससरलै, चट्ट दऽ निन्ने टूटि गेलै हमहीँटा छली सपनलोकमे, सबकुछ पुरने ठिम्मन छै भाइ रे, अखनो कुछ नइ निम्मन छै हमरासबहक खून-पसेना, ओकरे सँझुका तिम्मन छै हमरासभक मुस्कीक मोन्हिकेँ एखनोधरि जे अपन धोधिसँ मुनने अछि ओहि धोधिकेँ कुतरैत समतामूलक समाजक निर्माणमे अग्रसर होइत हमसभ सफलता पाबि सकी, जाहिसँ हमरासभक नववर्षक यात्रा सरिपहुँ आह्लादकारी भऽ सकए। आजाद गजल १ झुट्ठो जे नहि डाइन नचौलक ओ भगता ओ धामी की एको गाम जँ डाहि ने सकलहुँ तँ ओढ़ने रमनामी की अक्षत-चानन धूप-दीपसँ जतऽ यज्ञ सम्पूर्ण हुअए- ततऽ जँ क्यो हड्डी रगड़ैए, ओ कामी ओ कलामी की बाप-माएपर्यन्त परोसै स्नेह जखन बटखारासँ- नकली सभक दुलार लगैए, से काकी, से मामी की सोनित सेहो शराब बनै छै शासनकेर सनकी भट्ठी दियौ घटाघटि जे भेटए से, फुसियाही की दामी की पोखरिक रखबारी पएबालए कण्ठी खालि बान्हि लिअ फेर गटागटि घोँटने चलियौ, से पोठिया से बामी की पाग उतारिकऽ कूदि गेल “प्रेमर्षि” सेहो अखाड़ामे ढाहि सकल ने जुल्म-इमारत करतै ओहन सुनामी की (वि.२०६२/०५/३०) आजाद गजल २ मोन जँ कारी अछि तँ चमड़ी गोरे की करतै? ममते जँ अरुआएल तँ माएक कोरे की करतै? गगनसँ उतरै मेघ नयनमे जखन साँचिकऽ शङ्का केहनो अन्हार चीरिकऽ जनमल भोरे की करतै? नीम पीबिकऽ माहुर सेहो पचाबैत आएल छी तँ काँटकेँ धाङैत डेगकेँ थोड़े अङोरे की करतै? घामक सिँचल धरती छोड़ि ने जकरा कतौ भरोसा तकरा लेल बनसीक सुअदगर बोरे की करतै? आगि पीबिकऽ बज्र बनौने छै जे अप्पन छाती तकरा आगाँ गोहिया आँखिक नोरे की करतै? तैयो लागल “प्रेमर्षि” अछि बस प्रेमक खेतीमे प्रेमक धन भेल घरमे जाबिड़ चोरे की करतै? (वि.२०६२/०५/२०) आजाद गजल ३ घसाइत आ खिआइत चोख फार भेल छी गला-गला गात गजलकार भेल छी शब्दकेर महफामे भावक वर-कनियाँ लऽ सदिखन हम दुलकैत कहार भेल छी धधराक धाह मारऽ पोखरि खुनाएल अछि स्वयं भलहि प्यासल महाड़ भेल छी हमरे फुनगी लटकल धानक जयगान- मुदा, हमधरि तिरस्कृत पुआर भेल छी भावक व्यापार मीत पुछू ने भेटल की मलहम दऽ दर्दक अमार भेल छी दुखियाक गीत जेँ गबैत अछि गजल हमर लतखुर्दनि होइत तेँ पथार भेल छी रूप-रङ्ग हम्मर आकार किए निरखै छी? निज आखरमे हम तँ साकार भेल छी अबियौ सहभोज करी बन्हन सभ तोड़िकऽ प्रेमक हम परसल सचार भेल छी आजाद गजल-४ जँ बजितहुँ हम फूसि तँ भगवाने छलहुँ अछि आदति खराब जे कि साँच बजै छी देश दलदल छै भेल फूटि नीतिक जे घैल बुझू तकरे सुखएबा लेल आँच बजै छी कियो कतबो कहौक शिवक ताण्डव छियै हम तँ सत्ताकेँ नटुवाक नाँच बजै छी भलहि झूलि जाइ ब्रह्म लेल फँसरी सही तैयो पाकलकेँ कथमपि ने काँच बजै छी मुक्तक सुरेन्द्रक लऽ गजल गढ़ि लेल मुदा दू आ दू कहियो नइ पाँच बजै छी आजाद गजल-५ आबि गेल गजलोमे रोशनसँ रोशनी बढ़िते जेतैक एकर पोषणसँ रोशनी हाथ सैंति मीत हमर मूहक उदार महा मुदा कोना बरतै उद्घोषणसँ रोशनी? आगिएमे जरिकऽ सोना हम चमकै छी दुनियाभरि तेँ चतरल शोषणसँ रोशनी भने सागपात खोंटब छोड़ि देल जनकपुरी कहियो की भेल छै इमोशनसँ रोशनी! बरू मोनक घाओमे लगा दियौ प्रेमर्षि पसरत अवश्य प्रेम-लोशनसँ रोशनी आजाद गजल-६ हम कहब ने कथमपि हथियार निकालू कने धरगर यौ मीता अखबार निकालू दासत्वक सिक्कड़िसँ जे अइ जकड़ाएल जङ्ग खुरचैत ओ असली विचार निकालू मुहदुब्बर भेल छी तेँ सभक्यो लुलुअबैए लाल सोनितसन आखर ललकार निकालू गौरवकेर गीत हमर गर्भहिमे मरिरहल आब तकरोलए साँठल सचार निकालू टकटकी लगौने पिआसल चकोर लेल थोड़े चानहिसन मिठका दुलार निकालू स्वर्णिम बिहान काल्हि बिहुँसत जरूर बस गुजगुज एहि रातिसँ अनहार निकालू केहनो हो तख्त-ताज जकरालग नतमस्तक ओहनेसन कलमक तरवार निकालू आजाद गजल-७ हम्मर सरकारक महा ने साफ नीयत छै झूठ नइ बजैत अछि, साँचक कब्जीयत छै गमलामे धान रोपि धान्याञ्चल यज्ञ करए डण्ड खीचि मुसरीधरि खोलैत असलीयत छै जनताक फोड़नसँ तेल कपचि टोइयामे- बारए मशाल, जे इजोतक अहमीयत छै लाख-लाख दीपक ई पसरल प्रकाश कहै- आजुक एहि सुरुजमे जरूरे कैफीयत छै कोरामिन लगा-लगा कोरमे सुतओने अछि देश तेँ दुरुस्त छैक, सुस्त बस तबीयत छै सभक मोनमे छैक मात्र आब प्रश्न एक- हमर स्वप्न-आस्था की ओकरे मिल्कीयत छै! आजाद गजल-८ जीवनकेर डोर छोड़ि हाथक लटाइमे जुनि पुछू स्वाद की छै गुड्डीक कटाइमे इतराएब-छितराएब कहू कोन गुमानपर नान्हिटा शरीरो अछि भेटल बटाइमे फटैत तँ दूधे छै, नेनक जे खानि छियै खट्टा जाए दूधमे वा दूधहि खटाइमे प्रेम छोड़ि संसारक रङ्ग सभ धोखड़ि जाइ छोड़ू अगधाएब बैसि चकमक चटाइमे कर्मक खड़ाम पहिरि शतपथपर चलबासन पुण्य कतहु पाएब नहि रामक रटाइमे जन्म आओर मृत्यु थिकै सृष्टिक विधानटा मजा छैक जिनगीक सङ्घर्ष छटपटाइमे आजाद गजल-९ बोल रे मन एकतारा बोलै टनन-टनन-टन-टन धनुषक जनु टङ्कार छुटैछै झनन-झनन-झन-झन कतबो घुमरैत आबै बदरा अपने जाएत बिलाकऽ जेना तप्त ताबापर जल होइ छनन-छनन-छन-छन प्रेमक डिबिया बचाकऽ राखी साँचक आँचर तरमे बड़ उकपाती पवन बहैए सनन-सनन-सन-सन जाधरि छौ साँसक घण्टी बस ताधरि छौ बजबाके गनगनाइत रह तेँ रे मीता गनन-गनन-गन-गन तोरे चुप्पीके मलजलसँ नित्य जे चतरल जाइछौ जरा दही ओहि अकाबोनकेँ हनन-हनन-हन-हन तोहर सुर-गर्जनसँ जरूरहि, ठाढ़ देबाल दरकतै तखने चहुँदिस हँसी खनकतै खनन-खनन-खन-खन आजाद गजल-१० सिहकैत कनकन्नीमे सीटर छी, जर्सी छी मखा-मखा प्रेम करी, मोनक प्रेमर्षि छी चानक धियानमे धरती नहि छूटए, तेँ डिहबारक भगता हम दूरक ने दर्शी छी थाहैत आ समधानैत काँटोपर जे बढ़ैछ फाटल बेमाएवला चरणक स्पर्शी छी हम्मर वैदेहीक कुचर्च कएनिहार लेल अँखिफोड़बा टकुआ छी, जिहघिच्चा सड़सी छी गन्ध जँ लगैए तँ मूनि लिअ नाक अहाँ तिरहितिया खेतक हम गोबर छी, कर्सी छी जिनगीक कखहरबामे साँसक जे मात्रा अछि दहिना दिर्घी नहि, बामाक हर्षि छी आजाद गजल-११ मुक्तिगीत अम्मल अछि, जीयब हम अमलेमे रचि-रचि सजाएब नेह-गीत मोन-कमलेमे धूर-धूर खेत पड़ल शासनकेर मोहियानी निष्ठाक अन्न तैयो उपजाएब गमलेमे दूभिजकाँ चतरल अछि जे मोनक कणकणमे उपटत धरखन्ने ओ धुरफन्दीक हमलेमे! पघिलत जे बर्फ़ तखन ढाहि देत आरि-धूर नाचि लिअए नङटे ओ भने एखन जमलेमे शासनकेर भाथीसँ चिनगी अछि रञ्ज भेल जुटिअबियौ खढ़-पात मेहनतिसँ घमलेमे गजलक ई पनही पहीरि बाट चलैत काल पओलहुँ जे हेआओ तेँ समर्पित ई विमलेमे बृषेश चन्द्र लाल-जन्म 29 मार्च 1955 ई. केँ भेलन्हि। हिनकर छठिहारक नाम विश्वेश्वर छन्हि। ओ विश्वेश्वर प्रसाद कोइरालाक प्रतिबद्ध राजनीति अनुयायी आ नेपालक प्रजातांत्रिक आन्दोलनक सक्रिय योद्धा छथि। नेपाली राजनीतिपर बरोबरि लिखैत रहैत छथि। मैथिलीमे हिनक “आन्दोलन” कविता संग्रह प्रकाशित छन्हि। नजरि अहाँक चितकेर जूड़ा दैत अछि। घुराकए एक क्षण जिनगी देखा दैत अछि। धँसल डीहपर लोकाकए फेर स्वप्न महल पाङल ठाढ़िमे कनोजरि छोड़ा दैत अछि॥ बजाकए बेर-बेर सोझे घुराओल छी हम हँसाकए सदिखन हँसीमे उड़ाओल छी हम बैसाकए पाँतिमे पजियाकए लगमे अपन लतारि ईखसँ उठाकए खेहारल छी हम सङ्केत एखनो एक प्रेमक बजा लैत अछि जरए लेले राही जड़िसँ खरा दैत अछि उठाकए उपर नीच्चा खसाओल छी हम जड़ाकए ज्योति अनेरे मिझाओल छी हम लगाकए आगि सिनेहक हमर रग-रगमे बिना कसूर निसोहर बनाओल छी हम झोंक एक आशकेर फेरो नचा दैत अछि उमंगक रंगसँ पलकेँ सजा दैत अछि हिमांशु चौधरी विष-वृक्ष धरतीमे आबि आकाश दिश ताकऽ बला स्थितिसँ काँपि रहल छी हसोन्मुख प्राप्तिकँ लऽ कऽ दुःखक अन्तिम परीक्षा भऽ रहल अछि देवता रहितौ देवता मरि गेलाक कारणें आस्था मन्दिरमे सूतल अछि सुषुप्त आस्थाकेँ जगओनाइ कठिन भऽ रहल अछि दिनानुदिन आ उपचारहीन युगक अवैध घाओक पीजमे पिछड़ि कऽ हरेक अंगकेँ क्यान्सर कहि नियतिमे दिन बिताबऽ पड़ि रहल अछि घाओक टनकनाइसँ बेसी घाओक परिकल्पनासँ अवरुद्ध अछि- कण्ठ आ छाती आड़ि-आड़िमे शरीरक अंग भेटऽ लागल अछि हर जोतबाक सहास नहि भऽ रहल अछि मानचित्रसँ हिमालक छाह भागल जा रहल अछि पहाड़ आ मधेशमे अन्हार बढ़ल जा रहल अछि पीयर गजुरक नीचाँ हवाक वेगसँ बुर्जाक घण्टीमे सेहो घृणा चिचिया रहल अछि उड़ैत परबाक पाँखिमे सेहो बारुद बान्हल अछि फरिच्छेमे मृत्युदण्डक क्रम बढ़ैत गेलासँ मृत्युक खातामे मूल्यवान छाती छाउर भेल जा रहल अछि भोर आ राति गर्भाधान कएनाइ छोड़ने जा रहल अछि छीः छीः एहनेमे विष वृक्ष रोपनाइ नहि बन्द भऽ रहले अछि। रामभरोस कापड़ि अन्हारक विरुद्ध उपर अन्हार निचां अन्हार वाम अन्हार दहिन अन्हार विगत अन्हार आगत अन्हार चारुभर अन्हार अन्हारे–अन्हारक विचमे बन्न भेल जकां कोनो कृष्णक प्रतिक्षामे संक्रमणक नामपर एहि आन्हर वर्तमानकें सहि रहलहुं अछि ! ई सहब हमर नामर्दी किन्नहु नहि अछि, एहि अन्हारक विरुद्ध विगतक कएकटा आन्दोलन हमर पुरुषार्थकें दुनियांक आगां स्थापित क’ चुकल अछि । हम अपन ताही पुरुषार्थकें रक्षार्थ एहि अन्हारक संतापकें सहेजबाक उपक्रम क’ रहल छी, संक्रमण वितबाक प्रतिक्षा क’ रहल छी, रैतीसं शासक बनबाक सुखद अनुभूति किछु कालक हेतु चकबन्न कोनो कोठरीमे पडबासं वेजाय नहि हयत, तएं गणतन्त्र आ नयां नेपाल नयां गणतन्त्र आ नयां नेपाल नयां सम्विधान आ जनताक सत्ता चकबन्न कोठरीक कोनो खिडकीक दोग द’ इजोत बनि अवस्से आओत– नहि हएतै विफल संघर्षक प्रतिफल एहि कारी गुजगुज कोठरीमे हाथपैर मारि–मारि क’ तेहने नव इजोतक हेतु हमरा सभक ई संघर्ष कहियो उफांटि नहि हयत विराट कारी रातिकें चिरबा लेल दिऔरीक लुकझुक टेमीक प्रकाश हमर आदर्श रहल अछि, अन्हारक विरुद्ध हमर ई संघर्ष नव क्षितिजक अन्वेषण करत जत्त सरिपहुं इजोतक टा साम्राज्य हयतै !! आजाद गजल करिछौंह मेघके फाटब, एखन बाँकी अछि चम्कैत बिजलैँकाके सैंतब, एखन बाँकी अछि उठैत अछि बुलबुल्ला फूटि जाइछ व्यथा बनि पानिके अड़ाबे से सागर, एखन बाँकी अछि बहैत पानिआओ किनार कतौ खोजत ने अगम अथाह सन्धान, एखन बाँकी अछि फाटत जे छाती सराबोर हएत दुनियाँ “भ्रमर” ई झिसी आ बरखा प्रलय, एखन बाँकी अछि। जितमोहन झा घरक नाम "जितू" जन्मतिथि ०२/०३/१९८५ भेल, श्री बैद्यनाथ झा आ श्रीमति शांति देवी केँ सभ स छोट (द्वितीय) सुपूत्र। स्व.रामेश्वर झा पितामह आ स्व.शोभाकांत झा मातृमह। गाम-बनगाँव, सहरसा जिला। एखन मुम्बईमे एक लिमिटेड कंपनी में पद्स्थापित।रुचि : अध्ययन आ लेखन खास कs मैथिली। पसंद : हर मिथिलावासी के पसंद पान, माखन, और माछ हमरो पसंद अछि। दिलक कलमसँ शेरो शायरी चाँदक लेल सितारा हजार छैन ! मुदा सितारा के लेल चाँद एक !! ओहिना अपनेक लेल हेता हजारो ! मुदा हमरा लेल अहि सिर्फ एक !! हाथक लकीर पर एतवार क लेब ! भरोसा हुवेंतँ हर हदकेँ पार क लेब !! हरेब आर पेब सभ नशीवक खेल अछि ! दिल जिनका अपनाबे हुनकेसँ प्यार क लेब !! दिलजे डूबलतs आशाके गाम आँखमs मचैल गेल ! एक चिराग की बुझल सौ चिराग जैल गेल !! हमर आर हुनकर राह बस एतबे देर एक छल ! दुई कदम चललों की राहे बदैल गेल !! नोरसँ पलक भींगे लैत छलो ! याद हुनकर आबैत अछितँ कैन लैत छलो !! सोच्लों की बिसैर जै हुनका ! मुदा हर बेर ई फैसला बदैल लैत छलो !! अपन आगाजसँ आजू तलक जिंदगी, अहिकें याद मs गुम छल ! तयों पता नै किये ई एहसास अछि, जेना की चाहत हमर कम छल !! दुनियाँक सभ फूल,खुशबू, आर बहार ! अपनेक मिले इ सभ उपहार !! आसमाँ के चाँद, आर सितारा ! एय सब सँ अपने करू श्रृंगार !! अपने खुश रही, आवाद रही ! ख़ुशी के एहेंन हुवे फुहार !! हमर एहेंन दुवा अछि हजार ! दामन अपनेक कम परे .... जीवन मेंs अपनेक मिले एतेक प्यार !! मंजिल आसान सभटा, मुस्किल बेनूर हुवे ! दिलक जे भी अछि तम्मना ओ हमेशा दूर हुवे !! होठ पर होथक बात हुवे, ख़ुशी मेs समटल जिन्दगी ! गम भरल परछाई अपनेक आँचल सँ लाखो दूर हुवे !! फूलक तरह मह्कैत रहू, सितारा के तरह चमकैत रहू ! हमर एतबे दुवा अछि अपनेक लेल .... अपने जाते भी रही, हरदम चाह्कैत रहू !! लौटक आयब एक दिन, जरुर हमर यकींन करब ! हमर याद आबे तँ आइख अपन नै कहियो नम करब !! दुनियाँ साजिश केs कs जुदा नै के दिए हमरा ! कियो किछ भी कहे अपने भरोसा नै करब !! फुरसत के लम्हा मेंs ख़त लिखब अपने कs मुदा ! हर दिन अपने हमर खतक इंतजार नै करब !! हाथ मेs पहिरने कंगना छी, आर कान मेंs पहिरने बाली ! हम विदेहक लेल अहिना लिखेत रहब, चाहे नव वर्ष होई या दिवाली !! जखन जनता जागि जाइत अछि ! मुम्बईकेँ अपन कहै वला नज़र कियेक नञि आबैत छथि ! मुम्बईक दुश्मन सभ सँ ओ कियेक नञि टकराबैत छथि !! की ताज, ओबेराय, मरीन हाउस, मुम्बई मs नञि अछि ! या फेर मुम्बईक ठेकेदार अपन मौत सँ घबराबैत छथि !! दोसर प्रान्तक कहीकेँ अपने सभ लोग कs मारैत छथि ! दोसरे प्रान्तक लोग सभ मुम्बई पर जान लुटाबैत छथि !! अपने देशक लोग जखन रहैत छैथ तिनका केँ तरहे ! ओ कनियोटा वारसँ लकड़ीक तरह टुईट कs बीखैर जाइत छथि !! शर्मो नञि आबैत छैन अपन देशक निकम्मा नेता कs ! बजैत छला की पैघ-पैघ शहर मs छोट-मोट हादसा होयते रहैत अछि!! मुम्बईक जंगमे शहीद तँ बहुत जवान भेला मगर ! शहर मे खाली चंद शहीदक फोटो लगायल जैत अछि !! जे दुश्मन हमरा देश पर करैत अछि छुप - छुप कs वार ! हमर नेतागन ओकरा कs दावत पर इज्जत सँ बजाबैत छैथ !! सुइन लिय सभ नेतागन जखन जनता जैग जैत अछि ! तखन कुर्सी खुद - ब - खुद निचा भैग जैत अछि !! कृष्णमोहन झा (1968- ), जन्म मधेपुरा जिलाक जीतपुर गाममे। “विजयदेव नारायण साही की काव्यानुभूति की बनावट” विषयपर जे.एन.यू. सँ एम.फिल आ ओतहिसँ “निर्मल वर्मा के कथा साहित्य में प्रेम की परिकल्पना” विषयपर पी.एच.डी.। हिन्दीमे एकटा कविता सँग्रह “समय को चीरकर” आ मैथिलीमे “एकटा हेरायल दुनिया” प्रकाशित। हिन्दी कविता लेल “कन्हैया स्मृति सम्मान”(1998) आ “हेमंत स्मृति कविता पुरस्कार”(2003)। असम विश्वविद्यालय, सिल्चरक हिन्दी विभागमे अध्यापन। एक दिन आइ नहि तँ काल्हि काल्हि नहि तँ परसू परसू नहि तँ तरसू नहि तरसू नहि महिना... किछु बरखक बाद एक दिन अहाँ घूरि कऽ आयब अही चौकठि पर आ बेर-बेर अपनहि सँ कहब अपना- धन्यवाद! धन्यवाद!! अमरेन्‍द्र यादव टमटमियाँ घोडा अमेरिका जे इराक पर अपन खैमस्‍ती झाडलक अछि ताहिसँ हमरा कोन काज । म्‍ााओवादी जे बन्‍दुक उठौने अछि आ गणतन्‍त्रक लेल लडि रहल अछि तकर हमरा कोन मतलब । सौंसे मुसहरी जे भुखक सुली चढि रहल अछि आ घर—घरक बेटी पुतौह जे चुल्‍हाक आँच बनि रहल अछि तकर हमरा कोन चिन्‍ता । हम तऽ अहाँक टमटमियाँ घोडा छी बाबुजी । अहाँक वीर्यसँ लऽ कऽ खुन पसिना धरिक लगानी अछि हमरा पर । हम कोना बिसरि सकैत छी अहाँक ओ आदेश अहाँक ओ महत्‍वाकाँंक्षा हँ बाबुजी हमरा चढबाक अछि अहाँक सपनाक पहाड पर । निमिष झा,समाचार प्रमुख,हेडलाइंस एण्ड म्यूजिक एफ.एम.,97.2, ललितपुर, नेपाल जीवन एकटा दुरुह कविता अर्थहीन शब्‍दक अर्थ खोजबाक अभिलिप्‍सामे अनायास थमि जाइत अछि आँखि फारि दैति छियै पन्‍नाक पन्‍ना चेतनाक शब्‍दकोश आ भोगैत छी एकटा पराजयक थकान जत्त नहि भेटैत छै जीवनक यर्थाथक अर्थ आ तएँ बुझाइत अछि जीवन एकटा दुरुह कविता छै । बजैत छै लयात्‍मक गीत जीवनक मधुर सङ्गीत आ छम...छम...कऽ नचैत सङ्गीतसँग असंख्‍य कलात्‍मक पएर आ प्रस्‍फुटित भऽ जाइत छै जीवन उपवनमे मुदा अनायास फेर बन्‍द भऽ जाइत छै सङ्गीतक धुन थाकि जाइत छै पएर मुरझा जाइत छै उपवनक फूल आ तएँ बुझाइत अछि जीवन एकटा सारहीन सङ्गीत छै । आन्‍नद छै माछ जकाँ जीवन सरोबरमे हेलब उल्‍लास छै एकटा गुड्डि जकाँ आकाशमे उड़ब मुदा उड़ि नहि सकैत अछि हमर आल्‍हादित मोन आ अनायास उल्‍लासक धरातलसँ दुर्गतिक चट्टान पर अनवरत खसैत छै मोन आ डुबि जाइत छै सरोबरमे आ तएँ बुझाइत अछि गुड्डि जकाँ उड़ि नहि सकबाक आ माछ जकाँ हेलऽ नहि सकबाक नियतिक भोग छै जीवन । चिर्रीचिर्री भेल मोन अहाँके सफलताक शिखर पर देखऽ चाहैत छलौं भीडसँ पृथक अहाँक परिचय खोजैत छलौं ई हमर सपना नहि प्रेमक भावना नहि जीवनक आदर्श छल एहि बाट पर संगे चलबाक नियार छल मुदा आब तऽ ठिके ओ नियार सपने भङ्ग गेल खुलल आँखिसँ देखलौं सबटा भ्रमसन लागल क्षणभंगुरमें विलीन भेल एकटा अतीतसन लागल । जोरसँ कानि नहि सकैत छी मोन निचोरी कऽ निकलल नोर कें रोकि नहि सकैत छी क्षतविक्षत छातीक ई व्‍यथा ककरो कहि नहि सकैत छी व्‍यथासँ भरल मन, जीवन लऽ बनाबटी हँसी हँसैत छी वेदना नुकाऽ खुशीक भ्रममें जिबाक असफल प्रयास करैत छी । चुल्‍हा आ चौका आब अहाँक संसार बनल सिन्‍दूर आ चुरी अहाँक परिचय ई नेल आ हतकडीसँ दूर हम अहाँके सम्‍पूर्णता दैत छलौंह मुदा अहाँ तऽ सीतक सिन्‍दूरसँ दबल छी नुपूरक जञ्‍जिरमें बन्‍हयाल छी किया चारि किलाक बन्‍दी बनि गेलौंह अहाँ ? हमर सपनासँ आब अहाँ विभोर नहि हैब चाहियो कऽ हमर आकाँक्षां अहाँक तन्‍द्रा भङ्घ नहि करत हम स्‍वीकार कऽ चुकल छी ई सब हमर असफलता अछि हमर सपनाक चिता अछि अहीँक लेल देखल सपना सब अहाँक जीवन लक्ष्‍यमें सम्‍पूर्ण सपनाके रुपान्‍तरण नहि कऽ सकबाक प्रमाण अछि ई । जीवनक लक्ष्‍य आ उद्देश्‍य अहाँक तरबासँ पिचाइत गेल अहाँ उज्‍ज्‍वल प्राप्‍तिक लेल दूर भऽ गेलौंह मुदा हम आ हमर मोन इजोरियोमें अन्‍धकारमय अछि सदाक लेल ई मोन फाटि गेल अछि चिर्रीचिर्री भऽ गेल अछि । वेदनाक तरङ्ग निरश आ उचाट वातावरण विरक्त आ विरान दृश्य निर्मम सन्नाटा तीतायल चेहरा विक्षिप्त मोन भूतलायल आकृति आक्रोशसँ पाकल आँखि उच्छ्वाससँ जरल ठोर रागसँ पिसायल चित्रवृत्ति परस्पर टूटल सम्बन्ध जकाँ निरीहता नहि फूल जकाँ मधुर मुस्कान नहि मोनक निस्तब्धतामे स्निग्ध जागरण मात्र गड़ैत अछि हृदयमे वेदनाक तरङ्ग असमर्पित उन्‍माद अहाँक वएह नयन, वएह मोन आ वएह तन हम देखिरहल छी, सुनिरहल छी आ भोगिरहल छी समयक लम्‍बा अन्‍तरालक बाद सेहो आँखि खोलैत आ मिचैत सेहो आ अहाँ हमर शरीरक अदृश्‍य सरित प्रवाहमे सर्वाङ्घ समाहित छी, सज्‍जित छी । ई अभीष्‍ट रूप अहीँक थिक जकर अनुपस्‍थितिमे हमर चित्त शुष्‍क सिकतातुल्‍य भङ्ग गेल अछि ई शीतल छाहरि अहीँक थिक जकर अभावमे हरेक निमिष हमरा लेल नीरस आ उदास वसन्‍त बनि गेल अछि । अहाँ पाइन छी हमर पियासक अहाँ वसन्‍त छी हमर बसातक तएँ एकटा अतृप्‍त उन्‍माद नाचि रहल अछि भैरव बनि हमर मानसमे । हमर स्‍नायुक रोबरोबमे एकटा विषाक्त तृष्‍णा बहिरहल अछि आ बहिरहल अछि हमर धमनीक कणकणमे एकटा उन्‍मुक्त तृषा । बहुत बेर उघारि दलियै, फाडि देलियै नृशंस बनि आवेशसँ लज्‍जाक पर्दासभ आ बन्‍द क' देलियै नैतिक मूल्‍यसँ पाशविक उन्‍मादसभ । हँ आईयो ओहिना स्‍मृतिमे लटपटायल अछि अहाँक गरम साँसमे गुञ्‍जित हमर जीवन संगीत अहाँक आँचरिमे ओझरायल हमर सर्टक बट्टम अनार जकाँ अहाँक दाँत पर पिछरैत हमर जीह अहाँक ब्‍लाउजक हुकसँ खेलैत हमर दसो आँगुर आ अहाँक सुन्‍दर छाल पर दौडैत हमर ठोर । तथापि किएक नहि मिझाइत अछि छातिक ई उन्‍मत्त मोमबत्ति किएक निष्‍काम नहि होइत अछि मोनक उत्तप्‍त बोखारसभ जेना अहाँ दारुक प्‍याला होई आ हम चुस्‍की ल' रहल छी मदहोस भ' रहल छी अहाँक स्‍वप्‍निल लज्‍जानत तनमे निमिष निमिषमे । मुदा उफ ई केहन विडम्‍बना नित्‍यशः एक्‍केटा विन्‍दू पर दुर्घटना होइत गेल हमर उच्‍छृङ्खल वासनासभ अहाँक दर्शन आ सिद्धान्‍तक शिखरसँ नितदिन एक्‍के रस्‍ता घुरि जाइत छल अभिशप्‍त अहाँक विचार हमर अभिशून्‍य मस्‍तिष्‍कके झकझोरैत छल । शायद कमजोरी हमरा मे छल कि, गिद्ध बनि हम युद्ध नहि क' सकलौं अहाँक तनसँ शायद महानता अहाँक छल माला बनि अहाँ समर्पित नहि भ' सकलौं हमर गलासँ । हाइकु गरम देह छिछैल गेल मोन अमृत–वर्षा । रामनवमी एलै एहू बेर मुदा राम नै । नै छै उत्‍साह कुचाग्रक छुवन ई शरीरमेँ । अपन पीडा आँचरिमे नुकबै हमर माय । छाह खोजैछ ग्‍ााछ काटि काटिकऽ सभ्‍य मानव । प्‍ाावस राति गवै उन्‍मुक्‍त मोन विरह गीत । नकली हँसी कुटील व्‍यवहार आजुक छौडी । पीयर पात पतझरक बाद तुत्‍छ होइछ । लोचन नीर नहि बुझै जगत बहैछ स्‍फूर्त । प्रेमक द्वारि बन्‍द भऽ जाइत छै स्‍वार्थक आगू । खुलल वेणी पियाक प्रतीक्षामे खुल्‍ले रहलै । हम भ्रमर नोचि देलियै फूल विजेता बनि । पावस राति गवै उन्‍मुक्त मोन विरह गीत । अन्‍तर नहि कागज आ हृदय जखन फटै । भालचन्द्र झा अपन अस्तीत्वक असली मोल बुझबाक हुअए यदि अपन अस्तीत्वक असली मोल त पुछियौक सुकरातकें देखबियौक ओकरा विश्वक नक्शा पर पहिने अपन “देसक” अस्तीत्व ओहि देस मे अपन “राज्यक” अस्तीत्व राज्य मे अपन “जिलाक” अस्तीत्व जिला मे अपन “गामक” अस्तीत्व गाम मे अपन “घरक” अस्तीत्व आ तहन घर महुक “अपन” अस्तीत्व आ ई सभ “विश्वक नक्शा” पर से बूझि लियौक... हमर माय गर्भगृहक सुखासन सँ बहरेलहुँ त हमर जन्मदात्री अपसियाँत रहय भनसिया घर मे तीतल जारैन कें धूआँ मे करैत रहय धधराक आवाहन देहक धौंकनी कऽकऽ आ तहिया सँ लऽ कऽ आइ धरि ओकरा आन कोनो ठाम नहिं देखलियैक देखलियैक त बस कोनटा घरक ऐंठार पर सभक ऐंठ पखारैत कखनो अँगना बहारैत त कखनो जारैन बीछैत कखनो कपड़ा पसारैत त कखनो नेन्नासभक परिचर्या करैत खिन मे जाँत पर, त खिन मे ढेकी पर, चार पर, चिनमार पर अँगनाक मरबा पर, घरक असोरा पर दिन-दुपहर, तीनू पहर जोतल कखनो दाईक चाइन पर तेल रगड़ैत त कखनो छौंरी सभक जुट्टी गूहैत राति मे पहिने दाईकें आ तहन बाबूकें पएर दबबैत एहि तरहें ओकर जीवनक आध्यात्म भनसिया घर सँ शुरू भऽ कऽ भनसिये घर मे समाप्त भऽ गेलैक झुलसैत देखलियैक चूल्हिक आगि मे नारीक स्वतंत्रता, ओकर अस्मिता ओकर मान आ स्वाभिमानकें कहाँ भेटलैक पलखतियो ओकरा एहि सभ दिसि ताकहो कें आइ सोचै छी सेहो नीके भेलैक अगिलुका पीढ़ी सचेत भऽ गेलैक भलमनसियत सँ जँ नहिं भेटलैक त छिनबाक ताकति भेटि गेलैक मुदा ताँहिं की हमर मायक त्याग आ बलिदान ईब्सेन कें नोरा सँ अथवा गोर्कीक माय सँ रत्तियो भरि कम कहाओत? हमरा जनितबे रत्ती भरि बेसिये बूझू अंकुर काशीनाथ झा- गाम कोइलख, जिला मधुबनी। नेपाल-१ टेलीविजनक मैथिली समाचार वाचक पश्चाताप असत्यक धार मे, पापक पथ पर, अधर्मक दिशा मे, अविरल चलैत रहलौं । किछु करबाक आश मे, आगू निकलबाक प्रयास मे, सैदखन लड़ैत रहलौं । दोसरक दुख दर्द सऽ दूर, सफलता के नशा मे चूर, जीतबाक लेल, की - की नहि केलौं । मुदा जखन हम धारक पार पहुंचल छी, असगर थाकल छी, शरीर सऽ हारल छी, अंतःवेदना सऽ ग्रसित पड़ल छी, तऽ आत्मा पूछि रहल अछि, जे उपर संग की लऽ जैब, हम निरूत्तर, पश्चातापक संग नोर बहा रहल छी॥ प्रकाश झा बाल-बुदरुकक लेल कविता १. फूलडाली में फूल छै, पूजा हेतैन देवान के। गेंदा, गुलाब, कनैल छै, माला बनतैन भगवान के। २. लाल लाल गुलाब छै, अड़हुल सेहो लाल । तीरा सेहो लाल छै , माधुरियो होए छै लाल । ३. सुन्दर फूल कनैल के, पीयर ओकर रंग । फर तोड़ि क’ खेलै छै , बच्चा बुच्ची ओकर संग । सुबोध ठाकुर, सी.ए.। गाम-हैंठी बाली-मधुबनी। मनक तरंग सनन-सनन सन बहए छल पवन शब्दक हिल्कोरक संग डोलि रहल छल मन सोचल किए नहि शब्दकेँ छन्दक रूप देल जाए, कविता एक अनमोल बनाओल जाए, लिखए बैसलहुँ हम तखन सनन-सनन सन बहए छल पवन विरहक वेदना मोनमे जतेक छल मानस-पटलपर तखने सभटा उभरल, शब्दक रूपी बूँद से बुझबए लेल अगन लिखए बैसलहुँ हम तखन सनन-सनन सन बहए छल पवन नहि हम अति विद्वान छी परञ्च लग-पास परिलक्षित दृश्यसँ अनजान छी, करए लगलहुँ सभकेँ बुझबए लेल तँए जतन, सनन-सनन सन बहए छल पवन हृदयक आह्लादसँ, विनती कएलहुँ सन्ध्या कालक प्रह्लादसँ जुनि बनाऊ आर ककरो परदेशी कठोर साजन सनन-सनन सन बहए छल पवन नहि जानि की हम लिखलहुँ लिखए काल हम किछु नहि बुझलहुँ जुनि बुझब एकरा झूठ वचन ई अछि शब्द रूपी मनक तरंग सनन-सनन सन... केना होएत मिथिलाक जीर्णोद्धार सभ मारि रहल चीत्कार सगरो मचल हाहाकार, किओ नहि ककरो दुख बुझएवला, आर नहि करएवला अछि विचार, सभ मारि रहल चीत्कार सगरो मचल हाहाकार, बेटीबाप मथाहाथ दए कानए बेटावला माला जापए, दहेज बनल अचि मिथिलाक अलंकार, सगरो मचल हाहाकार कहाँ गेल सुन्दर सृजन रचना कवि विद्यापति केर भैरवी वन्दना बदलि गेल सभक व्यवहार, सभ मारि रहल चीत्कार सभ अपन वर्चस्वक खातिर, बनल जाइत अछि कुटि दुष्ट शातिर, कहू एनामे केना होएत मिथिलाक जीर्णोद्धार? सभ मारि रहल चीत्कार सगरो मचल हाहाकार। शब्दक वाण चलेबए- नहि सहबए आब अत्याचार मनमे उठैये बेर-बेर विचार नहि सहबए आब अत्याचार शब्दक वाण चलेबए हम अपन सौम्य शक्ति बढ़ेबए सुन्दर मिथिला पेंटिंग ओ संस्कृति सँ खान-पान मिथिलाक वैभव सँ दुनियाँमे विदेहक माँटिक अलख जगेबए हम अपन सौम्य शक्ति बढ़ेबए मृदु भाषा अछि अपन धरोहर जाहिसँ बनब हम सभक ह्र्देश्वर से आब सभकेँ जनेबए विदेहक म्काटिक अलख जगेबए पिया हमर परदेशिया होली खेलब ककरा संग पिया हमर परदेसिया यौ के बुझत हमर उदगार,के दोसर करत विचार पिया हमर परदेशिया औ। केश फुजल मन अछि सुतल हृदय के वेदना अछि मुदा जागल के दोसर करत एकर परितिकार, नाहि से बुझै हमर सनेहिया यौ होलि खेलब ककरा संग पिया हमर परदेशिया यौ। बैरि बानाल हमर मधुमास, जगबै रहि-रहि कामना और आश, कोयलिया के कुहुक मन के सतबै से नहि बुझै नीरमोहिया यौ होली खेलब ककरा संग पिया हमर परदेशिया यौ । कहै सुबोध धनि जुनि कानु जुरशितल मे करै ले शितल औताह अहां के मनबसिया यौ । हम गामेमे रहबइ रही दूर अपन माटिसँ मेनेजर रहि-रहि कलुशय छोड़ि अपन गाम मन रहि-रहि बिहुसए ओ सुन्दर मनभावन पोखरिक घाट ओ वसंत आर सावनमे सुन्दरि पाबनिहारनिसँ सजल बाट-घाट बगियामे सदिखन कोयली कूकए रही दूर अपन गामसँ मेनेजर रहि-रहि कलुशय अछि सुबोधक कामना, जुनि करू दूर आब पुत्रकेँ माँ अहीँक सानिध्यमे रहए लेल मन तरसए, छोड़ि अपन गाम मन रहि-रहि बिहुसए। रूपेश कुमार झा 'त्योंथ' आयल फेरो समय लगनक दलान पर किछु लोक छथि बैसल, ककरो मोन खनहन, ककरो मुंह लटकल, सभ करैत छथि गप्प-सरक्का, कखनो काल कऽ हँसी-ठट्ठा, ताहि बीच कखनो चलैछ चटक-मटक, आयल फेरो समय लगनक। क्यो दऽ रहल छथि मोंछ पर ताव, तऽ किनको हृदय मे छनि पैघ घाव, बेटाक बाप करैछ अपन बेटाक बड़ाइ, ओ लेबे करता खूब ऐंठि कऽ पाइ, नहि चलैछ बेटी बापक सकपक, आयल फेरो समय लगनक। दरवज्जे पर सँ होइछ कथा, केऽ आब जायत सौराठ सभा, ओतय कखनो लागि जेतै घटा, तऽ फेर कखनो हेतै खूब नफा, पेटो तऽ चलै छै, ओतय बियाह होइ छलै चटपट, आयल फेरो समय लगनक। खूब फरैछ एखन झूठक खेती, भाँड़ मे जाओ दोसरक बेटी, बुद्धि खटाउ भेटत कमीशन, एक्के बेर तऽ चाही परमीशन, मनुक्ख बिकाइछ हाथे दलालक, आयल फेरो समय लगनक। ककरो कुहरेने क्यो भऽ जाइछ ने सुखी, ठीके कहै छी हम, तकै छी की ? होइछ थोड़हि ने किछु दहेजक टका सँ, खेत नहि पनियाइछ बैसाखक घटा सँ, मेटाऊ समाज सँ नाओ एहि कुकृत्यक, आयल फेरो समय लगनक दहेज लेब थिक घोर पाप, समाज केर ई कारी छाप, मेटाऊ आदर्शक मेटौना सँ, देखू आयल घट्टक बेतौना सँ, बेर अछि एखने दहेज दमनक, आयल फेरो समय लगनक। जंगल दिस ! कम नहि, लागल छल भीड़ बेस सूर्य उगल, फाटल कुहेस तरुणी-तरुणक एकटा जोड़ा घूमि रहल छल गुफा एलोड़ा चश्मा साजल दुनू केर माथ रखने एक दोसरक हाथ मे हाथ हिप्पी देखि लागल तरुण अपाटक जूता छलैक फोरेन हाटक जिंस लगौने आओर टी शर्ट देखि मोन कहलक बी एलर्ट तरुणीक केश बॉब कटक खाइत चलैत छल चटक-मटक बढ़ैत चलि जाइत छल सीना तनने तरुण प्रेमीक संग गप्प लड़ौने तरुणी देह पर छलैक वस्त्र कम तकर ने छलैक ओकरा गम चलैत-चलैत भेल ठाढ़ दुनू मोने सोचल एना लोक चलैछ कुनू धेलक एक दोसर केँ भरि पाँज देखि कऽ हमरा भऽ गेल लाज मुँह घुमा पुछलियैक-जेबऽ कोन दिस बाजल दुनू एक संग-जंगल दिस! मैथिल के? मिथिलाक अति पावन महि पर जकर भेल थिक जन्म वा जे करैछ एहि भूमि पर अपन जीवनक कर्म जे कए रहलैछ प्रवास मुदा पुरुषा सभ करैत छलनि मिथिले मे वास चाहे ओ कोनो धर्मक कियए ने हो धर्मक अन्तर्गत कोनो जातिक कियए ने हो एहि सोच पर अबैछ घृण जे मैथिल अछि मात्र ब्राह्मण मैथिल छलथि राजा जनक हुनक सुता छलीहए सीते जाहि पर गर्व करैछ सगरे मिथिला ने वैह छलाह ब्राह्मण, ने हुनकर धिये कि ओ मैथिल नहि? ई जुनि कहि अछि मिथिला कतेको विभूति जनने सदति रहू सीना तनने पुरा काल सँ ई माटि उपजबैत अछि बड़-बड़ विद्वान सुनू खोलि कऽ दुनू कान बसै छथि कलकत्ता, काठमांडू वा न्यूयार्क ओ दिल्ली ओ छथि सुच्च मैथिल जिनक ठोर पर खेलि रहल छथि मैथिली सभ मैथिल मिलि निज मिथिला केँ दियाबू एकर मान-सम्मान जे उभरय विश्व मानचित्र पर बनि एकटा विशिष्ट चान बुझलहुँ ने, जे कहलहुँ से आब नहि पूछू, मैथिल के? मनीष झा "बौआभाई" माय (कविता) एक-एक क्षण जे बेटा के खातिर कर जोड़ि विनती करैइयै माय बिनु अन्न-जल ग्रहण केने बेटा लै जितियाक व्रत राखैइयै माय आ एहि तरहें माय हेबाक कर्त्तव्य पूरा करैइयै माय जिन्दगीक रौदा में तपि क' बेटा के छाहड़ि दैइयै माय बरखा-बिहाड़ि सन विषम समय में आँचर स' झाँपि राखैइयै माय आ एहि तरहें माय हेबाक कर्त्तव्य पूरा करैइयै माय घर में छोट-छिन बात पर में बाप स' लड़ि लैइयै माय बाप स' लड़ि बेटा के पक्ष में फैसला करैइयै माय आ एहि तरहें माय हेबाक कर्त्तव्य पूरा करैइयै माय बेटा नै जा धरि घर आबय बाट टुकटुक ताकैइयै माय ओठंगि के चौकठि लागि बैसल राति भरि जागैइयै माय आ एहि तरहें माय हेबाक कर्त्तव्य पूरा करैइयै माय वयस कियैक नै हुऐ पचासक तहियो बौआ कहैइयै माय अहू वयस में नज़रि ने लागय तैं अपने स' निहुछैइयै माय आ एहि तरहें माय हेबाक कर्त्तव्य पूरा करैइयै माय होय जानकी वा अम्बे के प्रतिमा सभ रूप में झलकैइयै माय तीर्थ-बर्थ सब मन के भ्रम छी घर में जे' कुहरैइयै माय कर्त्तव्य हमरो ई कहैइयै घर में नै कलपय ई माय आ एहि तरहें जन्म देल त' माय के पद पाबय ई माय सतीश चन्द्र झा,राम जानकी नगर,मधुबनी,एम. ए. दर्शन शास्त्र, समप्रति मिथिला जनता इन्टर कालेन मे व्याख्याता पद पर १० वर्ष सँ कार्यरत, संगे १५ साल सं अप्पन एकटा एन.जी.ओ. क सेहो संचालन। मध्य वर्गक सपना भीजि क’ आयल छलहुँ हम आँखि मे किछु स्वप्न धेने। मोन के पौती मे भरि क’ स्नेह के संदेश रखने। किछु कहब हम बात अप्पन किछु अहाँ सँ आइ पूछब। फेर हम निष्प्राण भ’ क’ बाँहि मे विश्राम खोजब। पी लितहुँ हम नोर आँखिक ठोर पर उतरल अहाँ के। नेह सँ परितृप्त करितहुँ साटि छाती मे अहाँ के। ल’ लितहुँ चुम्बन हृदय सँ गाढ़ रक्तिम ठोर पर हम। की करै छी ? लोक देखत, अहाँ कहितहुँ , हँसि दितहुँ हम। भागि चलितहँु फेर सँ हम संग ल’ सुन्दर विगत मे। कल्पना के पाँखि ल’ क’ उड़ि जयतहुँ उन्मुक्त नभ मे। होइत जौं ई सत्य सपना देवता के जल चढ़बितहुँ। हे प्रिये ! होइतै केहन जौं किछु समय के रोकि सकितहुँ। भेंट होइते सभ बिसरलहुँ हम केना क’ बात मोनक। छै कहाँ रहि गेल वश मे स्वप्न देखब मध्यवर्गक। अछि जतेक सामथ्र्य अप्पन क’ रहल छी कर्म सभटा। मोन मे अछि सोच कहुना किछु रहय बाँचल प्रतिष्ठा। अर्थ दुर्लभ वस्तु जग केँ अछि एकर भरि मास खगता। खर्च बढ़िते जा रहल अछि बढ़ि रहल दानव बेगरता। कात मे मुनियाँ कनै अछि किछु नया परिधान कीनत। नीक ब्राँडक जींस, जैकेट पुत्रा बड़का आइ आनत। माँग छल पायल अहूँ के मोन मे अछि दू बरख सँ। नीक कुर्ता लेब हमहूँ जीब की हम आब सुख सँ। साग - सब्जीक दाम पुछि क’ होइत अछि परिपूर्ण इच्छा। जा रहल छी पाँव पैदल, भाग्य अछि रेलक प्रतिक्षा। देत के सहयोग अपनो क’ रहल अछि लोक शोषण। चीज शौखक अछि सेहन्ता क’ रहल छी मात्रा भोजन। नाम सँ के आब चिन्हत अर्थ केँ सम्मान होइ छै। झूठ के सम्बन्ध सगरो के कतय किछु प्राण दै छै। कामना भगवान सँ अछि जन्म दोसरो, संग भेटय। उच्च नहि त’ दीन .. निर्धन वंश कुल मे जन्म भेटय। माँटि पर बैसल अहाँ संग खेल करितहुँ, स्नेह सदिखन। काल्हि के नहि आइ चिन्ता छुच्छ जीवन, तुष्ट जीवन। भ्रमित शब्द हेरा गेल छल हमर शब्द किछु फेर आइ घुरिया क’ आयल। बास भेलै नहि कतौ जगत मे थाकि हारि क’ अपने आयल। नुका गेल सब रही नीन्न मे मोनक कागत सँ उड़िया क’। केना ? कखन ? सब के ल’ भगलै आन - आन भाषा फुसिया क’। आतुर मोन उचटि क’ ताकय बैसल बाट दूर धरि कखनो। राति बिराति द्वार के खोलत छी जागल अबेर धरि एखनो। पसरल देखि हमर निर्धनता भागि गेल छल सब उबिया क’। खोजि रहल छल सुख जीवन केँ भोग वासना मे बौआ क’। अर्थ बाँटि सम्मान समेटब छलै मोन मे इच्छा जागल। मान प्रतिष्ठा के इजोत मे भ्रमित भेल सबटा छल भागल। शब्द अभागल चीन्हि सकल नहि हम बताह कवि छी वसुधा मे। बिसरि जाइत छी हम जीवन भरि की अंतर छै गरल - सुधा मे। नहि अछि लोभ अर्थ के हमरा नहि चाही सम्मान जगत के। निज भाषा केँ स्नेह,कलम सँ निकलत धार रत्त अमृत के। हम कविता सँ दिशा दैत छी दृष्टिहीन व्याकुल समाज के। जगा रहल छी जे अछि सूतल गीत गावि क’ बिना साज के। नहि छपतै कविता जनिते छी पत्रा पत्रिाका के पन्ना मे। छपतै नग्न देह नारी के मुख्य पृष्ट ,अंतित पन्ना मे। मुदा केना हम कलम छोड़ि क’ मौन भेल आँगन मे बैसू। केना हेतै किछु व्यथा देखि क’ द्रवित मोन मे नहि किछु सोचू। कोमल हृदय अपन अंतर सँ प्रतिक्षण आगि उगलिते रहतै। पढ़तै कियो लोक नहि तैयो कलम हाथ केँ चलिते रहतै नाव आ जीवन नाव नदी मे चलल सोचि क’ दूर नदी के अंत जतय छै। देखब आई ठहरि क’ किछु छण नदी समुद्रक मिलन कतय छै। छै संघर्ष क्षणिक चलतै जौ जल धारा विपरीत दिशा मे। चलब धैर्य सँ भेटत निश्चय छै आनंद मधुर आशा मे। कखनो अपने पवन थाकि क’ मंद भेल चुपचाप पलटतै। फेक देब पतबार अपन ई जल धारा के दिशा बदलतै। छोट नाव के एतेक घृष्टता सुनि क’ भेल नदी के विश्मय। नाचि रहल अछि जल मे तृणवत बुझा रहल छै जीवन अभिनय। की बुझतै ई नाव नदी मे जीवन पथ धारा अवरोधक। केना चीर क’ निकलि जाइत अछि नहि छै भय ओकरा हिलकोरक। तेज धार छै प्राण नाव के जीवन छै सागर अथाह जल। नदी किनारक छाँह मृत्यु छै जल विहीन जीवन के प्रतिपल। नहि होइ छै किछु भय जीवन मे मृत्यु देखि सोझा मे प्रतिक्षण। अपने चलि क’ नाव मनुख के सिखा रहल छै जीवन दर्शन। क्रुद्ध नदी के जल प्रवाह मे उतरि गेल जे ‘तकरे जीवन’। भय संघर्ष,निराश,कष्ट सँ ठहरि गेल ओ ‘जड़वत जीवन’। मौनक शब्द हेरा गेल अछि शब्द अपन किछु तैं बैसल छी मौन ओढ़ि क’। वाणी जड़वत, जिह्वा व्याकुल के आनत ग’ ह्नदय कोरि क’। के बूझत ई बात होइत छै मौन शब्द,वाणी सँ घातक। राति अमावश के बितला सँ जेना इजोत विलक्षण प्रातक। अछि सशक्त जीवन मे एखनो ई अभिव्यक्तिक सुन्दर साध्न। एकर चोट छै प्रखर-उचय अग्नि सन शीतलता चंदन के चानन। नहि छै आदि -उचयअंत मे समटल अंतर मे विश्राम वास छै। आनंदक अतिरेक ह्नदय मे नव अनुभूतिक महाकाश छै। अछि अव्यक्त मौन अक्षर सँ ज्ञान दीप के प्रभा प्रकाशित दृष्टिबोध् सँ दूर मौन अछि शब्द अर्थ सँ अपरिभाषित। वाणी अछि ठहराव झील के मौन नदी के निश्छल धार। उठा देत हिलकोर हृदय मे जखने बान्हब धार किनार। छै संगीत मधुर स्वर झंकृत नै छै अर्थ मौन के जड़ता। कोलाहल सँ दूर मौन के वाणी सँ छै तिव्र मुखरता। कतेक विवस अछि शब्द जगत के वर्तमान के व्यथा देखि क’। असमर्थ अछि सत् चित्राण मे की लिखू हम शब्द जोड़ि क’। चुनाव लागत फेरो पांच साल पर संगम तट पर कुंभक मेला। ओहिना फेरो पांच साल पर राजनीति के पसरत खेला। रंग बिरंगक चिन्ह बनायेल टांगल नव नव सुन्दर झंडा। अछि महान इ पर्व देश के निकलत बाहर जेलक गुंडा। छलथि जतेक अनपढ़ उदंड सब भेटलनि किछु रोजगार गाँव मे लाठी,ठेंगा,बैनर,झंडा भेटलनि पार्टी सँ इनाम मे। चमचम खाधी वस्त्रा देह पर किछु गमछा मे बान्हल टाका जोर जोर सँ नारा पढ़ि क’ गढ़ता किछु जीवन के खाका। बँटि जायत भोटक दुविधा मे पिता पुत्रा आ भाई सहोदर डुबत फेरो लाल रक्त सँ सौंसे धरती फाटत दर दर। लालच लोभ स्वार्थ मे परि क’ चलतै तेज हवा उन्मादक छल बल मे ओछरायत जनमत जड़त आगि सौंसे अवसादक। लगै कतेक छै नीक कान मे सुनि क’भाषन नेता मुख सँ। देखा देत किछु सुन्नर सपना राज करै अछि अपने सुख सँ। हमरे मिलि क’ दिअ भोट सब अछि हमरे दल सभ्य बिचारक। छी देशक हम असल हितैसी हम छी बेटा अहीं समाजक। रहत आब नहि कियो देश मे दीन,हीन,दुर्बल,बैसारी सबके शिक्षा, सबके भोजन सब घुमता घर घर अधिकारी। छी ! छी ! कतेक झूठ अछि भाषण मिठगर वाणी , कपट मोन मे। प्रजातंत्रा अछि भोट दैत छी सबटा बुझितो अपन मोन मे। भ जायत जँ प्रजा सुखितगर के नेता के पाछाँ चलतै । गाजा बाजा ढ़ोल बजा क’ नारा जयजयकार लगेतै। बनत फेर किछु मंत्राी, रंाजा सबटा दौड़ल दिल्ली भागत। हैत अनिष्ट एक दिन कहियो सूतल जनता जहिया जागत। शब्द चिकड़ि रहल अछि शब्द आबि क’ निन्न पड़ल निश्बद्द राति मे। अछि उदंड, उत्श्रृखल सबटा नहि बूझत किछु बात राति मे। केना करु हम बंद कान के उतरि जाइत अछि हृदय वेदना। बैसि जाइत छी तैं किछु लिखय छीटल शब्द हमर अछि सेना। कखनो कोरा मे घुसिया क’ बना लैत अछि कविता अपने जुड़ल जाइत अछि क्लांत हृदय मे शब्द शब्द के हाथ पकड़ने। कविता मे किछु हमर शब्द के नहि व्याकरणक ज्ञान बोध छै। सबटा नग्न, उघार रौद मे नेन्ना सन बैसल अबोध छै। कखनो शब्द आबि क’ अपने जड़ा दैत अछि प्रखर अग्नि मे। कखनो स्नेह,सुरभि,शीतलता जगा दैत अछि व्यग्र मोन मे। क्षमा करब जौ कष्ट हुए त’ पढ़ि क’ कविता शब्दक वाणी। शब्द ब्रह्म अछि नहि अछि दोषी छी हमही किछु कवि अज्ञानी। हमर स्वतंत्रता छी एखनो कमजोर कतेक हम मौन भेल चुपचाप ठाढ़ छी। किछु बंधन अछि परंपरा के किछु समाज सँ भयाक्रांत छी। भेल रही कहिया स्वतंत्र हम केना आब इ बिसरि सकै छी। अछि महान इ पर्व देश के, सर्व धर्म सब मना रहल छी। तखन कियै छी हम एखनो धरि बान्धल जरजर परंपरा सँ। मुक्त करत के फेर आबि क’ रुढ़िबादिता के पिंजरा सँ। बिधवा के दुदर्शा, दहेजक भोगि रहल छी दंश केना हम। स्वार्थ धर्म लय पुत्रक माया केना चलायब वंश अपन हम। अछि सिंघासन उच्च पुत्र के, पाबि पिता सँ स्नेह भावना। पुत्री लय एखनो अछि राखल अनुशासन, तप, ज्ञान,साधना। डेग-डेग पर नीति समाजक नारी के निर्बलता दै छै। अछि स्वतंत्रता बनल पुरुष लय द्वेत भावना उचित कहाँ छै। पढ़ा लेब कतबो कन्या के, मांग दहेजक नहिं किछु कमतै। अछि विध्वंसक अहं पुरुष के नारी तैयो चुल्हे फुँकतै। एक आध टा पावि उच्च पद केना समाजक दंभ मिटेती। पुरुष प्रधान समाजक सोझा के अधिकारक बात उठेती। पड़त अग्नि नहिं मुख मे, पुत्रक जायब स्वर्ग केना धरती सँ। निज संतान पुत्र आ पुत्री अछि उत्पन सब अपन रक्त सँ। तखन कियै छै बनल बाध्यता करत कर्म सब पुत्र पिता के। चलतै तखने पुस्त- पुस्त धरि नाम, वंश, सम्मान पिता के। वंश चलै छै एखनो ओकरे जे जग मे इतिहास पुरुष छै। चललै मार्ग बना क अपने, भुजबल मे जकरा पौरुष छै। ज्ञान, धर्म अथवा समाज लय जे देलकै आहुति प्राण के। अमर बनल ओ रहत ह्रदय मे, बदलि देलक भाग्यक विधान के। कतेक उपेक्षित आइ वृद्ध छथि अपने सँ अपमान पावि क’। छन्हिं अपने संतान,चकित छथि पैघ बनेलथि पालि पोषि क’। अन्नक लेल प्राण गेल जिनका पड़ल बूंद नहिं दूध कंठ मे। भोज भेल भारी परगन्ना गाय दान भेल श्राद्ध कर्म मे। वर्तमान बितलन्हि बिपदा मे, की करता परलोक बना क’। कतेक धर्म अर्जित क सकता अंत समय मे वेद सुना क’। एखनो मंदिर के प्रांगन मे प्रथा देवदासी अछि निन्दित। छथि पाथर के देव, नीक अछि, की करता भ’ क’ स्पंदित। जौं रहितहुँ एखनहुँ स्वतंत्र हम नै रहितै इ दशा समाजक। अंतहीन अछि एकर कहानी पन्ना किछु पढ़ियौ इतिहासक। ई जीवन भेल व्यर्थ ई जीवन ले के जन्म जगत मे । नहिं केलहु किछु काज व्यथा ई रहल ह्रदय मे । बीतल बचपन उड़ल संग तितली के धेने। कखनो मस्त मलंग खेल मे जोर लगेने। आवि गेल चुप चाप उतरि के यौवन कहिया। चैंक उठल मन भेल भविष्यक आहट जहिया। लगा लेलहुं संपूर्ण जोर ताकत छल जतवा । अछि की कम संघर्ष करब परिवारक सेवा । अन्न, वस्त्र, भोजन के करिते उचित व्यवस्था । बीत गेल जीवन के सबटा नीक अवस्था । छै कर्मक ई खेल भाग्य के कोना मेटेबै । भाग्य प्रवल छै कहि के ककरा केना बुझेबै । किछु जीवन के दोष देवता छथि किछु दोषी। करिते रहलहुं कर्म सतत् किछु कम आ बेसी। भेटल किछु सम्मान, मान लय के अछि भूखल । होई छै एखनो सुनू, अर्थ सँ सबटा प्रतिफल । कहाँ शक्ति छनि सरोस्वती के असगर अपना। सबसँ उपर ठाढ़ लक्ष्मी सबके सपना । जिनका जतवा अर्थ पैघ छथि जग मे नामी। बिना अर्थ सब व्यर्थ, दुखक जीवन अनुगामी। आब सोचि की करब उम्र उतरल अगुता के। वाणप्रस्थ मे जायब किछु संताप उठा के। हम रहलहुं अभिलाषी भव मे मोक्ष मार्ग के। चलिते रहलहुं हम धिसियाक पथ सुमार्ग के। की भेटल अभिमान करब जकरा ले के हम। पेट पोसि के मात्र बीतेलहुं ई जीवन हम। अप्पन भाषा बनल मंच पर शब्द जोड़ि क’ जगा रहल छी झूठक आशा। बिसरि मैथिली मृदुल कंठ सँ चिकड़ि रहल छी आनक भाषा। करब याद माईक कोरा मे निकलल शब्द पहिल जे मुख सँ। कतेक सुकोमल,मिठगर,रसगर, ई भाषा अछि बाजू सुख सँ। छी मैथिल संतान कथी लय बाजि मैथिली शर्म करै छी । छोड़ि पियरगर शब्द अपन ई अंग्रेजी के ओट धरै छी। नहिं जीवन के नव प्रवाह मे अछि भाषा कखनो अवरोधक। नहिं बाजै छी तैं अछि लज्या बना लेने छी दृष्टि अबोधक। बाजब हम सब अप्पन भाषा लिअ’ आई संकल्प हृद्य सँ। पसरल जायत अपने दिन. दिन भ’ जायत समृद्ध अभय सँ। विवेकानंद झा सिंगरहार हम अहांक श्वेत नूआ मे ललका कॊर जॊकां हम अहांक स्मृति मे जाड़क भॊर जॊकां हमही अहांक फूलडाली से उझिक कऽ खसल कनेर हमही कॊशीक नव-जल भसिआयल कांट कुश अनेर हमही अहांक कॊबर खसल लहठीक टूक छी हमही अहांक हृदय-मर्यादल वासनाक हूक छी हमही तऽ छी अहांक पॊथी मे सहेज राखल फूल हमही तऽ छी अहांक एड़ी संऽ रगड़ि निकसल धूल देखैत अहांक सौंदर्य मे ब्रह्माक विवेक हम अहींक वाणी-वीणा मे मधुर गीतक टेक हम हमही अहांक गौरी लग गाड़ल धूपकाठी छी पॊखरि नहायल आयल रूपसी कन्या अहां लसकि हृदय फांक भेल मनॊलॊकक कन्या अहां केश संऽ झड़ैत बिंदु हम निर्विकार छी मुंहे पर ठाढ़ हम गर्भ गृह पैसैत अहां कॊनॊ विहंगम दृश्य सन मऽन मे बसैत अहां बाबा पर ढेराइत हम अछिंजलक टघार छी ग्रीष्मक दुपहरिया मे ठमकल बसात जॊकां आततायी रौदक प्रचंडतम प्रमाद जॊकां हुलसि आयल संजीवनि सिहकल बयार पर मूनल विभॊर नैन भॊगक आधार छी १९९६ मे कहियॊ००० अमित मिश्र (१९९३- ), गाम-करियन, जिला-समस्तीपुर, पिता-नवीन कुमार मिश्र, माता-विभा देवी। नव-अंशु (ापन गप, गजल १-९०, हजल-१-६, रुबाइ- १-१६) अपन गप गजल मने प्रेम, गजल मने दर्द मुदा एखन गजल प्रेम-विरहसँ आगू बढ़ि समाजक सब कोणमे अपन पएर पसारि रहल अछि। हिन्दी वा उर्दूमे गजलक इतिहास पुरान अछि मुदा मैथिलीमे गजल एकदम नव अछि। जहिना नव पानिमे तीव्र प्रवाह होइ छै ओहिना मैथिली गजल द्रुत वेगसँ समाजमे पसरि रहल अछि एकर प्रत्यक्ष प्रमाण फेसबुकक "विदेह" ग्रुप आ अनचिन्हार आखर ब्लाग http://anchinharakharkolkata.blogऽpot.com पर देखबाले भेटैत अछि । ऑनलाइन पत्रिकाक संग-संग प्रिंट पत्रिका सभ सेहो अपन सभ अंकमे गजल केँ स्थान दऽ रहल अछि। गजलक बारेमे जँ कने जानकारी भऽ जाएत तँ हमरो लिखैमे नीक लागत आ अहूँकेँ पढ़ैमे मोन लागत। तँ चलू देखै छी मैथिलीक गजल की छै? मूल रूपसँ गीत आ गजल सहोदर भाइ छै। मैथिलीमे गीत बहुत पहिलेसँ गाओल जाइत रहल अछि तेँ ई बड़का भाइ भेल आ गजल एखन जुआन भऽ रहल अछि तेँ ई छोटका भाइ भेल। आब हम अपन ऐ कथनकेँ प्रमाणित करै छी। गजल आ गीतमे अंतर की छै? मात्र एक अक्षरक। गीत आ गजल दुनू गाओल जाइ छै जँ ध्वनिक तुक {राइम्स } सभ पाँतिमे मिलैत रहत तँ गीत वा गजल दुनू सुनैमे बेशी नीक लागै छै। मुदा गीतमे राइम्स नहियो हेतै तँ चलतै मुदा गजलमे प्राय: पाँति संख्या 1, 2, आ तकरा बाद 4, 6, 8, 10 . . . मे हेबाक चाही। गीतमे कतेको पाँतिक बाद फेरसँ मुखरा दोहराओल जाइ छै मुदा गजलमे प्राय: तुकान्तबला पाँति बादमे कहल जाइ छै। गजल कमसँ कम 10 टा पाँतिक होइ छै जकरा 2-2 पाँति क रूपमे बाँटि कऽ शेर कहल जाइ छै। जहिना गीतक शास्त्र व्याकरण होइ छै {सा रे ग . . .} तहिना गजलक व्याकरण होइ छै। जहिना शास्त्रीय गायनमे राग होइ छै तहिना गजलमे बहर होइ छै। जहिना गीत कोनो ने कोनो ताल-रागमे होइ छै तहिना गजल कोनो ने कोनो बहरमे होइ छै। आजुक जमानामे तेज धुन आ डी.जे. गीत गाओल जाइ छै। जहिना गीतमे कोनो तरहक चिन्हक {अर्द्ध-विराम, पूर्ण विराम आदि} केँ मोजरे नै दै छथि, ओहिना गजलमे कोना पाँतिमे कोनो चिन्ह {. , ? आदि} नै देल जाइ छै। आब एना किए कएल जाइ छै से नै पूछू? अपने सोचू ने, गीते जकाँ गजलोकेँ तँ गाओल जाइ छै। जहिना गीतक कोनो शीर्षक नै होइ छै तहिना गजलक कोनो शीर्षक नै होइ छै। गीत केँ "भक्ति, प्रेम, विरह, देशभक्तिऽऽ आदि रूपमे बाँटल गेलैए आ गजलोकेँ "गजल, बाल गजल आ हजल" क रूपमे बाँटल गेलैए। गजलक बारेमे बेशी जानकारी आशीष अनचिन्हार जीक लिखल पोथी "अनचिन्हार आखर" वा ब्लाग http://anchinharakharkolkata.blogऽpot.com" पर भेटि जाएत। गजलमे आबैबला किछु शब्दकेँ देखू। 1} शेर- शेर दू पाँतिक होइत अछि आ अपना आपमे सदिखन पूर्ण भाव दै अछि आ आन पाँतिसँ स्वतंत्र रहैत अछि। 2} गजल- कमसँ कम पाँच टा शेरके जँ किछु तुकान्तक संग एक ठाम राखल जाए तँ ओ गजल बनै छै। एकटा गजलमे एकै रंग तुकान्त हेबाक चाही। 3} रदीफ- गजलक पहिल शेरक अंतिमसँ देखू, जँ कोनो एहन शब्द जे शेरक दूनु पाँतिमे कॉमन होइ तँ ओकरा गजलक रदीफ कहबै। आइ चलू संगे प्रेम गीत गेबै प्रिय एकटा प्रेमक महल बनेबै प्रिय एहि शेरमे "प्रिय "दुनू पाँतिमे अछि तेँ एकर रदीफ भेल "प्रिय"। आब गजलक सभ शेरक दोसर पाँतिमे ई रदीफ रहबाक चाही, से अनिवार्य अछि। 4} काफिया - काफिया मने मोटा मोटी तुकान्त {राइम्स} बुझू। जँ बाजैमे एकै रंग ध्वनि बुझना जाइए तँ ओ भेल काफिया। काफियाक तुक ओइ शब्दक अंतिम सँ पता लागै छै। जे तुकान्त गजलक पहिल पाँतिमे अछि सएह आन सभ पाँतिमे हेबाक चाही। मतलब जे गजलक पहिल शेरक दुनू पाँतिमे आ आन शेरक दोसर पाँतिमे। काफिया- गमला. राधा. चेरा. केरा {ऐ मे तुकान्त "आ" भेल} हेतै, खेबै, झेलै {ऐ मे तुकान्त"ऐ" भेल} रोटी, हाथी, रेती {ऐ मे "ई" भेल} झोरी, बोरी {ऐ मे"ओरी" भेल} एनाहिते अओर सभमे काफिया {तुकान्त } बनत। गजलक पहिल शेरमे रदीफ आ काफिया क्रमश: पाँतिक अंतिमसँ अनिवार्य रूपसँ हेबाक चाही। आ आन शेरक दोसर पाँतिमे सेहो रदीफ आ काफिया क्रमश: अंतिम सँ हएत। 5} मतला- गजलक पहिल शेर जेकर दुनू पाँतिमे रदीफ आ काफिया क्रमश: अंतिमसँ होइ एकरा मतला कहल जेतै। चाँद देखलौ तँ सितारा की देखब अन्हारक रूप दोबारा की देखब प्रेमक सागरमे बड नीक लागै डुबऽ चाहै छी तँ किनारा की देखब ऐ मे पहिल शेरक दुनू पाँतिमे कॉमन "की देखब" अछि तेँ ई ऐ गजलक रदीफ भेल आ रदीफक पहिले देखू, दुनू पाँतिमे "सितारा "आ "दोबारा " छै एकर तुकान्त भेल "आरा" तेँ ई भेल काफिया। आब दोसर शेरक दोसर पाँतिमे देखू। रदीफ "की देखब" आ तुकान्त "आरा " क संग शब्द "किनारा " अछि। आब ऐ गजलक सभ शेरक दोसर पाँतिमे अंतसँ रदीफ "की देखब" आ काफिया "आरा" तुकान्तक संग हेबाक चाही। तुकान्तक पाता शब्दक अंतसँ चलै छै। 6} मकता-- गजलक अंतिम शेर जैमे शाइर अपन नामक प्रयोग करै छथि ओइ गजलक मकता कहल जाइ छै। मेघक डरे चान नै बहरायल नै औता अमित नजारा की देखब ई भेल मकता । शाइर अपन एकै टा नामक प्रयोग करथि। जेना हम पहिल गजल सँ"अमित" लिखै छी तँ आब कतौ "मिश्र " नै लिख सकै छी। बहरक पहिचान लेल हम U मने " ह्रस्व " लेने छी आ I मने दीर्घ लेने छी। हम लिखैत तँ 2008 सँ छी मुदा मास जनवरी 2012 क अंतिम सप्ताह मे श्री आशीष अनचिन्हार जी सन गुरू भेटलनि, संगे विदेह सन प्लेटफार्म भेटल तेँ हम ऐ दिनकेँ अपना लेल नव जागरण मानैत छी। हमर एकटा इस्कूल संगी जे पहिल बेर लिखबाक साहस देलनि, श्री आशीष अनचिन्हार जी {हमर गजल गुरू} जे गजलक ज्ञान आ "अनचिन्हार आखर" मे जगह देलनि, श्री गजेन्द्र ठाकुर जी जे विदेह -मैथिलीक अन्तर्राष्ट्रिय आनलाइन पत्रिका {www.videha.co.in } मे जगह दऽ लिखबाक साहस देलनि, श्री ओम प्रकाश झा जी जे बेर-बेर हमर गजल यात्रामे मदति केलनि, हिनका सभकेँ हम कहियो नै बिसरि सकै छी। संगे संग प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूपसँ संग देबऽ बला सभ गोटेक संग सभ पाठकगणक जीवन भरि आभारी रहब। एकटा गजल पुष्प अपने सबहक लेल:- पुष्प गजलक लऽ एलौँ प्रेम आँगनमे शब्दके घोरि एलौँ नेह चाननमे नव सिनेहक सजल मधुमासमे रमलौँ भासलौँ हम कतौ दुख विरह सावनमे नव समाजक लऽ ऐना देखलौँ मुँहके भूतिया गेल सब संस्कृतिक बासनमे मंद मुस्की हजल के संग बड हँसलौँ बाल छी बनल हम कखनो कऽ गायनमे अमित आशीष चाही मात्र हमरा यौ भाव रस रहब भरि सदिखन समर्पणमे अपनेक सुझाबक बाट जोहैत हम- -अमित मिश्र गजल 1 चान देखलौ तँ सितारा की देखब अन्हारक रूप दोबारा की देखब प्रेमक सागर मे बड़ मोन लागै डुबऽ चाहै छी तँ किनारा की देखब एहि ठामक मिठाइसँ बेसी मीठ रूपक छाल्ही केँ दोबारा की देखब अपने आप राति रंगीन भऽ जाए फेर बोतलक इशारा की देखब मेघक डरे चान नै बहरायल ओ नै औता तँ नजारा की देखब जखन यादिक सहारे जी सकै छी तखन चानक सहारा की देखब वर्ण -13 2 जे किछु कहब हँसि कऽ कहू प्रेमक जालमे फँसि कऽ कहू भीज जाउ सिनेहक वर्षा मे दिलक झीलमे धँसि कऽ कहू खसा दिअ आइ बिजुरी अहाँ रूपक चानन घसि कऽ कहू प्रेम केलौँ कोनो पाप तँ नै ने लगमे आबि हुलसि कऽ कहू जमाना जुल्मी किछु नै करतै डरू नै बाँहिमे कसि कऽ कहू अन्हरिया कते दिन रहतै देखू भोर भेलै हँसि कऽ कहू बना लेब दुलहिन अप्पन अमित कने खखसि कऽ कहू वर्ण -11 3 कोना चमकल रूप सब बूझहऽ चाहै छै अंग-अंग मे हम्मर गजल रहऽ चाहै छै केशक गजरा जानि नै की सब करेतै यै मुस्की कए वाण पर करेज ढहऽ चाहै छै पएरक पायल मोनक मोर नचाबै यै डाँरक लचकी कए बिजुरी सहऽ चाहै छै पाकल आम छी हरियर-पियर सुटमे प्रेमक मथनी सँ प्रेम दही महऽ चाहै छै राति अमावस मे पुनिम बनि कऽ एलौँ यै चलि आउ मोर अंगना दिल कहऽ चाहै छै परी बनि सपना मे सबहक त आबै छी ''अमित '' तऽ सिदखन सुतले रहऽ चाहै छै वर्ण - 16 4 आँचर तर मरबाक मजा किछु और छै संग प्रेम मे भिजबाक मजा किछु और छै सुतल मे त श्वप्नपरी बड यादि आबै छै जागल श्वप्न देखबाक मजा किछु और छै गीत-संगीत त ताले सँ बान्हल रहै छैक बीन ताल के नचबाक मजा किछु और छै गणित विज्ञान हिन्दी भुगोल बड सिखलौ प्रेमक पाठ पढ़बाक मजा किछु और छै फूल भरल बाट पर कतबो चलु अहाँ कांट पर में चलबाक मजा किछु और छै जमाना तेज छै क्षण में पहुंचू सब ठाम इंतजार में रहबाक मजा किछु और छै अनचिन्हार देलनि पांति बनल गजल अमित संग लिखबाक मजा किछु और छै. वर्ण -- 16 5 आइ नोरसँ आँखि बोरि रहल छी ककरो दिश मोन मोड़ि रहल छी तेज श्वासक कोदारिसँ आइ हम ओ इयादक माँटि कोरि रहल छी तरेगणक बीच बैसल चानसँ पहिले जकाँ डोर जोड़ि रहल छी अन्हारक बीच कुकुरक आवाजसँ रहि-रहि कऽ ध्यान तोड़ि रहल छी कत्तौ- कत्तौ जुगनू चमकी उठै छै नै एला प्रिय आश छोड़ि रहल छी राति जुआन बुढ़ सब भेलै देखू ओ औता विश्वास नै छोड़ि रहल छी आइ नै तँ काल्हि जरूर औता प्रिय यैह सोचि ओछेना छोड़ि रहल छी वर्ण --13 6 आब तँ राति बिताएब भेल कठिन वर्षा मे वस्त्र सुखाएब भेल कठिन दिन तँ भीड़ मे हसैत बित जाइ छै राति कऽ दर्द नुकाएब भेल कठिन सब ठाम चोरी-डकैती जोर धेने छै प्रेमक धन बचाएब भेल कठिन यार सब छलैए तँ ताश खेलै छलौँ पहिला यादि मिटाएब भेल कठिन माँ-बाबू कनियाँ बच्चा भाएक चिन्ता छै आब सब लेल खाएब भेल कठिन अनचिन्हार चिन्हार सब छितरा गेल संबंधक पुल बनाएब भेल कठिन धधैक रहल पानिमे धधरा देखू अमित आगि मिझाएब भेल कठिन वर्ण --14 7 करेजमे जनमल घाव तँ जडिएबे करै छै भिजल रूइया कए बोझहा भरिएबे करै छै जीवन दुखक सागर अछि सब केउ जानै छी हिम्मत राखू तँ सुख फेर सँ सरिएबे करै छै कऽ लिअ कतबो झुठक खेती बेइमानी डकैती भगवान घर मे तँ हिसाब फरिएबे करै छै अनकर कन्हा पर बंदुक राखि चलाबै सब केउ नीक बात नै कहै सब गरिएबे करै छै बाप-दादा कए इज्जत निलाम जुनी करै जाउ सदिखन बदनाम लोक त' भरियेबे करै छै जहिना गजल नीक लिखबाक कोशिश रहै छै "अमित" विद्वान लोक समाज सरियेबे करै छै वर्ण --18 8 रातिमे हुनकर इयादि आबैए बेसी रातिमे बाट जोहैत आँखि जागैए बेसी कतबो प्रकृतिक कोरामे रहब मुदा खण्डहर सिनेहक नीक लागैए बेसी माँ कए चिन्ता जेना संतान लेल होइ छै खून नै देह-देहसँ चिन्ता बहैए बेसी गामक टूटल टाट दोगसँ देखैत ओ पहिलुक मिलनक बात दागैए बेसी कोना-कोना कोहबर सँ कलकत्ता एलौँ रूकबो नै करै फिल्म जेकाँ भागैए बेसी विरहक वेदना झुलसा देलक आत्मा घुरो सँ अमित करेज सुनगैए बेसी वर्ण --15 9 हरियाली देख हरियर मोन भऽ जाइ यै बंजर धरा देख बज्जर मोन भऽ जाइ यै जँ आमक गाछी मे एक्को मिनट बिताएब मीठ पवन सँ मिठगर मोन भऽ जाइ यै जँ खेत मे देखै छी झुमैत गहूँमक बालि सरसोँ फूल सँ रसगर मोन भऽ जाइ यै घरक आगू गुलाबक उपवन सजेलौँ आब एत्तै करब गुजर मोन भऽ जाइ यै लोभी लोक लाजो नै करै छथि गाछ काटि कऽ देख कऽ अमित गड़बड़ मोन भऽ जाइ यै वर्ण--16 10 गोर गाल पातर ठोर छै नैन कारी बड़ बेजोर छै नाक कान डाँर केश नीक यौवन झरनाक शोर छै गुलाब कही त बड़ कम दोसर ठामक इजोर छै विरह जँ अन्हरिया छै तऽ इ प्रेमक मधुर भोर छै जीवन जँ नरक भेलै तऽ स्वर्ग नगर कए डोर छै मोन मोहै छै मशीन आइ मुदा इ पैघ चितचोर छै होली मे रंगक मेल जेकाँ सबसँ मिलबाक होर छै चीख हिनक प्रेमक स्वाद अमित तऽ भेल विभोर छै वर्ण --10 11 बिन हुनका देखने मोन ने मानए जँ देख ली तँ ककरो होश ने आनए सबसँ बड़का नशेरी पकैड़ लाऊ ऊहो हारत जँ दारू नैनसँ छानए पियर सरिसोँ फूलक हँसी लोभाबै हिनक मुस्कीसँ बाधो मस्त भऽ फानए डाँरक लचकी ,चाल सुनू अल्हर छै रूप सँ छिटकल इजोर चान आनए जँ खोलि देती माँथ परक उपवन बर्षो एहि ठाँ बसबाक लेल ठानए सच कही तँ उच्च ताप पर तपल अनमोल सोना .जे सब चाहै किनए सच कही तँ उच्च ताप पर तपल अनमोल सोना जे सब चाहै आनए वर्ण --14 12 देहमे सटलै जखन देह सिहरि गेलै देह देह किएक आइ देहे देख हहरि गेलै देह दैवक सबसँ नीक रचना मनुष्यक देह छै अनेको उपमासँ सजल से उघरि गेलै देह नव दुनियाँमे चलैत-फिरैत मशीन छै लोक मानवता प्रेम भाइ-चारा बला मरि गेलै देह गोर-कारी छोट-पैघ लिंगक नाम पर बाँटल अमित आब कहिया सुनब सुधरि गेलै देह एकाएक बसंतक हमला भेलै मौसमपर नव पात भरल गाछ जेकाँ मजरि गेलै देह श्वासमे तेजी खूनक प्रवाह बढ़ि गेलै पलमे लड़ाइमे ज्ञानी पुरूष जेकाँ सम्हरि गेलै देह वर्ण --18 13 करेजक पहचान छै मोछ हिम्मत कए चलान छै मोछ मौगी जेकाँ जुनि बनू यौ भैया सब मर्द कए शान छै मोछ बिन टिक कए जुनि रहू यौ टिक मनुखक गुमान छै मोछ , संस्कार पड़ल जनेऊ भेलै जनेऊ सब के प्राण छै मोछ नै सोचु बेरोजगार रहब सबहक तऽ सम्मान छै मोछ , मोछ राखब खराप बात नै , नव संस्कृति सँ मिलान छै मोछ वर्ण --11 14 की भाइ, किछु लिखै छी तs गजल लिखू धुन-ताल कए फूलसँ बान्हल लिखू प्रेम करै छी बड अहाँ आ शाइरी नै प्रेम प्रगाढ़ हेएत पल-पल लिखू खुशी- गम संग सब रंग समाजक धोरि एक्के घैलामे ताड़क जल लिखू कल्पना कते दिन टिकतै मोनसँ लिखू गामक हवामे साँस लऽ गजल लिखू सबहक मोनमे उठै नव तरंग फाग रंग-अबिर लगा अटल लिखू बड भेल प्रेम आ शराबक गजल समाज उत्थान लेल भऽ बेकल लिखू किछु नव शीर्षक नव शब्द चुनि कऽ अमित नव समाज मे रमल लिखू वर्ण --14 15 गजलसँ परिचय करेलक अनचिन्हार आखर गजलक अ आ इ ई सिखेलक अनचिन्हार आखर भटकै छलौँ गीत आ कवितामे ओझरा हम कतेक लिखबाक मकसद बतेलक अनचिन्हार आखर साहित्यक रंगबिरही विधा मे एकटा गजलो छैक दू पाँतिक भाव कहि सिखेलक अनचिन्हार आखर आबि गजलक भंडारमे केओ गजल गाबऽ लागत एगो अलगे दुनियाँ बसेलक अनचिन्हार आखर जा धरि लिखब गजले टा लिखबाक कोशिश करब अमित कए शाइर बनेलक अनचिन्हार आखर वर्ण --20 16 जीवनमे एक्को बेर मान समाजक राखबै अहाँ कखनो तऽ बाट हमर घरक धरबै भुतीया गेलौँ बिहाड़ि शहर दिश जे चललै धुमि उर्वर धरा पर पालो हऽरक धरबै हम गाम छी ,हम संस्कृती छी , हम इज्जत छी कखनो तs हमर जीर्ण देहक लेल सोचबै सगरो अत्याचार ,सगरो लुट-पाट मचल छै कहियो तs अपन सर्द खून गरम करबै पैसा कारी-उज्जर , भोजन दुर्लभ भेल आइ कखनो तs सत्यक मिझाईत घूर सुनगबै पहिले केऊ चलत काफिला बनबे करतै अमित कहिया कलममे क्रांति भरि लिखबै वर्ण --17 17 अहाँ कखनो तऽ बाट हमर घरक धरबै हमरा संगे अहूँ त बाट समाजक धरबै भाग्यमे जे लिखल अछि तें विरहमे मरै छी आशा केने छी कहियो तऽ मान नोरक धरबै राहू-केतू केने अन्हरीया ताशक सियाह छी हेतै जँ तेज मंगल तऽ ध्यान भोरक धरबै काँट कलपाबैए कने काल कनेक दर्द दऽ फूलो भेटबे करत बाट नै डरक धरबै सिनेह जँ हारत तऽ समझू दुनियाँ डोलत लड़ाइ जीत कहियो तऽ झण्डा प्यारक धरबै ठार दलान पर स्वागतक थारी सजेने छी माँग हमर राँगल हाथ सेनुरक धरबै नै मागै छी अकाशक लाख तरेगण हम यौ अमित कहियो तऽ गजल हजारक धरबै वर्ण --17 18 देखि दुनियाक रंग हम दंग रहि गेलहु नीक नहियों लागल रंग तैयो सहि गेलहु बान्ह सँ बाहर निकलैत नवका पानि छलै टुटल नाव तऽ संग छल तैयो दहि गेलहु ताकत अछि एते चिर देब पहाड़क सीना दुनियाँक विकराल रूप देख ढहि गेलहु सगरो भूख गरीबी दर्दसँ ग्रसित छै सब आ हम ए.सी मे रहितो रौदसँ डहि गेलहु पैघ हेबाक होरमे इज्जत सब बिसरलै अमित जाग आबो तऽ अपनेसँ कहि गेलहु वर्ण --17 19 ‎की अहाँ अपन संग देबै की भरि जीवन संग देबै सहबै बाढ़ि भुकंप .रौद जखन-जखन संग देबै निकलतै कलमसँ लावा रचबै सुमन संग देबै साहस तँ देहमे दौगैए पुरतै सपन संग देबै पुण्यक राज फेरसँ एतै हो पाप हवन संग देबै धरा पताल सब मिथिला मैथिली गगन संग देबै अहाँक संगे टा चाही प्रिय अमित नयन* संग देबै *हुनका अपन नयन मानि रहल छी एहि ठाम * वर्ण --------10 20 बीत गेल होली आब कहिया एबै पिया छुटल रंग कहिया रंग लगेबै पिया असगर आश लगा ओझराएल छलौँ निरास छी खुश कऽ कखन नचेबै पिया यौवनक बिया अंकुरि गाछ बनि गेलै कखन रूय फलक स्वाद बतेबै पिया जाड़क ओछेना ,बसंतक पसेना राजा गर्मीयोँ मे अकेले आगि सँ तपेबै पिया डाह होइ यै देखि सहेलीक प्रेम सुख काजे के पत्नी मानि सुधा बरसेबै पिया देहक वस्त्र फसकि की सँ की भऽ गेलै यौ फोन सँ बात कऽ और कते सिहेबै पिया यौवन समय आ समुद्रक लहर छै ठहरै नै छै गाड़ी कहिया बढ़ेबै पिया प्रात आबू ने गाम रूपक रंग धेने छी अमित हाथसँ प्रेम पुआ खुएबै पिया वर्ण --15 21 बंद आँखिसँ होइ रचना राति-दिन हुनके सपना बोली फूल बरसै गमकै प्रेम भरल घर अंगना कैनवासपर फोटो जेकाँ आधा-अधुरा होइ सामना कोनो रोक नै जोर चलैए मात्र ओ कऽ सकै छथि मना घुमै छी दोसर नगरमे नैन मिलेने फाँकैत चना कहै यै आलसी इ दुनियाँ मात्र केलौँ हुनके रचना सपना आ कल्पना अमित राति -दिन हुनके सपना वर्ण -- 10 22 राति कऽ जानि नै किए नीन नै होइ यै कतबो टाकामे श्वप्न कीन नै होइ यै जग फोँफ काटै हम करोट फेरै छी दोसरोसँ मिठ सुख छीन नै होइ यै अनंत अकास तरेगण पसरल पुर्णिमामे अमावश मलीन नै होइ यै प्रेयषी प्रेमक पता पलक पुछैए पुनः पाबि पंक पथ नीन नै होइ यै जिनगी जहल अपने लोक बनेलक आब तऽ सुखल नोरो भीन नै होइ यै कते कठिन छै किनब कतौ प्रेम हमहुँ भिखमंगा देख घीन नै होइ यै प्रेममे दर्द नीनक मेल नै होइ छै अमित दुनू कहियो तीन नै होइ यै वर्ण --14 23 टूटिए जेतै संबंध जँ दस लेल एकसँ इहो स्वीकार अछि भीड़ मे जीबै छी तेँ भीड़के बचेनाइ हमर व्यबहार अछि हम बनियाँ छी सए कमा लेब दस छुटि गेल कोनो दुख नै सबल तऽ बढ़बे करतै ओकरा संग दिअ जे लचार अछि माछक लोभमे सड़ल माछ लऽ दुषित नै करब समाजके एक दाममे बिकै बला ककरो जिनगी नै मीना बजार अछि सब के सबसँ किछु-ने- किछु चाहत रहै छै छोट बाट पर अहाँ एक बेर आबू हम दस बेर इ हमर व्यबहार अछि लड़ाइ कऽ देह जुनि तोड़ै जाउ प्रेम कऽ दिल धरि पहुँचु यौ अमित गिनती के फेरा मे नै पड़ू सगरो अपने संसार अछि वर्ण-23 24 राति देखलौ सदियह तोर रूप गे चान हमर जान लऽ गेलेँ जान हमर लिखल तोरे नामे छलौ जान हमर प्राण लऽ गेलेँ पहिल चिन्नी मिला प्रेम के पानिसँ गाढ़ बनौलेँ प्रेमके चाशनी रंग-रूप यौवन राति चमका कऽ प्राण हमर इमान लऽ गेलेँ केलेँ सुशोभित नेह उपवन रंग-बिरंगक तितली बनि कऽ अनमोल पराग राति पिया कऽ गे चान हमर गुमान लऽ गेलेँ एहन आदत लागल जँ तोरा नै देखी मोन हमर नै लागैए आँखि बन्नो मे तोरे तऽ हम ताकै छलौँ जान हमर मान लऽ गेलेँ आबि हकिकत मे एकबेर गाम गोरी हमरो तऽ मान राखि ले अमित भटकैत मोन के सम्हारि कऽ मान हमर शान लऽ गेलेँ वर्ण-24 25 अ-आसँ सिखलौँ आखर जोड़ि गजल बनेनाइ जेना कागजक नाह आ फूल कमल बनेनाइ मतला रदीफ काफिया कसीदा शेर आ बहर धुनसँ साजि कऽ रंगबिरही महल बनेनाइ प्रेमिकाक आँचरसँ प्रेमक पाठ आ प्रेमालाप कुहरैत करेजक दर्दके चंचल बनेनाइ दिनके राति रातिके दिन साँझ-भोरसँ बदलि मोनक भावके अनका लेल सरल बनेनाइ जन्मदिनक ढेर रास बधाइ आ-आ के हमर अमित अ-आ गंगा शेर के गंगाजल बनेनाइ * अ-आ मने " अनचिन्हार आखर " वर्ण-18 26 नव चान बैसल छै हमर कोहबरमे सुन्नर मुँह नुकेने ओ अपन आँचरमे एक कोण पर बैसल ओ लाले लाल लागै ओ चुप छथि मुदा गाबै छी हम भीतरमे नहूयेँ उठल घोघ मोन आनंदित भेल जागल अथाह प्रेम मात्र एक नजरमे नै मरलौँ नै जीलौँ बीचे मे रहि गेलौँ हम पीब हुनकर स्पर्श सन मीठ जहरमे सबदिन चान आबैए सजैए कोहबर अमित आइ मागै छी जा ओ प्रेम नगरमे वर्ण-16 27 डहकल करेज जड़ल करेज और जड़ाएब कोना बीन डोरक पतंग अहाँ कहू और उड़ाएब कोना जीवनक पर्दापर कतेक नव नव नाटक खेललौँ जखन अन्हार भेल रंगमंच रचना रचाएब कोना आँखिक सामने उजड़ि गेल बसल बसाएल दुनियाँ आब भटकल बाट पर प्रेम नगर बसाएब कोना की सही केलौँ आ की गलत केलौँ किछु नै जानि हम पेलौँ जानै छी एतऽ बड भीड़ छै नैनसँ नोरो बहाएब कोना खुशीसँ काटू जीवन खसैत पड़ैत काटि लेब हमहूँ अमित आजुक राति बड भारी राति ई बिताएब कोना वर्ण-21 28 दोसरक दर्द अपन बूझि जड़ि रहल छी हम छी अपने समाजक तेँ संग मरि रहल छी हम कखनो हँसलौँ कखनो कानलौँ सब रंगमे रंगि भऽ नै जाऊँ असफल तेँ बड्ड डरि रहल छी हम कोना बताएब खूनक एक एक ठोपक रहस्य खूनक प्यासल बड्ड छै तेँ हहरि रहल छी हम नेह सगरो भेटि रहल छै खुले आम बजारमे सीसा सन टूटल दिल जोड़ि तरि रहल छी हम आइ देखलौँ दुनियाँ हम अपन खुलल आँखिसँ अमित आइ बूझलौँ अनेरे जड़ि रहल छी हम वर्ण-19 29 अहाँक रूप देख देख जीवन जी लै छी हम मदिराएल नैन देख कऽ कने पी लै छी हम ओना तऽ बड बड़बड़ाइत रहै छी सखरो अहाँक ठोर खुलै यै तऽ अपन सी लै छी हम अहाँ मक्खन अहाँक परतर कोना करब दूर नै भऽ जाउँ अहाँ सँ तेँए दही लै छी हम बात इ अलग जे जमाना कहै प्रेमी हमर अहाँ तऽ जानै छी दर्द छोड़ि और की लै छी हम सब सप्पत अहीँ के नामे अहीँ के नामे श्वास प्राणो छै अहीँके नामे की ऐसँ बेसी लै छी हम नव दिवस मे करू सजनी नवका गप्प यै अमित अहाँ पर एकटा शाइरी लै छी हम वर्ण-17 30 खूनसँ भिजलै धरती मिथिला बनबे करतै कतबो घायल मैथिली मिथिला बनबे करतै जानकीके छाती पर जे चोट लगलै आइ एतऽ खून बनि जेतै चिनगी मिथिला बनबे करतै चोटाहल साँप धऽ लै छै रौद्र भयानक रूपके आब शेर गरजै बेशी मिथिला बनबे करतै एकोटा शहीदके बलिदान नै हेतै व्यर्थ आब पापीके मूँह हेतै कारी मिथिला बनबे करतै जागू मिथिला एक जूट भऽ चलियौ छाती तानि कऽ करियौ अमित तैयारी मिथिला बनबे करतै वर्ण-18 31 धन आ ऋण संगे जोड़ल तऽ जाइ छै चिन्नी नोन पानिमे घोँटल तऽ जाइ छै जे कानैए से हँसबो जरूर करै छै आम संग बबूर रोपल तऽ जाइ छै जे काज केउ कहियो नै केलक एतऽ विपति एला पर सोचल तऽ जाइ छै नोर जड़ैए वा खून जड़ैए हर्ज की कखनो कऽ माहुरो घोँटल तऽ जाइ छै जँ लोढ़ी घसल कपार मे तऽ की भेल अपनो सँ लकीर गोदल तऽ जाइ छै डाह करब तऽ डहि जाएब अपने डहकल करेज जोड़ल तऽ जाइ छै पानि अपन बाट अपने बनबैए इ चंचल धारा के मोड़ल तऽ जाइ छै जँ कारी मायाजाल सँ मारै छै लोक के ओ जादूए सँ मोन मोहल तऽ जाइ छै सही आ गलत सब छै एहि जग मे अमित गलत के टोकल तऽ जाइ छै वर्ण-14 * एहि ठाम "धन" मने"+ve" आ "ऋण" मने "-ve "भेल 32 अपन अपनेके लड़बै छै नेत अपने पर डोलबै छै जे कानै छै देखार भऽ जग मे हँसै वला के वैह कनबै छै कलमक ताकत जुनि पूछू हंगामा तऽ इएह करबै छै जेकर मोन मे अहाँ बसलौँ करेजक खून ओ करबै छै देखाइ नै दै छै जे सूक्ष्म जीव बिमरियाह वैह बनबै छै भरोसा करब ककरा पर भरोसे वला होश उड़बै छै नै चिन्हार छै जगमे अमित कोसी माँ अपनेके दहबै छै वर्ण- 11 33 अपन लोक मरखाह बनल छै यौ भैया कुटमैती आब चोटाह बनल छै यौ भैया जहर पीबि तेजै छै अपन प्राण अपने जिनगी भमर अथाह बनल छै यौ भैया नोर पोछत नै आब केओ ककरो कहियो दोसरक हँसी कटाह बनल छै यौ भैया प्रेम बनल आब एतऽ इतिहासक शब्द करेजक छंद घबाह बनल छै यौ भैया लूट मचल अछि चारू दिश इजोरियेमे जन जनक डलबाह बनल छै यौ भैया उबडूब करै छी संसारक बैतरणीमे जिनगी तऽ फूटल नाह बनल छै यौ भैया अपन शप्पत दऽ बनबै अपन दुश्मन अमित शोणित सियाह बनल छै यौ भैया वर्ण-16 34 ताड़ी के कने छानि कऽ दिअ दारू कतौ सँ आनि कऽ दिअ मर्दक छै पहचान दारू आइ तऽ छाती तानि कऽ दिअ डूबल छी जे मदहोशीमे रम मे दुख सानि कऽ दिअ बंधन इ दुनियाँके तोड़ू सबटा बान्ह फानि कऽ दिअ नैनक निशा बड्ड चढ़ल ठोर सटा कऽ जानि कऽ दिअ गिलास छोरू बोतल लाबू अमित आइ हानि कऽ दिअ वर्ण-10 35 शहरक सब शराबी चलू घर हमर ओतै नशा के बसेबै नया नगर हमर भऽ कऽ दुनियाँसँ अलग कने काल झूमब क्षणेमे हरिया जेतै सुखल चर हमर नदी नोरमे घोरब रंग बिरंगक पानि कोनो इयादक चखना हेतै कर हमर पिबै सँ पहिले मीता मुनि ले आँखि अपन कहै नै इयाद नै केलौँ दिलबर हमर खसै छी बीच्चे सड़क तऽ कहै शराबी सब ओकरा हँसबै लेल खसै छै धर हमर भऽ कऽ बदनाम अमित जी सकै छी हम त कहत हरजाइ तऽ जड़त घर हमर वर्ण--16 36 हम बाजि रहल छी मायक कोखिसँ हम सबटा सुनै छी बेशक कोखिसँ कष्ट सहब हमर नियती बनल मल- मुत्र खून सहै छी मायक कोखिसँ मारि देब पहिल तीन बहिन जेकाँ सुनि हँसि रहल छी मायक कोखिसँ बेटी कए जौ मारबै यौ भलमानुष बेटा जनमत कोन मायक कोखिसँ हम बेटी छी दुर्गा छी सुनि लिअ अहाँ आइ हुंकार भरै छी मायक कोखिसँ बेटी कए जे केउ सम्मान नै करत नै जनमऽ चाहब ओ मायक कोखिसँ बेटी बिन बंश ककरो तऽ नै बढ़तै जारि कऽ बंश मरै छी मायक कोखिसँ वर्ण 14 37 गजल नै नै गीत लिखलौँ जँ लिखलौँ तऽ प्रीत लिखलौँ दरद सीमा पार केलक तऽ मरहम घसि मीत लिखलौँ उलट बातसँ नीक लागै गरम के हम शीत लिखलौँ बयानसँ पलटब तऽ इज्जत जँ नेता सन गीत लिखलौँ बरसबै नै मेघ बनबै ढहल आँगन भीत लिखलौँ बहू सासुक भेल झगड़ा मधुर संगे तीत लिखलौँ बचब नै यौ प्रलय हेतै फँसल साँसक जीत लिखलौँ अमित देखल अपन नैनसँ समाजक सब रीत लिखलौँ मफाईलुन-फाइलातुन ( ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ + दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ सँ बनल बहरे-मजरिअ ) 38 फुलल फूलक आशमे भेटल कटैया इ मधुमासक समयमे पतझड़ समैया तड़प भेटत मात्र फँसलौँ यदि मरूस्थल बनल छै मारूक एहन घर घरैया जड़ल मानव नेह मे दुख मीत दै छै पियासल छै खूनके सब मन वनैया खसल छै अर्थव्यवस्था सड़ल सोँगर अपन पेटक भूख बनि गेलै बलैया दऽ रहलै यै दोष सऽब पर सऽब नगर मे दऽ रहलै केओ तऽ ककरो नै बधैया कते टाटक दोगमे अजगर बसैया दरद सिन्धुसँ भासि गेलै अमित नैया मफाईलुन-फाइलातुन-फाइलातुन ( ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ + दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ + दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ सँ बनल बहरे-सरीम ) 39 आइ एला पिया घर लए कंगना दाइ गै लाज लागै छलै होयते सामना दाइ गै नीन नै होइ यै यादि ओ आबि गेला जखन आइ एला पिया काज केने मना* दाइ गै आलु कोबी कए राख भेलै भुजीया सखी जानलौँ आबि गेला पुरा* पहुना दाइ गै बाजलै पायलो दोगलौ ओलती मे नुका , सून जे भेल छल बैसकी अंगना दाइ गै नीक साड़ी चुनर आ बुटीदार चोली छलै भेल हरियर मन प्रेम भेलै घना दाइ गै दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ केर हरेक पाँतिमे पाँच बेर प्रयोग भेल अछि। ई बहरे मुतदारिक अछि। * काज केने मना कए मतलब छल जे जाही ठाम पिया काज करै छलाह ओही ठाम सँ काज-धाज छोडि क चलि एलाह * पुरा{जगह कए नाम} 40 असगर जनम लेलहुँ असगरे जी रहल अपने भाग अपनेपर भरोसा बचल मोनक खेतपर बजड़ा अपन खाइ छी गलती अपन तेँए बाट काँटसँ भरल मोजर नै सिनेहक भेल कहियो हमर अपने तोड़ि नाता शहर मे जी रमल दै छी दोष नेताके किए आब यौ अपने भोट दै छी घेँट अपने कटल लोभी छी अधम छी अमित भटकै सगर पक्षक नै अपक्षक मोन अपने बनल मफऊलातु-मफऊलातु-मुस्तफइलुन ( दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व+ दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व +दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ सँ बनल बहरे-कबीर ) 41 नेता आ गुन्डा के एकै बूझू आगू आबू देखू जल्दी जागू दौड़ा-दौड़ी केने लेने झोरी लूटै टाका मागै वोटो देखू कारी केने टाका गाँधी बाला कूदै झूठे भ्रष्टाचारी सोचू बोली खूंखार डेरेलै नेना मारू लाठी हाथो-टाँगो तोड़ू गाड़ी-घोड़ा भेलै खेलौना यौ एतै हेतै जादू खेला झाड़ू नेता नै भेलै गुन्डा मानू ने गुन्डे भेजै छी अन्हारे देखू वार्णिक बहर {10 टा दीर्घ सब पाँतिमे } 42 पुन: जोडि लेबै नेहकेँ डोर राजा जी कनेको बहै नै जानकेँ नोर राजा जी कने आउ राजा जानि नै की भऽ जेतै यौ कनेको नचाबू प्रेमकेँ मोर राजा जी किए सुन्न भेलौं आइ बेमौत मारै छी कने आइ मस्तीमे करू शोर राजा जी जमाना मिलेतै नै सुनू बैलगा देतै अनाड़ी बुझै छै प्रेम छै चोर राजा जी चटा देब संगे प्यार के चाशनी हमरा अमीतो बुझू भेलै सराबोर राजा जी हरेक पाँतिमे "फऊलुन-मफाईलुन" अर्थात ( ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ + ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ सँ बनल बहरे तवील ) 43 जखन राति आएल कारी पिया यौ अहाँ मोन पड़लौ जखन होइ घर मोर खाली पिया यौ अहाँ मोन पड़लौ अहाँ दूर बैसल सताबैत छी साँझ-भोरे सदिखने सनेसोँ जँ आएल देरी पिया यौ अहाँ मोन पड़लौ बरसलै प्रथम बूँद वर्षा मिलन यादि आबै तखन यौ विरह केर तानल दुनाली पिया यौ अहाँ मोन पड़लौँ पिया जी जखन बहल पवना मधुर गीत गाबैत कोयल जखन काँट मे फसल साड़ी पिया यौ अहाँ मोन पड़लौँ जँ देखब कतौ छिपकली डर सँ बोली फुटै नै हमर यौ जँ धड़कै हमर सून छाती पिया यौ अहाँ मोन पड़लौँ कने आबि नेहक जड़ल भाग फेरो सँ चमका दिऔ यौ अमित आश देखैत रानी पिया यौ अहाँ मोन पड़लौ बहरे -मुतकारिब {ह्रस्व-दीर्ध-दीर्ध 6बेर सब पाँतिमे } 44 चादरो फाटल सड़ल बड उठबै कखन बाढ़ि एलै भासलै घर बनतै कखन कोन कोना नाह भेटत मजधार मे राति दिनकर दिन कऽ चन्ना बूझै कखन चोरि भेलै चैन आ चाहो के अमल देह टूटै दोष अनका देबै कखन डाँग लागै दैब के अधगेरे जखन पानि मानव एक बूँदो माँगै कखन बेचबै बेटा जँ जिनगी बचतै तखन अमित कह ने पानि सगरो घटतै कखन फाइलातुन-फाइलातुन-मुस्तफइलुन { I-U-I-I-I-U-I-I-I-I-U-I} एक बेर सब पाँति मे बहरे-जदीद 45 भेलै इ सरकार आन्हर कानै इ देशो भऽ असगर कोना कहब आइ सोना सगरो तऽ छै भेल गड़बड़ सांसद बनल हाट माछक . नाचै असल बनि कऽ बानर बनलै बजट लूट मचलै कारी टका बनल सागर मरलै कते एतऽ कोना के करत यौ खोज एकर पोर्नो चलै राज तऽरमे लाजे अमित रचल आखर {मुस्तफइलुन-फाइलातुनI-I-U-I-I-U-I-I} बहरे-मुजास 46 करेजक घर तऽ खोलू कने कते छै प्रेम देखू कने अहाँ हेबै सराबोर यौ नगर मे आबि देखू कने मजा एतेक छै एतऽ यौ मना नै करब मानू कने नयन के बाट धेने प्रथम सिनेहक चार उतरू कने सिहकि रहलै हमर मोनसँ धुन प्रितक सरगम तऽ गाबू कने मोनक अछि आश संगे मरब सिनूरक मान राखू कने गजल एगो अहाँ गाबि लिअ अमित हाथो बढ़ाबू कने हरेक पाँतिमे--ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ ह्रस्व-दीर्घ 47 कोन टोना केलकै जोगिया सदिखन करेजा हमर जरिते रहल चोरि केने चैन होशो हमर सदिखन अनेरे उड़िते रहल नै छलै डर एतऽ मरबाक आ नै मोन मे दर्द अंदेशा छलै देख नवका एतऽ बहिते हवा से आब नेहक गजल मरिते रहल भागि गेलै कोन नगरक गली मे आइ देखा कऽ सतरंगी सपन बाट जोहैते भऽ जेतै कखन की आँखिमे नोर बड भरिते रहल उजरि गेलै जखन कोनो उपवनक कोनटा परक गाछक फूल यौ तखन सबटा कोयलक मधुर बोली संग दर्दक हवा उड़िते रहल आइ खोजै छी अपन ओहि जादूगर कए फेर खेला खेलबै अमित केने आश नेहक सदिखने भीतरे-भीतर जरिते रहल बहरे मदीद फाइलातुन-फाइलुन ( I-U-I-I+ I-U-I ) 3 बेर 48 खतम सब काज भेल हमर स्वतंत्र मिजाज भेल हमर कतौ जिनगी छलै धधकै खुशी पर राज भेल हमर पुरान जँ गाछ , मज्जर नव अपन तऽ अवाज भेल हमर सरस पल भेल बड दिनपर सदेह इलाज भेल हमर सदिखन गजल लिखैत रहब अमित नव साज भेल हमर बहरे-वाफिर मुफाइलतुन U-I-U-U-I 2 बेर सब पाँतिमे 49 ओ बिसरि गेलै किए प्रेम हेरेलै किए बीच चौराहा जड़ल राख दिल भेलै किए आश अमृत के छलै जहर बनि एलै किए झुनझुना हमर समझि आइ ओ खेलै किए प्रेम देबी बनि कऽ ओ नोर बोझेलै किए नै जबाबो भेटलै अमित दुख भेलै किए फाइलातुन-फाइलुन ( I-U-I-I + I-U-I ) बहरे-मदीद 50 घोघ हुनकर उतरि गेलै पवन संगे ससरि गेलै आँखि रहि गेलै खुजल यौ रूप यौवन निखरि गेलै टोह मे छल मोन बगुला राशि सुन्नर उचरि गेलै चउरचन मे चान पूजब पावइन सब बिसरि गेलै जेठ मे मधुमास एलै गाछ नव दिल मजरि गेलै मधुप केलक आक्रमण बड काम मे सब लचरि गेलै अंशु आशक झाँपि लेलनि कुकुर पर जे नजरि गेलै पाप भेलै ,घोघ ससरल अमितके मन हहरि गेलै फाइलातुन ( I-U-U-U ) बहरे-रमल 51 ओकर मूँह लागैए कते म्लान सन कतऽ गेलै चमक ओ पुनमके चान सन मौलाइल गुलाबक ठोर ओकर किए नोराएल कारी नैन जे वाण सन केशो नै गुहल पसरल धरा पर किए देने पेटकुनियाँ भेल अपमान सन टोना कोन डाइन केलकै आइ यौ मुस्की गेल हेरा कोयलक गाण सन दिल मे आगि लागल छै विरह के अमित परदेशी पिया भेला अपन जान सन मफऊलातु--- मफऊलातु--- मुस्तफइलुन ( I-I-I-U + I-I-I-U + I-I-U-I ) बहरे -कबीर 52 आब आगिक पता पुछतै पानि ऐठाँ नै जड़त यौ कतौ घर लिअ जानि ऐठाँ कखन धरि लोक जड़तै चुप जानवर बनि तोड़बै जउर से लेतै ठानि ऐठाँ छै दहेजो तऽ महगाई कम कहाँ छै ओझरी सोझरेतै लिअ मानि ऐठाँ बदलतै समय सगरो नवका जमाना नै जँ बदलत तऽ ओ मरतै कानि ऐठाँ जे जनम देलकै हुनका बिसरलै सब माँथ पर जनकके रखतै फानि ऐठाँ भाइ मे उठम-बजड़ा नै आब हेतै आइ तऽ स्वर्ग के देबै आनि ऐठाँ आगि पर पानि नेहक हँसि ढ़ारि दिअ ने अमित सब के मिला सुख लिअ सानि ऐठाँ फाइलातुन-मफाईलुन-फाइलातुन ( I-U-I-I + U-I-I-I + I-U-I-I ) बहर-असम 53 अपन जीत होइत देखिते रूप लागै यै सए रास आशा देखिते प्रेम जागै यै हजारो कड़ी संगे जुड़ैए जँ एलौँ यै डऽरो मोन मे जे छल अहाँ संग भागै यै अहाँ चान छी वा छै सुमन संग नै परतर अमी मीठ सन बोली अहाँ के तऽ लागै यै जँ हम देख लै छी प्रेम के मुँह सनक पोथी सबालो बनै जल्दी दिमागो तऽ भागै यै बरसतै जँ सदिखन नेह रस हमर घर मे यै सराबोर हेतै अमित आशा इ जागै यै फऊलुन-मफाईलुन बहर-तबील ( U-I-I + U-I-I-I ) 54 बीतल दिनक ओ प्यार कतऽ चलि गेल यौ नेहक जुड़ल ओ तार कतऽ चलि गेल यौ जै तालमे हम भासि गेलौँ सादिखने मचलैत छल ओ धार कतऽ चलि गेल यौ फूलोसँ कोमल घेँटमे लटकैत जे दू बाँहिके ओ हार कतऽ चलि गेल यौ सब अंग छै गाथा कला के कहि रहल मधुमास के श्रृंगार कतऽ चलि गेल यौ बदलैत मौसमके मजा नै आब छै जेठक तपल ओ जाड़ कतऽ चलि गेल यौ छै कल्पनामे बनल रचना मात्र ओ छै अमितके ओ प्यार कतऽ चलि गेल यौ मुस्तफइलुन दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ बहरे-रजज 55 भेटल अहाँके संग हमरा जहियेसँ जिनगी हमर लेलक करोटो तहियेसँ हम एकरा की कहब छल एहन भाग बैसल छलौँ हम बाटमे दुपहरियेसँ गेलौँ शिखरपर भेल जे एगो स्पर्श जुड़ि गेल श्वास प्राण संगे तहियेसँ छी ग्यानके पेटी अहाँ जादू गजल शाइरक कोनो कलम लागै हँसियेसँ हम भेल नतमस्तक लिखब कोना शब्द शाइर अमित छी संग हमरा जहियेसँ मुस्तफइलुन-मुस्फइलुन-मफऊलात ( I-I-U-I +I-I-U-I + I-I-I-U ) बहरे-सरीअ 56 बेचि खेलक इमानो बजारमे नाचि रहलै इ दुनियाँ अन्हारमे के अपन आब छथि एत से कहू नेह सबटा त बेचल हजारमे भोर किछु राति किछु भेष सब घरै के असल छै इ लोकक पथारमे भाइ नै भाइ के रहल आब यौ लोक चुटकी लऽ रहलै दरारमे बेचि एलै जखन रोटी एक कऽर अमित नै देख आशक सचारमे ( I-U-I +I-U-I +I-U-I + I-U ) 57 सदिखन अहीँ धेआनमे रहलौँ हमर कखनो अहाँ धेआनमे रमलौँ हमर शोणित अपन देलौँ जड़ा लिखलौँ गजल की पाँति एको प्रेममे रचलौँ हमर नै थाह भेटल कोन घर छै प्रेम यै कहने छलौँ जे झूठ सन कहलौँ हमर छी कल्पनामे रूप फोटो छापने की दिल सँ एक्को बेर मन गमलौँ हमर छी ठेठ हम भाषा हमर बूझलौँ कहू की अमित नेहक भाव के पढ़लौँ हमर मुस्तफइलुन I-I-U-I तीन बेर सब पाँति मे बहरे-रजज 58 उठलै करेजामे दरदिया हो राम बदलल पियाके जे नजरिया हो राम डूबा कऽ नेहक तालमे संगे संग लेलक बदलि अपने डगरिया हो राम मधुमास लागै आब सौतिन हरजाइ बेचैन केलक बड्ड अन्हरिया हो राम छै फूल पसरल सेज काटै सब अंग गरमी दऽ रहलै यै चदरिया हो राम कोना कऽ सम्हरत मन समझमे नै ऐल बड्ड अमित तड़पाबै बदरिया हो राम मुस्तफइलुन- मुस्तफइलुन-मफऊलात बहरे- सरीअ 59 किए एखन मोन हमर शाइर बनल छै लिखल जेकर नाम ओ एखन कटल छै बनाबी हम रूप जे शब्दक नगरमे नगर ओकर नैनके लागै जहल छै गजल जेहन हम लिखै सबदिन छलौँ से कहाँ हमरा मोनमे ओहन गजल छै दिनक काटै रौद रातिक चान धधकै बहर मारै जान पथ काँटक बनल छै कखन हारब जीवनक अनमोल पारी अमित जा धरि छी करै शेरक कहल छै मफाईलुन-फाइलातुन-फाइलातुन बहरे - सरीम 60 खाली हुनक बाते छलै फूल सन बाँकी बचल सबटा छलै शूल सन खंजर बनल नैनक कमल कोर छल ठोरक तऽ लाली आगि जड़ मूल सन बदलल किए सब आइ से जानि नै छल नेह काँटक पैघ टा कूल सन छै आब सपना देखब व्यर्थ सन भेलै कहाँ ओ हमर अनुकूल सन जाएब हम पागल भऽ कहलौँ सते छै अमित सब किछु भेल निर्मूल सन ( I-I-U-I + I-I-U-I + I-U-I ) 61 पाहुन कने अटकि जाऊ गप लाख टाकाक अछि यौ हमरा कने हाथमे लेने हाथ कहबाक अछि यौ जाएब चलि कोन सदिखन रोकब अहाँ रूकबै जे काजर कने नैनमे अपने लग लगेबाक अछि यौ श्रृंगार छी हमर सबटा जानम अहाँ जानि लिअ यौ चुटकी सिनूरक पिया आ टिकुली सटेबाक अछि यौ परदेशमे जाइ छी कहिया भेँट हेबै अहाँ यौ जी भरि कऽ एखन तऽ नेहक सोना तपेबाक अछि यौ आँचरसँ बान्हब करेजामे साटि सब किछु कहब हम हम हँसब आ अमित राजाके बड्ड हँसेबाक अछि यौ मुस्तफइलुन-फाइलातुन { दू बेर सब पाँतिमे} बहरे-मुजस्सम वा मुजास 62 मोनसँ पढ़लकै लिखलकै पोथी हजार ओ तैयो भटकि रहल छै बनि बेरोजगार ओ नै छै एतऽ कारखाना जाएत लोक कतऽ सपना टूटि गेल भीखे माँगत बजार ओ दोसर ठाम पेट काटिकऽ कोना रहत बचल छै पहिलेसँ देह केने सौँसे उघार ओ बदलल लोक आब अपना अपनी तऽ होइ छै भेटल रोजगार नै भेटै नै उधार ओ फहराएत सगर झंडा ताकत तऽ छै बचल पर की करत बनल छै सब अपने बिहार ओ सोचै छी भऽ जाइ एखन एहन सन प्रलय नै बचतै अमित इ भूखल देहक पथार ओ मफऊलातु-फाइलुन दू बेर 63 खिड़कीसँ सीधे देखै छलौँ हम चान घन तिमिर मोनक छाँटै छलौँ हम चान हेतै अपन फेरो भेँट ओतै जा कऽ तेँ जागि आशा लगबै छलौँ हम चान दिन भरि समाजक पहरा कतेको नयन छवि संग तोहर भटकै छलौँ हम चान लागै तरेगण लोचन पलक झपकैत बनि मेघ घोघट लागै छलौँ हम चान शुभ राति फेरो भेटब अमिय नेहक लऽ सब दिन अमित नव आबै छलौँ हम चान मुस्तफइलुन-मफऊलातु-मफऊलातु {दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व} बहरे-सलीम 64 टिटही टेकलक अकासके असगर जीत लेत तासके आँङुर एक के तऽ काज छै छै बलगर दमगर बासके एहन लोक आश तोड़ि दै बाबा बनल मोह पाशके छै मानव जँ राम काज की पाथर पूजि दिन उपासके केवल कर्म मात्र अपन छै आ छै अमित उपज चासके दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ- 65 पूसक गाछी जकाँ लागैए गाम हमर बंजर परती जकाँ लागैए गाम हमर बर्फक ढेला सँ छाँपल नै जीयल तऽ मरल भूतक कोठी जकाँ लागैए गाम हमर छै महिला बूढ़ नेना थाकल गाम मात्र बासी रोटी जकाँ लागैए गाम हमर नवतुरिया दौड़ लगबै शहरक पानि लेल हारल पारी जकाँ लागैए गाम हमर कहिया सरकार जागत हेतै अमित भोर कारी मोती जकाँ लागैए गाम हमर दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व 66 करेजक नस मांसके पाथर बना लिअ गरीबक दुख दर्दके मोहर बना लिअ मरै छै बेटी जँ कोखे दिन दहारे पवनपुत्रक धामके कोबर बना लिअ सिनेहक बीया असंभव भेल रोपब मनोजक नद मोनके विषधर बना लिअ कलह करबै भूख नेता देखियौ ने जवानक सब बातके सोँगर बना लिअ अपन हेतै देश संगे प्रात हेतै कटारक कर अमित के भोथर बना लिअ मफाईलुन-फइलातुन-फइलातुन बहरे -सरीम 67 रावणक मुत्तीसँ लुत्ती नै मिझा सकैए कंठ जेना ओस चाटिकऽ नै भिजा सकैए आंत जुन्ना जखन बनि गेलै भुखे पियासे छोट सरकारी मदति भुख नै भगा सकैए गेल गामक गाम जड़ि सुड्डाह भेल कोठी ठोर मुस्की दैत हाथो नै उठा सकैए पाइके छाहरि बिछौना पर जँ सुतल नेता दर्द लोकक ओकरा कोना जगा सकैए आब महगाई लऽ रहलै आइ जीब कोना अमित कागज नै गजल कोना लिखा सकैए 2122-2122-212-122 ( 68 किछु बात एहन जे कना गेल हमरा बिसरल दरदिया जे जगा गेल हमरा छल रौदमे अभरैत ओ चित्र केकर शाइद चिन्हारे पर जड़ा गेल हमरा छल मोनमे नै कहब ककरो दरद हम चर्चा हुनक सुनिते बजा गेल हमरा नै छी नशेरी छै नशा विरहके यौ बहलै इयादक झर पिया गेल हमरा देखल जखन फूटैत बड्ड बमक गोला रोआँ जड़ल देहक घमा गेल हमरा चाहै छलौँ कोनो रचब गजल नेहक पर अमित नोरक धुन लिखा गेल हमरा मुस्तफइलुन-मुस्तफइलुन-फाइलातुन 69 हमर नेहक सजा जिनगी जड़ा देलक गीत दर्दक बना जिनगी कना देलक छै अनचिन्हार अपने नाम एखन यौ खेल झूठक जमा जिनगी हरा देलक नोर बहतै तऽ हमरे पर हँसत दुनियाँ कसम झूठे गना जिनगी लिखा देलक जहर के प्रेम मे खूनो जहर भेलै दाँत विरहक गड़ा जिनगी विषा देलक गाम उजड़ल शहर कानल हँसल जतऽ ओ भवर एहन फँसा जिनगी बझा देलक नै मवाली अहाँ हमरा कहू देखिकऽ नेह पागल बना जिनगी डरा देलक जीब कोना बचल जिनगी कहू एखन अमित मौतसँ सटा जिनगी मुआ देलक फाइलातुन-मफाईलुन-मफाईलुन बहरे-मुशाकिल 70 आँचरक छाँव बिसरल नै आब जेतै अंङुरी छुटल टहलल नै आब जेतै देखलौँ माँ जखन दर्द वाण सहलेँ दर्द दोसरक देखल नै आब जेतै गीत तूँ तूँ गजल आनंदक लहर छेँ कात सुरसरिक छोड़ल नै आब जेतै धैर्यके बानगी माँ तूँ एहि जगमे नेह कैलाश बहकल नै आब जेतै डाँट तोहर तऽ देखेलक बाट हमरा तोर छवि छोड़ि भटकल नै आब जेतै हमर अपराध हेबे करतै बहुत माँ रूसलौँ माँ तऽ चहकल नै आब जेतै फाइलातुन-मफाईलुन-फाइलातुन बहरे-असम- 71 भूख जाड़ल लोक कोना हँसि सकैए नोर कानल लोक कोना हँसि सकैए देखने जे होइ अर्थी अपन लोकक दर्द जागल लोक कोना हँसि सकैए लोभ जागल मोह मोहल लोक हँसतै श्वास काटल लोक कोना हँसि सकैए जहर बनबै जे कहाँ ओ नोर बहबै जहर चाटल लोक कोना हँसि सकैए दर्द दै जे छी कने अपने लऽ देखू चोट लागल लोक कोना हँसि सकैए राखि हमरो नोर अपना आँखि सोचू अमित मारल लोक कोना हँसि सकैए फाइलातुन I-U-I-I तीन बेर सब पाँतिमे बहरे-रमल 72 हमर मुस्कीसँ हुनका आगि लागल यौ हुनक कनखीसँ तरका आगि लागल यौ चुनावक गीत भाषण भरल झूठक छै अपन मुँह कहब किनका आगि लागल यौ उखाड़ब लाश गड़लाहा हमर मरजी अहाँ बाजब तऽ बड़का आगि लागल यौ नगरमे बनल मुद्दा भ्रूण हत्या छै इ वर्फक सर्द मटका आगि लागल यौ कहत भोरे दऽ पेट्रोलक समाधी ओ जड़ल छाउर सँ बड़का आगि लागल यौ दुखाइत नस अपन हाथे तऽ नीके छै पड़ल दोसर सँ पटका आगि लागल यौ मिझा देलौँ पहिल सब आगि घी ढारिकऽ "अमित" छै फेर नवका आगि लागल यौ मफाईलुन U-I-I-I तीन बेर सब पाँति मे बहरे -हजज 73 बेटा अपन मुर्खके सोटासँ हम अकछ छी बाबाक फूटलहबा लोटासँ हम अकछ छी पेट्रोल कखनो तऽ कखनो गैस सब्जी महग काला बजारी करै कोटासँ हम अकछ छी बेटी कपारपर छै चिन्ता इ सदिखन बनल कनियाक नेहक भरल मोटासँ हम अकछ छी छै आगि धरती बनल नै पानि आकाश मे पीबैत कारी धुआँ मोटासँ हम अकछ छी दै यै भगा काज छोड़ा जीब कोना बचब छै खसल टाकाक लंगोटासँ हम अकछ छी रचना करै छी तऽ खर्चा होइ यै नै मुदा अतिथी अमित एतऽ दस गोटासँ हम अकछ छी मुस्तफइलुन-फाइलुन दू बेर बहरे-बसीत 74 बिसरलौँ जग पिबै छी बोतल शराबक मनक मारल चुमै छी बोतल शराबक हमर छै जीत तड़िखानामे पियाबू अपन नामे लिखै छी बोतल शराबक हमर छै जान ई अंगुरक पानि नै छै बनै शोणित किनै छी बोतल शराबक शहर के कोन मैखान जतऽ पिलौँ नै जहर दर्दक कहै छी बोतल शराबक गिलाससँ आब पल भरि दोस्ती कऽ देखू घर स्वर्गक रहै छी बोतल शराबक जनम भेलै इयादक तहियेसँ झूमैँ अमित संगे रखै छी बोतल शराबक मफाईलुन-मफाईलुन-फाइलातुन बहरे-करीब 75 चल लिखल जाए कोनो शराबी गजल नब रचल जाए दर्दक कटारी गजल भरि ले कलममे स्याही शराबक आइ अंगुरक जऽलमे घोरब गुलाबी गजल बहुते चलै छै ओकर सबालक नजर चल आइ भेजब पहिलुक जबाबी गजल दारूसँ जड़बै छी हम जुआनी अपन सबके पिया दी एखन हजारी गजल छै नाम ओकर दोसर नशा के नगर तेँ जाइ छी मैखाना सलामी गजल लागै गिलासो एखन नशामे गऽजब छै अमित कोनो प्रेमक कहानी गजल मुस्तफइलुन-मफऊलातु-मफऊलातु बहरे-सलीम 76 नै जीयत शराबक नशा लागल लोक कोना हँसत कोनो दुखक खेहारल लोक काठी फेकबै आगि उठतै बोतलसँ नै रहतै जवानी अपन जाड़ल लोक के कानत कतौ आन लेए कऽह एतऽ नै छै समय ककरो अपन भागल लोक दै छै साँस कखनो अपन धोखा आब एहन नेहमे छै किए पागल लोक जड़तै एक दोसर सँ जिनगी मे जखन कटतै घेँट अपने सबर हारल लोक क्षण भरि के नवल दोस्त नै चाही आब हमरा अमित चाही अपन झाड़ल लोक मफऊलातु-मुस्तफइलुन-मफऊलातु बहरे-हमीद 77 जवानीके शराबसँ घोरि देखू ने जँ चाही आगि छाती बोरि देखू ने कतौ छै बाँझ जिनगी आ कतौ टूअर अपन गामसँ तऽ नाता जोड़ि देखू ने बचल छै किस्त जिनगी रोग मे कोना गरीबक टोल गाड़ी मोड़ि देखू ने कनक कोठी जड़ल रावणक जानै छी अपन मोनक अहं के फोड़ि देखू ने कने हँसियौ मनुख जीवन जँ अछि भेटल अमीरी के नशा सब छोड़ि देखू ने मफाईलुन U-I-I-I तीन बेर- बहरे- हजज 78 दुख जिनगीक मेटाबऽ एलै नव अंशु बिसरल बाट देखाबऽ एलै नव अंशु टूटल खसल घर जड़ल दाही रौदीसँ छप्पर आश जोड़ाबऽ एलै नव अंशु हेराएल मुस्की नयन नोराएल पाथर ठोर मुस्काबऽ एलै नव अंशु सूतल नेह मातृत्व मौलाइल सगर प्रेमक ओस चमकाबऽ एलै नव अंशु टूटल तार नेहक कतौ देखत आब प्यारक डोर नमराबऽ एलै नव अंशु हेतै अपन मिथिला अपन राजक भोर मन मिथिलाक धड़काबऽ एलै नव अंशु मफऊलातु-मुस्तफइलुन-मफऊलातु बहरे- हमीद 79 छै चिन्हल पथ तैयो भटकि गेलौँ एतऽ बीच्चे सड़क पर फँसि लटकि गेलौँ एतऽ ढहि गेल सबटा आशके नवका महल कपड़ा सड़ल सदृश फसकि गेलौँ एतऽ हम कल्पना के लोकमे केलौँ भ्रमण सपने जकाँ एखन ठमकि गेलौँ एतऽ प्रेमक तऽ परिभाषा कहाँ कखनो पढ़ल निष्ठुर भऽ गेलौँ तेँ सरकि गेलौँ एतऽ अपने सँ बतियाइत रहै छी सदिखन तऽ अपनेक छी मारल सनकि गेलौँ एतऽ जिनगी कहाँ ककरो अपन कखनो भेल पातर कमानी झट लचकि गेलौँ एतऽ पतझर जकाँ झड़ि गेल छै सबटा अंग जतऽ अमित भट्ठी मे झरकि गेलौँ एतऽ बहरे सरीअ 80 हमर जिनगी जेल लागै बंद घऽरमे सटल जीवन गेल पग पग गरम छऽड़मे बालु सदिखन उड़ल जिनगी के सतह पर भटकि गेलौँ जखन समाजक पैघ चऽरमे चाहलौँ जतऽ रोपि नामक लेब उपजा ओतऽ आशा बझल दमनक तेज हऽरमे नै अपन छै एतऽ आ नै मानलक अछि एसगर छी पड़ल झूठक चार तऽरमे कटत कोना रैन जिनगी बचत कोना पैघ लागल छै ग्रह बड़ एक कऽरमे नेह नै भेटल मुदा दर्दक उपज बड अमित जिनगी चढ़ल फाँसी यैह डऽरमे बहरे रमल 81 बसलौँ अहाँ जखन मनमे हमरा चमकि गेल जिनगी अनमोल नेहक उड़ल खुशबूमे महकि गेल जिनगी माधुर्य माँखैत खुजलै जखने कमल ठोर रानी लवणी सँ छलकैत ताड़ी बूझू छलकि गेल जिनगी गाबी अहाँ गीत मोने मोने जँ तैयौ गजब धुन मुस्की दऽ देलौँ चहटगर अमृत झमकि गेल जिनगी नीरीह जानबर बनि नैनक मारि खेलौँ सदिखने फूले छलै बाण नैनक तेँए धड़कि गेल जिनगी सगरो अहाँ के लिखल छवि डूबल कलम नेहमे यै गाबै अमित गजल लिखलक देखू दमकि गेल जिनगी बहरे मुजास 82 युग विज्ञानक शोध एखन कऽ देखै छी अपन मन परबोध एखन कऽ देखै छी रहत जगमे अमर मानव मरत दानव नव मशीनक शोध एखन कs देखै छी भाग बनतै मात्र दस खा कऽ रसगुल्ला शक्ति के हम बोध एखन कऽ देखै छी सत्त सी ओ टू बनल झूठ आँक्सीजन कार्बनक अबरोध एखन कऽ देखै छी डाहि हम संस्कार संस्कृति मुस्कै छी मान लेल क्रोध एखन कऽ देखै छी देश चलबै छी तऽ सब राज के देखू जोड़ि कर अनुरोध एखन कऽ देखै छी बहरे-कलीब 83 गजल छी गीत छी छी अहाँ प्रीत छी रंग सभ भरल तन मीठ छी तीत छि आड़ि नै बनल छै सब दिशक जीत छी शान छी जान छी छी अहाँ मीत छि फाइलुन 212 - 212 बहरे मुतदारिक 84 कते दी टी आर पी नेहक प्रोग्रामक कहू ने छलैए छल* मात्र केलौँ किए ई नाटक कहू ने छपल छल फोटो अहाँ के करेजक नव कैमरा मे गड़ल सबटा राज कागतक पसरल राखक कहू ने जखन हँसतै हमर जिनगीक साँसो नोरपर हमरे तखन पूछब हाल सबटा अहाँ के बाटक कहू ने बजारक छै भाव गरमे मुदा नेहक बहुत कम छै किए नेहक कूंड मे ढारलौँ घी विरहक कहू ने सगर हाथो के मिलेनाइ बिन बातक ठीक नै छै "अमित" के की करत ठेकान कोनो मनुखक कहू ने मफाईलुन-फाइलातुन 1222 - 2122 दू बेर बहरे मजरिअ 85 आशक डोर टूटल हार भेले बुझू डरलौँ पूसमे बड जाड़ भेले बुझू चलबै बाटपर रोड़ा तऽ भेटत बहुत ठेससँ डरब बेरा पार भेले बुझू गाछो घर बनै टापू जँ निर्जन रहल खेबै मांस नै फलहार भेले बुझू कतिआएल लोकक पूछ नै आब छै जोहब बाट जतऽ उद्धार भेले बुझू बेसी नीक नै छै सत्यवादी बनल बदलब नै तऽ कारागार भेले बुझू मफऊलातु-मफऊलातु-मुस्तफइलुन 2221 2221-2212 बहरे कबीर 86 दर्दक छोर नै भेटै कतौ हमरा तऽ आँखिक नोर नै रूकै कतौ हमरा तऽ जेठक रौद झड़काबै मनक विश्वास विरहक जेठ नै छोड़ै कतौ हमरा तऽ कैक्टस गड़ल छल हमरा समय समयपर फूलो आब जख्मे दै कतौ हमरा तऽ टूटैए पहाड़ो खसल पाथर बहुत शोणित माथ के फोड़ै कतौ हमरा तऽ हँसलै लोक देखाबा करै नोरक तऽ "अमितक" घेट के घोटै कतौ हमरा तऽ मफऊलातु 2221तीन बेर 87 गजल नेह सागरमे किनारा जँ नै हेतै संग भरि जीवनक चिन्ता जँ नै हेतै सात जनमक बनल बंधन तऽ नै टूटत डोर विश्वासक इ आधा जँ नै हेतै हाल हमरा सनक ककरो तऽ नै हेतै फेर आँखिक ओ इशारा जँ नै हेतै भीड़ लोकक नै बढ़त मरत नै बेटी श्राद्ध के अधिकार बेटा जँ नै हेतै चाह ककरो तम अन्हारक तऽ नै रहितै राति मे लाखौँ सितारा जँ नै हेतै हमर नोरक गजक नै ठोर पर सजतै पत्र नेहक "अमित" सादा जँ नै हेतै फाइलातुन-फाइलातुन-मफाईलुन 2122-2122-1222 बहरे-- कलीब 88 कारी मेघ नव उमेदक भोर केलक कोमा पड़ल मनुख जेना सोर केलक उधियाइत पवन सटै देहसँ तऽ लागै आनत पत्र पाहुनक तेँ शोर केलक जनता लाख झूठ अश्वासनसँ बेदम देशक लेल मेहनत जी तोड़ केलक मोनक मैल नै करै छै साफ गंगा कारी चाम पोति पौडर गोर केलक दोस्ती मात्र लेन देनक लेल एखन पार्टी आ चुमाउनक सब जोड़ केलक प्रेमक सजल नव उमेदक खंडहर जतऽ ओतै "अमित" गजल नोरे नोर केलक मफऊलातु-फाइलातुन-फाइलातुन 2221-2122-2122 89 किछु बात एहन भेल छै घर घर तऽ रावण भेल छै बम फोड़ि छाउर देश छै जड़ि देह जाड़न भेल छै प्रिय नै विरह जनमै बहुत सजि दर्द गायन भेल छै जिनगी भऽ गेल महग कते झड़कैत सावन भेल छै दस बात सूनब की "अमित" सब ठाम गंजन भेल छै मुतफाइलुन 11212 दू बेर बहरे -कामिल 90 आखर जखन रूपक लिखल उपमा सजल फूलक लिखल आदर्श छी रूपक बनल काजर नयन कातक लिखल सरगम अहाँक स्वर सजल मुस्की नगर तानक लिखल कहलौँ करेजक सब कहल किछु बात हम राजक लिखल चमकैत नभ मे छी चान तारा गजल हाटक लिखल मुस्तफइलुन-मफऊलातु 2212-2221 बहरे- मुन्सरह हजल 1 हरदी-चुन-करीखा लगाउ हुनक मुँहपर चुगला सनक फोटो बनाउ हुनक मुँहपर सड़ल फाटल चट्टी वाला बोरा सँ अंगा बनाबू एकाध लोइया कादो लगाउ हुनक मुँहपर बेंगक माला चाहे जुत्ता कए हार सँ हो स्वागत , करिकबा कुकुर हुलकाउ हुनक मुँहपर होली छै तऽ शराब हेबाक चाही ने हिनका लेल , पिल्लू वाला महुआ बरसाउ हुनक मुँहपर कत्तौ सँ एकटा बत्तूपकैर कए लेने आबू यौ जनतासँ बारह बजबाउ हुनक मुँहपर वर्ण-18 2 ‎ कनियाँ कए मारिसँ सब त्रस्त भेल छै हकमि चलै जेना भेकम भेल रेल छै चारि बजे भोरे पानि उझलि उठाबथि , भऽ जाइ छी स्टार्ट बुझू पानि नहि तेल छै , चाहक जोगार एगो दोसर हाथ झाड़ू किचेन कए काज सँ कहू कोन मेल छै स्कुलक दौड़ा सँग सब्जी बैँक बजार जेबै जीनगी लागै यै ओलंपिक कए खेल छै होइ साफ झाड़ू सँ बेलनाक मारि खाइ गर्दन पर छै कैँची घर बुझू जेल छै नैहर कए धमकी आतंकी जेकाँ लागै बम बलास्ट सन बाजब ,जान गेल छै पिबै छी जहर मुदा बचा लै यै ब्रत कऽ लोकल ट्रेन जेकाँ जीनगी ठेलम-ठेल छै लिखै छी प्रेमक गजल ओकरे डर सँ कंठ पर चढ़ि लिखेलक वैह देल छै मरऽ चाहै छी भाई मदद करू बताबू अमित कतऽ लागल मृत्यु कए सेल छै वर्ण-15 3 यदि बैसब कोठलीमे लागत बेशी रंग यै तोड़ि कऽ केबार मोबिल लगा करब तंग यै बनरी सन मुंह बना देब अहाँक भौजी यै कारिका कादो लगा देब मोन हेएत चंग यै बहिन कए कते देर नुका क रखबै यै अहाँ बड़का शिकारी जेकाँ हमहूँ धेने छी ढंग यै दौड़ा -दौड़ा क खत्ता में पटैक क राँगब हम प्रेम सँ खा लिअ एकटा मिठका पड़ा भंग यै लगबा लिअ दुनू गाल पर अबीर आ रंग डूबि जाऊ भौजी अहाँ मस्ती में अमित संग यै वर्ण-17 4 किनकोसँ उधार लेल गेल हँसी उलटा काज क बड़का देल हँसी करिखा - चुना लगा अपने मुंह में अपने सँ मुर्ख बनल भेल हँसी गदहाक भैया बनेलनि आइ ओ मुर्खता सँ मरखाह बकलेल हँसी कोयला लगा मंदिर धरि दौड़ला करिया लग सभहक फेल हँसी बजेलक जजमान पूजा के लोभ दौड़ला खसला भेल अलेल हँसी हाथ उठाऊ जे पैघ विद्वान छी से अमित .लगायत आइ सेल हँसी वर्ण-13 5 आगू नाथ नै पिछु पगहा देखियौ कोना कूदै गदहा होर लागल फल-फूल मे के सब सँ बड़का बतहा मुर्ख दिवस मुर्खक नामेँ केरा बनि गेलै यै गदहा बत्तीस मार्च के सम्मेलन मुर्खीस्तान मे हेतै सबहा पाइ कमाइ छै चारि लाख मुदा सब्जी लेलनि दबहा चुन्नू सुतल अपन घर मुदा उठल जा कऽ भूतहा मोनूआँ चढ़ल साइकिल उठेने माँथ पर बोझहा बीस टका मे दर्जन केरा मुन्नू लै छै बीस मे अदहा माँथ उठेने छलै छै गोनू खसलै खद्दा , भेलै पटहा चुन्नू मुन्नू गोनू वा अमित कहू के छथि पैघ बतहा वर्ण-10 6 भेल किछु बात एहन जे कना गेल हमरा हरासंखनी कनियाँ माथ बथा गेल हमरा ओना त छै अमावश्या सन कारी केश ओकर मुदा ओहि मे फड़ल चोर पटा गेल हमरा ओना नाम छै शांती मुदा घर छै माछक हाट छऽ टा बरदक पिलवान बना गेल हमरा फोटूये देख परान उड़ि गेल छल हमर से माँथ पर बंदूक राखि उड़ा गेल हमरा सब दिन कहै यै जे प्यार नै करै छेँ हमरा जँ भागौँ तऽ सौँसे देह दाँत गड़ा गेल हमरा माइ के बजाबे भाइ के बजाबे सब दिन ओ चाउर दालि आँटाक भाव बता गेल हमरा भने फूलेसरा कुमारे रहि गेल भाइ सब अमित ओ तऽ जीते जी श्राद्ध करा गेल हमरा सरल वार्णिक बहर वर्ण-17 रूबाइ 1 पोखरि नै दौड़ैत नदी के धार छी नै छी मात्र कलम सत्यक हथियार छी छी ज्ञानक अथाह सागर मोती भरल अपटी खेत मे उपजल बिड़ार छी 2 डेगे डेग पर विरहक गड़ल छल कंकर परती खेत करेजक भरल छल कंकर सबटा खाद पानि भरोसक व्यर्थ भेल लुबधल काँट सन दर्द फड़ल छल कंकर 3 छै जागि रहल देश आ जागि रहल गाम खेती अपन करै अपन लोक बसल गाम जागल युवा नव शक्तिके संचार संग बनतै मिथिला आब मैथिली पढ़ल गाम 4 सहि लेबै दर्द जँ घाव कोनो फूटत तऽ एहिसँ बेसी दर्द जखन मीत रूठत तऽ कोनो बोतल टूटत तऽ शोर नै हेतै हेतै शेर तखने जखन नेह टूटत तऽ 5 कोनो मीत जखन जिनगी जड़ा दै यै कोनो मलहमसँ नै घाव सुखा दै यै सबटा बाग उजड़ि जाइ छै पलमे खूनक बूँद जँ कागज पर बहा दै यै 6 खगता छै एकटा बाट बटोही के विश्वासक मशाल जड़ेने जोड़ी के नै प्रेमसँ तऽ लड़ि कऽ अधिकार भेटत ने नै देतै तऽ छीनब मिथिला रानी के 7 विधनाक डाँग चलै तऽ उठल की खसल की विपतिक बोझ खसै तऽ मरल की जीयल की जानपर जखन पड़ै तऽ दुनियाँक होश नै भूखसँ तड़पल लेल तरल की उसनल की 8 बाजल लाश आब पाँच काठी चाही बूढ़ी काकी कहैए लाठी चाही एहन अंतीमो समयमे किछु चाही ककरो आगि ककरो खोरनाठी चाही 9 भरि राति तरेगणसँ बतियाइत रहलौँ चन्नासँ नैन मिला लजाइत रहलौँ रंगीन छलै वर्फ रातिक इन्द्रधनुष नेहक लऽ गर्मी हम ठंढाइत रहलौँ 10 जे सोचसँ बाहर एहन पहेली छी भीतर झड़ल बाहर राँगल हवेली छी हमरासँ जुनि आश राखू जीतक आब कछुआक तऽ नै खरगोशक सहेली छी 11 जिनगीक छोट बाटपर संगी चाही जीबाक लेल कने छोट हँसी चाही रान्हल अपच सुपच कर्म सदिखन भेटत उमरक पड़ल मारि लेल लाडी चाही 12 चाही नशा एगो मीठ मुस्की संग चाही प्रमाण तऽ इयादक हिचकी संग भोरक नव भूरूकबा बनि जगाबू तऽ चाही नयन वाण एगो चमकी संग 13 भेटल अहाँक संग इ गोटमिलानी छै भासैत नाहक इ प्रेम कहानी छै ताकत बढ़ि गेल चान धरि जाएबाक छै जोश जीतक वा अथक जुआनी छै 14 कखनो पानि कखनो इजोत लेल अनशन छोटसँ छोट बातसँ सगरो भेल अनशन छै हथियार बनल जीतक गारंटी संग राजक नीति के छै एगो खेल अनशन 15 सपना सपने रहि गेल आजादी के लागल हथकड़ी सदिखन तऽ गुलामी के पहिने छल विदेशक आब भेल देशक जिम्मेदार दुनू देशक नाकामी के 16 अहाँ सन मीत सँ एतबे प्रीत चाही जै नै बिसरि सकी एहन अतीत चाही हारब हम मजा हमरा आएत मुदा सदिखन अहाँक सब मोड़ पर जीत चाही चंदन कुमार झा (१९८५- ), पिता-श्री अरूण झा, माता-मीना देवी, ग्राम-सड़रा, मदनेश्वरस्थान, पोस्ट-मदना, थाना-बाबूबरही, जिला-मधुबनी। जन्म-स्थान-सिसवार (मामा गाममे) नाना- स्व. सुशील झा (राजाजी), आरंभिक शिक्षा-मामा गाममे (१०वाँ धरि), आगाँक शिक्षा- अन्तर-स्नातक (वाणिज्य) एवं स्नातक (वाणिज्य) चंद्रधारी मिथिला महाविद्यालय दरिभंगा सँ। वित्तीय-प्रबंधन मे डिप्लोमा (वेलिंगकर इन्सटीच्युट आफ मैनेजमेन्ट, मुम्बई) सँ। व्यवसायिक जीवन- एकटा बहुराष्ट्रीय कंपनीमे लेखा-विभागमे कार्यरत। परिवार-निम्न मध्यम वर्गीय कृषक परिवार। मोनक बात [अपन गप, गजल (१-६६), हजल (१-२), बाल गजल (१-१५), रुबाइ (१-३३), कता (१)] अपन गप १ हम साहित्यक विद्यार्थी नै छलौं। तैँ साहित्यक बहुत रास बात, व्याकरणसँ अपरिचित छी। तखन सभदिन साहित्यसँ लगाव रहल। साहित्यिक पोथी-पत्रिका पढ़ब सदिखन रुचिगर लगैत रहल अछि। कोनो सामान्य जनमानस जेकाँ हमरो मोनमे अपन आसपासक समाज, वातावरण, इत्यादिक प्रति अनेकानेक भाव उत्पन्न होइत रहैत अछि। बहुत रास भाव बितैत समयक संग-संग उड़िया जाइत अछि। तखन ओइमे सँ किछु अक्षरक रूपमे कागजपर अवतरित भऽ कखनो कविता तँ कखनो कथा, कखनो गजल तँ कखनो रुबाइ आ साहित्यक आन-आन विधाक रूप धारण करैत अछि। हम बेशी किछु नै कहए चाहब कारण जतेक कहब ततेक गलतीक संभावना बढ़ि जाएत। बस एतबे कहब जे हमर "मोनक बात" आम जनक मोनक बातसँ मेल खाएत आ सामाजिक सरोकारसँ जुड़ल हमर चिन्तन समाजकेँ आगू लऽ जएबामे सहायक सिद्ध हएत से आशा रखैत छी। जिनकर अनुकंपासँ कहियो उॠण नै हएब- श्री विजयकांत मिश्र (अध्यापक)-कन्हई, श्री शंभूनारायण झा-सुसारी, श्री ताराकांत झा (संपादक, मिथिला समाद), डा० धीरेन्द्र नाथ मिश्र (मैथिली विभागाध्यक्ष, सी.एम.कालेज) क संग-संग संपूर्ण विदेह परिवारसँ भेटल स्नेहसँ अभिभूत छी। श्री गजेन्द्र ठाकुर आ आशीष अनचिन्हारक लेल कोनो शब्द नै भेटि रहल अछि जाहिसँ हुनकर धन्यवाद कही। अंतमे हम अपन समस्त परिजन-पुरजन, जिनकर बिना हमर अस्तित्वक कल्पनो नै कएल जा सकैत अछि, क प्रति अपन कृतज्ञता व्यक्त करैत सृष्टिकर्तासँ एतबे प्रार्थना करब जे सभक स्नेहक संग-संग हुनकर कृपा एहिना भेटैत रहए। २ मैथिली गजलः- हमरा दृष्टिमे.. गजलक प्रादुर्भाव अरबी भाषामे भेलै, तदुपरांत एकरा उर्दू अपनौलक आ उर्दूक शाइर सभ गजलकेँ विश्व साहित्य-जगतमे बेस चिन्हार बनौलक। प्रारंभमे गजल माने प्रेमालापे बूझल जाइ छलै मुदा बितैत समयक संग शाइर सभ एकरा सामाजिक सरोकारसँ जोड़ैत गेलाह आ आब प्रायः सभ विषय पर गजल कहल जाइत अछि। भारतमे गजलकेँ जे ख्याति भेटलै तइमे उर्दू गजलक योगदान अन्यतम छै। आब तऽ उर्दू-हिन्दीक अलावे आन-आन भारतीय भाषामे सेहो गजल बेस लोकप्रिय बनल जा रहल अछि। मेहदी हसन, जगजीत सिंह, गुलाम अली, पंकज उदास, हरिहरण आदि गायक अपन गजल गायकी लेल जग-प्रसिद्धि पौलनि। मैथिलीमे गजलक जन्मदाता पं. जीवन झा केँ मानल जाइत अछि। सन १९०५ ईस्वीमे ओ सर्वप्रथम मैथिली गजल लिखलन्हि। ऐ साल मैथिली साहित्य जगतमे एकटा आओर ऐतिहासिक काज भेल छल जे जयपुर सँ मैथिलीक प्रथम पत्रिका "मैथिल हित साधन" बहराएब प्रारंभ भेल छल। तैँ मैथिली पत्रकारिताक प्रारंभ वर्ष सेहो ऐ साल केँ मानल जाइत अछि। तखन फेर हम सभ मैथिली गजल दिशि घुरि आबी। पं.जीवन झाक बाद मैथिली मैथिली साहित्यमे अनेक गजलकार भेलाह। श्री गजेन्द्र ठाकुर मैथिली गजलक ऐ युगकेँ "जीवन-युग" कहैत छथि (देखल जाए-"अनचिन्हार आखर" मे हुनक आलेख)। करीब १०७ बरखक इतिहासमे मैथिली गजल मैथिली साहित्य जगतमे अपन उपस्थिति बेर-बेर दर्ज करबैत रहल अछि। मुदा दुर्भाग्यवश ई कोनो ने कोनो कारणवश कतिआएले रहल अछि। मैथिली गजलकारक मध्य गजलक व्याकरणक मादेँ अनिश्चितता सेहो एकरा एकात हेबाक प्रमुख कारण रहलैक अछि। मैथिली साहित्य पर संस्कृतक प्रभाव ककरो सँ छपित नै छै। अधिकांश मैथिलीक साहित्यकार लोकनि संस्कृतक पण्डित रहलाह अछि। एकदिश जहाँ ऐ सँ साहित्यिक समृद्धि भेलै ओत्तहि दोसर दिशि एकटा बड़का नोकसान सेहो भेलै जे मैथिल सर्वहारा वर्ग मैथिली साहित्य सँ कटैत चलि गेल। प्रायः सभ भारतीय भाषा पर संस्कृतक प्रभाव कोनो असामान्य बात नै छैक से मैथिली भाषा-साहित्य लेल सेहो ई कहियो उकरु नै बनल मुदा मैथिली व्याकरण पर अंग्रेजीक प्रभाव एकर सर्वमान्यताक बाटमे बाधक भऽ सकै छै से हमरा शंका अछि। खएर ई सभ अत्यंत संवेदनशील विषय छै, से ऐपर सभ विद्वान लोकनिकेँ गंभीरतापूर्वक सोचबाक चाही। मैथिली गजलक विकास-यात्राक चर्चा-क्रमकेँ आगाँ बढ़बैत आब किछु एकर व्याकरणक विषयमे चर्चा करी। बीसम शताब्दीमे मैथिलीमे अनेक गजलकार भेलाह आ हुनकर गजल सभ विभिन्न पत्र-पत्रिका आ पोथीक रूपमे प्रकाशित-प्रसारित होइत रहल। मुदा ऐमे बेशी गजल सभ गजल-व्याकरणक मानकक अनुकरण नै करैत अछि आ कखनो काल कोनो-कोनो रचना तँ एहनो बुझना जाइत अछि जे ओकरा जबरदस्ती गजलक श्रेणीमे राखल-गानल गेल छै। मैथिलीक ऐ पुरान पीढ़ीक गजलकार सभमे बहुतोकेँ एखनो गजलक अरबी बहर आधारित व्याकरणक परिकल्पना आ ओकर अनुपालन कऽ गजल लिखबाक तर्क पचि नै रहल छन्हि जे दुर्भाग्यपूर्ण अछि। जखन अंग्रेजीकेँ आधार मानि मैथिली व्याकरण लिखल जा सकैत अछि तखन अरबी-फारसीक गजल व्याकरणकेँ मैथिली भाषानुरूप बना मैथिली गजल द्वारा स्वीकार्य किए नै कएल जा सकैत अछि? ऐसँ मैथिली साहित्यकेँ विस्तार भेटतै, से हमर मानब अछि। मैथिलीमे छंदोबद्ध रचनाक परंपरा रहलैक अछि मुदा किछु साहित्यकार मात्र "बिंब" आ "भाव"केँ महत्वपूर्ण बुझैत छथि। ओ सभ छंद, अलंकार इत्यादिकेँ महत्वहीन कऽ बुझैत छथि मुदा एखनो सत्य यएह छैक जे मैथिली साहित्य जगतमे छन्दोबद्ध आ अलंकार युक्त रचनाकेँ श्रेष्ठ मानल जाइत छैक। बिंब आ भावक बिना कोनो रचनाक अस्तित्व संभव नै मुदा छंद, अलंकार आ व्याकरणक आन-आन मानक एकटा रचनाकेँ उत्कृष्ट बनबैत अछि ताहिमे कोनो दूमत नै हेबाक चाही। ओना हम एकटा गप्प फरिछा दी जे हमहूँ छंदमुक्त पद्य लिखैत छी मुदा प्रयास हरदम रहैत अछि जे छन्दोबद्धे लिखी। गजल स्वाभाविक रुप सँ कहल जाइ छै आ एहिमे गेयता सेहो हेबाक चाही तैँ बहरक (छन्दक) अनुपालन यदि एहिलेल अनिवार्य छै तँ ई नीक बात छै। मैथिली गजलक हेतु एकटा मानक व्याकरण तैयार करबाक लेल श्री गजेन्द्र ठाकुर आ श्री आशीष अनचिन्हार जी द्वारा कएल जा रहल प्रयास स्तुत्य अछि। ई दुनू गोटे क्रमशः "विदेह-मैथिलीक प्रथम ई पाक्षिक" आ "अनचिन्हार आखर" व्लॉग क माध्यम सँ मैथिली गजल व्याकरणकेँ जन-जन तक पहुँचा रहल छथि। खास कऽ आशीषजी जाहि समर्पणसँ मैथिली गजलक विकास लेल लागल छथि आ नव-नव गजलकार केँ प्रोत्साहित करैत छथिन्ह से एकटा ऐतिहासिक प्रयास अछि। हुनकर "अनचिन्हार आखर” (गजल आ रुबाइ संग्रह) आ http://anchinharakharkolkata.blogspot.in/ ब्लॉगपर अरबी-फारसी गजल-व्याकरणकेँ जाहि तरहेँ मैथिली भाषानुरूप सुबोध आ सुव्यवस्थित बना परसल गेल अछि ओ अनुकरणीय अछि। "अनचिन्हार आखर"क प्रकाशनक बाद मैथिल गजल-जगतमे एकटा नवयुग प्रारंभ भेल जकरा फेर श्री गजेन्द्र ठाकुर "अनचिन्हार युग" कहि संबोधित कएने छथि। मैथिली गजलक ई नवयुग अनेक नव गजलकारकेँ प्रोत्साहित कएलक। अनेक रचनाकारकेँ गजल आ सेहो व्याकरणक मापदण्ड पर सोंटल गजल, रुबाइ, कता इत्यादि लिखबाक लेल प्रेरित कएलक। ऐ युगक किछु गजलकारमे श्री ओमप्रकाश झा, श्री अमित मिश्र, श्रीमति शांतिलक्ष्मी चौधरी, श्री मिहिर झा, श्री जगदानंद झा "मनु", श्रीमति रुबी झा, श्री राजीव रंजन मिश्र, श्री पंकज चौधरी "नवलश्री' सन अनेको नाम अछि जे अपन प्रतिभाक बलपर गजलकारक रूपमे मैथिली साहित्य-जगतमे स्थापित भऽ चुकल छथि। हमहूँ पहिने अपन टुटल-फुटल भाषामे किछु कविता लिखैत रही मुदा विदेह परिवार आ अनचिन्हार-आखर परिवार हमरा गजलक माने बतौलक आ गजल लिखबाक लेल प्रेरित कएलक। ऐ संग्रहमे जे किछु गजल लिखने छी ओ सभ हिनके सभक सत्प्रयासक प्रतिफल अछि। आब हम अपने सभक सोझाँ, एखन धरि हम गजलक विषयमे जतबा ज्ञान "अनचिन्हार आखर" आ विदेह परिवारसँ ग्रहण कऽ सकलौं, ताहि आधार पर गजलमे प्रयुक्त होमएबला किछु प्रचलित शब्दावलीक संक्षिप्त परिचय राखए चाहबः- १. शेर वा शाइरी - दू पाँतिमे पूर्ण भावक अभिव्यक्ति थिक शेर वा शाइरी। २. मतलाक शेर वा मतला- कोनो गजलक पहिल शेरकेँ मतला कहल जाइत छै। एकर दुनू पाँतिमे काफिया आ रदीफक रहब आवश्यक। ३. रदीफ- मतला बला शेरक अंतिम शब्द समूह जे ओइ शेरक दुनू पाँतिमे जस के तस रहैए। ओना बिनु रदीफक शेर एवं गजल सेहो होइत छै। ४. काफिया - मतलाक शेरमे रदीफसँ पहिने जे तुकान्त वा स्वर अथवा मात्राक साम्य रहै छै तकरा काफिया कहल जाइ छै। बिना काफियाकेँ शेर वा गजल नै कहल जा सकैत अछि। मतलाक शेरक अलावे गजलक प्रत्येक शेरक दोसर पाँतिमे रदीफसँ पहिने काफिया होएब आवश्यक। काफिया संबंधी विस्तृत निअम "अनचिन्हार-आखर''मे http://anchinharakharkolkata.blogspot.in/ पर देखल जा सकैत अछि। ५. मकता - मकता गजलक अंतिम शेरकेँ कहल जाइ छै जाहिमे गजलकार अपन नाम वा उपनामक उल्लेख सेहो करैत छथि। ६. बहर - सरल भाषा मे कही तँ गजलमे प्रयुक्त छंदकेँ बहर कहल जाइ छै। बहरक बिना गजल कहल (लिखल) नै जा सकैत अछि। कतौ-कतौ आजाद गजलक परिकल्पना सेहो कएल गेल छै मुदा ताहूमे काफिया अनिवार्य। एहन गजलक प्रचलन सेहो बहुत कम्मे छै। मैथिलीमे बहरकेँ मुख्यतः तीन भागमे वर्गीकृत कएल गेल अछि- (क) (१) सरल वार्णिक बहर (२) वार्णिक बहर (ख) मात्रिक बहर (ग) अरबी बहर अरबी बहरकेँ तीन खण्डमे बाँटल गेल अछि- १. समान बहर २. अर्धसमान बहर आ ३. असमान बहर। १. समान बहर - समान बहरक अंतर्गत सात टा बहरकेँ राखल गेल अछि जे अग्रलिखित अछिः- (क.) बहरे-हजज (ख.) बहरे-रमल (ग.) बहरे-कामिल (घ) बहरे-मुतकारिब (ड.) बहरे-मुतदारिक (च.) बहरे-रजज (छ.) बहरे-वाफिर। २. अर्धसमान बहर - अर्धसमान बहरक अंतर्गत सेहो सात टा बहर केँ राखल गेल अछि जे एना अछि- (क.) बहरे-तवील (ख.) बहरे-मदीद (ग.) बहरे-बसीत (घ.) बहरे-मुजास (ड.) बहरे मुन्सरह (च.) बहरे-मजरिअ (छ.) बहरे-मुक्तजिब। ३. असमान बहर - असमान बहरक अंतर्गत कुल तेरह गोट बहर केँ राखल गेल अछि जकर विवरण एना अछि- (क.) बहरे-खफीफ (ख.) बहरे-जदीद (ग.) बहरे-सरीअ (घ.) बहरे-करीब (ड.) बहरे-मुशाकिल (च.) बहरे-कलीब (छ.) बहरे-असम (ज.) बहरे-कबीर (झ.) बहरे-सगीर (ञ.) बहरे-सरीम (ट.) बहरे-सलीम (ठ.) बहरे-हमीद (ड) बहरे-हमीम। आशीषजी कहैत छथि जे उपरोक्त बहरक अलावे आरो बहुत रास बहर छै मुदा ओ सभ अरबी-उर्दूमे बहुत बेशी प्रचलित नै छै, लेकिन हमर ई विश्वास अछि जे आशीषजी जल्दिए ओइ बहर सभकेँ सेहो मैथिली भाषानुरुप समायोजित कऽ हमरा सभकेँ परसताह। ऐठाम एकटा बात आओर कहए चाहब जे गजलक संबंधमे एतए हम जे सभ जानकारी देलौं ओहि संबंधमे विस्तृत जानकारीक लेल "अनचिन्हार आखर" पढ़ी एवं http://anchinharakharkolkata.blogspot.in/ पर जाइ। हमर किछु गजल आ रुबाइ एहनो भेटत जे गजलक व्याकरणक शत-प्रतिशत अनुपालन नै करैत हएत। ई सभ हमर प्रारंभिक रचना अछि तइँ ऐ रचनासभक प्रति कने भावुक छी। अंतमे जे किछु अपने सभकेँ सार्थक लागए तकर श्रेयक भागी "विदेह" आ' "अनचिन्हार आखर" परिवार छथि आ जतऽ कतौ कोनो त्रुटि बुझाएत से हमरा माथ पर आओत। अपने सबहक सुझाव आ उत्साही प्रतिक्रियाक आशाक संग -चंदन कुमार झा गजल 1 लोक कहैये वाह-वाह की खूब लिखै छी कोना कही जे, कलमे सँ गुदरी सीबै छी शब्द-जाल बुनै छी आ' ओकरे ओझराबी सोझराबै में ओकरे खाली दिन कटै छी रास-रंगके लोभ देखा क' मोन बुझाबी देह जरैये, खाली खूनक सेप घोटै छी कत्त गेल ओ' रीत पुरनका से नै जानी "चंदन" गबै छी गीत, मधुघट पीबै छी -वर्ण-१५ 2 हाथमे खुरपी माथे पथिया चललौं करै कुकूरे बधिया आञ्गि-नूआ' छै चेथरी-चेथरी नाकमे झूलय तैयो नथिया पूत-कपूतो कहबै छै बौआ बुच्ची केर त' होय सरधिया बहु-बेटीकेँ जारि रहल छै सभकेँ चढ़लै की दुर्मतिया नारी जननी होइछै "चंदन" सृष्टि केर ई प्रेम-मुरतिया -वर्ण-११ 3. साँझ बारल जखन बाती, पिया यौ अहाँ मोन पड़लौं राति आयल जखन कारी, पिया यौ अहाँ मोन पड़लौं फूलेलै जखन रात-रानी, पिया यौ अहाँ मोन पड़लौं कोइली जखन बाजै-बाड़ी, पिया यौ अहाँ मोन पड़लौं पहिरी जखन लाल साड़ी, पिया यौ अहाँ मोन पड़लौं साटी जखन माथ टिकुली, पिया यौ अहाँ मोन पड़लौं विरहक आगि जरै छाती, पिया यौ अहाँ मोन पडलौं दहेलै काजर केर धारी, पिया यौ अहाँ मोन पड़लौं सजौले सेज जखन ताकी, पिया यौ अहाँ मोन पड़लौं पढ़ै छी "चंदन" केर पाँती, पिया यौ अहाँ मोन पड़लौं -वर्ण-२० 4 प्रेम केलौं कि केलहुँ कुकर्मे सैह नहि जानि रहल छी अश्रुधार भसियाओल सभ-टा सपना छानि रहल छी सात जन्म धरि संग रहत से सप्पत खयलक झूट्ठे फुसि छलै पिरीतक बतिआ मन-अनुमानि रहल छी धन-बैभव, ऐश्वर्यक आगाँ के पुछतैक निरधनकेँ सत्य-नेहकेँ मोल ने किछुओ गप-सभ जानि रहल छी बीत गेलै, से बात गेलै, नहि याद करब नहि कानब' फेरो नहि भसियेबै "चंदन", से निश्चय ठानि रहल छी --वर्ण-२१ 5 हरहोर भेलै, बड़ शोर भेलै सजलै बरात, मटकोर भैलै मरबा सजलै, पिपही बजलै नटुआ केर नाच बेजोर भैलै जे भोग छलै, भरि पोख छलैक तीमन तरुआ, तिलकोर भेलै हम बैसल छी, अन्हरियामे जे चान छलैक, से चकोर भेलै "चंदन" हिय हर्ष उफनै छैक, जौँ कूदल आँखि सँ नोर भेलै -वर्ण-१२ 6 जगरनेमे राति बीतल, छलै नोरे राति शीतल चनो कनलै ओस झहरल, लगै छै तैँ भोर तीतल कछमछाइत मोन प्राणो, करे फेरी राति बीतल बुझय चाही, नियति से रण, रहल छी हाइर कि जीतल पुछय सभ, की भेल "चंदन" कही कोना अपन बीतल -बहरे-मजरिअ (1222+2122) 7 एखन राति कटै छी हम कनिते-कनिते, एखन दिन बीतै पहर गनिते-गनिते लगै अछि ई जीवन अकारथ, अचानक, बिसरलहु गामो शहर तकिते-तकिते पहुँचलहु ने जानी कोना एहि चौबटिया, बिसरलौ ठेकाना कखन चलिते-चलिते कहाँ कऽ सकलियइ एकचारी हम ठाढ़ो, बिकायल घरारी महल बन्हिते-बन्हिते कही कोन कथा आओर सुनायब की पाँति, शब्दहुँ हेराओल गजल पढ़िते - पढ़िते नियति केर फेरामे ओझरायल ''चंदन", छिड़ियेलै सपना पलक मुनिते-मुनिते -वर्ण-१६ 8 करेजक घर तँ खोलू कने सिनेहक ताग जोरू कने अहिँक हिय-बीच चाही बसय जगह बसबाक छोड़ू कने बनल बेरस हमर जीवने अहिमेँ नेहरस घोरू कने करय फरियाद "चंदन" सुनू सजल संबंध जोरू कने (ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ+ ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ+ ह्रस्व-दीर्घ) 9 आन्हर बनल सरकार छै, लाचार भेल जनता व्यापार पोषित नीति सँ कोना केर एतैक समता गाम भूखल-पेट देशक, खेत उसर भेल छैक बाढ़ि-रौदीक बीच उपजल छैक मात्र दरिद्रता कल-करखाना शहरमे चलइछ दिन-राति जे प्रगतिक अछि मापदण्ड आ' एकात भेल जनता गाम जा' बसि रहल शहर, जीविका केर जोहमे महाजन केर ब्याज-तर, फुला रहल निर्धनता ग्राम-वासिनी भारती, किएक गेलीह बसै नगर कनैत छथि आइ तँइ, ई केहन कैलनि मूर्खता "चंदन" करू आह्ववान, स्वराजक एकबेर फेर हँसतीह एही सँ देश , खुशहाल बनत जनता --वर्ण-१९ 10 नेहक सूत बान्हि रखलियै करेजक कोन ओकरा बिसरल नहि भेल जकरा, ओ' बिसरि गेल हमरा जिनगीक बाट जकरे आञ्गुर ध' चलब सिखेलियै बिचहि बाटमें ओ' छोड़ि पड़ायल खसितहि हमरा कहाँ बचल छै कनियो मोल आब अनमोल-नेहक, सौंसे छै खाली टाकाक पूछ, आब लोकक पूछ ककरा "चंदन" टाका त' छियै हाथक मैल सत्-संबंधक आगाँ, जे नै बुझैछ ई बात , बनैछ तकरे जिनगी फकरा -वर्ण-२० 11 घोघ हुनकर उतरि गेलै जोत सगरो पसरि गेलै बहल पुरबा जखन शीतल हुनक आँचर ससरि गेलै देखि हुनकर ठोढ़-लाली आगि छाती पजरि गेलै नैन लाजे हुनक झूकल अटकि हमरो नजरि गेलै रूप यौवन निरखि "चंदन" मोन मधुकर मलरि गेलै I-U-I-I+I-U-I-I 12 जिनगी केर बाट पर काँट सौँसे गाड़ल छै नियति केर टाट बेढ़ सगरो दफानल छै माय-बाप,भाय-बन्धु, छै झुठहि संबध सभ मोह-जाल ओझरायल जिनगी गतानल छै कनियो जँ ढीठ बनि सुनलक कियो मोनक छूतहर घैल बनल समाजो से बारल छै लुटि-कुटि जीवन भरि आनल से बाँटि देल खाली हाथ आब देखि परिजन खौंझायल छै बुढ़ भेल, दुरि गेल फकरा बनि बैसल छै "चंदन" कहय केहन दुनिया अभागल छै -वर्ण-१७ 13 मूरख बड़ा महान ओ'जे अपनाकेँ काबिल बुझै छै अपन माथक टेटर ठीक्के ककरहु नहि सुझै छै आनक नीको अधलाह ताकब कबिलताइ कहाबै अप्पन अधलाहोकेँ जगमे सभसँ नीमन बुझै छै छह-पाँच नहि किछुओ बुझै नहि मोने कलछप्पन ऊँच-नीचक भेद ने जाने मूर्ख सभकेँ एक बुझै छै छल-प्रपंच आ राग-द्वेष तऽ काबिल केर गहना छी चलैत बाट तैँ ओकरहि सभकेँ भिखमंगो लुझै छै पर-उपकारे लीन रहै जे सैह अछि अस्सल ज्ञानी "चंदन" असली ज्ञानी जगमे ओ' जे नहि खूब बुझै छै -वर्ण-२० 14 शब्द संग खेलाएब हमरा नीक लगैत अछि शब्दहि ओझराएब हमरा नीक लगैत अछि मोनक चिनबार पर छी रान्हैत जे मीठ-तीत्त से भावहि झोराएब हमरा नीक लगैत अछि सुखक-गीत दुखक-टीस जिनगीक कथा-ब्यथा जगभरि सुनाएब हमरा नीक लगैत अछि सुरूजक किरीण चढ़ी स्वर्ग केर विहार करी धरतीमें लोटाएब हमरा नीक लगैत अछि विहग-गीत गाबय छी आ' विरहनि सुनाबै छी "चंदन" ई बौराएब हमरा नीक लगैत अछि -वर्ण-१८ 15 कौआ कूचरल भोरे अँगना साँझ परैत औथिन्ह सजना छम-छम-छम-छम पायल बाजै खनकि उठल कंगना सासुक बोली लगैए पियरगर ननदि बनल बहिना गम-गम-गमकय तुलसीक चौरा चानन सन अँगना रचि-रचि साजल रूप मनोहर कत'बेर देखल ऐना टिकुली-काजर जुट्टी-खोपा नवका-नुआ चमकय गहना पहिलहि साँझ बारल दीप-बाती जगमग घर-अँगना उगल चान असमान हृदयमे उठल विरह वेदना सेज सजौने बाट तकैत छी एताह कखन घर सजना "चंदन" सजनी गुनधुन बैसलि की मांगब मुँह बजना -वर्ण-२२ 16 हमरा आब इजोतहि सँ लगैत अछि डर चुप भेल तैँ बइसल छी हम अन्हार घर नहि मोन अछि हमरा नाम आर परिचय अनजान छी संसारमे तेँ घुमैत छी निडर तकैत अछि लोक नाममे पहचान लोकक गुण-शीलक आब समाजमे कहाँ छै मोजर संबंध नहि जकरा सँ बनल सैह समांग तोड़लक भरोस ओ' भरोसे छलहु जकर "चंदन" जगक रीति ओझराउ नहि जिनगी सुनू खबरदार ! हरदम रहू बेखबर -वर्ण-१७ 17 पुनिमक राति केर चान सन चमकैत छी अहाँ अँगना केर तुलसी चौरा सन गमकैत छी अहाँ कखनहु मायक ममता बनि झहरैत छी अहाँ कखनहु आगिक धधरा सन धधकैत छी अहाँ कखनहु संगी-बहिनपा बनि हँसबैत छी अहाँ कखनहु जीवन संगिनी बनि बुझबैत छी अहाँ कखनहु अबलाक रूप धरी फकरैत छी अहाँ कखनहु काली केर रूप धरी डरबैत छी अहाँ कखनहु प्रेमक मुरति बनि सिखबैत छी अहाँ "चंदन" नारी केर रूप अनेक देखबैत छी अहाँ -वर्ण-१९ 18 नहि फुरैछ हमरा आब प्रेम गीत अंतर नहि किछुओ हारि हो वा जीत टकटकी लगौने रहै छी राति-भरि सपनो नहि आबय केयो मनमीत श्मशान बनल अछि करेज हमर पैसत के एहिमे सभ क्यो भयभीत जीवैत छी मुदा बैसल छी मुर्दाघर मुर्दा संग जीवन करैत छी ब्यतीत "चंदन" जीवने सँ लगैछ आब डर मृत्यु सँ हमरा अछि भऽगेल पिरीत -वर्ण-१४ 19 चलू एकबेर फेर रंगमंच सजाबी बहुरूपिया-रूप धरी आ नाच देखाबी दुनिया बरू बूझत बकलेले हमरा हमरा अछि सख जे दुनियाके हँसाबी सुन्दर अभिनेता त' जगभरि भेटय हमर मोन जे पाठ लेबराक खेलाबी दुनियाक रंगमंच जे लागैछ निरस आउ एकरा जीवन-रस बोर डुबाबी "चदन" ई जे गुमसुम बैसल जीवन चलू अपने पर हँसि एकरा हँसाबी -वर्ण-१५ 20 कमला-कोशीक धारमे दहायल जिनगी थाल-कादो सनायल मटिआयल जिनगी निशाँ ताड़ीकेर मातल बौरायल जिनगी माटि चाँगुर सँ कोरैछ भुखायल जिनगी रौद जेठ केर जारल फुलायल जिनगी एसी घर देखू बैसल घमायल जिनगी टुअर-टापर नञ्गटे टौआयल जिनगी देखू साजि-सम्हारल ओरिआयल जिनगी देखू हँसैत कनैत आ' खौँझायल जिनगी "चंदन" रूप अनेकहु देखायल जिनगी -वर्ण-१६ 21 सपना नोरक धार बहाओल जागि-जागि केर राति बिताओल साज-सिंगार सोहैछ नै किछुओ विरहा-आगि करेज जराओल नभमे चमकल जखने चंदा हियामे प्रेमक ज्वारि उठाओल कोइली सौतिन मुँह दुसै अछि कू-कू-कुहुकिक’ होश उड़ाओल अचके बालम ऐलाह अँगना "चंदन" सजनी मोन जुड़ाओल -वर्ण-१२ 22 लगै अछि लाल अहाँकेर गाल जहिना सिनुरिया आम अहाँ केर चान सन मुखरा देखि चानो बनल गुलाम केश कारी घटा घनघोर अमावस राति सन लागय नैन काजर सजल चमकल बिजुरीक छूटल घाम जएह बोली अहाँक ठोर केर चुमि कए बहराइछ महुआ गाछ पर कोइली सैह बाजल बनल सूनाम डेग राखल जत' धरती माटि बनिगेल ओत' चानन रुनझुन पजेब-झंकार सँ अँगना बनल सुरधाम कसमस जुआनी देखिकऽ सुधिबुधि हमर हेरायल पिबै लेल नेहरस ब्याकुल भमरा भऽगेल बदनाम "चंदन"पथिक प्यासल प्रेम केर बाट पर बौआइछ दिऔ ने नेहरस एकरा पिआय बैसाकऽ करेजा-धाम -वर्ण-२१ 23 बेचि खेलक इमानो बजारमे लाज-धाखो सजेलक सचारमे भाय-बापो सँ देखू लड़ैत छै प्रेम देखू फुसिक छै भजारमे आब मातोक ममता बिकाय छै नेह-नाता भसेलक इनारमे जे कहाबै लफंगा समाजमे सैह नामी बनल छै जबारमे देखि"चंदन" परल छी विचारमे साधु-संतो रमल बेभिचारमे मुजाइफ-212-212-212-12 24 हमतऽ कनिते रही आँखिक नोरे सूखा गेलैक अपने कानब पर देखू हमरा हँसा गेलैक लोक पुछलक जखन कहल ने भेल किछुओ असगरे आइ सभ बात अनेरे बजा गेलैक साओन-बदरी जे आगि उनटे धधकि उठलै आइ सैह आगि एकबूँद पसेने पझा गेलैक बैसि अँगना भरि राति गनैत छलौँ तरेगन आइ सैह तरेगन केयो आँचर सजा गेलैक कतेको साल सँ पटबैत छलौँजे गाछ "चंदन" आइ अँगनामे रोपल सैह गाछ फुला गेलैक -वर्ण-१८ 25 नैनक बाण चलाकऽ हम्मर अपटी खेतमे प्राण लेलौँ झूठहि छल जे प्रेम-पिहानी से सभटा हम जानि गेलौँ सप्पत खयने रही अहाँ जे आयब हम्मर सपनामे सपना देखब सपने रहलै निन्नो अहाँ दफानि लेलौँ रहै मोन जे प्रेम-रस सँ भीजा गढ़ब नूतन जिनगी हम एहिमे सौरभ मिझरेलौँ अहाँ नोर सँ सानि देलौँ मोन छल जे मूक्त गगनमे उड़ब अहाँ आ' हम संगे उड़ि गेलौँ कतऽ अहाँ ने जानि हमरा एहिठाँ छानि गेलौँ हमरा बिनु जँ जीबि सकी तऽ जीबू अहाँ सुखक जिनगी बाट तकिते अहीँक "चंदन" काटब जिनगी ठानि लेलौँ -वर्ण-२१ 26 उजरल गाछी जँका लगैछै गाम हमर चुप्पी सधने किएक कनैछै गाम हमर नवकी कनिञा जँका छलैजे गाम हमर विधवा नारी बनल कनैछै गाम हमर भरले-पुरले हँसै छलैजे गाम हमर टूअर टापर भेल फिरैछै गाम हमर प्रीतक पाँती गबैत छलैजे गाम हमर उकटा-पैंची किएक करैछै गाम हमर निर्मल-निश्छल बास छलैजे गाम हमर "चंदन" किए डेरौन लगैछै गाम हमर -वर्ण-१६ 27 करेजकेँ पाथर बना लिअ पिरीतकेँ आखर मिटा दिअ सपन जनम भरिकेर देखल कहूतऽ की नोरहि भसा दिअ जड़ैत छै जे आगि विरहक कहैत छी तकरा मिझा दिअ जनमक संगी बनक बदला कहैत छी नाता कटा लिअ रकटल "चंदन" मोन बेकल कियोतऽ प्रीतमके बुझा दिअ 12-1222-122 28 मिथिला राजक खातिर मैथिल लड़बे करतै खूनसँ भिजलै धरती मिथिला बनबे करतै निज मातृभूमि उत्थानक हेतु लड़िते रहतै मायक लाजक खातिर संतति मरबे करतै मिथिला-मैथिल-मैथिलीक स्वाभिमानक रक्षार्थ निज प्राणहुक उत्सर्ग मैथिल करबे करतै कमला-गंगा-कोशी-गंडकक सप्पत खा' मैथिल अलगहि राजक सपना पूरा करबे करतै जेतै ने ब्यर्थ बलिदान आब कोनो बलिदानीके "चंदन" ठोस प्रतिकार मैथिल करबे करतै -वर्ण-१८ 29 कहिये सँ कतिआयल कनै छथि जानकी कहिये सँ रिरिआयल फिरै छथि जानकी मिथिला सँ बिधुआयल लगै छथि जानकी मैथिल सँ खिसिआयल लगै छथि जानकी घर-घर सँ बौआयल फिरै छथि जानकी घर-घर तऽ छिछिआयल फिरै छथि जानकी रामहि सँ डेरायल लगै छथि जानकी जिनगी सँ अकछायल लगै छथि जानकी अपराध की कयलनि पुछै छथि जानकी चुप्पहि जनक "चंदन" कनै छथि जानकी 2212 + 2212 + 2212 -बहरे-रजज. 30 किछु बात एहन जे कना गेल हमरा जिनगीक नव माने सिखा गेल हमरा सपनाक दुनिया छलहुँ झूलैत झूला तखनहि उठल बिर्ड़ो जगा गेल हमरा पालन अपन पेटक करैए कुकूरो आनोक हित जीबू बुझा गेल हमरा अप्पन हरख हरखित रहैछै सभ क्यो अनके दुखहि कानब बता गेल हमरा "चंदन"मनुज जीवन बितै नहि अकारथ जिनगीक सभ मकसदि गना गेल हमरा 2212-2212-2122 31 नैनक नीर भीजल चीर जमुना तीरमे करेजा क्षीर सींचल वीर जमुना तीरमे बैसल नीड़ कूक अधीर जमुना तीरमे लागल भीड़ मूक बहीर जमुना तीरमे आसक सीर सुखै नै नीर जमुना तीरमे चासक सीर गरै छै सीर जमुना तीरमे देशक वीर भेल फकीर जमुना तीरमे नेताक भीड़ गिरैछै खीर जमुना तीरमे सनले खून द्रौपदी चीर जमुना तीरमे लागल घून काया प्रवीर जमुना तीरमे -वर्ण-१६ "जमुना तीर अर्थात दिल्ली, सीर-जड़ि, जोतल खेतमे हरक चेन्ह, हड्डी 32 मन वीणा तार झंकार भरल मैथिल-जन’क हुंकार प्रबल बहुत आँखि केर नोर बहल बहुत जगक दुत्कार सहल आब उचित उपचार करब शत्रुक प्रहार जे खून बहल निज अधिकारक हेतु लड़ब सौभाग्य जँ प्राण तियागै परल मिथिला-राजक तऽ माँग अटल "चंदन" मैथिल लड़िते डटल -वर्ण-१२ 33 मोन एहन जे मानबे नहि करैए आगि विरहा तैँ साउनोमे जरैए नोर झहरै छै आँखि से, कंठ सुखले बुन्न भरि नेहक लेल तैयो मरैए जेठके रौदहु जकर छाहरि जुरेलौँ बिनु बसाते से पात आसक झरैए डारि पर प्रीतक,फरल संबंध छल जे पाथरे चोटायल, सड़ल फर झरैए बाट 'चंदन' टकटक अहीँके तकैए मोन बहसल,ने आस किन्नहु धरैए -2122-2212-2122/बहरे-खफीफ 34 राति तरेगण गनिते कटै छी आगि विरहके जड़िते रहै छी बाट अहीँकय तकिते रहै छी रूप अहीँलय सजिते रहै छी बनल बताहे हँसिते रहै छी कोनहि बैसल कनिते रहै छी गीत विरह के गबिते रहै छी तामस मोनक पिबिते रहै छी मोनहि अपने लड़िते रहै छी "चंदन"लागय जिविते मरै छी 2-1 +1-2 + 2-1 + 1-2+ 1-2-2 -वर्ण-१२ 35 मलय पवनकेँ मदिर गंध सँ श्वास रोग उपचार करब दुषित वायु अवरूद्ध साँस जे तकर आब प्रतिकार करब जड़वत बनल जे जीवन जगमे तकरा पुनः बना चेतन मधु-पराग सँ नहाके ओहिमे नवल उर्जाक संचार करब निज अवलंबन हेतु जगायब बिसरल सभटा श्रम-शक्तिके कर्मेक बलपर विजय प्राप्ति लय कर्मयुद्ध हुंकार करब रहत आब नहि हारल-थाकल घर-बैसल मानव एक्कहु चलू आब कर्मक प्रकाश सँ करिखल घर उजियार करब एकप्रण एकनिष्ठ श्रद्धासँ निश्छल भावहि गाँथब श्रममाल श्रमक फल भेटब छै निश्चित "चंदन" जगत प्रचार करब -वर्ण-२४ 36 आँखि खूनसँ भरल जेना काँट हृदय गरल जेना पानि खौलय अनल जेना आगि लगए ठरल जेना नोर पोखरि भरल जेना धार खूनक बहल जेना गाछ छलए फरल जेना आब लगए झरल जेना गाम छलए सजल जेना आब "चंदन" मरल जेना 2122-2122 -वर्ण-१० 37 जकरे पाय छलौँ तर-उपर सैह पूत कमौआ धेलकै घर मरचर बनले भरले घर ठाठ उछेहल आँटिओ नै खर ढनढन कोठी ओ’ बखारी-ढक उनटल बासन भनसाघर रकटै नेना सटकल उदर बेदम उकासी दबाइ बेगर चंदन' कोनाकऽ जिनगी कटत ॠण-पैच कोना चलत गुजर -वर्ण-१२ 38 मोन केर बात सदति लिखिते रहब चौबटिया ठाढ़ गजल कहिते रहब जिनगीक बाट कतबो गड़ै काँट-कूश हँसिते गुलाब सन गमकिते रहब समाजो बरु घिसिऔत हमरा कादोमे कदबे कमल बनि फुलाइते रहब बरू कतबो झाँट-बिहाड़ि एतै रस्तामे मुदा तैयो दीप आसक लेसिते रहब 'चंदन' पाथर समाजक छाती पिजाय कलमक धार सँ शत्रू हनिते रहब -वर्ण-१५ 39 आब सूतल लोक जागि रहलैए तैँतऽ बेछोहे चोर भागि रहलैए देखू लागल भीड़ चौबटिया पर बेटा माँ-बापकेँ बेलागि रहलैए बजारक भीड़ तकैछ एकांत सूतय लेल लोक जागि रहलैए चैतक पछबा सुड्डाह भेल घर भादबोमे धधकि आगि रहलैए तबधल धरती दहेतै फेरो सँ सुगरकोना मेघ लागि रहलैए जड़लै घर, दहेलै डीह "चंदन" डटले लोक क्यो नै भागि रहलैए -वर्ण-१३ 40 गुप्फ अन्हार, नहि हाथो-हाथ सुझैए आनक बात कोन, परिजनो हुथैए जकरा ले सर्वस्व कएलहुँ अर्पण सैह हमरा मतलबी लोक बुझैए खून पसेना बहाबी,मुदा छी दरिद्र भिखमंगा बौसैए, धनिकहा लुझैए कत्तौ करोट फेरै लोक सड़क पर कतहु कुक्कुरो पलंग पर सुतैए केओ भूखे पेट,रकटल प्राण,कानै "चंदन" पाचकक चुर्णो खाय कुथैए -वर्ण-१४ 41 राति सपनमे प्रियतम एलाह कर-कौशल सँ हमरा जगेलाह काँच निन्न टूटल,मोन कछमछ उड़ीबिड़ी लगा अपने नुकेलाह देहक पानि बनि बहल पसेना अधरतिये मोन प्यास लगेलाह कसमस आञ्गि नख लागि फाटल चेन्ह सगर देह नह गरेलाह हमरा संग कत खेल खेलेलाह "चंदन" तखन जा मोन जुड़ेलाह -वर्ण-१३ 42 दू लबनी केर खेला देखू लागल रेलम रेला देखू फुसिए ठेलम ठेला देखू बलजोड़िक झमेला देखू मत्त गुरू संग चेला देखू नाच करै अलबेला देखू जीवनक संध्यावेला देखू कानै अनाथ कोरेला देखू विषले लागल मेला देखू अमृत भेल करेला देखू -वर्ण-१० 43 फूल नै बनलौँ तऽ की,काँट बनि गड़ैत तऽ छी प्रेम नै केलौँ तऽ की, संग हमर लडैत तऽ छी अन्हार छै घर तऽ की, दीप बनि जड़ैत तऽ छी सोँझा नै हँसलौँ तऽ की,परोछमे कनैत तऽ छी अपना नै सकलौँ तऽ की, संगमे रहैत तऽ छी भऽनै जाइ आनक संगी,से सोचि मरैत तऽ छी सुख नै देलौँ तऽ की, संगे दुख कटैत तऽ छी मीत नै भेलौ तऽ की, रूसलमे बौँसैत तऽ छी बुझि कऽ बकलेले हमरा, अहाँ हँसैत तऽ छी छी अकछायल तऽ की, बात तैयो सुनैत तऽ छी -वर्ण-१७ 44 आखर आखर सजा लिखै छी गीत अहाँ ले सजनी चाँचर पाँतर हम तकै छी प्रीत अहाँ ले सजनी अपन करेजा कोड़ि माटि, सौरभ पुनि मिझरेलौ नेहक रसमे भीजा गढ़ै छी भीत अहाँ ले सजनी अहाँक रूपके आगाँ हम हारि गेलहु अपनाकेँ अप्पन हारि बिसारि लिखै छी जीत अहाँ ले सजनी मधुर मिलनक बेला कहियो तऽ मधुघट पीबै सोचि-सोचि घट-घट पिबै छी तीत अहाँ ले सजनी अँगना, घर, दलान, सजा, बाट तकैत छी बैसल "चंदन"नेहक बुन्न तकै छी शीत अहाँ ले सजनी -वर्ण-१९ 45 रोटी महग, महगे नून भेल छै बोटी सुलभ सस्ता खून भेल छै सौँसे शहर सहसह लोक गज्जले गामक दलानो-घर सून भेल छै प्रगतिक पथ भ्रष्टाचार अड़ल छै नेता समाजक जनु घून भेल छै खेती करय जे से दीन भेल छै बइमान बेपारी दून भेल छै करनी अपन नहि देखैत लोक छै "चंदन"फुसिक खातिर खून भेल छै २२१२ २२२१ २१२ 46 मोनक बात मोनहिमे रखैत छी चुप्पी लाधि हम जिनगी कटैत छी चकमक जगत,लागल चौन्ह लोककेँ घर अन्हार चैनक निन सुतैत छी झूठक लेल आमिल लोक छै पिने हम सत्तो जनेबा ले कुथैत छी बेचल खेत डाबर-डीह गुजर ले तैयो केस कित्ता दस लडैत छी जुन्ना जड़ल ऐंठन एखनो बचल "चंदन" बोल तै ऐंठल बजैत छी -२२२१ २२२१ २१२ 47 ककरो तऽ जुन्ना आँत भेल छै केयो खा-खा अप्सयाँत भेल छै पिसा रहलै देशक जनता कानूने-व्यवस्था जाँत भेल छै बुड़िबके लोक नेता बनलै विकास नेनाक खाँत भेल छै समाज बुड़लै बरु खत्तामे संसद भोजक पाँत भेल छै -वर्ण-११ 48 द्वेशक धाह सँ बेशी स्नेहक छाह छै शीतल नैनक नोर सँ बेशी देहक घाम छै तीतल देहक खून सँ बेशी लोकक मोन छै धीपल अप्पन सोच सँ बेशी आनक सोच छै रीतल ककरो हाथ सँ बेशी ककरो गात छै भीजल खूनक छाप सँ देखू सगरो बाट छै तीतल ककरो खाप सँ बेशी कत्तहु आम छै बेढ़ल ककरो सगर जिनगी बान्ह-कात छै बीतल ककरो बोल समदाउनक भास छै भरले गाबय "चंदन" उदासी जग बुझै छै गीतल -वर्ण-१७ 49 हम रूकल छी, लेखनी ठमकल अछि सभ कल्पना ठामे-ठाम दरकल अछि प्रगतिक पहिया आइ बिच्चे बाट पर भ्रष्टाचारक ओठ लागि अरकल अछि भोगी भूपति सभ धयने बाना योगीक रोटी प्रजाक खाय क्रमशः सरकल अछि ज्ञान-शील, तप-त्याग संकुचित भेल छै मुदा संकीर्ण सोच सौंसे फलकल अछि "चंदन"लोककेँ निश्चय प्रतिकार चाही कि फेर अनेरुए मेघ ढनकल अछि ? -वर्ण-१५ 50 दानवी चोट सँ मानवता थकुचल जाइए चाँगुरक नोक सँ मनुक्ख बकुटल जाइए भजारि-भजारि बिचार लोक भजार तकैछै तैयो डेग-डेगपर भजार ठकल जाइए नंगटे नचइत लोककेँ सोच कहाँ छैक जे नाच बढ़ल जाइए आ' तेल सधल जाइए जड़ा छातीकेँ निकलैछ जे धूँआ असमानमे ओही सँ तप्त पृथ्वी, हिमालयो घमल जाइए "चंदन"रोगायल छाती कुंठित मोन लोकक बस पाथरक मकान खाली बढ़ल जाइए -वर्ण-१७ 51 नैनक काजर पर मोहित छै सगरो जगत जड़ैत डिबिया केर मोनक मरम के बुझत ? मदान्धकेँ सरोकार नहि होइत छै ककरो सँ फेर सरकारकेँ कोना दीनक लचारी सूझत ? गोर गाल, कारी काजर देखि अन्हरेलै युवक तखन कनैत मायक आँखिक नोर के पोछत ? काँख तर नुकौने रहैछै लोक पानिक बोतल तखन फेर चौड़ीमे के इनार पोखरि खुनत ? गाम भऽगेलै सुन्न मुदा करै चकमक शहर "चंदन" ई बढ़ैत बिषमताकेँ सम के करत? -वर्ण-१८ 52 मानवताक डेन पकड़ि मनुक्ख बनैत भगवान हेतै मुदा, पतितकेँ पशु कहब जौ, पशुओक अपमान हेतै मूरख भूपति बनि बैसलै, लुधकी लगले चाटुकार छै तखन जगत मे अहीँ कहू की विद्या केर सनमान हेतै? रामक मर्यादा तोड़िताड़ि, गौतमक विचारकेँ छोड़िछाड़ि गाँधीक देखाओल पथकेँ त्यागि की मानवक कल्याण हेतै ? अंगना बिच देबाल बनल छै, टुटि गेलै दलान पुरना बेढ़ल फरकी-टाट छै सगरो फेर कत्त खरिहान हेतै ? द्वेश-देयादि मोनमे जकरा, जे नै बनल समांग ककरो "चंदन" तकरा कहत दरिद्रे उचगर भलेँ मकान हेतै -वर्ण-२२ 3 नयनक काजर नोर घोरिकऽ मोसि बनेलौ भाव करेजक आखर-आखर लिखि पठेलौ बुझलहुँ अहाँ विदेशमे जाकऽ खूब कमेलौ मुदा कहू की गामहि सन नेह ओत्तहु पेलौ छै सुविधा कने कम्म गाममे शहर अपेक्षा मुदा,की कहियो सूच्चा भोजन शहरमे खेलौ हम बेकारे देखि-देखि सपना रैन गमेलौ अपन जुआनी अहीँ आसमे बेरथ गमेलौ आन बुझैत छी हमरा आहाँ कोनो बात नहि "चंदन"मुदा कोनाक’ माय-बाबूकेँ बिसरलौ -वर्ण-१७ 54 जकरे देह केर घाम चानन सन गमकै छै तकरे टुटली मरैया स्वर्गक सुख बरसै छै अनकर माथ पर बज्जर जे कियो खसबै छै अपने बोलीक लुत्ती से अपने घर जड़बै छै नवतुरिया छै बुड़िबक बुढ़-पुरान कहै छै ओहोछलै कहियो नौसिखुए सेनै मोन रहै छै चुबय ककरो चार केयो भासल भीत सटै छै खिड़की बुन्न निहारे केयो आनक आड़ि छटै छै कंठी-माला,चानन-टीका,धोती-कुर्ता खूब सजै छै लेकिन नाञ्गट-भूखलकेँ देखिते नाक मुनै छै कन्यागत छै कानि रहल वरागत बिहुँसै छै केयो खून बेचकऽ देलकै केयो सऽख पुरबै छै ई की भेलै जे सगरो खाली बहुरुपिया घुमै छै "चंदन"एलै कलिकाल जे खाली खूनेटा पिबै छै -वर्ण-१८ 55 ओ जे बताह बैसल छै सड़कक कातमे एकोरती नहि लाज छैक ओकरा गातमे पेटकुनिया लधने जे सूतल एकातमे दुइयो दाना भातक नहि ओकरा पातमे दू लबनी पीबि बनै छैक जे नृप साँझमे तकरा भेटै ने उसनल अल्हुआ प्रातमे अपनो घरमे नै कनियो मोजर जकरा दिल्ली केर सरकार छैक तकरा लातमे जकरा ले सेहन्ता नवान्नो अपना खेतक "चंदन" देबै नै पएर तकरा जिरातमे -वर्ण-१६ 56 आखर-आखर गानि-गानि की लिखबै हम मात्रा-बहरे फानि-फानि की लिखबै हम मायक भाषा पूज्य जानि की लिखबै हम अप्पन छाती तानि-तानि की लिखबै हम कविकोकिलकेँ मान राखि की लिखबै हम मिथिला-मैथिल युद्ध ठानि की लिखबै हम फगुआ-चैती गाबि-गाबि की लिखबै हम रौदी-दाही कानि-कानि की लिखबै हम भासल सपना छानि-छानि की लिखबै हम "चंदन" भावहि सानि-सानि की लिखबै हम 222-2212-1222-2 57 बात की भेल एकबेर बढ़िते चलि गेलै नेहक ताग सँ संबंध सजिते चलि गेलै रही सचेत त' मुदा बुझलौ नहि मरम अनचिन्हार मनमीत बनिते चलि गेलै छल नहि ज्ञात हमरा कोनो रीति-प्रीतक फेर कहिया ई पिरीत बढ़िते चलि गेलै जे भेलैक जेना भेलैक बात छोड़ "चंदन" जिनगी जनु संगीत त' सजिते चलि गेलै -वर्ण-१६ 58 कहू, की अहाँ अप्पन संग देबै जीवनमेँ नवल उमंग देबै हम भटकल बाट-बटोही छी पथ हेरब, हमरा संग देबै राति जागय ई टुकुर-टुकुर ऐ आँखि सपन सतरंग देबै "चंदन" जीवन जँ काठ बनत सौरभ मिझरा अंग-अंग देबै -वर्ण-१२ 59 जगभरिमे सब बस दोसरकेँ आँकयमे छै लागल भुजि जनताकेँ नेता भुज्जा फाँकयमे छै लागल अपना घरकेँ अठबज्जर से बचि भेलै नै जकरा से अनकर देबालक भुरकी झाँकयमे लागल छै जकरा अंगा-टोपी जुड़लै नांगट बनि नचइत छै नांगट छै से झँपबा खातिर टाँकयमे छै लागल भरले-पुरले छै से माँझे ठामहि बिष्ठा फीरय निरधन बेबस लचरल छै से ढाँकयमे छै लागल एन्नी ओन्नी दहिना बामाँ घुमबय छै जे जनता "चंदन" सगरो भरले गप्पी हाँकयमे छै लागल -१४टा दीर्घ सभ पाँति मे 60 हम भाय अहाँ छी बहिन हमर दुनू मिलि जितबै जगत सगर गाम-नगर घर डगर-सगर हमरे अहाँ सँ छै छहर-महर परपंच कियो कतबो रचतैक हमरा नहिए परबाह तकर आशीष अहाँक जौँ रहत बनल पुनि छेकि सकत के बाट हमर राखीक सपथ कर्तव्यक पहर "चंदन" नै ताकत बकर-बकर -वर्ण-१३ 61 करेजक टीस कहबै ककरा कहबै जकरे बुझतै फकरा मकरजालमे फाँसल जिनगी जगत भरि छै भरले मकरा कबुला केलकै स'ख पुरेलकै मारल गेलै बलिक बकरा बाँटि रहल छै बखरा-बखरा भेटल छै जैह जत्तहि जकरा "चंदन" सत्ता पर जे छै बैसल किछु नहि आब मोन छै तकरा -वर्ण-१२ 62 चुप्प रहला सँ दुनिया नीक मानै छै लेकिन चुप्पाके दुनिया नै गुदानै छै हँसै छलै बाजै छलै बेटी नैहरमे सासुर बसिते देरी किएक कानै छै बेघर सूतल रहै छै बाट-घाटमे संपतिशाली जकरा पीचब जानै छै शोषित नारी मरि गेलै लगा'क फाँसी शोषक,समाज ओकरे वेश्या मानै छै अजगुत लोक अद्भुत समाज छैक रहि-रहि "चंदन" एतबे ठेकानै छै -वर्ण-१४ 63 हर उठौलहु, पालो टंगलहु, लदहा लाधि रहल छी गोला आ' सिलेबिया बड़दक, जोड़ा हाँकि रहल छी चासि-समारल, फेर तेखारल, आब चौमासि रहल छी लाल सतरिया, करिया कामोर, बीआ छाँटि रहल छी भुटकुनमा-माय, बड़ा प्रेम से, पनपिआइ ल' आयलि, बैसि पीपर तर, दुहू परानी, फुटहा फाँकि रहल छी जगरनाथ छै अपन हाथ, गंगाजल छैक पसेना एहि सँ सिंचल हम जजाति तैँ, जून्ना बाँटि रहल छी 64 बीतल फगुआ, चलू आब रब्बी काटय लए बूट, खेसारी, सरिसब ओ' तीसी झाड़य लए भरल दुपहरिया, केहन बहैछै पछबा हन-हन चलू कर'लय दओन गहुम, राहडि़ झाँटय लए बडकी काकी भास लगा, गाबथि चैतावर बैसलि माँझे आँगन तिसियओरि खोँटय लए केहन सोहनगर लागय नवका बूटक सतुआ चलू चौबटिया, बाट-बटोहीकें बाँटय लए साँझ पड़ल, पुनि पुरबा पलटल, कोइली कुहके बोनिहारक श्रम-पुलकित मन कुदै नाचय लए 65 कयल कोन पाप, नहि जानि की भ' गेलइ, लगेलौं नेह जकरे सँ, ककरो मीत बनि गेलइ करय छी प्रेम कतबा हम, ओ' जानि नहि सकल, आ'कि जानि-बूझिक’, अनचिन्ह बनि गेलइ सिनेहक ताग कतय गेल, संबंध की भेलइ जीनगीक राग-रभस सभ-टा टीस बनि गेलइ जग छैक सत्ते "झूठ", बात बूझ ने "चंदन" टुटै छै स्वप्न सहस्त्रो, एकटा फेर टुटि गेलइ 66 हम बैसले छी अन्हारे छी हेलि रहल मझधारे तेजलक मीता-भजारो छोड़लक संग परिवारे जाधरि छल धनक अम्बारे खूब भेटइत छल पियारे आइ एसगरे परल छी एहि भरले, बिच-बजारे नहि बचल कोनो अधारे "चंदन" कर्मक मारि खिहारे हजल 1 कनिया हम्मर बड़ गुणवन्ती बुझा गेल हमरा किएक कुमारहि लोक मरैए जना गेल हमरा शांती जहिए घरमे पैसली तहिए सँ छी अशांत क्रांति घरमे मचल तेहन जे मिटा गेल हमरा सासु लगै छन्हि सौतिन ससुर लगैन्ह चरबाह गारि अलौकिक हुनका मूँहक लजा गेल हमरा संग गोतनीक लड़थि भैंसुर के नहि परबाह आबतऽ देखू दुनू भाइयो बिच बझा गेल हमरा रौ दैवा नहि जनलौ किछुओ फँसलौ ब्याहक फाँस "चंदन" रूपक माया फँसरी लटका गेल हमरा 2 गुरूजी बैसलाह खोलि खटाल चेलवा बनलनि गुरू घंटाल घूर जरौलन्हि पोथी केर टाल दूध बेचिकए भेलाह नेहाल इसकुल जाऽकऽ भेलाह कंगाल माल पोसिकऽ भेलाह मालामाल पशुगणना कऽ फुटलनि भाल पशुपालन सँ रुपैयाक टाल घी-दूध पीबि भेलनि देह लाल आब अखाड़ा बिच ठोकथि ताल गुरुआनिक गजबे रंगताल ठोरक संग-संग रांगथि गाल गुरुजी बैसलाह खोलि खटाल ज्ञानक पूँजीओ गेलनि पताल -वर्ण-१२ बाल गजल 1 चार पर छै कौआ बैसल माँझ अँगना बौआ बैसल घुट-घुट खाथि दूध-भात मायक कोरा बौआ बैसल राजा-रानी सुनथि पिहानी मइयाँ कोरा बौआ बैसल ओ-ना-मा-सी सिखथि-पढ़थि, बाबाक कोरा बौआ बैसल सुग्गा-मेना संग खेलै छथि "चंदन" अँगना बौआ बैसल 2 कुकरुकू जखन मुरगा बाजल किरिण सुरूजक मूँहमेँ लागल कौआ डकलक कोइली बाजल आँखि मिड़ैते चुनमुन जागल नहा-सोनाक’ कयलनि जलखै इसकुल गेलथि घंटी बाजल दीदीजी बड्ड नीक लगैत छन्हि मास्टर जी के छड़ी लय भागल कान पकड़िक’ उठक-बैठक तैयो खेले पर मोन छै टाँगल "चंदन" टन-टन घंटी बजलै छुट्टी भेलइ घर दिस भागल 3 बेंग बजय छै टर-टर-टर्र बगरा उड़य फर-फर-फर्र झरना झहरे झर-झर-झर्र बाँस बजय छै कर-कर-कर्र मिल चलय छै धर-धर-धर्र साँप ससरलै सर-सर-सर्र चुनमा छाती धक-धक-धक्क डरसँ कापय थर-थर-थर्र पप्पा एलखिन भागि गेल डर बात पदाबय चर-चर-चर्र 4 बुच्ची पहिरलक सोन गहना बौआक डाँर झूले लाल फुदना साजि-राजि दूनू गेला मेला देखऽ हाथमे पाइ छलै बारह अना मुरही-कचरी, आ' बतासा-लड्डू रंग-विरंग किनलक फुकना झूललक झूला नाच देखलक "चंदन" घुमल घर सोना-चना 5 साँझ परल, बैसि पिपर पर चिड़ै करय पंचैती सूगा-मैना ब्याह रचाओत बगुला करय घटकैती फुदकि-फुदकिक’ फुद्दी नाचय फेर हेतै वनभोज कौआ पिजबैछ लोल कोइली गाबि रहल छइ चैती बगरा-परबा अपस्याँत अछि इंतजाममे लागल डकहर बैसल सोचि रहल कोना हेतै कुटमैती पोरकी पिपही बजा रहल छै टिटही पिटै ढोलक मोर नचैछै ता-ता-थैया "चंदन" अद्भुत ई कुटमैती 6 नवका कुर्ती नवके सलवार पहिर कय बुच्ची भेल तैयार ललका फीताक गुहलक जुट्टी बाजे रुनझुन पायल झन्कार हाथक बाला खन-खन-खनके टम-टम चढिक’ गेल बजार ढोलक-पिपही आ तमाशा-नाच सूनल देखल हरख अपार बाबाक हाथ पकड़ि कए बुच्ची प्रमुदित घुमय हाट-बजार 7 मस्जिद जखने परल अजान कोइली ठनलक पराती गान कौआ डकलक खेत खरिहान बगुला खत्ता बिच करय स्नान गर-गर दुध दुहैछ बथान टक-टक पड़रू लगौने ध्यान बाबा छथि बाड़ी बान्हथि मचान बाबी अँगना मेँ लगाबथि पान टुह-टुह लाल पूब असमान 'चंदन'जलखैमे दूध मखान 8 दऽ रहल छी अपन शपथ, नै कानू बौआ लेबनचूस लऽ पप्पा औताह, कुचरे कौआ हम तऽ माय छी सत्ते,मुदा बेबस लाचारे कीनि खेलौना देब कतऽसँ,नहि अछि ढौआ भरना लागल खेत, महाजनक तगेदा फेर कोनाक’ सख पुरौताह बाप कमौआ अहीँ पुरायब सख सेहन्ता आस धेने छी अहीँ जुड़ायब छाती बनिकऽ पूत कमौआ कबुला,पाती,विनय,नेहोरा, करैछी भोला बेलपात "चंदन" चढ़ायब खूब चढ़ौआ -वर्ण-१६ 9 भैया के नबका बुशर्ट आ हमरा दीदी के फेरन ओ'तऽ सौंसे गाम घूमै छौ हमरा अंगनोमे बेढ़न चूल्हा-चेकी,बर्तन-बासन, आगाँ से नै करबौ हम हमरो चाही कापी-पिल्सिन, बेटाके देलही जेहन बौआ छुच्छे छाल्हि खेतौ हमरा नै दूधो परपइठ जौँ नै करबौ टहल तखन लगतौ मोन केहन बहुत सहलियौ आब नै चलतौ तोहर दूनेती हमरो चाही बखरा आब नै चलतौ कलछप्पन गै माय युग बदलि गेलैए बेटी नै बेटा से कम "चंदन" गमकैत भविष्य रचबै हमहूँ अपन -वर्ण-१९ 10 एकदिन हमरो हेतैक मकान एकदिन हमरो हेतैक बथान एकदिन हमहुँ कीनब समान हमरो घर बनतै पू-पकवान एकदिन हमहुँ बुलबइ चान अंतरिक्षमे हेतै हमरो दलान सभकेयो अपने केयो नहि आन हमहुँ बनबै गाँधी सन महान विद्या-वैभवक लेल अनुसंधान करय जे "चंदन" बनय महान -वर्ण-१३ 11 चिक्का कबड्डी खेलबइ खेत पथारमे हमर नाह चलतैक ओलती धारमे इसकुल सँ जखन घुमबइ साँझमे बाबा संगमे घुमबइ धारक पारमे आमक गाछी खोपड़ी तर मचान पर काका संगे हमहुँ बैसबै रखबारमे गीजल-गाँथल हम नहि खेबौ बाटीमे माय गै हमरो साँठिक’ दहीन थारमे मुरही कचरी झिल्ली खेतै छैक सेहन्ता "चंदन" तैँ छैक लोढ़हा लोढ़ैत नारमे -वर्ण-१५ 12 माय गै हमरो कीनि देऽ नेऽ चान एकटा देऽने गुड़क पूरी फोका मखान एकटा चमकै इजोरिया लागै छै कोजगरे छै बाबा हमरो दीअ’ने खिल्ली पान एकटा चकलेट-बिस्कुटो भऽ गेलै कत्ते महग पप्पा हमहूँ करबइ दोकान एकटा छोटको चच्चा केतऽ आब भऽ गेलै ब्याह गै मैंया हमरो कनिया कऽ दे जुआन एकटा चान पर घर हेतै तारा पर दलान "चंदन" हमहूँ भरबै उड़ान एकटा -वर्ण-१५ 13 पकड़ि के दाबा चलइ छै खने ठेहुनियाँ भरइ छै मधुर सनके बोल लागै जखन माँ-पप्पा बजइ छै चढ़िकऽ छाती पर ककाकेँ भभा के लगले हँसइ छै सुगा मैना जखन बाजय सुनिकऽ थपड़ी पिटइ छै मनोरथ सभटा पुरौतै बइस के चंदन गुनइ छै -वर्ण-१० -१२२२ २१२२ बहरे-मजरिअ 14 भोर भेलै शोर भेलै काँचे निन्न खोर भेलै माघ मास शीत जल दहो-बहो नोर भेलै काँट कंठमे गड़लै भोग नहि झोर भेलै भैंस भेलै पारी तरे छाल्ही डाढ़ी घोर भेलै थारी बाटी पिटैत छै माय मोन घोर भेलै -वर्ण-८ 15 ओम्हर गगन बिच मेघ जहिना उमकि रहल छै एम्हर मगन मन बाल तहिना कुदकि रहल छै धधकति छलै जे माटि कहियो अगिन-कुण्ड सन पबिते अमियके बुन्न मह-मह गमकि रहल छै खिलखिल दुबर लागय छलै पतझाड़ कालमे खलखल हँसय छै आब फुनगी हुलकि रहल छै दबकल छलय जे सालभरि बिल बीच बेंगबा घुच्ची भरल जल पाबि जँह-तँह कुदकि रहल छै टुक-टुक निहारय बइस "चंदन" कोर बेचनी दाबाक कगनी पानि पर जे भसकि रहल छै -वर्ण-१९-२२१२-२२१२-२२१२-१२ रुबाइ 1 भासल सभटा सपना नोरक धारमे कण्ठ दबायल जनु हमर गृमहारमे बैसल छी एकात निजहि परिवारमे सोंगर खोँसि रहल छी टूटल चारमे 2 लोक भूखले पेट चिकरैछ बाट पर छै ढ़करैत सरकार सूतल खाट पर निन्न टुटैछै नेताक आब केवल कोनो आम जनतासँ लागल चाट पर 3 अपन महीष कुरहरिए नाथब सुगरे गूँह सँ चिपरी पाथब छी स्वतंत्र देशक बासी तैँ की बरछी सँ माला गाँथब 4 बरू बिनु दबाइ चलि गेलै ओकर जान श्राद्ध तऽ मुदा करजा लऽ भेलै गौदान खाय अधहे पेट कटलक जिनगी सकल मरल तऽ सौजनी मारैत छै सुरकान 5 नोरसँ सिक्त आँचर आब निचोड़ि दिऔ जँ आँगुर कियो देखबै कर तोड़ि दिऔ त्यागू भय सीता मैयाक सपथ धरू मिथिला राजक शत्रू मुण्ड मचोड़ि दिऔ 6 टूटल बान्ह बहलै गामक गाम फेर गेल दहा जिनगी कतेको ठाम फेर कागतक नाव, सरकारो तत्पर छलै मुदा, बाढि भासल कतेको जान फेर 7 दू टुक कहलौ दू फाँक भेल संबंध चुप्पहि जँ रहलौ फोँका गेल संबंध पस भरल टीसैत पसीझैत घाव सन सत्यक शूल गाड़ि बहा देल संबंध 8 संध्या-वंदन,काठ सिरिखण्ड घसै छी भोर-साँझ आरती घरिघण्ट पिटै छी भाँग पीबि मस्तक तिरपुण्ड लेपै छी रुचि-रुचि रोहु मूड़ा मुरिघण्ट चभै छी 9 देखू पियक्कर बताह जमानाके सून्न मंदिर भरले ताड़ीखानाके कनैत लोक हँसी किनबा ले लुटबैछ पेट काटि जोगाओल खजानाके । 10 दूध सँ बेशी स्वाद लगैए ताड़ीमे खेत बिकायल लागल हाथ घराड़ीमे एखन तऽ अमृत लगैए चिखनासंगे बुझबै जखन लीवर सड़त बुढ़ारीमे 11 ताड़ी छानब छोड़ि छानू निज विचार दारू ताकब त्यागि ताकू संस्कार अप्पन घर जाड़ि भट्ठीमे छी बैसल नजरि उठा देखू जड़ल केहन कपार 12 सत्ते अहाँ कखनो मोन नहि पड़ैत छी, किएकतऽ सदिखन मोनेमे रहैत छी फूल बनि सदिखन हृदयमे गमकैत छी अहीँक नेहक जोत सँ हम चमकैत छी 13 अहीँक प्रेमक छाह जीब' चाहै छी अहीँक आँचरक हवा पीब' चाहै छी अपन फाटल करेजा सीब' चाहै छी अहीँक नैनक शराब पीब' चाहै छी 14 करेजक तहमे चौपैत रखलौँ जकरा खून अपन पिया पोसैत रहलौँ जकरा जुआनीक मद बौरायल सैह लगैछ परल एकात समाजमे बनलौँ फकरा 15 सूर्यक प्रखर रश्मि सन चमकैत रहू शरदक इजोरिया सन दमकैत रहू कामिनी रातरानी सन गमकैत रहू रुन-झून पायल पहिरि छमकैत रहू 16 अहाँक केश सँ झहरैत पानिक बुन्नी अहाँक गाल सँ ससरैत पानिक बुन्नी अहाँक ठोर सँ टपकैत पानिक बुन्नी हमरो देह सँ टघरैत पानिक बुन्नी 17 घोरनक छत्ता झाड़ि पानि ढ़ारि देबौ एकहि चाट मे धरती पर पारि देबौ रै खचराहा खचरै सभ घोसारि देबौ मैथिलीक अपमान करब विसारि देबौ 18 जौँ डेनधऽ चलबे संग तऽ तारि देबौ नैतऽ कलमक मारि, गत्र ससारि देबौ मिथिलाक विरोधी, मारि खेहारि देबौ रचलाहा प्रपंच पर पानि ढ़ारि देबौ 19 महगीक आगिमे जरलै जनताके बटुआ दिन-राति एक तीमन पिबैछी झोर पटुआ सरकारके विरोधमे लगबैत छल जे नारा खसल छै सड़क पर से लोक लटुआ-लटुआ 20 छाक भरिके आइ पीबय दिअ' हमरा पोख भरिके जिनगी जीबय दिअ' हमरा खोँचाह बात से लागल खोँच, फाटल, गुदरी भेल जिनगी सीबय दिअ' हमरा 21 सीता चरण नूपुर झनक झमकैत रहय बाड़ी अयाची फूल सदति गमकैत रहय जनकक खेतक माटि माथ सजबैत रहय मैथिल-मिथिला कीर्ति जगत पसरैत रहय 22 धिया सिया सन घर-घरमे जनमैत रहय शंकर बनिकऽ पूत अंगनामे खेलैत रहय उगना सन केर चाकर बाँहि पुरैत रहय हरियर खेत-पथार सदति बिहुँसैत रहय 23 कल-कल कमला कोशी निर्मल बहैत रहय छल-छल गंगाक निश्छल जल छलकैत रहय बागमती गंडक धरती जी जुड़बैत रहय माछ मखानक डाला नित सजबैत रहय 24 उज्जर परती हरिया गेलै जेना दियादी झगड़ा फरिया गेलै जेना लागल भीड़ छिड़िया गेलै जेना मोनक बात मरिया गेलै जेना 25 अनका कनिते देख भभाकऽ लोक हँसैए अपन विपति के बेला देखू कोना कनैए अनकर कान्ह कोदारि हल्लुक लगैछै जकरा अपना हाथ सँ धरिते बेंट सैह लोक कुथैए 26 नाङट गरीब, माने हकन्न कनैए फैशने चूर धनिको, नङटे नचैए देखू नङटा, नङटे के देखि हँसैए एकदोसर के देख संतोष धरैए 27 देखलौँ माँझ अँगना ओगरैत सपना देखलौँ चौबटिया पर लोढैत सपना देखलौँ हाट ककरो मोलबैत सपना ककरो झूठक दोबर तौलबैत सपना 28 नील नैन बिच साजल काजर करिया रूप लगैए अनमन धवल इजोरिया निश्चय अहाँ जनैत छी टोना-टापर भेल बताह छै तैँ गामक नवतुरिया 29 कखनो बनि विपक्षी चित्कार करै छै सत्ता हाथ लगितहि फुफकार भरै छै नेता वोटक लेल कतबा रूप धरै छै कत्तहु अनशन कत्तहु इफ्तार करै छै 30 दरकल करेजा कोना सिबै हम कहू ई नोर आँखिक कोना पिबै हम कहू पियासलि हम छी पिया बसथि विदेशमे फेर साउन मास कोना जिबै हम कहू 31 (एकटा बड़दक मुँह सँ...) जौँ हाँकब चुचकारि तऽकऽ देब तेखार हाँकब जँ रेबाड़ि तऽ हैत चासो पहाड़ जौँ बुझब समांग तखने बाँहि हम पुरब जौँ करबै अड़पेना तऽ खायब लथार 32 जिबै कतेक दिन एना चुप्पी साधिके तकबै कहिया दबाइ एहि बियाधिके चलबै कतेक दिन घुसकुनिया मारिके रहबै कतेक दिन पेटकुनिया लाधिके 33 पावसक बूँद पाबि धरणी तृप्त भेल छै कामानल जड़िते तरुणी अतृप्त भेल छै देह वस्त्र लेपटायल घामे सिक्त भेल छै पिया अंकमे पड़ले मनुआ तृप्त भेल छै कता 1 मन वीणा सँ उठि रहल छैक करूण राग माटि मिथिलाक किएक कऽ रहलै विलाप सनल किएक शोणित सँ मैथिल भू-भाग सुनऽमे नहि किए अबैछ कोकिल-अलाप विनीत उत्पल (१९७८- )। आनंदपुरा, मधेपुरा। प्रारंभिक शिक्षासँ इंटर धरि मुंगेर जिला अंतर्गत रणगांव आs तारापुरमे। तिलकामांझी भागलपुर, विश्वविद्यालयसँ गणितमे बीएससी (आनर्स)। गुरू जम्भेश्वर विश्वविद्यालयसँ जनसंचारमे मास्टर डिग्री। भारतीय विद्या भवन, नई दिल्लीसँ अंगरेजी पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्लीसँ जनसंचार आऽ रचनात्मक लेखनमे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कनफ्लिक्ट रिजोल्यूशन, जामिया मिलिया इस्लामियाक पहिल बैचक छात्र भs सर्टिफिकेट प्राप्त। भारतीय विद्या भवनक फ्रेंच कोर्सक छात्र। आकाशवाणी भागलपुरसँ कविता पाठ, परिचर्चा आदि प्रसारित। देशक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे विभिन्न विषयपर स्वतंत्र लेखन। पत्रकारिता कैरियर- दैनिक भास्कर, इंदौर, रायपुर, दिल्ली प्रेस, दैनिक हिंदुस्तान, नई दिल्ली, फरीदाबाद, अकिंचन भारत, आगरा, देशबंधु, दिल्ली मे। एखन राष्ट्रीय सहारा, नोएडा मे वरिष्ट उपसंपादक .। हम पुछैत छी (अपन गप, ५० टा कविता) अपन गप गाम-घरक स्थिति, मिथिला आ अंग प्रदेशक सामजिकताक जर्जरता आ जीवनानुभवक छवि प्रस्तुत कविता संग्रह हम पुछैत छी मे अछि। सभटा कविता तकरे ओझराहटिकेँ सोझरएबाक प्रयास अछि। जिनगीक आरोह-अवरोह, सामाजिक ओझराहटि आ रूढिवादी परम्परा मन-मस्तिष्कपर चोटक संग हृदएकेँ हिलकोरि कऽ दिमागकेँ सुन्न कऽ दैत छैक। एक कात मिथिलाक नब्बै प्रतिशत लोकक अदौसँ आएल परम्परासँ विरत होइमे हाथ-पएर फूलि जाइत अछि। दुनियाँक विकासकेँ आँच बुझै छथि, जाति-पाति, छुआ-छूतौवलिसँ हटि कऽ चलैमे प्राण जाइत छनि। ओहि समयमे हमर जनम समाजक मुँहपर चमेटा देबाक संग प्रश्न सेहो अनैत अछि। एहन विकट परिस्थितिमे जखन दुनिया एकटा गाममे बदलि रहल अछि, जिनगीक सभटा डेग विषम अछि, ताहिमे कविता सृजनक एकपेरियापर अनबरत किए चलि रहल अछि? हमर रचानात्मकताकेँ आगू अनबाक श्रेय आदरणीय गजेन्द्र ठाकुरकेँ जाइत छन्हि, हम आभारी छी पत्रकार मित्र आशीष झाक जे हमर सभटा कविताकेँ मनोयोगपूर्वक पढि त्रुटिक निदान कएलन्हि । हम आभारी छी अपन मित्रक संग घरक लोकक जे हमर कवित्वकक प्रशंसाक संग-संग समालोचना सेहो केलथि। समर्पण-माँ प्रेमलता झा आ पापा डॉ. वेदानन्द झाकेँ जिनकर कोरामे बैस बाजैक, पढैक, लिखैक आ सोचैक क्षमता पौलहुँ। - विनीत उत्पल ककर गलती कतेक दिवससँ सोचैत रही जे गाम जाएब परञ्च दिल्लीक उथल-धक्कासँ मुक्त होएब तखन ने। पछिला दशहरामे जखन गाम पहुँचलहुँ तँ आड़ि पकड़ि टोल अबैत रही। ओहि ब्रह्मबाबाक ठामपर एकटा स्त्रिगण बैसलि रहथि की कहू , धक्कसँ रहि गेलहुँ कंठक थूक कंठहिमे सुखा गेल स्त्रिगण कोनो भूत नहि छलीह ओ कोनो डाइन-जोगिन सेहो नहि रहथि ओ गौरी दाइ छलीह बियाहक ठामे साल विधवा भेल ताहि दिनसँ ओ नवयुवती उजरा नुआ पहिरैत छथि सीथमे चुटकी भरि सेनूर नहि, गुमसुम रहैत समय काटि रहल छथि। तँ हुनका देखि सदिखन सोचैत छी की यैह मिथिला थिक यैह हमर संस्कृति थिक मनकेँ मारि कए एकटा नवयुवती जीवन काटि रहल अछि ओकरा कियो देखनिहार नहि छैक ओ नवयुवतीक सिउथ जुआनीमे उजड़ि गेल ताहि दिनसँ ओकरापर की बितैत होएत जे पति बीमारीसँ मरि गेलखिन एकरामे गौरी दाइक की दोख दोख तँ हुनक पिताक छनि जिनका वरक बीमारीक जानकारी नहि छल मुदा ओहो की करताह घटक बनि कऽ गेल रहथि द्वितीकार जे कहलन्हि सैह ने सत्य मानितथि ई गप सत्य छल जे गौरी दाइ अपन पिताक गलतीक सजा भोगि रहल छथि भाग्यकेँ कोसि रहल छथि आब की कही देश-परदेशमे तँ वर- कनिया बदलि जाइत अछि जेना छः मासपर बदलैत छी हम अपन अंगा मुदा, ई गौरी दाइ बीसेक साल बादो नहि बदलतीह ओहि दिनसँ पतिक वियोगमे दिन-राति कुहरैत रहतीह कियो कतहुसँ खुशियोमे हुनका नोत नहि देतन्हि कियो अपन नवजातकेँ खेलाबए लेल नहि कहतन्हि की करती गौरी दाइ कियो हुनका देवी कहतन्हि तँ डाइन-जोगिन कहबासँ लोक-वेद पाछुओ नहि रहतन्हि। मनुखो नहि भेल ओइ दिन जखन भिनसरे काल सूर्य उगैसँ पहिने जखन आफिससँ डेरा पहुचलहुँ डेड़ियापर एकाएक डेग ठमकि गेल सोचए लगलहुँ देखू तँ, साँझ काल जाइत छी आफिस भोर-भिनसरे डेरा घुरैले ई देशक राजधानी छी मीडियामे काज करैत छी मुदा, रातिकेँ घरमे नहि रहैत छी जखनकि चिड़ै-चुनमुनी सेहो साँझ पड़ैत घर घुरैत अछि एहि ठाम अपन बाबा सेहो मोन पड़ैत छथि बाबा कतेक तमसाइत रहथि जखन हम अनहार भेलापर घर नहि घुरैत रही कहथिन ई बुड़बक भऽ गेल साँझक बेला बितलाक बादो घर नहि घुरैत अछि कहिया बुधियार हएब अहाँ आइ अहाँक पापासँ कहै छी ओहि नेनपनमे हम बाबाकेँ मनाबी हुनकर पएर जाँती आ सप्पत खाइ, कही बाबा, काल्हिसँ सकाले आएब कतेक लाम-काफ दैत रही आ किएक तँ पापाक थापड़क नामेसँ थड़थरा जाइत रहए हमर देह मुदा आब जखन बाबा नहि छथि पापा किछु नहि कहैत छथि हम आइ अपन पएरपर ठाढ़ छी चाहियो कऽ साँझ खन घर नहि घुरि सकैत छी सोचैत छी, स्वर्गमे बाबा बैसल हेता आ सोचैत हेता ई बुड़बकहा हमर गप नहिए मानलक साँझ खन चिड़ैया-चुनमुन सेहो घर घुरि अबैत अछि मुदा ई मनुखो भऽ मनुख नहि भेल। की फर्क पड़ैत अछि ओहि दिन संपूर्ण वैशालीमे श्मशान सन शांति छल जहि दिन आम्रपालीकेँ तथागत कलयुगक यथार्थ बतौलखिन आ कहलखिन नहि केकरो आकांक्षा तँ की फर्क पड़ैत अछि आकांक्षा केकरो तँ की फर्क पड़ैत अछि कहब एक बेर धोखा देलहुँ कहब एक बेर धोखा खेलहुँ। अंगप्रदेश बिसरि जाउ ओहि कर्णक नगरी अंगप्रदेशकेँ जतए जकरासँ जे मंगितहुँ से भेटैत कहियो विक्रमशिला सन विश्वविद्यालय रहै अहि ठाम चारू कातसँ लोक आबथि शिक्षा लेबा लेल एहि ठाम अछि मंदार पर्वत जे अछि समुद्र्मंथनक निशानी अहि ठाम आएल रहथि कवि रविन्द्रनाथ शरतचंद्रक नेनपन बीतल एहि ठाम मुदा अंगप्रदेशपर ककर नजरि लागल ने ओ चास-बास ने आस दलमलित होइत अछि अंगप्रदेशक आत्मा आ बजबैत अछि तारणहार परीक्षा कहू वा नहि कहू अलबल रीति-बीध युग-युगसँ अपन समाजक कोढ़-करेज कोढ़ि अछि बनेने एकटा पावनि अछि मधुश्रावणी पत्नीक पतिव्रता सर्टिफ़िकेट लेल होइत अछि अइमे टेमी जकरा कहैत छी हम अर्धांगिनी बारंबार दैत छथि परीक्षा त्रेतामे सीता ओ अहिल्या कलयुगमे होइत नित अग्निपरीक्षा छी हम पुरुष मुदा छी बड़ डेरबुक तहिसँ परीक्षा नहि दैत छी नहि फेलक चिंता आ ने पासक पार्टनर, अहाँक मूल की ? अहाँकेँ मोन छथि कवि मुक्तिबोध जखन हुनका कियो नव लोक भेटैत छलनि तँ पुछथिन पार्टनर, अहाँक पालिटिक्स की आब तँ मुक्तिबोध नहि छथि मुदा मिथिलामे हुनकर गप घर-घर मे अहाँ सुनि सकैत छी ई गप जखन-तखन नहि सुनबै मुदा ब्याह-दानमे आ घटकैतीमे सुनबै एकदम्मे पार्टनर, अहाँक मूल की ? अहाँकेँ एहि गपमे अंतर किछु नहि लागत मुदा पताल आ अकासक अन्तर छैक मुक्तिबोधक गपमे मानसिक आ वैचारिक स्तर जखनकि मिथिलाक संस्कारमे निखटुओ जे छथि से पूर्वजक गुणगानमे पेटकुनिया धेने भेटताह एकटा गप पुछै छी आबकि राजतंत्र छैक जे राजाक बेटा राजा होएत । नहि टाइम अपना लेल नेनामे गाम-घरमे सुनैत रही नोकरी नहि करी तखन तँ एक कानसँ सुनि दोसर कान दऽ उड़ा दैत रही मुदा जखनसँ नोकरी केलहुँ अछि बुझबामे आबि गेल नोकरीक भाव नहि अपन ठाम ने ठेकाना जतए कंपनी पठेलक ओहि ठाम वैह ठेकाना नहि सुतैक टाइम नहि उठैक आ ने नहि खाइले नहि टाइम अपना लेल यैह छै नोकरी । भाव-समर्पण जीवनक जीवंतता की मनुष्यक मनुष्यता की जेहन मोन, जेहन भाव तहिने होइत अछि भाव-समर्पण नर्तकी जखन राग मालकौसमे स्टेजपर बिजलीक बिजलौकामे अपन संपूर्ण प्रतिभाक प्रदर्शन करैत छथि देखू तखन की होइत अछि राग, की बनैत अछि भाव लागत जेना देहमे नर्तकीक आत्मा नहि देवता बैस गेल रहै जे जेना नचा रहल छल तहिना नर्तकी नाचैत छलि की ततकार की ठाठ की करी ओइ चकरघिन्नीक वर्णन शब्दो तँ ओतेक नहि अछि तँ कोना करी वर्णन भाव-समर्पणक अहाँ ककरो बेटी होएब अहाँ ककरो बहिन होएब मुदा अहाँ जकरासँ प्रेम करैत होएब से होएत कतेक भागशाली जे नर्तकी अपन संपूर्ण समर्पण-अस्तित्व नृत्यमे झोंकि दैत अछि ओकर प्रेम वा पुरुष होएतैक सरिपहुँ संपूर्ण। इतिहासक लिखल कोनो इतिहासक पोथीक पन्ना पलटि कऽ देखू खाली शासक वा राजाक इतिहास लिखल गेल छैक रामाएण आ महाभारतोमे शूरवीर आ विजेताक गुणगान भरल छैक भारतक स्वतंत्रताक पहिल वा ओकर बादक इतिहास एकरा सँ फराक नहि छैक माउंटबेटनसँ लऽ कs गांधी आ नेहरू चंद्रशेखर आ अम्बेडकर धरि गुणगानसँ भरल छैक गांधीजी कहैत रहथि देशक अन्तिम मनुखक गप करू ओकर नीक, तखन होएत देशक उत्थान हम पुछैत छी इतिहास तँ कहियो देशक अन्तिम मनुखक गप नहि लिखलक तँ हम कोन लुरिये करब। आतंक आतंकसँ नहि होइत अछि आतंकवाद खतम ताहि लेल नहि गोली वा बारूदक जरूरति दू-चारि गोटेकेँ पकड़ि कऽ गोली मारलासँ नहि सून-सपाट होएत आतंकवाद । मार्क्सकेँ जेना रहै मार्क्सवादक जरूरति समाजकेँ रहै समाजवादक दरकार आतंककेँ नहि कोनो वादक आवश्यकता खत्म करहि पड़त आतंकक गाछ ठारि काटलासँ नहि चलत काज संपूर्ण तंत्रक करै पड़त ब्रेनवास से सुनू, समाजमे प्रेम आ भैयारी भूख-प्यासक निदान, शिक्षा ओ सदभावक अलख जगबै पड़त तहिसँ सुनर परिवार, सुनर समाज सुनर देश आ सुनर दुनिया होएत। इन्द्रप्रस्थक कथा युग-युगसँ लिखल जा रहल छैक इन्द्रप्रस्थक कथा द्वापर मे अहि ठाम छल पांडवक राजधानी जकरा पाबैक लेल अठारह दिन धरि भेल महाभारत मारल गेल हजारक-हजार लोक समए बदलल, आब नहि छथि ओ पांडव नहि ओ कौरव मुदा आबो मारल जाइत अछि लोक तहिया उजड़ि गेल छल गामक-गाम आइ कामनवेल्थक नामपर उजड़ि रहल अछि गरीबक झोपड़ी हम पुछैत छी शिखंडीकेँ आगू कऽ रचल गेल छल षड्यंत्र सत्ताक लेल भाइ-भाइक दुश्मन भेल मारि-काटि कऽ केलक वंशक नाश आब अहि इन्द्रप्रस्थमे वर्ल्ड क्लासक नामपर रचल जाइ अछि षड्यंत्र गरीबकेँ भगेबाक लेल। नोकरी आकि आजीवन कारावास नेनामे अहाँ घोंइट-घोंइट कऽ यादि करैत रहिऐ किताबक पन्ना सोचैत रहिऐ खूब पढ़ि-लिखि कऽ नीक सन नोकरी भेटत तहि लेल दिन-राति घसैत रही कलम क्लासमे अबैत रहि प्रथम मुदा जखन नहि भेटल सरकारी नोकरी तँ प्राइवेट नोकरी करै पड़ल एहि समयमे नहि अपन लेल समए नहि परिवारक भरण-पोषणक लेल पाइ एहि ठाम विकट परिस्थितिमे मन पड़ैत अछि बरटोल्ड ब्रेस्ट हुनकर कहब छल जे एक गोटाकेँ कम दरमाहा देब माने अछि आजीवन कारावास हम पुछैत छी अहाँ कहू वा बताऊ कोन नीक कम दरमाहाबला नोकरी वा आजीवन कारावास एक ठाम, अहाँकेँ दुनिया भरिक रहत दायित्व मुदा नहि रहत शांति दोसर ठाम, अहाँकेँ दुनिया भरिक रहत शांति मुदा नहि रहत कोनो दायित्व। जाति-पाति जाति-पाति धर्म-संप्रदाय लऽ कए जाधरि एक-दोसराकेँ देखए नहि चाहबै ताधरि अहाँक कल्याण नहि होएत जखन अहाँ जनैत छी कर्मक आधारसँ बाँटल गेल रहए जातिक भेद तखन अहाँक ई आक्रोश-हाक्रोस आ ई तामस वा चिचियाएब देखि कऽ हँसी अबैत अछि हमरा जहि जुगमे जेकरा जे नीक लागल एहने धर्म वा संप्रदाय बनौने छैक जकरा जाहिसँ चित्त जुड़ल तहिसँ जुड़ल जकरा जाहिसँ चित नहि जुड़ल से नहि जुड़ल ओहिनामे अहाँ जे दोसराकेँ गारि-फज्जति करैत छी ओहिसँ केकरो नहि खाली अप्पन चिन्हास बतबैत छी। एक धूर जमीन एक धूर जमीनक लेल जे अहाँ चिचिया रहल छी की सोचैत छी अहाँ संगे लऽ जाएब एक धुर जमीन सँ किछु नहि होएत साल आकि हजार सालसँ जमीन ओही ठाम छैक आइ छी अहाँ काल्हि नहि रहब जे अहाँक जमीन छेकने छथि ओ सेहो नहि रहताह मरलाक बाद चारि हाथ जमीन चाही अंतिम संस्कार लेल तकरा बाद सब छी माटि तखन एक धूर माटि लेल कथीले मरैत छी कथीले चिचियाइत छी कथी लेल मन मलिन करैत छी तँ सुनु, नहि करू एहि माटि लेल हाए-हाए कोनो एहन काज करू माटि आकि सभक करेजमे बैसि जाऊ। चंद्रमुखी अंगप्रदेशक लोक नहि जनैत अछि चंद्रमुखीकेँ सुखी अछि जे सभ कियो ओकरा नहि जनैत अछि दुखी अछि जे कियो ओकरा जनैत अछि जे जनैत अछि शरतचन्द चट्टोपाध्यायकेँ देवदासकेँ ओ जनैत अछि जनैत छैक सेहो अंगप्रदेशकेँ अंगप्रदेशक निवासी छलीह चंद्रमुखी नगरवधू नहि मुदा ओकरोसँ कम नहि छलीह जोगसरमे हुनकर कोठा छल शरतचन्द गेलाह हुनकर संग चंद्रमुखीक आत्मा अंगप्रदेशकेँ छोड़ि देलक आब नहि ओ ठाम नहि ओ ठौर जे पारो आकि देवदासकेँ जनैत अछि चंद्रमुखीक तकलीफ जनैत अछि जे नहि जनैत अछि अनठेने अपनेमे रमल अछि। मिथिला हमर देश मिथिला हमर देश अछि हमर रग-रगमे मिथिलाक पानि आ हवा बसल अछि तहिसँ जखन मोन पड़ैत अछि बड़ाइ कऽ दैत छी निंदा करबासँ पाछुओ नञि रहै छी ई मिथिला हमर जन्मस्थान छी ई मिथिला हमर पूर्वजक पहिचान छी नीक वा अधलाह ई मिथिला हमरेसँ नाम छी अहाँ जेहन करब काज अहाँ जेहन संस्कार पाएब अहाँ जेहन संस्कार देब ओहीसँ मिथिलाक जान छैक से नहि ओहेन काज करू से नहि ओहेन आस करू जकरासँ नहि मात्र मैथिल आ मिथिलाक वासीक मोनकेँ ठेस लागै। वंशक चिराग गाम-घरक जखन हालचाल जनैत छी सुनैत छी फलनां मातृकमे अछि नाना-नानीक संग कोनो घर नहि भेटत जे अपन बुत्तापर अपन बच्चाक पालन-पोषण कs सकत दैत छी गप लिअ लपालप फकड़ा लहालोट सभ घरे-घर भेटताह दस मिनटक मजा आ तकर सजा माइ आ मातृकक लोक भोगता जखन अहाँ जमाए बनि सासुरमे अधिकार करैत छी तखन अपन कर्तव्यकेँ किए बिसरि जाइत छी अहाँ देने छी बच्चाकेँ जन्म अहाँक वंशक चिराग अछि ओ अपनहिसँ पालन-पोषण करहिमे संतुष्टिक लेल करहि परत मेहनत दिनराति एक। फूसि आ सत फूसि, फूसि आ फूसि एकटा नुकाबै लेल हजार टा फूसि बाजए पड़त मुदा सत गपमे ई गप किए नहि होइत अछि एहन होइत अछि एकटा सत बाजबाक संग हजार सत आगू आबैत अछि एहन लोक मे दूइ टा गप होइत अछि सत आकि फूसि अहाँ कोन दिस ठाढ़ छी वा होएब ई अहाँक विवेक, बुद्घि वा निर्णयक क्षमतापर अछि ई गप सत अछि जे फूसिक महल भुरभुरा कऽ खसि जाएत सत्तक एकहि झोंकसँ। बिकाइत छैक कहियो अहि देशमे कमला बिकाइत छथि खबर छपलाक बाद बबेला मचि गेल छल राजस्थानक कमला एक महीससँ कम दाममे बिका गेल रहथि लोक वेद एकटा स्त्रीगणक बिकेबापर कतेक हल्ला केलन्हि आइ स्मरणमे अछि ओ गप मुदा एखनो मिथिलाक पुरुषक दशा देखियऊ लड़कीसँ ब्याह नहि करैत छथि दहेजक नामपर बिका जाइत छथि लड़कीक बाप हाथे। महागरीब एक दिनक गप अछि छोटका नुनू आ भौजीमे बाताबाती भs गेल भौजी कहलखिन ई धुर, अहाँ सभ गरीब छी नहि अछि मकान नहि भेटैत अछि भरि पेट भोजन हमर नहियरक गप किछु आओर अछि छोटका नुनूकेँ नहि रहल गेल ओहो किए पाछू रहितथि मिथिलाक बड़का गपाष्टकमे डुबकी लगौने कहलखिन सुनू भौजी, सभ बाप अपन बेटीक ब्याह अपनसँ ऊँचमे करैत छैक जे हम गरीब छी तँ अहाँक नहियर अछि महागरीब। चुनावक गप चुनावक मौसम आबि गेल सभटा नेता जे चुनावक मैदानमे ठाढ़ होइत छथि अपन सम्पतिक लेखा लोकक आगू रखैत छथि केकरो एकटा वाहन नहि केकरो अप्पन मकान नहि कियो एहनो अछि जेकरा लग छैक कुबेर सनक सम्पति मुदा आम जनताक दिससँ हम पुछैत छी ओहि सम्पतिक लेख-जोखमे कतेक सत रहैत छैक कतेक फूसि अदालतमे तँ धर्मग्रंथक शपथ खाए फूसि बाजल जा रहल छै सहस्राब्दीसँ। पप्पू केकरा देत वोट दिल्लीमे एहि बेर एकटा नाराक खूब प्रचार-प्रसार भए रहल अछि “पप्पू कान्ट वोट”, माने ई जे जे चुनावमे वोट नहि दैत अछि ओ “पप्पू” अछि माने ई जे जे चुनावमे वोट नहि दैत अछि हुनका अपन अधिकारक आ कर्तव्यक ज्ञान नहि अछि एकर मतलब ई भेल इलेक्शन कमीशनकेँ पता छैक जे बेसी लोक अपन अधिकार आ कर्तव्यसँ विमुख अछि तहिमे विज्ञापन वा प्रचारक की जरूरति जेकरा ई ज्ञान नहि छैक जे हम की करी एकरासँ लोकतंत्रपर की फर्क पड़त ओहिनो पागल वा दिवालियाकेँ वोट देबाक अधिकार नहि छैक एहि लोकतंत्रमे। नहि करू घोषणा जहियासँ होश सन्हारने छी देखैत छी सभ चुनावमे हम नेताजीकेँ करैत घोषणा सड़क बनबा देब, घर बनबा देब, रोजगारक सुविधा घर-घर पहुँचा देब आर तँ आर एक टकामे चाउर भेटत सभकेँ एहन दिवास्वप्न देखाबैत छथि नेताजी जे हुनकर सरकार की आओत राइते-राइत दुनिया बदलि जाएत साठि साल भऽ गेल भारतकेँ लोकतंत्र बनल साठि साल भए गेल नेताक आश्वासनमे जीब जागू जनता-जनार्दन जागू एक बेर कहियौ एहि नेता सभकेँ अहि बेर नहि दियौ कोनो आश्वासन नहि करियौ कोनो घोषणा हुनकासँ एतबे टा कहियौ जे अहाँक पार्टी पछिला बेर तक जेतबा घोषणा कएने अछि ओहि टा केँ पूरा कए दियौ एतबे टा पूरा करैत युग बीत जाएत एक खाढ़ीक नेता की करत दोसर खाढ़ीक नेता ओहि घोषणाकेँ पूर्ण करत कए सकत आकि नहि एकरोमे संदेहे। दिअए पड़त वोट लोकतंत्रक लेल ई बड़ लाजक विषए छैक जे चुनावक मौसम आबैक संग नेता आ गधामे कोनो अंतर नहि रहि जाइत अछि जहि उम्मीदवारकेँ जेहि दलसँ टिकटक जोगार लागैत छैक ओहि दल सन रंगमे रंगि खोल ओढ़ि लैत अछि नहि कोनो भरोस, नहि कोनो सम्मान बस जनताकेँ मूर्ख बनाबैत छैक ई नेता गिरगिटो एतेक तेजीसँ अपन रंग नहि बदलैत छैक जेना नेता बदलैत छैक पार्टी वा सिद्धांत आब समय आबि गेल नेताकेँ सिखाबए पड़त सबक जनता जखन जागत तखन ई गप हएत संभव एकरा लेल अपन अधिकारक प्रयोग कए दिअ पड़त वोट। बदलि गेल वैशाली वैशाली छल पहिल गणतंत्र जतए जनता द्वारा जनताक आ जनतापर शासन छल सहस्राब्दीक बाद जखन एक बेर तथागत देखैले एलखिन एहि भारतवर्ष लाज आ तामससँ घामे-पसीने भए गेलाह एक गोटेसँ पुछलखिन की रौ एहि भारतवर्षमे लोकतंत्र छैक हमर समयमे अहि ठाम रहैक वैशाली, जतए छल गणतंत्र तथागत अपन गप जाधरि खतम करितथि एकटा लोक कहि देलखिन हुजूर एतए लोकतंत्रक परिभाषा बदलि गेल आब एहि लोकतंत्रमे जनताकेँ बिसरि जाऊ गोली-बारूद द्वारा गोली बारूदक आर गोली बारूदपर शासन होइत छैक एहि वैशालीमे। सपना अपूर्णे रहि गेल आकाश मंडल साफ सूर्यक ताप मध्यम-मद्धिम नीक लोकक एकटा फूटे रोमांसक भाव आबैत रहैत ओहि दिन जखन हम आ अहाँ एक-दोसराक आलिंगनमे एकाकार भेलहुँ सूर्यक ताप कम भए गेल वायुक वेग उद्वीग्न भए गेल एक-दोसराकेँ निङहारैत उज्जवल करैत दुइ साँस एक भए गेल एक दोसरामे पूर्णरुपेण एकीकृत होएबाक लेल रोआं-रोआं पुलकित छल मुदा, जना सूर्य आ चांद, अकास आ धरती एक नहि होइत अछि तहिना हमर सपना अपूर्णे रहि गेल आ सभटा लोक चिर निद्रामे आलीने रहि गेल। सामाजिक प्राणी पहिलुक बेर अहाँसँ भेल जखन भेंट नहि अहाँमे एहन किछु गुण भेटल जकरा मोन राखितहुँ मुदा आस्ते-आस्ते सबंध प्रगाढ़ भेल नहि रहलौं हम आ अहाँ अनचिन्हार कने-कने कए एक दोसराकेँ चिन्हलहुँ सुख-दुखमे संग काज-बेकाजक गप सभटा सहभागी भेल दिन होइत वा राति जखन मोन पड़त तखने फोनसँ गप भए जाइत छैक जीवनक यात्रा कखन धरि साथ चलत कियो नहि जानैत छैक मुदा एक टा गप मानैये पड़त जे मोनक कोनो कोन एक-दोसरक बिना खाली छैक अरस्तु कहने रहैक "मनुख एक टा सामाजिक प्राणी छी" तहिसँ सामाजिकताक विचार करी हम दूर-दूर छी नहि जानि कहिया एक भेल रहितहुँ। जीवनक पथिक हम जीवनक पथिक छी जहिना रेलगाड़ी चलैत काल अपन पाछाँ प्लेटफ़ार्मकेँ छोड़ैत चलैत छैक तहिना जीवनमे पड़ाव आबैत रहैत छैक अहाँ हमरा लेल जीवनक कोनो पड़ावपर नीक केलहुँ वा अधलाह हम अहाँक लेल अधलाह केलहुँ वा नीक जखन हम वा अहाँ एक बेर शांत मस्तिष्क आ शांत हृदएसँ सोचबै वा सोचब जखन विकट परिस्थितिक सामना करए पड़त तखन जे दोषी होइत ओ अपन चेहरा अएनामे नहि देखि सकत अपनाकेँ कहियो माफ नहि कए सकत मुदा, हे पथिक ओहि काल हुनकर हाथमे किछु नहि रहत नहि ओहि ठाम नहि हाथपर समए। गामक गप एक युगमे होइत छैक बारह बरख आ एक बरखमे होइत अछि तीन सए पैंसैठ दिवस एक दिवसमे होइत छैक चौबीस घंटा एक घंटामे होइत अछि साठि मिनट हम कोनो अहाँकेँ गणित आ समएक हिसाब-किताब नहि बुझा रहल छी हम जोड़ि रहल छी कतेक समएसँ गाम नहि गेलहुँ आधा युग बीति गेल गाम गेना जहि दिवससँ बाहर अएलहुँ शहरक रंग-ढ़ंगमे रंगि गेलहुँ सोचैत छी हम एतहि बदलि गेलहुँ ओ गाम कतेक बदलल होइत छोटका काकाक द्वारपर आबो लागैत हेतै घूर दलानपर बैठकीमे होइत हएत सभ शामिल सूर्य उगलासँ पहिनहिये सभ जाइत हेतै लोटा लऽ कए दतमैनसँ मुँह आबो धोइत हएत आकि नहि गामक लोक पाँच बरखमे सरकार बदलि जाइत छैक गामक लोकमे सेहो परिवर्तन भेल हएत लकड़ी-काठीसँ चुलही जरैतत हेतै आकि नहि बभनगमावाली भौजी चाएपत्ती मांगइले आबैत हेतै आकि नहि गोबरसँ घर-द्वार नीपाइत हेतै आकि नहि दरबज्जापर माल-जालक टुन-टुन बाजैत हेतै आकि नहि ई सभ सोचैत काल हम एक-एक गपक तुलना करैत छी शहरसँ गाम आ शहरमे फर्क भऽ गेल छैक जमीन आ आसमानक मुदा, सभ किछु गाममे बदलि गेल नहि बदलल छैक तँ आत्मीयता। बच्चा नीक छै ई बच्चा नीक छै कतेक नीक तकर मापदण्ड नहि कोनो सुसंस्कृत-संस्कारवान छै कतेक तकरो पैमाना नहि छै बेसी बजै नहि छै दुनियादारीक नव वस्तुकेँ बूझाबक इच्छा नहि छै ताहि लेल ई बच्चे नीक छै माएकेँ दूध पिएबाक लेल तंग नहि करैत छै नहि भेटैत छैक तखनो चुप्पे छै आ ताहि लेल ई बच्चा नीक छै दुनियाक फ्रीसानी देखि कऽ अपन दुखक सोचि कए ई बच्चा कानब बिसरि गेल ताहि लेल ई बच्चा नीक छै माए-बापक झगड़ा देखि कए घरमे अशांतिसँ घबराएल ई बच्चा केकरो किछु नहि कहैत छै ताहि लेल ई बच्चा नीक छै जे रटाएब से रटत अपन दिमागसँ किछु नहि पूछत किताबी कीड़ा छै ई बच्चा ताहि लेल ई बच्चा नीक छै सोचैक क्षमता नहि छै माए-बापसँ पूछि कए करैत अछि सभ काज ताहि लेल ई बच्चा नीक छै दुधमुँहा बच्चा जेना नहि किछु बाजैत अछि ई नहि किछु काज करैत अछि आ ताहि लेल ई बच्चा नीक अछि। जिनगी एकटा तमाशा जिनगी एकटा तमाशा छै कखनो उतार कखनो चढ़ाव कहियो खुशी कहियो गम एकरे नाम जिनगी छै जिनगी एकटा तमाशा छै केकरो जीतपर केकरो दुःख केकरो हारिपर ककरो सुख सुख-दुखक सार जिनगी छै जिनगी एकटा तमाशा छै एक ठाम फेल तँ दोसर ठाम पास पास-फेलक झमेला जिनगी छै जिनगी एक तमाशा छै केकरो कानलासँ हँसब केकरो हँसबासँ कानब हँसबाक-कनबाक खेल जिनगी छै। स्त्रीगण स्त्रीगणकेँ दोसर दर्जाक मानलासँ पुरूष समाजकेँ की भेटैत छैक किछु संतुष्टि किछु घमंड सोचैत छी हमहीं सर्वश्रेष्ठ मुदा एहि फुसियाहीक गपसँ नहि किछु भेटत केकरो दुःख दऽ कऽ अहाँकेँ सुख भेटैत अछि ? तँ सुन लिअ एकटा गप अहाँ कहियो सुखी नहि रहब स्त्रिगणसँ सीखू सामंजस्य बनाबैक लेल प्रबंधनक गप आ धैर्यक क्षमता कहबामे ई सभ छोट गप लागैत अछि मुदा अहाँकेँ क्षमता नहि अछि जे नौ मास एक जीवनक भार साधी भोरसँ साँझ धरि भनसाघरमे रंग-बिरंगक तीमन बना सकब कतबो दियौ तर्क कलेजापर हाथ धरि कऽ एक बेर सोचब अहाँ आ एक स्त्रिगणक क्षमतामे अन्तर हृदए ओ दिमाग खुजि जाएत अहाँक घमंड चिर्री-चोंथ भऽ जाएत अहाँकेँ मानहि पड़त तुच्छ छी अहाँ दोसर दर्जाक तँ अहाँ छी अपन कमी नुकाबैले धक्कममुश्ती करैत छी। सभ्य समाज तथाकथित सभ्य समाजमे प्रेम करैक अधिकार नहि छैक लोककेँ अहाँ प्रेम करबै तँ घरसँ बारल जाएब समाजमे प्रतिष्ठा खत्म भए जाएत अहाँ होएब घृणाक पात्र अहाँ माएसँ प्रेम कए सकैत छी अहाँ पितासँ प्रेम कए सकैत छी अहाँ बहिनसँ प्रेम कए सकैत छी अहाँ भाइसँ प्रेम कए सकैत छी अहाँ घरसँ प्रेम कए सकैत छी अहाँ पढाइसँ प्रेम कए सकैत छी अहाँ करियरसँ प्रेम कए सकैत छी अहाँ कुकुड़सँ प्रेम कए सकैत छी मुदा नहि कए सकैत छी प्रेम स्वर्णिम भविष्यक लेल आन जातिक युवक वा युवतीसँ ई सभ्य समाजक परिभाषा छैक माए-बापक पसिनसँ ब्याह करू माए-बापक पसिनसँ प्रेम करू माए-बापक पसिनसँ बच्चा जनमाऊ। नीक लोक नीक लोक ओ जे रहैत अछि इमानदार बेइमानी जखन धरि रहैत अछि नुकाएल नीक लोक ओ जे रहैत अछि सत्यवादी पकड़ल नहि जाइत छैक जखन धरि झूठ नीक लोक ओ जे रहैत अछि संस्कारी जखन धरि आगू नहि आबैत छै राक्षसी प्रवृति नीक लोक ओ जे रहैत अछि विश्वासी जखन धरि मुँह नहि खोलैत अछि धोखा पाओल लोक नीक लोक ओ जे नहि करत अश्लील गप जखन धरि आगू नहि आबैत अछि कामुक प्रस्ताव नीक लोक ओ जे करत लोक संग मीठ गप जखन धरि आगू नहि आबैत छैक प्रताड़ित पत्नी। हम हुनकर छी हम हुनकर छी जिनकासँ रूप आ रंग पेने छी हम हुनकर छी जिनकासँ संस्कार आ मर्यादा पेने छी हम हुनकर छी जिनकासँ अक्षर आ शब्द पेने छी हम हुनकर छी जिनकासँ कदम आ ताल पेने छी मुदा हम हुनकासँ अलग छी जिनकर ओछपन आ सतहीपन आत्माक आगू खसबाक लेल मजबूर करैत अछि। गप नहि मानलहुँ अहाँ दोषी छी अहाँ अपराधी छी अहाँ चोर छी अहाँ अभागल छी अहाँ देशद्रोही छी अहाँ स्वार्थी छी ई गप हम नहि काल कहि रहल अछि ई गप हम नहि इतिहास कहि रहल अछि ई गप हम नहि अहाँक आत्मा कहि रहल अछि अहाँ कहियो आत्माक गप नहि मानलहुँ समाजक फूसि प्रतिष्ठाक पाछु भागैत रही ताहि लेल छी दोषी अहाँ कहियो आत्माक गप नहि मानलहुं फूसि ठाठ-बाट लेल औनाइत जीलहुँ जिनगी ताहि लेल छी अपराधी अहाँ कहियो आत्माक गप नहि मानलहुँ स्वयंकेँ नीक कहबाक लेल अपन शान्ति चोराबैत छी ताहि लेल छी चोर अहाँ कहियो आत्माक गप नहि मानलहुँ स्वयंकेँ भाग्यवादी देखबाक लेल अभागल बनल रही ताहि लेल छी अभागल अहाँ कहियो आत्माक गप नहि मानलहुँ देश सेवाक आगि रहैत मुदा देशकेँ लुटलहुँ ताहि लेल छी देशद्रोही अहाँ कहियो आत्माक गप नहि मानलहुँ समाजक सेवा करैत-करैत अपन सेवा करए लगलहुँ ताहि लेल छी स्वार्थी। मन पड़ैत अछि मन पड़ैत अछि पापाक डांट जखन हम नहि पढ़ैत रही मन पड़ैत अछि पापाक स्नेह जखन हम सभटा टास्क पूरा कए लैत रही मन पड़ैत अछि पापाक संग घूमब जखन भोर-साँझ टहलइले जाइत रही मन पड़ैत अछि पापाक चौकीपर सुतब जखन थाकि गेलापर जाँतैत आ तेल लगाबैत रहथि पापा पापा एखनो बिगड़ैत छथि आ स्नेह करैत छथि एखनो घुमाबएले लऽ जाइत छथि आ चौकीपर सुतैत छथि मुदा हम आइ गाममे नहि छी। माएक तपस्या बच्चाकेँ जनम देब तपस्या अछि माएक लेल एहिसँ बेसी कठिन तपस्या छैक जखन तीनटा बेटी रहए आ घरक लोक हुअए रूढिवादी मिथिलाक सभ घरमे एहन माए भेटत जकरा एकटा बेटाक लेल पति, ससुर आ साउस करैत रहैत छैक नाकोदम अशिक्षाक मारल समाजक लोक बेटीक नहि बुझए मोल बेटा भेलापर छाती फुला कऽ घुमैत अछि बेटाकेँ पाबैक लेल मन्दिर-मस्जिद जा कए कौबला माँगैसँ पाछू नहि रहैत अछि बेटी भेलापर सासुरमे कोहराम मचैत छैक प्रसूताकेँ भरि पेट प्रताड़ित करैत छैक मुदा एहन समएमे सुनबा वा बुझबा लेल तैयार नहि छैक आकि बच्चाक जनम एकटा तपस्या छैक महान लोक आम लोकक लेल होइत छैक निअम वा कानून महान लोकक लेल नहि होइत अछि ई सभ किछु आम लोक आम रहि गेल कृष्ण भगवान भए गेल राम भगवान भए गेल अशोक सम्राट भए गेल जान बचाबैक लेल कए दियौ ककरोपर प्रहार तँ भए जाएत मामला दर्ज मुदा महान लोकक जानक खातिर तैयार रहैत अछि हजार जान अपन सुविधानुसार निअम बदलि लैत छथि कानून बदलि लैत छथि ई महान लोक आम लोक करए ई काज तँ भऽ जाएत अपराधी एहि तरहक एही लेल कियो बनि जाइत अछि महान। मनुख आ माल आइ फरियाएल जाए अपना सभ मनुख छी आकि माल किएक तँ दुनूमे छैक जमीन आ आसमानक अंतर एकटा पेटक लेल रहैत अछि ललाइत एकटा परिवारक लेल रहैत अछि कपसैत एकटा फूसि प्रतिष्ठाक लेल करैत अछि छल-प्रपंच एकटा पाइ-कौड़ीक लेल घड़ी-घड़ी करैत अछि नौटंकी एकटा मानसिक संतुष्टि लेल बौराइत अछि दिन-राति एकटा शारीरिक संतुष्टि लेल होइत अछि व्यभिचारी एकटा पएरपर ठाढ़ भेलाक बाद माए-बाप कऽ दैत अछि कात दोसर तँ अछि चारिटा टांगबला अपन पेट भरलाक बाद दैत छैक दोसरकेँ अवसर सभ कियो ओकर सहोदर छथि झूठ लेल प्राण नहि गमबैत अछि दोसर नहि बौराइत अछि मानसिक वा शारीरिक संतुष्टि लेल पएरपर ठाढ़ भेलाक बाद माए-बाप स्वतंत्र कऽ दैत अछि अहिनामे के ककरासँ उत्तम ई कहैक गप नहि अछि मनसँ सोचैत आत्मासँ जाँचैत निश्चित करू जे नीक के? मनुख आकि माल। समाजक ई रूप इहो अछि एहि समाजक चेहरा दिल्लीक बाटपर बत्ती लाल भेलापर इंदौरसँ निजामुद्दीन वा पटनासँ दिल्लीक लेल ट्रेन पकड़बा लेल आ फेर घरक दुआरिपर दस्तक दैत देखबामे आबैत अछि ओ नहि तँ पुरूष अछि आ नहि एकटा स्त्री भरिसक शारीरिक रूपमे मुदा मन वा अभिनयक स्वरूप रहैत अछि अलग-अलग से से हुनकर की नाम देल जाए माएक कोखिसँ इहो लेल जनम भाइ-बहिनक संग पोसाएल-बढ़ल स्कूलमे पढाइक सीढ़ी चढ़ल मुदा फारम भरैत काल खसल भारी बिपैत किएक तँ आपशन छल दू टा स्त्री वा पुरूष तखन शुरू भेल हुनकर सामाजिक बहिष्कार नहि घरक रहल नहि रहल घाटक परिस्थिति सभकेँ जीएब सिखा दैत छैक से देखबामे आबैत अछि बाट सँ लऽ कऽ ट्रेन धरितक। गप शुरू करल जाए फेरसँ गप जतए खत्म भऽ गेल छल अपन गप आ संवाद मुदा एहि बेर ध्यान राखब एकटा गप जे एक-दोसरकेँ स्वाधीन छोड़ब से बेसी नीक होएत बिसरै पड़त के फूसि बाजल छल के सत्यक रस्ता पकड़ने छल विश्वासघात आ पश्चातापक घोंट के पी गेल छल के ककरा देलक ई कष्ट जे अनुभूत तँ भेल मुदा कहल नहि गेल भूगोल आ इतिहाससँ दूर भऽ कऽ एहि समयांतरालमे दुनियाँ बदलि गेल धरतीस चन्द्रमापर पहुँचि गेल लोक खाढ़ी-खाढ़ीढ़ी खत्म भऽ गेल आ नबका लोक आबि गेल आब नोर नहि बहैत अछि आ॓ शब्दक जालसँ ताधरि हृदय मोम नहि बनैत अछि ककरो नोरसँ अनंत कालक स्मृति आइयो सिनेमा जेकाँ आंखिक आगू घुमैत जाइत अछि बिना कोनो ब्रेक आ इंटरवलक नक्सलक नामपर मरि जाइ छथि लोक लहाशक ढेर से गुजारि रहल छथि दिन आ राति डेग-डेग पर बारूदी सुरंग आ बंदूकक नोकक आगू निन्द नहि आबैत छैक लोककेँ जखन ई बात सहस्राब्दीसँ छल इराकसँ लऽ कऽ अफगानिस्तान धरि मनुख नहि छैक ओ मनुख जकरामे एकटा आत्मा छल कहियो आ॓ भऽ गेल अछि मशीन एकटा ओसामा बनि गेल छल अशांतिक प्रतीक दोसर ओबामाकेँ भेटल शांतिक आशामे नोबल एहि युगमे जतए बाट एतेक कंटकाकीर्ण छैक ओतए बिसरल बाट ताकहि पड़त गप शुरू करहि पड़त एक ठां बैसै पड़त एकटा उम्मेदक संग कोन गपसँ खत्म होएत मोनमुटाव बुझाउ जे कखनो धोखा खा सकैत अछि ओ एहि बाटपर। सुतल अछि अनंतकालसँ ओ सुतल अछि अनंतकालसँ एहन नहि जे ओ बेसी थाकल अछि एहनो नहि जे ओ राति भर जागल अछि ओकरा घर वा दफ्तरमे कलह नहि भेल अछि ? ओ सुतल अछि अनंतकालसँ राति भरि करट बदललाक बाद राक्षसी खानपान केलाक बाद देहमे शिथिलता एलाक बाद दू टकाक लेल झूठ-फूसि केलाक बाद अदहा दुनियापर कुचेष्टा केलाक बाद ओ सुतल अछि अनंतकालसँ किएक तँ ओकर मामलाक सभटा गप फूसि अछि सत्यकेँ फूसि वा फूसिकेँ सत्य बना कऽ प्रस्तुत करब छैक आसान किएक तँ ओकरा निन्द नहि अबैत छै सत्यक सोझाँ ओकरा निन्द नहि आबैत छैक कटु सत्य सुनलापर ओ सुतल अछि अनंतकालसँ किएक तँ ओ पढ़ि नहि सकल किएक तँ ओ एहन भक्त अछि जे खाली ‘जी हँ, जी हँ’ करैक अतिरिक्त आ तरबा चटबामे आगू नहि कऽ सकैत अछि कोनो काज किएक तँ सुनि नहि सकैत अछि ओ जे ओ अछि आस्थापर विश्वास कऽ सकत मुदा नहि कऽ सकत सम्वाद तँ आबि गेल अछि ई समए कुंभकर्णी नींदमे सुतल लोककेँ जगैबाक तथ्य आ तर्कक कसौटीपर कसबाक अनपढ़केँ पढ़बाक किएक तँ बुड़बक ज्ञानी कखनो ककरो किछु नहि सुनि सकैत अछि। मुर्दाघर आब हड़ताल नहि होइत अछि कार्यालयमे, फैक्ट्रीमे अपन मांगकेँ लऽ कऽ कोनो शहरमे आब धरना-प्रदर्शन नहि होइत अछि मंत्रालय वा विभागक आगू कोनो मुआवजाकेँ लऽ कऽ कोनो भीड़भाड़बला सड़कपर आब झगड़ा-फसाद नहि होइत अछि चौक-चौराहा वा चौबटियापर अपन अधिकारकेँ लऽ कऽ कोनो मोहल्लामे जखन की एखनो मांग अछि यथावत नहि भेटल एखन धरि केकरो मुआवजा अपन अधिकारेसँ बेदखल कएल जा रहल छथि लोक सब दिश नजरि आबि रहल अछि मुद्दा-मुद्दा स्त्रीक मांग भऽ रहल अछि सून समाजक तथाकथित सफेदपोश ठेकेदार निकालि रहल छथि टाटी घुटि रहल छथि स्त्रीगण, पुरूख जे से, ओ देश, देश नहि जतए मांगकेँ लऽ कऽ मुआवजाकेँ लऽ कऽ अधिकारकेँ लऽ कऽ आ मुद्दाक लेल अबाज नहि उठैत अछि पसरल रहैत अछि निःशब्द मौन ओ लगैत अछि मुर्दाघर। मन पड़ैत अछि कतेक दिन बाद आइ मन पड़ैत अछि रामप्रसाद ओ रामप्रसाद जेकर पिता आ पितामह हमर पितामहक हरबाह छल मन पड़ैत अछि हुनकर हर जकरासँ खेत जोतैत छल भोर आ साँझ ताहि दिन कतेक मन लगैत रहैक गाममे ओहि हरमे जोतैत छल दू टा बड़द बड़दक घंटी आबो बाजैत अछि कानमे मन पड़ैत अछि जखन धान काटि कऽ बोझ राखल रहै आंगन आ दुआरिपर मुदा समए बीतल नहि रहल आब रामप्रसाद नहि रहल आब पितामह नहि रहल आब दुआरिपर हर आ बड़द गाममे ट्रक्टर आबि गेल थ्रेसरसँ आब काज होइत अछि से निन्न नहि टुटैत अछि घंटीसँ आ नहि बोझ रखाइत अछि आंगनमे। समाज अंगरेजीमे एकटा फकरा अछि अहाँ प्रेम कऽ सकैत छी अहाँ घृणा कऽ सकैत छी मुदा अहाँ हमरा नकारि नहि सकैत छी ककरो छोट कहबासँ कियो पैघ नहि भऽ जाइत अछि ककरो चोर कहलासँ कियो हवलदार नहि भऽ जाइत अछि ककरोसँ संबंध बनलासँ कियो संबंधी नहि भऽ जाइत अछि ‘माँ’ शब्द बजलासँ कियो अपन मां नहि भऽ जाइत अछि ककरोसँ नहि बजलासँ कियो बौक नहि भऽ जाइत अछि ककरो निंदा केलासँ कियो प्रशंसाक पात्र नहि बनि जाइत अछि ककरो मित्र नहि बनबै छी तँ कियो दुश्मन नहि बनि जाइत अछि ई सभ गप एकटा प्रहेलिका नहि अछि परिस्थिति अछि समाजक जतए समाज, संस्कृति, परंपरा आ कतेक ‘वाद’क नामपर अपन दोष नुकैबे लेल दोसरकेँ दोषी ठहराओल जाइत अछि सदएसँ। मरलाक बाद अपन देशमे एकटा अछि लतमारा गोसाईं ढेलमारा देवता आ पूजाक स्थान अहिठाम पहिने लात मारल जाइत अछि आ ढेला फेंकल जाइत अछि तकर बाद प्रेमसँ होइत अछि पूजा फकरा अछि मरले गुण की पड़ैले गुण ताहिसँ मरलाक बाद सभ कियो भऽ जाइत अछि देवता जीवित मनुक्खसँ दुश्मनी आ मरलाक बाद एहन नीक जे कहलो नहि जाइत अछि मुदा ई गप नहि ई अछि हमर सभक संस्कार आ विचार बढ़ैत लोकक निंदा करब नीक लोककेँ गारि पढ़ब काज कम बेसी गप देब ई छी हमर सभक संस्कृति आ शिष्टाचार उगैत सूरजकेँ प्रणाम सभ कियो करैत अछि अप्पन देश टामे मनाओल जाइत अछि छठि जाहि मे डूबैत सूरुजक कएल जाइत अछि अराधना मुदा एकरोसँ किछु नहि सीखैत छी हम से डूबैत लोकक काटि लैत छी गरदनि साहित्य, समाज, कला आ राजनीतिक कोनो समाजमे ककरो कियो नहि करत आदर श्राद्धकर्म आ पेट भरि भोज खा कऽ कहत मरलाक बाद अहाँक आत्मा भऽ गेल तृप्त जीवित रहैत जकरा अहाँ नहि सोहाबैत छी ओ कहत अप्पन संस्मरण, कहत अहाँ रही देवता सन अहाँक नाम पर स्थापित होएत संस्था अहाँक नामपर देल जाएत पुरस्कार जीवित रहत अहाँक कृतित्व आ व्यक्तित्व आरोप लगबैत रहै बला लोक गुणगान करत अपन नाम अहाँसँ जोड़त भरल जाएत पन्ना पोथीक छापत अहाँक संगक स्मरण सभ बरख अहाँक मरलाहा दिन कोनो नीक सभागारमे फोटो सजाकऽ फूल-माला चढ़ाकऽ देल जाएत बड़का-बड़का गप आ नोर बहाओत लोक जेना सभसँ बेसी कष्ट हुनका भेल एकर कारण ई जे आब नहि दऽ सकत केकरो गारि ईष्या, द्वेष, झंझट आ छल-प्रपंच सभटा दोष देल गेल जखन रही एहि धरा पर तपस्वी, सुकर्मी आ अनंत विभूषणसँ विभूषित भऽ गेलहुँ जखन बैसल छी अहाँ स्वर्ग वा नरकमे सुनु तात हमर गप अपन काज कम दोसराक काजमे टांग भिड़बैत निंदा-शिकाइत करैत काठपर जड़ैत माटिसँ निकलि कऽ माटिमे मिलैत कतबो गप फेकब इएह छी यथार्थ रहि जाइत अछि अहाँक नीक कर्म आ अहाँक नीक बोल। ओम प्रकाश झा- कियो बूझि नै सकल हमरा (अपन गप, गजल १-८७, रुबाइ- १-८, कता- १-२) अपन गप आइ हम अपने सबहक हाथमे ई पोथी समर्पित करैत बहुत प्रसन्नताक अनुभव कऽ रहल छी। हमर ई पहिलुक प्रकाशित पोथी थिक आ सेहो मैथिली गजलक थिक, ई बात हमरा बहुत आनन्दित करैत अछि। किएक तँ हम आनो विधामे मैथिली साहित्य लिखैत छी, मुदा हम मूल रूपसँ अपनाकेँ गजलकार मानैत छी। हम ओना तँ नेनपनेसँ किछु-किछु लिखैत रहलौं, खास कए तुकबन्दी करबामे हमरा नीक लागैत रहल, मुदा गजलकारक रूपमे हमर उदय मात्र "अनचिन्हार आखर" आ "विदेह"क प्रयास आ सहयोगक परिणाम थिक। तीन गोटे जे बिना कोनो लोभ आ हेतुक ऐ पाछाँ रहलाह अछि, तिनकर उल्लेख कएने बिना हमर प्रयास आ मेहनति निष्फल हएत। ओ तीन गोटे छथि सर्वश्री गजेन्द्र ठाकुर, आशीष अनचिन्हार आ उमेश मंडल। आदरणीय गजेन्द्र भाय द्वारा लिखित मैथिली गजलशास्त्रक अध्ययन करैत रहलापर शनैः शनैः हमरा गजल लिखबाक किछु ज्ञान प्राप्त भेल। संगहि शुरूआती समैमे हमर काफिया आ रदीफक शुद्धिकरणमे हुनकर अपूर्व योगदान रहल छन्हि, जे बिसरनाइ हमरा लेल अपराध हएत। ओहिना आशीष भाय हमरा बहरक दुनियाँमे आनलथि। हुनके प्रेरणा रहलन्हि जे हम शुरूहेसँ बहरमे गजल लिखैत रहलौं। पहिने सरल वार्णिक बहरमे लिखलौं आ बादमे आशीष भाय हमरा अरबी बहरक दुनियाँमे ढुकेने गेलाह। हम अरबी बहरक जे थोड़ बहुत जनतब प्राप्त कऽ सकलौं, ओकर पूरा-पूरी श्रेय आशीष भायकेँ जाइत छन्हि। हुनकर ई ऋण हम कहियो नै उतारि सकैत छी आ हम हुनकर आभारी जिनगी भरि रहए चाहै छी। तेसर महत्वपूर्ण व्यक्ति छथि उमेश भाय, जिनका हम सिनेहसँ डाक्टर साहब कहैत छियन्हि। डाक्टर साहब हमरा मोबाईलसँ फोन कऽ कए जे प्रेरणा दैत रहलाह, से अनुपम छै। ओ सदिखन हमर उत्साह बढ़ाबैत रहलाह आ हुनकर ई अदम्य इच्छा रहलन्हि जे हमर गजलक पोथी प्रकाशित हुए। गजल लिखबा लेल ओ हमरा खूब प्रेरित करैत रहलाह आ संगहि हमर गजलक तत्काल समालोचक बनि कऽ हमर लिखनाइमे सुधार आनबाक प्रयास करैत रहलाह। ई तीनू गोटे हमरा लेल अविस्मरणीय छथि आ सदिखन रहताह। हम अपन पिता आदरणीय श्री पीताम्बर झा आ माता आदरणीया श्रीमती रामकुमारी झाक योगदानक चर्च आवश्यक बूझै छी। हमर बाबूजी सदिखन किछु ने किछु लिखैत रहैत छथि, मैथिली पत्र पत्रिकाक संकलन करैत रहैत छथि आ परम समाजवादी विचारधाराक लोक छथि। हुनकर साहित्य प्रेम आ लेखन हमरामे आनुवांशिक रूपेँ आएल अछि, से हम अनुभव करैत छी। हुनकर समाजवादी सोच आ पूजनीया माताजीक उदारवादी सोच हमरा बड्ड प्रभावित कएने अछि आ हम ऐ प्रभावमे जिनगी भरि रहए चाहै छी। हमरा हुनका सभ दिससँ भेटल संस्कारपर गर्व अछि आ हमर रचना हुनके सभक संस्कारक प्रतिफल अछि, तँए हम हुनका सभकेँ चरण कमलमे अपन रचना समर्पित करैत छी। ई चर्च अधूरा रहि जाएत, जँ हम अपन पहिलुक श्रोता अपन धर्मपत्नी श्रीमती रेखा झाक चर्च नै करी। जखन हम गजल लिखै छी तँ पहिने हुनके सुनाबैत छियन्हि आ ओहो धैर्यसँ सुनि कऽ ओइपर अपन विचार राखैत छथि आ कएक ठाम शब्द सुधारक अनुशंसा सेहो करैत छथि। हमर बियाहक बीस बर्ख भऽ गेल अछि आ एतेक दिनसँ घरक पूरा भार सम्हारि कऽ जे सहयोग ओ हमरा देने छथि, से हुनकर हमरा लेल अपूर्व प्रेम आ ति‍यागक पहि‍चान थिक। हमर साहित्य सृजनक प्रेरक वएह छथि। जखन बहुत दिन धरि नब गजल नै लिखै छी, तखन वएह टोकि दैत छथि जे लिखनाइ किअए बन्न कएने छी। हुनकर ई समर्पण आ प्रेमक प्रतिफल हमर गजल छी। हमर गजल यात्रामे हमर तीनू सन्तान, सुश्री आकांक्षा, सुश्री अदिति आ सुश्री पूर्णिमाक योगदान सेहो कम नै अछि। जखन हम लिखैले बैसैत छी, ई तीनू बहिन हमरा कोनो व्यवधान नै करैत छथि आ जखन लिखनाइ परसँ उठैत छी, तकर बादे अपन समस्या आ जरूरतिसँ हमरा अवगत कराबैत छथि। एकर अलावा "विदेह"क सभ मित्र लोकनिक हम सेहो आभारी छी, जे हमर गजल सभपर अपन प्रतिक्रिया दैत रहलाह आ हमरामे उत्तरोत्तर सुधार आनबाक प्रयास करैत रहलाह। हम अपन विभागीय संगी, कर्मचारी आ अधिकारी लोकनिक सेहो आभारी छी, जे कार्यालय अवधिक बाद हमरा कहियो तंग नै कएलथि, जइसँ हमर लिखब सुगम भेल। नौकरीक बीचसँ समए निकालि कऽ लि‍खि‍‍ लेनाइ हिनके सबहक सहयोगसँ सम्भव भेल अछि। आब हम गजलक विषएमे किछु विचार अपने सबहक समक्ष राखए चाहै छी। गजल करेजक संवेदनासँ जनमैत अछि। संवेदनहीन करेजसँ गजल निकलनाइ सम्भव नै अछि। संगहि गजलक व्याकरणक जनतब सेहो परम आवश्यक अछि। कहबाक मतलब ई अछि जे गजल ओ गाड़ी थिक जकर दूटा पहिया छैक, करेजक संवेदना आ गजलक व्याकरण। गजल लिखबामे काफियाक शुद्धता बड्ड महत्वपूर्ण होइत छै। किएक तँ बिना रदीफक गजल तँ लिखल जा सकैए, मुदा बिना दुरूस्त काफियाक गजल नै भऽ सकैए। काफियाक निअम विस्तृत छैक आ ओकर जनतब हमरा कतेक भेल अछि से निर्णए अहाँ सुधी पाठक लोकनि कऽ सकैत छी। काफिया आ रदीफक बाद बहर अाबैत अछि। बहरक शास्त्र सेहो बड्ड विस्तृत छै। गजलक व्याकरणक विशद वर्णन श्री गजेन्द्र ठाकुरजीक मैथिली गजलशास्त्रमे देल गेल अछि। मोटा मोटी बहरकेँ एकटा शृंखला (पैटर्न)क रूपमे बूझल जा सकैए। कहबाक मतलब जे सभ शेरक सभ पाँतिमे एके मात्रा-शृंखलाक पालन हुए, तँ ओ गजल बहरमे कहल जा सकैए। एकर अर्थ ई भेल जे पहिल शेर (मतला) सँ लऽ कऽ मकता धरि जँ एके मात्रा-क्रमक प्रयोग भेल अछि, तँ ओ गजल बहरमे हएत। मतलब पहिल शेरक पहिल पाँतिमे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग जइ क्रममे भेल अछि, जँ ह्रस्व आ दीर्घक मात्रा वएह क्रममे गजलक सभ पाँतिमे अछि तँ ओ गजल बहरमे कहल जाएत। ओना मैथिलीमे आदरणीय गजेन्द्र ठाकुरजीक द्वारा प्रतिपादित सरल वार्णिक बहर, जइमे गजलक प्रत्येक शेरक सभ पाँतिमे वर्णक संख्या समान राखल जाइत अछि, खूब प्रसिद्ध भेल अछि आ नब गजलकारक शुरूआतमे खूब मददगार सिद्ध भेल अछि। हमहूँ सरल वार्णिक बहरमे गजल लिखनाइ शुरू कएने छलौं आ पोथीक बेसी गजल अही बहरमे अछि। अरबी बहरमे सेहो किछु प्रयास कएने छी आ ई प्रयास कतेक सफल भेल, ई अहीं पाठक लोकनि बता सकैत छी। हम ऐ बातक समर्थक छी जे गजलक नीचाँमे अरबी बहरक नाओं वा जँ गजल सरल वार्णिक बहरमे अछि तँ वर्णक संख्या अबस्स लिखबाक चाही। तँए हम सभ गजलक नीचाँमे बहरक नाम वा वर्णक संख्याक उल्लेख कएने छी। हम एखनौं सीखिये रहल छी, तँए बहर, काफिया आ रदीफक दोख किछु ठाम भाइयो सकैए। अहाँ सुधी पाठक लोकनि जँ ऐसँ अवगत कराएब तँ हमरा अतीव प्रसन्नता हएत, किएक तँ हम अपन गलतीकेँ सुधारैत आगाँ आरो नीक गजल लि‍खि‍ सकब। संवेदनात्मक रूपमे हम कतेक सफल भेल छी, ईहो निर्णए अहीं सभ कए सकैत छी। -ओम प्रकाश झा गजल- १ भीख नै हमरा अपन अधिकार चाही हमर कर्मसँ जे बनै उपहार चाही कान खोलि कऽ राखने रहऽ पड़त हरदम सुनि सकै जे सभक से सरकार चाही प्रेम टा छै सभक औषध एहिठाँ यौ दुखक मारल मोनकेँ उपचार चाही सभ सिहन्ता एखनो पूरल कहाँ छै हमर मोनक बाटकेँ मनुहार चाही "ओम" करतै हुनकरे दरबार सदिखन नेह-फूलसँ सजल ओ दरबार चाही (बहरे-रमल) गजल- २ रमजान आ ईदक शुभ अवसरपर प्रस्तुत कऽ रहल छी एकटा गजल। ऐ गजलक प्रेरणा हम एकटा प्रसिद्ध कव्वालीसँ लेने छी। मदीनाक मालिक अहाँ ई करा दिअ करेजा हमर बस मदीना बना दिअ हमर मोन निश्छल भऽ गमकै धरा पर कृपा एतबा अपन हमरा पठा दिअ बनै सगर दुनियाँ खुशी केर सागर सभक ठोर एतेक मुस्की बसा दिअ दया केर बरखा करू ऐ पतित पर मनुक्खक कते मोल हमरा बता दिअ दहा जाइ दुनियाँ सिनेहक नदीमे अहाँ "ओम"केँ प्रेम-कलमा पढ़ा दिअ (बहरे-मुतकारिब) गजल- ३ प्रस्तुत कऽ रहल छी हम अपन पहिल बाल गजल। ई गजल एकटा बाल मजदूरक पीड़ापर आधारित अछि। करबा नै मजूरी माँ पढ़बै हमहूँ नै रहबै कतौ पाछू बढ़बै हमहूँ हम छी छोट सपना पैघ हमर छै गे कीनब कार जकरा पर चढ़बै हमहूँ टूटल छै मड़ैया आस मुदा ई छै सोना अपन छत कहियो मढ़बै हमहूँ चारू कात पसरल दुखक अन्हरिया छै कटतै ई अन्हरिया आ बढ़बै हमहूँ पढ़ि‍-लिख खूब सबतरि नाम अपन करबै जिनगी "ओम" सुन्नर ई गढ़बै हमहूँ (मफऊलातु-मफाऊलातु-मफाईलुन) गजल- ४ कहू की कियो बूझि नै सकल हमरा हँसी सभक लागल बहुत ठरल हमरा कियो पूछलक नै हमर हाल एतय कपारे तँ भेटल छलै जरल हमरा करेजासँ शोणित बहाबैत रहलौं विरह-नोर कखनो कहाँ खसल हमरा तमाशा बनल छी अपन फूँकि हम घर जरैमे मजा आबिते रहल हमरा रहल "ओम" सदिखन सिनेहक पुजारी इ दुनियाँ तँ ‘काफिर' मुदा कहल हमरा (बहरे-मुतकारिब) गजल- ५ तकियो कनी कानैए उघारल लोक गाड़ब कते दुखमे बड्ड गाड़ल लोक धरले रहत सभ हथियार शस्त्रागार बनलै मिसाइल भूखे झमारल लोक छै भरल चिनगीये टा करेजा जरल अहुँकेँ उखाडत सभठाँ उखाड़ल लोक लोकक बले राजभवन इ गेलौं बिसरि खाली करू आबैए खिहारल लोक माँगी अहाँ "ओम"क वोट मुस्की मारि पटिया सकत नै एतय बिसारल लोक (बहरे-सलीम) गजल- ६ नैनक छुरी नै चलाबू यै सजनियाँ कोना कऽ जीयब बताबू यै सजनियाँ नै चोरि केलौं किया डरबै हम-अहाँ सुनतै जमाना सुनाबू यै सजनियाँ छी हम पियासल अहाँ प्रेमक धार छी आँजुरसँ हमरा पियाबू यै सजनियाँ बेथा करेजक किया नै सुनलौं अहाँ हमरासँ नेहा लगाबू यै सजनियाँ छटपट करै प्राण तकियो एम्हर अहाँ "ओम"क करेजा जुड़ाबू यै सजनियाँ (बहरे-सगीर) गजल- ७ मोनक आस सदिखन बनि कऽ टूटैत अछि किछु एना कऽ जिनगी हमर बीतैत अछि मेघक घेरमे भेलै सुरूजो मलिन ऐ पर खुश भऽ देखू मेघ गरजैत अछि हम कोना कऽ बिसरब मधुर मिलनक घडी रहि-रहि यादि आबै मोन तड़पैत अछि देखै छी कते प्रलाप बिन मतलबक चुप अछि ठोढ़ बाजै लेल कुहरैत अछि मुट्ठीमे धरै छी आगि दिन-राति हम जिदमे अपन "ओम"क हाथ झरकैत अछि (बहरे-कबीर) गजल- ८ जीनाइ भेलै महँग एतय मरब सस्त छै महँगीक चाँगुर गड़ल जेबी सभक पस्त छै जनता ढुकै भाँड़मे चिन्ता चुनावक बनल मुर्दा बनल लोक नेता सभ कते मस्त छै किछु नै कियो बाजि रहलै नंगटे नाच पर बेमार छै टोल लागै पीलिया ग्रस्त छै खसि रहल देबाल नैतिकताक नित बाटमे आनक कहाँ लोक अपने सोच मे मस्त छै चमकत कपारक सुरूजो आस पूरत सभक चिन्तित किया "ओम" रहतै भेल नै अस्त छै (बहरे-बसीत) गजल- ९ धारक कात रहितो पियासल रहि गेल जिनगी हमर मोनक बात मोनहि रहल दुख सहि गेल जिनगी हमर मुस्की हमर घर आस लेने आओत नै आब यौ पूरै छै कहाँ आस सबहक कहि गेल जिनगी हमर सीखेलक इ दुनियाँ किला बचबै केर ढंगो मुदा बचबैमे किला अनकरे टा ढहि गेल जिनगी हमर पाथर बाट पर छी पड़ल हमरा पूछलक नै कियो कोनो बन्न नाला जकाँ चुप बहि गेल जिनगी हमर जिनगी "ओम" बीतेलकै बीचहि धार औनाइते भेटल नै कछेरो कतौ बस दहि गेल जिनगी हमर (बहरे मुक्तजिब) गजल- १० करेज घँसैसँ साजक राग निखरै छै बिना धुनने तुरक नै ताग निखरै छै अहाँ मस्त अपनेमे आन धिपल दुखसँ जँ लोकक दर्द बाँटब लाग निखरै छै इ दुनियाँ मेहनतिक गुलाम छै सदिखन बहै घाम जखन सुतल भाग निखरै छै हक बढै केर छै सबहक इ नै छीनू बढ़त सभ गाछ तखने बाग निखरै छै कटऽ दियौ "ओम"क मुड़ी आब दुनियाँ ले जँ गाम बचै झुकैसँ तँ पाग निखरै छै (बहरे-हजज) गजल- ११ कहैए राति सुनि लिअ सजन आइ अहाँ तँ जेबाक जिद जूनि करू इ दुनियाँक डर फन्दा बनल इ बहाना बनेबाक जिद जूनि करू अहाँ बिन सून पड़ल भवन बलम रूसल किया हमरासँ हमर मदन अहाँ नै यौ मुरूत बनि कऽ रहू हमरा हरेबाक जिद जूनि करू इ चानक पसरल इजोत नस-नसमे ढुकल मोनक नेह छै जागल सिनेहसँ सींचल हमर नयन कहल अहाँ कनेबाक जिद जूनि करू अहाँ प्रेम हमर जुग-जुगसँ बनल हम खोलि कहब अहाँसँ कहिया धरि अहाँ संकेत बूझू सदिखन इ गपकेँ कहेबाक जिद जूनि करू कहै छै मोन "ओम"क पाँति भरल प्रेमसँ सुनि अहाँ चुप किया छी इ नोत कते हम पठैब उनटा गंगा बहेबाक जिद जूनि करू (बहरे-हजज) गजल- १२ हमर मुस्कीक तर झाँपल करेजक दर्द देखलक नहि इ जमाना सिनेहक चोट मारूक छल पीड़ा जकर बूझलक नहि इ जमाना हमर हालत पर कहाँ नोर खसबैक फुरसति ककरो रहल कखनो कहैत रहल अहाँ छी बेसम्हार मुदा सम्हारलक नहि इ जमाना करैत रहल उघार प्रेमक इ दर्द भरल करेज हमरा सगरो हमर घावक तँ चुटकी लैत रहल कखनहुँ झाँपलक नहि इ जमाना मरूभूमि दुनियाँ लागैत रहल सिनेहक बिला गेल धार कतौ करेज तँ माँगलक दू ठोप टा प्रेमक किछ सुनलक नहि इ जमाना कियो "ओम"क सिनेहक बूझतै कहियो सनेस पता कहाँ इ चलै करेजक हमर टुकडी छींटल मुदा देखि जोड़लक नहि इ जमाना (बहरे-हजज) गजल- १३ कतौ बैसारमे जँ अहाँक बात चलल तँ हमर करेजमे ठंढा बसात चलल विरह देख हमर झरल पात सभ गाछसँ सनेस प्रेमक लऽ गाछक इ पात चलल मदन-मुस्कीसँ भरल अहाँक अछि चितवन करेजक दुखक भारी बोझ कात चलल बुझाबी मोनकेँ कतबो इ नै मानै अहीं लेल सभ आइ धरि शह-मात चलल छल घर हमर इजोतसँ भरल जे सदिखन जखन गेलौं अहाँ, "ओम"क परात चलल (बहरे हजज) गजल- १४ किछ हमर मोन आइ बस कहऽ चाहैए अहींक बनि कऽ सदिखन तँ इ रहऽ चाहैए इ लाली ठोरक तँ अछि जानलेवा यै अछि इ धार रसगर संग बहऽ चाहैए अहाँ काजर लगा कऽ अन्हार केने छी बरखत सिनेह घन कखन दहऽ चाहैए अहाँ फेकू नहि इ मारूक सन मुस्की बिना मोल हमर करेज ढहऽ चाहैए बिन अहाँ "ओम"क सुखो छै दुख बरोबरि सभ दुख अहाँक इ करेज सहऽ चाहैए (बहरे-हजज) गजल- १५ मधुर साँझक इ बाट तकैत कहुना कऽ जिनगी बीतैत रहल हमर पहिल निन्नक बनि कऽ सपना सदिखन इ आस टा टूटैत रहल हमर कछेरक नाव कोनो हमर हिस्सा मे कहाँ रहल कहियो कखनो सदिखन इ नाव जिनगीक अपने मँझधार मे डूबैत रहल हमर करेज हमर छलै झाँपल बरफसँ कियो कहाँ देखलक अंगोरा इ बासी रीत दुनियाँक बुझि कऽ करेज नहुँ नहुँ सुनगैत रहल हमर रहैए चान आकाश कखनो उतरल कहाँ आंगन हमर देखू जखन देखलक छाहरि चान मोन तँ ओकरे बूझैत रहल हमर अहाँ कहने छलौं जिनगीक निर्दय बाटमे संग रहब हमर यौ अहाँक गप हम बिसरलहुँ नहि मोन रहि रहि ओ छूबैत रहल हमर (बहरे-हजज) गजल- १६ चलल बाण एहन इ नैनक अहाँक मरलौं हम। सुनगल इ करेज हमर सिनेहसँ बस जरलौं हम। भिड़त आबि हमरासँ औकाति ककरो कहाँ छै जखन-जखन लडलौं हरदम अपनेसँ लडलौं हम। हम उजड़ल बस्ती बनल छी अहाँक इ सिनेह सँ सिनेहक नगर मे सदिखन बसि-बसि उजडलौं हम। हम तँ देखबै छी अपन जोर मुँहदुब्बरे पर कियो जँ कमजोर छल पीचि कऽ बहुत अकडलौं हम। अहाँ डरि-डरि कऽ देखलौं जाहि धार दिस सुनि लिअ सभ दिन उफनल एहने धारमे उतरलौं हम। (बहरे-मुतकारिब) गजल- १७ अहाँकेँ हमर इ करेज बिसरत कोना। छवि बसल मोनमे आब झहरत कोना। हवा सेहो सुगंधक लेल तँ जरूरी बिन हवा फूलक सुगंध पसरत कोना। अहीं टा नै इ दुनियाँ छै पियासल यौ बिन बजेने इ चान घर उतरत कोना। जवानी होइ ए नाव बिन पतवारक कहू पतवारक बिना इ सम्हरत कोना हमर मोन ककरो लेल पजरै नैए बनल छै पाथर करेज पजरत कोना। (बहरे-हजज) गजल- १८ अन्हारक की सुख बुझथिन इ इजोतक गाममे सदिखन रहै वाला। दुखेकेँ सुख बना लेलक करेजक घातक दुख चुपे सहै वाला। जमानाक नजरिक खिस्सा बनलए आब तँ करेज हमर सुनू यौ हुनकर नजरि कहाँ देखलक हमर करेजक इ शोणित बहै वाला कहै छै लाजक नुआमे मुँह नुकौने रहल दुनियाँक डर सँ अपन, इ रीत अछि दुनियाँक तँ एतऽ किछसँ किछ कहबे करतै कहै वाला करू नै प्रकट अपन सिनेह मोनक यैह हमरा ओ कहैत रहल किया हम राखब उठाकेँ समाजक जर्जर रिवाज इ ढहै वाला। अहाँ डेग अपन उठेबे करब कहियो हमर मोनक दुआरि दिसक बहुत "ओम"क बहल नोर दुखक गरम धारमे गाम इ दहै वाला। (बहरे-हजज) गजल- १९ कुशल आबि देख लिअ एतऽ सभटा आँखि नोरसँ भरल छै। विकास कतऽ भेलै विकासक दिस इ बाट चोरसँ भरल छै। चिड़ै सभ कतौ गेल की मोर घूमैत अछि गाम सगरो इ बगुला तँ पंख अछि रंगि कऽ सभा वैह मोरसँ भरल छै। सभ नजरि पियासल छल तकैत आकाश चानक दरसकेँ निकलतै इ चान कहिया आसक धरा चकोरसँ भरल छै। उजाही उठल गाममे नै कनै छै करेज ककरो यौ हमर गाम एखनहुँ खुश गीत गाबैत ठोरसँ भरल छै। कहै छल कियो गौर वर्णक गौरवक एहन अन्हार इ सभ दिस तँ अछि स्याह मोन जखन इ भूमि गोरसँ भरल छै। (बहरे-मुतकारिब) गजल- २० कहि कऽ नै मोनक हम तँ बड्ड भेल तबाह छी बाबू। कहब जे मोनक अहीं बाजब हम बताह छी बाबू। हुनकर गप हम रहलौं जे सुनैत तँ बनल नीक छलौं गप हुनकर हम नै सुनल कहथि हम कटाह छी बाबू। सदिखन रहलथि मूतैत अपने आगि सभकेँ दबने हम कनी डोलि गेलौं ओ कहै अगिलाह छी बाबू। बनल छल काँचक गिलास हुनके मोनक विचार सुनू इ अनघोल सगरो भेलै हम तँ टुनकाह छी बाबू। सचक रहि गेल नै जुग सच कहि कऽ हम छी बनल बुरबक गप कहल साँच तँ अहीं कहब "ओम" धराह छी बाबू। (बहरे-हजज) गजल- २१ टूटि-टूटि कऽ हम तँ जोड़ाइत रहै छी। मोनक विचार सुनि पतियाइत रहै छी। गौरवे आन्हर पड़ल अपने घरारी सदिखन मुँह उठा कऽ अगधाइत रहै छी। हाटमे प्रेमक खरीद करै सभ किया बूझि नै आब तँ हम बिकाइत रहै छी। फहरतै झंडा हमर सभ दिस हवामे एहि आसेँ खूब फहराइत रहै छी। "ओम"क कपार पर कानि कऽ की करत ओ फूसियों हम ताकि औनाइत रहै छी। (बहरे-रमल) गजल- २२ जन-गणक सेवक भेल देशक भार छै जनताक मारि टका बनल बुधियार छै चुप छी तँ बूझथि ओ अहाँ कमजोर छी मुँह ताकला सँ कहाँ मिलल अधिकार छै बिन दाम नै वर केर बाप हिलैत अछि घर मे गरीबक सदिखने अतिचार छै हक नै गरीबक मारियौ सुनि लियऽ अहाँ जरि रहल पेटक आगि बनि हथियार छै झरकल सिनेहक बात "ओम"क की कहू सगरो पसरल जरल हँसी भरमार छै (बहरे-कामिल) गजल- २३ आबि गेलै बहुत मस्ती थोड़बे पीबि कऽ। आब डोलै सगर बस्ती थोड़बे पीबि कऽ। जे करी की करत थौआ भेल छै लोकक खूब हेतै जबरदस्ती थोड़बे पीबि कऽ। चोरबाकेँ चलल डंटा साधु बैसै चुप हैत आगू मटर-गश्ती थोड़बे पीबि कऽ। बाजबै जे मुँहक छै चाहे कहू मातल की कहू छै मुँहक सस्ती थोड़बे पीबि कऽ। आब नेता बनि खजाना लूटबै देशक "ओम"केँ की बढ़ल हस्ती थोड़बे पीबि कऽ। ------------- वर्ण १५ ---------------- वर्ण क्रम I U I I U U U I I I U I I U U गजल- २४ मुस्कीसँ झाँपि रखने छी जरल करेज अपन। सभसँ नुकेने छी दुख भरल करेज अपन। दिल्लगी करै लेल चाही एकटा जीबैत करेज ककरा परसिऐ हम मरल करेज अपन। मोहक जुन्नामे बान्हल हम जोताईत रहै छी देखैत रहै छी मायामे गड़ल करेज अपन। कियो देखै नै तैं केने छी करेजकेँ तालामे बन्न देखबिऐ ककरा आब डरल करेज अपन। कोनो गप पर नै चिहुँकै आब करेज "ओम"क अपनेसँ हम घोंटै छी ठरल करेज अपन। वर्ण १८ --------------- गजल- २५ भूखल पेटक गणितमे ओझराएल लेल ज्ञान की गरीबक सभ दिन एक्के मोहर्रम की रमजान की आँखिमे सपना लेने मरै बला लोकसँ जा कऽ पूछियौ ओकरा लेल की मंदिर-मस्जिद पूजा आर अजान की दैव-दैव कोढ़ि‍या चिचियाबैत हाथ पएर मोडने अपन मेहनति पर जीबू चढै लेल आसमान की जिनगी भरि भरै छी पापक पेटी खूब जोगाड़ लगा पाप नै कखनो पाछाँ छोडत हैत केने गंगा-स्नान की मनुक्ख-मनुक्खमे अंतर करै ओ धर्म नै हमर छी "ओम" लेल छै सभ बरोबरि हिन्दू की मुसलमान की ------------------- वर्ण २० --------------- गजल- २६ कखनो छूबि दियौ हमरो फुलवारीक फूल बूझि कऽ। किया केने छी यै कात हमरा करेजक शूल बूझि कऽ। हमरासँ नीक झूलनियाँ जे बनल अहाँक सिहन्ता हमरो दिस फेरू नजरि झूलनियाँक झूल बूझि कऽ। अहाँक नैनक मस्ती बनल प्रेमक पोथी सभ लेल हमहुँ पढ़ब प्रेम-पाठ अहाँसँ इसकूल बूझि कऽ। बहत प्रेमक पवित्र धार करेज बनत संगम प्रेम छै पूजा नै छोड़ू एकरा जिनगीक भूल बूझि कऽ। प्रेमक घर अहाँक अछि किया फूजल केवाड़ी बिना ठोकि लियौ "ओम"क प्रेम ओहि केवाड़ीक चूल बूझि कऽ। ----------------------- वर्ण २० ----------------------- गजल- २७ हम सभ पूछी अहाँसँ एकेटा सवाल किछ बाजू ने। अहाँ केलिऐ किया देशक एहेन हाल किछ बाजू ने। आसक धारमे हेलैत मनुक्खक कोनो हेतै कछेर आस पूरत कहियो एतै एहन साल किछ बाजू ने। भूखल आँखिक नोर सुखाकेँ बनि गेल अछि यौ नून वादाक अचार चटा करब कते ताल किछ बाजू ने। कदम ताल करैसँ कतौ देशक भ्रष्टाचार मेटेतै गुमस बेसी हेतै तँ भऽ जैत यौ बवाल किछ बाजू ने। राशन होय की शासन अहाँ सभठाँ पेंच लगौने छी कर जोड़ि कहैए "ओम" तोड़ू इ जंजाल किछ बाजू ने। ------------------- वर्ण २० --------------------- गजल- २८ जिनगीक गीत अहाँ सदिखन गाबैत रहू। एहिना इ राग अहाँ अपन सुनाबैत रहू। ककरो कहैसँ कहाँ सरगम रूकै कखनो कहियो कियो सुनबे करत बजाबैत रहू। खनकैत पायल रातिक तड़पाबै हमरा हम मोन मारि कते दिन धरि दाबैत रहू। हमरा कहै छथि जे फुरसति नै भेटल यौ घर नै अहाँ कखनो सपनहुँ आबैत रहू। सुनियौ कहै इ करेजक दहकै भाव कनी कखनो तँ नैनसँ देखि हिय जुराबैत रहू। ------------ - वर्ण १७ --------------- गजल- २९ पेटक आगि मिझबै लेल मायकेँ जान बेचैत देखलौं बहकल मोनक पाछाँ लोककेँ ईमान बेचैत देखलौं ईमान धरम त्यागक खिस्सा आब पोथीक गप भेल छै रक्षाक सप्पत खाऽ कऽ ककरो हिन्दुस्तान बेचैत देखलौं धरती पर भेल अछि लोकक ठेलमठेल सबतरि खाली जमीने नै इंटरनेट पर चान बेचैत देखलौं लादि कऽ भरल बस्ता आब नेना भुटका बूढ़ भऽ जाइए भेटैए कहाँ नेनपनक मधुर गान बेचैत देखलौं रेडिमेडक जुगमे हँसी भेट जाइए रेडीमेड आब छगुनता लागै "ओम"केँ जे मुस्कीक थान बेचैत देखलौं -------------------- वर्ण २१ ---------------------- गजल- ३० चमकल मुख अहाँक इजोर भऽ गेलै अधरतिए मे लागै जेना भोर भऽ गेलै काजर बूझि हमरा नैन मे बसा लिअ अहाँक नैना मारूक चितचोर भऽ गेलै कुचरै कौआ रहि रहि मोर आंगन मे जानि अबैया अहाँक मोन मोर भऽ गेलै नैनक इशारा दैए प्रेमक निमन्त्रण आब लाजे कठुआ कऽ बन्न ठोर भऽ गेलै बनल नाम अहींक "ओम"क प्राण-डोरी अहाँक आस मे करेज चकोर भऽ गेलै (सरल वार्णिक- १५ वर्ण) गजल- ३१ करेजमे काढ़ल छै अहाँक छवि नै मेटैत कखनो। मोनमे बन्न अहाँक प्रेम कियो कोना चोरैत कखनो। अहाँ खुश रहू यैह छै आब हमर दर्दक इलाज इ दर्द फुरसतिमे हमर करेज सुनैत कखनो। असगर बैसल अहाँक यादिमे हम हँसि लैत छी हँसीक राज भेटलासँ हमर मोन बतैत कखनो। मोनमे बसल अहाँक छवि नै भीजै तैं नै कानैत छी मुदा रोकी कते अहाँक यादि हमरा कनैत कखनो। एक बेर कहि दितिये अहाँ हमरे लेल बनल छी गीत प्रेमक "ओम"क मोन हँसि गुनगुनैत कखनो। --------- सरल वार्णिक बहर वर्ण २० ---------- गजल- ३२ केहन मीठ विरहमे झोरि गेलौं अहाँ हमरा। नोरक झोर विकट छै बोरि गेलौं अहाँ हमरा। नीक कहै छल सभठाँ फूल भेटै छलै सगरो आब कहै हम वहशी घोरि गेलौं अहाँ हमरा। लोक बजै छल हमरा प्रेममे जोड़ि देल अहाँ टूटल टाट बनल छी तोड़ि गेलौं अहाँ हमरा। देल करेज अपन सौंसे अहाँ केर हाथ प्रिये सौंस करेजक टुकडी छोड़ि गेलौं अहाँ हमरा। "ओम"क मोन बुझलकै नै बनेलौं अहाँ घिरनी नाच करी बनि घिरनी गोड़ि गेलौं अहाँ हमरा। ------------------ वर्ण १८ ---------------- गजल- ३३ नबका बर्खक नब उमंग सगरो छै। खुशी जतबा ओम्हर ओतबा एम्हरो छै। बर्ख-बर्खसँ दुखसँ छौंकल सभ आत्मा हेतै तृप्त जरूर इ उमेद हमरो छै। नब बर्ख बनै प्रेम-नाव दुख-धारमे सभ प्रेम करू बिसरू कोनो झगड़ छै। बन्न करियौ नै उत्सव ऊँच अटारीमे असंख्य भूखल आँखि सिहन्ता ओकरो छै। असल आजादी भेटै यैह "ओम"क दुआ बिला जाइ भ्रष्ट आचरण जे ककरो छै। --------------- वर्ण १५ ------------- गजल- ३४ मोनक मोनसँ चलिकऽ केहेन हाल केने छी। प्रेममे अपन जिनगी हम बेहाल केने छी। करेज हमर छल उद्गम प्रेमक गंगाकेँ विरह-नोरमे सानि करेजकेँ थाल केने छी। जकर प्रेम-ताल पर हम नाचैत रहलौं हमरा वैह कहै छै एना किया ताल केने छी। एके बेर हरिकऽ प्राण झमेला खतम करू जे बेर-बेर आँखिक छुरी सँ हलाल केने छी। अहाँक मातल चालिसँ "ओम"क मोन मतेलै ऐमे दोख हमर की अहाँ आँखि लाल केने छी ---------------- वर्ण १७ ------------------ गजल- ३५ टुकडी-टुकडीमे जिनगी बीताबैत रहलौं सुनलक नै कियो जे बेथा सुनाबैत रहलौं अपन आ आनक भेद इ दुनियाँ बुझौलक इ भेद सदिखन मोनकेँ बुझाबैत रहलौं ऐ मोनमे पजरल आगि धधकैत रहल हम पेटमे लागल आगि मिझाबैत रहलौं अपन अटारी सभसँ सुन्नर बनाबै लेल कोन-कोन नै जोगाड़ हम लगाबैत रहलौं दुनियाँक खेलामे "ओम" बनऽ चाहल मदारी बनि गेलौं जमूरा सभकेँ रीझाबैत रहलौं -------------- वर्ण १७ --------------- गजल- ३६ आकाश बड्ड छै शांत भरिसक बिहाड़ि आबै छै ओंघरैत सभ एहिमे बलौं ओहार ओढ़ाबै छै पोछि दियौ झहरैत नोर अहाँ निशब्द आँखिक आँखिक नोर थीक लुत्ती झटसँ आगि लगाबै छै चिन्है छै सभ ओकरा कतेक स्वाँग रचेतै आब तखनो ओ सभकेँ बिपटा बनि नाच देखाबै छै नंगटे भेल छै तखनो कुर्सीक मोह नै छूटल कुर्सीक इ सौख ओकरा किछसँ किछ कराबै छै रोकि सकै छै कियो नै सागरमे जौं उफान एलै परतारै लेल देखियौ माटिक बान्ह बनाबै छै --------------- वर्ण १८ ----------------- गजल- ३७ बनि जेतै घर एखन धरि जे छै हमर मकान प्रिये घोरि दितिऐ हमर प्रेममे अहाँ अपन जौं प्राण प्रिये एक मीसिया इजोत चानक चमकाबै छै पूरा दुनियाँ अहाँ बिन अछि घर अन्हार छत जकर छै चान प्रिये आँखि मुनल हमर जरूर छै मुदा हम छी नै सूतल अहाँक प्रेमक वाहक मुस्की दिन-राति लैए जान प्रिये कखनो देखाबी प्रेम अहाँ बनै छी कखनो अनचिन्हार प्रेमक खेलमे अहाँक नुका-छिपी केनेए हरान प्रिये जिनगीक रौदी छै प्रचण्ड शीतल अहाँक केशक छाह विश्राम ओहि छाहमे करै ले डोलै "ओम"क ईमान प्रिये ---------------------- वर्ण २१ --------------------- गजल- ३८ डूबैत रहलौं हरदम हम आर कहिया धरि इ अन्हेर हेतै खाली मझधारे नै हेतै कपार हमर हमरो कोनो कछेर हेतै सभ लेल बाँतर कात राखल छी कियो तँ कखनो ताकत एम्हरो खूब गजल सभ ले कहल गेल हमरो लेल ककरो 'शेर' हेतै सुख-दुख जीवन-क्रममे लागल कखनो मीठ कखनो तीत भेटै बड्ड अन्हरगर साँझ भेलै कहियो इजोत भरल सबेर हेतै सभ मिल भिड़ल छै माथापच्ची केने एकटा कानून बनबै लेल केहनो कानून बनि जाओ मुदा ओहिमे संशोधन बेर-बेर हेतै आब नै लुटेतै देशक वैभव नै कऽ सकतै खजानाकेँ चोरी कियो सोनक चिड़ै छल देश हमर पुरना वैभव वापस फेर हेतै -------------------- वर्ण २५ ------------------------- गजल- ३९ सदिखन स्वार्थक चिन्तन करैत रहैए मोन हमर इ गप नै बूझि जाइ कियो डरैत रहैए मोन हमर अपन खेतक हरियरी बचा कऽ रखबाक जोगारमे आनक जरल खरिहानो चरैत रहैए मोन हमर विचार अपन गाड़ने दोसरक छाती पर खाम जकाँ इ खाम उखडबाक डरे ठरैत रहैए मोन हमर हृदयक भाव अछि तरंगहीन पोखरिक पानि भेल गन्हाईत जमल भावसँ सड़ैत रहैए मोन हमर अन्तर्विरोधक द्वन्द्व युद्धमे बाझल अछि "ओम"क मोन अपनाकेँ जीयेबाक लेल मरैत रहैए मोन हमर ------------------- वर्ण २१ ------------------- गजल- ४० ओकर गाँधी-टोपी कतौ हरेलै आब ओ हमरे टोपी पहिराबै छै सेवकसँ बनि बैसलै स्वामी हमरे छाती पर झण्डा फहराबै छै चुनाव-कालमे मुस्की दऽ हमर दरबज्जाक माटि खखोरलक जे भेँट भेला पर परिचय पूछै देखियो कतेक जल्दी बिसराबै छै दंगा भेल वा बाढ़ि‍-अकाल सभमे मनुक्खक दाम तय करैवाला पीड़ाक ओ मोल की बूझतै जे मौका भेटते कुहि-कुहि कुहराबै छै जनताक तन नै झाँपल पेटक आँत सटकि कऽ पीठमे सटल वातानुकूल कक्षमे रहै वाला फूसियों कानि कऽ नोर झहराबै छै डारि-डारि पर उल्लू बैसल सौंसे गाम बेतालक नाच पसरलै एखनो आसक छोट किरण "ओम"क मोनमे भरोस ठहराबै छै ------------------------ वर्ण २५ ----------------------- गजल- ४१ अन्हरिया रातिमे सँ भोर कखनो निकलबे करतै दुखक अनन्त मेघकेँ चीर सुरूज उगबे करतै सभ फूल बागक झरि गेल सुखाकऽ एकर की चिन्ता नब कोढी फूटलै कहियो सुवास पसरबे करतै टूटल प्याली पर कहाँ कानैत छै मय आ मयखाना प्याली फेर कीनेतै मयखानामे मस्ती रहबे करतै सागरमे सदिखन बिला जाइत छै धारक अस्तित्व तैं की धार रूकै छै बिन थाकल देखू बहबे करतै काल्हि "ओम"क नाम लेबाक ककरो फुरसति नै हेतै आइ कान किछ ठोढ़सँ हमर नाम सुनबे करतै ------------------ वर्ण २० ------------------- गजल- ४२ हमर छोटका बाबा (हमर पितामहक अनुज) ८८ बरखक अवस्थामे स्वर्गवासी भऽ गेलाह। हुनकर स्मृतिमे हम अपन भावांजलि ऐ गजलक माध्यमे प्रकट कऽ रहल छी। सभ कहैए पंचतत्वमे आइ अहाँ विलीन भऽ गेलौं हम निशब्द भेल ठाढ़ छी देखियौ वाणी-हीन भऽ गेलौं नब वस्त्र पहीरि अहाँ कोन जतरा पर निकललौं बाट जोहैत छी एखनो अपस्याँत राति-दिन भऽ गेलौं अंगुरी अहाँक पकड़ि बाध-बोन हम घूमैत छलौं आब कहाँ ओ अंगुरी हम बाट नापि अमीन भऽ गेलौं जेनाई छल निश्चित यौ दिन तकेने अजुके छलिऐ बंधन कोनाकऽ तोडलिऐ कानैत आब बीन भऽ गेलौं चिंतित "ओम"क तन्नुक कन्हा आब कोना बोझ उठेतै गेल आब अहाँक छाहरि हम छत-विहीन भऽ गेलौं ------------------- वर्ण २० -------------------- गजल- ४३ कोनो खसैतकेँ जे लिऐ सम्हारि यैह थीक जिनगी डूबैतकेँ जौं दियौ पार उतारि यैह थीक जिनगी भाव कोनो हुए मोनमे शब्द होइत छै संवाहक जे बाजैसँ पहिने लेब विचारि यैह थीक जिनगी मान-अपमान दुनू भेटै छै इ मायाक थीक लीला अन्यायकेँ सदिखन दी मोचाड़ि यैह थीक जिनगी भाँति-भाँतिकेँ मेघ विचारक मोनक भीतर घूमै सुविचारसँ राखू मोन पजारि यैह थीक जिनगी आन दिस अपन काँच अंगुरी कोना उठेतै "ओम" पहिने लितौं अपनाकेँ सुधारि यैह थीक जिनगी ------------------ वर्ण १९ ----------------- गजल- ४४ अपने खोजमे अपन मोन हम धुनैत रहै छी छिड़िएेल मोती आत्माक सदिखन चुनैत रहै छी आनक की बनब एखन धरि अपनहुँ नै भेलौं मोन मारिकऽ सभ गप पर आँखि मुनैत रहै छी कहियो भेटबे करतै आत्माक गीत एहि प्राणमे छाउर भेल जिनगीकेँ यैह सोचि खुनैत रहै छी झाँपै लेल भसिऐल जिनगीक टूटल धरातल सपनाक नबका टाट भरि दिन बुनैत रहै छी बूझि सोहर-समदाउन जिनगीक सभ गीतकेँ मोन-मगन भेल अपनेमे हम सुनैत रहै छी ---------------- वर्ण १९ ---------------- गजल- ४५ हेतै की आब बूझाय नै एहि देशमे देश फँसल अछि घोटाला आ केसमे कोनाकऽ बचायब आब घर चोरीसँ फिरै छै चोर सगरो साधुक भेषमे जरै छै गाम तखनो बंसी बजाबै ओ बूझै नै लिखल देबालक सनेसमे शिकारी मनुक्खक बनल छै मनुक्खे गोंतै छै सभ बाट आ घरो कलेशमे बेईमानीक पताका फहरै आकाश पाकै ईमान आब पसरल द्वेषमे ---------- वर्ण १४ ------------ गजल- ४६ हम तँ केने बहाना राम केर अहींक नाम लैत छी बनि गेलौं हम चर्चा गाम केर अहींक नाम लैत छी रखने छी करेजसँ सटाकऽ यादि अहाँक सदिखन हमरा काज की ताम-झाम केर अहींक नाम लैत छी ताकि दितिये कनी नजरिसँ मुस्कीयाकऽ जे एक दिन काज पड़ितै नै कोनो जाम केर अहींक नाम लैत छी हमर काशी मथुरा काबा सभ अहींमे अछि बसल जतरा भऽ गेल चारू धाम केर अहींक नाम लैत छी रोकि सकतै नै जमाना इ मोनसँ मोनक मिलनाई मोन कहाँ छै कोनो लगाम केर अहींक नाम लैत छी --------------------- वर्ण २० -------------------- गजल- ४७ देखि हुनकर असल रंग भक हमर टूटि गेल पोखरिमे सभ नंग-धडंग भक हमर टूटि गेल सभ आँखिक नोर सुखायल आगि एहेन छै लागल देखिकऽ कानैत यमुना-गंग भक हमर टूटि गेल बूझलौं अपनाकेँ कपरगर एकटा संगी भेटल छोड़ि देलक ओ जखन संग भक हमर टूटि गेल कते बियोंत लगाबै छलौं अहाँकेँ अंग लगाबै लेल जखन लगेलौं अंगसँ अंग भक हमर टूटि गेल मस्तीक नाव भसिया गेल छै समयक ऐ प्रवाहमे छलौं यौ हमहुँ मस्त-मलंग भक हमर टूटि गेल ----------------- वर्ण २० -------------------- गजल- ४८ हमरासँ की नै करेलक सिहन्ता हमर सदिखन खाली कनेलक सिहन्ता हमर अहाँ भेटतौं से हमर कहाँ इ भाग्य छलै मुदा अहीं दिस बढेलक सिहन्ता हमर सुरूजक आगिसँ बचू यैह जमाना कहै बाट सुरूजक धरेलक सिहन्ता हमर चान मुट्ठीमे बन्न कैल ककरोसँ नै भेलै हमरा यैह नै सिखेलक सिहन्ता हमर "ओम"क सिहन्ता जेना कतौ मरि-हरि गेलै सभटा सिहन्ता जरेलक सिहन्ता हमर --------------- वर्ण १६ --------------- गजल- ४९ आउ मजा लियऽ शुरू फेर खेल भऽ गेलै देखू खेलनिहार सभमे मेल भऽ गेलै कोनो निअम-निष्ठाक जरूरति नै एतऽ कोनो दोगसँ ढुकु ठेलम-ठेल भऽ गेलै जकरा किछ लागल नै हाथ हल्ला करै जे लेलक मजा ओकरा तँ जेल भऽ गेलै टिकट बाँटै आ काटै केर कबड्डी शुरू चुनाव भेलै नै जेना कोनो रेल भऽ गेलै जीतला पर सुन्नर कोठा-गाड़ी भेटत बाटक इ धूरि जनताक लेल भऽ गेलै -------------- वर्ण १५ ------------ गजल- ५० वाह कतेक मजा अबै छै उठा-पटकमे नब-नब दाँव देखबै छै उठा-पटकमे सभक मुँह भेलै लाल-लाल कुश्ती लड़ैत सभ जोर कते लगबै छै उठा-पटकमे छै के संगी केँ शत्रु बनल इ पता नै चलै छै अपन मुदा खसबै छै उठा-पटकमे प्राण हतने कोना सभ भिड़ल छै देखियो कियो माल देखू बनबै छै उठा-पटकमे ककरो हारि गेलासँ बन्न नै भेल दंगल हारि झट मुँह उठबै छै उठा-पटकमे ----------- वर्ण १६ --------------- गजल- ५१ पता नै कोन आगिमे जरैत रहल करेज हमर पानि नै खाली घीए टा चाहैत रहल करेज हमर आनक मरल आत्माकेँ जीयाकऽ राखैक फेरमे फँसि नहुँ-नहुँ सुनगैत मरैत रहल करेज हमर एतेक मारि खेलक झूठ प्रेमक खेलमे जमानासँ कियो देखलक नै कुहरैत रहल करेज हमर फेर कतौ नै कियो बम फोड़िकऽ अनाथ करै ककरो सूर्योदय होइते धडकैत रहल करेज हमर अपनाकेँ नित जीयाबैमे करेजक खून करैत छी खसि-खसिकऽ देखू सम्हरैत रहल करेज हमर दुख आ सुखमे अंतर करैमे नै ओझराकऽ कखनो नब गीत सदिखन गबैत रहल करेज हमर ---------------- वर्ण २० ----------------------- गजल- ५२ ऐना तँ सदिखन हमरा सत्ते कहै छै हमर रूप हमरे देखबैत रहै छै चलि गेलौं तँ बूझलौं अहाँ हमर नै छी बनल विश्वासक किला एहीना ढहै छै धारकेँ कोन मतलब भूमिक दर्दसँ जेम्हरे मोन भेल धार ओम्हरे बहै छै देखू प्रेमक अकाल नै छै एहि गाममे उधारक प्रेमक बाढ़िसँ गाम दहै छै ककरो मारबाक चोट सहि लेत "ओम" मुदा बूझै नै प्रेमक मारि कोना सहै छै -------------- वर्ण १५ --------------- गजल- ५३ आइ-काल्हि सदिखन हम अपनेसँ बतियाईत रहै छी लोक कहैए जे हम नाम अहींक बड़बड़ाईत रहै छी सभ बैसारमे आब चर्चा करऽ लागलौं अहींक नाम केर सुनि कऽ कहै छै सभ जे निशाँमे हम भसियाईत रहै छी हमरा लागैए निशाँ आब टूटि गेल छै पीबि लेलाक बाद सोझ रहैमे छलौं अपस्याँत आब डगमगाईत रहै छी एते बेर नाम लेलौं अहाँक हम कहियो तँ सुनने हैब कोन कोनटामे नुकेलौं अहींकेँ ताकैत बौआईत रहै छी एक चुरू अपने हाथसँ आबि कऽ पीया दितिये जे "ओम"केँ मरि जइतौं आरामसँ हम जाहि लेल टौआईत रहै छी ----------------------- वर्ण २२ ----------------------- गजल- ५४ नित पूछै छै किछ सवाल इ जिनगी करै सदिखन नब ताल इ जिनगी कखनो बनि दुखक घुप्प अन्हरिया लागै मारिसँ फूलल गाल इ जिनगी सुखक राग कखनो सुनाबै एनाकऽ रंगल बनि कतेक लाल इ जिनगी कहै जिनगी होइत छै जीबैक नाम ककरो लेल होइए काल इ जिनगी जिनगीकेँ बूझैमे "ओम" ओझरायल जतबा बूझलौं लागै जाल इ जिनगी ------------- वर्ण १४ ------------- गजल- ५५ एकटा खिस्सा बनि जइते अहाँ संकेत जौं बुझितहुँ हमही छलहुँ अहाँक मोनमे कखनो तँ कहितहुँ लोक-लाजक देबाल ठाढ़ छल हमरा अहाँक बीच एको बेर इशारा दितिऐ हम देबाल खसबितहुँ अहाँक प्रेमक ठंढा आगिमे जरि कऽ होइतौं शीतल नहुँ-नहुँ भूसाक आगि बनि कऽ किया आइ जरितहुँ सभकेँ फूल बाँटैमे कोना अपन जिनगी काँट केलौं कोनो फूल नै छल हमर काँटो तँ अहाँ पठबितहुँ जाइ काल रूकै लेल अहाँ "ओम"केँ आवाज नै देलिऐ बहैत धार नै छलहुँ हम जे घुरि कऽ नै अबितहुँ ------------------ वर्ण २० --------------------- गजल- ५६ हमर नजरिमे पैसि कऽ हमर नजरि बनि फडकि रहल छी पोर-पोरमे अहीं समेलौं सीनामे हमर अहीं धडकि रहल छी विरह-विषसँ मोन पीड़ित छल अहाँक प्रेमक अमृत भेटल प्रेम-सुधासँ मोन नै भरै जतबा पीबि ओतबा परकि रहल छी हृदयक छल बाट सुखायल जेकरा सिनेह अहाँक भीजायल छन-छन भीजि प्रेमक बरखामे तखनो किया झरकि रहल छी जिनगीक रौदीकेँ अहीं भगेलौं अहाँ प्रेम-मेघ केर छाहरि केलौं भरल हमर आकाश प्रेमसँ अहाँ छी बिजुरि तड़कि रहल छी भाव-शून्य "ओम"क छल जे अंतर जिनगीमे आबि मारि कऽ मंतर अहीं बनलौं गजल कविता बनि भाव मोनमे बरकि रहल छी --------------------------- वर्ण २५ --------------------------- गजल- ५७ भेटलै जखने नबका मीत पुरनाकेँ कोना छोड़ि देलक जकरासँ छल ठेहुँन-छाबा हमर मोनके तोड़ि देलक सपथक नै कोनो मालगुजारी सपथक नै बही बनल संग जीबै-मरैक सपथ खा कऽ जीबतै डाबा फोड़ि देलक ओकरा लग छै ढेरी चेहरा हमरा लग बस एके छल अपन भोरका मुँह पर नब मुँह साँझमे जोड़ि देलक जिनगी-खेतमे विश्वास-खाद दऽ प्रेमक बीआ हम बुनल धोखा केर कोदारि चला कऽ देखू लागल खेती कोड़ि‍ देलक "ओम" प्रेमक घर बनेलक ओकरा बिन छै सून पड़ल बाट जे जाइ छल ओहि घरमे कोनो जोगारे मोड़ि देलक ---------------------- वर्ण २२ -------------------- गजल- ५८ कतौ छै रौदी प्रचंड कतौ बरखासँ हरान छै कतौ छै फूजल मोन कतौ बन्न पेटीमे प्राण छै ककरो भेल अपच कियो देखू भूखले मरल कतौ छै होइत भोज कतौ उजड़ल दोकान छै एके कलमसँ लिखलक किया भाग्य नै विधाता कतौ छै तृप्त हृदय कतौ छूछे टा अरमान छै कियो मुट्ठीमे समेटने कते इजोत छै बैसल कतौ छै जे सून घर कतौ भरल इ दलान छै अचरजसँ देखै छै "ओम" लीला एहि दुनियाँक कतौ छै इ मौनी खाली कतौ बखारी भरि धान छै ------------------- वर्ण १८ ------------------ गजल- ५९ पिया जुनि करू बलजोरी लोक की कहत प्रेम करू मुदा चोरी-चोरी लोक की कहत तन्नुक शरीर मोरा यौवन उफनायल चुप्पे बान्हू अहाँ प्रेम-डोरी लोक की कहत थमल नै डेग अहाँ प्रेम-नोत पठाओल हम आब बनलौं चकोरी लोक की कहत श्याम रंगमे अहाँक मोर अंग रंगायल दीयाबातीमे खेललौं होरी लोक की कहत "ओम"क प्रिया इ आतुर मोनकेँ बुझाओल कतेक कहब कर जोड़ि‍ लोक की कहत -------------- वर्ण १६ -------------- गजल- ६० ओ हमरा बिसरि गेल जे गाबैत रहै छल हमर गीत शहरक हवा लागि गेलै आब भेल शहरी हमर मीत मोनक कोनटामे नुकेलक नेनपनक सभ क्रीड़ा-खेल खाइ छलै संगे पटुआ ओकरा लागै मधुर हमर तीत छल जुटल जकरा संग हृदय हमर रहितो काया दू हमरा हरबैथ आब अपमान बूझैथ ओ हमर जीत दोस्तीक सपथ खाइत नै छलै अघाइत ओ हमरा संग भसकेलक घर दोस्तीक द्वेषक बनि गेल हमर भीत मीत घुरि आबू एखनहुँ "ओम"क हृदयमे अहींक वास फेर बहाबियो धार दोस्तीक जे छल अहाँक हमर रीत -------------------- वर्ण २२ --------------------- (हमर नेनपनक मीतकेँ समर्पित जे हमरा बिसरि गेला) गजल- ६१ घोघ तरसँ चान उगल अँगनामे इजोर पसरि गेलै मोन हमर छल बान्हल किया आइ अपने पिछड़ि‍ गेलै मृगनयनी मोनमोहनी चंचल नयनसँ प्राण हतल मुख पर नयन-कमल जै सुरभिसँ मोन पजरि गेलै सुनि अहाँक वचन भऽ प्रेम मगन मोन-मयूर नाचल प्रेम-बोली तोहर सुनल इ हृदय नाचि कऽ ससरि गेलै हिय-आँगन पायल झन-झन संगीत मधुर छै बाजल रोकि कोना जे मोन नाचल नै कहब किया नै सम्हरि गेलै अहाँक अजगुत रूप देखि कऽ भाव "ओम" रोकि नै सकल जे किछ छल मोन राखल कोना देखू सभटा झहरि गेलै ---------------------- वर्ण २२ --------------------- गजल- ६२ कर जोड़ै छी सरकार आब रहऽ दियौ कते करब भ्रष्टाचार आब रहऽ दियौ ‘टू जी' चारा खान घोटाला किछो नै छूटल भरि गेल अछि ‘तिहाड़' आब रहऽ दियौ मुखिया बनैसँ पहिने चलै छलौं पैरे कोना चढ़ऽ लगलौं कार आब रहऽ दियौ कण्ठ मोकि जनताक कते राज करब जनता नै छै यौ लाचार आब रहऽ दियौ कोना फूसि बाजि अहाँ "ओम"केँ ठकि लै छी केलिऐ लाजक संहार आब रहऽ दियौ ----------- वर्ण १५ ---------------- गजल- ६३ मिझबै लेल पेटक आगि देखू पजरि रहल छै आदमी जीबाक आस धेने सदिखन कोना मरि रहल छै आदमी डेग-डेग मँहगी केर निर्दय जाँतमे पीसल राति दिन पीअर मुँह बिहुँसि कऽ उठौने कुहरि रहल छै आदमी जनसंख्याक नांङरि कियाक बढ़ले जाइए बिन थाकल फसिलक उपजा कम भेल सौंसे फरि रहल छै आदमी स्वार्थक एहन बिहाड़ि चलल छै आइ मनुक्खक गाममे सम्बन्धक झरकल गाछसँ आब झरि रहल छै आदमी कहियो हँसीक ईजोर पसरतै "ओम"क अन्हार टोलमे यैह सोचैत सलाई विश्वासक रगड़ि रहल छै आदमी -------------------- वर्ण २२ --------------------- गजल- ६४ हमर हृदयक कुंज-गलीमे विचरैत मोनक मीत अहीं छी गाबि-गाबि जे मोन सुनाबै सदिखन ओ राग अहीं गीत अहीं छी जिनगी हमर पहिने कहियो एते सोअदगर किया नै छल सभटा सोआद अहींमे छै बसल मीठ नोनगर तीत अहीं छी आँखिक बाट मोनमे ढुकि कऽ प्रेमक घर आलीशान बनेलिऐ ओहि घरक कण-कणमे छै नाम अहींक ओकर भीत अहीं छी जुग-जुगसँ प्रेमक धारमे अहीं हमर पतवार बनल छी हमर प्रेमक दुनियाँक सुन्नर रंग सभटा आ रीत अहीं छी "ओम"क मोन केर कोन-कोनमे बसल रहै छै अहींक सुरभि आब ई जमाना सँ की लेनाई प्रिये हमर हार आ जीत अहीं छी ------------------------- वर्ण २४ -------------------------- गजल- ६५ बालुक भीत बनल जिनगी चमकै छै कोना सुखायल ई फूल सम्बन्धक गमकै छै कोना नकली मुस्कीक भीडमे हरायल कतौ हँसी चिन्ता भरल मुँह पर मुस्की दमकै छै कोना पैघ भेल जाइ छै मनुक्ख झूस विचार भेलै कर्म-धारमे हल्लुक विचार जमकै छै कोना भऽ रहलै तमाशा नाचक बिना सुर-तालके सरगम कतौ नै मुदा पैर झमकै छै कोना काठक बनल लोक रहै छै ऊँच मकानमे जे सुनै छै कियो नै किछ "ओम" बमकै छै कोना ------------------- वर्ण १७ ------------------ गजल- ६६ किया एना ई भऽ गेल छै देखू उनटा व्यवहार हर वहै से खढ़ खाय छै बकरी खाय अचार ककरो तन नै झाँपल कियो आडम्बर छै केने कियो तरसल बूँद लेल लागल कतौ सचार रामनामा ओढ़ि‍ कऽ आबै भीतर रखने खंजर छै जकर मोन दरिद्र हमरा देलक हकार महगी केर बाण चलै छै चाम देहक नोचैत जन-जन ओ बाण सहै भूशायी पड़ल लाचार। जीबै केर अधिकार छिनायल "ओम" देखू कोना ‘सुनामी' बनि तड़पैत मोनमे भरल विचार --------------- वर्ण १८ ----------------- गजल- ६७ धरल रहि जैत होशियारी मोटरी बान्हने की हैत जखन टूटल अछि केवाड़ी यौ ताला भरने की हैत नीमक पात तर चानन कानै ई कोन रीत रचेलै जे ई सवार बनल सवारी नाक रगड़ने की हैत केहेन गाछी अहाँ लगेलौं जे भूताहि भेल जाइए यौ बढ़बै लागै जखन बेमारी दवाई कीनने की हैत झरकल मुँहकेँ झाँपने नीक होइत छै सदिखन राखले रहि जैत ई तैयारी मुँहकेँ रँगने की हैत शीशा महग भेल हीरासँ "ओम"केँ अचरज लागल राखले घर भरल बखारी सगरो कानने की हैत ------------------ वर्ण २० ------------------- गजल- ६८ आगि पजरलै जखन धुआँ उठबे करत यौ इ प्रेममे डूबल मोन खिस्सा रचबे करत यौ किया करेज पर खंजर नैनक अहाँ चलेलौं ककरो खून भेलै इ दुनियाँ बूझबे करत यौ होइ छै प्रेमक डोरी तन्नुक एकरा जूनि तोड़ू जोड़बै तोड़ल डोरी गिरह बनबे करत यौ राम-नाम मुख रखने प्रेमक बाट नै धेलिऐ प्रेमक बाट जे चलबै मुक्ति भेटबे करत यौ बीत-बीत दुनियाँक प्रेमक रंग मे रंगि दियौ "ओम"क इ सपना अहाँ संग पूरबे करत यौ ---------------- वर्ण १८ ---------------- गजल- ६९ मुस्की अहाँक हमर काल बनल अछि नैनक चालि जीकेँ जंजाल बनल अछि अहाँकेँ देखि सुरूज कोनटा नुका गेल लाल अहाँक एहन गाल बनल अछि लिखते रहै छी पाती अहाँकेँ प्रिये हम राखै छी घरे पातीक टाल बनल अछि हमरो सुधि कखनो लियौ ने प्रियतम अहींकेँ सुमिरैत की हाल बनल अछि "ओम" दीप बनि जरै इजोत अहीं लग देखू प्रेमक खिस्सा विशाल बनल अछि -------------------वर्ण १५-------------------- गजल- ७० आउ मिल मोनक दीप जराबी दियाबाती आबि गेलै सिनेह तेल हिया बाती बनाबी दियाबाती आबि गेलै अंगनामे फेरता ऊक बाबा दुख रोग भगाबै लेल डाह-घृणाकेँ हम ऊक घुमाबी दियाबाती आबि गेलै दरिद्रा आब कतौ नै रहतै जे सूप डेंगाओल जैत मैंया संगे सगरो सूप डेंगाबी दियाबाती आबि गेलै हलुआ-पूड़ी लड्डू-बताशा सबहक घर बनल छै आइ खूब प्रेम-मधुर खुआबी दियाबाती आबि गेलै मँहगी गरीबी बेरोजगारी हिंसाकेँ नाच पसरल "ओम" संग इ सभ दूर भगाबी दियाबाती आबि गेलै -------------------वर्ण २०-------------------- गजल- ७१ पिया हमर रूसल जाइत किछ नै बजै छैथ करब हम कोन उपाय ककरो नै सुनै छैथ बड्ड जतनसँ कोठा बनल जे सून पड़ल छै कतऽ सँ भेटल हकार पिया घुरि नै तकै छैथ आउ सखि शृंगार करू मोर पियाक मोन भावै कोन निन्नमे सूतला हमरा किया नै देखै छैथ चानन काठ केर महफा छै बहुत सजाओल ओहिमे लऽ चलल पियाकेँ कनियो नै कनै छैथ सासुरक सनेस पर "ओम"केँ लागल उजाही नैहरक सखा सभ छूटल यादि नै आबै छैथ ----------------वर्ण १८----------------- गजल- ७२ धार नहि होइए मुक्त बान्हकेँ कोना कऽ तोड़ब बहैत हवा मुट्ठीमे बन्न हम कोना कऽ करब सपना होइ छै सपना कतबो सोहाओन हुए निन्न टूटै पर ओकरा अपन कोना कऽ कहब अनकर आस बेनियाक बसात सत्ते कहै छै ककरो मुँहकेँ ताकैत आसमे कोना कऽ रहब नोंचि लेलिऐ कियाक अहाँ सुन्नर पंख चिड़ैक बिन पंख आकाशक नोत आब कोना कऽ पूरब बिलमि जइयो कनी "ओम"क गाममे किछ खन केहन छै गाम हमर से अहाँ कोना कऽ बूझब -----------------वर्ण १८----------------- गजल- ७३ रूसल छै कपार कहियो बौंसेबे करतै मोन रहतै टूटल कते जोडेबे करतै सागरक कात सीप बिछैत रहब हम कोनो सीपमे कखनो मोती भेटेबे करतै क्षितिजक बाटकेँ हम धेने छी सदिखन आकाशमे हमरो हिस्सा कनी हेबे करतै सजबै छी अपन उपवन एहि आसमे उजड़ल घरमे सुगंध भरेबे करतै कियो मानै नै मानै "ओम" इ कहिते रहत नैन रहतै नै पियासल जुड़ेबे करतै .......................वर्ण १६....................... गजल- ७४ जखन मोनमे प्रेमक आँकुर फूटल तखन प्रेमक गाछ निकलबे करत जखन जवानीक ककरो लुत्ती लागल तखन प्रेमक धधरा उठबे करत प्रेम छै रामायण प्रेम छै गीता पुराण प्रेम छै पूजा-पाठ प्रेम ईश-भगवान जखन इ मोन पवित्र मंदिर बनल तखन प्रेमक मुरूत बसबे करत जिनगी कछेर बनल इ प्रेम छै धार प्रेम इ समाज बनबै प्रेम परिवार जखन हिय सिनेहक संगम रचल तखन प्रेमक इ गंगा बहबे करत प्रेमकेँ बान्हत डोरी एखन नै बनल प्रेम मुक्त छै सदिखन सहज सरल जखन जिनगी-आकाशक सीमा हटल तखन प्रेमक चिड़ैयाँ उड़बे करत "ओम"क निवेदन अहाँ कते नै सुनब एना अहाँ चुप रहि कते मूक बनब जखन याचना अहाँक मोनमे ढुकल तखन प्रेमक भिक्षा तँ भेटबे करत .......................वर्ण ३०....................... गजल- ७५ ताकलौं एना किया कोनो पैघ बात भय गेलै मोन डोलै हमर पीपरिक पात भय गेलै बिन पीने इ निशाँ किया हमरा लागै लागल हमरा बूझि कऽ शराबी लोक कात भय गेलै हमरा हमरेसँ चोरी अहाँ कोना कय लेलौं बन्न छल हिय-खिडकी कोनो घात भय गेलै प्रेमक सींचल जिनगी आब भेलै रसगर सुखायल चाउर छलै मीठ भात भय गेलै सभ ओझरीसँ हम भिन्ने नीक रहैत रही नैन-ओझरी लागल "ओम"क मात भय गेलै ..................वर्ण १७..................... गजल- ७६ आगि लागल मोनक धाहकेँ रोकि देलिऐ कोनो दुख गहीर छल मुस्की मारि देलिऐ अपन मोनक धार कियो कोना कऽ रोकत इयाद जे हमरा करेजमे भोंकि देलिऐ आँखिक कोर भीजल नोर किया नै खसल कृपणक सोन जकाँ ओकरा राखि देलिऐ नोर इन्होर होइ छै एहिसँ बाँचि कऽ रहू फेर कहब नै अहाँ किया नै टोकि देलिऐ "ओम"क फाटल छाती कियो देख नै सकल कोनो जतनसँ ओकरा हम सीबि देलिऐ .......................वर्ण १६....................... गजल- ७७ मोनक आस आब टुअर भेल तृष्णा एखनहुँ नै दुब्बर भेल अन्हारसँ झरकैत रहलहुँ इजोत नै कखनो हमर भेल मधुमाछी मधु बनबैत रहै मधु सदिखन अनकर भेल कुहेसक मारल बाट कानैए रौद नै एखन सनगर भेल चीनी फाँकैत तबाह भेल "ओम" मधुर कियाक नोनगर भेल ............वर्ण १२............. गजल- ७८ थानकेँ नापबाक फेरमे गज फेकल जाइए आकाश छूबाक फेरमे जमीन छूटल जाइए भाँति-भाँतिक सुन्नर फूल लागल फुलवारीमे कमल लगेबाक फेरमे गेना टूटल जाइए चानीसँ संतोख भेल नै आब सोनक पाँछा भागू सोन कीनबाक फेरमे इ चानी रूसल जाइए दूरक चमकैत वस्तु अंगोरा भय सकै अछि मृगतृष्णाक फेरमे देखू मृग कूदल जाइए चानक इजोरियामे काज "ओम"क होइते छल भोर-इजोरियाक फेरमे चान डूबल जाइए ------------- वर्ण १८ --------------- गजल- ७९ हवामे अहाँ लात चलबैत रहू हमरा की आकाश पर भात बनबैत रहू हमरा की हम गामक पोखरिमे माछ मारैत रहब जाउ अहाँ समुद्र उपछैत रहू हमरा की एखन धरि हम खम्भा गाड़ैमे परेशान छी बड़का महल अहाँ ठोकैत रहू हमरा की हमर आँखिक सपना आँखियेमे मरि गेल अहाँ जागले सपना देखैत रहू हमरा की "ओम" कहैत रहत अहिना सोझ-सोझ गप्प अहाँ सभकेँ टेढ़े सुनबैत रहू हमरा की ------------- वर्ण १७ ----------------- गजल- ८० हम कातसँ सदिखन देखते रहलिऐ हम नै बजलिऐ अहुँ किछ नै सुनेलिऐ नैनक धार अहाँक जे उफनैत रहल चुप रहि हम ओहिमे हेलैत रहलिऐ मदमस्त नैना अहाँक जुलुम कऽ रहल बिजुरी खसेनाई अहाँ कतऽ सँ सीखलिऐ शुरू भेल इ खिस्सा हमर जे अहींसँ प्रिये सभ किछ बूझैत किया अहाँ नै बूझलिऐ एना अन्हार केने "ओम"क प्रेम-संसारमे मुख-चान कतऽ अहाँ नुकबैत रहलिऐ ------------- वर्ण १६ ----------------- गजल- ८१ टूटल मोनकेँ हम बुझावैत रहि गेलौं एक मीसिया हँसी हम ताकैत रहि गेलौं फूलक मुस्की कैद छै काँटक महाजालमे जालसँ मुस्कीकेँ हम छोड़ाबैत रहि गेलौं सूरजक हँसी हरायल मेघक ओटमे फूँकि कऽ मेघ हम उधियाबैत रहि गेलौं निर्झर अछि शांत भेल पाथरक चोटसँ चोटक दाग मोनसँ मेटाबैत रहि गेलौं छिड़ियायल छै हँसी "ओम"क वश नै चलै हाथक सफाई हम देखाबैत रहि गेलौं ------------- वर्ण १६ ----------------- गजल- ८२ कियो किछ नै सुनै छै अहाँ करै छी बवाल अहाँ नै बूझै छी बहिरा नाचै अपने ताल ककरासँ माँगै छी अहाँ अपन जबाव यौ बाजत कोना एखन नै बूझलक सवाल हुनकर मुस्कीके देखि अहाँ की बूझि गेलौं चवन्नियाँ मुस्की हुनकर अदाक कमाल नीतिशास्त्रक हुनका पाठ बुझौने हैत की ओ जेबीमे रखै छथि नीति बूझि कऽ रूमाल देखैत अछि नौटंकी "ओम" हुनकर चुप्पे लागै हुनका जे हम छी तिरपित निहाल ------------- वर्ण १६ ----------------- गजल- ८३ डेग दैत पूरब अहाँ पच्छिम पताइत छी चढ़ल मस्ती जवानीक अहाँ अगधाइत छी बिना पुजारीक मन्दिरक शोभा नै भावै अछि हम छी प्रेम-पुजारी अहाँ नै पतियाइत छी नैनक इशारासँ जे अहाँ किछु कहि देलिऐ ओ सभक सोझाँ सुनाबैमे किया लजाइत छी संकेत अहाँकेँ हम अपन प्रेमक पठेलौं कहलौं अहाँ देखू किया एना भसियाइत छी "ओम" लुटेने अछि पूरा जिनगी अहीं पर यै मोन-आँगनमे रहियौ किया खिसियाइत छी ------------- वर्ण १७ ----------------- गजल- ८४ माटिक बासनमे भय गेल भूर ओकरा फोड़िये देनाई नीक जखन विश्वास भय गेल चूर ओ रिश्ताके तोड़िये देनाई नीक फरियाद सुनावैत पूरा जीवन ताकैत छी किया रखने आस कानमे ठूँसने रहैथ जे तुर ओ हाकिम छोड़िये देनाई नीक बिना मिलेने ताल-मात्रा कखनो सु-संगीत कहाँ अछि निकलल ककरोसँ मिलल नहि जे सुर महफिल छोड़िये देनाई नीक अपस्याँत भेल छी मरखाह बड़दके खूँटामे बान्हि राखयमे बेसी चलबय लागै जे खुर ओ बड़दके खोलिये देनाई नीक फाटल वस्त्र कहुना पैबंद लगा कऽ पहरि सकैत अछि "ओम" मुदा जाहि मे सगरो अछि भूर ओ कपड़ा फेकिये देनाई नीक ------------- वर्ण २४ ----------------- गजल- ८५ मूर्ख दिवस (०१ अप्रैल) के अवसरपर हमर विशेष प्रस्तुति मूर्ख दिवस पर पता चलल हम सभसँ बड़का मूर्ख थिकौं आइ धरि इ कियो कहाँ कहल हम सभसँ बड़का मूर्ख थिकौं जिनगीक चुल्हिमे जरि गेल सभटा कथा कविता आर गजल देखू एको शेर नै ठीक बनल हम सभसँ बड़का मूर्ख थिकौं हमरा "फूल"* बूझि कऽ ओ फूल पठौलनि झुठक मुस्कीमे सानल बूझलौं ओकरे हृदय कमल हम सभसँ बड़का मूर्ख थिकौं मुँहमे राम बगलमे छूरी इ हमरासँ कहियो नै सपरल बनि नै सकल हमर महल हम सभसँ बड़का मूर्ख थिकौं सुनलौं सभ ठाम खूब माखै छथि बुधियार टोलक रहबैया एहि दुनियाँमे "ओम" मूर्खे भेल हम सभसँ बड़का मूर्ख थिकौं ....................सरल वार्णिक २४ वर्ण........................... (ऐठाम "फूल" माने अंग्रेजीक फूल अर्थात मूर्ख।) गजल- ८६ बाहरक शत्रु हारि गेल मुदा मोन एखनहुँ कारी अछि नांगरि नहि कटा कऽ मुड़ी कटबैक हमर बेमारी अछि तेलसँ पोसने सींग रखै छी व्यर्थ कोना हम होबय देबै खुट्टा अपन गाड़ब ओतै जतऽ सभक सँझिया बाडी अछि पेट भरल अछि तैं खूब भेजा चलैए नै तँ हम थोथ छी ढोलक कियो बजाबै मस्त भेल बाजैत हमर थारी अछि जीतबा लेल ढेरी रण बाँचल एखन कहाँ निचेन हम केहनो इ व्यूह होय टूटबे करतै जँ पूरा तैयारी अछि डाह-घृणाकेँ अहाँ कात करू इ अस्त्र शस्त्र नै कमजोरी छै आउ सभ ओहिठाम जतय रहै "ओम" प्रेम-पुजारी अछि सरल वार्णिक बहर वर्ण २२ गजल- ८७ चढ़ल फागुन हमर मोन बड्ड मस्त भेल छै पिया बूझै किया नै संकेत केहन बकलेल छै रससँ भरल ठोर हुनकर करैए बेकल तइयो हम छी पियासल जिनगी लागै जेल छै कोयली मधुर गीत सुना दग्ध केलक करेज निर्मोही हमर प्रेम निवेदनकेँ बूझै खेल छै मद चुबै आमक मज्जरसँ निशाँ चढै हमरा रोकू जुनि इ कहि जे नै हमर अहाँक मेल छै प्रेमक रंग अबीरसँ भरलौं हम पिचकारी छूटत नै इ रंग ऐमे करेजक रंग देल छै (सरल वार्णिक बहर वर्ण १८) फागुनक अवसरपर विशेष प्रस्तुति। रूबाइ- १ कखनो तँ हम अहाँकेँ मोन पड़िते हैब यादिक दीप बनि करेजमे जरिते हैब बनि सकलहुँ नै हम फूल अहाँक कहियो यै मुदा काँट बनि नस नसमे तँ गड़िते हैब रूबाइ- २ कोना कऽ रंगलक करेजकेँ इ रंगरेज रंग छूटै नै नैन पियासल छोड़ि गेल मुदा आस मिलनक टूटै नै हमरा छोड़ि तड़पैत पिया अपने जा बसला मोरंग बूझथि विरहक नै मोल भाग्य इ ककरो एना फूटै नै रूबाइ- ३ हमर करेज संगे खेलाईत रहलौं इ कोन खेल अछि मिलन अहाँसँ हमर खुजल आँखिक सपना भेल अछि जाडक रौद कहै छलौं हमरा इ एखन धरि मोन अछि अनचिन्हार छी आब अहाँ लग लोकक ठेलम-ठेल अछि रूबाइ- ४ अहाँक दुनू नैन बनल अछि हमर जिनगीक सम्बल मुस्की अहाँक करैत रहै अछि हमरा सदिखन शीतल भेटतौं अहाँ जौं नै हमर जिनगीमे सोआद कहाँ रहितै अहीं प्रेरणा बनल रहै छी देखि अहींकेँ लिखै छी गजल रूबाइ- ५ संगी सभसँ नीक शराब छै देखू कहियो नै बदलै छै एकर निशाँक नै जवाब छै देखू कहियो नै बदलै छै टूटल करेज जोड़ि दैए दुखक तापकेँ करै शीतल फेर कहिऐ कोना खराब छै देखू कहियो नै बदलै छै रूबाइ- ६ पीनाई तँ हम छोड़ि देब मुदा पीनाई हमरा नै छोड़ैए जीनाई तँ हम छोड़ि देब मुदा जीनाई हमरा नै छोड़ैए होशमे आबै ले पीनाई छै बड्ड जरूरी सुनि लियऽ यौ दोस्त पीबि कऽ हम होशमे छी ढनमनेनाई हमरा नै छोड़ैए रूबाइ- ७ अहाँ केर राजभवनक ऊँच सिंहासन हमरे छी बाँटि कऽ जकरा अहाँ हँसैत छी ओ राशन हमरे छी जनताक जे छै अधिकार सभटा आब अहाँ दऽ दियौ कूदि रहल छि जाहि पर खूब ओ आसन हमरे छी रूबाइ- ८ जागल आँखि केर सपना बनल जिनगी कुहरल आश केर झपना बनल जिनगी फाटल छल करेज हम सीबैत रहलौं रूसल सुखक आब नपना बनल जिनगी कता- १ चलल पूरबा जखन उड़ल आँचर अहाँक उधियाइत आँचर हमर करेज लेने गेल कारी मेघकेँ मात करैत अछि काजर अहाँक सगरो दुनियाँमे देखियौ घुप्प अन्हरिया भेल कता- २ अहींसँ शुरू अहीं पर खतम ई खिस्सा हमर करेजमे अहाँक छवि हम तँ बसा रखने छी आब अछि अहाँक छवि करेजक हिस्सा हमर ककरो नजरि नै लागै एकरा नुका रखने छी उमेश मंडल- निश्तुकी (अपन गप, किछु कविता, हाइकू-टनका, आ दूटा गजल) अप्‍पन गप साि‍हत्‍यक वि‍द्यार्थी हेबाक नाते कथा, कवि‍ता, उपन्‍यास, महाकाव्‍य पढ़बाक अवसर भेटैत रहल अछि‍ मुदा लि‍खबाक वि‍चार हेमनि‍मे जागल। ओना परि‍वारमे साहि‍त्‍यक प्रति‍ आकर्षण आइये नै पहि‍नहि‍सँ अछि‍। बाबेक अमलदारीमे ‘महाभारत’, ‘तुलसीकृत रामायण’, कबि‍र रचि‍त ‘अनुराग सागर’ घरमे अछि‍ जेकरा समए-कुसमए उनटबैत-पुनटबैत रहलौं अछि‍। आइक जे भाग-दौड़क जि‍नगी बनि‍ गेल छै ऐसँ पढ़ैक-लि‍खैपर बहुत बेशी प्रभाव पड़ि‍ गेल अछि‍। जइक चलैत परि‍वार-समाजमे अपनापनक वि‍चार सेहो शि‍थि‍ल भऽ रहल अछि‍। हाइ-नारायण, सबहक मनकेँ यएह घेर लेने छन्‍हि‍ जे पाइयेसँ सभ कि‍छु होइ छै। तँए जौं पाइ भऽ जाएत तँ जि‍नगीक सभ उदेसक पूर्ति भऽ जाएत। मुदा ओ ई बूझैसँ कात भऽ जाइ छथि‍‍ जे जि‍नगी जीबैले पाइयोक जरूरति‍ होइ छै जे एक साधन मात्र छी। वैश्वीकरणक प्रभावसँ आइ दुनि‍याँ गाम-घर जकाँ बनि‍ गेल अछि‍। जेकर प्रभाव जि‍नगीक कोने-कोन पसरि‍ रहल अछि‍। जखने काेने-कोन पसरि‍ रहल अछि‍ तखने जीवन-धारा प्रभावि‍त हेबे करत। जखने जीवन-धारा प्रभावि‍त हएत तखने आचार-वि‍चारक संग जीवन-शैली सेहो प्रभावि‍त हएत। एक समए छल जखन कठि‍न मेहनति‍ कए कऽ कवि‍ शास्‍त्रीय पद्धति‍ अपनौलनि‍ जे आइक जुगमे कठि‍न भऽ गेल अछि‍। जइसँ नव-नव शैली, नव-नव ढंग नव-नव पाठक लेल आबि‍ रहल अछि‍। जइठाम छन्‍द-अलंकार प्रमुख छल ओ गौण भऽ रहल अछि‍। संग-संग पढ़ै-लि‍खैक दयरा सेहो बढ़ल अछि‍। देश-वि‍देशक भि‍न्न-भि‍न्न भाषा, भि‍न्न-भि‍न्न शैलीक संग भि‍न्न-भि‍न्न समाज आ ओकर जीवन पद्धति‍ सेहो बुझबाक आ जनबाक अवसर भेट रहल अछि‍। जइसँ कवि‍-साहि‍त्‍यकार प्रभावि‍त हेबे करताह। कवि‍ता लि‍खैक प्रेरणा भाय गजेन्‍द्रजी (श्री गजेन्‍द्र ठाकुर) आ भाय नागेन्‍द्रजी (श्री नागेन्‍द्र कुमार झा) सँ भेटल ‘वि‍देह’ पत्रि‍काक सम्‍पादनक अवसर जखन देलनि‍ आ काज करए लगलौं तखन रंग-रंगक कवि‍ता, गीत, गजलक संग-संग गद्यो वि‍धाकेँ देखबाक अवसर भेटल जइसँ कलम घुसकए लगल।- उमेश मंडल कुमही फूल सदृश रूप हमर कहबै छी कुमही मगर। फूले सदृश सि‍रो हमर धरतीसँ हटल छी मगर। ऊपर पानि‍क बास हमर पानि‍ये पीब करै छी गुजर-बसर। लाइग‍ कोनो नै धरतीसँ हमर रस धरि‍ चुसैत रहलौं ओकर। पबि‍ते पूर्वाक सि‍हकी हम पछि‍म भाग टहलि‍ जाइ छी। जखनि‍ पबै छी पछबाक सि‍हकी पूब दिस टहलि‍ जाइ छी। बीच उत्तर दछि‍न पूरब पछि‍म वि‍परीत-वि‍परीत चालि‍ धड़ै छी। सि‍र शरीरसँ नम्‍हर रहि‍तो धरती कहि‍यो नै छूबि‍ पबै छी। आश-नि‍राश बीच हम सुन्‍दर रूप बना जि‍बै छी। धर्मात्‍मा धर्मात्‍मा होइ छथि‍ ति‍यागी। ति‍यागी कहल केकरा जाए यौ भैयारी? वएह ने जे केलनि‍ ति‍याग आकि‍ ओ जे केलनि‍ भोग बेसुमार। एक लोटा पानि‍यो पीलनि‍ दोसरेक हाथ। मजदूर, हरबाह भि‍नसरसँ साँझ धरि‍ देह धुनैए उचि‍त बोनि‍ मात्र दू सेर पबैए एक सेर बेच लऽ दोकान जाइए नून, तेल, हरदी, गोटी कि‍नैए ‍बचलाहा एक सेरसँ सभो परानी पेट चलबैए भरि‍ दि‍न तँ ओहो खटबे करैए? अहीं कहू, केहेन पंचैति‍या एले पंचैती करए काल ऊपरे-ऊपर नजरि‍ दौड़ौलकै। काजुल संग ति‍यागीकेँ देखि‍ ने पेलै हि‍नक ति‍यागपर नजरि‍ नै खि‍ड़ेलकै भोगीकेँ धर्मात्‍मा कहि‍ गेलै। शुभारम्भ साँझक समए छल झि‍स्सी पड़ैत छल। हालहि‍मे सि‍नेमाक हाँल जे थप्प भेल पड़ल छल तेकर पुन: शुभारम्भ‍ भेल छल। अबैत रहथि‍ ओम्हरसँ ओ लखन पान दोकानदारकेँ देखि‍ते पूछि‍ देलखि‍न हाल-चाल करि‍ते “की यौ लखन, दोकान तँ आब चलैत हएत खन-खन?” लखन करए लागल भन-भन- “आबे गड़बड़ अछि‍ पहि‍नहि‍ ठीक छल।” ओ वेचारे सोचए लगलाह- जहि‍येसँ हाँल चालू भेल हएत दोकान सबहक वि‍क्री चौगुना भेल हएत तखन ई कि‍अए बजैए पहि‍नुके वि‍क्रीकेँ नीक कहैए। ओ, वि‍चारए लगलाह हठात् भीतरमे आखिर अछि‍ कि‍छु बात लखनसँ पूछि‍ बैसलाह तड़ाक- “केना पहि‍नहि‍ ठीक छल अहाँक समाचार नीक छल?” “यौ भाय, हम अपन वि‍क्रीसँ जतेक नै खुशी छी वि‍क्रमक वि‍क्री बढ़ि‍ गेने ओइसँ बेसी दुखी छी।” लखन कि‍छु अहि‍ना सोचलक कि‍न्‍तु मोनक बात नै उगललक। मुँहथरि‍ जेहने घरक लोक रहै छै घरक मुँहथरि‍ तेहने होइ छै। जेहने घरक मुँहथरि‍ रहै छै तेहने ने बाटो धड़ै छै। जेहने जेकर बाट रहै छै आचारो-वि‍चार तेहने होइ छै। जेहने आचार-वि‍चार रहै छै तेहने ने संस्‍कारो बनै छै। जेहने जेकर संस्‍कार होइ छै तेहने ने जीवनो भेटै छै, तेहने ने कला-संस्‍कृतो होइ छै। जेहेन जतए केर कला-संस्‍कृति‍ रहै छै मनुक्‍खक मुँहथरि‍ तेहने होइ छै, साहि‍त्‍यक मुँहथरि‍ तेहने होइ छै। पचमेड़ पाँच मेड़ मि‍लि‍ एकठाम कहबैए पचमेड़। जहि‍ना बाट चारि‍ मि‍लि‍ कहबए चौमेड़। मेरहा-मेरहा जौं वि‍चार करब रंग-बि‍‍रंगक पचमेड़ देखब। आउ देखी आगूक मेड़ खाजा-लड्डू, जि‍लेबी-बुनि‍या आे बताशा सभ मि‍लि‍ एक सेहो कहबैए पचमेड़। फुट-फुट भऽ टुकड़ी बनि‍ नाओं अलग एका-एकी जहि‍ना आड़ि‍-घुर फुटल आड़ि‍ये-धुर नाओं कहबैत। तहि‍ना ने खजो-लड्डू खजे लड्डू कहबैत। मेड़-मेड़ मि‍लि‍-मि‍लि‍ मधुर-मधुर जहि‍ना बनैत तहि‍ना ने वि‍चारक बीच करक चाही वि‍चार यौ मीत। मि‍लि‍ वि‍चार-आचार पाँच पचमेड़क संज्ञा लैत साँच। वि‍चार मधुर मेड़क अछि‍ प्रत्‍यक्ष पचमेड़क। तीनू तीनठाम भेने कहबैत बलजोरी अछि‍ भने। खपड़ा माटि‍-पानि‍ संग मि‍लि‍ सानि‍-बाटि‍ कऽ मि‍ला-मि‍ला मुंगरीक माइर मारि‍ कऽ थोपुआ खपड़ा बनाओल जाइत। ठोकि‍ ठठा थोपुए जकाँ नरि‍या सेहो बनाओल जाइत बात अलग चाकोपर नरि‍या खपड़ा बनैत हाथोपर। साचा पाबि‍ टाली बनैत नम्‍हर-नम्‍हर गड़ धड़ैत। नरि‍या-थोपुआ, टाली एक-दोसरपर बजेलक ताली कहि‍यो एक-दोसरक बीच मेल-मि‍लाप नै केलक खाली। एक मुंगरी दोसर चाक मारि‍ खा-खा बढ़ेलक हाथ। देखि‍ दुनूक मेल-मि‍लाप टाली खपड़ा आबि‍-आबि‍ करए लगल साफ। साचा भरे बनल टाली अपन शरीर केलक भारी। बत्ती कोरोसँ बनल ठाठ जबाब देलक जोड़ल हाथ। आबि‍ बीच्‍चेमे एस्‍वेस्‍टस सभकेँ हड़बड़ेलक। टगि‍-टगि‍ खपड़ा टाली नपरा बनि‍ होंसथए माथ खाली। गामक इयार अहाँ लेल परदेश ति‍यागल अहींले सुख-सुवि‍धा ति‍यागल। परदेश कमा लोक धन बनबैए सुख-भोगसँ तृप्‍त रहैए। बाढ़ि‍-रौदी सहि‍-सहि‍ अहींक संग रहै छी। अहाँक सि‍नेह पबैले आगि‍-छाइ सेहो सहै छी। फूसि‍घर मे रहि-रहि‍ पानि‍-पाथर सेहो सहै छी। लत्ता-कपड़ा बि‍नु तन प्रेम करैत आएल मन पाला-शीतलहरी सहि‍-सहि‍ संग अहाँक पूरै छी। इयारक-यारी नि‍माहि‍-नि‍माहि‍ मातृभूमि‍क संग जीबै छी। पएर पादुका वि‍चार-सकल बीच फँसल अप्‍पन आन बुझाइए। इम्‍हर केकरा के देखत दूरेसँ छि‍ड़ि‍आइए। दोहरी जिनगी देखि‍-देखि‍ अपनो मन बौआइए। भेद-भावक जइ नगरीमे अइयो ओ चीज देखाइए। आइ गप-सप्‍पक बीच चीज ओ बदलल अवश्‍य बुझाइए। गप-सप्‍प ओ बेवहारक बीच अन्‍तर सभ दि‍नसँ अबैए। बूझि‍-बूझि‍ बुझैत रहलौं हम डरैत एना कि‍अए भऽ जाइए। होइमे कोन हेबे करत हृदए हमर कहैए। कि‍अए पएर पादुक अपन पहि‍र-पहि‍र नै चलैए। एम्‍हर-ओम्‍हर देखि‍-देखि‍ नि‍चलाकेँ ऊपरे-ऊपरे ऊपरका खोंटि‍ खाइए। तरे-तरक ऐ चालि‍केँ नै बूझि‍ मारि‍ खाइए। बचल जि‍नगी अकारथ बना कामौर कान्‍ह चढ़बैए। छठि ‍ पोखरि‍क चारूकात बनौलक गौआँ घाट। भरल पथि‍या लऽ धेलक सभ बाट। पहुँचल सभ हाली सजेलथि‍ अपन-अपन डाली। जरबाक लेल तैयार भेल दि‍आरी हाथि‍यो केलक अपन तैयारी जरैत दीप कुरनीपर लऽ धेलक माथपर अछि‍ हाथी बैसल आइ घाटपर। टौकना, खमहरूआ, सुथनी, हरदी, आदी इत्‍यादि‍ सभ पुराओत अपन-अपन फर्ज सभ, चुकबए चाहैत अछि अपन-अपन कर्ज देत सूर्यकेँ अर्घ। भोगी नाच करए बानर चाउर खाए मदारी बीचमे तँए अछि‍ सरोकारी। वि‍कासक नाओंपर भऽ रहल अछि‍ नाच। मानसि‍कता, मानसि‍कता, मानसि‍कता पसरल अछि‍ चारूकात नीक बात! कि‍एक नै हुअए वि‍कास। बीक रहल अछि‍ चारूकात ब्‍लडप्रेशर-डायबि‍टीजक गोली संगे-संग तैयो मदारीये बनल छथि‍ ति‍यागी भरि‍ जीवन भोजन केलनि‍ बैसारी ऊपरसँ दवाइयोकेँ बढ़ौलनि‍ बेपारी। भोग करैत-करैत भेल छथि‍ अघोर तइपरसँ रटना लगेने छथि‍ ताबड़तोर स्‍वर्ग जाए चाहैत छथि‍ सोरपोर। हमरा बीचमे हुअए कोनो नै बाधा हम सभदि‍न रहलौं जे मधुशाला! बनलै तँ अछि‍ वि‍चारशाला जइमे लटकल अछि‍ बड़का ताला। श्रोता भागवत वाचन शुरू भेल श्रोता सभ आबि‍-आबि‍ जगह लेल। चारि‍ तरहक श्रोता बैसल छथि‍ अपन-अपन काज-धि‍यानमे लगल छथि‍ बाचको आ श्रोतो। एक तरहक श्रोता भागवत सुनि‍ नीकक प्रचार करै छथि‍ दोसरोकेँ नव गप्‍पसँ अवगत करबै छथि।‍ दोसर श्रोता अंगीकार करै छथि‍ मुदा बजै नै‍ छथि‍ बि‍ना पुछने। तेसर श्रोताकेँ देखि‍यो बैसल छथि‍ भागवत प्रवचनमे मुदा धि‍यान छन्‍हि‍ व्‍यापार मंडलमे घुरि‍आइत-नुरि‍आइत। स्‍पष्‍ट अछि कि‍छु नै पेला ई प्रसादेटा खेलाह ई। चारि‍म श्रोतापर करू वि‍चार ई छथि‍ मुदा सदाचार सुनि‍तो छथि‍ आ गबि‍तो छथि‍ अपन जि‍नगीक क्रि‍यासँ मि‍लैबि‍तो छथि‍। ओतबे नै‍ डेन पकड़ि‍ पछुएलहाकेँ खीं‍चि‍तो छथि‍ आ, ठमकलहाकेँ धक्का सेहो लगबै छथि‍। कल्‍याणी कल्‍याणी नाओंसँ लगैत अछि‍ जेना केने हेती ई कि‍छु एहेन काज वा करतीह। जइसँ भेल हएत कल्‍याण वा हेतै कल्‍याण। मुदा से भेल आकि‍ नै‍ भेल एत्ते धरि‍ जरूर भेल। भाग्‍य-तकदीर सभसँ पैघ होइत अछि‍ से कहि जरूर गेल। शब्‍दजाल वाक्‍यजाल सन महजाल। बनि‍ बना क’ फँसबैत धरि‍ जरूर गेल। देश हमर देश कि‍छु लोक खेल रहल छथि‍ धुरखेल। खुट्टीसँ आगाँ पड़ल बड़का देबाल देवालक भीतरे लागल अछि‍ मड़कड़ी चारूकात। इजोत चकचकाइत अछि‍ दि‍ने जकाँ राइतो बुझाइत अछि‍। चुट्टी-पि‍पड़ी छोड़ि‍ सभ कि‍छु देखाइत अछि‍ मुदा, देबालक अंति‍म खुट्टीसँ ओम्‍हरे भऽ रहल अछि‍ मनोरंजन। हेबक चाही जरूरतसँ ऊपर उठि‍ गेलापर स्‍वभावि‍क अछि‍। मुदा देवालसँ इम्‍हर बोन-झार सदृश मनुक्‍खक जड़ल रूपक खेखनैत स्‍वर कि‍यो सुनैबला नै‍ चारि‍ तरहक नाओं रचैबला लोक देशक भीतरेमे बड़का देवाल ठाढ़ करैमे अपनो उड़लनि‍ होश। कऽ रहल छथि‍ कि‍लोल हमर देश अछि‍ अनमोल एक्कैसम शदीमे चलि‍ रहल अछि‍ ताबड़तोर। आश्चर्य चहारदेवालीक भीतर मात्र गनगनाइत अछि‍ बोल भऽ रहल अछि‍ भोजक बदला भोज मात्र ओम्हरे अछि‍ ई गरदमगोल माने चहारदेवालीक ओही पार बुझबैत अछि‍ अपनाकेँ मनोरंजन योग। परती-पराँतमे रहएबला दि‍नकट्टू जनमहि‍ काल भेल छल मइटुग्गर छेँटगर हेबासँ पहि‍ने ओ कहबैत छल दूधकट्टू आइ दुनू हाथ जोड़ि‍ दू सए फीट एन.एच. सड़कक कातमे हजारक-हजार कहबैत अछि‍ दि‍नकट्टू। पएरमे चट्टी नै‍ छै पहि‍रैले चलए मुदा पड़तै पक्की सड़कपर शीशा-काँटी पसरल सड़कपर। खाइ-पीबैक नै‍ छै जोगार ओकरा आ ने छै कोनो रोजगार चारूभरसँ खाली सुनै छै -जल्दी जोड़ि‍ लैह सरोकार तूँ एक्केसम सदीक समाज तूँ। भाषा भेद हमरा सबहक माथपर पसरल अछि‍ मरलत्ती जकाँ किछु कियो सुचि‍ंतक नै जे चिंतन करता ऐपर ई कथी लतड़ल अछि सभपर? मुदा दुर्भाग्यसँ ऐमे छुपल अछि‍ किछु बात जइमे अछि‍ नै एक्कोटा पात सबहक कहब छन्हि “ई आगाँ चलि‍ कऽ करत प्रदूषण साफ जीबैक लेल स्वच्छ हवा-बसातक अछि‍ जहि‍ना खगता करत ई दूर सबहक बेगरता।” देखा चाही ई दूर करत प्रदूषण आकि‍ करत सभकेँ निपत्ता। नोर गोरसपट टकधि‍यान लगेने मुनि‍या बैसल अकानैए। घर-अंगन, द्वारि‍-दरबज्‍जा भोरे सभ दि‍न बहारैए। बर्तन-बासन, छि‍पली-कटोरी सभ दि‍न चमका कऽ मांजैए। झक-झक झलकैत थारी-बाटी देखि‍ मुनि‍या माए गुनगुनाइए। गुनगुन्नीमे अह्लाद भरल छै सुख-दुख सेहो उमरल छै मुनि‍या आब छोड़त ई दुनि‍याँ। माइक आँखि‍क नोर मुनि‍याक हृदैमे उठबैत हि‍लकोर भऽ जाइत अछि‍ बेहोश। होश अबि‍ते फेर अकानैए आँखि‍क नोर नि‍ङहारैए माइक मन टटोलैए। सुखक नोर आकि‍ दुखक नोर दुनू एक्के संग टघरैत-झहड़ैत माएक चेहरापर देखैए। खूर-खूर, खूर-खूर काजौ करैए घर-आंगन सम्‍हारबो करैए। मुनि‍या मुदा ई बूझि‍ नै पबैए की‍ खुशी आ की‍ दुख, एक्के संग माइक आँखि‍मे ई नै बूझि‍ पबैए यएह बेवसी मुनि‍याकेँ सतबैए। धारक कात अपना आँखि‍ये सभ देखैए अपना चालि‍ये सभ चलैए। सज्ञान-अज्ञान आँखि‍क बीच चालि‍यो अपन चालि‍ मारैए। जहि‍ना धारक दू भीत्ता बीच पानि‍क तेज धार बहै छै तहि‍ना मनुख-मनुख बीच अपन-अपन जि‍नगीक धारा छै। चालि‍-चलनि‍ सदृश टुकड़ी जुटि‍-जुटि‍ महार बनै छै। जहि‍ना धारक महार संग आकृति‍ रंग-बि‍रंगक छै। सभ मनुख बीच तहि‍ना ओहि‍ना सदएसँ बनल अबै छै। एक जाइए दोसर अबैए उराहि‍-उराहि‍ कर्म करैए। उराहए-नि‍माहए लेल बेवस्‍था बीच छै अनमेल। कि‍यो लि‍रही पोखरि‍ सदृश तँ कि‍यो मरता इनार जकाँ सदएसँ पड़ल मरता भेल। बेवस्‍था जेकरा हाथ लगल छै सेहो तँ भूतही‍ धार बनल छै। उनटैत-पुनटैत करैए खेल तामसे बीच बि‍खाह अछि‍ भेल। मारल बुइध मरलेमे मारि‍ खा-खा मारल बुइध कहबै छी। मरले बाट पकड़ि‍-पकड़ि‍ हँसी-खुशीसँ जीबै छी। मरले ने जीवि‍यो जाइ छै जीलहे ने मरबो करै छै। जहि‍ना पबि‍ते अद्राक पानि‍ मुइलहो धार जीबै छै। भलहि‍ं जीतहा धार बीच तीन-मसुआ ओ कहबै छै। तीन धार कि‍एक ने हो ऊहो तँ धारे कहबै छै। बाट-घाट बना-बना यात्री पार करै छै। मुइलहा-जीतहा बीच सदए तीरम-तीर चलै छै। एकक सम्‍बन्‍ध हि‍मालयसँ रहने फाँड़ी सेहो फुटबै छै। ऊहो बीच दोसर एहन छै अपने बेथे बेथाएल छै। एक-दोसर बीच ताना-तानी चलैत आबि‍ रहल छै। एकेसम शदीक ढाढ़स बना नहर खुनबै छै। कागज-पत्तर बीच सदए ओझरा-ओझरा मरै छै। खुशी ओर-छोर वि‍हि‍न दुख जहि‍ना सुखोकेँ तहि‍ना ने होइ छै। एक जाइए दोसर अबैए दुख-सुख सेहो कहबैए। सुख-दुखक चालि‍ अजीब छै संगे-संग चलैत रहै छै। तारा-ऊपरी लटपट-सटपट छाती मि‍ला-मि‍ला चलै छै। सभकेँ अपन-अपन खुशी छै चाहे व्‍यक्‍ति‍ हुअए आकि‍ परि‍वार। तहि‍ना ने रोगो-वि‍याधि‍ छै अपन-अपन सबहक दरकार। बेकती-बेकती बीच-बीचक केना दुनू संगे चलतै। जाबे तेना नै चलतै व्‍यक्‍ति‍क परि‍वार केना बनतै। बाट-बटोही बाट चि‍न्‍हबैत बटोहीकेँ पहुँचबैत घाट बटोहीकेँ। चलि‍-चलि‍ बटोही पहुँचैत घाट लेल बाटे-बाट। वि‍चारक संग जँ चालि‍ रहल घाटपर जाइसँ कि‍यो नै रोकत। वि‍चारक टुकड़ी वाणी बनि‍ वाण रच्‍छा, शक्‍ति‍ बनि‍ उभड़त अपन-अपन। शक्‍ति‍ तँ शक्‍ति‍ये बनि‍ चाइलि‍क भरे खाइए। एक बटोही भार बनि‍ भारक संग भरमबैए। दोसरक कि‍रदानी देखि‍-देखि‍ गारा संतोष लगबैए। हे यौ अहाँ हे यौ अहाँ, केलौं जे कि‍छु अहाँ जे केलौं अपनेले अहाँ। तइले दुख हमरा अछि‍ कहाँ। सुन्नर निर्मल छोड़ि‍ अहाँ अकल्‍याणक बाट पकड़ि खुरछाही कटैत रहलौं बदलैत रूप ओ स्‍थि‍ति‍केँ चि‍न्‍ह-जानि‍ क’ तैयो अहाँ ढेका पकड़ि‍ टहलैत रहलौं अहाँ। आइ जौं हम, कि‍छु बजै छी कि‍छु करै छी ऐमे केना मास्‍टरी करै छी अहाँ। काल्हि‍ अहाँकेँ हमर कोनो भान नै छल कन्नि‍को धि‍यान नै छल। मुदा, भुखल केर पेट भरबाक जगह तेल, फुलेलक फेरि‍मे धकलैत ओइ जेरमे रहलौं अहाँ। आब गाम, गाम नै रहल वि‍श्वक गाम भऽ गेल। अहाँक बजारोसँ पैघ आ सघन जतए इमानदार, कर्मठ, उदार रहैत आएल अछि‍ आइसँ नै सदि‍ओंसँ जेकर साक्षी अछि‍ इति‍हास। संभवत: अहुँक चपचपी सघन भऽ जाइत अछि‍ तखन गामेक नक्शामे। अपन गाम उड़ैत-उड़ैत उठि‍ नै सकलौं उजड़ि‍ गेलौं उपटि‍ गेलौं। केरा आ अड़ि‍कंचनक पात कलक बगलक खत्ता बले दुनूक लहलहाइत वीर देखि‍ विश्वस्‍त भऽ आश्वस्‍त भऽ हम उड़ि‍ गेलौं। बिना जड़ि‍-मुड़ीक भऽ गेलौं ठुठ गाछ सन, नव पेंपी खोजक लि‍लसा मनमे अछि‍ हमरा व्‍याप्‍त मुदा, खत्ताकेँ हम बुझै छी अधला जे हमर करत कल्‍याण संभवत: तँए हमरा नै अछि‍ वि‍श्वास उड़ैत-उड़ैत उठि‍ नै सकलौं बौराए गेल छी अकासे-अकास। कि‍छु नै फुराइए की कही कहल नै जाइए देखै छी रहल नै जाइए। सुनै छी तँ आश्चर्य लगैए हवाइ लड्डू सगतरि‍ बि‍काइए। हाथीक बदला सि‍क्कड़ि‍ लेने साँझ-परात घुमैए। लेल्हा, लुल्हा, लुटलाहा बंचि‍त भऽ कऽ अपन भाग्‍यपर कनैए। बेवस्‍था केर होइत नाच साँझ-परात सभ देखैए। नि‍नाएल आँखि‍, भकुआएल मोन नैसर्गिक प्रति‍भाक टोना करैए। विश्वक आहटि‍ पाबि‍ वि‍ज्ञानक सुगबुगाहटि‍ देखि कि‍छु क्षणले सभ एक होइए मुदा, ओ सि‍क्कड़ि‍ कखनो जाति‍क तँ कखनो धर्मक माला पि‍न्हबैए। कखनो झालि‍क धून तँ कखनो मृदंगक। अपन धुनक धूनि‍मे सभ अंध भेल बौअाइए कि‍छु नै फुराइए। के मैथि‍ल? जहानक परम सत्‍य जेकरा अंग्रेजिया युनि‍भर्सल सच्‍च कहै छथि‍- “सुरूज पूबमे उगैए।” जौं बेर-बेर आदि‍त्‍यसँ पूछल जाएत तँ की हएत...? ओहो भऽ जेताह भक् की देखबए चाहै छथि‍ संसारक लोक... की हम कर्तव्‍य पथसँ वि‍मुख छी? प्रत्‍यक्षकेँ प्रमाण की? कि‍अए देतीह वैदेही बेर-बेर अग्नि‍ परीक्षा। दशानन जौं सीयासँ करि‍तथि‍ सम्‍पर्कक प्रयास भष्‍मि‍भुत हएब नि‍श्चि‍त छल भगवानोकेँ बूझल छलनि‍ तखन रघुवर कि‍अए लेलनि‍ सीताक अग्‍नि‍ परीक्षा? मि‍थि‍लाक बेटी कतए गेलीह... दोख केकर? राजधर्म वा कर्तव्‍यबोध भरि‍गर पड़ल लोकक अवि‍श्वास जकरा लेल सुखसँ वि‍मुख भेलथि‍ रघुवर ओकरे आँखि‍मे नोर नै... तँए, दूर नै भगाउ बेर-बेर कि‍अए कहै छी “हमहूँ मैथि‍ल” कखनो तँ अपन मोनसँ पुछू “अहाँ मैथि‍ल, आकि‍ हम मैथि‍ल?” फूलबाबूकेँ भेटलनि‍ पुरस्‍कार वयनाक धेने हथि‍यार मुदा, हुनक नेना-भुटका मैथि‍लीसँ अनभुआर... फूलबा मैथि‍लीक नै अछि‍ साहि‍त्‍यकार। मुदा हाथमे भाषाक पतवार धेने घुमि‍ रहल अपन खेत-पथार डोका-काँकोर बीछ ओ भैंटक लाबा चि‍बा कऽ उफनैत सोनि‍त जरा रहल अछि‍ मि‍थि‍लामे बैसल..... मुदा, प्रश्न रहि‍ये गेल के मैथि‍ल? बाधा वि‍दा भेल मंगला पूभर कान्‍हपर टँगने अछि‍ साइकि‍ल बालुपर। कहुना कऽ लगि‍चेलक लटपटाइत पहुँचल धारक कछेरमे। बि‍नु पानि‍क अछि‍ धार चक-चक करैत अछि‍ बालु चारूकात। नाउ नै‍ बालु देखि‍ भेलै मंगलाकेँ थोड़े होश एलै अपन छूच्‍छ जेबीपर भरोस भेलै आब टपैमे कोनो नै हएत बाधा पहुँचबे करब सरायगढ़क पाठशाला। मुदा, मंगला लसकि‍ गेल घाटपर नजरि‍ दौगौलक अपन कोनो लाटपर। जेबीमे देने हाथ तकैए चारू कात। सोचैए, आब की करबै हौ बाप ई तँ लेबे करतै घाटी। जेना लगैए एकरा उठल छै आँती। सुखलौ घाटक लेतै खेबाइ नै देबै तँ देत ई रेबारि‍।‍‍ सहए भेल मंगला घूमि‍ गेल पच्‍छि‍मे मुड़ि‍‍ गेल। कवि‍ता हम नै बि‍सरब अपन सनातन आ संस्‍कार। नै‍ बि‍सरक चाही अहुँकेँ अपन आचार दोस बनब आकि‍ दि‍याद-बेहाल आकि करब खाली हाल-चाल। तैयार भऽ गेल अछि‍ सबालक महाल। अहाँ नै बुझै छि‍ऐ बनि‍ जाउ दि‍याद। अहाँ करू कि‍छु रि‍याज पाँति‍ राखू चारि‍ याद। यौ दोस अहाँ आनू अपन होश कए लि‍अ स्‍वीकार हे यौ दि‍याद। हि‍या गुनि‍ भरल दि‍याद सुनि‍ पड़ल। फाँट बीचमे आबि‍ धूनि‍ पड़ल। हट, हट, हट नै तँ घसक फाँट करए उद्घोस। दुनू अपन ठाम बेहोश। मुदा, तैयार भेल सोर-पोर कल्‍याण लेल नै‍ जोर अपन फाँटले ताबरतोड़। खास खास जगहक खास आदमी खास जि‍नगीमे खास बात। देशक नाओंपर भऽ रहल अछि‍ ई खास। मुदा, जखने देश एक परि‍वार सभकेँ चाही रोजगार। खुशी चाही सबहक घर-द्वार आकि‍ ईहोमे करबै बेपार? गुजरि‍ गेल मध्‍यकाल आ भक्‍ति‍काल। मुदा पाछू मुँहे लुढ़कल कि‍एक जाइ छी यौ महराज? फंदा जखने करब नखरा सभ कहबे करत हमर दऽ दि‍अ बखरा जँ अहाँ रहब शांति‍चि‍त भेटत अपन सभ परि‍चि‍त। करब अहाँ कल्‍याणक काज सभकेँ हेतै अपने-आपपर लाज। लाज सि‍खबैत अछि‍ काज आ मुँहो मोड़ैत अछि‍ हठात् भऽ जाइत अछि‍ केनादन धऽ लैत अछि‍ अमती काँटसन। डेग गामक गाम भेल वाम जखन ओ केलनि‍ एलान छोड़ह आब अल्‍प्राजोलाम। गाढ़ नि‍न्नमे डूबि‍ जा दोसरे साँझ मुदा ऐ लेल करए पड़तह एक काम। आपसमे बैस ि‍नर्णए करह आम करह प्रति‍ज्ञा खा सप्‍पत तोड़ि‍ देब, छोड़ि‍ देब देहेजक ताम-झाम। करब मात्र आवश्यक खर्च कल्‍याण। बहुतो कएलनि‍ स्‍वीकार। जि‍नका सि‍रपर बेटीक बि‍आह छन्‍हि‍ सवार वएह आदमी बेटा बि‍आहमे भऽ जाइ छथि‍ वाम! कहू, केना टुटत दहेजप्रथा केर ताम-झाम? प्रश्न आगाँ आबि‍ केलक सबहक माथ जाम भऽ गेल गोलबन्‍द कि‍छु गाम पुन: भेल सप्‍पत-सप्‍तान। अपना सभ छी बुधि‍‍जीवि‍ सभ प्रणाम चलत अपने सबहक गोड़ धाम मुदा, चलए पड़त अपनो एकचालि‍पर कम-सँ-कम भेल गोलबन्‍द गामपर। चलए लगल सभ भऽ एकठाम कि‍छु दि‍न मात्र चलल ई काम। बादमे देखल गेल गरीब-धनीक बीच ठाढ़ भेल बड़का खाम्‍ह। देखि‍ सकै छी पचि‍सो गाम। समस्‍या तँ अछि‍ भेले भेल बाम आब कोन करब काम। ऐ लेल वि‍चार आ दृष्‍टि‍कोण बीच रचए पड़त गुनए पड़त देखए पड़त तखन हएत सर्वकल्‍याण गप्‍प देलासँ चलत नै काम वि‍चार कऽ उठए पड़त समाजकेँ चि‍न्‍हए पड़त। समस्‍याकेँ देखए पड़त यथार्थकेँ जानए पड़त। तेकर बाद सर्वकल्‍याणसँ सरोकार जोड़ए पड़त। बेवहारि‍क रूप आ चालि‍ धड़ए पड़त। गप आ काजक बीचक खदहा भरए पड़त तखन होएत समस्‍या भराम। बुझैक बाट जहि‍ना चलैक बाट होइ छै तहि‍ना तँ बुझैयोक बाट छै। जेहेन जे बाट चलै छै तेहने घाट पहुँचै छै। कि‍यो पहुँचए घाट सरोवर कि‍यो पहुँचए कमला घाट। कि‍यो पहुँचए मरैत परलाही तँ कि‍यो पहुँचए धोबि‍या घाट। जेहेन जे घाट पहुँचैत तेहने जल से पेबो करैत। जेहेन जल जे पाबि‍ पबैत से तेहने ने पीबो करैत। गुण अवगुण तँ पाछू बुझैए तत्-खनात तँ पि‍यास बुझबैए। कनीटा फूसि‍ कनीटा फूसि‍ बजा गेल पढ़ुआकाका लग आइ। पढ़ुआकाका बूझि‍ गेलाह टोकि‍ कऽ आगूमे थूक फेक देलाह। सरमे-भरमे कि‍छु नै बजलौं आगू माहेँ देखि‍ नै सकलौं। सोचैत-सोचैत सोचि‍ नै सकलौं अपन गलती बूझि‍ नै पेलौं। नीक बेजाए बीच रहलौं सभ दि‍न आगूक मतलब बूझि‍ नै पेलौं। पोखरि‍ उड़ाह सोलो सालसँ गदि‍याएल पोखरि‍ उड़ाहए लेल तरसैए। करमी-केचलीसँ भरि‍याएल पोखरि‍ कुहरि‍-कुहरि‍ कहैए। युग-युगसँ दुदि‍सिया मारि‍ मुर्दा बाट पकड़ेलक सहे-सहे पसि‍-पसि‍ घाटक मुर्दा बना देलक। नै रहल कोनो आश जि‍नगीक आ ने रहल कोनो मनोरथ हारल मन बाजि‍ ने पबैए बात अपन कोनो सार्थक की कहब केकरा कहब अपन बेथे सभ बेथाएल। देखत के केकरा यौ भैया बीख पीब सभ अछि‍ बनल बि‍खाह। घाम घाम चुबा-चुबा कऽ तमैत अछि‍ कोलाक कोला लगबैत अछि‍ फसि‍ल धैर्य आ दि‍लसँ। बाढ़ि‍-रौदी बीच सदि‍खन कि‍सानक हृदैमे होइत अछि‍ धैर्यक गर्दमगोल। अपनो खाएब आ दोसरोकेँ खि‍आएब यएह तँ हि‍नक अछि‍ मनोकार। मुदा ऐ मनोकारकेँ कि‍यो नै दैत अछि‍। सभ अपन-अपन सरोकार कागजपर पुड़बैत अछि‍। खुनाइत नहर पाछूसँ भोथाइत अछि‍। आँखि‍ फाड़ि‍-फाड़ि‍ सभ देखैत अछि‍ कि‍ंतु कि‍यो ने लजाइत अछि‍। ठूठ बाँस बगुला बसि‍ते ठुठि‍याए लगलै हरि‍अर-घनगर बँसबि‍ट्टी। बास बना-बना बसए लगलै उजड़ा बगुला सबहक पति‍याएल धाड़ी। कोनो अछि‍ ठूठ भेल रोग-वि‍याधि‍सँ आ कोनो ठूठ छै बाढ़ि‍ बेटीसँ। समूह छोड़ि‍-छोड़ि‍ कोनो ठूठ भेल अपन करनीसँ। जे कहि‍यो छलै हरि‍याएल बाड़ी सुखल अछि‍ आइ ओ सील बनल पड़ल अछि‍। चीड़-चीड़ कऽ जरना बना-बना ओकरा जरने जोग कहैत अछि‍। तँए कि‍ ओकर गुण देह अकारथ नै! मुरदो बनि‍ हँसैत छै। रश्‍मि‍ रूप पाबि‍-पाबि‍ रश्‍मि‍ संग हँसि‍-हँसि‍ जरै अछि‍। लतड़ैत लत्ती हरि‍अर-कोमल तत्ती करैला आँखि‍ मारि‍-मारि‍ कहै छै। अछैते औरूदे नि‍कलैए प्राण तड़सि‍-तड़पि‍ कऽ कहै छै। ऊपरे-ऊपर एना दबतै जनु भम्रमे पड़ल छलै। लत्ती बूझि‍ लतड़ए देलकै। संगी कहि‍-कहि संग धऽ धऽ धात केलकै भीतरे-भीतर। जइ सेवा लेल जन्‍म भेलै कि‍छु कहाँ पाबि‍ पेलौं ई गप ओ बुझलक बाद। जि‍नगी अकारथ बना-बना कऽ मृत्‍युक बाट अपने धेलक। बौआएल बटोही बि‍नु ओर-छोड़क बाट बुझने ओर-छोड़ बि‍नु बुझने बौआइत रही। आगू-पाछू देखि‍-देखि‍ बटोही मने-मन पचताइत रही। हमरे सन ईहो बटोही हराएल बाट बढ़ए चाहैए। सबहक एक्के उदेस अछि‍ सुखसँ जि‍नगी जि‍बए चाहैए। बाट-बाट सबहक भि‍न्न-भि‍न्न जे जा-जा एकठाम मि‍लैत। एकबट्टी, दुबट्टीसँ बढ़ि‍-बढ़ि‍ पचबट्टी जा-कऽ फँसैत। जइ पचबट्टीपर पहुँच कऽ रावण हरलनि‍ सीताकेँ। ब्रह्मचारी रूप बना सजि‍-धजि‍ भ्रमि‍त बनौलनि‍ सीताकेँ। फकुआक रोटी भादबक पूर्णिमाक इजोत बदरीहन बादल चमकि‍ उठल। छने भरि‍क भलहि‍ं कि‍अए नै भीतर-बाहर ज्‍योति‍ पहुँचेलक। सालक तँ सभ शुभ लक्षण माघेक बर्खा कराओल स्‍नान। चढ़ि‍ते फागुन सजबए लगल फूलसँ लदि‍ गेल आम। फूले नै फड़ो भेल तहि‍ना आशा-अशी चैत-बैशास बीतल। चढ़ि‍ते जेठ सि‍नुर सि‍ंगार कऽ भरि‍-भरि‍ रस रसाल बनल। जेठ-अखारक सुख-भोग सभटा साउनेमे सठि‍या गेल। भादवक झटकी केना कऽ कटतै भकुआक रोटी आश भेल। पंच परमेश्वर भगवती पूजामे पचमेड़े प्रसाद चढ़ै छै। खाजा-लड्डू, जीलेबी-बतासा बुनि‍याॅ मि‍लि‍ पचमेड़ कहबै छै। जहि‍ना पाँच दि‍ससँ अबैत बाट पचबट्टी कहबै छै। तहि‍ना पाँचो मधुर मि‍लि‍ कऽ पचमेड़ सेहो कहबै छै। पाँच नदीक बेग मि‍लि‍ जेना प्रशान्‍त सागर कहबै छै तहि‍ना ने पाँचो वि‍चारधारा पंच परमेश्वर कहबै छै। पंच प्रमेश्वर बास करए सुख-दुखक मेल-मि‍लाप करए पाँचोक सुख-दुख पाँचो बूझि‍ परमात्‍मा परमेश्वर नाओं धरबए। गाए मंचामृतक समुद्र गाएकेँ कहल जाइ छै। सभ कि‍छु रहि‍तो बेचारी पशु बनि‍ जि‍नगी जीबै छै। अपन अजादी ति‍यागि‍-ति‍यागि‍ जंगल छोड़ि‍ संग पकड़ै छै। अपन देह गला-गला सेवा धर्म बूझै छै। दूध अमृत अमृत छी दहि‍यो। घी ज्ञान कहबै छै। आषब-अरि‍ष्‍ट बनि‍-बनि‍ जीवन दान गोंत करै छै। आंगन-घर पवि‍त्र करैले गोबर जि‍नगी दान करै छै। अपन फला-फल पबैले सभ कि‍छु लुटबै छै। तुलसी पंचामृत जहि‍ना बनै छै मचमेबो तँ तहि‍ना होइ छै। पाँचो गुणसँ भड़ल-पुड़ल पंचांगम कहबै छै। पात चढ़ै छै देव सीर ऊपर पूष्‍प गंध अकास उड़ै छै। शक्‍ति‍वर्द्धक बीआ बनि‍ कऽ जीवन दान करै छै। डाँट-चाम मि‍लि‍-मि‍लि‍ गाछ रूप धड़ै छै। अपन जि‍नगी हरैत-भरैत दोसरोक जीवन भरै छै। सीरक तँ अजीब रूप छै तर-ऊपर जि‍नगी धड़ै छै। अपन कलाकारी देखा-देखा नाओं कहाँ बदलै छै। काँच फल काँच फलक ठेकान कते जते काल देखै छी, मात्र ततेक। काँच माटि‍क मूर्ति जहि‍ना ढाॅचा मात्र कहबैए। तहि‍ना तँ फूलोसँ बनल फल सि‍रखार मात्र कहबैए। आ वएह सि‍रखार आशा बान्‍हि‍-बान्‍हि‍ रौद-बसात सहैए। पहि‍ने सि‍रखारसँ खि‍च्‍चा बनैए फलक रूप तेकर बाद धड़ैए। मुदा ऐ दुनि‍याँक वि‍सबासे कतेक खि‍च्‍चासँ आगूओ बढ़त। डम्‍हा-डम्‍हा रंग लऽ कऽ छि‍टकत पाकल रसगर फल बनत। काँचे फल जकाँ दुि‍नयो चलै छै हँसैत-कनैत संग बढ़ै छै। लघु कवि‍ता हँसैत लहास लहास माने मुइल मुइल माने लहास। ई के नै‍ बुझत हठात्। गुम-सुम भेल छल जँए ओ बुझाइत छल लहास तँए ओ मुदा, आब ओ बाजत बजैत-बजैत हँसत अहाँक कृति‍पर बनल संस्‍कृति‍पर। प्रकाश ज्ञानक प्रकाश जाइत अछि‍ ओतए तक जतए कि‍यो नै‍ जा सकत हठात्। मुदा, ज्ञानो भऽ जाइत अछि‍ गुलाम सांकृत्‍यायन पड़ै छथि‍ मोन घराम। अगि‍लह आगि‍-पानि‍केँ मनक माइनकेँ अजीब बात अछि‍। मि‍त्र दुश्‍मन देवता तीनू मानि‍ लोक धड़ैत अछि‍ छेबता। सप्‍पत खाइ काल देवता लोकक घर जड़बैकाल मि‍त्ता। एकक मीत दोसरक हृदए करैत वि‍दीर्ण अपनाकेँ साबित करैत अछि‍ वएह तीनूमे बँचल अछि‍ जएह। बारहे-बारह घंटा दुनूक छै राति‍ दि‍न। आगूमे अड़ल छै उदय अस्‍त। राति‍क अंत उदयसँ होइए भोरक अस्‍तसँ... अस्‍त-व्‍यस्‍त हम नै बुझब तँ के बुझा देत? दर्दक डरे हनहनाइत, भनभनाइत ओइ स्‍वरकेँ सुनैले नै‍ छथि‍ कि‍यो तैयार। जइमे मात्र ओ मात्र गाओल जाइत अछि‍ संस्‍कृति‍क गीत। कि‍यो नै‍ बनए चाहैत छथि‍ मीत करए जे पड़तनि‍ हुनक दर्दसँ प्रीति। सुधार भकोभन ओइ अन्‍हार कोठरीमे जइमे काजर सन कारी राति‍ दि‍नोमे बुझाइत अहीं कहु यौ भाय तखन शीशामे केना आएत ओकर चि‍त्र केना देखाएत? वि‍चारक फाँट अहाँक गप अपन मन दुनू मि‍लैए। मि‍लि‍ दुनू अछि‍ चौचंग खोजि‍ रहल अछि‍ वसंत मुदा बसंतक चि‍ड़ैकेँ संग नै राखए चाहैए ओ असगर काइये की लेत मने-मन चिंता करै छी हम। पड़ाइन गामक मुँहथरि‍ जंगल बनल अछि‍। आइ धरि‍ गौआँ बौआइत अछि‍। पीचे-पीच सड़के-सड़क। काते-कात कति‍याएल अछि।‍ बजारे-बजार बौराएल अछि। तत्‍व ज्ञान बसंत आएल गाम जाएब आब एतए रहि‍ नै पएब बसंतेक खोजमे तँ छी बौआएल। धोधरि ‍ भुरकीसँ भार बनि बील बोहरि‍ धरि‍ बनि‍-बनि‍ असंतोष। धोधरि‍ बनि‍ धुधुआ रहल अछि। मंगल कातमे ठाढ़ भऽ मंगला चारूकात नजरि‍ दौगा-दौगा हृदैकेँ केने अछि‍ थीर। नै गेल ओइ भीड़। देखि‍ भागम-भागक होड़ अपनाकेँ केलक एकोर। बुढ़ारीमे बजैत रहलौं हरदम। केलौं ने एक्को छन। सुनैत-सुनैत मनमन्‍द सुनबैमे होइत छी बुलंद। आब की करब मन अछि‍ चौचंग। जि‍नगी चाह करैए कर्मक बाट देखबैए। हाइकू/टनका आप्‍त-व्‍याप्‍त छै भुखमरी आइयो अनठबै छी देखि‍ देखि‍ हमहीं आँखि‍ अँखि‍अबै छी। समस्‍या आप्‍त सोलहनी सजल साहि‍त्‍यकार लेखे पुरान छै आप्‍त केना एतै यथार्थ। तोरा पएरे हम नै जेबो आब कि‍एक तँ तूँ भेलेँ लापड़बाह चऽल कोढ़ि‍क चालि। अहाँक आँखि‍ चपेटि लैत अछि‍ हमर हृदै औनाए लगैत छी चारू भुवन हम। दीन-हीनले नाटक करैत छी दया देखा कऽ दया-सँ-माया बीच हमहीं फॅसल छी। राति‍क अंत उदयसँ होइए दीनक अंत अस्‍त होइए दुनूकेँ भेद कऽ कऽ अजस धड़ैत छी। पग पगहा बाट-बटोही घाट ढाठ बनैए कर्म आ अकर्म नै जे बूझि‍ चलैए। जीवनक रस कालचक्र ओझल केने आएल दि‍न-राति‍क भेद तखन तँ हएत। हरि‍अर लत्ती आँखि‍ मारि‍-मारि‍ कऽ कहै छै आबो फल वि‍हुन हम रहल रहब आबो। सातम तल धरती सजल छै पातालपर अकासो सात खण्‍ड मर्त देव लोक छै। बाट-बटोही बाटे-बाट बौआइ छै हँसि‍-खेल कऽ सभ साँझू पहर ठेहि‍याए चाहैए। बीआ अकुर बढ़ैत बनल गाछ पौरुष पाबि‍ बनाओल जि‍नगी सन्‍हि‍या धरतीमे बनौलक जि‍नगी। देखि‍ तुलसी अनन्‍त सरोवर उमरि‍ झील हुलसि‍-हुलसि‍ कऽ नाचि‍-नाचि‍ गबैए। अश्रु सजि‍ कऽ अनन्‍त कमल बीच प्रेम पसारि‍ अमृत सजबैए सेज-सजा कऽ छाती। बर्खाक बून धारसँ मि‍लि‍ धारा धर-धरा कऽ अपना गति‍ये ओ चलए चाहैत छै। अकास बीच स्‍वर्ग-नरकक छै संसार आप्‍त रचि‍ बसि‍ संसार भागक बनल आश। तामि‍ कोड़ि‍ कऽ परती-पराँत बीच भोगक चास बनि‍-बनि‍ भेल छै ऊँचका डीह-बास। साटि‍-साटि‍ कऽ सहे-सहे बनल हुच्‍ची सदृश एका-एकी मेटए हँसैत खनदान। सि‍रजि‍ रूप शि‍खर सौन्‍दर्यक देखि‍ बि‍हि‍या आनि‍ जगबैए ओ अपन सजबैए। प्रेमीक रूप जमुनामे सौरभ पाबि‍ प्रकाश चढ़ि‍-चढ़ि‍ कऽ आबि‍ सभकेँ ओ देखैए। कहू केहेन मि‍थि‍ला जेहेन छै दसो दि‍शाक धरती नभ बीच किसान-बोनि‍हार? रंग-बि‍रंगी मने हेराएल छै दृष्‍टि‍ धरती आत्‍मि‍क-भौति‍क ओ दैवी रूप बनल। आगत देखि‍ तीनूक तकरार तत्‍व कहैत चि‍क्कन चालि‍ चलैत परखि-परखि जीबू। हारि‍-जीतक अजीब ऐ सृष्‍टि‍क मन ने माने जोग-भोग सि‍रजि‍ वि‍परीत चलए। सोचि‍-वि‍चारि‍ नापि‍ चलि‍ बाटकेँ जोति‍ते चास चलि‍-ससरि‍ चलू लाट बना संगमे। बिर्रोमे उड़ि‍ दोगे-सान्‍हि‍ये पड़ा मातृभूमि‍सँ पुरुषत्‍व गमा कऽ बौआ रहल अछि। फूल जहि‍ना सभतरि‍ फूला कऽ गंध बँटैले संग कए कऽ बसात नभ बीच चलैत। नदी गोंगि‍ऐ कमल केर फूल रँग बदलै रौद लगलापर उज्‍जरो भऽ जाइत। बोनि‍हारि‍न केर सोणि‍तक छै सड़कपर देल अलकतड़ा नै छै केकरो पता। फूस घरक छप्‍पड़पर ठाठ तीन आसक खढ़, खपड़ा, चार एसबेस्‍टस आब। चाकक एक हाथ परहक दू माटि‍ सानि‍ कऽ खपड़ा बनैत छै थोपुआ आ नरि‍या। दुनू मि‍ला कऽ ठाठपर पड़ै छै रौद बर्खासँ रच्‍छा करै छै घर तैमे लोक रहैए। रौद वसात शीतलहरी धुनि‍ गरमी जाड़ वसंत-सँ-वहार मि‍थि‍लाक इयार। जाड़ मासमे शीतलहरी धुनि‍ अबै-जाइए कनकन्नी होइ छै थरथरी धड़ै छै। हरि‍अरका डग-डगीसँ भरि‍ जाइत अछि।‍ करगर रौदसँ रोहनि‍ सभ साल। तोरा पएरे हम नै जेबो आब कि‍एक तँ तूँ भेलेँ लापरवाह चऽल कोढ़ि‍क चालि। अहाँक आँखि‍ चपेट लैत अछि‍ हमर हृदै औनाए लगैत छी चारू भूवन हम। बैंग बजैए टर्र-टर्र रटैत घोघ फल्का कऽ उछलि‍-उछलि‍ कऽ तड़ैप-तड़ैप कऽ। अगम पानि‍ जीवक जि‍जीवि‍षा उहापोहसँ बनल स्‍थि‍ति‍ अछि‍ अप्‍पन आन भेल। कदम फूल सभरँगा रँगसँ शोभि‍त छै झड़ैत रहैत छै समए समैपर। दि‍न-राति‍क बीच संसार अछि‍ वि‍चार बीच मेघौन आप्‍त छैक उग्रास व्‍याप्‍त छैक। खने मेघौन खने उग्रास भऽ भऽ चलैत-चलि‍ कारी घटा बनि‍ कऽ बुन-बुन सागर। अकास मार्ग ठनका आ पाथर नचि‍-नि‍च्‍चाँ कि‍नछड़ि‍ बि‍रजि‍ परि‍चए दइए। चढ़ि‍ अखार दि‍न-राति‍ सुगंध महमहबए पड़ि‍ते फुहारसँ चारूकात अम्‍बार। भीर-कुभीर छि‍ड़ि‍यबए क्षीर सदति‍ संग ससरए समीर राग-वि‍रागक। वि‍शाल क्षेत्र रंग-रंगक फूल फूलाएल छै आँखि‍ बि‍नु आन्‍हर देखि‍नि‍हार लोक। गाछीक बीच हजारो वृक्ष आप्‍त सबुर गाछ मेवा फड़ैत छैक नजरि‍क कमाल। खेल खेलक कालक बनाओल खेले वि‍चि‍त्र दि‍न-राति‍ चलि‍ कऽ मति‍ये बदलैए। धरती संगी संग मि‍लि‍ हँसए मातृभूमि‍केँ सेवा कऽ जगबैए जगेनि‍हार मात्र। आगि‍ पजरि‍ तड़पि‍ छटपटा धरती फाड़ि‍ ज्‍योति‍ पबैले जीव नि‍कलए लगैत। गाछ-सँ-फूल सि‍रजि‍ सजबैए शक्‍ति‍क संग जि‍नगीक परीक्षा साधक सजबैए। माघ मासक राति सतपहरा दर्शन पाबि‍ सहन सि‍रजि‍ कऽ राति‍-दि‍न हँसए। अद्भुत खेल वि‍धाता बनाओल आँखि‍-मि‍चौनी राति‍ दि‍न बदलि दि‍न राति‍ बनैए। वसन्‍त राग नव सूत जेबर भरैत कहए सदि‍खन जि‍नगी परखति‍ चलए। समए संग गति‍-मति‍ चलि‍ते ग्रह-नक्षत्र दोहरी बाट बनि‍ अन्‍हार इजोतक। तमाशा बनि‍ कंगाल बनल छै सपना बीच सपनाए रहल दि‍शाहीन देशक। खुशी खुशीक दुनि‍याँ बनल छै धीया-पुताक देखि‍-देखि‍ नचैत कथनी बीच भेद। लुत्ती छि‍टकि‍ ठौहरीक धधड़ा करि‍या धुआँ जीव-जन्‍तु पड़ाइ धीरजसँ सहैत। शीतल नोर झहड़ि‍-झहड़ि‍ कऽ कहैए सुना मनक ताप बीच पटबैत रहबै। रग्‍गरक छै पसरल वनमे धधड़ा-धुआँ अश्रु करूआइते पड़ाइ छै जीव। वेदनक वाण योग-ि‍वयोग बीच लहलहाइत हफैत हवा बीच नयन नीर ज्‍योति‍। कोमल कली लहलहाइए तब शीतल पाबि‍ श्रृंगार सजबैत जुआनी पबि‍ते ओ। गुण धरम देखि‍ पड़ैए तब मधुर प्रेमी कर्मक संग भाव अनैए जब तब। हँसि‍ गाबि‍ कऽ जगत जननीकेँ सेवा करैए राति‍-दि‍न आदि‍सँ मि‍थि‍लाक वीर। वंशक वृक्ष लतरि‍-पसरि‍ कऽ वि‍शाल बनि‍ कोसी-कमला बीच बलि‍दान करैए। बाते-बातमे झगड़ैए तानि‍ कऽ नइ रहैछ कल्‍याणक माइन रावणक सखाकेँ। सृजए नि‍त सौहार्दक बाट ओ जननी प्रेमी बूझि‍-बूझि‍ मर्म ओ नूतन घाट दुर्गक। लइते जन्‍म धरतीपर आबि‍ अकास बीच चक्रक चक्का जानि‍ नूतन बाट बना। धारी अनेक दुर्ग सेहो अनेक शक्‍ति‍-सँ-शक्‍ति‍ सटि‍-सटि‍ बनैछ बटोही पार ओर। सुख-संतोष सरोवर बनैए रूप करम सदि‍ लीला करैए बनल सत् कर्म। ठूठ अपन करनीसँ भेल छै बाँस सभटा उजरा बगुलाक फेरमे पड़ि‍-पड़ि‍। दूध अमृत आषब-अरि‍ष्‍ट भऽ जीवन दान करैत एलै गाए पशु बनि‍ जि‍बैए। पौरुष पाबि‍ रोकए नै ककरो बाट-घाट ओ सि‍रजि‍-सि‍रजि‍ कऽ नि‍त नूतन घाट। एक वनमे लतड़ि‍ पसरि‍ कऽ पसरि‍ वि‍श्व काटि‍-छाँटि‍ कऽ बाट बाटले झगड़ैए। कतेक अछि‍ कल्‍पना यर्थाथमे अन्‍तर बूझि‍ लगा रहल नहा घामसँ स्‍वयं हम। अखन अहाँ रंग-रंगक फूल सदृश बनि‍ बनल फूले जकाँ आप्‍त-व्‍याप्‍त छी अहाँ। हमर प्राण थर-थर कपैए बनि‍ लहाश चुपचाप ठाढ़ भऽ देखि‍ रहल अछि‍। बबाजी बीच पसरल जहि‍ना सेवा धरम समाज सेवी बीच गरीब-गरीब छै। पाबि‍ सकलौं जि‍नगी अकारथ बनि‍-बनि‍ कऽ बाट धेलौं अपने भीतर घात भेल। जरना बनि‍ सील बनल छैक रश्मि‍-सँ-रश्मि‍ हँसि‍-हँसि‍ जरै छै मुर्दो बनि‍ हँसै छै। हमरा पाछू धेने रहैत अछि‍ हरेक छन उठैत-बैसैत ओ कखनो नै छौड़ैए। मेघ लटकै प्रकाश छिरियाइ प्रकृति नाचै। मेघ बादल दुनू चलै साधल पहाड़ी दि‍स। इन्‍द्र कमल होइत अछि‍ फूल उज्‍जर धप। थल कमल गाएक घंटी सन होइत अछि।‍ सोणि‍त दान महादान होइछ जीवन लेल। हरि‍अर आ पीअर मि‍लि‍ दुनू काँच-पाकल कनैल फूल पत्तामे नुकाएल रहैत अछि।‍ एतुक्का गि‍द्ध पड़ाइन करैए मनुक्‍खे जकाँ। अंडी छाहरि‍ दैत अछि‍ राहति‍ कोशि‍कन्‍हामे। उज्‍जर मेघ टि‍करी बनि‍-बनि‍ जेना चलैए। केराक वीर अपन वीरताकेँ घोकचौअने। मोर-मोरनी वादलक सह पाबि‍ नाचै लगैत गुफाक गुंज श्वेत वादलक सह अनुगूंजि‍त। रँगल कोसा लेने अबैत संग केरा घौड़केँ। चम्‍पा-चमेली रोहनि‍क नक्षत्र कड़क रौद। मरूआ बीआ रोहनि‍ आम दुनू उमझै पकै। ति‍क्‍खर रौद बालुक जहाजकेँ तेजी अनैत। सुरेब सि‍सो ऋृगवैदि‍क सन कठमकठ। पहार पार उत्तरवारि‍ कात कि‍छु अवश्‍य। पाथर उगै। पानि‍ सटकै छैक मेघ लटकै। गोल-मोल छै धप्-धप् चान छै दाग लागल। सुग्‍गा बैसल सोचि‍ रहल अछि‍ पाछू लोक ले। सुग्‍गा बैसल छै चि‍न्‍तामे डूबल दीन-हीन ले। परहेज आ संयमसँ भेटैछ पैघ जि‍नगी। झुठ बाजब पाप होइत अछि‍ स्‍वयं छोड़ि‍ नै। एकटा चान सातटा देखाइत मोति‍याबि‍न। कनैलक बीआ घुच्‍ची बना खेलैत बच्‍चा-बेदरू। कि‍ष्‍कार मास लताम लुबधल पि‍रे-पीअर। माछक चटनी जोड़ी मरूआ रोटी चहटगर। दुर्गा पूजाक मतलब होइछ शक्‍ति‍पूजा। अन्‍हार गुप्‍प हाथो-हाथ ने सुझै हवा बहैत। राजनेतासँ नीक मानल ऐछ काजनेता। गेंदा पातक घा हाथ-पएरक रससँ छुटै। खेती-वाड़ीकेँ कि‍सान लचारीकेँ कोन महत। सबल साँच दुर्बल भेल झुठ दुनूमे फाँट। खेरही दालि‍ नेबो रस मि‍लल हृदै खि‍लल। चौमास-बाड़ी दालि‍ खेसारी गाए-बरदले। पीपर पात बि‍हरन आप्‍त छै तैयो डोलैत। शान्‍त हवासँ अन्‍हर-बिहाड़िक आगम होइ। हरि‍अरसँ तेज भऽ जाइत छै आँखि‍क ज्‍योति। वनमे बास वनफूलक आस अमलतास। ऊँच-नीचक भेद झपने जाइ हरि‍अरी यौ। नि‍चुका सभ चौरस अ-हटल ऊँचका हटि।‍ प्रकृति‍ शक्‍ति‍ लाल रंग पाबि कऽ‍‍ हँसैत अबै। प्रकृति‍ हँसै‍ लाल रंग पाबि सुधार लेल। बीचक मेधा हरि‍अर उज्‍जर दूरी व्‍याप्‍त छै। सघन डारि‍ एक्को रत्ती नै बैर नि‍च्चा-ऊपर। नि‍च्चा-ऊपर समतल सघन देखू एतए। कोनो नै आश छोड़ि‍ पोरोक साग सरदि‍याह। केरा गाछमे घौरक संग कोसा खुश छी पूरा। केरा गाछमे घौरक संग कोसा लटकल छै। भारी रहि‍तो बीर खा-खा थि‍कहुँ अँखि‍याएल। नीचाँ ऊपर सक्षम छै सभठॉ चाही टूस्‍सेटा। राति दि‍नमे कोनो नै अछि‍ हीन नाप-जोखमे। गुण-दोषसँ एक-दोसर बीच अबैए फाँट। दि‍न प्रतीक बनि‍ ज्ञानक अछि‍ भेल महान। राति होइए‍ अज्ञानक प्रतीक लोक कहैए। दि‍नकेँ दुन्‍नी राति‍ चौगुन्‍नी सेहो लोके कहैए। नि‍र्णए लि‍अ नीक संग अधला होइते अछि। गर्मी मासमे कि‍सानक आशमे ठढ़ी अबैए। आश धड़ैए बाट पतझारक सभक सोझा। उपाए बि‍नु सहसहबइए मनुख जन्‍म। पूर्ति प्रकृत करए चाहैत छै मनुख तन। मनक बाढ़ि‍ आबि‍-आबि‍ तोड़ैए तन-सँ-तन। आड़ि‍-धूड़केँ टुटलाहा मुँहकेँ कि‍यो ने जौड़ै। काति‍क मास डंका बजा कऽ तोड़ि‍ दइए। भरि‍ दि‍न ओ झाँट-ब‍र्खा स‍जैए रोपनि‍ लेल। अगहनमे‍ कटनी करैए ओ धान खेतमे। ओसा बना कऽ मोट-महीं बेरा कऽ उसनै कुटै। खांहि‍स भरे सोचि‍-सोचि‍ कऽ डरे‍ महिंका बेचै। छने-छनाक उड़ि‍ जाए दनाक भेल नि‍हत्‍था। दूटा गजल- 1 एतऽ माथ चकराइए चलू घूमि‍ चली तनो-सँ-तन छुबाइए चलू घूमि‍ चली

कि‍यो केकरो नहि‍ देखैए ऐ समाजमे मोने मन झगड़ाइए चलू घूमि‍ चली

गोर मौगी गौरबे आन्हर भेलि‍ अड़ल करि‍या बाट बुझाइए चलू घूमि‍ चली

कोन उपाए लगाबी तौड़ैले ऐ फानीकेँ टूटि‍ मन जे कनाइए चलू घूमि‍ चली

करब नै कोनो आस ऐ समाजसँ हम उमेशो जौं घुरियाइए चलू घूमि‍ चली 2 कल्‍याणक बाट नै पकड़तै लगैए ई भाँड़ि‍-भाँड़ि‍ सभकेँ झपटतै लगैए ई अकालोमे काल बनि‍ बौएलक सभकेँ कि‍छु बाजी तँ और मखड़तै लगैए ई ‍कोनो आंगुर कटने अपने होइ घा भेद नै करबै तँ झगड़तै लगैए ई मुँह सीब कऽ रहब तँ रहि‍ सकैत छी लोक गीत जँ गेबै चहकतै लगैए ई छोड़ि‍ देने टूटि‍ जाएत समाज अपन उमेश जोड़तै तँ चहकतै लगैए ई‍। उमेश पासवान (१९८४- ), पि‍ताक नाओं- स्‍व. खखन पासवान, माता श्रीमती अमेरि‍का देवी, गाम- औरहा, पंचायत- उत्तरी बनगामा, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी। वर्णित रस (आमुख, कागज, समाज, रावण-कंश, भरल घैल, कलजुग, उमर-अवस्‍था-मन, पि‍यासल, हत्‍या, फाटल भवि‍ष्‍य, गेलहे घर छी, पलटन लाल, बाढ़ि, डेग डेगपर खतरा, कपुत, आशा, गामक चौअनि‍याँ, नेताजी नमस्‍कार, सतहि‍या, अज्ञानी, दलि‍दर, पोसि‍या, मैना, माछक तीमन, कवाड़ी, बरखाक मौसम, मि‍थि‍लाक नारी, रगड़ा, नेता, मनक बि‍सवास, केहेन वि‍धना, अपनेकेँ की कही, फुसि‍-फट्टका, हकि‍कत, पावन भूमि‍, एना नै कर, भुतहा मोड़, हमरो लेने चलू, अथाह, गारल मुर्दा, हाल-चाल, पथ ई केहेन, गृहस्‍थ सबहक हाल, मि‍थि‍ला महान, हेराएल, दुभर, वि‍डम्‍वना, दि‍यादी बॉट, पुर्णि‍मा, रि‍श्‍ता, अज्ञानी, कनी देखू, मास्‍टरक बहाली, फागुनमे, श्‍यामल मोहे, जीतक झंडा, युवा, हम युवा, पथि‍क, हमहूँ कनै छी, एना कि‍एक, जि‍ति‍या, डगर, रमल छी, संत, बन्‍हन, संघर्ष जारी रखब, भरदुति‍या, गवहा संक्राति, कि‍मती भोट, असली-नकली, कोसी, मच्‍छर रानी, हरि‍जन, हम छी मैथि‍ली, बौकी, चौके-चौक,ठेँस, पेटक खाति‍र, जगदीश बाबू, उजरल घर, जीवनक नैया, डर, नटीन, बताह, ज्ञानक नव ज्‍योति, केहेन चालि, बसन्‍त योद्धा) आमुख जनकल्‍याणक लेल पहि‍ल अथक प्रयास छी वर्णित रस। देशमे बढ़ल भ्रष्‍टाचारक वैदि‍क इलाज छी वर्णित रस। जनाधि‍कारक लेल बुलंद अावाज छी वर्णित रस। दलि‍त उपेझि‍त वर्गक पहि‍चान छी वर्णित रस। ऊँच-नीचक भेद-भाव रखनि‍हारक ऊपर शब्‍दक प्रहार छी वर्णित रस। साहि‍त्‍य-पुरुष जगदीश प्रसाद मण्‍डल, गजेन्‍द्र ठाकुर जीक असि‍रवाद छी वर्णित रस। साहि‍त्‍य सेवामे जुटल व्‍यक्‍ति‍ उमेश मण्‍डलक प्रेरणाक परि‍णाम छी वर्णित रस। मैथि‍ल-मथि‍लाक आ अपन मातृभाषाक गुणगाण छी वर्णित रस। कागज सादा कागज छी हम सादगी समाएल अछि‍ हमरामे मुदा तखनो हम गुलाम बनल छी सतरंगी रंगक कलमकेँ पूर्ण अधि‍कार जमौने अछि‍ हमरा ऊपर घेरल रही छी हम कलमक मोइखसँ आबद्घ भऽ देबालसँ घेरल रहै छी हम शान्‍तचि‍त्त नि‍श्चल मनसँ मुदा तखनो असंख्‍य शब्‍द–चि‍त्रसँ दबल रहै छी हम ति‍याग-बलि‍दान दऽ कऽ हम अपन एक देशभक्‍त सन समाज केर सेवामे लगल रहै छी हम सादा कागज छी हम सादगी समाएल अछि‍ हमरामे। समाज खुशामदी आ ने बेगारी करब हम अपन कर्मक बाटपर सदि‍खन चलब हम मेहनति‍ कऽ अपन भाग्‍यक लेल परि‍लक्षि‍त भऽ कऽ सदि‍खन आगू बढ़ब हम पुरान अवधारणाकेँ समाज अखनो धरि‍ पजि‍औने अछि‍ ऊँच-नीच जाति‍-पाति‍ अनुसारे काम-काजकेँ ओकरा बदलब हम दाब-चाप, दहेज-अशि‍क्षा, अन्‍धवि‍श्वासक जालकेँ तोड़ब हम मृत्‍युसैय्या जे धेएने अछि‍ दलि‍तक अधि‍कार ओकर समानता हेतु लड़ब हम। रावण-कंश मूर्छित भऽ खसल भूमि‍पर गुमानक ढेरपर जा कऽ बैसल छल ओ तृष्‍णा प्रति‍सोधक आगि‍मे जरैत सि‍याह सन लगैत छल ओ बि‍नु परबाह केने सुकर्म ति‍यागि‍ कऽ अधर्मक बाटपर चलल छल ओ जि‍तबाक लेल पुरे वि‍श्वकेँ लैस भऽ कऽ आधुनि‍क परमाणु हथयारक संग वि‍नाशक डंका बजेने छल ओ खूनसँ रँगि‍ कऽ अपन हाथ अमेरि‍काक वर्ल्‍ड ट्रेड सेन्‍टरसँ शुरूआत केने छल ओ कि‍छु छनक लेल थर्ड़ा उठल ओ मानव हृदए सोचमे पड़ि‍ गेल की रावण-कंश अखन धरि‍ नै मारल गेल जना हू-ब-हू कर्मसँ एक्के साँचमे गढ़ल सन लगै छल ओ पापक घैल जखन भरल एक दि‍न मूर्छित भऽ खसल भूमि‍पर। भरल घैल शीतल पानि‍सँ भरल घैल आइ लड़ि‍ रहल अछि‍ अपन असति‍त्‍व बचैबाक लेल बचौने अछि‍ अपन डंढक मोस्‍कि‍लमे पड़ल अछि‍ सूर्जक ि‍करण गुस्‍सा रहल अछि‍ ओ उम्मस भरल गर्मीपर जे बेर-बेर प्रयास केलाक बादो भेद नै पाबि‍ रहल अछि‍ शीतल पानि‍सँ भरल घैलक कमजोर पड़ि‍ गेल सूर्जक कि‍रण कि‍एक तँ पानि‍ सहने अछि‍ सभ दुख-दर्दकेँ लड़ि‍ कऽ पहाड़सँ खसि‍ कऽ झरनासँ बहैत नदीक धारामे नि‍श्चल-अवि‍चल मनसँ पहुँचल अछि‍ आइ घैल तक। कलजुग शि‍शक टुकड़ीकेँ बि‍छौन बनाकेँ हम सुतैत छी अपन करेजमे काँटकेँ नुका रखैत छी हम गरदनि‍मे भ्रष्‍टाचारक माला पहि‍रने रहैत छी हम रोजे करबै छी नव-नव घटना लूट-हत्‍या, चोरी-डकैती तखनो चैनसँ रहै छी जाति‍ धर्म मजहब केर नाओंपर पैघ-पैघ फसाद हम करबै छी जँ अहूसँ मन नै भड़ैए हमरा तँ जंगलक वि‍नास परमाणु हथि‍यार आतंकवाद-उग्रवादसँ दंगा-फसाद करबै छी लहु-लहुआन कऽ प्रकृतिक-सृष्‍टि‍केँ हम हँसैत रहै छी तखनो मनुक्‍ख कऽ रहल अछि‍ वि‍कासक बात की चि‍न्‍हलौं अपने हम के छी कलजुग। उमर-अवस्‍था-मन कतेक बर्खक बाद मि‍लल सि‍नेहक पीर जरमति‍ वैह अछि‍ नोरक संग अधि‍र शाश्‍वत पि‍ड़ा बूझि‍ मन समस्‍याक धनधोर बादलमे चमकैत बि‍जलीमे भेटल आइ प्रेमक तरंग देखि‍ कऽ ठमकल हमर माथ सभ दि‍न‍ तकैत रहलौं अर्थक बाट अन्‍हार जि‍नगीमे भेल ज्ञानक वि‍हान तखनो हम पाछाँ रहि‍ गेलौं बहुत भऽ गेल देर समैक सदुपयोग नै कए सकलौं छुटकारा लेल कऽ रहल छी लाखो जतन अंत समैमे अर्थी सजाओल जा रहल अछि‍ हमर सभ छोड़ि‍ जा रहल छी खाली हाथे बनि‍ फकि‍र। संग छोड़ि‍ रहल अछि‍ उमर-अवस्‍था-मन आ शरीर। पि‍यासल सोन सन सुरति‍केँ कि‍छु नै अछि‍ मोल बाजू हे मैथि‍ल अपन मातृभाषामे मधु सन मीठ बोल राजा वि‍देहक ई गाम सि‍नेहक पि‍यासल ई मि‍ि‍थला जगत-जननी माता सीताक जन्‍मभूमि‍ एतए माटि‍क कण-कणमे अछि‍ भरल वि‍द्वता स्‍वर्ग सन सुशोभि‍त देवलोक सन सुन्‍दर अछि‍ हमर मि‍थि‍ला ओहन महान जतए सुग्‍गाे पढ़ैत छल वेद-पुराण मुदा यौ श्रीमान् शि‍शा पि‍घला कानमे ढारल जाइत छल सेहो सुनैत छी यौ श्रीमान्। अन्न-धन भरल अछि‍ पोर-पोरमे कुहकैत चि‍ड़ै-चुनमुन करैए कि‍लोल सोना सन सुरति‍क अछि‍ नै कोनो मोल। हत्‍या थानापर पड़ल अछि‍ एगो लाश थाना पुलि‍स कऽ रहल अछि हत्‍याराकेँ पकरैक कोशि‍श हत्‍याक कारणक छान-बि‍न रहस्‍यक तलाश शंकामे पकराएल एक गोट व्‍यक्‍ति‍ जेकरा नै अछि‍ डरसँ होसो हवास पुलि‍स करकि‍ कऽ बाजल नै कर तँू बकवास सत-सत बाज के करलकै एकर हत्‍या संग-संग रहै छेलही तँू दोस छलौ तोहर खास कनै छै एकर बीबी-बच्‍चा, माए-बाप कि‍अए करलीही एकर जि‍नगी नाश। फाटल भवि‍ष्‍य समय कही रहल अछि‍ जागू-जागू अवाज उठाउ अप्‍पन हक लेल एखन नै जागब तँ परि‍स्‍थि‍ति‍क परि‍णाम भोगए परत अहीक लेल लड़ए पड़त खुन खुनामे भजाएब एक दि‍न अबएबला समएमे के देखलकै अबैबला ओ दि‍न जीतब तब वाह-वाह जँ हारब तँ परि‍स्‍थि‍ति‍क परि‍णाम भोगए पड़त अहींसँ कहै छी सि‍र उठा कऽ जि‍बू फाटल-भवि‍श्‍य अप्‍पन अपनेसँ सि‍बू अखनो बुझइये ओ अपनेकेँ नवतुि‍नया ओकरा संगे आँखि‍सँ आँखि‍ मि‍ला कऽ रहू। गेलहे घर छी जौं अखार महि‍नामे बुढ़ बरद, पजरामे दरद पंजाबमे मरद अछि‍ तँ समझू हे गेलहे घर छी। घर लग बलान चोर संग मि‍लान धनक शान अछि‍ तँ समझू हे गेलहे घर छी। दूध लग बि‍लाइ बच्‍चा लग सलाइ अप्‍पन काज करैमे केलौं ढि‍लाइ तँ समझू हे गेलहे घर छी। डराइबर अनारी एड्स बेमारी दोकानमे खाइ छी उधारी तँ समझू हे गेहले घर छी। मैट्रीकमे फेल जवानीमे जेल बुढ़ाढीमे केलौं मेल तँ समझू हे गेलहे घर छी। चाहक चुस्‍की लड़कीक मुस्‍की दारू आ वि‍स्‍कीक फेरीमे परलूँ तँ समझू हे गेलहे घर छी। बन्‍दूकक नाल माछक चाल सैरक गाल देखि‍ कऽ कुदब तँ समझू हे गेलहे घर छी। भैयारीमे झगरा घरवाली अछि‍ तगरा ससूर अछि‍ लबरा तँ समझू हे गेलहे घर छी। बाप कंजूस कोठीमे लागल मुस नोकरीमे देलौं घूस तँ समझू हे गेलहे घर छी। कपड़ापर पड़ल मोबि‍ल कपारमे फरल ढील टॉगमे गरल कि‍ल तँ समझू हे गेलहे घर छी। पलटन लाल केहेन-केहेन माेछबला दरोगा ऐ थानासँ गेले तँ आब एले पलटन लाल ओजन छै हि‍नकर एकसौ कि‍लो चलै छै केना मोकनी हाथीक चालि‍ केहेन-केहेन.....। क्षेत्रमे दि‍ने देखार भऽ रहल छै चोरी, डकैती, अपहरण, हत्‍या खाली ओ कमबैमे लागल छै माल केहेन-केहेन....। घूस लेनाइ जेना छै हि‍नकर पुस्‍तैनी आदति‍ एतएक जनता हि‍नकासँ छै तंगहाल हम-अहाँ कि‍ करबै आब तँ बि‍हारमे ठेकेपर अफसर सभ भऽ रहल छै बहाल केहेन-केहेन मोछ.....। बाढ़ि‍ गड़-गड़ चुबि‍ रहल छल छप्‍पड़ काइट रहल छल माछी मच्‍छर राइत भरि‍मे डूमि‍‍ गेल डबरा आ डगर एक्केबेर आएल एहेन बाढ़ि‍ छन भरि‍मे देलक सभ कि‍छु उजाड़ि‍ नेना-भुटुका सभ छल ठि‍ठुड़ैत पछबा हबा बहि‍ रहल छल गुफड़ैत भगवान कि‍एक मारलक एहेन मारि‍ हाथ जोड़ि‍ करै छी वि‍नती आब नै आनब एहेन बाढ़ि‍। डेग डेगपर खतरा लोक लोककेँ जानसँ मारै छै दानव सन करै छै बेबहार कि‍यो भऽ गेल बइमान कि‍यो चाेर कि‍यो दहेज लोभी कि‍यो डाकू खॅखार वि‍श्वास केकरापर के करत? अपनो अप्‍पनकेँ लऽ लइ छै जान मनुख-मनुखकेँ नै चीन्‍हि‍ रहलैए मनुख चरि‍त्र जानवर सन भऽ रहलैए मानवता आब औना रहलैए डेगपर खतरा अछि‍ ओना बुझा रहलैए देखू आजुक मनुख बदलाव देखि‍ गि‍द्धो कोना सरमा रहलैए। कपुत समए संग-संग सभ कि‍छु बदैल गेल लगैए कलयूगक चपेटमे सभ कि‍छु परि‍ गेल माता-पि‍ता भगवानसँ बढ़ि‍ कऽ होइए तकरो लोग बि‍सरि‍ गेल वृद्धावस्‍थामे अखन अकेले परि‍ गेलैं की कहूँ रहि‍-रहि‍ देह सि‍हरैए थर-थर कपैए हाथ कोना कऽ केकरो लग बाजब पुत भऽ गेल कपुत कऽ देने अछि‍ कात भेटल अछि‍ पुरान ओछनि‍ आ टूटल खाट पुसक जारमे कि‍यो हमरो लग आबए कखैनसँ तकै छी बाट। आशा मैथि‍ल छी हम मैथि‍ली हमर भाषा यौ जाइत-पैतक दोग रचि‍ कि‍अए देखै छी अपने सभ तमासा यौ अही सन सोनि‍त बहैए हमरो देहमे हमरो अछि‍ कि‍छु अभि‍लाषा यौ जन्‍म लेने छी अपने सभ जकाँ हमहूँ अही धरतीपर हमरो मनमे अछि‍ कि‍छु आशा यौ रोज सुति‍-उठि‍ करै छी हम पावन भूमि‍ मि‍थि‍लाक उन्नति‍क आशा यौ मैथि‍ल छी हम मैथि‍ली हमर भाषा यौ। गामक चौअनि‍याँ ए.पी.एल बी.पी.एल भऽ गेल करि‍या झुमर गामक चौअनि‍याँ नेता सभ केना खेलाइए उलटा खेल केकरो चारि‍ गोटेमे चौदह कूपन केकरो डि‍बि‍योमे नै तेल कहैए गामक सभ्‍य लोक सोझ अोंगरीसँ घी नि‍कालब बड़ अछि‍ झमेल गामक लफंगा सभ नेतागि‍रीक धमकी दऽ लऽ जाइए जरकि‍न भरि‍ तेल डि‍लर लबैए अनाज बारह महि‍ना बाइस कि‍लो बाँकीकेँ कऽ दइए बि‍लेकसँ तरपेसकी सेल मुँहदुबरा सभ कतौ पास तँ कतौ भऽ जाइए फेल ए.पी.एल बी.पी.एल भऽ गेल करि‍या झुमर गामक चौअनि‍याँ नेता केना खेलैए उलटा खेल। नेताजी नमस्‍कार नेताजी नमस्‍कार अपनेकेँ ई जनता सभ जि‍तेने अछि‍ पहि‍ले चरबै छलौं अहाँ गाए-महि‍ंस मंत्रीक कुरसीपर बैसेने अछि‍ कने करू वि‍चार नेताजी नमस्‍कार ऐठामक गरीब सभ िदल्‍ली-पंजाबमे कमा रहल अछि कोइ बम्‍बइ तँ कोइ कलकत्तामे बौआ रहल अछि‍ पढ़ल-लि‍खल बेरोजगार सबहक सर्टिफि‍केट दि‍वार खा रहल अछि‍ अपने कि‍एक नै दइ छी रोजगार कने करू वि‍चार नेताजी नमस्‍कार अपने केना बुझब मैट्रीकमे फेल छी चोरी-डकैती-अपहरण-हत्‍याक मामलामे जेल सेहो गेल छी सभ कि‍छुसँ छी रि‍टायर‍ खाली भोटक लेल करै छी मारि‍ कने करू वि‍चार नेताजी नमस्‍कार अस्‍पताल भऽ भूतबंगला रोडपर भऽ गेल खदहा साले-साल अबैए बाढ़ि‍ वि‍कासक रूपैया अपनेक चमचा जाइए डकारि‍ अपने हेलीकॉपटरसँ करै छी शैर कने करू वि‍चार नेताजी नमस्‍कार आबो वि‍कासक बात करू दोसरपर दोख थोपि‍ गारल मुर्दा नै उखारू कागजी काम करलासँ नै सुधरत बि‍हार कने करू वि‍चार नेताजी नमस्‍कार। सतहि‍या सावन मास छल राति‍ रहै अनहरि‍या बर्खा रूकैक नाओं नै लैत छल लधने छल सतहि‍या ढौसाबेंग कि‍ड़ी-मकौड़ी करै छल सोर भुरुकुबा कनी उगल छल चुह-चुहि‍या करै छल कि‍लोल फरि‍च्‍छ होएबामे देरी मुदा छल पहि‍ल भोर एक्के बेर टुटल बड़का बान्‍ह गाम घर बनि‍ गेल काेसी आ बलान पानि‍मे रहि‍-रहि‍ उठै छल ऊफान तब मनमे सोचलौं हे भगवान केना बँचत आब लोकक जान माथपर हाथ दऽ सभ अछि‍ कनैत कतएसँ आनब मरूआ-धान भुखसँ नि‍कलैए जान कएल खेती सभ गलि‍ गेल नै रहल कोनो नामो-ि‍नशान। दलि‍दर साहि‍त्‍यक दलि‍दर कतेक जुलुम करैए हमरापर कि‍यो तँ बाजू कि‍यो हमरा दि‍ससँ अवाज उठाउ खि‍ंच देने अछि‍ लक्ष्‍मण रेखा बाँटि‍ कऽ एक भागमे बन्न कऽ देने अछि‍ सभ रस्‍ता द्वार हरपने अछि‍ ओ हमर हक जाति‍क नाओंपर करैए ति‍रस्‍कार दुख: हमर ओ केना केना बुझत केकरासँ कही अपन दि‍लक हाल वर्षोसँ देखि‍ रहल छी हि‍नक यएह रंगताल मंगै नै छी कि‍छु हम हि‍नकासँ हम बस चाही हमर अधि‍कार साहि‍त्‍यक दलि‍दर कतेक जुलुम करैए हमरापर। पोसि‍या हम खोजै छी अहींकेँ यौ कनी अगारी आउ लऽ कऽ उ मोटरी जे लेने छी अहाँ पोसि‍या बराबरि‍ कऽ जइमे बन्‍हने छी हमर अधि‍कार हमरा सोझामे खोलू आबो सभ गि‍रह ओझरा कऽ नै राखू माइक बोली मैथि‍ली भाषा आबो नै कसू अप्‍पन सोल्‍हनी बला रसा आब नै सुनब हम अपनेक बनल-बनाएल खि‍स्‍सा दूधक दाँत टूटि‍ गेल गेल अछि‍ ज्ञानक इजोतसँ आँखि‍ हमर खुलि‍ गेल अछि‍ दऽ दि‍अ हमर हि‍स्‍सा हम खोजै छी अहींकेँ यौ कनी अगारी आउ लऽ कऽ उ मोटरी जे लेने छी अहाँ पोसि‍या। मैना एलै एहेन अन्‍हर-बि‍हाड़ि‍ जइ डारि‍पर छलै मैनाक खोंता वएह टूटि‍ गेलै डारि‍ डारि‍क संगे खोंता गि‍रलै खोंतामे रहैत बच्‍चा संग जोड़ो मरलै पलक झपकि‍ते मैनाक जि‍नगी देलकै उजाड़ि‍ एलै एहेन अन्‍हार-बि‍हाड़ि‍ जइ डारि‍पर छलै मैनाक खोंता वएह टूटि‍ गेलै डारि‍ कोनमे दुबकल कनै छै मैना वि‍रहक दर्द अखन जनै छै मैना उजरल खोंता देखि‍ नोर बहा रहल छै मैना बि‍तल दि‍न यादि‍ कऽ सि‍हरै छै मैना एलै एहेन अन्‍हर-बि‍हाड़ि जइ डारि‍पर छलै मैनाक खोंता वएह टूटि‍ गेलै डारि‍ दुखक पहाड़ ओकरेपर खसलै वि‍पति‍क साया ओकरेपर पड़लै आँखि‍मे नोर लेने मैना एक दि‍न जगल छोड़ा उड़ि‍ गेलै मैना एलै एहेन अन्‍हर-बि‍हाड़ि‍ जइ डारि‍पर छलै मैनाक खोंता वएह टुटलै डारि‍। माछक तीमन हाल छै बेहाल खेती बारीक छै ताल छी अखन खेतमे सौंसे देह लगल अछि‍ थाल धि‍या-पुता सभ कदबामे कुदै छै देखि‍ कऽ माछक चाल कोइ पकड़ै छै इचना कोइ पकड़ै छै पोठी बि‍चमे बगुला छै मालो-माल ओमहर बि‍आ जे उखारै छै महि‍ला जन कोइ करै छै, सासु-ननदि‍क नि‍ना-बि‍ना कोइ गबै छै सोहर-समदाैन छमकी-लबकी भौजीकेँ केना करै छै लुसुर-फुसुर मन कहै छै हमरा ऐ बौआ पकड़ू ने अहूँ कऽ देब मरूआक रोटी माछक तीमन एगो जे दँतटुट्टी बुढ़ि‍या छै ओहो कहाँ छै कम खाली तमसाइ छै कहै छै साँझे सबहक घरमे हेतै गम-गम-गम। कवाड़ी जहि‍यासँ केलौं शादी गमा देलौं सभ अजादी की करब करै छी आब खेती-बारी काम नै चलत आब करि‍ कऽ नौकरी सरकारी वेतन भेटैए दस महि‍नापर कतएसँ आनब घरमे नुन-हरदी कतएसँ आनब साग-सब्‍जी-तरकारी एक दि‍स घरमे बैसल मैडम जुति‍ फरमबैए ऑडर करैए जानि‍ दि‍अ लेकमीक लि‍पि‍स्‍टि‍क ठोररंगा-नहरंगा पाउण्‍ड्स पोडर फि‍ल्‍मी हि‍रोइन सन साड़ी सुनि‍ पछताइ छी आब जेबमे एक रूपैया नइए माथ भऽ जाइए भारी नीक छल कुमार छलौं आब भऽ गेलौं कवाड़ी शादी नहि‍ये करि‍तौं वा रहि‍तौं बाल-ब्रह्मचारी कि‍ करू आब कि‍छु नै फुराइए नै कि‍छु करने रहलाे ने जाइए मैडमक संग गृह युद्ध लरी वा बनी पति‍ पति‍त-पत्नी पुजारी दोसर गुजारा कोनो नै भऽ गेल अछि‍ लचारी दहेज लेने छलौं दु-तीन लाख आब पड़ैए भारी भानस-भात केकरा कहैए काम बेरमे कनि‍याँकेँ अंगनामे लगि‍ जाइए दीक कहै छथि‍- गोइठा-जरना नै गैस चाही नै तँ बढ़ि‍ जाएत बेमारी करै छी आब खेतीबारी काम नै चलत आब करि‍ कऽ नोकरी सरकारी दुख: हमर कहाँ कि‍यो बुझैए जेहने बि‍डि‍ओ छै तेहने सि‍ओ, तेहने थाना प्रभारी। बरखाक मौसम बरखाक मौसम आबि‍ गेल नदि‍-नाला-पोखरि‍-झाँखरि‍ पानि‍सँ भरि‍ गेल कअए जगह कोसी-कमला भुतही-बलान नदि‍मे भऽ रहल अछि‍ कटान फेरि‍ नै कटए कुसहा बाघ सन बाढ़ि‍क घटना तइ लेल सभ कि‍यो भऽ जाउ सावधान हर जगह हर ठाम कमजोर भऽ रहल छहर-बान्‍ह नदि‍क कातमे जौं अछि‍ अपनेक गाम सभ कि‍यो ऐ बातपर दि‍यौ धि‍यान प्रशासनकेँ सूचि‍त करू अपनो बचू दोसरोकेँ बचाउ एक देश भक्‍त सन करू काम गाममे नाहक करू इतजाम। बरखाक मौसम आबि‍ गेल। मि‍थि‍लाक नारी गामक परि‍धान पहीर हे मि‍थि‍लाक नारी पुजी जेष्‍ठ सभकेँ करी आदर-सम्‍मान गोबरसँ आंगन नीप साफ-सुथरा करी साँझ-बि‍हान मन हर्षित रहैए तुलसी आंगनमे हलसैत रहैए करी सहयोग एक-दोसरकेँ पढ़ि‍ रोज स्‍मरण करी गीता-पुराण करी जौं कि‍छु सेवन दही-चुड़ासँ कहाँ कि‍छु अछि‍ नि‍मन ति‍लकोरक तरुआ पान और मखान सदा अपनाबी मैथि‍लक ठाठ-बाठ सुशोभि‍त रखी मि‍थि‍लाक नाम गामक परि‍धान पहीर हे मि‍थि‍लाक नारी पुजी जेष्‍ठ सभकेँ करी आदर-सम्‍मान। रगड़ा सुकदेवा आ चि‍चोरबावालीमे छल रगड़ा एक दि‍न भेल मारा-पि‍टी झगड़ा बात अतेक बढ़ि‍ गेल केस-फौदारीपर चलि‍ गेल गाम-समाजक लोक दुनू गोटेकेँ केलक मना तैयो चि‍चोरबावाली चलि‍ गेल थाना एक दि‍स सुकदेवा डरसँ सुखि‍ भऽ गेल परास हि‍नको कि‍छु नै फुराएल ईहो चलि‍ देलक केस करैले फुलपरास, जखन टपल भुतही-बलानक पार तखने छूटल हि‍नका गरमीक बोखार मोनमे आएल हि‍नका होश-हवाश सोचलनि‍ जे जाएब जखन थाना तँ लागि‍ जाएत फेरीक फाना उल्‍टे घुमि‍ कऽ चलि‍ आएल घर सि‍हरै छल तरे-तर कखनो अंगना तँ कखनो जाइ छल गामपर ओमहर चि‍चोरबावालीकेँ लोक सनकाबै छल सुकदेवाक करबा दहक भीतर एहनो कहूँ भेल पुरुख हाथ उठेलक जनानीपर इ सभ सुनि‍ कऽ चि‍चोरबावाली फुलि‍ कऽ भऽ गेल तुम्‍मा झटसन आवेदन थानामे कऽ देलक जमा तब हि‍नक मोन भेल संच हमरा दरोगा कहलखि‍न ऐ चौकीदारकेँ अछि‍ वनगामा पंचायतक सरपंच हम कहलौं सर सुनू सरपंच अछि‍ साहुजी नूनू गामपर दू-चारि‍ दि‍न खूब भेल हंगामा आवेदन घूमि‍ कऽ चलि‍ आएल पंचायत भवन वनगामा दुनू तरफसँ भेल पंचैती सुखदेबापर भेल जुर्माना तब कहलक सुकदेबा हम छी गरीव-दुखि‍या अपने स्‍वास्‍थ्‍य वि‍भागसँ अपजल छी यौ दयानंदजी मुखि‍या अपने गछि‍ लि‍यौ जुर्माना मुखि‍या कहल- हाय रे जमाना, हाइ रे जमाना। नेता नेता सभ भऽ गेल पि‍यक्कर चमचा चौअनि‍या भऽ गेल एतए ठि‍केदार देखि‍यो केना चलतै ई सुशासनक सरकार क्षेत्रमे वि‍कासक काम नै ठीकसँ भऽ रहल अछि‍ बि‍ल पास होइए करोड़क-करोड़ हजार-हजार देखि‍यो कोन बन्‍दर बाटमे आइ पड़ल अछि‍ बि‍हार ई अछि‍ एतुक्का नेता जीक कमाल कतौ सड़कपर कादो तँ कतौ सड़कपर थाल जोरसँ करू हि‍नकर जयकार घूसखोर नेताजी जि‍न्‍दावाद-जि‍न्‍दावाद जनता भेल अछि‍‍ बेहाल वि‍कासक रूपैया खा कऽ नेता अफसर भेल अछि‍‍ मालो-माल सगरे पसरल अछि‍ भष्‍टाचार अनभिज्ञ भेल अछि‍ सरकार ई अछि‍ एतुक्का नेता जीक कमाल वर-बर बि‍गड़ल जाइए बि‍हारक हाल केना चलतै सुशासनक सरकार जि‍तलाक बाद क्षेत्र आ जनताकेँ भूलि‍ जाइए मंत्री बनलाक बाद रूपैयापर तुलि‍ जाइए इमान-धर्म हि‍नक चरि‍त्र घटि‍ जाइए केना कएल जाए ऐठामक नेतापर बि‍सवास खाली करैए पत्‍थरपर शि‍लान्‍यास कहैए अापनेकेँ जनताक पालनहार नेता सभ भऽ गेल पि‍यकर चमचा चौअनि‍या भऽ गेल ठि‍केदार देखि‍यो केना चलतै ई सुशासनक सरकार। मनक बि‍सवास भेल अन्‍हार लगल जेना सभ नि‍पत्ता बहल पछबा चलल हवा टुटल पत्ता हृदए व्‍याकुल मि‍लनक आश दौड़ैत-दौड़ैत भेटल नै कतौ ठौर कखनो सफलता कखनो असफलताक डर दृढ़ संकल्‍प अटुट बि‍सवास जि‍वनमे आश लेने मनमे बि‍सवास देखि‍ रहल छी सुगम पथ उत्‍साहक रथ एक दि‍न जरूर पुरा होएत मनक मनोरथ ऐ लेल पीबए परैए कोनो घाटक पानि‍ कि‍एक नै उपछए पड़ए खत्ता भेल अन्‍हार लगल जेना सभ नि‍पत्ता। केहेन वि‍धना लि‍खलनि‍ वि‍धाता कलजुगमे मेटा रहल मानवता अप्‍पन-अप्‍पन हि‍तक लेल मारि‍ कऽ रहल अछि‍ परोपकारक नै अता-पता केहेन वि‍धना लि‍खलनि‍ वि‍धाता आब कि‍अए भऽ रहल अछि‍ मनुख चरि‍त्र नि‍प्पता सेवासँ सभ नि‍रवि‍त माता-पि‍ता केहेन वि‍धना लि‍खलनि‍ वि‍धाता नि‍त दि‍न मनुख-मनुख करैए हत्‍या केकरा दोख दी जेहने गुरु तेहने चटि‍या असली-नकलीमे अन्‍तर की माटि‍क मुरुत बनल अछि‍ भाग्‍य वि‍धाता। अपनेकेँ की कही समाजक अइना कही कि‍ फोटोग्राफर प्रोफेसर कही कि‍ पत्रकार कवि‍ कही कि‍ रचनाकार अफसर कही कि‍ बेरोजगार अभि‍भावक कही कि‍ दोकानदार पढ़ै छी रोज अपनेक लि‍खल समाचार खुलि‍ जाइए हमर बुधि‍क सभ द्वार टक-टकी लगेने रहै छी पढ़बाक लेल हि‍न्‍दुस्‍तानक समाचार सबहक मनकेँ भावैए अपनेक बेवहार डरे अछि‍ घुसखोर कमी भेल भ्रष्‍टाचार सदि‍खन अहि‍ना चुमी अहाँ सफलताक शि‍खर-पहाड़ कोन नाम केर सम्‍बोधन करी अपनेक लेल अचरजमे पड़ल अछि‍ कवि‍ चौकीदार। फुसि‍-फट्टका हे आब बुझि‍औ बड़ दम खम देखबै छलए चौकीदार-दफेदारकेँ आबि‍ रहल अछि‍ ओ सभ कि‍यो आबए दि‍औ नि‍ति‍श कुमारकेँ घूस लइए तरे-तर ि‍नर्दोशकेँ भि‍तर दोषीकेँ बहार कनि‍याकेँ लऽ कऽ नेपाल तँ कहि‍यो घरपर खाली फूसि‍ फट्टका हे आब बुझि‍औ आबि‍ रहल अछि‍ ओ सभ कि‍यो डि‍यूटी कम-सम खाली छुट्टी मोन जे गरमाएत ओनीहारकेँ तँ लगा देत पुलि‍स लाइनमे डि‍यूटी कि‍ बुझै छि‍ऐ मुख्‍तार-मुंशी, दुनू पार्टीसँ करैए कनफुसकी थानाकेँ छोड़ि‍ दै छि‍ऐ जे.पी बाबू आर.आर सि‍ंहपर हे आब बुझि‍यो। हकि‍कत आँखि‍ बंन्न डि‍ब्‍बा गायब अतै हकि‍कत अछि‍ जोर चलैए लबड़ा-चुच्‍चाक जे मंगैए दऽ दि‍यौ नै देब तँ जानपर मोशि‍बत अछि‍ लोक बनल अछि‍ बहुरुपि‍या रंग भेषसँ केकरा चि‍न्‍हब मोसकि‍ल अछि‍ एतए मनुखक रूपमे शैतान छि‍पल अछि‍ के की छी नै कि‍नको माथपर लि‍खल रहैए आइ मानवताकेँ कऽ रहल अछि‍ कलंकि‍त जे अप्‍पन स्‍वार्थ भावमे डुमल अछि‍ मनुख तन पाबि‍ कऽ प्रभूक भजन छोड़ि‍ कऽ अहि‍त काममे लागल अछि‍ आँखि‍ बन्न डि‍ब्‍बा गायब एतेक हकि‍कत अछि‍। पावन भूमि‍ बि‍हारक पावन भूमि‍मे सदा बहैत अछि‍ गंगा, कोसी कमला बलान एकर ि‍नर्मल जलसँ नि‍खरल अछि‍ एतुक्का खेत ओ खरि‍हान वि‍क्रमशि‍ला वि‍श्ववि‍द्यालय बुद्ध स्‍पुत मि‍थि‍ला पेटिंग अति‍तक अछि‍‍ स्‍वाभि‍मान महा कवि‍ वि‍द्यापति‍ आर्यभट्ट, आयाची मंडन जतए छथि‍ महान एतए अति‍थि‍ पुजल जाइत अछि‍ संतकेँ होइत अछि‍ सत्‍कार स्‍वागतमे भेटैए पान-मखान भाषा संस्‍कृति‍ सदि‍खन सभकेँ मनमोहने अछि‍ कला संस्‍कृति‍केँ अलग-पहि‍चान एतए श्रीराम आएल छथि‍ बनि‍ कऽ मेहमान एखन हम कहाँ बि‍सरलौं जे कहि‍ गेल महावि‍र बुद्ध भगवान अपन माटि‍ पानि‍सँ जुड़ल छी हम अल्‍लाकेँ जपै छी पुजै छी श्री राम छठि‍, ईद मनबै छी एक संग मि‍लि‍ कऽ हि‍न्‍दू और मुसलमान देश हमर हि‍न्‍दुस्‍तान बि‍हारक पावन भूमि‍पर सदा बहैत अछि‍ गंगा कोसी कमला बलान। एना नै कर बौआ रौ एना नै कर सुन हमर बात कि‍दु सोची जखन मन रहैए शि‍तल सुख-दुख राखी कऽ मोनमे बि‍सरि‍ कऽ सभ बात बि‍तल बौआ रौ एना नै कर सुन हमर बात अबेर तक नै रह सूतल रह भोरे उठि‍ कऽ कर माए-बाबुकेँ प्रणाम तकरबाद धुम-फि‍र टहल मन रहतौ चंचल बौआ रौ एना नै कर सुन हमर बात अपनासँ श्रेष्‍ठसँ कि‍छु सि‍खी नै बात करी रटल खेली-कुदी पढ़ी-लि‍खी करी सबहक कहल बौआ रौ एना नै कर सुन हमर बात। भुतहा मोड़ नि‍त दि‍न होइए नव-नव घटना साँझ ओ भोर कोइ होइए घाइल तँ कोइ होइए चोटील थोड़बो थोड़ मरि‍ गेलै बुचना तँ मरि‍ गेलै सजन-धजल बर उजरि‍ गेलै केकरो मांगक सि‍नुर उजरि‍ गेलै केकरो घर बि‍हुँसै छै नव कन्‍याँ कनै छै माए-बाबू-भाए-बहि‍न बहबै छै दहो-बहो नोर चरचामे बनल छै हृदए वि‍दारक ई घटना चहू ओर मौतक चौराहा बनल अछि‍ एन.एच भुतहा मोड़। हमरो लेने चलू हमरो कहि‍ दि‍अ यौ अपने कतए जा रहल छी संग हमरो लेने चलू हमहूँ जाए चाहै छी अपनेक संग अइठाम ऐ दुनि‍याँमे मोन हमरो औना गेल जेना लागैए हम भऽ गेलौं तंग सभ ई अपनेक बनाओल ई वि‍धना अछि‍ के अप्‍पन के पराया सभ अपने छी हम आइ बूिझ गेलौं सभ कि‍छु भऽ गेल मोह माया हमर भंग अपनेक अलौकि‍क छी अन्‍तर्यामी छी सभमे छी अंनत रंग खुलि‍ गेल हमर आँखि‍क भरम दुनि‍याँ ई एकटा नाटक अछि‍ केकरो जीवन तँ केकरो मरण ई पार्ट तँ अहि‍ना चलैए हमरो कहि‍ दि‍अ यौ अपने कतए जा रहल छी संग हमरो लेने चलू। अथाह पलक झपकैत हम सपनाक दुनि‍याँमे बटोही सन हम हेरा गेलौं जहू दऽ कऽ बाट नै छल तहू दऽ कऽ हम चलि‍ देलौं डेग-डेगपर होइत रहल लोक संगे नोक-झोक जाइत रहलौं हम बेरोक-टोक उलटि‍ कऽ नै देखलौं के भेल खुश के भेल नाराज बि‍नु परवाह केने हम चलैत रहलौं ततेक दूर हम चलि‍ गेलौं हमरो थाह नै लागल निनक नदीक धारामे सपनाक नाहपर सवार हम चलैत रहलौं अवि‍रल मोनमे वि‍भि‍न्न तरहक वि‍चारक प्रवाह अबैत रहल डगमगाए लगलूँ बि‍च अथाहमे लोभ-क्रोध नै छल हमरा चाहमे पलक झपकैत हम सपनाक दुनि‍याँमे बटोही सन हम हेरा गेलौं। गारल मुर्दा श्‍मशानमे गारल मुर्दा छटपटा रहल अछि‍ भि‍तरसँ अंगुरी अप्‍पन उठा रहल अछि‍ कहरैत श्वरमे बाजल आजुक मनुखक अस्‍ति‍त्‍व कि‍ अछि‍ मानवताक गुण वि‍श्वास परम्‍परा सभ कि‍छु बि‍सरि‍ गेल अछि‍ आइ मनुखक दुश्‍मन मनुख बनल अछि‍ सभ लोभ-क्रोध मोह-माया केर जालमे ओझरा गेल अछि‍ गारल मुर्दाक प्रश्नसँ हमर हृदए कापि‍ गेलि‍ एकर उत्तर हमरा लग नै छल अनायास हमरो मुँहसँ नि‍कलि‍ गेल आजुक मनुखक अस्‍तत्‍व कि‍ रहि‍ गेल। हाल-चाल बड़ बराब छै हाल ऐठामक नेता छै माला-माल रोड-सड़ककेँ देखि‍यौ तँ कदबा गजार सन छै थाल ऐ मुँहझौसा नेता सभकेँ कोइ नै कि‍छु कहै छै भरि‍ बरसात साँप-कि‍ड़ाक डरसँ साँझे घर घड़ै छै एक-दोसरमे एकता नै छै यएह छि‍ऐ काल बड़का नेता-मंत्री छि‍ऐ तँ एकर मतलब की कतेक बेलना बेलए पड़लै ओकरा केना कऽ गलतै राजनीति‍क दालि‍ मासुम जनताक संगे चलै छै चतुर सि‍आरक चालि‍ अाबए दहक समए हौ नेता भि‍जल बि‍लाइ सन हेतह हाल अखन तँ खाली पाइये सुझाइ छै सगरे पि‍टै छै वि‍कासक डंका मुदा घरक आगाँमे साँझे बेंग कोकि‍आइ छै करै छै कोनो काज जेना कछुआक चालि‍ बड़ खराप छै हाल ऐठामक नेता छै माला-माल रोड-सड़ककेँ देखि‍यौ कदबा गजार सन छै थाल जहि‍ना इण्‍डि‍या तहि‍ना नेपाल। पथ ई केहेन गुज-गुज अनहरि‍यामे केना हेरा गेल हमर मोन आब सम्‍हारब केना अप्‍पन जीवन नै पाछाँ छोड़ैए मद्धपान दारू-शराब नै पाछाँ छोड़ैए संगतक लक्षण जेम्‍हर जाइ छी सगरे ओनाइ छी पथ ई केहेन जइपर चलैत खूद पछताइ छी आइ मरनासन भऽ गेल हमर अवस्‍था कष्‍टक मारल छटपटाइ छी केहेन कठि‍न ई रस्‍ता अपने प्रश्नसँ हम ओझराइ छी दोसरकेँ संदेश कि‍ देब ने जि‍ऐ छी आ ने मरै छी करनीक फल भोगि‍ रहल छी अपने सभ करू वि‍चार नशामुक्‍त बनौ देश ओ संसार। गृहस्‍थ सबहक हाल सभ कि‍सान भेल अछि‍ परेशान समएपर बरखा नै भऽ रहल अछि‍ केना रोपाएल धान बि‍ति‍ गेल श्रावणक मास खेतमे गि‍राएल बि‍आ सुखि‍ कऽ भऽ रहल अछि‍ नाश। जोतल खेतमे गरदा-धूल उड़ि‍ रहल अछि‍ कि‍सान सभकेँ ऐबेर खेतीसँ आस टूटि‍ रहल अछि‍ अखन धरि‍ नै भेल पानि‍ सभ गि‍रहत मेघ दि‍स देखि‍ रहल अछि‍ इंद्र भगवान कि‍एक भऽ गेल नराज नै जानि‍। सभ कि‍सान भेल अछि‍ परेसान समैपर बर्खा नै भऽ रहल अछि‍ केना रोपाएत धान। पछि‍ला साल बाढ़ि‍मे नाश भऽ गेल धान हम कि‍सान खेतीपर ि‍नर्भर छी ऐबेर सुखार भऽ गेल कि‍सानक जा रहल अछि‍ जान सभ कि‍सान भेल अछि‍ परेसान समैपर बर्खा नै भऽ रहल अछि‍ केना रोपाएत धान। मि‍थि‍ला महान टाटपर लतरल ति‍लकोर पोखरि‍मे मखान अखार मासमे झूमि‍-झूमि कऽ कि‍सान रोपैए धान जगमे सभसँ सुन्‍दर अछि‍ हमर मि‍थि‍ला धाम भाषा आ संस्‍कृति‍ देखि‍ लोभाएल श्रीराम बारीमे भेटैए पान घर-घरमे होइए चूड़ा-दहीक जर-जलपान मैथि‍ल मि‍थि‍ला महान हरक पाछाँ बगुला घुमैए हरबाहा जोरसँ बरदकेँ बाबू भैया कहि‍ हँकैए आरि‍पर बैसल गि‍रहतबा खुशीसँ दइए मुस्‍कान। हमर सभ सुन्‍दर मि‍थि‍ला गाम मैथि‍ल मि‍थि‍ला महान। माता-बहि‍न सभ खेतमे गबैए सोहर-समदौन घुमरैत मेघ देखि‍ कवि‍केँ हर्षित होइए मोन हरबाहा जलखैमे खाइए मरुआ रोटीपर सुक्‍खल नून बहैए पछबा हवा पानि‍ पड़ैए झम-झम वर्षाक झटकसँ टुटैए आसमान सभसँ सुन्‍दर हमर मैथि‍ल मि‍थि‍ला महान। हेराएल जि‍नगीक सफरमे जि‍नगी जिनाइ हम बि‍सरि‍ गेलौं कि‍ हमर हेराएल कि‍ हमरा भेटल संघर्षक रास्‍तामे ‍बाधासँ लड़नाइ हम बि‍सरि‍ गेलौं सही रस्‍तामे छल काँट भरल पगडंडीसँ हम नि‍कलि‍ गेलौं चुकि‍ गेल सभ ओ बात सच कहनाइ हम बि‍सरि‍ गेलौं मानव भऽ मानवकेँ धर्म हम नै नि‍भा सकलौं जाइत धर्म ऊँच-नीचक बंधनमे हम जकरि‍ गेलौं अखन कमी महसुस होइए ऐ सभ बातक कि‍ करब आब तँ जि‍नगी अहि‍ना गुजरि‍ गेल जि‍नगीक सफरमे जि‍नगी जि‍नाइ हम बि‍सरि‍ गेलौं। दुभर मंहगाइक दानब आसमान चढ़ि‍ गेल सभ भाड़ एतए गरीबपर पड़ि‍ गेल कि‍यो भऽ गेल अरबपत्ति‍ कि‍यो भऽ गेल खरबपत्ति‍ कतौ गरीब कि‍यो नून रोटी लेल मरि‍ गेल चलैए ई शि‍लशि‍ला एतए अहि‍ना जहि‍ना तहि‍ना कि‍यो सासनक गद्दीपर बैस राज करैए केकरो बेटा-बेटी डाक्‍टरी तँ इंजि‍नि‍यरि‍ंग पढ़ैए केकरो बेटा-बेटी घरेलू नोकर बनि‍ घरक काज करैए रोज मेहनति‍ मजदुरी करि‍ कऽ जीवन बि‍तबैए गरीबक बेटा हॉस्‍पीटलमे रूपैया बि‍नु इलाजक खाति‍र मरि‍ गेल महगाइक दानव आसमान चढ़ि‍ गेल। वि‍डम्‍वना कतेक लि‍खब दलि‍तक बेथा सलहेश गामक संदेश कतेक लि‍खब समाजक वि‍डम्‍वना आँखि‍क नोर सुखि‍ गेल दर्द नै होइए कम के बुझत कि‍ अछि‍ झूठ कि‍ अछि‍ साँच टकमे टि‍क जोरि‍ रहैए बुझैए अपनाकेँ बड़का खुद ओ अछि‍ भि‍तरसँ कारी दुश्‍मन बनल तड़का बड़-बड़ करैए नाच दलि‍तक प्रगति‍सँ जलनक लगैए हि‍नका आॅच कतेक लि‍खब दलि‍तक बेथा सलहेश गामक संदेश। दि‍यादी बॉट अपनहि‍ घरमे हेराएल छी हम भेटैए हि‍स्‍सा बरोबरि‍ कऽ मुदा बॉटमे पछुआएल छी हम लड़ए पड़त अखनो दि‍यादी बॉटक लेल नै तँ करत आओर झेल कऽ रहल अछि‍ ओ दि‍गभ्रमि‍त हमरा दलि‍त अक्षोप कहि‍ कऽ करने अछि‍ एकात हमरा ओही एकातसँ चलि‍ कर आएल छी हम सहलौं सभ कि‍छु सलहेशक संतान रहि‍तौं जहि‍या तक चुप रहलौं हम आइ आँखि‍ फारि‍ कऽ देखि‍ रहल अछि‍ ओ हमरा जब अप्‍पन हि‍स्‍साक बात कऽ रहल छी हम अपनहि‍ घरमे हेराएल छी हम। पुर्णि‍मा पुर्णिमाक राति‍मे चाँद केर चुप चाप घरतीपर उतरैत देखलौं घासपर गि‍रल ओस केर बुन्नमे अप्‍पन चेहरा देखि‍ चाँदकेँ खि‍लखि‍लाएल हँसैत देखलौं नव यौवन कोमल हसीन सुरत चाँदकेँ पुरा मुखड़ा देखलौं घरतीपर प्रकृति‍क सृष्‍टीक मनमोहन दृश्‍य देखि‍ गाछ-वृक्षक संग चाँदकेँ नचैत देखलौं चाँद कहलक कि‍छु बात धीरेसँ बाजू अप्‍पन रूप-रंग घन-सम्‍पति‍क भाओ नै तौलू चाँदकेँ लोकक लेल यएह संदेश लि‍खि‍ कऽ जाइत देखलौं पुर्णिमाक राति‍मे चाँद केर चुप-चाप...। रि‍श्‍ता हँसैत-खेलैत हमर जि‍नगी छलए वसंत ऋृतु जकाँ जाइत छलि‍ऐ अलग मुदा दोस छलए पक्का भेदभावो नै कोनो जेना मालामे गाँथल रंग-बि‍रंगक फूल जकाँ हुनकर खुशीमे हँसैत-छलौं दुख:मे कनै छलौं संग-संग चलै छलाैं नदि‍क दुनू कि‍नार जकाँ दुनू गोटेमे मि‍त्रता छल सुदामा और कृष्‍ण जकाँ लोक देखि‍ कऽ जड़ै छल धधकल कुलाह जकाँ दोस्‍तीमे जहर घोरि‍ देलक दूधमे खटाइ जकाँ दुनू दोसकेँ अलग कऽ देलक लोक अप्‍पन रास्‍ताक दि‍वार जकाँ हँसैत खेलैत...। अज्ञानी कम फुल कि‍चरमे फुलाइ छै जखन संग दइ छै पानि‍यो आँखि‍ मुनि‍ कऽ कि‍एक बनल छी अज्ञानी यौ छोट तँ लोक कर्मसँ होइ छै मुदा हमर कि‍एक छै आइ दुख: भरल कहानी यौ देहसँ देह केना छुबाइ छै कि‍एक नै चलैए हमर छुअल पानि‍ यौ कोन जुलुमक सजा हमरा दऽ रहल छी कि‍अए बुझै छी हमरा अपमानी यौ जि‍वन हमर केना बि‍ततै भेद-भाव ऊँच-नि‍चक भावना समाजक मनसँ कहि‍या मि‍टेतै केहेन अहाँ छी अज्ञानी यौ। कनी देखू हे बलान माता कनी देखू अहाँ हमर ओर आँखि‍सँ सुखल नोर भुखसँ सुखल ठोर घरमे नै अछि‍ िकछु बॉचल सभ लऽ गेलेँ बाढ़ि‍मे दहा कऽ दक्षि‍ण अाेर कनैत-कनैत करेज फटैए केना अहाँ देलौं हमरा झकझोड़ि‍ दाना-दानाक लेल बि‍लखै छी बौआ रहल छी हम चारू ओर वि‍पत्ति‍क बादल हमरा ऊपर लागल अछि‍ घनघोर राति‍क नीन नै होइए जागि‍ कऽ होइए भोर हे माता दया करू नै बनु अहाँ नि‍ठाेर अनजानमे जौं कोनो गलती भेल होएत हमरासँ तँ माफ करब हाथ जोड़ि‍ लगै छी गोर हे बलान माता कनी देखू...। मास्‍टरक बहाली देखि‍यौ-देखि‍यौ भेड़ि‍या-धसान सन भेल एतए मास्‍टरक बहाली कि‍यो नै करैए एकर रखवाली स्‍कूलमे नैना-भुटुका करैए हल्‍ला-गुल्‍ला मास्‍टर साहेब दऽ रहल अछि‍ ठहाका पढ़ाइ-लि‍खाइ के करबैए देखि‍यौ केना उठबैए सरकारी टाका अखार मासमे बारह बजे दि‍न तक खेतमे कदबा-गजार करैए सर एक बजे स्‍कूल अबैए सर खैनीमे लगबैए चोट शि‍क्षाकेँ रखने अछि‍ ताखपर मंगनीमे उठबैए नोट स्‍कूलमे मैडमोकेँ देखि‍यो ओहो कम नै छथि‍ लेक्‍मीक लि‍पि‍स्‍टक लगेने मैडम बॉबकट केश पहरबैए इतर छि‍ट कऽ केना स्‍कूलकेँ गमकबैए पर्ससँ नि‍काइल कऽ अइना रहि‍-रहि‍ मुँह ि‍नङहारैए मोबाइलपर करैए हेल्‍लौ समए केना बि‍तबैए देखि‍यो-देखि‍यो सरकारी पैसा केना उठबैए कहबी अछि‍, जेहने इमाम सहाब तेहने ढोलकि‍या वि‍द्यार्थीक गार्जियन भरि‍ दि‍न धि‍या-पुतासँ गाए-महींस चरबबैए देखि‍ये-देखि‍यो खि‍चरी खाइ बेरमे स्‍कूल केना पठबैए। फागुनमे अइहो वृजगोपाला फागुनमे खेलैले होली हमरा संगे तोरा लेल संजौनी छी मखन भड़ल थाड़ी बाट जोहि‍ रहल अछि‍ राधा-सखी केर संग ई वसंतक ऋृतु मधुमासक मौसम फगुनी हवामे हम उराएब रंग अबि‍र अहाँ प्रेम सुधा केर रंग बरसैए हमरा रंग दि‍हो अप्‍पन रंगमे हमर जि‍नगीक मनोरथ पुरा कदि‍हो श्‍यामा अहीबेर होलीमे अइहो वृजगोपाला फागुनमे। श्‍यामल मोहे खोजत हम तोरा ताही लेल हेरा गेल हमर कृष्‍ण कन्‍हैया बासुरी बजइया सखी हे कि‍छु बाजत नै तोर ओनाएल छी हम मृगा कस्‍तुरी सन खोजीह देहो श्‍यामल मोहे चि‍त्तचाेर सखी हे कि‍छु बाजत नै तोर वृन्‍दावन यमुनातट पनघटपर कदमुआ पेड़ सुना लगत प्रेम लीला करत आब के फेर सखी हे कि‍छु बाजत नै तोर बड़ा नटखट छैल छबि‍ला चि‍त्तमन प्रि‍तम केर केस अछि‍ घूंघराएल मोर मकून्‍दल सरपे सखी हे कि‍छु बाजत नै तोर। जीतक झंडा जरै जाउ वतन केर दुश्‍मन आगि‍ सुनगाएल करू जीत केर झंडा फहराएल करू मोनमे राखि‍ कऽ उमंग गीत देश भक्‍ति‍क गाएल करू हि‍मालय सन ऊँच हृदए अछि‍ हमर प्रेमक फूल खि‍लाएल करू अछि‍ गाँधीक देश ई गंगा-यमुना पावन नदि‍ दइए संगमक संदेश जतए ति‍लक, टैगोर, अम्‍बेदकर जतए वि‍र भगत सि‍ंह चन्‍द्रशेखर, सुभाष वीर पुत्र जतए भेटए संघर्षक कथा जतए मातृभूमि अप्‍पन भारत माता केर गुण गाएल करू जरै जाउ वतनक दुश्‍मन आगि‍ सुनगाएल करू। युवा रहैए युवाकेँ उमंग मोनमे जौं पहाड़सँ लड़ि‍ लेब हम संघर्षक जीवन अहि‍ना चलतै जीवनक अंति‍म समैमे कि‍छु करि‍ लेब हम जोश जतए कम नै हुअए युवा के तँ परि‍स्‍थि‍ति‍ सात समुद्र पार कऽ लेब हम हमरा नै रोकू कि‍यो दलि‍तक दरदकेँ हर संभव कम कऽ लेब हम‍ लड़ए कि‍एक ने पड़ए हमरा अही दुश्‍मनक संग दुश्‍मनक छाती चीर कऽ देखा देब हम बहुत सतेने अछि‍ हमरा समाजकेँ भरि‍ जीवन बीच अखारामे पटकि‍ कऽ देखा देब हम चुप नै रहू सभ अप्‍पन हकक लड़ाइक लेल आगू बढ़ू रहैए युवाकेँ उमंग मोनमे। हम युवा जाति‍-धर्म मजहब केर नामपर षडयंत्र रचैए कि‍यो हमर देशकेँ भीतर आबि‍ कऽ आतंकवादक गाछ रोपैए कि‍यो भारतवासी शेर छी शेरकेँ मादमे आबि‍ कऽ जगबैए कि‍यो दुश्‍मनक थाह नै ऐ बातक हम युवा हर मोड़पर ठार छी अंत करैले सदि‍खन ऐ दानवक लेल तैयार छी हम छी गोली, हम छी बारूद हमही खंजर तलवार छी ति‍रंगाक ति‍नू रंग तीर-कमान छी जौं दोस्‍तीक लेल हाथ बढ़ाएब तँ हमही फूलक माला गला केर हार छी संदेश दइ छी शान्‍ति‍ केर हमहीं महात्‍मा गाँधी, गौतम बुद्धक अवतार छी जौं कहि‍यो एक बुन्न सोनि‍त गि‍रल ऐ धरतीपर तँ हमहीं वीर भगत सि‍ंह चन्‍द्रशेखर आजाद छी जाति‍-धर्म ओ मजहब केर नाओंपर। पथि‍क हम पथि‍क छी जीवन केर जीबि‍ लि‍अ दि‍अ नि‍हस्‍वार्थ रूपसँ मनुख बनि‍ कऽ दोख हमरा ऊपर नै लागए कोनो नै गलती हुअए फेर हम पथि‍क छी जीवन केर मनुखक तन भेटल हमरा मानव धर्म नि‍भाएब मानव सेवा करब जीवन प्रयत्न चंचल डगर मोहनी मायाक बसमे नै ओझराएब फेर हम पथि‍क छी जीवन केर गाड़ि‍ देलौं हम मन जीतक झंडा अपना मोनमे अवि‍रल समस्‍या कठि‍न परीक्षा कि‍एक नै हुअए जीवनमे पाछू उलटि‍ कऽ नै देखब फेर हम पथि‍क छी जीवन केर। हमहूँ कनै छी जहि‍यासँ हम अहाँकेँ नै देखि‍ रहल छी साँझ-वि‍हान एक नोर कनै छी। कतए चलि‍ गेलैं अहाँ छोड़ि‍ कऽ हमरा एतए असगर आगूक दुनि‍याँ हम अन्‍हारे देखै छी। सभ पुछैए अहाँक बारेमे कि‍यो अाह करैए हे भगवान केना भऽ गेलै नीक लोककेँ कि‍यो करैए अहाँक बराइ कहू कतए चलि‍ गेलौं अहाँ हमरा छोड़ि‍ कऽ आइ हमहूँ कनै छी बौओ कनैए माइक आँखि‍सँ सदि‍खन नोर झहरैए जखन कि‍छु सोचै छी अहींक यादि‍ अबैए जहि‍यासँ हम अहाँकेँ नै देखि‍ रहल छी। एना कि‍एक अखनो चलै छै समाजमे टंगघि‍च्‍चा टंगघि‍च्‍चीक खेल ऊपरसँ नूनू बौआ भि‍तरे-भि‍तर कहैए बकलेल बर्षोसँ देखि‍ रहल छी हर तरहसँ दलि‍तक उपेक्षा कएल गेल कहू कि‍एक मैथि‍ली छी हम मि‍थि‍लावासी छी तइ लेल? ऐ तरहक नि‍अम बनौनि‍हार अपने के जौं हमरोमे कमी खोजै छी तँ अपनो समाजक चेहरा देखू कि‍एक नै हुनको संग अहि‍ना कएल गेल ऐ प्रश्‍नक जबाब दि‍अ समाजक जाति‍-पाति‍क नाओंपर बटनि‍हार अहाँकेँ कहू दलि‍तकेँ हर तरहसँ उपेक्षि‍त कि‍एक कएल गेल काि‍वल नै बुझू अपनाकेँ अपने छी बकलेल अखनो चलै छै समाजमे टंगघि‍च्‍चा टंगघि‍च्‍चीक खेल। जि‍ति‍या गे दैया गि‍ति‍या माए गेल छौ पोखरि‍मे नहाइले पावनि‍ छै जि‍ति‍या होइ छै बड़ भारी तीन दि‍न धरि‍ सहल रहए पड़ै छै कऽ ले घर-आंगना साफ सुथरा चूल्हि‍-चौका नीप पोति‍ ले देखैमे लगतौ नीमन आइ बनबि‍हेँ मरूआक रोटी माछक तीमन जि‍ति‍या पावनि‍ सभ मि‍थलानी करै छै बाल-बच्‍चा घर-परि‍वारक दुख: कलेश दूर होइ छै बढ़ै छै उमेर पोखरि‍मे घेराकेँ पातपर खैर-तेल चढ़ै छै खुश होइ छै देव पि‍तर भगवान भोरे सभ खाइ छै आमक अमोट चूड़ा-दही जर-जलपान गे दइया गि‍ति‍या। डगर जि‍नगीक ओइ मोड़पर हम बैसल छी जतए देखै छी हरेक तरहक लोकेँ जे अलग-अलग डगरपर चलैए कि‍यो ऊपर चढ़ि‍ गेल कि‍यो बीच बाटमे अॅटकि‍ गेल कि‍यो असफलताक डरसँ पाछू रहि‍ गेल शाइद एकर जि‍नगी कहैत छै हम अखने धरि‍ असमंजसमे पड़ल छी कि‍ करू कि‍छु नै फुराइए तइ लेल एत्तै बैसल छी बैसल रहब पछुआ जाएब हमरो आब एतएसँ चलए पड़त कोन डगर चली केन दि‍शा चली अप्‍पन शक्‍ती देखि‍ बाट पकड़ए पड़त जि‍नगीक ओइ मोड़पर। रमल छी रामक धूनमे रमल छी हम संतक सेवामे जुटल छी हम शांति‍क संदेश बाटैमे लागल छी हम गाए रक्षा करैक शपथ खेने छी हम वेद पुराण धर्म शास्‍त्र पढ़ि‍ कऽ अप्‍पन जीवनमे उतारबाक कोशि‍शमे लागल छी हम नीज स्‍वार्थ त्‍यागी केर लोकहि‍त काममे लागल छी हम जइ बाटपर चलल महात्‍मा गाँधी महात्‍मा बुद्ध वएह बाटपर चलल छी हम राम केर धूनमे रमल छी हम। संत नदि‍मे भसि‍आएल मुर्दा शांतचि‍त्त भऽ कऽ पानि‍पर पड़ल अछि‍ एकर नै नाओं अछि‍ नै कोनो पता पानि‍क रेतक संगे अनजान पथपर चलल अछि‍ कतौ पानि‍क रेत झकझोरइए तँ कतौ झारीमे फसि‍ कऽ नि‍कलैक प्रसास करैए कतौ नदि‍क कछेर‍मे टकरा कऽ चलैए पानि‍ धार संगे उथल-पुथल होइए रौद-बसात सहैए उगैए तँ डुमैए सफरक एेकरा कोनो ठेकान नै बस पानि‍क संग चलैए जहि‍ना संत भक्‍ति‍-भावमे डुमल रहैए भक्‍ति‍ मार्गपर चलैए नदि‍मे भसि‍आएल मुर्दा। बन्‍हन चुप धड़कन कि‍छु कहैत छी ई केहेन अजब सन टि‍स हमर दि‍लमे होइत अछि‍ जेना लगैए दुख केर नदि‍सँ बाचि‍ कऽ हम नि‍कलल छी हम खुशीसँ चि‍ड़ै जकाँ उड़ै लेल चाहै छी हम मुदा पएरमे लागल अछि‍ ई बेरि‍या बन्‍हन ओकरा खोलैले चाहै छी हम एगो भूल भऽ गेल हमरासँ ओ भूलकेँ भूलैमे खुद अपनाकेँ भूलि‍ गेल छी हम आब हमर अपनो छाँह दोसरकेँ लगैए आ खुदकेँ खोजैले नि‍कलल छी हम। संघर्ष जारी रखब समस्‍या और बढ़ि‍ गेल सफर अधुरा रहि‍ गेल जीत केर हारि‍ गेलौं हम हरेक कोशि‍श नाकाम भऽ गेल तखनो अप्‍पन हौसला नै हारने छी हम हर डेंग संघर्ष जारी रखब अनजान अनभिज्ञ ई समए कतै तक लजाइए हमरा वि‍रह केर भीरसँ मुदा एकर डर नै अछि हमरा‍ लड़ैत रहब अप्‍पन समाजक अधि‍कारक लेल लोग हमर काम देखि‍ हँसैए हमरापर मुदा हम तेकर फि‍कि‍र नै केने छी एहेन जीनगी जि‍नाइसँ कोन फाइदा जइमे संघर्ष नै अछि‍ एतए सभ अप्‍पना-अप्‍पना लेल जि‍बैए जीने तँ अोकरा कहल जाइए जे समाज कल्‍याणक लेल जबैए मरलाक बादो सदि‍खन हुनकर कृति‍ जि‍वि‍त रहैए अहू ओ अही डगरपर हमहूँ चलल छी। भरदुति‍या आइ छि‍ऐ सुकराती गे मुनि‍या दि‍आरी डि‍बि‍यामे कर तँू तेल एम्‍हर आ रौ मंगला हुका-बाती खेल ई पावनि‍ त्‍योहार छै मेल मि‍लाप करैक सभ संग कऽ ले मेल प्रेमसँ रहैमे नै होइ छै कोनो परेशानी दीप जरा हुका बाती खेल केलह वि‍हाने दइयाक सासुर जहीये भरदुति‍या पावनि‍ छै न्‍योंत लि‍हेँ देतौ हाथमे पान-सुपारी आसि‍रवाद लि‍हेँ देखि‍हेँ हुरा-हूरीक पहलमानी फटाका-फुटुकीक नै कर झेल आइ छि‍ऐ सुकराती गे मुनि‍या। गबहा संक्राति‍ बड़ अनचि‍त भेल गृहस्‍त सबहक संग ऐबेर खेतीमे लगाउ खर्चा मेहनति‍-मजदुरी सभ बाढ़ि‍क चपेटि‍मे चलि‍ गेल पावनि‍-ति‍हारमे सेहन्‍ता लगले रहि‍ गेल आजुक दि‍न गवहासंक्राति‍ अछि‍ अन्न-धनक घरमे कमी देखै छी केना कऽ अहीबेर खेतक आड़ि‍पर जा कऽ कहब सेर-बरोबरि‍ उखैर सन बीट समाठ सन सि‍स जेम्‍हर देखै छी खाली खेत खसल अछि‍ चारू दि‍स प्रश्न कऽ रहल अछि‍ हमरासँ खेतक आड़ि‍ आ मेर खेतमे अगबे अछि‍ बालुक ढेर केना कऽ गुजर चलत उपजा कऽ कास-पटेर बड़ अनचि‍त भेल गृहस्‍त सबहक संग ऐबेर। कि‍मती भोट हरेक पाँच बर्खपर जन प्रति‍नि‍धि‍ हम सभ चुनै छी राज्‍य सभासँ संसद धरि‍ पहुँचाबै छी अपन कि‍मती भोट दऽ कऽ जि‍ताबै छी चुनवक भार हम जनता सभ उठाबै छी मुदा जीत गेलाक बाद ई नेता-मंत्री अपनाकेँ बुझैए महान कहू वि‍कासशील देशक श्रेणीमे रहल वि‍कसि‍त कहि‍या बनत हि‍न्‍दुस्‍तान लोकतंत्रक हि‍नका परबाह नै देशक वि‍कासक हि‍नका चाह नै सामंतवादी सन रखैए अपन सोच मन-मोताबि‍क करैए वि‍कासक रूपैया केर खर्च माननीय हि‍नका केना कही एक नम्‍मरक अछि‍ ओ चापलूस बेइमान कहू वि‍कासशील देशक श्रेणीमे रहल वि‍कासि‍त कहि‍या बनत हि‍न्‍दुस्‍तान एक दि‍स वि‍श्व बैंकसँ कर्जा लऽ रहल अछि‍ दोसर दि‍स धांधलीक रूपैया‍ वि‍देशमे जमा कऽ रहल अछि देशक कोन तरह कमजोर बना रहल अछि‍ लोकतंत्रकेँ कऽ रहल अछि‍ अपमान कहू वि‍कशि‍त देशक श्रेणीमे रहल वि‍कसि‍त कहिया बनत हि‍न्‍दुस्‍तान। ‍

असली-नकली मोन जौं चोन्‍हराएत तखन की करबै कलयुग अछि‍ कछु भऽ सकैत अछि‍ असली-नकलीमे फर्क कोन की झूठ की साँच तर्क कोन सभ एक्के सि‍रहने पड़ल अछि‍ आइक परि‍स्‍थि‍ति‍मे नीक कही तखनो गेलौं बेजाए कही तैयो गेलौं तइ दुआरे हम मुँह लटकेने छी कखन की भऽ जाएत से कोनो ठीक नै सभ कि‍छु देखि‍ कऽ आँखि‍ मूनि‍ लेब मुदा चुप रहब सेहो ठीक नै समए सभ दि‍न अहि‍ना थोड़े रहतै हरेक प्रश्‍नक जबाब जरूर भेटतै मौन जौं चोन्‍हराएत तखन की करबै। कोसी माइहे कतेक हम कनलौं-खि‍जलौं कतेक नोर बहेलौं सनइ-पटुआ कास-पटेर अल्हुआ-मरूआ उपजा कऽ गुजर-बसर हम केलौं सहलौं बड़-बड़ कष्‍ट बाढ़ि‍मे घर-द्वार वि‍हि‍न चैन-वि‍वेके हम रहलौं सोचि‍-सोचि‍ कऽ‍ समए बि‍तेलौं व्‍यर्थ-फि‍जुल कऽ देलि‍ऐ मि‍थि‍लाकेँ दू-भागमे अहाँ पूबमे सहरसा-सुपौल पछि‍ममे मधुबनी-दरभंगा बि‍चमे अगबे बालु आ धूल कहू आब कतेक चुप रहब ऐबेर हम बना देलौं पुल रोजी-रोटीक अवसर भेटल हँसै छल जे दुनि‍याँ आब हमरा देखत शि‍क्षाक नव-ज्‍योति‍ जागत जाएत पढ़ैले बेटा-बेटी कओलेज-स्‍कूल माइहे कतेक हम कनलौं-खि‍जलौं कतेक नोर बहेलौं। मच्‍छर रानी सूनसान राति‍मे चुपचाप नंगे पएर लग अबैए भन-भन करैत छोट-नटखटी सुकुमारी प्‍यारी-दुलारी मच्‍छर रानी चोंच नोकि‍ला नयन कटि‍ला अछि‍ बड़ सि‍यानी उघार देह देखि‍ कऽ करैए हमरा संग छेड़खानी कखनो गाल-चुमैए कखनो खून चुसैए प्‍यास नै लगैए जेना कहाँ पि‍बैए पानि‍ भरि‍ राति‍ जागि‍ कऽ हम एकरा संगे राति‍ बि‍तबै छी होइए बड़ परेसानी आब एकरासँ बचबाक करब उपाइ रोजे राति‍ कऽ लगाएब मच्‍छरदानी सूनसान राति‍मे चुप-चाप नंगे पएर लग अबैए। हरि‍जन हि‍न्‍दु मुसलि‍म सि‍ख ईसाइ सभकेँ कहै छी सभसँ पुछै छी कि‍एक भेल दू रंगक मोन हम दलि‍त छी मेहनति‍-मजदुरी कए कऽ बि‍तबै छी अपन जीवन तैयो जरैत अछि‍ लोक देखि‍ कऽ जरै केकरो तन करै अछि‍ छुआ-छूतक भेद-भाव मंदि‍र पूजाघर जेबासँ करैत अछि‍ वंचि‍त एखनो एकैसम सदीमे हरि‍जनक संग कि‍एक कऽ रहल छी अहाँ सभ अनुचि‍त हि‍न्‍दू-मुस्‍लि‍म-सि‍ख ईसाइ। हम छी मैथि‍ली हम छी मैथि‍ल जे बजै छी वएह लि‍खै छी जे देखै छी वएह कहै छी स्‍वयं दलि‍त छी दलि‍तक दरद जनै छी कि‍छु व्‍यक्‍ति‍क कि‍रदानीसँ चकि‍त छी दलि‍त भऽ कऽ ओ व्‍यक्‍ति‍ अपनो समाजकेँ बि‍सरि‍ गेल अप्‍पन भाषा-भेष छोड़ि‍ कऽ दोसरक रंग-ढंगमे ढलि‍ गेल नाओं मात्रसँ दलि‍त कर्मसँ बहुरूपि‍या बनि‍ गेल साहि‍त्‍य जे समाजक आइना मानल जाइए ओहूमे अप्‍पन नामक खाति‍र अप्‍पन बोली-भाषा तक बि‍सरि‍ गेल तइ दुआरे दलि‍तक स्‍थि‍ति‍ जस-के-तस रहि‍ गेल हम छी मैथि‍ल। बौकी मांगि‍-चांगि‍ कऽ बौकी जीवन अपन बि‍तबैए कोइ दइ बाइस भात-रोटी कोइ दइ फाटल-पुरान वस्‍त्र ओइ फाटल वस्‍त्रसँ झाँपने अपन तन बेइमान भेल अछि‍ लोकक नजर। उजरल-पुजरल अछि ओकर‍ टुटलघर। बसल अछि‍ ओ गामक कातमे जि‍नगीक फि‍कि‍र नै अछि‍ ओकरा इज्‍जति‍क छै डर पोसने अछि‍ दुगो सुगर। जे भागल फि‍रैए गाछि‍ये-गाछी-बासे-बाँस चरबै ले जाइए दि‍न-दुपहर। ऐ दुनि‍यासँ अछि‍ ओ बेखबर मांगि‍-चांगि‍ कऽ बौकी जीवन अपन बि‍तबैए। चौके-चौक समए-साल बदलल लोकक सोच बदलल एम्‍हर प्रसाशन भेल अछि‍ बौक सि‍रका तारी गाजा-भाँगकेँ आब के पुछैए देशी-वि‍देशी इंग्‍लि‍श दारू भेटैए चौके-चौक एक सालमे दारू पि‍बनि‍हार सभ मि‍ल कऽ लगौलक जोर साँझ-वि‍हान-भाेर सरकारी राजस्‍वमे बढ़त भेल अही बेर दारूसँ साढे तीन करोड़ पीब कऽ दारू जनता मरए दि‍न-दुगुना राित चौगुनाक दरसँ आमदनी बढ़ए सरकार कहए हमर ऐमे कोन दोख समए-शाल बदलल लोकक। ठेँस लागल जखन ठेँस जीवनमे सही डगरपर चलनाइ सि‍खि‍ लेलौं हम जेकरा बूझै छलौं अपन सफर केर साथी आइ दुख परलापर असली रूप हि‍नको देखेलौं हम चलैए परत अनगि‍नि‍त बाटपर हमरा असगरे आइ जानि‍ गेलौं हम कतौ काँट भेटत बाटमे कतौ फूल भेटत बाटमे सभ संगे सभ कि‍छु सहि‍ कऽ रहनाइ आइ सि‍खि‍ गेलौं हम केतने आएत हमरा ऊपर वि‍पत्ति‍क बादल समस्‍यासँ लड़नाइ सि‍खि‍ गेलौं हम लागल जखन ठेँस जीवनमे। पेटक खाति‍र पेटक खाति‍र जीवन नै भेल कखनो अस्‍थि‍र कहि‍यो चैत मासमे लड़ैत लह-लह लूसँ जरैत रौदमे घामसँ तर-बत्तर कोदारि‍ पारलौं बसि‍या भात तँ कहि‍यो नून-रोटी खा कऽ रहलौं कहि‍यो खुद्दी फाँकि‍ कऽ पानि‍ पीब सुतलौं बाल-बच्‍चाकेँ छोड़ि‍ दि‍ल्‍ली-पंजाबमे रि‍क्‍सा घि‍चलौं तँ पि‍ट्ठीपर बोरा उठेलौं तैयो कर्जदारक ताना-बाना बात कहि‍नी सुनलौं ओकर बेगारी करलौं चारि‍ सेर बोनि‍ लेल लोकक खेतमे भरि‍ दि‍न खटलौं मुँह-पेट बान्‍हि‍ कऽ अहुमे सँ जोगा कऽ रखलौं बर-बेमारी भेल बाल-बच्‍चाकेँ तँ कोठी पेहना खोलि‍ घान-चाउर बेचलौं रौद-बसातमे जरैत गरीबीसँ लड़ैत हम जीवन अप्‍पन गमेलौं पेटक खाति‍र जीवन नै भेल। जगदीश बाबू हम छी सेवक मैथि‍ल जगदीश बाबूक चेला नै हमरा लड़ू खि‍यौलनि‍ नै देलथि‍ मि‍श्रीक ढेला तैयाे हम छी सेवक मैथि‍ल जगदीश बाबूक चेला गुरुजी छथि‍न हमर बड्ड महान् साहि‍त्‍यक छथि‍ पइघ वि‍द्वान मधेश मि‍थि‍लामे हि‍नक अलग पहि‍चान जएह बजै छथि‍ वहए करै छथि‍ वएह लि‍खबो करै छथि‍ तमोरि‍या लग बेरमा अछि‍ हि‍नक गाम दर्शन करबाक मोन होइए हमरा बहुत मुदा छी हम अकेला तैयो हम छी सेवक मैथि‍ल जगदीश बाबूक चेला गामक जि‍नगी मौलाइल गाछक फूल मि‍थि‍लाक बेटी जीवन-सघर्ष, जीवन-मरण उत्‍थान-पतन पढ़ि‍ कऽ हमर उत्‍साहसँ बढ़ल मोन उठेलौं हमहूँ कलम लि‍खै छी कवि‍ता तँए हम छी सेवक मैथि‍ल........। उजरल घर उजरल घर तवाहीक मंजर देखि‍ कऽ हम वेदनामे डुमल रहै छी खुला आसमानक नि‍च्‍चा जानवरसँ बत्तर रौद-बसातमे कष्‍ट सहि‍ कऽ रहै छी गरजैत मेघ घनघोर बादल पानि‍-बर्खाक संग बाढ़ि‍मे दहाइत लहाश उजरल घर लोकक चि‍तकार देखै-सुनै छी गरीबक जि‍नगी नि‍हत्‍था योद्धा रेतपर बनल घर जकाँ अखन बुझै छी कष्‍टक मारल वि‍पत्ति‍क आगाँ हारल छी जि‍ऐ छी नै मरै छी बीचमे परि‍ कऽ हुकुर-हुकुर करै छी उजरल घर तबाहीक मंजर। जीवनक नैया जोर भेलै पानि‍क धार कोसी-कमला बलानमे गे माइ रहि‍-रहि‍ उठै छै उफान डरसँ नि‍कलैए हमर जान गे माइ तूहीं जगक पालनहार तोरे करै छी बेर-बेर गोहारि‍ गे माइ हमर जीवनक नाहक खेबैया तूहीं लगेबेँए आब पार गे माइया माटि‍क मुरुत बनि‍ कऽ एना कि‍आ बैसल छी दुख आब हमरा सहलौ नै जाइए जान कौड़ीक मोल जेना बुझाइए गे माइ जोर भेलै पानि‍क धार। डर हे यौ केना कहै छि‍ऐ नै छै डर आॅफि‍समे हाकि‍मक डर घरमे घरवालीक डर देशमे आतंकवादी-माओवादीक डर हे यौ केना कहै छि‍ऐ नै छै डर जनताकेँ नेतासँ डर बापकेँ बेटासँ डर सासुकेँ पुतोहुसँ डर बि‍जली रहि‍तौ लॉडस्‍पीकरक डर खेलमे मैच फि‍क्‍सिंगक डर रूपैयामे जाली नोटक डर हे यौ केना कहै छि‍ऐ नै छै डर गोसाइकेँ भगतासँ डर मन्‍दि‍रक चन्‍दाकेँ पण्‍डासँ डर घी खरि‍दब तँ डलडासँ डर प्रेम करब तँ धोखाक डर हे यौ केना कहै छि‍ऐ नै छै डर। नटीन झोटा झोटौबलि‍ हेतौ नटि‍नि‍या तोरा संग अही बेर गे करबौ हम चुमौन अही लगनमे एतौ घरमे सौतीन उ दि‍न अबैमे नै छै देरी गे झोटा झोटौबलि‍ हेतौ नटि‍नि‍या आठ बजे दि‍न धरि‍ सूतल रहै छेँ तूँ पुरुषसँ करबै छेँ चूल्ही-चौकाक काम केहेन करै छेँ तूँ अनहेेर गे झोटा-झोटौबलि‍ हेतौ नटि‍नि‍या रहै छेँ घरमे बैसल करै छेँ उकटा-पेंची नैहरे लागे ताेरा नीक गे टोले-टोले घुमल फि‍रै छेँ कामक बेरमे अंगनेमे लागि‍ जाइ छौ दि‍क गे झोटा-झोटौबलि‍ हेतौ नटि‍नि‍या बाबू तोहर गामक मुखि‍या बेटी तेकर दुलारी गे ससुर-भैंसूरकेँ दि‍अर सन बुझै छेँ माथपर कि‍एक नै लइ छेँ साड़ी गे ओल सन तँू बोल बजै छेँ केना कही हम तोरा मि‍थि‍लाक नारी गे झोटा-झोटौबलि‍ हेतौ नटि‍नि‍या। ‍ बताह गुम-सुम बैसल रहै ओ अप्‍पन हाथक लकि‍र नि‍हारि‍ कऽ हँसैए ओ गुज-गुज अन्‍हरि‍या राति‍मे असगरे घुमल-फि‍ड़ैए ओ गि‍त गुनगुनाइत अछि‍ तँ कखनो जोरसँ गबैए ओ हुनक भेष-भुसा देखि‍ कऽ लोग कहैए हि‍नका छथि‍ बताह सुनि‍ कऽ बि‍खनि‍-बि‍खनि‍ गारि‍ पढ़ैए ओ पहि‍रने फाटल-अंगा-पेंट नम्‍हर-नम्‍हर केश-दाढ़ी बढ़ेने रहैए ओ घूि‍म-घूमि‍ कऽ माँगि‍-चाँगि‍ कऽ खाइए ओ जखन कि‍यो दुतकारैए हि‍नका बोम फाड़ि‍ कऽ कानैए ओ कि‍ साँचे बताह अछि‍ ओ? ज्ञानक नव ज्‍योति‍ सभ जन जागल जखन भेल सबेर सुख समृद्ध ज्ञानक नव ज्‍योति‍ दुनि‍या भरि‍मे परसत अपन वि‍हार ओ दि‍न अबैमे नै अछि‍ देरी अति‍तकेँ सहेजैमे लागल छी हम अप्‍पन बुधि‍-कौशलसँ नव वि‍हारकेँ गढ़ैमे लागल छी हम चलब सदि‍खन सत् आ वि‍कासक डगरपर भूलि‍ कऽ जाति‍-धरम लाएब समाजमे नव क्रांति‍ मेटाएब भ्रष्‍टाचार अशि‍क्षा, देशक सि‍रसँ छुआ-छूतक भेद-भावकेँ तब हएत बुद्धक वि‍हार देखत दुनि‍या नेक नजरि‍सँ भेटत सभकेँ समान अधि‍कार जय मि‍थि‍ला जय बि‍हार। केहेन चालि‍ फुलोपर केना करी हम भरोषा बि‍नु मौसमक खि‍लैत अछि‍ ओ सावन अबैसँ पहि‍ने नै जानि‍ कतेक रंग बदलैत अछि‍ ओ सभ भँवरासँ दोस्‍ती अछि‍ हि‍नका सभसँ मि‍लैत अछि‍ ओ अप्‍पन कहि‍ कऽ काँटसँ घाइल कऽ दैत अछि‍ ओ भँवरा सभ शि‍काइत करैत अछि‍ हि‍नकर कि‍एक एहेन चालि‍ चलैए ओ कतौ और जख्‍म दि‍ए तँ बरदास कऽ लेब मुदा करेजमे काँट जकाँ गरैत अछि‍ ओ नै जानि‍ एहेन चालि‍ कत्तएसँ सि‍खि‍ कऽ आएल अछि‍ ओ फुलोपर केना करी हम भरोष। वसन्‍त आएल वसन्‍त नव जि‍वन लऽ कऽ हर प्राणीमे उमंग भरि‍ कऽ गाछ-वृक्षमे नव कनोजरि‍क संग मोजर फूल ि‍नकलैत अछि‍ खेतमे गहुम-खेसारी ति‍सी-मसुरी तोरीक फूलसँ समुच्‍चा बाध गमकैत अछि‍ मधुमाछी लगौने सेनुरि‍या आमक गाछपर छत्ता देखि‍ कऽ लुक्‍खी डरैत अछि‍ अरहुलक फूल चूसि‍ कऽ फुलचोभी चि‍हुकैत अछि‍ कौआ आ कोइलीमे भेल अछि‍ कनाइर कोइलीक बोली सुनि‍ कऽ अबैए कौआ भऽ जाइए मारि‍ सि‍मरक फड़ देखि‍ कऽ सुग्‍गा पकैक बेर तकैत अछि‍ भेल वि‍हान जखन चि‍हू-चुहि‍या प्रेमक मधुर संदेश परसैत अछि‍ लखन काका गबैत अछि‍ प्राती देव-पि‍तरकेँ जपैत अछि वसंती हवामे स्‍वर्गक आनन्‍द अबैत अछि‍ जाएल वसंत नव जीवन लऽ कऽ। योद्धा सत्‍यक भीड़सँ नि‍कलल योद्धा बन्‍हने तीर-कमान मायवी ऐ दुनि‍यामे देखि‍ रहल अछि‍ ऊपर-नि‍च्‍चा सोचि‍ रहल अछि‍ कतए खोजब- कतए ताकब के भेटत धरम-मार्गपर चलनि‍हार नीक इनसान सगरे पसरल अछि‍ अत्‍याचार मनमे स्‍वार्थ-द्वेष भड़ल अछि‍ लोककेँ केकरासँ पूछब के कहत के अछि‍ वीर हनुमान सभ लगौने चन्‍दन-टीका पंडि‍त बूझी आकि‍ शैतान त्रेता-द्वापर युगसँ अखनि‍ धरि‍ कते चलाएब गद्दा-सुदर्शन चक्र-तीर-कमान कते बनाएब ऐ धरतीकेँ लहू-लहुआन ओहि‍ना एतए कानि‍ रहल अछि‍ जपानक हीरो-सीमा भारतक बंगालमे भेल गैंस अग्‍नीकाण्‍ड सत्‍क भीड़सँ नि‍कलल योद्धा। शिव कुमार झा “टिल्लू”, पिताक नाम ः स्व. काली कान्त झा ‘‘बूच‘‘,माताक नाम ः स्व. चन्द्रकला देवी,जन्म तिथि ः 11-12-1973,शिक्षा ः स्नातक (प्रतिष्ठा),जन्म स्थान ः मातृक ः मालीपुर मोड़तर, जि.-बेगूसराय,मूलग्राम ः ग्राम + पत्रालय - करियन, जिला – समस्तीपुर। संप्रति ः प्रबंधक, संग्रहण, जे. एम. ए. स्टोर्स लि., मेन रोड, बिस्टुपुर, जमशेदपुर। अन्य गतिविधि ः वर्ष 1996 सँ वर्ष 2002 धरि विद्यापति परिषद समस्तीपुरक सांस्कृतिक ,गतिवधि एवं मैथिलीक प्रचार-प्रसार हेतु डाॅ. नरेश कुमार विकल आ श्री उदय नारायण चौधरी (राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक) क नेतृत्वमे संलग्न| - क्षणप्रभा (अपन गप,किछु पद्य) अपन गप “क्षणप्रभा”क अर्थ होइछ बि‍जरी जेकरा प्रबुद्ध जन तड़ि‍त कहैत छथि‍। हम कोनो नैसर्गिक कवि‍ नै, क्षणि‍क भावना कवि‍ताक रूपेँ अभि‍व्यक्त भेल जेकर प्रासंगि‍कताक ि‍नर्णए पाठकगणपर छन्हि। हमर कहब मात्र ईएह जेे हमर ई पहि‍लुक प्रयास थि‍क ऐमे काव्य लक्षणा ओ व्यंहजनाक अनुपालन भेल वा नै ऐ वि‍षयमे हम कि‍छु नै कहि‍ सकैत छी, मात्र ईएह कहबाक लेल नीति‍ संगत हएत जे जइ भाषाकेँ बाल कालहि‍ंसँ ि‍हआमे लगा कऽ रखलौं ओइ भाषामे अपन कि‍छु अभिव्यक्ति पाठकगण लग परसि‍ रहल छी। हमर जन्म मातृक मालीपुर मोड़तरमे भेल, हाशमीजी ओइ गामक बगलमे शिक्षक छला, मालीयेपुर गाममे रहै छला, हमर बाबूजी स्व. कालीकान्त झा बूच सँ साहित्य साधनाक क्रममे बड्ड अन्तरंगता भऽ गेल छलनि, पारिवारिक सम्बन्ध जकाँ। हमर बाल्यकालक उपनाम "टिल्लू" हिनके राखल छलनि, जखन हम नेना छलौं (४-५ बर्खक) तँ ओ हमरा कहै छला- "टिल्लू मियाँ राही, पेटमे कराही, आ दौड़ऽ हौ सिपाही"। माए चन्द्र कला देवी सेहो मैथि‍लीमे कि‍छु पद्य लि‍खने छलीह। बालकाल मातृकमे बीतल, तकर बाद पैतृक गाम उदयनाचार्यक भूमि‍ करि‍यनक माटि‍-पानि‍मे रमि‍ आगाँ बढ़ैत गेलौं। पि‍ताक कवि‍त्वक कारणेँ महाकवि‍ आरसी, चन्द्रभानु सि‍ंह, प्रवासी, प्रो. नरेश कुमार वि‍कल, प्रो. वि‍द्यापति‍ झा, प्रो. राम कृपाल चौधरी राकेशसँ परि‍चय भेल। तकर परि‍णाम थि‍क ई छोट-छीन कृति‍। धन्यवादक पात्र छथि‍ ् गजेन्द्र ठाकुर आ उमेश मण्डल जि‍नकर सानि‍ध्यमे ई झुझुआन रचना सोझाँ आएल। संग-संग डॉ. शेफालि‍का वर्मा, श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, श्रीमती ज्योति‍ सुनीत चौधरी सन प्रवीण साहि‍त्यकार सेहो उत्साहवर्द्धन लेल धन्यवादक पात्र छथि‍। समर्पण- अपन छोटका कक्का स्व. नवलकान्त झाक चरण रजमे सादर समर्पित।- शि‍व कुमार झा “टिल्लू” ऋतुराज मे विरहिनी पिया कोना कऽ बिततै फागुन मास अपार औ, जीवन भेल पहाड़ औ ना ..... । कोइली कुहकै ठाढ़ि पात होइछ मन मे अघात एकसरि डूबि रहल छी, अहीं बिनु हम मझधार औ जीवन भेल पहाड़ औ ना ..... । भ्रमरक गुंजन लागय तीत, केहेन निष्‍ठुर भेलहुँ मीत कोना कऽ सूखि सकत ई फूटल अश्रुधार औ, जीवन भेल पहाड़ औ ना ..... । सखी सभ सदिखन अछि कवदाबय, बिछुरन रोदन लऽ कऽ आबय बिहुंसल यौवन पसरल मेघ आ अभिसार औ, जीवन भेल पहाँड़ औ ना ..... । देखिते अबीर गुलालक रंग विरह बनौलक कलुष उमंग कहू कोना उठत ई मृत शय्याक कहार औ, जीवन भेल पहाड़ औ ना ..... । कंतक आवाहन आजु मुदित मन बालारूण केर - करू मंगल गुणगान अय । जड़ उपवन मे सुमन फुलाओल यौवन महमह भान अय । श्रैंगारिक वेला मे सपनहिं प्रियतम छूलनि कपोल हमर । अर्द्ध निन्न मे चिहुँकल जहिना, सासु मरोड़लि लोल हमर । अभिनव औता आजु सुनल दुरभाष मे अपने कान अय । जड़ .......... झट उठि देखल धर्म मातृ केर, आनन परिमल पुष्प बनल । पूत दर्शनक आश मे डूबलि, मंजुल मुसकी पनकि रहल, चलू रम्भा भंडार चढ़ाबू हेता भुखल अहँक परान अय । जड़ .......... असमंजस मे दुहु भैरवी, मातृक लोचन सुधा भरल । वामा हम तऽ नेहक लुत्ती, तनय अनल प्रेम धधकि रहल । जननी हृदय छोह सँ आकुल स्वार्थहि हमर जहाँन अय । जड़ .......... चरण छूबि नाथक माता केर, कयलहुँ चटपट स्नान हम । कुमकुम केसर जूही चमेली, कुलदेवी गमगम अनुपम । देवकी नन्दन बंसी बजाबथु बोरि - बोरि द्राक्षा तान अय जड़ .......... संभवि अहाँॅ ननदि नहि अनुजा, बनि कम कयलहुँ ताप हमर । नहि तऽ फॅसि विरहक संतापे, पीवि लेतहुँ कखनहुँ जहर । आनव उपहारे मे अहीं लेल विज्ञ, धान्यवर चान अय जड़ .......... अतृप्त नयन आकुल पड़ल विगलित नभ दिशि तकैत, छलहुँ रैनि केर निर्वांणक प्रतीक्षा करैत । कोना काटव एहि संतापी जामिनी केॅ, ओ तऽ छलीह हमरे कटैत । झकझोड़ि देलक अन्तर्मन केॅ नयनाक पूछल अंतिम प्रश्न- अहूँ अहिना करब की? पददलित कयलक विष रहित फन केॅ । दुहू नैन नोर सँ सरावोरि, देलनि हमर आत्मा केॅ मडोरि । निःछल करूणामयी भऽ भाव विभोर देखऽ लगलहुँ अवलाक धधकैत ज्वार सुनैत गेलहुँ सुनैत गेलहुँ । निरूत्तर हमर व्यथा क्षीण भऽ गेल - मंच सँ नेपथ्य भरिगर लागल की सोचैत छलहुँ ? वास्तविकता............ चाननक सेज पर पड़लि अर्धांगिनी धान्य, रजत, कांचन, भरल.......... मुदा ! सदिखन खसैत् वेदना केर दामिनी ? छल अपूर्ण यौवन अतृप्त नयन हा ! तात कोना कएल वरन एक गाही वयसक सुकन्या केर कंतक वयस पचपन..... । गामक चुलबुली मोनालिसा कुहरि रहलि कनक गृह मे - असहाय तातक देल विपदा केॅ भोगि रहलि जोगि रहलि । कोना पार करती लछिमन रेखा - अपन विंहुसल हिलोर केॅ कतऽ करतीह प्रस्फुटित हमरा सँ कयलीह अपन पीड़ा प्रकट पाषाणी नर कऽ देलनि जीवन विकट बूढ़ कंतक डोलि गेल आसन शंकाक अजगर तोड़ि देलक प्रीति स्तंभ कठोर आदेश देलनि अपन दारा केॅ - आजुक पश्चात् पर पुरूष सँ गप्प कथमपि नहि करब नहि तऽ ? हऽम अचंभित सुन्न शिथिल कलंकित चरित्र लऽ कऽ धूरि गेलहुँ निःतरंग अपन पुरान पथ पर काॅपि रहल दुहु पग .... कोन अपराध कयलहुँ हऽम तऽ छलहुँ पोछैत नोर । अतृप्त नयन सँ झहरैत नोर । कुरूक्षेत्र मे राधा नवनीत अहाँॅ पतवार बनू एहि करूस सरोवर जीवन केॅ, ठिठुरल कदम्ब जमुना ठहरल सखी हँसी उडाओल अर्पण केॅ । आक्रांतित चहुँ दिशि सुमन तरू, विकल जड़ चेतन नभ धरती, जल बुन्न बनल घन घनन घटा, त्रासित राधा मन अछि परती । नवनीत............... सत् असत कर्म बीचि घूमि रहल, सभ जनितो अहाँॅ अनजान बनल, भेंटत की जन संहारे सँ, अवला चित्कार आ नोर भरल । नवनीत............... शापित करती ओ हिन्द सती, जनिक नाथ लुप्त भू आंचल सँ, संगहि करूणित वृन्दा - मथुरा, लेब पाप सभक युद्ध माॅचत जॅ, नवनीत............... खोलू रण कर्मक डोरा डोरि, डुबू पीयूष राधा - रस मे, उत्ताप प्रेम तिल सुनगि रहल नहि आब ई यौवन अछि वश मे नवनीत............... मधु श्रावणी मधुप विना सुन्न उपवन रे, मधुश्रावणी आयल । कंत विनय विवश कतऽ रे हिय ‘आरती’ हेरायल । सुनू शिव छलिया स्वांगी बनि हमरा विरहय लहुँ, संग महादेव नाम देवर केॅ कलंकित कयलहुँ मधुप .............. हम कएल कतेक अनुग्रह रे अहूॅ हमरा वचन देल, मंजुल मिलन कतऽ गेल रे, कतय बात कलित गेल, मधुप .............. हऽम अभागलि मैथिली रे, अपनहि देल घात, नुपूर खनकि दुःख कातर रे, तोड़ल दामिनी गात, मधुप .............. विकल मल्हार सुनि शिव, आनन हँसी सँ उमड़ायल, जुनि हहरू सिये, अहँक लखन रघुवर संग आओल, मधुप .............. बरहमासा प्रियतम आकुल कुम्हरल दारा मन, टिहुकि उठल ना । मूक शिशिर पुचकारथि कोना ? दूर द्वीप सजना । जामिनी बनल कंत बिनु विजन, तरूणी माघ मनाओल क्रन्दन, सरस वसन्त क ललित रात्रि मे - हहरै कंगना । प्रियतम................... दादुर ठहकय तृप्ति सरोवर, अश्रुधार सँ सींचित कोबर, कीर मृदुल सुनि चैतो बीतल, विह्वल नयना । प्रियतम .............. अहँ सँ सिनेहक धंधा कयलहुँ, पौन आस बैशाख बुड़यलहुँ हृदयक मीन नीर बिनु व्याकुल - सुन्न पलना । प्रियतम .............. जेठक रौदी काटि रहल छल, सूखल कानन झाँॅटि रहल छल, उदधि अकाशे जल सँ तिरपित- लवालव अंगना। प्रियतम .............. साओन-भादव मौन मनाओल, तुहिन गात तर आश्विन आयल, कातिक - अगहन बिहुँसथि - पूस मांगै छथि ललना । प्रियतम .............. कोप भवन मे कनियाँॅ रूसलि किए सूतलि छी बनबू ने कनेक चाय अय । मिथिला हम चललहुँ , टाटानगरी सँ आइ अय । अहाँॅ जौ एना रहब तऽ हम कोना जीअब, सदिखन कनिते - कनिते व्यथे जहर पीअब । एना अहाँॅ रूसब तऽ हम कऽ लेब दोसर सगाइ अय, मिथिला .......................... अहाँॅ केर रूप देखिते कामदेवो कानैत छथि, ‘‘मृगनयनी‘‘ केॅ ओ उर्वशी मानैत छथि । बिहुँसल मादक घुघना लागै लौंगियाँ मिरचाइ अय, मिथिला .......................... छगनलाल ज्वेलरी सँ कनक हार लायव, आजु रैन पूनम केँ, पार्क मे घुमायव । हहरल मनक तृष्णा, नहि बनू हरजाइ अय, मिथिला .......................... ऊठू प्रिये, अहाँॅ जल्दी नहाबू, कोप भवन सँ उठि कऽ लऽग मे आबू । मंदहि मुस्की मारू, हऽम अनिलहुँ अछि मलाइ अय, मिथिला .......................... प्रेयसीक विलाप लागै बरखा इन्होर, मारै बयसक जोर, मिलनक आशा मे बैसलि - छी आबू ने चकोर । बाटे तऽ तकिते तकिये, नयन सूखि गेलै, प्रेयसीक विलाप पर नहि - अहँक ध्यान एलै । ठनका गर्जय मांचल शोर, तिरपित नृत्य मोरनी मोर । मिलनक आशा मे वैसलि,- छी आबू ने चकोर । बेदर्दी जुनि बऽनू, मोन टूटि गेलै । पावसक शीतलता - आतप्त भेलै । लुप्त भगजोगिनी दर्शय भोर, लटकल मेघ गगन घनघोर, किएक हृदय तोड़ि रहलहुँ । हाँ ! हम्मर मन चित चोर । लंका खुरखुर भैयाँ सूट सियौलनि, बतही काकीक हाथ रूमाल । अध वयसि चोकटलही भौजी, बाट पसारलि प्रेमाजाल मैथिली कुहरथि पर्णकुटी मे, सूर्पनखा बनली रानी । नेना पेट क्षीर विनु आकुल, मोबाइल नचावथि पटरानी । अर्द्धांगिनी नेत्री सँ कुपित भऽ शंखनाद कयलनि मामा । हस्त ऊक लऽ मामी खेहलथिन्ह, फूजल मामा केर पैजामा । अपन पुतोहु केॅ झोंकि अन लमे, बनि गेलीह गामक सरपंच । धर्माचार्य देव मंदिर केर, मुदा हृदय भरल परपंच । कतेक घऽर मे सान्हि काटि, शांति समिति केर आव प्रधान । रक्षक छथि चुटकी मे वैसल, कोना बाॅचत अवला केर मान ? विद्यालय केॅ मुॅह नहि देखल, धएने कुरसी शिक्षा सचिव । कुटिल तंत्र केर ईह लीला मे मारल गेलन्हि मूक गरीब । मुंडी इनार मे हुरहुर जनमल, कमीशन लागत दस परसेन्ट । नौकरशाह मोटर मे घूमथि, आँखि गोगल्स काँखि मे सेन्ट । सभ काज मे दिऔक भएट, शौच करू वा लघुशंका । रामराज्य केॅ बिसरि जाऊ, आर्यावर्त आव सद्यः लंका । राजनीति मे अज्ञ - विज्ञ केर, नहि कोनो अछि वर्ग विभेद । अपने पीबथि ताड़ी दारू, मंत्री विभाग मद्य निषेद्य राग वसंतक गेल जमाना सुनू ब्रितानी विकट संगीत । डंकल कुरथी पाक बनल आ अप्पन वारिक पटुआ तीत । होरी हाथ अबीर काॅरव पिचकारी, भाल पर गदरल चाह उमंग । पूरन भैया होरी खेलथि, नव नौतारि सारि केर संग । कखनहुँ डुबकी लैत अधर मे, जुट्टी मे कखनहुँ हिलकोर । नील, वैंजनी लाल गुलाल सँ, रंगलनि चम्पा पोरे - पोर । ‘टिल्लू’ नयन पर अचरज पसरल, देखि भ्राता केर बसन्ती वुन्न । एखनहुँ श्रृंगारक आह भरल मुदा - आँखि अन्हार कान छन्हि सुन्न । हऽम पुछलअनि कोना कऽ कयलहुँ, मधु सँ उबडुव मधुर प्रबंध । सकल तन अछि बेकार मुदा हम, ध्राण शक्ति सँ सूॅघल गंध । भौजी लऽ वाढ़नि आ खापड़ि, झाड़ि देलनि भैयाँ केर अंग । कुरता फाटल नयन नोरायल भूतल खसल होरी के रंग । माॅडर्न जमाना नुआ धोती मिल बरहर जनमल, आयल बरमूडा मिनी स्कर्ट । मुन्ना भैया चुनरी ओढ़ू, भौजी पहिरलनि जोलही सर्ट । काकी मरौत काढ़ने बैसलि, कक्का गऽर धरम केर वाना । कदली कनियाँक हाँथ मे वीयर, आवि गेल माॅडर्न जमाना । भरि दिवसक गणना जौ करवै, बहुआसिनक सात वेरि सतमनि । भरल साॅझ स्वामी आयल छथि, अॅइठार वैसलि लऽ मुॅह मे दतमनि । अस्सी दशक मे माय सँ मम्मी फेर माॅम आब भेली मम्मा । मायक भ्राता केर नाम की राखब? मामा पिघलि बनला झामा । अपन नेना सँ वेस पियरगर, संकर झवड़ा चायनीज कुकुर । भुटका - नाथ केॅ छाड़ि घऽर मे टाॅमी संग गेलि अंतःपुर । चरण स्पर्श निर्वांण लेलक आव, छुट्टो कैंचा केॅ भऽगेल वाय । भौजी एकसरि मधुशाला मे भैयाँ सँ गेलनि मोन अघाय । नेना पच्छिमक बोली उगलै । माॅ मैथिली कोना वजतीह दैयाँ । बात अंगरेजियाँ माथ घुसल नहि, मुदा करै छथि याँ ! याँ ! याँ तिलकोर मखान नीक नहि लागय, नहि सुस्वादु मकैयक लावा । पाॅपकाॅर्न चाउमीन दलिया लेल, मोॅछ पिजौने बैसलनि बाबा। ऋतुराज सोहर गावथि कोइली बहिना, कीर मधुर ध्वनि बजबथि साज । जननी वीणा वादिनी हर्षित, अवतार लेलनि सद्यः ऋृतुराज । गर्वित उपवन मधुपक गुंजन, वर्णक पुष्पक दिव्य सोहनगर । सरिता लवलव शांत उदधि छथि, मऽहु रसाल मे उमड़ल मज्जर। माघक सातम धवल इजोरिया, भेल नवल ऋृतु नृप छठिहार। चिनुआर भरल पायस पूआ सँ, कुलदेवी साजल उपहार । भगजोगिनी केर पंचम सुर सुनि, आंगन महमह मुग्ध दलान । दशोदिशि मलमल गेना फूलल, सरिसब बूट भरल खरिहान । रवि संग सुषमा अछिंजल उष्मा, पात-पात पर पछवा वसात । विरहिनी बैसलि कंत आश मे वयः ताप सँ उपटल गात । मातु उमा मन मुदित विभूषित, सजल नुपूर चरण चमकल । शिवरात्रिक अवाहन भेलै, नाथ कुशेश्वर छथि गमकल । संवत जड़ल आ होली आयल, अबीर गुलाबी हरियर लाल । क्षितिज धरित्री एक बनल छथि, ढ़ोलक डुग्गी झाॅझक ताल । छोट पैघ केर भेद मिटायल, वृद्ध जुआन संग मे बाल । छोटकी कनियाँॅ ठोर रंगलि आ - बऽरक भरल पान सँ गाल ।ं भैया भांग सुधा मे सानल, शिथिल पड़ल छथि माँझ ओसार । रंगलहुँ हऽम भौजीक चरण केँ, विदा बसन्त एहि लोक सँ पार । नवतुरिया होरी बाढ़िक पसाही मे डूबल सगरो मिथिला धाम । बागमती करेहक आंत मे, ओझरायल हम्मर गाम । भदैया संग रब्बी बूड़ल, जिरात मे फाटलि गंग । बीति गेल फागुन मुदा, ऊँच जोतॉस जलमग्न । नेना टोली हेरि रहल, सम्मत लेल खर पतवार । रामू बाबा सूतल खाट पर, ऊड़ल खोपरिक चार । पौत्रक नीन जहिना फूजल, झमाड़ल कुंभकरण । झट सनि ऊठू औ बाबा देखू नभ तरेगन । राम लोचन दौड़लनि गाड़ि पढ़ैत बड़ी पोखरिक मोहारि । बनि कपीश नेना भुटका देलक खोपड़ी जाड़ि । लालिमा देखि आदित्य केॅ कदवा कएल दलान । शंभू रंगलनि गोबर थाल सँ छोटका पाहुनक कान । तीन फुटिया लाला पैघ खोंचाह, हाकिम पर फेकल रंग । फूदन चिनुआरक घैल मे, मिलाओल चिन्नी भंग । भरि कठौत पायस भरल, घिवही पूआ केर संग । भौजी तन बोरल गुलाल सँ, उमड़ल मातृ उमंग । चैतावर टिटही तान मे, गावथि टलहा दऽल । छोट छीन गुंजन - सुमन्त, घूमथि भूत बनऽल । सा रा रा रा गूंजि रहल लुटकुन जीक बथान । सियाराम जय गान सँ गमगम मैथिल दलान । डॉक्टर भैयाक सार पर ढ़ारल कारी मोबिल । देखि नेना गण केर होरी गहुमनो घुसि गेल विल । चैतावर आयल चैत मधुर रंग पॉचम, उपवन बुलबुल गावय ना ............ । सन - सन पुरबा मलय वसात, झन - झन देह झनकाबय ना............. । कुहकै कुक कोइली बबुर वन, चहकै अलि पाटलि मधुवन, फड़कै मोर मोरनि लोचन, फनकै मृगी पद फन - फन, भन - भन मन भनकावय ना । सन - सन.................... भाविनी खिलायलि गहवर, वहिना मुदित हिय फरफर, सखी नेह मातलि कोहवर भौजी रेह गावथि सोहर, क्षण - क्षण तन छनकावय ना । सन - सन.................... प्रियतम व्यथित ई आखर, नोरक सियाही झरझर, कोमल शय्या भेल खरखर, सुखि देह वक सन पातर कण - कण पट सिहरावय ना । सन - सन.................... उपटल फागुन केर रस वुन, हहरल नुपूर स्वर झुन - झुन, विकल नैन भेल अधर सुन्न अछि कोन कांता मे अवगुन? घन - घन घट सनकावय ना । सन - सन.................... व्रत एकान्त लुटकुन जी केर चकचक भाल, कपोल सिनुरियाँ बनल रसाल । टीशन चलला लऽ घटही कार, आवि रहल थिन्ह सासु आ सार । छहछह तन मन भरल उमंग, गृह घुरलनि विधि माताक संग । झटपट शांभवि चाह बनावू, पहिने रूहे आफजा लावू । मम्मी छथि वड़ जोड़ पियाँसलि भूक्खे समस्तीपूर सँ मैसूर आयलि । जलखै सेवै दलिपूड़ी क बोर, मझिनी भुजल परोर आ इचना झोर । जुनि करू अकरहरि श्रवण जमाय, अहँक सासु तऽ हमरो माय । माय हमर आडम्वरि धर्मी, सनातन पालिका संग षट्कर्मी । मतिसुन्न लक्ष्मीनाथ बजार गेलनि, फुलल परोर माँछ इचना लेलनि । देखिते भऽरल माँछक झोरा, फुजलनि सासु वन्न मुॅह वोरा । पाहुन देलथिन धऽर घिनाय, कोना करव हम नहाँय खाय ? काल्हि हमर छी व्रत एकान्त मछैन गृह केर सगरो प्रान्त । फेकू माँछ सटल तरकारी, ग्ंागाजल सँ धोयब आंगन वारी । गैस चढ़ल अन्न नहि खायब, बौआ सँ अंगूर सेव मंगायव । काल्हुक लेल चाही आमक चेरा, माटिक चूल्हि आ वॉस चडेÛरा । सिंगापूरी नहि चिनियॉ केरा, शुद्ध सुधा गुड़ सानल पेरा । शांभवि ई मैसूर नहि गाम, कतऽ हम ताकू जाड़नि आम? विकट भेल रवि व्रत एकान्त, एहि चक्कर हमर जीवन अशान्त । लुटकुन माथ मे शोणित अटकल, भाय वहिन मुॅह मुस्की फटकल । हम की करव सभ दोष अहाँ केॅ, पावनि मास किएक बजौलहुँ माँ के ? ताकय चललनि कर्नाटक केर गाम, हाँथ चूल्हि माँथ गठरी आम । सोझे आवि खाट पर खसलनि । शांभवि जोर ठहक्का हँसलनि । सुनू प्रिये तारू सूखल अछि, जल विनु हम्मर हिय विकल अछि । एहेन व्यथा नहि हँसि उड़ाबू, त्रास कंठगत नीर पियाबू । अनाचार विहुंसल विजुकल दुष्यन्तक मन तनय गड़ल अछि थाल मे । न्याय - धर्म भू हिन्द घेरायल अनाचार केर जाल मे । परदारा आ परक द्रव्य दिशि, अधम कुलोचन हुलकि रहल । राजकोष केर बात की कहू ? श्वेत वस्त्र बीचि फुदकि रहल । जनतंत्रक आंचर वसुधा पर मुस्की कौरव भाल मे । न्याय ....................... उदयन दर्शन आव अलौकिक, भेल विदेहक कथा विलुप्त, सभजन लागल भौतिकता मे बुद्ध अयाची पुंज शुशुप्त, खर खवास सँ मालिक धरि नाचय कैंचा केर ताल मे । न्याय ....................... काटर लऽ कऽ गृहस्थ धर्म केॅ, पालन कऽ रहलनि मनुसंतान । जानकी माता पातरि सजावथि, मधुशाला पैसलनि हनुमान । गर्भक कन्या भ्रूण हत्या सँ समायलि कालक गाल मे । न्याय ....................... जाति, पंथ, भाषा विभेद ई, प्रजातंत्र केॅ साड़ि रहल । कुटिल राजर्षिक चक्रव्यूह, अपने अपना केॅ जाड़ि रहल देवभूमि केॅ दियौ मुक्ति फॅसि गेल दलालक चाल मे । न्याय ....................... अभिनव मिथिला धाम ‘‘माँ मिथिले अभिनव मिथिला धाम । अहँक कोर केॅ छोड़ि आव हम, नहि जएव दोसर ठााम । माँ मिथिले .......... वौरयलहुँ सगरो आर्य भुवन मे, कतहु न भेटल चैन । अकवक विकल दिवस दुःख भोगलहुँ, तमस कटै छल रैन । माँ मिथिले .......... नवटोल नववोल देखलहुँ नवल चालि, भाउज भावहुक नहि भान । तात पूत एक्के संग वैसल, करथि सुरारस पान । माँ मिथिले .......... मैथिल दीन जनेर फॅकै छथि, मुदा देव पितरक मान । छोट पैघ वीचि लक्षिमन रेखा, नहि ककरो अपमान । माँ मिथिले .......... उदयन सँ दर्शन सीखि वॉटव, अयाँची सँ, आत्म सम्मान । भारती मंडन सँ ब्रहम ज्ञान लेव, आरसी याँत्री सँ स्वाभिमान । माँ मिथिले .......... उर्मि धिआक त्याग देखिक, कण-कण भाव विभोर, वैदेहीक सती धर्म सँ उमड़ल, कमला मे हिलकोर । माँ मिथिले .......... गोविन्द मधुपक सुनव पराती, खोलि क दुनू कान । शिव शक्ति केॅ श्रद्धा सँ पूजव, सुनवैत विद्यापति गान । माँ मिथिले .......... खोरा चाउर संग भाटा अदौरी, वथुआ तिलकोर मखान । आचमनि श्वेत वलानक जल सँ, गलौंठी पतैलीक पान । माँ मिथिले .......... आन धाम सँ रास सोहनगर, कुलदेवी क गहवर । पच्छिमक त्वरित गीत सँ रूचिगर अपन वैन सोहर । माँ मिथिले .......... हे तात विलखि रहल छी अन्हर जाल मे, छोड़ि कत चलि गेलहुँ तात । कॉपि रहल छथि सूर्यमुखी आ, कुहरथि वृद्ध कनैलक पात । टोलक सभटा नेना भुटका, आश लगौने घूमथि वथान । के देत उदयन धामक पेड़ा, के देत मिठगर मगही पान । पंडित बाबा खाट पकड़लनि, ककरा मुख सँ सुनता गान । श्यामजी अश्रु इनार मे पैसलनि, आव के कहतनि पैघ अकान । आर्या माँक दुआरि सुन्न अछि, सत्संगी सभ ओलती मे ठाढ़ । भक्ति सागरक धार विलोकित, लुप्त गगन मे अहँक कहाँर । अनसोहाँत ई दैवक लीला, कोना बनौलनि मर्त्य भुवन ? विज्ञानक ऑगन सँ बाहर, जन्म मरण जीवन दर्शन । करतीह कोना श्रृंगार मेनका, करतनि के रूपक वर्णन । देवराज छथि कोप भवन मे जल विनु करव कोना तर्पण? मुख मलीन कहियो नहि देखलहुँ, सुख दुख सँ अहाँ विलग विदेह । अंतिम भीख मॅगै छी बाबू, दर्शन दिऔ एक वेरि सदेह । आत्म उद्बोधन अहाँ अपने पड़ल छी घोंटि धथुर कैलाश औ, टूटल हम्मर आश औ ना । धरा पर अयलहुँ प्रदोषक दिन, मातु - पितु अहँक भक्ति मे लीन, बूझल सभ जन वम वम लेलनि हमर घर वासऔ । टूटल ........... नेन कालहिं सँ छी हर भक्त, सुखायल करम - धरम मे रक्त, शारदालीन संग मे शंकर पर विश्वास औ । टूटल ........... देखिते वितल सुधामयी वर्ख, जीवन सँ दूर भागि गेल हर्ख, जननी उठलि भूमि सँ छोड़ि मोहक पाश औ । टूटल ........... चहुँ दिशि कालक भेल प्रहाँर, करम गति फॅसल वीचि मॅझधार, उदधि मरूस्थलि भेली हिय मे पसरल त्रास औ । टूटल ........... ‘आशु’ अछि मात्र अहीं सँ मोह, होईछ अपन भाग पर छोह, हरू दुःख वा करू हम्मर निरस जीवनक नाश औ । टूटल ........... कोना कऽ अंतिम नमन करव (कन्या भ्रूण हत्या पर एक छोट रचना) कोना कऽ अंतिम नमन करव, आँचरकेँ अहाँ कलंकित कएलहुँ पुत्र जन्म सेहंतित सपना मे करूणाधारिणी निर्दयी भेलहुँ । नहि देखलहुँ आदित्य नहि शशिक शिखा, नहि नभ देखलहुँ नहि देखलहुँ वसुधा नहि भेटल छोह नहि मृदुल क्षेम, नहि मोती माणिक्य रजत हेम, पॉच मास अहँक गर्भ मे रहलहुँ जनपरिजनक तिरस्कार सहलहुँ अपैत बूझि कएलहुँ अहाँ गर्भपात भेल अपूर्ण नेना पर वज्रपात अछि कोन ओ शक्ति मनुसुत मे जे बेटी मे नहि दर्शित भेल मणिकर्णिका क शंखनाद सुनिते वृद्ध कुंवरक यौवन झट धुरि गेल दुःख एक्के वातक तातप्रिया सृष्टि देलनि संतति केॅ गरल पिआ पावन आर्यभूमिक सुनयना वैदेही केॅ देलीह माटि मिला भववंधनक ई केहेन दर्शन नीर क्षीर विनु वीतल जीवन तजि गेल प्राण तँ अनल अर्पण अमिय मधु सँ पुत्र कएलनि तर्पण एक वेरि हमरो जौ कहितहुँ अहाँ जीवन मे सुधा वोरि देतहुँ माँ देतहुँ सतरंगी परिधान पुत्र सँ वढ़ि कऽ करितहुँ सम्मान दिअ आशीष हमर जननी फेरि वेटी वनि नहि आवी अवनी नहि सूखय पुनि नव किसलय दल नहि जल सँ पहिने भेटय अनल पावस लगिते आतप अनल ज्वाल सँ, पसरल सगरो हाँहाँकार तरूण - वरूणक अग्निवेश सँ जीव - अजीव मे अशंातिक ज्वार मोन विरंजित हृदय सशंकित वनल सरोवर कलुष मसान सूखल किसलयक कोमल कांति धधकि रहल नव लता वितान नष्ट करब एहि प्रलय भयंकर प्रकट भेलन्हि अपने देवेश घन घन घटाक संग आगमन शीतल पावस बूनक वेश नव रंग नव धुन नव मुस्कान घुरल सृष्टि मे नवल जान पुष्प खिायलि कांचन उपवन फूरल भ्रमर केॅ मधुर गान मंातलि सरोवर कलकल सरिता नूतन नीरक खहखह धारा आयल कृषक मे दिव्य चेतना भागल वेदनाक पुरा अँधियारा पंकज प्रस्फुटित भेल सरोवर वकः काक चित शांत सोहनगर भरल घटा मे मोर मजूरक नाच मधुर वड़ लागय रूचिगर गोधूलिक पवन वेग मे चहकि उठल भगजोगिनी वयः ताप मे उमड़ि गेलि मिलनक वियोग मे तरूणी उन्मत्त घटा संग मधुर प्रेम मे नर-नारी भ‘ गेल विभोर दुई मासक ई रूचिगर पावस उमड़ाओल नव सृष्टिक जोर गीत पिया निर्मोही खनकि गेल कंगना, विपुल मृगी नयना, किएक अहाँ बनलौ औ - प्रवासी सजना । आगि भेल शीतल उधिया रहल पानि, सुवासित जीवन मे उफनि गेल ग्लानि, सुन्न प्रेयसीक सिनेह हृदय अंगना, विपुल मृगी नयना ...................... । उमड़ि रहल विरह प्रखर आतप समान, मुरूझायल शुष्क अधर मरूघट मे प्राण, धॅसल बान्ह मर्यादाक सजना, विपुल मृगी नयना ............................ । क्षणहि मे जीवन अभिशापित वनल, सूखि गेल नेह पुष्प नोर सँ भरल, आव कहि ने सकव हम सजना विपुल मृगी नयना .............................. । कक्का औ (बाल कविता) सिबू मरसएब बड़ मरखाह छथि छक्का छोड़ौलनि कक्का औ दाँत कीचि दुनू भौं सिकुड़ाबथि हाँथमे नरकटिक सटक्का औ... भूगोलक पहरि संस्कृत वचै छथि क्षणे-क्षण नोंइस लऽ हाँफी छिकै छथि पंचतंत्र पर करथि टिटम्भा विष्णुशर्मा सँ नमछर खम्भा बरहर गाछ तर गदहा बना कऽ पाँछासँ मारथि धक्का औ... जखन कोनो छन्दक अर्थ पुछै छी कहै छथि कुकुर पर लेख लिखें रौ कहू तँ कोना हम एक्के पहरिमे रंग-बिरंगक बयना सीखू हाँथ मचोरि पीआठ पर देलनि बज्जर सन दू मुक्का औ... मुरुखे रहब आ महिस चराएब कहियो नहि ओहि इसकुल जाएब एहन राकस सँ जान छोड़ाउ भरि जिनगी अहँक गुण गाएब बजै छी किछु जौं नजरि झुका कऽ खिसियाबथि कहि भूतक्का औ... हिंसक नानी खापड़ि बेलना केर कहानी, आब नहि दोहराबू अय नानी । नाना बऽनल छथि सियाँर, भक् छथि जेना हुलुक बिलार, दंतक गणना घटि कऽ बीस हुरथि गूड़ - चूड़ा केॅ पीस गावथि दारा दरद जमानी । आब............... वरन् केर वर्ख भेल चालीस, अर्पित अहँक चरण मे शीश, अहाँॅ लेल लबलब दूध गिलास, नोर पीबि अपन बुझावथि त्रास, क्षमा करू ! छोड़ू आब गुमानी । आब............... अवकाश क बीति गेल दस साल, पेंशन सँ आनथि सेब रसाल, भरि दिन पान अहाँॅ केर गाल ऊपर सँ मचा रहल छी ताल, चमेली सँ भीजल अछि चानी आब............... कतेक दिन सुनता पितृ उगाही, संतति पूरि गेलनि दू गाही, मामा मामी क बिहुँसल ठोर, माॅ छथि, चुप्प ! साधने नोर, कोना बनि जेता आत्म बलिदानी आब............... चश्‍माक बोखार सोलहम मे कएल अंतःस्‍थ प्रवेश, हुलसल मन गेलहुँ नवल देश । हिय बसथि कला धयलहुँ विज्ञान, राखल जननी इच्‍छाक मान । वैद्य अंगरेजियाँ वनि बचाबू दीनक परान, अर्थहीन मिथिला मे बढ़त शान । धऽ ध्‍यान सुनल सृष्‍टिक इच्‍छा, गाँठि बान्‍हि लेलहुँ लऽ गुरूदीक्षा । कॉलेज मे बीतल पहिल सत्र, आओल तातक आदेश पत्र । पढ़िते आबू अहाँ अपन गाम, हैत ज्‍येष्‍ठक विवाह विद्यापति धाम तन झमकि गेल, मन गेल गुदकि भौजी केॅ देखबनि हऽम हुलकि । आगत रवि पहुँचल जनम ग्राम, शत अभ्‍यागत छथि ताम-झाम । चहुँ - दिशि भऽ रहल चहल पहल, चिन्‍ह - अनचिन्‍ह सखा सँ भरल महल । एक नव नौतारि बहुआयाँमी, पूछल सँ छथि छोटकी मामी । प्रथमहि हुनका सँ भेंट भेल, भेल दुनू गोटे मे क्षणहिं मेल । सॉझे औतीह दीदी अनिता, आकुल माँ केर एक मात्र वनिता । देखिते देखैत आबि गेल सॉझ, माँ तकिते बाट ओसार माँझ । दीदी आंगन अयलि हँसिते हँसैत माँ गऽर लगौलनि ठोहि कनैत । हिनक नयन हेरायल रिमलेस मे, देखि मामी पड़लनि पेशोपेस मे । चश्‍मा मे सुन्‍नर दाईक विभा, बढ़ि रहल हिनक नयनक शोभा । मामी ! ई सऽख नहि आँखिक इलाज, माँथ दर्द सँ छल वाधित सभ काज । सुनि मामी मोन भऽ गेल अलसित, हुनक वाम आँखि मे पीड़ा अतुलित । नोचिते नोचैत भेल नयन लाल, दर्द पसरि रहल सम्‍पूर्ण भाल । आंगन दलान पीड़ा किल्‍लोल, आँखि धोलनि लऽ जल डोले डोल । फूलि गेल नयन केर अधर पऽल, हऽम सेकलहुँ लऽ गुलाब जऽल । वैद्यो आयल नहि कोनो असरि, कछमछ कऽ रहली - रहली कुहरि । माते कयलनि बाबूजीक ध्‍यानाकर्षण, आँगन मे आबि ओ दऽ रहला भाषण । सभ दोष सारक नहि दैछ ध्‍यान, वयस तीस मुदा एखनहुँ अज्ञान । रक्‍त जमल विलोचन झिल्‍ली मे, सैनिक कंत पड़ल छथि दिल्‍ली मे । सरहोजि सँ पुछलनि पीड़ाक काल, पहिल बेरि भेल छल परूॅका साल । माँ सऽ कहलनि लाउ नव अंगा, हिनका लऽ जायब दड़िभंगा । तिरस्‍कार करब नहि हएत उचित, कनियाँ दरद सँ अति विहुंसित । काल्‍हि अछि विवाह अहाँ जुनि जाऊ, करैत छी उपाय नहि घबराऊ भोरे ‘टिल्‍लू' जेता हिनक संग, नहि विवाह मे कऽ सकलनि हुड़दंग । भातृक सासुर जेता चतुर्थी मे, मातृ आदेश लागल हम अर्थी मे । नहि बात काटल शांत छलहुँ सुनैत, राति बितल सुजनी मे कनिते कनैत । कोन बदला लेलक बापक सार, अपन संकट बान्‍हल हमरा कपार । मामी केॅ हम नहि चीन्‍हि सकल, भीतर सँ इन्‍होर ऊपर शीतल । नहि जा सकलहुँ हम वरियाँती, गाबै छी हुनक दुःखक पॉती, भोरे उठि दड़िभंगा जा रहलहुँ, नैनक शोणित सँ नहाँ रहलहुँ । पहुँचल डॉक्‍टर मिसिर केर क्‍लिनिक, चक्षुक चिकित्‍सक सभ सँ नीक दुआरे पर कम्‍पाउन्‍डर नाम पुछल, मामी नुपूर कहलनि ओ कुकुर लिखल । देखऽ मे भऽल पर वज्र बहीर, उपरि मन हँसल, भीतर अधीर । वैद्य मिसिर कहल नहि दृष्‍टि दोष दुहू आँखिये देखै छथि कोसे-कोस । नेत्रक आगाँ नहि अछि अन्‍हार हिनका लागल चश्‍माक बोखार । हम लिखि दैत छी शून्‍य ग्‍लास, बुझा दिऔन हिनक रिमलेशक प्‍यास । ताहू सँ जौं नहि हेती नीक, आँखि सेकू बनि स्‍नेही बनिक, अधर पर मुस्‍की आगाँ अन्‍हार, कानल मन सोचि विवाहक मल्‍हार । डॉक्‍टर बनऽ केर तृष्‍णा मन सँ भागल, एहेन मरीज भेटत तऽ हएब पागल । धुरि गाम माता केर करब नमन, तोड़ू जननी हमरा सँ लेल वचन । चशमिश नैन मामी छथि अति गदरल, हमर योजना हिनक भभटपन मे उड़ल । आकुल जननी (बाल कविता) सूति रहू हमर लाल, अर्द्ध रैनि बीतल । अहँक अविरल नयन सँ आँचर तीतल । घोंटि अछिंजल काटि रहलहुँ अछि जीवन, तात दर्शनक आश छिन्न किएल अरपन, क्षीर बिनु दुहू वक्ष शुष्क पड़ल । सूति रहू .......... कोन सियाँही सँ लिखल विधना हमर कपार ? अपने प्रवास गेलनि छोड़ि हमरा व्यथा धार, चानन सन नेनाक हिय, भूख सँ कानल । सूति रहू .......... हुनके की दोष दिअऽ स्नेहक ओ दिव्यमूर्ति, कायाँदीन विद्याविहीन करथि पंचजनक पूर्ति, अहँक अश्रु मातृ नयन शोणित भरल । सूति रहू .......... कहबनि गौमाता आनू औता फागुन मे कामधेनुक सुधा भरब अहँक कण-कण मे अहाँॅ निन्न हऽम कल्पना मे उड़ल । सूति रहू .......... अंतिम छंद (बाल कविता) सात बरख केर जखन वयस छल, विहुंसल मन उजड़ल मकरन्द । एखनहुँ क्षण - क्षण हिय सँ उफनय, माय जे वाजलि अंतिम छंद । सुनू पूत हम छाड़ि अवनि केॅ, जा रहलहुँ विधना केर घऽर । अपन तात केॅ कोॅचा पकड़ू, मानि जननि शीतल आँचर । हमर चरण धऽ लियऽ अहाँॅ प्रण, तनय धरम केर राखब मान । कर्म डगरि पर हमर छाँह संग, बढ़ब करैत पितृक सम्मान । हंसवाहिनी चरण मे अर्पित, अपन शीश दऽ सोखब ज्ञान । नीच बाट पर डेग नहि राखब, जीवन मे करब नहि सुरापान । केहन दृष्ट अदृश्य व्याधि ई, सभ किछु बूड़ल अहाँॅ भेलहुँ दीन । हिय नहि हारू एहि अखिल भुवन मे, छथि कतेक लाल साधन विहीन । अम्बुज अहाँॅ केॅ हमर शपथ थिक - विलोचन सँ जुनि बहबू नोर । शिखर लक्ष्य केॅ निश्चित साधव, दैत मातृ स्मृतिक वोर । हुनक दिव्य आशीष प्रताप सँ, भेल धन, मन, यश पूरित जीवन । मुदा ‘माय’ गुंजन जौ सुनि हम, रोम-रोम सँ उपटय क्रन्दन । हुरहुर (बाल कविता) दलानक पाँजरि गमकि रहल छल, गदरल गाछ फुलल फुलवारी। कात सटल कट्ठा भरि लागल, खसखस साग हरियर तरकारी । बाबा कमावथि सीता गुनि - गुनि, हमर हाथ मे जऽलक गगरी । हुनक नैन सँ ओझल भऽ कऽ, खूब चिबाबी गाजर ककरी । लदल गाछ छल नेबो बरहर, अनार शरीफा मधुर लताम । बिनु आज्ञा केयो पात जौ छूबय, बाबा छीलथि ओक्कर चाम । दीर्घ पिपासित किछु गाछ कॅपै छल, ढ़ारि देलहुँ भरि गगरी नीर । झन्न पीठ पर लागल चटकन, उमड़ल व्यथा गेल देह सिहरि । खसि पड़लहुँ कात परती मे, तमकैत बाबा लगलनि दुत्कारय । अछि उदण्ड दीर्घटेंटी नेना, हम्मर कोनो बात ने मानय । पुष्पहीन अफलित गाछ पर, देलक सभटा जऽल उड़ेल । नीक अधलाह गप्प बूझय नहि, तेसर कक्षा मे चलि गेल । भनसार आबि माय सँ पूछल, लोचन डबडब नासिका सुरसुर । आड़ि मुरझायल थिक कोन झाड़ी, बाउ ओहि अनाथक नाम हुरहुर । माल जाल सँ फुलवारी बचवऽ लेल, आड़ि पर मालिक ओकरा रोपय । सामन्ती जिरातक उपेक्षित सेवक, खाद - पानि लेल ककरो नहि टोकय । लोलुप जहाँनक अपवर्जी थिक सओन जनमल वैशाखे उपटल । तीत पात मे पुष्प खिलय नहि, उपहासे मे जीवन विपटल । रैन इजारियाँ गगरी भरि - भरि, जल सँ देलहुँ हुरहुर केॅ बोरि । भोरे - भोरे बाबा केॅ देखल, सजावैत कियारी पासनि सँ कोरि । कर्कष हिय मे प्रीति देखि कऽ, झट दौड़ि हुनका गऽर लगाओल । दलित उपेक्षित जीवन वॉचल, श्रद्धा सँ नोर टपकाओल । अंजलि (बाल कविता) कक्का ः सूति रहू अय बुच्ची ओल, पाकल परोर सन लागय लोल । उल्लू मुख भदैयाँ खिखिरक वोल, नाम ‘अंजलि’ कतेक अनमोल । अंजलि ः माँ टिल्लू कक्का वड़का शैतान, थापर मारि ठोकै छथि कान । अहाँ सँ नुका कऽ चिववथि पान, फोड़वनि माथ वा तोड़वनि टॉग । कक्का ः भौजी ! छोटकी फूसि वजै छथि, रीतू संग भरि दिन विन-विन करै छथि । दावि रहल छी हिनक देह हम, उत्छृंखल नेना करै छथि तम-तम । अंजलि ः कक्का जुनि घोरू मिथ्याक भंग, आव नहि सूतव हम अहाँक संग । माँ लग हमरा सँ सिनेह देखवैत छी, एकात पावि हमर घेंटी दवैत छी । कक्का ः पठा देव काल्हि अहाँ केॅ हाँस्टल, नेनपन ओहि ठॉ भऽ जएत शीतल । ओतय भेटत नहि खीरक थारी, नहि रसमलाइ नहि पनीरक तरकारी । अंजलि ः काकू बनव हम बुधियाँरि नेना, सदिखन वाजव सुमधुर वयना । ककरो संग नहि मुॅह लगाएव, अहीं लग रहव हाँस्टल नहि जाएव । अहँक आँचर (बाल कविता) आव विसरव कोना सुनू जननी अहाँ, कतेक निर्मल सेहंतित अहँक आँचर । हिय सिहकै जखन वहै लोचन तखन नोर पोछलहुँ लपेटि हम अहँक आँचर । कोना अयलहुँ खलक ? मोन नहि अछि कथा, पवित्र पट सँ सटल देह भागल व्यथा । सिनेह निश्छल अनमोल प्रथम सुनलहुँ मातृबोल, मोह ममताक आन के करत परतर? दंत दुग्धक उगल, नीर पेट सँ बहल, देह लुत्ती भरल कंठ सरिता सुखल । जी करै छल विसविस तालु अतुल टिसटिस, मुँॅह मे लऽ चिवयलहुँ अहँक आँचर । नेना वयसक अवसान ताकऽ चललहुँ हम ज्ञान, कएलहुँ गणना अशुद्ध गुरू फोड़ि देलनि कान । सिलेट वाट पर पटकि माँक कोर मे सटकि, तीतल कमलाक धार सँ अहँक आँचर । देखि पाँचमक फल मातृदीक्षा सफल, भाल तिरपित मुदा ! उर तृष्णा भरल । गेलहुँ कतऽ हे अम्बे कतऽ गेल आँचर, ताकि रहलहुँ हम आंगन सँ पिपरक तर । स्‍नि‍ग्‍ध-स्‍वाती झि‍हि‍र-झि‍हि‍र ना हे पि‍या, झि‍हि‍र-झि‍हि‍र ना! झहरय स्‍नि‍ग्‍ध स्‍वातीमे बदरा, झि‍हि‍र-झि‍हि‍र ना...! परम सुहावन मास वि‍रह ि‍हय, टपकए नेहक बुन्न ललि‍त पवनमे ठि‍ठुरि‍ रहल छी, जीवन भऽ गेल सुन्न टपकए वि‍रहक अश्रुलाप ई, झि‍हि‍र-झिहि‍र ना... तृप्‍ति‍-तपि‍त सि‍तुआक कल्‍पना, उपटल अर्णव तट मोती अहाँ बहएलहुँ नि‍रस जीवनमे, कि‍ए अगम दु:ख सोती? मि‍लनक आश कानए पैजनि‍याँ, झुनुर-झुनुर ना.... कांति‍ श्रवि‍त माणि‍क्‍य बनल, मदमत्त भेल गजराज मुग्‍ध जहानक रम्‍य प्रहरमे, फफकि‍ गेलहुँ हे ताज! तोड़ू वेदनाक डोरि‍ ई, झमड़ि‍-झमड़ि‍ ना.....।। घटा बसन्‍ती कूकू केर मादक स्‍वर सुनि‍ते, ि‍सनेहातुर मन चहकि‍ उठल उबडुब आनन हरि‍यर कानन, “घटा वसन्‍ती‍” धार बहल। ति‍तली रूनझुन नीरज रससँ कएलक झंकृत सकल जहान अपन मनोरथ सि‍द्धि‍ करऽ लेल प्रेयसी कएल त्रृतुराजक गान। उमड़ि‍ रहल नव तरूणी यौबन रसस्‍नात भेलि‍ चंचला-गात पुष्‍प सेजपर मि‍लन सम्‍मोहक चभटि‍ गेल अछि‍ दुनू पात। जर्जर वृद्धा आ सुखल वृद्धमे धुरि‍ आएल पुनि‍ कामुक जान भागि‍ गेलनि‍ धर्मराज देखि‍ कऽ ऋृतुराजक ई अनुपम शान। हॅसी-खुशीसँ चल-अचल जीवन, ताकि‍ रहल होरी केर वाट जड़-चेतनक सुरभि‍त कांति‍ देखि‍ कऽ कएलक गान हृदयसँ भाट। रंग-वि‍रंगक अवीर गुलाल संग नाचि‍ रहल उन्‍मादि‍त होरी सृष्‍टि‍ मनोहर चक-चक तरूवर मॉतल चह-चह चहुँदि‍शि‍ जोड़ी। चैतावरक आेंघाएल कलरब अग्‍नि‍देव केर जुआरि‍ बढ़ल घटल जहानमे कलकल जीवन मादकता स्‍वर्गोकेँ जीतल।। साहि‍त्‍यक वि‍दूषक कि‍ए हमरा कहै छी वि‍दूषक। की हम केलहुँ अहाँसँ खटपट।। शैशव अप्‍पन गाममे बि‍तएलहुँ सभ ठाम देसि‍ल गीत सुनएलहुँ मूड़न हो वा महुअक। मात्र वि‍देहसँ रखलहुँ आशा सभ दि‍न पढ़लहुँ मैथि‍ली भाषा व्‍यारव्‍याता बनि‍ भेलहुँ चकमक। श्रृंगार पहरमे कवि‍ता लि‍खै छी, छी गृहस्‍थ मुदा बैराग सि‍खै छी हमर जीवन दरससँ ओ भेलि‍ भक्। कहि‍या धरि‍ बॉटव जागरणक परचा कतहुँ नहि‍ देखलहुँ अप्‍पन चरचा दक्षि‍ण नयन भेल फकफक। दि‍नचर्या लि‍खि‍ कवि‍ बनि‍ गेला आन्‍हर गुरू संग बताह चेला उल्‍लू लग कोकि‍ल ठकमक। कतेक दि‍न भरत वि‍लाप सुनाएव फोका डबडब परि‍चय प्रसूनक। आउ-आउ दीर्घ सूत्री भेद मेटा दि‍अ हमहूँ मैथि‍ल गऽर लगा लि‍अ बनाउ मि‍थि‍लाकेँ सम्‍यक। मुदा जीबै छी जीवनक डोरि‍ फुजि‍ उड़ल व्‍योममे कातर प्राण मुदा जीबै छी सड़ल वसन पजड़ल अछि‍ आंगुर गलल ताग गुदरी सीबै छी.... ककरो बाड़ी बेली फुलाएल ककरो पोखरि‍ भैंटक लावा हमरा घरक परथनो गि‍ल्‍ल भेल आँचक बि‍ना सुन्न अछि‍ तावा कागत-मुद्राकेँ बीड़ी बना कऽ कोंढ़सँ लेसि‍-लेसि‍ पीबै छी..... लाल रंग शोणि‍त सन टपकय पीत कुटि‍ल पि‍लहा बनि‍ धधकय कुपि‍त होलि‍का छाँह देखाबथि‍ बड़ीपर काक-भुसुण्‍डी हबकय अग्‍नि‍देवक हुथ्‍थ डाङसँ सुधाकेँ खोड़ि‍-खोड़ि‍ जड़बै छी.... कटाह वसंत कहि‍यो नै आबथि‍ राखथु अपने संग वि‍धाता कुसुमि‍त रहै सबहक आङन घर हँसि‍-हँसि‍ कौड़ी खेलथि‍ पुनीता अपन संत्रासकेँ हि‍यामे नुका कऽ सबहक सुखक कामना करै छी.....।। रमा साँझ पहर दि‍प-वाती दि‍न एलौं रमा नाओं रखने छलि‍ बाबी मातृ कोरक हम पहि‍लुक नेना कोन-कोन जीवन गीत‍ गाबी खढ़क मचान नि‍लय बनि‍ चमकल कनक-रजतसँ छनछन माता पि‍ताक बटुआमे बैसलनि‍ लक्ष्‍मी कण-कण खह-खह कएल वि‍धाता लव-कुश बनि‍ जननीक कोखि‍सँ दू-दू सारस आङनमे खि‍लाएल तरूण लताकेँ स्‍नि‍ग्‍ध देखि‍ सर समाज घूरथि‍ औनाएल धेलकनि‍ पाण्‍डु जर बाबूकेँ नोकरी छोड़ि‍ खाटपर खसलनि‍ खेत पथार व्‍याधि‍ संग बूड़ल तैयो तेसर लोकमे पैसलनि‍ जै ओलती छल तृप्‍त पपि‍हरा सुग्‍गा चुनमुनीक चहचह शोर क्षणहि‍ंमे देवराज टपकेलनि‍ शरद-ि‍नशामे आगि‍ इन्‍होर हाथसँ करची कलम छूटि‍ गेल छोड़ि‍ पड़ेलनि‍ भामि‍नी- भद्रा चरण नुपूर धरा खसि‍ टूटल आङन बाड़ी भरल दरि‍द्रा काँच बएसमे सेंथुमे सि‍नूर गदगद भेलीह मातु सुनयना कहुना लाज गेल दोसर घर सुखद नोर खसबै छथि‍ मयना कंतक आङन सेहो कलुष भेल जखने नि‍कसल वज्र चरण रज रैन पचीसी संग सि‍नेहक लहठी फोड़ि‍ नि‍पत्ता पंकज तुसारि‍क नि‍स्‍तार कोना कऽ करि‍तौं उज्‍जर नूआ खाली हाथ सेंथुसँ सेनुर अपने पोछलौं आन्‍हर सासु संग पीटै छथि‍ माथ आजुक डाइन- कहि‍यो छलौं लक्ष्‍मी छाँहसँ भागथि‍ अहि‍वाति‍न सभ नोरक घृतसँ चि‍नुआर नि‍पै छी ककरो संग नै बाँटब कलरब काक-दृष्‍टि‍ धेने छथि‍ बाहर चानन ठोप केने‍ कि‍छु लोक आर्य भुवनक रौ बनमानुष सभ गर्दनि‍ दाबि‍ पठबए परलोक नारीटा लेल नि‍अम केहेन ई? वरन् एक तँ कहाएब सती अपन कांताकेँ छोड़ि‍ घरमे कहि‍या धरि‍ तकबेँ अबला रति‍? उनटा-पुनटा सबरी मायक सि‍नेह उनटल छन्‍हि‍, पनटि‍ गेल छथि‍- तात राम ति‍यागक मूरति‍ सि‍या बदलि‍ गेली प्रति‍ झण बदलए आठो-याम बोतल क्षीरमे नेना उबडुब पुष्‍ट वक्षक लेल अंबा अंध टाॅप पहि‍रलनि‍ यशोदा मैया कान्‍हा हेरथि‍ आँचर गंध कक्का दलानपर रसमंजरि‍ लागल पढ़ि‍-लि‍ख पूत भेलनि‍ अधि‍कारी घूसक टाकासँ दलानकेँ छाड़ब लालबत्ती बरू भऽ जाउ कारी अन्न-पानि‍ बि‍नु बाबा मुइला भीठ बि‍का हेतनि‍ वृषोत्‍सर्ग सभ बौराएल यशोगान लेल गजि‍या शीत तप्‍पत अपवर्ग नांगरक चार चुआठ बनल ति‍रपि‍त झाकेँ भेटलनि‍ शमि‍याना गोदानक संग जौं साँढ़ नै दागब लोकवेद सभ देत ताना पहि‍ल छायामे हमरो भेटल राहरि‍ दालि‍ संग वासमती बाबाकेँ जौं एहि‍ना खुआबि‍ति‍यनि‍ एखन नै जेता छल तट वागमती छोट परि‍वारक लेल मामी माहुर कात भेली नानी बनि‍ अपरतीप आर्य भूमि‍मे मि‍झा गेल अछि‍ संयुक्‍त परि‍वारक खहखह दीप सुकेश्वर रामक गाराक कंठी हाथ धएने धर्मक पतवार अपैत कुलमे जन्‍म की भेलनि‍? माथ लि‍खयलनि‍ जाति‍ चमार सुरावोरि‍ मुर्गी टांग चि‍बाकऽ वि‍वि‍ध कुलक्षणक संग राति‍ बि‍ताबथि‍ पंडि‍त वंशक कठुआएल पौरूष मास्‍टर साहेब ब्राह्मण कहाबथि‍। कवि‍क कामना पूत बढ़बैछ वंशक मान मुदा पि‍परौलि‍या बाबासँ मंगलनि‍ पोतीक रूपमे सुकन्‍या अचा अपर्णा वा भव्‍या कवि‍ बनि‍ गेला पि‍तामह सफल भेल कबुला-पाती भगवत कृपा देख- खुशीसँ फुललनि‍ जीर्ण छाती जेठका जीवन झखरैत पाषाण वि‍याहक भेल सोलहम बरख एखन धरि‍- नि‍:संतान दोसर नि‍ष्‍कपट बुड़ि‍वक परंच पि‍तृसेवक अवि‍राम करची सन लकलक काया रंग धन इव श्‍याम घनश्‍याम कनि‍याँ कोरमे सद्य: अएली वैदेही बनि‍ कन्‍या कवि‍क उपवन भेल धन्‍या मुदा! साक्षीक पि‍ताक स्‍थान जेठके केँ भेटत श्‍यामकेँ जौं छन्‍हि‍ बाप कहएबाक सख आश वा दीर्घ पि‍यास दोसर बेटीक लेल राखथु एकादशी उपास यएह भेल कवि‍ गेला स्‍वर्ग भेटलनि‍ मुक्‍ति‍ भेलनि‍ अपवर्ग साक्षीक माताक कोरमे फेर बेटी बनि‍ अएली भारती वि‍चि‍त्र अन्‍हेर प्रकृति‍क फेर अङने अङने अड़ए लागल गप्‍प हरबि‍ड़रो बरसए लागल कनफुसकीक झाँट अपने हाथसँ कवि‍जी रोपलनि‍ बबूरक काँट बड़की काकी दि‍अ लगलनि‍ तान नै छलनि‍ हुनका संसारक ज्ञान कबुलामे कि‍एक मंगलनि‍ बेटी हम जौं हुनका स्‍थानपर रहि‍ति‍यनि‍ तँ जनमि‍तहि‍ दाबि‍ देतौं ऐ राक्षसनीक घेँट बेटीक लेल प्रार्थना! आश्चर्य केहन कवि‍क कामना एकबेर आर अन्‍हेर भादवक अन्‍हरि‍याक फेर स्‍तब्‍ध छथि‍ सभ केओ देख कवि‍ कुलक दशा आङनक बहुआसि‍न सभ टोलक अनन्‍या कपार पि‍टए लगलथि‍न छोटको पुतोहुक कोरमे जनमलि‍... कन्‍या हा भगवान महात्‍माक यएह मान मङने देलि‍यनि‍ तीन पुष्प माल लागल फोटोमे कवि‍ छथि‍ मुग्‍ध तल्‍लीन जेना कहि‍ रहल होथि‍ के रखलक जहानक मान? के बढ़ेलक कुलक सम्‍मान? के बचेलक वंश सीता अहि‍ल्‍या सावि‍त्री वा रावण कौरव कंस? मुरूदा जगाउ इजोतमे तँ सभ चलै छै अन्‍हारमे चलि‍ कऽ देखाउ स्‍वान सुनि‍ पदचाप जागय चचरी चढ़ल मुरूदा जगाउ नृपक मीठ दर्द सुनि‍ बौराएल पटरानी-मंत्री-सेनापति‍-चाकर ओइ अभागल दि‍स के तकलकै जे सर्ववि‍ही‍न जकर देह जर्जर भरल पेट हाफी करैत पहुँचल महाजन दुआरि‍ जखने स्‍वार्थक दुग्‍धसँ बनल पयस भरि‍ थारी आगाँ रखलौं तखने आँत चटचट कंठ सूखल पानि‍ नै जे घोँटि‍ पाबय सुक्‍खल अछोप मध्यम जनकेँ झाँॅटि‍ ‘चंडाल’ कहि‍ भगाबए देवध्‍वनि‍मे नि‍पुण वाचक पंचतत्‍व देहे भरल छै पि‍रही नै केओ दैत ओकरा छुद्र कुलमे ओ जनमल छै देव धर्मकेँ पीस रहलै झपटल सोन बोरि‍ कऽ बटोरल केहेन वि‍कराल मृगतृष्‍णा ई सभ घोंटि‍ उन्‍मत्त जहर घोरल अंति‍म आग्रह ि‍थक सुनू बौआ ऐ फेरमे कखनौं परब नहि‍ अपना संग सभकेँ जगाएब कुमार्ग कहि‍यो धरब नै।। अस्‍ति‍त्‍वक प्रश्न? ककरासँ कहबै के पति‍येतै अपने तरंगमे भीजल दुनि‍याँ बड़ अथाह स्‍वार्थक अर्णव ई शुभ बनि‍ गेलै लोलुप बनि‍याँ शोणि‍त बोरि‍-बोरि‍ टाट बनएलौं खर खोड़ि‍ टि‍टही लऽ गेलै फाटल आँॅचरसँ कोना कऽ झँपबै खाली चि‍नुआर बेपर्द भऽ गेलै व्‍याल दृष्‍टि‍सँ राकस गुड़कए चि‍हुकि‍-बि‍चुकि‍ कऽ कानए रनि‍याँ कर्मक नाहमे भेलै भोकन्नर वामे हाथे पानि‍ उपछलौं भदवरि‍एमे पतवारि‍ हेराएल दहि‍ना हाथक लग्‍गा बनएलौं सभटा आङुर पानि‍ खा गेलै, कोना बजतै दर्दक हरमुनि‍याँ कछेरमे वि‍षनारि‍ उगल छै थलथल पाँक पएर धँसि‍ गेलै अन्‍हार मोनि‍मे कछमछ कऽ रहलौं बि‍नु जाले टेंगड़ा फँसि‍ गेलै कोना कऽ हमरा बाहर करतै नोर चाटि‍ हहरए सोनमनि‍याँ... कि‍छु छि‍द्दीक तरमे दबि‍ कऽ पंद्रह अाना अकसक कऽ रहलै भारी भेल कुकर्मक सोती ओकरे धारमे गंगा बहलै घनन दरि‍द्रा तांडव करतै, अस्‍ति‍त्‍वक- प्रश्न बनल पैजनि‍याँ... क्षणप्रभा सभ दि‍स सर्द कि‍यो नै बेपर्द देह सि‍हकल रेह ठि‍ठुरल पोखरि‍-इनार ठमकल पूस रमकल श्‍याम असर्ध शीतक बीच टक टक कएने आश कखन भरत मोनक पि‍यास कबदबैत चम्‍पा मुस्‍कैत पलाश सूर्यमुखीक दशा देखि‍ ओकरासँ कि‍अए करैत छी सि‍नेह जे कुन्‍तीकेँ ठकि‍ लेलक ओकर कौमार्य नष्‍ट कऽ देलक आइ आगि‍क ढेपपर के करत वि‍श्वास? झाँपू मर्यादा बचाउ गेह भावक आगाँ प्राप्‍ति‍क कोन मोजर एतबेमे मेघ उड़ि‍ गेल शीत लुप्‍त भेल क्षणप्रभा बनि‍ रवि‍क अर्चिस सूर्यमुखीक, कोमल कोंपरमे समा गेल ज्‍योति‍पुंजकेँ आदि‍त्‍यक चरण मानि‍- सूर्यमुखी अपन सेंथुमे भस्‍मीभूत कऽ लेलीह अखण्‍ड सौभाग्‍यवतीक आशीषक संग कि‍रण ससरल कली फूल बनि‍ पसरल हम तँ उभय लि‍ंगी छी नै रहि‍तौं तैयो करि‍ति‍यनि‍ सुरूजसँ प्रेम...... सभ कि‍अए दैत छी हुनकापर दोख ने डूमैत छथि‍ ने उगैत छथि‍ सभ पि‍ण्‍ड घूमि‍- हुनकापर डूमि‍ जएबाक कलंक लगबैत अछि‍- जखन अपनामे दृढ़ता नै तँ दोसरपर दोष केहेन? बि‍नु बजौने सभ लग अबैत छथि‍ आठो याम जरैत छथि‍ कुन्‍ती सभ जनैत कि‍अए कएली वरण- ज्‍योजि‍पुंजकेँ बान्‍हब ककरासँ भेल संभव? आदि‍त्‍य सि‍नेहक तापस लगले तप्‍पत, लगले वि‍द्रूप कोना भेला छलि‍या? सि‍नेहक अर्थ सुधि‍ प्रभंजन नै स्‍पर्श एकर नै अवसान नै उत्‍कर्ष... क्षणप्रभा जकरापर खसल ओ जरल ओ मरल मुदा! सि‍नेहक क्षणप्रभा वासना मात्र नै- शाश्‍वत स्‍पंदन... जकरामे केलक प्रवेश ओकरा रोम-रोम शेष-अशेष एकर भंगि‍मा वएह कहत जकरामे संवेदना रहत....। सगर राति‍ दीप जरय राति‍ माने कारी पहर गत्र-गत्र शांत जीव अजीव आक्रांत रजनीक लीलासँ क्षणि‍क बचबाक लेल लोक जरबैछ दीप सभ्‍यताक वि‍कासक संग-संग मनुक्‍ख चेतनशील होइत गेल पहि‍ने इजोतक लेल... खर-पुआर जारनि‍ लत्ता नूआ फट्टा सूत छोड़ि‍ रूइयाक बाती ढि‍बड़ीक बदला लेम्‍प बहकैत रोशनीमे गबैत पराती बुइि‍धक वि‍कास भेल... वि‍द्युत तरंगमे गैसक उमंगमे वि‍ज्ञानक जय भऽ गेल... सभ ठाम इजोत मुदा! वैदेहीक घर अन्‍हार मात्र लि‍खते रहब ककरोसँ नै कहब के बूझत कथाक वि‍कास ककरो नै छल आभास दधीचि‍ बनि‍ साङह लेने आबि‍ गेलनि‍ मैथि‍ली कथा जगतमे प्रभास सुरुज दि‍न भरि‍ अपन करेजकेँ जड़ा कऽ नै मेटा सकल ऐ वसुन्‍धरापर सँ वि‍गलि‍त मानुषक प्रवृत्ति प्रभास दीप बारि‍ अपन करूआरि‍ सम्‍हारि‍ कथा सागरक जमल तरंगमे दि‍अ लगलनि‍ हि‍लकोर... समाज जागत- ई छल वि‍श्वास मुदा नै आदि‍ भेटलनि‍ नै भेटलनि‍ छोर... कि‍नछेरि‍पर अपसियाँत कथाकार लऽ लेलनि‍ ि‍नर्वाण जागरणक आशामे कहि‍यो तँ सुखतनि‍ वैदेहीक झहरैत नोर... चलि‍ गेला अभि‍लाषा लेने उत्तराधि‍कारी सभ खेलाइत छथि‍ अट्ठा बज्‍जर करि‍या-झुम्‍मरि‍ उद्यत छथि‍ अधि‍कार हरबाक लेल पाग पहि‍रबाक लेल सगर राति‍ दीप जरय... रमण रमानन्द- आनन्द वि‍भूति‍ गेरुआ गर लगौने छथि‍ मलंगिया महेन्‍द्र मसनद पजि‍औने छथि‍ समालोचक- उद्घोषक सूतय मात्र वाचक मंच चि‍करय... कहैत छथि‍ बुढ़ छी तखन गोष्‍ठीमे आबि‍ नाटक करबाक कोन प्रयोजन? दीप बारि‍ दुआरि‍ नै जराउ जे जगदीश जागल रहत ओकर गामक जि‍नगी के सुनत? ओ अछि‍ समाजक कात कहि‍यो होमए देब ओकर साहि‍त्‍य साधनाक प्रभात कि‍एक तँ ओ थि‍क वेमात्र जइ माटि‍क अन्‍हारकेँ सुरुज नै हटा सकल ओ केना हटत माटि‍क दीपक बल...? जौं दृष्‍टि‍कोणमे रहत छल तँ वि‍वेक केना ि‍नर्मल? ओइ कठकोंकारि‍ सबहक बीच मैथि‍ली छथि‍ दुबकल सगर राति‍ दीप जरय अन्‍हार घर संस्‍कार सड़य कथासँ केना पारस ि‍नकसय...? कर्मयोगी ने भगता योगी आ ने डलबाह हरखक तरंग नै, नै वि‍पत्ति‍क आह पहि‍लुक दर्शन कहि‍या भेल नै अछि‍ मोन जहि‍यासँ देखैत छि‍यनि‍ वएह गंभीर मुस्की .. ककरो उपहास नै ककरो परि‍हास नै, नै ठोरपर वसन्तक गान नै हि‍अमे ग्रीष्मक मसान नेना सभक प्रि‍य अध्यापक कर्मयोगी- अपकल कोना भेलनि‍ पि‍तामह चूकि‍? रीति‍क कालपुरुखक नाओं- कामदेव!!! कोनो नै काम भलमानुष नि‍ष्काम तेसर पहरक वि‍झनीक बाद जगतधात्रीक नि‍त्यक दर्शन तामझामक गाममे रहि‍तो त्रि‍पुंडसँ मुक्त छुच्छेक हाथे तर्पण आब की मंगैत छथि‍ बाबा? झबरल आंगनमे शक्ति सहचरी जाइ रवि‍-शशि‍क कि‍रणकेँ आत्मसात करबाक लेल लोक करैछ अनर्गल प्रलाप व्यर्थ कुटि‍चालि‍ रचैछ चोरि‍ कऽ आडंवर करैछ तनयक रूपमे ओ दुनू बाबाक आंगनक श्रवण कुमार “अचला” चंचला बनि‍ देलनि‍ कन्याक उपहार दु:खक सोतीमे जखन अकुलाइत छैक मनुक्ख तखन आस्तिक‍कता जगैछ भूख मुदा! ति‍रपि‍त बाबा नै करैत छथि‍ भगवानसँ छल, सुधामे जल मन नि‍रमल.... समाजमे छन्हि शीतलताक आह सदेह कवि‍ नै तखन वैदेहीक चाह? अपने नेपथ्य मे रहि‍ नाटकक कएलनि‍ ि‍नर्देशन देसि‍ल वयनाक प्रति‍ कर्मक गति‍ अर्पण एकाध प्रहसन लि‍खि‍ अकथ्य कवि‍ता गढ़ि‍ कतेक आजाद भऽ गेल चि‍न्हार मुदा! इजोतक स्रोत तक पि‍रही अन्हार कोनो नै छन्हि ‍ छोह सबहक उत्कर्ष हुअए यएह आश, यएह मोह की ब्राह्मण की अछोप की धानुक की गोप सबहक बाबा...... जइ गाछक छिऐ छाहरि‍ वएह उतुंग वएह श्रंृग सि‍क्कठि‍ हुअए वा नरकटि स्वीकार करैए पड़तनि‍ समाजकेँ बाबा सन चेतनशील मनुक्ख केँ जे संस्कार लुटाबए सबहक कल्याणक लेल अन्तर्मनसँ सोहर गाबए...। ‍ एकटा छली आरती एकटा छली आरती भदेसक भारती आगाँ ‘राय’ की लागल ओ सभ बूझि‍ गेलथि‍ कि‍छु आर वि‍द्रूप वा होशि‍यार छलनि‍ खड़ाम देबाक आश भदेसक कांता महा भदेसमे छथि‍- हुनका पड़ाइन लागि‍ गेल छन्‍हि‍ आन कि‍एक जाएत केना पड़ाएत कि‍न्नौं नै होमए देलक मुक्‍तक काव्‍यक आश पूर केओ नै गेल भागलपुर आरती रूसि‍ गेली क्षणि‍क नै अन्‍तर-आत्‍मासँ हुसि‍ गेली मुँहजोड़ भाषामे जे राखत आत्‍मासँ वि‍देह-तनुजासँ सि‍नेह आत्‍मासँ गेह सबहक हएत वएह दशा भाेगए पड़तनि‍ उत्तराधि‍कारीकेँ क्‍लेश सभ दि‍नक लेल बि‍ला देतनि‍ जहानसँ भगा देतनि‍ मात्र हमहीं टा नाचब हमहीं देखब के सूतल के जागल के नै बूझय जे करत प्रयास ओ भऽ जाएत अभागल ऐ माटि‍सँ उपटल वैदेहीकेँ आन भूमि‍क लोक माटि‍मे मि‍ला देलनि‍ मुदा अपन आरतीकेँ अपने साङह खसा देलकनि‍.....। (लेखिका आरती कुमारी लेल) मि‍थि‍ला-पुत्र मि‍थि‍लाक बेटीकेँ सहए पड़लनि‍ झमेलि‍या बि‍आहक दंश सतभैंया पोखरि‍सँ पंचवटी धरि‍ ि‍कसुन तकलौं कतहु नै भेटल सभ राकश सभ कंश नअ मास नहि‍ पैंसठि‍ बरख धरि‍ मयना उठबैत रहलीह प्रसव वेदनाक टीस तखन जा कऽ भेल जीवन संघर्षक जीत दि‍वसेमे तरेगन बहकल वि‍देहक आङन जनमल जगदीश मौलाइल गाछक फूल गमकल तापसमे भैंटक लावा चमकल पूर्वाग्रहक चपेटि‍मे जाति‍-पजाति‍क गेठमे ओझरा कऽ मैथि‍ली भऽ गेल छलि‍ ि‍नर्मूल बेदम्म गजेनक आश जागल सुखैत गुल्‍लरि‍मे फूल लागल रमकल जि‍नगीक जीत वैयक्ति‍क नै- पसि‍झैत गामक जि‍नगी मात्र मेंहथ आ बेरमा नै मौरंगसँ सि‍मरि‍या धरि‍ चमकि‍ उठल इंद्रधनुषी अकास केकरो नै छल वि‍श्वास द्वि‍जक मुरदैयाक संग-संग अछोपक सोती बहत...? स्‍वाभावि‍क छल उपहास हएब मुदा! ति‍रस्‍कारक क्षोभ नै जीवन-मरण तँ प्रकृति‍स्‍थ लीला तखन केकरोसँ केहेन द्वेष? अवतारवादक सेहो होइछ पराभव केओ पनही देत की नै कोनो तृष्‍णा नै नै उत्‍थानक आश पतनसँ घृणा नै अकाल भेल तँ बि‍साँढ़ चि‍बा कऽ राि‍त-दि‍न समरसता दीप जड़बैत रहल अपन गीतांजलि‍ गाबि‍ कम्‍प्रोमाइज करैत रहल कोनो कलुष कम्‍प्रोमाइज नै गत्र-गत्रमे समन्‍वयवाद कलमे टा सँ नै जीवन दर्शनमे सेहो चलि‍ गेला भोगेन्‍द्र नै तँ उत्तर भेटि‍ जइतए यात्री, आरसी आ फजलुरसँ सेहो कोनो तुलना नै आन इचना-पोठीक कोन गप्‍प लोक चानी नै टलहा कहए विज्ञ नै बुड़ि‍बक बूझए संस्‍कार नै छोड़ब खाँटी कि‍सान मजदूरक रूप ब्रह्म बेलामे कलम खि‍याबथि‍ सरल धवल बेरमाक भूप एहन साम्‍यवादी- फाँसीपर चढ़ि‍ जाएब मुदा बटोहीकेँ अधलाह बाट नै देखाएब केकरो नै सुनलक संतति‍क कोन कथा अर्द्धांगि‍नी सेहो सहैत रहलीह ऐ लेलि‍नक सेहो देल ब्‍यथा ने केकरो तर करब ने केकरोसँ ऊपर जाएब सबहक शोणि‍त एक्कहि‍ रंग कएलक वि‍रोध व्‍यवस्‍था बेढंग मरल गरीबक बाप मुदा की पुरहि‍त-पात्रकेँ भरि‍गर चाही धूर-धूर बास बि‍का गेल काहि‍ काटि‍ लुटबैत बाहवाही लेस मात्र नै दया अग्रजकेँ सि‍हरि‍-सि‍हरि‍ अश्रु-उच्‍छवास कहि‍यो नै अगि‍ला पएर पुजाबथि‍ कतए राम धर भूत पि‍शाच? सभा बजौलनि‍ धानुक टोलक अपनहि‍ जाति‍मे पंडि‍त देखू भाँज पुराएब जटि‍ल कर्मकाण्‍डक माइक समान नै धरती बेचू मात्र बाटपर आनय खाति‍र करै छथि‍ प्रति‍क्षण सामन्‍त वि‍रोध सम्‍यक समाज मि‍थि‍लेमे बनतै जगा रहलाह समभाव बोध अक्षेपसँ नै गंग छुआबथि‍ तखन केना कऽ हाड़ छुआइत मन: दीपसँ ि‍हयमे तकबै मि‍थि‍ला पुत्रक स्‍पन्‍दन हएत...। (श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल जीकेँ समर्पित..) सुखार काल रहसल त्रास बहकल मधुमासे संत्रास महकल अषाढ़ कुपि‍त इन्‍द्र रूसल जल बुन्न बि‍नु बि‍आ वि‍हुसल आड़ि‍ चहकल खेत दड़कल प्रशान्‍तक प्रकोपे मनसून सरकल शोषि‍त कलकल जुआनी गरकल रोहि‍णी-आरदरा सुखले रमकल “ग्‍लोबल-वार्मिग” फनकल क्षुब्‍ध प्रकृति‍ सनकल वि‍ज्ञानक चमत्‍कारमे उच्‍छ्वास छनकल गाछ काटि‍ फोर लेन बनेलौं पहि‍ने कि‍अए नै नवगछुली लगेलौं अपने गति‍क स्‍टेयरि‍ंग पकड़लौं मजूर कि‍सानकेँ घर बैसेलौं कृषि‍ प्रधान देशमे नोरक स्‍नात आँखि‍क शोणि‍तसँ केना भीजत पात? ऐ बेर सुखाड़ साउनो बीतल दीनक आत्‍मा तीतल भदैया बूड़ल रब्‍बीक कोन आश सुक्‍खल मुरदैया मरूझल कास अगि‍ला साल आओत बाढ़ि‍ देलौं खेति‍हरकेँ ताड़ि‍? वाह रौ वि‍ज्ञान वाह रौ धनमान बि‍नु हथि‍यारें लेलें गरीब-गुरवाक जान जकर भऽ सकए संलयन आ वि‍घटन आयुर्वेदमे तइ रसायनक चर्चा वि‍ज्ञानक बाढ़ि‍मे सगरो पाॅलीथीन कागत छोड़ि‍ बाँटि‍ रहलौं प्‍लास्‍टि‍कक पर्चा आजुक रसायनसँ माटि‍क कोखि‍ उजड़ल ठुट्ठ डाँट कि‍छु नै मजड़ल प्‍लास्‍टि‍क छोड़ि‍ लि‍अ जूटक बोरा पाॅलीथीन नै ठोंगा-झोरा छोड़ रौ धनचक्कर एडभान्‍स बनबाक चक्कर पकड़ेँ अपन बाप पुरुखाक देल हथि‍यार धरे मौलि‍क संस्‍कार केमि‍कलसँ नहा तँ लेबें मुदा! की चि‍बेबें....? गजल १ कालरात्रि‍मे महमह दि‍नमान कोना आएत मोनमे पाप झबरल भगवान कोना आएत नहि‍ जड़ै प्राण वायु मरल सरल देह संग अधम नीचाँ खसत धर्म गगनमे बि‍लाएत माँझ आंगन काँटक बोन नहि‍ रोपू प्रि‍यतम काग कोइली सन कोमल संतान कोना पाएत वि‍रह मासमे ने सोहर सोहनगर लगै छै कंठमे पि‍त्त चभटल मधुगीत कोना गाएत अपने करू रास लीला नेना दूध बि‍नु कानए कर्मभीरू पुरुखकेँ जयकार कहेन हाएत गजल २ कहू की बात हम मानि‍नि‍ कलुष भऽ गेल अछि‍ अर्पण कोना सहबै अखल कंटक दबै छै टीसतर तर्पण सोहाबै नै खुशी सरगम समाजक हास परि‍लक्षि‍त धुनै छी देल कालक गति‍ गदराबै नै वि‍कल जीवन पति‍त नि‍यति‍ आकुल भेलै जड़ल अर्णव तरंगे छै सूतल ईश सभ पंथक एलै समभावमे वि‍चलन बाहरसँ जे जत्ते गुमसुम हि‍आसँ ओ ओते बि‍खधर चानन बहलै उषाकाले वाह रौ जहानक संकर्षण भेटल जेकरा जतऽ अवसरि‍ हाथ धोलक हलालीसँ नीति‍क मंचपर चढ़ि‍ते करै माटि‍ नेह प्रति‍ गर्जन हाइकू सूतल जग/ दिनकर लालिमा/ जगा देलक रविक लाली/ /ऐ सूतल जहाँकेँ/ जगा देलक बर्खाक बाद/ खहखह पाइन/ वसुधा तृप्त सन्दीप कुमार साफी (प्रसिद्ध किरण), जन्म ७ जून १९८४ पिता श्री सीताराम साफी, माता- श्रीमती सीता देवी, गाम- मेंहथ, भाया- झंझारपुर, जिला- मधुबनी। शिक्षा- बी.ए. (प्रतिष्ठा), मैथिली। सन्दीप कुमार साफी- बैशाखमे दलानपर- समर्पण- अपन पिता श्री सीताराम साफी आ माता श्रीमती सीता देवी केँ समर्पित।- भाइजी आनन्द कुमार झा, नाटककार लेल। बैशाखमे दलानपर- गद्य-पद्य मिश्रित (आत्मकथा खण्ड, कविता खण्ड, विहनि कथा खण्ड, लघुकथा खण्ड, विचार बिन्दु खण्ड) आत्मकथा खण्ड (मैथिलीमे दलित आत्मकथाक सर्वथा अभाव रहल अछि। सन्दीप कुमार साफीक आत्मकथा मिथिलाक साहित्य, समाज आ संस्कृतिकेँ हिलोरैत ओइ अभावक पूर्ति करैत अछि।- गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक, विदेह) आत्मकथा जीवन एगो संघर्ष होइत अछि, संघर्षमय होइत अछि। ऐ संघर्षमे कियो-कियो आगू निकलि जाइत अछि तँ कियो अप्पन जीवनमे बहुत पाछू छूटि जाइत अछि। ओही संघर्षमय दुनियाँमे एगो हम छी, जिनकर नाम अछि संदीप कुमार साफी माने किरण। स्कूलमे सन्दीप नामसँ चिन्हल जाइबला अओर गाममे सभ किरण नामसँ पहचानैए। ग्राम+पोस्ट मेंहथ, भाया- झंहझारपुर, जिला- मधुबनीक रहनिहार हमर जन्म निर्धन गरीब परिवारमे भेल। हम जातिक धोबी छी, हरिजन (दलित) छी। गाममे सभक कपड़ा धो कऽ माँ-बाबू हमरा सभक पालन-पोषण केने अछि। हम चारि भाइ-बहीन छी, जइमे हम सभसँ बड़का छी, तइसँ छोट हमर भाइ-बहीन सभ अछि। हमर जन्म ०७.०६.१९८४ ई. मे भेल। ओइ जमानामे सस्ता सभ किछु, तैयो हमरा सबहक भरन-पोषण झूर-झूरइतो चलए। अ-आ सँ कबीर कान तक हम सभ दुखीरामसँ पढ़लौं। किछु दिन बाद बाबूजी सरकारी स्कूलमे नाम लिखा देलक। सरकारी स्कूलमे पढ़ाइ चलै तँ ठीके-ठाक मुदा हम सभ ओतेक किछु बुझि नै पबिऐ। ओहेन गारजनो होसगर नै जे देखबितए जे की लिखलएँ, की सिखलएँ। मुदा धीरे-धीरे आगू बढ़लौं। छोटमे माए एकटा बकरी किनलक जे ओकरोसँ किछु रुपैया आमदनी हएत तँ कहुना गुजर-बसर हएत। थोड़ेक दिन बकरी सेहो चरेलौं अओर बकरी बेचि हमर माँ ओहीसँ एकटा बाछी लेलक जे ओइसँ दूधक आमदनी हएत आ ओइ पाइसँ अपन परिवार सुखीसँ गुजर करब। ई सभ काज करैत बाबूजी संगे लोकक ऐठाम कपड़ा पहुँचेनाइक सेहो काज करैत छलौं। पिछला पाँच दस सालमे जमाना बहुत आगू बढ़ि गेल। पहिले एते बोइन नै भेटैत छलै जेतेक अखुनका समएमे भेटैत अछि। पहिने एक मोटा कपड़ा धोइ छल हमर माँ-बाबू तँ गिरहस्त सभ पाँच सेर धान नै तँ दू किलो आँटा दैत छलै। कियो कपड़ा धुआइ तरे पाइयक आमदनी नै रहलासँ मजूरीमे दू-तीन किलो अल्लूए दऽ देलक। पहिने पाइ महग छलै आ अन्न-पाइन सस्ता छलै। गाममे सबहक माय-बाबू इस्कूल भेजै मुदा हम जाइ लोकक कपड़ा पहुँचाबऽ, तइयो सौँझका टेममे अंगनामे बोरा बिछा कऽ पढ़ैले बैसए हमर पिसियौत भाय राजू भैया, तखन हमहूँ पढ़ैले आबी तँ दू-कानसँ बीस कान तक सिखलौं। ओकरा बाद अप्पन गामक इस्कूलमे नाम लिखा देलक, हेडमास्टर छल पहिने कोइलखक यादवजी, हुनका कहि बाबू, जे एकरा कनी देखबै। किछु दिन अहिना समए कटल, चौथा-पचमामे बढ़ला बाद किताब पढ़ला किछु आबि गेल तँ गारजीयन कहलक जे चलि जा बौआ पीसा संगे, ओतै नेपालमे रहिहऽ। गामपर खर्चाक दिक्कत तँ हेबे करइए, से नै तँ ओतै काज-राज करिहऽ अओर ओतै रहिहऽ। पढ़ाइ-लिखाइ आब छोड़ऽ। पढ़ि-लिखि कऽ की हेतै। १९९४ ई. क समएमे हम चलि गेलौं नेपाल। ओतै दीदी संगे रही, सभ दिन कपड़ा धोइ अओर संगे पहुँचाबैले जाइ। अओर आबी तँ लकड़ी चुल्हापर भानस करी। भोरे तीन बजे उठी कपड़ा धोइले। ओइ समए हमर उमेर बुझू जे ११-१२ कऽ छलए। किछु दिन ओहू ठाम गुजारलौं। तकरा बाद हम फेर गाम एलौं। हमर बाबू कहलनि जे आब नै जा, किछु दिन पढ़ऽ। कमसँ कम मैट्रिको तक पढ़ि लेबऽ तँ कतौ ने कतौ सरकारी नोकरी भइये जेतऽ। हमरा जेतबे जुड़त ओतबेमे हम गुजर करब मुदा तूँ पढ़ऽ। तकरा बाद हम कोठिया इस्कूलमे नाम लिखेलौं। ओइ ठाम छठासँ किलास चलै छलै। फेर थोड़ेक दिन गामेमे रहि कऽ माल-जाल चरा कऽ हाइस्कूल तक गेलौं। मुदा समए एहेन आएल जे फेर हम पढ़ाइ छोड़ि पंजाब चलि गेलौं। ओइ समएमे हम छलौं नौमामे। गेलौं ओइ बास्ते जे हमरासँ छोट बहीन छल, घरक गारजन कहलक जे बौआ गाममे रहलासँ आब किछु नै हेतौ, से नै तँ चलि जा लोक सभ संगे बड़का कक्का लग चण्डीगढ़। कतौ नोकरी धरा देतऽ, कइहक हमर नाम जे बाबू कहलक यऽ। हमर कक्का बित्तन साफी जे बी.ए.क डिग्री प्राप्त केने छलए, वएह सोचि हमर बाबू हुनका लगमे पठौलनि जे ओकरा कनीक बुइध छै, कतौ नीक-नीक नोकरी पकड़ा देतै। मुदा हमरा लगमे कोनो सर्टिफिकेट नै रहए, से हमरा कतौ छोटो-मोटो काजपर नै राखए। कोनो औफिसोमे नै राखए जे ई तँ पढ़ल लिखल नै अछि, सभ दफतरमे से कहए। आखिरीमे काका एगो प्रेस आइरनक दोकान कऽ कहलक, एतै आइरन कर। नया आइरनक दोकान, कोइ ग्राहक आबै, कियो नै आबै। एक-दू महिनाक बाद काका हमरापर शक करए लागल जे ई पाइ कमाइ अइ मुदा हमरा नै दइए। हमरा मनमे बहुत दुख हुअए जे हम कतऽ आबि गेलौँ, खेनाइ खाइ लऽ जाइ तँ कहए जे दोकानक भाड़ा आब तोरे भरऽ पड़तऽ चाहे दोकान चलऽ या नै चलऽ। ई सभ सुनि मन व्याकुल भेल जे आब ऐठाम हमरा रहलासँ कोनो फाएदा नै हएत। आब एतऽसँ जाइए पड़त। ओही ठाम गामक कतेक लोक रहै छल, तेकरा कहि-सुनि हम कोठीमे काज करए लगलौं। एक महिना भेल तँ गाम जाइ कऽ भाड़ा भऽ गेल। एलौं काका लगमे जे हम गाम जा रहल छी। तँ काका कहलक, रुकि जा, हम टिकट बना दै छिअ। एक दू दिन रुकि जा। गामक लोक जाइत छै, तेकरा संगे हम गाम पठा देबऽ। तइ बिच हमरा संग एगो घटना भऽ गेल जे हमरा पएरमे आगि लागि गेल। हमरा पूरा पएरमे, पएरसँ एड़ीसँ जांघ तक झड़कि गेल। आब हम बड़का समस्यामे फँसि गेलौं। उ घाव हमरा तीन महिना तक घिघरी कटेलक। असगरे साइकिलसँ एक पएरे पाइडिल मारि कऽ ऊँच-नीच रस्तापर सँ जाइ छलौं दवाइ कराबैले चण्डीगढ़ शहरसँ दूर छै गाम धनास, ओइठाम। कम पाइमे डाक्टर दवाइ दै छलै। सप्तामे तीन बेर जाइ छलौं दवाइ कराबैले। जेहो रुपैया कोठीसँ कमा कऽ अनने छलौं सभ पाइ कक्काकेँ दऽ देलौं। एकर समाचार जखन हमर माँ आ बाबूकेँ पहुँचल तँ बहुत कानल जे कोहुना बौआ केकरोसँ पाइ लऽ कऽ तूँ गाम आबि जो। ओही ठाम छै बुधन अओर कोरैला, तेकरासँ पाइ लऽ कऽ गाम चलि आ। हम गामेपर ओकरा पाइ दऽ देबै। ओही समएमे हमर बोर्ड परीक्षाक फॉर्म भराइ छलए, यएह कातिक अगहन महिनामे हमरा केकरो द्वारा चिट्ठी समाद आएल जे जल्दी गाम आबऽ जे किछु दिन पइढ़ो लेबऽ अओर घाव से छुटि जेतऽ। हमर फॉर्म हमर संगी मनोज पासवान सभ भरि देलक। किछु बुझल ने सुझल, ने गणितक ज्ञान ने संस्कृतक ज्ञान। तैयो परीक्षा मधुबनीमे वाटसन स्कूलमे भेल सन २००० ई. मे, जखन दू महिना बाद रिजल्ट निकलल तखन मनमे जएह धुकधुकी छल सएह भेल। हम परीक्षा पास नै कऽ पेलौं। आब तँ अओर मोन दुखी भऽ गेल जे आब की कएल जाए। तकरा बाद कोइ ने कोइ कहलक जे संस्कृत बोर्ड सँ परीक्षा दहक। एक बेर बाबू तँ हमर मानलक मुदा माँ कहलक जे आब सभ पढ़ाइ-लिखाइ छोड़ऽ, चलि जा ममियौत भाए संगे बंगलोर। हम फेर बंगलोर चलि एलौं। ऐठाम काज भेटल खानाक केटरिंगमे, कुक सबहक कपड़ा धोइ कऽ काज भेटल। किछु दिन बाद गामपर सँ हमर विवाहक बातचीतक समाचार आएल जे तूँ गाम आबऽ। फरबरी-मार्चमे हम गाम गेलौं। बाबूजीकेँ कहलियनि जे विवाहमे जे दहेज देतऽ ओइ दहेजसँ अओर एक सालमे किछु रुपैया अओर लगा कऽ बहिनक कन्यादान सेहो कऽ लेब। किछु भाड़ा-बर्तन अओर ओइमे लगा देबै। ई सभ मजबूरी देख हमर विवाह २००२ मे भेल, पण्डौल गाममे, जइ गामक पड़ोसमे कनी हटि कऽ अछि भवानीपुर गाम, जइ ठाम महादेव उगना रूप धारण कऽ विद्यापतिकेँ दर्शन देने छलनि जे अखन मिथिलामे सुप्रसिद्ध अछि, कवि विद्यापति अओर उगना महादेव। हमर विवाहक पश्चात एक बेर फेर हम संस्कृत बोर्डसँ परीक्षा देलौं, अओर ओइमे हम द्वितीय श्रेणीसँ उत्तीर्ण भेलौं। हम ई परीक्षा केथाही-रामपट्टी स्कूलसँ देने छलौं २००५ मे। तेकरा बाद पुनः हम अपने गाम लगमे कॉलेज छल शिवनन्दन-नन्दकिशोर महाविद्यालय, भैरवस्थान ओइमे एडमिशन करा कऽ आइ.ए. मे, हम फेर आबि गेलौं बेंगलोर। तकरा बाद ओइ केटरिंगमे आदमी बढ़ि गेलासँ हमरा ओइठाम काज नै भेटल तँ हम फेर एतौ एकटा कोठीमे काज पकड़लौं अओर गाम आबि कऽ इण्टरमीडिएट परीक्षामे फेर शामिल भऽ गेलौं आ अहूमे सेकेण्ड डिवीजनसँ पास भेलौं, कोठीएमे समए बचए तँ पढ़बो करी, किताब गामसँ लऽ कऽ जाइ छलौं। संग-संग बहिनक कन्यादान सेहो भऽ गेल भगवतीक दयासँ। ओही विवाहमे किछु खर्चा आ कर्जा भऽ गेल बेसी। कोठीमे दू हजार रुपैया दिअए महिना, ओइमे घरक खर्चा अओर ओम्हर अपन पढ़ाइक परीक्षा फीस, पलसमे परिवारक सेहो खर्चा। फेर बी.ए. मे नाम लिखेलौं अओर फेर चलि गेलौं बंगलौर। हमर विषय छल आर्ट जे कोनो ट्यूशन बिना पढ़ि सकै छलौं। हमरा इण्टरमीडिएटमे हिन्दी विषयमे ज्यादा अंक आएल छल मुदा अपने नै रही गाममे तँ हमर संगी छल राकेश कुमार ठाकुर, लगैमे हजाम, वएह छल हमर फॉर्म भरनिहार, परीक्षा शुल्क जमा केनिहार, हुनका मैथिलीमे ज्यादा अंक एलै, ओइ वास्ते हमरो उ यएह ऑनर्स विषय रखबा देलक। गाम एलौं तँ मन किछु पछताइतो छल जे आबक जमानामे आर्टक पढ़ाइ कियो पढ़ै छै, मुदा मैथिलीक जखन नाम सुनलिऐ तखन मन गदगद भऽ गेल। हँ, मुदा किताब भेटल बहुत मेहनति कऽ कए। हर साल पाँच सएमे किताब खरीदऽ पड़ए, ओहूमे जेरोक्स पन्ना। तेकरा पढ़ि कऽ हम बी.ए. फर्स्ट क्लाससँ २०११ ई. मे पास केलौं ललित नारायण मिथिला यूनिवर्सिटा, कामेश्वर नगर दरभंगासँ। ताऽत हमरा बालो बच्चा भेल। पढ़ाइ संग-संग एकरो सबहक देख-रेख केनाइ माय-बापक दायित्व होइ छै। तखन हम फेर गामसँ बेंगलोर आबि गेलौं। कतेक बेर पैराशुट रेजीमेंटमे बेंगलोरमे भर्तीमे बहालीमे गेलौं मुदा असफल रहलौं। ऐबेर गाममे एस.टी.ई.टी.बला परीक्षामे सेहो शामिल भेलौं मुदा उहो असफल रहल। आबि गेलौं बेंगलोर जे आब ओतेक कोनो नीक एजुकेशनो नै अछि जे कतौ नोकरी हएत, तैयो कोनो काजमे लागल छी। भगवतीक दया, आगू हुनका हाथमे छनि। हमरा दूटा बेटा अछि अओर एकटा बेटी, बड़का अछि राजकुमार साफी, छोट बेटा सागर कुमार साफी। तइसँ छोट अछि राज नन्दनी कुमारी। अखन ई सभ आंगनवाड़ी स्कूलमे पढ़ि रहल अछि। ओतेक पाइ अछि नै जे प्राइवेट स्कूलमे धीया-पुताकेँ पढ़ाएब, दिनोदिन महगाइ बढ़ले जाइत अछि। हम सभ बी.पी.एल. कोटिमे शामिल छी। धीरे-धीरे एतबो शिक्षा भेलाक बादो कोनो नोकरी नै भेटैए। लोक कहै छलए जे एतेक पढ़निहार बड़का अफसर होइत अछि मुदा हम सभ किछु नै कऽ पाबि रहल छी। हमरा संगीतसँ बेसी मिलान रहैत अछि। गीत गेनाइ हमरा बहुत नीक लगैत अछि। मैथिली होइ बा नेपाली बा हिन्दी, हम ओहू गीतकेँ गाबि सकै छी। कीर्तन-भजन केलौं अपने गामघरपर संगी-साथी संग। जीवन एगो घड़ीक सुइया होइत अछि, दिन भरि, राति भरि चलिते रहैए, कखनी बन्द भऽ जाएत किनको नै थाह अछि। हम अप्पन ऐ मैथिलीक माटि-पानिसँ जुड़ल हर एक बातक सम्मान करब। अप्पन भाषाकेँ ऊँच शिखरपर पहुँचेबाक प्रयास करब। हम मैथिल छी, मिथिलेमे रहब अओर पोरो साग तोड़ि कऽ गुजर करब। सादा छी सादा रहब। जय मिथिला, जय मिथिला धाम, प्रणाम। कविता खण्ड भकजोगनी भुकुर-भुकुर बत्ती बड़ै राइतक अन्हरियामे हाथ-हाथ नै सुझैए जेबाक अछि टोलपर कुक्कुर भुकैए झाउ-झाउ-झाउ साँझक बजैए छअ हाथमे नै अछि लाठी-ठेंगा नरहिया करैए सोर मैझला बाबा गबैए निर्गुण तमाकुलपर मारै चोट बौआ कनैए भगजोगनी लए बड़ैए चाहूँ ओर पकड़ रोउ, भुल्ला, होकवा ठहा-ठहै अन्हरियामे लुत्ती नेने माथपर नारक आँटी थरथराइ छी हम पछुआरमे रौदी भऽ गेल ओह, की पुछै छी समधि जे छल सब चौपट भऽ गेल सब गिरहस्तक खेत मुँह बाइब गेल खेतमे देखलौं दरारि फाटि गेल पानि बिन धान ओहिना सुखि गेल डोका सब कतरा घुसि गेल डकहर सब ओहिना उड़ि गेल आब ओ कहाँ धारक ओ रेती धीया-पुता ऐबेर की खेती ऐबेर तऽ नै अछि जनेरक आशा की जानि हएत की दशा अखाढ़ महिना किछु खेत सुखि जाइ कलयुगकेँ देखहीं रौ भाइ कहैछ हमरा सबहक माय जे चारि साल अहिना रौदी भऽ गेल डकही सन पोखरि सुखि गेल बड़का-बड़का पीपर सुखि गेल बेलक गाछमे बेलो नै भेल मालजाल सब पानि बिनु तरसए मेघसँ एको बेर पानि नै बरसए जटा-जटिन के गीत सब गाबए तैयो नै इन्द्र भगवान सब जागए डबरा-डबरीसँ बेङ सब भागए बौगुला सब टुकुर-टुकुर ताकए रबी-राइ मरहन्ना भेल सौंसे खेतमे केसौरक पंना भेल आबक दुलारू बेटा आबक दुलारू बेटा दूध भात नै खाए जतऽ देखए चुन-तमाकुल ओतऽ दौड़ल जाए कनी दय- दय- दय भोर-साँझ नै पढ़ए छौड़ा धऽ कऽ छिड़िआए कनियो किछु कहबै तऽ भुँइए ओंघराए माइयक बिगारू बेटा छाल्ही भात खाए इसकूल जाइ नामसँ ओकरा माथा दुखाए पहिरै लऽ चाही ओकरा जीन्स पेन्ट टीसट, दिन भरि अंगनामे एकोबेर ने टिकत उड़ल रहैए जी ओकरा टाएल-गुल्लीपर कखनो देखियौ ओइ खेत तऽ कखनो बान्हपर पढ़ैले चाही ओकरा कोपी कगजिया दुए दिनमे देत कोपी पिलसिन खिया आबक धीया-पुता बड्ड खच्चर बापक नाम पुछबै तऽ कहत मच्छड़ संस्कारक हीन भेल पाइयक चीन्ह भेल आवारा लुच्चा भीन भेल सपनामे देखलौं भाइ रौ सपनो कतौ सच भेलैए महीसक पीठपर कहूँ मंच होइए देखलियौ भरि राति नाच गोपीचन के अपने छी गुअरटोलीपर महीस चरैए धारऽ कातमे ओ कैतकी पूर्णिमाक राति छै माएनटलबला लाइट छै छअ कऽ हॉरन पीपर गाछपर बाजि रहल छै ओ जिलेबी कचरी मुरही गमछा के ओजरी बनओने छी रहि-रहि कऽ ढोल मिरदङपर मुरही के फक्का लगबै छी भोरे उठलौं महीस घरमे तऽ गोबरक चोथपर पड़ल छी कौआ कुचरैए पाहुन अबैए आइ कौआ कुचरैए हमर प्रीतम अबैए जखन हमर प्रीतम ऐता तखन तोरा हम बिस्कुट खुआएब बहुत आस लगौने छी कचक तीमन पकेने छी मन छल मारा माँछ आनितौं दुल्हाक मन हर्षित करितौं आइ अंगना नीपै छी दुआरि बहारै छी सँउसे टोल बिस्कुट चकलेटक हकार दै छी आबिहए गै लुखिया तोरो देबौ बिस्कुट आउर दालमोट पिआ लय आइ तरुआ तरब खमहरुआ अल्लू तिलकोर तरब भौजी ननदिकेँ फाउन करब हमरा लय नीक नीक साड़ी अनथिन आउर पर्स सेण्डील अनथिन पाँच दिन पहिने ई बात कहने रहथिन जूड़शीतल मिथिलाक पाबनि जूड़शीतल भोरे धीयापुताक माँथ तीतल ओम्हरसँ आबए बड़का भैया लोटामे भरने ठंढा पानि माथपर दैत जाइए काइन ओइ दिन बनबैए बड़ी पूरी आउर सतुआ पाकल बड़ी भीरीमे जाइए कठुआ भोरे सब स्नान ध्यान कऽ गोसाँइ लग गुड़ आउर चढ़ाबैए फेर बाइस पाबनि दिनसँ स्वर्गीय बाबा दादीकेँ पानिक कलसा चढ़ाबैए होली जेना सब जूड़शीतलमे मीट-माँउस सब खाइए ऐ पाबनिमे मुनिगा दाइलक आउर आमक टिकुलाक बहुत महत्व अछि अपन मिथिलामे ऐ चीजक साबिकेसँ बहुत स्नेह अछि आसकतिये गंगा दूर भोरे उठैए दातमैन करैए भांग पीबि भकुवाए रहैए अपने एको बेर खेतक आइरोपर ने जाए दिन भरि जनसँ टहल कराबए हइद घड़ी आक धुतहर पीस खाए खाली अइ दलानसँ ओइ दलान जाए सदखनि छकरी तास खेलाए ओही सबसँ, दिनभरि नहाइसँ नै फुरसति बेमाए फाटल अछि लेहू बहै अछि एगो गोली खाएब से एकोरती फुरसति नै बारीमे मुनिगा सोहरल अछि दूटा तोड़ि खाएब से टेम नै धीयापुता डेराइत रहैए काजे डरे पड़ाइत रहैए आसकतिक भरल बुढ़बा ई कतौ जाइतो नै अछि कहबै की कुछ कहबै तँ फनैक उठैए मारि करै लाए सनैक उठैए एक ठाम गेलौं बरियाती भाइ रौ एकठाम गेलौं बरियाती खा कऽ फूलि उठल हमर छाती पहिने देलकौ पेप्सी कोला पीब कऽ उठलौ पेटमे जौला चटे देलकौ बिगजी नास्ता ओइमे छेलौ बिस्कुट खस्ता तुरते एलौ तैरपातक चाह पीब कऽ मन कहलकौ बाह झट दऽ अनलक पान सुपारी जर्दा खा कऽ उड़ेलौं सब कियो गर्दा पाँच मिनट बाद बैसेलकौ भोजन पट्टी देख कऽ कुरियाए लगलौ कनपट्टी आब हम कोन पेटमे खाएब तैयो बैसलौं भोजनपर आकि अनलक अल्लू तरुआ आउर खमहाउर संगे आएल तरका पूरी पलेटमे बरहलाग कुरी आकि अनलक माँछक मूड़ा काँटक लगा देलिऐ बड़का कूरा नजरि पड़ल रसगुल्ला दिस खीच देलिऐ एक-डेढ़ सए पीस पिट्ठैपर आएल दही-नून सुरीक कऽ भेल पेट गुरुम धाँइ-धाँइ हाथ-मुँह सब धोलौं जेबीमे जनेउ सुपारी लेलौं सहटि कऽ गाड़ी सीटपर बैसलौं दिन भरि अन्न-पानि नै पीलौं हजमोलाके गोटी खेलौं बानरक माया पुँछपर जहिना बानरक माया रहैए पुँछपर तहिना माइयक माया रहैए बेटी आउर पुतपर जन्मसँ रहैए संगे-संग बियाह-दान बाद रहैए सब तंगे-तंग सबटा पीलक एके माइयऽ दूध नमहर भेला बाद बिसरि गेल दुख बेटी भेली अप्पन सासुर गेली बेटा अपनामे मारा-मारी केलक माइयक दूधमे घोरलक माँटि अपनामे लेलक घर-घरारी बाँटि अपन मइते जीअ लागल तारी दारू पीअ लागल केकरो कियो नै कहैबाल अनकरे गपे जीयैबाला माइ-बाप सब देख रहल अछि आँखिसँ ढप-ढप नोर बहै अछि बुढ़बा बुढ़ियाक सामर्थ घटि गेल बाजत की चुप्पे रहि गेल पंचनामा हँ तँ भैया आब तऽ अपना सब बुढ़ भेलौं झगरा झंझट खूब केलौं आब ने होइए मारि करी अपनामे नै सब कियो लड़ी धीयापुता सब नमहर भेल पहिनुका जुग आब नै रहि गेल सब कियो अपना-अपनापर भेल कमाइ-खटाइ सब बाहर गेल चल एक-दूटा पंचनामा बनाले पाँच गोटाकेँ आइ बैसाले घराड़ी सँ लऽ कऽ खेत तक बारीसँ लऽ कऽ डोरा तक सबहक कागज अलग बनाले जमीन सबहक रसीद कटाले अमीन आनि कऽ नपा जोखाले खेत आइरपर कतरा लगाले जे धीयापुतामे काल्हि झंझट नै होउ अपनामे सब मील कऽ रह कोनो बात छौ तऽ अपनामे कह माय-बापक बात सह मारैके मन तऽ सागमे हरदी नै गामघरमे देखल जाइए इस्त्रगनपर अत्याचार बढ़ैए काम-काजू जननी सब भेल काज करैत देख थाकि गेल दिन भरि घास-भुसा करैए सासु ननदिक बात सुनैए बच्चा सबहक नेरपन करैए तहूपर से भानस करैए अंगना घरक काज करैए मरद-पुरुख सभ कोढ़िया भेल साँझ-भोर पसीखाना गेल एक दिन कमाइले नै जाइए पाँच दिन बैस कऽ खाइए तहूपर से कानून बतियाइए नून-तेल घरमे आनि कऽ नै दय खाली नीक-निकुत खाए ने कहियो पूब-पश्चिम जाए ओ बेचारी फुट्टै कानए लोक सब मिल कऽ तना मारए मारैके मन घरवालीकेँ तऽ कहैए सागमे किए ने हरदी देलही ओ दिन बिसरि गेलही रौ भाइ रौ की हालचाल छौ ठीक-ठाक छौ ने दलानपर आइ बड़ चहल-पहल छौ देखै छियौ माहौल गरम छौउ आइ कोइ कुटुम अबै छौ की एह बाल्टीनक बाल्टीन शरबत घोराइ छौ कागजी नेबोके गमक आबै छौ भोर आइ आँखि लाल लगै छौ मुँह सेहो भभकि रहल छौ कनी टोलबैयोकेँ देखहिन हमहूँ छीयौ दोसे-महीम ओ दिन बिसरि गेलहिन रौ संगे-संग कबडी खेलेलौं खत्ता उपछि गरचुन्नी मारलौं पुआरमे पका कऽ ओकरा खाइ छेलौं अखैन बनि गेलाए बबाजी कहै छै आब नै किछ खाइ छी सौंसे भरि दिन झूठ बजै छाँए साधु भऽ कऽ ई की करै छाँए ऊपरसँ छाँए साधो तोरा मनमे लागल छौ कादो एको बेर केकरो नै पुछै छाँए तखन तोरा लय की साउन की भादो जे कियो माँछ खाए मुरा-पुँछ समेत से बैकुण्ठ जाय नाति-पुत समेत चल जे केलाए से ठीक केलाए तुलसी माला केँ धारण केलाए जँ माला तोड़लाय तऽ भगवान घरमे बारल जेमए रुसनाहैर यै गामवाली यै घुरि जाउ अहिना होइ छै अपनामे मारा-मारी झोंटा उजारी नै गै बहीन हम नै रहबौ आइ हम रेलमे कइटे मरबौ एकरा घरमे एक रत्ती चैन नै सब कहैए हमरा डाइन अइ एक तऽ हमर माए-बाप अभगलाहा जे घर बड़ भेल जरलाहा पेने मुंगरीए हमरा मारैए हम कोनो बैसल रहै छी गै माए गै, रौ बाप गतर-गतर कऽ हमरा फोड़लक घरसँ हमरा बाहर कऽ देलक हम ओकर आब बौह छिऐ जाबे नै भाएसँ पिटबेबै ताबे नै हम चाइनसँ रहबै नै तँ आइ कनैल पीस पी लेबै हे कनियाँ अहाँ एना नै कानू ई दुनियाँक रीत छिऐ से जानू झगड़ा सबकेँ ओहिना होइ छै एना कहूँ लोक जहर पिबै छै चलू-चलू गामपर छौड़ा कानैए बान्हपर की कहू हम बड़-कनियाँक झगड़ा पंच भेला लबरा घर ऊँच आ कान बुच हेयउ ओकरा ओतऽ जाएब हम कोन रस्ते जाएब ई कोन गाम छिऐ हुनकर नाम की छिऐ कियो कहबे केलक अछि ओ बड़ धनीक अछि दुआरिपर हाथी घोड़ा अछि ऊँच-ऊँच धानऽ बोरा अछि अहाँ हमरा पुछै छी तऽ सुनू कहै छी तऽ बैसू अहाँ, हम आबै छी यएह गामक नाम छी अहाँ बैसले रहि जाएब, हम अबिते रहि जाएब देखियौ ओकरा ओतऽ जे जाएब बुझियौ कुकुरेसँ कटाएब ओतऽ झबड़ी कुत्ता रहैए भरि दिन झाँउ-झाँउ भुकैत रहैए खाली नामे ओकर सुनबै अंगनामे गुरो-खुद्दी नै देखबै खाली नामेँ ऊँच आउर कान बुच हम सब बाजब की रहै छी चुप झगरा करै लय सन-सन करैए ठाढ़ हएत से जी पड़ैए ओकरासँ हम सब की लागब अपने अछि गामसँ बारल प्रतिष्ठा लय हम सब मरै छी ओकरामे अहाँ की भीरै छी जाउ जतैसँ आएल छी ओतै जाउ अपने घर नून रोटी खाउ सरलो भुन्ना तऽ रहुअक दुन्ना आबक छौरा सब बड सुकुमार भोरहरवामे ओकरा लागए गुमार काजऽ नाम सुनि लागए बोखार चोरी करै लए करय जोगार भरि दिन जीन्स पहीर छौक घुमए लेटा-लेटाकेँ चीलम चुमए अपने तऽ गेल मुदा पड़ोसियो लऽ कऽ गेल देहपर दीनक बारह बजैए फाइसनमे खाली चुर रहैए बापक बियाहमे फटफटिया देलकै बेच बिकीन कऽ ओकरो खेलकै नासेहि काल बिनासेइ बुद्धि चाउर सधलौ आब खाइए खुद्दी पोखरि दिस ओहिना नै जाएत मोटर साइकिलपर धाख जमाएत एकरे सभ सन गिरहत भेल खेतो बाड़ीसँ उबजा गेल आब ने ओहन मनुख देखाइए जे हर जोति कऽ खेती करैए हमहूँ सब उबजाबै छेलिऐ चारि-चारि कठाके तामै छेलिऐ साठि सालक हमहूँ भेलौं अखनो तक हम नै अकछेलौं रौ सरलो घुन्ना तऽ रहुअक दुन्ना हमरा जकाँ जखन हेमाँ तूँ की जानी की करमाए तूँ बाड़ीक पटुआ तीत जे कहबौ से तऽ करमाए नै फिजूल पाइ करमाए खर्चा कमाए तऽ पड़ै नै छौ हम तऽ बाप छियौ कहबे करबौ आब हम बुढ़ भेलौं ई राज पाट तोहर छियौ एखन तोहर सबहक जमाना छौ हमहूँ सब पढ़ै छेलिऐ एना नै लाट सहाएब बनलिऐ गामपर सब काज-राज सम्हारि कऽ बाबूके खेतक आइर-कोन बना कऽ टेमपर स्कूल सेहो जाइ छेलिऐ करै नै छेलिऐ एको रत्ती भूल पाएरमे चप्पल नै पीठपर बैग नै जाइ छेलिऐ कलमे-आइरे-धुरे पढ़ैले हाथमे सबटा किताब कोपी पजीयओने पानिमे भिजैत रौदमे तपैत संघर्षमय शिक्षा पाबै छेलिऐ नै छल होस्टल नै छल कोचिंग पिपरऽ गाछ लग पढ़ै छेलिऐ हमरा ओतेक तऽ पाइ नै अछि जे नीक स्कूलमे पढ़ेबौ तोरा हम सब कहाँ पढ़लिऐ पब्लिक स्कूलमे तैयो धुरझार अंग्रेजी पढ़ै छिऐ आइ-काल्हि एगो ई धंधा भऽ गेल गाँव-गाँवमे प्राइवेट इस्कूल खुइल गेल भुसकोलहो सब मास्टर बनि गेल हम तऽ एतबे कहबौ जे गामेमे पढ़ मुदा तूँ कहमय जे मधुबनीमे पढ़ हम तऽ यएह कहबौ जे बाड़ीक पटुआ तीत जतेकके बौउह नै ओतेकके लहठी समधि एकटा भैंस लेबाक अछि चलू लऽ अबै छी लोफा हाट सऽ अहाँ तऽ बुझै-सुझै छिऐ एकटा खुटापर मालोजाल रहनाइ छै जरूरी बाल बोध सब दुध लय रहैए बेल्ला भेल गोबर करसी के हएत सुविधा पाहुन पड़कलए दुध ताकऽ पड़ैए गुरा-भुसा जे अनका दै छिऐ से अपने खाएत ओहुना दुध अखुनका जमानामे महगसँ आसमान छुने जाइए कीन कऽ एतेक खाएब अहाँ तऽ भैंसक पैकार छी बहुत दिनसँ आइ-काइ करै छी जे एकटा महीस लेब बेटा-पुतौह बाहरे रहैए गामपर असगर बैसल नीक नै लागैए अहूमे तऽ लागल रहब दूध बेच कऽ मरोमशालाक तऽ पाइ हएत जरबै लय चिपरी-गोइठा तऽ हएत अछाए समधि, महिसक खोराक तऽ बुझले अछि ने एक टाल नार पुआर चाही ३ महिनामे ढक कऽ ढक भुसा खाएत आउर भोरे पोखरिमे नहाएत ओकर गोबर गोत छुबऽ पड़त दिन-राति मेहनति करऽ पड़त आ महिसक दाम चालीस हजार अछि अखन उहोमे चारि बियान महीस के बाप रे बाप ओतेक मे हम नै सकब छोड़ू नै लेब जतेक के बौउह नै ओतेक के लहठी मन लगले रहि गेल मन छल एगो जमीन किनितौं चारूकात जमीन घेरितौं ओइमे एगो फ्लैट बान्हितौं जीप मोटरकार किनितौं नोकर-चाकर दरबान रखितौं ओइमे स्वीमिंग पुल बनैतौं सभदिन ओइमे स्नान करितौं बड़का हम बिजनेस करितौं हवाइ जहाजपर से चढ़ितौं बिजनेसमे अप्पन नाम करितौं मिथिलाक आगू नाम करितौं हम मिथिलाक वासी छी मरैतखीन रसगुल्ला खाएब जवानसे बुढ़ भेलौं बिगहा-बिगहा हम किनलौं रती-रती कऽ हम जोड़लौं जौ-खुद्दी खाके खेत किनलौं मालदह कलकतिया आम रोपलौं बाँसक बिटक ई तऽ नै अछि पोखरि-झाँखड़ि ई तऽ नै अछि सब पोखरिमे रौह नेन मारा अछि दुरापर जोड़ा-बड़द टाएर अछि धान-चाउरके कमीए नै अछि तीनटा बेटा पुतौह भेल अपनामे सब भीन भऽ गेल नाति-पोता सब पढ़ै-लिखैए के देखैए बुढ़बाकेँ सुतल रहै छी, दबकल रहै छी हम असगरे दलानमे असगर खाइ छी दोसर बेर के पुछैए रातिकेँ रहै छी अनहारमे एकटा खाट आ एकटा सुजनी राति भरि मच्छर खूब कटैए एकरती डिबियामे तेल दैए कुछ देर बरि कऽ ऊहो बुताइए लालटेन लाय मन लगले यए जूता लय मन तरसैए खोंखीसँ दम फुलैए दवाइ के करबैए गोदान कालमे बेटा पुछैए बाबू की रसगुल्ला खाएब प्राण जाइए छुटि मुँहक बात मुँहे रहि गेल जय मिथिला जय मिथिलेश जय वैदेही जय मैथिल माघक शीतलहरी बाप रे बाप होइए प्राण चलि जाएत मन नै होइए ओछैनसँ उठी जवानक ई हाल तँ बूढ़क की भरि माघ पिअब सभ की पाइनो बरफ भऽ गेल दिन भरि धुइनसँ आँखि नै सुजहाइए ओछाइ-बिछाइ सभ गेल तीति सन-सन-सन-सन पछवा बहैए केरा पातसँ बुन्नी खसैए हाथ पएर सभ सुन्न भऽ गेल लोचना करए बाँझीक धधरा सुटकल रहैए दलानमे बगरा एक महिनासँ रौद नै भेल आलू गाछ सभ गलि गेल बाप रे बाप, होइए प्राण चलि जाएत रसगुल्लाक जबार नोत दै छी यौ नोत दै छी रसगुल्ला जबारक नोत दै छी हम आएल छी महरैल गामसँ समुच्चा गामकेँ नोत दै छी मुखिया जी यौ लखन काका आइ सौँझुका हम नोत दै छी पियोर छेनासँ बनल रसगुल्ला काशी भाइ यौ नोत दै छी पहिल तोरमे पहुँचब सभ गोटए सबेरे सकाल कऽ नोत दै छी पूरी तरकारी अओर देब तखन तइपर सँ देब रसगुल्ला तोपि नोत दै छी यौ नोत दै छी रसगुल्ला जबारक नोत दै छी बसंत पंचमी सरस्वती पूजा सभ साल जेना हरेक सालमे आबैए विद्यार्थी सभ हर्ष उमंगसँ माता लग शीस झुकाबैए माघ मासक शुक्ल पक्षमे ई सुन्दर पाबैन आबैए हरियर-हरियर तीसी-मौसरी सरिसौ कऽ फूल फुलाइए जोर-जोरसँ पछबा हबा धऽ कऽ गर्दा उड़ाबैए देखियौ आम आ देखियौ महुवा सभ मिल सुगन्ध सुंगहाबैए गाछमे हरियर नवका पत्ता रौदामे चमक देखाबैए नहू-नहू बहए पुरबा हाबा होलीक गीत सुनाबैए धिया-पुता सभ बैठ आइरपर गहुम गोइढ़लाक ओरहा पकाबैए बसन्त पंचमी सभ लोककेँ अपनामे मिलाबैए कातिकक पूर्णिमा जेबै देखैले मेला कमलाके सभ सालमे मेला लागए जोर नहाइले जाएब भोरे भोर हेतै ओही बाउलपर कुस्ती खाएब तोड़ि कऽ कुसियार माए बहीन सभ खेलए सामा चकेवा भसबऽ जाए ओइ किनार चुगलाकेँ चूड़ा दही खुआ कऽ लेवान दिन चूड़ा कुटाए उक्खड़िमे। जोतलाहा खेतमे भसाबए सामा चकेवाकेँ पूर्णिमा नहाइले जाइ कमलामे मेला लागैए दुनू पारमे नाच तमाशा हुअए अल्हा रूदल बिकाए झिल्ली मुरही मिथिलामे माए बहीनके भाइयक मानल जाए ई पाबनि सालमे एक बेर नाम लिअए भाइक सभ बहीन हमर भइया रहए जुड़ाएल। गामक इनार चलए मिलान सभ लोककेँ भरै छलौं एक ठाम पानि अपनामे रहै छलए बाजा भूकी रहै छलौं सभ मिलि-जुलि कऽ घर-घरमे आब भेल कल लोको सभ भेल अल कल खीचि ने पाबए इनारक रस्सी ने रहल टोलमे एकता के राखए पोखरि इनारक सेखता साविकक देनके होइए अभास कोनाकेँ बुझाएब पियास विलुप्त भऽ रहल अछि इनार कतऽ गेल घैलाक पानि ओही ठाम करै छलौं स्नान रहै छल गामक शान देवी-देवता रहै छल प्रसन्न मन रहै छल शुद्ध रखै छलौं शुद्ध-अशुद्धक मान। अप्पन गाँव अप्पन गाँव अछि साफ लग-लगमे कलम गाछ स्वच्छ हवाक सुगन्ध सुंगहाएत बाट बटोहीक मन बहलाएत हँटि-हँटि कऽ पोखरि इनार स्नान करै छी ओइ किनार महारपर सुन्दर पाखैर गाछ कौआ मएना करए किलोल भोरे देखै छी कौल्ह चलैए रस-गुड़क सुगन्ध आबैए हरियर-हरियर गहुमऽ खेत कालसँ बहैए कमला रेत गाँवसँ बनल शहर बजार खूब बनए पापड़ अचार गामक छी ई रीति-रिवाज सभक करए आदर सत्कार बैशाखमे दलानपर आउ यौ यार, खेलाइ छी तास बैस कऽ अखन करब की चलू करै छी टेम पास बेर झुकतै तँ जाएब करैले घास चण्डाल सन रौद लगैए चारि बाजऽ जा रहल अछि लगैए अखन एक बाजल अछि महींस खोलब ओइ बेरमे पोखरि लऽ जाएब नहाबैले सुतलोमे गरमसँ नीक नै लागए खाटोमे उड़ीस करैए कछर-मछरसँ नीन्द नै अबैए पुरबा हवा सेहो पेट फुलाबए घामसँ देखू गंजी भीज गेल कौआ डाढ़िपर लोल बबैए मेना जामुनपर झगड़ा करैए बगड़ा दलानपर ची-चू-ची-चू गीत सुनाबए एहन गरम नै देखलौं कहियो रातिकेँ मच्छड़ दिनकेँ माँछी तंग करैए आउ यौ यार खेलाइ छी तास सेवा मन होइए करितौं बेटाक बियाह पुतहु लेल हिक गरल अछि काज करैत काल आब देह थाकि गेल भानस करैक शक्ति नै अछि बेटी भेली, अप्पन सासुर गेली असगर अंगनामे नीक नै लगैए होइत पुतहु तँ एक हाथ सेवा करितए मुदा एगो बातक डर लगैए पुतहुक चर्चा देख टोलमे अही सेवासँ चित्त हराइए पढ़ल-लिखल कनियाँ सभ गेल आदर सत्कार सभ बिसरि गेल आठ बजेमे, सुति कऽ उठए चुल्हा अंगना सभ, अहिना पड़ल-ए के करए ससुर-भैंसुरक परदा रीत-रेवाजक उड़ाबए गरदा एकर देखसी करए, सभ कनियाँ ई नै लागए ननदि, साउसकेँ बढ़ियाँ ऐ पढ़ल लिखलसँ घास-छिलनी नीक मन होइए करितौं बेटाक बिआह पुतहु लेल हिक गरल अछि। वर बिकाय लगनमे वरक रेट नै पुछू यौ बाबू मारा माँछक जेना दाम बढ़ैए कनीको पढ़ल-लिखल रहल तँ बेटाबला अप्पन मोँछ सीटैए लड़कीबलाक खेत बिकाइए देखू जमाना ताल ठोकैए दुल्हाक डिमाण्ड अछि, पाइ सन करी जमा लिखल-पढ़लमे सभसँ तेज पँचमामे पाँच बेर अठमामे आठ बेर दसमामे दस बेर लड़का फेल एहनो लड़का लगनमे बिक गेल वरक रेट नै पुछू यौ बाबू मारा माँछ जेना दाम बढ़ैए। विहनि कथा खण्ड अन्ध विश्वास काकी गोर लगै छियनि, बैसथु। -के, उड़ीसावाली कनियाँ। -हँ काकी, निके रहै छथि। -की ठीक रहब कनियाँ, तैयो ठीक छी। बुढ़-पुरान भेलौं, हमरा सभकेँ तँ ई पुरबा हवा जान लेबऽ लगैए। सौँसे डाँर ठेहुन बातरससँ कनकनाइए। कोनो दवाइ नै काज करैए। -आबथु, बैसथु। एक तँ कतेक दिन पर भेँट भेलथि यऽ। -नै कनियाँ। आँगनमे बड्ड काज छै। आइँ यै कनियाँ, भुखनो बच्चा आएल अछि? -हँ काकी, मरनीक बाबुओ एलखिन। -कनियाँ बच्चा सभ सेहो एलनि। -नै काकी। अखैन बच्चा सभक गरमीक परीक्षा चलै छै, तइ दुआरे ओकरा सभकेँ नै अनलिऐ। आब गर्मी छुट्टीमे सभ आम लिच्ची खाइ लए अबै छन्हि। -आँइ यै कनियाँ, मरनी तँ आब बियाहैवाली भऽ गेल हएत। -हँ काकी, ओकरेले कतौ लड़का ताकै गेल छथिन। काकी माथ केहेन लागै छनि। आबथु कनी तेल दऽ दै छियनि। -नै कनियाँ। आइ जाए दिअ, आउर दोसरो दिन आएब। -माथ फहराइ छनि तेल बिनु। -से तँ ठीके कहै छी कनियाँ। हमर रुसना डिल्लीसँ हमरा लए एगो नवरतन तेल ठंढा बला, पाँचटा साबुन नहाइ बला, दू किलो सर्फ पठा देलक, जे माय लगा आ जे किछु घटतौ तँ फोन करिहिएँ। ने, अखैन कनियाँ रवि रायकेँ समय छै, भूसा गर्दा सभ माथमे भरि जाइत छै। बड्ड गपशप केलौं कनियाँ, आब कनी जाए दिअ कनियाँ। -ठीक छै काकी जाथु। हमहूँ भानस करऽ जाइ छी काकी। काकी हिनका भनसा भऽ गेलनि। -नै कनियाँ। हमहूँ जाइ छी। कनीक पछुआरमे सँ भोरे अरिकौंछ तोड़लिऐ, तकरे चक्का बना कऽ झोरेबै, कनीक आमिल दऽ कऽ। तेहन हमर पुतोहु भेल कनियाँ जे अखैन तक दालि तरकारी नून, से नून-जाउर बना दैए, कहियो अनूने। कहियो अन तीमन नीक नै बनबैए। कनियाँ अहाँकेँ नीक लगैए अरिकौंछ। -हँ काकी, हमरा सबकेँ ई कतऽ पाबी। -ठीक छै तऽ हम अपना छोटा नातिन दिया पठा देब बाटीमे। जाइ छी कनियाँ। …………………………….. -बड़की दीदी, बड्ड गप्प सरक्का चलै छलै रुसना माएसँ। की बात छै, अहूँकेँ गुण जादू सिखबाक अछि की? -नै छोटकी। तोरा सभकेँ यएह पपियाहा मन सभ दिन मन खराप राखै छौ। -नै यै दीदी। एको महिना नै भेलै, सुगौनावालीकेँ देहपर पाँचटा देवी पठौने छलै। कतेक ओझा गुणी एलै, तखन जा कऽ कनीक अन्न-पानि खाए लगलैए। सभ कहै छै हकल डाइन छै। छोटका बेटाकेँ मारि कऽ सिखलकैए। -छोड़ ई सभ बात। तूँ सभ गामघरमे रहि कऽ अहिना सबकेँ डाइन आउर जोगिन कहै छिहिन। ई सभ अन्धविश्वास छिऐ। समाजमे ईएह सभ बातसँ झगड़ा होइत रहैए आउर एक दोसरकेँ डाइन कहैए। साउस पुतोहु -कनियाँ, घरमे छी यै? -की भेलनि माए? -आँइ यै छौँकावाली, एतेक निचेनसँ सुतै किए छी यै? दुपहरक काज-राज अहिना पड़ल छै। कनी महिसोकेँ पानि देखा ने दियौ, पियासल महीस खुट्टा तोड़ि रहल छै। एतेक कहूँ मनुख सुतए। कतेक नीन आबैए अहाँकेँ यै। -तँ की करू, सुतबो नै करू। भरि दिन खटैत-खटैत हाथ-पएर कारी-झामर भऽ गेल। ओम्हर चिलका तंग करए, इम्हर भानससँ तंग। हिनका होइ छै, हम भरि दिन खटैते रही, हमरासँ नै हएत महीसकेँ पानि पिआए। हमर माथ बड़ जोर दुखाइए, डाँर-पिट्ठी सेहो तोड़ने जाइए। एखन हमरासँ किछु नै हएत कएल। -आँइ यै, एतेक कहूँ पुतोहु बानसब्बर हुअए। सुनियौ यै ढुकरीक माए। अहाँ सभ कहबै जे साउसक दोख। हम की बैसल छी। भरि दिन गोरहा पाथैत-पाथैत दुपहर भऽ गेल, एक टाएर गोबर छल हन। एखन तक पूजो नै केलौं। कखैन खाएब कोनो ठीक नै। ऐ महरानीकेँ देखियौ जे हमरेपर हाथ-पएर चमकाबैए। बड़का छोटका कऽ आइयक कनियाँ कोनो माने-मतलबे नै राखैए। अपन जएह मोन भेल वएह केलक। के खेनहारकेँ देखैए, जे ससुर भैंसुर खेलक कि नै, अपन पेट भरि गेल, दोसर आब जेना रहए। अपन भूख तँ चुल्हा फूक, दोसरक भूख तँ माथा दुख। भगवान हमरे बेटाक कपाड़मे ई नसिनियाँ बथाए छल। जाइ छी नहाइ लए, एकरासँ मुँह लगाएब तँ अपने मुँह खराब हएत। मुदा एकरा जाबे तक बेटासँ पिटबाएब नै ताबे तक हमहूँ सुख-चैनसँ नै रहब। हमहूँ ऐ कनसिनियाँकेँ देखा कऽ रहब, जँ बेटा वशमे रहत तँ ऐ जनानीकेँ केहन होइ छै। साउससँ जवाब-सवाल केनाइ सभ हम देखा देबै। महीस जेना नाथि देबै। पुतोहु- देखियौ यै मकरा काकी। हम सभ सुनि रहल छी। साउस कहूँ पुतोहुपर एतेक आगि-बाउल ढारै अइ यै। खिखरी माए, हमर साउस पहिने पुतोहु नै छलै की, जे पुतोहुकेँ एना सताबै छै। जँ ई बुढ़िया बेटासँ हमरा मारि खिया देलकै तँ घरमे यएह रहत कि हमहीं रहब। झोँटा-केस हम नै उखाड़ि लेलिऐ तँ फेर की। साउस- यै, सुनियौ यै टोल-पड़ोसक लोक सभ। ऐ भत खोखरीकेँ हम कोन आगि-बाउल ढारि देलिऐ जे ई हमर झोटा-केस उखारत। कोनो हमरा कियो देखनाहर नै अए। आइ आबऽ दही बुढ़बाकेँ, नै किछु कहलकौ तँ फेर की। पुतोहु-हाँ-हाँ, देखब ने अहाँ हमर की बिगाड़ि लेब। जँ बेसी ओम्हर-आम्हर करब तँ हम छोटका भाएकेँ फोन कऽ के नैहरे चलि जाएब। तखन अहाँ अहिना असगरे चुल्हा फुकैत रहब। कहिया मरतै ई बुढ़िया, हमरा जानपर अछि। सगुन ठकोकाका- हर्षित बाबू। एना माथपर हाथ धेलासँ काज-राज चलैबला नै अछि। किएक तँ अपन मिथिलामे भऽ एलैए जे परम्परा, तेकरा तँ निभाबैए पड़त। किएक तँ अखुनका जइ मनसूबे चलि रहल अछि, तेकरा संग हमरा लोकनिकेँ चलऽ पड़त ने। अच्छा, खएर बात अपन समाजमे गरीब होइए वा धनिक, मुदा बेटी विवाह कोनो धरानीए भइए जाइत अछि। तइ लेल घबड़ेबाक कोनो बात नै। सभ बाबा उगना ठीक कऽ देथिन। ठीक छै तँ जाइ छी हर्षित बाबू, ठीक छै। हर्षित बाबू- आ ठको काका। हाँ कहू, की कहै छी। देखियौ जे चढ़ैत शुद्धमे बेटीक कन्यादान कऽ के हम सभ दिल्ली जल्दी जाए चाहै छी। तइ दुआरे काका हम अहाँकेँ सलाह लिअ लए आएल छी। जल्दीसँ कतौ भाँज लगेबै। ठकोकाका- हर्षित बाबू। ओना हम सखबारमे एगो लड़का देखने छलिऐ, हमरा बड पसन्द आएल। लड़का बंगलोरमे इन्जीनियरिंगक तैयारी करैत अछि। बुझबामे आएल, लड़का नीक गोत्रसँ संलग्न अछि। भाव-विचार बड मधुर आ स्वभाविक सेहो छै। मुदा हर्षित बाबू, लड़का कऽ माय-बाप नै अछि, ओकरा मामा-मामी आ नाना-नानी पालने अछि। हर्षित बाबू- ठकोकाका, जँ अहाँ ओ भाँज लगबितौँ तखन तँ बुझु जे सभ ठीके-ठाक रहितै। ठकोकाका- ओ लड़का बुझु जे अहाँकेँ सेट भऽ गेल। सगुन ठीक अछि अहाँक यौ हर्षित बाबू। हर्षित बाबू- शुभ लगनमे देरी की। जे नगद लेता अओर लड़का जे लेतहिन, हम सभ देबनि दै लेल। चैनकेँ गलामे देबनि, मोटर साइकिल देबनि। मुदा ओ लड़का हमरा बड पसन्द आएल। ठकोकका, अहाँ जल्दीसँ ई चक्कर चलाउ। हमर कन्यादान भऽ जाए। जल्दीसँ सगुन लऽ कऽ जाउ, गोर लगै छी। लघुकथा खण्ड ओगरबाह बड़ दिन भऽ गेल भात खेला। मरुआ रोटी खाइके आब मन नै होइए। रोटी चिबाबैमे आब सकै नै छी। दालिमे जँ लोंगिया मेरचाइ नै दैत अछि तँ दालि रोटी खाइमे स्वादे नै अबैत अछि आ बेशी मरचाइयो खेलासँ पेटमे सुलवाइ सेहो हेमऽ लगैए। पुतोहु देख कऽ खौंझाइए जे बिना मरचाइके बुढ़बाकेँ एकोरती रोटी ससरै नइए, अखन देखियौ जे सँउसे नुए-वस्त्रे घिनओने अछि। ई सभ सुनि आउर देख कऽ हमरो नीक नै लागैए, लोक देख कऽ सेहो दुर छीया करैए, कहिया एतै अगहन मास जे खूब खइतौं खेसारी साग, भात आउर अल्लूक चटनी। मन थाकि गेल गामपर बैसल-बैसल, जवान तँ छी नै जे जाएब पंजाब-दिल्ली खटै लए। आब गामेमे रहि कऽ मालिक गिरहस्त सबहक खेत ओगैर कऽ अप्पन बाल बच्चाक गुजर करै छी। धानऽ मासमे धान ओगरलौं, गहूमऽ मासमे गहूमकेँ, रवी महीनामे रवीकेँ ओगरलौं, ओहीसँ अप्पन जीवन बितैए। ……………………… बड़का गिरहस्त सबहक खेतक देखभाल केनाइ। अखार मासमे जखन अप्पन रोपनी खतम कऽ लैत छल, तखन खेतक देख भाल केनाइ ओगरबाहक काज रहै छल। सब गिरहस्त अप्पन गामपर आबि कऽ नथुनी मरड़केँ कहि दै छल जे कनीक हमरो खेतक देखभाल करिहऽ, जे हेतऽ ओगरबाही से हम खेतेमे एगो कोन बारि कऽ दऽ देबऽ, तऽ ओगरबाह अप्पन देख-रेख करै छल, खेतमे आइरसँ पानि निकालनाइ, साँढ़-पारासँ बचेनाइ। ई सबटा काज ओगरबाह करै छल। धानक कटनी होइ समएमे सब गिरहस्त ओइ ओगरबाहकेँ साल भरिक बोइन दऽ दै छल। उहो अपन ऊँचगर जगह देखि कऽ एगो खोपड़ी बनाबैत छल, आउर ओही खोपड़ीमे रहि कऽ अपन धानक देख-रेख करै छल, आउर धानो खूब उपजबै छल। भदै, जसबा, मलीदा, जेकर भात अंगनामे बनितए तऽ दलानपर ओकर गमक जाइ छल। मुदा आब ने ओ धान रहल आने उबजा रहल। सगरौ देखै छी जे उबजाउ माँटि काटि कऽ सड़क हाइवे तैयार होइए, अइ शहरसँ ओइ दिस लेल रस्ता बनैए, कतेक उबजै छेलै कुसियार कमला कातक माँटिमे, तऽ उबजा सब दिनेसँ अछि, चाहे उ धान हुअए या गहूम या कुसियार मुदा चापी जगहमे तऽ पानि सब दिन भरले रहैए, खाली ओइमे सोउरखी, भेंट, मिरचाइ, केसाउर उबजैए, दिन प्रतिदिन लोक सब भेल जा रहल अछि सुकमार, सगरो देखै छी जे खेनहार भऽ गेल बेसी आ उबजेनहार भऽ गेल कम। खाइ लाए चाही अमीर जकाँ, से गरीब घरमे पतरके चाउर भात आउर खेतमे जखन कहबै धीयापुताकेँ जे एक छअ कोदारि पारऽ तऽ कहत हमरासँ नै हेतऽ, अप्पन जनसँ कराबऽ, हमरा हाथमे फोंका भऽ जाएत, देहमे एकोटा बच्चा माटि नै लगाबऽ चाहैए, कहबै जे बौआ कनीक बाबाक खेतमे चौकी दऽ आबहक तँ कहत हमरासँ नै हएत, हम तऽ काउलेज जाइ छी, बड़का मजीस्टेट बनऽ। पढ़ाइ तऽ जरूरीए छै, मुदा संग-संग खेनाइयो ने छै, भुखले तऽ पढ़ाइयो नै भऽ सकैए। पढ़ि लिख कऽ जखन हम रुपैय्या कमेबै आउर ओइ रुपैय्याकेँ हम खा लेबै से तऽ नै हएत, ओइ टाकासँ हम धान-गहूम, मर-मसल्ला, तेल-नून लेबै। तखने ने हम ओइ पाइक कोनो काज बुझबै, जे ओइ पाइ कऽ कोनो काज नै हेतै तऽ बैंकेमे रखलासँ कोन फाइदा। ई पाइये तऽ लोक नै खाइ छै। जखन ई अन्ने नै उबजतै तखन हमरा लोकक पढ़ै कऽ की फाइदा। हवा आउर पानि पी कऽ तऽ नै हएत जीअल, ओही दुआरे पढ़ि-लिख कऽ गिरहस्त इन्जीनियर बनबाक चाही जे किसान सबकेँ सलाह भेटतै, जे नै बुझै छै तेकरा सबकेँ खेती-बाड़ीक बारेमे सिखाएल जेतै, बुझाएल जेतै। ओना अपना मने गिरहस्त सब अलए-पलए खाद छीट कऽ अपने खेतक उर्वरक शक्ति घटा लै अछि। ओइसँ ओ फसल नाश होइते अछि आउर दोसरोक फसलपर असर पड़ैत अछि, ओहीसँ उबजा नै होइत अछि। गिरहस्त सब तबाह रहैत अइ, जे अहू साल उबजा नै भेल। अहू बेर रौदी भऽ गेल। ओही संग बजार-मार्केटपर अनाजक सेहो असर पड़ल, महगाइ बढ़ल जेकर दाम ५० रुपैय्या तेकर दाम ९० रुपैय्या भऽ गेल, लोक जिअत कोना, दिन-प्रतिदिन महगाइ आसमान छुने जाइए, दिनोदिन जनसंख्या बढ़ले जाइए, काज करऽ आब कियो चाहैए नै, यएह सभ चाहैत अछि जे अल्हुआ उपरेमे फड़ैत अछि। पहिने लोक हर-बड़दसँ खेत जोइत कऽ छोड़ि दै छेलै मुदा अखनी देखियौ जे एकेबेरे धान आउर खेरही खेतमे बुइन दैत अछि, खरे पतारमे, ने कियो खर बिछलक, आने कियो ढेपा फोड़लक खेतमे, माँटि तरखायए नहिये, आउर गीलगरे खेतमे जजाइत छीट दैत अछि, तखन कहत जे अहू बेर दालि नै भेल, आब देखियौ जे सबहक दरबज्जापर सँ धीरे-धीरे टाएर बड़द हर-फार सभ उजरि रहल अछि। सब एटोमेटिकक दुनियाँमे आबि गेल। ट्रेक्टरसँ देखियौ जे उपरे-ऊपर जोति दैए, खेतमे माँटि नै होइए, आउर ओइ लागल अन्न नै उबजैए। पहिने लोक सब हर-बड़द राखि कऽ सब सुविधा प्राप्त करै छल मुदा अखैन देखियौ जे सब गिरहस्त डेराइत रहैए, जे अइ बेर अन्न उबजत कि नै उबजत, किएक तँ गोइठा गोबर होइत छेलए, तऽ ओइसँ जरनाकेँ सेहो काज पड़ि जाइ छल, खेनाइयो बनि जाइ छल, खेनाइयक सेहो स्वाद कुछ अलगे रहै छल। आउर ओ छाउर लऽ के खेतमे फेकलासँ कम्पोस्ट खादक काज करै छल, मुदा अखन देखियौ जे घरे-घर गैस चुल्हा भऽ गेल, प्रेसर कुकर भऽ गेल, जइसँ तुरन्त खेनाइ बनि जाइत अछि, कोनो नै धुआँ-धुकुरक झंझट, कियो बुझलक, कियो नै बुझलक जे खेनाइ बनलै कि नै, जतेक नीक छै ई गैस चुल्हा, ततबए खराबो छै जँ प्रेसर कुकर ब्रास्ट भेल तऽ बुजहू जे घर संगे उड़ि जाइए लोक, बाँचइ के कोनो उपाए नै। मुदा आइ कालि लोक भऽ गेल अलकल, एकटा सलाइ नै बारऽ चाहैए। ओकरो लेल आब लाइटर चाही, गैस पजारैमे सुविधा हएत। आब के पिसैए लोरही-सिलौटपर मसल्ला, सब आब मिक्सीमे पिसैत अछि। गाम-गाममे भऽ गेल आब बिजलीक कुटैया, आब ढेकीमे धान, के खाइए ललका चाउरक भात, कहत जे एहेन फाटल-फाटल चाउर हमरा मुँहमे गरैए। के खाएत आब सीम दाइ, आ बड़ी। के भरैए आब घैलामे पानि। सबहक दुआरिपर आब चापाकल भऽ गेल, जखन चाही तुरन्त ताजा भरि कऽ कहत पिअब। सगरो देखल जाइए, तऽ ई सब चीज आब उठाइन भेल जाइए। पहिने लेवानमे देखै छेलौं जे दाय काकी माए सब अदहा राइतीए अंगनामे उखैर-समाँठसँ चूड़ा कुटि रहल अछि। काकी चुल्हापर खापड़िमे लारनिसँ धान भूजि रहल अछि, होइत भिनसर चूड़ा तैयार भऽ जाइ छेलए। मुदा अखुनका इस्त्रगन सबकेँ देखल जाए तऽ ओइ सब बेबहारमे सबसँ पाछू अछि, दिनोदिन सब चीज सब छुटल जाइत अछि। आलसमे लोक बेमुक्त भेल जा रहल अछि, जे उबजै छै ओ खेत आने लोक करैए, साँढ़-पारा खाइए खेतमे धान। एक खेतक ओगरबाह, ओ भगा कऽ दैए ओकरा खेतमे, तऽ दोसर खेतक ओगरबाह ओ भगा कऽ दैए ओकरा खेतमे, सब अपना-अपनाकेँ बचाबैए, दोसरकेँ खुआबैए। ……………………. बड़ दिन भऽ गेल भात खेला। मरुआ रोटी खाइके आब मन नै होइए। रोटी चिबाबैमे आब सकै नै छी। दालिमे जँ लोंगिया मेरचाइ नै दैत अछि तँ दालि रोटी खाइमे स्वादे नै अबैत अछि आ बेशी मरचाइयो खेलासँ पेटमे सुलवाइ सेहो हेमऽ लगैए। पसीखाना -भूखन, हौउ भूखन, अंगनामे छअ हौउ, कनी बाहर आबऽ। हम छी ट्रेक्टरबला, मेंहथसँ ऐल छी, कनीक लेबरक काज छेलए, चारि-पाँचटा माँटिकटीबला। भिनसरक आठ बाजि गेलै। सुतले छअ हौउ, कनी बान्हपर आबऽ। तखन एकटा छोटका बच्चा, गांइरखुल्ले छौँउरा, टिनही बाटीमे बसिया भात आउर मुरै साग खाइत अंगनासँ बाहर भेल कहैए- हमर बाबू सुतले छै। रातिमे माएसँ झगड़ा भऽ गेलै, भुखले सुति रहलै, अखैन तक नै उठलै। -आँइ रौ बौआ, तऽ माए कतऽ छौ? -माए गेलै गिरहत खेतमे धान काटै लाए। -ठीक छौ, तऽ जाइ छियौ हम, उठतौ बाबू तऽ कइईहैन जे ट्रेक्टरबला ऐल छलऽ। कुछे छनक बाद भुखना अंगैठी मोर करैत उठैए, आउर कहैए- कतऽ गेलाए गै गोपलखावाली, जल्दीसे हमर रौतुका माँछ भात ला। भकुवाएले भुखना घरसँ बाहर आएल, आँखि मीरते देखैए अंगनामे केकरो नै तऽ बैसि जाइए, ओसारिपर कनीक भक टुटलै तऽ अपन छोटका बेटाकेँ पुछैए- करिया छाँए रौउ, करीया। छोटका छौरा बकरी चरबैत रहैए। कनीक घरसँ हटिकऽ खेतमे ऊ अवाज दैए- की भेल्लऽऽऽऽ बाबू। तऽ कहैए- आँइ रौउ, देखही तऽ रौतुका माँछ घरमे छौ कि नै? ओकर बेटा कहैए- आँइ हौ, रातिमे तऽ माए साग-भात केने छेलै, माछ-भात कहाँ बनेलकै। तोरासँ माए दसटा रुपैय्या मांगलकऽ तऽ माएकेँ तूँ झोंटा पकड़ि कऽ अंगनामे नै मारलहक, जे हमरा लगमे एकटा अछि नहिये आउर हिनका दियैन हम तेल लय पाइ। तऽ माँछ-भात कहाँ बनलै, मुरै साग आउर भात बनल छेलै। लागैए तूँ सपनाइत उठलऽ हन, जेहो बचल छेलै भात सेहो हम दुनू भाँइ खा लेलिऐ, आब नै छै हण्डीमे। भुखनाकेँ भुखे प्राण जाइ छल, तऽ केलक की, ओसारापरसँ सीमेण्टबला छोटका बोरामे अदहा बोरा उसना धान उठेलक आउर चलि गेल। दोकानमे ओकरा बेचिकऽ करीब तीस रुपैय्या भेल, ओइ पाइसँ भुखना अढ़ाइ रुपैय्यामे एमप्रो बिस्कुट लेलक आउर चारि आनाक सलाइ आउर एक बण्डल बीड़ी लेलक, आउर एगो छलिया सुपारी ओकरा दोकानेपर फोड़ि लेलक सरोतासँ, आउर कुर्ताक जेबीमे राखि लेलक। बिस्कुट खा कऽ पानि कलपर पी लेलक आउर एक टूक सुपारी मुँहमे लऽ कऽ गुलठियाए एगो बीड़ी धरा कऽ अप्पन पी रहल अए। करीब दू के समए भऽ रहल छेलाए, ओमहरसँ चारिटा आउर पियाक आबि रहल छेलाए, उ सब भुखनाके संगीराए छेलाए। ओकरा सबकेँ भुखना देख के कहैए- की रौ दोस, कतऽ जाइ छाँए? -चल ने मुड बनाके आबै छी कोठियासे। दुवे सेरके देबै आउर सब गोटाए पान खाएब। साँझमे घुमैत-फिरैत चलि आएब। अतऽ असगरे बैसके की करमाए। -ठीक छै दोस। चल हमहूँ संगीए ताकैत छेलाउ, जे कियो भेटत तऽ जाएब, तारी पिअ, मुदा कियो भेटते नै छेलाए, चल। एमहर भुखनाक कनियाँ धान देखके सौँसे टोलमे लोकसँ पूछि कऽ गारि पढ़ि रहल अछि जे हमर ओसारपर सँ धान के लऽ गेल? धान कुटबै लाए रखने छेलौं। धीयापुतासँ पुछलौं तऽ ऊहो सब कहलक जे हम नै देखलियौ केकरो चोरबैत। ओही कालमे कियो पूछि दैए जे आँइ यै गोपलखावाली, घरबला कतऽ गेल यै, चारि-पाँच दिनसँ नै देखै छी। -कतऽ जेतै यइ बहीन। गेल हेतै कोनो पसीखाना तारी पिअ। नै कतौ देखबै तऽ ओतै भेटत साँझ-विहान, उठोउना लागल छै। देखियौ ने, डाक्टर कहने छै जे लीभर कमजोर छै आ तैयो नै ई बजरखसुवा तारी छोड़ै छै। साँझो खन अही पिऐ खातिर बजलिऐ तऽ झोंटा पकड़ि कऽ मारलक, राइतो नै खेलक। हमरा लगमे पाइ अछि जे एकरा दवाइ करा देबै? असगर धान काटै छी, धीया-पुताकेँ पालै छी, दुटा बकड़ी पोसने छी, ओकरेसँ छअ महीनामे पाँच सौ हजार टाका भऽ जाइए, मुदा ई सरधुवा तऽ एकोटा रुपैय्या हमरा हाथमे नै दैए, आउर रातिकेँ खाइ लए मांगत नीके निकुत, खाली तरले भुजले, हम कतऽ सँ पुराएब। आइयो आएल छेलै मेंहथसँ टेकटरबला, कहै लए जे काज करऽ चलऽ मुदा ई जुवन पिठा खाली पी के ओंघराएल अछि अंगनामे। कहियो यै दीदी रुख-सुख नै खाएत, सबदिन खाली चाही पीयै लए। एकटा रेडियो छेलै, सेहो बेचि कऽ पी गेल। सौंसे पियाक देखलौं मगर एहेन पियाक हम नै देखलौं जे घर परिवार के कोनो धियान फिकिर नै। एतेक लोक पैंजाब गेलै, एकरा कहै छिऐ तऽ कहैए हम एतै कमाएब आउर एतै खाएब। लोक कमा-कमा की नै केलक मुदा एकरा देखियौ जे खाली मौगी कमाइ खाइए आ भने दिन जाइए। एकटा घर नै तेकर कोनो ध्यान-फिकिर नै, खाली दिनभरि दौड़ मियाँ महजीदपर। बैसल-बैसल किछु नै फुराएल तऽ खाली पिनाइ आउर सुतनाइ। सुतल-सुतल सुस्ती पकड़ि लेलकै। घरमे एकोरत्ती मटिया तेल नै छै, हम लोकक अंगनासँ पैंच आनिकऽ डिबिया बाड़ै छी। तेल आनब से पाइ नै यए, आउर एकरा खाली चाही पाइ पियै लए, धियापुता पढ़त से हमरा एकटा रुपैय्या नै अछि जे मास्टरकेँ देबै। हम तऽ तंग आबि गेल छी। मन नै होइए एकरा घरमे रही, भागि जाइ हम बाल-बचा लऽ के नैहर। जरलाहाके जहियासँ ऐ भिखमंगाके घरमे एलौं, कहियो सुखसँ नै खाइ-पिबै छी। कि कहियो नीक कपड़ा पहिरतौं, जे नैहरामे बियाहमे देलक साड़ी माय-बाप वएह साड़ी साया ब्लाउजसँ गुजर करै छी। माए एगो पहुँची देने छेलाए, सेहो कमहरसँ नै भिखमंगा झंझारपुरमे चाटि लेलक। हमरा फुसियेँ कहलक जे दोसर रङके बनाके आनि दै छियौ। की कहू यौ गौंआ-घरुवा, ई सब देखके तरीवा हमरा गाँव नै जाइए लाजे जे एकर भाए-बाप की कहत। हमर बापकेँ एतेक मन खराब छेलाए से तऽ एतेक कहैत रहि गेलिऐ मुदा खाली कहए, साँझमे जाइ छी, पाइ लऽ लिअए आउर घुरि कऽ आबि जाए जे अनहार भऽ गेलै, ओही दुवारे नै गेलिऐ। कालि चलि जेबै। विचार-बिन्दु खण्ड राजा अओर परजा एगो समए छेलै जहिया लोक लोकपर विश्वास करै छल, अपन समाजमे कोनो तरहक बातचीत होइत छल तँ गाममे जे राजा रहै छल तिनका ऐठाम सभ निपटारा भऽ जाइ छल, अओर ओही ठाम न्याय अओर अन्यायक फैसला होइ छल, किएक तँ सभ लोक राजाकेँ सम्मान अओर आदर-सदाचारसँ नाम लैत छल, किएक तँ राज्यमे कोनो तरहक सुखार या आपदा-बिपत्ति होइत छल तँ राजा परजाक संग दैत छल, ओइ परजाक मदत-सहायता करैत छल मुदा अखन एहन समए आबि गेल जे राजा अओर परजामे कोनो अंतरे नै रहि गेल, किएक तँ आब ने ओते अन्न उपजै छै आ ने राजा परजाक मदति सहायता करै अछि। पहिने लोक सभ राजासँ अप्पन बेटीक बियाहक बातचीत लऽ कऽ जखन राजदरबारमे जाइ छल तखन ओही व्यक्तिकेँ महराज आश्वासन दैत छल जे तूँ या तोहर बेटीक खर्चाक व्यवस्था भऽ जेतऽ तखन परजो अप्पन राजामे लीन रहै छल। मुदा ने ओ सस्ता जमाना रहलै अओर ने ओ राजा रहलै, किएक तँ पहिनुकहा लोक सबहक कहब छेलै जे ओ लोक सभ जे छेलै, एगो लोहाबला व्यक्ति मानल जाइ छेलै, ओ सभ जे बाजै छेलै से करै छेलै, अप्पन नाम हँसाए नै दै छेलै, कोइ दोसर गामबला यदि नाम सुनै तँ कहै जे फलाँ गामक राजा अप्पन परजाक सुख-दुख देखै छै, कतेक नीक छै ओ गाम, चल ओही गाममे घर बनाएब , ओही राजाक राज्यमे रहब। देखही जे दुआरिपर कतेक-कतेकटा ढक छै, कतेक अन्न छै, कएगो हाथी बान्हल छै, कतेकटा हुनकर दरबज्जा छै, चल ओही राजमे रहब, कोनो चीजक दिक्कत नै हएत। सभ प्राणी ओही ठाम जीवन बिताएब। ई सभ परजा राजाक नव परजा बनैत छल। आब तँ देखल जाए तँ राजा परजाकेँ सुपै बोइले नै दइ पर तैयार होइत अछि। पहिने एक सेर मरुआ नै तँ एक सेर जऽ दैत छल। भरि दिन हर जोइत कऽ आबै छल तँ ओ मालिक अप्पन जऽनकेँ मरुआ अओर जऽ बोइन दैत छेलै। मुदा देखैत महगाइ कऽ चलैत राजाक मनमे अविकार आबि गेल जे एतेक अन्न जे ओकरा देबै से ओही अन्न बेच कऽ हमरा अओर दु कट्ठा खेत भऽ जाएत अओर अपन बढ़ैत परिवार देख कऽ सोचऽ लागल जे ई संसार अहिना रहत मुदा अप्पन सान-गुमान सभ राजा बिसरि गेल, के देखैए परजाकेँ अओर के देखैए अप्पन सान सौकत। बदलैत दुनियाँ देख परजा सभ गामसँ शहरमे काज करैक लेल प्रस्थान केलक जे आब गाममे राजा अप्पन घर-परिवारकेँ देखत आकि हमरा सभक मदति करता। सभ परजा अपन गाम छोड़ि शहरमे कमाए लागल, अओर जे राजाक हरोड़ीमे काज करैत छल से ओ जमीन जजाति सभ राजासँ लिखबा कऽ परजा अपन नाम कऽ लेलक। आब ने राजा ओइठाम कियो परजा हरोऊरी खटैत अछि। किएक तँ दोकानमे एक टका सलाइ दै छै आ राजा ओइठाम भरि दिन धान-दाउन करलापर पाँच किलो धान बोइन दै छै, से नै तँ आब गाम छोड़ि शहरेमे काज करब, बड़ बढ़ियाँ मन भेल तँ काज केलक, नै भेल तँ अप्पन चारि दिन बैठल छी, दोसर किछु करै अछि, ई सभ सोचि राजा अओर परजामे कोनो महत्व कनीक-कनीक सभ हटल जाइत अछि, लोकक मनमे आलस्यक प्रवेश भऽ गेल, केकरो नै केकरो से मतलब रहि गेल। मिथिलांचलक राजा छल राजा जनक जे अप्पन राज्यमे खेतसँ खलिहान तक परजाकेँ कखनो दुखी नै देख सकै छल। जे कोनो मनमे कल्पना करैत छल परजा तँ ओकरा सबहक राजा जनक पूरा करैत छल, केकरो कोनो तरहक असुविधा नै होइ, तेकर लेल तत्पर रहै छल। एक बेर राज्यमे भीषण सुखार भऽ गेल जे दू की पाँच साल तक बर्खा नै भेल, धरती फाटि-फाटि गेल तँ महराज जनक यज्ञ कऽ कए अपन परजाक हितक लेल भगवान इन्द्रदेवसँ प्रार्थना केलनि जे हमरा बचाउ, हमरा परजापर दया करू, हमर परजा मरि रहल अछि, आइ कतेक मास भऽ गेल हमर परजा सभकें अन्न खेला, हे भगवान, हमरा अओर हमर परजापर दया करू। अओर एतेक सभ बात सुनै छेलै, भगवान अओर भक्तमे यएह व्यवहार होइक चाही अओर यएह सत्यता अपनेबाक चाही, ओहीसँ प्रकृति सेहो गवाही दैत अछि जे मनुषमे भगवानसँ केहन भेदभाव हेबाक चाही। सभ गदगद तँ भगवान अओर संसार सुखदमय रहत मुदा अखन तँ सभ अपन अपन पेट भरि गेल तँ दोसरक पेट भरलै कि नै तेकर चिन्ता के करैत अछि। पहिने ने एतेक बी.पी.एल. छेलै, अओर ने एतेक ए.पी.एल. सबहक गुजर समान होइ छेलै, सभ जऽ अओर जनेरक खिचरी खाइत छेलै, भऽ गेल कहियो तँ केकरो एहने नीक घर रहैत छल जे भातक मुँह देखैत छल, अखन देखू जे गरीब अमीर एक समान खाइ-पिबैत अछि। दालि भात अओर तरकारी प्रेमसँ खाइत अछि। मुन्ना जी (उपनाम, एहि नामे मैथिलीमे लेखन), मूलनाम मनोज कुमार कर्ण, जन्म–27 जनवरी 1971 (हटाढ़ रूपौली, मधुबनी), शिक्षा–स्नातक प्रतिष्ठा, मैथिली साहित्य। वृत–अभिकर्त्ता, भारतीय जीवन बीमा निगम। पहिल विहनि कथा–‘काँट’ भारती मण्डनमे 1995 पकाशित। पहिल कथा–कुकुर आ हम, ‘भरि रात भोर’मे 1997मे प्रकाशित। एखन धरि कएक दर्जन विहनि कथा, लघु कथा, क्षणिका, गजल आ लघुकथा सम्बन्धी आलेख प्रकाशित। विशेषः- मुख्यतः मैथिली विहनि कथाकेँ स्वतंत्र विधा रूपेँ स्थापित करवाक दिशामे संघर्षरत। मुन्नाजी- माँझ आंगनमे कतिआएल छी (अपन गप, गजल- १-५०, रुबाइ- १-११) अपन गप मोन पड़ैए बर्ख १९८९ क जून मासक एकटा राति। हम आ प्रेमचंद्र पंकज हितेन्द्र पुस्तकालय राजे ( दरभंगा) द्वारा आयोजित कविगोष्ठीसँ घुरि गाम अबैत रही। बाटमे ओ (प्रे.पं.) गजल लिखबाक चर्चा केने छलाह आ हम हुनका गजल सुनेबाक आग्रह केने रहिअन्हि। ओ गायक नै गजलगो छथि मुदा ओ गाबि कऽ सुनबैत रहलाह, आ हम एकक बाद एक आग्रह करैत गेलिअन्हि। हम ओइ गाओल शेर सभसँ प्रभावित भेलौं आ गजल लिखबाक निश्चय केलौं। गाम पर आबि एकहि रातिमे लगभग सात-आठ टा गजलक प्रारुप तैयार केलौं। सत्यतः हमरा पद्यमे रुचि नै छल। कविता दिस सोच जाइते नै छल। मुदा तुकान्त जोड़ैत छलौं। आब ऐठाम अहाँ सभ जरूर बुझि गेल हेबै जे कवितामे अतुकान्त कविता दिस हमर सोच नै छल। आ उपरको लिखित कविगोष्ठीमे जखन हमर कविता पढ़बाक बेर आएल तँ हम कविता नै किछु क्षणिका पढ़ने छलौं। क्षणिका आ हाइकू हम शुरुएसँ लिखैत छी। तुकान्त जोड़बाक आदति सन पड़ि गेल छल। जकर कारण छल स्थानीय मंच संचालनक दायित्व। मंच सांस्कृतिक आ राजनैतिक दुनू छल। सांस्कृतिक कार्यक्रममे हमरा अपन गाम (हटाढ़ रुपौली) मे ई काज अढ़ाएल जाइत छल आ हम अपनो ऐमे गंभीर रूपेँ रुचि लै छलौं। हमर मंच संचालनमे सभ प्रकारसँ सहयोगी रहैत छलाह- श्री शैलेन्द्र आनंद, ललनजी झा नंगड़ू, भवनाथ भवन, प्रेमचंद्र पंकज, कुमार राहुल आदि। ऐ मंच संचालन लेल हम तुकान्त करैत छलौं आ तँए गजल दिस रूचि जागल। गजल दिस रूचि एला पर प्रेमचंद्र पंकज जी सँ एकाध बेर अपनामे चर्च केलौं तँ ओ मतला, काफिया आ रदीफक चर्चा केलाह, मुदा पहिल खेप हेबाक कारणेँ हमर मगजसँ बहरा गेल। ओना हुनका गजल लिखब आ हमरा सभकेँ दू घंटीक बीच सुनेबाक क्रम सन बनि गेल छल। तकर कारण छल जे दुनू गोटे वर्ग संगी रही आ दूनू मैथिली साहित्यमे प्रतिष्ठाक एकहि सत्रक छात्र रही। शुरुआतहिसँ विहनि कथामे घनघोर रुचि छल। मुदा तुकान्त आ गजलक अछैतो ओइमे कमी नै एलै। आ जँ कोनो समयमे जे गजल फुरा जाइत छल से लीखि डायरीमे चौपेति दैत छलौं, तकरा बाद ओकर कोनो चर्च नै। एकर कारण छल, हमरा गजलक शास्त्रीय पक्ष नै बूझल छल। दिल्लीमे मिथिलांगनक एकटा कार्यक्रममे सुन्दरम जी द्वारा गाओल गजल फेरसँ एक बेर हमरा डायरीमे चौपेतल पुरान गजल सबहक मोन पाड़ि देलक। आ तकरा बाद हम फेरसँ गजल लिखबामे जुटि गेलौं, जे आ आब ई विहिनि कथे जकाँ निर्बाध चलि रहल अछि। आ एक बेर फेर हम फोन पर प्रेमचंद्र पंकज जीकेँ किछु गजल सुनेलौं आ ओइ महँक कमी बतेबाक आग्रह केलौं। पंकज जी कमी बतेबाक बदलामे हमरा कहलाह जे अहाँ गजेन्द्र ठाकुर जीसँ कमी पुछिऔन्ह, हुनका गजलक बारेमे बहुत किछु बूझल छन्हि। ओना ओइसँ किछु दिन पहिने हम विदेह आ अनचिन्हार आखर पर गजेन्द्र ठाकुर जीक आलेख देखने रही आ प्रभावित सेहो भेल रही। मुदा हमरा हिसाबें ओ आलेख ओइ समयमे हमर लेभलसँ बहुत उपर रहै तँए हम पंकज जीसँ सलाह मँगने रही....... मुदा खएर........। तकरा बाद हम अपन पुरान गजल बिना किछु काँट-छाँटकेँ विदेहमे प्रकाशित हेबा लेल पठा देलौं, जकरा बहुत रास संशोधनक संग विदेहमे प्रकाशित कएल गेलै। आ जखन हम अपने अपन गजलक संशोधित रूप पढ़लौं तँ बहुत नियम अनायासे हमरा सोझाँ आबि गेल। विदेहमे प्रकाशनक पछाति आशीष अनचिन्हारजी जोर दैत गजल लिखबैत रहलाह। ओइपर मंथन, संशोधन करैत रहलाह। जँ हम अपन गजल यात्राक संक्षिप्त रूप कही तँ प्रेमचंद्र पंकज जीक गजल लेखनसँ अप्रत्यक्ष रूपेँ आ गजेन्द्र ठाकुर आ आशीष अनचिन्हार जी सँ प्रत्यक्ष रूपेँ सहयोग भेटल। आ अही सहयोगक बलेँ आइ हम अपन पचास गोट गजल आ किछु रुबाइ अहाँ सबहक सोझाँ अनलौं "माँझ आंगनमे कतिआएल छी" केर रूपमे। उपरोक्त सभ गोटेकेँ हार्दिक आभार व्यक्त करैत पाठकक निष्पक्ष विचार चाहैत छी। कोनो कमी पर निर्बाध टिप्पणी केर स्वागत अछि। हँ ऐ संग्रहक किछु गजलमे चारिए टा कए शेर अछि जे कि गलत अछि, कायदासँ गजलमे कमसँ कम पाँचटा शेर हेबाके टा चाही मुदा ऐ प्रकारक त्रुटि लेल मात्र हमही टा जिम्मेदार छी आ भविष्यमे एकर सुधार जरूर हेतै। गजल 1 बनलै सरकारी किरानी जिनगी नेहाल भऽ गेलै प्रूफ पढ़ि संपादक कहेबा लेल बेहाल भऽ गेलै रंगकर्म केर ज्ञानक बिन पिटए डंका सगरो मैथिली रंगकर्म क्षेत्रक ओ बुझू दलाल भऽ गेलै मारि अंघोरिया तकै प्रायोजक खरचा-पानि लेल मैथिली केर नाम बेचि बुझू जे मालो-माल भऽ गेलै रंगोत्सवमे लागै सर्वभाषा रंगमंचनक भीड़ देखू जे अपन भाषाक नाटकक अकाल भऽ गेलै आखर---19 2 धार एखन धरि तँ उफानपर अछि लोक ताका-ताकी करैत बान्हपर अछि नहि जानि किओ केखनो जाएत भसिया किओ कोठा पर किओ मचानपर अछि कोठो बलाकेँ तँ नै बकसथिन्ह कमला दूनू बगलीक बान्ह कटानपर अछि भोर होइते मचि गलै गरद-मिसान कोठा मड़इया दूनू भसानपर अछि आखर-15 3 फाटैत छल जतए मेघ आ जमीन पहुँचल पहिने ओतहि अभागल बुझनुक बुझए सियार अपनाकेँ जा धरि छल टिकल नीलमे राँगल फँसि गेल अपनेसँ व्यूहमे बेचारा नै भेलै लाठी अपने ओकरा भाँजल जतऽ शेर राज करै छल पहिनेसँ बुधियार छल ओ पहिनेसँ माँजल सियार जा कऽ पढ़ौलक मंत्र जखन प्रजा शेरसँ छल पहिनेसँ साधल आखर---14 4 बिगड़लो रुपकेँ नकल करैए आब लोक नकलोकेँ यथार्थ संजोगि राखैए आब लोक दायित्व बुझैए मात्र अपन स्वार्थपूर्ति लेल अनकामे अपनाकेँ विलगा लैए आब लोक धुँआधार हँकैए गप्प लोक कल्पनाकेँ भावेँ यथार्थमे अपनाकेँ सुनगा लैए आब लोक जीबनक दशा-दिशा तय करैए मात्र स्वयं भाइ देखावामे स्वयंकेँ हेरा लैए आब लोक देखू पहिनेसँ आरक्षित भऽकेँ जिबैए सभ मुदा बेर पड़ने देखार होऐए आब लोक स्तरसँ उपर जीबाक भऽ गेलैए परिपाटी पाइक फेरमे भ्रष्टाचारी भेलैए आब लोक आखर---17 5 नेताक फाँसमे फँसल ई भारत भाए-भैय्यारी जकाँ देखू छटपटा रहल माछ भरल अपियारी जकाँ लोक तँ कटैए घिसिऔर महँगाइसँ मारल भऽ कऽ भावे मुदित मुदा स्वर निकलैछ फकसियारी जकाँ आर्थिक उदारीकरण कमाइ आब लाखमे होइछ मुदा वैश्विक परिस्थितिमे मोल लागए हजारी जकाँ बिहारक सिरखारी बदलि गेल सन लगैए आब श्रमिक घटलासँ कंपनी-मालिक लगै बिहारी जकाँ आइ धिया-पुता घुमैए प्रशिक्षित बेरोजगार भऽ कऽ महगाइमे आंशिक लाभ पाबि बुझैए दिहाड़ी जकाँ आखर---20 6 बुझाइ नै अछि बात जे कोन अभिप्राइ छै कटै अपनोकेँ पाछू ने कोनो सम्प्रदाइ छै गनै अछि पाइ केर सदिखन आँखि खोलि काजक बेरमे देखिऔ लागत औंघाइ छै मातल छै दिनोमे कैंचाक जोगारक लेल मंगनी बला काजकेँ पुछिऔ तँ खौंझाइ छै सटू किरानी बाबूसँ घूस केर गप्प लेल पाइ लैते अनर्गलो काज पूरा भऽ जाइ छै संत रहै छै सभ उपरसँ देखलापर पकड़ेला पछातिये तँ किओ चोर कहाइ छै आखर---16 7 कएल कोनो कुकृत्यसँ लोक नै आब ढ़ठाइए वएह कुकर्मी सभ-सभ ठाम आब ठठाइए लोक पबैए रोजगार तँ बुनैए नव समाज जतऽ जा कमाइए ओतुके भऽ आब सठिआइए उघरल लोक सभकेँ छुट्टा भऽ घुमैत देखब मुदा झँपलाहा लोक जे लाजे आब ढ़ठिआइए नीक काज केनिहार सभ झँपले रहैत अछि नीच काज केनिहारक झंडा आब उधिआइए आखर---18 8 आइ सगरो समाज लागै दलाल छै पाइ लेल अपनोकेँ करै हलाल छै रखने रहै अछि मुट्ठीमे माटि नुका कहि कऽ सोना बेचबा लेल बेहाल छै आधुनिक दौड़मे अछि मातल सन आर्थिक उदारीकरणकेँ कमाल छै टल्हाकेँ किनैए सोना बुझि लोक सभ विदेशी ब्राण्ड-नाम पाबिए बेहाल छै खुलल पोल छलै दलालक जखने इंटरपोल धरि मचल बबाल छै तखन सरेण्डर करै तस्कर सभ कहै छै जे इ देशभक्तिक सबाल छै भरि लेलक अछि स्विस बैंकक खाता जोड़ि हाथ कहै गलतीकेँ मलाल छै आखर---14 9 ई दौड़ए नेतबा दिल्ली धरि जेना भैंसी दौड़ै मालक थरि खाँहिस तँ भरब जेबी छै दूनू छोड़ै ने कोनो कसरि बीत नापि कऽ हाथ गनाबए छै एकल नापिक नै असरि भरल पंचैती माथ झुकाबै ई जान बचाबै कोना ससरि बाँटै धरमकेँ दुनू मीलि कऽ कूटि-चालि तँ जाइछ घोसरि आखर---11 10 आजुक युगक कथा पुराण सुनू जाहिसँ पेट भरए सएह गुनू नै करू देखाँउसे दूइर समय स्वंय कोनो समस्याक निदान चुनू जँ लागल पसाही अनका घरमे तकरा लेल अहाँ नै कपार धुनू घर तँ बचाउ सदिखन अप्पन मुदा तेँ दोसरा बेर नै आँखि मुनू आखर—13 11 माछ मँगैए आरक्षण गणतंत्रक लिहाजसँ माटि-पानि छोड़ि देलक आब चलैए जहाजसँ छोड़ि भरोसा जालकेर निकलै छलै ओ गाँजसँ एलेक्ट्रीक-मशीन आबि करैए बहार माँझसँ कनिक्के पानि पसीन नै निकलैत छी बैराजसँ बर्फक बीच जीबि आब खुश भऽ गेलौ सुराजसँ ओतौ नेता भेल प्रविष्ट जुटै छी एक अवाजसँ मनुक्खो डरैत अछि ऐ सिंगी-माँगुर जाँबाजसँ आखर---18 12 जुग बीति गेलै लगबैत जोगारमे मुदा पता नै की लीखल छै कपारमे दिन बितेलौं दोस्तीए निमाहि हम तँ तैयो छल हत्यारा अपने भजारमे भाइ जे काटैए गरदनि सदिखन ओ जे माथा टेकैए मंदिर-मजारमे हे एना नै चलू हाथ छोड़ि बाटपर बहि जाएब कहियो उन्टा बयारमे जे बुझतै बितैत समय केर मोल मुन्ना ओकरे दिन बिततै बहारमे आखर-----14 13 जे चुबै छै ठोर-आँखिसँ ओकरा ताड़ी बुझू जँ पीतै केओ संसारमे तँ बरबादी बुझू आब तँ एहने बिआहक परिपाटी बुझू लिव-इन-रिलेशन वाली घरवाली बुझू भाइ जेबीमे घुसल हाथक की महत्व छै तालसँ ताल मिलए तँ ओकरा ताली बुझू निराशा संग आशापर टिकल छै दुनियाँ जँ देखलहुँ भगजोगनी तँ दिवाली बुझू बहुतों अछि संसाधन देश-परदेशमे मुन्ना अछि निकम्मा तँ ओकरा मवाली बुझू आखर-----16 14 ई लोक कहैत हो किच्छो मुदा एहन बात भेल छै जाहि नगरसँ गेल बिहारी ओ मसोमात भेल छै आएल सुबुद्धि अपन श्रमकेर बूझल महत्व आब तँ अपनो राज्यमे विकासक परात भेल छै देखू जकरा नामपर माँगल गेलै सुख-सुविधा देशमे ओ बेचारा तँ बहुत दिनसँ कात भेल छै बोनिहार बिन जे डुबल कतेको कंपनी देशमे आब बुझू जे सभ अहंकारीकेँ पक्षाघात भेल छै दोसरक बलें रहैए ओ बहुत कुदैत-फनैत मुन्ना तँए साहित्यो ओकर बापक जिरात भेल छै आखर-----19 15 आब कविता आ गीत नै गजल चाही अपहर्ता चाँगुरसँ सकुशल चाही ठोरक मुस्की बनल रखबाक लेल धन आ जन सबहक सबल चाही जहिया धरि रहत पेट खाली सन गीत संगीत नै पेटक अमल चाही कते आश करू हुनकर मड़ैयाक आब अपन बनाओल महल चाही तकनीकी रुपें भऽ रहल छी सबल तँए ई भ्रष्ट व्यवस्था बदलल चाही आखर-----14 16 छोटको ठेससँ नै सबक लेलहुँ हम तँए बड़का खाधिमे खसि गेलहुँ हम जोगाड़ तँ सभ छल जिनगीमे हमरा जेबी छल छोट तँए नै लगेलहुँ हम आब तँ माँझ आंगनमे कतिआएल छी अपने चालिसँ आब बेरा गेलहुँ हम नोर तँ खसैए मुदा मजा सन लगैए केहन नीक प्रेमक दुख लेलहुँ हम बड्ड धाह छल जे ई करब ओ करब मुदा नौकरीकेँ फेरमे सितेलहुँ हम आखर-----15 17 सभ उमेर वर्गकेँ प्रेम चाही मरितो धरि कुशल-छेम चाही लगेबै मोनमे करेजमे आगि तैं तोहर जौबनक टेम चाही डाहसँ पहुँचब कोस-दू कोस आगू बढ़बा लेल तँ प्रेम चाही लोकसोंझा-सोंझी नै करत बात पीठक पाछू बड़का ब्लेम चाही नहि कटतै संयमसँ जीवन जीबा लेल नित नव गेम चाही आखर-----12 18 केकरो अंगियाबी तँ गात बनि कऽ कहियो जँ बही तँ बसात बनि कऽ घर अछि उदाम तँ कोनो बात नै अहाँ जँ झाँपी तँ खढ़-पात बनि कऽ बदरी लादल रहै कोनो बात नै जदि बरसी तँ बरिसात बनि कऽ जँ रखबै भूखल तँ कोनो बात नै जँ भरब पेट तँ खैरात बनि कऽ आब नै मानै छै केओ ठोरसँ ऐठाँ तँए तँ सगरो जाउ लात बनि कऽ आखर-----13 19 नजरि उठा कऽ देखबै तँ खाली बुझाएत ई दुनियाँ नजरि गरा कऽ देखबै तँ सभ देखाएत ई दुनियाँ अहाँ केखनो नै करू सवारी दू नाहक एकै बेरमे जँ करबै तँ बाबूबिच्चे धारमे डुबाएत ई दुनियाँ संगतुरियाकेँ दबेबाक पाप भरल अछि मोनमे जानू केखनो अन्हरियामे धकेलि आएत ई दुनियाँ ऐठाम भ्रष्टाचारी केर नेतमे खोट अछि सदिखन आब तँ कहियो एकर कुर्सी पलटाएत ई दुनियाँ आखर-----20 20 हियासँ हिया मिलाउ नजरिसँ काज नै चलत जोगार बैठकी केर उठा-उठी राज नै चलत समय दूनू गोटेक लेल अछि अन्हरिया बला जँ मोनमे इजोत नै जागत तँ काज नै चलत समेटि कऽ अपन बाँहिमे बिहुँसैत रहू अहाँ केवल जँ मूँह निहारब तैसँ काज नै चलत अंगिया कऽ अपन संबंधकेँ पूर्ण विराम दिऔ सिनेहक बीच कौमा देबै तैसँ काज नै चलत अहाँ पाबि लिअ पहिने ऐ समाजसँ अधिकार दूनूक लिव-इन रिलेशनसँ काज नै चलत आखर-----18 21 मूँह पर मुस्की छलै बिहानसँ पूर भेलै इहो कमैनी बथानसँ टुग्गर तँ बुझै नेनेसँ अपनाकेँ दुब्बर नै रहलै भेला सियानसँ जिनगीक छँटलै अन्हरिया आब ई भेटल नव तकनीकी ज्ञानसँ धरमक लेल करए काटा-काटी देवतो दुखी अपन अपमानसँ अन्नक जगह लेलक फास्टफूड डरैए नै केओ अन्नक जिआनसँ प्रकृति बदलि रहल छैक सौंसे लोक काज करैए योग आ ध्यानसँ आखर-----13 22 लोक भऽ लोककेँ दुश्मन बुझू खाली जमाना अप्पन छै बेर पर मित्र नै बुझै केकरो शत्रु मुदा छप्पन छै बेर-बेगरते पएर पुजैए पाछु देखाबैए छूरी तस्करीक मौका नै छोड़ए तैसँ नै बुझू वीरप्पन छै नजरि गरा रहैए करैए हमला अवसर ताकि सोंझा आबि माथ झुकाबै ईएह ओकर बरप्पन छै उपरका मोनसँ साफ अछि भीतरसँ तँ साँपे बुझू जँ ओ गाएत भजनो लागत भासमे कलछप्पन छै आखर-----20 23 आधुनिक तकनीकिये केओ सेर-सवा सेर अछि पारंपरिक वितपनि भेनाइ सेहो अन्हेर अछि मुदा ई परंपरे निमाहता करत जिनगीकेँ जेना नाव सदिखन तकैत धारक कछेर अछि वैश्वीकरण केर दौड़मे सभटा भेल छिन्न-भिन्न जतै देखू आँखि उठा ततै लागल कूड़ा ढ़ेर अछि लोक तैयो तँ लगबैत सन देखाइए अंध-दौड़ मुदा वास्तविक संस्कारे-परंपरा बेर-बेर अछि आखर-----19 24 लिव-इन-रिलेशन लेल प्रेम उधार चाही हम रही नै रही मुदा प्रेमी जिम्मेदार चाही सभ तँ विलगा लैए सेहन्ता पूर भेलापर ओ थकनी उतारैए तँ केकरो व्यापार चाही उदारीकरण पहुँचल हमर गाम धरि केकरो समाने तँ केकरो दोकानदार चाही पीठपर तँ घोंपैए जे छूरा बहुत आदमी मारए सीनामे हमरा एहने भजार चाही आखर-----17 25 सूचनाक तंत्र आब सूचित कऽ रहल अछि जे लोक संवेदनहीन सन भऽ रहल अछि बनि पछिलगुआ धरैए माइक मंचपर सौंसे चमचागिरीक नाच कऽ रहल अछि आब एकरा कोन प्रभाव कहबै हम बाबू पएर पकड़िनिहार गट्टा धऽ रहल अछि पता नै कोन बेत्थे मुन्ना घुमैए सगरो नग्र एम्हर तँ हेंजक-हेंज मजा लऽ रहल अछि आखर-----17 26 शब्दसँ हटि शब्द-सारसँ जे काज चलाबैए लोक अर्थकेँ अनर्थ कऽ तँ आब पसाही लगाबैए लोक सबहक चित्त तँ स्थिर नै रहि पबै छै सदिखन जिन्दो लोककेँ मरल कहि फायदा उठाबैए लोक सभटा आब बिसरि जाइछ लोक स्वार्थ-सिद्धि बास्ते नाङटोकेँ खुजल मंचपर नचाबऽ चाहैए लोक बिसरि औकाति बेसियोमे अतृप्तिक भान होइ छै तखन भिजलो काठकेँ धधका तापऽ चाहैए लोक शब्दक अर्थक ज्ञान वास्ते पलखति नै होइत छै मुदा शब्द जोड़ि रचनाकार कहाबऽ चाहैए लोक आखर-----19 27 जकरासँ लय मिलए ओ गीत बुझू जकरासँ स्वर मिलए ओ मीत बुझू सिनेही तँ एहिठाम भऽ सकैए केओ जकरासँ नजरि मिलए प्रीत बुझू आधुनिकताकेँ फेरमे बहि नै जाउ परंपराकेँ सदिखन अतीत बुझू पक्षधरसँ राखू अपनाकेँ बचा कऽ विपक्षीक सभ बातकेँ नै तीत बुझू आखर-----14 28 अछि ई दुनियाँ लगैत जोगारसँ बाँचल निठ्ठलो तँ एतऽ नै अछि व्यापारसँ बाँचल ऐठाँ पुरुषो रहैत अछि धंधामे लागल अछि केओ नै एतऽ ऐ अधिकारसँ बाँचल पसरि गेलैए सगरो गाममे फास्टफूड आब सभ अछि तीमन-सचारसँ बाँचल सभ अपनाकेँ पूरे काबिल बुझैए ऐठाँ केओ नै अछि ठक आ बुधयारसँ बाँचल आखर-----16 29 विषवमनसँ विषपाइ बनू नै केखनो अहाँ करू शुद्ध मोन समय अछि एखनो सदा समय केर संग डेग बढ़ाउ अहाँ प्रगति केर मोकाम लगीच अछि एखनो अनीति संग नैतिकताक पाठ नै पढ़ाउ नेतकेँ बदलबाक समय अछि एखनो केखनो ने पैसू यै केकरो मोनकेँ भीतर खाँहिसमे पैसबाक समय अछि एखनो ताकू नै मलार केकरो सुखाएल मोनमे रंग-रभसक मोन बाँचल अछि एखनो आखर-----16 30 जीता-जिनगी श्मसान सन लगैए लोक मरियो कऽ फिरीसान सन लगैए लोक महगाइसँ खूने नै हड्डियो सुखाइए आब झुलैत मचान सन लगैए लोक नित दाँव खेलि बितबैए समय सभ हक छीनि बलबान सन लगैए लोक देखनिहारो आब नै अछि केओ केकरो सहारा दऽ भगवान सन लगैए लोक लगा कऽ लगानी मठोमाठ भेल छी हम घुरबैमे यजमान सन लगैए लोक आखर-----15 31 नै जानि केकरो बड़प्पन केना सम्हारू चारि तहमे झाँपल अछि कोना उघारू सभ कर्तव्य अछि माटिमे गाड़ल सन गाड़ल वस्तुकेँ अहीं कहू कोना उघारू दुर्गति पहिने तखन ई सद्गति आबै कहू दुर्गति लोकक सोंझा कोना उघारू तेसर क्रम शील केर अछि फरिछाबै कहू केकरो अश्लीलताकेँ कोना उघारू चारिम नजरिक फेरमे डुबा रहल नजरे कड़गड़ तकरा कोना उघारू आखर-----15 32 हमरा तँ सुख भेटैए गजलक गाँतीमे ओहिना जेना जाड़मे गर्मी भेटए गाँतीमे बगए-बानिसँ बुझू जे नन्हकिरबा लागै अपन सभटा दाढ़ी ताकी नन्हकी नाँतीमे दारू-दरबार लगा रही निसाँमे मातल हम बखानी सत्य सभटा उठल आँतीमे अप्पनकेँ तँ दूर हटा कऽ सही रंगदारी रंगदारक लेल धार चढ़ेलौं दराँतीमे आखर-----16 33 केलक रौदी कहियो दाही कहियो छोड़लक कहियो उछाही कहियो दोसरक बेगरते देल लगानी अपना बेगरते उगाही कहियो केसक बिन ने हएत समझौता मोकदमा कहियो गवाही कहियो हम तँ घूर जड़ेलौ गर्मी मासमे मिझाएल आगिसँ पसाही कहियो खद्धधारीक इशारे जुलुम करैए अफसर तँ छल सिपाही कहियो आखर-----13 34 उठल कछमछी तँ पेदार भऽ गेलौं बीतल उमिर आब बेकार भऽ गेलौं पढ़बाक समय गेल रंगदारीमे आब लेखनीक जे वफादार भऽ गेलौं धुँआइत देखा रहल बाट सगरो जेना लगैए सूखल सेमार भऽ गेलौं जीवन काटब भेल बहुत मोश्किल आब लागए जेना मँझधार भऽ गेलौं आखर-----14 35 धरती पर अकछा लोक जाए चाहैए चान पर डेराइए कुटुकचालि बन्द हएत दलान पर लोक नहि चाहैए बेर-बेर अपन परिवर्तन आब तँए तँ निर्भर रहैए अपने समान पर प्रदूषणसँ उकताइए बचऽ चाहैए बेमारीसँ मुदा की ओ ओतए जा कऽ रहि पाएत बिछान पर दूरक ढ़ोल सोहाओन बुझि उपर जाए चाहैए अनचाहा ऐय्याशीसँ अबैए पुरने मकान पर आखर-----19 36 लऽ कऽ बैसल थातीकेँ उपहार करैए ओकर पाइसँ ऐश सभ यार करैए आब धएल छै संबंधे लेल जतियारी तँए पसारी बुझु जे उपकार करैए लोक तकैए आब सुविधा जनक वस्तु तैयो गरमेबाक काज पुआर करैए खपल जा रहल समाजिक छोट-पैघ पाइ बला गरीबक मनुहार करैए सभ्य जा रहल अछि कतिआएल एतऽ शांति बँटैकेँ सभ काज हुड़ार करैए आखर-----15 37 करै अछि किलोल माथा चढ़ि अबै नै अछि केओ आगू बढ़ि मानवता भऽ रहल विलीन दै अछि उपराग कोठा चढ़ि जेना गढ़ैछ गहना सोनरा पड़ोसिया सुनाबै बातो गढ़ि गढ़ब तँ केहनो गढ़ाएत मुदा सोझगर हएत मढ़ि आखर-----11 38 बिनु पीनहुँ नशामे मातल अछि ई दुनियाँ शोणिते भीजल जेना काटल अछि ई दुनियाँ सभ कहै अछि दोषी एक-दोसर लोककेँ तें अपने सही कहऽमे लागल अछि ई दुनियाँ मंद-मंद मुस्की मुदा ठोर अछि काँपि रहल सिनेहसँ सिक्त मुदा फटल अछि ई दुनियाँ नजरि बचौने रहैए अपने लोक आब तँ फाँटसँ फटिआएल साटल अछि ई दुनियाँ राखू अपन विचारकेँ संजोगि कऽ सदिखन अहीं सन लोक लेल ठाठल अछि ई दुनियाँ आखर-----17 39 देखू मुसडंडा अराम करैए लोककेँ जीयब हराम करैए भरि दिन करैए ओ काटा-काटी साँझेसँ मुदा राम-राम करैए चोर-उच्चकाकेँ छै अड्डा एतए ओ दसमंजिला धराम करैए सभ्य रहैछ नुकाएल जतए असभ्य जिनगी विराम करैए आखर-----12 40 नजरि झाँपि देहकेँ बजार बना लैए बिनु बिआहो केकरो भतार बना लैए मानू नै छै सामर्थ्य बुझबाक यथार्थकेँ तें कल्पनेमे उड़ि कऽ संसार बना लैए सत्य कही तँ जिनगी बेकार छै लोकक गाम नै शहरमे परिवार बना लैए रहै छै आगि जखन स्वार्थ केर मोनमे तखन गदहोकेँ ओ भजार बना लैए गुजारि उमेर धरैए बानि समाजक ता धरि तँ जिनगीकेँ पहाड़ बना लैए आखर-----15 41 पहिरु गहना एना जे झमका दिए नेह जोरू एना जे भाग्य चमका दिए लिअ ने विराम कहियो जिनगीमे जोश बैसनाहरकेँ सेहो छका दिए चलू तँ सदिखन समय केर संग एना बैसू जे जिनगीकेँ गमका दिए संगी केहनो भेटए तँ डर नै करू संग धरू एहन जे रमका दिए करू अफसोच ओहन आदमी पर जे सबहक जिनगीकेँ ठमका दिए . आखर-----14 42 लोक तँ लजाइ छल पहिने छोट काज पर मुदा आइ काज नीक कऽ उड़ैए जहाज पर जाति मेटा लोक आइ रहरहाम भऽ जीबैए तैं केकरो ध्यान नै जाइ छै अनसहाज पर बन्न भऽ अपने घरमे जीबैए नवका लोक ओकर मोन कहाँ आब जाइ छै रेवाज पर पहिने मनुखमे देखाइत छल मनुक्खता आब छैक टिकल मोन दोसरा अवाज पर आखर-----17 43 अपन देशक ऐ रोजगारीकेँ खसबैए सरकार पूँजी निवेशक नामे विदेशीकेँ बसबैए सरकार हाट-बाजारक महत्व नै बूझै माँल बुझै मूल्यवान छोट-छोट व्यपारी के तँ भीतर धसबैए सरकार लगा पसाही देश भरिमे करबैए जन आंदोलन पीबै बला पानियोमे कचराकेँ भसबैए सरकार लोकक पैसा-कौड़ी केर इंतजामसँ लड़ैए चुनाव अप्पन कुर्सीक लेल जनताकेँ फँसबैए सरकार आखर-----20 44 पश्चिम केर ड्रेसमे मेल लगैए फीगरसँ देखिऔ फीमेल लगैए फैशन आ चालिसँ अछि आधुनिक तैं ई पत्नीसँ बेसी रखेल लगैए ई बजार भेल जाइए देहगर तँए सभ देह केर खेल लगैए बाहरसँ चिक्कन-चुनमुन देखू भीतरसँ भारतीय रेल लगैए आखर-----13 45 अपन माटि-पानिक मोल पानिमे भसा गेलैए तँए तँ आब शहरुआ रंग धौंस जमा गेलैए अफसर आ बबुआनी भऽ गेलैए मुट्ठीक खेल सभ धिया-पुता तकनीकी ज्ञान लऽ रमा गेलैए देहकेँ जे खूब धुनियो कऽनै पेलक बोनि ऐठाँ शिक्षाक प्रतापे ओकरे धिया-पुता कमा गेलैए गमैया लोक आबो जोगेने अछि पुरखाक थाती शरहक चपेटमे आबि नवका झमा गेलैए आब नै लुलुआबैए लोक अपन पड़ोसीयाकेँ पाइसँ पटि सबहक घर गम-गमा गेलैए आखर-----18 46 नेनाक नेनमतिसँ जँ कष्ट होइ छै केकरो-केकरो मुदा जँ सियान करै नेनमति तँ कष्ट हेतै सगरो बुद्धि तँ जीबाक सभ लग छै राखि तथिआएल बुझू मुदा बुद्धि बलें मात्र जीबैत देखै छी केकरो-केकरो डरैए अन्हरियासँ सभ तकैए बाट बिहान केर अन्हारसँ विलगि कऽ उजास भेटैए केकरो-केकरो जँ हियाकेँ हेड़ाबए चाही तँ हेड़ा लिअ कतौ-केखनो हियासँ हिया मीलि पबैए केखनो कऽ केकरो-केकरो जगलोमे जँ देखि लैत अछि सपना केखनो-केखनो सूतलमे सपनाक यथार्थ भेटैए केकरो-केकरो आखर-----20 47 पहिने ताकि कनडेरिए फँसेलौं अहाँ पछाति ब्रम्हचर्य उपदेश देलौं अहाँ जिनगीक सभ बाट जे लगै छै मलिन हमर जिनगीमे पैसि कऽ हँसेलौं अहाँ हम तँ बिलटल रही एकसर भऽ कऽ हमरा सन ऐ निकम्मासँ बन्हेलौं अहाँ जिनगी तँ बन्न किताबक पन्ना रहए मुदा खोलि एकरा सौंसे तँ देखेलौं अहाँ आखर-----15 48 बड्ड मजा जँ अबैत छैक मुफ्त मालमे मुदा दुख होइ अछि जीबैत मलालमे सहि ने सकब समाज केर उपराग नीक छल जे जीबैत रहितौं अकालमे मोन ने भरैत छल अबैत वेतनसँ आब हम अपनाकेँ गानै छी दलालमे अपन जिनगी आगू बढ़ेबा लेल दोस लागल छी हम तँ दोसरक हलालमे आखर-----15 49 केखन धोखा देत ई समान बजरुआ गारंटी नै ई केखनो हँसाएत केखनो देत कना गारंटी नै सरकार बनाबै एहन योजना गरीबक लेल केखन जेतैक गरीबक अस्तित्व मेटा गारंटी नै केकरोसँ किछु बाँचल नै छै ऐ दुनियाँमे आब बड़कोसँ किछु बाँचल नै छै ऐ दुनियाँमे आब सहलहुँ सभ दुख जे भेटल अनकासँ मुदा अपनोसँ किछु बाँचल नै छै ऐ दुनियाँमे आब सभ जेतै बिका खाली दामटा सही हेबाक चाही सगरोसँ किछु बाँचल नै छै ऐ दुनियाँमे आब अगड़ा केर नाम पर भेल बहुत राजनीति पिछड़ोसँ किछु बाँचल नै छै ऐ दुनियाँमे आब 50 पहिलुक शब्द कौआ-मेना बिसरल जाइए आब बसात पछबा सौंसे सिहकल जाइए नुक्का-चोरी सभ तँ भागि गेलै हमरो गामसँ ई विडीयो गेम सौंसे आब पसरल जाइए पानि चोरा कऽ राखि लेलक पाइ बला देशमे देखू आब गरीबक कंठ लहकल जाइए कनेकबे जगह देलिए तँ माथ चढ़ि गेल जमा धौंस हमरे उपर अड़कल जाइए उड़ै छैक आँचर जखन-जखन हुनकर से देखि हमरो मोन आब बहकल जाइए रुबाइ 1 जड़ब अहाँ जरू दिया बाती जकाँ गाएब तँ गाउ एना पराती जकाँ ताकि कनखिये मोन ने रिझाउ अहाँ करू जुनि उकपाती जकाँ 2 दिअए सिनेह अपन नेना जानि कए हमहूँ टुग्गर निमहब अपना मानि कए जँ छोड़बै अनेरुआ सन हमरा तँ फफकि मरब एकसर कानि कए 3 टूटल छल नेह आब तँ जोड़ भए गेलै छलै दुश्मन मुदा चितचोर भए गेलै जखने लिखलकै पाँतीमे मोनक बात दुनूक नेहक तँ भंडाफोड़ भए गेलै 4 हिला देलक गगनकेँ मारि तीर बचा लेलक जे अर्धनग्न चीर द्रौपदीकेँ बढ़ा वस्त्र केलक रक्षा संसार भरि बेटल छल वएह वीर 5 उमरे वर्षक संग बढ़ि जुआइ छै नजरि सोंझा-सोंझी भए कऽ लजाइ छै प्रेमक भाव जे नै पढ़ि पाबै अछि तखन बुझू जे ओ हृदैसँ कसाइ अछि 6 मोन भए उठल दुखित होहकारीसँ उठि दर्शक भागल मारामरीसँ प्रायोजक तँ पथने रहल कान अपन कर्ता देखार भेला जतियारीसँ 7 जखन सभ केओ देखू नेहाल भेलै तखन बुझू जे गोटी तँ लाल भेलै दर्शक जखने झूमि उठल मनसँ तखने तँ संयोजक मालोमाल भेलै 8 ऐ शत्रुकेँ तँ तोड़ै लेल दम चाही मात्र चित्रगुप्त नै ऐ लेल यम चाही अहाँसँ किछु नै बिगड़तै एकर एकरा शोधै लेल तँ खाली हम चाही 9 जतेक चाही जी लिअ सपनामे राखू यथार्थ संजोगि अपनामे उधियाउ नै एकपेड़िया बाटपर नै तँ जाएत नापल जिनगी नपनामे 10 ताकि कनडेड़िए कतए नुकेलहुँ कहू फेर किए नजरि फेरि लेलहुँ बिहुँसैत बैसल छी सोंझा अहाँ आब कहू अहीँ कोना फेर एलहुँ 11 दै छिऐ आशीर्वाद लगा कऽ फानी छी जोगारमे ऐखनो जे कते तानी वाह की जमाना देखाइए हमरा सत्य छै इएह मानी की नै मानी विन्देश्वर ठाकुर, पिता:-श्री सूर्यनारायण ठाकुर, माता:-श्रीमती तुलफी देवी, पत्नी:-श्रीमती किरण देवी। गाम:-गा. वि. स. गिद्धा ७ योगियारा, धनुषा नेपाल। हाल:- कतार; शिक्षा:- स्नातक [INTER]; जन्म:-18/4/1991; हाल:-नबोदित साहित्यिक मोबाइल पुस्तकालय कतारक कार्यकारीणी सद्स्य एवम् अन्तरराष्ट्रिय नेपाली साहित्य समाज कतार च्यापटरक साधारण सदस्य। नेपालक नोर मरूभूमिमे (अपन गप, गजल खण्ड, शेरो-शाइरी खण्ड, लघुकथा खण्ड, विहनि कथा खण्ड, कविता खण्ड) अपन गप साहित्य प्रति अगाध रुचि भेलाक कारण रचना लिखब-पढ़ब हमर शौख अछि। विद्यार्थीये जीवनसँ किछु छिट-फुट रचना लिखितो प्रवासमे आबि आर बेसी विकसित भेल । कतारक मरुभूमिमे अपन देश आ परिवारसँ दूर रहल वेदनासँ मन बेपीड़ित भेलाक कारण हमरा लेल साहित्य एक नव गति लेलक आ कथा, कविता, गीत गजलक माध्यमसँ अपन भोगल भोगाइ आ अपनत्वकेँ सम्झनासभ बाहर लेबाक मौका भेटल। ऐ रेगिस्तानमे अन्तर्राष्ट्रिय नेपाली साहित्य समाज कतार च्यापटर आ नबोदित साहित्यिक मोबाइल पुस्तकालय नामक दू टा संस्था एवम् एकर पदाधिकारी लोकनि भरपूर सहयोग केलनि। संगे-संग मैथिलीक सर्जक सभमे अब्दुल रजाक जी, बेचन महतो आ मो. असरफ राइन जीक सेहो स्नेह भेटल। हिनका सब गोटे प्रति हार्दिक आभार प्रकट करऽ चाहब। एम्हर हमरासँ दूर रहितो केवल फेसबुक आ ईमेलक माध्यमसँ सदैव मार्गदर्शन कऽ रहल विदेह ग्रुप प्रति हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त करै छी। ऐके साथ हमर परम् पूज्य, मैथिलीक पैघ स्रष्टा एवम् विदेह ग्रुपक संयोजक श्री गजेन्द्र ठाकुर जी प्रति सादर नमन करै छी। साथे धन्यवादक पात्र छथि विदेह ग्रुप आ ऐ समूहक पदाधिकारी लोकनि। हमर रचना सभकेँ गहनपूर्वक अध्ययन कऽ सदैव सल्लाह-सुझाब देनिहार विदेह ग्रुपक श्री गजेन्द्र ठाकुर जी, आशीष अनचिन्हार सर, उमेश मण्डल जी, पंकज चौधरी, अमित भाइजी, शान्तिलक्ष्मी दीदी, राजीव रंजन सर आदि-इत्यादिकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद। हमर जीवनमे प्रेरणाक स्रोत बनल दादी श्रीमती देबसुनर देवी, पूज्य पिता श्री सूर्यनारायण ठाकुर, माता तुलफी देवीकेँ श्रीचरणमे बारम्बार प्रणाम! तथा गुरु श्री पवन कुमार मण्डलकेँ सत्-सत् नमन करै छी। तहिना जीवनक हरेक मोड़पर सुख-दुखमे साथ देनिहार धर्मपत्नी किरणजी केँ स्नेह भरल अभिवादन! आ हमर साहित्य लेखनक ऊर्जा रहल पुत्री प्रीतिकेँ दिलसँ धन्यवाद। एकर अतिरिक्त हमर साहित्यिक जिनगीमे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रुपेँ सहयोग केनिहार सम्पूर्ण मित्रगण, आफन्तजन, तथा बन्धु-बान्धवमे बेर बेर सलाम ।- समर्पण- बेरोजगारीके चपेटामे पड़ि प्रवासी जीवन बिताबऽपर बाध्य भेल ओ श्रमिक सभ जे अपन इच्छा, सपना आ यौवनाकेँ तिलाञ्जली दैत, आफन्तसँ लाखो कोस दूर केवल अपन परिवार आ राष्ट्र लेल दिन-राति संघर्ष कऽ रहल छथि। ओइ सच्चा, निठुर आ ईमानदार श्रमजीवी सभकेँ समर्पित ।- विन्देश्वर ठाकुर गजल खंड 1 पान सन पातर ई ठोर अहाँकेँ अहाँ छी चान्द हम चकोर अहाँकेँ जुनि घबराउ सब नीक भऽ जेतै अहाँ छी राइत हम भोर अहाँकेँ संसारक गति बदलि जाए मुदा अमर रहै प्रेमक डोर अहाँकेँ समय पैघ बलवान छै अपने नै चलत ओइ आगू जोर अहाँकेँ नै बहाउ नयनसँ नोर कनियों मोती सन मोल अछि नोर अहाँकेँ (सरल बार्णिक आखर-१३) 2 भक्ति गजल अहीँ छी हमर भवानी मैया हम अहाँकेँ मानै छी करब सब दिन पूजा पाठ मनसँ हम ई ठानै छी उजड़ल घर बसाबू माँ एना किए फटकारै छी राति भरि निन्द नै आबै सदिखन अहाँ लऽ कानै छी क्षमा करु या सजा दिअ हम तँ अहींक सन्तान छी अज्ञानी हम पुत्र अहाँकेँ बिधान ने किछु जानै छी चिनी लैताह दूध लैताह कही न माइ गै बाबुकेँ लड्डू आ पेड़ा हमहूँ बनेबै तैं तँ चिक्कस सानै छी अहीँ जननी दुख हरनी करु हमर उद्धार हे शक्ति स्वरुपा जगदम्बे हम अहाकेँ पहचानै छी (सरल बार्णिक आखर:१९) 3 गजल सब खुशी भेटत बस मन होबाक चाही सरकारी नोकरी लेल धन होबाक चाही जङ्गल उजड़लासँ रोग सभ बढ़लै स्वस्थ रहबाक लेल वन होबाक चाही दानव चपेटामे पिसा रहल लोक एतऽ रावन ला रामके आगमन होबाक चाही बात बनौलासँ केवल काम कोना चलतै घर सुद्धी करब तँ हवन होबाक चाही जनताकेँ खून चुसने नेता जी कहै छथि चुनाबमे उपरका सदन होबाक चाही (सरल बार्णिक आखर:१६) 4 बाल गजल आइ दिन भरि सुतले छी खटिया उपर चढ़ले छी माए लेलक नहि कोरामे तै सँ दिन भरि रुसले छी हम सुकना सँ की कम छी अङ्ग्रेजी नेपाली पढ़ले छी काका मूर्ति दैत बजलाह बौआ तोरा लेल गढ़ले छी रोहितक बाबू दूसत की ओकरासँ हम बढ़ले छी (सरल बार्णिक आखर:१०) 5 बाल गजल भैया सँगे हमहूँ जेबै दही चूरा हमहूँ खेबै सुटबासँ झगड़ा भेलै ऐ छौड़ा के मूँह तकेबै मन लगा कऽ पढ़बै तँ पुरस्कारो हमही पैबै काल्हि स्कूलमे दौड़ हेतै ओहूमे हम एक एबै हमरो जँ भाइ हेतै तँ गीत नाद खूब सुनेबै (सरल बार्णिक आखर:९) 6 भक्ति गजल हम छी बालक कनी ध्यान दिअ मैया निर्बुद्धी आ निमुखाके ज्ञान दिअ मैया छी हम अभागल जन्मेसँ आइ धरि गाममे जीबाक लेल शान दिअ मैया नित्य दिन धूप आ आरती उतारब भक्ति भरल हमर प्राण दिअ मैया मरितो छनमे रही समीप अहाँकेँ एहन अनूप बरदान दिअ मैया लाल चुनरी चढ़ा जयकार लगाबै कोखिसँ एहन सन्तान दिअ मैया सरल बार्णिक आखर : १४ 7 गजल भाङ्ग आ गाजा खेने छी तोरो ला किछु लेने छी माए देलक मुरही ओहो झोरामे धेने छी चटनी खिएबौ मीता अल्लू सेहो पकेने छी हरी चोरौलक ढ़ौआ तैसँ दूर भगेने छी चल आइ पियो लेब भट्ठीबाली पटेने छी (सरल बार्णिक आखर: ८) 8 गजल धीरे-धीरे स्नेह बढ़ाएब हम करेजसँ भले सटाएब हम बिनु अहाँकेँ जियब नै कखनो जिनगी अहीँपर लुटाएब हम आँखिक तारा छी अहाँ ऐ सजनी छोड़ि कऽ कहियो नै जाएब हम अहाँ ला सदिखन हँसि मरब कहियो नै नोर बहाएब हम प्रेम अहाँकेँ पवित्र अछि प्रिय तइसँ नै गंगा नहाएब हम (सरल बार्णिक बहर आखर:- १२) 9 गजल पिया जी एलखिन होलीमे जैबै हमहूँ आब डोलीमे नानीके देल एकटा थाली खैबै हम ओही घकोलीमे दियर ननदि सेहो अछि मजाक करबै रङ्गोलीमे सासुके हम मनाए लेबै जादू अछि हमरा बोलीमे पेटीमे छैक बड़ सम्पति धरब नुका हम चोलीमे (सरल बार्णिक बहर आखर:- १०) 10 गजल होलिकाकेँ फेर जरैबै एहिबेर के होलीमे पूरी सँगे माउस खैबै एहि बेर के होलीमे भैया के साली आएल छै दीदी के ससुरारिमे चुपे हम रंग लगैबै एहि बेर के होलीमे खराब रंग सभक लेल हानिए होइ छै तैं तँ नीक रंग मंगेबै एहि बेर के होलीमे खट्टर कक्का बुढ़िया दाइ सब केउ झुमतै हँसि हँसि चोली भिजेबै एहि बेर के होलीमे नै झगड़ा नै झंझट कोनो हेतै ऐ समाजमे खुशीके बरखा करेबै एहि बेरके होलीमे (सरल बार्णिक आखर : १७) 11 गजल माघे संक्राति एहू बेर आबिए गेल हम बौआइत छी एखनो कतारमे लाइ-मुरही खेताह भाइ ओइठाम हम टौआइत छी एखनो कतारमे झगड़ा रहै भाइसँ तीलक लाइ ला हम खौझाइत छी एखनो कतारमे दू साल पहिने पिटने छल भाइजी हम खिसिआइ छी एखनो कतारमे पैसाक पाछू जिनगी नरक बनल हम कमाइत छी एखनो कतारमे (सरल वार्णिक बहर- आखर १४) 12 गजल देखब मनमानी कतेक दिन करै छी बिधवा सँग कहानी कतेक दिन करै छी समय चक्रमे अहूँ मुरछाएब जीवनकेँ गुलामी कतेक दिन करै छी मानव भऽ मानवता सिखू दोसरकेँ गुलामी कतेक दिन करै छी मलिन नै करु मिथिलाक सँस्कृति बौवा-बुच्चीक ढुवानी कतेक दिन करै छी समएमे एखनो नीक पथ रोज मानवताक ग्लानि कतेक दिन करै छी शेरो-शाइरी खंड हमर नाम बेचिकऽ खाएबला चोर छै हक अधिकारला लजाएबला चोर छै अपने भाइ-बापक गर्दन काटिकऽ खूनक समुन्द्रमे नहाएबला चोर छै सब ढलिया हमरे आगू पाछू ठार छै लगै जे बालुके उचका पहाड छै उखरलो सुथनी नै उखरतै जेकरासँ ओहो अपन अलगे राज ला बेहाल छै एककेँ पाछू बेहाल नै बनू एना आँसू गिराकऽ दु:खहाल नै बनू एना मिलत जरुर पुन:सपनाक रानी अहाँकेँ बेवफाक पाछू कङ्गाल नै बनू एना पेटभरि खाएब कठिन छै एतऽ रोजगारी पाएब कठिन छै एतऽ नेता लोकनि भले जे किछु बाजि लय बेरोजगारी भगाएब कठिन छै एतऽ इजोरियाक आसमे अन्हार भेल जिनगी जीवनक हर साँसमे पहाड़ भेल जिनगी पास रहितो अहाँक हम घुटि-घुटि मरै छी लागै चारू तरफसँ निराश भेल जिनगी खाएब अहूँ संगे-संग तँ चलू लतामक पेड़पर मट्टीके बरसात करब तँ चलु कतारक बसेरपर आउ साथ मीलि किछु योजना बनाबी मैथिली दुश्मन सभकेँ दूर भगाबी तखने बनत भविष्य मिथिलाकेँ तँ किए ने अपन प्रदेश गमकाबी हरवक्त याद ओकर जान मारैय रातियो कऽ निन्दकेँ हरान करैय हम बौरा गेली साथी सभ कहैय अहीं कहू किएक परेशान करैय प्रेम दिवस(१४ फरबरी) क अवसरपर हृदयसँ निकलल मर्मस्पर्शी भावना... नै सोचू नै घबराउ अहाँ एक दिन हम जरुर आएब संगमे दसैं तिहार तथा भ्यालेनटाइन सेहो मनाएब दुश्मन कतबो दुवारपर होइतो लाख कोसके बीच होइ छै प्रीतम दूर पहाड़पर होइतो घर-आङनके बीच होइ छै आजुक दिन प्रेमक प्रतीक प्यार करी से मन करैय अहाँ संगक झगड़ा-प्यार दुनु हमरा याद अबैय I LOVE ....her I MISS ....her चलू आब बिश्राम करी भैया फेसबुक हटा कऽ अराम करी भैया लजैनी जेहन लजाएब अहाँ लग जतेक आएब अहाँ टक लगा हम देखते रहब घुङ्घटा जखन उठाएब अहाँ नै किछु लिखै छी बाप रौ बाप दारुए पिबै छी बाप रौ बाप कविता प्रतियोगितामे प्रथम पुरस्कार खुशीसँ जिबै छी बाप रौ बाप अहाँ सभ राति भरि जागल रही बस फेसबुकपर लागल रही संसार बदलैसँ पहिने अपना बदलू बिपना पाबऽसँ पहिने सपना बदलू जँ जीबित राखब खोप भितरकेँ चिड़िया निफिकिर साथ उपरका झपना बदलू इच्छा रहितो ई जीवन बिताएब कोना मन रहितो ई सिन्दूर लगाएब कोना अहाँ छी हमर पिछला प्रीतम जरुर मुदा हुनका छोड़ि अहाँ संग जाएब कोना की कहू कते कहू बड़ बड़ लीला छै मोछबला नेता सभकेँ नङ्गौटी ढीला छै हे सुथनी सन बात नै करू डरछेरुवास आब नै डरू बड़ सहलौं अत्याचार अहाँ आबो तँ अधिकार लेल लड़ू गेल छल दारू पी कक्का बजारमे पाछुएसँ मारलक छौड़ी धक्का बजारमे मिथिला राज लेल धरना करै छी बात-बातपर झगड़ा करै छी बेइमाने आ भ्रष्टाचारे करब तँ नाहकमे किएक धरना करै छी आबू समीप चलू नैन लड़ेबै करेजसँ अपन करेज सटेबै प्रेमक दीपसँ इजोर छै दुनियाँ खुल्ला आकाशमे घर बनेबै राति अन्हरिया अहीं संग काटब दु:ख सुख सब दुन्नू मीलि बाँटब मेघ गरजै आ बुन्द बरसै कतबो फुटल आकाशकेँ स्नेहसँ साटब निन्द हेरा गेल चैन हेरा गेल नोर बिना जे नैन हेरा गेल मन छल नीकसँ राति भरि सुतितौं यादमे सब अमन-चैन हेरा गेल तन थकित आ मन बेपीड़ित भऽ गेल साँस चैनकेँ जेना पछिया उड़ा कऽ लऽ गेल काल्हि धरि जे जिनगी रमनगर लगैत छल सब दु:खकेँ मोटरिया आइ अइठाम धऽ गेल सपना स्वर्गक देखा कऽ जिनगी नरकमे गिरा देलियै प्रेम हमरासँ कऽ कऽ सेनुर दोसरेसँ भरा लेलियै रिमझिम-रिमझिम पाइन आजु पड़ै कतारमे देह सिहरै मनो खुशी आजु लगै कतारमे अहूँ जीबू हमहूँ जियब सब कियो इन्सान छी जीवन पथपर मीलि चलू सब कियो अंजान छी स्नेहक तार टुटल सबसँ जिनगी जिअब कल्पना भेल काल्हि धरि जे अपन छल आइ गरीबइमे सपना भेल जिनगी जिअब पहाड़ लगैय भेल पिया परदेसिया अपने पयरमे कुड़हरि लागल भेलहुँ हम दुदुसिया स्वतन्त्र देशक स्वतन्त्र नागरिक आजु नेश्नल डे अछि कतारमे एतऽ धूम-धामसँ नाचै सब केउ बड़ भीड़ अछि देखल बजारमे भौतिकवादकेँ शिकार भेनिहार सभ सुपनेखा सजा कऽ सीता बना देलक साहित्यमे फुर्ती देखेनिहार सभ गजल चोरा कऽ कविता बना लेलक राइतमे हम खबुस खाइ छी सुबहमे हम कामपर जाइ छी जखने बेसी थाइक जाइ छी फेसबुक चला कऽ मस्त भऽ जाइ छी अहीं छी ज्ञानकेँ देवी मैया अहीं छी भाग्य उदायनी हम अबोध बालक अहाकेँ अहीं हमर बिद्यादायनी मैथिल कहैत जखन माथ झुकेलौं भाषा बजैत जखन ओठ लरबरैलौं हम बुझी कोना कर्मयोगी अहाकेँ जौं मैथिली गजलमे आगि लगैलौं जौं छी मैथिल तँ पोस्ट मैथिलीमे करू साँस अटकै मुदा मौतसँ नै डरू सदा रहब अमर अहाँ इतिहासमे रङभूमिमे अथवा रजाइएपर मरू बिनु समर्थनकेँ किछु नै भेटत एतऽ नै छिनने अधिकार भेटत एतऽ सब छथि स्वार्थी आ दलाल मात्र गोरतर धऽ कऽ घसीटत एतऽ आइ फेर सपनामे मिथिला देखलौं पछिला साथी संगी सभसँ भेटलौं आँखि खुलल तँ अपने बिछान पर भावनाक लहरमे करेजसँ सटलौं समीप अपन कने आबऽ दिअ करेजसँ हमरा लगाबऽ दिअ बड़ तड़पेलौं अहाँ एखन धरि आबो तँ प्यास मेटाबऽ दिअ प्रेममे हम शायद आब पागल भऽ जाएब बिनु उत्सव बिनु मौसमकेँ बादल भऽ जाएब ओ जेतीह पिया घर डोलीमे सजि कऽ हम भरि जिनगी ला अभागल भऽ जाएब हमर जिनगीकेँ कोनो हिसाब नै रहल पढ़बाक लेल कोनो किताब नै रहल बैसल छी एखनो असगर एकान्तमे किन्तु पीबाक लेल कोनो शराब नै रहल हमर सूरति अपना आँखिमे सजा लिअ अपन मनकेँ फुलवारीमे हमरे बसा लिअ राखब हथेलीपर सदखनि ऐ कनियाँ एक बेर बस हमरासँ मांग भरा लिअ पएरक पायल झमकैत रहै अहिना चान सन चेहरा चमकैत रहै अहिना अनुपम छी फूल अहाँ हमरा बगैचाकेँ दिग-दिगान्तर धरि गमकैत रहै अहिना सुतलमे चेहरा अहाँकेँ सपना बनि अबैय विपनामे बिम्बसँ भरल रचना बनि अबैय अशाकेँ दीप संग निराश भेल ठाढ छी हम सिहकै हवा लगै जेना साजन बनि अबैय सब केउ के आगू आबै पड़त एहि रोगके जड़सँ मेटाबै पड़त जँ चाहै छी स्वस्थ आ दुरुस्त प्रदेश दहेज मुक्त मिथिला बनाबै पड़त अहाँ लेल प्रेमक किताब रखने छी बुझू धड़कन के हिसाब रखने छी अहाँ डालर बनू भारु हमहीँ बनब नै कोनो बात अहाँ सोम रस बनू दारू हमहीं बनब नै कोनो बात हमर मर्जी घर-घर चाटब जकरा पाएब तकरा बाँटब पिया भेल विधायक हमर तोरा कि हम नङ्गटे नाचब हम बूड़ि छी तैं बिदेशमे आएल छी अहाँ ज्ञानी छी तैं घरमे नुकाएल छी लघुकथा खंड सपनाक अवसान एक दिन रमलोचना आंगनमे सँ महेस महेस... किलोल करै छथि। तखन चौकियेपर सँ काकी कहै छथिन, बौवा एम्हरे आउ- काकीक मन बड़ पिड़ाएल आ मन खिन्न रहए। रमलोचना गामक बेटा आ महेसक संगी छला। बुढ़िया रमलोचनाकेँ बजा कऽ महेशक खिस्सा सुनबैत छथिन। "महेस जे तीन साल पहिने गेल छला -कतार अपन सपना पूरा करबा लेल। जेबाक बेर अत्यन्त हर्षित, माए ला घर बनाएब, पत्नीक लेल नीक कपड़ा, बच्चा-बुच्चीकेँ नीक स्कूलमे पढ़ाएब आ जवान बहिनक शादी करब। हतपतमे पास्पोर्ट बनौलक। अपन कियो नै रहै विदेशमे। तैयो घरक पड़ोसी मदनकेँ सहयोगमे हुनकर मामासँ भीसा मङौलक। पहिने कनिए पैसामे भऽ जाएत कहितो प्लेनपर चढ़ऽसँ पहिने १ लाख नगद लेबाक जिद करऽ लागल। पैसा नै भेलाक कारणे दोबरके कागज बनबा लेलक। आब दूध-माछ दूनू बाँतर भऽ गेलै महेसकेँ। की करत? घरमे सब सदस्यकेँ आँखिक नोर पोछैत ओ गेला कतार। मुदा हुनका सभकेँ नै चाही एना, काम नाथुरकेँ कइहक दिन-राति धुपमे तबूक उठाएब आ देह धुनिकऽ बिल्डिंग कन्सट्रक्सनमे काम करब। नै खेबाक नीक व्यबस्था, नै सुतबाक। कम्पनी सेहो सप्लाइ। घरक याद बड़ सतबै महेसकेँ। मुदा प्रतिज्ञाक अटल रहथिन महेस। कतबो दु:ख पीड़ा होइतो काम नै छोड़थिन। ओइठाम ब्याज बढ़ि कऽ घर गिरवी रखबाक स्थिति आबि गेलै। एतऽ पगार जहिना के तहिना। दिन-दिन सोचि-सोचि कमजोर भऽ गेल बेचारा महेस। एक दिन काम करैत काल करेन्ट लागि गेल हुनका। साथी-संगीक सहयोगमे अस्पताल लऽ जा जान बचलनि। मुदा हाथ बिना काम के भऽ गेल। ऊपरसँ कम्पनी, तोरा गल्तीसँ करेन्ट लागल आ कम्पनीकेँ समान सभ नोकसान भेल, कहैत मास सेहो काटि लेलक। शरीर बिना कामकेँ भेलासँ उपचार करेबाक बदला महेसकेँ घर पठा देलक। महेसकेँ आँखिसँ नोर बर-बर टपकैत रहल। घर पहुँचलाक बाद ओ माएक स्थिती देखि बौक भऽ गेला। जेना मुँहसँ किछु अबाज नै निकलल। माय सेहो अन्तिम साँस रोकने बस महेसक लेल। बौवा-बुच्ची बाबूक सनेसक प्रतीक्षामे। पत्नी लेल सेहो किछु नै। हाथ खाली। बड ग्लानि भेलनि महेसकेँ। किछु दिन बाद उपराग सबसँ महेसक धैर्यताक बान्ह टुटि गेलै। ई बान्ह बड मजबूत होइ छै आ टुटलापर सर्वनाश होइ छै। ईएह भेल महेसक साथ। अपन जबान बहिनक विवाह दहेजक कारण नै भऽ सकल आ गामक लोगक ताना सुनि-सुनि ओ पागल भऽ गेला। महेस, बहीनक सृष्टि लऽ कऽ रक्षा करब, उद्देश्य रखने हमर बेटा ऐ गरीबीक चपेटामे जिनगी नरक बना लेलक। आ हम सभ दर-दर भटकि रहल छी। अते कहैत बुढ़ियाक आँखिमे नोर भरल आ जोर-जोरसँ चिचिया उठल आ धिया-पुता जकाँ हुचकि -हुचकि कानऽ लागल। भुखाएल जानवर सभ १ आइ भोरेसँ कतारक सभ ठाम आन्धी-तूफान बिर्रो आ बिहाड़ि ततेक ने भेल जे बुझू पानिक नै माटिक बरसात भेल आ एखनो तक भऽ रहल छै। हमरा बुझि पड़ैत अछि जे दिन भरि पड़िते रहत। ओना हम दुखित नै छी आ रहने हएत की? कारण प्रकृतिकेँ पराजित केनाइ असम्भव। ई आजुक हवा किछु बेसी क्षति तँ नहिए केलक। तखन छै की तँ हवा संगे आएल बाउलक कण सभ आँखिक भौह आ पपनीमे ठोका-ठोका मजा लुटि रहल छल। जखन कामपर निकललौं तँ हजारो सपना उड़ा कऽ लऽ गेल बिहारि सीमरकेँ रुइया जकाँ अपना साथ गगनमे। तैयो हम प्रसन्न छी ई सोचि जे काल्हि धरि जे सपना केवल आँखिक भित्तामे सजाओल छल आइ तँ कमतीमे हवाक सहारासँ अकाशमे सूर्य, चन्द्रमा एवम् तारा संग भरिपोख मनोरंजन तँ लैत हेता.. खुशीसँ तँ झुमैत हेता, आ अपन सफलतापर खुशीसँ तँ नचैत हेता। २ कतेको दिन बाद आइ फेर सप्तरङ्गी आकाश देखऽमे आएल। मौसम पूरा साफ आ बुलन्द। ऊपरसँ टिप-टिप पानि पड़ि रहल जेना बसन्तक आगमन भेल हुअए। मुदा मन्टुटियाक आँखि नोरसँ भरल। पिजड़ामे कैद भेल सुगा जेहन छटपटा रहल। सच मानू तँ ऐठामसँ भागि जेबाक प्रयासमे, मुदा ई असम्भव। मन्टुटिया एकटा नेपाली नारी अछि जे १ साल पहिने कमेबाक लेल कतार आएल रहए। गामपर घरबला दोसर महिला संगे विवाह कऽ एकरा छोड़ि देलाक बाद अपन एकटा बेटीकेँ माए-बाप लग राखि दर-दर ठोकर खाइत कतार पहुँचली। एतौ ओतेक नीक काम नै मुदा एक गोट शेखकेँ [मालिक] घरमे कामकाज मिललै। दु:ख तँ बड़ छलै तैयो अपन बाध्यता आ विवशता देखि दिन काटऽ लागल। मन्टुटिया देखऽ मे पातरे-छितरे, सामला रङ्ग, ने बेसी नमहर, ने बेसी छोट, लगभग २५ बर्षक कड़ा जवानी। छोट-छोट आँखि आ दहिना गालपर तिलबा ततेक ने सोभै जे लोक सभ पछाड़ि लागि जाइ। ओना काम घरक करितो शरीरकेँ सिट-साट कम नै करै। कतेक दिन तँ ड्राइभर लोकनि सेहो रुपैयापर प्रस्ताव आगू बढ़ौने रहै पर ओ सभ सफल नै भेला, कारण इज्जत बेचि खाएब मन्टुटियाकेँ पसन्द नै छलनि। कतारक राजधानी दोहासँ २ किलोमीटर पश्चिम नजमा जाए बला बाटमे होली डे बिल्ला होटलक पछाड़ीमे मन्टुटिया मालिकक घर छै। अपने बुढ़बा २ टा शादी कएने छथि आ एखन ५५ सालकेँ भऽ गेला। बुढ़बाकेँ १ बेटी आ ४ बेटा मिला कुल ५ गोट धिया-पुता छलनि। जइमे जेठ बेटीक विवाह भेल छै, सहुदीए रहै छै कहाँ-दन। बाँकी सभ कुमारे। खुल्ला साँढ़ जकाँ। हिनकर बेटा सभ ततेक ने छिचोरा जे शुरुए दिनसँ मन्टुटियाक पछाड़ी हाथ धो कऽ पड़ल छै। अतेक दिन तँ कोनो विधी बचि गेल। मुदा आजुक दिन मालिक दुनु मलकानिक संग हुमरा करबा लेल सहुदी गेल। एहने मौकाक इन्तजार छलै ओइ कौवा-चिल सभकेँ। भरि दिन कतऽ रहै नै पता मुदा साँझ पड़िते धम-धम चारू भाइ आएल। प्रमुख गेट बन्द केलक। अपन कोठामे जा खाना देबाक लेल किलोल केलक। मन्टुटिया खाना लऽ जखने आएल ओहो गेट बन्द भऽ गेल। निच्चामे पान-परागक पौच, मेग्डोल [शराबक] बोतल तैयार, जेना पूर्व योजना रहै। साथै टि.भी. मे थ्री-एक्स प्लेयर लगा काम उत्तेजनाक प्रयासमे। एकर अतिरिक्त एकटा कोनो गोली रहै जे जूसमे धऽ कऽ मन्टुटियाकेँ पिया देलकै। मन्टुटियाक सरपर कामदेव ताण्डब करऽ लागल। रङ्गमंच रन्कैत गेल। नाटक क्लाइमेक्स तरफ बढ़ैत गेल। धीरे-धीरे सबकेँ जवानीक भूत चढ़ैत गेल आ भुखाएल जानवर सभ मन्टुटियाकेँ लुटैत रहल, मन्टुटिया लुटाइत रहल, लुटाइत रहल...... बस लुटाइत रहल । ३ आइ फेर कतेको दिन बाद हमरा मनमे एकटा सम्झना के लहर उठल। मन अस्त-व्यस्त भऽ गेल। बचपनमे साथी सभ संगे खेलैत छली जे बालु-बालु आ चोरा-नुकी, ओ सभ आइ बहुत याद अबैत अछि, कारण ऐठाम आइ ओहने बाउल देखलौं। मुदा किछ फरक तँ अवश्य छै, एकर गन्ध, एकर रङ्ग आ एकर स्वादमे। अपन मिथिलाक बाउल जइपर हमर बाल्यकाल बितल, नाना प्रकारक खेल खेललौं, ओ कतेक पवित्र छल। कतेक मर्मस्पर्शी लागए। एखनो छी दिन राति बाउलमे मुदा ओतुका स्नेह, अभास केवल मनमे, आत्मामे आ शरीरक खूनमे मात्र सीमित अछि। शायद हमर दुर्भाग्य अथवा प्रारब्धक फल कही, हम अविछिन्न रुपमे अपन मातृभूमिकेँ पुकारि रहल छी एतुका रेगिस्तानमे, सामुन्द्रिक लहरमे, उँचका महलमे आ नमहरका गाड़ीमे, मुदा अस्पष्ट, असम्भव आ घनघोर अन्धकार लगैत अछि अपन माटिपानि, अपन संस्कृति। सोचैत छी हम किएक एलौं एहन उजाड़, पतझड़ आ मरुभूमिमे। फेर दोसर मन कहैत छथि ऐठामसँ तोहर घर परिवार आ नून तेल चलैत छौ। तो एकरा मरुभूमि कोना कहि सकैत छिही? हवा, पानी, अन्न सभ किछु एतुका खाइत छें। अतेतऽ की परिवारकेँ बचबाक आधार छौ ई रेगिस्तान, तँ तो कोना एकर अपमान कऽ सकैत छें ? हम निरुत्तर भऽ जाइ छी। निस्तब्ध भऽ जाइ छी। प्रेम-पत्र हमर प्राणप्यारी नम्रता, मन भरिकेँ माया आ स्नेह मात्र अहाँकेँ। हम ऐठाम कुशल रहि अहाँक कुशलताक कामना करै छी। अहाँक वियोगमे बिना पानिक माछ आ बिना नेहुक मांस बनल हम एतऽ परिवारक भरण-पोषण लेल श्रमजीविक टोपी लगा दिन काटि रहल छी। काल्हिक फोनसँ सच्चे हमर मन बड़ दुखित अछि। अहाँक उपराग छल जे हमरा बिसरि गेलौं, बराबर फोन नै करै छी। अहाँकेँ हमर खियाले नै अछि। मुदा सत्य ई नै छै। किएक तँ हम तँ बस शरीर छी जइकेँ आत्मा अहाँ छी। जौं श्वास लेबऽ बला फोकसो हम छी तखन अक्सीजन तँ अहाँ छी। आब अहीं कहू जकरा बिना हम एक पल बाँचि नै सकब ओकरासँ अलग रहबाक कल्पना कोना करब? मुदा तैयो परिस्थिति लोककेँ दोसरकेँ सामने विवश कऽ दै छै। आन लग काम करब, ओहो प्रचण्ड गर्मीमे, बड़ पैघ बात छै। घरमे बसिया-कुबसिया किछु नै खाइ छलौं। मुदा एतऽ सुखल खबुस चिबाएब लत भऽ गेल अछि। नेपालमे रहैत काल विदेश माने स्वर्ग हएत, से कल्पना करै छलौं। ओतुक्का लोक सभ आनन्दसँ, खुशी साथ जीवन बितबैत हेता, से भ्रम छल। पैसा जेना गाछसँ हिला कऽ लाखक लाख पठबैत अछि, तहिना बुझाइ छल। शायद एखन अहूँ ओहे सोचैत हएब । मुदा देखू हृदेश्वरी, सत्य ई नै छै। स्वर्ग कहल ई जगह वियोगा भासमे तड़पि-तड़पि मरऽ बला स्थान छै। एतऽ पैसाक महत्व संगे मनुष्यक खरीद-बिक्री होइ छै। दोसर दिस रातिमे अहाँ संग बिताएल ओ पल सभ, स्नेहक तीत-मीठ गप-सप बिढ़नीक खोता जकाँ हमरा मानस पटलमे आबि कऽ निन्द तोड़ि दैए। कखनो-कखनो विदेश छोड़ि कऽ अहीं संग ओइ ठाम साग-पात खा दीबसँ गमएबाक इच्छा होइए। मुदा बिगतकेँ दु:ख, दर्दसँ मन तरसि जाइए। सच्चे नीक खाना, नीक कपड़ा आ नीक गहना लेल कतेक तरसि गेल छलौं। नीक खाएब आ नीक लगाएब सपना भऽ गेल छल। एतऽ आबि परिवार टेबब एकटा किनर मिलल अछि। दायित्व पूरा करबाक एकटा सहारा अछि। हम एतबेमे खुशी छी। मुदा तैयो फोन करबाक पर्याप्त पैसा आ समए नै हएब, दोसरकेँ बसमे बड़द जकाँ जोताएब, घर-परिवारसँ दूर रहब चिन्ताक विषय थिक। एहन बिषम परिस्थितिमे हमर साथ देब, आत्मविश्वास बढ़ाएब, अपनामे धैर्यताक बान्ह मजबूत राखब, अहाँक कर्तव्य अछि। कारण अहाँक धैर्यता आ आत्मविश्वासे प्रवासमे हमरा हौसला प्रदान करत। अन्तमे समय-समयमे फोन करैत रहब से वाचाक संग एखन विराम। बाँकी दोसर पत्रमे। अहाँक स्नेही एकान्त राम मरुभूमी टोल, कतार विहनि कथा खण्ड बिपतियाक विदेश कतेको दिनसँ मुँह घोकचौने बिपतियाकेँ ओठपर आइ भरल मुस्कान अछि। कारण तीन महिनाक बाद पश्चिम दिससँ चान्द उगल। माने कम्पनी आइ तलब देबाक लेल राजी भेल। तीन महिना धरि बिभिन्न बहाना बनाकऽ टारैत छल। अगला महिना अगला महिना अगला महिना..... । मुदा तीन महिना बाद कामदार सभ जब उखरल तँ कम्पनी सेहो विवश भऽ गेल सेलरी देबाक लेल। मुदा ओतेक सोझिया नै रहै कम्पनीक मनेजर। लेबर सभकेँ ठकि फुसला एक महिनाक तलब देलक आ २ महीनाक राखिए लेलक। अन्तत: जे होइ, सभ कामदारकेँ खुशी भेलनि। बिपतिया सेहो खुशी भेला। सेलरी लऽ पैसा गनैत अछि तँ मात्र पाँच गोट नमरी। पहिनेसँ आएल मुस्कान बिपतियाक मुहसँ बिला गेलै। ओ चिन्तित भऽ गेला। कारण खानाक पैसा बङ्गालीकेँ उधारिए छलनि। चुल्हा चौका चलाएब हेतु घरमे पठाबै पड़तनि। ओतबे कहाँ महन्थासँ लेल ढौआ नै बुझेता तँ ५०००० के सुइद-सुइद जोड़ कऽ २ लाख बनाइए देतै। आब की करता? बिपतिया गम्भीर सोचमे पड़ि गेला। "घर परिवार छोड़ि कऽ सात समुन्द्र पार एला पत्थर फोड़ऽ मुदा तैयो घर नै चलल आ पेटो नै चलल, धिक्कार अछि हमर मेहनत आ हमर कामकेँ- बरबड़ाइत आ लथरैत ZEKREET क trust exchange मे जा प्रभु मनी ट्रान्सफर द्वारा पत्नीक नामसँ खाना पैसा सभ पठा देलक। आरो नै किछु तँ ओइ महन्था धनिककेँ कर्जा तँ सधतै। बहसल कनियाँ -गामबाली दीदी, जनकपुर जाइ छी? रुकू कनि हमहूँ जाएब। समान सभ लेबाक अछि हमरो आ आरो बहुत रास काम अछि । - नै यै कनियाँ, हम अहाँकेँ लऽ कऽ नै जाएब, अहाँक सास बड नङटिनी अछि। हमरा बेसतरि कऽ कऽ धऽ देत। -दूर जो, झाँटब बारहनिसँ बुढ़ियाकेँ। कमाइ छथि बिदेशमे हमर घरबला आ कोह कटै छै ओइ लटलहबीकेँ। तँ ने बेजाय, २४ घण्टा हनहन पटपट करिते रहैए । -ओ जे कहै छथिन सेहे करियौ ने से। किए नै चलै छी हुनकरे जूतिमे? -यै दीदी, हम कहाँ पढ़ल, लिखल धनिकाहा घरक बेटी, सभ दिनसँ लैस लम्फा कैने, शहर बजार घुमने, चारि घाटक पानि पीने। मुदा ई हमरा गाइ-महींस जकाँ बान्हि कऽ घरमे रखै छथि तँ कोना रहबै। ऊपरसँ हमर पति तँ मुट्ठाक मुट्ठा रुपैया पठबिते अछि तँ की गम हमरा? अहाँ छोड़ू ई बात सभ, चलू.. चलू .. जल्दी, ट्रेन छुटि जाएत। न्याय स्कूल जाइ काल एकटा लड़कीकेँ ओहे गामक मुखियाक बेटा अपना हबसक शिकार बना लेलक। ई घटना सुनलाक बाद स्कुलिया छौड़ा सभ ओकरा बड़ पिटलक। ऐ घटनासँ हुनकर बाबूजीकेँ अपन पगड़ी खसबाक भान भेलै आ अपन बेटाक करतूतपर पर्दा देबाक लेल पञ्चायत नै करबाक घोषणा केलक। मुखियाक एहन पक्षपात देखि पूरा समाज मीलि कऽ एक निर्णय केलक जे न्याय आखिर न्याय होइ छै। आ सबकेँ साथ उचित न्याय हएब आवश्यक छै चाहे ओ राजा हुअए या प्रजा। तैं पञ्चायत हेबाक चाही तथा दोषीकेँ कर्म अनुसार उचित सजाय भेटबाक चाही। समाजक आगू मुखियाक कोनो बस नै चललै। ओ पञ्चायत करबाक लेल विवश भऽ गेल। दोसर दिन भोरे पञ्चायत बैसल आ उचित न्याय भेल। जेहन करणी तेहन भरणी साँझक समयमे बुढ़िया अपन नवकी पुतौहकेँ लऽ कऽ पोखरि-झाखरि जाइ छल। तखने ओम्हरसँ रामगंजवाली अबै छली। बिच्चे बाटमे दुनुकेँ भेंटघाट भेल आ रामगंजबाली पुछलक बुढ़ियासँ - -यै काकी, एकटा बात फेर सुनलिऐ, केनादन सच्चे? -गे कि सुनलहीय से? -ऐ बुढ़िया धनगढ़ीवाली दिया नै सुनलिऐ से, कहाँदन दोसरो घरबला छोड़ि देलकै? -हँ गे, सुनलियय हमहूँ। दूर बररुपियाकेँ कोन बात। बुढ़ारीमे घिढ़ारी करऽ जेतै तँ अहिना हेतै ने। -हँ यै काकी, हे घरमे ककरो नै गुदानै छलै। अपने मनसँ जे जे मन होइ छलै से से करै छलै। घरबला बिचरा परदेशिया २ साल ३ सालमे एक बेर अबै छलै आ फेर चलि जाइ छलै। मुदा ढौवा रुपैया सभ एकरे नामपर पठबैत छलै। कोनो चीजक तकलीफ नै। से रंडिया दुन्नू बच्चोकेँ छोड़ि कऽ सभ ढौवा लऽ कऽ ओइ चमरबा मरदबा संगे कोना उढ़रि गेलै? आ आब जखन ढौवा चूसल भऽ गेलैय तँ लात मारि कऽ भगा देलकै। नीके भेलै कुकर्मीकेँ जेहने करणी तेहने भरणी। आब छिछयाइत रहो जिनगी भरि। प्रतिशोध नव विवाहित सुभाषकेँ आइ सुहागराति छनि। खान-पीन समाप्त भेलाक बाद हजारो सपना तथा प्रेमपूर्ण आशा बोइकऽ प्रेयसी इन्तजार कऽ रहल घर दिस बढ़ल। एगोट पएर असोरापर आ एगोट आङ्गनेमे छलै कि भितरीसँ कन्या बाजल- "कनिक हमर पएरक चप्पल नेने आउ, हम बिसरि गेलौं।" नवपत्नीक एहन संस्कारहीन बात सुनि सुभाषकेँ करेजपर ठनका खसलै मुदा दाम्पत्य जीवनक पहिल दिन आ प्रेयसीक प्रथम राति सोचि जखन ओ चप्पल लऽ कऽ गेला तँ घोघ उठबैत सीना तानि कऽ कन्या बजली- "अहाकेँ हम चप्पल लाबऽ लेल अढ़ेबाक प्रयोजन बुझलिऐ? अहाँक बाबूजी मुँहमाङ्गी रकम लऽ अहाँकेँ बेचलक अछि आ हमर बाबुजी एक-एक धूर जमीन बेचि हमरा लेल अहाकेँ किनलक अछि। ऐ हिसाबे पैसासँ खरीदल दास भेलौं अहाँ जे आवश्यकता पड़लापर खरीदार किछु करा सकैए।" ई गप्प सुनि सुभाषक गर्दन लाजसँ झुकि गेलै आ ओ निरुतर भऽ गेला। तखन कन्या फेर नम्र भऽ कहलनि- ई हम बस अहाकेँ महसूस करेबाक हेतु एकटा अभिनय कएलौं। आजुक बाद एहन किछु नै करब। एखन लेल क्षमाप्रार्थी छी।" कन्याक आँखिमे अपन बाबूजीसँ लेल गेल पैसाक ज्वाला छल। टकापर बिकाएबला एहन दानवरुपी पति प्रति प्रतिशोधक भावना छल। उपकारकेँ चुपकार हम जयनगरसँ अबै छलौं। रस्तामे देखलौं, एकटा महिला अपन ६ महिनाक बच्चाकेँ गोदीमे लऽ कऽ कनै छल। लगमे जा जखन देखलिऐ तँ ओ हमरे पड़ोसी मनोजक भनसिया रहए। माने हमर गामक भौजी। घर एकेठाम हेबाक कारण हम सभ एक-दोसरकेँ बड नीक जकाँ जनैत छलौं। हमरा देखि ओ आरो जोड़-जोड़सँ हिचकि-हिचकि कानऽ लगली। की भेल भौजी, छोट बच्चाक लेने एना किए भागल जाइ छी? प्रश्नक उत्तरमे ओ बजली- "हमरा ऐ दुनियाँमे कियो नै अछि। जतऽ ततऽसँ हम ठोकरे खाइ छी तैं हम मरि जाए चाहै छी। हमरा छोड़ि दिअ। जत मन हएत, ततऽ चलि जाएब। ने तँ जहर माहुर खा मरि जाएब।" एहन पिड़ाएल बात सुनि हम नम्रसँ पुछलिऐ- भौजी एना किए बजै छी? घरमे फेर झगड़ा भेल से? तब ओ अपन दु:ख भरल कहानी बताबऽ लगली- बच्चा कानऽ लगबाक चलते खाना समएपर नै बनि सकल तइसँ हुनकर ससुर-सासु आ पतिदेव सेहो पिटलकनि आ घरसँ भगा देलकनि। पित-खीसमे ओहिना बाजल हेता ओ सभ, चलू अहाँ। घर छोड़ि नै जाउ कतौ। कतेक समझौलाक बाद ओ आबऽ लेल राजी भेलनि। जखन हम अपना संगे मोटरसाइकिलपर लाबि ओकरा दूरापर उतारलौं तँ उनकर ससुर, सासु आ हुनकर पति हमरा उपर उल्टे लांछना लगौलक। तोरे कारण ई मौगिया अतेक बहसल छै। तोरे सिखाएलपर एके टाङ्गपर नचै छै। आदि आदि .... तखन हम महसूस केलौं जे दोसरकेँ इज्जत बचाएब आ अपना बेइज्जत हएब। दोसरकेँ भलाइ करब अपन चरित्र हत्या कराएब। उपकारकेँ चुपकार एकरे कहै छै। विचार कविजी केँ नमस्कार कवि जी! नमस्कार! नमस्कार! कि समाचार सञ्जय बाबू? ठीके छै अपन कहू? हमरो नीके छै रामजीकेँ कृपासँ कविजी जँ नै खिसयाइ तँ एक बात पूछी? कहऽ कहऽ की बात? यौ काल्हि रातिमे मुग्लानी सौगात द्वारा अतेक भव्य समारोह आयोजन भेल छलै। अपने किए तमसा कऽ चलि एलौं? धत् छोड़ू ओ बात सभ सञ्जय जी। यौ कहू तँ हम अतेक दिनसँ कविता लिखै छी आ ओ रमलखना हमरा कविताकेँ बारेमे पढ़ाउत? कविताक बिम्ब आ प्रतीककेँ अवगत कराओत? ओ कहै छल जे अहाँक कवितामे आरो निखार एबाक बाँकी अछि। बिम्ब आ प्रतीकमे आरो सुधार लाबू। ओतेक पैघ साहित्यिक समारोहमे हमरा बेइज्जत-बेइज्जत कऽ कऽ धऽ देलक। तैं हम सभा छोड़ि कऽ भागि एलौं। हम तँ बौक भऽ गेलौं ओइ कविजीक एहन गप्प सुनि कऽ। कहैत छै जे कवि तँ देश आ समाजक प्रतिनिधि होइ छै। अपना रचनासँ नयाँ देशक निर्माण करै छै। मुदा एहन विचारधाराक कविसँ कि नयाँ युगक निर्माण भऽ सकैए, जकरामे अपन गुण-दोष सुनबाक क्षमता नै छै। हमरा किछु नै फुरा रहल छल। कविता खंड हमर मिथिलाधाम ऐ धरतीपर पावन नगरी नाम जकर अछि मिथिलाधाम सीता संग विवाहित पाहुन मर्यादा पुरुषोत्तम राम भक्तिभाव चारू दिस पसरल अछि प्रसिद्ध ज्ञान विज्ञान विद्यापति संग वेद पुराणसँ हमर मिथिला बड़ महान ॠषि मुनि हमर मिथिलाकेँ अछि विदित जगतमे नामी राजा जनक, सीता रामकेँ एक पौराणिक नीक कहानी एहन सुन्दर मिथिला नगरीकेँ लङ्का किए बनौने छी बम, आतंक, हत्या, हिंसासँ दुनियाँमे चर्चा पौने छी कतबो कमाएब ढौवा रुपैया बरकति नै बिनु माइ के जकड़ल देशकेँ छोड़ने सुख नै कतार सउदी जाइके बिनती हमर मिथिला बचाउ सम्मान सभ ठाम पाबू यौ चाहे रही घर आङ्गनमे या विदेश कमाबू यौ खूनक ढेला संग नवपुस्ताक पतन सुन सुन हौ भैया सभ आगिक चिंगारी पसाही लागि देशभरि तबाही मचि गेलौ जन्मदाता सभ धरतीपर अवतरण कराबऽसँ पहिनेहि अपन-अपन कोखिकेँ सुड्डाह करऽ लगलौ भविष्यक कर्णधार छै बच्चा काल्हि धरि उपमा देनिहार सभ दाम्पत्यक सुखमे लिप्त भऽ अधर्मी, राक्षस आ नरपिशाच भऽ गेलौ सृष्टिक फूल बनि सुन्दर जिनगी लऽ अनुपम ब्रम्हाण्डक अवलोकन करब एहन पुनीत आ परम उद्देश्य खूनक ढेला संग बेकार भऽ गेलौ के दोषी, ककर अछि दोष ककरा अछि होश, के अछि बेहोश लोभी, लालची, महत्वाकांक्षी सन मात-पितासँ मनो घबराए लगलौ दोसर दिस रोगी लेल भगवान कहेनिहार समाजसेवी नामसँ प्रख्यात भेनिहार आ स्वार्थक बिषपान केनिहार आला-सुइ बला सभ भौतिकवादक चपेटामे पड़ि पथभ्रष्ट भऽ गेलौ मच्छर आ खुनचुवा जकाँ रस चुसऽ लगलौ पता नै ई रावणराज कहिया धरि चलत लैङ्गिक असमानतामे गर्भ कहिया धरि उजड़त भगवान सबुद्धि देथि ऐ दुरात्मा सभकेँ कारण पिताक आगू माइयो लाचार भऽ गेलौ माने खूनक ढेला संग जिनगी बेकार भऽ गेलौ हिसाब जिनगीक मार्च महिनाक उतरार्द्धमे आइ हम मृत्युकेँ देखलौं सुनने छलौं/ सोचने छलौं मृत्यु अत्यन्त सुन्दर होइ छै सरल होइ छै मुदा यथार्थ बिल्कुल फरक बिल्कुल अलग पैलौं भयानक आ बिकड़ाल रूप देखि हम डरसँ पानि-पानि भऽ गेलौं आब ऐठाम- मृत्युक कटघरामे हम अपन भूत, वर्तमान आ भविष्य स्पष्ट देखि रहल छी एखन धरि अनुमानित हम ५ लाखक दारू पीने हएब २ लाख ५० हजार ७०० क माउस खेने हएब कतौ अपने लुटेलौं / कतौ दोसरकेँ लुटलौं एनामे बर्बाद भेल हएत हमर जमा ३ लाख ७५ हजार आइ हम सोचै छी- ऐ रकममेसँ किछु पढ़ाइमे लगौने रहितौं तँ आइ हमरा पास कोनो बिषयक डिग्री रहैत किछु पैसा स्वास्थ्यमे खर्चने रहितौं तँ हमर शरीर कोनो बिमारीक घर नै रहैत अथवा ओ रुपैया बचल रहैत तँ अपने देशक कोनो नीक शहरमे आलीशान महल बनल रहैत मुदा दुर्भाग्यक गप्प, एहन किछु नै भेल फलत: हम नर्कक चक्कर काटि रहल छी आ एखनो राति-राति भरि सादा पन्नापर कलमक नोखसँ जिनगीक हिसाब करै छी बस हिसाब करै छी। नबरङ्गी बिलाइ देखलौं एतऽ भिन्न-भिन्न बिलाइ कारी बिलाइ कोनो उज्जर बिलाइ खैरल बिलाइ आ गैरल बिलाइ अछि सब ठाम बिलाइए बिलाइ बिलाइ नेपालक बड़ होशियार सिंह दरबारमे पैसैत अछि कतारक बिलाइ ठीक विपरीत हमरा किचेनमे पैसैत अछि देखलौं सब किछु जुठौलक बिलाइ मोट बिलाइ कोनो पातर बिलाइ बच्चा बिलाइ आ बुढ़िया बिलाइ अछि सब ठाम बिलाइए बिलाइ मोट बिलाइ जेना नेपालक जनताक खुन चुसने नेता पातर बिलाइ कतारमे जे भटकल अनाथालयक बेटा देखलौं सब नबरङ्गी बिलाइ वैष्णव बिलाइ-साँकट बिलाइ घुसहा बिलाइ आ फुसहा बिलाइ अछि सब ठाम बिलाइए बिलाइ नवबर्षक शुभकामना जन्मब दुर्लभ ऐ धरतीपर माटि-पानि अछि जकर महान सदियोसँ परिचर्चा पौने अछि आर्यसमाज विद्यमान पूर्वज जिनकर नाना क्षेत्रमे कुशल, ज्ञानी, गुणवान छै इतिहासक हर पन्नापर एकसँ एक नीक नाम छै एखनुक मैथिल पथभ्रष्ट भऽ कुकर्मी-कुसंस्कारी भऽ रहल आधुनिकताक दुर्गन्धित हवासँ धाराशायी मिथिलाकेँ कऽ रहल एहन विषम परिस्थितिमे अपन कर्तव्यक बोध करब छिड़िआएल, भुलल, भटकल जनकेँ लऽ सत्मार्गक ओर चलब ई पुनीत कर्मयोगी सभमे अछि हमर चरण बन्दना सम्पूर्ण स्रष्टा एवम् समाजमे ऐ नवबर्षक शुभकामना हमर समाज बौरा गेल एखनुक सबसँ पैघ सवाल अछि सगरो बल्तकारे बल्तकार गाममे बल्तकार, शहरमे बल्तकार देशमे बल्तकार, विदेशमे बल्तकार बुझू जे घोर कलयुग छा गेल माने हमर समाज बौरा गेल अत्याचार, आतंक, महिला-हिंसा निस्तब्ध भऽ सब केउ देखैत अछि जनता तँ आपसमे फुटले देखब लुटेराक त्राससँ सरकारो डगमगा गेल माने हमर समाज बौरा गेल सुरक्षाकर्मी पथभ्रष्ट भऽ जुआ खेलै शान्तिसेना हीनताबोधमे दारू पेलै अशान्तिक भूमरिमे धरती खौझा गेल माने हमर समाज बौरा गेल कतौ फेसबुकसँ बल्तकार ककरो स्काइपमे बल्तकार कखनो निम्बुजसँ बल्तकार तँ कतौ ट्वीटरमे बल्तकार एहन अपराध सर्वत्र छा गेल माने हमर समाज बौरा गेल सहनशीलताक प्रतिमूर्ति नारी मर्यादाक परिष्ठाता होइ छै माया-प्रेमसँ जगत फुलाबै स्वप्नदर्शनक द्रष्टा होइ छै मुदा दुर्भाग्य दानवक उदय भेल सकुनी मामा संग कंसक आगमन भेल द्रौपदीक चीरहरण, सीताक रूपहरण निन्दनीय घटना आइ फेर दोहरा गेल माने हमर समाज बौरा गेल की कहू, देखलौं घोर अनैतिक बात जइठाम देखू बल्तकारे बल्तकार बेटीक बल्तकार, दीदीक बल्तकार मौसीक बल्तकार, पिउसीक बल्तकार बुझू जे घोर कलयुग छा गेल माने हमर समाज बौरा गेल परदेशी पिया कोना बिसरलौं मुँहो हमर भेलौं अहाँ कोना बिरान जन्म-जन्मक व्रतबन्धनसँ पल भरिमे भऽ गेलौं आन देखि सपनामे छाती फटैए बिपनामे देखि कऽ दिल धड़कैए लोगक पिया घर आबै छथि हमर आखिसँ नोर खसैए जन्मेसँ हम भेलौं अभगली बचपन छिनल सासुर पौली बाली उमरमे भेलौं परदेसी बिनु पियाकेँ जीवन बितौली केश फल्कौवामे तेल गमकौवा लऽ जाइत छलौं पान-मखान टोकलक बिच्चे बाट मुझौंसा अहाँ गामक बुढ़बा हजाम नीक नै लागै बिन अहाँकेँ लौटब कहिया अपन गाम असगर आङ्गन दाँत कटैए बिन अहाँकेँ ठाम-ठाम केश अहाकेँ बिखड़ल-बिखड़ल चेहरा जेना लागै बबाल लोग लगाबै ओठ लिपिस्टिक मुदा अहाँक ओहिना अछि लाल देखि अहाँकेँ आँखि शराबी लागए समुन्द्रक पानि जेना बिनु बतौने हमरा रानी छुपेलौं एहन जवानी कोना छुरी जइसन नाक अहाँकेँ हीरा जइसन दाँत अछि चाल ढालपर हम फिदा छी कोयल सन मीठ-मीठ बात अछि मुस्कान अहाकेँ गजब हसीना तारीफ कतबो कम अछि देहो जेना संगेमर्मर और ओहूमे दऽम अछि बाजल जखने पएरक पायल केलक हमर दिलकेँ घायल छन छन छन बजल झंकार लऽ गेल हमर चैन करार मन करैए देखैत रहितौं सदिखन अहाँकेँ पास रही जौं लौट आएब अहाँ लग रानी बड़ प्रेम करब से आस करी छठिक शुभकामना छठि पावनि धुमधामसँ हएत पोखरीपर जाइ के माथ नमा कोटि नमन करै छी हम छठि माइ के सु-स्वास्थ दीर्घायु जीवन पुरबथि सबकेँ कामना सम्पूर्ण श्रद्धालु भक्तजनकेँ ईएह अछि शुभकामना पिया अहाँकेँ यादमे मेघ सन कारी केशपर गोरे गोरे गाल यौ आमक रस सन लाल ओठपर पिया अहाकेँ नाम यौ हम दू जोड़ी संग-संग जीअब गायब प्रेमक गुणगान यौ मरऽसँ पहिने आ मरलाक बाद बस रहब अहाँक गुलाम यौ हे प्राणेश्वर लौटब कहिया करब कखन आराम यौ घायल दिलकेँ मलहम अहाँ दिल अछि अहाँक मकाम यौ राति-राति भरि निन्द नै आबै बड़ जोर झकझोरै याद यौ बिन अहाँके जिनगी बीतल अहाँ दिल्ली, अरब, असाम यौ नोर बहैए नयनसँ हमर राह देखैत सौ बेर यौ अपने भेलौं परदेशी बाबू हम छी एतऽ बेकार यौ बिनु पानिकेँ मछली बुझू फुटल अल्मुनियम थारी यौ बिनु रोहितकेँ जिन्दा लाश भेल ई अहाँक रुपाली यौ प्रेमक फल सीसा फुटल दिल टुटल सकनाचुर भऽ छिरया गेल डोलीमे ओ गेली पिया घर हाथमे दारू थमा गेल दारुए हमर साथी-संगी बिनु ओकर सहारा नै कखनो ठर्रा कखनो प्याक बिनु ओकर गुजारा नै जिनगी अपन नरक बनेलौं ओइ लजबिज्जीक प्यारमे मरणासनमे साँस अछि लटकल ओ मजा करै ससुरालमे प्यार करब पैघ बात नै निमाहब बड़का बात छै प्रेमसँ ककरो जीवन सम्हरल ककरो जीवनमे घात छै वेलेन्टाइन शुभकामना बिन्दिया सब दिन चमकैत अहाँकेँ हाथक मेहदी लाल रहए वेलेन्टाइनक शुभ अवसरपर जोड़ी अहाँक बबाल रहए चूड़ी अहाँकेँ खन-खन खनके प्रेमीसँ बहुते प्यार मिलए दु:ख अहाँकेँ देखि कऽ भागए खुशी केर संसार मिलए फूल सन ई खिलल चेहरापर कली सन मुस्कान अछि नै देखि अहाँकेँ प्रेम दिवसपर दिल बहुत परेशान अछि दिलसँ दिलकेँ बात कही बिनु कहने नै रहि सकी हेप्पी वेलेन्टाइन डे तथा मनसँ प्रेमक गुनगान करी सम्मान जन्मभूमिक आएल नयाँ साल देखू लऽ कऽ एक नयाँ उत्साह सब छथि मग्न एक दोसरमे करए हृदएसँ प्रेम प्रवाह आइ कतेक महत्वक दिन एक दोसरकेँ सब जुराबै रहए सबदिन एहने दिन शान्ति आ समृद्धि पाबै मानव बीच सद्भाव देखल बोधिवृक्ष सभ जेना हरा-भरा मनोरम दृश्य आ अद्भुत पारीकार लागए जेना प्यारा-प्यारा ईर्ष्या दोष त्यागब उत्सवमे पुन: मिलि जुलि परिवार चलाएब आमक चटनी आ दही भात चैतक रिन्हल बैशाखमे खाएब छुटल ई सौभाग्य हमर जखने बढ़लौं विदेशक ओर राति-राति भरि निन्द नै आबए भोरे आखिसँ टपकए नोर अपनेक दुआ आ धैर्यताक आड़मे काममे हम प्रस्थान करै छी अन्तःकरणसँ हर अवसरपर जन्म आ कर्मभूमिक सम्मान करै छी जूड़शीतल दु:ख अहाँकेँ देखि कऽ भागए खुशी केर संसार मिलए टोला टापर घर डगहरमे अहींक जय जयकार मिलए खूब जुराबै मात-पिता सभ भाइ बहिनसँ प्यार मिलए जूड़शीतलकेँ शुभ अवसरपर पाहुनकेँ सत्कार मिलए झूठ फुसिसँ जान छोड़ाबथि सचकेँ करबथि सामना सदखनि जीवन गमगम गमकथि ईएह नव बर्षक शुभकामना प्रवासक वेदना हमर जिनगीक कोनो हिसाब नै रहल पढ़बाक लेल कोनो किताब नै रहल बैसल छी एखनो असगरे एकान्तमे किन्तु पीबाक लेल कोनो शराब नै रहल सपनामे ओहे चेहरा अबैए अबैत अछि ओहे ठाम आ गाम कतबो बिसरऽ चाही दिलसँ नै बिसरि पाबी जनकपुर धाम छी मैथिल हम मिथिलाक बासी दूर छी तैयो अपन प्रदेशसँ विवशताक मारल, पड़तारल पत्र लिखै छी अलग देशसँ माए बाबुकेँ चरण-बन्दना दोस्तकेँ हमर सलाम रहल अन्जान-सुन्जानपर ध्यान नै देबै माफ करब सब कहल सुनल मन लगाबी कतबो एतऽ जिउ टाङ्गल अछि दूरापर दिन कटै छी राति अइ भारी सदखनि जान अस्तुरापर प्रेमक मलहम फोन बनल अछि जीबाक माध्यम दू बात अछि थाकल ठेहिआएल आबी जौं कखनो लागै नै केओ साथ अछि कते कहू प्रवासक वेदना लिखैत सेहो शरम लगैए नोर आखिसँ टपटप चुबए कलम पकड़ैत हाथ कँपैए बस ई विनती नीकसँ रहब नीकसँ राखब गाउँ समाज एक दिन हमहूँ लौट कऽ आएब जगमग करतै मिथिला राज सुनि लिअ दू बात हमर भला करब तँ भला मिलत बुरा करब तँ बुरा मिलत ई छै जगत जननीक धरती कर्मक फल अवश्य मिलत हे मानव नीक कर्म करू करै छी किए खिसयालि सन चोरीक धन नै रहत सब दिन करै छी किए धधियालि सन ऐठाम सब किछु नाशवान छै जाहि पड़त ई जग छोड़ि कऽ बिनु भक्तिकेँ सुख नै भेटत रहब कते मुँह मोड़ि कऽ सुनै छी जानकी मन्दिरमे गिट्टी बालु गिरबै छी अपन स्वार्थ पूरा हेतु जनताकेँ घिसयबै छी एखनो ज्ञानक ताला खोलू आबि जाउ नीक पथपर दुर्दशासँ बचौथिन मैया आशन हएत स्वर्ग रथपर हम सब मैथिल एक रही एकजुट भऽ साथ चली पहिचान बनाबी अपन मिथिलाकेँ इतिहासक पन्नापर चमकैत रही सब कहै छथि मरू-भूमि हम कहै छी उर्बर छै रेगिस्तानमे एहन भूमि दर्शन भेनाइ दुर्लभ छै हम छी एखन कतारमे चारू दिस समुन्द्रसँ बेरल किछु अंश छै बालु पत्थर कतौ अछि महलसँ घेरल ऐ देशमे एकटा ठाम जमेलिया जकर नाम छै वसोवास हमरो अछि ओइठाम अपनेमे ओ महान छै नाना प्रकारसँ परिश्रमी सभ ईमान्दारी अपन बचौने छै दूर देशमे रहितो नित्य अपन स्वाभिमान बचौने छै ई अछि मित्र नेपाली हमर पत्थरमे कएने छथि हरा-भरा नै घटै कहियो रोटी इनका परिवार संग रहथि कुशल सदा पुन: चमकतै मिथिला राज जय मैथिल जय मिथिलावासी करू सब मिलि कऽ जयकार बन्द हेतै कुशासन सबकेँ पुन: चमकतै मिथिला राज सब ढेलफोड़बा नेता तेहने लै टिकट, कुर्सी, भत्ता पार्टी अते जे नाम याद नै जन्मल जेना गोबर-छत्ता के रावण के अछि कुम्भकरण ककरा बुझी न्यायक भगवान झोरा भरब रणनीति सबकेँ बस रामलीलामे बनैए राम हाथीसन दुमूँहा दाँत छै एक देखाबै दोसरसँ खाए पीठ पछाड़ी छुरा मारत मुँहपर बाजत भाए यौ भाए आइ पद छै घुमि लेब बड़का बड़का गाड़ीमे छिनब जखने छुछुन्नर बनतै छिछएतै बारी-झारीमे माङ्गल भीख नै भेटतै ककरो सभ जनता जँ मिलबै आब बन्द हेतै कुशासन सबकेँ पुन: चमकतै मिथिला राज आबो किए नै मिलि बाँटि कऽ ऐ दानव सभकेँ श्राद्ध करी हक छिनब जँ पाप थिक तँ किए ने एक अपराध करी गरीबो दुखिया चैनसँ जीअत हेतै गाउँ समाज उद्धार बन्द हेतै कुशासन सबकेँ पुन: चमकतै मिथिला राज भैंसी हेरा गेल आइ भोरे हम गेल छलौं चोरनिया चौरी भैंसीमे साथमे मोहना, सोहना आ बुधनो छल भैंसीमे बुधना-मोहना जामुन तोड़लक सोहना संग आधा बटलक हम कहलियै हमरो दे ओ कहलक अपने तोड़ि ले मन हमर बेपिड़ित भेल तरबाक तामस मगजपर गेल सोचलौं अनेरे हम नै जरी कविता लिखि मन ठण्डा करी जा कऽ बैसलौं आरि कात लागल एक कविता हाथ तखने आएल भैंसी के याद दौड़ैत गेलौं डगहर कात नै देखिते हमर मन डेरा गेल की कहू हमर भैंसी हेरा गेल नङ्गौटिया साथी हम जन्मली कुसी अम्बसिया ओ जन्मल इजोरियामे संगे खेलली बालू-बालू मीत लागल दुपहरियामे संगे पढ़लौं संगे लिखलौं घुमलौं बड़ बड़ खेत पथार कखनो तोड़लौं आम आ जामुन कखनो चोरौलौं अपने अचार बचपन बितल यौवना आएल गामक संगी दूर पड़ाएल बाबू हुनकर पैघ जिमदार काका सेहो छल ठिकेदार हमर बाबू छोट किसान गुजर करी साँझ बिहान हमर पढ़ब सपना भेल ओ पढ़ि लिखि कऽ मास्टर भेल मन कऽ भाव उठैए जखने लिखै छी छोट कविता सन नै भेटत कहियो जीवनमे ओहन नङ्गौटिया मिता सन सत्यता हम मानव छी एक दिन जन्मलौं संसारमे माय/ बापक इच्छा संगे एलौं संसारमे नाना तरहक क्रियाकलाप कएलौं कोनो नीक काम कोनो खराब काम कखनो सामाजिक काम तँ कतौ अपराधीक काम मुदा की अपने सभकेँ बुझल अछि? हमहूँ एक दिन जरूर मरबै गोरहा-काठीसँ धुह-धुह जरबै इहलीला हमर समाप्त भऽ जेतै शरीरक संगे कुकर्म सभ जेतै कारण हमरा पता अछि- किए कि, पृथ्वी नाशवान छै नाशवान रहतै सब दिन नै कियो अमर रहलैए आ नै कियो रहतै प्रकृतिक यथार्थ/ दुनियाँक सत्यता ईएह छै आ ईएह रहतै मृत्यु पश्चात हमर मृत्यु पश्चात हवा ओहने बहतै जेहन छलैए पहिने दुनियाँ ओहने रहतै जेहन रहै पहिने सूर्य, चन्द्रमा पृथ्वी, आकाश सब अपना अपना ठाम अपन गतिसँ चलतै केवल फरक हेतै ओ क्षण जतऽ हेतै हमर शव कियो कन्नारोहट करतै कियो आँचरसँ मुँह पोछतै सर पटकतै हमर बेटा दू ठोप कनतै हमर बेटी हेतै निःसहाय हमर कनियाँ लगतै कहिया हुनका भेटी मुदा, ई सभ एकटा मायाक जाल एकटा मनक भ्रम केवल कनिक समय लेल केवल कनिक दिन लेल वा केवल कनिक महिना लेल मात्र रहतै ओ समय- चलतै जोर-शोरसँ चर्चा हमर मुँह-मुँहसँ बाट आ डगहर कियो कहतै हम नीक छलौं कियो कहतै खराब कियो देतै उपमा अमृतकेँ कियो कहतै डकहर शराब ऐ लोकापवाद संग, समयकेँ चक्र चलिते रहतै जिनगी ओ सभ कटिते रहतै एतै पुन: कोनो नयाँ आयाम बिसरि जेतै सभ हमर नाम सबकेँ मनसँ हेरा जाएब हम सदा-सदा लेल बिसरा जाएब हम दैवक खेल सपना हमर सपने रहि गेल मांगक सेनुर बहिए गेल आस लागल छल जाहि पियापर हमरा छोड़ि कऽ चलिए गेल नैन तकैय मन कनैय हाथक चूड़ी बाट जोहैय पएरक पायल झनकि झनकि कऽ पिया वियोगक गान गबैय अपन किस्मत समयक खेल जिनगी जिअब नसीब नै भेल भरल जवानी रससँ डुबल दैवो केहन निठुर भऽ गेल घड़ी देखि-देखि दिन कटै छी गनि तरेगन होइय भोर होस ने कखनो सुधि ने कखनो अछि रातिए कि भेल इजोर हम अभागल बिधवा बनली करेजक टुकड़ा लैए गेल आस लागल छल जाहि पियापर दुनिया छोड़ि कऽ चलिए गेल रक्षाबन्धन भाइ-बहिनक प्रेम भरल छै लिअ ने एकरा अर्थ अनेक एक दिन ला सालमे आबए तैं तँ छै ई पर्व विशेष थाल सजल छै लड्डू रखल छै लाल चन्दनसँ माथ रङ्गल छै हर्ष-खुशीकेँ बाढ़ि आबि गेल हाथमे स्नेहक डोर बन्हल छै चारू दिस गुंजए गीत भाए-बहिनक रीत आ प्रीत माँ अम्बेसँ करैत प्रार्थना होए भैयाकेँ जीते जीत नीक पथ रोज यौ भैया बढ़तै हमरो आत्मविश्वास रक्षा करब देश, समाजक रखने छी बस ईहे आस अहाँ हमर आँखिक तारा छी हम बहिन अहाँक दुलार शत्रुकेँ चङ्गुलसँ करब सदखनि अपन भूमि उद्धार बाट जोहब हम ऐ दिनकेँ रहत जाधरि ठोठमे प्राण रक्षाबन्धन जगमग करतै भैया जिअत सालो साल छठि मध्य राति सपनामे हम नेपाल गेल छलौं छठिमे परिवार संगे बड़ खुशी भेल छलौं ठकुवा भुसबा आरो सब कुछ लऽ गेल छलौं फटक्काकेँ झोरा मुदा घरही बिसरि गेल छलौं माय, बाबू बहिन भाइ कनियाँ छलीह साथमे छोट-छोट बातपर तैयो रुसि गेल छलौं प्रसाद खाइत काल निन्द खुलल जखने अपने ओछानपर कतारमे सुतल छलौं विपनामे होइत सच्चे मजाक करैत साथी धत् हम तँ बेकारमे सपनामे गेल छलौं दिवाली भेटब दोसर दिवालीमे हम ऐ साल नै आबि सकलौं मुदा आएब दोसर दिवालीमे पूजा करब संगे लक्ष्मीकेँ प्रसाद चढ़ाएब थालीमे रावण मारि कऽ राम एलाह तखने भेल दिवालीक शुरूआत दीप जराएब आरती करब खुशी बाँटब अछि पैघ बात अपने झुमू सब केउ झुमताह खुशी मनाउ परिवारमे बिसरि सब किछु मन लगाबू फटक्का छोड़ू दरबारमे असत्यपर सत्यकेँ पताका तैं अछि ई पाबनि महान आगामी दिनमे टुटे अहिना दुष्ट दलकेँ ई अभिमान सत्संगत सु-मार्ग देखाबू माँ सँ बस ईएह प्रार्थना करू गरीबी भागै समृद्धि आबै बस ईहे अर्चना करू अन्तमे हम की कहू अहाँकेँ ध्यान राखब ऐ पालीमे हम ऐ साल नै आबि सकलौं मुदा आएब दोसर दिवालीमे प्रेमक अकार की अछि प्रेम की एकर अकार दिअ सब केउ अपन विचार करैय सब केउ प्रेमक पूजा पता नै ककरो के अछि दूजा प्रेम बिना अन्हार अछि जिनगी लगबै नारा बुढ़बा-नन्हकी बच्चो जुअनका ऐमे मातल सबकेँ आँखिपर पट्टी साटल कियो कहैय देहसँ प्रेम कियो कहैय सुरतिसँ कियो करैय जन्म-धरतीसँ कियो करैय मूरतिसँ सब केउ अपन जमबैत अछि भिन्न-भिन्न रूप बनबैत अछि हम कहै छी मनमे अछि प्रेम हम कहै छी आत्मा अछि प्रेम गाउमे छलौं गाउँ टा छल प्रेम शहरमे एलौं शहर टा भेल प्रेम देशमे छलौं सीमित छल प्रेम विदेशमे एलौं देशटा भेल प्रेम जौं जौं जाइ छी दूर देशसँ प्रेमक आयतन बढ़े बिशेषसँ रखने छी एखनो छातीमे सचने छी मनक पाथीमे हमरा नजरिमे उत्तम अछि प्रेम आ परम विशाल अछि एकर अकार कि कहब अछि अपने सभकेँ दिअ सबकेउ अपन विचार जनकपुरक रेल जनकपुरक रेलवे स्टेसन बनल अछि एक बज्र बिशेषण जीर्ण अवस्थाक मरम्मत जरुरी सेहो टालल दोसर सेशन।। नेपालक एक मात्र रेल यातायात सेहो बनल विश्वासघात जनकपुरसँ निकलल गाड़ी पटरी छोड़लक बिचे बाट।। बौआ पुछलनि माय कहू ई ट्रेन कहिया धरि चलत? माए बजलनि सुनु बौआ कुर्सीक खेल जहिया धरि चलत।। घिच्चाघिच्च-मिच्चामिच्च छोड़िते स्वर्ग भऽ जाएत अपन देश समान विकास सभठाम हएत नै रहत कोनो उलझन विशेष।। रेलवे आकि रेलक चार्ट बड पैघ समस्या छै निवेदन हमर सम्बन्धितसँ जल्दी ऐपर ध्यान देबै।। अस्पतालक हाल जनकपुरक अञ्चल अस्पताल बनल अछि एक पैघ सवाल समयमे जँ नै ध्यान देबै तँ रुप ईहो लऽ लेत बिकराल ।। फोहरमैला व्यवस्थापन देखल ऐ संस्थाक दोसर खराबी नै भविष्यक परवाह अछि ककरो करए सभ अपन मनमानी।। स्वार्थक विष पीने सभ सेवक नै लागय मन उपकारमे रोगी ऐ ठाम खूनसँ लतपत मुदा ओ व्यस्त क्लिनिक संसारमे।। देशक सर्वोच्च जनशक्ति छी तँ ऐ बातपर ध्यान धरी रोगीक लेल भगवान बनब तँ अपन कर्तव्यक बोध करी।। आबो, दु:ख, पीड़ा जनताक बुझब ईहे मनमे आस अछि समय-समयमे अस्पतालो टेबब अटुट जनविश्वास अछि।। अपन अलग पहिचान बनेबै अहूँ आबू हमहूँ एबै अपन अलग पहिचान बनेबै बड पीने छल खून मुझौसा तेलचट्टाकेँ तेल चटेबै।। हेतै वापस भेँट जखने चमरा खेतमे मुँह डुबेबै भक-भक सुझतै दुनियाँ तखने ढौसा बेङ्गक ढौह फुलेबै।। कुर्सी छिनबै सत्ता छिनबै दिन-रातिक भात्ता छिनबै फटर-फटर जे करतै जखने देहक कपड़ा-लत्ता छिनबै ।। नै छोड़बै नै क्षमा करबै हकले चाहे जिबै मरबै मरि जेबै तँ लेखा लेबै जिबै तँ गङ्गा स्नान नहेबै।। यौ भैया यौ बाबू आबू बन्दूक देखि नै पाछू भागू चाही जँ मिथिला राज अहाँकेँ जोड़सँ अपन डेग बढ़ाबू।। बदलू सरगम बदलू साज डटि कऽ करु अपन काज चुमत सफलता कदम अहाँकेँ गम गम करत मिथिला राज।। चान्द सुरज अछि साथ अहाँकेँ धरतीसँ आकास धरि विश्वासक एकटा किरण पकड़ने बैसल अन्तिम साँस धरि।। चलू सभ केउ युद्धमे जेबै अपन अलग पहिचान बनेबै चारुदिस फहरेबै झण्डा छुट्टे मिथिला राज बनेबै ।। गीत राति छलै काल्हि धरि भोर भऽ गेलै कारी पोतल इतिहास इजोर भैए गेलै। बड सतौने छलै तङ्ग केने छलै ओहो तनाशाह मरल सोर भैए गेलै चलु उठी कनी आबो जागी कनी सबठाँ मिथिलाक झण्डा फहराबी कनी हम तैयारे छी अहूँ तैयारे रहू ओइ छुछुनरकेँ अहाँ खबरदार कहू आब भेटतै सभ हक पहिने खाली छलै ढेलफोरबाकेँ एतऽ मनमानी छलै सब एक जुट भेली जोर भैए गेलै राति छलै........... भोर भैए... मनक भाव की चूकि भेल हमरासँ जकर देलौं एहन सजाए अहाँ छी सब केउ अपने साथ-साथ पर केलौं किए हमरा जुदा ।। सपना देखब अपराध छिऐ तँ एहन प्यास जागल कोना बिनु परिवार जिनगी टेबब जीवन एहन काटब कोना ।। झुठ-फुसिक इल्जाम लागए ई नारी जीवन केहन परिवार प्रति अटुट श्रद्धा होइतो बिताबी हर छन नरक लागे जेहन।। सुनि, सोचि कनी ध्यान धरी नै जुदा करु परिवारसँ छी सदस्य हमहूँ ऐ परिवारक नै वंचित करु परिवारसँ।। साम्प्रदायिक दङ्गा समाजमे गेलौं फूट देखलौं परिवारमे देखलौं आपसी द्वन्द्व टोला-टापर स्तब्ध मौनता नेता सभ करे नारा बुलन्द। लिखबाक छल हमरा सामाजिक कथा जनता-जनार्दनक पीर आ व्यथा खोजैत छलौं कोनो यथार्थ घटना भेटल ओतऽ लुटपाट घटना। छोट-छोट बातक बिषय बनौने राजनीतिकेँ अपन अजेण्डा बनौने धर्मनिरपेक्ष देशक जनता सभ साम्प्रदायिक दङ्गाक आह्वान कएने। काल्हि धरि छलै सलीम चचा आइ भऽ गेलै तलवारक निशाना ईद दिवाली एक बुझाइ जेना लुटै छै आइ सभ ओकरे खजाना। हमर कलम ओतै ठरा गेल मन-मस्तिष्क दुनु घबरा गेल देखी नतीजा नङ्गटे नाचके बुझु हमर मसि सुखा गेल । नै बनल कोनो नीक कविता नहिये बनल रसगर उपन्यास मानवता, सामाजिकतापर आँच आएल छै लगै सब ओतऽ हास-परिहास । हमर निवेदन पहिरु अङ्गा कतेऽ नचै छी नङ्गे -नङ्गा ? भविष्य अहाँक चौपट भऽ जाएत तेँ बन्द करु साम्प्रदायिक दङ्गा । चेतना स्वार्थ-स्वार्थसँ भरल संसार छिनए सबकेँ सब अधिकार अपन अभिमान बचएबाक हेतु करए लाखो अत्याचार।। की कहू दुनियाँक रीत किछु नै समझमे आबैए अपन झूठ शान-सौगात ला मिथ्या दोष लगाबैए।। मानव भऽ मानवता भुलब ई केहन अनैतिक बात कहू नैतिक पतन, अस्तित्वमे दाग लऽ आब कथीक पश्चताप कहू।। अपील सुनू, धधकत इनसान अपनहि जैसन सबके मान स्वार्थ बिना जँ जिनगी टेबब निश्चित बनत देश महान ।। एक एहनो नारी चाही उनका स्टेण्डर खाना तीत नै कि मीठ-मीठ दाना खर्च करऽ मे कनियो कम नै बस देखब सर्कस सिनेमा॥ भोरे उठि अबै छी जखने आर्थिक स्रोतक अधारपर पिछुवारेसँ चुपे निकलल शोपिंग करऽ बजारपर॥ नयाँ डिजाइनक साड़ी चाही अभिनेत्री सन गहना यौ बात हिनकर छनि छुछे करु कि करियै हम बहिना यै॥ नव युक्तिसँ नव प्रेमी संग प्रेमक नाटक थिक हिनकर काम फ़सलनि जे हिनका फेरामे भऽ गेलाह ऐठाम बदनाम॥ पहिनेक नारी एहि मिथिलाके सहनशील आ कतेक सुशील छलीह आजुक नारी भौतिकवादमे मैथिलानीक गुण बिसरि गेलीह॥ कि हएत हमरा मिथिलाकेँ नारी जौँ पथ छोड़ि देताह जीवनके दु रथ होइ छै बिनु नारी जीवन कोना चलताह॥ आशीष अनचिन्हार मुन्नाजीक गजल सियाराम झा सरस जीक संपादनमे बर्ख १९९० मे "लालकिला आ लोकवेद" नामक एकटा साझी गजल संग्रह आएल। ऐ संग्रहमे गजलसँ पहिने तीनटा भाष्यकारक आमुख अछि। पहिल आमुख संपादक जीक छन्हि आ ओ तकर शुरुआत एना करै छथि "समालोचना आ साहित्यिक इतिहास लेखनक क्षेत्रमे तकरे कलम भँजबाक चाही जकरा ओइ साहित्यक प्रत्येक सूक्ष्तम स्पंदनक अनुभूति होइ......."। अर्थात सरसजीक हिसाबेँ कोनो साहित्यिक विधाक आलोचना, समीक्षा वा ओकर इतिहास लेखन वएह कऽ सकैए जे ओइ विधामे रचनारत छथि। जँ हम एकर व्याख्या करी तँ ई नतीजा निकलैए जे गजल विधाक आलोचना वा समीक्षा वा ओकर इतिहास वएह लीखि सकै छथि जे गजलकार होथि। मुदा हमरा आश्चर्य लगैए जे ने ई. १९९० सँ पहिले सरस जी ई काज केलाह आ ने १९९० सँ २००८ धरि ई काज कऽ सकलाह। २००८ केँ ऐ दुआरे हम मानक बर्ख लेलौं जे कारण २००८ मे हिनकर, मने सरस जीक, एखन धरिक अंतिम गजल संग्रह "थोड़े आगि-थोड़े पानि" एलन्हि मुदा ओहूमे ओ एहन काज नै कऽ सकलाह। आ बर्ख २००८ मे गजल विधा पर केन्द्रित ब्लाग "अनचिन्हार आखर" आएल जइमे गजलक व्याकरण आ आलोचना पर पर्याप्त काज भेल। आ गजल विधाकेँ सरस जी आ हुनक टीमसँ छुटकारा प्राप्त भेल। आ जे काज १०० साल मे नै भेल से मात्र एक साल पाँच मासमे गजेन्द्र ठाकुर कऽ देखेलाह आ मैथिली गजलकेँ पहिल गजल शास्त्र देलाह। ई हमरा हिसाबेँ कोनो गजलकारक सीमा भऽ सकैत छलै मुदा सरस जीक दोहरा चरित्र ओही आमुखक तेसर आ चारिम पृष्ठमे स्पष्ट भऽ जाइत अछि, जतए सरस जी लिखै छथि "मैथिली साहित्यमे तँ बंगला जकाँ गीति-साहित्यिक एकटा सुदीर्घ परंपरा रहलैक अछि। गजल अही परंपराक नव्यतम विकास थिक, कोनो प्रतिबद्ध आलोचककेँ से बुझऽ पड़तैक। हँ ई एकटा दीगर आ महत्वपूर्ण बात भए सकैछ जे मैथिलीक समकालीन आलोचकक पास एहि नव्यतम विधाक आलोचना हेतु कोनो मापदंडिके नहि छन्हि। नहि छन्हि तँ तकर जोगार करथु.........." आब ई देखल जाए जे एकै आलेखमे सरस जी कोना दोहरापन देखा रहल छथि। आलेखक शुरुआतमे हुनक भावना छन्हि जे जे आदमी गजल नै लीखै छथि से एकर समीक्षा वा इतिहास लेखन लेल अयोग्य छथि मुदा फेर ओही आलेखमे ओहन आलोचकसँ गजल लेल मापदंड चाहै छथि जे कहियो गजल नहि लिखला। भऽ सकैए जे सरस जी ई आरोप अपन पूर्ववर्ती विवादास्पद गजलकार मायानंद मिश्र पर लगबथि होथि, जे कि सरस जीक हरेक आलेखसँ स्पष्ट होइत अछि। मुदा ऐठाम हमरा सरस जीसँ एकटा प्रश्न जे जँ कोनो कारणवश माया जी ओ काज नै कऽ सकलाह वा जँ मायानंद जी ई कहिए देलखिन्ह जे मैथिलीमे गजल नै लिखल जा सकैए तँ ओकरा गलत करबा लेल ओ अपने (सरस जी) की केलखिन्ह। २००८ धरि मैथिलीमे १०-१२टा गजल संग्रह आबि चुकल छल। मुदा अपने सरस जी कहाँ एकौटा गजल संग्रह समीक्षा वा आलोचना केलखिन्ह। गजलक व्याकरण वा इतिहास लेखन तँ बहुत दूरक बात भऽ गेल, सरस जी कहै छथि जे गोर बीसेक बहरमे ओ गजल लिखै छथि, मुदा हुनकर संग्रहसँ स्पष्ट अछि जे बहरक सामान्यो ज्ञान हुनका नै छन्हि, आ जँ छन्हि तँ से हुनकर गजलमे गोर बीसेक छोड़ू, एक्कोटा बहरमे गजल लिखल नै भेटैछ। ऐ आलेखसँ दोसर बात इहो स्पष्ट अछि जे सरस जी कोनो समकालीन आलोचककेँ गजलक समीक्षा लेल मापदंड देबा लेल तैयार नै छथि। जँ कदाचित् कनेकबो सरस जी आलोचक सभकेँ मापदंड दितथिन्ह तँ संभवतः २००८ धरि गजल क्षेत्रमे एहन अकाल नै रहितै। आब हम आबी विदेहक अंक ९६ (१५-३१ दिसम्बर २०११) पर जइमे श्री मुन्ना जी द्वारा गजल पर पहिल परिचर्चा करबाओल गेल छल। आन-आन प्रतिभागीक संग-संग प्रेमचंद पंकज नामक एकटा प्रतिभागी सेहो छलाह। पंकज जी अपन आलेखमे आन बातक संग इहो लिखैत छथि "कतिपय व्यक्ति एकटा राग अलापि रहल छथि जे मैथिलीमे गजलक सुदीर्घ परम्परा रहितहु एकरा मान्यता नहि भेटि रहल छैक। एहन बात प्राय: एहि कारणे उठैत अछि जे मैथिली गजलकें कोनो मान्य समीक्षक-समालोचक एखन धरि अछूत मानिकऽ एम्हर ताकब सेहो अपन मर्यादाक प्रतिकूल बुझैत छथि। एहि सम्बन्धमे हमर व्यक्तिगत विचार ई अछि, जे एकरा ओहने समालोचक-समीक्षक अछूत बुझैत छथि जनिकामे गजलक सूक्ष्मताकें बुझबाक अवगतिक सर्वथा अभाव छनि। गजलक संरचना, मिजाज आदिकें बुझबाक लेल हुनका लोकनिकें स्वयं प्रयास करऽ पड़तनि, कोनो गजलकार बैसि कऽ भट्ठा नहि धरओतनि। हँ, एतबा निश्चय, जे गजल धुड़झाड़ लिखल जा रहल अछि आ पसरि रहल अछि आ अपन सामर्थ्यक बल पर समीक्षक समालोचक लोकनिकें अपना दिस आकर्षित कइए कऽ छोड़त।” अर्थात प्रेमचंद जी सरसे जीक जकाँ भट्ठा नै धरेबाक पक्षमे छथि। सरस जी १९९० मे कहै छथि मुदा पंकज जी २०११ केर अंतमे मतलब २२साल बाद, सरस जी सेहो बहरमे नै लिखि पाबै छथि आ प्रेमचन्द्र पंकज सेहो बहरमे नै लिखि पाबै छथि। मतलब बर्ख बदलैत गेलै मुदा मानसिकता नै बदलै। ओना ऐठाम हम ई जरुर कहए चाहब जे भट्ठा धराबए लेल जे ज्ञान आ इच्छा शक्ति चाही से बजारमे नै बिकाइत छै। मुदा आब ऐठाम हम ई जरूर कहए चाहब जे मायानंद मिश्रक बयान आ अज्ञानतासँ मैथिली गजलकेँ जतेक अहित भेलै तइसँ बेसी अहित सरस जी वा पंकज जी सन अभट्ठाकारी लोकनिसँ भेलै। आब हमरा लोकनि आबी मुन्ना जी प्रस्तुत हुनक पहिल गजल संग्रह पर। जँ अहाँ मुन्ना जी द्वारा लिखल आमुख पढ़ब तँ नीक जकाँ बुझा जाएत जे आखिर मैथिली गजलमे मुन्नाजी किए कतिआएल रहलाह। आखिर की कारण छलै जे पंकज जी अपन खास मित्रकेँ गजल सुनबैत तँ रहलाह मुदा अपन मित्रकेँ गजल लिखबाक लेल उत्साहित नै केलाह जखन कि हुनका बूझल छलन्हि जे मुन्ना जी गजलमे सेहो रुचि लऽ रहल छथि। भऽ सकैए जे ई आरि-खेत बला भावनाक विषय हुअए मुदा एकर परिणाम खतरनाक भेलै। अर्थात मुन्ना जी बहुत दिन धरि गजलसँ दूर रहि गेलाह। हमरा विश्वास अछि जे जँ पंकज जी ओइ समयमे मुन्ना जीकेँ भट्ठा धरेने रहितथिन्ह तँ आइ मुन्ना जी गजलमे बहुत आगू रहितथि आ मात्र इएह मुन्ना जी नै बल्कि हजारो मुन्ना जी गजलमे आगू अबितथि। मुदा एतेक भेलाक बाबजूदो हमरा खुशी ऐ बातक अछि जे मुन्ना जी कतिआएल तँ रहलाह मुदा पछुआएल नै रहलाह। आ ई बात अहाँ हुनक हरेक गजल पढ़ि कऽ अनुभव कऽ सकैत छी। चाहे ई बात व्याकरणक होइ वा भाव-भंगिमाक वा शब्द संयोजनक, आइ मुन्ना जी अपन समकालीन गजलकार ( खास कऽ अपन मित्र वर्गादिसँ ) बहुत आगू छथि। अनचिन्हार आखर (गजलक संक्षिप्त परिचय, ७८ टा गजल,३२ टा रुबाइ आ २ टा कता) गजलक संक्षिप्त परिचय गजल मने प्रेमिकाक आँचर सेहो होइत,गजल मने हिरणीक दर्द भरल आवाज सेहो होइत छैक, गजल मने प्रेमी-प्रेमीकाक गप्प सेहो होइत छैक। कहबाक तात्पर्य जे जतेक विद्वान ततेक परिभाषा। तथापि जँ गजलक एकटा सर्वमान्य परिभाषा चुनबाक हएत तँ हमरा हिसाबें अरबी भाषा मे जे पहिल अर्थ धूनब (जेना रुइ धूनब) आ दोसर प्रेमालाप होइत छैक आ हमरा हिसाबें इ दूनू अर्थ ठीक छैक। जँ पहिल अर्थ धूनब लेबै तँ जहिना रुइ के धुनला सँ शुद्ध रुइ बहराइ छैक आ थोड़बे रुइ बेसी भए जाइत छैक तहिना आखर(word) के अनुभव सँ धूनि थोड़बे आखर सँ भावनाक रंगबिरही महल के ठाढ़ करब गजल भेल। आ जँ दोसर अर्थ प्रेमालाप लेबै तँ कने सूक्ष्म रुप मे जाए पड़त। स्थूल रुपें देखला सँ गजल समान्य प्रेमी-प्रेमिकाक बचन लागत मुदा वस्तुतः गजल मे आत्मा प्रेमिका आ परमात्मा प्रेमीक रुप मे अबैत अछि। गजल मूलतः अरबी शब्द छैक तँए इ बुझबामे कोनो भाँगठ नहि जे गजल नामक काव्य सर्वप्रथम अरबी भाषा कहल गेल। एहिठाम इ कहब उचित जे शाइरी केखनो लिखल नहि वरन कहल जाइत छैक। एहिठाम शाइरी मने गजल समेत सभ काव्य विधा भेल। गजलक जन्म आ विकासके जनबासँ पहिने अरब देशक ऐतिहासिकताके जानब बेसी जरुरी अछि। इस्लाम धर्मक जन्मसँ पहिनेके समयके जमानः-ए-जाहिलियः कहल जाइत छैक, जकर मतलब अछि "अन्हार युग"। अन्हार युगमे जाहि तरहक काव्य रचल गेल ओ मूलतः अपन-अपन कबीलाके प्रशंशा आ विपक्षी कबीलाक खिद्धाशंसँ भरल अछि आ एहि काव्य शैलीके कसीदा कहल जाइत छैक। एहि युगमे मुतनब्बी नामक शाइर महत्वपूर्ण छथि। कसीदामे जखन प्रेमक प्रवेश भेल तखनेसँ गजलक जन्म हेबाक संभावना अछि। आ एहि प्रयोगक श्रेय इमरउल कैस (539 इ.) के जाइत छन्हि। अरबी साहित्य विशेषज्ञ सभके मानब छन्हि जे इमरउल कैस अन्हार युगक पहिल शाइर छथि जे गजल कहब शुरु केलथि। संगहि-संग कैसे एहन पहिल शाइर छथि जे अपन प्रियतमकेँ खसल दयार ( दयार मने डीह ) पर कानि कए गजल कहबाक परंपरा शुरु केलथि। कैसक अलावे अरबीमे अन्तरह्-बिन-शद्दाह-अल-अबसी (525-615 इ.) अपन गजल-उल-अजरी मने पवित्र प्रेमक गजल लेल प्रसिद्ध भेलाह। अरबीक शाइर अहदे--उमवीक (661-749 इ. ) योगदान गजलमे सर्वाधिक अछि। तँए विद्वान लोकनि एहि युगके उमवी युग कहैत छथि। उमवी समयमे मक्का आ मदीना शाइर आ कलाकारक केन्द्र छल। जाहि कबीला ( खानदान ) मे पैगम्बर हजरत मोहम्मदक जन्म भेलन्हि ओही कबीलामे शाइर उमर-बिन-अबी रबीय ( 643-711 इ.)क जन्म सेहो भेलन्हि। इ. 701 जन्मल जमील बुसीन विशुद्ध गजलगो शाइर छलाह। बुसीन वस्तुतः जमीलक प्रेमिकाक नाम छल जकरा जमील अपन तखल्लुस ( उपनाम ) के रुपमे प्रयोग करैत छलाह। आब एहि समय धरि गजलक विषय मात्र शारीरिक नहि रहि भावनात्मक भए गेलैक। प्रसिद्ध शाइर उमरु-बिन-कुल-सूम अत़गलबी अपन गजलक शुरुआत प्रेमिकाक देहसँ नहि वरन जाम-ओ-मीनासँ करैत छथि। इस्लामक जन्म पछाति अरबी शाइरीके विषय तँ बदलबे केलै संगहि-संग इस्लाम जखन इरान इराक पहुँचल तँ गजल सेहो पहुँचि गेलै। आ एहि तरहें आब फारसीमे सेहो गजल कहनाइ शुरु भेल। फारसीमे गजलगोइ नवम शताब्दीक अंतसँ शुरु भेल। मुदा एहिठाम इ कहबामे कोनो संकोच नहि जे फारसीमे कहल गजल अरबी गजलसँ बेसी नीक, समृद्ध, उदार आ भावनासँ परिपूर्ण अछि। एकर कारण इ जे अरब के तुलनामे इरान सभ्यता-संस्कृतिके मामलेमे बेसी विकसित छल। फारसीमे संभवतः रुदकी समरकन्दी पहिल शाइर छथि जे गजल कहलथि। रुदकी गजलक अलावे कसीदा, रुबाइ, मनसवी आदि सेहो कहलथि। फारसीक लगभग सभ महत्वपूर्ण शाइर गजल कहलथि जेना श़ेख सादी, रुमी, ख्वाजू किरमानी, हाफ़िज, शिराजी इत्यादि। फारसी गजलमे कमाल ख़जन्दी महत्वपूर्ण हस्ताक्षर छलाह। एहि सभहँक अलावे ओहि समयमे उ़र्फी, मजीरी, तालिब, कलीम आ सायब सभ सेहो गजलक विकास अपना-अपना तरीकासँ केलथि। एकटा आर गप्प---- फारसी गजलमे सायबके तमसील ( मने दृष्टान्त)क बादशाह मानल जाइत अछि, मुदा ओ स्वयं एहि कलाके उस्ताद गनी काश्मीरीके बुझैत छलाह। आ हुनकासँ भेंट करबाक लेल भारत ( फारसी इतिहासमे हिन्दोस्तान ) सेहो आएल छलाह। फारसी गजलके संबंधमे दूटा गप्प आर । पहिल जे अमीर खुसरो " अमीर खुसरो देहलवी"क नामेँ भारतसँ बेसी इरानमे प्रसिद्ध छलाह। आ दोसर गप्प जे स़फवी युगमे इरान शासक सभँहक अकृपाक कारणे बहुत शाइर सभ भारत आबि बसि गेलाह। एहने क्रममे शाइर शैख- अली-हर्फी-इस्फाहानी जे बनारस आबि गेलाह। सन 1765इ.मे हुनक मृत्यु भेलन्हि । आ एहने समयमे भारतक माटि पर गजल अपन गमक पसारि देलक। एहिठाम इ मोन राखब उचित जे भारतमे अमीर खुसरोके पहिल गजलगो सेहो मानल जाइत अछि। आ एहि गमकक किछु कण मीर, गालिब जेहन शाइरके जन्म देलक। आ तकरा बाद धीरे-धीरे उर्दू शाइरीक जन्म भेल। मोहम्मद व़ली कुतुबशाह उर्दूक ओ पहिल शाइर छथि जनिकर दीवान ( गजल संकलन) प्रकाशित भेलन्हि। कुतुबशाहक बाद जे शाइर भेलाह ओ छथि--ग़व्वासी, वज़ही, बह़री इत्यादि। आ उर्दूक संग-संग गजल मिथिलाक माटि पर सेहो पसरल जकर पहिल उदाहरण कविवर जीवन झाक नाटक सुन्दर-संयोगमे भेटैत अछि। गजल कोना कहल जाइत छैक? आब एहि प्रश्न पर चली। सभसँ पहिने जे शाइरी सदिखन कहल जाइत छैक लिखल नहि । आब अहाँ एकरा अरबी प्रकिया मानि मूँह नहि घोकचा लेब। हिन्दु धर्मक चारु वेद लिखल नहि कहल गेल छैक। आ शाइरी सेहो वेदे जकाँ कहल जइत छैक। शाइरी विशुद्ध रुपसँ उच्चारण पर निर्भर अछि। तँए गजल कहल जाइत छैक लिखल नहि। आब इ कही जे गजल किछु शेरक संग्रह होइत छैक ( कमसँ कम पाँच आ बेसीसँ बेसी सत्रह )। जँ सत्रहसँ बेसी शेर देबाक हुअए तँ फेरसँ एकटा मतला कहू आ शेर कहैत चलू। आ एना दूगजला, तीनगजला, चौगजला होइत रहत। ओना गजलक संबंधमे इहो धेआन राखब जरूरी जे प्राचीन गजलगो गजलमे ताक (विषम) संख्या रखैत छलाह जेना 5, 7,9 आदि। एकर कारण इ कहल जाइत अछि जे पहिने गजलक विषय विरह युक्त प्रेम छल तँए जुफ़्त (सम) के छोड़ि ताक ( विषम ) के प्राथमिकता देल जाइत छलै। मुदा आधुनिक गजलगो एहि रुढ़िके तोड़ि देने छथि। आब इ बूझी जे शेर की थिक। शेर सदिखन दू पाँतिक होइत छैक आ शाइर जे कहए चाहैत अछि ओ दुइये पाँति मे खत्म भए जेबाक चाही, अन्यथा ओ गजलक लेल उपयुक्त नहि। आ एहन-एहन गजल जकर हरेक शेरमे अलग-अलग बात कहल गेल हो ओकरा "गैर-मुसल्सल" गजल कहल जाइत छैक। किछु गजल एहनो होइत छैक जकर हरेक शेर एकै विषय पर रहैत छैक। एहि प्रकारक गजलके "मुसल्सल" गजल कहल जाइत छैक, मुदा "मुसल्सल" गजल बेसी नीक नहि मानल जाइत अछि। उर्दूमे पाँतिकेँ "मिसरा" कहल जाइत छैक। शेरक पहिल पाँतिकेँ "मिसरा-ए-उला" आ दोसर पाँतिकेँ "मिसरा-ए-सानी" कहल जाइत छैक। आब शेरक किछु उदाहरण देखू-------------------------- अला हुब्बी बे-सेहने की फ़ सबहीना वला तब्की ख़मूरल अन्दरीना अर्थ---- ऐ साकी सुन पेआला उठा कए हमरा एतेक जामे-सुबूही (जामे-सुबूही मने भोरक बचल शराबक पेआला) दे की जाहिसँ अन्दरीना ( अन्दरीना सीरीया देशक एकटा जगहक नाम अछि)मे एकौ ठोप शराब नहि बचै। ( भाषा- अरबी, शाइर- उमरु-बिन-कुल-सूम अत़गलबी) अगर आ तुर्के-शीराजी बदस्त आरद दिले-मारा ब-खाले हिन्दुवश बख़शम समरकन्दो बुखारा रा अर्थ--------- जँ ओ सुन्दरि महबूब हमर करेज चोरा लेथि तँ हम हुनकर एकटा तिल पर समरकंद आ बुखारा सन-सन देश हुनका दए देबैन्ह। ( भाषा- फारसी, शाइर- हाफ़िज शीराजी ) उनके आ जाने से आ जाती है मुँह पर रौनक वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है ( भाषा-उर्दू, शाइर गालिब ) बाट तकैत दिन बीति जाएत बुझलिऐ आस तकैत जिनगी बिताएत बुझलिऐ ( भाषा- मैथिली, शाइर गजेन्द्र ठाकुर ) लड़कीकेँ जाति नहि होइत छैक लड़का अजाति नहि होइत छैक (भाषा-मैथिली- शाइर रोशन झा) भागब कोनाक दूर जिनगी सँ डरब किया मृत्यु केर चिनगी सँ (भाषा-मैथिली- शाइर प्रवीण चौधरी "प्रतीक") अहाँ संग प्रेम करबा पर बिर्त हम अपटी खेतमे मरबा पर बिर्त हम ( भाषा- मैथिली, शाइर आशीष अनचिन्हार ) जँ उपरका शेर सभके देखबै तँ पता लागत जे इ सभ दुइये पाँतिके छैक आ जे बात कहल गेल छैक से पूरा-पूरी छैक। इएह भेल शेर। गजलसँ जुड़ल किछु आर पारिभाषिक शब्द देल जा रहल अछि। बिना एकरा बुझने गजल नहि बुझल जा सकैए। 1) मतला------------"मतला" गजलक ओहि पहिल शेरके कहल जाइत छैक जकर दूनू पाँतिमे काफिया आ रदीफ रहै। एकटा गजल उदाहरणक लेल देल जा रहल अछि। अपन आँखिमे बसा लिअ हमरा अपन श्वासमे नुका लिअ हमरा जहाँ मरितो जीबाक आस रहए ओहने ठाम तँ बजा लिअ हमरा हाथ सटेलासँ मोन केना भरतै अहाँ करेजसँ सटा लिअ हमरा एहि गजलक पहिल शेरक पहिल पाँतिमे काफिया "आ"क मात्रा अछि (केना से काफिया बला खंडमे पता चलत)। आ रदीफ " लिअ हमरा" अछि। तेनाहिते शेरक दोसरो पाँतिमे काफिया "आ"क मात्रा अछि आ रदीफ "लिअ हमरा"। संगहि-संग इ शेर गजलक पहिल शेर अछि, तँए इ भेल मतला। आब दोसर शेर पर आउ, मतलाक बाद इ कोनो जरुरी नहि छैक जे दूनू पाँतिमे काफिया आ रदीफ हुअए। मुदा मतलाक बला शेरक बाद जे शेर छैक तकर दोसर पाँतिमे काफिया आ रदीफक रहब अनिवार्य। उपरके गजलके देखू मतलाक बाद जे शेर अछि------ "जहाँ मरितो जीबाक आस रहए "ओहने ठाम तँ बजा लिअ हमरा" एहि शेरमे देखू पहिल पाँतिमे ने रदीफ छैक आ ने काफिया , मुदा दोसर पाँतिमे काफिया सेहो छैक आ रदीफ सेहो। अन्य शेरक लेल एहने सन बुझू। ओना मतलाक बाद जे मतला आबए तँ इ शाइरक क्षमता के देखबैत छैक आ गजलके आर बेसी सुन्दर बनबैत छैक। तएँ ओकरा हुस्ने-मतला कहल जाइत छैक।ओना शाइर चाहए तँ गजल हरेक शेरके मतलाक रूपमे दए सकैए।बिना रदीफक गजल सेहो होइत छैक जकरा "गैर-मुरद्दफ" गजल कहल जाइत छैक मुदा काफिया रहब बिलकुल अनिवार्य। 2) रदीफ-------------- रदीफ मतला बला शेरक दूनू पाँतिक ओहि अंतिम हिस्साके कहल जाइत छैक जे दूनू पाँतिमे समान रूपें बिना हेड़-फेरके आबए। उपरका बला हमर शेरके देखू एहिमे "लिअ हमरा" समान रुपसँ दूनू पाँतिमे अछि अर्थात इ भेल रदीफ। इ रदीफ गजलक हरेक शेरक हरेक दोसर पाँतिमे (मतला बला शेरकेँ छोड़ि) अनिवार्य रुपें अएबाक चाही। एकटा आर दोसर मतलाकेँ देखू----------------- "दूर जतेक जाएब अहाँ लग ओतबे आएब अहाँ" एहि शेरमे "अहाँ" रदीफ अछि से स्पष्ट अछि। पूरा गजलमे रदीफ एकै होइत छैक। उपरमे रदीफक जे उदाहरण अछि ताहिकेँ अलावा एकटा आर रदीफ होइत अछि जे काफियामे पाओल जाइत छैक। एकरा तहलीली रदीफ कहल जाइत छैक। उर्दूमे तहलीलक मतलब "नीक जकाँ मिझराएल" होइत छैक। इ उदाहरण सभसँ बेसी फड़िच्छ हएत। मानू जे अहाँ कोनो गजलक मतलामे काफियाके रूपमे "चलिऔ" आ "रहिऔ" शब्दक प्रयोग केलिऐ। आब धेआनसँ दूनू शब्दके देखू। दूनूमे "औ" समान रूपसँ छैक आ "औ"के बाद जे बचै छैक से भेल "चलि" आ "रहि" ।आ "औ"सँ पहिने दूनू शब्दमे "इ"क मात्रा अछि सगहि-संग "च"के "र" संग स्वर-साम्य सेहो भए रहल छैक। तँ फेर चली तहलीली रदीफ पर । "चलिऔ" आ "रहिऔ"मे "औ" भेल तहलीली रदीफ। आब इ शाइरके मजबूरी छैक जे ओ गजलक आन-आन शेरमे काफिया लेल ओहने शब्द लेथि जकर अंतमे "औ" होइक। जेना "कहिऔ", "सुनिऔ", "बजिऔ" इत्यादि। बहुत शाइर एहन-एहन काफियामे " औ" के काफिया मानि लैत छथि से गलत। तँए शाइर "चलिऔ" आ "रहिऔ" के बाद कोनो शेरमे " हौ", "रौ" इत्यादि काफिया नहि लेल जा सकैए (मुदा जँ केओ शाइर मतलामे "चलिऔ" आ " हौ" काफियाके प्रयोग करै छथि तँ गजलक काफिया "औ" स्वर होइत अछि आ एहन स्थितिमे "रौ" आदि काफिया लेल लेल जा सकैए। एकर बेसी विवरण मात्रा बला काफियाक खंडमे भेटत )। आब मैथिलीमे तहलीली रदीफक महत्व एहि लेल छैक जे मैथिलीमे विभक्ति सभके सटा कए लिखल जाइत अछि ( बहुत गोटेँ शब्दक अंतमे "औ" के बदलामे "यौ"के प्रयोग करैत छथि। तथापि एहनो स्थितिमे "यौ" तहलीली रदीफ अछि)। एकटा आर गप्प मैथिलीमे एहन शब्द जे "इकारान्त" अछि ओकर उच्चारण अलग होइत अछि मने लिखलो पहिने जाइए आ बाजलो पहिने जाइए जेना की लिखै तँ छी "माटि" मुदा बाजै छी "माइट", लिखै छी "देखि" मुदा बाजै छी "देइख" एकर आन-आन सभ उदाहरण सभ सेहो अछि। मैथिलीमे तहलीली रदीफक महत्व एहि द्वारें सेहो अछि।तँए मैथिलीमे काफिया निर्धारण धेआनसँ करए पड़त आ एकर विस्तृत विवरण काफिया बला प्रकरणमे भेटत। 3) काफिया-------------- काफिया मने तुकान्त।आ तुकान्त मने स्वर-साम्यक तुकान्त चाहे ओ वर्णक स्वर-साम्य हो की मात्राक स्वर-साम्य। रदीफसँ पहिने जे तुकान्त होइत छैक तकरा काफिया कहल जाइत छैक। आ इ रदीफे जकाँ गजलक हरेक शेरक ( मतला बला शेरकेँ छोड़ि) दोसर पाँतिमे रदीफसँ पहिने अनिवार्य रुपें अएबाक चाही। काफिया दू प्रकारक होइत छैक------- (क) वर्णक स्वर-साम्य आ (ख) मात्राक स्वर-साम्य। वर्णक काफिया लेल शेरक हरेक पाँतिमे रदीफसँ पहिने समान वर्ण आ तकरासँ पहिने समान स्वर-साम्य होएबाक चाही। एकटा गप्प आर बहुतों शाइर खाली रदीफक बाद बला वर्ण वा मात्राके काफिया बूझि लैत छथि से गलत। काफियाक निर्धारण काफिया लेल प्रयुक्त शब्दके अंतसँ बीच वा शुरू धरि कएल जा सकैए। उदाहरण देखू--------- "दूर जतेक जाएब अहाँ लग ओतबे आएब अहाँ" एहि शेरक पहिल पाँतिमे रदीफ "अहाँ" छैक। आ रदीफसँ ठीक पहिने "जाएब" शब्द छैक | जँ अहाँ "जाएब" शब्द पर धेआन देबै तँ पता लागत जे एहि शब्दक अंतिम वर्ण "ब" छैक मुदा एहि "ब" संग "आएब" ध्वनि सेहो छैक। तहिना दोसर पाँतिमे रदीफ "अहाँ"सँ पहिने "आएब" शब्द अछि। आब फेर अहाँ सभ "आएब" शब्दके देखू। एहिमे अंतिम वर्ण "ब" तँ छैके संगहि-संग "आएब" ध्वनि सेहो छैक।मतलब जे उपरक शेरक दूनू पाँतिमे रदीफ "अहाँ"सँ पहिने ब वर्ण अछि, "आएब" स्वर (ध्वनि)क संग।अर्थात "आएब" ध्वनिसँ युक्त "ब" वर्ण एहि शेरक काफिया भेल। आब एहिठाम इ मोन राखू जे जँ उपरक इ दूनू शेर कोनो गजलक मतला छैक तँ ओहि गजलक हरेक शेरक कफिया "ब" वर्णक संग "आएब" ध्वनि होएबाक चाही। अन्यथा ओ गजल गलत भए जाएत। आब एही गजलक दोसर शेरके देखू------------------- "जँ खसब हम बाट पर आशा अछि उठाएब अहाँ" एहि शेरमे पहिल पाँतिमे ने रदीफ छैक आ ने काफिया मुदा दोसर पाँतिमे रदीफ सेहो छैक आ रदीफसँ पहिने शब्द " उठाएब" अछि। एहि शब्दक अंतमे "ब" वर्ण तँ छैके संगहि-संग "ब"सँ पहिने "आएब" ध्वनि सेहो छैक।एहि गजलक आन काफिया सभ अछि--------"नहाएब", "देखाएब" आ "हटाएब"।एकटा आर दोसर उदाहरण देखू----- "मालक खातिर तँ माल-जाल बनल लोक देखाँउसक खातिर कंगाल बनल लोक" एहि मतलाक शेरमे "बनल लोक" रदीफ अछि। आ रदीफसँ पहिने पहिल पाँतिमे "जाल" शब्द अछि। संगहि-संग दोसर पाँतिमे "कंगाल" शब्द अछि। आब हमरा लोकनि जँ एहिमे काफिया निर्धारण करी। दूनू शब्द के नीक जकाँ देखू। दूनू शब्दक अंतिम वर्ण "ल" अछि मुदा पहिल पाँतिमे "ल"सँ पहिने "आ" ध्वनि अछि (मा) आ दोसरो पाँतिमे "ल"सँ पहिने "आ" ध्वनि अछि (गा)।तँ एहि दूनू शब्दक मिलानके बाद हमरा लोकनि देखै छी जे दूनूमे "ल" वर्ण समान अछि। संगहि-संग वर्ण "ल" सँ पहिने "आ" स्वर अछि। तँए एहि गजलक काफिया "आ" स्वरक संग "ल" वर्ण भेल। आब शाइरके बाँकी शेरमे काफियाके रूपमे एहन शब्द चुनए पड़तन्हि जकर अंतमे "ल" वर्ण अबैत हो एवं ताहिसँ पहिने "आ" स्वर हो। एहि गजल मे प्रयुक्त भेल आन काफिया अछि-----दलाल,प्रकाल, जंजाल,देबाल | अच्छा तँ काफिया पर भेल एतेक मंथनके बाद एकटा प्रश्न जे जँ कोनो गजल केर मतलामे रदीफक बाद पहिल पाँतिमे " छोड़ए" आ दोसर पाँतिमे "फोड़ए" शब्द आबि रहल हो तँ कहू जे एहिमे काफिया की हेतै। आ दोसर प्रश्न जे जँ कोनो शाइर " छोड़ए" आ "फोड़ए"के बाद आन शेरमे काफियाके रूपमे " जाए" शब्द लेथि तँ ओ सही हेतै की गलत। एहि प्रश्न पर विचारु, हम अपन विचार काफियाक विवरणके बाद देब। एक बेर फेर हम अहाँ सभ के मोन पाड़ि दी जे काफियाक निर्धारण खाली मतलामे होइत छैक, आ बाँकी शेर मे ओकर पालन। संगहि-संग इहो मोन राखू जे जँ गजलक मतलामे काफिया गलत भेल हो तँ ओकरा छोट गलती मानल जाइत छैक, मुदा जँ मतलामे सही काफिया छैक आ बाँकी शेरमे सँ कोनो शेरमे काफियाक गलत पालन भेल छैक तँ ओकरा बड़का गलती मानल जाइत छैक। काफिया निर्धारण करबा समयमे दूटा आर गप्प मोन राखू------ 1) जँ मतलाक कोनो काफिया मे अनुस्वारक प्रयोग छैक तँ हरेक शेरक काफियामे अनुस्वार हेबाक चाही ओहो ठीक ओही स्थान पर जाहि पर पहिल काफियामे छैक। जेना मानि लिअ कोनो मतलाक पहिल पाँतिक काफिया "बसंत" छैक, तँ आब अहाँके ओहन शब्द काफियामे देबए पड़त जकर अंतसँ दोसर वर्ण पर अनुस्वार अबैत होइक जेना की "अनंत" , "दिगंत" इत्यादि। आ एहने सन नियम चंद्रबिंदु लेल सेहो छैक। अनुस्वार बला काफियामे एकटा आर गप्प मोन राखू जे बहुत गोटे अनुस्वार बला शब्द के संयुक्ताक्षर ( मैथिलीमे पंचमाक्षर ) रूपमे सेहो लिखैत छथि। जेना की "बसंत" के बदलामे "बसन्त", "अनंत" के बदलामे "अनन्त" वा "दिगंत" के बदलामे "दिगन्त"। मुदा एहन ठाम इ मोन राखू जे एक गजलमे या तँ अहाँ अनुस्वार लए सकैत छी या संयुक्ताक्षर। जँ अहाँ एकटा काफिया अनुस्वार बला लेबै आ दोसर संयुक्ताक्षर तँ इ गलत हएत। उदाहरण लेल "बसंत" के काफिया "अनन्त" या "दिगन्त" नहि भए सकैत अछि। हँ " बसन्त" के काफिया "अनन्त" वा "दिगन्त" जरूर होइत छैक। आ से एहि द्वारे जे संयुक्ताक्षर बला काफिया लेल किछु आर नियम छैक। जकर विवरण निच्चा देल जा रहल अछि। 2) आब कने संयुक्ताक्षर बला काफियाके देखी। किछु आर विवरणसँ पहिने किछु संयुक्त शब्द सभके देखल जाए। प्रस्थान, चुस्त, दुरुस्त, किस्मत । आब इ देखू जे संयुक्त वर्ण अंतसँ कोन स्थान पर पड़ैत अछि। जँ इ अंतसँ तेसर आ ओकर बाद मने चारिम या पाँचम स्थान पर अबैत हो तँ काफियाक नियम पहिने जकाँ हएत। मुदा जँ इएह संयुक्त वर्ण काफिया बला शब्दक अंतसँ दोसर स्थान पर अबैत हो तँ कने धेआन देबए पड़त। मानि लिअ जे मतलाक पहिल पाँतिमे "चुस्त" काफिया छैक। तँ आब हरेक काफियाक अंतमे "स्त" रहबाक चाही। उदाहरण लेल "चुस्त"क काफिया "मस्त" ',पस्त" , "हरस्त" आदि भए सकैए। उदाहरण रूपमे एकटा शेरके देखल जाए-------- हएत कोना गुदस्त जीबन भेल चिन्तासँ हरस्त जीबन आब एहि शेरमे रदीफ "जीबन" भेल आ पहिल पाँतिमे काफिया "गुदस्त" अछि, आब संयुक्ताक्षर बला नियमके हिसाबें काफिया बला शब्दमे अंतसँ दोसर वर्ण "स्त" होएबाक चाही। आब दोसर पाँतिके देखू रदीफसँ पहिने काफियाके रूपमे "हरस्त" अछि जकर अंतसँ "स्त" अछि जे नियमके मोताबिक सही अछि। एहि गजलमे आन काफिया सभ एना अछि---- "व्यस्त", "मदमस्त", "मस्त", "सस्त" आदि। संयुक्ताक्षरक इ नियम मात्रा बला काफिया लेल कने अलग ढ़गसँ छैक। किछु विस्तृत विवरण मात्रा बला खंडमे भेटत। मात्रा बला काफिया पर विचार करबासँ पहिने कनेक फेरसँ तहलीली रदीफ आ मैथिली विभक्ति पर विचार करी। कारण जे मैथिली विभक्ति मूल शब्दमे सटि जाइत छैक। आ तँए ओ केखन काफियाक रूप लेत आ केखन रदीफक से बुझनाइ परम जरूरी। विभक्ति------ मैथिलीमे विभक्ति चिन्ह समान्यतः पाँच गोट अछि। कर्म---- केँ करण--- एँ /सँ अपादान-- सँ सम्बन्ध---क अधिकरण--मे /पर एहिकेँ अतिरिक्त विद्वान लोकनि कर्ताक चिन्हकेँ सुन्नाकेँ रूपमे लैत छथि।इ पाँचो चिन्ह मूल शब्दमे सटि जाइत छैक। आ एहि पाँचोमेँसँ "एँ" चिन्ह मूल शब्दक ध्वनि बदलि दैत छैक। उदाहरण लेल देखू---- "बाट" शब्दमे "एँ" चिन्ह सटने " बाटेँ" होइत छैक। "हाथ" शब्दमे सटने "हाथेँ" इत्यादि। आब कने इ विचारी जे जँ कोनो शाइर एहन शब्द, जाहिमे विभक्ति सटल होइक जँ ओकर काफिया बनेता तँ की हेतै। एहि लेल किछु एहन शब्द ली जाहिमे विभक्ति सटल होइक। उदाहरण लेल------ मूल शब्द-------------- विभक्तिसँ सटल शब्द हाथ------------------- हाथक /हाथेँ/ हाथसँ/ हाथमे/ हाथकेँ फूल-------------------- फूलक /फूलसँ /फूलेँ संग-------------------- संगमे /संगेँ राति------------------- रातिएँ/ रातिसँ /रातिमे एहि विवरणकेँ हमरा लोकनि दू भागमे बाँटि सकै छी------ 1) एहन मूल शब्द जे अंतसँ अकारान्त हुअए, आ 2) एहन मूल शब्द जकर अंतमे मात्राक प्रयोग होइक 1) आब जँ कोनो शाइर एहन मूल शब्द जे अकारान्त छैक आ ओहिमे विभक्ति लागल छैक तकरा काफिया बनबै छथि तँ हुनका इ मोन राखए पड़तन्हि जे बादमे आबए बला हरेक आन-आन काफियामे वएह विभक्ति कोनो आन मूल शब्दमे आबै जे अकारान्त होइक संगहि-संग स्वर-साम्य सेहो रखैत हो | उदाहरण लेल----- मानू जे केओ मूल "हाथ" शब्दमे "क" विभक्ति जोड़ि "हाथक" काफिया बनेलक। दोसर आन-आन काफिया लेल इ मोन राखू जे आबए बला ओहि काफियाक अंतमे "क" विभक्ति तँ एबै करतै, मुदा विभक्ति "क"सँ ठीक पहिने अकारान्त वर्ण एवं स्वर-साम्य होएबाक चाही जेना की मानू "बात" शब्दमे विभक्ति "क" जुटला पर "बातक" शब्द बनैत अछि। आब पहिल काफिया "हाथक" आ दोसर काफिया "बातक" मिलान करु (काफियाक मिलान सदिखन शब्दक अंतसँ कएल जाइत छैक)। देखू पहिल काफिया "हाथक" आ दोसर काफिया "बातक" दूनूक अंतमे विभक्ति "क" अछि संगहि-संग विभक्ति "क" केर बाद दूनू काफियाक शब्द "थ" आ "त" अकारान्त अछि संगहि-संग "हा" केर स्वर-साम्य "बा"सँ छैक। आब फेर तेसर शब्द "पात" लिअ आ जँ ओहिमे "क" विभक्ति जोड़बै तँ " पातक" शब्द बनतै। आब पहिल काफिया "हाथक" आ दोसर काफिया "पातक" मिलान करु । देखू अंत सँ दूनू शब्दमे "क" विभक्ति छैक आ ठीक ओहि सँ पहिने दूनू शब्द अकारान्त छैक आ संगहि-संग 'हा"के स्वर-साम्य "पा"सँ छैक।एनाहिते दोसर उदाहरण देखू----मूल शब्द "पात" विभक्ति "मे" जुटला पर "पातमे" शब्द बनैत अछि। फेर दोसर शब्द "बाट" विभक्ति "मे" जुटला पर "बाटमे"। आब फेरसँ मिलान करु--- दूनू शब्दक अंतमे विभक्ति "मे" लागल छैक । विभक्ति "मे"सँ ठीक पहिने अकारान्त वर्ण सेहो छैक संगहि-संग "पा" केर स्वर-साम्य "बा"सँ छैक। किछु आर उदाहरण लिअ----- "कलमसँ"-----"पतनसँ", "बापकेँ"-----"आबकेँ" इत्यादि। 2) एहन मूल शब्द जकर अंतमे मात्रा होइक ओकर काफिया लेल धेआन राखू जे विभक्तिके बाद ठीक वएह मात्रा स्वर-साम्यक संग एबाक चाही। उदारहरण लेल------ आँखिसँ----चाँकिसँ----बाँहिसँ, इत्यादि रातिमे----जातिमे--- जाठिमे, इत्यादि घुटठीकेँ---गुड्डीकेँ---चुट्टीकेँ, इत्यादि पानिक--आनिक, इत्यादि केखनो काल दूटा विभक्ति एकै संग जुटि जाइत छैक जेना "रातिएँसँ" एहन समयमे अहाँकेँ दोसरो काफिया ओहने लेबए पड़त जाहिमे दूनू विभक्त समान होइक स्वर-साम्यक संगे। उदाहरण लेल " रातिएँसँ" केर काफिया "छातिएँसँ" "हाथिएँसँ" "बाटिएँसँ" आदि-आदि भए सकैत अछि। विभक्ति बला काफियाक संबंधमे एकटा आर खास गप्प। कोनो एहन मूल शब्द जकर अंत कोनो एकटा खास विभक्तिसँ साम्य रखैत हो, विभक्तिसँ पहिने बला वर्ण अकारान्त वा मात्रा युक्त (जेहन स्थिति) हो संगहि-संग ओहिसँ पहिने स्वर-साम्य हो तँ ओ दूनू काफियाक रूपमे लेल जा सकैए। उदाहरण लेल एकटा विभक्ति बला शब्द "पातक" वा "बाटक" लिअ। आ आब एहन मूल शब्द ताकू जकर अंतमे "क" होइ, "क"सँ पहिने अकारान्त वर्ण होइक ( जँ अकारान्त वर्णसँ पहिने स्वर-साम्य होइ तँ आरो नीक) तँ ओ दूनू ( एकटा विभक्ति युक्त आ दोसर मूल) शब्द काफिया भए सकैत अछि। उदाहरण लेल उपर लेल दूनू विभक्त युक्त शब्द "पातक" आ "बाटक"के मूल शब्द "बालक" पालक" वा "चालक"सँ मिलाउ। जँ गौरसँ देखबै तँ पता लागत जे इ शब्द सभ काफिया लेल एकदम्म उपयुक्त अछि। तेनाहिते मात्रा बला शब्द जाहिमे विभक्ति सटल हो आ ओहन मूल शब्द जे ओकरासँ मिलैत हो एकदोसराक काफिया बनि सकैत अछि। जँ कोनो मतलाक अंत मूल शब्दसँ सटल विभक्तिसँ होइक हो तँ ओकरा बिना रदीफक गजल मानू। उदाहरण लेल---- भरोसे टा भेटल सेहो उधारमे लागल छी हम दोसरे जोगारमे एहि गजलक आन अंतिम शब्द अछि---- "अन्हारमे", अनचिन्हारमे", "धारमे"। देखू एहि सभमे "र" सेहो आ "मे" सेहो छैक,मुदा तैऔ एकरा बिना रदीफक गजल मानल जाएत। आब कने मात्रा बला काफिया पर विचार करी। मैथिली वर्णमालामे १६ गोट स्वर देखाओल गेल अछि। अ, आ, इ, ई उ, ऋ, ॠ, लृ,( आ लृक आर एकटा दीर्घ रूप) ऊ, ए, ऐ. ओ. औ, अं एवं अः। जाहिमे "अ" तँ हरेक वर्णक (जाहिमे हलन्त् नहि लागल होइक)मे अंतमे अबिते छैक। अन्य छह गोट स्वर ( ऋ,ॠ, लृ आ लृक आर एकटा दीर्घ रूप, अं एवं अः) खाली तत्सम शब्दमे अबैत छैक। बचल नऔ गोट स्वर आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, एवं औ ( एकर लेख रूप क्रमशः--ा, ि, ी, ु, ू, े, ै, ो एवं ौ अछि) |संगे-संग हम मैथिलीमे रेफ बला काफिया पर सेहो बिचार करब। मतलब जे एहिठाम हम कुल दस गोट मात्रा पर बिचार करब। मुदा एहि दसोमे "इ", " उ" आ रेफ पर बिचार हम बादमे करब। एकर कारण जे मैथिलीमे एहि तीनूक उच्चारण कने अलग ढंगसँ होइत अछि। तँ चली मात्रा बला काफिया पर। मतलामे रदीफसँ पहिने जँ वर्णमे कोनो मात्रा छैक। तँ गजलक हरेक शेरक काफिया मे वएह मात्रा अएबाक चाही चाहे ओहि मात्राक संग बला वर्ण दोसरे किएक ने हो। बाद-बाँकी स्वर-साम्य बला नियम उपरे जकाँ बूझू। इएह भेल मात्रा बला काफियाक नियम। आब एकरा कने उदाहरणसँ बूझी। देखू नोर सुखा रहल दर्द मुदा देखा रहल" एहि शेर मे रदीफ अछि " रहल", आ रदीफ सँ पहिने पहिल पाँति मे वर्ण "ख"क संग "आ"क मात्रा अछि। तेनाहिते दोसर पाँति मे रदीफ सँ पहिने वर्ण "ख"क संग "आ"क मात्रा अछि। एहि गजलमे लेल गेल अन्य काफिया अछि---"गना", बिझा", "फेका" एवं "लिखा" । जँ गौरसँ देखबै तँ पता लागत जे रदीफसँ पहिने बला वर्ण बदलि रहल छैक (खाली मतलामे एकै छैक "ख" मुदा आन शेर सभमे इ "न", "झ", "क" आ फेर "ख" अछि) मुदा मात्रा सभमे एकै "आ" ( "आ" केर लेख रूप ा) छैक। अर्थात एहि गजलक काफिया भेल "आ"क मात्रा। अन्य बचल मात्राक लेल एहने समान नियम अछि आ हरेक मात्राक एक-एकटा उदाहरण देल जा रहल अछि। 1) "एनाइ जँ अहाँक सूनी हम नहुँएसँ सपना बूनी हम" ( काफिया "ई"क मात्रा) एहि गजलक अन्य काफिया अछि---- "चूमी", "पूछी", "बूझी", "खूनी", ,"लूटी", "सूती" आदि। 2) "जँ तोड़ब सप्पत तँ जानू अहाँ फाँसिए लगा मरब मानू अहाँ" ( काफिया "ऊ"क मात्रा) एहि गजलमे लेल गेल अन्य कफिया --- "गानू", "आनू", बान्हू" आदि। 3) "मोन तंग करबे करतै देह भाषा पढबे करतै" (काफिया "ए"क मात्रा) एहि गजलमे लेल गेल अन्य कफिया ---"खुजबे", "उड़बे", "सटबे" आदि अछि। 4) "सभ दिन तँ भेँट होइते रहै छी हम तैऔ भोर आ साँझक बाट जोहै छी हम" ( काफिया "ऐ"क मात्रा) एहि गजलमे लेल गेल अन्य कफिया ---"सोहै", "भूकै", "लूटै", "बूझै" आदि अछि। केखनो काल "ऐ" केर उच्चारण "अइ" जकाँ होइत अछि। जेना "सैतान" बदलामे सइतान, बैमानक बदलामे "बइमान" इत्यादि। 5) “आब हरजाइकेँ तों बिसरि जो रे बौआ मोन ने पड़ौ एहन सप्पत खो रे बौआ ( काफिया "ओ"क मात्रा) एहि गजलमे लेल गेल अन्य कफिया------ओ, खसो, पड़ो इत्यादि अछि। 6) " एक बेर फेर हँसिऔ कनेक ओही नजरि सँ देखिऔ कनेक" ( काफिया "औ"क मात्रा) एहि गजलमे लेल गेल अन्य कफिया ---"रहिऔ", "चलिऔ", "बुझबिऔ" आदि अछि। **** केखनो काल "औ" केर उच्चारण "अउ" जकाँ होइत अछि। उम्मेद अछि जे उपर देल गेल सात प्रकारक मात्रा बला उदाहरणसँ काफिया संबंधी नियम बेसी फड़िच्छ भेल हएत। तँ आब चली "इ", "उ" आ रेफ पर। मैथिलीमे "इ" आ "उ" लेख आ उच्चारण दूनू पहिने लिखल आ कएल जाइत छैक। एकरा हम उदाहरणसँ देखाएब, तँ पहिने "इ" केर उदाहरणसँ शुरु करी। शब्द "राति" मुदा ओकर उच्चारण भेल "राइत", लिखल जाइए "गानि" मुदा बाजल जाइए "गाइन", तेनाहिते "पानि" केर उच्चारण "पाइन" भए गेल। मैथिलीमे वर्ण "इ" तेहन उत्फाल मचेलक जे बहुत आन शब्द सभ "इ" वर्णक संग लिखल जाए लागल जेना की "जाइत", "खाइत" आदि। एकटा आर महत्वपूर्ण गप्प, मैथिलीमे "इ"कार दू रूपमे प्रयोग होइत अछि- पहिल रूप भेल जाहिमे मात्राक अबैत अछि आ दोसर रूपमे "इ"कार वर्णके रूपमे अबैत अछि। पहिल रूपक उदाहरण "राति", "जाति" सभ भेल आ दोसर रूपक उदाहरण "जाइत", खाइत" सभ भेल आब कने हमरा लोकनि काफिया पर आबी। जँ अहाँ कोनो एहन शब्दक काफिया बना रहल छी। जकर अंतिम वर्ण "इ"कार युक्त अछि तँ अहाँकेँ आन-आन काफिया लेल "इ"कार युक्त वएह वर्ण लेबए पड़त जे पहिल काफियामे अछि। उदाहरण लेल जँ अहाँ "राति" शब्द काफिया लेल लेलहुँ तँ आब अहाँकेँ दोसर काफिया लेल "त" वर्ण "इ"कार युक्त हेबाक चाही। जेना की "पाँति", "जाति", आदि। अथवा एहन शब्द लिअ जकर अंतमे "त" होइक आ ताहिसँ पहिने "इ" वर्णक रूपमे रहए जेना की "जाइत"। एकर मतलब जे "राति" शब्दक काफिया लेल "जाति", "पाँति" क संगे "जाइत", "खाइत", "नहाइत" सेहो आबि सकैत अछि। आ हमरा जनैत एहीठाम मैथिली गजल उर्दू गजलसँ पूर्णतः अलग भए जाइत अछि। आ संगहि-संग इ विशेषता मैथिली गजलके एकटा अपन अलग छवि बनबैत अछि। आ इ विशेषता ह्रस्व "उ" , "ऐ”, "औ", आ रेफ बलामे सेहो अबैत अछि। आब कने ह्रस्व "उ" पर धेआन दी। मैथिलीमे जँ शब्दक अंतमे "उ" अबैत हो आ ठीक ओहिसँ पहिने अकारान्त वर्ण हो तखन "उ" केर उच्चारण प्रायः औ/अउ जकाँ होइत अछि। उदाहरण लेल मधु शब्दक उच्चारण मौध/मअउध होइत अछि। आ जँ "उ"सँ पहिने आकारान्त वर्ण हो तखन "इ"ए जकाँ "उ" केर उच्चारण पहिने होइत अछि। उदाहरण लेल "साधु" केर उच्चारण "साउध", "बालु" केर उच्चारण "बाउल" इत्यादि। ओना उच्चारण लेल आनो शब्द लेल जा सकैए। आब इ देखी जे एहि प्रकारक शब्दके काफिया कोना बनतै। जँ अहाँ "उ" सँ पहिने अकारान्त बला वर्णसँ बनल शब्द काफिया लेल लैत छी तँ धेआन राखू जे आन-आन काफियाक उच्चारण "कोनो वर्ण( एक वा एकसँ बेसी) + औ/अउ + अंतिम निश्चित वर्ण" आबै। आब उपरकेँ बला शब्द "मधु"के लीअ। एकर उच्चारण "म + औ/अउ + ध" अछि, तँए एकर दोसर काफिया "कोनो वर्ण( एक वा एकसँ बेसी) + औ/अउ + ध" हेतै। आब जँ अहाँ दोसर शब्द "पौध" लेलहुँ, तँ एकर उच्चारण "प + औ/अउ + ध " अछि। अर्थात "मधु" केर उच्चारण "पौध" केर बराबर अछि। तँए "मधु" केर काफिया "पौध" हएत। एनाहिते आन-आन शब्द सभ काफियाके लेल ताकल जा सकैए। आब आबी ओहन शब्दपर जकर अंत "उ" होइक आ ठीक ओहिसँ पहिने आकारान्त वर्ण होइक ( जेना की उपरमे एकर उच्चारण पद्धित देखा देल गेल अछि, तँए सोझें काफिया पर चली)। ठीक ह्रस्व "उ" जकाँ नियम छैक एकरो। मानि लिअ जँ अहाँ "बालु" शब्द लेलहुँ, तँ मोन राखू दोसर काफियाक उच्चारण " आकारान्त कोनो वर्ण + उ + ल" होइक जेना की "भालु" इत्यादि। संगहि-संग ह्रस्व "इ"ए जकाँ "चाउर" केर काफिया "चारु" एवं "बालु" केर काफिया "आउल" ( owl) भए सकैत अछि। मैथिलीमे बहुत काल "उ" आ चन्द्रबिंदु एकै संग अबैत अछि। जेना " कहलहुँ" ,"सुनलहुँ", "रहलहुँ" आदि। मानि लिअ जँ इ शब्द सभ जँ काफियाक रूपमे आबि रहल अछि तँ एहन समयमे धेआन राखू जे काफियामे ठीक वहए वर्ण "उ" आ चन्द्रबिंदुक संग आबए। से नहि भेला पर काफिया गलत भए जाएत। उपरमे देल तीनू शब्दके देखू । तीनू शब्दक अंत " ह" सँ अछि ओहो "उ" आ चन्द्रबिंदुक संग। मने इ तीनू काफिया लेल उपयुक्त अछि। आब हमरा लोकनि फेरसँ एकबेर संयुक्ताक्षर बला नियमपर चली। मात्रा बला संयुक्ताक्षर लेल पहिनेसँ कने अलग ढ़गसँ देखू। इ गप्प उदाहरणसँ बेसी फड़िच्छ हएत। मानू जे मतलाक पहिल पाँतिमे काफियाक रूपमे "चुट्टी" शब्द लेल गेल। आब दोसर काफिया लेल मोन राखू जे "ई" मात्रा युक्त कोनो शब्द भए सकैत अछि। उदाहरण लेल "चिन्नी", "बुच्ची" आदि "चुट्टी"क काफिया भए सकैत अछि। मुदा जँ मतलाक काफिया "चुट्टी" आ "घुट्ठी" छैक तखन आन शेरक काफिया "चिन्नी" या "बुच्ची" नहि भए सकैत अछि। कारण मतलाक दुनू काफियामे "ई" मात्रा युक्त वर्णक बाद आधा "ट्" क प्रयोग छैक, तएँ आन शेरक काफिया लेल ओहन शब्द ताकू जाहिमे "ई"मात्रा युक्त अक्षरकेँ बाद आधा "ट्" अबैत हो जेना "बुट्टी", "कुट्टी" इत्यादि। एकटा गप्प आर ओ शाइर जे अनुस्वारके बदलामे पंचमाक्षरके प्रयोग करैत छथि से धेआन राखथि जे काफियाक निर्धारण उपरकें नियमक हिसाबें होइक। आघात बला शब्दक काफिया------- मैथिलीमे दू प्रकारक आघात अछि मात्रात्मक आ बलाघात। मुदा मात्रात्मक आघात ओतेक महत्व नहि रखैत अछि, तँए हम एतए खाली बलाघात पर बिचार करब। मैथिलीमे कोन शब्दमे कतए आघात पड़त तकरा देखल जाए----पहिने मात्रात्मक आघातके देखू। 1) दू वर्ण धरि बला एहन शब्द जाहिमे एकौटा गुरू वर्ण नहि हो- एहन शब्दमे अंतसँ दोसर शब्द पर आघात पड़ैत छैक। जेना "घर", "बर"। एकर उच्चारण "घSर", "बSर" आदि होइत अछि। मतलब "घ" आ "ब" पर आघात पड़ल छैक। जँ एक या एकसँ बेसी दीर्घ हुअए तँ पहिल दीर्घ पर आघात पड़ैत छैक। जेना "हाथ", "खत्ता" आदि।मतलब "हा" आ "त्ता" पर आघात छैक। "हाथी" "माछी" । एहि शब्द सभमे पहिल गुरू "हा" एवं "मा" पर आघात छैक। ) तीन वर्ण बला एहन शब्द जाहिमे तीनू लघु वर्ण हो---- एहन शब्दमे अंतसँ दोसर वर्ण पर आघात पड़ैत छैक। जेना "तखन", अगहन" ।एहिमे "ख" आ "ह" पर आघात छैक। जँ एक या एकसँ बेसी दीर्घ हुअए तँ पहिल दीर्घ पर आघात पड़ैत छैक। जेना "ओसारा"मे "ओ" पर आघात छैक। "बतासा" मे "ता" पर आघात छैक। 3) चारि वर्ण बला शब्दमे अंतसँ दोसर वर्ण पर आघात पड़ैत छैक। उदाहरण लेल "भिनसर" मे "स" पर आघत छैक, "अगहन" मे "ह" वर्ण पर छैक। जँ चारि वर्ण बला ओहन शब्द जाहिमे दीर्घ सेहो छैक तकर आघात उपरमे देल गेल आने नियम जकाँ अछि। जेना "उच्चारण" मे च्चा पर आघात छैक। कुल मिला कए एकसँ चारि वर्ण धरिक शब्द लेल एकै रंगक नियम अछि। 7) पाँच वर्ण बला शब्दमे अंतसँ तेसर वर्ण पर होइत छैक चाहे ओ लघु हो की दीर्घ। मने पाँच वर्णमे आघात सदिखन बीच बला वर्ण पर पड़ैत छैक।उदाहरण लेल "देखलहक" मे अंतसँ तेसर वर्ण "ल" पर आघात छैक, तेनाहिते "कमरसारि" मे "र" पर आघात छैक, "कनपातर" मे "पा" पर आघात छैक। 8) छह आ छहसँ बेसी वर्ण बला शब्दमे दू ठाम आघात पड़ैत छैक। शब्दक अंतसँ दोसर वर्ण पर आ अंतेसँ चारिम वर्ण पर चाहे ओ लघु हो की दीर्घ। एहिठाम इहो मोन राखू जे शब्दक अंतसँ दोसर वर्ण पर पड़ल आघात बेसी कठोर मुदा चारिम स्थान पर पड़ल आघात मन्द होइत अछि। **** विभक्ति बला शब्दमे आघात निर्धारित करबाक लेल विभक्तिकेँ हटा कए गणना करु। जेना की "पातक" शब्दमे आघात गनणा "त" वर्णसँ शुरु हएत ने की अंतिम वर्ण "क" सँ। सभ विभक्ति जुटल शब्द लेल इएह मोन राखू। आब कने आघात बला शब्दके काफिया देखी। एहन ठाम इ मोन राखू जे आघात बला स्थान आ वर्णक मात्रा समान रहए। उदाहरण लेल "घर" आ "मजूर" दूनूमे दोसर स्थान पर आघत छैक मुदा मात्रा अलग-अलग छैक, तँए इ दूनू एकदोसराक काफिया नहि बनि सकैए। तँ "घर" शब्दक काफिया लेल "बर", "तर", " हर", “भिनसर" आदि उपयुक्त रहत । आ "मजूर" लेल "मयूर", "हजूर" आदि उपयुक्त रहत। आनो-आन आघात बला शब्दक काफिया लेल इएह नियम बूझू। एहिठाम हम फेर मोन पाड़ी जे काफियाक निर्धारण खाली मतलामे होइत छैक आ बाँकी शेरमे ओकर पालन। तँए जँ केओ मतलामे विभक्ति बला शब्दकेँ "फूलक" आ हाथक" काफिया लेताह तँ सही हएत आ बादबाँकी शेरमे "अक" काफियाक प्रयोग हेतैक। मुदा जँ केओ गोटे मतलामे "फूलक" आ "अड़हूलक" लेलक आ तकरा बादक शेरमे "हाथक" प्रयोग करत तँ ओ बिल्कुल गलत हएत। "फूलक" आ "अड़हूल" बाद आन शेर लेल काफिया "ूलक" होएबाक चाही। आब कने "रेफ" बला काफिया पर बिचार करी। रेफ "र" वर्णक एकटा रूप अछि।जे "र्" मने आधा "र्" मानल जाइत अछि। मैथिलीमे रेफ आ ओकर पूर्ण रूप ( र वर्ण ) दूनू चलैत अछि | मुदा इ जनबाक लेल जे कतए रेफक रुप रहत आ कतए "र" वर्णक एहि लेल किछु उदाहरण देखी------- मर्द------ मरद बर्खा-----बरखा बर्ख-----बरख चर्चा----चरचा एहि चारि गोट शब्दके देखलासँ इ बुझाइत अछि जे जँ अकारान्त वर्ण पर रेफ हुअए तँ ओकरा लेल पूर्ण "र" के लिखब बेकार बुझाइत अछि कारण जे लिखलो जाइत अछि "बर्ख" आ पढ़लो जाइत अछि "बर्ख"। तँए इ मोन राखू जे अकारान्त वर्ण पर जँ रेफ हुअए तँ ओकरा "र" के रुपमे नहि लिखल जाए। मुदा जँ कोनो वर्ण मात्रायुक्त हो संगहि-संग रेफ युक्त हो तँ ओहि शब्दमे "र" वर्णके प्रयोग कएल जा सकैए। जेना की चर्चा के चरचा, बर्खा के बदला मे बरखा, फुर्ती केर बदलामे फुरती इत्यादि। आब जँ अहाँ रेफ बला शब्दक काफिया बना रहल छी तँ पहिने इ निश्चित करू जे अहाँ रेफक रूप लेबै या "र" वर्णक। जँ अहाँ रेफक रूप लेबै तँ मोन राखू जे एकर नियम "इ"कार बला काफियाक समान हएत। हमर कहबाक मतलब जे जँ अहाँ मतलाक पहिल पाँतिमे काफिया "गर्दा" लेलहुँ आ तकरा बाद आन काफिया बर्खा या बरखा लेलहुँ तँ बिलकुल गलत हएत। "गर्दा" शब्दक काफिया लेल दोसरो शब्दक अंतसँ "द" वर्ण रेफ लागल हेबाक चाही। मुदा जँ अहाँ मतलाक पहिल पाँतिमे काफिया "बरखा" लेलहुँ तँ ओकर काफिया "परदा", "गरदा", "जरदा" आदि भए सकैत अछि। तेनाहिते इ मोन राखू जे जँ रेफ शब्दकेँ अंत छोड़ि ( शुरूमे वा बीचमे कतौ) छैक तँ संस्कृतक शब्दमे तँ रेफे रहत मुदा विदेशज खास कए अरबी-फारसी आ उर्दू बला शब्दमे "र" भए जाइत अछि। जेना की पर्वतकेँ " परवत" नहि लिखल जा सकैए मुदा शर्बतकेँ " शरबत" जरूर लीखि सकैत छी। एहिठाम इ मोन राखू पर्वत आ शरबत दूनू एकदोसराक काफिया भए सकैए। काफियाक संबंधमे एकटा गप्प आर- काफियामे वर्ण "र" केर उच्चारण "ड़" के बराबर मानू संगहि-संग "स", "श" आ "ष" केर उच्चारण सेहो समान मानू। जाहिठाम "ष"के उच्चारण "ख" जकाँ हएत ततए पूर्ण "ख" काफियाके रूपमे आबि सकैत अछि। जँ "ढ" अक्षर शब्दक शुरूमे छैक त ओकर उच्चारण "ढ" जँका होइत छैक मुदा तकरा बाद ओकर उच्चारण "रह्" जँका छैक। आ हमरा विचारें काफियामे "ढ", "र" एवं "ड़" समान अछि। उदाहरन लेल "ठाढ़"क काफिया "विचार", "हुराड़" आदि भए सकैत अछि। केखनो काल "त्र" केर लेख रूप "तर्" आ "क्ष" केर लेख रूप "च्छ" अबैत अछि। शाइर उपरकें नियमक हिसाबें एकर काफिया बनाबथि। आब कने शुरुआत बला प्रश्न पर चली। पहिल प्रश्न छल जे जँ कोनो मतलामे "छोड़ए" आ "फोड़ए" काफिया हो तँ बाद बला शेरमे काफिया की हेतै। उत्तर स्पष्ट अछि बादबाँकी शेरमे काफिया "ओड़ए" वा "ओरए" हेबाक चाही। नहि तँ गजल गलत भए जाएत। संगहि-संग दोसर प्रश्न छल जे जँ "छोड़ए" आ "फोड़ए" के बाद "जाए" हुअए तँ सही हएत की गलत। एकरो उत्तर स्पष्ट अछि---- जाए के उच्चारण "ओड़ए" वा "ओरए" सँ नहि मिलैत अछि तँए "जाए" काफिया "छोड़ए" आ "फोड़ए" के बाद गलत हएत। 4) मकता-------------- गजलक ओहि अंतिम शेरके कहल जाइत छैक जाहिमे शाइर अपन नाम-उपनाम (तख़ल्लुस)के प्रयोग करथि। जेना एकटा उदाहरण देखू-------------- "ठकि रहल अनचिन्हारके कहिओ अहाँ तँ कहिओ हम" एहिमे हम अपन उपनाम "अनचिन्हार"के प्रयोग केने छिऐक आ इ शेर गजलक अंतिम शेर छैक तँए इ शेर भेल "मकता"। बिना मकताक गजल सेहो होइत छैक। मकताक संबंधमे इ धेआन राखू जे शाइर अपन सभ गजलमे या तँ अपन नामके प्रयोग करथि वा अपन उपनामके। मने दूनूमे सँ कोनो एकैटा। एकर उदाहरण हम अपने पर लैत छी। हम अपन गजलमे या तँ "आशीष"के प्रयोग करबै वा "अनचिन्हार"के। इ नहि जे किछु गजलमे "आशीष" आ किछुमे "अनचिन्हार"। बहर ---- गजल सदिखन कोने ने कोने बहरमे होइत छैक। बिना बहरक गजलक कल्पना असंभव। जेना छन्दक आधार लय होइत छैक तेनाहिते बहरक आधार अऱूज वा अऱूद होइत छैक। अऱूज वा अऱूद मने शेर मे निहित मात्रा-क्रम होइत छैक। अऱूज वा अऱूदके वज़न सेहो कहल जाइत छैक। बहरक चर्च आगाँ बढ़एबासँ पहिने एकटा गप्प आर| एहिठाम हम उर्दू बहर केर वर्णन कए रहल छी। आ मैथिली गजलमे इ बहर सभक प्रयोग मैथिली गजलक 100सालक इतिहासमे कहिओ नहि भेल मुदा हालहिमे गजेन्द्र ठाकुर द्वारा बहरे-मुतकारिबमे सफलतापूर्वक गजल लिखल गेल। तँए आब एकर चर्चा आवश्यक। ओना मैथिलीमे वार्णिक बहरक खोज सेहो गजेन्द्र ठाकुर द्वारा भेल अछि जकर अनुकरण प्रायः हरेक नव गजलकार कए रहल छथि। एहि लेखमे जतेक उदाहरण देल गेल अछि से वार्णिक बहर पर आधारित अछि। ओना एहि बहरक चर्चा हम बादमे सेहो करब। तँ पहिने उर्दूक बहर देखी। अऱूज वा अऱूदक अविष्कार हिजरीक दोसर सदीमे खलीले इब्ने अहमद बसरी केने छलाह। हुनका इ विचार मक्काक ठठेरा बजारमे बर्तन बनेबाक अवाज सूनि अएलन्हि। प्राचीन कालमे मक्काके अऱूज वा अऱूद सेहो कहल जाइत छलैक तँए बसरी ओहि मात्रा क्रमके अऱूज वा अऱूदक नाम देलथि। अरबी साहित्यमे 16 बहरक प्रयोग भेल। बादमे इरानमे तीन टा बहरक अविष्कार भेल। आब हम एहिठाम बहरक संक्षिप्त परिचय दए रहल छी। अरबी साहित्यमे बहर तीन खंडमे बाँटल गेल अछि 1) सालिम मने मूल बहर, 2 ) मुरक्कब मने मिश्रित बहर आ 3) मुदाइफ मने परिवर्तित बहर। एहि तीनूमेसँ मुदाइफ बहरके चर्चा एखन हम नहि करब कारण जखन मैथिलीमे मूल बहर पर गजल लिखले नहि गेल अछि। तँ कोन हिसाबें हम ओकरा (मुदाइफ बहरकेँ) एतए प्रस्तुत करू। अरबीमे सालिम मने मूल बहर मे सात टा बहर अबैत अछि। आ मुरक्कबमे बारह टा। बादमे एही बारहके उलट-फेर करैत आठ टा आर बहर बनाएल गेल। कुल मिला कए मुरक्कब बहर बीस टा भेल। हम अपना सुविधा लेल मुरक्कब बहरकेँ दू खंडमे बाँटि देने छी। संगहि-संग सालिम बहरके हम "समान बहर" नाम देने छिऐक। आ मुरक्कब बहरक पहिल खंड (जाहिमे कुल सात टा बहर अछि) तकरा अर्धसमान बहर नाम देलिऐक आ मुरक्कब बहरक दोसर खंड जाहिमे तेरह टा बहर अछि तकर नाम "असमान बहर" देलिऐ। तँ आब एकर विवरण निच्चा देखू।। बहरसँ पहिने रुक्नकेँ बूझी। संस्कृतक गण जकाँ अरबी मे सेहो होइत छैक जकरा "रुक्न" कहल जाइत छैक। इ रुक्न आठ प्रकारके होइत अछि। जकर विवरण एना अछि------- रुक्नक स्वरूप मात्रा रुक्नक नाम मात्रा क्रम खमासी रुक्न 5 फऊलुन ( फ/ऊ/लुन) ISS (I/S/S) खमासी रुक्न 5 फाइलुन (फा/इ/लुन) SIS (S/I/S) मूल रुक्न 7 फाइलातुन (फा/इ/ला/तुन) SISS ( S/I/S/S ) मूल रुक्न 7 मफाईलुन (म/फा/ई/लुन) ISSS ( I/S/S/S ) मूल रुक्न 7 मुस्तफइलुन (मुस्/तफ/इ/लुन SSIS ( S/S/I/S ) मूल रुक्न 7 मुफाइलतुन (मु/फा/इ/ल/तुन ) ISIIS ( I/S/I/I/S ) मूल रुक्न 7 मुतफाइलुन (मु/त/फा/इ/लुन IISIS ( I/I/S/I/S ) मूल रुक्न 7 मफऊलातु (मफ/ऊ/ला/तु SSSI ( S/S/S/I ) ****** एहिठाम I मने 1 मने हस्व आ S मने 2 मने दीर्घ भेल | एहि रुक्न सभकेँ इयाद रखबाक लेल गणितीय रूपसँ एना बुझू--------- a) एकटा लघुकेँ बाद जँ दूटा दीर्घ हो तँ ओकरा "फऊलुन" कहल जाइत छैक। b) एकटा लघुकेँ बाद जँ तीनटा दीर्घ हो तँ ओकरा "मफाईलुन" कहल जाइत छैक। c) जँ "मफाईलुन" केँ उल्टा करबै तँ "मफऊलात" बनि जाएत मने तीनटा दीर्घकेँ बाद एकटा लघु। d) दूटा दीर्घकेँ बीचमे जँ एकटा लघु रहए तखन ओकरा "फाइलुन" कहल जाइत छैक। e) "फाइलुन" केर अंतमे जँ एकटा आर दीर्घ जोडबै तँ ओ "फाइलातुन" बनि जाएत। f) "फाइलातुन" केर उल्टा रूप "मुस्तफइलुन" होइत छैक। g) शुरुमे एकटा लघु तकरा बाद एकटा दीर्घ तकरा बाद फेर दूटा लघु आ तकरा अंतमे एकटा दीर्घ हो तँ "मुफाइलतुन" कहल जाइत छैक h) "मुफाइलुन" केर अंतसँ तेसर या दोसर लघु हटा कए पहिल लघु लग बैसा देबै तँ "मुतफाइलुन" बनि जाएत। मने शुरुमे टूटा लघु तकरा बाद एकटा दीर्घ तकरा बाद फेर एकटा लघु आ तकरा बाद अंतमे एकटा दीर्घ। एही आठो रुक्नक हेर-फेरसँ बहर बनैत अछि जकर विवरण निच्चा देल जा रहल अछि। 1) समान ध्वनि---------एहि खंडमे कुल सात गोट बहर राखल जाइत अछि। जकर विवरण एना अछि-------- क) बहरे-हज़ज---------- एकर मूल ध्वनि अछि "मफाईलुन" मतलब I-S-S-S (1-2-2-2) मने हस्व् -दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ| इ ध्वनि शाइर अपना सुविधानुसार प्रयोग कए सकैत छथि। मतलब कोनो शाइर एक पाँतिमे एक बेर, वा दू बेर वा ...... कतेको बेर ( बेसीसँ बेसी सोलह बेर ) प्रयोग कए सकैत छथि, मुदा मात्रा-क्रम नहि टुटबाक चाही।आ जँ एहि ध्वनि के शेर के रुप मे देबै तँ एना हेतैक------ I-S-S-S I-S-S-S I-S-S-S + I-S-S-S I-S-S-S + I-S-S-S I-S-S-S + I-S-S-S I-S-S-S + I-S-S-S I-S-S-S + I-S-S-S + I-S-S-S + I-S-S-S I-S-S-S + I-S-S-S + I-S-S-S + I-S-S-S....................................... तँ इ भेल बहरे-हज़ज केर ढ़ाँचा। एहिठाम फेर एक बेर गौरसँ देखू। उपरका ढ़ाँचा सभमे दूनू पाँतिमे मात्रा क्रम एकै छैक। अर्थात ह्रस्व के निच्चा ह्रस्व आ दीर्घ। आ मोन राखू जँ अहाँ बहरे-हज़जमे गजल लीखि रहल छी तँ हरेक शेरक मात्रा क्रम इएह देबए पड़त। नहि तँ गजल बे-बहर कहाओत। ख) बहरे-रमल------- एकर मूल ध्वनि एना अछि--- फाइलातुन मने ----- S-I-S-S,अर्थात दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ। आब जँ एहि ध्वनि के शेर मे प्रयोग करबै तँ एना हेतैक--- S-I-S-S + S-I-S-S + S-I-S-S + S-I-S-S S-I-S-S + S-I-S-S + S-I-S-S + S-I-S-S (एहिठाम हम खाली चारि-चारि ध्वनिके उदाहरण देलहुँ अछि, मुदा शाइर एकसँ लए कए कतेको बेर ( बेसीसँ बेसी सोलह बेर ) ध्वनिके प्रयोग कए सकैत छथि।) इ भेल बहरे-रमल। ग) बहरे-कामिल----- एकर मूल ध्वनि अछि "मुतफाइलुन" मने I-I-S-I-S मने ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ। शेरमे एकर ढ़ाँचा एना छैक------ I-I-S-I-S + I-I-S-I-S + I-I-S-I-S + I-I-S-I-S + I-I-S-I-S I-I-S-I-S + I-I-S-I-S + I-I-S-I-S + I-I-S-I-S + I-I-S-I-S (एहिठाम हम खाली चारि-चारि ध्वनिके उदाहरण देलहुँ अछि, मुदा शाइर एकसँ लए कए कतेको बेर ( बेसीसँ बेसी सोलह बेर ) ध्वनिके प्रयोग कए सकैत छथि।) इ भेल बहरे-कामिल घ) बहरे-मुतकारिब-------- एकर मूल ध्वनि फऊलुन अछि मने I-S-S मने ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ। एकर ढ़ाँचा देखू------- I-S-S + I-S-S + I-S-S + I-S-S + I-S-S I-S-S + I-S-S + I-S-S + I-S-S + I-S-S (एहिठाम हम खाली चारि-चारि ध्वनिके उदाहरण देलहुँ अछि, मुदा शाइर एकसँ लए कए कतेको बेर ( बेसीसँ बेसी सोलह बेर ) ध्वनिके प्रयोग कए सकैत छथि।) इ भेल बहरे-मुतकारिब ङ) बहरे-मुतदारिक--------एकर मूल ध्वनि अछि "फाइलुन" मने S-I-S मने दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ अछि। एकर ढ़ाँचा एना अछि------ S-I-S + S-I-S + S-I-S + S-I-S S-I-S + S-I-S + S-I-S + S-I-S (एहिठाम हम खाली चारि-चारि ध्वनिके उदाहरण देलहुँ अछि, मुदा शाइर एकसँ लए कए कतेको बेर ( बेसीसँ बेसी सोलह बेर ) ध्वनिके प्रयोग कए सकैत छथि)| इ भेल बहरे-मुतदारिक। च) बहरे-रजज------ एकर मूल ध्वनि "मुस्तफइलुन" छैक। मने S-S-I-S मने दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ। एकर ढ़ाँचा एना हेतैक------ S-S-I-S + S-S-I-S + S-S-I-S + S-S-I-S S-S-I-S + S-S-I-S + S-S-I-S + S-S-I-S (एहिठाम हम खाली चारि-चारि ध्वनिके उदाहरण देलहुँ अछि, मुदा शाइर एकसँ लए कए कतेको बेर ( बेसीसँ बेसी सोलह बेर ) ध्वनिके प्रयोग कए सकैत छथि।) इ भेल बहरे-रजज | छ) बहरे-वाफिर------------ एकर मूल ध्वनि "मुफाइलतुन" छैक मने I-S-I-I-S मने ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ। एकर ढ़ाँचा देखू------ I-S-I-I-S + I-S-I-I-S + I-S-I-I-S + I-S-I-I-S I-S-I-I-S + I-S-I-I-S + I-S-I-I-S + I-S-I-I-S (एहिठाम हम खाली चारि-चारि ध्वनिके उदाहरण देलहुँ अछि, मुदा शाइर एकसँ लए कए कतेको बेर ( बेसीसँ बेसी सोलह बेर ) ध्वनिके प्रयोग कए सकैत छथि।) इ भेल बहरे-वाफिर | 2) अर्धसमान बहर-------- एहि खंडमे कुल सात गोट बहर अछि। एकरा हम अर्धसमान बहर एहि द्वारे कहैत छिऐक जे एहिमे हरेक पाँतिमे कमसँ-कम अनिवार्य रुपसँ दूटा ध्वनिके समान रुपमे प्रयोग करए पड़ैत छैक। आब शाइर एहि दूनू ध्वनिके एक पाँतिमे जाए बेर ( बेसीसँ बेसी सोलह बेर ) प्रयोग कए सकथि ओ हुनका ऊपर छन्हि। आ एहि खंडक छहो अन्य बहर लेल एहने सन बूझू।। एकर विवरण निच्चा देल जा रहल अछि। क) बहरे-तवील--------- एकर मूल ध्वनि छैक " फऊलुन-मफाईलुन"। एकर ढ़ाँचा देखू------- I-S-S + I-S-S-S I-S-S + I-S-S-S I-S-S + I-S-S-S + I-S-S + I-S-S-S I-S-S + I-S-S-S + I-S-S + I-S-S-S I-S-S + I-S-S-S + I-S-S + I-S-S-S + I-S-S + I-S-S-S I-S-S + I-S-S-S + I-S-S + I-S-S-S + I-S-S + I-S-S-S........................... एहि बहर आ एहि खंडक बाँकी अन्य छहो बहरक लेल एकटा आर बात मोन राखू जे ध्वनि जाहि क्रममे देल गेल अछि ताही क्रममे रहबाक चाही। जेना की बहरे-तवीलमे अहाँ देखलहुँ जे एकर ध्वनि एना छैक " फऊलुन-मफाईलुन" मुदा जँ अहाँ एकरा " मफाईलुन- फऊलुन" बला क्रममे रखबै तँ इ बहरे-तवील नहि हएत। ख) बहरे-मदीद-----------एकर मूल ध्वनि अछि "फाइलातुन-फाइलुन"। एकर ढ़ाँचा एना छैक-------------------- S-I-S-S + S-I-S ग) बहरे बसीत----- एकर मूल ध्वनि " मुस्तफइलुन-फाइलुन" छैक। एकर ढ़ाँचा एना हएत---------------------------- S-S-I-S + S-I-S-S घ) बहरे-मुजस्सम वा मुजास----------------------------- एकर मूल ध्वनि " मुस्तफइलुन-फाइलातुन" छैक। एकर ढ़ाँचा एहन छैक----------- S-S-I-S + S-I-S-S ङ) बहरे- मुन्सरह----------- एकर मूल ध्वनि "मुस्तफइलुन-मफऊलात"। एकर ढ़ाँचा छैक--------------- S-S-I-S + S-S-S-I च) बहरे-मजरिअ-------------- एकर मूल ध्वनि छैक "मफाईलुन-फाइलातुन" एकर ढ़ाँचा एना छैक-------- I-S-S-S+S-I-S-S छ) बहरे-मुक्तजिब------- एकर मूल ध्वनि छैक " मफऊलात-मुस्तफइलुन"। एकर ढ़ाँचा छैक----------- S-S-S-I +S-S-I-S 3) असमान बहर--------- एहि खंडमे कुल तेरह गोट बहर अछि। एकरा हम असमान बहर एहि द्वारे कहैत छिऐक जे एहिमे हरेक पाँतिमे कमसँ-कम अनिवार्य रुपसँ तीनटा ध्वनिके समान रुपमे प्रयोग करए पड़ैत छैक।जाहिमे दूटा ध्वनि तँ समान रहैत छैक खाली एकटा मने तेसर ध्वनि दोसर आबि जाइत छैक। आब शाइर एहि तीनू ध्वनिके एक पाँतिमे जाए बेर ( बेसीसँ बेसी सोलह बेर ) प्रयोग कए सकथि ओ हुनका ऊपर छन्हि। आ एहि खंडक आर अन्य बहर लेल एहने सन बूझू। एकर विवरण निच्चा देल जा रहल अछि। क) बहरे-खफीफ------एकर मूल ध्वनि छैक "फाइलातुन-मुस्तफइलुन-फाइलातुन"| एकर ढ़ाँचा छैक---------- S-I-S-S + S-S-I-S + S-I-S-S ख) बहरे-जदीद----- एकर मूल ध्वनि छैक "फाइलातुन- फाइलातुन-मुस्तफइलुन"| एकर ढ़ाँचा छैक---------- S-I-S-S + S-I-S-S + S-S-I-S ग) बहरे-सरीअ----- एकर मूल ध्वनि छैक " मुस्तफइलुन- मुस्तफइलुन-मफऊलात" | एकर ढ़ाँचा छैक------- S-S-I-S + S-S-I-S + SISS घ) बहरे-करीब------ एकर मूल ध्वनि छैक " मफाईलुन- मफाईलुन- फाइलातुन"| एकर ढ़ाँचा छैक---- I-S-S-S + ISSS + S-I-S-S ङ) बहरे-मुशाकिल------- एकर मूल ध्वनि छैक " फाइलातुन- मफाईलुन- मफाईलुन | एकर ढ़ाँचा छैक---- S-I-S-S + I-S-S-S + I-S-S-S च) बहरे-कलीब-------- एकर मूल ध्वनि छैक "फाइलातुन—फाइलातुन--- मफाईलुन" | एकर ढ़ाँचा छैक--- SISS--- SISS---- ISSS छ) बहरे असम------- एकर मूल ध्वनि छैक फाइलातुन--- मफाईलुन--- फाइलातुन (SISS---- ISSS--- SISS एकर ढ़ाँचा छैक ज) बहरे कबीर----- एकर मूल ध्वनि छैक मफऊलातु--- मफऊलातु--- मुस्तफइलुन (SSSI--- SSSI--- SSIS एकर ढ़ाँचा छैक झ) बहरे सगीर----- एकर मूल ध्वनि छैक मुस्तफइलुन--- फाइलातुन---- मुस्तफइलुन(SSIS--- SISS--- SSIS एकर ढ़ाँचा छैक ञ) बहरे-सरीम----- एकर मूल ध्वनि छैक मफाईलुन--- फाइलातुन--- फाइलातुन | एकर ढ़ाँचा छैक------- ISSS + SISS + SISS ट) बहरे सलीम----- एकर मूल ध्वनि छैक --- "मुस्तफइलुन-- मफऊलातु---मफऊलातु"| एकर ढ़ाँचा छैक---- SSIS + SSSI + SSSI ठ)बहरे हमीद----- एकर मूल ध्वनि छैक--- "मफऊलातु----मुस्तफइलुन----मफऊलातु"| एकर ढ़ाँचा छैक--- SSSI + SSIS + SSSI ड) बहरे हमीम--- एकर मूल ध्वनि छैक-- "फाइलातुन--- मुस्तफइलुन--- मुस्तफइलुन" |एकर ढ़ाँचा छैक-- SISS + SSIS + SSIS आब हमरा लोकनि इ जानी जे अरबीक एहि आठो रुक्नकेँ मैथिलीमे केना बदलि सकैत छी। मैथिलीमे दू प्रकारक छंद पद्धति अछि-----मात्रिक आ वार्णिक | A) मात्रिक------ एहिमे दू, तीन, चारि, पाँच आ छह मात्रा खंडके जोड़ि कए अक्षर विन्यास कएल जाइत छैक। आ एहि अक्षर विन्यासकेँ गण कहल जाइत छैक। मात्रिक छंदमे पाँच टा गण होइत अछि----- क) ण (णगण) = द्विकल मने दू मात्राक खंड ख) ढ ( ढगण) = त्रिकल मने तीन मात्राक खंड ग) ड ( डगण) = चतुष्कल मने चारि मात्राक खंड घ) ठ ( ठगण) = पंचकल मने पाँच मात्राक खंड ङ) ट ( टगण) = षटकल मने छह मात्राक खंड एहि गणकेँ अतिरिक्त मैथिलीमे एक मात्रा, सात मात्रा आ आठ मात्राक वर्ण विन्यास सेहो होइत छैक। मुदा ओकरा गण नहि मानल जाइत छैक। कारण एक मात्रा अपूर्ण भेल। तेनाहिते सात वा आठ मात्रा बला विन्यास कोनो ने कोनो रुपेँ उपरक पाँचो गणसँ मिलैत अछि। उदाहरण लेल सात मात्राक वर्ण विन्यास देखू---" पहिराओल" = IISSI । आब एहिमे देखू पहिल तीन मात्रा मने ( IIS) चतुष्कलक रुप थिक आ अंतिम दूनू मात्रा मने ( SI ) त्रिकलक रुप थिक। आठ मात्राक लेल एहने सन गप्प। उपरक पाँचो मात्रा विन्यासकेँ अलग-अलग रुपेँ लिखल जा सकैए आ एहि हिसाबें ------ द्विकल- दू रूप मे लिखल जाइत अछि----- 1) घर = II 2) ओ = S त्रिकल- तीन रूप मे लिखल जाइत अछि----- 1) भिजा = IS 2) अपन = III 3) आब = SI चतुष्कल- पाँच रूप मे लिखल जाइत अछि----- 1) छौंड़ी = SS 2) तकरा = IIS 3) चुमान = ISI 4) फेकल = SII 5) सदिखन = IIII पंचकल- आठ रूप मे लिखल जाइत अछि----- 1) लड़ाकू = ISS 2) तिलकोर = IISI 3) हौहत्ती = SIS 4) तरेगन = ISII 5) सरधुआ = IIIS 6) जागरण = SIII 7) अंगूर = SSI 8) चहटगरि = IIIII षटकल - तेरह रूप मे लिखल जाइत अछि-- 1) सोहारी = SSS 2) बपखौकी = IISS 3) सुधामयी = ISIS 4) मादकता = SIIS 5) असगरुआ = IIIIS 6) सिताएल = ISSI 7) लालटेन = SISI 8) खटखटाह = IIISI 9) मोताबिक = SSII 10) अधमौगति = IISII 11) सुरेबगर = ISIII 12) राजभवन = SIIII 13) चपलचरण = IIIIII तँ चलू आब एहि पाँचो गणसँ अरबी रुक्न बनाबी। इ अरबी रुक्न आठ अछि । तँ देखू एकर नियम----- 1) जँ द्विकलक (णगनक) एहन रूप जाहिमे एकसरें दीर्घ मने--SS (जेना-जे, गे, खो, जो आदि) रहए आ तकरा बाद पंचकल (ठगण)क ओ रूप रहए जाहिमे पहिल वर्ण लघु आ तकरा बाद दूनू दीर्घ (ISS) हो तँ जे रूप बनत से उर्दू मे "फाइलातुन" कहबैत छैक। एकटा उदारहरण लिअ " गे सुशीला" एकर मात्रा क्रम अछि (SISS) ---- आब एकरा "फाइलातुन" (SISS) सँ मिलाउ| एकरा एना देखू------ S + ISS = SISS 2) जँ पंचकल (ठगण)क ओ रूप जाहिमे पहिने दूटा दीर्घ आ तकरा बाद एकटा लघु हो (SSI) तकरा द्विकल (णगन)क ओहन रूपसँ जोड़ू जाहिमे एकसरें दीर्घ (S) हो। तँ ओ "मुस्तफइलुन" ( SSIS) बनत। एकरा एना देखू---------SSI + S = SSIS 3) जँ त्रिकल (ढगण)क ओहन रूप जाहिमे पहिल लघु आ दोसर दीर्घ (IS) हो तकरा चतुष्कल (डगण)क ओहन रूपसँ जोड़ू जाहिमे दूनू दीर्घ (SS) छैक। तखन जे बनत तकरा "मफाईलुन" (ISSS) बनत मने। उदाहरण लेल---निशा एलै (ISSS)। एकरा एना देखू-----IS + SS = ISSS 4) जँ चतुष्कल (डगण)क ओहन रूप जकर शुरूआतमे दूटा लघु आ अंतमे एकटा दीर्घ होइ मने (IIS) तकरा त्रिकल (ढगण)क ओहन रूपसँ जोड़ू जाहिमे पहिल लघु आ अंतिम दीर्घ मने (IS) तँ "मुतफाइलुन" (IISIS) बनि जाएत। एकरा एना देखू-------IIS + IS = IISIS 5) जँ पंचकल (ठगण)क ओहन रूप जाहिमे पहिल लघु दोसर दीर्घ आ तकरा बाद अंतिम दूनू लघु मने (ISII) हो तकरा द्विकल (णगण)क ओहन रूपसँ जोड़बै जाहिमे एकटा दीर्घ होइक मने (S) तँ मफाइलतुन बनि जाएत। एकरा एना देखू------ISII + S = ISIIS 6) जँ चतुष्कल (डगण)क ओहन रूप जाहिमे दूनू दीर्घ हो (SS) मने तकरा त्रिकल (ढगण)क ओहन रूपसँ जाहिमे पहिल दीर्घ आ अंतिम लघु (IS) मने हो तँ "मफऊलात" (SSIS) बनत। एकरा एना देखू-----SS + IS = SSIS 7) पंचकल (ठगण)क ओहन रूप जाहिमे पहिल लघु आ तकरा बाद दूनू दीर्घ हो मने (ISS) से "फऊलुन" कहाइत अछि। एकरा एना देखू------ ISS 8) पंचकल (ठगण)क ओहन रूप जाहिमे पहिल दीर्घ आ तकरा बाद लघु तकरा बाद फेर दीर्घ हो मने (SIS) से "फाइलुन" कहल जाइत अछि। एकरा एना देखू------SIS *****मात्रा गनबाक लेल मोन राखू जाहि अक्षरमे "अ", "इ", "उ", "ऋ" एवं "लृ" नुकाएल हो तकरा लघु मानू आ तकरा बाद सभकेँ दीर्घ। संगहि संग अनुस्वार तँ दीर्घ अछि मुदा चन्द्रबिंदु लघु।संगहि-संग जँ कोनो शब्दमे संयुक्ताक्षर हुअए तँ ताहिसँ पहिलेक अक्षर दीर्घ भए जाइत छैक चाहे ओ लघु किएक ने हुअए। उदाहरण लेल--प्रत्यक्ष शब्दमे दूटा संयुक्ताक्षर अछि पहिल त्य एवं क्ष। आब एहिमे देखू "त्य" सँ पहिने "प्र" अछि तँए ई दीर्घ भेल आ "क्ष" सँ पहिने "त्य" अछि तँए इहो दीर्घ भेल। मुदा इ मोन राखू "न्ह" आ "म्ह" संयुक्ताक्षरसँ पहिने बला शब्दमे लघु दीर्घ नहि होइत छैक। जेना की "कुम्हार" मे "म्ह" सँ पहिने "कु" दीर्घ नहि भेल तेनाहिते "कन्हाइ" शब्दमे सेहो "न्ह"सँ पहिने "क" वर्ण दीर्घ नहि भेल। क्ष, त्र आ ज्ञ संयुक्ताक्षर अछि। B) वार्णिक छंदमे तीन-तीन मात्रा खंडक आठ विन्यास कएल जाइत अछि। एहि तीन-तीन खंडक गनणा "दशाक्षरी" पद्धतिसँ कएल जाइत अछि। इ एक प्रकारक सूत्र अछि। इ सूत्र अछि-----"यामाताराजभानसलगा"। एहि दसो अक्षरमेसँ पहिल आठ अक्षर आठो गणक नामक पहिल अक्षर थिक। आ इ आठ गण अछि----- य = यगण मा = मगण ता = तगण रा = रगण ज = जगण भा = भगण न = नगण स = सगण आ अंतिम दूटा अक्षर "लगा" कोनो गण नहि अछि। कारण इ जे वार्णिक छंदमे तीन-तीन मात्रा होइत छैक। मुदा "लगा" केर बाद कोनो अक्षर नहि अछि। तँए "स" के बाद कोनो गण नहि बनि सकैत अछि। आब गण बनेबाक तरीका देखू---- अहाँ जे गण बनबए चाहैत छी तकर पहिल अक्षर आ तकरा बादक दू अक्षर आरो लिअ। जे अक्षर क्रम आएत तकर मात्रा गणक मात्रा कहाएत। उदाहरण लेल मानू हमरा "मगण" बनेबाक अछि तँ सभसँ पहिने "मा" लिअ तकरा बादक दूशब्द अछि "तारा"। आब एकरा एकठाम लेने "मातारा" बनत। आब एकर मात्रा अछि---SSS | तँ इ भेल "मगण"। एकटा आर उदाहरण लिअ मानू हमरा जगण बनेबाक अछि तँ ज लिअ आ तकरा बाद दू शब्द अछि "भान"। तँ दूनू मिला कए "जभान" बनत मने "जगण" केर मात्रा क्रम ISIअछि। एनाहिते आठो गण बनैत अछि। आठो गणक रुप देल जा रहल अछि----- गणक नाम दशाक्षरी खंड मात्रा क्रम यगण यमाता ISS मगण मातारा SSS तगण ताराज SSI रगण राजभा SIS जगण जभान ISI भगण भानस SII नगण नसल III सगण सलगा IIS तँ चलू आब एहि आठो गणसँ अरबी रुक्न बनाबी। इ अरबी रुक्न आठ अछि । तँ देखू एकर नियम---- 1) यगण (ISS )सँ पहिने एकटा दीर्घ लगेने " फाइलातुन" बनत। मने S + यमाता = SISS = फाइलातुन ( वैकल्पिक रुपें एनाहुतो कए सकैत छी------- रगण मने (SIS) केँ बाद एकटा आर दीर्घ लगेने "फाइलातुन" बनत।मने SIS + S = SISS 2) रगण (SIS )सँ पहिने एकटा दीर्घ लगेने " मुस्तफइलुन " बनत। मने S + रगण = SSIS = मुस्तफइलुन (वैकल्पिक रुपें एनाहुतो कए सकैत छी----- तगण मने (SSI) केँ बाद एकटा आर दीर्घ लगेने "मुस्तफइलुन" बनत। मने SSI + S = SSIS ) 3) यगण (ISS )केँ बाद एकटा दीर्घ लगेने "मफाईलुन" बनत। मने ISS + यगण = ISSS = मफाईलुन (वैकल्पिक रुपें एनाहुतो कए सकैत छी---- मगण मने (SSS) सँ पहिने एकटा लघु लगेने "मफाईलुन" बनत। मने I+SSS = ISSS 4) रगण (SIS) सँ पहिने दूटा लघु लगेने " मुतफाइलुन " बनत। मने II + रगण = IISIS = मुतफाइलुन ( वैकल्पिक रुपें एनाहुतो कए सकैत छी--- सगण मने (IIS) केँ बाद एकटा लघु आ तकरा बाद एकटा दीर्घ लगेने "मुतफाइलुन" बनत। मने IIS + I + S = IISIS = 5) जगण मने (ISI) केँ बाद एकटा लघु आ तकरा बाद एकटा दीर्घ लगेने "मफाइलतुन" बनत। मने ISI + I + S = ISIIS 6) मगण मने( SSS) के बाद एकटा लघु लगेने "मफऊलात" बनत। मने SSS + I = SSSI = मफऊलात ( वैकल्पिक रुपें एनाहुतो कए सकैत छी----- तगण मने (SSI)सँ पहिने एकटा दीर्घ लगेने “मफऊलात” बनत। मने S + SSI = SSSI 7) यगण मने ( ISS) पूरा-पूरी "फऊलुन" केँ बराबर अछि। 8) रगण मने ( SIS) पूरा-पूरी "फाइलुन" केँ बराबर अछि। तँ दूनू प्रकारक छंद आ तकरा रुक्नमे बदलनाइ हमरा लोकनि सेहो देखलहुँ। तँ आब चलू तैआर भए जाउ गजल लिखए आ पढ़ए लेल। एहि लेखक सहायतासँ खाली मैथिलीए नहि कोनो आन भाषामे सेहो सही गजल लीखि सकैत छी, खाली काफियाकेँ नियम बदलि जेतै भाषाकेँ हिसाबें। मैथिलीमे बहर उपरमे हमरा लोकनि जतेक बहर देखलहुँ ताहि उपर मैथिलीमे आइ धरि गजल कहले नहि गेल। अर्थात जीवन झासँ लए कए 2008 धरि मैथिलीमे बहर नहि छल। 2008क बाद गजेन्द्र ठाकुर उपरका बहरमे गजल तँ कहबे केलाह संगहि-संग मैथिली लेल एकटा अन्य बहर सेहो तकलाह जकर नाम देल गेल---वार्णिक बहर। एहि बहरक मतलब छैक मतलाक पहिल पाँतिमे जतेक वर्ण छैक ओहि गजलक आन हरेक शेरक पाँतिमे ओतबए वर्ण हेबाक चाही। उपरमे उदाहरण लेल हम अपन जतेक शेर देने छी ओ सभ सरल वार्णिक बहरमे अछि।तथापि एकटा उदाहरण आर----- जहिआ धरि हमरा श्वास रहत तहिआ धरि हुनक आस रहत आब एकरा गानू। एहि दूनू पाँतिमे 13-13 वर्ण अछि। इ भेल सरल वार्णिक बहर। वर्ण कोना गानल जाए ताहि लेल इ धेआन राखू----- हलंत बला अक्षरकेँ 0 मानू संयुक्ताक्षरमे संयुक्त अक्षरके 1 मानू। जेना की "हरस्त" मे स्त=1 भेल। तकरा बाद सभ अक्षरकेँ 1 मानू चाहे ओकर मात्रा लघु हो की दीर्घ। वार्णिक बहर दू तरहक अछि--- सरल वार्णिक बहर, आ वार्णिक 1) सरल वार्णिक बहर----- उपरका सभ उदाहरण सरल वार्णिकक अछि। 2) वार्णिक-------- एहिमे वर्णक संग-संग मात्राक सेहो धेआन राखए पड़ैत छैक। मने वर्णक संख्या तँ निश्चित हेबाके चाही संगहि-संग ह्रस्व के निच्चा ह्रस्व आ दीर्घ के निच्चा दीर्घ हेबाके चाही। उदाहरण लेल----- नचनी नाच नचा गेल प्रेम हुनकर जिनगी बाँझ बना गेल प्रेम हुनकर आब एहि शेरके देखू दूनू पाँतिमे 15 वर्ण तँ छैके संगे-संग पहिल पाँतिमे जाहि ठाम जे मात्रा छैक वएह मात्रा दोसरो पाँतिमे ओही ठाम छैक। तँ इ भेल वार्णिक बहर| आब अहाँ एतए प्रश्न कए सकैत छी जे जँ एहिमे ह्रस्व के निच्चा ह्रस्व आ दीर्घ के निच्चा दीर्घ छैक तँ एकरा उर्दूक बहर किएक ने मानल जाए। मुदा एहिठाम मोन राखू खाली ह्रस्व के निच्चा ह्रस्व आ दीर्घ के निच्चा दीर्घ रहने उर्दूक बहर नहि होइत छैक। जँ अहाँ एकरा मात्रा क्रम देबै तँ पता चलत जे एकर रुप एना छैक---- I+I+S+S+I+I+S+S+I+S+I+I+I+I+I आब अहाँ गौरसँ देखू इ ढ़ाँचा उर्दूक कोनो बहरसँ मेल नहि खाइत अछि। तँए एहि शेरमे ह्रस्व के निच्चा ह्रस्व आ दीर्घ के निच्चा दीर्घ रहितो उर्दूक बहर नहि मानल जाएत। आब कने इ विचारी जे मैथिलीमे कोन बहरके प्रधानता दी। जेना की हमरा लोकनि जनैत छी "सरल वार्णिक बहर" सभसँ बेसी हल्लुक अछि तँए गजलगो ( शाइर) शुरुआतमे एही बहर मे गजल लिखैत तँ नीक। तकरा बाद अभ्याससँ दोसर बहर (वार्णिक बहर) पर आबथि आ तकरा बाद उर्दू बला बहर पर हाथ अजमाबथि। एखन मैथिलीमे दोसर बहर अर्थात क प्रारंभिक चरण चलि रहल अछि। अंतमे सबसँ खास गप्प गजल चाहे अहाँ कोनो बहर मे किएक ने लिखब रदीफ आ काफियाक नियम सभ लेल एकै रंग रहत। गजलक भाषा चूँकि गजलकेँ प्रेमी-प्रेमिका (आत्मा-परमात्मा)क गप्प-सप्प सेहो मानल जाइत छैक। आ गप्प-सप्प सदिखन गद्यमे होइत छैक तँए गजल लेल गद्यात्मक भाषा हेबाक चाही। एहि स्तर पर इ संस्कृत काव्यसँ बिलकुल अलग अछि। जे गजल जतेक गद्यात्मक हएत ओ ओतेक बेसी नीक हएत। भाषाक संबंधमे एकटा आर गप्प- हरेक भाषाक दूटा रूप होइत छैक पूर्ण आ अपूर्ण। मैथिलीओमे छैक, किछु उदाहरण देखू------- पूर्ण रूप--------- अपूर्ण रूप नहि---------------नै जाहिठाम----------जैठाम कतेक-------------कते हेतैक-------------हेतै गजलक संदर्भ मे हमर इ अनुभव अछि जे अपूर्ण भाषा गजल लेल बेसी नीक। कारण भाषाक अपूर्ण रूप लोकमे उच्चरित होइत छैक आ गजल तँ पूरा-पूरी उच्चारण पर निर्भर छैक। तँए जे तेजी अहाँकेँ "नै हेतै" वाक्य-खंडमे भेटत ततेक तेजी "नहि हेतैक" वाक्य खंडमे नहि भेटत। हम अपन गजलमे अपूर्ण रूपकेँ प्रधानता देने छी। पूर्ण रूपकेँ प्रयोग हम खाली वर्ण आ मात्रा मिलेबाक लेल करैत छी। आब अपना गजलक मादें किछु शब्द। हम बहुत कम दिनसँ गजल लिखैत छी। आ इ वास्तविकता छैक। संगहि-संग इहो वास्तविकता छैक जे हम मरितो काल धरि गजल लिखब आ तखनो कहब जे " हम बहुत कम दिनसँ गजल लिखैत छी"।हमर मोनमे गजल प्रायः 2001सँ बसल अछि मुदा एकर भयंकर रुप तखन देखाएल जखन की 2008मे "अनचिन्हार आखर" (http://anchinharakharkolkata.blogspot.com) मैथिलीक पहिल गजलक ब्लागके रुपमे जन्म लेलक। आ एहि "अनचिन्हार आखर"केँ प्रति हम कतेक मोहासक्त छी से अहाँ सभ देखिए रहल हएब।ओना एखन धरिक हमर सभ गजल सरल वार्णिक बहर पर आधारित अछि। ओहिमे कोनो-कोनोमे वार्णिक बहरक झलक सेहो भेटि जाएत। गलती कतेको प्रकारसँ होइत छैक जेना की अज्ञानतावश,मोहवश, आलस्यवश आदि। बहुत संभव जे हमर आलेख आ गजलमे बहुत रास गलती होइक। आ एहि लेल सुधी पाठकसँ माफी चाहैत छी। संगहि-संग जँ किनको कोनो सुझाव देबाक छन्हि ओ वयक्तिगत वा सार्वजनिक रुपें दए सकैत छथि |समय अएला पर हम ओहि हिसाबें जरूर परिवर्तन करबै | -समर्पण सिरजनहारकेँ- आशीष अनचिन्हार गजल 1 मालक खातिर तँ माल-जाल बनल लोक देखाँउसक खातिर कंगाल बनल लोक भूखक दर्द होइत छैक प्रकाशोसँ तेज देखू पेटक खातिर दलाल बनल लोक वृत तँ टूटल मिलल समानांतर रेखा देखू बिनु कागजीक प्रकाल बनल लोक सत्त-सत्त ने रहल ने रहल फूसि-फूसि अपने लेल अपने जंजाल बनल लोक उपरसँ गंगा घाट भीतर मोकामा घाट एतए नुनिआएल देबाल बनल लोक **** वर्ण---------16***** 2 चुप्प रहत मनुख गिद्दर भुकबे करतैक निर्जीव तुलसी चौरा कुकुर मुतबे करतैक जँ केकरो वीरता सीमित रहि जाए गप्प धरि तँ दुश्मनक लात छाती पर पड़बे करतैक विद्रोह आ अधिकारके अधलाह बुझनिहार आइ ने काल्हि अपटी खेतमे मरबे करतैक बसात पर बसात दैत रहू क्रांतिक आगिके नहुँए-नहुँ सही कहिओ तँ जरबे करतैक कहैत रहिऔ विद्रोहक गजल अनचिन्हार कहिओ केओ ने केओ एकरा पढ़बे करतैक **** वर्ण---------18******* 3 एहि लाइलाज बेमारीक की हाल हेतै स्वेछाचारी-चारणीक की दलालहेतै हरेक समय बितैए दुख आ दर्दमे गरीब लेल नव पुरान की साल हेतै नौकरी उड़िआ गेलै बालु जकाँ देशसँ आब किएक केओ काजमे बहाल हेतै अहुरिआ कटैत लोक डूबल नोरमे ओ तँ नोरे पीबि मँगनी मे हलाल हेतै धैरज धरु प्रतीक्षा करु अनचिन्हार मरब तँ नीक जिनगी तँ जंजाल हेतै **** वर्ण---------15******** 4 मछगिद्ध जँ माछ छोड़ए तँ डर मानबाक चाही लोक जँ नेता भए जिबए तँ डर मानबाक चाही बेसबा खाली देहे टा बेचैत छैक अभिमान नहि लोक अस्वभिमानी हुअए तँ डर मानबाक चाही सभके छै बूझल शेर केखनो नहि खाएत घास जँ बीर अँहिंसक बनए तँ डर मानबाक चाही सीमा केर रक्षा करैत जे मरथि सएह बिजेता माए बेचि जँ रण जितए तँ डर मानबाक चाही सम्मानक रक्षा करब उद्येश्य अछि गजल केर जँ ओकर उद्येश्य छुटए तँ डर मानबाक चाही **** वर्ण---------19******* 5 एहि रुपें सभमे करार हेतै खाए लेल मनुखे जोगार हेतै मीडिआ तँ बनि गेलै पोर्नोग्राफी आब सएमे सए फिराड़ हेतै बयससँ पहिने बच्चा जबान पंचमे बर्खे रति झमार हेतै संबंध जरि रहल सभ ठाम परिवार गूँहक भराड़ हेतै चेतह अनचिन्हार रुकि जाह छनेमे आदमी बेस्महार हेतै **** वर्ण---------12****** 6 कागतक नाह चलि रहल सुखाएल धारमे ओ तँ घरमुरिआ दैए इजोरिआक अन्हारमे नाङट समय नाङट आदमी आ नाङट व्याख्या राधा भेटतीह गली-गली कान्ह हरेक छिनारमे छद्म भेषे रहितहि तँ एहन सन गप्प नहि मोश्किल छैक फर्क केनाइ मनुख आ हुराड़मे बजैत लोकके सुनबाक फुर्सति कहाँ भेटतै एहिठाम सभ लागल अछि आत्म-अभिसारमे किछुओ कहब खतरनाक बुझाइए एतए एकौटा अपन लोक कहाँ एते अनचिन्हारमे **** वर्ण---------18****** 7 मनुख पर भुकैए कुकूर खजानाके चोरबैए कुकूर की मनु की आदम की छै हौआ नियम बना तोड़ैए कुकूर लक्ष्य नै बाटे-बाट पसरल बेमतलब दौड़ैए कुकूर आगि-पानि-बसात बेकाजक रंग-महलमे रहैए कुकूर पदितो जाइ पड़ाइतो जाइ कुकूरेके हबकैए कुकूर **** वर्ण---------11******* 8 आबो परबोध करु अपने विरोध करु लोक तँ बढ़त आगाँ अहाँ अवरोध करु धनी बनि जाए धनी एहने तँ शोध करु बहर नै गजल नै इ आबो तँ बोध करु आएत अनचिन्हार अहाँ अनुरोध करु **** वर्ण---------8******** 9 भेष हुनक भगवान सन काज हुनक सइतान सन बेटा बलाके तँ पंडित बुझू बेटी बला तँ जजमान सन मँहगाइ बढ़ल छै तेना ने कोबरो तँ झूरझमान सन देहे जिंदा,भावना मरि गेलै जग लगैए समसान सन नहि बनत केओ राम मुदा सेवक चाही हनुमान सन **** वर्ण---------11******** 10 इ दुराचार अँहिक खूरक प्रतापे इ भ्रष्टाचार अँहिक खूरक प्रतापे देखू लोक पढ़ैए जान अरोपि कए मुदा बेकार अँहिक खूरक प्रतापे जनबल,धनबल, आरो बल-बल इ सरकार अँहिक खूरक प्रतापे इद्दुत-विद्दुत सभटा फेल की कहू भेल अन्हार अँहिक खूरक प्रतापे हाथ मिलाउ, छाती लगाउ तैओ सभ अनचिन्हार अँहिक खूरक प्रतापे **** वर्ण---------14****** 11 मूसक आखर बिलाइक नाम गाएक नोर तँ कसाइक नाम हुनका नै हुनकर धोधि देखू घीअक सुगंधि मलाइक नाम किएक शिक्षकके सम्मान हेतै बापक कर्जा तँ पढ़ाइक नाम आरि मने गारि, गारि मने मारि खेतक उपजा बटाइक नाम एहनो होइ छै कहिओ-कहिओ पानिक प्रेम तँ सलाइक नाम **** वर्ण---------12****** 12 जीबनमेँ सभकेँ एनाहिते घाम चलैए केखनो अराम तँ केखनो हराम चलैए अधरतिआमे देखबै केखनो अनचोके चुड़ैले जकाँ तँ उन्टा हमर गाम चलैए आब तँ तरबा बचि जाइत छै सदिखन बाट पर सदिखन जुत्ता-खराम चलैए रामक आदर्श तँ मरि गेल हुनके संगे बुझू आब तँ खाली हुनक नाम चलैए चिन्हार तँ बिलमि जाइए चिन्हारक संग देखू अनचिन्हार मुदा अविराम चलैए **** वर्ण---------16****** 13 गोली सँ तँ डेराएल अछि मनुखसँ सइतान धरि जानवर तँ जानवर भगवत्तीसँ भगवान धरि नीकक लेल सोहर तँ खरापक लेल समदाउन गाबिए रहल गबैआ सोइरीसँ असमसान धरि इ समालोचना केकरा कहैछ छन्हि किनको बूझल पढ़ू, अछि सगरो पसरल निन्दासँ गुणगान धरि राम नामक लूटि थिक लूटि सकी तँ लूटू सदिखन लूटि रहल छथि दक्षिणा पंडितसँ जजमान धरि सदिखन पसरि रहल पसाही सगरो कोने-कोन घृणा-द्वेष-तामस क्रिसमस-होलीसँ रमजान धरि **** वर्ण---------20******* 14 देह केराक थंब सन गोर-नार लगैए अड़हूलक फूल सन भकरार लगैए नोर अँहाक तँ बेली-चमेली,गेंदा-गुलाब मुदा हँसी तँ अँहाक सिंगरहार लगैए मरनाइ तँ एकै होइ छै सभहँक लेल लहासे सन तँ कटल कचनार लगैए सीसोक सीस कटल,चऽहुक चऽहु टुटल आमक नव पल्लव तँ अंगार लगैए आम-जाम,कुम्हर-कदीमा,लताम-सरीफा आब तँ जकरे देखू अनचिन्हार लगैए **** वर्ण---------16******* 15 मोन पड़ैए केओ अनचिन्हार सन साइत कहीं इएह ने हो प्यार सन जे नै कमा सकए टका बेसीसँ बेसी लोक तँ ओकरे बुझै छै बेकार सन समय कहाँ कहिओ खराप भेलैए कमजोरके लगिते छै अन्हार सन किछु तँ देखाएल चोके-अनचोकेमे चोरे तँ बुझाइए पहरेदार सन संग रहबै-छोड़बै तँ फरक देखू बालु जकाँ समस्या पहाड़ सन **** वर्ण---------14******* 16 जीबनमे दर्दक सनेश शेष कुशल अछि हम नहि कहब विशेष शेष कुशल अछि अन्हरे सरकार तँ चला रहल राज-काज की कहू, छै बौकक इ देश शेष कुशल अछि देहे टा बदलैए आत्मा नहि सूनि लिअ अहाँ एहने सरकारक भेष शेष कुशल अछि मुक्का आ थापड़क उपयोगके करत आब खाली आँखिए लाल-टरेस शेष कुशल अछि गजल कहब एतेक सोंझ नै अनचिन्हार हम तँ आब चलै छी बेस शेष कुशल अछि **** वर्ण---------17******* 17 अँहा तँ असगरेंमे कानब मोन पाड़ि कए करेजक बाकसके घाँटब मोन पाड़ि कए आइ भने विछोह नीक लागि रहल अँहाके काल्हि अहुरिआ काटि ताकब मोन पाड़ि कए मिझरा गेलैक नीक-बेजाए दोगलपनीसँ कहिओ एकरा अँहा छाँटब मोन पाड़ि कए अँहा जते नुका सकब नुका लिअ भरिपोख फेर तँ अँही एकरा बाँटब मोन पाड़ि कए आइ जते फाड़बाक हुअए फाड़ि दिऔ अहाँ मुदा फेर तँ इ अहीँ साटब मोन पाड़ि कए **** वर्ण---------17******* 18 जँ प्रेम अछि तँ कहनहि नीक शीतल आगिमे जरनहि नीक घोघक रहस्य तँ एना बुझिऔ झरकल मुँह झपनहि नीक लोक जहर दैए मुस्किया कए आब तँ हँसीसँ डरनहि नीक दबाइ देबै तँ बढ़बे करत प्रेमक दर्दके सहनहि नीक आब जँ भेटत दुख अहूँ लग तखन संसार छोड़नहि नीक **** वर्ण---------12******* 19 बाजू चोर आ चुहारक लेल ताला की अँही कहू बेइमान लेल केबाला की लोक डुबैत अछि भाव आ अभावमे कहू डुबबाक लेल नदी आ नाला की लोक तँ खुश होइए तेल मालिशसँ एहि रोगीक लेल दबाइ वा आला की फूसे घर पर होइए दैवी प्रकोप इल्डिंग-बिल्डिंग लेल ठनका-पाला की इज्जत सुकाजसँ भेटै छै संसारमे एहि लेल बासन-सिंहासन-माला की **** वर्ण---------14******* 20 आइ-काल्हि भाँड़े आ की भड़ुएक तँ चलती छैक आइ-काल्हि चोरे की पहरुएक तँ चलती छैक होइत रहल निपत्ता फल आ फूल बगैचासँ सुखाएल सन जड़ि मालिएक तँ चलती छैक चिचिआ कए जगबैत छल लोकके सदिखन गोली खेलक ओ निशबद्दीएक तँ चलती छैक घोघके घोघ नै ओकरा आब दोसरे चीज बुझू साँझ-राति धंधामे बहुरिएक तँ चलती छैक कलम लेने ठाढ़ अनचिन्हार चौबटिआ पर कुबाट देखबैत कुमार्गिएक तँ चलती छैक **** वर्ण---------18******* 21 कहू, इ की केलहुँ बैसले-बैसल अँहा आगि तँ लगेलहुँ बैसले-बैसल अँहा रोड़ी कहींक इँटा-बालु सीमेंट कहींक महल बनेलहुँ बैसले-बैसल अँहा इन्द्र की करताह परतर अँहा संग तंत्र जन्मा देलहुँ बैसले-बैसल अँहा अगस्तस्य तँ पीने छलाह एकटा नदी समुद्रो पी गेलहुँ बैसले-बैसल अँहा लाठी-भाला लेने बैसल छल ओ खेतमे साँढ़ ढ़ुका देलहुँ बैसले-बैसल अँहा **** वर्ण---------15******* 22 बाट अन्हारमे डूबल केकरा बजाउ जगैत लोक तँ सूतल केकरा बजाउ लेलहुँ हम सप्पत रहब एकै संग ओ तँ मोड़ पर छूटल केकरा बजाउ राम ठकाएल तँ अल्ला छथि बौआएल मंदिर-मस्जिद टूटल केकरा बजाउ दुनियाँ घालमेलक दुनियाँ भ्रमजाल सीसी-छौंड़ी-पाइ घूमल केकरा बजाउ चाहै छलहुँ आबथि हमर करेजमे मुदा इ किस्मते रूसल केकरा बजाउ **** वर्ण---------15******* 23 गजल सुख जिनगीक गजल दर्द जिनगीक रहए ठाढ़ अविचल गजल मर्द जिनगीक अँहा हिमालयक भाए छी वा कैलाशक जन्मल बनि गेल आगिक गोला गजल सर्द जिनगीक देखएमे तँ हेतैक लाजोके लाज तेहने सन देखाएत अंग-अंग गजल बेपर्द जिनगीक अनचिन्हार साकी दए रहल गजलक हाला बनल छैक दबाइ गजल बेदर्द जिनगीक इ तँ साफ करबे करत कोने-कोनमे जा कए देखू कोना पसरल छै गजल गर्द जिनगीक **** वर्ण---------18******* 24 किछु दूर चलब हमहूँ जँ संग दए सकी रंगि देब हम तँ रंगमे जँ रंग दए सकी अन्हारोमे चलब हम बिनु ठोकर खएने हमरा चलबाक जँ कनिको ढ़ंग दए सकी कहबै जँ चार पर तँ चढ़बै पहाड़ पर किच्छो ने असंभव जँ कने उमंग दए सकी हेताह कोने-कोन मे नुकाएल कतेको राम मरत इ रावण जँ धनुष-भंग दए सकी हमहूँ रहि सकै छी सभसँ दूर सदिखन जँ अपने जकाँ भावना अपंग दए सकी **** वर्ण---------17******* 25 हँसैत जिनगी कना बैसल छी मोनमे केकरो बसा बैसल छी नहि होइक अन्हार कोबरमे तँ तँए करेज जरा बैसल छी उराहल पानिसँ कब्ज होइए गंगो-जलके सड़ा बैसल छी भेटबे टा करत केओ ने केओ उम्मीदे पर तँ जिया बैसल छी करोटक तँ परिवर्तन नाम जखन की आत्मे सुता बैसल छी **** वर्ण---------12******* 26 अपन आँखिमे बसा लिअ हमरा अपन श्वासमे नुका लिअ हमरा जहाँ मरितो जीबाक आस रहए ओहने ठाम तँ बजा लिअ हमरा हाथ सटेलासँ मोन केना भरतै अहाँ करेजसँ सटा लिअ हमरा भरि जिनगी बौआइते रहलहुँ अपने संग तँ बैसा लिअ हमरा जाइ छी मुदा जेबाक मोन नै अछि कोनो सप्पतसँ घुरा लिअ हमरा **** वर्ण---------13******* 27 इजोतक दर्द अन्हारसँ पुछिऔ धारक दर्द तँ किनारसँ पुछिऔ नहि काटल गेल हएब जड़िसँ काठक दर्द तँ कमारसँ पुछिऔ समदाउनो तँ निर्गुने बुझाएल कञिआक दर्द कहारसँ पुछिऔ खेतक हरिअरी तँ नीक लगैए इ अनाजक दर्द धारसँ पुछिऔ करबै की हाथ आ गरा मिला कए इ दर्द तँ अनचिन्हारसँ पुछिऔ **** वर्ण---------13******* 28 (क) केकनैए हमरा लेल केहँसैए हमरा लेल सपनामे एबै आस नै केसुतैए हमरा लेल जँ हम चलिए जाएब केरहैए हमरा लेल छोड़ि दिअ सुतले अहाँ केउठैए हमरा लेल अनचिन्हार नाम-गाम केअबैए हमरा लेल **** वर्ण---------9******* (ख) केकनैत अछि एहिठाम हमरा लेल केहँसैत अछि एहिठाम हमरा लेल हुनकर सपनामे एबै विश्वास नहि केसुतैत अछि एहिठाम हमरा लेल उठनाइ खराप नहि मुदा अहूँ सोचू केसुतैत अछि एहिठाम हमरा लेल बसातक संग आबि गेल मनुख-गर्दा केउड़ैत अछि एहिठाम हमरा लेल अनचिन्हार नाम गामो तँ अनचिन्हार केअबैत अछि एहिठाम हमरा लेल **** वर्ण---------15******* 29 हमरा मोनमे बैसल मात्र अदना साँप इ बाहर सह-सह करैत पदना साँप लगबैत रहलहुँ भएट आ सूचना तंत्र देखू बढ़ैत रहल महँगी-विपदा साँप इ बिकनीक डिजाइन छैक की सुन्दरीक देखिऔ छातीमे लेपटाएल तगमा साँप हम तँ मनुसँ जन्मल रही की आदमसँ बाजत किएक इ सेकुलर-भगवा साँप बुझाएत नै रहत पातेमे मिझराएल सुनू एनाहिते तँ डसैत छै सुगबा साँप अनचिन्हार रहत वा चिन्हार की करबै समय पर सभ बनै अजगरबा साँप **** वर्ण---------16******* 30 एहने अहाँक प्रेम छल पछाति जानल हम खाली मूहँक तँ छेमछल पछाति जानल हम आगि लागल छै घर मे चिन्ताक गप्प नहि कोनो कारण अपने टेम छल पछाति जानल हम सड़ैत देखलिऐक किच्छोके कादो मे सदिखन अपने घरक हेम छल पछाति जानल हम कोंढ़ीके सुँघलकै आ बजरखसुआ चलि गेलै दाइ ओ नकली भेम छल पछाति जानल हम कानून तँ बनै छै आ टूटै छै बेर-बेर देशमे लोके लेल नेम-टेम छल पछाति जानल हम **** वर्ण---------18******* 31 माटि-पानि-बसात लेल युद्ध देखू छोटको बात लेल युद्ध आदर्श बनाम आदर्शवादी बुद्ध-गाँधीक गात लेल युद्ध जर-जमीन-जोरु एतबा नै देखू फेकल पात लेल युद्ध नून नै चटबए पड़तै बेटीके आब तँ गर्भपात लेल युद्ध तकनीकी जुगक इ व्यवस्था साँझ होइते प्रात लेल युद्ध **** वर्ण---------11******* 32 पतालमे जा अकास नपैत छी डिबिआ मिझा प्रकाश तकैत छी कागतमे लिखल कागती प्लान घोटालासँ विकास करबैत छी पानि सड़ि गन्हाइते रहलैक आरिए बान्हि पानि बहबैत छी बुड़िबक देवी कुरथी अक्षत हम एहने विकास करैत छी चिन्हार नहि अनचिन्हारे नीक तँए तँ परिचय नुकबैत छी **** वर्ण---------12******* 33 गुंगुआइत बसात चुप्प रहू पदुराइत बसात चुप्प रहू चारु दिस तँ पसरि गेल धुँआ हे पझाइत बसात चुप्प रहू अहाँक कुंठा जड़ि जमेने अछि किकिआइत बसात चुप्प रहू अहूँ पर हँसत केओ-कहिओ ठिठिआइत बसात चुप्प रहू जे भेटत अनचिन्हारे भेटत चिचिआइत बसात चुप्प रहू **** वर्ण---------12******* 34 अहूँ तँ पड़ाएल छलहुँ हमहूँ तँ पड़ाएल छलहुँ अहूँ घबराएल छलहुँ हमहूँ घबराएल छलहुँ शायद एहने भेंट लिखल छल कपारमे सदिखन अहूँ तँ लजाएल छलहुँ हमहूँ तँ लजाएल छलहुँ रुकलाहा जिनगीक लेल सौरी बेर-बेर सौरी सजनी अहूँ उबिआएल छलहुँ हमहूँ उबिआएल छलहुँ शेर तँ चल गेल आब ताल देनहे की हएत कहिऔ अहूँ सुटिआएल छलहुँ हमहूँ सुटिआएल छलहुँ रहि गेलहुँ अनचिन्हार करेज सटेलाक पछातिओ अहूँ अगुताएल छलहुँ हमहूँ अगुताएल छलहुँ **** वर्ण---------21******* 35 प्रकृति जँ दुश्मन बनए तँ ओकरा रोकब कठिन काँटी जँ छाती पर रहए तँ ओकरा ठोकब कठिन लक्ष्य जँ नहि रहत आँखिक सीमान पर सदिखन जोर लगेलाक पछातिओ ओकरा लोकब कठिन संसारमे पापक घैलके एहने गति छै से मानै छी जँ नै रहबै सत्यक संग तँ ओकरा फोड़ब कठिन आब जँ अहाँ चाही तँ एकरा कोनो नाम दए सकै छी केकरो करेज सँ निकलल गप्पके तोड़ब कठिन बौआइत रहू मसाने गाछिए-बिरछिए सदिखन जँ अहाँ नहि बनब भूत तँ ओकरा टोकब कठिन **** वर्ण---------20******* 36 बनतै कतेक बहन्ना देखबाक चाही ओ बनतै कतेक सन्ना देखबाक चाही आब तँ भेल नूनो-सोहारी पर आफद सुनू फटकी कतेक चन्ना देखबाक चाही थपड़ी तँ अदौसँ बजिते आएल अछि लुटतैके कतेक टन्ना देखबाक चाही घरक बोझ छिड़िआ रहल सदिखन कोम्हर हेड़ा गेल जुन्ना देखबाक चाही खेतोके पता नहि की भए गेलैक अछि खादोक बाद मरहन्ना देखबाक चाही **** वर्ण---------15******* 37 बटोही केहन छैक बाट पर चलि कए देखिऔक पिआसलक पिआस घाट पर चलि कए देखिऔक घर मे घोंघाउज केने कोनो लाभ नहि भेटत आब सस्ती-महँग केहन हाट पर चलि कए देखिऔक कमजोर वस्तुक मर्म ओना नहि बुझाएत अहाँके कने दिबाड़ लागल टाट पर चलि कए देखिऔक बुझिए जेबै कुसिआर आ सिठ्ठी केर संबंध अहाँ तँ कनेक कोल्हुआरक राट पर चलि कए देखिऔक नै रहत कनियों मोल अहाँक गुण केर दुनियाँमे अहाँ बिनु पैकिंग के हाट पर चलि कए देखिऔक **** वर्ण---------20******* 38 एक बेर फेर हँसिऔ कनेक ओही नजरिसँ देखिऔ कनेक बाजब प्रेम लेल जरुरी नहि आँखि झुका चुप्प रहिऔ कनेक हम आबि गेलहुँ अहींक लेल हमरो लेल तँ चलिऔ कनेक प्रेमक भाषा अहींके अछि पता आब हमरो बुझबिऔ कनेक नहि रहत केओ अनचिन्हार हाथ बढ़ा कए देखिऔ कनेक **** वर्ण---------12******* 39 अपनेसँ आगि लगबैत छी मिझबैत छी अपनेसँ पीबि खसैत छी आ सम्हरैत छी आँखिमे भरल छै नोरक धन लकथक अपनेसँ जमा करैत छी आ लुटबैत छी शांत इजोरिआमे अशांत करेज हमर अपनेसँ हकार दैत छी आ नोंत पुरैत छी टूटल करेजके तँ आरो टुटबाक इच्छा अपने करेज तोड़ैत छी आ कुहरैत छी केबूझत हमर दुख आ दर्द एहिठाम चिन्हार रहितहुँ अनचिन्हार रहैत छी **** वर्ण---------16******* 40 पिपरक पात जँका तँ डोलैत लोक सिम्मरिक रुइ जँका तँ उड़ैत लोक देखू सृष्टि तँ बनि गेल भुतहा गाछ भोर-साँझ ओझाके सहैत लोक नोर तँ मानल गेल गंगा-जल जँका देखू नोरेसँ जिनगी धोबैत लोक सीसा तँ मासे-मास टूटै लोहा बर्खमे मुदा खने-खन भेटत टूटैत लोक देव-दानवक डर तँ मानलो जाए अपने डरें छुल-छुल मुतैत लोक **** वर्ण---------14******* 41 देखिऔ तँ केना भेलैक गाछके कात भेने चिड़ैआ बाजब छोड़ि देलक परात भेने अहाँक दरस-परस बड्ड महँग अछि सटि जैतहुँ अहाँक देह मे बसात भेने आशो राखी तँ कनेक नीके जकाँ राखी भाइ दालिए आ तीमन ने बचै छैक भात भेने सभँहक घरमे एकटा अगत्ती जन्मए सरकारक निन्न टुटै छै खुरफात भेने लागि गेलै भरना सभँहक भाग-सोहाग आब की हेतै आगि लग सप्पत-सात भेने **** वर्ण---------16******* 42 भोज ने भात हर-हर गीत की करु आब लागल भूख कहू मीत की करु जिनगी अजगुत आदमी तँ विचित्र केखनो घृणा तँ केखनो प्रीत की करु प्रेम बदलि रहल समयोंसँ बेसी केखनो आगि तँ केखनो सीत की करु मनुख के पहिचानब बड्ड कठिन केखनो बिग्घा केखनो बीत की करु मिलेलहुँ गरासँ गरा तैऔ हमरा भेटल दुश्मन नै मनमीत की करु **** वर्ण---------14******* 43 एकटा चान हमरा लग रातिमे अबैए देखू वएह कागत पर पाँतिमे अबैए जीबाक लेल जी सकै छी अहाँक बिनु मुदा देखू नोर बेर-बेर आँखिमे अबैए आँखिसँ बेसी सपना नहि देखबाक चाही फुनगीक आसमे बैसल माटिमे अबैए पिजाएल लाठी किएक केकरा लेल कहू अपने खु्ट्टाक बड़द जजातिमे अबैए किएक कोनो नारिकेँ कहबै हड़ाशंखिनी अपने लोकक गनती हड़ाहिमे अबैए **** वर्ण---------16******* 44 गीतक आखर-आखर धारके मोन छैक रीतक आखर-आखर धारके मोन छैक लोक अपनेसँ विश्वासघात करैए मात्र प्रीतक आखर-आखर धारके मोन छैक हारि गेलासँ लाभे-लाभ हेबाक अवसर जीतक आखर-आखर धारके मोन छैक नहि देखबिऔक डर आगिक धाह केर सीतक आखर-आखर धारके मोन छैक कट्ठा-बिग्घाक उपजा लोक तँ नहि बूझत बीतक आखर-आखर धारके मोन छैक **** वर्ण---------16******* 45 लोहछल मोनक खुरफात थिक संबंध असली हाथीक नकली दाँत थिक संबंध कोना बचतै आयोगक गठन करू अहाँ काटल गाछक नवका पात थिक संबंध केकरोसँ दोस्ती तोड़ब ओतेक सहज नै करेजमे तँ अंगदक लात थिक सबंध हटा लिअ अपन मुँहसँ मास्क तुरंत इ शुद्ध प्राणरक्षक बसात थिक सबंध बिनु बजने बैसल रहू आ तमाशा देखू बैसल बुढ़िआक शह-मात थिक सबंध **** वर्ण---------16******* 46 साओन-भादवमे तँ सुखा गेल धार एक ठोप पानि लेल बिका गेल धार पानिसँ बाढ़ि छै की बाढ़िसँ पानि देखू अपने पानिसँ दहा गेल धार कोना बचतै पिआसल ठोर आ कंठ घैलके तँ देखि कए नुका गेल धार गप्प तँ चललै बिजली आ बान्ह पर देखू सुनिते-सुनैत डेरा गेल धार कछेर पर तँ होइ छलै रसलिल्ला देखू तँ अनचोकेमे जुआ गेल धार **** वर्ण---------14******* 47 पूछए लागल पात नुका कए रातिमे बूझए लागल पात नुका कए रातिमे हम तँ बेशर्मीक हद टपि गेलहुँ हूथए लागल पात नुका कए रातिमे नै छै पाइ जे कराओत इलाज दर्दक कूथए लागल पात नुका कए रातिमे सुआद तँ लगलैक खाली शोणित केर चुसए लागल पात नुका कए रातिमे अनचिन्हार स्पर्शक रहस्य बुझलहुँ छूबए लागल पात नुका कए रातिमे **** वर्ण---------15******* 48 इजोत लेल अन्हेर नगरी जाइत लोक सपनेमे तँ सपनाक भात खाइत लोक खेत तँ आब पटाओल जाइछ शोणितसँ पानि महँक तेले जकाँ तँ छताइत लोक जकरा जतेक भेटैक सएह बड़ अगत्ती खएलाक पछातिओ तँ गुंगुआइत लोक छोड़लकै डनिञाँ तेहन ने अगिनबान मोनेमे पजरि मोनेमे पझाइत लोक बसातक कमी तँ छैक गामोक बगैचामे आक्सीजनेक बोतलमे तँ औनाइत लोक **** वर्ण---------16******* 49 सभहँक ठोर पर बस अहिंक नाम आब तँ चारु पहर बस अहिंक नाम इ संसार तँ मरैए अहाँक रुपे देखि सुन्दरताक जहर बस अहिंक नाम आब तँ किछु नहि बचल हमरा लग तँए सगरो उमर बस अहिंक नाम देखू मोनक उत्फाल करेजक बिहाड़ि आब आँखिक भमर बस अहिंक नाम नीके तँ लगैए इ दुखक गाम हमरा आब सुखक नगर बस अहिंक नाम **** वर्ण---------15******* 50 अपने रुकि गेलहुँ अनका रोकबाक चक्करमे अपने टुटि गेलहुँ अनका तोड़बाक चक्करमे एकरा हम नसीब कहू की दूनू गोटाकमिलान अपने फुटि गेलहुँ अनका फोड़बाक चक्करमे करेजक एहन उत्फाल नै बुझल छल हमरा अपने जुड़ि गेलहुँ अनका जोड़बाक चक्करमे एतेक गहींर हेतैक खाधि खत्ता थाह नहि छल अपने लुटि गेलहुँ अनका लोढ़बाक चक्करमे शिखर पर पहुँचिते लोक बनैए अनचिन्हार अपने छुटि गेलहुँ अनका छोड़बाक चक्करमे **** वर्ण---------19******* 51 हम कीनल खुशी पर नाचू कतेक हम लोहाक कंठसँ बाजू कतेक रहस्य बेपारक बुझबै नहुँ-नहुँ कमजोर हाथमे तँ तराजू कतेक आधुनिको नै उत्तर-आधुनिक जुग भावनाकेँ बेचैत लोक चालू कतेक ने माए ने बाप ने तँ भाए ने बहीनि इ सार-सरहोजि-सारि-साढ़ू कतेक मनुख तँ बनि जाइए अनचिन्हार इ जानबरक रूप चिन्हाबू कतेक **** वर्ण---------14******* 52 कथा जखन बिआहक लागल हेतैक गरीबक बेटी तँ बड्ड कानल हेतैक गोली लागल देह भेटत दसो दिशामे कुशलक खोंइछ तँ कतौ बान्हल हेतैक डेगे-डेग निद्रा देवीक प्रचार-प्रसार आब केना कहू जे केओ जागल हेतैक सड़ि गेलै एहि पोखरिक सुन्दर पानि जुग-जुगान्तरसँ नहि उड़ाहल हेतैक विश्वास करु समान कम नहि भेटत देखिऔ बाटेमे बाट भजारल हेतैक **** वर्ण---------15******* 53 कोनो सोहके केखनो नहि बिसारि राखब मोनक गाछ केखनो नहि झखारि राखब अबिते हएत मारिते रास कनैत आँखि अहाँ थोड़ेक हँसी संगमे सम्हारि राखब बहिते-बहैत बन्हा जाएब अहाँ बान्हसँ संगमे हरदम कनिकबो जुआरि राखब अबैत रहलाह नव-नव बिक्रमादित्य कन्हासँ कहिआ इ बैताल उतारि राखब नै कानू अबिते हएत रिलीफ लेने नेता घर-दुआरि बना आँगन बहारि राखब **** वर्ण---------16******* 54 बेमार छी मुदा बेमार नहि लगैत छी दबाइ खाइ से कहिओ नहि चाहैत छी हमरा अँहा नीक लगै छी सभ दिनसँ मुदा प्रेम अछि से कहि नहि पबैत छी विसर्जन बला मुरती छी हम धारमे भसा देल गेलहुँ मुदा नहि डुबैत छी सभ दिन हमरा लेल मधुश्रावनिए टेमी दगेलाक बादो नहि कुहरैत छी एकरा तँ प्रेम कहिऔ की स्वार्थ कहिऔ आब तँ हुनके इसारा पर चलैत छी **** वर्ण---------15******* 55 बाट टूटैत रहलैक हर समय लक्ष्य छूटैत रहलैक हर समय भाइ बाढ़ि-भूकंप आबै की नै आबै बान्ह टूटैत रहलैक हर समय समय सतयुग होइ की कलयुग ओ तँ लुटैत रहलैक हर समय भाइ धर्मक युद्ध होइ की अधर्मक सेना कटैत रहलैक हर समय बेसी तेज दौगने नै भेटत पदक ओ तँ खसैत रहलैक हर समय **** वर्ण---------14******* 56 बाउ किछु विरोधाभास तँ विचित्रे बुझाइत छैक देखू पेटक आगि तँ पानिसँ नहि मिझाइत छैक राम नाम तँ सत्त थिक मुदा श्मसाने धरि किएक लोक रामसँ बेसी रावणें लेल घुरिआइत छैक बम-गोली चलए लगलैक एना भए कए आब देखू फटक्को छुटला पर लोक चकुआइत छैक आब लोक छल-छद्म करए लगलै खुल्लमखुल्ला शांति-महल पर युद्ध पताका फहराइत छैक जले जिनगी थिक भेटत हरेक पोथीमे लिखल बाढ़िमे तँए चारु दिस जिनगीए देखाइत छैक **** वर्ण---------19******* 57 जँ देशमे आरो अन्ना हेतै तँ इ भ्रष्टाचार सुन्ना हेतै या तँ पुलिस या सरकार दुन्नू दलालक मुन्ना हेतै सत्य तँ निकलबे करतै बान्हल कतबो जुन्ना हेतै लिखेतै इतिहास खूनसँ गजल हमर पन्ना हेतै जे बदलतै अधलाहकेँ ओ अकासमे चन्ना हेतै **** वर्ण---------10******* सोलह अगस्त 2011सँ महात्मा गाँधीक दोसर रूप अन्ना हजारे द्वारा कएल गेल भ्रष्टाचार विरोधी अनशनकेँ समर्थनमे लिखल गेल। 58 हमर मोन नहि भरैए मिलनक बेरमे इ तँ अनचिन्हार बुझैए मिलनक बेरमे जेहने विरह हो तेहने सिनेह सदिखन अनचिन्हार मोन पड़ैए मिलनक बेरमे इ जे देखै छी हमर देहक भाषा- अभिलाषा आब अनचिन्हार कहैए मिलनक बेरमे आब भगवानो जनैत छथिन्ह मोनक बात देखू अनचिन्हार अबैए मिलनक बेरमे हुनक रीत हुनकर प्रीत हुनकर गीत आब अनचिन्हार लगैए मिलनक बेरमे **** वर्ण---------19******* 59 अहाँ गप्प हमरा संग एहिना करैत रहू आ एहिना मोन हमर अहाँ जुड़बैत रहू ने तँ मोन भरतै ने करेज भरतै केकरो हम अँहाके छूब अहाँ हमरा छूबैत रहू चलू दोस्त नहि दुश्मने बनि जाउ हमर आ करेजसँ करेज भिरा अहाँ लड़ैत रहू बरसतै अमरित केर बरखा करेजमे बस खाली अहाँ कनडेरिए तँ देखैत रहू अनचिन्हार लिखत प्रेमक पाँति गजलमे करेज पर हाथ राखि एकरा पढ़ैत रहू **** वर्ण---------17******* 60 सोना भेटत सस्ता महँग चाउर देखब एक दिन लोक एहिना तँ लूटत हबाउर देखब एक दिन देशमे लोकसभा-विधानसभा बनि गेल शोकसभा भूखल जनता तँ देतै धमाउर देखब एक दिन हुनकर धोधिए देखि तँ मेटा गेल आब भूख हमर अहूँ तँ एहिना करब चराउर देखब एक दिन एकौ बेर देखि लेत हमरा अहाँके संग मे सजनी तँ लोक जरत आ बनत छाउर देखब एक दिन नोरक खिच्चरि दर्दक तिलबा आ कष्टक चुड़लाइ एहिना अनचिन्हारक जड़ाउर देखब एक दिन **** वर्ण---------20******* 61 आब दर्दक गीत गबैए अनचिन्हार टूटल करेजके जोड़ैए अनचिन्हार नै होइए भेंट-घाँट हुनकासँ केखनो सपनेमे तँ देह छूबैए अनचिन्हार जखने सटलै ठोरसँ ठोर तखनेसँ प्रेम संसारमे घुमैए अनचिन्हार जहिआसँ हुनका देखलक अझक्केमे सपनेमे करोट फेरैए अनचिन्हार जते मँहगाइ छै तते आमदनी नहि दलाल लग बेटा बेचैए अनचिन्हार **** वर्ण---------15******* 62 भाइ छोट्टे सन डिबिआ बारि दिऔ अहाँ अन्हारक जड़ि उखाड़ि दिऔ जँ काज नहि हुअए सोंझ ढ़गे तँ सौंसे भाभट अपन पसारि दिऔ भुतिआ गेलै मनुखताइ मोनसँ कुशलक खढ़ी कने उचारि दिऔ अनचिन्हारक मोन भीजल काठ कने प्रेमक आगि तँ पजारि दिऔ नीक काजके जे रोकत संसारमे कने डाँड़ ओकर तँ ससारि दिऔ **** वर्ण---------13******* 63 जादू-मंतर मारि देलकै ओ जाइत-जाइत मोन केकरो हरि लेलकै ओ जाइत-जाइत जकरा अबिते भोर आबि गेलै ठोर पर आँखिमे साँझ आनि देलकै ओ जाइत-जाइत हाथ थरथराइत छलैक फूलों तोड़बासँ कोमल मोन तोड़ि देलकै ओ जाइत-जाइत उखरल छलैक सुलबाइ मुदा तैओ देखू आँकर-लोहा पचा लेलकै ओ जाइत-जाइत अनचिन्हारक ठोर सटलै अनचिन्हारसँ मुदा मुँह तँ घुमा लेलकै ओ जाइत-जाइत **** वर्ण---------17******* 65 ने केकरो हीत ने तँ मुद्दैआ छी हम अपने विरुद्धक लड़बैआ छी हम हमर टूटल पाँखि देखि हँसू नहि फाटल अकासक तँ चिड़ैआ छी हम आरि लेल मारि करब नीको-बेजाओ प्रेम-घृणाक तँ नीक गबैआ छी हम इ जरुरी नहि जे जश भेटबे करत नोंत देनिहार तँ घरबैआ छी हम सम्मानक हमर नै तँ केकर हेतैक ने सेर ने सवा-सेर अढ़ैआ छी हम **** वर्ण---------14******* 65 शब्दक बरखासँ जरैत छी किएक प्रेमक चरचासँ डरैत छी किएक हमर गजल कोनो लाल रंग नहि एना साँढ़ जकाँ भरतैक छी किएक हम अँहाक दुश्मन छी सभदिनुका एहन फूसि अहाँ बजैत छी किएक कहू ने जे इ थन महँक दूध चाही इ पड़रु जकाँ चुकरैत छी किएक बिना कनने ओहो नै दूध पिआएत तखन चुपचाप रहैत छी किएक **** वर्ण---------14******* 66 कोम्हरसँ अएलै एहन फसादी रे जान रे जान की लगलै बड़का पसाही रे जान ओ जे मोटेलै बलू से कोना मोटेलै रे जान खेने हेतै सभटा धन सरकारी रे जान ओ तँ काजो करैए उपरसँ लातो खाइए होइए एहने बुड़िबक बिहारी रे जान पघिलैए जे लोहे जकाँ जमैए मोमे जकाँ रे जान की कहबै ओहए सुतारी रे जान हेतै कोना समाधान हड़तालेसँ रे जान रे जान की तोड़बै कोना इ दिहाड़ी रे जान **** वर्ण---------16******* 67 जहाँ देखलहुँ घर तहीँ धड़ खसा लेलहुँ अँसगरेंमे तँ अपन जिनगी बसा लेलहुँ लोक तँ फेकैत रहल पाथर पर पाथर तकरे बीझि-बीझि एकटा घर बना लेलहुँ झोल लागल देबाल पर टाँगल छै उदासी अँहाक हँसी टाँगि हम ओकरा सजा लेलहुँ मोनमे भूर छातीमे धाह मुदा देह साबुत अपन भावनाके दरबारमे नचा लेलहुँ देखू संसार तँ छोड़ि देलक हमरा कातेमे हम अपन देहके अपनेसँ भसा लेलहुँ . **** वर्ण---------17******* 68 इ गप्प जखन जड़िआ जाइत छैक मोन तँ अनेरे भरिआ जाइत छैक कण-कण जुड़ल पाथर बनि गेल भिन्न भेने उड़िआ जाइत छैक कतबो कटतै मोनक जड़ि केओ अहाँक सोहसँ हरिआ जाइत छैक अपनोके अनचिन्हार बना देलासँ अनठीओ आबि गरिआ जाइत छैक लोक जखन अबैए आमने-सामने तखने तँ बात फरिआ जाइत छैक **** वर्ण---------14******* 69 आरे तिरपित पारे तिरपित कनही कूकूर माँड़े तिरपित बैसि रहल इ सरकार चुना देशक जनता ठाढ़े तिरपित मनबैए मधुमास धनिकबा हमर भाग अखाढ़े तिरपित देखू उठौना लागल दूनू साँझ इ बाछी मुदा लथारे तिरपित कतबो झपबै नँगटिनियाँके निर्लज्जी मुदा उघाड़े तिरपित **** वर्ण---------12******* 70 अंगूर खट्टा लताम थुर्री जामुन लाल इ गाछो तँ मचा रहल बड़का बबाल अखबारी विकास आ इ जनता उदास आब तँ इ बहिरा नाचए अपने ताल देखू पाँच बरख पर सुरुज उगैए रहैए बाँकी समय तँ बदरी-बिकाल एतए लागल हाट अछि गमला केर आब तँ एतए फूल तकैए कादो-थाल देखू अनचिन्हार तँ अनचिन्हारे अछि आब चिन्हारो बनल अछि बड़का काल **** वर्ण---------15******* 71 इ तबीयत ठीक रहत जँ इ रैयत ठीक रहत खल-खल हँसती धरती जँ इ नीयत ठीक रहत हेतैक नीक देशक जँ इ जेठरैयत ठीक रहत बेकूफ बेटा टके काबिल जँ इ किस्मत ठीक रहत हेबे करतैक समाधान जँ सिकायत ठीक रहत **** वर्ण---------10******* 72 चीजे जखन बेकार छैक कमार की करतै एतए लोहार की करतै सोनार की करतै लोक जखन फँसि जाइए अपनहि जालमे तखन छिपार की करतै देखार की करतै बाउ जतए धन के घाँटी बजैत हो ओतए इ लचार की करतै आ इ पिआर की करतै खेत तँ छैक मुदा खेतिहर नहि एहिठाम आब तँ इ बाढ़ि की करतै सुखाड़ की करतै जखन बढ़ि जाए टीस तँ आशीष लग आउ इ चिन्हार की करतै अनचिन्हार की करतै **** वर्ण---------17******* 73 शराबके खराप नहि मानू सदिखन एकरा कञियें जकाँ तँ जानू सदिखन भाइ बेसी पीब तँ मोन भरि जाएत मीत अहाँ थोड़बे-थोड़ आनू सदिखन स्वर्गक सुख भेटतै जँ देखबै एम्हरो आरती छोड़ि लबनी दफानू सदिखन इ दुखक पहाड़ तँ बड़की टा हौ भाइ संगमे तँ बोतल राखि फानू सदिखन भरल छैक निशा हुनकर जौबनमे पिबै छी कनियें मुदा बेकाबू सदिखन **** वर्ण---------15******* 74 रचना कतेक टका लगतै सपना किनबाक लेल कहू जूटल घर सरदर अँगना किनबाक लेल हम तँ मुक्त छी इ लिखनाइ-पढ़नाइ-बुझनाइसँ रचना कतेक टका लगतै रचना किनबाक लेल सत्त मानू हम काज करै छी लोकतंत्रक पद्धतिए रचना कतेक टका लगतै पटना किनबाक लेल हमरा देशमे पत्रकारिता गुलाम छै टी.आर.पीक रचना कतेक टका लगतै घटना किनबाक लेल देखू आब तँ भगवानो पड़ल छथि भक्तक फेरमे रचना कतेक टका लगतै विधना किनबाक लेल **** वर्ण---------20******* 75 कहिओ सम कहिओ विषम कहिओ बेसी तँ कहिओ कम होइत रहलै अकाल मृत्यु कहिओ गोली तँ कहिओ बम खेलाइत रहलै देह पर कहिओ देवी तँ कहिओ जम निकलि रहल हरेक दिन कहिओ टका तँ कहिओ दम ठकि रहल अनचिन्हारके कहिओ अहाँ तँ कहिओ हम **** वर्ण---------11******* 76 देश चुल्हामे गेल संसदमे हल्ला मचि रहल कानून की भेल संसदमे हल्ला मचि रहल अकाल, बाढ़ि, भूकंप इ सभ आबि चल गलैक नेताक भत्ता लेल संसदमे हल्ला मचि रहल घोटाला पर घोटाला बैसल कमीशन जाँचक कमीशनक लेल संसदमे हल्ला मचि रहल टूटि गेलै सपना आ मेटा गेलै आजादीक अर्थ इ दलालक खेल संसदमे हल्ला मचि रहल एकैटा लाश तँ भेटल बाट पर अनचिन्हार ओकर जाति लेल संसदमे हल्ला मचि रहल **** वर्ण---------18******* सोलह अगस्त 2011सँ महात्मा गाँधीक दोसर रूप अन्ना हजारे द्वारा कएल गेल भ्रष्टाचार विरोधी अनशनकेँ समर्थनमे लिखल गेल। 77 यथा एन्नी तथा ओन्नी एन्नी-ओन्नी तथैव च यथा माए तथा बाप मुन्ना-मुन्नी तथैव च हमर करेज जरैए अहाँ गीत लिखै छी यथा ओ तथा अच्छर पन्ना-पन्नी तथैव च देखहक इ बोंगहक पोता कोना करै हइ यथा मुल्ला तथा हम सुन्ना-सुन्नी तथैव च देवतो तँ जड़ि पकड़ै हइ बचले रहू यथा मौगी तथा भूत ओझा-गुन्नी तथैव च बान्हि भँइ दूरा पर लेबै ढ़ौआ पर ढ़ौआ यथा हम तथा तों, आ बन्ना-बन्नी तथैव च बचिअह अनचिन्हार भाइ एहि गाममे यथा साँप तथा ओ जहर चिन्नी तथैव च **** वर्ण---------16******* 78 जँ सटतै ठोर अनचिन्हारसँ तँ बुझिऔ होली छैक सदिखन बाजए केओ प्यारसँ तँ बुझिऔ होली छैक बेसी टोइया-टापर देब नीक नै भाइ सदिखन अहाँ निकलि जाएब अन्हारसँ तँ बुझिऔ होली छैक देखू केहन-केहन गर्मी मगजमे रहै छैक बंधु मनुख जँ बचि जाए गुमारसँ तँ बुझिऔ होली छैक जहाँ कनही गाएक भिन्ने बथान तहाँ सुन्न-मसान काज होइ सभहँक विचारसँ तँ बुझिऔ होली छैक की दुख होइ छै चतुर्थीक राति मे नहि बुझि सकबै सुनू जँ हँसी आबए कहार सँ तँ बुझिऔ होली छैक **** वर्ण---------20******* रुबाइ 1 हिम्मति रखने काज सदा बनि जाएत देह तँ जरत नाम मुदा रहि जाएत इ जे देखा रहल समस्या केर पहाड़ ठानि लेब तँ रुइ जकाँ उड़ि जाएत 2 भेटत खुशी केकरो देखलाक बाद केकरो ठोरसँ नाम सुनलाक बाद कहबामे लागत बरु एकै-दू छन मजा भेटत आइ लव यू कहलाक बाद 3 अपन बाँहिमे अहाँके गछारि लेब हम नजरिसँ करेजमे उतारि लेब हम एक बेर हँ तँ कहि कए देखिऔ सगरो बाट पर आँचर पसारि देब हम 4 ठोरसँ ठोर सटतै तँ गीत जनमत आँखिसँ आँखि मिलतै तँ प्रीत जनमत दुश्मनीमे जिनगी केखनो नहि बिताउ हाथमे हाथ देबै तँ मीत जनमत 5 इ जे अहाँक मूँह अछि गुलाब सन आ आँखि जे लगैए शराब सन सगरो दुनियाँ बताह भेल देखि कए मोन हमरो लगैए बताह सन 6 हमरा जीवन मे अहीं केर खगता अहाँ बिना पड़लै करेज हमर परता खेलाइत रहू अहाँ हमरा मोन मे बनू अहाँ देवी हम बनब भगता 7 हमरा ठोरक पिआस भेल छी अहाँ हमरा मोनक हुलास भेल छी अहाँ हम बिसरि ने पाएब अहाँ के कहिओ टूटल करेजक विश्वास भेल छी अहाँ 8 ओ मोन पड़ै छथि तँ निन्न ने अबैए देह होइए सुन्न नीको ने लगैए चाहै छी हम जे ओ हमरे लग रहथि ओ तँ ओ हुनक इयादो ने अबैए 9 हुनका सँ दूर करबा पर बिर्त लोक अकास मे भूर करबा पर बिर्त लोक हमही मरब हुनकर प्रेम मे या तँ अपटी खेत मे मरबा पर बिर्त लोक 10 एकटा हाथ बढ़लै हमरा दिस एकटा डेग उठलै हमरा दिस एतेक बड़का गप्प कोना कहू एकटा नजरि उठलै हमरा दिस 11 रूपक रौद सँ जौबन पघलि जाएत अहाँक श्वास सँ बसातो गमकि जाएत अहाँक चलब करबैए मारि सगरो ठमकब तँ मोन कने सम्हरि जाएत 12 जहिआ हमर पिआर के जानब अहाँ तहिआ ओकर तागति मानब अहाँ आइ भने बिता लेब राति सूति कए काल्हि सँ आँगुर पर दिन गानब अहाँ 13 सपना जखन केकरो टूटि जाइत छैक मोनक बात मोने मे रहि जाइत छैक विश्वास सँ बड़का धोखा कोनो ने टूटल करेज इ बात कहि जाइत छैक 14 हुनका देखने उमकैए मोन हमर संग मे रहने रभसैए मोन हमर ओ जखन अबै छथि हमरा सोझाँ मे सभटा झंझटि बिसरैए मोन हमर 15 माटि मे पानि मे आगि आ बसात मे दिन मे राति मे साँझ आ परात मे देखाइ छी अहीं खाली चारु दिस केहन तागति अछि अहाँक इयाद मे 16 कहब कतेक बात अहाँ सँ हम सजनी चलब कने दूर अहाँ संग हम सजनी जँ पकड़बै अपन हाथ सँ हाथ हमर जीबैत रहब बहुत दिन धरि हम सजनी 17 बहुत बात रहि गेल घोलफच्चका मे साँप-मगरमच्छ घूमि रहल चभच्चा मे अहिंसा होइए सभ सँ नीक बुझलहुँ राम-रज्यक कल्पना उठैए लुच्चा मे 18 देह मोन एकै मिलन के बेर मे रूप-रंग एकै मिलन के बेर मे अहाँ भने चल जाउ दूर हमरा सँ प्रेमक दर्द एकै मिलन के बेर मे 19 हुनका जँ देखितहुँ तरि जइतहुँ हम ओकरा पछाति बरु मरि जइतहुँ हम अहाँ केर आँखिक निशा एहन नीक जँ पीबितहुँ तँ सम्हरि जइतहुँ हम 20 हुनका अबिते मोन हमर हरिआ गेल आँखिक बात मोन मे फरिआ गेल ओ केलथि केहन जादू हमरा पर हुनक इयाद अबिते मोन भरिआ गेल 21 हुनका लेल रूप सजा लेबाक चाही आइ जबानी के लुटा देबाक चाही काज नहि इजोत के हमरा-हुनका लग इजोत लेल घोघ उठा लेबाक चाही 22 जँ खोट ने रहतै सरकारक नेत मे अनाज उपजबे करतै हमरो खेत मे पसारए ने पड़तै हाथ दोसर ठाम रहतै किछु कोठी आ किछु पेट मे 23 चाम जँ अहाँक चाम सँ भीरि जेतै बूझू मरलो मुरदा जीबि जेतै इ प्रेमक आगि बड्ड कड़गर आगि बूझू पाकलो बाँस लीबि जेतै 24 जखन हुनकर घोघ उठेलहुँ सच मानू आँखिक निशा सँ मतेलहुँ सच मानू हुनक रूप भमर जाल लगैए हमरा तैओ हुनके सँ नेह लगेलहुँ सच मानू 25 एहि पार हम ओहि पार अहाँ बैसल छी मुदा एक दोसराक करेज मे पैसल छी जहाँ धरि देखी अहीँ देखाइ छी हमरा देखू हमरो दिस एना अहाँ किएक रूसल छी 26 कते दिन जिबैत रहब उधार के जिन्दगी जिबैत रहू सदिखन पिआर के जिन्दगी ने काज आएत समय पर ई धन-बीत बिका जाएत पाइ-पाइ मे हजार के जिन्दगी 27 रूप देखा बताह बना देलक छौंड़ी सूतल मोन के जगा देलक छौंड़ी की कहू छल ओ केहन हरजाइ अचके मे हमरा कना देलक छौंड़ी 28 अपन करेज अपने सँ डाहि लेब हम प्रेमक महल अपने सँ ढ़ाहि लेब हम अहाँ जा सकै छी हमरा जिनगी सँ असगरे कत्तौ जिनगी काटि लेब हम 29 इ जे अहाँक मूँह अछि गुलाब सन आ आँखि लगैए अहाँक शराब सन सगरो दुनियाँ बताह भेल देखि कए मोन हमरो होइत रहैए खराब सन 30 नोर बनि आँखि मे आबि जाउ गीत बनि ठोर पर गाबि जाउ बढ़ि गेल दूरी संगो रहैत के कतेक दूर प्रेम सँ नापि जाउ 31 हुनका देखिते बजा गेल आइ लव यू मोन करेज पर लिखा गेल आइ लव यू आब एकरा प्रेम कहू की बतहपनी सुतली राति मे बजा गेल आइ लव यू 32 प्रेम मे खून सुखा नोर बनि जाएत हुनक ठोरक हँसी भोर बनि जाएत चिन्हार मरबे करत हुनका देखि-देखि अनचिन्हार जीबि चितचोर बनि जाएत कता 1 जकर अगैंठीमोड़ एतेक सुन्दर तकर देहक हिलकोर केहन हेतैक जकर आँखिक नोर एतेक सुन्दर तकर हँसी भरल ठोर केहन हेतैक 2 देखिते हुनका करेजक गाछ मजरि गेल प्रेम गमकए लागल पहिल गोपी जकाँ लगबिते चोभा गिनगी हमर सम्हरि गेल बनि गेलहुँ हम कृष्ण अहाँ गोपी जकाँ विदेह सदेह ३३ 1890 1891 विदेह सदेह ३३ विदेह सदेह:३३|| 1891 1890 || विदेह सदेह:३३

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