ISSN 2229-547X विदेह सदेह ३४ रचनात्मक गद्य-पद्य लेखन भाग-३ (विदेह www.videha.co.in/ पेटार अंक १-३५० सँ) विदेह-सदेह शृंखला- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ गद्य आ पद्यक एकटा समानान्तर संकलन विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथीक सर्वाधिकार सुरक्षित अछि। काॅपीराइट (©) धारकक लिखित अनुमतिक बिना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रतिएवं रिकॉडिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक अथवा यांत्रिक, कोनो माध्यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्पादित अथवा संचारित-प्रसारित नै कएल जा सकैत अछि। (c) २०००- अद्यतन। सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर) केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ "विदेह" पड़लै।इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA (c)२०००- अद्यतन। सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि। सम्पादक 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऐ ई-पत्रिकामे ई-प्रकाशित/ प्रथम प्रकाशित रचनाक प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ मूल आ अनूदित आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। (The Editor, Videha holds the right for print-web archive/ right to translate those archives and/ or e-publish/ print-publish the original/ translated archive). ऐ ई-पत्रिकामे कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। ISSN: 2229-547X मूल्य : भा. रू. ४,५००/- संस्करण: २०२२ Videha Sadeha 34: A Collection (Vol.III) of Creative Maithili Writings in Prose and Verse e-published in Videha e-journal issues 1-350 at www.videha.co.in). अनुक्रम गद्य-खण्ड (पृ. १-७०७) गजेन्द्र ठाकुर- बेचन ठाकुरक नाटक (पृ. २-६) डॉ. प्रेमशंकर सिंह- मणिपद्मक कथा–यात्रा, हास्यव्यंग्य सम्राट प्रोफेसर हरिमोहन झा, हरिमोहन झाक रचनाक परवर्त्ती रचनाकर्मीपर प्रभाव (पृ. ७-५८) मिथिलेश कुमार झा- समय—संकेत, “हम मैथिल” (मैथिली त्रैमासिक) पत्रिकाक लोकार्पण, “संपर्क”क मासिक बैसार (पृ. ५९-६२) हेमचन्द्र झा- अग्रसोची, गोनू झाक पंचैती, साढ़े तीनो लाख, एना किएक?, कुंठा, मास्टर साहेब नहि रहलाह (पृ. ६३-९१) उमेश मंडल- संस्कार गीत (पृ. ९२-१९२) जगदीश प्रसाद मंडल- संस्कार गीत/ लोक गीत नाद (पृ. १९३-२००) पन्ना झा- असामान्य के (पृ. २०१-२०९) शीतल झा- नेपालमे मघेशीकेँ समस्या आ सामाधान! (पृ. २१०-२२४) अतिश कुमार मिश्र- नेपालक राज्य पुनर्संरचना मे मिथिला आ मैथिली (पृ. २२५-२३०) रामभरोस कापडि भ्रमर- एहि बेर सातम् अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन काठमाण्डूमे हयत, जनकपुरमे मिथिला महोत्सवक आयोजनः नवअध्यायक शुभारंभ (पृ. २३१-२४३) श्यामसुन्दर शशि- जनकपुरके खवरि- रेल सेवा बन्द । नेपाल सरकार कानमे तेल तूर धऽ सूतल, शहीद धोषणामे सेहो ‘मूह देखि मुंगवा’ (पृ. २४४-२४९) राजदेव मण्डल- हमर टोल (उपन्यास) (पृ. २५०-३४२) सुजीत कुमार झा- लघुकथा- चिड़ै, लघुकथा- धधकैत आगिः फुटैत कनोजरि, हारैत हारैत नेपाल पत्रकार महासंघक केन्द्रीय अध्यक्ष, नेपालमे मिथिला राज्य की सम्भव छैक?, सपथमे मैथिली (पृ. ३४३-३७३) निमिष झा- मैथिलीक युगद्रष्टा (पृ. ३७४-३७८) आशीष चौधरी- २ टा बीहनि कथा (पृ. ३७९-३७९) नवेन्दु कुमार झा- पचास वर्षक भेल प्रादेशिक समाचार एकांश- १९९३ मे प्रारंभ भेल छल मैथिली मे समाचारक प्रसारण, सताक प्राप्ति बनल भाजपाक उद्देश्य (पृ. ३८०-३८८) सतीश चन्द्र झा- हमहूँ कहाँ बुझलियै (पृ. ३८९-३९३) अनमोल झा- रिलेशन, अधिकार, युगान्त, अधिकार, चेतना, भारतीय डाक, युद्ध, टेकनोलजी, कोर बैंकिंग, अन्हरजाली, सुरक्षित (पृ. ३९४-४०४) दुर्गानन्द मंडल- लघुकथा- डाक्टर कर्मवीर (पृ. ४०५-४१२) दयाकान्त- समीकरण, फार्मुला, तिरंगा (पृ. ४१३-४१६) अमरेन्द्र यादव- रिपोर्ट (पृ. ४१७-४२०) मनोज झा मुक्ति- देशक अवस्था आ जनताक प्रवृति, महोत्तरीक मालपोतमे कर्मचारी मालामाल के करत कारवाही ?, रिपोर्ताज, चाँद के टुकडा, इज्जतिक खातिर (पृ. ४२१-४५३) सुशांत झा- अहां कोना रहै छी भौजी.... (पृ. ४५४-४५८) कुसुम ठाकुर- प्रत्यावर्तन (पृ. ४५९-५७२) बेचन ठाकुर- बाप भेल पित्ती, अधिकार (पृ. ५७३-६६०) ऋषि वशिष्ठ- पूत कमाल (पृ. ६६१-६६९) देवांशु वत्स- बनभोज, बुल्लुक टॉफी, नताशा (पृ. ६७०-७०७) पद्य-खण्ड (पृ. ७०८-१४५५) सतीश चन्द्र झा- चुनाव, भाषा आ राजनीति, भूखल पेट, पाँच साल, सत्यक जीत, गरीबक स्वर्ग, नव वर्ष, भाषा आ राजनीति, मैथिल, कविता आ कनियाँ, पंखहीन कल्पना, बुधनी, सृजन, कन्यादान, चानक प्रेम, सिंगरहारक फूल, सोनाक पिजरा (पृ. ७०९-७५७) सुबोध कुमार ठाकुर- आशा, जुग बदलि गेल, सुन्न लागए गाम, अधूरा प्रेम आर चान, नेनाक प्रश्न, सनेश, हम नहि छी अभिशाप, जीवन यात्रा, अओताह मन भावन (पृ. ७५८-७८०) विनीत ठाकुर- जाढ़, नव वर्ष, अएनाके की मोल, गीत १-२, अभ्यागत, उठू मैथिल भेलै भोर (पृ. ७८१-७८७) निशाप्रभा झा- लोकगीत संकलन (पृ. ७८८-७९८) हिमांशु चौधरी- नियति, टप-टप नोर आ ज्वाला, आतङकक राजकुमार, पाथर, कथा, की भार सांठू, गीत (पृ. ७९९-८१०) रूपेश कुमार झा 'त्योंथ'- चाही हमरा मिथिला, जय हिन्द! जय जय मिथिला!! (पृ. ८११-८१४) अजित कुमार मिश्र- अप्पन माटि, नववर्ष (पृ. ८१५-८१७) दयाकान्त- हे मैथिल आबो जागु, ई बुढिया अछि हक्कल डइन, बाढ़ि, माँ मिथिला ताकय संतान (पृ. ८१८-८२५) मिथिलेश कुमार झा- खब्बरदार, आजाद गजल (पृ. ८२६-८२७) सन्तोष कुमार मिश्र- केकरा करु किलोल हो मिता (पृ. ८२८-८२९) कालीकांत झा "बूच"- मातृवंदना, कपीश वंदना, आउ हमर हे राम प्रवासी, गौरी रहथु कुमारी, गै खुशबू , वंदना, हे तात, झूला, राधिकाक विलाप, करूण गीत, वेदना, उदासी, परिचय पात, जागू मॉ आद्या, देसिल वयना क अस्तित्व, भैयाक विआह, नारि सुनू , चैती दुर्गा, गीत, हमर गाम, नवदुर्गा, रामावतार, डहकन, राघव सरकार, माथ पर धान, बुढ़ारी मे घीढ़ारी, सारिक पत्र पाहुनक नाम, राम बिना अवधपुरी, शिव शक्ति पूजन, विरहिनी, नचारी, गीत, गय नानी, हीरा-बेटी, स्वागत गान, मातृ गीत, सोन दाइ, हील हाइ-हाइ, मिथिला क बेटी, जेठी करेह, ऊँ नमः शिवाय, मणिद्वीपक महरानी, सरस्वती वंदना, भदैया होली, वनिवासक अंत, मिथिलाक दुःदशा, माला, जागरण गान, तोहर ठोर, नचारी, सुनू आब मन जेहन लगैए, गहवर जननी केर, भगवती वंदना, भौजीक अवाहन, स्वप्न सुन्दरि, कचोट, श्रृंगार वा वैराग्य, अकाल, नोर, श्रावणी, गामे मोन पड़ैए, भगतालाभ, सिया सॅ रामक परतर, गौरी बनलि जोगिनिया, काली रूप वर्णन, चलि अबियौ पटना सॅ गाम, पहुना, बेटी बनलि पहाड़, हमर जिनगी, मुन्ना कक्का सासुर चलला, नोतक प्रेमी, अप्पन मिथिला, अय काकी, संशय, युग परिवर्तन, वसन्ते-बिरहिनी, दीनक नेना, पतनी व्रता, अन्हर मारि, उद्यनाचार्य, काटरक परिणाम, कवि कोकिल - विद्यापति, रौ घुरना, एक पर सॅ एक, अजुकी दाइ, श्री राम केवट संवाद, राधा विरह, विरक्ति, कमौतिन भौजी, कन्यादान, पोताक अट्ठहास (पृ. ८३०-९७२) राजदेव मण्डल- [आह ज्ञानक झंडा झाँपल अस्तित्व रहब अहीं सभक संग नदीक माछ बाट-बटोही सीमा परक झूला चीड़ीक जाति बाढ़िक चित्र- दिलक बोल अहिंसक वीर मनोवांछित चान परेमक अधिकार मधुर गीत सिर बिहून धड़ हथियारक सभा घातक गंध कुहेसक परदा युग्मक फाग-पत्री आगमन जाति बदलैत बाट भितरिया जानवर बाउल परक माछ कांध परक मुरदा मिझाइत दीया िहत-अहित प्रयास ऑफिसक भूत कठुआएल-रूप सुनगैत चिनगी अहॉंक अगवानीमे महत्वाकांक्षाक गाम एकटा चुप्पी छड़पटाइत लहाश रूसल धीया बसातक धुजिनी अदृश्य आगि- तीन मित्रक गपशप नव बिहार मुँहझप्पा टूटल बन्हन अढ़ाइ हाथक सांगि कानैत अधिकार आबद्ध हम पुन: उठब एकबेर दरपनक स्थिति मिलन बाध शिष्ट-अशिष्ट ढहैत महल अश्रुधार नाचैत भूत माय यत्न बघनखा रंगक खोज कंटकमय नवनीत लाज मिलन-बिछुड़न परिवारक गाछ त्रिशंकु अनमोल जिनगी मुनियाँक चिन्ता (बाल कविता) कथीक गाछ (बाल कविता) नेहाइपर लेखनी झगड़लगौना पिशाच गाछक बलिदान हेराएल गाछक हिस्सा लाल ज्योति बीखक घैल पत्रोत्तर अन्हारक खेल नाचक बिखाद आँखिक प्रतीक्षा] (पृ. ९७३-१०८७) मनीष ठाकुर- विरह गीत (प्. १०८८-१०८९) कुसुम ठाकुर- चुल बुली कन्या बनि गेलहुँ, अभिलाषा (पृ. १०९०-१०९१) चन्द्रकान्त मिश्र- खाथि साग-भात हगैथ पड़ोर, जागु-जागु मैथिल, पी-पी-पी दारु पी (पृ. १०९२-१०९६) रघुनाथ मुखिया- दूधक धार, छाँहक–सुआद, मनुक्खक सूखौंत, जमल शोणित, कालचक्र, कोशीक आगमन, एक सालमे तेरह महीना, बिखाह चाङुर, ई नेना, आइ पहिल बेर , दादागिरी, राजमहल (पृ. १०९७-१११६) अशोक दत्त- कविता- आह्वान, गीत नाटक-इहो बच्चे छै (लए), नौटङ्की नाटक-नइँ आब नइँ (लए) १-२, गीत, कविता, गीत १२, शिव गीत, कविता- अहुरिया, कविता- सङ्केत, शिव गीत, कविता-अभियान, गीत (पृ. १११७-११३७) शीतल झा- मुक्तक, बोकरे सन, शांति!!!, सब केव उदास रहैअ!, हमर संस्कारक गीत, कवि जी तबाह छथि (पृ. ११३८-११४४) डॉ. शेफालिका वर्मा- हमर माय (पृ. ११४५-११४६) धीरेन्द्र प्रेमर्षि- फेर आबि गेल नवका साल (पृ. ११४७-११४८) रामभरोस कापडि भ्रमर- गीत १-२ (पृ. ११४९-११५०) मनीष झा "बौआभाई"- ऋतुपति बसंत (पृ. ११५१-११५२) मनोज कुमार मंडल- जाहि प्रांत रहैत छी हम (पृ. ११५३-११५४) नवीन कुमार "आशा"- अंतरकलह आ विचार, बैसल-बैसल सोची मनमे, हमरा भेटल, सुनू सुनाउ अपन खबरि, की लिखू तोरा लेल, नै बिसरलौं चारि साल, मस्ती करू यौ बौआ मस्ती करू, आव मोन करें कमाई, तोहर गोर गोर गाल ……, किया ने पावी तोहर टोन , अनामिका, हमहूँ तँ छी इंसान, अनाथ, एक दिन बाबु कहला हमरा, माँ छिन्नमस्तिका, दफ्तर, कोना बिसरू तोरा, करेजक प्यास, परी छी, माए बाबु .., आस, बाबा धामक रस्तामे कविता लिखाइत अछि, राखह माता पिताक ध्यान, की लिखू, अविस्मरणीय, कि जीवनक ई अछि सत्य (पृ. ११५५-१२०३) राम विलास साहु- कविता, गीत, हाइकू, शेनर्यू आ टनका (रथक चक्का उलटि चलै बाट) [अप्पन गप महगाइ कोइली कुहकै आमक डारि प्रीतक गीत गंजन कर्मक फल प्रेमक बान्ह जीबैत चलू बिसरल गीत जड़ैत दीप गामक नारी पियासल धरती चिंता-चिता मातृभूमि मिथिलाक अभिनंदन ई की केलौं अहाँ केकरा संग खेलब होरी गाए-माए खेतिहरक जिनगी ज्ञानक दीप दुखाएल गंगा बेंगक बरियाती बलानक बाढ़ि पानिक बून्न हेराएल भगवान जीबए लेल चैताबर गीत चैती गीत प्रेमक भूखल मरूआक मान अरमान भारत माता परदेशी मोनक बात की कहब धनरोपनी लफंगा बेरोजगारी रूपैआक ढेरी भ्रष्टाचारी आएल वसन्त अप्पन-पराया बाट बटोही हाटक चाउर बाटक पानि ज्ञान बाॅटैत चलू प्रेम आकि पैसा कालक पहरा पियासल मन दहेजक खेल घर परदेश गहुमक कटनी-दौनी बिआह की थिक? आजुक दिन पुत्र कुपुत्र कतेक दुख काटब हरि हे बारहो मास सड़क बीच नाला आँखि रहितो आन्हर भाग भरोसे फूल-पत्ता भदबा बाबा बले फौदारी केकरा ले कानब परिवर्त्तन माइयक ममता परदेशिया पाहुन धरतीक सुख साओनक राित लोभी भोम्हरा भोरक क्षण गरीबक मान माए हमर गाम घर अगिलगी काली मैयाक गीत हमर िबखरल समाज िचड़ै चुनमुन्नी माइक लाल के गरीब? नैनाक खेल कोइली कूहकै आमक डारि नींदिया बैरी भेल पहुना पागल प्रेमी कोसीमे समाएल जिनगी हाइकू/ शेनर्यू/ टनका] (पृ. १२०४-१३४५) रामदेव प्रसाद मण्डल “झारूदार”- अपन गप, प्रार्थना, गीत, झारू, महाझारू (हमरा बिनु जगत सुन्ना छै) (पृ. १३४६-१४२३) विस्मृत कवि- पं. रामजी चौधरी (१८७८-१९५२)- विविध भजनावली- १-४५ (पृ. १४२४-१४४३) संदेश- (पृ. १४४४-१४५५) 2
गद्य खण्ड मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत् - हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम् अक्खर (अक्षर ) खम्भा तिहुअन खेत्तहि काञि तसु कित्तिवल्लि पसरेइ। अक्खर खम्भारम्भ जउ मञ्चो बन्धि न देइ॥ [कीर्तिलता प्रथमः पल्लवः पहिल दोहा।]माने अक्षररूपी स्तम्भ निर्माण कए ओहिपर (काव्यरूपी) मंच जँ नहि बान्हल जाए तँ एहि त्रिभुवनरूपी क्षेत्रमे ओकर कीर्तिरूपी लता (वल्लि) प्रसारित कोना होयत। गजेन्द्र टाकुर बेचन ठाकुरक नाटक बेचनजी विगत पचीस बर्खसँ मैथिली नाटकक लेखन आ निर्देशनमे जुटल छथि। हिनकर एक दर्जन नाटक ग्रामीण सबहक मोन तँ मोहनहिये छल जे विदेहमे प्रकाशित छीनरदेवी आ बेटीक अपमान विश्व भरिमे पसरल मैथिली भाषीक बीचमे कएकटा समीक्षात्मक बहस शुरू सेहो कऽ देने अछि। जखन मैलोरंग अपन सर्वेक्षण शुरू केलक जे मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ नाटक महेन्द्र मलंगियाक ओकर आंगनक बारहमासा वा बेचन ठाकुरक बेटीक अपमान आ आशीष अनचिन्हारक समीक्षापर बहस चलिये रहल छल तँ तारानन्द वियोगीक कथन आबि गेल, ऐ सर्वेक्षणकेँ रोकबाक आग्रह करैत- "हम तं चकित छी प्रकाश। की मैथिलीक एहन दुर्दिन आबि गेलै जे आब एना तुलना कएल जेतै? जकरा बलपर सौंसे भारतीय साहित्यमे मैथिलीक झंडा बुलन्द मानल जाइत रहल अछि, तकरा मादे हमर नवतुरिया सब एना बात करता? एतेक सतही आ विवेकहीन पीढी मिथिला पैदा केने छथि यौ? की पं० गोविन्द झाक ओ कथन सत्य होब'बला छै जे तीस-चालीस सालमे मैथिली मरि जाएत। (मैथिली माने मैथिली साहित्य।) एना नहि काज चलत। किछु करियौ बाबू।" मुदा प्रकाश बाबू कहलखिन्ह- "सर! किछु कारण अछि। सब नवतुरियाक स्थिति एक रंग नहि छनि। सभहक अपन अपन मनतव्य छनि। मुदा अँग्रेजीमे एकटा कहाबत अछि। सरभाइवल ऑफ दी फिटेस्ट....। जे कियो जे किछु सोचैइथ मुदा मैथिली आ नाटक लेल सोचैत छथि इहए हमरा लेल जीवन दायी अछि।" तारानन्द वियोगी फेर लिखलन्हि- "मिथिलाक प्रति जं प्रेम अछि, तं अपन बिरासत कें चिन्हनाइ आ ओहिपर गर्व करनाइ सीखू। हरेक भाषामे किछु एहन रचना होइ छै जे 'क्लासिक्स' के कोटिमे अबै छै।। (से मैथिलियोमे छै) जखन आगुओ कोनो ओहि टक्कर के रचना आबि जाइ छै तं ओकरा सम्मान दैत पूर्वक क्लासिक्स के बराबरमे राखल जाइ छै। ऐ लेल बिरासत कें खारिज करब जरूरी नै छै। मानि लिय' जे गजेन्द्र ठाकुर बड्ड विशिष्ट कवि छथि, तें की अहां ई सर्वेक्षण कराएब पसन्द करब जे 'विद्यापति पैघ कवि की गजेन्द्र ठाकुर?' साहित्य के संस्कृतिमे आम तौरपर एना नहि कएल जाइ छै। मुदा 'खास' तौरपर जं करए चाही, तं ताहि सं ककरो के रोकि सकै छै। राजनीति के संस्कृतिमे तं से चलन छैके।" तइपर उमेश मंडल जवाब देलखिन्ह जे ई उदाहरण तखन सटीक होइतए जँ बेचन ठाकुर वा महेन्द्र मलंगियाक तुलना ज्योतिरीश्वरसँ कएल जाइत। ऐ डिसकसनक शुरूमे प्रकाशजीक विचार बेचनजीक नाटकक विरुद्ध छलन्हि आ से पुनः सिद्ध भेल जखन बेचन ठाकुरक "अधिकार" नाटक ऐ टिप्पणीक संग पोस्ट कएल गेल तँ ओ ओकरा डिलीट कऽ देलन्हि। एना किए भेल? जखन प्रकाश झा महेन्द्र मलंगियाक नाटक करबै छथि (मैथिलीमे विदेहक एलासँ पूर्व प्रूफरीडरकेँ सम्पादक कहल जाइ छल आ नाटकमे जे कियो कोनो काज नै करथि कुर्सीपर पएर लटका क' बैसथि आ गप छाँटथि तकरा नाटकक निर्देशक कहल जाइ छल) तँ 90 प्रतिशत दर्शक मैथिल ब्राह्मण आ जखन संजय चौधरी मलंगियेक नाटक करै छथि तँ 90 प्रतिशत दर्शक कर्ण कायस्थ; आ दुनू गोटे मैथिलीक नामपर सरकारी संगठनसँ, जे टैक्सपेयरक पाइसँ चलै छै, पाइ ल' नाटक करै छथि, शहरो वएह दिल्ली छिऐ। ई समाज किए तोड़ल जा रहल अछि? आ दु जातिक अतिरिक्त शेष मैथिली भाषी? मुदा तइले वियोगीजीक आह्वान प्रकाशकेँ नै भेटै छन्हि! किए!! आ प्रकाशजी बेचनजीक नामो बेचा ठाकुर लिखै छथि आ पाठकक ऐपर भेल विरोधक बावजूद सुधार नै करै छथि से उच्चारण दोष, ह्रिजै दोष अनायास भेल नै सायास भेल सिद्ध होइत अछि। प्रकाशजी उमेश मंडलकेँ कहै छथि जे ओ हुनकासँ सम्पर्क बढ़ेबामे रुचि नै राखै छथि मात्र फोनपर गप छन्हि से हमहूँ 2008मे प्रकाशजीक पहिल बेर नाम सुनने रहियन्हि, मिथिलांगनक अभय दास नाम-नम्बर देने रहथि आ तहियासँ दू-तीन बेर 2-3 मिनटक फोनपर गप अछि आ 2-3 बेर ठाढ़े-ठाढ़े गप अछि, अंतिम बेर जखन उमेश मंडल जीक कहलापर जगदीश प्रसाद मण्डल जीक नाटक हुनका देने रहियन्हि आ ओ ओइ बदलामे मलंगियाजीक पोथी कूरियरसँ पठेबाक गप कहने रहथि। वियोगीजी आ प्रकाशजी अखनो धरि "मेडियोक्रिटी" सँ बाहर नै आबि सकल छथि आ सार्थक सम्वाद आ समालोचना सहबामे तत्काल अक्षम छथि। जँ जँ ओ लोकनि आर मेहनति करताह आ "मेडियोक्रिटी"सँ बाहर बहरेताह तँ तँ हुनका लोकनिमे समालोचना सहबाक क्षमता बढ़तन्हि। टैक्सपेयर तँ सभ छथि, ओतए तँ जाति-भेद नै छै। मुदा "अधिकार" नाटक डिलीट नै कएल जा सकल, ई बचि गेल कारण ऐ नाटकक कएक टा बैकप कतेक संगणकपर उपलब्ध छल। से ऐ परिप्रेक्ष्यमे बेचन ठाकुर जीक तेसर नाटक "अधिकार" विदेहमे देल जा रहल अछि आ आशा करैत छी जे आशीष अनचिन्हार फेर ऐ नाटकक समीक्षा करताह आ सूतल लोक जेना आँखि मीड़ैत उठल अछि तहिना ई नाटक ग्रामीणक पहिने आ मैथिली नाटकक किछु ठेकेदार समीक्षक/ निर्देशक लोकनिक पछाति निन्न तोड़त। संगहि जेना मजारपर वार्षिक उर्स होइ छै जतए लोक सालमे एक बेर चद्दरि चढ़ा आ अगरबत्ती जड़ा क' कर्तव्यक इतिश्री मानि लैए, तहिना मैथिलीक नामपर खुजल कागजी संगठन सभक, जे बेसी (95 प्रतिशत) मैथिल ब्राह्मण सम्प्रदाय द्वारा टैक्सपेयरक पाइकेँ लुटबा लेल फर्जी पतापर बनाएल गेल अछि, वार्षिक (बर्खमे ओना एक्के बेर हिनकर सभक निन्न खुजै छन्हि) काजक समीक्षा होएबाक चाही। जखन हम संस्कृत वीथी नाटकक निर्देशन/ अभिनय करै छलौं तँ ओतए अभिनय केनिहार सभक आ सह-निर्देशक लोकनिक प्रतिभा आ मेहनति देखि हर्ष होइ छल; मुदा एतए प्रतिभाक दरिद्रता किएक? उत्तर अछि जे एक जातिकेँ लेब आ तहूमे तै जातिकेँ जकरा अभिनयसँ पारम्परिक रूपमे कोनो लेना देना नै छै, आ जकरा लेना-देना छै तकरा अहाँ बारने छी तँ की हएत? जखन हरखा पार्टीमे खतबेजी रावणक अभिनय करै छलाह तँ से आ जखन ओ चन्द्रहास नाटकमे खलनायकक नै वरन चरित्र अभिनेताक अभिनय करै छलाह से, दुनूमे कियो नै कहि पबै छल जे कोन अभिनय बीस! बच्चामे गाममे आँखिसँ देखल अछि। संगहि जे लिस्ट गनाओल जाइत अछि, तैमे खतबे जी कतौ नै!! दसटा मैथिली निर्देशक छथि जे पटना, कलकत्ता, दिल्ली, मुम्बइ, चेन्नइमे (सभटा मिथिलासँ बाहर) निवास करै छथि आ 200 लोकक सोझाँमे ऑडिटोरियममे नाटक करबै छथि आ कलाक न्यूनताक पूर्ति लाल-पीअर-हरियर लाइट-बत्ती जड़ा क' करै छथि (किछु अपवादो छथि), की भरि मिथिलामे एतबे नाटक मैथिलीमे होइए आ की एतबे निर्देशक मैथिलीमे छथि? गाम-गाममे पसरल असली मैथिली नाटकक निर्देशकक सूची आ हुनका द्वारा बिना टैक्सपेयरक फण्डसँ खेलाएल गेल नाटकक अभिलेखनक काज विदेह टीम द्वारा चलि रहल अछि जकर विस्तृत सूची "सर्वे ऑफ मैथिली लिटेरेचर वोल्यूम.2 मे देल जाएत। सूचनाक अधिकार विषयपर आधारित मैथिली नाटक- अधिकार इन्दिरा आवास योजनाक अनियमितताकेँ आर.टी.आइ.सँ देखार करैबला आ रिक्शासँ झंझारपुरसँ दिल्ली जाइबला असली चरित्र मंजूरक कथा अछि जे डिलीट नै कएल जा सकल मुदा किए डिलीट कएल जा रहल छल, किनकर हितकेँ ऐ नाटकसँ खतरा छन्हि/ छलन्हि आ किए एकर विरोध एतेक तीव्र रूपमे भेल, से सभटा आब फरिच्छ भ' गेल अछि। डॉ. प्रेमशंकर सिंह (१९४२- ) ग्राम+पोस्ट- जोगियारा, थाना- जाले, जिला- दरभंगा। 24 ऋचायन, राधारानी सिन्हा रोड, भागलपुर-812001(बिहार)। मैथिलीक वरिष्ठ सृजनशील, मननशील आऽ अध्ययनशील प्रतिभाक धनी साहित्य-चिन्तक, दिशा-बोधक, समालोचक, नाटक ओ रंगमंचक निष्णात गवेषक,मैथिली गद्यकेँ नव-स्वरूप देनिहार, कुशल अनुवादक, प्रवीण सम्पादक, मैथिली, हिन्दी, संस्कृत साहित्यक प्रखर विद्वान् तथा बाङला एवं अंग्रेजी साहित्यक अध्ययन-अन्वेषणमे निरत प्रोफेसर डॉ. प्रेमशंकर सिंह ( २० जनवरी १९४२ )क विलक्षण लेखनीसँ एकपर एक अक्षय कृति भेल अछि निःसृत। हिनक बहुमूल्य गवेषणात्मक, मौलिक, अनूदित आऽ सम्पादित कृति रहल अछि अविरल चर्चित-अर्चित। ओऽ अदम्य उत्साह, धैर्य, लगन आऽ संघर्ष कऽ तन्मयताक संग मैथिलीक बहुमूल्य धरोरादिक अन्वेषण कऽ देलनि पुस्तकाकार रूप। हिनक अन्वेषण पूर्ण ग्रन्थ आऽ प्रबन्धकार आलेखादि व्यापक, चिन्तन, मनन, मैथिल संस्कृतिक आऽ परम्पराक थिक धरोहर। हिनक सृजनशीलतासँ अनुप्राणित भऽ चेतना समिति, पटना मिथिला विभूति सम्मान (ताम्र-पत्र) एवं मिथिला-दर्पण,मुम्बई वरिष्ठ लेखक सम्मानसँ कयलक अछि अलंकृत। सम्प्रति चारि दशक धरि भागलपुर विश्वविद्यालयक प्रोफेसर एवं मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली साहित्यक भण्डारकेँ अभिवर्द्धित करबाक दिशामे संलग्न छथि,स्वतन्त्र सारस्वत-साधनामे। कृति- मौलिक मैथिली: १.मैथिली नाटक ओ रंगमंच,मैथिली अकादमी, पटना, १९७८ २.मैथिली नाटक परिचय, मैथिली अकादमी, पटना, १९८१ ३.पुरुषार्थ ओ विद्यापति, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर, १९८६ ४.मिथिलाक विभूति जीवन झा, मैथिली अकादमी, पटना, १९८७५.नाट्यान्वाचय, शेखर प्रकाशन, पटना २००२ ६.आधुनिक मैथिली साहित्यमे हास्य-व्यंग्य, मैथिली अकादमी, पटना, २००४ ७.प्रपाणिका, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००५, ८.ईक्षण, ऋचा प्रकाशन भागलपुर २००८ ९.युगसंधिक प्रतिमान, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८ १०.चेतना समिति ओ नाट्यमंच, चेतना समिति, पटना २००८ मौलिक हिन्दी: १.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, प्रथमखण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७१ २.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, द्वितीय खण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७२, ३.हिन्दी नाटक कोश, नेशनल पब्लिकेशन हाउस, दिल्ली १९७६. अनुवाद: हिन्दी एवं मैथिली- १.श्रीपादकृष्ण कोल्हटकर, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली १९८८, २.अरण्य फसिल, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१ ३.पागल दुनिया, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१, ४.गोविन्ददास, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००७ ५.रक्तानल, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८. लिप्यान्तरण-१. अङ्कीयानाट, मनोज प्रकाशन, भागलपुर, १९६७। सम्पादन- गद्यवल्लरी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६६, २. नव एकांकी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६७, ३.पत्र-पुष्प, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९७०, ४.पदलतिका,महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९८७, ५. अनमिल आखर, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००० ६.मणिकण, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ७.हुनकासँ भेट भेल छल,कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००४, ८. मैथिली लोकगाथाक इतिहास, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ९. भारतीक बिलाड़ि, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, १०.चित्रा-विचित्रा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ११. साहित्यकारक दिन, मिथिला सांस्कृतिक परिषद, कोलकाता, २००७. १२. वुआड़िभक्तितरङ्गिणी, ऋचा प्रकाशन,भागलपुर २००८, १३.मैथिली लोकोक्ति कोश, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर, २००८, १४.रूपा सोना हीरा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००८। पत्रिका सम्पादन- भूमिजा २००२ मणिपद्मक कथा–यात्रा स्वाधीनता–संग्राम विकट–प्रत्युहक पश्चात् देश जखन स्वतंत्र भेल तखन भारतीय शासन–व्यवस्था भेला पर आधुनिक भारतीय भाषामे साहित्य–सृजनक एक प्रबल ज्वार आयल परिणाम भेलैक जे साहित्य–सरितामे एक नव–स्पन्दनक संचार भेलैक आ प्रत्येक सृजक अपन–अपन साहित्यक विकासार्थ अभूत पूर्वगतिएँ साहित्य–सृजन दिस उन्मुख भेलाह तथा प्रत्येक विधामे अत्युच्य कोटिक साहित्य–सृजनक अभूतपूर्व परम्परा उद्भूत भेल। एहि दिशामे मैथिली–साहित्य पछु आयल नहि रहल; प्रत्युत निर्वाध गतिएँ साहित्य–सृजनक परम्पराक शुभारम्भ भेलैक जकर प्रकाशनक श्रेय समकालीन पत्रिकादिकेँ छैक जे नव–नव प्रतिभा सम्पन्न साहित्य सृजनिहारकेँ साहित्य–साधना दिस उन्मुखक कए प्रोत्साहित करब प्रारम्भ कयलक। एकरे प्रतिफल थिक जे स्वाधीनताक पश्चात् मैथिली–साहित्यक सर्वांगीन विकास भेल तथा प्रत्येक विद्यादिमे नव–रूपें साहित्य–सृजनक परम्पराक श्री गणेश भेल। स्वाधीनोत्तर कालमे मैथिली गद्यक विकासमे वैदेही (1950), मिथिला दर्शन (1953) तथा मिथिला मिहिर (1960) अन्य पत्रिकादिक अपेक्षा दीर्घजीवी भेल साहित्य–सरिताक प्रवहमान वेगवती धारामे अवरोध नहि होमय देलक। मैथिली कथा साहित्यकेँ प्रोढ़, प्राणवंत, समुन्नत आ समृद्धशाली बनयबाक दिशामे पटनासँ प्रकाशित मिथिला मिहिरक पुनर्प्रकाशन निश्चये मीलक पाथर प्रमाणित भेल जे सहस्त्राधिक कथाकारक एक वर्ग तैयार कयलक जनिक कथा एहि लब्ध–प्रतिष्ठ पत्रिकामे अनवरत प्रकाशित होइत रहल जकर श्रेय आ प्रेय छनि एकर विद्वत वरेण्य साहित्य चिंतक आ सम्पादक सुधांशु शेखर चौधरी (1920–1990)केँ जे प्राचीन एवं अवाचीन कथाकारक अद्भुत समंवय कयलनि। एहि विषयकेँ ध्यानमे राखि एकर प्रत्येक अंकमे कम सँ कम दुइ आ अधिक सँ अधिक चारि कथाक समावेश कयलनि। एकर अतिरिक्त समसामयिक पृष्ठभूमिमे मिथिलांचलमे प्रचलित व्रत–त्योहारक कथा सेहो समय–समयपर प्रकाशित होइत रहल। मिथिला मिहिरक नव वर्षक प्रवेशांक कथा–अंकक रूपमे नियमित रूपेँ बहराइत रहल जे एकर साक्षी थिक मैथिली कथा–साहित्य अपन प्रौढ़ताकेँ प्राप्त कयलक। कारण मैथिली कथा–साहित्यक सर्वाधिक सशक्त ओ सम्पन्न विधा कथा ओ कविता थिक। निश्चयतः एहि कथानक सत्यताक अपलाप नहि कयल जा सकैत अछि। किंतु एहि स्थितिक संग–संग इहो विचारणीय विषय थिक जे कोन एहन तत्व सभ विशेषतया कथाकार लोकनिक मध्य काज कयलकनि जे अपनाकेँ स्थापित करबाक हेतु कठिन साहित्य–साधना कयलनि तथा निरंतर हुनक कथा धारा प्रवाहित होइत रहलनि, कारण कथा गद्य–साहित्यक विशिष्ट विधा थिक जकर प्रतिरूप मैथिली–कथामे सर्वत्र दृष्टिगोचर होइत अछि। उपर्युक्त पृष्ठभूमिक परिप्रेक्ष्यमे डा. व्रजकिशोर वर्मा मरिपद्म (1918–1986) एक एहन प्रतिभा सम्पन्न कथाकार उद्भूत भेलाह जे एहि विधामे अपन अक्षय कथा कृतिक कारणेँ एक कीर्तिमान स्थापित कयलनि जे निश्चये मैथिली–साहित्येतिहासमे एक अविस्मरणीय ऐतिहासिक घटना थिक। क्वालिटी आ क्वानटिटीक दृष्टिसँ विश्लेषन कयल जाए तँ हिनक कथा–यात्रा अनंत छनि। ओ जाहि विपुल परिमाणमे मैथिली कथा–भण्डारकेँ भरलनि जे अन्यान्य कथाकार लोकनिक द्वारा सम्भव नहि भऽ सकल, किंतु एतय एक प्रश्न वाचक चिह्न अछि जे विपुल परिमाणमे कथा–रचना कयलो पर ई साहित्येतिहासमे सर्वथा उपेक्षिते रहि गेलाह। मैथिलीक वरिष्ठ इतिहासकार डा. जयकांत मिश्र (1922–2009) हुनक कथा–यात्राक प्रसंगमे A History Of Maithili Literature (Sahitya Academy New Delhi 1976) तथा मैथिली साहित्यक इतिहास (साहित्य अकादेमी नई दिल्ली 1988)मे एको शब्द लिखब उचित नहि बुझलनि, ने जानि किएक? साधारण पाठक तँ इएह अनुमान करत जे ओ मरिपद्मक कथादिसँ सर्वथा अनभिज्ञ वा अपरिचित छथि, वा जानकारीक अभाव छनि वा जानि बूझिक उपेक्षा कयलनि। राधाकृष्ण चौधरी (1924–1984) A Survey Of Maithili Literature (शांति निवास, बमपास टाउन, देवघर, झारखण्ड, 1976) मैथिलीक विस्तृत चर्चा करैत हुनक दुइ कथाक विशेष उल्लेख कयलनि अछि, Manipadm’s Purishaka Mula (Value Of Man) and Kona Elini (What brought you) (Page 247–248)| चेतना समिति पटना द्वारा आयोजित भारती–मण्डन–व्याख्यान मालाक अंतर्गत डा. जयधारी सिंह (1929–2000) मैथिली कथाक विश्लेषण करबाक क्रममे कथाकार लोकनिक उपलब्धिक मूल्याकंन करबाक अपेक्षा कथा संग्रह सभक परिचय दऽ कए ओहिमे संग्रहीत कथा कारक जे परिचय देलनि जे वर्त्तमान परिप्रेक्ष्यमे अप्रासंगिक प्रतीत होइत अछि। एहि क्रममे ओ परिपद्मक साहित्यकारक दिन (संचयिता), शाश्वत ऑल इण्डिया रेडियो (अभिव्यञ्जना), प्रतिद्वन्द्विता (पल्लव) एवं दक्षिणा (मिथिला मिहिर) कथाक उल्लेख कयलनि (मैथिली साहित्यक रूप–रेखा पृष्ठ 89–103)। मैथिली साहित्यक इतिहास (भारती पुस्तक केन्द्र दरभंगा 1991)मे डा. दुर्गानाथ झा श्रीश (1929–2000) मैथिली गद्य साहित्यक विश्लेषणक अंतर्गत आधुनिक गल्प–साहित्यक अंतर्गत नकटाक शिकार (वैदेही), पट्टीदार (वैदेही), एवं संयोग (वैदेही) मात्र कथाक उल्लेख कयलनि आ हुनक कथाक प्रसंगमे एको शब्द लिखब उचित नहि बुझलनि (381–382)। डा. दिनेश कुमार झा (1941–2002) मैथिली साहित्यक आलोचनात्मक इतिहास, मैथिली अकादमी, पटना 1979)मे मैथिली कथाक प्रवृत्ति मूलक विश्लेषण करबाक क्रममे हुनक मात्र दुइ यथार्थवादी कथा शोणितक स्वाद (मिथिला मिहिर) एवं दछिना (मिथिला मिहिर)क उल्लेख कयलनि, किंतु हुनक कथा–धाराक वा प्रवृत्तिक कोनो विश्लेषण नहि कयलनि जे हास्यास्पद प्रतीत होइछ। हाल चाल (1986)क मरिपद्म–श्रद्धाञ्जिल अंकमे मात्र पैंतीस कथाक शीर्षक चर्चा कयल गेल अछि जे उपहास्पद थिक। साहित्य–अकादेमी आ चेतना समिति पटनाक तत्वाधानमे मैथिली गद्यक विकास (1994) पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठीमे मोहन भारद्वाज (1943) मैथिली कथा गद्यपर अपन आलेख प्रस्तुत कयलनि, किंतु मरिपद्मक सदृश सशक्त गद्यकारक गद्यक प्रसंगमे ओ विचार करब अनावश्यक बुझलनि जखन कि हुनक गद्य अत्यंत सशक्त ओ प्राणवंत अछि जकर यथार्थताक अवबोध पाठककेँ हुनक कथाक अनुशील नहिसँ पाठककेँ होयतनि। डा. मिघन प्रसाद (1961), मैथिली कथा कोश (1996)मे मरिपद्मक एक सय आठ कथाक शीर्षक वद्ध उल्लेख कयलनि जाहिमे सँ मुनरीक मोल (1964) कथा नहि; प्रत्युत एकांकी थिक जकरा हम अनमिल आखर (कर्ण गोष्ठी कोलकता 2000)मे संकलित कयल अछि। ओहिमे सँ तीन कथाकेँ अर्चित मानलनि अछि। (कथा कोश पृष्ठ-......), किंतु हमरा जनैत हुनक कथाकेँ मर्मकेँ आत्मसात करबाक दिशामे ओ सचेष्टता नहि देखौलनि तेँ एहन निष्कर्ष बहार कयलनि। डा. प्रसाद बहुचर्चित, चर्चित तथा अर्चित कथा क्रम जे एहन निर्धारण कयलनि अछि ताहिसँ हम असहमत छी, कारण कोन आलोचक प्रत्येक कथाकारक कथा–कृति धरि सीमित रहि जाइत छथि। किंतु जाहि समीक्षककेँ उपयुक्त अवसर भेटैत छनि तँ ओ समग्र कथा–कृतिक प्रत्येक पक्षसँ परिचित भऽ कए वास्तविक समीक्षा करबाक प्रयास करैत छथि। अवलोकन (1995)मे डा. अरूण कुमार कर्ण (1961) मरिपद्मक कथा–संसार शीर्षकसँ एक समालोचनात्मक आलेख अछि जाहिमे हुनक सम्पूर्ण कथा–कृतिक विश्लेषण नहि कऽ कए मात्र वैदेही ओ मिथिला मिहिरक जे कथादि हुनका उपलब्ध भेलनि, ओहि आधार पर हुनक आलेख केन्द्रित अछि। डा. कर्ण सेहो मुनरीक मोल (1964)केँ कथा कहलनि जे नितांत भ्रामक आ अशुद्ध थिक। उपर्युक्त परिप्रेक्ष्यमे आब आवश्यक भऽ जाइत अछि जे डा. व्रज किशोर वर्मा परिपद्मक कतेक कथा कृति अद्यापि मैथिलीक विभिन्न पत्र–पत्रिकादिमे आ कथा–संग्रहादिमे प्रकाशित अछि तकर यथार्थतासँ जनमानस पाठक परिचित भऽ जाथि। मैथिली कथा–द्वारपर मरिपद्म दस्तक देलनि बीसम शताब्दीक षष्ठ दशक आरम्भिक कालमे, जाहि हुनक लेखकक एक दिन (1950), जामवंत चारी (1952), धरतीक हाक (1953), नकटाक शिकार (1954), पट्टीदार (1954), संयोग (1955), ओ दिन आ ओह दिन (1957), दुनू छोर (1959), भट्ठापरक पीपर (1960), ओइ लेखक दुआरे (1960), क्षण आ मन (1961), तऽरमे एक्के (1962) एवं मिस फिट (1969) कुल तेरह कथा प्रकाशित अछि। दरभंगासँ प्रकाशित मिथिला मिहिरमे हुनक इजोतदाइ (1951), जोगबा मिसर (1951) बाल गोविन्द (1953), सुमरिन महालन (1953) एवं राजकुमारी चैननक रोमांस (1953) कुल पाँच कथा पाठक सम्मुख आयल। किंतु हुनक कथा–यात्राक शिल्प विकसित भेल तखन, जखन पटनासँ ओकर पुनर्पकाशन प्रारंभ भेलैक जाहिमे साधनाक मोह (1960), सफलताक छड़पान (1960), युधिष्ठिक पत्नी (1961), माइक संस्कृति (1961), हमर अष्टग्रह (1962), विसरल नहि जाइत छैक (1962), मरूधारा (1962), बहिनिक दुलार (1963), मुक्ति दिवस (1965), ओ विश्व विद्यालय (1965), आकृतिक ओहि पार (1965), दछिना (1966), उजरा बीछ (1967), लेखा–जोखा (1968), शोणितक स्वाद (1968), करोरिया मुँह (1969), खण्डित – साधना (1970), एकटा लौंग मार्च (1971), केँ? (1971), झिंगुर टेल (1972), सरोकारी (1972), लवहरि कुशहरि (1973), दोस्ती (1973), तेसर प्रेत (1974), स्वगता (1975), एकटा खुटेसल बकरी (1976), सोनहुला कनतोड़ (1976), श्मशानसँ घुरलापर (1976), प्रतिशोध (1976), सर्पसागर आ सुन्दरी (1976), हीरो गिरगिट (1977), हुनका नहि कहबनि (1977), खोजक भेंट (1978), चमचा (1978), एयर होस्टेज (1978), बस स्टैण्डपर (1979), चाहवाला छौड़ा (1979), जहीहा (1980), अद्वैत (1982), समाद (1982), क्षतिपूर्ति (1982), बसक बात (1983), एवं दानी दार (1984) कुल पचास प्रवासी मातृभाषानुरागी लोकनिक सहयोगसँ बङ्ग भूमिक महानगर कोलकातासँ प्रकाशित पत्रिकादिमे, मिथिला दर्शन (1953), कथीले (1955), लुतुक (1955), पोखरि खोर (1955), दुपरिया रातिक शिकार (1956), केशकरक इशारा (1957), बीसक ढ़ोलकिया (1958), प्रवासी एलाह (1960), मौनव्यथा (1960), हाफे हाफ (1960), कोव्रागर्लक खोजमे (1964), अदला – बदली (1973), एवं एकटा जरैल मोमबत्ती (1977) मैथिली प्रकाशमे एकटा फाजिल पोस्ट कार्ड (1976–77), आखरमे चिंतामरित (1968) तथा मैथिली दर्शनमे खंजरी लै कै (1976) एक–एक कथा प्रकाशित अछि। धीया पूतामे बिलाइक डायरी (1960), अभिव्यञ्जनामे तीन शाश्वत ऑल इण्डिया (1960), ओइ राति (1962), एवं बुझले छल, निर्माणमे तीन रखबाक आ भरिया (1954), जौं लोक चढ़ैत होइ (1955) एवं रौंग साइड (1955), पल्लवमे तीन घरमुँहा (1957), नीमाक तीन युग (1957) एवं प्रतिद्वन्द्विता (1958), अभियानमे एक तुलिका लऽ कऽ (1963), आहूतिमे सरिसवक सागर (1976), कथा दिशामे एक एकपहिया ट्रेक्टर आ दोसर (1980) देस कोसमे अहैत (1981), माटि पानि आधुनिकीकरण (1984) तथा स्मारिका (धनबाद)मे एक हुनका खोजमे प्रकाशित अछि। मरिपद्मक किछु कथा एहनो उपलब्ध होइत अछि जे नवीन पुस्तक प्रकाशनोपलक्षमे साहित्यकारक दिन (1953) टटका गप्पमे ओ दुनू (1964), गल्प–सुधामे क्रिमनल (1964), गल्प गुच्छमे नैका बनिजारा (1979), मैथिली ललित गद्यमे यात्रा (1973) तथा साहित्य–सौरभमे महाप्राण सलहेस (1987), अतएव ओकर प्रकाशन तिथि पुस्तक प्रकाशन तिथि मानव उचित हैत। केवल ओ दुनू कथाक पश्चात् जा कऽ मैथिली अकादमी पत्रिका (जनवरी–दिसम्बर 1985)क अंकमे प्रकाशित भेल। मैथिली प्राचीन ओ अर्वाचीन पत्रिकादिक अनुसंधान कऽ कए हमरा दृस्टिएँ कुल एक सएसँ बेसी कथा प्रकाशित अछि। हमरा अनुसंधानक क्रममे चारि कथाक सूचना आर भेटल अछि ओ थिक वैदेहीमे एक जामवंत चाही (1952), मिथिला दर्शनमे दू मिल औरो दिऔ (1959) तथा राधाकृष्ण चौधरी दू कथाक पुरूषक मोल एवं कोना अयलनिक चर्चा कयल;अनि अछि जे अनुसंधेय थिक। एहू सम्भावनाकेँ नहि अस्वीकारक जा सकैछ जे हिनक आर कथादि विभिन्न पत्रिकादिमे प्रकाशित हो जाहि दिस अद्यापि अनिसंधाता लोकनिक नजरि नहि गेलनि अछि। अद्वैत शीर्षकसँ सेहो मरिपद्म दुइ कथाक रचना कयलनि जकर उल्लेख भेटैत अछि। एक देस कोस नवम्बर 1981 तथा दोसर मिथिला मिहिर 3 जनवरी 1982क अंकमे प्रकाशित अछि आ दुनू कथाक भाव भूमि सर्वथा पृथक–पृथक अछि। किंतु कथा कोशकार मिथिला मिहिरमे प्रकाशित कथाकेँ अनुसंधान एवं कथानु क्रमणिकामे उद्वैत कहलनि अछि। ओ अपन सूक्ष्म दृष्टिक उपयोग करबामे अन्यमनस्कता देखौलनि अछि, कारण अद्वैत एवं उद्वैतमे हुनका कोनो अंतर नहि बुझना गेलनि। पाठकक एहि भ्रम दूर करबाक उद्देश्यसँ प्रस्तुत संग्रहमे हम दुनू कथाकेँ समाविष्ट कयल अछि। मरिपद्मक मसिजीवी साहित्यकार रहथि जनिक साहित्य–साधनाक अविरल धारा सतत कल–कल करैत साहित्य–सरितामे प्रवाहित होइत रहलजे मैथिलीक विभिन्न पत्रिकादिक अनुशीलनसँ स्पष्ट अछि। हुनक साहित्य–साधना निर्वाध गतिसँ प्रवाहित होइत रहलनि तथा ओ जीवनक अंतिम क्षण धरि साहित्य–साधनामे तल्लीन रहलाह जकर साक्षी थिक हुनक अक्षय–साहित्य–भण्डार। मरिपद्म कथा–साहित्यमे प्रवेश कयलनि वैदेहीक माध्यमे, किंतु बिस्तर भेटलनि मिथिला मिहिरमे तथा कथा–जगतमे चिन्हस गेलाह बाल गोविन्द (1953) कथा लऽ कए जे हिनका अविस्मरणीय कथाकार बनादेलक। हुनक कथा परिधिक व्यापकताक अनुमान तँ एहीसँ लगाओल जा सकैछ जे हुनक समसामयिक कोनो एहन पत्रिकादि नहि अछि जाहिमे हुनक कथा नहि प्रकाशित भेल हो। मरिपद्म माने प्रवाह। मानवीय भावनाक प्रवाह। भाषण ओ लेखनमे प्रवाह। यथार्थताक नाम पर कलाक नाम पर ओ मानवीय भावनाकेँ थकुचि देबाक प्रबल विरोधी रहथि। कथा कहबाक शिल्पमे केवल संदेश देनिहार रहथि जे मानवीयताक हत्या नहि हो। समाजक हर व्यक्ति स्वर हिनक कथादिमे गुंजित होइत अछि चाहे ओ सामाजिक हो वा असामाजिक। सामाजिक यथार्थक मार्मिक मूल्याकंन हिनक कथा साहित्यक वैशिष्टय अछि। उपन्यास एवं कविता सदृश हिनक कथादिमे भावुकताक प्रभुसत्ता भेटैत अछि। एहि सभमे भोगल यथार्थ जीवनक विसंगति, जटिलता, कुण्ठा–संत्रास तथा यथार्थ जीवनक विविध आयामकेँ ओ अभिव्यक्त कयलनि। कविताक समानहि ओ गद्यमे उपमा–उपमानक झड़ी लगा देलनि अछि। आधुनिकताक परिवेशमे परिवर्तित होइत सामाजिक पृष्ठभूमिक यथार्थताक मूल्याकंन हिनक कथाक मर्मज्ञताक अछि। लोक–प्रचलित सहज–संवेद्य, बोध गम्य, सरल, सुकुमार शब्दावली जे मैथिलीमे विलुप्त भेल जा रहल छल ओहि सभक दस्तावेज थिक हिनक कथा जगत, जाहिमे प्रचुर परिमाणमे ओ ओकर प्रयोग भेल अछि। मरिपद्म कथा–धारामे एक–सँ एक महत्वपूर्ण हिलकोर अनलनि तथा जीवनक महत्वपूर्ण सूक्ष्माति सूक्ष्म धड़कन, शाश्वत एवं सम्प्रतिक समस्याक जीवंत चित्र प्रस्तुत कयलनि। हिनक कथा–साहित्यक वैशिष्टय थिक जे भाषा–शैलीमे रोचकता, गम्भीर दृष्टिकोणमे व्यापकता, धारावाहिकता–भावुकता प्रभुसत्ता, महत्वपूर्ण उद्देश्य हुनक कथामे सर्वत्र उपलब्ध होइत अछि। हिनक कथामे प्रभावोत्मादकता, कल्पनाक प्रौढ़ता, प्रकृति वर्णनक सश्रीकता, कथानक–क्षेत्रक विशालता, विश्वव्यापी अनुभूतिक उद्घाटन तथा पात्रक अंतः स्तलमे प्रवेश करबाक अद्भुत क्षमता अछि। कथा तत्वकेँ सुरक्षित रखैत चरित्रक सूक्ष्मता, वातावरण ओ परिस्थितिक निर्माण कऽ कए उत्कर्ष–विधान हिनक कथाक मार्मिकता अछि। हिनक कथाक दृष्टि ओ दृष्टिओ दृष्टिमे भिन्नतासँ भरल अछि। कथोमे अद्युनातन प्रवृत्तिक रचना आ रचनाकारक खबरि ओ रखैत छलाह चाहे ओ रवीन्द्रनाथ ठाकुर (1861–1941), की जार्ज बनार्ड शाँ (1856–1950) अथवा टी.एस.इलिएट (1888–1964)। हिनक कथामे सामाजिक ओ वैयक्तिक दुनू पक्षक सम्यक रूपसँ चित्रित भेल अछि। ओ कथामे देश एवं अंचलक समस्या पर अपन विचार निर्भीकताक संग प्रस्तुत कयलनि। मरिपद्मक कथा–गद्यक सूक्ष्म रूपेँ विश्लेषण कयल जाय तँ कतिपय आलोचनात्मक कृतिक सम्भावना दृष्टिगत भऽ रहल अछि। मैथिली कथा साहित्यपर पर्याप्त मात्रामे आलोचनात्मक कृतिक अद्यापि अभावे अछि। मरिपद्मक विशाल कथा–यात्राक परिधि अछि। ई जाहि परिमाण अमे कथा लिखलनि ओहि परिमाणमे अद्यापि मैथिलीमे कोनो कथाकार कथा–रचना नहि कऽ पौलनि। हिनक सम्पूर्ण कथा–यात्रा केँ एकहि संग प्रकाशित करब दुःसाध्य ओ असम्भव थिक, कारण समग्र कथा एक विशाल ग्रंथक आकार लऽ लेत जकर सम्भावना मैथिलीमे नहि दृष्टिगत होइत अछि जे क्यो प्रकाशक एहन विशाल–काय कथा–संग्रह प्रकाशित कऽ पौलाह। मैथिलीक हेतु दुर्भाग्य पूर्ण स्थिति अछि जे हुनक जीवन–कालमे कोनो कथा–संग्रह नहि प्रकाशित भऽ सकल। एहन साहित्य–मनीषीक साहित्य–साधनाक एहिसँ पैघ पुरस्कार आन किछु नहि भऽ सकैछ जनिक स्मृति पटल पर मरिपद्मक साहित्य अद्यापि आच्छादित कयने अछि। पुस्तकाकार रूपमें हुनक कथा–कृतिक प्रकाशनो परांत हुनक कथा जनित प्रतिभाक वास्तविकताक यथार्थताक मूल्यांकनक सम्भावना अछि। हास्यव्यंग्य सम्राट प्रोफेसर हरिमोहन झा आधुनिक जीवन निश्चये विभिन्न प्रकारक विसंगति एवं विषमता द्वारा खंडित भेल जा रहल अछि। एहन स्थितिमे अभिव्यक्तिमे तिक्तता आयब अस्वाभाविक नहि। गंभीर रूपेँ आहत भेल मनुष्य जखन बाजत तखन ओ व्यंग्ये बाजत, जखन ओ किछु करत तखन प्रहारे करत। इऐह कारण अछि जे जखन रचनाकार आन्तरिक एवं बाह्य रूपेँ अपनाकेँ आहत अनुभव करैत छथि तखनओ व्यंग्यकार बनि जाइत छथि। व्यंग्यकारक उत्तरदायित्व भ’ जाइत छनि जे समसामयिक युगक समस्त विसंगतिक आलोचना प्रस्तुत करथि। वस्तुत: व्यंग्य एक एहन साहित्यिक अभिव्यक्ति अछि जाहिमे व्यक्ति तथा समाजक दुर्बलता, करनी-कथनीक अन्तरक समीक्षा वा निन्दाकेँ वऋभगिमा दए वार्णत: स्पष्ट शब्दक माध्यमे प्रहार कयल जाइत अछि। व्यंग्य र्णत: अगंभीर रहितहुँ गंभीर भ’ सकैछ, निर्दय रहितहुँ दयालु भ’ सकैछ, प्रहारात्मक होइतहुँ तटस्थ लागि सकैछ, मखौल लगितहुँ वौद्विक भ’ सकैछ, अतिश-योक्ति एवं अतिरंजनाक आभास देवाक बदला पूर्णत: सत्य भ’ सकैछ। व्यंग्यमे आक्रमणक मुद्रा तँ अनिवार्य अछि। प्राय व्यग्यकेँ उपहास, उपालभ्म, परिहास, प्रहसन, वाकू-वैदग्ध्य एवं वऋवित आदिसँ पृथक क’ देखबाक प्रचलन नहि अछि, किन्तु हास्य एवं व्यंग्यम किछु विपनता अछि। हास्य निप्प्रयोजन मुक्त एवं बाह्य धरातलक वस्तु होइछ तेँ ओ विशिष्ट नहि भ’सकैछ, परन्तु व्यंग्म कहियो निप्प्रयोजन नहि होइछ। व्यंग्यक प्रयोजन वस्तुत: गुढ़ एवं मार्तिक अछि। हास्य मनकेँ सतेज एवं प्राणकेँ सजीव करैत अछि। प्राकृत-हास्य मानव स्वभावक उज्जवल गुण थीक। एहिमे घृणा वा विरक्तिक लेशो नहि रहैत छैक। सिद्वान्त, व्यवहार, धारणा एवं वस्तु स्वरूपक बीचक असंगति हमरा हँसवाक हेतु बाध्य करैछ। प्राकृत-हास्य कटुताक बोध नहि करबैत अछि, प्रत्सुत असीम सामान्यता एवं असंगति वा अन्तविरोध ‘हास्य-कर’ होइछ। गंभीर स्तर पर तँ ओ दु:ख, पीड़ा, वेदना उत्पन्न करैछ। प्राकृत-हास्यमे एहि हेतु एक प्रकारक वृहत् अनुभतिक आशा रहैत अछि आ सामान्य अनभिज्ञता वा उपलब्धि सेहो। उच्चतम हास्यसँ कोमलता एवं करूणाचाक अभद संबंध रहैत अछि। हास्यसँ हमर अभिप्राय ओहि प्रत्येक मन: स्थितिसँ अछि जकरा हास्य व्यंग्य, हँसी-ठट्टा कौतुक, विनोद-रसिकता आदि शब्दसेँ साहित्यमे व्यक्त कयल जाइत अछि। अंग्रैजीमे ह् युमर शब्दमे आअँरँनि, रौटाइअँ, फन, जोक्स, प्लेजन्ट्रि जेस्ट, विट, फारस, पैरडि, रिड्-इक्यूल, आदि द्वारा व्यक्त सम्पूर्ण मन: स्थिति कोनो ने कोनो रूपसँ मिश्रित अछि। अतएब अंग्रेजीकहू युमर धारणसँ अर्वाचीन साहित्य अत्यधिक प्रभावित अछि। रसमयी रचनाक सिद्वहस्त प्रर्ण हास्यरसावतार प्रोफेसर हरिमोहन झा आधुनिक मैथिली कयलनि अपन अद्वितीय प्रतिभाक परिचय देलनि अछि। एकरे फलस्वरूप ओ एतेक लोकप्रियता अर्जित कयलनि। एहिसँ सिद्व भ’ गेल अछि जे मिथिलाक पावन भूमि एहि क्षेतमे विद्यापतिक जन्म द’ सकैछ। हिनक उपलब्ध रचनामे गद्यक प्रधानता अछि हिक प्रदृत्ति कथा-साहित्य दिस विशेष रहल। हिनक पूर्ववर्ती कथाकार कथामे गद्यक उत्पन्न क’ अन्तमे पातक हत्या क’ दैत छलाह। अवसाद एवं निराशाक वातावरणसँ संपूर्ण मैथिली कथा साहित्य तिमिराच्छन्न भ’ रहल छल। मैथिली साहित्यमे ई श्रेय प्रो. हरिमोहन झाकेँ छनि जे सर्वप्रथम एहि प्रवृत्तिकेँ चिन्हलनिआ आ एहिसँ पृथक भ’हास्य-व्यंग्यक नव प्रवृत्तिक अवलम्बन कयलनि। मैथिलीक पाठककेँ अवसादमय वातावरणसँ फराक क’ हास्य व्यंग्यक एक नवीन मागेक रश्मि प्रदान कयलनि। मौथिलीमे हिनह हास्य-व्यंग्यसं युक्त रचनाम कन्यादान, द्विरागमत, प्रणम्य देवता, रंगशाला, खट्टर ककाक तरंग, चर्चरी, एवं एकादशी, पुस्तकाकार प्रकाशित अछि। एहिसँ अतिरिक्तो किछु कथा तथा स्फुट कविता समय-समय पर पतिकादिमे यत-तत प्रकाशित अछि जाहिमे हास्य-व्यंग्घक अजस्त्र धारा बहाओल गेल अछि। जीवनक प्रत्यक्ष देखल अनुभवगम्य रूपकेँ हास्य-व्यंग्यक माध्यमे चितित करब हिनक वैशिष्ट्य अछि। समकालीन मैथिल समाजक कुरूचिपूर्ण एवं सामाजिक विकृति पर कुठाराघात करैत-करैत ई अतिरजनाक आश्रय सेहो लेलनि अछि। जीबनमे अतविरोध, असंगति, क्षुद्र प्रव़त्ति, मूर्खतापूर्ण संघर्ष, बाबा वाक्य प्रमाणमूक हठधर्मिता, दम्भ, पाखण्ड, ढोंग, मिथ्या बड़प्पन, स्वार्थ-परता आदि हिनक हास्य-व्यंग्यक प्रमुख आलम्बन रहल अछि। हिनक रचनामे आचार, अनुष्ठान एवं धार्मिक वाह्याडम्बरक प्रति तीव्र आत्रोश भेटैत अछि। ई अपन रचनामे मानव मनक मोद, मोह, शोक, वेदनाकेँ एक मनोवैज्ञानिक जकाँ पर्यवेक्षण कयलनि अछि। वस्तुत: ग्राम्य परिवेशक यथार्थक अवतारणामे ई सिद्वहस्त छथि। ’कन्यादान’ एवं ‘द्विरागमन’ हिनक बहुचर्चित उपन्यास थीक। मैथिली उपन्यासमे‘कन्यादान’ क विशेष महत्व अछि। एहिमे अनमेल विवाहक समस्याकेँ उठाओल गेल अछि। पति-पत्नीक ई बेमेल ओकर अवस्था वा रूपक कारणे नहि, प्रत्युत शिक्षा दीक्षाकेँ ल’ कय अछि। एक एम.ए. पास युवकक विवाह ए.बी.सी. पर्यन्त नहि जननिहारि कनियाक संग होइत छैक। एहि प्रकारक विवाहकेँ उपन्यासकार नाटक काहेकद्ध भर्त्सना करैत छथि। अतएव स्त्री-शिक्षा ‘कन्यादान’ क प्रमुख स्वर थीक। एतय उपन्यासकार मैथिल समाजमे प्रचलित वैवाहिक विपमताकेँ अपन हास्य पृष्ठभूमि बनौलनि। एकर नायक सी.बी. मिश्र अत्याधुनिक पाश्चात्य सभ्यताक प्रतीक थिकाह जे ग्रामीण परिवेशसँ अनभिज रहलाक कारणेँ अपन आतृभाषा पर्यन्तसँ अपरिचित भ’ जाइत छथि। नायिका बुच्ची दाइ प्राचीन मैथिल संस्कृतिक प्रतीक थिकीह जनिका पर पाश्चात्य सभ्यताक कोनो छाप नहि छनि। नायक-नायिका संधर्षमय परिस्थितिक चिद्रण कय उपन्यासकार हास्य-ध्यंग्यसेँ ओत-प्रोत वातावरएणक निर्माण पाठकक हेतु कयलनि अछि। कन्यादानक अवसर पर जखन नायकस नाम पुछल जाइत छनि तखन ओ उत्तर दँत छथि—‘हमर नाम छय सी. सी. मिश्रा।‘1 एहन उत्तर सुनि मिथिलाक अशिक्षित महिलावृन्दक अट्टहाससँ सम्पूर्ण वातावरण गुंजित भ’ जाइत अछि। एहि पर एक तरूणी जे अपनाकेँ सबसेँ कुधियारि बुझैत छवि ओ छथि ओ टिप्पणी करैत छथिन—‘नखन तँ बोतल मिसर हिंनक बापे होइथिन।द्धद्ध वस्तुत: एहि प्रकारक कथोपकथन उपन्यासमे अनेक स्थल पर आयल अछि, जतय उपन्यासकार हास्य-रससँ युक्त वातावरणक निर्माण करबामे सफल भेलाह् भेलाह् अछि, ओतडि अशिक्षित मैथिलानी पर व्यंग्य सेहो कयलनि अछि। एकर किछु चरितकँ व्यग्यंकार एहि प्रकारेँ प्रस्तुत कयलनि अछि जे पाठक पर अपन अमिट छाप छोड़ैत छथि। ‘कन्यादान’ क घटकराज टुन्नी झाक स्वरूप, बजबाक शैली एवं उच्चारण प्रऋियासँ लोक चीन्हि जाइत अछि जे घटकैती करबामे पूर्ण अनुभवी भ’ गेला पर कथा तीन प्रकारेँ स्थिर करैत छथि ‘’एकटा खनखनौआ जाहिमे कन्यागत खनखनाके टाका हँसोथि लैत छथि। दोसर मानि लिय टनटनौआ जाहिमे बर पक्ष टनटनाक’ हजार पाँच शैक तोरा गनबैत छथि। तेसर मानि लिय ठनठनौआ जाहिमे वर कन्यागत दुह ठनठन गोपाल भए काज करैत छथि। हिनक खनखनौआ, टन-टनौआ, ठनठनौआ बलाघटकैतीक वृत्तान्त सुनितहि पाठक हँसैत-हँसैत लोट-पोट भ’ जाइत अछि। घटक-राज अपन वाक्-पटुतासे सेहो मनोरंजन करैत छथि। घटकराजकेँ घटकैतीक प्रति ई वैज्ञानिक दृष्टिकोण देखाय उपन्यासकार हनका अपूर्व क्षमता प्रदान कयलनि अछि। जनैत एहिसै सफल चरिख कन्या-दानमे आर कोनो नहि अछि तकर कारण जे टुन्नी झा जकाँ अपन पक्षक प्रतिपादन बुते नहि भेलनि। ओ सामाजकि दोप तिलक-प्रथाक स्तम्भ स्वरूप थिकाह। एकरे फलस्वरूप मैथिल समाज दिन प्रतिदिन जजेरित भैल जा रहल अछि। ’कन्यादान’ एवं द्विरागमन अविस्मरणीय चरिख झारखण्डीनाथक क्रिया-कलाप, बाजब-भुकब, चलब-फिरब, खायब-पीयब सभमे हल्लुक हास्य भेटैत अछि। झारखण्डीकेँ वास्तवसे एतबा ज्ञान नहि छनि जे लाल काकीक तारक विपयमे ककरो आगूमे चर्चा नहि करबाक प्रतिज्ञा क’ एकर पालन करी। डाक्टरक संग हुनक कथोपकथनक एक अंश थवणीय अछि ‘’हमरा आङनमे कव्जियत बूझि पाता है। रामजीक परतापसँ कहियो-कहियो पेटो फूलि जाता है और लोक बेद नीके रहता है।‘’ जतेक बेर‘कन्यादान’ पाठक द्वारा बयम पुछला पर हुनक उत्तर तँ सुनू—‘’ सरकार ! हमरा लोक सभ दुलारसँ ‘खट्टर’ कहता है, लेकिन असल नाम झारखण्डी माय-बाप राखि दिया। और उमिरमे सरकार सब भाईसँ छोट है।‘’ ‘द्विरागमन’ मे झारखण्डीनाथ लाल ककाक ओतय बुच्ची दाइक शिक्षिका मेम साहेबक स्वागत करबाक हेतु प्रस्तुत होइत छथि। मेम साहेब हुनकासँ जिज्ञासा करैत छथिन—‘’ बाथ एहि ठामसँ बहुत दूर है। कोस छबेक-सातेकसँ कम नहि पड़ेगा। बाथ (गाम) मे आपका के रहता है ?‘6 बहवाँडि उत्तर तथा अपरिचित भाषाक नकलसँ एहिठाम हँसी लगैत अछि। उपन्यासकार हास्य उत्पन्न करबाक हेतु कतिपय चरित केँ अवलम्ब बनौलनि अछि। पुरोहित, जनिका लेल शुद्व उच्चारण करब गुण नहि, प्रत्युत आवश्यक छनि ; तोतराइत छथि। एहन पुरोहितक प्रसंगमे उपन्यासकार कहैत छथि—‘’ पंडित नवोनाथ झा तोताराइत-तोतराइत कंठरूपी बोरासँ उभड़-खाभड़ मंतक रोड़ा गड़गड़ा कए उझिलय लगलाह।‘’; मोहरिर जे लिखाइ-पढ़ाइ करैत-करैत बूढ़ भ’ गेल छथि, किन्तु तारक ‘क’ अक्षर पढ़बाक परिश्रममे परिश्रममे असफल भ’ जाइत छथि। बड़का गामवाली एवं बटुक जी प्राचीन परंपरागत रूढि़क झुंडमे रहितहुं शुद्व ओहि पक्षक पक्षपाती नहि छथि। हिनका सभक चरित्रमे साधारण बुद्वि उपन्यासक अन्य पात्रक अपेक्षेँ अधिक मात्रामे छनि। बटुक जी मूर्ख रहितहुँ अदूषित बुद्विक छथि। हिनक वार्तालय पाठकक मनोरंजन करैत अछि। एहि दृष्टिसँ सी. सी. मिश्रक प्रसंग हिनक कथ्य विलेक्षण अछि —‘’ हमरा लेखेँ त कुछ न छथ। ‘शंशकीरित’ मे हमरा साथ न बोल सकँ छथ। एगी कनी गो ‘जोतिश’के बाम पूछ देलिएन ताहीमे ढोकार हो गेलन। शीशूबोध के एगो इशलोक पूछलिऐन त चूड़ा अमौट दुन्नू खसे लगलैन। कुछ न छथ। मङनीमे महग छथ’’ ग्रामीण परिवेशमे रहितहुँ बड़का गामबाली पाश्चात्य सभ्यताक प्रतीक थिकीह जे सी. सी. मिश्रकेँ अपन हाथक कठपुतरी बना लैत छथि। हिनकेमे सी. सी. मिश्र अपन भावी पत्नीक मधुर कल्पना करय लगैत छथि जकर वास्तविकताक रहस्योदघाटन चतुर्थीक राति भ’जाइत अछि। उपर्युक्त नरित्र उपन्यासमे ‘कौमिक वातावरण उत्पन्न करबामे सहायक भेल अछि। भेल अछि। एहन-एहन पात्रक वृत्तान्त पढि़ क’ हँसी तँ लगबे करैछ, संगहि इही अनुभव होइछ जे समाजक प्रत्येक अंगमे सुधारक प्रयोजन अछि। ‘प्रणम्य-देवता काटाक्ष-पूर्ण रेखा-चित्र अछि जे प्रधानत: सामाजिक आलोचना प्रस्तुत करैत अछि। एहिमे ओ प्राचीन कथा-पद्वतिकेँ ग्रहण क’ गंभीर सँ-गंभीर विषयकेँ सरस-सुस्वादु बना क’ जनमन-रंजनक संग रूढि़-ग्रस्त जीर्ण-शीर्ण, विचारधारा परआधात कय नवीन प्रगतिक प्रेरणा दैत छथि। हिनका ने तँ प्राचीन अन्ध-विश्वासक प्रति निष्ठा छनि आने नवीनताक प्रति आसक्ति। एहिमे हास्य-व्यंग्यक सबसँ उपयुक्त स्थल तखन अवैत अछि जखन ओ भोजन अथवा धर्माचरणक प्रसंगकेँ ल’ कय कथाक पुष्ठिभूमि बनबैत छथि। जेना ‘विकट-पाहुन’ क चित्रणमे भोजन-प्रियता एवं अव्यवहार-कुशलताक कारणेँ हिनका सभकेँ दोसराक असौकर्यक कोनो ध्यान नहि रहैत छनि। पाहुनलोकनि अपन परिचय प्रोफेसर साहेवक लग कोना दैत छथि से देखू—‘’हें-हें-हें-हें अपने जे किने से हमरा चिन्हने हैब1 चीन्हब कोना ? कहियो देखने रही तखन ने ! हम अपनेक मसियौतक जे किने से-साढ़ू क पिसिऔत भाय होयबैन्ह।‘’ एहि प्रकारक परिचये वास्तवमे हास्यास्पद भ’ जाइत अछि। अध्रपक्क कटहर, एक हत्था पाकल केरा, एक बोतल धृत, माल्टेड मिल्क, एक पसेरी दालमोट एवं एक धरिका अमोटसँ गजेन्रद्र नाथ, ब्रजेन्द्र नाथ, भीमेन्द्र नाथ एवं दिसम्बर नाथक पनरिआइ होइत छनि। आब भोजनक सूची दिस दृकूपात करू— ‘’किन्तु हमर सरबेटा दिगम्बर नाथ—हें-हें-हें बिनु सोजने भात कोना खैताह ? हिनका लेल छनुआ सोहारी, अनोन तरकारी बना देबँन्ह। मधुरक संग खा लेताह। हमरालोकनि तँ- हेँ-हेँ-हेँ-हेँ धरे थिक। भोजनमे जे किने से भात, दालि, तरकारी, धृत, दही, चीनी, सब, आर की। हमरा संगमे एकटा जमीरी नेबो अछि से दूरि भेल जाइत अछि। तेँ थोड़ँ क मोछो मंगा लेब।‘’ मैथिलक भोजनप्रियताक एलबम एहिमे भेटि जाइत अछि जे हास्य उत्पन्न करबामे सहायक सिद्व होइछ। ’प्रणम्य-देवता’ मे धार्मिक आचरणक उल्लेख ‘धर्मशास्त्रचार्य’ एवं ‘ज्योतिषाचार्य मे विशेष रूपेँ भेल अछि। धर्मशास्त्रचार्य महामहोपाध्याय धुरन्धर शास्त्री अपन धार्मिक एवं आडम्बर ततेक ने पसारैत छथि जे पहिने ओ गामक लोक पर हँसैत छलाह; किन्तु बाह्याडम्बरक विरोध भेला पर आब हुनके पर संपूर्ण गाम हँसय लगैत अछि।‘ज्योतिपाचार्य ‘क अन्तर्गत ज्योतिप जनित आडम्बर पर व्यंग्य कयल गेल अछि। एहि दोपपूर्ण कारणेँ आदिस्यनाथ एवं मार्त्तण्डनाथक बीच टीका-टिकोअलि सेहो भ’ जाइत छनि। एहिमे सामाजिक समस्याक अतिरिक्त पारिवारिक समस्या पर सेहो व्यंग्य कयल गेल अछि। ‘साझी आश्रम’ मे जे चित्र प्रस्तुत कयल गेल अछि ओहि आधार पर परिवार सुख-साधनक बदला दु:खक अपार सागर बनि गेल अछि। वस्तुत: साझी आश्रयक जे दुर्दशा होइत छैक तकर एलबम भगीरथ झाक परिवारमे भेटैत अछि।11 व्यग्यकार अत्याधुनिक युगमे फैशनक बढ़ैत स्वरूप पर दृष्टिगम करैत छथि तँ हुनक लेखनी अत्यधिक प्रखर भ’ जाइत छनि। एहि, प्रकारक फैशनक अत्यधिक प्रभाव समकालीन नवयुवक समुदाय पर पड़ल अछि। अत्यधिक बनने दुर्घटना भ’ जैबाक संभावना रहैत छैक। आइ काल्हुक अप-टुडेट लेडी’ क प्रतीक थिकीहु ‘मंजुला देवी।‘’12‘नकली लेडी’ कोना सहजहि गमा जाइत छथि से ‘प्रणम्य देवता’ क ‘अंगरेजिया बाबू’क पत्नी ‘चमेली दाइ छथि।13 हुनक नकली स्वरूप तँ देखू—‘’ हे भगवान ! ई की !श्रीमती जी सबटा चौपट कैलैन्हि। नाक पर ‘स्नो’ लागल। कनपटद्यटी पर ‘पाउडर’पोतल ! गाल पर ‘लिपिस्टिक’ ढेउरल ! ठोर पर ‘नेल पालिश लेभरल ! हाय ! हाय !बहुरूपियाक वेश बना लेलन्हि ।‘’ जे ‘हिन्दुस्तानी साहेब’ अंग्रेजक ‘प्रियतम सम्बन्धी बनय चाहैत छथि तनिक झलक मधुकान्त चारत्रमे भेटैत अछि। ’रंगशाला’ क प्रत्येक कथा ओना तँ हास्य-व्यंग्सँ ओत-प्रोत अछि, किन्तु एकरा हिनक अन्यान्य रचना सदृश लोकप्रियता नहि भेटलैक। एहि प्रसंगमे ओ लिखैत छथि—‘’ई तेहन मनोनुकूल नहि भेल आ ततबा लोकप्रियो नहि भ’ सकल। तथापि एकरा द्वारा एक ढर्रा कायम भ’ गेलँक और गोटा नव-नव पर कथा-कहानी लिखय लगलाह।‘’15एकर प्रत्येक कथा एक वर्ग विशेषक प्रतिनिधित्व करैछ। हास्य-व्यंगक माध्यमे कथाकार सामाजिक दुर्नीतिसँ समाजकेँ पथक करबाक प्रयास कयलनि अछि। पात्रक चयनमे कथाकारकेँ बीआय नहि पड़लनि कथाकार स्वयं एहि तथ्यकेँ स्वीकार करैत छथि—‘’ हँसि, हँसि कऽ आनन्द कियेक ने लेल जाय ? क्षणिके विनोद सही, रसक छिटका तँ भेटत। कोन ठेकान, कदाचित एतबे मात्र सत्य होइक।‘’16 हास्य व्यंग्यक अत्यन्त सजीव ‘खट्टर तरंग’ मे उपलब्ध होइछ। एकर कधा नायक खट्टर कका पूर्णत विनोदी प्रकृतिक व्यक्ति छथि। हिनक प्रत्येक बात विनोदपूर्ण होइत छनि। ई अपन प्रत्युत्पन्नमतित्वक कारणेँ सदिखन काव्य-शास्त्र:विनोदक धारा प्रवाहित करैत् छथि। हिनक विनोदपूर्ण वार्तामे व्यंगयकार व्यक्ति, समाज धर्म, दर्शन आदिक कटू आलोचना करैत छथि। थैकरे जकरा ‘राउण्ड एबाउट पेपर्स’ कहलनि तकरा व्यंग्यकार खट्टर ककाक समक्ष परम्पर-के केन्द्र विन्दु बनबैत छथि। ओकर चारू भाग नवीन विचार-धारा प्रस्तुत करैत छथि। आधुनिक परिप्रेक्ष्यमे प्राचीन मान्यता कोनो अर्थ नहि रखैत अछि। ‘खट्टर ककाक तरंग’ मे वणित विषय विचारात्मक, सरस एवं मनोरंजक अछि। हिनक वात लुती सन होइत छनि। ई देशक मूर्खताक श्रेय पंडितकेँ दैत छथि। एहि कमये ई असली एवं नकली पंडितक सम्पक् विश्लेषण कयलनि अछि—‘’ असली पंडित विद्याक अन्वेषणमे रहैत छथि, नकली पंडित विदाइक अन्वेषणमे। असली ज्ञानक विस्तार करैत छथि, नकली पंडित धोधिक विस्तार असली पंडित सूर्खताक संहार करैत छथि, नकली पंडित केवल मधुरक।‘’ हिनका अनुसारे वैह वासतवमे पाडित्य प्राप्त कयने छाथे जे अपन बुद्विक प्रयोग नित-नूतन आविष्कार हेतु करैत छथि। क वेद-पुराण, कमेकांड-धर्मशास्त्र गीता-वेदान्त, रामाण-महाभारत, ज्योतिष-आयुर्वेद, तंत्र-मंत्र, देवी-देवता स्वर्ग-नरक, पुनर्जन्म-मोक्ष, पाप-पण्य सभकेँ ई कोना लैत छथि से देखबाक एवं हँसबाक अवसर एहीमे भेटँत अछि। एकर मर्मस्पशी व्यंग्य अन्तस्तलमे पहुँचि सुरसुरी लगा दैत अछि। ओ अन्ध-विश्वास, धार्मिक पाखण्ड दोंग, रूढि़ आदिक प्रति व्यंग्यक माध्यमे भयानक विद्रोह करैत छथि। एहि प्रकारक मतक खण्डनमे हिनका ततवा रस भेटँत छनि जे सामाजिक रूढि़ वा अन्धविश्वास पर प्रहार करबाक हेतु ई संदिखन भंगघोटना लेने तत्पर रहैत छथि। जाधरि पाश्चात्य-प्राच्य सभ्यता एवं संस्कृतिक समन्वय नहि हैत ताधरि जीवनक कोनो मूल्य नहि। अतएव एहन समन्वय कोन प्रकारेँ होमक चाही ? युगक अनुसारेँ समन्वय अनिवार्य प्रतीत होइत अछि। एहि प्रसगमे खट्टरककाक दावा छनि जे ओ गोनू एवं गंगेश दुनूक वंशज थिकाह तखन पाश्चात्य सभ्यताक प्रतीक बूझब भ्रम थीक। हुनक कथन छनि जे ‘’ही इयैह बात तँ बुझबामे नहि अबैत अछि। कोन प्रकारेँ सम्न्वथ करै कहैत छह ? आबसँ शिवजीक माथ पर ‘सोडा वाटर’ ढारि दिऐन्ह ? भगवतीकेँ औचरक बदला ‘गाउन’ ओढ़ा दिऐन्ह? कुल देवताकेँ लिपिस्टिक लगा दिऐन्ह ? श्राद्वमे ‘केक’ ल’ कए पिंड दी? ब्राह्यण भोजन करा क’ ‘बिल’ द’ दिएन्ह ? जनउ धोबक हेतु ‘लोण्ड्री’ मे द’ दिऐक ? तारा काकीकेँ अंग्रेजीमे समदाउन गाबय कहिऐन्ह।‘18 एहि प्रकारेँ परम्परावादिताक जालमे ओझरयल समाज एवं व्यक्ति पर ओ जे व्यंस्य कयलनि अछि ताहिमे शाश्क्तक माधुर्य्य एवं कुनैनक तिक्तताक प्राचुर्य अछि। हुनक कथन छनि ‘’हमर बात् होइत अछि ओलक टोंटी कतेक गोटाकेँ भक द’ लगतँन्ह। कतेक गोटाकेँ अमाँशय उखडि़ जेतँन्ह।‘’19 हिनक विनोदपूर्ण विचार-पाठक विशेष रूपसेँ मनोरंजन करबे करैत अछि संगहि स्थल-स्थल पर व्यंग्य रूप तेहन झँसिगर भऽ गेल अछि जे औखि-नाकसँ पानि सेहो बहय लगैत । एहिसँ स्पष्ट जाइछ जे हिनक व्यंयक अत्एंत स्पष्ट रूप एहिमे उपलब्ध होइछ। चर्चरी हिनक विविध रूपक रचना संग्रह थीक। एहिमे कथा-पिहानी, एकांकी-प्रहसन, गप्प-सप्प किछु संगृहीत ओछ जाहिमे प्राचीनता एवं आधुनिकता पर समान रूपेँ व्यंग्य कयल गेल अछि। परम्परावा एवं अन्धविश्वासी मैथिल संस्कृतिक प्रतीक थिकाह भोल बाबा, जे अपन वाक् चातुर्य्यसँ हास्य एवं व्यंग्यक धारा बहौलनि अछि। ओ पुरातनताक पृष्ठभूमिमे अर्वाचीनताक जन्म मानैत छथि। उपर्युक्त परिप्रेक्ष्पमे हिनक‘दलान परक गप्प’, ‘चौपाडि़ परक’, ‘धूर तरक गप्प’ एवं ‘पोखरि परक गप्प’ विशेष उल्लेखनीय अछि। हिनक मान्यता छनि जे प्राचीन महापुरूष लोकनिक आदर्शमय जीवन छलनि। ओ स्वाभिमान, मर्यादा एवं मनस्विताक सुरक्षार्थ सतत तत्पर रहैत छलाह। भोल बाबाक अनुसारेँ आधुनिक सभ्यता प्राचीन पृष्ठभूमिमे कोनो अर्थ नहि रखैछ। ई प्राचीनकेँ आदर्श-मानि आधुनिकता पर व्यंग्य करैत कहैत छथि जे आधुनिक समयमे सब प्राचीन वस्तु समाप्त भेल जा रहल अछि—‘’हाथीकेँ मोटर खयलक, धोड़ाकेँ साइकिल खयलक, रामलीलाकेँ सिनेमा खयलक, भोज केँ पार्टी खयलक, भाँगकेँ चाह खयलक तथा संस्कृतिकेँ अंग्रजी खयलक।‘’20’’ हरिमोहन झा हास्य-व्यंग्यक माध्यमे नारी जागरणक शंखनाद कयलनि। चर्चरीक अनेक कथाक माध्यमे ओ मिथिलाक तारीमे दुर्गाक रूप प्रतिष्ठिन करय चाहैत छलाह। ग्रेजुएट पुतोहु’21 मेमे जाग्रत नारीक प्रति समाजमे उत्पन्न प्रतिकियासँ परिचय करबैत छथि। ‘ ग्राम सेविका’22 मे ओ जाग्रत नारीक मंजुल मंगलमयी मूर्तिकेँ प्रतिष्ठित करैत छथि। नारी जागरणक फलस्वरूप ओहो सब आब काटरक विरोधमे नारा लगबैत छथि। ‘एहि बाटे आबै छथि सुरसरि धार’23 मे मिथिलाक नारी अनमेल विवाह एवं तिलक दहेजक विरोधमे आवाज उठौलनि। ओ सब कहैत छथि जे ‘’ बिकी बला वर जाथु अपन घर। जे मँगताह हजार से रहताह कुमार। जे गनताह ओ कनताह। घटक पजियार होठ होशियार आब ने चलत ई रोजगार।‘24 किछुए दिनक पश्चात् नारीक एतेक बेशी जागरण भेल जे ओ सब आदर्श-विवाहक हेतु आन्दोलन प्रारंभ कयलनि। समाजक एहन कांति देखि व्यंग्यकार कहैत छथि ‘’ हरब तिलक ने तँ रहब कुमारि। जे नहि करताह द्रव्यक माँग, सैह भरता कन्याक माँग। तिलक करू दूर तखन दिअ सिन्दूर।‘’25 एहन परिवर्तित परिस्थितिमे नारी पुरूषक संग चलब प्रारंभ कयलनि तकरा देखि भोल बाबा चिन्तित भऽ जाइत छथि। ओ कहैत छथि जे नारी जागरणक फलस्वरूप ‘’पुरूषक संग बैसि क’ दौड़ैत अछि, कुदैत अछि, फनैत अछि, हेलैत अछि, नचैत अछि।‘’26 हिनक हास्य व्यंग्यक प्रतिभाक वास्ततिवक प्रस्फुटन हिनक काव्यमे भेल अछि। हिनक हास्य व्यंग्यक रूप अधिक स्पष्ट तखन होइत अछि जखन ओ समकालीन समाजमे प्रचलित अवस्थाक कारणेँ अनमेल विवाहक समस्या पर प्रहार करैत छथि। मिथिलाक सामाजिक जीवनमे ई मान्यता प्रचलित रहल अछि जे पुरूष कतबो विवाह किऐक ने करथु, किन्तुनारी एकहि विवाहक अधिकारिणी छथि। एकरे फलस्वरूप वृद्व व्यक्ति अपन कुलीनताक आधार पर अनेक विवाह करैत छथि। व्यंग्य-कवि एहि पृष्ठ भूमिक व्यंग्यात्मक शब्द चित्र अपन प्रसिद्व कविता ^ढालाझा’27 मे प्रसतुत कयलनि अछि। ढाला झाक स्वरूपक चित्रण करैत कहैत छथि जे हुनक माथ पर फाटल पुरान पाग तथा कान्ह पर गोबनौर सन अंगपोछा, माथ खल्वाट, त्रिपुण्डछक तीन ठोप तथा पैध रूद्राथ टीकमे बान्हल छनि। इऐह थिकाह ढाला झा, लुट्टी झाक प्रणैत्र, नरहा पौजि, ककड़ौड़क वासी एवं बेलौंचेक वंशज। हिनक यथार्थ स्वरूप कार्टून सदृश अछि जकरा देखतहि पाठकक हास्यक कोनो अन्त नहि रहैछ। औ बहुविवाहमे विश्वास रखनिहार ओहि प्राचीन परम्पराक अनुमोदक तथा कुलीन प्रथाक प्रतीक थिकाह जे सासुरकेँ आर्थिक आयक अजस्त्र स्त्रोत मानैत छथि। समय-समय पर ओ ओतय ओहिना प्रस्तुत होइत छथि जेना महाजन लहना-तगादाक हेतु खदुकाक ओतय जाइछ। ओ अपन श्वसुरक प्रसंगमे जिज्ञासा करैत छथि— कहाँ गेलाह फल्लाँ झा कन्यादानी श्वशुर हुमर हुनकासँ जरूरी खानगीमे गप्प करबाक अछि22 कुलीनताक कारणेँ ढाला झा अपन श्वसुरक प्रति एहन संबोधत दैत छथि। मैथिल समाज विभिन्न प्रकारक पाँजि एवं जातिक नाम पर विभाजित अछि। ओ श्वशुरसँ भरना छोड़ैबाक हेतु टाकाक मांग करैत छथि, किन्तु हुनक अस्वीकारात्मक उत्तर पाबि बमकि उठैत छथि— सासुरक अछि कोन कमी, जाइत छी दोसर ठाम जे नहि रूपेया देत, भोगत भरि जन्म फल बेटी हकन्न रहतइ कनैत ओकर जीवन भरि हमरा की ? जेम्हरे जैब, सार कोनो भेटिए जैत। ई कहि फराठी लैत, लग्गा सन डेग दैत मैल किट्ट फाटल पुरान पाग माथ पर लैत अङपोछा कान्ह, कुद्व कठकोंकाँडि़ जकाँ विदा भेलाह ढाला झा पित्ते थर-थर कपैत 29 एतय हास्यमे सन्निहित व्यग्य द्वारा ओ सामाजिक दोष दिस सर्वसाधारणक दृष्टिकेँ आकृष्ट करैत छथि। मिथिला मध्य एहि प्रकारक वैवाहिक प्रचलन मुख्यत: जाति-पाँति पर अवलंबित अछि। मैथिलके गर्व छनि जे ओ श्रीकान्त झा, महादेव झा, यजुआड़ै एवं बेलौचेक वंशज थिकाह। वस्तुत: मूल आर गोत्र पर समाज ततेक विश्वास करैत अछि जे ओहि वितण्डावादक फलस्वरूप ओकर अध: पतन शनै-शनै भेल जा रहल अछि। एहि प्रकारक परंपरावादीद वैवाहिक कुरीतिसँ जर्जरित समाजक पाँजि’ पाटि, सिद्वान्त पतड़ा, हरिसिंह देवी व्यवस्थाओ कर्मकाण्ड पर व्यंग्य कवि कहैत छथि जे आधुनिक परिप्रेक्ष्यमे ओ सब ‘आगि’ मे धू-धू क’ जरि रहल अछि— रातिमे हम स्वप्न देखल, आगि लागल घर जरैये। चार सभ पुरना धधकि कय जोर सँ धू-धू करैये।।31 जहिना जहिना आधुनिकताक अग्नि अत्यधिक प्रज्वलित भेल जा रहल अछि तहिना पुरातन-ताक धज्जी-धज्जी उडि़ रहल अछि। एतय ओ अन्धविश्वास, असमर्थता, आडम्बर, धर्म-नीति एवं संस्कृति पर निर्ममता र्वक व्यंग्य कयलनि अछि जतय फोंका पर्यन्त बहरा जाइत अछि। अर्थाभावक कारणेँ समकालीन मैथिल समाजमे कन्या-विकयक प्रथा सेहो प्रचलित अछि। कन्या-विकयक कारणेँ अनमेल विवाहकेँ प्रोत्साहन भेटल अछि। एकरे परिणाम थीक जे कोमल कलीकेँ कोकनल ढेंगक संग विर्वाह करय पडैत छनि। व्यंग्यकार‘कन्याक नीलामी डाक’32 मे अध: पतित कुलीन प्रथा एवं समाज पर कुठारधात करैत छथि। वर पक्ष एवं कन्या पक्षक घटक उपस्थित भ’ कोना परस्पर वर्तालाप करैत छथि, कथा स्थिर करैत छथि, तकर रूप तँ देखू— वर पक्षक घटक— सिंह लग्न मे जन्म भेल छन्हि, वयस तीनिये श्रीस। टीपनि अपने मिला लिय, संवत उनैस सै तीस। कलम चारि बीधा अपन छन्हि, हर बड़द दुइ जोड़। डेढ़ पाइ मासो किनलन्हि अछि, टका छैन्हि नहि थोड़। बेस किमतिगर छथि पनिगर हिनका सन भेटत ने आन। (कानमे कहैत छथि) तीस टका अपनहु के भेटत, खैब सुपारी पाम। दुनू पक्षक घटकक पारस्परिक वार्तालापक कममे विवाह स्थिर भ’ जाइछ, कारण कन्याक पिता कन्या बिकी हेतु उताहुल छथि। व्यंग्यकार एहन कन्याक पिता पर व्यंग्य करैत छथि— करब कथा पहिने जौँ हम्मर सभटा कर्ज सधावी चारि सौ जे गनि दिय’ व्यवस्था झट सिद्वान्त लिखाबी 31 एहि पर वरक उत्तर छनि— तावत तिन सै आनल, बाँकी देब सधाय 35 एहि पर कन्याक पिता उत्तर दैत छथि— ‘हैण्ड नोट लिखि देल जाय, अपनेकेँ कयल जमाय’ 36 जाहेना कोनो वस्तुक बिकीक हेतु बजारमे त्वंचाहंच होइछ तहिना वर एवं कन्यापक्षक घटक बीच सेहो होइछ। आश्चर्य तँ तखन होइछ जखन कन्याक पिता निर्ल ज्जतापूर्वक घोषणा करैत छथि जे जैह कर्ज सधा सकताह सैह कन्याक अधिकारी हेताह। समाजक आर्थिक दशा सुदृढ़ नहि रहलाक कारणेँ मिथिलामे एहि प्रकारक अनमेल विवाह प्रचलित अछि। एतय हास्य एवं व्यंग्य दुनूक रूप अत्यन्त तीव्र अछि। मैथिल लोकनिक भोजनप्रियता जगतसिद्व अछि। एहन भोजलन-विन्यास पर प्रो. झा निश्चित रूपेँ व्यंग्य कयलनि अछि। मिथिलामे जमायक स्वागतार्थ कतेक विन्यास कयल आइद तकर स्पष्ट चित्र ‘ढाला झा’ मे भेटैछ :— रातिमे सचार लागल ढाला झाक आर्गामे बाटी अठारह टा हुनका आगाँ लगाओल गेल बड़ बड़ी भटबड़ कदीमा तिलकोड़ और पापड़ तिलौरी ओ दनौरी आदौरी भाँटा एक बट्टा छल्हिगर दही एक बट्टा खोआ गाढ़ चीनी पर्याप्त, मालभोग केरा पाकल खूब डेढ़ सेर मेही भात, जाँति कऽ छलैन्हि परसल धृतसँ कँल चिक्कन तथा बाटीमे राहडि़ दालि आमिल देल, ऊपर खूब घृत छह छह करैत एहि प्रकारक भोजन-विन्यासक वर्णन सुनितहिँ निश्चये क्षुधाग्नि भऽ जाइछ। एतय व्यंग्यकार प्रचलित परंपरा पर प्रहार क’ हास्ये नहि, व्यंग्यक पर्याप्त सामग्री पाठककेँ देबाक प्रयास कयलनि अछि। समाजक अन्यान्य अपेक्षा ढोंगी-पोंगा-पथी पंडित लोकनि हिनक हास्य-व्यंग्यक सबसँ बेशी शिकार भेलाह। तन्त्र-मन्त्र, शास्त्र-पुराणक वितण्डवादक कारणेँ सामाजिक जीवन दिन-प्रति-दिन विषम भेल जा रहल अछि। एहना स्थितिमे व्यंग्यकार कोना चुप्प बैसि सकैत छथि ? धर्मक नाम पर विषम भेल जा रहल अछि। एहना अपनाकेँ अग्रदूत बुझनिहार पाखंडी ‘पंडित लोकनि’ पर व्यंग्य कय व्यंग्यकार हुनक भंडा फौड़लनि अछि। यथार्थत: ओ लोकनि अपन ज्ञानक दुरूउपयोग निष्प्रयोजन शास्त्रार्थक चकमे समाप्त क’ दैत छथि। आधुनिक संदर्भमे पंडितलोकनिक किया-कलाप ठप पडि़ गेल, किएक तँ युग परिचतित भ’ गेल अछि। परिवत्तित परिस्थितिकेँ देखि पंडितलोकनिमे आत्रोशक भावना स्वाभाविक अछि। एहना हुनका सभक विलापक अतिरिक्त आन कोनो उपाय नहि रहि जाइछ1 ‘पंडित’ मे पाठकेँ प्रचूर सामग्री भेटँत छनि— जमाना बदलि गेलैक, उनउलै बात सब पुरना। उठै अछि पित्त तँ बहुतो करू की वृद्व अथबल छी जहाँ बट्टाक धृत पड़ै छल भोजमे आगाँ तहाँ आब डालडासँ दालि छौंकल देखि छी 35 ‘बुचकुन बाबा’ केँ आधुनिक नारीक पहिरब-ओढ़ब, चलब-फिरब, लिखन-पढ़ब एवं उन्मुक्त जीवन फुटलो नहि सोहाइत छनि। हुनका अनुसार नारी सतत दासताक बेड़ीमे जकड़ल रहथि, सँह उत्तम। हुनकर कथन छनि जे लोक केचुआकेँ फूँकि-फूँ कि साँपक सर्जन रहल छथि। एहन परिस्थितिमे ओ हफीम खा क’ अपन प्राणान्त करय चाहैत छथि। व्यंग्यकार वस्तुत: एहन पण्डितक अन्ते चाहैत छथि। पाश्चात्य सभ्यता एवं संस्कृतिक रगमे सँगाक’ नारी ग्रामीण परिवेशमे अत्यन्त उपहासात्मक बनि जाइछ। एकर स्पष्ट चित्रण व्यंग्यकार 'अँङरेजिया लड़कीक समदाउन’ मेकयलनि अछि— आङनक बाहर घुमय नाह जयबैक भैसुर जैताह पड़ाय देब पितर किनको नहि हँसबैन्ह सभ जँताह तमसाय ओहिठाम जा अण्डा नहि मङबैक तकर ने छैक उपाय जो मन हो कहबैन्ह चुपचाताहे आनि देताह हमर जमाय 39 पाश्चात्य सभ्यतामे लालित-पालित कन्याकेँ चेतावनी दैत छथि; किन्तु हुनक व्यवहार पर व्यंग्यकारक आक्षेप एकदम स्पष्ट अछि। आधुनिक सभ्यातामे प्रो. झा केँ जे दोष परिलक्षित होइत छनि तकरी ई व्यंग्यक माध्यम बनबैत छथि। हिनक प्रसिद्व कविता ‘टी-पार्टी विशुद्वा हास्य-रसक रचना थीक। टी-पार्टी आधुनिक सभ्यता एवं संस्कृतिक प्रतीक थीक। एहि कवितामे कृत्रिमताक अभाव् अछि व्यंग्यकार कोनो अलंकरणक चेष्टा नहि कयलनि अछि। एकर भाषामे अद्भभुत प्रवाह अछि। हास्य-रसक पुष्टिक हेतु जेहन भाषा आवश्यक अछि ताहि रूपक भाषाक प्रयोग एहिमे कयल गेल अछि। ‘टी-पार्टी’ क बाह्यडम्बरक प्रति कवि उपहास करैत छथि— दूरे सँ देखँत छी जे अपूर्व अछि समारोह कुर्सी ओ टेबुल कतार सँ सजाओल अछि उज्जर दपादप श्वेत चादर ओछाओल और नाना प्रकारक फुलदान अछि शोभायमान40 पार्टीक साज-सज्जा तथा अल्प भोजनकेँ देखि कवि व्यंग्य करैत छथि— एकटा सिहारा और एक फक्का दालमोट एक रसगुल्ला और बुनिया एक चौठी मात्र तोला भरि सेबइ समतोला दुइ फाँक एक चुटकी किशमिश तथा सोहल केरा टा41 पार्टीक पश्चात् व्यंग्यकारक मनमे आधुनिक सभ्यताक प्रति जे भावना जागत भेल ओ निश्चये उपहासात्मक थीक। बस पार्टीक ने नाम लिय सोझे जाड भानसमे पजारू गऽ आँच शीघ्र खीचडि़ और साना बनाउ जतेक जल्दी हो आर ई कार्ड लऽ कऽ चूल्हिमे झोंकि दिअ42 प्रोफेसर हरिमोहन झाक उपर्युक्त रचना समूहक विश्लेषणसँ एतबा एतब। निश्चित रूपेँ कहल जा सकैछ जे ई मैथिली हास्य-व्यंग्य-साहित्यक उज्जवल भविष्यक सूचक भेलाह। हिनक हास्य-व्यंग्य रचनाक प्रभाव मैथिली समाज पर तीन रूपेँ पड़लँक। प्रथम तँ ई मैथिलीमे पाठक वर्गक निर्माण कयलनि। द्वितीय, मिथिलाक कन्यालोकनिक व्यक्तिगत जीवन प्रभावित भेल जकर फलस्वरूप हजारक हजार शिक्षित भ’ रहलि छथि। तेसर प्रभाव मैथिलीक परवर्ती साहित्यकारलोकनि पर पड़लनि ये एहि मे उन्मुख भेलाह जहिना सुस्वादु, चर्व्य चोष्य, लेह्य, पेय भोजनकेँ प्राप्त कयला पर हौइत छनि तहिना हास्य-व्यंग्यमे अभिरूचि रखनिहार पाठककेँ हिनक रचनाक पारायणोत्तर हिनक रचनाक लोकप्रियताक अनुमान तँ एही सँ लगाओल जा सकैछ जे उपन्यास ‘चन्द्रकान्ता संतति’ केँ पढ़बाक हेतु अनेक अहिन्दी भाषी पाठक प्रोफेसर हरिमोहन झाक चित्ताकर्षक हास्य-व्यंग्य-रचनाक रसास्वादनक लेल हिनक विभिन्न रचना समय-समय पर विभिन्न भारतीय एवं मासिक पित्रकादिमे अनूदित भ’ प्रकाशित होइत रहल अछि। श्रेय हिनके छनि सर्वाधिक रचना विभिन्न भाषामे सेहो अनूदित प्रसंग-निर्देश 1. कन्यादान, पृष्ठ 18 2. तत्रैव, पृष्ठ- 19 3. तत्रैव, पृष्ठ— 21 4. तत्रैव, पृष्ठ— 37 5. तत्रवै, पृष्ठ — 38 6. द्विरागमन, पृष्ठ— 158 7. कन्यादान, पृष्ठ— 104 8. तत्रैव, पृष्ठ — 59 9. प्रणम्य देवता, पृष्ठ—3 10. तत्रँव, पृ — 12 11. तर्त्रव, पृष्ठ— 53 12. तत्रैव, पृष्ठ —232-245 13. तत्रँव, पृष्ठ—270 14. तत्रँव, पृष्ठ—274 15. प्रथम अखिल भारतीय मैथिली लेखक सम्मेलन, कथा विभागीय सभापतिक भाषण, वैदेही समिति, लाल बाग, दरभंगा-1853पृष्ठ-3 16. रंगशाला एक-झलक, पृष्ठ—‘ख’ 17. खट्टर ककाक तरंग पृष्ठ- 293 18. तत्रँव भूमिका, पृष्ठ-छ 19. तत्रँव — पृष्ठ-ग 20. चर्चरी, पृष्ठ-220 21. तत्रैव, पृष्ठ-1 22. तत्रैब पृष्ठ -24 23. तत्रव, पृष्ठ-189 24. तत्रै व, पृष्ठ-189 25. तत्रै व, पृष्ठ-129 26. तत्रै व, पृष्ठ- 248 27. मासिक स्वदेश, वर्ष-1 अंक 4 विकास संवत् 2005 चैत्र, पृष्ठ- 28. तत्रैव, पृष्ठ-153 29. तत्रैव, पृष्ठ-153 30. वैदेही, अक्तूबर 1253, पृष्ठ-155 31. तत्रै व 32. मिथिला, वर्ष-1 अंक-4 जेठ, सन् 1336 पृष्ठ- 99. 33. तत्रै व 34. तत्रै व 35. तत्रै व 36. तत्रै व 37. मासिक स्वदेश, पृष्ठ-154. 38. मिथिला-दर्शन मार्च पृष्ठ- 1260, पृष्ठ-2 39. वैदेही विशेषांक-सन् पृष्ठ 1350 पृष्ठ 9. 40. मासिक स्वदेश, वर्ष-1 अंक 4, -वैशाख, विकम 2005र्सवत् पृष्ठ- 391 41. तत्रै व पृष्ठ- 220 42. तत्रै व, पृष्ठ- 222 43 हरिमोहन झा अभिनन्दन ग्रन्थ 1983) हरिमोहन झाक रचनाक परवर्त्ती रचनाकर्मीपर प्रभाव विगत शताब्दी निश्चये मैथिली साहित्यक हेतु स्वर्ण कालक रूपमे प्रवेश पौलक जकर फलस्वरूप सामाजिक वातावरणक विशिष्ट सन्दर्भमे साहित्यिक वातावरणमे नव स्पन्दनक संचार भेलैक जे मातृभाषानुरागी रचनाकार एकर चहुमुखी विकास-यात्रामे मनसा वाचा कर्मणा आ कर्त्तव्य बुद्धया अजस्र साहित्य सरिता प्रवाहित करब प्रारंभ कयलनि जे पत्रिकादिक प्रकाशनक फलस्वरूप जनमानसमे मातृभाषाक प्रति अनुराग भावना उत्पन्न करबाक निमित्त जनजागरणक अभियान चलौलनि जे वर्त्तमान परिप्रेक्ष्यमे ऐतिहासिक महत्वक विषय भ’ गेल अछि। मातृभाषानुरागी साहित्य सृजक नव-नव प्रवृत्तिक रचनाक माध्यमे जनमानसक ध्यानाकर्षित करबाक निमित्त नव भाव-धाराक साहित्य-सृजन करब प्रारम्भ कयलनि तकरा अस्वीकार करब रचनाकारक प्रति अज्ञानता प्रदर्शित करब हैत। पत्रिकादिक प्रकाशनोपरांत मैथिली गद्य गंगा सहस्रमुखी साहित्यिक धारा उन्मुक्त भ’ कए प्रवाहित होमय लागल जकर फलस्वरूप एकांकी, उपन्यास, कथा, निबन्ध, नाटक, प्रहसन, संस्मरण एवं यात्रा वृतांतादिक सर्वतोमुखी विकास-यात्राक शुभारम्भ भेल। वस्तुतः उन्नैसम शताब्दीक उत्तरार्द्धमे नवीनताक सूत्रपात भेल जकर फलस्वरूप आर्थिक, धार्मिक, राजनीतिक, सामाजिक, एवं सांस्कृतिक जीवनमे नव-नव परिवर्त्तन दृष्टिगत होमय लागल। सम्पूर्ण राष्ट्र यथार्थोन्मुख प्रवृत्तिसँ प्रेरित भ’ महात्मा गाँधीक स्वतंत्रता आन्दोलनक प्रश्रय देमय लागल। सामाजिक वातावरणक विशिष्ट सन्दर्भमे ओकर प्रतिनिधित्व पाश्चात्य शिक्षित वर्गक हाथमे छल। ओ लोकनि एक भाग अपन सांस्कृतिक विरासतक सुरक्षार्थ उत्सुकता देखौलनि तँ दोसर भाग नव आलोकक स्वागत कयलनि। एही सांस्कृतिक अनुष्ठानक पृष्ठभूमिमे अत्याधुनिक भारतीय भाषादिक विकास-यात्राक शुभारम्भ भेल जकर नेतृत्व बुद्धिजीवी लोकनि कयलनि। एही संक्रांति कालमे साहित्यमे आधुनिकता प्रारम्भ भेल आ रचनाकार साहित्यक नवीनतम प्रवृत्ति दिस उन्मुख भेलाह जे हास्य-व्यंग्यक सजीव चित्र अपन साहित्यमे प्रस्तुत कयलनि। उपर्युक्त परिप्रेक्ष्यक स्वर्णिम बेलामे विगत शताब्दीक प्रथम दशकमे एक एहन अद्वितीय प्रतिभा सम्पन्न साहित्य-सृजक प्रादुर्भूत भेलाह जे अपन विविध रूपा अद्वितीय प्रतिभा सम्पन्न रचनावली ल’ कए पाठकक सम्मुख प्रस्तुत भेलाह जनिक साहित्यमे प्रचुर परिमाणमे हास्य तीक्ष्ण एवं प्रखर व्यंग्यक कारणेँ ओ जे लोकप्रियता अर्जित क’ कए प्रमाणित कयलनि जे मिथिलाक पावन भूमि अद्यापि विश्वकवि महाकवि विद्यापति सदृश सुसम्पन्न प्रतिभाशाली रचनाकार उत्पन्न क’ सकैछ ओ रहथि हरिमोहन झा (1908-1984)। ओ प्रचुर परिमाणमे उपन्यास, एकांकी, कथा, कविता, निबन्ध, प्रहसन, एवं जीवनयात्राक रचना क’ कए गद्य एवं पद्य धाराक अवरूद्ध मार्गकेँ नव प्रवृत्तिक रचनादि द्वारा प्रशस्त कयलनि। साहित्यक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थिक जे रचनाकार अपन अनुभूतिकेँ सत्यताक संग उद्घाटित करब साहित्यकारक दायित्व होइछ। रचनाकारक व्यक्तित्वक निर्माणमे अनेक प्रकारक भूमिका कार्य करैछ आ ओहि सभक सम्मिलित संयोजनसँ अपन रचनाक स्वरूप सुनिश्चित करैछ। मातृभाषानुरागसँ उत्प्रेरित आ अब्याहत मोह हिनका अपन कौलिक विरासतक रूपमे प्राप्त भेलनि जकरा ओ जीवन आ जगतक गम्भीर अनुभवकेँ व्यक्त करबाक तीव्र लालसा हिनका साहित्य-सृजन दिस प्रेरित कयलक। साहित्यिक क्षेत्रमे ई अपन अद्भूत समंवयात्मक दृष्टिकोणक परिचय देलनि। ओ युगक निष्प्राण धमनीमे अपन साहित्यक माध्यमे नव जीवनक रक्त संचारित करबाक प्रयास कयलनि। ओ गद्य आ पद्य दुनू विधामे समान रूपेण लेखन कयलनि, किंतु पद्यक अपेक्षा गद्य-विधाकेँ, जकर अभाव मैथिलीमे छल तकरा पूर्त्ति करबाक संकल्प कयलनि। ई श्रेय आ प्रेय हुनके छनि जे ओ सर्वप्रथम मिथिलाञ्चलक संगहि संग राष्ट्रीय आ अंतराष्ट्रीय जनमानसक नव्यतम प्रवृत्ति हास्य-व्यंग्यकेँ चिन्हलनि तथा ओकरा अवलम्बन क’ कए कन्यादान (1933), द्विरागमन (1943), प्रणम्य देवता (1945), रंगशाला (1948), खट्टर ककाक तरंगक प्रथम भाग (1948), द्वितीय भाषा (1955), चर्चरी (1960), एकादशी (1964), जीवन यात्रा (1982), आ काव्य संग्रह (2005) आदि पुस्तक रूपमे प्रकाशित अछि। एहिसँ अतिरिक्त निबन्धादि यथा स्त्री-शिक्षाक वर्त्तमान दशा (मिथिला वर्ष-1 अंक-1 सन् 1336 वैशाख), स्वराज केँ लेत (मिथिला वर्ष-1 अंक-8 सन् 1337 अगहन) एवं देशाचार (डॉ. प्रेमशंकर सिंहक शोध प्रबन्ध)मे समसामयिक सामाजिक कुरीतिक प्रति ओ साकांक्ष कयलनि। हिनक निम्नस्थ कथादि यथा निरसन मामाक सिनेमा (1961), प्रगतिक पथपर (1961), शास्त्रार्थक जोश (1962), सहस्त्रर्थाचिभ्यो नमः (1962), सहयात्रिणी (1963), आब मोक्षे चाही (1970), भोला बाबाक गप्प (1974), कालाजारक उपचार (1977) एवं महाभारतक क्षेपक (1979), मिथिला मिहिरमे धूल-धूसरित भ’ रहल अछि। हिनक प्रहसन यथा बौआक दाम (1946), महाराज विजय (1948), ठोपसँ टोप (1935), आदर्श मैथिल रेलवे एवं रेलक झगड़ा (1960) आदि कोनो संग्रहमे नहि आबि सकल अछि जे चिंतनीय विषय थिक। उपर्युक्त रचनादिमे ओ सामाजिक वातावरणक विशिष्ट सन्दर्भमे सामकालीन मैथिल समाजक कुरुचि पूर्ण सामाजिक विकृति एवं विसंगतिपर कुण्ठाराघात कयलनि। सादा जीवन आ उच्च विचारक ओ प्रतिमूर्ति रहथि। ओ सत्य ज्ञानक भण्डार रहथि। ओ सशक्त व्यंग्यकार रहथि। हुनक चिंतन, पाण्डित्य, नीर-क्षीर विवेचनक शक्ति, व्यक्ति-व्यक्तित्वक खरेपन, सोझ, सपाट कथनक निखरल स्वरूप जनमानस समक्ष प्रस्तुत भेल जे उपन्यासकार, एकांकीकार, कथाकार, कविताकार, निबन्धकार, प्रहसनकार, एवं जीवन-यात्राकारक रूपमे हिनक साहित्यिक अवदान निश्चित रूपें प्रेरणादायक प्रमाणित भेल राष्ट्रीय एवं अंतराष्ट्रीय स्तरपर। हिनक चिंतन आ साहित्य-साधना सागर सदृश विशाल अछि जे परवर्त्ती साहित्यसाधक लोकनिक प्रेरणाक अविरल स्रोत बनल। ओ अपन साहित्यिक प्रतिभा प्रसादात सामाजिक वातावरणक विशिष्ट सन्दर्भमे अन्ध-विश्वास, रूढ़िग्रस्त परम्परा, धार्मिक वितण्डावाद, जीवनमे अंतर्विरोध, असंगति, ढ़ोंग, दम्म, पाखण्ड, बाबा वाक्यं प्रमाणम् क’ हठधर्मियता, मिथ्या बड़प्पन, मूर्खतापूर्ण संघर्ष, जीर्ण-शीर्ण विचार धारापर कशाघात क’ कए आचार-विचार एवं वाह्याडम्बरक तीव्र आलोचना आ भर्त्सना कयलनि। आनक उपलब्धिकेँ सहज भावसँ स्वीकारैत ओ सत्य गुणग्राहकक भूमिकाक निर्वाह कयलनि। हिनक कृतित्वक वैशिष्ट्य थिक हास्यमे सन्निहित व्यंग्य द्वारा ओ सामाजिक दोष दिस जनमानसक ध्यान आकर्षित कयलनि। प्राचीन एवं अर्वाचीन परम्परा एवं परिपाटीक दोष सम्प्रति वर्त्तमान अछि ओहि सभकेँ लक्ष्य क’ कए ओ अपन व्यंग्यवाण सँ बेधबाक प्रयास कयलनि। हिनक साहित्यमे ने तँ प्राचीन अन्धविश्वासक प्रति निष्ठा अछि आ ने तँ नवीनताक आन्धानुकरणक प्रति आशक्ति। हरिमोहन झाक सम्पूर्ण साहित्य मात्र मिथिलाञ्चलक परिसर धरि सीमित नहि रहल, प्रत्युत राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तरपर उज्ज्वल भविष्यक सूचक सिद्ध भेल। हिनका द्वारा स्थापित परम्पराक प्रभाव परवर्त्ती युवा पीढ़ीक साहित्यपर तीन रूपें पड़लैक। प्रथम तँ ई मैथिलीमे पाठक वर्गक निर्माण कयलनि। द्वितीय मिथिलाञ्चलक कन्या लोकनिक व्यक्तिगत जीवन प्रभावित भेल जे हजारक हजार शिक्षित भ’ कए एक नव ज्योति जगौलनि। तृतीय प्रभाव पड़ल परवर्त्ती साहित्यकार लोकनिपर जे हुनका द्वारा प्रवाहित हास्य-व्यंग्य अविरल धाराक अनुकरण क’ कए साहित्यक विभिन्न विधामे साहित्य सृजनक परम्पराक शुभारम्भ कयलनि। मैथिली साहित्यमे हिनका द्वारा हास्य-व्यंग्यक जे धारा प्रवाहित कयल गेल ओ एक नव-युगक अवतारणा क’ कए नव ज्योति जगौलक। हिनक प्रतिभाक छाहरिमे न्यू फोर्सक आविर्भाव भेलैक। हुनक कथा-साहित्यक परिवेशमे न्यू फोर्सक औनाहटिकेँ नहि थाहल जा सकैछ। न्यू फोर्सक अवतारणा एहन धरातलपर भेल आ एकर औनाहटि सर्वथा मौलिक छैक। हिनक साहित्यमे एकहि अकुलाहटि थिक समाजक नव जीवन शक्ति (भाइटल फोर्स)क प्राचीनताक सड़ल छोलकोइया फोड़ि क’ जनकल्याणक किरणसँ बाहर हैबाक अकुलाहटि। हुनक साहित्यमे रूढ़िवादक अन्धकार पूर्ण रात्रिक अंतिम अंशमे विहग कुलक रागिणी जे अयनिहार नवयुगक आन्दोलनक स्वागतमे गूंजि रहल अछि। ओ नारी जागरण शंखनाद कयलनि जकरा माध्यमे पर्दा प्रथा, तिलक-दहेज, बाबा वाक्यं प्रमाणम् पर गम्भीर चोट कयलनि। हिनक साहित्य समाजक बीच प्रखर वेगसँ प्रवाहित होइत विभिन्न सामाजिक शक्ति सोसल फोर्सक घात प्रतिघात अछि। हुनक पात्र सभ परिस्थितिक प्रवाहमे बहैत अछि। आधुनिकताक बसातमे हिलैत अछि। मैथिली उपन्यासक क्षेत्रमे ई हास्य-व्यंग्यक जे अजस्र धारा बहौलनि जे परवर्त्ती उपन्यासकार लोकनिक पाथेय बनल। जतय ओ शिक्षा-दीक्षा कारणेँ अनमेल विवाहक बलिदानक वेदी कन्या लोकनिक कुर्वान होइत देखलनि तकरा परवर्त्ती उपन्यासकार लोकनि व्यापक परिधिमे आनि यथा अवस्थाक कारणेँ अनमेल विवाह, रूप-गुणक कारणेँ अनमेल विवाह, शिक्षा दीक्षाक कारणेँ अनमेल, विधवा-विवाह आदि विविध सामाजिक वातावरण विशिष्ट सन्दर्भमे समसामयिक समाजमे व्याप्त विविध समस्यादिपर व्यंग्य कयलनि। वस्तुतः हिनक उपन्यासक प्रभाव मैथिली साहित्यपर तीन रूपें पड़लैक-समाजक मनोवृत्तिपर, कन्या लोकनिक व्यक्तिगत जीवनपर तथा परवर्त्ती लेखक समुदायपर। हिनक उपन्यास नव युगक चौराहापर सामाजिक वातावरणक विशिष्ट सन्दर्भमे परम्परावादक गुदरी पहिरने, कट्टरता मारल, ढ़ोंगक झमारल, रूढ़िवादी जजर्रित समाजपर तीक्ष्ण व्यंग्य क’ कए हास्य उत्पन्न कयलनि। हिनक हास्य-व्यंग्यसँ संयुक्त उपन्यास माइल स्टोन प्रभावित भेल जे हिनका द्वारा स्थापित मापदण्डक टक्कर क्यो नहि क’ सकला। हिनका द्वारा स्थापित एहि प्रवृत्तिक व्यापक प्रभाव परवर्त्ती अत्याधुनिक उपन्यासकार लोकनिपर पड़लनि जे वस्तुतः एहि प्रवृत्तिक वास्तविक विकास दृष्टिगत होइत अछि। हिनकासँ प्रभावित भ’ योगानन्द झा (1922-1986) मिथिलाञ्चलमे प्रचलित कुलीन प्रथाक निस्सारतापर भलमानुस (1944) मे अन्धविश्वासक वेदीपर सुकुमारी निर्मलाक निर्मम हत्या आ पवित्रा (1966)मे बाल-विवाहक कारणेँ वैधव्यक समस्या उपस्थित क’ कए व्यंग्य कयलनि। हरिसिंह देवक वैवाहिक व्यवस्थाक पृष्ठभूमिमे कन्या-विक्रय आ वृद्ध-विवाहक पृष्ठभूमिमे वैद्यनाथ मिश्र यात्री (1911-1998), पारो (1353 साल) एवं नवतुरिया (1954)मे अवस्थाक कारणेँ अनमेल विवाहक समस्यापर व्यंग्य कयलनि। उपन्यास सम्राट व्रजकिशोर वर्मा मणिपद्म (1918-1986) अनलपथमे प्राचीन कुलीन प्रथाक नीचाँ दबायल चिनगोरा नव सामाजिक चेतनाक स्फुलिंग बनि क’ भुवनेश्वर एवं सरिताक रूपमे खिलैत अछि। सामाजिक नैतिकताक भर्त्सनाक संगहि-संग एहिमे सामाजिक जीवनमे राजनीति एवं आर्थिक पक्षपर व्यंग्य कयल गेल अछि। शारदानन्द झाक जयवार एवं अवधनारायण झाक वनमानुषमे उपन्यासकार समाजांतर्गत कतिपय उदण्ड व्यक्तिक दुष्कर्मसँ परिवार कलंकित भ’ सम्पूर्ण समाज हास्यापद भ’ जाइछ। राजकमल (1929-1967), पाथर फूल (1957) एवं आदि कथा (1958)मे व्यक्तिक व्यवहार एवं आंतरिक जगतक वीभत्स नग्नता एवं सामाजिक विरूपतापर व्यंग्य कयलनि। जतय विन्देश्वर मण्डल बाटक भेट जिनगीक गेंठ (1967)मे तिलक-दहेजपर ततय रूपकांत ठाकुरक नहलापर दहला (1967)मे बीसम शदीक उत्तरार्द्धमे जीवनमे आयल विसंगतिपर हास्य-व्यंग्य शैलीमे समसामयिक समाजपर व्यंग्य कयलनि। समाजक परिवर्त्तित परिवेशमे ओ कथा-साहित्यांतर्गत जाहि हास्य-व्यंग्य शैलीक अवतारणा कयलनि तकरा परवर्त्ती पीढ़ीक युवा कथाकार लोकनि अधिक प्रशस्त कयलनि। किछु कथाकार तँ हुनक विचारधाराक अनुगमन कयलनि आ किछु व्यंग्य-मिश्रित भाषा-शैलीकेँ। परवर्त्ती कथाकार कोन अनुपातमे हुनक अनुकरण ओ विचारणीय प्रश्न अछि। हिनक कथाक लोकप्रियताक फलस्वरूप परवर्त्ती कथाकार हाँजक हाँज अग्रसर भेलाह जकर फलस्वरूप हास्य-व्यंग्य शैलीक निम्नस्थ कथा संग्रह प्रकाशमे आयल यथा नागेन्द्र कुमारक ससरफानी (1947), दृष्टिकोण (1954), शिकार (1954), एवं फलेना जामुन (1955), मायानन्द मिश्र (1934)क भाङक लोटा (1957) गोविन्द चौधरीक पाञ्चजन्य, रूपगर्विता एवं पाँच फूल, उदयभानु सिंहक जखन-तखन (1963), रूपकांत ठाकुरक धूकल केरा (1964) एवं मोमक नाक (1965), रमानाथ मिश्र मिहिर (1939-1999)क स्मृति (1965) एवं एकयुगक बाद (1975), छत्रानन्दसिंह झा (1946)क डोकहरक आँखि (1971) एवं काँटकूस (1977), हंसराज (1938-2006) जे कीने से (1972) दमनकांत झा (1924-1994)क गपाष्टक (1974), अमरनाथ झाक क्षणिका (1975), एकटा चाही द्रोपदी (1976), कबकब (1977), जोंक (1978), मोम जकाँ वर्फ जकाँ (1980) एवं अधकट्टी (2007) तथा मंत्रेश्वर झा (1944)क एक बटे दू (1977) आदि उल्लेखनीय अछि। परवर्त्ती किछु कथाकार एहन छथि जनिक कथा संग्रह तँ नहि प्रकाशमे आबि सकल अछि, किन्तु समकालीन पत्रिकादिमे हुनका सभक एहि प्रवृत्तिक कथादि प्रकाशित अछि जकर संख्या शताधिक अछि। हरिमोहन झा ने विश्रुत गद्यकार रहथि, प्रत्युत वाक् सिद्ध कविताकार सेहो रहथि। हुनका विलक्षण प्रतित्वपन्नमतित्वक प्रतिभा सेहो छलनि। काव्यक क्षेत्रमे कुत्सित वैवाहिक परम्परा, बाल-विवाह, वृद्ध-विवाह, आधुनिक फैशन एवं सभ्यता, महगी, धार्मिक पाखण्ड, पर्दाप्रथा इत्यादि विषय केन्द्रित क’ कए गंभीर व्यंग्य कयलनि। परवर्त्ती युवा पीढ़ीक कवि लोकनि कतिपय कविताक रचना कयलनि। ओ ढ़ाला झा (विक्रम संवत् 2003)मे एहन व्यंग्यात्मक चित्र प्रस्तुत कयलनि जे लुट्टी झाक प्रप्रौत्र, नरहा पाञ्जि, ककरौड़क निवासी तथा बेलौंचेक वंशज, जनिक स्वरूप देखितहि पाठकक हास्यक अन्त नहि होइछ। एकर प्रभाव परवर्त्ती बड़ चर्चित काव्यकार वैद्यनाथ मिश्र यात्रीपर पड़ल आ ओ बूढ़वरक रचना कयलनि जे मैथिल समाजक यथार्थ व्यञ्जना उपस्थित करैत अछि। ई कविता भावनाक तीव्रताक कारणेँ हृदयग्राही बनि गेल अछि। वृद्ध विवाहक शब्द-चित्र चन्द्रनाथ मिश्र अमर (1925) बुढ़बा काका (1364 साल)मे अंकित कयलनि जे पुनर्विवाहक हेतु कतेक व्याकुल छथि। एहन वृद्ध-वरकेँ देखि क’ केँ पाठक नहि हैत जकरा हृदयमे आक्रोशक भावनाक उदय नहि हैत। एहि परम्परासँ प्रभावित समाजक यथार्थ अभिव्यञ्जना वैद्यनाथ मिश्र यात्री बूढ़वरमे कयलनि : • माथ छलनि औन्हल छाँछ जकाँ • जीह गाँजक जोलही माछ जकाँ • दाँत ने रहन्हि निदन्त रहथि • बूड़ि रहथि घेंत्था वसन्त रहथि मिथिलाक समसामयिक समाजमे वृद्ध-विवाहक प्रचलनक कारणेँ कन्या विक्रय प्रथाक प्रचलन भेल। एहि परिप्रेक्ष्यमे हरिमोहन झा कन्याक निलामी डाक (1336 साल)मे पतित कुलीन प्रथापर कुण्ठराधात कयलनि जे कन्या एवं वर पक्षक घटक कोना मायाजालमे फँसा क’ कोमल कलीकेँ वृद्धक संग विवाह स्थिर करैत छथि तकर मार्मिक चित्रणसँ प्रभावित भ’ वैद्यनाथ मिश्र यात्री जखन कहैत छथि : • देख’ मे सुखैल पकटैल काठ रुपैया बान्हि बूढ़ ऐला सौराठ • तथा • ई की कैल उठा क’ आनल • कमलक कोढ़ी लै ढ़ेङ कोकनल • बेटीकेँ बेचलहुँ मड़ुआक दोबर • बूढ़ बकलेल सँ भरलहुँ कोबर आ उपर्युक्त प्रसंगमे चन्द्रनाथ मिश्र अमर कहैत छथि : • आगि देखौने कतहु नहि नमरैक लाह • वृद्ध विवाहक दुष्परिणाम होइछ अधिकांश कन्या विधवा बनि जाइछ। बाल-विधवाक जीवन केहन विषाद पूर्ण होइछ तकर स्पष्ट चित्रांकन वैद्यनाथ मिश्र यात्री कयलनि विलाप कवितामे। यथा : • भुस्साक आगि जकाँ • जरै छी मने मन हमहुँ • फटै छी कुसियारक पोर जकाँ • चैतक पछबामे ठोर जकाँ हरिमोहन झा अत्याधुनिक फैशन परस्त युवक-युवतीपर सेहो व्यंग्यक कुण्ठाराधात कयलनि जकर स्पष्ट चित्र भेटैछ बूढ़ानाथ (1960) काव्यमे। आधुनिक समाजमे नारीक चारित्रिक उच्छृंखलता कतेक वेसी अछि ताहिपर कवि व्यंग्य करैत छथि। एहिसँ प्रभावित भ’ वैद्यनाथ मिश्र यात्री अत्याधुनिक राधिकापर कटाक्ष कयलनि : • देवि स्कूटर वाहिनी घुरिआउ सन्ध्याकाल • कोनो होटल मध्य बाट तकैत हैत बाँके बिहारीलाल युग चक्रक कवि चन्द्रनाथ मिश्र अमर जखन कटाक्ष करैत छथि : सुन्दरता लै पुरुष फटै छथि नारी वर्गक कान कटै छथि तैं तँ महिला सब उठि चलली काटै पुरुषक कान कहौ केँ आधुनिक फैशनक अति व्यापक प्रभाव पड़ल, जाहिसँ प्रभावित भ’ परम्परावादी पण्डित लोकनि सेहो एहिसँ अछूत नहि रहि सकलाह। ओ सभ सेहो आधुनिकताक संग चरणमे चरण मिला क’ चलय लगलाह। गोपाल जी झा गोपेश (1931-2009) एहने एक पोंगा पण्डितपर व्यंग्य करैत छथि : देखने छलियनि पण्डित जीकेँ टोस्टक संग चाहक चुस्की लैत वैदिको जी भेटलाह सिनेमेमे देखय आएल छला राजकपूरक सतरंगी तमाशा अत्याधुनिक सभ्यतामे जतय हिनका दोष दृष्टिगत भेलनि तकरो ई व्यंग्यक आलम्बन बनौलनि। एहि दृष्टिएँ हिनक टी पार्टी (2005 साल) विशुद्ध हास्य-व्यंग्यसँ अनुप्राणित अछि जाहिसँ प्रभावित भ’ गोपालजी झा गोपेश कतिपय कविताक रचना कयलनि। धार्मिक पाखण्डक आलम्बन बना क’ ई कतिपय काव्यक सृजन कयलनि। तन्त्र-मन्त्र, शास्त्र-पुराणक वितण्डावादक कारणेँ सामाजिक जीवन दिन प्रति दिन विषम भेल जा रहल अछि। धर्मक नामपर अपनाकेँ अग्रदूत बुझनिहार पाखण्डी पण्डित लोकनिपर व्यंग्य क’ कए धर्माचारक भण्डा फोड़लनि जकर प्रत्यक्ष उदाहरण थिक हुनक पण्डित (1953) एवं पण्डित विलाप (1960)। एहिसँ प्रभावित भ’ राजकमल चौधरी वैद्यनाथ धामक पण्डा लोकनिपर, आद्यानाथ झा निरंकुश (1934) गामक भूत एवं ब्रह्मस्थानमे, काञ्चीनाथ झा किरण (1906-1989) माटिक महादेवमे (1950) तथा तन्त्रनाथ झा (1909-1994), मुसरी झा (1956)मे उपर्युक्त पृष्ठभूमिमे व्यंग्य कयलनि जाहिमे हास्यक रूप स्वयं उद्भाषित भ’ गेल अछि। जहिना ओ अपन गद्य-साहित्यमे नारी जागरणक शंखनाद कयलनि तहिना ओ अपन काव्यमे सेहो उपर्युक्त प्रवृत्तिकेँ अधिक मुखर कयलनि जकर स्पष्ट रूप हिनक अङरेजिया लड़कीक समुदाउन (1953) एवं बुचकुन बाबा (1358 साल)मे उपलब्ध होइछ। एहिसँ प्रभावित भ’ परवर्त्ती युवा कवि लोकनि कतिपय काव्यक सृजन क’ कए एकरा अधिक मुखर कयलनि। हिनक निरसन मामा (1953)सँ प्रभावित भ’ वैद्यनाथ मिश्र यात्री नवनाचारी तथा बुचकुन बाबासँ प्रभावित भ’ गोपाल जी झा गोपेश करिया काकाक रचना कयलनि। भिन्न-भिन्न स्थानसँ पत्रिकादिक प्रकाशनक फलस्वरूप निबन्ध-लेखनक एक प्रबल ज्वार आयल तकरे फलस्वरूप हास्य-व्यंग्य मिश्रित निबन्धक पारम्परिक शुभारम्भक प्रमाण थिक हिनक निबन्ध-साहित्य जाहिमे ओ समसामयिक सामाजिक कुरीति, पण्डित लोकनिक वाह्याडम्बर आ प्राचीन अन्धविश्वासकेँ खण्डित करबाक दिशामे जनमानसक ध्यानाकर्षित कयलनि। पहिने तँ हिनक निबंधादि वैदेही, मिथिला दर्शन, स्वदेश एवं मिथिला मिहिरमे प्रकाशित भेल, किन्तु पश्चात् जा क’ खट्टर ककाक तरंग प्रथम भाग (1948) आ द्वितीय भाग (1955)मे प्रकाशित भेल जकर फलस्वरूप एहि विधाकेँ अत्यधिक बल भेटलैक। हिनक निबन्धक प्रमुख नायक छथि खट्टर कका जे पूर्णत: विनोदी प्रवृत्तिक व्यक्ति छथि। हिनक प्रत्येक बात विनोद पूर्ण होइत छनि। ई अपन प्रतित्वपन्नमतित्वक कारणेँ सदिखन काव्य-शास्त्र-विनोदक धारा प्रवाहित करैत छथि। हिनक व्यंग्य युक्त विनोद पूर्ण कथनमे व्यक्ति, समाज, धर्म, दर्शन आदिक कटु आलोचना उपलब्ध होइछ। थैकरे जकरा राउण्ड एवाउट पेपर्स, कहलनि ओहि परिप्रेक्ष्यमे खट्टर कका पुरातन परम्परा यथा अन्धविश्वास, धार्मिक पाखण्ड, ढ़ोंग, रूढ़ि आदिपर व्यंगय क’ कए भयानक विद्रोह करैत छथि। हिनक निबन्धक प्रमुख स्वर रहल अछि वेद-पुराण, कर्मकाण्ड, धर्म-शास्त्र, रामायण-महाभारत, ज्योतिष, आयुर्वेद, तन्त्र-मन्त्र, देवी-देवता, स्वर्ग-नरक, पुनर्जन्म-मोक्ष आदि विविध विषयकेँ ओ कोन रूपेँ देखलनि जे हिनका तार्किक निबन्धकारक कोटिमे परिगणित क’ देलक। ओ गीता, दुर्गापाठ एवं सत्यनारायणक कथाक विनोदात्मक व्याख्या करैत छथि तँ सांख्य, वेदान्त एवं भगवत्-भजनपर व्यंग्यात्मक पिचकारी छोड़ैत छथि। हिनक निबन्ध साहित्य बिजलीक करेंटक समान अछि। धार्मिक पाखण्डक खण्डनमे ओ प्रमाण एवं व्यंग्यवाणक झड़ी लगा देत छथि। हिनक निबन्धादिककेँ पंक्ति-पंक्तिमे हास्य-व्यंग्यक अजस्र धारा प्रवाहित भेल अछि। विचार-प्रधान निबन्धमे देखल जाइछ जे विचारात्मक एवं मधुर भावात्मक गद्यशिल्पक सम्मिश्रण आ वाद-विवादक प्रसंगमे संयुक्त गम्भीर व्याख्यात्मक गद्य-शिल्पक तेजी रहैछ। एहन गद्य शिल्पक हेतु बात कहबाक लेल भाषा नहि तकैछ। निबन्धक क्षेत्रमे हुनका द्वारा स्थापित परम्पराक परिप्रेक्ष्यमे परवर्त्ती युवा निबन्धकार एहि प्रवृत्तिसँ अनुप्राणित भ’ आगाँ बढ़यबामे अद्भूत योगदान देलनि जकर संख्या सह्स्राधिक अछि। किन्तु दुर्योगक विषय थिक जे जाहि परिमाणमे हास्य-व्यंग्यसँ संयुक्त निबन्ध विभिन्न पत्रिकादिमे प्रकाशित भेल ओकर अत्यल्प संग्रह प्रकाशमे आयल अछि। खट्टर ककाक तरंगसँ सर्वाधिक अनुप्राणित भेलाह अमृतधारी सिंह (1918-1992) तथा हुनक शैलीक अनुकरण क’ कए घूटरबाबाक जाल (1976) एवं मन्त्रेश्वर झा ओझा लेखेँ गाम बताहे (1979) प्रकाशमे आयल। उपर्युक्त दुनू निबन्ध संग्रहमे हास्य-व्यंगयक संग कथात्मक रोचकताक समन्वय भेल अछि। एतय एक बातक उल्लेख करब अधिक समीचीन हैत जे एहि विधामे नव-नव प्रतिभा सम्पन्न निबन्धकारकेँ उपस्थित करबाक दिशामे पटनासँ प्रकाशित मिथिला मिहिर अत्यधिक प्रोत्साहित कयलक। किन्तु एतबा कहबामे अतिशयोक्ति नहि होयत जे जाहि प्रकारक लोकप्रियता हरिमोहन झा अर्जित कयलनि ताहि रूपक लोकप्रियता अद्यापि किनको नहि भेटलनि अछि। हरिमोहन झाक प्रहसन, एकांकी एवं छाया रूपक रचना क’ कए एक प्रतिमान प्रस्तुत कयलनि जकर व्यापक प्रभाव परवर्त्ती युगक युवा रचनाकर्मीपर पड़ल। एहि सब रचनादिमे व्यंग्य एवं हास्यक प्रधानता अछि जाहिमे ओ समाजकेँ कंगाल बना देनिहार दहेज प्रथा आ नारी जागरणक शंखनाद कयलनि। एहि दृष्टिएँ तन्त्रनाथ झाक एकांकी चयनिका (1947)मे कालेज प्रवेशमे एक अनुभवहीन, आधुनिकताक प्रिय एवं अर्द्धज्ञान प्राप्त छात्र समुदाय, तमघैलमे स्वार्थी समाज आ उपनयनाक भोजमे सामाजिक द्वेष तथा कुप्रथापर प्रपंच रचनिहार तथा घटकक पराभवमे नव युवक समुदायपर व्यंग्य कयलनि अछि जे विनु कन्या देखने विवाहार्थ प्रस्तुत नहि होइत छथि। योगानन्द झा मुनिक मतिभ्रम (1953)मे वृद्ध विवाहपर कठोर आघात कयलनि जाहिमे नाटकीय व्यंग्यक स्वर अधिक प्रखर अछि। सामाजिक वातावरणक विशिष्ट सन्दर्भमे समसामयिक घटनाक आधार बना क’ चन्द्रनाथ मिश्र अमर समाधान (1955)मे निरक्षरता निवारक पाठशालामे वयस्क शिक्षापर संगहि नवीन पाठ्य प्रणालीमे आधुनिक शिक्षा पद्धतिपर तथा मलरवि (1961) हास्य-व्यंग्यक जे वातावरणक सृजन कयलनि जे सर्वाधिक निखरल अछि। सुधांशु शेखर चौधरी (1920-1990)क हथटूट्टा कुरसी (1960)मे दू पीढ़ीक मानसिक वैषम्य, संघर्ष, वाह्याडम्बर, ममत्व एवं सामाजिक परिवेशपर कठोर व्यंग्य कयलनि अछि। एहि प्रवृत्तिकेँ आगाँ बढ़यबाक दिशामे परमेश्वर मिश्र क’ त्रिवेणी, हरिश्चन्द्र झाक छींक, रूपकान्त ठाकुरक वचन वैष्णव (1965) एवं लगाम (1966), चन्द्रकान्त झाक वाल्टी क्लब (शाके 1881) एवं पढ़बाक खर्च (शाके 1881), प्रबोध नारायण सिंहक हाथीक दाँत (1964), उदय नारायण सिंह नचिकेताक रामलीला (1977), जगदीश झाक मैथिली एकांकी प्रहसन (1988), किशोरी यादवक आँखिक बीझ (1987), मन्त्रेश्वर झाक बहुरूपिया (1993) एवं धूर्त्तनगरी (1993) समारोह (1991) एवं पराजय (1994) आदि-आदि एकांकी एवं प्रहसन हरिमोहन झाक हास्य-व्यंग्य शैलीक अनुकरण क’ कए लिखल गेल अछि। एहि विधामे कतिपय एकांकी एवं प्रहसनकार उद्भूत भेलाह जनिक रचनादि विभिन्न पत्रिकादिमे धूल-धूसरित भ’ रहल अछि जकर संकलन अद्यापि प्रकाशमे नहि आबि सकल अछि। हमर विश्वास अछि जे भविष्यमे एहि विधाक अनुकरण क’ कए परवर्त्ती युवा पीढ़ी नव रूपेँ हास्य-व्यंग्य प्रस्तुत करताह। कारयित्री एवं भावयित्री प्रतिभासँ समलंकृत हरिमोहन झाक उपन्यास, एकांकी, एवं प्रहसन, कथा, कविता, निबन्धादिमे हास्य-व्यंग्यक नव प्रवृत्तिक ओ जे नेओ देलनि ताहिसँ अनुप्राणित भ’ परवर्त्ती युवा रचनाकर्मी राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तरपर प्रभावित भेलाह जे उपर्युक्त विवेचनसँ स्पष्ट अछि। एहि प्रवृत्तिक हिनक विशाल साहित्यिक अवदान एक वट-वृक्षक समान अछि जकर परिसरकेँ केन्द्र-विन्दु मानि परवर्त्ती युवा रचनाकर्मी हास्य-व्यंग्यक अजस्र धारा प्रवाहित कयलनि आ पाठकवर्गक निर्माण, स्त्री शिक्षाक व्यापक प्रसार, अनमेल विवाहक अंत, धार्मिक वितण्डावादमे सुधार, चारित्रिक दुर्बलताक विनाश, राजनीतिक मूल्यमे ह्रास, सामाजिक वातावरणक विशिष्ट सन्दर्भमे सुधारक प्रयोजनीयताकेँ ध्यानमे राखि रचना कयलनि। हिनक साहित्यक व्यापक प्रभावक फलस्वरूप परवर्त्ती युवा पीढ़ीक साहित्य मनीषीपर पड़लनि आ हुनक प्रतिभाक प्रस्फुटन भेलनि। हुनक साहित्यक विशाल परिधिकेँ ध्यानमे राखि क’ जँ हुनका मैथिली साहित्यक चार्ल्स लैम्ब कहल जाय तँ कोनो अतिशयोक्ति नहि हैत। अंग्रेज समाजक जेहन चित्रण बनार्ड शॉक रचनामे उपलब्ध होइछ ओही प्रकारक मिथिलाञ्चलक सामाजिक जीवनक विशिष्ट सन्दर्भक एलबल थिक हिनक साहित्य-संसार। जहिना सुस्वाद, चर्व्य, चोष्य, लेह्य, पेय भोजनकेँ प्राप्त भेलापर पेटूकेँ आनन्द होइछ तहिना हास्य-व्यंग्यमे अभिरुचि रखनिहार राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय युवा पीढ़ीक परवर्त्ती रचनाकारकेँ हास्य-व्यंग्यक ई एक नव मार्ग प्रशस्त कयलनि। हिनक साहित्य-संसारक लोकप्रियताक अनुमान तँ एहीसँ लगाओल जा सकैछ जे जहिना देवकीनन्दन खत्रीक उपन्यास चन्द्रकान्ता सन्तितकेँ पढ़बाक हेतु अनेक अहिन्दी भाषी जनमानस हिन्दी सिखलनि तहिना हरिमोहन झाक चित्ताकर्षक हास्य-व्यंग्य रचनाक रसास्वादनक हेतु बहुतो लोक मैथिली सिखलक। हिनक विभिन्न रचनादि समय-समयपर विभिन्न आधुनिक भाषाक प्रमुख साप्ताहिक, पाक्षिक एवं मासिक पत्रिकादिमे अनूदित भ’ प्रकाशित भ’ अमैथिली भाषीकेँ आनन्दित कयलक। वस्तुतः ई श्रेय आ प्रेय हिनके छनि, जनिक साहित्य सर्वाधिक भाषामे अनूदित एवं समादृत भेल जे हिनका राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्यमे अत्याधुनिक परिवेशमे युवा रचनाकारकेँ साहित्य-सृजनक निमित्त उत्प्रेरित कयलक। विद्यापतिक पश्चात् मैथिली भाषा-साहित्यकेँ अन्तर्राष्ट्रीय पहचान देनिहार रचनाकारमे हिनक समस्त साहित्य अजर, अमर एवं अक्षुण्ण रहत से हमर विश्वास अछि। मिथिलेश कुमार झा, पिता श्री विश्वनाथ झा जन्म 12-01-1970 केँ मनपौर(मातृक) मे पैतृक ग्राम-जगति, पो*-बेनीपट्टी,जिला-मधुबनी, मिथिला, पिन*- 847223 डाक-संपर्क द्वारा- श्री विश्वनाथ झा, 15, हाजरा रोड, कोलकाता-- 700026 शिक्षा : प्राथमिक धरि- गामहिक विद्यालय मे। मध्य विद्यालय धरि- मध्य विद्यालय, बेनीपट्टी सँ। माध्यमिक धरि- श्री लीलाधर उच्च विद्यालय,बेनीपट्टीसँ इतिहास-प्रतिष्ठाक संग स्नातक-कालिदास विद्यापति साइंस काँलेज उच्चैठ सँ, पत्रकारिता मे डिप्लोमा-पत्रकारिता महाविद्यालय(पत्राचार माध्यम) दिल्ली सँ, कम्प्युटर मे डी.टी.पी ओ बेसिक ज्ञान। रचना: हिन्दी ओ मैथिली मे कविता, गजल, बाल कविता, बाल कथा,साहित्यिक ओ गैर-साहित्यिक निबंध, ललित निबंध, साक्षात्कार, रिपोर्ताज, फीचर आदि। प्रकाशित पहिल रचना: हिन्दी मे– मुखपृष्ठ अखबार का- जनसत्ता(कलकत्ता संस्करण) मे 19-10-94 केँ(कविता) मैथिली मे- विधवा(कविता)-प्रवासक भेंट(मैथिली मासिक कोलकाता)-रिकार्ड तिथि उपलब्ध नहि, आरक्षण सिर्फ सत्ताक हेतु- आलेख(प्रवासक भेंट-कोलकाता)- नवम्बर 1994 कें। प्रकाशित रचना: मैथिली:- प्रायः 15 गोट कविता, 17 गोट बाल कविता, 18 गोट लघुकथा, 3 गोट कथा, 1 टा बालकथा, 44 गोट आलेख आ 6 गोट अन्य विविध विषयक रचना प्रकाशित। प्रकाशित रचना:- हिन्दी:- प्रायः 10 गोट कविता/गजल, 18 गोट आलेख, 1 गोट कथा ओ 3 गोट विविध विषय प्रकाशित। समय—संकेत ___ नमस्कार,कहिया एलहुँ गामसँ ? काज नीके- जना सम्पन्न भेलै ने? ___ हँ- हँ, खूब नीकसँ सब किछु भ’ गेलै । ___ ऎं यौ, अहाँक बडका भैयाक की समाचार छनि ? ___ बडका भैया ! ठीक छथि । --- माएक काज मे सब भाँइ जुटल रहिऎ ने । ओहो भेटल छलाह । --- ठीक छथि । ___ --- --- !1 --- --- ‘ त ‘ भाए-भैयारीक भेंट सेहो आब काजे-परोजने हेतै की !!! ‘ --- --- ओ छगुंता मे पडि गेल छलाह। “हम मैथिल” (मैथिली त्रैमासिक) पत्रिकाक लोकार्पण दिनांक २६.०७.०९ (रवि दिन) केँ हावड़ाक मेडिज्कल क्लबक सभागारमे साँझू पहर आयोजित एकटा कार्यक्रममे मैथिली त्रैमासिक “हम मैथिल”क लोकार्पण भेल। एहि कार्यक्रमक अध्यक्षता कएलनि श्री किशोरीकान्त मिश्र। कार्यक्रमक उद्घाटन कएलनि श्री युगल किशोर झा, अतिथि छलाह श्री गंगा झा ओ श्री रामलोचन ठाकुर। पत्रिकाक विमोचन श्री नवीन चौधरीक हाथेँ भेल। संचालन कएलनि श्री प्रमोद ठाकुर। एहि अवसरपर विभिन्न वक्ता लोकनि पत्रिकाक हेतु हर्ष जनबैत संपादक-प्रकाशककेँ शुभकामना देलनि। दोसर सत्रमे श्री रामलोचन ठाकुरक अध्यक्षतामे एकटा कवि सम्मेलन भेल। एहिमे कविता पाठ कएलनि श्री अजय कुमार झा “तिरहुतिया”, श्री अमरनाथ झा “भारती”, श्री अनमोल झा, श्री मिथिलेश कुमार झा, श्री विनय भूषण आ श्री रामलोचन ठाकुर। कार्यक्रमक अन्तमे श्री मनमोहन चंचल धन्यवाद ज्ञापन कएलनि। लोकार्पित पत्रिका: हम मैथिल (प्रवेशांक जुलाइ-सितम्बर २००९) प्रधान सम्पादक-श्री रामलोचन ठाकुर संपादक-श्री मनमोहन मिश्र “चंचल” संपादकीय पता-१४८ सी.रोड, बामनगाछी, सलकिया, हावड़ा-६, फोन-९९०३२०१०५० पृष्ठ-४०, दाम-१६ टाका “संपर्क”क मासिक बैसार १२ जुलाइ २००९ (कोलकाता)-संपर्कक जुलाइ मासक बैसार नियमानुसार मासक दोसर रवि (१२ जुलाइ)केँ संध्या पाँच बजेसँ नवीन प्रकाशनक कार्यालय-कक्षमे भेल। एहि बैसारक अध्यक्षता श्री नवीन चौधरी कएलनि। आरम्भिक कुशल-क्षेम ओ विविध चर्चाक उपरान्त उपस्थित रचनाकार लोकनि अपन-अपन रचनाक पाठ कएलनि। संपर्कक परम्परानुसार संपर्कमे प्रस्तुत रचना टटका, अप्रकाशित ओ अपठित होइछ। प्रस्तुत रचना सभपर उपस्थित श्रोतागण अपन-अपन प्रतिक्रिया जनौलनि। रचनाक पाठ कएनिहार रचनाकार छलाह-मिथिलेश कुमार झा (समय-संकेत, उपकार-लघुकथा), अनमोल झा (नीक लगैत अछि हमरा-कविता), सुरेन्द्र ठाकुर (देखब कहीं छिलकि नञि जाए-कविता, मुइल राष्ट्र-कथा), नवीन चौधरी (दू गोट कथा)। पठित रचना पर उक्त रचनाकार सभक संगहि श्री किशोरीकान्त मिश्र, श्री नवोनारायण मिश्र, श्री देवशंकर मिश्र, श्री रोहित मिश्र, श्री विमलकान्त मिश्र, श्री शंकर मिश्र आदि अपन प्रतिक्रिया जनौलनि। हेमचन्द्र झा अग्रसोची आई महेश बाबू अपन तीनू बेटा अजय, विजय आ दुर्जयक संग कोनो विशेष मुद्दापर गप्प कऽ रहल छथि। गप्प कखनो फुसुर-फुसुर होईत अछि तँ कखनो तेज भऽ जाईत अछि। ओना महेज बाबू पकिया गृहस्थ। अपन गृहस्थीक बलपर तीनू बेटाकेँ पढ़ेलनि–लिखेलनि आ तीनू बेटीक वियाहो केलनि। सदिखन गाम घरसँ जूड़ल रहयवला महेश बाबू पहिले बेर दिल्ली अयलाह अछि, तीनू बेटा दिल्लीएमे छनि। अपने दुनू प्राणि गाममे छथि। तीनू बेटी सासुर बसैत छनि। खेत पथार बटाईपर छनि, तथापि ततेक भऽ जाईत छनि जे कोनो बेटासँ कहियो मंगबाक पयोजन नहि पड़ैत छनि। गाममे सभ कहैत अछि जे महेश बेस सुखितगर आदमी अछि, एकर परिवार बेस नीक छैक, सभ अपन पायरपर ठाढ़ छैक------आदि। आ तेँ महेशबाबू गाममे निश्चित छलाह। कहिया दिल्ली बेटा सभसँ भेंट करक लेल या धीया पुता सभकेँ देखबाक लेल ओ नहि अयलाह सालमे एक-आध बेर बेटे सभ गाम जाईत छलनि। तथापि एहिबेर मुद्दे से फँसि गेलनि जे दुर्गापूजाक बाद ओ अपन एकटा गौंआक संग दिल्ली अयलाह। सामने दियावाती या छठि रहबाक बावजूदो ओ एलाह। यद्यपि तीनू बेटामे थोड़-बहुत मतांतर रहैत छल, परन्तु ओ प्राय: प्रकट नहि होईत छल। मुदा एहि बेर फागुनमे अजयक जेठकी बेटीक कनेदानमे से नहि भेल। गप्प-शप्पक क्रममे नहि जानि कोन गप्पपर मझिली पुतोहु आत्मदाहक प्रयास केलकनि। यद्यपि दिनक समय छल आ कनेदान-दुरागमन रहबाक कारणे बेटियो सभ छलनि तेँ बात आगू नहि बढ़लैक आ मामिला थमि गेलैक। गाममे ई बात जंगलक आगि जेकां पसरि गेल आ देखैत-देखैत पूरा गामक लोक जमा भऽ गेल। महेश बाबूक सभटा संचित प्रतिष्ठा आ सुख-चेन जेना छनहिमे देखार भऽ गेलनि। कनिये दिनक बाद बेटा सभ सपरिवार वापस चलि गेलनि आ तीनू बेटियो अपन-अपन सासुर निचेनसँ आब महेश-बाबू पूरा प्रकरनपर विचार करय लगलाह जे एना भेल किएक। गाम-घरमे सेहो लोक सभसँ विचार-विमर्श केलनि ई बुझवामे भांगठ नहि रहलनि जे सभक जड़ि छैक पाई। मास्टर साहेब तँ प्रकटत: कहियो देलखिन जे अहाँ अपन जीबैत पाईवला झंझटि किएक ने फरिया दैत छियैक? वस्तुत: ६-७ साल पहनि महेश बाबू पाही पट्टीक एकटा एक बिघवा खेत बेचलनि। अपनासँ आब ओकर रखवाली कयल पार नहि लगैत छलनि, तेँ ओकरा बेच देलनि। किछु पाईं तँ जमीनमे फँसेलाह, किछु जमाय सभ लऽ गेलखिन आ बाँकी ४०,००० फिक्स कऽ देलाह। ओही साल अजयक बेटाक मूड़न जमा भेल। अजय येन-केन प्रकारेण दुनू छोट भायकेँ बुझा देलथि जे बैंकमे पाई राखलासँ की फायदा होयत। ई पाई हमरा दऽ दिअ। हम शेयर बजारमे एकरा लगायब आ गामक बाँकी सभ काज हमरा जिम्मामे रहत। हम एक्कहि सालमे एकरा दोबर-तेबर कऽ लेब आदि। परंतु से भेल नहि। कारण जे हो। दू-तीन साल बीतलाक बाद अजय राम कहानी शुरू केलनि जे हमरा शेयरमे घाटा लागि गेल। तथापि सभ सब्र केने रहल जे की पता शेयरक दाम बढ़ि जाई। परंतु ई की? एक दिन गप्प शप्पक क्रममे जेठकी दियादनी मझिली दियादनीकेँ कहलथिन्ह जे अहाँ सभ आब ओई पाईकेँ बिसरि जाईयौ। अहाँक भैंसुर घरक लेल ई केलथि ओ केलथि.....। आ एही मुद्दापर कनेदान आ दुरागमन संपन्न होईतहि उक्त घटना घटल। महेश बाबू शीघ्रातिशीघ्र एकर समाधान करय चाहैत छलाह। तथापि आषाढ़- सोनमे गामसँ बहरेताह कोना, तेँ दुर्गापूजाक बाद दिल्ली अयलाह, खास कऽ कऽ एहि मामिलाक पंचैती करक लेल। पहिने पहुँचलाह अजयक डेरापर, ओहिठाम हाँज-भाँज लेलनि ,परंतु ई नहि कहलनि जे एहि काजक लेल आयल छी। विजयक डेरा लगे छल। ओतहु गेला आ समटा बात बुझलनि। भरदुतिया दिन पहुँचलाह दुर्जयक डेरा। अजय आ विजय सेहो रहनि संगमे। फरिछौढ भऽ सकैत छल ओही दिन परंतु दुर्जयक बिनु हाँज-भाँज लेने ओ गप्प कहब उचित नहि बुझलाह। दुर्जयकेँ स्पष्टत: कहलनि जे हम एहि काजक लेल आयल छी आ एकर समाधानक रस्ता देखौलेन से तोँ ओई ४०,०००मे हिस्सा नहि लहक। हम कहि सुनिकेँ विजयकेँ किछु दिया दैत छियैक आ एहि तरहेँ हमर इज्जति प्रतिष्ठा बचा दय। चूंकि गप्प इज्जत प्रतिष्ठाक छल, दुर्जेय मानि गेल आ रवि दिन सभ भाईक बजाहटि भेल एहि लेल। पहिने तँ अजयक सामनेमे प्रस्ताव भेल जे तोँ ४०,०००×२ = ८०,००० केँ तीनू भाईमे बाँटि देहक। परंतु अजय तर्क रखलक जे हम एहि बीच गाममे अलान-फलान खर्च केलहुँ आ तेँ हम पाई नहि देब। संगहि ई परिवारक पहिल कनेदान छलैक, एहिमे हिनको सभकेँ शेयर देबय पड़तनि आ ई सभ शेयर नहि देलाह, तेँ हिनका सभक हिस्सा कटि गेल। तर्क सूनि सभ अकक् रहि गेल। दुर्जेय स्वयं कनेदानमे प्रस्ताव रखने छल जे अहाँक की पोजीशन अछि से कहू तँ हमहूँ किछु इंतजाम करैत छी। अजय मना कऽ देने छलाह। परंतु हुनका की बूझल छलनि से ओहि सझीवा पाईमे सँ हुनक हिस्सा कटि गेलनि। तहन अजयकेँ कहल गेल जे ई ठीक नहि केलह तँ ओ दोसर प्रस्ताव रखलनि जे अहाँ गाम जाउ आ खेत बेचिकेँ दुनू भाईकेँ ४०–४० दऽदियनु। ई प्रस्ताव तँ किन्नहु नै मानल जा सकैत छल। पर्याप्त कहा-सुनीक बाद अंतत: अजय २०,००० देबपर सहमत भेलाह आ ई फैसला भेल जे ओ २०,००० विजयकेँ दऽ देथिन। एवं प्रकारेण महेश बाबू एहि मुद्दासँ जान छोड़ेलनि। एहि सभ घटना क्रममे अग्रसोचीक बुद्धिक तारीफ करय पड़त। कनेदानसँ ६-७ साल पहिने योजना बद्ध ढंगसँ समटा सझेवा पाई अपन कब्जामे करब आ कनेदानक बाद हिस्साक नामपर काटब, वस्तुतः- हुनक धूर्तता आ चालाकीक उत्कृष्ट उदाहरण छल। अग्रसोची सुखी रहलाह। बिनु कोनो हुज्जतिकेँ पहिल कनेदान निकलि गेलनि। सभसँ घाटामे रहल दुर्जय। ओकरा हाथ किछु नै एलैक। लेकिन ओ पर्याप्त खुश छल जे सभटा पहिने देखार भऽ गेलैक। अन्यथा भाईमे सभसँ छोट रहने ओ सभ दिन सभक मददि करैत रहितय आ अपना बेरमे कियोनै आबि तैक मददि करय आ तटबक पछतेलासँ की लाभ होईतैक? गोनू झाक पंचैती गोनू झा आ चोरक लुका-छिपी बहुत दिन धरि चलैत रहल । चोर सभ ठकायल, पिटायल आ पकड़ायल तथापि हारि नहि मानलक । एक बेर गोनूक घर मे हाथ लागि गेला सँ धनक जे आशा रहैक से तँ रहबे करैक, सभ सँ बेसी चिन्ता रहैक गोनूक हाथें बेर-बेर भेल अपमानक बदला लेनाई । चोर सभ साँझ आ राति मे जा कऽ छका चुकल छल या पकड़ा चुकल छल । भेष बदलि कऽ साँझे पहुँचला सँ सेहो किछु लाभ नहि भेलैक आ एहि चक्कर मे गोनूक बाड़ी तमनाई सँ लऽ कऽ हुनकर गहूम धरि पटा चुकल चल । आब एके टा उपाय छलैक जे कोनो दिन गोनू देरी सँ घर आबथि आ ता सबेरे सकाल हुनका घर मे हाथ साफ कऽ देल जाय । चोर सभ एहि दिशा मे काज करब आ सियाइडी लेब शुरू कऽ देलक । एमहर गोनू आई-काल्हि राज दरबार मे काजक अधिकता सँ विलम्ब सँ घर अबैत छलाह । चोर सभ एही ताक मे रहय । ताहू मे एकटा रिस्क रहैक जे तँ एमहर घर मे पैसी आ ओमहर गोनू हाजिर भऽ जाथि तखन की होयत । एके टा उपाय रहैक जे येन-केन प्रकारेण घर वापस अबैत काल गोनू कें भांगक बहाने रोकल जाय आ ओमहर किछु चोर मिलि के हुनका घर मे तावत हाथ साफ कऽ दैक । सैह योजना बनल । एहिना एक दिन गोनू कने अबेर दबा के घर अबैत रहथि । ओ सभ दिन भांग चढ़ा कें घर आबथि आ ओहि दिन अबेर हेबाक बादो रस्ता मे एक गोटाक आग्रह पर भांग पिबाक लेल बैसि गेलाह । ओ भांग पिबाक लेल बैसले छलाह कि किछु अपरिचित चेहरा सभ कें देखलनि जे ओतय आबि के बैसि गेल आ हुनका आग्रह पर आग्रह करय लगलनि । गोनू कें ई बुझबा मे भांगठ नहि रहलनि जे एहि मे किछु चालि जरूर छैक । एमहर राति बितैत जाईक । गोनू कें एकाएक घरक सुरक्षाक धेआन एलनि । घर मे पत्नी असगरे चलखिन आ ताहू मे ओहि दिन हुनकर व्रत रहनि । मिथिलाक नारी पति कें बिनु खोएने खईतथि कोना, बड़ी राति धरि गोनूक इंतजार करैत रहलीह । हारि कें तमसा कें हुनक पत्नी खा लेलीह । तत्पश्तात पत्नी सूति रहलीह । तामस तँ रहबे करनि आ ताहि द्वारे भरि पेट खाईयो ने सकलीह तथापि कहुना कें अन्ठा-पन्ठा कें सूति रहलीह, ई निश्चय करैत जे आई भरि राति गोनू कें बाहरे ठाढ़ रखतीह । गोनू कें जहन सभटा माजराक आशंका भेलैन तँ ओ झूठ-मूठ तुरंते नशा चढबाक बहाना केलनि आ ओतय सँ चलि पड़लाह । चोर तँ सोचने छल जे जा गोनू नशा मे मत्त घर पहुँचताह ता हुनक संगी सभ हाथ साफ कऽ देत । ओमहर गोनूक घरक अगल-बगल छूपल चोर हुनका पत्नी कें सूतल देखि सेन्ह काटि घर मे ढूकि गेल आ ई अकानय लागल जे हुनक पत्नी नीक जेकाँ सूति रहलीह वा नहि । ओमहर गोनू भांग पीबि दौगले घर पहुँचलाह आ लगलाह केबाड़ कें जोर-जोर सँ पीटय । बड़ी काल बाद पत्नी घर खोललीह आ बरसि पड़लीह गोनू पर । गोनू घर मे प्रवेश कयला तँ हुनका ई बुझबा मे भांगठ नहि रहलनि जे आई फेर चोर सभ हमरा घर मे आबि गेल अछि । ओमहर चोरक संकट आ एमहर पत्नीक संभाषण । गोनू कने काल धरि शांत रहलाह आ चोर कें पकड़बाक योजना पर विचार करय लगलाह । ता धरि पत्नीक संभाषण चालूये छल । कनेक काल शांत रहलाक बाद गोनू बरसि पड़लाह पत्नी पर । फेर की छल, दुनू दिस सँ वाक्युद्ध होमय लागल । राति कने बेसी बीति गेल रहैक । लोक सभ घरे-घरे सूति रहल छल । तथापि गोनू आ हुनक पत्नीक आवाज सूनि सभ कियो जमा होइत गेल । धीरे-धीरे पूरा टोलक लोक जमा भऽ गेल । आब चोर सभ बेस फेर मे पड़ल । आब भागियो नहि सकैत छल । हारि कें ओ सभ दम साधि कें बैसल रहल । लोकक जमा भऽ गेलाक बादो गोनू आ हुनक पत्नीक वाक~युद्ध चलिते रहल । लोक सभ बीच मे गोनू कें चुप कराबय चाहलनि । तथापि ओ बजलाह जे ई हमर घरक मामिला अछि अहाँ सभ जाउ । तथापि भीतर सँ पत्नी एकर प्रतिवाद केलखिन जे टोलक लोक सभ आई एहि झगड़ाक पंचैती कऽ कें जाउथ । झगड़ाक क्रम मे गोनू बाहर रहथि आ हुनक पत्नी घरक अंदर । ओ घरक अंदरे सँ एहि बात पर जोर देलनि जे आई एहि झगड़ाक पंचैती भऽ कऽ रहय । अंत मे टोलबैयाक आग्रह पर दुनू गोटे शांत भेलाह आ पंचैती पर रजामंदी देखेलैन । तथापि गोनू कहलखिन जे अहाँ मे सँ कियो शुरू सँ हमरा लोकनिक झगड़ा देखलौंह अछि जे पंचैती करब । जाउ एहन व्यक्ति कें बजा कें लाउ जे शुरू सँ हमरा लोकनिक झगड़ा देखने हो ओएह उचित पंचैती कऽ सकैत अछि । गोनूक ई गप्प सूनि सभ अवाक् रहि गेल । बड़ विकट समस्या छल । सत्ते टोलबैया मे सँ कियो शुरू सँ दुनू गोटाक झगड़ा नहि देखने छलाह । तथापि कियो बजलाह - गोनू बाबू एहन पंच तँ नहि भेटत । अहाँ दुनू गोटे अपन-अपन बात रखियौक आ ताही आधार पर पंचैती हेतैक । तथापि गोनू बजलाह जे जँ हम एहन लोकक पता बता दी जे शुरू सँ हमरा सभक झगड़ा देखलक अछि, तँ ओकर बात अहाँ सभ मानबैक? एहि पर लोक सभ तैयार भऽ गेल । गोनू इशारा केलनि लोक कें जे घरक दक्षिण-पश्चिम कोन पर चारि-पाँच टा पंच छथि । हुनके सभ कें पकड़ि के आनू । लोक सभ बूझि गेल गोनू बाबूक चालि आ फेर पकड़ा गेल चोरबा सभ सीने पर । सभ कियो मीलि खूब पीटलनि चोरबा कें आ ओ सभ येन-केन प्रकारेण कुहरैत-हुकरैत अपन घर पहुँचल आ गोनूक घर मे चोरि करबाक सपनाक तिलांजलि दऽ देलक । (इ खिस्सा स्मृति पर आधारित अछि) साढ़े तीनो लाख “ अपने तीन भाई छी, तँ कम सँ कम साढ़े तीनो लाख तँ गनबै; विदेसर बाबूक ई वाक्य जेना रमणक हदय पर ब्रजाघात के देलक । हुनक मूँहक बकार बन्न भऽ गेलनि । पछिला छह महीना तँ जाहि कथाक पाछू पड़ल छलाह, तकर आश ई पाँती तोड़ि देलकनि । एहूठाम कुटमैती नहि भऽ पेबाक पीड़ा हुनका चेहरा पर साफ देखाई दऽ रहल छलनि । आब रमणक लेल एहिठाम एको मिनट काटब पहाड़ छलनि । जेना-तेना आगूक कपमे बाँचल चाह ओ समाप्त केलनि आ ओहिठाम सँ चलबाक उपक्रम करय लगलाह । हुनक मोन मे झंझावातक प्रवाह चलिये रहल छल । बेर-बेर ओ झंझावात जेना जीह धरि आबि के रूकि जाईत छल । रमण बाबू कन्यागत छलाह] रें प्राय: बजबाक हक नहि छलनि हुनका । किछु बाजि ओ अपन-अपन मोन हल्लुक करय चाहैत छलाह । तथापि बात जेना मोन सँ जीह पर आबि अटकि जाईत छलनि । तथापि एहि झंझवात मे मोन तँ ई कहिये देखकनि जे काज तँ नहिये भेलौ,तहन चुप्प किएक छें ? जे बजबाक छौ से बाजि दही आ मोनक भरास निकालि ले । एहि उहापोह मे ५-१० मिनट आर बीति गेल । तथापि अंततः चुप्पी के तोड़ैत रमण बजलाह “ हमरा पहिने सँ शंका छल जे अपने दहेज वला गप्प उठेबे करबै आ तें हम पहिनहि अहाँ ओहिठाम नहि आबय चाहैत छलहुँ । हमरा अपन आर्थिक सीमा ज्ञात अछि आ हम बुझैत छलहुँ जे अहाँ एहिठाम कुटमैती मे नहि सकब । तथापि अपने के हमर बचिया पसिन छल आ अहीं काज पर विशेष जोर द’ क’ हमरा बजौने छलहुँ । आ तें हम आयल रही । तथापि पाईवला गप्प अपने उठाइये देलियैक । एहि संबंध मे हम एतबे कहब जे धरौआ गनबाक सामर्थ्य हमरा मे नहि अछि । तथापि अपन बेटीक बियाह मे जतय धरि भऽ सकत करब । ताहि शर्त पर जँ अपने कें कथा मंजूर हो तँ बेस, नहि तँ आज्ञा देल जाऊ । ” रमणक बातक तत्काल कोनो जवाब नहि द’ सकलाह विदेसर बाबू । हुनक माथ झुकि गेलनि । एकबेर फेर वातावरण मे चुप्पी पसरि गेल । एही चुप्पीक मध्य रमण बाबू नमस्कार पातीक बाद ओहिठाम सँ विदा भ’ गेलाह । रमण दिल्ली महानगर मे एकाउन्टेन्टक एकटा छोट-छीन नोकरी करैत छला । पाँच गोटाक परिवार छलैक । दूटा जेठ बचिया आ सभ सँ छोट बचवा । पहिल कन्यादानक चक्कर मे साल भरि सँ घूमि रहल छला । कतहु बर पसंद होई तँ घर नहि । जतय दुनू पसंद होई ततय नकदी सुनि चुप्पे वापिस भ’ जाय । तथापि एहिठाम उम्मीद रहैक जे काज पटि जायत । कारण काजक शुभारंभ विदेसर बाबू स्वयं कयने रहथि । विदेसर बाबू सेनाक सिविल ड्यूटी मे अधिकारी वर्ग सँ इलाहाबाद सँ रिटायर भेल छलाह । अपन दू पुत्रक संग दिल्लीए मे निवास करैत छलाह । गाम-घरक सम्पन्न लोक छलाह । गाम पर खेत-पथार सहित घर-आँगन सभ किछु व्यवस्थित छलनि । जेठ पुत्र निजी क्षेत्रक कोनो कंपनी मे नीक पद पर कार्यरत छलनि आ छोट पुत्र स्व-रोजगार मे लागल छलनि । घरे लग एकटा कॉस्मेटिक्सक दोकान खोलने छलाह । वस्तुतः हिनके बियाहक लेल एकटा नीक पारिवारिक लड़कीक तलाश छलनि विदेसर बाबू कें । प्रभात रमणक ममियौत विदेसर बाबूक पड़ोस मे रहैत छलाह । प्रभात एखन अध्ययनरत छलाह आ यदा-कदा विदेसर बाबू ओहिठाम गेल करथि । गप्प-शप्पक क्रम मे विदेसर बाबू हुनका सँ अपन पुत्रक बियाहक बात कहलथि । विदेसर बाबू कहलाह जे हमरा घरेलू काज मे दक्ष, सुन्नर आ कनेक पढ़ल-लिखल कन्या चाही । प्रभातक ध्यान तत्काल रमणक जेठकी बचिया पर गेल आ ओ बिदेसर बाबू कें एहि संबंध मे विस्तार सँ बता देलनि । संगहि प्रभात ईहो स्पष्ट क’ देलक जे हमर पिसियौत रमण बाबू अहाँ मे सकताह नहि आ तें यदि पाई-कैड़ी वला गप्प रखबैक तँ ओ काज नहि क’ सकताह । प्रभात अगिला रवि के रमणक डेरा पर पहुँचलाह आ प्रस्तावक संबंध मे रमण कें कहलनि । रमण के प्रस्ताव नीक लगलनि आ तें ओ अपन बचियाक फोटो आदि प्रभात के द’ देलनि । संगहि रमण ईहो कहलाह जे हमरा जहाँ धरि होयत हम गानब, तथापि हुनका हैसियतक अनुसार हम नहिं सकब से स्पष्ट कहि दैत छियह । तें पहिने हुनका सँ पाईवला गप्प खुलबा लीह आ तखने गप्प आगू बढ़बियबह । रमणक गप्प मे अपन स्वीकारोक्ति दैत प्रभात फोटो आहि लेलक आ अपन डेरा पर वापस आबि गेल । किछु दिनक बाद बिदेसर बाबू सँ फेर ओकर भेंट भेलैक आ बिदेसर बाबू फेर पूछि देलथिन्ह कथाक प्रसंग । एहि बेर प्रभात स्पष्ट कहलकनि जे हम कथाक प्रसंग अपन पिसियौत सँ गप्प केलहुँ अछि, परन्तु चूँकि ओ अहाँक हैसियत मे नहि सकताह, तें कहलनि अछि जे अहाँ अपन डिमांड स्पष्ट रूप सँ बता दियौ, ताकि तदनुसार ओ आगू विचार करताह । “ डिमांडक कोनो एहन बात नहि छैक । हुनका चिंता नहि करय कहियौन । हमरा हुनक बचिया पसंद अछि । हुनका कहियौन जे हमरा भेंट करथि ।” - विदेसर बाबू कहलाह । तत्पश्चात प्रभात शीघ्रे रमण कें फोन केलकनि आ अगिले रवि दिन विदेसर बाबू ओहिठाम जेबाक प्रोग्राम तय भ’ गेल । चूँकि रमण एहि बेर आशान्वित छल, तें संग मे अपन जेठ भाय विनोद या छोट भाय महेश के सेहो ल’ लेलक । अपने तीनू भाई रमण आ प्रभात सहित चारि गोटा कोना जाईत तें रमण अपन पितियौत विनय के सेहो संग क’ लेलनि आ दू बजे दिन धरि विदेसर बाबू ओहिठाम पहुँचि गेलाह । तथापि विदेसर बाबू ओहिठाम पहुँचबा सँ पूर्व सभ कियो प्रभातक डेरा पर जमा भेलाह आ पहिने अपना मे विचार-विमर्श केलाह । विनोद रमण सँ पुछलनि जे एहि कनेदान मे तोहर कतेक बजट छौक । रमण कहलाह जे हम एक सँ सवा लाख गानब आ आगू बरियाती खर्च, दुरागमन आदि सभ तें छैके । विचार-विमर्शक बाद सभ कियो विदेसर बाबू ओहिठाम हाजिर भेलाह । मिथिलाक पारंपरिक रीतिए विदेसर बाबू सभक स्वागत केलनि । नमस्कार पाती समाप्त भेलाक बाद परिचय पात भेल । दुनू पक्ष एक-दोसर के विस्तार सँ अपन परिचय देलनि । फेर गाम घरक स्था-पातक गप्प भेल । किछु इलाहाबादक नोकरीक गप्प सेहो भेल आ पटना मे जमीन लेबाक गप्प सेहो उठल । गोत्र-मूल आदि सहित वर्तमान मँहगाई, नोकरिहाराक समस्या मिथिलाक बाढ़ि, राजनीतिक घटना-चक्र आ गाम-घर मे दिन-दिन घटल जाईत धान-पानिक मुद्दा पर सेहो विचारक आदान-प्रदान भेल । कन्यागत दिस सँ लारव निवेदनक बादो बिदेसर बाबू-पाईवाला गप्प ओहू दिन नहि बजबाह । एवं-क्रमेण चारि बाजि गेल । सभा-तोड़बाक समय सेहो भेल । अपन पाईवला गप्प तँ बिदेसर बाबू नहिये बजलाह, तथापि कन्यागत सँ जरूर खुलाबय चाहलाह । आखिर दुनू पक्ष दिस सँ पाईवला गप्प नहि निकलल । अंत मे सभा के समाप्ति दिस ल’ जाईत विदेसर बाबू बजलाह-‘तहन अहाँ लोकनिक की विचार भेल । चूँकि पाईवला गप्प एखनहुँ अस्पष्ट छल तें विनोद ई कहैत सभा समाप्त केलाह जे हम सभ पहिने लड़का देखि लैत छियैक आ तत्पश्चात् विचार-विमर्शक उपरांत अपने सँ फेर भेंट हेतैक । पाँचो गोटा कन्यागत विदेसर बाबू आ हुनक जेठ बालकक संग लड़का कें देखबाक लेल दोकान पर पहुँचलाह । लड़का के देखि हुनका सँ कनेक काल गप्प केलाक बाद सभ गोटे ओतय सँ चलि देलाह । बस स्टेण्ड धरि विदेसर बाबू अरियातय एलाह । नमस्कार-पातीक औपचारिकताक बाद विदेसर बाबू वापस भेलाह आ फेर सभ कियो प्रभातक डेरा पर जमा भेलाह । तीनू भाई रमं अपन पितिऔत आ ममिऔतक संग एहि पर फेर विचार केलनि । अंततः इ निर्णय भेल जे प्रभात भौजी के आनि कें लड़का देखा देथुन, एहि रूपें जे एहिठामक लोक वा लड़का नहि बूझि सकथि । जँ भौजी (लड़कीक माय) कें लड़का पसन्द हेतैन तँ अगिला रवि दिन रमण स्वयं असगरे विदेसर बाबू सँ भेंट करथि आ हुनका समक्ष आदर्श कथा कऽ लेबाक प्रस्ताव राखथि । आ तत्पश्चात् जँ पाई-कौड़ीक गप्प उठैक तँ अपन अधिकतम सामर्थ्य एक-सवा लाख बता देथि । तदनुसार बीच्चे मे एक दिन प्रभात आयल आ भौजी के ल’ क’ लड़का देखेबाक लेल गेल । भौजी कें लड़का पसन्द पड़लनि आ तें रमण अपन पूर्व निर्धारित कार्यक्रमक अनुसार अगिला रवि कें विदेसर बाबू ओहिठाम पहुँचलाह । थोड़े काल एम्हर-ओम्हर के गप्प भेलैक आ एही क्रम मे रमण आदर्श कथा क’ लेबाक प्रस्ताव विदेसर बाबु लग रखलनि । संगहि इहो कहलनि जे हमर बेटीक वियाह थिक, तें अपन सामर्थ्यक अनुसार गोर लगाई कहि जहाँ धरि भ’ सकत नगदीक व्यवस्था करब । रमणक एहि प्रस्तावक तत्काल उत्तर नहि द’ सकलाह विदेसर बाबू । नगद टाका छुटैत देखि हुनक पहिलुका सभटा आदर्श धयले रहि गेल । अपन कहलाहा सभटा गप्प जेना विदेसर बाबू के मोन पड़ि गेलनि । हुनक वाक् बन्न भ’ गेलनि । कन्यागत सँ एहन आशा नहि रहनि । हुनका मोन मे वस्तुतः की रहनि से सँ ओएह बुझथि,परंतु चेहराक भाव बता रहल छलनि जे ओ एहन भारी घाटा नहि सहि सकैत छथि । वातावरण मे कनेक कालक लेल चुप्पी पसरि गेल । रमण सँ ५ मिनटक समय ल’ क’ विदेसर बाबू घरक भीतर गेलाह । ता धरि रमण शांत-चित्त बैसस रहल । विदेसर बाबू कनिये काल मे वापस भेलाह आ बजलाह - “अपने तीन भाई छी नोकरी मे, कम सँ कम साढ़े तीनों लाख तँ गनबे करबैक” । बिदेसर बाबूक ई वाक्य पछिला छह महीना सँ जोड़ल गेल कथा-सूत्र कें समाप्त क’देलक । एना किएक? मन्नू भाय रहथि सामाजिक लोक । सभक हाड़ी-बिमारी आ बर-बेगरता मे ठाढ़ रहब रहनि हुनक कर्त्तव्य । गाम मे किनको ओहिठाम कोनो काज होई मन्नू भाय हाजिर । सभक काज मे आदि सँ अंत धरि सहयोग देबय वला मन्नू भाय बेस लोकप्रिय । की बच्चा कीए बूढ़ सभ हुनका मन्नुये भाय कहनि, चाहे ओ रिश्ता मे ककरो किछु लागथि । मन्नू भाय गरीब लोक । माथ पर बाप-पुरखाक छोड़ल मात्र १० कट्ठा जमीन,किछु घरारी आ घरारिये लग कने-मने बाड़ी-झाड़ी । एकरा अतिरिक्त गुजर करक लेल दू-तीन टा महीस पोसने रहथि । ओही महीस सभक दू-दही-घी, चिपड़ी-गोइठा बेचि कऽ गुजर करथि । माथ पर रहनि ५ गोटाक परिवार । पत्नी, तीन बेटी आ एक बेटा । आश्रम एखन रहनि लेधुरिया आ तें हरदम तंगो-तरीज रहथि । तथापि अपन सामाजिक दायित्वक प्रति सचेष्ट रहथि आ अपन काज खगाईयो के दोसरक काज मे मददि करबाक लेल हरदम तत्पर रहथि । एकबेर संजोग सँ ओ कोनो कुटमारे गेलाह । किछु विशेष काजक कारणें ओतय किछु दिन रुकय पड़लनि । ताहि बीच मुकुन्द बाबू ओहिठाम उपनयन बजरि गेल । मुकुन्द बाबू गामक धनिक लोक । हुनक एकमात्र बेटाक उपनयन मे गौंआँ कें दू-तीन दिन भोज खेबाक अवसर छलै । परन्तु बिनु मन्नू भायक भोज- भात हो कोना? समय बीतैत गेल आ कुमरमक दिन सेहो आबि गेल । भोरे-भोर मुकुन्द बाबू ओहिठाम लोकक जुटान भेल । समस्या छल जे पूरा गौंआँक लेल भानस-भात बिनु मन्नू भायक सहयोग सँ होयत कोना । लोक सभ एहि समस्या पर विचार कैये रहल छल की ता मन्नू भाय हाजिर भऽ गेलाह । लोकक जान मे जान आयल । मन्नू भाय कहलाह जे हमरा एकाएक आईये याद आयल जे मुकुन्द बाबू बेटाक आई कुमरम छनि आ हम भोरे-भोर ओतय सँ विदा भेलहुँ जे मुकुन्द बाबूक काज बिथूति ने होइन । मन्नू भायक जेठ संतान बेटी १२ वर्षक । दोसर रहनि बेटा ९ वर्षक आ दुनू छोट बेटी क्रमश: ७ आ ४ वर्षक । कनेदान सामने रहनि तथापि अपन एकमात्र बेटाक उपनयन समय पर कराबय चाहथि । अपन पेट काटि-काटि उपनयनक लेल एक-एकटा पाई जमा केने रहथि । बड्ड सेहेन्ता रहनि जे एकबेर अपना ओहिठम गौंआँ के खुआबी आ तकरे तैयारी मे भीतरे-भीतर लागल रहथि ओ । गाम मे चौधरी पट्टी प्रमुख । चौधरी पट्टीक तीन मुख्य शखा । दू शाखा मे मोछक लड़ाई रहैक आ ताही चक्कर मे गाम मे दुगोला रहैक । चौधरीक तेसर शाखा अपन भगिनमान सहित विभक्त रहथि । प्राय: सभ परिवार मे दुगोला रहैक । ताहू मे जखने कतौ काज बजरै कि कनफुसकी शुरू भऽ जाईक । मन्नू भाय सेहो एकटा गोल धऽ कऽ रहथि आ अपन बेटाक उपनयन मे ओहि पूरा गोल कें नोत दऽ कऽ खुएबाक पक्ष मे रहथि । शनै: शनै: उदोगक दिन आबि गेल । पूरा गोल मे हकार पड़ल । किओ बाँस,तऽ कियो खड़ लऽ कऽ हुनक मददि केलनि । समय पर बँसकट्टी भेलैक । ओही दिन मरबठट्ठीक दिन सेहो रहैक । लोक सभ अबैत रहलाह आ भेद पुरबाक ले दू-चारिटा बन्हन दऽ घसकैत रहलाह । सभ आबथि दू-चारिटा बन्हन देथि, शर्बत पीबथि, पान खाथि आ चुपचाप घसकि जाथि । अंतत: मड़बा ठाढ़ करबाक बेर रहि गेलाह मन्नू भाय, हुनक पितियौत कारी भाय आ एक दू गोटा आर । मन्नू भाय सन सामाजिक लोक कें ई आशा नहि रहनि जे समाज हमरा काज मे एना करत । पूरा जिनगी लोकक उपकार केने रहथि आ तें भरोस रहनि जे पूरा समाज हमरा काज मे तत्पर रहत । उदोग आ मड़बठट्ठी होइतहि उपनयनक उपक्रम शुरू भऽ गेल। रोज मड़बा नीपब, बहारब, मड़बा पर गीतक अनिवार्यताक संग हुनक पत्नी सेहो अति व्यस्त रहय लगलीह । देखैत-देखैत माटि- मंगलक दिन आबि गेल । एहि मे पुरुष-पातक विशेष काज नै रहैक तें माटि-मंगल नीके नां बीति गेलैक । प्राते छगरा धूर रहैक आ तकरे प्रात रहैक कुमरम । उपनयनक महत्वपूर्ण दिन । भगवती पूजा आ बलि प्रदानक दिन आ संगहि भोज भातक दिन । समाजक असली काज आईये रहैक । चँकि मन्नू भाय पहिनहि सँ बेटाक उपनयनक तैयारी कयने रहथि तें अपन पूरा गोल मे पुरुषक दफा नोत देलाह । आई पूरा विश्वास रहनि जे पूरा समाज हमर मददि करत । भला हो कोना ने? सभक बेर मे ठाढ़ होईत रहल छलाह सदिखन ओ । लेकिन ई की । समाजक लोक हुलकियो देबय नहि एलैन। जेना-तेना अपन पितियौत कारी भायक संग अहरी खुनलाह, टोकना-लोहियाक इंतजाम केलाह आ अहरी पजारि देलाह । परन्तु ५-६ मन चाऊर, ओकर दालि, तरकारी, बड़ी, सतमनि-अदौड़ी,पापड़ आदिक इंतजाम केनाई छोट काज नहि रहैक । अपस्यांत भऽ गेलाह दुनू भाय । बीच मे एक-आध गोटा जिज्ञासाक लेल अयबो केलाह, परन्तु कहि के जे गेलाह जे फेर अबैत छी से नहिये घुरलाह । एवं क्रमेण दिनक तीन-चारि बाजि गेल । किछु सामग्री तैयारो भऽ गेल। ता गोलक प्रमुख बालेश्वर चौधरी अपन सात-आठ चमचाक संग पहुँचलाह । हुनका पहुँचतहि सभ चमचा हड़बिड़ो मचबय लागल। मन्नू भाय के आदेश भेलनि जे चौधरी जीक स्वागत करहुन । तुरंत मन्नू भाय ओमहर गेलाह । शर्बत बनल, चाह बनल आ फेर पान भेलैक । चौधरी सहित चमचा सभ खेलक-पीलक आ ओतय सँ चलि देलक । पुन: रहि गेलाह मन्नू अपने दुनू भाय । ब्राह्मण कें नोति देने रहथिन आ तें मानू गरा मे उतरी बन्हा गेल रहनि । येन-केन प्रकारेण अपना कें एहि सँ उॠण केनाई छ्लैन । ताही मे लागल रहथि दुनू भाय । काज तँ प्राय: सोझरायल छलनि परन्तु चौधरी आ हुनक चमचा आबि आर गड़बड़ कऽ देलकनि। जा मन्नू अपने चमचा सभक स्वागत मे लगलथि कारी भाय असगरे पड़ि गेलाह । आंच तेज करथि तऽ अदहन उधियाईन आ अधहनक शमण करथि तँ आँच बन्न भऽ जाईन । येन-केन प्रकारेण ९ बजे राति धरि भोजक सामग्री तैयार भेल आ बिझहो भेल । भोजनक समय लेकिन सभ जुटलाह । राति भऽ जेबाक कारणें सभ पहिले तोर मे भोजन करय चाहथि । तथापि टोलक किछु नवतुरिया बारिक बनबा लेल तैयार भेल आ पहिल तोरक भोज समाप्त भेल । खूब यश भेलनि मन्नू भाय के । दोसर तोर मे नवतुरिया सभ भोजन केलक आ अपन घर चलि गेल । ई तँ धन्य कही नवतुरिया सभ कें जे बँटबाक जिम्मा उठेलक नहि तँ कदाचित ओहो काज अपने दुनू भाय के करय पड़तैन । समाज अपन चालि नीक जकाँ देखा देलक । फेर रहि गेलाह दुनू भाय । पाहुन परक के भोजन करबैत, कुमरम रातिक आन विध-व्यवहार करैत, आँठि-कचार करैत पूरा राति बीति गेल । एको मिनटक लेल दुनू भाय आराम नहि कऽ सकलह। खैर प्रात भेने उपनयन रहैक । आचार्य, पुरहित,नौआ, ब्रह्मा आदिक सहयोग सँ मन्नू भायक बेटा के जनऊ पड़ि गेलैन । उपनयनक राति मे अठबभना कऽ कऽ मुक्त भेलाह मन्नू भाय । आब मन्नू भाय सामाजिक लोक नहि रहलाह । अपना काज सँ मतलब राखथि आ अपने मे मस्त रहथि । समाज मे ककरो ओहिठाम बजाओल गेला पर टारि जाथि मन्नू भाय । आखिर मन्नू भाय एना किएक भऽ गेलाह? गंभीर प्रश्न अछि समाजक समक्ष। कुंठा नौ बजे राति मे ड्यूटी सँ वापस भेले छल सुरेश कि पत्नी ओकरा समक्ष गाम सँ आयल चिट्ठी राखि देलखिन। यद्यपि सुरेश जिज्ञासा कयलक जे एहि मे की प्रमुख बात लिखल छैक से कहू, परन्तु पत्नी स्वयं पढ़ि लेबाक लेल कहैत किचेन मे चलि गेलीह। सुरेश गाम सँ आयल चिट्ठी के आद्योपांत पढ़लक आ एकटा गंभीर श्वास लैत ओकरा टेबुल पर राखि देलक। तखनहि पत्नी एक गिलास पानि आ चाह ल' क'पहॅुंचि गेलीह। सुरेशक गंभीर मुखाकृति पर अबैत-जाईत विभिन्न रेखाक अध्ययन करैत पत्नी गप्प शुरू केलीह - ‘‘की सोचलियै एहि पर'' ‘‘एहि मे सोचबा जोग किछु नै छैक, वरन् ई तँ एक तरहक आदेश छैक, जेकर पालन करबाक लेल हमरा कहल गेल अछि'' - सुरेश बाजल। ‘‘कतय सँ अनबैक एतेक टाका?'' पत्नी जिज्ञासा केलनि। पत्नीक एहि प्रश्नक तत्काल कोनो जबाव नहि द' सकल सुरेश । समस्या गंभीर छलैक। एकमात्र बेटाक उपनयन सामने छलैक। दिल्ली सन महानगर मे मात्र4-5 हजार टाकाक नोकरी करैत अपन परिवार के संगे रखैत सुरेश हरदम ‘‘हैंड टू माउथ' रहैत छल। 4-5 हजार टाका मे कोना बचतैक आ ताहि पर सँ उपनयनक वास्ते खर्चाक एकटा पैघ आदेश गाम सँ। सेहो छोट-मोट नहि 50-60 हजार टाकाक। चिट्ठी लिखने छलाह सुरेशक जेठ भाय दिनेश । दिनेश गामे मे रहथिन। हुनको दू बेटाक उपनयन रहनि। ओ झंझारपुर मे वोकालति करेैत रहथि आ गाम पर किछु ट्यूशन। खेती-पथारीक जिम्मा सेहो हुनके पर। माता-पिता वृद्ध रहथिन तें एहि काज मे ओ सभ कोनो आर्थिक मददि करबा में असमर्थ रहथिन। छोट भाय महेश, जिनका एकटा बरूआ रहनि, ग्वालियर मे रहथि। ओ फुट्टे अपने समस्या सँ ग्रस्त। गामक सर-समाज देखैत, अपन परिवारक हाड़ी-बिमारी देखैत आ गाम-गामक नोत पुराई करैत दिनेशक अनुसार हुनका एको पाई नहि बचैत छनि आ उपनयनक सभ छाड़-भार सुरेश पर रहतैक, सएह पत्र आयल छल गाम सँ। तथापि पत्र मे ईहो लिखल छल जे माधव भाय कोन रूपें पछिला साल अपन बेटाक उपनयन कयलनि अछि आ एहने उपनयन होमक चाही। घंटा-डेढ़ घंटा एहि विकट समास्या पर विचार करैत रहल सुरेश अपन पत्नी मीनाक संग, तथापि किछु निष्कर्ष नहि निकालि सकल। अंततः पुनः फोन पर जेठ आ छोट भाय सँ काल्हि गप्प करबाक नियार करैत दुनू प्राणी सूति रहल। परन्तु निन्न कहाँ एतैक? दुनू प्राणी करौट फेरैत परात केलक। भिनसरे टेलीफोन बूथ पर पहॅुंचल। गाम आ ग्वालियर फोन मिलेलक। परन्तु सभटा व्यर्थ। दुनू भाय हाथ उठा देलखिन। कियो ई सोचय नहि चाहलखिन जे एतेक पाई ई अनतैक कतय सॅ? जे से समय पर अपन ड्यूटी पर पहॅुंचल सुरेश। ड्यूटी की छलेैक। एकटा थोक विक्रेताक ओतय काज करय। ‘‘ए टू जेड'' सभटा काज करय पड़ैक। ओना कहबाक लेल रहय तँ काउन्टर पर, परन्तु आवश्यकता पड़ला पर लोहा सेहो उठबय पड़ैक आ आनो कयकटा काज करय पड़ैक। काज करैत चिंताक रेखा स्पष्ट देखाय पड़ैक ओकरा माथ पर। ओकरा किछु अनमनस्क सन देखि मालिक जिज्ञासा केलकैक। ओ टारय चाहल। तथापि मालिक नीक लोक रहैक। खोधि-खोधि क' पूछय लगलैक आ सुरेश के सभटा राम कहानी कहय पड़लैक। तथापि पाईवला गप्प ओ नहि कहि पओलक। मालिक खर्चाक संबंध मे जिज्ञासा केलकैक तँ बाजल 50-60 हजार। एकबेर मालिको अचंभित भ' गेलैक आ एहि प्रस्ताव पर पुनः विचार करक अनुरोध केलकैक। तथापि सुरेश बाजल - ‘‘सर हमलोंगों को पूरी जिंदगी मे सिर्फ तीन काम करना है - बेटे का जनेऊ, लड़की की शादी और माँ-पिता का श्राद्ध। इससे ऊपर न हम कुछ कर सकते हैं और न ही सोच सकते हैं।'' सुरेशक उक्त बात सूनि कें मालिक थोड़े पसीझल। मालिक सुरेश के आश्वासन देलकैक जे तोरा जते रूपया चाही से ल' जो आ तों बाद मे धीरे-धीरे दरमाहा मे सँ हमरा कटा दिहें। सुरेश कें जेना कतहु सँ प्राण भेटलैक। तुरंत ओ हामी भरलक। साँझ मे हँसी-खुशी घर आयल आ अगिला दिन पुनः गाम आ ग्वालियर फोन कयलक जे समय पर उपनयन हेतैक आ अहाँ सभ अपन तैयारी मे लागि जाऊ। उदोग सँ तीन-चारि दिन पहिने गाम पहॅुंचल सुरेश सभ के ल' क'। सभटा काज शुभ मुहुर्त मे सम्पन्न होईत गेलैक आ रातिमक प्रात जेना निःश्वास छोड़लक ओ। जे किछु ल' क' आयल छल लगभग सभटा खर्च भ' गेलैक। महेश 5000 पकड़ा के फराक भ' गेल। दिनेश गाम मे रहथि, सभटा कारबार अपना हाथ मे रखलनि। सुरेश खर्च करैत गेल, परन्तु खर्चक कोनो हिसाब नहि भेलैक। भार-दोर वाला आमदनी सेहो दिनेश रखलथि अपना पॉकेट मे आ निश्चिंत भ' गेलाह। काज सम्पन्न भेलाक बाद सुरेश वापस दिल्ली आयल। आब समस्या रहैक कर्जा सधेबाक। प्रथमतः कमरा-किचेन वाला घर छोड़ि सिर्फ एकटा कमरा वला घर लेलक ताकि मकान किराया मद मे बचैक। बच्चा सभ ठीक-ठाक स्कूल पढ़ैत रहैक,ओकरा सभक नाम एकटा साधारण स्कूल मे लिखेलक आ 5000 टाका दरमाहा मे सँ1000 कटेनाय शुरू केलक। कुला मिला कें दुर्दिनक शुरूआत भ' गेलैक आ सभ तरहें सुरेश कुंठित भ' गेल। एहि तरहक कुंठा सिर्फ सुरेशे के नहि छैक, वरन् मिथिलांचलक एकटा सम्पूर्ण युवा पीढ़ी एहि सँ ग्रस्त अछि। ई एहन पीढ़ी अछि जे गाम मे पढ़लक-लिखलक,ओतय पलल-बढ़ल आ रोजगारक वास्ते दिल्ली वा कोनो शहर आबि गेल। संघर्षक पथ पर अग्रसर होईत अपना लेल शहर मे रोजगार ताकि कनेक स्थिर होईत अछि ई वर्ग कि सामने अबैत छैक गामक समस्या। आई उपनयन, काल्हि बियाह, परसू मूड़न,चारिम दिन दुरागमन आदि। हर काज मे गाम गेनाई एकर विवशता छैक आ नोकरी करेैत अछि तँ खर्चो-पानि करय पड़ैत छैक। गामक लोकक सामान्य सोच छैक - शहर मे टाकीक कोन कमी। ताहू मे जँ कियो सरकारी नोकरी मे अछि तँ ओकर शामते छैक। सरकारी नोकरीक मतलब एम्हर-ओम्हरक आमदनी। शहर मे अहाँ की छी? कतय छी? कोना गुजर करैत छी? एहि सभ सँ कोनो लेना-देना नहि छैक गाम लोक कें। शहर मे छी, नोकरी करेैत छी, तँ पाईक कोन समस्या। गाम वा सर-कुटुमक सभ काज में दियौक, माने स्वयं बिका जाऊ। एहि नववर्गक सभ सँ पैघ समस्या अछि जे ई वर्ग अधखिज्जू अछि। आधा गामक अछि आधा शहरक। आ तें बेसी कुंठित अछि। कोनो काज वा संस्कार ई गाम मे करताह। कारण ओतहि रहल छथि, नेनपन बितेने छथि। एकेबेर सभटा कें तोड़बाक सामर्थ्य नहि छनि हिनका मे। परंतु एना कते दिन चलत? कते दिन धरि कुंठित रहत ई वर्ग। आई ने काल्हि एहि सँ उबरबाक रस्ता निकालहि पड़तैक एहि वर्ग कें। आवश्यकता छैक सोच मे परिवर्तत करबाक। गामक समाज सहित एतय एकटा अलग समाजक निर्माण करबाक आ सभ तरहक संस्कारक शुरूआत एही ठाम करबाक आ तखनहि मुक्त होयत ई वर्ग कुंठा सँ। वरन् जिनगी भर पिसाईत तरह ई वर्ग एहिना। मास्टर साहेब नहि रहलाह आई मास्टर साहेब शांत भऽ गेलाह । भोरे-भोर सौंसे गाम मे खबरि पसरि गेल जे आब मास्टर साहेब दुनिया मे नहि छथि । छब्बे मास पहिने तँ रिटायर भऽ कऽ आयल रहथि ओ । एखन पेंशनक कागतो कहाँ सोझरायल रहनि । कएकटा काज एखन बाँकिये रहनि । सेहेन्ते अपन एकमात्र बेटा भोलूक वियाह १६ वरषक अवस्था मे करेने रहथि । अगहन मे दुरागमन करेबाक विचार रहनि,से कहाँ भेलनि । जेठे मे विदा भऽ गेलाह ओ । जिनगी भरि एक-एक पाई बचेनहार, चारि-चारिटा कनेदान अपना हाथें केनहार, बाप-पुरषाक ७-८ बीघा जमीन के १२ बीघा पर लऽ गेनहार, साबिकक घरारी सँ अलग घरारी लऽ कऽ घर बनेन्हार मास्टर साहेब आखिर अपन बेटाक लेल दू कोठली पक्का घर नहिये बना सकलाह । भला कालक आगाँ ककरो बस चललैक अछि? मास्टर साहेब हारि गेलाह काल आ समय सँ । आई मास्टर साहेब नहि हुनक लहाश पड़ल अछि आँगन मे । करुण क्रंदन सँ पूरा आँगन शोकाकुल छैक । किछु दिन पहिने सँ ओ दुखित छलाह । दरभंगा जा कऽ दवाई-दारू करेने रहथि । दवाई सभ चलिये रहल छलनि, ता एकाएक काल्हि सांझ मे ओ बेसी दुखित भऽ गेलाह । गाम मे जे डाक्टर रहैक से बजाओल गेलाह । ओ नाड़ी देखलनि, बी.पी चेक केलनि, आला लगेलनि आ कहलनि जे ता हम किछु दवाई लीखि दैत छी आ ईहो कहैत छी जे हिनका आगू लऽ जैऔन । परिवारक सभ सदस्य हुनका आगू लऽ जेबाक उपक्रम मे लागल । परंतु मास्टर साहेब मना कऽ देलनि । शायद हुनका अपन मृत्युक आभास भऽ गेल रहनि । ओ स्पष्ट कहने रहथि जे जँ भिनसर धरि बाँचि गेलियह तँ डाक्टर लग लऽ जैहह । हम राति-बिराति डाक्टर लग नहि जायब । से मास्तर साहेबक मरितहि हुनक एकमात्र बालक भोलू पर विपत्तिक पहाड़ टूटि पड़ल । १६ वरषक बालक जेकर जन्म चारि बहीनक बाद भेल छलैक,विपत्तिक तँ एखन धरि नामो ने सुनने छल । पछिले साल तँ मैट्रिक कयलक ओ आ एखन पटना मे आई.ए. मे पढ़ैत अछि । वियाहो भऽ गेल छैक । आब ओकरा पर अपन पढ़ाइ पूरा करबाक जिम्मा छैक, माइक लेल परिवार पेंशनक कागत बनबेबाक छैक, अपन परिवारक चिन्ता छैक आ ७-८ बीघा खेतक जिम्मा छैक । भला १६ वरषक बालक सँ एते हो कोना आ ताहि पर सँ सामने छैक पिताजीक श्राद्धक चिन्ता । मास्टर साहेब शुरुहे सँ मास्टर साहेब नहि छलाह । अपना जमाना मे शास्त्री केलाक बाद जखन शीघ्रे नोकरी नहि भेलनि तँ कलकत्ता चलि गेलाह । ओतय पूजा-पाठ वला ड्यूटी पकड़लनि । १६-१६ घंटा पूजा-पाठ वला ड्यूटी करथि । फेर बाद मे कोनो जोगाड़ सँ मास्टरी भेलनि आ बनि गेलाह हाइस्कूलक संस्कृत शिक्षक । एक-एकटा पाई बचाबथि आ गाम पठाबथि । गाम मे परिवारो नमहर रहनि । तीन भाईक भैयारी मे जेठ रहथि । ७-८ बीघा खेत तीन भाइ मे कम लगनि, क्रमश: ओकरा बढ़ाय १२ बीघा पर लऽ गेलाह । बीच-बीच मे कनेदानो सभ केलनि । पिताजीक मृत्युक बाद भिन-भिनौज भऽ गेलनि । घरारी तक बँटा गेलनि । अपनहि अमलदारी मे बेटाक माथ पड़हक ४ बीघा खेत के ७-८ बीघा पर पहुँचा देलनि आ सभटा कनेदानो सँ मुक्त भेलाह । दाह-क्रिया सम्पन्न भेल आ तीनिये दिनक बाद आबि गेल छौड़झप्पी । सभ चीज सँ समांग सभ मुक्त भेलाह । आब आयल असली तैयारीक बेर । ओमहर मास्टर साहेब मुईलाह आ एम्हर गौंआ मे कनफुसकी शुरू । मास्टर साहेब जिनगी मे कत्ते कमेलाह एकर गणना होमय लागल । ओहि मास्टर साहेबक श्राद्ध तँ नीक सँ हेबाक चाही, गौंआ के दू दिनक भोज तँ हेबाके चाही ऊपर सँ किछु बँटलो जाय यथा लोटा या धोती या ....। कियो एकोबेर ई नहि सोचलाह जे मास्टर साहेब जिनगी भरि काजे करैत रहलाह । आ किनको लग ईहो सोचबाक समय नहि रहनि जे एहि १६ वरषक बालकक एतेटा जिनगी कोना कटतैक । जाहि बालकक पिताजीक स्वर्गवास भऽ गेलै, घरक कर्ता-धर्ता चलि गेलै, जेकरा लग स्वयं सिर छुपेबाक लेल एकटा घर नहि छैक, ओकर जिनगी कोना बिततैक । बस ऊपर सँ किछु हेबाक चाही । औपचारिकतावश गामक बैसारी भेल । ५-१० टा बूढ़-पूरान उपस्थित भेलाह । वस्तुत: पहिने एहि बैसारीक पाछू एकटा पैघ उद्देश्य रहैक । कर्ताक गड़ा मे उतरी रहैत छनि, ओ कोनो काज नहि कऽ सकैत छथि । ओ समाजक समक्ष अपन मोनक इच्छा रखैत छलाह जे हम अपन पिता/माता श्राद्धक निमित ई सभ करय चाहैत छी । आब समाजक दायित्व बनैत छलैक जे कर्ताक इच्छाक पूर्ति कोना हो आ समाज तदनुसार अपन काज करैत छल । जहन कर्ताक गड़ाक उतरी टूटैत छलनि तँ ओ समाज के एक-एक पाई सधा दैत छलखिन । परन्तु आब बैसारक उद्देश्य दोसर भऽ गेलैक अछि । समाज कर्ताक समक्ष अपन माँग राखय रखलाह अछि जे तोहर पिता तोरा लेल ई केल्थुन, तों ई करह, ई बाँटह...। सएह भेल, बूढ़-पुरान सभक विरोधक बावजूदो बैसार मे ई मुद्दा उठिये गेल जे की बाँटल जायत । कर्ता अपन असर्मथता जतेलैन, तथापि अगिला दिन भोर होइत-होइत सौंसे गाम मे खबरि पसरि गेल जे मास्टर साहेबक श्राद्धक समाप्तिक बाद प्रति परिवार पूरा गाम मे “फुलही लोटा” बाँटल जायत । पाई कतौ सँ अबौ, समाज के कोन मतलब? भोज भातक तैयारी सहित श्राद्धक आन तैयारी सभ समयानुसार शुरू भऽ गेल । एकादशाह आ द्वादशाह मे खूब जमगर भोज भेलैक । गौंआ सभ खएलक आ बैसि गेल लोटाक इंतजार मे । एतबे नहि सरो-कुटुम कहाँ बाकी रखलनि । मास्टर साहेबक जेठकी बेटीक नि:संतान मृत्यु भऽ गेल रहनि आ तें आब तीनटा जीवित रहथिन । दोसर बेटी दिसक दुनू नाति नानाक श्राद्धक उसरगाक लेल तत्पर रहैक । तेसर बेटीक तीनू बेटा सेहो कम नहि रहय । ओहो सभ तैयारे छल । चारिम बेटीक धिया-पुता छोट रहैक आ तें एहि झमेला सँ काते रहैक । एकादशाह दिन आँगन मे उसरगा समान सभ पर नाति सभक नजरि रहैक । उसरग-पुसरगक विध खतम होईतहि सामानक लेल नाति सभ तत्पर भेल । सभ कियो सभ सामान लेलक । लेकिन दोसर बेटी दिसक दुनू नाति छोट सामानक मोह मे नहि पड़ि गाय के हाँकि के अपना गाम पर बान्हि आयल । तेसर बेटी दिसक नाति सभक हाथ मे अयलैक ओछाओन, छाता, जूता. खटिया आदि । ओकरा सभ के ई बात बड्ड अखरलैक जे हमर मसिऔत सभ गाय लऽ कऽ चलि गेल । मामला द्वादशाह दिन तँ शांत रहलैक, परन्तु तकर प्राते गरमा गेलैक । तेसर जमाय सभटा सामान वापस कऽ देलनि आ विरोध स्वरूप रूसि रहलाह । काल्हिए तँ भोलूक उतरी टुटलैक अछि आ आईये नव समस्या आबि गेलैक । ओ किकर्तव्यविमूढ़ भऽ गेल । सभ सभठाम फुट्टे रूसल । जेकर पिताजी मरि गेलैक तेकरा के देखतैक, अपने मे समाने लय सिर-फुटौव्वल । आखिर ओ अबोध बालक अपन चुप्पी तोड़ि सभ बहीन के एकठाम बजेलक आ प्रश्न केलक - “हम तोरा सभ बहीन सँ छोट छियौ । तों सभ हमरा बोल-भरोस कतय देमे, उल्टे सामान सभ लेल झगड़ा करैत जाई छें । की बाबूक मृत्युक बाद हमरा प्रतिये तोरा सभक कोनो फर्ज नहि बनैत छौक? भोलूक प्रश्नक जबाव केकरो लग नहि छल । सभ निरुत्तर छल । उमेश मंडल संस्कार गीत एहि बेरक बात थिक। विविध- भारती रेडियो स्टेशन सँ गीत सुनैत छलौ। एखन धरि मैथिली साहित्य सॅ कम्मे-सम्म सिनेह छल। ओना परिवार सॅ समाज धरि मैथिलिऐक बीच आठो पहर समय बीतैत अछि। कातिक पूर्णिमाक दिन रहने, समाजक माए-बहिन लोकनि सामा भसा आंगन दिसि सोहर गबैत घुमलीह। एकाएक हमरो कान मे, गीतक ध्वनि हवा मे छिछलैत अबै लगल। रेडियो बन्न कऽ सोहर सुनै लगलहुँ। गीतक स्वर हृदय केॅ झकझोड़ए लगल। जेहने माए-बहीनि लोकनिक स्वरक मधुर टाँस तेहने एकरुपता। जहिना बहीनि,माए-बाप समाजक सखी-सहेली छोड़ि, सासुर जेबा काल, अपन क्रन्दन स वातावरण केॅ शोकाकुल बनबैत आ सखी-सहेली सोहरक स्वर सॅ विदा करैत, तहिना भऽ गेल। हृदय विदीर्ण हुअए लगल। अनायास मन मे सवाल उठै लगल- (क) की हमर कला- साहित्य, भूमण्डलीकरण स, आगू बढ़त? (ख) आ कि जतय अछि ततय, अजेगर साॅप जेॅका थुसकुरिया मारि, बैसल रहत? (ग) आ कि हमर कला-साहित्य मटियामेट भऽ जायत? एहि प्रश्नक बीच उलझल मोन मे, डिबियाक टिमटिमाइत इजोत जेकाॅ, आयल जे अपनो मातृभाषा आ मातृभूमिक सेवा लेल किछु कयल जाय! एहि जिज्ञासाक संग अपने लोकनिक बीच, एकटा छोट-छीन पोथी ‘संस्कार गीत’ राखि रहल छी। आशा अछि जे अधला पर ध्यान नहि दऽ, आगूक सेवा लेल पे्ररित आ प्रोत्साहित जरूर करब। गीतक संकलन किछु पोथिओक अछि आ अधिकतर माए-बहीनिक कंठक सेहो अछि। जहि गीतिकार लोकनिक गीत संकलित अछि, हुनक आभारी छी। आ जे गीत माए-बहीनि लोकनिक कंठक अछि, ओ जहिना कहलनि तहिना लिखलो गेल अछि तेॅ शब्दक फेड़ि-फाड़ आ टूटल सेहो अछि। गीतक संकलन करै मे अग्रज सुरेश मंडल आ अनुज मिथिलेश मंडलक भरपूर सहयोग रहल। (१) सिंह पर एक कमल राजित ताहि उपर भगवती। उदित दिनकर लाल छवि निज रुप सुन्दर छाजती। दाँत खटश्खट जीह लहश्लह श्रवन कुन्डल शोभती। शंख गहिश्गहि, चक्र गहिश्गहि खर्ग गहि जगतारिणी। मुक्तिनाथ अनाथ के माँ भक्तजन के पालती। सिंह पर एक कमल राजित ताहि ऊपर भगवती। माँ ताहि ऊपर भगवती। (२) सभ के सुधि अहाँ छी अम्बा हमरा किए बिसरै छी हे। हमरा दिस सँ मुह फैड़े छी, ई नहि उचित करै छी हे। छी जगदम्बा जग अबलम्बा तारिणी तरणि बनै छी हे। छनश्छन पलश्पल ध्यान धरै छी दरसन बिनु तरसै छी हे। छी हम पुत्र अहीं केर जननी से तँ अहँा जनै छी हे। रातिश्दिन हम विनय करै छी पापी जानि ठेलै छी हे। सभ के सुधि अहाँ लै छी अम्बा हमरा किए बिसरै छी हे। (३) कोन दिन आहे काली तोहर जनम भेल, कोन दिन भेल छठियार। शुक्र दिन आहे सेवक हमरो जनम भेल, बुध दिन भेल छठियार। पहिर ओढ़िय काली गहबर ठाढ़ि भेली, करब मे काली के सिंगार। कोन फूल ओढ़न माँ के कोन फूल पहिरन, कोन फूल सोलहो सिंगार। चम्पा फूल ओढ़न, जूही फूल पहिरन, ओढ़हुल फूल सिंगार। भनहि विद्यापति सुनु माता काली, सेवक रहु रक्षपाल। कोन दिन आहे काली तोहर जनम भेल, कोन दिन भेल छठियार। (४) अब ने बचत पति मोर हे जननी, अब ने बचत पति मोर। चारु दिसि पथ हेरि बैसल छी, क्यो ने सुनै दुख मोर। हे जननी..... एहि अवसर रक्षा करु जननी, पुत्र कहाएव तोर। हे जननी..... अलटिश्बिलटि कऽ जँ मरि जायब, हँसी होयत जग तोर। हे जननी..... अबला जानि शरण दीअ जननी, नाम जपत हम तोर। हे जननी.... (५) हम अबला अज्ञान हे श्यामा, हम अबला अज्ञान। धन सम्पत्ति किछु नहि अछि हमरा, नहि अछि किछुओ ज्ञान। हम अबला.... नहि अछि बल, नहि अछि बुद्धि, नहि अछि किछुओ ध्यान। हम अबला...... कोन विधि भव सागर उतरब, अहिंक जपल हम नाम। हम अबला... (६) जगदम्ब हे अबलम्ब मेरी, जननी जय जय कालिका। दष भुजा दष खड़ग राजित, पाष खप्पर विराजित। मुण्ड लयश्लय मगन नाचय, गाबय योगिन मालिका। भाइ भैरब मुण्ड छीनथि जय जय कालिका। (७) अहाँ कियै भेलहुँ कठोर हे जननी अहाँ कियै भेलहुँ कठोर। हम दुखिया माँ शरण अहाँ के अहाँ कियै भेलहु कठोर हे जननी... अतुल कष्ट सहि जनम देल अछि आब पोछत के नोर हे जननी ... ककरा पर हम जनम गमायब के करती आब शोर हे जननी.... ककरा पर हम रुसि परायब के आब रक्षक मोर हे जननी अहाँ कियै.... (८) क्यो ने हमर रखबार हे जननी, क्यो ने हमर रखबार। चिन्ता विकल विवस मन मेरो, मन दुख होइए अपार। हे जननी क्यो.... बिनु अबलम्ब धार मे डुबलहुँ, सुझत नहि किनार। हे जननी..... अहाँ किए देर लगेलहुँ जननी, हम डुबलहुँ मझधार। हे जननी.... सृष्टिक मालिक अहीं छी जननी, करहु सभक प्रतिपाल। हे जननी.... माता के सब पुत्र बराबरि, पंडित मूर्ख गमार। हे जननी.... कतेक विनय कय थाकि गेलहुँ हम, अब करिअ भव भार। जननी... (९) कहाँ नहैली काली कहाँ लट झाड़लन्हि, कहाँ कयल सिंगार हे। गंगा नहैली काली बाट लट झाड़लन्हि, गहबर कयल सिंगार हे। पहिरि ओढ़िया काली गहबर ठाढ़ भेलि, करय लगली सेवक गोहारि हे। यष लिय यष लिय काली हे माता, अहाँ यष फिरु संसार हे। कहाँ..... (१०) अयलहुँ शरण तोहार हे जगतारनि माता। लाले मन्दिरबा के लाले केवरिया, लाले ध्वजा फहराय हे जगतारनि माता। लाले चुनरिया के लाले किनरिया, लाले सिन्दुर कपार हे जगतारनि माता। राखि लिय मुख लाली हमरो, हम लेब अँचरा पसारि हे जगतारनि मता। अयलहुँ शरण तोहार हे जगतारनि माता। (११) हे जगदम्बा जय माँ काली प्रथम प्रणाम करै छी हे। नहि जानि हम सेवा पूजा अटपट गीत गबै छी हे। सुनलहुँ कतेक अधम के मैया मनवांछित फल दै छी हे। पुत्र सम जानि चरण सेवक के जन्मक कष्ट हरै छी हे। विपतिक हाल कहल की हे मैया आषा लागि जपै छी हे। सोना चानी महल अटारी ई सब किछु ने मँगै छी हे। मनक मनोरथ मनहि मे राखि मंदिर तक पहुँचे छी हे। अहाँक चरण के दास कहाबी एतवे हम मनबै छी हे। प्रेमी जन सँ पाबि निराषा नयन नीर बहबै छी हे। नोर बहा कऽ अहाँ लय मैया मोती माल गुथै छी हे। (१२) गरजह हे मेध गरजह गरजि सुनावह रे। ललना रे ऊसर खेत पटाबह सारि उपजाबह रे। जनमह आरे बाबू जनमह जनमि जुड़ाबह रे। ललना रे बाबा सिर छत्र धराबह शत्रु देह आँकुष रे। हम नहि जनमब ओहि कोखि अबला कोखि रे। ललना रे भैलहि वसन सुतायत छौड़ा कहि बजायत रे। जनमह आरे बाबू जनमह जनमि जुड़ाबह रे। ललना रे पीयर वसन सुताबह बाबू कहि बजायब रे। (१३) पलंगा सुतल तोहेँ पिया कि तोहें मोर साहेब रे। ललना रेश् बगिया जँ एक लगबितहुँ टिकुला हम चखितहुँ रे। भल नहि बोललिह धनी कि बोलहुँ न जानह रे। ललना रे बेटबा जँ एक तोरा होइत सोहर हम सुनितहुँ रे। भानस करैत तोहें गोतनी कि तोहें मोर हित बंधु रे। ललना रे अपन बालक दिअ पैंच पिया सुनु सोहर रे। नोन तेल पैंच उधार भेटय आर सभ किछु रे। ललना रे कोखिआक जनमल पुत्र सेहो नहि भेटय रे। मचिया बैसल तोरे सासु कि सासु सँ अरजि करु रे। ललना रे कओनश्कओन तप केलहुँ पुत्र फल पेलहुँ रे। गंगहि पैसि नहेलहुँ हरिवंष सुनलहुँ रे। ललना रे देवलोक भेला सहाय कि पुत्र फल पयलहुँ रे। आदित लगैत बिलम्ब भेल होरिला जनम लेल रे। ललना रे लाल के पलंगा सुता देल पिया सुनु सोहर रे। दसमासी सोहर (्१४) प्रथम मास जब आयल चित फरिआयल रे। जानि गेल सासु हमार चढ़ल मास दोसर रे। सासु मोर बसु नैहर ननदी बसु सासुर रे। घर छथि देबर नदान चढ़ल मास तेसर रे। बाट रे बटोहिया कि तोहि मोर भैया कि हित बंधु रे। हमरो समाद लेने जाउ चढ़ल मास चारिम रे। अन्न पानि किछु नहि भावय खटरस भावय रे। कहब हम कओन उपय चढ़ल मास पाँचम रे। रचिश्रचि पतिया लिखाओल नैहर पठाओल रे। बिनु आमा नैहर विरान चढ़ल मास छट्ठम रे। आगुश्आगु आवय दोलिया पाछु भैया आवय रे। घुरिश्घुरि घर भैया जाउ चढ़ल मास सातम रे। तन भेल सरिसब फूल देह भेल पीयर रे। अब न बाँचत जीव मोर चढ़ल मास आठम रे। घरश्घर बाजत बधावा कि भेल बड़ आन्नद रे। अयोध्या मे जनमल राम चढ़ल मास नवम रे। तुलसीदास सोहर गाओल गाबि सुनाओल रे। भक्तवत्सल भगवान कि आजु प्रकट रे। (१५) एक दिन छल बन झंझर आब बन हरियर रे। बड़ रे सीता दाई तपसी कि गरम सँ रे। के मोरा गरुअनि काटत खिनहरि बूनत रे। ललना रे मन होय पियरी पहिरतहुँ गोद भरबितहुँ रे। ललना रे राम दहिन भए बैसतथि कौषल्या चुमबितथि रे। (१६) प्रथम समय नियराओल शुभ दिन पाओल रे। ललना रे देवकी दरदे वयाकुल दगरिन आयल रे। दोसरो वेदन जब आयल कृष्ण जन्म लेल रे। ललना रे तेसर हरिक प्रवेष कलेष मेटायल रे। दगरिन आबि जगाओल केओ नहि जागल रे। ललना रे हरि देखि सभ मन अचरज सभ हित साधल रे। सूरदास प्रभु हितकर कृष्ण जनम लेल रे। बाजन बाजय सभ ठाम देव लोक हरखित रे। (१७) उतरि सावन चढ़े भादव चहुँ दिस कादब रे। ललना रे मेधवा झरी लगाबय दामिनि दमकय रे। जनम लेल यदुनन्दन कंस निकन्दन रे। ललना रे फुजि गेल वज्र केवाड़ पहरु सब सूतल रे। शंख चक्र युक्त हरि जब देवकी देखल रे। ललना रे आइ सुदिन दिन भेल कृष्ण अवतार लेल रे। कोर लेल वसुदेव कि यमुना उछलि बहू रे। ललना रे हरि देल पैर छुआय नन्द घर पहुँचल रे। नन्द भवन आन्नद भेल यषुमति जागल रे। ललना रे सूरदास बलि जाय कि सोहर गाओल रे। (१८) घर से बहार भेली सुन्दरि, देहरि धय ठाढ़ भेली रे। ललना रे ओलती धय धनि ठाढ़ि कि, दरदे व्याकुल रे। कथि लय बाबा बिआहलनि, बलमु घर देलनि रे। ललना रे रहितहुँ बारि कुमारी, दर्द नहि जनितहुँ रे। अगाध राति बिराल पहर रति, बबुआ जनम लेल रे। ललना रे बाजय लागल बधाबा, कि गाओल सोहर रे। (१९) पहिल परन सिया ठानल सेहो विधि पूड़ाओल रे। ललना रे भेटल अयोध्या राज ससुर राजा दषरथ रे। दोसर परन सिया ठानल सेहो विधि पूराओल रे। ललना रे भेटल कौषल्या सासु लखन सन देओर रे। तेसर परन सिया ठानल सेहो विधि पूराओल रे। ललना रे माँगल पति श्रीराम सेहो विधि पूरल रे। (२०) गाँव के पछिम एक कुइयाँ सुन्दरि एक पानि भरु रे। ललना रे घोड़बा चढ़ल एक कुमर पानि के पियासल रे। पानि पीबू पानि पीबू कुमर सुरति नहि भुलह रे। तोरो सँ सुन्दर हमर स्वामी जे तजि विदेष गेल रे। कोन मास तोहरो वियाह भेल कोने गवन भेल रे। कोने मास जोड़ल सिनेह कि तजि परदेष गेल रे। फागुन हमरो विआह भेल कि चैत गवन भेल रे। बैसाख जोड़ल सिनेह कि तेजि विदेष गेल रे। (२१) जीर सन धनि पातरि फूल सन सुन्दरि रे। ललना रे सुतल प्रेम पलंग पर दरदे व्याकुल रे। सासु जे हुनका अलारनि बहिन दुलारनि रे। ललना रे तिल एक दरद अंगेजह, होरिला जनम लेत रे। जाहक हे ननदी जाहक, भइया के बजाबह हे। ललना रे भइया ठाढ़ देहरि बीच कहु बात मनके रे। खेलौना (२२) भैया के घर बेटा जनम लेलक बधैया माँगे एलै हो लाल। सोना खराम चढ़ि भैया एला की की मोर बहीन लेली हो लाल। सोनाक हम मट्ठा लेलौ रुपा केर हम लेलौ काड़ा हो लाल। रेषमी कपड़ाक अंगा लेलौ जड़ी लागल हम टोपी हो लाल। पचासक बदला सौ लऽ कए जेती रेषम साड़ी पहिरेबनि हो लाल। भनस कए कऽ भौजी अयली खादी साड़ी पहिरेबनि हो लाल। सयक बदला पचास लय कए जैती, मूड़ी मे डांड़ लगतनिहो लाल। कनैत खीजैत घर ननदि जेती हो लाल। (२३) आइ छठि दिन घर मे सुदिन भेल घर मे भेल ललना, दुआरे वाजे बजना। बाबा लुटाबथि हाथी ओ घोड़ा बावी लुटावे गहना, दुआरे बाजे बजना। काका लुटाबे घड़ी ओ औंठी काकी लुटाबे कंगना, दुआरे बाजे बजना। पिसा लुटाबे मोटर गाड़ी पीसी लुटाबे यौबना, दुआरे बाजे बजना। (२४) बाजे बाजे बधाबा नन्द के अंगना कथक नाचे पमरिया नाचे, छोटकी ननदिया नाचे अंगना। किये तोँ ननदी नाचह आंगन, तोरो भैया रहथि पटना। श् बाजे.... भैया हमर पटना रहै छथि, ओतहि सँ आओत मोती के कंगना। भाई मोरा जीबौ भतीजबा जीबौ, देव पुराओल मन कामना। (२५) ककरा के अंगना जमहिरा रे, मन रंजे के लाल। ककरा बहिनि आबय रे, मन रंजे के लाल। बाबा के अंगना जमहिरा रे, मन रंजे के लाल। पलंगा सुतल तोहे पिया हे, मन रंजे के लाल। बहिन मांगय इनाम रे, मन रंजे के लाल। तेरे सन्दुक मे कंगना रे,श् मन रंजे... कंगना हम नहि लेब रे, मन.... हमहि त लेब नौ लाखा हार,श् मन..... हँसैत जायब ससुरारि रे,श् मन...... हम नहि देब नौ लाख के हार,श् मन.... कनैत जाउ ससुरारि रे,श् मन..... जँ नहि देब नौ लाख के हार,श् मन.... बबुआ के लऽ जैब ससुरारि रे,श् मन.... फेर कऽ बबुआ जनम लेब रे,श् मन.... नैना मे नैना मिला लेब रे,श् मन.... सुनु बचन अहाँ ननदी रे,श् मन.... कोखिया लहरि नहि जाय रे, गन रंजे के लाल। गनियारि पिसबाक गीत कहमा केर जड़िया कहमा सिलौटिया रे। ललना रे कओन मुँह भय पीसब, कौशिल्या पीआयब रे। दछिन के इहो जड़िया, पछिम सिलौटिया रे। ललना रे पूब मुँह भय पीसब, कौषिल्या पीयाअब रे। पहिने जे पीलनि कौषिल्या रानी, सुमित्रा रानी रे। ललना रे सिल धोइ पीयल कैकेयी रानी तीनू गरभ सँओ रे। कौषिल्या के जनमत राम, सुमित्रा के लछमन रे। ललना रे कैकेयी के भरत, शत्रुघन, तीनू घर सोहर रे। तेल-कसाय लगवैक गीत (1) कौने बाबा हरबा जोताओल, मेथिया उपजाओल हे। कौने बाबी पीसल कसाय, जे कि बरुआ ओंगारल हे। बड़का बाबा हरबा जोताओल, कि सरसो उपजाओल हे। ऐहब बाबी तेल पेरौलीह, बरुआ ओंगारथि हे। (2) काँचहि बाँस के मलिया हे, आकि ताहि मलिया तेल फूलेल हे। कौने बाबी लगेतीह तेल फूलेल, आकि कौन बाबी लगेती उबटन हे। आकि फल्लाँ बाबी लगेती तेल फुलेल, आकि फल्लाँ बाबी लगेती उबटन हे। मूड़न गोसाउनि नोतक गीत जँ हम जनितौं काली मैया औती अगर चानन मंगबितौ हे। गंगा सँ मैया चिकनी मंगबितौ ऊँच के पीड़िया बनबितौ हे। नीर गंगाजल सँ पीड़िया निपबितौ अड़हुल फूल चढ़बितौ हे। पीअर पीताम्बर माँ के आँचर दीतौं सोन रुपे घूघरु लगाय हे। जोड़ा छागर धूर बन्हबितौ करिया दीतौं बलिदान हे। भनहि विद्यापति सुनु देबि काली सदा रहब सहाय हे। पितर नोतक गीत कौन बाबा आओत गजन हाथी ओ जे कौने बाबा लिल घोड़ा हे। कौने बाबी अओती दोलियहि कि बरुआ आषीष देती हे। बड़का बाबा आओता गजन हाथी छोटका बाबा लिल घोड़ा हे। ऐहब बाबी अओती दोलियही कि बरुआ आषीष देती हे। मुड़न बेरक गीत समुआ बैसल तोहे बाबा कि बरुआ अरजि करु हे। लपटि झापय ललाट करह जगमूड़न हे। रहु बाबू रहु बाबू बरुआ कि होयत सुदिन दिन हे। नोतब सकल परिवार करब जगमूड़न हे। मूड़न करैत बरुआ क बाबा सँ अरजि करु हे। आनहु पीसि बोलाय कि अउरी पसारल हे। औती पीसी सोहागिन बैसति चैक चढ़ि हे। पीअर वस्त्र पहिरती केष परिछति हे। केष कटबै कालक गीत कौने बाबा छुरिया गढ़ाओल सोने मढ़ाओल हे। कौने अम्मा लेल जन्म केष कि शुभश्शुभ होयत हे। बड़का बाबा छुरिया गढ़ाओल रतने मढ़ओल हे। बड़की बाबी लेल जनमकेष कि शुभश्शुभ होयत हे। देब हे नौआ भैया लाल धोतिया सोनक कैंचिया हे। शुभ कऽ उतारऽ बाबाक केष बबुआ जीक मूड़न हे। नौआक गीत धीरेश्धीरे कटिहह नौआ केष, कि बौआ बड़ दुलारु छइ हौ। बौआक मामी नौआ तौरे देवह, कि बौआ छै बड़ दुलारु हौ। बौआक मामी भार पठौलखिन, ठकुआ तोरे देबह केरा तोरे देवह हौ। बौआक नाना घोती पठेलखिन, पीअर मे रंगि के तोरे देवह हौ। धीरेश्धीरे कटिहह केष, कि बौआ छै बड़ दुलारु हौ। नहेबा कालक गीत कोने बाबा पोखरि खुनाओल, कि घाट बनाओल हे। कोने बाबा भरथि जूड़ी पानि, कि बरुआ नहाबथि हे। अपन बाबा पोखरि खुनाओल, घाट बनाओल हे। ऐहब बाबी भरु जुड़ि पानि, कि बरुआ नहावथि हे। चुमाओन गीत आजु माइ शोभा श्री रघुवर के मातु कौषल्या हकार पठाओल गाइन जतेक नगर के। कैकेयी आयलि सुमित्रा आयलि गाइनि सगर नगर के। दुबि अछत लय देवलोक आयल चर डोलय रघुवर के। तुलसीदास प्रभु तुम्हरे दरस के जीवन सफल दरस के। आजु माइ शेभा श्री रघुवर के। भगवतीक विनती अयलहुँ सरन तोहर हे जगतारनि माता। अयलहु..... लाले मन्दिरिया के लाले केबरिया। लाले घ्वजा फहराय हे जगतारनि माता। लाले चुनरिया के लाले किनरिया, लाले सिनुर कपार हे जगतारनि माता।। राखि लिऔ मुखलाली हमरो। हम लेब अचरा पसारि हे जगतारनि माता।। अयलहुँ सरन तोहार... गाम देवताक गीत बेरिश्बेरि बर बरजौं मालिनि बेटिया, बाट घाट जुनि रोपु फूल हे। एहि बाटे औता ब्राह्मण दुलरुआ, घोड़ टाप तोड़ि देत फूल हे। कानै लगली खीजै लगली मालिनि बेटी, आखि स बहै लागलि नोर हे। के निरमोहिया फूल गाछ तोड़त, के रे देत वरदान हे। जुनि कानू जुनि खीजू मालिनि बेटिया, हमरा स लीअ वरदान हे। पहिल जे मंगलौ ब्रह्मण सिर के सिनुरबा, तखन कोर भरि पुत्र हे। जे पुत्र दीह ब्राह्मण हरि नहि लीह, बाँझी पद छूटत गोर हे। साँझ साँझ दिय यसुमति मइया हे साँझ बीतल जाइये। जैता कन्हैया खिसिआय, हे साँझ बीतल जाइये। कथी केर दीप कथी केर बाती, हे साँझ बीतल जाइये। सोना केर दीप पाट सूत बाती, हे साँझ बीतल जाइये। सरसो तेल जरय सारी राती, हे साँझ बीतल जाइये। जरय लागल दीप चमकि गेल बाती, हे साँझ बीतल जाइये। खेलय लगलै साँझ मइया, हे साँझ बीतल जाइये। उपनयनक गीत (उद्योग गीत) गोसाउनिक नोतक गीत अढ़ुल फूल देखि अयली गोसाउनि, दूधहि चरण पखारब हे। छुट्टा पान गोटा सुपारी, माँ काली नोतल जाथि हे। बरुआक माय बाप गोचर करै अछि, सुनु माता विनती हमार हे। सेबक बालक स्तुति नहि जानय, छमा करब सब अपराध हे। पीतर नोतक गीत दुअरहि बाजन बाजय स्वर्ग आवाज गेल हे। स्वर्ग मे पुछथिन बड़का बाबा कतय बाजन बाजू हे। अहाँ कुल जनमल फल्लाँ बरुआ ओतहि बाजन बाजू हे। स्वर्गहि पितर आनन्द भेल कि आब वंष बाढ़ल हे। स्वर्ग सँ आबि पितर बरुआ के आषीष देल हे। बँसकट्टीक गीत वृन्दावन बाँस कटायब कि मड़बा बनायब हे। पहिने बाँस के पूजब तखन छऽ लगायब हे। आहे ई थिक काठ सुकाठ एही सँ मारब बान्हव हे। आकि वृन्दावन बाँस कटायब कि मड़बा बनायब हे। मड़ठट्ठीक गीत जन्म सुफल आइ भेल की आंगन माड़ब भेल हे। जन्म सुफल ओहि बाबाक जिनका आंगन माड़ब हे। जन्म सुफल ओहि बाबीक जनिका कुल पुत्र भेल हे। पीयरहि खड़ छरायब कि लाल झालरि लगायब हे। ताहि माड़व बैसत फल्लाँ बरुआ जिनकर जनउ हैत हे। चहुदिस रहतनि सर सम्बन्धी की माड़ब सोहाओन हे। मड़वा छारैक गीत बाबा हे फल्लाँ बाबा मड़वा छारि मोहि दैह। बरिसत हे नन्हबुनिया मेघ, भाीजत हे मोरा बालक बरुआ, पीताम्बर ओढ़न को दैह। बाबा हे.... बाबी हे फल्लाँ बाबी आँचर झाँपि मोहि लैह। बरिसत हे नन्हबुनिया मेघ, भीजत हे मोरा बालक बरुआ, आँचर झाँपि मोहि लैह। बाबा हे.... मड़बा नीपक गीत बाबा दान दीअ यौ, मटिया कोड़ैक इनाम दीअ यौ। बाबा दान दीअ यौ, मड़बा नीपैक इनाम दीअ यौ। गइया जे देलौ बछिया लगाय, आर किछु दान बेटी आमा सँ लीअ? आमा दान दीअ यै, मड़बा नीतैक इनाम दीअ यौ। बाली जे देलौ बेटी झुमका लगाय, आर किछु दान बेटी भैया सँ लीअ। भैया दान दीअ यौ, मड़वा नीपैक इनाम दीअ यौ। कंगना जे देल खीलन लगाय, आर किछु दान बहिन काकी सँ लीअ। बलिप्रदान कालक भगवती गीत बदन भयावन कान बीच कुण्डल विकट दषन घन पाँती। फूजल केष वेष तुअ के कह जनि नव जलधर काँती। काटल माथ हाथ अति शोभित तीक्ष्ण खड़ग्कर लाई। भय निर्भय बर दहिन हाथ लय रहिअ दिगम्बरि माई। पीन पयोधर ऊपर राजित लिधुर स्रावित मुण्डहारा। कटि किंकणि शब कर मण्डित सिक बह शोणित धरा। बसिय मसान ध्यान सब ऊपर योगिन गण रहु साथे। नरपति पति राखिअ जग ईष्वरि करु महिनाथ सनाथे। बेटा विवाह कुमरमक गीत (1) हम ते पोखरि खुनबै तेइ के घाट मढ़ैबै। छिनारो आयल करिहें ओहि रे पोखरिया मे। रसिया बात बाजू सम्हारि, छोड़ू हमरा से अरारि। हम त झुलफी धय घिसिआयब पोखरिया मे। हम त कोठवा उठैब तेइ मे खिड़की लगैब। छिनरो अबायल करिहें ओहि रे कोठरिया मे। रसिया बात बाजू सम्हारि छोड़ू हमरा से अरारि, हम त झुलफी धय घिसिआयब कोठरिया मे। हम त पलंगा लगैब तेइ मे तोसक ओछायब। छिनरो आयल करिहें ओहि रे पलंगिया मे। रसिया बात बाजू सम्हारि छोड़ू हमरा से अरारि। हम त झुलफी घय घिसिआयब पलंगिया मे। (2) रिमझिम रिमझिम बुन्दे बरसि गेल, अंगना मे पड़ल कजरिया। थरिया धोबै गेलि फल्लाँ छिनरिया, खसली टांग अलगइया। घेड़बा चड़ल एलखिन फल्लाँ रसिया उठ गै छिनो हरजैया। हम कोना उठबौ रसिया, तोहर बचनिया डरबा मे पड़लैमचकिया। डरबा मचकिया के की की दबैया, सोठि पीपरि मरचइया। सोठि पीपरि के बड़ रे जहरिया, अतर गुलाब ठंदैइया। जुटिका बन्धनक गीत कोने बाबा केरा गाछ रोपल, केरा कोसाय गेल हे। कोने बाबीक बरुआ उमत भेल राति शहर बसु हे। फल्लाँ बाबा केरा गाछ रोपल केरा कोसाय गेल हे। फल्लाँ बाबी बरुआ उमत भेल राति शहर बसु हे। मड़बहि घीव ढ़रकि गेल स्वर्ग इजोत भेल हे। स्वर्गक पितर आनन्द भेल आब कुल रहत हे। आम-महु विआहय लेल जयबा कालक गीत जाइत देखल पथ नागरि सजनी गे,आगरि सुबुधि सयानि। कनकलता सन सुन्दरि सजनीगे, विधि निरमाओल आनि। चलैत हस्ति गमन सन सजनी गे, देखैत राजदुलारि। जनिकर ऐहन सोहागिनि सजनी गे, पाओल पदारथ चारि। निल वसन तन घेरल सजनी गे, सिर लेल चिकुर सम्हारि। ओहि भ्रमर रस पीबह सजनी गे, बैसल पंख पसारि। आम-महु विआहक गीत (1) आम बीछै गेली छिनरो, आँठी विछि लैली हे। पचास बेर मना देलियह, तैयो ने तो मानली हे। आम महु बिआहै छलै, तही से भुलेलियै हे। हजार बेर मना देलियह, तैयो ने तो मानली हे। (2) अमुआ मजरि गेल जमुआ मजरि गेल चम्पाकली ताहि तर छिनरो ठाढ़ि नयना सँ नीरे ढरी। घोड़बा चढ़ल एलखिन फल्लाँ रसिया किए अकेली ठाढ़ं, नयना सँ नीरे ढरी। सासु मोर बुढ़िया हे ननदी ससुररिया मोर पिया गेलै परदेष, नयना सँ नीरे ढ़री। छाड़ि दीअ आ गे छिनरो घरबा दुअरबा सुख सम्पति सगरी। छोड़ि दैह बिअहुआ के आष चल हमरो नगरी अगिया लगेबै रसिया के घरबा दुअरबा, सुख सम्पति सगरी। बज्र खसेबै तोरे माथ मोर पिया आते रही। उपनयन कालक गीत (1) चैतहि बरुआ विजय भेल बैशाख पाहुन भेल हे। घर पछुआर केबटा बसु पार उतारि देहु हे। जौं हम पार उतारब जायब कओन देष हे। जायब हम जाहि देष जहाँ अपन बाबी हे। बाबी के चरण पखारब लाल जनउआ देती हे। (2) काषी मे जाय बरुआ ठाढ़ भेल जनऊ पुकारय हे। आहे के थिका कासी के वासी जनऊ मोहि चाहिय हे। सुतल छला बाबा कवष्वनाथ सेहो उठि बैसला हे। आहे हम थिकौं काषी के वासी जनऊआ पहिरायब हे। झारिखंड जाय वरुआ ठाढ़ भेल जनऊआ माँगय हे। आहे के थिका झारिखंड वासी जनऊ मोहि चाहिय हे। हम थिकौं झारिखण्ड वासी जनऊआ पहिरायब हे। आंगन आबि ठाढ़ि भेल भिखि मांगय हे। हम थिकौं अहाँ के बाबी झोरी भरिय देव हे। भीख कालक गीत मिथिलाक रुसल बरुआ काषी कथि लेल जाय। आगे दाय कियो नहि हित बन्धु जे बरुआ लेल बिलमाय। आगे दाय बाबा से बड़का बाबा बरुआ लेल विलमाय। बाबी से अइहब बाबी भीख नेने ठाढ़ि। आगे माइ भिखो ने लियै बरुआ मुँहो सँ ने बजाय। पहिरय लय पीयर धोती ओढ़य लेल मांगल चादर। आगे माय हाथ दुनु मंट्ठा माँगे कान दुनु सोन। आगे माइ मिथिलाक रुसल बरुआ काषी कियै जाय। पुरोहित के गारि बकलेल बभना चूड़ा दही चाटय ऐला हमर अंगना। चाउर देलियनि दालि दलियनि धेलनि अंगना। एक रती नोन लय करै छथि खेखना। धेती देलियनि तौनी देलियनि धेलनि अंगना। एकटा गमछा ले करै छथि खेखना। सोन देलियनि चानी देलियनि धेलनि अंगना। एकटा पाइ ले कोना करै छथि खेखना। जनउ कालक गीत लाल पीयर अछि माड़ब पाने पात छारल हे। ताहि माड़ब बैसलाह बाबा से फल्लाँ बाबा हे। बगल भए बैसलखिन बाबी से ऐहब बाबी हे। कोरा बैसौलनि बरुआ से फल्लाँ बरुआ हे। बरुआ जे मँगै बाबी लाल पीयर जनऊ दिय हे। रहुश्रहु बाबू आइ अहाँ ब्राह्मण होएव हे। कि लाल जनऊआ देब हक कि पियर जनऊआ हक। चुमाओन कालक गीत आइ षिवक चुमाओन हेमन्त घर मे। सखि सब गाबै मंगलाचार हेमन्त घर मे। आंगन चानन निपू मनाइन गजमोती चैक पुराइ। काँचहि बाँस के डलबाँ बुनाओल। ताहि राखब दूभि धान हेमन्त घर मे। चुमबै बैसली सासु मनाइनि। गौरी सहित त्रिपुरारी हेमन्त घर मे। दुबि अक्षत लय मुनि सब आयल। जय जय शब्द सुनाय हेमन्त घर मे। दनही आ बिलौकी कालक गीत (1) अमुआ मजरि गौले महुआ मजरि गेलै। ताहि तर फल्लाँ छिनरो ठाढ़ि नयना सँ नीर झरे। घोड़बा चढ़ल एलखिन फल्लाँ रसिलवा, कियै छिनरो एकसरि ठाढ़ि। सासु मोरा आन्हर ननदि गेल निज घर, मोर पिया गेल परदेष। नयना...... छोड़ि दिहो छिनरो घरबा दुअरबा, छोर विहुआ के आस। नयना........ (2) नामि नामि कोसिया मे जुटिया गूथविह लटका के चलिहह ना। छिनरो गोरी बदन बिछा के चलिहह ना। पतरी कमरिया मे डरकस पहिरि लचका के चलिहह ना। गोरे कलइया मे घड़ी पहिरि देखा के चलिहह ना। गोरेश्गोरे अखिया मे सुरमा लगाबिह मचका के चलिहह ना। बेटा विवाह विवाहक लेल जाय कालक गीत (कुमार) (1) जहि दिन आहे बाबू तोरो जनम भेल, अन्न पानि किछु ने सोहाय हे।, सेहो बाबू चलला गौरी विआहन, दुधबाक दाम दहु ने चुकाय हे। दूधक दाम अम्मा सधियो ने सकइछ, पोसाइक दाम दै देव हे। जाबत जीव अम्मा सध्यिो ने सकइछ, धनी हेती नौरी तोहार हे। नित दिन आहे अम्मा चरण दबेती, भोरे उटि करती प्रणाम हे। (2) पाकल पान के बिड़िया लगाओल नगर मे पड़ल हकार। आबथु देवलोक बैसथु माड़ब चढ़ि, सब मिलि साजु बरियात हे। कौने बाबा साजल आजनश्बाजन कौने बाबा साजु बरियात हे। कौने बाबी साजल दुलहा दुलरुआ, झलकैत जायत बरियात हे। (3) साँठह आहे आमा सिन्दुरक पुरिया, नगर मे पड़ल हकार हे। साजह आहो बाबा दुलहा दुलरुआ, दूर जायत बरियात हे। जखनहि रामजी कोबर बिच आयल, सरहोजि छेकल दुबारि हे। हमरा के दान दीअ ननदोसिया, तखन कोबर देव पैर हे। मोरा कुल आहे सरहोजि बहिनी ने जनमल, राम लखन दुहु भाइ हे। सेहो भाइ मोर संगहि अयलाह, सरहोजि मांगथि दहेज हे। बरियातीक गीत (1) ऊँची महलिया मालिनि के घर, नीचा लागल फुलवारी हे। ले गे मालिनि सोनाक सूइया, बाबू के गूँथि दे मौरि हे। मौरि लय आयल मालिन, कहलक के देत मौरक दाम हे। घर सँ बाहर भेला फल्लाँ बाबा, हम देब मौरक दाम हे। (2) कौने बाबा सजल घोड़ हाथी कौने बाबा साजु बरियात हे। कौने दुलहा साजथु रहिमल घोड़ा साजि चलल बरियात हे। तिल एक आहे बाबू घोड़ा विलमाव अमा गोर लागि लिय हे। जुरहि जैहह बाबू जुरहि अबिह जुरहि होयत विवाह हे। रहमल घोड़ा सलामति रहतै शुभ2 होयत विवाह हे। नगहर भरबाक गीत भरय चलली सखि सिरहर नव कलष मँगाइ। चानन सिरहर उर लय शुभ सिन्दुर लगाइ। सागर तट जब महुँचल सब नारी। सिर सँ कलष उतारल देल आमक डारी। लोचन प्रीत जुड़ायल सब मिलि मंगल गावे। सब के ई दिन होय विधाता लिखथि भागे। शुभ कार्य मे विदा होयबा कालक गीत शुभे ल बहार भेलि बेटीक माय, काहु हाथ नारियल काहू दूबि धान, काहू खोंइछा साँठल पाकल पान भैया हाथ नारियल भौजी दूबि धान। अमा खोंइछा साँठल पाकल पान। आजू मोरा आजू मोरा उचित कल्याण, बीलहह हे तरुणी सिनुर पिठार। बेटीक विआह (कुमारि गीत) (1) कौने बन बोले कारी कोइलिया कौने बन बोले मयूर हे। कौने घर बोले सीता हे दुलारी आब सीता रहति कुमारि हे। आनन्द बन बोले कारी कोइलिया निकुंज बन बोले मयूर हे। राजा जनक घर सीता बेटी बोले आब सीता व्याहन जोग हे। जाहक आहो बाबा राज अयोध्या जहाँ बसै दषरथ राज हे। राजा दषरथ के चारि पुत्र छनि राम लखन दुइ वीर हे। गोरहि देखि जनु भुलहि हो बाबा श्यामहि तिलक चढ़ैब हे। अपन जोग बाबा समधि जोहब नगर जोकर बरिआत हे। सीता जोकर बाबा लायब जमैया देखत जनकपुरक लोक हे। (2) जहि दिन आहे बेटी तोहरो जनम भेल से दिन कहलो ने जाय। चिन्ता निन्द हरित भेल बेटी थीर नहि रहल गेयान। कथी लय आहे सियाक जन्म भेल से भेल व्याहन योग से सुनि बाबा उढ़ला चेहाय चलि भेला ताकयं जमाय। बाँध बनबिहह बाबा पोखरि खुनबिहह लगबिहह आमक गाछ। हँस जुटत आ कमल फुलायत जल मारत हिलकोर। ई सरोवर जैतुक नहि माँगत भैया होयता वेहाल। दरबाजा पर वरियाती ऐला पर (1) आउ आउ आहे बहिना सखिया हमार हे। रतन पलकिया चढ़ि आयल चारु दुलहा। हाथी घनेरो आबे घोड़ा हजार हे। कतेक वरियाती आबे पाबी न पारे हे। जेहने कुमारि तेहने चारु कुमार हे। तिरहुत के नर नारी देखय मुँह उघारि हे। लग भऽ जाऊ बहिनि लाज बिसारि हे। गाओल सिनेहलता मन के उसारि हे। परिछनक गीत (1) शिव छथि जागल लागल दुआरी हे बहिना, शिव छथि लागल दुआरी। इन्द्र चन्द्र दिक्पाल वरुण सभ, चढ़िश्चढ़ि निज असबारी। साजि बरात हेमन्त घर आयल, नगर शोर भेल भारी। शिव... पुरहित ब्रह्मा चारु मुख लय, वेद ऋृचा उचारी। दाढ़ी झुलबैत अगुआ नारद, ब्राह्मण वीणा धारी। शिव... परिछय चलली माय मनाइनि,लय कंचन दुइ थारी। शिव... पटकि आरती घर के पड़ली, नाग छोड़ल फुफकारी। शिव... योगन गण मण्डप बीच आयल, भरि गहना पेटारी। तखन ससरि मण्डप दिषि आयल, देखल सब नरश्नारी। शिव... हरहारा के काड़ा, पहुँची पनिया दरारी। ढ़ोढ़क जोसन सुगबा के मुनरी, मनटीका मनिहारी। ढ़ोरक करेत आ अजगर, अधसर के पटसारी। धामन करधन गेड़ुली गहुमन, नागक नथिया भारी। शिव... जेहने बर तेहने बरियाती, तेहने गहना सारी। षिव छथि लागल दुआरी, हे बहिना षिव छथि लागल दुआरी। (2) चलु सखि सब देहरि पर साजू डाला पान हे। आनि ठक बक दीप लेसू परिछु सीताराम हे। हरखि चलू बरियात बरियात आयल राज भवन समीप हे। आइ अछि बड़ भाग हे सखि राम दरषन देल हे। (3) सीता करथि बिलाप तन थरश्थर काँप। धनुषा केओ नहि तोरल जनकपुर मे। आब हम रहब कुमारि घर बैसल हिय हारि, बिनु पुरषक नारि जनकपुर मे। घर मे बैसब आब जाय, अपन वयस गमाय। मरब जहरश्बिख खाय, जनकपुर मे। (4) घीरेश्घीरे चलियौ दुलहा अंगना हमार हे। अंगना मे होयत दुलहा विधि व्यवहार हे। सरहोजि दाइ लेती नाक पकरि हे। लग कनी अबियौ दुलहा लाज बिसारि हे। धुनेष के झाँपल मुँह करियौ उधार हे। सिताजी के माय सुनयना आरती उतारु हे। कपड़ा उतारै कालक गीत माइ हे नाक दबाय वरके जाँचू बहिना। दाइ हे योगी छथि कि भोगी से बुझबनि कोना? कपड़ा निकालि बनी देखियनु बहिना। दाइ हे रोगी छथि कि भोगी से बुझवनि कोना? माइ हे हाथ पैर नीक जकाँ जाँचू बहिना। हाथ पैर ठीक छनि कि नहि से बुझवनि कोना? घुमाय फिराय वर के देखियनु बहिना। माइ हे नांगर छथि कि ठीक से वुझबनि कोना? दाइ हे बजाय झुकाय बरके देखियनु बहिना। पण्डित छथि कि मूर्ख से वुझबनि कोना? पाग उतारै कालक गीत जे एहि बर के आंगन अनलनि हुनका देवनि गारि हे। धोती पहिरक लूरि ने हिनका पाग खसल जाय हे। देह परहक वस्त्रो जे छनि सेहो अनलनि माँगि हे। ठक बक किछुओ नहि चिन्हथि हिनका देबनि फेरि हे। अक्षरक ज्ञान कनियो ने हिनका नित करथि चरबाहि हे। मूसे कवि इहो पद गेलनि गौड़ीक बड़ दिअमान हे। चतुर घटक इहो वर अनलनि हिनके दियनु वियाहि हे। नाक धरक गीत सिर स पाग उतारल काँख दबाओल हे। लय डोपटा गिरमोहार नाक धय आनल हे। दुधहि चरण परवारल निहुरि निहारल हे। हिनको परिछि घर आनल परिछि देखओल हे। ठक बक चीन्हक गीत चलूश्चलू दुलहा अंगना हमार यो। अंगना मे होयत दुलहा विधि व्यवहार यो। ठक के कहलनि दुलहा माटिक मुरुत यो। दुलहाक माय केहन छिनारि इहो ने सिखेलखिन हे। हुनकर काकी केहन छिनारि इहो ने सिखेलखिन हे। बेसन के कहलनि दुलहा घाटि यो। दुलहाक पीसी केहन छिनारि इहो ने सिखेलखिन यो। भालरि के कहलनि दुलहा केरा के पात यो। दुलहाक बहिन केहन खेलारि इहो ने सिखेलखिन यो। मूज के कहलनि दुलहा इ थीक कोर यो। हिनकर पितामही केहन खेलारि इहो ने सिखेलखिन यो। आंगन जायकालक गीत चलु घीरे धीरे ललन ललीक अँगना ई अंगना नहि बुझब अवध के दौड़ल चलब मन मानत जेना। चलु..... गमकैत फूल कियारी लागल हीरा पन्ना गमला साजल बेली चमेली गुलाब दोना। चलू.... एहिना फुल रहय मिथिला मे बारहो मास ओ तीसो दिना। चलू.... देखथि दुलहा ठाढ़ अँगना। चलु.... अठोंगर कुटै कालक गीत हम धनमा कुटैब एहि बरबा से। घुरि फिरि आयल अवधबा से। की बहिया की नृपति बालक। बुझबनि उखरि मूसरबा से। घुमि घुमि धान कुटै छथि बालक। विवष भेल बेवहरबा से। चैदह भुवन ई अनका बन्है छथि। आइ बन्हियनु काँच डोरबा से। स्नेहलता ई गाओल अठोंगर। रानी बिलोकति घरबा से। नैनाश् योगिनिक गीतश् पहिल योगिनिया तोहे अपन सासु हे। आब दुलहा भेलहा योगिनिया बसी हे। आलरिश् झालरि कन्ह कारु सिर बेनिया हे। गीत स पहिनक फकड़ा थिकौ बंगालिनि बसी, बंगला सुरपुर स आयल छी सूखल नदिया नाव चलाबे, बिन लेसन के दधि जनमाबे। चुलहिक पुत्ता सारि उपजाबे, कोठी पर जे बड़द नचाबे। कन्या निरीक्षण कालक गीत देल आमक पल्लव आमक पल्लव हे। चिन्हू बाबू चिन्हू घनि, अपन चिन्हि जुनि भूलव हे। रघुकूल के एक रीति, तकर सुधि राखब हे। आहे! हेरथि नहि परनारि, से तखनहि जानब हे। चारु ललन चित्त चंचल करे डगमग हिय हे। आहे! आजु असल थिक जाँच नृपति घर आयल हे। यद्यपि चारु कुमार कुलक पति(पैत) राखल हे। सब सखि देल हकार ललन कहि राखल हे। एहि अवसरक फकड़ा काँच बाँस काटि के, बंगला घर छाड़ि के, दहिन लट झाड़ि के. वाम छथि कनियाँ दहिन छथि सारि, उठाउ प्रथम वर हृदय विचारि। जौं नहि चिन्हब अप्पन नारि, हँसती सखी सब थपड़ी पाड़ि। आम महु विवाहक गीत उठु उठु कामिनि छोड़ह लाज, द्वार लागल छथि पाहुन समाज। आयल दषरथ साजि बरियात, फुलह फलह सखि नव जल जात। मन जे आँकल गेल तुलाय, सुनतहि सीता गेली फुलाय। गद्गद स्वर बड़ होइछ लाज, आजु देखत मोहि ससुर समाज। धोबिनक सोहागश् धोविनक बेटी झट दहिन सोहाग गे राजा जनकजी के एक गोट बेटी। सिन्दुर पिठार लय मुँगरी पुजबही, लय धो दहिन सोहाग गे। धोबिन... गुर चााउर लऽ मुँह मे खुअबही कोचा धो दहिन सोहाग गे। धोविन.... सुकुमारि धिया के सोहाग दही ने, खय के देबौ चूड़ा दही। पहिरय के देबौ सायाश्साड़ी जेवर देबौ लटकाय। सुकुमारी.... देबौ मे देबौ गाय महिसबा, जोड़ा बड़द देबौ हकाय। सुकुमारी.... बेदी घुमय कालक गीतश् (1) गरदनि बान्हल चदरिया आगूश्आगू सिया माई। करथिन मण्डप परिकर्मा हे दुलहा और भाई। बसहा जकाँ सभ घुमथिन हे न चलय प्रभुताई। गाबथि मंगल गाइनि हे सब मंगल छाई। हँसी अली मुसकाथि छनहि देथि पीहकारी। से सुनि हँसि कऽ जमाय हे देल परिक्रमा सारी। (2) नहु नहु दुलहा चलै छथि कोना। जेना कल्हुआ के बरदा घुमै जेना। बड़द के उपमा हुनका देलियनि कोना। माई हे चैरासीक फन्दा मे पड़लनि जेना। डेग नमहर कऽ दुलहा चलै छथि कोना। माई हे खुट्टा स बड़दा खुजै जेना। बरदाक उपमा हुनका देलियनि कोना। माई गे चैड़ासीक फन्दा मे पड़लनि जेना। अंगना मे ठाढ़ दुलहा लगै छथि कोना। जेना अंगना मे मेह गाड़ल हो जेना। मेहक उपमा हुनका देलियनि कोना। जेना चोरासीक फन्दा मे पड़ला जेना। कहथि सिनेहलता चलब कोना। माई गे आंगुरक इसारा देब जेनाश्जेना। कन्यादान कालक गीतश् कोनहि कुल मे सीता जनम लेल, कौनहि कुल श्रीराम हे। कौनहि आगे माइ वेद उचारल कौनहि कैल कन्यादान हे। राजा जनक घर सीता जनम लेल दषरथ घर श्रीराम हे। नारद ब्राह्मण वेद उचारल जनक कयल कन्यादान हे। राजा जनक देल हीरा मोती सोनमा आओर देलनि धेनु गाय हे। रानी सुनयना देल सीता सन बेटी राम लेल अंगुरी लगाय हे। कहमा छुटल सुपति मौनियाँ कहमा जनक ऋृषि बाप हे। कहमा छुटल माय सुनैना जिनका झहरनि नोर हे। अंगनहि छुटल सुपति मौनियाँ दुआरे जनक ऋृषि बाप हे। मंदिर छुटल माय सुनैना जनिका नैन नोर हे। सिनुरदान गीतश् पाहुन सिन्दुर लिय हाथ, सर सुपारीक साथ। सिता उधारल माथ सिन्दुर लिय अय। सुन्दर बितै अछि लगन, अहाँ धनुष कयल भगन। सब आनन्द मगन, आषिष दिय अय। रघुबर सिर शोभनि मौर, सीता नित पूजथि गौर। आइ पूरल मनोरथ नरपति होय लय। महिमा दुनूक अनूप, सब आनन्दित भूप। आइ पूरल मनोरथ आनन्दित होय लय। लावा छिटबा कालक गीतश् मैना देखहुँ जाय, त्रिभुवन पति भेल अहाँक जमाय। षिव गौरी मिलि लावा छिड़िआय। भूखल वासुकि बिछिश् बिछि खाय। सोनाक बट्टा भरि घोरल कसाय। उमत सदाषिव भसम लोटाय। जटा मे देल अंकुसी लगाय। झिकतहि सुरसरि गेलि बहराय। विआहक गीत मचिया बैसल तोहे राजा हेमन्त ऋृषि, सुनू अहाँ बचन हमार यो। गौरी कुमारि कते दिन रहती, ई नहि उचित विचार यो। एतबा वचन जब सुनल हेमन्त ऋृषि, पंडित अनलनि बजाय यो। आबथु पंडित बैसथु पलंग चढ़ि, मुनि देथु धीया के विआह हे। एक पोथी तकलनि दोसर पोथी तकलनि, तेसर मोथी तकलनि पुरान यो। ओहि रे जंगल मे योगी एक वसै छथि, तनिके संग धिया के विआह यो। अरही वन के खड़ही कटाओल, वृन्दावन बिट बाँस यो। देव पितर मिलि माड़व ठानल, होबय लागल धिया के विआह यो। एक दिस बैसला नारद ब्राह्मण, दोसर दिषि गौरीक बाप यो। बाघक छाल पर वैसला महादेव, होअय लागल धिया के विआह यो। कन्यादान कय उठला हेमंत ऋृषि, मोती जेंका झहरनि नोर यो। किए जे खेलौ बेटी किए पहिरलौ, कथी ले भेलहुँ वीरान यो। खीर जे खेलौ बाबा चीर पहिरलौ, सिन्दुर लै भेलहुँ वीरान यो। देहरि छेकक गीत छोड़ब नहि दुआरि सुनियौ रघुनन्दन। जौं रघुनन्दन चलला कोवर घर सरहोजि छेकल दुआरि। नेग बिना दय पैर बढ़ायब देब गारि हजार यौ, सुनियौ रघुनन्दन ... पाँच पदारथ हरि जीक संग मे एक सरहोजि एक सारि यौ, सुनियौ... जौं नहि देता सात पदारथ बेचता बहिन भाय यौ। सुनियौ.... बरियाती खेबा कालक गीत (1) समधि गारि नइ दै छी विनती करै छी, समधिक माए पितिआइन गोअरबा के दै छी। गोअरबा सँ दूध मंगबै छी, लके समधि जिमबै छी। समधि... समधि के दादी नानी ल बनियाँ के दै छी बनियाँ सँ चीनी मंगा समधि के दै छी। समधि.... समधि क मौसी पीसी ल मड़बड़िया के दै छी। मड़बड़िया स धेती कीनि समधि के दै छी। समधि गारि.... (2) निज कुल कामिनि समधिन छिनरो महिमा अगम अपार। सगर नगर घर एको ने छोड़लनि के थिक अपन परार। बनियाँ मे जे फल्लाँ के गछलनि जिनका टाका हजार। पढ़ूआ मे जे डाक्टर के गछलनि जे भोकतनि सूई बारम्बार। राजपूत मे जे फल्लाँ के गछलनि जनिका ढ़ालश्तलवार। गोआर मे जे फल्लाँ के गछलनि जिनका धेनु हजार। सोनरा मे जे फल्लाँ के गछलनि जनिका जेवर भण्डार। तमोलिन मे जे फल्लाँ के गछलनि के करतनि उपर लाल। कोवर गीत (1) कोने बाबा बान्हल इहो नव कोवन हे जनकपुर कोवर। कोने अम्मा लिखल पूरैन हे जनकपुर कोवर। फल्लाँ बाबा बान्हल इहो नव कोवर फल्लाँ अम्मा लिखू पूरैन हे। ताहि पैसि सुतय गेला फल्लाँ दुलहा सीता कोवर धय ठाढ़ि हे। बैसू सीता दाइ लाले रे पलंगिया बुझि लिय हमरो गेयान हे। जनकपुर (2) नव खटिया नव पटिया नव सब पुरहर हे। आहे नव नव जोड़ल सिनेह सोहाग राति निन्द नहि हे। ताहि पैसि सुतलाह फल्लाँ दुलहा संग सिया दाइ हे। सीताअति सुकुमारि सोहाग राति निन्द नहि हे। हटि सुतु हटि सुतु ससुर जी के बेटिया अहाँ धामे गरमी बहुत हे। एतबा वचन सुनि कनियाँ सुहवे रुसि बाहर चलि जाइ हे। हम नहि घुरबै ककरो वचनियाँ कोवरक वर बड़ ठेकर हे। महुअक कालक गीत बर रे जतन सासु मौहक रान्हल खिरियो ने खाथि जमाय। गे माइ गौरी जाय दहिन भरि बैसलि थार बदल दुइ भेल। मनाइनि जाय पाँछा भय बैसलि वर करा एक देल। गे माइ सेहो करा हम कुकुर जिमायब से पान वर के देल। घरभरी कालक गीतश् माय मनाइनि पान लगाबथि सब मिलि कैल ओरियान। आइ थिकनि घरभरी सखि हे धीया जमैआ मोर जाय। धानश्पान देल हाथहि सखि हे दुनू मिलि देलि छिड़आय। भनहि विद्यापति गाओल सखि हे सब बेटी सासुर जाय। खोंइछ झाड़ैक गीत सगर जनम हम आस लगाओल, भैया करता बिआह गे माइ। भौजी के खोंइछा मे हीरा मोती आओत, ताहि लय गहना गढ़ायब गे माइ। तेहन घर ने भैया बिआहल, भौजी खोंइछ दुबिश्धान गे माइ। जनु कानू जनु खीजू बहिन दुलरुआ, हम देव गहना गढ़ाय गे माइ। कोवर परातीश् अब ने विलासक बेरि हे माधव, आब ने विलासक बेरि। मुखहुक पान बिरस सन लागत, दीपक जोति मलीन। हे माधव..... चेरिया आय बहारय आंगन, चन्द्रक जोति मलीन। हे माधव..... ग्वाला आय गौ दूहन लागे, बछड़ डगरि बन गेल। हे माधव...... सूरदास प्रभु तुम्हारे दरस को, सुर्य उदय भय गेल। हे माधव....... कनियाँ मुँह देखैक गीत सुनू हे सखिया सिया मुँह देखू शुभ काल। पहिने जे देखथि सासु कौशिल्या, देखू हे सखिया मोहर देखि शुभ काल। तखन जे देखथिन गोतनि बड़ैतिन। देखू हे सखिया कंगना देथि शुभ काल। तखन जे देखथिन ननदि बड़ैतिन, देखू हे सखिया टाका देथि शुभ काल। तखन जे देखथि परश्परोसिन, आषीष देथि शुभ काल। सुनू हेे सखिया.... कोबर नीपै कालक गीत नीक नीपू नीक नीपू दुलहिनिया। नहि नीक नीपब ते सुनब कहिनिया। कुम्हराक बेटी अहाँ थिकहुँ दुलहिनिया। माटि आनि नीपू नइ ते सुनब कहिनिया। जोलहाक जनमल थिकहुँ दुलहिनिया। पाट आनि नीपू नइ ते सुनब कहिनिया। बहियाक बेटी अहाँ थिकहुँ दुलहिनिया। पानि आनि नीपू नै ते सुनब कहिनिया। कोबर नीपै काल कनियाँ क ठकैक गीत देखू देखू हे सखि सीता रुसि रहली, आधा निपलनि कोबर आध छोड़ि बैसली। देखू- देखू ..... सीताक बापकेँ बजाउ, सीता माए केँ बजाउ की सब सीता के सिखा क वदा कयली। देखू.... सुनलनि सासु कौषिल्या हाथ मोहर धयली कंगना गढ़ायब टीका मंगायब सीता किए रुसली। देखू- देखू ........ गौरी पूजाक गीत गौरी पूजय चलल रुक्मिनि संग सखी दस पाँच यो। तीन फूल लय गौरी पूजल बेली चम्पा गुलाब यो। तीन सिन्दुर लय गौरी पूजल मोटिया पीपा अचीन यो। तीन नेवेद्य लय गौरी पूजल नेवो नारंगी अनार यो। तीन वस्त्र लय गोरी पूजल लाल पीयर पटोर यो। तीन बेरि कल जोरि पूजब लय गंगाजल नीर यो। हड़ीर पानक गीत रतन सिंहासन बैसथु सुलपाणि रवाथि ने हरीर पान पीवथु जूड़ी पानि। जेहने महादेव के गौरीदाइ परान तेहने फल्लाँ दुलहाके फल्लीं दाइ परान। जेहने रामचन्द्र के सीता दाइ परान तेंहने फल्लाँ दुलहा के फल्लों दाइ परान। जेहने हड़ीर खेने मधुर पानि तेहने फल्लाँ दुलहाक फल्लों दाइ मधुर हे। मुट्ठी खोलैक गीत सखि मुट्ठियो ने खोलय जमैया हे हारि गेला रधुरैया। हमरो सीता मुट्ठी कसि के बान्हल खोलियो ने सकला जमैया हे।हारि गेला... हमरो सिया दाइक कोमल आँगुर धीरे स खोलब जमैया हे। हारि गेला... चतुर्थीक कालक गीत चलुश्चलु कामिनि कर असनान। प्रखर भानु मुख करत मलान। शीतल शुरभीत जल घट देल। पंकज नायक नभगत भेल। आजु चतुर्थीक अवसर थीक। किछुओ ने भिजतह लोहित सारि। लहु लहु जल हम ढा़रब बारि। दुहु जन रहु गय अमर कहाय। वरुण देव नित रहथु सहाय। कुमर चतुर्थीक उत्सव तोर। विधिकरी विधि करु भऽ गेल भोर। नहायकालक गीत राम लखन सन सुन्दर वर के जनु पढ़ियनु केओ गारि हे। केवल हास विनोदक पुछिअनु उचित कथा दुइ चारि हे। प्रथम कथा ई पुछिअनु सजनी कहता कनेक विचारि हे। गोरे दषरथ गोरे कौषल्या, भरत राम किएक कारी हे। सुनु सखि एक अनुपम घटना, अचरज लागत भारी हे। खीर खाय बालक जनमौलनि, अवध पुरी के नारी हे। अकथ कथ की बाजू सजनी, रघुकूल के गति न्यारी हे। साठि हजार बालक जनमौलनि सगरक नारि छिनारि हे। नेहलता किछु आब ने कहियनु, एतवे करथि करारी हे। हँसी खुषी मिथिला से जेता, पठा देता महतारी हे। वेदी उखारै कालक गीत सखि यदि एक बापक बेटा हेता दोसर हाथ ने लगेता हे। दू बापक बेटा हेताह तखने दोसर हाथ लगोता हे। दू कोन के वेदी उखारलनि तेसर आंगन मे ठाढ़ हे। कहियनु गऽ सासु ससुर सँ आंगन मे रुसल छथि जमाय हे। कहियनु जाय जमाय बाबू सँ औंठी देवनि गढ़ाय हे। पटिया समटय कालक गीत रघुववर पटिया देलनि ओछाय सीता फेकल जुमाय कोवर घर मे। गाइन मंगल गीत गाय विधिकरी विधि कराय। सखि सब करथि विनोद कोवर घर मे। कहथिन सरहोजि बुझाय जुनि अहाँ अगुताइ। विधि करियौ आइ कोवर घर मे। सौजनक गीतश् मेही भात जतन भनसीआ साँठि लयल भरि थारी जी, राहड़िक दालि बटा भरि उत्तम ताहि देल घी ढ़ारी जी। ओल पड़ोर तरल तरकारी खटरस भेग लगावै जी। महिसिक दही छाँछ भरि उत्तम परसय प्रेम पियारी जी। दही खयवा कालक गीत हे वर दही किये ने खाइ छी माय अहाँक गोआरक बहु छथि अहाँ संग किएक ने लयलहुँ संग संग अयली टीसन सँ घुरली टीकट मास्टर देखि डेरेयली हे वर चीनी किये ने खाइ छी माय अहाँक छथि बनियाक बहुआ स्ंाग किये नहि अनलहुँ स्ंागे अयली दरबजा सँ घुरली समधी देखि डेरेयली। हे वर... चित्ती साटक गीत भितिया मे चितिया सटि हे योगिया जाहि ठाम लागल सिन्दुर पिठार। जहाँ जहाँ सुमिरन करबे रे योगिया रखिहे हिरदय लगाय। नून तेल पैंच लेल सिन्दुर सपन भेल पिया भेल डुमरीक फूल। भितिया.... मधुश्रावनीश् गोसाउनिक गीतश् (1) विनती सुनियौ हे महरानी, हम सब शरण मे ठाढ़। अक्षत चानन अहाँ के चढ़ायब, आरती उतारव ना। बेली चमेलीक माँ के हार चढ़ायब अढ़ूल चढ़ायब ना। करिया छागर धूर बन्हायब, उजर चढ़ायब ना। (2) महिमा तोहर अपार हे जगजननी महिमा तोहर अपार हे। बामे रवप्पर दहिने कताबहै सोनितक घार हे।महिमा..... पहिरन चीर गले मुण्डमाला पैर मे नुपुर अपार हे। सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस के सदा रहिय रखवार हे। महिमा.... बिसहाराक गीत साओन मास नागपंचमी भेल। बिसहरि गहवर सोहाओन भेल। केओ नीपै गहवन केओ चैपारि। हमही अभागिन निपी दुआरि। केओ लोढ़े अढ़ूल केओ बेलपात। हमहू अभागिन हरिअर दूबि। केओ माँगे अनधन केओ माँगे पूत। हमहू अभागिन सिरक सिन्दुर। पावनिक गीत पाबनि पूजू आजु सोहागिन प्राण नाथ के संग मे। कारी कम्बल झारि गंगाजल काजर सिन्दुर हाथ मे। चानन घसू मेहदी पीसू लिखू मैना पात मे। पावनि साजि भरिश्भरि आनल जाही जूही पात मे। कतेक सुन्दर साज सजल अछि लिखल मैना पात मे। आँखि मूनै कालक गीत नहुँ नहुँ धरु सखी बाती, धरकय मोर छाती। नहुँ नहुँ पान पसारह, नहुँ नहुँ दृग दुहु झाँपह। मधुर मधुर उठ दाह मधुर मधुर अवगाहे। कुमर करह विधि आजे, मधुश्रावनी भेल आजे। टेमी कालक गीत क्दली दल सन थर थर कापय मधुश्रावनी आजे। स्कल सिंगार समारि साजथि सब मधुमय कैल समाजे। क्मल नयन पर पानक पट दै नागर जखनहि झाँपै। विधकरी हाथ चन्द्रकर बाती देखि सगर तन काँपै। आजु सोहागिन सहमल बैसल मुख किये पड़ल उदासे। अम्बा मुख हेरय कियै कामिनि पल पल लैह उसासे। कुमर नयन सँ नोर बहाबह गाइनि गाबथि गीते। बड़ अजगुत मधुश्रावनी विधि परम कठिन इहो रीते। बटसावित्री बड़क पूजाक गीत जेठ मास अमावस सजनी गे सब धनि मंगल गाव। भूषण वसन ठीक करु सजनी गे रचि रचि आँग लगाव। काजर रेख सिन्दुर भेल सजनी गे पहिरथु सुबुधि सयानि। हरखित चललि अक्षयवट सजनी गे गवितहि मंगल गाने। घर घर नारि हकारल सजनी गे आदर सँ सभ गेलि। आइ थिक बड़साइति सजनी गे तैँ आकुल सभ भेलि। घुरुमिश्घुरुमि जल ढ़ारल सजनी गे बांटल अक्षत सुपारी। फतुर लाल देल आषिष सजनी गे जीबथु दुलह दुलारी। (2) कतेक जतन भरमाओल सजनी गे, दै दै शपथ हजारे। सपथहुँ छल जौं जनितहुँ सजनी गे, नहि करितहुँ अंकारे। आब जगत भरि मानिनि सजनी गे, केओ जनि करय पिरीते। मुँह सँ अधिक बुझावथि सजनी गे, वचन त राखथि थीर हुनक हिया दगधल मोर सजनी गे, जसु नलिनी दल नीर। गुन अवगुन सब बुझलहुँ सजनी गे, बुझलुँ पुरुषक रीत। मनहि विद्यापति गाओल सजनी गे, पुरुषक कपटी प्रीति। कोजगरा चुमाओन भैया के करियनु चुमाओन कोजगरा मे। बाबू जी पुछि पुछि परसथि मखान भोजघरा मे। आंगन चानन नीपल गेल अछि। गजमोती चैक पुराय देल अछि। भैया के कहिऔन चुमाओन कोजगरा मे। मानिक दीप जराओल दय दय। काँच बाँस के डाला लय लय। भैया के करियौन चुमाओन कोजगरा मे। पचीसी गीत खेलू खेलू यौ भैया बाजी लागइ के। सीता जीतथि रामजी हारथि बाजी लगाइ के। सखि सब देथिपिहकारी बाजी लगाई के। सीता हारथि रामजी जितथि बाजी लगाइ के। सखी सब गेल लजाय बाजी लगाइ के। धन्य धन्य सखी हम मिथिलावासी। रामजी भेला जमाय बाजी लगाइ के। जुआ खैलै लेल एल जनकपुर वाजी लगाइ के। हारला भाय बहिन पितिआइन हे वाजी लगाइ के। दुरागमन- कनियाँ परिछनि सीता एली अंगना परिछन चलु सखि सब। कथी के महफा कथी के लागल ओहार हे। सोनाक महफा रेषमक लागल ओहार हे। सीता एली अंगना परिछन चलु सखी सब। कथी के साड़ी कथीक लागल किनारी हे। रेषमक साड़ी गोटा लागल किनारी हे। सीता एली अंगना परिछय चलू सखि सब। कतय गेली सासु ओ ननदि जी हे। सीता के अरिछिश्परिछि घर लय चलू हे। सीता एली अंगना परिछय चलू सखि सब। चमाओन गीत चुमाबहु हे राम सिया के चुमाबहु हे। आंगन चानन निपल कौषिल्या, गजमोती चैक पुराइ हे। अलष कलष लय पुरहर साजल, मानिक दीप जराय हे। काँचहि बाँस के डाला बनल अछि, दही ओ धान सजाई हे। दूभि अक्षत लय मुनि सब अयला, शुभ शुभ शब्द सुनाई हे। चुमबय बैसली मातु कौषिल्या, सखि सब मंगल गावे हे। देहरि छेकक गीत राम सिया मिलि अयला अवधपुर, बहिन छेकलनि दुआरि हे। हमरा दान देव जहन अहाँ भैया, तहन छोड़व हम दुआरि हे। सासु ससुर हमरा किछु नहि देलनि, कि देव अहाँ के देहरि छेकाइ हे। हाथक औंठी भैया खोलि देलखिन, बहिन लेलनि देहरि छेकाइ हे। खोंइछ झारक गीत सगर जनम हम आस लगाओल, भैया करताह विवाह गे माई। भौजीक खोंइछ मे सोना चानी आओत, ताहि लय गहना गढ़ायब गेमाई। तेहना ठाम ने भैया बियहला, भौजीक खोंइछ दुभि धान गे माई। सगर जनम हम आस लगाओल, भैया करताह विवाह गे माई। मोरि बैसक गीत मोरि बैसल अहाँ अपन सासु, मुंह जनु अहाँ बाजब हे। पुतहुँ होयत गलजोर, मुंह जनु अहाँ बाजब हे। मोरि बैसल अपन पितिया सासु, मुंह जनु बाजब हे। पुतोहू होयती गलजोर, मुँह जनु अहाँ बाजब हे। कनियाँ मुँह देखैक गीत सुनु हे सखि सिया मंुह देखु शुभ काल। पहिने जे देखथि अपन सासु कौषिल्या। तखन जे देखथिन गोतिन बड़ेतिन। तखन जे देखथिन ननदि बड़ैतिन। तखन जे देखथि पर परोसिन सब। आषीष देथि सब मिलि शुभ काल। सुनु हे सखि.... कोवर पराती आब न बिलासक बेर हे माधव आब न बिलासक बेर। मुखहुक पान निरस सन लागय, दीपक जोति मलीन। ग्वाला आबि गो दुहन लागे, गैया हमर बन गेल। चेरिया आबि झारु दियै, सुरुज उदय भय गेल। सूरदास प्रभु तुम्हारे दरस को चन्द्रक जोति मलीन। आब न.... कोबरक गीत कोबर लिखय गेलि रानी कौषिल्या, चारु कात लिखल मयूर। ताहि कोबर सुतला फल्लाँ दुलहा, संग लागि सीता सुकुमारि। मुह उधारि सुन्दरि के पुछलनि कोन कोन अभरन हे। हाथ कंगना अपन बाबा देलनि, सिकरी लखन देओर हे। सिरक सिन्दुर प्रभु अहीं जे देलहु यैह तीन अभरन भेटल हे। कोबर नीपक गीत देखू देखू हे सखि सीता आइ रुसि रहली। आधा निपलनि कोबर आधा छोड़ि बैसली। सीताक बापके बजाउ ओ भाय के बजाउ। की की सीता के सिखाय कइलनि विदा। सुनि सासु कौषिल्या मोहर लेलनि हाथ। कंगना गढ़ायब टीका गढ़ायब सिया किय रुसली। कन्या पक्ष तुलासी गौड़ीक गीत फूल लोढ़य गेलि गौरी माली फुलबाड़ी बसहा चढ़ल षिव आइ गे माइ। लोढ़ल फूल षिव देलनि छिरिआइ। कनैत खीजैत गौरी अम्मा लग ठाढ़ि। के तोरा मारलक के पढ़ल तोरा गारि। हम नहि कहब अम्मा कहितहुँ लाज। पूछू गय सखि सभके कहत बुझाय। महेषवाणी हम नहि आजु रहब एहि आंगन, जौं वूढ़ होयत जमाय गे माई। एक त बैरिन भेल विधि विधाता, दोसर धिया के बाप गे माई। तेसर बैटी भेला नारद ब्राह्मण, हेरि लयला बूढ़ जमाय गे माई। धोती लोटा पोथी पतरा, सेहो सब लेबनि छिनाय गे माई। जौं किछु बजता नारद ब्राह्मण, दाढ़ी धऽ देबनि धिसिआइ गेमाइ। अरिपन लेपलनि पुरहर फोरलनि, फेकलनि चैमुख दीप गे माई। धिया लऽ मनाइनि मन्दिर पैसलीह, केओ जुनि गाबथि गीत गे माई। भनहि विद्यापति सुनु ए मनाइनि, इहो थिक त्रिभुवन नाथ गे माई। शुश्षुभ कऽ षिव गौरी विवाहू, इहो वर लिखल ललाट गे माई। समदाउन बारह बरस केर छल उमिरिया तेरहम बरस ससुरारि। कौने निरमोहिया दिनमा पठाओल कोन निरमोही मानि लेल। कौने निरमोहिया डोलिया पठौलक कौने निरमोही नेने जाय। ससुर निरमोहिया दिनमा पठौलक बाबा निरमोही मानि लेल। भैया निरमोहिया डोली पठौलकइ स्वामी निरमोही नेने जाय। कथी देखि धैरज धरबह हे सखिया कथि देखि रहब लोभाय। घरभरीक गीत माय मनाइनि पान लगाबथि सब मिलि कयल ओरियान। आइ थिकनि घरभरी सखि हे धिया जमैया मोर जाय। धान पान देल हाथहिँ सखि हेे दुनु मिलि देल छिड़िआय। भनहि विद्यापति गाओल सखि हे सब बेटी सासुर जाय। अवसर विषेष वा समसामयिक पावस नव घन गरजत माला। एक सघन तिपिराछन रजनी कूजित दुतिय मराला। तेहर सेज सुनि लखि पहु बिनु उठल अन्तर ज्वाला। रहिश्रहि चहुदिषि चपला चमकत विहरिनि जन जिमि भाला। खेपब राति कौन विधि सखि हे चिन्ता हृदय विषाला हे जलधर अहाँ जाउ ततय झट जहाँ बसथि नन्दलाल। करबनि विनय चरण धय लबि कऽ आबथु शीघ्र कृपाला जौं झट दऽ मोहन नहि औता करता निमिप अभेला। तौं ब्रज मे एको नहि जीउति विरहिनि सब व्रजवाला। कजरी सखी हे पिया नहि घर अयला, मेघवा वरिसन लागे ना। जौं हम जनितौं पिया नहि औंता रखितहुँ हृदय लगाय। हमरा सँ की त्रुटि भेल सखि हे आइधरि नहि आय। जौं जनितौ पिया ऐहन करता दितियनि नहि हम जाय। सखी हे पिया नहि घर अयला। (2) सखिया सावन ने डर लागै जियरा धड़श्धड़ धड़कै ना। ष्याम घटा चहुँ ओर देखायत बिजुरी चमकै ना। पिया मोर परदेष गेला सुन सेजबा न भावै ना। झींगुर दादुर मोर पपिहरा कोइली कुहकै ना। सखिया सावन मे डर लागै ना। उदासी तिरहुत मधुपुर गेल मनमोहन रे मोर बिहरत छाती। गोपी सकंल बिसललनि रे जते छल अहिबाती। सुतलि छलहुँ अपन गृह रे निन्न गेलौ सपनाइ कर स छूटल परसमनि रे के लेल अपनाई कत सुमिरब कत झाँखब रे हम मरब गरानी। आनक धन लय धनबन्ती रे, कुबजा भेलि रानीश्तिरहुत। (2) जखन चलल हरि मधुपुर रे सब सुरति निहारि। आब कोना रहब हरि बिनु रे झाँखथि ब्रजनारी। वन मे डोलय पिपर पात रे बहय सेमरि। हम धनि डोलिय पिया बिनु रे बिनु पुरुषक नारी। केहन कर्म विधि लिखलनि रे झाँखथि वृजनारि। हरि बिनु भूषण भार भेल रे पलंगा ने सोहाई। (3) एते दिन भ्रमर हमर छल सखि हे, आब गेल सारंग देष। मधुपीबि भ्रमर लोभित भेल सखि हे। मोहि किछु कहियो ने गेल। ककराश्ककरा कहब, अपन दुख सखि हे, नयन निन दुरि गेल। जे बिरहे हम व्याकुल सखि हे भ्रमर हमर रुसि गेल। आंगन मोर लिये बिजुवन सखि हे, घर भेल दिवस अन्हार। पुरुषक वचन ऐहन थिक सखि हे, सपतक नहि विसवास। अवसर विषेषक गीत मलार (1) अलि रे प्रीतम बड़ निरमोहिया। आतुर वचन हमर नहि मानय, परम विषम भेल रतिया। काँपत देह घाम घमि आबत, ससरि खसत नव सरिया। आवत वचन थीर नहि आनन, बहत नीर दुहू अँखिया। रमानन्द भामिनि रहु थीर भय सुख बिच कहु दुख बतिया। (2) हे उधो लिखब कोन विधि पाती। अंचल पत्र नयन जल कज्जल नख लिखि नहि थीर छाती। चन्द्र किरण बध करत एतए पिय ओतए रहू दिनश्राती। रेषम वसन कनक तन भूषण तेसर पवन जीव घाती। कहथि रमानन्द सुनू विरहिनि आओत श्याम विरहाती। (3) अलि रे हम रघुवर संग जायब भूखल पायब भोजन करायब निर्मल जल पियेबै। थाकल पायब चरण दबायब शीतल बेनिया डोलेबै। औंघैल पायब वन पत्र लायब तहि पर आँचर ओछेबै तुलसीदास प्रभु तुम्हरे दरस को रघुवर चरण लेपटेबै। योग (1) भात खेआय मन मारलन्हि हे अपन सासु हे। जाय ने देथि अपन देष हे अपन सासु हे। अम्मा होयती बाट देखैत करवन बाबू औताह हे। पान खेआय मति मारलन्हि हे सरहोजिनि अपन हे। जाय न देथि निज देष बुझाय रखतीह हे। कर जोरि विनती करै छी सुनू रघनन्दन। बान्हत अहाँ के प्रेम अहाँ अपने छी जगवन्दन। (2) प्रिय पाहुन मन सँ जिमि लिअ। अपने योग बनल अछि किछु नहि सेहो मनहि विचारि लिय। बुझब तखन हम जौं किछु माँगव और दिअ। भावक भुखल स्वभाव अहाँ के तेँ हम सब हरसाइत छी। भनहि विद्यापति इहो मंगल मिथिला विधि जानि लिअ। (3) हमर अपन करिये छथि पाहुन ताहि सँ मतलब अनका की। अपन बल पर अपन खुषी थिक ताहि मे कानून जहाने की। अपन बहिनि यदि फेकिये देता ताइ सँ मतलब अनका की। साठि हतार जनभूलखिन पुरखिन तकर करै छी निन्दा की। प्रसव कास मे दषा जे भेलनि ताहि सँ मतलब अनका की। गटश्गट गारि सुनै छथि लालन मगर मरम्मति करताकी। स्नेहलता मुसकाथि लजाइत उचित बात मे बजता की। उचिति(1) श्यामा वरन श्री राम हे सखि! देखैत मुख अभिराम। आइ हमर विध बाम हे सखि! मोहि तेजि पहु गेल आन। पढ़ल पंडित भान हे सखि! पहुक नहि करि अपमान। भनहि ‘विद्यापति’ भान हे! स्ुापुरुष गुणक निधान। (2) श्याम गोकुल तेजि गेल रे, हमर कोन दोख भेल रे। हमरा सँ नित अपराध रे, तोहे प्रभु गुणक अगाध रे। कत गुणकरब बखान रे, जग भरि के नहि जान रे। भनहि ‘विद्यापति’ भान रे, सुपुरुष गुणक खान रे। (3) जओं करु सुजन सिनेह रे, उपला पाहुन नेह रे। हेमकर मण्डप हेम रे, चाानन वन कत नीम रे। हिंगु हरदि कत बीच रे, गुनहि चिन्हल ऊँच नीच रे। मणि कादब लेपटाय रे, तैओ ने तनिक गुण जाय रे। अलि के कुसुम अनेक रे, मालति के अलि एक रे। काक कोइलि एक कांति रे, भेम्ह भ्रमर दुई भाँति रे। कह ‘बादरि’ अवधारि रे, सुपुरुष जन दुइ चारि रे। बारहमासा (1) चैत हे सखि मत्तकोकिल कुहुकि काम जगाव यो। कठिन श्याम कठोेर मानस ऋृतु बसन्त विदेष यो। बैषाख हे सखि देखि उपवन ललित कुसुम विकास यो। देखि निज कुच कुसुम मौलल रहत चित्त न थीर यो। जेठ हे सखि तेल चन्दन पंक लेप शरीर यो। बिन नाथ चन्दन शीतलादिक धघकि जारत देह यो। आषाढ़ हे सखि झमकि झमकत नीर बिजुरी जोर यो। देखि काँपत देह थर नयन धारा नोर यो। आयल साओन मेघ बरिसत घुमुड़ि घोर समीर यो। सुमरि यौवन उमड़ि आबत प्राणमति नहि पास यो। भादब जलधर धड़कि ठनकत खसल चैकि अचेत यो। काहि कहु अब श्याम बिनु सखि जात जीवन मोर यो। आस आसिन अन्त कय सखि बैसल कंत दुंरंग यो। शरद चन्द्रक चाँदनी देखि चित्त चंचल मोर यो। देखि कातिक नारि एकसरि तानि शर रतिनाथ यो। करत आंकुल जीव छनश्छन कठिन कन्त न बूझ यो। लबिजात धान समान अगहन कमल सन कुच मोर यो। झट नाथ-नाथ पुकार कय सखि पड़ल सेज अचेत यो। पूस ओस बेहोष भय सखि खसत प्रीतम पास यो। हम अकेलि सून पहु बिन काटब कोन विधि राति यो। माघहे सखि जाड़ लागत जुलुम करि गेल कंत यो। अंगअंग अनंग ज्वाला ताप तापित देह यो। रमानन्द रहु धीर कामिनि धीर धय मन मारि यो। आओत फागुन मिलत बालम खेलत हुनि संग फागु यो। (2) कहत मैना सुनू यो मुनि जन गौरी कोना रहत कुमारि यो। गौरी जोग बर खोजि आनू चढ़ल मास बैसाख यो। जेठ नारद फिरति चहु दिषि जोहल भंगिया भिखारि यो। कहथि नारद सुनहु त्रिभुवनपति चलह व्याहन आज यो। अखाढ़ हेमन्त घर बरियात लायल देखल सकल समाज यो। काज राज सब छोड़ि सखिसब देखु हर बरियात यो। सावन वर बौराह आयल बसहा पीठ असवार यो। एहन उमत वर हेमन्त लायल पैर फाटल बेमाय यो। भादब मैना भेलि व्याकुल धुनथि माथ कपार यो। घटक के हम की बिगाड़ल की विधि लिखल लिलाट यो। आसिन मैना गेलि अंगना मन दुख अगम अपार यो। आब हम विष घोरि पीअब मरब जल बिच जाय यो। कातिक शंकर भस्म तेजल कयल गंगा स्नान यो। रगड़ि चानन अंग लेपल भेल सुन्दर रुप यो। अगहन मैना भेलि हरसित लावथि गाइनि बजाय यो। चलह सखि सब गीत गाबह त्रिभुवनाथ जमाय यो। पूस सखि सब छोड़ि बैसलि देखथि रुप अनूप यो। चलह सखि सब करह मौहक देखि नैन जुड़य यो। माघ शंकर भेल व्याकुल जोहथि आक धथुर यो। एहन उमत वर हेमन्त लायल भाँग हुनक अधार यो। फागुन षिव सँ कहथि गौरी सुनू षिव अरजी हमार यो। एक बेरि भस्म उतारु शंकर देखत हेमन्तक समाज यो। चैत मैना भेलि हरसित पूरल मनक अभिलाष यो। भनहि विद्यापति ई पद गाओल मिलल त्रिभुवन नाथ यो। (3) अगहन सीता के विवाह, पूस कोवर तैयार। माघ सीरक भराय देव रधुवर जी के। फागुन फगुआ खेलायब, चैत फूल लोढ़ि लायब, बैषाख बेनिया डोलायब रधुवर जी के। जेठ घाम परे भारी, आषाढ़ वुन्द झरे सारी, सावन झूलबा लगा दे, रधुवर जी के। भादव राति अन्हार, आसिन करब सिंगार कातिक आवि गेल मिथिला रधुवर जी के। (4) कातिक अयले कलकतिया जोहन बटिया। अगहन चुड़वा कुटायब पूस दही पौरायब। फागुन फगुआ खेलायब चैत फूल लोढ़ि लायब। बैषाख बेनिया डोलायब जोहन बटिया। जेठ हेठ भऽ गमायब अषाढ़ घर चल जायब। सावन दुनु मिलि खेलब जोहन बटिया। भादब नहि घहराय आसिन आस लगायब। कातिक ऐलै कलकंतिया जोहन बटिया। छौमासा(1) साओन सर्व सोहाओन सखि हे फुलल बेलि चमेलि यो। रभसि सौरभ भ्रमर भ्रमि भ्रमि करय मधुरस केलि यो। आरे केलि करथु पहु मन दय सखि अधिक विरह मन उपजय। भादव घन घहराय दामिनि गरजि गरजि सुनाय यो। बरसु घन झहर बून्द रिमिझिमि मोहि किछु नहि भाय यो। आरे भामिनि भय घन दमसय सखि मुरुछि खसु महिमय। परिणाम कोन उपाय हे सखि करब कोन परकार यो। मास आसिन अधिक ज्वाला विरह दुख अपार यो। आरे कतेक सहब दुख पहु बिनु सखि ककरो नाह बिछड़ि जनु। नाह विछुड़ल मोर हे सखि होयत जीवक अन्त यो। अरुण कातिक धसिय धायब जतय लुबधल कंत यो। आरे कंत जोहय हम जायब सखि जतय उदेष हम पायब। अगहन हे सखि सारि लुबधल लबल जीवन मोर यो। योगिनि भय हम जगत जोहब जतय जुगल किषोर यो। आरे हमर प्रभु जौं अहोताह सखि कर गहि कंठ लगोताह। पूस धैरज धरय चाहिए भमर रहल विदेष यो। हुनि विदेषी सुखहि खेपत हमर तरुण वयस यो। आरे विदेसहि वैसि गमओताह सखि हमर गृह नहि अओताह। माध झिहिर पवन डोलय देह झाँझड़ मोर यो। हँसथि, बसन उधारि सखि सब कहथि मोहि विजोर यो। आरे शोक वियोग मनहि मन सखि चित्त नहि थिर रहे एको छन। (2) वैषाख मास तनि तलफत घाम चुबै अबिरल। वैसि बेनिया डोलायब कोठरिया मे। जेठ दहकत अकास, घाम सहलो न जात पैस बैसब भीतर मन्दिरिया मे। अषाढ़ वुन्द अपार पावस बरसे हजार देखि हरषथ अपन कोठरिया मे। साओन बरखा बहार, झुला करब तैयार झुला झुलबै हम फुलवरिया मे। भादब भरु गदी नार, नैया करब तैयार अहाँ झिझरी खेलायब नदिया मे। आसिन शरद बहार चाँदनी के झलकार रास रचालेब कंचन महलिया मे। कातिक दुतिया मनायब सबके एतहि बजायब करब सब सुख साज कोठरियामे। अगहन पन्चचमी मनायब नवका चड़बा कुटायब प्यारे परसि खुआयब ससुररिया मे। चैमासा (1) माध मोहन नेह लगायल अपने चलल परदेष यो। ओहि रे परदेषिया रामा ओतहि गमाओल हम धनि बाड़ि बयस यो। फागुन हे सखि आम मजरल कोइली सबद घमसान यो। कोइली शब्द सुनि हिया मोर सालय नैना सँ झहरय नोर यो। चैत हे सखि चित्त चंचल यौवन भेल जीवकाल यो। आन धन रहितय बेचि हम खइतौं ई धन बेचलो न जाय यो। बैषाख हे सखि विषम ज्वाला घाम सँ भीजल शरीर यो। रगड़ि चन्दन अंग लेपितहुँ जौं गृह रहितथि कन्त यो। (2) कैसे खेपव बिनु कामिनि दामिनि दमसय रे। सखि री सुखक मास अषाढ़ आस नहि पूरल रे। दादुर करत पुकार झिंगुर झंझकारत रे। सखी री सावन चहुँ ओर घटा मयूर बन कुहकत रे। भादव मे मेघ झंहरत मोर मन झहरत रे। सखी री हरि बिनु मंदिर शून गुण कत सुमिरब रे। ‘सूरदास’ प्रभु गावल सखी समुझाओल रे। सखी री धैरज धरु चहु मास आसिन हरि आओत रे। वसन्त (1) सरस वसन्त समय भेल सजनी गे दखिन पबन बहु धीरे। सपनहुँ रुप वचन एक भाखिय मुखा सँ दूर करु चीरे। तोहर बदन सन चान होथि नहि यदपि जतन विधि देथि। कय वेरि काटि बनाओल नव के तदपि तुलित नहि होथि। लोचन तूल कमल नहि भय सक से नहि के जग जाने। तै पुनि जाय नुकायल ज लमे पंकल एहि अपमाने। मदन बदन परतर नहि पावथि जब भरि तोहरहि जोहि। भनहि विद्यापति सुनु वर यौवति उपमा सुझय न मोहि। (2) समय वसन्त पिया परदेष असह सहब कत विरह कलेष सुमरि पहु मन नहि थीर मदन दहन तन दगध शरीर षीतल पंकज चम्पाक माल हृदय दहन करु विषधर ज्वाला श्रवण दहन करु कोकिल गान चान दहन तन अनल समान (3) रंगीली रंगश्महल मे खेलतु आज वसन्त। संगश्सखी श्रृंगारश्सजी सब सरस तरंग वसन्त। रंगीली... सुश्कर कनक पिचकारीश्धारी, सोहत श्री सिय कन्त। भीजतश्भूषणश्वसनश्रमणश्तन, अनुपमश्छवि दर्षन्त। रंगीली... तिरहुत (1) मधुपुर गेल मनमोहन रे मोर बिहरत छाती। गोपी सकल बिसरलनि रे जते छल अहिबाती। सुतल छलहुँ अपन गृह रे निन्द गेलौं सपनाइ। कर स छूटल परसमनि रे के लेल अपनाइ। कत सुमिरब कत झाँखब रे हम मरम गरानी आनक धन लय धनवन्ती रे कुबल भेलिरानी। (2) जखन चलल हरि मधुपुर रे सब सुरति निहारि। आब कोना रहब हरि बिनु रे झाँखथि ब्रजनारि। वन मे डोलय पिपर पात रे जल बहय सेमारि। हम धनि डोलिय पिया बिनु रे बिनु पुरुषक नारि। केहन कर्म विधि लिखलनि रे झाँखथि वृजनारी ळरि बिनु भूषण भार भेल रे पलंगा ने सोहाई। (3) सुतल छलहुँ हम घरवा रे गरवा भोतिहार। राति जखन भिनसरवा रे पहु आयल हमार। कर कोषल कर कपइत रे मुखचन्द्र निहारे। केहन अभागलि बैरिन रे भागल मोर निन्द। विद्यापति कवि गाओल रे धनि मन धरु धीर। समय पावि तरुबर फरु रे कतबो सिंचु नीर। बटगवनी (1) तरुणी वयस मोर बीतल सजनी गे पिया पिया बिसरल मोर नाम। कुसुम फुलीय फूल मौलल सजनी गे भ्रमरो ने लेल विश्राम। सिर सिन्दुर नहि भावय सजनी गे मुखहि खसय एहि ठाम। उठ दूत परम व्याकुल सजनी गे नयन ढ़रकि खसु वारि। अधरस ओतय गमाओल सजनी गे दय गेल सौतिनक बारि। युगल नयन मन व्याकुल सजनी गे थिर नहि रहय गेयान। विद्यापति कवि गाओल सजनी गे ई थिक दुखक निदान। (2) चानन बुझि हम रोपल सजनी गे भय गेल सिमरक गाछ सजनी गे। ताहि रे गमक पिया जागल सजनी गे। चलि भेल पिया परदेष सजनी गे। बारह बरस पर आयल सजनी गे, लायल कंगही सनेस सजनी गे। ताहि कंगही लय आयल सजनी गे, कय लेल सोलह श्रृंगार सजनी गे। खोंइछ भरि लोढ़लहुँ चंगेरी भरि सजनी गे, सब फूल सेजिया लगैब सजनी गे। फगुआ (1) मिथिला मे राम खेलथि होरी। मिथिला मे... अतर गुलाब कुम कुम केषरि, रंग अबीर भरल झोरी। सखि सब सजि धजि रधुवर के देल अबीर भरल झोरी। होइछ बाद्य विधान विविधश्विधि नाचश्गान ओ झिकझोरी। मारथि मर्स पूर्ण पिचकारी राम सकुचि जाइछ गोरी। सुरश्गण सुमन गगन सौ उझलथि, अबीर गुलाल बीच घोरी। कूदथि बालक वृन्द मुदित मन, मिलाश्मिला निज-निज जोरी। धै फगुआ के रुप मिथिलापुर, घरश्घर मचि रहल होरी। ‘हरेकिृष्ण’ शोभा लखि सकुचित, शेषश्षारदाश्षत् जोरी। (2) गलिअन बिच धूम मचायो री, गलियन... ग्वालवाल संग लिये कन्हैया नित भोरे उठि आयो री। हाथ अबीर गुलाल पिचकारी सिर डारो री। वन्षी वीणा झाल बजाओ देत गारी गायो री। -गलियन...... (3) गोरी संग कृष्ण खेलय होरी ग्वाल वाल संग कृष्ण कन्हैया सुन्दर रंग भरी झोरी। बाजत आबत झाल मृदंग सब सब जन आबत रस बोरी। गिरिधर दास गाओल बाल संग युग युग जीबओ यह जोरी। गोरी संग... (4) परदेसिया लै अंगना निपावे गोरिया। परदेसिया... जब परदेसिया नगर बीच आयल खुटे खुट अंगना निपावे गोरिया। परदेसिया... जब परदेसिया आंगन बीच आयल रचि रचि केसिया बन्हावे गोरिया। परदेसिया... जब परदेसिया घर बीच आयल झाड़ि झाड़ि पलंग ओछावे गोरिया। परदेसिया... (5) परदेसिया के नारि सदा रे दुखिया। चारिम मास फागुन अब बीतल कहियो ने आयल पहुँ पतिया। परदेसिया.... पाचम मास चैत जब बीतल अपनो ने सूनल हुनि बतिया। परदेसिया... (6) होरी खेलत श्री रघुवर रसिया। धूम मचावत, डंफ बजाबत घाटश्बाट सब रोक लिया। श्री रघुवंषी छैल छबीले, श्री मिथिलेष दुलारी सिया। ललकारत दोऊ ओर परस्पर जीत लिया होरी जीत लिया अबीर उड़ावत रंग वरसावत जनक नगर के गलि गलिया। ‘प्रेमनिधि’ अबला प्रबला भऽ, उमड़ि चली हे रंगरलिया। (7) होरी मे लाज न करु गोरी। प्रेम ब्रजवासी तु गोरी भली बीनहै यह जोड़ी। जौ इससे सीधे नहि खेलहुँ मार मार कर वरजोरी। सुरदास निकले सब बन मे लिये जाय वन मे जोड़ी। चैताबर (1) कृष्ण तेजल मधुवनमा हो रामा कौन करनमा कृष्ण तेजल मधुवनमा। यमुना तट पर वंषी वट पर सेहो नहि लागत सोहनमा कौतुक हास रास वृन्दावन सेहो सब भेल सपनमा हो रामा कृष्ण तेजल मधुवनमा। जौं हम जनितौं कृष्ण नहि औता रहितौ अपन भवनमा। सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस को हरि मुख भेल सपनमा। हो रामा कृष्ण तेजल मधुवनमा। (2) चैत रे महिनमा पिया बिनु आबै नहि निंदिया, हो रामा... पिया परदेष गेल सुधि बुधि हरि लेल भुलि गेल घर के सुरतिया हो रामा पिया बिनु..... जब सुधि आबै पिया तोहरो सुरतिया कुहुकि उठय मोर छतिया हो रामा पिया... केहन कठोर भेल पिया के करेजवा एको नहि लिख भेजय पतियाश्हो रामा घर जब अइहे। पिया कोरा लै बैसिहें नखरा लगैंहें आधी रतिया हो रामा... कहत महानन्द सुनु हे सहेलिया ऐसे मे बितैं हें सारी रतिया हे रामा.... (3) डिम डिम डमरु बजाबै हो रामा, षिव रंगरसिया। अपने सदाषिव पूजा पर बैसता गौरी सँ टहल कराबै हो रामा... अपने सदाषि भाँग उपजावै गौरी सँ भाँग पिसाबै, हो रामा.... अपने सदाषिव बसहा चराबै गौरी सँ डोरी धरावै, हो रामा.... अपने सदाषिव माँगिश्माँगि आनथि, गौरी स धान कुटावै, हो रामा.... (4) रुसल पियबा मना दे कोइलिया तेरी मीठी बोलिया। सगर रैनि हम कतेक मनाओल ओ नहि मानल मोर बतिया। केओ नहि हितश्बंधु ककरा जगायब के पिया देत मनैया। आमक गाछ पर तोही जे कुहुकब हम कुहुकब दिन रतिया हो रामा... सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस को कओन हरल हुनि मतिया। हो रामा तेरी मीठी बोलिया (5) कौन कयल योग टोनमा, हो रामा सब गेल वनमा राम लखन सिय वनहि सिधारल, दषरथ तेजल परनमा, हो रामा.. मातु कौषिल्या रोदना पसारल सुन भेल नगर भवनमा, हो रामा.. तुलसदास प्रभु तुम्हरे दरस को, धन इहो कोप भवनमा, हो रामा.. झूला (1) यमुना तीरे कदमक डारी झूला रेषम के डोर गे। षोभा देखि भेल चितबौरी ज्ञान हरन भेल मोर गे। एक दिष राधा एक दिष कन्हा दोउ कर झिकझोर गे। राधा वदनमा पर शोभे माला निरखत नंद किषोर गे। नभ धेरि अयलै कारी बदरिया भेलै गगन मे शोर गे। विरहिन के चित्त चंचल भेलइक नयना झहरे नोर गे। राधाकृष्ण युगल अति सुन्दर एक श्यामल एक गोर गे। (2) आयल सावनक मास, मन मे बढ़ल हुलास मनमा लागि गेलै वृन्दावन नगरिया मे। झुला परम अनमोल, लागत रेषमक डोर झूलत नन्द किषोर इजोरिया मे। सखियन संग राधा रानी से छवि कोना के बखानी सुन्दर बाजन बाजै हुनका पैजनिया मे। झूलवै मिलिकय सखी सहेली, सुमुखी राधा अलबेली झूलत राधे श्याम यमुना किनरिया मे। एक सखि लेने कर मे माला, कहाँ गेल नन्दलाला सूरदास पुछथिन्ह छोड़ि डगरिया मे। (3) झूला लगे कदम की डाली, झूले कृष्ण मुरारी ना। कौने काठ के बनल हिड़ोला कोन वस्तु के डोरी। झूला.. राध झूलय कृष्ण झुलावय बारीश्बारी ना। झूला.. छठि (1) अंगना मे पोखरी खुनायल छठि मइया औती आइ। दुअरा पर तमुआ तनायल छठि मइया औती आइ। अँचरा सँ गलिया बहारब तैपर पियरी ओढ़ायब छठि मइया औती आइ। (2) डोमिन बेटी सुप नेने ठाढ़ छै उगै हो सुरुज देव। अरघ केर बेर हो पूजन केर बेर मालिन बेटी फूल नेने ठाढ़ छै उगै हो सुरुज देव। अरघ केर बेर हो पूजन केर बेर केओ ने छै लेसबैया परमेसरी मैया सोना के दियरा मइया, पाटश्सुती बाती हे अबला नारी लेसबैया परमेसरी मइया निर्धन कोढ़ी बाटे-घाटे ठाढ़ छै उगै हो सुरुज देव। अरघ केर बेर हो पूजन केर बेर पान सुपारी पकवान नेने ठाढ़ छै उगै हो सुरुज देव। (3) हमरो पर होइयौ सहाय, हे छठि मइया हमरो पर होइयौ सहाय। चारि पहर राति जलश्थल सेबलौं सेबलौ छठि गोरथारि, हे छठि मइया। हमरो पर होइयौ सहाय। अपना ले मंगलौ अनश्धन लछमी जुगश्जुग मांगल अहिबात, हे छठि मइया हमरो पर होइयो सहाय। घोड़ा चढ़ै लेल बेटा एक मंगलौ हमरो पर होइयो सहाय। वयन बिलहै लेल बेटी एक माँगल माँगल पण्डित जमाय, हे छठि मइया हमरो पर होइयो सहाय। (4) केरवा जे फरल छै घौद सँ, ओइ पर सुग्गा मड़राय। मारबौ रे सुगवा धनुष सँ, सुगा खसल मुरुझाय। सुगनी जे कानय वियोग सँ, आदित होउ ने सहाय। काँचहि बाँस केर बहिंगा, ओइ मे रेषमक डोर भरिया जे फल्लाँ भरिया, भार नेने जाय छै बाटहि पूछै बटोहिया स, ई भार किनकर जाई। आन्हर होइबे रे बटोहिया ई भार छठि माई के जाइ। ई भार दीनानाथ के जाय। समदाउन (1) बड़ रे जतन सँ सिया जी के पोसल सेहो रघुवंषी नेने जाय। कौने रंग दोलिया कौने रंग ओहरिया लागि गेल बतीसो कहार। लऽ कऽ निकसल बिजुवन सखिया ओहि बन केओ ने हमार। केयो जे कानय राजमहल मे केओ कानय दरबार। केओ जे कानय मिथिला नगर मे जोड़ि सँ बिजोड़ि केने जाय। आजु धीया कोना अमा बिनु रहती छनश्छन उठति चेहाय। (2) भेल विवाह चलल षिवषंकर गौरी सहित कैलाष। बसहा पीठ षिव दोलिया पठाओल बाघ छाल पड़ल ओहार। बड़ रे जतन सँ गौरी के पोसल घृत मधु दूध पीआय। सोनाक मुरुति सन गौरी हमर छथि वर भेल तपसि भिखारि। हमर गौरी कोना तपोवन जैतीह झाँखथि राजदुलारि। (3) सुग्गा जौं पोसितहुँ भजन सुनविते धीया पोसि किछु नहि भेल। घीवक घैल जकाँ पोसलौं हे धीया बेटा जेँका कयल दुलार। सेहो धीया मोर सासुर जैतीह सुन भवन केने जाय। ओलतिक छाहरि जकाँ पोसलौं हे धीया मधुर जेँका राखल जोगाय। सेहो धीया मोर सासुर जैतीह सुन भवन केने जाय। (4) बारह बरस केर छल उमेरिया तेरहम बरस ससुरारि। कौने निरमोहिया दिनमा पठाओल कोन निरमोही मानि लेल। कोने निरमोहिया डोलिया पठौलक कौने निरमोही नेने जाय। ससुर निरमोहिया दिनमा पठौलक बाबा निरमोही मानि लेल। भैया निरमोहिया डोली पठौलकइ स्वामी निरमोही नेने जाय। कथी देखि धैरज धरबह हे सखिया कथी देखि रहब लोभाय। (5) जखन महादेव निज घर चललाह गौरी सहित कैलाष। बसहा चढ़ल षिव डोलिया पठौलनि बाघछाल कयल ओहार। घर सँ बाहर भेला हेमन्त ऋृषि भय गेल बाप पीठी ठाढ़। घर सँ बाहार भेलि माय मनाइनि सुसुकि बहाबथि नोर। सब दिन खाथि गौरी माखन मिसरी सक्कर करथि अहार। से गौरी कोना धतुर भाँग खयती आन की हयत आधार। पराती (1) उठि भोरे कहू गंगाश्गंगा। उठि भोरे कहू गंगाश्गंगा। छल एक पापी महाबली जाय मगह मरि गेल। ओकरा तनके कौओ कुकुर ने खाय, गिद्ध गीदर देखि डराय। उठि... गलि गेल माँस हाड़ भेल बाहर रोमश्रोम भेल विकलाई। कणिका एक उड़ि पद पंकज, सुर विमान लय धाई। उठि... पंछी एक उड़ल गंगा मे ऊपर पाँखि फहराई। देखू गंगाजी क महिमा जे ओ कोना तरि जाई। उठि... गेल बैकुण्ठ मुदित मन देखू, आरति सुर उतराई। भोलाजी गंगाक महिमा, कहइत अधिक लजाई। (2) कोन गति होयत मोर हो प्रभु कोन गति होयत मोर। जनम जनम हम पाप बटोरल कहिओ न भजलहुँ तोर। बेरि बेरि अँखिया कमल मुख हेरलहुँ सुधि नहि तोर एको बेर। अबहु सुमति गति दिय त्रिभुवन पति शरण रहब हम तोर। तुलसीदास प्रभु तुम्हरे दरस के दुख संकट हरु मोर। (3) रथ पर निरखत जात जटाई रथ पर निरखत जात। रथ के उपर बैठ वैदेही नाजत निठुराई। रथ पर... है कोइ वीर राम के दलमे रथ के ले बिलमाई। कोन वंष के सूत रघुराई कौन हरने आई। रथ पर ... सूर्यवंषक राजा नृप दषरथ तनिके सुत रघुराई। तनिके प्रिया नाम जानकी निषचर हरने जाइ। रथ पर... करुण वचन जब सूनेउ जटाई रथ चढ़ि कयल लड़ाई। अग्निवाण मारल सो धरती गिरल मुरदाई - रथपर मन सँ आषिष देल माता जानकी प्राण रहे घट छाई। एहि बाटे आओता रघुवर ताकय सव बात कहव बुझाई। रथ पर... (4) जागहु राम कृष्ण दोउ मूरति दषरथ नन्द दुलारे। उदय होय उदयाचल आवत जोति पलंग पसारि। जय जयकार करत सब आयो सुर नर मुनि तुअ दुआरे। जा.... क्रीट मुकुट मकराकृत कुण्डल मुरली धनुष सम्हारि। कब देखिहौं नयनन दोउ मुरति सन्तन केर रखबारे। - जा.... पायो दरस परस पद पंकज पापी पुरुष निवारे। रहे एक आस दास तुलसी के तीन लोक के न्यारे। सीता पति राधा वर जोरी लेइय सुधि न हमारे। - जागहु.... (5) जुनि करु राम वियोग हे जननी। जुनि.. सुतल छलहुँ सपन एक देखल, देखल अवधक लोक हे जननी। - जुनि.... दुइ पुरुष पथ अबइत देखल, एक श्यामल एक गोर हे जननी। - जुनि.... कंचन गढ़ हम जरइत देखल, लंका मे उठल किलोल हे जननी। - जुनि..... स्ेातु वान्ह हम बन्हाइत देखल, समुद्र मे उठल हिलोर हे जननी। - जुनि.... नचारी (1) रहबौ हम तोहरे नगरिया हो भंगिया, रहबौ हम तोहरे नगरिया। झारी मझारी मे कुटिया बनायब, सब दिन बहारब डगरिया हौ भ्ंगिया। भांगो धथुर पीसि तोहरा पियायब, भोर साँझ दुपहरिया, हो भंगिया....। भांगक बाड़ी मे बसहा चराएव, जीवन भरि करबौ चकरिया, हो भंगिया... धथुर के फूल बेलपतिया चढ़एव, चानन चढ़ायब केषरिया, हो भंगिया.... कतबो हटेला सँ हम नहि हटबह, कहियो ने छोड़वह दुअरिया, हौ भंगिया...। सब दिन नवीने नचारी सुनाकय अप्पन बितायब उमरिया, हौ भंगिया... नेको अनेको जनम मे बसविहह, अपन घरक पछुअरिया, हो भंगिया... ‘मधकर’ सतत बाट हम तोरे ताकब कहियो त फेरबऽ नजरिया, हौ भंगिया...। (2) आइ मयना के अंगना सोहाग बहिना। जेना जूटल छै शोभा के खान बहिना। गौरी ओ शंकर युगल रुप मोहन। कए के सकै अछि बखान बहिना। घरश्घर नगर ओ डगर पर विराजय। तानल वसन्त वितान जहिना। छवि के छटा पर कपिक घन घटा अछि। तै पर स्वर लय के जुटान बहिना। मोदो प्रमोदो प्रमोदो पाबि उमड़ल। उदधि देखि पूनम के चान जहिना। षिवराति षिवमय करय विष्व भरि कैं। ‘मधुकर’ सब फागुन के मास एहिना। (3) गौरी तोर अंगना बड़ अजगुत देखल तोर अंगना। एक दिस बाघ सिंह करै हुलना दोसर बड़द छैन सेहो बउना। पैंच उधार लय गेलहुँ अंगना सम्पत्ति के मध्य देखल भाँग घोटना। खेती ने पथारी सिव के गुजर कोना मंगनी के आस छनि वरिसो दिना। कातिक गणपति दुइ जन बालक एक चढ़ै मोर एक मूस लदना। भनहि विद्यापति सुनु उदना दारिद्र हरण करु घैल शरणा। गौरा... (4) नारद बहुत बुझा हम कहलहुँ गौरी लय एहन वर अनलहुँ यो। हमरो गौरी छथि बारह बरख केर बुढ़वा वर लय अयलहुँ यो। नारद बड़ अजगुत अहाँ कयलहुँ। गौरी लय एहन बर लयलहुँ यो। तीनि भुवन बर कतहुँ न भेटल तँ घर घूरि फिरि अबितहुँ यो। बेटि गौरी छथि अल्प वयस केर कनिको नहि बिचारलहुँ यो। भनहि विद्यापति सुनिय मनाइनि त्रिभुवन पति लय अयलहुँ यो। (5) जोगि एक ठाढ़ अंगनमा मे। भिखियो ने लिअय बाटो नहि छोड़य गौरी कोना जयती अंगनमा मे। देह अछि सह सह विषधर शतश्षत भूतश्प्रेत छनि संगवा मे। बरहा चढल षिव डमरु बजाबथि जटा बीच गंग तरंगना मे जोगि एक ठाढ़ अंगनमा मे। सामाक गीत (1) डाला लय बहार भेली बहिनो से फल्लाँ बहिनो फल्लाँ भैया लेल डाला छीनि, सुनु राम सजनी.... समुआ बैसल तोहें बाबा बड़ैता तोर बेटा लेल डाला छीनि सुनु राम सजनी... कथी केर आहे बेटी डालवा तोहर छौ कथी बान्हल चारु कोन सुनु राम सजनी... काँचहि जे बाँस केर डलवा यौ बाबा बेलीश्चमेली चारु कोन सुनु राम सजनी ... जौं तोरा आहे बहिनो डलवा जे दय देब हमरा के की देब दान सुनु राम सजनी.... चढबाक घोड़ा देव पढ़वाक पोथी देब छोटकी ननदिया देब दान सुनु... (2) चानन बिरिछ तर भेलि बहिनो से फल्लाँ बहिनो ताकथि बहिनो भाइ केर बटिया एहि बाटे औता भैया, से फल्लाँ भैया .. दखि लेबनि भरि अँखिया पैर पकड़ि जनु कानू हे बहिनो, से फल्लाँ वहिनो फाटत मोर छतिया। (3) हमर भैया कोना आबै हाथी चढ़ल भैया हँसैत आवै पान खय मुह रंगैत आबै रुमाल लय मुह पोछेत आबै। दरपन लय मुह देखैत आबै चुगिला कोना के आवै गदहा चढ़ल हिहिआइत आबै कोइला सँ मुह रंगैत आबै गुदरी सँ मुह पोछैत आबै। (4) गे माइ कौने भइया जयता अटना पटना कोने भैया जयता मुंगेर। कोने भइया जेता दिल्ली कलकत्ता कौने भइया जयता रंगून। कौने भइया लौता आलरिश्झालरि कौने भइया लौता पटोर कौने भइया लौता झिलमिल केचुआ। कौन भइया लौत कामी सिन्नुर कौने बहिना पहिरथि आलरि झालरि कौने बहिनी पहिरु पटोर। कौने बहिना पहिरथि झिलमिल केचुआ कौने भौजी कामि सिन्नुर। युगेश्युगे लीबथु इहो सब भैया, भौजी के बाहु अहिवात। (5) नदिया के तीरे तीरे फल्लँा भैया खेलथि सिकार। कहि पढ़ोलनि भाइ फल्लाँ बहिनो के समाद भैया आओताह पाहुन हे। कोठी नहि मोरा आरब चाउर बसनो नहि बीड़ा पान हे। कौन विधि राखब माइ हे, फल्लाँ भाइक मान हे। हाट बजार सँ चाउर मंगायब, तमोली सँ बीड़ा पान हे। पटना शहर से धोतिया मंगायब, राखब भैया के मान हे। (6) गाम के पछिम ठुठि पाकड़ि रे ना ना रे ताहि पर बाबा बसेरा लेल ना। खेलितेश्धुपैते गेली फल्लाँ बहिनी ना। एक कोस गेली बहिनी दू कोस ना। तेसर कोस बहिनी हेराय गेलौ ना। तकैत तकैत गेलथिन फल्लाँ भौया ना। एक वन तकलनि भैया दुइ वन ना। कतहुँ ना भेटय बहिनिया मोर ना। देहरि बैसल भैली खुष भेली ना। ना रे भेल ननदी हेराय गेली ना। (7) गाम के अधिकारी भैया हे भैया हाथ दस पोखरी खुना दिय। चम्पा फूल लगा दिय हे। फुलवा लोढ़ैत बहिनी आयल हे। घमि गेल सिर के सिन्नुर नयन भरु काजर हे। छता लेने आवथि भैया से फल्लाँ भैया हे। बैसह बहिनी एहि छाह आषीष देहु हे। युगेश्युगे जीवथु फल्लाँ भैया तोरो अहिबात बढ़ू हे। राग संबंधी ललित राग मे मेघ समय पर जलदान करे। पृथ्वी धनश्धान्य सँ भरल रहे। पिसुन पाबि जनु नृपतिक काने। गुन बुझि भूप करथु सनमाने। चिरै जिबथु हिन्दुपति देओ। गुन कीरथि गाबहि सब केओ। राजविजय राग मे जय जय परिजात तरुराज। पाओल पुरुब पुन दरसन आज। सरगक भूखन गुनक निवास। सुरहुक तोहें परिपूरह आस। सेवक सब तुअ दानव देबा। मानव जानव की तुअ सेवा। सुरमति निअ कर करथि किआरी। सची देथि सुरसरि जल ढ़ारी। सुमति उमापति भन परमाने। माहेसरि देइ हिन्दुपति जाने। आसावरी राग मे जायब हरिक समाजे। पाओब नयन सुख आजे। कि आरेश्ध्रुवमद। जोगहुँ न जानिअ जन्ही। दिठीभरि देखब तन्ही। ब्रह्म सिव सेव जाही। काहि भजब तेजि ताही। मनहि भगति लेब माँगी। समय परमपद लागी। हिन्दुमति जिउ जाने। महेसरि देइ बिरमाने। सुमति उमापति भाने। पुनमति भजु भगमाने। वसन्त राग मे अनगिनत किंषुक चारु चम्पक वकुल बकुहुल फुल्लियाँ। पुनु कतहुँ पाटलि पटलि नीकि नेवारि माधबि मल्लियाँ। कर जोरि रुकुमिनि कृष्ण संग वसन्त रंग निहार हीं। रितु रभस सिसिर समापि रसमय रमथि संग बिहार हीं। अति मज्जु बन्जुल पुन्ज मिन्जल चारु चूअ बिराजहीं। निज मधुहिं मातलि पल्लबच्छवि लोहितच्छवि छाजहीं। पुनु केलि कलकल कतहु आकुल कोकिल कुल कूजहीं। जनु तीनि जग जिति मदननृपमनि विजयराज सुराजहीं। नव मधुर मधु रसु मुगुध मधुकर निकर निक रस भावहीं। जनि मानिनि जन मान भन्जन मदन गुरुगुन गावहीं। बराडीराग मे अब तरु अबनी तेजि अकास। न थिक दिवाकर न थिक हुतास। धोती धबल तिलक उपबीत। ब्रह्म तेज अति अधिक उदीत। बैनब दण्ड वेद कर सोभ। आवथि नारद दरसन लोभ। परम जुगुत तिनि जगतक हीत। ब्रह्मासुत मोर सम्भुक मीत सुमति उमापति भंन परमान। जगमाता देवि हिन्दुपति जान। पंचम राग मे सखि हे रभस रस चलु फुलवारी। तहँ मिलत मोहि मदनमुरारी। किनक मुकुट महँ मनि भल भासा। मेरु सिखर जनि दिनमनि बासा। सुन्दर नयन बदन सानन्दा। उगल जुगल कुबलय लय चन्दा। बनमाला उर उपर उदारा। अन्जनगिरि जनि सुरसरि धारा। पिअर बसन तन भूखन मनी। जनि नव घन उगल दामिनि। जीवन धन मन सरबस देबा। से लय करब हरि चरनक सेवा। सुमति उमापति मन परमाने। जगमाता देइ हिन्दुपति जाने। नटराग मे कि कहब माधब तनिक बिसेसे। अपनहु तनु धनि पाब कलेसे। अषनुक आनन आरसि हेरि। चानक भरम कोप कतबेरी। भरमहु निअ कर उर मर आनी। परम तरस सरसीरुह जानी। चिकुर निकर निअ नयन निहारी। जलधर जाल जानि हिअ हारी। अपन बचन पिकरब अनुमाने। हरि हरि तेहु परितेजय पराने। माधव अबहु करिअ समधाने। सुपुरुष निठुर ने रहय निदाने। सुमति उमापति भन परमाने। माहेसरि देइ हिन्दुपति जाने। मालव राग मे हरि सउँ प्रेम आस कय लाओल। पाओल परिभब ठामे। जलधर छाहरि तर हम सुतलहुँ आतप भेल परिनामे। सखिहे मन जनु करिय मलाने अपन करम फल हम उपभोगव तोहें किअ तेजह पराने। ध्रुवम् पुरुब पिरिति रिति हुनि जउँ विसरल तइओ न हुनकर दोसे। कतन जतन धरि जउँ परिपालिअ साप न मानय पोसे। कवहु नेह पुनु नहि परगासिअ केवल फल अपमाने। बेरि सहस दस अमिअ भिजाबिअ कोमल न होअ परवाने। ध्रुवम् गुरु उमापति पहु देव दरसन मान होएव अबसाने। सकल नृपतिपति हिन्दुपति जिउ महरानि विरमाने। ध्रुवम्। केदारराग मे मानिनि मानह जउँ मोर दोसे। साँति करह बरु न करह रोसे। भौंह कमान बिलोकन बाने। बेधह बिधुमुखि कय समधाने। पीन प्योधर गिरिबर साधी। बहु मास धनि धरु मोहि बाँधी। की परिनति भय परसनि होही। भूखन चरनकमल देह मोही। सुमति उमापति मन परमाने। जगमाता देइ हिन्दुपति जाने। भल्ला राग मे माधब करह हमर समधाने। देह मोहि पारिजात तरु आने। एहिखन तोरित करिअ परयाने। नहि तइँ हमर अबस अबसाने। एहि परि हमर पुरत अभिमाने। हयत हसी नहि होअ अपमाने। सुमति उमापति भन परमाने। पटमहिखी देह हिन्दुपति जाने। विभास राग मे सहस पूर्णससि रहओ गगन बसि निसिबासर देओ नन्दा। भरि बरिसओ विस बहओ दहओ दिस मलय समीरन मनदा। साजनि आब जिबन किअ काजे पहु मोहि हिन करु अपजस जग भरु सहय न पारिअ लाजे। ध्रुवम् कोकिल अलिकुल कलरब आकुल करओ दहओ दुहु काने। सिसिर सुरभि जत देह दहओ तत हनओ मदन पचबाने। सुकवि उमापति हरि होए परसन मान होएत समधाने। सकल नृपति पति हिन्दुपति जिउ महेसरि देइ विरमाने। ध्रुवम् जगदीश प्रसाद मंडल संस्कार गीत/ लोक गीत नाद संस्कार कल्पना थिक। हमरा सभक बीच संस्कारक प्रयोग विभिन्न रूप मे विभिन्न जगह पर होइत अछि। ओना जहि रूप मे संस्कारक प्रयोग हमरा सभक बीच होइत, ओ मन्द आ कुषाग्र रूप मे सेहो होइत। मुदा विचारणीय प्रष्न अछि जे मन्द तँ किऐक? आ कुषाग्र तॅ किऐक? एखन हम एहि प्रष्नक उत्तर नहि द शास्त्रीय प्रयोग दिषि नजरि दैत छी। गर्भजनित वातावरण जन्य कतिपय अपदार्थ के दूर करैक हेतु संस्कारक कल्पना कयल गेल अछि। कहल गेल अछि जे एहि सॅ शरीर आ मन परिष्कृत होइत अछि। शालीनता आ शिष्टता मनुष्यताक परम सिद्वि थिक आ ओकर प्राप्तिक साधन थिक संस्कार कर्म। दषर्न शास्त्रक अनुसार भोग्य पदार्थक अनुभूतिक छाप थिक संस्कार कर्म। मनुष्यक अव्यक्त मन पर अुभवक जे छाप पड़ैत छैक, समय अयला पर ओ प्रकट भऽ जायत छैक। यैह छाप थिक वासना आ यैह कहबैत अछि जन्मान्तक संस्कार। धर्मशास्त्री लोकनि संस्कार केॅ शारीरिक, मानसिक आ बौद्धिक गुणश्दोषक प्रक्रियाक रुप ग्रहण कयलनि अछि। आष्वलायन अपन गृहसूत्र मे एगारह तरहक संस्कारक वर्णन केने छथि। जखन याज्ञवल्क्य बारह तरहक। गौतम भिन्नश्भिन्न दैवयज्ञ केॅ संस्कार मे परिगणित कऽ अड़तालिस संख्या धरि लऽ गेल छथि। भारत सरकारक 1901 इसवीक जनगणना प्रतिवेदनक अनुसार ओहि समय हिन्दू मे बारह संस्कार प्रचलित छल। मिथिला मे सोलह तरहक संस्कारक विधान मान्य अछि ई थिक गर्भधान,पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राषन, चूड़ाकर्म,कर्णबेध, उपनयन, वेदारम्भ, समावर्तन, विवाह, वानप्रस्थ, सन्यास आ अन्त्येष्टि। एखन सिर्फ पाँच तरहक जन्म,मूड़न,उपनयन,विवाह आ मृत्यु संस्कारक चलनि अछि। मुदा इहो सभ जाति मे समान नहि अछि। जेना उपनयन सिर्फ समाजक अगुआइल जातिक बीच अछि। मूड़नोक रुपरेखा एकरंगक नहि अछि। तेँ जँ सभकेँ नजरि मे राखि देखैत तँ सिर्फ तीनिये टा संस्कार जन्म,विवाह आ मृत्यु अछि। संस्कारक कल्पना आ ओकर चयन वा नामकरणक पाँछा सामाजिक कारण सोहो प्रमुख रहल। स्पष्ट अछि जे संस्कारक शासन जीवन पद्धति के खास ढ़ंग सॅ नियंत्रित आ आदर्षोन्मुखी बनयवाक लेल देल गेल। शुद्धताक अपेक्षा सुनियोजित जीवनश्व्यवस्थाक आवष्यकता अथवा स्थितिक उपस्थिति दिषि संकेत करैत अछि। कहैक तात्पर्य जे आर्यअनार्यक घालमेल सँ उपजल सामाजिक स्थिति मे संस्कारक माध्यम सॅ अपन अस्मिता के सुरक्षित रखवाक ब्राहम्णवादी चिन्तनक परिणाम थिक संस्कार। मध्यकाल मे संस्कारक पालन पर बेसी जोर देल गेल। ओना दोषक निवारण आ गुणक अंगिकार करब अधलाह बात नहि थिक। इतिहास साक्षी अछि जे भौतिक परिस्थितिक प्रभवक कारणे समाज मे कखनो बेटिक त कखनो बेटाक मोल बढ़ैत रहलैक अछि। आइ जकरा मैथिल संस्कृति कहल जा रहल अछि,से की वस्तुतः मिथिलाक संस्कृति थिक? एहि लेल मिथिलाक इतिहास दिषि देखए पड़त। मिथिलाक धरती हिमालयक माटिश्बालू सँ बनल अछि। नदी प्रदेषक एहि भूभाग पर किरात आ कोल रहैत छल। आर्यीकरणक अभियान मे जे किछु बहरबैया लोक सभ एहिठाम अयलाह ओ द्विज बनि के एहि प्रदेष पर सत्ता स्थापित केलनि। क्षत्रिय राजसत्ता कब्जा केलनि आ ब्राह्मणक हाथ मे समाज सत्ता आयल। वैष्वलोकनि अर्थसत्ताक स्वामी बनलाह। मूलवासी अर्थात आदिवासी अन्त्यज बनि गेलाह। बहरबैया लोक कम संख्या मे आयल रहथि तेँ कृषि कर्यक लेल वा आनो प्रयोजन सँ प्रतिलोम विवाह जोर पकरलक। जकर चर्चा मनुस्मृति आ मिथिलाक इतिहास मे बिस्तार सँ अछि। द्विजक संख्या कम रहने, एहि ठामक आदिवासीक देवीश्देवता,पावनिश्तिहार आ नेमश्तेम अपनौलनि। जहि स ब्राह्मणीकरण भऽ गेल। समाजक सत्ता ब्राह्मणक हाथ मे छलनि तेँ हुनके जीवनश्षैली संस्कृति बनल। बहुसंख्यक मूलवासी पर एकटा नवश्संस्कृति आरोपित कयल गेल। औझुका जेँका प्रचारश्प्रसारक माध्यम त नहि छल, मुदा जे किछु छल ओ हुनके सभक बीच छलनि। लिखैकश्पढ़ैक सुविधा आ सामथ्र्य रहने हुनके (द्विजिक) संस्कृति सम्पूर्ण मिथिलाक संस्कृति रसेश्रसे बनि गेल। मुदा मूलवासीक जीवनश्शैली आ रीतिश्नीतिक पूर्ण विलयन ने त संभव छल आ ने से भेल। आइयो ओ (मूलवासी) दूबि बनि माटि पकड़ने छथि। जकर संस्कृति लोक संस्कृत कहल जाइत छैक। मूड़न आ उपनयन, आब सेहो काम्य संस्कारक कोटि मे अबैत जा रहल अछि। अखनो मिथिला मे ढ़ेरो जाति बसल अछि। किछु जाति छोड़ि बहुसंख्यक जातिक बीच उपनयन प्रथा नहि अछि तेॅ उपनयन के मिथिलाक संस्कार कोना मानल जाय? हाँ, खंडित संस्कार कहल जा सकैत अछि। तहिना मूड़नोक अछि। एक रुप मे मूड़नोक चलनि नहि अछि। केयो देवस्थान जा मूड़न करबैत त क्यो गंगाकात जा। केयो गामे मे कबुलाश्पाती द करबैत त केयो बिना गीतेश्नाद,पूजेश्पाठ केने,करैत। केयो समाज मे खीरश्टिकड़ी बाॅटि करैत त क्यो भोजश्भात कऽ। तेॅ सब मिला के देखला पर प्रष्न उठैत जे मुड़नक कोन रुप मानल जाय? तहिना विवाहोक संबंध मे प्रष्न उठैत? कुमार बर आ कुमारि कन्याक संग विवाह प्रचलित अछि। मुदा द्वितीय बर आ कुमारि कन्याक संग विवाह होइत जखन कि बहुसंख्यक जाति मे द्वितिय बरश्कन्याक विवाह सेहो होइत। द्वितिय कन्याक संग कुमार बर के सेहो होइत अछि तहिना मृत्यु संस्कार मे सेहो एकरुपता नहि अछि। मृत्यु के शोक बुझि गीतिश्नाद नहि होइत। मुदा प्रष्न उठैत जे मृत्यु शोकेक संस्कार किऐक थिक? हाॅ, असामयिक मृत्यु के शोकक श्रेणी मे राखल जा सकैत। मुदा उचित आयु बीतला परक मृत्यु के शोक किऐक मानल जाय? जहिना प्रकृति मे देखैत छी जे अपन पूर्ण आयु पाबि स्वतः नष्ट भऽ जाइत अछि तहिना त मनुष्यो थिक। मुदा ढ़ोरो प्रष्न उठलाक उपरान्तो समाज, विवाह आ मृत्यु के व्यवहारिक संस्कार रुप मे अपनौने अछि। छिटश्फुट ढ़ग सँ जे किछु होइत हो मुदा समुद्र रुपी समाज, सब कुछ अपना पेट मे समेटि लैत अछि। व्यक्तिगत जीवनक समस्या सँ ऊपर उठि कऽ सार्वजनिक जीवन जीवाक एहि अभ्यास कालक महत्व आइयो अछि। सन्यास यैह थिक। ब्रह्मचर्य जीवन ज्ञान अर्जनक होइत। गृहस्ताश्रम व्यवहारिक जीनगी होइत, जे उपार्जन क जीवनश्जीवाक माध्यम होइत। नव परिवारक सृजन होइत। जहि सॅ समाज आगूओ बढ़ैत आ समृद्धो होइत। तेसर अवस्था वा अंतिम संन्यास अवस्था तक पहुँचैतश्पहुँचैत ज्ञान आ कर्म सँ पूर्ण मनुष्य केँ अज्ञान आ अबोध मनुष्यक सेवा मे लगि जायब, बेजाय नहि। वास्तव मे ओ जरुरियो अछि। संस्कार गीतक अर्थ थिक विभिन्न संस्कारक प्रसंग मे गाओल जायवला गीत। ई लोक प्रचलित गीत थिक। तेँ एहि मे लोक गीतक आत्मा बसैत अछि। लोक गीतक मनोहर फुलवाड़ी मे यदि संस्कार गीत के हटा देल जाय तँ ओ निष्प्राण भऽ जायत। यैह कारण थिक लोकगीतक, प्रायः समस्त विषेषता संस्कार गीत मे उपलब्ध अछि। मृत्यु संस्कार केँ छोड़ि अन्य सभ संस्कार आनन्दोत्सवक माहौल मे मनाओल मे जाइत अछि। उमंगमय वातावरण मे नारी कंठ सँ निकलैत स्वरलहरी देह मे थिरकन, हृइय मे झंकार आ मस्तिष्क मे चुलबुली उत्पन्न कऽ दैत अछि। गीति गायव मिथिलाक सभ नारश्नारीक सहजात गुण रहल अछि। जेना दखैत छी जे मूड़न, उपनयन, विवाह इत्यादिक समय सभ नारी समवेत स्वर मे गीति गबैत छथि। जे मिथिलाक धरोहर छी। तहिना पुरुषो पावनि आ धार्मिक कार्य मे सभ मिलि गबैत छथि। संस्कार गीत लाकगीतक अंग थिक। कहल जाइत अछि जे लोकगीतक रचनाकार नहि होइत छथि, ओ सार्वजनिक रचना होइत अछि। एकर वास लोक कंठ मे अछि। एक कंठ सँ दोसर कंठ धरि जाइतश्जाइत गीतक स्वरुप बदलि जाइत। ततबे नहि! गीतक भास सेहो बदलैत। एक्के गीत भास बदलिश्बदलि कत्ते रुप मे गाओल जायत। तेँ संस्कार गीत मे एकरुपताक अभाव भेटैत अछि। स्वभावगत एहि स्थितिक दोसर परिणाम थिक भनिताक बेलगाम प्रयोग। गीत गौनिहारि सभ अपने फुरने कोनो गीत मे कोनो रचनाकार नाम भनिताक रुप मे जोड़ि दैत छथि। विद्यापतिक रचना उमापतिक भ जाइत त कखनो उमापतिक चंदा झाक वा मनबोधक। ततबे नहि मैथिली क्षेत्र सँ बाहरोक रचनाकार जना तुलसी, सूर दास,मीरा इत्यादि मिथिलाक माएश्बहीनिक कंठ मे आबि मिथिलेक आ मैथिलिऐक गीतिकार बनि जाइत छथि। जे उचित आ अनुचित दुनू थिक। उचित एहि लेल जे हुनकर लोकप्रियता विनयपत्रिता, रामायण, सुरसागर माध्यम सँ एतेक अधिक प्रचलित भऽ गेल अछि जे अपन बनि गेल छथि। जहाँ धरि शब्द टूटैक प्रष्न अछि ओ ज्ञानअज्ञानक बीचक बात थिक। भषाक जन्म आम जनक बीच होइत। किछु नव शब्दो जन्म लैत अछि आ शुद्व शब्द टूटि कऽ नवो बनि जायत अछि। तेँ कोन गीत किनकर लिखल थिकन्हि, संस्कार गीत मे वुझब कठिन भऽ जायत अछि। स्पष्ट अछि जे संस्कार गीत मैथिलश्महिलाक परिष्कृत सांस्कृतिक चेतनाक परिचायक थिक। मिथिला मे संस्कार गीत अनौपचारिक षिक्षाक माध्यम अछि। मैथिल समाज मे नारीक लेल औपचारिक षिक्षा वर्जित छल। सिर्फ नारिये नहि माटि परक लोकक लेल सेहो छल। कहल जाइत अछि जे वेद वा गीता पढ़ला सँ ओ बताह भऽ जायत। नारी मे विदुषी होइत छलीह। संस्कार गीतक संबंध संस्कृति आ साहित्य से त अछिये, समाज स सेहो अछि। संस्कृति, साहित्य आ समाजक अन्तरावलम्वन केँ जत्ते नीक जेँका संस्कार गीत प्रकट करैत अछि तत्ते एहि प्रकारक आन कोनो घटक नहि। संस्कार गीतक संकलनश्प्रकाषन सँ मौखिक परम्परा साहित्य समेटल जाइत अछि आ ओ साहित्य अघ्ययनश्विष्लेष्णक आधार प्रस्तुत करैत अछि मिथिला मे संस्कार गीतक श्रीगणेष होइत अछि गोसाउनिक गीत सँ। एहि स मैथिल समाजक धर्मभावनाक ज्ञान होइत अछि। किन्तु प्रष्न अछि जे संस्कारक अवसर पर ई धर्मश्भावना मुख्यतः गोसाउनिऐक गीत मे किऐक प्रकट होइत अछि? स्पष्ट अछि जे एहिठाम गोसाउनि गोसाई सँ बेसी महत्वपूर्ण छथि। भगवानोक गीत मिथिला मे गाओल जाइत अछि मुदा संस्कार कर्मक अवसर पर जे प्रधानता भगवती गीतक अछि से भगवानोक गीतक नहि! आब प्रष्न उठैत जे मिथिला मे देवीश्पूजाक प्रमुखता किऐक अछि? सभ जनैत छी जे देवीश्पूजा तंत्रसाधना सँ सम्बद्ध अछि। किछु इतिहासकारक मत छन्हि जे तंत्रसाधना असंस्कृत जनजातिक समाज सँ आयल अछि। जकरा कालान्तर मे ब्राह्मणवादी लोकनि अपना लेलनि। बहुत दिन धरि तंत्रश्साधना अवैदिक कार्य बूझल जायत छल। रसेश्रसे अपनवैत-अपनवैत सनातन धर्म मे जोड़ा गेल। वैदिक धर्मावलम्बी सभ सेहो तंत्रश्साधना अपना देवी पूजा दिषि आकृष्ट भेलाह। एहि सँ अतिरिक्त मिथिलाक समाज मे शैवश्धर्मक प्रमुखता छल अथवा शाक्त धर्मक। जे विवाद विद्वत मंडली मे बहुत दिन धरि चलल। पनचैती सँ फरिआयल जे मिथिलाक लोक पंचदेवोपासक होइत छथि। ई मान्यता पुरानकालक समन्वयवादी धार्मिक जीवनक देन थिक। संस्कार गीतक मध्यकालीन चरित्र के देखार करैत अछि। गीत संस्कार मे मैथिली गीतक अपन इतिहास अछि। लोचनक ‘रागतरंगिणी’ मे मैथिल गीतक जे इतिहास लिखने छथि तदनुसार एकर जन्म तेरहमश्चैदहम शताब्दी मे भेल। षिव सिंह आ विद्यापति समकालिन छलाह। हुनके पितामह सुमति मैथिली गीतक परम्पराक प्रारंभकर्ता छलाह। एहि प्रकारे मिथिलाक देषी गीत परम्पराक स्थापना भेल। ऐतिहासिक आाधार पर यैह मानल जाइत अछि मुदा गीत गेवाक प्रवृति मनुष्यक विकासक संग जुड़ल अछि। जहि आधार पर आरो पुरान कहल जा सकैत अछि। गीत गेवाक ढ़ंग, जकरा राग कहल जाइत, मिथिला मे भास कहल जाइत छैक। मिथिला भासक अपन विषिष्टता छैक। संस्कार गीत एहि भासक भंडार छी। हँ,किछु त्रुटिपूर्ण बात सेहो अछि जे कम जनने एक्के गीत (समदाउन) खुषीक समय मे सेहो गवैत छथि आ शोकक समय सेहो जखन कि दुनूक लेल अलग-अलग विषयवस्तु होइछ। तहिना बेटाक विवाह मे कुमार गीत आ बेटीक लेल कुमारि गीत मे सेहो अंतर होइत अछि। जनमक समय खेलौना आ सोहर मे सेहो अंतर अछि। ... पन्ना झा असामान्य के डाक्टर नन्दीक चेम्बर मे बैसल-बैसल मोन थाकि गेल। अनायास भेंटकरक समाद पठेने छलाह। मोने-मोन कारणक अटकर लगा रहल छलहुं। कतेकोकारण मोन मे आयल मुदा एकोटा कारण सटीक नहि बुझना जाइत छल। डा.नन्दीक अनुपस्थिति मे हुनकर रोगी या सम्पूर्ण नर्सिंग सम्हारयवला हुनकरदहिना हाथ डा. सिन्हा कतेको बेर अपन मुखरित मुखारविन्द देखाय गेला। पुछलापर कहने छलाह कारण त' हमरो नहि बूझल अछि, तखन मात्र एतबे कहने छथिजे अयला पर बैसय कहबन्हि। डा. नन्दीक कार्यव्यस्तता आ समयक अभाव मोन पड़ला पर इच्छा भेलउठि क' चल जाइ। आखिर कतेक काल प्रतीक्षा कयल जाय? एना कयला स'गुरुक गुरुता लघु भ' जयतन्हि। समय बितयबाक लेल नर्सिंग होमक निरीक्षणकरय लगलहुं। आधुनिक आ सुरूचिपूर्ण सजावट, जीवाक लालसा उत्पन्न करयवलाचित्र सब, जे संभवतः मानसिक रोगी सभक द्वारा चित्रित छल, एक कोन मेलतरल मनी प्लान्ट, टेबुल पर टटका फूलक गुच्छा कांचक पात्र मे पानि परराखल। भीतर जा क' रोगी सब स' भेंट करक इच्छा भेल मुदा नहि गेलहु जे कोनठीक एही बीच डाक्टर साहब आबि ने जाइथ। अपना स्थान पर बैसले छलहुं कि एक सौम्य, हृष्ट-पुष्ट, प्रसन्नमुख युवकप्रवेश कयलन्हि। हुनकर अनुसरण आवश्यकता स' अधिक गंभीर एक व्यक्ति क'रहल छलाह। अबितहिं पहिल युवक हमरा स' प्रश्न कयलन्हि- डा. नन्दी छथि किनहि? -नहि, बैसू कनेक काल मे औताह''। हमर उत्तर छल। पहिल युवक कें देखिक' लागल जे हम पूर्व-परिचित छी। स्मरण नहि भ' रहल छल। सोचल-हमरसंबंधी त' नहिये छथि तखन कतय देखने छियैन्ह? कोना चिन्हैत छियन्हि? पूर्वमे कतहु देखने छियन्हि, एतबा निश्चित छलहुं। एही ओझराहटि मे छलहुँ कि संगआयल दोसर युवक ठठा क' हँसि पड़ल आ फेर तुरत गंभीर भ' फुसफुसाय लागल,जेना ककरो स' गप्प क' रहल हो। एहि तरहक व्यक्तिक एहि तरहक क्रिया-कलापदेखक अभ्यस्त भ' गेल रही तें कोनो विशेष प्रभाव नहि पड़ल। संग आयल पहिलयुवक सेहो तटस्थ छलाह। मुदा तीव्र ठहाका डा. सिन्हा के ओतय अयबा लेलबाध्य कयने रहनि। आगन्तुक दिस अभिमुख होइत पुछने छलखिन्ह- कहल जाय,नब कोनो समाचार? संगे के छथि? आगन्तुकक शान्तभावें उत्तर छलन्हि - अहांलेल कोनो नब नहि। हमरा लेल अशान्तिदायक। ई छथि, रोगीक मित्र रोगी आओ बिहुंसल छल। डा. सिन्हा हमरा पुछलन्हि - हिनका चिन्हलियैन्ह? अपन केस-हिस्ट्री ई मात्र अहींके कहने छलाह। हमरा भक्क द' सब स्मरण भ' आयल। ओव्यक्ति लज्जापूर्वक आंखि नीचा कयनहिं हाथ जोड़ि देने छल। ओकर स्वास्थ्य लाभ पर हार्दिक बधाई दैत हमरो हाथ जोड़ा गेल छल। डा.नन्दी के अयला पर हुनका स' आवश्यक गप्प क' डेरा विदा त' भ' गेलहुं मुदाओहि व्यक्तिक संग प्रथम साक्षात्कार आर ओकर केस हिस्ट्री पुनः स्मृति-पट परआबि गेल। लुम्बिनी पार्क ;मानसिक-रोग-अस्पताल मे डा. मित्राक क्लास आठ बजेप्रातः प्रारम्भ भ' जाइत छलन्हि। अस्पताल डेरा स' काफी दूर छल। डेराक काजसलटि, बस स' पहुंचलहुं त' भीतर जा क' हड़बड़ायल अपना ग्रूपक संगी सबकेताकय लेल एक बेर चारू दिस दृष्टि घुमाओल। तखनहि एक रोगीक कोठली स'अनु हड़बड़ायल निकललि आर हमरा देखितहिं कहने छलि -बाज अयलहुं हम एहिडिग्री स'। लुम्बिनीक ई हमर अंतिम भीजिट भेल।'' हमर जिज्ञासा छल - कियैककी भेल? एखने हिम्मत टूटि गेल? एखन त' पूरा एक साल बाकी अछि? अनुगंभीर भ' कहने छलि - एहन पेसेन्ट त' एकोटा नईं भेटल छल। किछु साधरणप्रश्न पुछलियै त' मुंह पर थूकि देलक।'' अनु डा. मित्राक चेम्बर दिस बढ़ि गेल छल। हम ओही कोठली मे घुसलरही जतय स अनु बहरायलि छलि। ओतय हमरा ग्रूपक आर सब छात्रा-छात्राबैसल छल। सामने एक सुदर्शन पुरुष मुंह घुमाक' खिड़की बाटे बाहर ताकि रहलछल। किछु क्षण परिस्थितिक निरीक्षण क' हम एक सहपाठी स' आस्ते स' पुछनेरहियैक - की कोनो खास बात? ओ शी करैत मुंह पर आंगुर देने हमरा बाहरआनि कहलक - एकर केस हिस्ट्री लेबाक हमरा लोकनिक सब चेष्टा निष्फल भेलअछि। ककरो किछु कहिते नईं छै। अनु किछु बेशी प्रश्न केलकै त' मुंह पर थूकिदेलकै। तों त' गिन्नी ;विवाहिता, मलिकाइन छें। सब ठाम प्रिफरेन्स' भेटैत छउ।भ' सकैयै एतहु लहि जाउ। प्रश्न विचारणीय छल, मुदा मित्रा सर कें कंक्रीट काज चाहियन्हि, खाना-पूर्त्तिनहि। साहस क' आगू बढ़लहुं। ओहि व्यक्तिक सम्मुख जा नमस्कार क' परिचय पूछक साहस कयनेछलियैक। ओ निर्विकार भावे मात्र हमरा दिस तकने छल। -जँ हम गलती नहि क' रहल छी त' अहीं श्री चौधरी छी? ओ तैयो चुप। -हमरा डा. मित्रा पठेने छथि। अहां स' किछु जानकारी लेबय लेल। अहांकेंअसुविधा नहि हो त' हम किछु पूछि सकैत छी?'' ओ एक बेर मूडी उठा, हमरा दिस देखलक फेर खिड़कीक बाहर देखयलागल जेना किछु ताकि रहल छल। ओकर प्रतिक्रियाहीन चुप्पी स' हमरा बलभेटल। बुझबैत कहने रहियैक -एहि स' अहूंकें लाभ होयत। एहि कैदखाना स' मुक्तिभेटत। ऑफिस जा सकब।'' ओ हमरा पर बरसि पड़ल छल- बन्द करू अपनलेक्चर। भगवानक लेल दया क' अहाँ लोकनि हमरा एसगर छोड़ि दिय'। स्वयंबड़बड़ायल छल - घरक लोक एहि नर्क मे धकेल गेल आर एतय घर जयबाकगप्प। हमर ग्रूप ओतय स' बिदा भेल ई बुझि जे एकरा पाछू समय नष्ट कयलास' कोनो लाभ नहि। हम जयबा काल अंतिम प्रयास कयल - अहां एकान्त चाहैतछी त' ठीक छैक, हमरा लोकनि जा रहल छी। मुदा अहां त' स्वयं विद्वान आबुझनुक छी, मोनक कष्ट बँटला स' मोन हल्लुक होयत आ चिकित्सा मे सुविधासेहो। क्षीण आशाक संग ओ पुछने छल - तखन हमरा छोड़ि देल जायत? -एतयअहाँ कोनो जन्म भरिक लेल त' नहिये आयल छी। स्वस्थ्य भेला पर पुनःपरिवारक संग रहब।'' ओ हमरा बैसक संकेत कयने छल। बाहर मे अपना ग्रूप के सूचना द' हमआबि क' बैस गेल छलहुं। ओ बिना कोनो भूमिकाक सहज स्वाभाविक रूपें कहबआरंभ कयने छल - नाम हमर अहांकें बुझले अछि। अधिकांश लोक नामे स'जनैत अछि, चेहरा स' ओतेक नहि। हम कलकत्तेक वासी छी। इन्जीनियर छलहुं।एखन त' पागल छी। जेना सब रहैत अछि हमहूं रहैत छलहुं। डेरा, ऑफिस, क्लब,मित्र-वर्ग, संबंधी सब स' लगाव छल। अनायास एक दिन अपने महल्ला क रीनास' परिचय भेल। हमरे ओहिठामक आयोजित एक भोज मे। रीना सुन्दरि, स्मार्ट,हँसमुख, डिग्री कोर्स - फाइनलक छात्रा। ओकर सब किछु हमरा आकर्षितकयलक। हाव-भाव, व्यवहार, वेश-भूषा सब नीक लागल। ओकरा स' बेशी कालभेट होमय लागल या कहि सकैत छियैक जे भेटक सुयोग बनबैत गेलहुं। ओहोबिना कोनो प्रतिवादक हमर संग दैत गेलि। लेक, सिनेमा, थियेटर, होटल कतहुसंग जयबा मे हिचकिचायल नहि। हमरो ओकरा बिना कतहु मोन नहि लगैतछल। सतत एक्केटा ध्यान मे रहैत छल - रीनाक सामीप्य। ओहो कहैत छलि -क्लास, लेक्चर, घर कतहु मोन नहि लगैत अछि। हम विभोर भ' जाइत छलहुं।दूनू गोटे मे कतेको प्रेम, आश्वासन आर प्रतिज्ञाक गप्प होइत छल। हमरा लोकनिदिन-प्रतिदिन एक दोसराक समीप होइत रहलहुं। घरक लोकक प्रतिवादक उपरान्तोहम ओकर प्रत्येक इच्छा आर आवश्यकताक पूर्त्ति करैत रहलियैक। ओ आनर्सक परीक्षा पास कयलक। ताहि उपलक्ष मे हम ओकरा अपनऔंठी उपहार स्वरूप द' कहने छलियै -एकरा अपना स' अलग करक अर्थ होयतअहाँ हमरा अलग करब। उत्तर मे ओ मात्रा बिहुँसि देने छल। एक दिन रीनानौकरी करक इच्छा व्यक्त कयने छलि, जाहि मे हमर सहयोग अपेक्षित छलैक।हम हंसि क' कहने रहियैक - दूनू गोटे बाहरे काज करी ई आवश्यक छैक की?मात्रा हमर आय पर्याप्त नहि होयत? ओ मौन रहि गेल छलि। आस्ते-आस्ते हम रीना मे परिवर्त्तनक अनुभवकयल। ओ हमर सामीप्य त' दूर भेंट तक नहि करय चाहैत छलि। हमर देलउपहार सेहो आब नहि लेबय चाहैत छलि। कारण पुछला पर कतेको बहाना। हमराकोनो कारण बुझवा मे नहि आबि रहल छल। हम अपना कें कमजोर आ विचलितअनुभव करय लागल छलहुं। बीच मे किछु दिन सर्दी-ज्वरक कारण डेरा स' निकलल नहि भेल। रीनापुछारियो तक करय नहि आयल। कनेक स्वस्थ भेला पर हमहीं ओकर डेरा गेलहुंत' पता लागल जे किछुए काल पहिने बाहर निकललि अछि। मोन कें संतोष देलहुं- ई बताहि निश्चित नोकरीक पाछू बउआइत होयत। समय व्यतीत करक ध्येय स' हम सिनेमा हॉल दिस बढ़ि गेल रही। संयोगस' टिकट भेट गल छल। सिनेमा आरंभ भ' गेल छलै। हमरा सामनेक सीट परएकटा जोड़ी बैसल छल। हाव-भाव स' नव-दम्पति हेबाक आभास भेल।इन्टरवलक प्रकाश मे जे देखल ओहि स' बड़ पैघ मानसिक झटका लागल। ओयुवती हमर रीना छल, आ युवक हमरा लेल अपरिचित छल। अनायासे मुंह स'निकलि गेल छल - रीना! अहूं आयल छी? हम अहांक डेरापर गेल छलहुं। अहाँस' भेट नहि भेल त' सोचल सिनेमा देखि समय बिता आबी। रीनाक प्रति हमर सम्मोहन हटल नहि छल। ओहि युवकक उपस्थितिहमरा लेल नगण्य छल। तखनहि सुनाइ पड़ल - ई के थिकाह, रिनी? -हमरामुहल्ला मे रहैत छथि।'' रीनाक एहि उत्तर स' हमरा मोन मे ठेस लागल। हॉल मेफेर अन्हार भ' रहल छलैक। ओ व्यक्ति रीनाक हाथ पकड़ि सीट पर बैस गेलछल। ओतय रहब हमरा असह्य बुझना गेल आ हम डेरा घुरि आयल रही। हमरआत्मा ई स्वीकार नहि क' पाबि रहल छल जे रीना एहन कोनो काज करत जाहिस' हमरा - ओकरा बीच मनमुटाव भ' जाय। दर्द स' हमर माथ फाटय चाहैत छल।मुदा से भेलै नहि। कखन झपकी लागि गेल, नहि बुझलियै। निन्न मे हम चिचियाउठल रही - नहि, नहि एना नहि भ' सकैत अछि, ई असंभव ..... मिथ्या छी।माय जगा देने छलि - की स्वप्न देखैत छी यौ? निन्न मे बाजक बीमारी त' अहांकें नहि अछि? दू दिन बाद रीनाक ओतय स्पष्टीकरण लेल जयबाक साहस कयनेछलहुँ। गप्पक क्रम मे कहने छलि - विवाह आ मित्रता मे कोनो सम्पर्क नहिहोइत छैक। मित्र कतेको भ' सकैत छथि, विवाह कोनो एकटा स' होयत। विवाहकरक योग्य मित्र एखन तक नहि भेटल अछि। सिनेमा हालक ओकर संगीयुवकक चर्चा कयला पर कहने छलि -.......... इन्डस्ट्रीक मालिक छथि। इन्टरव्यूमे हमरा स' बहुत प्रभावित छलाह। बड़ सरल आ मिलनसार लोक। हमहूँ हुनकास' प्रभावित छी।'' हतप्रभ भेल मानसिक झंझावात नेने डेरा चल आयल रही। तखनहिं स'प्रत्येक महिला हमरा नाटकक पात्रा लागय लागलि। लागल जेना सब अपन-अपनकुशल अभिनय मे लागल अछि। हमर छोट बहीन भोजन लेल पूछय आयलि त' प्रश्न कयने रहियै - तोंहुकोनो अभिनय क' रहल छें? अप्रत्याशित प्रश्नक उत्तर प्रश्ने स' भेल छल -अहांपागल भेलहुं अछि की?'' हमरा भय छल एहि पीड़ा स' हमर मस्तिष्क ने विकृतभ' जाय आर यैह कटु सत्य हमर बहीन बाजल छल। तामसे हम पेपर वेट उठाक' ओकरा पर फेकने छलियैक जे ओकरा माथ स' शोणित बाहर क' देने छलैक।तकर बाद सबक पूछल प्रश्नक उत्तर हम टेढ़ आ अपशब्द मे देने रहियै। भोर मेऑफिस जयवाक या किछु करक इच्छा नहि भेल तें घर बन्द क' पड़ल रहलहुँआर रीनाक व्यवहार पर सोचैत परेशान होइत रहलहुँ। हमर दुर्व्यवहार बढ़ि नेजाय तें ककरो स' गप्प नहि कयल, एसगर कनैत रहुलहुं, स्वयं मे ओझरायलगप्प करैत रहलहुं। घरक सब गोटे केवाड़ खोलक नेहोरा करैत रहैत छल, हमनहि खोलैत छलियै। दैनिक-दिनचर्या बाधित भ' गेल छल। ऑफिस जयबाक त' कोनो प्रश्ने नहिछल। स्वयं मायक खुओला पर एक दू क'र खा लैत छलहुँ। एहिना कतेक दिनबीतल मोन नहि अछि। आब घर स' निकली त' सभक कातर दृष्टि हमरा पर रहैतछलै। हमरा भेल छल आब सभ हमरा क्षमादान द' देने अछि। एक दिन बाबूजीकआग्रह पर हुनकर एक नजदीकी मित्रक ओतय जयबा लेल तैयार भेल छलहुं। मायभरि पाँज क' पकड़ि कानय लागल छल, जे अनर्गल लागल। बाबूजी माय के डटनेछलखिन्ह। संभवतः डर भेल रहनि जे हम जयबा स' बिमुख नहि भ' जाइ।बाबूजीक ओ मित्र वास्तव मे एतयक डाक्टर छलाह आ तहिया स' हम एतहि छी।अहाँ पूछि सकैत छी जे अहाँक सहपाठिका पर हम थूकि कियैक देलियन्हि। एकत' ओ अनावश्यक चहकि रहल छलीह, रीना जकाँ। हुनक स्वर आ आकृतिअझक्के मे हमरा रीना सन लागल। लागल जेना ओ जानि-बूझि क' हमरा खौंझारहल छल। चौधरीक केस-हिस्ट्री बूझि हम बहुत आश्वस्त भेल छलहुं। हुनका सांत्वनादैत बाजल रही - अहां त' एकदम स्वस्थ छी। एतेक नीक जकां अपन मोनकगप्प हमरा स' कयलहुं। हम मित्रा सर के अहांक प्रोग्रेसक रिपोर्ट द' दैत छियन्हि। चौधरीक आकृति पर पुनः आक्रोशक भाव आबि गेल छलै। ओ हमरा स'पुछने छलाह - हमर एक प्रश्न अछि - लोक हमरे कियैक पागल कहैत अछि?अहाँ लोकनिक शब्द मे असामान्य। असामान्य हम कियैक? रीना या एहि तरहकअभिनय करयवाली कियैक नहि? हम हुनक प्रश्नक उत्तर बिना देनहिं ओतय स'बिहुंसि क' निकलि गेल रही। शीतल झा, जनकपुर, धनुषा नेपालमे मघेशीकेँ समस्या आ सामाधान! (1) नेपाल भारतके उत्तरदिस बिहार स उत्तर, पश्चिम बंगाल स पश्चिम, उत्तरप्रदेश स उत्तर पूर्वमे हिमालय पर्वतके एक अंशमे स्थित एकटा देश नेपाल अछि। २४० वर्ष पहिले गोरखा के एकटा लड़ाकु राजा पृथ्वी नारायण शाहके राज्य बिस्तारमे महत्वाकांक्षा स्वरूप उपत्यका सहित पूर्वमे तिस्ठा नदी आ पश्चिमे कांगड़ा किल्ला तक बिस्तारके क्रममे दक्षिणके सम्तल भूमिमे स्थित बिभिन्न ऐतिहासिक मुलुक पर बिजय प्राप्त करैत गेल ब्रिटिस्ट भारत सरकारके प्रतिरोधक बाद युद्ध भेल। १८१६ के सम्पन्न संधि नेपालके बर्तमान अवस्था कायम करैत १८६० के संधि सँ एकटा पूर्णता प्राप्त भैलै आ १९२३ के संधि एकटा देश मान्यता देलक। (२) मधेश मध्य एशिया स बनल शब्द मधेश नेपालक समतल भूमिमे रहल जाति जनजातिके मधेशी शब्द सँ सम्बोधन कएल गेल। एहि समतल भू-भागके तराई कहितोमे यही ठामक बासिन्दाके तराई बासी या मधेशी कहित खष भाषिक पहाडि वर्ग सम्बोधन करैत रहल १८१६ के सन्धिके खाकामें राप्ती आ कोशी के बिचक भूभाग ब्रिटिस्ट भारत लेने छल आ नेपालके २ लाख रुपैया देने छल। मुदा अन्तिम कालमे नेपालक अनुरोधपर ओ छोडि देलक। १८५९ भारतके प्रसिद्ध स्वतन्त्रता युद्ध सैनिक बिद्रोह के दमन करावक लेल नेपाली सेना भारतमो पठोलक बदलामे पश्चिमके चार जिल्लाके लएक जे सहित महाकालि सँ मेची तक समग्र २०-२२ जिल्ला मधेशक अछि आ एहि ठामक बासिन्दा मधेशी। (३) मधेशी प्रति ब्यवहार राजनीतिक-बर्तमान मधेशमे तत्कालिन अवस्थामे जे स्वतन्त्र राज्य सब रळे तकरा उपर प़थ्वी नारायण शाह हमला करैत गेल आ मिथिला राज्य सेहो कब्जा कएलक आ एकर १०००० ( दश हजार) सेनाके सहायता ल क पूर्वमे आक्रमण सफल कएलक आ तिरहुतिया सेनाके भंग कएलक। सम्पूर्ण मधेश पर ओ, साम्राज्य काएम करेके लेल सबपर जातिय साँस्कृतिक प्रशासनिक भाषिक दमन सुरु कएलक आ मधेशके पूर्ण उपनिवेश के रुपमे देखैत एकटा पूण्ति ओपनिबेशिक शासन चलव लागल। एही मधेशीके कहियो कोनो अधिकार नहि भेटलै जौँ कतहु नेपालक इतिहासमे मधेशीके चर्चा अवैतछैक ओ राजाके षडयन्त्र में ओकरा प्रयोग करवमे आएल छै। खस जातिमे २ जात शाह आ राणा आ क्षेत्री सत्ता संघर्षक क्रममे राजा के कटपुतली बनाक राखके काज जंग बहादुर राणा कएलक जेकर वंश १०४ वर्ष तक राजा आ प्राजा दुनुपर शासन कएल। जकरा कालमें चाकरीवाज शोषक पहाडी के शासनमें अंश रहलै, मुदा तहियो मधेशी निर्मम शोषण दमनके शिकार भेल। सम्पूर्ण मधेश शाह आ राणा सभक के जमिन्दार छलैक या दरवरियाक भाइभरदार दार के प्रशासन मार्फत राजनीतिक होइछलै आ प्रशासन मे मधेशी नहिं छलै । राणा शासनक अन्तथ आ शाह शासनक प्रारम्भ २००९ सालक कथित क्रान्तिमें। राजनीतिक स्वतन्त्रता नहीं, शाह वंशीय स्वतन्त्रता अएलै। २००७ साल सँ २०१७ सालतक विभिन्न राजनीतिक घटना क्रममें मधेशी के जनसंख्याके अनुपातमें कतहु राजनीतिक स्थान नही देल गेलै। जौ किनको स्थान भेटल ओ राजनीतिक आन्दोलनमें विशेष योगदान कएलनि तै। प्रशासनमें आ सुरक्षा क्षेत्रमें प्रवेश नही कतहु मधेशीकै देशक हरेक क्षेत्र पर रहल जाहिमे मधेश पूर्णत: पिसा गेल। एकरा अस्तित्वपर प्रत्येक क्षण खतरा रहै। नागरिकता ऐन कडा एकल गेल आ मधेशी के नागरिकता पर शंका करैत, देव में हाथ कठोर कएलक। एकरा कता संख्याके न्यून देखावक लेल पहाड स पूनर्वासिके नाम पर पहाडीके बसोवास मधेश में करौलक। जंगलके विचमे स राजमार्ग वनाक मधेशीके जनसंख्याक कम देखावकें खडयन्त्र करैत मधेशके मरभूमि बनावके चाल चलला। आसामी भुटानी वर्मेली नागरिक समेतके बसौलक आ सामाजिक अस्तित्व सेहो खतडा में पडैत गेल। एक भाष एकभेष एकराज्य एकदेश क निर्मम नीति के मधेश मे जे दमनपूर्वक प्रयोग क सकै तेहन मेधशी नेताके प्रयोग करैत रहल। तथापि २०४६ सालमें आन्दोलन भेले आ लोकत पुर्जीवित प्राप्त कएलक। मुदा मधेशीके जीवन में कोनो परिवर्तन नहीं भेल। राजनीतिकमें कोनो अधिकार नहीं, सतामे कतछु पहुँच नही। सरकारी नीति निर्माण में किनको स्थान नही। दलके उच्च तहमें कोनो संख्यात्मक परिवर्तन नही। कोनो सम्मानजनक स्थान नही। केवो टिकाउ नही। किनको स्वाभिमान नही। सवपर एकटा कलंक मढल रहैछ। मधेशी नेताक निर्यात इएह भेल। प्रशासनमें मधेशी न्यून होइत गेल। जनपद प्रारीमें सेहो घटे तगेल सेनामें कतहु प्रवेश नही प्रावधिक क्षेत्रमे रहल सभके दमन वेस्नी वृत्तिविकाश कम एहि यस अवस्था सभ दलमें देखल गेला कोना प्रगतिशील कोन प्रजातान्त्रिक अन्याय भेल कहि नहीं सकैछी तुरुन्त सम्प्रदायिक आरोप, तुरुन्त निस्कासन, एहन निति रहल ०४६ स ०६२ तक राजा ज्ञानेन्द्रक शाही कालमे विभिन्न जाति, जात सभक विचमें लोकहतान्त्रिक चेतना प्रवेश् कएलक समावेशीकरण, समानुपातिक उपस्थिति जातीय स्वायाता संधीय संरचना आत्मनिणर्निक अधिकार आदि शब्दक राजनीतिक अर्थ जनतामें प्रवेश कएलक आ विभिन्न आन्दोलन भरहल अछि। राज्य पक्ष शब्दमें स्वीकार कएलक अछि मुदा नियतव एह पुरान छै, प्रवृति राणाकालीन छै। कपटपूर्ण मनशाय शाहकालीन छै। दलक केन्द्रीय निकायामें वएह रबैआ छै। मधेशी अधिकारक आन्दोलनपर वएह आरोप, वएह कलंक, वएह दमनक धम्की, वएह मिथ्या अस्वासन वएह स्थान, सम्मान नहिं देवाक सामन्ती प्रवृति। (४) आर्थिक मधेशी पर भ रहल आर्थिक शोषणक अनन्त स्वरुप अछि। 1816 के संधिताकाल में मधेश मांगल गेल छैक पहाडीके पलएवाक लेल चितौनके सामने मधेश नहीं मांगल गेल छेक1 किए ओतेक भूभाग में ओहि क्षेत्रक सामन्तक पोषण भजेतै भन्सार मधेसमें सव खर्च पदाडके लेल। कारखाना मधेश मधेशमें राजस्व पहाडके लेल। उत्पादन मधेश मधेशी नियन्त्रण वेचविखन भष्ट पहीके हाथ में कोनो निकायपर मधेशीके नियन्त्रण नही भ्रष्टाचार मे सलग्न पहाडी सजाय मधेशी के मधेशीस्थिति गाँव गाँवमें एकेटाकें पहाडी जीमन्दार के राजनीतिक हस्तक्षेप ओकरे प्रशासनिक पहुँच ओकरें। पूरे क्षेत्रमें आर्थिक शोष ओकरें । ओहे प्रभावशाली व्यक्ति। ओकरें सामाजिक हैसियत। गामक झगडाके न्यायधीश ओहे। सारा जमिनपर ओकरें कब्जा। कोनो छोअ जीमन्दार मधेशी त ओकरा उपर क जीमन्दार पहाडी । मध्य युगीन निर्मम सामन्ती शोषण अखनो देखल जाति अछि मधेश में। (५) सांस्कृतिक भाषिक, सामाजिक दमन • नेपाल विभिन्न जाति आ वर्णके मिश्रित देश अछि स्वीकारितोमें विभिन्न जातिक विभिन्न भाषा, विभिन्न भेष अलग सामाजिक सम्बन्ध सांस्काृति पहिचानके स्वीकार नै कएकल कहिओ पहाडी सत्ता शाही प्रशासनके मजबूत आ निर्मम वनकेलेल एकहि भाषा, खस भासा अर्थात शाही भाषा, अर्थात गोरख भाषा, अर्थात नेपाली भाषा के दमनकारी नीति प्रयोग एकलक बाँकी सभ भाषा पर सम्बैधनिक रुपस प्रतिबन्ध लागल आ सरकारी कामकाजक भाषा भेष आ ओहि भाषाभाषीके जे पारम्परिक पहिरन रहै से पहिरनके के दरवारक पहिरन मानल गेल। ओहे भेष सरकारी भेष भेल ओ है प्रशासनिक भेष भेल पहिरन आ राजनीतिक भेष होइत आ अन्तमें जनप्रतिनिधिक औपचारिक भेष होइत-होइत सम्रग नेपाली नागरिकके भेष जकाँ ओकरें। ओपचारिक पोषाक मानल गेल। शिक्षामें सरकारी काम काजके आ इएह भाषा रहल आ अदालत एहि विषयमें शाही हाथक कठपुतली रहल। • ६. जातिय जनजातीय शोषण • आई प्रत्येक जातीय क्षेत्रमें खसजाति, पहाडी वर्गाके दमनकारी, नीति प्रवे भेल अछि। अल्पसंख्यक जाति, विलिन भ रहल अछि। कहाँ थाररु कहाँ दनुवार अहि सभक जातिय क्षेत्रक उन्मूलन भएरहल अछि सभक भाषाभेषक विलनक अवस्था में सांस्कृतिक अतिक्रमण आक्रमण प्रतीक्षा जनजातिक खस क्षेत्रमें। • (७) प्रशासनिक • प्रशासनिक क्षेत्रमें रहल पक्षपात उत्पीडन, शोषन दमन अति निर्मत आ उल्लेखनीय अछि। कर्मचारी तन्त्रके उच्च पद पर बहुत नगन्य मधेश्ी रहल छथिआ तिनका हतोत्साहित आ कमजोर बनाएल जाइत अछि। निचका कर्मचारी सव सेहो हुनका टेरैत नहि छनि। निक कार्य क नहि सकै छथि1 मधेशी पर दमन चलावके हुनकर योग्यता बनाबल जाइत छनिअ पहाडी ओकरा मधेशी पर दमनके लेल लाठी के रुपमे प्रयोग करैत अछि। ओ स्वयं भयभीत रहैत छथि समग्र पहाडी वर्ग जातीय आ साम्प्रादायिक भावनासँ ग्रस्त रहैत अछि आ मधेशी पर सम्प्रदायिक आरोप लगवैत अछि। मधेशी के उपर मानव अधिकारके हनन होइत अछि आ ओकरा कतहु दर्ज करैत अछि। • (८) न्याकि क्षेत्र • अदालती कामकाजक भाषा खस भाषा अछि। न्यायधीशवादी प्रतिवादी के मर्म, भाषा, पीडा अर्थ विना बुझ्ने न्याय सम्पादन करैत छथि उल्टा अर्थ लगाक फैसला होइत अछि। सारा खस भाषामें होव के कारणस मधेशी न्या प्राप्त ने क सकैछे आ न्यायधीश सभ सेहो पहाडी (खस) र के हित में कहछथि आ स्वयं सम्पद्रायिक भावना स ग्रस्त रहैत छथि। • (९) अन्य क्षेत्र • कोनो निर्वाचित मनोनित संस्थामे मधेशी के पहुँच स्थाना, सम्मान नहिं अछि मानव अधिकार आयोग प्राध्यापकसंघ, चिकित्सक, संघ, अधिवक्ता संघ, इन्जिनियर संघ, विद्यार्थी संघ, शिक्षक संघ, महिला संघ, किसान संघ, कर्मचारी संघ, कतहु मधेशीके शायदे गोठे स्थान दैत अछि आ। तकरो नीति निर्माण में अल्पमत रहला के कारण वात रखवाक अवसर नीहं रहैछै। कोनी राष्ट्रयी दलक मातृ संगठन मे सेहो यह अवस्था अछि । तै शोषणा उत्पीडन, अवहेलना, दमन सर्वत्र व्याप्त अछि असहय अछि। • (१०) प्रजातन्त्रिक आन्दोलन मा आ राष्ट्र निर्माण में मधेशक भूमिका • राजा शासनके विरुद्ध में भेले प्रजातान्त्रिक आन्दोलनके केन्द्रीय स्थान मधेश छल। ओहि आन्दोलनके लेल मधेश भूमि मात्र नहीं देलक मधेशी आन्दोलनमें भाग लेलक आ रक्त देलक आ जान देलक २०१७ सालकेँ पचायती विरुद्धकेँ आन्दोलन सेहो मधेशमें केन्द्रीत रहल २०३६ सालक आन्दोलन मधेशमें सेहो भेल। विद्यार्थीद्वारा कएल गल प्रत्येक प्रगतिशील प्रजातान्त्रिक आन्दोलन में मधेशक व्यापक आ अग्र भूमिका छल । आ क जनआन्दोलन-2 त सेहो पूर्णत मधेश ओकरा उर्वराभूमि प्रदान कएलक आ अखनक संसद कमे पूनर्जीवन देलक। नेपालक कोनो प्रगति शील आ प्रजातान्त्रिक नेता नहि छथि। जिनका मधेश राजनीतिक जन्म आ पालन पोषण आ कर्म भूमि देलक। मुदा मधेशक एतेक योगदान आ एकरा प्रति एतेक गद्धारी एतेक कृतध्नत्रा । • एकटा प्रश्न प्रत्येक मधेशीके अनुतरित करैत अति जे मधेश सभक स्तरके पहाडी नेताके जितवैत अछि मुदा कोनो उच्च तहक मधेशक नेताक पहाड में टिकट भेटिते आ ओत स ओ जिविका अविर्त यह प्रश्न अछि जे कोनो मधेशी नेता मात्र नही पहाडी नेता के सेहो अनुतरित वना दैत अछि। निर्लज्ज वना दैत अछि। मुदा 2014 साल सँ अखन तक सभ चुनावमें कोनो भेदभाव नही राखि मधेशी पहाडी के भोट दैत अछि। टिकट पवाएक अधिकार होइतो में पहाडीके लेल टिकट छोडिदैन। अछि उत्साहपूर्वक ओकरा जिवैत अछि मुदा ओकर इज्जत ओतवे। ओकरालेल ओहे दुर्भाग्य ओहे विडम्बना। • प्रत्येक आन्दोलनमें जेकरा पहाडी जेकरा राष्ट्रियता के आन्दोलन कहलकै, बुझने आ विना मधेशी ओहिमें सामेल भेल1 मुदा ओ राष्ट्रीय नागरिक नही, राष्ट्रीय व्यक्ति नही। इह छै मधेशी क नियति ! • • (११) शोषण, दमनक इएह स्थिति देखैत असहय भेला स ०६३ माघ में मधेशी आन्दोलन फुटि पडल मधडेशी आन्दोलनक किछु प्रमुख कारण: • (क) हजारो वर्ष सँ (मधेशपुर) रहल सामन्ती शोषण उत्पीडन दमन दिक्कियाए अछि। • (ख) गोर्खा राजा का शाह वंशीय राजतन्त्रात्मक निर्मता जे जनतापर हरेक क्षेत्रमें व्याप्त छैय, जे उपरोक्त बूँदा पर देखावल गेल अछि, जकर अन्तय लोकतान्त्रिक सरकार क अवस्थामें सेहो संभावना नहीं देखलगेल आ नैरश्यता आ असहयताक अवस्था आएल। • (ग) लोकतान्त्रिक आन्दोलन उठावएकालमें दलक नेता सभद्वारा नमहर आश्वासन मुदा सरकार वनलापर उएह स्थिति, उएह दमन। • (घ) मानवअधिकार, जातीय अधिकार, लोकतान्त्रिक अधिकार सम्बन्ध में वेसी सँ वेसी लेख, रचना, अन्तर्राष्टि्य जगतमें ख्याति प्रप्त विद्वान सभक महत्वपूर्ण विचार सब आएल वौधिक जगतमें हलचल पैदा करैत रहल, चेतना लवैत रहल आ आन्दोनलिन करैत रहल। • (ङ) राजनीतिक दलमें मधेशी समुदायक नगव्य पहुँच रहितोमे ओकरा प्रति दमन, उत्पीडन स आएल ओकरा में उकुसमुकुस होइल रहल जे नीत वनिक फुटैल छल आक्रोस वनैत छल चाहे अपना व्यक्तिगत उत्थान के लेल मात्र सही। • (च) माओवादी जनयद्धताका ओ विभिन्न जातीय स्वायतताके नारा लगौलक आ ओहि अनुसार संघीय संरचना के भ्रूण स्वरुप जातिय क्षेत्र निर्माण कएलक जे एकटा कान्तिकारी चेतना छलैक मुदा वाद में ओकर नीतिका व्यवहार नहिं रहलै। • (ज) एहन सिर्जल वातावरणमें अन्तरिम संविधानक घोषणा। भेल जाहिमे कोनो दल विगतकेँ आस्वासन वचन, घोषणा लागु नही कएलक आ धैर्यताक सीमा टुटि गेल। • (झ) जनप्रतिनिधिद्वारा बनावल गेल सभास सम्बिधानसभा वनत आ ओ जनताके संविधान होएत से मान्यता अनुकुल अपना सभानुपातिक उपास्थिति संविधान सभामें नही होएत से सम्भावना निश्चय देखैत आन्दोलन भ गेल। • (ञ) जनसंख्या के आधारपर समानुपातिक निर्वाचन क्षेत्र निर्धारण करव दल आ नेता सभ पछा र हल थि। ओ सभ मधेश स जिते मुदा मधेशक सीट कम रहैक से मनसाय देखि जनता नहि सहल। • (ट) कोनो दल भितरके मधेशी एहन स्वतन्त्र आन्दोलन नहि उठावि सकैत अछि ओ दलक नीति, अनुशासन, लोभस वाहनहल रहलाके कारण सँ अलग आन्दोलन भँडकि उठल। • (ठ) मधेशी जनअधिकार फोरमके किछु वर्ष स लगातार बौद्धिक क्षेत्रमें एकल गेल तथ्यांक सहित के चेतामूलक पुस्तिका पुस्तकके प्रकाशन आ मधेशी अधिकारका विषयमें करै काजसँ किछु प्रतिष्ठा आ विश्वास के कारण सँ आन्दोलन ई स्वरुप लेलक। • (ड) शान्तिपूर्ण आन्दोलन में एकलगेल प्रहरी दमन आ सरकारी दमन सँ मधेश उत्तेजित भेल। • (ढ) शान्तिपूर्ण बन्दके कार्यक्रम पर माओवादी के हिंसात्मक प्रहार सँ आ राहारतप्राप्त मधेशी कार्यकर्ता के मृत्यु सँ आगि मे घ्यूके काज एकलक आ माओवादी विरुद्धमें आन्दोलन केन्द्रीत होइत समग्रमें खस वादी सत्ता केँ विरुद्ध में उत्तेजित होइत गेल। • (ण) प्रधानमन्त्रीको पहिल सम्बोधन कपटपूर्ण रहल वात में मधेशीले विश्वास भेल आ आन्दोलन उत्तेजित होइत गेल । • (१२) वर्तमान अस्था • (क) आठ दलद्वारा अनुमोदित प्रधानमन्त्री क देशक नाम सँ सम्बोधन के कतहु कोनो रुपमें लागु नहि भेल अछि। • (ख) शान्ति तथा पुननिर्माण मन्त्री तथा वार्ता टोली संयोजनक साथ कएल गेल सहमति लागु नहि भेल छै। जाहिमे राजनीतिक मुद्दापर सहमति नहि वनलै सिर्फ प्राविधिक मुद्दा पर। • (ग) संघीय संरचनाक अधार तय सरकार नही कएलक जाहिस मधेश आ जनजाति सबके शंका सरकार पर छै। • (घ) सरकारद्वारा समानुपातिक उपास्थिति (राज्यके प्रत्येक अंगमें) के कोनो प्रयास नहि कएक गेल अद्धि पुराने खसवादी अहंकारी प्रवृत्ति कपट वर्तमानो मे अछि। • (ङ) सात दलके पार्टी संगठन में तथा नीति निर्माणके स्थान पर कोनो समानुपातिकता अवलम्बन नहि कएलक अछि। • (च) 1 दर्जन सँ वेसी हथियार धारी संगठन मधेशमें संचालन भेल जे अछि हिंसा, अपहरण, धम्की के माओवादी शैली अपनौने अछि। • (छ) किछु हाथियारधारी समूह मधेशके एकटा स्वतन्त्र देश, राष्ट्र के नीति ‘क’आन्दोलन अछि। • (ज) मधेशके उत्तरीक्षेत्रमें राजमार्ग के कातेकात परिस्थितिवस वस बसल आ बसाओल गेल पहाडी वर्ग मधेश आन्दोलन, मधेशी आ मधेशी आ मधेककके विरुद्धमें अपन शक्ति प्रयोग करेत अछि। राजमार्गपर कब्जा नियमित बन्द मधेशी पर हमला, मधेशी अधिकार प्रति विष वमन, संघीय अन्तर्गत मधेश राज्यके विरुद्ध मे अलग राज्यकमाग कत्यादिस मधेशमें एकटा खास प्रकारक शंका भय आ छै आ उत्तेजना के सम्भावना छै। ओनाक हुनका पहाडी समुदायक सभके मधेशमें अधिकार, सम्मान, सुरक्षा, स्थान इत्यादी खतडा देखैत आक्रोशित अछि। आ एकटा नयाँ द्वन्दक संभावना अछि । • (झ) अखन कोनो एकता दल एकटा नेता मधेशक भावनाके प्रतिनिधित्व नहिक रहल अछि। संगिठत आवाज नहि आवि रहल अछि। समग्र मधेश अहिंसात्मक आ हिंसात्मक आन्दोलनमें केन्द्रीत अछि। • (ञ) मधेश मे वर्तमान राज्यसत्ता प्रति अविश्वास आक्रोस आ आग्रह मात्र अछि मुदा एकरा अपराधिक कृयाकलाप के आरोप लगवैत सीमा कडा करारहल अछि जैस नेपाल भारतके सम्बन्धके गलत प्रयोग आ भविष्यमें गलत व्याख्या कएल जाएबाक संभावना अछि। • (ट) राज्य पक्ष सँ जायज माग पूरा करके बदलामें या सहमति भेलवात के पुरा कर के बदलामें गृहमन्त्री तथा अन्य विशाल नेता सभक धमकीसँ सेहो आक्रोस में बृद्धि भ रहल अछि। मधेशकै हतियारधारी समूह उत्साहित अछि। आ उदाहरणीय बुझैत अछि। • (ड) दिनानुदिन मधेशक होइत मरुभूमिकरण राज्यपक्षद्वारा उत्तरी मधेशमें कएल गेल जंगल विनास पहाडी मूलके नागरिकके बसोबास स मात्र भेल से मधेशमें बौद्धिक क्षेत्र आ राजनीतिक क्षेत्रमें व्यापक उठि रहल अछि। ई सभ अखन वर्तमान मनस्थिति आ पतिरिस्थति नेपालमें अछि। • (१३) मेधशी समस्या के समाधान: • (क) सुगौली सन्धि पश्चात मधेशमें रहल मधेशी के पहाडी सत्ता नेपाली ने बुझैत रहल अछि। मधेश नेपाल आ मधेशी इन्डीयन कहिक बुझैत रहल, व्यवहार करैत रहल, सनीति वनबैत रहल, अपमान करैत रहल, नागरिकता सँ बञ्चित करैत रहल। तैं मधेशी के नेपाली बुझैक सम्मान दैक व्यवहार नीक करैत। अर्थात मधेशी के अपन पहिचान सहित नेपालमें रहए पाएव। • (ख) राज्यक प्रत्येक अंगमे मधेशीके समानुपातिक आ सम्मानजनक उपस्थिति:- • राज्य नीति निर्माणक प्रत्येक अंगमें राज्यक प्रतीक्षा अंगमे मधेशीके उपस्थिति देखवनाई अति आवश्यक अछि। दलक केन्द्रीय निकाय, राज्यक अग सभमें शीघ्रतिशिघ्र मधेशीके स्थान नहीं भेटत मधेश शान्त नही रहत से सम्भावना। • (ग) राज्यक पुनसंरचना • राज्यक पुनर्संरचना होइक आ ओ संघीय संरचनाके निर्णय करैक आ संघीय संरचना जाति, संस्कृति, भाषा भौगोलिक एकरुपता, प्राकृतिक सम्पदा इत्यादिके आधारपर होइक जे मधेशक चाहना आ माग छैक। समग्र मधेश पर स पहाडी शोषणा उत्पीडन के अन्त्य होइक आ तहन संधीय संरचना के प्रत्याभूति होइत एहन संधीयता र पृथकतावादी आन्दोलन कमजोर होइछ। • (घ) राज्स्वक समुचित उपयोग • कर भन्सार, मालपोत इत्यादी राजस्वक जे आय छै तकरा मधेसमें नगणय मात्रामें व्यय करबाक नीति आव व्यवहार रहि आएल छै तै एकरा मधेशमें मधेशी प्रतिनिधिके राखि नीति निर्माण कएनाई आवश्यक छै। • (ङ) सन्धि सम्झौता कालमें मधेशीक सहभागिता • भारत नेपालक वीचमें ऐतिहासिक, भगौलिक, राजनैतिक सांस्कृतिक साहित्यक सम्बन्ध छै तकरा देखैत भारत के कोको सम्झौता, सन्धि के कालमे मधेशी प्रतिनिधि बुद्धिजीवी रहनाई आवश्यक छै, अन्यथा निर्णय अव्यवहारिक होइत छैक। खास के जल सम्बन्धी जलविद्युत सम्बन्धि कोनो सम्झौता में। • (च) संविधान सभामें समानुपातिक सहभागिता: • आगामी संविधानसभामें मधेशाकी केँ मधेशक जनजातिके समानुपातिक उपस्थिति, संविधान सभाके लेल अगामी संविधान के लेल देशक शान्तिकेँ लेल, मधेशाक समस्याके समाधान के लेल आ राष्ट्रिय धारमें मधेशीके सम्माहितक लेल नेपालके सवल राष्ट्र बनकेलेल आवश्यक अछि। • (१४) अन्तमे मधेशके समस्या के तत्काल समाधान आ दीर्घकालीन समाधानक उपाय में उपरोक्त विविसभ दीर्घकालीन अछि त तत्कालीन समाधान के रुपमें मधेशके प्रत्येक शक्ति सँ विना धम्की वार्ता के ‘क’ समस्याक शान्तिपूर्ण समाधान करबाक चाही आ मधेशीके साथ विना कोनो छलकपट, विशवासमें लक राष्ट्रिय समाधानदिस जएवाक चाहि। अतिश कुमार मिश्र नेपालक राज्य पुनर्संरचना मे मिथिला आ मैथिली नेपाल अखन संघीय संरचनाके अन्तिम चरणमे अछि । संविधान सभा अन्तर्गतक राज्य पुनर्संरचना तथा राज्यक बाँड फाँड समिति देशके मिथिला भोजपुरा कोच मधेश सहित १४ टा राज्यक आवधारणा सहितक प्रतिवेदन संविधान सभामे प्रस्तुत कएलक अछि । नेपालक पूर्व झापा जिल्ला सँ पश्चिममे पर्सा आ दक्षिण मे भारतक सीमा धरिक पूर्वि मधेशक समथल भू भाग प्रस्तावित मिथिला भोजपुरा कोच मधेश राज्य अछि । ई राज्य राजनीतिक, समाजिक, सांस्कृतिक, जनसंख्या आ अन्य आवश्यक पुर्वाधारक रुपमे नेपालक सभ सँ समृद्ध राज्य हएत अहिमे कोनो दू–मत नहि अछि । मिथिलाक इतिहास मिथिला राज्यक इतिहास अति प्रचिन अछि । त्रेता युग सँ शुरु भेल मिथिलाक इतिहाँस राज्यक रुपमे भलेही नहि हुए मुदा भाषिक समृद्धताक कारण नेपाल आ भारतक सीमामे बटायल मिथिला क्षेत्र अपन अस्तित्व जिविते रखने अछि । प्राचिन मिथिला पूर्वमे कोशी, पश्चिममे गण्डकी, उत्तरमे हिमालय सँ दक्षिणमे गंगा धरि छल । जे बृहदविष्णुपुराणक मिथिला खण्डमे अहि प्रकारे उल्लेख अछि । गंगा हिमवर्तो मध्ये नदी पञ्च देशान्तरे । तैरभूक्तिरिति ख्यातो देशः परम पावन ः ।। कौशिकीन्तु समारभ्य गण्डकीमधिगम्यबै । योजगनामि चतुर्विशत् ब्यायामः परिकीर्तित ः ।। अहि सँ स्पष्ट होइत अछि जे प्रचिन मिथिलाक भूमि वर्तमान नेपालक मोरङ जिल्ला सँ पर्सा धरि तथा भारतक दरभंगा सँ पूर्णियाधरि छल । नेपालक मध्यकालिन इतिहासमे त्रिशक्तीके स्थ्ाापना भेल छल जाहिमे मिथिला राज्यक स्थान प्रमुख रहल पाओल जाइत अछि । दक्षिण भारतक कर्णाट वंसीय नान्यदेव सन १०९७ (११५४ वि.स.)मे बारा जिल्लाक सिमरौन गढ़के राजधानी बना सम्पूर्ण मिथिलाके समेटि कऽ तिरहुत राज्यक स्थापना कएलन्हि । कर्णाट बंशक शासन १३२४ धरि चलल । ओहिके वाद अहि राज्य पर भारतक मुगल सम्राट गयासुद्धिन तुगलक अनिषर आ ब्राहमण वंशक औनियार आ तकर बाद फेर सँ मुगल सभक अधिपत्य रहल छल । इम्हर मल्लकालिन नेपालक इतिहास मे यक्ष मल्ल दक्षिण क्षेत्रक विजय अभियानक समयमे मिथिला छिन्न भिन्न भेल छल । ओहि समयमे पश्चिमक मगरात सभ बीच एकटा नयाँ शक्तिक उदयभेल जकर नेतृत्व मुकुन्द सेन कएलन्हि । ओ पाल्पाकेँ राजधानी बना कऽ अपन राज्य विस्तारक क्रममे पाल्पा सँ मोरङ्गधरि राज्य स्थापित कएलन्हि । मुकुन्द सेनक मृत्युक बाद हुनक बेटासभ बीच राज्यक बटबारा भेल जाहिमे पुर्वि भाग मकवानपुर छोटका बेटा लोहाङ्गसेनक हिस्सामे पड़लन्हि । ओ तराइक दक्षिण आ पुर्वी भाग विस्तार कएलन्हि । जाहि अनुसार पूर्वमे टिस्टा नहि सँ काठमाण्डू उपत्यकाक दक्षिणी भू भाग, भारतक चम्पारण, सारज, मुजफ्फरपुर आ दरभंगाधरि कायम कएने पाओल जाइत अछि । सेन वंशक अन्तिम राजा दिग्बन्धन सेनक समयमे अर्थात सन् १७७१ मे ई रान्ज्य तत्कालिन नेपालमे समाहित भऽ गेल । सन् १८१४ सँ १९१६ धरि चलल नेपाल आ अंग्रेज बीचक लडाई मे मिथिलाक मोरङ्ग छोडि सम्पूर्ण भू भागपर अंग्रेज कब्जा कऽ लेने छल । सन् १८१६कें सुगौली सन्धीक बाद मिथिलाक किछ भाग पून ः नेपालमे आएल जे वर्तमान नेपालक, मोरङ, सुनसरी , सप्तरी, सिरहा, धनुषा, महोत्तरी, सर्लाही, रौतहट, वारा आ पर्सा अछि । राज्य पुनर्सरचना मे मिथिलाक अवस्था संविधान सभाक राज्य पुनर्संरचना एवं राज्यक शक्ति बाँडफाँड समिति झापा सँ पर्सा धरि मिथिला भोजपुरा कोच मधेश राज्यक अवधारणा प्रस्तुत कएलक अछि । प्रस्तुत अवधारणा अनुसार अहि राज्यमे झापा, मोरङ्ग, सुनसरी, सप्तरी, सिरहा, धनुषा महोत्तरी, सर्लाही, रौतहट, बारा आ पर्साके समावेश कएल गेल अछि । प्राचिन मिथिलाक नेपाल स्थित भू–भागके केन्द्र बना कऽ बनाओल गेल अहि राज्यक राजधानीमे जनकपुरकेँ प्रस्ताव कएल गेल अछि । प्रमुख राजनीतिक दल एकीकृत नेकपा माओवादी आ एमालेक सहमतिमे समितिक वहुमत सँ अवधारणा पास भेल अछि । प्राचिन मिथिला सहित विभिन्न काल खण्डक इतिहासकेँ देखल जाय तऽ पूर्वके झापा छोडि अन्य जिल्ला मिथिला क्षेत्रमे रहल प्रमाणित होइत अछि । अखुनक कोशी पारक मोरङ, सुनसरी मैथिली भाषी क्षेत्र अछि । बिगतकेँ देखल जाय तऽ एतिहासिक, साहित्यिक आ साँस्कृतिक आधारसभ भेटैत अछि । मैथिली भाषा साहित्यक लेल स्वर्ण युग मानल गेल १३ अम शताब्दीकेँ मध्यमे जखन मैथिली भाषा अपन स्थान बना चुकल छल । ओहि समयमे विद्यापतिक समकालिन कविक रुपमे मोरङक लक्ष्मी नारायण, गोपीनाथ, वीरनारायण, धिरेश्वर, भिस्म कवि, गंगाधर आदी कविक स्थान अबैत अछि । अहि सँ ई प्रमाणित होइत अछि जे ओहि समयमे वर्तमानक सुनसरी आ मोरङ्ग सेहो मिथिला क्षेत्रमे छल । अर्थात अखुनक कोशी नदि मोरङ सँ पुर्व छलैक हएत आ बादमे कोशी अपन स्थान परिवर्तन कएने हेतैक । राज्य पुनर्संरचना समिति प्राचिन मिथिलाक इतिहासकेँ अपन आधार मानि मिथिला भोजपुरा कोच मधेशक राज्य आवधारणा प्रस्तुत कएने अछि आ राजधानी सेहो जनकपुरकेँ बनौने अछि । प्रस्तावित राज्यमे मैथिलीक अवस्था सांस्कृतिक आ एतिहासिक दृष्टीकोण सँ समृद्ध मैथिली भाषाक इतिहास उल्लेख करब आवश्यक नहि बुझाइत अछि । ई.स. ८०० सय सँ शुरु भेल मैथिली भाषाक १२ सय वर्ष सँ वेशीक इतिहास अछि । मैथिलीक विकाश अहि गति मे भेल जे मिथिलाक अतिरिक्त अन्य क्षेत्रमे सेहो विस्तारित होइत गेल । १३ अम शताब्दीक उतारार्धमे मैथिली भाषा तत्कालिन नेपाल (काठमाण्डू उपत्यका पर) अपन अधिपत्य जमा चुकल छल । मुसलमान सभक आक्रमण सँ पराजित भऽ नेपाल पहुँचल हरिसिंहक रानी अपन नैहर भादगावमे शासन स्थापना कएलन्हि । हुनका संगे बहुत रास मैथिल विद्वानसभ कवि सभ सेहो उपत्यका प्रवेश कएने छल । ओही समय सिँ उपत्यकामे मैथिली भाषाक विकाश भेल पाओल जाइत अछि । ओतवे नहि मल्ल शासन कालमे अर्थात १३ अम शताब्दीक उतरार्ध सँ लऽ कऽ आधुनीक नेपाल एकीकरणक समय (१७६८ ई.) धरि नेपालक राज काजक भाषा सेहो मैथिली रहल । आ वर्तमान अवस्थामे सेहो मैथिली भाषा नेपालीक बाद दोसर स्थान पर अछि । २०५८ सालक जनगणना अनुसार नेपालक १२.३० प्रतिशत जनता मैथिली भाषा बजैत अछि । जे कुल जनसंख्या २ करोड़ ३१ लाख ५१ हजार ४२३ क १२.३० प्रतिशत अर्थात २८ लाख ४७ हजार ६२५ अछि । मैथिली भाषिक सम्पूर्ण क्षेत्रके समेटिक वनाओल गेल मिथिला भोजपुरा कोच मधेशक कुल जनसंख्या ६७ लाख ६१ हजार ६७५ अछि । अर्थात प्रस्तावित अहि राज्यमे मैथिली भाषाक प्रमुख स्थान अछि । २०५८ सालक जनगणना सर्लाही आ रौतहट जिल्लाकेँ बज्जीका भाषाक सूचिमे रखने छथि जे कुल जनसंख्याक १.५ प्रतिशत अर्थात २ लाख ३१ हजार ५ सय १४ होइत अछि । जकरा मैथिली भाषाक विद्वानसभ विभेदकारी नेपालक राजनीतिकेँ परिणाम मानि रहल छथि । हुनका सभक तर्क छन्हि जे बज्जीका भाषा मैथिली भाषक सहबोली अछि । तहिना नेपाली आ भोजपुरी बाहेक अहि क्षेत्रमे बाजलजाय बला , थारु, दोनवार, अंगिका सहितक भाषासभ सेहो मैथिलीएक सहबोली रहल हुनकासभक दावी छन्हि । जँ मैथिलीक संग सहबोली भाषाकेँ सेहो मिला देल जाय तऽ अहि राज्यक करिव आधा जनसंख्या मैथिली भाषीक हैत । बाकी आधामे अन्य भाषा । प्रस्तावित अहि राज्यमे भोजपुरी भाषाक सहो महत्वपूर्ण स्थान अछि एकरा नकारल नहि जा सकैया । नेपालक कुल जनसंखयाके ५.८५प्रतिशत अर्थात १३ लाख ५६ हजार ६ सय ७३ भोजपुरी भाषी अछि । जनसंख्याक आधारमानि कऽ प्रस्तावित अहि राज्यक मुख्य भाषा मैथिली हैत से लगभग पक्का अछि । प्रस्तावित राज्य सँ मैथिलीक अपेक्षा कोनो भाषाके दिर्घकालिन बनएबाक लेल ओहि भाषाके जनजनसँ जोडव आवश्यक होइत अछि । आ जनमुुखि बनएबाक लेल रोजिरोटी सँ जोरब, राज्यक अधिकारीक अर्थात कामकाजी भाषा बनाएब अछि । बोलीचालीक भाषामे मात्र सिमित होइत गेल मैथिली भाषा जँ अहि राज्यक मुख्य भाषा बनैत अछि तऽ मैथिली भाषाक लेल नव स्वर्णिम युगक शुरुवात हैत । मुदा अखनो विघ्न बाधासभ आवि सकैत अछि । मधेशवादी दलसभ अहि पुनर्संरचनाके स्वीकार नहि कऽ रहल अछि । तऽ किछ आन दल सभ सेहो एकर विरोधमे अछि । अपना भाषाके स्थापित करएबाक लेल समिति सँ प्रस्तवित संरचना यथावत संविधानसभा सँ स्वीकृत होइक तहि लेल सम्पूर्ण मैथिली भाषीकेँ एक जुट भऽ आगा आएव आवश्यक अछि । मिथिला राज्य स्थापना संघर्ष समिति सहित मैथिली भाषाक क्षेत्रमे कार्यरत संघ संस्थाक प्रमुख दायित्व बनैत अछि जे अहिके लेल आगा आवय, प्रस्तावित राज्य मे अन्यभाषी सभ सेहो छथि । तएँ हुनक भाषाके संरक्षणक विश्वास दियबैत मैथिली भाषाके स्थापित करायब आवश्यक अछि । मुदा काज कठीन अछि । एहि चुनौतीकेँ स्वीकार करहि परत। रामभरोस कापडि भ्रमर, अध्यक्ष: साझा प्रकाशन, पुलचोक, ललितपुर एहि बेर सातम् अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन काठमाण्डूमे हयत भारतक सम्विधानक आठम् अनुसूचिमे मैथिलीके सामेल करबाक तिथि २२ दिसम्वरकें स्मरणीय बनएबाक हेतु डा. बैद्यनाथ चौधरी बैजू विद्यापति सेवासंस्थानक अमलाक संग अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलनक रुपमे प्रत्येक वर्ष ताही तिथिकें मनबैत रहलाह अछि । ओहि सभ सम्मेलनमे दू चारि गोटे नेपालक प्रतिनिधि सहभागी भ अन्तराष्ट्रिय स्वरुप प्रदान करैत आएल अछि । एहु बेर ई सम्मेलन आन्ध्र प्रदेशक चित्तुर जिल्ला अन्तरगतक तिरुपतिमे आयोजित छल । संस्कृत विश्वविद्यालयक डीन झा जकि सहयोगे आयोजना होबा बला उक्त सम्मेलनमे वैजू बाबूक सभ तामझाम आमंत्रित छल । पहिने ई आयोजन विश्वविद्यालय परिसरमे सम्पन्न होइत, मुदा आन्ध्रप्रदेशमे चलैत तेलंगाना आन्दोलनक कारणें ई सम्मेलन तिरुपतिसं १० कि.मि. दक्षिण ब्रम्हर्षि आश्रममे सम्पन्न करबाक नेयार कएल गेल । ओत्तहि आवास, भोजन एवं कार्यक्रम स्थल । परिसर प्राकृतिक छटाक विच रमणीय छल । कार्यक्रम २२ दिसम्वर क ३ वजे प्रारंभ भेल । उद्घाटन कएलनि नेपालक सभासद् यदुवंश झा, प्रमुख अतिथि छलाह विश्वविद्यालयक रजिष्टार । विशिष्ट अतिथिमे दरिभंगाक विधायक सरावगी सहित पंक्ति लेखक सेहो रहथि । जेनाकि वैजूजीक सभ सम्मेलनमे होइत अछि कार्यक्रम पूर्व निर्धारित नहि छल । तत्काल अनुहार देखि बनाओल गेल हुनक कार्यक्रमक तीनटा चरण हेाइछ – पहिल शुभारंभ आ सम्मान, दोसर भाषण–भुषण आ तेसर सांस्कृतिक कार्यक्रम । एही तरहें एहु कार्यक्रममे सम्मान कएल गेल । हमरा लेखें दू गोट सम्मान महत्वपूर्ण छल – डा. प्रफुल्ल कुमार मौन आ अयोध्यानाथ चौधरीक । सभासद यदुवंशजीक सम्मान औपचारिक छल । कार्यक्रमक शुरुआतेमे एहि बेर अगिला सम्मेलन काठमाण्डूमे हयत से बात चर्चामे छल । दरिभंगा–जनकपुर आवतजावत कएनिहार समदिया सभ एकर वीडा–पान पूर्वेमे उठा लेने छलाह आ काठमाण्डू सम्मेलनक हेतु वाह–वाही लुटबाक आत्मरति करब शुरु क देने छलाह । ई बात डा. बैजूक महा सचिवीय भाषणमे प्रकट भेलै जकर कडा प्रतिवाद पंक्ति लेखक अपन भाषणमे कएलक । अन्तराष्ट्रिय सम्मेलनक आयोजन खेल नहि छिऐक । डा. बैजूक कएल–धएल पर सपरानी तीर्थयात्रामे जाएब एक बात छैं, आमंत्रित अतिथि लोकनिकें उचित सम्मानक संग कार्यक्रमके औचित्यपूर्ण बनाएब दोसर बात । हमर दृढ धारणा छल – जाहि तरहें बैजूबाबू कार्यक्रमक आयोजन अस्त व्यस्त हालतिमे करैत छथि तेहन काठमाण्डू मे नहि हयत ।मंचसं हम सम्पूर्ण श्रोता, दर्शक सभक आगां बाजल छलहुं–काठमाण्डूमे सातम् अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन हयत मुदा हमरा शर्त पर । अन्तराष्ट्रिय जिज्ञाशाक केन्द्रविन्दु काठमाण्डूमे महज भोज भातक हेतु भेडियाधसान उपस्थिति किन्नहुं नहि हयत । निर्धारित प्रतिनिधि, परिचयपत्र सहित सहभागी कराओल जएताह आ कार्यक्रममे स्थानीय कलाकार सभक सेहो उल्लेख्य उपस्थिति रहत । ई बात डा. बैजू आ काठमाण्डू आयोजक विच पूर्व निर्धारित रहत, जाहिमे फेरबदल संभव नहि । कहबाक जरुरति नहि हमर जानकारीसं वैजू बाबूक कैम्पमे निफिकिर भेाजन भात आ नंींदक आनन्दलेनिहार विच हडकम्प शुरु भ गेलै । बहुतोकें वुझएलै–काठमाण्डूक सम्मेलन आ पशुपतिक दर्शन कठिन भ गेल । यद्यपि वैजू बाबू मंचसं हमर शर्त आ प्रस्तावकें स्वीकार कएलनि मुदा अपन फौजकें तोष भरोस देबाक हेतु पशुपति दर्शनक युक्तिक आश्वासन दैत रहलाह । काठमाण्डू सम्मेलनक विशिष्ट पक्ष की ? जे केओ अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन बैजू संस्करणमे गेल हयताह ओ शुरु सं अन्त धरि सहभागिताक अव्यवस्था अवश्य देखने हयताह । कार्यक्रममे सम्मान प्रदान आ सांस्कृतिक कार्यक्रम मात्र आकर्षक होइछ । काठमाण्डू सम्मेलन निर्धारित प्रतिनिधिक संग विशिष्ट विद्वानक सहभागितामे हयत । जाहिमे सरिपहुं विदेशी विद्वान सभकें समावेश कएल जाएत । उद्घाटन राष्ट्रपति वा प्रधानमंत्रीक हाथें हो से आयोजक चाहत, जे असंभवो नहि छैक । तओं कार्यक्रमक गरिमा बढत । सम्मान देबाक हेतु एकटा विशेषज्ञ कमिटी गठन हयत जे विभिन्न भाषामे काज करितो मैथिली वा मातृभाषा प्रति विशेष लगावकें प्राथमिकतामे राखि सम्मानक हकदार निर्धारित करत । सम्मानमे एकटा छपल कागजक टुकडी खुल्ला नहि ताम्रपत्रमे लिखित आकर्षक फ्रेम लागल रहत । प्रतीक चिन्ह जानकी मंदिर, पशुपतिनाथ, स्वयंभूक सीसा जडित मौडल हयत जाहिमे पाग, दुपट्टा रहबे करत । औचित्यपूर्ण कार्यक्रमक हेतु एकटा गंभीर प्रकृतिक विचार गोष्ठीक आयोजन हयत, जत्त विभिन्न विषयमे लगभग तीन चारि घंटाक छलफल चलाओल जाएत । गोष्ठीक एकटा केन्द्रिय विषय निर्धारित कएल जाएत । एहि गोष्ठीमे विभिन्न भाषा–भाषी विद्वान सभकें सहभागिता सुनिश्चित कएल जाएत । तहिना मैथिलीक स्थापित विद्वान, साहित्यकार सभकें सहभागी कराओल जाएत । एकटा आकर्षक कवि गोष्ठीक आयोजन हयतैक, जाहिमे पठित कविता सभके सम्पादन क पुस्तकाकार प्रकाशनक योजना आयोजक के छन्हि । सांस्कृतिक कार्यक्रममे डा. बैजूक हेंड़मे सामिल बहुतो महत्वपूर्ण कलाकार मध्ये उत्कृष्टकें छानि आमंत्रित कएल जएतनि । सम्मेलनक सांस्कृतिक प्रभारी कमलाकान्त जी सं परामर्श क ई गुरुत्तर काज सम्पन्न कल जाएत । नेपालोक विशिष्ट सांस्कृतिक कलाकार सभकें अवसर उपलव्ध कराओल जएबाक कारणें सिमित समयमे सिमित कलाकारक प्रस्तुति आयोजक लोकनिकें बाध्यता हयतनि । एहि तरहें काठमाण्डू सम्मेलन आन समयक सम्मेलन सं किछु फूट आ सन्देशमूलक हयत । काठमाण्डू अन्तराष्ट्रिय मिडियाक चहल–पहल बला ठाम हयबाक कारणें जत्त कार्यक्रम पूर्ण कभरेज पाओत ओत्तहि ताहिमे पूस्तुत प्रत्येक गतिविधि संयमित, व्यवस्थित आ आकर्षक रखबाक जिम्मेवारी आयोजक लोकनिकें हयतनि । छठ्म अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलनक मंच सं भेल एहि तरहक उद्घोषकें सभ पक्ष स्वागत कएलक अछि । विश्वविद्यालयक कुलपति तत्काले अएबाक स्वीकृति प्रदान कएलनि अछि तं चेन्नईक भाइ मणिकान्त दास, कलकत्ताक कामदेव झा, अशोक, मुम्वईक सुशील झा दिल्लीक गंगेश गुंजन–काठमाण्डू सम्मेलनक आकर्षण हयताह । मैथिली अनुरागी लाखों सहृदयी सभक संग हम आयोजन पक्ष सेहो एहि सुखद क्षणक प्रतिक्षामे छी । तखन एकरा सफल बनएबालेल सभ पक्षक सभ तरहें सहयोग जरुरी छैक । कोनो जिज्ञासा क हेतु हमर निम्न सम्पर्क पर अवश्य खोजवीन क सकैछी । जनकपुरमे मिथिला महोत्सवक आयोजन ः नवअध्यायक शुभारंभ नेपाल सरकारक संस्कृति मंतालय द्वारा २०५५ सालक ऐन द्वारा गठित वृहत्तर जनकपुर क्षेत विकास परिषद् एहिसं पूर्वो तीन बेर ‘मिथिला महोत्सव’क आयोजन २०६३, २०६४ आ २०६५ सालमे कऽ चुकल अछि । मुदा ओ तीनू आयोजन खेल तमासा सं आगां नहि जा सकल । राजनीतिक हस्ती सभक जमघट आ तेहने सन पृष्टपोषण करैत सम्पूर्ण आयोजन । एमहर दीगम्वर राय जखन परिषद्क अध्यक्ष भऽ अएलाह तं मिथिला महोत्सव किछु फूट करबाक सोच बनौलनि । फूट एहि मायने मे जे ओ मिथिलाक परम्परागत लोक संस्कृति आ जविनशैलीके मूर्त्त अमूर्त्त रुपें पस्तुत कएल जएबाक विचार रखलनि । तकरालेल स्थानीय जानकार सभक चारि पांच बैसार भेल आ तखन जे ढांचा तैयार भेलै तकरे आधारपर सम्पूर्ण कार्यकम करबाक नियार भेल अछि । अगामी रामनवमीक अवसर पर चैत ९ गते सं १३ गते (२२ मार्चस २६ मार्च धरि) आयोजन होब’ बला ई महोत्सव स्वयं अपनामे एखन धरिक नव हयत । औचित्य एवं विशेषता पाचीन मिथिलाक स्थापना माधव विदेह द्वारा आइसं पांच हजार वर्ष पूर्व भेल ई इतिहास सत्य अछि । तहिया सं आइधरि तीन राजवंश मिथिलामे शासन कएलक । राजा जनकक वंश समाप्त भेलाक बाद १०९७ ई. मे नान्यदेव मिथिलाराजक नओ ठाढ कएलनि जे २२७ वर्ष धरि चलल । तकरा वाद हेरायल मिथिला पुनः १५५६ ई. मे ओइनवारवंशक संग उजागर भेल जे दरिभंगा महाराजक राजपाट गेला धरि चलल । एहि विच अनेकों तरहक सामाजिक, राजनीतिक उथल–पुथल होइत रहल । मुसलमानी शासक सभक आकमणसं पीडित मिथिलाञ्चलक राजा वा शेष्ठ व्यक्तित्व, विद्वान सभ नेपाल दिश शरण लेलनि । अपन संस्कृति आ भाषाक संग पलायन कएल ई महापुरुष लोकनि मैथिल संस्कृतिक छापकें अक्षुण्ण रखलनि । ओकर परम्परागत सम्पदा, लोक व्यवहार, जीवन शैली, आचार–व्यवहार सभकें वर्षहुं धरि वचा कऽ रखलनि । जकर पभाव समस्त मिथिलाक आवादीपर पड़लैक । मिथिलाक विशिष्ट जीवनशैली, सांस्कृतिक परम्परा, धार्मिक सहिष्णुता एखनो मननीय रहल अछि । माछ–मरुवाक रोटी, खेसारीक साग आ आलुक सन्ना, तिलकोरक तरुआ, छाल्हिगर दही–मुंहसं पानि आबि जाए तेहन भोजनक सामगी रहल अछि । धोती, अंगपोछा, मुरेठा, गोलगाला–खास पहिरन अछि तं जट–जटिन, सामाचकेवा, झिझिया, लोक पर्व । अरिपन, टाटपरक चितांकन मौलिक चित अछि तं पोखरि मे चुभक्का मारि उजी–उजीक खेल अपन पहिचानक साक्षी बनल अछि । पौती, पेटारी, खुरपी–हंसुआ, जांत–ढेकी, खेत–खढ़िहान जीवन पद्धतिक अंग रहल अछि । सोहर, झूला, पराती, पावस, महराई, पजनिया,ं गोदना, पमरिया गीत – घर–आंगनक शोभा बनैत आबि रहल अछि । हजाम, लोहार, कुम्हार, डोम गृहस्थी चलब’ बला पसारी सभ अछि । एहने तत्व सभक सहयोगसं वनैत अछि एकटा मैथिल परिवार, मिथिलाक जनजीवन । ‘मिथिला महोत्सव’ तेहने जीवन शैलीक ताही रुपमे पस्तुति हयत । आजुक नवका पीढि अपनो परम्परागत लोक व्यवहार, जीवनशैलीकें विसरने जा रहल अछि, एहि पदर्शनीसं अप्पन पहिचान पति आर उर्जावान बनत से विश्वास कएल जा रहल अछि । एकर आयोजन वृहत्तर जनकपुर क्षेत विकास परिषद् जनकपुरधाम कऽ रहल अछि । एकर नारा छैक, हम्मर संस्कृति हम्मर पहिचान ः समृद्ध मिथिला हम्मर अभियान’ । महोत्सवक आकर्षक पक्ष मिथिलाञ्चलमे पहिल बेर एक्के ठाम मिथिलाक गौरब गाथाक विभिन्न पक्षसभ, इतिहास, भूगोल, संस्कृति, कला एवं लोक जीवनक झांखीसभ जीवंत रुपें पदर्शन कएल जाएत । मैथिलीमे लिखित पाचीन पाण्डुलिपि, दस्तावेज तथा पुरातात्विक सामगी सभक पदर्शन हयत । मिथिलामे रहनिहार जनजाति, आदिवासी एवं विभिन्न जाति सभक परम्परागत व्यवसाय देखब’ बला फूट फूट स्टल सभ राखल जाएत, जाहिमे व्यवसायिक, उत्पादनक कियात्मक रुप देखाओल जाएत । मिथिलामे परम्परागत रुपें पचलित भेषभूषा, परिधान आ आभूषणक सेहो ओत्त पदर्शन कएल जाएत । मैथिल खानपानक विविध रुपरंगक स्वाद आ अनुभूति लेल जा सकत । सभ धार्मिक सम्पदायक फूट फूट स्टल द्वारा अपन अपन धर्म ज्ञानक पचार पसारक अवसर उपलव्ध कराओल जाएत । लोक जीवनमे आब बला बारहो मासक पर्व तिहारक विशिष्टता दृश्य द्वारा देखाओल जाएत । लोक गायक गायिका सभक माध्यमसं जन्मसं मृत्यु धरिक भावदृश्यक अनुभूति गायन द्वारा कराओल जाएत । लोकमंचक पस्तुतिकरण कममे राजा सलहेस, दीनाभदी, लोरिक, दुलरा दयाल, जया विसहरक नाचक संगहि जट जटिन, समा चकेबा, झिझिया नृत्यसभ देखाओल जाएत । लोकशिल्पक विभिन्न पक्षकें देखब’ बला पदर्शनीक आयोजन कएल जाएत । पचलित लोक गाथाक नायक आ कथा पसंगकें माटिक मूर्ति द्वारा सजीव रुपें पस्तुत कएल जाएत । मैथिलीमे पकाशित पत पतिका सभ, पुस्तक सभक पदर्शनी सेहो रहत । महोत्सव अबधि भरि विचारगोष्ठी, कवि सम्मेलन, वाल गोष्ठी, फिल्म उत्सव, सभासद् सम्मेलन, व्यवसायिक एवं औधोगिक पदर्शनी, खेलकूदक संगहि मनोरंजनक आनो सामगीक भरमार रहत । एहि तरहें विभिन्न आयोजनक तैयारि चलि रहल अछि । पाचीन तिरहुतिया गाछीकें एकर आयोजन स्थल बनाओल गेल अछि । एकरालेल ४९ गोट उपसमिति बनाओल गेल अछि । लगभग ५० लाख टकाक खर्चसं सम्पन्न होब बला ‘मिथिला महोत्सव’ सम्पूर्ण मैथिली भाषीक हेतु दर्शनीय तं हएबे करत, आन्तरिक पर्यटनकें सेहो बढाबा एहिसं भेटतैक । नेपालमे अगामीसन् २०११ कें पर्यटन वर्षक रुपमे मनएबाक तैयारी चलि रहल अछि । एहि तरहक आयोजन ताहिमे सहयोगीक काज करत से विश्वास कएल जा सकैछ । श्यामसुन्दर शशि जनकपुरके खवरि- रेल सेवा बन्द । नेपाल सरकार कानमे तेल तूर धऽ सूतल जनकपुरधाम । गत एक सप्ताहसँ जनकपुर रेल सेवा बन्द अछि। भारत एवं पूर्वी धनुषाके आवागमनके वास्ते प्रयोगमे आवएवला एकमात्र रेल सेवा बन्द भेलासँ दुनू देशक नागरिकके सास्ती भोगए परि रहल छनि । मुदा रेल व्यवस्थापन,स्थानीय प्रशासन,सरकार आ राजनितीकदलसभ कानमे तेल तूर धऽ निषवद्ध पडल अछि । ककरो कोनो चिन्ता नहि। हँ सोमदिन नेपालक राष्ट्रिय मानव अधिकार आयोग मध्यमांचल क्षेत्रीय कार्यालय जनकपुर एहि विषयपर चिन्ता व्यक्त कएलक अछि। आयोगके प्रमुख प्रदीपकुमार झा प्रेस विज्ञप्ति प्रकाशित कऽ रेल सेवा अविलम्ब सुचारु कएल जएवाक वातावरण सृजना करवालेल स्थानीय प्रशासन तथा सम्बन्धित पक्षसँ सकृय पहलके अपेक्षा कएलक अछि। नेपालके एकमात्र रेल्वे सेवा बन्द भेलाक बाद धनुषाक पूर्वी भागसँ दैनिक जनकपुर आवागमन करएवला हजारौ सर्वसाधारणके कठिनाई भेलैक अछि आ एहि बन्दीसँ बन्द—व्यावसाय सेहो प्रभावित भेल अछि। अतः बन्दक सम्पूर्ण कार्यक्रम फिर्ता लए अपन जायज मांगके वार्ताक माध्यमसँ समाधान करबाकलेल आयोग सम्बन्धित पक्षसंग आग्रह करैत अछि । झा विज्ञप्ति मार्फत आह्वान कएने छथि । गत सातदिनसँ रेल्ा सेवा अवरुद्ध भेलाक बाबजुदो स्थानीय प्रशासन चुप्प अछि । रेल्वे व्यवस्थापनके कोनो फिकीर नहि छैक । सरकार एतेक वेपर्वाह अछि जे तीन सप्ताह पूर्व नियुक्त कएल भेल महाप्रवन्धक भोला पंजियारके एखन धरि हाजिर होवए नहि पठौने अछि । एम्हर रेल सेवा बन्द कऽ आन्दोलनमे उतरल कर्मचारीसभक वास्ते सेहो साँप छुछुन्नरिके ताल भऽ गेल छनि । ओसभ अपने मोने रेल खोलैत लजा रहलाह अछि आ कोनो निकाय खोलवालेल आग्रह नहि कऽ रहल छनि । हुनकासभक आरोप अछि जे कोनो निकाय हमरासभक मांग प्रति सकारात्मक नहि अछि । दोसर दिस सेवाग्राहीसभ सरकार आ कर्मचारीक प्रवृति विरुद्ध आन्दोलनमे जएवाक धमकी देलक अछि । हुनकासभक कहब छनि जे यात रेल नीक जकाँ चलाओल जाय वा बन्द क देल जाय । मधेसी जनअधिकार फोरम आ नेपाली काग्रेस निकट श्रमिकसभक एक समूहले चारि सूत्रीय मांग राखि रेल्वे प्रशासन,लेखा आ प्रवन्धकके कार्यालयमे तालाबन्दी कएने छल । जकर विरोधमे माओवादी निकट अखिल नेपाल यातायात मजदुर संघ रेल सेवा बन्द करौने छल । शहीद धोषणामे सेहो ‘मूह देखि मुंगवा’ गणतन्त्रान्त्रिक आन्दोलनके प्रथम शहीद दुर्गानन्द झाके एखनधरि औपचारिक रुपमे शहीद घोषणा नहि कएल जएवापर मधेसी नागरिक समाजक अगुवासभ कडा प्रतिवाद कएलनि अछि । हुनकासभक आरोप छनि जे देशमे शहीद घोषणा करबाक विषयमे सेहो ‘मूह देखि मुंगवा’ बाटल जा रहल अछि । लोकतन्त्रके गरदनि दवा क्रुड पंचायती व्यवस्था सूत्रपात करएवला राजा महेन्द्रउपर २०१८सालमे वम प्रहार कएनिहार शहीद दुर्गानन्द झाके ४७सम् वलिदानी दिवसके अवसरपर वृहस्तपतिदिन जनकपुरके जानकी मन्दिर प्रांगणमे आयोजित प्रवचन गोष्ठीक वक्तासभ ई आरोप लगोने छलाह । ‘देशमे शहीद घोषणा करेवाक दौर चलल अछि । चोर,डकैतसभ सेहो शहीद घोषित भेल मुदा अदालतके निर्णयसँ फाँसीक सजाय पावएवला दुर्गानन्द झाके एखनोधरि शहीद घोषणा किए ने कएल गेल ।’ स्वर्गीय झाके सहकर्मी एवं वम काण्डके दोसर जिवित शहीद अरवीन्द ठाकुरके प्रश्न छलनि । जनकपुर वौद्धिक समाजके अध्यक्ष राजेश्वर नेपालीके मांग छलनि जे स्वर्गीय झाके राष्ट्रिय विभूति आ गणतान्त्रिक आन्दोलनके प्रथम शहीद घोषणा कएल जएवाक चाही । लोकतन्त्रके हत्या कऽ पंचायती व्यवस्था सूत्रपात कएनिहार राजा महेन्द्र विरुद्ध लोकतन्त्रवादीसभमे आक्रोश छल । लोकतन्त्र स्थापनार्थ नेपाली काग्रेस सशस्त्र जनयुद्धके घोषणा कएने छल । एहि बीच राजा महेन्द्रके जनकपुर भ्रमण तय भेल छल । नेपाली काग्रेस राजाउपर वम प्रहार करवाक निर्णय कएलक । एहि वास्ते सीमावर्ती भारतीय नगर उमगाउॅमे अध्ययनरत्त १९वर्षिय दुर्गानन्द झा आ अरवीन्द ठाकुरके जिम्मा देल गेल । काग्रेस पार्टीक निर्णय अनुसार २०१८साल माघ ९गते राजा महेन्द्रउपर जानकी मन्दिर प्रांगणमे वम प्रहार कएल गेल छल । अरवीन्द ठाकुर वम सहित पकडल गेलाह मुदा दुर्गानन्द झा राजा महेन्द्रउपर मन्दिर प्रांगणमे वम प्रहार कएलनि । राजा अपने बाचि गेलाह मुदा मोटर क्षतिग्रस्त भेल छल । लगभग १८महिनाक चरम यातना पश्यात तत्कालीन मुलुकी ऐनमे परिवर्तन कऽ दुर्गानन्द झाके राजकाज अपराध सजाय ऐनके दफा ४अन्तर्गत फाँसीक सजाय देल गेल आ ठाकुरके उर्म कैदक सजाय । झाके २०२०साल माघ १५गते केन्द्रिय कारागारमे फाँसीपर लटका हत्या कएने छल । चुकी तत्कालीन कानूनमे गाई आ ब्राहृमनके हकमे मृत्यु दण्ड वर्जित छल तें ऐनमे संशोधन कऽ दुर्गानन्द झाके फाँसी देल गेल छल । राजदेव मण्डल, जन्म: १५.०३.१९६० ग्राम- मुसहरनियाँ, पोस्ट- रतनसारा, भाया- िनर्मली, जिला- मधुबनी, पिनकोड नं. ८४७४५२ (बिहार)। राजदेव मण्डलकेँ अम्बरा (कविता संग्रह) लेल विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कार रूपेँ प्रसिद्ध) क मूल पुरस्कार २०१२ भेटल छन्हि। हमर टोल (उपन्यास) कल्प, यर्थात, स्वप्नक तल माछक जालमे लोग फँसल माछ पुछैत अछि- कि यौ भाय? लोग कहैत- किछु कहल ने जाए। हमरे हाथसँ जाल बनल हमरेपर अछि आब तनल। समर्पण- समस्त मिथिलांचल केँ समर्पित सुधी पाठक वृंद- सम्मुख ठाढ़ छी लऽ कऽ सुमन, शत-शत नमन शत-शत नमन। आभार- श्री गजेन्द्र ठाकुर एवं उमेश मण्डलजी १ (नाओं, स्थान, घटना आदि कल्पनापर आधारित अछि।) पूर्वरूप :- (क) अहाँ एहि वसुंधराक कोनो कोनपर छी। ई हमर आत्मविश्वास कहि रहल अछि। अहाँक नै देखितहुँ हम देख रहल छी। अहाँक उपस्थितिक ज्योत्सना हमरा चारूभर आभासीन भऽ रहल अछि। आर ओइ ज्योतिसँ हमर रोम-रोम पुलकित भऽ रहल अछि। हमहूँ तँ ओइ नृत्यलीलाक अंश छी। हम बुभुक्षित छी अहाँक सिनेह आ आशीरवादक लेल। हमरा क्षमा नै करब तँ दण्ड दिअ। किन्तु बिसरू नै। यएह कामना अछि। अहाँक स्मरण कऽ किछु रचबाक प्रयत्न कऽ रहल छी। ~ (ख) विशाल सागरक पसरल जलपर धनुकटोली ठाढ़ अछि। की ओ हँसि रहल छै? आकि कानि रहल छै? लगैत अछि जेना रँग-बिरँगक जलमे ओ उगि आएल अछि। चारूभर उड़ैत सुगन्धित धुइयाँ। मुँह आ देहमे लटपटाइत बादल जकाँ कारी आ उज्जर धुइयाँ। आ लगैत छै जे ऊ आकृति रसे-रस बढ़ि रहल हो। गाम-नगर-महानगर सभटा आकृतिक भीतर ढुकल जा रहल हो। नजरिक जे एकटा बिस्तार होइ छै, सेहो जेना ओकरा सोझहामे छोट भेल जा रहल छै। ओकरा निसाँससँ निकलैत हवा, बुझाइ छै जेना बिहाड़ि बहैत हो। बहुत गोटे जेना एक्के बेर जय-जयकार केलक। मथापर जटा, अधपक्कू दाढ़ी-मोछ, लाल कुंडाबोर आँखि हाथमे बड़कीटा शंख लेने एकटा बाबाजी देखाए पड़ैत छै। ओकरा आँखिसँ लहू बहि रहल छै। हवाकेँ कंपित करैत गम्भीर वाणी निकलैत अछि- “दैविक दैहिक भौतिक ताप....।” आकास फाड़ैबला शंखनादसँ आगूक शब्द झपा गेल। संगे बाबा महतोकेँ जय-जयकार होअए लगल। धनुकटोली शनै: शनै: जलमे समा रहल अछि। ओइ स्थानपर उगैत छै- एकटा छोटका टोल। जेना हमर टोल। छोट-पैघ, नीक-अधलाह घर-दुआरि। हँसैत-कानैत लोक-वेद, धीया-पुता, माल-जाल, चिरइ-चुनमुन्नी, सुखल आ हरियर- गाछ-बिरिछ, पोखरि, इनार गली, सड़क, चौबटिया। की ई सपना छी आकि सत्य.....। आकि सत्यक सपना? ~ २ गहवर घर हल्ला कऽ रहल अछि। सघन अन्हार कान ठाढ़ केने सुनि रहल अछि। गिरहतबाकेँ ईंटाबला घरपर बैसल इजोत हनहना कऽ हँसैत अछि। हँसी अन्हारमे छिड़िया जाइत अछि कन्तु अन्हारमे छिड़िआएलो इजोत भकजोगनी जकाँ भुकभुकाइत अछि। हड़हड़ाइत हवा आ ओकरा कान्हपर चढ़ल भगैतक स्वर दड़बड़ मारि रहल अछि- सौंसे टोल। “कतेक दूर रहलह हौ सेवक-राजा फुलबरिया हौ.....। एके कोस रहलह हौ सेवक राजा फुलबरिया हौ.....। लागि गेल चौदहम केवाड़ हौ....।” ताल काटैत मिरदंग आ झनकैत झाइल। भगैतया सभ गाबैसँ बेसी देह मचकाबैत अछि। जेना देह नाचैत अछि टाँग नै। साज-बाजक तालपर नाचैत देह आ मन। गहवरक पछुआरमे अन्हार खटखटा रहल अछि। ऊ अन्हार नै भूत प्रेतक छाँह छिऐ। नेंगरा बुढबा कहैत रहै छै। रौ गहवरक देवी-देवताक डरे सबटा साहन सभ पछुआरमे नाँगटे नाचैत रहैत छै। वएह सभ कखनो काल नढ़ियाकेँ कान पकड़ि केंकिया दैत अछि- भूउउऊ.....। ओकरे सुरमे सुर मिला कऽ भूत प्रेत कानए लगैत अछि- कुउउऊ....। तखैन टोलक लोक भलहिं सुटैक जाइ किन्तु कुताकेँ देख लिओ ताल। जना नाँगरिपर कियो मटिया तेल ढारि देने होइ। गहवरक आगू सौंसे अँगनीमे दीया जरि रहल अछि, गोल-गोल पाँतिमे। अन्हरियाकेँ गरदनियाँ दऽ भगा रहल अछि। तैयो उ थेथर जकाँ दोग-दागमे ठाढ़ रहैए चाहैत अछि। हे एकोटा दीपक टेमी निच्चाँ नै हो। हँ... हँ एहेन बखतमे भकइजोत बड्ड खराब। डाइन आ भूत केनौ सँ लपकि सकै छौ। अपन-अपन सतरकी। घटलासँ पहिने दीपमे तेल ढारैत रह। पता छह तेल कते डहतै। महगाइ तँ अासमानमे भूर कऽ देने छै। ओइ कारणे तँ सभकेँ भकभकाइते छै। यएह तेल जरे ककरो फटै छै एकरो....। झकाश इजोत देखैक छौ तँ देखही शहर जा कऽ। राइतोमे सड़कपर गिरल सुइया ताकि लेबही। भगतकेँ कोनो कम पामर होइ छै। चाहतै तँ ऐ गाछो सभमे इजोत जरए लगतै। अच्छा चुप। बड़का लाल बुझक्कर भऽ गेलेँ। हम नै अहाँ बड़का विदुआन। अहाँ चुप रहू। एम्हर देखू। खेलाबन भगत पूजा ढारि रहल अछि। खीर, लड्डू, पान, सुपारी, तुलसी, गंगाजल सभटा डाली सभमे सजाएल छै। मनक तरजूपर तौल कऽ अछत-फूल राखि रहल अछि। सभटा पूजाकेँ कुड़ि एके रंग एके आकार। भगत जखैन लिहुरि कऽ पूजाकेँ कुड़ि रखैत छै तखैन ओकर पेट बोमिया उठै छै। “गै माए, भगत पेटमे बाघ रखने छै। देखै छीही हुमड़ै छै।” “गै दाइ, देवताे-पितर नै बुझै छौ। तोहर बेटी तँ जुगमे भूर करतौ। अखैन तँ पा-भरिक छौ।” हे मुँह सम्हारि कऽ बाजू। अपन बेटी जेना बड्ड सतबरती। कोन-कोन रसखेल केलक के नै बुझलक। हे लबरी.....। हे चुप.....। झगड़ा-झाँटी बन्न। पहिले कहलौं औरतिया सभकेँ एक कात आ पुरूष सभकेँ एककात बैठाएल जाए। हँ-हँ सएह कएल जाए। आइ गहवर घरमे पहिलुक डाली जागेसरकेँ लागल अछि। ओकरा स्त्रीकेँ कोखिया गोहारि हेतैक। अोकरा देहपर कखनौ भूत सवार भऽ जाइत अछि आर उ खेलाए लगैत अछि। केना भूत सवार नै हेतै? धर्मडीहीवालीकेँ देहो तँ सवारीकेँ जोग अछि। भरल-पूरल जवानी, श्याम वर्ण, तेलसँ छट-छट करैत देह, खलिआएल आँखि, गोल बाहिंपर कसल अँगिया। कारी भौंरा केश। आँखिकेँ जेना स्वत: खैंच लैत अछि अोकर देह। एकर ठीक उनटा जगेसराक शरीर। जेना जुआनीमे घुन लगल हो। तहिना ओकरा देहकेँ बेमारी अधखिज्जु कऽ देने अछि। कमजोरीक कारणें तामस हरदम नाकेपर चढ़ल रहैत अछि। तइपर सँ बाल-बच्चा नै होइ छै। तामस आर दुगुना। ई सभटा तामस उतारत धर्मडीहीवालीपर। कखनो फनकए लगैत अछि- “सन्तानक मुँह कतऽ देखते ई पपिआही। जीनगी भरि तँ कुकरम केने अछि।” धर्मडीहीवालीकेँ भरि देह ई बात छूबि लैत अछि। अपन असल नाओं निरमला जेकरा उ नैहरमे राखि कऽ अाएल अछि। अपना नैहराक बड़ाइ चिबा-चिबा करए लगैत अछि- “हमरा धर्मडीहीकेँ लोक असल धर्म-कर्म करैबला सभ अछि। पपिआहा सभ तँ अहीठाम भरल अछि।” दिन, दुपहर, राति कखनो दुनू बेकैतमे बकटेटी शुरू भऽ जाइत अछि। टोलक बूढ़-सुरकेँ अनसोहाँत लागब स्वभाविके। जगेसराकेँ किछो तँ कहऽ पड़तै- “हे रौ, नै होइ छौ तँ ओझहो-धामिकेँ देखाबहि। कोनो धरानी एकोटा बाल-बच्चा भऽ जेतौ तँ बुझही जे सभ दुख पार। ई भूत-देवी आ तामस-पित सभटा एकरा देहसँ भागि जेतौ।” “सन्तान लेल तँ कोखिया गोहारि करबै पड़तौक।” कतेक दिनसँ जागेसर गोचर विनतीमे लगल अछि। किन्तु भगत पिघलत तब ने। भगतकेँ छुट्टी कहाँ रहै छै। आइ ऐ गाम तँ काल्हि दोसर गाम। नाेते-नत। आखिर पक्का भगत छिऐ रामखेलाबन। दू पीढ़ीसँ ओझहा-धाइमक काज कऽ रहल छै। पहिने ओकरा गहवरमे गछौटी करियौ। साफ-साफ कहियो पूजामे कतेक खरच करबै। पाठीक बलि देबै। गछि लिओ। तब भगत तैयार हएत। कतेक खुशामदे आइ तैयार भेल अछि खेलाबन भगत। ~ ३ गहवरक अँगनीमे जेना ललका इजोत उतरि गेल छै। अन्हारक कोरामे लहुआएल लाल चिल्हका खेला रहल हो, तहिना सन लगैत अछि। धधकैत आहुत, चौमुख जरैत दीप, अड़हुलक लाल फूल, लाल सिनूर, ललका डाली। सबहक मुँह जेना ओही लालीसँ ढौंरल हो। लाल टुह-टुह भेल भगतकेँ आँखि सपनामे डूबि-उगि रहल हो। पहिले कहि देल गेल छलै। मरद सभ एककात आ औरतिया सभ एककात। बात के सुनतै? ढीठ सभ मरदक झोंझिमे ढुकि कऽ बैसल छै। दोसरो दिस तँ थेथरे सभ अछि। मौगियाह जकाँ दोगमे ढुकि कनफुसकी कऽ रहल छै। पता नै चलै छै औरत आ मरदक। एक तँ इजोत तेजगर नै छै। दोसर साड़ीसँ आधा मुँह झँपने छै। आँखिक भाग देखलासँ केना िचन्हत लोक। दसगरदा जगहपर सभ चलै छै। सभ की चलतै। उतरबरिया कातसँ औरतिया सभकेँ नै बैठबाक चाही। उत्तरसँ देवताक आवाहन होय छै। गियान तँ छौ नै। आबि गेलौ संुघहा धान। सुंधाय मड़रकेँ सभ सुंघहाधान कहै छै। सुंघहाधान छूबिते हाथमे गड़ि जाए छै। टोकैते देरी सुंघाय मड़रकेँ बकटेटी शुरू। फेर कियो सुंघहाघान बाजि नै सकैत अछि। देख लिऔ लाठीक हुड़ाठ। मुँह भाँगि देबै, कियो बजत तँ। मुँहकेँ चुप्प राख। तेरहे बरखक उचितवक्ता छै तइसँ की। ओकरासँ गप्पमे के जीतत। उचित बात फट्ट दऽ बजल- “गोहारि, गोसांय सब बन्न। सुंघाय बाबा कहि देलक। कियो मुँहसँ बाजि नै सकैत छी। भगतो वाक केनाक देत। चलै चलू आब िकछु नैै हएत। के बतीसी लाठीसँ झड़ाएत।” भगतकेँ नवसिखुआ चेला फनका रपटैत बजल- “देहपर नै लत्ता-चौधरी बोलत्ता। ऐ गामक मालिक सुंघाय छियो की जे ओकर औडर चलतौ। अखने सुंघबाकेँ कंठ पकड़ि बाहर दिस ठोंठिया देबो। बुझि ले, तोरो कोनो बाप नै बचेतौ।” उचितवक्ताकेँ कपारपर तामस नाचि उठल। सुंघाय मड़र पाछूसँ डाँड़मे लाठी लगौने ठाढ़ छै। बूढ़ देहक भार लाठीपर देने आँखि मूनि देवता-पित्तरकेँ सुमरि रहल अछि। गहवरक सीमामे बकटेटी नै करबाक चाही। हम पपियाहा। हमरा छेमा कऽ दिअ। “एहेन गप्प कहत।” उचितवक्ता फोंफिया कऽ उठल आ सुंघाय मड़रकेँ पाछूसँ लाठी खैंच लेलक। लाठी चमकाबैत फनकापर हुड़कल। सुंघाय मड़र धाँय दऽ डाँड़ भरे खसल। कुहरैत बाजल- “हौ बाप, मारि देलक। ऐ लुकड़बाकेँ जन्मे भेल छै मरचायसँ। तब ने एकर बात आ बानि मरचाय जकाँ लगै छै। एकर बाप सभ साल लंगी मरचायकेँ खेती करै छलै। ओहीसँ जोड़ा बरद कीनलकै। ओइसँ की। दारू पी कऽ सिरजल चीज केहेन हेतै।” उचितवक्ताकेँ हाथसँ लाठी छिना गेल छै। महुराइत बजल- “अपना बेटा दिस नै तकै छहक। टूटलो डाँड़पर अनकर आड़ि कोदारिसँ नै छाँटबहक तँ जलखै नै भेटतह। केहेन कुकरमी छहक, खेलि देबै सभटा बात।” “नै गौ बाबू, कल जोड़ै छियौ। हमरा उठा कऽ पहुँचा दे।” “अच्छा चुप रहू। शान्त भ' जाऊ। देखियो ओने गोहारि शुरू भ' रहल छै।” पहिलुका डाली जागेसरक लगल छै। डाली दौड़ कऽ अपने आगू चलि गेलै। सभटा देवताक किरपा छै। देव किरपा बिनु डोले नै पात। आपसी फुसुर-फुसुर भ' रहल छै। ओकर पति जागेसर गहवर घर दिस टकटकी लगौने। “एहेन जवानीसँ भरल देह आ तब बाल-बच्चा नै होइ छै।” “जागेसरक बाछी एहेने बनल छै। एेबेर गाभ टेकतै की नै?” “खेलावन भगत एे काजमे माहिर छै। आब देखियो तँ....।” स्त्रीगण दिससँ कने मन्द स्वर निकलै छै। “भैयाखौकीकेँ लाज-धाक होइ छै की नै। अपने दहकेँ अपने जे करै छै। छिनरिया....।” “अइठाम अबिते सभ देवी-देवा चढ़ि जाइ छै। आ नैहरा जाइते सभटा छूटि जाइ छै।” “सुनै छिऐ जे नैहरासँ एकटा छौड़ा आठे दिनपर भेँट करए अबै छै। पछोड़ धेने रहै छै।” “ई सभ तँ होइते रहै छै। तोरो मन होइ छौ की।” एक दोसरकेँ मुक्का मारैत औरतिया सभ एकसंग हँसैत अछि। “चुप। सभ मुँह बन्न कऽ ले। भगतकेँ भाव आबि गेलै।” “कारणीकेँ एमहर लाबह।” भगतियाक भगैत जोर-शोरसँ शुरू भ' गेल छै। “जय हौ देव। कनी नीकसँ देखियो। माथ आ पेट दुनूमे दरद छै।” खेलावन भगत देह-हाथकेँ ऐंचैत धर्मडीहीवालीक आगूमे बैसैत अछि। मंतर पढ़ि माथ हाथ दऽ रहल छै। माथपर सँ हाथ ओकरा छातीपर गिरबैत अछि। फेर पेटकेँ हँसोति दै छै। पेटपर सँ हाथ ससरि पुन: माथपर। धर्मडीहीवाली चौंक उठै छै। ओकर देह सिहरि उठै छै। भगत फेर माथपर हाथ रखैत काजकेँ दोहरौलक। “चटाक।” धर्मडीहीवालीक चमेटा भगतकेँ मुँहपर लगल। संगहि कंठ पकड़ि धकेल देलक। आशा नै छलै से भेल। भगत ओंधरा गेल। तामसे थर-थर काँपैत। लोगमे हड़कम्प भ' गेल। किछु ठाढ़ आ किछु बैसल अछि। स्त्रीगणक आँखि आश्चर्यमे डुमल। “गे माइ गे माइ। आब की हेतै।” “आगि बरिस जेतै। ठनका गिरतै।” उचितवक्ताकेँ नै रहल गेल तँ बजल- “भगतकेँ असल भूतसँ पाला पड़ि गेल छै। सभ गुण-मंतर अखन भीतर भ' गेल छै। टाँग केना असमान दिस ठाढ़ केने छै। लगै छै जेना टिटही होइ।” फड़फड़ा कऽ उठैत अछि- भगत। बेंत लऽ कऽ धर्मडीीवालीकेँ पीठपर तड़-तड़ा दैत अछि। “आइ हमसभ भूतकेँ भगा देबै।” धर्मडीहीवाली भागैत अछि। “रे खुनियाँ सभ। रे कोढ़ी फूटतौ रे बेईमनमा। गे माइ गेऽऽऽ।” जगेसरा आगूसँ घेर लैत अछि। एक्के धक्कामे जगेसराकेँ गिरबैत धर्मडीहीवाली पड़ाइत अछि। भगत देहसँ गरदा झाड़ि रहल अछि। जगेसरा हाथ जोड़ि थर-थर काँपि रहल छै। “आब की हेतै यौ भगतजी। कोनो उपाए लगाऊ। जे कही अहाँ।” “हेतैक सभ उपाए लगतैक। भगतसँ भूत नै जीत सकै छै। कोखिया गोहारि हेतै। तूँ परसू आबि कऽ भेँट कर। हमरे नाओं छिऐ रामखेलावन भगत। पछुआरक अन्हारमे किछु करूण क्रदन सन भेल। भगत छड़पि कऽ गहवरमे ढुकि गेल। हवाक झोंक अाएल। किछु दीप मुझा गेल। लोक सभ पीठपर डरकेँ लादने एका-एकी ससरि रहल अछि। ~ ४ ढेरूवा नै नाचै छै असलमे जागेसरक मन नाचै छै। सुतरी कटा रहल छै- कतौ मोट कतौ पातर। मन थिर रहै तब ने। मनकेँ थिर राखब बड्ड कठिन। ई तँ कियो साधक कऽ सकैत छै। सभ जँ साधक भऽ जेतै तँ देश दुनियाँकेँ कोन गति हेतइ। तँए पहिने मन उड़ै छै तब तन। जागेसरक मन धारक थौकड़ा जकाँ उपला रहल अछि। आइ तँ भुटायौ वैध जबाब दऽ देलकै- “धर्मडीहीवालीकेँ सन्तान नै हेतौ। विधाता कलम मारि देने छौ। एकर कोखि ऐ जनममे नै भरतौ।” हौ बा आब कोन उपाय हेतै हो। पहिने तँ लोक खोंखीबाला कहै छलै। आब मुँह दाबि कऽ कहै छै- “निरवंशा।” दुआरिपर जगेसरा ढेरूआकेँ गिनगिना रहल अछि। सँगे ओकर माथा घूमि रहल अछि आ माथामे घूमि रहल अछि- धर्मडीहीवाली। किन्तु पछिला फूइसक घर थिर अछि। ठीके कहै छलै- उचितवक्ता- “हटा ऐ ठाँठ गाएकेँ। कर दोसर बिआह। ला टटका माल। नीक नसल देख-सुनि कऽ। पुरहिया लऽ आन। चाइरे-पान सालमे छौड़ा-छौड़ीसँ खोभारी भरि जेतौा।” नसल तँ एकरो खराब नहिये छै। नमगर-छरहर काजा, भरल-पूरल सीना। जखनी सिंगार कऽ कए निकलै छै तँ संगी-साथीकेँ कहए पड़ै छै- “जगेसरा भागशाली अछि। अपना तँ कमजोर, करिआएल, बेमरियाह अछि। किन्तु ओकरा मौगीकेँ देखियौ। जँ आगूसँ निकलै छै तँ मन फुरफुरा उठै छै।” भाग्यशाली कतऽ। भाग्य कतएसँ नीक हएत। सुन्दर तँ अछि लेकिन बाँझ। जँ निपूतर रहब तँ पिण्डदान के करत? हमरा बाद सम्पतिकेँ के भोगत? बुढ़ारीमे सहारा के बनत? ओह ऐ औरतियाकेँ भगबहि पड़त। ठीके कहै छलै- उचितवक्ता। लेकिन भगेबै केना? छै तँ ई बड़ जब्बर। ओइदिन खेलावन भगतसँ झाड़फूँक करबैले गेलिये। एके झापटमे भगतकेँ दाँत चियाइर कऽ खसा देलकै। महतो बाबाकेँ थानसँ भभूत लाबि देलिऐ। छाउर बुझि कऽ मूतनारमे फेक देलकै। यएह भोंसड़ीकेँ बिसबासे नै छै किछोपर। फल कतएसँ भेटतै? आब एकरा डेँगा-ठेठा कऽ भगबहि पड़तै। लेकिन केना कऽ आँखि उनटा कऽ जँ हमरा दिस तकै छै तँ हमरा लघी लगि जाइत अछि। तैयो हम तँ मरद छी, देह तानहि पड़त। हम जँ मौगा बनल रहबै तँ उ बेहया बनि जेतै। संभार तँ हमरहि करए पड़तै। कतेक दिनसँ एकर चालि-चलन देख रहल छी। नकोरबा बनियाँसँ कतेक सटिया कऽ गप्प करैत रहै छै। छनमाकेँ अँगनामे ढुकै छै तँ निकलैक मने नै होइ छै जेना। हम भूखल रहि जाइयो कोनो बात नै लेकिन ई भोरे निकलि जाएत- टोल चक्कर लगेबाक लेल। टोलक चक्कर थोड़बे लगबै छै ई तँ दोसरे चक्करमे लगल रहै छै। कतेक बेर भऽ गेलै। भूखसँ पेट दुखा रहल अछि। हमरा दिस धियान रहै तब ने। धियान तँ आओर ककरोपर रहै छै। धर्मडीहीवाली अँगनासँ निकलि कऽ टोल दिस जा रहल अछि। जागेसराक ढेरूआ रूकि गेलै। “ऐ- कतऽ जा रहल छी? छुच्छे कूद फान? ऐ अँगनासँ ओइ अँगना? जेना कोनो काजे नै छै। एके लाठीमे टाँग तोड़ि देबौ। अपने घरमे बैठल रहबेँ।” धर्मडीहीवालीकेँ टाँग रूकि गेलै। उनटि कऽ बजल- “देहमे तागद तँ छै नै आ टाँग तोड़ता? देखै नै छी केहेन बेमारी ढुकल छौ, तोरा देहमे। कोढ़ि फुट्टा कहीं कऽ।” झगड़ा बढ़तै। जागेसरकेँ बढ़िया चांस भेँट गेल छै। उ झगड़ाकेँ बढ़ाबए चाहैत अछि। “मुँहसँ गारि निकलतौ तँ थुथुन तोड़ि देबौ।” “गारि नै देबौ तँ असिरवाद देबौ?” “यएह बड़का आएल अछि- असिरवाद देनिहारि। निपूतरी, बाँझिन। गे भौंसरी, एकटा मूसोकेँ जन्मा कऽ देखही। तोरी माइकेँ।” “खबरदार, हमरा माइक नाओं नै ले। पूछलीही नै अपना माएसँ। कतऽ कतऽ मुँह मारलकौ तब ने तोरा सन बेटा पैदा केलकौ। बेमरियाहा.......।” जागेसर ढेरूआ फेकैत लग चलि गेल अछि। करोधसँ थरथरा रहल अछि। “मुँह बन्न राखबें आकि देबौ चमेटा।” धर्मडीहीवालीकेँ आँखि तामसे ललिया गेलै। उ आओर लग आबि गेलै। देह अड़ि कऽ बाजलि- “ले मार। असल बापक बेटा छी तँ मारि कऽ देखही। बापसँ भेँट करबा देबो।” चटाक, चटाक। मुँहपर थप्पर पड़ल। “तु थप्पर मारलें-हमरा। आइ हम जे न से कऽ देबो। आओर बखतमे टिटही जकाँ पड़ल रहैत छै आ मारै कालमे कतएसँ गरमी चढ़ि जाइ छै।” ओ जगेसरा िदस हुड़कैत अछि। ओ डाँड़क डोरा आ झाँपल अंगमे लटकए चहैत अछि। लेकिन जगेसरा तँ लाठी लऽ कऽ तैयार भऽ गेल अछि। “निकल हमरा घरसँ- छिनरिया। कोन-कोन कुकरम कऽ केँ तब हमरा घर अएलें। पता नै। भागबें अइठामसँ आकि चलेबाै डंटा?” “ले मार। आओर मार हमरा। अहिना भागि जेबो तोरा सात पुरखाकेँ घिना देबो। पूरा समाजमे उकैट देबो-सबकुछो।” उ कानि-कािन कऽ फाेंफिया रहल अछि। हाथ चमकाबैत जगेसराक लग सटल जा रहल अछि। “भगा देबही। छातीपर छिपाठी रोपि कऽ रहबो। बहुते बल भऽ गेलो, हाथेमे। थप्पर मारबें।” कहैत जागेसरकेँ धकेल देलक। आसाकेँ विपरीत जागेसर धड़फड़ा कऽ गिर पड़ल। आगि नेस देलक- जगेसरकाकेँ। तामसे काँपैत ओ लाठी लेने उठल। “तोरी माँ की.........। आइ तोहर हड्डी तोड़ि देबो। परान लऽ लेबो।” फटाक-फटाक। धर्मडीहीवालीक पीठ आर जाँघपर लाठी बरिस रहल अछि। “गे माइ गे माइ। मारि देलक रेऽऽऽ। दौड़ रेऽऽऽ। कोढ़िफुट्टा बेदरादा, रे लकवाबला। गे माइ, मरि गेलियौ गेऽऽऽ।” दूरेसँ टोलक लोक चिचिया रहल छै। “रे जगेसरा- रूकि जो। मरि जेतै बेचारी। गलत बात। गाए-भैंस जकाँ पीटै छी।” “एना मारबें तँ कोनो दिन लंका कांड भऽ जेतौ।” “आखिर कोन झगड़ाकेँ निपटारा नै होइ छै।” “ई औरतियो बड्ड झगड़ालू अछि। छुलही कहीं के, आबो अइठामसँ जेबें की अड़ल छँए।” लोक सभ बीच-बचाव करऽ रहल अछि। धर्मडीहीवाली दस पन्द्रह डेगपर ठाढ़ भऽ गेल अछि। आ ओइठामनसँ गरिया रहल अछि। “हम छुलही? झगड़ाउ? केकरा घरमे सतबरती बैसल छै? हम सबटा जानै छी। सबहक बात सुनै छी। ऐ खुनिया, बेदरदाक कारने। रे अनजनुआँ जनमल, देहमे कोढ़ि फुटतौ रेऽऽ। हाथमे घुन लगतौ।” जागेसर गरजैत अछि- “ऐ बीचमे नै आबै कोइ। ई औरतिया सनैक गेल छै। दुसमन सभ एकरा सिखा-पढ़ा कऽ तुल-तैयार कऽ देने छै।” कातमे ठाढ़ भेल लोक सभकेँ बाजए पड़ैत अछि- “हमरा बुझि पड़ैत अछि मरदे सभ सनकल अछि। दू-चारि दिनपर एहिना पिटाइ प्रोग्राम चलैत रहैत छै।” “पिटाइ नै करब तँ पूजा करू। कपारपर चढ़ा कऽ राखू।” “से कहाँ कहै छी हम। सभ किछुकेँ एगो रास्ता होइ छै ने। आकि किछु बुझे ने सुझे फरमा दिया फाँसी।” “ठीके कहै छै। सबहक औरतिया कोनो बाँझिन छै आकि छुलाहीए छै, ऐँ?” औरतियो सभ चुप नै रहि सकैत अछि। “हे यौ बउआ मरद भेल सोना। ओकर सभ गलती माफ। औरतियो भेलै टलहा। ओकर की गिनती छै।” “चुप रहु अहूँ तँ अपना पुतहूकेँ खोरनीसँ खांेचारैते रहै छिऐ। की बजब।” “केकरापर करब सिंगार-पिया मोरा आन्हरे हे...।” धिया-पुता कातमे डेराएल सन मुँह कएने ठाढ़ अछि। धर्मडीहीवाली चौबटियापर ठाढ़ भऽ कऽ सात पुरखाकेँ गरिया रहल अछि। जगेसारा लाठी लऽ कऽ रेबाड़ैत अछि। “ठाढ़ रह भोंसरी। आइ चौबटियेपर बेदशा करबौ।” चोटक मोन पड़िते धर्मडीहीवाली भागैत अछि। पाछुसँ बाघ जकाँ गरजैत जागेसर। लोक तमाशा देख रहल अछि। कनेके दूर दौगलापर जागेसर हकमए लगैत अछि। “जो अपना बापक पास। एमहर जँ घुरि कऽ एबें तँ प्राण लऽ लेबौ।” कानैत-खीजैत धर्मडीहीवाली जा रहल अछि- नैहर दिस। नुआ-बस्तरक कोनो ठेकान नै। जेना सुइध-बुइध हेरा गेल हो। ओ कानैत अछि। किन्तु भीतरसँ बोल फूटि रहल अछि। “हमरा तँ बापसँ मोलाकात करबा देलही रे निवंशा। तोरो छोड़बो नै। अठगामा मैनजन-पंच जमा कऽ देबौ- तोरा दुआरिपर। आठो गामक लाेकसँ थू-थू करबा देबौ।” जागेसर ओहीठाम बैस कऽ खांेखिया रहल अछि। “खों...... खों...... खों....... आक थू.....।” पता नै ओ थूक केकरापर पड़ल। समाजपर, गामपर आकि ओइ स्थानपर, धर्मडीहीवालीपर, आकि अपनहि आपपर। पता नै......। ~ ५ पंचायत! हँ, हँ बुझलौं गामक पंचैती। जातिक सरदार, मैनजन-देमान। करत छान-बान्ह। मुँहपुरूष आ सरपंचक शान। पंच भगवान। धुर, भगवान नहि बेमान। मुँह देखल पंचैती। जेकर लाठी तेकर जोर। निरबलक आँखिमे भरल नोर। कमजोरे लेल सभटा कड़ी। आब गामे-गाम बनि रहल छै-कचहरी। तैयो पंचैती होइते छै। हँ जातिक पंचैती। परजातिक पंचैती। जाति तँ जातिसँ साइंग होइत छै। दस लोकक निरणय तँ मानहि पड़तै। नै तँ समाजक नँगटाहा सभ नाँगटे नाचत। समाज, कानून, बन्धन, डण्ड जरिमाना। इनसाफक उपाए। सभकेँ निसाफ मिलबाक चाही। नै तँ कहियो गाड़ीपर नाह आ कहियो नाहपर गाड़ी। सएह यौ मड़र। कालू मड़रक दुआरिपर पंचैती भऽ रहल छै। जातिक मैनजन। हँ हँ बीचेमे बैसल छै। आँखि केना नचै छै- मुँहदुसी जकाँ। धरमडीहीयोसँ पंच सभ आएल छै। की बुझाइत छै, जगेसराकेँ, छोड़ि देतै ओहिना। ओहिदिन मारैत-मारैत थकचुन्ना कऽ देने रहै, अपना घरवारीकेँ। घरसँ भगा देलकै। आ पाछूसँ समादो पठा देलकै। जे तोहर बेटी बदचलन छौ। चोरनी छै। बाँझ छै। राखह अपना बेटीकेँ कपारपर। आ रे तोरी कऽ, एहेन डकलीलामी। धर्मडीहीवालीक बाप तीन-चारि महिना धरि टकटकी लगौने इन्तजार केलकै। कोनो कौओ-पंछी सुइध-बुइध लेबाक लेल नै पहुँचलै। अंतमे ओकर बाप जातिक मैनजनकेँ खबैर देलकै। पूरा टोलक लोक जमा भेल छै। धनुखधारी मड़र, उचितवक्ता, ढोढ़ाइ गुरूजी भुटाइ वैद, फतींगा, बिडियो साहेब, चंतनजी जेकरा सभ चोतबा कहै छै। आर बहुत गोटे कनेक पाछू दाबि कऽ बैसल छै। पाछूसँ बीख उगलि मुँह चोरा लेबामे असान होइ छै। टाटक पाछाँ स्त्रीगण कान पाथने अछि। ओ सभ आँखि नचबैत फुसुर-फुसुर कऽ रहल अछि। कालू मड़रक नजरि ओतऽ तक पहुँच गेल। “आब मौगी सभ पंचैती करत। एस.पी., डी.एस.पी. मंतरी-संतरी सभ बैनते छै। आब कोनो कम पावर छै, ओकरो पास।” दुनू हाथ जोड़ैत आगू बजल- “तब ने ओहि राित जोकरबा दुनू हाथ जोड़ि कऽ नाचमे कहैत रहै- तुम्ही हो माता, तुम्ही पिता हो।” छौड़ा सभ खिखिया कऽ हँसैत अछि। “बुढ़वा बहुत दिन धरि लात तरमे राखि राज केलहक आब सभटा पाछू दऽ कऽ बोकरेतह। धनुखधारी मड़र रपटैत अछि- “चुप, गामक इज्जत झाँपि कऽ रखबाक चाही। दोसरो गामसँ पंच सभ आएल छै। की कहतौ।” ई काल कतएसँ आबि गेलै। की हौ, कथीक धोलफच्चका भऽ रहल छै। हे रौ जा रहल छै तँ जाए दही दोसर जातिक मैनजन किएक रहतै। हँ हँ, जाउ अहाँ। हमरा जातिक मामला छै। जय भगवान। ढोढ़ाइ गुरूजी घूस लेने छै। हँ-हँ, जगेसरासँ पाँच बोरा भुस्सा। विल्कुल फ्री। कतेक दिन फोकटमे चाह पीतै आ खेतै, से तँ अलगे। बजतै नै तँ घूस केना पचतै। ढोढ़ाय गुरूजी बीचमे जोरसँ गरजैत अछि- “जोरू-जमीन जोरकेँ, नै तँ किसी औरकेँ। अपना औरतियाकेँ पाँजमे रखबाक लेल जगेसरा चारि-पाँच लाठी खींचे देलकै तँ कोन जुलूम भऽ गेलै। के सभ ताजनकेँ अधिकारी होइ छै से तँ सभ जनिते छिऐ।” धरमडीहीसँ आएल कन्हैया मैनजनक कनहा आँखि जखैन चमकै छै तँ सबहक सिटी-पिटी गुम भऽ जाइ छै। ओ अपन छिड़िआएल मोंछकेँ सिटिया रहल अछि। ढोढ़ाय गुरूजीपर जखैन ओकर ललिआएल नजरि पड़ैत छै तँ तत्काल गुरूजी चुप्पी साधि लैत अछि। पाँच बोरी भुस्सा हवामे उड़ि जाइत छै। आ पेटमे बसात औनाए लगैत छै। उचितवक्तासँ नै रहल गेलै तँ टोन कसि देलकै। “धुर ई ढोढ़बा की बजत। एकरा बहूकेँ तँ दोसर जातिक धरमीलाल पंजाब लऽ कऽ भागि गेल आ अइठाम लबर-लबर करै छै।” “ई उचितवक्ता फेर टें-टें करए लगल चुप रहबें की नै।” “हे, आइ जे पंचैतीमे खचरपन्नी करबें तँ मुँह थकचुन्ना कऽ देबो।” “रौ तोरी कऽ। हमर बाप कहने रहै जे पंचैतीमे उचित बात ढेकैर कऽ बजिहेँ। आ तूँ मुँह थकुच देबही तँ बजबै केना। ऐ सँ नीक। हम अइठामसँ चलि जाए।” बेंगाय बाबा आइ गाँजा नै पीने छै। नै तँ लौडिसपीकर जकाँ बजितै। ऊ तँ धरमडीहीवालीकेँ तरफसँ छै। जागेसर दिससँ ढेकैरतै तब ने फ्रीमे गाँजा भेटतै। धुर नै बुझबहक। ओकर नजरि गड़ल छै। जगेसराक डीहबला जमीनपर। साेचै छै कहुना झगड़ा बढ़तै तँ कम दरपर ई दाव सुतरि जाएत। हँ आबि गेलौं खिस्सा कहैबला खिस्सकर। ई तँ खिस्सेपर पंचैती कऽ देतौ। ऊ जमाना गेलै। आब तँ जेकरा पासमे साम-दाम भय-भेद छै आकरे बुत्ते पंचैती हेतै। पंचैती कारणे कते पंच बिलटि जाइत छै। जे दसगोटेमे नै बजल अछि। ठाढ़ भऽ कऽ बजैत काल ओकरा थरथरी छुबि दैत छै। “हँ तँ, आब घोंकले गप्पकेँ कतेक घोंकैत रही। सभ बात जानले अछि। करू तसफिया।” सुनियौ झटकलाल मड़रकेँ गप्प। अपन बेटी केकरा संगे भागि गेलै। तकर पत्तो नै लगलै। अच्छा छोड़ू। गप्प सुनू। “यादि अछि ने मड़र। पुबरिया टोलपर चुनचुन पहिलुका स्त्री पहुँच गेलै- थाना। तुरतेमे पुलिस पहुँच गेलै- दरबज्जापर। वर आ वरक बापकेँ ततेक पीठपर डण्टा बरसौलकै जे छर-छर नुआ-बस्त्रे... की कहब आब तँ वैह पहिलुकी स्त्री महरानी बनि कऽ घरमे बैसल छै।” आब तँ औरतकेँ जमाना आबि गेलै। तैयो आकरो किछु दाबि-चापि कऽ तँ राखहि पड़तै। नै तँ ऊ सनकि कऽ किछाे बनि सकै छै। एकर मतलब गाए-भैंस जकाँ आेकरा डेंगा देबै। नै हिसाब-किताबसँ। साँपो मरि जाए आ लाठियो नै टूटै। अइठाम तँ मारैत-मारैत लाठी टूटि गेलै। अपना घरवालीकेँ नै राखै चाहै छै। जागेसरसँ पूछल जाए। किछु विशेष गप्प छै। आखिर, किएक नै राखए चाहै छै, अपना स्त्रीकेँ। कारण तँ दरपन जकाँ साफे छै। चारि सालसँ बेसी भऽ गेलै आ एकोटा बच्चा नै जनमा सकलै। यएह गप्प छै ने हौ जागेसर? हँ-हँ बात तँ यएह छै, असलमे। दोसर बिआह करबाक लेल पंचायतसँ औडर भेट जाए। दोसर अपाय तँ छै नै। आखिर खनदान आ सम्पतिक रखबार तँ चाही। गुँर कतौ आ भूर कतौ। ऐ बातक कारणे झगड़ा होइत छलै। आब बुझलौं तरका गप्प। ऐमे धर्मडीहीवालीक कोन कसूर? सभ कसूर ओकरे। जखन खेत खराब छै तँ.....। फेर चुप। एक आदमी तँ दस-दसटा बिआह करै छै। यएह, डाँरमे ने डोरा बहू करत जोड़ा। सार सभकेँ खाइले तँ जुमै नै छै। आ राजा जकाँ हजार गो रानी रखत। तूँ गारि देबही। मार सारकेँ। हँ बाजि नै सकै छेँ। आन गामसँ आबि कऽ रँगदारी। पंच छी की डकैत। हड़कंप मचि गेलै। सभ गोटे उठि कऽ ठाढ़ भऽ गेलै। किछु लोग सभकेँ शान्त कऽ रहल अछि। भाय एनामे काज नै चलतौ। पाँचटा पंच एकान्तमे विचार कर। ने तँ महाभारत भऽ जेतौ। देखियौ पंच भगवान, ऐ छौड़ाक किरदानी। सभटा हमर लताम तोड़ि लेलक। लिअ पंचक बेटा चोर। आब करू फैसला। अच्छा चुप रहू। एकर निरलय दोसर दिन हएत। यएह करै छै केना। जेना छोटका जातिक पंचैती भऽ रहल हुअए। अइसँ नीक तँ ओकरे सभ। इह, हमरा सभसँ बहुत नीचो जाति तँ अछि! तइसँ की। आखिर छी तँ शूद्रे। चुपू हमर छूबल सभ खाइत अछि। हँ हँ छुच्छे ठेसी। एकान्तमे विचारि कऽ पंच सभ आबि गेल। सुनल जाए। की कहै छै। “सुनू, जागेसरसँ गलती भेलै। ओकरा औरतियाकेँ एतेक नै पिटबाक चाही। बाल-बच्चा नै होइ छै तँ ओझा-गुणीसँ देखाबौ। डागदर वैदसँ इलाज कराबौ। तैयो नै हेतैक तँ दोसर बिआह कऽ सकैत अछि। किंतु धरमडीहीवालीकेँ राखहि पड़तै। निरणय सभकेँ मंजूर अछि?” हँ-हँ, दसक निरणय, भगवानक निरणय। मंजूर अछि। सभ मानि लिऔ। ढोढ़ाय गुरूजी सोचै छै भुस्सा मिलत की नै। खेलावन भगत मोंछ पिजा रहल अछि। गाममे भगत तँ हमहींटा छी। धर्मडीहीवालीक बाप कनहा मैनजनकेँ कहने छै। “जँ अहाँ ऐ सम्बन्धकेँ नै टूटए देबै तँ जोड़ा भरि धोती देब।” ओकर बामा आँखि फड़कि रहल छै। उचितवक्ता दौड़ल आएल आ बजल- “हे यौ धर्मडीहकेँ कन्हैया मैनजन! अहाँकेँ चौबटियापर पुलिस खोजि रहल अछि। कोनो मोकदमामे नाओं अछि की?” “आऍं।” मैनजन धोती सम्हारैत पड़ेलाह। एकाएकी सभ उठऽ लगल। डरक पंजा जेना बढ़ऽ लगल। सबहक अन्तरक दोख जेना ठाढ़ भऽ गेल हुअए। स्वर जेना हवामे अलोपित भऽ गेल हो किंतु पएरक गतिमे तीव्रता आबि गेल छलै। धोनाह भऽ गेल असमान दिस तकबाक केकरा फुरसति छै। ~ ६ स्वार्थक कारणे दुनू परानीमे झगड़ा भेनाय स्वभाविके अछि। झगड़ाक बाद देह आ मन अलग हेबे करतै। वएह सुआरथ फेर दुनूकेँ मिलन करबौतै। से बात साँचे किन्तु झूठे। जे हुए किन्तु झगड़ाक बाद मिलन एक तरहक नव संचार करैत छै, मोनमे। जेना लगैत रहै छै जे सभकिछो अभिनव भऽ गेल हुअए। दमित लीलसा सभ फन-फनाक ठाढ़ भऽ गेल हो। मनक फुलवाड़ीमे नव नव फूलक आगमन। भनभनाइत भ्रमर। आबि जाइ छै- अभिनव प्रीत! धर्मडीहीवाली आपस आबि गेल छै। जागेसर आब डरे किछो नै बजै छै। एक सए झंझटसँ एकेटा झंझट ठीक। ठीके कहै छलै उचितवक्ता- ‘मौगीसँ जे अराड़ि करबें तँ सभ नेबाबी भीतरी घोंसारि देतौ आ बोलती बन्न भऽ जेतौ। धर्मडीहीवालीपर भनभनियाँ भूत सवार भऽ गेल छै। जखैन-तखैन भनभनाइते रहै छै। कोन ठेकान छै। लोग कने हटिए कऽ ओकरासँ गप्प करैत अछि। धर्मडीहीवालीक मोनक बात के बूझत। जखैन ओ असगर होइत अछि तखैने ओकरा अगल-बगलमे सखी, सेहेली, भर-भौजाइ, अड़ोसी-पड़ोसी सभ ठाढ़ भऽ जाइत अछि। जहिना नैहरामे ठाढ़ होइत छलै, तहिना। ओकरा सभकेँ कियो नै देखै छलै। देखतै किएक। मोनक आँखिसँ देखै छलै मात्र धर्मडीहीवाली, आ गप्पो करै छलै। “गे िनरमला, सन्तान कोन भारी चीज छै। चाहनेसँ कोन चीज नै होइ छै। कने दिमाग लड़ा सभ कुछो ठीक भऽ जेतौ। देखै छी दिदियाकेँ। ओकरो सासुरमे एहिना झगड़ा होइत छलै। बेटा जनमैते रानी बनि गेलै।” “है शुरूमे तँ बहुतो हल्ला-फसाद भेलै। बदचलन छै। बेहया छै। किन्तु सभ किछो रसे-रसे दबि गेलै। के केकरा याइद रखै छै, कथी। फुरसैतमे दोसरोक गप्प मोन पड़ैत छै आ काजक बोझ जँ माथपर रहै तँ अपनो विषयमे बिसरि जाइत अछि।” “ई तँ एहेन दुनियाँ अछि। जे जखैन ढोल पिटैक हएत तखैन केकरो सुगबुगाइतो नै देखबै। आ जँ चुप्पी साधि लेबाक बखत हएत तँ बाघ जकाँ गर्जन करए लगत।” “के कथी बजै छै से बात छोड़ू। अपना विषयमे सोचू। अहाँकेँ बच्चा चाही। ओकरा जन्म दिअ पड़त। डागदर-वैद्य गहवर-भगत चाहे जतएसँ हुअए।” धर्मडीहीवाली हँसैत अछि भनभनाइत....। फेर तमसा जाइत अछि। डरे खोलि कऽ नै बजैत अछि किन्तु पतिकेँ देखते ओर मान घिरनासँ डुबकि जाइत अछि। कोनो काज मोन लगा कऽ नै करैत अछि। जेना उड़ी-बिड़ी लगले रहैत अछि। आब जागेसरो मनकेँ मारने रहैत अछि- डरे....। फेर ने पर-पंचैती बैस जाए। आ समाज थू-थू करए लगे। समए पाबि मुँह दाबि कऽ कखनहुँ काल कहि दैत अछि। “ओहि दिन खेलावन भगतसँ झगड़ि गेलिये। कहू तँ ओकरासँ फेर देखा दी। नै तँ महतो बाबा लग डाली लगबा दी। विसवास नै होइत अछि तँ डागदर-वैध जइठाम चलब ततहि चलू।” किन्तु धर्मडीहीवालीकेँ दिल-मोन तँ भरबे नै करै छै, ऐ गप्पसँ जेना। हरदम देहमे आगि लगले रहै छै। सुतैत-बैसैत बेचैन। सोचैत छै- जँ पति चाहैत अछि तँ आइ भगतसँ भेँट करबै। कौआ, मैना, बगरा सभ एकेठाम खेलाइत छलै। चिल्हौड़क छाँह देखते सभटा एकेबेर फड़फड़ा कऽ उड़ि गेलै, अासमान दिस....। खुला आकाशमे उड़ैत एक खुंडी मेघ। धर्मडीहीवालीक छाती धुकधुका उठल। नै जानि किएक....। ~ ७ सुनमसान बाधमे असगरे पीपरक गाछ। कोनो बटोहीकेँ छाँह देबाक लेल ठाढ़ छै। कतेको दिनसँ छै। किन्तु आइ उ गाछ नै छै जे पहिने रहए। ओइसँ की? गामक सीमानक निरलय तँ गाछे करतै। एकरे धोधहैरमे बैस कऽ प्रेत बोमियेतै आ डेरबुक लोक एक कोला हटि कऽ चकोना हैत पड़ैतै। बुधियार लोक सात बेर गोर लागि छाँहमे जिरेतै। कौआ जँ छेर दइ तँ तुरत्ते उठि कऽ चलि देतै। असगुन भेलौ भाग....। असगरमे फुनगी दिस तकबाक साहस केनाइ बुड़बक सबहक काज छिऐ। दूबज्जी गाड़ीक सीटी ऐ गाछ लग ठाेकले चलि अबै छै। अजय गाछक छाँहमे ठाढ़ भेल। तीन बरिसक बाद गाछकेँ देख रहल छै। ऐ बीचमे कहुना कॉलेजक पढ़ाइ पूरा केलक। बी.ए. पास केनाइ कोनो मामूली गप्प छिऐ! छाँहक बात मानि ओ रूखगर जगहपर भिनभिनाइत बैस गेल। सबचीज ओहिना छै। तैयो बदलि गेलै। बहुत दिन बितला बाद देखलहो चीज अनचिन्हार बुझाइ छै। झटकलाल मड़रकेँ लोक सभ झटकू मड़र कहै छै। कारण-कहैमे सुविधा आ झटकू मड़र कोनो तमसाह बेकतीयो नै छै, जे कोनो डर हेतै। झटकलाल मड़र मनमे बड़का-बड़का लीलसा पोसने छल। चाहे जे करए पड़ए। बेटाकेँ पढ़ेबै। अजय बेसी पढ़त तँ बड़का हाकिम बनत। बापोकेँ नाओं जाति-जवारमे चमकैत रहत। खरचा तँ दिऐ पड़तै। आखिर बड़का हाकिम। जते तेल देबै ततबे ने गाड़ी दौड़तै। नै छै रूपैया। की तकै छी? शीशोक गाछ बेच। नै भेलौ तँ बाँस बेच। बेसी पैसा लगतै। कोनो मूतनार-हगनार खेत बेच ले। की यौ मालिक? मालिक खेतक जड़सीमनबला रूपैया दैत टिटकारी मारने रहए- “बाप बनौरा पुत्त चौतार, तेकर बेटा नेड़हा फौदार। देखिहेँ बादमे बापकेँ सरवेन्ट ने कहौ।” “किछो करतह किन्तु पढ़ावह। पढ़लासँ बुइधगर मनुक्ख तँ बनबे करतह।” अजय सुनैत छल- कात-करोटसँ। किछ गप्प संगी –साथीयोसँ बुझि लैत छल। बीख-अमरीत पिबैत चलैत जिनगी! सभ आस तँ पूरे नै होइ छै। किछ बचलो रहै छै तँए ने जिनगीक दौड़ा-दौड़ी होइत रहै छै एक दोसरकेँ पछोड़ धेने दौड़ैत रहै छै। फेर नवका आश ठाढ़ भऽ जाइ छै। कते कुद-फान केलक-अजय। किन्तु मोन मोताबिक नौकरी नै भेट सकलै। ओने झटकलालक अभिलाषा! सोचै छै अजय- बाबूजीकेँ कतऽसँ पता चलतै जे अइठाम कोन-कोन खेल चलै छै। भ्रष्टाचार आ तिकड़म केहेन नाच नचै छै। केना उनटा छुरीसँ हलाल होइ छै- लोक। हमरा जातिमे तँ कोनो बड़का नेतो नै छै। एक आध जँ छै तँ ओहो झोरउगहा। फेर तरघुसका रूपैया कतएसँ एतै? ने पैरबी आ ने पैसा तँ सड़कपर टहल लगाउ। नौकरी-चाकरी नै भेल तँ पढ़लौं कथीले? जेना पीपरक धोधरिमे सँ कोइ पूछलक- “कतए जाइ छहक- अजय? गाम? गाममे के पूछतह तोरा? कोन काज करबहक तूँ? गमैया कोन काज हेतह तोरा बुत्ते? हर-कोदारि चला सकै छहक तँू? रौद-बसातमे रोपनी-कटनी कऽ सकै छहक? गामक विद्वानक बीच रहि सकबहक? ऐठाम केकरोसँ कोइ कम नै बुझै छै। लिखनाइ-पढ़नाइ भले नै जनैत छै किन्तु सभ छै- ज्ञानवान विद्वान। सबहक अपन-अपन विचार आ थ्योरी छै। लाठीक सहारासँ चलैबला साँढ़ जकाँ ढेकरैत अछि। जेकरा घरमे एक साँझक खरचा नै छै ओकरो गप्प करोड़पति जकाँ चलै छै।” अट्टहासक स्वर- “हा-हा-हा-हा, गाममे तूँ नै रहि सकबहक। मिस्टर अजय कुमार, तोरा सभ अजैया कहतह। बी.ए.क डिगरी हवामे उड़ि जेतह-फर-फर। ऐठाम शहरी ज्ञान तँ दूरक गप्प छै, तोहर कोनो बात कोइ नै सुनतह। ही-ही-ही।” अजय गरजैत बजल- “जरूर सुनतै। तँू चुप रह। हम समाजमे पसरल कुरीतकेँ हटेबाक कोशिश करबै। ऐठामक जड़ता आ जिदकेँ तोड़ए पड़तै। देशक अंग-अंगकेँ साफ आ स्वस्थ्य करए पड़तै। गाम-गाममे सुधार भेलासँ देशक सुधार हेतै। समाज बदलतै। नव समाज बनबए पड़तै। किछ लोककेँ बीड़ा-पान उठबए पड़तै।” अजय हाथ चमकबैत जोर-जोरसँ बजए लगल। शीला बड़ीकाल पहिनेसँ ओइठाम एकटा झोंइझमे नुकाएल अछि। ओ अजयकेँ हाथ-देह फड़कौने आ चिचिया कऽ असगरेमे बजनाइ देख रहल अछि। उ डेराएल सन सुरमे अजयकेँ टोकबाक प्रयास केलक। किन्तु अजय नै सुनलकै। ओकरा पक्का विश्वास भऽ गेलै जे गाछ परक प्रेत अजयकेँ गरसि लेलकै। वएह एकरा देहपर चढ़ि कऽ बजि रहल छै। ऐठाम तँ कोइ छेबो नै करए। केकरा कहतै। किछो जल्दी करए पड़तै। आगि-पानिसँ तँ भूतो-प्रेतो डेरा जाइ छै। मनमे विचार करैत अगल-बगल देखलक। लगीचेमे एकटा खत्ता छलै। खत्ताक कोरपर एकटा फूटल बालटी सेहो राखल छलै। शीलाकेँ तुरन्त फुरेलै। ओ बालटीमे पानि भरलक आ अजयकेँ माथापर उझैल देलकै। अजय चकोना हएत शीला दिस दौड़ल। “के छी? एना किएक केलौं। ठाढ़ रहूँ।” शीला उनटि कऽ भागलि। जेकरा देहपर भूत चढ़ल छै। से की करत, कोन ठेकान। अजय झपैट कऽ पाछूसँ शीलाकेँ पकड़लक। तैयो शीला छुटबाक प्रयास कऽ रहल छै। जमीन भीजल छलै पकड़-धकड़मे दुनू खसल। तरमे शीला ऊपरसँ अजय चढ़ल। मुँह देखते अजय चौंकैत बजल- “शीला, अहाँ छी। एना िकएक केलौं।” “अहाँ असगरेमे अड़-बड़ बजै छलौं। हमरा तँ बुझाएल जे अहाँपर प्रेत चढ़ि गेल अछि। आब बुझाइत अछि अहाँपर सँ उतरि कऽ हमरापर चढ़ि गेल अछि।” “तेकर मतलब हम प्रेत छी?” “अहाँ भूत-प्रेत नै चोर छी। तब ने हमरा मनक चोरि केलौं आ निपत्ता भऽ गेल छलौं। आबो देहपर सँ हटू ने।” “नै हटब।” “जल्दी हटू। नै तँ धकेल देब। देखै छिऐ कोइ आबि रहल छै।” दुनूक मन कतेक बरिस पाछू चलि गेल छलै से पता नै। जेना पछिला स्वर्गक सरोवर सोझा आबि गेल छलै। आ ओइमे दुनू संगे-संग जल-खेल करए लगल छलै। गाछ परक चिड़ै-चुनमुनी ओइ खेलकेँ देखैत चुन-चुन करैत ओकरा सभक आनन्दमे अपन उपस्थिति दरज कऽ रहल छलै। विरह आ प्रतीक्षाक कथा चलैत रहल। कतेक देरसँ पता नै। वर्तमान उपस्थिति भेल तँ अजय पूछलक- “अहाँ एमहर कतए आएल छलौं?” शीलाकेँ हँसी लागि गेल किन्तु ओकरा आँखिमे नोर भरल छलै। “हमर काका-काकी जहिया झगड़ा करैत छलै तहिया-तहिया अइठाम सुनहटमे आबि जाइत छलौं आ अहाँक बाट जोहैत रहैत छलौं। कतेक माससँ अहाँक इन्तजारी करैत समए काटै छलौं। जखन कोनो चिरइयो टा समाद नै दैत छलै तँ कानैत-कानैत आपस घर घुरि जाइत छलौं। आइ सगुनियाँ चिड़ैकेँ दरशन भाेरे भेल छलै। भेँट भऽ गेल।” “हम तँ सोचने रही जे अहाँक बियाहो भऽ गेल हेतै। कोरमे बच्चा खेलाइत हेतै। किन्तु आब बुझाइत अछि जे हमहूँ भाग्यशाली छी। शाइत दुनू गोटे एक दोसरक लेल बनल छी।” “धुर, बियाहक बात की करैत छी। हमर पितयौत बहिन लीलीयाक बियाह होइबला छै। की हेतै से नै जानि। जातिक सभटा लोक अरचन रोपै छै।” “अरचन किएक? ऐठाम लोक तँ बियाहकेँ यज्ञ बुझै छै तँए एक-दोसरक सहयोग करै छै।” “हँ से तँ ठीके। किन्तु हमर पलिवार तँ ढाठल छै। बागल छै। हमरा परिवारकेँ जातिसँ अलग कऽ देने छै।” अजय चौंकैत पूछलक- “जातिसँ अलग किएक कऽ देने छै?” मुड़ी झुकौने शीला मन्द स्वरे बजली- “बाबूजी केँ मरलापर काका सराध-गैतक भोज नै केलकै। कतऽसँ टका लाबितै। ओइ साल फसिल नीक नै उपजल छलै। सभ मुँह पुरूषकेँ कहलकै- जे हमरा घरमे कोनो उपाए नै छै। रोटीयो नै जुमै छै तँ भोज कतएसँ करब। किन्तु भोजक नाओंपर सभ जाति एक भऽ गेलै। ओ सभ कहलकै- अकलू मड़र दोसराक भोजमे बड़ फानैत छलै। जे भोज नै करए से दालि बड़ सुरकाए। ओकरा सराधक भोज लगबे करतै। जँ पूरा जातिकेँ भोज नै देतै तँ जातिसँ अलग। आगि-पानि सभ बन्न।” “भोजक एतेक महत्व छै अपना समाजमे।” “की कहब घरमाबाबूपर घर ढुक्का पंचैती हैत रहए। चट दऽ धरमाबाबू भोज गछि लेलकै आ कहलकै- “उ तँ झूठ-मूठ हमरापर आरोप लगबै छै।” भोजक नाओंपर सभ कुकरम माफ भऽ गेलै। अजय अबाक्! शीलाक मुँह दिस ताकि रहल अछि। मोनमे बिहाड़ि सन उठल छै। जेना ओकरा सौंसे देहमे जातिक जाल लटपटा रहल छै। “कोइ आबि रहल छै। अहाँ संगे देख लेत तँ की हेतै पता नै।” कहैत शीला धड़फड़ा कऽ उठल आ टोल दिस चलि देलक। वएह बाट छिऐ किन्तु लगै छै ऊ नै छिऐ। अजय अपना घर दिस बढ़ि रहल अछि। ओ स्वप्नमे छै कि यर्थाथमे पता नै। किन्तु गाम दोसर रँगक लगै छै। ओ लवका रँग ओकरा आँखिमे छै कि.....। ~ ८ ‘ठक-ठक-ठक’ गाछ कटि रहल छै। झमटगर आमक गाछ। कटबा रहल छै- झटकलाल मड़र। कुरहैड़क चोटसँ डारि-पात थर-थर काँपि रहल अछि। चिड़ई-चुनमुनी फड़फड़ा कऽ उड़ि रहल छै। जार-जार कानैत जेना कहि रहल छै-गाछ। “हौ, हमरा नै काटह। हमर कोनो दोख नै। हम तँ तोहर सहायक छीयह। मीठ-मीठ फल, पवित्तर हवा, शीतल छाँह दैतै रहए छी। बरखा बूनीमे हमर सहयोग देखते छी। तैयो हमर जान लऽ रहल छी। आह... हमरा बहैत खूनकेँ कियो नै देख रहल अछि- हौ......।” जल्लाद जकाँ दू गोटे चला रहल अछि-कुरहैड़। गाँजाक निसाँसँ दुनू आँखि लाल। घामसँ नहाएल। चाहै छै- जलदीसँ जल्दी गाछकेँ गिरा दी। मौतक निन्न सुता दी। किछु दूर हटि कऽ झटकलाल मड़र ठाढ़ अछि। जल्दी गाछ कटबाक आग्रह कऽ रहल छै। जेना गाछ नै कोनो भरिगर बोझ ओकरहि कपारपर लाधल छै। झटकलाल मड़रक छोटका बेटा अजय जेना गाछक करूण क्रन्दन सुनि लेलक। ओकरा पाएरमे तेजी आबि गेलै। “बाबूजी! आमक गाछ किएक कटबा रहल छिऐ?” झटकलाल मड़र घुरि कऽ देखलक आ कने गम्भीर होइत बजल- “ई अपन गाछ नै छी अजय। ऐपर जीबू बाबूक अधिकार छन्हि।” “जीबू बाबूकेँ?” “हँ, हुनके दक्षिणामे देल गेल छै। बरिसोपूर्व ताेहर दादाजी केँ श्राद्ध-कर्ममे आत्माक शांति आ मुक्तिक लेल। दान-दक्षिणामे देलाक बादसँ हम सिरिफ रखबारि करै छिऐ।” अजयक व्यंग्यसँ भरल स्वर निकललै- “आ आम पकलापर अहाँ घर पहुँचा दैत छिऐ- वाह..।” “हँ हौ। ब्राह्मण देवता छथि। हमरा ईमानदारीपर गाछ छोड़ने अछि। हुनके सबहक हाथमे तँ मुक्ति छै। ओ जँ हमरापर विश्वास करै छथि तँ हमरो कर्तव्य निमाहए पड़तै किने...।” “अहाँ बताह भऽ गेल छी बाबूजी। हम गाछ नै काटय देब।” “फेर, अहाँ पढ़ि-लिख कऽ की बजै छी। आगिसँ खेल करए चाहै छी। सराप दऽ देत तँ अगिला जनम तक पड़ि जाएत। जिनगीकेँ सफल करबाक लेल बहुत बात सहए पड़ै छै।” “गाछ केकरो। रखबारि कोइ आर करए। डरे फल दोसरठाम पहुँच जाए। अहाँ डेराएल छी। आन्हर छी।” झटकलाल मड़र तमसा गेल। “दू अछर अँग्रेजी पढ़ि लेलहक तँ हमरा आन्हर बुझै छहक। पात्रकेँ देल दान छिऐ। तेकरा हम बैमानी कऽ ली। अधरमी कहीं कऽ।” नै सुनने छहक- ‘जो जस करहि सो तस फल चाखा।’ “हँ, हँ बुझलौं। गाछक सेवा अहाँ करै छी। फलक रखबारि अहाँ करै छी। ओ फल खाइत अछि- जीबू झा। ई छिऐ कर्मक फल।” “हमरा फलक चिन्ता नै अछि। असलमे गाछ हमर नै छी। हुनका लकड़ीक जरूरत छन्हि। अपन गाछ कटबा कऽ लऽ जा रहल छथि। दान-दक्षिणामे देल गेल छन्हि तेकरा हम केना रोकि देबनि। एहन जुलुम हमरा बुत्ते नै हएत।” “बाबूजी, जुलुम तँ अहाँसँ भऽ रहल अछि। जीअत गाछकेँ काटनाइ पाप करम छिऐ। अपराध छी। पर्यावरण दूषित भऽ रहल छै। गाछ-बिरिछक अभावसँ प्रदूषण फैल रहल छै। अहाँ गन्दगी फैलाबैमे मदति कऽ रहल छिऐ।” “हम गन्दगी फैला रहल छिऐ की? अधरमी जकाँ बात तूँ करै छहक। पाप-पुण्यक गियान नै छह तोरा। तोरे सन लोकक संख्या जँ धरतीपर बढ़ि जेतै तँ ई धरती थरथर काँपए लगतै।” अजय अपन केश नोचैत धुनधुना कऽ बजल- “भैंसक आगाँ बीन बजेलासँ की फैदा। किन्तु गाछ तँ नै काटए देबनि।” फानि कऽ आगू गेल आ लपकि कऽ कुरहैड़ पकड़ैत बजल- “रूकि जा। गाछ नै काटि सकै छह।” कनेक दूरपर धर्मानन्द बाबू आ ढोढ़ाइ गुरूजी दू गोटेसँ गप्प कऽ रहल अछि। झटकलाल मड़र जोरसँ शोर पाड़ैत अछि- “यौ धर्मानन्द बाबू सभ गोटे एम्हर आउ। देखियौ हमर बेटा पागल जकाँ करैए। गाछ नै काटए दइए। कहू जे जीबूबाबूकेँ की जबाब देबनि। कोनो तरहेँ एकरा ऐठामसँ हटाउ।” धर्मानन्द लग आबैत बजल- “जीबूबाबू तँ हमरे दुआरिपर छथि। हमरे टाएर गाड़ीसँ हुनकर लकड़ी जेतै। बहलमानक खोजमे आएल छलौं। घोंचाय तँ गाड़ी चलबैमे माहिर छै। ओकरे ताकि रहल छी।” फेर फुसफुसाइत स्वरमे आगू बजल- “अहाँ तँ जानिते छिऐ मड़र। टाएरगाड़ी तँ घोंचायकेँ नाओंसँ उठल छलै। ऑफिसमे ओकरे नाओं दरज छै। ओइ दिन- हम तँ चलाकीसँ आनि लेलौं। संदेह होइत अछि आब। कहीं बुझि जाएत तँ गाड़ी घेर लेत।” झटकलाल मुड़ी झुलबैत कहलकै- “धुर, ओकरा केना मालूम पड़तै। मुरूख-चपाट छै। एम्हर जीबूबाबू अपना सबहक संग छथि। किछो नै हेतै। लेकिन पहिले हमरा ऐ झंझटसँ निकालू। अजयकेँ ऐठामसँ ठेल-ठालि कऽ हटाउ।” ढोंढ़ाय गुरूजीकेँ संगे आओर दू गोटे आबि गेल। झटकलाल मड़रक इशारा पाबि सभ गोटे एक्केबेर अजयकेँ पकड़ि लेलक। घिंचैत-ठेलियबैत ओइठामसँ दूर लऽ जेबाक प्रयास करए लगल। “अइठामसँ चलह। तूँ पढ़ूआ बाबू छहक। तोरा समाजक सभ गप्प नै बूझल छह। जीबूबाबू साधारण लोक नै छथि। पैघ पैरवीबला बेकती छथि। हमरा सभकेँ कतेक बेर नीक-अधलामे बचौने छथि।” अजय ओइठामसँ घुस कऽ नै चाहैत छै। विरोध कऽ रहल छै। ओकरा सबहक बन्धनमे छटपटा रहल अछि। किन्तु बन्धन ढील पड़ै तब ने। “कहै छी हम। हमरा छोड़ि दिअ। नै तँ बड्ड खराब बात भऽ जाएत। पाछू हमरा दोख नै देब।” झटकलाल मड़र ठेलैत कहलक- “चहल अजय चलह। काज नै रोकहक। सुनह- धरम करैत जँ हुए हािन, तैयो नै छोड़ी धरमक बानि।” अजय जालमे फँसल चिड़ै जकाँ फरफरा रहल अछि। जाल तोड़बाक बारम्बार प्रयास कऽ रहल अछि। असोथकित भेलापर देह थिर भऽ गेल। मुदा बुइध तेजीसँ दौड़ए लगल। घर-दुआरि-गाम-शहर-राज्य-देश आओर आगू दिस.....। ~ ९ धर्मडीहीवाली कतेक दिनसँ कोशिशमे लगल अछि किन्तु मौका हाथ नै लगै छै। ओकर विचार छै जे असगरमे सभटा बात खेलावन भगतकेँ साफ-साफ सुनाबी। परन्तु झार-फूँक करबैबलाकेँ कोनो अभाव छै। आ गप्प हाँकैबला तँ ओकरे लग बैसत। कखनो सुनहट नै। एेसँ पहिने महतो बाबाक स्थानमे डाली लगौने रहए। घोड़ा साफ-साफ कहि देलकै- “हम की करबौ। कोखि मारल छौ।” फेर दवाइ करबैक विचार भेल। नीक डाक्टर गाममे रहै नै छै। शहरक बड़का भारी डाक्टर लग जाएत तँ ओतेक रूपैया कतएसँ लाबत? संगे के जाएत? रहत कतए अनभुआर जगहपर? तैयो धर्मडीहीवाली निराश नै भेल छै। किछु दिनसँ खेलावन भगतपर ओकर विश्वास जेना बढ़ए लगलै। लचारीमे कतेक बेर विचारी करए पड़ै छै। हौ बाबू विश्वासे गुणे फल। आखिर दस-दस कोसक लोक आबै छै। फलित नै होइ छै तँ ओहिना? मरल-सुखाएल कोखि हरियर भऽ जाइत छै। जश-अपजश विधि हाथ। सोझेमे तँ छै-नररी बुढ़ियाक पुतोहू। ओझा-गुणी, डाक्टर-वैद्य, धाइम सभ नकारि देने रहए। खेलावन भगत दूटा सन्तान होइक वाक दऽ देलकै। समूचा धनुकटोलीकेँ ठकमुड़ी लगि गेलै। जहिया वचन पूरा भेलै। कहए भगता आ पूराबए देवता। ओना तँ ऐंठ खाइ छै आ झूठ बजै छै। सभ कुकरम देखते छी। नचारकेँ विचार की। दस गोटेक बात तँ मानहि पड़ै छै। चलतीमे तँ माटियो बिका जाइत छै। धर्मडीहीवालीकेँ तँ सोचि-विचारि कऽ काज करए पड़तै। जागेसर तँ ओइ दिन कहि देलकै- पंच सभ साल भरिक समए देने अछि। अहाँक मन-जेकरासँ इलाज कराबी। ओझा-गुणी, डागडर-वैद्य। हमरा दिससँ कोनो मनाही नै। सिरिफ टाका-पैसा पुरौनाइ हमर काज छी। पाछाँ हमर कोनो दोख नै। खेलावन भगत बेंतमे तेल लगा कऽ सुररि रहल छै। भगतकेँ सभ किछु अलगे टाइपक। बेंत लगै छै- साँप सन। अन्हारमे देख लेत तँ साँपे बुझेतै। आइ धर्मडीहीवालीकेँ मौका भेटलै। सुनहटमे सभ गप्प फरिछा कऽ कहि रहल छै। किन्तु भगतक मन जेना कतौ आर टहल-बुलि रहल छै। देह कतौ आ मन कतौ। आँखि जेना निशाँमे डुमल छै। धर्मडीहीवाली सोचैत अछि- एना किअए केने अछि- भगतजी। कहीं ओइ दिनका गप्प मन तँ ने पड़ि गेलै। झाड़ैत काल चमेटा जे लगल रहए। कहीं हमरापर तमसाएल तँ ने अछि। आब जे होए। बखत पड़लासँ........। धर्मडीहीवाली कने सुरकेँ तेज केलक। अपना दिस धियान खिंचबाक लेल तँ उपाए लगबए पड़तै। “भगत जी, हमरो दुख हरण कऽ लिअ। आब तँ हम कतौक नै रहबै। जँ बाल-बच्चा नै हेतै तँ सोतिन तरमे बास करए पड़तै। अहाँ तँ बुझिते छी- नदी तरक चास-आ सौतिन तरक बास।” “सौतिन ने कहै छै। बैरिन तरक बास।” टप्प दऽ बाजल भगत। “हम तँ मूरूख छी भगतजी। अहाँ तँ भगवान छिऐ। परोपट्टामे अहाँक जय-जयकार भऽ रहल अछि। कतेकोकेँ दुख हरण कऽ लेलिऐ। हमरो दुखसँ उबारू। खाली आँचारकेँ भरि दिअ। जँ हमरा संतान नै हेतै तँ हम बेसहारा भऽ जाएब। पएर पकड़ै छी भगत जी। कोनो उपाए करू।” निसाँस खिंचैत भगत बजल- “गुरू महराज कहने रहथिन- सुआरथ लागि करे सभ पीरीत।” धर्मडीहीवालीकेँ आँखिसँ भरभरा कऽ नोर खसि पड़ल। भगत जीक दिल पिघलि गेलै। ओकरा हाथकेँ अपना पएरपर सँ हटबैत कहलक- “घबरा नै। सभ कुछो हेतै। जे बाट देखाबै छिऔ। ओइपर चलए पड़तौ।” “बचा लिअ भगतजी। जीअत तँ जीअत, मुइलोमे सौतिन नै बकसै छै। मुइलोपर बिसाइत छै।” “तूँ तँ एक-तरफा सोचै छेँ। पुरूषोकेँ दूटा स्त्री भेलासँ ओहिना कठ होइ छै। तरघुसका तकलीफ होइ छै। तोरा तँ मालूमो नै हेतौ घोंचाय मड़रक भाइक खिस्सा।” “हमरा कतएसँ मालूम हेतै।” “आब तँ बेचारा दुनियाँसँ चलि गेलाह। चारि-पाँच साल पहिलुका गप्प छिऐ। सौतिनियाँ डाहक शिकार भऽ गेलै। दुनू स्त्री मिलि कऽ दशा बिगाड़ि देने रहए। देखैत छी आइयो दुनूटा साँढ़ जकाँ ढेकैर कऽ लड़ैत छै।” “की भेल रहै भगतजी?” धर्मडीहीवालीक आँखिमे उत्सुकता भरि गेल छै। खेलावन भगत पलथी मारि कऽ बैस गेल। दहिना जाँघपर राखल बेंत थरथरा रहल छै। मुँहसँ खिस्साक बखान चलि रहल छै। “घोंचाय मड़रक भाइक नाओं रहै- चिचाय। एकटा स्त्रीमे संतान नै भेलै। फेर दोसर केलक। ओहोमे संतान नै भेलै। दुनू औरतियामे राति-दिन हड़-हड़, खट-खट होइते रहए। चिचाय झगड़ा छोड़बैमे अपस्याँत। दुनू तरफसँ गाड़ि मारि सुनए पड़ैत। चिचाय लवकीकेँ बेसी मानैत। ओकरो संगे राति बिताबैत। पुरनकी कछ-मछ कऽ राति काटैत। सौतिनिया डाहसँ जरैत पुरनकी सोचलक।” किछु काल रूकि भगत आगू बजय लगल- “हँ, अमवस्याक राति रहए। खट-खट अन्हार। टिपिर-टिपिर बून चुबैत। हाथ-हाथ नै देख पड़ैत। लबकी जइ घरमे सुतैत रहए ओइ ओसरपर चिचाय दहिना पएर रखलक आकि बामा पएर पुरनकी पकड़ि लेलक। अन्हारक कारने चिचाय देख नै सकल। ओ डरे ‘आऊँ, आऊॅ’ करए लगल। लबकी दौग कऽ निकलल आ दहिना पएर पकड़ि लेलक। दुनू अपना-अपना दिस खिंचए लगल। अपना-अपना घर दिस लऽ जेबाक प्रयास। खैंच रहल छल। चिचायकेँ बुझि पड़लै जे दू फाँकमे चीर कऽ बँटि लेत। ओ बाप-बाप करैत चिचिया उठल। अड़ोसिया-पड़ोसिया जमा भेल। तखन ममिलाकेँ शान्त केलक। दूटा स्त्री केलाक फल एहनो होइत छै।” “भगतजी, तैयो मरदक जाति ऊपरे रहै छै। हमर नैया कोन विधि पार लगतै।” “तूँ चिन्ता नै कर। अबए दही उ शुभ घड़ी। उ पवितर राति।” खेलावन भगत बेंत उठा कऽ उपदेश दिअ लगल- “सात दिन पहिलेसँ अरबा-अरवाइन भोजन। दुनू बखत स्नान। मन देह शुद्ध। चौबटियापर पूजा-चक्कर। बाहर बजे रातिमे एकान्त जगहपर आबए पड़तौ। राह-बाटमे कोनो टोका-चाली नै। कियो देखै नै। निशिभाग रातिमे चौबटियापर स्नान-पूजा कबुला सभ करए पड़तौ। समैपर सभटा बात बुझा देबौ। भेंट करैत रहिहें। शरणमे आबि गेल छेँ तँ कल्याण भऽ जेतौ।” “धन्य हो भगतजी।” धर्मडीहीवाली उठि कऽ आंगन दिस चलि देलक। ओकर पएर स्थिर नै भऽ रहल छै। जेना निशाँसँ मातल हो तहिना ओकरा मनमे बुझाय छै। पता नै ई निशाँ सफलताक छिऐ वा असफलताक। ओकर पएरक गति तेज भऽ गेलै। तैयो गहबरक गन्ध ओकरा चारूभरसँ घेरने छै......। ~ १० राति जमुन भारी सन लगै छै। खट-खट अन्हार छै। एते लोक कतए जाइ छै हौ? गोपी मड़रक दुआरिपर बहुते टोलबैया जमा छै। ठाढ़ भेलहा सभ गप-सप कऽ रहल छै आ बैसलाहा सभ फुसराहटि। लोकक बीचमे गोपी मड़रक जेठका बेटा मनमा बैसल छै। बैसल नै छै बल्कि अधहा सूतल आ अधहा जगल छै। जेना निशाँमे मातल हुअए। ओंघराए कऽ खसै ले करैत छै किन्तु ओकर जुआन स्त्री पाछूसँ सम्हारने छै। ओकरा स्त्रीकेँ अपना देहक कोनो सोह-सुरता नै छै। फाटल वस्त्र रहलाक कारणे ओकर छाती कनेक उघाड़ छै। सबहक नजरि पहिने ओहि उघड़ल अंगसँ टकरा जाइ छै। आगूमे दू-तीन हाथ जगह खाली छै। जइठाम जरैत लालटेनक इजोत आ कुदैत-फानैत कीड़ा-फतिंगा। नीमक छोट-छोट ठारि आ पात राखल छै। खेलावन भगत अपना चेला-चपाटीक संगे झाड़-ॅफूंकमे लागल अछि। गरजि कऽ मंत्र जाप करैत नीमक ठाढ़िसँ बीखकेँ झाड़ि रहल अछि। “एगारह हाथ काय चल बरहम दोहाय चल सातो पुरा नाग चल हरो-हरो बिसंभरो दोहाय बिसहारा माताक छिअ।” गोपी मड़र अखने भुटाय वैद्यकेँ सोर पाड़ए गेलै। ओकर छोटका बेटा घनमा नीमक ठाढ़ि-डारि आ लगपाँचेक मॉंटि लाबैक लेल गेल छै। लोग आपसी फुसराहटि कऽ रहल अछि। पाछूसँ केकरो जोरगर स्वर आएल- “की भेल छलै हौ?” “दुनू परानी सूतल छलै। निन्न टूटलापर चिचिया कऽ कहलकै- हमरा किछु काटि लेलकौ। दौग कऽ आबैह जा।” “हँ, सुनैत छिऐ जे परिवारमे कमाउ पुत वएह टा छै।” “खेतपर सँ थाकल-ठेहिआएल। खेलाक बाद सुति रहलै। खाट, चौकी तँ घरमे नै छै। सिमसल जमीनपर सुतै छलै। साँप काटि लेने हेतै।” “हँ हौ, घरक दशा नै देखैत छहक। एक दिस कूड़ा-करकटक ढेरी तँ एकदिस जंगल-झाड़। कतौ साफ-सुथरा देखै छहक। एनामे मनुख रहतै।” “भुटाय वैद्य की कहै छै हौ?” “कहै छै- असगुन भऽ गेलौ। सुनै छी ने नढ़िया भूकि रहल छौ। जान लेबा बेमारी छौ एकरा।” ई सुनि मनमाक स्त्री जोर-जोरसँ कानय लगली। “फटृट चुप, कुलछनी। बाप-बाप चिचिया रहल छेँ। सतबरती रहितें तँ एना हेबे नै करितौ।” गोपी मड़रकेँ ठोर सुखि गेल छै। आँखिमे लोर नै छै तैयो गमछासँ पोछि रहल अछि। मनमाक स्त्री ठोह पाड़ि कऽ कानि रहल छै। गोपी मड़रक छोटका बेटा घनमाकेँ आब दुख बरदाइशसँ बाहर भऽ रहल छै। ओ चिचिया कऽ कहै छै- “हौ भैयाकेँ कहुना बचा दहक हौ सर-समाज।” मनमाक हालति निरन्तर बेसी खराब भेल जा रहल छै। आब ऊ घररए लगलै। “नै बचतै शाइत आब।” लोक लगही लाथे ससरि रहल अछि। िनसाँस छोड़ैत बजै छै- “लगै छै साँप नै कटलकै, काल डसि लेलकै।” “आँखियो नै तकै छै। साँस केना घुरघुराइ छै।” “बेचारी, भरल जुआनीमे विधवा भऽ जेतै।” “धुर, औरतियाकेँ कोन ठेकाना। तुरत्ते दोसर बियाह कऽ लेतै। बिपैत तँ गोपी मड़रकेँ पड़लै। बेचारेकेँ कमौआ पूत....।” खेलाबन भगतकेँ आँखि लाल भऽ गेलै जोरसँ गरजि कऽ बजै छै- “एहेन कठोर छइ जे सुनि नै रहल अछि। उत्तरसँ रास्ता खाली करै जा। महा डाकिनी मंत्र पढ़ए पड़तै।” “हे, हौ, हटै जा उत्तर भ्ारसँ। बाट खाली करै जा।” लोगमे सुगबुगाहटि होइ छै। एने-ओने हटि जाइ छै। “हे रौ, उत्तरसँ हटि जो। कोन ठेकान छै- देवी औतै की साँप।” मुदा उत्तरसँ हड़बड़ाइत अजय अबैत छै। किछ काल तँ ओकरा जानकारी लेबामे लगि जाइ छै। धनमा कानि-कानि सभटा गप्प कहै छै। सुनिते ओ तमसा जाइ छै आ चिचिया कऽ कहैत अछि- “किएक सभगोटे मिलि कऽ एकर जान लऽ रहल छहक। बहुत नाटक केलहक। बेचारा अन्तिम घड़ी गनि रहल छै। आबो मंतर-जापकेँ रोकह आ लऽ कऽ अस्पताल चलह।” सभ ओकरे दिस तकए लगल। रामखेलावनक आँखि तामसे ललिया गेलै। ओ फुफकारैत बजल- “आबि गेलौ बकटेट। हमरा डाकनि मंतरकेँ बीचेमे तोड़ि कऽ नाश कऽ देलकौ।” अखन अजय केकरो बात नै मानतै। जान जाइक सबाल छै। “ऐ भगतजी, एकरा जानक गारन्टी लेबै अहाँ? जँ ई मरि जेतै तँ अहाँकेँ गोपी मडरक बेटा आपस करए पड़त। अहाँकेँ अपनापर बिसवास अछि। अहाँ बचा लेबै।” भीतरे-भीतर खेलाबन भगत डगमगा गेल। किछु तँ बजए पड़तै। “ऊपरबलाकेँ यएह इच्छा हेतै तँ के रोकि सकैत छै। देवीक कृपासँ कतेकोकेँ ठीक केलिऐ। एकरो ठीक करबै।” “ई तँ मरल जा रहल छै आअोर अहाँ कहिया देवीक कृपासँ ठीक करबै। आ हमर दाबा अछि- जँ ई जीअत अस्पताल पहुँचि जाएत तँ ठीक भऽ जेतै। एहेन स्थितिमे कियो केकरो अस्पताल लऽ गेल हेबै तब ने बुझबै।” नकोर बनियाँ बीचेमे टपकल- “हँ भाय, जरटोलीमे हमरा बहनोइकेँ साँप कटने रहै। चिरा लगा कऽ ऊपर जौड़ीसँ बान्हि देलकै आ अस्पताल लऽ गेलै। दोसरे दिन ठीक भऽ आपस एलै। अस्पतालक बड़का डागदर भगवानोसँ बढ़ि कऽ छै।” अजय फटकारैत बजल- “मुँह की ताकै छहक। एकरा उठाबह आ चलह अस्पताल। ओझा-गुणीक चक्करमे जान चलि जेतह।” “लाबह खाट। टाँगि कऽ लऽ चलह। ने सड़क छै आ ने गाड़ी।” गोपी पड़रक छोटका बेटा दौग कऽ खाट लऽ अनलक। तामसे फाेंफिया कऽ खेलावन भगत उठल आ झटकि कऽ चलल। औंठा धोतीमे लगलाक कारणे धड़फड़ा गेल। बीचसँ स्वर आएल- “यौ भगतजी, ढेका खूलि गेल। सम्हाररू जल्दी।” खेलावन भगत तामसे थरथराइत बजल- “नासे काल विनासे बुद्धि। देवी माइक कारजमे अड़चन। सभ नास भऽ जेतौ।” ढेका पकड़ने फनकैत जा रहल अछि। सनसनाइत अधरतियाक समए। गामक चारूभर थाल-कादो आ पानिसँ भरल। एकोटा सड़क नै। खटोला उठा कऽ चलब आड़िये-धुरे सम्भव छै। कात-करोटक कटहा झाड़ टाँगमे लगैत छै। एक मील एहने कठिन बाट छै। हिम्मत बान्हि चारि-पाँचटा युवक खाट उठौने जा रहल छै। गोपी मड़रक बेटा खाटपर पड़ल छटपटा रहल छै। समए जतेक बितैत छै ततेक रोगीक हालति खराब भेल जा रहल छै। “हौ जल्दी चलह हौ।” “एहेन खराब रस्ता ऊपरसँ कनहापर एतेक भार। केना दौगबै हौ।” सड़कपर पहुँचबामे घंटा भरिक समए लगि जाइ छै। खाटकेँ एककातमे राखि सभ गोटे साँस खींचैत ठाढ़ भेल। गोपी मड़र लग जा अपना बेटाकेँ मुँह उघारि देखैत अछि। आ चिचिया उठैत अछि- “रौ बौआ, रौ मनमा उड़ि गेलौ रौ।” सभ खटोलाक चारूभर घेरि लेने अछि। अजय छूबि कऽ देखैत अछि। “वास्तवमे मरि गेल।” सभ एक दोसराक मुँह ताकि रहल अछि। “मरि गेलै आब की करबहक?” “आपस लऽ चलह। कपारमे यएह छलह।” गोपी मड़रक छोटका बेटा बपहारि काटि रहल अछि। कतेक गोटे आँखिक लोर गमछासँ पोछि रहल अछि। कालू मड़र कहैत अछि- “ठीके कहैत छलै खेलाबन भगत। घमण्ड देखे लहक। टूटि गेलह ने धमण्ड। सभटा खेला अजय लगेलकै। आब वएह जबाब दौ। गोपी मड़रक बेटा आपस कऽ दौ। बकटेटीक कारणे भगत कहि देलकै- नास भऽ जेतौ।” “हमरा सभ कतए जेबै? की करबै? झाड़-फूकक सिबा रस्ता कोन?” “अस्पताल निकटमे नै छै। सड़क एकोटा नै छै। गाड़ी-घोड़ा नै छै जे चढ़ि कऽ फर्रसँ उड़ि जो।” “हम तँ कहै छलौं जे रस्तेमे खतम भऽ जेतौ। मुदा हमर बात सुनए तब ने।” अजयक बोल नै फुटि रहल छै। आखिर केकरा की जबाब देतै। अधिक लोक कालू मड़रक समर्थन दऽ रहल छै। ओ सोचि रहल अछि- गामसँ केना अंधविश्वास, जड़ता आ जीद्दकेँ हटाओल जाएत। ज्ञान-विज्ञान बढ़ि कऽ कते आगू चलि गेल। गाम कतेक पाछू अछि। झाड़-फूक करैत-करैत मरि जइतै तँ कोनो गप्प नै मुदा बचबैक प्रयासमे मरि गेलै तँ आब देखि लियौ। दू घंटासँ झाड़-फूंक कऽ रहल छलै। जँ दू घंटा पहिले अस्पताल लऽ गेल रहितै तँ एकर जान बँचि जाइतै। आगू-आगू खटोला जा रहल अछि। आपस गाम दिस। पाछूमे अछि, गोपी पड़र आ ओकर छोटका बेटा। कानैत, धड़फराइत बढ़ैत। करूण क्रन्दण बढले जा रहल अछि। ओही मध्यमे अजय जेना घेरा गेल अछि। ~ ११ “दौग कऽ अबै जा हौऽऽऽ। देखहक हौ लोक सभ। हमरा अँगनामे ढेपा बरिस रहल छै। पछुआर दिससँ कतेक ढेपा फेँक रहल छै। दौगै जा हाे।” “गे माइ गे माइ। कोन उपद्रव शुरू भऽ गेलै गे। कोन देवी-देवता खिसिया गेलै हो देव। हौ समाज बचाबह हौ।” हल्ला–गुल्ला सुनि बहुते लोक दुआरिपर जमा भऽ गेल छै। देवीपुरवालीक मुँहपर डर नाचि रहल अछि। “की भेल?”- अड़ोसी-पड़ोसी पूछि रहल छै। “जान बचाबह हौ। पछुआर दिससँ ढेला बरिस रहल अछि, अँगनामे।” “अन्हार रातिमे पछुआरमे केना कऽ देखबै?” “फुलचनमा टाॅर्चक इजोतसँ देखही तँ के छी सरबा।” “हे, गारि नै देबाक चाही। किनसाइत देवी-देवताक ममिला हेतौ तँ धक्कापर चढ़ि जेबे। बुझि लही, एक्के बेरमे जय-सियाराम।” हिम्मतगरहा तीन-चारिटा छौड़ा आगू बढ़ल। चारूभर टाॅर्चक इजोत छिड़िया गेलै। “कहाँ छै कोइ हौ। नुका तँ नै रहलै।” “कोन ठेकान, कहीं भूत-प्रेरक ममिला ने होइ।” “भऽ सकै छै। देवीपुरवाली कोनो कबुला-पाती केने होइ आ पूरा नै केलाक कारणे देवी प्रकोप मचबैत होइ।” “देवीपुरवाली लालटेन नेस रहल छै। अँगनामे तँ ढेपाक ढेर लगल छै। एकर बेटे नै छै।” “धुर, उ तँ चौकपर ताड़ी पीब कऽ मतंग हेतै।” देवीपुरवालीक पुतोहु चमकी ओसारपर बैसल छै। बेचारी डरे थर-थर काँपि रहल छै। देवीपुरवाली िवधवा रहितो मरद जकाँ काज करैत छै। बेटाकेँ जन्मैते पति सदाक लेल संग छोड़ि देलकै। ओइ बेटाक भरोसे पहाड़ सन जीनगी काटि लेलकै। ओकर बेटा ‘नकचट्टा’ आब जुआन भेलै। ओइक संगे आसा जगलै जे एकटा कमौआ पुत भेल आब। किन्तु ओहो पियक्कड़ भऽ गेलै। काम करत तँ करिते रहि जाएत। कहीं ताड़ी पिबाक लेल गेल तँ कखैन आएत पता नै। सासु-पुतोहु मिलि कमा-खटा कऽ कहुना गुजर चला रहल अछि। “कही एकर पुतोहु चमकी डाइन तँ नै छै हो?” “नै-नै, ई बात झूठ छै। एतेक भोली-भाली औरत डाइन केना कऽ भऽ सकै छै।” “हँ, हँ, भोला-भाला चेहरा भीतर दिल बेइमान।” “हँ रौ भाय। तब ने जइ समैमे पहिलुक बेर आएल रहै। लबे-धबे रहै। टोलमे बड़का हो-हल्ला भेल रहै।” “हे रौ, ऊ जइ घरमे ठाढ़ होइ ने ठीक ओकरा कपारक सामने घरक छप्परमे आगि लगि जाए छलै। उतरबरिया घरमे जाय वएह बात। दक्षिणवरिया घरमे जाय फेर वएह बात। ई तँ चट दऽ लोक मुझा दैत छलै नै तँ पूरा घर जरि कऽ सुड्डाह भऽ जएतै।” “पसरतै केना कऽ। बान्हल आगि रहै ने। बुझिही, औरतियाकेँ देह नै रहै, आगिक भट्ठी रहै।” “तब तँ नकचट्टाकेँ सलाइ कीनबाक कोनो जरूरते नै।” सभ गोटे एक्केबेर खिसिया कऽ हँसए लगल। उन्मुक्त हास्य। “अरे तोरी कऽ, ई तँ असल अगिनदाइ छियौ रौ।” “फेर ई बेमारी ठीक केना भेलइ?” “वएह खेलावन भगत कतेक दिन तक झाड़ फूंक केलकै। तब अगिनदाइक देहसँ आगि कम भेलै।” “सुनने रही जे ओकरे लग गेलासँ ई खेला शुरू भेल रहै।” “हँ मथदुखी झड़ेबाक लेल खेलावन भगत लग लऽ कऽ गेल रहै। ओही दिनसँ ई अगिलगौना काण्ड हुअए लगलै।” “तब तँ कुल करामात खेलावने भगतक रहै।” पछुआर दिससँ अजय सोर पाड़लक- “दौग कऽ एने अबै जो। भूत पकड़ा गेलौ।” सभ एक्केबेर दौगल। बैगन गाछक झोंझसँ अलटरबाकेँ निकालैत अजय कहलकै- “एकरा पंचक पास लऽ चल।” “हँ हँ ठीके बात। घोंचाय अपना बेटाकेँ किअए नै सम्हारैत छै। राति-विराइत औनाइत रहै छै। रातिचर भूत जकाँ।” “लोककेँ डेरानाइ कोनो नीक गप्प होइ छै। कहीं आँखिमे ढेपा लगि जाय तँ फूटि जेतै।” “जन्मेले टासँ नै होइ छै, पतिपालो करए पड़ै छै। लऽ चल। पंचसभ निरलय करतै।” डेढ़हथ्थी कान्हपर लेने घोंचाय गरजैत देवीपुरवालीक दुआरिपर पहुँचलै। “हमरा बेटाकेँ पंचक पास लऽ जेनिहार के छी? ई छौड़ा अखने अँगनासँ खा-पी कऽ निकललै। मुतै लेल बाड़ीमे गेल छलै। ई केना कऽ ढेपा फेकतै? छै कोइ गबाह? देखलकै ढेपा फेकैत? अजैया दू अक्षर शहरसँ पढ़ि कऽ की आएल जे सभ जगह अपने कबिलगीरी। अोकरा अँगनामे कोनो देवी ढेपा फेकै छै आ नाओं लगबै छै, हमरा बेटाकेँ।” घोचायक स्त्री गारि पढ़ैत पाछूसँ अबै छै। “के निपूतरा हमरा बेटाकेँ पकड़ने अछि। कोनो चोरी-डकैती केलकै की। कोइढ़फुट्टा, छोड़ हमरा बेटाकेँ। ने तँ जे ने से कऽ देबै।” झमारि कऽ अपना बेटाकेँ छोड़ौलक। ओकर बाँहि पकड़ि घिचने घर दिस चलि पड़ैत अछि। पाछूसँ फनकैत घोंचाइ जा रहल अछि। “अखैन तँ बेकारक झगड़ा ठाढ़ भऽ जइतै। अजयकेँ कोन दुसमनी छलै, ओइ छौड़ाक संग।” “दुसमनी ओकरासँ नै छै। असल दुसमनी घोंचायसँ देवीपुरवालीकेँ छै।” उचितवक्ता बीचमे आबि कऽ बजए लगल- “बेटाक जन्म भेलापर अँगनासँ बहींगा फेकल जाइ छै। जे घरक ऊपरसँ दरबज्जापर गिरबाक चाही। फेर ओही बहींगामे बैरक झाड़ आ जूता लटका कऽ घरक आगू गाड़ल जाइ छै।” “घोंचायक संग की भेल रहै?” “घोंचायक बेटा भेल रहै ने तँ अँगनासँ बहींगा फेकने रहै। ओही समैमे देवीपुरवाली दुआरिपर ठाढ़ रहै। बहींगाक नोक ओकरा टांगमे गड़ि गेलै। पंचैती भेलै तँ घोंचायकेँ डण्ड-जरिमाना लगलै। ओही दिनसँ दुसमनी चलि रहल छै।” “कहीं ढेलफेक्का भूतकेँ घोंचाय भेजैत हेतौ।” “कुछो हौ। खेलाबन भगतकेँ पूजाक खरचा भेट जेतै। तब देवीपुरवालीकेँ कल्याण हेतै।” देवीपुरवालीक बेटा नकचट्टा ताड़ी पीब कऽ दुआरिपर आबि गेल छै। ओ निसाँमे गरजि रहल छै। “हमरा दुआरिपर एतेक लोक किएक जमा भेल छै हौ? बुझै छी, ऐ अौरतियाकेँ। सनकल जा रहल छै। हम घरपर नै रहै छी तँ छौड़ा सभकेँ सोर पाड़ि कऽ रसलीला करैत रहैत अछि। कहाँ छै हमर मोटका समाठ बला लाठी। आइ डाँड़ आ पीठी सरका देबै हम।” अगिनदाय डरसँ कोठी गोड़ा तरमे नुका रहल अछि। पता नै देहपर लाठी कतए-कतए गिरतै। रोइयाँ काँटो-काँट भऽ रहल छै। उचितवक्ता दुआरिपर सँ बिदा होइत बजल- “अजय भाय, चलह ऐठामसँ। नै तँ समाठसँ चूड़ा जकाँ कूटल जेबह।” सभ धड़फड़ा कऽ चलि पड़ैत अछि। अजय देखैत अछि। आसमानसँ चुगला गिरैत अछि। धरती दिस बढ़ैत इजोतक रेखा। चारूभरसँ अन्हार ओकरा दिस दौगल। छनेमे जेना ओकरा पकड़ि घोंटि लेलक। फेर आँखि अन्हारेमे अछि, इजोतक प्रतीक्षा करैत। ~ १३ जनीजाति सभ अँगनामे गाबि रहल अछि। “बाबा केँ अँगना मे लगनहि आएल पोती भेल डुमरी केँ फूल हे एहि बेर लगनमाँ फिराय दियौ बाबा सिखऽ छियै लूरि बेबहार यौ।” अकलू मड़रक बेटीकेँ बिआह हेतै। बरयाती आबि रहल छै। दुआरिकेँ कते चिक्कन-चुनमुन केने छै। लगै छै जेना चनन छिटका देने हो। ततेक इजोत चमकै छै जे अन्हार तँ जेना निपत्ता भऽ गेलै। दुआरि आ अँगनाकेँ सभ चीज दोसरे रँगक लगै छै। चमाचम। एककातमे भनसिया सभ अहरी चढ़ा देने छै। “पहिने भात नै, तीमन बनतै। पानि ला रे।” “भैया, एक चिलम गाजा हमरा घरबारीसँ मंगा दे तँ हम भरि राति खटबौ।” “चुप, दारू, गाजा पी कऽ भानस करता।नूनक बदलामे चीनी ढारि देबही। तब की हेतै?” किछु लोक भोजन-भात बना रहल अछि तँ किछु लोक बरयातीकेँ सूतए आ बैसए लेल बेवस्था कऽ रहल अछि। धीया-पुता सभ दलानक आगूमे खेल रहल छै। किछु नाँगट-उघार तँ किछुकेँ देहपर बस्तरो अछि। नाकमे नेटा, सुर-सुर करैत। “भैया मुतबै हौ।” “चुप सार, तोरा तुरत्ते मुतबास लगि गेलौ।” “तँ परसादी मँगा दे।” “भगवानक पूजा नै हेतै। एकरा अँगनामे बिआह हेतै।” “हे रे छौड़ा, ऐठाम लगही कऽ देलही।” बूढ़बा लाठी लऽ कऽ फटकारैत बजल- “भाग दुआरपर सँ। नीचा जा कऽ खेल।” अँगनामे गीत गौनिहारि सभ उपरौंझ कऽ रहल अछि। पहिने तँ एकोटा जनीजाति एबे नेे करै छलै। “जाितसँ अलग। ढाढल बान्हल छै- अकलू मड़र। ओकरा संगे के जाएत बन्धनमे पड़ैले।” अकलू मड़रक स्त्री बड्ड चलाकी जनै छै। टोलक मूलगनि घुघुरबत्तीकेँ पटिया लेलकै। “दाय हे, जेहने हमर बेटी तेहने तोहर बेटी। कोनो तरहेँ पार-घाट लगा दहक। दोसरा गामकसँ लोक सभ आबि रहल छै। अपना गामक इज्जतिक सबाल छै। अपना टोलक गप्प आन लोक किएक बुझतै। रहबै तँ एकेठाम।” केना कऽ मानतै औरतिया सभ। आखिर सुख-दुखमे एकसाथ रहैत आएल छै। “नदिया किनारे बाबा हौ किनकर बाजा बाजै, किनकासँ माँगे दहेज हौ, नदिया किनारे पाेती तोरे बाजा बाजै हमरासँ माँगे दहेज गे.......।” डिम-डिम-डिमिक। ढोलक आ पीपीहीक अवाज। “आरे तोरी कऽ बराती तँ गामक बगलमे पहुँचि गेलौं। जल्दी सभ प्रबन्ध कर रौ।” “इह, कोनो लाट साहेबकेँ बरयाती नै आबि रहल छै।” “सुनै छी, जे दू बीघा जमीन छै।” “दू बीघा जमीन छै आ सात भाँइ छै। फेर सातोकेँ दू-दूटाक धिया-पुता। अँगनामे बेदराक ढेरी लगल छै।” “सुनै छी, लड़िका घरक छप्पर बनबैमे तेज छै। लाड़-पुआर बत्तीक छप्पर। तँए खेतीक अलाबे किछ आमदनी भऽ जाइ छै।” “बुझलौं- घरमे फुइस-फाइस बाहरमे धक्का।” अँगनासँ गीतक अवाज- “सोनाक पिंजरा बना दऽ हौ बाबा, ओहि मे रहब नुकाय हौ। सोनाक पिंजरा बना देबो गे पोती पिंजरा सहित नेने जाय गे.....।” बुढ़बा सभ अपना पगड़ी आ धोतीकेँ ठीकसँ बान्हैत अछि। ढोल-पीपही आ स्पीकर जोर-जोरसँ बजए लगल। लोगमे हड़बड़ी मचि गेल छै। समाजक लोक दुआरिपर एकट्ठा भऽ रहल छै। “बरयाती आबि गेलै। चलै-चल सुआगतमे। खाना-पीना बादमे हेतै। सुआगतमे तिरोटी नै हेबाक चाही।” “हँ, ठीके गप्प। दोसरा गामक लोक, अरिजन-परिजन, कुटुम। ओकरा ढाठ बान्हसँ की मतलब।” “हँ हँ, आखिर हमरो धनुकटोलीक किछ शान छै।” “अरे तोरीकेँ, नाचक पाटी लौने अछि।” “हँ, लगही आ झाड़ासँ टोलकेँ महकौतौं।” “ई सार तँ नमरी लोफर छै। धियाने दोसरे तरफ।” उचितवक्ता मुड़ी डोलबैत बजल- “असल गप्प एहिना भकभका कऽ लगै छै। सावधान, नाच देखैते चिड़ै कोनो छौड़ा संगे उड़ि ने जाऊ।” “चुप्प, शैतान।” डेढ़ियापर जनीजातिक भीड़। वर देखबाक सबहक आँखिमे उत्सुकता। रंग-बिरंगक साड़ी-आँगी पहिरने। फूल सन फुलाएल मुख। चहकैत छौड़ा सभक दल। पैंट-शर्ट, लुँगी-कुरतामे सजल। बुढ़ सभ धोती-कुरता आ माथकेँ गमछासँ मुरेठा बन्हने। “पहिले पएर-हाथ धोबाक लेल जलक बेवस्था करह। पूछि लहक सभ बरियाती आबि गेलै।” “दुल्हा नै आएल छै?” “आरे बहींचो, बिना वरक बरियाती आबि गेलै हौ। बिआह केना हेतै?” “कहै छै- गामसँ संगे-संग चललौं। रास्तामे पछुआ गेल। पता नै कतए रहि गेलै।” “छुच्छै धुतहु फूकै छलै रे। बिना दुल्हेक घर-दुआरि। दुआरिपर आएल किएक? मार सार बरियाती सभकेँ।” “ऐमे बरियातीक कोन दोख?” “हे रौ ला तँ सटका। दोष-गुणकेँ फरिछाबै छथि।” “हे रौ, मनकेँ थिर करै जो। ठहर, एना नै करै जो।” बरियाती सकदम। जेना सबहक छातीमे डर ढुकि गेलै। सभ मुँह लटका लेलक। गप-सप्प बन्न। मने-मन सभ सोचि रहल अछि। कहीं भरि राति वर नै एतै तब की हेतै? एहने स्थितिमे बरियाती सभकेँ छौलका छोड़ेने रहै, ढेलपुरा गाममे। चलाक बरियाती धोतीकेँ डाँड़मे खोंसि रहल अछि। पछुआरक रस्तो भजिआ रहल अछि। रंगमे भंग। तमाकूल-बीड़ी सभ बन्न। अँगनामे गीतनादक बदलामे फुसराहटि शुरू भऽ गेल छै। “लीलाक भाग्ये खराप छै। कतेक मेहनति अकलू मड़र केलकै तब सभ चीजक इतजाम भेलै। दू बरिससँ बेचारेकेँ एड़ी खिआ गेलै तब जा कऽ बिआहक बात तँइ भेलै। आब देखियो...।” “छठी राति विधि लिखे लीलारा की संकट के मेटनहारा।” बात सुनि लीलाक कलेजामे जेना बरछी भोंका गेलै। ओ मुँहमे नुआ ठूसि कऽ कानि रहल अछि। लोकक मनमे शंका औना रहल अछि। कहीं लेन-देनमे कोनो गड़बड़ी तँ नै भेल छलै। अकलू मड़र छै-बड़ा मक्खीचूस। “तीमन-तरकारी बनेबै की नै?” “धुर, छोड़ि दियौ। की हेतै की नाइ।” उचितवक्ता केना चुप रहतै। “कानल कनियाँ रहिए गेल कानी कटाओल वर घुरिए गेल।” “मार सारकेँ रौ। बड़ लबर-लबर करै छौ। एने अकलू मड़रकेँ पाछूसँ निसाँस छूटि रहल छै। आ एकरा.....।” अकलू मड़रकेँ दोस-महिम, कर-कुटुम सम्बन्धी सभ बाध-वोन दिस खोजै लेल निकलि गेल छै। “हल्लो जे करबै से वरक नाओं जानबे नै करै छी।” स्टेजपर ढोलक-हरिमुनियाँ चुप्पे पड़ल अछि। नाच पाटीक लोक सभ चुपचाप बिड़ी पी रहल अछि। “हमरा सभ की करबै यौ? एहो लगन ने उधारे रहि जाए।” “चुप, ओने दोसर नाच भऽ रहल छै। तोहर नाच के देखतौ। बानर जकाँ कूदल घुमै छेँ तखैनसँ।” नाचक लेबरा चट दऽ बजल- “सभ तँ बानरेक सन्तान छी आ बानरे छी। हम छी लड़का बानर।” “हे, मुँहकेँ चुप राख नै तँ..।” “गौ बाबू आदति नै छौ। पेट फूलि जाएत।” अकलू मड़र सोचि रहल अछि- एक तँ जाति आगि-पानि बन्न कऽ देने अछि। जखैन कि हमर कोनो दोष नै छलए। भैया मरि गेल छलाह। घरमे कुछो नै रहए। ऊपरसँ अकालक तबाही। कतएसँ करितौं भोज? लोक कहलक खेत बेचि। कहए पड़ल- खेत बेचि लेबै तँ खेती कतए करबै? कतेक जमीने छै हमरा पास। दोसरकेँ दुख देखबाक फुरसति केकरा पास छै? सभकेँ तँ अपने दुख भारी छै। अपने सुआरथमे आन्हर। तैयो टेबैत, हथोड़ैत कहुना चलि रहल अछि। एक साँझ भोज-भात हेतै आ हमर सभ किछो बिका जेतै। लेकिन कहाँ कोइ सुनलक हमर गप्प। ओही दिन जातिसँ अलग कऽ देलक। कतेक मेहनति केलौं। केकरा-केकरा नै गोड़लग्गी केलौं। कोन-कोन जानवर लग ने माथ लगेलाैं। तब िबआहक गप्प निश्चित भेल। ओहोमे कोन दुसमनी लगि गेल से पता नै। वर बाटेमे बिला गेल। के की केलक से नै जानि। सभ तँ दुसमने अछि। वर नै आएत तँ हमर बेटी कुमारि रहि जाएत। दोसरठाम बिआहक गप्पो नै होएत। लोक सोचत लड़कीमे कोनो खराबी छै। बाप रे बाप, कोन उपाए हेतै। कतौ कऽ ने रहबै- हम। सभटा खरच-बरच बेकार चलि जेतै। फेर दोबारा कतए सँ एतेक टाका-पैसाक बनोबस करबै। अफवाह फैलत- बिआहमे कोन नाटक भऽ गेलै रौ। केकरो सोझामे केना जाएत। अकलू मड़र अन्हारेमे बैसि कऽ कानि रहल अछि। लोक सभ वरकेँ खोजि-खाजि कऽ आपस आबि रहल अछि। “कतौ नै भेटलै। बड़की सड़क तक कतौ नै छै।” “चारि-पाँचटा छौड़ा बौआ रहल छलै। लग जा कऽ पुछिते पड़ा गलै। गुँहे-मूते दौगैत अपने गाम दिस आएल।” सभ निसाँस छोड़ैत अछि। वरक काका चिचिआइत अछि- “आबि गेल। आबि गेल- दुल्हा। कतए रहि गेल छलही, तूँ सभ रौ।” हंस पलटि गेल-समधीक। सबहक आँखिमे उत्सुकता। शान्त पोखरिमे हलचल। लोकक देहमे जेना गति आबि गेलै। नाच-मंडलीक कलाकार फानि कऽ स्टेजपर चढ़ि गेलै। ढोलक-हरमुनियााकेँ जेना परान घूमि गेलै। औरत-सभ खखसि कऽ गला साफ कऽ रहल अछि। तरे-तर। “लीलाक माए जल्दी सभ किछो तैयार करू। चुमबैले। समए नै छै।” “चलू, पहिने लड़िका देखबै।” ग्रामीण सभ जमा भऽ गेल छै। “समधि कहाँ छै?” “समधीकेँ रतौनी भेल छै। कम सुझै छै।” “अहाँक बेटा कहाँ अछि? कानमे तँ लंगोटा बन्हने छै- सुनतै केना।” “हेयौ दुल्हा कतए छै?” बरियाती सभ चारूकात सँ घेरने अछि। बीचमे चारि-पाँचटा छौड़ा ठाढ़ अछि। ओकरा देहपर कछी-जंघिया मात्र अछि। उघारे देह-जाड़सँ सुटकौने। मुँह लटकौने। दुल्हाक काका हाथसँ इशारा करैत छै। “वएह छी वर। जेकरा देहपर ललका जँघियाटा अछि।” उचितवक्ता फेंफिया कऽ बजल- “अरे तोरी कऽ। हौ, ओइ गामक एहने रिवाज छै। नंगा भऽ कऽ एहिना उघारे बिआह होइ छै। नंगटा कहीं के....।” “सभ खचरपन्नी समधीक छी। दहेजबला सभटा टाका-पैसा अपना मौगीक पछुआरे राखि कऽ आएल अछि।” “हँ हौ, बेटाकेँ कछी-जंघिया पहिरा कऽ कुश्ती लड़बाक लेल ठाढ़ कएने अछि।” सभ ठिठिआ कऽ हँसल। हा.... हा.... हा.. ही... ही...। “हे रौ हमरा तँ लगै छौ, भैंस-गाए चरा कऽ बाधसँ एहिठाम चलि एलौ। देखहक तँ कपारमे एको बून तेल छै। बिआह हेतै, कोनो खेल नै हेतै। दसटा ग्रामीत देखतै।” “माथपर मौड़ कहाँ छै हौ?” “चुप रह, मौड़ की देखबहक। घौड़ देखहक। बेटाबलाकेँ संतोष रहै छै हौ। दैत रहक।” समधी तरे-तर तामसे फुलल अछि। बेटाक हालति देखि बजत की। अन्तमे घोंघिया कऽ बजल- “जखैनसँ दुआरिपर पएर रखलौं तखैनेसँ सभ ओल सन बोल बजि रहल अछि। आँत छुबौआ बात। जेना हमर कोनो परतिष्ठे नै। मनुखक बेवहार एहने होइ छै की? सभटा बकटेटिया आ लंठाधिराज जमा भऽ गेल अछि। बेसी तामस चढ़त तँ लड़िकाकेँ लऽ कऽ चलि जाएब। सबहक जेना मगजे उनटल छै।” कालू मड़र बीचमे आबि कऽ सम्हारैत अछि। “सभ बकटेटे जकाँ गप्प नै करहक। एकरा सबहक संगे की भेलै सेहो तँ बुझबहक।” समधी अपना बेटासँ पुछै छै- “की भेल रहौ बौआ?” दुल्हा ठोह पाड़ि कऽ कानए लगैत अछि। उचितवक्ता ठिठिआ कऽ हँसए लगल। “कनियाँ बिदागरी कालमे कानै छै। ई केहेन वर छै जे सासुर अबिते काल कानि रहल छै मौगी जकाँ।” “पहिने सुनि लहक गप्प।” “हमरा सभ टाएर-गाड़ीसँ आबि रहल छलौं। बाधमे सात-आठटा डकैत धेरि लेलक। जेबीसँ सभटा पैसा-कौड़ी छीन लेलक। टाँर्च तँ हाथ मोचाड़ि कऽ पहिने झपटि लेने रहए। दिल्लीसँ कमा कऽ घुमैत काल जे पंेट-शुट कीनने छलौं सेहो निकालि लेलक। हमरा सभकेँ ठाेंठकरिया दैत गाड़ीपर सँ खसा देलक। आ उ सभ टाएरपर चढ़ि बड़दकेँ हाँकि देलक।” “हम कहै छियौ, निश्चित मूतनमा डाकू हेतौं। आइ-काल्हिमे ऊ जेलसँ छुटल छै।” “आब लिअ, सुनियौ, सरकार केहेन छै। चोर-डकैतकेँ कतेक छूट दऽ देने छै। कतौ आएब-जाएब मोश्किल। सभ अपने कुरसी बचेबाक लेल परेशान। गरीबक तरफ धियान के देतै?” चोर-चहार निशंक भऽ कऽ साँझ-विहान लुट-पाट करै छै। घूसक टाका-पैसा गनैत-गनैत रक्षा करैबलाकेँ पलखति नै भेटै छै। की करतै, आदति पड़ल छै हौ। “हाय रे, अपने समांग दालि-भात।” “अच्छा आब ऊ बात छोड़ि दहक दुल्हाकेँ कपड़ा-वस्तर पहिराबह।” धड़फड़ीमे दोसराक धोती-कुरता वरकेँ पहिरा देल गेलै। देहक नापसँ कुरता नमहर छै। लड़िका बाबाजी जकाँ लगै छै। उचितवक्ता ऊपर-नीचा तकैत कहै छै- “हड़बड़ी बिआह कनपट्टी सिनुर।” “टाइम नै छै। विध-बेवहार शुरू करह।” फेरसँ सबहक मुँह हरिआ गेलै। गीत गनगना गेलै। ओने राजा सलहेसक नाच शुरू भऽ गेलै। “अरे तोरी के, देखहक, तालपर डान्सरकेँ नचैत। जेहने रूप तेहने नाच। आइ खूबे जमतै।” अखैनियो मनोरथ मड़र नमहर केश राखिते अछि। जुआनीमे लोक ओकरा नटुआ कहै छलै। बीचेमे टपकल- “अरे, ई की देखै छी। एक समैमे हमहूँ नामी डान्सर छलौं। धनिकाहा गाम नाच-पाटीमे गेल रहियौ। तीन दिनक साटा रहै। भोरेसँ बड़का घरक मलिकाइन सभ कहै- चाह हमरा घरपर बनतै तँ कोइ कहै जलखै हमरा घरपर। मन तँ हमर उड़ल फिरै। लकिन की करबै अपना घरक मोह.....।” नाच शरू भऽ गेल छै। राजा सलहेसकेँ रिझबैक लेल सती सेालहो सिंगार कऽ रहल छै। अँगनामे साईत सिनुरदान भऽ रहल छै। झोंकपर गीत कान तक आबि रहल छै। दुल्हा सिनुर लियौ हाथ, पान-सुपारीक साथ, दुलहिन उघारि लियौ माथ, सिनुर लए ले। दुल्हाक सिरपर शोभे मोर, दुलहिन सभदिन पूजत गोड़ दुलहिन उघारि लिऔ मांग, सिनुर लए ले। ग्रामीत सभ नाचक रसमे डुबकि गेल अछि। गामक झगड़ा-लड़ाइ आ सिनेह-परेमकेँ अजय देखि रहल अछि। ओ कखनो नाच लग जाइत अछि तँ कखनो कोनचरसँ आंगन दिसि हुलकी मारैत अछि। चारूभर छड़पटाएल घुड़ैत अछि। किन्तु शीलाक कोनो सुर-पता नै भेट रहल छै। अजय तकैत-तकैत अपस्यिांत। पछुआरमे केराक बड़का-बड़का गाछ लाेके जकाँ ठाढ़ छै। छोटका-छोटका झड़-झाँखुरमे भगजोगनी भुक-भुकाइते रहै छै। ओइ झाँखुरक अढ़मे माटिक ढिमका छै। वएह तँ बनल अछि, दुनूक परेम मिलन स्थल। ओइठाम दुनू गोटे सभ किछु मोन पाड़ैत अछि आ सभ किछु बिसरैत अछि। जहियासँ जोड़ लगैत गहुमन ओइ जगहपर मारल गेलै तहियासँ ओम्हर जेबाक साहस कमे लोक करै छै। अँगनामे शीलाकेँ कछमच्छी लगल छै। लोकक आँखिसँ बचि कऽ ओइ जगहपर जेबाक कोशिशमे लगल छै। परन्तु काजक अँगना अछि तँए कोइ ने कोइ ओकरा सोर पाड़ि लैत अछि। पछुआरमे अजयकेँ मच्छर काटि रहल छै। चोर जकाँ रगड़ि कऽ मच्छरकेँ मारैत अछि फेर विचारमे हरा जाइत अछि। शीला आइ दुलहिन जकाँ सजल छै। केना ने सजितै? ओकरा बहिनक बिआह भऽ रहल छै। छजन्ता छै। अजय आगूक खत्तामे देखैत अछि। पानिमे चान थरथराइत टहलि रहल अछि। चन्द्रमाँक बगलमे दोसर चानकेँ उगैत देखि चकोरकेँ चकविदोर लगैत अछि। “अन्हारमे चोर जकाँ के बैसल अछि?” “मोन आ दिलकेँ चोरबैबला चोर।” “हँ ठीके मक्खन चोर।” अजय आ शीला सहटि कऽ बैस गेल अछि। दुनू एक-दोसरसँ अर्थहीन गप्प कऽ रहल अछि। जइमे अर्थ भरल अछि। दुनू तेना कऽ सटि गेल जे लगैत अछि जेना गहुमन साँपक जोड़ी फेर जोड़ लगल। लोभ फाेंफिया उठल। हाथपर चढ़ि कऽ कामना ससरि रहल अछि। सुगन्धक स्वरूप बदलि गेल अछि। मुखक लाली चारूभर छिड़िया गेल छै। जेकरा ठोर समेटि रहल अछि। कामना आ परेमक डोरि बढ़ले जा रहल अछि। मन्द बसात सँ केराक गाछ हिलैत अछि। सुखदानक संगे पत्तापर सँ पानिक बून भरभरा कऽ गिरैत अछि। अँगनासँ कोहबर गीत आबि रहल अछि। कथी केर मड़बा कथी केरि कोहबर कथी-केरि लागल केबाड़, यौ बिनु बाँसक कोहबर सोने केरि मड़बा, रूपा केरि कोहबर हीरा-मोती लगल छै केबाड़, यौ बिनु बाँसक कोहबर। ~ १४ गामक चौबटिया। असलमे तीनबटियाकेँ सभगोटे चौबटिया नाओं राखि देलकै। दस गोटे जे कहलकै सएह साँच। गाए बाहलै तँ हँ। बड़द बाहलै तँ हँ। की करबै, गामक तँ एहने रूल छै। पीपरक गाछ तर अजय धिया-पुताकेँ पढ़ा रहल छै। ई गप्प कतेक दिन टोलबैयाकेँ कहलकै लेकिन कोइ धियान नै देलकै। केना कऽ धियान देतै, फुरसत हेतै तब ने। खेती-गिरहस्ती आ बीच-बीचमे सराध-बिआह आबि जाइ छै। फेर पावनि-ितहार। संगहि झगड़ा-लड़ाइ तँ सभ दिन होइते रहै छै। एक-दोसराक टाँग पकड़ि कऽ घिचैक तैयारी। दुसमनक काजमे बाधा नै देल हुए तँ सोझामे हवा जरूर छोडि देत। दुरगन्धे निकलतै। दोसराकेँ बढ़ैत देखि चुप रहब बड़ कठिन। एहन टोलपर अजय धिया-पुताकेँ पढ़ेबाक कोशिश कऽ रहल छै। लोकक दुआरिपर गप उड़ि रहल छै। “सरकारी नोकरी तँ भेटलै नै। आब चललै, गामकेँ सुधारै वास्ते।” “अपना जेना बड़ सुधरल। दोसरो धिया-पुताकेँ निकम्मा ने बना देलक तँ फेर कथीले।” “बकटेट भऽ गेलै। नै घरकेँ आ ने घाटकेँ। कहै छलै जे सभगोटे पैखाना कोठली बनाउ। रूपैया कतएसँ लबतै लोक।” “बकरी-गाए चरेतै तँ दू पाइक उन्नति करतै, धिया-पुता। जँ अजैयाक सभटा गुण सिखतै तँ समाजमे सभसँ लड़ैत रहतै।” किछु लोक सभ जगह अलग तरहक होइत छै। ओकर सबहक सोच भिन्न छलै। “धिया-पुता उच्चका जकाँ भरि दिन खेलाइते रहै छै। ऐठाम पढ़लासँ फ्रीमे दू अछरक बोध भऽ जेतै। अजैया केहनो छै तइसँ की। काज तँ नीके कऽ रहल छै।” “लोक सभ किछो कहौ हमरा सबहक धिया-पुता पढ़तै।” रसे-रस गाछ तरक स्कूल चलतै की, दौड़ए लगलै। आ ढोढ़ाइ गुरुजी तामसे भेर। दियादक संगे अकलू मड़रक पलिवार ढाठल छै। जाति आगि पानि बन्न कऽ देने छै। ओकर छौड़ा बीचेमे बैसि कऽ ककहारा पढ़ि रहल छै। अजय कनीकालक लेल कोनो चलि गेल छलै। ताबे छौड़ा सभ हड़-हड़ खट-खट शुरू कऽ देलकै। “हे रौ, तूँ तँ ढाठल-बान्हल छी। हमरा सबहक बीचमे किएक एलही।” “ई केकरो दुआरि थोड़बे छै। ऐठाम किअए ने एबै।” “नै रहए देबौ ऐठाम। भागि जो, नै तँ बापसँ भेँट करा देबौ।” “बापक नाओं लेबही।” “चटाक-फट्ट” “दुनू तरफसँ थप्पर-मुक्का शुरू भऽ गेलै। पेंट-गंजी फटि गेलै। ठोरसँ खून छड़-छड़ बहए लगलै। छौड़ा कनैत अँगना दिस भगलै।” अजय तेजीसँ पहुँचल। सभकेँ फटकारैत पाँितमे बैसौलक। ओकरा सबहक दिस तकलक। सभटा बनैया धिया-पुता सन लगैत अछि। हजारोक भविष्य अन्हार दिस जा रहल छै। बचेबाक प्रयासमे अपनो भविष्य अन्हारमे चलि जेतै। बलिदान तँ करए पड़तै। प्राप्त करबाक लेल किछु हरा जाएब स्वभाविके छै। अकलूक पितियौता भाय रामरती मड़र गरजैत आबि रहल छै। “ई झटकूक बेटा माहटर बनि गेलै। खूनियाँ माहटर। ठीके कहै छलै, ढोढाइ गुरुजी- हम तँ धान-चाउर लऽ कऽ पढ़बै छलौं। लेकिन अजैया खून लेत।” “की भेल मड़र?” “ई कालू मड़र, सार अपनाकेँ लाइट सहैब समझै छै। अपना धिया-पुताकेँ सनका देलकै। धरहा कुत्ता जकाँ लोककेँ काटनो फिड़ै छै। हमरा छौड़ाकेँ अंगा फाड़ि देलक। मारैत-मारैत खून बोकरा देलकै। ई बहींचो मैनजन छी आकि काल। ओकरे धिया-पुताकेँ आइ हम थकुचि देबै।” कालू मड़र ओमहरसँ अबैत छलै। गारि सुनिते गरजैत कहलकै- “ऐ रामरती, मुँह खाली नै कर। मरदक बेटा छेँ तँ हमर कोनो बेदराकेँ हाथ लगा कऽ देखही। ओहीठाम हाथ काटि देबौ।” कुत्ताक झुंड एक दोसरपर भूकए लगलै। धिया-पुता सभ किताब लऽ कऽ पड़ाएल। “भाग रौ खून खतरा हेतौ। दूनूक दियादवाद लाठी-भाला लऽ कऽ निकलि गेल छै। टोलमे हड़कम्प मचि गेलै।” मुँहपुरुख सभ बीच-बचाव कऽ रहल छै। “आपसमे किएक लड़ै छी। सबूर करू। शान्त रहू मड़र। गपकेँ नै बढ़ाउ।” ढोढाइ गुरुजीकेँ दाउ सुतरि गेलै। फेर क, ख, पढ़बैक बदला एक बोड़ा धान लेतै। कुदि कऽ आगाँ अबैत बजल- “सभटा नाटक अजैया कऽ रहल छै। झगड़ाक जड़ि।” दुनू पक्षकेँ लोक सभ ठेल-ठालि कऽ हटा देलकै। असगरे अजय गाछ तर ठाढ़ अछि। गाछसँ स्वर निकलि रहल छै- एकटा बीयासँ हमर जनम भेल। छोट-छीन बीआमे नुकाएल छलौं। बाहर एलापर हजारो बीया हमरासँ निकलि रहल अछि। एकसँ अनेक। हमरा छाँहमे कतेक जीव-जन्तु सुखक निसाँस लऽ रहल अछि। तैयो हमरेपर झटहा......। ~ १५ धनुषधारी मड़र टोलबैया सभकेँ जातिक गौरव-गाथा सुना रहल छै। “है यौ, जीबू झा हमरा छोटा जाति बुझैत अछि। हम सभ तँ मगधक धनुष धारण करए बला जाति छी। हमरा सबहक जातिमे की नै अछि। ऐ जातिक कतेको नेता देशकेँ स्वतंत्र केलक। आइयो मंडल नेता अपन अलग पहिचान बनौने अछि। जातिक देवता बाबाक स्थान मगहमे छै। सुनै छी जे महतो बाबा जीवान्तेमे समाधि लेने रहथि। तँए ऐबेरक एलेक्सनमे मंडल सभकेँ सोचबाक चाही जे केकरा जीतौलासँ हमर जाति आगाँ बढ़त।” “मड़र, जनौ आब निकालि लिअ।” “किअए यौ, हमर वंशज कोनो छोट अछि।” “धूर अहींक जातिक फुलचनमा एकटा नचनियाँ छौड़ी संगे भागि गेल।” “कहिया यौ?” “दस-पनरह दिन पहिने। बाप तँ दिल्लीमे कमाइ छै। सुनै नै छी- ओकर माए बोमिया रहल छै।” “चुप रह, एक-आध परशंेट सभ जगह एहिना होइ छै। तइसँ की लोक छोट भऽ जाइ छै।” ~ १६ “बाँन्हल जूड़ा खूबिये गेल, नयना नाेर चुबै हे ललना रे दरदेसँ मन भेल बियाकुल किनका जगाएब हे....।” स्त्रीगण गीत गाबि-गाबि धान रोपि रहल अछि। मरद सभ तँ पंजाब दिल्लीमे खटि रहल छै। औरत सभ काज नै करतै तँ खेती-पथारी नै हेतै। औरत सबहक खुशामद करए पड़त आब। गिरहत पाछूसँ कहैत छै- “पाँति सोझसँ लगा। बिराड़केँ पूरा गाड़ि दीहैक। हाथ तेजीसँ चला।” “चुप रह मौगा-गिरहत।” घुनघुनाइत स्वर। औरत सबहक धियान गीतपर छै। ओइ सूरपर हाथो चलि रहल छै। “पूर्वा जे बहै झलमल हे ननदि आब पछिया बहै मधुर हे ननदि भौजाइ मिलि पनिया लँ गेलै जमुनामे उठि गेलै बाढ़ि हे...।” “चुभ्- चुभ......।” कतारमे धानक बिराड़ माटिक सहारासँ ठाढ़ होइत! माटि-पानि-प्रकाश-बीआ-प्रगति- निरन्तर विकास! आड़िपर सँ एक गोटे हल्ला करैत छै- “झटक लाल मड़र स्वर्ग सिधारि गेलाह। दाह संस्कारमे शामिल हेबाक लेल हकार देल जा रहल अछि।” “करनी देखबै मरनी बेरमे।” “ले सभ काजपर बज्जर गिर पड़लौ। अखने मरबाक टेम छलै।” “रोपनी टाइममे तँ लोक लहाशोकेँ झाँपि दइ छै- औछाओन तरमे। की करबहक चलह-चहल।” ~ १७ कालू मड़रक दुआरिपर जातिक बैसकी भऽ रहल छै। “भोज तँ लोक अपना मनसँ करै छै। ऐ मे दोसर गोटे की कहतै।” “सुनै छी जे ऐ टोलपर केकरो पुरखा भोज केने रहै। कतेको सभा नोतल रहै। पहाड़ सन भातक गंज। ऐ पारसँ ओइ पार। किछु ने देखा पड़ै। आधा मील तलक लोक पाँतिमे बैसल रहए। जे धिया-पुता हरा गेलै से दू दिनपर भेटलै। रेलबे कातमे भोज भेल रहै। रेलक डरेबर, गार्ड उतरि गेलै। अंग्रेजीमे पुछए लगलै। लाेक पातपर दालि-भात देलकै। खुशी-खुशी खेलकै। ओइ समैमे सम्पति अपार रहै। दिल विशाल रहै। इलाकामे चरचा बहुत दिन तक होइत रहलै- हँ भैया धानुको जातिमे महाभोज चौड़ासी होइत छै। आब तँ फूटहा खा कऽ लोक जीबैत छै। कहाँ राजा भोज........।” “बजहक जागेसर कतेक गोटेेक भोज करबहक?” “हमर हालति तँ बड़ खराप अछि, तैयो हम जातिसँ बहार नै छी।” “हौ एकर बाप तँ लोककेँ खेत-पथार बेचा देलकै। एकरा केना छोड़ि देबै। अजैयाक टेरही अही बेर तोड़ि देबै।” “भोज नै देतै तँ जातिसँ अलग कऽ देबै।” कालू मड़रक धियान जागेसरक पचकट्ठबा खेतपर छै। टक लगौने छै कतेक दिनसँ। धरमानन्द बाबूक धियान जागेसरक चरका बड़दक जोड़ीपर छै। बेचहि पड़तै। जेतै कतए। “हँ, हँ रूपैया-पैसा भऽ जेतै। बहुत कमा कऽ रखने छै- झटकलल मड़र।” “समाजमे किछु हैसियत देखाबए पड़तै।” “हँ हौ बिना भोज केने स्वर्गक दुआरि केना खुलतै।” “अठगामा लोककेँ नोति दहक। आखिर ओकरे अरजल सभटा खेत छै।” अजय बीचमे आबि बजैत अछि। “दबाइक अभावमे हमर बाप मरैत रहए, तँ केकरा पासमे रूपैया नै रहै। पैंच, रीन कियो नै देलक। आइ सबहक लग रूपैया छै। हम बुझै छी राजनैति हम भोज नै करबै।” कहैत, जातिक बैसकीसँ उठि चलि देलक। “हे हे एना नै बजहक।” “आ रे तोरी कऽ सबहक मुँहमे टाटी लगा देलकै। ठीके छै। जहिया जातिक चोटपर चढ़तै तहिया बुझतै।” सब किछुसँ किछु बजैत तामसे गुम्हरैत चलि देलक। ~ १८ खेलावन भगत चौबटियापर चक्कर पूजि रहल छै। एकाश दिस तकलकै। लगलै जेना अधरतिया भऽ गेलै। ओना तँ साँझो-परात लोक एनए नै अबै छै तँ रातिक कोन गप्प। लोककेँ डर पैसल छै- जे सुनहटमे बाधक चौबटियापर मुँहरगड़ा प्रेत रहै छै। एक दिन उचितवक्ताक कक्का चोटपर चढ़ि गेल रहै। खून बोकरैत-बोकरैत आँखि उनटि गलै। के जानि-बूझि कऽ आगिपर टाँग राखत। “जानि बूझि नर करै ढिठाइ....।” किनकर मैया बाघिन जनमे। केकरा ओतेक हिम्मति छै जे एमहर एतै। खेलावन भगत पूरा निचेन अछि। ओकर आँखि अड़हूल फूल जकाँ लाले-लाल भऽ गेल छै। धोतीकेँ डाँरमे कसने अछि। चाकड़-चौरठ देह, नंग-धड़ंग। आगूमे सजावटिक संग पसरल अछि। अड़हूल फूल, अरबा चाउर सिनूर। एक कातमे मनुक्खक खोपड़ीक कंकाल, दाँत किचने। धधकैत आहूत। पाँतिमे जरैत दीप। धूमन आ घी जोरसँ झाेंकैत अछि। तँ आहूत धधकि उठैत अछि। निशिभाग अन्हरिया रातिमे धरमडीहीवालीक चेहरा चमकि उठैत छै। नमरह-नमहर खुगल केश। पैघ-पैघ आँखिमे नीनक छाँह। जेना निशाँमे मातल होइ। अधभिज्जू साड़ीसँ देहक किछु भाग झाँपल, किछु भाग उघाड़। बन्न होइत आँखि खेलावनक गर्जनसँ चौंकि उठैत अछि। “जय काली-वन्दी-जोगनी भद्रकाली-कपाली...।” आगूमे जरैत दीप दिश ताकए लगैत अछि। “ओने नै एमहर देख। धधकैत आगि दिश।” खेलावन गरजैत अछि- “जेना कहै छियौ तहिना करैत जो। हमरा औडरकेँ अवहेलना करबै तँ अलटरबाकेँ स्त्री जकाँ सौंसे देह आगि धधकि उठतौ।” धरमडीहीवालीक ठोर सुखा रहल छै। बजतै से सट्ठा नै छै। “नै यौ भगतजी। जहिना कहबै तहिना करबै।” “हँ, करैत जो। तइमे कल्याण छौ। जय काली।” ऊपर दिस तकैत चिचिया उठैत अछि। “गे छुलही गात छोड़ नै तँ जरा कऽ भसम कऽ देबौ।” भगत आँखि गुड़रि धरमडीहीवाली दिस तकैत अछि। “एमहर देख, हमरा दिस। मुँह किअए गाड़ने छेँ। कलशा कऽ जल उठा कऽ पी ले।” “आब हम नै पी सकब। हमरा बुत्ते नै हएत। घंटा भरिसँ तँ पीते छी- घोंटे-घोटे। गलामे जलन भऽ रहल अछि। देहम जेना आगि नेश देने अछि। निन्नसँ आँखि बन्न भऽ रहल अछि। लगै छै जेना आसमानमे उड़ि रहल छी। कहीं बेहोश भऽ जाएब तब।” “चुप छुलाही देखै छी- ब्रह्म पिशाचक देल बेंत। ऐसँ अखने....। मन साधि कऽ। पी ले। इलाज भऽ रहल छौ तँ राति भरि कष्ट हेबै करतौ।” डरे थर-थर कापैत धरमडीहीवाली कलशा उठा कऽ मुँहसँ लगा लेलक। साड़ी छातीपरसँ ससरि गेल। भगत जीक आँखि नाचए लगल। कामनाक चिल्हौड़ सुनहट पाबि गन-गना कऽ उड़ए लगल। स्पर्शक लेल हाथ आतुर भऽ गेल। मन बन्धन मुक्त भऽ बनमे बौआए गेलै। कलशाक बचल नीरसँ अपन पियास मेटबए लगल। श्राद्ध कर्म एक मास पहिने बीतलै। तहियासँ अजय गप्पकेँ भजिया रहल छै किन्तु कुछो पता नै लगि रहल अछि। ओकर भौजाइ कखनो जोगनी जकाँ प्रगट भऽ जाइ छै तँ कखनो भूत जकाँ अँगनासँ निप्पता भऽ जाइ छै। परसू शीलाक गपसँ ओकर माथा ठनकल जखैनसँ धर्मडीहीवाली आ भगतक खिस्सा ओ सुनलक तखैनसँ जेना ओकरा देहमे आगि नेश देलकै। “अरे तोरी के। पूरा टोलकेँ सुधारेबला ठीकेदारक घरेमे भोंकार। लाेक मने-मन कहैत हेतै- अपन घर-पलिबार सम्हरबे नै करै छै आ दोसराकेँ उपदेश देने घुड़ै छै। पर उपदेश कुशल...। अँगना लेल तँ अजय बेकूफ छै। पता नै खेलावन भगत की भरने छै दिमागमे।” साँझेसँ अजय अपना भौजाइक चमक-दमक देखि रहल छै। बिना कारणे टिटही नै लगै छै। अजय ओकरेपर नजरि गड़ौने छलै। किन्तु छनेमे छनाक। कखैन निपत्ता भऽ गेलै। अजय टाँर्च लेलक आ सभ घरमे इजोत घुमेलक। कहाँ छै कतौ। दुआरिपर ओकर भाय जागेसर खोंखिया रहल अछि। अजय सोझे दौगल- गहवर दिस। हाय रौ तोरी। भगत गहबरसँ पार भऽ गेल छै। कतए हेतै? शीला चौबटिया परक नाओं कहने रहै। घोड़ा जकाँ दौगल अजय। हकमैत चौबटियापर जूमि गेल। आगूमे देखैत अछि। खेलावन भगत धरमडीहीवालीक साड़ी खोलि रहल अछि। एहनो हालतिमे धरमडीहीवाली साड़ीकें भरि मुट्ठीसँ धेने अछि। चीरहरण सफल नै भऽ रहल अछि। अजय लपकि कऽ भगत जीक बेंत उठौलक आ तड़ा-तड़ि खेलावनक पीठपर बरसबए लगल। ऐ अप्रत्याशित आक्रमणक लेल भगत तैयार नै छल। ओकर दिमागक काज जेना बन्न भऽ गेल। तैयो पलटि कऽ गरजल- “के छेँ? आइ जरा कऽ तोरा राख कऽ देबौ। जय माँ काली.....।” अगिला शब्द ओकरा मुँहसँ नै निकलि सकल। फटा-फट बेंत ओकरा कपारेपर खसए लगल। छड़-छड़ा कऽ कपारसँ लहू बहए लगलै। माथ पकड़ने पड़ेबाक कोशिश केलक। धधकैत आहूत अजय ओकरा देहपर उझलि देलकै। “हौ बाप हौ। गे माइ गे।” डिरिया उठल। अजय पाछूसँ गरजल- “ठहर सार, आइ सभटा तंत्र-मंत्र तोरा पाछाँसँ भीतर ठूसि दै छियौ।” “हौ बाप आब मरि जेबइ हौ।” कहैत लंक लऽ कऽ भागल भगत। अजय किछु दूर रेबाड़लक। फेर आपस आबि धरमडीहीवालीकेँ सम्हारि कऽ उठौलक कहुना घिसियाबैत टोल दिस चलि देलक। ~ १९ सौंसे टोल खबरि गनगना रहल छै। कतेक गोटे अधरतियासँ जगले रहि गेल। कतेक गोटे अधरितियासँ जगले रहि गेल। डर केना नै हेतै? सौंसे टोल निशिभाग रातिमे भूत कहरै छलै। कुहरौआ भूत। डिबिया नेस कऽ लोक समए कटलक। गाममे कोनो बिजली बड़ै छै। डरे अन्हारमे कतेक लोक अँगनेमे लगही केलक। कथाी छी कोन ठेकान। कहीं ऊपरेसँ झपटि लेत तँ जुलुम भऽ जाएत। राति-बिराइत के केकरा देखै छै। सभ दूरेसँ ‘हो-लगऽ-लगऽ’ करत। किछु हिम्मतगर छौड़ा सभ भिनसरबेमे बाहर निकलि गेल। टोह लऽ रहल अछि जे कुहरैक स्वर कोन दिससँ आबि रहल अछि। सबहक अनुमान अछि जे अकलू मड़रक पछुआर चोटाह छै, जइठाम जोड़ लगैत गहुमन मारल गेल, आही झँखुरा दिससँ अबाज अबैत छलै। अखनी अन्हार पूरा फरीच्छ नै भेल छै। ओम्हर जेबामे साँप-कीड़ाक सेहो एकटा डर। तँए सभ गोटे अकलू मड़र घरसँ पूरब तीन बटियापर ठाढ़ अछि। पछुआरक ऊ जमीन शाइत परती अछि। तब ने कोइ नै जोत-कोड़ करैत छै। धुर, हमरा तँ बुझाइत अछि जे केकरो डीह-घराड़ी पहिने छलै। हे रौ, धरमानन्द बाबू पोखरि दिससँ आबि रहल छै। ओकरेसँ पूछल जाए। हे यौ, अकलू मड़रक पछुआरबला जमीन किएक परती जकाँ पड़ल रहै छै? धरमानन्द बाबूक पएर ठमकल। छौड़ा सभ दिस तकैत बजल- “बूझल नै छह- जोतबैया बिना खेतबा पड़ल परती। दुखन आ शान्ति मड़र दूनू भाँइक घराड़ीबला अछि ऊ जमीन।” “ओ सभ कतए चलि गेलै?” “दुखन मड़र बड्ड झगरौआ रहै। झगड़ाबला जमीन खोजि-खोजि कऽ कीनैत छलै। माने झगड़ा खरीदै छलै। एकबेर पछबरिया टोलक बरियासँ पल्ला पड़ि गेलै। ओ सात भाइक भैयारी। धिया-पुता हर-हाकिम। तेहेनकेँ चपाठलकै जे सभ सेर-सम्पति बिका गेलै। शान्ति मड़रसँ झगड़ा करैले कहै। मगर शान्ति मड़र किअए जाएत। मोकदमामे आधा खरचा मँगै ओ नै दैत छलै। दुखन एक दिन ओकरो कान-कपाड़ फोड़ि देलकै। बेचारे शान्ति मड़र अपन हिस्सा किछु बेचलक किछु छोड़ि-छाड़ि कऽ शहर भागि गेल। सुनै छी जे ओकर बेटा सभ बड़का-बड़का हाकिम बनि गेल अछि।” “आ दुखन मड़र कतए गेलै?” “जब रहै धन वित्त नित अबै रे पहुनमा, आब दोस-बोन छोड़लक दुआर।” खेत-पथार बिका गेलै। सेर सम्पति सभ नाश भऽ गेलै। अन्न पानिक अभाव। धिया-पुता बिलटि गेलै। अनटूटू धिया-पुता दबाइ-दारूक अभावमे मरि गेलै। हौ बाप डुबै छी। हौ बौआ हाथ-पएर चलाबह। एने तँ करम भेल रहै बाम। हौ, आब की कहेबह। शान्ति मड़र जखनि मरलै तँ कफनक कपड़ा आ अछियाक लकड़ी सभ चंदा मांगि कऽ पुराओल गेलै। ओहि दिनसँ ओकर डीह-घराड़ी परती बनल छै। वंशक एकमात्र टीका पंजाबमे बसल छै।” “हौ, पछुआरमे कही शान्ति मड़र प्रेत बनि कऽ नै बैसल छै।” “धुर, ई बहुत पहिलुका गप्प अछि। चलू आब फरीच्छ भऽ गेलै। किछु छै आकि सभ निपत्ता भऽ गेलै। देखबो करबै।” डराइत-धकमकाइत सभ पछुआरमे पहुँचि गेल अछि। “कहाँ छै कतौ किछो। हवामे बिला गेलै साइत। रौ टाँग बचा कऽ रखिहेँ। कहीं साँप-ताँप हेतौ।” “रौ, बिचला झँखुड़ा बड्ड हिलै छौ।” “रौ बहिं, हइया रौ करिया प्रेत। मरि कऽ पड़ल छौ।” “भाग रौ जल्दी।” “ठहर, हमरा ठीकसँ देखि लिअ दे।” “नाँगटे छै। धोती तँ कटहा झाड़मे फँसल छै। रहतै नै उघारे।” “हौ बाप ई तँ खेलावन भगत अछि। हौ, दौड़ै जा। देखहक कोन हाल भेल छै। मारैत-मारैत हगा-मूता देने छै।” “पानि ला रे। छींट मुँहपर। पूरा होशमे नै छौ। भुट वैदकेँ सोर पार।” स्त्री-पुरूष ढेर लगल जा रहल छै। औरतिया सभ नाँगट देह देखते नाक नुआँसँ मुनैत पड़ाइत अछि। “मारह मुँह धाय कऽ। हे रौ मुँहझौंसा सभ, पहिने आकरा बस्तरसँ झाँपि देबही, से नै।” “किअए भौजी ऐ सँ पहिने ई चीज नै देखने रही अहाँ?” औरतिया सभ गारि पढ़ैत पाछाँ घुसकल जा रहल अछि। “हौ सौंसे देहकेँ झड़का देने छै। पीठीपर लाठीक चेन्ह छै।” “होशमे आबि गेलै। की भेल भगतजी?” कुहरैत बजए लगल। “हौ, असल चंडालिन जोगनीसँ युद्ध भऽ गेल छल। ओहने कसगर भूतक सेना छलै- ओकरा सँगे। कहुना राति भरि लड़ैत-लड़ैत गामकेँ बचेलौं। हमर दशा तँ देखिते छहक। तोरा सभकेँ बचाबै खातिर.....।” “आ रौ तोरी के, इएह छलै कुहरैबला प्रेत। गौआँ-घरूआ तँ उल्टे एकरे मारितै, अन्हरिया रातिमे। लुक्का लऽ कऽ झड़काबैत।” “हे यौ भगत, अइठाम केना पहुँचलौं?” “सभटा भूत, जोगनी, देवीकेँ मारि कऽ भगा देलिएक। आपस होइत काल बेहोश भऽ कऽ गिर पड़लौं। ऐ टोलक लेल तँ हम अपन जान अरपन कऽ देलिऐक। आब जाने समाज।” “धनि छी अहाँ भगतजी। टोलक लोक अहाँक सँग अछि अहाँक लेल तैयार अछि सभ जी-जानसँ।” “देखहक हौ, धरमडीहीवालीकेँ लोक सभ टाँगने जा रहल छै। अजय पाछाँसँ दौगल जा रहल छै।” “सुनै छी अस्पताल जा रहल छै। पुछलाक बादो किछु नै बजै छै अजय।” “बजतै कतएसँ। गप्पे हेतै ओहने। जे बजलासँ......।” अजयकेँ नाम सुनिते खेलावन भगत टन-टना कऽ ठाढ़ भऽ गेल। पछिम दिस चलि देलक। “हे यौ भगतजी, अहाँ कतए जाइ छी। अहाँक तबीयत बड्ड खराब अछि। चलू गहवर घर पहुँचा दैत छी।” “नै, हम आब नै ठाढ़ रहब। हम जा रहल छी। हमरा बहुत दूर जेबाक अछि। गुरुसँ भेँट करबाक अछि। वएह हमरा जान बचा सकैत अछि। नै तँ रातिमे की हएत से पता नै।” “हे यौ सुनू भगतजी, कनीकाल मोन मारि सुस्ता लिअ।” “नै-नै आब नै रोकू हमरा। जुलुम भऽ जेतै।” दुलकी मारैत पछिम दिस चलि देलक। टाँगमे जेना पाँखि लगि गेल हुअए। अा तहिना लोगोक मनमे जेना पाँखि लगि गेल हुअए। “रौ, रातिमे सबेरे घरक भीतर बिछौन पकड़ि लीहेँ। साँझे लगही झाड़ि कऽ कऽ लीहेँ।” “चोर-छीनारकेँ खौब सुतरतै।” मरद भऽ कऽ मौगी जकाँ किएक गप्प करै छी। चल, अपन-अपना डेढ़हथ्थी पिजा। रोइयाँ नै भगन हेतै केकरो।” ईह, बड़-बड़ घोड़ी भाँसल जाए, छोट घोड़ी कहए कहाँ छै पानि। भोरका सुरुज उगि आएल अछि। पत्तापर सँ ओसक बून चाटि रहल अछि। बसातक ठण्ढीसँ देह सिहरि रहल अछि। चिड़ै-चुनमुनी अहारक खोजमे चलि देने अछि। पानिक जीव सभ पोखरिमे हलचल शुरू कऽ देने अछि जेना। गिरहतक स्वरकेँ संगे बड़दक घण्टी बाजि रहल अछि। टोलसँ ऊपर धुइयाँ उड़ि रहल अछि। सूतल प्रकृति जेना शनै: शनै: जागि रहल अछि। किन्तु ऐ टोलबैयाक माथपर शंका आ डरक छाँह पसरल जा रहल अछि। ~ २० कालू मड़रकेँ अँगनासँ दुआरि धरि लोक सभ सह-सह कऽ रहल अछि। किछु लोक गप्प हाँकि रहल अछि। गीत-नाद भऽ रहल छै। “कालू मड़रकेँ अँगनामे होम होइ छै- जाप होइ छै हाेमक धुइयाँ अकास उड़ि जाइ छै।” अँगनामे औरतिया सभ गीत गाबि रहल अछि। घरमे हवन कुंड जरि रहल छै। होम-जाप भऽ रहल छै। केना नै हेतै। घरपर गिद्ध बैसि गेल रहै। अशुद्ध आ अपवित्तर घरमे केना रहितै। धड़फड़ीमे एकबेर भुटाय वैद्यक घरमे साँप मरबाक लेल छोट जाति ढूकि गेल रहै। ओकरो शुद्ध करबए पड़ल रहै। ई तँ साफ-साफ घरपर गिद्ध बैसल रहै। भारी अपावन। मरल गाए-मालक सड़ल मासु खाइबला गिद्ध। पण्डितजी कतेको परकारक लकड़ी मँगोने छै। घी, धुमन, जअ-तिल, मधु सेहो सभ। होमक धुइयाँ जतए-ततए जेतै। सभ शुद्ध भऽ जेतै। होमक बाद टोलबैयाकेँ भोज-भात देल जेतै। देखै छहक ने चूल्हा पजारि देने छै। तीमन-तरकारी कटबा रहल छै। हौ, ई तँ बिना मतलबक खरच भऽ रहल छै ने। आखिर कौआ-पंछीक जखैन डेन दुखा जेतै तँ ओ गाछपर नै तँ चारपर बैसबे करतै। गाछ तँ आब बड़का-बड़का छेबो नै करै। हे रौ, कौआ-पंछी आ गिद्धमे फरक छै ने। सुनने नै छी गिद्ध मारि गिद्ध करे अधारा.....। की यौ साहेब। ओना तँ गिद्धोक संख्या घटि गेलै आब। धुर छोड़ह, आदमकद भेलासँ आदमी थोड़े भऽ जाए छै। हँ हँ, तूँ सभ मनुक्ख छहक। और सभ तँ बानरे छै। ओइमे परिवर्त्तन हेबाक चाही। कतएसँ बीचेमे भगतिया सभ आबि गेलै हौ? मैयाक डाली उठि गलै शाइत। केकरो सपन देने हेतै। हँ हौ, देखै छहक ने सभसँ आगू। डालीमे माइ सजल छै। तेकरा पाछू भगत बेंतसँ इशारा करैत वाक् दऽ रहल छै। सभसँ पाछूमे भगतिया सभ भगति गाबि रहल छै। ......चकमक-चकमक करैत कहमाँसँ एलै हे मैया......। जेहने झालि बजौनिहार तेहने मिरदंगिया। सुनहक की कहै छै- भगत। सुनु हे दाइ-माइ सकले-समाज। हमरा सपन देलक माइ। जे हम सिलौट-लोढ़ीमे परगट भऽ रहल छिऔ। कोइ मसाला पिस कऽ नै खो। पनरह दिनक बाद सभ अपना देव-पित्तर लग माथ लगाबिहेँ। पूजा-पाठ केलाक बादे मसाला पिस कऽ खा सकैत छहक। दस गामसँ माँगि-चाँगि कऽ पूजा-पाठ कएल जेतै। तब देवी माइ खुश हेती। आब सौंसे टोलसँ चाउर आ रूपैया माँगि कऽ भगत लग जमा करहक। परसाल हल्ला भेल रहै जे औरतिया सभ अपना-अपना नैहरासँ लबका साड़ी, चूड़ी पहिरि कऽ सासुर एतै। आ सासुरमे घीसँ भरि राति दीप जरौतै। तब ने साड़ी, चूड़ीक दोकानदार सभ मालो-माल भेलाह। फेर ऐबेर कोनो मसाला कम्पनीबला नाटक केने हेतै। हौ, शिक्षित नै बनबहक। आर्थिक सुधार नै करबहक। तँ ऐ अन्हरजालीसँ बचबो नै करबहक। चारूभर तँ अन्हरेसँ घेरल छहक। ओ हो देवी-देवताकेँ तँ निरमान लोके ने केलकै। दोख केकर? ई अजय एक नम्बरकेँ बकटेट अछि। जेकर धिया-पुता एकरा लग बैसतै सभ बकटेट भऽ जेतै। हम तँ अपना छौड़केँ ममहर पठा देने छी। देवी-देवता किछो नै बुझै छै। अहंकार देखबै छै। नाश हेबाक पहर छै। एहेन लोककेँ तँ गामसँ भगा देबाक चाही। तोरा सबहक विचार उनटि गेल छह। पढ़बहक-लिखबहक नै तँ एहिना हेतह। नया ढँगसँ खेती-बाड़ी नै करबहक तँ सभ दिन भूखे मरबहक। फँसले रहबहक पुरना जालमे। मरैत-रहअ आ सड़ैत रहअ। मुरुख चपाट। हे रौ पहिले अपना पलिवार आ कुल-खनदानकेँ सुधारि ले। पढ़ा-लिखा ले तब लबरपन्ना करिहेँ। आ बेसी मुरुख-मुरुख कहबेँ तँ अखने.....। ईह उचित कहैत घर झगड़ा। हाँ हाँ, चुप रहू मड़र। अस्थिर रहू। की मुँह लगबैत छी। अरे जे जस करै सो तस फल चाखा। हँ हँ ऐठामसँ चलू। नै तँ झगड़ भऽ जाएत। होमक काज भऽ गेलै। चलै चलू भोज खेबाक लेल। लोक सभ बैस रहल छै। भोज खाइबला पंच सभ पाँति लगा कऽ बैसल छै। केराक पातपर दालि-भात, तीमन-तरकारी परसल जा रहल छै। हौउ, शुरू करू भोजन। रौ तोरी के, घी कहाँ पड़लै हौ, बिसरि गेलहक की? नै यौ, घी तं सभटा होममे जरि गेलै। बचल रहितै तब ने। सभटा आगिमे डाहि देलहक। ई तँ काबिल लोकक काज अछि। वातावरण केहेन हम-मह करै छै। सुकरातियेमे तँ टीकमे तेल पड़ैत। कहियो-काल भोजे-काजमे जी कऽ घीबक सुआद मन पड़ैत छल। तहूपर बज्जर गिरल। जल-ढार भऽ गेलै। झब-झब खा ले। देखै छी ऊपरमे। गिद्ध फेर चकभौर मारि रहल छै। कहुना केकरो चारपर फेर बैस जाए। बैसबे करतौ। जतए एहेन अधरमी लोक रहतै आ देव-पितरकेँ निंदा करतै ततए कुछो भऽ सकैत अछि। दालि-भात आ तीमन-तरकारी पाँते-पाँत दौग रहल अछि। हौ पानि चला दहक। बक्-बक् गाड़ा लगैत अछि। आरो तोरी के, भगै जो रौ। फेर कालू मड़रकेँ चारपर गिद्ध बैसि गेलै। देखहक हौ, जुलुम भऽ गेलै। गिद्ध तँ ओंघरा कऽ निचा गिर पड़लै। हौ, गिद्ध मरि गेलै। दौड़ै जा हौ। सभ देखबाक लेल दौगल। भात-दालि टाँगसँ धँगा गेलै। भोज घिना गेलै। अधा खा कऽ किअए भागल-लोक सभ। भागत नै तँ गिद्धे जकाँ जान देत। पपियाहा! महा अनिष्ट केलक। तब ने एहेन गप्प भेलै। बेमरियाह माल हेतै नै तँ साँप कटलासँ मरल मवेशी हेतै। ओहन बिखाहा मासु खेतै तँ गिद्ध मरबे करतै। फेर ई दोसरे बात। आब कोन उपाए हेतै हौ देव। हौ समाजक लोक। महा अनरथ भऽ गेलै। सभकेँ ठकमुड़ी लगि गेल छै। गप्प कटाबलि चलि रहल छै। किछु डेरबुक सभ ससरलो जा रहल अछि। की हेतै की नै। अँइठ-कुँइठ सबहक देहमे लगि गेल छै। धाेइले पहिने। एहेने समैपर लोक अपन-अपन गम्भीर विचार राखि सकैत अछि। आब करहक बड़का होम-जाप आ महाभोज। सभसँ फराक भऽ कऽ कालू मड़र मुँह बाबने ठाढ़ अछि। टक-टक आसमान दिस तकैत। मने-मन बिदबिदा रहल अछि। जेना कोनो मंत्र आसमानमे भेज रहल अछि। आकि कोनो देव-पितरसँ गप्प कऽ रहल अछि। ~ २१ “ढोढ़ाइ गुरुजीक भाय सिफैतकेँ नोत देबही तँ हमरा सभ भोज नै खेबौ।” “ठीके, ओकरा बध लगल छै। ने पूजा पाठ केलक ने गंगा असलान केलक। तब पाँतमे बैस कऽ खाएत। हम बरदाश नै कऽ सकै छी, ई गप्प। जाति आ धरमक गप्प अछि। एनामे तँ लोक बहैश जाएत।” भोज होइसँ पहिले नोत दइकालमे दसगोटेसँ सलाह-विचार तँ करै पड़ै छै। भोजक सुगन्धसँ लोग चट दऽ जमो भऽ गेल। आपसी विचार करए लगै छै। हौ की भेल रहै? केना वध लगलै।” “हौ हाटसँ साँझमे खरीद कऽ लाबने रहै। रातिमे बान्हले बड़द मरि गेलै।” “हौ, कथीसँ खेती-पथारी करतै। बुझहक जे बजर खसि पड़लै।” “बेमानीक टका-पैसासँ खरीदने हेतै।” “बेचाराकेँ ऐबेर खेती मार भऽ जेतै।” अजय ठाढ़ भऽ कऽ गप्प सुनैत छल। ओकरा नै रहल गेलै तँ बजल- “ओकरा तँ दुख पड़ले छै। ऊपरसँ अहूँ सभ तँ परान खींचबाक लेल तैयारे छी।” “आब सुनियो अजयक गप्प। ई ऐ टोलमे कोनो बन्हन नै रहए देतै। सभकेँ बिगारिकेँ छोड़ि देतै। एकोबेर इनसाफक बात नै करै छै।” “इनसाफक गप्प हम नै करै छी। अहाँ लबकीकेँ बेटीक साथ इनसाफ केलिऐ? ओकर बेटी बीख खा कऽ मरि गेलै। के नै जनै छलै जे ओकरा पेटमे कनफट्टा बनियाक बच्चा पलि रहल छै। कनफट्टा ओकरा सँगे जोर-जबरदस्ती केने रहै।” “कहाँ गछलकै पंचैतीमे?” “पंचैतीमे कतएसँ गछतै। ओइसँ पहिने कनफट्टा लोभ दऽ देलकै। जे हम तोरा संगे बिआह कऽ लेबौ। तोहर पलिबारक खरचा हम अपना दोकानसँ चलेबौ। ऐ कारणे लबकीक बेटी पंचैतीमे कनफट्टाकेँ बचा लेलकै। पंचो सभ टाका-पैसा लेने रहै। सभ बातकेँ मटिया देलकै।” “बादमे तँ सभ पंच लग गेल। पएर पकड़ि सभटा गप्प कहलक। अहाँ सभ कहाँ कऽ सकलौं-इनसाफ। उनटे ओकरा बेहया-बेश्या कहि कऽ दुतकारि देलिऐक। तब ने बेबश भऽ कऽ ओ बीख पीबि लेलकै। ओकर हतियाकेँ पाप केकरापर गेलै? केकरा वध लगलै?” “हौ, हमरा सभ पिंगल पास थोड़े छी। दू आाखर जे पढ़ि लेलक से आसमानेमे भूर करै छै।” “हमरा सभ उनटा बजै छी की अहाँ सभ। सुकरातिक दिन जे सुगरक बच्चाकेँ मरखाहा भैंससँ खून करबा दैत छी, ओइ बच्चाकेँ भैंस रगड़ि-रगड़ि जान लैत रहै छै आ अहाँ सभ ताली मारैत खेंखिआइत रहै छी। भैंसकेँ घुमा-घुमा कऽ लबैत रहै छी। जे कहुना सुगरक बच्चाकेँ मारि दै। एकटा छोट जीवकेँ अपना सोझामे जानि बूझि हत्या कराबैत काला अहाँ सबहक इनसाफ कतए चलि जाइत अछि। ओइ समैमे सभकेँ वध लगैत अछि की नै? सभकेँ वध लगल अछि। सभ जाउ गंगा-स्नान। अहाँ सभकेँ अन्दरमे वध करबाक प्रवृत्ति अछि।” “हे रौ एकरा ऐठामसँ भगा। नै तँ सभकेँ नाश कऽ देतौ। केकरो बजै नै दैत छै।” “यौ मड़र सबहक नाशसँ नीक जे एकटाकेँ नाश भऽ जाए। बहींचो..। एना कहुँ बजै छै।” “फेर मुँह सम्हारि कऽ गप्प करू नै तँ ठीक कऽ देब।” “हाँ, हाँ अस्थिर रहू। झगड़ा भऽ जाएत। हे रौ हटा दुनू गोटेकेँ।” किछु गोटे दुनूकेँ ठेलि-ठालि कऽ हटा रहल अछि। ~ २२ चौबटियापर गाछ तर चारि-पाँच युवक गप्प हाँकि रहल अछि। जइमे सिंहेसरा, अजय, घनमा, उचितवक्ता ठाढ़ अछि आ दूटा छौड़ा कनी हटि कातमे फुसराहटि कऽ रहल अछि। रामरती मड़रकेँ आगू दऽ कऽ जाइत देखि उचितवक्ताकेँ नै रहल गेलै। “बित्त भरिक बितबा, बितौसँ छोट, चलैत अछि बितवा टेरैत मोछ।” रामरती मड़र तमसा कऽ पाछू घुमि देखलक। गारि मुँहमे आबि गेल छलै। छौड़ा सभकेँ बेसी संख्यामे देखि घुनघुनाइत चलि देलक। “बूढ़बा बड्ड तमसाह छै। घमण्डी नम्बर एक।” “खूटा बले पररू डिरिया रहल छै। ऐ टोल परक जतेक मुँह पुरुष अछि सभटा जीबू बाबू नै तँ अच्युतानन्दक गुलाम बनल अछि। तब ने झँपले-झाँपल ओकरे सबहक जूति-भाँति अहू टोलमे चलै छै।” “गुलाम तँ सभ बनले रहितै। संयोगसँ पंजाब-दिल्ली कमेबाक रास्ता खूलि गेलै। सभकेँ आगाँ बढ़बाक रास्ता भेटि गेलै। लबका हवा-पानि लगलासँ बुधिक विकास भेलै। नै तँ आइयो बेगारमे गिरहत सभ जौड़ी बँटबाबैत, बाड़ीमे खटाबैत।” “बेगार आइयो छै। खाली ओकर रूप बदलि गेलै। बुधिक विकास की हेतै। आइयो ऐ टोलक स्कूल मालिक टोलपर बनले छै। आ आहीमे बान्हल साँढ़ डिरिया रहल छै। बाँआँ-आँ।” “नै यौ, एकरा विरोधमे एकता हेबाक चाही।” “पहिले पढ़बहक तब ने, एकता करबहक। संघर्ष तँ आगाँक गप छिऐ। जड़िमे स्कूले पार भऽ गेल छै।” “पनरह दिनपर मास्टर साहेब मुँहपुरुखक दलानपर आबि हाजरी बना लैत छै। सभटा मुँहपुरुष मास्टरकेँ दोस-महिम अछि।” “हे यौ, लोग सभ तँ गाए-चरौनाइकेँ नीक बुझै छै। कहै छै पढ़लासँ की हेतै।” “हँ हँ। नमहर भेलापर चोरि सीखतै।” “लेकिन भोजकेँ नीक बुझै छै। तब ने कते पलिवार भोजक कारणे सभ जमीन जथा बेचि देलकै।” “हौ, सुनै छी जे फुलचनमा गबैया एकटा नचनियाँ छौड़ी संगे भागि गेलै कतौ। आरे तोरीकेँ उनटे बात।” “नीक केलक। नटुआ मनोरथकेँ बूढ़मे खाइयोपर आफत रहै छै।” “गप्प तँ भसिया गेलै। रामरती मड़र किएक खिसिया गेल छलै?” “हँ, बीत भरिक बीतबा। बुझलहक नै।” “कहबहक तब ने बुझबै।” “एकरा बापक नाम रहै-बिताय मड़र। भुट्टा आदमी आ बड़का-बड़का मोछ।” “जमानाक गप्प कहै छहक।” “हँ हौ सुनलाहा गप्प। एकर बाप बिताय मड़र चारि बरसक रहै। ओही समैमे बिआह करैक लेल गेल रहै। रातिमे ततेक कनलै जे भोरे माएकेँ जाए पड़लै। गामक कातमे जा कऽ बितायकेँ दूध पिऔलकै। लेकिन बिआह भेलाक बाद निकललै बिताय। धोती-कुरता पहिरने। मोंछपर हाथ फेरैत। टेढ़िया चालि धेने। पाछाँमे साड़ी पहिरने छोटकी कनियाँ। कनियाँ-पुतरा सन। ओही दिनसँ ई फकरा लोक कहै छै। बीत भरिक बीतबा बितौसँ छोट। आइयो तँए ओकरा बेटाकेँ आँतमे लगि जाइ छै। आकि हेतै आेकरा बेटो बिआहमे सएह भेल।” “की भेल छलै। बूढ़बा मड़र कहै छलै।” “बिताय मड़र सोचलक अपना बेटाकेँ बिआहमे गलती नै करबै। धिया-पुतामे बिआह नै करबै। बेटा जुआन भऽ गेलै तँ लड़की ओकरा उमेरक भेटबे नै करै। लड़की जुआन घरमे राखतै तँ सभ कहतै- बुढ़िया बेटीकेँ घरमे कुमारे रखने छै। अन्तमे बिताय मड़र अपना बेटाकेँ कमे उमेरक लड़कीसँ बिआहलक। सभ कहै- बूढ़बा लड़िका कतएसँ उठा आनलकै। कनियाँ नैहर आएल तँ सासुर जेबाक लेल तैयारे नै होइ। बूढ़बाकेँ बेटा झगड़ा करै। कतए कहाँ बिआह कऽ देलक। अन्तमे बिताय अपना भाइक संगे समधीक घर पहुँचल। समधी घरसँ अनुपस्थित रहए। समधिन अँगनासँ समाद भेजलकै- अखनी हमर बेटी धिया-पुता छै। सासुर नै जाएत। खिसिया कऽ दुनू भाँइ आपस भेल। गामसँ बाहर भेलापर देखलक- जे ओकर पुतोहु साग तोड़ि रहल अछि। बिताय मड़रक भायकेँ ललकारा देलक- “की देखैत छी लऽ चल ऐठामसँ उठा कऽ। फेर बारहटा बहाना करतौ। गामपर छौड़ा छुरी फनका रहल छै। ललकारा सुनैत ओकर भाए कनियाँकेँ कन्हापर उठा लेलक। कनियाेँ बाप-बाप चिचिया उठल। आवाज सुनि चारूभरसँ गौआँ दौगल। कतेक लाठी-फराठी दुनू भाँइक देहपर टुटलै पता नै। फेर पंचैती भेल। कनियाँ सासुर आएल। गर्भवती भेल। किन्तु बच्चा जन्मै काल माएकेँ खा गेल।” “तँ ई खाम सनक औरतिया के छी यौ? सुनै छी जे मंतरसँ गाछ हँकै छै।” “गप्प हँकै छी कि अकासमे भूर करै छी।” “धुर, ई तँ चुमौनवाली लबकी छी।” “हे रौ, भाग रौ रामरती मड़र फेर अबै छौ।” सभ धड़फड़ा कऽ चलि देलक। कौआ-मैनाक लड़ाइ शुरू भऽ गेल। जेकरा कियो नै देखलक किन्तु गाछ देखलक। आर बहुत किछु देखतो गाछ चुप्पे रहल। ~ २३ धरमानन्द बाबूक दुआरिपर महाभारतक कथा भऽ रहल छै। कथा बाचककेँ हाव-भाव आ टहकार लोगक मनकेँ मोहि लैत छै। संगे भोज-भात सेहो हेतै। “आइ दिन शुभ अछि। तब ने सरकारो शुभ दिनकेँ एलेक्सन करबा रहल छै।” “भोट खसबए लेल तँ हमरो जाए पड़त। पहिले किछु देर सुनि लैत छी। भोज सबेर होएत तँ खा-पीबि कऽ भोट गिरबै ले जाएब।” “अखनी तँ मालिक टोलक लोक लाइन लगा कऽ भोट खसबैत हेतै।” “हँ यौ, भोट तँ ओही टोलक इसकूलमे गिरतै। ऐ टोलक इसकूल ओही टोलपर बनि गेलै।” “इसकूलकेँ तँ गौशाला बना देने छै। बड़का लोकक धिया-पुता ओइमे पढ़ैत नै छै तँ की हेतै।” धनुक टोलीक लोक धरमानन्द बाबूक दुआरिपर महाभारत कथा सुनि रहल छै। “जुआ खेलैमे द्रोपदीकेँ हारि गेलै। पाण्डव सभ तामसे फनकि रहल छै। किन्तु बेवश छै। झूठक सहारा नै लऽ सकैत अछि। आब चीरहरण हेतै।” अजय दू-तीन संगीकेँ संग लेने सभकेँ कहि रहल छै- “हे यौ, भोट गिरा लिअ। पाँच बरिसपर एहेन अवसर भेटै छै। अपना नेताकेँ चूनि लिअ।” “के जाएत। एतए अमरीत वाणी बरिस रहल छै। वोट तँ दू घंटा बादो गिराएल जाएत।” धरमानन्द बाबूकेँ ऐबेर नेता सभ भोटक लेल रूपैया घूस नै देने छै। छौड़ा सबहक आगू ताश पसरल छै। मुँह पुरुखक नाटक। “मंडल नेता एलेक्सनमे ठाढ़ छै।” “की जाति की पर-जाति। एलेक्सनक बाद तँ कोनो नेताकेँ दरशनो दुरलभ भऽ जाइ छै।” “कोइ सरकार बनो। कुछो नै होइ छै। की भेलै पचासन बरिससँ।” “हँ हँ, पहिले भोज खेबै तब भोट गिराबै लेल जेबै। ऐबेर तँ कोनो फायदो नै छै।” तीन बजेमे खा-पी कऽ सभटा धनुक टोलीकेँ लोग भोट गिरबए लेल पहुँचल। अच्युतानन्द बाबू आँखि उनटा कऽ तकैत अछि। “एतेक लोक कतएसँ आबि गेलै।” अच्युतानन्द बाबूक जेठका बेटा उचितवक्ताकेँ धकियबैत अछि। “रे पाछू हट। तूँ भोट गिरा लेने छीही।” “हम तँ अखनी एबे केलौं, भोट गिरा कऽ जाएब।” “भाग, हमरा इसकुलपर सँ।” “केकरो बापक इसकुल नै छिऐ।” “सार, बापक नाम लैत छेँ। भेँट करा देबौ।” “मार चारि चमेटा रौ।” थप्पर-मुक्का चलए लगलै। अच्युतानन्द बाबूक इशारा पाबि पुलिसिया डण्टा बरिसए लगलै। “फटाक.... सटाक.......।” हड़विर्ड़ो मचि गेलै। लोक बाप-बाप चिचिया उठल। उचितवक्ता मारि खा कऽ बाहर निकलैत बाजल- “ठीके कहै छलै अजय। कियो बात नै मानलकै। तँए ओते भोज खेलक चेला बनि आ एते मारि खा कऽ महंथ भेल।” दोगा-दोगी सभ भागि रहल अछि। ~ २४ सुरुज डुमल हो वा धरती घूमल हो। मुदा अन्हार तँ पसरल जा रहल छै। अन्हार भेलासँ पहिने शीला घर नै पहुँचतै तँ ओकर काका मारैत-मारैत चमड़ी खैंच लेतै। केना नै मारतै? जवान-जहान लोक अन्हार-धुन्हारमे घरसँ बाहर। अपन माए-बाप नै। ओकरा जन्मसँ पहिले बाप ओकर माएकेँ राँड़-मसोमात बना कऽ उड़ि गेलै। शीला दस सालक भेलै तँ माए अनाथ बना कऽ संसारसँ भागि गेलै। काका-काकीक सहारासँ जिनगी कटि रहल छै। थप्पर-मुक्का चलब कोनो खास नै। लाठीक चोट आ दगनीक दाग पड़लै तब खास गप्प भेलै। भूख सहाज करै छलै तँ देह दुबरा गेलै। समैपर खेलक तँ खायपेट्टी नै खेलक तँ भूखले रही कोढ़िनियाँ। सभ दिनेसँ सिनेहक भूखल छली बेचारी। बचपनेसँ अजय आ शीला गामक गली-कुचीमे खेलने छलै। डोह-डबरामे नांगटे नहेने छलै। एकर सभसँ नमहर कारण दुनूक माए सखी जकाँ रहै छलै। दुनूक बीच खूब मेल। एक दोसराक कनौनाइ आ हँसौनाइ चलै छलै। खैर, ई छल बचपनक गप्प। फेर जुआन भेलापर अजय शहर चलि गेल। आर ओतए अपन पढ़ाइ-लिखाइ पूरा करए लगल। कहियो काल छुट्टीमे गाम अबै छलै तँ शीलासँ भेँट-मोलाकात भऽ जाइ छलै। आ सुनहटमे बैसि कऽ दुखक कथा पसारि दैत छलै। अजय बोल-भारोस दैत-दैत कखनो अपनो कानय लगैत छलै। परन्तु जखनि अजय शहर चलि जाइत छलै तखैन शीला असगरे दुखक पोखरिमे डुमकी मारए लगैत छलै। उज्जर आ कारी पाँखि फलकौने उड़ैत समए। लोगक उमेर बितैत छै आकि समए। परन्तु बितै तँ छै। कल्पना, यर्थात आकि दुनूक मिश्रण। समए सभकेँ नापैत। दौड़ैत-पड़ाइत आगू बढ़ैत। बेदरा, जुआन फेर बूढ़....। गामक लगीचेमे धरमानन्द बाबूकेँ दसकठबा करजान छै। छठि पावनिमे खौब आमदनी होइत छलै। दसकट्ठाक केरा पावनिमे रूपैया उझलि दैत छलै। ओइसँ सटले डेढ-दू बीघामे काश-पटेरक जंगल। बड़का-बड़का घास-पात। कतएसँ ओते जन-मजूर भेटतै। अधहा काटल आ अधहा लगले रहि जाइत छलै। एकबेर एकटा चीता बसेरा लऽ लेने रहै। डरे लोक साँझे टाटी-बेनाठी लगा लैत छलै। ओइ भूतहा जंगल लग अजय ठाढ़ छै। बाधसँ आपस जाइत शीलाकेँ इशारासँ सोर पाड़ैत छै। शीला एने-ओने देखलक आ सट्ट दऽ करजानमे ढुकि गेल। अजय पुछलकै- “नेगरी जकाँ किएक चलै छी।” “पएरमे कनी चोट लगि गेल रहए।” “कथीसँ?” “छोड़ू ने ऊ गप्प।” “हमरासँ चोरा कऽ कोनो गप मनमे राखए चाहै छी। एकर मतलब हृदैसँ नै चाहै छी हमरा।” “फेर अंट-शंट बाजि रहल छी।” “ई भेलै अंट-शंट। अहाँ हमरा सोझाँमे झूठ बजब। एहेन हमरा विश्वास नै छल।” शीला मुड़ी गोंति लेलक। ओकरा आँखिसँ दू बून नोर खसि पड़लै। बझाएल कंठसँ कहलकै- “हमरा काकाकेँ सुभाव तँ बुझते छी। चारि-पाँच दिन पहिले अहाँसँ गाछीमे भेँट भेल रहए। चुगला सभ चुगली कऽ देलकै। ई खबरि सुनिते काकाकेँ देहमे आगि नेस देलकै। ई तँ लाठी पातर रहै जे टुटि गेलै। नै तँ हमहीं मरि जैतौं। देह हाथमे तँ कम चोट अछि मुदा जाँघक चोट....।” अजय देखि रहल छै शीलाक जाँघ। गोर चमड़ीपर कारी सियाह दाग पड़ल। आँखिमे नोर रहबाक कारणे झलफलाह देखा रहल छै। खोंखीक आवाज सुनि दुनू भीतरी करजान दिस ससरि गेलै। ओनए टोलपर दोसरे नाटक चालू भऽ गेल छलै। अजयकेँ दुश्मनोक संख्या बहुत छै। जइमे सभसँ आगू छै खेलावन भगत। मुँहपुरखी छिनबाक डर छलै धरमानन्दकेँ ओहो दुसमन। ढोंढाइ गुरुजीकेँ डर छलै जे अजय कहीं धिया-पुताकेँ पढ़बए ने लगै। कालू मैनजनकेँ बात नै मानलकै। भोज नै केलकै। तँए कतेको दुसमन। कतेक पराेक्ष आ कतेक प्रत्यक्ष दुसमन। दुसमनक बीचमे खबरि पहुँचि गेल छलै। “अजैया आइ चोटपर चढ़ि गेल छौ।” “अकलू मड़रकेँ सभसँ आगू राख। ओकरा भतीजीक इज्जत खराब कऽ रहल छै ने।” अकलू मड़र तामससँ गरमा गेल छै। “जँ इज्जते नै बचतै तँ जी कऽ की करबै।” अगिलगौना सभकेँ नीक मौका भेटि गेल छै। “ई सरबा अपनाकेँ शहरी बुझै छै। देहातक इज्जतकेँ ऊ की जनतै। बेरा-बेरी सबहक इज्जत-परतिष्ठा बेरबाद कऽ देतौ।” “हम तँ कहै छिऔ। राफ-साफ कऽ दही-एक्केबेर। सीधे गरदनि काटि देबै। ने रहतै बाँस आ ने बजतै बौसली।” सबहक भितरिया बाघ गरजए लगलै। युद्ध करू वा देखू। भितरिया पियास मेटेबाक उपाय। भीड़-भाड़मे के केकरा देखै छै। जेकरा जे हथियार हाथ लगलै, उठा लेलकै। लाठी-भाला, तीर-धनुष, गड़ाँस-फरसा जेना बनैया सुगरकेँ मारैत काल होइ छै। सभ एके संगे दौड़लै। “खेलावन भगत खबरि देने छलै केरा बगानमे दुनू रसलीला कऽ रहल छै।” शीला आ अजय दोसरे संसारमे टहलि-बुलि रहल छलै। अजय कहि रहल छलै- “अपन-अपन टोल, अपन-अपन जाति अलगे-अलग। तब ने अपन जूति चलतै। अन्हा गाममे कन्हा राजा। एेठाम ज्ञान-विज्ञान निकलै छै- गहवर घरसँ। कानून निकलै छै-मुँहपुरुषक गप्पसँ। बहि रहल छै- उनटा बसात। सभसँ छोट उनचास हाथ।” पैघ निसाँस लैत आगू बजल- “करए पड़तै परिवर्त्तन। परिवर्त्तनक लेल कि जे किछो करए पड़ै। जिनगियोकेँ होम करए पड़ै तैयो ससते बुझू।” “हो.... हो..... हो..... लगे.....।” “भुक... भुक....।” टाँर्चक रोशनी। कुत्ता कानि रहल अछि। सुनहटकेँ चीरैत अवाज- “घेर ले पूरा बगानकेँ आ काटि कऽ ओहीमे गाड़ि दबै।” “चर-मर, खट-खट, धुम-धुम।” सैकड़ों पदचाप। सुनहटक निसाँस सन। अन्हारमे जेना भूत-प्रेत नाचैत-दौड़ैत....। “बाप रे बाप। सबहक हाथमे हथियार छै। चारूभरसँ घेर रहल छै। जेना अपना सभ जानवर छी।” स्वर थरथरा कऽ निकलैत अछि- “भागू ऐठामसँ। खुनियाँ सभ आबि गेल।” ऊँचगर माटिक ढूहपर देखते शीला बोमिया कऽ कानए लगैत अछि। “अहाँ भागि जाउ अजय। अहाँक जरूरत छै। हमरा कारणे अहूँक जान चलि जाएत।” “अहाँकेँ छोड़ि हम असगरे भागि जाएब। हमरा एतेक डेरबुक बुझै छी। मरबै तँ संगे आ जीअब तँ संगे। हम कोनो अधलाह करम नै केने छी। हम भगबै नै, संघर्ष करबै। अंतिम साँस तक परिवर्त्तन आ प्रगतिक लेल हमर संघर्ष जारी रहतै। हम लड़बै अपना बाँहक बलसँ। अन्हार निश्चित हटतै।” “काश-पटेरक वन दिस भागू। जल्दी करू। खुनियाँ सभ पाछूमे चलि आएल।” घनघोर अन्हार। काश-पटेर आ घास-पातक जंगल। पाछूमे मनुखक खूनसँ पियास मुझबैबला जानवर। भागैत-पड़ाइत दूटा प्राणी.....। “कतौ नै भेटै छै। ऐ काशमे नुकाएल छै।” “रौ ठेकानि कऽ अन्दाजसँ तीर चला। जेतै कतए। आहीमे झड़का कऽ मारि देबै।” “हँ, सूखल काश छै। आगि लगा दहक। ओहीमे डहि कऽ भसम भऽ जेतै।” “आ जँ बहरा दिस भगतै तँ खुंडी-खंुडी काटि देबै। ठीके बात।” डेढ़ दू बीघा काश आ घासक जंगलमे आगि लगा देलकै। धू-धू, चर-चर... चराक। चिरै-चुनमुनी, साँप-कीड़ा, कतेको जीव सभ जरि रहल अछि। लहाश आसमान दिस उठि रहल छै। धुइयाँसँ चारूभर भरि गेलै। गदमिसान भऽ रहल छै। अजय आ शीला एम्हरसँ ओम्हर भागि रहल छै। पएर खुँटी आ काँटसँ लहू-लहान। देह काश पटेरसँ कटल। सन-सनाइत एकटा तीर अजयक बाँहिमे भोंका गेलै। नोचि कऽ फेकलक अजय। बलबला कऽ खून बहए लगलै। शीला कानैत बजली- “हम नै जीअब आब। हमरा ऐ खूनसँ माँग भरि सकै छी अहाँ?” समए कम छलै, अजय हँसैत बाजल- “लिअ खूनक सिनूर।” भर भरा कऽ खूनक बून ओकरा माँगपर गिरल। पाछाँसँ साड़ीमे आगि लगि गेल। अजय ओकर साड़ी खोलि कऽ फेंकि देलक। आगू भागल तावत अजयकेँ नुआ-वस्तरमे आगि पकड़ि लेलक। ओहो अपना सभ कपड़ा-बस्तर फाड़ि कऽ फेिक देलक। दुनू वस्त्रहीन। खूनसँ भीजल देह। चारूभरसँ आगिक लपट। बचबाक कोनो उपाय नै। तैयो भागैत-पड़ाइत। एक दोसराक सहारा दैत। झोंझमे एकटा चभच्चा देखाए पड़लै। डबरा सन गहींरगर पानिसँ भरल। चारूभर कुकुआहा उड़ैत। आगिक झड़क। उठैत लपट। धुइयाँसँ आन्हार भेल आँखि। जान बचेबाक लेल दुनू ओइ चभच्चामे ‘छपाक’ कूदि गेल। कनीकाल हलचल फेर एक-दोसराकेँ आँखिमे देखैत दुनू शान्त। ईहो काल गुजरि जेतै निश्चित। धैर्य... पैघ प्रतीक्षा... साक्षी। दुनूक देह, मन आ चित्त अपन-अपन काज कऽ रहल अछि। धर्मडीहीवाली चिचिया कऽ अपन पति जागेसरकेँ कहलकै- “लाज नै होइ छै। सभ गोटे मिलि कऽ सहोदरा भायकेँ झड़का रहल छै आ ई मुड़ी गोंति कऽ बैसल छै। गे माइ गे माइ। आइ हमहीं मरि जेबै आकि सभकेँ मारि देबै।” कहैत चारमे सँ ‘सड़ाक’ हँसुआ खींचलक आ केंकिहारि काटैत केलवनी दिस दौगल अेकरा पाछू जगेसरा लाठी लेने बमकि रहल अछि। पाछू लगल आर स्त्रीगण सभ। चारू भरक गौआँ-घरूआ गगनचुम्मी धधरा देखि दौड़ल आबि रहल छै। अजय आ शीलाक हँसी आसमानक अट्टहासमे सम्मलित भऽ रहल अछि। आगिक बीचमे पानि आ ओइ पानिमे हजारो जीव-जन्तु। ओइ बीचमे शीला आ अजय पूर्ण नग्न एक दोसराकेँ आलिंगनमे कसने ठाढ़ अछि। अन्त नै अनन्त... परिवर्त्तन आ विकास हेतु....। सुजीत कुमार झा, -कथाकार सुजीतजी जनकपुरसँ प्रकाशित होएबला दैनिक मैथिली समाचारपत्र मिथिला डट कम क सम्पादक छथि। लघुकथा- चिड़ै “ यदि नलिनी, अहिं सन होशियार रहितै अहाँ कतेक सुख दैत छी, आ एकटा ओ छथि, जे हमर दूटा बच्चाकेँ माय भऽ कऽ मात्र रहैत छथि । मनोजक स्वरमे विवशताक अभास नई छल । मात्र एकटा इच्छा छलन्हि — यदि नलिनी सेहो उषा जकाँ सुन्दरी, होशियार आ सुख देबऽ बाली रहितए तँ सम्भवतः उषाकेँ आइँखो उठा कऽ नहि तकतैथि । उषा दिश एकटक देखैत मनोज पुछलन्हि— “ की, नलिनीके विषयमे सोचिरहल छी ? ” नई, हम किए सोचू हुनका विषयमे ? हम तँ हुनका देखनो नहि छियैन— उषा मुस्कैत मनोजक गर्दैनिमे अपन बाँहि लेपटा देलन्हि । मनोज सोचऽ लगलथि जे पढ़ल लिखल रुपवती उषाकेँ कार्यालयमे डेग धरिते सभहक आँखि हुनकेपर नाचि उठैत हएत, कतेक मजामे रहैत हएत हिनकर हाकिम । जखन मोन करैत हेतन्हि लग बजा अपन आँखिक पियास मेटा लैत हेताह । ओना उषा ओहन नहि छथि । ओ मात्र हमरा चाहैत छथि । ओहि दिन मनोज बहुत प्रशन्न रहथि । कए दिनक बाद उषाक टेलिफोन आएल रहैक आ हुनका अपन घर बजौने छल । उषा अपन घरकेँ खूब सजौने छलिह । मनोजक पसिनक सिंगार कएने छलिह, पसिनक खाना सेहो बनऔने छलिह । मनोजकेँ घर पहुँचलापर उषा गप्पक क्रममे पुछलन्हि “ एना कहियाधरि चलत ? ” “ की ? ” मनोज सहजहिं जिज्ञासा कएलन्हि । “ की, एहने सम्बन्ध रहत हमरा सभक ? ” “ तँ की गृहस्थीके झण्झटिमे पड़ऽ चाहैत छी ? धुर बताहि तहन एहन उल्लासमय क्षण नहि रहत आ ने एहन हल्लुक वातावरण ” मनोज हरेक शब्दपर जोड दैत बजलथि । प्रतिक्रियामे उषा किछु नहि बजलीह । “ तमसा गेलियै ? हम तँ सम्झा रहल छलहुँ । ठीके छै, कोनो ने कोनो बहन्ने नलिनीकेँ डाइवोर्स दऽ देबै । आब उठू ।” कए दिन सँ मनोज सँ भेट नहि होएबाक कारण उषा मने — मोन टूटऽ लागल छलिह । नै कार्यालयमे मन लगनि आ ने घरमे । ओहि दिन बहुत बियाकुल भेलापर आलमारी सँ एल्बम निकालि कऽ पन्ना उन्टाबऽ लगलि । उन्टबैत — उन्टबैत एकटा फोटोपर नजरि स्थिर भऽ गेलनि । अही सोफापर दूनु बैसल रहथि आ आटोमेटिक क्यामरा एडजस्ट कऽ जल्दि सँ उषाकेँ माथ अपन कन्हापर धएने रहथि मनोज आ ओम्हर ‘क्लिक’ । ‘कतेक स्वभाविक छैक ई चित्र ?’ ओहि दिन अनायसे मनोजक मुह सँ निकलि गेल रहनि । “ यू लुक बन्डरफूल.... लाइक ए ब्राइड” “ तँ बना लिअ ने” । जँ सम्भव होइतै.... आ मनोज चुप भऽ गेलाह । किए चुप भऽ गेलियै ? नालिनी सँ डेराइत छियैक । उषा जानि — बुझि कऽ बात उठौने रहथि । नलिनी सँ तँ नहि मुदा डर तँ अछिए । लोक की कहत ? “ लोक ? ओ तँ एखनो कहैत हैत ” उषा कटाक्ष कएलन्हि । तिर निशानापर लागल रहैक । मनोज तिलमिला कऽ रहि गेलथि । किछु काल तक खिडकी सँ बाहर देखैत रहलथि आ किछु कालक बाद बजलाह “ अहाँ हमर गर्ल फ्रेण्ड नहि, अहाँ तँ प्राण छी ।” मनोजकेँ स्वभाव बड़ विचित्र छलनि । सदिखन ओ उषाकेँ ओझराहटिमे धऽ दैत छलाह । ओहि दिन मुसलाधार पानि पडैत रहैक । एकाएक मनोज उषाक घर पहुँच गेलाह आ कहलन्हि चलू समान किनै छी । “ एतेक पानिमे ?” “ हँ, दोकानमे भीड कम हैते ।” आ हँसऽ लगलाह । कहियौ कोनो पावनि दिन चौकपर भिड होइतै तँ ओइ भिडमे मनोज उषाकेँ लऽ कऽ हेरा जाय चाहथि । जाहि सँ हुनक गतिविधि सँ लोक अनजान रहैक आ कहियो अबेर रातिधरि खाली सडकपर घुमैत रहबाक आनन्द लेबऽ चाहथि । कतेक विरोधाभास छल । कोनो— कोनो दिन तँ मनोज आबि कऽ घण्टो सोफापर सूतल चुपचाप अपनेमे हेराएल रहैत छलाह । तखन उषा सोचथि सायद विजनेसकेँ कोनो चक्कर हेतैक वा हिनकर ओझराहटि नलिनी नहि बुझैत हेतीह । चाँैक कऽ उषा घडी दिश तकली । एखन देर छन्हि हुनका आबऽ मे, हम नहा लैत छी । तखने डोरबेल बाजि उठल । एहि समयमे के आएल सोचिते द्वार खोलि कऽ देखलन्हि तँ मनोज ठाढ़ छलाह । “ अहाँ कार्यालय सँ चलि एलियै । मनोज अबिते उषा सँ प्रश्न कएलन्हि । “ गेबे नहि केलियै ।” “किए । ” अहाँ जे आबऽ बला छलहुँ । “ से अहाँके पहिनहि सँ पता छल”— मनोज पुछलनि । हँ अहाँके पसिनक खाना बनौने छी । आई कोनो बहन्ना नहि चलत, आइ एतै खाय पडत— कहि बाथरुममे चलि गेली । लाल रंगक पारदर्शी साडीमे ओ बहुत सुन्दर लागि रहल छलीह । मनोज पत्रिकाक पन्ना उनटा रहल छलाह । सेन्टक सुगन्ध सँ उषाक समिपताकेँ आभास होइते मनोज मुडी उठा कऽ देखलन्हि आ लपकि कऽ हुनका अपन बाँहिमे कसि लेलन्हि । ओम्हर नलिनीकेँ फुर्सत कहाँ छलन्हि ? ओ मनोजक व्यस्ततापर अपन तामस देखाबऽ लगैत छली । महिनो नीक जकाँ गप्प नहि करथि, मनोजक ई उपेक्षा हरेक कार्यमे देखाइत छल । अपन आदत अनुसार घर अबिते स्कूलके बच्चा जकाँ घडी, पेन, चश्मा एम्हर ओम्हर राखि दैत छलथि । मुदा दोसर दिन सभ व्यवस्थित रहैत छल । यदि नलिनी तमसा जाइत तँ कोनो समान तकैत तकैत मनोजक धैर्य टूटि जाइत छल । नलिनी नुका कऽ सभ चिज देखैत रहैत छली आ आबि व्यवस्थित कऽ दैत छली । आ आँखिए आँखिमे सल्लाह भऽ जाइत छल । “ की सोचि रहल छी ?” उषाक प्रश्नपर मुस्कैत मनोज हुनका दिश देखैत बजलाह“ अहिंक विषयमे, कतेक काज करैत छी अहाँ ? एकटा नोकरनी राखि लिअ ने” आइ काल्हिक पढल लिखल लडकी नोकरी सेहो करैत अछि । घरके काम आ उपर सँ घर बला, साउस, ननदिके उलहन सेहो सहैत रहैत अछि । “ तएँ अहाँ बियाह नै कएलहुँ ? ” मनोज पुछलन्हि । “अहाँ सोचऽ के अवसर कहाँ देलहुँ” ई कहि मनोजकेँ अपना दिश खिच लेलन्हि । नलिनीक यादकें मनोज बिसरऽ चाहैत रहथि । तएँ हुनका अपना सँ अलग कऽ बजलथि — भूख लागल अछि, चलू खाइ छी । उषा नाना प्रकारके व्यञ्जन बनौने छलीह । आनि कऽ आगामे पडोसि देलीह । मनोज अपने धुनिमे खाइत रहलथि । उषा हुनक हरेक सुख सुविधामे जूटल रहलथि ताकी एतय आबि कऽ ओ कोनो प्रकारक कमी नहि महसूस करथि । खाना खाइत मनोज पुछलन्हि “ सिनेमा देखऽ चलब ?” “ पिक्चर ? आइ, ?”— उषा सोचमे पडि गेली, महिनो बाद एतय अएला है आ अपन समय सिनेमामे बरबाद करब । ओ हरेक क्षणके संजोगि कऽ राखऽ चाहैत छलीह । एतेक प्रतीक्षाके बाद आई अवसर भेटल अछि । ओकरो सिनेमा घरमे बचकाना प्रेम प्रसंगके देखऽ मे बीता दी ? नहि एना नहि हैत सोचैत बजली । चारि बाजि गेलै इन्टरभल भऽ गेल हेतै । “ ठीक छै दोसर शो देखब ।” कहि ओछाओनपर पडि रहलाह मनोज । उषा टेपरेकर्डरमे गजलके कैसेट लगा देलन्हि । संगीतक मधुरता वातावरणकेँ मनमोहक बनाबऽ लागल । टेपरेकर्डर मनोजे देने रहन्हि । उषा टयूबलाइट अफ कऽ नाइटलैम्प बारलन्हि । पुरना जमानाबला लालटेन के आकारबला ओ नाइटलैम्प सेहो मनोजे देने रहन्हि । आब तँ हरेक पुरान चिज फैशन बनि गेल छैक । ओ केश झाडि कऽ जुट्टी गुहऽ लगली । मनोजकेँ एकटक अपना दिश देखैत ओ पुछलन्हि –“ की देख रहल छी ?” “ अहिंक सुन्दर केश, किए बन्हैत छियै एकरा ? खोलि दियौ ? खूजले नीक लगैत अछि । हरेक सुन्दर चिजके स्वतन्त्र रखला सँ ओकर सुन्दरता अओर निखरैत छैक । केशमे एकटा क्लिप लगा दियौ , बस्स ।“ जुट्टी खोलि उषा केशमे क्लिप लगा लेली । हलका मेकअप कऽ कऽ साडी बदलऽ लगली । बहुत रास साडी मनोज किन देने छलन्हि मनोजकेँ तँ बहन्ना चाही । बाट चलैत कोनो महिलापर नजरि पडिते पुछि बैसथि “ चाही ओहन साडी ? ” तँ की हम ओकर साडी देखैत छलियै ? ओ तुनकि कऽ कहैत छलि । “ आओर की ? दोसर महिलाक रुपपर अहाँक नजरि थोडबे टीकत । की पता ओ अहाँ सँ सुन्दर .... । “ मनोज डोण्ट वी सिली ?” उषा प्रेम सँ...... । किए प्रेम करैत छी हुनका । हरेक साडीके पाछु एहने कोनो मधुर प्रसंग होइत छलैक । ओ सोचमे डूबि गेली कोन साडी पहिरु ? रातिमे सिल्क बढियाँ लगैत अछि अपने सँ कहैत आसमानी रंगक साडी, गलामे नेकलेस, कानमे हिराके टप्स आ हातमे सोनक चुडी पहिर ओ मनोजक आगाँमे ठाढ भेलि तँ रुपसीके देखि मनोज क्षणभरि स्तब्ध रहि गेलथि । अरे ! गहनाक प्रदर्शनी छै की ? एखन तँ सिनमा देखऽ जाइत छी । दिनमे जँ ई पहिरने रहितौं तँ कतेको महिला एहने गहना बनएबाक हेतु...........। प्लीज मनोज, कहियोकाल तँ बाहर निकलै छी । अपने देल समानके एकबेर नहि देखब हमरापर केहन लगैत अछि ? एहने प्रेमालापक सँग दुनू घरसँ बाहर भऽ गेलाह । सिनेमा । प्रेमालाप, हीरोकेँ पराक्रम मुदा दूनु अपनेमे लीन । फिल्म समाप्त भेलै । दूनु बाहर अएलथि तँ रातिके एगारह बजैत छल । ठण्डा ठण्डा हवा बहिरहल छल आ ताहुमे इजोरिया राति एकाधेटा सवारी सडकपर चलैत छल । दूनु एक दोसरमे लीन मौसमक आनन्द लैत पैदले घर दिश बिदाह भेलथि । विजुलीके खम्भा पाछु छुटैत गेल । गप्पक जेना कोनो अन्त नहि छल, मुदा उषाकेँ घर चलि आएल गलीकेँ मोडपर मनोज गुडनाइट कहैत उषा सँ बिदा लेलन्हि । गलीमे प्रवेश करिते संयोग उषाके तीन चारिटा गुण्डा घेर लेलकन्हि । स्वयंके छोडबैत उषा मनोज मनोज चिचिआए लगली । मुदा मनोज तँ.........। खाली आँखि सँ उषा उज्जर वस्त्रमे घुमैत नर्सके देखैत रहलीह । डाक्टर एखने जाँचि कऽ गेल छल । नर्स कहलन्हि —“ बेहोशीकेँ हालतमे कोनो पडोसी अहाँके एतँ पहुँचौने छल । चौबीस घण्टापर होश आएल अछि । “ नर्स दबाइ पिआ कऽ चलि गेली । तखने मुस्कैत मनोज उषाकेँ समिप आबि बैसि रहलाह । उषा निर्विकार भाव सँ खिडकीपर बैसल चिडैकेँ देखैत रहली जे बीच बीचमे उडि जाइत छल आ पुनः ओहिपर आबि कऽ बैसि जाइत छल । केहन हाल अछि उषा ? ” उषाक हाथ अपना हाथमे रखैत मनोज नहुँऐ सँ पुछलन्हि । “ बस जीवि रहल छी ।” आ दोसर दिश ताकऽ लगलि । पुलिसमे रिपोर्ट कएलियै ? बेसी चोट तँ नहि आएल ? नहि रिर्पोट नहि कएलियै — उषा रुष्ट होइत बजली । उषा डियर, एम्हर देखू, गहना लूटागेल सैह दुःख अछि ने । जाए दियौ गहना फेर बनि जाएत । “ बन्द करु एहन बकवास । आब हमरा गहनाकेँ मोन नहि अछि । ओ जेना आएल ओहिना चलि गेल”— कहैत हिचुकि—हिचुकि कऽ कानय लगली । “ की देहमे बुहत दर्द अछि, उषा बताउ ने, अहाँकेँ कतँ चोट लागल अछि ।” “ चोट लागल अछि हमरा हृदयमे”— कहि अओर कानऽ लगली । “ प्लीज ठीक सँ बताउ ने ।” “ अहाँ तँ एना चलि गेलांै जेना हम अहाँके केउ नई छी” — ओ बजली । मनोज चुप रहलाह । कहू ने, नलिनीकेँ एना छोडि कऽ भागि जेतियै ? हम यदि नलिनी रहितहुँ तखन ? .. तखन हम अपन प्राण दऽ कऽ सेहो हुनकर रक्षा करितियै । तखन हमरा छोडि किएक भागि गेलहुँ । उषा अहाँ नहि बुझबै ई बात । बदनामीके डर सभ व्यक्तिकेँ होइत छैक । बिजनेस मैन छी । समाचारपत्रमे नाम छपि जाएत तँ फेर .... ओ बजैत बजैत रुकि गेला । “ कहू न फेर की ? ” “ अहाँ... नलिनी...हमर मतलब...हमर कनियाँ तँ नहि ने छी ... । अहाँ तँ... अहाँ छी .... । लघुकथा- धधकैत आगिः फुटैत कनोजरि अन्हरिया राति सुनसान जंगल । बीच पक्की सड़क पर रातुक नरवताकेँ चीरैत ट्रकक अवाज गूँजि रहल छल । ड्राइवर ओहि सुनसान सड़क पर तीव्र गति सँ ट्रक आगा दौड़ा रहल छल । ड्राइवरक बगलमे बैसल खलासीकेँ दूर सँ ओहि सुनसान निर्वाध जंगलमे कोनो परछाँही ट्रक दिस अबैत बुझएलै । खलासी भयसँ कम्पित स्वरमे बाजल— “गूरुजी...................... देखियौ आगाँ सँ कियो आबि रहल अछि ।” ड्राइवर ट्रकक प्रकाशमे दूर स्पष्ट होइत महिला आकृतीक ध्यान सँ देखय लगैत अछि । “गुरुजी, एहि सुनसान जंगलमे एतेक रातिमे महिला ? खलासी घबराइत बाजल । ड्राइवर गम्भीर भऽ गेल । क्षण—क्षण समीप अबैत आकृति पर नजरि स्थिर कएलक । टांग ओकर ब्रेक दिस बढल । “गूरु.............. रुकू नहि, अवश्य कोनो गड़बड़ अछि ...............गति बढ़ा कऽ बढ़ि जाउ ।” ड्राइवर सोचमे पड़ि गेल । राजमार्ग ...... कोसो तक कोनो घर नहि ...........चारु दिस बड़का—बड़का गाछ आ बोन—झांखुर । एम्हर तँ केओ दिनोमे नहि पयरे निकलैत अछि । एहनमे ई युवती........ । सलवार समीज सँ करोड़ी सेहो नहि लगैत अछि । लगपासक करोडी सेहो रातिमे जंगली जानवरक डर सँ असगर नहि निकलैत अछि । तहन ई अछि के ? एतऽ एतेक रातिमे कोना ? कतऽ सँ आयल आ कतय जा रहल अछि ? कोन समस्यामे अछि ? ई सभ सोचिते—सोचिते ड्राइवर ट्रकक गति कम कऽ देलक । ओम्हर खलासीक डर आओर बढ़ि गेल छल । ओ डर सँ कापय लागल छल । आ आतंकित स्वरमे पुनः ड्राइवर सँ कहलक जे ‘नहि रुकू, भागि चलू ।’ मुदा ड्राइवर खलासीक गप्प पर ध्यान नहि दऽ ई निश्चय कएलक जे एहि युवतीक मदत करब । अतः ओ एकदम युवतीक लग आबि ट्रक रोकलक । किछु क्षण युवतीकेँ गौर सँ देखलक । युवती कम उमेरक छल । कम्पित स्वरमे युवती सँ पुछलक— “ तोँ के छेँ आ कतय जाए चाहैत छेँ ? ” युवती किछु सोच ऽ लागल कि ओ केना आबि गेल एहि सुनसान जंगलमे...................... अमावश्यमे..............ओकर कण्ठ अवरुद्ध भऽ गेलै । ओकरा बुझएलै अवश्य ई सपना अछि । आ कोना एतऽ आबि सकैत अछि । एते रातिमे.............अहि स्थानमे ..........अवश्य ई सपने अछि । आ ई विचार अबिते ओकरा भीतर अदभूत रोमाञ्च भरि गेलै । कहियो काल एना होइत छैक । सुतैत—सुतैत सपनाक अवस्थामे अचानक व्यक्ति एतेक जागरुक भऽ जाइत अछि की ओकरा ज्ञान भऽ जाइत छैक की ओ जखन चाहय, आँखी खोलि दुःखद स्थिति सँ दूर जा’ सकैत अछि । आ जखन ओकरा विश्वास भऽ जाइत छैक, आँखि खोलब आ दुखक स्थिति सँ दूर हएब ओकरा अपना हाथमे छैक, तखन ओकरा अपना शक्तिक अभास होइत छैक जे हम जे चाही कऽ सकैत छी । जखनकी अवस्था अेकरा अधीनमे छैक तखन ओ किए नहि मनमानी करए ? अपन ईच्छाक पूर्ति करय । ककरो की विगड़तै ? ककरो पतो नहि चलतै ई सपने तऽ छैक । तहन किएक नहि अपन उत्सुकता शान्त कऽ लिए ? एहि सँ बढ़ियाँ अवसर आब कहिया भेटत ? बाबुजी हरेक समय कहैत छथि जे हमर बुद्धि बड़ तेज अछि । हमरा चिकित्सक बनएबाक इच्छा छन्हि हुनक । एखने सँ एकर घरमे तैयारी भऽ रहल छैक । घरमे माय नहि अछि तऽ की बाबूजी आ भैया तऽ छथि घरमे पुस्तकालय अछि । सिनेमा देखबाक, उपन्यास पढ़यक छूट नहि अछि । टीभी कार्यक्रम सेहो गिनल—चुनल देखबाक अवसर भेटैत अछि । आगाँ बढ़क अछि तऽ एकाग्रचित भऽ उद्देश्य पूर्तीक हेतु लगबाक अछि । हुनका सभकेँ अहि सँ बेसी अपेक्षा नहि अछि । ओ अपनामे मस्त किताब सँ सटल रहैत अछि । किछु दिन सँ एकटा शब्द बेर बेर ओकर मस्तिष्कमे हथौड़ी जकाँ बजैर रहल अछि — “की होइत छैक बलात्कार ?” किए बलात्कारक बाद लड़कीक आत्महत्या करय पडैÞत छैक, परिवार जन मुह नुकबैत रहैत अछि । एतेक सोचि ओकर बुद्धि हारि जाइत अछि । शब्दकोष छानि मारलौं, मुदा अर्थ नहि भेटल ,एहन कोन जबरदस्ती एहन कोन बल—प्रयोग ? किछु बुझबामे नहि आबि रहल छल । ई की छैक । ओकर उत्सुकताक अन्त नहि छलै । किए नहि आई सपना पूरा कऽ लिय ? ज्ञानो भेटि जाएत आ आत्महत्या सेहो नहि करय पड़त । तीन वर्ष पूर्व पड़ोसक रितू आन्टी ओकरा अपना घर लऽ गेल छल आ बहुत बैज्ञानिक ढंग सँ ओ ओकरा ‘फैक्ट टच लाईफ’ के विषयमे बतौने छलै । अचानक ओकरा सभकिछु नव लागि रहल छल जेना ओ जागि गेल हो । ओकरा किछु बेसी देखाई देबय लगल हो, किछु आवाज सुनाय लागल छल । किछु स्पष्ट बुझयमे आबय लागल छलै । मुदा बलात्कार शब्द मात्र एक रहस्य बनल रहल । से एकरा जानय—बुझयकें एहि सँ बढ़िया अवसर अओर की भऽ सकैत अछि ? ड्राइवर उत्साह बढ़बैत पूछलक, “ कतय जाएक अछि बेटी ? आउ, बसि जाउ । आगा शहरमे छोड़ि देब । एतय कोसो तक कियो लोक नहि रहैत छैक । बहुत मुश्किल सँ जयन्ती किछु हिम्मत जुटा पौलक । ओ सोचय लागल किछु बाजय पड़त तऽ झूठ किए नहि .............। से बाजल— ‘बाट भुतिया गेल छी लिफ्ट दऽ दीअ ?’ “मुदा अहाँ एलौं कतय सँ ?”, घर सँ भागि कऽ एलौं । बिना किछु सोचने उतर देलक । फेर देखलक दूनु व्यक्तिक उत्सकुकता किछु शान्त भऽ गेल छल । से आगाँ बाजल— “ दिनभरि एहि सड़कपर चलैत रहल छलौं । जखन थाकि गेलौं तऽ एकटा गाछक जाड़िमे सूति रहलौं । एखन निन्न टुटल... बहुत डर... लागि रहल अछि । ” “ से त ठीक अछि मुदा जएबाक कतय अछि ?” ड्राइवर पूछलक । एकर उत्तर ओकरा लग नहि छल । ओ चुप्प रहल । “ ठिक छै चलू, बैसू । शहर तक छोड़ि देब । ” ओ सोचय लागल कि दूनु बीचमे बैसाक’ .... बाटभरि ओ हमरा सँ मजाक करत..... बलात्कार करत आ हमरा बलात्कार केना होइत छैक की होइत छैक, तकर जानकारी भेटि जाएत, मुदा से भेल नहि । दूनु सकुचि गेल आ ओकरा खिड़की लग बैसा देलक जयन्तीक डर भगावय के लेल ड्राइवर एकटा अभिभावक जकाँ ओकरा उपदेश देबय लागल । शहर पहुँचला पर पुलिस चौकी लग उतारैत ओकरा माथ पर हाथ फेरैत कहलक— घर चलि जाएब.... वैह अहांक अपन अछि..... अहाँकें नीक देखय वाला वैह सभ छथि..... ” कहि ट्रकमे सवार भऽ चलि गेल । पुलिसक विषयमे जयन्ती सेहो बहुत किछु सुनने आ पढ़ने छल । ओ सोचय लागल की एखनो किछु नहि विगड़ल । एखनो एतय काम बनि सकैत अछि । मुदा दूटा पुलिसकेँ देखि ओकर करेजक धुक धुक्की बढ़ि गेल, हाथ पाएर ठण्ढ़ा होबय लागल । “के छेँ.... की काम छौं ? ” “हम बाटे बिसरि गेलौं हएँ.... एतऽ बसि जाउ ? दूनु पुलिस एक दोसर दिस देखय लागल । जयन्तीक हृदय धुक—धुक करय लागल की शायद आब ओकर उत्कण्ठाक अन्त होबय लागल अछि । ओ भय सँ काँपय लागल । “ की नाम छौ तोहर ? “रुना” बुद्धि एतेक सजग छलैक कि ओ अपन सही नाम तक नहि बतौलक । बापकेँ, नाम की छौ ? कतय रहैत छें ? की सोचै छें ? ओ ई सोचि कऽ एक के बाद दोसर फूसि बजैत गेल कि पता ई सपना नहि होअय...... सत्य मिलत ? ओ अपन प्रियजनक लेल कतेक लज्जाक कारण बनि जाएत । नहि—नहि स्वयं मरि जाएत, मुदा अपन परिवारजन्यकें कोनो हालतमे बेइज्जति नहि होबए देत । “ लगैत अछि कोनो अपराधी अछि”, एकटा पुलिस बाजल । एखने बन्द कऽ दू डण्डा पड़तै तँ सत्य अपने उगिल देत । “ नहि—नहि” डरे जयन्तीक कण्ठ अवरुद्ध भऽ गेलैक । किछु क्षण अपनाकें नियन्त्रित करैत बाजल, “ अपराधी होइतौं तँ स्वयं एतय अबितौ ? ९ कक्षाक विद्यार्थी छी । काका वकील छथि । हड़बड़ाहटमे एतेक सत्य ओकरा सँ बजा गेल छलै । “ लगैत अछि घर सँ भागि कऽ आएल अछि, “ दोसर पुलिस बाजल, “नवालिग अछि एतय बैसय देब ठीक नहि अछि । बिना बातक बतंगड़ भऽ सकैत अछि ।” जयन्ती थकमकाइत नहुँए सँ बाजल— “हम घर नहि जायब” , कहऽ चाहि रहल छल हमरा सँग जे चाहैत छें से कऽ ले..... बलात्कार कऽ ले, मुदा नहि जानि ओकरा कोन संस्कार आबि कऽ ओकर मुह बन्न कऽ देलक । “राति कऽ हम तोरा एतय बिना महिला पुलिसके नहि राखि सकैत छियौ । या तऽ तोरा चौकी जाए पड़तौक वा फेर नजदीकक धर्मशालामे । बाँकी काल्हि देखबै । आगाँ की करबाक छैक”— एक पुलिस बाजल । जयन्ती चुपचाप धर्मशालामे आबि गेल । दोसर दिन कोनो तरहे जयन्ती धर्मशाला सँ निकलि आएल । जयन्ती आब एक साइकल लग ठाढ़ तीन युवक सँग गप्प कऽ रहल छल । तीनू ओकरा ललायित नजरि सँ घुरि रहल छल । जयन्ती सोझे प्रस्ताव रखलक, “हमरा अहाँ सिनेमा देखाएब?” ओ सभ किछु सोचैत एक दोसर दिस देखऽ लागल । ” कि वस्तु छैक?” “विलाड़िक भागे सीक टूटल” दोसर हँसल । “ककरा सँग देखब” तेसर पुछलक । अहाँ तीनू के सँग” ओकर उत्तर छलैक । आउ हमरा साइकल पर बैसि रहु, ओहिमे सँ एक गोटे बाजल जयन्ती कने झिझकैत संकोच सँ बाजल, ” जी नहि हम पयरे चलब, आ ओ सभ सिनेमा हाँल दिस बढ़ि गेल ।’ जखन तक सिनेमा शुरु नई भेल ताबत धरि शान्ति रहल । सिनेमा शुरु होइते मानू बिहारि आबि गेल । छीना झपटी शुरु भऽ गेल । ओ क्रमशः घबराहटिमे कखनो एकर तऽ कखनो ओकर हाथ हटबैत रहल । मुदा, अवस्था ओकर नियन्त्रण सँ बाहर होइत जा रहल छल । जखन एक हाथ ओकर सलवार दिस आ दोसर छाती दिस सरकय लागल तँ झट सँ ठाढ भऽ गेल । फेर ट्वाइलेट जएबाक अछि कहि, जल्दी सँ बाहर निकलि आएल । दूटा युवक सेहो पाछु लागि गेल । किछु देरक बाद बाहर निकलल आगाँ दूनु युवककेँ ठाढ़ देखलक । झट सँ फेर ट्वाइलेटमे घुसि गेल । आ सिनेमा समाप्त होएबाक प्रतिक्षा करय लागल । सिनेमा समाप्त होइते भीड़क लाभ उठा कोनो तरहे ओतय सँ भागि गेल । आब ओ घर घुमैत भीड़मे सँ एक छल । ओकरा पता छलै, कियो ओकरा ताकि रहल छै । भीड़मे अपनाकेँे नुकबैत अनजाने बाटमे ओ आगाँ बढैेत रहल । एखन तक ओ एक विचित्र भय सँ काँपि रहल छल, जेना कोनो चोरी कएने हो वा कोनो बड़का अपराध । सपना शायद सत्य भऽ गेल छल । ओ पूर्णरुपमे सत्यकेंँ झेलि रहल छल । स्वप्नक सुरक्षा नहि जानि कतय हेरा गेल छलैं । देखलक समीप मन्दिरमे आरती भऽ रहल छै । मन्दिरमे प्रवेश कएलक ओतय भीड़ छलै । ओहिमे ओ सम्मिलित भऽ गेल । भय सँ शरीर सुन्न भेल जाइत रहैक तएँ एकटा पायामे सटि कऽ आँखि बन्न कऽ लेलक । कखन आरती समाप्त भेल आ लोक चलि गेल जयन्तीकेँ पतो नहि चललै । आँखि खुजलै तऽ एकटा साधुकें अपना दिस घुरैत देखलक । कोनो स्वचालित यन्त्र जकाँ आगाँ बढ़ल आ हुनकर चरण स्पर्श कएलक । ओकर गरा अवरुद्ध भऽ गेल छलैक । किछु बाजब ओकरा बसक बात नहि छलैक । “ तोहर मनकाना पूरा हेतौ.............उठ धैर्य सँ काम ले” जयन्ती उठि कऽ ठाढ़ भेल । ओ साधुक आँखि दिस देखलक । एकटा विचित्र ज्वाला धधकि रहल छलै ओहि साधुक आँखिमे । साधु ओकरा अपना पाछा अएबाक हेतु कहलक आ यन्त्रवत् हुनकर पाछु—पाछु जाय लागल । हुनक पाछु चलि मन्दिरक प्राङ्गण पार करैत ओ एकटा कोठरीमे प्रवेश कएलक । भितर घुसिते’ द्वार अपने धड़ सँ बन्द भऽ गेल । ओ बन्न द्वारकेँ देखैत थकमका कऽ ठाढ़ भऽ गेल । “ चलि आ’ “ पलटि कऽ देखलक तँ भीतरक दोसर प्रवेश द्वार पर ठाढ़ साधु ओकरा कहि रहल छल । झिझकैत मोन सँ ओ दोसर द्वार पार कएलक तऽ ओहो धड़ाक दऽ अपने बन्न भऽ गेल । ओ डेरा कऽ, बन्न द्वार केँ देखय लागल । साधुक पुनः आदेशात्मक स्वर ओकरा कान सँ टकरएलै— “चलि आ” देखलक ओ आब भितर तेसर द्वार पर ठाढ़ छल । किछु क्षण ठाढ़ रहल । भक्तिपूर्ण विश्वास सँ पुनः ओ आगा बढ़ल । धड़ाक दऽ तेसरो द्वार बन्न भऽ गेल । आब साधु चारिम द्वार पर ठाढ़ ओकर प्रतीक्षा कऽ रहल छल । जयन्तीक डर सँ हृदय धड़कय लगलै, गर सुखि गेलै । पैर काँपय लगलै । ओ सिनेह सँ भरि गेल की साधुक भेषमे कतेको राक्षस घुमैत अछि, मुदा की करत..... बेसी सँ बेसी ओतबे करत ने, जकर जिज्ञासा सँ एतय धरि आएल छी ।से अपनाकेँ मजगुत कऽ द्वार पार कऽ गेल । । देखलक आगाँ एकटा आओर द्वार छल, जतय साधु ठाढ़ छल । केबाड़ लग सँ धूप जड़बाक सुगन्ध ओकर तनमनमे व्याप्त होबय लागल । एकटा छोटका दीप सेहो जरैत देखि रहल छल । मदहोश वातावरणमे ओकर तनमन शिथिल होइत बुझेलै ओतय ओकर बुद्धि सजग होइत जा रहल छल । ओकरा विश्वास होइत जा रहल छल कि एहि पाँचम द्वार केँ पार कएलाक बाद बाँकी सभद्वार ओकरा लेल सभदिनक लेल बन्द भऽ जाएत । “ आ तखन साधुक फेर ओहने आदेशात्मक स्वर सुनाए देलक । जयन्ती हुनकर बात जेना नई सुनने हो । ओकर प्रज्ञा ओतय सँ भगवाक आदेश दैत हो एहन अनुभूति होइते घुमल आ जाही बाटे’ आएल छल ओम्हरे भागय लागल ।” ओ भगैत जा रहल छल अज्ञान सँ ज्ञान दिस ? शून्य दिस चेतना दिस ? जागरण दिस ? शायद ओकरा एकटा जानकारी भेट गेल छलै । नइ ई ठीक नई अछि । अचेतन मनमे सेहो किछु जन्मजात संस्कार एहन होइत अछि, जकर सीमाकेँं उल्लंघन स्वप्नमे सेहो सम्भव नहि अछि । शायद ओकरा जानकारी भऽ गेल छलै की स्वप्न अपन अनुभवक आधारभूत घटना पर केन्द्रित रहैत अछि । स्वप्न सँ अज्ञानताक नाश नहि होइत अछि, ज्ञान नहि भेटैत छैक । हारैत हारैत नेपाल पत्रकार महासंघक केन्द्रीय अध्यक्ष नेपालमे एकटा कहावत अछि नेपालक एकीकरणक समयमे पृथ्वीनारायण शाह कतेको ठाम हारि गेल रहथि । निराश भऽ अपन घरमे अराम कऽ रहल रहथि की देखलखिन एकटा चुट्टी किछ पर चढयकेँ प्रयास करैत छल आ ओ बीचमे खसि परैत छल । चुट्टी के देखलखिन चारि पाँच वेरक प्रयासक वाद ओ चढि गेल । एकरवाद हुनका एकटा ज्ञान भेटलन्हि आ पृथ्वीनारायण शाह फेर सँ एकीकरण अभियानमे जुटि गेलाह , एखनकेँ नेपाल अछि तकर निर्माण भऽ सकल । करीब—करीब नेपाल पत्रकार महासंघक केन्द्रीय अध्यक्ष धर्मेन्द्र झा सँग एहने स्थिति भेल अछि । ओ चुट्टी तऽ नहि देखलथि मुदा पत्रकारक नेतृत्व करबाक अछि से अठोट हुनका केन्द्रीय अध्यक्ष बना देलक । धर्मेन्द्र २०५१ सालमे नेपाल पत्रकार महासंघ धनुषाक कोषाध्यक्षमे हारल रहथि । फेर २०५४ सालमे केन्द्रीय सदस्य पदमे, २०५९ सालमे केन्द्रीय सचिव पदमे , २०६२ सालमे महासचिव पदमे हारल रहथि । किछ गोटे तऽ हुनका हरुवा पुरुष तक कहय लागल छलनि । मुदा २०६५ सालमे नेपालक पत्रकार सभक सभसँ वडका पद महासंघक केन्द्रीय अध्यक्ष भऽ गेलथि । नेपाल पत्रकार महासंघक पूर्व अध्यक्ष तारानाथ दहाल कहैत छथि– ‘महासंघक नेतृत्व करबाक अछि से अठोट आ पत्रकार सभ बीच सम्वाद कायम राखब धर्मेन्द्रकेँ अहि स्थान पर पठौलक ।’ धर्मेन्द्र अहि बीचमे २०५६ सालमे केन्द्रीय सदस्यमे मात्र जितल छलथि । ओ स्वंय कहैत छथि — ‘केन्द्रीय कमिटीक विभिन्न पदमे हारलौ तहुँ सँ बेसी जनकपुरमे कोषाध्यक्ष पदमे हारल छलौं तहिया बड दुःख भेल छल ।’ ३०/३५ गोटे सदस्य रहल जिल्लामे हारि गेलौं तकर बाद प्रण लेने रही जे केन्द्रक प्रमुख पदपर पहुँच सभकेँ देखा देबै । कहियो नेता बनयकेँ सपना देखने धर्मेन्द्र रामस्वरुप रामसागर बहुमखी क्याम्पस जनकपुर अन्तर्गतक स्वतन्त्र विद्यार्थी युनियनक सदस्य आ नेपाल विद्यार्थी संघ धनुषाक उपाध्यक्ष सेहो भेल रहथि । मुदा स्ववियू कालमे २०४३ सालमे चहल पहल नामक भिते पत्रिका निकाललथि । आ सम्पादक भेलाक बादक लोकप्रियता वा प्रभाव हिनका अहि दिस खिच लेलक । ओ अपन स्ववियूकालमे जागृति नामक पत्रिकाक सम्पादक सेहो भेल रहथि । मैथिली आ राजनीति शास्त्र सँ एम.ए आ इन्डियन इन्स्टिच्यूट अफ मास क्म्युनिकेशन दिल्ली सँ डिप्लोमा धरिकेँ पढाइ कएने धर्मेन्द्र पत्रकारिता केँ पेशा बनौलथि । धर्मेन्द्रक बाबु राजेन्द्र झा कहैत छथि– ‘धर्मेन्द्र लग क्याम्पसमे टिचिङ्ग करब, अन्य सरकारी नोकरी दिस जाएब आ पत्रकारिता करब तिनटा विकल्प छल । मुदा हम देखलियै धर्मेन्द्रक इच्छा पत्रकारिता दिस वेसी अछि । पत्रकारितामे बहुत रास कठिनाइ छैक बुझलाक बादो हमसभ कोनो रुकाबट नहि कएलौ ।’ जाहि लगन सँ ओ काज करैत छलथि हमरा विश्वास छल ओ एक दिन बढिया करता राजेन्द्र आगा कहलन्हि । २०२३ चैत ४ गते माता मनोरमा झा आ पिता राजेन्द्र झाक जेष्ठ पुत्रक रुपमे सिरहा जिल्लाक गोविन्दपुर वस्तिपुरमे जन्म लेनिहार धर्मेन्द्र जहिना पत्रकारक नेता छथि तहिना लेखन क्षेत्रमे सेहो चोटी पर छथि । काठमाण्डू सँ प्रकाशित अन्नपूर्णापोष्ट दैनिकक समाचार संयोजक छथि । धर्मेन्द्र हिमालय टाइम्स दैनिककेँ कार्यकारी सम्पादक सेहो रहि चुकल छथि । जनकपुरमे धर्मेन्द्रक सम्पादनमे प्रकाशित नवविचार साप्ताहिक पत्रकारितामे एकटा अलग चिज देने छल । प्रत्येक हप्ता अन्तरवार्ता, व्यंङ्ग, समाचारमे विविधता ओहि पत्रिकाक विशेषता छल । ओना व्यवसायिक पत्रकारिता माधव आचार्यक सम्पादनमे जनकपुर सँ प्रकाशित जनआकांक्षा आ विएम खनालक सम्पादनमे प्रकाशित विदेह साप्ताहिक सँ शुरु कएने छथि । साहित्यमे सेहो धर्मेन्द्रके प्रयोगवादी कविक रुपमे चिन्हल जाइत अछि । धर्मेन्द्रक रस्ता तकैत जिनगी, एक श्रृष्टी एक कविता , एक समयक वात, धुनियाएल आकृतिसभ सनक हिनक मैथिली संग्रह आएल अछि । तहिना नेपालीमे गोनु झाका कथाहरु , कौशलका परिहास सहित दर्जन सँ बेसी पुस्तक प्रकाशित अछि । पुरस्कारक बात जँ कएल जाए तऽ २०५५ सालमे नेपाल विद्याभूषण ‘ख’, रिपोर्टस क्लबद्वारा २०६० सालमे वेष्ट जर्नलिस्ट अवार्ड , २०६४ सालमे नागाअर्जुन वेष्ट पब्लिकेशन पुरस्कार , २०६५ सालमे राष्ट्रीय प्रतिभा पुरस्कार देल गेल अछि । भारत , अमेरिका , श्रीलंका, बंगला देश, कतार, नर्बे, फिन्लैण्ड , डेनर्माक, स्वीडेन आ जर्मनीके भ्रमण कऽ चुकल धर्मेन्द्र के आगा बढाबयमे माता पिताक अतिरिक्त कनिया मुन्नी झाक सेहो महत्वपूर्ण योगदान रहल ओ प्रसंगक क्रममे वेर वेर कहलन्हि । देशक पत्रकारसभके श्रमजीवि ऐन अन्तर्गत मिडियासभ तलब दौक, विना नियुक्ती पत्रके देशक कोनो पत्रकार के काज नहि करय परैक ताहि अभियानमे ओ आ हुनक नेपाल पत्रकार महासंघ अखन लागल अछि ओना मैथिलीक अभियानी लोक सेहेा छथि । मैथिली भाषा साहित्य कला साँस्कृतिकेँ कोना बढाओल जाय ताहिमे लागल रहैत छथि । फेर सफलताक शिखर पर चढलाक बादो धर्मेन्द्र अपन कैरियरकेँ प्रति ओतबे गम्भीर छथि जतेक २०/२५ वर्षक युवा रहैत अछि । नेपालमे मिथिला राज्य की सम्भव छैक ? नेपालक संविधानसभाक राज्य पूनर्संरचना तथा राज्यक शक्ति बाँटबखरा समिति अपन प्रतिबेदनमे मिथिला भोजपुर कोच मधेश नामक राज्य रखलाक बाद मिथिला नाम सँ राज्य बनत तकर सम्भावना बढल अछि । नेपालमे १४ टा राज्यक आवश्यक्ता रहल ओ प्रतिवेदनमे उल्लेख अछि । राज्य पूनर्संरचना तथा राज्यक शक्ति बाटबखरा समितिक सदस्य राम चन्द्र झा कहैत छथि –‘नयाँ संविधान निर्माणक लेल समितिक प्रतिवेदनकेँ आधिकारिकता महत्वपूर्ण रहल तएँ नेपालमे मिथिला राज्य हैत, अहि गप्पकेँ नजर अन्दाज नहि कएल जा सकैत अछि ।’ मिथिला राज्य संघर्ष समिति सेहो आव मिथिला राज्य हैत ताहिमे कोनो भाँगठ नहि रहल कहैत अछि । संघर्ष समितिक संयोजक परमेश्वर कापड़ि कहैत छथि–‘नेपालमे राज्यक लेल जे तत्वसभ चाही से मिथिला लग मात्र छल तएँ ई तऽ होबहेके छल । तखन मिथिला संग आओर नाम जोडि देल गेल अछि , ताहि पर हमरा सभकेँ आपत्ति अछि ।’ (नीचाँक नक्शाकेँ पैघ रूपमे देखबा लेल क्लिक करू) ‘मिथिला भोजपुरा कोच मधेशक स्थानपर मिथिला मात्र रहैत तऽ बेशी प्रशन्नता होइत’ कापडि आगा कहलन्हि । ओना राज्य पूनर्संरचना तथा राज्यक बाँटबखरा समितिक सदस्य एवं पूर्व मन्त्री राम चन्द्र झा कहैत छथि –‘नाममे सेहो मिथिला अछि फेर एकर राजधानी सेहो जनकपुर तखन अओर सँ की लेना देना ।’ ओना विश्लेषक सभ राज्य पूनर्संरचना तथा राज्यक शक्ति बाँटबखरा समिति देशक प्रमुख आधिकारिक शक्ति होइतो एकर रिपोर्ट पर बहुत रास अभ्यास करबाक बाँकी रहल कहैत छथि । तएँ बहुत उत्साहित होएबाक आवश्यक्ता नहि अछि । मिथिला राज्यक स्थापनामे बाधा एक दिस राज्य पूनर्संरचना तथा राज्यक शक्ति बाँटबखरा समितिक प्रतिवेदन मे मिथिला राज्य स्थापनाक बात अएलाक बाद जहाँ किछ मैथिल संघ संस्था सभ उत्साहित अछि ओतहि एकर प्रतिवेदन अबिते नेपालमे विवाद ठाढ भऽ गेल अछि । नेपालक मधेशवादी दलसभ मधेश राज्यमे मिथिला उपराज्यक बात कऽ रहल अछि । नेपालक प्रमुख मधेशवादी दल मधेशी जनअधिकार फोरमकेँ केन्द्रीय अध्यक्ष उपेन्द्र यादव कहैत छथि –‘हम स्वयं मैथिल छी मुदा मिथिला क्षेत्रकेँ तखने विकास हैत जखन मधेश राज्यक स्थापना हैत आ ओहिमे मिथिला रहत ।’ ओ एक मधेश स्वायत्त प्रदेश बाहेककेँ बात बर्दास्त नहि कएल जा सकैत अछि कहलन्हि । मधेशी जनअधिकार फोरम नेपाल, मधेशी जनअधिकार फोरम लोकतान्त्रिक, तराई मधेश लोकतान्त्रिक पार्टी आ सदभावना पार्टी संयुक्त रुपमे एक मधेश प्रदेशकेँ लऽ कऽ आन्दोलन कऽ रहल अछि । मधेशी दलसभक विरोध मिथिला राज्य स्थापनामे सभ सँ बेसी बाधक बनि रहल अछि । मैथिल सभकेँ आपत्ति कतय बहुतो मैथिलकेँ नाम पर आपत्ति छन्हि । ओ सभ कहैत छथि ‘मिथिला भोजपुरा कोच मधेशक स्थान पर मात्र मिथिला रहबाक चाही । मिथिला लग राज्य बनबाक सभ सँ बेसी आधार अछि ।’ आधारकेँ प्रष्ट करैत रामानन्द युवा क्लब जनकपुरक अध्यक्ष दिपेन्द्र ठाकुर कहैत छथि– ‘मिथिला संगे इतिहास भुगोल मात्र नहि वर्तमान मे सेहो सभ चीज अछि ।’ एखन मिथिला भोजपुरा कोच मधेश राज्यक सीमा जे निर्धारण कएल गेल छैक से नेपालक झापा जिल्ला सँ पर्सा जिल्ला धरि अछि । जाहिमे करिव ४६ प्रतिशत मैथिली भाषी छथि । ५४ प्रतिशतकेँ नजर अन्दाज नहि कएल जा सकैत अछि । जँ सभ भाषाकेँ राज्य भाषाक रुपमे स्थान देल गेलै तऽ मैथिली भाषाकेँ बेसी क्षति हैत । जानकार सभक अनुसार मैथिली बाहेककेँ भाषा सेहो राज्यक भाषा भऽ सकैत अछि । ताहि सँ मैथिली भाषाकेँ जे अलग रुप सँ फाइदा होइतै से नहि हैत । ज्ञातहुए नेपालमे नेपाली भाषाक बाद सभ सँ बेसी बाजल जाय बला भाषा मैथिली अछि । मिथिला राज्य स्थापनाक आन्दोलन कतय मिथिला राज्य स्थापनाक आन्दोलन जाहि रुपमे बढबाक चाही से नहि बढि रहल अछि । खास कऽ डकुमेन्टेशनकेँ विषयमे जेना किछो नहि भऽ रहल अछि । एमाले नेता शितल झा, साहित्यकार डा. सुरेन्द्र लाभ, डा. विजय कुमार सिंह, पूर्व मन्त्री राम चन्द्र झा वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक सीके लाल, माओवादी नेता राम रिझन यादव ,डा. विरेन्द्र पाण्डे, साहित्यकार धीरेन्द्र प्रेमर्षि सहितक व्यक्ति सभक किछ कार्यपत्र आएल अछि मुदा ओहो संग्रहित नहि अछि । मिथिला राज्य स्थापनाक माँग केँ लऽ कऽ मिथिला राज्य संघर्ष समिति गठन तऽ भेल अछि मुदा एक वर्ष भितर आन्दोलनकेँ नाम पर सडकपर कवि गोष्ठी बाहेक तेहन उल्लेखनीय काज किछ नहि भेल अछि । ओना संघर्ष समितिक सचिव रमेश रञ्जन झा संघर्ष समिति खासे काज नहि कएलक अहि बातकेँ मानयकेँ लेल तैयार नहि छथि । ओ कहैत छथि ‘संघर्ष समिति मिथिला राज्यक लेल लविङ्गकेँ काज करैत आएल अछि ।’ ओना मिथिला नाट्यकला परिषद जनकपुर, रामानन्द युवा क्लबक अभियानकेँ सेहो नजर अन्दाज नहि कएल जा सकैत अछि । मुदा महिना दू महिना पर एकटा दू टा कार्यक्रम कऽ देलौं ताहि सँ ठोस उपलब्धि नहि भऽ रहल अछि । इतिहासमे मिथिला मिथिलाक परम्परागत सीमा बृहदविष्णुपुराणक मिथिला महात्म खण्डमे वर्णित अछि । जाहिकेँ आधार मानि कवीश्वर चन्दा झा मिथिलाक सीमा सम्वन्धमे अहि प्रकार वर्णन कएने छथि – गंगा बहथि जनिक दक्षिण दिशि, पूर्व कौशिक धारा पश्चिम बहथि गण्डकी उत्तर हिमबत बल विस्तारा कमला त्रियुगाअमृतृता धेमुड़ा वागमति कृतसारा मध्य बहथि लक्ष्मणा प्रभृति से मिथिला विद्यागारा अहि भूभागक विस्तार अहि प्रकार पूर्व पश्चिम करिव २९० किलो मिटर , उत्तर दक्षिण करिव १९३ किलो मिटर होइत अछि । जाहि अनुसार एकर कुल क्षेत्रफल ५५ हजार ९७० बर्ग किलो मिटर रहल अछि । ई क्षेत्र एखन नेपाल आ भारतमेँ बटि गेल अछि । जहाँ धरि मिथिलाक स्थापनाक बात अछि विदेध माधव सरस्वती तीर सँ आबि मिथिलामे आर्य सभ्यताक विस्तार कएलन्हि । आ विदेह वा जनक राज्य वंशक आधारशीला राखल गेल । अहि वंशमे जनक द्वितीय नाम सँ चर्चित शिर ध्वज भेल छलाह । जिनक पुत्री भगवती सीता रहथि । विदेह राज्य कुलक मिथिला पर शासनक समय ३००० ईश्वी पूर्व सँ ६०० ईश्वी पूर्व धरि अनुमानित अछि । नेपालमे मिथिला राज्य किया मिथिलाकेँ स्वर्णिम इतिहास अछि । मात्र नेपालेके लेल जाए तऽ कहियो मैथिली भाषाके प्रसार राज्य सभाधरि छल । राजधानी काठमाण्डूक मूल भाषा मैथिली छल । मुदा अखन मैथिली जनबोली धरि सिमित भऽ गेल अछि । एकर कला परम्पराक विकास होबय नहि सकि रहल अछि । भारतक मधुवनी पेन्टिङ्ग जतय विश्व बजारमे तहलका मचौने अछि ओतहि विश्व प्रसिद्ध मिथिला पेन्टिङ्गक एकटा सीमित बजार अछि । ओहु पर मैथिल सभक पहुँच नहि अछि । वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक सीके लाल कहैत छथि ‘मिथिला राज्यक आवश्यकता आँगुर पर नहि गनाओल जा सकैया’ । ओ समग्र मिथिलाक विकासक लेल मिथिला राज्यक आवश्यकता रहल बतौलन्हि । हुनक अनुसार मिथिलाक गुमल पहिचान पुनः प्राप्तीक लेल मिथिला राज्यक आवश्यकता अछि । सपथमे मैथिली नेपालक उपराष्ट्रपति परमानन्द झा उपराष्ट्रपति पदक सपथ मैथिली भाषामे लेलन्हि अछि । उपराष्ट्रपतिक सपथकेँ पुरे मिथिलाञ्चलमे चर्चा अछि । बहुतो गोटे मैथिली आन्दोलनकेँ सपथ सँ जोडैत छथि। उपराष्ट्रपति कार्यालयक अनुसार मैथिली भाषामे सपथ लेलाक बाद उपराष्ट्रपति झाकेँ सयकडो बधाई अहि दुआरे एलन्हि जे ओ मातृ भाषामे सपथ लेलथि । ओ अहि सँ पूर्व हिन्दी भाषामे सपथ लेने रहथि । मुदा हुनकर ओ सपथ नेपालमे भारी विवादमे आएल छल । मुदा मैथिलीमे लेलाक बाद ठिक विपरित भेल अछि । नेपाली भाषीसभ सेहो एकरा प्रशंसा कएने अछि । मैथिलीक युवा साहित्यकार धीरेन्द्र प्रेमर्षि कहैत छथि ‘नेपालमे विकल्पकेँ रुपमे हिन्दीकेँ प्रस्तुत करयबलाकेँ उपराष्ट्रपतिक नयाँ सपथ सँ चटकन लगलैक अछि । मिथिला राज्य संघर्ष समितिक संयोजक परमेश्वर कापड़ि आब मैथिलीकेँ कियो नहि रोकि सकैत अछि तकर एकटा छोटका उदाहरण रहल बतबैत छथि । नेपालमे मैथिली भाषामे सपथ लेबाक परम्परा नेपालमे मैथिली दोसर सभ सँ बेशी बाजय बला भाषा रहल अछि । कहियो काठमाण्डू उपत्यकाक राज्य भाषा मैथिली छल । ओतयकेँ राजासभ मैथिलीमे साहित्य लेखन सेहो करैत छलथि । मल्ल कालमे कएटा राजा एहन भेलथि । जिनकर एकटा साहित्यकारक रुपमे एखनो आदरकेँ साथ नाम लेल जाइत अछि । मुदा सपथकेँ इतिहास बहुत लम्बा नहि अछि । नेपालक संसदक तथ्याङ्क अनुसार डा. बंशीधर मिश्र नेपालक संसदमे पहिल बेर मैथिली भाषामे सपथ लेलन्हि । नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी (एकीकृत मार्क्सवादी लेलिनवादी)क नेता रहल डा. मिश्र २०५१ सालमे सपथ लेने रहथि । जहिया ओ मैथिली भाषामे सपथ लेलथि तहिया मैथिलीकेँ बात करब अपराध मानल जाइत छल, एहन स्थितिमे सपथ लेने रहथि । आब तऽ मिथिलाञ्चलक अधिकाँश नेता मैथिलीमे सपथ लैत छथि । हिन्दी भाषाकेँ गुणगान करयबला मधेशी जनअधिकार फोरमक सह अध्यक्ष जय प्रकाश प्रसाद गुप्ता सनक व्यक्ति सेहो मैथिलीमे सपथ लेने छलथि । अहि बेरक संविधान सभाक चुनावमे एकीकृत नेकपा माओवादी तऽ अपन सभासदसभ केँ अपन अपन मातृ भाषामे सपथ लेबाक लेल िह्वप जारी कएने छल । मैथिलीक चर्चित युवा साहित्यकार धीरेन्द्र प्रेमर्षिक शब्दमे मैथिली आन्दोलन सही दिसामे जा रहल अछि । तकर संकेत अहि बेरक संविधानसभाक सपथ देखलाक बाद लगैत छल । मन्त्रीक रुपमे पहिल बेर एकीकृत नेकपा माओवादीक तत्कालिन नेता मात्रिका प्रसाद यादव सपथ लेने रहथि । मैथिलीयोमे कम विवाद नहि उपराष्ट्रपति परमानन्द झा हिन्दीमे सपथ लेलाक बाद भारी विवाद भेल छल । एतेक तक की हुनका फेर सँ मैथिली भाषामे सपथ लेबय पडलन्हि । अहि सँ कम मैथिलीमे सपथ लेबयबलाकेँ नहि भेल छल । एकीकृत नेकपा माओवादीक तत्कालिन नेता मात्रिका प्रसाद यादव मैथिली भाषामे मन्त्रीपदक सपथ लेबाक इच्छा प्रगट कएलाक बाद तत्कालिन प्रधानमन्त्री गिरिजा प्रसाद कोइराला किछ घण्टाक लेल सपथ कराबय सँ रोकि देने रहथिन । मुदा मात्रिका यादव नहि झुकलथि आ ओहि समयक सरकारकेँ झुकय पडल छल । मात्रिका यादव कहैत छथि ‘ प्रजातन्त्र चलि एलैक, गणतन्त्र चलि एलैक आ एकटा भाषा एकटा भेषक नीति रहबे करतै, ई स्वीकार नहि अछि ।’ मैथिल छी अहि बातक गर्व अछि प्रसंगक क्रममे ओ कहलन्हि । संासदक रुपमे जहिया डा. बंशीधर मिश्र सपथ लेने रहथि तहियो विवाद भेल छल । आ ओ अडलथि तखन मैथिलीकेँ जीत भेल छलैक । सपथमे एतेक माथापिच्ची किएक मैथिली भाषामे सपथ लेला सँ मैथिलीकेँ की भेट जएतैक वा की भेट गेलैक ? कोनो नेताद्वारा सपथ लेलाक बाद एकटा छोटछिन कनफुसकी बहस अवश्य होइत अछि । मुदा मैथिली आन्दोलनीसभ अहि सँ आन्दोलनमे बल पहुँचैत अछि कहैत छथि । काठमाण्डू सँ प्रसारण होइत आएल कान्तिपुर एफएमक हेल्लो मिथिला कार्यक्रमक प्रस्तोता एवं चर्चित युवा साहित्यकार धीरेन्द्र प्रेमर्षि कहैत छथि ‘मैथिलक पहिचानक जतय संकट छैक ओतय छोट छोट चिज महत्व रखैत छैक । भारतक संसदमे जखन कीर्ति अजाद पाग पहिर कऽ जाइत छथि तऽ लोककेँ गौरव होइत अछि । तहिना नेपाल हुए वा भारत जखन मैथिल नेतासभ मिथिला मैथिलकेँ पहिचान बला कोनो बात करैत छथि तऽ गौरव होइत अछि । आ अहि सँ मैथिली आन्दोलनमे बल पहुँचैत अछि । सपथक लेल नेपालमे प्रयास नेतासभ मैथिलीमे सपथ लौथु ताहि लेल मैथिली आन्दोलनी संस्थासभ पञ्चायते काल सँ प्रयास करैत आएल अछि । नेतासभ चुनाव जितैथ तऽ अन्य व्यक्तिकेँ अन्य काज रहैक मुदा जनकपुरक मिथिला नाट्य कला परिषदक संस्थापक स्व.योेगेन्द्र साह नेपाली नेता सभकेँ घर घरमे जा कऽ मैथिली भाषामे सपथ लेबाक लेल आग्रह करथि । मैथिली विकास मञ्च काठमाण्डू आ धीरेन्द्र प्रेमर्षिकेँ योगदान सेहो नहि बिसरल जा सकैत अछि । जनकपुरक आकृति संस्था, राजविराजक मैथिली संस्थासभ सेहो अहिकेँ लेल काज कएने अछि। निमिष झा मैथिलीक युगद्रष्टा कोनो साहित्यमे किछ साहित्यकारसभ एहन होइत छथि जिनकर जन्म कोनो घटनाक रूपमे होइत अछि आ ओहि घटनासँ सम्बन्धित सम्पूर्ण साहित्य प्रभावित भऽ जाइत अछि । ओहन साहित्यकारक साहित्यिक व्यक्तित्व ओहि साहित्यक सर्वाङ्गीण विकासमे वरदानसिद्ध होइत अछि । ओहन साहित्यिक महापुरुष पूर्ववर्ती साहित्यिक परम्परा आदिक सम्यक अनुशीलन पश्चात अपन मान्यता एवम साहित्यिक योजना निर्दिष्ट करैत छथि । अपन कार्यसभक माध्यमसँ युगान्तकारी आ प्रभावशाली रेखा निर्माण कऽ अमरत्व प्राप्तकरैत छथि । मैथिली साहित्यक इतिहासमे विद्यापति एकटा एहने अतुलनीय प्रतिभाक नाम अछि । सम्पूर्ण मैथिली साहित्य हुनकासँ प्रभावित अछि । हुनकर प्रभाव रेखाकेँ क्षीण करबाक साहित्यिक क्षमता भेल व्यक्ति मैथिली साहित्यक इतिहासमे अखन धरि किओ नहि अछि । विद्यापति मैथिली साहित्यक सर्वश्रेष्ठ कवि छथि । हुनकेमे मैथिली साहित्यक सम्पूर्ण गौरव आधारित अछि । इतिहासकार दुर्गानाथ झा ‘श्रीश’क शब्दमे विद्यापति आधुनिक भारतीय भाषाक प्रथम कवि छथि । ओ संस्कृत साहित्यक अभेद्य किलाकेँ दृढ़तापूर्वक तोड़ि भाषामे काव्य रचना करबाक साहस कयलनि । हुनकरे आदर्शसँ अनुप्रेरित भऽ शङ्करदेव, चण्डीदास, रामानन्द राय, कवीर, तुलसीदास, मीरावाई, सुरदास सनक महान स्रष्टासभ अपन भक्ति भावनाक माध्यमसँ अपन मातृ भाषाकेँ समृद्ध कयलनि । मैथिली साहित्यमे विद्यापति युग ओतबे महत्वपूर्ण अछि जतबे अङ्ग्रेजी साहित्यमे शेक्सपियर युग, नेपाली साहित्यमे भानुभक्त युग, बङ्गालीमे रवीन्द्र युग तथा हिन्दीमे भारतेन्दु युग । विद्यापतिक रचनासभमे मिथिला पहिल बेर अपन वैशिष्टय भक्तिभावना, शृङ्गगारिक सरसता एवम् मौलिक साङ्गीतिक लय प्रस्फुटित भेल आभाष कयलक अछि । ओकर बाद विद्यापतिक पदावलीसभ जनजनक स्वर बनि सकल तऽ मिथिलामे युगोसँ व्याप्त असमानताक अन्त करैत विद्यापतिक रचनासभ समान रूपसँ लोकस्वरक रूप ग्रहण कऽ सकल । वास्तवमे विद्यापति युगद्रष्टा रहथि । ओ मैथिली साहित्यक श्रीवृद्धिक लेल अथक प्रयास मात्र नहि कयलनि, तत्कालीन समयमे पतनोन्मुख मैथिल समाजक पुनर्संरचनाक लेल सेहो मद्दत पहुँचौलनि। विद्यापतिक प्रादुर्भावक समयमे भारतीय उपमहाद्वीपक प्रायः हरेक भागक सभ्यता आ संस्कृति सङकटपूर्ण अवस्थामे छल । मुसलमानी शासकसभक आतङक चरमोत्कर्षमे रहल ओहि समयमे मैथिल संस्कृतिक रक्षा आवश्यक भऽ गेल छल । ओहन अवस्थामे विद्यापतिक आगमन मैथिली साहित्य आ संस्कृतिक विकासक लेल महत्वपूर्ण वरदान सिद्ध भेल । एक दिस मुसलमानी शासकसभक आक्रमण आ दोसर दिस बौद्ध धर्मक बढ़ैत प्रभावक कारण समाजमे सिर्जित वैराग्यक मनस्थितिसँ आक्रान्त मैथिल सभ्यता आ संस्कृति अपन उन्नयनक रूपमे सेहो विद्यापतिकेँ प्राप्त कऽ अपन मौलिकता बचाबयमे सक्षम भेल । विद्यापति अपन विविध रचनासभक माध्यमसँ सामाजिक पुनर्संगठनक प्रक्रियाकेँ बल देलनि । ओ समाजसँ पलायन भऽ रहल मैथिल युवासभकेँ समाज निर्माणक मूल धारामे प्रभावित करएबाक लेल अथक प्रयास सेहो कयलनि । हुनकर एहने प्रयासक उपज अछि शृङ्गगारिक रचना सभ । मुसलमानसभक आक्रमणसँ पीडित आ पलायन भऽ रहल तत्कालीन मिथिलाक युवासभकेँ मुसलमान विरुद्ध प्रयोग कऽ मिथिलाक अस्तित्व रक्षा करबाक लेल विद्यापतिक ई रचनासभ सहयोगी प्रमाणित भेल । तत्कालीन समयक लेल विद्यापतिक अहि प्रकारक चातुर्यकेँ कुटनीतिक सफलताक रूपमे देखल जा सकैया । समाजमे व्याप्त असमानाता, कुरीति, अन्धविश्वास सहित विभिन्न विसङगतिसकेँ मानव प्रेम एवम भाषा उत्थानक भरमे विद्यापति अन्त करबाक काजमे सफल छथि । विद्यापतिक सम्पूर्ण रचनासभ शृङ्गगार आ भक्ति रससँ ओतप्रोत अछि। कतेको विद्वानसभ विश्व साहित्यमे विद्यापतिसँ दोसर पैघ शृङ्गगारिक कवि आन किओ नहि रहल कहैत छथि । महाकवि विद्यापति तत्कालीन समाजमे प्रचलित संस्कृत, अवहठ्ठ आ मैथिली भाषाक ज्ञाता छलथि । ई तीनु भाषामे प्राप्त रचनासभ अहि बातकेँ प्रमाणित करैत अछि। यद्यपी विद्यापतिक जन्म तथा मृत्युक सम्बन्धमे विभिन्न विद्वानसभक विभिन्न मत अछि । तथापि मिथिला महाराज शिव सिंहसँ ओ दू वर्षक जेष्ठ रहथि । अहि तथ्यक आधार पर विद्वानसभ हुनकर जन्म तिथिकेँ आधिकारिक मानैत छथि । कवि चन्दा झा विद्यापतिद्वारा रचित पुरुष परीक्षाक आधार पर विद्यापति राजा शिव सिंहसँ दू वर्ष पैघ रहथि उल्लेख कयने छथि । जँ ई तथ्यकेँ मानल जायतऽ सन् १४०२ मे राज्यारोहणक समयमे राजा शिव सिंहक उमेर ५० वर्ष छल आ विद्यापति ५२ वर्षक रहथि । अहि आधार पर विद्यापतिक जन्म सन् १३५० मे भेल निश्चित अछि। डा.सुभद्र झा, प्रो. रमानाथ झा, पं. शशिनाथ झा आदि विद्वानसभ ई मतकेँ स्वीकार करैत छथि मुदा डा.उमेश मिश्र, डा.जयमन्त मिश्र सहितक विद्वानसभ विद्यापतिक जन्म सन् १३६० मे भेल कहैत छथि । अहिना विद्यापतिक मृत्यु प्रसङ्गमे सेहो एक मत नहि अछि । अपन मृत्युक सम्बन्धमे मृत्यु पूर्व विद्यापति स्वयंद्वारा रचित पद विद्यापतिक आयु अवसान कात्तिक धवल त्रयोदशी जानेकेँ तुलनात्मक रूपमे अन्य मत सभसँ अपेक्षाकृत युक्ति संगत मानल गेल अछि । मुदा अहिसँ वर्षक निरुपण नहि भेल अछि । विद्यापतिक जन्म हाल भारतक बिहार राज्यक मधुवनि जिल्ला अन्तर्गत बिसफी गाममे भेल छल । ई मधुवनी दरभङ्गा रेल्वे लाइनक कमतौल स्टेसन लग अवस्थित अछि । हिनक पिताक नाम गणपति ठाकुर आ माताक नाम गंगादेवी रहनि । हाल विद्यापतिक वंशजसभ सौराठमे रहति छथि । विद्यापति बालके कालसँ कुशाग्र वुद्धिक अलौकिक प्रतिभाक रहथि । अपन विद्वान पिताक सम्पर्कमे ओ प्रारम्भिक शिक्षा ग्रहण कयलनि । मुदा औपचारिक रूपमे प्रकाण्ड विद्वान हरि मिश्रसँ शिक्षा ग्रहण कयलनि । तहिना प्रकाण्ड विद्वान पक्षधर मिश्र विद्यापतिक सहपाठी रहनि । विद्यापति मैथिली साहित्यक धरोहर मात्र नहि भऽ संस्कृतक सेहो प्रकाण्ड विद्वान रहथि । ओ मैथिली आ अवहठ्ठक अतिरिक्त संस्कृतमे सेहो अनेको रचना कयने रहथि । हुनकर रचनासभकेँ तीन भागमे वर्गीकरण कयल जाइत अछि । क) संस्कृत ग्रन्थ ः भू–परिक्रमा, पुरुष परीक्षा, शैवसर्वस्वसार, शैवसर्वस्वसार प्रमाणभूत, लिखनावली, गङ्गा वाक्यावली, विभागरि, दान वाक्यावली, गया पत्तलक, दुर्गाभक्ति तरङ्गिणी, मणिमञ्जरी, वर्ष, व्रत्य, व्यादिभक्ति तरङ्गिणी । ख) अवहठ्ठ ग्रन्थ ः कृतिलता, कृतिपताका ग) मैथिली ग्रन्थ ः गोरक्ष विजय आशीष चौधरी, चरैया, अररिया २ टा बीहनि कथा १ एकटा कार सँ एकटा चिड़ियाँ टकराए गेल आर बेहोश भऽ गेल। कार मालिक बढ़ियाँ (बड्ड नीक) आदमी छलै। कार मालिक चिड़ियाँ केँ उठाए केर अपन घर आन लक आर चिड़ियाँ केँ पिंजड़ा मे डाएल (बन्द क) देलक। आर सोचलक जखन चिड़ियाँ ठीक भऽ जाएत तखन उड़ाए देब। जखन चिड़ियाँ केँ होश आएल तँ चिड़ियाँ सोचलक लागेये जँ कार मालिक टकराएबे मे (दुर्घटना मे) मरि गेल ये तँ हमरा उम्र केद केँ सजा भऽ गेल ये। २ जहाज केर अपन उड़ब पर बड्ड (बहुत) घमंड छलै। लेकिन एक दिन जहाज केँ पास सँ एकटा रॉकेट बड्ड तेजि सँ निकलि गेल। जहाज केँ बड्ड हेरानि लागल (भेल) जे हमरो सँ तेज कोई उड़ि सकैत ये। जहाज केँ नहि रहल गेल आर रॉकेट केँ पुछलक भाइ अहाँ एतना तेज कोना उड़ैत छिये? रॉकेट कहलक भाइ जखन अहाँ केँ पाछु मे आगि लागल रहत ने तखन अहों एतना तेज उड़ै लागब। नवेन्दु कुमार झा पचास वर्षक भेल प्रादेशिक समाचार एकांश- १९९३ मे प्रारंभ भेल छल मैथिली मे समाचारक प्रसारण आकाशवाणी पटनाक प्रादेशिक समाचार एकांश 28 दिसम्बर 2009 के अपन स्थापनाक पचास वर्ष पूरा कएलक अछि। आकाशवाणीक पटना केन्द्र सँ 28 दिसम्बर 1959 के जे प्रादेशिक समाचारक प्रसारणक प्रांरभ भेल ओ बिना कोनो बाधा के प्रसारित भऽ पाछा नहि देखालक आ समाचार पर अपन गहिर नजरि रखने समाचार के जनता धरि पहूचैबा मे कोनो कसरि नहि छोड़लक अछि। प्रारंभहि सँ एहि एकांश सँ जूड़ल समाचार संपादक आ हुनक सहयोगीक दल सीमित साधनक बावजूद एकरा मजभूत स्तम्मक रूपमे ठाढ़ कएलनि। बिहारक जनता के समाचार जगत सँ जोड़बाक जे काज आकाशवाणीक प्रादेशिक समाचार एकांश कएलक से अनवरत चलि रहल अछि । आजादीक बाद देशभरि मे आकाशवणीक पाच टा केन्द्र छल। ओना आजादी सँ पहिने देश भरि मे आठरा केन्द्र छल जाहिमे देशक बैटवाराक बाद तीनरा केन्द्र पाकिस्तान मे रहि गेल। स्वतंत्रता प्राप्तिक बाद एहि संचार माध्यमक विस्तार प्रारंभ भेल आ सौभागय सँ एकहि वर्षक भीतर 26 जनवरी 1949 के आकाशवाणीक पटना केन्द्र सँ समाचार क प्रसारण पहिल बेर 1959 मे प्रारंभ भेल। समाचार एकांश दिल्लीक तात्कालिक सहायक समाचार संपादक गुरूदत्त विधालंकारक नेतृत्व मे समाचारवाचक रामरेणु गुप्त आ संवाददांता रवि रंजन सिन्हाक दल काज करब प्रारंभ कएलक। हुनक आ संवाददाता रवि रंजन सिन्हाक दल काज करब प्रारंभ कएलक। हुनक प्रयास सँ एकरा रोमांचक क्षण आएल आ 28 दिसम्बर 1959 के सांस सात बाजिकऽ पाच मिनट मे प्रादेशिक समाचारक पाच मिनटक पहिल बुलेटि आकाशवाणी पटना सँ प्रसारित भेल। देश-दूनिया सँ बिहारक जनता के जोड़बाक लेल प्रारंभ भेल ई प्रयास अपन गति पकड़लक आ एकर समय क संगहि समाचारक अवधि में परिर्वतन आएल। प्रादेशिक समाचारक बढ़ैत लोक प्रियता के देखि पाच मिनटक ई बेलेटिन दस मिनटक भऽ गेल सा सांझ मे सात बाजिक तीस मिनट पर प्रसारित होमए लागल आ आइयो शहर सँ लऽ भऽ सुदूर गाम-धरमें एहि बुलेटिनक सात बाजिक तीस मिनट पर लोक सभी प्रतिक्षा करैत रहैत छथि। देश आ प्रदेशक बदलैत चातुर्दिक परिस्थित के देखि प्रतिदिन मात्र एकटा बुलेटिन सँ काज नहि चलैत देखि 10 अप्रील 1978 के एकटा आर बुलेटिनक प्रसारण प्रारंभ भेला। ई बुलेटिन प्रतिदिन दुपहरण मे तीन बाजि कऽ दस मिनट पर प्रसारित होएब प्रारंभ भेला। पाँच मिनटक ई बुलेटिन सेहो बिना कोनो बाधा के प्रसारित भऽ रहल अछि। एकांश द्वारा दू टा बुलेटिनक सफलता पूर्वक प्रसारणन बाद तेसर बुलेटिन सेहो प्रसारित होएब प्रारंभ भेल जे प्रतिदिन प्रात: काल मे आठ बाजिक दस मिनट पर प्रसारित अछि जे दरस मिनट अछि। प्रादेशिक समाचार एकांश द्वारा प्रदेशक उर्दू भाषी जनता क लेल उर्दू समाचारक प्रसारण सेहो कएल गेल। 16 अप्रील 1989 सँ एकांश द्वारा उर्दू बुलेटिन इलाकाई खबरें’ दूपहर तीन बजि कऽ दस मिनट पर प्रसारित कएल जा रहल अछि। पाँच मिनटक एहि बुलेटिनक माध्यम सँ आकाशावणी पटना क समाचार एकांश अपना के उर्दू भाषी जनता सँ जोड़लक। अपन यात्राक अगिला कड़ी मे एकांश मैथिली भाषी जनता के जोड़बाक योजनाके मूर्त रूप देलका 2 अक्टूबर 1993 सँ मैथिली भाषी जनताक लेल मैथिली समाचार बुलेटिन ‘ संवाद’ क प्रसारण प्रारंभ भेल। सांझ छह बाजिक पन्द्रह मिनट पर प्रसारित होमए बाला पाच मिनटक बुलेटिन प्रारंभ मे सप्ताह तीन दिन प्रसारित होइत छला संवादक बढ़ैत लोप्रियता के देखि पाच मिनटक ई बुलेटिन 16 अगस्त 2003 दिन सँ सांझ मे छह बाजि कऽ पन्द्रह मिनट पर प्रतिदिन प्रसारित भऽ रहल अछि। ‘ संवाद’ आकाशवाणी पटनाक प्रादेशिक समाचार एकांश द्वारा तैयार कएल जाइत अछि आ एकर प्रसारण प्रतिदिन आकाशवाणीक दरभंगा केन्द्र सँ होइत अछि। एकांश द्वारा समाचाराक अलाबा समकसामयिक विषय पर सभीक्षातमक वातीक कार्यक्रम ‘समसामयिक चर्चा’ 1992 सँ प्रारंभ भेला ई साप्ताहिक कार्यक्रम सभ शनि दिन प्रसारित होइत अछि। आकाशवाणीक समाचार एकांश अपन डेग आगा बढ़ौलक आ विधायिकाक नतिविधि सँ जनता के जोड़बाकक लेल विधान मंडल सभीक्ष कार्यक्रम प्रसारण प्रारंभ कएलका विधान सभा आ विधान परिषद्क सत्रक दरमियान एकांश द्वारा प्रतिदिन आठ बाजि कऽ बीस मिनट पर ‘ विधान मंडल समीक्षा’ प्रसारित करैत अछि। देशमे आएल सूचना क्रान्तिक प्रभाव सेहो प्रादेशिक समाचार एकांश पर पड़ल। एकांश आधुनिक सूचना तंत्र सँ लैस भेल आ वर्ष 2003 मे रोमांचक क्षण आ एल। एहि वर्ष एकांशद्वारा ‘दूरभाष समाचार सेवा’ क प्रसारण प्रारंभ भेल। श्रोता अपन फोन पर समाचार सूनऽ लगलाह। एतबा नहि वर्ष 2005 मे एकांश आधुनिक मीडिया क साधनक उपयोग करैत डी टी एच पर सेहो अपन सेवा उपलब्ध करौलक आ प्रादेशिक समाचार डी टी एच पर सेहो उपलब्ध भऽ गेल। एफ एम चैनलक बढ़ैत लोकप्रियताक देखि वर्ष 2006 सँ प्रमुख समाचार तीन टा बुलेटिन 10.30, 11.30 आ सांझ 6.30 बजे एफ.एम चैनल पर सेहो प्रसारित भऽ रहल अछि। समाचार सेवा प्रभागक वेब साइड www. Newsonair.nic in आ www. newsonair. com पर सेहो वर्ष 2007 सप्राइज़ प्रादेशिक समाचार उपलब्ध होमए लागल अछि। दूनियाक कोनोमे बैसल व्यक्ति एहि वेव साइट के खोलि आकाशवाणी पटनाक प्रादेशिक समाचार के पढि़ आ सूनि सकैत अछि। समाचार सेवा प्रभागक तर्ज पर प्रभागक रिदशा निर्देशक अनुसार प्रादेशिक समाचार मे संवाददाताक वाइस डिस्पैच, वाईस कास्ट आ साउट बाइटक कऽ प्रयोग कऽ समाचार के रोचक बनैबाक प्रयास प्रारंभ भेल। ई प्रयास अक्टूबर 2006 मे मूर्त रूप लेलक। संवाददाताक आबाजमे समाचारक प्रसारण जे प्रारंभ भेल से एखनो चलि रहल अछि। वर्ष 2006 मे मूर्त रूप लेलक। संवाददाताक आबाज मे समाचारक प्रसारण जे प्रारंभ भेल से एखनो चलि रहल अछि1 वर्ष 2006 मे मूर्त रूप लेलक । संवाददाताक आबाज मे समाचारक प्रसारण जे प्रारंभ भेल से एखनो चलि रहल अछि। वर्ष 2006 मे समाचार सेवा प्रभागक पहल पर जिलाक गतिविधि पर आधारित कार्यक्रम ‘जिले की चिह्ठी’ क नाम बदलि कऽ ‘जिले की हलचल’ कऽ देल गेल ‘जिले की चिट्ठी मे प्रदेशक विभिन्न जिलाक अंशकालिक संवाद दाताक प्रेषित समाचारक आलेखक प्रसारण होईत छल मुदा एकर परिवर्तित रूप ‘जिले की हलचल’ मे जिलाक समाचार आधारित एहि कार्यक्रम के संवाददाताक आवाजमे प्रसारित कऽ एकरा आर जीवंत बनाओल गेल अछि। ई कार्यक्रम प्रतिदिन प्रादेशिक समाचारक बाद प्रसारित होईत अछि। प्रादेशिक समाचार एकांशक स्थानाक संगहि जाहि इमानदारीक संग गुरूवारदत्त, रामेरणुगुप्ता आ रवि रंजन सिन्हा आकाशवाणी समाचार सँ बिहारक जनता के जोड़बाक काज प्रांरभकएलनि ओकरा पूरा इमानदारीक संग हुनक बाषजूद प्रादेशिक समाचार एकांश जनता के त्वारित आ विश्वसनीय समाचार देबाक लेल तत्पर अछि। अपन कर्तव्यक निर्वाह एकांश देश-दूनियाक हलचल सुदूर गामधरि पहूचा रहल अछि। सताक प्राप्ति बनल भाजपाक उद्देश्य ‘पार्टी विथ डिफरेन्स’ क दाबा करए बाला भारतीय जनता पार्टी आब अपन चालि आ चारित्र के आन दलक डांचा मे ढालि रहल अछि। राजनीतिक अपराधी करण आ भ्रष्टचारक विरूद्ध संघर्षक शंखनाद करए बाला भाजपा आब अपराधी आ भ्रष्टाचारीक आगां नतमस्तक भऽ गेल अछि। ई स्वाभावि को अछि। राजनीति दलक एकमात्र उद्देश्य् सत्ताक प्राप्ति अछि आ एकर प्राप्तिक लेल सभ किछु जायज अछि। ज्यो ई नहि रहैत तऽ पार्टी विथ डिफरेन्स बाला भाजपा जाहि शिक सोरेनक विरुद्ध संसद सँ लऽ कऽ सड़क धरि संधष्र कएलक दलक संग झारण्ड मे शासन करबा लेल बेचैन नहि रहैत। देशक बहुचर्चित सांसद घुस काण्ड आ शशिनाथ झा हत्याकांड क आरोपी झारखण्डा मुक्ति मोर्चाक अध्यक्ष शिबू सोरेन के झारखण्डक मुख्य मंत्री बनैबाक लेल भाजपा अपन समर्थन दऽ अपराध आ भ्रष्टाचारक एकरा नव परिभाषा लिखबाक प्रयास कऽ रहल अछि। झारखण्ड मे त्रिशंक विधान सभा बनलाक बाद सोरेन पहिने कांग्रेसक चिरौरी कएलनि ओ काँग्रेस आलाकमान द्वारा मुख्य मंत्री पद देबा सँ मना बएलाक बाद पाला बदलि राजग केँ खेमा मे गेलनि आ जेना भाजपाक नेता सत्ताक प्राप्तिक लेल बेचैन छलाह, शिबूक सभ कुकर्म के बिसारि हुनक आगां नतमस्तक भऽ गेलाह। शिबूक संग भाजपा के प्रदेश मे स्थायी सरकारक एतबा चिन्ता छल तऽ एहि चुनावक आवश्यकता नहि छल। मधु कोड़ाक मुख्य मंत्री पद सँ विदाई समय भाजपा ओहि सभ सँ पैघ दल छल। सदनमे ओकर 30 रा सदस्य छल आ झामुमो के सेहो 18 सदस्य छल। आ दूनू दल आरामदायक बहुमत प्राप्त कऽ झामुमोके सेहो 18 सदस्य छल। आ दूनू दल आरामदायक बहुमत प्राप्त कऽ सरकार चला सकैत छल। मुदा सरकार सजानाक जे बाबादी भेल एकरा लेल भाजपा जिम्मेदार नहि अछि? मात्र काँग्रेसके सत्ता सँ बाहर रखबाक लेल भाजपाक ईनाटक पार्टीक बदलि रहल चालि चरित्र आ चेहरा कहल जा सकैत अछि। राष्ट्रीवादी विचारक पोषक आ अपन ईमानदार छवि क तगमा लेने धुमि रहल भाजपाक भ्रष्टाचारक विरुद्ध संघर्ष नारा लोकक आखिमे झाउर झोकब बुझि पड़ैत अछि। ओना पार्टी अपन नीति आ सिद्धांत पर चारि डेग चलि दू डेग पांछा हटबामे कोनो परहेज नहि करैत अछि बशर्ते सत्ताक गांरटी हो। राम मंदिरक मामिला होकि धारा 310, अथवा समान अचार सँ हिताक मामिला पार्टी अपन एहि भूल सिद्धांत सँ समझौता कएलक आ केन्द्र से गांरटेड सत्ता हाथ लागल। एकर बाद तऽ जेना पाटी मनुकख खूनक स्वाद लऽ चूकल शेर मऽ गेल आ सत्ताक ई स्वाद लेलाक बाद बिनू सत्ता प्राप्ति रहब दुष्कर भऽ गेल। झारखण्ड भूख के शांत करबाक प्रयास कहल जा सकैत अछि। बदलैत राजनीतिक परिदृश्याक मध्य राष्ट्रवादक झण्डा दो रहल भाजपा आब अपराधी आ भ्रष्टचारीक कन्हापर चढि़ कोनो हाल मे सत्ता प्राप्तिक नीति पर चलि रहल अछि। पार्टीक बदलैत चाहि। चरित्र आ चेहरा ज्यो वर्ष 2010 मे बिहार मे होमए बाला विधान सभा चुनावक दरमियान सोझा आबि सकैत अछि। प्रदेशक बदलि रहल राजनीतिक बातावरणमे बिहार मे सेहो त्रिशंकू विधान सभाक संभावना बुझि पड़ैत अछि। ज्यों ई मेल 13 सत्ताक कुसीक लेल भाजपा पशुपालन घोटालाक लेल चर्चित राजद अध्यक्ष लालू प्रसादन आगां साष्टांग दण्डबत भऽ कोनो आश्चर्य नहि होएत। ई सत्त अछि जे राजनीतिक दलक लेल सत्ताक प्राप्तिक एकमात्र लक्ष्य होईत अछि। चुनावक मैदान मे उतरबा सँ पहिने भने पैघ-पैघ दाबा कएल जाईत हो। जनताके दिन मे चाद आ तारा देखैबाक आश्वासन देल जाईत हो मुदा मत गणनाक बाद बदलैत राजनीतिक परिदृश्यक अनुरूप नीति आ सिद्धांत बदलैत अछि। आ ई सभ झारखण्ड मै पान मे ताल ठोकड बाला दल प्राप्तिक लेल नव-नव सभीकरण बनबड लागल आ सफलता भाजपाके भेटला। सांसद घुस काण्ड मे संसदक कार्यवाही के पन्द्रह दिन घरि ठप्प कऽ जनताक टाका बर्बाद करए बाला आ शिबू सोरेन पाक साफ लगलनि। राँची सँ लऽ कऽ दिल्ली धटि बैसल भाजपाई शिबू के क्लीन चीर दैत रहलनि आ ओम्हर शाशिनाथ झाक परिजन शिबू के मुख्य मंत्री नहि बनैबाक चिरौरी करैत रहलाह। सत्ता प्रप्तिक एहि जोशमे स्वoझा के न्याय दे एबाक बात दबि गेल अछि। भाजपाक नेतृत्व घृतराष्ट्र जकां आखि पर पट्टी बान्हि न्याय सँ आँखि चोरा रहल अछि। मामिला स्पष्ट अछि। ज्यो शिबू सोरेन एतबा पाक साफ छलाह तऽ फेर आखिर कोन कारण भाजपा शिबूक विरूद्ध संघर्ष करैत रहला ईहो सत अछि जे शिबूक विरूद्ध संघर्ष करैत रहल। ई हो सत अछि जे शिबूक विरूद्ध कानूनक अनुसार मामिला पर निर्णय होएत आ निर्णय भेलो अछि। ओ न्यायालय द्वारा बरी कएल गेल छथि आ आब मामिला सर्वोच्च न्यायालय मे अछि। न्यायालय अपन धारा आ साक्ष्यक आधार पर निर्णय देत मुदा सच तऽ झारखण्डक एक जनता जनैत अछि। ज्यों न्यायालय द्वारा बरी कएलाक बाद दोस्ती जायज अछि तऽ बिहार मे पशुपालन धोटालाक किछु मामिलामे राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद के सेहो राहत भेटल अछि तऽ भला हुनक विरूद्ध संघष्र जारी राखब बिहारक जनता के मुर्ख बनाएब नहि अछि। वर्ष 2009 मे लगातार हारिक स्वादाक बाद वर्षक अंतमे विजेता बनबाक अवसर हाथमे अबैत देखि भाजपा अपन नीति आ सिद्धांत के फिक्स डिपाजिट कऽ देलक अछि। एक दिस भाजपा अपराध भ्रष्टाचारक संरक्षण दऽ सत्ता चलाओत दोसर दिस ओकर नीति आ सिद्धांत बढ़ैत रहत। सताक सहयोगी बनलाक बाद भने भाजपाई मदहोश भेल होथि मुदा स्वoशशि नाथ झा क आत्मा भाजपाक एहि निर्णय पर जरूर आश्चय्र चकित होएत शिबूक मुख्य मंत्री बनलाक बाद स्वoझाक परिजनके न्याय भेरत एकरतऽ कल्पना करब बेक्कूफी अछि। झामुमो सुप्रीमो जतए स्वo झाक हत्याक मामिलामे अपना आप के पाक साफ करबाक सभ संभव प्रयास करताह ओतहि भाजपाई पूर्व मुख्य मंत्री मधु कोड़ाक साम्राज्यक अनुरूप एहि तरहक अपनो छोअ साम्राज्य बनैबा मे कोनो कसरि नहि छोड़ता । किएक तऽ झारखण्डक ई नियति बनि गेल अछि । सतीश चन्द्र झा, राम जानकी नगर, मधुबनी हमहूँ कहाँ बुझलियै चान! चान! हे यै चान ! सुतले रहब। केबार खोलू ने । हम कुसुम छी। हर्ष खुशी मे डूबल स्वर कान मे पड़िते निन्न खुजि गेल। भोरक किछु हेरायल सपना फेर सँ हेरा गेल..आ हम उठि क’ बैसि गेलहुँ। आँखि मलि क’ दुनू हाथ कें जोरि दर्शन करिते केवार खोलय दौड़ि गेलहुँ। की बात छौ ? एते भोरे ..? प्रश्न पूरा नहि भेल मुदा ओ बाजल दीदी ..आइ हमर वियाह अछि।राति मे बाबू कतौ सँ ठीक कएने अयलै। पाँचमा पास छैक आ दिल्ली मे कोनो काज सेहो करैत छैक। आँहा अवश्य आयब। नहि जानि ओ की की बाजि रहल छल,मुदा हम त ओकर पहिल शब्द ’वियाह’ सुनि ततेक ओझरा गेलहुँ जे किछु आओर नहि पूछि सकलियै आ ओ दौड़ल चलि गेल। .. हँसैत ..एकटा अबोध हँसी . निर्विकार चेहरा ..। मुदा हम! हमर चेहरा तनावपूर्ण। लागल जेना हृदय मे किछु गरम चीज सन्हिया गेल हो आ हमर संपूर्ण रक्त मे एकटा अपरिचित झुनझुन्नी बनि क’ दौड़ि रहल हो .सरपट.. अति तिव्र गति सँ। अचानक शरीरक बोझ उठाबय मे पैर असमर्थ भ’ गेल आ हम धम्म सँ धरती पर बैसि गेल रही।. सुन्न भेल.. मुदा भीतर लट्टू जेकाँ किछु नचैत रहल .. नचैत रहल .. अविराम । नहि जानि कखनो क’ एकटा आश्चर्य एतेक भयभीत कियै क’ दैत छैक .एकर उतर ने तहिया भेटल ने आइ धरि बुझबा मे आयल। मोनक किछु बात कें अभिव्यक्तिक माध्यम एखनो नहि छैक। शब्द त’ किन्नहँु नहि। हँ आँखिक नोर कखनो क’ हृदय मे चुभैत कोनो भावना कें बुझि जाइत छैक। गाम घरक जीवन। छल-प्रपंच सँ बंचित समतल धरती जेंकाँ समटल आचरण जतय छोट-छोट सपना देखि ओकरे परिपूर्ण करबा लेल छटपटाइत आत्मा। ओही श्वच्छ परिवेश मे हम आ हमर कुसुम संगी बनि क’ एखन धरि रहैत छलहुँ। ओ हमर हरबाहक बेटी छल। छोट लोकक बेटी, मुदा तखन ई बात नहि बुझलियै जखन पहिल बेर ओकरा अपन आँगन मे देखि हाथ पकड़ने दौड़ि गेल छलहुँ दलान पर। नेनपन कहाँ बुझि पबै छै जाति पाति आ उच्च निचक बात। ई त’ उमर बढ़ला सँ समाजक व्यवस्था आ मोनक अहं मे लोक भसिया जाइत अछि। मुदा दोस्ती त’ मोनक एक्टा मिठ्ठ संबंध छै एकरा समाज आ परिवार सँ की मतलब। एक बएस के कतौ दू टा अबोध एक दोसर के अँाखि के पढ़ि लेलक आ बन्हि गेल एकटा शब्दहीन संबंध मे। आई फेर नहि जानि कियैक जीवन कें बीतल संपूर्ण हवा बसात मोन मे प्रचंड बिरर्रो उठा देने छल आ हम ओइ मे एकटा छोट फतिंगा जेकाँ उड़ियाइत अपन अस्तित्व कें बचावय मे संघर्षरत छी। यैह त’ जीवन छै- सतत संघर्ष आ अपन अस्तित्वक रक्षा। मुदा कहाँ भेल अस्तित्वक रक्षा। आलोक सँ वियाह भेलाक बाद लागल जेना जीवनक संपूर्ण सपना मुर्त रूप ल’ लेत। स्नेहक संबंध प्राण मे एकटा नव स्फूर्तिक संचार करैत छैक। विचारक धरातल पर पति-पत्नी एक दोसर के सम्मान दैत छैक। मुदा वियाहक दू मासक बादे सभकिछु उल्टा लागय लागल। प्रेमक निर्वाध गति सँ बहैत शीतल जल मे दुर्गंध आबि गेलैक। आलोकक अहं मे अपन अस्तित्व कत’ हेरायल जे एखनो धरि नहि भेटल। पिताक एक मात्र संतान छलहुँ हम। स्नेहक कतौ कमी नहि अनुभव भेल।शिक्षाक मर्यादा सदैव जीवन कें बान्हि क’ रखलक। घरक संस्कार जाति समाज के कठोर बंधन कहियो स्वतंत्रता नहि द’ सकल जे अपन पती सँ विद्रोह क’ सकी आ अपन जीवनक ठमकल दुर्गंधित पानि कें समुद्र मे बहा क’ निर्मल क’ली। आइ बुझाइत अछि जे शिक्षा आरो कमजोरे करैत छैक। लोक की कहत? सम्मान कें रक्षा कोना हैत? समाज मे लोक की की बाजत? सभटा बिचार मोन मे उठिते हम अपना कें बहुत कमजोर अनुभव करय लगैत छी और अपन संपूर्ण व्यथा कें सहर्ष स्वीकार करैत आकाश मे नुकायल देवता सँ मृत्युक वरदान मंगैत प्रतिदिन अपन बान्हल दिनचर्या मे लागि जाइत छी। कमजोर नारिक कमजोर विचार। शिक्षित नारी आ एते कमजोर आत्मविश्वास। जखन क’ ई विचार अबैत अछि त’ मोनक कारी वेदना स्वेत मुखमंडल पर ततेक ने अपन रेखा चित्र खिंचि दैत अछि जे ओकरा भरब असंभव भ’ जाइत अछि। मोनक आँखि सँ फेर किछु देखैत छी त’ लगैत अछि जे हमर कुशुम कहाँ कमजोर छल। दशमी मे पढ़ैत-पढ़ैत वियाह भेल रहैक। वियाहक बाद एक दू बेर सासुर सेहो गेल। ओकर घरवाला दारू पीबि क’ ओकरा संग बहुत मारि पीट करैत छलैक। एक दिन ओकर सूतल स्वाभिमान जागि गेलैक आ ओकरा छोड़ि देलक। ओ अपन विगत के संपूर्ण पसरल स्याही पर उज्जर पिठार सँ फेर कोबर लीखि लेलक। जीवनक निर्णय लेबा मे ओ कतौ कमजोर नहि पड़ल। फेर सँ ओ अपन दोसर पतिक संग प्रेम करैत दुनियाँक टेढ़ मेढ़ बाट पर चलि पड़ल। एक दिन हमरो कहलक दीदी अहाँ एतेक कष्ट उठा क’ कोना अपन पतिक संग निर्वाह क’ लैत छी। ओना त’ अहाँ हमरा सँ बेसी पढ़ल लीखल छी। नीक संस्कार अछि। स्वयं कमा क’ खा सकैत छी। तखन कियै?’’ तू नहि बुझबिही’’! ओ चुप भ गेल। मुदा हमहूँ कहाँ बुझलियै ? ओ त कम पढ़ल छल। छोट जाति .. ताहू पर गरीब ..। मुदा हम त पढ़ल लिखल उच्च जाति ..पैघ लोक ..नीक संस्कार! लेकिन कहाँ बुझि सकलियै एकर कारण ? की एकर कारण संस्कार छैक? अथवा सुशिक्षा? पता नहि कोना बुझबै एकर रहस्य । हम एम0ए0 पास क’ क’ नौकरी करबा लेल पिता जी सँ अनुमति चाहैत छलहुँ लेकिन ओ कहलथि जे हम अहाँक विवाह लेल चिन्तित छी। एकटा पिता के सबसँ पैघ बोझ पुत्रीक कन्यादान होइत छैक तैं ओ एहि सँ मुक्त होयबा लेल जतय ततय प्रयत्नशील रहैथ। हमर सहमति त’ एकटा मात्र हुनका लेल स्नेहक अभिव्यक्ति छल जाहि मे कर्तव्यक एकटा निर्वहन सेहो छलैक। हम अपन सहमति स्नेहक प्रतिदान स्वरूप द देलियन्हि। गाम सँ किछु दूर एकटा धनाढ्य पढ़ल लिखल परिवारक एकलौता पुत्र आलोक संग हमर वियाह भ गेल। दान दहेजक मांग नहि सुनि हमर पिता कें लगलन्हि जे आजुक युग मे निश्चय ओ लोकनि भगवान छथि मुदा किछु दिनक बाद ज्ञात भेल जे ओहि भगवानक संपूर्ण आत्मा कलुषित छल। धनाढ्य आ सुशिक्षित नींव मे सौसे दिबार लागि गेल छल आ ओही दिबारक मजबूती लेल हमरा वलिदान देबाक छल। आलोक कें एकटा आओर वियाह भ’ चुकल छलन्हि। संभवतः पाच छः साल पूर्वहिं मुदा संतान नहि होयबाक कारणे अपन वंश आ अहंकारक गाछ के आगाँ बढ़ाबय लेल एकटा सुशिला कन्याक खोज रहन्हि। तखन हमरे संग प्रपंच भेल। जीवनक एक एकटा नुका क’ पौती मे राखल हमर सुन्दर कल्पना हेरा गेल। आ हेरा गेल हमर संपूर्ण अस्तित्व जकर रक्षा करब हमर बसक बात नहि रहल। एकटा हारल मनुक्ख। मात्र बच्चा पैदा करबा लेल आनल गेन छल । इच्छा वा अनिच्छा किछु कतौ नहि । अपन घर नहि । अपन किछु सपना नहि। विद्रोह करबा लेल हिम्मति नहि एकदम कमजोर ..हम ..चान। मुदा हमर संगी कुसुम .. अपन जीवनक उतार चढ़ाव मे अपन अस्तित्व एखनो धरि बचौने ..खुब होसगर आ ठोस कुशुम। अनमोल झा (१९७०- )-गाम नरुआर, जिला मधुबनी। एक दर्जनसँ बेशी कथा, साठिसँ बेशी लघुकथा, तीन दर्जनसँ बेशी कविता, किछु गीत, बाल गीत आ रिपोर्ताज आदि विभिन्न पत्रिका, स्मारिका आ विभिन्न संग्रह यथा- “कथा-दिशा”-महाविशेषांक, “श्वेतपत्र”, आ “एक्कैसम शताब्दीक घोषणापत्र” (दुनू संग्रह कथागोष्ठीमे पठित कथाक संग्रह), “प्रभात”-अंक २ (विराटनगरसँ प्रकाशित कथा विशेषांक) आदिमे संग्रहित। रिलेशन -गोर लगै छी। हम निखिल बजै छी। -नीके रहू। कहू की समाचार छै गामक। -ठीके छै चचाजी। कहलहुँ जे हप्ता दिनक एकटा काज अछि लखनऊमे। से अपनेक डेरापर रहबै। कोनो दिक्कत तँ नै ने हएत। - दिक्कत। दिक्कत कोना नै हएत। एकटा घर, बरण्डापर खेनाइक समान। कोना रहै छी से हमहीं सभ बुझै छी। भातिज छी, दिक्कत थोड़े होमए देब अहाँकेँ। आऊ, एकटा होटल बुक कऽ देब। कोनो दिक्कत नै हएत..। अधिकार -एकटा बात ध्यानसँ सुनि ले लखना, जँ बेगारी नै खटमे हमर आ अबाज ऊँच कके बजमे तऽ बासडीह जे छउ तकरा खाली करऽ पड़तउ। हमर पुरखा तोरा बाप-पुरखाक रैयतमे अपना जमीनपर बसेने छला एहि उपकार ले जे तू हमरा मूँह लागल जबाब देमे। -तकर माने की अहाँ हमर उपजल बोनि नै देब आ अहाँक बेटा-भातिज हमर इज्जति दिस आँखि उठायत। हाथ-पैर तऽ तोड़ि देबै तकर। हँ रहल बासडीह बला सवाल से एते सस्ता नै छैक जे खाली करबा देब अहाँ। दस-बीस साल जे बटाइयो खेती करै छै तऽ सरकार कहै छै जे खेत ओकरे छियै आ दू पाँच पुरखा सऽ जाहि डीहपर बसल छी हम सब से हम्मर नै! हाकिमक देल बासगीत परचा सेहो अछि हमरा लग। युगान्त -हे सुनै छी की? -हँ माँ कहथु ने, की कहै छथि। -आइ रीता दाइ अबै छै। -से की? -से घर आँगन नीप लिअ। तिलकोड़, पापर, राहड़िक दालि, बड़ी सब सकाले कके राखि लिअ। -बेस! एतऽ हम हिनका दुनु बेकतीक सेवाक लेल छियैनि। हिनका बेटी जमाय लेल नै। अबैत छथिन एहि बेर अपने गाम, चल जेबनि संगे। लऽ लिहथि तखन धधकल..कहलकै जे..!! अधिकार -एकटा बात ध्यानसँ सुनि ले लखना,जऽ बेगारी नै खटमे हमर आ आबाज ऊँच कके बजमे तऽ बासडीह जे छउ तकरा खाली करऽ परतउ। हमर पुरखा तोरा बाप-पुरखाकेँ रैयतमे जमीनपर बसेने छला एहि उपकार ले जे तू हमरा मुँह लागल जबाब देमे। -तकर माने की अहाँ हमर उपजल बोनि नै देब आ अहाँक बेट-भातिज हमर इज्जत दिस आँखि उठायत। हाथ-पैर तऽ तोड़ि देबै तकर। हँ रहल बासडीह बला सवाल से एतेक सस्ता नै छैक जे खाली करबा देब अहाँ। दस-बीस साल जे बटाइयो खेती करै छै तऽ सरकार कहै छै जे खेत ओकरे छियै आ दू पाँच पुरखासऽ जाहि डीहपर बसल छी हम सब से हम्मर नै! हाकिमक देल बासगीत परचा सेहो अछि हमरा लग। चेतना -पपा, अहाँ आ मम्मीक भोटर काड अछि। -नै बेटा, नै अछि। -तखन भोट कोना खसेबै? आब बिना ओकरे भोट नै खसब देतै। -तऽ भोट नै खसेबै। -टी.भी.मे अहाँ नै देखै छीयै पपा, जे कहैत छैक- यदि अहाँ भोटक दिन भोट नै खसबै छी तऽ अहाँ सूतल छी, पपा...!! भारतीय डाक ओकर एल.आइ.सी. कऽ पॉलिसी मैच्योर्ड भऽ गेल छलै! सामान्य आ साधारण लोक कऽ पचास हजार टाका एक संग भेटब आ ओहि सऽ पहिनेहे ओकर खल-खल कके खर्च करैक ब्यबस्था भऽ गेल रहै छैक, तकरा दऽ जल्दी सऽ जल्दी सधबैक चिन्ता छलै ओकरा। आइ एकटा स्पीड पोस्ट सऽ पत्र एलै हे। जाहिमे सत्तरह तारीक कऽ पठाबैक स्टाम्प लागल छैक, पूरे आठ दिन पर चेक भेटलै हे। कलकत्ता सऽ लोकल डिलेवरी, स्पीड पोस्ट। भारतीय डाक पर ओकरा एखनो गर्व छैक जे देरिये सही, चेक तऽ भेटि गेल....! युद्ध सासु पुतौहुकऽ देखितहि कहलकै- जे हमरा बेटाकऽ नून खुआ हरि लेलक, तकरा नीक नै करथिन बाबा बैद्यनाथ ! पुतौहु कनडेरिये तकैत कहलकै- जे हमरा सँए कऽ अँखियबैयऽ तकरा बज्र खसा देथिन बिदेसर बाबा, बज्र खसा देथिन...! टेकनोलजी -पाइ कथी सऽ पठेलियैन बाबू कऽ। -कथि सऽ पठेबैन। आब पहिलुका जमाना नै रहलै जे बीमा करू, ड्राफ बनाउ, रजिस्ट्री करू वा ककरो हथौतीये पठाउ। आब तऽ नवका-नवका टेकनोलजी एलैहे। कोर बैंकिंग मे एतय बाबूकऽ एकाउन्टमे जमा कऽ देलियै, ओतय संगे-संग हुनका खातामे पाइ जमा भऽ गेलैन। -यैह! यैह ने मूर्खपना भेल। पाइ आब जहिया पठेबै गाम अहाँ, से मनीआडरे द्वारा! -किए, से किए, ओहिमे तऽ बड़ समय लगै छै पहुँचैमे, आ कमीसनो पाँच रुपये सैकड़। -से जे लागै। जखन डाक बाबू पाइ देमय जेतनि बाबूक, आ एक-दू गोटाक गबाही राखि पाइ देतनि तऽ गामक लोक तऽ बुझतै जे बेटा-पुतौह्पाइ पठेलकैहे। बुढ़बा के छोड़ि नै देने छै ओहिना...हँ...!! कोर बैंकिंग -डाक बाबू, हमर एकटा मनीआडर अबै बला छै। देखियौ ने एलै हे की नै? -के फेकना पठेतौ। -हँ, एलैहे की? -नै गै, फार्म तऽ एलौ हे, पाइ तऽ एखन नै एलैहे, एतै तऽ काहा पठेबौ। -आर कनी दिन ठकि लिअ गिरहत! कहै छलै फेकनाक बाउ जे किदैन बैंकिंग भऽ जाइ छै झंझारपुरक बैंक तऽ ओतऽ पाइ जमा करत नेना, एतऽ संगे संग आबि जेतै खाता मे...!! अन्हरजाली भऽ गेलै। आइ कठराबालीक दोसरो बेटीक बियाह भऽ गेलै। बेचारीकेँ भरोस नै छलै जे ई अन्तिम बेटीक बियाह करा निसास छोड़ब। आ दुरागमन तऽ अपना हाथमे छैक, जे जुड़तै से देतै, नै जुड़तै नै देतै। दहेज जकाँ मोल-मोलाइ आब नै ने हेतै। कठराबालीक घरबाला पाँच हजार महीना दिल्लीमे कमाइत छलै। मुदा नै कहियो सैंयेक देहपर एकटा वस्त्र भेलै नै अपने वा दीये-पुतेकऽ। की करतै कहुना समय काटै छल। से जे आइ बेटीक बियाह छलै हुइल बजड़ल छलै। बरियातीक पचास टा अबैया छलै आ एलै एक सय गोटा। कठराबालीक मोन अपसियाँत छलै, सबटा एस्टीमेट फेल भऽ गेलै। हाँइ-हाँइकऽ सब सामान आनल गेल। तरकारी काटैक हुइल भेलै। तीमन बन्ना हाँसू कठराबाली अपने सऽ अँगने-अँगने जा पाँच टा आनि देलकै। बेस तरकारी सब बनलै। वर-बियाह भऽ गेलै। जसो भेलै। दोसर दिन भेने रुनियाँ माय समाद देलकै कठरा बालीकेँ जे हमर तीमन-बन्ना हाँसू नै पहुँचल हे, से दऽ जाथु नै तऽ बात नै ठीक हेतैन। कठराबाली कतबो ताकै हाँसू, भेटबे नै करैय। तरकारी बनबै काल कियो दाइ-माय हाथ लगा नेने चल गेल रहथिन। एक दिन रुनियाँ फेर आयल जे माय कहलक हे आँच जरै छै से कनि तामे अहाँ अपने हाँसू दियौ। कठराबाली देलकै अपन बला हाँसू। जखन दोसर दिन एकरो आँच जरै छलै तऽ हाँसू लेबय अपने गेलै तऽ रुनियाँ मायक गप्प सुनि ओकरा ठकमूड़ी लागि गेलै। रुनियाँ माय कहलकै- ऐँ अहाँक ई सपरतीब, हाँसू हराकऽ ठेसी सऽ अहाँ अपन हाँसू लेमऽ एलहुँ हेँ। सठ्ठा नै छल तऽ बेटी कियै जनमेलहुँ। हमर हाँसू दऽ जाउ तखने ई हाँसू भेटत। नै तऽ अहूँ घर हमहूँ घर। आदि-आदि। कठराबालीकेँ ठकमूड़ी नै लगितै, मुदा लगलै एहि लके जे पाँच हजारक कमेनहारक बहु रहैत आ दूये टा बेटीमे दू लोक सुझय लागल अछि हमरा। आ रुनियाँ, हिनियाँ, गिनियाँ आ रनियाँ एहि चारि गोट बेटीक माय आ सब कुमारिये। घरबाला एकटा साधारण गिरहस्थ। कोना कऽ अपना नून-तेले निमाहि लेत एही चारि गो भगवतीक चण्डीस्वरूपा माय। आ कठराबाली खाली हाथे अपना अँगना घुमि गेल, मुदा पयरे नै उठि रहल छै, पैर लोथ भऽ गेलै। जे हमरा देखियोकऽ एकर अन्हरजाली नै हटलै....!! सुरक्षित भाइस चान्सलर बनलाक बाद बधाइ देबऽ लेल आयल लोकक ताँता लागल छलै। बहुत गोटा क्षुब्ध आ विस्मित सेहो छल। प्रायः बहुत गोटाकेँ बुझल छलै जे एखन हिनका सऽ पन्द्रह गोटा आर सिनियर अछि तकरा बाद हिनकर नम्बर अबैत छनि। मुदा सभकेँ पाछू छोड़ैत भी.सी.क कुर्सीपर बैसल देखि एक गोटा पूछि देलकैन- श्रीमान् अपनेक नम्बर तऽ बड़ पाछा छल। कोना एलउ एतेक जल्दी एतय। भी.सी. हँसैत कहने रहथिन- सभ मंत्रीजीकऽ कृपा छियैन। ओ लोक फेर पुछलक- मंत्रीजी कते दिन? हुनका गेलापर की हैत अहाँक? भी.सी.गम्भीरता पूर्वक कहने छलखिन- किछु नै हैत हमरा। कारण जैह मंत्री एताह हम तिनके सपोटर भऽ जायब। तैँ हम सुरक्षित छी, अति सुरक्षित...। दुर्गानन्द मंडल, सहायक शिक्षक, उ. वि. झिटकी-बनगावाँ, मधुबनी (बिहार)। लघुकथा- डाक्टर कर्मवीर मोन पड़ैत अछि छः जून 2003। जहि दिन तय ई छल जे भारतक प्रधानमंत्री मिथिलांचलक घरती निरमली (जे सभ तरहें, सभ दृष्टिकोणसँ सभ मामलामे किछु बेसिये पिछड़ल अछि) औताह। आ कोशीमे बनऽ बला रेल पुलक शिलान्यास करताह। जेठक दुपहरिया, सभठाम लोक सभ गर्मी-गुमाड़सँ अफसेआंत, सबहक देह धामे-पसीने तर-वतर मुदा सभ केओ मंत्रीजीकेँ देखवाक लेल ओतवे हरो-हरान, ओतवे फिरिशान। एहन बुझना जाईत छल जे खेत-पथाड़, बाध-वोनसॅ आगि उठिरहल अछि, सड़कपर धुरा-विड़ोक रुप लैत, सन-सन सन-सन हवा आ लू चलैत। तखनो ओहि दिन परोपट्टाक लोक सबहक उजाहि उठल, सगर बाजार, बाजारक चारु कातक, जे पूर्ण रुपेण अतिक्रमित छल, प्रशासनक चुस्ती-दुरुस्तीसँ एकदम साफ-सुथड़ा। ऐना, जेना ऐना झक-झक करैत। खूव प्रचार-प्रसार भेल, जगह-जगह पर्चा-पोस्टर साटल गेल, उद्धेश्य अधिकसँ अधिक लोक आवि मंत्री जीक भाषणसँ लाभ उठावथि। ओहि दिनक रौदो ऐहन बुझना जाईत छल जेना छाहरियो रौद आ गर्मीसँ फिरिशान भऽ कतऊ छाहरि ताकि रहल अछि। किछुए कालक वाद ऐहन बुझना गेल जे चारुकातक वाट काॅलेजेक फिल्ड दिस मुड़ि गेल हो जाहिठाम मंत्रीजीक प्रोग्राम तय छल। जेम्हरे ताकू मुड़ी-ए मुड़ी, कपारे-कपार, लोकहिपर लोक, लोकक मुड़ि छोड़ि आर किछु नहि। सभ एक दोसराकेँ धकियबैत, आँगा बढ़वाक अथक प्रयास करैत, किछु सफलो भेलाह, आ असफल वेशी। साॅझ-पड़ैत-पड़ैत लोकक लेल गदमिशान उठऽ लागल। जे जतहि रहथि से ओतहि रहि गेलाह। एको मिशिया-आगू या पाछु हेवाक साहस नहि कऽ सकलाह। एतबहिमे सबहक आँखि अकाशमे हहाईत किदुनपर परलैक। किदुन तऽ बढ़-बढ़िया नाम छै ओकर। किदुन तऽ कहै छै हँ-हँ मोन पड़ल हेली-कोप्टर। सभसँ पहिने उतरलाह सेनाक जवान वाद ओकर प्रधान मंत्री जी, जोर-जोरसँ हल्ला होमय लागल- ‘‘इन्कलाव जिन्दावाद!’’ ‘‘जिन्दावाद-जिन्दावाद।’’ -‘‘आज का नेता कैसा हो?’’ ........... जैसा हो।’’ ततपश्चात शुरु भेल भाषण-भूषणक कार्यक्रम सभ क्यो कान पोति सुनऽ लगलाह- बीच-बीचमे फेरि वएह नारावाजी। इन्कलाव-जिन्दावाद। जिन्दावाद-जिन्दावाद।। एहि तरहें एहि सबहक मध्य भाषणक कर्यक्रम समाप्त भेल। सभ अपन-अपन घरक बाट धेलैन्हि। हुनकहि सबहक संग हमहूँ अपन वासापर अयलहूँ। हाथ-पैर धोइत जाकि खुरसीपर वैसलहूँ देखैत छी एकटा व्यक्ति हमर अता-पता पुछैत अवैत छथि आ अपन परिचय एहि तरहें दैत छथि- श्रीमान् संभवतः अपने हमरा नहि चिन्ह सकलहूँ! हम कने अकचकाईत पुछलियैन्हि, से की? अपने पहिने वैसल तऽ जाउ, सामने राखल विरिंचपर वैसतहि ओ बजलाह- ‘‘हम छी कर्मवीर।’’ एतवहि सुनितहि करेज सूप-सन चाकर भऽ गेल। हृदय आनन्दातिरेकसँ झुमि उठल। नहि जानि किएक आॅखिसँ दू ठोप नोर खसि पड़ल। ओ बजलाह- ‘‘श्रीमान् अपने कनैत किऐक छी? हम कहलियैन्हि- ‘‘तो नहि बुझबहक। तोरा देखिते हम अपने आपकेँ नहि रोकि सकलहूँ, आ ई नोर तऽ खुशीक थिक। आई ऐहन सौभाग्य जे पाहुन वनि एहिठाम अयलह, अहो भाग्य हमर। ओ तऽ अवाक। किछु नहि बजलाह, बजलाह किछुकालक पश्चात जे- ‘‘श्रीमान् हमरा चरि वज्जी गाड़ी छुटि गेल। हम आई अपनहि अहिठाम रहव आ भोजनो करब। सुनितहि हर्ष भेल जे कर्मवीर कमे उमेर मे ऐतेक स्पस्ट वादी, सभ किछु खोइलचा छोड़ा कऽ वजनिहार, जे चाहे अहाँकेँ कष्ट हुअए वा खुशी। कनेक कालक वाद हमरा लोकनि चाह-पान करऽ लेल चैक दिस विदा भेलहूँ। गामक चैक। बड़़कीटा पाखरीक गाछ चारुकात चबुतरासॅ घेरल। गामक अधिकांश लोक चाह-पान पीवाक लेल साँझ-परात ओतहि आवथि। वगलमे छल फुसियाही दूसाधक धान-गहुम पीसऽ वाला मीशील, आ घोघना मियांक कोटाक दोकान। सटले छल मुनेसराक कनिएटा नोन-तेलक दोकान। आ वगलहिमे छल रामा मुखियाक मुरही, कचड़ी, मटर, घुघनी आ इचना माछक चखना वला एकचारी देल दोकान। दसे डेग हटिकेँ छल अगहनियाँ पसीनीयाँक ताड़ीक दोकान, जाहि ठाम दर्जनो घैल ताड़ीसँ भरल, पूव मुहे राखल आ घैलसँ वहरा रहल छल जे बुलबुला, बुलवुला-बुलवुलाकेँ ससरि घैलक पेन तरमे राखल बीड़वापर खसैत छल। किछु पीयाकक आँगामे राखल छलै दू बेचाही ताड़ी, मुरही, कचड़ी आ इचना माछक चखना। लोकसभ ताड़ी पीवि झुमय, मने मस्त छलै सवहक आ समवेग स्वरमे गवैत छल ई गीत- ‘‘ताड़ी वाली ताड़ी पी आ दऽ.......ताड़ वाला ताड़ी दऽ खजूर वाला कम..... ताड़ीवाली ताड़ी पिआ दऽ। दृश्ये छल लाजवाव! सभ किछु देखैत हमरा लोकनि पहूँचलहूँ ठको काकाक चाहक दोकानपर। एकेटा चाहक दोकान आ ढ़ेर रास लोक चाह पीविनिहार। पाखरीक गाछक चबुतरापर वैसेत हम हाक देल - ‘‘ठको कक्का दू कप चाह हमरो सवके दिहह..करीब दस मिन्टक वाद ठको कक्का डंटी विहिन कप, जे कोरहूँपर कने फुटले छले नेने आयल चाह। ऐह चाह तँ चाह छल! महीसिक दूधक अगव चाह, एको ठोप पैनिक छुति नहि, मीठगरो ततवे, ठोरमे ठोर सटऽ वाला चाह। अर्थात् चाहक चाह। चाह पीवि कैंचा दऽ हमरा लोकनि बढ़लहुँ बौआ काकाक पान दोकान दिशि। लग पहुँचति कहलियनि- ‘‘गोड़ लगै छी कक्का कने दू सीक्की पान देब’’। कठघारामे बैसल बौआ कक्का पुछलनि- ‘‘हौउ नीके छह किने? बहुत दिनक बाद देखलियह, कहऽ कोना की हालचाल छह अरविन्दक आ घौलुक? पुछैत पान लगबए लगलाह। हँ कक्का सभ अहाॅ सबहक अशीर्वाद छी। सभ कियो नीके-सुखे छी, बौआ कक्का पान लगा आगा बढ़ौलैन्हि। हमरा लोकनि पानक आनन्द लेबए लगलहुँ। पानो ततबे सुअदगर। कियेक तँ शुद्ध देशी पान छल। ताहूँमे बेरमा बरैबक। एक तँ मिथिला दोसर मैथिल ऊपरसँ बेरमा बरैबक पान, बौआ काकाक लगाओल। अपूर्व! गप्प सप्पक क्रमे लोक सभसँ भेंट भेल, कुशल- छेम सभ एक-दोसराक हाल चाल पुछैत सभसँ कर्मवीरक परिचय करौलियैन्हि। नहि जानि जे हिनकामे कोन ऐहेन गुण छलैक जे जिनकेसँ परिचय करवयैन्हि सभ हुनकासँ प्रभावित भऽ जाइथ। अकानि नहि सकलहूँ जे कर्मवीरक मनमे कोन कल्पना जन्म लऽ रहल छलैक। ओ तँ जकरा हम कल्पना मात्र बुझैत छलहूँसे तँ साकार करक प्रवल संभावना लैत राति खेवाक काल बजलाह...। दुनू गोटाक आँगामे दूटा थारी राखल छल, जाहिमे कनिएटा कटोरी, आ कटोरीमे घीड़ाक तीमन खेड़हीक दालि देल, दू फाॅक पिआउज आ नान्हिऐटा टुकड़ी छल अचाड़क, आर छल काॅच मेरचाई एक-एक प्रति, प्रति थाड़ीमे। लोटा आ गिलास जलसँ भरल छल, आ दुनू गोटे वैसल रही खेवाक लेल, ततवहिमे अरविन्द आ घौलू दुनू वौआ टीशन पढ़िकेँ आयल। कर्मवीर जीकेँ गोड़ लागि आशीर्वाद लऽ अपन-अपन छिपलीमे रोटी लऽ खैए लगलाह। भोजनक क्रमे किछु काल धरि गुम्म-सुम्म रहलाक वाद कर्मवीर जी बजलाह- ‘‘श्रीमान् मोन होइत अछि जे जँ अपने आदेश दी तऽ हमहूँ एकटा क्लीनिक खोलि प्रैक्टिस करितहूँ। सुनि मन हर्ष भेल जे हिनकामे किछु करवाक उत्साह छैन्हि। आ गामक प्रति एतेक सिनेह जे कतहूँ आन ठाम नहि जा कए वल्कि गामहिमे सेवा करताह। नहि तँ प्रायः परदेश खटऽ वालाक तँ उजाहि उठल छैक। ऐहेन सन वुझना जाईछ जे सभ सुख परदेशेमे छै! मुदा ई तँ हमरा लोकनिक धोखा थिक धोखा! हम कहए चाहैत छी जे जँ देहमे खुन अछि तँ गामोमे कियो भुखे नहि रहताह। एक तँ साधारणो मजुरी 80 टाकासँ 150 टाका धरि अछि, ताहूपर जन-मजदूरक अभावे। दस दिन खुशामद करिऔक तखन एक दिन आवि काज कए देत। ओतवहि नहि माय-बाप, भाय-भौजाई, पर-परिवार बाल-बच्चाक संग रहवाक सुख कतए पाएव गामहिमे ने? आ कि परदेशमे? उत्तर एकेटा भेटत- गामहिमे, तखन अहीं सभ कहूँ जे परदेश खटबै कथी लेल? की एहि लेल जे ऐवा काल सनेशमे एड्स लेने आएव। हम तँ सप्पत दऽ कहऽ चाहैत छी, जे गामक माटि-पानि आ थाल-कादोमे सभ सुख अछि। कोनो गामसँ चिक्कन अप्पन गाम, आ कोनो धामसँ चिक्कन मिथिलाधाम। अहूँ सभ अप्पन-अप्पन करेजपर हाथ राखि कहू जे हम फुसि कहैै छी? आव प्रश्न ई उठैत अछि जे जखन सभ कियो परदेशे खटवै तखन गामक विकाश हेते कोना? मुदा कर्मवीर जीमे हमरा भेटल जे ओ गामहिमे रहि गामक आ समाजक विकाश करवाक भावना हुनका हृदयमे हिलकोर मारि रहल छल। मन गद-गद भऽ उठल। आर किछु काल गप्प-सप्प करैत हमरा लोकनि सुति रहलौ। प्रातः किछु गोटा (मेडिकल लाईनसँ जुड़ल) सँ भेंट करौलियैन्हि, ततपश्चात एकटा नीक दिन तका हिनक क्लिनिकक उद्धाटन सम्पन भेल। जीवनक दोसर रुप संधर्ष होयत छैक। मुदा ताहिसँ कर्मवीर जी धबरेला नहि वल्कि जीवनक लेल संधर्ष करए लगलाह। से ताहि तरहें जे काल्हुक कारी झामड़ सुखल-साखल देह, पिचकल-पुचकल गाल, धसल- धसल आॅखि पेट पाँजरमे सटल खपटासन, कोनो पहिरलहे पेन्ट आ वुशर्ट पहिरि पुराने-धुराने जूता आ चप्पलसँ समय खैपऽ वाला, जीवनकेँ ऐतेक लगसँ देखऽ वाला कर्मवीर, हमरा आईयो हुनक ई वात मोन पडै़त अछि जे ओ पुछने रहथि- ‘‘श्रीमान् की अपने कहियो रातिकेँ भुखले सुतल छी? माथमे नहि घुसल ई बात जे हुनक प्रश्नक भाव की छैन्हि? मुदा सत बात तँ ई छल जे ओ काल्हुक राति उपासे रहलाह, भुखले सुति रहलाह। भरि राति धरि निन्न नहि भेलैन्हि, कोनो तरहे कछमछााकेँ राति वितौलैन्हि। प्रातः भेंट भेलापर हुनक धसल आॅखि आ भुखल पेट हमरा किछु पुछि रहल छल। मुदा हम छलहुँ निःशब्द। काल क्रमे समयक संग मेहनत रंग देखौलक। रोगी सभ आबए लगलैन्हि, भगवती जस लगवैत गेलथिन्ह। गुजर-वसर करए लगलाह तँ कनियोंकेँ लए अनलैन्हि आ आनन्दसँ रहए लगलाह। भोला बावाक कृपासँ दिन दूना आ राति चैगुना आमदनी होमय लगलैन्हि। आई ओ दस धूर जमीन लए घर बना वाल-बच्चाक संग हंसी-खुशीसँ छथि। एकटा सफल व्यक्तिक रुपमे आ सफल डाॅक्टरक रुपमे। डाॅ. कर्मवीर। कहियो कताल हमरो हुनका घरपर जेबाक मौका लगैत अछि। एक डिब्बा बटर-बेक बिस्कुटक संग। डाॅक्टर साहेवक दुनू बच्चा निछोह दौड़ल अवैत अछि एहि आवाजक संग मम्मी-मम्मी अंकल जी आए- अंकल जी आए। तात घरसँ बहार होइत छथि डाॅ. साहेवक कनिआ-पूनम, जेहने नाम-तेहने पुनमक चाँन सन मुँह। आँखि चोन्हिआ जाईत अछि। बेश पाँच हाथ ऊँच! देहो दशा खूब भरल-पूरल। कनेक श्याम रंग, कलकत्तिया आमक फारा सन-सन आँखि, बादामी नाक, औंठिया केश कारी भौर, दुनू कात जूट्टी गुहल आ ताहि जूट्टीकँे धुमा कऽ खोपा बन्हने, कसल-कसल वाँहि, आ पाकल तिलकोरक फड़ सन दुनू ठोर। जतवे देखऽ मे सुन्दर, ततवे मीठ-मीठ बोल। नम्हर-नम्हर हाथ आ दुनू हाथमे रहन्हि भरि-भरि हाथ चुड़ी। हाथक आँगूरमे बेश कीमती पाथड़क अंगूठी। सुगा पंखी रंगक ब्लाउज आ साड़ी पहिरने, माथपर साड़ी लैत, आॅचर सम्हारि दुनू हाथ जोड़ि, पएर छुबि गोर लगैत छथि। सौभाग्यवती भवः आशीर्वाद दैत आँखि नोड़ा जाइत अछि। मन पड़ैत छथि डाॅ. कर्मवीर छह फीट छह इंच उॅच, भरल-पुरल देह, मोती जेँका झलकैत दाॅत, क्लीन सेभ, कनेक बहरायल पेट आ हँसैत ई अभिवादन- ‘‘प्रणाम श्रीमान् कुशल थिकहुँ की ने? अन्तर स्पस्ट भए जाईत अछि काॅल्हुका कर्मवीर- आजुक डाॅ. कर्मवीर। दयाकान्त समीकरण रामसेवक के विधान सभा मे टिकट भेटब तय अछि, ५० सालक मेहनत कायल छलैक, सब वर्ग मे नीक पैठ छैक पूरा क्षत्र क s मे ईहा एकटा एहेन उमीदवार अछि जाकर जीत लगभग तय छैक | दोसर पार्टी वाला सब बड़ प्रलोभन देलकैक जे हमरा पार्टी मे चली आ हम पार्षद हम राज्य सभा सदस्य बना दैत छियैक मुदा टस से मस नहीं भेल अप्पन पार्टी के लेल निस्वार्थ सेवा करैत रहल जाकर परिणाम छैक जे आई जीताब लगभग तय छैक | समाचार पत्र मे जखन नामक घोषणा भेल ते रामसेवक के नाम नहीं रामगुलाम के नाम छलैक आहिरेबा! ई की भय गलैक रामगुलाम ते जेल मे छैक ओकर साख ते क्षेत्र मे बहुत ख़राब छैक तखन ओकरा टिकट कियाक भेटलैक | एतबे मे रामुद्दीन बाजि उठल तु सब किछु नहीं बुझैत छिहिन रामगुलाम काल्हिये जेल स s छूटी के एलैक " ओही से की हेतैक ओकरा के वोट देतैक ओ कते के मर्डर केलक" फेर बेबकूफी वाला बात ओ सब केस मे बड़ी भय गलैक एतय जाति समीकरण चलैत छैक ताहि द्वारे ओकरा टिकट देल गेल, संगही ओकरा सन दबंग नेता क्षेत्र मे और के अछि बहुत दिनका बाद मंत्रीजी अप्पन क्षेत्र आबि रहल छलाह | शिक्षा मंत्री बनलाक बाद शायद पहिल बेर अप्पन गाम आ क्षेत्र जेवाक मोका भेटलैन, पहिने जखन विधायक छलाह तखन ते कहियो काल बाज़ार मे दर्शन भs जायत छल मुदा आब ते दर्शन दुर्लभ भs गेल | बहुत बेलना बेललाक बाद मंत्री बनलाह | क्षेत्रक लोक के मन बहुत खुश भेलैक जे आब हमरो सबहक गाम मे स्कूल खुजत, विकाश होयत | फार्मुला मंत्रीजीक काफिला बहुत करीब १५-२० टा गाड़ी छल, मंत्रीजीक गाड़ी बिच मे सजल धजल फूलक माला से लदल छल | ओही गाड़ी मे मंत्रीजीक संग हुनकर सचिव सेहो बैसल छल, सबकियो आराम सs जा रहल छलैथ की गाड़ी एकाएक सड़क पर रुकी गेल | रोडक कात मे किछु लोक हाथ मे फुलक माला लs मंत्रीजीक जयकार कsरहल छल एक आदमीक हाथ मे एकटा कागज पर आवेदन पत्र छल आ ओ आवेदन पत्र मंत्री जी देबय चाहैत छल ओकरा सबहक मांग छल जे हमरा गाम एकटा मिडिल स्कुल हेवाक चाही| कियाक ते अहि गाम मे कोनो स्कुल नहीं अछि बगल के गाम मे धारक ओही पार जे स्कुल छैल ओही मे लड़का सब ते कुनु तरहे स्कुल चलि जायत अछि मुदा लड़की सब नहीं जा पबैत अछि | पुलिस वाला मंत्री जी सs मिलेवाक लेल तैयार नहीं छल जकर बिरोध केला पर ओकरा सब पर पुलिस डंडा बरसाबय लगलैक| "अहाँ पुलिस के मना करियो आ आवेदन पत्र के मंजुर कs लियो अखन सरकार लग फंड छैक आ ओकर कहब छैक जे हरेक पंचायत मे एकटा स्कुल हेवाक चाही" सचिव बाजी उठलाह, मंत्रीजी आँखी लाल पियर करैत बजलाह "अहाँ बेबकुफ के बेबकुफ रही गेलहु पढला लिखला से किछु नहीं होयत, हम मंत्री छि आ अहाँ हमरा सिख्बैत छी अहाँ के पता नहि अछि जे अखन वोट के तीन साल छैक अखन यदि मंजुर कs देबैक ते इलेक्शन मे सब बिसरी जतेक ई सब काज वोट से छः महिना पहिने सुरू कायल जायत छैक" तिरंगा भारतक राजधानी दिल्ली मे शायद ट्रैफिक के सेहो राजधानी छैक ओहो मे बीआरटी रोड पर सबसे बेसी ट्रैफिक रहैत अछि चिराग दिल्ली रेड लाइट पर ओही रेड लाइट पर एकटा बच्चा बहुत रास तिरंगा झंडा लय के बेचैत छल आओर जोर जोर सं बजैत छल तिरंगा ले लो कल पंद्रह अगस्त है बाबूजी कम से कम एक झंडा तो ले लो एकटा कार सं जा के चिपैक गेल और हाथ जोरी के झंडा लेबाक आग्रह कराय लागल बाबूजी आपके गारी मे बहुत अच्छा लगेगा कार मे बैसल बाबूजी के गुस्सा आबी गेलैन और कार के दरबाजा खोली के ओकरा मरबाक कोशिस केलैथ दरबाजा के चोट बच्चा के कपार मे लगलैक और बच्चा रोड पर खसी परल आ ओकरा माथा से खून बहय लगलैक एतबा मे लाल बत्ती भय गेल और बाबूजी गारी ल के चलैत बनलाह विजय के दहिना टांग पर से एकटा कार पास कय गेल | विजय के पता छलैक जे आई जे स्कुल मे मास्टर जे पढेने रहैक तिरंगा के महात्म ई केसरिया शहीद के प्रतीक थीक उज्जर रंग सादगी के और हरियर हरियाली के ओकरा मास्टर इहो कहने रहैक जे तु सब कि बुझबिन शहीद महात्म तोरा सबके ते आजादी ओहिना भेटी गेलौक ! बेचारा विजय दिन मे स्कुल करैत अछि और साँझ के लाल बत्ती पर हरेक सीजन के हरेक रंगक सामान बचैत अछि ! जखन ओकरा होस भालैक ते देखैत अछि पायर लग माय बैसल अछि और हमर दहिना टांग नहि अछि आई ओकरा मास्टर जी के केसरिया रंगक महात्म बेर बेर याद आबी रहल छैक । अमरेन्द्र यादव रिपोर्ट जनकपुरस्थि.त एमाले पार्टी कार्यालय लग बम भेटल अछि । बम राखबाक जिम्मेवारी अखिल तराई मुक्ति मोर्चा लेने अछि । धनुपा पुलिसक अनुसार बमकेँ निष्कृ्य करय सेनाक डिस्पो्जल टोली घटनास्थँलमे पहुँचल अछि । ......................... मन्त्रीँ परिषदक बैसार-प्रधानमन्त्री क कार्यालय सिंहदरवारमे बैसयबला बैसारमे उपराष्ट्रोपती परमानन्द झाक सपत प्रकरण आ सेवा सुविधा कटौती प्रति सत्तारुढ मधेशवादी दलसभक असन्तुषष्टियक विषयमे परामर्श हएत । तहिना, बैसारमे बजार हस्तपक्षेप कऽ दैनिक उपभोग्यत चीजसभ सुपत मुल्युमे उपलब्ध करेबाक अर्थ मन्त्रामलयक प्रस्ताव सहित अन्य विषयमे सेहो विमर्श हएत। कृषि तथा सहकारी मन्त्रीत मृगेन्द्रर सिंह यादव जानकारी देलन्हिय । ................... पुर्व–पश्चिेम राजमार्ग अन्तर्गत सर्लाहीक लालबन्दी्मे एम्वु्लेन्स दुर्घटना भेलासँ एक गोटेक मृत्य आ ५ गोटे घाइल भेल अछि । पुर्वसँ पश्चिममदिस आबि रहल १ च २५२५ नम्बरक एम्वुरलेन्स दुर्घटना भेलासँ महोत्तरी लक्ष्मी्निया ५ निवासी बिमारी ५२ वर्षिय कृपा महतोक मृत्यु भेल अछि । दुर्घटनामे घाइल ५गोटेक इलाज प्राथमिक स्वादथ्य केन्द्र लालबन्दीममे भऽ रहल- सर्लाही पुलिस जनौलक अछि । एहिबीच,अरनिको राजमार्ग अन्तमर्गत सुकुटे लग सुनकोसी नदीमे बस खसिकऽ भेल दुर्घटनामे हेरा रहल सभक खोजीकार्य आई सेहो तिव्र अछि । पुलिसक अनुसार काल्हिक राति आओर २ गोटेक लास भेटल अछि । ई सहित दुर्घटनामे मरनिहारक संख्यार २२ पहुँचल अछि । नेपाली सेना, सशस्त्रु पुलिस, नेपाल पुलिस तथा स्थानियवासीसभ भोरेसँ हेरारहल सभक रबर बोटक माध्यामसँ खोजी कऽ रहल डिएसपी प्रमोद कुमार खरेल जानकारी देलन्हि । दुर्घटनामे १३ सँ बेसी यात्री हेरारहल पुलिसक अनुमान अछि । ...... धनुषाक खजुरीवासीक आन्दो्लनक कारण अवरुद्ध रहल नेपालक एक मात्र रेल सेवा जनकपुर रेल्वे आईसँ सुचारु भेल अछि । रेल दुर्घटनामे दोषी रहल कर्मचारीपर कारवाही आ लिक मर्मत करबाक सहमती भेलाक बाद खजुरीवासीसभ आन्दोेलन फिर्ता लेलक अछि । पटरी बिगरलाक कारण बेर बेर रेल दुर्घटना भऽ रहल कहैत स्थाकनीयवासी, वुधदिनसँ अनिश्चि्तकालीन रेल सेबा बन्द करौने छल । ................. तराईक महिलासभद्धारा मनाओल ३ दिना जितिया पाबनिक दोसर दिन आई पबनैतिनसभ निराहार उपवास कऽ रहल अछि । आई भोर सुर्य उगबासँ पहिने दहीचुडाक ओठघन खेलाक बाद ब्रती महिलासभ, उपवास शुरु केलक अछि । काल्हि नुहाधोकऽ नीकनुकुत खेलाक बाद ओसभ, व्रतक सुरुवात केने छल । काल्हिर दुपहर पवित्र जलासयमे नहाकऽ जितमहान भगवानक पुजा केलाक बाद पाबनि समाप्त हएत । तराईक थारु, राजवंशी सहित मैथिली आ भोजपुरीभाषी महिलासभ, सन्ताऽनक दीर्घ जीवन एवं सफलताक कामना करैत जितियापाबनि मनबैत अछि । ................................ नागरिक सर्वोच्चजताक मांग करैत आन्दो लनरत एकिकृत माओवादी, आई राजधानीक खुलामञ्जन जनसभा कऽ रहल अछि । संयुक्त राष्ट्रि य जनआन्दोालन, नेवाः राज्य समितिक आयोजनामे होबयबला जनसभाकेँ अध्यक्ष पष्पकमल दहाल प्रचण्ड सहित शिर्ष नेतासभद्धारा सम्वोधन करबाक कार्यक्रम अछि । सभा शुरु होयबासँ पहिने राजधानीक विभिन्न स्थानसँ र्याणली सेहो निकालल जाएत माओवादी जनौलक अछि । नागरिक सर्वोच्चताक मांग करैत देशव्यािपी जनसभा करैत आएल माओवादी, आइए जुम्लाीमे सेहो सभा आयोजना कऽ रहल अछि । ................................. ५ दिनसँ रत्नसपार्क शान्ति बाटिकामे आमरन अनसनमे बैसल ३गोटे आंशिक प्राध्यायपकसभक स्वास्थ्य अत्यन्त नाजुक भेल अछि । दु सुत्रिय मांग रखैत सोमदिनसँ अनसनमे बैसल आंशिक प्राध्यापक प्रेम कुमार विश्वाकर्मा, लिलाराज बराल आ अमृतेन्द्र कर्णक स्वास्थ्य नाजुक बनैत गेल स्वास्थ्य परिक्षणमे संलग्न वीर अस्पतालक चिकित्स्कसभ बतौलक अछि । देशभरिक आंशिक प्राध्यापकसभकेँ करार सेवामे नियुक्त करबाक आ आगामी दिनमे आंशिक प्राध्यापक नियुक्ति करैतकाल सेवा सुविधा आ शर्त स्पष्ट होयबला ऐन निर्माण बनेबाक मांग करैत प्राध्यापकसभ, आमरण अनसन शुरु जारी रखने अछि । एहिबीच, आन्दोतलनरत आंशिक प्राध्यापकसभ, अपन मांग प्रति ध्याकनाकर्षण करेबाक लेल आई प्रधानमन्त्री निवासमे धर्ना देत । प्रधानमन्त्री निवास वालुवाटारमे भोर ११ वजेसँ १ घण्टा आ १ बजेसँ २ वजे धरि शिक्षा मन्त्रालयमे धर्ना देबाक कार्यक्रम अछि । ....................... नेपाली सेनाक पृतनापतिसभक सम्मेोलन - छत्रमान सिंह गुरुङ्ग प्रधान सेनापतीमे नियुक्त भेलाक बाद होबय लागल पहिल सम्मेीलनमे ६ गोटे पृतनापति तथा उच्च सैनिक अधिकारीसभक सहभागिता रहत सेनाक प्रवक्ता रमिन्द्र क्षेत्री जानकारी देलन्हि । सम्मेलनमे नवनियुक्त सेनापती गुरुङ्ग सम्वो्धन करताह आ पृतनापतीसभद्वारा काम कारवाहीक विषयमे जानकारी करेबाक कार्यक्रम अछि । श्रोतक अनुसार प्रधानसेनापती गुरुङ्ग, पृतनापतीसभसँ परामर्शक बाद अपन अवधारणा बनेबाक तयारी कऽ रहल छथि । ..................... . त्रिभुवन विश्व् विद्यालयक साधारण सभा-त्रिवि कार्यालय बल्खु्मे बैसयबला ५१ सद ीय सभामे प्रधानमन्त्री एवं त्रिवि कुलपती माधवकुमार नेपाल सेहो सहभागी हेेताह । सभामे ३ अर्बसँ बेसीक वार्षिक बजेट तथा प्रगति विवरण पेश कएल जाएत त्रिविक उपकुलपती माधवप्रसाद शर्मा जानकारी देलन्हि मनोज झा मुक्ति देशक अवस्था आ जनताक प्रवृति अखुनक परिवेशमे ककरोसँ पुछियौक देशक अवस्था केहन अछि ? त, कहता कि कहू सभ ठाम भ्रष्टाचारे भ्रष्टाचार व्याप्त अछि । देशक नेता भ्रष्ट, कर्मचारी तन्त्र भ्रष्ट, पत्रकारिता जगत भ्रष्ट, व्यापारी भ्रष्ट...आर किदन किदन...सभचीज भ्रष्टे भ्रष्ट, तहन देशक स्थितिके कि कहबैक...। देशक स्थिति निश्चितरुपेण नीक त नहिंए अछि, मुदा एकर दोषी के ? सभ जौं भ्रष्टाचारिए अछि त नीक व्यक्ति केओ नहिं ? आ देशक जनता कि दूधक धोएल अछि ? सबकेँ एकवेर अपना छातीपर हाथ राखिकऽ सोंचहिटा पड़त । आखिर किया देशक हालति एहि तरहें दिनानुदिन खसकैत जाऽरहल अछि ? देशमें सब तरहक लोक हाएव कोनो आश्चर्यक गप्प नहिं । सबहक कहब ई छन्हि जे सभक्षेत्रमे भ्रष्टाचारीए लोकक चलाचल्ती छैक । अईसँ असहमत बहुत कम्मेगोटे हएता । मुदा यहो सत्ये छैक जे सत्यक बाटपर धिरे—धिरे आगा ससरैत लोक सेहो अई देशमे अछि । हँ, सत्यवादी धारमे लागल खाँटी राष्ट्रवादी सभक सँख्या बहुत कम अछि आ दिनानुदिन ओहि सँख्यामे ह्रास होइत जाऽरहल अछि । तकर कारण कि ? जौं स्पष्टरुपसँ कहल जाए त दशक एहि परिस्थितिक जिम्मेवार आन केओ नहिं, हमहि आँहाँ छी । हमही आँहाँ देशक नेताके, व्यापारी आ कर्मचारीकेँ भ्रष्टाचारी बनावि रहल छियैक । हम आँहाँ एकटा नेताके भ्रष्टाचार करबालेल विवश कऽ दैत छियैक । जौं गाममे एकटा कोनो नेता साइकलपर चढिकऽ अवैत अछि या पैदल अवैत अछि त ओकरा देखबाकले कोना जनता नहिं जाइत छियैक । एतवे नहिं ओई नेताके अपना दरबज्जापर बैसऽदेवमें सेहो हमसब अपनाआपके हीन महशुस करैत छी । आ हमरे आँहाँक गाममे जौं एकटा नेता महँग गाड़ीमे चढिकऽ अवैत अछि त ओकरा पाछा या कहु स्वागत करबाकलेल माइए पुते दौड़ैत छियैक, ओकरा अपना दरबज्जापर बैसबऽमे हमसब अपनाके गर्वान्वित भेल अनुभूति करैत छी । चुनावक समयमे कतबो सकारात्मक सोंंचवला नेता किएक नहिं हुअए ओकरा भोंट देवाक बदलामें हमसब मतपत्रमे अपन जातिक उम्मेदवारके चिन्हमे मोहर लगवैत छी । ओतवे नहिं अपन मतक महत्वके बुझितो हमसब अपना मतके पाई लऽ कऽ बेचि दैत छियैक जकर कारणसँ जकरालग अपन जातिक जनसँख्या वेसी अछि आ वेसी पाई अछि वएह नेता चुनाव जितैत छथि । कि हमर आँहाँक एहि तरहक व्यवहार एकटा नेताकेँ भ्रष्ट बनवाकलेल विवश नहिं करैत छैक । जौं जातिक नामपर केओ जितैत अछि त ओ अपना जातिक वाहेक आन जनताके वारेमे किया सोंचत ? आ अपना जातिकलेल सेहो किछु नहिं कऽसकैया, कियाक त ओ ई नीक जकाँ बुझने रर्हैत अछि जे अपना जातिकलेल हम काज नहिंयो करब तखनो हमर जाति हमरा भोंट देबेटा करत। आ ओ जे पजेरोबला नेता आ पाईबला नेताक तुलनामें अपनाके निरीह बुझैत अछि, ओहो हमरा आँहाँक सामिप्यता पएवाकलेल आ चुनाव जीतवाकलेल पाईएके अपना जीवनक सभसँ पैघ लक्ष्य बुझि ‘एनि हाउ, पाई कमाऊ’ के नीति अवलम्वन कऽलैत अछि । आ जखन ओ पाइएक बलपर हमरआँहाँक भोट लेत त किया हमरा आँहाँक विकासकलेल ओ सोंचताह ? तहिना देशक कर्मचारिके हमही आँहाँसब अपन काज जल्दीसँ जल्दी करेबाकलेल या कानूनन नहिंयो होबऽवला काज गैरकानूनन रुपसँ करेबाकलेल घुस देल करैत छियैक आ एहिं तरहें एकटा कर्मचारीकेँ जवरदस्ती हमसब भ्रष्टारी बना दैत छियैक। ओनो कर्मचारीयो खासकऽ एकटा पुलिसमे जेबाकलेल हाकिम एकलाख टका लेल करैत छैक, हाकिमके डाइरेक्टर बनेवाकलेल मन्त्रीद्वारा लाखो रुपैया घूस लेल जाइत छैक । जहन ओ कर्ज पैंच लऽ कऽ बहाल भेल रहैत छैक त कोनो बहन्ने कमेबेटा करतैक । एकटा व्यापारीकेँ काला बाज़ारी करबामे सेहो हमसब अपने बहुत बेसी दोषी छी । हमसब बुझितो रहैत छि तइयो ओकर विरोधमे बजबाक हिम्मत नई करैत छियैक ? हमरा आँहाँलेल के बाजि देत ? ककरो लग ओतेक फुरसति नहिं छैक । हमसब सबके भ्रष्टाचारी त कहैत छियैक, मुदा अपन टेटर नहिं देखैत छी । सरकार अपन गाम अपने बनाबु कहिकऽ प्रत्येक गाममे १५ सँ ३० लाखधरि रुपैया प्रतिवर्ष देल करैत अछि । गामक विकास कतेक भेल छैक, विशेषकऽ मधेशमे से ककरोसँ छुपल नहिं अछि । सभ पार्टीक प्रतिनिधिसब अपन बपौटी(पैत्रृक) सम्पति बुझि खुलेआम लुटैत अछि आ हम आँहाँ मौन भऽ सबकिछु देखैत रहैछी । जौं कियो व्यक्ति ओइ काजक विरोध करैत छैक त हमहि आँहा केओ पार्टीक नामपर, केओ जातिक नामपर ओहन भ्रष्टाचारीकेा दूधक धोएल बनाऽदैत छियैक । ओहन भ्रष्टाचारीकलेल पार्टीयोसब अपन प्रतिष्ठाधरि दाओपर लगा दैत अछि ओकरा बँचवऽमें । एकरा अरिक्त जे किछु कोनो गामठाममे जौं छोटछीन विकासक काज होइत अछि त ओकरा विनाश करबामें हमसब बहादुरी बुझैत छी । अपना घरक अगााक सडकपर राखलगेल ग्राभेलक पाथर अपना घरमे घुसियाबऽमे त हमरा सबके जोरा सम्भवतः कतौ नहिं भेटत । एतेक धरि कि सरकार विद्यालयसबके व्यवस्थित करबाकलेल अपनेगामक स्थानिय व्यक्तिक अनुसारे चलेवाकलेल विद्यालय व्यवस्थापन समीतिके निर्माण योजना लाबि प्रायः सभ विद्यालयके समुदायमे हस्तान्तरण केलक, मुदा विद्यालय व्यवस्थापन समीति अखन मात्र पाई कमेबाक एकटा स्थलक रुपमें परिणत भऽगेल अछि । चाहे विद्यालयमे शिक्षकक रखबामे होय या शिक्षककेँ सरुवामें हुए, विशेष कऽ मधेशक प्रत्येक विद्यालय व्यवस्थापन समीतिसभ एहि तरहक व्यापारमें लागिगेल अछि । विद्यालयक पढाई केहन छैक, शिक्षक विद्यालयमें अवैत अछि कि नहिं, विधार्थी अवैत अछि कि नहिं ताहिसँ व्यवस्थापन समीतिके कोनो मतलव नई रहल देखल जाऽरहल अछि । एहि तरहें देशक विकास कोना हायत ? जाधरि हमसब अपने नहिं सुधरब त आन के सुधारत ? जौं हमसभ एकटा सत्य बाटपर चलनिहार, देशभकत आ जनताक समस्याके अपन बुझऽबला नेताक बदलामे तामझामबला पँजेरो एनिहार नेताके निरुत्साही नहिं करब त दिनानुदिन भ्रष्टाचारक दलदलमें हमसब धँसैत जाएब । सत्यक पक्षधरके मनोबल बढेनाई जरुरी आ सभक कर्तव्य भऽगेल अछि । आन कियो किया हमरा आँहाँक सम्बन्धमे सोंचि देत ? ताएँ आनके दोष देबासँ पहिने एकवेर हमसभ अपने टेटर देखब कि ? टेष्ट परीक्षा आबऽलागल, मैथिलीक विद्यार्थी पुस्तक बिहीन शैक्षिक वर्षक अन्त होमऽ लागल अछि, किछु दिनकवाद दशम कक्षाक टेष्ट परीक्षा सेहो हएत । आन आन विषयक विद्यार्थीक कोर्स अन्तो होमऽलागल अछि, मुदा हिलसि कऽ अथवा ककरो दबावसँ मैथिली विषय लेनिहार विद्यार्थी अखनो धरि पुस्तक केन्द्रक दुवारिपर हाजरी दैत बरोबरि भेटत । कारण जे दशम कक्षाक विधार्थी अखनो धरि नहि देखने अछि— दश किलासक मैथिली पोथी । धनुषा जिल्लाक लगभग एक दर्जन आ महोत्तरी जिल्लाक पर्सा पतैली लगायतक स्कूलमे मैथिली विषयक पढाई होइत अछि, मुदा विधार्थी आ शिक्षक दुनुगोटे मैथिलीक पुस्तक अखनधरि नई भेटलाकवाद फिरसान अछि । साझा प्रकाशनद्वारा प्रकाशित पुस्तक, जनक शिक्षा सामग्री केन्द्रद्वारा विधार्थीकलेल उपलब्ध कराओल जाइत अछि । जनकपुरधाम स्थित विद्यापति चौकपर रहल ‘विद्या पुस्तक केन्द्र’क विक्रेता कलानन्द झा कहलनि, ‘साझा प्रकाशनकेँ वेरवेर तगेदा कएलाकवादो मैथिलीक पुस्तक उपलब्ध नहि कराओल गेल’ । दुखक गप्प त ई अछि जे ताहिकालमे मैथिली विषयक पाठ्य पुस्तकक आभाव देखल गेल अछि, जाहिकालमे साझा प्रकाशनक अध्यक्ष छथि— मैथिलीक पैघ साहित्यकार/पत्रकार/कवि/फोरमक नेता/बहुतरास मैथिली संघ—संस्थाक अगुवा व्यक्तित्व श्री राम भरोस कापड़ि ‘भ्रमर’ । अपनाके मैथिलीक योद्धा आ साझा प्रकाशनक पहिल मैथिल/मधेशी चेयरमैन कहबामे गर्व कएनिहार कापड़िके पदपर पहुँचलाक वादो मैथिली पोथी नहि भेटव सर्वत्र आलोचनाक विषय बनल अछि । मैथिली विषयक पुस्तकक अभाव हएव, मैथिली भाषा आन्दोलनक व्यापकतामें सऽभसँ पैघ रोकावटकरुपमें देखाऽरहल अछि । मैथिलीक पाठ्य पुस्तकक सहज उपलब्धता जाधरि नई हएत ताधरि विद्यालयक शिक्षामें मैथिलीक पढाई मात्र भाषण धरि सीमित रहत । गणतन्त्र प्राप्तिकबाद मैथिलीकेा भजा कऽ भलेहिं कतेको मैथिल वरिष्ठ पदपर चलिगेल होथि, मुदा धरातलिय यथार्थ इएह अछि जे मैथिली काल्हियो पाछा छल आ एखनो सिसैकते अछि । महोत्तरीक मालपोतमे कर्मचारी मालामाल के करत कारवाही ? देश पूर्णतया भ्रष्टाचारक दलदलमे जकड़ागेल अछि । नेपालकलेल भ्रष्टाचार कोनो नयाँ बात नहिं अछि, मुदा जन आन्दोलन दूक बाद देशमे भ्रष्टाचारक बाढ़िए जकाँ आबिगेल अछि । भ्रष्टाचारक एहि बाढ़िमे कर्मचारीसब मालामाल भऽ रहल अछि । ओना व्यापारी, पत्रकार, नेता आ देशक प्रायः निकाय एहि सँ अछुत नहिं रहल अछि,जेकरा जतऽ भेटैत अछि ओतहि लुटऽमे लागल अछि । भ्रष्टाचारक एहि बाढ़िमे बहुत मुश्किलसँ एकाध गोटे इमान्दार मनुख्ख भेटत, जकरा आजुक भ्रष्टाचारक माहौलमे बुड़िबकके संज्ञा भेटैत अछि । मधेश आन्दोलनकबाद मधेशमे जौं सभसँ बेसी फाइदा भेटल अछि त मधेशी कर्मचारीके । मधेशीक नामपर ओसब ब्रम्हलुट मचौने अछि । मधेश आन्दोलन आ तकराबादसँ दिनदुगुन्ना आ राति चौगुन्नाक हिंसावसँ खुजल शसस्त्र समूहक डरसँ मधेशक कार्यालयमे रहल अधिकांश पहाड़ी मूलक कर्मचारी अपन अपन सरुवा कराबिलेलक आ मधेशक कार्यालय सबमे स्थानिय मधेशी मूलक कर्मचारीके भ्रष्टाचारक नदि समुद्रमे परिणत भऽगेल । मधेशक कार्यालय सबहक हालति एतेक नाजुक भऽगेल अछि कि कर्मचारी खुलेआम घुस माँगिरहल अछि आ केओ किछु कहऽ नहि सकैया । कोनो जनता जौं किछु कहओ त कोनो ने कोनो दलक नेता आ ओहि कर्मचारीक अपन जातिपातिक लोक लाठी उठालैत अछि, जे भ्रष्टाचारक खेतीमे मलजलक काज कऽ रहल अछि । किछु जनता त घुस द कऽ आओर एकरा बढावा दऽ रहल अछि जल्दी जल्दी काज करेबाकलेल/अनैतिक काज करेबाकलेल, त अधिकांश जनता घुस देबाकलेल बाध्य भऽगेल अछि । भ्रष्टाचार कतेक चरम सीमापर पहुँच गेल अछि आ कोना खुलेआम भऽ रहल अछि तकर एकगोट उदाहरण महोत्तरी जिल्लाक जलेश्वर स्थित मालपोत कार्यालयक रवैयासँ देखल जाऽसकैय । मधेशमे रहल महोत्तरी जिल्लाक मालपोत कार्यालय सेहो मधेश आन्दोलनकवाद मधेशी कर्मचारीद्वारा खुलेआम लुटारहल अछि । मधेश आन्दोलन पश्चात महोत्तरीक मालपोत कार्यालय कामचलाउ रुपमे एकटा सुव्बाके सहारे चलि रहल अछि, ओहिना जेना ‘राम भरोसे हिन्दू होटल’ । अखन महोत्तरी मालपोतक हाकिम बनल छथि मधेशीक नामपर मधेशीके लुटनिहार, कानूनी ज्ञानसँ अनभिज्ञ, कहुनाक सुव्बा बनल लाल देव राय । जे जनता पाइ नहि दैत अछि तकरा एतेक ने नियम कानून देखवऽ लगैत छथिन्ह जे जनता परेशान भऽजाइत अछि । कहबी जे छैक ‘बन्दूक पकड़ा देलापर हवल्दार बनि जाइत छै’ सैह बातक प्रत्यक्ष उदाहरण बनल छथि —लाल देव राय । मधेशीक नामपर हाकिम बनल कानूनक ‘क’ अक्षर नईं जनने आ पैघ कानुञ्चीके दावा कएनिहार लाल देव रायके कानूनी सल्लाहकार बनल अछि महोत्तरी मालपोतक खरिदार.......। महोत्तरी जिल्ला मालपोतमे घुसक वर्णन करैत गा.वि.स. हाथीलेटके युवा पिताम्वर महतो कहलनि,‘हम काज कराबऽ मालपोतमे गेलहु त काज एकदिनमे नहिं भेल । दोसर दिन जहन ११/१२ बजे गेलहुँ त काज भेलाकवाद कार्यालयक खरिदार पदमे कार्यरत कर्मचारी सुशील ठाकुर ‘ भोरे भेलाक नाते नीकेसँ बोहनी करेबाक लेल कहलथि ।’ एक्कहिटा सुशिल ठाकुर नहिं प्राय ः सब कर्मचारिक इहे रबैया ओतऽ देखवामे आओत । पंक्तिकार स्वयं एकटा काज लऽ कऽ एभिन्यूज महोत्तरी सम्वाददाता कमलेश मण्डलक संग महोत्तरीक मालपोतमे पहुँचल छल, एकटा कागज लेवाक छल हमरा सबके । जहन कागज भेटिगेल त ओतहिके कर्मचारी तेजनारायण झा अखनधरि बोहनी नहि भेल बात कहैत पाई मांगि बैसलाह । एतवे नहिं प्रायः सब टेबुलपर बिना बोहनी आ दक्षिणा देने कोनहुँ काज नहिं भऽ सकैय । कर्मचारीसब एनाकऽ पाइ मंगैत अछि जेना हूनक बाबु/बाबा पूँजी फँसाबिकऽ कोनो व्यापार/व्यवसाय कऽदेने होय । किछु कर्मचारी त ‘हे एतवा कममे घाटा लागि जेतैक’ सन बात कहऽमे सेहो पाछा नई हटैत अछि । ई सऽब किछु जनितो सरकारी संयन्त्र मौन अछि, किया त ओहो भ्रष्टाचारमे लिप्त अछि । जखन एहि घुसक सन्दर्भमे कार्यालयक प्रमुख बनल सुव्वा लाल देव राय सँ पुछलगेल त ओ कहलथि ‘ ई घुसक बात सर्वथा मिथ्या अछि, अखनधरि केओ सिकायत नहिं केलक अछि । हम अपने सँ भरिदिनमे २ बेर निचा सँ उपर अनुगमन करैत छी । जौं घुस लैत देखि लेलियैक त हम अवश्य कारवाही करबैक ।’ हूनका जहन हमसब अपनासबसँ माँगल बात कहलियैन त कहलथि,‘आहाँके तखने ने कहबाक चाही, अखन किया कहैत छी ।’ जलेश्वर स्थित महोत्तरी मालपोतक प्राँगणमे एकगोट पागलसन भेषमे टहलैत मनुख्खके देखवैत एकगोट लेखनदास नामनई लिखवाक शर्तपर कहलथि जे ‘काल्हि सातबजे रातिमे एहि पागलके जमिन हाकिमके पाइ खुवाबिकऽ दोसरगोटे अपना नामपर लिखबा लेलकैक ।’ ओ ई कहलथि जे लाल देव जी ठीके कहलथि जे हम २ बेर अपने नीचा उपर जाकऽ निरीक्षण करैत छी । ओ दूइए बेर नहि ५/७ वेर नीचा सँ उपर सभ रुममे चक्कर लगवैत रहैत छथि जे साँझमे कोनो कर्मचारी ई नहि कहए जे हमरा आई कमे पाई भेल । ओ ई देखवालेल जाइत रहैत छथि जे ककरा टेवुलपर कतेक पाई झरि रहल अछि । कतौ हमरासँ बेइमानी त नहि भऽ रहल अछि ? मधेशक कार्यालयसबमे मधेशी कर्मचारीके खुलेआम भ्रष्टाचार रोकबाकलेल केओ तैयार नहि अछि । जे एक/दू गोटा एकर विरोध करैत अछि तकर काज नहिं भऽ सकैय । कानून निरीह बनल अछि, जौं आक्रोशित किछु युवा अधैर्य भऽकऽ ओहन कर्मचारीके पिटैत अछि त सम्पूर्ण कार्यालयक कर्मचारी लगायत देशव्यापी रुपमे कर्मचारी सबहक आन्दोलन शुरु भऽ जाइत अछि । कर्मचारी जाहि जातिक अछि ओ जातिक व्यक्ति/सँघ संस्था/नेता ओकरा पक्ष लऽ कऽ बाजब/नारा जुलुश करबाक शुरु कऽ दैत अछि । घुसक खेती कतेक बढ़ल अछि एकर अन्दाजा एकटा खरिदार/मुखिया/सुव्वा सनसन कर्मचारीके आलिशान महल देखिकऽ लगाओल जाऽसकैय । जहन कि मात्र नोकरीक भरोसे इमान्दारिताक पाईसँ अपना सम्पूर्ण जीवनक कमाईसँ एकटा अधिकृत या फस्टक्लाश अफिसर नीक दूतल्ला घर अपना तलवसँ नहि बनावऽ सकैय । मुदा बाजत के ? आब देखबाक ई अछि जे के नेपाल मायक कोन बेटा आगा बढैत अछि भ्रष्टाचार आ भ्रष्टाचारीके समाप्तीक रास्तापर....। रिपोर्ताज सभ् ग।ेटे कहै छयि जिवन अमूल्य छियै, बहुत तपस्याक बाद मनुष्यक जिवन भेटैत छैक। आ इहो कहवी छइ जे जीवन एकटा संधर्ष छियै, संधर्षक बाद मनुष्यके सफलता अवश्य भेटैत छइ हमरा लेल मा़त्र कहवीए मे सिमीत रहिगेल इ सब। हमर नाम रोशन पंजियार अछि,हमर घर सुनसरी जिल्ला मे पडैत अछि। हमर परिवार एकटा किसान परिवार अछि। हमरा घर मे दाइ, बाबा,माय बाबु आ हमरा लग हमर एकटा बहीन आ दूटा भाय अछि। हम अपना परिवारक सबस जेठ संतान छी। एकटा मघ्यम वर्गीय परिवार होइतो जेठ संतानक नाता स होइ वा जेइ कारणे होइ सबहक सिनेह भरपुर हमरा भेटल। दाइ, बाबा, के विशेष इच्छा भेलाक बादो हम मैट्रिक स आगा नइ पढ सकलौ। कारण इ जे पढ मे ठिक ठाक होइतो एकही बेर मे हम एस. एल. सी. पास नइ कर सकलहुॅं, जबकी हमरा स कमजोर बहुतो वि़द्यार्थी पास भ गेल। कहुनाक दोसर बेर हम परीक्षा देलौ आ पास भेली। मैट्रिक पास क क हम काठमाण्डू गेलौ, कोनो काज करबाक लेल। काठमाण्डू जाक सबस पहिने अपना क्षे़त्रक नेता लग गेलहुॅ, जकरा हमर बाबु सब चुनाव मे बड सहयोग कैने रहथिन्ह। हूनका जाक कहलियैन जे हमरा कतहुॅ काज लगा दिय। ओ कहलैथ देखैत छियै। हम प्रत्येक दिन ओइ नेताजी ओत जाइत छलौ। ओना हमरा लगायत आरो बहुतो बेरोजगार सब नेताजी ओत पहुॅचैत छल। हमरा सबके क्षेत्र मे चारि भाग मे 3 तीन भाग, लगभग 80 प्रतिशत मधेशीक जनसं़ख्या छइ आ 20 प्रतिशत गैर मधेशीक। ताहिस नेता जी ओत मधेशी आ गैर मधेशी दुनु तरहक बेरोजगार रोज हाजरी लगवैत छल। लागातार डेढ, दू मास हम ओत गेलहुॅ, मुदा हमरा नोकरीक कोनो जोगाड नइ भ सकल। जबकी हमरा सामने मे 25/30 टा नेताजीक अपन जाति़़़़़़़़़़ भाइ या कही गैर मधेशी सबहक नोकरी भेट गेल छल। तखन हमरा सोच आयल जे हम सब बेकारे दोसर के जितवै छी अपना क्ष़ेत्र सॅ। आब हारल थाकल हम एकटा गार्मेन्ट मे काज कर लगनहुॅ। ओत हमरा हेल्फर के काज भेटल कहियो अपना घर मे एकटा मोटा नइ उठौने छलौ हम मुदा एत दिन राति हमरा समाने लाद पडैत छल। कहुनाक 4/5 मास गुजारा कंएलहुॅ। आब हम अपने काज करबाक बात सोचलहुॅ आ एकटा पुरान साइकल किनिक ओइ मे पाछा बडका केलियर लगबाक छिटटी बन्हलहु आ तरकारी बेच लगलहुॅ। आब हम भोरे पाॅच बजे उठित छलहुॅ आ साइकल ल तरकारीक बडका बजार कालिमाटी चलि जाइत छलहुॅ आ ओत तरकारी किन क अपन डेरा चल अवैत छलहुॅ। कनी जलखइ क क तरकारी निकजका साइकल पर ध क काठमाण्डूक गलिए गली मे निकलि जाइत छलौ बेचबाक लेल। 10 बजे धरि घुमित छलहुॅ आ आबिक खाना बनाक खाक आराम करैत छलौ आ फेर 2 बजे साइकल ल क निकलि जााइत छलौ। ओना कहियो हमरा बेसी राति धरि नइ घुम पडैत छल, किया त हम दोसर स कनि कमे नाफा ल क बेच देयै रही तरहे हमर दिन बितैत छल। हम जहिया गार्मेन्ट मे काज करैत छलहुॅ त दिन राति मेहनत क क चारि साढे चारि हजार पाइ कमाइत छलौ बा उपर स ठिकदार के गारि बात मुदा तरकारी बेचे मे 6/8 हजार हम कमा लैत छलहु। अही बीच मे काठमाण्डू मे रहिरहल हमरा गाम के एकटा लडका हमरा घर मे जाक कहलकै जे रोशन साइकल पर तरकारी बेचै या। तुरन्ते हमरा गाम स चिठठी आयल घर अएबाक लेल। हम घर गेलहुॅ त हमरा दाइ, बाबा, माय बाबुजी सब गोटे कहलथि जे इ कोन काज शुरु क देले त मान, इज्जति के कोनो ठेकान नइ छौ, तोरा अही लेल तोरा मैट्रिक धरि पढलियउ। भ गेलै काठमाण्डु जाय के कोनो काज नइ छै, आब गामे मे रह। हम हूनका सबहक बोली सुनिक अबाके रहि गेलहुॅ। फेर हूनका सब के कहलियैन, देखियौ काज कोनो छोट आ नम्हर नइ होइत छैक, हम जना एस. एल. सी. पास कैने छियै त हमरा केओ हाकिम थोरही बना देतै आ दोसर मे मधेशी संगे केहन भेदभाव छइ से बुझले अछि। दोसर के नोकरी स त बहुत नीक छइ अपन काज। आहाॅ सब निश्चिन्त रहुॅ अइमे इज्जति ककरो नइ जायत रहिगेल समाज के बात त समाज आइ धरि ककरो नीक नइ कहलकैया। आहाॅ बड नीक जका रहैत छी त इश्र्या करत आ स्थिति कनि खराब भ गेल त समाज हॅसत। ताही स समाज के चिन्ते नइ करु। अहिना कहुना कहुना, समझा बुझाक घरक लोक के हम फेर काठमाण्डु गेलहुॅ। आ पुनः तरकारिए बेचबाक काज मे लागि गेलहुॅ। हमरा मोन भेल जे मेने रोडजखने मालूम भेलइ ओकरा सबके जे हम विदेश जाय चाहैत छी बस पासपोर्ट बनाब स लक विदेश जाय धरि काज के जिम्मा ल लेलक, किया त सब काज फटफट भ जाइत छै जै 8/10 दिन मे पासपोर्ट बनिक आब मेडिकल जॉचला काठमाण्डू गेलहु मेडिकल भेलाक बाद मलेशिया क लेल पासपोर्ट मैनपावर मे बना देल गेल हमर हम फेर गाम चलि अयलहु 2 मास के बाद मे 1 लाख टका ल क अगिला 5 दिन मे काठमाण्डू चलिआउ आहा क फलाइट उठम दिन मे कहल गेल हमरा लग 30 हजार छला आ 60 हजार कर्ज लक काठमाण्डू अएलहु हमरा उडबला हमरा संगे हमर बाबुओ औलथि पाइ पुरा बुझा देलियैक आ हमर वीजा द देलक वास्तव मे उठम दिन मे हमर फलाइट भ गेल हम 2 वर्षक लेल एकटा कम्पनी मे सुपर भाइजरक लेल जाइत छलौ मलेशिया पहुचलहु त कम्पनीक एकटा आदमी हमरा सबके लेब एयर पोर्ट पर आयल छल हम सब गोटे संगे कम्पनी मे गेलहु काल्हिस काज पर आब पडत कहिक कनि दूर पर रहल एकटा गोदाम सनक घर मे ल गेल हमरा सबके ओकहल गेल जे एतही रह पडत काल्हि भिने कम्पनी मे गेलहु हमर बारी आओल त बजाक ल गेल एकटा गोदाम मे आ सामान एत स उठाक ओत धर परत से काज हमरा देखाओल गेल हमरा बड खिस उठल एजेन्ट पर,कहने छल सुपर भाइजरक काज आ एत लेबर के काज कर परैया हम नेपाल फोन केलहु... चाँद के टुकडा अखनो, अहु समय मे आविक मनुख्ख किया एहन पुरान सोँच रखै छयि? आन-आन चन्द्रमा पर जाक घर बनयबाक सोँचि रहल अछि आ हम सब अपन घर के उजाडैत छी। मनुष्यक जन्म किछु करबाक लेल होइत छैक ओनाहिएँ नष्ट करबाक लेल नहि। हँ कहियो काल एहन परिस्थिति आबि जाइत छैक जे मनुख्खके विचलीतक दैत छैक मुदा एहन विचलनक परिस्थिति मे अपना आपके सम्हरबाक चाही, संकट के सामना करबाक चाही जे अखनो लोक नइ बुझि सकल अछि। मनोज मुक्तिजी हम अहाँक कार्यक्रम के नियमित श्रोता छी आ एही कार्यक्रम मादे बहुत लोकक जीवन मे घटल घटना सब सुनैछी ताही स हमरा जीवन मे त नइ मुदा हमरा मित्र के घर मे घटल ई घटना हम पठावि रहल छी। एकरा सुनिक श्रोता सबके किछु लाभ होय तन्हि ताइ आश स पठाबि रहल छी। हमर घर धनुषा जिलाक एकटा गाम मे अछि। हम आ हमर मित्र विनोद बच्चे स बाले वरख सँ संगे पठित छलौ। ओना संगी सभ त आरो छल मुदा विनोद जका दोसर नहि। विनोद सभ दिन सब क्लास मे हमरा स निक नम्बर लाबिक पास होइत छल। पठनाइ लिखनाइ के संगही सभ काज मे विनोद ओतवही निपुण छल चाहे वो खेलकुद हुए, बाजभुक मे हुए वा अनुशासने मे हुए। सब तरहेँ विनोद निक छल। हम सब संगे संग मैट्रिक पास कयलहुँ। मैट्रिक क बाद मे I.SC. पठबाकलेल जनकपुरक रा. रा. व. काँलेज मे एडमिशन लेलहुँ। ओना ई बात आइस 10 वर्ष पहिनेक बात अछि। विनोद के परिवार सेहो बड हँसी खुशी रहैत सखी स जिविरहल परिवारक उदाहरण गाम मे छल। विनोदक परिवार छोटे छल- माय, बाबुजी एकटा बहिन आ विनोद के जोडि क चारि गोटे छल ओहे परिवार मे। विनोदक बहिन से हो सातम क्लास मे अध्ययनरत छलीह। विनोदक बाबु एकटा सरकारी अस्पताल मे काज करैत रहथिन। हमर सब हक गाम जनकपुर स लगे भेलाक कारण स बेसी पावनि मे हम सब गामे चलि जाइत छलहुँ। हमरा अन्य,अन्य कोनो संगीके जौ कोनो तरहक परेशानी चाहे उलझन होइत छलै त सभ गोटे विनोदे लग जाक सल्लाह –सुझाव लैत छलौ। अर्थात विनोद बहुत सुझबुझ बला व्यक्ति छल। जहिना विनोद नाम छल तहिना ओ विनोदी अर्थात हँसमुख लोक से हो रहय, ने कोनो गम, ने कोनो चिंता, कोनो काज मे आत्म विश्वास---(दन दन दनाइत रहु)। अहिना हम सभ I.SC. पास कयलहुँ। I.SC . पास कयलाक बाद दुनु गोटे काठमाण्डू गेलहुँ। डाँक्टरी पढाइयक प्रवेशक तैयारी करबाक लेल। काठमाण्डू मे से हो हम सब एकही रूम मे रहीत छलहुँ। विनोदक घर सँ आ हमरा घरक लोक सब स फोन मे बातचीत भ जाइत छल। एकबेर छठिक पावनि मे हम सब गाम गेलहुँ। विनोदक योजना छल जे ओ 4/5 दिनक बाद आओत आ हम पहिन ही चलि आयब। छठिमे गाम पर से हो बहुत मनोरञ्जन भेल छल। छठिक प्रातःभिने हम काठमाण्डू अयलहुँ, ओ सोमदिन छल आ विनोद आयबाक रविदिन रहै। ओना असगर त मेनेजर नइ लगैत छल, मुदा वेसी दिनक बात थोड्वे छैक कहैत असगरे कहुना शनिदिन धरि वितयलहुँ। रविक दिन भोर मे छः, सात बाजिगेल विनोद नइ आयल। भेल,फेर आइ बाट मे गाडी जाम भ गेल होय तै ताही स देरी भ रहल छैक। अहिना हम ग्यारह बजे तक इंतजार क क खाना बनाक खयलहुँ, इ सोचेक जे बुझाइया विनोद दिनुका गाडी स आयत साझ मे सेहो सात-आठ बजिगेल, विनोदक कोनो अता- पता नइ छल। अहिना 9, 10, होइत 11 बजिगेल विनोद नइ आयल। हमरा आशंका होवए लागल। विनोद वचन के एकदम पक्का लोक छल।राति कटनाइ मुश्किल बुझाइत छल। बहुत राति धरि जगले छलहु निन्न कखन पडिगेलो पते नइ चलल। भोर मे दरबज्जा ढकढकयबाक आवाज स हमर निन्न टुटल। गामस फोन आयल छल। गेलहुँ त फोन पर विनोद छल। विनोद कहलक जे हमारा नइ आब सकलहुँ किछु दिन आओर हमरा लागत। विनोदक बहिनक विवाह ठिक भ गेल छल बुधेदिन विवाह भेलाक कारणे हडबडी मे सभ काज करबाक छलै। ओना अयबाक लेल त हमरो कहलक मुदा अखुनका क्लास छोडए बला नइ भेलाक कारण स हम नइ जा सकलहुँ। बेस्पति दिन एहन समाचार आयल जे अबाके रहि गेलहुँ। विनोद, विनोदक बाबु, आ विनोदक माय तीन गोटे फाँसी लगाक मरि गेल। माथ पकरिक वैसि गेलहुँ जे एहन खुशी मे एहन विपत कोना? ई समाचार त हम बुझियवै नइ केलौ मुदा बुझियवाक लेल विवश भ गेलौ। तैयो अपन मनके मनयबाक लेल हमारा तखने गामक लेल विदा भेलौ जनकपुरक गाडी नइ भेटल,विरगंजक गाडी पकरलहुँ। शाम पहुँचित-पहुँचित 5 बजि गेल। शाम जाइते सबस पहिने विनोदे ओत गेलहुँ। तिनु लहास के मेडिकल चेक के लेल जनकपुर लगेल छलैक। राति मे सभ खेडा हमरा बुझए मे आयल जे किया सामुहिक आत्महत्या भेलैक। विनोदक बहिन जकर विवाह बुधदिन होब बला छलैक ओ बरियाती आबस पहिनही एकटा चिठ्ठी लिखिक छोरि देने रहे जे—{“बाबु,माय,आ भैया,हमरा माफ करब।ओना ई बात हमरा आहाँ सबके पहिनही कहीं देबाक चाही मुदा संकोच स नइ कहए सकलहुँ आ ऐ हम विवश छी ई काज करबाक लेल। अखन हम बहुत बडका धर्मसंकट मे छी, एक दिस सब परिवार ओअर मान इज्जत आ मर्यादा अछि त दोसर दिस हमर पुरा जिवनक प्रश्न अछि जे हमरा जिवाक अछि। ताही स हम अपन जिवनक लेल क रहल छी। निहोरा अछि जे हमरा तकबाक प्रयाश नइ करब।“}-- आहाँक-- कुलच्छिन/बहिन॥ विनोदक बहिन गामेक एकटा पासमान जातिक लडिका संगे चलि गेलाक बाद समाज स बँचबाक लेल विनोद आ विनोदक माय, बाबु मृत्यु के चुमने छल अपन इज्जत बचयबाक लेल सबस सस्ता काज हुनका सबके याह बुझयलनि। मनोज जी हम श्रोता सभके ई घटना अइ लेल सुनयलहुँ जे की सबके समझाब-बुझाब बला विनोद द्वारा कायल गेल ई काज उचित भेल? ने जानि अखन कतेक विनोद समस्या स घेराक आत्महत्याक रस्ता चुनत? जीवन त जीवाक लेल होइत छैक, किछु करबाक लेल होइत छै। जीवन मे छोटछिन रूकाहट त होइते रहैत छैक। आत्महत्याक बाट चुनब एकटा निक लोकक काज किनहु नइ भेल जेना हमरा बुझाइत अछि। जीवन संघर्षक दोसर नाम छियै---। --------------------------- [1] --------------------------------------- ओना जीवनक सम्बन्ध मे बहुत गोटे अपन-अपन परिभाषा करै छयि, मुदा हमरा बुझि पडैत अछि जीवन मात्र देखावा छियै। ओना ई सब ठाम शत-प्रतिशत सत्ये नही भ सकैय। बहुत दिन स उकुस-मुकुस करैत हमर मोन के गठरी के अछि टेंज मैथिली गुञ्जन मार्फत खोलि रहल छी। अखुनका समय बहुत आगा बढि गेल छैक ताएँ हमसब सत्य, झूठ, आ देखावा के चिन्हिक, बुझिक किछु करबाक चाही से समस्त श्रोता स हमर आग्रह अछि। हमर नाम ए. कुमार अछि। हमर घर जनकपुर अञ्चल मे पडैत अछि। हम अखन विराटनगर मे रहैत छी। ओना बचपने स ने उधोके लेव,ने माधव के देव से सिद्धांत रही आयल अछि हमर। अपना घर स दूर विराटनगर मे रहियो क जे किछु समय भेटैत अछि तकरा अपन संस्कृतिक प्रचार- प्रसारक कार्यक्रम मे जाक वितवैत छी आ नइ त घरक पाछु मे रहल वारी मे काज करैत रहैछी। हम आइ अप्पन नहि कि किछु महानुभाव सबहक ,देखावा केहन-केहन छन्हि से श्रोता के सुनाव चाहैत छियन्हि। मैथिलीक कोनो कार्यक्रम, सामाजिक काज वा किछु रहैत अछि त सबस आगा-आगा रह वला व्यक्ति सबमे स रहैत छयि एकटा व्यक्ति संदेश कुमार, संदेश जीक मिठ बोली, आर्कषक व्यक्तित्व आ निक पाइबला नौकरी हूनक विशेषता छन्हि। विरटनगरक कोनो संस्था हुए, हूनक उपस्थिति आनिवार्य रहै छन्हि। संदेश जीक कार्यप्रणाली पर किनको कोनो आपत्ति नइ रहैन। ककरि घरबला- घरबालीक पंचेती हुए, किटनैतिक गप्प हुए चाहि जातिक सभा, सब ठाम हूनके वोलबला रहैत छन्हि। हमरे नहि की एत रहबला प्रायः लोकके ई विश्वास छलै की संदेश जी गलत नइ क सकै छयि। विश्वास ककरो पर नइ कायल जा सकैत छैक तकर वडका प्रमाण सदेश जी छयि। मैथिल ब्राह्मण सबहक वैसार छल विराटनगर मे, ओना नहियो त 45-50 गोटेक उपस्थिति छल ओहि ठाम। मुद्धा छल’ राकेश के सभ काज मे उपस्थितिक। मैथिली वा मैथिलक कोनो काज होइत छल त संदेशे जी जक राकेश के सेहो अनिवार्य उपस्थिति रहैत छल ओतय। राकेश सप्तरी जिल्लाक वासी छथि। किछु दिन पहिने राकेश दोसर जाति मेँ विवाह क लेने छल। विवाहक बाद कोनो काज परोजनमे राकेशक उपस्थिति संदेश जी के नीक नइ लगनि। संदेश जीक ई पूरा कोशिश रहैत छल जे राकेश के समाजिक बहिष्कार कायल जाए। सभा मे संदेश जीक कहब छलनि जे राकेश कुसंस्कारी भ गेल, समाज के विगाडि देलक। एहन-एहनके सामाजिक बहिष्कार जरुरी छैक नइ त एकदिन समाज नष्ट भ जायत। हम मौन रहिक एकटा कोना मे वैसल विचार सब सुनैत छलहुँ। ओना आनो बहुत बाबु लोक सब रहैय ओतय मुदा सब “बरोक भाइ आ कनियोक भाइ“ जका तनिक चुप्प छलैय। सभा मे उपस्थित लोक सब मे छलयि, एकगोट वृद्ध से हो। आइ स पहिने हुनका हमारा एत नइ देखने रहियै न। ओ वृद्ध ठाढ भ बाजब शुरु कयलन्हि- हमर नाम रघुनन्दन मिसर अछि। हमर घर संदेश बाबुक बगल के गाम मे पडैत अछि। संदेश बाबु हमरा नइ चिन्हैत हेता मुदा हम हिनका चिन्हैत छियनि। हम मोरङ्ग़े जिल्लाक एकटा गामक स्कूल मे शिक्षक छी। ओना आइ हम पहिले दिन एहन सभा मे अएलहुँ, या आ बाज नहि चाहितो अपनोक नहि रोक सकलहुँ अछि। किया त हमारा शुरुए स एत देखि रहलछी, एतुक्का सब लोक भ्रम मे फँसल छयि। के ओ हँ, हँ करैत त के ओ चुप्प-चाप रहिक। तखने सँ हम सुनि रहल छी, जातिक संस्कार अपन संस्कृतिक जोगय बाक गप्प। मुदा एकैटा समाधान जे अंतर्जातिय विवाह क लेने राकेश के सामाजिक बहिष्कार कि मैथिलक संस्कार आ जातीय संस्कृति मे मात्र स्वजाति वा विजाति मे विवाह अवैध छैक? हम कनिको एही स सहमत नहि छी। संदेश बाबु तखने स समाजक, जातिक, संस्कारक, संरक्षण ल बडका भाषण द रहल छयि। हमर प्रश्न अछि अपने सब स जे की अपन जन्म देब बला माय, बाबुके गारि पढब, मारब-पीटब आदि काज सँ समाज की संस्कारिक होइत छैक? संदेश बाबु, अपन टेटर से हो देखियौ। जे लोक अपने समाजकेँ बिगाडि रहल छयि, से एत आबिक समाजक बाहक बनल छयि। एहन- एहन सँ हमरा आहाँके सचेत होयबाक चाही। हँ ई जे बौवा छयि संदेश बाबु सने हँ मे हँ मिलवैत हिनको हमारा निक जका चिन्हैत छियै। बाबु बेचारा बडका विद्वान छलनि मुदा हिनका सन पुत भेलनि। जाधरि पंडित जी जीवित छलाह ई एकहुँ सेर दूध नइ देलखिन्ह, गाम पर एत स जाइ छयि त सब एक दोसर के मुँह तकैत रहै छयि जे कोन घर भोजन बनत त भोजन करब। ई बउवा एत जातिक इज्जत मे लागल दागक बात करै छयि। अपन भतिजी, एकटा नइ दू-दू टा भागि गेलनि दौसर जाति संगे। कि यौ? याह विराटेनगर स 25 दिन पर ल जाक पुनः ब्राह्मणे मे वियाह करा देलखिन्ह। की अपना जातिक लेल नीक काज केने छयि। हमरा स बुझू त जे हिनका सँ लाख गुणा निक राकेश बाबु जे कम स कम दोसर लडकी के त अपना संस्कार मे मिलौने छयि। एत उपस्थित सब समाज सँ हमर याह आग्रह अछि जे जौँ समाज के संस्कृति आ संस्कार बचब चाहित छी त चुप्पे रहला स काज नइ चलत समाज मे अगडीया बन बला संदेश बाबु सबहक चरित्र के नापेँ पडत- तौलेँ पडत। समाज ककरो बपौती सम्पति नइ होइत छैक। एहन मात्र दोसर के टेटर देख बला स समाजक सचेत करबाक हमर आ आहाँक कर्तव्य अछि। जी ताइ दिनक बाद संदेश जी आ हुनक पिछुलग्ग मित्र सब झुठ-फुस बजनाइ छोडि देने छयि। आ हम आभारी, कृतज्ञ छी ओ बुढा मास्टर साहेब के। कार्यक्रम मैथिली गुञ्जन मे ई घटना पढयबा मे मात्र एकैटा हमर लक्ष्य अछि जे मैथिल समाज मे अपने करब आ दोसर के-धरब “बला प्रवृति के हमरा आहाँके अंत करहि टा पडत। चुप रहला स काज नइ चलत जे अपन जन्मदाता के आदर नइ कर सकै या ओ समाज के कत ल जाक छोडत”, एहन- एहन स लोक के पर्दा उठाबही पडत। जौ अहुँक गाम वा शहर मे कियो संदेश बाबु सन अछि त देखब भाग ने जायब। एहन लोकक चरित्र ठीक ओहने रहित छैक जे दहेजक विरोध कय निहार अपना बेटाक वियाह मे मोटगर नोट लैत छयि----॥ --------------------------------- शनिवार -------------------------------- जीवन, ओझरायल डोरा जका बुझिपडैय या। वास्तव मे सब किछु एकही आदमी के नइ भेटक सकैय किछु ने किछु के कमी प्रत्येक मनुख्य के रहवे करै छन्हि। कहियो एक –एकटा पाइला तरसैत रह-वला व्यक्ति जखन बहुत पाइ कमालइ छयि त बाहरस देख वला सब हक नजरि मेँ ओ सर्वगुण सम्पन्न लगैछयि मुदा कि? पाइएक लेल हुनका कि-कि छोड परल हैतनि से केओ नइ सोचेक छिन्ह। किछु तही तरहक हमरो जीवन मे भेल अछि। अपना जीवन मे भोगने किछु क्षण, आ चाहियो क नइ कर पाविरहल किछु वंदना के हम प्रस्तुत करबाक लेल दिल्ली स इ पत्र पठावि रहल छी। ओना हम त नहिए सुनाओ सकब तथापि आशा अछि अवश्य प्रसारण क देवइ। गाम पर छलहुँ त एही कार्यक्रम के आनन्द भरपुर मात्रा मे उठवित छलहुँ। एखन हमर जीवन कत स कत चलि गेल हमर नाम महेन्द्र आनन्द अछि। हमर जन्म एकटा मध्यम वर्गिय परिवार मे, बिहार राज्यक मधुबनी जिल्ला मे भेल। हमारा अपना माय-बाबुक पहिल संतानक रुप मे जन्म लेने छलहुँ। माय के क ओ ट के ज्ञान नइ छलैन्हि, आ बाबुजी दिल्ली मे काज कहाँदोन करथिन्ह। कहाँदोन अइला कि हमरा जन्म भेलाक छऎ मासेक बाद बाबु के मृत्यु भ गेलनि। कहाँदोन हमरा ओ देखनहुँ नइ रहथिन। हमरे देखएला जखन ओ दिल्ली स अवैत रहथिन सन 1963 मे त बस एक्सिडेण्ट मे हुनक मृत्यु भ गेलनि। बहुत कष्ट क-क माय हमरा पोसने होइथिन से अनुभव, हमहे की केओ क सकैछथि। बाबु स जेठ एकटा कका छथिन्ह। जहिया बाबुक मृत्यु भेलनि त दादी- दादा दुनु गोटे जिविते रहथिन्ह। बेटाक मृत्यु दादी आ दादा दुनु गोटेक तोरि देलकनि। बाबु मरलाक दुए साल के भीतर मे दादी-दादा सेहो ई संसार छोडिक चलि गेलखिन्ह। पतिक मृत्यु के बाद माय के छहरि देनिहार गाछ के रुप मे रहल दादी- दादाक मृत्यु क विछोह परीक्षा गेल कनि हुनका। अपना जीवन मे एकके बाद आयल दोसर आफत- विपत स हडबराइयोक माय मात्र हमरा लेल अपन जीवन जिय लगलिह। कहबी छै—“डूबैत सुरज के केओ पुछुनिहार नहि होइत छैक”। तहिना कका माय के भिन्न क देलखिन्ह। दुःख सहब माय के आदति भ गेल रहनि, माय नइ हडबडेलखिन्ह। ओना मामा आविक माय के अपना गाम लगेलखिन्ह आ ओतही सभ दिन रहबाक लेल कह लगलखिन्ह मुदा बच्चा लक नैहर ओगरब माय के नइ नीक लगलैन्ह आ ओ 10/15 दिनक बाद अपने गाम घुरि एलखिन्ह। हूनक जीवनक एक मात्र सहाराक आशा हमही छलियैक। ओना खेत एते हिस्सा भेटल छलै जकर उपजनी स कहुना साल कटा जाइत छलै। घरे मे माय चर्खा चलवैत छलिह। महिना मे 2 वेर मामा अवैत छलखिन्ह आ चर्खाक सूत मधुबनी आ सूतक पाइ आ सामान माय के द अवैत छलखिन्ह। गामे मे क स्कूल सँ हम आठ क्लास पास कयलहुँ आ गामक से एक/डेढ कोस पर रहल एकटा हाइस्कूल मे नाम लिखा, पढ लगलहुँ। हमरा बाबु नइ होइतो गाम मे ककरो स खराब कपडा आ पढाइयक समान मे कमी, हमरा माय कहियो नइ होब देलखिन्ह। माय के बैसी समय चर्खेकाटए मे वितैत छलन्हि। हमरा याद अछि जहिया हम 9 वाँ क्लास मेअ रही त माय के मोन बहुत जोर सँ खराब भ गेल रहन्हि। बेसीकाल हुनकर माथ दुखाइत। डाँक्टर जाँच क क हुनका चश्मा देने रहनि आ चर्खा कनि कमे कटबाक सलाह देने रहनि। समय-वितैत जा रहल छल अपना गति मे। हम मैट्रिकक परीक्षा देवाक तैयारी मे छलहुँ। ओना बच्चे क्लास स हमपढाइ लिखाइ मे ठीक होयबाक कारणे पुरा गामक आश हमरा पर छलै। हँ एकटा बात हम चाहियोक नइ विसरल छी जे जौ केओ हमरा ‘टुग्गर’ वा ‘टुगरा’ कहीं दै से हमरा माय के कनिको बर्दाश्त नइ होइन। हमर मैट्रिक परीक्षाक सेंटर बेनीपट्टी मे परल छल। परीक्षा देबाक लेल बेनीपट्टी मे एकटा रुम भाडा ल क ओत रहल छलहुँ। अपन संतानक प्रति सिनेक भावना माय के, परीक्षा समय मे बेनीपट्टी हमरा संगे रह स नइ रोक सकलनि। मायक आर्शिवाद आ हमर मेहनत दुनु सफल भेल। हम फर्स्ट डिभिजन सँ मैट्रिक पास कयलहुँ। रिजल्टक दिन जे हम मायके खुशी देखलियैन तकर वर्णन हम नहि क सकैत छी। माय ओहिदिन पूरा गाम मे लड्डू बटने छलखिन्ह। “एहन खुशी छलखिन्हजेना एकटा बच्चा अपना घर मे भ रहल दीदीक वियाह मे खुशी रहैत छयि।“ मैट्रिक पास कयलाक बाद माय फेर चिंता मे परीक्षा गेलखिन्ह। डाँक्टर हुनका बेसी चर्खा कटबाक लेल मना केने रहनि मुदा ओ हमरा पढाइयक खातिर विसरि गेलखिन्ह, आ दिन-राती चर्खे मे बिताव लगलखिन्ह। हम मधुबनीक आर. के. काँलेज मे काँमर्स बिषय ल क पढ लगलहुँ। बच्चे स माय स कहियो दुर नइ रहल, हमरा शुरू-शुरू मे 10/15 दिन बहुत केनादोन लागल मुदा कहुना- कहुना रहा लगलहुँ। अहिना हमारा I.COM से हो फर्स्ट डिविजन सँ पास कयलहुँ। दिन रातिक मेहनत सँ मायके स्वास्थ्य खराब होब लागल रहनि।माय के कतबो जीद्द के हम नइ सुनि अपन मौसा ओत गेलहुँ जे दिल्ली मे छलैथ। माय के मोन रहनि जे हम आओर पढी। दिल्ली मे एकटा फैक्ट्री मे सहायक एकांटेंट मे काज भेट गेल। एक वर्ष जल्दीए बिति गेल ओत। ओना हमारा 2 बेर गाम आयल छलहुँ। आब हमर तनखा एते भ गेल छल जहिसँ प्रत्येक मास हम गाम पर सेहो हजार/पन्द्रह सय पठा दैत छलियै। माय के छती बडजोर दुखाय वला बीमारी स परेशान रह लगलखिन्ह। हमरा चिठ्ठी लिखबाक बजवौ लयि आ विवाह करबाकलेल जोर देव लगलयि। हम मात्र 10 दिनक छुट्टी मे आयल छलहुँ। माय के बात के हम नइ काट सकलहुँ। आ ओही दस दिन मे ममे गाम मे हमर विवाह भेल आ दुरागमन से हो। माय के मोन बेसी खराब होब लगलैंन्ह। ऐबेर हम नया कनिया सहित मायके ल क दिल्ली चलि एलाहुँ। डाँक्टर सँ जाँच के बाद पता चलल जे हुनका केँसर भ गेल छन्हि।एकर कारण छला वैसी चर्खा काटब। हम इलाज मे अपना तरफ स कोनो कमि नइ रखलियै मुदा ओइ सालेक अंतधरि माय से हो हमरा अनाथ बनाविक एही संसार स चलि देलीह। अहिना समय बितैत गेल। अखन हम फैक्ट्री मे सिनीयर एकाउंटेंट छी। अखन हमरा परिवार मे हम सब 3 तीन गोता छी, हम, कनियाँ, आ एकटा 2 वर्षक बेटा ‘सुकोमल’ अछि। देखियौ, समय कोना चलैछै, अखन अपना कनियाँ बच्चा कहु अपन पुरा परिवार आ पाइ स से हो भरल-पुरल होइ तो बहुत दुःख होइ या अपन नेन्हपनक बात सब याद क! क! अखन हमारा चाहियोक संगी सभ संगे खेलायबला आसपास, झिझिर-कोना, पकढिल्लो, कबड्डी-कबड्डी, सुर्रा नइ खेल सकैत छी। ओना आन बच्चा जका हम मायक अत्यधिक सिनेहक कारणे बहुत कमे खेल सकलहुँ ओ खेल सभ। मनोज जी हम प्रायः निश्चित क नेने छी जे अपना सुकोमल के गामक माटिमे खेलाव खातिर सभ चुट्टी गामे पर वितायब। संस्कृति, भाषा, आ माटि-पानि बुझबाक लेल गामक मे रहनाइ बड़ जरुरी होइत छैक से हमरा बुझाइया। हमारा समस्त श्रोता सँ आग्रह से हो करबनि जे अपना बच्चाके गाम मे सेहो खेलबाक मौका दियौ, कियाक त खेलनाइ जीवन मे सब दिन सम्भव नहि। हमरा बस एक्हीटा बातक कचोट होइत रहैया जे अपन गाम हमरा के पडल अछि जकर याद मे सदिखन लिप्त रहैछी। (चाँद के टुकडा) हमरा हमर गाम। इज्जतिक खातिर एहि लोकप्रिय कार्यक्रम ’मैथिली गुञ्जन मे’ बहुतोलोकेक जिवनक घटना सुनैत-सुनैत आई हम अपना जीवन मेँ वितल या कि कहु विति रहल घटना लिखिक, पठावि रहल छी ई आशा लक जे अवश्य प्रशारण क,देब। अपन मोनक बोझ कम करब आ मैथिल समाज मे व्याप्त एहि चलन प्रति सम्पूर्ण समाज क लेल हमर ई प्रश्न अछि। हमर नाम सुची अहि। हमर घर सागरमाया अञ्चल मे पडैत अछि। हम(3) तीन भाय-बहिन छी।(2)टा भाय आ हम बहीन मे एसगरे छे। बाबुजी हमर एकटा सरकारी कर्मचारी छथि आ माँ गृहिणी। हमर जन्म 2030 साल, आइ स 33 वर्ष पहिने भेल। बाबुजी सरकारी नोकरिहारा आ एसगर बहिन होयबाक नाते घर-परिवारक सब क्यो बड मानैत छलयि हमरा। बाल्य काल बहुत दुःखमय रहल हमर। हम सब अर्थात माँ,दुनू भाय आ हम अपना गामे मेँ रहैत छलहुँ आबाबुजी ओतही जत-जत हुनकरपोस्टिंगहोइत। हमरा गामे मे हाइस्कूल होयबाक कारणेँ हमारा सब भाय-बहिन स्कूल संगे जाइत-अवैत छलहुँ। मैट्रिक हम बहुत नीक जका पास कयलहुँ। मैट्रिकक बाद गाम स तीने किलोमीटर पर रहल एकटा काँलेज मे हमर एडमिशन भेल। काँलेज मे लडकीक संख्या ओते बेसी नै त कमो नै छलै। हम I.A. First year के परिक्षा देलहुँ आ कनि दिनक बाद रिजल्ट सेहो आयल, बहुत नीक नम्बर आयल छल हमरा। हमर बाबुजी पढल-लिखल आकी कहु बुझनिहार होयबाक कारणे हमरा स्वतंत्र जका छूट भेटल छल कोनौ अंकुश नहि। एहि तरहे हमारा I.A. फर्स्ट डिविजन सँ पास कयलहुँ 2043 साल मे। आब B.A. मे पढबाक लेल हमरा विराटनगरक महेन्द्र मोरंग केंपस मे एडमिशन भेल। ओना विराटनगर मे त हमरा अपन परिवारक केओ व्यक्ति नइ छलयि हँ, हमर मामा-मामी ओतइ रहैत छलयि। मामा एकटा फैक्ट्री मे मैनेजर छलयि। हम हूनेक सब संगे रहेत छलहुँ। काँलेजक हमरा क्लास मे हमरा अलावा एकटा आर मैथिल लडकी छली- पुनम। ओना लडका सब त बहुत छल मूदा एकटा लडका अरुण यादव बहुत सभ्य आ पढाइयोमे निक छल। ओना हमरा ककरोस ओते मतलब नइ रहैत छल। मतलब रहैत छल त मात्र अपन पढाइ सँ। हँ साहित्य मेँ हमर रुची होयबाक कारणे कविता सम्मेलन सब मे हमर जायब मामा के कनिको नीक नइ लगैत छलनि। एहि तरहे हम फस्ट इयर नीक नम्बर स पास कयलहुँ कहियो शाम चलि आयल बेर मे वा आवश्यक नोट सब हमरा अरुण सहयोग क दैत छलयि। अरुण हमर बहुत नीक मित्र भ गेलाये। हमरा दुनू गोटाक बीच आर कोनो तरहक सम्बन्ध नइ छल, मुदा सम्बन्ध त मात्र एकटा असल मित्रक। अरुण कहियो काल हमरा डेरा पर अबैत छलयि जे हमरा मामा अरु मामी के कनिको निक नइ लगैत छलनि। मामी आब एकटा कोनो छोटो बात मे अरुण लगाक उलहनक रुप मे बात कहि दैत छलयि। एकदिन भोरे हमर बाबुजी विराटनगर पहुँचलयि आ हमरा पढाइ-लिखाइ आर सब बात-व्यवस्था सम्बन्ध मे पुछलयि। हम-सब बहुत नीक कहलियैन। बाबुजी ताइके बाद हमरा अरुणक सम्बन्ध मे पुछलयि- के छीयै ई अरुण यादव। ओकरा स केहन सम्बन्ध छै तोरा? बाबुजी के बहुत सरल रूप मे हम कहलियैन- अरूण यादव हमरे क्लासक एकटा सभ्य आ लगनशील विद्धार्थी छियै, आ हमर बहुत नीक मित्र। बाबुजी अइस बेसी हमरा नइ पुछलयि आ- “निक जका पढब,सब विचार करैत.” कहिक ओहि दिन चलि गेलयि। बाबुजी त चलि गेलायि मुदा हमरा मोन मे एकटा मामा-मामी आ बाबुजी प्रति कनि केनादोन सोचाय। लागल। हम अरूणक मात्र एकटा मित्र मानैत छियै आ ई सब एहन शंका किए क रहल छयि। फेर हम अपना के सामान्य बनब के प्रयाश कर लगलहुँ। पहिनही जका काँलेज जयबाक हमर दिनचर्या शुरु भेल। हमारा आब अरुण स बहुत कमे बजैत छलहुँ। पहिने त ओना हमारा कहयो हम नइसोचैत छलहुँ, मुदा आब हमरा कखन काँलेज जाइ आ अरुण के देखैत रही जका होइत छल। अहिना शुरु-शुरु मे अरुण प्रति कोनो भावना नइ आयल हमरा मोन मे मामा-मामी जबरदस्ती कहिक अरुण प्रति हमरा सोचबाक लेल विवश क देलयि। B.A. सेकेण्ड इयर अर्थात फाइनलके परीक्षा होब मे मात्र चारिमास बाँकि छल मुदा आब हमरा पढ मे कनिको मोन नइ लगैत छल। आखिर एक दिन हम अपना-आपके नइ रोक सकलहुँ आ अरुण के कहि देलियै जे- हम आहाँ सँ प्रेम करैछी। अरुण एकदम चूप-चाप छल। हम पुछलियै- कि हम अहाँके पसन्द नइ छी? अरुणक बोल फुटल- नइ-नइ से बात नइ छियै। आहाँ सब तरहे बहुत नीक छी, हम अहाँक एही प्रस्तावके हृदय सँ स्वागत करैत छी। मुदा डर अछि हमरा अइ बात के जे हम यादव छी, आहाँ ब्राम्हण छी,की हमरा आहाँक विवाह संभव छीयै? अरुणक एही प्रश्न के कोनो उत्तर हम नइ देलियैक। हमरा मोन मे ई पूरा विश्वास छल जे अखन के जमाना मे जाति-पाति कोनो बडका कारण नइ छियै, हम अपना बाबुजी के कहुना मना लेबै। परीक्षा नजदिक भेलो पर हम दुनु गोटे ओते नइ पढि रहल छलहुँ जतेक पढबाक चाही। प्रेम छुपाओल नइ जा सकै छई, स्याह हमरो सब संगे भेल। मामा-मामी बाबुजी के खबर केलाखिन्ह, बाबुजी विराटनगर आबिक हमर स समान लइत ,हमरा नेने गाम चलि औलायि। हमारा बाबुजी के कह चाह लियैन जे आब मात्र 2 मासक बाद हमर B.A. फाइनल परीक्षा अई। मुदा बाबुजी कोनोबाते हमर सुनबाक फेरी मे नइ रहथि। बस दस दिनक भितर इण्डियाक एकटा गाम मे हमर विकाह ठिक क देल गेल। हमरा नइ चाहितो हमर विवाह करादेल गेल। हमर आ अरुण दुनु गोटेक सब सपना चकनाचुर भ गेल। चाहियोक किछु नइ कर सकलहुँ। हम त आब भाग्य मे ब्याह लिखल सोची कहुन अपन नयाँ जीवन के स्विकारबाक लेल बाध्य भ गेलहुँ। विवाहक पाँचे दिन पर द्विरागमन भ गेल। अपना सासुर गेलहुँ। सासुर आयल जे उमंग एकटा नयाँ विवाहिता मे होइत छै वा अपन नइहर छोडका लेम जे दुःख होइत छै से कनिको हमरा नई बुझायल, किया त हम अपना आपके मात्र एकटा कठपुतली बुझैत छलौ मात्र कठपुतली। विवाहक छः दिन भेलाक बादो हमरा हमर पति नइ टोकलथि, हमरा लग हमर पति औलयि। आइये हम ओइ मनुख्यक के निकजका देखि रहल छि जकरा संग हमर जिवनक प्रत्येक साँस बन्हागेल अछि। बर पलंग पर बैसलयि। ओहो चुप आ हमहुँ चुप। दुनु गोटे चुपे-चुप बैसल ओराति बितिगेल। प्रातःभिने राति मे फेर औलयि, ओइदिन ओ दारु पिबिक आएल रहथि। दारु स हमरा एकदम घृणा लगैत छल मुदा हमारा एकहुँ रति हुनका मना नइ क सकलियैन। बेगर किछु बजने हम सब संगही सुतलहुँ। प्रातःभिने पाँच बजे हमर बारह उठिक दिल्ली चलि गेलयि। दिल्ली मे ओ कम्प्यूटर इंजिनियरिंग क रहल छलयि। द्विरागमनक (3) तीन मासक बाद हमर बाबुजी क अयलाक बाद पता चललनि जे ओ नाना बन, बला छयि। समय अपना समयसँ विति रहल छल। हम एकटा बच्चाक माय बनलहुँ। सासुर मे सउस, ससुर सब गोटे बड़ा मानैत छलयि हमरा। बच्चा भेलाक एक ही मासे म हमर बाबुजी अपन गाम ल ऎलयि। हमर आठ मास रहलाक बाद ससुर विदागरी कराक हमरा सासुर ल गेलयि। तीन वर्ष वितिगेल छल हमरा बारह के दिल्ली गेला। एक दिन हमर ससुर इमरजेंसी तार पठाविक हमरा वर के गाम बजौलखिन्ह। गाम एलाक बाद राति मे हमरा दुनु गोटे मे परिचय-पात्र भेल। एतेक दिन धरि ने कियो सब किछु कहलथि आ नइ हम ककरो बतेलियै, हम त मात्र एकटा हड्डी आ माउसक बनल मुर्ति आ की कहु रोबोट जका छलहुँ। ओइ राति मे हमर पति सब किछु हमरा बतौलयि। ओ कहलयि-देखु हमारा आहाँ स विवाह करबाक पक्ष मे नइ छलहुँ, हमर त दिल्लीए मे एकटा लडकी संगे प्रेम करित छलौ जे हमरा बाबु-मायेक बुझल रहै। मुदा सब किछु बुझितो ओ जातिक कनियाँ आ दहेजक लेल जबरदस्ती हमर विवाह आहाँ सँ कए देलयि। आहाँ स भेल विवाह हम मात्र अपन बाबुक इज्जति बचाब लेल केने छलहुँ। विवाहक बाद हम दिल्ली जाक ओही लडकी स वियाह क लेलहुँ, जकरा हमारा प्रेम करैत छलियै, हम चाहितोमे आहाँ स प्रेम नइ क सकेछी हँ मात्र आहाँ हमर कनियाँ छी आ आहाँक बच्चाक बाबु हमही छी स्याह टा हमारा कहि सकेछी।“ हम हुनका किछु नइ कहलियैन आ ओहिना बच्चाक संग कहियो नैहर- कहियो सासुर करैत हमर जीवन वितैत छल। अखन दू वर्ष सँ एकटा वोर्डिङ स्कूल मे हम पढाबि रहल छी आ शेष अपन जीनगी गुजारि रहल छी। एहि तरहे जहिया अरुण स हम प्रेम बड करैत छलहुँ जबरदस्ती ताना मारि-मारि क हमरा अरुण संग प्रेम करबाकलेल विवश क देलक। जाति आ समाजक खातिर हमर जीवनक डोरी ओइ खुट्टा मे बान्हि देल गेल जे लडका पहिनही स एकटा दोसर लडकी संग प्रेम करैत छल आ लडका के नइ चाहितो जाति आ समाजक डर स चार लाख दहेज लक हमरा सँ विवाह कए देल गेलै। अइमे घाटा कोन समाजके भेलै वा फायदा कोन समाजके भेलै। घाटा आ फायदा त जकरा जे होऊ मुदा हमर जीवन अभिशप्त बनादेल गेल हमरा बाबुजी आ हमरा साउस- ससुर द्वारा। नइ अपने प्रेम करए बला मनुख्ख सँग जिवन विताव सकलहुँ आ नइ अपना पतिक जिवने मे समाहित भ सकलौ। ई दोष ककरा देल जाय, हमर प्रश्न सब समाज स अछि। उतरो चेहे जे अबै मुदा हमर जीनगी-----, हमर जीनगी त-------। सुशांत झा अहां कोना रहै छी भौजी.... लक्ष्मी आई आठवां क्लास मे चल गेलि। मिडिल स्कूल के हेटमास्टर यादवजी ओकर अंग्रेजी के बड्ड प्रशंसा करैत छथिन्ह। कहैत छथिन्ह जे अगर एकरा मौका भेटैक त जरुर किछु करत ई बचिया। ओहिदिन जिलास्तरीय नाटक प्रतियोगिता के लेल रिहर्सल मे बौआरानी के सलेक्शन स्कूल सं भेलैक। कहने रहय-कका यौ...मेन रोल नहि भेटि सकल, लेकिन हम अपना दिस सं खूब कोशिश केलियै। हम ओकर अंग्रेजी के टेस्ट करयैक लेल ओकरा सं रीडिंग दैक लेल कहैत छियैक। बौआरानी धुरझार अंग्रेजी पढ़ैत अछि आ ओकर माने सेहो बतबैत अछि। हम सोचैंत छी जे एकटा प्रतिभा के फेर अकाल मृत्यु भ जैतैक की...? लेकिन के जनैत अछि प्रारब्ध मे ककरा की लिखल छैक। हमरा दस साल पहिने के बात मोन पड़ैत अछि। शैलेन्द्र भैया के ससूर गाम आयल रहथिन्ह आ बड़का कका सं कहलखिन्ह- आब हमरा अहां के संबंधक कड़ी खत्म भय गेल। बड़का कक्का पहिने नहि बुझलखिन्ह, लेकिन कनिये कालक बाद हुनका आंगन मे कन्ना रोहटि उठि गेल। पूरा गामक लोग जमा भ गेल। पता चलल जे शैलेन्द्र भैया नहि रहलाह। बड़का कक्का के जीवन मे पहिल बेर कनैत देखने छलियन्हि, 65 साल के अवस्था मे अंगना मे ओ ओगरनिहया मारि का कानि रहल छलाह। लक्ष्मी तहिया छोट छल, प्राय चारि या पांच साल के। ओकर छोटकी बहिन रागिनी 2 साल के हेतैक। शैलेंद्र भैया एखन रहितथि त 44-45 के रहितथि। भैया के कका हुनका एनटीपीसी मे नौकरी लगा देने रहथिन्ह। ओ जमाना छलै जहिया एडहाक पर बहाली होईत छलैक आ बाद मे हाकिम ओकरा किछु दिनुका बाद परमानेंट कय दैक। शैलेंद्र भैया ताबत परमानेंट नहि भेल छलाह, इम्हर घर पर घटक सबहक लाईन लागि गेलन्हि। हाय रे मिथिला के बेटी सब, आई हुनका परमानेंट नौकरी रहितन्हि त भौजी के ई दिन थोड़े देखय पड़ितन्हि। शैलेंद्र भैया के बियाह नीक परिवार मे भेलन्हि। भौजी के बाप ततेक धड़फडेल रहथिन्ह जे बेटी के मेट्रिक के परीक्षेक साल बियाहि देलखिन्ह। भौजी आ भैया के अबस्थो मे बढ़िया अंतर छलन्हि...लेकिन सबकिछु के दरकिनार करैत बियाह भ गेल। आब सोचति छी, त बुझायत अछि जे ई एकटा मैथिल पिता के विवशता स बेसी किछु नहि छल। शैलेन्द्र भैया आ भौजी अनपरा चलि गेला..जतय एनटीपीसी मे ओ क्लर्क छलाह। जमाना बदैल रहल छल। दिल्ली मे नब आर्थिक व्यवस्था लागू भ रहल छल,उदारीकरण के नाम पर कयकटा नियम बनायल आ हटायल जा रहल छल। भैया के परमानेंट होई के संभावना दिन पर दिन क्षीण हुअय लगलन्हि। आब त एडहाक के दरमाहो कम पड़य लगलन्हि जहिया स बियाह भेल छलन्हि। ताबत लक्ष्मी आ रागिनी दुनिया मे आबि गेल छल। भैया शराब पिबय लगला। पति-पत्नी के बीच संबंध खराब हुअय लगलन्हि। धीरे-2 शराब हुनकर स्वास्थ्य के प्रभावित केरय लगलन्हि। हुनकर किडनी खराब भय गेलन्हि। ओ छुट्टी लय क गाम आबि गेलाह। ओ छुट्टी पर छुट्टी लेने जाईथ। लेकिन एडहाक के नौकरी मे लंबा छुट्टी-कतेक दिन चलितन्हि। गामों मे हुनकर शराब के नशा नहि छुटलन्हि। पाई नै रहन्हि त अन्न पैन बेच क पी लथि। पोलीथीन आ सस्ता शराब सेहो। कखनो पोखरिक महार पर त कखनो नहरिक कात मे। जन हरवाह सब देखय, त कक्का के कहनि। जहि खानदान मे एकोगोटे भांग आ बीड़ी सिगरेट नहि पीबय ओहि आदमी के बेटा के बारे मे शराबी होई के चर्चा कतेक अपमानजनक आ लज्जास्पद हेतैक-ई हमरा सबके ओतेक छोट अवस्था मे नहि बुझे पड़े। लेकिन आब कल्पना करैत छी, त मोन केना दनि कर लगैत अछि। भौजी के सासु के व्यवहार दिन पर दिन भौजी के प्रति बिपरीत भेल जाईन्ह। आब त ओ खुलेआम कहय लगलीह जे अही मौगी के पेरे हमर बेटा के मोन खराब भेल जाईये। बात-2 पर रक्षिसिया आ गारि भौजी के नियति बनि गेलन्हि। एकटा कुलीन घर के कन्या-जकर कुलशील के गवाह मिथिला के तमाम पंजीकार छलाह-जे पारंपरिक मिथिला के सर्वोत्तम गांव मे स आयल छलीह-हुनकर ई हाल हमर मोन के विदीर्ण कय दिए। ओहि समय हम पटना मे छलहुं। मैट्रिक पास कय मेडिकल के तैयारी करी, कहियो काल गाम जाई। मोबाईल के जमाना नहि छल। मां स चिट्टी-पर बात हुए या गाम जाई तखने। एतेक नहि बुझियै। साल 2001 के पितरपक्ष मे गामे मे रही। शैलेन्द्र भैया के अंगना मे हमरा नोत रहै। हम खा क उठले रही की, भैया के ससूर अयलाह। तकर बाद कन्ना रोहटि उठि गेल। तकर बाद के कहानी भौजी के दुख, अपमान, मानसिक यातना आ संघर्ष के कहानी छन्हि। तीन साल तक भौजी कोनो तरह कटलीह। लक्ष्मी आ रागिनी के चमकैत चेहरा मलीन भेल गैलैक। ओ आब पूर्ण ग्रामीण वाला लागय। लेकिन लक्ष्मी तीन साल तक अनपरा के पब्लिक स्कूल मे इसाई टीचर सं अंग्रेजी पढ़ने रहय। ओकर अंग्रेजी एखनो नीक रहै। दूनू बहिन आब गामे मे बिहार सरकार के स्कूल मे जाई। कोनो तरहे समय बीतल। भौजी के शिक्षा मित्र मे भय गेलन्हि। डेढ़ हजार महीना पर। नबका युवा मुखिया शैलेन्द्र भैया के दोस्त रहन्हि। ओ भरल पंचायत मे बाजल जं एकटा वेकेंसी हेतैक त शैलेन्द्रक कनिया के हेतैक। आई अहि बात के चारि साल बीत गेल। आई नीतीश सरकार शिक्षा मित्र सबके दरमाहा साढ़े सात हजार कय देलकैक। आब ओकर नाम पंचायत शिक्षक भय गैलैक आ ओ परमानेंट सेहो भय गैलेक। आब भौजी के सासु के व्यवहार बदलि गेलन्हि। भौजी घर चलबै छथि। आब ओ सोचैत छथि जे ओ त बेसी नहि पढ़ि पेली लेकिन दूनू बेटी के जरुर इजिनियरिंग करेती। ओ हमरा स पूछैत रहैथ, जे अहां सब त पत्रकार छी-कतेक जान पहचान हेत,कनी देखबै। हमरा लक्ष्मी के आंखि मे ओज देखा रहल अछि। ओकरा अगर मौका देल जाई त ओ जरुर किछु करत। हेडमास्टर यादवजी के कथन सही छन्हि...। लेकिन की ई कहानी एतय खत्म भय जेबाक चाही ? की लक्ष्मी आ रागिनी के भविष्य सुनिश्चित भय गेनाई अहि खिस्सा के सुखद अंत मानल जाई ? भौजी के अवस्था एखनो 31 साल छन्हि। जहिया बियाह भेल छलन्हि तहिया 17 साल के छलीह। हुनकर की हेतन्हि...?? .हुनकर के छन्हि.?? .की हुनकर सुखदुख के कोनो मोल नहि...?? ई सवाल मुंह बौने ठाढ़े अछि...मिथिला के समाजक समाने...आ हर साल सैकड़ों मैथिलानी अहि सवालक सामने हारि जाइत छथि....जे हमर के अछि...??की हमर सुखक कोनो मोल नहि...? कुसुम ठाकुर प्रत्यावर्तन १ एक बेर हमरा एकटा पत्रिकामे किछु लिखय लेल कहल गेल छल, ई सन् १९९६ क गप्प थिक। हम बस एतबे लिखि सकलहुँ- "हम की लिखी हमर त लेखनिये हेरा गेल"। मुदा आइ बुझना जाइत अछि जे नञि, हमरा एकटा कर्तव्यक निर्वाहण करबाक अछि। २ हम सदिखन अपनाकेँ हुनकर शिष्या सहचरी आ नहि जानि कि सब बुझैत रही। हुनक कि एकोटा एहन रचना छलनि जकरा कि हम पूरा होमसँ पहिने कै-एक बेर नहि सुनइत रही। हम तँ हुनक एक- एक रचनाकेँ ततेक बेर सुनइत रही जे करीब करीब कंठस्त भऽ जाइत छल। एक एक संवाद आइ धरि ओहिना हमर कानमे गूंजैत रहैत अछि। हम तँ हुनक सबसँ पैघ आलोचक, सबसँ पैघ प्रशंसक रही। अद्भुत कलाकार छलाह, एक कलाकारमे एक संग एतेक रास गुण भरिसक नहि होइत छैक। लेखक, निर्देशक, अभिनेता,गीतकार, संगीतकार, सब गुण विद्यमान छलन्हि। हमरा कि बुझल रहए जे नीक लोकक संग बेसी दिनक नहि होइत छैक। भगवनोकेँ नीक लोकक ओतबे काज होइत छैन्ह जतबा कि मनुष्य केँ। हम तँ भगवानसँ कहियो किछु नञि माँगलियनि, बस हुनक संग सदा भेंटय- यैह टा कामना छल। मुदा एक टा बात निश्चित अछि जे जओँ भगवान छथि आ कहियो भेटलथि तँ अवश्य पुछ्बन्हि जे ओ हमरा कोन गलतीक सजा देलथि, हम तँ कहियो ककरो ख़राब नञि चाहलियैक। एतेक कम दिनक संग, परंच ओ जे हमरा पर विश्वास केलन्हि आ हमरा स्नेह देलन्हि, शायद हमरा सात जन्मोमे नहि भेट सकैत छल। एखनो जँ हम हुनक फोटोक सोझाँ ठाढ़ भऽ जाइत छी तँ बुझाइत अछि जे ओ कहि रहल छथि- हम सदिखन अहाँक संग छी। ३ जाहि दिन हम पन्द्रह बरखक भेलहुँ ओकर दोसरे दिन हमर विवाह भऽ गेल। ओहि समय हम विवाहक अर्थ की होइत छैक सेहो नञि बुझैत छलियैक। हम तँ मैट्रिक केर परीक्षा दऽ अपन पितिऔत बहिन केर विवाह देखय लेल गाम गेल रही। हमरा की बुझल छल जे हमरो विवाह भऽ जायत। ओहि समय हमर बाबूजी अरुणाचल (ओहि समय केर नेफा ) मे पदासीन छलाह, हम रांचीमे अपन छोटका काका लग रहि कऽ पढ़ैत रही । हमर पितिऔत बहिन केर विवाह भेलाक तुरंत बाद हमर बाबूजी आ छोटका काका कत्तहु बाहर चलि गेलाह, कतय गेलाह से हम नञि बुझलियैक। हम सब भाइ-बहिन आ हमर छोटका काकाक बड़की बेटी, अर्थात हमर पितिऔत बहिन सेहो हमरा सब संग गाम पर रहि गेलि, कारण हमरा सबहक स्कूलमे गर्मी छुट्टी छलैक , हम सब खूब आम खाइ आ खेलाइ। मुदा हम देखी जे हमर दादी हमरा किछु बेसी मानथि। अचानक एक दिन भोरमे जखनि हम उठलहुँ तँ देखैत छी जे सब कियो व्यस्त छथि। हमर दादी सब काज करनिहार सबकेँ डाँटि रहल छलीह, कहैत छलीह- " आब समय नञि छैक, जल्दी जल्दी काज करए जो"। हमरा किछु नञि फ़ुराइत छल जे ई की भऽ रहल अछि। हमरा देखिते हमर दादी कहलथि- "हे देखियौ, अखनि तक ई तँ फराके पहिर कऽ घूमि रहल छथि"। हमरा किछु बूझयमे नञि आबि रहल छल जे ओ की बजैत छलीह। तखनि हमरा ध्यान आयल जे किंसाइत हमर जन्मदिन काल्हि छैक ताहि दुआरे दादी कहैत हेतीह- हमरा किचकिचाबए लेल। ओ सब दिन कहैत छलीह जे अइ बेर जन्मदिनमे अहाँकेँ साड़ी पहिरय पड़त आ हम खौँझा जाइत छलहुँ। ई सब सोचिते छलहुँ ताबत देखलियैक जे छोटका काका आँगन दिस आबि रहल छलाह। हुनका संग हमर बाबा सेहो छलाह । ओ दुनु गोटे दलान पर सँ आबि रहल छलाह , से बाबा के देखला सँ बुझयमे आबि गेल । हुनका सबके देखिते हमर माँ आ दादी दुनु गोटे आगू बढ़ि कऽ हुनकर स्वागत केलथि आ माँ केँ हम कहैत सुनलियैन्ह- "आब कहू जल्दी सँ जे लड़का केहेन छथि"। हमरा किछु नञि बुझना जाइत छल, तावत हमर काका हमरा दिस देखलथि आ देखिते देरी कहलथि- “ अरे तोहर बियाह ठीक कऽ कए आयल छियहु, मिठाइ खुआ”। हम तँ एकदम अवाक रहि गेलहुँ। हम ओतय सँ भागि कऽ अपन कोठरी मे आबि बैसि कऽ सोचय लगलियैक, आब की होयत हम तँ अपन दोस्त सब केँ कहि कऽ आयल रही जे अपन दीदीक बियाह मे जा रहल छी , ओ सब की सोचत। हमरा एतबो ज्ञान नहि छल जे हम बियाहक विषय मे सोचितहुँ।, हमरा चिंता छल जे दोस्त सब चिढायत। बेश, कनि कालक बाद सँ हमर भाय बहिन सब खुशी खुशी हमरा लग अबथि आ सब गोटे खुशी खुशी कहथि, " हम सब नबका कपड़ा पहिरबय"। ओ सब त आर बहुत छोट छोट छलथि, हमही सबसँ पैघ छी। हमर काका जल्दी जल्दी स्नान ध्यानक बाद भोजन कऽ तुरंत चलि गेलाह, पता चलल जे ओ बरियाती आनय लेल गेलाह। ओहि दिन, दिनभरि सब व्यस्त छलथि। हम अपन माँ केँ व्यस्त देखियन्हि, परंच खुश नञि लगलीह । भरि गामक लोकक एनाइ-गेनाइ लागल छलय। दोसर दिन भोरे हमर बाबूजी अयलाह । हुनका चाय देलाक बाद आ हुनका सँ गप्प केलाक बाद माँ केँ हम प्रसन्न देखलियन्हि। तावत धरि हमहूँ बूझि गेल छलियैक जे आब सत्ते हमर विवाह भऽ रहल अछि आ हमरा दोस्त सब सँ बात सुनइये पड़त आ ओ सब चिढायत तकरा सँ हम नहि बचि सकैत छी। ओहि दिन हमर जन्मदिन सेहो छलय, साँझमे दादीकेँ मोन रहि गेलन्हि आ हमरा साड़ी पहिरय पड़ल। ४ खैर हमर विवाह बड़ धूम धाम सँ भेल आ हम तेहेन लोकक जीवन संगनी बनलहुँ जे हमर जीवन धन्य भऽ गेल। गामक ओ समय हम कहियो नञि बिसरि सकैत छी। ई ओहि समयक गप्प थिक जखनि कि हमर बहिनक विवाह भऽ गेल छलन्हि आ ओ सभ चलि गेल छलीह। हमर बाबूजी आ छोटका काका हमरा लेल वर ताकय लेल गेल छलथि। आइ-काल्हिक हिसाब सँ तँ हम ओहि समय एकदम बच्चा रही आ शहरमे रहलाक कारणेँ हम गाम घरक बहुत किछु नहि बुझैत छलहुँ। सब सँ बेसी विवाह बैसाख, जेठ आ आषाढ़ मे होइत छैक, अर्थात शुद्ध रहैत छैक। ओहि ज़मानामे अर्थात १९७२ ईस्वी मे गामक रौनक किछु आर रहैत छलय। प्रतिदिन कतो ने कतो विवाह होइत छलैक जाहिमे दादी हमरा लय जयबाक आग्रह अवश्य करैत छलीह। हमहूँ कहियो विवाह नय देखने छलहुँ, पहिल विवाह हम अपन दीदीक (पितिऔत ) देखलियन्हि। ओही समय मे बेसी विवाह सभा सँ ठीक भेलहा सब रहैत छलैक जाहि कारणेँ हरबड़ी वाला विवाह हमरा देखय कs ओतेक इच्छा नञि होइत छल, मुदा दादी केँ मोन रखबाक लेल हुनका संग कतहु-कतहु चलि जाइत छलहुँ। ओहि समय हम परीक्षा फलक प्रतीक्षामे रही आर कोनो काजो तँ हमरा नहि छल । एक दिन हम, माँ आ दादी आंगनमे बैसल छलियै कि एकटा खबासनी आयल आ दादी केँ कहलकन्हि- " मलिकैन कनि एम्हर आयल जाओ "। ई सुनतहि दादी ओकरा लग चलि गेलीह, पता नञि ओ हुनका कि कहलकन्हि। कनि कालक बाद दादी हमरा कहलथि- "चलऽ हम तोरा एकटा सोलकनि सबहक विवाह देखाबैत छियौक"। हमरा आश्चर्य भेल जे आइ दादी केँ की भेल छन्हि जे ओ हमरा सोलकनिक विवाह देखय लेल कहैत छथि। हम आश्चर्य सँ पुछलियन्हि- "अहाँ सोलकनिक विवाह देखय लेल जायब "? दादी मुसकैत हमरा कहलथि- "चलहि नय अहि ठाम, ब्रम्ह-स्थान लग बरियाती छैक, दूरे सँ खाली बरियाती देखि चलि आयब दूनू गोटे"। हमारा मोन तँ नहि होइत छलय बरियाती देखबाक मुदा हम दादी केँ संग जएबाक लेल तैयार भऽ गेलियन्हि। ब्रम्ह-स्थान लगे छलय, हम दुनु गोटे जखन ओतहि पहुँचलहुँ तँ देखलियए जे ओतहि बीच मे पालकी राखल आ ढोल पिपही बाजैत छल, जों आगु बढ़लहुँ तँ देखैत छी जे ओहि पालकी मे वर मुँह पर रूमाल देने बैसल छथि आ एकटा बच्चा हुनका आगू मे बैसल छलन्हि, बरियाती सब सेहो बैसल छलैक। खैर हम सब आगू बढिकऽ बरियाती लग पहुँचि गेलियैक। हमरा निक भलहि नञि लागैत छल मुदा पहिल बेर अहि तरहक बरियाती देखैत रही। हम आश्चर्य सँ बरियाती देखैत रही कि कनिये कालक बाद सब बरियाती ठाढ़ भऽ गेलथि आ पिपही ढोल जोर सँ बाजय लगलय। हम सब कनि पाछू भऽ गेलहुँ, जहिना पालकी उठलय कि हमरा माथ पर कियो पानि ढ़ारि देने छल। हम तँ हक्का बक्का भऽ कऽ एम्हर-ओम्हर ताकय लगलहुँ, तँ देखैत छी दादीक हाथमे गिलास छलन्हि। हम कानय लगलियए। ई देखि कऽ दादी हँसैत तुरंत हमरा कहलथि- “गर्मी छलैक ताहि द्वारे ठंढा कऽ देलियौक।“ हमरा बड़ तामस भेल। हम सब जखनि घर पहुँचलहुँ, हम कानइत माँ सँ कहलियए- “ हम कहियो दादी संग विवाह देखैक लेल नञि जायब”। हमर एकटा पीसी ओहि ठाम बैसल रहथि, कहि उठलीह, " नञि कानी, तोहरे निक लेल केलथुन"। हमरा किछु नञि बुझय मे आयल आ बकलेल जकां हुनकर मुंह देखैत पुछलियन्हि- "कि नीक भेल, सभटा कपड़ा भीजि गेल"। ई सुनि कऽ ओ कहलथि- "गय बरियातीक जेबा काल पानि माथ पर देला सँ लोकक विवाह जल्दी होइत छैक, ताहि लेल तोरा पानि देलथुन "। हम आर जलि भुनि कऽ ओतए सँ चलि गेलहुँ। ओकर कनिये दिनक बाद हमर विवाह भऽ गेल। ५ जहिया हमर विवाह भेल ओहि समय हमर घरवाला श्री लल्लन प्रसाद ठाकुर इंजीनियरिंगक अन्तिम बरखमे पढैत छलाह। हम मैट्रिकक परीक्षा देने रही आ परीक्षा फल सेहो निकलि गेल छल। हमर विवाह आषाढ़ मास मे (दिनांक १३ जुलाईकेँ भेल छल। विवाहक तुंरत बाद मधुश्रावणी छलैक ताहि द्वारे हम गाम पर रही गेलहुँ आ हमर काका मधु-हमर पितिऔत बहिन-के संग राँची चलि गेलाह । काका हमरा कहैत गेलाह जे ओ हमर परीक्षा फल आदि स्कूल सँ लऽ कॉलेज मे हमर नाम लिखवा देताह। तैं हम निश्चिन्त रही। हमर काका नाम लिखवेलाक बाद हमरा खबरि सेहो कऽ देलन्हि। हमर नाम "निर्मला कॉलेज रांची" मे लिखायल छल। दादीक आग्रहपर हमरा गामपर रहि मधुश्रावनी करवाक छल, बहिनक विवाह सँ अपन विवाह आ मधुश्रावनी धरि करिब दू मास सँ बेसी रहय पड़ल छल। हम पहिल बेर अपना होश मे एतेक दिन गाम पर एक संग रहल रही। ओना तँ हम सब, सब साल गाम जाइत रही, मुदा एक संग एतेक दिन नञि रहैत रही। ओ पहिल आ अन्तिम बेर छल जे हम गामक मजा निक जकां ल सकलियैक। चतुर्थी आ दहनहीक बाद सब गोटे चलि गेलाह। हिनको कॉलेज खुजल छलन्हि, ईहो- हमर घर वाला- मुजफ्फरपुर, अपन कॉलेज चलि गेलाह। आनक गेलापर ओतेक सुन्न नञि लागल, मुदा जहिया ई गेलाह ओहि दिन बड़ सुन लागल। ई किएक होइत छैक नहि जानि, विवाह होइतेक संग एतेक प्रगाढ़ सम्बन्ध कोना भऽ जाइत छैक जे एक दोसरा सँ अलग रहनाइ निक नञि लागैत छैक। दादी हिनका सँ करार करवा लेलथिन जे मधुश्रावणीमे अवश्य अओताह। दादी केँ तँ हँ कहि देलथि मुदा हमरा सँ कहलथि ओ नहि आबि सकताह। हमर मोन तँ छोट भऽ गेल मुदा फेर सोचलहुँ हमर तँ क्लास छूटिये रहल अछि हिनकर किएक छूटन्हि। हम कहलियन्हि किछु नञि, ओहि समय मे हम हिनकर बातक हँ वा नञि मे जवाब दैत रहियन्हि। ओनाहुँ हम कम बाजैत रही आ हिनका सँ तँ निक जकाँ बाजय मे हमरा एक साल लागि गेल। गाम पर बाबा दादीकेँ छोड़िकऽ घर मे, हमर माँ बाबुजी आ हम छहु भाय बहिन रही। ओहि समय मे असगरो जे सभ गाम पर रहैत छलाह वा छलीह, किनको ई नञि बुझाइन्ह जे असगर छथि । आ हमर घर मे तँ विवाह भेल छल। रोज भोर साँझ गाम घरक लोकक अएनाइ-गेनाइ लागल रहैत छलैक। एक तँ अहुना जहिया जहिया हम सब गाम जाइ, लोक सबहक एनाइ-गेनाइ लागल रहैत छलैक आ अहि बेर तँ हमर विवाह भेल छल। अहि बेर कनि बिशेष लोकक एनाइ-गेनाइ रहैत छल आ हमर कनि विशेष मान-दान सेहो होइत छल। कहियो कतहुँ सँ खेनाइ आबय कतहुसँ खोइंछ भरय कऽ लेल कियो कहय लेल आबथि , सभ कियो एतबा अवश्य कहथि, ठाकुरजी बड़ जल्दी चलि गेलथि। दादी सभकेँ कहथि-“ फेर जल्दिये अओताह, पंचमी सँ मधुश्रावणी धरि रहताह”। हुनका सभ केँ की बुझल जे ठाकुर जी नञि आबि रहल छथि, हम सुनि कऽ चुप रही, किनको किछु नञि कहियन्हि, माँ तक केँ नञि कहने रही, मुदा जखन हिनकर एनाइ-गेनाइक गप्प सुनि मोन उदास भऽ जाय। हमर जहिया विवाह भेल हम ओहि समय फ्राक या स्कर्ट ब्लाउज पहिरै रही। अचानक हमरा साड़ी पहिरय पड़ि गेल। जहाँ कियो आबथि, ख़ास कऽ मौगी महाल महक तँ हमरा बजायल जाय। हमर बहिन सभ दौड़ कऽ हमरा लग अबथि कहय कऽ लेल, ओकर बाद हम जल्दी सँ ककरो सँ साड़ी ठीक करवाबी आ तखन्हि हम हुनका सभ लग जाइ। दियादि महक काकी-पीसी सभ गोटेमे सँ बराबरि कियो ने कियो रहैत छलीह, ओ सभ ठीक कऽ देथि, तइयो कैक बेर हमर पैर साड़ी मे फँसल होयत आ हम खसल होयब । जे कियो आबथि एतवा अवश्य कहथि, " देखियौ कुसुम केहेन लागैत छथि"। आ देखलाक बाद कहथि- "बड़ सीरी चढ़ल छैक"। कतेक निश्छल भावना आ कतेक अपनापन रहैत छलैक हुनका लोकनि मे। हमर दु तीन टा पीसी सेहो ओहि समयमे ओतहि रहैत छलीह, जिनकर सबहक विवाह ओहि बरख भेल छलन्हि आ ओ सभ हमर संग तुरिया छलीह। भरि-दुपहरिया घर भरल रहैत छल, हुनका सभ संग ओहिना समय बीति गेल आ पंचमी आबि गेल। पंचमी सँ एक दिन पहिने भोरे भोर हमर सासुर सँ भार आयल, ओहि मे सब किछु बिधक ओरिओन सँ आयल छल। भरि गामक लोक केँ दादी हकार दियवा देलथिन, सभ भार देखैक लेल आबथि आ जे देखथि से कहथि, एतेक निक भार किनको ओतहुसँ नञि आयल छलैक, गाम पर सभ गोटे भार देखि कऽ बड़ प्रशंसा करथि, हमरा ई सुनि बड़ निक लागय। जिनका हम कहियो देखने सुनने नय- हुनकर प्रशंसा सुनि हम खुश होइ। हमर दादी सेहो खुशी सँ सबकेँ कहथि- “अरे महादेव झा ओतय सँ भार आयल अछि”। हमरा ओहि समय मे किछु नञि बुझाय, हम सोची हमर ससुरक नाम तँ हीरानंद ठाकुर छन्हि, दादी बेर बेर किएक कहैत छथि महादेव झा ओतय सँ आयल अछि। हम पुछऽ चाही किनको सँ मुदा एम्हर ओम्हर मे बिसरि जाइ। कॉलेज सँ हमरा ई प्रतिदिन एकटा चिट्ठी लिखथि, ओहि मे सब दिन जवाब देवाक लेल लिखैत छलथि, मुदा हमरा जवाब देबय मे लाज होइत छल। एक दिन हमर भाय आ बाबुजी कोनो काज सँ मुजफ्फरपुर जाइत छलाह। ओहि दिन हम पहिल चिट्ठी लिखि कऽ भाय केँ देलियन्हि जे हुनका दऽ देबाक लेल। पंचमी सँ एक दिन पहिनहि भोर मे भार आयल छल, साँझ मे बाबुजी सब केँ सेहो अयबाक छलन्हि। हमरा अपन संगी आ पीसी सब संगे फूल लोढ़य लेल जयबाक छल। दादी सब ट्रेन सँ हिनकर बाट ताकथि अंत मे हमर बहिन सब सँ कहि पुछओलथिन, हम बहिन सबकेँ कहि देलियन्हि- हमरा किछु नञि लिखने छथि। दादी तकर बाद सँ निश्चिंत भऽ गेलीह आ तखन सँ कहथि जे तोहर बाबुजी सब संग अवश्य अओताह। साँझ मे सब घाँउझ बान्हि कऽ हमरा ओतहि आयल देखए लय- सबहक हाथ मे फूल डालि आ पथिया छलैक कियो-कियो अपन खबासिनीकेँ सेहो संग मे लऽ लेने छलथि किछु कुमारि सब सेहो संग मे छलथि । हमरो संग दादी एकटा खबासिनी लगा देलथि ओ हमर फूल डालि आ पथिया लऽ लेलथि। हमसब पूरा टोलक सब गोटे गीत गाबैत हँसी मजाक करैत अपन अपन फूल डालि पथिया लेने पहिने गाछी दिस गेलहुँ। दादी हमरा हिदाइत देने रहथि- जे बाँस वा अन्य पैघ गाछक पात कियो तोरय, जाहि जूही कऽ पात आ फूल सभ हम अपने तोड़ी। हमरा बड़ पोल्हा कs कहलथि- "हे मधुश्रावणी लोक केँ एकय बेर होइत छैक जहिना कहैत छी कयने जाउ"। हमहुँ निक बच्चा जकाँ मुरी हिला कऽ हँ कहि देलियनि। हम सब, सब सँ पहिने बंसबट्टी दिस बिदा भेलहुँ। बाँसक पात तोड़लाक बाद हम सब जाहि जूही आ अन्य अन्य पात आ फुलक खोजि मे सबहक बाड़ी-बाड़ी जाइ आ सभ तरि सँ फूल सभ बटोरैत जाइ। हमरा तँ बुझलो नञि छल जे कोन - कोन फूल आ कोन-कोन पात चाही। जेना जेना सभ कियो तोड़थि हमहुँ तोरैत जाइ। दादीक हिदाइत हमरा मोन छल। हम पथिया टा नहि उठा पाबैत रही, सेहो हमर पितिऔत बहिन, देयादि महक छलीह - से उठा दैत छलीह। जखन्हि हमरा सभ गोटे कहलथि जे आब भऽ गेल, हमहुँ हुनका सभ संगे आपस हेबाक लेल चलि देलियन्हि। हमरा देखि कऽ ततेक आश्चर्य भेल, हमसभ एक-एक पथिया भरि कऽ पात जाही जूही लऽ लेने रहि। आब ओ हमरा बसक नहि छलैक जे ओ हम उठा कऽ एको डेग आगू बढितहुँ। हमर पितिऔत बहिन ओकरा अपन माथ पर लऽ कऽ चललीह। रास्ता भरि हँसी मजाक होइत छलैक, ओही मे सँ बेसी मजाक हम नहि बुझैत रही। बिच-बिचमे बटगमनी सेहो हैत छलैक। इहो गप्प होइत छलैक जे किनकर सभहक वर आयल छथि आ किनकर सभहक बाद मे अर्थात मधुश्रावणी सँ पहिने अओताह। हमारो सँ सब पुछथि, हम किछु नञि, बाजी हमरा लाज होइत छल। नहि बजला पर सभ हमर आर मजाक उड़ाबथि, हम अहिना दुखी छलहुँ ताहि पर ई सभ मजाक करथि। कखनो मोन होइत छल बेकारे सभ संग अयलहुँ। हमरा होइत छल हम कहुना घर पहुँची, हम मजाक सँ तंग आबि कऽ अपन बहिन सँ जे पथिया लेने रहथि, कहलियन्हि, अपना सब आगू चलू। हम सभ आगू जल्दी जल्दी बढि रहल छलियैक मुदा कथी लेल हमरा कियो जल्दी जाय देत पकड़ि कऽ बिच मे हमरा सभ गोटे कऽ लेलथि। ओहिना करैत हम सब मुखिया बाबाक घर लग पहुँचि गेलहुँ । हमर घर ओकर बाद छलैक हम हाथ मे फुलक डाली लेने सभ संग बिच मे चलैत रहि। घर लग पहुँचि सभ गोटे जोर जोर सँ हंसथि हमरा ई कहि आगू कऽ देलथि जे आब हमर दादी देख लितथि तँ हुनका सभकेँ डाँटि परतन्हि। हम आगु आबि जहिना बरामदा दिस बढलहुँ देखैत छी कुर्सी पर बाबा आर बाबुजीक संग ई बैसल छथि आ तीनू गोटे चाह पीबि रहल छथि। हम लाज सँ जल्दी-जल्दी आँगन दिस भागि गेलहुँ। आँगन पहुँचि देखैत छी दादी आ माँ व्यस्त छथि। एक तँ पाबनिक ओरियाओन होइत छलैक, दोसर जमाय विवाहक बाद पहिल बेर आयल छलथि, तेसर समधियोनि सँ पाहुन भार लऽ कऽ से आयल छलथि। हमरा देखितहि दादी कहय छथि- "यै अहाँ बिना माथ झपने अहिना बाबा आ बाबुजीक सोंझा सँ आबि गेलहुँ"। हम किछु नञि बजलियन्हि, हम आ हमर बहिन चुप-चाप कोहबर घर जाय कऽ फुल डालि आ पथिया राखि देलियैक। ओहि समय मे हमरा माथ झांपय मे बड़ लाज होइत छल। हम बाहरि आबि कऽ माँ सँ पुछलियैक, " बाबुजी मुजफ्फरपुर सँs कखन्हि एलथि" जकर जवाब दादी सँ भेटल, "अहांक बाबुजी कॉलेज सँ ठाकुर जी केँ पकड़ि कऽ लऽ अनलथि "। साँझ मे किछु-किछु बिधक ओरिओन आ गीत भेलैक आ दादी कहलथि सब गोटे जल्दी सुतय जो भोरे उठय परत। राति मे सुतय काल पता नञि हमरा कोना मोन छल, हम हिनका सँ पुछलियन्हि- "भार कतय सँ आयल छैक "? हिनका किछु बुझय मे नञि अयलन्हिन्ह, हमरा कहलाह- "मतलब.... कोन भार "? फेर मुस्कुरैत हमरा कहलाह- "अहाँ के हमरा देखि कऽ खुशी नञि भेल जे अहाँ हमारा सँ भारक विषय मे पुछैत छी "। हम मुड़ी हिला कऽ हाँ कहि देलियन्हि मुदा फेर आस्ते सँ कहलियन्हि- " दादी सब सँ कहैत छथि महादेव झा ओतय सँ भार आयल छैक। ई सुनतहि जोर सँs ठट्ठा कऽ हँसैत हमरा कहलाह- "ओ.., अच्छा..., ओ महादेव झा, ओ हमर सबहक पाँज़ि अछि ताहि लेल बाजैत होयतीह"। तकर बाद हमरा पाँज़िक विषय मे सेहो बता देलथि। हमरा अपना पर हँसी लागल-कहु तँ भोर सँ हम ई सोचि कऽ परेशान छलहुँ जे महादेव झा के छथि। हम महादेव झा क विषय मे सोचति सोचति नहि जानि कतय ध्यान मग्न भs गेलहुँ, अचानक हमर ध्यान खुजल तs देखैत छी ई हमरा सोझाँमे ठाढ़ भs मुस्की दs रहल छथि। ई देखि कs हमरा लाज भs गेल, आ ई तुंरत हमरा दिस हाथ आगू कs कहलाह, " लिय, अहाँक लेल हम मुँह बजाओन अनलहुँ अछि, ई हमरा दिस सs अहाँक लेल पहिल उपहार थिक। चतुर्थी दिन वाला तs दादाक कीनल छलन्हि, ई हमरा दिस सs अछि"। ई कहि हमरा दिस एकटा किताब आगू बढ़ा देलथि। ६ पंचमी दिन भोरे भोर दादी सभ गोटे कs उठा देलथिन। हिनको उठय परि गेलन्हि , इहो भोरे भोर तैयार भs गेलाह, हिनको हमरा संग पूजा पर बैसय कs छलन्हि । पूजा पर बैसैत बैसैत ९ बाजि गेलैक। दादी भरि गामक लोक कs हकार दियबोने रहथि मुदा पूजा काल गामक सभ गोटे नहि आयल छलथि । हँ, अपन दियादि महक सभ कियो अवश्य आयल रहथि। परंच भरि दिन लोकक एनाइ गेनाइ लागल छलय। पूजा आ कथा समाप्त होइत होइत १ बाजि गेलय। सब सs पहिने हिनकर भोजनक व्यवस्था कs हिनका खुआयल गेलन्हि , तकर बाद अहिबाति सबहक खेनाइ कsओरिओन कs हुनका सब कs बैसायल गेलन्हि । हमरो हुनके सबहक संग बीचमे बैसि कs खेबाक छलs। हमरा मिट्ठ खेबाक एको रत्ती इच्छा नहि होइत छलs। सब गोटे खेबाक लेल जिद्द कsदेलथि ई कही जे बस एकर बाद आब मिट्ठ नहि खाय पड़त । दोसर साँझ भेला पर किछु नय खेबाक छल, कहुना कनि खीर खा कs उठि गेलहुँ पूजा पर सs उठला पर ततेक नय थाकि गेल रही जे होइत छलs जे चुप चाप सुति रही मुदा कनि कनि काल पर कियो नय कियो आबि जाइत रहथि आ हुनका सब लग बैसय लेल तुंरत बजाहटि आबि जाइत छल। दुपहर मे हम सब फेर फूल लोढ़य लेल गेलहुँ ओहि दिन हम बहुत थाकल रही, तथापि जेना जेना सभ गोटे फूल पत्ति तोरथि तहिना हमहुँ तोरि कs राखने जाइ, ओहि दिन बुझि पड़ैत छल सब थाकल रहथि, ओहि दिन हम सभ जल्दिये आपस भs गेलहुँ। प्रतिदिन हमसब फूल लोढ़य लेल जाइ आ एक पथिया करीब रोज फूल पात आनी। बारहम दिन हमसब कनि जल्दी जाs कs फूल जाहि जूही लs अनलियय ओहि दिन बहुत लोकक ओतहि पाहुन कs अयबाक छलन्हि , किनको ससुर कs अयबाक छलन्हि तs किनको वर कs। बारहम दिन धरि करीब खिड़की तक फुल पातक टालि लागि गेलैक, ताहि पर उपर सs दूध, जल प्रसाद चढायल जायत छलैक। कोहबर घर मे ओना तs धूप दीप जरति छलैक मुदा तइयो कनेक मनेक गंध रहति छलैक। बारहम दिन साँझ मे पूजा वाला सबटा फूल पात हटाs कs ओहि ठाम साफ करायल गेलैक, कियैक तs मधुश्रावणी दिन फेर सs सभटा फूल पात हटेलाक बाद ओतहि साफ कs फेर सs अरिपन परैत छैक। जखैन्ह फूल पात हटायल जायत छलैक तखैन्ह बुझय मे आयल जे हमसभ कतेक फूल पात आ जाहि जूही तोरने रहि, खत्मे नहि होयत छलैक । साँझ मे हमर ससुर अपने, हमर एकटा पितिऔत दियोर कs संग भार लs कs अयलाह। तखैन्ह सs घर मे सबगोटे आओर व्यस्त भs जाय गेल्थिन।हमर दादी आ माँ भार देखबा आ देखेबा मे व्यस्त छलिह। बिधक की सब आयल अछि की सब नहि। हमर ससुर सेहो विवाहक बाद पहिल बेर आयल छलाह। हिनको अपन दादा (पिताजी) सs विवाहक बाद पहिल बेर भेंट भेल छलन्हि ,गप्प सप मे देरी भs गेलैक। ७ हम सुनने रहि जे मधुश्रावणी दिन कनिया कs सासुर सs बिधक सामान संग टेमी सेहो अबैत छैक आ ओहि सs कनिया कs दुनु ठेहुन कs डाहल जायत छैक। टेमी सs डाहलाक बाद ओकरा पर पान आ सुपारी दs ओकरा रगरि देल जायत छैक जाहि सs फोका अवश्य होय। फोका भेला सsनिक मानल जायत छैक। सब दिन फुल लोढ़य काल इ सब गप्प होयत रहैत छलैक। हम सांझे सs डरल रहि आ जखैन्ह सs हमर ससुर आबि गेलाह तखैन्ह सs दर्दक कल्पना कs आओर डरि जायत रहि। दादी कs गप्प मोन परि जाय जे "मधुश्रावणी लोकक एके बेर होयत छैक"। किनको सs किछु पुछबो नय करियैन्ह। राति मे सुतय मे देर तs भs गेल छलैक, भगवान भगवान कs सुतय लेल गेलहुँ हम अहुना कम बाजति छलौंह ओहि दिन आओर किछु नय बाजल नहि होयत छलs इ हमरा सs दू तिन बेर पुछ्लाह किछु भेल अछि, हम सब बेर नहि कहि दियनि मुदा हिनका बुझs मे आबि गेलन्हि कि किछु गप्प अवश्य छैक। जखैन्ह इ हमरा बहुत पुछ्लथि तs हम धीरे सs कहलियैन्ह, "हमरा डर होयत अछि"। हिनका किछु बुझय मे नय अयलैन्ह, अचानक हमरा डर कियैक होयत छलs। इ हमरा बहुत निक सs बुझा कs पुछ्लाह "डरबाकs आखिर कोन गप्प छैक", अहाँ पहिने डरु नय आ हमरा कहु की गप्प छैक"? हम डरैत हिनका कहलियैन्ह "हमरा टेमी सs डर होयत अछि"। "टेमी... कियाक टेमी सs डर होइत अछि"? हम हुनका तुंरत सभटा कहि देलियैन्ह जे काल्हि कsलेल डरि रहल छलन्हु। इ हमरा कहलाह "अहाँ जुनि डरु एकतs हमरा बुझलि अछि जे हमारा ओतय टेमी नहि होयत अछि, दोसर जाओं होयतो होयत तs अहाँ कs नहि होमय देबैक, हमर गप्प के कियो नय काटतिह "। ओहि दिन पता नहि कोना आ कियाक, तुंरत हिनका पर पूर्ण रूपेण विश्वास भs गेल, हम निश्चिंत भs गेलहुँ जे आब हमरा टेमी नहि परत। ओकर बाद हमरा मोन मे कोनो डर नहि छल। भोरे उठी कs तैयार भेलन्हु मुदा मोन मे कनिको डर नहि छल। मधुश्रावणी दिन पूजा मे कनेक आओर बेसी समय लगलैक, जखैन्ह टेमी देबाक भेलs तs जहिना हमर बिधकरि उठलथि इ तुंरत कहि देलथिन हमरा सब मे टेमी नय होयत अछि। इ सुनतहि हमरा ततेक नय खुशी भेल जकर वर्णन नहि कयल जा सकति अछि। बिधकरि उठि कs एकटा टेमि आनि कहलथिन ठीके हिनका सभके शीतल टेमि होयत छैन्ह। एकटा टेमि मे चंदन लगा ओहि सs हमर दुनु ठेहुन मे लगा देल गेल। ओहि दिन फेर अहिबातिक संग खेबाक छलs। हमर ससुरक सौजनि सेहो छलन्हि । पाबनि सsउठलाक बाद हिनकर भोजनक व्यवस्था आ हमर ससुरक सौजनि भेलैन्ह आ हम खेलाक बाद जहिना सोचलौन्ह आब आराम करैत छि कि माँ आबि कs कहलैथ तैयार होयबाक अछि हमर ससुर, दादा जी आबैत होयताह। दादा जी कs आदेश छलन्हि जे ओ हमरा भगवति घर मे देखताह। हम फेर तैयार भs भगवति घर चलि गेलंहु । दियोर आ दादा जी दुनु गोटे भगवति घर अयलाह आ कनि दूर ठाढ़ भs गेलाह। हमरा संग जे छलिह ओ हमरा जाs कs गोर लागय लेल कहलैथ, हम ठाढ़ भsदादा जी लग जा हुनका गोर लागि लेलियैन्ह आ ओहि ठाम बैसि गेलंहु, ओ तुंरत देखेबाक लेल कहलैथ आ हुनका जहिना देखा देल गेलन्हि हमरा हाथ मे एकटा गहना दs ओतय सs चलि गेलाह। दादा जी साँझ मे चलि गेलाह। हमारो सबके दू दिन बाद जेबाक छलs। हमर छोट भायक मुंडन छलन्हि अरेराज मंदिर मे, हुनकर मुंडन करा हमरा राँची मे छोरति, छोटका भाय आ तिनु बहिन के संग माँ बाबुजी कs अरुणाचल जयबाक छलन्हि बाबुजी कs छुट्टी से ख़तम भs गेल छलन्हि । । हिनका सेहो मुंडन मे उपस्थित रहबाक लेल माँ बाबुजी सब कहैत रहथि। राति मे इ हमरा सs हमर मोन जांचय लेल पुछ्लथि अहाँक माँ बाबुजी हमरो मुंडन मे उपस्थित होयबाक लेल कहैत छथि, हम की करि । हम पहिने त चुप रहि मुदा टेमी वाला बातक बाद स हमर कनि धाख टुटि गेल छल। हम धीरे सs कहलियनि छुट्टी अछि त अहुँ हमरे सब संग चलु ,मुंडन कs बाद अहाँ मुजफ्फरपुर चलि जायब आ हम सब राँची चलि जायब। इ हमरा कहलथि हमर कॉलेज मे हरताल चलैत अछि। जाहि दिन शुरू भेल छलैक ओहि दिन अहाँक बाबुजी पहुँचि गेलाह , हम सोचिते छलहुँ अयबाक लेल ताधरि हमरा बाबुजी कहि देलथि छुट्टी अछि तs अहि ठाम कि करब चलु हमरा संग आ हम चलि आयल रहि। दोसर अहाँ चिट्ठी जे लिखने रही, हमरा ततेक नय ख़ुशी भेल जे हम तुंरत आबय चाहति रहि। हम हिनकर गप्प सुनी कs मोने मोन बड खुश भेलहुँ , मुदा ई हमर मोनक गप्प कोना बुझि गेलाह से नहि जानि। इ हमरा अपने मोने कहय लगलाह राँची तs अहि ठाम स दूर छैक परंच हम कोशिश करब जखैन्ह छुट्टी होयत हम आबि जायब अहाँ चिंता जुनि करब, खूब मोन स पढ़ब। हम इ सुनतहि उदास भ गेलौहुं, तखनि हमरा लागल जे आब हमरा हिनका सs अलग रहय मे निक नय लागत। तेसर दिन हम दुनु गोटे, माँ बाबूजी, हमर भाय बहिन सब दादी बाबा कs संग गाम सs अरेराज कs लेल बिदा भs गेलहुँ। राति सबगोटे मोतिहारी मे रुकि भोरे भोर हमसब मन्दिर पहुँची गेलहुँ आ मुंडन भेला पर सबगोटे मन्दिर दर्शन करय लेल जाय गेलथि , हम आ ई बाहरे सs भोला बाबा कsगोर लागि लेलियैन्ह। दादी कहने छलथि विवाहक एक बरख धरि लोग मन्दिर कs भीतर नहि जायत छैक। सबगोटे वापस फेर मोतिहारी आबि गेलहुँ, दादी बाबा गाम चलि गेलाह आ हमसब ओहि दिन मोतिहारी रुकि गेलहुँ , दोसर दिन हमारा सब के मुजफ्फरपुर सs राँची के लेल रेल गाड़ी छलs। दादी बाबा कs गाम गेलाक बाद माँ, बाबुजी, हम सब छहु भाई बहिन, आ ई, ओहि दिन मोतिहारी रही गेल रही। हमारा सब कs दोसर दिन मोतिहारी सs मुजफ्फरपुर जेबाक छsल। साँझ मे ई हमरा कहलाह माँ के कहि दियौन्ह आ चलू हम सब सिनेमा देख कs अबैत छी। पहिने तs हम तैयारे नहि होइत छलिये मुदा जखैन्ह ई बहुत कहलाह तs हम जएबाक लेल तैयार तs भs गेलहुँ मुदा माँ सs कहबा मे हमारा लाज होयत छलs। जखैन्ह हम माँ सs कहय लेल तैयार नहि भेलहुँ तs ई हमर छोटकी बहिन अन्नू के बजा कs कहलथिन, "अहाँ अपन माँ सs चुप चाप कहि दियौन हम दुनु गोटे सिनेमा जाइत छी"। अन्नू बेचारी तs ठीके माँ सs चुप चाप जा कs ई गप्प कहलथि,मुदा कोना नय कोना हमर तेसर बहिन बिन्नी ई गप्प सुनि लेलथिन आ तकर बाद एक के बाद एक सब भाई बहिन सब सिनेमा जएबाक लेल हल्ला करय लागय गेलीह, सब छोटे छोट छलथि। माँ सब के बुझबति छलिह मुदा कियो मानय लेल तैयार नहि छलथि।बहुत बुझेला पर आओर सब गोटे तs मानि गेलिह बिन्नी नहि मानलिह। हमरा आर हिनका "अपना देश ", विवाह कs बादक पहिल सिनेमा बिन्नी कs सँग देखय परल। हम सब सिनेमा की देखब बिन्नी के सम्हारय मे हमर सबहक समय बीति गेल।हम की कहियो ओहि दिनका देखल सिनेमा बिसरी सकैत छी। दोसर दिन भोरे हम सब मुजफ्फरपुर के लेल बिदा भs गेलहुँ। पहिने तs हमर सबहक कार्यक्रमक अनुसारे हमारा सबके मुजफ्फरपुर मे रहबाक नय छलs मुदा हिनकर आग्रह के बाबुजी मानि गेलाह आ हमसब मुजफ्फरपुर मे सेहो दू दिन रहि गेलहुँ। ओहि दिन हमरा सब के पहुँचलाक बाद इ अपन हॉस्टल इ कहि कs गेलाह जे अपन सामान राखि आ जानकारी लs कि कॉलेजक हरतालक की भेलैक इ आबि जेताह आ दिनका भोजन इ हॉस्टल सs करि कs अओताह। दुपहर मे इ अयलाह आ हिनक सँग हमर दीयरि सल्लन जी, जे हिनका सs दू बरखक छोट छथि आ हिनके कॉलेज मे पढैत छलाह हमारा सs भेंट करय कs लेल सेहो अयलाह। सल्लन जी सs हमरा पहिल बेर भेंट छल। बरियाति आयल छलाह, मुदा एक तs गामक बरियाति,दोसर बरियाति सब पहिने आँगन मात्र सुहाग देबय कs लेल आबति रहथि। थोरेक काल गप्प, आ चाह नाश्ताक बाद इ हमरा आ सब बच्चा(हमर भाय बहिन) सब के सिनेमा लs जयबाक लेल कहि तैयार होयबाक लेल कहलथि सब खुशी खुशी तैयार भs जाय गेलथि आ हमर छोटका भाय के छोरि, बाकि पूरा बटालियनक सँग हम सब सिनेमा देखबाक लेल बिदा भs गेलहुँ। हमरा सब सँग सल्लन जी सेहो रहथि हम मोने मोन सोचलहुं आय इ एतेक गोटे सँग सिनेमा देखबाक लेल तैयार कोना भs गेलाह। फेर मोन मे आयल ओहि दिन बच्चा सब कानैत रहथि, इ सोचि सब के लsजयबाक सोचने होयताह, सल्लन जी आ बौआ(हमर बडका भाय ) सेहो सँग रहबे करथि। घर सs निकलतहि रिक्शा भेंट गेलs एक टा रिक्शा पर हम दुनु गोटे आ बाकि दू टा पर सल्लन जी आ बौआक सँग सब बच्चा सब बैसि जाय गेलथि। ओना हम मुजफ्फरपुर दोसर बेर आयल छलहुँ, मुदा पहिल बेर मात्र राति भरि जनकपुर सs राँची जाय काल लंगट सिंह कॉलेजक गेस्ट हाउस मे रहि। हमर सबहक रिक्शा पाछू छलैक आ तेहेन ख़राब सड़क जे हमर ध्यान दोसर दिस नहि छल, हमरा होयत छल कहीं खसि नय परी। हम मात्र सड़क आ रिक्शा दिस देखैत सिनेमा हॉल लग पहुँची गेलहुँ। रिक्शा सs उतरतहि इ रिक्शा वाला के पाई दs हमरा कहलथि चलू। हम किछु बूझलियैक नहि आ पुछलियैन्ह,"आ बाकि सब गोटे"? इ मुस्कुरैत कहलाह बच्चा पार्टी के सल्लन अपना सँग दोसर सिनेमा देखाबय लेल लs गेलाह। हम हुनका सँग सिनेमा हॉल मे जा जखैन्ह बैसलहुं तs सिनेमा शुरू होयबा मे थोरेक समय छलैक। इ हमरा कहलाह हमरा सिनेमा देखबाक ओतेक इच्छा नहि छलs हमरा तs अहांक सँग रहबाक छलs आब फेर कतेक दिनक बाद भेंट होयत नहि जानि, आ ओहि ठाम इ सम्भव नहि छलs। हमर कोरा वाली सारि सब जे छथि, ओ हमरा एको मिनट असगर कथि लेल रहय देतीह। सल्लन हमरा सँग आबिते छलाह, हुनका अहाँ सs भेंट करबाक छलन्हि । हम सोचलहुं सिनेमा देखबाक नाम पर सब तैयार भs जेतिह , आ सल्लन सs पुछलियैन्ह तs कोरा खेलाबय वाली सारि सब सँग सिनेमा देखय लेल तैयार भs गेलाह। ओहि ठाम कहितौंह त फेर हल्ला भs जायत तकर आशंका सs हम अहूँ के किछु नहि कहलहुं। प्रकाश(हमर पैघ भाय ) आ सल्लन के सबटा बुझल छलन्हि , ताहि लेल हुनकर सबहक रिक्शा आगू गेलन्हि आ हमर सबहक पाछू छsल । इ सुनि हमरो निक लागल, जखैन्ह सs हम सब गाम सs निकललहुं तखैन्ह सsनहि जानि कियाक हमरो मोन इ सोचि उदास छलs जे पता नहि आब कहिया भेंट होयत। हमरो आ हिनको दुनु गोटे के कॉलेज खुजल छsल दोसर हमरा लागैत छsल जे रांची सs मुजफ्फरपुर बहुत दूर छैक। हम सब सिनेमा की देखब गप्पे मे समय बीति गेल। इ तs निक छsल जे दीपक सिनेमाक सब हिनका चिन्हैत छलन्हि दोसर ओहि दिन एकदम कम भीर छलैक आ हमरा सब के एकदम कात मे सीट भेन्टल छल जाहि ठाम कियो बैसल नही छलथि राति मे हम सब आपस अयलहुं तs बच्चा सब सल्लन जी आ बौआ कs सँग आपस हमरा सब सs पहिनहि आबि गेल रहथि हमरा तs होयत छल हमर बहिन सब हमरा सब के देखि कs हल्ला करतीह मुदा ओ सब किछु नही बजलिह। सल्लन जी अपन हॉस्टल आपस चलि गेलाह। ८ ओहि राति हमरा एको रत्ती नींद नहि भेल। दोसर दिन हमर सबहक रेल गाड़ी छल। हिनकर कॉलेज तs खुजि गेल छलन्हि मुदा इ हमरा कहि देने रहथि जे एक दिनक गप्प छैक, ताहि लेल इ हमरा सबके गेलाक बाद सs अपन क्लास करताह। साँझ मे हमरा सब के छोरय के लेल हमरा सब सँग इहो स्टेशन अयलाह हमरा स्टेशन पर ठाढ़ हेबा मे सब दिन सs बड़ ख़राब लागैत छsल मुदा ओहि दिन नहि जानि कियाक, होइत छsल जे रेल गाड़ी जतेक देरी सs आबैक से निक। कथी लेल, गाड़ी अपन निर्धारित समय पर आबि गेलैक आ हमरा ओहि पर सवार होमय परल। रेल गाड़ी खुजय सs पहिनहि ई मौका देखि कs चुपचाप हमरा लग आबि कहलाह "आब चिट्ठी अवश्य लिखब नहि तs हमारा पढ़य मे मोन नहि लागत"। हमहू मुडी हिला जवाब दs देलियैन्ह। जहिना जहिना गाड़ी खुजय के समय होयत छलैक हमरा बुझाइत छsल जेना हमरा कियो जबरदस्ती पठा रहल अछि। गाड़ी आब ससरय लागल मुदा हम दूनू गोटे एक टक एक दोसरा के ताबैत देखैत रही गेलहुँ जाबैत धरि आँखि सs ओझल नहि भsगेलहुँ। रांची पहुँचलाक दोसर दिन हम कॉलेज गेलहुँ मुदा हमर कॉलेज मे एको गोट हमर स्कूलक संगी नहि भेंटलिह। हम चुप चाप जा कs पछुलका बेंच पर बैसी गेलहुँ। क्लास मे हम असगर रही जनिकर कि बियाह भेल छलैक। हमरा क्लास मे नन सब सेहो कैयेक टा छलिह। हमरा बगल मे सब दिन आबि कs एकटा नन बैसि जाइत छलिह। एक सप्ताहक बाद बाबुजी जएबाक चर्च करय लगलाह, हुनका गेनाइ आवश्यक छलन्हि । ओ तsआयल छलाह नीलू दीदी, हमर पितिऔत बहिनक बियाहक हिसाबे छुट्टी लs कs मुदा हमर विवाहक चलते हुनका छुट्टी बढाबय परि गेलन्हि । हमर माँ बाबुजी अरुणाचल मे रहैत छलथि, जाहि ठाम मात्र छोटका बच्चा सब के लेल स्कूल छलैक ।हम आ बौआ (हमर बडका भाय ) तीन चारि बरख सs पढ़ाई लेल माँ बाबुजी लग नहि रहि छोटका काका लग राँची मे रहैत छलहुँ। हुनका लोकनि के जएबाक चर्च जखैन्ह जखैन्ह होय हमर मोन छोट भs जायत छsल, हम कात मे जाय खूब कानी। हमर माँ सैत इ देखि लेत छलिह, एक दिन हमरा पुछि देलथि "अहाँ कियाक कानैत छी"। हमरा आओर कना गेल मुदा हम बजियैन्ह किछु नहि। हमरा सब दिन सs इ रहल, यदि हमरा मोन मे दुःख होइत अछि तs हम किनको किछु नहि कहैत छियैन्ह आ कात मे जा असगरे कानैत छी।एक दिन माँ हमरा असगरे लs जाय कs पुछलथि हमरा कहु अहाँ कियाक कानैत छी नय तsहमरा ओतहु जाय कs ध्यान लागल रहत। इ सुनतहि हमरा आओर कना गेल। माँ तखैन्ह बुझि गेलैथ आ पुछलथि कहु तs हम नहि जाई आ किछु दिन अहाँ लग रही जाइ, अहाँक बाबुजी असगरे चलि जयताह। हम किछु नहि बजलियैन्ह मुदा हमरा इ सुनि निक लागल। हमर माँ, बाबुजी के कहि सुनि कs हुनका असगर जएबाक लेल तैयार कs लेलकनि। हमर चाचा इ सुनि कs पहिने माँ के रूकबा लेल मना कयलथि मुदा माँ के मोन देखि कs ओहो चुप भsगेलथि। एक सप्ताहक बाद बाबुजी के अरुणाचल जायब तय भेलैंह। बाबुजी के रांची सsमुजफ्फरपुर जा ओतहि सs अवध आसाम मेल सs अरुणाचल जएबाक छलन्हि । ९ आय भोरे बाबुजी असगर चलि गेलाह। माँ कs मोन नहि मानलन्हि जे ओ हमरा कानैत छोरि कsजैतथि। बाबुजी कs गेलाक बाद हमरा बड अफसोस होयत छलs जे माँ के हमरा चलते रहय परि गेलैन्ह, आ आब बच्चा सब के लs असगर जाय परतैन्ह। कॉलेज जयबाक खुशी एतबे दिन मे समाप्त भs गेल, कियाक से नहि जानि। कॉलेज जाइ अवश्य मुदा जेना कतो आओर हेरायल रहैत छलहुँ।घर आबि तs घर मे सेहो एकदम चुप चाप जा अपन कोठरी मे परि रहैत रही। माँ सब सोचथि हम थाकि जायत होयब आ सुतल छी, मुदा हम घंटो ओहिना परल रहैत रही। हमरा अपनहु आश्चर्य होयत छलs। स्कूल गेनाई तs हम मोन ख़राब मे सेहो नहि छोरैत रही , फेर हमरा एहि तरहे कियाक भेल जा रहल छलs। काल्हि बाबुजी चलि गेलाह से आओर घर सुन लागैत छलैक ताहि पर कॉलेज जयबाक से मोन नहि होयत छलs। कहुना कॉलेज तs गेलहुँ मुदा ओहियो ठाम नीक नहि लागल।कॉलेज सs आपस अयलाक कs बाद नहि जानि मोन जेना बेचैन लागैत छलs। हमरा बुझय मे नहि अबैत छल जे एहि तरहे कियाक भsरहल अछि। जहिना हाथ पैर धो कs अयलहुं मौसी (जे की हमर काकी सेहो छथि) जलखई लsकs ठाढ़ रहथि आ हमरा आगूक जलखई दैत बजलीह जल्दी सs पहिने जलखई कs लिय। अहाँ सब दिन बहाना कs दैत छियैक जे भूख नहि अछि एतबहि दिन मे केहेन दुब्बर भs गेल छी। नीक सs खाऊ पिबू नहि तs ठाकुर जी अओताह तs कहताह एतबहि दिन मे सब हमर कनियाँ के दुब्बर कs देलैथ। ठाकुर जी नाम सुनतहि नहि जानि कतय सs हमरा मुँह पर मुस्की आबि गेल। बुझि परल जेना फूर्ति आबि गेल हो। मौसी के एकटा नीक मौका भेंट गेलैंह आ ओ तुंरत माँ के बजा कहय लागलिह "हे बहिन, अहाँ तs किछु नय बुझैत छियैक, कुसुम थाकय ताकय किछु नय छथि रोज तीन चारि बेर ठाकुर जी कs नाम लs नय लेल करू, सब ठीक रहतैक"। आब हमरा कोनो दोसर उपाय नहि बुझाइत छल, हम बिना किछु बजने चुप चाप मौसी के हाथ सs जलखई लsलेलियैन्ह। सब राति हम आ काका विविध भारतिक हवा महल अवश्य सुनैत रही। हमरा दुनु गोटे कs इ कार्यक्रम बड़ पसीन छलs। सब सुति रहथि मुदा हम दुनु गोटे हवा महल के बाद सुतय लेल जाइत रही। हमरा कतबो पढ़ाई कियाक नहि हो सब दिन काका हमरा हवा महल काल अवश्य बजा लेत छलाह। आइयो हवा महल जहिना शुरू भेलैक मधु के भेजि कs हमरा बजा पठेलथि। हवा महल सुनलाक बाद हम अपन कोठरी मे सुतय लेल चलि गेलहुँ आ काका अपन कोठरी मे। जहिना इ कहने रहथि, तहिना सब दिन हिनकर चिट्ठी आबैन्ह आ ओकर जवाब सब दिन राति मे सुतय काल लिखय चाहि मुदा हिनका हम की सम्बोधन कs चिट्ठी लिखियैन्ह इ हमरा बुझय मे नहि आबति छलs आ हम पुछबो किनका सs करितहुँ । हम अपन पहिल चिट्ठी जे हिनका बौआ सँग मुजफ्फरपुर पठौने रहियैन्ह ताहू दिन सोचैत- सोचैत जखैन्ह किछु नय फुरायल छलs तs हम हिनका "ठाकुर जी" सम्बोधन कs चिट्ठी लिखि पठा देने रहियैन्ह। ओ चिट्ठी पता नहि कोना , हिनकर कोनो दोस्त देख लेने रहथि आ हिनका कहि देने रहथिन्ह जे अहाँक सारि चिट्ठी बड़ सुन्दर लिखति छथि।इ ओकर चर्च हमरा लग हँसैत हँसैत कयने रहथि। हमरा ओहि दिन अपना पर तामस अवश्य भेल छलs मुदा हमरा बुझले नय छलs जे लोग की संबोधन कs घरवाला के चिट्ठी लिखैत छैक। आब तs "ठाकुर जी "सम्बोधन कs सेहो नहि लिखि सकैत छलहुँ । जखैन्ह हम सुतय लेल अयलहुं तs इ सोचिये कs आयल छलहुँ जे, किछु भs जाय आइ हम चिट्ठी लिखबे करबैन्ह।हमरा अपने बहुत खराप लागैत छलs जे हम एकोटा चिट्ठिक जवाब नहि देने रहियैन्ह। बहुत सोचलाक बाद जखैन्ह हमरा सम्बोधनक कोनो शब्द नहि फुरायल तs हम ओहि भाग कs छोरि चिठ्ठी लिखय लगलहुँ । चिट्ठी मे कैयाक ठाम हम लिखिये जे हमरा मोन नहि लागति अछि जल्दी चलि आऊ मुदा ओ फेर हम काटि दियय । खैर बिना सम्बोधन वाला चिट्ठी लिखि कs हम एकटा किताब मे इ सोचि कs राखि देलियैक जे भोर तक किछु नय किछु फुरा जयबे करत। तखैन्ह ओ लिखि कsकॉलेज जाय काल खसा देबैक। पोस्ट ऑफिस हमर घरक बगल मे छलैक। चिट्ठी लिखलाक बाद हम सोचलहुँ सुति रही मुदा कथि लेल नींद होयत। बड़ी काल तक बिछौना पर परल परल जखैन्ह नींद नहि आयल तs उठि कs पानि पीबि लेलहुँ आ फेर बिछौना पर परि कs हिनकर देल किताब "साहब बीबी और गुलाम पढ़य" लगलहुँ । दू चारि पन्ना पढ़लाक बाद किताबो सs मोन उचटि गेल आ जओं घड़ी दिस नजरि गेल तs देखलियैक भोर के चारि बाजति छलs। सोचलहुँ आब की सुतब, जाइत छी चिट्ठी पूरा कs तैयार भs जायब। इ सोचि जहिना उठि कs कलम हाथ मे लेलहुँ कि बुझायल जे कियो केबार खट खटा रहल छथि। हमरा मोन मे जेना एक बेर आयल कहीं इ तs नहि अयलाह। हम जल्दी सs आगू बढ़ि कs जहिना केबार खोलति छी तs ठीके इ एकटा बैग लेने ठाढ़ छलथि। हम किछु क्षण ओहिना ठाढ़ भs हिनकर मुँह ताकैत रही गेलहुँ अचानक मोन परल आ हिनका सs बिना किछु पूछने वा कहने ओहि ठाम स तुरन्त भागि गेलहुँ । ता धरि काका के छी करैत ओहि ठाम पहुँच गेलाह आ हमरा भागैत देखि पुछलथि" के छथि"?हम बिना किछु कहने ओहि ठाम सs भागि अपन कोठरी मे जा बैसि गेलहुँ। काका हिनका देखैत देरी अ हा हा ... ठाकुर जी आयल जाओ बैसल जाओ कहैत हिनका घर मे बैसा तुरंत ओहि ठाम सsजोर जोर सs भौजी भौजी करैत भीतर आबि सब के उठा देलथि। थोरबहि काल मे भरि घरक लोग उठि गेलथि। तुरंत मे चाह पानि सबहक ओरिओन होमय लागल। राँची मे तs हमर पितिऔत चारि भाई बहिन सेहो रहथि। जाहि महक तीन गोटे हिनका देखनेहो नहि रहथि, मधु टा विवाह मे छलिह। सब हिनका देखय लेल जमा भs जाय गेलथि। मौसी सs सेहो हिनका पहिल बेर भेंट भेल छलैन्ह। विवाह मे मौसी नहि रहथि नीलू दीदी कs विवाह के बाद सोनूक (छोटका बेटा) मोन खराप भs गेल छलैन्ह आ काका मौसी, सोनू, निक्की आ पप्पू के राँची छोरि आयल छलथि। हुनका एतबो समय नहि भेंटलैन्ह जे मौसी के फेर अनतथि। हम अपन कोठरी मे चुप चाप बैसल रही, रतुका बेचैनी आब नहि छलs मुदा हमरा किछु नहि बुझाइत छलs जे हम की करी। इ सोचैत रही जे कॉलेज जाइ या नहि, जयबाक मोन तs नहि होयत छलs, ताबैत मौसी हमरा कोठरी मे कुसुम कुसुम करैत हाथ मे चाह लेने घुसलीह। हमरा देखैत कहय लगलीह "अहाँ अहिना बैसल छी, जल्दी सs चाह पीबि लिय आ तैयार भs जाऊ। हमरा इ सुनतहि बड़ तामस भेल, हमरा मोन मे भेल कहू तs इ अखैन्हे अयलाह अछि आ मौसी हमरा कॉलेज जाय लेल कहैत छथि हम धीरे सs कहलियैन्ह हमर माथ बड़ जोर सs दुखायत अछि। इ सुनतहि मौसी के मुँह पर मुस्की आबि गेलैन्ह आ कहलथि तैयार भs जाऊ मोन अपनहि ठीक भs जायत, आ आय कॉलेज नहि जयबाक अछि। इ सुनतहि हमरा भीतर सs खुशी भेल,बुझायल जेना हम यैह तs चाहैत रही, जे कियो हमरा कहथि अहाँ कॉलेज नहि जाऊ। हम जल्दी सs चाह पीबि तैयार होमय लेल चलि गेलहुँ। ओना तs हमरा तैयार हेबा मे बड़ समय लागैत छलs मुदा ओहि दिन जल्दी जल्दी तैयार भsगेलहुँ। अपन कोठरी मे पहुँचलहुं तs मौसी हमरे कोठरी मे रहथि आ किछु ठीक करैत छलिह। हमरा देखैत बाजि उठलिह "बाह आय तs अहाँ बड़ फुर्ती सs तैयार भs गेलहुँ, आब माथक दर्द कम भेल"? हम हुनका दिस देखबो नही केलियैन्ह आ दोसर दिस मुँह घुमेनहि हाँ कही देलियैन्ह। काका के विवाहे बेर सs हिनका सँग खूब गप्प होयत छलैन्ह। हमर काका बड़ निक आ हंसमुख व्यक्ति, ओ हिनका सs कखनहु कखनहु कs हँसी सेहो कs लेत छलाह। हिनको काका सs गप्प करय मे बड़ नीक लागैत छलैन्ह। हम तैयार भs कs पहुँचलहुं ता धरि ओ सब गप्प करिते छलाह। मौसी हमरे कोठरी सs काका के सोर पारि हुनका सs कहलथि" ठाकुर जी कs तैयार होमय लेल कहियोक नहि, थाकल होयताह "।किछुए कालक बाद इ हमर वाला कोठरी मे अयलाह,हम चुप चाप ओहि ठाम बैसल रही। हिनका देखैत देरी हमरा की फुरायल नहि जानि झट दय गोर लागि लेलियैन्ह।गोर लगलाक बाद हम चुप चाप फेर आबि कs बैसि रहलियैक। मोन मे पचास तरहक प्रश्न उठैत छल।इहो आबि कs हमरा लग बैसि रहलाह आ पुछ्लाह अहाँ कानैत कियाक रही, आ हमरा देखि कs आजु भागि कियाक गेलहुँ। अहाँक बाबुजी जखैन्ह सs इ कहलाह जे अहाँ कs कनबाक चलते माँ रही गेलीह, आ आब एक मास बाद जयतीह, तखैन्ह सs हमरो मोन बेचैन छलs। अहाँ के बाबुजी के गाड़ी मे बैसा सीधे हॉस्टल गेलहुँ आ ओहिठाम मात्र कपडा लs जे पहिल बस भेंटल ओहि सs सीधा आबि रहल छी। हिनकर इ गप्प सुनतहि हमर आँखि डबडबा गेल। हमरा अपनहु इ नहि बुझल छलs जे हम कियाक भागल रही आ नहि इ, जे हमरा कियाक कना जायत छल। साँझ मे हम चाह लs कs जखैन्ह घर मे घुसलहुं तs इ आराम करैत छलाह मुदा हमरा देखैत देरी उठि कs केबार बंद कs लेलथि आ हमरा लग आबि बैसैत कहलाह "अहाँ सs हमरा किछु आवश्यक गप्प करबाक अछि"। हम किछु बजलियैन्ह नहि मुदा मोन मे पचास तरहक प्रश्न उठैत छलs। चाह पीबि कप राखैत कहलाह "अहाँ सच मे बड़ सुध छी, अहाँ हमर बुची दाई छी"। हम तखनहु किछु नहि बुझलियैन्ह आ नय किछु बजलियैन्ह, मोने मोन सोचलहुं इ बुची दाई के छथि। हम सोचिते रही जे हिनका सs पुछैत छियैन्ह, इ बुची दाई के छथि ताबैत धरि इ उठि कs एकटा कागज लs हमरा लग बैसि रहलाह। हमरा सs पुछलाह हरिमोहन झा कs नाम सुनने छी? हम सीधे मुडी हिला कs नहि कहि देलियैन्ह, ठीके हमरा नहि बुझल छलs। ठीक छैक हम अहाँ के बुची दाई आ हरी मोहन झाक विषय मे दोसर दिन बतायब। पहिने इ कहू, अहाँ के तs हमरा देखि कs खुशी आ आशचर्य दूनू भेल होयत। हिनका देखि कs हमरा खुशी आ आश्चर्य तs ठीके भेल छलs मुदा हिनका कोना कहितियैन्ह हमरा कहय मे लाज होयत छलs, तथापि पुछि देलथि तs मुडी हिला कs हाँ कहि देलियैन्ह। इ अपन हाथ महक कागज़ हमरा दिस आगू करैत कहलाह, इ अहाँ के लेल हम किछु सम्बोधानक शब्द लिखने छी, अहाँ के अहि मे सs जे नीक लागय वा अहाँ जे संबोधन करय चाहि लिखी सकैत छी, मुदा आब चिट्ठी अवश्य लिखब। कोनो तरहक लाज, संकोच करबाक आवश्यकता नहि अछि। बादक गप्प के कहय हम तs इ सुनतहि लाज सs गरि गेलहुँ। हम सोचय लगलहुं हिनका हमर मोनक सबटा गप्प कोना बुझल भs जायत छैन्ह। थोरबे काल बाद इ हमरा अपनहि कहय लगलाह हम अहाँक किताब देखैत छलहुँ तs ओहि मे सs हमरा ओ चिट्ठी भेटल जे अहाँ हमरा लिखने छलहुँ। ओहि मे अहाँ हमरा संबोधन तs नहि कयने छी मुदा ओ हमरे लेल लिखल गेल अछि से हम बुझि गेलहुँ। कोनो कारण वश अहाँ नहि पठा सकल होयब इ सोचि हम पढि लेलहुँ। पढ़ला पर दू टा बात बुझय मे आयल, पहिल इ जे अहाँक मोन एकदम सुध आ निश्छल अछि, आ दोसर इ जे अहाँ मोन सs चाहैत छलहुँ जे हम आबि, आ देखू हम पहुँची गेलहुँ। अहाँ हमरा चिट्ठी एहि द्वारे नहि लिखी पाबैत छी नय जे अहाँ के सम्बोधनक शब्द नहि बुझल अछि,कोनो बात नहि।एहि मे लाजक कोनो बात नहि छैक, अहाँ के जे किछु बुझय मे नहि आबय आजु सs ओ अहाँ हमरा सs बिना संकोच कयने पुछि सकैत छी। ओहि दिन नहि जानि कियाक, हमरा बुझायल जे बेकारे लोक के घर वाला सs डर होयत छैक। पहिल बेर हुनक जीवन मे हमर महत्व आ स्थान केर आभास भेल आ हमरा मोन मे संकोचक जे देबार छलs से ओहि दिन पूर्ण रूपेण हटि गेल। नहि जानि कियाक, बुझायल जेना एहि दुनिया मे हमरा सब सs बेसी बुझय वाला व्यक्ति भेंट गेलैथ। जाहि दिन हमर विवाह भेल छलs ओहि समय हमर बडकी दियादिन केर सेहो द्विरागमन नहि भेल छलैन्ह। आ ओ राँची अपन नैहर मे छलिह। दोसर दिन साँझ मे इ कहलाह जे काल्हि भौजी सsभेंट करय लेल जयबाक अछि आ ओकर बाद परसु मुजफ्फरपुर चलि जायब। आजु चलु राँची(राँची केर मुख्य बाज़ार मेन रोड के लोग राँची कहैत छैक) दुनु गोटे घूमि कs अबैत छी। बरसातक मास आ बादल सेहो लागल छलैक तथापि हम सब निकलि गेलहुँ। रिक्शा किछुएक दूर आगू गेला पर भेंट गेल। घर सs मेन रोड जयबा मे करीब आधा घंटा लागैत छलैक। हम सब आगू बढ़लहुं ओकर १५ मिनट केर बाद सs पानि भेनाइ आरम्भ भs गेलैक। विष्णु सिनेमा हॉल सs किछु पहिनहि हम दूनू गोटे पूरा भीजि गेलहुँ। सिनेमा हॉल लग पहुँची इ कहलाह, भीजि गयबे केलहुं,चलू सिनेमा देखि लैत छी तs आपस घर जायब, कपड़ा सिनेमा हॉल मे सुखा जायत। राति मे अचानक माथक दर्द आ प्यास सs नींद खुजि गेल, बुझायल जेना हमर देह सेहो गरम अछि। उठि कs पानि पीबि फेर सुति गेलहुँ। भोर मे मोन ठीक नहि लागैत छलs मुदा हम किनको सs किछु कहलियैन्ह नहि, भेल कहबैक तs बेकार मे सब के चिंता भs जयतैन्ह। मोन बेसी खराब लागल तs जा कs सुति रहलहुं। जखैन्ह आँखि खुजल तs देखैत छी डॉक्टर हमरा सोंझा मे अपन आला लेने ठाढ़ छलथि। हमरा ततेक बुखार छल जे चादरि ओढ़ने रही तथापि कांपति छलहुँ।डॉक्टर की कहलैथ से हम किछु नहि बुझलियैक। हमरा थोर बहुत बुझय मे आयल जे कियो हमर तरवा सहराबति छलथि, आ कियो गोटे पानिक पट्टी दs रहल छलथि , मुदा हम बुखारक चलते आँखि नहि खोलि पाबति छलहुँ, हम बुखार मे करीब करीब बेहोश रही। जखैन्ह हमरा होश आयल आ आँखि खुजल तs प्यास सs हमर ओठ सुखायत छल, मुदा साहस नहि छलs जे उठि कs पानी पिबतहुं। जहिना करवट बदललहुं तs हिनका पर नजरि गेल। हिनका हाथ मे एकटा रुमाल छलैन्ह आ बिना तकिया सुतल छलथि। हमरा इ बुझैत देरी नहि भेल जे इ हमरा रुमाल सs पट्टी दैत दैत सुति रहल रहथि। हमरा हिम्मत तs नहि छल तथापि हम चुप चाप उठि जहिना हिनकर माथ तर तकिया देबय चाहलियय इ उठि गेलाह। हमरा बैसल देखि तुंरत कहि उठलाह अहाँ कियाक उठलहुं अहाँ परल रहु। इ सुनतहि हम फेर तुंरत परि रहलहुं। भोर मे उठलहुं त कमजोरी तs छलs मुदा बुखार बेसी नहि छल। मौसी सs पता चलल जे चाय पिबय के लेल जखैन्ह मधु उठाबय गेलीह तs हम बुखार सs बेहोश रही। इ देखि तुंरत डॉक्टर के बजायल गेलैक। डॉक्टर के गेलाक बाद बड राति तक माँ आ इ दूनू गोटे बैसल रहथि आ ठंढा पानी सs पट्टी दs बुखार उतारबाक प्रयास मे लागल रहथि। माँ के बाद मे इ सुतय लेल पठा देलथि आ अपने भरि राति जागल रहथि कियाक तs बुखार कम भेलाक बादो हम नींद मे बड़ बड़ करैत छलियैक। दोसर दिन सs हमर बुखार कम होमय लागल मुदा हमरा पूर्ण रूप सs ठीक होयबा मे एक सप्ताह लागि गेल। हिनका कतबो कहलियैन अहाँ चलि जाऊ, क्लास छूटैत अछि मुदा इ कहलाह, अहाँ ठीक भs जाऊ तखैन्ह हम जायब। एक सप्ताह इ कतहु नहि गेलाह हमरे कोठरी मे बैसि कs अपन पढ़ाई करथि। साँझ मे काका लग बैसि कs खूब गप्प होयत छलैन्ह। ओहि एक सप्ताह मे काका सेहो हिनका सs बहुत प्रभावित भsगेलथि आ इहो काका के स्वभाव सs परिचित भेलाह। साँझ मे परिचित सब हिनका सs भेंट करय लेल आबथि। एहि तरहे पूरा सप्ताह बीमार रहितहुँ हमरा खूब मोन लागल। आइ भोर सs हमरा एको बेर बुखार नहि भेल। काल्हि भोर मे हिनका मुजफ्फरपुर जयबाक छैन्ह भरि दिन इ हमरा सँग गप्प करैत रहलाह। साँझ मे काका ऑफिस सs अयलाह तs इ हुनका लग बैसि हुनका सs गप्प करय लगलाह आ हम अपन कोठरी मे छलहुँ। माँ मौसी जलखई के ओरिआओन करैत छलिह बाकी भाई बहिन सब बाहर खेलाइत छलैथ। हमरा इ सोचि कs एको रति नीक नहि लागैत छलs जे काल्हि इ चलि जेताह आ ओकर किछु दिनक बाद माँ सेहो चलि जयतीह। राति मे सुतय काल इ कहलाह भोरे तs हम जा रहल छी मुदा हमर ध्यान अहीं पर ता धरि रहत,जा धरि अहाँक चिट्ठी नही भेंटत जे अहाँ पूरा ठीक भs गेलहुँ अछि। एहि बेर माँ के जाय काल नहि कानब, ओ बड दूर रहति छथि हुनको अहिं पर ध्यान लागल रह्तैन्ह। अहि बेर रोज एकटा कs चिट्ठी अवश्य लिखब, आ हमरा दिस देखैत आ मुस्की दैत कहलाह आब तs अहाँ के चिट्ठी लिखय मे सेहो कोनो तरहक दिक्कत नहि हेबाक चाहि। हमहु हिनकर मुस्कीक जवाब मुस्की सs दsदेलियैन्ह। आजु साँझ मे माँ के अरुणाचल जेबाक छैन्ह। हमरा खराप तs लागि रहल अछि मुदा एहि बेर हम कानैत नहि छी। माँ बड उदास छैथ। एक तs हमरे छोरय मे हुनका नीक नहि लागैत छलैन्ह, आ आब तs बिन्नी के सेहो छोरय परि रहल छैन्ह।माँ बिन्नी के हमरा आ काका के कहला पर छोरि कs जा रहल छथि। पन्द्रह दिन सs बिन्नी के बुखार छलैन्ह ठीक तs भs गेलैन्ह मुदा ओ बहुत कमजोर भs गेल छथि। डॉक्टर हुनका लs कs ओतेक दूर जएबाक लेल मना कs देने छथिन्ह । बाबुजी के चिट्ठी आयल छलैन्ह हुनक मोन ख़राब छैन्ह। माँ के किछु नहि फ़ुराइत छलैन्ह जे ओ की करथि। जखैन्ह हम कहलियैन्ह जे अहाँ जाऊ बिन्नी के रहय दियौन्ह तs ओ अरुणाचल जयबाक लेल तैयार भs गेलीह। निक्की बड ताली छथि हुनका कोनो काज काका स वा दोसर किनको सs करेबाक होयत छैन्ह तsततेक नय नाटक करय छथि जे लोग के ओ सच बुझा जायत छैक आ हुनका ओ काज करय लेल भेट जाइत छैन्ह। जखैन्ह सs माँ के जेबाक चर्च शुरू भेलैक निक्की माँ सँग जेबाक लेल हल्ला करय लगलीह।काका कतबहु निक्की के बुझेबाक प्रयास केलैथ मुदा ओ नहि मानलिह आ हुनकर नाटक के आगू सब के हुनकर बात मानय परलैन्ह। माँ निक्की के अपना सँग अरुणाचल लsजएबाक लेल तैयार भs गेलीह। साँझ मे माँ सोनी, अन्नू, छोटू आ निक्की के लs मुजफ्फरपुर चलि गेलीह। इ कहने रहथिन्ह जे मुजफ्फरपुर बस अड्डा आबि जेताह आ ओहि ठाम सs माँ सब के अपन कॉलेज लs जयताह माँ सब भरि दिन कॉलेजक गेस्ट हाउस मे रहि साँझ के अवध आसाम मेल पकरि कs चलि जेतीह। माँ के गेलाक बाद सs घर एकदम सुन भs गेल छलैक। एहि बेर बहुत दिन माँ सँग रहल रहि से आओर खराप लागैत छल। राति मे काका बहुत उदास छलैथ, हुनका निक्की के बिना नीक नहि लागैत छलैन्ह। आय रबि छैक हमरा कॉलेज नहि जएबाक छलs। भरि दिन प्रयास मे रहि जे बिन्नी के असगर नहि छोरियैन्ह। बेर बेर हुनका दिस देखियैन्ह जे ओ उदास तs नहि छथि। एक तs हमही छोट बिन्नी तs हमरो सs करीब नौ साल छोट छथि मुदा ओ हमरा पकरि मे नहि आबय दैथ जे हुनका माँ के याद अबैत छैन्ह। दिन भरि काका सेहो बिन्नी लग बैसल रहथि आ हुनका हंसेबाक प्रयास करैत रहलाह। राति मे काका कहलाह काल्हि तs अहाँक कॉलेज अछि अहाँ अपन समय पर चलि जायब। सोम दिन हमर दू टा क्लास होयत छलs आ दुनु भोरे मे छल। हम कॉलेज जाय लगलहुं तs बिन्नी के समझा बुझा देलियैन्ह आ मौसी रहबे करथि। हमर क्लास १० बजे तक छलs, क्लासक बाद हम घर जल्दी जल्दी पहुँच सीधा अपन कोठरी मे गेलहुँ कियाक तs माँ के गेलाक बाद बिन्नी हमरे कोठरी मे हमरे सँग रहैत छलिह। जओं अपन कोठरी मे पहुँचति छी तs बिन्नी आ इ दूनू गोटे बिछाओन पर बैसि कs गप्प करैत आ हँसैत छलाह। हमरा देखैत देरी बिन्नी तुंरत कहय लगलीह, "दीदी निक्की बोमडिला(बोमडिला, अरुणाचल मे छैक) नहि गेलीह। ततेक नय नाटक केलिह जे ठाकुर जी कs पहुँचाबय लेल आबय परलैन्ह"। साँझ मे काका बड खुश छलथि, निक्की आपस जे आबि गेल रहथि। दोसर दिन इ फेर मुजफ्फरपुर आपस चलि गेलाह। १० हम माँ के सँग आय अरुणाचल जा रहल छी। माँ आयल तs रहथि हमर द्विरागमन करबाक लेल मुदा हमर सास ससुर नहि मानलथि। काका के बदली राँची सs कहियो भs सकैत छलैन्ह। इ सोचि हिनकर इच्छा आ जोर छलैन्ह जे द्विरागमन भs जायत तs हमरो नाम मुजफ्फरपुर मे लिखवा दितथि आ हम ओहि ठाम पढितहुं। माँ सब के सेहो चिंता नहि रहितियैन्ह आ हिनको नीक रहितियैन्ह। बाबुजी के चिट्ठी लिखि कsएहि लेल इ मना लेने रहथि। जहिया सs हमर मोन ख़राब भेल छल तहिया सs इ लगभग सब मास एक बेर राँची आबि जायत छलाह। मुदा हमर सास एकही बेर कहि देलथिन "आय धरि हमरा सब ओहिठाम पहिल साल मे द्विरागमन नहि भेल अछि, आ नहि धारति अछि"। अंत मे जखैन्ह हमर सास ससुर तैयार नहि भेलथि तs माँ हमरा कहलथि "चलु अहाँ अरुणाचल गेलो नहि छी, घूमि कs चलि आयब। जओं एहि बीच मे काका के बदली भs गेलैन्ह तs फेर सोचल जायत जे की कायल जाय"। हमर कॉलेज गरमी के छुट्टी लेल बंद छलैक। दू दिन पहिनहि हमर विवाहक पहिल वर्षगाँठ छलs आ आय हम अरुणाचल जा रहल छी। हमर मोन इ सोचि कs उदास छलs कि ओतेक दूर जा रहल छी। फेर कतेक दिन पर हिनका सs भेंट होयत से नहि जानि। हमरा एको रत्ती माँ के सँग जयबाक खुशी नहि छलs। हमर चेहरा देखि कs कियो कहि सकैत छलथि जे हमर मोन बहुत दुखी अछि। हिनको मोन उदास छलैन्ह आ चुप चाप हमरे लग ठाढ़ छलथि। हम हिनक मोनक गप्प सेहो बुझि रहल छलियैन्ह मुदा की करी से नहि बुझय मे आबि रहल छलs। हम सब वेटिंग रूम मे ट्रेनक प्रतीक्षा मे छलहुँ जाहि केर अयबा मे अखैन्ह बहुत देरी छलैक। हम बेर बेर देखाबय चाहि रहल छलियैक जे हमर आंखि मे किछु परि गेल अछि आ हम अपन रुमाल सs निकालय के प्रयास कs रहल छी, मुदा सत्यता किछु आओर छलैक। इ हमर मोनक गप्प बुझि गेलाह आ माँ के कहलथि "अखैन्ह तs ट्रेन आबय मे देरी छैक हम सब चाह पीबि कs थोरेक काल मे अबैत छी"। इ कहि आ बौआ के बुझा हमरा चलय लेल कहलथि। जहिना हम सब बिदा भेलहुँ कि हिनकर मित्र धनेश जी, चलि आबैत छलाह। हुनका देखि हम सब रुकि गेलहुँ। जखैन्ह ओ माँ कs गोर लागि लेलथि तs हुनको सँग लs आगू बढ़ि गेलहुँ। माँ के लेल चाय इ वेटिंग रूम मे पठा देलथि। हम दुनु गोटे आ धनेश जी रेलवे केर जलपानगृह मे बैसि कs चाय पिबय लगलहुं। धनेश जी हिनकर अभिन्न मित्र छलथि आ दुनु गोटे एकहि कॉलेज मे सेहो पढैत छलाह। विवाहक बाद ओ पहिल बेर हमरा सs भेंट करय के लेल आयल छलाह। हम ओहिना बेसी नहि बजैत छलहुँ दोसर आय होयत छल जे बाजब तs पता नहि कना नहि जाय। इ हमर मोनक गप्प बुझि गेलाह आ हुनक बेसी प्रश्नक जवाब दs रहल छलथि। किछु किछु तs ओहि मे हमरा हंसेबाक लेल आ ध्यान दोसर दिस करबाक लेल सेहो छलैक। धनेश जी आ इ गप्प कs रहल छलथि, हम बीच बीच मे माथ तs डोला रहल छलहुँ मुदा हमर ध्यान कतहु आओर छल। हमर मोन एकदम बेचैन लागि रहल छल आ बेर बेर हम घड़ी देखि रहल छलहुँ। राँची मे रहैत छलहुँ तs कम सs कम मास मे एक बेर इ आबि जायत छलाह। चिट्ठी से सब दिन अबैत छलs । अरुणाचल जा तs रहल छलहुँ इ सोचि कs जे घूमि कs चलि आयब मुदा काका के बदली लs कs चिंता होयत छलs । राँची मे रही तs जखैन्ह मोन होयत छलैन्ह आबि जायत छलाह अरुणाचल एक तs दूर छलैक दोसर ओहि ठाम जेबाक लेल परमिट बनाबय परैत छैक। हमर की किस्मत अछि नहि जानि जहिया हमरा माँ सँग रहबाक मोन होयत छलs, हम माँ सs अलग रहलहुं। आब हिनका सँग रहबा मे नीक लागैत छलs आ रहबाक मोन होयत छलs तs आब हिनको सs एतेक दूर जा रहल छलहुँ, इ सोचि कs हमर मोन दुखी छलs । तथापि धनेश जी सोझा मे छलथि तs मुँह पर हँसी अनबाक प्रयास करैत छलहुँ। अचानक हिनकर बोली कान मे आयल "आब समय भs गेल छैक चलु माँ के चिंता होयत हेतैन्ह", इ सुनतहि हम सब उठि कs चलि देलहुं। हम सब जखैन्ह पहुँलहुं तs माँ के ठीके हमरा सब कs आबे मे देरी देखि चिंता होयत छलैन्ह। देखैत देरी बजलीह "अखैन्ह तक कुली सब नहि आयल अछि, आब ट्रेन आबय वाला छैक"। एतबा माँ कहिते छलिह की दुनु कुली आबि गेलैक। हम सब ट्रेन मे बैसि गेलहुँ, सामान सब जगह पर रखवेलाक बाद इहो हमरा सब लग बैसि गेलाह। सोनी बिन्नी दुनु गोटे एक एक टा खिड़की वाला सीट लs कs बैसि गेलीह, बेचारी अन्नू आ छोटू के कात मे बैसा देने रहथि। माँ आ बौआ अपना हिसाबे सामान सब ठीक करबा मे लागल छलथि। इ एक टक हमरे दिस देखैत छलाह। बुझि परैत छ्लैन्ह जेना आब कहताह अहाँ नहि जाऊ। हम अहाँक बिना नहि रहि सकैत छी। हम लाचार दृष्टि सs हुनका दिस देखि रहल छलहुँ आ मोने मोन भs रहल छलsकियो हमरा कहि दितैथ अहाँ के आब नहि जयबाक अछि। मुदा से नहि भेलैक आ अचानक धनेश जी खिड़की लग आबि कs कहलाह "यौ आब नीचा आबि जाऊ गाड़ी के सिग्नल भs गेल छैक"। एतबा सुनतहि इ हरबरा क उठि गेलाह आ कहलाह "पहुँचैत देरी चिट्ठी अवश्य लिखि देब।" इ कही माँ के गोर लागि उतरि गेलाह। हम घुसकि कs बिन्नी लग बैसि गेलहुँ आ फेर हिनका दिस लाचार भs देखय लागलियैन्ह। अचानक बुझायल जेना हमर किछु एहि ठाम छुटि रहल अछि । ट्रेन धीरे धीरे स्टेशन सs आगू बढ़ि रहल छलैक, मुदा हमर दुनु गोटे के नजरि एक दोसर पर छलs । हम सब एक दोसराके देखि रहल छलहुँ। धीरे धीरे दूरी बढ़ल जा रहल छलs, जखैन्ह आँखि सs ओझल भs गेलाह तs हम फेर अपन जगह पर आबि कs बैसि गेलहुँ। बौआ, सोनी बिन्नी अन्नू आ छोटू सब खुश छलथि। माँ अपन खाना वाला पेटार खोलि सब के ओहि मे सs निकालि कs खेबाक वस्तु सब के देबय लागलीह। गाड़ी सिलिगुरी पहुँचि गेल तs माँ हमरा आ बौआ के स्टेशन दिस देखा कs कहलिह "अहाँ सब के तs याद नहि होयत, एहि ठाम तक हम सब ट्रेन सs आबि, ओकर बाद गाड़ी सs सिक्किम जायत छलहुँ"। बाबुजी सिक्किम मे सेहो तीन बरख रहल छलथि। करीब चौबीस घंटा सs हमर सबहक ट्रेन न्यू बोगाई गाँव स्टेशन सs आगू आबि,एकटा छोट सन स्टेशन पर रुकि गेलैक। एतेक छोट स्टेशन की एहि ठाम किछु खेबा पिबाक सेहो नहि भेटैत छलैक। आगू कोनो ट्रेनक दुर्घटना भs गेल छलैक जाहि चलते सब ट्रेन एहि ठाम आबि कs रुकल रहैक। ओहि ठाम तेहेन स्थिति भs गेलैक जे बाद मे स्टेशन पर पानि सेहो खतम भs गेलैक। माँ के आदति छलैन्ह दूरक यात्रा करबाक आ ओ अपना सँग खेबा पिबाक ततेक नहि सामन रखने रहथि जे हमरा सब के ओहि मे कष्ट नहि भेल, मुदा सब गोटे परेशान भs गेलहुँ। एक तs एहिना अरुणाचल जेबा मे तीन दिन लागैत छलैक, ताहि पर चौबीस घंटा एक ठाम रुकलाक चलते आओर सब परेशान भs जाय गेलौन्ह। ट्रेन चारद्वार जहिना पहुचलैक हमरा सब केर जान मे जान आयल। बाबुजी स्टेशन पर ठाढ़ छलथि। करीब तीस घंटा देरी सs हमर सबहक ट्रेन पहुँचल छलैक। स्टेशन सsसीधा हम सब गेस्ट हाउस पहुँच गेलहुँ, ओहि ठाम हमरा सब के राति भरि रहबाक छल। हम सब तैयार भs आ जलखई करला कs बाद बोमडिला (अरुणाचल) के लेल सरकारी जीप सs बिदा भs गेलहुँ। बाबुजी हमरा बतेलाह अरुणाचल मे भारत केर १/३ सेना रहैत छैक। बॉर्डर पर परमिट देखाबय परलैक आ परमिट देखेलाक बाद बाबुजी कहलथि "अहाँ पहिल बेर आयल छी, बौआ तs एक बेर आयल छलथि। अहाँ जीप मे हमरा सँग आगू बैसि जाऊ, देखय मे बड नीक लागत। हम बाबुजी सँग आगू बैसि गेलहुँ। ओना तs आसाम सेहो नीक लागल, मुदा अरुणाचल मे प्रवेशक सँग बुझायल जेना प्रकृति एकरे कहैत छैक। कश्मीर तs हम नही देखने छलियैक जाहि केर तुलना लोग स्वर्ग सs करैत छैक।अरुणाचल मे प्रवेश करैत घाटिक घुमावदार सड़क आ चढाई आरम्भ भs गेलैक। सड़क सब नीक मुदा पातर देखय मे आयल। कहुना दू गाड़ी जएबाक जगह छलैक। बाबुजी बतेलाह जे सब सड़क सेना के छलैक। जीप जहिना जहिना आगू बढैत गेलैक,चढाई तहिना तहिना बढ़ल जा रहल छलैक। सोनी बिन्नी सब तs ओहि ठाम माँ बाबुजी लग रहैत छलथि आ कैयेक बेर आयल गेल रहैथ सब गोटे गप्प मे व्यस्त छलिह। हमर ध्यान मात्र प्राकृतिक सुन्दरता देखय मे छल। पहाडी नदी के विषय मे सुनने आ कविता मे पढ़ने रही। मुदा आय साक्षात देखि रहल छलहुँ।जतेक सुनने रही ताहू सs सुंदर छल इ पहाडी नदी। झरना देखय लेल दूर दूर जायत छलहुँ, आ अहि ठाम तs रास्ता मे कैयेक टा झरना भेट रहल छलs। बाबुजी हमरा सब ठामक नाम आ ओहि जगहक महत्व बताबैत जा रहल छलाह। बाबुजी कहलाह "आब इ जगह ठीक सs देखू, इ छैक तवांग वैली (Tawang Valley)। चीन सँग सन ६२ केर लड़ाई मे एकर बड महत्व छैक"। एहि ठाम सsबोमडिला बड लग छैक। ६२ मे सब सs बेसी लड़ाई बोमडिला मे भेल छलैक। बाम दिस जओं हमर नजरि गेल तs नीचा मे नदी बहैत छलैक, ओ देखा कs कहलाह " इ नदी देखैत छी, पहाडी नदी रहितो लड़ाई समय मे इ पूरा खून सs लाल भs जाइत छलैक। एहि ठामक लोग सब कहैत छैक जे लड़ाई केर बाद इ नदी सs कतेको लाश निकलल छलैक। बाबुजी जहिना कहने रहथि बोमडिला लग छैक तहिना किछुयैक दूरी गेलाक बाद घर सब नजरि आबय लागल। एकटा झरना आयल आ बाबुजी कहलाह लिय बोमडिला पहुँचि गेलहुँ। जीप झरना सs किछुए आगू आबि कs रूकि गेलैक। बोमडिला पहुँचलहुं त साँझ भs गेल छलैक। जीप सs उतरि कs माँ हमरा सब के लsआगू बढि गेलिह आ बाबुजी सामान सब उतरवाबय लगलाह। हम जहिना सीढी पर चढि ऊपर अयलहुं, लकडी के घर सब देखाई परय लागल। बाहर सs सब घर देखय मे एकहि जेना बुझि परैत छलैक। सब घरक छत हरियर, मुदा दू घर सs बेसी एक समतल जमीन पर नजरि नहि आयल। ऊपर आ नीचा सब ठाम जएबाक लेल सीढी बनल रहैक।ऊपर नीचा करैत हम सब अपन घर पहुँचि गेलहुँ। हम सब ततेक थाकल रही जे चाय आ जलखई केलाक बाद कखैन्ह नींद आबि गेल,हम नहि बुझलियैक। माँ के बोली पर हमर नींद खुजल। माँ कहि रहल छलथि " उठु नय भोजन केलाक बाद फेर सुति रहब"। उठलहुँ तs, मुदा जारक चलते हमरा भोजनो करबाक मोन नहि भs रहल छलs।माँ हमरा बिछोना सs उतरय लेल मना कs देलथि आ हमर भोजन बिछाओन लग मँगा देलिह। भोजनक बाद हम कोहुना उठि कs हाथ धोए लेल बिछाओन सs उतर कs गेलहुँ। हमर आँखि खुजल तs माँ बाबुजी आ एक आओर व्यक्ति के अपना सोझा मे देखि हम हरबरा कs उठय लगलहुँ। माँ कहलिह "किछु नहि भेल अछि परल रहू। असल मे अहाँ हाथ धोअय लेल गेलहुँ तs ओहि ठाम बेहोश भs खसि परल रही। की भेल छलs?डॉक्टर साहेब कहैत छथि ऊंचाई के चलते भेलैक अछि। एके बेर ओतेक नीचा सs ८ हजार फीट पर पहुँचि गेलहुँ ताहि केर असर छैक आओर किछु नहि"। तखैन्ह हमरा याद आयल जे हमरा चक्कर जेना बुझायल छलs आओर किछु याद नहि छलs। डॉक्टर इ कहि चलि गेलाह जे आराम करू भोर तक एकदम ठीक भs जायत। बेर बेर उठि मुदा बुझाइत छल एखैन्ह भोर नहि भेलैक आ फेर सुति जाइत छलहुँ। मोन मे आयल जे घड़ी देखि लेत छी। जओं घड़ी दिस नजरि गेल तs आठ बाजैत छलs, हरबरा कs उठलहुँ आ बाहर दिस निकलि गेलहुँ। राति मे एक तs ठंडा आ ताहि पर ततेक थाकल रही जे घर मे घुसलाक बाद बाहर निकलबाक हिम्मत नहि भेल। बाहर आबितहि बुझि गेलहुँ जे हमरा कियाक होयत छलs जे भोर नहि भेलैक अछि। धुंध तेहेन छलैक जे अपन घर छोरि कs सामने वाला घर सेहो नहि देखाइत छलs। किछुए कालक बाद बौआ सेहो बाहर पहुँचि गेलाह। धुंध बेसी काल नहि रहलैक आ हटैत के सँग प्राकृतिक रूप साफ साफ देखाई परय लगलैक।किछु काल तक ठाढ़ भs हम प्रकृतिक ओहि रूप के देखैत रहि गेलहुँ। जतय तक नजरि गेल, सब घरक सोंझा मे सुंदर सुंदर फूल नजरि आयल जे देखि मोन प्रसन्न भs गेल। हम ठाढ़ भsदेखैत छलहुँ कि अचानक एक झुंड लड़ाकू विमान (mig) बुझायल जेना हमर घरक ठीक पाछू सs निकलल अछि आ आसमान मे एम्हर सs ओम्हर करय लागल। ओ कखनहु बुझाइत छलs आब खसि परतैक मुदा फेर तुंरत ऊपर आबि जायत छलs। ओहि विमानक झुंड देखैत देरी हम दुनु भाई बहिन अपन बरामदा सs उतरि जओं पाछू गेलहुँ तs पहाड़ के सुन्दरता देखि किछु काल ओहि ठाम ठाढ़ रहि गेलहुँ। बुझाइत छल जेना पहाड़ घरक ठीक पाछू मे अछि। हम आ बौआ घरक चारू कात घुमि घुमि कsसब वस्तु देखय लगलहुँ। एक सs एक सुंदर फूल घरक सामने आ कात वाला फुलवारी मे लागल छलैक।फूलक रंग आ आकर देखि हम आश्चर्य चकित रही गेलहुँ। बाबुजी ऑफिस जएबाक लेल बाहर अयलाह त हम दुनु भाई बहिन बाहर छलहुँ। ओ बतेलाह जे बोमडिला मे बहुत सैनिक छैक, मुदा ओ सब नजरि नहि आयत कियाक तs सब बंकर(bunkar) मे रहैत छैक। अहि ठाम भारतीय सेनाक जेट,(jet)मिग(mig) आ सब तरहक लडाकू विमान देखय भेटत। सैनिक सब बराबरि अपन अभ्यास करैत रहैत छैक। भारत चीनक बोर्डर सेहो बोमडिला सs लग १४ हजार फीटक ऊंचाई पर एकटा जगह छैक सेलापास ताहि ठाम छैक। ओतय तs आओर बेसी ठंढा रहैत छैक। जुलाई, अगस्त मास मे एतेक जाड़ हम नहि देखने रहियैक। एक तs अहि ठाम हमरा आ बौआ दुनु गोटे के मोन नहि लागैत छलs ताहि पर जाड। हम आ बौआ सब दिन सोचैत छलहुँ घुमय लेल जायब मुदा जाड़क चलते नहि जायत छलहुँ। बाबुजिक ऑफिस घर सs बहुत नीचा रहैन्ह आ सीढी सs उतरय आ चढ़य परैत छलैन्ह जे १०० सs बेसी छलैक। एक दिन हम आ बौआ बिचारि कs स्वेटर पहिरि घुमैत घुमैत बाबुजी के ऑफिस देखय लेल गेलहुँ। जाइत काल मे उतरय के छलैक, ओ तs बड नीक लागल आ दुनु गोटे सीढ़ी पर कूदैत कूदैत उतरि गेलहुँ। चढ़ैत काल दुनु गोटे के हालत ख़राब भs गेल। आपस अयलाक बाद बौआ कहलाह "ठाकुर जी अओताह तs हम हुनका अवश्य बाबुजी के ऑफिस लs जयबैन्ह"। अन्नू आ छोटू तs बहुत छोट छलथि, सोनी आ बिन्नी दिन मे स्कूल चल जाइत छलिह, बौआ आ हम दुनु गोटे बेसी घर मे रहैत छलहुँ। साँझ मे बाबुजी अयलाह, हम सब बैसि कs बोखारी लग चाह पिबति रहि आ गप्प सप्प होयत छलैक। गप्प के बीच मे माँ बाबुजी सs कहलिह "मुन्नी बौआ के कतहु कतहु घुमा दियौक नञ। इ सब कतहु नहि जायत छथि भरि दिन घर मे रहैत छथि। दुनु गोटे के मोन नहि लागि रहल छैन्ह"। इ सुनतहि बाबुजी कहलाह"बुझाइत अछि आब हमर बदली जल्दिये भsजायत। आजु हम ठाकुर जी के लेल परमिट बनवा कs पठा देलियैन्ह आ जल्दिये आबय लेल लिखि देने छियैन्ह। हुनको आबि जाय दियौन्ह तs तीनू गोटे एकहि संग घूमि लेताह। बाद मे तs एहि ठाम आबय मे थोरेक झंझट छैक"। इ सुनी हमरा नीक लागल, सच मे हमरा मोन नहि लागि रहल छल। जहिया सs बाबुजी कहलाह ओ हिनका लेल परमिट पठा देने रहथि ताहि दिन सs हम आ बौआ सब दिन हिनक बाट देखैत छलियैन्ह। बौआ सब दिन बैसि कs हमरा सsगप्प करैथ जे हिनका अयला पर हम सब कतय कतय घुमय लेल जायब। ओ सब पता कs कs राखने रहथि जे कोन कोन ठाम घुमय वाला छैक। बोमडिला बड छोट जगह छलैक आ ओहि ठाम बाबुजी के ऑफिस(CPWD) केर लोक सब के छोरि किछु प्रशानक लोक आ केंद्रीय विद्यालय के किछु शिक्षक सब सेहो रहैत छलथि। माँ सब के किछु लोक के घर एनाई गेनाइ छलैन्ह हमरा अयला सs सांझ मे बराबरि कियो नहि कियो भेंट करय के लेल आबैत छलथि या नहि तs हमरा सब के लs कs माँ, बाबुजी भेंट कराबय लेल जायत छलथि। बोमडिलाक मोसमक एकटा विशेषता देखय के लेल भेंटल। ओहि ठाम जोर सs पानी नहि परैत छलs मुदा भरि दिन झिसी होइत रहैत छलैक आ बीच बीच मे थोरे थोरे समय के लेल रोउद निकलैत रहैत छलैक। बाबुजी के ऑफिस केर एक गोटे भेंट करय लेल आयल छलथि आ हुनका सब के पानि के चलते जेबा मे देरी भs गेल छलैन्ह। हुनका सब के गेलाक बाद माँ जल्दी जल्दी सतमन(नौकर) सs खेनाई के व्यवस्था करवाबय मे लागि गेलिह। पूरा बोमडिला के लोक के पनबिजली (hydroelectricity)द्वारा बिजली भेटति छलैक आ राति के १२ बजे के बाद सs बत्ती नहि रहैत रहैक। माँ के प्रयास रहैत छलैन्ह जे १० बजे तक रतुका भोजन भs जाय, मुदा आजु किछु देरी भs गेल छलैक। माँ भोजनक व्यवस्था मे लागल छलिह। हम आ बौआ बिछाओन मे घुसि कs अपन गप्प करैत छलहुँ, बाकी चारु भाई बहिन सब खेलाइत रहथि आ खूब हल्ला करैत छलथि। बाबुजी अपन ऑफिसक काज करैत छलाह। अचानक बुझायल जेना कियो केबार खट खटा रहल छथि। सोनी बिन्नी बाहर वाला घर मे खेलाइत छलिह केबारक आवाज सुनी दुनु गोटे केबार खोलय लेल दौड़ गेलिह। केबार खोलैत के सँग ओहि ठाम सs ठाकुर जी ठाकुर जी करैत भागि कs भीतर आबि गेलिह। हिनक नाम सुनैत देरी माँ बाबुजी सब बाहर वाला घर दिस आबि जाय गेलथि। हिनका अयला सs माँ आ सतमन के आओर काज बढि गेलैक। ओ सब जल्दी जल्दी आओर किछु किछु खेनाई मे बनाबय लगलथि। चाह पिलाक बाद माँ हिनका कहलथिन "इ जल्दी स तैयार भs जाओथ थाकल हेताह, भोजनक बाद गप्प करिहैथ"। कोहुना भोजन बिजली जाय सs पहिने भs गेलैक आ सब कियो सुतय लेल चलि गेलथि। बौआ हम आ इ बैसि कs गप्प करैत छलहुँ। इ अपन यात्राक वर्णन करैत कहलाह "आइ तs हम बचि गेलहुँ। चारद्वार पहुँचि पता केलहुँ तs लोक सब सs पता चलल आब बोमडिला के लेल एकहि टा बस छैक जे बेसी राति मे पहुँचायत। दिन वाला बस के लेल चाराद्वर मे राति भरि रहय परत इ सोचि चलि देलहुं। एहेन खतरनाक आ भयावह सड़क पर बस ड्राईवर तेनाक चला कs आनलक अछि जे हमर तs प्राण उपरे छल। बोमडिला आबि कs सेहो नीचा मे दुकान लग छोरि देलक। ओहि ठाम एकटा लोक नजरि नहि आबैत छल। संयोग सs एक गोटे भेंट गेलाह जे बाबुजी के ऑफिस के छलाह। ओ हमरा झरना लग पहुँचा कs गेलाह। झरना के बाद ऊपर चढि पहुँच तsगेलहुँ घर तक, मुदा होयत छल एहि राति मे ग़लत घरक केबार नहि खट खटा दियैक। पहिने घर लग आबि किछु काल ठाढ़ भs कs भीतरक गप्प सुनबाक प्रयास कयलहुँ। हल्ला सs बुझि गेलहुँ यैह घर हेबाक चाहीं मुदा मोन आगु पाछु होयत छल केबार खट खटाबी कि नहि कि अचानक मैथिलि मे बाजय के आबाज आयल आ तुंरत हम केबार खट खटा देलहुं"। हिनकर गप्प सुनि बौआ खूब हँसलाह आ कहलाह "बिना खबरि केने अहाँ बोमडिला आयब तs अहिना होयत नञ"। राति बड भs गेल छलैक हम सब उठि सुतय लेल आबि गेलहुँ। हम हिनका सs कहलियैन्ह अहाँ तs कालिदास भs गेलहुँ। इ हमरा दिस देखि हँसैत बजलाह "कि करितौंह अचानक अहाँ सs भेंट करबाक मोन भs गेल आ बिना किछु सोचनहि चलि देलहुं। राति मे मोन भेल आ भोरे तैयार भs हम निकलि गेलहुँ। हम स्टेशन के लेल निकलति रही ओहि समय मे हमरा बाबुजी के चिट्ठी भेंटल जाहि मे परमिट भेजने रहथि। परमिट के एतेक महत्व छैक हमरा से नहि बुझल छलs। ओ तs संजोगे सs हमरा परमिट भेंट गेल नहि तs बड दिक्कत होइत। टिकट से, स्टेशन पर आबि कs लेलहुँ ओहो संयोगे सs भेंटल"। ११ बोमडिला आबय समय हम सोचनहुँ नहि रहिये जे एतेक जल्दी हिनका सs भेंट होयत। हिनका देखि हमरा अत्यन्त प्रसन्नता भेल मुदा व्यक्त करय मे संकोच होयत छलs। इहो हमरा देखि कम खुश नहि छलथि आ नहि हिनका अपन प्रसन्नता व्यक्त करय मे देरी लागलैन्ह। बौआ के जायत देरी अपन खुशी व्यक्त कs देलाह। हम हिनका सs गप्प करैत छलियैन्ह आ हिनक कॉलेजक विषय मे पुछति छलियैन्ह कि अचानक इ कहि उठलाह " हम सोचि लेने छी, सब मास अहाँ लग आबय के लेल छुट्टी लेब, ताहि सs नीक जे अहाँक नाम हम मुजफ्फरपुर मे लिखवा दी। प्रकाश(बौआ के नाम) एहि बेर सs बाबा लग रही कs पढिये रहल छथि। हम अहाँ कs बाबुजी सs गप्प करैत छियैन्ह। ओनाहुँ अहाँक काका कs बदली राँची सs भsरहल छैन्ह आ निर्मला कॉलेज मे अहाँ के हॉस्टल मे नहि लेत, कियाक तs ओ सब बियाहल के हॉस्टल मे नहि लैत छैक। द्विरागमन होयबा मे एखैन्ह कम सs कम डेढ़ साल छैक, अहाँक बाबुजी के कतय बदली होयतैन्ह नहि जानि। हम आब बेसी दिन अहाँ सs अलग नहि रहि सकैत छी। मुजफ्फरपुर मे भेंट तs होयत, आ बदली के चक्कर से नय रहत"। हम चुप चाप सुनि लेलियैन्ह, सोचलहुँ कॉलेज तs मुजफ्फरपुर मे राँची सs नीक नहि होयत मुदा हिनकर छुट्टी आ ऐबा जयबा वाला चक्कर समाप्त भs जयतैन्ह। भोर मे बौआ के देखलियैन्ह जल्दी जल्दी तैयार भs गेलाह आ हिनकर खुशामद करय छलाह। हमरा मना कs देने छलथि हिनका सs सीढी के विषय मे गप्प करबाक लेल वा बतेबाक लेल जे कतेक सीढी छैक। जलखई के बाद हम, बौआ आ इ तीनू गोटे घुमय लेल निकलहुँ।जाड़ छलैक हम सब अपन अपन गरम कपडा पहिर लेने रही। सबस पहिने बाबूजी के ऑफिस पहुँचलहुँ ओ देखलाक बाद बौआ कहलाह चलु हम सब आओर नीचा चलैत छी। हम सब नीचा चलैत गेलहुँ, नीचा जाय मे तs बड नीक लागल। एक तs सीढ़ी नीक छलैक दोसर ढलांग पर उतरय मे ओनाहु नीक लागैत छैक। उतरय समय मे हम सब बुझबे नहि केलियैक जे कतेक नीचा जा रहल छी। हम सब मौसम आ प्रकृति केर आनंद लैत कखनहु कs बाजी लगा कs दौड़ति आ कखनहु कूदति नीचा उतरति गेलहुँ। अचानक इ कहलाह आब आगू नहि , आब एतय सsआपिस चलु। सड़क नजरि आबय लागल छलैक हम सब विचारि केलहुँ सड़क सsआपिस भेल जाय आ हम सब पहिने सड़क सs आ बीच बीच मे सीढी सs चढैत ऊपर जाय लगलहुँ। ऊपर चढय समय सेहो शुरू मे तs नीक लागल मुदा जलदिये थाकि गेलहुँ। ततेक गरमी लागल जे एक एक कs अपन अपन स्वेटर उतारय परि गेल। ओकर बाद हम सब रुकि रुकि कs चलय लागलहुँ। घर पहुँचति पहुँचति हम सब ततेक थाकि गेल रही जे घर पहुँचति देरी इ तs सीधे बिछौन पर परि रहलाह। किछु समय बाद जखैंह इ भोजन करय लेल उठलाह तs बौआ हँसैत पुछलथिन "केहेन लागल बोमडिला "। सुनतहि हँसय लगलाह आ कहलाह "अरे अहाँ तs हमरा मारि देलहुँ आ पुछति छी केहेन लागल बोमडिला, हम आब किनहु अहाँ दुनु भाई बहिन संग पैरे घुमय नहि जायब "। बाहर वाला घर मे बैसला सs गेट ओहिना नजरि आबैत छलैक आ गेट लग सीढ़ी छलैक जाहि सs ऊपर चढि आ फेर नीचा उतरि कs झरना लग जाय परैत छलैक ।झरना के बाद दाहिना दिस सीढ़ी छलैक जाहि सs नीचा उतरि बाबुजी केर ऑफिस जाय परैत छलैक । बाबुजी सब दिन भोर मे जायत समय आ खेनाई खाय लेल जखैंह आबैत छलाह तखैन्ह दुनु बेर ऑफिस पैरे जायत छलाह आ आपिस आबैत छलाह। इ सब दिन बाबुजी के ऑफिस जाय समय बाहर वाला घर मे जा कs बैसि रहैत छलाह। जाय समय बाबुजी हमरा कहैत गेलाह जे हम सब तैयार रही ओ ऑफिस जाय कsजीप पठा देताह आ हम सब सलारी जे कि बहुत नीक जगह छलैक ताहि ठाम सsआजु घुमि आबि। बाबुजी केर ऑफिस जाय समय हम जखैन्ह बाहर वाला घर मे गेलहुँ तs इ आ बौआ पहिनहि सs ओहि घर मे छलाह। जहिना हम पहुँचलहुँ बाबुजी गेट लग पहुँचि गेल छलाह, ओ जहिना गेट सs ऊपर गेलाह इ तुंरत कहि उठलथि ,देखू आब बाबुजी घुरताह, हम मजाक बुझि हँसय लगलहुँ मुदा सच मे बाबुजी किछुए आगू जा फेर आपस घर आबि गेलाह आ अपन कोठरी मे जा फेर ऑफिस गेलाह। हम पुछलियैन्ह अहाँ कोना बुझलियय जे बाबुजी आपस अओताह, तs हमरा कहलाह ओ तs सब दिन एक बेर ऑफिस जाय समय मे आपिस आबि कs जाय छथि। हम जहिया सs अयलहुं अछि हम देखि रहल छियैन्ह। बाबुजी के किछु नय किछु सब दिन छुटैत छैन्ह आ ओ आपिस आबि कs लs जायत छथि। हमरा हँसी लागि गेल आ कहलियैन्ह अहाँ के अहि ठाम कोनो काज नहि अछि तs यैह सब देखति रहैत छियैक। आजु बाबुजी ऑफिस सs अयलाह तs आबिते सुनेलाह जे हुनक बदली के आदेश आबि गेल छैन्ह आ आब जलदिये हुनका जमशेदपुर जा कs ओहि ठामक कार्य भार सम्भारय परतैन्ह । इ सुनि हमरा बड खुशी भेल, संगहि देखलियैक बिन्नी सोनी बौआ सब खुश छलथि आ सब सs बेसी माँ खुश छलीह। जहिया सs बाबुजी कहलथि जे हुनक बदली केर आदेश आबि गेल छैन्ह ओहि दिन के बाद सs बौआ हम आ इ सब दिन घुमय निकली, बीच बीच मे कोनो कोनो दिन सोनी बिन्नी सब सेहो सँग जायत छलिह। बोमडिला मे घुमय लेल एक सs एक जगह छलैक मुदा प्रदूषण नामक कोनो वस्तु नहि। दूर वाला जगह सब तs जीप सs जाइत छलहुँ मुदा लग वाला सब पैरे जाइत रही। एकटा बातक ध्यान इ सदिखन राखथि जे चलैत चलैत बेसी दूर नहि जाई। हमरा लोकनि कs बोमडिला मे एक डेढ़ मास घुमति फिरति कोना बीति गेल से बुझय मे नहि आयल। जएबाक दिन लग आबि गेल छलैक, बाबुजी कहलथि जे सब गोटे एकहि सँग चारद्वार तक जायब। ओहिठाम सs ठाकुर जी आ बौआ मुजफ्फरपुर चलि जयताह आ बाकी हम सभ जमशेदपुर चलि जायब। चारद्वार गेस्ट हाउस तक सब गोटे सँग अयलहुँ आ ओहि ठाम आबि एक बेर फेर बिछरय के आभास भेल मुदा एहि बेर दोसर तरहक छलs। मोन मे भेल आब तsकिछुए दिनक गप्प छैक तकर बाद तs सब ठीक भs जायत। हमर पढ़ाई आ हिनका अयबा जयबा मे सेहो कोनो तरहक दिक्कति नहि होयत। हिनकर ट्रेन पहिने छलैन्ह,जाय समय मे हमरा उदास देखि इ कहलाह " आब तs अहाँ जमशेदपुर मे रहब ओहि ठाम जाय मे हमरा कोनो दिक्कत नहि होयत। किछु दिन बाद हमर पढ़ाई सेहो खतम भs रहल अछि"। जमशेदपुर पहुँचि बाबुजी के रहय लेल एकटा खूब पैघ सरकारी बंगला भेट गेल छलैन्ह जे कि किछु दिन सs खाली छलैक। जतबा पैघ घर छलैक ततबे पैघ ओहि मे बगीचा मुदा खाली कियाक छलैक से तs बाबुजी के नहि बुझय मे अयलैन्ह, मुदा माँ के ओहि घर मे रहय मे डर होयत छलैन्ह आ कहलथि "एहि घर मे बेसी दिन नहि रहल जा सकैत अछि। जाबैत कोनो दोसर नीक घर नहि भेटय छैक ताबैत एहि बँगला मे रहल जाय"। माँ सब के कहि देने रहथि जरूरी सामान मात्र खोलबाक अछि। ओहि बंगला मे कम सs कम छौ सात टा कोठरी छलैक जाहि मे सs दू टा कात वाला कोठरी आ भनसा घर खोलि हम सब रहय लगलहुँ। बाकी सब कोठरी बंद रहैत छलैक। हम सब जमशेदपुर अयलहुँ ओकर दू तीन दिन बाद काका भेंट करय लेल अयलाह,हुनका देखि हम तs आश्चर्यचकित रहि गेलहुँ। एतबहि दिन मे ततेक कमजोर लागैत छलाह जे देखतहि माँ पुछलथिन "अहाँ के किछु होयत अछि की फूल बाबू"। काका कहलथि कोनो ख़ास नहि, बीच बीच मे पेट मे गैस भs जायत अछि जाहि के चलते दर्द होयत रहैत अछि।काका जाय लगलाह तs माँ काका के कहलथिन जे राँची जा कsसबस पहिने नीक सs डॉक्टर से देखाऊ, बराबरि दर्द भेनाई ठीक नहि छैक । हम सब ठीक दुर्गा पूजा सs पहिने जमशेदपुर पहुँचल रही । एक तs नब जगह ताहि पर तेहेन घर छलैक जे कतहु घुमय जाय मे से डर होयत छलैक, मुदा हम सब जमशेदपुरक पूजा देखलहुँ। दिवाली सs एक दू दिन पहिने इ पहुँचलाह। हिनका देखि कs सब भाई बहिन सब खुश भs जाय गेलथि आ इहो सब संग मिली कs दिवाली के पटखा कs तैयारी करय मे लागि गेलाह । दिवाली दिन साँझ मे पूजाक बाद सभ गोटे बाहर मे बैसि कs प्रसाद खाइत छलहुँ प्रसाद खेलाक बाद इ उठि कs पाछू गेलाह आ सँग सँग चारू भाई बहिन सेहो हिनके पाछू चलि गेलथि। माँ भानस मे लागल छलिह बाहर मे मात्र हम आ बाबुजी बचि गेलहुँ। अचानक पाछू वाला घर मे बुझायल जेना बम फुटैत छैक। बाबुजी आ हम दूनू गोटे दौरि कs भीतर गेलहुँ। माँ से भनसा घर स दौरि क अयलीह। जाहि दिस सsआवाज अबैत छलैक ओहि दिस घरक भीतरे सs हम सब गेलहुँ। बाबुजी घर सब खोलैत जओं बीच वाला हॉल लग पहुँचलाह तs सामने मे इ ठाढ़, संग मे बिन्नी, सोनी, अन्नू आ छोटू सब पटाखा छोरि थपरी पारि खुश होयत छलथि। असल मे इ, सब बच्चा के लs कs बीच वाला हॉल मे पटखा छोरैत छलाह। बीच वाला हॉल ततेक टा छलैक आ ताहि पर खाली जे छोटका पटाखा सेहो बुझाइत छलैक जे बम फुटल छैक। हिनका देखि बाबूजी किछु नहि बजलाह आ हँसैत आपिस भs गेलाह। ओना तs जहिया सs हम सब जमशेदपुर अयलहुँ आ बाबुजी के बुझल भेलैंह जे काका के मोन ख़राब रहैत छैन्ह बराबरि राँची जायत छलाह आ काका के डॉक्टर लग अपनहि लs कs जायत छलाह, मुदा एहि बेरक गप्प किछु आओर छैक। पिछला बेर डॉक्टर एन.के. झा एक मास बाद आबय लेल कहने छलथिन आ कहने छलथिन जओं एक मास मे ओ दवाई काज नहि केलकैन्ह तs काका के जमशेदपुर वा बम्बई लs जाय परतैन्ह। काका के कोन बिमारी छैन्ह से राँची के डॉक्टर के पता नहि चलैत छलैक। एहि बेर बाबुजी सोचि के जायत छलाह जे जओं डॉक्टर साहेब कहलथि तs काका के जमशेदपुर लs अनताह। जमशेदपुर मे बाबुजी के एतबहि दिन मे डॉक्टर सब सs जान पहचान भs गेल छलैन्ह आ काका के विषय मे डॉक्टर सब सs गप्प सेहो कयने रहथिन। बाबुजी राँची सs लौट कs अयलाह तs हमर हिम्मत हुनका लग जयबाक नहि होयत छल। बाबुजी सs की पुछियैन्ह, की कहताह इ सोचि रहल छलहुँ कि माँ अयलीह आ अपनहि कहलीह जे काका सब दू तीन दिन बाद आबि रहल छथि, आब एहि ठाम हुनकर इलाज होयतैन्ह। राँची मे डॉक्टर सब के नहि बुझा रहल छैक जे हुनका कोन बिमारी छैन्ह। इ सुनतहि हमरा मोन मे तरह तरह के आशंका होमय लागल। काका, मौसी, मधु, पपू, निक्की आ सोनू सभ गोटे आबि गेलथि। काका के देखि हम हुनका देखितहि रहि गेलहुँ। पहिल दिन जमशेदपुर हमरा सब सs भेंट करय लेल आयल छलथि ताहु सs बेसी कमजोर लागैत छलाह। हमरा किछु नहि फुराइत छलs जे हम की बाजियैन्ह। काका हमर मोनक गप्प अपनहि बुझि गेलाह आ कहलाह "पेट मे बड दर्द होयत अछि आब एहि ठाम भैया लग आबि गेलहुँ आब ठीक भs जायब"। भोरे बाबुजी काका के लs कs टाटा मेन हॉस्पिटल गेलाह। करीब १२ बजे बाबुजी असगरे अयलाह आ माँ सs कहलथिन जे" जयनंदन के check-up करय के लेल भर्ती कs लेलकैन्ह अछि। बेर बेर अनाइ गेनाइ मे दिक्कत होइतैक ताहि चलते भरती करा देलियैन्ह। सब जाँचक बादे डॉक्टर बतायत जे हुनका की छैन्ह आ कोन दबाई चलतैन्ह"। साँझ मे माँ आ मौसी सेहो बाबुजी के सँग काका सs भेट करय लेल गेलिह। मधु पप्पु सब घर पर हमरा सब सँग छलथि। काका के एक सप्ताह सs बेसी भs गेल छैन्ह हॉस्पिटल मे मुदा अखैन्ह धरि जाँच चलिए रहल छैन्ह। बिमारी कोन छैन्ह सेहो नहि बुझल छैक। बाबुजी के आजु एक गोटे सs कहैत सुनलियैन्ह जे आब एहि सप्ताह मे सब टा जाँच खतम भs जयतैक, तकर बाद हुनकर इलाज आरम्भ होयतैन्ह। मौसी सब दिन अपना सँग सोनू के लs जायत छलिह। आय माँ आ मौसी सँग मधु पप्पु सेहो काका सs भेंट करय लेल गेल छथि। हमर मोन सेहो छलs जेबाक मुदा एक संगे बेसी लोग गेनाइ ठीक नहि, हम सोचलहुँ दोसर दिन जायब। सब चलि गेलथि तs मोन से नहि लागति छलs। रहि रहि कs बाहर जायत छलहुँ देखय लेल जे माँ सब अयलीह कि नहि। माँ सब हॉस्पिटल सs लौट कs अयलीह तs माँ भनसा घर दिस चलि गेलिह, मौसी अपन बच्चा सब मे लागि गेलिह मुदा बाबुजी एकदम उदास बुझेलाह। हम चाय लs कs बाबुजी लग गेलहुँ आ हुनका चाय दs धीरे सs पुछलियैन्ह "काका के मोन केहेन छैन्ह"। किछु समय तक तs बाबुजी किछु नहि बजलाह मुदा फेर कहलाह "मोन ठीक नहि छैन्ह, आब सब रिपोर्ट आबि गेलैक अछि । जयनन्दन के कैंसर छैन्ह, सेहो अन्तिम स्टेज मे। अहाँ के मौसी के नहि बुझल छैन्ह आ नहि हुनका किछु कहबैन्ह । आय सs दवाई सेहो शुरू भs गेल छैक"। बाबुजी के हम किछु जवाब नहि दs सकलियैन्ह आ ओहि ठाम सs चलि गेलहुँ। माँ सs हम पहिनहि कहि देने रहियैन्ह जे आजु हम काका के देखय लेल अवश्य जायब। हॉस्पिटल पहुँचि काका लग गेलहुँ तs देखि बुझायल जेना काका आओर कमजोर भs गेल छथि। अस्पताल सs अयलाक बाद हमरा किछु नहि फुराइत छल जे की करी। राति मे हमरा किछु नहि फुरायल तs हिनका चिट्ठी लिखय लेल बैसि गेलहुँ आ काका के स्वास्थ्य केर विषय मे सबटा लिखि देलियैन्ह। आय इहो पहुँचि गेलाह। बाबा के नहि कहल गेल छैन्ह , दादी के किछु आओर कही बजा लेल गेल छैन्ह। काका, काकी, पीसा, पीसी सब तs पहिनहि सs आबि गेल छथि। काका के मोन दिन दिन ख़राब भेल जा रहल छैन्ह इ देखि परिवारक सभ गोटे चिंतित छथि। अस्पताल सs अयलाक बाद मौसी आ दादी मन्दिर गेल छथि। बाबुजी आ बाकी परिवारक सभ गोटे बैसि कs गप्प क रहल छथि। हम बाहर मे बैसल छी कि अचानक बाबुजी के कहैत सुनलियैन्ह "टिस्को (TISCO) के प्रबंध निर्देशक केर पत्नी के सेहो जयनन्दन वाला बिमारी छैन्ह आ ओ अमेरिका सs इलाज करा कs आयल छथि। हुनको अमेरिका के डॉक्टर जवाब दs देने छैन्ह, आब ओहो एहि ठाम अस्पताल मे छथि आ एके डॉक्टर दुनु गोटे के इलाज कs रहल छैन्ह। दवाई सेहो एके परि रहल छैन्ह। आब तs मात्र भगवान पर भरोसा अछि"। इ सुनलाक बाद मोन आओर छोट भs गेल सोचय लगलहुँ पता नहि आब काका ठीक होयताह की नहि। परिवारक सभ कियो जमशेदपुर मे छथि मुदा बाबा आ बौआ के किछु नहि बुझल छैन्ह। बौआ के मेट्रिक परीक्षा छैन्ह इ सोचि हुनका किछु नहि बतायल गेल छैन्ह। बिचार भेलैक जे इ मुजफ्फरपुर जयबे करताह परीक्षा समय मे बौआ लग चलि जयताह। भोर मे मामा सभ अयलाह आ इ मुजफ्फरपुर चलि गेलाह। हमरा कहैत गेलाह जे मेट्रिक के परीक्षा तक ओम्हरे रहताह कारण सभ गोटे जमशेदपुर मे छथिन्ह जओं बौआ के किछु काज भेलैंह तs एको गोटे के लग मे रहबाक चाहि। १२ घर मे ततेक लोक जमा भs गेल छथि जे दिक्कत तs होयते छैक हॉस्पिटल सेहो सब कियो एक सँग नही जा सकैत छी।मोन रहितो सभ दिन गेनाई सम्भव नही भs रहल छैक। बाबुजी आ मौसी के बेसी समय हॉस्पिटल मे बीति रहल छैन्ह। हिनका गेलाक बाद सँ हम काका के देखय के लेल नहि गेल छी। आय सोचि लेने रही किछु भs जाय हम हॉस्पिटल जेबे करब। बाबुजी के कहि हम हुनके सँग हॉस्पिटल पहुँचलहुँ मुदा काका के देखि मोन बड दुखी भs गेल। दिन दिन ओ कमजोर भेल जा रहल छथि आ हुनकर पेट फूलल जा रहल छैन्ह। बाबुजी डॉक्टर सँ भेंट करय के लेल चलि गेलाह,काका लग हम आ मौसी छलहुँ। जहिना बाबुजी गेलाह काका इशारा सँ हमरा अपना दिस बजेलाह। हम हुनके विषय मे सोचि रहल छलहुँ तुंरत लग मे गेलियैन्ह। ओ हाथ देखा हमरा अपना बगल मे बैसय के लेल कहलाह आ हम जहिना बैसलहुँ तुंरत हँसय के प्रयास करैत कहलाह " तोरा बुझल छौक आय काल्हि तोहर मौसी भइया सँ गप्प करय लगलिह"। हम किछु नहि बजलियैन्ह मुदा भीतर सँ हमरा ततेक तकलीफ भेल जे कहु एहेनो लोक होयत छैक जे अपन जीवनक अंत समय छैन्ह आ ओ हमरा आ मौसी दुनु गोटे के चेहरा देखि हँसेबाक प्रयास कs रहल छथि। असल मे बियाहक बाद दादी हमर मौसी केईकहि गप्प नहि करय देलथिन्ह जे लोक भैंसुर सँ गप्प नहि करैत छैक। अपन विवाह सँ पहिने मौसी बाबुजी सँ गप्प तs करिते रहथि सारि जे छलथि बाबुजी के। आब एहेन परिस्थिति छलैक जे मौसी के बाबुजी सँ गप्प करला बिना गुजर चलय वाला नहि छलैन्ह। भोरे सँ कियो मन्दिर गेल छलथि कियो मौनी बाबा लग तs कियो तांत्रिक लग घर मे हम आ माँ छी। हमर सबहक एक गोटे परिचित रोटी दs गेलथि आ पता चलल जे ओ रोटी पानि मे रहैत छैक आ ओकर पानि देला सँ केहेनो बिमारी कियाक नहि होय ठीक भs जाइत रहैक। एकटा कहबी छैक "डूबते को तिनके का सहारा" एकदमईएहि ठाम लागू होयत छैक। माँ ओ हुनका सँ लs कs भगवान लग राखि देलथि। तीन चारि दिन सँ सब गोटे परेशान आ चिंतित छलथि मौसी लग किछु कहबाक लेल सब के मना छैन्ह तथापि बुझाइत छैक मौसी के सब किछु बुझल छैन्ह। राति राति भरि ओ नहि सुतय छथिन्ह आ नहि ठीक सँ भोजन करैत छथि। साँझ मे छोटू आ हमरा चारु बहिन के छोरि बाकी सभ गोटे हॉस्पिटल चलि गेलाह। हमरा साहस नहि भेल जे कहितियैन्ह जे हमरो लs चलु। करीब नौ बजे राति मे छोटका मामा के छोरि सब आबि गेलथि मुदा हाव भाव बता रहल छलैन्ह जे काका केर स्थिति ठीक नहि छैन्ह। हमरा पुछय के हिम्मत नहि भs रहल छल जे हम किनको सँ पुछबैन्ह मुदा भरि राति नींद नहि भेल। भोर मे उठलहुँ त बाबुजी ओहि सँ पहिनहि हॉस्पिटल जा चुकल रहथि। दादी, मौसी,पीसी, सभ गोटे मन्दिर मोनी बाबा लग गेल छलिह। अचानक देखलियैन्ह छोटका मामा परेशान जल्दी जल्दी आबि रहल छलाह आ आबिते पुछलाह "माँ सब कतs छथुन्ह "। हम कहितियैन्ह ताबैत माँ बाहर निकलि अयलीह आ माँ के देखैत तुंरत मौसी आ दादी के विषय मे पुछलाह। माँ जहिना कहलथि जे ओ मन्दिर गेल छथिन,ईसुनतहि मात्र एतबहि कहलाह "आब ओकर कोनो काज नहि छैक हम हुनका सब के लेने आबैत छियैन्ह"आ तुंरत घर सँ चलि गेलाह। माँ तs तुंरत कानय लगलिह मुदा हमरा किछु नहि फुरा रहल छल जे की करी। एतबा तs बुझिये गेलहुँ जे काका नहि रहलाह। काका के दाह संस्कार जमशेदपुर मे भेलाक बाद सब के विचार भेलैंह जे काज गाम पर कयल जाय मुदा भारत बंद रहलाक चलते हम सब साँझ मे गाड़ी सँ निकलि गेलहुँईसोचि जे भोर तक गाम पहुँची जायब। बाबा के किछु नहि बुझल छलैन्ह। सिमरिया मे अस्थि प्रवाह कs हम सब गाम के लेल प्रस्थान कs गेलहुँ। एक तs सब दुखी ताहु मे बैसय के से दिक्कत छलैक मुदा जेना तेना हम सबईसोचैत जा रहल छलहुँ जे आब तs गाम लग आबि गेल। सब के झपकी तs आबिये रहल छलैक। बाबुजी आ छोटका मामा आगू बैसल छलाह। अचानक हमर आँखि खुजल तsदेखैत छी बाबुजी पूरा खून सँ लथ पथ छथि आ सीट पकरि पाछू एबाक कोशिश कsरहल छथि। ताबैत नजरि गेल एक बोझा कुसियार(गन्ना ) पूरा के पूरा अगुलका शीशा तोरि भीतर घुसल छलैक। हमरा किछु नहि बुझायल तs हम बाबुजी के पकरि कsअपना दिस खिँचय लगलहुँ । ताबैत छोटका मामा अयलाह ओ अपनहि खून सँ लथ पथ छलाह आ बाबुजी के कोहुना कs बाहर निकललाह हम सब सब गोटे गाड़ी सँ बाहर भेलहुँ । बाहर पहुँचि जे देखय मे आयल से वर्णन करय वाला नहि छैक। कुसियार सँ लदल बैल गाड़ी हमर सबहक गाड़ी के मारि देने छलैक। सोनू के माथ मे चोट छलैन्ह आ मामा के हाथ नाक दुनु ठाम सँ खून नजरि आयल। बाबुजी के सड़क कात मे एकटा गाछ तर सुतायल गेलैन्ह। गाड़ी केर ड्राईवर भागि गेल छलैक। बुझाइत छलैक पूरा के पूरा गाम उठि के आबि गेल छलैक। पुछला पर पता चलल चकिया गाम लग मे छैक। विपत्ति पर विपत्ति हमरा सब पर परल छल मुदा गाम वाला सब मे सँ कथि लेल एको गोटे मदद करताह उलटा ओ सब सामन लs कsभगबाक प्रयास करय छलाह। ओ तs मामा छलाह जे ओहनो स्थिति मे बाबुजी आ हमरा सब के सँग सामान पर सेहो ध्यान देने छलाह। गामक एक आदमी मात्र एतबा मदद केलैथ जे ओ हमरा सब के कहलथि जे आब ट्रेनक के समय भs गेल छैक आ पॉँच मिनट मे अहि ठाम पहुँचत जओं ट्रेन रुकि जाय तs अहाँ सब ओहि सँ मोतिहारी जा सकैत छी। जतय हम सब छलहुँ ओहि केर बगल मे ट्रेनक लाइन छलैक माँ जहिनाईसुनलथि तुंरत बाबुजी के छोरि सीधे लाइन तरफ़ दौडि के पहुँचि गेलिह आ हुनका देखि मौसी सेहो। मामा मना करैत रहि गेलाह कथि लेल सुनतिह। हम बाबुजी के पकरि कs बैसल रहि। मामा की करितथि हुनको पाछू सँ जाय परलैन्ह।जखैन्ह ट्रेन नजरि आबय लागलय तs देखलियैन्ह मामा दौडी कs अयलाह। मामा के आबितहि हम माँ सब लग चलि गेलहुँ। कतबो कहिये लाइन पर सँ हटि जो माँ कथि लेल हटतिह। जओं जओं ट्रेन लग आबय हमर डर बढैत जाय। गाँव वाला सब कात मे ठाढ़ भsतमाशा देखि रहल छल। एक तs भारत बंद ताहु पर हम सब लाइन पर ठाढ़ भs गाड़ी रोकय छलहुँ। गाड़ी किछु दूर पर ठाढ़ भs गेलय आ ओहि के बाद धीरे धीरे हमरा सब दिस बढ़य लागल। ट्रेन एकदम धीरे धीरे चलय छल। सब गेट पर सिपाही सब ओहिना नजरि आबैत छल। माँ जहिना देखलथि जे गाड़ी आब लग आबि गेल छैक कि जोर जोर सँ चिल्लाबय लागलिह "गाड़ी रोको, मदद करो पूरे परिवार का एक्सिडेन्ट हुआ है"। गाड़ी लग मे आयल तs हम सब बगल भs गेलहुँ। पहिने तs बुझायल गाड़ी नहि रुकत मुदा किछु आगू जा रुकि गेल। हम सब सबस पहिने बाबुजी के ऊपर चढेलहुँ आ आराम सँ एकटा सीट पर सुता देलियैन्ह ओकर बाद सब कियो ट्रेन पर चढि बैसि गेलहुँ। कोहुना मोतिहारी स्टेशन तक पहुँचलहुँ। पूरा स्टेशन लोक सँ भरल छलैक। असल मे गार्ड खबरि दs देने रहैक जे एक्सिडेन्ट वाला सब के आनि रहल छी। ओहि ठाम सँ हॉस्पिटल तक सब इंतज़ाम पुलिस वालाक छलैक। संयोग सँ ओहि ठामक एक गोट रेलवे के पैघ अधिकारी हमर परिवार के चिन्हैत छलाह ओ हमर बड़का काका आ एकटा हमर पितिऔत काका के जे कि रेलवे मे छलाह खबरि कs देलैथ। बाबुजी के डॉक्टर कहि देलकैन्ह अछि तुंरत सीतापुर या अलिगढ लs जएबाक लेल हुनकर एक आँखि मे बहुत चोट छैन्ह। बाकी सब के घाव छलैक जे ठीक होयबा मे दू चारि दिन और लागि जयतैक। मोतिहारी करीब करीब हमर पूरा परिवारक लोक पहुँचि गेल छलथि विचार भेलय जे लाल मामा आ माँ के छोरि सभ गोटे गाम जायब। माँ लाल मामाक सँग बाबुजी के लs कs अलिगढ चलि गेलिह, छोटू के तs सँग लsगेलिह मुदा बाकि तीनू बहिन के हमरा पर छोड़ि कs गेल रहथि। हम सब बड़का काका काकी सँग मोतिहारी सँ गाम आबि गेलहुँ। दादी मौसी मधु निक्की पप्पू आ सोनू सेहो संगे आबि गेलाह। गाम पहुँचलहुँ, ई समाचार सुनि बाबा बड दुखी छलाह। एकटा बेटा के गेलाक दुःख तs रहबे करैन्ह दोसर बेटा के दुघॅटनाक समाचार हुनका आओर तोड़ि देलकैन्ह। इम्हर सब बच्चा सब डरल सहमल रहथि। मधु सब तs मौसी लग रहैत रहथि दादी से, अपन दोसर दोसर काज मे रहैत छलिह मुदा हमर तीनू बहिन हमरा एको मिनट लेल नहि छोरथि। हमरा अपने किछु नहि फुरैत छल की करी। डरल तs हमहू रही मुदा हुनका सब केर सोंझा मे साहस केने रही। बौआ सेहो गाम पर छलथि हुनकर परीक्षा भs गेल रहैन्ह। दोसर दिन भरि दिन लोकक एनाई गेनाई लागल रहलै आ भरि दिन कन्ना रोहटि सेहो होयत रहैत छलैक। जतेक कन्ना रोहटि होय ततेक बच्चा सब और डरि जैत छलथि। साँझ होयत देरी सब हमरा पकरि कs बैसि जाय गेलिह। अचानक हम जाहि कोठरी मे रही ताहि मे बड़की काकी अयलीह आ बच्चा सब के पकड़ि क किछु जलखई करेबाक लेल लs गेलिह। हम चुप चाप घर मे बैसि क असग़र कानैत छलहुँ आ भगवान सँ कहैत छलहुँ हे भगवान माँ नहि छैथ बाबुजी के की होयतैन्ह नहि जानि एखैंह कम सँ कम हिनका पठा दियौन हम असग़र कोना तीनू के सम्भारब। मौसी आ मधु सब सँग तs सब गोटे के सहानुभूति छलैन्ह मुदाईतीनू बहिन के देखय लेल हमही टा छलियैन्ह। ई सोचिये रहल छलहुँ कि देखलियैक एकटा जन बैग लेने आयल आ राखि कs चलि गेल। देखला सँ हिनके बैग जेहेन छलैक मुदा जा धरि हम किछु पुछतिए ओ चलि गेल। हमरा मोन मे पचास तरहक बात आबि रहल छल कि देखलियैन्हईघर मे घुसि रहल छथि।ईसीधे हमरा लग अयलाह आ जहिना पुछलाह अहाँ कोना छी कि हमरा नहि रहि भेल आ हम हिनका पकरि कs खूब कानय लगलहुँ। इहो पाछु कथि लेल रहताह आ दुनु गोटे एक दुसरा के पकरि कs कानैत छलहुँ। हमरा सब केर मुँह सँ एको शब्द कथि लेल निकलत। अचानक हमरा बुझायल जे तीनू बहिन आबि रहल छथि। हम अपना के सम्हारैत हिनका सँ पुछलियैन्ह अहाँके कोना बुझल भेल। कहलाह हम तs मोतिहारी आयल छलहुँ अपन कॉलेजक काज सँ ओझाजी ओहिठाम गेलहुँ तs पता चलल। हम पहिने हॉस्पिटल गेल रहि बाबुजी आ मामा के देखि हमर मोन ख़राब भs गेल। ओहि ठाम सँ भागल एहि ठाम आयल छी। हम सब गप्प करिते छलहुँ कि तीनू बहिन आबि गेलिह आ आबिते सोनी हिनका पकरि कs कानय लगलीह। बिन्नी अन्नू से लग मे आबि गेलिह। ओ दृश्य हम नहि बिसरी सकैत छी। बौआ तs लड़का छलाह आ बाबा सँ हुनका बड लगाव छलैन्ह मुदा हमरा सब के मोन मे असुरक्षा के भावना छल ओ हिनका देखि खतम भेल। काका केर काज खतम भेलाक बाद सब चलि गेलाह हम चारु भाई बहिन, बाबा दादी आ मौसी अपन चारु बच्चा सब सँग रहि गेलिह। इहो चलि गेलाह, हमरा एको रत्ती गाम पर मोन नहि लागैत छल, मुदा मजबूरी मे रहय परल। अचानक एक दिन तार आयल जे नानी सेहो नहि रहलिह। काका के देहान्तक खबरी सुनि ओ खाना पीना छोरि देने रहथि आ हुनक देहांत भs गेलैन्ह। तार अयलाक एक दू दिन बाद मामा अयलाह ओ अपना सँग मौसी आ हुनक चारु बच्चा सब के सेहो लs कs चलि गेलाह मुदा ओ एक बेर हमरा सब के कहबो नहि केलाह जे अहुँ सब चलु। हम ओ दिन नहि बिसरी सकैत छी मौसी सब केर गेलाक बाद मात्र हम पाँच भाई बहिन आ बाबा दादी रहि गेलहुँ एक तs हम सब कहियो गाम असग़र नहि रहल रही ताहु परओहेन परिस्थिति मे। राति राति भर हम डर सँ नहि सूती। सोनी तs राति मे हमारा पकडि कs सुतथि आ ताहू पर कैयक बेर डर सँ चिल्ला उठैथ। एक तs हम अपनहि डरपोक ताहि पर सब भाई बहिन के जिम्मेदारी हमरा पर रहैक। दादी बाबा तs बुढ छलथि। माँ बाबुजी के कोनो समाचार से बुझय मे नहि आबि रहल छल। हम राति राति भर सूती नहि आ सोचैत रहैत छलहुँ। नहि जानी कियैक करीब पन्द्रह दिन भs गेलैक माँ बाबूजी के कोनो समाचार नहि भेटल छलईसोचि सोचि हमरा बड चिन्ता होयत छल। राति के निन्द तs नहिये होय उलटे चारि पाँच दिन सँ हमर छाती मे जोर सँ दर्द होमय लागल । पहिने तs दादी के हम नहि कहलियैन्ह मुदा बाद मे कहय परल। दादी के से चिन्ता होमय लागलैंह, ओ अपना भरि किछु किछु सँ मालिश करथि मुदा ठीक नहि भेल। अंत मे दादी कहलथि ठाकुर जी के चट्ठी लिखि दहुन आबि जयताह। मुदा ओ अपनहि हमरा सब केर देखय लेल पहुँची गेलाह आ दादी के कहला पर हमरा लs क पटना डॉक्टर सँ देखाबय लेल लs गेलाह। पटना मे हमर मौसी रहैत छलिह हुनके ओहि ठाम रही इलाज करेबाक विचार भेलैक। सब गोटे के जेबा मे तs झंझट छलैक मुदा हम अन्नू के नहि छोरलियैन्ह आ हुनका अपना सँग लेने गेलियैन्ह। सोनी बिन्नी के दादी राखि लेलथिन्ह आ कहलथि कोनो चिन्ता नहि करय के लेल। हम सब साँझ मे पटना पहुँचलहुँ आ मौसी के डेरा गेलहुँ, ओहि ठाम बाबुजी पहिनहि सँ रहथि।ओ सब भोर मे पहुँचल रहथि। माँ सँ पता चलल जे बाबुजी के कोहुना एकटा आँखि बाचि गेलैन्ह दोसर नहि बचायल जा सकलैन्ह। दोसर दिन हम सब जमशेदपुर आबि गेलहुँ । १३ छोटका बेटाक जन्मक बाद इ टिस्को से संबध भs गेलाह। बड़का बेटा भास्कर(पुत्तु )ओहि समय मे सवा दू बरखक छलाह आ छोटका बेटा मयुर (विक्की) मात्र तीन मासक। हिनका अयलाक किछुए मास बाद बाबुजी केर बदली राँची भs गेलैन्ह आ माँ सब जमशेदपुर सँ चलि गेलिह। ओहि समय मे टिस्को के घर भेटय मे किछु दिक्कत छलैक आ वरिष्टता के आधार पर घर भेटैत छलैक। हम सब एकटा छोट छीन घर लs कs रहय लगलहुँ। कलाकार मन बेसी दिन चुप नहि बैस सकैत छैक आ ताहू मे लल्लन जी सन कलाकार। अपन व्यस्तताक बावजूद ओ टिस्को के नौकरी मे अयलाक किछुए समय बाद सँ अपन नाट्य आ सांस्कृतिक गतिविधि मे सक्रिय भs गेलाह। ओहि समय मे टिस्को केर पदाधिकारी आ कर्मचारी सब के द्वारा कर्मचारी सब के लेल सुरक्षा नाटकक आयोजन कएल जाइत छलैक आ ओहि नाटक सब पर खर्च सेहो बहुत कम कयल जाइत छलैक। ओ नाटक सब एक दम नीरस आ संदेश मात्र के लेल रहैत छलैक। दर्शक सेहो मात्र अपन विभागक आ किछु आन विभागक लोक जे सब नाटक मे भाग लेत छलाह रहैत छलैक। कार्य भार स्म्भरलाक किछुए मास बाद अपन विभागक सुरक्षा नाटक मे भाग लs आ ओकर संवाद मे फेर बदल कs ओहि मे सर्वश्रेष्ट अभिनेताक पुरस्कार प्राप्त केलाह। दोसर बरख जओं हुनका नाटक लेल कहल गेलैन्ह तs साफ कहि देलथिन जे ओ नाटक रविन्द्र भवन जे कि जमशेदपुर केर सबस नीक प्रेक्षागृह छलैक ओहि मे करताह। ओहि बरखक नाटक रविन्द्र भवन मे भेलैक आ दर्शक के ओहि नीरस विषय पर कयल गेल सुरक्षा नाटक खूब पसिन भेलैक आ श्री ठाकुरक जमशेद्पुरक नाट्य यात्रा एहि ठाम सँ प्रारम्भ भs गेलैन्ह। सब दिन मैथिली केर सेवा करय लेल प्रतिबद्ध श्री ठाकुर जी के मोन मे सदिखन इ रहैत छलैन्ह जे किछु करि वा नहि मैथिली भाषा आ साहित्य के अपन कलम सँ किछु तs सहयोग करिए सकैत छलैथ। जमशेद्पुरक मैथिली संस्था "मिथला सांस्कृतिक परिषद" केर सदस्यता तs अयलाक किछुएक समय पश्चात इ सोचि ल लेलाह कि मैथिली केर सेवा करताह। सन १९८१ ई मे एकटा आन्दोलन शुरू भेल छलैक आ गाम गाम आ सब शहर सँ सेहो प्रधानमंत्री के नाम पोस्ट कार्ड पर मैथिली भाषा केर अष्ठम सूची मे स्थान देबाक लेल आग्रह कयल गेल छलैन्ह। जमशेदपुर मे एकटा सांस्कृतिक कार्यक्रमक आयोजन से करबाक विचार भेलैक जाहि केर भार श्री ठाकुर जी के देल गेलैन्ह। श्री ठाकुर जी तय केलाह कि एकटा सगीत संध्या कयल जाय आ ओहि कार्यक्रमक नाम देल गेलैक संकल्प दिवस। ओहि कार्यक्रम के लेल सबटा गीत मैथिली मे अपनहि लिखि आ ओकर धुन दs तैयारी कराब मे लागि गेलाह । मैथिली मे हुनक इ पहिल कार्यक्रम छलैन्ह आ कार्यक्रम मे मुख्य गायक सेहो अपनहि छलथि। कार्यक्रमक उदघाटन गीतक नाम से "संकल्प गीत"परलैक। "संकल्प गीत" संकल्प लिय संकल्प लिय संकल्प लिय यो बाजब मैथिली मिथिलाक लेल जियब यो .... संकल्प लिय..............२। शांतिमय प्रयास हमर ई सुनी लिय देशक नेता.....३ सूची अष्टम मे स्थान दियो आरो ने किछु कहब यो .... संकल्प लिय.......२ लाखक लाख पत्र जाइत अछि आँखि खोइल क देखू .....३ aआबि गेल समय इन्द्रा जी मिथिलाक मान राखू ......३ संघर्ष बढ़त जं बात ने मानबै आरो ने हम साहब यै संकल्प लिय ...........३। -लल्लन प्रसाद ठाकुर - अहि कार्यक्रमक खूब प्रशंसा भेलैक आ श्री ठाकुर जी के एहि कार्यक्रम कय जे प्रसन्नता भेलैन्ह ताहि केर परिणाम स्वरुप ओ एकटा नाटक करबाक ठानि लेलैन्ह। जमशेदपुरक मिथिला सांस्कृतिक परिषद केर महिला शाखाक स्थापना भेलैक आ ओकर सदस्या लोकनि अपन एकटा मुख्य कार्यक्रम करबाक लेल श्री ठाकुर जी के आग्रह केलथि। ठाकुर जी हुनक सबहक आग्रह मानि लेलाह आ तय भेलय जे नाटक होयतैक।ठाकुर जी के पहिल नाटक" बड़का साहेब" ओकरे देन छैक। ओहि नाटक केर लिखैत हम देखने छियैन्ह बुझाइए मे नहि आयल जे नाटक लिखनाइ एको रति कठिन छैक। ततेक सामान्य आ सरल भाव सँ लिखैत छलाह एक एक टा संवाद के हमरा पहिनहि कैयेक बेर सुनबैत छलाह। हमरा तs नाटकक पूर्वाभ्यास सँ पहिनहि सबटा संवाद याद भ गेल छल। एक बेर जे ठानि लैत छलाह ओकरा पूरा करबा मे अपन जी जान लगा दैत छलाह। बड़का साहेब केर पूर्वाभ्यास महिला शाखा केर एक गोट सदस्य के ओहि ठाम होइत छलैन्ह। हम सब तsसपरिवार सब दिन उपस्थित रहैत छलहुँ। एक तs अपने मुख्य भूमिका मे छलाह दोसर विक्की से ओहि नाटक केर बालकलाकार छलाह तेसर बहुत रास काज नाटक संबंधी होइत छलैक जे हमरा भार देने छलाह आ चाहैत छलाह जे हम सब दिन नाटकक अभ्यास देखि जाहि सँ हम बहुत किछु देखि कs बुझि लियय। बड़का साहेब केर पूर्वाभ्यास मे सब दिन महिला शाखाक सदस्य द्वारा कैयेक टा नाटक होयत रहैत छलैक। हुनका सब के ई विश्वास नहि छलैन्ह जे नाटक नीक होयतैक। किछु सदस्य बुझैत छलिह जे ओ नाटक केर विषय मे अधिक बुझैत छथि, मुदा प्रत्येक नाटक मे निर्देश केर अपन कल्पना आ सोच होयत छैक। सब दिन इ हुनका लोकनि के समझाबथि जे अहाँ सब निश्चिंत रहू नाटक नीक होयबे करत मुदा हुनका सब के भरोस नहीं होयेंह। इ सब दिन घर आबि क कहैथ इ पहिल आ अंतिम अछि आब हम दोसरा के लेल नाटक नहीं करब ख़ास क मौगी सब लेल तs नहिएँ टा। सब दिन हम आ बालमुकुन्द जी हिनका बुझाबियैन्ह। एक तs एकहू टा नीक कलाकार नहि रहथि दोसर हर काज मे व्यवस्थापक सबहक हस्तक्षेप। हिनका नीक नहि लागैन्ह मुदा जखैन्ह कार्यक भार लs लेने रहथि त पूरा करबाक छलैन्ह। एक त सब दिन नाटकक पूर्वाभ्यास मे किछु नहि किछु होइत रहैत छलैक ताहि पर नाटक मंचनक तारीख स तीन चारी दिन पहिने इंदिरा गाँधी के हत्या भ गेलैक आ प्रशासन दिस स सबटा कार्यक्रम रद्द करबाक आदेश आबि गेलैक। दोसर तिथि तय करबा मे समय नहीं लगलैक अखबार मे से निकलबा देल गेलैक मुदा हुनक मोन नहि मानलैंह आ जाहि तारीख के नाटक मंचन होयबाक छलैक ताहि दिन अपनहि बालमुकुन्द जी आ किछु कलाकार लोकनि के लs रविन्द्र भवन केर गेट लग ठाढ़ भ गेलाह इ सोचि जे लोक के असुविधा नही होय। २० नवम्बर १९८३ के पहिल बेर जमशेदपुर मे मैथिली नाटक "बड़का साहेब" केर मंचन भेलैक आ ओहि नाटक केर सफल मंचन सs जमशेदपुरक मैथिली भाषा भाषी अचम्भित रहि गेलाह। पहिल बेर कोनो मैथिली नाटक टिकट पर भेल छलैक। "बड़का साहेब " नाटकक अनुभव हुनका दोसर नाटक लिखय लेल आ ओकर मंचन करय लेल बाध्य कs देलकैन्ह। हमर मात्रिक सहरसा अछि। हमर पितिऔत बहिन जे कि हमर मसिऔत सेहो छथि हुनक विवाह सहरसा मे छलैन्ह हम सब ओहि विवाह मे जमशेदपुर सs गेल रही। हमर मात्रिक मे सभ कियो एक सs एक गायक छथि। कोनो विवाह वा यज्ञ होइत छैक तs यज्ञ खतम भेलाक बाद पूरा परिवार दलान पर बैसि जाइत छथि आ गाना बजाना होइत रहैत छैक। ओहियो दिन हम सब बाहर बैसल रही आ गाना बजाना होइत छलैक ओहि बीच मे एकटा वृद्ध व्यक्ति अयलाह। मामा सब हमरा सब के बजा हुनका सs परिचय करेलैन्ह आ कहलथि इ छथि "लिलो काका"। हम नाम बड सुनने रहियैन्ह मुदा भेंट हुनका सs पहिल बेर भs रहल छल। पॉँच दस मिनट हुनका सs हम सब गप्प कयलहुँ ताहि के बाद ओ चलि गेलाह। ओतबहि काल मे दू टा गप्प हुनक विषय मे हम सब बुझलहुँ पहिल जे हुनका सांप स बड डर लागैत छलैन्ह दोसर हुनका कियो बुढ कहैन्ह से पसीन नहि छलैन्ह। हुनका गेलाक बाद तुंरत इ हमरा कहलाह हमर दोसर नाटकक नाम भेंट गेल "लिलो काका"। "बड़का साहेब" नाटक मे महिला शाखा केर हस्तक्षेप आ नाटक केर पूर्वाभ्यास के बीच मे जे नाटक सब होइत छलैक ताहि सs तंग आबि सोचि लेने छलथि जे आब दोसर संस्था के लेल नाटक नहि करब। "मिथिला सांस्कृतिक" परिषद नाटक के पाछू पाई खर्च करय लेल सेहो तैयार नहि रहैक। इ सब सोचि अपन अभिन्न मित्र बालमुकुन्द जी , श्री बैद्यनाथ जी आ श्री पूर्णानंद जी के सँग लsआ हुनका सबहक सहयोग स एकटा नाट्य संस्था के स्थापना कयलैन्ह जाहि केर नाम राखल गेलैक "मिथिलाक्षर" (नाट्य एवं संगीत संस्था)। मिथिलाक्षर के bye laws मे देल गेलैक जे ओ व्यक्ति एहि संस्थाक सदस्य भs सकैत अछि जे कोनो तरहक कलाकार हो व कला से प्रेम राखैत हो मुदा सदस्यताक लेल कोनो शुल्क नहि छलैक। हिनकर आदति छलैन्ह जे कैयेक टा नाटकक नाम लैत रहैत छलाह। मिथिलाक्षरक स्थापनाक बाद तय भेलैक जे शीघ्र एकटा नाटक कायल जाय। कलाकार सब केर एकटा बैठक बजायल गेलय आ ओहि मे तय भेलैक जे नाटक होयत आ दू दिन नाटक होयत। एकटा हिन्दी आ एकटा मैथिली मे। कलाकार सब के नाटक केर नाम से बता देल गेलय मैथिली मे "लिलो काका"। जखैन्ह हिन्दी केर नाटक के नाम कलाकार सब पुछलथिन तs कहि देलथिन"डम डम डिगा डिगा "। मैथिली नाटकक नाम तs हमरा बुझल छल हिन्दी वाला सुनि हमरो आश्चर्य भेल। ओ नाम हुनका तत्काल ध्यान मे अयलैन्ह आ कहि देने रहथि। "लिलो काका" नाटक जाहि समय लिखैत छलाह ओहि बीच मे एक दिन हमरा ओकर संवाद सुनाबैत कहलाह लिलो काका के अंत मे हम मारि देबैन्ह से इ नाटक केर नाम हम सोचि रहल छि लिलो काका सs "मिस्टर नीलो काका " कs दिये आ ओहि दिन सँ लिलो काका सँ नाटकक नाम "मिस्टर नीलो काका "भs गेलय। "मिस्टर नीलो काका" आ "डम डम डिगा डिगा" केर पूर्वाभ्यास (रिहल्सल) जाहि समय होइत छलैक ओहि समय हम सपरिवार सब दिन रिहल्सल मे जाई। अपने नीलो काका केर मुख्य भूमिका क रहल छलाह विक्की से ओहि मे बालकलाकार के भूमिका मे छलाह पुत्तु हिन्दी वाला नाटक के बालकलाकार छलाह आ बचलहुँ हम तs हमर काज पहिल छल जे सब दिन रति मे घर आबि ओहि दिनका पूर्वभ्यासक समीक्षा केनाई दोसर कहि देने छलाह जे मंच पर बेसी भीर नहीं लगेबाके अछि ताहि हेतु ओ हमरे सम्हारे के छल। हम सब, सब दिन साँझ ६बजे रिहल्सल लेल जाई आ राति ९ बजे सँ पहिने कहियो नहिं लौटी।लौटलाक बाद बालमुकुन्द चौधरी आ इ बैसैथ आ ओहि समय व्यवस्था केर काज आ विचार विमर्श सब होय। कहि सकैत छि जे जूता सिलाई से लs कsचंडी पाठ तक स्वयं हिनके सम्भारय के छलैन्ह। बालमुकुन्द जी तs संग रहबे करैत छलाह। नाटक सs पहिनहि सबटा टिकट बिका गेल छलैक दुनु नाटकक सफल मंचन भेलैक आ मैथिली के संग संग हिन्दी प्रेमी सब के सेहो नाटक मे एकटा नवीनता भेटलैक। रातों राति जमशेदपुरक मंच आ जमशेदपुर केर नाट्य प्रेमी के बीच श्री लल्लन प्रसाद ठाकुर केर नाम आबि गेलैन्ह। "मिस्टर नीलो काका" आ "डम डम डिगा डिगा" केर सफल मंचनक किछु महिना बाद पटनाक मैथिली संस्था "अरिपन "एकटा अन्तराष्ट्रीय नाट्य समारोहक निमंत्रण पठेने रहैक जाहि के इ स्वीकार क लेलाह। कलाकार सब स पूछल गेलय तs सब तैयार छलाह। समय बहुत कम छलैक मुदा नाटक केर सफल मंचन आ कलाकार सब के उत्साह हिनका और उत्साहित क देलकैन्ह। रिहल्सल ठीक ठाक चलैत छलैक अचानक एक दिन एकटा कलाकार जिनकर नाम लक्ष्मीकांत छलैन्ह आ जे सनिचराक भूमिका मे छलाह अयलाह आ कहलाह हुनक गाम गेनाइ बड़ आवश्यक छैन्ह मुदा ओ चारि पॉँच दिन मे आबि जयताह। हिनकर मोन तs नहि मानलैंह मुदा फेर सोचलाह कैल नाटक छैक आ ओ आश्वासन देने छथि तs आबिये जयताह। रिहल्सल चलैत छलैक ओहि बीच एक दिन सांझ मे हम सब रिहल्सल लेल पहुँचलहुँ तs एक महिला कलाकार जे काकी के भूमिका मे छलिह हुनकर समाद अयलैन्ह जे ओ पटना नहि जा सकैत छथि हुनका कोनो आवश्यक काज स शहर स बाहर जाय परि रहल छैन्ह। इ सुनतहि इ चिंतित भ गेलाह ओहि दिन रहल्सल की हेतैक सब कियो विकल्प के विषय मे सोचय लागि गेलहुँ। कलाकार सब के कहि देल गेलय घर जेबाक लेल, आ इ जे काल्हि धरि किछु ने किछु हेबे विकल्प भा जेतैक कलाकार सब के गेलाक बाद हम चारू गोटे आ बालमुकुन्द जी बाचि गेलहुँ मुदा हमरा सब के किछु नहि फुरैत छल। इ दुनु गोटे हमरा सs सेहो विकल्प केर विषय मे पुछलाह मुदा हमहु निरुतर रही, की कहितियैन्ह। आब त इज्जत के सवाल भs गेल छलैक। बालमुकुन्द जी आ इ किछु समय के लेल बाहर गेलाह आ भीतर आबि हमरा कहलाह, "आब इ अहींके करय पडत"। इ सुनतहि हमरा हँसी लागि गेल, इहो हँसय लगलाह। किछु समय बाद इ गंभीर भs कहलाह "आब हम मजाक नहि क रहल छी"। आब इ हमर सबहक इज्जत केर सवाल छैक आ हमरा सब के दोसर स्त्री पात्र एतेक कम समय मे भेन्टनाइ बहुत कठिन अछि दोसर हमरा अहाँ पर विश्वास अछि अहाँ इ भूमिका निक सs कs सकैत छि।" हम निरुत्तर भ गेलहुं कहितियैन्ह की, इज्जत के सवाल छलैक। तय भेलय जे काल्हि सs हम काकी के भूमिका मे रहब आ रिहल्सल करब। दोसर दिन हम सपरिवार रिहल्सल के लेल पहुँचि गेलहुँ आन दिन तs हम तरह तरह के टिप्पणी दैत छलहुँ मुदा ओहि दिन एकटा कलाकार के रूप मे पहुँचल रही। कलाकार सब के कहि देल गेलैंह जे आय स काकी के भूमिका मे हम रहब। हमर सब संवाद हिनके संग छलैन्ह अर्थात काकी के सब टा संवाद काका के संग छलैन्ह जे हमरा लेल बड़ कठिन छल। एक तs एतेक नीक कलाकार आ ताहू मे पति संग अभिनय केनाई । खैर रिहल्सल शुरू भेलय जखैन्ह हमर संवादक समय आयल तs हम उठि कs स्टेज दिस गेलहुँ मुदा जहिना हमर संवादक समय आयल आ हम जहिना हिनका दिस देखलियैन्ह हमरा हँसी छुटि गेल हमरा सँग चौधरी जी सेहो हँसि देलाह। ओकर बाद हम कैयेक बेर प्रयास केलहुँ मुदा जहिना हिनका दिस नजरि जाय कि हमरा हँसि छुटि जाय आ संग मे चौधरी जी सेहो हँसि दैथि। अंत मे चौधरी जी के बाहर जाय लेल कहल गेलैंह मुदा कथि लेल हमर हँसि रुकत। ओहि दिन आन सब कलाकार अपन अपन पाठ कs घर जाय गेलाह । इ सब कलाकार के आश्वासन देलथिन जे घबरेवा के नहि छय काकी वाला भूमिका निक होयबे करत। दोसर दिन हम सोचि क आयल रही जे हम हँसब नहि आ नीक सs रिहल्सल करब मुदा जहिना हमर बेर आबै हँसि हम नहि रोकि पाबी। इ अंतिम दिन रिहल्सल तक चललय मुदा घर मे कखनहु कखनहु इ हमरा किछु किछु बताबैत रहैत छलाह। हमरा अपनहि बड़ चिंता होय जे की होयत मुदा इनका हमरा पर पूर्ण भरोस छलैन्ह आ सब के कहैथ "चिंता जुनि करय जाय जाऊ इ स्टेज पर एके बेर कs लेतिह हमरा पूर्ण विश्वास अछि"। हम त हिनकर विश्वास देखि कs दंग रही मुदा अपना हमरा डर लागैत छल। लक्ष्मीकांत नहि अयलाह आ समाद पठौलैन्ह जे ओ सीधे पटना पहुँचि जयताह। हम सब पटना के लेल बिदा भेलहुँ रास्ता मे इ हमर बड़का बेटा भास्कर के किछु किछु बुझाबैत जाइत छलाह पटना पहुँचलहुँ ओहिओ ठाम लक्ष्मीकांत नहि पहुँचलाह। हम सब जाहि दिन पहुँचल रही ताहि दिन साँझ मे हमर सबहक स्टेज रिहल्सल छल। भोर स इ भास्कर के सनिचारक पाठ याद करय लेल कहने रहथि संग संग अपनहु रहैत छलाह। होटल मे दू बेर रिहल्सल भेलैक आ साँझ मे स्टेज रिहल्सल। दोसर दिन श्री ठाकुर सपरिवार कलाकार सब सँग नाटक लेल तैयार रहथि। नाटक पटना आ पूरा मिथिला मे धूम मचा देलक। मिस्टर नीलो काका के कैयेक टा पुरस्कार भेन्टलय, श्री ठाकुर के श्रेष्ठ कलाकार , श्रेष्ठ आलेख तथा श्रेष्ठ महिला कलाकार के लेल हमरा हमर छोट बालक के श्रेष्ठ बालकलाकार के लेल सेहो पुरष्कृत कायल गेलैन्ह। १४ १३ जून १९८५ के भारतीय नृत्य कला मन्दिर मे "मिस्टर नीलो काका" कs सफल मंचन के पश्चात् प्रति वर्ष अंतर्राष्ट्रीय नाट्य प्रतियोगिता मे मिथिलाक्षर आ "श्री लल्लन प्रसाद ठाकुर" जी कs नाटक सब बेर पुरस्कार लैत रहलैन्ह आ मैथिली दर्शक आ नाट्य प्रेमी के सब बेर एक टा नव सामाजिक विषय पर नाटकक नीक प्रस्तुति देखय के लेल भेँटैत रहलैन्ह। १९८६ मे अंतर्राष्ट्रीय नाट्य प्रतियोगिता के लेल जहिया निमंत्रण आयल छलैक ओहि समय "श्री लल्लन प्रसाद ठाकुर"जी के लिखल नाटक सब मंचित भs चुकल छलैन्ह मुदा नव नाटक केर नाम ओ सोचि कs रखने रहथि। जहिया निमंत्रण आयल छलैक ओकर बाद कलाकार सब के एकटा बैठक भेलैक आ ओहि मे नाटक जे अन्तराष्ट्रीय समारोह मे जएबाक छलैक ओकर नाम बतायल गेलैक। नाटक केर नाम "लौंगिया मिरचाइ " सुनतहि कलाकार सब बड खुश भेलाह मुदा जखैन्ह इ सुनालाह जे मात्र नाम टा लिखल छैक तs पहिने त किछु कलाकार मायुस भेलाह मुदा सब बेर नाटक मे ओहिना होइत छलैक आ ता धरि कलाकार सब श्री लल्लन जी के प्रतिभा सँ परिचित भs गेल छलाह। कलाकार सब केर बैठकी के बाद ओहि दिन राति मे बैसि कs पात्र आ "पहिल दृश्य" लिखि देलाह आ हमरा ओ कैयेक बेर सुनय परल। ओकर बाद रबि दिन सs रिहर्सल सेहो शुरू भs गेलैक। एक दृश्यक रिहर्सल कतेक दिन होयतैक। एक दिन साँझ मे देखलियैन्ह रिहर्सल स जल्दि आबि गेलाह आ आबिते कहलाह "आजु हम लिखय के मूड मे छी आ एक दृश्यक रिहर्सल कतेक दिन होयत। अहाँ सब खेलाक बाद सुति रहु आ हमरा लेल चाय बना कs राखि दिय हमरा आजु नाटक पूरा करबाक अछि"। इ सुनतहि हम कहलियैन्ह हम सुति जायब ता अहाँक संवाद सब के सुनत। हम नहि सुतब अहाँ चिंता जुनि करू हम चाय बना बना कs अहाँके दैत रहब। राति मे बच्चा सब खेलाक बाद सुति रहलाह हम चाय बना कs राखि देलियैन्ह आ बैसि कs किछु समय हुनक संवाद सब सुनलियैन्ह मुदा किछु समय बाद नीँद आबय लागल तs सुति रहालौंह। अचानक नीँद खुजल तs देखलियैन्ह लिखिए रहल छलाह ओहि समय ठीक ४:३० होइत छलैक। हुनका लग गेलहुँ तs कहलाह आब खतमे पर छैक एक बेर चाय पिया दिय। हम उठि कs चाय बनेलहुँ आ चाय दुनु गोटे चाय पिलहुँ ५:३० बजे तक "लौंगिया मिरचाइ" नाटक पूरा छलैक। इ नाटक सेहो कैयाक टा पुरस्कार पौलक। "मिस्टर नीलो काका" के बाद जे नाटक सबस बेसी लोकप्रिय आ चर्चित भेलैक ओ छैक बकलेल। २९-४-बकलेल के अन्तराष्ट्रीय मैथिली नाट्य प्रतियोगिता के लेल कलाकार भवन एहि सिनेमा मेक मंचन भेल। एहि नाटक के सर्वोत्तम नाटक, सर्वोत्तम आलेख , सर्वोत्तम निर्देशक, सर्वोत्तम बालकलाकार, सर्वोत्तम प्रकाश परिकल्पना आ सर्वोत्तम मंच सज्ज्या के पुरस्कार भेटलैक आ नाट्य प्रतियोगिताक निर्णायक मंडलक अध्यक्ष आ फ़िल्म निर्देशक " श्री प्रकाश झा" मंच पर पुरस्कार दैत समय "श्री लल्लन प्रसाद ठाकुर जी" कs प्रशंसा करैत पता आ फ़ोन नम्बर माँगि लेलाह। बकलेल नाटक केर किछु मास बाद अचानक एक दिन प्रकाश जी के फ़ोन अयलैन्ह आ फ़ोन पर कहलथिन्ह जे ओ एकटा फिचरेट फिल्म बना रहल छथिन्ह आ ओहि फिल्म मे मुख्य भूमिका करबा के छैन्ह, आ जल्दी दू तीन दिन के लेल पटना आबय परतैंह। ऑफिस सs छुट्टी लs पटना गेलाह आ दू तीन दिन के बाद आपस आबि गेलाहआपस अयला के बाद अपन ऑफिस स छुट्टी ल आ दू कलाकार के अयबाक लेल कहि चलि गेलाह। प्रकाश जी हुनका अपन कलाकारक चुनाव मे सेहो रहबाक लेल कहने रहथि। कलाकारक चुनाव सs शूटिंग धरि करीब डेढ़ मास लागि गेलैक। शूटिंग बेतिया लग गाम मे भेल छलैक आ किछु बम्बई मे ।सिनेमाक नाम छलैक " कथा माधोपुर की " ई सिनेमा पंचायती राज पर बनायल गेल छैक। १५ एहि सिनेमाक प्रेमिएर पटना मे छलैक आ हम श्री लल्लन जी के संग ओहि के लेल पटना गेल छलहुँ। ओना तs जमशेदपुर मे १९८१ सs श्री लल्लन प्रसाद ठाकुर केर नाटक आ सांस्कृतिक गतिविधि शुरू भs गेल छलैन्ह मुदा मैथिली केर सेवा आ हुनका अपना संतुष्टि भेंटलैन्ह १९८३ मे, जहिया ओ अपन लिखल पहिल मैथिली नाटक केर मंचन केलाह, मुदा ओहियो मे किछु त्रुटि हुनका अपना बुझेलैन्ह। मिथिलाक्षरक स्थापनाक बाद पहिल नाटक छलैक "मिस्टर निलो काका" जाहि केर पहिल मंचन जमशेदपुर मे भेलैक आ दोसर मंचन "अन्तराष्ट्रीय नाट्य समारोह" पटना मे। "मिस्टर निलो काका" क s मंचन केर बाद प्रतिवर्ष मैथिली भाषा भाषी के एकटा नाटक देबाक आ मंचन करबाक लेल प्रतिबद्ध श्री ठाकुर जी प्रतिवर्ष एकटा नाटक केर रचना करैत रहलाह आ ओकर मंचन होइत रहलैक। एहि बीच बिना कोनो अनुभव के एकटा मैथिली विडियो फ़िल्म सेहो बनौलाह। जमशेदपुर मे पहिल फिल्मोत्सव श्री ठाकुर जी केर देन छैन्ह। प्रकाश झा जी केर सँग हुनक सिनेमा मे काज केलाक बाद प्रकाश झा फिल्मोत्सव जमशेदपुर मे भेल छलैक जाहि केर पूरा व्यवस्था श्री ठाकुर जी अपनहि कएने छलाह। त्रिदिवसीय नाट्य समारोहक केर इच्छा पहिल नाट्य समारोह सs छलैन्ह, ओ जमशेदपुर मे भेलैक आ खूब नीक जकां संपन्न भेलैक। प्रकाश झा जी के सात कड़ी वाला धारावाहिक "विद्रोह" केर शूटिंग से मदनपुर( बेतिया) केर जंगल जंगल आ बम्बई मे भेलैक आ ओ शूटिंग के बीच मे श्री ठाकुर जी केर मोन किछु ख़राब भs गेल छलैन्ह जाहि चलते ओ धारावाहिक केर शूटिंग जल्दी खतम होइते चलि अयलाह। हमरा से पता नहि कियैक जहिया सs श्री ठाकुर जी शूटिंग के लेल गेलाह मोन बहुत घबराइत छल। फोनक बेसी सुविधा नहि छलैक तथापि हुनका खबरि भेंट गेलैन्ह आ अपन शूटिंग खतम करि कs आपस आबि गेलाह। बेतिया सs अयलाक बाद पता नहि कियाक आ की भेलैंह, बीच बीच मे बुखार लागि जायत छलैन्ह, डॉक्टर सs देखा दबाई होइत छलैन्ह तs फेर दू तीन दिन मे ठीक भsजाइत छलाह। एहिना करीब चारि पॉँच मास तक चलैत रहलैक बीच बीच मे हम कहियैन्ह नीक सs डॉक्टर के देखा लिय, डॉक्टर सँs देखाबथि तs मुदा पूरा पूरा चेक अप नहि होय। हमरा ओहिना मोन अछि अचानक एक दिन बुखार भेलैंह आ एकहि बेर खूब तेज़ बुखार भs गेलैन्ह। एहि बेर हम सोचि लेने रहियैन्ह जे पूरा नीक सय जांच करवाबय के छैन्ह मुदा ओ अपनहि बजलाह एहि बेर हॉस्पिटल मे भरती भsजाइत छी आ नीक सँ पूरा जाँच करवा लैत छी। राति मे ततेक बेसी बुखार भsगेलैन्ह जे ओहि समय भरती कराबय परि गेलैन्ह। भोर मे हम हॉस्पिटल गेलहुँ तs डॉक्टर बी.एन.झा राउंड(round) मे छलाह पुछला पर कहलाह "बुखार नहि अछि साँझ तक छोरि देबैन्ह आ नहि तs काल्हि घर जा सकैत छथि" हम हुनका भोजन करवेलाक के बाद घर आबि गेलहुँ। सांझ मे बच्चा सब के लs कs अयलहुं। पता चलल जे डॉक्टर साहेब केर आदेश छलैन्ह जे बिना सबटा जाँच कएने घर नहिं जाय देताह। हम सब राति मे घर आबि गेलहुँ। दोसर दिन किछु एहेन भेलैक जे हम भोर मे हॉस्पिटल नहिं जा सकलहुँ । बड़का बेटा पुत्तु आ पंडित जी सँ चाय नाश्ता पठा देलियैन्ह आ हम एकहि बेर दुपहर मे हुनकर कपडा लs कs गेलहुँ जे आइ तs घर आपिस आबिये जयताह। हॉस्पिटल मात्र हुनकर कपडा आ चाय लs कs गेल रही। पहुँचलहुँ तs हिनका उदास देखलियैन्ह, पुछला पर कहलाह जे अइयो डॉक्टर साहब नहि छोरताह। हम सुनतहि डॉक्टर बी. एन. झा लग गेलहुँ, कहलाह जे "हम आब ठाकुर जी के किछु आओर दिन रखबैन्ह हुनका खुनक बहुत कमी छैन्ह "। इ सुनतहि हमरा चिन्ता भेल मुदा करितहुँ की राति मे फेर सs खाना लs कs आबय परल आ राति भरि हम सुति नहिं पयलहुँ । दोसर दिन श्री ठाकुर जी केर सबटा खून इत्यादि केर जाँच शुरू भेलैक । जाँच केलाक बाद डॉक्टर बी. एन. झा ओहि जांचक सबटा रिपोर्ट देखि खुश नहि छलाह हुनका किछु आशंका छलैन्ह, की से तs नहि कहलाह, कहलाह "bone marraw" करवाबय परतैन्ह। १६ हमर एकटा स्वभाव अछि, जे आई धरि हम नहि बदलि सकलियैक अछि, आ आब शायद बदलि नहि सकैत छियैक। हमरा मोन मे खराप बात बहुत जल्दी आबि जायत अछि। पचास तरहक आशंका तुंरत आबि जायत अछि। हम कतबो कोशिस करैत छियैक जे मोन सs निकालि दियैक मुदा कियैक ओ निकलत। चाहे कियो घर सs बाहर गेल होयथ आ समय पर नञ लौटल होयथ किंवा कोनो तरहक मोन खराप होय। हम बहुत जल्दी घबरा जायत छी। आ तखैन्ह नञ हमरा खएबा मे नीक लागैत अछि आ नञ दोसर कोनो काज मे। इ हमर सबस पैघ कमजोरी अछि एहि लेल हमरा हमर शुभ चिन्तक बेटा हमर पति आ हमर सब सs नीक संगी जे आई धरि एकहि टा छथि सेहो कैयैक बेर समझौलैथ आ समझाबैत छथि मुदा ओहि स्वभाव के हम नहि बदलि सकलहुँ। हम सोचि के अस्पताल गेल छलहुँ जे हम श्री ठाकुर जी के लs कs घर अयबैन्ह आ अनबो कयलहुँ मुदा हमरा पता चलल आ डॉक्टर बी.एन.झा कहलैथ जे bone marrowकराबय परतैन्ह आ ओहो वेल्लोर जाय कs , इ सुनतहि हमरा जेना खराब दिनक आशंका भs गेल। ओना तs डॉक्टर साहब बुझेलथि जे जमशेदपुर मे सेहो bone marrow भs सकैत छलैन्ह, चूँकि ओ चाहए छलथिन्ह एक बेर वेल्लोर मे सबटा जाँच भs जाय ताहि लेल ओ जमशेदपुर मे आगू जाँच नञ कराय वेल्लोर पठा रहल छलथिन्ह। ओहि दिन, राति भरि हमरा कियैक नींद होयत। भरि राति सोचितहि प्रात भs गेल। दोसर दिन सs वेल्लोर जेबाक आ अगुलका जाँच करेबाक विषय मे सोचय के छल, आ हम सब सब सँ पहिने अपन बहिन जमाय, यानि छोट बहिनक पति जे नीक डॉक्टर छथि आ धनबाद मे छलाह हुनका सs गप्प कयलहुँ। ओहि समय हमर बाबूजी सेहो धनबाद मे छलाह। सब सs बात बिचारक बाद भेलैक जे बाबुजी हमरा सब सँग वेल्लोर जयताह आ माँ बच्चा सब संग जमशेदपुर मे रहतिह। बाबुजी श्री ठाकुर जी आ हम तीनू गोटे साँझ मे वेल्लोर पहुँचलहुँ। होटल पहुँचि आ तैयार भs एक बेर अस्पताल गेलहुँ आ अस्पताल देखि आबि गेलहुँ। राति भरि हमरा कियैक नींद होयत भोर मे हम सब समय पर तैयार भs अस्पताल पहुँचि गेलहुँ। अस्पताल मे तs किछु दिक्कत नहि छलैक मुदा जाहि डॉक्टर के ओहि ठाम डॉक्टर बी. एन. झा पठेने रहथि हुनक विषय मे हम सब पता करय के लेल घुमि रहल छलहुँ। हमरा सब केर घुमैत देखि एक सज्जन रुकि कs पुछलाह " अहाँ सब केर कोनो दिक्कत अछि वा किनको खोजि रहल छि"? हम तुंरत कहलियैन्ह "असल मे हमरा सब केर डॉक्टर कुरियन सs देखेबाक अछि, हुनके खोजि रहल छियैन्ह" । सुनतहि ओ पुछलाह "अहाँ सब रजिस्ट्रेशन करवा लेने छी "? जहिना हम सब कहलियैन्ह नय करवाबय के अछि, ओ तुरंत अपना संग लs जा रजिस्ट्रेशन करवा संग चलय लेल कहलाह आ ओकर बाद कुर्सी सब लागल हॉल छलैक ओहि ठाम बैसय लेल कहि कतहु चलि गेलाह। श्री ठाकुर जी केर नाम लs बजेलकैन्ह हम तीनु गोटे भीतर गेलहुँ । भीतर पहुँचि हम जे देखलहुं तs हमर आश्चर्यक ठेकान नहिं रहल। डॉक्टर कुरियन आओर कियो नहि, ओ तs ओ व्यक्ति छलाह जे हमरा सब केर सब काज करवा अपना सँग ओहि ठाम तक अनने छलाह । हम बाबुजी आ श्री लल्लन जी तीनु गोटे एक दोसराक मुँह तकैत रहि गेलहुँ । विश्वास नहिं भेल जे एतेक नामी आ पैघ डॉक्टर के इहो रूप होइत छैक । हम सब तs कहियो कल्पना मे सेहो नहि सोचने आ देखने रहियैक डॉक्टर के इ रूप । डॉक्टर कुरियन पहिने जमशेदपुरक पूरा रिपोर्ट देखि आ विस्तार सs सब किछु पुछलाह आ ताहि केर बाद इ कहि अस्पताल मे भर्ती होयबाक लेल कहलाह जे दू तीन दिन मे सबटा जाँच भs जायत ताहि केर बाद हम अहाँ सब केर किछु कहि सकैत छी। अस्पताल मे भर्ती करेलाक बाद दू तीन दिन तक हम सब दिन, राति मे हिनकर भोजनक बाद करीब १० बजे आपस होटल बाबुजी केर सँग आबि जायत छलियैन्ह । मोन तs अयबाक नहिं होयत चल मुदा बाबुजी आ हिनकर जिद्द रहैत छलैन्ह तsआबि जाइ ।राति भरि हम किछु किछु समय पर बाथरूम जाइ आ समय देखि । भोर ६ बजे सs पहिनहि अस्पताल पहुँचि जायत छलहुँ बाबुजी अपन बाद मे आबथि। एक सप्ताह धरि जाँच आ रेपोर्टक सिलसिला चलैत रहलैक आ एक सप्ताह बाद एक दिन डॉक्टर कुरियन अपने अपन पूरा डाक्टरक दल सँग अयलाह । एक टा चीज हम वेल्लोर अस्पताल मे देखलहुँ जे कोनो ठाम देखय के लेल नहिं भेटल। ओहि ठामक डाक्टर सब पूर्ण रूपेण मरीज के लेल समर्पित रहैत छथि आ ताहू मे डाक्टर कुरियन के हम महान कहि सकैत छियैन्ह । सब दिन ओ आबि पहिने मरीज वाला बिछावन केर बगल मे एकटा आओर बिछावन रहैत छलैक ओहि पर बैसि जाइत छलाह आ पहिने हाल चाल पुछैथ । ओहियो दिन आबि बैसी गेलाह आ हाल चाल पुछलाह, ताहि केर बाद कहलाह "आब सबटा रिपोर्ट तs आबि गेल अछि, मुदा हम सब bone marrow करबैन्ह जाहि मे बहुत कष्ट होइत छैक। ठाकुर जी केर खून बहुत कम छैन्ह जाहि लेल हमरा सब केर खुनक आवश्यकता परत आ अहाँ सब मे सs एक गोटे के खून देबय पडत। हम तुंरत खून देबाक लेल तैयार भs गेलहुँ। हमरा घर मे हमर चारू गोटे के एकहि ग्रुप केर खून छैक। डाक्टर कुरियन हिनका देखि जखैन्ह बाहर गेलाह तs हुनक एकगोट सहायक डाक्टर हमरा बाहर बजेलाह आ हमरा एकटा फार्म दs blood bank जा खून देबाक लेल कहलथि । हम फार्म लेलाक बाद हिनकर केबिन मे नहिं गेलहुँ आ सोझे blood bank चलि गेलहुँ। नर्स के जहिना फार्म देखेलहुँ ओ तुंरत एक टा कुर्सी पर बैसेलथि आ किछु समय बाद हमरा एकटा खूब पैघ हॉल मे लs गेलिह । जहिना हॉल मे हम पैसलहुँ पूरा हॉल मे सब ठाम सब बिछावन पर लोक सुतल खून दैत छल । इ देखतहि हमर डर सs हालत ख़राब भs गेल । हमरा सूई सs बड डर होइत छलs आ सुनने रहियैक जेblood donation मे बहुत समय लागैत छैक।मोन मे एक सँग कैयैक टा प्रश्न उठैत छल जाहि मे पहिल ई: जँ हम बेहोश भs गेलहुँ तs की होयत ?हमरा सँग आओर कियो नहि छलs । बाबुजी के हम खून देबय लेल नहि कहितियैन्ह । सूई घुसाबय सs पहिने तक हम बहुत डरल छलहुँ मुदा एक बेर सुई घुसा देलक ताहि केर बाद साहस बढि गेल आ दर्द से नहि होइत छल। जखैन्ह हमरा बुझय मे आबि गेल, हम बेहोश नहि होयब तs हम नर्स सs पुछलियैक "इ खून हमर पति के देल जयतैन्ह नय" ? ओ कहलक " नहि अहाँक पति के दोसर खून हुनक ग्रुप के देल जायत जे bank सs उपलब्ध होयत "। हम सुनने छलियैक जे bank मे HIV केर जाँच नहि होइत छैक जाहि चलते मात्र सम्बन्धी व जे मरीजक संग आयल रहैत छथि हुनके खून लेल जाइत छलैक , इ सुनतहि हमरा और मोन बेचैन होमय लागल तथापि हम ओहि blood bank केर विभागाध्यक्ष छलैथ हुनका बजवोलियैन्ह आ कहलियैन्ह हमर आ हमर पति केर खुनक एकहि ग्रुप छैन्ह । ओहो हमरा कहलथि ई संभव नहि छलैक । हमरा किछु नय फ़ुराइत छल, तथापि हम हुनका आग्रह केलियैन्ह जे "हमर खून पर हमर नाम आ मरीजक नाम लिखि राखि दियोक आ किछु घंटा रुकि कsकोनो दोसर ठाम खून पठाबियौक , ताबैत हम डॉक्टर कुरियन सs भेंट कयने आबैत छि "। डॉक्टर कुरियन केर नाम सुनतहि डॉक्टर हमरा कहलैथ "ओना तs हम सब,सब खून पर खून देबय वाला केर नाम,मरीजक नाम आ तारीख लिखि दैत छियैक । डॉक्टर कुरियन कहि देताह तs हम अहींक खून अहाँक पति लेल पठा देबैन्ह "। नर्स आबि हमर सुई निकालि देलैथ आ हमरा हिदायत देलैथ जे कम स कम १५ मिनट रुकय लेल मुदा हम सुई निकालैत के संग अपन चप्पल पहिरलहुं आ तुंरत ओहि ठाम सs बिदा भs गेलहुं । हम देखलियैक नर्स चाय लय आबि रहल छलैथ मुदा हमरा ओहि समय इहो होश नय छल जे हम खून देने छलियैक तुंरत नय जयबाक चाही । हम आठ नौ दिन सs वेल्लोर मे छलहुँ आ ओतबा दिन मे ततेक बेर डॉक्टर कुरियन सs काज पड़ल छलs जे कोन समय मे डॉक्टर कुरियन कतय रहैत छथि से हमरा बुझल भs गेल छल । हम जल्दी जल्दी ओहि वार्ड पहुँचलहुँ मुदा पता चलल डॉक्टर कुरियन ओहि ठाम नहि छलाह ओहि वार्ड केर डॉक्टर हमरा दोसर वार्ड केर नाम बता कहलथि अखैन्ह ओहि ठाम भेटताह , हम लगभग दौरति ओहि वार्ड तक पहुँचलहुँ । वार्ड मे पहुँचलहुँ ताबैत धरि पसीना सs लथपथ भs गेल छलहुँ हमरा देखि केयो कहि सकैत छलs जे हम थाकल आ परेशान छी । वार्ड मे पहुँचति देरी हम डॉक्टर कुरियन केर सहायक डॉक्टर सs हुनका विषय मे पुछलियैन्ह मुदा ओ हमारा जवाब देबय सsपहिने पुछलाह "आखिर की बात अछि अहाँ एतेक घबरायल कियैक छि? पहिने अहाँ बैसू आ हमरा कहू की बात छैक "? आ तुंरत एक ग्लास पानि मँगा कs पिबय लेल देलाह , मुदा हम पानि पिबय सs पहिनहि एक साँस मे हुनका सब बात बता देलियैन्ह आ कहलियैन्ह" हमारा डॉक्टर कुरियन केर मदद चाही" । ओ तुंरत कहलाह अहाँ के हम कतहु नय जाय देब हम तुंरत डॉक्टर कुरियन के एहि ठाम बजा दैत छियैन्ह । तुंरत अपन पेजर निकालि खबर पठा देलथि हुनक समाद अखैन्ह खतमो नहि भेल छलैन्ह कि हम डॉक्टर कुरियन के आबैत देखलियैन्ह । हम दौरि क डॉक्टर कुरियन लग पहुँचलहुँ आ सबटा बात बता देलियैन्ह । हमर गप्प सुनैत देरी डॉक्टर कुरियन हमरा कहलाह "अहाँ घबराऊ जुनि, अहीं केर खून अहाँक पति के देल जयतैन्ह" आ फ़ोन उठा ओहि ठाम सs blood bank केर विभागध्यक्ष के फ़ोन करि कहि देलथिन्ह जे "श्री ठाकुर जी केर केबिन मे हुनक पत्नी जे खून देने छथिन्ह सैह पठायल जाय "। एतवा वाक्य सुनि हमरा जे ख़ुशी भेटल ताहि केर हम वर्णन नहि कs सकैत छियैक । एहि देश मे एहेनो डॉक्टर छैथ ताहि केर हमरा अंदाज नहि छल । हम हुनका धन्यवाद कि देतियैन्ह हम एक टक हुनका देखैत रहि गेलियैन्ह। ओ हमरा दिस देखि कहलाह अहाँ केबिन मे जाऊ साँझ मे श्री ठाकुर जी केर अहीं वाला खून चढ़तैन्ह। हम डॉक्टर कुरियन सs भेंट करि केबिन दिस जाइत छलहुँ रास्ता मे हमरा चक्कर आबि गेल आ हम एक ठाम कुर्सी पर बैसि गेलहुँ। पॉँच दस मिनट केर बाद हम केबिन पहुँचलहुँ, बाबुजी आ इ हमरा लेल चिंतित छलैथ जे हम कतs चलि गेल छलहुँ, देखैत देरी पुछलाह "कतs गेल छलहुँ "। हम कहलियैन्ह "खून देबय लेल, दsदेलियैक आ आब साँझ मे अहाँके खून चढत "। साँझ मे हिनका जल्दी भोजन करवा देलियैन्ह खून चढ़ेनाइ शुरू भेलैक ओकर किछु समय बाद बाबुजी के होटल पठा देलियैन्ह आ हम हिनका बगल मे बैसि गेलहुँ। कतबहु कहैथ सुति रहु हमरा कियैक नींद होयत एक तs चिंता दोसर हम जमशेदपुर मे देखने रहियैन्ह जहाँ हमर ध्यान दोसर दिस देखैथ तs झट द tube के पकरि ओकर speed बढ़ा दैत छलाह जे कहुना खून चढेनाइ जल्दी खतम भs जाय। राति मे इ सुति रहलाह आ हम हिनकर हाथ पकरने बैसल रहि गेलहुँ आ जखैन्ह पूरा खून चढि गेलैन्ह तs नर्स के बजा ओकर पाइप सब निकलवा ताहि केर बाद बगल वाला बिछावन पर परि रहलहुँ। दोसर दिन भोर मे डॉक्टर के आबय सs पहिने नर्स आबि जाँचक लेल हिनकर खून लs गेलैन्ह आ ओकर दोसर दिन भोर मे bone marrow होमय के छलैक । डॉक्टर कुरियन अपन पूरा डॉक्टरक दल सँग अयलाह हुनका देखैत नहि जानि कियैक हमरा आशंका आ डर दुनु होमय लागल। हमरा मात्र एतबा बुझल छल जे रीढ़ केर हड्डी सs खून लेल जयतैन्ह जे कष्टप्रद होइत छैक। डॉक्टर सब जहिना हिनकर केबिन मे घुसलथि हमरा आ बाबुजी के बाहर जेबाक लेल कहि देलैथ। हम तs एक सँग ओतेक डॉक्टर के देखि घबरायल छलहुँ। बाहर मे ठाढ़ पचास तरहक मोन मे आबैत छल। अचानक हिनकर कानय केर आवाज बुझायल, ओ सुनतहि हमरा कना गेल आ हमर आँखि के आगु जेना अन्हार भs गेल। हम बाबुजी के बिना किछु कहनहि जा एकटा कुर्सी पर बैसि गेलहुँ । बाबुजी के कोना अपन स्थिति केर विषय मे बुझय देतियैन्ह । डॉक्टर जखैन्ह बाहर निकलाह तs हमरा कहलैथ अहाँ सब आब भीतर जाऊ । भीतर गेलहुँ तs इ कानैत छलाह आ हमरा देखैत देरी कहि उठलाह "मारि देलक "। हम वर्णन नहि करि सकैत छी जे हमरा ओहि समय मे असगर केहेन बुझायल, बाबुजी छलाह मुदा हुनका सोंझा हम अपन वेदना के कोना प्रकट होमय दितियैन्ह , ओ नहि रहितथि तs हम अवश्य कानय लगितौन्ह। दोसर दिन डॉक्टर कुरियन अपन डॉक्टरक दल सँग सबटा रिपोर्ट लs कs अयलाह ,आ आबि श्री ठाकुर जी केर बगल मे बैसि गेलाह। पहिने हुनक हाल चाल जे कि सब दिन पुछैत छलाह पुछलाह आ ताहि केर बाद अपन असली मुद्दा पर अयलाह। सब सsपहिल ओ हमरा सब केर कहलाह हम सबटा रिपोर्ट देखि लेने छी आ इ निष्कर्ष निकलल अछि जे अहाँक "cell malignant" अछि। ओहि समय मे हम इ तs नहि बुझैत छलहुँ जे "malignancy" की होइत छैक मुदा इ बुझा गेल जे किछु ख़राब बीमारी छैक, किछु गरबर छैक। डॉक्टर कुरियन सबटा बात बताबैत कहलाह आब चूँकि इ "oncology department" केर case छैक ताहि लेल हम अहाँ के "oncology department" पठा रहल छी। oncology शब्द सुनैत केर सँग हमरा जेना सब बुझय मे आबि गेल आ ओकर बाद हमरा मुँह स एक शब्द किछु नहि निकलल जे हम डॉक्टर सँ किछु पुछितियैन्ह । डॉक्टर कुरियन अपन सहायक डॉक्टर सब केर कहि कs चलि गेलाह जे अस्पताल सँ छुट्टी देबाक लेल आ "oncology" विभागक डॉक्टर सs देखबाक लेल सबटा कागज तैयार करि देबाक लेल। हम सब आपस होटल आबि गेलहुँ। दोसर दिन हम सब होटल सs सीधा oncology department डॉक्टर प्रसाद लग पहुँचलहुँ । ओहि दिन हम आ श्री ठाकुर जी गेल छलहुँ। बाबुजी के आँखि देखेबाक छलैन्ह ओ आँखि वाला अस्पताल चलि गेल छलाह, जे एक तरह सँ नीके छलैक । डॉक्टर प्रसाद जे हमरा सोंझा मे कहलथि से भगवान कोनो पत्नी के ओ दिन नहि देखाबथि जे हुनका ओ सुनय परैन्ह । डॉक्टर प्रसाद विस्तार सs बिमारी के विषय मे बतेलाक बाद कहलथि जे इ बिमारी मे लोक बेसी सs बेसी पन्द्रह साल जीबैत छैक। किछु आओर जाँच से कराबय लेल कहलाह मुदा ओ बाहर रहि सेहो करायल जा सकैत छलैक । हम सब आपस होटल अयलहुँ, इ त बहुत राति तक जागल रहलाह आ ओकर बाद सुति गेलाह मुदा हम तs भरि राति जागले रहि गेलहुँ। दुनु गोटे एक दोसरक स्थिति बुझैत छलियैक मुदा कथि लेल राति भरि मे एको शब्द बाजि होयत । भोर मे तैयार भs समय पर डॉक्टर प्रसाद लग पहुँचि गेलहुँ । डॉक्टर प्रसाद किछु जाँच केलाक बाद कहलैथ जरूरत परतैक तS "WBC" बदलय परतैक आ ओहि लेल एक गोट अपन आदमी के तैयार रहय पड़त जिनकर " WBC "लेल जा सकैत अछि । ओ "WBC" बदलय केर सबटा प्रक्रिया बता देलाह । हमरा एकटा फॉर्म द ब्लड बैंक जेबाक लेल कहलाह आ हिनका फेर सs भरती हेबाक लेल । हम हिनका केबिन मे पहुँचा ओहि ठाम सs फेर ब्लड बैंक पहुँचि गेलहुँ । ब्लड बैंक केर डॉक्टर हमरा हाथ सँ फॉर्म लs एकटा कुर्सी पर बैसय कहलाह। किछु समय बाद आबि खून निकालि लेलैथ। हम जहिना कुर्सी पर सs उठय चाहलहुँ हमर माथ घुमि गेल आ हम धम्म सs फेर कुर्सी पर बैसि गेलहुँ । इ देखि हमर बगल मे नर्स छलैथ से पकरि हमरा तुंरत बेड पर सुता देलिह । हम उठलहुँ तs डॉक्टर हमरा कहय लगलाह, "हम अहाँक खून नहि लs सकैत छी कियैक तs अहाँ जाँच समय मे बेहोश भs गेलहुँ अछि। इ सुनतहि हमरा कनाइ छुटि गेल मुदा हम अपना आप के रोकि लेलहुँ आ ओहि ठाम सँ निकलि चलि देलहुं। हमरा किछु नहि फ़ुराइत छल हम की करी हमरा संग आओर कियो नहि छलाह । हम मोन दुखी कयने चलल जाइत छलहुँ आ सोचैत छलहुँ आब की होयत। अचानक सामने मे डॉक्टर कुरियन पर नजरि गेल ओ हमरा देखि हमरे तरफ आबैत छलाह। ओ हमरा पुछलाह " डॉक्टर प्रसाद की कहलाह", हम हुनका सबटा परिस्थिति बता देलियैन्ह आ इहो जे हमरा लग दोसर कियो नहि छैथ हम आब की करी। ओ तुरन्त कहलाह अहाँ घबराऊ जुनि जरूरत परतैक तs हम अपन WBC अहाँक पति के देबैन्ह । इ सुनैत देरी हम अपना आप के नहि रोकि पयलहुँ आ कानय लगलहुँ । मोन मे भेल कि एहनो डॉक्टर होइत छैक? ओ वाक्य आय धरि डॉक्टर कुरियन केर क़र्ज़ हमरा लग अछि। आय धरि हम डॉक्टर कुरियन के कहल वाक्य नहि बिसरि सकलहुँ। १७ डॉक्टर प्रसाद जाँच कयलाक बाद कहलाह एहि बेर तs WBC केर काज नहीं छैक मुदा दोसर बेर परि सकैत छैक। एक बरखक दवाई आ डॉक्टर बी. एन. झा केर नाम सsसबटा रिपोर्ट बना कs देलाह आ फेर एक साल बाद आबय लेल कहलाह । वेल्लोर आबय समय एकर एको रत्ती भान नहि छल जे एतेक गंभीर बीमारी भs सकैत छैन्ह। जाहि दिन डॉक्टर कुरियन बीमारी के विषय मेबतेलाह ताहि केर बाद सs हमर जेना माथ सुन्न भs गेल छल । ई बुझय मेनहि आबय जे हम की करी। नहि हम बिमारी के विषय मेहिनका सs गप्प कs सकैत छलहुँ आ नहि हमरा मेअतेक हिम्मत छल जे हम किनको आओर सs बिमारी के विषय मेगप्प करितहुं। बच्चा सब तs बहुत छोट छलथि । जमशेदपुर पहुँचलहुँ तs लोकक एनाई गेनाइ शुरू भs गेलैक मुदा हमरा एको रत्ती नीक नहि लागय, की कहिये लोक सब सs से नहि बुझय मेआबय आ नय हम ओहि समय हुनका लग रहि जे किछु कहब या कि सुनब । लल्लन जी अपनहि जे कहबाक के रहैन्ह कहथि । ओहो कि कहितथि, कहि दैत छलाह जे सब ठीक भs जेतैक दबाई देने छथि डॉक्टर । भीतर मेहमरा की होइत छल ई तs हम वर्णन नहि कs सकैत छी मुदा ऊपर सs अवश्य देखेबाक कोशिस करियैक जे सब ठीक छैक । बाबुजी के सेहो पूरा गप्प नहि बुझल छलैन्ह । माँ बाबुजी चलि गेलाह आ फेर हम ई आ दुनु बच्चा रहि गेलहुँ । एक एक कsपरिवारक सब कियो हिनका देखय लेल अयलाह, ओहि मेमात्र बिनोदजी (हमर बहिनक पति ) जे की स्वयं डॉक्टर छथि, केर छोरि आओर किनको बीमारी के विषय मेनहि बुझल भेलैंह। वेल्लोर सs आबि ई तुरन्त ऑफिस जाय लगलाह संगहि दवाई सेहो चलय छलैन्ह । बीमारी केर ओहि समय केर वर्णन केनाइ हमरा लेल बड कठिन अछि । हमरो बुझल आ हिनको बुझल छलैन्ह जे बीमारी खतरनाक छैक आ डॉक्टर केर हिसाबे १५ साल सँ बेसी आदमी एहि बिमारी मेनहि जीवय छैक तथापि हम दुनु गोटे एहि सन्दर्भ मेबात केनाई तs दूर कहियो ई नहि बूझय देव चाहिए जे हम एहि सs चिंतित छी । सच पूछू तs हमर तs मोन कहियो नहि मानय जे हिनका एहेन बिमारी छैन्ह । सब दिन मोन मेहोय जे एतेक नीक लोग आ शंकर जी केर भक्त के ऐना कहियो नहि भs सकैत छैक,ठीक भs जेतैन्ह । हम अपना भरि तs सदिखन हुनकर ध्यान राखियैन्ह आ कोशिस राखी जे कोनो बात सs ई नहि बुझय मेआबैन्ह कि हम हिनकर बिमारी सs चिंतित छी। नहि जानि कियैक मुदा हमरा सब दिन हिनकर काज करय मेनीक लागैत छल आ हम हिनकर सब काज अपनहि करैत छलियैक । बीमार भेला पर तs स्वाभाविक छलैक काज बेसी होइत छलैक मुदा ओ हम अपनहि करैत छलियैक। एहि बीच मेबिनोद जी के पता चललैन्ह जे बनारस कोनो होमियोपेथिक डॉक्टर छैक जे एहि तरहक रोगक इलाज करैत छैक तs ओ ओहि ठाम जा ओकरा ओतहि सs दवाई लs आनलथिन्ह, जे हर तीन घंटा पर देबय के छलैक । घर पर देलाक बाद हम ऑफिस जयबाक समय संग दs दियैन्ह। राति मेसे छोरबाक नहि छलैक , हम घडी मेअलार्म लगा ली आ हर तीन घंटा पर उठि उठि कs दबाई दियैन्ह। मोन मेहोइत छल भगवान कहुना हिनका निक कs देथुन। हमारा भगवान पर पूर्ण विश्वास छल जे ओ नीक कs देथिन्ह। हमरा घर मेखास कs हमर माँ भोला बाबा के भक्त छथि ओ सदिखन कहैत भोला बाबा के मोन स ध्यान कयला सs ओ अवश्य सुनय छथि। हमरा होय जँ हम मोन सs भोला बाबा के ध्यान करबैन्ह तs अवश्य ओ हमर सुनताह कियैक नहि सुनताह। दबाई तs सब दिन हम जागि जागि क देलियैन्ह आ पूरा से भेलैक मुदा किछुए दिन बाद पता चललैक जे ओ डॉक्टर धोखेबाज छलैक आ लोक के दबाई मेस्टेरोइड मिला कs दैत छलैक । खैर ई सिलसिला त चलैत रहलैक। जहाँ कियो कहथि व पता चलैक जे ओ डॉक्टर या वैद नीक छथि या ओ किनको ठीक कयलथि या हुनका ओहि ठाम गेला सs फायदा भेलैन्ह हम ओहि ठाम जयबाक लेल हिनका मना लियैन्ह आ देखा दियैन्ह मुदा डॉक्टर प्रसाद केर दबाई कहियो बन्द नहि केलियैन्ह। वेल्लोर सs अयालक किछु मास बाद बिनोद जी आ सोनी( हमर दोसर बहिनक पति आ बहिन) केर भयानक दुर्घटना भ गेलैन्ह ई सुनतहि हम दुनु गोटे धनबाद पहुचलहुँ । भगवानक इच्छा छलैन्ह जे ओ सब बाचि गेलथि । धनबाद आ पटना मेइलाज करेलाक बाद हुनका सेहो इलाजक लेल वेल्लोर जेबाक छलैन्ह। हम आ लल्लन जी दोसर बेर वेल्लोर असगर गेलहुँ । बिनोद जी किछु दिन केर बाद पहुँचलाह आ हुनका सँग हुनक भाय आ एकटा संगी छलथिन्ह । एहि बेर फेर किछु दिनक लेल लल्लन जी के अस्पताल मेभर्ती होमय परलैन्ह आ सबटा जाँचक बाद डॉक्टर प्रसाद हिनका दबाई देलथिन्ह आ chemotherapy शुरू करबाक लेल कहि अस्पताल सs छोरि देलथिन्ह मुदा ओ एहि बेरक रिपोर्ट सs खुश नहि छलाह , जतबा सुधार के हुनका आश छ्लैन्ह ततबा नहि भेल छलैन्ह । वेल्लोर मेडॉक्टर के जे कहबाक रहैत छैक से ओ सबटा मरीज आ घरक लोक वा जे कियो सँग मेरहैत छैक हुनके सोझा मेकहि दैत छथि । लल्लन जी के बिमारी केर विषय मेसेहो हमरा आ लल्लन जी केर सोझा मेओ सब किछु कहैत छलाह । लल्लन जी तs किछु किछु डॉक्टर सs पुछि लैत छलाह मुदा हमरा हिम्मत नहि होय जे हम किछु पुछितियैन्ह । हमरा सब दिन मोन मेआशंका बनल रहैत छल जे हमरा पूरा तरह हुनक बिमारी के विषय मेनहि बुझल अछि। एक दिन हम विचारलहुँ जे असगर डॉक्टर प्रसाद लग जाय कs हुनका सs हम पुछबैन्ह हमरा लल्लन जी के सोझा मेपुछय केर हिम्मत नहि छल । अस्पताल सs जहिया छुट्टी भेटल छलैक ओहि दिन हम लल्लन जी के कहलियैन्ह अहाँ किछु समय बिनोद जी लग हुनके केबिन मेबैसु हुनको नीक लागतैंह आ हम किछु बजार सs लेने आबैत छी ताहि केर बाद होटल चलब । हम ई कहि हुनका सँग बिनोद जी केर केबिन गेलहुँ आ किछु समय बाद लल्लन जी के छोरि ओहि ठाम सs निकलि सीधा डॉक्टर प्रसाद लग चलि गेलहुँ। हुनका स जे जानकारी भेटल ओ सुनि हमर तs माथ घुमि गेल मुदा हम अपन हिम्मत नहि छोरलहुँ आ ओहि ठाम सs सीधे निकलि बिनोदजी केर केबिन दिस जेबाक लेल जहिना निकललहुँ सामने लल्लन जी के आबैत देखि हम चुप चाप दोसर दिस मुडि गेलहुँ । हम हुनका डॉक्टर प्रसाद केर कक्ष मेजाइत साफ़ देखलियैन्ह मुदा ओ हमरा नहि देखि पयलाह । एहि तरह केर हम सिनेमा मेदेखने छलियैक मुदा असल जीवन मेहमरा सँग होयत, ई कहियो सोचनहु नहि छलियैक । हम सीधा बिनोदजी केर केबिन के लेल चलि देलहुँ मुदा रास्ता भरि डॉक्टर प्रसादक बात दिमाग मेघुमैत छल जे आब अहाँ दोसर बेर WBC आ bone marrow transplantation केर सोचि कs आयब, दोसर ई जे बाद मेहड्डी ततेक कमजोर भs जयतैन्ह जे बहुत ध्यान देबय पड़त नहि तs हड्डी टूटय के डर रहतैंह तेसर ई जे हुनक चालिस प्रतिशत cells malignant छलैन्ह जे डॉक्टर केर कहनानुसार ठीक नहि छलैक। हम इ त बुझिए गेल छलहुँ जे लल्लन जी सेहो हमरा परोछ मेकिछु डॉक्टर प्रसाद सँ पुछय चाहैत छलाह आ ओहि लेल हुनका लग गेल छलाह । इ सोचि हमरा आओर भीतर सँ तकलीफ होइत छल जे हुनका सब बात बुझल रहतैंह तs हुनका मोनमेसदिखन तरह तरह केर भावना आबैत रहतैंह। हमरा वेल्लोर अस्पताल केर आ डॉक्टर केर इ एको रत्ती नीक नहि लागल। कम स कम रोगी के नहि बतेबाक चाहि। हम सदिखन अपन किस्मत पर गौरवान्वित होइत छलहुँ आ आजु होइत छल हे भगवान हमर इ भ्रम के नहि तोरु । बिनोद जी केर केबिन मेपहुँचि हम बैसि गेलहुँ, एक बेर नहि पुछालियेंह हिनका विषय मे। बिनोद जी अपनहि कहलाह , "ठाकुर जी नहि भेटलाह ओ तs अहिं के ताके लेल गेलाह अछि । हम बस एतबहि कहलियैन्ह आबि जयताह । हम अपन मोन मेआबय वाला एक एक टा उद्वेग के कोना कहितियैन्ह। ओना त एकटा कहबी छैक "जाबैत साँस ताबैत धरि आस " मुदा हमरा तs पूर्ण विश्वास छल जे लल्लन जी के किछु नहि होयतैन्ह मात्र किछु दिनक ग्रहक चक्कर छैक, तथापि चिन्ता तs होइते छल । हम इ कोना कही जे चिन्ता नहि होइत छल । हमारा सब केर वेल्लोर सs अयालक किछु मास बाद दादा जी (हमर ससुर) अयलाह। एक दिन दादा जी लल्लन जी सs गप्प करैत छलाह, हम दोसर कोठरी मे छलहुँ मुदा हुनकर सबहक गप्प ओहिना स्पष्ट सुनाई परैत छल । जहिना हम हिनक बिमारी के विषय मे गप्प करैत सुनालियैक ओहि घर मे रुकि गेलहुँ आ दादा जी आ लल्लन जी केर गप्प सुनय लगलहुँ । दादा जी हिनका सs कहैत छलाह "अहाँ चिंता जुनि करू अहाँ केर मात्र ग्रहक चक्कर अछि , हम बेबी बाबु सs अहाँक आ अपन टिपनि देखेलियैक अछि अहाँके किछु कष्ट अवश्य अछि मुदा हमरा पुत्र शोक नहि अछि "। इ सुनी लल्लन जी आ दादा जी केर मुख मंडल पर आबय वाला भाव तs हम नहि देखी सकलियैक मुदा कल्पना अवश्य केलहुँ । खास कs लल्लन जी केर जिनका हम खूब नीक सs चिन्हैत छलियैक । हम आगू नहि सुनी सकलियैक आ ओहि ठाम सs चलि गेलहुँ । मनुष्य कतेक विवश होइत छैक ? दादा जी अपन इच्छा हिनका लग व्यक्त कयने रहथि जे हुनक इच्छा छलैन्ह जे हुनक बेटा सब सेहो मधुबनी मे घर बनाबथि , हमरा एक बेर लल्लन जी इ बात कहने छलाह । दादा जी जमशेदपुर सँ गेलाक किछुए दिन बाद एकटा चिट्ठी पठौलथि जाहि मे लिखने छलाह जे ओ मधुबनी मे मकानक लेल जमीन देखि रहल छथि संगहि गाम पर सेहो एकटा जमीन छैक आ हुनक इच्छा छैन्ह जे ओ जमीन लल्लन जी लs लेथि । चिट्ठी अयलाक किछुए दिन बाद दादा जी केर दोसर चिट्ठी अयलैन्ह जाहि मे ओ लल्लन जी के पाई लs कs गाम वाला जमीन रजिस्ट्री कराबय लेल आबय के लेल लिखने छलाह संगहि एकटा मधुबनी मे मकान लेल नीक जमीन छलैक सेहो लिखने छलाह । लल्लन जी मधुबनी गेलाह आ गामक जमीन रजिस्ट्री करा लेलथि संगहि हुनका मधुबनी वाला जमीन सेहो पसीन आबि गेलैन्ह आ ओहि जमीन वाला सँ सेहो गप्प करि कs आबि गेलाह । किछु दिन बाद पाई केर इंतजाम करि कs दादा जी केर पठा देलथिन्ह आ दादा जी केर जमीन रजिस्ट्री कराबय लेल कहि देलथिन्ह । हमरा कहलाह "ओना तs हमरो इच्छा नहि छल मधुबनी मे मकान बनेबाक, मुदा दादा कहि देलाह तs हुनकर इ इच्छा अवश्य पूरा होयतैन्ह "। लल्लन जी केर सोचब सच मे ठीक छलैन्ह, जमीन किनला के बाद सs दादा जी बड खुश रहैत छलाह । Tisco सँ घर बनेबाक लेल क़र्ज़ (loan) भेटय मे किछु समय लागि गेलैक । ता धरि दादा जी नींव दियेबाक सबटा दिन देखवा लेलाह । नींव देलाक सँग घर बनय लगलैक हम दुनु गोटे सँग मे पंडित जी सेहो मधुबनी घर बनेबाक लेल गेल छलहुँ । पता नहि कोन धुन छलैन्ह आ की सोचय छलाह मुदा हम सब जे सोचि कs घर बनाबय लेल गेल रही ताहि सँ बेसी नीक घर बनि गेलैक । एक तs अपने" सिविल इंजिनियर " मकानक सबटा नक्सा अपने बनने छलाह आ दुनु गोटे ठाढ़ रहैत छलहुँ तs किछु नय किछु अपन सुविधाक ध्यान आबिये जाइत छल । मिला जुला कs हमरा सबहक हिसाबे जतबा मकान मद मे लगबाक चाहि ओहि सँ बहुत बेसी भs गेलैक मुदा कोनो वस्तु मे हम सब कटौती नहि केलियैक सब सामन नीके लगायल गेलैक। बेसी सामन तs जमशेदपुर सँ ट्रक सs किनि कs पठायल गेल छलैक । मकान बनैत छल ओहि समय मे कखनहु कs हमरा मोन मे होइत छल जे बेकार मे एतेक खर्च कs रहल छियैक मकान केर पाछू मुदा हिनका नहि कहि पाबियैन्ह । मकान बनय मे तs ओना छौ मास लागि गेलैक मुदा दो मास लगातार हम , लल्लन जी आ पंडित जी (जे हमर बेटे सन छथि ) तीनू गोटे छलहुँ ओहि केर बाद बीच बीच मे हम आ लल्लन जी अबियैक आ किछु दिन रहि चलि जाइत छलियैक मुदा पंडित जी छौ मास धरि लगातार रहलाह आ मकान बनि गेलाक बादे जमशेदपुर आपस गेलाह । खैर छौ मास मे मकान बनि कs तैयार भs गेलैक । गृह प्रवेशक दिन देखा कs गृह प्रवेश सेहो खूब धूम धाम सँ भेलैक । गृह प्रवेशक किछुए दिन बाद हमर देवर केर विवाह छलैन्ह जाहि मे लल्लन जी बड उत्साहित छलाह आ विवाह सेहो नीक सँ संपन्न भेलैक । गृह प्रवेश सँ विवाह धरि ओहि बेर हम सब करीब एक मास मधुबनी मे रही आ अपन ओहि मकान मे छलहुँ मुदा एकटा प्रसन्नता होइत छैक, से पता नहि कियैक हमरा भीतर सँ नहि होइत छल। इ भावी दुखक संकेत छल कि की, नहि जानि । लल्लन जी हमरा सs किछु नहि नुकाबय छलाह आ नहि हम हुनका कोनो काज मे बाधा दियैन्ह आ कि मना करियैन्ह। हुनका मोन मे अपन माँ पिता जी भाई बहिन के प्रति अपार स्नेह छलैन्ह । माँ केर तs ओ परम भक्त छलाह , माँ किछु कहि देथिन्ह तs हुनकर प्रयास रहैत छलैन्ह जे ओ ओकरा अवश्य पूरा करैथ मुदा एहेन विडम्बना जे हुनकर बीमारी के विषय मे हम माँ के नहि कहि सकलियैन्ह। माँ के मात्र एतवा बुझल छलैन्ह जे लल्लन जी केर बेर बेर बुखार भs जाइत छैन्ह । मनुष्य जखैन्ह दुःख मे रहैत अछि तs ओकरा भगवान छोरि और किछु मोन नहि रहैत छैक । ओ अपन दुःख मे ततेक नहि ओझरायल रहैत छैक जे आन किछु सोचबाक ओकरा फुर्सत नहि भेंटैत छैक । लल्लन जी सन व्यक्तित्व केर बाते किछु आओर होइत छैक । अपने बीमार छलाह मुदा दोसर केर विषय मे सदिखैन सोचैत रहैत छलाह । कखनहु कs हुनक एहि तरहक सोच देखि हमहु बिसरि जायत छलहुँ जे ओ बीमार छथि मुदा एहेन कोनो दिन नहि होइत छलैक जे हम राति मे हुनका विषय मे नहि सोचैत छलहुँ । हमर तs जेना नींद उरि गेल छल , राति या तs टक टकी लगा कs बितैत छल या नहि तs नोर बहा कs । दोसर तरफ़ मुँह कs हम भरि राति कानैत रहि जाइत छलहुँ। एक तs लल्लन जी बीमार छलाह दोसर हम एहि विषय मे किनको सs नहि कहने रहियैन्ह आ नहि हम ओकर चर्च करैत छलहुँ खास कs बच्चा सब लग तs एकदम नहि । सब सs कष्टप्रद छलs जे हमरा दुनु गोटे के सबटा बुझल छल मुदा हम सब एक दुसरा संग सेहो कखनो एहि विषय पर गप्प नहीं करैत छलियैक । की गप्प करितियैक , कोना करितियैक मुदा एक दिन लल्लन जी केर मुँह सs निकलिए गेलैन्ह आ हमरा पुछि देलाह । हमरा ओहिना मोन अछि, हमर मंगल व्रत छल साँझ मे खेलाक बाद हमर माथ घुमय छल हम बिछौना पर आबि कs परल रही लल्लन जी टीवी देखय छलाह किछुए समय बाद ओहो आबि कs हमरा बगल मे परि रहलाह । इ देखि पता नहि हमर मोन आओर बेचैन भs गेल हम मुँह झाँपि कs दोसर दिस घुमि गेलहुँ । ओहि घर मे मात्र हम दुनु गोटे छलहुँ । अचानक लल्लन जीक आवाज कान मे आयल "किछु होइत अछि की , आकि फेर माथ घूमि रहल अछि" । हम किछु नहि बजलियैन्ह , हम ऐना परल छलहुँ जेना हम सुतल रहि , मुदा ओ तs हमर एक एक टा मोनक गप्प बुझैत छलाह तुरन्त कहलाह हम सब बुझैत छी अहाँक मोनक गप्प , मुदा हमरा बाद अहाँ की करब"? बस एतबहि बजलाह आ चुप भs गेलाह । इ सुनतहि हमर माथ जेना सुन्न भs गेल , हमरा किछु नहि फुरायल आ नहि किछु बाजि भेल मुदा हमर आँखि सs नोर ढब ढब खसय लागल आ ओ रुकय के नाम नहि लैत छल । ओहि राति हम पहिल बेर लल्लन जी के सोंझाँ मे हुनका बीमार भेलाक बाद कानल छलहुँ आ भरि राति कानैत रहि गेलहुँ । लल्लन जी केर सेहो एतबा हिम्मत नहि छलैन्ह जे हमरा चुप्प करबितथि । लल्लन जी हमरा सs किछु नहि नुकाबय छलाह आ नहि हम हुनका कोनो काज मे बाधा दियैन्ह आ कि मना करियैन्ह। हुनका मोन मे अपन माँ पिता जी भाई बहिन के प्रति अपार स्नेह छलैन्ह । माँ केर तs ओ परम भक्त छलाह , माँ किछु कहि देथिन्ह तs हुनकर प्रयास रहैत छलैन्ह जे ओ ओकरा अवश्य पूरा करैथ मुदा एहेन विडम्बना जे हुनकर बीमारी के विषय मे हम माँ के नहि कहि सकलियैन्ह। माँ के मात्र एतवा बुझल छलैन्ह जे लल्लन जी केर बेर बेर बुखार भs जाइत छैन्ह । मनुष्य जखैन्ह दुःख मे रहैत अछि तs ओकरा भगवान छोरि और किछु मोन नहि रहैत छैक । ओ अपन दुःख मे ततेक नहि ओझरायल रहैत छैक जे आन किछु सोचबाक ओकरा फुर्सत नहि भेंटैत छैक । लल्लन जी सन व्यक्तित्व केर बाते किछु आओर होइत छैक । अपने बीमार छलाह मुदा दोसर केर विषय मे सदिखैन सोचैत रहैत छलाह । कखनहु कs हुनक एहि तरहक सोच देखि हमहु बिसरि जायत छलहुँ जे ओ बीमार छथि मुदा एहेन कोनो दिन नहि होइत छलैक जे हम राति मे हुनका विषय मे नहि सोचैत छलहुँ । हमर तs जेना नींद उरि गेल छल , राति या तs टक टकी लगा कs बितैत छल या नहि तs नोर बहा कs । दोसर तरफ़ मुँह कs हम भरि राति कानैत रहि जाइत छलहुँ। एक तs लल्लन जी बीमार छलाह दोसर हम एहि विषय मे किनको सs नहि कहने रहियैन्ह आ नहि हम ओकर चर्च करैत छलहुँ खास कs बच्चा सब लग तs एकदम नहि । सब सs कष्टप्रद छलs जे हमरा दुनु गोटे के सबटा बुझल छल मुदा हम सब एक दुसरा संग सेहो कखनो एहि विषय पर गप्प नहीं करैत छलियैक । की गप्प करितियैक , कोना करितियैक मुदा एक दिन लल्लन जी केर मुँह सs निकलिए गेलैन्ह आ हमरा पुछि देलाह । हमरा ओहिना मोन अछि, हमर मंगल व्रत छल साँझ मे खेलाक बाद हमर माथ घुमय छल हम बिछौना पर आबि कs परल रही लल्लन जी टीवी देखय छलाह किछुए समय बाद ओहो आबि कs हमरा बगल मे परि रहलाह । इ देखि पता नहि हमर मोन आओर बेचैन भs गेल हम मुँह झाँपि कs दोसर दिस घुमि गेलहुँ । ओहि घर मे मात्र हम दुनु गोटे छलहुँ । अचानक लल्लन जीक आवाज कान मे आयल "किछु होइत अछि की , आकि फेर माथ घूमि रहल अछि" । हम किछु नहि बजलियैन्ह , हम ऐना परल छलहुँ जेना हम सुतल रहि , मुदा ओ तs हमर एक एक टा मोनक गप्प बुझैत छलाह तुरन्त कहलाह हम सब बुझैत छी अहाँक मोनक गप्प , मुदा हमरा बाद अहाँ की करब"? बस एतबहि बजलाह आ चुप भs गेलाह । इ सुनतहि हमर माथ जेना सुन्न भs गेल , हमरा किछु नहि फुरायल आ नहि किछु बाजि भेल मुदा हमर आँखि सs नोर ढब ढब खसय लागल आ ओ रुकय के नाम नहि लैत छल । ओहि राति हम पहिल बेर लल्लन जी के सोंझाँ मे हुनका बीमार भेलाक बाद कानल छलहुँ आ भरि राति कानैत रहि गेलहुँ । लल्लन जी केर सेहो एतबा हिम्मत नहि छलैन्ह जे हमरा चुप्प करबितथि । लल्लन जी केर बीमारिक किछुए दिन बाद पता चललैक जे प्रभाकर जी (हिनक मित्र श्री पशुपति जी केर सबस छोट भाई ) जे पहिनहिं सँ बीमार छलाह केर किडनी के बीमारी छैन्ह आ हुनका डॉक्टर वेल्लोर लs जेबाक लेल कहि देने रहथिन्ह । ओ सभ जखैन्ह वेल्लोर सs अयलाह तs पता चललैक जे प्रभाकर जी केर दोसर किडनी लगाबय परतैक जाहि मे बहुत पाइक काज परतैक । सब चिंतित छलाह मुदा लल्लन जी अपना दिस सs हुनका लोकनि के आश्वासन देलथिन्ह आ अपने बीमार रहितो एकटा नाटक लिखी कs ओकरा सँग सांस्कृतिक कार्यक्रम केर आयोजन करि ओकर टिकट सँ जे पाई जमा भेलैक ओ प्रभाकर जी केर इलाजक लेल राखि देल गेलैक । लल्लन जी केर बीमारिक विषय मे शायद हमरा सँ बेसी वर्णन नहीं कयल होयत मुदा एतबा जरूर छैक हम आब सोचैत छियैक तs हमारा अपनहि आश्चर्य होइत अछि जे ओहि समय मे भगवान पता नहि कोना ओतेक शक्ति देने रहैथ। एक तs हम हुनक बीमारिक विषय मे सुनलाक बादो अपन संतुलन बनेने रही , दोसर सब दिन संग मे रहितहु हम नहि हुनका आ नहि कहियो दोसर के अपन मानसिक स्थिति केर पता चलय देलियैक । मुदा हमर नींद एकदम चलि गेल, सब राति करवट बदलि कsबिताबैत छलहुँ। कैयेक राति ततेक नहि घबराहट होइत छलs जे हम उठि कs टहलय लागैत छलहुँ । ताहि पर विडम्बना जे नहि हम किनकहु सs लल्लन जी केर बीमारिक विषय मे कहने रहियैंह आ नहि कहि सकैत छलियैक । डॉक्टर कहनहीं रहथिन्ह जे हड्डी मे दर्द होयतैंह ख़ास कs बाँहि मे। राति मे हम ततेक सम्हारि कs सूती, डर होइत छल जे कहीं चोट नहि लागि जायेन्ह। भरि राति दर्द ठीके होइत छलैन्ह आ हम जौं बिसरियो जाइयैक तs हुनक दर्द से कुहरैत देखि तुरंत मोन परि जाइत छल । हमरा तs जेना आदति भs गेल छल हमेशा एक हाथ हिनक बाँह पर धs कs धीरे धीरे दबाबैत रहैत छलियैक । कहबी छैक "डूबते को तिनके का सहारा "। हमरा जहिना कतहु पता लागय जे कोनो नीक डॉक्टर छथि चाहे ओ होम्योपैथी हो व आयुर्वेदी हम कोसिस करी जे लल्लन जी के देखा दियैक । लल्लन जी केर बीमारी के विषय मे मात्र बिनोद जी के सबटा बुझल छलैन्ह । हुनाका पता चललैंह जे कोनो होम्योपैथी डॉक्टर बनारस मे छैक आ ओ कैंसर तक केर इलाज करैत छैक अपने डॉक्टर आ नीक डॉक्टर रहैत ओ बनारस गेलाह आ हिनका लेल होम्योपैथी दबाई आनलथिन । डॉक्टर कहने छलैक जे एक दम समय पर दबाई देबाक छैक आ हर तीन तीन घंटा पर दबाई देबाक छलैक । हम हर तीन घंटा पर दबाई दियैक आ राति मे सेहो घड़ी मे अलार्म लगा लगा कs दियैक । ओना तs हमरा नींद नहि होइत छल, मुदा कहीं नींद लागि गेल आ दबाई छूटि नहि जाय से सोचि अलार्म लगा लियैक , मुदा भगवान तहियो नहि सुनलाह। एक दिन पता नहि कोना भोरका पहर ३ बजे दबाई देबाक छल मुदा हमर आंखि लागि गेल आ अलार्म सेहो नहि बाजलैक । भोर मे हरबरा कs उठलहुँ आ उठला पर हमरा ततेक अफ़सोस भेल भरि दिन कानैत रही गेलहुँ । नहि भरि दिन खेबाक इच्छा भेल आ नहि कोनो काज मे मोन लागय । साँझ मे लल्लन जी हमरा बहुत समझेलाह आ कहलाह एक बेर किछु देरी सs दबाई देला सs किछु नहि होयतैक । खैर दबाई तs जतबा डॉक्टर कहने रहैन्ह ततेक पूरा खेलाह आ ओहि दिन केर बाद कोनो दिन एको मिनट देरी सs नहि देलियैन्ह । किछु दिन बाद पता चललैक जे ओ डॉक्टर बेईमान छलैक आ ओ दबाई मे steroid मिला कs बेचैत छलैक । एक दिन लल्लन जी केर ऑफिस मे एक गोटे सँ पता चललैन्ह जे पूना मे एकटा बहुत पुरान डॉक्टर छथि ओ एहि बीमारिक इलाज करैत छथि । बस हम सब पूना जएबाक अपन कार्यक्रम बना लेलहुँ । हमर बड़का बेटा पुत्तु, ओहि बेर पूना मे नाम लिखेने छलाह ओ अपन सामन लेबय ले आबय वाला छलाह , तय भेलैक जे ओ आबिये रहल छथि हुनके सँग पूना जायल जेतैक । हमर सब केर पूना जेबाक तैयारी होइत छलैक एहि बीच मे लल्लन जी केर मोन किछु बेसी ख़राब भs गेलैन्ह । जमशेदपुर केर अस्पताल मे भरती भेलाह । पता चलैक जे फेर खून बहुत कम छलैन्ह , डॉक्टर खून चढेबा लेल कहलैंह आ विचार विमर्श के बाद भेलैक जे एहि बेर टाटा मेमोरिअल refer कs रहल छैन्ह कियैक तsओहि ठाम डॉक्टर अडवानी छथि जे कि भारत केर सब सँ नीक oncologist छलैथ । डॉक्टर सब अस्पताल सँ छोरय समय refer कs देलथिन्ह । आब हम सब तय केलियैक जे बम्बई तक पुत्तु सँग हम सब जायब आ ओहि ठाम देखेलाक बाद पूना सेहो जायब । पुत्तु के सेहो देखि लेबैन्ह कोना रहैत छथि आ पूना वाला डॉक्टर सsसेहो देखा लेबैक । हम सब पुत्तु के सँग बम्बई गेलहुँ ओहि ठाम हमर तेसर बहिन केर घरवाला, हेम जी सेहो अयलाह डॉक्टर अडवानी सs देखायल गेलैक । डॉक्टर अडवानी केर हिसाबे दबाई ठीके चलय छलैक मुदा ओ किछु और दबाई देलाह आ एक साल के बाद अयबाक लेल कहलाह । खैर हम सब डॉक्टर स देखा पूना चलि गेलहुँ आ दोसर दिन भोर मे डॉक्टर केर पता लs खोजय निकललहुँ । पता जे छल ताहि पर पहुँचि तs गेलहुँ आ डॉक्टर अपनहि निकलल मुदा ओकर व्यवहार आ बात करय के ढंग तेहेन छलैक जे बुझायल जेना हम सब भिखमंगा होइ । ओ हमरा सब के एकटा पता बतेलैथ आ इ कहि भगा देलैथ जे ओहि ठाम जाऊ मरीजक इलाज ओहि ठाम होइत छैक इ हमर घर अछि । खैर हम सब खोजैत पहुँचि तs गेलहुँ, ओहि ठाम डॉक्टर बहुत समय रुकलाक बाद भेंटलथि आ इहो पता चलल जे असल मे डॉक्टर ओ व्यक्ति छलाह जिनका ओहि ठाम हम सब पहिने गेल छलहुँ आ पहिने ओ घर पर देखय छलाह । इ हुनक एकटा सहायक डॉक्टर छथिन्ह । खैर लल्लन जी एकदम देखाबय लेल तैयार नहि छलाह तथापि हम हुनका मना कs देखाबय लेल तैयार केलियैंह । जखैन्ह डॉक्टर सsपुछलियैन्ह जे कतेक समय लागत तs ओ इम्हर उम्हर करैत छल आ मात्र एतबा कहलैथ बैठिये अभी समय लगेगा आ सब किछु संदेहास्पद बुझाइत छल । लल्लन जी इशारा दs हमरा अपना दिस बजेलाह आ कहलाह चलु हम एहि ठाम नहि देखायब । हम कतबहु कहलियैन्ह नहि मनलाह आ हम सब बिना देखेनहि वापस भs गेलहुँ । बेचन ठाकुर, गाम चनौरागंज, झंझारपुर, मधुबनी। महान सामाजिक मैथिली नाटक- बाप भेल पित्ती पहिल अंक दृश्य- एक (स्थान- लखनक घर। दलानपर लखन, लखनक कक्का मोतीलाल, भाए बौहरू बड़का बेटा मनोज आ छोटका बेटा संतोष उपस्थित छथि। लखन चिन्तित मुद्रामे छथि। सभ कियो चौकीपर बैस विचार-विमर्श कए रहल छथि। बारह वर्षीय मनोज आ दस बर्षीय संतोष दलानपर माटि-माटि खेल रहल अछि। मोतीलाल- लखन, चिन्ता-फीकीर छोड़ू। की करबै? भगवानकेँ जे मर्जी होइत अछि, ओकरा के बदलि सकैत अछि? अहाँ कनियाँकेँ एतबे दिनका भोग छेलै। आब अहाँक की विचार भऽ रहल अछि? लखन- कक्का, अपने सभ जे जेना विचार देबै। मोतीलाल- हम सभ की विचार देब? पहिने तँ अहाँक अपन इच्छा। लखन- दूटा छोट-छोट बौआ अछि। ओकर पतिपाल केना हाएत? जँ कुल-कनियाँ नीक भेटत तँ दोसर कऽ लइतौं। मोतीलाल- भातीज, अहाँक नीक विचार अछि। ऐ उमेरमे अहाँक िनर्णए हमरो उचित बुझना जाइत अछि। बौहरू- कक्का, एगो कहबी जे छै ‘सतौत भगवानोकेँ नै भेलै’ से? मोतीलाल- बौआ, तोहर की कहब छह? लखनकेँ बिआह नै करबाक चाही की? बौहरू- हँ, हमर सहए कहब रहए। भैया कनी तियाग कऽ दुनू छौंराकेँ पढ़ा-लिखा कऽ बुधियार बनाबितथि। ओना भैयाकेँ कनियाँ केहेन भेटतनि केहेन नै। मोतीलाल- हमरा विचारसँ लखनक परिस्थिति बिआह करैबला अवस्स अछि। लखन- कक्का, नजरिमे दऽ देलौं। जदी सुर-पता लगए तँ जोगार लगाएब। मोतीलाल- बेस देखबै। पटाक्षेप। दृश्य- 2 (स्थान- मदनक घर। ओ अपन बिआहल बेटीक बिआहक चिन्तामे लीन छथि। कातमे पत्नी-गीता दलान झाड़ि रहल छथि। मोतीलालक समधिक समधि हरिचन मोतीलालकेँ मदनक ऐठाम कुटुमैतीक संबंधमे लऽ जाए रहल छथि। हरिचन मदनक ग्रामीण छथि। हिनका दुनूक पहुँचैत मातर गीता घोघ तानि अन्दर चलि जाइत छथि। दलानपर तीन-चारिटा कुर्सी लागल अछि। मोतीलाल आ हरिचनक प्रवेश।) हरिचन- (कर जोड़ि) नमस्कार मदन भाय। मदन- नमस्कार नमस्कार। मोतीलाल- नमस्कार कुटुम। मदन- नमस्कार नमस्कार। बैसै जाइ जाउ। (दुनू जन बैसलाह।) संजय, संजय, बेटा संजय, संजय। संजय- (अन्दरसँ) जी पिताजी, हइए ऐलौं। (संजयक प्रवेश।) (हरिचनकेँ मदन पकड़ि कऽ अंदर लऽ जाइत छथि।) मदन- लड़िकाकेँ बेटा दुगो छै आ अस्था-पाती? हरिचन- गोटेक बीघाक अन्दरे छै। अपना भरि कोनो दिक्कत नै छै। मदन- की करी की नै, किछु नै फुराइए। हरिचन- हमरा सभकेँ लेट होइए। यदि विचार हुअए तँ हुनका लड़िकी देखाए दियनु। नै तँ कोनो बात नै। मदन- बेस, अपने दलानपर चलू। हम बुच्चीकेँ लेने आबै छी। (हरिचन दलानपर आबि गेलाह। किछुए काल बाद मदन सेहो आबि गेलाह।) मदन- चलू, देखल जेतै। कऽ लेबै। आगू भगवानक मर्जी। हम लड़िकीक बाप छिऐ। तँ हमरा लड़िका देखबाके चाही। मुदा हम सभ दिन अहाँपर विश्वास करैत रहलौं। आइ कोना नै करब? हरिचन- हम अहाँक संग कहियो बिसवासघात केलौं? मदन- से तँ कहियो नै। ओना दुनियाँ बिसवासेपर चलै छै। (वीणाक संग मीनाक प्रवेश। मीना सभकेँ पएर छूबि गोर लगैत अछि।) हरिचन- कुर्सीपर बैसू बुच्ची। (मीना कुर्सीपर बैसैत अछि। वीणा ठाढ़े अछि।) मोतीलाल बाबू, लड़िकीकेँ किछु पूछबो करबनि, तँ पुछियौ। मोतीलाल- की पुछबनि, किछु नै। हरिचन- बुच्ची अहाँ चलि जाउ। (मीना सभकेँ गोर लागि अन्दर गेलीह।) मदन- हरिचन भाय, लड़िकी अपने सभकेँ पसीन भेलीह? मोतीलाल- हँ, लड़िकी हमरा लोकनिकेँ पसीन अछि। मदन- तहन अगिला कार्यक्रम की हेतै? हरिचन- जे जेना करीऔ। ओना हम विचार दैतौं जे बिआह मंदिरमे कऽ लैतौं। चीप एण्ड बेस्ट। मदन- कहिया तक? हरिचन- कहिया तक, चट मंगनी पट बिआह। काल्हिये कऽ लिअ। बढ़िया दिन छै। कुटुमैती लगा कऽ नै रखबाक चाही। मदन- भाय, ओरियान कहाँ किच्छो छै? हरिचन- जे भेलै सेहो बढ़िया, जे नै भेलै सेहो बढ़ियाँ। आदर्शेमे आदर्श। मदन- बेस, काल्हुके दिन रहए दिऔ। हरिचन- जाउ, जे भऽ सकए, ओरियान करू। हम सभ सेहो जाइ छी। जय रामजी की। मदन- जय रामजी की। (हरिचन आ मोतीलालक प्रस्थान।) होनी जे हेबाक हेतै, सएह ने हेतै। आप इच्छा सर्वनाशी, देव इच्छा परमबल:। पटाक्षेप। दृश्य- 3 (दृश्य- लखनक बरिआतीक तैयारी। वर लखन, मोतीलाल, बौहरू, मनोज आ संतोष मदनक ओइठाम जा रहल छथि। मदन अपन घरक कातमे एकटा शिव मंदिरक प्रांगणमे बिआहक पूर्ण तैयारी केने छथि। सात गोट कुर्सी आ एक गोट टेबूल लगल अछि। पंडीजी गणेश महादेवक पूजा कए रहल छथि। मदन, मीना, गीता हरिचन, संजय आ वीणा मंदिरक प्रांगणमे थहाथही कए रहल छथि तथा बरियातीक प्रतीक्षा कए रहल छथि। मीना कनियाँक रूपमे पूर्ण सजल अछि। बरियाती पहुँचलाह। डोलमे राखल पानिसँ सभ बरियाती हाथ-पएर धोइ कऽ कुर्सीपर बैसलाह आ लखन वरबला कुर्सीपर बैसलाह। बापेक कातमे एक्के कुर्सीपर मनोज आ संतोष बैसलाह। मदन प्रांगणमे आबि जलखैक बेवस्था केलनि। सभ कियो जलखै कऽ रहल छथि।) मनोज- पापा, पापा, नाच कखैन शुरू हेतै? लखन- धूर बूरबक, अखैन किछु नइ बाज। लोक हँसतौ। मनोज- किअए हौ, लोक हँसतै तँ हमहूँ हँसबै। कहऽ न नटुआ कखैन औतै? लखन- चुप चुप, नटुआ नै कही। लड़िकी औतै। मनोज- कए गो लड़िकी औतै? आर्केस्ट्रा कखैन शुरू हेतै? लड़िकी संगे हमहूँ नचबै, गेबै आ रूमाल फाड़ि कऽ उड़ेबै। पापा हौ, लड़िकीकेँ कहबै खाली रेकाँडिंगे डांस करैले। अगबे भोजपूरीयेपर। लखन- चूप बड़ खच्चर छेँ रौ। आर्केस्ट्रा नै हेतै। डांस नै हेतै। मनोज- तखन एतए की हेतै हौ पापा? लखन- हमर बिआह हेतै बिआह। संतोष- पापा हौ, तोहर बिआह हेतै आ हमर नै। लखन- हँ हँ, तोरो हेतै। संतोष- कहिया हेतै? लखन- नमहर हेबहीन तहन हेतौ। संतोष- हम नमहर नै छिऐ। एत्तेटा तँ भऽ गेलिऐ। आब बिआह कहिया हेतै? लखन- बीस साल बाद हेतौ। संतोष- बीस साल बाद बुढे भऽ जेबै तँ बिआह कए कऽ की हेतै? हम आइये करब। लखन- आइ तोरा ले लड़िकी कहाँ छै? संतोष- आँइ हौ पापा, तोरा ले लड़िकी छै आ हमरा ले नै छै। केकरोसँ कऽ लेबै। लखन- केकरासँ करबिहीन? संतोष- मौगी सभ औतै न, तँ ओइमे जे सभसँ मोटकी मौगी हेतै, ओकरेसँ करबै। दूधो खूब पीबै नम्हरो हेबै आ मोटेबो करबै। पापा हौ, हमरा लोकनियामे तोरे रहए पड़तह। लखन- बेस रहबौ बौआ। (जगमे पानि आ गिलास लऽ कऽ संजयक प्रवेश। सभ कियो पानि पीलनि आ हाथ-मुँह धोइ अपन-अपन जगहपर बैसलाह। पंडीजी पूजा पूर्णाहुतिक पश्चात वर लग बैस जलखै केलाह।) गणेश- अहाँ सभ विलंब किअए करै छी? बिआहक मुहुर्त्त हुसि रहल अछि। हौ, हौ, जल्दी चलै चलू। कोनो चीजक टेम होइ छै किने? (लड़िकीक संग सरयातीक प्रवेश। सभ कियो मंदिरपर गेलाह। सतहपर बिछाएल दरीपर बैसलाह।) गणेश- आउ लड़िका-लड़िकी, हमरा लग बैसू। (लखन आ मीना पंडीजी लग बैसैत छथि। पंडीजी दुनूकेँ अपन रामनामबला चद्दरि ओढ़ा दैत छथिन। दुनूकेँ हाथमे अरबा चाउर आआेर कुश दइ छथिन।) गणेश- लड़िका-लड़िकी पढ़ू- मंगलम् भगवान विष्णु, मंगलम् गरूड़ध्वज: मंगलम् पुण्डरीकाक्ष मंगलाय तनोऽहरि:।। लखन, मीना- मंगलम्.....। (पंडीजी तीन बेर ई मंत्र पढ़ा कऽ अपना बगलमे राखल सेनूरक पुड़ियामे सँ एक चुटकी सेनूर लड़िकाक हाथमे देलनि।) गणेश- बिआहक मुहुर्त्त बीति रहल छल। तँए हम एक्केटा मंत्रसँ बिआह करा दै छी। आब सिन्दुरदान होइए। लड़िका, लड़िकीक मांगमे सेनूर दिअनु। (लखन मीनाक मांगमे सेनूर देलनि।) आब अपने सभ दुर्वाक्षत दिअनु। (पंडीजी पैघ सबहक हाथमे दुर्वाच्छत देलखिन।) मंत्र- ऊँ. आब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसौ जायतामाराष्ट्रे राजन्य: शूर........ सन्तु पूर्णा सन्तु मनोरथा शत्रुणां बुद्धिनाशोस्तु मित्राणामुदयस्तव। (मंत्रक बाद सभ कियो लड़िका-लड़िकीकेँ दूर्वाक्षत देलखिन।) लाउ, दुनू समधि दक्षिणा-पाती। सस्तेमे अहाँ सभ निमहि गेलौं। (दुनू समधि एकावन-एकावन टका दक्षिणा देलखिन।) इएह यौ, एक्को किलो रहुक दाम नै। खाइर जाउ। मदन- पंडीजी लड़िकी-लड़िकीकेँ असीरवाद दिअनु। (लड़िका-लड़िकी पंडीजीकेँ पएर छूबि प्रणाम करैत छथि। पंडीजी असीरवाद दइ छथिन।) मोतीलाल- पंडीजी, मोनसँ असीरवाद देबै। गणेश- हँ यौ, दक्षिणे गुणे ने असीरवाद भेटत। (सभ कियो जा रहल छथि।) पटाक्षेप। दृश्य- चारि (स्थान- रामलालक घर। रामलालक दुनू पत्नी लक्ष्मी आ संतोषी घरमे हुनका सेवा कऽ रहल छथि। लक्ष्मी पक्षमे दूगो बेटी-एगो बेटा छन्हि तथा संतोषी पक्षमे एगो बेटी-दूगो बेटा छन्हि। छओ भाए-बहिन एक्के पब्लिक स्कूलमे पढ़ए गेल छथि।) रामलाल- बड़की सभ धिया-पुता नीक जकाँ घरपर पढ़ै-लिखै अछि न? हम तँ भिनसर जाइ छी से रातियेमे अबै छी। पेटक पूजा तँ बड़ पैघ पूजा छै किने? हम नै पढ़लौं से अखैन पछताइ छी। लक्ष्मी- छौड़ाक लक्षण अखैन बड़ नीक देखै छिऐ, अग्रिम जे हुअए। हमरा सभकेँ पढ़ैले कहए नै पढ़ै अछि। रामलाल- छोटकी, अहाँ किछु नै बजै छी। संतोषी- दुनू गोटे एक्के बेर बाजि देब तँ अहाँ की सुनबै आ की बुझबै? रामलाल- कोनो तकलीफ अछि की? संतोषी- जेकरा अहाँ सन घरबला रहतै, तेकरा तकलीफो हेतै आ अहुँसँ होशगर बड़की छथि। स्वामी, एगो गप्प पूछी? रामलाल- एक्के गो किअए, हजार गो पूछिते रहू। संतोषी- अहाँ, एहेन चिक्कन घरवालीकेँ रहैत दोसर बिअाह किअए केलिऐ? रामलाल- बड़कीसँ बेटा होइमे किछु बिलंब देखलिऐ तँए दोसर केलिऐ। संतोषी- नै यौ, दोसर गप्प भऽ सकै छै। रामलाल- हमरा तँ नै बूझल अछि, अहीं बाजू दोसर की भऽ सकै छै? संतोषी- अहाँकेँ, अहाँकेँ, अहाँकेँ, एगोसँ मोन नै भरल। रामलाल- बस करू, बस करू, अहाँ तँ लाल बुझक्करि छी। अहाँ तँ अंतर्यामी छी। ओना मोनकेँ जतए दौगेबै, ओतए दौगतै। मन ही देवता, मन ही ईश्वर, मन से बड़ा न कोइ। मन उजियारा जब जब फैले, जग उजियारा होय।। (इसकूल पोशाकमे सोनीक प्रवेश।) सोनी- पापा, पापा, इसकूलक फीस दियौ। रामलाल- माएकेँ कहियौ बुच्ची। सोनी- माए, इसकूलक फीस दहिन। लक्ष्मी- कत्ते फीस लगतौ? सोनी- तों नै बुझै छीही छअ गो विद्यार्थीक छअ सए टाका। लक्ष्मी- छोटकी, जाउ, दऽ दियौ ग। संतोषी- बेस, लेने अबै छी। (संतोषी अन्दर जा कऽ छअ सए टाका आनि सोनीकेँ देलनि आ फेर पति सेवामे भीर गेलीह।) रामलाल- छोड़़ै जाइ जाउ आब। अंगना-घर देखियौ। अहुँ सभकेँ कनी, काज होइ छै। (दुनू पत्नी चलि गेलीह।) पटाक्षेप। दृश्य- पाँच (स्थान- रामलालक घर। रमाकान्त मुखियाक संग बलदेब वार्ड सदस्यक प्रवेश।) बलदेव- (दलान परसँ) रामलाल, रामलाल भाय। रामलाल- (अन्दरेसँ) हइए एलौं भाय। दलानपर ताबे बैसु। जलखै कएल भऽ गेल। बलदेव- मुखियोजी एलाह, कने जल्दिये एबै। रामलाल- तहन तुरन्त एलौं। (हाथ-मुँह पोछिते प्रवेश। प्रणाम-पाती कऽ अन्दरसँ दूटा कुर्सी अनलनि। रमाकान्त आ बलदेब कुर्सीपर बैसलाह। मुदा रामलाल ठाढ़े छथि।) रामलाल- मुखियाजी, आइ केम्हर सूरूज उगलै? आइ रामलाल तरि गेल सरकार। कहियौ सरकार हम केना मन पड़लौं। इनरा आवासबला कोनो गप्प छै की? बलदेव- गप्प तँ इएह छै। मुदा पहिने कुशल-छेम, तहन ने अगिला गप-सप्प। कहु अपन हाल-समाचार। रामलाल- अपने सबहक किरपासँ हमर हाल-समाचार बड्ड बढ़ियाँ अछि। भाय, अपन हाल-चाल कहु। बलदेव- भाय, एकदम दनदनाइ छै। रामलाल- आ मुखियाजी दिशिका। रमाकान्त- हमरो हाल-चाल बड़ बढ़िया अछि। वएह एलेक्शन नजदीक छै तँए पंचायतमे घुमनाइ अावश्यक बुझलौं। संगे संग अहुँक काज रहए। रामलाल- तहन अपने किअए एलिऐ, हमहीं चलि अबितौं। रमाकान्त- देखियौ, जनता जनार्दन होइ छै। पहिने जनता तहन हम। जनता मुखियाकेँ बड़ आशासँ चुनै छै। ओइ आशाक पूर्ति केनाइ हमर परम कर्त्तव्य छै। रामलाल- अपने महान छिऐ। अपनेक आगू हम की बजबै? बलदेव- मुखियाजी, कने ओकरो ऐठाम जाइक छै। हिनकर काज जल्दी कऽ दियनु। रमाकान्त- तहन दऽ दियनु। (बलदेव बेगसँ बीस हजार टाका निकालि रामलालकेँ देलखिन।) रामलाल- (पाँच सए टाका निकालि) मुखियाजी, ई अपने राखि लिऔ। रमाकान्त- नै, ई नै भऽ सकैए। ई अपने रखियौ। हमरा पेट ले बहुते फंड छै। कहबी छै- ओतबे खाइ जइसँ मोंछमे नै ठेकए। रामलाल- भगवान, एहेन मुखिया सगतर होइतै। बलदेव- रामलाल भाय, जतए-ततए सुनै छी अहाँक परिवारक संबंधमे। तँ मन हर्षित भऽ जाइए। एहेन सुन्दर ढंगसँ परिवार चलेनाइ आइ-काल्हि असंभव अछि। रामलाल- सभ भगवानक किरपा छन्हि आ अपन करतब तँ चाहबे करी। रमाकान्त- हमरा लोकनि जाइ छी। जाउ, अहुँ अपन काम-काज देखियौ। (रमाकान्त आ बलदेवक प्रस्थान) रामलाल- धन्यवाद बलदेव भाय, धन्यवाद मुखियाजी एहिना सभ जनतापर खिआल रखबै। पटाक्षेप। दृश्य- छह (स्थान- लखनक घर। मीना अपन बेटी रामपरी आ बेटा कृष्णाक संग बैडमिंटन खेल रहल अछि। रामपरी- मम्मी, कसि कऽ मारहीन ने। काॅर्क नै उड़ै छौ। मीना- बेसी कसि कऽ नै लगै छै। कम-सँ-कम बौओ जकाँ बमकाही ने? (मनोजक प्रवेश) मीना- ओएह, एलौ सरधुआ भाँड़ैले। रामपरी- आबए दहीन ने मम्मी। भायजी छथिन। मीना- भायजी छथिन। कप्पार छथिन। काॅर्क फूटि जेतौ तँ आनि कऽ देतौ? रामपरी- मम्मी, भायजी कतए सँ आनि कऽ देतै, तोंही कह तँ। आकि पापा आनि देथिन। मीना- पापाकेँ हम जे कहबै, से करथुन। तोहर कहल नै करथुन। रामपरी- मम्मी, ई गप्प तोहर नीक नै भेलौ आ पापोकेँ नीक नै भेलनि। मीना- तों पंचैती करैले एलँह की बैडमिंटन खेलैले? खेलबाक छौ तँ खेल नै तँ जो एत्तएसँ। रामपरी- तोंही सभ खेल, हम जाइ छी। (खीसिया कऽ रामपरीक प्रस्थान। रामपरीबला बैटसँ मनोज बैडमिंटन खेलए लगैत अछि। मीना बैटेसँ ओकरा मारैले छुटैत अछि। फेर दुनू माय-पुत बैडमिंटन खेलए लगैत अछि।) कृष्णा- मम्मी, तोरा दीदी जकाँ खेलल नै होइ छौ। कने पापाकेँ कहबीन सीखा दइले से नै। मीना- बौआ, पापा हमरा की सीखेथुन, हमहीं सीखा दइ छिऐ। कृष्णा- तेकर माने तों पापासँ जेठ छीही? मीना- उमरमे भलहिं छोट हएब मुदा अकलमे निश्चिते जेठ। (संतोषक प्रवेश) संतोष- हमहूँ खेलबै कृष्णा। (बैट लऽ कऽ खेलए लगैत अछि। झटसँ मीना संतोषक हाथसँ हाथ मोचारि कऽ बैट लऽ लैत अछि। टुनकीबला आ मुड़ीमचरूआ कहि बैटसँ मारैले दौगैत अछि। संतोष भागि जाइत अछि। ओइपर खीसिया कऽ कृष्णा एक बैट मम्मीकेँ बैसा दैत अछि।) कृष्णा- तों बड़ खच्चर छेँ मम्मी। खेलल-तेलल होइ छौ नहियेँ आ जमबै छेँ। अखैन संतोष भायजी रहितै तँ खूम बैडमिंटन खेलतौं की नै। मीना- संतोषबा तोहर भायजी नै छिऔ। जेकर छिऐ से बुझतै। तोरा ओकरासँ कोनो मतलब नै। कृष्णा- किअए मम्मी? उहो तँ हमरे पापाक बेटा छिऐ ने? मीना- मुदा तोहर मम्मीक बेटा नै ने छिऐ। कृष्णा- बुझबीहीन तँ किअए नै हेतै? नै बुझबीहीन तँ हमहूँ तोहर दुश्मन छिऔ। मीना- बकबास नै कर। काल्हि जनमलेँ आ बुढ़बा जकाँ गप्प करै छेँ। सभ बात तों अखैन नै बुझबीहीन। आब काल्हि खेलिहेँ चल। (बैट-काॅर्क लऽ कऽ मीना-कृष्णाक प्रस्थान।) पटाक्षेप। दोसर अंक दृश्य- एक (स्थान- रामलालक घर। संतोषी बिस्तरपर पड़ल अछि। पाँच भाय-बहिन इसकूल गेल अछि। मुदा सोनी घरेपर अछि सोनीक तबीयत ठीक नै अछि।) संतोषी- सोनी बुच्ची, कनी देह दबा दिअ तँ? सोनी- हमरा अपने माथ दुखाइए। तँए इसकूलो नै गेलौं। अखन धरि बासिये मुँहेँ छी। खैर अहाँ तँ छोटकी माए छी। अहाँक अज्ञाक पालन केनाइ हमर परम कर्त्तव्य छी। संतोषी बुच्ची अहाँ बुधियार छी ने। (सोनी संतोषीक देह दबाए रहल अछि।) साेनी- छोटकी माए, बड़ भुख लागल-ए, कनी खाइले दिअ। संतोषी- हमरा नै हएत। जाउ अपनेसँ लऽ लिअ गऽ। सोनी- एक दिन अहीं कहने छेलिऐ, अपनेसँ खाइले कहियो नै लइले। धिया-पुताकेँ घटि जाइ छै। तँए हम अपनेसँ नै लेब। संतोषी- लिअ वा नै लिअ। हमरा बुते नै हएत देल। अपना देहमे करौआ लागल अछि। सोनी- जाइ छिऐ बड़की माएकेँ कहैले। (सोनी, लक्ष्मीकेँ कहैले अन्दर गेलीह। एमहर संतोषी और गबदिआ कऽ पड़ि रहलीह। सोनी आ लक्ष्मीक प्रवेश।) लक्ष्मी- छोटकी, छोटकी, छोटकी। सोनी- अखने जगले छेलै। तुरन्ते देखही। गै माए सूतल लोक ने जगैए, जागल की जगतै। लक्ष्मी- (जोरसँ) छोटकी, छोटकी, छोटकीऽ ऽ ऽ ऽ। (संतोषी फुरफुरा कऽ उठै छथि।) संतोषी- की कहलिऐ दीदी? लक्ष्मी- सोनीकेँ अहाँ किअए कहलिऐ, देहमे करौआ लागल अछि? संतोषी- हम से कहाँ कहलिऐ। हम अपना दऽ कहलिऐ जे हमरा देहमे करौआ लागल अछि की। एतबेपर बुच्ची भागि गेलीह। सोनी- अपन बेटाक माथपर हाथ रखि कऽ कहबै? संतोषी- हम बजबे नै केलिऐ। एतेक आगि किअए उठबै छी सोनी। साेनी- आगि तँ अहाँ उठबै छी आ लगबै छी। हमरे माथपर हाथ रखि कऽ बाजू तँ। संतोषी- हँ यै, साँच बात किएक ने बाजब। आउ, लग आउ। लक्ष्मी- बूझि गेलौं अहाँ कत्ते साँच बजै छी। अनकर बेटा-बेटी उपरेमे अबै छै आ अपन बड़ कसेब कऽ छै। िनर्लज्जी नहितन। झूठ बजैत कोनो गत्तरमे लाजो नै होइ छन्हि। संतोषी- िनर्लज्जी तँ अहाँ छी जे बेटीक पक्ष लऽ कऽ फेफिया कऽ उठै छी। लक्ष्मी- िनर्लज्जी िनर्लज्जी करब तँ अखैन झोंटा पकड़ि कऽ पोटा िनकालि देब। संतोषी- कनी देखियौ तँ झोंटा पकड़ि कऽ। (रामलालक प्रवेश) रामलाल- अहाँ सभ कथीले हल्ला-फसाद करै छी? चुपै जाउ। छोटकी, की बात छै? संतोषी- दुनू माइ-धीन हमरा कहैए, झोंटा पकड़ि कऽ पोटा निकालि देब। रामलाल- बड़की, अहाँ से किअए कहलिऐ? लक्ष्मी- हँ हँ, हमरा सींग बढ़ि गेलै तँए दुआरे। ओकरे पुछियौ तँ। रामलाल- की बात छै छोटकी? संतोषी- ओकरे सभकेँ पुछियौ। रामलाल- की भेलै बुच्ची? सोनी- हमरा माथा दुखाइ छेलए। इसकूलो नै गेलौं। बासिये मुँहेँ रही। छोटकी माएकेँ कहलियनि खाइले दिअ। तँ ओ कहलनि, अपनेसँ लऽ लिअ। देहमे करौआ लगल अछि। ई बात बड़की माएकेँ कहलियनि तँ ओ माएसँ लड़ैले तैयार छथि। रामलाल- हमरा तोरापर विश्वास अछि बुच्ची। तों फूसि नै बाजि सकै छेँ। हम बात बूझि गेलौं। छोटकी, सोलहन्नी अहाँक गलती अछि। बड़कीसँ अहाँ लगती मानू। नै तँ एहेन घरवाली हमरा नै चाही। अपन जोगार देखू। जेहने हमर परिवारक सुबेवस्थाक चर्चा सौंसे गाम होइ छेलए तेहने परिवारक प्रतिष्ठाकेँ माटिमे मिलबए चाहै छी। तुरन्त सोचि कऽ बाजू, की चाहै छी? संतोषी- (किछु सोचि कऽ, बड़कीक पएर पकड़ि) हमरेसँ गलती भेलै। आब गलती कहियो नै हेतै। रामलाल- बड़की, आइ माफ कऽ दियनु। आइ दिनसँ गलती नै करतै। सदिखन मीलि कऽ रहै जाइ जाउ। “जहाँ सुमति वहाँ सम्पत्ति नाना। जहाँ कुमति वहाँ विपत्ति निधाना।” पटाक्षेप। दृश्य- दू (स्थान- लखनक घर। लखन दलानपर बैसल छथि आ पारिवारिक स्थितिक संबंधमे सोचि रहल छथि।) लखन- की करी नै करी, किछु ने फुराइत अछि। बेटी रामपरी सेहो ताड़ जकाँ बढ़ि रहल अछि। आमदनी कम छै आ परिवारमे खर्चा बड़ छै। (मनोज आ संतोषक प्रवेश।) मनोज- पापा, बहुते छौंड़ा सभ इसकूल जाइ छै पढ़ैले। हमहूँ सभ जाएब। हमरो सभकेँ नाम लिखा दिअ ने सरकारी इसकूलमे। लखन- नाम लिखबैमे पाइ लगतै, किताब-कोपीमे पाइ लगतै, टीशन पढ़ैमे पाइ लगतै। हमरा ओतेक सकरता नै अछि। हमरा बुते नै हेतौ। पहिने पेटक चिन्ता कर। संतोष- पापा, रामपरी आ कृष्णा जे पब्लिक इसकूल जाइ छै से? ओकरा सभकेँ पाइ नै लगै छै? लखन- से मम्मीसँ पुछही गऽ। पाइ कोनो हम दइ छिऐ। संतोष- मम्मीकेँ बजा कऽ एत्तऽ आनू। कनी अपनेसँ कहबनि। लखन- जो बजा आन। (संतोष शीघ्र मीनाकेँ बजा कऽ अनैत अछि।) मीना- की कहै छी? लखन- की कहब। मनोज-संतोष कहैए हमहूँ पढ़ब, से की करबै। मीना- कप्पार करबै, अंङोरा करबै, धधकलहा करबै। लखन- एना किअए बजै छी? बोलीमे कनियो लसि नै अछि। हरदम निशाँमे चूर रहै छी। मीना- बड़ फटर-फटर बजै छी। मुँह बन्न करू, नै तँ बूझि लिअ। जाउ अहाँ एत्तएसँ। एकरा सभकेँ हम जबाब दइ छिऐ। (लखनक प्रस्थान) की कहलेँ मनोज? मनोज- मम्मी, हमरो सभकेँ इसकूलमे नाम लिखा दिअ। बहुते छौड़ा सभ इसकूल जाइ छै। मीना- बड़ पढ़ुआ भऽ गेलेँ तो सभ? बिना ढौए के पढ़ाइ होइ छै, की खेनाइ होइ छै? पेट भरै छौ तँए फुराइ छौ। एत्तऽ सँ अक्खैन भाग। नै तँ बढ़नी देखै छीहीन। कमा कऽ लाऽ तँ खो वा पढ़। नै तँ घर नै टपि सकै छेँ तों सभ। मनोज- मम्मी, हमरा सभकेँ कमाएल हेतै। जन मे के रखतै? मीना- नै कमाएल हेतौ तँ भीखे मँगिहेँ आ ओम्हरे खैहेँ। संतोष- अपना बेटा-बेटीकेँ पढ़ाबै ले होइए आ हमरा बेरमे की होइए? मीना- भगलेँ सरधुए सभ की? (बढ़नी लऽ कऽ मारैले दौगल। संतोष भागि गेल। मनोज पकड़ा गेल। “पढ़ुआकेँ सार अछि भगलेँ एत्तए से” कहि कहि मनोजकेँ मीना बढ़नीसँ झँटलक। अन्तमे हाथसँ छूटि कऽ कनैत-कनैत भागि गेल।) पढ़ैए। फोकटेमे पढ़ाइ होइ छै। (हकमैत-हकमैत) ऊपरेमे अल्हुआ फड़ै छै। पटाक्षेप। दृश्य- तीन (स्थान- आन गामक बाट। मनोज कानि रहल अछि। संतोष-संतोष चिचिया रहल अछि। बटोही सभसँ पूछि रहल अछि। आँखिसँ दहो-बहो नोर जा रहल अछि।) मनोज- हौ बटोही, हमरा संतोषकेँ देखलहक? हरेराम- नै, हम नै देखलियौ। मनोज- (हिचुकि-हिचुकि कऽ कानि) संतोष रौ संतोष। असगरे हम केना रहबै रौ संतोष। तों कतए भागि गेलेँ रौ संतोष। हौ बटोही, एगो छौड़ाकेँ भागैत कतौ देखलहक? अनबर- नै बौआ, नै देखलियौ। के छेलौ तोहर ओ? मनोज- हमरे भाए छेलै। यै काकी, एगो छौड़ाकेँ देखलिऐ केम्हरो भागल जाइत। आरती- हँ बौआ, एगो छौड़ा हमरे पाछू-पाछू अबै छेलए। अखने केम्हर गेल केम्हर नै। कत्तेटा छेलाए? केहेन कपड़ा-लत्ता पहिरने छै? मनोज- नअ-दस बर्खक छै। मलि-ढलि कपड़ा पहिरने छै। आरती- हँ देखलियौ बौआ। देखहीन गऽ अही सभमे कतौ बौआइत हेतौ। तुरन्ते हमरे पाछू-पाछू छेलौ। मनोज- संतोषबा छियँए रौ, संतोषबा छियँए रौ। संतोष- (अन्दरसँ) हँ, हइए छी भाइजी। आबै छी। मनोज- कतए छेँ रौ? जल्दी आ। संतोष- भूख लागल छल। अही अंगनामे खाइ छेलौं। जल्दिये एलौं। मनोज- जल्दी आ। (संतोषक प्रवेश।) संतोष- भायजी यौ भायजी। मनोज- बौआ रौ बौआ। तोरा फकरैत-फकरैत हमरा ठोंठ सुखा गेलौ। (दुनू गरदनि मिलैत अछि) संतोष, भूख हमरो बड़ लागि गेल छौ। चल, केकरोसँ मांगि कऽ खएब। संतोष- भायजी, ई मलिकाइन बड़ नीक लोक छै। एक्के बेर कहलियनि जे मलिकाइन किच्छो खाइले दिअ, बड़ भूख लगल यऽ तँ कहलनि- आ, खा ले। बेचारी भरि पेट खुएलक। एक बेर अहुँले पूछऽ दिअ मनोज- बौआ, मलिकाइन की सोचथिन जे छौड़ा सभ बड़ लोभी अछि। संतोष- भायजी, बेगरता भेलापर गदहोकेँ नाना कहए पड़ै छै। आ ओ तँ मलिकाइन छथिन। मनोज- बेस, पूछहीन। (संतोष अन्दर जा कऽ) संतोष- मलिकाइन, मलिकाइन। राधा- की कहै छैं? संतोष- कहैत तँ लाज होइए। राधा- कह ने, की कहए चाहै छेँ? संतोष- भायजीओ केँ बड़ भूख लागल छै। परसुए भिनसर मम्मी हमरा दुनू भाँइकेँ बाढ़निसँ झाँटि-झाँटि कऽ घरसँ भगाए देलक। राधा- बाप नै छथुन? संतोष- बाप ओकरे दिस छै। हमरा सभकेँ कहैए पहिने पेटक चिन्ता कर। राधा- माए अपन नै छियौ? संतोष- नै, हमर माए मरि गेलै ने तँ पापा दोसर बिआह केलकै। राधा- भायजीकेँ बजा आनहीन। संतोष- मलिकाइन, दियौ ने, लेने जाइ छिऐ। दूरेपर खा लेतै। राधा- तों चल। हम लेने अबै छिऐ। (संतोष बहराए मनोज लग आएल।) मनोज- की कहलखुन? संतोष- कहलखिन, तों चल। हम लेने अबै छी। (राधाक प्रवेश। लोटामे पानि आ थारीमे खेनाइ लऽ कऽ) राधा- ले बौआ खो। (मनोज बैसि कऽ खाए रहल अछि।) बौआ, नवकी माएकेँ धिया-पुता छौ? मनोज- हँ, दूगो छै- एगो बेटा-एगो बेटी। राधा- ओकरा सभकेँ मानै छै की? मनोज- हँ हँ, खूम मानै छै। पढ़ेबो-लिखेबो करै छै। हम कहलिऐ- हमहूँ सभ पढ़ब। तइले हमरा बाढ़नियेँ-बाढ़नियेँ खूम झँटलक आ घरोसँ निकालि देलक। राधा- तों खो बौआ। दुनू भाँइ भीखो मांगि कऽ पढ़िहह-लिखिहह। आइ-काल्हि बिन पढ़ने काज नै चलतह। केहेन-केहेन पढ़ुआ तँ घास छिलै छै आ मुरखाहाकेँ के पूछतै? (मनोज खा कऽ थारी धोइ देलक।) आब तों सभ जो बौआ। (दुनू राधाक पएर छूबि प्रणाम करै छै। राधा दुनूकेँ असीरवाद माथपर हाथ राखि कऽ दइ छथिन।) पटाक्षेप। दृश्य- चारि (आन गामक बाट। बाटमे चलैत-चलैत मनोज आ संतोष गप-सप करैत अछि। भीख मंगैक योजना बनबैत अछि।) मनोज- हम गेबै तँ तों बजबिहेँ आ तों गबीहेँ तँ हम बजेबौ। संतोष- भायजी, अहाँ की गेबै आ हम की बजेबै? मनोज- दुनू भाँइ अल्ला-रूदल गेबै आ लोटे-छिपली बजेबै। जेना मुसहरीमे होइ छेलै। संतोष- लोटा-छिपली कतए सँ आनबै? मनोज- केकराेसँ मांगि लेबै। संतोष- भायजी, एगो कहियौ तँ। मनोज- कहै छिऐ। आ ऽऽऽऽ, जतरा बनेलिऐ शारदा मैया आजू गै बनाय ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ। भीख मंगैले एलौ, अहीं गाम-घरमे। पढ़ैले कहलिऐ तँ, देलक माए निकालि। बढ़नीसँ झाँटि-झाँटि कऽ सतौत भगौलक। (अल्ला–रूदल सूनि लोक सबहक भीड़ भऽ गेलै।) रामसेवक- (संतोषसँ) बौआ, एगो तोहू कही। संतोष- पाइ देबहक, खाइले देबहक। रामसेवक- हँ देबौ। संतोष- एगो छिपली आ एगो लोटा देबहक बजबैले? फेरो दऽ देबह। रामसेवक- हँ देबौ। आनि दइ छियौ। (अन्दर जा कऽ एगो लोटा आ एगो छिपली आनलक आ संतोषकेँ देलक।) संतोष- भायजी, लिअ छिपली-लोटा आ बजाउ अहाँ। (मनोज छिपली-लोटा बजा रहल अछि।) सुनै जाइ जाउ माता-पिता, भाए-बहिन सभ। आ ऽ ऽ ऽ ऽ, से किअए गै सतौत माता, अपन बेटा-बेटीले दुनू भायकेँ भगौलेँ। दुनू भाँइ कोन गलती केलिऐ, नाम लिखबए पापाकेँ कहलिऐ। पापापर ओ शासन केलकै, डरे पापा जुआ पटकलकै। अपन बेटाकेँ इसकूल धरेलकै, हमरा इसकूलक मुँहोँ नै देखौलकै। तैयो बैमनमा दुनू भाँइकेँ, पेटोक जोगार नै केलकै यौऽ ऽ ऽ ऽ। (थोपरीक बौछार भऽ गेलै। मुलकिन बिस्कुट-पाइ सेहो पड़लै। दुनू भाँइ पाइ बिस्कुट समटि कऽ जाए रहल अछि। दर्शकगण सेहो अपन-अपन घर गेल। बाटमे दुनू भाय गप-सप करैत अछि।) संतोष- भायजी, कतेक भेलै? मनोज- बहुते भेलै बौआ-पच्चीस गोट टाका भेलै आ पाँच डिब्बा बिस्कुट भेलै। की सभ करबीहीन पाइकेँ? संतोष- चलू ने भायजी होटल। खूम मासु-भात खाएब आ कनी-मनी दारूओ पीब लेब। मनोज- एहेन गप्प फेर कहियो धोखोसँ नै बजीहेँ। कोन परिस्थितिमे लोक पाइ देलकौ, से मोन पारहीन। अबैकालमे मलिकाइन की कहने छेलखुन से मोन छौ? संतोष- नै भायजी बिसरि गेलिऐ। अहीं कहियौ। मनोज- पढ़ै दऽ ऽ ऽ। संतोष- हँ हँ हँ, आब धक्क दऽ मोन पड़ल। दुनू भाँय भीखो मांगि कऽ पढ़ीहेँ-लिखीहेँ। आइ-काल्हि बिन पढ़ने काज नै चलतह। मनोज- तब सएह, हमरा लोकनि केना पाइक गलत काज करब? गुरो खुद्दीसँ काज चलि जेतै। पहिने पढ़ैक जोगार कर बौआ। संतोष- आ रहबै कतए? मनोज- चल ने, कतौ हलुको दाममे ओढ़ना-बिछौना कीनि लेब आ कोनो टीशनपर रहब। ओतए इजोतो रहै छै। ओही इजोतमे रातिमे पढ़बो करब आ गुजर जोग गीत गाबि पाइयो कमाएब। संतोष- भायजी, बड़ चिक्कन विचार अछि। चलू, पहिने कोनो सरकारी इसकूलमे दुनू भाँइ नाओं लिखा लेब। तहन रहैक जोगार करब। सरकारी इसकूलमे पाइ बड़ कम लगतै। कतौ जँ मोनसँ पढ़बै तँ चिक्कन फैदा हेतै। मनोज- बेस, चल बौआ। आइ कतौ नाओं लिखाइये लेब। चल। (मनोज आ संतोषक प्रस्थान।) पटाक्षेप। दृश्य- पाँच (स्थान- लखनक घर। लखन आ मीना आपसमे गप-सप कऽ रहल अछि। रामपरी आ कृष्णा इसकूल गेल अछि।) मीना- स्वामी, छौड़ा सभ माथा खराब कऽ देने छेलए। भने भागि गेल। कहै छेलए पढ़ब। बड़ पढ़ुआक सार भऽ गेल रहए। अपन दुनू बेटा-बेटीक पढ़ाइ केना होइ छै से हमहीं की अँहेँ बुझै छी। लखन- अहाँ कोनो गलती कहबै रानी। मुदा कहियो-कहियो मोन पड़ि जाइए तँ बुकौर लागि जाइए। मीना- एकर माने अहाँक धियान ओकरे सभ दिस अछि हमरा सभ दिस नै। लखन- आहिरेबा, ओकरा सभ दिस रहितए तँ ओकरा सभकेँ तैकतिऐ ने, खोज-खबरि रखितिऐ ने? मीना- नै यौ, अहाँ हमरा सभपर धियान नै दइ छी। (आइसँ हमरा अहाँक कोनो मतलब नै।) (रूसि रहैत अछि।) लखन- अहाँ खातीर हम दुगो बेटा-तियागलौं आ तैयो उनटे मुँह फुलेने छी। मीना- ओइ दुनू चकेठबाक नाओं नै लिअ। नै तँ बात केनादन भऽ जाएत। लखन- संतोषबा मनोजबाक नाओं आब नै लेब। सएह ने और की? मीना- हमरा टोकि नै सकै छी। हमर बेटा-बेटी मेघसँ ढब सन खसलै की। लखन- हे हे, पएर पकड़ै छी, दाढ़ी पकड़ै छी। (छुलकि-छुलकि मीना भागि रहल अछि। लखन आगाँ-पाछाँ करैत खुशामद करैत अछि। मुदा ओ लखनसँ बजा-भुकी बन्न केने अछि।) हे हे, लोक सभ की कहतै? लखना बहुरागी भऽ गेल। लाउ जाँति दइ छी। ऐ बीचमे अहाँ बड़ मेहनतिबला काज केलौं। मीना कृष्णा आ रामपरीक खाितर हम जान दइले तैयार छी। अहाँ सन सुन्नरि दुनियाँमे के छै? हेमा मालीन अहाँक तरबो जकाँ नै छै। लाउ पएर रानी, कने जाँति दइ छी। हे हे, कान-नाक पकड़ै छी। अहाँक कहल नै काटब। (मीना पएर बढ़ाए देलनि। लखन ओकरा जाँति रहल अछि।) मीना- देखबै, दुनू भाए-बहिन नाम करतै। कोनो सरकारी इसकूलमे पढ़ै छै की। पब्लिक इसकूलमे, पब्लिक इसकूलमे। (रामपरीक प्रवेश) रामपरी- पापा, मम्मीकेँ की भऽ गेलै? लखन- किच्छो नै। थाकि गेल छेलखुन मम्मी। रामपरी- हम जाँति देतिऐ। अहाँ किअए हरान भेलौं। लोक बुझतै तँ की कहतै? लखन- की कहतै बुच्ची? कहियो गड़ीपर नाउ तँ कहियो नाउपर गड़ी। बुच्ची, अहाँ अखने इसकूलसँ किअए चलि एलिऐ? रामपरी- पापा, कृष्णो चलि आएल। नुकाएल अछि। इसकूलमे हेड सर खूम मारलखिन। परीक्षामे सभ विषयमे लड्डूए नंबर एलै ओकरा। मीना- तहन हेड सर पढ़ेलखिन की? काल्हिसँ तों सभ इसकूल बन्न कर। ऐसँ बढ़ियाँ मुरूखे। रामपरी- हेड सर पढ़ेलखिन नै तँ आन सभ विद्यार्थीक रिजल्ट बढ़िया किअए होइ छै। हमहूँ बढ़िया जकाँ पास छी। चलए नै आबए तँ अंगने टेढ़। मीना- कहि देलियौ। काल्हिसँ ओइ इसकूल नै जेबाक छौ। सरकारी इसकूल जइहेँ। ओतइ नाओं लिखा देबौ। रामपरी- बेस जएह कहबीन सएह ने करबै। मुदा। मीना- मुदा, तुदा हम किच्छो नै बुझै छिऐ। जे कहै छिऔ से कर। बुझलेँ। पटाक्षेप। दृश्य- छह (स्थान- रेलबे स्टेशन। मनोजकेँ बामा हाथ कटल छै आ संतोषकेँ दुनू आँखि गायब छै। संतोष मनोजक कनहा पकड़ि प्लेटफाॅर्मपर घूमि रहल छै। तखने अटैची लऽ कऽ राम सेवकक प्रवेश। राम सेवक टकटकी लगा कऽ दुनूकेँ देखि रहल अछि। मुदा चिन्हैत नै अछि।) रामसेवक- बौआ सभ, हमरा चिन्है छीही? संतोष- हँ हौ, किअए नै चिन्हबह। चिन्हल लोक कतौ अनचिन्हार होइ छै। बाजबसँ हम बूझि गेलिअह। तोंही ने हमरा छिपली-लोटा आनि देने छेलहक आ गानापर पाइयो देने छेलहक। रामसेवक- हँ हँ हँ बौआ। तोरा दुनू भाँइकेँ एना किअए भऽ गेलौ? पहिने केहेन बढ़िया छेलेँ। मनोज- दुनू भाँय इसकूलसँ बससँ टूरपर जाइ छेलिऐ। ड्राइबरकेँ आॅभरटेक करैमे संतुलन नै रहलै। बस पलटी मारि देलक। छह-सात गो मरबो केलै। धनि हेड सर जे हमहूँ सभ जीलौं। बेचारा अपना दिससँ खरचा कऽ जी-जान लगा देलखिन। संतोष- दूगो स्पोर्ट डेथ भेलै। दूगो हाॅस्पीटल पहुँचैत-पहुँचैत दम तोड़ि देलकै। तीन गो हॉस्पीटलमे दू दिनका बाद दम तोड़ि देलक। रामसेवक- तों सभ आब ठीक छेँ ने? मनोज- हँ अहाँ सबहक पएरक दुआसँ आब हमरा सभ विकलांगो भऽ कऽ ठीक छी। अहाँ कतए जाइ छिऐ कक्का? रामसेवक- कने दिल्ली जाइ छिऐ बौआ। हमर छोटका बौआ दिल्लीयेमे पढ़ै छै। ओकर तबीयत खराब छै। सएह अबैले फोन केने रहए। बौआ, हम जाइ छिऔ। हमर गाड़ी अबै छै। (दुनू भाँइ पएर छूबि प्रणाम केलक।) राम सेवक असीरवाद दऽ प्रस्थान।) संतोष- भायजी, अहाँकेँ इसकूलक बेर भऽ गेल हएत ने? मनोज- हँ हँ लेटे भऽ रहल अछि। वएह भेँट गेलखिन। गप-सपमे टेम लगि गेल। संतोष- जाउ, अहाँ इसकूल। बेसी लेट हएत तँ सर मारताह। मनोज- अहाँ ठीकसँ रहब। बेसी एम्हर-ओम्हर नै करब। स्टेशनपर चोर-उचक्का बड़ रहै छै। छिपलियो-लोटो पार कऽ देत। संतोष- हम लगे-पासमे घुमबै आ जतए जेबै झोरा लटकेने जेबै आ लटकेने रहबै। जाउ अहाँ, लेट होइए। (मनोज बस्ता लऽ कऽ प्रस्थान) पढ़ै तँ हमहूँ छेलौं। पढ़ैयोक मोन होइए। मुदा भगवानक इएह मर्जी छेलनि तँ हम की कऽ सकै छी? पढ़ि सकै छी मुदा। खाइर हमरा नै पढ़ल हएत तँ कोनो बात नै। मुदा जेना-तेना भाइजीकेँ अवस्स पढ़ाएब। आगू भगवानक किरपा। (प्लेटफाॅर्मपर एकठाम बैस कऽ झोरासँ छिपली-लोटा निकालि आ झोरा कनहापर लटका अल्ला-रूदल गेबाक तैयारी केलक।) (1) आ ऽ ऽ ऽ ऽ, जतरा बनेलिऐ बाबू भैया भीख मंगैले आइ। टका-दू टकासँ किनको, किछु नै बिगरतै यौऽऽऽ। करमक फल सभकेँ भेटै छै, भलाइक बदला भलाइ भेटै छै। मुट्ठी बान्हि सभ कियो अबै छै, हाथ पसारि सभकेँ जेनाइ छै। तैयो नै दाइ-माइकेँ दया अबै छै आइऽ ऽ ऽ। (दर्शक-श्रोताक भीड़ पाइ बरसा रहल छै। संतोष मस्तीमे गाबि रहल छै।) (2) कोन कुकर्म केलिऐ हम, बाबू भैया दाइ-माइ। जेकर फल आइ भोगै छी यौऽ ऽ ऽ। सतौत माए घरसँ भगौलकै, बाप पित्ती भऽ घूमि नै तकलकै। दसे-बारहमे दुनूकेँ भगौलकै, भरि पेट खाइले नै देलकै। पढ़ैले बढ़नीसँ झँटलकै, अपनाकेँ खूब पढ़ौलकै। भीख मांगि दुनू पढ़ै छेलौं, बस पलटीमे विकलांग भेलौं आन्हर भऽ नै पढ़ि सकलौं, भायजीकेँ इसकूल पठेलौं अनाथक नाथ अहीं सभ दुखियाकेँ उबारबै यौऽ ऽ ऽ ऽ। (थोपरीक बौछार भेल। पाइक ढेर लागि गेलै। पाइ समटि संतोष अपन जगहपर आबि गेल। सभकेँ प्रणाम कऽ संतोषक प्रस्थान।) पटाक्षेप। तेसर अंक दृश्य- एक (लखनक घर। लखन आंगन बहारि रहल छथि। मीना खटियापर पड़ल-पड़ल हुनका देखि रहल छथि।) मीना- कने हाथ बैसा कऽ बहारब। खर-पात ओहिना छूटि जाइए। लखन- हमरा जहिना हएत तहिना ने बहारब। मीना- खाली तीन मन भातक गोला खाइमे होइए। होउ, हबर-हबर अंगना बहारू। बरतनो ओहिना छै। लखन- ताबे अहाँ बरतनो माँजि लेब से नै। मीना- किअए अहाँक देहमे करौआ लागल अछि। हम आइ किच्छो नै करब। आइ हम भरि दिन बैस-सुति कऽ खुशी मनाएब। लखन- कथीक खुशी? मीना- आइ दुनू भाए-बहिनक मैट्रिकक रिजल्ट निकलैबला छै। दुनू बुझैले इसकूल गेल अछि। ओना दुनू बढ़िया नम्बरसँ फस्ट हेब्बे करतै। ई हमर दाबा अछि। लखन- पानिमे मछरी, नअ-नअ कुटिया बखरा। रिजल्ट अपना हाथमे अछि जे दाबा करै छी। मीना- अपन हाथमे नै अछि तइसँ की। हमर बेटा फस्ट डिबिजनसँ पास करबे करत। लखन- खाइर अहाँसँ के जीतत? मीना- तहन किअए मुँह लगबै छी? जाउ, बरतन-बासन आनि लिअ। एत्तै माँजि लिअ। खेनाइयोक बड़ बेर भऽ गेलैए। (लखन अन्दरसँ बरतन-बासन आनि माँजि रहल अछि।) लखन- अखैन तक बौआ सभ नै आएल? मीना- जे काज करए गेलै से कए कऽ ने आएत। ओना अबिते हएत। ताबे हम सुतै छी। (कनैत-खिजैत कृष्णा आ रामपरीक प्रवेश।) लखन- किअए कनै छह बौआ? किअए कनै छी बुच्ची? रामपरी- (हिचकि-हिचकि कऽ) हम एक नंबर ले फाइल भऽ गेलिऐ। लखन- आ बौआ? रामपरी- बौआकेँ तँ और कनीयेँ नंबर छै। हमरोसँ दस नंबर कम छै। लखन- जाउ, दुनू भाए-बहिन, मम्मीकेँ कहियनु। बड़ दाबा करैत छेलीह। (कनैत-कनैत दुनू मीना लग पहुँचल। मीना फुरफुरा कऽ उठलीह।) मीना- किअए कनै जाइ छेँ तों सभ? कृष्णा- दुनू भाए-बहिन फाइल भऽ गेलियौ। मीना- इसकूलमे कए गो फाइल भेलै? रामपरी- तीन सए विद्यार्थीमे दूगो। उहो हमहीं दुनू भाए-बहिन। मीना- ओ, बूझि गेलिऐ। मस्टरबा कोनो चक्कर-चालि लगौने हाएत। रामपरी- नै मम्मी, सरक कोनो चक्कर-चालि नै भऽ सकै छै। हमरे सबहक गलती हेतै। मीना- जखन तोरे सबहक गलती हेतै तखन आइ अखैनसँ तों सभ किताब-कोपी छुइ नै सकै छेँ। सोचै छेलौं बेटा-बेटीकेँ इसपी. कलक्टर बनाएब। जो रामपरी किताब कोपी लेने आ। डाहि दइ छिऐ। ओते पाइमे कत्ते जमीन कीनने रहितौं? तोरा सभकेँ पढ़ाबैमे कंगाल भऽ गेलौं। अक्खैन किताब-कोपी ला, सभटाकेँ डािह दइ छियौ। रामपरी- एगो मौका और दहीन मम्मी। मीना- मौका-तौका हम नै बुझै छिऐ। तोरा सबहक खातिर हम बीकि गेलौं। जो आब तों सभ मुरूखे रह। हमरा नै पढ़ेबाक-लिखेबाक अछि। हमरा सामनेसँ भागै जाइ-जो। (दुनू भाए-बहिन मम्मीक पएर पकड़ि लैत अछि।) रामपरी- मम्मी, एकटा मौका आैर दहीन। कृष्णा- मम्मी, एगो मौका और दहीन। लखन- कहै जाइए तँ एगो मौका और दिऔ। असफलते सफलताक जननी अछि। मीना- हमरा नै सीखाउ। हम अपने बड़ सीखने छी। केहेन केहेन गेल्लाह तँ मोछबला एल्लाह आ मोंछबला गेल्लाह तँ निमोच्छा एल्लाह। अपन काज करू अहाँ। पएर छोड़ै जाइ जो। मौका हम नै बुझै छिऐ। (कृष्णा आ रामपरी पएर नै छोड़ै छै। मीना जबरदस्ती लगमे राखल ठेंगासँ दुनूकेँ मारि-मारि कऽ भगबै छै।) सभसँ घटिया काज पढ़ेनाइ-लिखेनाइ अछि। एहनो सड़ल काज कियो करए? पटाक्षेप। दृश्य- दू (स्थान- रामलालक घर। लक्ष्मी, संतोषी, सोनी, मोनी, पप्पू, रानी, अमर आ सुमन रामलालक संग प्रसन्न मुद्रामे बैसल छथि दलानपर। सभ एक दोसरकेँ चकलेट खोआ रहल अछि। सोनी-मोनीक रिजल्टक खुशीमे।) रामलाल- हमर सोनी बेटी अपन इसकूलमे स्टूड फस्ट आ मोनी स्टूड सकेण्ड केलीह। एहेन सुन्दर रिजल्ट पाबि हम अति प्रसन्न छी। आ बड़की अहाँ? लक्ष्मी- रिजल्टक खुशीमे हमरा मोन होइए दारू पीबितौं। मुदा लोक की कहत? रामलाल- छोटकी अहाँ? संतोषी- हमहूँ बहुत प्रसन्न छी। हमरा मोन होइए जे हमहूँ पढ़ितौ आ एहने रिजल्ट अनितौं। बड़ नाम होइतए। रामलाल- ई तँ आब संभव नै अछि। धिया-पुताक संबंधमे अपन विचार दिअ। संतोषी- हमर इएह विचार जे जतेक संभव हुअए, सभ धिया-पुताकेँ मनसँ पढ़ाउ आ काबिल बनाउ। विद्या सभसँ पैघ धन छी। ई स्थायी संपत्ति छी। रामलाल- अहाँक विचार अति उत्तम अछि। हमरा बेसी पढ़ाएल तँ नै हएत मुदा जतए तक हएत तइमे पएर पाछू नै करब। मरितो दम तक हिम्मत नै हारब। सुनै जाइ-जाउ बौआ-बुच्ची सभ। अहाँ सभ खूम मनसँ पढ़ु। खर्चा जे हेतै से हम जेना-तेना पुराएब। सभ धिया-पुता- जी पापा, हम सभ खूम मनसँ पढ़ब आ बड़का हािकम बनब। पटाक्षेप। दृश्य- तीन (स्थान- रेलबे स्टेशन। संतोष अल्ला-रूदल गाबैक तैयारी कऽ रहल अछि।) संतोष- बारह बजे रातिमे भाइजी आएल रहथि, ओ कहलनि- “बौआ, हम आइ.ए.सए.क परीक्षामे स्टूड फर्स्ट केलौं। आब हम कलक्टर बनब। हम ट्रेनिंगमे जा रहल छी। तों ठीकसँ रहिहह। हम जल्दिये आएब।” आ भवानक महिना, अगम-अथाह छै यौऽ ऽ ऽ ऽ। तन मन धनसँ श्रम करू, सफलता भेटबे करत। अहींसँ भीख मांगि भाइजीकेँ पढ़ौलिऐ। अहींक असीरवादसँ, कलक्टर बनेलिऐ। तैयो बाप-पीत्ती भऽ, हुलकियो नै देलकै यौ ऽ ऽ ऽ। (नीक व्यक्तित्वमे मनोजक प्रवेश।) संतोष गीत गेेेनाइ बन्न कऽ देलक। मनोज सभकेँ दहिने हाथसँ प्रणाम करैत छथि। मनोज- बौआ संतोष, नीक छी ने? संतोष- भाइजी एलौं। (पएर छूबि प्रणाम कऽ) हम पूर्ण कुशल छी। अपने नीकेना एलौं ने? मनोज- हँ बौआ, हम बढ़िया जकाँ एलौं ट्रेनिंगो बड़ नीकसँ केलौं। परम आदरणीय, माए-बाप, भाय-बहिन। मनोजक हार्दिक प्रणाम। अपने सबहक अशीर्वादसँ हम आइ आंध्रप्रदेशक कलक्टर बनि ज्वाइन करए जा रहल छी। एकटा भीखमंगाकें अपनेक टाका-दू टाका तारि देलक। तइ लेल अपने सभकेँ हार्दिक धन्यवाद। हमरा कलक्टर बनेबाक मूल श्रेय हमर परम प्रिय अनुज संतोषकेँ जा रहल छन्हि। आइक बाद हमर संतोष अपने सभकेँ सेवा नै कऽ सकताह। हिनका अपने संग लेने जा रहल छियनि। हमरा लेल ई की की नै केलाह। हम हिनकर संग आब केना छोड़ि देबनि। हम आजीवन हिनकर आभारी रहबनि। अंतमे, यएह कहब जे हमरा सबहक गलतीकेँ क्षमा करब। धन्यवाद। संतोष- हम अपने सबहक संग घूलि-मिल गेल रही। एतएसँ टसकबाक मोन नै होइए। मुदा भाइजीक आदेशकेँ केना ठोकरा सकै छी? जाइए पड़त। क्षमाप्रार्थी संतोषक दिससँ समस्त दर्शक वृंदकेँ कोटि-कोटि धन्यवाद। (मनोजक संग झोरा-झपटी लऽ कऽ संतोषक प्रस्थान।) पटाक्षेप। दृश्य- चारिम (स्थान- कलक्टरक आवास। सिपाही वीरभद्र गेटपर ठाढ़ छथि। संतोष डेरापर अछि। मनोज आॅफिस गेल छथि। दीन-हीन अवस्थामे रामलालक प्रवेश।) वीरभद्र- का बात हाउ? रामलाल- सरकार, कनी हाकिमसँ भेँट केनाइ आवश्यक छै। वीरभद्र- हाकिम अभी न हाउ। जा कल अभीहह। रामलाल- डेरापर कियो छथिन्ह सरकार? वीरभद्र- हँ, हुनकर भाए। रामलाल- हुनकोसँ भऽ सकै अछि। कथा-कुटमैतीक संबंधमे गप-सप छै। वीरभद्र- अच्छा आबह। (रामलाल अन्दर जा कऽ संतोष लग बैस गप-सप शुरू केलनि।) रामलाल- सर प्रणाम, हम ठहरलौं एगो अति िनर्धन व्यक्ति। बड़ आशासँ हम अपने लग पहुँचबाक दुस्साहस केलौं। संतोष- कहु की बात? रामलाल- सर, हमरा तीनटा बेटी अछि। ओइमे पहिल बेटीक बिआह लेल अपने ओइठाम पहुँचलौं हेँ। कलक्टर सहाएबक हाथ अपना बुच्ची ले मांगए एलौं अछि। सर एगो गरीबोकेँ तारीयौ? संतोष- गरीबक संबंधमे हमरा अपने किछु नै कहियौ श्रीमान्। बायोडाटा आ लड़िकीक फोटो अपने अनने छी? रामलाल- हँ सर, अनने छी। इएह लिअ। (झोरासँ निकालि कऽ सर्टिफिकेट आ फोटो संतोषकेँ देलनि।) संतोष- श्रीमान्, लड़िकी केहेन छथि? रामलाल- अपन मुँहसँ अपन बड़ाइ ठीक नै। ओना अछि। संतोष- हम बायोडाटा कलक्टर सहाएबकेँ देखा देबनि। हुनकर जे जेना विचार होन्हि। रामलाल- हम काल्हि फेर आएब सर। सर, हमरा िबन्दुपर सकारात्मक ढंगसँ सोचबाक प्रयास अवस्स करबै। संतोष- ईश्वरक इच्छापर छोड़ि दियनु। रामलाल- धन्यवाद सर। जय रामजी की। संतोष- जय रामजी की। (रामलालक प्रस्थान।) पटाक्षेप। दृश्य- पाँच (स्थान- कलक्टरक आवास। दुनू भाँइ संतोष आ मनोज बिआहक संबंधमे गप-सप कऽ रहल छथि।) मनोज- बौआ, काल्हि आॅफिसमे बैसल रही तँ बिआहक लेल एकटा आॅफर आएल। लड़िकी एस.पी. छै। अहाँक सोच सकारात्मक अछि। तँए अपनेक सलाह हमरा सिरोधार्य हएत। संतोष- अपने श्रेष्ठ छिऐ आ आइ.ए.एस. आॅफिसर सेहो छिऐ। अहाँकेँ हम की सलाह दऽ सकै छी? ओना अहाँक अनुपस्थितिमे काल्हि एगो गरीब पहुँचल छेलथि। हुनक जिज्ञासा आ साहसेकेँ धन्यवाद दैत छियनि। बायोडाटा सभ आ फोटो दऽ गेलाह आ कहलनि जे कलक्टर सहाएबकेँ देखा देबनि। हम काल्हि फेर आबै छी। ओ आइए एताह। देखियौ हुनकर बायोडाटा आ फोटो। (संतोष मनोजकेँ बायोडाटा आ फोटो देलनि। मनोज गौरसँ देखि रहल छथि।) मनोज- बौआ, अहाँक की विचार? ओना डेकोमेन्ट्स तँ सभ तरहेँ नीक छै। संतोष- यदि डेकोमेन्ट्स अहाँकेँ पूर्ण रूपेन नीक लगैए तँ ई बिआह कएल जा सकैए। गरीब ने गरीबक दु:ख बुझतै भायजी। वानर जानए आदीक स्वाद। मनोज- बौआ, अहीं कहू, की िनर्णए लेल जाए? एक दिस एस.पी. लड़की आ दोसर दिस साधारण बी.ए. पास लड़िकी सेहो गरीब। संतोष- हमरा विचारसँ बी.ए. पास लड़िकी अपनाएल जाए। कारण ओ जिनगी भरि प्रतिष्ठा दैत रहतीह। मनोज- बौआ, अहाँक विचारकेँ हम कहियो काटि नै सकै छी। कारण हमरा लेल अधलाह अहाँ किन्नहु नै सोचि सकै छी। अहाँक जे जेना विचार हएत से हमरा मान्य अछि। हमरा आॅफिसक टाइम भऽ गेल। हम आॅफिस जा रहल छी। (मनोजक प्रस्थान आ रामलालक प्रवेश।) रामलाल- प्रणाम सर। संतोष- प्रणाम-प्रणाम। आउ बैसल जाउ। (संतोष आ रामलाल बैस कऽ गप-सप कऽ रहल छथि।) रामलाल- सर, हम अपन समैपर उपस्थित छी। अपनेक जे आज्ञा? संतोष- अपने श्रेष्ठ छिऐ आ कर्मठ सेहो छिऐ। अपनेक आज्ञाक पालन अवस्स हेतै। अहाँक प्रस्ताव हमरा लोकनिकेँ मान्य अछि। रामलाल- सर, सचमुच अपने महान छिऐ। एहेन सुन्दर विचार आ िनर्णए लेल अपने सभकेँ हमर हार्दिक धन्यवाद। तहन की केना अगिला आज्ञा होइ छै सर। संतोष- श्रीमान्, अपने गरीब छिऐ आ भाइजी केँ सेहो समैक बड़ बेसी अभाव रहै छन्हि। तँए काल्हिये काली-मंदिरमे आबि बिअाह कार्यक्रम संपन्न कऽ लिअ। पाइ-कौड़ी जे किछु खरच हेतै दुनू दिसक से हमर। जाउ, अपने सभ काल्हि काली मंदिरक प्रांगणमे एगारह बजे पहुँचि जाएब। तखने हमहूँ सभ पहुँचि जाएब। बिआह एक बजे हएत। बेसी लाम-काफ नै हेतै। रामलाल- बेस, तँ हम जा रहल छी। जय रामजी की। संतोष- जय रामजी की। (रामलालक प्रस्थान।) पटाक्षेप। दृश्य- छह (स्थान- काली मंदिर। पुजारी हरिनन्दन पूजामे लीन छथि। रामलाल, लक्ष्मी, सोनी, मोनी, पप्पु, संतोषी, रानी, अमर आ सुमनक प्रवेश।) सभ कियो सजल-सजल अछि। तुरन्त मनोज, संतोष, वीरभद्र, स्टेनो अमन, आ नौकर चन्दन बरियातीक रूमे प्रवेश। दुनू पक्षसँ नमस्कार-पाती भेल। सभ कियो कुर्सीपर बैसलाह। परिछन भेल। लड़िका-लड़िकी मंदिरक सामने लागल विशेष कर्सी-टेबूलपर बैसलथि। पुजारी पूजा कऽ आबि कुर्सीपर बैसलाह।) हरिनंदन- रामलाल बाबू, जलखैयोक जोगार छै की? रामलाल- हँ हँ, अवस्स छै। हरिनंदन- तहन जल्दी चलाउ। फेर बिआह-दान सेहो ने छै। रामलाल- जे आज्ञा होइ पंडीजी। बौआ पप्पु, नश्ता-पानि चलाउ। (पप्पु, अमर आ सुमन नश्ता-पानि चलाए रहल अछि। नश्ता कऽ सभ कियो अपन-अपन जगहपर बैसलथि।) हरिनंदन- चलू लड़िका-लड़िकी मंदिरमे। (लड़िका-लड़िकी मंदिरमे गेलथि। पंडीजी कंबलपर आ लड़िका-लड़िकी कुशक चटाइपर बैसलथि। दुनूक हाथमे कुश दऽ पंडीजी मंत्र पढ़ा रहल छथि।) पढ़ै जाइ जाउ- ऊँ यज्ञोपवीतम् परमं पवित्रं प्रजा पतेर् यत सहजं पुरस्तात्। आयुष्यमग्रयं प्रतिमृन्च शुभ्रं यज्ञोपवीतम् बलमस्तुतेज:।। मनोज+सोनी- ऊँ यज्ञोपवीतम् परमं पवित्रं प्रजा पतेर् यत सहजं पुरस्तात्। आयुष्यमग्रयं प्रतिमृन्च शुभ्रं यज्ञोपवीतम् बलमस्तुतेज:।। हरिनंदन- चलू आब जयमाला हएत। (लड़िका-लड़िकी जयमाला लेल बैसलथि। मोनी आैर रानी जयमाला करौलनि।) हरिनंदन- आब दुर्वाक्षत हएत। पहिने दक्षिणा लाउ। रामलाल- दक्षिणा आगू-पाछू भेटबे करत। किअए हर-बराइ छी पंडीजी? हरिनंदन- बिआहे कालमे हमर कनियाँ सप्पत देने छथिन जे पहिने दक्षिणा तब दुर्वाक्षत। अमन- दक्षिणा लिअ, काज आगू बढ़ाउ। हरिनंदन- हँ, ई भेल मरदबला गप। लाउ। (अमन एक सए एक टाका दक्षिणा देलनि।) दर्वाक्षतक बाद अपने सभ मैयाकेँ प्रणाम कऽ जल्दी प्रस्थान करबै। पंडीजी पैघकेँ अक्षत देलनि।) ऊँ आब्रह्न ब्राह्नणो............... मित्राणमुदयस्तव। (पैघ जन लड़िका-लड़िकीकेँ दुर्वाक्ष दऽ सभ कियो मैयाकेँ प्रणाम करै छथि। फेर सभ कियो नमस्कार-पाती कऽ प्रस्थान करै छथि।) पटाक्षेप। दृश्य- सात (स्थान- लखनक घर। अस्वस्थ अवस्थामे मीना चिन्तामग्न अछि।) मीना- हे भगवान, ऐ सँ बढ़िया हमरा लऽ चलू। दुनियाँमे केकरो कियो नै। कोन बेमारी ऐ देहमे पसि गेल से नै कहि। इलाजो कराएब से आब खेतो-पथार नै रहल सभटा बीकि गेल। आब डीहेटा बचल अछि। बेटा बेटी नै पढ़लक। दुनू नरहेर जकाँ बौआइए। बेटी जुआन भेल जा रहल अछि। ओकर बिआह-दानक चिन्ता सेहो सताए रहल अछि। एगो कमाइबला की करत? सेहो हमरे बेमारीक चक्करमे फँसल रहैत अछि। (लखनक प्रवेश) लखन- रानी, मोन बेसी खराब अछि की? मीना- हँ बड़ बेसी खराब अछि। जीअब की नै से नै, कहि। लखन- यै, संपत्ति किअए रहै छै? डीह अछि ने। डीह भरना रखि दइ छिऐ। ओइसँ इलाज कराए लिअ। जीअब तहन ने भोगब। मीना- लोक की कहत जे डीहो बहुमे लगा देलक। लखन- हम अप्पन करतब करब। मीना- बेस, अहाँक जे विचार। लखन- जाधरि अहाँक घटमे परान रहत, ताधरि हम अपन प्रतिकार नै छोड़ब। कारण हम अहाँक हाथ पकड़ने छी। आइ उ बेटा सभ रहितए तँ किछु उस्साहसक आशा करितौं। मीना- के बेटा सभ? लखन- मनोज आ संतोष। मीना- ओकर नाम नै लिअ। नै तँ हम अहु दशापर जहर-माहूर खा लेब आ सभकेँ जहल खटाएब। लखन- एहेन बात छै तँ हम ओकरा सबहक नाम नै लेब। सएह ने? मुदा जहर-माहूर खा लेब तँ ओकर स्वादो तँ अहींकेँ भेटत आ नयन सुख कत्ते हएत सेहो कने सोचि लिऔ। अपनाकेँ बड़ बेसी बुझनाइ सेहो बड़ खराब होइ छै। आबो अपन ई बुझनाइपर नियंत्रण राखू। अन्यथा अप्पन बुझू। पटाक्षेप। दृश्य- आठ (स्थान- कलक्टरक आवास। आवासपर मनोज, संतोष, सोनी आ वीरभद्र छथि। वीरभद्र वर्दीमे छथि और तीनू साधारण पोशाकमे छथि।) सोनी- स्वामी, हम अति प्रसन्न छी। मुदा एतए तीनटा चीजक कमी देखाए पड़ि रहल अछि। मनोज- बाजू प्रिय, उ तीन गो कोन चीज अछि? सोनी- सासु, ससुर आ ननदि। मनोज- प्रिय, अहाँकेँ कोनो चीजक कमी नै अछि। मुदा एत्तए नै, अपन गाममे। सोनी- तहन एक्को दिन ले गाम चलल जाए। प्राणप्रिय हुनको सभकेँ दर्शन तँ कऽ लेब। मनोज- मुदा एगो खेद अछि जे कहैमे लाज होइए। सोनी- कहबै नै तँ बुझबै केना? मनोज- इहए जे हमर अप्पन माए स्वर्गवास भऽ गेल छथिन, माए सतौत छथि आ ननदि सेहो ओही पक्षक छथि। सोनी- जे छथि से छथि, मुदा हमरा लेल वएह अप्पन छथि, सभ किछु छथि। संतोष- भौजी, अपनेक विचार तँ उत्तम अछि। मुदा वएह मए हमरा दुनू भाँइकेँ बोनक पत्ता तोड़ौलक ने। हमरा दुनू भाँइकेँ कहियो मनुक्ख नै बुझलक। भीख मांग कऽ खाइले कहलक पढ़ैले कहलिऐ तँ बढ़नीसँ झँटलक। कोन-कोन करम ने केलौं। सोनी- बझै छिऐ बौआ, होनहार वीरवान के होत चिकने पात। जदी कैकेयी अपन भरत ले राजगद्दीनै मांगितथि तँ राक्षस राज नष्ट होइतै? अहाँ सभ एत्तए पहुँचितिऐ आ हम एत्तए पहुँचितौं? मनोज- से तँ अहाँ काए लाखक गप्प बजलौं। सोनी- हम की बाजब प्रियतम, हम तँ मुरूख छी। मुदा भगवान जे किछु करै छथिन से नीके करै छथिन। हम अपने सभसँ आग्रह करैत छी जे इर्ष्या-द्वेषकेँ तियागि गाम चलू आ अपन समाजकेँ देखाए दियनु बुझाए दियनु जे ईश्वर जे किछु करै छथिन से नीके करै छथिन। संगहि अपन समाजमे एगो पार्टी दिऔ। मनोज- बौआ, भौजीक विचार कटैबला नै छन्हि। काल्हिये गाम चलू आ ओत्तए एगो चिक्कन पार्टी भेनाइ आवश्यक छै। (एम्हर वीरभद्र खैनी चूना कऽ खाइए, ओंघाइए, मोंछ टेरैए, मोंछ फरकबैए।) सोनी- प्रियतम, कने सिपाही दिस धियान दियौ। (मनोज, सोनी आ संतोष सिपाही दिस धियान देने छथि।) वीरभद्र- (निन्नमे) कए महीनासँ कनियाँ उपासे हाएत। सरकार छुट्टिये नै दइए। गामक नीक-निकुत खाइमे बड़ नीक लगैए। जेहन हमर कनियाँ सुन्नरि तेहने ओकर हाथक भोजन। मोन होइए जे सरकारेकेँ छुट्टी दऽ दैतिऐ आ कनियेँकेँ सरकार बनाए दैतिऐ। दुनू परानी एक्केठाम रहितौं। कनियाँ छोड़ि हम स्वर्गोमे नै रहि सकै छी। मनोज- सिपाही, सिपाही, सिपाही ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ। वीरभद्र- (फुरफुरा कऽ उठि) जी जी जी, जीर-मरीच धनिया मिरचाइ। जगले तँ छी सर। तनी मेहरारूक यादि आ रहल वानी। मनोज- ड्युटी पिरीयडमे एना नै हेबाक चाही। नैतँ छुट्टी भऽ जाएत। वीरभद्र- अब ऐशन ना होइ सर। (फेर वीरभद्र खैनी खा कऽ सुति रहल आ सपनाए रहल अछि।) सर कहलनि छुट्टी भऽ जाएत। मुदा मैडम एक्को बेर आइ तक नै टोकलक। बड़ चिक्कन छी तँ अपने घरमे। हमरा अहाँसँ कोन मतलब अछि। सभटा प्रशासन सभकेँ देखै छिऐ बड़का-बड़का पेट। जेना पेटमे साँढ़-पाराक बच्चा होइ। बाप रौ बा, ओइ पेटमे घूस लाए कत्ते जगह छै? ओना हमरो पेट तँ छोट नै अछि नम्हरे अछि। मुदा हमरा पेटमे तीनिटा बच्चा अछि। उहो बच्चा केकरो आनबला नै अछि अपने कनियाँबला अछि। सर बिअाह केलखिन, पार्टियो नै देलखिन। जाबे तक पार्टी नै देतहीन ताबे तक बच्चे नै हेतनि। हमर वचनकेँ ब्रह्मो नै काटि सकैए। मनोज- सिपाही, सिपाही, सिपाही.......। वीरभद्र- (फुरफुरा कऽ उठैत) जी सर, जी सर, जी सर। मनोज- सिपाही, अहाँ किअए एना करै छी? नोकरी करब, की छुट्टी लेब? वीरभद्र- सर, छुट्टी तँ नै लेब। मुदा पार्टी तँ लऽ के रहब। पार्टी दऽ देबै। सभ नीन्न पार भऽ जेतै। मनोज- बेस, काल्हि हमरा गाम चलू। ओत्तै धमगिज्जर पार्टी हेतै। वीरभद्र- तहन हम मोंछ-तोंछ पीजा लइ छी। पटाक्षेप। दृश्य- नअ लखनक घर। मीनाकेँ उनटा साँस चलै छन्हि। लखन चिन्तित मुद्रामे बैसल छथि। हुनका आँखिसँ दहो-बहो नोर जा रहल छन्हि। रामपरी आ कृष्णा हिचुकि-हिचुकि कानि रहल अछि।) लखन- आब की करब? डीहो बीिक गेल। मुदा कारणी चंगा नै भेल। डाॅक्टर कहलनि जे ई पेसेन्ट बड़का ऑपरेशनक बादे ठीक भऽ सकैत अछि। हम पचास हजार टाका कतएसँ आनब? छूच्छाकेँ के पूच्छा? (मनोज, सोनी, संतोष आ वीरभद्रक प्रवेश। सभ कियो एक-दोसर दिस ताकि रहल छथि। मुदा कियो किनको चिन्है नै छथि।) लखन- अहाँ सभ के छी? मनोज- हम अहींक बेटा मनोज छी। ई संतोष छथि। ई हमर पत्नी छथि। ई हमर सिपाही छथि। लखन- बौआ मनोज, बौआ संतोष। (दुनू बेटाकेँ भरि पाँज कऽ पकड़ि खुशीसँ कानि रहल अछि। एक-दोसरकेँ छौड़ैक मन नै होइ छन्हि। फेर छोड़ि दइ छथि। सभ एक-दोसरकेँ गोर लागै छथि। मुदा मीना, मनोज, संतोष आ सोनीक गोर लागै कालमे पएर छीप लेलनि।) डोरी जरि जाए मुदा ऐंढ़न नै जाए। आबो चेतू। मरनासन अवस्थामे छी। मीना- (कुहरि कऽ) आब हम की चेतब, अहाँ सभ चेतु। लखन- करतबक फल तँ भेटबे करत। मीना- हम तँ नै रहब दुनियाँमे। मुदा अहीं अमर भऽ कऽ रहब। से दुनियाँ देखत ने। अाह! ओह! प्राणो नै छुटैए। मनोज- माताजी केँ की भेलनि, पिताजी? लखन- आइ साल भरिसँ बेमार अछि। पेटमे कोनो गड़बड़ी छै। एकर इलाजमे डीहो तक बीकि गेल। डॉक्टर कहलनि जे एकरा बड़का ऑपरेशन हेतै तबे ठीक हएत। ओइमे कमसँ कम पचास हजार खरच हएत। हम आब कतए सँ ओत्ते पाइ आनब। ने राधाकेँ नअ मन घी हेतनि आ ने ओ नचती। बौआ तोरा सभकेँ एना किअए भऽ गेलह? मनोज- इसकूलसँ टूरपर जाइ कालमे बस पलटी मारि देलक। ओहीमे दुनू भाँइकेँ एना भऽ गेल। हेड सर जी जान लगा कऽ जिऔलनि। आइ अपनेक किरपासँ कलक्टर छी। लखन- (आश्चर्यसँ) कलक्टर! कलक्टर! साँचे कहै छह? मनोज- हँ हँ। कलक्टर। साँचे कहै छी। अहाँ सप्पत। लखन- यै, बेटा कलक्टर भऽ गेल। आबो कने नैन जुड़ा लिअ। मीना- (कुहरि कऽ) कलक्टर होइ की मजिस्टर होइ, उ अपने गाँइर सम्हारत। ओइ सँ हमरा की? संतोष- पिताजी, चालि परथित बेमाए। तीनू मुइने जाए। सोनी- बौआ, अखन ई सभ नै बजिऔ। अखन मधुर वचनक आवश्यकता अछि। प्राणप्रिय एक बेर अपना सभ माताजीकेँ देखतिऐ। मनोज- हमहूँ सएह साेचैत रही जे बड़के हॉस्पीटल चलितौं, ऑपरेशन करा दैतिऐ। मीना- (कुहरि कऽ) हम ऑपरेशन-तपरेशन नै कराएब। आ ने होस्प्ीटल जाएब। संतोष- सुनै छिऐ भौजी हिनकर भाषा। वीरभद्र- बड़ी टेढ़ जनानी बा। बड़ी रार जनानी हऽ। मनोज- अपने सभ शांत रहियौ। माताजी, अपने हाँस्पीटल चलिऔ। कोनो चीजक डर नै। डॉक्टरकेँ हम अपने कहबै जे बिना ऑपरेशनक ठीक करैले। अहाँ अवस्स ठीक भऽ जाएब। बड़का डॉक्टर छै। मीना- डाक्टर बड़का रहै की छोटका रहै। हम आब जी कऽ की करब? मनोज- रामपरी आ कृष्णा जे ओत्ते कनैए, ओकरा की हेतै? मीना- अपना केने की होइ छै? भगवानक जे मर्जी हेतनि सएह हेतै? हम कतौ ने जाएब। हम मरबे करब। सोनी- स्वामी, हमरा लगैए जे ई ओना नै जेती। जबरदस्ती एम्बूलेंसमे बैसाउ। मनोज- हमरो सएह लगि रहल अछि। ओना माताजी बुधियारि छथि। जबरदस्ती नै करए पड़तै। मीना- हम बुधियार रहितौं तँ इएह दशा होइतए हमर। मनोज- सभ कियो मिलि कऽ हिनका उठाउ कोनो तकलीफ ने होन्हि। (सभ कियो मीनाकेँ उठबए चाहैत छथि। मुदा ओ नै-नै करै छथि। मुड़ीमचरूआ सरऽधुआ इत्यादि सभ कहि-कहि गारि सेहो दइ छथि। मुदा जबरदस्ती हुनका उठा-पुठा कऽ एम्बूलेंसमे बैसा, हॉस्टपीटल लऽ जाइ छथि। सबहक प्रस्थान।) पटाक्षेप। दृश्य- दस (स्थान- हॉस्पीटल। डॉक्टर धीरेन्द्र कमपान्डर विजय आ विवेक तथा नर्स अनिता आ मनीषा हॉस्पीटलक काॅमन रूममे बैसि चाह पीबैत गप-सप करैत छथि।) धीरेन्द्र- विजय, आब मोन होइए जे डॉक्टरी पेशासँ सन्यास लऽ ली। दिन-राति कखनो चैन नै। एत्ते कतौ लोक बेमार पड़लैए। विजय- सर, खान-पान आ जलवायु प्रदूषित भऽ गेलैए। स्वाभाविक छै लोक बेमार पड़बे करत। विवेक- सर, लोककेँ बहुत टेंशनो भऽ गेलैए। व्यायाम-योग खतम भऽ रहलैए। तहन लोक स्वस्थ किअए रहत? धीरेन्द्र- पाइ बड्ड कमेलौं। एकटा बेटा इंगलैण्डमे डॉक्टर अछि आ दोसर अमेरिकामे इंजिनियर। आब भगवानक शरणमे जा शांति चाहै छी। अनिता- सर, परोपकारसँ सेहो शांति भेटै छै। मुफ्त इलाज कएल जाउ, आत्मा संतुष्ट रहत। धीरेन्द्र- नै अनिताजी, ई बात नै छै। मुफ्त इलाससँ वा कम फीससँ डॉक्टर हल्लुक भऽ जाइ छै। मनीषा- तहन परोपकार आ इमानदारीकेँ पैघ गुण किअए कहल जाइ छै सर? धीरेन्द्र- एक्सट्रा आर्डिनरी प्रतिष्ठा देखबै तँ अोकरा सभकेँ नजर अंदाज किछु करैए पड़त। ओना आइ-काल्हि परोपकार आ इमानदारी कागजे भरि रहि गेल अछि। आइ काल्हि नै उ देवी छै आ ने उ खराह छै। (पेसेंट मीना केर संगे लखन सपरिवारक प्रवेश।) मनोज- (डॉक्टरसँ) डाॅक्टर साएहाएब, एकटा पेसेंट छै। इमरजेन्सीमे भर्ती कएल जाउ। (अपन परिचय पत्र देखबै छथि।) धीरेन्द्र- (परिचय पत्र देखि) विजय, कलक्टर सहाएबक पेसेंटकेँ इमरजेन्सीमे देखबै। जल्दी लेने आउ। (दुनू कमपॉण्डर आ दुनू नर्स मीनाकेँ आनलनि। आलासँ हुनका जाँचलनि।) सर, प्रीसकेप्शनो सभ छै अपने लग? मनोज- जी सर। (मनोज धीरेन्द्रकेँ प्रीसकेप्शन देलनि। ओ गौरसँ देखलनि।) धीरेन्द्र- सर, अपनेक पेसेंट ऑपरेशनक अछि। मनोज- जे आवश्यक होइ, से कएल जाउ। धीरेन्द्र- सर, किछु खूनक आवश्यकता हएत। मनोज- बाजारसँ आनि देब। जे पाइ लगतै से हम तैयार छी। धीरेन्द्र- जदी नै उपलब्ध हेतै तहन? मनोज- हम सभ सभ कियो छी। जिनकर खून सेट करतै से तैयार छथि। खूनक जाँच कएल जाउ। धीरेन्द्र- विजय, सबहक खूनक जाँच कऽ लिअ। (विजय सबहक खूनक जाँच करै छथि।) विजय- सर, मनोजक ग्रुप मिलै छन्हि। मनोज- सर, हम तैयार छी। धीरेन्द्र- अनिताजी आ मनीषाजी, पेसेंटकेँ ऑपरेशन थियेटरमे लऽ चलू। संगमे सर सेहो जेथिन। (दुनू नर्स मीनाकेँ थियेटरमे लऽ गेलथि। संगमे मनोज सेहो छथि।) अनीताजी, सरसँ खून लऽ लिअ। पेसेंटकेँ हिनके खून सेट करै छन्हि। (अनिताजी मनोजसँ खून लेलनि।) मीना- हम मरि जाएब तँ मरि जाएब, एकर खून नै लेबै। धीरेन्द्र- मनीषाजी, पेसेंटकेँ एगो निशाँबला सुइया दऽ दियनु। (मनीषाजी मीनाकेँ सुइया देलनि। पेसेंट बेहोश भेलीह।) सरकेँ बाहर कऽ दियनु मनीषाजी। (मनोजकेँ मनीषा डेन पकड़ि बाहर आनि बैसौलनि। थियेटरमे ऑरेशन भऽ रहल छन्हि। थियेटरमे पेसेंट, डाॅक्टर आ दुनू नर्स छथि। रमाकान्त आ बलदेवक प्रवेश।) लखन- प्रणाम मुखियाजी। रमाकांत- प्रणाम प्रणाम। लखन- नमस्कार बलदेव भाय। बलदेव- नमस्कार, नमस्कार भाय। (आपसमे सभ कियो प्रणाम-पाती कऽ बैसलाह।) रमाकान्त- लखनजी, पेसेंटक हाल-चाल कहू। लखन- पेसेंट ऑपरेशन थियेटरमे छथि। डाॅक्टर कहलनि घबरेबाक काज नै छै। रमाकान्त- लखनजी, गामेपर सुनलौं जे अहाँक बेटा कलक्टर बनलथि। से ठीके बात छिऐ? लखन- (मनोजसँ) बौआ, मुखियाजी केँ प्रणाम करियनु। (मनोज मुखियाजीक पएर छूबि प्रणाम केलनि।) रमाकांत- लखनजी, अहाँक बेटा पाथरपर दुबि जनमा देलक। हिनक तियाग-तपस्या लेल हिनका हार्दिक धन्यवाद। (दुनू नर्स ऑपरेशन थियेटरसँ पेसेंटकेँ बाहर निकालि बेडपर सुतौलनि। पेसेंट बेहोश छथि। पीठेपर डाॅक्टर निकललथि। आपसमे प्रणाम-पाती भेलनि। डॉक्टर कॉमन रूममे गेलथि। रामलालक प्रवेश।) रामलाल- मुखियाजी प्रणाम। रमाकांत- प्रणाम प्रणाम। रामलाल- कहू पेसेंटक हाल। लखन- अखने ऑपरेशन भऽ कऽ एलीह। अखन होशमे नै एलीह। रामलाल- लखन भाय, सुनलौं अपनेक बेटा कलक्टर भेलाह आ गामो आएल छथि। लखन- बौआ मनोज, कक्काकेँ गोर लगहुन। (मनोज, रामलालकेँ पएर छूबि प्रणाम केलनि। दुनू एक-दोसरकेँ टकटकी लगा कऽ देखि रहल छथि। कियो किनको चिन्है नै छथि। फेर मनोज सोनी लग जाइ छथि।) मनोज- यै, एगो आदमी माता जीक जिज्ञासामे आएल छथि। उ लगै छथि जेना अहींक पिताजी होथि। नै हम चिन्हलियनि आ ने उ चिन्हलथि। कने चलि कऽ देखियनु तँ। (सोनी आबि कऽ अपन पिताजी केँ चिन्हलथि।) सोनी- पिताजी प्रणाम। (पएर छुबि कऽ) रामलाल- खुश रहू बेटी। अहाँ एत्त कत्त? सोनी- माता जीक ऑपरेशन छेलनि। रामलाल- (आश्चर्यसँ) माताजी! माताजी!! सोनी- हँ पिताजी, पेसेंट हमरे सासु छथिन। रामलाल- तहन तँ लखन हमर समधि हेथिन। नमस्कार समधि (लखनसँ) लखन- (आश्चर्यसँ) से केना रामलाल भाय? रामलाल- से हमरो नै बूझल छेलए। अखने बुझलौं। अहाँक जे पुतोहु हेती से हमरे बड़की बेटी छथि। लखन- साँचे कहै छी? रामलाल- साँचे नै कहै छी तँ फूसि। ई गप मजाक वा फूसिबला भऽ सकै छै। लखन- तहन तँ नमस्कार समधि। रामलाल- नमस्कार नमस्कार। लखन- कहू बाल-बच्चा आ समधीनक हाल-चाल। रामलाल- बाल-बच्चा सभ आनन्द अछि आ दुनू समधीन बमकि रहल छथि। दुनू एकपर एक छथि। हुनका सबहक आगू हमहीं बड़ बूढ़ छी। मुखियाजी, रामलाल, भायसँ समधि बनि गेलाह। मनोज हमरे दमाद छथि। रमाकांत- रामलालजी, तहन तँ अपने छक्का मारि लेलिऐ। वएह मनोज आ संतोष लखनक बौरेलहा बेटा रहए। आइ देखियौ भगवानक किरपा। रामलाल- मुखियाजी, भगवान राइकेँ परवत आ परवतकेँ राइ बना सकै छथि। आखिर प्रेरणा तँ हुनके होइ छन्हि आ करतब अप्पन। रमाकान्त- रामलालजी, अपनेक करतबक फल जे दूटा कनियाँ रहैत सुसज्जित परिवारक चर्चा कत्त-कत्तए ने होइए। जखन कि अहाँ अपन समधिकेँ देखियौ। एगो समदाही, सतौत बेटाकेँ खाक छनाए देलकै। (मीनाकेँ होश एलनि।) मीना- कने पानि पीब। (सोनी पानि आनि कऽ पीअबैत छन्हि।) सोनी- माताजी, उठि कऽ बैसल हएत। मीना- कने सहारा दिअ तँ कोशिश करै छिऐ। (सोनी मीनाकेँ सहारा दऽ उठा कऽ बैसौलनि आ दुनू डेन पकड़ि बैसल छथि।) रामलाल- समधीन, आब ठीक छी ने? अपने हमर समधि केना छिऐ, पड़ोसी छेलिऐ ने? रामलाल- भगवानक किरपा जे अपनेक डेन पकड़निहारि हमरे बेटी छी आ अपनेक मनोज हमर दमाद। मीना- (कर जोड़ि) देखियौ भगवानक महिमा अपरम्पार होइ छै। वएह मनोज आ संतोषकेँ हम कोन-कोन दुर्दशा ने केलिऐ। एतबे नै बढ़नीसँ झाँटि घरसँ निकालि देलिऐ। आइ वएह मनोजक किरपा जे हम अपने सबहक दर्शन कऽ नयन जुड़बै छी। सचमुच हम बड़ पैघ पापी छी आ मनोज, संतोष और सोनी परम महान छथि। ऐ संदर्भमे हम क्षमाप्रार्थी छी, क्षमाप्रार्थी छी, क्षमाप्रार्थी छी। मनोज- धन्यवाद माताजी। घर चलै चलू। माता जी आब चंगा भऽ गेलीह। (सबहक प्रस्थान) ।पटाक्षेप। ।।इति शुभम्।। सूचनाक अधिकार विषयपर आधारित मैथिली नाटक- अधिकार दृश्य- एक (स्थान मुखिया चन्दनक घर। दलानपर चारि-पाँचटा कुर्सि लागल छै। मुखियाजीक मुहँलगुआ अमरनाथ आ चन्दन कुर्सीपर बैस गपसप कऽ रहल छथि।) अमरनाथ- मुखियाजी, आइ-काल्हि कोनो मुल्हा फँसलै की नै। चंदन - फँसिते रहै छै की। ओना दू-तीनि दिनसँ बोहनियो नै भेल अमर भाय। अमरनाथ - मुदा बड़ कसि कऽ धऽ लै छिऐ अहाँ। चंदन - की करबै, अहीं कहु। हमरा सरकार कोनो तनखाह दै छै? (मंजूरक प्रवेश पूर्ण गरीबी अवस्थामे) मंजूर - मुखियाजी प्रणाम। चंदन - प्रणाम प्रणाम। आउ मंजूर भाय। (मंजूर भुइँयापर बैसि जाइ अछि।) मंजूर भाय, नीच्चाँमे किआए बैसलौं? कुर्सीपर बैसु ने। मंजूर - हम कुर्सीपर बैसैबला लोके नै छिऐ। कुर्सिपर हाकिम सभ बैसै छथिन। अमरनाथ भाय, प्रणाम । अमरनाथ- प्रणाम प्रणाम, कहु मंजूर भाय, की हाल चाल? मंजूर- जीऐ छी नै मरै छी, हुक्कुर-हुक्कुर करै छी। अहाँ ऐ फाटल-चिटल लोकपर, कोनो ध्याने नै दै छी ।। अमरनाथ - कहु धिया-पुताक हाल-चाल, घरवालीक हालचाल? मंजूर - की कहब, धिया-पूता चारि-पाँचटा बेसी भऽ गेलै। तैसँ अक्कछ रहै छी। कहलनि अपरेशन कराऽ लिअ तँ कहलनि अपना सबहक हदीशमे से नै लिखल छै। आ फेर कहलनि हुअ ने दियौ कत्ते हेतै अपन-अपन कमा कऽ खेतै। (चन्दन आ अमरनाथ मुस्काए रहल छथि।) अमरनाथ- मंजूर भाय, कनियाँ थेहगर छ से? मंजूर- की पूछै छी? आब नै सकै छी तैयो बड़ हरान कऽ दै आए। आब छोड़ भाय मजाक तजाक। ऐ बुढ़बाकेँ की चटै छी? चन्दन - कह मंजूर केम्हर-केम्हर एलाह? मंजूर - सरकार, इन्दिरा आवासबला गप हम कहिया कहलौं 2006एमे। कत्ते दिन भऽ गेलै? ताबे कत्ते आदमीकेँ इन्दिरा आवास भेटबो केलै। सरकार हमरोसँ बेसी गरीब कियो छै? टमटम चलबै छेलौं तँ घोड़ीओ खर्च नै निकलै छेलाए। सुखा-टटा कऽ घोड़ीओ मरि गेल। करजा-बरजा लऽ कऽ एगो पुरना रिक्शा कीनलौं। सेहो कहियो चलैए कहियो नै। टेम्पू-सवारी रिक्शेबलाक रोजी-रोटी खेलकै। आब हमरोपर ध्यान दियौ सरकार। बरसातमे एक्को बुन्नी पानि बाहर नै खसै छै। चन्दन - बीस हजार तोरा नाम सँ भेटतह । ओइमे की खरचा-बरचा करबहक? मंजूर - हम तँ कहब, एक्को पाइ नै । मुदा अहीं कहियौ की केना लगतै? चन्दन - अमरनाथ भाय, कनी बूझाए दियौ। अमरनाथ - मंजूर भाय, ओना सभकेँ छ-सात हजार लगै छै, अहाँकेँ पाँच हजार लागतै। मंजूर - बाप रे बा, तहन हमरा की बचतै? पनरह हजारमे केहेन घर हेतै? अमरनाथ - किछु अपनो दिशिसँ लगा देबै। मंजूर - खाइ लाए मरै छी,धिया-पुता पन्नी बिछै आए रोडपर। ओइमे से एक-दू साए टका खइ-पीऐ लाए दऽ देब, सरकार। किरपा करियौ। चन्दन - पाँच हजार देबै तहने हाएत। नै तँ नै हाएत। बात जानी साफ। मंजूर - हे हे सरकार, पएर पकड़ै छी। दाढ़ी पकड़ै छी। एगो घर डाइनो बकसै छै। एगो गरीबो केँ कल्याण करू। नीक हाएत सरकार। चन्दन - बेसी नीक हमरा नै पचै छै। ओत्ते लगबे करत। मंजूर - तहन जाइ छी सरकार। जे करियौ। ओना एगो गरीबकेँ तारितिऐ ऽ ऽ ऽ ऽ। (प्रस्थान) चन्दन - हम फेर मुखिया हाएब की नै, के जनै छै? माल बनेबाक बेर अनेक नै अछि। अमरनाथ - से तँ ठीके मुखियाजी। काल्हि के देखलकै? ओना मंजूर वास्तवमे बड़ गरीब अछि। (पटाक्षेप) दृश्य – दू (स्थान मंजूरक सलाहकार विनोदक दलान विनोद कूर्सीपर बैसि पेपर पढ़ि रहल छथि। दीन हीन अवस्थामे मंजूरक प्रवेश।) मंजूर - नेताजी प्रणाम। विनोद - प्रणाम प्रणाम। कहऽ की हाल चाल? आइ बहुत दिनपर देखलिअ। कह केम्हर-केम्हर एलाह? मंजूर - की पूछै छी नेताजी। मुखिया बिना घूसे इंदिरा आवास नै देमऽ चाहैए। तहूमे बीस हजारमे कम-सँ-कम पाँच हजार। कहू तँ पनरह हजारमे की की करब? अहूमे आइ चारि-पाँच सालसँ आइ-काल्हि आइ-काल्हि करैए। अखैन कतबो पएर दाढ़ी पकड़लियन तैयो उ नै घमलथि। एक्के बेर कहलथि, पाँच हजार देबै तहने हाएत। नै तँ नै हाएत। बात जानि साफ। अपने हमरा बुधि दिअजे एकर कोनो नियम कानून छै की नै? विनोद - कानून तँ छै, मुदा दौड़ा-बढ़ी करए पड़तह। तों गरीब आदमी छह। तोरा सँ पार लगतह? मंजूर- – नेताजी, मरता क्या नहीं करता । मरल तँ हम छीहे। अहाँ हमरा रस्ता बताए दिअ, देखै छिऐ कानूनमे दम छै की नै। उचितक लेल अहाँ हमरा जे कहब से करै लाए तैयार छी। विनोद - हम एगो आवेदन लिखि दैत छियह। मुखिया लग अखैन चलि जा दऽ दिहक आ की कहै छह से फेर कहिहह। (विनोद मंजूरकेँ एगो आवेदन लिख दैत छथि आ मंजूर उ लऽ कऽ मुखिया लग तुरंत जाइ अछि।) (पटाक्षेप) दृश्य- तीन (स्थान - चन्दन मुखियाक दलान। दलानपर चन्दन आ अमरनाथ कुर्सीपर बैस गपसप कऽ रहल छथि। मंजूरक प्रवेश।) मंजूर - मुखिया जी प्रणाम। चन्दन - प्रणाम प्रणाम। मंजूर - अमरनाथ भाय प्रणाम। अमरनाथ - प्रणाम प्रणाम मंजूर भाय। बैसू। मंजूर - की बैसब? बैसलासँ पेट भरतै। मुखिया जी एगो दरखास छै, देखल जाउ। चन्दन - लऽ लिअ अमरनाथ। पढ़ियौ की लिखल छै। (अमरनाथ दरखास्त लऽ कऽ पढ़ै छथि। मंजूर भूइयांमे बैसि जाइत अछि।) अमरनाथ - सेवामे, श्रीमान् मुखिया महोदय। ग्राम पंचायत राज रामपुर। महाशय, नम्र निवेदन अछि जे हम अति निर्धन व्यक्ति छी। अपन पंचाइतमे किनको सँ पहिने हमरा कोनो सुविधा भेटक चाही। ओइमे अपने हमरा पाछू छोड़ि दै छिऐ। इंदिरा आवास लाए चारि-पाँच साल सँ घूमबै छी। जै गरीबकेँ पाँच हजार टाका नै रहाए ओकरा इंदिरा आवास नै भेटए! ऐ संदर्भमे अपने सँ करबद्ध प्रार्थना अछि जे एगो महागरीबकेँ निःशुल्क इंदिरा आवास प्रदान कऽ कल्याण काएला जाए। संगहि सूचना अधिकारक तहत पंचाइत सचिव सँ इंदिरा आवासबला आय-व्यय फाइल उपलब्ध करबैमे सहयोग काएल जाए। धन्यवाद। अपनेक बिसवासी- मंजूर चन्दन - जाउ मंजूर, अहाँकेँ जै अधिकारक प्रयोग करबाक अछि करू ग। देख लेबै। नै, जदी पाँच हजार टाका ओइमे से देबै तँ अखनो भऽ सकैए। मंजूर - नै मुखियाजी, हमरा कानूनेमे जाए दिअ। चन्दन - जाउ ने हम रोकने छी। मंजूर - बेस हम जाइ छी। (मंजूरक प्रस्थान) अमरनरथ - मुखियाजी एकरा बुते एगो अल्हुआ तँ उखरबे नै करतै आ आएल छेलाह धमकी दै लाए। केहेन-केहेन गेल्लाह तँ मोंछबला एल्लाह। चन्दन - हा हा हा ऽ ऽ ऽ ऽ (ठहक्का मारि हँसै छथि।) जाए दियौ अमरनाथ कतए जेतै कानून अपना हाथमे छै। (पटाक्षेप) दृश्य- चारि (स्थान - विनोदक दलान। विनोद ससुराइर जाइक तैयारीमे छथि। तखने मंजूरक प्रवेश।) मंजूर - नेताजी प्रणाम। विनोद - प्रणाम प्रणाम। कहऽ मंजूर, मुखियाजी भेटलखुन। मंजूर - हँ भेटलथि तँ जरूर। मुदा फेर ओएह गप्प। बिना पाँच हजार घुसे काज नै हाएत। अहाँके जै अधिकारक प्रयोग करबाक हुआए ये करू। विनोद - आब हुनक, किछु नै कहक। हम तोरा तीनिगो आवेदन लिख दै छियह। एगो बी.डी.आे. केँ दऽ दिहक, एगो एस. डी. ओ. के दऽ दिहक आ एगो डी. एम. केँ दऽ दिहक। डर नै ने हेतह? मंजूर - डर कथीके हेतै नेताजी। कोनो हम चोरी कर जाएव। अहाँ कनी हानि कऽ लिखि दिअ। (विनोद तीनगो आवेदन लिखि दै छथि।) विनोद - मंजूर, ई तीनु आवेदन लाएह। तीनु ऑफिसमे दऽ दिहक। हम आइ ससुराइर जाइ छिअह। एक सप्ताहक बाद एबह। देखहक की होइ छै? मंजूर - हम एखनइ जाइ छी नेताजी। विनोद - बेस जाह। हमहूँ जाइ छिअह। (पहिने मंजूरक प्रस्थान। तकर बाद विनोदक प्रस्थान।) (पटाक्षेप) दृश्य- पाँच (बी.डी.ओ. कार्यालय। गेटपर एगो सिपाही छथि। बी.डी.ओ. अशोक कार्यालयमे फाइल उनटा रहल छथि। तखने मंजूरक प्रवेश। सिपाही मानसिंह छथि।) मंजूर - प्रणाम सर। मनसिंह - प्रणाम प्रणाम। का बात हउ? मंजूर - सर, कनी बी. डी. ओ. सहाएबकें भेंट करबाक छै। मानसिंह - बात का ह, से पहिले बोल न? सहाएब जरूरी काममे फंसल बा? मंजूर - सर, हमरो बड़ जरूरी काज छै। इंदिरा आवासबला एगो दरखास छै। मानसिंह - अच्छा जा। (मंजूर अशोक लग पहुँचलथि।) मंजूर - हाकिम परणाम। अशोक - बाजू की बात अछि? मंजूर - हाकिम इंदिरा आवासबला एगो दरखास छै। अशोक- अखैन उ सब काज नै होइ छै ब्लॉकमे। उ काज मुखिए करै छै। अपन मुखिए लग जाउ। मंजूर - हाकिम, मुखियासँ अक्कछ भऽ गेलौं तहन ने अपनेक शरणमे एलौं। चारि-पाँच साल पहिने बाढ़िमे घर दहाए गेल। सिरकी तानि सभ परानी कौहुना जीबै छी। अशोक - मुखिया की कहलनि? मंजूर - मुखिया कहलनि जे बीस हजारमे पाँच हजार लेब, तहने हाएत, नै तँ नै। अशोक - किछु लऽ दऽ के काम कऽ लैतौं न? मंजूर - हाकिम, हमरा उ बात एक्को रत्ती पसीन नै पड़ल। एक-दू साए बला गप रहितै तँ सोंचबो करितिऐ। हाकिम, किरपा कऽ ई दरखास लियौ आ एगो गरीबोसँ गरीबपर विचार करियौ। अशोक - बेस लाउ। (मंजूर अशोककेँ दरखास दऽ दै छथि।) मंजूर - परणाम हाकिम। जाइ छी हम। रिक्शा चलबै लाए जाएब। (प्रस्थान) अशोक - सेवामे, श्रीमान् प्रखंड विकास पदाधिकारी महोदय, कार्यालय - भगवानपुर महाशय, सूचना अधिकारक तहत हम पूछै लाए चाहै छी जे इंदिरा आवास पाँच हजार घूसे लऽ किअए भेटत, ओना किआए नै भेटत? एकर लिखित जवाब दूः दिनक अन्दर चाही। नै तँ आगू बढ़ब। धन्यवाद, मंजूर, ग्राम पंचाइत राज रामपुर। (अशोक आवेदन पढ़ि कूड़ामे फेंक दै छथि।) एकर लिखित जबाब दू दिनक अन्दर चाही, नै तँ आगू बढ़ब। जाउ, जतए बढ़ब, ततए बढ़ू। सभठाम एक्के रंग भेटत। पटाक्षेप दृश्य- छह (स्थान - अनुमंडल कार्यालय। सुनील एस. डी. ओ. आ बहादुर हुनक सिपाही छथि। सुनील फाइल उनटा रहल छथि। मंजूरक प्रवेश।) मंजूर - सर प्रणाम। बहादुर - प्रणाम प्रणाम। कत हुरार जकँा हुरकल जाइ छी? रूकू। पहिने एतऽ पाँच गो टका दिअ, तहन अन्दर जाएब। मंजूर - (जोर सँ) ऐ देहमे करौआ लागल छह की? सरकार सँ तों तनखाह नै लै छहक? बहादुर - अच्छा जा। बेसी बाजह नै (मंजूर सुनील लग पहुँचल।) मंजूर - परणाम हाकिम। सुनील - की बात? मंजूर - इंदिरा आवासबला एगो दरखास छै। लेल जाउ। सुनील - (आवेदन लऽ कऽ) अहाँ जाउ। मंजूर - जाइ छी हाकिम। एगो गरीबोकेँ कल्यााण करबै। परणाम। (मंजूरक प्रस्थान।) सुनील - सेवामे, श्रीमान् अनुमंडलाधिकारी महोदय, बेनीपुर। महाशय, हम मंजूर ग्राम पंचाइत राज रामपुरक स्थाइ निवासी छी। चारि-पाँच साल पहिने बाढ़िमे घर दहा गेने काहि काटि रहल छी। इंदिरा आवास लाए मुखिया चंदन पाँच हजार टाका घूस मांगैए। बी. डी. ओ. साहेब सेहो हमर आवेदन पर कोनो ध्यान नै देलनि। सूचना अधिकारक तहत हम एकर लिखित जबाब दू दिनक अन्दर चाहै छी। अन्यथा आगू बढ़ब। धूः ई बकवासबला आवेदन छै। के माथा पच्ची करतै ऐमे? (सुनील आवेदन के कुड़ामे फेंक दै छथि ।) प टा क्षे प दृश्य- सात (स्थान समाहरणालय। डी. एम. चन्द्रकान्त कार्यालयमे फाइल उनटा रहल छथि। गेटपर सिपाही हंसराज ठाढ़ छथि। तखने मंजूरक प्रवेश।) मंजूर - परणाम हुजुर। अन्दरा कलक्टर सहाएब छथिन? हंसराज - की बात? मंजूर - हुनके सँ काज य। हंसराज - कोन काज से? मंजूर - इंदिरा अवासबला एगो दरखस देबाक छै हाकिमकेँ। हंसराज - लाउ ने पाँच हजार टाका, हमही काज कराऽ दै छी। हाथो-हाथ काज भऽ जाएत। मंजूर - खाएब, से ओकाइदे नै आ पाँच हजार टाका हम कत्त सँ देब? हंसराज - तहन ऑफिसमे नै घुसु। घुरि जाउ। मंजूर - से किआए, अहींक ऑफिस छी लगाएल। हंसराज - बेसी फटर-फटर बाजलौंह तँ एक्के झापरमे ठीक भऽ जाएब। कोनो बाप काज नै देत-3 मंजूर - बेसी बाप-बाप केलौं तँ बूझि लिअ। हंसराज - (मंजूर के एक थापर मारि) हरामी कहीं के। आब बाज कोन बाप काज देतौ। मंजूर - (हंसराज केँ एक थापर मारि) हरामी सभ, चोट्टा सब गरीबकेँ खा कऽ साँढ़-पारा भऽ गेल। (हंसराज आ मंजूरमे हाथापाई भऽ रहल अछि। हल्ला सुनि चन्द्रकान्त गेटपर एलाह।) चंद्रकान्त - अहाँसब हल्ला-फसाद किआए करै छी? हंसराज की भेलै? हंसराज - सर, ई हमरा बिना मतलबकेँ गाड़ि दऽ देलक। मंजूर - सर, पहिने इहाए हमरा गाड़ि देलक। तहन हम देलिऐ। चंद्रकान्त - धिया-पुता जकाँ गाड़ि-गलाैज, मारि-पीट करै जाइ छी। छिः! छिः! लेक सब हँसत। बाजू बौआ, की बात अछि? मंजूर - हुजुर एगो इंदिरा आवासबला दरखास छै। चंद्रकान्त - लाउ अन्दर आउ। (मंजूर आ चन्द्रकान्त कार्यालसमे जाइ छथि।) आब बाजू की कष्ट? मंजूर - हजूर हम रिक्शा चालक छी। कमाइ छी तँ खाइ छी। नै तँ उपासे रहै छी। चारि-पाँच साल पहीने बाढ़िमे हमर झोपरी दीहा गोल। इंदिरा आवास लाए मुखियालजीकेँ कहलियन्हि तँ उ कहलनि जे पाँच हजार टाका घूस देबही तहने हेतौ नै तँ नै हेतौ। पएरो दाढ़ीयो पकड़लियनि जे खाइ पीयै लाए, एक-दू साए टाका पेटो काटि कऽ देब। हमरापर किरपा कएल जाउ। मुदा टस-सँ-मस नै भेलाह। हजूर, एगो हमर दरखास स्वीकार काएल जाउ। चंद्रकान्त - बेस लाउ। (मंजूर चंद्रकान्तकेँ दरखास्त दऽ दै छथि।) मंजूर - हजूर, हमरा पंचाइतमे हमरासँ बेसी गरीब कियो नै हाएत। अपने पता कऽ लियौ। एगो गरीब बड़ आशा सँ अपने लग पहुँचल अछि। किरपा अवस्स कएल जाउ हजुर। आब हम जाइ छी हजुर। तीनि दिनसँ भुखले छी। (मंजूरक प्रस्थान) चंद्रकान्त - सेवामे, श्रीमान् समाहता महोदय, परसा महाशस, नम्र निवेदन अछि जे हम मंजूर ग्राम पंचाइत राज रामपुरक स्थाइ निवासी छी। हम अति निर्धन रिक्शा चालक छी। चारि-पाँच साल पहिने पहिने हमर झोपड़ी बाढ़िामे दहा गेल। हम सब परानी सिरकी तानि पशु जीवन जीबै छी। कृपया एगो इंदिरा आवासक अनुमति प्रदान काएल जाउ। ऐ लेल हम अपनेक आजीवन कृतज्ञ रहब। ओना मुखिया, बी.डी.ओ. आ एस.डी. ओ.के. आचरणसँ हम पूर्ण आजीज छी। कृपया हमर अनुमति दू दिनक अंदर देबाक कष्ट करी। अन्यथा हम सूचना अधिकारक तहत घूसखोरीक विरूद्ध आवाज अवस्य उठाएब। धन्यवाद, (आवेदन पढ़ि चन्द्रकांत कुड़ामे फेक दै छथि। ई तँ सरासर धमकी भेलै। सूचना अधिकार तँ हमरा मुट्ठीमे छै। हम कोनो आइरी-गाइरी हाकिम छी, डी.एम.छी।) हंसराज- (अन्दर कार्यालय जाक) सर, ई आदमी बड़ खच्चर छेलाह। जहाँ कहलिऐ पाँच हजार घूस देबै तँ हाथो-हाथ काज करा देब। फट सन एक थापर बैसा देलक। तकरे हाथापाई छेलै । चन्द्रकांत- जाए ने दियौ। ओकरा कोनो ऑफिस गुदानतै। प टा क्षे प दृश्य- आठ (स्थान- विनोदक दलान। विनोद कुट्टी काटि रहल छथि। मंजूरक प्रवेश।) मंजूर - नेताजी परणाम। विनोद - परणाम परणाम। कह मंजूर, काज भेलह? मंजूर - आइ पनरह दिन भऽ गेल। काजक कोनो अता-पता नै। बेकार लाए रोजी-रोटी छोड़ि कऽ हरानो भेलौं। विनोद - मंजूर, तों जिला तक पहुँचलहक। तोहर काजक कोनो सुनबाई भेलै। आब बुझहक प्रशासन केहेन भ्रष्ट छै। एकटा करह, छोड़ह माथा-पच्ची। जा कमैहह आ खैहह। ऐ सबहक चक्करमे नै पड़ह। ऐ रास्तामे बड़ा फेदरत छै। मंजूर - नेताजी, परेशानी झेलै लाए हम तैयार छी। अहाँ हमरा उपाइ बताउ। विनोद - हाईकोर्ट छै, सुप्रीम कोर्ट छै। सूचना आयोग छै। मंजूर - नेताजी, हमरा आहाँ जत्त जाइ लाए कहबै ओत्त जाइ लाए तैयार छी। विनोद - बेस, एगो दरखास्त हम लिख दै छियह। तों जगदीशपुर चलि जाह। ओइ गाममे एगो हमर पुरना मित्र छथिन। हुनक नाम श्यामानन्द छियन्हि। पूछैत-पूछैत चलि जइहह। हुनका दरखास्त दऽ दिहक। बड़ नीक लोक छथिन। गरीबकेँ अपनो दिशसँ मदति करै छथिन। मंजूर - बेस अपने लिखि दियौ। (विनोद आवेदन लिखै छथि। मंजूर आवेदन लऽ कऽ प्रस्थान करै छथि।) विनोद - केहेन भ्रष्ट प्रशासन छै जे ओइ बुढ़बाकेँ दौड़बैत-दौड़बैत हरान कऽ देलकै। मुदा बिन घूस एगो इंदिरा आवास नै भेटलै। (मुँह बिजकाए लै छथि।) प टा क्षे प दृश्य- नअ (स्थान - नेता श्यामानन्दक दलान। दलानपर बैस उ पत्रिका उनटा रहल छथि। मंजूरक प्रवेश।) मंजूर - परणाम सरकार। श्यामानन्द - परणाम परणाम। नै चिन्हलौं। मंजूर - सरकार हम मंजूर छी। रामपुरसँ बड़ी आशसँ पएरे एलौंहें। श्यामान्नद - बाप रे बा, एत्ते दूरसँ पएरे। धन्यवाद अहाँक। मंजूर - सरकार, मजबूरीक मारल छी, बाढ़िक झमारल छी, मुखिया-बी.डी.ओ.-एस.डी.ओ.-कलक्टर सभसँ रिटाइर छी। श्यामानंद - कहु की बात अछि। मंजूर - सरकार, एगो हमर दरखास छै। श्यामानंद - लाउ दरखास्त। (श्यामानंद आवेदन लऽ पढ़ै छथि।) सेवामे, श्रीमान् सूचना आयुक्त महोदय, पटना। महाशय, निवेदन अछि जे चारि-पाँच साल पूर्व बाढ़िमे हमर झोपड़ी दहा गेल। हम गरीब आदमी छी। रिक्शा चला कऽ कौहुना गुजर करै छी। कमाइ छी तँ खाइ छी नै तँ उपासे रहै छी। आइ पाँच सालसँ सिरकी तानि पशु जकाँ रहै छी। बरसातमे एक्कोटा बुन्नी बाहर नै खसै आए। म्ुखियाजीकेँ पएर-दढ़ी पकड़लियन्हि तँ उ कहलनि पाँच हजार घूस देबै तँ इंदिरा आवास भेट जाएत। नै तँ कोनो उपाए नै। बी. डी. ओ., एस. डी. ओ. आ डी. एम लग दरखास्त देलौं आ सूचना अधिकारक तहत दू दिनमे जबाब मांगलौं। आइ पनरहम दिन छी। कत्तौ कोनो सुनवाइ नै। ऐ संदर्भमे हमर श्रीमान् सँ करबध प्रार्थना अछि जे स्थितिक पूर्ण जाँच कराबए हमर सूचना अधिकारक औचित्यपर गंभीरतापूर्वक विचार काएल जाए आ एगो उजरल अतिदीनकेँ बसाएल जाए। ऐ पुण्यात्मक कार्यक लेल हम अपनेक आजीवन आभारी रहब। धन्यवाद, अपनेक विश्वासी नाम - मंजूर ग्राम - रामपुर प्रखण्ड - भगवानपुर जिला - परसा (बिहार) (श्यामानंद किछु देर सोंचिकऽ) आइ धरि हमरा लग एहेन केस नै आएल छल। ई गंभीर केस अछि। खाइर मंजूर अहाँ जाउ। हम पूर्ण प्रयास करब। मंजूर - हमरा आबो पड़तै पटना।? श्यामानंद - एखन नै। जरूरी पड़तै तँ बजाए लेब। मंजूर - बेस सरकार किरपा अवस्स करबै। श्यामानंद - अहाँ जाउ। एत्ते दूर जेबाको अछि पएरे। मंजूर - परणाम सरकार। श्यामानंद - परणाम परणाम। (मंजूर प्रस्थान करै छथि।) प टा क्षे प दृश्य- दस (स्थान - मंजूरक घर। मंजूर घरक आगू रस्तापर माथा-हाथ दऽ बैसल छथि।) मंजूर - अल्ला सबटा विपत्ति हमरे दऽ देलक। घोड़ीओ मरि गेल। सब दिन रिक्शो नै चलै आए। गाम-घरक काजो सब दिन नै भेटै आए। एम्हर धिया-पुता खोखरै आए। सिरकीयो चुऐ अए। की करी की नैं, किछु नै फुराइए। या अल्लाह, या खुदा। (श्यामानंदक नोकर मालिकक प्रवेश।) मालिक - मंजूर अपने छिऐ? मंजूर - जी जी, की कहै छी से? मालिक - हमर नेताजी श्री श्यामानंद बाबू अपनेकेँ काल्हिु पटना बजौलन्हि। सूचना अधिकारक प्रयोगमे अपनेक बड़ पैघ प्रतिष्ठा भेटऽ जा रहल अछि। मंजूर - परणाम सर, परणाम सर। धन्यवाद अहाँकेँ। एहेन शुभ समाचार आइ धरि कियो नै देने रहथि। मालिक - बेस हम जाइ छी। अहाँ जरूर जेबै, बिसरबै नै। (प्रस्थान) मंजूर - (घरवाली नजीमा लग जा कऽ) गै नजीमा काल्हि हम पटना जेबै। आब देखही अल्ला की करै छै? नजीमा - बटखरचा लाए तँ घरमे किच्छो नै छै। कनी मुरही हेतै। मंजूर - साहाए दऽ दिहनि। नजीमा - जेबहक केना? ओत्ते दूर पएरे हेतह जाएल। मंजूर - टेनमे मांगैत-चांगैत चलि जेबै गै। नजीमा - कनी ओरियाके जइहह। सेहो तँ गाड़ी आइए पकड़बहक तब नऽ काल्हि पटना पहुँचबहक। मंजूर - ठीक कहै छें नजीमा। जो अखने मुरही लेने आ विदे भऽ जाइ। ओना असडसँ टेन छुटि जाएत तहन। हमरा भीखो मांग पड़तै नजीमा। नजीमा - की करबहक? मजबूरीक नाम महात्मा गाँधी होइ छै। तोरा अबेरो होइ छह। हैआए मुरही लेने आबै छियह। (नजीमा एक मुठी मुरही खोंइछामे आनलथि।) हैआए, एतबे छेलै। मंजूर - ला जे छौ से। (नजीमा मंजूरक गमछामे देलक) हम जाइ छियौ। राति विराति कनी जाइगे के सुतीहेँ। घर बेपरद छौ । नजीमा - बेस, तू जा ने अल्ला के नाम लऽ केऽ । मंजूर - या अल्ला, या विस्मिला । प टा क्षे प दृश्य- एगारह (स्थान - सूचना आयुक्त कार्यालय पटना। ब्रह्मदेव सुचना आयुक्त, नेताजी श्यामानंद आ उप सूचना आयुक्त अनजार कार्यालयमे बैस कऽ मंजूरक भूमिकापर समीक्षा कऽ रहल छथि।) श्यामानंद - सर, आइ धरि हमरा मंजूर जकाँ केस कहियो आ कत्तौ नहि टकराएल राहाए। एत्ते गरीब एवं मूर्ख रहैत एहेन कठिन स्टेप। अंजार - साहाएब, वास्तवमे मंजूर धन्यवादक पात्र आछि जेे निच्छछ देहाती आ औंठा छाप रहैत अपन अधिकारक आ कर्त्तव्यक प्रति संघर्शषीलताक प्रदर्शन केलनि। ब्रह्मदेव - हम एते पद देखलौं मुदा मंजूर जकाँ अपन हकक प्रति जागरूक एवं कर्मठ व्यक्ति नै भेटल राहाए। जदी उ अखैन एतऽ रहिताए तँ हम हुनका हार्दिक धन्यवाद दैतौं। श्यामानंद - आइ पटना आबै लाए ओकरा संवाद पठेने रहिऐ। संवाद भेटलै की नै। आएत की नै पता नै । (मंजूरक प्रवेश।) मंजूर - (श्यामानंद केँ) परणाम हुजूर। (कर जोड़ि) श्यामानंद - परणाम परणाम। मंजूर - (ब्रह्मदेव केँ) परणाम हुजूर। ब््राह्ममदेव - परणाम हुजूर। मंजूर - (अंजारकेँ) आदाब हुजूर। अनजार - आदाब आदाब। मंजूर - हुजूर सभ, हमरा आबैमे बड़ देरी भऽ गेल। क्षमा काएल जाउ। हुजूर? टेने लेट छेलै। ब्रह्मदेव - अच्छा चलू कोनो बात नै। बेसी लेट नै भेल। अहींक नाम मंजूर छी ने? मंजूर - जी हुजूर। ब्रह्मदेव - हम सूचना आयुक्त छी। हम अहाँकेँ हार्दिक धन्यवाद दै छ। (वाह! वाह! कहि पीठी ठोकै छथि।) अहाँ जकाँ अपन अधिकारक आ कर्त्तव्यक प्रति समर्पित नागरिक देशकेँ उद्धार कऽ देत। अपने केँ बहुत-बहुत धन्यवाद। (हिन्दुस्तान पत्रकार पवन आ दैनिक-जागरणक पत्रकार महेशक प्रवेश। दुनु मंजूरक फोटो घीचै छथि आ गपसप करै छथि।) पवन - मंजूर, ऐ कार्यालयमे अपनेकेँ की भेटलै? मंजूर - हुजूर। सूचना आयुक्तक साहाएब हमरा धनवाद देलकै। महेश - जखन धन्यवाद नै दैतथि तहन? मंजूर - तखन हमरा हाकिमपर सँ विशवास हटि जाइताए। हम बूझि जाइतौं जे बड़को आपिस बकवास अछि बेमतलब अछिै पवन+महेश - धन्यवाद मंजूर भाय। प टा क्षे प दृश्य- बारह (स्थान - आई. बी. एन.-7 चैनलक मनेजर अखिलेशक आवास। उ मिथिला समाद पेपर पढ़ि रहल छथि।) अखिलेश - मंजूर को प्रतिष्ठा। मंजूर ग्राम-पंचाइत राज रामपुर, प्रखंड-भगवानपुर, जिला-परसा (परसा) क स्थाई निवासी छथि। ओ अतिदीन रिक्शा-चालक छथि जे पूर्ण मूर्ख छथि। ओ इंदिरा आवासमे घूसखोरीक विरूद्ध आवाज उठेबामे सूचना कार्यालयसँ प्रतिष्ठा प्राप्त केलन्हि जइसँ सूचना आयुक्त ब्रह्मदेव हार्दिक धन्यवाद दैत पीठ ठोकलनि। ब्रह्मदेव कहलनि, ऐहेन कर्मठ नागरिक देशक उद्धार करत। (अखिलेश किछु काल सोचि कऽ पेपर राखि दै छथि।) मंजूर मूर्ख एवं गरीब रहि कऽ एहेन कठिन कदम उठौलनि देशक महान प्रेरणादायक काज केलनि। उ देशक अस्सल नागरिक छी। हुनका हमरा तरफसँ हार्दिक धन्यवाद आ अवार्ड परसु दिल्लीमे भेटतन्हि। हम हुनका सपरिवार आबै-जाइक भाड़ा पठाए दै छियन्हि। प टा क्षे प दृश्य- तेरह (स्थान मंजूरक झोपड़ी। झोपड़ीमे मंजूर, नजीमा, बेटी सलमा, नाजीनी, खुशबू आ बेटा अजहर, जफर एवं अस्फाक उपस्थित छथिै मंजूर सपरिवार दिल्ली जेबाक विचार-विमर्श काए रहल छथि।) मंजूर - गै नजीमा, अखिलेश अपना सभकेँ दिल्ली आबै-जाइक खर्च पठाए देलकौ, से जेबही? नजीमा - कथी लाए हौ? मंजूर - से हमरो नै बुझल छौ। एक आदमी कहै छेलाए जे जाह दिल्ली, अखिलेश बड़का अबार देतह। कहाँदुन पेपरमे निकलल छेलै। नजीमा - चल ने देखियौ तँ ओकरा केहेन छै? हौ हमरा से कुच्छो पूछतै तँ की कहबै? मंजूर - जे फुरतौ से कहिऐ। उ कोनो नै बुझै हेतै जे मुरूख आ गरीबक भनसिया सधारणीमे केहेन होइ छै। गै नजीमा, लोक सभ हमरा बड़ मजाक करैए जे दिल्ली जा न, रिक्शापर बैसा कऽ अन्नपूर्णा के खूम घुमबिहह। नजीमा - हौ, अपना सभकेँ अपने गाम लऽ के नै तँ चलि जेतै? मंजूर - नै गै, से तँ नै बुझाइ छौ। चल नऽ बुझल जेतै। बड़ बेसी तँ अपना गाम लऽ जेतै। ऐ सँ बेसी की हेतै? ओतै खाएब, पीयब आ मौज मस्तीमे रहबै। बुझै छी ही, अखिलेश कत्तेक बड़का आदमी छै? नजीमा - हँ हौ, सुनै छिऐ बड़ीटा लोक छै। बियाह-तियाह करै लाए नै ने कहतै। मंजूर - नै गै, तूँ तँ बूरबक जकाँ गप करै छें। सलमा - बाबा, हमहुँ जेबौ तोरा सँडे. दिल्ली अखिलेश केँ देखै लाए। अस्फाक - बाबा, हमहुँ ओकरेसँ बियाह करबै। मंजूर - केकरासँ अस्फाक - अखिलेशक साइर सँ। मंजूर - धुर बुरबक, लोक हँसतौ। खुशबू - बाबा, सभकेँ दिल्ली लऽ जेबहक आ हम घरपर असगरे रहबै? मंजूर - सभ कियो चलबै बुच्ची राजधानी एस्प्रेससँ। ओइ टेनमे जाड़मे गरम आ गरममे जाड़ लगै छै। गै नजीमा, तू सभ जल्दी तैयार होइ जो। आइ रातिमे पटनासे ओ टेन छै। फेद एत्ते दूर जेबाको छै न। लेट भऽ रहल छौ। नजीमा - जाइ छियह तैयार होइ लाए। तोंहूँ जा झारा-झपटासँ भऽ आबह। तोरा खुच-खुच झड़े लगैत रहै छह। मंजूर - अच्छा हम ओम्हरसँ अबै छी। तों सभ तैयार रह। प टा क्षे प दृश्य –चौदह (स्थान - दिल्ली। मंच सजल धजल अछि । दर्शकक भीड़ अछि। अखिलेश आओर अन्नपूर्णा मंचपर उपस्थित छथि। अखिलेशक नौकर किसुन मंचपर घुमि रहल छथि। अखिलेश आ अन्नपूर्णा पेपर पढ़ि रहल छथि। किसुन - मालिक, ओ सभ एखन धरि नै पहुँचलथि की कारण भ सकै छै? अखिलेश - ट्रेनक टाइम आब भऽ गेलै आए। ओ सभ आबिते हाएत। (सपरिवार मंजूरक प्रवेश) मंजूर - परणाम हुजूर। (अखिलश केँ) अखिलेश - परणाम परणाम मंजूर भाय। मंजूर - परणाम मैडम। अन्नपूर्णा - परणाम परणाम। बैसे जाइ जाउ। (सब कियो कुर्सी पर बैसै छथि।) अखलेश - मंजूर भाय, सपरिवार नीके ना एलौं न? मंजूर - जी, बड़ नीकेना एलौं। राजधानीमे चढ़ि हम सभ तइर गेलौं। अन्नपूर्णा - मंजूर भाय, ई के छथि? मंजूर - हमरे घरवाली छिऐ नजीमा। अन्नपूर्णा - नजीमा बहिन, नमस्कार। नजीमा – नमसकार बहिन। अन्नपूर्णा - बहीन, उ सभ के छथि? नजीमा - सभ हमरे धिया-पुता छथि। अन्नपूर्णा - बहुते धिया-पुता अछि। ऐपर सुधार करू, बहीन। नजीमा - की करबै, अल्लाक मर्जी। अन्नपूर्णा - सभकेँ नीक जकाँ पढ़ाएब-लिखाएब। अखिलेश - मंजूर भाय, आब अपना सबहक आयोजित कार्यक्रमपर ध्यान देल जाए। मंजूर - जी हुजूर। अखिलेश - समस्त दर्षक लोकनि, अखिलेशक नव वर्षक हार्दिक शुभकाना आ अभिनन्दन। आइ ऐ देशक अहोभाग्य अछि जे मंजूर जकाँ अपन अधिकार आ कर्त्तव्यकेँ बुझ बला प्रथम नागरिक हमरा सभकेँ प्राप्त भेल जे गरीब-गवार रहैत देशक भ्रष्टाचारीक विरूद्ध बीड़ा उठा कऽ अपन इमानदारी आ कर्मठताक परिचय दैत सफलता समस्त जनताक बीच समर्पित केलनि। हम हिनक अहम भूमिकासँ प्रसन्न भऽ कऽ बेस्ट सिटीजन ऑफ द नेशन अवार्डक लेल चुनलौं आओर एखन शीघ्र हम हिनका अपन अवार्डसँ सम्मानित करबनि। (थोपरीक बौछार भऽ जाइए।) मंजूर भाय अपनेक दर्शक लोकनिकेँ किछु कहियौ। मंजूर - हम दर्शक भाय सभकेँ की कहबैन। हम तँ मुरूख छी। तहन अपनेक आज्ञा भेलै तँ किच्छो कहि दै छिऐ। हम तँ इहाए कहब जे देशमे भ्रष्टाचारीके जनम जनता देलकै आ ओकर पालन-पोषण से हो जनते करै छै। जदी एकजुट भऽ कऽ सख्ती सँ एकर विरोध काएल जाए तँ पक्का कहै छी जे ऐ महामारीसँ देशके मुक्ति भेटतै आ हमर देशक कल्याण हेतै तथा दुनियामे एकर नाम हेतै। ऐ से बेसी हमरा किच्छो नै फुराए य। धनवाद। (फेर थोपरीक बौछार भऽ जाइ छै।) अखिलेश - आब अपने सबहक समक्ष हम मंजूर भायकेँ सम्मानित काए रहल छियन्हि। (अखिलेश मंजूरकेँ फुल-माला अर्पित केलनि। थोपरीक बौछार भेल। अखिलेश मंजूरकेँ अवार्ड देलनि। थोपरीक फेर बौछार भेल। मंजूर अखिलेश केँ पएर छूबि प्रणाम कर चाहैत छथि। मुदा अखिलेश मंजूरक हाथ पकड़ि लै छथि।) मंजूर भाय, सचमुच अपने ऐ देशक महान प्रेरक छिऐ। हमरा सँ बड़ पैघ छिऐ। अहाँकेँ हार्दिक प्रणाम। मंजूर - खुश रहु अखिलेश भाय। अहाँकेँ हमर उमेर लगि जाए। (मंजूर अखिलेश सँ गरदनि मिललथि आ नजीमा अन्नपूर्णा केँ पएर छूबि प्रणाम केलक। थोपरीक बौछार भेल।) प टा क्षे प दृश्य- पनरह (स्थान - मंजूरक झोपरी। मंजूर अपन भाए रमजानीसँ गपसप कऽ रहल छथि।) रमजानी - भैया, की केना भेलै दिल्लीमे? मंजूर - बौआ, अखिलेश हमरा अबार देलकै आ फुल-माला हमरा पहिरा कऽ नवाजलकै। लोकक बड़ भीड़ छेलै। (चन्दन आ अमरनाथक प्रवेश।) अमरनाथ - मंजूर भाय नमस्कार। मंजूर - नमस्कार, नमस्कार। मुखियाजी, परणाम। चन्दन - परणाम, परणाम। मंजूर - बैसल जाउ, सरकार सभ । (चन्दन आ अमरनाथ पीढ़ीयापर बैसलथि।) अमरनाथ - मंजूर भाय, खर्च-बर्च करू। अहाँकेँ इंदिरा आवासबला बीस हजार टाका आबि गेल आ मुखियाजी सेहो अपना तरफसँ पाँच हजार टाका दै छथि। मंजूर - अमरनाथ भाय, हमरा हरामक पाइ नै चाही हमरा अपन उचित पाइ बीस हजार चाही अप्पन पाइ मुखिया जी अपने रखथि। अमरनाथ- मंजूर भाय, अहाँकेँ मुखियाजीबला पाँच हजार लेमहि पड़त। उ अहाँकेँ पाँच हजार मदतिमे दै छथि। मंजूर - एहेन मदति लेबाक मन नै होइ अए। कारण मुखियाजी समाजक संग बड़ गददेदारी करै छथि। चंदन - इएह लिय, पच्चीस हजार टाका। मंजूर - लाउ, बड़ जिद्ध करै छी तँ । (चन्दन मंजूरकेँ पच्चीस हजार टाका देलनि।) चन्दन - मंजूर भाय, आहाँ सचमुच महान छी। हमर गलती के माफ काएल जाए। मंजूर - गलती तखने माफ करब जखन अपने पब्लिक संग नीक व्यवहार करब। चन्दन - आब केकरो संडे. गलत व्यवहार नै करब। मंजूर - तहन गलती माफ अछि। अमरनाथ - धन्यवाद मंजूर भाय। (चन्दन आ अमरनाथक प्रस्थान।) रमजानी - भैया, बड़ चौंसैठ छह मुखियाजी। एहेन घूसखोर नै देखल। मंजूर - तैं ने हमरा सनक गरीब आ मुरूख सँ घट्टी मानलनि। रमजानी - भैया, तोरा एत्ते आगू बढ़ाबामे किनकर यानगदान छै? मंजूर - बौआ, नेताजी विनोदक किरपा छैन। ओ गुदरीक लाल छथिन। गरीब जरूर छथिन मुदा सब तरहक बुधिमे पारंगत छथिन। गरीबक मसीहा छथि। उचितक लेल जी जान लगा दै छथिन। (नेताजी विनोदक प्रवेश।) परणाम नेताजी। विनोद - परणाम, परणाम। कह मंजूर कह रमजानी की हाल-चाल छै? रमजानी - अपनेक किरपा सँ बड़ बढ़ियाँ छै। नेताजी, भैयाकेँ खाली अबारेट भेटलै और कहाँ किछु भेटलै। विनोद - कथी भेटतै? रमजानी - किच्छो पाइ-कौड़ी भेटतै तहन ने? विनोद - बौआ, प्रतिष्ठा से बढ़ि कऽ किछु नै छै। ओना पाइयो प्रतिष्ठाक सिंगार छिऐ। सेहो मंजूर केँ जरूर भेटतै। मंजूर तों धैर्य राखह संतोष राखह। सबटा धीरे-धीरे हेतै। बहुत ठाम तोहर सहयोगक चर्चा भऽ रहल छै। मंजूर - नेताजी, अपने जेना कहबै। हम साएह करबै। नेताजी, अपने अपन अनुभव पब्लिककेँ किछु दैतिऐ तँ बड़ बढ़िया होइतै। विनोद - हम कोन जोकरक छी जे पब्लिककेँ अपन अनुभव देबै। आइ-काल्हि कियो केकरोसँ कम नै छै। तैयो हम दू शब्द कहि दै छिऐ। अशिक्षे कारण जनता सुयोग्य प्रतिनिधिक चयन नै कऽ पावै अछि, ताड़ीए दारूए पर बीकी जाइ अछि। स्वभाविक छै जे प्रतिनिधि क्षतिपुर्तीमे घूसखोरीक अाश्रय लेत। ओइ घूसखोरीकेँ मेटाबऽ लेल हमरा लोकनिकेँ एकजुट भऽ कऽ शिक्षाकेँ सबसँ आगू बढ़ेनाइ अछि। हमरा नजरिमे सबटा अव्यवस्थाक मूल कारण अशिक्षा छै। अशिक्षा हटतै तहने व्यवस्था सुधरतै आ देशक चहुँमुखि विकास हेतै। अंतमे मंजूरकेँ हार्दिक बधाई दैत अपन दू शब्द खत्म करै छी। जय हिन्द ! जय भारत !! जय शिक्षा !!! पटाक्षेप ऋषि वशिष्ठ पूत कमाल अर्जुन चौधरीक विआह गाममे चर्चक विषए बनल छलै। अर्जुन चौधरी एकटा सुभ्यस्त गृहस्थ रहैत अपन बेटाकेँ कोनो ने कोनो जोगाड़े विदेश पठा देने छला। चौधरीक बेटा दस सालपर गाम घुमल छल। सौंसे गामक लोक पहिने यएह कहैत छलै जे अर्जुन चौधरीकेँ ओहि बेटे पोता नहि होमएबला छनि। ओकर लोटिया डूमले बुझू! ओकी आब गाम आओत? एह! ओ छौंड़ा आब चौधरीक कहने विआह दान करतनि......... ओ तँ ओम्हरे कतहुँ साइट-धाइट लगौने हेतनि की! अर्जुन चौधरीक बंश बुड़ले बुझू। अर्जुन चौधरीकेँ अपन एकमात्र पुत्र बंशीपर भरोस छलनि मुदा लोकक बात सुनि-सुनि हुनको करेज दलमलित होमए लगैत छलनि। खास कऽ जखन बंशीक माए ककरो बेटाक चर्च करैत छलखिन जे ओ बाहरेमे विआह कऽ लेलकनि। तखन तँ चौधरीकेँ जेना करेज कटि कऽ खसि पड़ैत छलनि। जहियासँ बंशी आएल अछि सगरो गाममे ओकरे चर्च होइत रहैत छैक। ओना आबक बंशी आ दस साल पहिनेक बंशीमे कतहु मेल मिलाप नहि छैक। दस साल पहिने जखन बंशी कोरिया गेल छल तँ थुल-थुल करैत देह दशा, कौड़ी सन-सन लटकल आँखि आ धरतीकेँ जेना धमकबैत चालि।......... आर तँ जे, ओकर वेश-भुषा आ बगए-बानिसँ ओ साफे विदेशी बुझाइत। ओ बंशी आब बंशी नहि रहल अपन नाम बदलि कऽ डब्बू कऽ लेने अछि। गामक लेल डब्बू चिड़िघरमे आएल नव जानवर जेकाँ छल जकरा सभकियो देखए चाहैत छल। आ डब्बूक लेल ई गाम-घर आ लोक सभकिछु नब बथान लगैत छल। ठीक ओहिना जेना माल-जाल लेल नबका बथान। सभ किछुकेँ सुँधैत। धियापूता स्कूलसँ हेँजक-हेँज अबैत छल डब्बूकेँ देखवाक लेल। डब्बूक थुलथुल देहदशा पएरमे उज्जर दप-दप जुत्ता, लाल रेगक घुट्टी भरिक मौजा, तैपर कारी रंगक ठेहुन धरि पहिरने पैंट। पैंटमे बसोटा जेबी जेना जगह-जगह चेफड़ी साटल होइ। ऊपर बंदगलाक गंजी आ माथपर मुजैला पथियाक टोप। आँखिमे कारी खुंझा चश्मा, पाछाँसँ डोरी बान्हल। धीया पूताक लेल जेना एकटा खेल उखड़ि गेल छलै। केम्हरोसँ आएल आ डब्बूकेँ देखि कऽ ठिठिया लेलक। एतबेमे जेना ओकर सबहक सभटा ठेही मेटा जाइ। अर्जुन चौधरी डब्बूक विआह करेबाक लेल गोटीपर गोटी फिट करैत रहलाह। पहिने तँ हुनकर अनुमान छलनि जे बेटाकेँ अबिते घटक झपट्टा मारत। लड़का विदेशमे कमाइए। भेल मुदा उनटे। ओ जतए बेटाक विआहक चर्च करथि सभ यैह कहि कऽ टारि दैत छलनि जे बिलेँती लड़काक कोन ठेकान। ओकरासँ वियाहि कऽ के अपन बेटीक जिनगी खराप करत......... एकटा बुढ़ा तँ एतेक तक कहि देलखिन जे- ‘‘औ बाबू, तोहर बेटा छह भारत छोड़ो आन्दोलनकारी आ हमसभ छी सुच्चा भारती। गाँधीक भारत छोड़ो आन्दोलन छलनि फिरंगीकेँ भारत छोड़ेबाक लेल आ तोहर बेटा तँ अपनहि भारत छोड़ने छह......। आब तोहीं कहह जे के एहन धरकट बाप होएत जे एतेकटा बेटीकेँ पोसि-पालि कऽ अपनहि हाथेँ गरदनि काटि लेत?’’ ......अर्जुन चौधरीकेँ जेना सटाक्........चाट लगलनि ओहि बुढ़ाक बातक। ओ जेना तेना बेटाक विआह कराबक लेल मोने-मोन निश्चय कऽ लेलनि। डब्बूक लेल लोकक व्यवहार सामान्य नै छलै आ गामक लोकक लेल डब्बुक व्यवहार असमान्य छलै। ठीक ओहिना जेना ओझाक लेखेँ गाम बताह आ गामक लेखेँ ओझा.........। गाम भरिमे टुनटुन एकमात्र ओहन लड़का जकरासँ डब्बू जखन-तखन गप्प करैत छल। टुनटुन डब्बूक बालसंगी छलै जे पढ़बा-लिखबामे तेज रहितो परिस्थितिवश गामेमे रहैत छल। .......जेना-तेना अर्जुन चौधरी अपन बेटाक रामनगर तँइ केलनि। ओ अपन बेटाक बदलल व्यवहारसँ कनेक बेसिये चिन्तित छलाह। विआह तँ तँइ भऽ गेलै मुदा किछु तेहन ने भऽ जाइ जाहिसँ सभ कएल-धएल चौपट्ट भऽ जाए। ........आइ विआहक दिन अछि। अर्जुन चौधरीक घरमे जेना उत्सवक माहौल छनि। आँगनसँ कखनो-कखनो महिलाक सामुहिक स्वरमे गीत आ कखनो हँसी-ठट्ठाक अवाज दलान धरि पहुँचैत अछि। आंगनमे बजैत साउण्ड वॉक्ससँ निकलैत रीमिक्स गीत........‘‘सैंया दिलमे आना रे......’’ मुदा बेसी सुनाइ पड़ैत छल। दलानपर हथपड़ीक लेल आएल पाँच गोट सुभ्यस्त भेल बैसल छथि। गाम-समाज अपन-अपन तर्कसँ डब्बू आ अर्जुन चौधरीक गुणगान करबामे जुटल अछि। पाहुन सभ कखनो-कखनो गप्पोमे सहमति आकि असहमति टा व्यक्त करैत छथि। एकटा प्रौढ़क कहब छनि जे- ‘‘बस्स एकटा संतानकेँ विदेश पठा दिऔ! देखियौ सभ कष्ट दूर....!’’ दोसर टिपैत छथिन- ‘‘विदेश पठाएब सबहक बशमे बात नै छै औ बाबू! विदेश पठाबहिमे केहन केहनकेँ ढोंढ़ी ढील भऽ जाइ छै।’’ प्रौढ़ जेना दोसराक गप्पकेँ मलहम लगबैत छथि- ‘‘से तँ होइते छै, फाउ-दावमे जँ विदेश जैतै तँ सभ अपन बेटाकेँ विदेशे पठा दितै।’’ अर्जुन चौधरीक जेना जीह टाँगल छलनि। ओ कछमछीमे रहथि। कखनो आँगन कखनो दलान। आँगनमे स्त्रीगणक भीड़ आ दलानपर पुरुषपातक। डब्बू विआहक लेल तैयार भऽ गेल छल। ओ कोट पैंट पहिरि गलामे टाइ लगा कऽ तैयार छल। स्त्रीगण सभ ओकरा धोती-कुर्त्ता पहिरेबाक लाख कोशिश केलनि ओ साफे नकारि देलकनि। डब्बू धोती-कुुर्ता आ डोपटा-पागकेँ ‘‘पूअर’’ ड्रेस कहैत अछि। डब्बूक माए जखन कपड़ा बदलबाक लेल कहलखिन तँ ओ तमकैत बाजल- ‘‘हम ड्रेसमे कोनो कम्प्रोमाइज नै कऽ सकै छी।’’ महिला सभ कनफुसकी करए लगलीह। ‘‘मए गै माए, एहन अन्हेर नै देखल-ए! ई मैथिल ब्राहमणक विआहमे कतौ अंगरेजिया ड्रेस चललै-ए?’’ बेराबेरी सभ बुझबैत रहलीह मुदा डब्बू ककरो बात मानबाक लेल तैैयार नहि भेल। हथधड़ीक बेर भेलै। महिला सभ कनफुसकी करैत सभ बिधकेँ पूरा करैत गेलीह। स्त्रीगणसभ गीत गबैत डब्बूकेँ लऽ कऽ दलान तक गेलीह। डब्बू अप्टू-डेट बेर। सूट-बूटमे सजल-धजल। पैट-कोट टाइ जूता आ काँखतर झुलैत एकटा बैग। पाहुन सभ वरकेँ देखिते अकचका उठलाह। बरियाती समाज सेहो चौंकि गेलाह। अर्जुन चौधरी मुदा गप्पकेँ सम्हारलनि। -‘‘कपड़ा-लत्तासँ कोन अन्तर पड़तै, जेहने धोती तेहने सूट-बूट। देहो झँपेबाक ने काज छै।’’ बरियाती समाजसँ एकटा युवक व्यंग्य केलक- ‘‘वाह! बहुत सुन्दर! ई भेलै किने प्रगतिवादी विचार!’’ अर्जुन चौधरी जेना लजा गेलाह। हुनका वुझबामे अएलनि जे ई वाह-वाही नहि अपन संस्कृतिक पतनपर व्यंग्य वाण छल जे सोझ करेजमे लागल। हथकड़ीक लेल आएल पाहुन उठलाह। ओ अपन विध बाधक लेल अग्रसर होइत बजलाह- ‘‘ऐसँ हमरा सभकेँ कोनो अन्तर नै पड़ैए! हमसब तँ घरबैयाक पठाओल दूत छी। ......बस्स! वरकेँ लऽ जेबाक अछि। आब ई सूट-बूट पिहरि कऽ चलथि वा नांगट से तँ हिनकर विवेकक बात छै।’’ एकटा बुढ़केँ जेना अकस्मात बजा गेलनि- ‘‘कमसँ कम माथो तँ झाँपि दहक! उधारे माथ विआह करेबहक?.......हौ, माथक पाग प्रतिष्टाक निशानी होइछै।’’ एतबा सुनिते झट् दऽ डब्बूक भाय धुनेस लागल पाग डब्बूक माथपर धऽ देलखिन। डब्बू झटकैत ओकरा नीचाँ खसा देलक।- ‘‘ई केहन जोकर सन लगैए।’’ डब्बू टुनटुनक इशारासँ लग बजौलक आ कानमे किदु फुसफुसाइत कहलक। टुनटुन आंगनसँ मुजैला टोप नेने आएल। डब्बू ओकरा माथपर रखैत मुस्कुराएल। फोटोग्राफरक बिजलौका चमकि उठलै। कन्यागतक दलान भुकभुकिया बल्व आ टेन्ट-समेनासँ धेरल-बेढ़ल आ सजाओल छल। विस्मिल्लाह खानक सहनाइक धुन बाजि रहल छल। सौंसे गामक लोक वर वरियातीक स्वागतक ेलल उताहुल छल। वर बिलेंतमे रहै छथि, ई भीड़ जुटबाक आकर्षण छल। पुरुष आ स्त्री सभ बिलेंतीया वरकेँ देखए चाहैत छथि। सबहक मोनमे एकटा नव जिज्ञासा। वर बरियातीक गाड़ी घर्र......घोंऽऽऽ करैत कन्यागतक दलानपर पहुँचए लागल। वरकेँ उतरैत देखि स्त्रीगणक झूंड दूरेसँ ठहाक्का मारलनि- ‘‘माए गै माए, ई वर तँ मुँहोंमे जाबी लगौने छै।’’ - ‘‘आ सूट-बूट ने देखियौ! गोविन्द कका ठीके सुलेखियाकेँ गददनि काटि लेलखिन।’’- एकटा किशोरी बाजि उठलि। कन्याक माएक करेज पातसन कापए लगलनि। ’’हे भगवती आब की हेतै?’’ पड़ोसिन सभ रंग-विरंगक चर्च-बर्च करए लगलीह। ककरो कहब छलै जे- ‘‘सुलेखा एकरा संग कोना जीवन बिताओत!’’ तखनहि एकटा महिला बाजि उठलीह- ‘‘देखियौ यै, ई तँ वरक हाथोमे किदन भेल छै।........ बापरे बाप! सौंसे हाथ ठेल्ला ओदरल छै।’’ एकटा युवती तजबीज करैत बाजल- ‘‘नै यै काकी, ओ तँ हाथोमे किदन पहिरने छै।’’ कन्याक माएकेँ रहि-रहि सेप सुखाइत छलनि। कन्याक जेठकी बहीन बिधकरी बनल छलीह। ओ वरकेँ देखि बाजि उठलीह- ‘‘देखियौन ने, तेहन नाच नचेबनि जे सभ बिलेंती भूत उतरि जेतनि।’’ सभ स्त्रीगणकेँ जेना कोनो कौतुक दृष्यक अनुमान लागि गेलनि। ओ सभ ठिठिया उठलीह। दलानक दृश्य अद्भुते छल। बरियाती सभ अपना-अपनामे मस्त। सरियाती स्वागत सत्कारमे व्यस्त। अर्जुन चौधरीक मुँहपर मुदा जेना फुफड़ी पड़ैत छलनि। पंडालक सभसँ मुख्य आसनपर बैसल डब्बू अपन मित्र टुनटुनसँ लगातार बात-विचार करैत छल। टुनटुन डब्बूक ‘‘गाइड’’ बनि गेल छल। डब्बू परिछनक लेल बजाओल गेलाह। स्त्रीगण सभकेँ जेना एकटा खेलौड़िया नेना हाथ लागि गेलै। बिधकरी चौल करैत बजलीह- ‘‘की यौ दुल्हा, ई नाकमे मुन्नो किएक लगौने छी? कने नाक बाहर करियौ तखन ने बिध-बाध हएत।’’ दोसर स़्ी टिपलनि- ‘‘आ हाथमे जे काछु जेकाँ खोल पहिरने छथि से?’’ तेसर स्त्री अधिकारिक कपें बाजि उठलीह- ‘‘ओहो खोलए पड़तनि की! सभटा वस्त्रो खोलए पड़तनि, तखन ने परिछनि हेतनि।’’ तेसर स्त्रीक गप्प समाप्तो नहि भेल छलनि कि एकटा युवती डब्बूक हाथसँ सट् दऽ दस्ताना घिचि देलकनि। डब्बू जेना छिलमिला उठलाह। - ‘‘ओफ्फो! एनामे तँ इन्फेक्शन भऽ सकैए!’’ डब्बू दस्ताना छिनबाक लेल झपटलनि तावेत ओ युवती ओहि दस्तानाकेँ जुमा कऽ फेकलक! डब्बू जेना बेचैन भेल एम्हर-ओम्हर मूड़ी झाँपए लागल। तावत विधकरी नाकमे लागल मास्कपर हाथ दऽ देलक। पाछाँसँ ओ युवती मास्कक डोरी घिचलक। ......देखिते-देखिते ओ मास्क बिधकरीक हाथ आबि गेल। ओ ओहि मास्ककेँ अपना नाकपर लगवैत लोककेँ हँसेबाक अभिनय केलनि। डब्बू अपन दुनू हाथक तरहत्थीसँ नाक झाँपलक। एकटा महिला महौलकेँ आर सुखद बनबैत बजलीह- ‘‘जाह! दुल्हाकेँ नाक तँ छनिहेँ! ई छौंड़िया सभ तखनसँ कहै छलैए जे दुल्हा बिलेंतमे नाक कटा आएल छथि।’’ समूचा भीड़ ठहाक्कापर ठहक्का लगाबए लागलि। एकटा युवती व्यंग्य करैत बजलीह- ‘‘दुल्हा बड़ लजकोटर छथिन! देखियौन ने अपनाभरि एकोटा अंग उधार छोड़ने छथिन!’’ स्त्रीगणक हँसी-ठहक्का बढ़ैत गेलनि आ डब्बूक तामस। डब्बू मास्ककेँ बिना एतेक लोकक बीच रहब सोझे सोझ बिमारीकेँ नोतब बुझैत छलाह। ओ केहन-कहाँ हाथे स्त्रीगणक स्पर्श कऽ इन्फेक्शनकेँ बेसाहब मानैत छलाह। ओ तरङैत अपन कपड़ा उतारबसँ इन्कार कऽ देलनि। स्त्रीगण सभ जिद्द पकड़ि लेलनि। बिना वस्त्र उतारने एक्कहुटा बिध आगू नै बढ़त। डब्बू तमकैत दरबाज्जा दिस पड़ेलाह। स्त्रीगण सभ हँसैत आ धिक्कारैत पछौड़ केलनि। अर्जुन चौधरी, डब्बूकेँ देखि जेना अधमरु भऽ गेलाह। डब्बू फनकैत बजलाह- ‘‘एहन बिआह हम नै करब। ई सभ तँ हमर.....।’’ अर्जुन चौधरी डब्बूकेँ पोल्हबैत बजलाह- ‘‘एना तामस नै करु! ई सभ बिध-बेबहार छै! ई सभ तँ करजि पड़त!’’ - ‘‘हम नै करब एहन बिध-बेबहार!............फुलिश मैरेज.........।.........भेगाबोन लेडिज!!’’ - ‘‘तखन तँ बियाहो नै हेतह!’’ - ‘‘बिआह नै होएत तँ नै करब!............आ जँ बिमार भऽ जाएब तखन......?’’ एकटा बुढ़ बरियातीकेँ नहि रहि भेलनि। ओ चमकैत बाजि उठलाह- ‘‘इह बुड़िबक नहितन! अँइ हौ! एहन जे जीह छेगाएल छह से तोरेटा बिआह हेतह कि आर ककरो भेल छै?’’ दोसर बृद्ध दाँत किचैत बजलाह- ‘‘नै, नै! यएह एकटा अवतारी पुरुष भेलाहेँ।’’ अर्जुन चौधरी आ टुनटुन डब्बूकेँ बुझबैत रहलाह! स्त्रीगण सभ ठहक्का मारैत रहलीह। कन्याक माएक करेज कपैत रहलनि। बिध-बेबहार ठमकल छल। सबहक मोनमे शंका छलैक। की हएत, की नै? पुरान स्त्रीगण सबहक कहब छलनि जे- ‘‘बर झमकाह छैक। एकरा घुमा दियौ! कथीलए सुलेखाक गरदनि हलाल करबै।’’ नवतुरक मुदा दोसरे विचार! सुलेखाक सहमति स्थितिक अनुसार लेब जरुरी छलै। निस्तुकी भेल जे- ‘‘सुलेख अपन आँखिये बरकेँ देखथि आ अगिला बिध-बाधक लेल निर्णय करथि। ओ हँ कहतीह तँ बिआह होएत आ नहि कहतीह तँ डब्बूक बिदाइ।’’ नव तूरक ई निर्णय बुढ़-बुढ़ानुसकेँ कठाइन लगलनि। ओ सभ नाक-मुँह चुकरियाबए लगलीह। स्त्रीगणक झूंड सुलेखाक नेतृत्वमे दलान दिस बढ़ल। बुढ़ पुरान पछुआ गेलीह। सुलेखा डब्बूकेँ इशारासँ अपना दिस बजेलीह। डब्बू नहि मे इशारा केलनि। स्त्रीगणक झूंड आर आगाँ बढ़ल। बिधकरी बाजि उठलीह- ‘‘की सुलेखा? हँ की नहि?’’ सुलेखा मुस्कियाइत हँ मे इशारा केलनि। बिधकरी हाथ बढ़बैत डब्बूक टाइ पकड़लनि। डब्बू अर्जुन चौधरी दिस पड़ाए लगलाह।.........ऊँहूँ.......! आहाँ आब सुलेखाक सम्पति छियनि। ओम्हर नै एम्हर चलू!’’ ई कहैत बिधकरी डब्बूकेँ अपना दिस घिचि विदा भेलीह। सभ स्त्रीगण डब्बूकेँ सहटारैत आंगन दिस चललीह। बुढ़ी सभ सेहो पछोड़ धऽ लेलनि। बरियाती सभ भयमुक्त भऽ हँसी ठट्ठामे लागि गेलाह। देवांशु वत्स, जन्म- तुलापट्टी, सुपौल। मास कम्युनिकेशनमे एम.ए., हिन्दी, अंग्रेजी आ मैथिलीक विभिन्न पत्र-पत्र्रिकामे कथा, लघुकथा, विज्ञान-कथा, चित्र-कथा, कार्टून, चित्र-प्रहेलिका इत्यादिक प्रकाशन। पद्य खण्ड सतीश चन्द्र झा,राम जानकी नगर,मधुबनी,एम. ए. दर्शन शास्त्र, समप्रति मिथिला जनता इन्टर कालेन मे व्याख्याता पद पर १० वर्ष सँ कार्यरत, संगे १५ साल सं अप्पन एकटा एन.जी.ओ. क सेहो संचालन। चुनाव छल केहन हवा आयल उदंड। तृष्णाक आगि पसरल प्रचंड। सभ जाति धर्म केँ फेर बाँटि क’ देलक समाजक खंड- खंड। सत्ता सुख,धन बल मान लेल। निज स्वार्थ धर्म सम्मान लेल। विष घृणा द्वेष सगरो द’ क’ सभ भोट समटि क ससरि गेल। उन्मादक तेज हवा उठलै। उधियाक’ ककरा की भेटलै ? छुच्छे बातक जल बृष्टि छलै पोखरि इनार सौसे भरलै। बड़का कें कहि क’ मधुर बोल। छोटका लोकक जड़ि गेल टोल। अछि कतेक तुच्छ मानव एखनहुँ जीवन कें नहि छै कतौ मोल। कहियौ ओकरा की हेतै लाज। नहि भेल गाम मे कतौ काज। अछि बाट ताकि क’ थाकि गेल बासठि बरखक जीवित समाज। अछि राजनीति मे के सुयोग्य। अस्सी प्रतिशत एखनहुँ अयोग्य। ओ कोना हमर उद्धार करत ओकरा लए छै ई देश भोग्य। जड़ि गेल झड़कि क’ कतेक देह। मरि गेल हृदस सँ प्रेम स्नेह। देलक की हमरा प्रजातंत्रा ? दुख विपदा अछि ओहिना सदेह। जनमत अधिकारक मोल भाव। घर घर छिड़ियायल बैर भाव। सभ बेर कतेक बलिदान लेत अछि रक्त पिपासू ई चुनाव। भाषा आ राजनीति अछि घातक आतंकबाद सँ बढ़ि क‘ ई भाषा के झगड़ा। कखन कतय ई आगि लगायत कोना एकर पहिचानब चेहरा। अछि रहस्यमय राजनीति के क्रिया कलाप कर्म मन वाणी। छापि रहल अछि पत्र पत्रिका प्रतिदिन एकरे एक कहानी। कखनो बाँटत जाति जाति कें कखनो सीमा शरहद भारी। कखनो बात धर्म के कहि क’ लगा देत सौंसे चिनगारी। कतेक होइत दै चेहरा एकरो जानि सकल नहि कियो एखन धरि। सपथ लैत अछि ’सेवा धर्मक’ समटि लेत धन आँजुर भरि भरि। स्वार्थ कते धरि खसत खाधि मे कते आओर लज्जित क्षण आयत। हिन्दी पर लागल कलंक जे कोना एकर इतिहास मेटायत। सीखि लेथु सभ भूखल जन- जन अलग अलग सभ प्रांतक भाषा। तखने भरतनि पेट आब नहि रहलै हिन्दी देशक भाषा। सत्ता पक्ष विपक्ष कान मे कोना तूर छथि ध’ क’ सूतल। सीखि रहल अछि आइ मराठी टैक्सी चालक भय सँ कलबल। जतय देश मे छै एखनो धरि लाखो लोकक रोटी सपना। सड़क कात छतहीन जिन्दगी कंकर पाथर घास बिझौना। की मतलब छै ओकरा की छै ? भाषा,भेष कतय की बान्हल। बिना परिश्रम सँ औतै नहि भात दालि थारी मे सानल। जनहित के कल्याण आब नहि राजनीति सँ रहलै आशा। छल प्रपंच के अस्त्र सस्त्र सँ सत्ता सुख सबकें अभिलाषा। भले लेथु ई शपथ मंच पर विश्वक प्रचलित सभ भाषा मे। नहि बदलत तकदीर देश कें जन जन ठाढ़ रहत आशा मे। भूखल पेट सड़कक काते गली -गली सँ पन्नी कागत बीछ - बीछ क’। जीबि रहल अछि एखनो मानव दृश्य ठाढ़ अछि केहन विकासक। रद्दी-फद्दी, डिब्बा- डुब्बी जे भेटल ल’ गेल समटि क’। गंदा-गुन्दी किछु नहि बूझत ल’ जायत सभ ताकि हेरि क’। जड़तै तखने ओकरो चुल्हा भरतै पेट राति मे कहुना। शिक्षा के अधिकार करत की छै एखनो जे रोटी सपना। फाटल साटल वस्त्र देह पर लाज अबोधक कहुना छाँपल। जएत कोना इस्कूल पीठ पर शीशी बोतल दै किछु बान्हल। छोट छोट नेन्ना उठि भोरे दौड़ जाइत अछि रौद बसाते। भरतै पेट कोना परिवारक अछि गरीब अक्षर सँ काते। मासक मास अभाव सुअन्नक एक साँ किछु खा क’ जीबय। अछि धिक्कार समाज राज्य कें जौं आबो किछु भूखल सूतय। पाँच साल छल भेल प्रफुल्लित गाम गाम जहिया जड़ शासन अंत भेल। स्वागत मे जन जन छलै ठाढ़ सुन्दर भविष्य कें स्वप्न लेल। बदलल प्रदेश के किछु बसात सुख शांति फेर सँ उतरि गेल। चलि पड़ल विकासक विवध चक्र जीवन कें जड़ता लुप्त भेल। ल’ सकल मुदा नहि चित्र अपन संपूर्ण सुभग सुन्दर स्वरूप। भ सकल नष्ट नहि एखनो धरि भ्रष्टाचारक दानव स्वरूप। बनि रहल योजना नित नव नव घुरि रहल जिला सँ देल पाइ। ऑफीसर लागू करत कोना नहि छै जइ मे एकरा कमाइ। प्रतिपक्ष अगिलका सरकारक गद्दी लए अछि बुनि रहल जाल। वातानुकुलित घ’रक जीवन नहि किछु बुझतै रौदी अकाल। छै आबि गेल ओ समय फेर धन बल सँ सभ जीतत चुनाव। सामर्थ्यवान के संग लेत भूखल सँ एकरा की लगाव। सभ दोष एक दोसर कें द’ छीनत फुसला क’ पाँच साल। सुख दुख ओहिना जीवन ओहिना जहिना छल बीतल पाँच साल। सत्यक जीत किछु विलंब सँ मुदा सत्य कें जीत होइत छै। बुन्द-बुन्द सँ सागर कें निर्माण होइत छै। कतबो बादल झाँपि देत दिनकर कें नभ मे जागत तैयो प्रात,राति नहि अमर होइत छै। नहि भेटत अधिकार माँगि क’ इएह विधान छै। बाँटि सकी जे जते , सत्य के असल ज्ञान छै। अपने सँ अनुरोध स्नेह दुख सुख सभ बाँटी अपने दै छै संग, विपति मे आन- आन छै। एखनो धरि मिथिला के नित अपमान होइत छै। अधिकारक संघर्ष करब सम्मान होइत छै। एक डेग सभ चलब मैथिली बढ़तै आगा अपने भाषा पर सभकें अभिमान होइत छै। लिअ आइ संकल्प करब संघर्ष फेर सँ जय मिथिला के शंखनाद हम करब फेर सँ। छटतै लागल धुइन बाट पर चलबै जखने फुटतै अपने किरिण भले ही किछु विलंब सँ। जे छी जतय ओतै सँ आगाँ चलू झटकि क’। अछि संम्मानक बात लेब हम कहियो लड़ि क’। एक बेर सभ लिअ प्रतिज्ञा स्वच्छ मोन सँ अपने भुस्सा हैत बाट कें बाधा जड़ि क’। गरीबक स्वर्ग खसलै कोना ठिठुरि क' दुखिया माघक जाढ़ हार मे लगलै। काठी देह बयस अस्सी के क्षण मे देहक प्राण निकललै। छलै एकटा फाटल कंबल पुत्रक माया ओकरे देलकैं। अपने दुखिया आगि तापि क' पिता धर्म के मान बढ़ेलकै। भाग्यहीन जीवन गरीब के भूखल पेट बृद्ध के काया। बिना स्वार्थ के दान कहाँ छै। के बुझतै सरकारक माया। मुक्त भेल कहुना झंझट सँ माया मोह त्यागि क' भागल। गाम टोल के लोक सहटि क' सद्गुण ओकर बखान' लागल। कते नीक छल दुखिया सभकें दैत रहल ई संग गाम मे। जायत स्वर्ग भक्त छल भारी लीन रहै छल ‘राम नाम' मे। लगलै हँसी जोर सँ सुनि क' पड़ल देह दुखिया के तखने। कते लोक अछि एखनो पागल आइ बुझलियै हमहूँ मरने। दुख अभाव पीड़ित जन जीवन कोना स्वर्ग केर सीढ़ी चढ़तै। धर्म कर्म धन कें शोभा छै निर्धन की ईश्वर ल' करतै। नव वर्ष बनल धरोहर नव इतिहासक बीत गेल ई साल ससरि क’। आउ करी स्वागत नव वर्षक घृणा,द्वैष के बात बिसरि क’। बीत गेल सभकें ओरियाक’ एक बरख जीवन के कहुना। भेटल कखनो हर्ष खुशी त’ कखनो टूटल मोनक सपना। कतौ बनल संबंध स्नेह के कतौ स्नेह मे पीड़ा जागल। सुख-दुख,हर्ष व्यथा मे जीवन डगमग चलिते आगा भागल। काँपि उठल ई जीवन कहियो हृदय विदारक किछु घटना सँ। भेंट चढ़ल आतंकबाद के बिछुड़ल कते लोक अपना सँ। नुका गेल नेन्ना आँचर मे मुदा आब की ममता जगतै। सानल देह रक्त मे सांैसे की स्तन सँ दूध निकलतै। बाढ़ि,सुखाड़, अकाल, अग्नि सँ ठहरि गेल किछु क्षण ई जीवन नहि मानै छै पेट,जाइत छल फेर सहटि क’ आगा जीवन। बिलटि गेल घर बार छेाड़ि क’ कते लोक झगड़ा फसाद में। लागल आगि कतौ भाषा के राजनीति के नव प्रमाद में। बढल गेल सभ दाम वस्तु के रहल अभाव साल भरि अहिना। ताकि रहल छी बाट कोना क’ बीतत शुभ- शुभ पूरा महिना। जीवन अछि संघर्ष चलब हम फेर बिसरि क’ घाव विगत के। स्वागत करब पुष्प सँ हम सभ नव- नव आशा मे आगत के। हमर प्रार्थना नया साल मे सबके मंगल करथि विधाता। दीप जड़य सबके आंगन मे शांति, हषर््ा, सुख दैथि विधाता। भाषा आ राजनीति अछि घातक आतंकबाद सँ बढ़ि क‘ ई भाषा के झगड़ा। कखन कतय ई आगि लगायत कोना एकर पहिचानब चेहरा। अछि रहस्यमय राजनीति के क्रिया कलाप कर्म मन वाणी। छापि रहल अछि पत्र पत्रिका प्रतिदिन एकरे एक कहानी। कखनो बाँटत जाति जाति कें कखनो सीमा शरहद भारी। कखनो बात धर्म के कहि क’ लगा देत सौंसे चिनगारी। कतेक होइत दै चेहरा एकरो जानि सकल नहि कियो एखन धरि। सपथ लैत अछि ’सेवा धर्मक’ समटि लेत धन आँजुर भरि भरि। स्वार्थ कते धरि खसत खाधि मे कते आओर लज्जित क्षण आयत। हिन्दी पर लागल कलंक जे कोना एकर इतिहास मेटायब। सीखि लेथु सभ भूखल जन जन अलग अलग सभ प्रांतक भाषा। तखने भरतनि पेट आब नहि रहलै हिन्दी देशक भाषा। जतय देश मे छै एखनो धरि लाखो लोकक रोटी सपना। सड़क कात छतहीन जिन्दगी कंकर पाथर घास बिझौना। की मतलब छै एकरा की छै भाषा,भेष कतय की बान्हल। बिना परिश्रम सँ नहि औतै भात दालि थारी मे सानल। जनहित के कल्याण आब नहि राजनीति के बनतै भाषा। छल प्रपंच के अस्त्र सस्त्र सँ सत्ता सुख सबकें अभिलाषा। भले लेथु ई शपथ मंच पर विश्वक प्रचलित सभ भाषा मे। बदलि सकत नहि हुनक आचरण जनता ठाढ़ रहत आशा मे। मैथिल एहि देश प्रांत मे कोना हैत सम्मान मैथिली भाषा के । दोषी छी हमहूँ सब अपने छी दर्शक बनल तमाशा के। किछु कतौ बरख दिन पर कहियो विद्यापति पर्व मना रहलौं। हम पाग माथ पर राखि कतौ किछु कथा पिहानी बाँचि एलौं। की हैत करै छी झूठ- मुठ चढ़ि कतौ मंच सँ व्यथा पाठ। दू चारि लोक के छोड़ि दिअ बाँकी सभटा छी बनल काठ। सभ मुँह नुकौने जड़ बैसल छी कतय अपन भाषा भाषी। पथ उतरि करत के शंखनाद हम छी विद्रोहक अभिलाशी। अछि अपन पत्रिका गिनल- चुनल निष्प्राण भेल पाठक विहीन। के कीनत सोचि रहल अछि ओ टीशन पर टाँगल दीन हीन। हम कोना बचायब एकर प्राण ल’ जायब एकरा गाम- गाम। देखत बच्चा उपहास करत अंग्रेजी बाजब बढ़त नाम। चुट्टी पिपरी सभ जीव जन्तु अपना सँ राखत कतेक स्नेह। छथि मुदा केहन मैथिल समाज सभ समाघिस्थ, निश्चल, विदेह। माइक कोरा मे पहिल बेर जहि भाषा के छल भेल ज्ञान। ओ पहिल चेतना भाव बोध छल जीवन के आधार प्राण। सभ बिसरि गेल छी तैं देखू ! अछि सुखा रहल गंगाक धार। कहिया धरि रहब उपेक्षित हम सभ करू फेर सँ किछु बिचार। संकल्प लिअ उठि चलू आइ आँजुर मे गंगा जल राखू। दिनकर के साक्षी राखि फेर नहि आइ कियो पाछाँ ताकू। हरिमोहन झा जयकांत मिश्र सभकंे साहित्यिक मान लेल। छी कतय नीन्न मे एखनो धरि जागू मैथिल सम्मान लेल। कविता आ कनियाँ जीवन अछि भ’ गेल छिन्न-भिन्न सब मान प्रतिष्ठा धर्म गेल। ‘कविता’ आ ‘कनियाँ’ मघ्य आबि छी ठाढ़ आइ दृगभ्रमित भेल। छिटल किछु शब्दक गढ़ल अर्थ कविता अछि अंतर के प्रकाश। कनियाँ छथि स्नेहक पवन प्राण जीवन के नव सुन्दर सुवास। ‘क’ सँ कविता, ‘क’ सँ कनियाँ ह्रस्व ई लागल अछि दुनू के। दुनू के मात्रा एक रंग अछि बास हृदय मे दुनू के। अंतर अछि तकराबाद बनल अछि चाँद विन्दु कनियाँ उपर। तैं चान जेंका छथि चढ़ल माथ कविता अछि फेकल ताख उपर। कविता पोथी फाटल साटल कनियाँ नहि रहती बिना सजल। कविता सँ कनियाँ के सब दिन रहि गेलन्हि केहन विद्वेश बनल। कविता कनियाँ मे भेल केना सौतिनपन, झगरा एतेक डाह। तै लागि जाइत छन्हि कनियाँ के कविता सँ रौदक तेज धाह। धरती अंबर सन बना लेब ई मोन हृदय कतबो विशाल। नहि समा सकत संगे-दुनू क’ देत व्यथित क्षण हृदय भाल। अछि अर्थ विराट एकर जग मे शंकर के ई अछि ब्रह्म रूप। ज्ञानी पंडित अछि चकित देखि कविता कनियाँ के मूर्त रूप। की करू ठाढ़ छी सोचि रहल अछि हमरो जीवन मे दुविधा। क’ देब त्याग कविता जखने भेटत कनियाँ सँ सुख सुविध। रखने छी कविता के पन्ना कनियाँ सँ सबटा नुका- नुका। माथक सिरहन्ना मे ठूसल कविता किछु पुरना किछु नवका। भेटल किछु तखने समाधन छल जे भारी संकट विपदा। कनियाँ पर सुन्दर नव कविता किछु लीखि सुनाबी यदा-कदा। लिखय लेल बैसि गेलहुँ तखने बाहर कोनटा मे लगा घ्यान। गृहणी सँ कविता छलै रूष्ट नहि फुरा सकल किछु गीत गान। बैसल रहि गएलहुँ समाधिस्थ नहि दोसर पाँती उतरि सकल। हे मृगनयनी, नभ चन्द्र मुखी की करू हमर अछि कलम रुकल। पंखहीन कल्पना सुखा गेल अछि मोसि कलम केँ कोना आइ कविता हम लीखू। रुग्ण भेल अछि मोन भावना राति अन्हार चान की देखू। दीन हीन व्याकुल अनाथ भ’ भटकि गेल अछि भाव मोन केँ। पंखहीन विक्षिप्त कल्पना बदलि गेल अछि अर्थ शब्द केँ। कानि रहल अछि वर्णक मात्रा छंद आब उन्मुक्त भेल अछि। सुन्दर देह आगि सँ सगरो अलंकार केर झरकि गेल अछि। अछि आयल दुर्दिन साहित्यक आँखि खोलि क’ की हम देखू। सुखा ...............................लीखू। अहित सुखी भ’ जीवि रहल अछि हित दुर्लभ अछि वस्तु जगत केँ। स्वार्थ धर्म ज्ञानक परिभाषा भोग विलास अर्थ जीवन केँ। झूठ पहिरने वस्त्रा रेशमी सत्य ठाढ़ निर्वस्त्रा कात मे। अछि निर्मल नहि जल गंगा केर अध्र्य देब हम कोना प्रात मे। दिशाहीन जा रहल दूर छी केना ठहरि क’ किछु क्षण बैसू। सुखा ...............................लीखू। बिलटि गेल अछि अपन घ’र मे संस्कार, शिक्षा, अनुशासन। खंड - खंड मे बाँटि रहल अछि जाति धर्म केँ अंध कुशासन। ज्ञानी छथि बैसल अन्हार मे भ्रष्ट लोक केर नित अभिनंदन। सत्य आचरण लज्जित जग मे अत्याचारक रूप विलक्षण। चिंता छोरि करू हम चिंतन अछि मृगतृष्णा की की देखू। सुखा ...............................लीखू। पहुँचि गेल अछि यान चान पर अछि पसरल ओहिना निर्धनता। वक्षस्थल केर वसन बेचि क’ दूध पियाबथि शिशु कँे माता। लोक बनल अछि वस्तु बजारक बिका रहल जीवन नेनमन मे। भेल कतेक उन्नति एहि देशक चमकि रहल अछि विज्ञापन मे। बिलखि रहल अछि भूखल बच्चा केना द्वारि पर जा क’ बैसू। सुखा ...............................लीखू। बुधनी घुरलै जीवन दीन - हीन कें बनलै जहिया टोलक मुखिया। नव- नव आशा मोन बान्हि क’ सगर राति छल नाचल दुखिया। घास फूस कें चार आब नहि बान्हब कर्जा नार आनि क’। नहि नेन्ना सभ आब बितायत बरखा मे भरि राति कानि क’। माँगि लेब आवास इन्दिरा काज गाम मे हमरो भेटत। जाति - जाति कें बात कोना क’ ई ‘दीना’ मुखिया नहि मानत। भेलै पूर्ण अभिलाषा मोनक भेट गेलै आवास दान मे। दुख मे अपने संग दैत छै सोचि रहल छल ओ मकान मे। की पौलक की अपन गमौलक की बुझतै दुखिया भरि जीवन। मुदा बिसरतै बुधनी कहिया बीतल मोन पड़ै छै सदिखन। पड़ल लोभ मे गेल सहटि क’ साँझ भोर मुखिया दलान मे। होइत रहल भरि मास बलत्कृत विवश देह निर्वस्त्रा दान मे। जाति- धर्म, निज, आन व्यर्थ कें छै बंधन जीवन मे झूठक। जकरा अवसर भेटल जहिया पीबि लेत ओ शोणित सबहक। सबल कोना निर्बल कें कहियो देत आबि क’ मान द्वारि पर। कोना बदलतै भाग्य गरीबक दौड़त खेतक अपन आरि पर। भाग्यहीन निर्धन जन जीवन बात उठाओत की अधिकारक। नोचि रहल छै बैसल सभटा छै दलाल पोसल सरकारक। सृजन बुन्द बरखा कँे उतरि क’ देह के सगरो भिजेलक। तप्त मोनक आगि नहि तैयो कहाँ कनिओं मिझेलक। जड़ि रहल छल गाछ रौदक धाह सँ आँगन दलानक। छल केना सुड्डाह भ’ गेल फूल गेना, तरु गुलाबक। निन्न सँ जागल कमलदल बुन्द पड़िते दृग उठौलक। स्नेह सँ जल बूँद कँे सब निज तृषित उर सँ लगौलक। प्रस्फुटित नव पंखुरित किछु बुन्द आंचर मे नुकौलक। पीबि जल अमृत धरा कँे जीव जीवन कँे बचैलक। जड़ बनल किछु बीज कँे जखने भेलै स्पर्श जल सँ। अंकुरित भ’ गेल बंजर भूमि के चेतन अतल सँ। अछि मनोरम दृष्य सबकेँ छै केहन आनंद भेटल। हर्ष मे डूबल प्रकृतिक नृत्य मे जीवन समेटल। गाछ पर बैसल केना अछि खग बना क’ स्नेह जोड़ा। छी एतय हम आई असगर नहि पिया छथि,सुन्न कोरा। की केलहुँ हम स्नेह क’ क’ द’ देलक किछु घाव जीवन। नीक छल दुनियाँ अबोधक पूर्ण जीवन, तृप्त जीवन। घाव जँ रहितै शरीरक फोरि क’ कखनो सुखबितहुँ। तूर के फाहा बना क’ घाव पर मलहम लगबितहुँ। देत के औषधि बना क’ अछि चोटायल घाव मोनक। के मिटायत आबि हमरो नेह सँ संताप मोनक। द्वारि के पट बंद कयने छी व्यथित हम आबि बैसल। आइ अबितथि पिया, रहितहुँ अंक मे आबद्ध प्रतिपल। ठोर पर ठहरल सुधा जल आइ ‘प्रियतम’ के पियबितहुँ। प्रज्ज्वलित देहक अनल किछु स्नेह के जल सँ भिजबितहुँ। रक्त सन टुह-ंउचयटुह कपोलक मध्य चुंबन ल’ लितथि ओ। बाँहि के बंधन बना क’ बाध्य हमरो क’ दितथि ओ। तेज किछु बहितै पवन जँ ल’ जितय आँचर उड़ा क’। भ’ जितहुँ निर्लज्ज , भगितहुँ नहि हुनक बंधन छोरा क’। तोड़ि क’ सीमा असीमक द्वारि पर जा निन्न पड़ितहुँ। त्यागि क’ देहक वसन नव, स्वर्ण आभूषण हटबितहुँ। क्षण भरिक अवरोध क्षण मे क’दितहुँ अपने समर्पण। झाँपि आचरि मुँह करितहुँ देह कँे निष्प्राण किछु क्षण। प्राण सँ प्राणक मिलन मे अछि केहन जीवन अमरता। होइत तखने देह मे किछु ‘बूँद अमृत’ सँ सृजनता। के करत वर्णन क्षणिक ओ प्राण मे अनुभूति नभ कँे। शब्द सँ बांन्धब असंभव ओ घटित आनंद भव के। मोन मे उतरल कहाँ अछि किछु अभिप्सा काम बोधक। अछि हृदय मे आइ हमरो कामना मातृत्व बोधक। बुन्द जे ठहरल उतरि क’ जीव मे जौं होइत परिणत। अपन देहक रक्त, मज्जा दैत रहितहुँ दान मे नित। स्नेह सँ गर्भस्थ शिशु कँे धर्म मानवता सिखबितहुँ। स्त्राी जातिक एहि जगत मे मान राखब , नित पढ़बितहुँ। अछि जगत मे पूज्य नारी देवता के बाद दोसर। कष्ट सँ जीवन बुनै अछि गर्भ मे निज राखि भीतर। किछु सजावट लय बनल अछि वस्तु नारी नहि जगत मे। नहि करब अपमान कहियो बनि पुरुष दंभी अहं मे। अंक मे नवजात शिशु कँे दूध स्तन सँ पिया क’। पूर्ण मानव हम बनबितहुँ झाँपि आँचर मे जिया क’। होइत तखने जन्म हमरो किछु सफल परिपूर्ण जीवन। जौं सृजन नहि भेल तन सँ व्यर्थ अछि अभिशप्त जीवन। छै केहन मोनक अभिप्सा लालसा जग मे सृजन कँे। दैत छै के धैर्य एकरा नहि बुझै छै कष्ट तन केँ। छथि अचंभित देवतो गण देखि नारी के समर्पण । जी रहल जीवन बिसरि क’ गर्भ के रक्षा मे सदिखन। गर्भ मे नौ मास रखने अडिग बैसल असह् दुख मे। द’ रहल छथि अन्न भोजन देह सँ निज मातृ सुख मे। हर्ष मे अछि मग्न ममता । छै तपस्या पुत्रा स्नेहक। साधना मे लीन अछि ओ । छै केहन हठयोग देहक। अंत क्षण साक्षी विधाता ! मोन मुर्छित, दर्द तन मे। वेदना सँ प्राण व्याकुल अछि केहन पीड़ा सृजन मे। सुनि अपन नवजात शिशु के ओ पहिल अनमोल क्रंदन। धन्य ममता ! दुख बिसरि क’ हँसि उठै छै फेर तन मन। अंकुरित ओ बीज कहियो भ’ उठै छै गाछ भारी। छाँह ममता के बनै छै, प्राण के आधाार नारी। पैध होइते शिशु केना ओ किछु बनै छै दुष्ट दानव। अंध मोनक वासना में होइत अछि पथ भ्रष्ट मानव। बुझि सकल नहि गर्भ मे ओ भावना नारी हृदय केँ। बनि असुर निज आचरण सँ क’ देलक लज्जित समय कँे । होइत अछि नारी ‘बलत्कृत’ अछि पुरूष ओ के जगत कँे ? गर्भ नारी सँ धरा में जन्म नहि लेलक कहू के ? छी! घृणित कामी, कुकर्मी छै पुरूष पाथर केहन ओ। यंत्राणा दै छै केना क’ आइ ककरो देह कँे ओ। भरि जेतै ओ घाव कहियो देह नोचल , चेन्ह चोटक। जन्म भरि बिसरत केनाक’, ओ मुदा किछु दंश मोनक। मोन नहि भोगल बिसरतै, ज्वार पीड़ा के उमड़तै । लाल टुह टुह घाव बनिक जन्म भरि नहि आब भरतै। पढ़ि लितय जौं भाग्य ममता अछि अधर्मी ई जगत के। नहि करत ओ प्राण रक्षा पेट मे बैसल मनुख के । जन्म द’ क’ ओहि पुरुष के अछि कहू के भेल दोषी ? देव दोषी ? काल दोषी ? गर्भ अथवा बीज दोषी ? छै नियति नारी के एखनहुँ हाथ बान्हल, ठोर साटल। के देतै सम्मान ओकरा छै कहाँ भव धर्म बाँचल। ग्रन्थ के उपदेश ज्ञान क अछि जतेक लीखल विगत मे। भेल अछि निर्माण सभटा मात्रा नारी लय जगत मे। क’ सकत अवहेलना नहि दृष्टि छै सदिखन समाजक। नहि केलक विद्रोह कहियो धर्म छै बंधन विवाहक। जन्म सँ छै ज्ञान भेटल धर्म पत्नी के निभायब। स्वर्ग अछि पति के चरण मे कष्ट जे भेटय उठायब। ध्यान, तप, सेवा, समर्पण जन्म भरि नहि बात बिसरब। प्राण नहि निकलय जखन धरि द्वारि के नहि नांघि उतरब। नहि हेतै किछु आब कनने, शक्ति चाही खूब जोड़क। नोर मे सामथ्र्य रहितै... नहि रहैत ओ ‘वस्तु भोगक’। छीन क’ ओ ल’ सकत जँ किछु अपन सम्मान कहियो। चुप रहत भेटतै केना क’ दान मेे अधिकार कहियो । कन्यादान अछि आइ हमर क्षण ठहरि गेल। जीवित तन अछि निष्प्राण भेल। विपदा अपार, सगरो अन्हार अन्हर बिहारि सन मोन भेल। ई समय होइत अछि सम्मानक। अछि सता रहल भय अपमानक। जीवन केर सभसँ पैघ यज्ञ अछि आबि गेल कन्यादानक। पाषाण हृदय रक्तक बंधन। के संग देत परिजन पुरजन। परहित अछि दुर्लभ वस्तु आइ अनका लेल कानत आन केहन। धन सँ होइ छै संबंध गाढ़। अर्थक बंधन सगरो प्रगाढ़। के पूछत दुख सुख हाथ पकड़ि धनहीन रही हम कतौ ठाढ़। बीतल जीवन अछि अपन ध्यान। परिजन सँ एखनो नीक आन। किछु मांगि लेब जौं हुनका सँ उपहासक भोगब व्यंग्य वाण । ककरा ककरा सम्मान करब। की की असगर ओरियौन करब। भेटत सुयोग्य वर कोना आइ दानव समाज कें माँग भरब। छथि हृदयहीन मैथिल समाज। पढ़लो के नहि छै लोक लाज। हे देव ! गगन सँ उतरि कहू धनहीन कोना किछु करत काज। कन्या केर जहिया जन्म भेल। तहिये सँ अछि ओरियौन भेल। गहना गुड़िया सभ पाइ -पाइ रखलहुँ हम कन्यादान लेल। रहि गेल मुदा तैयो अभाव। नहि क’ सकलहुँ हम मोल भाव। आँगन मे छी भयभीत ठाढ़ सागर मे कंपित जेना नाव। की भेल पढ़ेलहुँ , देलहुँ ज्ञान। नहि भेल समस्या के निदान। अछि हमर सुता के ज्ञान व्यर्थ छनि हुनक पुत्रा सबसँ महान। छथि पिता पुत्रा के भाग्यवान। हुनके छनि जग मे बनल मान। हम कन्यागत छी तुच्छ लोक हमरा लेल की अपमान -मान। लौता अभद्र किछु बरियाती। हमरे धन सँ घोड़ा हाथी। हम रहब द्वार करबद्ध ठाढ़ काँपत भय सँ धक धक छाती। की हैत कखन आदेश हुनक। की मांग उठौता ओ दानक। अछि देह छोड़ि सभ बिका गेल ई केहन पर्व कन्यादानक। अछि केहन देवता के विधान। हम करब दान नेन्नाक प्राण। दुख सुख भोगत जे हेतै भाग्य जीवन भरि लागल रहत ध्यान। ममता कें रहि रहि बहत नोर। ताकत सगरो जौं हैत भोर। के कहत नीक किछु समाचार नाचत हर्षक आंगन विभोर । हमरो कखनो फाटत कुहेश। रहि जैत मोन मे याद शेष। कन्याधन सभदिन रहत कोना आयत कहियो अवसर विशेष। अछि प्रथा दहेजक महापाप। के करत मुक्त अछि घोर शाप। की लीखि रहल छी गीत नाद सुनियौ सगरो , सुनबै विलाप। चानक प्रेम नहि उतरल छल चान गगन सँ छलै आइ भारी जिद ठनने। जागि गेल छल प्रात निन्न सँ उदयाचल सिन्दुर सन रँगने। विश्मित पवन आँखि के मलि-मलि देखि रहल छल दृष्य ठाढ़ भ’। उगतै सुरुज चान जड़ि मरतै आवि रहल छै किरण गाढ़ भ’। मुशकि रहल छल चान, ठोर पर छलै अपन स्नेहक शीतलता। ताकि रहल छल बाट, मिलन कँे छलै हृदय मे मधुर विकलता। बनल नियम छै कालचक्र के के जानत की हैत अशुभता। के बाँचत, के भागत नभ सँ हैत नष्ट किछु आइ अमरता। प्रखर अग्नि सँ आइ सामना करतै शीतल प्रभा चान केँ। प्रेम समर्पण मे जीवन के द’ देतै आहुति प्राण कँे। अंग - अंग मे अग्नि पूँज सँ फुटतै फोँका लाल-लाल भ’। काँच देह नहि सहतै पीड़ा सुन्दरता जड़तै सुडाह भ’। पलक झपकिते घटित भेल किछु सुखद् दृष्य नभ केँ प्राँगन मे। शीश झुकौने सुरुज चान केँ बाँधि लेलक निज आलिंगन मे। भेल चान परितृप्त अंक मे पूर्ण भेलै मोनक अभिलाषा। पिघलि गेल छल सुरुज मिझेलै कुटिल अग्नि के अहं पिपाशा। मौन भेल छल दिनकर नभ मे नव आनंद अपार उठा क’। चान भेल किछु लज्जित,हर्षित उतरि गेल अपने ओरिया क’। सिंगरहारक फूल सिंगरहार के फूल गाछ सँ छै छीटल सगरो झड़ि झड़ि क’। बीछि रहल अछि अपन खोंछि मे के युवती आँजुर भरि भरि क’। अनचिन्हार अछि कोना रोकि क’ नाम पता ओकरा सँ पुछियौ। तोड़ि लेत किछु आन आबि क’ कोना फूल ओकरे लय धरियौ। चढ़ा रहल छल फूल कतय ओ कहाँ पुछलियै कहियो ओकरा। छलथि देवता अथवा दोसर पूज्य कियो छल आरो ओकरा। उज्जर दप - दप देह चान सन वएस काँच यौवन नव उतरल। सुन्दरता के देखि मुग्ध भ’ भोरक किरिण आबि छल ठहरल। मह मह गंध देह सँ ओकरे आबि रहल अछि किछु रहि रहि क’। बेकल भेल अछि कोइली तरू पर कू कू स्वर मे किछु कहि कहि क’। स्नेहक छै किछु बात होइत छल की की बाजू कोना मोन मे। बीतत साँझ फेर ओ आयत देख लेब भरि आँखि भोर मे समय बदललैै देखलहुँ भोरे सुन्न भेल छल गाछ झहड़ि क’। ताकि रहल छी बाट आइ हम आयत कहिया फूल उतरि क’। चंचल मोनक मधुर कल्पना जगा रहल अछि किछु कहि कहि क’। सुना रहल अछि गीत कान मे शीतल पवन मंद बहि बहि क’। सोनाक पिजरा सोनाक पिजरा खौंइछा मे ल’ क’ दूभि धान। पेटी, पेटार, पौती, समान। जा रहल आइ छी सासुर हम अछि कोना अपन लेए बेकल प्राण। हमरा बिनु माय कोना रहतै। बाबू केर सेवा के करतै। नीपत चिनबार कोना भोरे जाड़क कनकन्नी सँ मरतैं। अछि केहन देवता के बिधान। ल’ कोना जाइत अछि संग आन। एखने उतरल छल साँझ पहिल भ’ कोना गेल एखने विहान। छल केहन अबोधक नीक खेल। कनियाँ पुतरा मे मग्न भेल। आमक टिकुला लय दौड़ि गेलहुँ अन्हर बिहारि मे सुन्न भेल। कखनो फूलक बनि रहल हार। ल’ एलहुँ बीछि क’ सिंगरहार। झूठक पूजा, माटिक प्रसाद भरि गाम टोल देलहुँ हकार। जे भेल मोन मे केलहुँ बात। के रोकत जखने भेल प्रात। भरि खौंछि तोड़ि क’ भागि एलहुँ ककरो खेतक किछु साग पात। ई समय कोना क’ बढ़ल गेल। रहलहुँ हम सूतल निन्न भेल। नहि भान भेल कहिया अपने जीवन ओरिया क’ ससरि गेल। बाबू सँ मा किछु केलक बात। निशब्द इशारा उठा हाथ। ल’ अनलथि जा क’ पिया हमर ललका सिन्दुर पड़ि गेल माथ। देखलहुँ पाहुन छथि अनचिन्हार। निशिभाग राति सगरो अन्हार। भेटल किछु नव श्पर्श पहिल मन बहकि गेल उतरल श्रृंगार। किछु सत्य भेल मोनक सपना। भेटल मुँह बजना मे गहना। हमहूँ देलियन्हि सर्वस्व दान ई मोन हृदय जे छल अपना। अछि केहन विवाहक ई बंधन। स्नेहक संबंध बनल प्रतिक्षण। अपरिचित दू टा चलल संग विश्वासक बान्हल डोर केहन। संगी साथी सभटा छूटल। की बिसरि सकब जीवन बीतल। ओ घर द्वारि आँगन दलान सभ सँ छल स्नेह कोना टूटल। कनिते कनिते औरियौन भेल। पाहुन संग हमर चुमौन भेल। भगबती घ’र सँ बिदा होइत दू टा कहुना समदौन भेल। दृग जल सँ गंगा उतरि गेल। ममता विधान सँ हारि गेल। बाबू दलान पर रहथि ठाढ़ मा ओलती मे निष्प्राण भेल। खोंता मे पक्षी सिहरि गेल। दाना अहार छल बिसरि गेल। स्तब्ध भेल छल गाछ पात पछबा बसात छल द्रवित भेल। भारक समान किछु छल राखल। भरि गाँव टोल सौसे कानल। गामक सीमान धरि बहिना सभ दौड़ल बताह भ’ छल कानल। हम प्रात पहुँचलहुँ हुनक गाम। जे अछि नारी केर स्वर्ग धाम। नहि रहल एतय पहिलुक परिचय भेटल हुनके सँ अपन नाम। कोबर मे बैसल छी अनाथ। राखथि जे बुझि क’ प्राण नाथ। क’ देलक बिदा जखने परिजन दुख केर कहबै किछु कोना बात। बान्हल चैकठि सँ आब रहब। दुख सुख कहुना अपने भोगब। नैहरि सासुर केर मान लेल कर्तव्यक सभ निर्वहन करब। अछि उजड़ि गेल ओ पहिल वास। भेटल अछि सोना कें निवास। टुटि गेल पांखि, अछि भरल आँखि पिजरा सँ की देखू अकाश। सुबोध कुमार ठाकुर, गाम-हैंठी बाली, जिला-मधुबनीक मूल निवासी छथि आ चार्टर्ड एकाउन्टेन्ट प्रैक्टिशनर छथि। आशा जीवनक ज्योति ओ प्रकाश सबहक जीबए कऽ एके गो श्रोत होइत अछि सुखमए सुन्दर आश, सोचू जे आशा नहि होइतए जीवनक परिभाषा नहि होइतए एकरे बलपर विश्वक सभ क्षेत्र चाहे ओ होए कोनो परिवेश, एकरे बलपर सभ पर्व उल्लास, जीवनक ज्योतिक प्रकाश नान्हिये टाक बच्चा लए कए पोसथि छथि माए एहि आशा लए कए पैघ भेला पर ईएह राखत हमर विश्वास, सबहक जीबए कऽ एके गो श्रोत होइत अछि सुखमए सुन्दर आश, बिलटि गेल जन कुनु परिवार भए गेलै जन अर्थक अभाव तैयो ओ जीबि लैत अछि काल्हिक बलपर आइ खेपैत अछि सुखले रोटीमे भेटए मालपुआक आभाष सोचू होइत अचि कतेक सुन्दर आश सरिपहुँ आशा विहीन प्राणी होइत अचि जेना नदी बिन प्राणी कहीं गेला अए दिव्य ज्ञानी आबि जाए हुनक जीवन लीलामे खटास जीबए लेल जरूरी चए तँए आस जुग बदलि गेल जुग बदलि गेल, मन बदलि गेल, जकरे देखू से सनकि गेल नहि जानि किए, एक दोसरसँ सभ दूर सड़कि गेल, नहि माइ बाप नहि भाइ-बहिन, सभ अछि जेना संबंध विहीन, स्वच्छन्द रमए, स्वच्छन्द विचार लए, जीबए जिनगी सभ ऐंठ-खिचार भए, सम्बन्धक माने बदलि गेल सभकेँ नहि जानि ई की भेल, क्रोधी कामी अति लालची सभ अछि दुर्भावनासँ ग्रसित सभ सभ दिशाविहीन दिगभ्रमित भेल, जकरे देखू से सनकि गेल, आजुक परिदृश्यमे, नारिक जीवन अही सृष्टिमे, अछि दर्दनाक अतृप्त भेल तोड़ि लाज सभ नारी परोसी रहल लाजक श्रिंगार, देखिते जकरा मर्द भुकए बनि के सियार नारीक परिभाषा बदलि गेल जकरा देखिते क्षण ठिठकि गेल, जुग बदलि गेल। जकरे देखू से जुगल बनल होइतए नेना जेना जुवान बनल, हम जा रहल छलहुँ सड़कपर देखलहुँ नेनाकेँ बालिका प्रति व्यवहार सहजहि मनमे उठल विचार, गर्लफ्रेंडक संग प्रेमक परिभाषा बदलि गेल जुग बदलि गेल, मन भटकि गेल नहि अछि भेष-भूषा नारीक समान, नहि जानि कतएसँ आएल ई परिधान चूड़ी, लहठी आ साड़ीकेँ छोड़ि नारी आब जीन्स अधकट्टी स्कॉट संग भेल, जुग बदलि गेल, मन भटकि गेल, सभ भागि रहल फुसियाहींक आडम्बरपर, सभ नाचि रहल बिन बाजनपर नमस्कार अभिवादन छोड़ि, आब हाए-बाय आबि गेल, जुग बदलि गेल। चाही सभकेँ खूब विलाश, सभकेँ खजानाक छै तलाश जिनगीक फुसियाही साधन जुटबैक लेल, जिनगीयेकेँ सभ बिसरि गेल, जुग बदलि गेल सभ अछि अशान्त, अछि लोक कालहंत, पाश्चात्य सभ्यता केलक सभकेँ परेशान जे ग्रह बनि शान्तिकेँ निगलि गेल पुछै अपन संस्कृति कतए सभक सुबोध गेल, जग बदलि गेल, सभ भटकि गेल। सुन्न लागए गाम बुढ़िया माय कोनटा पर बैसल, थाकल आँखिसँ निहारि रहल छलीह बाट, काल्हि दिबाली छियैक दीप जरतए सगरे हमरो अँगना आएत फेरसँ उल्लास, बुढ़िया माय कोनटा पर बैसल, थाकल आँखिसँ निहारि रहल छलीह बाट, बैसले-बैसल मन सोचि रहल छल पिछला दिनमे मन घुमि रहल छल सगर टोल आओर गाम सुखमय लगैत छल जखन सभ गामहि रहैत छल मुदा आब ओ समए नहि रहल नहि रहल आब ओ बात बुढ़िया माय कोनटा पर बैसल, सोचिते मन परिजरित भय उठल जेना हृदयमे सहजहिं प्रश्न उठल किएक बनल सभ परदेशी, आ गाम बनल सुनसान सोचिते कऽ रहल छल मोन विलाप बुढ़िया माय कोनटा पर बैसल, थाकल आँखिसँ निहारि रहल छलीह बाट, केहन भेलइ ई मजबूरी रोटी खातिर बनलय दूरी, सभकेँ चाही खूब पाइ रुपैय्या आओर चाही खूब भोग विलाश बुढ़िया माय कोनटा पर बैसल... एक बेर जेना कहलकहि, कहि पठाबी ई समाद पुत्र सभकेँ, तूँ पाय आब बड कमेलह इहे पाइ तँ देश छोड़ेलकह नहि चाही खूब पाइ रुपैय्या घुरि आबह तूँ अपन देश बटोहिया माँ मिथिले दोहराबए सेहो इहे बात बुढ़िया माय कोनटा पर बैसल.. थाकल आँखिसँ निहारि रहल छलीह बाट। अधूरा प्रेम आर चान छिटकल क्षण आकाशमे छल मनमे दबल जतेक बात छल कहए लगलहुँ चानसँ बुझबए लगलहुँ प्राणसँ हमरो प्रेमक ज्योति जागल रहए हमरो प्रीतक आगि लागल रहए प्रेम करए लागल रहौँ हुनका हम प्राणसँ ई कहए लगलहुँ चानसँ आएल छलीह हमर मरुभूमि रूपी मनमे ओ मृगमरीचिका जेकाँ बनि कऽ ओ खेलाय लागल छलीह ओ हमर अरमानसँ कहए लगलहुँ हम चानसँ अखन तँ प्रेमक आँकुरो नहि फुटल छल मनक स्नेह सेहो ढंगसँ नहि चढ़ल छल नीक जेकाँ हुनका सुननहुँ नहि छलहुँ कानसँ कहए लगलहुँ ई चानसँ कर्मक डोरी संग बान्हल छलहुँ जीवन सार्थक करएमे लागल छलहुँ अर्थकेँ जुटबैमे प्यासल छलहुँ प्रेम मधुर संगीत फीका लागए हमर कानसँ, परंच हमर मनक गाममे ई शोर छल कहि नहि सकलहुँहुनका ई अपन जुबानसँ कहए लगलहुँ ई चानसँ अन्तर्द्वन्द चलिये रहल छल प्रेमक रंग चढ़िये रहल छल परंच ठीक भय गेलै हुनकर विवाह ककरो आनसँ, कहए लगलहुँ ई चानसँ जिनक पाणिग्रहण हम नहि कए सकलहुँ, जिनका लेल हम तड़पैत रहि गेलहुँ हाय केहन बान्हल छलहुँ विधाताक विधानसँ ओ छलीह हमर अधूरा प्रेम, कल्पना ओ यथार्थक बेजोड़ संगम आर पवित्र गीता कुरानसँ कहए लगलहुँ ई चानसँ नेनाक प्रश्न फेर कारी मेघ छयल देखि मन सभक हर्षायल सुन्दर बर्खा बुन्द खसत जीव चराचरकेँ जीवन भेटत आँखिमे काजर सजेने देखि मन मुदित म्र्गनयनी बात अधरमे सजा कए पुलकित भय छलि सेज सजेने परञ्च नेना ठाढ़ एकसर, सोचि रहल छल बात दोसर फेर बरखा खूब होयतय , फेर परुकेँ जकाँ सगरे ढहेतय भूखसँ तरसब हम सभ अन्नकक़ दाना नहि भेटत, जा कय बड़का दलानपर कानि-कानि कय राति काटब, किएक होइत अछि जलमग्न सगरो सुधि किएक नहि छै ककरो, किएक अछि कोशी ओ कमला , धार ई बागमती बलानक, छै किएक नहि उपाय एकर, सोचि रहल छल कोमल हृदय ओकर, जकर छल नहि ककरो लग उत्तर, डर कल्पनाक जखन यथार्थमे बदलल रहए, दृश्य बाढ़िक ताण्डव बनि बाध-बोन पसरल रहए, आँखिसँ काजर दहाएल, मृगनयनीक मुख मुरझाएल, कष्ट-पीड़ा आर डरसँ सबहक छल देह घमायल, के करत मालक निमेरा सोचि-सोचि बुधना दुखित भेल भागि-भागि सभसँ कहय छल आब बाँचब दुभर भेल, घर आँगन चार-चाँचर, भय गेल जल मग्न सगरो नहि कमल दल नहि मखानक आ नहि छल शेष धानक बाढ़िसँ कलहंत जीवन छलि मिथिला शिथिल भेल के करत प्रतिकार एकर बनायत मिथिलाकेँ निम्मन सभ साल आबि-आबिकेँ बाढ़िक ताण्डव करैत अछि विकास अवरुद्ध तोड़ि सभक आशाकेँ करए आस अवरुद्ध मुँह फाड़ि चिकड़ि-चिकड़ि कय नेना पूछि रहल अछि प्रश्न सभसँ की सब दिन अहिना जीब बाढ़िक ताण्डव देखि-देखि कय प्रश्न अबोधक नहि छै केवल प्रश्न अछि सुबोधक प्रश्न छै माइग्रेनक एवं प्रश्न अछि बुधना किसानक प्रश्न छै मिथिलाक आशाक एवं प्रश्न छै मिथिला विकासक सनेश जो रे पवन तू ओहि दूर देश पिआ बसए जाहि देश छी हम व्याकुल आतुर हद तक प्यासल छी हम अन्तर घट तक जा कऽ दए आ हुनका ई सनेस जो रे पवन तू सावनक रास भरल महीना कटए विरान हुनका बिना सहि नहि सकब हम ई कलेश जो रे पवन तू ओही दूर देश पिआ बसए जाहि देश आँखि कजराएल हमर मेघक संग हेराएल मनपर खसल बज्जर रसक मात्रा बाँचल नहि शेष जा कऽ दए आ हुनका ई सनेस कटत केना राति अन्हरिया ऊपरसँ जे चमकए बिजुरिया मनक बढ़ल जाए कलेश जा कऽ दए आ हुनका ई सनेश पसरल अछि रंग रभसक बहार सगरो मुदा हमरा लेल पसरल अन्हार सगरो एनामे जे छोड़तथि रणभूमि सखी सहेली उल्हन देत विशेष दए कऽ तू आ पिआ केँ ई सनेश जो रे पवन तू ओहि दूर देश पिआ बसए जाहि देश। हम नहि छी अभिशाप हम नहि छी अभिशाप समाजक, हम तँ छी आधार समाजक। जुनि हमरा देख ठोर बिजकाऊ, हमर बातपर ध्यान लगाऊ सोचू जे हम बेटी नहि होएतहुँ जगमे पुरुष कतएसँ अबितहुँ जगमे, कतएसँ अबितए जीवन चक्र मानवक जीवन होएतए वक्र, हमरासँ अछि श्रृंगार समाजक, हम नहि छी अभिशाप समाजक। बौआ जे किनको होइन नगर-नगरसँ बधाइ जाइन, होयतए बेटी तँ सभ लजाए कहाँसँ काली अएलउ दाइ, बात ई अछि अति विचारक, हम नहि छी अभिशाप समाजक, हमर परिस्थिति बनल जाइ आओर विकट, यंत्र सूक्ष्मदर्शीसँ आएल संकट, दुनियाँमे आगमनसँ पहिले, मुनियाँकेँ मारए छी पहिले, ओ बाबू- मय चण्डाल समाजक, हम नहि छी अभिशाप समाजक। बनए छी हमहुँ इन्जीनिअर-डॉक्टर हमर चमकसँ सेहो लजाए छथि भाष्कर, मुदा ई अछि केहन लाचारी तैयो बियाहमे लागए हजारी, कहाँ गेला समाज सुधारक, हम नहि छी अभिशाप समाजक, हमहीं तँ ममता लुटबए छी हमहीं जगक कष्ट उठबए छी, कखनो बेटी कखनो माए कखनो मृगनयनी कखनो दाए, विविध भूमिकामे आबि कए, करै छी हम उद्धार समाजक, हम नहि छी अभिशाप समाजक, उग्र जखन हम बेटी होए चामुण्डा दुर्गा काली होए, जखन शान्ति मुद्रामे होए, जनक नन्दिनी सीआ होए, कहाँ गेल सभ ज्ञान समाजक, हम नहि छी अभिशाप समाजक, नहि चाही हमरा आरक्षण, छी हम अबला ताहि कारण, हमरा चाही स्थान समाजक हम तँ चाही वरदान समाजक, हम नहि छी अभिशाप समाजक हम तँ छी वरदान समाजक। जीवन यात्रा थाकल पएर झमाड़ल देहसँ, भारी मन मुदा आशा आओर नेहसँ, चलय केर प्रयत्न कय रहल छल बटोही गुज-गुज अन्हार छल, मनमे डरक विकार छल, तैयो ठहियाइत बाट जोहैत चलि रहल छल बटोही। अन्तिम पड़ावपर छल यात्रा, सोनितक संचारक चाल कम मात्र , तैयो उल्लास भरि चलि रहल छल बटोही। बटखर्चाक सभ दिन अभाबे रहल, मन माफिक मंजिलक सभ दिन अभाबे रहल, तैयो प्रयासरत रहैत सदिखन चलैत रहल बटोही। थाकल पएर झमाड़ल देहसँ, भारी मन मुदा आशा आओर नेहसँ, चलय केर प्रयत्न कय रहल छल बटोही कखनो पुस्तकक बोझ लए कए, कखनो नोकरीक खोज लए कए, सरपट भागए के कोशिस कएलक बटोही। आयल बाटमे उपवनो कखनो, फुलाएल रहए रंग-बिरंग फूलो सगरो, मुदा चलबाक धुनमे सुगंध नहि लए पओलक बटोही। चढ़बाक हिमगिरीपर छल, इजोरिया राति सेहो सुन्दर तखने छल, परञ्च वीर रससँ ओतप्रोत श्रृंगार रस छोड़ि चलल बटोही। मन कतेक बेर कहलक, कनी बिलमि ली, यात्राक कनी आनन्द लए ली, मुदा आगाँ बढ़ए के होरमे, चलैत रहल बटोही। सदिखन संघर्षरत रहैत, मंजिलकेँ पाबए लेल प्रयास करैत, नहि सफले नहि असफले, बीचक प्रतियोगी छल बटोही। जीवन एक गोट यात्रा छी, मंजिल नहि से नहि बुझि सकल बटोही। थाकल पएर झमाड़ल देहसँ, भारी मन मुदा आशा आओर नेहसँ, चलय केर प्रयत्न कय रहल छल बटोही। अओताह मन भावन स्वप्न सलोना आँखिमे लेने धनी बहारि रहल छलि आँगन। सोचि-सोचि कए मन हर्षित छल आइ सँझमे अओताह हमर परदेशी मनभावन। छल बरखक आस मोनमे दबल मोन कतेक पीड़ासँ छल गुजरल कानि कए काटल राति अन्हरिया आर रससँ भरल महिना साओन, स्वप्न सलोना आँखिमे लेने धनी बहारि रहल छलि आँगन। ओ पछिला मिलन रातिक मोन भीजल रहए मिठगर-मिठगर बातसँ रोम-रोम पुलकित रहए, हुनक आलिंगन छल कतेक पावन, स्वप्न सलोना आँखिमे लेने धनी बहारि रहल छलि आँगन। नबका साड़ी आइ पहिरबए नेचुरल रंग बला लिपिस्टिक लगेबए गजरासँ हम केश सजेबए देखिते सोचमे पड़ि जएता साजन, स्वप्न सलोना आँखिमे लेने धनी बहारि रहल छलि आँगन। एतबामे फोनक घंटी बाजल धनी जेना निद्रासँ जागल, फोनपर आएल आबाज हम नहि आएब एहि महिना आब सुनि धनी झूर-झमान भए खसली जेना खसए रोगी दर्दक कारण, स्वप्न सलोना आँखिमे लेने धनी बहारि रहल छलि आँगन। कहए सुबोध धनी जुनि कानू बात कवि केर मानू, अगिला महिना निश्चय अओताह, अहांक सुन्दर मनभावन। स्वप्न सलोना आँखिमे लेने धनी बहारि रहल छलि आँगन। विनीत ठाकुर, मिथिलेश्वर मौवाही ६, धनुषा, नेपाल जाढ़ गत्तर–गत्तर जाढ़ दागे की कहु भाइ यौ राति काटब कोना ओढ़ीकऽ चटाइ यौ दुःखक पथार आव पसरल एकचारी थर–थर कापै बैसल बुधनी बेचारी हाथ–हाथ नहि सुझे लागलछै बड़ धूनी लाही लत्तिपर बरसै परै जेना फूँहीँ सुनि नहि पराती शब्दै नहि चिड़ीया कोक्रीया गेलै आइ की दादी बुढ़ीया गत्तर–गत्तर जाढ़ दागे की कहु भाइ यौ राति काटब कोना ओढ़ीकऽ चटाइ यौ घूर की फूकब भटे नहि निङ्हाँस–पोरा करेजामें साटगे बुधनी नेनाके लऽ कोरा कोपित भऽ धर्ती–जलवायु उगलै छै जहर ताँय नागिन फूफकार छोरै शितलहर गत्तर–गत्तर जाढ़ दागे की कहु भाइ यौ राति काटब कोना ओढ़ीकऽ चटाइ यौ नव वर्ष नव वर्षक ललकी कीरीणियाँ सुखक समाध लऽ पसरल दुनियाँ सभ केउ सुखित भऽ जिबै–जागै पूरे मिथिला मंगलमय लागै होइनै ककरो आव जाइ–बेजाइ मेहनतकें रोटीसँ नेना पोसाइ सभकें घरमें जुरै रुचै अन्न प्रशन्न मुद्रामें रमकै मोन जे बुझे अपनाकें बलशाली देश काज किछु एमकी करै विशेष जलवायू प्रदूशन पर राखै ध्यान पृथ्वीकें कम करै तापमान गीत- अएनाके की मोल अएनाके की मोल आन्हरके शहरमे लागे उल्टा मुँह सुल्टा अपने नजरमे ज्ञानक शुरमा लगाकऽ जे बजबैय गाल व्यवहारमें देखल ओकरो उहे ताल मोन भितरके दर्पण सेहो चुर–चुर एतऽसँ मानवता भागल अछि कोशो दुर घुमें दिनमें दरिन्दा ओढी सज्जनके खोल कतहुँ देखल मातम कतहुँ बाजे ढोल अएनाके की मोल आन्हरके शहरमे लागे उल्टा मुँह सुल्टा अपने नजरमे जे समाज सुधारक ओ करैय किशुनकेर ओकरे पाछु मुसना कहबैय शवा–शेर जा धैर नहि हाएत मोन सँ मद–पन नाश करत लोक कोनाकऽ विनीत भावक आश अएनाके की मोल आन्हरके शहरमे लागे उल्टा मुँह सुल्टा अपने नजरमे गीत-१ ठकन काका हो कलयुगमे देखल बड़ अजगुत मनुषक भेषमें घुमे सबतैर आब यमके दुत आबनै चानमें ओ शितलता मलिनभेल सुरुजक लाली स्वार्थक बसमें पैर मनुष सब करैय काज बेताली भरल बसन्तमे कुहके कोयलिया पुत भेल कपुत नोर बैन हिमालयसँ निकले कमला, कोशीके पानी हिचुके गंगोत्रीसँ गंगा सबके भेल एक कहानी नव दुलहिन धर्ती माताके छिन्न भेल सारीके सुत जे कहाबे अपनाके ज्ञानी उहे करे खिचातानी के नव बाट देखा मिथिलाके लिखत सुन्दर कहानी कहिया धैर जाल सोझराक मैथिल हायत मजगुत गीत-२ जिवन एक अनमोल गहना खुबकऽ झमकाऊ हिरा मोतिसँ प्रज्वलित सपना नयनमे सजाऊ कर्मक पथपर चलु आगु छोरु टिकरम जाल छि अहाँ चमकैत सोना माँ मिथिलाके कोखक लाल झगर लगाउन चुगला बनिकऽ मुहनै नुकाउ फूसक एकचारीपर कखनो उरुनै बनिकऽ कौवा केकरो माथपर ठनका खसा बजवियौनै कैह वौवा सोनितके हर एक कतरा अपन विकाशमे लगाऊ मानवता राईख मनमे दोसरके होइयौ सहारा सबकेउ एक दोशरसँ अपनामे राखू भाईचारा टुइट परु अधिकारकलेल केकरोसँ नै डेराउ अभ्यागत कतेक देरऽसँ ठाढ छैथ द्वार पर अभ्यागत सिदहा दऽ कऽ घरनी करु हुनका स्वागत प्रचन्ड गर्मिमें भित धेने भेल लहालोट छै तन पर गुदरी हुनकर परल कतेक छोट छै अपन दुःख आ पिड़ाके ओ छातिमे दवाकऽ टहल लगावे सगरो गामे–गाम जाकऽ जन्में की कर्मसँ हुनका कोना कहबै पछुवाएल कपटीके जालमें हुनक जीवन जे ओझराएल अषाढक रौदी जका पैरमे फाटल बेमाई छै समाजेनै देखतै तऽ ककरा गल दबाई छै गीत -उठू मैथिल भेलै भोर जय जय मैथिल जय मिथिला हर–हर गङ्गे जय कमला उठू यौ मैथिल भेलै भोर चुनमुन चिरैया करैय शोर कोशि कमला अमृत जल धारा आलश छोरु कहे भुरुकवा तारा माईट पानिके लगाक छाती बुढिया दादी गावे पराती गाई महिश खोललक चरवाहा हर लऽ विदाह भेल हरवाहा मन्दिर मस्जिद मिथिलाके शान रुप अनेक एकही भगवान जनक शलहेशक ई कर्मभूमि स्वर्ग समान वनाऊ मात्रिभूमि निशाप्रभा झा (लोकगीत संकलन) भगवती गीत तारा नाम तोहार तारा नाम तोहार हे जननी काली करथि पुकार सतयुग कलयुग दुइ प्रति हारल तीनू भुवन तोहार हे जननी तारा नाम तोहार। अष्ट भुजा लए सिंह पर चढ़ली देखइत सकल संसार हे जननी, तारा नाम तोहार। सुर-नर मुनि सभ ध्यान धरतु हे गले बैजन्ती माल हे जननी तारा नाम तोहार। तारा नाम तोहार हे जननी, तारा नाम तोहार। विवाह क गीत कोना वियाहब धीया ओ पिया, कोना वियाहब यो{(2)} वरक भाव आकाश चढल छई, दू अच्छर नहि पढ्ल-लिखल छई। माँग करए फटफटिया यो पिया, कोना वियाहब यो, कोना विहायब धीया ओ पिया, कोना वियाहब यो। {(2)} वरक बाप केहन छथि बोढ्ला, तिलक माँगे सोनक मोहरा, वरक बाप लटपटिया यो पिया, कोना वियाहब यो, कोना वियाहब धीया ओ पिया, कोना वियाहब यो। कोनो उपाय नहि हमरा सुझईए, बेटीक देखि जग झाझर लगइए, बेटीक वियाह झनझटिया ओ पिया, कोना वियाहब यो, कोना वियाहब धीया यो पिया, कोना वियाहब यो।{(2)} विवाह क गीत जाँघ जोडी बाबा बैसलनि मंडप चढि, आब बाबा करू कन्यादान यो। जौओ तिलक लए धीया केड उसरगलऊ, आब धीया भए गेल विरान यो। सुसुकि-सुसुकि कानशि माए सुनैना, बाबूजी केड चेहरा उदास यो। जाहि बेटी लए नटुआ नचाओल, सहए बेटी भए गेल विरान यो। कन्यादान करए उठलनि बाबा जनक रीखि, मोती जका झहरनि नोर यो। जाँघ जोडी बाबा बैसलनि मंडप चढि, आब बाबा करु कन्यादान यो। भगवती गीत कओने मुँह सँ अयलीह काली, कओने मुँह गेलीह हे कलजोरी-जोरी। कओने मुँह भए गेली ठाढ हे कलजोरी-जोरी। पूब मुँह सँ अयलीह काली, पश्चिम मुँह गेलीह हे कलजोरी-जोरी, उत्तर मुँह भए गेलीह ठाढ्हे कलजोरी-जोरी। कओने फूल ओढब काली कओने फूल पहिरन हे कलजोरी-जोरी, कओने फूल सोलहो सिंगार हे कलजोरी-जोरी। बेली फूल ओढन काली, चमेली फूल पहिरन हे कलजोरी-जोरी, ओडहुल फूल सोलहो सिंगार हे कलजोरी-जोरी। पहिरि औढिय काली गहबर मे ठाढि हे कलजोरी-कलजोरी, करय लगलीह सेवक के गोहारि हे कलजोरी-कलजोरी। खोलू ने केबार खोलू ने केबार हे जननी, खोलू ने केबार। माँ के द्वार पर् फूल नेंने ठाढ छी, पूजन करब तोहार हे जननी, पूजन करब तोहार। माँ के द्वार पर धूप नेने ठाढ छी, आरती उतारब तोहार हे जननी, खोलू ने केबार। माँ के द्वार पर माखन नेने ठाढ छी, भोग लगाएब तोहार हे जननी, खोलू ने केबार, खोलू ने केबार हे जननी, खोलू ने केबार। परिछन गारि ने हम दै छी दुलहा द रहलौ आशीष यौ, सासुर मे जुनि छाती तनियौ रहु लिबौने शीशयो ॥ गारि----- गरदनि मे तौनी लगबै छी, गरदामी ने अनलौ, नाक धरै छी नायब तैले, हाटक बाछा बनलौ। अहाँक जनम ओलन्हि तैले बाबू लेलन्हि फीस यौ ॥ गारि----- नव बडद छी सुन्दर लागब, ते परिरु ई माला, सासुर के धोती परिरु आ’, फेरु बाबा माला, जे जे कहलौ मानू नै त लागत ठुनका तीस यौ ॥ गारि----। मौसा हडकल मौसी गुडकल, पीसा अहाँक भरुआ, दुल्हा मुदा अहाँ गुनि रुसियौ, सासुके दुलरुआ। बहिन लेल हमारा घघरी मंगादेब बाबू ले’ कटपीसयौ ॥ गारि---- खेत बेचिक साइकिल देब, आ’महिस बेचिक रेडियों, काका के दोसर बेटी की जेतनि, विवाहलि कहियौ। बड हम पहिरब गुदडी दुल्हा जीबू लाख बरिस यौ ॥ गारि---- ब्राह्मणक गीत ब्राह्मण बाबू के नाम हम सुनिते छलउ नहि चिन्हि ने जानि कोना ब्राह्मण भेलउ, अहाँ पीपरक गाछ तर रहिते छलउ, अहाँ कोढिया केकाया जे देते छलउ। ब्राह्मण बाबू के नाम हम सुनिते छलउ, नहि चिन्हि नहि जानि कोना ब्राह्मण भेलउ, अहाँ पीपरक गाछ तर रहिते छलउ, अहाँ अंधा के नयना जे देते छलउ। ब्राह्मण बाबू के नाम हमारा सुनिते छलउ, नहि चिन्हि नहि जानि कोना ब्राह्मण भेलउ, अहाँ पीपरक गाछ तर रहिते छलउ, अहाँ बहिरा के कान जे देते छलउ। ब्राह्मण बाबू के नाम हमारा सुनिते छलउ, नहि चिन्हि नहि जानि कोना ब्राह्मण भेलउ, अहाँ पीपरक गाछ तर रहिते छलउ, ब्राह्मण बाबू के नाम हम सुनिते छलउ। --------------- हनुमानक गीत कानि-कानि कहथिन सीता सुनु हनुमान यौ, किया जो बिसरि गेलनि मोर भगवान यौ। जल-थल, शशि-निशि ,अग्नि समान यौ, रावणक बात सुनि लागए विष समान यौ। किया जो बिसरि गेलनि मोर भगवान यौ। हार मांस गलि पथि भेल भुगतान यौ, तइयौ ने छुटए मोर पतित प्राण यौ। किया जो बिसरि गेलनि मोर भगवान यौ। हम त कहई छी सीता अहाँ छी संज्ञान हे, लक्षुमनक संग अओता श्री भगवान हे। कानि-कानि कहथिन सीता सुनु हनुमान यौ, किया जो बिसरि गेलनि मोर भगवान यौ।। 1. हाथ सटकुनिया हो दीनानाथ हे घूमई छी संगहि संग आजु दिन उगई छी हे दीनानाथ आहे भेर भिनसर ॥2॥ आजु के दिनमा हो दीनानाथ हे लागल एतीबेर ॥2॥ बाट धेने जाई छही हे अबला एक त अन्हरा पुरूख ॥2॥ कानि–कानि कहई छही गे अबला हे लागल एतीबेर ॥2॥ बाट धेने जाई छही हे अबला एक तऽ बाझिनियॉ ॥2॥ पुत्र कनई छऊ गे अबला हे लागल एतीबेर ॥2॥ बाट धेने जाई छै गे अबला एकटा कोरिया पुरूख ॥2॥ कानि–कानि कहै छही गे अबला हे लागल एतीबेर ॥2॥ 2. माँ छठि मईया हे सुनु ने अरजिया हमार। जखन छठि मईया घर सऽ बहार भेली माँ छठि मईया कोढ़िया छथि काया लेल ठाढ। माँ छठि हे सुनु ने अरजिया हमार। जखन छठि मईया घर सऽ बहार भेली माँ छठि मईया हे अन्हरा छथि नयना लय ठाढ माँ छठि मईया हे सुनु ने अरजिया हमार। जखन छठि मईया दरबज्जा सऽ बहार भेली माँ छठि मईया हे बाँझिन छथि पुत्र लय ठाढ माँ छठि मईया हे सुनु ने अरजिया हमार। जखन छठि मईया गाम सऽ बहार भेली माँ छठि मईया हे निर्धन छथि धन लय ठाढ माँ छठि मईया हे सुनु ने अरजिया हमार। 3. कल जोड़ी ठाढ़ भेली पोखरी केऽ कात हे शिव के दुआरी हे, दीनानाथ निर्मल धार हे। अरघ उठैबे दीनानाथ अंकुरी हजार हे शिव केऽ दुआरी हे, दीनानाथ निर्मल धार हे। दूध चढ़ैबे दीनानाथ केराक घउड़ हे। शिव केऽ दुआरी हे, दीनानाथ निर्मल धार हे। हाथी बैसायब दीनानाथ अच्छत पान हे शिव केऽ दुआरी हे, दीनानाथ निर्मल धार हे। दीप जरायब दीनानाथ धूप–गुगुल संग हे शिव केऽ दुआरी हे, दीनानाथ निर्मल धार हे। नहाय–सोनाए दीनानाथ पोखरी के कात हे शिव केऽ दुआरी हे, दीनानाथ निर्मल धार हे। कल जोड़ी ठाढ़ भेली पोखरी के कात हे शिव केऽ दुआरी हे, दीनानाथ निर्मल धार हे। गौरीक गीत। 1. गेन्दा तोहर बड़ लाल गे मलिनिया ॥2॥ गेन्दा तोहर बड़ लाल। तीन सिन्दुर लय गौरी हम पूजब, पीपा आ भटिया अचीन गे। गेन्दा तोहर बड़ लाल गे मलिनिया ॥2॥ तीन फूल लय गौरी हम पूजब, चम्पा अड़हुल गुलाब गे। गेन्दा तोहर बड़ लाल गे मलिनिया ॥2॥ तीन फल लय गौरी हम पूजब केरा पेड़ा अनार गे। गेन्दा तोहर बड़ लाल गे मलिनिया ॥2॥ तीन वस्त्र लय गौरी हम पूजब लाल पीयर पीताम्बर गे। गेन्दा तोहर बड़ लाल गे मलिनिया ॥2॥ तीन जल लय गौरी हम पूजब गंगा यमुना सरयुग गे। गेन्दा तोहर बड़ लाल गे मलिनिया ॥2॥ 2. चलु गे सुन्दरि गौरी पूजय लय नटुआ नचायब आजु गे। नटुआ जे नाचत बजना जे बाजत देखत नगरक लोक हे। तीन सिन्दुर लय गौरी पूजब, मटिया आ पीपा अचीन गे, चलु गे सुन्दरि गौरी पूजब लय नटुआ नचाओत आजु गे। तीन फूल लय गौरी हम पूजब,बेली,चमेली अड़हुल गे, चलु गे सुन्दरि गौरी पूजब लय नटुआ नचाओत आजु गे। तीन वस्त्र लय गौरी हम पूजब पीयर,पीला,पीताम्बर पटोर गे, चलु गे सुन्दरि गौरी पूजब लय नटुआ नचाओत आजु गे। तीन जल लय गौरी हम पूजब, गंगा यमुना सरयुग गे, चलु गे सुन्दरि गौरी पूजब लय नटुआ नचाओत आजु गे। तीन नेवैद्ध लय गौरी हम पूजब, केरा पेड़ा नारियल गे, चलु गे सुन्दरि गौरी पूजब लय नटुआ नचाओत आजु गे। नटुआ जे नाचत बजना जे बाजत, देखत नगरक लोक हे। चलु गे सुन्दरि गौरी पूजब लय नटुआ नचाओत आजु गे। फूल छिटबाक गीत 1. फूल छीटय मे लागे सोहाओन, सिया जी के कोबर मे कथी मे लोढ़ब हे, बेली–चमेली, कथी मे लोढ़ब गुलाब सिया जी के कोबर मे। डाली मे लोढ़ब हे, बेली–चमेली, फुलडाली मे लोढ़ब गुलाब सिया जी के कोबर मे। किनका चढ़ायब हे, बेली–चमेली किनका चढ़ायब गुलाब सिया जी के कोबर मे। शिव जी चढ़ायब हे, बेली–चमेली, गौरी चढ़ायब गुलाब सिया जी के कोबर मे। किनका सँ माँगब हे,अनधन लक्ष्मी, किनका सँ माँगब सोहाग सिया जी के कोबर मे। शिव जी सँ माँगब हे, अनधन लक्ष्मी, गौरी सँ माँगब सोहाग सिया जी के कोबर मे। फूल छीटय मे लागे सोहाओन, सिया जी के कोबर मे। 2. भोला शंकर पार्वती (नचारी) भोला शंकर पार्वती जगपालक जगदीश्वर ईश्वर हमर अहाँ सुधि ली भोला शंकर पार्वती। दुःख जनम भरि भोगल बाबा, की अनाथ हम छी। कार्तिक, गणपतिसन हम नहि छी, छी अपराधी भोला शंकर पार्वती। उतरब पार अहीं बल बाबा अढ़रन ढ़रन अहीं भष्म विभूत कंठ विषधारी तांडव तान करी। भोला शंकर पार्वती। मुंडमाल सर्पक संग सभ दिन गंगा–चन्द्रधरी, पूरत आस मनोरथ बाबा गौरी के नगरी। भोला शंकर पार्वती। हिमांशु चौधरी नियति बिछानरुपी मशान मे अर्थहीन भ अपन लाशक कठियारी स्वयमसन भ गेल छी इच्छा सभ मे पूर्णविराम लागि गेल अछि तेँ एकटा नियति भ गेल छी हँसलासँ मात्र नहि कनएटा पडैत अछि कनैत-कनैत थाकि जाइत छी तखनो शांति नहि किछु मनोविनोद करएटा पडैत अछि बनाबटी मुस्की छोडएटा पडैत अछि धन्य कथा!--- धन्य यथार्थ!! तेँ जीवन मृत्यु मे लीन होइत जा रहल अछि, जीवन आ मृत्यु मञ्जिल होइत जा रहल अछि। टप-टप नोर आ ज्वाला शब्द वीणा मे अक्षरक तार लटका क आलाप क रहल छी ई केहन कोन अछि जे रौद नहि दैखैत छी ई केहन गाछ अछि जे कोयली नहि बजैत अछि भगवान! अल्लाह! गड! पराधीन क्षितीज मे छाओ बढैत जा रहल अछि रङ्ग आ तालक परिभाषाक शब्दजाल मे स्नेह उपेक्षित होइत जा रहल अछि दासताक छाँह बढैत जा रहल अछि सपना मे आगि लगैत जा रहल अछि शताब्दीक ई निर्मम मजाक नोरसँ भीजल पपनी केँ हड्डी आ चमडीक शरीरकेँ इलेकट्रोड सुगा बनबैत जा रहल अछि अशांत आ बेचैन बीच भीड पचीसी खेल भेल जा रहल अछि सभकेँ सिरक मे रखैत सहवास करबाक नीतिसँ आस्था दुर्वासा बनैत जा रहल अछि मेघक गर्जन, वर्षा आ ठनकाकेँ श्रृङ्खलासँ शीघ्र उपलब्धि दीर्घ पीडासन होइत जा रहल अछि घृणाक ज्वालामुखीकेँ कोनहुँ भविष्य नहि होइ तो टप- टप नोर आ क्रोधक ज्वाला अशोक होइत जा रहल अछि धाहे- धाहे बीच नव-नव पिआस बढैत जा रहल अछि तेँ स्वर्ग! जन्नत! हेवन! इतिहास/भूगोल मे नहि खोजि क वर्तमान मे खोजबाक आवश्यकता बढैत जा रहल अछि। आतङकक राजकुमार आइकाल्हि भोर – साँझ हमर गाम असुरक्षित अछि भोर मे शांति बलात्कृत साँझ मे सुरक्षा अपहरित शांतिक लेल अष्टजाम सुरक्षाक लेल महायज्ञ पद्धतिसन भ गेल अछि। कखनो लक्ष्मी भोकाडि पाडैत अछि कखनो सावित्री गोहारि मङैत अछि क्षणमे पार्वतीक हरण होइत अछि गामक देवता शांति-शांति कहैत छथि गामक गिद्धसभ क्रांति-क्रांति कहैत अछि। केहन कोलाहल केहन मिथकीय परम्परा आतङ्के-आतङ्क गामक मन्दिर,मस्जिद आ चर्च कोलाहल, द्विविधा आ मिथकीय परम्पराक आश्रय स्थल बनि सिर्जना,चिंतन आ सुरक्षा केँ बदी बना पौरुख, गौरव आ महत्वाकाङ्क्षाक घडारी केँ चारुदिससँ भाला, गडाँस ल क घेरि लैत अछि। भाला पौरुखक पेट मे गडाँस गौरवक छाती मे आतङ्कक हृदय एतबो मे नहि जुडाइत अछि डिहबारक गाछ मे सिर्जना, चिंतन, महत्वाकाङ्क्षा ज्ञान, भाव आ इच्छा के बान्हि आरासँ चीरैत अछि सूर्योदयसँ सुर्यास्त धरि अहङ्कार चिचिआइत अछि विजयोत्सव! विजयोत्सव!! सिर्जना, चिंतन महत्वाकाङ्क्षा, ज्ञान, भाव, इच्छा पौरुख आ गौरवक हत्या सँ शोकायल अछि हमर गाम। एक-एकटा फूल झडैत जा रहल अछि जकर कतहु नहि चर्चा होइत छैक गामक समवेदना हरेक दिन कष्टप्रद यात्रा क रहल अछि ई दृष्टिभ्रम नहि समय हमर गामकेँ बेर-बेर ठकलक अछि विध्वंशक गर्जन आ तर्जन से हो भ रहल अछि शोकाएल हमर गाम मे एक बेर फेर विवेक आ आस्थाक डिबिया बार पडतैक ओकर इजोत सँ पडाएति ---- आतङ्कक राजकुमार। पाथर पाथरकें आगां दीप बारैत किएक समयके बरबाद कएने छी ओकर आंखिमे एतेक गर्दा पड़ल छैक जे फुल आ गाछ धरिकें ने देखैत अछि फुल आ गाछक जीवन कलासन अछि काव्यसन अछि दृश्य आ द्रष्टाक प्रतीकसन अछि तें किएक ने पंचम स्वरमे फुल आ गाछक गान करब विश्वास अछि एहि दुनूकें गानसं पतझड़ सेहो मधुमास भ’ क’ आबि जाएत ताहि कारणे पाथरकें सुतए दियौ किएक की पाथर तं निद्राक अन्तिम अवस्था होइत अछि । कथा शुन्यभाव शुन्यकाश होइतहुं ने बिसरल छी व्यथा ने खतम होइबला अछि अनन्तता सुनल अछि विश्वास आ प्रेमहिसं संसार बनल अछि शुन्य नकारने छैक शुन्य तं पुर्णक गर्भमे होइत अछि शुन्यसं सभ उठैत अछि आ ओहीमे सभ लीन होइत अछि कतेक बड़का अछि पृथ्वी तरहथीके भीतर अछि एकर आयतनजे कखनो सुटैक जाइत अछि त क कखनो फुलि जाइत अछि तें इतिहास आ वर्तमान बीचक अन्तरकें सड़क साक्षी रखैत बिसङगतिक खाद्यि आ आत्मकथाकें कथा बीच बांचल छी सर्व सत्ये प्रतिष्ठितः ल’ क चेतनाक संवाहक सभके प्रतीक्षामे छी जे एकटा स्मृतिक दोसर ताजमहल बना देत तत्वमसि निर्मित मुल्यके प्रतिष्ठित क’ देत । की भार सांठू लाते–लातसं घाहिल लाशे–लाशस’ गन्हाएल सङक्रान्तिक पीड़ामे की भार सांठू थुराएल चानी फुफुड़िआएल अहिबक फड़ शोकाएल चाउर पिपाएल आंजुर दन्तकथाक पात्रजकां कचोट द’ रहल अछि गत्र–गत्रमे बेधल भाला–गड़ांस टीसे–टीस द’ रहल अछि फाटल–चिटल कपड़ा–लत्ता मूंह कतहु हाथ कतहुं स्ट्रेमे राखल सिगरेटक ठुट्ठीसन लावारिश भ’ गेल इतिहासमे बहल नोर फेर एहिबेर सेहो बहि गेल गन्हाएल लाशक भार कोना क’ सांठू ? अनिष्टकारी अमरौती पीने अछि ओकरा लेल सत्यम, शिवम आ सुन्दरमक सर्जक बाधकतत्व बाधकतत्व मरि जाए माहुरे–माहुर भ’ जाए अन्याय अमरलती द्रौपदीक चिरसन नमरैत चलि जाए एहन सनकमे सनकैत ओकर अमरौती कखनो बारुद फेकैए कखनो धराप रखैए बारुद आ धरापमे पोस्तादाना कत’ ताकू जे अनरसा बनाएब आ भार सांठब... क्यानभासमे फाटल गाछदेखि अन्हड़ि–बिहाड़ि अएबे करत विश्वासक जयन्ती अङ्कुरित भेल अछि परन्च बहुतो धोएल सींथक सेनुरक कारुणीकताक भार कोनाक सांठू ?.... गीत उड़ैत धुआंमे करेज उड़ैत जा रहल अछि जीवित इच्छा सिसकी भरैत जा रहल अछि पियाला भितर मदमस्त चेहरा देखैत छलहुं ओहि चेहराकें रेखा कोरैत छलहुं हम गरम बुन्नीमे चेहरा पकैत जा रहल अछि सिनेहक कसगर बन्हनमे बान्हल छलहुं हम ओहि बन्हनकें तोरण बनौने छलहुं हम झहरैत नोरमे बन्हन खुजैत जा रहल अछि सोनित एके होइतो पेराएल हलहुं हम बित–बितपर तिरस्कारस पीड़ाएल छलहुं हम सिलेटके आखरसन सभ मेटाइत जा रहल अछि रूपेश कुमार झा 'त्योंथ' चाही हमरा मिथिला ई ने पूछू कथिलए, चाही हमरा मिथिला मान करै छी हिन्द देश केर, हम्मर झंडा तिरंगा एकर नीचां चाही हमरा, एकटा अप्पन मिथिला ई ने पूछू कथिलए, चाही हमरा मिथिला पुरा काल मे मिथिला मे छल, ज्ञानी-प्राणी बड-बड मुदा हाल आब देखू एकर भऽ गेल केहन जर्जर भेल उपेक्षा हमर सभक, कयलहुँ बड्ड डिन मर-मर आब ने खायब टपला, चाही हमरा मिथिला माटि एतय केर उपजाऊ अछि, नहि बूझू यौ उस्सर प्रतिभा सभ अछि भरल-पडल, नहि बूझू अहाँ भूधड सुतल छलथि यौ मैथिल जन सभ, आब सभ क्यो जगला ई ने पूछू कथिलए, चाही हमरा मिथिला सुख-सुविधा केर अता-पता नहि, सउँसे थिक अन्हारे बाढि प्रभावे फसल बहैए, भऽ जाइछ लोक बिनु चारे कथा सडक केर कहल जाय ने, लगै जेना हो डबरा आब ने रहब फुसला, चाही हमरा मिथिला भेटल आजादी सगर देश मे, मिथिला जेना परतंत्रे कोनो लाभ लेल हमरा सभ, तकै छी पाटलिपुत्रे मुदा भेटै अछि किछुओ नहि यौ, भऽ जाइछ ओम्हरे घपला ई ने पूछू कथिलए, चाही हमरा मिथिला शुरुए सँ कतियाएल कनै छी, दुनू हाथ धऽ माथ करै मिथिला राज अलग, नहि चलतौ कोनो लाथ मात्र ङङ्गत्योंथ' नहि एकहि संग यौ, सभ मैथिल जन बजला ई ने पूछू कथिलए, चाही हमरा मिथिला जय हिन्द! जय जय मिथिला!! राष्ट्र हमर भारत थिक जे विश्वगुरुक महिमा सँ मंडित तकर कान्ह पर थिक सुशोभित हमर जन्मभूमि मिथिला जय हिन्द! जय जय मिथिला!! अनेकता मे एकता थिक देशक प्राण यैह तऽ थिक एक्कर पहिचान ओहि अनेक मे सँ एक हमर जन्मभूमि मिथिला जय हिन्द! जय जय मिथिला!! हिन्दक मही पर थिक विद्यमान संस्कृति अनेक बनि चान मिथिलाक संस्कृति सेहो एक अविरल दीप्तिमान विशेष शिला जय हिन्द! जय जय मिथिला!! माटि सोन ओ देश मणि कन्हुआ कऽ ताकै एम्हर कनी आँखि देबौ दुनू फोड़ि आ दम लेबौ तोरा माटि मिला जय हिन्द! जय जय मिथिला!! माटिक सेवक छी हम देशभक्त एकरा लेल बहा सकै छी रक्त माटि लेल पसीनाक ठोप-ठोप सुखा सकब ने कथिला? जय हिन्द! जय जय मिथिला!! पहिने हित देशक फेर प्रदेशक अगुआ सभ ले तोँ ई सबक नहि तऽ एहि देशक जनता चटिएतौ तोरा झोट्टा हिला जय हिन्द! जय जय मिथिला!! अजित कुमार मिश्र अप्पन माटि दूर देशमे अहाँ बसै छी मन अछि हमर घोर यौ , चिट्ठी-पतरी किछु नहि पठबी हम कोनाकेँ जीबि यौ ।।1।। छोड़ि गाम जे शहर भगलिऐ लए आसक सब पोटरी यौ , आस बदलि निराश भेल अछि आबहुँ तँ घूमि अबियौ यौ ।।2।। चिट्ठी पबितहिं पकड़ू गाड़ी तेजू शहरक पानि यौ , पानिक बदला शोणित पीबी तकरो नै भेल ज्ञान यौ ।।3।। चिट्ठी नै हम सप्पत दै छी जँ मानी अप्पन यौ , घुरती बेरक गाड़ी पकड़ू पहुँचू गाम- सिमान यौ ।।4।। आब गाम ओ गाम नै रहलै जत्तए दर-दर ठोकर यौ , लूरि जेहन अछि तेहने काजो गाम-गाममे पसरल यौ ।।5।। गाम गाम नै धाम बनल छै चहु दिस नव वितान यौ , गाम पहुँचिकेँ नाम करू अहँ फेर नै शहरक नाम यौ ।।6।। अप्पन गामक अलगे गुण छै नै छै दोसर ठाम यौ , घुरि फीरिकेँ सब अबैऐ राखू हमरो मान यौ ।।7।। नववर्ष सूर्यक प्रकाश सन जीवनमे ज्योति बस , चन्द्रमासन शीतल मन बाँटए ई वर्ष दस । पग-पग पर भेटए जन , दिन-दिन बढ़बए यश , कामना कण-कणमे, घोलए सुख-शान्ति रस ।। दयाकान्त हे मैथिल आबो जागु बितल राईत भऽ गेल भोर चिडे-चुनमुनी करैया सोर सुरजक ललिमा भू पर पसरल दैत अछि एकटा नव सनेश हम जग्लहु अंहु जागु अधिकारक लेल आगू आबू हे मैथिल आबो जागु कालि राज आई शिवराज किया करैया अहांक कात कखनो गोवा कखनो असम कखनो पंजाब कखनो गुजरात कि अहाँ नहि छी भारतवासी ? गर्व सऽ अपन अधिकार जताबु हे मैथिल आबो जागु जागु जनक धिया वैदेही जागु बुढ, नैना, जुआन जात धरम सब ताक़ राखी कऽ सबमिली कऽ करू संग्राम छोरु पार्टी स्वार्थ अपन सब आई माय के लाज बचाबू हे मैथिल आबो जागु आई अहाँ नहि आगू आयब तऽ पढ़त गाईर इतिहास आई अहाँ नहि एक होयब तऽ होयत अहिना उपहास सरशताक अहि धरती सऽ कर्कश्ताक बिगुल बजाबू हे मैथिल आबो जागु ई बुढिया अछि हक्कल डइन नैहर मे सिखलक सावर्ण मंत्र नहि काज करै एकरा लग कोनो जंत्र पहिने खेलक अप्पन सांय सालेक भीतर जावत भेल धांय तखन भुजय लागल टोल आ गाम एकरा लग के बुद् बच्चा नैन्ह ई बुढिया अछि हक्कल डइन नहि छैक एकरा कोनो लाज विचार ककरा संग करी कोण व्यव्हार नहि बजाबय कियो काज तिहार तैयो टपकी परैया बीचे द्वार नव कनिया खेला लगैत अछि भूत बाम हाथ से जाकर छुबय चैन ई बुढिया अछि हक्कल डइन ककरो मरैया सांप कटा के ककरो मरैया रोग ढूका के ककरो मरैया दर्द करा के ककरो मरैया धार डूबा के नहि छोरैया बुढिया ओकरा रहै छैक जाकर पर कैन ई बुढिया अछि हक्कल डइन बिच राईत मे गाछ हंकैया निशाभाग राईत मे गाम घुमैया पोषने अछि चुरिन, भूत जुआन करैया टोल परोस परेशान नहि बचल ओ लोक आई धरि तकैया जाकर दिस कन्खुरिये नैन ई बुढिया अछि हक्कल डइन दुनियाँ आई अन्तरिक्ष घुमैया सागर मे पताका भह्राबैया चंदरमा पर बसत आब लोक भारत खोजि लेलक ओतय पानि नहि भेल हमर सोच मे अंतर अखनो भूत, प्रेत आ डाइन ई बुढिया अछि हक्कल डइन बाढ़ि हाथ जोरी के विनय करै छी सुनु माँ कमला, कोशी बकसि दियै आब मिथिला के पुत्र टुगर भेल चैदिस | चिनवार पर सँ बहै छल धार जान बचायब भेल पहाड़ नहि खेवाक कोनो ओरियान बितल अन्न बिन कतेको साँझ नेना-भुटका मुँह तकै छल मायाक आँखी सँ नोड खसै छल बाप बेचारा बेबस बैसल अपना माथ पर हाथ धेने छल दुधपीबा बच्चा करै छल सोर मायक दुध, सुखायल ठोर नहि जानि कोन जन्मक ई पाप पुत्र बियोगक परल संताप कियाक बिधाता भेला बाम नहि छोरल खरदुतियाक ओरियान देल कमलाक कतेको साँझ तइयो मुइन फुटल अंगनाक मांझ बेटा, पुतोह, नैत आ नाती बहि गेल सबकियो टूटी गेल छाती कनि-कनि बढिया भेल बताह सागर गाम में मचल तवाह सुखी गेल पानि सुखल नोर पसरि गेल महामारीक प्रकोप बाध-बोन सब भेल बिरान सुखी गेल गाछ उजरल मचान भुतही पोखरी में उरैया बाल उच्चका डीह पर लगावय जाल स्वर्ग से सुन्दर छल ई धरती भय गेल आई अनाथ व्याकुल पुत्र छटपटा रहल जेना बिना पानि के माछ माँ मिथिला ताकय संतान ससरी गेल कतेको टाट खसि परल कतेको ठाठ नहि अछि कतहु पर्दा टाट नहि राखल दलान पर खाट कतेको घर साँझ-प्रात सं बंचित कतेको घर ताला सं संचित जतय रहै छल जमाल दलान आई बाबा बिन सुन्न दलान माँ मिथिला ताकय संतान सगर देश मे भय रहल पलायन मिथिला सन नहि दोसर ठाम बी०ए०, एम०ए० घर बैसी के कहिया धरि देता इम्तिहान जीबाक नहि बचल कोनो साधन नहि रोजगारक कोनो ठेकान गाम बैसी करता की बैउया कोना बचेता घरक प्राण माँ मिथिला ताकय संतान पढ़ल लिखल बौक बनल अछि धुरफंदी सब मौज करैत अछि एक आध जे पोस्ट निकलैत अछि भाई-भतीजा छापि लैत अछि सबतरि बन्दर बाँट मचल अछि कोनो विभाग नहि आई बांचल अछि बिना पाई कियो बात नहि करताह कतेक सहत सज्जन अपमान माँ मिथिला ताकय संतान हमर बुद्धि-विवेकक लोहा देशे नहि विदेशो मानैया हमर मेहनत-लग्नक वल पर आई कियो बाबु कह्बैया हमर उन्नति देखि के आई सब प्रांत हमरा सं जरैया करितहु प्रतिभाक सदुपयोग रहिता जँ मिथिलामे ओरियान माँ मिथिला ताकय संतान मिथिलेश कुमार झा खब्बरदार हे यौ ! एहि महान जनतंत्रक नेता, एहि देशक जनता बुझि गेल अहाँक चालि- प्रकृति- फूटनीति, गमि लेलक अहाँक गामसँ गद्दीक धरिक सस्त बेबहार____ बैसलाक धार; तैं सरकार, खब्बरदार! जनतंत्रक जनता केँ बुझिऔ जुनि निमूधन_____ शक्ति सँ हीन; जनताक संगठित शक्ति बनत प्रचण्ड बिहाडि अहाँकेँ पछाडि गढत इतिहास रहत साक्षी धरा-आकाश !! आजाद गजल उन्नति केलक गाम आब शहर लगैए, लोक-लोक मे भेद आ जहर बढैए । निधोख बुलै अछि चोर रखबार दम सधने, औंघायल कोतबाल धरि पहर पडैए । निट्ठाह पडल अछि रौदी जजाति जरै अछि, पानि ने फानय धार से छहर पडैए । अमावस्याक राति की इजोतक आशा, सगरो पसरल धोन्हि दुपहर बितैए । अपनो गाँव मे लोक बनल अनचिन्हार सन, अनटोला केर लोक देखि क’ कुकुर-मुकैर । सन्तोष कुमार मिश्र केकरा करु किलोल हो मिता केकरा करु किलोल हो मिता केकरा हम करिऐ किलोल भरल गाम लोकमे किओ नहि अप्पन अछि नहि किओ आन अछि हमरा लेल सबहे माटिक मूर्ति आ सबहे मुर्दा समान अछि । केकरा करु किलोल हो मिता केकरा हम करिऐ किलोल सबहे लग झूठक खिस्सा छै चिन्नि नइ मटिया मिट्ठा छै अन्हिरिया सेहो इजोरिया छै सबहक अपने खिस्सा छै । केकरा करु किलोल हो मिता केकरा हम करिऐ किलोल सपना नइ ई बिपना छै निराशा जीवनक आशामे परिवर्तणके जरुरत छै । कालीकांत झा "बूच" १९३४-२००९, हिनक जन्म, महान दार्शनिक उदयनाचार्यक कर्मभूमि समस्तीपुर जिलाक करियन ग्राममे १९३४ ई. मे भेलनि । पिता स्व. पंडित राजकिशोर झा गामक मध्य विद्यालयक प्रथम प्रधानाध्यापक छलाह । माता स्व. कला देवी गृहिणी छलीह । अंतरस्नातक समस्तीपुर काॅलेज,समस्तीपुरसँ कयलाक पश्चात बिहार सरकारक प्रखंडकर्मचारीक रूपमे सेवा प्रारंभकयलनि । बालहिं कालसँ कविता लेखनमे विषेश रूचि छल । मैथिली पत्रिका- मिथिला मिहिर, माटि- पानि, भाखा तथा मैथिली अकादमी पटना द्वारा प्रकाशित पत्रिकामे समय - समयपर हिनक रचना प्रकाशित होइत रहलनि। जीवनक विविध विधाकेँ अपन कविता एवं गीत प्रस्तुत कयलनि । साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा प्रकाशित मैथिली कथाक इतिहास (संपादकडाॅ. बासुकीनाथ झा) मे हास्य कथाकारक सूची मे डाॅ. विद्यापति झा हिनक रचना‘धर्म शास्त्राचार्य"क उल्लेख कयलनि । मैथिली एकादमी पटना एवं मिथिला मिहिर द्वारा समय-समयपर हिनका प्रशंसा पत्र भेजल जाइत छल । श्रृंगार रस एवं हास्य रसक संग-संग विचारमूलक कविताक रचना सेहो कयलनि । डाॅ. दुर्गानाथ झा श्रीश संकलित मैथिली साहित्यक इतिहासमे कविक रूपमे हिनक उल्लेख कएल गेल अछि | !! मातृवंदना !! जननि हय, जीवन हमर कठोर । अध्यावधि सुख - शांति न भेटल, पयलहुँ विपति अघोर ।। जननि हय जीवन हमर कठोर ।। 1 ।। जानी नहि वात्सल्य - पाश, अज्ञात सिनेहक कोर । लागल नहि ऑचर क छाँह, नहि सटल गाल पर ठोर ।। जननि हय जीवन हमर कठोर ।। 2 ।। आनन पर अविराम रूदन, मन पर चिंता घनघोर । कतऽ हमर विश्राम - राति हे, कतऽ विनोदी भोर ? जननि हय जीवन हमर कठोर ।। 3 ।। अपने शिव शव वनल शिवे, तोरो छह लगल बकोर । तोहर दया अकाशी चंदा, हम धरती क चकोर ।। जननि हय जीवन हमर कठोर ।। 4 ।। कपीश वंदना हमरापर तमाम दुरगंजन अपने छी महान दुख भंजन हे हनुमान, अथाह धारसँ पार कऽ दिअ, उद्धार कऽ दिअ हमरा पार............. हम छी पतित पुरनका पापी अएलहुँ शरण बनल संतापी हे कपीश, हाथे धऽ हमरा ठार कऽ दिअ, उद्धार कऽ दिअ हमरा पार......... पाबी अहँक अनमोल मंत्रणा तखन सुकंठक कटल यंत्रणा महावीर हमरोपर कनेक विचार कऽ लिअ उद्धार कऽ दिअ छोड़व नहि अपनेक आइ हम दैत रहब रामक दुहाइ हम “महामंत्र” केर हमरो गिरिमल- हार दऽ दिअ, उद्धार कऽ दिअ हमरा पार कऽ दिअ उद्धार कऽ दिअ। “आउ हमर हे राम प्रवासी” आउ हमर हे राम प्रवासी व्याकुल जनक, विह्वला जननी, पड़ल अवधपर अधिक उदासी आउ हमर हे राम प्रवासी? ।।1।। धिक् धिक् जीवन दीन, अहाँ बिनु बीतल बर्ख मुदा जीवै छी जीर्ण-शीर्ण मोनक गुदड़ीकेँ स्वार्थक सूइ भोँकि सीबै छी निष्ठुर पिता पड़ल छथि घरमे कोमल पुत्र विकल वनवासी आउ, हमर हे राम, प्रवासी।।2।। दुर्दिन कैकेयी बनि कऽ हे तात, अहाँकेँ विपिन पठौलनि जाहि चार तर ठार छलहुँ तकरापर दुर्वह भार खसौलनि गृह विहीन बनलहुँ अनाथ हा, हमर अभाग, मंथरा-दासी? आउ, आउ हे राम, प्रवासी? ।।3।। सोनक लंकापर विजयी भऽ सीता संग कखन घर अाएब? बीतल विपिनक अवधि, अपन अधिकार कहू कहिया धरि पएब? परिजन सकल भोग भोगथि आ- अहाँ बनल तपसी-सन्यासी।। आउ, आउ, हे राम, प्रवासी? ।।4।। भरत अहाँ विनु पर्णकुटीमे कुश आसनपर कानि रहल छथि अहँक पादुकाकेँ अवधक- ऐश्वर्योसँ अधि मानि रहल छथि थाकल चरण चापि रगड़ब- पदतल, बैसब पौथानक पासी।। आउ, आउ हे राम, प्रवासी?।।5।। “गौरी रहथु कुमारी” हएत नहि ई वियाह हे, गौरी रहथु कुमारी? बर बूड़ल बौराह हे, धिया शुचि सुकुमारी।।१।। चामक सेज, कुगामक बासी खन कैलाश, खनेखन काशी लागथि बुत्त भुताह हे, गौरी रहथु कुमारी।।२।। मुण्डक माल, ब्याल तन मंडित हस्त कपाल, मसानक पंडित अनुखन बिक्खक चाह हे, गौरी रहथु कुमारी।।३।। यध्यपि भाल सुधाकर, सुरसरि- बहथि बेहाल चरण धरि झरि-झरि तध्यपि धहधह धाह हे, गौरी रहथु कुमारी।।४।। कोठी कोठी भाङ भकोसथि कामरि-कामरि पानि घटोसथि आनक की निरबाह हे, गौरी रहथु कुमारी।।५।। भागलि, सखिगण सुनू कामेश्वर, गिरिजा छथि रूसलि कोबर घर जुनि बनु एहेन बताह हे, गौरी रहथु कुमारी।।६।। सासुर धरि शिव भाभट समटू परिछए िदयऽ सुनू हे बङटू बनलहुँ वर उमताह हे, गौरी रहथु कुमारी ।।७।। गै खुशबू !! (बाल साहित्य) बाबा मालबावू नाना छौ कमाल बाबू गै पप्पा रोकड़िया लग नानी मारौ टाल बावू गै। बाबा खातिर चाहक गिलास लबलब लबनी नाना पास नानी चुक्का ढारौ बान्हि-बान्हि रूमाल बाबू गै। बावा लेलनि मॉछे कीन, नाना खेलनि मुरगा तीन नानी भनसा घरमे लगा रहल छौ ताल बावू गै। बाबा वॉचथि वेद पुरान नाना पढ़थि नेवाज कुरान नानी मुल्ला जीसँ पूछि रहल छौ हाल बावू गै। नाना भोरे भगला बाहर नानी सॉझे पहुँचलि ठाहर ई सभ कहए आएल विद्याधर आ लाल बावू गै। वंदना (बाल साहित्य) अम्ब, अहाँक महिमाक मधुर वर गीत कोना हम वालक गाबी? समुचित शब्द ने आबि रहल अछि, सप्तक स्वरालाप नहि पाबी।।१।। तोरेमे स्तित्व बनल, तोँ रखलह जठरक उमड़ल सरमे रहल एहब हम कमल बनल, निष्चय रसभरल सुशील घरमे।। जन्मए काल ‘नाल’ लागल छल-तकर प्रणाम जनौलनि बाबी।। अम्ब, अहॉंक महिमाक मधुर गीत कोना हम वालक गाबी।।२।। टूटल गँट, पॉंक छूटल, दल गमकि गेल महमह गहवरमे सुनल देवि, ताेँ सूँधि लेलह, संतुष्ट भेलहुँ, छल हास अधरमे आइ अहॉंक निरमाल बनल छी खसल, हमर चलि गल नवावी। अम्ब, अहॉंक महिमाक मधुर वर गीत कोना हम वालक गाबी? ।।३।। दुर्दिन बनि बटबीज खसल, जनमल, बढ़ि गेल, विशाल बनल अछि आलिंगन-अपवर्ग, अंकक स्वर्ग, मर्त्यपद छोड़ा चलल अछि कहह कहह देवि, किए, एहि कुलकुठारसँ छह वेदावी? अम्व, अहॉंक महिमाक मधुर वर गीत कोना हम बालक गाबी? ।।४।। नव-मासक अविराम भारकेँ, कएलह वहन मधुर मुस्कीसँ हमरा ठोरक तरल मैल लगलह प्रियतर चाहक चुश्कीसँ फाड़ि दैह वरू आइ जननि, हम तोरे देहक पत्र जवावी? अम्ब, अहॉंक महिमाक मधुरवर गीत कोना हम बालक गाबी? ।।५।। !! हे तात !! ई कातर प्राण, चतुरथीचान - धरक धरि ध्यान रहय अनुखन । ई बेलक गात सजय नवपात पड़य हे तात, अहींक चरण ।। 1 ।। मनक सभबात बनय जलजात कि भऽ बरू जाउ एकातक आक फड़य सभ मौन मनोरथ फूल रहय अथबा बनिकऽ मरू खाक । करी सभदान, लियऽ भगवान उपस्थित दीन धथूर क मन ।। ई कातर प्राण, चतुरथीचान - धरक धरि ध्यान रहय अनुखन ।। 2 ।। हे त्रिपुरारि, अहॉक दुआरि, सुनी दिन राति भिखारि भिखारि सुनू अबधून ई दास अभूत ने माड़त आब कही पर चारि । हरू सभ दोष, भरू संतोष करू उद्घोष - ‘‘ई हम्मर जन’’ ।। ई कातर प्राण, चतुरथीचान - धरक धरि ध्यान रहय अनुखन ।। 3 ।। !! झूला !! झुलबथि कान्ह, झुलै छथि राधा ।। डूबि डूबि श्यामल नीरद मे - चान उगै छथि आधा ।। झुलबथि कान्ह, झुलै छथि राधा ।। कालिन्दी कूलक कदंब सॅ - रेशम डोरी लाधा ।। झूलि रहल मणि खचित मनोहर झूला एक अबाधा ।। झुलबथि कान्ह, झुलै छथि राधा ।। कंकण ताल खनन खन बँसुरी - बर कमाल, स्वर साधा खसली श्याम क कोर उछलिकऽ सम्हरथि सम्हरथि जा जा ।। झुलबथि कान्ह, झुलै छथि राधा ।। देखि देखि नाँचल ‘‘बुचबा’’ ताथैया - धिक् - धिक् - धा धा ।। विरह विकल मन विहग लेल ई - याद भेल अछि व्याधा ।। झुलबथि कान्ह, झुलै छथि राधा ।। !! राधिकाक विलाप !! चलि गेला सखि श्याम जमुना पार गय, हमर जीवन नाव तजि मजधार गय । पीठ पर फहरा रहल छल पीत पट, कॉख तर बॅसुरी अधर पर एक लट, कर कम लमे काठ केर पतवार गय ।......... भऽ गेला वैराग्य लऽ घर सॅ विदा, ज्ञान मे वनि नाथ गुरू जगतक मुदा, प्रेम मे की ई उचित व्यवहार गय ।...................... सत्य अछि घनश्याम चोर हियतोड़ छथि, रूप कपटी निरदयी बेजोर छथि, झूठ योगेश्वर कहनि संसार गय ।............. आन खातिर कान्ह पूर्णानंद छथि, मिलन सुमनक शुद्ध मधु मकरंद छथि, व्रजक बनला विरह हाहाकार गय ।............................. हुनक सांख्यक गीत सॅ गीता बनल, भक्ति केर उपदेश सॅ गुंजित गजल, राधिकाक विलाप सभ वेकार गय ।........................................ !! करूण गीत !! सुनि - सुनि कोकिलक करूण गीत, कुसुमित कानन केॅ देखि रहल अछि, आइ श्रवित लोचन समीत । अछि आवि गेल श्रृंगार सेज पर ज्वलित मसानक रौद्र रूप वर दंत दलक हासक विलास मे - वनल विभत्सक अंधकूप भ‘ गेल सुवर्णक शौर्य शिखर पर - शांति सागरक सुलभ जीत ।। हमरा भावक सुकुमार पाश मे आयल प्रेमक रम्य फूल कयलहॅु जहिना किछु आलिंगन चुभि गेल अनेको वक्रशुल उड़ि गेल गगन दुर्लभ सुगंध झड़ि गेल धरा मकरंद पीत ।। सौन्दर्यक भूमि मरूभूमि भेल, रमणीय देवसरि सुखा गेलि आयलि सुषमा इ छनक लेल हमरो जीवन केॅ दुखा गेलि संचित दुःखक रंजित सभटा, प्रेमकमधु देखू भेल तीत ।। कटि रहल किए ई कला इन्दु घटि रहल किए जीवन प्रकाश, रजनीक रूदन विगालित प्रभात क‘ रहल किए अतिशय उदाश भ‘ रहल ज्ञान जन्मक मकान व्नि रहत मसानक सात वीत ।। वेदना बैसलि छी सिनेहक पथार लऽ कऽ पिया चलि गेलहुँ कतऽ पहाड़ दऽ कऽ दरिसनक आश बनल कलुष सपना पूजाक दीप भेल नोरक नपना अहाँ आबू सजल चन्द्रहार लऽ कऽ पिया... उदरि महक चुलि बुलि तात बिनु शान्त निशबद भुवनमे छोड़ि कतऽ गेलहुँ कान्त? सेहन्तित छी लोढ़ि सिङगरहार लऽ कऽ पिया... सासुक मधुर गप्प झड़काबै गात कएलक अकच्छ तरुण पुरबा बसात स्वाती अएलनि रसवन्ती धार लऽ कऽ पिया... सिहकल सरस पूस देह ठिठुरल परिमल सिनेहक आश माघो बीतल आबि गेल फागुन फुहार लऽ कऽ पिया... !! उदासी !! चानक मुख देखु मलान भेल, भ‘ गेल आव रक्तभ क्षितिज, दुरदिन मानक अनुमान भेल ।। मुस्की मे हाड़क संदर्शन, आनन पर रूपक भ्रम विशेष, कहवैत रहल जे गालक तिल, से सॉपक विल वनि रहल शेष, ऑखिक तीरक विख पानि नोर वनि, झहड़ल हृदय झमान भेल ........................ ।। बुझलहुॅ जकरा हम सुधा कोष, ओ पानिक फूटल घैल बनल, कुहरैत अजर केॅ जड़ल देखि, सभ ज्योति स्वयम् मटमैल वनल, रवसि रहल मनोरथ स्फुतनिक, लूना अनेर हैरान भेल........................... ।। ककरा पर रूपसि करी आश, ई कल्पो विटप बबूर भेल, रोपल अमिसिंचित वर प्रवाल, बढ़ि जेठक ठुट्ठ खजूर भेल, जकरा छाया मे छलहुॅ आइ ओ - पुरना चार पलान भेल.......................... ।। !! परिचय पात !! जुनि पुछू परिचय पात सरवे, वरू रहल संग किछु रातुक विच, उठि चलव कि हएत परात सरवे ।। दू क्षणक लेल वट-विटप वास, जुनि लगबू पथ संपर्क सेज ओम्हर देखी हासे विलास एम्हर कॉपय रहि रहि करेज कानय विषाद लग परवशता आजुक ई अमानत गात सरवे ।। हम जएव अपना पतिक गाम, अछि पएर पड़ल कर्तव्य वंध ऑखिक आगॉ झलफल अन्हार पुनि बधिर वनल दुहू कर्ण रन्घ्र धुरि जाउ अहॉ अनचिन्ह जकॉ, अछि सजग कहरिया सात सखे ।। ओम्हर लागल मोनक पियास एम्हर उमड़ल अछि नयन नोर, टपनेक तालु ग्रीष्मक अकाश, पावसक धरातल हमर ठोर अछि अहॅक दृष्टि मे दाह मुदा ई लोचन द्वय स्नात सखे ।। वासना पिशाचक युगल वाहु, वढ़ि चलल वनाब‘ प्रवल पाश जएतनि शुचिताक कंठ दवा, भ‘ जएत प्रेमक सर्वनाश व्हि गेली देवसरि विचोवीच हम दुनू छी दू कात सखे ।। !! जागू मॉ आद्या !! सूतलि वतहिया मैया लागल केवाड़ अय । जागू - जागू मॉ आद्या करियौ उद्धार अय । मधुकैटभ महिषासुर घातिनि, धूम्रनयन चण्डादि निपातिनि, बीजक शोणित सुरा पायिनी, शुम्भ मारि कऽ शांति दायिनी पसरल फेरो अघलहिया असुरी अन्हार अय । जागू - जागू मॉ आद्या करियौ उद्धार अय । सौम्ये नंदिनी अति भयंकरे, रक्त दंतिके मॉ अयोनिजे, ताकू मॉ अपन संतति केॅ, शाकम्भरि हरि लियऽ दुर्गति केॅ, अहीं सॅ भेलै ताहिया दुर्गम संहार अय । जागू - जागू मॉ आद्या करियौ उद्धार अय । भीमे क्षुधिते असुर भक्षिके, अरूण नाशिनी साधु रक्षिके, अत्याचार कही जॅ हेतै, रक्षाभार अहीं पर एतै, लऽ तिरसूल सुदर्शन पहिया लियौ अवतार अय। जागू - जागू मॉ आद्या करियौ उद्धार अय । महिमा अहॅक महान भवानी, करू कतेक गुणगान भाविनी भोग मोक्ष दुहू पवै अभव्या, जे अहॅक धुरखुरू भाव्या, हमहॅू संतति नहि वहिया हमरो अधिकार अय । जागू - जागू मॉ आद्या करियौ उद्धार अय । !! देसिल वयना क अस्तित्व!! भुवनक सभ सॅ मिठगर वयना, वेन जकॉ अहॉ वॉटि देलहुॅ । औ भलमानुष मिथिला नंदन, मातृक देहक कुरी लगयलहुॅ । केओ दछिनाहा केओ तिरहुतिया, केओ वज्जि - सरैसा केओ कोशिकन्हा । एक्के नादि मे सभ मधुर चखै छी, तखन विलग अछि छान ओ पग्घा । कत‘ छी हम सभ कत‘ हमर मिथिला, कत‘ विदेह नोर खसवै छथि? कत‘ वैरागी वनि विद्यापति वैसल छथि, कत‘ सिया वेटी कुहरै छथि ? अहॉ छी भलमानुष त‘ रहू, हम अधम मुदा छी मिथिला भाषी । अहॉ पढ़ू अंगरेजी, फ्रेंच, जपानी, आन वयना वाजू घुमैत काशी । नहि अछि हमरा द्वेष अहॉ सॅ, छोड़ू नहि अपन उत्थानक अवसरि । मुदा! द्रविड़, वंग गुजराती केॅ देखू, हुनक वयना गेलनि आर्यावर्त मे पसरि । ओ नहि अपन भाखा केॅ छोड़लनि, स्वभूमि हो वा हो प्रवास । नेना भुटका संग देसिल वयना वाजू, जगाउ अगिला पिरही मे विश्वास । चन्दा सुमन यात्री मधुपक, जुनि करू भावना पर अघात । दिवस निकट ओ आवि रहल अछि, हेती मैथिली सभ सॅ कात । जौं अपन वयना सॅ सिनेह नहि राखव, ’मॉ‘ भ’ जेती अस्तित्व विहीन । ततक अस्तित्वक गप्प नहि पुछू, जननी बिनु ओ स्वतः विलीन । !! भैयाक विआह!! जहिना धरफर्री वियाह, तहिना कनपट्टी सिनूर, ओहिना कऽ लिऔ भैया अनिल रूकसद्दियो जरूर ।। वल्व जड़ै छल भीतर वाहर, केहेन अनूप अहॉ केर ठाहर, लालपुरक तोड़ण लागल छल, सोनापूरक कलश साजल छल, माथा पर मुसहरी गर मे माला मोतीपूर ।। अतुकांत मंत्र सॅ पं0 विद्याधर, करौलनि परिणय वॉचि धराधर, सार श्याम आ नवल नन्द सन, चन्द्र विकल स्वागत धुनि तनमन, भीम पघारी सॅ दतमनि लेल काटल ठॉढ़ि वबूर ।। गदगद देखि अंजु सन सारि, परिछन कालक विसरि लहुॅ गारि, समना आ भिरहा केर संगम दू-दू सासु सॅ सासुर गमगम, उषा सन सुकन्याक हाथ मे वियनि पंख मयूर ।। चललहुॅ जहिना अहॉ सहरसा, वरसावैत वसन्ती वरसा, भुक्खे गाड़ी मे अधीर औ मोन पड़ल कोवरक खीर औ, एकसरि किएक गेलहुॅ रंगशाला टूटल भौजीक गुरूर ।। !! नारि सुनू !! हे नारि सुनू सुकुमारि सुनू कहि रहलहुॅ हम किछुआन वात, तकरो अहॉ कानि पसारि सुनू ।। सतयुग मे हम नेना भुटका, त्रेता मे ब्रह्मक आचारी, द्वापर मे ज्ञानक अहंकार, कलि मे छल भक्तिक लाचारी, सभ झूठ मूठ केर दंभ देवि, जौं अहीं अनचिन्हारि सुनू ।। श्याम रैनि वाट नहि सूझय, सृजन देवि! अहॅक ऑचर अन्हार, धरा अनलहुॅ अवोध राघव केॅ, तखन कोना पसरल व्याभिचार ? रौद्र नायिके भुवन वचाबू अयलहुॅ अहॅक दुआरि सुनू ।। !! चैती दुर्गा !! आगॉ - आगॉ वऽर पाछॉ सॅ देयऽर । चलली सीता चैती दुर्गा देख दशानन नगर ।। संग साधना दाइ ज्ञान विरागी भाई । जा रहली भगतिनिया वेटी बापे कोर पर ।। मुसुकी अधर झॉपल घोघे तर । जगदम्बाक भाग जागलनि कतेक दिन पर ।। मोने मोन तरंग नैना रंगे रंग । बोने बोन बढ़लि जा रहली ठीक दुपहर ।। हम सुपनेखे दाइ करू ने सगाइ । हमरा सन केर सुन्नरि नारी अपने सन के नर ।। एखने सॅ ई हाल मेला हैत कमाल । देखू नकसिनुरी भऽ रहलै विच्चे वाट पर ।। मुरही बनला खऽर दूषण झिल्ली झऽर । त्रिसरा मूरक बरी चिबावथि चामुण्डा कर कऽर ।। बनला वालि मिठाइ जोगिनी लऽ लऽ खाइ । अच्छ कुमारक देहक कचरी कचरि रहल गीदऽर ।। नटुआ छथि हनुमान देखू नाच महान । उक फेरी केर कला प्रदर्शन भऽ रहलै घर घऽर ।। कहू की - की लेव जे कहवै से देव । गिरिमल हार लालक टीका शुद्ध सोनक छर ।। एहेन लोभ ने फेर कऽ दीए अन्हेर । सेन मोन पड़िते सीता केॅ होवऽ लगलनि डर ।। मेघनादक गऽर चाही कुंभक धऽर । हम बनैत छी काली अपने वनियौ हे हरि हऽर ।। रावण भेला निडर बान्है छी ऑचर । दसमुण्डी माला पहिराबू झोंटक ऊपर ।। होउ जननि समाधान बजलनि झुकि हनुमान । ई अपमान निशाचर कुल पर वर सतवनि जहर ।। !! गीत !! वंशीवट वेकार गय, यमुना तट अन्हार गय । एक श्याम विनु सगरो, वृन्दावन भरि हाहाकार गय ।। सून - सान घर द्वार गय, यौवन भेल असार गय । मन मोहन मुरलीक संग, चलि गेल नदी केर पार गय ।। उपटल खेत पथार गय, मिलनक वन्न वजार गय । आव राधिका सॅ के करतनि , हॅसि हॅसि मधुर दुलार गय ।। सखि पैसलि जलधार गय, होइतथि कोना वहार गय । सभक चीर चुनरी पजिऔने, श्याम ठाढ़ि पर ठार गय ।। !! हमर गाम !! हमर गाम अछि बड़ महान औ, शकरकंद लागल गारा । परतर के कऽ सकतै आन औ, शकरकंद लागल गारा ।। हलधर जूआन विशुनदेव पहलमान जतऽ, बुलबुल, बुच, बैजू बनऽल विद्वान जतऽ, ब्रह्मदेव सऽन विद्वान औ शकरकंद लागल गारा । परतर ......................................................................... ।। दऽस लोक बीच बनै धर्मावतारे, देखू से कऽ रहलै भवसागर पारे सुनहट मे लऽ रहलै प्राण औ शकरकंद लागल गारा । परतर ......................................................................... ।। मूरूख भऽ वी0 ए0 केर काने कटै छै, भोरे सॅ सॉझो धरि ज्ञाने छॅटै छै, निशवद मे चरबै - छै धान औ शकरकंद लागल गारा । परतर ......................................................................... ।। सगरो दिन रहलै फलहारे मे बैसल, सॉझे देखै छी ओ गहवर मे पैसल, कक्कर कऽ रहलै धेयान औ शकरकंद लागल गारा । परतर ......................................................................... ।। जक्कर मधूर चाखि मस्त गामवासी, खाकऽ धधूर सैह बनलै उदासी, कचरी केर केलकै दोकान औ शकरकंद लागल गारा । परतर ......................................................................... ।। भेल चौपाड़ि पऽर पूरा कठघारा, नौला सॅ भऽ रहलै वीस अवधारा, राखू सिड॰राही केर मान औ शकरकंद लागल गारा । परतर ......................................................................... ।। !! नवदुर्गा !! सिंह पीठ असवारि लगै छी अहॉ बऽर वढ़ियॉ । अति सुन्नरि सुकुमारि लगै छी अहॉ वऽर बढ़िया ।। हस्त त्रिशूल चक्र अति चकमक, रक्त पिपासित खप्पड़ भक् भक्, अखिल लोक अवाक् सभ ठकमक, चललहुॅ बनलि विहाड़ि लगै छी अहॉ बऽर बढ़ियॉ ।। गत्र गत्र पर रक्तक छिटका, असुरक पीजु चरण तर टटका, क्रुद्ध नयन कर सॉपक सटका, ठाढ़ि महिष केॅ मारि लगै छी अहॉ वऽर वढ़ियॉ ।। भऽरल सभटा राक्षस सेना, तीतल ऑचर बहल पसेना, आऊ हौकि दी वॉसक बेना, बैसू मुस्की मारि लगै छी अहॉ वऽर वढ़ियॉ ।। हे दुर्गे जगदम्ब व्यथा हरू, अपना कोर माय हमरा करू, रामक भक्ति सुधा मुख मे भरू, हे पयस्विनी नारि लगै छी अहॉ वऽर बढ़ियॉ ।। !! रामावतार !! डेग झटझारि चलू टेल्ह पट पारि चलू । राम अवतार भेल नरेशक द्वारि चलू ।। दिवसो दू पहरक मासो अति मधुरी, सिहकल मलय पवन, गमकल अवधपुरी, त्यागि कऽ आड़ि चलू, खेत पथारि चलू । राम अवतार भेल........................................ ।। संग मे शेष लखन भरतक शुभदर्शन, शंखे अरिमर्दन रामे मधुसूदन, नवो नरनारि चलू घोघ ऊघारि चलू । राम अवतार भेल..................................... ।। बॉटु सभ विसु वन्हन लुटाउ आभूषण, परगट पुरूषोत्तम धैन छी अॅऽहू हम, घट सम्हारि चलू चहुमुॅख वारि चलू । राम अवतार भेल ..................................... ।। शरणे आउ सखी उठाउ पदरजकण, लगाउ प्रेमांजन जुड़ाउ नैन अपन, जिनगी तारि चलू अहिल्या नारि चलू, राम अवतार भेल ............................. ।। !! डहकन !! मोॅछ लागल औ करकर मोॅछ लागल औ, बुडहा समधिक नाकक नीचाॅ कर - कर मोॅछ लागल औ ।। खोंच लागल औ खरखर खोॅच लागल औ, भृत्या समधिनक गालक ऊपर बरबर खोॅच लागल औ, सऽमधि बनला वन विलार चढला बोहुक चिनुआर ताबरतोड़ करौछक मारि देखि कऽ सोच लागल औ, खोंच लागल..................................................... ।। समधिन पड़ले पड़लि ऊतान, झाड़थि अपन पुरनकी शान, सऽमधि गोरथारी दिसि ठाढ़ कपै छथि कोच लागल औ खोंच लागल..................................................... ।। समधिन ऊपर सऽमधि तऽर हुड़ियाठल गतर गतऽर नूआ केर मुंडी सॅ डोराडोरि मे, घोॅच लागल औ, खोंच लागल..................................................... ।। !! राघव सरकार !! सुनिऔ औ राघव सरकार केहेन कऽ देलिऐ उपकार गमकल चरण कमल रज सॅ हम्मर सऽड़ल जिनगी ।। दुलकल दुलकल राजभवन सॅ आयलऊॅ आश्रम हुलसल मन सॅ, अकारण देखि ऐहेन उपकार चकित भऽ रहल सकल संसार गमकल....................................................................... ।। लुटा गेल सर्वस्व हमर छल के सुधि लितय मजाल ककर छल, अपने दया सिन्धु अवतार कयलहुॅ बरका चमत्कार । गमकल....................................................................... ।। मानव की कीट पतंग चरि हमरा त्यागि पड़ायल हे हरि, हरलहुॅ भारी पापक भार कयलहुॅ डूबल नैया पार । गमकल....................................................................... ।। चरण बढ़ाउ कृपालु खड़ाडी नेह नोर सॅ लाउ पखारी, पोछि आॅचर सॅ बांटवार करब हम तरवे केॅ श्रृंगार । गमकल....................................................................... ।। !! माॅथ पर धान !! की लचकल अछरल पछरल डाॅड़, की मचकल आॅचर गछरल फाॅड़, चालि उत्तान छै, माॅथ पर धान छै ।। बढ़ै छै रूनरून रूनरून शीस, पड़ै छै दीठि पायलक दीस, कंठ मे गान छै । माॅथ पर धान छै ।। की चमकल बुट्टी - बुट्टी देह, ठोर पर हासक पातर रेह, गाल तर पान छै । माॅथ पर धान छै ।। आॅखि पर लागल लाजक बोझ, घोघ सॅ ताकय सोझे सोझ, लक्ष्य खरिहान छै । माॅथ पर धान छै ।। भक्त रहलै मंदिर केॅ झोलि, गेलै दू - दू शिव आसन डोलि, अभय वरदान छै, माॅथ पर धान छै । वियोगक वीतल कारी रैन, जुड़ायल आइ मुड़ायल नैन, गगन मे चान छै, माॅथ पर धान छै ।। काटि कऽ माल भोग केर खेत, बान्हि कऽ बोझ चललि समवेत, गमागम प्राण छै । माॅथ पर धान छै ।। वदन पर अनुचित अलुपित दृष्टि, चरण पर करू सिनेहक दृष्टि एतय भगवान छै । माॅथ पर धान छै ।। हे चरऽरक चंडी धऽरक देवि, देश बढ़ि रहल अहाॅ केॅ सेवि, मोॅछ पर शान छै । माॅथ पर धान छै ।। !! बुढ़ारी मे घीढ़ारी !! बुढ़ारी मे ई घी की - एकरा कहियौ डालडा ढ़ारी ।। वरद जुआ कऽ हाॅफि रहल छथि - चमेर लेट्ट गाड़ी ।। बुनलनि गहुमक लेट भेराइटी, दऽ सकलाह खाद नहि डाइटी, दाना बेगाना भेलनि, थे्रसर पर चैकल नारी ।। मझिनी मे जलपान करै छथि, भरलो थार जियान करै छथि, उठि गेला चटनी चटैत, पड़ले तरूआ तरकारी ।। हे देखू अकरहर करै छथि, पेंचर ट्यूब मे हवा भरै छथि, जोलही धोती केर आसन पर, पसरल सीफेन साड़ी ।। बऽर सऽख सॅ दाॅत लगौलनि, खसि पड़लनि जहिना मुॅह बौलनि, कनियाॅ ओडÛठ़लि दरवज्जा पर, अपने बैसल बारी ।। टीशन पर रोमांस करै छथि, हीरो सबहक कान कटै छथि, कारी केश खिजाबी ताहि पर - उगलनि उज्जर दाढ़ी ।। !! सारिक पत्र पाहुनक नाम !! फोटो अहॅक टडÛबौने छी मन मे, हऽम छोट सारि अहॅक औ पाहुन, हमरे शपथ अहाॅ अबियौ फागुन मे ।। जहिया सॅ गेलहुॅ हमर नीन लेलहुॅ, ओझा अहाॅ पर सुनू मरि गेलहुॅ, हमरा तऽ कंठी अछि अपने मॅछखौका औ, झोरे चटयलहुॅ कियक नेनपन मे । फोटो .............................................. ।। साॅझे दैया लग परिते निनयलहुॅ, सपने मे झटकल अहाॅ चलि अयलहुॅ, ओझा बुझि धयलहुॅ जहिना हम बहिना केॅ, ओ हॅसलि हम दुःगंजन मे । फोटो .............................................. ।। चाही ने हमरा सिनुरो आ चूड़ी, इच्छा अछि एक्के बहुत मजबूरी, एखन अहाॅ नेह क्षीर दारू बहिना केॅ, हमर मिलन होयत अगिले जनम मे फोटो .............................................. ।। !! राम बिना अवधपुरी !! विलपि रहल वन उपवन भवन निःपरान गय, राम बिना अवधपुरी लागय मसान गय । पतनी चुड़ैल भेलि पति परेत सन सूझै, बेटा वैताल माय जोगिनी वनलि बूझै कोयलि कुलवधू आइ डाकिनी समान गय, राम बिना .......................................... ।। शैल युता काली आ शंकर भैरव बनला, तांडव नत्र्तकक लेल, सोझे सरयू फनला, डमडम डमरू त्रिशूल चमकय असमान गय । राम बिना .......................................... ।। धऽर धऽर मे विलाप द्वारि - द्वारि हहाकार, बूढ़क की बात हाय नेनो तजलक अहार, अप्पन ने ककरो क्यो सभक सऽभ आन गय । राम बिना .......................................... ।। शीतल अछि आगि पानि अदहन भऽ उधिएलै, काॅट भेल कोमल आ फूले गड़ि - गड़ि गेलै, झडकावै चानिनियाॅ जड़ि रहलै चान गय । राम बिना .......................................... ।। !! शिव शक्ति पूजन !! उमा संग शंकर केॅ पुजबनि पागल प्रेम मगनमा । गंगा जल भरि भार चढ़यबनि लेप देवेनि चंदनमा ।। आक धतूर बेल पातक संग सजि - सजि सुभग सुमनमा, दारूण दुर्दिन दीप जरा कऽ दुःखक धूप धुमनमा । उमा संग ................................................................... ।। अक्षत छीटि दूभि सॅ झपवनि सुन्नर गोर बदनमा, नीलकंठ केॅ भोग लगयबनि अमरित कनमा - कनमा । उमा संग ................................................................... ।। श्रद्धा सागरक बीच विश्वासक राखब मेरू मथनमा, केशर कुमकुम कस्तूरी सॅ गमका देबेनि भवनमा । उमा संग ................................................................... ।। छम-छम नाचि नचारी सुनयबनि माॅ गौरी क अंगनमा, आशुतोष तैयो नहि ढ़रता तऽ खसि पड़ब चरणनमा । उमा संग ................................................................... ।। !! विरहिनी !! रहि - रहि कऽ अहॅक लेल देह फेर धयलहुॅ अछि, लागल अहींक एक ध्यान, आऊ-आऊ रूसल हमर भगवान । सहलहुॅ कतेको हम जन्मक असहय ज्वाल, कहुना वितयलहुॅ अछि मरणक बहु अंतराल, मधुवन मे हे मोहन आइ हमर अवसर अछि, राखि लियऽ राधिका केर मान । आऊ............................................................... ।। वृन्दावन कुहरैछ यमुना कनैछ हाय, गोदावरी आॅचर तर छाती हहरैछ आय । गोकुल मे लाख - लाख मोन बहटारल हम तैयो वर व्याकुल परान । आऊ............................................................... ।। अहॅक रूप राखि नैन युग - युग सॅ जागलि छी, मुरली केर मधुर वैन गुनि - गुनि कऽ पागलि छी। परकीया पतिता हम प्रेमक पुजारिन केॅ, नहि - चाहि गीता केर ज्ञान । आऊ............................................................... ।। जकरा छै लागल हा विरहक प्रचंड रोग, तकरा की कऽ सकतै निष्कामी कर्मयोग। हमरा लग अपने छी चीर नवनीत चोर अंतः बनू बरू महान । आऊ............................................................... ।। अहॅक लेल अपयश केॅ जीवन मे जोगि लेब, पापो जौं लागत तऽ नरको केॅ भोगि लेब, इच्छा नहि मृत्युक अपवर्गक आ स्वर्गक अछि, अहॅक छाड़ि चाही ने आन, आऊ............................................................. ।। !! नचारी !! दहिना कऽ अपन भाग्य वाम, जा रहलहुॅ बैद्यनाथ धाम । त्यागि भाई बन्धु घऽर गाम, जा रहलहुॅ बैद्यनाथ धाम ।। कामनाक कामरू केॅ गंगा मे बोरि - बोरि, आयल छी अजगैबी नाथ शरण हाथ जोरि, नाचि - नाचि गाबि ठाम - ठाम, जा रहलहुॅ बैद्यनाथ धाम ।। दुःखक अथाह धार भैरव जी पार करू, बरका टा पापी हम हमरो उद्धार करू, लैत रहब जीवन भरि नाम जा रहलहुॅ बैद्यनाथ धाम ।। चुट्टी केर धारी सन धामो मे भीड़ देखि, छाती मे धकधकी सभ केॅ अधीर देखि, कोना की करबै हे राम ? जा रहलहुॅ बैद्यनाथ धाम ।। !! गीत !! राम मंत्रवत अहॅक नाम जपि - जपि दिवस बितावै छी , रातुक बीच चान पर तपि - तपि ध्यान लगावै छी । कहू अहाॅ की आन हमर छी, देहक रूसल प्राण हमर छी हे पाथरक देवता जागू अहीं एक भगवान हमर छी हम निर्दोष फूल तैयो निरमाल बनावै छी, रातुक..................................................... ।। जाहि बाट केॅ नित्य बहारी हम तीतल आॅचर सॅ झारी, जकरा अपना मे रखने अछि, हमर आॅखि ई कारी-कारी आई ताहि पर किएक अलसित गति सॅ आवै छी रातुक..................................................... ।। हमरा लेल राजपद त्यागू भवन छोड़ि कानन केॅ भागू, पाछूक सीता सन सुन्नरि दौड़ि पड़ि औ आगू - आगू, प्यासल प्रेमक जलद मर्यादा किएक जगावै छी रातुक..................................................... ।। आऊ - आऊ हे प्रिय अभ्यागत् अछि पसरल हृदयासन स्वागत् प्रियतम अहॅक पलकहुॅ लकि सॅ, हमर जन्म जन्मान्तर जागत लाऊ पखारि चरण नयन सॅ जल छलकाबै छी, रातुक..................................................... ।। !! गय नानी !! गय नानी गय नानी बड़ बदमास भेलैं गय नानी । नाना संगे लड़ाई काल समाठ लेलैं गय नानी ।। तोरे धरि नाना केर बातो, तो उनटौले पिड़ही सातो, तोरा डरे करथि ई थरथर त्यागि देलेनि सौंसे आंगन घर, नड़रौने तैयो हुनका खरिहान गेलैं गय नानी । गय नानी.............................................. ।। नाना खतिर छिपली कारी तोरा छौ स्टीलक थारी नाना पावथि नोन सोहारी अपना लय तरूआ तरकारी अधजनमू दही केर मूड़ी काटि खेलै गय नानी, गय नानी.............................................. ।। रहलनि आब कतऽ की हुनका, लागि गेल छनि तोहर ठुनका मुॅह मे रखने टुटल दाॅत छथि, खून देखि कऽ अपस्यांत छथि, भनसा घर सॅ नाचि - नाचि बथान गेलैं गय नानी । गय नानी.............................................. ।। !! नेना गीत !! (हीरा - बेटी) हीरा बेटी हमर बड़ दुलरैतिन । देखि कनियो कसरि चट् रूसि जयथिन ।। भोरे उठिते निनायल माॅगथि बिस्कुट, नहबऽ काल हेरथि नव बाबासूट, बुच्ची हम्मर सरोवर केर छोटकी मीन । देखि ............................................... ।। बाप गेलथिन बजार आनथिन केरा, चाही नितः चैपाड़ि परक दू पेरा, बिनु दूधक ई सहि जेती भरि दिन । देखि ............................................... ।। चाह जेबऽ मे माॅ जौं करथि देरिये, ई ताकथि बाबू केॅ कनडेरिये, खाइते - खाइते आॅगन सॅ एक - दू - दिन । देखि ............................................... ।। आइ भोरे सॅ खेलनि बऽत मुक्का, मूॅहे भेलेनि जेना फूटल चुक्का , छथि हेहरि ई फेरो करथि बिनबिन । देखि ............................................... ।। !! स्वागत गान !! आऊ - आऊ - आऊ सभक स्वागत करै छी, नैन मे समाउ हृदयासन धरै छी ।। उल्लासक गीत कतऽ सगरो करूणा क्रन्दन, उपटि रहल विपटि रहल मैथिलीक नन्दन वन, भ्रमर झुण्ड प्यासल छथि विहग वृन्द बड़ भूखन, मुरूझल छथि आम - मऽहु रऽसक सरिता सूखल, बबुरे वन कवि कोकिल लाजे मरै छी । आऊ............................. ।। विद्यापति शिव स्वरूप मृत्युंजय मऽरल छथि, हमरा सबहक अभाग अजरो भऽ जऽड़ल छथि, मात्र ई समारोही गोष्ठी सॅ की हेतै ? स्थिति जहिना तहिना संवत एतै जेतै मुरदा जगाउ लाउ पैर पकड़ै छी, आऊ............................. ।। काव्य पाठ करू मुदा कान्ह पर लियऽ लाठी, एक हाथ रसक श्रोत दोसर मे खोर नाठी पुरना किछु त्यागि - त्यागि पकड़ू किछु नऽव ढ़ंग मोंछो पिजाउ बाउ श्रृंगारक संग - संग अहाॅ गीत गाउ मुदा हऽम हहरै छी, आऊ............................. ।। अहॅक चपल चरण ऋृतुराजक सूचक अछि, अपने आत्मस्वरूप आशय तऽ ‘बूचक’ अछि, दीन हीन साधन सभ सॅ विहीन यद्यपि हम, उद्वेलित श्रद्धा समुद्र नहि तरंगो कम । शर्वरीश स्पर्शक लेल हहरै छी । अभ्यागत आउ सभक स्वागत करै छी । आऊ............................. ।। विशेष:- ई छल विद्यापति स्मृति पर्व समारोह 1984 ( आयोजन स्थल - ग्राम - बैद्यनाथपुर प्रखंड रोसड़ा, जिला - समस्तीपुर ) मे आगत अतिथिक स्वागत मे स्व0 कविक ओहि कालक मैथिलीक दशा पर पीड़ादायक प्रस्तुति । !! मातृ गीत !! तोरे मुस्की मे अभिनव आनंदक अनुपम देश गय ! तोरे दयादृष्टि मे नव नव सौन्दर्यक परिवेश गय !! चिता भस्म तन, कर कपाल छल, रूप अशुभ गर मुंडमाल छल, सर्पकंठ, विष असन दिगम्बर, मरूघट वास कतऽ आंग़न घर ? तोरे हाथ पकड़ि भिखमँगबा भोला भेला महेश गय । तोरे दयादृष्टि ..................................................................।। माइक हाथ पकड़लनि बाबू, ओहि हाथ पर हुनके काबू, बेटो तऽ चरणक अधिकारी उठलै तखन प्रश्न ई भारी, तोहर हाथ पैर दु दुहू मे महिमा ककर विशेष गय । तोरे दयादृष्टि ..................................................................।। शिशुक लेल आरामदेह माइक शरीर मोमक चाही, मक्खन सन कोमल करेज आ, हास शरद सोमक चाही, तखन किए पथरयलहुॅ धयलहुॅ अपन पाथरक भेष अय । तोरे दयादृष्टि ..................................................................।। !! सोन दाइ !! रहतौ ने हास, बहि जेतौ विलास गय, दुई दिवसक जिनगी सॅ हेवेॅ निराश गय ।। भरमक तरंग बीच मृगतृष्णा जागल छौ, मोहक उमंग बीच, प्राण किएक पागल छौ, चलि जेतौ सुनेॅ कंठ लागल पियास गय । दुई............................................................... ।। बाल वृन्द जा रहला, नव - नव युवको चलला, बूढ़ - सूढ़ जरि - मरि कऽ माटि तऽर परि गलला, तैयो छौ अपना पर व्यर्थ विश्वास गय । दुई............................................................... ।। अपना केॅ चीन्हे तोॅ नाम तोहर ‘‘सोन दाइ’’ टलहा सॅ मेझर भऽ मूॅह छौ मलीन आइ देश कोश विसरि - काटि रहलेॅ प्रवास गय । दुई............................................................... ।। नेनपन चलि भागलि आब इतिवस्था एतौ, कहेॅ कनेक गुनि धुनि कऽ तकर बाद की हेतौ, कहिया धरि कऽ सकबेॅ पर घर मे वास गय । दुई............................................................... ।। !! हील हाइ-हाइ !! खुडियौलक कसि - कसि कऽ नीपल करेज केॅ, धुरियौलक धीपल मनक हाइ वेज केॅ, कहऽ पड़ल आइ - नील - नील चप्पल केर हील हाइ - हाइ ।। बेकसूर केश अधगेड़ेॅ सॅ काटल छै, कोन घसबहबाक हाथेॅ छपाटल छै, अथवा हय दाइ - ठढ़िया गेन्हारी केॅ चरि गेलै गाइ ।। पर्स लटकौने कमरच्छा सॅ आयलि छै, नवसिक्खू डानि जकाॅ भूखलि पियासलि छै, बचबऽ हौ भाइ - हऽम एक दूइये ओ आखड़ अढ़ाइ ।। एखनो धरि भौजी केॅ लजवन्ती जगिते छनि, बूढ़ि भेली भैया लग लाज कते लगिते छनि, सुनहक ढ़ोढ़ाई - देखिये कऽ खा लै छी, घिबही मिठाइ ।। !! मिथिला क बेटी !! सीता केॅ सितिया बनौलक सौभाग्य हमर, रघुपति केॅ महुअक करौलक अनुराग हमर, मिथिला केर धरती अकाशे सॅ ऊॅच जतऽ जगदम्बे दुलरैतिन दाइ, जतऽ पुरूषोत्तम रामे जमाइ ।। हमर उर्मिला सनि जनमलि कक्कर कन्या, जकरा सॅ तिरहुत की ? अवधो भेलै धन्या, कोन सतवंती सॅ संवल लऽ लखन लाल, काले पर कयलनि चढ़ाई । इहो बात मने मोन पड़ल आइ ।। सूर्यवंश वैभव लग तुच्छ इन्द्रआसन छल, ताहि त्यागि योगासन पूर्ण अनुशासन छल, भरत भक्ति दिव्य दीप जगमग जग कऽ उठलै, माण्डवी केर सेवा सलाइ । वास लेला नंदिग्रामे जमाइ ।। अखिल भुवन विजयी भऽ शंकर आदिगुरू बनलनि, महिषी मे आवि मंडन केॅ मर्दित कयलनि मुदापस्त भऽगेलनि मिथिलाक बेटी सॅ शारदा बनलि भारती दाइ । गर्वित मिथिला भूमि आइ ।। !! जेठी करेह !! गय जेठी करेह तोॅ सवेरे उधिआइ छेॅ । वरखा तऽ हेठै भेलै अनेरे उपलाइ छेॅ ।। तोरो वाटर वेज बनल छौ, डेभलाॅप मेन्टक डेज बनल छौ, बहुत ऊॅच खतराक विन्दु गय, एना किए अकुलाइ छेॅ ? गय ...................................................... ।। ई इन्होर पानि चमकै छौ, मोर - मोर पर भौरी दै छौ, काटि - काटि डीहक करेज केॅ, तऽरे तऽर समाइ छेॅ । गय ...................................................... ।। बहकल तोहर रेतक धक्का, चहकल हम्मर धैर्यक पक्का, सत्यानाश सभक कऽ देवेॅ आवै छेॅ आ जाइ छेॅ, गय ...................................................... ।। जत्र - तत्र भऽ जेतौ मौॅका, इंजीनियर बनतौ बुरिबौका, वान्हि तोड़ि कऽ प्रलय मचेवेॅ एहने दाइ बुझाइ छेॅ गय ...................................................... ।। !! ऊँ नमः शिवाय !! श्याम छटा पर राधा गंगा धार देखू बहिना, वाम जटा तर वामा केर श्रृंगार देखू बहिना । वदन मनोहर कुंद ईन्दु सन भुवन वृत्त केर मध्य विन्दु सन, जड़ चेतन मोहक मृदु मुस्की लऽ रहलाह विक्ख केर चुश्की, लुटा रहल छथि अमृत केर भंडार देखू बहिना । श्याम छटा ............................................................ ।। दीपित कुंडल लोल - लोल अछि, प्रति विम्बित दुहू कपोल अछि, सर्पराज केर छत्र मनोहर, ममता मे विभोर डमरू धर, कर त्रिशूल उर उरगक गिरिमल हार देखू बहिना । श्याम छटा ............................................................ ।। केहरि छालक पट विभूषित तन, चंद्रालं कृत शिव प्रमुदित मन, वाम अंक गिरिराज कुमारी, गर लटकल गणेश भयहारी हिनके शरणागत सगरो संसार देखू वहिना । श्याम छटा ............................................................ ।। !! मणिद्वीपक महरानी !! अयली जगदम्बा दुर्गा देवी कल्याणी अय, मणिद्वीपक महरानी अय ! नाऽ ऽ ऽ।। सध्यः सुधा सिन्धु स्नात, मांजल गंगा जल सॅ गात, सेवक खातिर तजलनि नवरतनक रजधानी अय, मणिद्वीपक .............................................. ।। टपि कऽ अट्ठारह प्राकार देवी भऽ गेली साकार सभकेॅ सुना रहलि छथि अप्पन अभयावाणी अय, मणिद्वीपक .............................................. ।। हरि पीताम्बर सॅ पद झारथि, विधि सुरसरि सॅ चरण पखारथि, तरबा रगड़ि रहल छथि, रहि - रहि शंकर ज्ञानी अय, मणिद्वीपक .............................................. ।। महिषासुरक आव की डऽर, माता छाड़ू सिंहक भऽर, लोके राच्छस भऽ कऽ कऽ रहलै मनमानी अय, मणिद्वीपक .............................................. ।। !! सरस्वती वंदना !! अधर हास करतल वर वीणा हंस वाहिनी परम प्रवीणा । श्वेत अंबरे परे शुद्धि दे, अपरे परमेश्वरि सुबुद्धि दे ।। भावक सर विश्वासक शतदल, पर पसरल श्रद्धास्पद परिमल, हस्त स्फटिक माल मनोहर सहज तपस्विनी आत्म शुद्धि दे अपरे परमेश्वरि सुबुद्धि दे । आसीना कल्पना हंस पर पद सौन्दर्यक पंक वंश पर व्योम नायिके कथा गायिके हरू हमरो कुण्ठाबरूद्धि हे अपरे परमेश्वरि सुबुद्धि दे । सींचू ज्ञान कमंडल जल सॅ पोंछू माॅ प्रेमक आंचल सॅ उक्ति द्वार पर रसाहार करबू त्यागू युग युगक क्रुद्धि हे अपरे परमेश्वरि सुबुद्धि दे ।। !! भदैया होली !! डीहो धरि डूबल जखन बुर्ज बालुका पंक । रंग कोना पकड़त कहू तखन होलिका अंक ।। असली होरी बाढ़ि विच माॅचल छल नैहऽर, आङी डूबल घऽर मे, साड़ी भासल चऽर ।। फगुओ सॅ भऽ गेल अछि, अधिक नीक भदवारि, बूढ़ी पत्नी बेड़ पर कोरा मे नव सारि ।। भौजी कहलनि हुलसि कऽ लाउ लगा दी रंग । तेवर तेसर नयन लग, पसरल अजर अनंग ।। अपने छी परदेश मे हम छी बान्हे पऽर । यौवन खतरा बिन्दु लग, देह करय थर - थऽर ।। प्रेमक जल नेपाल सॅ छूटल अछि चलि आउ । चैते मे डूबब पिया, शीघ्र नाव बनवाउ ।। डिम-डिम ढ़ोलक ढ़ेंप सॅ छिटकल देहक पानि । उज्जर केश अबीर तर, बुढ़ियो भेलि जुआनि ।। मंत्री उड़थि अकाश मे, पब्लिक गेल पताल । धरती पर नेता लोकनि कऽ रहला रंगताल ।। सम्मत जहिना जड़ि रहल तहिना जड़ल करेज । दुहू जीव कछमछ करी पड़ल उपासक सेज ।। भोजन पैकेट पानि मे, गूड़ चूड़ा सभ गूम । फाउन्टेन पेनक धार मे भासल बूट गहूम ।। टूटल बलुआहा जखन खसला भीम उतान । अर्धांगिनीक चरण पकड़ि बचैलन्हि कहुना जान ।। !! वनिवासक अंत !! घुरल आव अवधक दिवस भाग जागल, बुड़ल नाव देखू नदी कात लागल ।। भरथि कान हनुमान संवाद अमरित, भरत भऽ रहल छथि मगन मोन तिरपित, विरागी हृदय भाव अनुराग जागल । बुड़ल नाव.................................. ।। नगर आबि रहलनि लखन राम - सीता, प्रजा कंठ गीता नृपकि प्राण प्रीता, विगत कालरात्रिक पहर प्रीत जागल । बुड़ल नाव.................................. ।। उठू तीनु जननी नयन नोर पोछू, सुनू कैकेयी त्यागु परिताप सोचू, उड़ल प्राण बहुरल पुनः गात लागल । बुड़ल नाव.................................. ।। प्रमोदी चमन वर्ख - वर्खक सुखयल, हुलसि आइ पनकल विहंसि कऽ फुलायल, मृगक अक्षि अपलक विहग प्रेम पागल । बुड़ल नाव.................................. ।। !! मिथिलाक दुःदशा !! नकशा सॅ मिटा रहल मिथिला केर नाऊॅ गय । कतऽ हमर पीढ़ी अछि कतऽ हमर ठाॅऊ गय । भारत सॅ भिन्नो बऽ बनलै बंगाल देश, मुदा अपन देशे मे दावल मिथिला प्रदेश, राज्यक की बात कठिन पाॅचो टा गाऊॅं गय । कतऽ हमर ...................................................... ।। हमर अमर षड़दर्शन हमर अचर साधु संत, हमर अजर वन उपवन हमर अपन वर बसंत, कवि कोकिल निकट काक करै काउॅ - काउॅ गय । कतऽ हमर ...................................................... ।। लोकवेद जागि रहल ओंघायल नेता छथि, अपने मे लड़ि - लड़ि कऽ घायल विजेता छथि, पूछत के हाल दशा ककरा सुनाऊॅ गय । कतऽ हमर ...................................................... ।। महिषी वा करियन हो, वाजितपुर मंगरौनी, सरिसब सॅ चैमथ धरि बनला सभ क्यो मौनी, देशक सभ सॅ दरिद्र मैथिल कहाॅऊ गय । कतऽ हमर ...................................................... ।। !! माला !! सुरभित अहॅक सिनेहक माला ।। जनम - जनम जपि रहब विपटतर, राखू बन्न अपन मधुशाला ।। देवि, सुखक परबाहि न हमरा, मिलनक अल्पो आहि न हमरा हम नर दुःखकाटब धरती पर, अपने बनलि रहू सुरवाला ।। सुन्दरि अहाॅ अकाशी गंगा, हम भूमिक प्यासल भिखमंगा । युग-युग बरू बौरायब मरू मे - अइॅठायब नहि पावन प्याला ।। सुरभित अहॅक सिनेहक माला ।। नहि श्रृंगार रौद्र हुंकारे । हम एहि पार, अहाॅ ओहि पारे दुहुक बीच कठोर कत्र्तव्यक - भरल अथाह भयंकर नाला ।। सुरभित अहॅक सिनेहक माला ।। !! जागरण गान !! असम, वंग पंजाब, गुजरात जागल । अहीं टा पड़ल छी उठू औ अभागल ।। सुरूज त्यागि आयल निशा केॅ उषा मे, खिड़ल जागरण ज्याति दऽशो दिशा मे । सगर श्रृंग - सागर धरिक निन्न जागल ! अहीं टा पड़ल छी उठू औ अभागल ।। चिकरि हॅसि रहल स्यार सिंहक दशा पर । चलल बकगणक हंस पर क्रुर थापर । निठूर काक कर सॅ पिकक कंठ दागल, अहीं टा पड़ल छी, उठू औ अभागल ।। विदेहक सुतक देह दुवेहि बनल अछि । ग्रसित कऽ रहल मैथिली केॅ अनल अछि । परक लेल दर्शन अपन आॅखि लागल, अहीं टा पड़ल छी उठू औ अभागल ।। हरण भऽ रहल अछि हमर मीठ बयना । कोना कऽ सिखत आन बोली ई मयना । विवश अछि वधिक हाथ सॅ ठोर तागल । अहीं टा पड़ल छी उठू औ अभागल ।। कतऽ पितृ स्वर अछि कतऽ मातृवाणी । फंटऽ जा रहल जीह बचबू भवानी । ब्नब गोड़ ई गुनि हमर प्राण पागल । टहीं टा पड़ल छी उठू औ अभागल ।। बहुत भेल हे आब ककरो ने मानू ! निकसि द्वारि प्राचीन तरूआरि तानू । अहह जाहि मे युग युग मे जंग लागल, अहीं टा पड़ल छी उठू औ अभागल ।। !! तोहर ठोर !! कि जहिना कुरकुर पानक ठोर । कि तहिना सुन्नरि तोहर ठोर ।। लगौलह बातक पाथर चून । सजौलह कऽथ कपोलक खून । कि रहलह एक्के बातक चूक, कतऽ छह प्रेमक पुंगी टूक ? कि जहिना लाली पसरल भोर । कि तहिना सुन्नरि तोहर ठोर ।। देखि कऽ लहरल हमर करेज, त्यागि अयलहुॅ उदयाचल गेह । अहाॅ बिनु व्याकुल वाटक माॅझ , सुमुखि भऽ रहल जीवनक साॅझ । कि जहिना वक्र सुधाकर गोर । कि जहिना सुन्नरि तोहर ठोर ।। पिपासित आयब अहॅक दुआरि, प्रेम पीयूष पीयब झटढ़ारि, बधिक जॅ बनत अहॅक बर बाहु तऽ हमहूॅ बनव विखंडित राहु, कि जहिना सुधा स्वर्ग मे थोर, कि तहिना सुन्नरि तोहर ठोर ।। सीखि विश्वकर्मा सॅ विज्ञान, बनायब सकरी मिल महान । भरब माधुर्यक कोषागार, सेहंतित भऽ जायत संसार । जेना कुसियारक पाकल पोर, कि तहिना सुन्नरि तोहर ठोर ।। बनव हम पुर्नजन्म मे धान, धान सॅ भऽ जायब चिष्टान्न । पड़ब पुनि अहॅक प्रतीक्षापात अछिंजल सॅ सद्यः स्नात । जेना छाल्ही साजल नव खोर । कि तहिना सुन्दरि तोहर ठोर ।। भऽ रहल वर्ण - वर्ण निःशेष, शब्द सॅ प्रगटल नहि उद्य़ेश्य । मने मे रहल मनक सब बात अनल मे पड़ल नवला जल गात । जेना आगू अलभ्य चित चोर । कि तहिना सुन्नरि तोहर ठोर ।। स्वः काली कान्त झा ‘‘बूच‘‘ !! नचारी !! गाबैत चलल छी बमबम, नाचैत चलल छी छमछम लगबैत ताल दुलकल डेगक सजवैत स्वरक नव सरगम ।। काॅवरि मे आबह गंगे तोॅ लागह हमरा संगे लऽ चलह जतऽ कैलाशी छथि चिता भूमि सन्यासी, हे करूणामयि दुख भंगे, देखबैत चलह पथ हर दम ...... ।। प्रेमक मस्ती मे भासल शंकर छथि परम पियासल श्रद्धा केर धार बहाबह विश्वाक पात्र बनावह बौरहबा अधिक उपसाल हुनका संतुष्ट करब हम .... ।। कंठे मे पचल हलाहल छाती पर काली बान्हल पदतल तर विश्वक वैभव ई महिमा हमरो जानल छथि आशुतोष ओंघायल तेॅ डमरू बजबह हरदम ..... ।। मानल हम शरणागत छी, तैयो तेॅ अभ्यागत छी स्वागत कऽ दहक यथोचित साधक छह चरण समर्पित अपने कंजूस कहयबह करूणा करबह जॅ कमसम ।। !! सुनू आब मन जेहन लगैए !! सुनू आब मन जेहन लगैए - जिन्दाबाद रहय गयघट्टा, रानी परती मुरली छौनी, कछमछ कऽ कऽ राति बितावी, बान्हि धोधि पर दनही तौनी, धन्य हऽम छी फल्लाॅ बाबू जजिमनिके मे क्षुधा जगैए । सुनू आब मन जेहन लगैए ।। अपना घर मे रखने नहि छी, कप्प गिलासक फूटलो टुकड़ी, बहराइछ पावनि तिहार मे मोरा मूनल गूड़क चुकड़ी धन्य - धन्य छथि मास्टर साहेब जेॅ ओ छथि तेॅ चाह चलैए । सुनू आब मन जेहन लगैए ।। मूड़क नहि परवाहि रहल अछि, शूलि उठय सूदिक कपचन मे पाइ पाइ केॅ जोड़ि आइ धरि सेठ कहयलहुॅएहि जीवन मे धन्य हऽम छी फल्लां बाबू ओहो धन्य नोत जे दैए । सुनू आब मन जेहन लगैए ।। बाहर सॅ जेहने बलबुतगर, भीतर सॅ तेहने पनिमऽरू, सज्जन हम जेहने दलानपर आंगन मे तेहने दुरजऽरू धन्य हऽम छी फल्लां बाबू बाढ़निये सॅ देह झरैए । सुनू आब मन जेहन लगैए ।। नोन मात्र कीनी दोकान मे स्ेहो जजिमानी ढ़ेबुआ सॅ मोन पड़य नहि किनने होयब, हम देहक सूतो देबुआ सॅ धन्य हऽम छी फल्लां बाबू खर्च देखिकऽ मांस गलैए । सुनू आब मन जेहन लगैए ।। समधिक हाथे देल गेल छल, हमरो आदर्शक गरदनिया बेटा मंगनी बिका गेल हम बनि कऽ रहलहुॅ बुरबक बनियाॅ धन्य हऽम छी फल्लां बाबू अखनो रहि - रहि चोन्ह अबैए । सुनू आब मन जेहन लगैए ।। !! गहवर जननी केर !! चमकि रहल चकमक औ, गहबर जननी केर । देखिते टूटल भक औ गहवर जननी केर ।। गुंबज गगन दिशा देवाल अछि, पंडा बनि कऽ ठाढ़ काल अछि चान सुरूज दीपक औ गहवर जननी केर ।। पदतल पर स्वयं शिव शंकर नारायण सूतल सुअंक पर विधि व्याकुल ठकमक औ गहवर जननी केर ।। गगनक गंगा चन्द्रकूप अछि उषा किरण ओढ़ुल अनूप अछि सकल भुवन पूजक औ गहवर जननी केर ।। टप - टप सुधा चरण सॅ चूबय वरद हस्त सुत मस्तक छूबय फलप्रसाद परिपक औ गहवर जननी केर ।। !! भगवती वंदना !! जनमि - जनमि कऽ बहुत भटकलहुॅ सभदेवक डगरिया । आयल छी आखिर उदास भऽ, अम्ब अहीक दुअरिया ।। अहॅक कोर मे विष्णु सुतल, सम्मुख ब्रह्या कानैत छथि । अहीक शक्ति बिनु स्वयं शिवो, अपना केॅ शव मानैत छथि ।। आन देव केर बात कोन सभ, बनि गेला पमरिया । जनमि ............................................ ।। प्रलय काल मे जीवक संग, भगवानो केॅ सुतवैत छह, तमसा देवि शक्ति तोरे सॅ देव दनुज पावैत छह, मोहगत्र्त ममतावत्र्तक ई, जाइ भरल नगरिया, जनमि .......................................... ।। दुर्भाग्य आलस्य हटाकऽ जगा दिअऽ नवचेतना, सम्मोहित कऽ दियौ दुष्ट केॅ भरू माॅ भीषण बेदना । हे माता मृतपाय पुत्र पर, ढ़ारू अमृत गगरिया । जनमि ............................................................ ।। !! भौजीक अवाहन !! कौआ माॅझे घर बड़ेरी पर भोरे सॅ कुचड़ै । भौजी अबिते हेती राॅची सॅ सगुन उचडै़ ।। अपने भैया भात पसौलनि, हमरो सॅ किछु काज करौलनि, बारी सॅ तिलकोर पात किछु आनै ‘बूच’ रै ।। कौआ ............................................................. । दुःखी मोन केॅ पोटि रहल छथि, काॅच दालि केॅ घोटि रहल छथि, पुरूखो हाथे दलिघोटना वर बढ़िया उसरै ।। कौआ ............................................................. । जल्दी - जल्दी केश छटौलनि, गुलरोगन केर तेल लगौलनि, दहिन आॅखि फड़कै छनि लागथि बर खुश रै ।। कौआ ............................................................. । भौजी औती ई रूसि रहता, नोरे मे सभ व्यथा सुनौता, हिनका खातिर आबि रहल छनि लेमनचूस रै ।। कौआ ............................................................. । !! स्वप्न सुन्दरि !! स्वप्न सुन्दरि अहाॅ जीवनक सहचरी । निन्न मे आउ अहिना घड़ी दू घड़ी ।। भोग भोगल जते जे बनल कल्पना, आब भऽ गेल अछि अन्तरक अनमना, हऽम मानव अहाॅ देव लोकक परी । निन्न .................................................... ।। मात्र उत्तापदायी बसंती छटा, आब संतापदायी अषाढ़ी घटा, काॅट लागनि सुखायल गुलाबी छड़ी । निन्न .................................................... ।। रूप अमरित पिया कऽ अमर जे केलहुॅ, विक्ख विरहक खोआ फेर की कऽ देलहुॅ ? घऽर मे जिन्दगी गऽर मरनक कड़ी । निन्न .................................................... ।। वेर वेरूक अहॅक फेर अभयागतम्, अछि सदा सर्वदा हार्दिक स्वागतम्, कप्प चाहक दुहू नैन मन तस्तरी । निन्न .................................................... ।। !! कचोट !! अहॅक लेल रंजन, हमर भेल गंजन । केहेन खेल ई, रक्त सॅ हस्त मंजन ।। तरल नेह पर मात्र दुःखक सियाही, जड़ल देह हम्मर अहॅक आॅखि अंजन । रचल गेल छल जे, सुखक लोक सुन्दर, चलल अछि प्रलय लऽ तकर सुधिप्रभंजन । मृतक हम, अहाॅ छी सुधा स्वर्ग लोकक, अहॅक लेल यौवन हमर गेल जीवन ।। !! श्रृंगार वा वैराग्य !! सध्यः अहाॅ, मुदा छी सपना एहि जीवन मे । सहजो सुख भऽ गेल कल्पना एहि जीवन मे ।। विहुॅसल ठोर विवश भऽ विजुकल, मादक नैन नोर केर नपना एहि जीवन मे । सहजो ..................................................... ।। अछि केॅ कतऽ श्रृंगार सजाओत्, आश लाश पर कफनक झपना एहि जीवन मे । सहजो ..................................................... ।। दुनियाॅ हमर एकातक गहवर, भेल जिअत मुरूतक स्थपना एहि जीवन मे । सहजो ..................................................... ।। दीप वारि अहाॅ द्वारि जड़यलहुॅ, घऽर हम लोकक अगितपना एहि जीवन मे, सहजो ..................................................... ।। !! अकाल !! ई अकाल नहि, महाकाल अछि, भूखक ऊक बान्हि नाड़रि सॅ, चारे पर ठोकैत ताल अछि ।।1।। फूके सॅ पताल खड़ड़ौलक, अनावृष्टि केर आगि लगौलक, एहि मंहगी क प्रचंड पसाही सॅ - उनचास बसात जगौलक ? हे देखह जड़ि रहल गाम घर, आकाशे भऽ गेल लाल अछि ।।2।। भारत आइ भेल अछि लंका, बजि रहल अछि मरणक डंका ! बाॅचि सकत एहि वेर विभीषण केर - कुटी अछि बड़का शंका । डोरि - डोरि सॅ बान्हल, एहि वेरूक विभीषणक मंडमाल अछि ।।3।। आंगन - आंगन हैया दैया, वाहिनिक कोर मरै छथि भैया । पूत परेम छाड़ि धरती केॅ, भरि - भरि कऽ धरै छथि मैया । वीसहुॅ आॅखि ओनारि दसानन, घुटुकि घुटुकि हिलवैत भाल छथि ।।4।। !! नोर !! हंसलहुॅ एक बेर जीवन मे, बेरि - बेरि कनैत रहल छी । बसलहुॅ एक बेर जीवन मे, फेर - फेर उजड़ैत रहल छी ।। चलि - चलि भटकि - भटकि कऽ कखनो, कखनो कऽ हम दौड़ि रहल छी । एक बुन्न जीवन क लेल मरि - मरि कऽ मरू मे बौड़ि रहल छी । अपन मोन केॅ उघबा कऽ आनक तन केॅ उछहैत रहल छी ।। बसलहुॅ .................................................................................. ।। एक - एक सायक क चोट केॅ, गुनि - गुनि छोट ध्यान नहिं देलहुॅ । बड़ कचोट चालनिक रूप मे, देखि - देखि चुप्पे रहि गेलहुॅ । ठोप - ठोप चारक चुआठ केॅ आॅगुर सॅ उपछैत रहल छी ।। बसलहुॅ .................................................................. ।। शिल्पक छाॅछ कल्पना पूरा, भावक दही विचारक चूड़ा । आनलक जे बेगाड़ भूख मे, पाबि रहल अछि खुद्दी गूड़ा । नवनीतक अछि लूट मुदा हम छाॅछी छोरक लैत रहल छी ।। बसलहुॅ............................................................ ।। !! श्रावणी !! आशवर शीघ्र श्रावण मे औता पिया । प्यास पर नीर पावन बहौता पिया ।। देखि हुनका सुखक मारि सहि ने सकब, खसि पड़ब द्वारि पर ठाढ़ रहि ने सकब, पाशतर थीर छाती लगौता पिया, प्यास पर नीर पावन बहौता पिया ।। भऽ उमंगित बहत आड़नक बात ई, उल्लसित भऽ रहत चाननक गात ई, पाततर पिक बनल स्वर सुनौता पिया, प्यास पर नीर पावन बहौता पिया ।। मन उमड़ि गेल बनि गेल यमुना नदी, तन सिहरि गेल जहिना कदंबक कली, श्वास पर धीर बंसुरी बजौता पिया, प्यास पर नीर पावन बहौता पिया ।। !! गामे मोन पड़ैए !! रोटी एक्के कोण गय बधुओ साग अनोन गय, तैयो कलकत्ता मे रहि रहि, गामे पड़ैए मोन गय ।। गऽर गृहस्थी कलटि रहल अछि, धीओ पूता विलटि रहल अछि, अजुके मिथिला सॅ चलि अबियौ, एलै टेलीफोन गय ।। आन - आन सभ टलहा चानी, रानी बनि बसलै राजधानी, धूमि - धूमि कऽ भीख मंगै छथि, हमर मैथिली सोन गय ।। खेते लग करेह केर सोती पानि पटा उपजायब मोती, हुगली केर बाबू सॅ बढ़ियाॅ कमला कातक जोन गय ।। ताकल हावड़ा सॅ दमदम धरि परतर नहि मोरतर वाली केरि ईडेन गार्डेन सॅ सुन्नर अछि, कोशी कातक बोन गय ।। पड़लि पार्क माॅडर्न बाला छथि , पतिए चढ़ा रहल माला छथि, तिरहुतनी अपना भोला लय ताकय धतुर अकोन गय ।। !! भगतालाभ !! साधना - भावना आॅठी - गुद्दा साधना क गंगा जे चललीह से - चलिते रहलीह आ- बिनु घूरल सागर मे समा गेलीह! ई छल, भगीरथ प्रयास । हा! हन्त! साधना क सेहन्ता क ई अंत! रहि गेल भावना क जऽल जे नहिएॅ जा सकऽल । भरल रहल ओ आलय सॅ सागर धरि, सिनेहक भंगिमा पर एक बेर धूरऽ लेल, सुअवसर पावि घूरल, आ तहिया सॅ - गंगा लाल की हेतैक ककरो ! भऽ गेलनि गंगे केॅ - भगतालाभ अर्थात् विद्यापति लाभ !!!!! !! सिया सॅ रामक परतर !! मानै छी सुनियौ रघुवंशी पुरूष अहाॅ बेजोड़ औ, हमरा सिया सखी लग लेकिन लागै छी किछु थोड़ औ । अपने केॅ जन्मौलनि माता, सीता हमर सहज संजाता, कतबो सुन्नर श्याम मुदा छी, कतबो गुनगर राम मुदा छी, अपने नीलाकाश जानकी, लाली पसरल भोर औ ।। मादक दृष्टि कमल दल लोचन मुस्की कामदेव मदमोचन, नशा बनल चढ़ि रहल नेह अछि, बिसरल छी हम कतऽ देह अछि, मुदा सियाक दिव्य दर्शन मे अमृते केर बोर औ ।। धनुषा तोड़ल पाबि जुआनी, तहिये सॅ छी नामी गामी, बाउ अधिक जुनि बनू गुमानी ताहि धनुखा केर सुनु पिहानी तकरा बाल्यावस्थे मे ई उठा लेलनि कऽ कोर औ ।। उच्च विचार आचरण सादा, सदिखन संयोगल मरयादा, आइ कतऽ रहि गेल बपौटी, पिछरल चरण करीनक पौटी फलक साधिका सीता हम्मर अपने फूलक चोर औ ।। हमरा सिया ............................................ ।। !! गौरी बनलि जोगिनियाॅ !! रूसल पिया केर गौरी बनलि जोगिनिया, पुनि हर बरब बनव कनियाॅ । सती विरह शिव मरूघट सेवल, कयल भस्म अन्वेषण केवल, बनि - बनि लावण्यक नोनिया ।। पर्ण सलिल खासो पुनि त्यागलि, युग-युग पिय तप मे लय लागलि भागलि योगेशक निनियाॅ ।। पुरबिल प्रीत रहल नहिं झाॅपल, भेल प्रतीति सकल तन काॅपल, बहल नैन प्रेमक पनियाॅ ।। गौलक स्वर्ग तलातल नाॅचल उमा अमि महिमा नम बाॅचल, जय हे कैलाशक रनियाॅ ।। !! काली रूप वर्णन !! मइक चरण कमल लाले लाल गय, भाल अढ़ूल फूल आॅचर पर, उड़ियौलक परिमल लाले लाल गय ।। श्यामल तन झाॅपल झोंटक बिच, बिहुंसल अधर विमल लाले लाल गय ।। लाले रंग लाल खप्पड़ अछि, वरदायक करतल लाले लाल गय ।। दया द्रवित विगलित छाती पर, मुंडमाल लटकल लाले लाल गय ।। उरसुमेरू उमड़लि पयस्विनी, चुरूअक खून चुअल लाले लाल गय ।। ममतामय मन भयदायक तन, भद्रकालिका नाम् कमाल गय ।। !! चलि अबियौ पटना सॅ गाम !! बी0 ए0 कैये लेलहुॅ एम0 ए0 ओ कऽए लियऽ नहि लियऽ नौकरीक नाम प्रियतम औऽऽऽ चलि आबि पटना सॅ गाम हमरा नहि चाही घरवैया नोकरिहारा सिलिक नहि चाही नहि सोनक सिक्कड़ि गारा करबे एक्के संझे बरू टुटली मरैया दू नमरी धंधा हराम ।। अहाॅ घास काटब, हम चूल्हि केॅ पजाड़ि लेब, अहाॅ हऽर लादब हम घऽर केॅ सम्हारि लेब, हऽम आड़ि ठाढ़ि सजल रोहिणी नक्षत्र जकाॅ अहाॅ हमर खेतक बलराम ।। रहतै ने रौदी ई आद्र्रा बरसि जेतै पनि एतै परती ओ निश्चय कदबा हेतै अहाॅ धान रोपब ठेहूनिया दऽ दोहरि मे जलखै मे गाड़ब हम आम ।। थाकल झमारल घुरि आयब मुन्हारि साॅझ पाटी ओछायब हम हॅसिते दुआरि माॅझ लक्ष्मी बनि तड़वा हम रगरब हे नारायण घऽर हम बैकुण्ठी धाम ।। धन्य - धन्य मेहनति के गंगा जे बहबै छथि, अपने पसीना सॅ धरती केॅ नहबे छथि, खटि रहला भूखल पेयासे देहाते मे हुनका दिय बिअनु विराम ।। श्रमक कोन मानि? जतऽ बुद्धिक विलास छै, पेरा दलाल गाल श्रमक पेट घास छै, दिल्ली कलकत्ता आ बम्बई केर बात की ? छोटो शहर बदनाम ।। घूसखोर मच्छड़ उड़ीस जकाॅ जीवै छै शोणित तऽ ओ - अवशिष्ट पीवै छै हड्डी सुखायल अछि तैयो ओ अधिकारी खगले केर तीड़ै छै चाम ।। !! पहुना !! हमरो नेने चलियौ, अहाॅ अपन गेह पहुना । हमहूॅ कऽ नेने छी, अहाॅ सऽ सिनेह पहुना ।। अपने केॅ चाही वैदेही हम सम देह एक ओ देही हमरो बाप बनल छथि देखू ने विदेह पहुना । हमरो ......................................................... ।। शून्य गगन केर श्याम घटा छी, मरू पर उमड़ल दिव्य छटा छी, मधुरी मुस्की लागै विजुकी क रेह पहुना । हमरो ......................................................... ।। सभक जीवनक एक प्राण छी, सगरो गगनक एक चान छी, हहरै छाती जहिना सागरक रेह पहुना, हमरो ......................................................... ।। हॅसि हॅसि अहाॅ सॅ नयन जुड़यलहुॅ, चलऽ काल हा ! ई की कयलहुॅ दशा कतऽ अछि मोन कतऽ ई देह पहुना हमरो ......................................................... ।। !! बेटी बनलि पहाड़ !! गेलै कतऽ विवेक विचार भेलै केहेन लोकाचार हाथक फुलडाली सन बेटी बनलै माथे परक पहाड़ ।। प्राणो सॅ जे अधिक पियरगरि, पोसलि गेली अंक मे भरि - भरि । काल्हुक ई दुलरैतिन बेटी, आइ घैल बनि लागलि घेंटी । आगाॅ भोगक पोरवरि पाछाॅ अपमानेक इनार ।। बेटी अहाॅ बेटों सॅ बढ़िकऽ, अयलहुॅ उड़नखटोला चढ़िकऽ अपने तों लक्षमिनियाॅ देवी, बापक मुदा सुन्न छह जेवी । हे देखू हरि गरूड़ त्यागि कऽ मांगि रहै छथि कार ।। कम्मे दामे भीठ बुड़यलहुॅ सोना पैंतीस ग्राम पुड़यलहुॅ । ब्याह राति केर खर्चा चाही, बरियाती औता दस गाही । बाहर भीतर बल्ब जड़ै अछि माॅझे ठाम अन्हार ।। म्ंागलनि दशरथ एक पाइ नहि, बजला किछु रामो जमाइ नहि । श्री कृष्णक तऽ लव मैरेज छल, हिस्ट्री हमर केहेन सुन्नर भल । मुदा आइ वृष भानु जनक कऽ रहला हाहाकार ।। बेटा बनलै बेबस बकरा, बापे कंठ पकड़लनि तकरा । जीवन जब्बह भेल मनुक्खक, मानवता रहतै ककरा लग । घऽर घऽर मे बूचरखाना गामे गाम बजार ।। !! हमर जिनगी !! बिनु घनश्यामक बेकार हमर जिनगी, धिक - धिक जुआनी धिक्कार हमर जिनगी ।। मेवा सड़ि जाऊ, फऽल फूलो सभ उसरि जाउ, मधुवन जड़ि जाउ नन्द राजभवन पजड़ि जाउ, सूखल जमुनिया केर धार हमर जिनगी । धिक - धिक जुआनी धिक्कार हमर जिनगी ।। भृकुटी पर क्रोध रहेॅ हृदय मे भरल सिनेह, मक्खन मन अर्पित अछि नोक - झोंक दही देह, ककरा सॅ करतै तकरार हमर जिनगी । धिक - धिक जुआनी धिक्कार हमर जिनगी ।। चोटी मे कस्तूरी एड़ी केसर कुमकुम मलि मलि कऽ बौसथि ओ, हम तॅ रूसलि गुमसुम कतऽ एहेन पेतै दुलार हमर जिनगी । धिक - धिक जुआनी धिक्कार हमर जिनगी ।। आगि जकाॅ दागि रहल चन्द्रमुखी केर उपाधि सोना सन देह हमर भस्म करब जोगसाधि पड़ल गोर्वधन पहाड़ हमर जिनगी । धिक - धिक जुआनी धिक्कार हमर जिनगी ।। भवसागर घाटपरक ज्ञानी घटवार कृष्ण कर्मक पुरान नाव धर्मक पतवार कृष्ण प्रेमी बिनु केॅ करतै पार हमर जिनगी । धिक - धिक जुआनी धिक्कार हमर जिनगी ।। !! मुन्ना कक्का सासुर चलला !! कच्छी कऽसि - कऽसि तहिपर धोती रऽचि दृ रऽचि कऽ । मुन्ना कक्का सासुर चलला, पूरा सजि-धजि कऽ ।। सबसॅ पहिने पोखरि धॅसला, चढिते काठ उनटि कऽ खसला । मललनि माथ माॅटि करिऔटी, ऊपर अयला झारि लंगोटी ।। अधमानी झामा सॅ गत्तर - गत्तर मलि-मलि कऽ, मुन्ना कक्का सासुर चलला, पूरा सजि-धजि कऽ ।। एते किएक बेकल हौ मुन्ना, तेरे एकटा सासुर की ? ज्तरा करऽ दिन देखबा कऽ, बाबा जी कहि देलनि ई । अधपहरा जखने हेतै, दू मिनट हेतै दस बजि कऽ, मुन्ना कक्का सासुर चलला, पूरा सजि-धजि कऽ ।। ताबरतोर चलल जा रहला, जेठक तेज बिहाडि जकाॅ । रैन कतहु ने, पडे बाट मे, साॅझ लगए मुनहारि जकाॅ । हुलसल डेग बढाबथि आगाॅ हुमचि - हुमचि कऽ, मुन्ना कक्का सासुर चलला, पूरा सजि-धजि कऽ ।। झाॅपल मुँहें सासु कहलथिन, झा दृ हमरा बड मानै छथि । जखन - तखन हमरो खातिर, गरमे रसगुल्ला आनै छथि । अझुका सबटा गुलगुल्ला थिक झा बजला हॅसि-हॅसि कऽ, मुन्ना कक्का सासुर चलला, पूरा सजि-धजि कऽ ।। !! नोतक प्रेमी !! धैन हमर छी कक्का औ, ‘‘नोतक प्रेमी‘‘ पक्का औ । पेट बांगला देषक पोरवरि, दाँते बान्ह फरक्का औ ।। भरलो तौला लेल सुरूक्का, धोधि बनल तरभुजिआ फुक्का । काकी बाजथि रौ रोग ढुक्का, बाबी मारथि छाती मुक्का ।। कसमकष गंजी पर परलै बिता भऽरि दरक्का औ । धैन......................................................।। भरि कठौत एकसरे चाही, सद्यः हुरने अछि दू - गाही । सून कऽ रहल भऽरल भनसा, हा ! भगवान कतऽ ई मनसा? उसनल अल्हुआ खाइत काल ईं छोडा दैत अछि छक्का औ । धैन......................................................।। चिब बऽ काल सोहारी सुक्खा, ठोर बनल सकरीक दुरुक्खा । पाकल दू किलो धरि आटा, बट्टा भरि तरकारी भाटा ।। सभटा खाकऽ परसन लऽ मॅुहबेने अछि दू फक्खा औ । धैन......................................................।। एहि परेत केॅ कहू ने पित्ती, ई षमसान घाट केर लुत्ती । सतत् रहै अछि दाॅत चियारल, मुँह लगैए कनसारल भारल ।। सुनिते लोट-पोट हँसि - हँसि कऽ खसला ‘बूच‘ तरक्का औ । धैन......................................................।। काकी केर आदेष निकललनि, कक्का जी जजिमनिका चललनि । आगाॅ लऽ अंगोक अॅधमोनी, अगवे मोटा - चोटा तौनी ।। ठिकम ठिक दुपहरिया ठहठह जेठक रौद कडक्का औ । धैन......................................................।। !! अप्पन मिथिला !! ज्ञान विचार भक्ति भावक भंडार अप्पन मिथिला । भोग बीच योगक निरमल संसार अप्पन मिथिला ।। ई एहनोटा बेटा पौलनि, जे त्रिभुवन मे पिता कहौलनि । अंग्मेदिनी अपरा माया, कोर आबि कऽ बनली जाया । ब्रह्याण्डक ई अद्भुत् चमत्कार अपन मिथिला । भोग ............................................... ।। षुकदेवो ई महिमा जनलनि, परमगुरू जनक केॅ मनलनि । भोगी केॅ देहाक मोह नहि, योगी तमकथि तुम्मा रहि रहि । धरती की आकाषे केर घर-द्वार अप्पन मिथिला । भोग.................................................. ।। जे सदैव सभ केॅ नचवै छथि, आदि षक्ति माया कहवै छथि । सुऽखे से बनली तिरहुतनी, भूमि लोटि कऽ भेली भुतनी । त्निके केलनि रचि-रचि कऽ श्रृंगार अप्पन मिथिला । भोग...................................................... ।। गौतम - कपिल - कणदि - अयाची, उदयन सन आचार्य भेल छथि । मंडित हमरा कर्मषक्ति लग, ज्ञानक पंडित हारि गेल छथि । न्याय दर्षनक सम सॅ पैघ टघार अप्पन मिथिला । भोग.................................................. ।। षास्त्र वैह‘ - हमज े सुनवै छी, ‘‘काव्य वैह‘‘ - हम जैह गवै छी । परम सोहनगर मैथिल अंगना, सभ सॅ मिठगर देसिल बयना । कवि कोकिल विद्यापति कंठक हार अप्पन मिथिला । भोग..................................................... ।। आइ गरीब - मुदा फकने‘ छी, पथिया भरल मखानक लावा । बासमती चूडा सानल - मिट्ठूर अमौट गलि औलनि बाबा । भरल चडेरा, चूडा दहीक भार अप्पन मिथिला । भोग .............................................. ।। ग्ंागो दीदी चाह बनावथि, कमला बेटी पान लगावथि । कोषी बहिना धान कुटै छथि, बागमती सिरहा फअकै छथि । धऽरक लक्ष्मी विहुंसथि माॅझ ओसार अप्पन मिथिला । भोग......................................................... ।। !!अय काकी!! अय काकी, अय काकी बड़ कमाल कयलहुॅ अय काकी । छथि सुधबौक हमर ई कक्का, ऐठल देह अचारक फक्का, बनल रहय छथि सपरतीभ ई, तैयो केहेन अपरतीभ ई, उनटलहो इंजिन पर सिंगनल लाल कयलहुँ अय काकी । अय.............................................................................................. ।। पितरलोक धरि डाकनि दै छी, सातो पुरूखा के उकटै छी, फीमेल भोटर क्यू मे लागल, आई अहाॅक घोघ अछि काढ़ल, पतिक नाम कहबाक काल रंगताल कयलहुँ अय काकी । अय............................................................................................. ।। जखने अहाॅ दाॅत केॅ जाॅती, तखने हुुनका लागनि दाॅती, स्वर्ग कतऽ नरको नसीब नहि, लाश बनल घूमथि गंजन सहि, कक्का कफन के फाड़ि - चीड़ रूमाल कयलहुँ अय काकी । अय..................................................................................................... ।। कक्का जी मरला आसाम मे, झुट्ठे हल्ला भेल गाम मे, स्ुनिते कोठी सान्हि नुकयलहुॅ, पहिने बासि भात लऽ खयलहुॅ, सिनुर पोछि कऽ कक्का केॅ नेहाल कयलहुॅ अय काकी। अय............................................................................................।। !! संशय !! भरल भवधार छै सजनी कोना पदवार हम करबै, पडल सब भार छै सजनी, कोना पतवार हम धरबै ।।1।। बनलि हम रूप करे रानी, मुदापंथक भिखारिन छी, जडल घटवार छै सजनी, कोना इजहार हम करबै ।।2।। सुभावक नाव पर हमरा जखन धऽकऽ चढा देतै‘, अडल इकरार छै सजनी, कोना इनकार हम करबै ।।3।। लगै छै मारि के दोमऽ जुआनी मारि केॅ के बीच बनिवीचे, मुदैं सुकुमार छै, सजनी कोना तकरार हम करबै ।।4।। कहाँ धरिआर हम खसल करूआरि ओ नीचाँ, गहन अनहार छै सजनी, कोना भऽठाढ हम रहबै ।।5।। !! युग परिवर्तन !! चिडै चित्त आब अंडे उडैए, गोनु मौन भोनुए केॅ फुडैए, बुचना घऽर पकडलक बुचनी बनि गेलै बहरैया । औ बाबू औ भैया की भऽ गेलै ले बलैया ।। चोकटलि करिअम्मा सन कनिया, सासु सुपक्क सिनुरिया । बेटा पडले गाम बाप छथि, खुट्टा ठोकि खगडिया ।। लाजो लगैए कहय पडैए अनसोहात सम सहऽ पडैये मोछ उट्ठा अधपै पौआ केषपकुआ सेर सवैया औ बाबू औ भैया की भऽ गेलै ले बलैया ।। एक्के धोती अहिरन पहिरन, सएह पुरूश कहवै छथि । अझुका नेता खादी तर, अंडरवीयर पहिरै छथि ।। एक परिए में ई अकरहरि, दुहू जीव एक्के रिक्षा पर पिक्चर देखऽ चलला लऽ कऽ चानी केर रूपैया, औ बाबू औ भैया की भऽ गेलै ले बलैया ।। सोझ साझ सभ संचमंच छथि, नेंगडे खूब नचैए । पी0 एच0 डी0 सुनथि अवाक, मुरखहवे थैसिस दैए । लाल डोमघर कंठी बाना, पंडित जी चलला पसिखाना बूढी माघ नहाथि जुआन केॅ जेठो मे जडैया ।। औ बाबू औ भैया की भऽ गेलै ले बलैया ।। !! वसन्ते-बिरहिनी !! नव - नव पप्पल मे हॅसलै पुरनी कचनार गय , बूढ़ी महुओ तर लगलै - रऽसक पथार गय । मलय वसातक मंतर पड़लै, विपटल हो ई आम मजड़लै, चैबट्टी पड़का जुग जुगहा पीपड़ नव पनकी सॅ भड़ल,ै पिंकी केॅ पिक् कऽ रहलै, निमकी दुलार गय । बूढ़ी महुओ तर ................................................... ।। बेली पॅजियाबय कनैल केॅ, बेल नुकावय रसक घैल केॅ, सरियाबय नव गठित गात केॅ, गड़ियाबय पछबा बसात केॅ, कदली कनिया कऽ रहलें घोघे उघार गय । बूढ़ी महुओ तर ................................................... ।। शूल - शूल पर फूल बनौलनि, खूब मालती मोन मनौलनि, गम-गम कऽ उठलीह चमेली, रूसलि चम्पा सासुर गेली, विधवो सिम्मर पर लगलै सिनुरी बजार गय । बूढ़ी महुओ तर ................................................... ।। मंगल कुशल कहू की वेशी ? सपने में अयला परदेशी, चिर - पिपास पर छल - छल प्याली, भागऽ लागल क्षुधा अकाली, ओरक उस्सर पर खसलै रसवन्ती धार गय । बूढ़ी महुओ तर ................................................... ।। रहलहुॅ शेष राति भरि जागलि, हुनक दोष की ? हऽम अभागलि, रसक अथाह सिन्धु छल उछलल, प्राण मुदा बुन्ने ले विद्वल, लग - लग अकाशे चन्ना धरती अन्हार गय । बूढ़ी महुओ तर ................................................... ।। !! दीनक नेना !! देखहीं रौ बौआ, ई कौआ गवै छौ । सुनहीं रौ तोरे, कुचरि सुनवै छौ ।। एम्हर तोॅ सूतल छे माॅझे ओसार पर, ओम्हर ओ नाॅचै पुवरिया मोहार पर, पुरबा वसात बॅसुरी बजवै छौ............... । सुनहीं रौ ................................................ ।। तोरा लय बनलौ ने बिस्कुट आ चाॅकलेट, नोनो रोटी सॅ ने भरतौ ई गोल पेट, बातक मधुर स्वरलहरी अबै छौ................. । सुनहीं रौ ..................................................... ।। बापे तोहर बनलौ परदेशी, चिट्ठी ने एलौं भेलौ दिन वेशी, माँ केर निनायल व्यथा जगबै छौ । सुनही रौ ......................................... ।। की बुझबेॅं ककरा कहै छै गरीबी, सपनो मे सुख नहिं जतऽ श्रमजीवी, लुत्ती लगाकऽ नगर बसवै छौ ......... । सुनहीं रौ ............................................. ।। कोरा मे तोरा सुताबै छौ बिनियाॅ झटकल औ अविहेॅ रौ, नूनूक निनिया, तोहर उपास हमरा लजबै छौ, सुनहीं रौ ...................................... ।। !! पतनी व्रता !! तेरा सुक्खक खातिर हम की - की नेॅ करबौ गय । बिना जान केॅ जीवौ प्राण अछैतो मरवो गय ।। तोहर नैहर घऽर बनायब, कमर सारि सॅ हऽर मंगायव, बापक चैड़ी लेबौ बटैया, देखि लिहैं तोहर ई कोठी मुनहर भरवौ गय । तोरा ....................................................................... ।। बैंक लोन सॅ गाय अनायब, तकरा पोसब खूब चरायव, अपने हाथे दूहब भोरे, चाह बनाकऽ देबौं तोरे, तोॅ पड़ले - पड़ले पिबिहै हम प्याली भरबौ गय । तोरा ............................................................................ ।। जल्दी ए दडिभंगा जएबौ, रंग - विरंगक अभरन लयबौ, तैयो जॅ समधान ने हेबेॅ, यैह ने हमरा पूब भगेबेॅ, बिनु टीकट पकड़ा कऽ अलिपुर जेहल पडबौ गय । तोरा. .............................................................................. ।। !! अन्हर मारि !! नक फकरो तऽ व्याहलि गेली, मृगनयनी कुमारि छै । देखि लियऽ औ नगरक लीला, भारी अन्हर मारि छै ।। गाम - गाम मे लगनक मेला, बऽर वरद बाछा बनिगेला । अपने बाबा करथि दलाली, बाप डोलाबथि बटुआ खाली । जकरा जतेक अधिक छै पूजी, तकरे ततेक पुछारि छै । देखि......................................................................................... ।। मेडिकल इंजीनियर बालक, छथिन महग सम सॅ बेशी। बान्हल छनि गरदाम गऽर मे, देखाबथि अपन शान शेखी । टुटपुजियों काॅलेजियो सबहक ऊँचे - ऊँचे आड़ि छै । देखि......................................................................................... ।। धऽनक महिमा कते कहू औ, ब्हुत लोक पाईक जनमल । ज्ञान विवेकक बात कतऽ छै, ज्करे टका सैह निरमल । सासु छुलाछनि बऽहु हिरोइन, शहर घुमक्करि सारि छै । देखि......................................................................................... ।। अपने भऽल पुरूष छी कतवो, सुन्दरि गुनगरियो बेटी । नहि मानत ई बऽर पक्ष जॅ, खाली अछि द्रव्यक पेटी । केबर गेलि बिलाड़ि मोंख पर रूपवती सुकुमारि छै । देखि......................................................................................... ।। आदर्शक सभ बात करै छथि, अपना बेर कात ससरै छथि । गनबऽ काल गरीबो मनगर, गनऽ काल सेठ पछडै छथि । जाहि घऽर ‘‘मैथिली‘‘ जनमलि मरघट्टी तकर दुआरि छै । देखि......................................................................................... ।। नैहर सासुर केर डगरा मे, बेटी भाटा बनि गुडकै । उपरागक रोटी क संग, अपना नोरक तीमन सुड़कै । सासुर सॅ नैहर धारि नितः सुनिते अयलि गारि छै । देखि................................................................................. ।। !! उद्यनाचार्य !! अभिनव अबध ललाम, जतऽ उदयनक घरारी। पावन करियन गाम, जतऽ उदयनक घरारी ।। सिंहमात्र पशु आरो किछु नहि, हम मनुष्य छी उदयन ई कहि । पौलनि विजय विराम, जतऽ उदयनक घरारी ।। वर्णित अछि भावी पुराण मे, परिशिष्टां के अछि प्रमाण मे । उतरल छल गोधाम, जतऽ उदयनक घरारी ।। हीर गर्व के कयल विखंडित, जे छल बौद्धक उद्भट पंडित । पसरल सगरो नाम, जतऽ उदयनक घरारी ।। भक्ति भावना मूक बनल छल, नास्तिकता बन्दूक बनल छल । थर - थर लोक तमाम, जतऽ उदयनक घरारी ।। भेल सनातन पुर्नस्थापित, हत् उत्साह बौद्ध अभिशापित । निर्भय चारू धाम, जतऽ उदयनक घरारी ।। आओल माधव चमत्कार लऽ, आचार्यक अंशावतार लऽ । पसरल ख्याति तमाम, जतऽ उदयनक घरारी ।। आक्रोशित भऽ जगन्नाथ पर, पौलनि हत्या दोष मुक्तिवर । भेटल यश विश्राम, जतऽ उदयनक घरारी ।। एक हाथ मे ज्ञान सुदर्शन, तर्क गदा दोसर मे सदिखन । वाक्युद्ध अविराम, जतऽ उदयनक घरारी ।। सूर्य पूब अगथि असत्य अछि, उदयाधरित दिशा तथ्य अछि । नवदृष्टिक आयाम जतऽ उदयनक घरारी ।। तेसर कर कमलक कुसुमांजलि, चरिम मे शंखक किरणावलि । नर भऽ प्रगटल श्याम, जतऽ उदयनक घरारी ।। आइ जतऽ अछि तरूवर पीपर, छल एहीं ठाॅ आचार्यक घर । पर्णकुटी विच गाम, जतऽ उदयनक घरारी ।। हंस भट्ट वेदान्त अरण्यक, सिंहबनल पहुँचल मिथिला तक । छूटल सभ केॅ घाम, जतऽ उदयनक घरारी ।। आगाॅ पूजा पुष्पक बारी, पाछाॅ साग पात तरकारी । जीवन क्रम निष्काम, जतऽ उदयनक घरारी ।। ओ बौद्धक विद्वान धुरंधर, वैदिक केॅ ललकारि घरे घर । भेल जयी सभ ठाम, जतऽ उदयनक घरारी ।। अर्थाभाव आत्मसम्मानी, घर अन्हार किरणा बलिदानी । सम - चम नियम विराम, जतऽ उदयनक घरारी ।। आबि गेल उदयन सॅ भीरऽ, लागल ज्ञानक गुद्दी तीरऽ । जहिना कुकुरक चाम, जतऽ उदयनक घरारी ।। सकशास्त्र मे ई अजेय छथि, दर्शन मे तॅ अपरिमेय छथि । गर्वित ध्वनित खराम, जतऽ उदयनक घरारी ।। तर्क - वितर्कक गोला छूटल, प्रतिमा पुंजक ज्वाला फूटल । अविरल आठोधाम, जतऽ उदयनक घरारी ।। एखनहुॅ आस्तिकता उत्साहित, कयलनि भगवत् भक्ति प्रवाहित । अनिरूद्ध उगन्त, बलराम, जतऽ उदयनक घरारी ।। अपना केॅ ओ सिंह मानि कऽ, लागल गरजऽ फानि फानि कऽ । निर्भय वारे आम, जतऽ उदयनक घरारी ।। डीहक पाॅजरि सुमन फुलओल, ब्ुद्धिनाथ आ आरसी आओल । मणिपाठक केल ठाम, जतऽ उदयनक घरारी ।। अरूण, तरूण, चन्द्रभानु, प्रवासी, नमथि डीह लग मिथिला वासी । विकल जपै छथि नाम , जतऽ उदयनक घरारी ।। पीपर तर आचार्य गुप्त छथि, तेज प्रखार यद्यपि शुशुप्त छथि । शतशः हमर प्रणाम, जतऽ उदयनक घरारी ।। !! एना जुनि नहाइ!! दाइ अय पोखरि एना जुनि नहाइ ।। अहाॅ छोट सारि हमर, अयलहुॅ दुआरि हमर, उचिते तेॅ कहि दै छी आइ । दाइ ................................................. ।। काछु जकाॅ पुनटै छी, माॅछ गकाॅ उनटै छी, साॅप जकाॅ जुट्टी दहाइ । दाइ ................................................. ।। आॅचर घननी पत्ता, तानल दू-दू छत्ता, मंगनी मे भीजै छथि भाइ । दाइ ................................................. ।। बौआ केॅ टकटकी, बच्चा केॅ फकफक्की, कक्का केॅ भऽ गेलेनि बाइ । दाइ ................................................. ।। भैया बान्हि कऽ बाना, बनल छथि दीवाना धपचट मे करता सगाइ । दाइ ................................................. ।। !! काटरक परिणाम !! रहतऽ की तिलकक ई पाय हौ, कऽ लय बरू फुटानी । तोरो कुमारि चारि दाय हौ, मेान पडि. जयतह नानी ।। बेटा आ बहु केयो काजो ने देतऽ, कुन्हरालि पुतोहु सभ कुन्नह सधेतऽ, पिविहऽ मिरचाई देल चाय हौ, कऽ लय बरू फुटानी । तोरो............................... । ज्हिया सॅ सेज तेजि उठलो ने जेतऽ, पोते तोहर नाचि - नाचि खिसियेतऽ, ढेपा दऽ कहतऽ ई लाय हौ, कऽ लय बरू फुटानी । तोरो............................... । टूअर कुकुर बूझि कौरा पठेतऽ, तऽर तेल ऊपर सॅ नोनों ने देतऽ, दाँत च्यारि मरि जयवह भाय हौ, कऽ लय बरू फुटानी । तोरो............................... । बेटा बिकायल छह पिण्ड कोना देतऽ, देबऽ जौं करतऽ तऽ पैठे ने हेतऽ प्रेते बनि रहिहऽ ढोरहाई हौ, कऽ लय बरू फुटानी । तोरो............................... । छोटका छह बाँचल हौ आबो तऽ चेतऽ, एहि पापे लोक परलोक दुहु जेतऽ, समधिन सॅ प्रेमक सगाय हौ, कऽ लय बरू फुटानी । तोरो............................... । !! कवि कोकिल - विद्यापति !! जनिका सॅ देसिल वयना, पौलनि परान गय । क्वि कोकिल नामे तनिका, जानय जहान गय ।। मिथिलांचल मे अभिनव आशा, पसरल घर - घर अप्पन भाषा । भाव करूण विचार श्रृंगारी, प्रगटौलनि आॅचर तर सॅ शंकर भगवान गय । कवि....................................................................... ।। मोॅज सेज पर योगक छाया, बर अथाह व्यक्तित्वक माया । उदर भिवलि पर बनल त्रिवेणी, रूपवती लग तीर्थक श्रेणी । श्रीतिक कालरात्रि मे चमकल श्रृष्टिक दिनमान गय । कवि ................................................................................... ।। बैन बसंत नैन मे भादो, धार पवित्र कात मे कादो । जल मे रहितहुॅ पुरनि पात सन, मरूस्थली मे रसस्नान सन । गाबथि राधापर लेकिन, माधव पर ध्यान गय । कवि कोकिल..........................................................।। धन्य - धन्य विद्यापतिनगरम्, विस्फीसुत सत् शिवम् सुन्दरम् । जड़ियो कऽ अवशेष बनल छथि, मरि कऽ अमर महेश बनल छथि । देहरि श्रृंगारक कांचन मंदिर मसान गय । कवि ............................................................. ।। !! रौ घुरना !! बात असले ई कहियौ, सुनेॅ रौ घुरना । हऽम विद्यापति तोॅहीं हमर उगना ।। पानि कतवो चढेलियौ - छेॅ पनिमऽरू । रऽस कतबो चटेलियौ - छेॅ दिनजऽरू । आब छुटतौ की, तोहर ई चालि पुरना । हऽम .......................................................... ।। आइ बुलिबुलि कऽ बहुतो - हम थाकि गेलियौ । लावेॅ चैकी उतारेॅ - आबेॅ रे एलियौ । देह दाबेॅ, लगावेॅ रे जोड़ दुगुना । हऽम .............................................. ।। मालिकिनी अनेरे - खेहाड़ि देलखुन । दुःख हमरो अछि - तोरा जे गाड़ि देलखुन । आंगनक कारकौआ, बनक सुगना । हऽम ................................................. ।। काल्हि ‘‘बूचो‘‘ देखलकौ - तोहर चमकी । हमरो पर चलौले - ऐहेन बमकी । देख अयना मे लटकल केहेन घुघना । हऽम ....................................................... ।। !! एक पर सॅ एक !! ककरो सॅ क्यो कम की गय, सबहक बडके बमकी गय । भुट्टी पहिने टीक पकडलक, गरदनि दबलक नमकी गय ।। बेटा करय एक सिरसासन, जानै बाप बेरासी आसन । पुतहुक हाथ कौर अरगासन, सासुक मुॅह कथौती वासन, सोझकी ठोकय ताल ताहि पर नेड़री झाड़ै झमकी गय ।। एक टका केर मड़ुओ चिक्कस, बान्हि पतौरा रखलहुॅ जेबी, गहुम प्रसाद तेल चरणोदक, विष्णुरूप डीलर केॅ सेवी, परूॅका जे भेलै से भेलै - हेतै असली एमकी गय ।। परजा प्राण तेयागल नेता, कहै जीवनक स्तर बढ़लै, परसन दैत - दैत भनसीए, अपने आब चूल्हि पर चढ़लै, बुरिबक बुझौ विकास मुदा ई - थिकै बुखारक चमकी गय ।। जोन महग मालिक छै सस्ता, भोजन बन्न जिलेबी नस्ता, आगाॅ सॅ भऽ रहलै पक्का, पाछा टाट टुटल चैफक्का, मालकिनी मटकी मारै तऽ, रहसै नौरिन छमकी गय ।। पोता हाथ सुपक्क सिनुरिया, बाबा माॅगथि रऽसक गाड़ा, मोन पड़नि कोबरक खीर औ, पड़तनि पिण्ड लहरतनि सारा, बूढ़ी केॅ लटकनि दू जुट्टी, कटलै केश जुअनकी गय ।। !! अजुकी दाइ !! अजुकी हम दाइ छी, अधिक अगुताइ छी, अहाॅ बाट ताकू हमहीं विदेश जाइ छी । राखि लियऽ अपन चूल्हि खपड़ि ई घऽर द्वारि । साॅझ दियऽ अपने सॅ आंगन मे दीप बारि । अहॅक चार खड्ड़ल हम लहरल सलाई छी ।। अजुकी .................................................................... व्यर्थ भेल सिनुरदान कोबर घर सूनसान । टूटि गेल पिंजर पट्ट पंछी भड़लक उड़ान । टपना पाॅखिक कमाइ गाछ चढ़लि खाई छी ।। अजुकी .................................................................... प्रिय वा प्रियतर कहाऊ, प्रियतम तऽ पाइ भेल । सर्वोपरि टका तकर, दिव्यज्ञान आइ भेल । तेॅ ने हम एक सिरये , अपने अघाइ छी । अजुकी .................................................................... बेबी भऽ हेतै तऽ अपने केॅ लऽ आनव । ताहि कालक हेल्पिंग केॅ बड़का टा गुण मानव । पातिव्रत्य रहल कऽ रवा कऽ नहाइ छी । अजुकी .................................................................... !! श्री राम केवट संवाद !! हम सभ कते काल सॅ नदी कात छी ठाढ़ औ, पहुॅचाबू ओहि पर औ ना ।। संगहि नव - नौतून परिवार, कलकल गंगा जी केर धार, केवट पकड़ू - पकड़ू अपने सॅ पतवार औ, पहुॅचाबू ........................................ ।। चिन्हलहुँ - चिन्हलहुँ औ सरकार, थिकियै अवधक राजकुमार, सुन्हलहुॅ चरण कमल मकरंदक चमत्कार औ, नहिं पहुॅचायब पार औ ना ।। लागल फेर चरण मे धूरि, छुविते नैयो जेतै ऊड़ि पोसब कहू कोन कोन तखन सकल परिवार औ, नहिं पहुॅचायब पार औ ना ।। पहिने तरबा अपन धोआऊ, तकवा बाद नाव पर जाऊ, अपने जौं चाहै छी उतरऽ दिन - देखार औ, पहुॅचाबू ओहि पर औ ना ।। सुनिते प्रेमक अटपट बात, प्रभुकेर सिहरऽ लागल गात, पसरल मुॅह पर मुश्की मन मे भरल दुलार औ, पहुॅचाबू ओहि पर औ ना ।। हुलसल मन उमड़ल आनंद, धोलक पद कमलक मकरंद अमृत - ओदक पिविते भेल सकुल उद्धर औ, रघुवर भेलेनि पार औ ना ।। !! राधा विरह !! श्याम होइछ परक प्रेम अधलाह हे, तेॅ बिसरि जाह हमरा बिसरि जाह हे । दीप बुझि रूप केॅ जुनि हृदय मे धरह, मोहवाती जरा तेल नेहक भरह । कऽ देतऽ जिन्दगी केॅ ई सुड्डाह हे, तेॅ बिसरि जाह हमरा विसरि जाह हे । हऽम मधुबन मे साॅझक पहिल तारिका, तोॅ फराके बनावह अपन द्वारिका । उठि रहल अछि अनेरेक अफवाह हे, तेॅ.......................................................... । हम विमल राश केर खास संयोजिका, छी प्रवल गोप केर प्रेयसी गोपिका, घाट सॅ खुलि चुकल अछि हमर नाह हे, तेॅ ................................................................ । मोन मे उत्तरी सागरक जल भरह, लाख चुचुकारी बर्फक महल मे धरह, हम तहू ठाम बरबानलक धाह हे, तेॅ ............................................................. । !! विरक्ति !! क्षण भंगुर संसार सजनि गय एहि ठाॅ दुःखक पहाड़ भरल अछि, नेरक निरझर धार सजनि गय उमड़ल बनल दहाड़ चलल अछि । बचा सकब कहू कोना आन केॅ, हम तऽ अपने डूबि रहल छी । हॅसा सकब कहू कोना आन केॅ, सिंगड़हार भऽ चूबि रहल छी । सजनि गय हिस्सक सागर खार बनल अछि, नोरक..................................................................... ।। मृगी जकाॅ हम काॅपि रहल छी, झाॅखुर सऽ तन झाॅपि रहल छी । देखि - देखि संधान सायकक, आयुक छाॅटी मापि रहल छी । करब कोना पथपार सजनि गय ठाम - ठाम सौतार भरल अछि, नोरक ................................................................................................... ।। विरहक शून्य सुदूर देश मे, दिवसक कठिन करेज जड़ल अछि । रजनी अछि जोगिनीक वेष मे, आंचर तर लुत्ती पसरल अछि । चिर - वियोग केर भार सजनि गय लऽ कऽ कहार चलल अछि, नोरक .................................................................................................. ।। विशेष:- स्व0 कवि अहि कविताक रचना सन् 1990 ई0 अप्पन अर्धागिंनीक मृत्युक वियोग मे कयलनि । !! कमौतिन भौजी !! भौजी नव सलवार सियौलनि - भैया पुरने साॅची मे । मियाॅ रहला गामे बीबी सर्विस पौलनि राॅची मे ।। भोरे आंगन कुचरल कौआ, भैया पड़ल माथ तर पौआ, सपने मे भौजी के पौलनि, प्रेमे पासी पाॅज लगौलनि, प्यासल - प्यासल आॅखि सटल सूखल खरकट्टल काॅची मे । मियाॅ रहला गामे बीबी सर्विस पौलनि राॅची मे ।। करथि आंगनक चैकीदारी, काज भानसक लागनि भारी, दहिना अंग जखन कऽ फड़कनि, अभिलाषा मे छाती धड़कनि, मनक व्यथा केॅ कखनहुॅ - कखनहुॅ गावथि गीतक पाॅती मे । मियाॅ रहला गामे बीबी सर्विस पौलनि राॅची मे ।। रोटी नहिएॅ बेलऽ आयल, बना लैत छी दलिपिट्ठी, एहि जीवन सॅ मरने पक्का ई हम्मर अंतिम चिट्ठी, मिलनक लेल प्राण अछि अटकल लटकल विरहक फाॅसी मे । मियाॅ रहला गामे बीबी सर्विस पौलनि राॅची मे ।। भौजी साॅझे आबि गेली हे, दूहल देह गुहल छनि जुट्टी, भैया केर सौभाग्य सुशीतल, बनि जायत ई गरमी छुट्टी, रूसल पति केॅ कनियाॅ बौंसथि गम - गम लौंग अराॅची मे । मियाॅ रहला गामे बीबी सर्विस पौलनि राॅची मे ।। !! कन्यादान !! आब बनवह विरान हय बेटी, चूबि जयतह ई नोर, डूबि जयतह ई ठोर, त्यागि थीर मुसुकान हय बेटी ।। बेटे जकाॅ तोॅ जनमलह आ बढ़लह, बेटो सॅ बढ़िकऽ माईक मन भरलह, काका आ काकी लगक दुलरैतिन तोॅ, अपना स्वभावे सभक मन हरलह, बाबा ध्यान तोॅ बाबी क जान तोॅ, बापक परान हय बेटी ।। तोरा जनमिते परायल अन्हरिया, पाॅजे समटलहुॅ हम पसरल इजारिया, घऽरक कुमुदिनियाॅ हम परक चननियाॅ तोॅ ई कहऽ आयल कहौतियाक भरिया, आई धरिक पूनम तोॅ काल्हिए सॅ बनि जयवह, दुतियाक चान हय बेटी ।। लैह अशीरवाद करह अचले श्रृंगार तोॅ, बनल रहह हुनक मुग्धमनक शुद्ध हार तोॅ आशुतोष, मृत्युंजय शंकरे जमाइ हमर, जानि गेलहुॅ पुत्री नहिं गौरी अवतार तोॅ, हम कऽ देलहुॅ दान, आइ भऽ रहलै ज्ञान, अहाॅ बनि गेलहुॅ हय बेटी ।। !! पोताक अट्ठहास !! पोता - खेत टी खरिहान टी आंगन टी दलान टी बाबा आब अहींक कान मे, टिटही टहकै टी टी टी ।। बाबा - प्याली पी भरि चुक्का पी, घट घट पी सूरूक्का पी, रौ कुलबोरन गाम घिनौले, लाते, जुत्ता, मुक्का पी ।। पोता - लत्ती कू बा झब्बा कू, अब्बा कू बा बब्बा कू, आगाॅ पाछाॅ डोरा डोरि मे डोलय दू - दू डिब्बा कू ।। बाबा - जऽर छू जमौरा छू, नीपल पोतल दौरा छू, मुतिते घऽरक सीरा चढ़ले, हगिते तुलसी चैड़ा छू ।। पोता - लोक कहैए बाटो पर सॅ, टीली लीली फट्ट औ भेल अहाॅ केॅ खाटो पर उतरब दुरू घट्ट औ आब अहाॅ सॅ डऽर कथी केल कतबो हुआ हुआ भूकू हुआ - हुआ की - की हुआ, मांगय विधकरी नूआ, मैया - धीया साड़ी चाही पुरहित केॅ धोती धूआ काॅच बाॅस केर नऽव पालकी आबय चारि कहरिया जू, काशी ............................ । बाबा - कूथि - कूथि कठगील अुगै छी, देखे टन दऽ चलि जेबे तोरे हम बरखी कऽ देबौ हमर श्राद्ध तोॅ की करबैं सभ अपना नेना केॅ बरजू चेता दैत छी औ बाबू जऽर छू ............................................ ।। राजदेव मंडल, शिक्षा- एम.ए.द्वय, एल एल बी.,पता- ग्राम-मुसहरनियाँ, रतनसारा(निर्मली),जिला-मधुबनी,प्रकाशित कृति- हिन्दी ,नाम-राजदेव प्रियंकर,उपन्यास- जिन्दगी और नाव,पिजरें के पंछी,दरका हुआ दरपन।आबैबला मैथिली कविता संग्रह- अम्बरा। [आह ज्ञानक झंडा झाँपल अस्तित्व रहब अहीं सभक संग नदीक माछ बाट-बटोही सीमा परक झूला चीड़ीक जाति बाढ़िक चित्र- दिलक बोल अहिंसक वीर मनोवांछित चान परेमक अधिकार मधुर गीत सिर बिहून धड़ हथियारक सभा घातक गंध कुहेसक परदा युग्मक फाग-पत्री आगमन जाति बदलैत बाट भितरिया जानवर बाउल परक माछ कांध परक मुरदा मिझाइत दीया िहत-अहित प्रयास ऑफिसक भूत कठुआएल-रूप सुनगैत चिनगी अहॉंक अगवानीमे महत्वाकांक्षाक गाम एकटा चुप्पी छड़पटाइत लहाश रूसल धीया बसातक धुजिनी अदृश्य आगि- तीन मित्रक गपशप नव बिहार मुँहझप्पा टूटल बन्हन अढ़ाइ हाथक सांगि कानैत अधिकार आबद्ध हम पुन: उठब एकबेर दरपनक स्थिति मिलन बाध शिष्ट-अशिष्ट ढहैत महल अश्रुधार नाचैत भूत माय यत्न बघनखा रंगक खोज कंटकमय नवनीत लाज मिलन-बिछुड़न परिवारक गाछ त्रिशंकु अनमोल जिनगी मुनियाँक चिन्ता (बाल कविता) कथीक गाछ (बाल कविता) नेहाइपर लेखनी झगड़लगौना पिशाच गाछक बलिदान हेराएल गाछक हिस्सा लाल ज्योति बीखक घैल पत्रोत्तर अन्हारक खेल नाचक बिखाद आँखिक प्रतीक्षा] आह लिअ पड़त आह करुणा अथाह बाहर शीतलता किन्तु भीतरमे दाह चारुभरसँ घेरलक आह लोक कहि रहल वाह-वाह अछि विश्वास छूबि लेब आकाश किन्तु पाइर तर अछि असंख्य लहाश चिचिआइत दास तइयो बढ़ल जा रहल मनक चाह पार लगाउत कोन नाह बिनु लेने आह कि भेटि सकत वाह-वाह परंच, नहि छी लापरवाह खोजब नवका राह। ज्ञानक झंडा अनन्त अभिलाषा बदलि देलक परिभाषा आकाश सभ ठाम भरती भऽ गेल चिड़ै चह-चह लोग सह-सह गन्ध मह-मह अन्न गह-गह भरल जान-माल टूटि गेल जर्जर जाल ज्ञान आब तोड़ए ताल भागल तंत्र-मंत्र सर्वत्र चलि रहल यंत्र आब नहि चलत अंधविश्वासक हथकंडा फहरा रहल विज्ञानक झंडा चहुँदिश छँटि गेल अन्हार भऽ रहल जए-जएकार नित नूतन आविष्कार अपरम्पार बना रहल धराकेँ स्वर्ग सन किन्तु कतऽ सँ आनत ओहन जन-मन तइयो लगौने आस कऽ रहल प्रयास नहि जानि झंडा आब कतऽ गड़त कोन नव दुनियाँक खोज करत। झाँपल अस्तित्व नहि जानि कहियासँ चाँपल अछि हमर अस्तित्व एकटा आकृतिसँ झाँपल अछि कखनहुँ काल ओ देखबैत अछि त्रास बारम्बार हटेबाक हम कऽ रहल छी प्रयास किन्तु ओ नहि छोड़ैत अदिबास टकराइत रहैत अछि हमरा मतिसँ निर्बाध अपना गतिसँ देखऽ चाहैत छी हम सरुप नहि अछि हुनक कोनहुँ रुप सुनने छलहुँ हम खिस्सामे एहन अनजानकेँ देखि सकैत अछि शीसामे हम मानैत छी खास ज्ञानेन्द्रियसँ जानैत छी भीतरमे ओ लगा रहल अछि फानी सुनि रहल छी वक्र-वाणी प्राप्त करबाक लेल उत्कर्ष करऽ पड़त आब संघर्ष नहि तँ बना सकैत अछि हमरा जोगी किन्तु अस्तित्वक लेल अछि ईहो उपयोगी। रहब अहीं सभक संग चिचियाकेँ सोर पाड़ैत हमर कंठ दुखा गेल पियाससँ जेना ठोर सुखा गेल चारुभर भरल लहाश कऽ रहल अछि हमर उपहास कियो नहि सुनैत अछि हमर अबाज कतऽ चलि गेलाह हमर समाज जरुरी छल एहि रुढ़िकेँ तोड़ि देब भविष्यक हेतु नव दिशा मोड़ि देब अहाँ सभ तँ अपनहि छी अगाध अग्रसर होऊ छोड़ू विवाद नहि रोकि सकत कोनो बिघ्न बाध हम नहि कएलहुँ कोनहु बड़का अपराध हेओ एमहर आउ नहि खिसिआऊ नहि करब आब निअम भंग नहि करब अहाँ सभकेँ तंग लिअ अपन राज नहि चाही हमरा ताज नहि बदलब आब अपन रंग रहब मिलि जुलि सभक संग। नदीक माछ नदीक कोखिसँ उछलल माछ कऽ रहल हवामे नाच यात्रा पहरक सगुनियाँ छोड़ए चाहैत अछि जलदुनियाँ देखऽ चाहैत अछि पवनदुनियाँ नदीमे रहितो नहि पाबि सकल पानिक थाह सूखलमे जएबाक हेतु खोजि रहल राह करऽ चाहैत अछि समाजिक हित बढ़बऽ चाहैत अछि नव दुनियाँसँ प्रीत छोड़ि देत अपन पुरान बास करत आब नव-नव प्रयास खोजत नव-नव चीज नव-नव बीज लाभ होएत आकि हानि जाँचत केहेन अछि हवा पानि रचत नव इतिहास नूतन चास बास परन्तु सुनने छल ओ अपनहि कान कहने रहथिन बूढ़-पुरान ‘‘कहियो नहि जाइहेँ ओहि दुनियाँ ओहिठाम भरल अछि खुनियाँ।’’ किन्तु नव अनुसंधान माँगैत अछि जीवनदान तखन भेटैत अछि सम्मान कोटि-कोटिकेँ अन्न प्राण मुदा ओ अछि अभागल जलबून्द कड़ी अछि लागल विफल भेल ओ छल बलमे पुनः खसल ओहि नदीक जलमे तद्यपि बारम्बार कऽ रहल प्रयास स्पर्शक हेतु मुक्ताकाश छोड़ि देने अछि मोह एहि जलक कऽ रहल कर्म चिन्ता नहि फलक। बाट-बटोही जाएब ओहि पार खसौने घाड़ पुरान पहाड़ बरिसोसँ अछि ठाढ़ हमरा मार्गकेँ कएने अवरुद्ध हड़पल भेल क्रुद्ध कतेको लगेलहुँ बाँहिक जोर दुखा रहल अछि पोर-पोर इंच भरि नहि भेल टसमस भऽ गेलहुँ हम बेबस नहि कियो दऽ रहल अछि साथ पहाड़ीपर पटकब आब माथ डूबा देबैक हम खूनसँ अपना घामक बूनसँ विफल भेल छी देह जर्जर पाछाँ सुनैत छी असंख्य स्वर स्त्री-पुरुष, बाल अबाल आबि रहल अछि तोड़ैत ताल गाबि रहल अछि समूह गान पुनः आएल शरीरमे जान मनमे उठए लागल उफान कतऽ गेल ओ पहाड़ी काँटसँ भरल झाड़ी आहि रौ तोरी ई कोन बात गड़ि गेल भूमि आकि भागि गेल कात आकि नभमे उड़ा देलक बसात मार्ग भऽ गेल तत्क्षण समतल चल-चल चल-चल जय हो जनबल ताकि रहल अछि बटोहीकेँ बाट नहि कियो लगा सकैत अछि टाट। सीमा परक झूला ई जर्जर झूला लगैत अछि जेना तुला सीमापर लटकल अछि पुरान डारिपर अटकल अछि पेंगापर झूलि रहल छी आब स्वयंकेँ बिसरि रहल छी अन्तिम छोरसँ अपन बाँहिक जोरसँ लगा रहल छी आस नहि छी निराश आस-पास प्रभातक उजास कखनहुँ एहिपार कखनहुँ ओहिपार बारम्बार दोहराबैत छी कार्य ब्यापार कट-कट-कट-कट टूटि रहल डारि दैत गारि तइयो सम्हारि धरतीसँ नाता जुटि रहल अछि गाछसँ झूला छूटि रहल अछि एम्हर आकि ओम्हर खसब रहब स्वछन्द आकि जालमे फँसब जीएब वा मरब फेर किएक डरब चाहे खसब एहिपार चाहे खसब ओहिपार रहत इएह धरती इएह भाव आर विचार सुख हो वा दुख रहब अन्ततः मनुक्ख। चीड़ीक जाति धायल पाँखि पर लटकल लहाश लऽ कऽ पहुँचल नीड़क पास ओ जे ओकर नहि किन्तु ओकरे छल लहू सँ भीजल तन कण-कण सशंकित अछि चीड़ीक मन तइयो मातृत्व सिनेह पियाबए चाहैत अछि खियाबए चाहैत अछि लोलमे राखल अहराक दाना अनजान बच्चा गाबि रहल गाना पाछू लागल शिकारी बनल अछि अधिकारी जेकरा भूखल आँखिमे तरजू अछि लटकल स्वादक बैटखारा अछि मनमे अटकल एकटा पलड़ामे प्रौढ़गात दोसरमे अछि नवजात घायल देह टुटैत नेह टप-टप चुबैत खूनक बूनसँ धरती भऽ रहल स्नात पूछि रहल अछि चिड़ै अपना मनसँ ई बात आबऽ बाला ई कारी आ भारी राति कि नहि बाँचत हमर जाति...? बाढ़िक चित्र- पहिल 2008 ई0 मे कुसहा -कुसहाक निकट टूटल कोसी बाँध ताहि कारणें आएल प्रलयंकारी बाढ़िक चित्र- (सघन अन्हार। भयंकर विस्फोटक। चिचिआइत लोकवेद।) कुसहा कोसीकेँ बाँध टूटि गेल लोक सबहक भाग्य फूटि गेल क्रुद्ध कोसी तोड़य ताल गरजि रहल अछि जेना काल भासि रहल अछि घर-दुआरि, जान-माल रूत्री-पुरुष, बाल-गोपाल कल-कल, छल-छल अगाध जलराशि बढ़ि रहल पल-पल डुबबैत, भसबैत करैत एकटार आबि रहल गरजैत कोसीक धार हे रौ जाग-जाग जल्दी भाग तँ बचतहु जान वैह महरानी बचा सकैत छउ प्राण बाढ़ि नहि ई अछि महाविनाष भासि रहल असंख्य लहास। (दोसर चित्र- सम्पूर्ण शरीर जलमे डूबल। सिरिफ हजारो हाथ पानिकेँ उपर भसि रहल अछि।) दुइ बरखक शिशु मायकेँ लहास पर चढ़ल जा रहल अछि बढ़ल दूध पिबैत खेल रहल अछि झिलहरि कोसीक भरल धार मे चिलहौड़ आ कौआ केँ झपट सँ कखनहुँकाल विकराल करुण गीत फूटि पड़ैत अछि ओकरा कंठ सँ केनाक बाँचत एहि चंठ सँ? तेसर चित्र- (साँझक आगमन। चारुभर करिया जल पसरल।) मोंटगर गाछ पर बूढ़ बकोली मड़र लटकल अछि डर सँ सटकल अछि नहि बाँचल एकोटा माल-जाल आयल ऐहन काल नहि बाँचल एको घरक चार डूबि गेल पूरा परिवार बाँचल अछि वंशक टीका एकमात्र तीन बरखक पोता ओकरो कोना बचेताह नीचा अछि तेज जलधार ऊपर अछि फणिधर तैयार शख्त शाखा पर पाइर सम्हारि एक हाथ सँ धेने डारि दोसर हाथ सँ पोता केँ बाँहि कपार पर बाजय कौआ काँय-काँय गाछक पत्ती सभ साँय-साँय साँप ससरल बकोली दिश ओकरा आँखि मे भरल अछि रिस ओ ताकि रहल अछि बाढ़ि दिश सर्प निकट फोंफकारि रहल अछि बकोली थर-थर काँपि रहल अछि हड़बड़ी मे हाथ ढील भऽ गेल डूब्बा पानि मे पोता गिर गेल बकोली केँ भाग्य फूटि गेल आब ओ कोना जीअत फाटल मन केँ कोना सीअत बाढ़िक पानि गोंगिया रहल अछि बिरिछ पर बकोली बोमिया रहल अछि। चारिम चित्र- (जनशून्य मे मुईल- माल-जाल, जीव-जन्तुक लहासक ढेरी।) एकसरि अर्धनग्न स्त्री परिश्रान्त मुख क्लांत बैसल अछि धारक कात देह स्नात जिअत अछि कि मुइल साइत सोचि रहल अछि इएह बात एखनहि निकलल अछि संघर्ष कऽ बाढ़िक धारा सँ बहराएल हो जेना कठिन कारा सँ नहि अछि सुधि अपन देह केँ न गेह केँ अर्ध चेतन मे डूबल कि बाजि रहल अछि से नहि जानि टप-टप देह सँ चूबि रहल अछि पानि दूई गोट भक्षक जेकाँ जेकाँ रक्षक पहुँचि गेल अछि पास देह सँ चुबैत जल देखि ओकर बढ़ल जा रहल पियास। पाँचम चित्र- (कतौ-कतौ उँचगर ढूह पर बाढि सँ बचल लोक सभ बताह जेँका एक दोसर दिष तकैत।) उँचगर बाँध पर बाढ़ि सँ बाँचल लोक सभकेँ माथपर नाचैत शोक आठ बरखक छौंड़ी धेने अछि एक गोटेक गोड़ आँखि सँ बहैत अछि नोर ‘‘हमर माय-बाप हेरा गेल भैया पानि मे घेरा गेल हओ बाप कतऽ जाएब कतऽ रहब आब कि खायब’’ आँखि गुआरि बाजल ओ ‘‘हमर परिवारक तँ अछिए न कोनो ठेकान ऊपर सँ कऽ रहल छँ तु छान बान्ह धीरज धर गे अभागल नऽ तऽ भऽ जेबें निष्चय पागल।’’ छठम चित्र- (राहत शिविर। कात-करोटमे ठाढ़ लोक सभ जेना प्राणविहीन भेल।) ओ स्त्री अछि कि अस्थिपंजर मात्र शिशु केँ सटौने अपनहि गात बड़-बड़ा रहल अछि कात हिं-कात राहत कर्मचारी कऽ रहल काम आॅफिसर पुछैत अछि कि भेल नाम ओ कहैत अछि- हमर बच्चा बेराम करम भेल बाम गिलासक घोरल सतुआ चाटि लेलहुँ काटि हम तीन दिन गिन-गिन नहि अएलाह कोनो सरकार केकर करब हम जय-जयकार हमरा पूरा अछि-षक तू छहक असली ठक कियक कहैत छहक खा ले सबटा सतुआ एकेबेर साँझ मे आबि जेतौ राहत सेरक-सेर एखनहि खा ‘केँ’ जान बचा सरकारक मान बचा खा ले भरिपेट प्राण बचा तिन दिन नहि आयल आब कि आयत अपन पेट भरत कि हमरा खिआयत हेओ सरकार अपरम्पार हम ओहिना नहि फानैत छी सब किछु जानैत छी जखन तक सतुआ, तखन तक आस सधि जाइत सतुआ तँ भऽ जाइत विनाश। (अन्तमे) जीनगी जीनगीक कथा बाँचि रहल अछि भूत भविष्यक छाँह नाचि रहल अछि काल इतिहास केँ बाँचि रहल अछि अवगुण आब गुणकेँ झाँपि रहल अछि सरकार दुःखकेँ नापि रहल अछि। दिलक बोल शब्द नहि रहल दिलक बोल तेँ नहि रहल ओकर मोल औनाइत रहल ओ अपनहि खोल कतबो करब अनधाेल बजैत रहैत छी अमरीत बोल भीतर रखने बीखक घोल नाश भऽ जाएत जीनगी अनमोल जहिया टघरत बीखक घोल एकदिन खुगि जाएत सभटा पोल मुखमे राम बगलमे छुरी सभ करत तब थुड़ि-थुड़ि दिलक बोल अछि शब्दक जान दुनू मिलि देत मान सम्मान।। अहिंसक वीर अहाँ कहैत छी- कायर बनबसँ नीक हिंसक भऽ जाएब से अछि ठीक लोग कहत- वाह-वाह किन्तु हमरा लगैत अछि ई अधलाह कायर मारि दैत अछि अपने आपकेँ दाबि लैत अछि अपन दुख आ तापकेँ हिंसा कऽ सकैत अछि दुरजन हिंसक नहि कऽ सकैत अछि सिरजन दुनूमे अछि अपन-अपन अवगुन आ गुन एहि दुनूसँ ऊपर अहिंसक वीर -धीर- गम्भीर दृष्टिमे हो आमजनक पीड़। मनोवांछित चान दीर्घ कामनाक भऽ गेल अवसान लगमे अछि बैसल मनोवांछित चान दमकैत आ गमकैत किशलय समान किन्तु देिख ओकर मुख म्लान बिसरि गेलहुँ हम मिलन गान पसरल नोर आँखि आर मुख कहि रहल अछि एक-एक दुख भाग्यसँ भऽ गेल बाइर फेर ने हुसि जाए पाइर- शंकासँ भरल ओकर मन नव स्पर्शसँ कंपित तन तेँ राखए चाहैत अछि सम्हारि दूइ बून्न आँखिसँ नोर झड़ल हमरो तब बाजय पड़ल धीरज धरू छोड़ू पुरान आस नूतन अछि सोझा तहिपर करू विश्वास घुरि अएलहुँ अहाँ अपना घर हमरा रहैत नहि करू कोनो डर फुलाएल एक एक अंग बजैत चलल संग-संग जेकरा छोड़ि अएलहुँ सेहो छल हमरे घर नहि छी देवता अहूँ छी साधारण नर शून्य बाट अछि ताकि रहल आगूमे अछि धुँध भरल तइयो ओहिपर चलहिं पड़़ल। परेमक अधिकार आँखिक भीजल कोर गिरल दूइ बून्न नोर जाहिमे देखलहुँ अहाँक रूप ओहिना स्मरण अछि दुलहिन बनल ओ रूप-अनूप कनेक तेज साँसक वेग नहु-नहु उठैत डेग नैहरसँ सासुर दिश हमरा छातीपर फाड़ैत चीस आँखि बनल भादोक झहरैत मेह सँगीसँ टूटैत नेह नहि देखि कोनो उपाए निशब्द फाटैत हमर हिरदय कतेक अहाँ सहने रही बिनु शब्दे कहने रही- “हमरा दाबने अछि माए-बाप आर समाज तेँ होइत अछि लाज किन्तु अहाँ छी पूरा डेरबुक पुरूष छी तइयो छाती धुक-धुक नहि कएलहुँ परेम जेना कएलहुँ चोरि हमरो जीनगीमे देलहुँ जहर घोरि प्रश्न उठैत बारम्बार साहस बिहीनकेँ छै प्रेम करबाक अधिकार” बैसल रहि गेलहुँ पछताइत जीनगी भऽ गेल अन्हरिया राति चलैत रहल काल उठैत रहल मनमे अहाँक सवाल आइ सुनलहुँ दूटा पाँति भोरे-भोर आँखिसँ गिरल अन्तिम दू बून्न नोर कहलहुँ अहाँ- “बीतल छन केँ आब बिसरि जाउ जीनगीकेँ दोसर ढँगे सजाउ।” मधुर गीत अपनहि छातीमे छुरी मारि हम काटै छी बपराहैड़ गिर रहल अछि बून-बून धरतीपर हमर खून के मारलक एकरा छुरी ओकरो आइ तोड़ि देबै मुड़ी लोग सोचैत अछि के छल एहेन मरमी-घाती किन्तु असलमे छी हम स्वयं आत्मघाती कतऽ सँ आएत एहेन उक्ति जे देत हमरा एहिसँ मुक्ति कतऽ सँ टूटत एहिसँ नाता स्वंय छी हम एकर जन्मदाता केना प्रसन्न भऽ नाचैत अछि लोग हमरा कोन धऽ लेलक रोग सभटा भेल अभाेग समए भेल जाइत अछि गत हमरो ताकऽ पड़त ओ पथ जाहिसँ छुटए बीख भेटए अमरीत हमहूँ गाएब मधुर गीत। सिर बिहून धड़ गौंआ-घरुआ आओर बरियात कियो नहि बुझि रहल अछि बात किएक नहि वर कऽ रहल सिन्दूर दान कि कियो कएलक हुनक अपमान बराती सभ तोड़ए तान केहेन अछि ओछहा खानदान बन्न भऽ गेल अछि मंगल गान सिनूर लेने ठाढ़ दूल्हा भेल अवाक नाचि रहल अछि माथक चाक फानि रहल सभ कातहिं कात कन्याकेँ कहाँ अछि माथ सिन्दूर कतए देल जाएत देखतहि तँ सभ गोटे पड़ाएत सिर बिहून धड़ बैसल अछि मनमे संशय पैसल अछि नहि अछि सौंथ नहि अछि मांग पीने छह सभ गोटे भांग कियो नहि देखि रहल अछि साइत सिनूर कतए देल जाएत बढ़ल जा रहल अन्हरिया राति एक-दोसर दिशि रहल अछि ताकि अकचकाइत गौंआ पुछैत अछि किएक रुसैत अछि दूल्हा आर की लेताह ओझा लेखे गाम बताह। हथियारक सभा जमा भेल सभ अस्त्र-शस्त्र पहिरने अछि खूनियाँ वस्त्र उच्च आसनपर संच-मंच बैसल अछि पाँच पंच सभसँ पैघ कोन हथियार निर्णय करबाक लेल तैयार के अछि श्रेष्ठ के अछि हीन गुण-अवगुणकेँ रहल अछि गिन कएने होएत जे पैघ संहारक काज वहए पाओत ई रक्तिम ताज कतेक बेर भेल अछि प्रहार कतेक कएने अछि नरसंहार सतयुगसँ कलियुग धरि आदिम युगसँ वर्तमान धरि सभ हथियारक बनल अछि इतिहास के कतेक बनौलक दास कतेक के कएलक विनाश पाषाण, लाठी आर अणुबम कियो नहि अछि ककरोसँ कम शक्तिक मदमे सभ रहल फानि ताल ठोकैत अछि देह तानि वीर, महारथीक जहिया बनल छलहुँ भक्त पीने रहि ओहिदिन भ्रिपोख रक्त सभ बाजए-हम छी जेठ हमरा सोझा सभ अछि हेठ पंच बजलाह- सुनह लगाबह घ्यान खोलह अपन-अपन कान तब भेटतह आजुक सम्मान बिनु देहसँ गिरौने रकत कऽ सकैत छह दोसर जुगत आँखिसँ बिनु गिरौने नोर दोसर तरहें लगा सकैत छह जोर बिना कोनो दबावकेँ जे करबौने होएत स्वीकार अपन सर्वोतम विचार बिनु हिंसाकेँ जे कएने होएत हृदयपर राज ओकरे भेटत ई अमूल्य ताज एखनुक निर्णय इएह भेल ठीक आगू आएत विचार आओर नीक पंचक निर्णय सुइन सभ लेलक कान मुइन सबहक माथपर गिरल गाज अहिंसा दिश बढ़ल ताज ककरो मुँहसँ नहि फुटय बकार सत्य अहिंसाक जय-जयकार घातक गंध आसमानसँ बरसैत आगि त्रसित जीव रहल अछि भागि लाल-लाल जेना काल रुप विकराल सँ बँचबाक हेतु आश्रयकेँ अन्वेषणमे भागि रहल अछि हरिणी कतऽ भेटत निरापद धरणी सोचैत मनमे गहन बनमे खोजि रहल अछि छाया बचेबाक लेल कोमल-काया दौड़ि रहल अछि छोट-पैघ तरुवरकेँ छाँहमे सनाहमे किन्तु गाछ सभसँ निकलि रहल तीव्र आर मन्द घातक दुर्गन्ध ओ सहि नहि पाबैत अछि किनको कहि नहि पाबैत अछि जेना बनि गेल जीभहीन गनि-गनि काटि रहल अछि दिन किन्तु कहिया तक काटत झड़क तेँ ओ जना रहल अछि आ बना रहल अछि फेसमास्क आओर छाता मोकाबिला करत आब ओ ओहि दुर्गन्धसँ कवच पहिरि ठाढ़ भेल अछि अपनहि सुगन्धसँ कुहेसक परदा कुहिेसक सघन आवरणसँ आवृत भऽ गेल छी हम निर्जन पथपर भयत्रस्त भेल खोजि रहल छी चिर परिचित मार्ग गंतव्य प्राप्तिक हेतु किन्तु दिशा भ्रमित भऽ गेलासँ ज्ञात नहि भऽ रहल अछि जे पूरब चलि रहल छी वा पश्चिम तखनहि हमरा देहसँ टक्कर मारैत अछि तीक्ष्ण प्रकाश झन-झना उठैत अछि मन चौन्हिया गेल चक्षु सँ देखैत छी जे हमर छाँह ठाढ़ भऽ गेल अछि भूत बनि कुहेसक परदापर ओ करए चहैत अछि भयभीत हमरा किन्तु इजोत देखा देलक बाट जे अछि सपाट। युग्मक फाग-पत्री (प्रथम) फगुआक रंग लागल अंग-अंग जागल अनंग अहाँ नहि छी संग। (द्वितीय) शीत भागल बसंत जागल पिक पागल कतए छी अभागल। (तृतीय) रितुराजक सुमन झूमैत कण-कण पिपासित मन अहाँ छी दुसमन। (चतुर्थ) कहने रहि- नहि घबराएब हम शीघ्रे आएब आब कतेक कमाएब ई मधुमास पुनः पाएब। (पंचम) परेमक संगहि विरह रहत जीनगीक संगहि गिरह रहत आब कतेक मन दुख सहत आउ न फगुआ की कहत। आगमन अहाँक आगमनसँ अंत भऽ गेल आँखित पतीक्षा आस छल आएब अहाँ किन्तु नहि जनैत छलौं आबि सकब अहाँ एतेक शीघ्र सोचने छलौं अहाँक स्पर्श होएत मृदुल आओर कोमल मलयानिल सन सुखद परन्तु अहाँक अएलासँ झन-झना उठल हमर हृदय किएक तँ अहाँक आएब नहि अछि सच्चा कहि रहल गोदीक बच्चा पतझड़ी जिनगीक आब हमरा करए पड़त सामना तइयो अहाँक लेल कऽ रहल छी मंगल कामना। जाति ओ कहलथि- ‘कनेक भऽ जाउ कात आर दिअ अपन परिचए-पात’ हमरा कहए पड़ल- अपन नाम-गाम आओर काम बजलाह ओ महाशय- ‘हमर आशय नहि बुझि सकलहुँ साइत हम पुछै छी जाति’ मूनने अछि ओ नाक हम भऽ अवाक निहारि रहल छी हुनक मुख ओ नहि बुझि सकलाह हमर दुःख। बदलैत बाट सोझा राखल दर्पणमे देखैत स्वयंकेँ छुटय लागल निश्वास आ ओहि उच्छावासक भापसँ बनए लागल दरपन मध्य नव-नव आकृति कोनहुँ सुखद कोनहुँ दुखद जेना, बर्तमान, भूत, भविष्यक खेतमे उपजि रहल हो नव-नव बिम्ब कोनहुँ कल्पित कोनहुँ स्मृत ................... किन्तु जठराग्नि तेज भेलापर बिसरि गेलहुँ अपनाकेँ निहारब बिदा भऽ गेलहुँ भनसा घर दिशि रोटीक खोजमे। भितरिया जानवर बन्हने छी बुद्धिक मजगूत कड़ीसँ एहि भीतरिया हिंशक पशुकेँ तइयो, कछमछाइते रहैत अछि कनेको दोग भेटलापर ठाढ़ भऽ जाइत अछि-फन-फनाक आ हम उनटे पाएरे आपस भऽ जाइत छी पुनः जंगली युगमे किन्तु भऽ जाइत अछि डर......... स्मरण कऽ ओहि युगक समस्याक तँइ आब करए पड़त सशक्त एहि कड़ीकेँ बाउल परक माछ तप्त रेतपर फड़फड़ाइत माछ कानि-कानि कऽ रहल नाच रेतापर फाड़ैत चीस उड़बाक लेल आसमान िदश ओ उछलि पड़ल अभागल देहसँ झड़ए लागल चॉंदीकेँ कण झूमि उठल कतेको ऑंखिक मन जरि रहल अछि माछक तन सुना रहल ओ दर्द भरल जीनगीक इतिहास डूबल हम आनन्द लोकमे कऽ रहल छी परिहास कहियो छल नाचैत ओ स्वजन-परिजनक बीच जालमे फसा कऽ मछेरा लओलक तटपर खींच ओ कानल िगड़गिड़ाएल िकन्तु, बचाबए लेल िकयो नहि आएल आब जतए जाएत नोचत अोकर मॉंस छीन लेत चलैत सॉंस तइयो नहि अछि निराश घेरासँ छुटबाक कऽ रहल प्रयास छुिट कऽ जतए िगरल बाउलसँ चारूभर िघरल आओर ओ जे छल जीनगी-जल सपना भऽ गेल गरम रेत अपना भऽ गेल। कांध परक मुरदा हमरा कान्ह परक मुरदा बाजैत अछि पुरना गप्प नव अन्दाजे साजैत अछि कहियो दोस जेकॉं बतियाबैत अछि कहियो दुसमन जेकॉं लतियाबैत अछि हम भागए चाहैत छी दूर िकन्तु बेबस, असोथकित देह भऽ गेल अछि चूर-चूर कान्हपर सँ एकरा हटाबए चाहैत छी भार िकछु घटाबए चाहैत छी तीनठाम नहि तँ एकेठाम पहिले करए चाहैत छी इएह काम फेकए चाहैत छी कंधासँ बचए लेल गुलामीक धंधासँ पिबैत अछि ओ हमर रकत तइयो बनल छी हम भगत हमरा चारूभर पसरि रहल बीख भरल दुर्गन्ध फाटि रहल नाक केहेन अछि भयावह गन्ध िकन्तु ओ हमरा कान्हपर अड़ल अछि हमरा मॉंस आर खूनमे गड़ल अछि मृत आओर जीवन्त लहू िमलैत रहल फूल कम आ बेसी कॉंटे खिलैत रहल सर, नहि सहब आब आत्मघाती प्रहार हमर कान्ह आर बॉंहि तनि कऽ अछि तैयार चाहे, टूटि जाए साँस बहि जाए खून उखड़ि जाए माँस अछि एहन िवश्वास हटत लहास फैलत उजास। मिझाइत दीया भुक-भुकाइत दीपक सम्पूर्ण शक्तिसँ संघर्षरत पराभूत करबा लेल सघनतमकेँ लगा रहल देहक बाती जीनगीक तेल िकन्तु, अथक प्रयास भऽ रहल फेल एक रत्तीक बाती दूइ बून तेल कतेक कऽ सकत खेल भऽ रहल अवसानक इजोत पड़ि गेल जेना अन्हारकेँ नोत फेर फक्क दऽ मुझा गेल अन्तिम सन्देश सुझा गेल प्रभुत्व सम्पन्न पओलक राज घुप्प अन्हार पहिरिलक ताज चोर उचक्काक अत्याचार नहि रोिक सकताह अन्हार सरकार हे प्रकाश, जुनि खसाउ नोर आिब रहल अछि नूतन भोर। िहत-अहित गप्प एकटा गूढ़ कहने रहथि गामक बूढ़ ‘‘अपन धीया-पुत्ता जानि लिअ हमर बात मानि, सॉंपक मन्तर आ खाटक बानि अनकर जीवन अपन हानि’’ ‘‘सुनू यौ बाबा हमरो अछि दावा अनकर हित तँ अपनो हित दोसराक करब अहित अपनहुँ भऽ जाएब कहियो चित पड़ोसिया घरमे जँ लागि जाए आिग तँ िक हम ओहिठामसँ जाएब भागि लगत पसाही उड़त कुकवाहा हमरो घर भऽ जाएत स्वाहा’’ उनटा घुमए लागल माथक चाक भऽ गेलाह ओ अवाक्। प्रयास बाँिहक लगौने चुट्टा उखाड़ि रहल छी खुट्टा िकन्तु नहि अछि ई खुट्टा भऽ रहल भान ई अछि बरिसों पुरान सुखाएल गाछ रोपल बाउल माटिसँ धोपल केहेन जाल िखरा देने छी रोपल गाछमे भिड़ा देने छी जे अहाँ बूते नहि होएत गारल से हमरा बूते कोना हएत उखारल तद्यपि लगा रहल छी जोरपर जोर िहलबे करते थोड़बो-थोड़ कतेको जोड़ी आँखि हँसैत अछि हँसले घर कते बेर बसैत अछि। ऑफिसक भूत सभ कुरसीपर भूत नाचैत अछि ऑंखि आ अँगुरीसँ दाम बॉंचैत अछि कुरसी अछि वएह बदलैत अछि ओकर मुख िकन्तु नहि बदलैत अछि हमर दुख सभ मुखपर अछि ओकरहिं राज मुँह नहि खुलत तँ होएत कोना काज कुरसी हो पैघ आिक छोट कऽ रहल चोट कऽ रहल-चोट ओ नचबैत अछि ओकरा मनकेँ शोणित पिबैत अछि साधारण जनकेँ हेओ समाज कोना होएत हमर अटकल काज अछि विश्वास लगौने छी आस आएत कोनो गुणी आर सच्चा दूत जेकरा देखतहिं भागत भूत वएह करत सबहक उपकार भऽ जाएत हमरो उद्धार। हे प्रकाश, जुनि खसाउ नोर आबि रहल अछि नूतन भोर। कठुआएल-रूप एहि मुरूतकेँ पूजैत आ गबैत मंगल गान हम भेलहुँ जवान मनमे छल पूर्ण आस भरल आत्मविश्वास विपत्तिमे होएत सहाइ दैत रहलहुँ दोहाइ करैत रहलहुँ जय-जय किन्तु हिनका सोझेमे सभ कुछ हेरा गेल हमरा सँगे भेल अन्याय ओ देखैत रहल निरूपाय नहि भेटल मेवा किएक करब सेवा थुड़ि कऽ देबै फेक नहि रहए देबै रेख क्रोधसँ कँपैत हम चला देलिएक लट्ठ िहनका माथपर आ गातपर टूटि कऽ भऽ गेल छहोछित हम भेलहुँ आश्चर्य चकित पर आशाक बीपरित मुरूतक भीतरसँ निकलल भयावह रूप टुकुर-टुकुर तकैत भेल अछि चुप्प हमरा दिश देखतहि ओ लटुआ गेल लाजसँ कठुआ गेल। सुनगैत चिनगी छाउरक ढेरीपर मिझाइत चिनगी सोचि रहल अछि अपना शक्तिक विषएमे “डाहि सकैत छलहुँ सम्पूर्ण विश्वकेँ किन्तु पड़ल छी आइ उपेक्षित सन जीबि रहल छी एहि आशापर जे उठत जोरगर बसात करत हमरा साथ पहुँच जाएव भुस्साक ढेरीपर आ पुन: लहलहा उठब हम तखन डाहि देव ओहि महलकेँ जे रँगल अछि शोणितसँ खाक कऽ देव ओहि जंगलकेँ जाहिमे नुकाएल रहैत अछि कुमंत्रणा करैत हिशंक जन्तु आ हम अपना धधरासँ लिखब नभपर नव इतिहास।” अहॉंक अगवानीमे हम सोचलहुँ-भेल अछि शुभागमन िकन्तु बसात बनौलक पदचापक भ्रम के रोकि सकैत अछि उड़ैत मनकेँ फड़कैत तनकेँ तेँ विवशताबश बन्न दरबज्जाक-रन्घ्र बनि गेल-चक्षु निहारबाक हेतु चानकेँ किन्तु डर छल उमड़त धनकेँ तइयौ-आसमे डूबल दिलकेँ थामि एकटक तत्पर छी अगवानीमे परन्तु, भूत बनल जा रहल वर्तमान कि पथ अछि कंटकमय वा दिल पाषाणमय भविष्यक अागिमे जरैत मन नीरीह तन। महत्वाकांक्षाक गाम रथासीन भेल छी हम आ रथकेँ घिंचने जा रहल अछि वेगयुक्त अश्व उबड़-खाबड़ सड़कपर दलमलित करैत भऽ रहल अछि शीघ्रतासँ अग्रसर हमरा हाथक कोड़ा “सट-सट-सटाक” पड़ि रहल अछि-उज्जर घोड़ाक पीठपर पड़ाएले जा रहल अछि लाल रंगक वाहन शब्द भेल- “धड़-धड़-धड़ाक” हरियर रंगक पहिया खसि पड़ल खाधिमे एखन अछि सुदूर-गन्तव्य हमर महात्वाकांक्षाक गाम तेँ फेंकि देलहुँ कोड़ा लगेबाक हेतु जोर-रथक जुआमे लगा देलहुँ कान्ह देखियौ आब तान। एकटा चुप्पी ई हमरा पाछू धेने रहैत अछि छोट आ पैघ भऽ कऽ हरक्षण उठैत-बैठैत, चलैत-फिरैत, सुतैत-जगैत देखैत रहैत अछि हमरा दुष्कर्म आ सुकर्मकेँ किन्तु किछो नहि बाजैत अछि सभ हमरा छोड़ि सकैत अछि परन्तु ई नहि छोड़ता ई पछुआ भऽ गेल छथि-हमर किन्तु अन्हारमे गेलापर भऽ जाइत अछि- लुप्त पुन: शीघ्रे प्रगट भऽ जाइत अछि पछुआ रहितो ई चुप्पा समदर्शी अछि एकरा नजरिमे सभ बराबरि नहि केओ धनीक नहि केओ उँच नहि केओ गरीब नहि केओ नीच नहि कोनो नाम नहि कोनो गाम तेँ हम कऽ रहल छी परनाम। छड़पटाइत लहाश अन्हार राति निर्जन बाटपर पड़ल हमर लहाश कि जरेबाक वा दफनेबाक नहि छै ओकरा? कात भऽ कऽ नाक मुँह घोंकचाबैत किएक पड़ाइत अछि लोक केहेन संक्रामक अछि रोग बीतल जाइत अछि राति भऽ जाइत भोर फेर वएह प्रतिदिनक शोर पुन: आएत राति कन्तु हमर ई लहाश गन्तव्यपर पहुँचत कहिया कखैन देखत अनचिन्हार असमसानकेँ जे अछि तैयार कएल गेल एहि अंत्येष्टि युगक व्यवस्था द्वारा। रूसल धीया कथीले एलौं सासुरसँ रूसि भऽ गेलौं हल्लुक, गप्प छलै फूिस सासुर बास जीनगीक बास नैहरक बास चासे मास असगरे एलौं आब की रहल बॉंकी ऑंखि उनटबैत बजली लालकाकी- नहि बाजू ढाकीक ढाकी नहि सोहाइत अछि चुप रहू काकी फाटि गेल आब हिया कनैत बजली धीया टूटलाहा घर आ तोतराहा बर थप्पर चलबैमे सभ तुर चरफर सासु चलाबै ठुनका पति भॉंजैत अछि डॉंग केकरा कहबै मोनक बात ससुर पीबैत अछि भॉंग पहिने बचत जान तबने राखब कुलक मान कतबो नीकसँ करैत छी काज तइयो वएह उलहन-उपराग ई नहि छी हमरा भागक खेल जानि बुझि पठेलहुँ ओहि जेल राखि लेलहुँ छातीपर पथ्थल नहि रखने छी डर चाहे किछो बितइ आब नहि जाएब ओहि घर। बसातक धुजिनी सदैव ई मकड़ा सभ बढ़बैते रहैत अछि जालकेँ आ फँसबैते रहैत अछि कीड़ा-फतिंगाकेँ तैयो, भिन-भिनाइते रहैत अछि निडर भऽ कऽ दू-चारि गोट आ तेँ फँसैते रहैत अछि छद्म-चालिमे ओना ई आवृत रहैत अछि निर्बल किन्तु, नहि कएलक कहियो तोड़बाक प्रयास ओ डेरबुक सभ परन्तु- आइ उठल अछि पुरबा बसात आ जोरगर मेघो अछि ओहि कात आबि रहल गड़-गड़ाइत तोड़ैत ताल टूटि जाएत आब ई प्रपंची जाल। अदृश्य आगि- एहि भीतरिया धधरामे जरि रहल अछि हमर ओ आकांक्षाक गाछ कतेक पैघ भऽ गेल छल एकर डारि-पात कतेक झमटगर आ विस्तृत बुझि पड़ैत छल एकर शीर्ष भऽ गेल हो गगनचुम्बी असंख्य लोग बिश्राम पौने हेता एकरा छॉंहमे किन्तु ई अदृश्य आगिक धधरा केहेन निर्मम अछि जे भष्म कएने जा रहल अछि सौंसे गाछकेँ नहि अछि अग्निशामक यंत्र हमरा लगमे आ जँ रहबो करैत तैओ नहि मिझा सकितहुँ जँ मिझायो जाएत तँ कि भेटैत छाउरक अितरिक्त। तीन मित्रक गपशप बहुत दिनक बाद मित्र मिलल तीनूकेँ मनक फूल खिलल पहिल पूछलक दोसरसँ- कहू मित्र सुखी छी वा दुखी उत्तर देलक भऽ कऽ दुखी- सभ कुछसँ छी भरल-पूरल सुरा-सुन्नरी रहैत अछि बगलमे पड़ल तइयो नहि छी सुखी हरक्षण रहैत छी दुखी उत्तरदाता प्रश्नकर्ताकेँ दैत गारि खाली गिलासमे दारू देलक ढारि हेओ मित्ता हमरेटा नहि सताउ किछ अहूँ बताउ- जीनगीक टूटलाहा नाहमे हरदम रहै छी अभावमे तैं ने माथ अछि झुकल ठोर अछि सुखल दुनू तेसरपर ऑंखि गड़ा देलक हाथमे लाल बोतल धरा देलक- अहूँ किछ बाेलू दिलक बात खोलू- हम छी मस्त फकीर नहि अछि कोनो फिकिर देह आ माेनसँ छी स्वतंत्र नहि करै छी केकरो बनगी जी रहल छी अपन जीनगी नहि छी दुखी मनसँ छी पूर्ण सुखी दुनू भेल चकित मुँहसँ निकलल वाणी- अहॉं नहि छी सॉंच या बजैमे करै छी बेमानी पशु छी या देव नहि तँ दानव एहि धरती परक नहि छी मानव। नव बिहार बनाएव हम नव िबहार छूबि लेब सफलताक दुआर प्राचीण ध्वंसावशेषपर पूर्व मिलल संदेशपर रचबाक अछि मजगूत िदवार सचेत भऽ रखबाक छै ईंटा बारम्बार कर्मरत हो बाल-अबाल उन्नत होएत सबहक भाल सफलता कए रहल पुकार बनाएव हम नव िबहार बिच्छिन्न गेहमे तम छिपल अछि सभकेँ दिलमे गम छिपल अछि एकरा निकालबाक हेतु भऽ जाउ तैयार बनाएव हम नव बिहार पुरान रंग आर संग सजेबाक अछि हरितिमाक रंग नव सृजित सज्जित महल भऽ जाएत तैयार बनाएव हम नव बिहार सुविचार जन-जन करू आइ अपना सभ प्रण करू मिलि कऽ कदम बढ़ेबाक लेल भऽ जाउ तैयार बनाएव हम नव बिहार। मुँहझप्पा एहि मेलामे कतए हेरा गेलौं मित्र! खेजैत-खोजैत भेल छी-अपस्यॉंत परन्तु अहॉं तँ ओढ़ि नेने छी-मुखौटा अहॉंक चीन्हब भऽ गेल कठिनाह एहि सम्पूर्ण भीड़मे मुखौटेधारी छथि-सभगोटे कऽ रहल अछि काज मुखैटेक भीतरसँ आदति पड़ल छन्हि सभकेँ पहिरबाक आहि, आब नहि भेटत-हमर िमत्र आननपर ब्याध्रानन लगाकए ढुकि गेलाह एहि युगक मुखौटाबला जातिमे निकलि रहल अछि नोर टप-टप ऑंखि भऽ गेल-झलफलाह बढे़लहुँ हाथ नोर पोछबाक हेतु फट्ट दऽ ठेकल मुखौटा अहि रौ तोरी ई कोन बात भेल संताप लटकल अछि केहेन खप्पा हमरो मुँहपर मुँहझप्पा। टूटल बन्हन ई भूखल भेड़िया लेर चुबबैत एकटक प्रपंची ऑंखिसँ ताकि रहल अछि-आहार आ कऽ रहल अछि-स्मरण सरस स्वादक पूर्व प्राइज़ शिकारक सँग घटित घटनाक चित्र आबि रहल दृष्टिक सोझा आ दोगमे छपकल शिकारी अछि सन्नद्ध बुद्धिक तीक्ष्ण तीर लऽ कऽ किन्तु चंचल भेड़िया कखन मारत हबक्का तकर अपनहुँ नहि छन्हि पता जठराग्नि तेज भेलापर बिसरि जाय छथि स्वजन-परिजनकेँ मनक बन्हन टूटि सकैत अछि कखनहुँ आ कए सकैत अछि- आधात चिर संचित पवित्र अंगपर आ कऽ सकैत अछि विकृत मनकेँ तैं तेज तीर चलादेब आवश्यक वा नहि तँ कऽ दियौक नव आहारक व्यवस्था। अढ़ाइ हाथक सांगि कतेक दुख भेल हेतै बाबूकेँ ओहिदिन भाइ हम जानि रहल छी याद पाड़ैत तरे-तर कानि रहल छी हमर बाबू छोड़ि काम एहिठामसँ कनेक बाम एकचारि तरमे रहै ठाढ़ ओहिदिन जहिया हम दुनू भॉंइ होइत रही भिन्न दुखसँ भेल खिन्न। बजल रही हम- एगो बेटा तीत आ एगो बेटा मीठ चुप रहू अहॉं बाजि नहि सकैत छी अपन गोटी भॉंजि नहि सकैत छी गप्पक खेती खूब करै छी चुप्प रहू हरदम बीख बजैत छी भेलो काजकेँ फेर गिजैत छी। कहने रहथि बाबू- हेओ बउआ नहि होअ भिन्न नहि भेटतह पलखति राति और दिन कपारपर लादल छह कइएक हजार श्रृण फुटा कऽ बदला लेतह सभ गिन-गिन। देने रही हम जवाब- एतेक दिनसँ कि केलहुँ विकास सभ चीज-वित्तकेँ केलहुँ नास बेचि बिकैन खेलहुँ सभ चास-बास देखैत छिऐ लाठीक हूर कऽ देब अखने पेटमे भूर। आइ हमरो दुनू बेटा भऽ रहल अछि भिन्न बॉंट-बखरा कऽ रहल गिन-गिन हम कछमछाइत ठाढ़ छी ओहिना बरिसों पूर्व हमर बाप करैत रहथि तहिना। बेटा कहैत अछि- शटअप मंदिरमे जा कऽ करू जप केहेन छी अहाँ गार्जियन कि कएलहुँ उपार्जन गप्प हँकैत खेलैत रहलहुँ ताश सभटा पुश्तैनी सम्पतिकेँ कएलहुँ विनास। ओना आब बजै छी कम तइओ नोर पोछैत बजलहुँ हम- कतेकसँ दुसमनी कतेकसँ मेल कइएक बेर खेललहुँ हुड़दंग खेल आगू बढ़बाक लेल कतेक कएलहुँ प्रयास तइओ रहि गेलहुँ पाछू आगॉं पड़ाइत रहल विकास हओ बउआ कतेक हमरापर बान्हैत छह झॉंगि सभपर छै अढ़ाइ हाथ सॉंगि। कानैत अधिकार अनुशासनक सीमापर कतेक कालसँ बैधानिक अधिकार रहल अछि कानि झॉंपि रहल अछि सबकुछ जानि स्वर दबल सन देने अछि मानि भीतरसँ विरोधक चिनगी निकलि रहल फानि फानि। आबद्ध हमर शरीर बान्हल अछि कड़ीसँ कनेको हिलबैत देरी झन-झना उठैत अछि ओहि शब्दसँ मन सिहरि उठैत अछि केहेन नचार भेल छी-हम टुकुर-टुकुर तकैत देखि सकै छी मात्र एकटा सपना स्वतंत्रताकेँ कतेक अन्तर अछि कल्पना आ यथार्थमे लगा रहल छी जोरपर जोर-तोड़बाक नहा गेल छी-घामसँ नि:सृत केहेन विचित्र गन्ध निसॉंस लेबामे बुझि पड़ैत अछि कठिनाह वस्त्र भऽ गेल अछि गोंत भिज्जू जकॉं असोथकित भऽ सोचि रहल छी निर्माणकर्ता एहि कड़ीकेँ छी हम स्वयं तइओ छी असमर्थ-तोड़बामे बौआ रहल अछि-मन स्मरणक गहन वनमे सतत् सचेष्ट भऽ ताकि रहल छी कड़ीक कमजोर भागकेँ। हम पुन: उठब एकबेर हम पड़ल छी मृत्यु शय्यापर चिर रोगाह छूत व्याधिसँ ग्रसित मैल वस्त्र फाटल, सड़ल नीच कुलक चिर उपेक्षित देखैत छी जे धर्मराजक आज्ञासँ आबि रहल अछि यम हमरे दिश हमर प्राण निकलिकेँ ठाढ़ अछि कातमे थर-थर कॉंपैत हम बनि गेलहुँ लहाश किन्तु यम सब ठमकि गेलाह हुनका मुखमण्डलपर घृणा मिश्रित भय छनि डर किएक से नहि जानि नाक मुँह सिकोड़ैत ओ घुरि गेलाह आ चुपचाप ई खेला देखि रहल अछि हमर प्राण निरूपाय भ’ पुन: ओ ढुकि गेलाह हमरा शरीरमे आ हम टन-टना क’ ठाढ़ भ’ गेलहुँ आब पड़ेबाक प्रयत्न क’ रहल अछि सब हमरा डरे घृणाकेँ पछाड़ि देलक भय कॉंपि रहल छथि थर-थर डरसँ धर्मराज बिदा भेल छी आब हम हुनके सिंहासनकेँ ओंघरेबाक हेतु किन्तु कमजोरी सन बुझि पड़ैत अछि हमरो तेँ किछु काल ठाढ़ भेल छी शक्ति संचय करबाक हेतु। दरपनक स्थिति जर्जर खूँटी आइ टूटि गेल ओहिपर लटकल शीशा धॉंहि द’ खसि पड़ल भ’ गेल छहोछित्त चित्रित दीवार मध्य कतेक घमण्डसँ छल स्थित जाहिमे देखि आननकेँ अपनाकेँ धन्य बुझैत छल-रूपधनी से भ’ गेल आब उपेक्षित पाएर बचा क’ चल’ पड़त ओहिठाम किन्तु एकरा प्रत्येक खण्डमे बनि रहल प्रतिबिम्ब कोनहुँमे मात्र ऑंखि कोनहुमे मात्र कपार विचित्र वीभत्स ओ कहियो नहि सोचने छल- एहन अवसान होएत हमर। मिलन बाध नील गगनमे भेल मगन उड़ैत पॉंखि संगहि ऑंखि जोड़िक सँग नव उमंग मिलन हेतु आकुल जेना पियाससँ भेल व्याकुल अछि पूर्ण आस मिटत संचित पियास करैत बात उतरल साथ बनल घर पल्ल्व तर तरूक डारिपर दूइ हृदय मिलत नव फूल खिलत किन्तु व्याधाकेँ कनहा ऑंखि रहल अछि ताकि क्षुधाक पहिरिने खोल नाचैत नेत्र गोल-गोल भ’ रहल तैयार-प्रपंची हथियार आर चलाएत तेज तीर देत देहमे पीर तइसँ ओ नहि डरत परेम कहियो नहि मरत। शिष्ट-अशिष्ट भीड़ मध्य दसो अँगुरी जोड़ैत टेढ़ भऽ गेल हमर हड्डी कियो दैत अछि- आर्शीवाद कियो नमस्कार किनको मुँहसँ निकलैत अछि “नहि चीन्हलहुँ....” तब बिधुआ जाइत अछि हमर मुँह परन्तु गोटेक तँ घुरियो नहि तकैत अछि हमरा जुटल हाथ दिशि मन अनोन भऽ जाइत अछि लागैत अछि जेना- नङटे ठाढ़ छी आ लोक सभ चला रहल अछि आँखिक तीर ताहि कारणे छोड़ि देलहुँ हथजोरी करब आ सिर झुकाएब अाब चलि देने छी- सोझहिं गुम्मा बनि। ढहैत महल नहि जोरगर बिहाड़ि नहि झितिकम्प भेल शायद आधार छल कमजोर भेल तेँ ई विश्वासक महल ढनमना कऽ गिर पड़ल खण्ड-खण्ड भऽ गेल- रँगीन दिवार जेकरा ठाढ़ करबामे कतेक अमूल्य काल-छल नष्ट भेल उतुंग गिरि सन-जर्जर भवनकेँ खसलाक भयंकर शब्दसँ चिड़इ-चुनमुनी उड़ि गेल बिहाड़ि सन लगैछ उड़ैत धूरा मध्य बनि रहल-नव आकृति ओ सभटा वृति जेकरा बरिसों पहिले छोड़ि-छोड़ि मातल छलहुँ निन्नमे। अश्रुधार हमरा प्रेयसीक नैनसँ बहैत रहैत अछि हरक्षण नोरक- नदी आ ओहि अश्रुजलमे लोक करैत अछि- अवगाहन केकरो ठण्ढ़ा आर केकरो होइत अछि गर्मानुभूति कियो कहैत छथि- वाह-वाह कियो कहैत छथि- बड्ड अधलाह किन्तु आन्हर-बहीर हमरा संगिनीकेँ नहि छैन्हि परवाह हुनक नोर नि:सृत होइते रहैत अछि किन्तु किछु दिनसँ ई लादने अछि- चुप्पी शाइत सधि गेलन्हि-नोर वा कऽ रहल अछि अक्षय अश्रु संग्रह। नाचैत भूत कतेक दिनसँ ई भूत नाचि रहल अछि हमरा माथपर चूसि रहल अछि हमरा शोणितकेँ भऽ गेलहुँ भूतचट्टू तइयो नहि छोड़ैत अछि ई निखट्टू बड़का-बड़का ओझा-गुणी कएलक प्रयास किन्तु ई नहि पड़ाइत अछि केहेन बेसुरा अछि- एकर नाचब राग-ताल विहीन लगैत अछि-जेना पीट रहल अछि-कियो फूटल टीनकेँ “झन-झनाक-झन” कुनमुना उठैत अछि हमर मन एहि भंयकर शब्दसँ करैत अछि दरद कएकबेर कएलहुँ यत्न भूतकेँ खसेबाक परन्तु खसि पड़ैत छी- अपनहि ई धऽ लेने अछि गहिया कऽ हमरा कपारक केशकेँ कसने अछि सवारी तेँ आब हम कऽ रहल छी शीर्षासन जँ नहि उतरता ई भूत तँ कऽ देबैक थकचुन्ना अपनहि शरीरक भारसँ। माय (क) दोसरोक माय अछि हमरे माय तँ कि यौ भाय अपना मायकेँ बिसरि जाइ जे करौलक अमृत-पान भेलहुँ जवान देशक शान ओहिठामसँ ससरि जाइ मायक सिनेहकेँ बिसरि जाइ कि यौ भाय। (ख) मैथिलीक अछि असीम भंडार एहि बातकेँ हम सोचि ली घर भरल हो जखन दोसरासँ किएक पैंच ली राखि संतोष करी उपाय कि यौ भाय। (ग) नहि होइ खिन्न नहि लिअ पड़ए ऋृण करू कोनो उपाय हे मैथिली माय भऽ जाए हमरो अभ्युदय कि यौ भाय। यत्न हरियर पातक मध्य पीयर फल देखतहिं मन ललचागेल ओकर सरस स्वादक अनुभव जगा देलक- तृष्णाक आिग मारय लगलहुँ- छड़पनियॉं करए लगलहुँ- उछल-पूछल तोड़बाक हेतु किन्तु डारिमे हाथ स्पर्श भेलासँ पूर्वे खैंच लैत अछि-नीचॉं टॉंग पकरि- धरती ठाँहि दऽ लगैत अछि- चोट ऍंड़ीमे यत्नपर यत्न कऽ रहल छी परन्तु फल नहि तोड़ि पाबैत छी लगैत अछि जेना भुकुर-भुकुर तकैत हमरा विफलतापर चला रहल हो- व्यंग्य-बाण ई वृक्ष लाज नहि होइत छन्हि- हिनका हमरे रोपल-पैघ भेलापर देखा रहल अछि- हमरे ठेसी किन्तु बसात अछि निशब्द मारने दऽ रहल अछि- पूर्वाभास उठल जोरगर-आन्हड़-बिहाड़ि निश्चय टूटत-ई फल। बघनखा कतउ नहि किछु बचल सुच्चा जतए देखू ततए बघनखा पत्नीक आँखिमे नोर भरल ताहिमे सँ खसल बघनखा कतउ नहि किछु बचल सुच्चा रोटी तोड़ि मुँहमे लेलहुँ पड़ल दाँत तर बघनखा कतउ किछु बचल सुच्चा वस्त्र झाड़ि कऽ पहिरैत काल भट्ट दऽ खसल बघनखा कतउ नहि किछु बचल सुच्चा सुतल छलहुँ घरमे आकि चारसँ चमकैत झनाक दऽ खसल बघनखा कतउ नहि किछो बचल सुच्चा मित्रक बड़का कुरतामे बटनक बदला बघनखा कतउ नहि किछु बचल सुच्चा वएह देखि रहल छी सर्वत्र कि हमर आँखिए बनि गेल बघनखा? रंगक खोज फाटल वस्त्रकेँ सीबैत चौन्हिया गेल चक्षु धड़फड़ीमे गड़ि जाइत अछि सुइया अपनहि हाथमे आ चाटि लैत छी स्व रक्तकेँ जाहिसँ लगबैत छी- अनुमान दोसर शोणितक स्वादकेँ बिसरि ओहि पीड़ाकेँ पुन: लगबैत छी चेफड़ीपर चेफड़ी बदलि गेल वस्त्रक रँग भऽ गेल अनचिन्हार लगैत अछि जेना कतेको रँगक झंडा टाँगल हो एकेठाम तइओ चला रहल छी काज मुदा भऽ जाइत अछि लाज कहियोकाल- कतेको जोड़ी आँखिक व्यंग्यात्मक तीरसँ भऽ जाइत बिद्ध तैं घरे मध्य नुकाएल रहब हमरा लगैत अछि नीक किन्तु पेटक आगि नहि रहए दैत अछि- निचेन अवश भऽ कऽ निकलि गेल छी लाल रँगक खोजमे जाहिमे रँगे देलासँ चितकबरा खण्ड सभ भऽ जाइत एक्के रँग तबे टूटत हमर हीन भावनाक जाल। कंटकमय नवनीत हमरा सम्पूर्ण शरीरमे जनमि गेल अछि पैघ-पैघ बिखाह काँट लोक सभ पड़ा जाइत अछि हमरा देखतहि किनको नहि छूबि सकैत छी- सिनेहसँ स्पर्श करैत छी- जिनका एकोबेर ओ बोमिया उठैत अछि प्रेमभाव बनि जाइत अछि- बैरीभाव अपनहुँ एक अंग दोसरसँ होइत अछि स्पर्श तँ मन सिहरि उठैत अछि कऽ लएतहुँ- आत्मघात किन्तु सेहो नहि कऽ पाबैत छी जिनगीक जहर घोरि-घोरि पीबि रहल छी बचल अछि एक अंग निष्कंटक नवनीत सन धुकधुककाइत छातीमे तकरहि देखैत जीवि रह छी आसहिपर। लाज निरलजकेँ ने लाज पेट भरलासँ काज देखि रहल छी मिताकेँ किरदानी बदलि गेल ओकर चालि आर-वाणी बरदाइससँ बाहर कऽ रहल- मनमानी लगौलक एहेन फानी जे लड़ि रहल छी दुनू परानी परेमक गाछ सुखा गेल मन पुरा दुखा गेल- अपन लाभ अनकर हानि की करए चाहै छल से नहि जानि तइयो इमानदारीक पहिरने खोल बजैत अछि नीक नीक बोल आइ हम एकर खोलि देबै पोल दसगोटेमे कोना ठाढ़ अछि लफंगा कऽ देबै एखने नंगा खिसिया कऽ बढ़लहुँ ओकरा दिश कऽ देबै नॉंगट- ऍंड़ीसँ देबै पीस हाय रौ तोरी ई कोन बात सभ भऽ गेलाह एके साथ ठिठिया कऽ सभ हँसि रहल अछि हमरेपर व्यंग्य कसि रहल अछि सभ बुझौलक तब असली बातकेँ जानि सोचि विचारि लेलहुँ मानि नहि होइत अछि नीक बेसी रिश सोचैत देखलहुँ अपना देह दिश गुदरी लटकल बनल छी भिखमंगा हम तँ अपनहि छी पूरा नंगा भीतरसँ सभटा गप्प जानि लाजे भऽ गेलहुँ पानि-पानि। मिलन-बिछुड़न अहाँसँ होइत अछि जखन मिलन बहए लगैत अछि मलय पवन- सन-सन झड़ए लगैत अछि मेघसँ छोट-छोट बून फुला जाइत अछि मनक प्रसून गाबए लगैत अछि भ्रमर- गुन-गुन चिड़ैक चहक मादक-महक प्रसन्नताक- दमक मिलैत अछि पूर्ण शांति आर सुख पड़ा जाइत अछि दुख किन्तु होइत अछि जखन बिछुड़न दुखसँ भरि जाइत अछि तन-मन सूखि जाइत अछि मनक फूल जेना रहि रहि गड़ैत अछि शूल मनमे भरए लगैत रोष बेचैनी आओर असंतोष हे सखी- करू कोनो उपाय जे दुनूसँ ऊपर उठि जाय मिल जाए त्राण दुनू भऽ जाए समान। परिवारक गाछ रौद रहै तीखर गाछ लने कपारपर घामसँ नहाएल स्त्री जा रहल छलीह सड़कपर कथीक गाछ छी ई केहेन फड़त एतेक रौदमे ई नइ मरत हम गाछक नाम पुछलौं बारम्बार ओ कहलक एकर नाम छि परिवार एहिमे शिक्षाक फल ड़त खाएत बाल-बच्चा तँज्ञानक इजोत करत हमरे परिश्रमसँ ई हेशाल एकरा नहि खा सकत कोनो काल पालि-पोसि कऽ बनाएब बलवान बढ़तै सबहक मान-सम्मान जेना कऽ पटेबै तेहने फड़त जँ कष्टमे रहबै तँ गिर पड़त हम मुँह दिश अकबका कऽ तकलहुँ पूछलिऐ-अहाँक बात नहि बुझि सकलहुँ सुनि हमर वाणी ओ बुझलक हमरा अज्ञानी। त्रिशंकु आँखिपर लगल अछि निन्नक झँपना देखि रहल छी डेराओन सपना घुरि कऽ आबि गेल छी गाम लादने समान पत्नी अछि वाम सपनोमे यादे अछि ओ दिन एतेक दुख कोना कटलो गिन-गिन दस मास पूर्व भागल रहि प्रेमिकाक संग सामाजिक नियमकेँ कऽ देलिऐक भंग शहरमे मित्र करैत छल काम दुनू गोटे पहुँचलहुँ ओहिठाम एकान्तमे मित्र बैठौलक साथ समझाबए लागल सभ बात- “उपरसँ जातिक टंटा आर लगतह पुलिसक डंटा अनकर बेटी रखने सँग पकड़ि कऽ तोड़ि देतह अंग-अंग गाबले गीतकेँ आब नहि गाबह कोर्ट जा जल्दी वियाह कऽ आबह कएलहुँ अन्तर्जातीय वियाह किछु लोक कहलक वाह-वाह किछु कहलक बड्ड अधलाह छोटकामे कएलक वियाह खादिमे धसि गेलाह काटि दस मासक प्रवास पहुँचल छी घरक पास पत्नी संगे ठाढ़ छी गोसॉंइ दुआरिक आगा पछुआरक गाछपर काँए-काँए करैत अछि कागा हमरा बापक मुइला भऽ गेल साल दु साल फेर ई कतएसँ पहुँचि गेला तोड़ैत ताल देखैत छी गोसाउनिक अगाड़ीमे नीर भरल अछि थारीमे जाहिमे धड़ विहीन बाबूक सिर नाचि रहल अछि क्रोधमे गलगला कऽ बाँचि रहल अछि- “ओहिठाम ठाढ़ रहू एमहर आबि नहि सकैत छी कुलदेवतासँ असीरवाद पाबि नहि सकैत छी जखन क्रोधसँ देवता जेतह जागि धन-जन आ घरमे लगतह आगि मुँह लटकौने केकर तकैत छहक राह उनटे पाएर घुिर जाह गोहराबह देवता-पित्तरकेँ मांगह सभसँ माफी एतबेक नहि छह काफी जा करऽ सात बेर गंगा स्नान बचाबह कुलक मान एहि कुलच्छनीक छोड़ि आपस आउ यौ बउआ अपन प्राण बचाउ” एकटा पाएर बाहर एकटा अछि घर अस्सी मन भारसँ दवा रहल छी तरेतर बाप दिश तकबाक नहि अछि साहस पत्नीक आँखिमे झाँकि रहल छी डरे थर-थर काँपि रहल छी हेऔ एहिसँ नीक छूटि जाइत प्राण तर धरती नहि उपर आसमान मध्य भागमे अटकि गेल छी नहि कऽ सकैत छी प्रेम त्रिशंकु जकाँ लटकि गेल छी किछु नहि फुराइत अछि की करबै आब पत्नीकेँ की देबै जवाब नहि एहिपार नहि ओहिपार धऽ लेने अछि जड़ैया बोखार एखनहुँ नहि सपना छोड़ि रहल अछि कंठ पकड़ि कऽ तोड़ि रहल अछि। अनमोल जिनगी “हारल जीनगी जीएब ताहिसँ नीक रणक्षेत्रमे मरि जाएब से अिछ ठीक” यौ मित्त अहाँक ई गप्प हमरा नहि लगल नीक जीनगीक संगे रहतैक हारि आर जीत कखनहुँ कानैत अछि लोग कखनहुँ गाबैत अछि गीत किछुकाल करैत अछि झगड़ा किछुकाल करैत अछि प्रीत जँ भऽ जाए जीनगीक युद्धमे हारि फेरसँ लिअ अपनाकेँ सम्हारि छोड़ि शोक मनकेँ राखि नीरोग मृत्युसँ नीक जीवनक सदुपयोग करबाक चाही समाज आ राष्ट्रक हित यएह तँ अछि जीवनक मूल्य यौ मित्त पकड़ि लिअ कोनो सुन्नर राह सभ कहत वाह-वाह बाजू हरपल मधुर बोल जीनगी अछि अनमोल बढ़ाउ संसारसँ मेलजोल बढ़ि जाएत जीवन मोल! मुनियाँक चिन्ता (बाल कविता) “बच्चा जनमि गेल बेटा भेल” सुनतहि घर खुशीसँ भरि गेल सौंसे टोल खबरि पसरि गेल बढ़ए लगल उछाह कहलक लोग-वाह-वाह मुनियाँ अछि लछमिनियाँ तब ने एकरापर सँ जनमल छौंड़ा हे गै तू किएक धेने छेँ दादीक कोरा मुनियाँ टक-टक ताकि रहल अछि आ मने-मन आँकि रहल अछि दादी बजल-की लेबेँ बाज करए दे हमरा काज खसौने घाड़ कनैत छह जार-बेजार यएह करतह रक्षिया जिनगीक उठौतह भार धेने छह हमर गात ई तँ छै खुशीक बात जनमल तोरा भाए कतेक खुशी छह तोहर माए दादी, सबटा जानै छी हम ओइ लए नहि कानै छी चिन्ता अछि हमरा आब के कोराकेँ लेत दूधो माए पिबऽ नहि देत आँइ, सभ हँसल आ मुनियाँ फँसल। कथीक गाछ (बाल कविता) चारिटा छाैंड़ा छल गाछ तर फनैत जिद लगौने डरिकेँ गनैत पहुँचल पाँचम- हे रौ की गनै छेँ ई कथीक गाछ िछएे से जनै छेँ? सभ भेल अवाक अपन जमौलक धाक सुनने रहि ई गाछ िछऐ अनचिन्हार जेकरा चिन्हलहुँ से चिन्हार नहि चिन्हलहुँ तँ भेल अनचिन्हार कहैत माथ उठौलक तानि एकटा छौंड़ा बजल फानि तहूँ तँ नहि रहल छेँ जानि अपनहुँ ठकाइत छेँ आ दोसरोकेँ ठकै छिही टेढ़ी देखा संतोख करै छी झूठक कऽ रहल छी परचार दुर-छी दुर-छी करतौ संसार अनजानकेँ करैक चाही जनैक प्रयास नहि छोड़ैक चाही आस पहिले बढ़ाले अपन गियान तब बाजबेँ तँ बढ़तउ मान। नेहाइपर लेखनी कान्हपर अंगोछा लए ठमकल छी कजरी लागल एहि चबूतरा घाटपर सम्मुख अछि पीड़ा जल प्रसार। सहरि-सहरि जोंक जाहिमे कऽ रहल अछि उन्मुक्त जल विहार। एहि पीड़ा जलसँ नहि जानि कहिया भेटत मुक्ति कहिया धुआएत गातक तहियाएल मलिनता जाधरि ई रहत जमल गन्हाइत पीड़ा-जल खण्डित नहि भऽ सकत जोंकक जल बिहार छी डेराएल अंग-अंगपर जोंक दंश अनुभव कए परन्च ई तँ अछि भीरूपन आत्मघाती जड़ता। तोड़ए पड़त आब भुतहा कुल ओ मोहारकेँ कोड़ए पड़त आब जल निकास बहाबऽ पड़त एहि गन्हाइत जलकेँ भरए लेल पोखरिकेँ नव वर्षाक जीवनसँ जोंक विहीन अमृतसँ तखैने भऽ सकत पुण्य-स्नान ताहि कारणे आइ हम लेखनीकेँ राखि देलहुँ िनर्मम नेहाइपर बनाबऽ लेल असि, तीक्ष्ण कोदारि काटऽ लेल भुतहा मोहारकेँ करऽ लेल स्वर्गिक स्नान। झगड़लगौना पिशाच ई झगड़लगौना पिशाच नै आबए देलक अपनापर आँच रखने सभसँ मेल खेलैत रहल झाँपल खेल जेकरा संगे करै ई कनफुसकी तेकरा मुखसँ उड़ि जाइत मुसकी ओ करै छल रगड़ा ताकऽ लगै छल झगड़ा एको घर नै छोड़ै छल लड़ैया बोखार एकटा रोकनाइ भऽ गेल छल बेसम्हार फैला रहल छल दोग-दोग भऽ गेल हो जेना संक्रामक रोग घर-घर छीटै छल झगड़ाक बीया झगड़ाक बाद फटै सबहक हीया नव शक्ति नित रोज करए लागल बेमारीक खोज धरा गेल सीपपर आइ भगै केर नै रहल कोनो उपाए “एना नै करियौ छान-बान्ह एतेक नै करियौ अपमान” किछु हँसैत किछु रहल कानि मुँह लटकौने पिशाच सभ किछु जानि कानि-कानि पएर लेलक छानि। गाछक बलिदान गाछसँ घेरल चारूभर मध्यमे छल दूटा घर चारूभरक गाछ झड़कि गेल तैयो आगि नै बहरा भेल ईश्वर केहेन रचना रचि गेल दूटा घर जरल सौंसे गाम बचि गेल तोरेटा घर भेलह बरबाद भगवानकेँ दहक धन्यवाद केकर कऽ रहल छी यशोगान पहिले दिऔ गाछक मान तब करब ईश्वरक सम्मान तँए बचल कतेकोक धन आ जान गाछ नै भेल पाछ नै तँ सौंसे गाममे आगि करैत नाँच यएह गप्प छै साँच हमहूँ नै हएब पाछु फेर रोपब दू-चारि गाछ। हेराएल हे यौ, हम हेरा गेल छी अन्हारमे घेरा गेल छी कोनो बाट नै भेटैत अछि बौआए गेल छी औआए गेल छी ऐ गामक की नाम छिऐ यौ घुरिया रहल छी चारूभर कोन घर छिऐ हमर भटकि रहल छी दर-दर नै भेट रहल अछि घर हे यौ कोन दुआरि अछि हमर सुनै छी फटकार भरल स्वर भीतर काँपि उठल थर-थर “बड्ड बजै छह चर-चर की नाम छिअ तोहर” बिसरल छलहुँ गाम आब तँ बिसरि गेलहुॅँ नाम कहए पड़त हम के छी स्वयं जानए पड़त हम जे छी नै तँ जिनगी भऽ जाएत अकारथ नै भेटत परमारथ। गाछक हिस्सा बिरिछपर कुड़हरि दन-दना रहल अछि दुनू भाँइ भन-भना रहल अछि यएह गाछ छिऐ झगड़ाक जड़ि एकरा देबै आइये काटि सभ किछ भए गेल भिन्ने तँ एकरो लेबै आइये बाँटि लगमे पहुँचल संच-मंच बुझबए लगल गामक सरपंच बैसू हकरू दुनू भाय नहि हएत झगड़ा अछि उपाय गाछमे छै दूटा फेंर नहि लाबए पड़त तरजू-सेर हिस्सामे भेल एक-एकटा मोटका डारि भायक परेममे किएक पाड़ै छी दरारि एकोटा गाछ रोपल भेल किएक करै छी एहेन अधलाह खेल जाहिपर जिनगीक आस चलैत अछि साँस तकरा कऽ रहल छी विनाश जएह देने अछि कपारपर छाँह तकरे कटै छी वाह-वाह ई करम अहाँसँ भऽ रहल अनुचित जे दऽ रहल जिनगी तकरे सँगे एहेन अहित करबै गाछक सेवा भेटत सुन्दर मेवा भेटत सुन्दर फल एहिसँ बढ़त शरीर आ मनक बल पंचक गप्प सुनि दुनू भाँइ कहलक घर चल। लाल ज्योति गन्तव्य दिश अग्रसर होइत धप्प दऽ– हम खसि पड़लहुँ अनभुआर कुपमे जे अछि बरिसों पुरान, सुखल जलक नामपर फाटल दरारि राक्षसक मुँह सन सधन-तमसँ भल छी भयभीत अएबाक हेतु-ऊपर कऽ रहल छी- यत्न पर यत्न किन्तु सर्प सन ससरि ससरि खसैत छी पुन: ओहिठाम मकड़ाक जाल सभ लटपटा रहल अछि- माथमे आवेश वश फेंकि रहल छी माँटिक ढेपा परन्तु ओहो लगैत अछि ठाँहि दऽ अपनहि कपारपर हथोड़ि रहल छी-नव राह तखनहि तीक्ष्ण लाल प्रकाशमे चौन्हिया जाइत अछि-चक्षु कियो सहृदय साहस कऽ देखा रहल अछि- मार्ग बढ़ि रहल छी आब शनै: शनै: ओहि बिन्दु दिश। बीखक घैल कतेको बरख पुरान एहि बीखक घैलमे तृण भरि छेद मात्र बून-बून चुबैत बीखसँ भऽ रहल अछि विषाक्त वसुन्धरा भष्म भऽ गेल मनवोचित गुण तइयो तीब्र गतिसँ आप्लावित करैत खोजि रहल अछि नव-नव आहार प्राणी सभ अछि पड़ा रहल सुड्डाह करैत अछि बढ़ि रहल बीखक बाढ़ि सभ अछि सशंक खोजि रहल अछि निर्विध्न स्थान पड़ाइत-पड़ाइत भेल अपस्याँत किन्तु आब नहि होएत घात बढ़ि रहल दूटा सशक्त हाथ अहर्निश ओहि कुम्भ दिश। पत्रोत्तर अहाँक उपरागसँ बेधल अछि गतर-गतर तैं दऽ रहल छी पत्रोत्तर कतेक कएलहुँ परिश्रम बनलहुँ निरलज टूटल धरम तब बनेलहुँ सोनाक घर सबकुछ सधि गेल भेलहुँ फक्कड़ मनोरथ तँ पूरा भेल किन्तु यएह आइ जहल भऽ गेल अहाँ लगसँ एतऽ धरि जेना लगल अछि कोनो अदृश्य कड़ी हवाक सँग अहाँक गन्ध आबि रहल अछि से स्वर संगीत बनि गाबि रहल अछि अहाँ अन्त: सँ सोर पाड़ै छी हम अपना हृदयकेँ तरे-तर मारै छी बीतैत अछि साल बीतैत मास एहि जेलसँ निकलैक कऽ रहल छी प्रयास आबैए जाड़ तँ अहाँ बिनु लगैए अन्हाड़ देहपर पड़ैए बून याद पाड़ैए अहाँक गुन-गुन हवा बहै जब गरम लागै फूटल हमर करम अबै जब बसन्त हमर हृदय करैत अछि हन्त तइओ हम केहेन छी कंत अहाँक बिसरि बनल छी संत खोज कएलहुँ हम असली आब बनल ओ नकली असल परेम मुँह फेरि नहि सकैत अछि ओकरा कियो धेर नहि सकैत अछि नहि जानलहुँ तँ जानब आब नहि हम मानब एक-एक ईंटाकेँ फोड़ब एहि स्वर्ण जेलकेँ तोड़ब अन्तरमे मिलन पियास करै अनघोल स्वर्णक होइत अछि बहुत मोल पर परेमक मोल अमोल। अन्हारक खेल ओहिठाम भऽ रहल छलै एकटा हास्यास्पद खेल एकत्रित दर्शकमे छलै तत्कालीन बड्ड मेल एकबेर आँखि मटकेलहुँ कनेक धियान भटकेलहुँ खेलाड़ी खेल आब की करता देखैत छी ओहिठाम ठाढ़ छै भाषणकर्ता भाषण झाड़ि रहल अछि अमृत वाणी ढारि रहल अछि छलिया भाषण नहि दैत छलै राशन लोग पीबै छलै अश्वासन नहि सुनै गेल देखै लेल गेल छलै लाेग सेहो भेल अभोग करऽ लगल आपसी रगड़ा थप्पर-मुक्का आ झगड़ा पुछए चाहलक भाषणक अता-पत्ता आकि ओहो भऽ गेल निपत्ता ओहि जगहपर भेल ठाढ़ सौंसे मनुक्खक हाड़ जहिमे सँ निकलि रहल छूछे अन्हार डूबि गेल सभ ओहिमे कानए जार-जार औनाए कऽ खसए बारम्बार ओ अन्हार सबहक देहकेँ बना देलक हाड़े-हाड़ एक दोसराकेँ देखि सभ भऽ रहल भयभीत बढ़बऽ पड़त एकताक गीत मारऽ पड़त छड़पनियाँ काटऽ पड़त गुड़कुनियाँ आगूमे छै इजोत जे दऽ रहल छै नोत लगबऽ पड़त कोनो ब्योंत। नाचक बिखाद लोग मनहि मन करै छल जाँच हम करै छलहुँ नाँगटे नाच आँखि देखैत छल मुँह हँसैत छल जखैन लोग केलक दुर छी-दुर छी धियान गेल तब अपना दिश अपने नाँगट देह देखि मोनमे आबि गेल रिश कहैत छी आब-लाउ कोनो नुआँ होइत अछि लाज बजैत अछि समाज- “अलगे रहू अहाँसँ नहि अछि कोनो काज” एहूसँ बेसी घिना जाएत स्वजन-परिजन जब सोझा आएत गप्प चारूभर गिन-गिना जाएत हेओ कएलहुँ जेना नहि करब एना नाचैत-नाचैत कखनहुँ काल नहि रहै छै सुधि-बुधि बिगैड़ जाइछै चाल एहो तँ छिऐ एकटा नवका ताल किछ लोक तँ कहै छै एकरो कमाल ओमहर लोगकेँ भले लगो नीक ई नाच एहिठाम नहि सोहाइत छै ई गप्प अछि साँच एतुक्का लेल नहि छै अनुकूल ई नाच हे यौ भाय करू कोनो उपाय। आँखिक प्रतीक्षा बन्न अछि अहाँक आँखि जेना नान्हिटा चिड़इ पसारने पाँखि आगुमे दुनू ठेहुनकेँ मोड़ने संगहि दुनू हाथ जोड़ने हम टक-टकी लगा कऽ रहल छी ताकि कखैन खुगत अहाँक आँखि एकबेर जाहिमे लेब हम झाँकि हमरासँ की भेल भूल चढ़ा रहल छी मनक फूल अधरतिया भऽ गेल साइत शरद पूर्णिमाक ई राति प्रकृतिपर झहरैत अछि चानी मधुर रस घोरैत कोइलीक वाणी मन्द-मन्द सिहकैत बसात केना रहब अहाँसँ भऽ कात एकोबेर तँ बोलू आबो आँखि खोलू निकलए नेह वा धिक्कार हमरा दुनू अछि स्वीकार देखबाक अछि उत्कट इच्छा हम करैत रहब जिनगी भरि प्रतीक्षा। मनीष ठाकुर विरह गीत चेहरा पर नूर छन्हि, आँखि कऽ झील सन गहराई मे, किछ त जरूर छन्हि, विरह कऽ पीर छन्हि, वेदना गंभीर छन्हि स्पष्टतः हुनकर आंखि, केकरो प्रतीक्षा मे, अतीव अधीर छन्हि, चेहरा पर उदासी कऽ स्पष्ट कईक चिन्ह छन्हि किन्तु नहिं ; ई त कोनो आम वेदना सऽ पूर्णतया भिन्न छन्हि, साडी छन्हि अस्त व्यस्त देखियौ त! ओहो व्यस्त, बैसल छथि चिन्तन मे; गहीर कोनो सोच मे अपने ओ डूबल छथि। बात मुदा कहत के? कियाक ओ मौन छथि ? मोन मे विचार के ई, केहेन छन्हि सतत प्रवाह? लगैय ब्रह्मों नहिं, पाबि सकता मनक थाह के छथि ? कतय के?कोन गाम सं आयल छथि? मन्दिर क आंगन मे , एहि पवित्र प्रांगण मे, भगवन के पूजा ले उद्यत की बैसल छैथ? दिव्य रूप शोभित ई रमणी जे बैसल छथि, देव पूजा हुनकर तऽ, मात्र एक बहाना छन्हि। मन्दिर मे आबय के, अश्रु के बहाबय के, प्रियतम जे हुनकर परदेस जा क बैसल छथि- भगवन के नाम पर हुनका बजावय के बैसल ओ सोचय छथि - प्रियतम के गप सब, पूछय छथि मने मन- “हमरा बतबियौ न - सजा ई केहेन ऐह? कियाक ई विरक्ति ऐह, दाम्पत्य जीवन सँ ? अपन एहि दासी के कियाक बिसरने छी?” किछो नहिं भेटय छन्हि, हुनका जबाब कतहु। ई सब त गप्प मुदा मनक भुलाबा छै, मात्र बहलावा छै । मेनको त जिनकर सौन्दर्य सँ जरय छथि, पारलौकिक सुन्दरि के, छोडि के बैसल ओ- केहेन मनुख छथि, निर्दय आ निष्ठुर छथि। पैसा कमाबय ले, प्रतिष्ठा पाबय ले, जे किछ काज संभव छन्हि, करय लेल आतुर छथि। किन्तु ओ ई बिसरल छथि जे- पत्नी आ अपन सुपुत्र, हुनके पर निर्भर छैथ। मात पिता क प्रति हुनक कर्तव्य की? मात्र अधिकारे टा ! हुनकर मन्तव्य छन्हि!! मानल अपन भविष्य, हुनके बनेवाक छनिन्हि प्रतिष्ठा जे पयबाक छन्हि - मेहनत जरूरी छै। अपने छथि दूर मुदा दिल सँ कियाक दूरी छै। हुनक एही मे मान, यैह मात्र छै निदान- पैसा रहय गुलाम; इंसां तऽ मालिक छै- भौतिक हर वस्तु के। भौतिकता इंसा पर, शासन जे करतै तऽ ई त हेबाके छै- भौतिकता हंसैत छै मानवता कनै छै। कुसुम ठाकुर चुल बुली कन्या बनि गेलहुँ बिसरल छलहुँ हम कतेक बरिस सँ , अपन सभ अरमान आ सपना । कोना लोक हँसय कोना हँसाबय , आ कि हँसी मे सामिल होमय । आइ अकस्मात अपन बदलल , स्वभाव देखि हम स्वयं अचंभित । दिन भरि हम सोचिते रहि गेलहुँ , मुदा जवाब हमरा नहि भेंटल । एक दिन हम छलहुँ हेरायल , ध्यान कतय छल से नहि जानि । अकस्मात मोन भेल प्रफुल्लित , सोचि आयल हमर मुँह पर मुस्की । हम बुझि गेलहुँ आजु कियैक , हमर स्वभाव एतेक बदलि गेल । किन्कहु पर विश्वास एतेक जे , फेर सँ चंचल , चुलबुली कन्या बनि गेलहुँ ।। अभिलाषा अभिलाषा छलs हमर एक , करितौंह हम धिया सँ स्नेह । हुनक नखरा पूरा करय मे , रहितौंह हम तत्पर सदिखन । सोचैत छलहुँ हम दिन राति , की परिछ्ब जमाय लगायब सचार । धीया तs होइत छथि नैहरक श्रृंगार , हँसैत धीया रोएत देखब हम कोना । कोना निहारब हम सून घर , बाट ताकब हम कोना पाबनि दिन । सोचैत छलहुँ जे सभ सपना अछि , ओ सभ आजु पूरा भs गेल। घर मे आबि तs गेलिह धीया , बिदा नहि केलहुँ , नय सुन अछि घर । एक मात्र कमी रहि गेल , सचार लगायल नहिये भेल।। चन्द्रकान्त मिश्र, पिता- श्री जनार्दन मिश्र, ग्राम-महथौर गोठ पो-महादेवमठ ,थाना-अन्धामठ ,जिला-मधुबनी, जन्म-30,12,1968 खाथि साग-भात हगैथ पड़ोर पेटमे अन्न नहि, मुँहमे पान रहवाके चाही। कुरता भले ही मैल रहैन, चप्पल मुदा चमकैते चाही।। बात करैथ लाख आ कड़ोड़। खाइथ साग भात हगैथ पड़ोर।। तरकारीमे तेल नहि खेताह, माथमे धृत कुमारी लगेवाके चाही। राशन भले ही नहि खरिदब, सिनेमा मुदा देखवाके चाही।। भात पर चाहियैन धरि तिलकोर। खाइथ साग-भात हगैथ पड़ोर।। साबुनक सेहन्ता लागले रहतैन, सेन्ट लगेनाय हिनका सँ सीखू। वीड़ी कहियो पिलैथ नहि, वील्सक पाॅकेट जेवी मे देखू।। कपड़ा तऽ भेटैन नहि पहिरता मुदा पटोर। खाइथ साग-भात हगैथि पड़ोर।। मण्डुलवा सन मूँह लगैत छन्हि, कनिया मुदा गोरिकिये चाही। घर पर खड़ नहि छन्हि, टाका मुदा एक मुट्ठा चाही।। कनिया वाप वेचैथ वाड़ी आ खड़होर। खाइथ साग-भात हगैथ पड़ोर।। बापके पादय नहि आवैन, अपना भरि दिन बंदूके चलेता। भरि साल करैथ गप्पक खेती बखार मुदा बनेवे करता।। हिनकर नहि जोर-वेजोड़। खाइथ साग-भात हगैथ पड़ोर।। डिबिया जलवै के सामथ्र्य नहि, सौंसे गाम धरि आगि लगेताह। कविरकाने कहियो नहि पढ़लैथ, सास्त्री मुदा संगीत सुनताह।। बात तेहेन जेना खौलति इन्होर। खाइथ साग-भात हगथि पड़ोर।। जागु-जागु मैथिल कुम्भकर्णी नीन्न तोड़ु, आपस मे आपक्ता जोड़ु। साधनहीन जर्जर समाज मे, विकाशक नव मन्त्र फूँकू।। आवो वदलू अपन मिजाज। जागु-जागु मैथिल समाज।। कतय गेल शान मिथिला के? कतय गेल दूधक बहैत धार? सोना उगलैत माटि कतय गेल, कतय गेल ओ वात-विचार? समझु आइ एकर राज। जागु-जागु मैथिल समाज।। सपटा विकाश मंत्री जीके घरमे। वचल लोक हकन्न कनै अए। एयर कंडीशनक नाम सुनै छी, रौद मे केहेन देह जरै अए।। सुखायल सोणित करव कोन काज। जागु-जागु मैथिल समाज।। टूटल सड़क अन्हार गाम, भेटय नहि ककरो कोनो काम। मुलूक छोड़ि के भागए पड़ल, एलहुँ बड़ दूर आन ठाम।। रक्षक पहिरने छथि भक्षक ताज। जागु-जागु मैथिल समाज।। चारा खाय छथि तेल पिवै छथि, अलकतरा सँ मोंछ टेरै छथि। सबहक हिस्सा खायवाक किस्सा, मंत्रीजी क्षणहि मे गढ़ै छथि। शर्म विवलथि वेचलथि लाज। जागु-जागु मैथिल समाज।। मैथिल आइ उपेक्षित वनलथि, मिथिला के अछि हाल-वेहाल। भासए हेंजक हेज माल-जाल।। मंत्री करैथ तइयो पाज। जागु-जागु मैथिल समाज।। पी-पी-पी दारु पी पी-पी-पी दारु पी, जी-जान छोड़ि केँ दिन राति पी, मरि जेमें त किछु नहि जेतौ दूध-दही या घी पी-पी-पी दारु पी......। एक घूॅट दारु दवाये जानु सौंसे बोतल हाल वेहाल कूकर मूॅति के मूॅह मे जेतौ जखने दारु लगतौ जी... पी-पी-पी-दारु पी। चाउर वेचलें आॅटा वेचले, वीवी के सभ गहना वेचलें। सभटा विकायै गेलौ, अनकर लेवे की। पी-पी-पी-दारु पी। रघुनाथ मुखिया, नेनो बासा, ग्राम+पो.–बलहा, भाया–सुखपुर, जिला–सुपौल, पिन कोड–852130 दूधक धार हम देखैत छी हमरा सोझाँमे दूध आ अन्नक लेल हमर दूधमुँहा नेना कोना छटपटा रहल अछि हमर कोढ़ ओहिखन फाटि जाइछ जखन ओ अपन आंगनक ड्योढ़ी दिस अपन तुरियाक दूध आ भातबला कटोरा दोड़िकेँ छीनऽ चाहैत अछि आ हमरा चिन्हबऽ लगैत अछि दूध आ भात ओकर रंग आ स्वाद ओहिखन मोन होइत अछि जे हमरा कानमे पसिझल पाथर किएक नञि भरि देल गेल वा ई गप्प सुनबासँ पहिनहि हमर प्राण–पखेरू किएक नहि उड़ि गेल? किएक तँ कलम क्रांति उठा सकैछ शांतिक समुद्र लहरा सकैछ बुद्धक लहाँस खसा सकैछ नव–नव सृष्टिक विनाश आ निर्माण कऽ सकैछ शोणितक धार बहा सकैछ मुदा शिशुक लेल दूधक धार जुटाएब ओ संभव अछि कलमसँ छाँहक–सुआद बेरोजगार लोक आ बिनु फरै–फुलाबै बला गाछ–बिरीछ दुनुमे की भेद आ की समानता मरि जाए बरू कटि जाए तँ बेजायै की। लोक–वेदक कहब छनि जे लोक नञि हरियर नोट कमाबऽ आ नञि काया पोसबाक लेल सुन्नर फऽर उपजाबऽ ओकर बेगरते कोन एहि संसारमे? हे देखु! तकनीकी शिक्षासँ परिपूर्ण डंकल अंकल आ चार्ल्स वॉवेजक उत्पाद नान्हिएटा गाछ जड़िसँ छीप धरि लदम–लद आ खाद पानिसँ कोना तोपल अछि आ हे एकबेर ओम्हरो देखू ओ.... बऽड़, पीपर आ पाखरिक ढ़ुठिआइत गाछ–बिरीछकेँ जूरो शीतलमे एक ठोप भेटाइत हेतै की नहिए तखनो सदति टटाइत ठाढ़ अछि अनका लेल। आ हेओ बाबू, भैया, साहेब हजूर ओहि बऽड़, पीपर आ पाखरिक छाँहक सुआद तेँ जेठक दुपहरियामे बाट नपैते मोसाफिरे बुझैत हेतै, नञि? मनुक्खक सूखौंत ओ कंठ मोकि हँसाबैए मुक्कासँ कटहर पकाबैए। जुनि माँगू पानि मुखिया–सरपंचक दालानपर ओ देशी दारूक धार बहाबैए पंचायती राजक विकासपुत्र कहेबा लेल मनुक्खक सूखौंत बनाबैए। ओ कंठ.... काल्हि कथीक पंचैती होएत तकर जोगार आइये लगाबैए जौं जोगार नञि लागल तँ निचेन बैसल मनुक्खपर अपन हुलाबैए। ओ कंठ.... पंचैतीसँ पहिनहि जे दारू आ मनुक्खक साना पहुँचाबैए ओ आँखि मुनिकेँ सुति रहैत अछि आ सरपंच, एक तरफा फैसला सुनाबैए। ओ कंठ.... सौ दिनक रोजगारक कार्ड दुइ–चारि टकामे बिकाबैए जे किओ नञि देलकै निशान ओकरा बीच्चे सड़कपर सदस्य सभ मुकियाबैए। ओ कंठ.... तेखगर जनताक मुँह बन्न करबा लेल जोरगर लोकसँ पहरेदारी कराबैए कमीशनक मोट रकम केर वास्ते सड़कमे तीन नम्बरा ईंटा लगाबैए। ओ कंठ.... मजाल अछि जे किओ करताह विरोध सोलहो पंच चमेटा देखाबैए जौं फूजल मुँह अहाँ केर बत्तीसे हाथक बीच कंठ धराबैए। ओ कंठ.... जमल शोणित सुनै छियै जे हमरो गाममे जमींदार सभ रहै खूब पैघो नञि तखन रहै तँ जमींदारे ओ अपन सिपाही आ मुँह लगुआक संगे–संग अठबारा छोटकाक टोलपर घुमै लऽ आबै आ जाहि टोलपर आबै बुझू जे पूरा टोले डोलमाल ओ डोलमाल कोनो बाढ़ि आ भूकंपसँ नञि मालिकक छुछन्नरि चालिसँ होइत छल मालिक बेधड़क ककरो आँगन घुसि ककरो बौह, बेटी आकि पुतोहूएसँ कहैत रहै जे हे गे फलनाक बौह, फलनाक बेटी, फलनाक पुतोहू उघार, उघार, उघार *तोहर पएर बड्ड सुन्नर छौ तँ ओ कतेक सुन्नर हेतौ आ कनियो बिलमि गेलापर दुनुटा सिपहिया हुनक तनक वस्त्रकेँ उपर उठा दैत रहै आ मालिक अपन दुनु हाथसँ कोनो–कोनो अंगकेँ मीड़ैत निर्लज्जताक आँखिसँ निहारैत पतित मुँह लगुआक संग खिलखिलाइत आँगने–आँगने छिछियाबैत रहै आ टोलक–टोल पुरूखक शोणित जमल जाइत रहै। कालचक्र गोरकाक समयमे किछु लोक सभ परोसि दैत रहनि अपन घरक जनानी सभकेँ ओकर चानीक थारीमे। किएक तँ हुनक देह की थोड़बे घटि जाइत रहनि? मुदा बाढ़ि जाइत रहनि बिनु किछु बेचने हुनके बखारीमे सोन आ चानीक भार आ नमरि जाइत रहै हुनक श्वेत–पधार छिड़िया जाइत रहनि हुनक नाम चान–सूरजक इजौत जकाँ भारतसँ बिलायत धरि। आ ओकरा गेलाक बाद एतुक्का बोनिहारिन जनानी सभसँ ओसुली भेलै सूदिक–सूदि अल्हुआक कंदसँ खेत–पथारक करमी सागसँ मड़ूआ, कोंनी, साम, कोदो आ खुद्दीक रोटी सभसँ बदलल जाए लागल रहै बोनिहारिन जनानीक अंग प्रत्यंग। आ एखन पंचायत प्रतिनिधि किछु अदला–बदली करबाक लेल बी.पी.एल, अन्त्योदय, आवास आ पेंशन लाभसँ दहाबोर कऽ देबाक शर्त्तपर भिक्षू वेषमे हाथ जोड़ने देह तकैत आँखि निपोड़ने ठिठिआइत ठाढ़ अछि एकटा नव–योवना मसोमातक ड्योढ़ीपर। कोशीक आगमन कहैत छथिन जोतखी–पण्डित पोथी–पतरा उचारिकेँ एहिबेर भगवती एतीह मनुखपर। तखन हम कहलिअनि कोशीक बिपटल मशान बनल एहि भूमिपर हेराएल–भुथिआएल लच्छक–लच्छ अनचिन्हार लहासक हिसाब–किताब देबाक लेल आब ओ नञि औतीह मनुख दिस। किएक तँ हुनके बहिन कोशी हुनका संगे छऽल केने संहारिणीक रूप धेने गाम–गाम सुड्डाह करैत लच्छक–लच्छ लहास हेलबैत सवा मास पहिनहि कुशहासँ सवार भेल चल एलीह मनुखपर। आब ओ ओहि हाड़क–हार सजेबामे लागल रहतीह शोणितक नीसाँमे माँ तल आ बिसरल रहतीह आगाँमे कल जोड़ने ठाढ़ भेल त्रस्त अरदसुआ सभकेँ अगिला आवाहन धरि। एम्हर बगुला भगत सभ जान बकसि देबाक लेल गोहारिक आश्वासन दैत सहयोगक अक्षत छीट रहल अछि आ, धीरज धरबैत अछि जे आब अहाँ सभक फूल हासि जरूर हेतै अपन–अपन डालीमे पान–परसाद सजौने एहिना पाँच बर्ख धरि कऽल जोड़ने, चुपचाप ठाढ़ तँ रहू। एक सालमे तेरह महीना आउ, आउ बाउ बैसू बड्ड दुखी देखै छी किछु खगता अछि की? बाजू–बाजू लजाउ नञि एतऽ अबिते छैक खगल लोक सभ अहाँकेँ की अछि? बेटीक बिआह आकि बापक सराध बेटाक अछि मूरन वा, माथक आँखिक अछि अपरेशन भेंटि जाइत छैक तखन हँ अहाँकेँ किछु जत्था–जाल वा किछु माल–जाल अछि की नञि? हँ, हँ अछि अपनेक आड़िमे ब्रह्मोत्तरेमे बचल अछि पचकठबी तखन आब ऐ कागतपर दहक ओठाक निशान आ, ई लैह नओ सय टका एक सय टका मास भरिक सूदि काटि लेलिऽ आ हँ, सुनऽ एहिबेर जेठ नञि टपऽ दिहक आखाढ़ेमे मलेमास हेतै आ, तखन तेरह मासक साल हेतै। बिखाह चाङुर पड़ाइत जटायुक वंशजसँ भेट भेल छल शांत आ एकांतमे अपस्याँत भागल जाइत देखि हम टोकालिअनि एक क्षण बिलमलाह आ, ओ हमरा पड़ाइते–पड़ाइत कहि गेल हे महामानव! अपनेक नित–निर्मित बिखाह वायुमण्डलसँ हमर वंश उपटि गेल कतेको डीह–डाबर पर बैंगन–भाँटा रोपा गेलै हमर तँ प्राणे बाँचल अछि जे एहि अन्हरियोमे भागि रहल छी अपनेक छत्र छायासँ आ हिआसि रहल छी ओहेन ठाँ जतऽ अपनेक जातिक आवागमन नञि हो। ओना तँ हमरो मोन रहऽ मंगल आ चान मुदा ओत्तहुँ पहुँचि चुकल अछि अपनेक यान नदी फिरिये देने अछि यूरो गागरिन आ राकेश श्रीमन् आन कतेको हाँ मुति घिनेने अछि अपनेक श्वान। हमर तँ दुखक नञि ओर मुदा बचाँ सकब तँ बचाउ अहाँ अपन संतानकेँ अपन बिखाह चाङुरसँ ई नेना बाढ़िमे भसियाओल मायक लहासकेँ धारक कातमे तकैत नेना दस बर्खक बलात्कृत मुइल बहिनक मुँह तकैत नेना फेकल पातपर लुधकल कुकूरकेँ चल जयबाक बाट तकैत नेना आतंकवादी विस्फोटमे चिथड़ी भेल मजूर बापक खंड–पखंड देहकेँ तकैत नेना भायक कफनक लेल मनुक्खक हेंजमे हाथ पसारने नेना हम पुछै छी–ई नेनाकेँ छी? हम देखैछी–ई नेना अहुँ भऽ सकैत छी अहुँक नेना भऽ सकैए ई नेना। आइ पहिल बेर गामक गाम पथार खेनिहारक गलामे लागि गेल रहै डोरि आइ पहिल बेर। हटिया–बाजारक भीड़मे आगाँमे राखल हरियरी ओकरा अनसोहाँत लगैत रहै आइ पहिल बेर। ओ खस्सी हरियरी छोड़ि चमकाबैत छूरी आ गलाक डोरि पकड़ने लोककेँ निहारैत रहै आइ पहिल बेर। दादागिरी बेसी दौड़बे तँ दौनीक बरद जकाँ कराममे जोड़ि देबौ! हाथ–मुँहमे जाय लागलौ? आ भरेऽ लागलौ पेट? जाबी बान्हि देबौ, जाबी!! पाँखि बढ़ल जाइ छौ? लोकतंत्र चाही तोरा? संविधान लेबे संविधान? आ ने लुक्कासँ झरका देबौ, लुक्कासँ! ईह! नाचैए कोना छम–छम मुंगरीसँ घुट्ठी ससारि देबौ, घुट्ठी नञि तँ मोन ठंडा केने रह, ठंडा चिन्है नञि छिही हमरा? भकसी झोंका देबौ, भकसी। कलमुच टुकुर–टुकुर तकैत रह कानमे तूर–तेल देने सूतल रह जाधरि हम तोहर कंठ मोकि साँस नञि निकासि दियौ। राजमहल राजमहलक देबालसँ अबैत अछि कनबाक सिसकी बेवशक माँउस सड़बाक गन्ह आ टपकैत अछि बूँद–बूँद शोणित। एकर एक–एक गोट ईंटा ओहि शोषित–मजूरक हाड़ अछि आ गिलावा ओकर मॉउस जकर पसेनासँ पटाकऽ ओकर शोणितसँ रंगल गेल देबाल। एहि देबालक चमकि देखिकऽ सहजहि अंदाज लागि जाइत अछि जे केहन लाल टुह–टुह शोणित रहै ओहि दमित–शोषित देहमे जे साफ–साफ देखार पड़ैत अछि अहि अट्टालिकापर। जतय चारू भरक हरियरीमे देखार पड़ैत अछि ओकर श्रम–शोषणक मूक गबाही जे जनम भरि परिश्रम करैत खिन्न मनसँ पेट पकड़िकेँ बितेलनि राति। वैह नर–कंकाल प्राचीरक नेओसँ जकरा छातीपर ठाढ़ अछि ई राजमहल चित्कार करैत शोर पाड़ि रहल अछि जे आबो तँ हमरा आजाद कराउ एहि मोटक देबाल आ लोहाक जंगलासँ जनैत छी! की भेल रहै? हमर गलती तँ मात्र एतबे भरि रहै जे फकत दुनू साँझक रोटी माँगलिअनि तेँ हमरा पएरमे बेड़ी बान्हि कऽ उनटा लटका देल गेल अछि तहियासँ आइ धरि समयक आँच सहैत आएल छी अपन विद्रोही संततिक प्रतीक्षामे। किऐ तँ आइ फेरसँ हुनक संतति किछु ओहने करबाक लेल एहि प्राचीरकेँ देखिकऽ यशोगान करऽ लगलाह अछि जे ई हमरे पुरखा बनौने छलाह। अशोक दत्त कविता- आह्वान निर्दोष मानव रक्तसँ रक्त रञ्जित धराक छाती कुहरि रहल अछि। कारामे बन्द कऽ देल गेल कलम अन्हार खोहमे धकियाओल जाइछ आवाज कोना करू शान्तिक बात, सर्वोच्च आसनपर विराजमान अछि दुराचार, अपराध जोड़पर अछि। आतङ्क कुकर्म। खुंखार कुकुरक नोचसँ सोनिताएल देह लेने कोना सूति सकै छी कोना भऽ सकै छी निश्चिन्त जखन तागसँ कटल गुड्डी जेकाँ पताए लागल अछि वर्तमान/भविष्य ते उठबैछी गाण्डिव अर्जून जेकाँ, सिंहानाद कऽ जगबै छी सुतनाहरकेँ हौ उठऽ/ देखहक देश बनल छह कुरूक्षेत्र समधातऽ लक्ष्य शान्ति लए। अस्मिता लए। गीत नाटक-इहो बच्चे छै (लए) कहे रहि-रहिकऽ हमरा सभ अमगला रे हमर कसूर कथी भेलियै बेटा जे हम गरीबहाके हमर कसूर कथी अछि हमरो उमेरिया पढ़ऽलिखके सङी-साथीके सङमे हँसऽ खेलके मुदा गारी, हम गारी, छियै गारी हँ-हँ गारी गारी सुनै छी अनकर दुअरिया रे हमर कसूर कथी, भेलियै बेटा . . . . पेट जरल अछि तेँ ने छी एत्तऽ पड़ल घरमे रहितै जे कोठी बरवारी भरल रहितौं हमहूँ, हमहूँ रहितौं हँ-हँ रहितौं, हँ रहितौं रहितौं अम्माके हमहूँ दुलरूवा रे हमर कसूर कथी, भेलियै बेटा . . . . . . . दर्द मनके अपन हम कत्ते सुनाउ हमहँ बच्चे छी केओ तऽ छाती लगाउ घूरि जएतै, हँ घूरि जएतै, हँ-हँ घूरि जएतै घूरि जएतै हमरो समैया रे हमर कसूर कथी, भेलियै बेटा . . . . . . . . . नौटङ्की-१ नाटक-नइँ आब नइँ (लए) सर्व साधारण घरके कथा कही अहि बेर। मेहनति छल संसार जकर दुरमतिया देलकै घेर।। दुरमतिया देलकै घेर बुझलकै अपन धीयाकेँ भारी। जकर एहन परिणाम भेलै भेल दिन सियाह राति कारी।। दिन सियाह राति कारी रेतलक धीया-पूताकेँ घेँट। अंचिया बनलै आगि बेदीके दर्दे रहलै शेष।। लौल कएलक सुनू केहन अज्ञातमे अजोहेमे देलकै कनियाँ बना। आब देखू अहाँ सभ जे की-की भेलै चूक कएलक जे तक्कर की परिणाम छै।। नौटङ्की-२ नाटक-नइँ आब नइँ (लए) बूधि गेलै बिला देलकै सासुर पठा पढ़ऽ लिखऽकेँ बेरिया देल कनियाँ बना। भेलै खाक मनोरथ आब नोरेँ बचल भरि जिनगी लए दोषेटा माथा चढ़ल।। तील-तीलकऽ जरल धुधुआकऽ जरल धीयाकेँ बियोगेटा रहि गेल पड़ल। शोक-सन्तापमे आब अपनो जरत यादमे आब धीयाकेँ ओ पल-पल मरत।। सुनू अहाँ समकेओ बाबू-भैया यौ एहन परिणाम रौदियाकेँ भेलै किए। नइँ करितै धीयाकेँ नेनहिमे बियाह तहन भोगितै नरक सन ओ जिनगी किए।। गीत लोहियामे दाइल केली अढि़यामे भात छिपा लऽकेँ काढ़ऽ गेली बहुमारलक लात आरे बाप रे बाप थाकल हारल घर आबी बहरा कमा अङनोमे दैहए लगले काम अढ़ा उल्टे कपाड़ पीटैत धरे जाके खाट अरे बाप रे बाप लोल रैङ सुत अपने तोशक बिछा हुकुम करे हमरा जो खाना बना कुच्छो जे कहली दैहए नहिराकेँ धाख अरे बाप रे बाप करमे छल फूटल जे कैली बियाह हट्ठोघड़ी मौगी हमर दैहए घिता कहियो ने सुने हमर एक्कोगो बात अरे बाप रे बाप दू आखर पढि़ बुझे हमरा मुरूखा आङन-घर छोडि़ कहे सदखिन घुमा सोङरपर टीकल हमर घरके टाट अरे बाप रे बाप कविता की लिखू कविता? की लिखू कविता ने रङ्गक उमङ्ग आ ने पुआक मिठास जीवनकेर कवितामे टीसक अनुप्रास। बस्तीमे करैत अछि ताण्डव नर्तन भूख, नइँ बजैत अछि डम्फ आ झालि एखन होलीमे, नइँ छे ककरो ठोरपर फगुआक गीत रङ्ग-अबीर नइँ उडै़त अछि सोनित तेँ शोकाएल अछि होलीक उमङ्ग, गरम तावापर पड़ल पानिक बुन्द जेकाँ उडि़ गेल अछि मुस्की। कतबो करओ केओ आत्मप्रशंसा मुदा, ठाढ़ होबऽ पड़तै काल्हि कठघारामे देबऽ पड़तै जबाब ओकरा जे सोनितओने अछि फगुआ, अओतै समय अएबे करतै खेलबै होली रङ्ग-अबीरसँ तहन लिखब कविता/ एखन की लिखू कविता? २०६२/१२/१ गीत-१ पुरूष चान आएल उतरि आइ मोर अङना छिटैत इजोर बजैत मधुर बयना स्त्री हमरा भेटल सिनेहक अनूप गहना आइ नाचब छमा-छम बजाए कङ्गना स्त्री मनकेँ कियारीमे जुही-चमेली चम्कए नयन बीच हिराकेँ ढ़ेरी पुरूष हुअए पूरा अहाँकेँ मधुर सपना रहओ सदिखन अहाँकेँ हँसैत नयना स्त्री हमरा भेटल सिनेहक . . . . . . पुरूष यौवनक मधुरसँ साँठल चङेरी प्रेमक हमर घरकेँ अहाँ बड़ेरी स्त्री अहीं छी पूजा हमर अहीं अर्चना सोलहो सिंगार हमर अहीं सजना पुरूष चान आएल उतरि . . . . . . . स्त्री उमङ्गकेर धारकेँ आब किए घेरी पुरूष एम्हर सहटि आउ करू ने देरी स्त्री हृदय बीच राखब सदति अपना पुरूष पूरा भेल कहियो जे छल सपना चान आएल उतरि . . . . . . . स्त्री हमरा भेटल सिनेहक . . . . . . गीत-२ पुरुष गोरी नइँ कर एते गुमान, तोरेपर मन जे अटकल सुन बात हमर तोँ मान, आब छोड़ एना नइँ हठ कर स्त्री तोरा सन बहुत अकान, दुनियाँमे हम अछि देखल छौ केहनो मुँह ने कान, करे काग जेकाँ किए करकर पुरुष हमरासँ नीक तोरा आओर कतऽ भेटतौ ओल सनक बोल सूनिकेँ तोरा पुछतौ जुआनी हेतौ जियान, एहिना जँ रहबे भड़कल स्त्री लेर चुअबैत किए घुमए पाछा-पाछा छी हम जुआन तैसँ तोरा कोन बाधा रे एखनों करै गियान, मरपाँखि किए छौ जनमल पुरुष नयनक कटारी तोहर हीयाकेँ बेधलक मस्त जुआनी जे छौ चैन उएह लुटलक दऽ दे हमरा पर ध्यान, मन तोरे लए अछि ककछल स्त्री चालि एहन छौ जेना कोनो वंश कुरहरि छाती पीटैत रहबे देखि-देखि सुन्नरि छिछिआइते जेतौ परान, जिनगी मरि रहबे रकटल शिव गीत बाबाक महिमा अपरम्पार गंग-राशि जटामे शोभए गरबामे साँपक हार, बाबाक महिमा. . . . . अपना खाइ छथि भाङ-धथुर आ रने-वने भटकै छथि सभक करथि मनोरथ पूरा औढ़रदानी कहबै छथि अपन अङ्ग विभुत-बाघम्बर अनका लए गृवहार, बाबाक महिमा. . . . . शिवकेँ महिमा जानि सकलकेँ पढ़ि-पढ़ि वेद-पुराण जग रक्षा लए विषकेर छाँकल बास बसथि समसान त्रिभुवन स्वामी अन्तर्यामी जगकेँ पालनहार, बाबाक महिमा. . . . . सभक हृदय बसै छथि महादेव सभक जनै छथि हाल अहूँक सूदि लेतऽ स्वयंभू टूटत दु:खक सञ्जाल देवक रक्षा कएलनि गौरी वर दुष्टक कऽ संहार, बाबाम महिमा. . . . . कविता अहुरिया पटापट भुजा रहल अछि भ्रष्टाचारक कनसारमे जिनगी। चेतनाशून्य सम्वेदनाशून्य कलमक तरूआरि हनहनबैत रेतैत अछि घेंट स्वेच्छाचारी शासक तेँ छटपटाइत छी। एक टुकड़ी रोटी लए भूखल पियासल मशिन जेकाँ श्रम कर लए बाघ्य गरीब मजदूरकेँ खैनीक नोसि जेकाँ सुड़कैए बीड़ीक धूआँ जेकाँ उड़बैए ओ, जकरा भेटैत छे आसन, जे बनाओल जाइछ भ्रष्टाचार नियंत्रक उन्मूलक ओहो बहैए अनन्त प्रलोभनमे बढ़ऽ लगैछ नह ओकर निकलि जाइछ सिङ्घ राक्षस जेकाँ हुड़कि कऽ फाँड़ऽ लगैए पेट आ नोचि-नोचिकऽ करैए शान्त अपन उदरक ज्वाला। चहुँदिश पसरल अछि भ्रष्टाचारीक साम्राज्य, भ्रष्टक महासागरमे फँसल उजबुजाइत जिनगी किछेर खोजैत कऽ रहल अछि रक्त तर्पण असन्तोष आ चरम घृणाक बीच। नइँ देखाइत अछि कोनो मन्दिर जतऽ चढ़ाउ आस्थाक फूल, रफ्फू पर रफ्फू करैत छी तैयो फाटलकेँ फाटले अछि जिनगी, दम फुलैए चेहो उठै छी सपनोमे नइँ भेटैत अछि जखन भ्रष्टाचारक सोइरकद अन्त तैयो हथोड़ैत रहै छी घवाह विगतकेँ ढ़ोइत निरोग भविष्य। टङाएल अछि जनमसिद्ध अधिकार भ्रष्टाचारीक जेबमे चौपेतल कागत जेकाँ आ हम घवाह कुकुर बनल एहि गलीसँ ओहि गली करैत रहै छी भुकबाक अभ्यास अपन स्वरमे आक्रोश आ क्रन्दनकेँ मिझरबैत जे घूरि ताकत कोनो समाङ निकालत समवेत् स्वर ओ स्वर जे स्वर ढ़ाहत भ्रष्टाचारक किला लगाओत जाबी भ्रष्टाचारीक मुँहमे। २०६२/१२/१५ कविता- सङ्केत पुष्ट वक्षक मर्दनमे जूटल वलत्कारी बुझैत अछि पट्ठा अपनाकेँ। बिसरि गेल उन्मादमे जाहि वक्षक उरोजकेँ चूसिकऽ आइ बनल अछि मर्दन करबा जोग ओही छातीकेँ करैत अछि छत-विछत जकर पीड़ासँ आधा हलाल कऽ छोड़ल गेल खसी जेकाँ छटपटा रहल अछि वर्तमान मुदा नइँ छै फिकर तकर नोचैत आएल अछि आओर नोचऽ लए उद्धयत अछि। कर्पुर जेकाँ उड़ैत अछि शान्ति, बढि़ रहल अछि मूख! क्रन्दन! टुग्गर होइत धीया-पूता! आह! अहुरिया कटैत अछि बिनु मोइसक कलम मुदा, आश, जिवित अछि फड़फराए जे लागल अछि वलात सीयल ठोर अधिकार लए, फड़कऽ लागल अछि बाँहि मसोरऽ लए ओकर गर्दनि जे प्रयत्न करैत अछि इदिअमिन आ हिटलर बनबाक जे दोहराबऽ चाहैत अछि ’शिकागो’-क बीच सड़कपर घोड़ाक टापसॅं कएल लतखुर्दन जे लगाकऽ आगि मस्त भऽ बजबैत अछि अपन बाँसुरी ‘निरो’ जेकाँ । ठोरक फड़फराएब, बाँहिक फड़कब सुखद सङ्केत अछि वलत्कारीक अन्तक । २०६२/१२/२५ शिव गीत भोलेदानी हमर अहाँ विनती सुनू खाली झोरी लऽ अएलहुँ दयासँ भरू अछि जन-जनमे सगरो अहींकेँ गुणगान दिअ हमरो अधरकेँ यौ, बाबा मुस्कान हमरा भेटए ने बाट जाए ककरा कहू भोलेदानी हमर अहाँ . . . . . . . होशे हराएल नइँ किछियो अछि भान हमरा लगैए कारी एखन सुरूज आ चान नाव भवसागरसँ पार जिनगीक करू भोलेदानी हमर अहाँ . . . . . . . . छी अहाँक शरण आएल, राखि लिअमान भोले अहाँ ने सुनब हम तेजब परान अछि हमरो अहाँसँ ई हट्ठे बुझू भोलेदानी हमर अहाँ . . . . . . . . कविता- अभियान भाइ-भतिजा मारिकऽ जे अछि शादी हथियौने, उन्मादमे ताण्डव नर्तनकेँ अछि देशमे रक्त बहओने। देशमे रक्त बहाबए किए कनिको नइँ छै भान, जागल जनता छेडि़ चूकल अछि गणतंत्रक अभियान चलल से आब ने किन्नहुँ रूकतै, अहंकारी आ अत्याचारी मुँहे भरे खसतै। मुँहे भरे खसतै खुनलक ‘ज्ञाने’ अपने खद्धा, छै ककरामे कुब्बत जे एहि बेरक सहिले धक्का । अही बेदकेँ धक्कामे भऽ जाएत चकनाचूड़, जनसमुद्रकेर लहरक आगाँ सभक टूटल गुरूर। सभक टूटल गुरूर तखन ई ‘ज्ञाने’ पारस की छै, ‘हिटलर’ तऽ धूल-धुसरित भऽ गेल ई तऽ बस मुसरी छै। मुसरी सङ टुनमुसरी जिनगीक जडि़ कटैए, छून लागि गेल कटैए, घून लागि गेल बाँहिमे से ई भरम पोसैए। नइँ लागल अछि छून बाँहिमे खुन भेल ने ठण्ढो सभ केओ मिल सङे लहराएब आजादीकेर झण्डा। आजादी सभक होइत छै जनमासिद्ध अधिकार, तकरा कोना छिन सकत ई सँड़ल-गलल दरबार। एहि दरवारकेँ सभ केओ मिलकऽ ईंटसँ ईंट बजादी, अही बेरकेँ उघबामे ‘नामो-निशान’ मेटा दी। ’नामो-निशान’ मेटा दी तैं लए बुलन्द करू आवाज, सिंहनाद कऽ सभ केओ बाजू लोकतंत्र जिन्दाबाद। लोकतंत्रकेर हएत बहाली राज करतै जनता, मेचीसँ महाकाली बजतै जन-विजयकेर डङ्का। जन-विजयकेर डङ्का बजने घर-घर हएत खुशियाली, लोकतंत्रकेर नामपर बजाउ जोड़सँ ताली। २०६२/१/७ गीत एक खाड़ा रोटी लए कुकुर बनल लोक अछि केओ एतऽ मलछैए केओ ककरो झपटैए रोटीए लए करैत कते देहक व्यापार अछि अभावकेर छूआँसँ आँखि पथराइ छै भूखकेर आरीसँ हृदय चिराइ छै एहन सन हालमे छै एक नइँ अनेक एतऽ पेटे बनल जकर जीके जञ्जाल अछि रोटीए लए करैत. . . . . . . मुँह भऽ जाइ चून सन देह पीरा जाइ छै नेनाहिमे ठोरसँ मुस्की हेरा जाइ छै ओकरा नइँ पुछियौ छै नीत आ अनीत कतऽ खेलबाक बयसमे एतऽ भेल जे लचार अछि रोटीए लए करैत. . . . . कोकनल घाओ जेकाँ जिनगी दुखाइ छै जुआनी सराप भेल दिन-राति बिकाइ छै झरकै छै निस दिन जिनगीक अंग ततऽ रोटीक भूगोल पाछा बौरल संसार अछि रोटीए लए करैत. . . . . शीतल झा, पिताक नाम–स्व. लक्ष्मी कांत झा, माताक नाम–स्व. दाई रानी झा, जन्म स्थान–सुगामधुकरही–५, ग्राम–नरहिया,धनुषा, नेपाल।, वर्तमान बसोबास–जनक पुर–६, जानकीनगर पगला धर्मशाला, महाराज सागरसँ दक्षिण, जिला धनुषा, नेपाल।, जन्म भिति–२०१२/०१/०१ जूड़शीतल।, शिक्षा–बी.ए., बी.एड., बी.एल.।, राजनीतिक संलग्नता–नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी (एमाले) पद–सलाहकार, के.क. नेकप्पा एमाले।, रूचि आ प्रकाशन–(i) संघीय संरचना आ मिथिला राज्य। मिथिलाक राजनीतिक इतिहास आ मिथिला (नेपालक सन्दर्भमे मात्र),(ii) संस्कृति, राष्ट्र आ मधेशक सम्बन्धमे विभिन्न रचना।, (iii) कविता (प्रकाशित विभिन्न पत्रिकामे), (iv) सुगौली सन्धि आ मिथिला (अप्रशित), “सुगौली सन्धि”मीन राज उपाध्याय नागरिक उड्डयन विभाग बाबरमहल (१) भारतक भूमिनिर्माण पौराणिक कथा, नक्शा, नेमूनि, निथि, ऐतिहासिक चर्चा (२) तत्कालीन राजाक इतिहास, भूगोल, नक्शा (३) भारतक लिखित इतिहास–(मौर्य, अश्लके, मानव इतिहास) (४) मुगल (ब्रिटिश साम्राज्य, हिमखण्ड) (५) मिथिला–वर्ड–तिरहूत, मुंशी जी, पगला बाबा, धर्मशाला। मुक्तक (१) हिन्दी पढ़लहुँ व्याकरण धोकलहुँ, हाकिम, नेता होइछ पुलिङ। छुटिएलौ मोंछ, भूमि, भाषा, सीमा, जनता होइछ स्त्रीलिङ॥ (२) आँखिमे नोर भरि गेल बिनु सर्दीकेँ जखन भय बढ़िगेल हथियार बिनु बर्दीकेँ, की हे तै वर्दीवाला हथियार सेहो नरसिंहक छैने, तै हिंसक हथियार देखबाक आब हिंसक छैने॥ (३) सब तरकारी छोड़ि नीक लागए लागल नेबो देल ओल, प्रशंसा तँ मात्र चाकड़ी अछि नीक अछि कटु बोल॥ (४) अभावक चिन्ता सदा अछि बढ़ि जाइयै हाटमे, मित्रत सर्वत्र छथि भय अछि जे छथि सङे बाटमे॥ (५) भूमि नहि भाषा नहि आकाश तँ अपन ललिअ चाकड़ीक नोकरी अछि अबकाश्त अपन ललिअ। बोकरे सन हम बुझलिऐ जकरा अपन, ओत रहल छल ओकरे सन, बधिआकेँ लिए खसी बनौनलिऐ, ओत रहिगेल बोकरे सन। पद, प्रतिष्ठा, पैसा छन्हि आब, भल मानुष त कहबनि ने? बात करैथ ओ नमहर मोटगर, मित्री चालि सब छोकरे सन, नीति, नियत, व्यवहारमे अंतर पैंचमे धोकल बजता हे, लाल, डम्हाएल, पुष्टक भ्रम अछि, मुदा रहल छथि चोकरे सन। की करब चेतु जन, मनसँ आबो चिन्हकेँ केँ छथिओ, मालिक बनाकए देखलहुँ ओ छथि हेहर थेथर नोकेर सन। शांति ! ! ! I. की उठौने छी? बम्! की पकड-अने छी? बन्दूक! की खोजैछी? शांति! भेटथिन्ह? नहि! II. की देखैछी? लास! की गिंजैछी? खून! की खोजैछी? चैन! भेटलाह? नहि! III. कऽ तँऽ बौआई छी? कोने कोने! कत छिछि आई छी? घाटे घाटे! की खोजैछी? सुरक्षा! भेटलाह? नहि! तहन ...... धैर्य धरू! बुद्ध आवि रहल छथि बन्दुक ने नहि, शांतिकेँ घिसिओने! बम् उठौने, चयनकेँ चिचिअबैत! सुरक्षाकेँ लति अबैत !!!! सब केव उदास रहैअ! सब केव एहिठाम उदास रहैअ, केव हमर, केव हुनकर, केव अहाँकेँ दास रहैअ! केब प्रधान, केब महान, केव गणमान्य होइथ, देखिओन कने नीक जकाँ, ओ ककरो खबास रहैअ! भाषण तँ मंत्री, प्राज्ञ आ संतकेँ नहि होइक, उतारि देखु हुनके पर, ओ कोरा नकवास रहैअ!! जीवित साँसक दम्यमे जे किछु गति दैछ ओ यंत्र लगाए देखलिअ ओ तँ एकटा लास रहैअ!! हमर संस्कारक गीत (१) की गल्ली, की सड़क़, की मन्दिर की मोहाड़? जखन नाक मूनिक, “पैर बारिक” चलैछी (२) पोखरि ऐतिहासिक होइक आ धनिकक कोड़ावल मोहाड़परक घर नमरैत गेलै पनिआब घटैत गेलै तहन कोनो मासमे मोन पड़िआइए शामाक गीत ”गामक अधिकारी तोहे बड़का भैआ हो! भैआ हाथ दस पोखरि खनाए दहो चम्पा फूल लगा दहो हो! (३) एहि ठामक मन्दिर की भेलै? हाकिम साहेब कब्जाक लेलखिन! आ मूर्त्ति? ओ तँ चोरा...अ...लेल कै! केँ? से तँ भयंकर पैघ लोक रहै! आ जयिन जग्गह? महान् जी बेच लेलखिन! सब? नहि किछु माइरामकेँ। किछु ओकरे भतिजाकेँ! तहन, मोन पड़ैअ आ गुनगुनाए लगैछी– “एहन पतित केर अही पति राखब हे महारानी सीया, अहीकेँ चरण केर आश् हे महारानी सीया!! कवि जी तबाह छथि कवि जी तबाह छथि हुनकासँ, गाल परक कारी बुन्कासँ! कविताक लेल खोजलनि एकटा नारी, श्रृंगार रस लेल पकड़लनि ओकर साड़ी कविक नाक टेढ़ भेलनि हुनकर ठुन्कासँ! कविजी मग्न भेलाह हुनक प्रेम चिन्तामे मन अटकि गेलनि कखनो केस कखनो फित्तामे बहकि गेलनि पत्नी पड़ोसीक नन्कासँ! डॉ. शेफालिका वर्मा हमर माय आय हम अपन मृत्यु देखलौं लहास पडल छल लोग फुटि फुटि कानि रहल छल हमर जिनगी मे, हमर बाट पर कांट बिछावे वाला सव हिचुकी रहल छल जकरा हमर जीवन से कोनो मतलब नहीं छल सबहक मुंह से हमर प्रशंसा निकलि रहल छल (जेकरा लेल जीवन भरि हम तरसैत रहलों ) घढ़ी घढ़ी क गप्प फुलझरी जकां छुटि रहल छल ..... आह ? भीतर से ओ कतेक खुश छलाह असगर आकास में हम चान सन चम्कब दम्कब ई ते छल मोनक बात आंखि सावन भादोक आकास हमर बेटा सव स्तब्ध्ह हुनक चीकरब भोकरब देखि अपन नोर बिसरी गेल अपन दुःख बिसरि गेल जिनका लेल माय भरि जीवन तरसैत रहलीह की वैह लोग छथि ई सभ ?चैन से माय के एकोटा सांस नहीं लेबे देलान्ही की वैह लोग छथि ई सभ ??आ हुनक अंतरात्मा विद्रोह कै उठल चुप भय जाओ अहाँ लोकनि बंद करू तमाशा , ई कानब बाजब जिनगी भरि हमर माय दीयाजकां जरैत रहलीह आय जखन ई चैन से सुति रहल ऐछ गहीर निन्न में परल ऐछ तखन अहाँ सब किएक हल्ला मचा रहल छि किएक चिकरी रहल छि ??? सभ चुप भै गेल ..मायक मृत्यु से बेटा पगलाय गेल ऐछ .. आ दुनू बेटा झुकि के हमर माथ चुमलक ईश्वर: हमर माय के चैन देब , अगलों जनम हम एही माय के कोखि से जनम ली आ अचक्के ओ चिकरी कनैत बेसुध भय गेलाह "हमर माय " धीरेन्द्र प्रेमर्षि फेर आबि गेल नवका साल फेर आबि गेल नवका साल हमर मुदा अछि पुरने हाल बदलल पतड़ा बढ़ि गेल खतरा एमकी कोना टहलतै काल! पाप बढ़ए जनु कोपर बाँस पुण्यक उखड़ि रहल छै साँस लोकक मूहक मुस्की देखू लगै जेना खरिदल मधुमास बाटघाट बिछबैत भ्रमजाल फेर आबि गेल नवका साल भेल पात झड़ि नाङट गाछ पोखरि छोड़ि पड़ाएल माछ सुग्घड़ रस्ता चलनिहारसभ लोथ भेल अछि लगने काछ मानवताकेर झुकबैत भाल फेर आबि गेल नवका साल फूटैत बम्म आ छूटैत गोली बन्द कऽ रहल न्यायक बोली नव-नव सालमे नव-नव ढङ्गे खेलल जाइ सोनितसँ होली धरतीक आँचर बनबैत लाल फेर आबि गेल नवका साल मिझाइत कालक दीप बुझी रातिक अन्त समीप बुझी दर्द निकालैत सृष्टिक घाओ बहा रहल अछि पीप बुझी ठोकैत एक नव-युगलए ताल फेर आबि गेल नवका साल धीरेन्द्र प्रेमर्षि- गीतसङ्ग्रह कोन सुर सजाबी? सँ रामभरोस कापडि भ्रमर गीत-१ बाध बोनसं उपर उठियौ करियौ मनके चंगा देश दुनियांके हाल ने जनबै रहब सभ दिन उटंगा अखनो अनके मुंह तकबै कखनो ने भेटत जस, पिया अहां रहलहुं जस के तस । ठीक नीक ने उठब–बैसब कोना वुझबै जीवनक रंग अप्पन काज सुतारत सदिखन अहां चास वासमे दंग भुच्चर बनि कऽ आंगन सेबने जीवन तहस–नहस, पिया अहां रहलहुं जस के तस ! बाल बच्चा टेल्गर होइते पढएबै बोरडिंग नीके पढ़तै लिखतै बढ़का बनतै सभ किछु हयतै ठीके सपना मनमे राखि हम जिलौं भोगलहुं अहांक अजस, पिआ अहां रहलहुं जस के तस ! अहांके बोली कोंढ़ कटैए आबो करु अहां बस, पिया रहलहुं जसके तस ! गीत-२ ऐ चन्दा अहां, खोजि पठाउ प्रिय कंत अहींक इजोरियामे गेला निरमोहिया बनल प्रतिक्षा अनन्त ! सजल सेज ओगरने सदिखन, हम बैसलि बौरायलि अओताह हृदय लगओताह, मनहिमन अकुलायलि राति–दिनकेर गणना विसरल सुधि वुधि भेल उसरन्त ! ऐ चन्दा, अहां खोजि पठाउ प्रिय कन्त !! लुच्चा पबन देह, छुबि–छुबि लसकए काम मोचरुवा हिय, रहि रहि चसकए ठाढ़स बान्ह भंग दुखदायी शील, कुल केर अन्त, ऐ चन्दा, अहां खोजि पठाउ प्रिय कंत !! दुनियां बैरी आंखि गड़ौने, लप–लप जीह करैए आनक चास खएबा अभ्यासी, हरिय घास तकैए आबहुं जं अहां भेद नुकएलहुं परतारब दिगदिगन्त । ऐ चन्दा, अहां खोजि पठाउ प्रिय कंत । अहींक इजोरियामे गेला निरमोहिया बनल प्रतिक्षा अनन्त!!! मनीष झा "बौआभाई" ऋतुपति बसंत (कविता) स्वागत अछि हे ऋतुपति बसंत वर्णनीय छी अहाँ अनंत स्वागत अछि हे ऋतुपति बसंत नवपल्लवक संग सुशोभित मज्जर देखि होइत मनमोहित बाट बटोही सहजहि आकर्षित गाबथि वर्णन ऋषि-मुनि-संत स्वागत अछि हे ऋतुपति बसंत वीणा वादिनी देलन्हि प्रवेश वरमुद्रा में हरलन्हि क्लेश ऋतुराजक छन्हि गुण विशेष गुण वखानक कोनो ने अन्त स्वागत अछि हे ऋतुपति बसंत मधुर सुगंध पसारैत महुआ टिप-टिप झहरैत आमक मधुआ गँहुमक खेतक हरियर बथुआ तीसी सरिसव बनल महंथ स्वागत अछि हे ऋतुपति बसंत रंग अबीरक संग में होली बूढ सियानक अलगहि टोली नेना भुटकाक टुनटुन बोली माटि लेटायल छोटका जन्त स्वागत अछि हे ऋतुपति बसन्त कुहू-कुहू कोइली गीत सुनाबय मोर आ मोरनी पंख पसारय बोल पपिहराक बड़ मन भावय विहुँसैत "मनीष" निपोरैत दन्त स्वागत अछि हे ऋतुपति बसन्त मनोज कुमार मंडल जाहि प्रांत रहैत छी हम। जाहि प्रांत रहैत छी हम। मोती सनक चमकैत पानि, सोना सनक जाहिठाम माटि, सोनित पानि बना कए खटैत अछि मजदूर जाहिठाम जाहिठाम घरती उगलैत हीरा मुदा खेद अछि एखनो अन्न-अन्नकेँ मरैत लोग, जाहि प्रांत रहैत छी हम। नदीक जाल बिछाउल जाहिठाम कहबाक लेल पानि खजाना अहिठाम, पानियो सँ बिजली बनैत सातवाँ दसक आजादीक बितल परन्तु एखनो दीया जलैत जाहिठाम सभ किछु बिलिन भऽ जाइत रातिक अन्हारमे जाहि प्रांत रहैत छी हम।। बागक हरियाली एतबा सुन्दर जे, भगवानो स्वर्ग लोकसँ अएबा लेल तरसैत अहि छटाकेँ देखैत हर्सित सभ अहि हरियाली अनबा लेल आतूर छनमे अबैत बाढ़ि सभ किछु बहा लऽ जाइत जाहिठाम जाहि प्रांत रहैत छी हम। भरल रहबा जाहि अन्नसँ डाबा किंतु भरैत छोट-पैघ नेतासँ जाहि माटि-पानि मुद्दा बना कअ बनैत छोटसँ पैघ राजनेता लूटल मे, लूटल जाइत जाहिठाम लोक जाहि प्रांत रहैत छी हम। नवीन कुमार "आशा" (१९८७- ), पिता श्री गंगानाथ झा, माता श्रीमति विनीता झा। गाम- धानेरामपुर, पोस्ट- लोहना रोड, जिला- दरभंगा। (भूल-सुधार: नवीन कुमार ’आशा’ जीक दू टा कविता १. “अंतरकलह आ विचार” आ २. “बैसल-बैसल सोची मनमे” “विदेह”क ७२म अंक (दिनांक १५.१२.२०१०) मे ई-प्रकाशित भेल। मुदा त्रुटिवश ई दुनू रचना “विदेह:सदेह ७ (विदेह मैथिली पद्य)” मे राजेश मोहन झा ’गुंजन’ केर नामसँ राजेश मोहन झा ’गुंजन’ केर आन रचानाक संग प्रकाशित भऽ गेल। तकर भूल-सुधार करैत ई-दुनू कविता एहि “विदेह:सदेह ३४” मे नवीन कुमार ’आशा’ जीक आन रचनाक संग पुनः प्रकाशित कयल जा रहल अछि।- सम्पादक) १ अंतरकलह आ विचार जुनि पुछू हमर हाल हम छी भय गेल बेहाल देखि ई समाजक कुरीति मन भय जाय आगि बनैत ई कीड़ाक खाधि बना कय आचार। बनल अछि ई चर्चा छपल अछि जगमे पर्चा भगलए यौ फेर एकटा बेटी फेर ककरो संग यौ एहिमे नहि लियल मजा ई तँ अछि एकटा सजा जँ भागल दोसरक बेटी ओकरो बुझियौ अपन सुता। बदलू ऐ कुरीतिकेँ बेटा होथि वा बेटी दियौन्ह हुनका ज्ञान जुनि बनु अज्ञान आइ जँ लेब मजा फेर बनत ओ सजा। ई अछि जगक रीति निक काजमे नहि देत संग अधला लेल आओत आगु जखन करब अहाँ किछु अधला बनि जायत ओ पिछला फेर नहि देत संग भय जायत अपनेमे मग्न बना लेत ओकरा चर्या कय देत अहाँक पुर्जा-पुर्जा। कोना बदलत ई समाज जकर होइ अछि नाश निक गप्प नहि करए क्यो अधला लेल सदैव तैयार। की भेल जाइत छै एहि समाजकेँ अपन सभ्यता सब क्यो बिसरए पश्चिमी होए हावी की होएत भावी समाजकेँ चिन्तित मन सोचै अछि। आजुक धिया-पुता नहि बुझए ओकरा आरो किछु नहि सुझए नहि सोचए घरक मान ओकरा बस अछि अपन ध्यान सजा कए माइ-बापक अर्थी बनि जाए ओ स्वार्थी नहि सोचए हुनका बारेमे जे हुनकर करथि पालन। देखि समाजक ई कुरीति मोन भय जाइ अछि पागल जा धरि नहि मिलत समाज नहि अछि तावए इलाज। कोना बदलत ई परिभाषा कोना बदलत ई समाज जकर करै नव पीढ़ी नाश लाबए पड़तै हुनका सड़कपर कहए पड़तै हुनका बेधड़क जुनि करू पूर्वजक अपमान हुनकर तँ राखू मान। २ बैसल-बैसल सोची मनमे बैसल-बैसल सोची मनमे मुदा नहि लत्ता तनपर आगि बड़ैत एहि गर्मीमे बैसल हम उघार आंगनमे सूर्यक तपिस न झेलल जाय न अधलाह किछु देखल जाय जा धरि नहि उठायब डंडा नहि भेटत मनकेँ ठंढ़ा आब ओ गेलै जमाना जाहिमे होइ तराना सभ दिस अछि दू मुँहा रस्ता ई जीवन नहि अछि सस्ता सभ दिस अछि एकटा मोल जँ अछि पाइ तँ अहाँ अनमोल बदलल जाए प्रेमक परिभाषा अछि जँ क्षमता तँ करू आशा भ्रष्टाचार अछि पयर पसारैत शिष्टाचार गेलै कहाँदन आब नहि अछि बेटा बापक हाथमे किछु दिन बाद होएत ई बेटाक आगाँ बाप झुकायत माथ बेटा बैसत कुर्सीपर बाप डोलायत पंखा देखी जे ई फड़ैत विष सोची मनमे हरदम कोना होएत ऐ समाजक विकास कतहु ने एकटा आस सभ दिस होइक निन्दा एहिसँ होअय शर्मिन्दा बैसल बैसल सोची मनमे। ३ हमरा भेटल हमरा भेटल एकटा विषय ओइ लेल भेटल किछु समए कहल गेल हमरासँ मीत लिखू युवा वर्ग लेल गीत फेर माँगल किछु समए आ युवा मंचमे पैसल हम देखि हुनकर स्फूर्ति मन भऽ जाय प्रसन्न ई देखि कही मनसँ ई छथि देशक भविष्य ऐ सँ नै कियो अनजान एतए सोचि बढ़ल मन फेर आएल दममे दम फेर कलम आगू बढ़ल आब केलक किछु लिखैक मोन युवाक मन हम जानी हुनकर दुख-दर्दकेँ जानी कि होए हुनकर अभिलाषा जँ युवा आगू बढ़ता तँ समाजक सम्मान बढ़त फेर राज आओत युवा वर्गक ऐ मे नै संदेह रहत हमरा भेटल...। ४ सुनू सुनाउ अपन खबरि नै बनू अहाँ बेखबर बेखबर बनै नै समए अछि मीत अखन गाऊ संगीत संगीतक नै करू अभेलना ओकर सभ स्वरमे अछि तान ओकरा नै करू अनजान जँ आइ फेरब ओकरासँ मुँह फेर जीनाइ भऽ जाए दुरूह एखन अछि बेर संघर्षक ओकरा नै दियौ विराम जँ आइ लगाएब अहाँ विराम नै बनि पाओत अहाँक पहिचान कते दिन लोक पहिचानत छथिन ओ हुनकर सन्तान किछु तय करू प्रत्यत करू तखन अपनाकेँ संयत रचथु भऽ संयत ई अछि सत्य यौ मीत जँ अहाँ छी निर्बल नै देत अहाँकेँ कियो बल जँ अहाँ किछु करब अपने तखन बनि पाओत पहिचान हमर ऐ गामक राखब ध्यान देबनि माता पिताकेँ सम्मान ऐ सँ नै बनू अनजान जँ आइ कनी होएत अपमान नै राखू अपन मान बस देखू एकटा लक्ष्य ओकरा जुनि करू भक्ष जे आइ होइ अपमानित तँ तैँ राखू ई ध्यान लीअए चाही ई शपथ नै होएब ऐ मे दू मत जखन अहाँ पाएब सम्मान नै करब ककरो अपमान आब आशा गपकेँ विराम लगाबथि अपनो आब पहचान बनाबथि सुनू सुनाऊ अपन खबरि (मित्र पी.एस.ठाकुर “बबलू” लेल) ५ की लिखू तोरा लेल गे सुनरी प्राण प्रिय हे मधुप्रिय, हे कर्णप्रिय मोन कहए लिख ओकरा लेल जकर कोनो नै मोल गे सुनरी प्राण प्रिय हे मधुप्रिय, हे कर्णप्रिय जखन देखी तोहर काया कहए मोन फुसफुसाय बौआ तूँ कर किछु माया जखन देखी तोहर खुजल केश मोन करए बदलि किछु भेष आँखि जखन देखी खाली मोने मोन दी गारि कही जँ रहितौं हम काजर भेटितै तोर छुबैक अवसर हे... तोहर देखि कऽ ठोर लागि जाए मनमे होर हमर कहए निर्लज्ज मोन जँ रहितै ठोरक शोभा पाबि जइतें तूँ ई मेवा गे सुनरी... जखन देखी श्रृंगारित रूप लागए जेना निकलि गेल धूप आब की लिखू तोरा लेल नै अछि कोनो शब्द मेल आब कही मोनसँ आब नै हमरा तूँ टोक आस लगौने कही मोनसँ जँ बनि पओतै ओ घरवाली नै बुझाइत छी हम खाली गे... ६ नै बिसरलौं चारि साल केना बिसरी ओ चारि साल जे बुनने छल एकटा जाल बदलि देलक जीवनक परिभाषा कतो नै छल एकटा आशा देखने छलौं एकटा सपना पढ़ी-लिखी शहरमे बनब एकटा अफसर छल हमर ई अभिलाषा जे बनि गेल छल निराशा आइ ओ दिन नै बिसरल ओ मनमे रचल बसल जखन केने छलौं फेल सभ कियो हाथो हाथ लेल सभ ठाम होइ अपमानित किए नै होइत सम्मानित मुदा सुनि कऽ मन करी शान्त फेर राखी दिलपर हाथ ओतएसँ आएल अवाज बौआ जँ तूँ केले फेल नै बुझ छुटि गेल रेल फेर देखा देलक पथ जइसँ आस निर्गत फेर देखा देलक किरण आ करऽ लगलौं विचरण केना बिसरी ओ चारि साल जे बुनने छल एकटा जाल केना बिसरी हम ओ दिन जकरा कटलौं गिन-गिन-गिन-गिन जखन जाइ कोनो गाम लोक जिनाइ करए हराम किए नै आइ बनल अफसर किए नै घुमी शहर किए नै पाबी सम्मान पर नै बिसरलौं चारि साल केना... ७ मस्ती करू यौ बौआ मस्ती करू मस्ती करू यौ बौआ मस्ती करू मुदा पढ़ाइपर कस्ती करू आएल छला अहाँक मास्टर कहि गेला कहि गेला हमरा दू आखर बौआ जँ तूँ नै पढ़बेँ तँ हमरा सभकेँ की देखबेँ तोरामे अछि उम्मीद बसल की ओ निकलत हम्मर भ्रम नै तूँ तोरिहेँ हम्मर आस नै तूँ करिहेँ हमरा निराश मस्ती करू यौ बौआ मस्ती करू मुदा पढ़ाइपर कस्ती करू आब नै तूँ छह नेना नै देखेबह तोरा ऐना तूँ जँ अपने नै बौझबऽ तँ तूँ केना की करबऽ जखन देखी तोरा पढ़ैत मनमे उल्लास फेर जागल जखन देखी खैलै-खेलाइ मनमे आबए रस मलाइ मस्ती करू यौ बौआ मस्ती करू मुदा पढ़ाइपर कस्ती करू हमर आस तूँ नै तोरिहेँ अपन माएकेँ नै बिसरिहेँ माइक सपना पूरा करिहेँ आ ओकर नाम अमर रखिहेँ कहै छलौ तोहर माए अहाँक बौआ नाम कमाए देखबै बौआक बापू अहाँकेँ मनपर नै रहत काबू जखन बौआ बनत डॉक्टर फेर होएत ओकरापर गर्व की बौआ ई निकलत भ्रम की बौआ तूँ तोरमे आस तोरासँ अछि जुड़ल हमर साँस नओ तूँ करिहेँ हमरा निराश बौआ जौँ तोरा लगलौ अधला जुनि तूँ करिहेँ तूँ अधला कहैक मतलब छलौ बौआ नै तूँ एना कतै टौआ आइ हमर मन भेल प्रसन्न किएक तँ तूँ भेलेहेँ पास माइक सपना पूरा हेतौ आ तोरा डिग्री भेटतौ ऐसँ छौ सभकेँ संदेश जुनि अहाँ बिसरू अपन भेष जुनि बिसरू अपन देश माता-पिताक करू सम्मान पहिने देखू हुनकर मान मस्ती करू यौ बौआ मस्ती करू मुदा पढ़ाइपर कस्ती करू ८ आव मोन करें कमाई कि कहू यो टूना भाई आव मोन करें कमाई दोस लोकनि सेहो धेलथि बाट एखन धरि हम पकड़ने दी खाट। माई बाप नहि कहथि किछु नहि ताकथि हमरा पिछु नहि वो कहथि त हम नहि सोचि इ तय अछि हुनक अपमान। जखन-जखन दुविधा मय आबी दथि वो हमर संग बच्चा सँ पकर लथि वो हाथ आब बने अछि हम दि साथ। जखन-जखन तड़ते इ मोन नहि किछु करि पाबि वो छन हर दम घुटि-घुटि के जीबी हर दुख के विस जकाँ पिबी आँखिक नोर बहावि कोना ओकर तोड़ पाबि कोना उपर सँ रहि हम खुष आ भीतरे भीतर काने मोन कालि रातिक बात कहिओं रातिक में कानेक भेल मोन नहि भेटल ककरों संग फेर भेटल निर्जिव क संग टोकरे पकरि कलों अलाव। लेक आब कहे यो भाई भय गेले छौड़ा बढ अलोकिक नछि हम अलोकिक आ लगे लोकक लाज बुझी हम ओकर इलाज। माई बाप नहि बुझी पावथि तखन कोढ फाटे यो। कि करथिन ओलोकइन छियनी तय हुनक आस। कखनो-कखनो मोन करइ अछि द दि हम अपन परान। जखन आवे इ बिचार तखन होई माई बापक बिचार फेर हुनका सोची रूक जाय माने जो आई हम फसरी लगेवे कि नहि घटथि हुनक मान फेर खाई एकटा कसम जखन धड़ी रहत पड़ान नहि छोड़ब हुनक ध्यान ९ तोहर गोर गोर गाल …… तोहर गोर गोर गाल गोरि करे कमाल तोहर तिरचि नज़र गोरि करो असर तोहर......................। मुस्कान तोहर अनमोल ओकर नहि मोल जखन निकलो तोहर बोल लगे हील गेल दिल आखि जखन देखि तोहर राती भ्रर रहि जै जागि तोहर गोर गोर गाल गोरि........................। गाल पर देखि जखन तिल रुकि जाइ दिल देखि तोहर सुनर काया मन के नहि आवे माया सोचे पापी ई मोन रहितो जखन उदास पबितो तोरा पास तोहर गोर गोर गाल गोरि करो कमाल.......। देखि तोहर मुह जिनाय भय जय दुरुह फ़ेर कहे ई चनचल मोन कहि दी ओ गप जे बनि गलो अपच आब कहि तोरा गप चाहि तोहर साथ चाहि तोरा बेहिसाब जखन गोरि पायल तोहर साथ लागल भय गलो सफ़ल तोहर गोर गोर गाल गोरि करो कमाल...........। (ए. झा क लेल...........) १० किया ने पावी तोहर टोन चोरी चोरी देखि तोरा नही भावे दोसर मोरा देखि तोरा ओही पल पाओल अपनाक धन्य चोरी............................../ सदिखन देखि घरक आगू हरदम करि तोहर पाछु पर नहि पावी तोहर संग भई गलो हम तंग चोरी.................................../ तोहर धयान मोन स निकाली करे लगलो हम पढाई कखनो कखनो याद आवे तोर ओहि पल निकले नोर चोरी ...................................../ मेट्रो मे जखन देखल तोरा फेर आयल माथ मे फेरा चाहलो गप करि दू टुक पर देखती रहलो टुक टुक मोनक गप रोकती न बने नै तोरा टोकती बने चोरी चोरी .............................../ जिनाई भेल आछि दूभर पाबू केना तोरा गे सदिखन सोची तोरा की तू बनवी मोरा चोरी चोरी......................../ चोरी चोरी खिचल तस्वीर ओकरे बुझल अपन तकदीर फेर सोचे मोन किया ने पावी तोहर टोन चोरी चोरी देखि तोरा नहि.............................../ ११ अनामिका साँझक समय निकली दुनु भाई छति ओ हमर छोट पर छथि हमर जिगरी / जखन जखन निकली घर से टोकियनी हुनका सदिखन सुनु यो भाई सुनु यो भाई कानो करब आइ घुमाई साझक............................../ किछु काल बाद ओ बजला चलू बुझी भौजीक हाल बुझलो भैया भौजीक हाल ओहो ते हेती बेहाल साझक................................/ हम ओही पर बाजल सुनु यो भाई सुनु यो बोआ अहिने किछु अछी हमर हाल रति के नहि नींद आवे दिन के नहि चैन यो साझक......................................./ सुनु यो भाई सुनु यो भाई साझक कि कहू हाल मोन रहे अछी बेकल लागल रहे टकटकी यो ६बजेक इंतज़ार मे जखन बाजे साझक ६ तखने भए जाइ हम छू साझक .............................../ गपक क्रम आगू बढ़ल आब पहुचलो चौक पर फेर पुछला हमरा भाई और सुनाऊ अपन हाल साझक................................../ फेर उनका से कहल जहिया से पायल हुनका जिनगी भयी गेल उनटा पुन्टा साझक......................................./ एकटा आरो गप कही सुनी के जुनी हसब यो जहिया जहिया देखि हुनका बढ़ी जाए धड़कन एक बेर जे सुरु भेल फेर नहि सुने यो साझक........................................../ अनामिका अनामिका अनामिका ई शब्द सदिखन पावी दोसरक नहि ज्ञान यो जखन देखि आगू पाछु सदिखन पावी हुनके आगू साझक ........................................../ आब गप क विराम लगाके साफ़ साफ़ हम कहे छि हुनक छियानि हम प्रिये ओ हमर प्राणप्रिये ओ हमर अनामिका मनभावन प्रीतम अनामिका साझक समय निकली .............................................../ १२ हमहूँ तँ छी इंसान डोम डोम डोम डोम सभ कियो हाक लगाबए मोने मोन अपने कही हमहूँ तँ छी इंसान आ हरदम करि भगवानक ध्यान आ हरदम जापि ॐ तँ किए कहै लोक डोम / लोक जखन दूर करै अछि तखन तखन मोन कनै अछि आ सदिखन सोचै मोन की अछि आखिर हमर गलती डोम डोम सभ कियो कहै अछि / डोमोक होएत किछु अरमान ओकरो तँ राखू किछु मान कखनो राखि देखू अपना तखन देखू कोनो सपना फेर बुझि पाएत लोक की अछि डोमक मान डोम .............................../ डोम जे नै होए जग मे कोना किन्को आगि जखन करि कोनो करतेबता कोना एतै बासक समान की कखनो सोचल ई जजमान डोम ........................................../ भगवानक अछि अलगे लीला हुनके बनाओल ई मेला डोमो तँ हुनके रचल अछि डोम डोम ............................../ रजा हरिसचंद्र पर जखन आएल विपदा ओहो पाओल डोमक शरण ओइ समय जे होएतनि मरण नै पओतथि डोमक शरण डोम डोम......................................./ कखनो कखनो मोन कनै अछि की अछि हमर ईहए मान फेर मोन अपने कहै अछि जे तूँ नै देबहीं अपन मान कोना पैमे लोकक मान डोम डोम डोम डोम सभ कियो हाक लगाबए ....................................../ १३ अनाथ माए बाबू अहाक आवे याद जे पबितो दूनूक साथ कि लोक कहिते अनाथ जखन देखि अहाक छाया ने रूकि पाबे तखन नीर माए .................................... कखनो कखनो मोन करे हमहू पाबि कोनो कनहा ने भेटे जखन कोनो कनहा तखन लागे हम छी अनाथ माए.......................................... अहा दूनू जे रहितो निक खराबक पहिचान करेतो कखनो हमरा डटितो कखनो करतो दुलार ने पेलौ ओ दुलार जे म रहे सभक संसार माए...................................... जखन करि बदमाशी लोक कहे हमरा यो बाबू कियाक ने हेते ऐहन ने छे ककरो साया कियाक ने करे कुसंग ने छे ककरो साया माए................................... भगवान ने ककरो ऐहन दिन देखाबे ने ककरो अनाथ बनाबथि भेटे सबके माए बापक प्यार जे मे अछि सभक संसार माए................................................... १४ एक दिन बाबु कहला हमरा एक दिन बाबु कहला हमरा नुनु आवे तोहर कथा की आखिर छो तोहर विचार आब हमहू भेलो लाचार जल्दी कह तू अपन विचार एक .................................. नुनु हम छालो लाचार आरिज़ भे कलो एकटा विचार आ कलो तोहर विवाह स्थिर पहिने पूरा गप सुनिहे तखन दियहे कोनो जवाब गप के आब आगू करी एक............................. नुनु की कहू आगुक हाल जिनाये भे गेल छल बेहाल भोरे भोरे जखन जागी पहुच जै छलाह घटक घटक कहति हमरा से कि करथि अपनेक बालक कि अपनेक बालक छति तैयार कि छन्हि दहेज़ क विचार ? जे अपनेक अछी कोनो मांग ते देल जै ओकर ज्ञान एक .................................. जखन सुनल हुनक विचार तखन देल हुनका ज्ञान कहल हुनका से हम ने सोचल जै अहेन कुटुम्बा अहेन ने अछी हमर विचार अपने स विनती छे कुटुम्बा ने हुएयों अपने तंग अपने आब दिन तकबियो हमरा किछु ने चाही बस एकटा कपरा मे करबे विदा ने करबे कोनो चिंता बाबु के गप सुनी भरी आयल आखी मे नोर जे अगर हो अहेने सबहक विचार ते कि होएए विवाह बाद अत्याचार एक................................................. बाबु के देल हम वचन आहाक माथ शदा राखब उपर करब सबहक सम्मान ने छोरब ओकर ध्यान एक....................................... १५ माँ छिन्नमस्तिका मैया मैया मैया मैया मैया मैया हे माँ छिन्नमस्ते धन्य ओ उजानक नगरी जेतऽ अहाँ विराजी माँ लोककेँ जखन रहए कोनो दुविधा माता अहा सँ करए फरियाद मैया मैया हे माँ छिन्नमस्ते पुत्र नवीनक सुनू फरियाद पुत्र फँसल अछि बीच भँवरमे ओकरो पार लगाबू माँ मैया मैया हे माँ छिन्नमस्ते पुत्र करै अछि दंड प्रणाम जँ माता नहि दिखायब पथ जँ माता नहि विनति सुनब पुत्र एतै दऽ देत प्राण मैया मैया हे माँ छिन्नमस्ते पुत्र करै अछि प्रणाम माता जँ अहाँ रुसि जायब तँ केकरा अपन विनति सुनायब जँ भेल अछि हमरा सँ गलती सजा हमरा सुनाबू माँ पुत्र फँसल अछि बीच भँवरमे ओकरो पार लगाबू माँ मैया मैया हे माँ छिन्नमस्ते पुत्र करै अछि दंड प्रणाम जखनो हम आबय छी गाम माता रहैए अहाँकं ध्यान माता कोना हेती हमर हुनका नहि केलौं प्रणाम जा धरि नहि करी दर्शन माता लागए जेना छूटल प्राण मैया मैया हे माँ छिन्नमस्ते पुत्र करै अछि प्रणाम माँ छिन्नमस्ते माँ छिन्नमस्ते राखि सभपर धियान मैया मैया हे माँ छिन्नमस्ते नवीन करै अछि दंड प्रणाम १६ दफ्तर दफ्तरक सब के खसता हाल जखन पहुँचब बुझु हएब हलाल . दफ्तरक चक्कर बड खराब ,ओतय ने अछि कोनो जवाब .. जँ अहा छी बड जल्दीमे ,स्वागत करियौनि नकदी सँ .. ओतय चलए सब तरहक रेट ,सब कियो लै छथि अलग सँ भेट .. बरका होथि वा छोटका सभकेँ दियौन टटका जँ करबनि सिनाजोरि हेत काज मे देरी... देख ओतुक्का नजारा चढल हमरा पारा, बुझितय ओकर इलाज पर हमरो तँय छल काज.. मोनमे आएल सबक सिखाबि ,फेर आएल याद . जँ हिनका सब सँ करब सिनाजोरि तँ होयत काजमे देरी कि करतै बेचारा आशा नै छलै आर कोनो आस . .जेबीसँ निकाललक टाका आ करा देलक ओ निर्गत ... कनिको ने सोचलक ओ जँ ऐकरा देब बढावा तखन तँ चढबै पड़त चढावा.. दफ्तरक ई हाल १७ कोना बिसरू तोरा तोहर यादमे गै सजनी एकटा गीत पेश करै छी जहिया तूँ गेलेँ दूर नै लागए किछु नीक तोहर यादमे पेश करै छी दिलसँ एकटा गीत आ आ आ आ आ सजनी सजनी सजनी गै सजनी के कहत हमरा साजन ककरा लेल बजाउ बाजन आब बस रहलौ तोहर इयाद ककरासँ करू फरियाद के कहत हमरा साजन ककरा लेल बजाउ बाजन सजनी सजनी गै सजनी १८ करेजक प्यास करेजक तूँ छँ प्यास ने जँ देखि तोरा प्रिय ने लागे किछु नीक तोरा लेल जतबा कहू ओ होयत कम ! ने हमरा छल आस जकर करी आरती ओ बनत प्राणप्रिय करेजक ...............! ने करेज कहल माने प्रिय , ने चित अछि स्थिर आजुक राति जुनि करु लाज बस बनि जउ एक दोसरक साज करेजक तूँ.............! सजनी जुनि मुनियौ अपन नयन आशा बनाओत ओकरा दरपण , ठोर जखन ठोरमे मिलै मौधक ओ एहसास देइत अछि करेजक... मृगनयनी हे रुपवती कते कहू अहाँक बारमे, आजुक राति जे देखल तोरा नवीन अंग गेलौं सिहरि करेजक..............! आब कते करु तोहर बखान प्रिय चलू करी मिलान , आजुक राति ली हम कसम देब अहँक जीवन धरि संग करेजक तूँ छँ प्यास १९ परी छी परी छी अहाँ नील गगनक नैन छी चैन.. इजोरियाक छी चाँद दीपक छी ज्योति .. तनक छी खुशबु होंठक छी मौध सदिखन देखि अहींक स्वप्न कि हमर बनब दर्पण.. प्रियशी कखन आएब अहाँ कहिया तक सताएब अहाँ परी छी अहाँ ..... ... नैनमे अछि अहींक स्वप्न अहाँ बिनु जीवन अछि तंग.. करुणा संग विनति करियो गे ने तुँ पहुँचबिए ठेस ... ने तँय आशा जिबैत मरि जाएत मरलो बाद घुरि ओ आओत तोरा अपन सजनी बनाओत...परी छी अहाँ नील गगनक.... २० माए बाबु .. माए बाबु आइ अहाँक मोन परल , तखन हमरा ने किछु फुराएल .. बैसि कऽ आंगन मे , खूब हम नीर बहायल.. फेर सोचल जे सपना देखला बाबु , ओकर कोना करु त्याग .. कोना घुरि जाए ओ गाम जकरा लेल लेलौं वनवास .... आइ मरम बुझे अछि आशा , की अछि ई मिथिला समाज .. एकरा मे अछि ओ जान , जे मुरदा मे सेहो फुकै जान. माए बाबु ने करब ई दुख बौआ एतय अहाँक पाबै सुख. जाबत ओ ने रचत इतिहास नै आओत अहँक पास... माए बाबु.. (अपन माँ बाबुजी कँ समर्पित ,हुनक आस ,नवीनक आशा) २१ आस नै छल हमरा ई आस तोरा पाएब की अपना पास आँखिमे बसै छल तोहर मुखड़ा जखन-तखन दिन-दुपहरिया जखन कखनो मिलैए तोरासँ नैन नै आबैए ओइ दिन चैन नै छल हमरा ई आस तोरा पाएब अपना पास पूरा दू बरख बाद देखल तोरा मुदा नै किछु कहि पाओल तोरा अखनो देखि तोहर चंचलता मोन करैए सदिखन तोरा देखी तोहर देखी मन्द मन्द मुस्कान बनेलकौ हमर दिलमे मकान तोहर की करू आरती जे अपने होअए पूर्णिमाक चान जेकर होअए अपन पहिचान ओकर की करू व्याख्यान बस एकटा गप कहियौ गए तोहर हृदैमे बसए आशाक जान कहियो नै छल हमरा आस पायब तोरा अपना पास २२ बाबा धामक रस्तामे कविता लिखाइत अछि बाबाक दरबारमे लगेलौं अपन अरजी, कहल बाबाकेँ सुनू यौ बाबा आस लगने आयल छी.. स्वीकार करु पुत्रक अरजी हरु ओकर सभ व्याधि.. बाबासँ हएत भेँट ..गप करब भरि पेट .. बस किछु दूर छी बाबासँ, मुदा नै अछि चित स्थिर.. कहै अछि करुणापूर्वक नवीन पूरा करियौ बाबा ओकर आस.. बोले बम बाबा केहेन तोहर लीला अदभुत् तोहर खेल.. एक बेर हमरो दर्शन दए आस लगौने आएल छी... बोल बम… २३ राखह माता पिताक ध्यान जँ अपनाकेँ देखब हेय आँखि सँ .. नै पायब किनको सम्मान जँ अपन मान अपने नै राखब कहियो नै पाबि सकब सम्मान.... अपन पहचान अपने बनाउ फेर माए बापक मान बढाउ कष्ट अछि मुदा हँसै छी नै लागनि माए बाबूकेँ बौआ अछि हमर दुखी... आशाक ई अछि अनुभव दुख जँ होयत ओइमे भेटत सुखक अंश, की हमर ई गप अछि गलत... हँसै छी दुख भगाबै लेल.. भगवान आशा अछि अहाँ सहारा देब.... कखनो-कखनो एहेन लगै अछि.. अंदर अंदर मोन कनै अछि देखल जे हम सपना कि ओ बनि पाओत आशाक अपना..... राति हो वा दिन बस एकटा बातक राखह ध्यान जावे छह तोरा मे पराण तावे राखह माता पिताक ध्यान.. २४ की लिखू की लिखू की लिखू नै मोन करै अछि की लिखू की लिखू तखनो जँ अपने जिद करै छी तँ अपनेकेँ प्रणाम करै छी। २५ अविस्मरणीय कोना कँ करि हुनक बखान जिनक जीचन में अमूल्य योगदान हुनक रहे सदिखन ध्यान जीचन मे हुनक अलग स्थान दूर रहियो के पास छथि एहसास छथि आ हृदय पास छथि जखन छलौ हम टुगर नै देलक जखन कियो संग तखन देलथि ओ आसरा कोना ओकरा बिसरी जाए जँ ओ ने देतथि संग कि पबितो इ सम्मान ? एहसास छथि आ हृदय पास छथि जखन लोक करे अपमान ओहि ठाम हुनका सँ पाबि मान कोना हुनक कर्ज तोड़ब जिनक हम छीक सदिखन ऋणी एहसास छथि आ हृदय पास छथि जखन हम करे छलौ विलाप कानै लेल दएलथि कनहा जखन नहि छल ककरो सँ आस ओ बनलथि हमर प्रकाश जा धरि रहत इ प्राण नहि बिसरब हुनका आ सदिखन रहत हुनक ध्यान कोना करू हुनक बखान जिनक अछि हृदय मे सम्मान एहसास छथि आ ........................ (मिन्न पी. एस. सिंह. ठाकुर आ भाई श्री मनीष बौआ भाई केँ समर्पित) २६ कि जीवनक ई अछि सत्य जागल सूतल सदिखन सोचि जीवनक की अछि सत्य ताकैत फिरी प्रश्नक उत्तर जतय ततय सर्वोत्तर जखन नहि भेटल उत्तर तखन कखनो कखनो सोची सुख वा हो दुख आँखि भरि आबए नोर की ई अछि जीवनक सत्य ? बच्चामे जकरा भेटए दुलार माए बापक भेटनि प्यार जखन ओ होथि सियान माए बापसँ लगाबथि जुबान कि ईएह अछि जीवनक सत्य ? पढि-लिखि जखन लेबए बच्चा आ नीक पाबि जाए नोकरी तखन वएह धिया-पुता माता पिताक नहि करथि सम्मान कि ईएह भेटलन्हि हुनका ज्ञान की ई अछि जीवनक सत्य ? घुमै छलौं पश्न्नक उत्तर लेल तखन मोन भेल आर विचलित पुतोहु करथि सास-ससुरपर वार आ बेटा करथि आगु-पाछु करैत रहथि हुनक अपमान ने देथि हुनका सम्मान की ईएह अछि जीवनक सत्य ? कत्तौ-कत्तौ देखै लेल भेटल जिबैत किए नहि करथि अपमान जँ मरि गेलाह ओ व्यक्ति हुनक समाज करए गुणगान की जीवनक अछि ई सत्य ? आशाक छनि विनती सभकेँ दियौन मान किए ने ओ होथि अज्ञान जीवनक ई बनि पाओत सत्य ? (अपन मामाजी डा. रमानंद झा "रमण" केँ समर्पित, जिनक हमर जीवनमे एकटा अलग स्थान अछि।) राम विलास साहु, जन्म- ०१ जनवरी १९५७, पता-गाम- लक्ष्मिनियाँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहिया, थाना- लौकही, जिला- मधुबनी (बिहार), पिन नं.- ८४७१०८ कविता, गीत, हाइकू, शेनर्यू आ टनका (रथक चक्का उलटि चलै बाट) [अप्पन गप, महगाइ कोइली कुहकै आमक डारि प्रीतक गीत गंजन कर्मक फल प्रेमक बान्ह जीबैत चलू बिसरल गीत जड़ैत दीप गामक नारी पियासल धरती चिंता-चिता मातृभूमि मिथिलाक अभिनंदन ई की केलौं अहाँ केकरा संग खेलब होरी गाए-माए खेतिहरक जिनगी ज्ञानक दीप दुखाएल गंगा बेंगक बरियाती बलानक बाढ़ि पानिक बून्न हेराएल भगवान जीबए लेल चैताबर गीत चैती गीत प्रेमक भूखल मरूआक मान अरमान भारत माता परदेशी मोनक बात की कहब धनरोपनी लफंगा बेरोजगारी रूपैआक ढेरी भ्रष्टाचारी आएल वसन्त अप्पन-पराया बाट बटोही हाटक चाउर बाटक पानि ज्ञान बाॅटैत चलू प्रेम आकि पैसा कालक पहरा पियासल मन दहेजक खेल घर परदेश गहुमक कटनी-दौनी बिआह की थिक? आजुक दिन पुत्र कुपुत्र कतेक दुख काटब हरि हे बारहो मास सड़क बीच नाला आँखि रहितो आन्हर भाग भरोसे फूल-पत्ता भदबा बाबा बले फौदारी केकरा ले कानब परिवर्त्तन माइयक ममता परदेशिया पाहुन धरतीक सुख साओनक राित लोभी भोम्हरा भोरक क्षण गरीबक मान माए हमर गाम घर अगिलगी काली मैयाक गीत हमर िबखरल समाज िचड़ै चुनमुन्नी माइक लाल के गरीब? नैनाक खेल कोइली कूहकै आमक डारि नींदिया बैरी भेल पहुना पागल प्रेमी कोसीमे समाएल जिनगी हाइकू/ शेनर्यू/ टनका] अप्पन गप मैथिली साहित्यक विद्यार्थी तँ नै मुदा हिन्दी बी.ए. धरि पढ़ने छी। गाममे रहने मैथिलीक बीच सभ दिन रहलौं। मातृभाषासँ सिनेह आ लगाउ तँ स्वभाविके। जिज्ञासा रहितो पहिने नै लिखि सकलौं जेकर अनेक कारणमे एकटा ईहो अछि जे हमरा इलाकामे मैथिली साहित्यक गतिविधि न्यून रहल। पत्र-पत्रिका सबहक स्थिति “बहिरा नाचए अपने ताल” सन रहल, मुदा आब किछु अलग बात अछि। अपने सबहक बीच एलौं तेकर श्रेय विदेह ई-पत्रिका एवं विदेह-सदेह पत्रिकाक संपादक मण्डलक छियन्हि। ओना इम्हर आबि कऽ पूर्वोत्तर मैथिल-असाम, कर्णामृत-कोलकाता आ मिथिलांचल टुडे दिल्लीक पत्रिकामे सेहो रचना छपल अछि। रचना लिखैमे, साहित्यकार जगदीश प्रसाद मण्डल केर प्रेरणा आ विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलनक अगुआ श्री गजेन्द्र ठाकुर जीक देल विश्वासकेँ हम कथमपि नै बिसरि सकब संगहि उमेश मण्डल जीक मदति। समर्पण-पूज्य पिता स्व. नशीब लाल साहु केर स्मृतिमे... महगाइ महगाइ अहाँ कतएसँ आ किअए एलौं आकि जबरदस्ती हमरा देशमे घुसि एलौं अहाँ विदेशमे भलहिं छलाैं के अहाँकेँ बजेलक आकि भूलसँ एलौं अहाँ अबिते हमरा देशमे आगि लगेलौं नोन शुन्य भऽ गेल तेल कतए गेल पता नै भेल हरदी किनेमे हड्डी टूटि गेल मशालासँ मन फीर गेल पिऔज-लहसुन सोना भाव बिक गेल पेट्रौल-डिजल आसमान चढ़ि गेल अहाँक मारिसँ देह टूटि गेल महगाइ कहलक- “किअए हमरा दै छी दोख अहाँ सभकेँ नै अछि होश अहाँक देशमे होइए बड़-बड़ घोटाला हमरा बजा कऽ लाबलक घोटालाबला आब हम अहाँ देशकेँ बना देब दिवाला खून बेचबा देत विदेशबला नेता आ अधिकारी भऽ जाएत मालबला सभ जनता बनब बेचारा-बेसाहारा।” अहाँ हमरा सभकेँ किअए बनेलौं दिवाला महगाइ अहाँ कतएसँ किअए एलौं....। कोइली कुहकै आमक डारि कोइली कुहकै आमक डारि सुनि हमर मनुआ घबराए पिया हमर रहिताए तँ धीरज दैताए बन्हाइ अन्हरिया राति हम बाट देखैत दुनू आँखि निहारि इजोरिया राति हम चान देखैत चकवा-चकोर बनि जाइत चन्दा बादल लुक-छुप खेले पिया रहिताए तँ हमहूँ संगे खेलतौं वहिने कोइली बोलीसँ हमरा दिलमे लगैए गोली पिया रहिताए तँ किछु कहबो कैरतौं अनका केना किछु कहबै पिया परदेशिया बर निरमोहिया कहिया बनत हमर रखबैया कोइली बोली सुनि हमर देह भऽ जाइए बहिर केकरा कहबै ई दूखक बात कोइली कुहकै आमक डारि।। प्रीतक गीत फागुन मास हमर बितए यौवनमा हमर दुख कहिया हरत सजनमा गौना कराए लिअ एबकी फगुनमा आमक गाछपर बैसल कोइली प्रीतक गीत सुनबए एबकी फगुनमा चैत मास जेना टपकै महुआ ओहिना टपकै हमर यौवनमा सावनक मेघ भिजबए बदनमा बिजली चमकए बादल बरसै देहसँ छुटै पसिनमा बरखा बरसै घनघनमा पिया बनल अछि बैमनमा ऊमड़ल नदिया, दरद जगाबए दरदक दुख केना केकरो कहबै आबिते सजनमा दरद हरि लैत फगुनमा गौना कराए लिअ एबकी फगुनमा प्रीतक गीत सुनबै छी सजनमा। गंजन बड़-बड़ गुड़ गंजन सहैए मिश्री नाओं धड़बैए पीटि-पीटि सोना आगि तपि कसौटी रगड़ि चमकैए चौदह बरख वन घुमैत वनबासी जिनगी बितबैत पुरुषोत्तम राम कहबैए केकरा कहबै सुख-दुख दुखसँ उपजए सुख दुखियाक सारथी भगवान बनैत सुखिया गंजन सहैत अज्ञात बास काटैत पाण्डव नित हरि दर्शन करैत सुखियाक साथी सभ बनैए दुखियाकेँ ने कोइ दुखक अंत एक दिन होइए सुखसँ संकट बढ़ैए बड़-बड़ गुर गंजन सहैए मिश्री नाओं धड़बैए। कर्मक फल कर्मक फल अवश्य मिलै छै जानि-बूझि जौं करै छै हानि होइ छै धन जन अभिमानक हािन सभ तरफ होइ छै नकिहानि काज नै होइ छै छोट-पैघ कर्मसँ लोक होइ छै छोट-पैघ जेहेन सोच ओहेन काज होइ छै भावनाक संग भाव नदी सन बहै छै सभकेँ सुख मिलए, दुखक अंत होइ छै कर्ता पुरुषक पूजा सभ करै छै कर्मसँ भाग्य बदलै छै कर्म पूजा कर्म महान जगतमे होइ छै अमर नाम सूतल जागलमे फर्क होइ छै सूतलमे भाग्यक विनाश होइ छै जागल पुरुषकेँ नाश नै होइ छै कर्मक फल अवश्य मिलै छै जानि-बूझि जौं करै छै हानि। प्रेमक बान्ह आशा-निराशा भेल पिआ कतेक दिन रहब अहाँ परदेश आँखिक नोर बहए दिन-राति सबूर बान्हि जीबै छी कहुना दिल धक्-धक् करैए अहिना धैर्य टूटि गेल हमर करम फूटि गेल सोगमे रोग बढ़ि रहैए तन धधकैए मोन बरसैए आँखिसँ बहैए निरंतर नोर किअए तरसाबै छी दिल हमर छन-छन बितैए जिनगी अनमोल कि राखल छै परदेशमे आउ मिलि रहब अपने घरमे नारी-पुरुष जिनगीक दुपहिया छी दुनू मिलि गाड़ी समरूप चलै छै परिवार समाजक िनर्माण होइ छै देशक प्रगति दिन-राति होइ छै जल्दीसँ लौटू अपन देश सभ दिन काज नै देत परदेश कतेक सबूर बान्हब हम दिलक अरमान सभ चूर भल गेल। बिनु प्रेम जिनगी बेकार अछि प्रेमक बान्ह सभ बान्हसँ मजगुत नै तोड़ि सकै छै कोनो काल जहिया तक संसार रहत सुरुज-चान गबाह रहत प्रेम अविनासी अमर रहत। जीबैत चलू जीबैत चलू खाति-पिऐत चलैत रहू सत्यक राह पकड़ैत चलू जिनगी अमर नै होइ छै नीक काज करैत चलू जीबैत चलू। कर्म अमर होइ छै जिनगी ओहीले मिलै छै सत्यक बाटपर ठाेकर बड़ लगै छै गिड़ैत-पड़ैत चलैत रहू जीबैत चलू। जाधरि सांस चलैत रहत संसारक जाल बढ़ैत रहत माया ममतासँ दूर रहू अनकर धनसँ परहेज करू जीबैत चलू। जिनगी जीबाक लेल नै नीक काज लेल होइ छै कर्म-सुकर्म संगै जाइ छै सभ किछु अहीठाम रहि जाइ छै कर्मक फल बाटैत चलू सबहक हीत करैत चलू किछु करैत चलू जीबैत चलू। बिसरल गीत कोइली बैसल आमक डारिपर झूलि-झूलि गाबए बिसरल गीत सूतलमे जगबए नीन मधुर गीतक स्वर सुनि मोन भेल विभोर बेर-बेर कोइली सुनबए दुख भरल सनेस बिसरल प्रेमक सिनेह दिलक दरद रहि-रहि जगए पिआसँ कहिया हएत भेँट बिसरल गीत मौलाएल मोन सुक्खल तन जेना उजरल वन कहिया हरिअर हएत ई प्रेमक बंधन कोइली सुनबए बेर-बेर बिसरल गीत। जड़ैत दीप आगिसँ आगि जड़ैत पानिसँ मेटैत पिआस दीप जड़ैत आगिसँ हवा दइ छै मुझाए जड़ैत दीप अपन ज्योतिसँ जगमग करैत जगत घूरक आगि रसे-रसे सुनगि हवासँ नै मुझाए जौं मुझाबए हवा घूराकेँ सुनगि जरबए जगत आगि नै जानए भेद सभकेँ जरबए एक्के संग जीनगी अछि दू-चारि दिनक फेर हएत अनहरिया राित कर्त्तव्य-धर्मक पालन करैत पथपर चलू दिन-राति चलैत रहू जाधरि अछि जिनगी जहिना दीप जड़ै छै ताधरि तेल रहै छै बाती संग अपन जिनगीक अनहरियामे दोसरकेँ राखए इजोरियामे तहिना मानव, मानव लेल उपकार करैत जड़ैत रहू जाधरि लहू अछि अहाँ संगे। गामक नारी मन्द–मन्द हवा सिहकए फूलक पंखुरी झरि-झरि गिरए छने-छन मौसम बदलए कखनो रौद कखनो छाह पड़ए बिनु वसन्त बहार बनए खेतक आड़िपर गामक नारी कनियाँ-बहुरिआ नवतुरिआ फाँढ़ बान्हि खेतमे काज करए भूलल-बिसरल सोहर-समदौन बिरहा-विदेशिया गीत गाबए बाट-बटोही सुनि-सुनि बाट भूलि लजाइ छलै कहैत बाट चलैत छलै गामक नारी- देशक छी हितकारी देशक िनर्माणमे करैत अछि साझेदारी। पियासल धरती पियासल धरती तड़सि रहल अछि काल-कोठरीमे छिपल बदरिया धरती सूखि दड़ारि पड़ल अछि सूखि दुबैक कमजोर पड़ल अछि गरमीसँ हाहाकार मचैए चिड़ै-चुनमुन मुँह खोलि बैसल अछि घास-पात सूखि जड़ैत अछि चास जड़ैत देखि खेतिहर माथपर हाथ लऽ सोचि रहल अछि पानि-बिनु जिनगी तड़पि रहल अछि माल-जाल भटकि मरि रहल अछि पोखरि-झाखरि डबरा-नदी सूखि रहल अछि नाओं-निशान मिट रहल अछि सूखि-सूखि धरती फाटि रहल अछि पिआसल धरती तड़सि रहल अछि िनर्दय छल मेघ मुदा दयावान भेल गरजैत-बरसैत कारीमेघ ऊमरल पानि बरिसल घन-घोर फाटल दरारिसँ- बेंगक बरियाती सजि निकलि पड़ल सभरंगा गीत उछलि-कुदि गाबए लगल कारी मेघ झुमि-झुमि बरसि रहल अछि धरतीक पिआस मरि रहल अछि धरतीक पिआस मरि रहल अछि। चिंता-चिता आगि जड़ैत सभ देखै छै दिल जड़ैत ने देखै कोइ चिंता-चितामे अन्तर छै चितापर मरल जड़ै छै चिंतामे जीविते जड़ै छै समुद्र उधियाइत सभ देखै छै दिल उधियाइत ने देखै कोइ लकड़ी जड़ि कोइला बनै छै कोइलामे हीरा खोजै छै चिता जड़ि सदगति मिलै छै चिंतामे जड़ि मणी खोजे छै बिनु चिंता नै दुनियाँ चलै छै चिंतामे लोक सभ दिन जड़ै छै चितामे अन्त होइ छै चिंता सभ जीबैत करै छै चितापर मरल चढ़ै छै आगि जड़ैत सभ देखै छै दिल जड़ैत ने देखैत कोइ। मातृभूमि हमर मातृभूमि जानसँ अछि प्यारी खूनसँ भीजल धरती पवित्र भूमि सजल वन उजाड़ि बाॅटै छी क्यारी हमर मातृभूमि धन सम्पतिसँ भरल-पड़ल नीत दिन सोना उगलैए खाए-पीब कऽ फूलै-फड़ै छी हम सभ मिलि ओकरे विनास करै छी हमर मातृभूमि जानसँ अछि प्यारी निवारण नै उजाड़न छी विनासक कारण हम सभ छी अपन मातृभूमिकेँ अपनेसँ विगाड़ै छी िनर्मल भूमि हवा-पानि प्रकृतिक रचनाकेँ बिगाड़ै छी मातृभूमि बचेबाक लेल अपन भूमिकेँ रक्षा-सुरक्षाक नित्य करू तैयारी बनू पूजारी हमर मातृभूमि जानसँ अछि प्यारी। मिथिलाक अभिनंदन नीत भोरे सुरुज करए मिथिलाकेँ अभिनंदन साँझ करै छै तरेगन-चान भरि राति जगि-जगि भगजोगिनी करै अभिनंदन मिथिलाक भूमि महान माटि-पानि अमृत समान भोरे पूर्बा साँझ पछिया करै छै मिथिलाक अभिनंदन मिथिला सन पावन धरती नै छैक दुनियामे आनो ठाम डेग-डेगपर पानिक खान पोखरि-झाखरि नदी छै अम्बार कोसी-कमला-तिलयुगा गंडक-बागमती-भूतही-बलान गाम-गाम अछि दलान अन्न-जल-फलसँ भरल घर-घरमे अतिथि मेहमान स्वागत होइ छै देवता समान तीनू लोकमे होइ छै गुणगान मिथिला अछि महान रंग-बिरंगक फूलपर भौंरा करै छै गुणगान बगिया-बगिया कोइली कुहकैए मोड़-पपिहा-मेना-बुलबुल कुदकि-चहकि सुनबए मिठि बोल सभ नीत-दिन सुति-उठि माथपर लगबैए माटिक चंदन मिथिलाकेँ करैए वंदन मिथिलाकेँ अभिनंदन। ई की केलौं अहाँ ई की केलौं अहाँ? अपन रहितो विरान भेलौं अहाँ जीबैत छलौं जिनगी जड़ा देलौं अहाँ ई की केलौं अहाँ? नामी छलौं वदनाम केलौं अहाँ गम भुलबै खातिर छिप-छिप मिलै छलौं अहाँ ई की केलौं अहाँ? ई हालति हमर किअए केलौं अहाँ जीबतेमे हमरा जड़ा देलौं अहाँ ई की केलौं अहाँ? दिलक दर्पणमे झाकि-झाकि देखू अहाँ हम कण-कणमे समाएल छी लहू जेना ई की केलौं अहाँ? शोक सागरमे डुमल छलौं कहुना नागीन बनि हमरा कटलौं केना ई की केलौं अहाँ? खूब सुरत हसीन पड़ी जेना मुस्कुराइत हँसै छी गुलाबक कली जेना मुर्दा आँखि खोलि ताकए चकोर जेना ई की केलौं अहाँ? केकरा संग खेलब होरी बाट तकैत भरि-भरि राति जगैत ऑंखिया भेल लाले-लाल कतेक पतझर बीतल कतेको आएल वसन्त-बहार सभ सखी-सहेली मिलि फगुआ गाबए खुशी मनाबए पिआ संग खेलै होरी हमर पिआ परदेसिया केकरा संग खेलब होरी सभ मिलि रंग-अबिर उड़ाबए हमरा कहि-कहि लजाबए केना भीजलो तोहर चोली ननदि-लजाबए देवरा सताबए केकरा संग खेलब होरी नैना-भुटुका टोली बनि मिठगर बोलीसँ गाबए होरी रंगक पिचकारीसँ रंग बरसाबए जहिना खेलैए राधा-संग कन्हैया होरी राम-लखन खेलै अवधमे होरी ढोल-मजीरा ढाक डफली पिट-पिट गाबए होरी रंग-अबिर गुलाल उड़बैत सभ मिलि खेलए होरी रंग-वरसै मोन तड़सै ऑंखिया भेल लाले-लाल कहिया आएत परदेसिया मिलि संगे खेलब होरी बिनु पिया तड़सै छी हम केकरा संग खोलब होरी। गाए-माए गाएकेँ माए सभ कहै छै मुदा पोसै छै ने सभ कोइ जे पोसै छै गाए हुनके हक छै कहत माए बिनु श्रम कर्म नै होइ छै ने श्रम कर्मक फल मिलै छै सुनल-सुनाएल सभ कहै छै जिनगीमे गाएक गुण नै जनै छै मरलामे वेतरनी पार करै छै गोदानक चर्च पुराणोमे कएल छै गाए पोसब तखन सुख भेटत जिबैतमे दूध-भात भेटत। नै पोसब गाए तँ मरलापर दूध-भात केना भेटत सभ लोकनि सोचैत रहै छै बिनु धरती महल बनबै छै गाएकेँ माए सभ नै बुझै छै मुदा माएकेँ माए सभ कहै छै गाए नै पोसै छै सभ कोइ। जिनगीक जीवन पथमे गाएक गुण नै जनै छै मुदा मरलापर गाए संगे वेतरनी पार स्वर्ग पहुँचै छै जिबैतमे गाए-माएकेँ दूध सभ पिऐ छै नरकसँ सोझे स्वर्ग पहुँचै छै गाएक जरूरी सभ नै बुझै छै दूधक लेल मारा-मारी करै छै मरलापर गोदान करै छै। खेतिहरक जिनगी भुरुकवा ऊगल सूतल पड़ल छलौं मोन कछमछाइत छल उठि मोन मारि कहुना बाल-बच्चा मिलि खेतपर गेलौं काज करैत घाम बहए भूखसँ टौआइत छलौं खेतक आड़ि बैस मिलि सूखल रोटी-नून-तेल चटनी मिरचाइ खेलौं पानि पीब काजमे भीरलौं खेतक काज करैत देहक हड्डी-पसरी धसि सूखि कारी बनि गेल भरि पेट खेनाइ नै भेल कतेको पीढ़ि बीति गेल नीक वस्त्र नीक घर कहियो नसीव नै भेल कहियो रौदी कहियो बाढ़ि भेल उपजा जरि-भसिया गेल खाद-पानि महग भेल खेतक उपजा जन-मजदूरीमे चलि गेल साल भरि बाल-बच्चा की खाएत केना जीअत माथपर हाथ धरि शोक-सागरमे डूमि गेल बाप-दादा अही सोचमे कर्जा लादि मरि गेल दुख दबाइ बेटी बिआहमे किताक-किताक खेत बिक गेल माथपर चोट मारैत बाजल- खेत कि देहक लहू बिक गेल जीब कऽ की करब केकरा मुँह देखाएब के शरण-भरण करत आत्मदाह करनाइ नीक रहत खेत उपजा कऽ की करब नै अन्नक दाम नै जिनगीमे अराम बजारक समानक दाम पहुँचि गेल असमान केना बँचत खेतिहरक प्राण। ज्ञानक दीप अन्हरिया राति इजोतक नै कोनो उपाइ सोचै छलौं केना भागत ई अन्हरिया राति सोचैत मोनमे फुराएल एक उपाइ अछि बचल दीप जरेलौं तखन किछु अन्हार भागल-पड़ाएल मुदा सोचलौं ई अन्हरिया बेर-बेर होइत रहत कहियो इजोरिया तँ कहियो अन्हरिया ऐ दीपसँ केना हएत मनुक्खक प्रकाश मनुखकेँ अछि ज्ञान-रूपी प्रकाशक अभाव जखन मनुख बनत ज्ञानी तँ अभिमानी अन्हार दूर भागत दीपक अन्हार भगौलासँ नै काज चलत दुनियाकेँ ज्ञानरूपी प्रकाश अछि जरूरी जइसँ दुनिया जग-मग हएत ज्ञानक दीप जरौलासँ कहियो अन्हरिया नै हएत। दुखाएल गंगा सभ साधु गंगा नहाइ छै कतेक पाप जिनगीमे केने छै जखन गंगा पापीक पाप धोइ छै सभक तन-मन शुद्ध करै छै तँ अपने गंगा किअए घिनाएल रहै छै गंगा साधुकेँ शुद्ध करै छै की साधु गंगाकेँ शुद्ध करै छै की पापी पापकेँ गंगामे धोइ छै तँ गंगा एतेक पाप कतए रखै छै स्वर्गक गंगा धरतीपर बहै छै पापीक पाप धोइत गंगा पापक मोटरी कतए रखै छै गंगा पापीकेँ तन-कंचन मोन िनर्मल करै छै सभक कल्याण उपकार करै छै उल्टे सभ गंगाकेँ दुख दइ छै किअए गंगा एतेक दुख सहै छै नै कोइ गंगाक हीत सोचै छै जिबैत गंगा मरैत गंगा पाप उघैत बदनाम होइ छै पाप नै पापी देखि गंगा धरती छोड़ि पड़ाएल फिड़ै छै स्वर्गसँ धरतीपर आबि गंगा दुबकि दिन-राति पचताइत रहै छै कतेक पापी धरतीपर बसै छै असगरे गंगा पाप धोइ छै पापीक पापीसँ दबि-दबि गंगा मरि रहल छै गंगाक दुख कोइ नै बूझै छै अपने दुखसँ दुखाएल गंगा सागरमे डूमि-डूमि मरै छै। बेंगक बरियाती असाढ़क मास उम्मस भड़ल दिन अमरस खाए-पीब खोपड़ीमे सूतल पसिनासँ देह भिजल निन्न टूटि गेल भंडार कोणसँ ढनढनाइत मेघ बिजुरी चमकैत घनघोर बरसैत जड़ल धरतीकेँ प्यास मुझबए लगल अद्रा नक्षत्रमे खन्ता–डबरा-पोखरि झम-झम बरखासँ भड़ए लगल भड़ल पानिमे बेंगक बरियाती सजए लगल उछलि-कूदि ढौसा चितकबरा पिअरका-मलिछाहा सुरुकुनियाँ काटि-काटि बरियातिक भीड़ जुटए लगल घोघ फलकाबैत एक्के स्वरमे टर्टराइत ढोढियाइत हजारक-हजार अनघौल करैत किछु गीत गाबए किछु पानिमे डूमि नकसक-नकसक करए किछु एक-दोसरापर सबार भऽ ऐपार-सँ-ओइपार करैत सबल-िनर्वलकेँ सभ मिलि सहयोग करए बेंगक जातिमे कोनो भेदि नै अपन संगठनकेँ मजगूत बनौने एकताक परिचए दैत रहल बरखाक बुन्न पड़ैत रहल शीतल हवा बहति रहल बेंगक बरियाती सजैत रहल। बलानक बाढ़ि बलानक बाढ़ि ढल-पर-ढल बजरैत सनसनाइत उधियाइत पसरि गेल बाढ़िक पानि हिम्मत हारि लोक करए लगल गुहारि बलानकेँ नै आएल कोनो दया-माया गौरवसँ कहलक चारि मास तक रहत हमर राज नै चलए देब हम अहाँ सबहक राज-काज जखन हमर बाढ़िक भूत सबार रहत ऐपारक लोक अही पार रहत ओइपारक लोक ओहीपार रहत जे हमरा बीच आएत ओ हमरे पेटमे समाएत कोस भरिक पेट हमर केना भरत कलम-गाछी चास-बास खाए कऽ लेब साँस पोखरि-खत्ता डबरा बालुसँ भरि बनाएब हम भीठ कहबी छै जे आएल बलान तँ बान्हलक दलान गेल बलान तँ उजरल दलान कहबी साँच-छूठ सेहो होइ छै मुदा बलान जिनगीकेँ तहस-नहस कऽ दइ छै उपजाऊ खेतकेँ बालुसँ भरि भीन्डा बना दइ छै अन्नक बदला बलान बालु फॅकबै छै बलानक बाढ़ि ठहुनिये पानिमे गरगोटिया दइ छै विकास नै हुअए दइ छै विनाश करै छै गाम-घरकेँ उजाड़ि जिनगी तबाह करै छै बलानक बाढ़ि। पानिक बून्न बून्न-बून्न पानिक खगता सभकेँ पड़ै छै बून्न-बून्नसँ घैला भरै छै पोखरि-इनार भरि झील-झरना-नदी भरै छै धारा मिलि समुद्र भरै छै सबहक पिआस मेटाइ छै दुनियाँ जीबै छै सुखाएल धरतीकेँ सिंचै छै सभ मिलि पानिक उपयोग करै छै दुरूपयोग सेहो होइ छै ओ दिन दूर नै छै पानिक बून्न लेल तरसि-तरसि मरतै धरती धधकि जीव जरतै दुनियाकेँ बचेबाक लेल बूने-बून पानिक रक्षा करए पड़त नै तँ जिनगी क्षनो भरि नै चलत। हेराएल भगवान मोन घबराएल छल चैन छिनाएल सन कच्छ-मछ करैत मोनमे फुराएल सुख-शांति लेल भगवानसँ मिलब अपन दुखरा सुनाएब जे सुख-शांति लेल कोनो उपाय बताएत जइसँ कल्याण हएत मंदिरे-मंदिर घूमि-घूमि पूजा-विनती बहुत केलौं मस्जिद-गुरुद्वारामे माथा टेकिलौं गिरजाघरमे प्रार्थना केलौं मुदा हेराएल भगवान कतौं नै भेटल मोनक अशांति नै मेटल मोनमे विचारि गहबरे-गहबर मंसा केलौं साधु-संतक सेवा करैत वन-जंगल घूमि-घूमि तीर्थाटन यात्रा केलाैं तन-मनक सुद्धि लेल गंगामे नहेलौं देहक मलि जरूर छुटि गेल मुदा मोनक मलि नै गेल बैचैनी बढ़ि गेल तखन ज्ञान भेल सबहक दिलमे भगवान बसैए कण-कणमे रमैए अपन मोन-मंदिरमे झाॅकि तकलौं हेराएल भगवानकेँ देखलौं सुख-शांतिक वरदान पेलौं। जीबए लेल जीबए लेल दुखक नोर पीबए पड़ै छै बिनु अरमान जीबए पड़ै छै दुखक भार जिनगी भरि सहए पड़ै छै जिनगी मिलै छै दुखक सहए लेल बिनु दुख सुख नै मिलै छै किछु करबाक लेल जिनगी जीबए पड़ै छै जीबए लेल दुखक नोर पीबि कऽ जीबए पड़ै छै संसार सुन्दर नै दुखक सागर छै अमर नै नाश्वर छै काँट भरल बाट मोड़े-मोड़पर त्रिशुल गाड़ल छै कर्मसँ काँट फूल बनै छै सभ दुख सुख बनि जाइ छै दुख सहि-सहि जहिना किचरमे कमल फुलै छै जीबए लेल किछु करए पड़ै छै बिनु कर्म जीवन सफल नै होइ छै जीबए लेल दुखक नोर पीबि-पीबि कऽ जीबए पड़ै छै। चैताबर गीत लाले रंग चुनरी रंगेबै हो रामा चैतक महिनमा ना गोरे-गोर हाथमे मेंहदी लगेबै सजनाकेँ तड़सेबै ना हो रामा चैतक महिनमा ना लाल रंग फूलसँ सजिया सजेबै मीठ-मीठ बात सजनासँ कहबै हो रमा चैतक महिनमा ना आमक बगियामे बैसल कोयलिया पियाकेँ बजबै ना हमरा तड़साबै ना हो रामा चैतक महिनमा ना चमेली फुलबासँ गजरा बनेबै कारी-कारी केसियाकेँ सजेबै पियाकेँ ललचेबै ना हो राम चैतक महिनमा ना। चैती गीत भोर भेलै हे सखी भिनसरबा भेले हे कनी चलू ने बगिया कोयलिया बजै हे हे सखी चैतक महिना हे आमक गाछीमे झुलुआ झुलबै पिया केर संगे हे हे सखी चैतक महिना हे कारी-कारी केसिया डॉरपर लटकै पूर्वा-पछियामे फुलकै मीठ-मीठ गीत पियाकेँ सुनेबै हे हे सखी चैतक महिना हे पिअर साड़ी लाल चोली लाले चुनरिया हे चढ़ल यौवन मसकै चोली रहि-रहि विहुँसै हे हे सखी चैतक महिना हे। प्रेमक भूखल हे उधो कियो हरत दुख मोर पएर पकड़ि हम अहाँकेँ कहै छी दुखक नै कोनो ओर दिलक दुख हम केना केकरो कहबै श्याम बनल चित्तचाेर हे उधो कियो हरत दुख मोर चढ़ल यौवन उमरल सन दरिया प्रेम वीरहसँ मन भेल मजबूर थर-थर काँपए देह हमर कलेजा भेल कमजोर भरल यमुना लेलक कोर आँखियासँ बहए हमरा नोर हे उधो कियो हरत दुख मोर डगर बहारि हम अङना निपलौं मुरि-मुरि देखैत चहु ओर सोलह श्रृंगार सजि बाट जोहै छी वंशी धून सुनि हम भेलौं विभोर कहिया भेटत श्याम चित्तचाेर हे उधो कियो हरत दुख मोर सभ गोपियन प्रेमक भूखल कन्हैया किअए अछि रूसल प्रेम वीरहमे हम छी सूतल सात जनम तक आस करब हम कन्हैयासँ दिलक बात कहब हम कोन कसूर भेल हमरासँ जल्दीसँ कहियौ कन्हैयासँ विनती सुनियौ दुखक मोर कन्हैया हरत दुख मोर कहिया मिलत श्याम चित्तचोर हे उधो कियो हरत दुख मोर। मरूआक मान अन्नमे मरूआ बड़ अनमोल रूपसँ कारी बड़ गुणकारी उपजे ऊसर खेत मुदा हितकारी राजा रंक खाइतो लजाइ गरीबक बचाबै प्राण विपत्ती समैमे मरूआ अतिथिओकेँ राखए मान मरूआक रोटी तोरीक तेल नोन मरिचाइ चटनीसँ मेल नहि कोनो खर्चा खाइतो चर्चा इचना, पाेठी माछक चटनी संगे जे खाइ मरूआ रोटी नहि बनत रोगी मोटी रक्तचाप, मधुमेह, जलोदर भागल रहत देहसँ कहियो नहि हएत कफ खांसी मरूआ औषधि गुणक खान आदिकालसँ रखने अछि मान मरूआ होइत अछि टिकाउ कोठीमे वर्षो तक रहए बन्द सभ दिन होइत अछि बिकाउ मरूआक खेती बड़ असान अन्नमे मरूआक बड़ मान सभ दिन राखए गरीबक मान। अरमान दू पाटनक बीच सभ पीसाइ समान सभ अरमान-आंसू संगे बहि गेल तेजाबी बरखा संग नुनगर पानिमे विशाल समुद्रमे विलिन जिनगीक गाड़ी डूबि गेल सभ अरमान-आंसू संगे बहि गेल जन्मक उद्देश्य नै रहल कोनो ठेकान रूकब कतए नै कोनो मकान सोचै छलौ- दुनियाँमे करब पैघ-पैघ काज मानव-दानवक बीच पिसाइत-पिसाइत भऽ गेलौं बेकाम राख समान दुख-सुख दू पाटनक बीच जिनगी नित्य पिसाइत भूलि गेलौं अपन उद्देश्य नै कए सकलाैं कोनो नाम निशान जिनगीक गाड़ी रूकि गेल दू पाटनक बीच सभ अरमान आंसू संगे बहि गेल। भारत माता हमर भारत भूमि हमर माता छी विशाल क्षेत्रमे अहाँ पसरल छी ऋृषि-मुनिकेँ अपने हृदैमे बसौने छी देवता आ मनुक्खक तीर्थ-स्थल बनलि छी छोट-पैघ सभ जीवकेँ अपने हृदैमे समौने छी अन्न, जल, फल आदिसँ हमरा सबहक जीवन पालै छी अनेको खनिज सम्पतिकेँ अहाँ हृदैमे छिपौने छी अपन संतानकेँ धनवान बनौने छी अनेको नदी-झील झरनासँ सभ फसलकेँ सिंचै छी प्रसाद रूपमे हमरा सभकेँ अन्न-जल-फूल-फल दइ छी वन-उपवन-वाग-बगिचाक शोभा नित रँग-विरँग फूलसँ सजबै छी अनेको तीर्थ-स्थलसँ पवित्र बनलि छी सूर-वीर पुत्र-पुत्रीसँ अहाँक गोद सभ दिन भरल अछि साहित्य,दर्शन,विज्ञान,ज्योतिष क्षेत्रमे अपन इतिहासक प्रकाश दुनियाँकेँ दइ छी हम सभ अहाँक पुत्र-पुत्री अहाँ हमर माता छी सभ धर्म, सभ जातिक आदर अहाँ करै छी अपन माटि-पानिसँ सबहक पालन करै छी अपनोकेँ नै दुश्मनोकेँ शरण अहाँ दइ छी अहाँक रक्छा हमसभ सदासँ करै छी हम सभ देशवासी अपन माताकेँ नित चरणपर सुमन अर्पित करै छी हमर भारत भूमि हमर माता छी। परदेशी किअए परदेशी बनल छी अहाँ किअए कलंकित बनल छी अहाँ अपन मिथिलाक महिमा अछि अपार अइठाम मिलैत अछि सबहक रोजगार आब नै रहत कोइ बेरोजगार मिथिला राज्यमे अछि काम अपार माटि-पानिसँ उपजे अन्नक भंडार कियो नै भूखल सूतल रहत सबहक बनत राटी-दालि बाल-बच्चा मिलि विकसित राज्य बनाएब राज्यक खुशहाली आ हरियाली बढ़ाएब अपनो खाएब आ दोसरोकेँ खुआएब अपने राज्यक माटि-पानि सदासँ अछि अमृत समान राखब दुनियाँक मान-सम्मान।। मोनक बात की कहब चलू बहिना चलू जहिना छी तहिना की कहब हालचाल बीत गेल ओहिना मंदिर, मेला कतेको घुमलौं जहिना तहिना पूजा-पाठ बहुतो केलौं पीया आएत कहिया फूल, बेलपत्ता, चंदन-अछत, धूप-दीप सभ देवताकेँ चढ़ेलौं तीन पेखन आब की करब समझि नै पबै छी अखन जादू-टोना सेहो केलौं चारू केना चलू बहिना चलू जहिना..... चढ़ल उमरिया हम केना बिताएब जिनगीक भार पहाड़ बनल अछि पहाड़क भारसँ यौवन भार अधिक बनल अछि देव-धरमकेँ दया नै अबैत अछि चंचल मन दिल धधकैत अछि सभ किछु रहितौं दिन-राति सुना बितैत अछि पिया बिनु जिनगी सुना-सुना लगैत अछि मनक बात की कहब......। धनरोपनी सावनक राति इजोरिया जरैत पूरबा हवा दोमैत आसन लगौने बैस अकास निहारैत सोचैत छलौं आश लगेने सावनक बून्न कहिया खसत जे भरिखरि धनरोपनी हएत किछु दुर नभमे बिजली चमकैत ढनमनाइत दस्तक दैत बादल उमरि गेल धरतीपर बेंगक बाजा निरंतर बजैत झिंगुरक झनकारसँ धरती धमकाबैत मेघक बरियाती सजए लागल कारी काजर सन मेघ उमरि पड़ल बिजली छिटकि छिटकि मेघक रास्ता देखबैत पसरि गेल चारूकात घनघोर बर्खा भेल डबरा-खत्ता भरि गेल खेत चानी सन चमैक गेल खेतक पानिसँ धूर तड़पैत उछलैत इचना-पोठी-टेंगरा चाल दैत कुदकैत देखि गामक बच्चा बेदरू कूदि-कूदि माछ पकड़ैत बिहानेसँ गजार कदबा हुअए लगल खेत हर जोतैत हरबाह बिरहा गाबैत गामक माए-बहिन धानक बीआ उपारैत भूलल बिसरल सोहर समदाउन गबैत धनरोपनी करैत खेत हर्षित मनसँ कहैत- “हरक नाश आ खेतक चासपर पेट भरबाक अछि सभकेँ आश।” लफंगा फाटल धोती फाटल अंगा पएरक जूता टुटल फाटल आँखिक चश्मा दूरंगा चौंकैत चलैत अछि बेढ़ंगा बात करैत जना लफंगा लफड़ैत चलि दरिभंगा बात-बातमे फॅसाबए दंगा सवाल-जबाब करैत अरंगा जखैन भऽ जाइत दंगा मौका पाबि फनैत नंगा बात-बातमे कहैत लफंगा मन चंगा तँ कठौतीमे गंगा साँच झूठक दोहरी अंगा एकरंगा पहिर बनाबै फंदा झूठक खेतीमे उपजाबए बूटी फाटल जेबीमे रखलक मोती राम-नाम रटलासँ नै मिलत रोटी नीक काज कऽ बनाएब कसौटी जखन किनब माेट-मोट पोथी ज्ञानक प्रकाश मिलत अनोखी विकासक गंगा बहत चौमुखी। बेरोजगारी हम छी बेरोगार काम करै छी लाचार हमरासँ करबैत अछि बेगार भुखल पेट बनल छी दुखारी दुखक मारल सूतल छी ऊपरसँ परिवारक बोझ भारी जहिना लकड़ीकेँ चीरैत आरी खेबाक नै भेटैत उधारी बाल-बच्चा बनल अछि भीखारी हमरा देखि लोक मारैए किलकारी की करब नै अछि समझदारी आसा नै कहिया बनब रोजगारी की प्राण लेत अत्याचारी देशमे कहिया मेटाएत बेरोजगारी सरकारकेँ नै अछि सभसँ सरोकार हम छी बेरोजगार। रूपैआक ढेरी रूपैआक ढेरीपर करैए खेल दुनियाँकेँ नचबैए ठेल-ठेल रूपयाक लालचमे बनल अछि पागल दानव बनि मानवपर करैत राज सुखक भूख मिटबैए रूपैआसँ दीन दुखियाक तौलैए रूपैआसँ मनुक्खक चालि छोड़ि चलैए नाच करैए खंजन चिड़ै सन सुखक चाहमे भटकि गेल राह सोमरसमे समाए गेल मन विचार नंगा नाच करैए रूपैआ ढेरीपर जोशमे होश उड़ि गेल नचबैयाकेँ जखन रूपैआक ढेरी अंत भऽ गेल जिनगीक दू किनारा बीच पिसाए गेल दुखक धारमे बहि गेल रूपैआक ढेरी जहिना मनुख मुठ्ठी बन्न जनमैए हाथ पसारि संसारसँ चलि जाइए रूपैआक ढेरी ओहिना रहि जाइए। भ्रष्टाचारी जागु-जागु यौ देशक भैयारी देशमे घुसल पैघ-पैघ चोर चोर केहेन पहिचान नै आबए देशमे घुसि सभकेँ सतौनेए देशक भैयारी, जागु, करू तैयारी देशक करू रखबारी आब अापसमे करू नै कोनो बेपारी। चोर देशकेँ करैत अछि कमजोर चोरक नाओं छी भ्रष्टाचारी सभ विभागमे जमैने अछि अधिकार मंत्री-संत्री एकरे बलपर भेल अछि मालो-माल। बड़का महलबलाक दिल अछि कारी सभ भ्रष्टाचारी, बनल अछि अधिकारी देशक धन विदेशमे करैत अछि बिकवाली सभ भ्रष्टाचारी, बनल अछि अत्याचारी जनताक सोनित बेचबाक करैत अछि रोज तैयारी केना भागत देशसँ ई भ्रष्टाचारी तेकर करू तैयारी जागू-जागू यौ देशक भैयारी। आएल वसन्त आएल वसन्त भागल जाड़ फूलसँ सजल धरती दुलहिन समान फूलक सुगन्ध चढ़ए आसमान आम मजरल महुआ पसरल भौंरा करए गुणगान सेरसौं बाजए शहनाइ समान वसन्ती रंगमे रंगाएल सभ एक समान ढोल, मजीरा, ढाक, डफली बजबैत गबैत फागुनक गान रंग अबीरमे नहाएल समान भेद-भाव मिट गेल सभ लगैए एक्के समान आमक गाछपर कोइली बजैत सभकेँ दैत प्रेमक वरदान धरती बनल स्वर्ग समान आएल वसंत भागल जाड़। अप्पन-पराया अपना लेल सभ मरै छै पराया लेल नै कोइ जे परायाकेँ अप्पन बूझै छै तँ जग सुन्दर होइ अप्पन तँ अप्पन होइ छै पराया किअए होइ छै सभ धरतीपर जनम लइ छै एक्केठाम जीबै-मरै छै जाति भेदक अंतर किअए होइ छै अपन करम अपने करै छै दोसरकेँ अहित किअए होइ छै जखन मनुक्खक जाति एक्के होइ छै सभ तँ अन्ने-पानि खाए-पीब जिबै छै तखन विचारमे किअए अन्तर होइ छै सबहक विचार जँ एक्के हेतै सभ-आनो-विरानो अप्पन हेतै एक्करंगा समाज बनतै सबहक विकास समरूप हेतै अप्पन-परायक भेद मेटेतै जग सुन्दर बनि जेतै। बाट बटोही डेग-डेगपर बाटमे मोड़ होइ छै तैयो राही बाट चलै छै तहिना जिनगीमे मोड़ होइ छै बाटक मोड़ करोट नै लइ छै मुदा जिनगीक मोड़ करोट लइ छै बाटपर बटोही सभ दिन चलै छै जिनगीक मोड़ कठिन होइ छै बाटक बटोही बदलैत रहै छै तहिना जिनगियो बदलै छै जहिना बाटक दिशा होइ छै ओहिना जिनगीक दिशा सेहो होइ छै सही बाट पकड़ि बटोही अप्पन-मंजिल पहुँचै छै गलत बाट पकड़ि बटोही भटकि-भटकि चलि थकै छै बाटक ओर-छोड़ नै होइ छै बटोही चलैत थकि मरै छै मुदा सही बाट चलैत बटोही अप्पन जिनगीक लक्ष्य पबै छै। हाटक चाउर बाटक पानि हाटक चाउर बाटक पानि बनियाँ घरक तरजूकेँ नै होइ छै कोनो माइन जानि-मानि होइ छै हानि जिनगी चलै छै उबानि उजरल वनमे फूल-फड़ खिलैत-फड़ैत केना ठेलि-ठेलि जिनगी चलैत केना फाटल वस्त्र टुटल घरमे जिनगी रहै छै अन्हारे-अन्हार सूखल जिनगी केना पोनगत पोनगि-पोनगि सुखि-सुखि जाए केना सिंचब नै फुराए सभ दिन जिनगी अन्हरिये बिताए इजोरिया कहियो नै देखाए सुक्खल तन उजरल मन वन-वन भटकै मृग समान हाटक चाउर बाटे बिलाएल घाटक पानि घाटे सुखाएल बिनु पानि नै पियास बुझाए। ज्ञान बाॅटैत चलू िलखैत पढ़ैत रहू जिनगीकेँ सजबैत रहू लिखल पढ़ि ज्ञानी बनू लिखि-लिखि ज्ञान बाॅटैत चलू अपन ज्ञान अपने नै दुनियाँमे बॉटैत चलू लिखैत-पढ़ैत रहू ज्ञानक गीरह नै बान्हू खोलि-सजाय बॉटैत रहू ज्ञानीक ज्ञानसँ दुनियाँ सजै छै आज्ञानी विनाश करै छै लोभ-मोह-माया-छोड़ि दुनियाकेँ सजबैत चलू ज्ञान बाॅटलासँ खर्च नै होइ छै निरंत्तर ज्ञान बढ़ैत रहै छै ज्ञानसँ अभिमान मेटाइ छै मान-सम्मान सभ दिन भेटै छै ज्ञानक काज राजा-रंककेँ पड़ै छै िबनु ज्ञान दुनियाँ नै चलै छै ज्ञान बॉटैत चलू....। प्रेम आकि पैसा अहाँकेँ की चाही? प्रेम आकि पैसा- प्रेम- प्रेमसँ सुख-शांति भेटत दुख हरत कल्याण करत बिगरल काज असान करत दिलक दरद असान करत एकताक पहिचान बनत यश बढ़त इज्जत भेटत विश्वक कल्याण करत। पैसा- पेंच फॅसाएत प्रेमसँ दूर राखत दुखक पोटरी सिरपर लादत ऊँच-नीचक भेद बढ़ाएत धर्म-इमान मेटाएत अपने बलसँ गरीबपर अत्याचार बढ़ाएत धाक जमाएत जोश बढ़ाएत नीन उड़ाएत दुनियाँमे अशांति बढ़ाएत अहाँकेँ की चाही। कालक पहरा कालक पहरा चहुओर पड़ैए चंचल चित्त मन चोर बनल अछि किला बीच दुआरिपर पहरा पड़ैए नगर शहरमे ढिढोरा पड़ैए राजा बैसल सिंगहासन डोलैए प्रजा सूतल नीन खिंचैए तही बीच चोर चोरी करैए कालक पहरा चहुओर पड़ैए। आन्हर राजा सेवक बहिर भूखल प्रजा होइ छै अधीर मंत्री-संत्री चोर बनल अछि अधिकारी खजाना लूटैए आन्हर राजा भुजा फँकैए मंत्री मलाइ चटैए भरल खजाना लूटि-लूटि नीत होली-दिवाली मनबैए देखि प्रजा भूखल सूतैए कालक पहरा चहुओर पड़ैए। खजानाक माल विदेस भेजैए रक्षक भक्षक बनल अछि िनर्वल राजा चोर सबल अछि जनताक लहु चौबटियापर बिकैए सिंगहासनसँ सटल राजा लोभ-मोह-माया बीच फँिस टुकुर-टुकुर तकैए खाली खजाना देखि राजा सोगमे सोगाएल रहैए कालक पहरा चहुओर पड़ैए। पियासल मन झुलसल तन करियाएल सन पियासल मन मन्हुआएल सन सूखल वन उजरल उपवन तपि-तपि धरती जरल सन बिनु मेघ तड़सए नयन करेजा कापए भुमकम सन कि हएत बर्खा हर्षित मन नै कोइ जानए ज्योत्षी सन मन उदास देखि डोलए पवन मेघकेँ बजबए सिहकि पवन वातावरण भेल मेघौन झरझर बरसए बजए ढनढन सूखल धरती मुरझाएल वन उपवन भेल हरिअर कंचन झुमि-झुमि नाचए मेघ संग पवन बिजुरी चमकए डरै तन-मन पाखि खोलि नाचए मोर-मोरनी संग सबहक तन-मन जुराएल पियासल मन धरतीकेँ बुझाएल। दहेजक खेल दहेज- बिआह बिगाड़त इज्जति उताड़त तैयो लोक करैत अछि दहेजसँ मेल जखन दहेजक खेल शुरू भेल बिआह भेल गरमेल समाजमे भेल बड़-बड़ खेल बिआह सन पवित्र बंधनकेँ बिगाड़ैत दानव दहेजक खेल बिआहक शुभ मुहुर्तमे दहेज दिअए अरचन-धोखा बिगाड़ैत समाजक नाता परिवार आ समाजक तोड़ि देत दिलक नाता आउ हम सभ मिलि दहेज मुक्त समाजक िनर्माण करू भेद-भाव मेटा कऽ बिआहक वंधन मजगूत करू। घर परदेश कतेक दिन बाद एलौं हाल-चाल दुखद सुनेलौं राति-दिन दुख किअए सहलौं घरेमे रहितौं धीरज देतौं सभ मिलि दुख सहितौं अधो रोटी खाए कऽ जीबितौं धिया-पुता संगे रहितौं अपने समाजमे कमेतौं परदेश पराया होइ छै दुख-सुख कियो नै बॉटै छै रूपैया लेल दुष्कर्म करै छै नै रूपैया भूखै मरै छै मुदा अपन समाजमे प्रेम होइ छै पैंच उधार सेहो भेटै छै अपन कि आनोकेँ विपत्तिमे मदति करै छै सभ इज्जतसँ जीबै छै घर छोड़ि परदेश किअए गमेलौं बाल-बच्चाकेँ बिलटेलौं रिनिया महाजन सेहो भेल कर-कुटुमैती सभ छूटि गेल एहेन करम किअए करब जे परदेशमे खटब काज नै देत मरितो परदेश आब एहेन काज नै करब जीबैले समाज सभसँ पैघ समाजेमे रहि जीअब मरब। गहुमक कटनी-दौनी अधरतियेमे नीन टुटल कच्छमछाइ सूतल पड़ल गहुमक कटनी माथपर चढ़ल काटि-खोंटि घर नै लाएब तँ भरि साल बाल-बच्चा की खाएत केना जीअत अही सोचमे पड़ल छलौं एकाएक मनमे फुराएल सभ धिया-पुताकेँ उठेलौं आँखि मिड़ैत हँसुआ लेलौं सभ मिलि खेत पहुँचलौं गहुमक खेतक नम्हर कित्ता सभ मिलि काटैत छलौं अधकटनी भेल मुदा चैतक रौद मुँहपर पड़ल आब कि काटब गहुम रौदामे झुलसि गेलौं खाली गहुमे काटब से केना भूख-पियाससँ बहए पसिना मुदा हिम्मति हारि जाएब केना सभ गहुम काटि खेत खसेलौं चैतक रौदमे देह झरकेलौं घूमि घर एलौं सुसतेलौं भानस-भात भेल नहेलौं सभ मिलि खेलौं आराम केलौं पानि पीब जुन्ना बनेलौं धिया-पुता संग खेत गेलौं गहुमक बोझ बान्हि-बान्हि उघि-उघि थ्रेसर लग पहुँचेलौं राति भरि दौनी करेलौं गहुमक दाना कोठीमे भरलौं भूसीकेँ भुसकाँरमे टलियेलौं चारि मासक गहुमक फसलि दिन-राति खटि कऽ घर केलौं साल-भरि रोटियो खाए जीअब तइ चिन्तासँ दूर भेलौं। बिआह की थिक? बिआह की थिक दू आत्माक मिलन कि दू रक्त मेल कि दू देहक संगम कि दू वंशक गठवंधन कि स्त्री-पुरुषक प्रेम वंधन कि मनुख जातिक क्रमश: सृजनात्मक सफल प्रयास की बिआह समाजक रीति-रिवाज छी बिआह की थिक? आजुक दिन समाजक बदलल स्वरूप ने ओ गाम ने ओ नगर ने पहिलुका ठाठ-बाठ ओ पुरना विरासतमे भेटल धरोहर भेल विलिन ख्ाण्ड-पखण्ड भऽ टूटि गेल बाबा समैक गाम-समाज पोखरि इनार परती-पराँत सभ किछु बदलि गेल नै अछि कोइ देखिबैया समाजक प्रेम टूटि गेल बड़का दलान बड़का परिवार टूटि कऽ चकनाचूर भऽ गेल कतेको पड़ाइन भेल तँ कतेको विकासक होड़मे गाम-घर छोड़ि चलि गेल समाजक मर्यादा पानिमे बहि गेल आजुक दिन नै रहल भाय-भैयारीमे प्रेम सभ अपन रागक डफली अपन-अपन बजबैए बदलल समाजक स्वरूपमे अपन जिनगी बितबैए खान-पान बदलि गेल पालकी-महफा ओहार लगल कठही गाड़ी विलिन भऽ गेल डफरा-बसुली कठघोड़ाक नाच आइ समाजसँ उसरि गेल गामक पंचैती गामेमे बड़का दलान बैस करै छल बड़का-छोटका सभ मिलि दूघ-पानि बेड़बै छल बाघ-बकरीकेँ एकठाम एकहि घाट नमबै छल आजुक दिन ओ रीति-रेबाज गामसँ उसरि गेल बदलल लोक बदलल समाज हित कम अहित बेसी भेल आजुक दिन देखै छी। पुत्र कुपुत्र आशीर्वाद हम दइ छलौं अहाँ नै उचित समझि सकलौं माए-बापक अरमानकेँ अहाँ पुरा नै कऽ सकलौं पुत्र नै कुपुत्र छी अहाँ खनदानक मर्यादा नै बचा सकलौं माए-बापक रीनकेँ अहाँ जिनगीमे नै सठा सकलौं स्वर्ग सन सृजल घरकेँ अहाँ लंका जकाँ जरा देलौं भरत सन भक्त भाएकेँ अहाँ अपन प्यार नै दऽ सकलौं देशभक्त छी अहाँ मुदा अपन घरकेँ जराकेँ जरा देलौं जरल घर ऊजरल परिवार समाजोकेँ अहाँ ठोकरा देलौं आबए बला समैमे अहाँ केकरा की जबाब देबै मुँह छुपा अन्हारेमे अहाँ आँखिक नोर बहेबै मनुख की मनुखताकेँ छोड़ि क्षनिक धन-सुख लेल अमुल्य जिनगी गमा देलौं असल जिनगी स्वर्ग छोड़ि नरकक जिनगी अपनाए लेलौं आशा बहुत छल अहाँसँ सभकेँ निरास बना देलौं की उदेस अछि अहाँक हम सभ नै जानि सकलौं की लऽ कऽ एलौं अहाँ की लऽ कऽ जएब सभ अरमानकेँ अहाँ क्षनेमे जराए मेटाए देलौं अहाँपर बहुत गर्व छल सभकेँ माटिमे मिला देलौं पुत्र नै कुपुत्रक नाओंसँ दुनियाँमे जानल जाएब अहाँ धन पत्नी मित्र बहुत भेटत माए-बाप सहोदर भाए जिनगीमे एक्केबेर भेटत टुटल दिल कहियो नै जूटत कुपुत्रक कलंक नै छुटत सभ किछु रहितो जिनगीमे आशीर्वाद नै भेटत। कतेक दुख काटब हरि हे हरि हे, दुखक ने कोनो ओर दुखक धार बहए चहुओर चंचल मन चतुराइ करए बीच भंवरमे घुरिआइत रहए थाकल तन-मन उबिआइत रहए जनमसँ मरण धरि छी अनाथ कतेक दुख काटब हरि हे। अहाँ बिनु हम केना जीअब जनमक बंधन केना तोड़ब थाकल पाॅव चलब केना दुख सहैत भेलौं मजबूर दुखक आस निरास भेल हरि हे हम छी अनाथ कतेक दुख काटब हरि हे। काठक नाव दुखिया सबार चहुओर बहए बयार बीच धार भौर खेलाइत उधिआएल धारमे डुमै सबार थाकल तन हारल मन अहाँक शरणमे छी आएल पड़ाएल कतेक दुख काटब हरि हे। सत्यक नाव धर्मक पतबारि हरि खेबैया पार लगाबए अपने मन मंदिरमे बसाबए जन्मक दुखसँ मुक्ति पाबए आत्माक रहस्य जानि भवसागरकेँ हरि पार लगाबए कतेक दुख काटब हरि हे। बारहो मास अगहनक आगमनसँ सभ सुख पाबए पूसक सर्द हवा दुख बढ़ाबए ओस कुहेससँ जाड़ बढ़ाबए माघक जाड़ हाड़ हिलाबए फागुन मास सभ फगुआ गाबए रंग-अबीर गुलाल उड़ाबए बाजए कोइली कू-कू मोर-पपीहा पी-पी वसन्ती हवासँ सभ हर्ष मनाबए आम-लीची बौरसँ बौड़ाएल फूलक महकसँ हवा पगलाएल चैत मास चना-जअ गहुम पकए महुआक फूल सभ दिसि गमकए बैसाखक रौद धरती तपाबए कुम्हार माटिक बासन पकाबए जेठमे खेतीहर खेत जोताबए धानक बीआ खेत खसाबए बनियाँ-बेकाल अन्नक भंडार बढ़ाबए असाढ़मे आम-जामुन खाबए पाकल आमसँ हाट सजाबए खेताक धूर मजगुत बनाबए सावन-भादो किसान करए खेत कादो खेतमे लगाबए धानक चास बाढ़ि-पानि दइ शोक-संताप आसीन जगाबए पावनि-तिहारक आस कातिक मास पेटक दुख सताबए तेरहम मास कर्जा बढ़ाबए अगहन आगमनसँ सभ सुख पाबए। सड़क बीच नाला साँझक समए पूर्बा बहैत डुमैत सुरुज चान मुस्काइ घर-घरमे दीप जरैत अकासमे तरेगन चमकैत बाग-बगिचा मह-मह करैत चिड़ै-चुनमुन्नीक चहक शान्त भऽ गेल गामक चौबटियापर पसरल हाट-बजार उसरि शान्त भेल मुदा हमर कान्त नै घर घुमि आएल ओ एबो करत केना बैसल अछि दारूखाना दारू पीब बनल अछि मस्ताना मस्तीमे कुश्ती केलक हार-पाँजर तोड़ि बेकाम बनल काज तँ बड़ घिनौना केलक लड़खराइत निशाँमे चलैत सड़कपर झुकैत-पड़ैत नालामे धड़फराइत गिरल निशाँमे बेहोश पड़ल छल मुदा कहैत छल ई नाला दिनमे रहैए सड़कक कात राितमे आबि जाइए सड़कक बीचो-बीच हमरा गिरबैए खिंच अपने दिसि मुदा हम तँ छी अपने नीच जखन हम होशमे एबै नाला बनेबै सड़कक बीच। आँखि रहितो आन्हर गहबर-गहबर गोसाँइ खेले भगता-भगतिनियाँ ठगिनियाँ देवी-देवताक ठिकेदार असल धर्मराज बनल पान-फूल अच्छत लड़ू दीप-धूप अगरबत्ती भरल रंग-बिरंगक डाली सजल डाली लगबए गहबरमे भुतिनियाँ झालि मृदंगक धाप संगे झुमि-झुमि गाबए देवी गीत गाेसाँइ खेले भगता-भगतिनियाँ छत्तीस देवी चौदहो देबान अखन छौ देहपर िवरजमान जे मांगब से पूरा करतौ कारनीक सभ रोग वियाधि हरतौ फूल-अच्छतसँ वरदान देतौ बिगरल काज मनोकामना चुट्की बजिते पूरा करतौ बदलामे लड्डु-छागर-पाठी मांगतौ बेङ जेना कूदि-कूदि घुमैत बेंतक छड़ीकेँ हिलिते आहूत जड़ैत देखिते भूत-प्रेत सभ भागि जेतौ अरहुल फूलसँ देवी बजाबए बोल जय गंगाक पुकार लगाबए भूत-प्रेत लगल कारनीकेँ झोंटा पकड़ि झुलाबए-भगाबए कोखिया गोहारि गहबरम करए कबुलामे छागर-पाठी बलि मांगए बिना देने नै देवी मान्तौ कुल-खनदान बाल-बच्चाकेँ सतेतौ गामक-गाम सुड्डाह करतौ सभ डरि एकटंगा कल जोड़ि देवीकेँ मनौलक-बुझौलक मन भरि लड्डू अँचरी चढ़ौलक छागर-पाठी बलि देलक तंत्र-मंत्रसँ बान्हल जंतर अपन-अपन कंठहार बनौलक अखनो धरि समाजक लोक अन्धविश्वासमे फँसि मरैए हिंसा-हत्यामे विश्वास करैए एकैसम सदी वैज्ञानिक युगकेँ आन्हर बनि कलंकित करैए धमियाँ-ओझा-गुणी भगता-भगतिनियाँ जंतर-मंतरपर विश्वास करैए आँखि रहितो अखन धरि लोक आन्हर बनि अन्हरा कहबैए। भाग भरोसे कोनो काज एना नै होइए सोचल समझल काज बनैए पूर्ब नियोजित मनमे ठानैए बिनु जानि बूझि हानि होइए गलत सोचसँ राह भटकैए मान-सम्मानपर ठेंस पहुँचैए जेहेन मन ओहेन काज होइए कर्मक फल ओहने पबैए सोचि समझि जँ हुअए काज अहित कम, हित काज होइए काजे लेल दुनियाँ बनल-ए काज कोनो नै छोट-पैघ होइए छोट-पैघ तँ कर्मसँ बनैए कर्मक फल अवश्य भेटैए राज-रंक हुअए वा फकिर सत् छी कि झूठ से कियो नै बूझैए सबहक हित ईश्वर करैए ईश्वर बिनु नै पत्ता हिलैए सभ किछु नाश्वर अमर नै होइए सत्य डगर कठिन होइए मुदा सत् कर्मसँ विजय भेटैए अपन काज अपना लेल सभ करैए जे काज लोक दुनियाँ लेल करैए कर्मवीर उहए कहबैए सूरवीर-धर्मवीर-कर्मवीरकेँ तीनू लोकमे जगह भेटैए भाग्य भरोसे नै किछु होइए। फूल-पत्ता फूल तँ फूल होइ छै पत्ता ने कोनो कम होइ छै बिनु पत्ता ने फूल फुलाइ छै पत्ता संगे फूल रहै छै जहिना दुख-सुख संगे होइ छै बिनु पत्ता नै फूलक शोभा होइ छै पत्ता फूल संग काटो होइ छै काट फूलक रच्छा करै छै सुखक संग फूल दइ छै दुखक संग पत्ता काँट दइ छै फूल-फड़क इच्छा सभ करै छै पत्ताक उपैछा करै छै फूल तँ फूल होइ छै पत्ताे ने कोनो कम होइ छै। भदबा तीस दिनक मासमे छह दिन भदबा रहै छै साल भरिमे बहत्तरि दिन होइ छै लोक कहैए भदबाकेँ काजमे बाघा करैए एहेन कोन बाघा जइसँ मनुखे प्रभावित होइए धरतीपर लाखो जीव होइए केकरो भादबा नै बाघा करैए मुदा मनुखकेँ महिनेमे छह दिन केना हानि करैए धरती सूर्ज-चान नक्षत्र सभ दिन अपना गतिये रहैए प्रकृित अपन रचना करैए एहेन पैघ काजकेँ भदबा कहाँ रोकैए भदबामे जनम-मरण होइए तखन भदबा किअए नै रोकैए भदबामे काज अशुभ होइतै जखन भदबामे दोख होइतै तँ सभ काज भदबामे रूकि जइतै नै भदबामे खेती होइतै आ ने पेट भरि कियो खइतै तहूमे भदबा बाघा करितै भदबाक नै कोनो दोख छै सभ दोख मनुखेकेँ छै अपन स्वार्थमे आन्हर बनि भदबाकेँ बदनाम करै छै भदबा कोनो बाघा होइतै सृष्टि-वृष्टिकेँ रोकि दइतै। बाबा बले फौदारी की केलौं की पेलौं जेहेन करब तेहेन पएब बाबाक थैली भरोषे नै चलत कोनो काज अपना भरोषे होइ छै काज जौं बाबा भरोषे फौजदारी लड़ब तखन पराजय हएत जे काज जहिना हेतइ ओहिना ने करए पड़त अनका भरोषे नै होइ छै काज अपन काज जौं अपने करब तखन प्रगति दिन-राति हएत स्वावलंबी जाधरि नै बनब ताधरि परजीवी बनल रहब की करब सोचि करब समए संग काज करब तखन जिनगीक महत रहत वर्त्तमानमे करब तँ भविष्य बनत भूत तँ बीत गेल वर्त्तमानपर भविष्य उज्जवल रहत संसार काजसँ चलैए जाधरि अपन काज अपनासँ नै करब ताधरि आत्म िनर्भर नै बनब आत्मनिर्भर भेनाइ सबहक कर्त्तव्य बनैए नै तँ एक-दोसराक संग जिनगीक पिसाइत रहैए अपन जिनगीक भारसँ लोक स्वयं दबल रहैए दोसराक भार केना सहैत रहैए दबि-दबि जिनगी मरैत रहैए की कहब कहल नै जाइए से हाल प्रमात्मा जनै छथि अपन विकास जौं सभ करत केकरोपर नै िनर्भर रहत सभ सुखी, दुखी नै कोइ रहतै। केकरा ले कानब हाल-चाल की कहब जेकरा ले कनै छी ओकरा आँखि नोर नै अपन हारल की कहब दुख कियो थोड़े बॉटि लेत सुखक साथी सभ बनै छै दुखमे जानल अनजान होइ छै केकरा ले कानब के हमर नोर पोछि देत सभ देखि-देखि मुँह चोरबैए धीरज देनिहारो नै भेटैए हमरे देखि हँसैत रहैए जहिना जरलपर नून छििट घा बढ़बैए केकरो देखिनिहार कोइ ने होइए जनए देखै छी अन्हारे रहैए मतलबी यार तँ बहुतो भेटैए दुनियाँमे केकरो कोइ नै स्वार्थमे एक-दोसरकेँ लूटैए केकरा कहबै के पतियेतै जेकरे कहै छी वएह हँसैए केकरा ले कानब वएह लतियबैए। परिवर्त्तन पल-पल क्षण-क्षण समए बढ़ैए क्षणे-क्षण मौसम बदलैए दिन-बदलि राति बनैए राति बदलि दिन कहबैए खास मौसम ऋृतु कहबै सभ ऋृतु बदलैत रहैए कल-कल छल-छल नदी बहैत सागर मिलि महासागर बनैए काल बदलि युग बदलैए युगक संग सभ किछु बदलैए बदलि-बदलि नव पुरान होइए प्रकृति बदलि आकृति बदलैए तन-मन बदलि चोला बदलैए परिवर्त्तन संसारक निअम छै उनटि-पुनटि संसार चलै छै करम-धरम नीति बदलै छै बदलि-बदलि जिनगी चलैए अहिना जँ सृष्टि बदलि जाएत तँ ई संसार केना चलत सभ किछु बदलितो सुरुज-चान कहाँ बदलैए। माइयक ममता माइयक ममताक नै अछि जोर नअ मास धरि गर्भमे पालि तीन साल धरि कोरामे खेला झूला-झुलाबै लोरी सुना अॅचराक छाँहसँ दुख बचा जिनगी भरि अपन ममतासँ धीया-पुताकेँ दीर्घायु बनाबै भगवानक ममतासँ बेसी माइयक ममता सुख पहुँचाबै भूखल-दुखलमे छाती लगाबै माइयक ममता अछि बेजोर सुक्खक खान माइयक ममताक नै अछि कोनो मोल तोल सागरसँ गहींर माइयक दिल धीरज अटल हिमालय सन जे सुख माइयक अँचरामे झाँपल बच्चाकेँ कोरामे मिलै छै ओ सुख ने स्वर्गोमे मिलै छै माइयक ममताक नै अछि दुनियाँमे कोनो जोर। परदेशिया पाहुन आएल पहुना बाटे अॅटकि गेल की गामक बाट भूलि गेल मन उपकैए झाँकि-झाँकि देखितौं आकि बाट चलि दूर देखितौं ओर-छोर नै देखै छी लगैए पहुनाक बाट छूटि गेल िक दिलमे कोनो कचोट भऽ गेल कि करब किछु ने फुराइए दिन-राति मन घबराइए कि हमरामे कोनो दोख बुझाइए जानि-मानि ने तँ भेल कोनो हानि मान-सम्मानमे जँ कोनो कमी भेल तँ हमरा कोनो उपरागो नै देल बिनु अपराध पाहुन भूलि गेल हमरासँ किअए रूसि गेल सभ दिन तँ पहुना लेल कोन-कोन करम ने करै छी पहुना परदेशिया जखने भेल अपन घर अंगना भूलि गेल कि कोनो सौतिनियाँ संग लगि गेल ओज-टोनसँ मन मोहि लेलक आएल पाहुन किअए बाट भूलि गेल पहुना पराया ने तँ बनि गेल दिन-राति सुरता पहुनापर लगल-ए सूरता करिते होइए मूर्छा देहक खून सुखि पानि बनैए पहुना यादि रहि-रहि बनैए गौना पहुना किअए करैलौं ऐसँ नीक कुमारिये रहितौं पहुनाक फेरिमे कहियो ने पड़ितौं दिलक रोगसँ दूरे रहितौं किअए एहेन दुख जुआनियेमे सहितौं पाहुन जँ परचट्टा हेतै अपन जिनगी परदेशमे गमेतै केना कोइ पहुनापर विश्वास करतै अपन जुआनी-जिनगीकेँ नास करतै। धरतीक सुख ऋृतुराज वसंत धरतीपर पहुँचल सोलह श्रृंगार करैत दुलहिन सन सजल धरती पगलाएल भौंरा नाचि-नाचि करए मधुपान अविराम चिड़ै चहकए कोइली कुहकए करए आगमन मदन रति सुआगतमे वसंत अभिनंदन करए आएल अतिथिक मधुपान करबए स्वर्गसँ उतरि धरतीपर परी सभ मिलि सुआगत गीत गबए देखि देवगण गुणगान करए सबहक दिल ललचाइ छलैक बेर-बेर धरतीपर मेहमान बनैत एहेन सुन्दर नै छै देवलोक धरतीक सुख स्वर्गसँ सुन्दर जे सुख मनुककेँ मिलै छै धरतीपर देवाेकेँ नै नसीब होइत स्वर्गमे धन्य अछि ओ पावन धरती बेर-बेर वसंतक बहार मिलए फूल-मंजर झुकि-झुकि सभकेँ अभिनंदन करए। साओनक राित झर-झर बरसै बदरिया हो रामा एबकी सवनमा बिजुरी चमकै मेघ गरजै थर-थर कापए वदनमा हो रामा झर-झर बरसै बदरिया हो रामा एबकी सवनमा। पिया िनरमोहिया बड़ निरदैया जानए ने कोनो मरमुआ हो रामा झर-झर बरसै बदरिया हो रामा एबकी सवनमा। सओनक अन्हरिया चमकै बिजुरिया पानिक बुन्नसँ भिजै वदनमा भीजल तन राति काटब केना झर-झर बरसै वदरिया हो रामा एबकी सवनमा। भीजल बदनमा चढ़ल यौवनमा सिहकए पवनमा तरपाबए सजनमा झर-झर बरसै बदरिया हो रामा एबकी सवनमा। चढ़ल यौवन दरिया सन उमरल पिया बिनु तरसै नयनमा हो रामा झर-झर बरसै वदरिया हो रामा एबकी सवनमा। लोभी भोम्हरा िखलल फूल देखैत भोम्हरा मुस्कुराइत गुनगुनाइत डड़ैत घुिम-घुिम फूलसँ करै गुप्त बात रसपान करैत भूिल गेल अपन गाम िबन जान पहिचान लोभी भोम्हरा करै गान काँटक नै कोनौ परवाह िदन राितक नै कोनौ ठेकान पहिचान फूलक कोमल पंकुरीमे कैद पड्ल सुनशान फूलक बीच भोम्हरा छोडै अपन मधुर तान िततली देखि बढ़ाबए शान फूलक सुगन्ध उड़ै धरती सँ आसमान बढल प्रेम देिख फूल कहलक भोम्हरासँ िकएक बनल छी अहाँ एतेक हमरा पर मेहरवान भोम्हरा कहलक मुस्कुराइत फूलसँ अहाँ छी हमर िदलक प्राण अहाँ िबन हम तेजब प्राण तीनु लोकमे फूल महान् देवतासँ पहिले हम करै छी रसपान सभ देवताकेँ अहाँ रखै छी मान खुशीमनसँ अहाँ हमरो करू कल्याण दिअ हमरा मधुपान ता धरि हम करै छी रसपान अहाँ सँ अछि हमरा जन्मे सँ जान पहिचान तै हम छी अहाँ पर मेहरवान हम बनल छी अहाँकेँ दीवान भोरक क्षण भोरक क्षण मन्द–मन्द हवा बहै प्रातक संकेत सँ चिड़ै-चुनमुन करैत नव िजनगी पावैत नील गगन पर पंख खोइल चारूकात भ्रमण करैत स्वतंत्र िजनगी िबताबै शीतल पवन उमंग जगाबै फूलक सुगन्ध गमकै पूरब ओरसँ िदनकर दीनानाथ अंधकार िचरैत लाल-लाल प्रकाश पूँजसँ अम्बर द्यरा पसारैत िबन सोपान गगन चढै नव िजनगी पाइबि सभ जन हर्ष मनाबै फूल मंजर पर मधुकर ताडंव नृत्य करै सौरभ सुगन्ध अविराम अनन्त सृष्टी वृष्टि करै स्वर्गक सुख पाबै नित्य होयत सुखद िवहान भोरक क्षण.......। गरीबक मान गरीबक राखू सदा मान गरीबक िदलमे बसै भगवान कहियो नहि करियो हुनकर अपमान गरीबमे अछि उर्जाक खान हुनकेँ मेहनतसँ बनैत अछि दुिनया महान् गरीबक िदल में बसै भगवान.... गरीबकेँ सतेलासँ तीन हािन होयत धन, धर्म, अभिमान नै मानवतँ देश बनत कंगाल रहि-रहि होएत भूचाल गरीब अपन पसीनासँ सींचैत अछि देशक कोना-कोना देशक िवकाशमे बहबैत अछि खून-पसीना हुनकेँ करियो मान सम्मान गरीबक अछि देशमे हरदम काम िबनु गरीब नै होएत काम गरीबक िदलमे बसै भगवान....। माए माए अहाँ िबना नै कोइ दोसर अहाँ िबना जगत भऽ जाएत बेघर अहाँक हृदए सागरसँ िवशाल दयाक सागर बनल छी अहाँ ईश्वरसँ बेसी छी अहाँ महान् नै कोनो दूजाभाव अछि अहाँक हृदैमे सभकेँ हृदए लगौने छी समान धरतीक रखै छी मान िन:स्वार्थ पालन करै छी संतान माइक ममता ईश्वरसँ महान् अहाँक दूधक नै अछि कोनो दाम अहाँक गोद स्वर्गक समान अहाँक दर्शन सभ तीर्थक समान सभ देवतासँ अहाँ छी महान्। हमर गाम घर हमर गाम घर शदियोंसँ उपेक्ष्िात नरकक जिनगी िबतबैत गामवासी गाँधी जीक सपना रामराज टूटि गेल जे कहने रहथिन देशक आत्मा गाम घरमे बसैत अछि मुदा, गामघरक दुर्दशा नै देखल नै बाजल जाएत अछि टुटल घरमे टपकैत पानि बुन्ने-बुन्ने सिर बचेबाक नै कोनो उपाए अछि घरसँ िनकलैत कादो भरल सड़क थालक दुर्गन्ध दम लेत सड़कक नामो निशान नै साफ पानि कत्तौ नै मिलैत जे प्राण बचाएब िदन भरि काज केलौं मुदा, भरि पेट खेनाइक नै कोनो इंतजाम। अनहरिया राति कहब केना साँप िबच्छूक सेनासँ लड़ब केना प्रकाशक नै कोनो उपाय मटिया तेल िबचौिलए पी जाए जखन िबजली गााम-घरसँ रहैत अछि िबलाएल नैना-भुटका केर िजनगी सेहो होइत अछि बेहाल पढ़बाक इच्छा अछि मुदा, स्कूलक दशा अछि दुर्दशा कुबेवस्था िशक्षककेँ पढ़ेवाक नै देखै छी इच्छा जखन देशक जनता सत्तरि प्रितशत गामेमे िजनगी िबतबैत अछि तँए सत्तरि प्रतिशत आमद सरकार िकएक नै गाम घरपर खर्च करैत अछि देशक सभ धन (आमद) शहरेपर व्यय करैत अछि सभ सुविधा नगर शहरमे जखन होएत अछि िकएक सरकार गामवासीसँ शौतेला बेवहार करैत अछि शासक, प्रशासक, संतरी-मंत्री गामवासीसँ बेमुख बनल अछि खून चूसबाक सोभाब जोंककेँ होएत अछि मुदा, मनुख मनुखक खून चूइस-चूइस गाम-घरकेँ नरक बनौने अछि हमर गामघर शदियोंसँ उपेिक्षत अछि। अगिलगी एके राितमे क्षणे-मे-क्षणाक भेल गामक पछबरिया कातसँ गोहालीक घरसँ आगि उठल पछिया हवाक झौकासँ क्षणे-मे-आगिक लपेटि ऊपर उठैत घरक-घर सुड्डाह करैत आगू बढ़ैत गामक घर धधकैत जड़ैत पुरे गाम सुड्डाह भऽ गेल आगिक िवभििषका बढ़ैत गेल गाए, बरद, बकरी बच्चा बेदरू सुतलेमे जरि मरि गेल लत्ता-कपड़ा बर्त्तन-बासन अन्नसँ भरल कोठी बखारी जरैत देिख छातीमे मुक्का मारैत नोर बहबैत हल्ला करैत जोर-जोरसँ कहैत ‘जान बचाबऽ हौ गौआँरी’ देखैत-देखैत गाम बिलिन भऽ गेल गामक िनशान मिट गेल चिन्ह-पहन्हि हटि गेल सभ एक दोसरकेँ जानक दुश्मन बनि गेल अपन जान बचाएत कि दोसरकेँ जान बचाएत? काल रूप आगि विकराल बनल अछि चारूकात भागि पड़ाइत कोने जाएब चारूकात आगिये-आगि माल-जाल मरल-पड़ल आगिक लपेटिमे सभ पड़ल देखते-देखते पुरे गामक नाम-िनशान िमट गेल क्षणेमे गामक लोक कंगाल बनि गेल एक्के रातिमे क्षणेमे क्षणाक भेल। काली मैयाक गीत काली मैया हे.......। कतेक नीनमे सूतल छी अहाँ लाली पलंगिया हे सेवकपर होइयो ने सहाय सेवक......। अहाँ िबनु हम छी निसहाय रणे-बने भटकै छी हम कहिया करब हमरापर दया बगियासँ फूल चुइन हम अहाँक मंदिर देलौं चढ़ाय काली मैया हे कतेक नीन.......। बेली चमेलीक गजरा बनेलौं अड़हुल फूलक माला चढ़ैलौं कतेको गहबर पूजा ढारलौं नीन तोिड़ जागू काली मैया हे दुिखया सेवकपर करियौ ने दया काली मैया हे कतेक नीन.....। आशीष वचनसँ सेवककेँ सभ संकटसँ िदयौ ने उबारि काली मैया हे सेवकपर होइयौ ने सहाय काली मैया हे कतेक नीन सूतल छी अहाँ लाली पलंगिया हे.......। हमर िबखरल समाज हमर िबखरल समाज केना होएत एक ठाम जाति-पातिसँ िबखरल ऊँच-नीचसँ िबगड़ल छुआ-छूतसँ अड़ियल हम सभ जातिसँ छी मानव मुदा, मानव-मानवसँ करै छी दानवसन बेवहार तखन समाजमे बढ़ैए अतियाचार नै होएत समाजक काज िबखरल समाजसँ नै होएत कोनो िवकास सभ भेद-भाव बिसरि कऽ बनाऊ एक रंगक समाज जइसँ हएत मानवक विकास करू प्रयास बनाऊ नव समाज सभ मिलि करब देशक विकास हमर िबखरल समाज.....। िचड़ै चुनमुन्नी िचड़ै चुनमुन हमरा सबहक दुश्मन नै दोस छी रािखयो ओकरोपर धियान नै हतियो ओकर प्राण रािखयो दया नै िलयो जान ओहो करैए हमरापर एहशान कीट-पतंग खाए कऽ बचबैत अछि अपन प्राण नै िबगाड़ैत अछि िकनको काम जइसँ होएत अछि हमरो कल्याण के करैत अछि सेवादान िचड़ै-चुनमुन प्रकृितक प्रति सदा सजग रहैत अछि सूचना दऽ करैत उपकार हमसभ मानव करियो विचार नै करियो चिड़ै-चुनमुनक िशकार चिड़ै जाितपर नै करियो अतियाचार नै तँ प्रकृित करत मानवपर प्रहार िचड़ैपर किरयौ पुन: विचार नै तँ उल्टे भऽ जाएत मानवक संघार। माइक लाल हम छी माइक लाल माइक सेवा िनत्य करै छी सभ िदन करै छी सौ-सौ प्रणाम मांगै छी हम अभयदान हमरा िदअ एहेन वरदान जइसँ करब दुिनयाँक कल्याण हमरा अछि दूटा माए जननी आ मातृभूमि दुनूकेँ करब सेवादान दुनियाँमे नै करब अपन माएकेँ बदनाम राखब जगतमे सदामान सेवा करैत देब हम बलिदान माए हमरा माथपर ितलक लगा िदअ दुश्मनसँ लड़ब सीना तानि कहियो ने हेतै दुश्मनकेँ चैन होश-बेहोश कऽ देबै हम छठिक दूध यादि करैबै हम दाँत तोड़ि बनेबै दन्तहीन हम हम छी माइक लाल.....। के गरीब? के गरीब? जे कड़ोरोसँ खेल करैत काला धन जमा करैत लहना लगानी ब्लैक-मेलक तैयारी िनत्य अछि करैत ढोगी बनि तीर्थक मजा लइत देश विदेश भ्रमण करैत सभ सुविधासँ लैश रहैत कहितो लाज नहि होइत हाथ जोड़ि सभकेँ कहैत हम छी गरीब मुदा, के गरीब? गाम घरक सुपर नेता ठाट-बाटपर हुनके धाख चास बास चारूकात खेत, बाड़ी-झाड़ी, गाछी जेनए देखियो हुनके कित्ता समए पाबि रंग बदलि गरीबसँ करैत धक्का आगू बढ़ि करै गरीबक हकमारी बी. पी. एल.मे नाओं अगाड़ी सभ लाभ लैत अछि सरकारी हाथ जोड़ि सभकेँ कहैत हम छी गरीब? नैनाक खेल नैना-भुटुका खलैए खेल अपनामे करैए ठेलम-ठेल मारि-पीट करैत खेलैए खेल खेल-खैलैत जँ होइत झगड़ा उठा-पटक करैत रगड़ा गरदा झारि करैत मेल सभ मिल करैत खेल खेलसँ जाति-पाति मिट गेल जेना पानि-पानि एक भऽ गेल नै कोनो मनमे अछि मइल एकताक पाठ पढ़ल गेल देशक लेल सोच बदलल गेल देशक विकास लेल खेलब खेल नैना-भुटका खलैए खेल....। कोइली कुहकै आमक डारि कोइली कुहकै आमक डारि सुनि हमर मनुआ घबराइ पिया हमर रहिताए तँ धीरज दैताए बन्हाइ अन्हरिया राति हम बाट देखैत दुनू आँखि-निहारि इजोरिया राति हम चान देखैत चकबा-चकोर बनि जाइत चन्दा बादल लूक-छूप खेले पिया रहिताए तँ हमहुँ संगे खेलतौं ओहने कोइली बोलीसँ हमरा दिलमे लगैए गोली पिया रहिताए तँ किछु कहबो करितौं अनका केना किछु कहबै पिया परदेशिया बर निरमोहिया कहिया बनत हमर रखबैया कोइली बोली सुनि हमर देह भए जाइए बहिर केकरा कहबै ई दुखक बात कोइली कुहकै आमक डारि।। नींदिया बैरी भेल पहुना नींदिया बैरी भेल पहुना बाली उमर हमर भेल गौना हमरा अहाँ किएक बिसरलौं अहिना चिट्ठिया-पतिया बहुतो भेजलौं एको नै धुमेलौं सनेस कोन दोख हमर अछि पहुना कतैक फागुन बीत गेल अहिना सोलह बरख हमर उमरि बीतैए सजल पलंग हमर सुना पड़लए सभ दिन सजि-धजि अहाँक आशमे अपन आँखिक नोर बहबै छी मन पड़ैत अहाँले सोलह श्रंृगार करै छी रस्ता बहािर बाट अहाँक जोहै छी सूतल छी हम सजल पलंगपर अहाँक बिनु नीन्न नै भेल सोलहसँ अठारह बीत गेल बीस बरस तक ऑचर बान्हि हम अपन यौवन रखलौं सम्हारि धर्म सतीत्वक पालन करैत हम जिनगी बीतबे छी दिन-राति कोन बैरिनियाँ नजर लगेलक अहाँकेँ जे हमरासँ नजरि छिपौने छी अहाँक आशमे हम पहुना हमर जिनगी बितैए सुना-सुना पहुना कतेक दिन जिनगी बिताएब अहिना निंदिया बैरी भेल पहुना....। पागल प्रेमी वसंतक मास मधुराएल अछि भौरा मंजरपर गुंजन करैत अछि महुआक फूूलसँ रस टपकैत अछि फागक मन्द हवा मन ललचाबैत अछि चहु ओर चहकैत चिड़ै चुनमुन फूलक सेजसँ धरती सजल अछि ओसक कण मोती बनल अछि मुदा हमरासँ हमर साजन बिगड़ल अछि चिड़ै चुनमुन हमरा जगबैत अछि चन्दाक चाँदनी बादलसँ मिलैत अछि साजन बिनु हमर सुहाग उजड़ल अछि जेना शराबी शराब पी कऽ पड़ल अछि राति-दिन हमर मन घबराएल रहैत अछि आशा हमर निराशामे बदलल अछि साजन बिनु हमर मन पागल बनल अछि पागल प्रेमी नालायक बनल अछि। कोसीमे समाएल जिनगी बालुक ढेरपर हमर गाम समाएल कोसी पेटमे हम छी बिलाएल कड़ोरो दिलक बनेने अछि फटेहाल मैथिली छी हमर भाषाक पहिचान मुदा, कोसी बनल अछि विकासक बाधा मैथिलीक पोथी अछि कोसीमे समाएल पढ़वाक नै अछि मौका कोसी दैत अछि धोखा जिनगी बनल अछि हमर कंगाल झौआ, पटेर, काश, खगरा हमरासँ करैए रगड़ा बाल बच्चाक जिनगी बालुमे समाएल की खाएब की पीअब सोचेत छी पचताइत जखन खाएब पीअब नीक तखन सोचबो करब नीक अखन तँ नै अछि गाम घरक ठेकान जान पहिचानसँ दूर रहे छी ई कोसी हमर बनल अछि जंजाल हमर भविष्य बालुपर बनल अछि बेकार तैयौ नै अछि कोसीकेँ दया बाढ़ि-पानि अछि हमरा करैत हानि गाम घरक ने कोनो ठेकान कोसीमे घुमैत हमर जिनगी बनल अछि घुमन्तु हिंसक जीव-जन्तु बीच बनल रहै छी रमनतु हमर ने कोइ बाटैए दु:ख सरकारो बनल अछि बेमुख हम छी बेसहारा कोनो नै अछि सहारा हम बाल-बच्चा संग बनल छी बेचारा। हाइकू/ शेनर्यू/ टनका भरल नदी नाह खेबै खेबैया पानि बहैत बाढ़ि पानि भरल केना प्राण बचत। मोर नचैत मोरनी संगे-संग बादल बुन्न प्रेमक दृश्य दैत मन हर्षित करै। कारी बादल बरखा बरसैत बून्न गिरैत बिजली चमकैत राति-दिन झरैत। आम रंगीला स्वाद छै अलबेला पीला रसीला लालौन सिनुरिया सभकेँ ललचाबै। लाल गुलाब संगे काँट लगल रूप गंधसँ सभक दिल बसै भौंराकेँ ललचाबै। पछताइ छी पथपर चलैत मौतक संग नरको नहि बास केना करब आस। टुटल खाट सूतल छी चैनसँ पहरा नहि करबट फेड़ैत पेटकुनिया दैत। पानिक बुन्न मोती सन चमकै धरतीपर माइटसँ िमलैत नदी रूप बनैत। चिड़ै चहकै चुनमुन फुदकै पंख खोइल नव पथ बनाबै आजादीसँ भरमै। गंगा भरल अमृत सन जल जिनगी दैत अपने सेवककेँ गोदमे बसाबैत। बेटा-बेटीमे नहि कोनो अंतर परेशानी की नहि लेब जंतर किए हएत अंतर दूजक चाँद घीरे चढ़े अकास ओहिना सिखू पुर्णिमाक चाँदसँ बेसी करू विकास। खेतक काज राखै जगक मान नै अपमान खूब कमाउ नाम धान-पान-सम्मान। गाएक दूध दही-गोत-गोबर घी छै अमृत मिलिते पंचामृत जे पिबै बनै देव। चैतक रौद तपाबै माटि-पानि पछिया हवा पकाबै चना-गहुम बहारै धूर-कण। फूलक डारि भौरा चढ़ै दू-चारि गमकै बाग वसन्ती हवा बहै कोइली गाबै गीत। कारी काजर आँखि देत सुखाय कारी बादल बरखासँ डुबाय मुखरा देत बिगाड़ि। सत्य वचन अपन हुऐ हानि मिले सम्मान नहि छोड़ब बानि दोसरक कल्याण। झाड़ू बहारै कुड़ा-कचड़ा धूर सत्य भगाबै मन बसल मैल पाप नै धुले पानि। धर्मक शोर पताल पसरल वीरक यश तीनू लोक पहुँचै अधर्मसँ अहित। चौबीस घंटा दिन राति बनैत सात दिनक सप्ताह बनैत छै बारह मास वर्ष। फूलक बाग सिंचैत अछि माली इन्द्र सिंचैत धरती उपवन अन्न उपजै खेत। टुटल दिल प्रेमसँ जुटैत छै सूखल नदी जलसँ जिबैत छै क्षणे आगू बढ़ै छै। चहकै चिड़ै वन-उपवनमे गमकै फूल वागमे झुलि-झुलि देखि चान हँसैत। नेना-भुटका खेलै गुड़िया खेल पानिसँ मेल जाित भेद भुलि पढ़ै एकता पाठ। पान मखान िमथिलाक सम्मान धानक खान जनकपुर धाम िमथिलाकेँ प्रणाम। पढ़ैत सुग्गा कहैत राम-नाम िपंजड़ा बन्द रहैत छै गुलाम अछि संत समान। साँच बजैत जग मारल जाय झूठ बजै तँ जगत पतियाय नै छोड़ू साँच वाणि। नीमक गाछी सूतल रही खाट सपनैति छी चलितो पछताति नदी तटक बाट। दु:खक बात नै कहियो केकरो सुनि हसँत हानि करत मान नै िमलत सम्मान। जीवन दैत जल जीव जन्तुकेँ शीतल चँाद चँादनी िछटकैत शोभा छै धरतीकेँ। आमक डारि झुला झूलैत राधा कृष्ण पुकारै संगे-संग झूलब वृन्दावनक झूला। पानक पात मखानक प्रसाद स्वर्गक बास नदी तटक चास नै होएत विश्वास। माइक गोद धरतीकेँ बिछौना फूलक सेज सुख पाबै बेजोर नै िमलै परलोक। बाँसक वंशी स्वर बजै मधुर माया पसारै स्वर छै अनमोल सुनै सभ विभोर। कारी काजर मुखड़ा िबगारैत कारी कोइली मधुर गीत गबै सभकेँ ललचाबै। चँादनी राति कहै मनक बात प्यासल प्रेमी प्यास बुझाबै राति दिलसँ करै बात। देव धर्मसँ ऊपर माए-बाप तीर्थक खान धरती माता अछि हिन्दुस्तान महान्। मान घटै जँ िनत्य जाय सासुर मान बढ़ै जँ करै अतिथि सेवा सेवासँ िमलै मेबा। कालक मुँह खुलल छै िवशाल क्रमश: सभ समए बचै नहि कोय एहि चक्रसँ। चमेली फूल गमकै िदन-राति गजरा बनि देवौकेँ नहि चढ़ै नारी सजाबै केश। कमल फूल िबराजै लक्ष्मीजी सुख शान्ति दै अन्न, धनसँ भरै सभक छै कल्याण। सावन मास जलक बुन्न पड़ै आसमानसँ बेंगक बाजा बजै खन्ता डबरा भरै। पानिक बुन्न मोतीसँ महग छै मोतीसँ नहि िमटै भूखक रोग पानि िजनगी दैत। मैथिली भाषा मौध सन मधुर जे नहि पढ़ै वो बाजितौ लजाय पबै पढ़िते मान। मौध मखान रेहु माछक खान पानसँ मान पाग सँ बढ़ै शान िमथिलाकेँ िनशान आमक फल मधुर रसदार फलक राजा सभकेँ मन भावै सभकेँ ललचाबै। सावन मास रिमझिम फुहार प्रेम बढ़ाबै प्रेमीकेँ ललचाबै गोरीकेँ तरसाबै। मोनक बात की कहब सजनी समए नहि की भेजब सनेस दिल दर्दक क्लेश। दिलक रोग नहि कोनो इलाज प्रेमक भूख नहि िमटै धनसँ नहि कोनो दबाइ। चंचल मन िचत्त घबराइत मन डोलैत नयन सुखदाय प्रेमी कहै लजाय। सोना कंगना पैर पयजनियँा नाचै अंगना घूमि घूमि तकैत हमर सजनियँा। फूलक डारि झूलि सनेश दैत देशवासीकेँ सदा प्रसन्न रहुँ देशक सेवा करू। देशक सेवा माइक सेवा करू िजनगी भरि धर्मक पालन छै गरीबक कल्याण। सूइत उठि माए-बाप गुरुकेँ छुऊ चरण िनत्य बन्दन करू कृपा करत देव। पढ़ि िलखि कऽ बनु ज्ञानीसँ दानी करू देशक िवकास कल्याणक रक्खू ऊँच ितरंगा। सभ अपन पराया नहि कोइ सूरज चँाद सभकेँ समझैत एक समान हित। राजा दुखित प्रजा सभ दुखित जोिगक दुख दुखिया सँ छै बेसी संसार अछि दु:खी। सेवा करैत पथपर चलैत आगू बढ़ैत झरना सन आगू संघर्षसँ बढ़ैते। खूनक दाग िछपाय नहि पाबै पापक भार धरती नै उठाबै सत्य करै से होय। प्रात:क जल पीबैत रहू िनत्य टटका फल खाऊ जीबैत धरि बनल रहु स्वस्थ। रथक चक्का उलटि चलै बाट चाक् चलै छै ठामे ठाम नचैत दुनू करै दू काम। बच्चा बेदरू खेलैत संगे खेल कखनु झगड़ा कखनो करै मेल पढ़ै छै पाठ एक। िखलैत फूल देखैत भौंरा नाचै रस पिबैत राति बितबै संगै प्रेमक बात करै। दिलक बात की कहब सजनी प्रेमक बाँध सभसँ मजबूत तोड़लौं सँ नै टुटै। खूनक दाग सभसँ अछि पक्का मिटैत नहि कारी दागसँ भारी बड़ पैघ बीमारी। सच्चा इंसान ज्ञान धर्म ईमान उच्च िवचारि मानवक श्रृंगार कार्य करै महान्। सूर्य रौंद सँ धरती तैप तैप शुद्ध होयत सोना तपै आगिसँ धर्म सँ तपै लोक। मोछक मान राखै छै घरवाली सेवक करै घरक रखवाली गाए छै हितकारी। दुर्जन साधु नौकर बेईमान कपटी िमत्र ई तीनू छी शैतान क्षणमे लेत प्राण। खाना खजाना जनाना पखानाकेँ पर्दामे राखू जौं राखक बाहर िबख बािन जाएत। प्रीत नै जानै ओछी जाित, नीन नै टुटल खाट प्यास नै धोबी घाट सभ कहै छै बात। बैल खींचैत अछि काठक गाड़ी मनुख खींचै छै दुिनयाक गाड़ी की बनल लाचारी। नीमक गाछ करैत हवा साफ दवा कऽ साथ। गंगा किनार तीर्थक जेना धाम पवित्र स्नान। अतिथि सेवा देव धर्मसँ पैघ मधुर सेवा। सभ दिन नै होइत छै समान राजा आ रंक। अमृत पान जिनगी दैत अछि अमर दान। मोरक पंख चमकै चटकिली प्रेम जगाबै। धनी बनब सभकेँ इच्छा अछि दीन किएक नै। रामदेव प्रसाद मण्डल “झारूदार”, गाम- रसुआर, भाया- निर्मली, जिला- सुपौल। मैथिलीक भिखारी ठाकुर नामसँ प्रसिद्ध मैथिलीक पहिल जनकवि । अपन गप, प्रार्थना, गीत, झारू, महाझारू (हमरा बिनु जगत सुन्ना छै) अपन गप (माए केर स्मृतिमे) प्रेरणा- माए-बाबूक संस्कारसँ प्रेरित मिललै हमरा ई उद्देश्य। दया-प्रेम दुनियाँमे बाँटि कऽ मेटा दिऔ दारूण-क्लेश।। उद्देश्य- मात्र उद्देश्य छै एत्ते हमर, घर-घरमे होइ शांति-अमन। सुख भरल होइ जीव-जगतकेँ, हरा-भरा होइ सभक चमन।। सहयोग- रहल नै पाछू नितु कुमारी, संग लगा नागेन्द्र कुमार झा । मण्डल उमेशजी बहा पसीना, संग लगा गजेन्द्र ठाकुर। पत्नी-बच्चा लहू जरा कऽ, सहयोगी बनलै भरपुर।। गुरु- पहिल गुरु माए, जग-जाहिर छै दोसरमे सौंसे संसार। सुदुर दर्श छै गुरु आखिरी, ओ.के. रामदेव झारूदार। प्रार्थना हे जगतकेँ पालक श्रृजक, हे दुनियाँ केर संघारी। अहाँसँ हमर अतबे प्रार्थणा, हम बनि सत् व्रतधारी।। बहुत कऽ देलिऐ पहिले अहाँ, कनिये हमरो दियऽ ज्ञान। काम करए एहन हमर तन, जगमे होइ सबहक कल्याण।। करू िनर्देशित हमरा तनकेँ, काम करए जनहितकारी। रहए अटल सत् पथपर हरदम, करए नै विचलित दुख भारी।। सुखमे हम नै होइ मतबाला, हुअए नै हमरा दुखक गम। दिल भरल रहए सेवा भावसँ, जत्ते करी तत्ते लगए कम।। मिट जाए अज्ञान अंधेरा, दीप जलए दिलमे सुज्ञान। ब्यापए ने हमरा कुरिती, पैदा केलक जकड़ा अज्ञान।। होइ छै जगमे की मानवता, नैतिकताक दिअ ज्ञान। दया प्रेमक बना कऽ सागर, नित्य करब जग संग स्नान।। करू कृपा जगपर अव्यक्ता, मेटा दिऔ दुनियाँक रोग। जाइत धरमसँ मुक्त होइ मानव, लोकक भीतर बसल होइ लोक।। मिटए मूलसँ सभक गरीबी, रहए नै भुखल कियो इंशान। होइ उत्थान दबल कुचललकेँ, कुछ प्रकाशु एहन ज्ञान।। हे िनर्देशक सारे जगतकेँ, कुछ िनर्देसु एहन काम। धरतीपर जे अमर करा दइ, उचा कऽ दइ जगमे नाम।। झंडा गीत झंडा तीरंगा सभसँ चंगा, छै दुनियाँमे ई बेमिशाल। एकर ऊँचाइ हीमगिरी सन, छुइ नै सकल कियो एकर भाल।। अइमे सागरक गहराइ, पाइब नै सकल कियो एकर पार। करतै जे कियो एहन ढिठाइ, निश्चित हेतै तेकर हार।। हरा रंग छै जीवन हम्मर, कऽ रहलै झंडा एलान। हरा हमर छै बाग बगिचा, हरा हमर छै खेत खलिहान।। रंग केशरिया गजब के पुरिया, ई खोललनि रणवाँकुड़ा वीर। देखलनि नै किछु आगू-पाछू, रँइग देलनि अपन सीना चीर।। श्वेत रंग तँ दयावान छै, ई सच्चाइक पहिचान। नीत धरम धीरज के उपमा, अहीसँ छै भारतक शान।। चक्र सिखबै छै हम सभकेँ, ठहरू नै सुनि मिठी बात। राह कठिन होइ चाहे कतनो, बढ़ु विकासक पथपर दिन राति।। सत्यमेव जयतेक अर्थ छै, सत्यक होइ छै हरदम जीत। सभकोइ पकरू सत्यक डोरी, एकरा मानू अपन मीत।। लालच नै होइ मनमे ओहन सीमा पार होइ अप्पन राज। रहै अछुता अप्पन सीमा, तकरा खातिर कसु आवाज।। शारनाथक अशोक स्तम्भसँ, लेलनि हिन्दी तीन बाघ निशान। ट्रिपुल शेर अहाँ हिन्द निवासी, भरल रहै मन एतए शान।। सिक्का नोट सरकारी पुस्तक, दस्तावेजपर शोभित निशान। समृद्ध छै प्रभुत्व हमर ई, सुना रहल दुनियाक गाण।। दायाँ बैल और वायाँ घोड़ा, बीच विराजैत चक्र निशान। हाथ मिला दुनू गाबै छै, जय जय जवान और जय जय किसान।। दया धरमकेँ ऐ धरतीपर, लेलनि बुद्ध गाँधी अकार। गंगा यमुना कृष्णा कॉवेरी, बहै छै जतए पावन धार।। जन-जनमे छै सच्ची श्रधा, जनता सेवक जतए नरेश। हजरत, तुलसी बालमिकीकेँ, गुइन्ज रहल घर घर अपदेश।। जिनकर चरण पखारै सागर, हीमगिरी जेकर िसरमौर। हृदैमे जकड़ा पावण गंगा, जलै दीप सुज्ञानकेँ और जागु-जागु बाबू।। अपन देश अपन देश अपन देश, अपन देश मिथिला देश। राजा जनककेँ ऐ धरतीपर, रहै नै लेश क्लेश। अपन....................। पसरल एतएसँ ज्ञान जगतमे, छै प्रगट भगवान भगतमे। हर नारी अतए पार्वती छै, हर नर अतए महेश। अपन....................। पग-पगपर अतए तिरथ धाम छै, झुठ नै अतए सत्यक नाम छै। पर उपकारक खातिर मानव, सहै छै भारी क्लेश। अपन....................। जगतरनी जतए गंगा धारा, ज्योति लिंग केर जतए उज्यारा। हजरत तुलसी बाल्मिकक गुँजि रहल उपदेश। अपन....................। भिन्नतामे जतए भरल छै एकता, भेद मुक्त छै अत केर जनता। माला तोरि कऽ जाति धर्मक, सभ कोइ देलकै फेक। अपन....................। सेवा केर जतए परमपरा छै, हर मानव लेने हाथ खड़ा छै। घर आएल मेहमानमे देखै, अल्ला ईषू गणेश। अपन....................। खेत बाग हरियाली भरल छै, अन्नसँ सभ भण्डार भरल छै। बरदकेँ घंटीसँ टिकल होय, जतए केर पुरा देश। अपन....................। ऊँच जतए मेहनतक मान छै, खुन पसिना सभक शान छै। हाथ नै फैले ककरो आगू, घर होइ की प्रदेश। अपन....................। ई जननी छै हिर वीर केर, सागरसँ गहींर धीर केर मतृभुमि केर रक्षा खातिर, गला सजल छै अनेक। अपन....................। सभ होइ जतए केर ज्ञानी ध्यानी, सभ होइ जतए सद्गुन विज्ञानी। मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वरासँ बटै अमन संदेश। अपन....................। धूम जतए सेवा केर मचल होइ, भला अइसँ कियो कोना बचल होइ सदियोसँ जतए रीत पुरान, जनता सेवक नरेश। अपन....................। जतए होइ किमती आइन जानसँ, झुकै नै बस टुटै शानसँ। निष्ठा, मर्यादा मानवता, जकड़ा लेल होइ नेक। अपन....................। झारू- डूबल हिन्द अज्ञान के सागर, तपि रहल अछि लोभ बुखार। शाशको तँ बंचित नै देखाबै, के करतै एक्कर उपचार।। झारू- फेल कऽ गेल ऐपर सभटा, एण्टिवायोटिक धरम-इमन। निष्ठा-नैतिकता-मर्यादा, दया मानवता नीति ज्ञान।। गीत- मानव मारै छै मानवताकेँ चढ़ि गेल छै अज्ञान यौ सभा लगा कऽ सभ कियो सोचू देशक सभ विद्वान यौ सभ बनल छै पैसा रोगी, अन्धविश्वास, कुरीतक जोगी सिर चढ़ल छै भ्रष्ट आचरण, दुख चढ़ल परवान यौ। सभा......। जनता राजा सभ अन्हरेलै न्याय विकासी काम बनरेलै साहित बनि कऽ ठक लुटेरा लुटै शान्ति ज्ञान यौ। सभा......। अहाँ बिना के ई दुख हरतै अहींसँ ई सभ दानव मरतै कलमकेँ एक बेर फेर बनाबू रामक तीर कमान यौ। सभा......। झारू- सत् कर्मसँ ऐ दुनियाँमे, शान्तिक संग सुख छै कुल। असत् संग संगति करबै तँ, जीवन गुजरत बनि कऽ शूल।। गीत- सत् मे सदा अटल रहू बाबू। सत्तक सुखमे देर छै।। असत् अज्ञान नरक केर भागी। ई जीवन अन्धेर छै।। जीवन डगरमे सत् करू संिचत बितै नै पल सतसँ वंचित छोड़ि असत् जे सतमे जीबए से दुनियाँमे शेर छै असत्.....................। असत् छोड़ि जे सत् नै धरै छै दुक्खक घर नरकमे परै छै सत छोड़ि असत् मे जीबए तकरा तँ दुख ढेड़ छै असत्...................। सत डगरमे फुले-फूल छै डगर असत् मे भरल शूल छै जे परल अज्ञान अंधेरा ई बुझैमे फेर छै असत्.................। झारू- जनता बनू अयोध्यावासी, भाइचाराक पढ़ि कऽ पाठ। गुनि कऽ प्रेम दयाक डोरी, बन्हू सभ मानवक गाँठ।। गीत- हिन्दु-मुस्लिम सिक्ख-इसाइ, एक्के गाछक सभ फूल यौ। एक्के प्रकृति सभकेँ रचलकै, दू बुझनाइ छी भूल यौ। जाति धर्मक सीमा तोरू मानवसँ मानवकेँ जोरू जब एकटामे सभ मिल जुड़बै देश हेतै मृदुल यौ एके................। जगत गुरूवार सभ रचना केलकै मेल एकताक मंतर देलकै जन जोरू जन फोरू बैनक सभकेँ चटाबै धुल यौ एके..........। झुठ-फुसक आइर बनल छै अपनो भैया गैर बनल छै अर्थक अनर्थ लगा कऽ देशकेँ भोंकै छी शूल यौ एके.........। झारू- बनू एक सभ भेद भुला कऽ, नारा सबहक यएह होइ एक। दया-प्रेम जनसेवा जकाँ, काज करू सभ नीक नेक।। गीत- नेता अफसर मौज करै छै। शासक आँखिमे छिट कऽ छौर।। जनता नै एकता बनबै छै। तँए चाटै छै मामक घैड़।। एकताकेँ जौं नै अपनेबै जीवन भरि सुख लऽ सपनेबै लुच्चा-लम्पट खुनि कऽ खाइ छै नीचाँ-ऊपर सभ खमहौर जन.......। अपने पेट लऽ सभ बेहाल छै तँए तँ देशक एहन हाल छै मात्र औपचारिक राज चलै छै मिडिया खाली लै छै घमहौर जन............। एकता बनैले सहए पड़ै छै घटो लगा कऽ बहए पड़ै छै अपन गलतपर लहए पड़ै छै जलै छै खुन पसिना और जनता.....। जन.........। झारू- जइ घरमे होइ नारी पूजा, ओ घर होइ छै स्वर्ग समान। ओइ घरकेँ तँ नरके मानू, जतए होइ नारीक अपमान।। गीत- परबस जिबै छै अखनो मिथिला देशक नारी यौ तँए फाटल छै साड़ी यौ ना नारी कोना कऽ हेतै सख्त कोइ नै दइ छै कनियो वक्त दुर हेतै कोना कऽ अबला के लाचारी यौ तँए......। गाम छै अखनो पुरूष प्रधान, नारी बनल छै चुसक आम। चुप रहि कऽ सहै छै, पुरूषक अत्याचारी यौ। तँए.....। नारी नेतो जौं बनै छै, कुर्सी पुरूष ओकर धुनै छै। कानुन कसै नै छै राजा, राजक छी बेमारी यौ। तँए.....। नारी सीता राधा अंश, पुरूष बनल छै रावण कंश। फेर कोना कऽ चलतै, ई घर दुनियाँदारी यौ। तँए......। झारू- पूजा-पाठक सत्ता दऽ कऽ, कऽ रहलै सभ मानव भूल। छोड़ि अपना कर्तव्य-कर्मकेँ मंदिर दौड़ए लऽ कऽ फूल।। गीत- देखियौ यौ सभ बाबू भैया, ई सभ की देखाइ छै। ज्ञान बिना ई अल्हर मानव, सुखलेमे नहाइ छै। दल बनेलकै सभ ठकपंथी, एकटाकेँ देने छै महन्थी। अन्न पानि की खेतै बाबा, दहिएमे नहाइ छै। ज्ञान....। मंदिरमे खुब चढ़बु चढ़ाबा, धन पुतकेँ खुब हेतै बढ़ाबा। ठकपंथीकेँ फेरमे मानव, पढ़ने ई पढ़ाइ छै। ज्ञान.....। मॉगनेसँ जब देवता दैइतै, िनर्धन निपुत कोइ किए रहितै। अंधविश्वासकमे अखनो मानव, जंगलमे बौआइ छै। ज्ञान....। झारू- जखन कियो काँट चुभाबए, ओकरा लेल अहाँ फेकू फूल। अहाँक फूलकेँ फूले मिलतै, ओकरा भेटतै शूल-त्रिशुल।। गीत- मेल एकता बड्ड सुख दइ छै, गाबै वेद-पुराण यौ। सभ भाँइमे जौं एकता रहितै, बम-बम रहितै मकान यौ।। छोड़ि दियौ जाति पातिक झगड़ा, तियागि दियौ सम्प्रदाइक रगड़ा। कंधासँ कंधाकेँ जोड़ि कऽ, रोपु विकाशी धान यौ। सभ..........। कुवुद्धिमे जौं ओझरेबै, कोना दु:खक गुत्थी सोझरेबै। भुख-गरीबी रोग अशिक्षा, कोना कऽ हेतै निदान यौ। सभ..........। राष्ट्रहित लऽ सबकियो सोचु, एकता जलसँ एकरा सिंचु देश जौं संकटमे फसेबै, बचतै नै ककरो शान यौ। सभ..........। झारू- दाँत तोहर छौ इज्जत रक्षक, कियो मवाली पकड़ौ हाथ। मार चपा दे फूल बत्तिसी, दाँत रहओ किछु मासुक साथ।। गीत- हम मिथलानी मिथिला के नारी, रहबै नै कमजोड़ यौ। नव डगर अपनेसँ गढ़बै, धरबै शिक्षा के डोर यौ। हक हमर जे आब कियो छिनतै, अपना लऽ दु:ख अपने किनतै। आब नै नारी रहब अनारी, बनबै सख्त कठोर यौ। नव...........। आब नै सहबै हम दुर्दशा, करबै नै आब ककरो आशा तोरि फेकबै जंजिर गुलामी, चाहे लगतै जे जोड़ यौ। नव...........। सभ नारीमे एकता बनेबै, नारी ससख्ती सभकेँ जनेबै जे कियो आब हमरा सतेतै, झुटका दऽ मलबै ठोर यौ। नव...........। झारू- जरए ने दिऔ कोनो प्लोथिन, ऐसँ उत्पन्न होइ छै जहर। जौं ऐसँ अहाँ बाज नै आएब, प्रकृति ढाएत भारी कहर।। गीत- जागू बाबू आबू आगू जीयापर करू विचार यौ कोना जीयब अइ प्रदूषणमे श्रृजनहार बेमार यौ। भू जल वायु घ्वनि प्रदूषण दुख दुनियामे अपार यौ। कोना बँचब एे काल गालसँ सभ मिल करू विचार यौ। विज्ञानक ई देन प्रदूषण बनि घर घुसल चुहार यौ। बाघ बनि ई मुँह बौने अछि दुिनयाँ बनल सिकार यौ। इंजन हो पूरा कंडीसन धुआँ नै छोड़ै बेकार यौ। करू खियाल किछु अगिला पिढ़ी कोना रचत संसार यौ। होयत कोना दुिनयामे पावन घरतीपर नर नारि यौ जगत पावनि गंगा मैया, खुद शुद्धिकेँ िभखाइर यौ। झारू- दया करू हे वीणापानी, मानवमे किछु दिऔ ज्ञान। भटकि गेल ई अपन रास्ता, भाइयो लगै छै शत्रू समान।। गीत- सभपर छै अज्ञानक छाया सतसँ भेलै दूर हौ। अपने भाएकेँ लहु चाटै छै बनि कऽ महिषा सूर हौ। अपने.......। जाति धर्म मानवता भेदी लोग बनल सभ अही केर कैदी धर्मक आगिमे जड़ै ई जनता बनि गेल छह सभ क्रुड़ हौ। अपने.......। धर्म इमानसँ लोक छै बंचित काम क्रोध आओर लोभ छे संचित निष्ठा नीति मानवताकेँ, जरा तपै छै घूर हौ अपने.......। अंध विश्वास छै सभकेँ धएने कुरीतिसँ घर छै भरने अज्ञानक अागिमे जड़लै सबहक करम कपुर हौ। अपने.......। झारू- नर नेता होइ आकि होइ नारी, पदपर वएह अछि शोभाइमान। लालच छोड़ि जनसेवा खातीर, न्याय केर खातीर करैए काम।। गीत- लोभी लालची राज करै छै फुहर गाल बजाबै छै लुटि-लुटि भोली जनताकेँ अप्पन घर सजाबै छै। पग-पग पसरल हेरा फेरी काम छै काला मुँह छै गोरी काला धनपर उजड़ा पॉलिस। थुथुन जोड़ि सौ लगाबै छै। लूटि..........। ककरा कहबै नीक छै बाबू बोरा लटकल छै सबहक आगू के करतै जनता केर सेवा दुर-दुर तक नै देखाइ छै। लूटि..........। राजकर्मी छै लोभ लहरमे जनता मरै छै लूटि कहरमे राजा पहिरने चदरा चश्मा किछो नै एकरा देखाइ छै। लूटि..........। झारू- की करू हम सेवा अहाँक, घर खाली किछु छै नै धन। बैसि बिछा दौं अहाँक नीचाँ, श्रद्धा-रंजीत अपन मन।। गीत- मिथिला रहि गेल बनि ई सिथला दुक्खक भरल गोदाम यौ रोऐ छै मिथिला केर धरती लऽ लऽ जनक जीक नाम यौ। आइ हर घरमे सीता रोऐ छै राइत-राइत भरि नै जनक सुतै छै कतए सँ एतै दहेजक पैसा हेतै केना कन्यादान यौ। रोऐ.........। दया धरम के गाछ सुखाइ छै निष्ठा नीति हाट बिकाइ छै इमानक कोनो मोल नै रहलै सेवा भेलै लोभक गुलाम यौ रोऐ.........। जनता हित लऽ कोइ लड़ै छै अपने पेट लऽ सभ कोइ मरै छै कहियो देखतै गरीब आजादी हेतै कोना नवका विहान यौ रोऐ.........। झारू- धरम-इमान और निष्ठा केर बीच, केकर भेल चरित्र िनर्माण। चाहे केतनो जोर लगाबू, शक्ति-संपन्न या धनवान।। गीत- देखियौ यौ सभ बाबू भैया हमरा ई की देखाइ छै गट्टा पकड़ने लोभ लोककेँ नरकमे लेने जाइ छै। लोभे करबै छै सभ पाप चाहे जते छै त्रिविध ताप ई धऽ लेलकै जकड़ा बाबू से दुखमे बौआइ छै गट्टा.........। लोभ सभकेँ करै छै अंधा चाहे छै कतनो कविल बन्दा नीत धरम निष्ठा मर्यादा किछाे नै सुझाइ छै गट्टा.........। जकड़ा चढ़लै लोभक पाप से नै बुझै छै माए-बाप दुनियाँ दारी के बताबए भाइयो नै सोहाइ छै। गट्टा..........। झारू- मुल्ला-साधु-पण्डित-ज्ञानी, के नै छै पैसा केर भक्त। पाछू एकर सारा जमाना, कऽ रहल छै तपस्या शख्त।। गीत- पढ़ै लिख कऽ सभ टेढ़ भेल छै ज्ञान किछो नै बुझै छै जइसँ पॉकेट बम-बम रहतै तनै माथे सुझै छै। पैसे लऽ विद्या पढ़ै छै पैसे लऽ मंदिर गढ़ै छै पैसे लऽ सभ जप-तप हइ छै पैसे लऽ देवतो पुजै छै। जइसँ............। पैसेसँ राजबर्दी चलै छै पैसेसँ आशिष मिलै छै वेदो मंत्र पैसेसँ तौले छै सभ अज्ञानमे जुझै छै। जइ..........। भुलि गेलै सेवा के रीती पैसेमे सभकेँ छै प्रीति नीत धरम इमान ज्ञानकेँ नै किछो कोइ बुझै छै। जइ...........। झारू- वन-झील-नदी आ वनबासी, पहाड़-पठार संग रेगिस्तान। करू सुरक्षा पर्यावरणक, ऐसँ देश बनत धनवान।। गीत- केमरासँ तस्वीर बनेबै मिथला मैथिल परिवर केर। तकरा देखेबै पटना जा कऽ विकास पुत नीितश कुमारकेँ। फोटो बनेबै खेत असिंचित सिंचाइ पानि बिजलीसँ वंचित। और बनेबै बाँटल खेतमे दूर-दूर फाटल दरार केर। तकरा.........। फोटो बनेबै टुटल घरक उखरहा एकताकेँ जोड़ि कऽ। भूख गरीबी रोग अशिक्षा आगू खड़ा पहारकेँ। तकरा.........। अंधविश्वासक महल देखेबै दहेज कुरीतक जहल देखेबै। फोटो बनेबै छुपल लुटेरा ढाेंगी ढोंग ढपारक। तकरा.........। झारू- पहिर माला मानवताक, देश विकासक लगा दिऔ होड़। अहाँ बनि जाउ चान गगन केर, निहारै जनता बनि चकौर।। गीत- मिल कऽ सजेबै राज पंचायती मेल एकता केर फूलसँ। भूख गरीबी रोग अशिक्षा तब ने मिटतै मूलसँ। युवा वर्ग आबू सभ जागू न्याय विकाशी फूल खिलाबू। शिक्षाकेँ नै गारि सुनाबू लोभ लालच केर फूलसँ। भूख..........। न्याय दिअबै गामे अन्दर लोग नै बनतै कोर्टमे बन्दर। सभ मिल झगरा आगि बुतेबै समता मूलक शूलसँ। भूख..........। सही सही राजकोष चलेबै घर-घर शान्ति दीप जरेबै। विकास खोधि धरतीसँ निकालबै शंकर केर त्रिशूलसँ। भूख..........। झारू- भािग गेला अंग्रेज अकेला, छोरि कऽ पाछू ढेरो जाित॥ कर रंगदारी वसुल रहल अछि, मारि मारि कऽ सभकेँ लाति॥ गीत- लोभी लालची कामी क्रोधी। भूमि भरल दूर-दूर हौ॥ बाजह हौ काका केना कऽ हेतह। देशक गरीबी दूर हौ॥ हाथ कड़ोरो काम जे कैरतै। सोनसँ खजाना भैरतै॥ घर बैसल घरघुसरा बैनि कऽ। कला कौशल मजदूर हौ॥ बाजह.........। व्यर्थ बैसल मानव संसाधन। हाथ पैर मेंहदी आँखिमे आजन॥ भरि दिन चौकपर तास खेलै छै। और मचबै छै हुर हौ॥ बाजह.........। सी.ओ, बी.डी.ओ, सरपँच मुखिया। धरतीपर सभसँ ई दुखिया॥ फँड कोना सभ हम्मर हेतै। हरदम भाजै भूर हौ॥ बाजह.........। शान्ति सभकेँ दँात काटै छै। एक दोसर लऽ दुख बाँटै छै॥ अपने भायकेँ लहु चाटै छै। बनि कऽ महिषासूर हौ॥ बाजह.........। काम-क्रोध और लोभ भरल छै। आगि अज्ञानमे सभ जड़ल छै॥ आम जानि कऽ सभ रोपै छै। गजड़ा काँट बबुर हौ।। बाजह.........। सुस्त परल छै राजक कर्मी। सेवामे बर्तै छै नर्मी॥ सत् कर्मकेँ सभकोई छोड़ि कऽ सुखसँ भेलै दूर हौ।। बाजह.........। राजकोषपर नजर गरल छै। हथियाबक लोभ भरल छै।। हम्मर की कर्तव्य बनै छै। ज्ञान हिनकासँ दूर हौ॥ बाजह.........। जाति धरम मानवता भेदी। लोग बनल सभ अही केर कैदी॥ धरम आगिमे जड़ि ई जनता। बनि गेल छह सभ क्रुड़ हौ।। बाजह.........। धरम इमानसँ लोग छै वंचित। काम क्रोध और लोभ छै संचित।। निष्ठा नीति मानवताकेँ। जड़ा तापल केर घुर हौ।। बाजह.........। अन्धविश्वास छै सभकेँ धरने। कुरितीसँ घर छै भरने।। अज्ञानक अग्निमे जड़लै। सबहक करम कपुर हौ।। बाजह.........। वोटक खाितर आजुक नेता। मारै छै चानी केर जूता॥ कुछ पापी तँ वोट बेच कऽ। खाधि खसल छै जरूर हौ।। बाजह.........। गप्पे-गप्पमे लफड़ा बढ़लै। शाशक सिरपर टेन्शन चढ़लै।। अलुल-जलुलसँ लड़ि ई शाषक। भेलह चकना चूर हौ।। बाजह.........। मुँह देखैल पंचैती होई छै। घूस पंच भगवानो खाइ छै।। आब ककड़ापर आश करतै। गामक लोग मजबूर हौ।। बाजह.........। ज्ञानले नै कोइ स्कूल जाइ छै। नौकड़ी कऽ ई जड़ि देखाइ छै।। शिक्षामे सभ कोई खोजै छै। पाइ अड़जि कऽ लुरि हौ॥ बाजह.........। झारू- भारत हो या ओइसँ बाहर, सत् जन कऽ रहलै स्वीकार। मानवकेँ छै दू आधार, सादा जीवन ऊँच विचार।। गीत- दया धरम निष्ठा मानवता ज्ञान भरल भरपुर गै बोल गै दैया कोना नै हेतै देशक गरीबी दूर गै। रोजगारक आब अवसर बढ़तै भूखल नै सबहक पेट भरतै नेता जनहित बोतल पीब कऽ रहतै हरदम चूर गै बोल गै..........। श्रम साधनक कहाँ कमी छै खनिज भरल हर जगह जमीन छै लोहा-अवरक ताम्बा-कोयला खान भरल भरपुर गै। बोल गै..........। सत् कर्म सभ कियो अपनेतै सत्यक रोटी हरदम खेतै सत्यक खातीर जगसँ लड़तै रण बाँ कुड़ा वीर गै बोल गै..........। हिन्सा छोड़ि सभ शांति धरतै वसुधाबि कुटुमकम गढ़तै जग अमन केर पोथी पढ़तै साँझ-भोर-दुपहर गै बोल गै..........। काम-क्रोध और लोभ भगेतै घर-घर शांति दीप जरेतै आब नै राज अज्ञानक रहतै धरतीपर दूर-दूर गै बोल गै..........। सेवाकेँ सभ पूजा बुझतै असत् छुटै केर युक्ति सुझतै असत् छोड़ि सभ सुख अपनेतै आब बेसी नै दूर गै बोल गै..........। झारूदारक सभ झारू पढ़तै सत् अहिंसा मनमे भरतै लोभ लालचक चिता जरा कऽ हिंसासँ रहतै दूर गै बोल गै..........। धरम इमान सभ कियो अपनेतै मानवता केर मंठ बनेतै जाति धरमसँ पानि भरेतै देसक लोक जरूर गै बोल गै..........। लोभ लालच आब ज्ञानसँ भगतै सेवा लऽ सबहक मन जगतै मानवता नै मुँह चोरेतै आब बनि मजबूर गै बोल गै..........। अन्धविसबासमे कोइ ने पड़तै कुरीतिकेँ बाहर करतै ज्ञान-विज्ञानक पोथी पढ़ि कऽ कर्मक बान्हतै धुर गै बोल गै..........। लोभमे आब नै वोटकेँ बेचतै राष्ट्र हित लऽ बटम दबेतै वोट बेचि कऽ पाप करै छी सोचतै सभ जरूर गै बोल गै..........। गाँधीक उपदेश भरल छै ऋृषि-मुनिसँ वेद जरल छै गौतम केर धरतीसँ टपतै मानवताक नूर गै बोल गै..........। झारू पढ़ि सभ लोभ भगेतै दादाबला दाउ लगेतै न्यायक खातीर दाउ चढ़ेतै अपन जान जरूर गै बोल गै..........। आब नै रहतै मानव दानव ज्ञानसँ रूकतै दुखक कानब शिक्षा केर आब माने बुझतै ज्ञान-कर्म जरूर गै बोल गै..........। झारू- दुनियाँ भरिक सुख होइ हमरा, दुख रहै सदिखन हमरासँ दूर। इच्छा-द्वेष छी दुखक सागर, ऐमे नै डूबि मरू हजूर।। गीत- बाबू करम कलमसँ लिखू अपन भाग यौ पाबू सत्यक साग यौ ना कर्म गति छै भारी गहन सत्यकेँ धारू अपना मन। बाबू सत्य पकड़ि कऽ बमबम रहतै बाग यौ पाबू सत्यक.........। कर्मे दइ छै घर और घरनी गंगाधाम या नदी बैतरनी डुबा देतै की करतै ऊँचा मरदक पाग यौ पाबू सत्यक......। कर्मेसँ छै बेटा-बेटी करते सेवा कि धरतै चोटी कुलकेँ ऊँच करतै आकि लगेतै दाग यौ पाबू सत्यक........। बचू असत्यक ई चपेटि लिअ तनमे सट लपेटि तनमे लगा नै सकतै कलजुग कोनो दाग यौ पाबू सत्यक.........। झारू- कर्त्तव्यमे अधिकार जुड़ल छै, एकरे अपना तनमे जोड़। चिंता कर नै अधिकारक, मिलतै निश्चित कऽ कऽ सोर।। गीत- ऊँच करबै अपना देशक नाम गै बहिनिया सातो करतब करबै परमान गै बहिनिया। करबै सभ संविधानक आदर राष्ट्र प्रतीकक सम्मान सादर एकता चढ़ा रखबै परमान गै बहिनिया तीनू करतब करबै परमान गै बहिनिया ऊँचा करबै...........। देशपर एतै जब कोनो संकट लगा देबै सहयोगक जमगघट राष्ट्र सेवा पहिला होएते काम गै बहिनिया चारिम करतब करबै परमान गै बहिनिया ऊँचा करबै......। सभकेँ बुझबै सम बराबर भाषा-मजहब जाति बराबर नारीक ऊँचा करबै मान गै बहिनिया पाँचम करतब करबै परमान गै बहिनिया ऊँचा करबै.......। धन सरकारी रक्षा करबै छोड़ि हिंसा शांतिकेँ धरबै अहीसँ करबै समस्याक निदान गै बहिनिया छअम करतब करबै परमान गै बहिनिया ऊँचा करबै........। वन-क्षील-नदी और वनवासी पर्यावरण छी रक्षा राशी अहीसँ हेतै सबहक कल्याण गै बहिनिया सातम करतब करबै परमान गै बहिनिया ऊँचा करबै.........। झारू- पेड़ पौधा छी जीवन रक्षक, अही केर भीतर सबहक प्राण। कर्वो-प्रोटीन-वसा-िवटामीन, भरलनि और खनिज भगवान।। गीत- बौआ पाँच गाछ सभ साल लगा रौ एकरा सन दोसर नै सगा रौ ई देतौ तोरा शीतल छाया फल देतौ पोसैले काया मैया धरतीकेँ अहीसँ सजा रौ एकरा सन........। जरना देतौ बनबैले खाना फर्निचर देतौ विधि नाना दबाइ बना कऽ दरद भगा रौ एकरा सन......। भगबै छै वायु प्रदुषण बनि खड़ा छै जे खड़दुषण पर्यावरण प्रदुषण भगा रौ एकरा सन........। वायु वेगकेँ कम करै छै जड़िसँ जमीन जकड़ि पकड़ै छै नै तँ सभ माटि जेतौ दहा रौ एकरा सन.........। बादलकेँ आकर्षण करै छै भू-मण्डलकेँ जलसँ भरै छै उठैत खेतमे फसल लहलहा रौ एकरा सन.........। झारू- साधुवाद हे देशक धरती, साधुवाद हे सभ जनता। साधुवाद हे ताज देशक केर, साधुवाद सम्प्रभुता।। गीत- कोसी-बलान कमला आँचरपर बसल ई सुन्दर गाम यौ धन-धन मिथिला धन-धन मैथिल धन-धन जनकपुर धाम यौ। ताल तलैया भरल सरोवर वन-बागमे शोभा दोबर फल-फूलसँ लदल गाछमे भोम्हरा करै छै गाण यौ धन-धन...........। हीर विर केर जननी धरती जनम-जात पावन सतवर्ती केतौ ने एहेन शीतल छाया धरतीपर कोनोठाम यौ धन-धन.........। चलह देखए कोसी महासेतु िनरमली उतरब ऐ हेतु केहेन बनेलकै राजक राजा मिथिलाक गौरव शान यौ धन-धन............। झारू- सबल रहै मिथिला केर धरती, सबल रहै देशक जनता।। सबल रहै ताज मिथिला केर, सबल रहै सम्प्रभुता।। गीत- हम्मर मिथिला हम सभ मैथिल छी दुनियाँमे सोर यौ धन-धन मिथिला धन-धन मैथिली जनकपुर जगमे बेजोर यौ। राज जनकक शान भरल छै विद्यापतिक गाण भरल छै निष्ठा नीति ज्ञान भरल छै अंग-अंग पोरे-पोर यौ धन-धन मिथिला...............। ताल तलैया भरल सरोवर वन-उपवनमे शोभा सुन्दर नीत नव नूतन फूल खिलै छै भोम्हरा करै छै सोर यौ धन-धन मिथिला.......। जग जाहिर छै धाम सिंहेसर जागेसर संग और विदेसर मदनेसर कुसेसर नामक बाजए डंका जोर-जोर यौ धन-धन मिथिला.......। झारू- जनता रोबै सुखल रोटी, घी मलिदा अफसर नेता।। देसक ई दसतूर बनि गेल, बहए बरद आ हकमए कुत्ता।। गीत- कत्ते सूतब यौ युवा बिहारी जागैक मौसम आइ छै लुच्चा-लम्पट चोर-उच्चका देसकेँ लुटने जाइ छै। जेकरे मिललै कुंजी-ताला बनि गेलै हाथी मतबाला टाँग तर चिप्पल भोली जनता बाप-बाप चिचिआइ छै लुच्चा–लम्पट......। अफसर रखै छै दलाल तँइ तँ जनता छै बेहाल बस ओकरे टा काज चलै छै जेकरा घूसक पाइ हाथ छै लुच्चा–लम्पट......। लगबू मेल एकताक मंत्र तोड़ि फेकू ई चोरबा तंत्र जइसँ बूझै ई पतितबा ईहो सभ कसाइ छै लुच्चा–लम्पट......। झारू- इन्कलाबमे लहू बहा कऽ, बेर्थ गेलै सभ वीरक खून। पहुँचै छै कहाँ सभ जनता लग, देसक अाजादीक गुण।। गीत- तुमलोग कहाँ आजादी पौलकै सभ लऽ रहलै आपे-आप शासक सूतल पलंग तोड़ै छै के निगरेतै बाप-रौ-बाप समता लऽ आजादी एलै याद छै केकरा सभ भूलि गेलै मोल मेटेलै रँग केसरिया सिर चढ़ल छै अमीरी ताप शासक.........। हम श्रमिक जे देस रचै छी परान पसीना खून बेचै छी ई इनसाफ कतएसँ एलै तकरा छै नून-रोटीक श्राप शासक..........। साहित्य चलि रहल छै उनटल तँइ तँ जनता जाइ छै बिलटल ठक-लुटेरा फेरिमे जनता करम छोड़ि करै छै जाप शासक............। तंत्र संरक्षण करै छै भक्षण होइ नै शासकसँ संरक्षण सभा लगै ने अहि केर खातिर और ने होइ छै वार्तालाप शासक..............। देशमे फैलल छै अन्हेर केना हेतै फेर सबेर अज्ञानक अज्ञानमे जनता नाहँक दुखमे करै विलाप शासक............। झारू- कुरसी शोभा ओइ मानवकेँ, जे मिललै दिल-दिलसँ जोड़ि। होइ रीत जतए केर एहन, बढ़तै विकास जंजीरकेँ तोड़ि।। गीत- नेता अफसर देशक मुड़ी तर केलकै काका हौ बेचि धरम-इमान खाइ छै घूसबला टाका हौ। बुझै नै कियो निष्ठा-नीति स्वाभिमानक नै छै परिचिती। जाति-धरमक झगड़ा लगा कऽ देशकेँ केलकह फाँका हौ बेचि धरम..........। सेवाकर्मी लोभमे ढुललै कर्मोकेँ पैसेमे भुललै बैसि गेलह आब बस विकासी कत्ते लगेबह धक्का हौ। बेचि धरम...........। निष्ठासँ नै काम करै छै लक्ष्मी पात्रसँ मात्र डरे छै जौ मुँहदुबरा आॅफिस एलै मारै छअ ओकरा धक्का हौ बेचि धरम...........। झारू- बच्चा बनतै बिलकुल ओहने, जे रखने छी अहाँ उसारि। ऐपर केकरो बस नै चलै छै, देखबै प्रकृति आँखि पसारि।। गीत- कनी देखही गै दाइ कनी सुनही रौ भाय कनी मानही गै माय बाप अज्ञानवस बनलै कसाइ। दिन भरि साहब जे कमबै छै साँझ तक दारूमे गमबै छै। माए-बाबूपर रौब जमबै छै कोड़ासँ कनियाँकेँ करै पिटाइ। कनी देखही.........। चौक-चौरहापर मोछ लहराबै कोँचाबला धोती पिन्ह फहराबै किसमत केर कनियाँ घरमे रोबै छै पेट पोसैले करए कुटाइ-पिसाइ कनी देखही.........। बौआ पढ़ाकू भैंस चरबै छै बुच्चीसँ माँ सभ काज करबै छै टटका फैदा सभ कोइ देखै छै चुल्हीमे गेलै इसकूलक पढ़ाइ कनी देखही...........। झारू- हे रसुआर केर बाबा वनजरैया, रूकै ने पण्डित घरक पास। डूमि रहल मानव कुरीतिमे, डुमा रहल अनधविश्वास।। गीत- मूर्तिमे भगवान सेबै छी भाँसै छी दऽ कऽ खेबा यौ। गीता कहै छै जीव शिव छी करू जगत केर सेवा यौ। नि:स्वार्थ सेवा नै केलौं तब तँ जीवन व्यर्थ गमेलौं। बिनु सेवाक व्यर्थ छै बाबू पूजा-देवी-देवा यौ। गीता कहै........। जग लुटेरा ठक भरल छै हाथ-हथियार पुरान पड़ल छै। पुण्य कल्याणक नामपर काटै सबहक जेबी-जेबा यौ। गीता कहै...........। सेवा बिना छै ज्ञान अधूरा झट पकड़ू आ पट करू पूरा। छोड़ि सतेनाइ सेवा धरू जीवन हेतै मधुमेवा यौ। गीता..........। झारू- बेटा पोसलौं असत्यक धंधा, और खिलेलौं बुड़ी कमाइ। बनल रहत ओ राहक रोड़ा, बक्त पड़त तँ बनत कसाइ।। गीत- सेर भेल छोटकी पेट भेल बड़की आब कहू केना चलतै गुजर। छौड़ा सभ नै मत सुनै छै विलटैबला एलै पहर। कन्या सभ छै गलबजौनी मुँहसँ उगलै बीख-जहर। ज्ञान घरूआरक लेइक बदला सासुपर ढाहि रहल छै कहर। छौड़ा सभ.........। एकटा छै दिल्लीकेँ धेने भेजै नै खाइयौले जहर। तकर कनियाँ पलंग तोड़ै छै बैसि-सुति गमबै आठो पहर। छौड़ा सभ...........। ई अज्ञानक फेर छी बाबू मानू कनियो बात हमर। पुत्रकेँ पोसू सत्यक कमाइ हेतै ने कहियो घरमे कहर। छौड़ा सभ..........। छौड़ा सभ सभ बातमे रहतै भगतै घरसँ दुखक लहर। सेर हेतै बड़की पेट हेतै छोटकी भगतै घरसँ सारा कहर। छौड़ा सभ..........। कथनी सुनि लिअ काली माइ, सभकेँ होइ मानवताक ज्ञान। गिर गेल मानव नरक खानमे, नैतिक पतनकेँ करै उत्थान।। गीत- शिक्षा एलैए ऐ दुनियाँमे सबहक घरमे रहैले। दुनियाँक सुख-शांति खातिर बरद बनि कऽ बहैले। जौं घरमे शिक्षा नै लाबबै मंगल गीत केना कऽ गबबै। अपना नैनाकेँ सभ कियो पढ़ाबू दुख दुनियाँक गहैले। दुनियाँक सुख..........। शिक्षेसँ सुख-शांति एतै दुख-गरीबी घरसँ जेतै। सुखक गाड़ी चढ़ि चलू सभ शिक्षा एलैए कहैले। दुनियाँक सुख..........। काम करू सभ सच्चा-पक्का पड़ै ने केकरो सुखमे धक्का। शिक्षा कहै छै सभ मानवकेँ आनो ले दुख कहैले। दुनियाँक सुख.........। झारू- सभसँ भारी दहेज बेमारी, परिणय सूत्रक ई छी घुन। रोबै छै सभ बेरा-बेरी, बहा-बहा आंशूमे खून।। गीत- जिनगी दुबर भऽ गेल राजा जनकक देशमे सभ डुमलै कलेशमे यौ। लोककेँ लगलै लोभक बोखार तँइ सभ धुनै छै कपार। अज्ञान चलबै छुिप कऽ राज दहेजक भेषमे। सभ डुमलै.........। कफ्फन बनि गेलै दहेज कोइ नै करै छै परहेज। बेरा-बेरी पड़ै छै सभपर मुरदा भेषमे। सभ डुमलै.........। सबहक मरि गेल नीति-निष्ठा तँए तँ खाइ छै दहेजी विष्टा। ज्ञान बिनु लोक जीबै छै विलकुल सुगर भेषमे। सभ डुमलै.........। केकरा कहबै नीक छै बाबू एकटा दुटा लाबू आगू। लटकल बोड़ा देखैबे बिलकुल बटुआ भेषमे। सभ डुमलै.........। झारू- ओइ पोथीकेँ राखि उसारू, खड़ा करै जे जाति-धरम। आगू लाबू ओइ पोथीकेँ, सिखबै जे मानवताक करम।। गीत- हिन्दु-मुस्लिम, सिख-इसाई सभ मिल कऽ दिऔ ई भाषण। जाति-पाति मानवता भेदी दइ छै नै केकरा ई राशन। जाति-पाति नेता जगबै छै अपन जीतक जोगार लगबै छै। ई नेता छी देशद्रोही ई की बुझतै सुशासन। जाति-पाति.........। जाति-पातिकेँ मनसँ भगाबू फूल मानवता घर सजाबू। मेल मिलाप समता एकताकेँ तइमे दिऔ उच्च आसन। जाति-पाति.........। एक बनू सभ मानव-मानव तब ने रूकतै दुखक कानब। फूट अनेकताक चिता जरा कऽ और दिऔ ओकरा अरगासन। जाति-पाति............। झारू- जमा केलौ धन लूटि-लूटि कऽ, बेटा पोसलौं घूसक धन। करू नै आशा ओकरा सुक्खक, जरा जीअत अहाँ केर तन।। गीत- समैसँ पहिले भागसँ बेसी केकरा मिललै बाबू यौ। तइदुआरे संतोष धरू मनकेँ करू काबू यौ। बिनु संतोषे नै मिलतै शांति जीवन रहतै लफड़ा क्रांति। धियान नै रहतै नीति-इमानक मन रहतै बेकाबू यौ। तइदुआरे.........। सुख-लाभ सभ कोइ चाहै छै दुख-घाटासँ सभ भागै छै। इच्छा बेस छी दुक्खक कारण सभ कियो एकरा तियागू यौ। तइदुआरे..........। अपने हाथपर करू आशा लगबू नै अनकामे धाँसा। स्वाभिमान नै जिन्दा रहतै फेर केना कहेबै बाबू यौ। तइदुआरे..........। झारू- रहल भरममे फँसि कऽ सुग्गा, देखि कऽ सुन्दर सिम्मर फूल। भागल भरम जौं लोल ओ मारल, यादि आएल फेर अप्पन भूल।। गीत- की अरजबै ओइ बेटाले पुत जे छै कुपुत यौ। उ तँ अरजतै खुद अपनेसँ पुत जे छै सुपुत यौ। कोइ अरजै छै मान-मर्याया कोइ चाहै छै इज्जत ज्यादा। कोइ बनल छै असंतोषमे कंस-कौरब केर दूत यौ। उ तँ...........। कोइ अरजै छै यश और कृति अरजै छै परलोकमे धरती। कोइ-कोइ हिंसा बूनि-बूनि कऽ बन गेल छै जमदूत यौ। उ तँ.............। कोइ बाँटै छै जगमे सेवा अरजै छै अमरत्वक आभा। कोइ परल अज्ञान-अंधेरा बनि कऽ जीबै छै भूत। उ तँ.............। झारू- बेटा-बेटी सम-बराबर एकर रक्खू पुरा धियान। जौं बेटीकेँ शिक्षा देबै काटि बैसत बेटाक कान। बेटी पढ़ि कऽ भऽ गेल घरक ई जंजाल यौ माए-बाबूक काल यौ ना। देखियौ अज्ञानक चरित्र पाइयेमे छै सबहक प्रीति। पाइ बिनु आब नै होइ छै रिस्ता कोनाे बहाल यौ। माए-बाबूक.........। बेटी आइ.ए., बी.ए. पास दुल्हा छिलतै घोड़ा-घास। बाप केना कऽ करतै बेटीक हलाल यौ। माए-बाबूक........। दुल्हा जौं मिलै किछु योग्य लाख-दास छै ओकर डोज। बापकेँ सुनि डोलै छै भितरसँ महाल यौ माए-बाबूक..........। एगो रहितै तँ गिन दइतै चाइटा कोना कऽ समेतै। लोक ओझरा मरै छै रीत-कुरीतक जाल यौ। माए-बाबूक.........। झारू- भूल करै जौं वनक पंक्षी, पशु करै तँ और छै बात। ऐसँ वंचित जीव-जगतकेँ मात्र छोड़ि कऽ मानव जाति।। गीत- कनी देखही दिनेश कनी सुनही सुरेश कनी मानही महेश लोक अज्ञानवश फँसलै कलेश। लोक अस्तयकेँ जब नै छोड़ै छै दुखक घर नरकमे पड़ै छै। तकरा मदत नै देवो केरै छै और मुँह मुड़ै देशक नरेश। कनी देखही..........। सारे-महिने भागवत सुनै छै कोइ नै किच्छो मनमे गुणै छै। दुख पड़लासँ माथ धुनै छै पकड़ि असत् केना कटतै कलेश कनी देखही............। छोड़ि शांति हिंसा अपनाबै मानवतासँ पानि भराबै। दया-धरमसँ टहल कराबै तकर रक्षा केना करतै गणेश। कनी देखही...............। झारू- सेवा कऽ कऽ जगवासीकेँ, मांगू नै छीनू आशीष। जौं सेवबै नि:स्वार्थ भावसँ, ईश्वर देतै सुख-बखसीश।। गीत- सेवा दइ छै सभकेँ मेवा बाजै छै बाबा केशौरी दास। बिना स्वार्थ जे सेवा करतै दुख नै रहतै तकरा पास। आइ सेवाकेँ कोइ नै धड़ै छै स्वार्थेमे सेवाेकेँ करै छै। सेवा चढ़ि कऽ लोभक गाड़ी धऽ लेलक दुखमे अवास। बिना स्वार्थ..........। जीवनक दू राह फुटल छै सेवा सतेनाइ साथ जुटल छै। छोड़ि सतेनाइ सेवा धरू जीवन सफल भऽ पूरत आश। बिना स्वार्थ..........। धरू सदा लऽ सेवा-शांति बढ़ै ने मन कखनो क्रांति। जीवनक ई मूल मंत्र छी एकरा पकड़ि कियो होइ नै नाश। बिना स्वार्थ.............। झारू- जब-जब जनम होइ ऐ धरतीपर, भारत माँ तोरा देशमे। रक्षा करब हम तोहर माता, वीर-बाँकुरा भेषमे।। गीत- कते कहबौ रौ भाय कते कहबौ रौ भाय कते कहबौ रौ भाय। भाय भूमिक वीर बराइ कते कहबौ रौ भाय। सिना भड़कलै ज्वाला क्रांति तियागि देलकै अपन सुख-शांति। तिलक लगा धरतीक धूलसँ देशक दुश्मन ले बनबै कसाइ। कते कहबौ.............। हिन्दु-मुस्लिम-सिख-इसाई एक बनलै सभ हिन्दी भाय। बना दुल्हनिया गोड़ी-फिरंगी वीर दुल्हा संग भेलै सगाइ। कते कहबौ............। गजब शस्त्रसँ केलकै क्रांति हाथ-हथियार छेलै सेवा-शांति। ओकरे जरूरी अखनो छै बाबू एहीसँ हेतै देशक भलाइ। कते कहबौ...........। झारू- अंग-अंममे लोभ जकरलक, मन फँसल छै माया जालमे। अपना आगिमे क्रोध लराबै, काम नचाबै दऽ दऽ ताल।। गीत- ज्ञान बिनु मानव भऽ गेल झर हरदम उगलै छै जहर। दुखमे डुमलै मानव जाति कोइ पकड़ गै पकड़। हरदम झुट्ठे-फूसि बजै छै सभटा उल्टे चालि चलै छै। निष्ठा मरि एकर कोइ पकड़ गै पकड़। बेचि देलकै धरम-इमान संग छै नै नीति-ज्ञान। रक्षा करतै के एकर कोइ पकड़ गै पकड़। छुटलै दया-धरम केर रीत छै नै सेवासँ परचित। दुख बाॅटतै के एकर कोइ पकड़ गै पकड़ मेटेलै मानवता-मर्यादा हरदम करै छै झूठा वादा। एतबार करतै के एकर कोइ पकड़ गै पकड़। झारू- पैसेमे तँ सभटा सुख छै, घेर लेलक सभकेँ अज्ञान। साधु-मुल्ला, पण्डित-नेता, सभ खुनै पैसा केर खान।। गीत- सभ ठकै छै ऐ जनताकेँ नेता-पण्डित बाबा यौ। तँए तँ देशक एहेन हाल छै तबल-तबाएल छै ताबा यौ। नेता नै जनहित बुझै छै नफ्फे टा दिसि आँखि सुझै छै। नीति-धरमकेँ किछु नै बूझै छै जानै नै जनसेवा यौ। तँए तँ.............। अन्धविश्वासक राज चलै छै घर-घर कुरितक दीप जरै छै। छोड़ि अपन कर्त्तव्य-कर्मकेँ पूजै करोड़ो देवा यौ। तँए तँ..........। पंडीजी ओहने पाठ पढ़बै छै जइसँ चढ़ाबा बेस चढ़बै छै। भवसागरक पार उतरै केर अहीठाम लइ छै खेबा यौ। तँए तँ...............। झारू- नै छेलियै कोइ ऐ धरतीपर, रहबै नै कोइ ऐ केर बाद। प्रगट छी जबतक ऐ धरतीपर, ऐ बीच जीवन करू अबाद।। गीत- सभकोइ मिलि कऽ मिथिलाकेँ सजाबै जाउ यौ बाबू। उजरए नै ई धरती तइ कामपर काबू यौ। बिसरू नै समता केर बोली अहीले खेललै खूनक होली। वीरक खनक मानकेँ बँचाबै जाउ यौ बाबू। उजरए नै............। अपन चैनक बोड़ा खोलू सेवामे जनता लेल घोरू। भ्रष्टाचारक नामकेँ मेटाबै जाउ यौ बाबू। उजरए नै..........। जगबू अपन नीित-निष्ठा तबे देतै जग प्रतिष्ठा। मानवताक दुनियाँमे बसाबै जाउ यौ बाबू। उजरए नै..........। झारू- कम खाउ आ रहू गमसँ, करू नै केकरो पमौजी। रोटी होइ बस सत्यक कमाइ, चलतै जीवन मनमौजी।। गीत- केना जीबै छै लोक एतए केर देखियो जा कऽ करीबसँ। कोन हालमे अहाँ जीबै छी पुछियौ कनी गरीबसँ। पेट छै खाली रोटी बिनु तन छै कपड़ा वस्त्र विहीन। सिरपर छत ले अरज करै छै दिन-राति अल्ला-शिवसँ। कोन हालमे.........। कतए देखतै लड्डू-लाइ कोदाे मरूआ लगै मिठाइ। धन-धन हे अल्हुआ बाबा मिलै छह तहूँ नसीबसँ। कोन हालमे..........। ऊपर अंबर निचचा जमीन आशा केकरो नै अल्ला बिनु। कोनो विधिसँ अॅटकल रहू कहै छै अपना जीवसँ। कोन हालमे..............। छै ई दुनियाँ भरिक मारल शामंतवादक झमारल। ई शोसित छै जनम-जनमक तँइ हिलल छै नीबसँ। कोन हालमे..........। झारू- पैसामे छै भूख अजूबा, भरल नै ऐसँ केकरो पेट। राजा भूखल जनता भूखल, भूखल अछि सासु और सेठ।। गीत- हे रसुआरक बाबा वनजरैया लगबह कोनो जोगार हे। अज्ञानक अन्हारमे डुमलै आधुनिक संसार हे। आबि तृष्णामे जरै छै दुनियाँ लोभ बनैलकै लोककेँ खुनियाँ। देवीक भौतिक और अध्यात्मिक हाथ धड़ा हथियार हे। अज्ञानक...........। सरोसती लछमी ले मरै छै नीति इमान बीच सड़क जरै छै। जइ कलमसँ सेवा होइतै से बनलै तलवार हे। अज्ञानक...........। हक गरीबक कतल करै छै अपन-अपन मलह भरै छै। निहित हाथ राजकोषक पैसा समा रहल बेकार हे। अज्ञानक............। झरू- जमीन पटा दिऔ गाछ-बिरिछसँ, सभ जगह करि दिऔ उद्यान। एना अगर जौ कऽ नै सकब तँ, तैयारू हतैले प्राण।। गीत- बाबू गाछ लगाबू परदुषण भगाबै ले दुनियाँकेँ बसाबैले यौ ना। लइ कार्वन दइ आक्सीजन करै जीवनक संरक्षण। समतुल पर्यावरण करै छै जीव बचाबैले परदुषण..........। दबाइ बनि कऽ गाछ जिआबै मिठगर-मिठगर फल खिआबै। जरना संग फर्निचर दइ छै घर सजाबैले परदुषण.............। करू दुनियाँपर रहम रोपू पाँच गाछ कम-सँ-कम। फेरसँ हरितक्रांति धरतीपर बसाबै ले। परदुषण............। जंगल कटि-कटि भऽ गेल कम तँए तँ जीव भरै छै दम। गाछ आब नै काटू पर्यावरण वचाबैले। परदुषण..........। झारू- राष्ट्र हितमे सभ किछु तियागू, धन-जीवन आ एैशो-आराम। संकटमे कहीं देश फॅसेबै, जीवन होएत दुबर हराम।। गीत- हमर बिहार और हम बिहारी भरि दुनियाँमे शोर छै। धन-धन बिहार आ धन-धन बिहारी पटना पगध बेजोर छै। ई भूमि छै हिर-वीरक सागरसँ गहींर धीरक। हक कुमर सिंह प्रभा देवी तइमे तँ मसहूर छै। धन-धन..............। नालंदा-रोहताह-भोजपुर बाँका-सिवान-सारन-भागलपुर। दरभंगा-सुपौल-सहरसा जनकपुर जगमे बेजोर छै। धन-धन..........। अगम कुंआ-तारामण्डल गोल घर सुन्दर छै बड़ पुल राजिन्दर। निरमली महासेतु लऽ कऽ दुनियाँमे मजहिर छै। धन-धन..........। झारू- ज्ञानी खोजै अपन गलती, दुजेमे खोजै अज्ञान। बैसल अज्ञानी खजूरक निच्चाँ, ज्ञानी मारि गेलाह मैदान।। गीत- पढ़ि कऽ देखियौ एकबेर गीता ऐमे आत्मिक ज्ञान छै। मानवताक रीढ़ ई पोथी खुदमे देखाबै भगवान छै। भीतरक सद्गुण देखबै छै की छै जे अवगणु बतबै छै। कसतुरी नाभी लखबै छै। तँए ई जगमे महान छै। मानवताकेँ............। साफ करू तन-मन और वाणी तियाग कररू दोसर के हानि। और कहै छै सेवा धरू सभसँ जे अासान छै। मानवताकेँ..........। जेअपनेलकै ऐ धरतीपर ओकरे मिललै अमत्वक जड़ि ई शात्र प्रतिभा देवी सभ पुस्तक केर शान छै। मानवता.............। झारू- काम-क्रोध मद लोभ मोह सन, सभ खेतमे दुक्खक बीज। जँ पनपल ई मौका पा कऽ सुख केर भऽ गेल पावर सीज।। गीत- देखियो सभ बाबू-भैया ई सभ की करै छै सुख ले एलै बोड़ा लऽ कऽ दुख किअए भरै छै लोभ-मोहमे सभ अन्हरेलै पढ़लो-लिखलो लोक बनरेलै दुनियाँ-दारी के बताबए भाइयोसँ लड़ै छै सुख..........। करोध-कठोरता सभ छै धेने अहंकार छै बेबस केने दोर केर सुख-शांति देखि किअए ई जरै छै सुख........। बहुत कम छै एहन कलामी जे नै करै छै कामक गुलामी जेकरा चढ़लै ई गिरगिटिया नरकमे सड़ै छै सुख..........। झारू- किछु ने देतै मंदिर-मस्जिद, देतै ने किछु गिरिजाघर। मनक सपना पूरा हेतै, जीव-जगत केर सेवा करतै।। गीत- धरम करैत जे हुअए हानि तैयो ने छोड़ि धरमक बानि हमर माए ई सिखबैत रहए साँझ-भोर-दुपहर दिन रानि। जानि बूझि ने केकरो सतैहनि सदिखन सत्तक रोटी खैहिहेँ भऽ सकौ किछु सेवा करिहेँ दिन-दुखी दुख अपन जानि धरम..........। दया प्रेमक रखिहेँ आगाँ टुटौ ने मानवता धागा भुखलकेँ तूँ अन्न खियैहेँ पियासलकेँ पियबिहेँ पानि धरम........। सत् डगर कखनो नै छुटौ असत् अन्हार लोभ नै लुटौ नैतिकता निष्ठा–मर्यादा धरम इमान कऽ जीबिहेँ मानि धरम.............। झारू- बचल जीवन छै घोर अन्धेरा, जराउ प्यारसँ ज्ञानक दीप। वर्णा देखेतै एतए नै किछो, मोती भरल सागरमे शीप।। गीत- कर भला तब हो भला कर भला तब हो भला। हम नै कहै छी ज्ञानी गुणी सबहक नीक लेल कहि गेलाह। दोसर सता कऽ दुख नै किनू सुख-शांति ले सेवा बुनू। जानै नै जे परक पीड़ा जगमे अन्धा रहि गेला। कर भला.........। जे जानलकै परक पीड़ा तकरा मिललै सच्चा हीरा। नाम अमर छै धरा धाममे गैर खड़ा छै धरम किला। कर भला...........। हिंसा छोड़ि सेवाकेँ पकड़ू डोरी प्रेममे सभकेँ जकड़ू। नै केकरोसँ शिकबा-सिकाइत केकरासँ ने कोनो गिला। कर भला...........। स्वागत गीत हम नै छी अहाँ योग यौ पाहुन अहाँ छी बड़ महान स्वागत स्वीकारू श्रीमान्। अहाँ छी गंगा अहाँ छी यमुना पग धूलसँ पावन भेल अंगना। अहाँक सेवाक ज्ञान नै हमरा हम बालक अज्ञान स्वागत.........। अहाँ छी अल्ला अहाँ छी शंकर अहाँ छी हीरा हम छी कंकर चरण धूल हम माथ लगा कऽ कल जोड़ि करै छी परनाम स्वागत..............। हमरा नै सोना सिंघासन मन दै छी हम आसन बैस बिराजू देव अतिथि हम छी गरीब महान स्वागत............। झारू- चलए समैसँ सूरज-चंदा, समैसँ होइ छै सुबहो-शाम। समैसँ बान्हल सौंसे दुनियाँ, अहूँ करू सभ समैसँ काम।। गीत- बाबू समए कम छै काम छै बेसी डटू ना आब तँ पाछाँ हट्टू नै यौ। भुदानी सभ छै अमीरकेँ पास ऐमे गरीबकेँ नै छै आश। फेरसँ भूमि भुदानी पुर्नविचारसँ विचारू ना आब तँ..........। चलता-फिरता बनबू न्यायालय गाम होइ जकर कार्यालय। गौआँ-अफसर मिल कऽ केस फाइलकेँ छाँटू ना। आब तँ............। विकास पहाड़ पड़ल छै आगू आबो युवा वर्ग सभ जागू। एकताक डोर पकड़ि कऽ भेद-विष्मता काटू ना। आब तँ.........। जब पौरुषे धीरज खोतै ऐठाम केना कऽ जनता जितै। निष्ठावानक बेटा सुख जन-जनमे बाॅटू ना। आब तँ.............। झारू- शासक होइ जन-जनमे स्नेही, हर जनपर होइ हुनकर प्यार। होइत साकार शब्द प्रजा-वत्सल, होएत देश खिल कऽ गुलजार।। गीत- बहिना आब नै रहतै पाछाँ अपन बिहार गै एलैए नीतीश कुमार गै ना। सभटा सड़क ढलेतै पक्का आब नै धँसतै गाड़ी चक्का बहिना विकासमे बनतै नव-नव मिनार गै। एलैए.........। न्यायमे लगतै लबका दाउ मिटतै सबहक पुरना घाउ आब नै रहतै कोर्टमे केस फाइलक पहाड़ गै एलैए...........। खेत हेतै चकबन्दी सिंचित रहतै कतौ नै बिलजी वंचित। बहिना खेतमे हेतै लबका हरा-बहार गै। एलैए...........। एतै मेल एकतामे जोड़ हेतै सुख-शांति केर भोर। सभ मिलि धकेलि गिरेबै जाति-धर्मक देबाल गे। एलैए............। झारू- दीप जराबू प्रेमक बाती, भरि कऽ तइमे सिनेहक तेल। फुटै आभा सुख-शांतिक, जन-जनमे होइ सम्मत मेल।। गीत- बनि जीबै हम सभ भैयारी हम बाके बिहारी। जाति-धरमकेँ करबै पाछाँ तब ने राज कहेतै अच्छा हिन्दु-मुस्लिम सिख-इसाई सभ छिऐ पहिले बिहारी यौ हम बाके.........। एकताक प्रमाण चढेबै अपना बिहारकेँ आगाँ बढेबै हर हाथमे रोजी दिएबै मूलसँ मेटेबै वेरोजगारी यौ हम बाके.............। अन्धविश्वासक राज हटेबै कुरीतिकेँ धूल चटेबै भूख-गरीबी रोग अशिक्षा और भगेबै भ्रष्टाचारी यौ हम बाके..........। झारू- राज हुनकेसँ चलि सकै छै, जिनका रगमे दानी खून। स्वामी भाव अंग-अंगमे भरल होइ, और भरल होइ सेवा गुण।। गीत- केकरोसँ नै रहबै पाछाँ सभसँ जेबै अगारी यौ सिर उठा गौरवसँ कहबै हम छी बाबू बिहारी यौ मेल एकताक फूल खिलेबै घर-घर शांति दीप जरेबै जग अमन केर झोरा लऽ कऽ घर-घर बनबै भिखाड़ी यौ सिर उठा...........। हक हमर जे आब कियो छिनतै अपना ले दुख अपने छिनतै आब ने केकरो मारल जेतै दसो नहक देहारी यौ सिर उठा..........। न्याय विकास प्रमाण चढेबै राजक नाम दुनियाँमे बढ़ेबै अन्धविश्वास अज्ञान-कुरीति सभकेँ करबै पछाड़ी यौ सिर उठा.........। झारू- चलि गेला सभ कहैबला, जग अमन केर रोपू जड़ि। के पढ़तै आब फेर ई फकरा, चिन्तित छै सभ पेट पोखरि।। गीत- यार दिलदार यार, की रौ भजार यार तूँ बिहारमे जा कऽ की देखलेँ। राजकर्मीकेँ सुतैत देखलौं फुहरीकेँ घूमि-घूमि मुतैत देखलौं। न्याय केर नामपर लुटैत देखलौं जनताकेँ राजा कुटैत देखलौं। न्याय मरै छल घूस अभावे राज धृष्टराष्टक चलैत देखलौ। यार दिलदार यार, की रौ भजार यार तूँ पटनामे जा कऽ की देखलेँ। राजभवनमे गदहा चलैत देखलौं पदगौरवमे राजा मरैत देखलौं। सभ गाड़ीमे पुलीश उड़ैत देखलौं मंदिरमे महिला मुड़ैत देखलौं। लुच्चा-लंपट कुर्सी धऽ धऽ मांसु मदिरापर पलैत देखलौं। यार दिलदार यार, की रौ भजार यार रेलगाड़ीमे चढ़ि कऽ की देखलेँ। सही टिकटपर फाइन लगैत देखलौं यात्रीकेँ नरक भोगैत देखलौं। पुलीसक वर्दीमे डकैत देखलौं टीटीकेँ पैसा ठकैत देखलौं। पुलीश टीटी सभ दल बना कऽ मुँह दुबराकेँ लुटाइत देखलौं। यार.............। झारू- जनता बनू अयोध्यावासी, गुणि कऽ मानवताक मंत्र। तन धुअल संतोष जलसँ, गला बान्हल होइ मर्याया यंत्र।। गीत- छूक-छूक-छूक-छूक रेल विकासी आब चलेबै पटरीसँ। आब सभ कुछ बिजलीसँ हेतै चलतै नै किछो बैटरीसँ। राजकर्मी बनतै मधुमेबा जमि कऽ करतै जनता सेवा। अमन चैनक फल खियेतै खोलि-खोलि विद्या मोटरीसँ। आब सभ कुछ..............। गामे-गामे एकता बनेबै अपन काज अपनेसँ करेबै। आब नै केकरो घूसमे जेतै बान्हल पैसा गठरीसँ। आब सभ कुछ.............। शिक्षा केर अाब लगतै झड़ी घर-घर बनतै ज्ञानक बरी। सभसँ कम जे पढ़ल रहतै कम नै रहतै मेट्रिकसँ। आब सभ कुछ..................। झारू- चाहे ओला पुस गिराबै, टपकि रहल होइ जेठक घाम। लिखलक किष्मत कहाँ विधाता, बैस घरमे करी आराम।। गीत- कतेक कहब हे बाबा वनजरैया अपना मनक मुराद हे। कहिया देखतै गरीब आजादी केना कऽ हेतै आजाद हे। आबो दलाली जीविते रहतै अनबूझकेँ खून पिबतै रहतै। साफ हेतै ई कचरा केना देश हेतै केना आवाद हे। कहिया............। के लेतै ऐ गरीबक जिम्मा एकरा हक ले सोच धिम्मा। ऐ गरीबक दुख हरै कऽ के देतै बुनियाद हे। कहिया............। सभ गरीब मजदूर मेहनतकस बनि जीबै छै देशमे बेबस। आजादी घर-घर पहुँचेतै पैदा करह औलाद हे। कहिया.............। झारू- हे भूमिक भाग्य विधाता, जगक अन्नदाता भगवान। कहाँ पता तोरा शिबा छै केकरो, छूपल कतए छै खेतमे धान।। गीत- सुनह हौ बाबू सुनह हौ भैया केना होइ छै ई टोना हौ। माटिमे जौं गोबर मिलै छै तब बनै छै सोना हौ। जे मिलबै छै खेतमे गोबर तकरा घरमे अन्न छै दोबर। ई जेकरा महकै छै बाबू दुखमे करै छै घौना हौ। माटिमे..........। जे कोइ चुल्हीमे जरबै छै समझू सोनाकेँ हरबै छै। जे फेकै छै एने-ओने तकर िवकास छै बौना हौ। माटिमे.............। जे नै करै गोबरक आदर फटले रहतै तकर चादर। आदर नमन जे एकरा करै छै हरदम रहै दिवाना हौ। माटिमे..............। झारू- पैसासँ सभ इज्जतबला, काज करै चाहै सैतान। तैयो पुजै ओकरे दुनियाँ, किएक तँ ओ छै पैसामान। गीत- आंगनबाड़ी खेत खेसारी बनि उजडै छै भाय हो। सभटा खाइ छै भैंस अनेरबा कोइ रोमए नै जाइ हौ। रोमैले जेकरा भेजै गिरहतबा दइ छै आजादी खाउ भरिपेटबा। हमर भाग हमरा ले छोड़ू जे छै हरा केलाइ हौ। सभटा..........। के करतै एकर निगरानी गिरल छै सबहक आँखिक पानी। नीति-धरम निष्ठा-मर्यादा सभटा गेलै बिलाए हौ। सभटा............। कर्मी संग रजो छै अन्धा तँए छै चौपट्ट विकासी धंधा निहित हएत राजकोषक पैसा सभटा गेलै समाए हौ। सभटा............। झारू- जगि कऽ रहब बाबू-भैया, और रहब चौकस हथियार। फेर नै पाबए राजक कुर्सी, लुच्चा-लंपट चोर-चुहार।। गीत- सुनह हौ बाबू सुनह हौ भैया बाके बिहारी बन्धु मन मित। ई एलेक्शन एहेन बुझाइ छै असत्यक ऊपर सत्यक जीत। सभ कोइ कहियौ हम नीतीश छी सोलह नै सभ कोइ बत्तीस छी। भूख गरीबी रोग अशिक्षा सभ मिलि कऽ करबै विस्मित। ई............। गामे-गामे एकटा बनेबै घर-घर शान्ति दीप जरेबै। जाति-धरमसँ मनसँ भगा कऽ गाबबै सभ मानवताक गीत। ई..............। स्वाभिमानकेँ सभ कोइ जगेबै लोभ-लालचकेँ मनसँ भगेबै। सभ मिल ऊजरल घर सजेबै सभ कोइ जपबै जय-जनहीत। ई...............। झारू- तरे स्वर्ग पण्डित पूजासँ, जे देखलक नै आइ तक कोइ। जौं सच्चा ई जानैत मानव, पण्डितसँ नै पुजाबैत कोइ।। गीत- अन्धविश्वास अज्ञान कुरीति भूख गरीबी भ्रष्टाचार। ई अंग्रेज केना कऽ भगतै बाबू-भैया करू विचार। हरदम घुमै चन्दा केर चक्कर धरम करैत लोक भेलै फक्कर। छप्पन करोड़केँ पुजैत-पुजैत उजरल जाइ छै घर-दुआर। ई.............। मुर्ख पढ़लमे की छै अन्तर सभ पढ़ै छै एक्के मंतर। बेचि धरम-निष्ठा–मर्यादा लगबै छै पैसाक जोगार। ई..............। देखियौ ई अज्ञानक धंधा गाड़ने छै कुरीतक झंडा। भूख गरीबी बढ़बै खातिर कऽ रहलै घर-घर परचार। ई...............। झारू- छोड़ि सत्य इमान-धरमकेँ, ताकै अज्ञानसँ तनक सुख। मिट सकै छै भूख तात्कालिक, मेटाइ नै ऐसँ केकरो दुख।। गीत- एबरी हमरा जीताबह हौ बाबू विकासक करबह काम हौ। आब केकरो सतेबह हौ बाबा आब पकड़ै छी कान हौ। गली-कुच्चीमे सड़क दौगैबह घर-घरे हम कल गड़ेबह। ई सभटा कागजेपर हेतह अपन भरबै मकान हौ। आब नै..................। सौर ऊर्जाले फरम भरेबह अपना चुल्हा लग तकरा गड़ेबह। जौं कुच्छो कोइ बजबह बाबू तकर धरब हम कान हौ। आब नै....................। फन्ड विकासी घर ढुकेबह सभ जनताकेँ घून पिसेबह। केकरो शिकाइत तँ काेइ ने सुनै छै विधि छै देशक बाम हौ। आब नै....................। झारू- पैसा होइ छै शशिसँ शीतल, जौं पाबै ज्ञानी-होशियार। कऽ कऽ सेवा दीन-दुखीकेँ, कऽ लेलक अप्पन बेड़ा पार।। गीत- झुमका देबौ बाली देबौ गै बेटी तूँ पढ़ गै। धरापर लटकल ज्ञानक डोरी पकड़ि कऽ ऊपर चढ़ गै। श्रद्धा रखिहेँ गुरु-गोसाँइ गुरुचरण गहि धड़ गै। जौं पढ़ैमे मन नै लगतौ जोतमेँ केना घर गै। धरापर...........। पढ़ विज्ञान तूँ गढ़ि-गढ़ि कऽ जगसँ मेटा कहर गै। लोक खड़ा अज्ञान आगिमे पी-पी बिख जहर गै। धरापर.............। जनहित केर तूँ पोथी पढ़ि कऽ नेता बन तूँ बड़ गै। गला लगा मानवता माला गिरलकेँ कर ऊपर गै। धरापर..............। झारू- सादी रीति सभ धर्ममे, छोट नै छै अति छोट छै। फँसि कऽ ई अज्ञान-अंधेरा, घर उजाड़ि कऽ जरबै नोट।। गीत- कनी देखही गै दाइ कनी सुनही रौ भाय कनी मानही गै माइ सासु अज्ञानवश बनलै कसाइ। नोट गीन-गीन कऽ नोट गनै छै अपने फाँसी आप बनबै छै। ई अज्ञानक देन कुरीति कऽ रहल दहेज छै सबहक धुलाइ। कनी..............। लोभक कारण लोभी बनै छै बँचतै नै किछो सेहो जनै छै। तब नै किअए आदर्श देखा कऽ मस्जिद-मन्दिरमे करै सगाइ। कनी...............। सासु-पुतोहुकेँ रोज कनबै छै कम-जहेजक रोब जमबै छै। सदी एक्केसम चलै छै बेटी सासुकेँ दही किछु सबक सिखाइ। कनी...............। झारू- हम और हमरा केर जालमे, फँसल एतए छै सभटा बन्दा। एही मोहकेँ कारण मानब, कर्म करै छै बनि कऽ अन्धा।। गीत- पढ़ै छेलिऐ लिखै छेलिऐ सिखै छेलिऐ ज्ञान केना देशक हाल सुधरतै दुखक हेतै केना निदान। बाजू भैया रामे-राम रामे-राम हाै भाय सभ अन्हरेलै अज्ञानक अन्हारमे। सबहक मनमे लोभ जकरलक सुझै नै नीति विधान। गला दाबि कऽ दहेज गिनाबै रिस्ता भेल बदनाम। बाजू...........। सभ उजरलै दहेजक लहरिमे। अन्धविश्वासक डंका पीट-पीट नोटक बान्है बोझ। कुरीतिक जाल फैला कऽ सभकेँ केने छै सोझ। बाजू..............। बिहार फँसल छै कुरीतिक जालमे। जनसेवाक पाठ बिसरि कऽ सेबैए मूर्ति-भगवान। छोड़ि अपना कर्त्तव्य-कर्मकेँ देवीपर देने छै धियान। बाजू..............। लोक ओझरेलै अन्धविश्वासक जालमे। झारू- मानवता १ ताज मिलै सम्पूर्ण जगतकेँ, आ बनि जीबए झारूदार। मानवमे मानवता होइ तँ, बदलै नै ओकर अवतार।। २ रंगू नै जीवन जाइत धरमसँ, सभकेँ मानू अप्पन मीत।। नीच ऊँचक भेद भुलि कऽ, गबैत रहु मानवता गीत।। ३ सत्ता हमर सारे जगतपर, मानवता हमर मेघा विधान।। पालनमे जे करए ढिठाइ, स्वीकारए ओ नरकक खान।। ४ जन-जनपर हम्मर शासन छै, हर चिजपर हम्मर अधिकार।। कोनो प्रप्त अप्राप्त कहाँ छै, तर्क लगा करू स्वीकार।। ५ हर अेा मानव हमर सिपाही, जिनका छन्हि मानवता ज्ञान।। मारू कुचलि दियौ बेमानवता, बढ़ाउ जगमे अपन नाम।। ६ हमरासँ पहिले कोनो नै शासन, नै छै कोनो धर्मक विधान।। हमरा बिनु जगत सुन्ना छै, हतैबला छै पशु समान।। ७ हमरा लेल छै कियो नै ऊँचा, नहि कियो नीच नादान।। जे बरतलक ऐ धर्मकेँ, अटल जगतमे हुनकर नाम।। ८ हम मानवक मूलाधार छी, सभ धरमक पिता समान।। पाप पुण्यसँ अति परे छी, देवतो छी हम्मर संतान।। ९ मानव वास्ते सीमा सरहद, मानवताकेँ सक्कर खेद।। जाति धरम सरहदसँ अलग छै, मानवतामे कोनो नै भेद।। १० जब धरै मानवता मानव, रहै नै भीतर जाइत धरम।। निष्ठा इमान कऽ करए आदर, और पुजै नित्य सत् कर्म।। ११ जब मानव धरै मानवता, तब बढ़ै जन-जनसँ मेल।। दूर रहै घरसँ सभ टेन्शन, ब्यापै नै कोनो झगड़ा झेल।। १२ जब धरै मानवता मानव, पक्का होइ ओकर इमान।। डर लगै छै असत् कर्मसँ, किन्नौं नै बदलै ओकर जुवान।। १३ जब मानवता धरै मानव, तब उपजै मन लाज लेहाज।। आदर दीली बड़ा पाबै छै, रहै नै छोट प्यारसँ बाज।। १४ मानव जब धरै मानवता, ओकरासँ कोइ दुखै नै जीव। और नै दुनियाँ ओकरा सताबै, जीवमे देखै अल्ला शिव।। १५ मानव जब मानवता धरै, तन पहिर नैतिक परिधान।। धरम इमानक रक्षा खातिर, करै न्यौछावर धन आ जान।। १६ मानवता जब धरै मानव, मिट जाए निच ऊँचक शान।। दुनियाँ देखाबै सम बराबर, देखै ने कियो अप्पन आन।। १७ धरै जब मानवता मानव, ब्यापै नै ओकरा त्रिविध ताप।। काम क्रोध ने लोभ सताबै, अन्धविश्वासमे करै नै जाप।। १८ मानवता जब शासक धरै, सुख सम्पन्न होइ जनता तमाम।। मिटै मूलसँ भूख गरीबी, रहै नै पाछाँ विकाशी काम।। १९ मानवता जौं न्याय कर्मी धरै, कम हेतै केश फाइलक थान।। कहल मुक्त भऽ साड़ी जनता, देखतै फेरसँ नया बिहान।। २० जौं मानवता धरै सिपाही, शुद्ध शासन कऽ रचै विधान।। झगड़ै नै जन-जनसँ कियो, शान्ति होएत सबहक परिधान।। २१ मानव जब मानवता धरै, प्रगट होइ भीतर नीत इमान।। निष्ठा मर्यादा नैतिकता, दया धरम सतकरम विधान।। २२ जब त्यागै मानवता मानव, भऽ गेल ओकर शान्ति भंग।। जकरा अखन तक कहै छल अप्पन, ओकरेसँ भऽ गेल भारी जंग।। २३ मानवता जब छोरै मानव, भऽ गेल अेाकर बेड़ा गर्क।। चिक्कारे जगवासी ओकरा, जीबै जीवन बना कऽ नर्क।। २४ अमूल रत्न मानवता मानू, जे पाॅलक ई जनहित भाव।। दुख तँ हुनका रहिते नै छन्हि, रहै नै कोनो सुक्खक अभाव।। झारू- ज्ञान १ कऽ रहलौं वन्दना सभकेँ, हम अज्ञानी नीच नादान। कऽ कऽ क्षमा सभ भूल-चूककेँ, सभ मिलि देबै अभयकेँ दान। २ जीवन-मरण पालन केर रचना, प्रकृति केर गजब विधान। ऐ रचनाकेँ भेदि-भेदि कऽ, जानि गेल अछि ई विज्ञान।। ३ सूर्या ताप जलवायुक संग, धरती आैर गगणक तीर। सूत्रवत् सयाेग करै छै, जइसँ जनम-मरण जंजीर।। ४ अही पंचशक्ति केर ज्ञानी, नाम देलनि अल्ला-भगवान। कियो कहै छथि राम प्यारसँ, ईसा-मूसा सुक्खक धाम।। ५ एकर प्रमान स्कूली पुस्तक, किछु बिसवास करू श्रीमान्। पढ़ि कऽ जेकरा आइ जगत भरि, कऽ रहल लोक गजब केर काम।। ६ आबू जानू वायुमण्डल, नाइट्रो अठहत्तर प्रसेंट। ओ एक्कैस अन एक प्रतिशत, रहए घेरने हरदम प्रजेन्ट।। ७ आर्गोन कार्वण हिलियम हाइड्रो, ओजोन नियोनमे एक प्रसेन्ट। कोहरा आंधी-बर्खा बादल, संग तुफान बिजली करेन्ट।। ८ एकर ऊँचाइ अठारह किमी, मानू एकरा प्रकृति गर्भ। प्रलय-प्रभव अहीसँ संभव, अहीसँ चलित जीवन सर्ग।। ९ तपि कऽ भीज कऽ सूखि कऽ जमि कऽ, करै छै नाइट्रो जग निरमान। जग रचियता तत्व बेरानबे, सबहक लेल छै ई वरदान।। १० नाइट्रोजनमय सौंसे जगत छै, अधिक छै सभमे एकरे अंश। होइ चाहे सौंसे जीव-जगत केर, खाहे ओकर सारा वंश।। ११ जहिना अक्षर ग्रन्थ रचै छै, तहिना तत्व रचै छै जीव। रचना एकर ईसा-मूसा, हजरत तुलसी राम और शिव।। १२ पृथ्वीक गुरूत्वाकर्षणसँ, सटल वायु धरतीपर। छी प्रभावित अहीसँ हम सभ, धरती केर सभ चेतन-जड़ि।। १३ गोल-गोल छै अनु-प्रमाणु, रचल छै जइसँ ई जग काण्ड। सूरज चंदा तारा गोल छै, गोल बनल छै ई ब्रह्माण्ड।। १४ कऽ रहलै प्रकृति नियंत्रण, सभकेँ कहाँ छै एकर ज्ञान। ओ भेद एकर की जनतै, जे नै पढ़लक भूगोल-विज्ञान। १५ तन अहाँ केर क्षेत्र मात्र छी, ज्ञाता मात्र प्रकृति जानू। जे दुनूक भेद जानलक, गीता कहै छै ज्ञानी मानू।। १६ गूथल छी हमसब प्रकृतिमे, जहिना धागामे मोती। अभिन्न छी हम सभ एक-दोसरसँ, जहिना बातीसँ ज्योति।। १७ प्रकृति एक तरू लता छी, फल-फूल छी जीव तमाम। कहाँ कल्पना हमर ऐ बिनु, हिनका नै छै हमर काम।। १८ प्रकृति छी गाए दुधारू, जइ खिबै जग सिनेहक गाछ। तकरा भेटै छै दूध दया केर, दुख नै रहै छै तकरा पास।। १९ प्रकृति छै धागा जइसन, जीव गूथल माला मोती। सभ रहि जाइ छै मैला पत्थल, किछुमे जरि जाइ छै ज्योति।। २० की इच्छा अपनेकेँ नै छै, हमहूँ चमकी बनि स्टार।। निश्चित पूड़त अहुँक आसा, छोड़ि असत् करू सत्य स्वीकार।। २१ आबू जानू संख्या रेखा, मानू एकरा जीवन आधार। एकरा िवचारि कऽ बाबू-भैया, देखि सकै छी स्वर्गक द्वार।। २२ सुन्यकेँ मानू संत बराबर, दाया पलस केर सुख आधार। वाया माइनस असत् बराबर, एनए ठाढ़ छै दुखक पहाड़।। २३ सम रहनाइये काफी मानू, भवसारग केर नौका बीच। धियान हमेशा एते राखू, असत् ने लिअए काँटा खिंच।। २४ सेवाक बटिखारा चढ़ाबू, काँटा झूकतै पलस केर ओर। सुख-शांति जश कृत्ति लऽ कऽ, सभ दिन एतै लबका भोर।। २५ ज्ञान दबाबै पलसमे काँटा, माइनसमे दबबै अज्ञान। सम-बराबरि रहनाइ काफी, सममे सदा अटल भगवान।। २६ ज्ञान बराबर ऐ दुनियाँमे, छै नै कियो नाशी-पाप। करू साफ बस तन-मन अपन, बैसतै आबि कऽ अपने आप।। २७ विष-अमृत सारे जगत भरल छै, लिअए ज्ञानसँ अमृत चूनि। अज्ञानक कुचक्रमे पड़ि कऽ, किअए मरै छी माथा धूनि।। २८ मुश्कील बहुत छै ऐ धरतीपर, िमलए कतौसँ सत्यक ज्ञान। जीवन जौं पावन करनाइ अछि, छोड़ि सतेनाइ सेवा ठान।। झारू- कर्म १ बहुत कोइ देलकै ऐ दुनियाँकेँ, बाबा बनि-बनि कऽ उपदेश। दऽ की सकै छी हम झारूदार, सूनि लिअ कर्मक सन्देश।। २ मानव धारए धनुष धर्मक, नीत इमानक चढ़ा कऽ तीर। खिंचै प्रत्यन्चा ज्ञानक गुस्सा, लक्ष्य कऽ कऽ असत् लकीर।। ३ कर्म करब अज्ञानक दमपर, हरदम जइमे दुखक आस। सुख भेटै छै ओइ वन्दाकेँ, जेकरा भीतर ज्ञानक बास।। ४ दुनियाँ भरिक सुख होइ हमरा, चाहि रहल अछि सारे लोक। लेकिन संभव कहाँ छै केकरो, मात्र भेटै सुखक संयोग।। ५ सुख-दुख पड़ल छै गोद प्रकृति, भेटतै केना जानू तंत्र। निश्चित सुक्खक ओ छै भागी, जे जानलनि सत्कर्मक मंत्र।। ६ सुख भेटत अछि केकरा चाहने, चाहि कऽ दुख भेल केकर दूर। ई अज्ञान छी बाबू-भैया, ई नै प्रकृतिक दसतूर।। ७ धियान धरू रेडियो धर्मिता, केना चलाबै छै बेतार। तन-तरंगसँ फलक िनर्णए, करए प्रकृति सेचि-विचारि।। ८ एकरे मानू नभ-मण्डलमे, जीव जगत केर फल खतिआन। कर्म-फलक सबहक लेखा, सत् अटल प्रकृति विधान।। ९ हवा जल आ सूर्या तापसँ, बनल छै सारे देह स्थूल। सत् कर्ममे एकरा जोरू, जोड़ि असत् मे करू नै भूल।। १० सत् कर्मसँ ऐ दुनियाँमे, शांतिक संग छै सुख छै कुल। असत् संग संगति करब तँ, जीवन गुजरत बनि कऽ शूल।। ११ कर्म मात्र दुइये दुनियाँमे, एक सच्चा दूजा छी भूल। सत् असत् केर ऐ चक्करमे, फँसल छै ऐठाम मानव कुल।। 12 जीव दुखाइ नै जानि-बूझि कऽ, भऽ सकए जत्ते बाँटू प्यार। शत्रू-मित्र ने बैरी कियो, यएह तँ छी सत् कर्म हमर यार।। १३ सत् कर्मपर सेवा जानू, जइसँ होइ छै जग िनर्माण। सूजश मान प्रतिष्ठा धनसँ, भरल रहै घर-वार मकान।। १४ असत् कर्मपर पीड़ा जानू, जीवन जइसँ होइ वदनाम। अपजस और नरक केर भारी, जग द्रोही होइ सभटा काम।। १५ बड़ा ने कियो जाति लऽ कऽ, नै बड़ा कियो धर्मसँ। कियो बड़ा अछि ऐ धरतीपर, वस अपने सत् कर्मसँ।। १६ जब-जब कर्मकेँ कर्मसँ जोड़ू, मन धरू सत् कर्मक धियान। दुखै ने जगवासी कियो, यएह तँ छी सत् कर्मक ज्ञान।। १७ काम सभ प्रकृति केर छी, अलग-अलग छै सबहक सूत्र। अही सूत्रमे जोड़ि तनकेँ, पलि रहल सभ जीवक पुत्र।। १८ काम सभ प्रकृति केर छी, जइ करै छी अहाँ-हम। चाहै मेटाउ दुख जगतक, या बूनू दुनियाँमे गम।। १९ असत् कर्मसँ नाता तोड़लक, जोड़ि लेलक सत् कर्मक डोरि। दुखू हुनका चलि पड़ल अछि, खूलल द्वार जन्नत केर ओर।। २० पुण्य मात्र छी परसुख देनाइ, पाप मात्र परदुक्खक दान। आइक ने सदियोक बात छी, कहि गेला ज्ञानी िवद्वान।। २१ धन बल भेटल तँ की भेटल, जौं भेटैत किछु सेवा कर्म। लऽ लिअ शिक्षा सत् गुरूसँ, फेराे जानबै एकर मर्म।। २२ सेवा तँ भगवान मात्र छी, कर्मकेँ जौं मानबै पूजा। अहीसँ सद्गतिकेँ भेटबै, राह नै छै कोनो दुजा।। २३ काम-क्रोध मद लोभ मोहसँ, लागल सभ धर्मीमे जंग। सभ धर्मक कहै छै पोथी, पकड़ू सभ सत् कर्मक संग।। २४ कर्मक जे कियो देलनि सत्ता, मानलक एकरे अपन भगवान। जगमे भेटलै ओकरे शांति, सुख सम्पन्न अछि ओ इन्सान।। २५ कर्म करू सभ नित्य धर्मसँ, बनैत रहत अहाँक बात। फलक इच्छा करू ने कखनो, ई तँ अछि प्रकृतिक हाथ।। २६ शरीर अहाँक यंत्र मात्र छी, किछु कराउ एहेन काम। धरतीपर जे अमर कराबए, ऊँचा करए जगमे नाम।। २७ जिनाइ तँ ओकरे जिनाइ छी, जे जानलक ई गहरा राज। धन जीवनक दाउ लगा कऽ, कऽ रहल जगसेवा कार्य।। झारू- रामायण १ पहिल वन्दना गुरु चरणमे, दुजे चरण शंकर भगवान। दुनू चरण अहीं केर नीचाँ, स्वीकाररू सत् सत् प्रणाम।। २ ओइ घरकेँ तँ अयोध्ये मानू, जइ घर करए रामायण बास।। कर्म रँगल होइ रामायणसँ, दुख नै रहतै तेकरा पास।। ३ श्याम रँग हे राम गोसाँइ, जाति-मानवक चश्मा उतार। कर्म-कथा बस देखए रमायण, पूजा-पाठक उतरए बोखार।। ४ कर्म-कथा छी राम-रामयण, सुख-शांतिक सत्यक प्रतीक। अपनाकेँ ऐ सत्य कर्म कऽ, सभ पहुँचै सुखक नजदीक।। ५ जइसँ सुधरइ जग-भरि मानव, लिखलनि कथा मुनि वाल्मिक। ओ की जानतै एकर भाषा, लागल जिनका अज्ञानक दीक।। ६ सभ पढ़ि सुनै छथि एकरा, पुजै छथि सभ आरती उतारि। कर्म घारक मूल मंत्रपर, करै नै छथिन कियो विचारि।। ७ सभ पढ़ै-सुनै छथि एकरा, भरल अछि भीतर एकर कथा। ज्ञान मात्रसँ किछु नै होइ छै, धरू भीतर किछु कर्म-बेथा।। ८ जूटल अछि मानव केर रिस्ता, धरती केर सभ जीवक संग। एकरा निमाहू सत् कर्मसँ, रिस्तेदार कियो होइ ने तंग।। ९ दादा-पोता-बाप आ बेटा, सभ बनै छथि एक्के लोक। करम-धरम छै सबहक अपन, मिलाउ रामायणसँ संयोग।। १० पिता बनू अहाँ राजा दशरथ, पुत्र बनू राम भगवान। भाय भरत लक्ष्मण-शत्रुध्न, माता बनू कौशल्या समान।। ११ पिता बनू अहाँ राजा दशरथ, पुत्रमे देखू अपन प्राण। पोसू एकरा सत्यक कमाइ, और दिलाबू सत्तकर्मक ज्ञान।। १२ पिता बनू अहाँ राजा दशरथ, बच्चा भेजू नित्य स्कूल। ज्ञान-विज्ञानक पढ़ा कऽ पोथी, सभमे खिलाबू ज्ञानक फूल।। १३ भाय बनू अहाँ लक्ष्मण सन, छोड़ू ने भारी दुखमे संग। अहूँ ओहीमे हाथ बटाबू, राज-काज जौं कऽ दिअए तंग।। १४ भाइक खातिर सभ किछु तियागू, सुख-शांति और राजमहल। निभा कऽ रिस्ता धरा धामक, जगमे करू मर्यादा अटल।। १५ पुत्र बनू अहाँ रामचन्दजी, पिता वचन लऽ तियागलनि सुख। नीति इमान मर्यादा खातिर, ईस नै केलनि बनबासक दुख।। १६ बेटी बनू सिया सुकुमारि, टारू नै किन्नौं बड़क बात। रहए प्रतिक्षा हुकुमक सदिखन, जेठ, पुस, साैनु आकि दिन-राति। १७ कन्या बनू सिया सुकुमारि, ऊँच करू पिताक पाग।। हुअए भूल ने कोनो एहेन, जइसँ लगए पागमे दाग। १८ पुत्री बनू सिया सुकुमारि, बड़ा कऽ सदिखनि करू लिहाज। कऽ कऽ सेवा जगवासीक, चढ़ा दिऔ सिर पिताक ताज।। १९ पत्नी बनू सिया सुकुमारि, पतिक खातिर तियागू सुख। हुनके खुशीमे मात्र खुशी होइ, हुनके दुखसँ मात्र होइ दुख।। २० पत्नी बनू सिया सुकुमारि, अहूँ पतिकेँ मानू राम।। दियौ नै आदेशक मौका, समझि कऽ हुनकर मनक काम।। २१ पत्नी बनू सतीअनुसुइया, जुबा ने उतरे पतिक नाम। पर पुरुष सपनो नै देखल, पतिकेँ मानलनि चारू धाम।। २२ पत्नी बनू मनदोदरी रानी, पतिकेँ दिऔ सत् नीत सलाह। दियौ ने गुस्सा केर मौका, कऽ कऽ कोनो नीच गुनाह।। २३ पुतोहु बनू अहाँ सीता-रानी, सासु पाबए माता केर मान। ससुर-भैसुर होइ पिता बराबरि, ननदि-दिअर भाए-बहिन समान।। २४ पुतोहु बनू अहाँ रानी सीता, ससुक छीनू हाथक काम। गोतनी जेठानी सगी बहिन सन, जेठ लगै भाय बड़ा समान।। २५ शासक बनू अहाँ रमचन्द्रजी, जन-जनमे सुख भरू भरपुर। होइ उत्थान दबल-कुचलकक, और होइ देशक गरीबी दूर।। २६ पहिर कऽ माला मानवताक, देश विकासक लगा दियौ होड़। अहाँ बनि जाउ चाँद गगनक, निहारए जनता बनि चकौर।। २७ जनहितकेँ कोनो ठेँस ने पहुँचै, होइ एकताक नारा बुलन्द। निष्ठा चढ़ि कऽ ऊँच शिखरपर, करए फूटक कारा बन्द।। २८ जे जेतए करै छी जे किछु, देश सेवाक सभ छी काम। रक्खू सुरक्षित अपन नीति, खाउ नै ओइमे अपन इमान।। २९ जनता बनू अयोध्यावासी, शांति केर पकड़ू आधार। दुखी ने होइ जन-जनसँ कियो, सभमे होइ सेवाक विचार।। ३० जनता बनू अयोध्यावासी, सदिखन पाबू सत्यक साग। नीति धरम इमान जलसँ, हरा-भरा होइ सबहक बाग।। ३१ जनता बनू अयोध्यावासी, भायचाराक पढ़ि कऽ पाठ। गुनि कऽ प्रेम दयाक डोरी, बान्हु सभ मानव केर गाँठ।। ३२ सबहक सत्रु सबहक दुश्मन, काम-क्रोध-लोभ-अज्ञान। लोभ छै तइमे सबहक नाशी, दया-धरम और नीति इमान।। ३३ की कऽ सकल चतुरेगी सेना, की केलनि जोग जप विज्ञान। ध्वष्त भेल अयोध्या नगरी, जब धेलनि केकइ अज्ञान।। ३४ भेल अज्ञान वस रानी केकइ, की पुरा भेल उनकर आस। जे प्यारा राजगद्दी पाबैत, भेज देलनि हुनका बनवास।। ३५ ई करामात अज्ञानक छी, उनटा दइ छथि जजबात। उलटि गेल अज्ञानसँ सभटा, ऐ धरतीकेँ मानव जात।। ३६ पाइये टामे सभटा सुख छै, घेरि लेलक सभकेँ अज्ञान। झोंकि देलनि सभ शक्ति ऐ लेल, गमा कऽ निष्ठा धरम-इमान।। ३७ काम-क्रोध मद लोभ मोह सन, सभ खेतमे दुखक बीज। जौं पनपल ई मौका पाबि कऽ, सुख केर भऽ गेल पावर सीज।। तियाग- महा झारू १ जीवन कोन सर्वोत्तम होइ छै, बाबू सोचू करू विचार। नाम अमर होइ धरा-धाममे, तियागक सभ पकरू आधार।। २ कर्म बिना अहाँ जीअब केना, अही लेल कर्म-फलक तियाग। सभ कर्म छै जगमे दोषी, जइसँ अपने पाबै छी साग।। ३ हरा रहत घर-द्वार अहाँकेँ, ऐमे फेंटू तियागक जल। जौं अहाँ एहेन नै कऽ सकब, निश्चित दुखमय होएत कल।। ४ सत्य-अस्त छी मनक सृजन, मात्र छै करनाइ असत्यक तियाग। असत्य छोड़ि की बचै छै, झटसँ कहू सत्यक बाग।। ५ एकरा बिनु अहाँ सपनाउ नै, हमर जन्म छी मानवक। असत् पकड़ि कऽ एत्ते जानू, जनम बितैए दानवक। ६ असत् तियाग तँ मात्र तियाग छी, मनसँ तियागू ऐ इंसान। असत् तियागि कऽ जे जिबै छै, रहै छै बनि कऽ ओ भगवान।। ७ जतए अहाँक चुल्ही जरै छै, ओतए नै पहुँचैत असत्क दाना। अहीसँ दुखक सृजन होइ छै, विष भरल छै ओहेन खाना। ८ मीठ होइ सत्यक सुखल रोटी, असत्यक मेवा करए तियाग। ओइ घरमे सभ देव पुरुष छै, हरा रहए ओ हरदम बाग।। ९ मन चाहै छै मनसँ केकरो, और करै मन केकरो तियाग। इच्छा, द्वेष तँ नाम छिऐ एकर, ऐसँ कटै छै सुखक बाग।। १० सभसँ पहिले एकरे तियागू, खुशी नै एेमे छै गम। तियागि नै सकबै दोष एहेन तब, तब समझू अज्ञान छी हम।। ११ सुखक इच्छा सभकेँ सताबै, एही लेल चाहतक तियागू। सुख शांतिक ई छी नाशी, सोबू नै बाबू आबो जागू।। १२ दुखसँ द्वेष तँ सभकेँ होइ छै, एकरा चाहए तियागए सभ। लोहाबला गेट लगाबू, की दुख घर नै एते तब।। १३ सुख मिलल अछि केकरा चाहने, चाहि कऽ दुख भेल केकर दूर। ई अज्ञान छी बाबू भैया, ई नै दुनियाँक दसतूर।। १४ काम-क्रोध मद-लोभ मोहसँ, सभ करै छै असत्यक काम। पहुँच सकल नै एकरा तियागने, कियो धरती सुखक धाम।। पुलिस सूधारक महा झारू १ पुलिस शब्द स्पेनिश भाषा, भीतर एकरा छह उद्देश्य। अही लेल शासक अपनौलनि, ऐ धरतीक सभटा देश।। २ पहिला अक्षर पी कऽ जानू, पीसँ बनै छै शब्द पोलाइट। शिष्ट हुअए सभ हमर सिपाही, देशक शासन होएत हाइलाइट।। ३ अक्षर दोसर ओकेँ जानू, ओसँ आएल शब्द ओब्जेक्ट। मात्र उद्देश्य होइ सुशासनकेँ, और एकरे सभटा सब्जेक्ट।। ४ एल लाबलक लिगर एडवाजर, अर्थ कानूनी उपदेशक। राजा-जनता बीचक डोरी, दुनूकेँ तूँ प्रकाशक।। ५ इंटेलिजेन्सकेँ आइ बजेलक, तूँ छह बेटा चतुर-चलाक। देखा करिश्मा कोनो एहेन, राजा-प्रजा रहए अवाक।। ६ अक्षर सी चेकिंगकेँ कहलक, नित इमानसँ कर परताल। सेवा होइ बस न्याय केर खातिर, करए नै कहियो तूँ हरताल।। ७ ई बोलेलक इनरजेटिक, कर्मठ जानू एकर अर्थ। शांति-संपन्न देश हो हमर, धरू सिपाही मन ई व्रत।। ८ जनता हितक रक्षा खातिर, बनल सिपाही असीम अधिकार। बनि कठपुतली धनबलाक, हित-सँ-अहितमे बदलल विचार।। ९ लेतै के सामाजक जिम्मा, करतै सुरक्षा एकरा के। जेकरा छै रक्षा केर जिम्मा, भक्षक बनि बैसल छै से।। १० नीक छल राज ऊ अंग्रेजी, कहि रहल अछि पुरनिया लोक। शत्रु लगै मित्रसँ अच्छा, सोचू केहेन ई संयोग।। ११ चूप हो बेटा पुलीस अबै छै, िनर्धनमे ई खौफ-िनसान। नागरि डोलबैत ओकरा आगू, जे देखाबए एकरा धनवान।। १२ कुल-खनदान ने देखए राजा, शायद रजौ छै बकलेल। जइ घर सभ दिन चोर जनमलै, पुलिस वर्दीकेँ दइ छै धकेलि।। १३ वर्दी पुलीसमे चोर घूसल छै, संगमे गामक दलाल छै। तँए तँ सड़क बीच भोली जनता, भऽ रहल हलाल छै।। १४ इनकलाब की अहीले एलै, पुलिस चोर संग जुट्टेले। अनपढ़-बेचरा-गरीब जनताकेँ, उक्खरिमे दऽ कऽ कुटैले। शासक सुधारक महा झारू जय हिन्द हे देशक धरती, जय हिन्द हे देशक जनता। जय हिन्द हे ताज देशक, जय हिन्द सम्प्रभुता।। आस्तिक-नास्तिक दुइ भावसँ, बनल प्रकृति द्वन्द्व विधान। आस्तिक जग िनर्माण करए, नास्तिक करए जगनाशी काम।। जब हेतै आस्तिक गुण राजा, देशक हेतै नव-िनर्माण। जनता पहिरए प्रेमक माला, एकता धनसँ भऽ धनवान।। जब हेतै नास्तिक गुण राजा, जनद्रोही हेतै सभ काम। बिखरए जनता टुटल माला, देश बनि जाएत दुक्खक धाम।। राज विद्याक खेल नै जानू, ई जगमे भारी विज्ञान। जे गुनलनि अछि पाठ मानवताक, हुनके छन्हि एकर पहिचान।। राज विद्याकेँ ओ की जानत, जेकड़ा हाथ लाठी भैंसबार। लाठीसँ कहीं राज चलै छै, राज चलाबए कलम तलवार।। राज हुनकेसँ चलि सकै छै, जिनका रगमे दानी खून। स्वामी भाव अंग-अंगमे भरल होइ, और भरल होइ सेवा गुण। जेकर हाथ हमेशा निचाँ, उ बाबू नै कुर्सी जोग। ऐ बुन्नकेँ शासनकर्मी, ताकए घोटालाक संजोग।। प्रजावत्सल्यकेँ जाने भाषा, जनहितमे बस टिकल होइ मन। रोम-रोम जनताकेँ समर्पित, और होइ अर्पित जीवन धन।। जानै नै जे सेवा भाषा, धन-धारण बस आखिरी धून। हाथ हमेशा जेकर नीचाँ, उ की जनतै दानक गुण।। मन रंगल होइ सत्य भावमे, तन चढ़ल निष्ठा केर वस्त्र, एक हाथमे पालन डोर होइ, दुजेमे रक्षा केर शस्त्र।। चोरबा-चुतिया हाथमे परतै, जब-जब देशक शासन डोर। लूट-मार चोरी डाका संग, बलात बढ़तै लगा कऽ होर।। सच्चा शासक हुनके जानू, मानवतासँ रंगल होइ देह। नीत-इमानक ताज चढ़ल होइ, दिलमे होइ जन-जनसँ नेह।। निष्ठाहीन जब शासक हेतै, समझू देशक विधाता बाम। पहिया विकासी पन्चार रहतै, न्यायक रहतै चक्का जाम।। लाज रहत तब राज ताजकेँ, ब्यापै नै एकरा त्रिविध ताप। पाबै नै एकरा पुत्र प्यारा, सतबै नै एकरा माए-बाप।। आँखि छोड़ि कऽ कानपर देतै, जब-जब देशक राजा जोड़। भुख गरिबी सिर चढ़ि बैसतै, उफड़ा जकाँ उपलेतै चोर।। शत्रु मित्र नै ताजकेँ धरै, छुबै नै एकरा सुन्दर नारी। ताज नै पकड़ै जाति-धरमकेँ, और नै टोकै पत्नी प्यारी।। तन-मन मैला राजा हेतै, समझू उ राजा अज्ञान। रहै िनरक्षित राजक जनता, देशसँ मेटेतै नीति ज्ञान। ताल जलै नै क्रोध आगिमे, डुबै नै ई लोभक घोल। काम मोह नै अहं सताबै, वर्णा की रहतै एकर मोल।। पद गौरवकेँ अंधा राजा, और हेतै मनक विकलांग। सोना उपजै वाला खेतमे, तब उपजतै गाजा-भाँग।। तन अहाँक एक यंत्र मात्र छी, कुछ कराबू एहेन काम। धरतीपर जे अमर कराबे, ऊँचा कराबै जगमे नाम।। विस्मृत कवि- पं. रामजी चौधरी (१८७८-१९५२) विविध भजनावली- १-४५ ॥ श्री गणेशाय नमः ॥ १. ॥ विनय ॥ जय गणेश शंकर सुत सुन्दर अति कृपालु दीनन जन पालक लम्बोदर अति रूप गजानन, युअ यश कहि न सकत सहसानन। हमछी अति गमार कछु जानन निज पद कमल देहु उर ध्यानन॥ रामजी अरज सुनहु कछु कानन। वर्णत चहत राम गुण आनन॥ २. ॥ राग ध्रुपद ॥ सेवो मन शंकर अति कृपाल सेवक दुःख भंजन हौ दयाल, जटा शोभित गंग धार तन छाय भस्म उर मुंड माल उपवित भुजंगम दृग विशाल बिजया नित पीबत फिरत मतवाल। कर त्रिशूल बघ छाल बिराजित दास आस राखन के सुर ररु कैलाश वास गिरजा लिअ संग बहुवजत ताल शोभए शशिभाल॥ काशीपति तेरो यश अपार सुनि आय धाय तेरो द्वार रामजी अति दीन कर नेहाल जिमि वेगि मिलए अवधेश लाल॥ ३. राग संगीत नाचत स्वयंग ये॥ कुंज बन चहुं ओर सुन्दर सघन बृक्ष बनाय मण्डित लकत सुमन लजाय सुर तरु जगमगात मयंक॥१॥ कठताल डम्फ मंजीर बाजत गोपी गण चहुं दिसि छाजत कुहिकि कलरव मोर नाचत राधा लेत मृदंग॥२॥ बेनु आदि स्वराग बाजत षट त्रिंशरागिन राग गावत गण सब सुनत धावत यमुना बढ़त तरंग॥३॥ तिहुं लोक आनन्द होत सुनि-सुनि पवनजल सब फिरत पुनि-पुनि रामजी गृह कार्य झाँकत कौतुक रंग॥४॥ ४. तिरहुत वारि वयस पहु तेजल सजनी गे कि कहु तनिक विवेक, कबहु नैन नहि देखल सजनीगे अवधि बितल दुई एक। भावैन भवन शयन सुख सजनीगे ज्यौं मिलत भरि अंक। एहेन जीवन लय कि करव सजनीगे आनो कहत कलंक। भूषण वसन भरि सम सजनी प्राण रहत अब से शेष। निर्दय भय पहु वैसल सजनीगे रामजी सहत कत शोक॥ ५. तिरहुत निठुर श्याम नहि बहुरल सजनीगे कैलनि बचन प्रमाण। कओन विधि दिवस मनायव सजनीगे हित नहि दोसर आन॥ नयन वरिस तन भीजल सजनीगे दिन दिन मदन मलान। शिर सिन्दूर भावै सजनीगे भूषण भावे न कान॥ केहेन बिधाता निर्दय भेल सजनीगे आनक दुख नहि जान। रामजीके आश नहि पुरत सजनी मदन कयल निदान॥ ६. भजन भैरवी आब मन हरि चरनन अनुराग। त्यागि हृदयके विविध वासना दम्भ कपट सब त्याग॥ सुत बनिता परिजन पुरवासी अन्त न आबे काज। जे पद ध्यान करत सुर नर मुनि तुहुं निशा आब जाग॥ भज रघुपति कृपाल पति तारों पतित हजार बिनु हरि भजन बृथा जातदिन सपना सम संसार रामजी सन्त भरोस छारि अब सीता पति लौ लाग॥ ७. ॥ राग विहाग ॥ को होत दोसर आन रम बिनु॥ जे प्रभु जाय तारि अहिल्या जे बनि रहत परवान॥ जल बिच जाइ गजेन्द्र उबारो सुनत बात एक कान॥ दौपति चीर बढ़ाई सभा बिच जानत सकल जहान॥ रामजी सीता-पति भज निशदिन जौ सुख चाहत नादान॥ ८. चैत के ठुमरी चैत पिया नहि आयेल हो रामा चित घबरायेल।। भवनो न भावे मदन सताबे नैन नीन्द नहि लागल॥ निसिवासर कोइल कित कुहुकत बाग बाग फूल फूलल॥ रामजी वृथा जात ऋतुराजहि जौंन कन्त भरि मिललरामा॥ चित घबरायेल चैत पिया नहि आयल॥ ९. चैतके ठुमरी आबि गेल चैत बैरनमा हो रामा विधि भेल वामा॥ लाले-लाले चून्दरी लगाय पलंगपर पियवा न अयल सपनमा॥ जौवन जोर आर भैल दिन दिन विष सन लागत भवनमा॥ रामजी जीवन वृथा एहि तनमे प्रभु कोन देखलो नयनमा॥ १०. चैतके ठुमरी आबि गेल सियाक खोजनमा हो रामा पवन सुअनमा॥ वरजि वरजि हारे सब निसिचर लड़त कौ न सयनमा॥ उपवन नास रिसाय लंकपति मेघवासे कहत बयेनमा॥ मारसि जनि सुत बान्हिके लाऊ रामजी बुझत कारनमा हो रामा॥ ११. महेशवाणी सुनु सुनु चण्डेश्वर नाथ कृपा दृष्ट से एक वेर ताकहु हम छी परम अनाथ॥ देव दनुज भूपति कत सेबल कियो न दुखके साथ, बड़े निरास आश धय रोपल अहाँक चरणमे माथ॥ भटकि-भटकि सबके रुचि बूझल सब स्वारथके साथ जे छथि मित्र अपेक्षित परिजन सभै रखै छथि क्वाथ॥ नहि किछ वेदपुराण जनए छी नहि पूजाके भाव निसि दिन चिन्ता उदरके फूसि फटकके बात।। अहाँ दयालु दीनेपर सब दिन जनैत अछि संसार रामजीके सकल मनोरथ पूर वहु भोला नाथ॥ १२. महेशवानी बम भोला छथि अनमोल कतेक दुखी हम जाइत देखल करैत अति अनघोल॥ ककरहु देविक दैहिक दुख छनि ककरहु भौति कलेस कियो अबै छथि आश अन्न टकाके लेल॥ कतेक बिकल छथि पुत्र दार ले कतेक अनेक कलेस कतेक अहाँके भजन करै ये परमारथके लेल॥ परसि मणि अहाँ झारी वैसल सवके दुख हरि लेल॥ रामजी किछु कहि न सकैछी अपराधी के लेल॥ १३. महेशवानी एहन बड़के खोजि आनलन्हि पारवतीके लेल॥ जिनका घर नहि धन परिजन नहि जाति पातिक झेल, डमरु बजावथि गिरिपर निसि दिन भूत प्रेतसँ खेल॥ अन्नक खेती किछु नहि राखथि भांग धुथुर अलेल, भूषण गत्र-गत्रमे लटकट बिषधर देखि उर मेल॥ परम बताहक लक्षण सभ छनि अंग भस्म लेपि लेल, हाथी घोड़ा त्यागि पालकी वोढ़ बड़द चढ़ि लेल॥ कहथि रामजीभाग ऊदय अब लेल, त्रिभुवन पति गौरी पति हेता साजू पूरहर लभे॥ १४. महेशवाणी हमरो जीवन व्यर्थ बीति गेल। कहियो बिल्बपत्र नहि तोड़ल, फूल रोपि नहि भेल। अक्षत धूप, दीपलै, चानन शंकर पूजि नहि भेल॥ कतेक वासना मनमे करि-करि दिवस रैन बिति गेल। कवहुँ ध्यान शान्त चित्त भए बम-बम कहियो न भेल॥ सुत बनितादि विषय बस कवहुँ, मन बिश्राम न भेल। चिन्ता करति करति दिन बीतल, अब जर्जर तन भेल॥ कहथि रामजी सकल आश तजि शिव सेबू अलबेल। शिब बिनु दोसरके हरत दुसह दुःख निश्चय मन करिलेल॥ १५. महेशवानी शिवकें सुनै छियन्हि दयाल दुखियाक कहिया सुनता सवाल। जय गंग चन्द्र भाल, कंठ मुण्डमाल, भंग ले बेहाल॥ वाम भाग पार्वती बसहा सवार, अंग-अंगमे विषधर लटकल हजार, भूतनात प्रणत पाल दिगम्बर धार, भस्म अंग संग बेताल डमरु बघ छाला॥ रामजी दीननपर कखन करब खयाल शिव बिना हमर के करत प्रतिपाल॥ १६. महेशवाणी शिव काटू ने जञ्जाल। कतेक कहब हम अपन हवाल॥ निसि दिन चैन नहि भूख भेल काल चिन्ता करति भूलि गेल अहाँक खयाल। बन्धु वर्ग कुटुम्ब संग धेलाह अनेक भल केओ न सहाय भेला दुर्दिन प्रवल। रामजीके आशा एक जँ निगाहनै करब रहब बेकल॥ १७. महेशवाणी शिव कहूने बुझाय॥ ककरा कहब हम अपन दुख जाय।। केओ ने भेटैत छथि अहाँक समुदाय जे सुनि हेताह तुरत सहाय॥ हित मित बनिता सुत स्वास्थ्य से भाए। निर्धन देखि भुख लए छपि घुमाए॥ बम्भोला वैद्यनाथ दीनन अपनाय झाड़ीमे बैसि हीरालालको लुटाय॥ रामजी आशा लगाय कृपा दृष्टि हेरू नाथ लिय अपनाय॥ इति सिद्धिरस्तु। शुभञ्चास्तुस्त्र १८. भजन विनय प्रभू बिनू कोन करत दुखः त्राणः॥ कतेक दुःखीके तारल जगमे भव सागर बिनू जल जान, कतेक चूकि हमरासे भऽ गेल सोर ने सिनई छी कानः॥ अहाँ के त बैनि परल अछि पतित उधारन नाम ।नामक टेक राखू प्रभू अबहूँ हम छी अधम महानः॥ ज्योँ नञ कृपा करब एहि जन पर कोना खबरि लेत आन। रामजी पतितके नाहिँ सहारा दोसर के अछि आनः॥ १९. भजन लक्ष्मी नारायण जीक विनय लक्ष्मी नारायण अहाँ हमरा ओर नञ तकइ छी यौ। दीनदयाल नाम अहाँके सभ कहए अछि यौ। हमर दुःख देखि बिकट अहाँ डरए छी यौ। ब्याध गणिका गिध अजामिल गजके उबारल यौ। कौल किरात भिलनी अधमकेँ उबारल यौ। कतेक पतितके तारल अहाँ मानि के सकत यौ। रुद्रपुरके भोलानाथ अहाँ के धाम गेलायो। ज्यों न हमरा पर कृपा करब हम कि करब यौ। रामजी अनाथ एक दास राखु यौ। २०. भजन विनय भगवती जय जय जनक नन्दिनी अम्बे, त्रिभुवन के तू ही अवलम्बेः। तुही पालन कारनी जगतके, शेष गणेश सुरन केः। तेरो महिमा कहि न सकत कोउ, सकुचत सारभ सुरपति कोः। परमदुखी एहि जगमे, के नञ जनए अछि त्रिभुवनमेः॥ केवल आशा अहाँक चरणके, राखू दास अधम केः॥ कियो नहि राखि सकल शरणोंमे, देख दुखी दिनन केः॥ ज्योँ नहि कृपा करब जगजननी, बास जान निज मनमे। तौँ मेरो दुख कौन हटावत, दोसर छाड़ि अहाँकेः॥ कबहौँ अवसर पाबि विपति मेरो कहियो अवधपति को, रामजी क नहि आन सहारा छाड़ि चरण अहाँकेः॥ २१. भजन विनय प्रभु बिनु कौन करत दुःख त्राणः।। कतेक दुखीके तारल जगमे भवसागर बिनु जल जानः॥ कतेक चूकि हमरासे भऽ गेल, स्वर नञ सुनए छी कानः।। अहाँके तौँ बानि पड़ल अछि,पतित उधारण नामः। नामक टेक राखु अब प्रभुजी हम छी अधम जोना। कृपा करब एहि जन पर कोन खबरि लेत आन। रामजी पतितके नाहि सहारा दोसर के अछि आनः॥ २२. विहाग भोला हेरू पलक एक बेरः॥ कतेक दुखीके तारल जगमे कतए गेलहुँ मेरो बेरः॥ भूतनाथ गौरीवरशंकर विपत्ति हरू एहि बेरः॥ जोना कृपा करब शिवशंकर कष्ट मिटत के औरः॥ बड़े दयालु जानि हम एलहुँ अहाँक शरण सुनि सोरः॥ रामजीके नहि आन सहारा दोसर केयो नहि औरः॥ २३. भजन महेशवाणी भोला कखन करब दुःख त्रान? त्रिविध ताप मोहि आय सतावे लेन चहन मेरो प्राण॥ निशिवासर मोहि युअ समवीने पलभर नहि विश्रामः॥ बहुत उपाय करिके हम हारल दिन-दिन दुःख बलबान, ज्यौँ नहि कृपा करब शिवशंकर कष्ट के मेटत आन॥ रामजीके सरण राखू प्रभु, अधम शिरोमणि जान॥भोला.॥ २४. विनय विहाग राम बिनु कौन हरत दुःख आन कौशलपति कृपालु कोमल चित जाहि धरत मुनि ध्यान॥ पतित अनेक तारल एहि जगमे, जग-गणिका परधान।। केवट,गृद्ध अजामिल तारो, धोखहुषे लियो नाम, नहि दयालु तुअ सम काउ दोसर, कियो एक धनवान।। रामजी अशरण आय पुकारो, भव ले करू मेरो त्राण॥रामबिनु॥ २५. भजन विनय लक्ष्मीनारायण हमर दुःख कखन हरब औ॥ पतित उधारण नाम अहाँके सभ कए अछि औ, हमरा बेर परम कठोर कियाक होइ छी औ।। त्रिविध ताप सतत निशि दिन तनबै अछि औ॥ अहाँ बिना दोसर के त्राण करत औ॥ देव दनुज मनुज हम कतेक सेवल औ, कियो ने सहाय भेला विपति काल औ॥ कतेक कहब अहाँके ज्योँ ने कृपा कर औ, रामजीके चाड़ि अहाँक के शरण राखन औ॥ २६. भजन विनय एक बेर ताकू औ भगवान, अहाँक बिना दोसर दुःख केहु ना आन॥ निशि दिन कखनौ कल न पड़ै अछि, कियो ने तकैये आन केवल आशा अहाँक चरणके आय करू मेरे त्राण॥ कतेक अधमके तारल अहाँ गनि ने सकत कियो आन, हमर वान किछु नाहि सुनए छी, बहिर भेल कते कान॥ प्रबल प्रताप अहाँक अछि जगमे के नहि जनए अछि आन, गणिका गिद्ध अजामिल गजके जलसे बचावल प्राण॥ ज्योँ नहि कृपा करब रघुनन्दन, विपति परल निदान, रामजीके अब नाहि सहारा, दोसर के नहि आन॥ २७. महेशवानी सुनू सुनू औ दयाल, अहाँ सन दोसर के छथि कृपाल॥ जे अहाँ के शरण अबए अछि सबके कयल निहाल, हमर दुःख कखन हरब अहाँ, कहूने झारी लाल॥ जटा बीच गंगा छथि शोभित चन्द्र विराजथि भाल, झारीमे निवास करए छी दुखियो पर अति खयाल॥ रामजीके शरणमे राखू, सुनू सुनू औ महाकाल, विपति हराऊ हमरो शिवजी करू आय प्रतिपाल॥ २८. महेशवानी काटू दुःख जंजाल, कृपा करू चण्डेश्वर दानी काटू दुःख जंजाल॥ ज्योँ नहि दया करब शिवशंकर, ककरा कहब हम आन, दिन-दिन विकल कतेक दुःख काटब ज्योँ ने करब अहाँ खयाल॥ जटा बीच गंगा छथि शोभित, चन्द्र उदय अछि भाल, मृगछाला डामरु बजबैछी, भाँग पीबि तिनकाल॥ लय त्रिशूलकाटू दुःख काटू, दुःख हमरो वेगि करू निहाल, रामजी के आशा केवल अहाँके, विपति हरू करि खयाल॥ २९. महेशवानी शिव करू ने प्रतिपाल, अहाँ सन के अछि दोसर दयाल॥ भस्म अंग शीश गंग तीलक चन्द्र भाल, भाँग पीब खुशी रही, रही दुखिया पर खयाल। बसहा पर घुमल फिरी, भूत गण साथ, डमरू बजाबी तीन नयन अछि विशाल॥ झाड़ीमे निवास करी, लुटबथि हीरा लाल, रामजी के बेर शिव भेलाह कंगाल॥ ३०. महेशवानी शिवजी केहेन कैलौँ दीन हमर केहेन॥ निशिदिन चैन नहि चिन्ता रहे भिन्न, ताहू पर त्रिविध ताप कर चाहे खिन्न॥ पुत्र दारा कहल किछु ने सुनै अछि काअ ताहू पर परिजन लै अछि हमर प्राण॥ अति दयाल जानि अहाँक शरण अयलहुँ कानि, रामजी के दुःख हरू अशरण जन जानि॥ ३१. महेशवानी विधि बड़ दुःख देल, गौरी दाइ के एहेन वर कियाक लिखि देल॥ जिनका जाति नहि कुल नहि परिजन, गिरिपर बसथि अकेल, डमरू बजाबथि नाचथि अपन कि भूत प्रेत से खेल॥ भस्म अंग शिर शोभित गंगा, चन्द्र उदय छनि भाल वस्त्र एकोटा नहि छनि तन पर ऊपरमे छनि बघछाल, विषधर कतेक अंगमे लटकल, कंठ शोभे मुंडमाल, रामजी कियाक झखैछी मैना गौरी सुख करती निहाल॥ ३२. विहाग वृन्दावन देखि लिअ चहुओर॥ काली दह वंशीवट देखू, कुंज गली सभ ठौर, सेवा कुंजमे ठाकुर दर्शन, नाचि लिअ एक बेर॥ जमुना तटमे घाट मनोहर, पथिक रहे कत ठौर, कदम गाछके झुकल देखू, चीर धरे बहु ठौर॥ रामजी वैकुण्ठ वृन्दावन घूमि देखु सभ ठौर, रासमण्ड ल’ के शोभा देखू, रहू दिवस किछु और।। ३३. विहाग मथुरा देखि लिअ सन ठौर॥ पत्थल के जे घाट बनल अछि, बहुत दूर तक शोर, जमुना जीके तीरमे, सन्न रहथि कते ठौर॥ अस्ट धातुके खम्भा देखू, बिजली बरे सभ ठौर, सहर बीचमे सुन्दर देखू, बालु भेटत बहु ढ़ेर॥ दुनू बगलमे नाला शोभे, पत्थल के है जोर कंशराजके कीला देखू देवकी वो वसुदेव॥ चाणूर मुष्टिक योद्धा देखू कुबजा के घर और, राधा कृष्णके मन्दिर देखू, दाउ मन्दिर शोर॥ छोड़ विभाग रामजी मधुबन, घूमि लिअ आब, कृष्ण बसथि जेहि ठौर॥ गोकुल नन्द यशोदा देखू कृष्ण झुलाउ एक बेर॥ ३४. महेशवानी भोला केहेन भेलौँ कठोर, एक बेर ताकू हमरहुँ ओर॥ भस्म अंग शिर गंग विराजे, चन्द्रभाल छवि जोर।। वाहन बसहा रुद्रमाल गर, भूत-प्रेतसँ खेल॥ त्रिभुवन पति गौरी-पति मेरो ज्योँ ने हेरब एक बेर, तौँ मेरो दुःख कओन हरखत सहि न सकत जीव मोर॥ बड़े दयालु जानि हम अयलहुँ, अहाँक शरण सूनि शोर, राम-जी अश्रण आय पुकारो, दिजए दरस एक बेर॥ ३५. भजन विनय सुनू-सुनू औ भगवान, अहाँक बिना जाइ अछि आब अधम मोरा प्राण॥ कतेक शुरके मनाबल निशिदिन कियो न सुनलनि कान, अति दयालु सूनि अहाँक शरण अयलहुँ जानि॥ बन्धु वर्ग कुटुम्ब सभ छथि बहुत धनवान, हमर दुःख देखि-देखि हुनकौ होइ छनि हानि।। रामजी निरास एक अहाँक आशा जानि, कृपा करी हेरु नाथ, अशरण जन जानि॥ ३६. महेशवाणी देखु देखु ऐ मैना, गौरी दाइक वर आयल छथि, परिछब हम कोना। अंगमे भसम छनि,भाल चन्द्रमा विषधर सभ अंगमे, हम निकट जायब कोना॥ बाघ छाल ऊपर शोभनि, मुण्डमाल गहना, भूत प्रेत संग अयलनि, बरियाती कोना॥ कर त्रिशूल डामरु बघछाला नीन नयना हाथी घोड़ा छड़ि पालकी वाहन बड़द बौना॥ कहथि रामजी सुनु ऐ मनाइन, इहो छथि परम प्रवीणा, तीन लोकके मालिक थीका, करु जमाय अपना॥ ३७. महेशवानी एहेन वर करब हम गौरी दाइके कोना॥ सगर देह साँप छनि, बाघ छाल ओढ़ना, भस्म छनि देहमे, विकट लगनि कोना॥ जटामे गंगाजी हुहुआइ छथि जेना, कण्ठमे मुण्डमाल शोभए छनि कोना॥ माथे पर चन्द्रमा विराजथि तिलक जेकाँ, हाथि घोड़ा छाड़ि पालकी, बड़द चढ़ल बौना॥ भनथि रामजी सुनु ऐ मैना, गौरी दाइ बड़े भागे, पौलनि कैलाशपति ऐना॥ ३८. भजन विहाग राम बिनु विपति हरे को मोर॥ अति दयालु कोशल पै प्रभुजी, जानत सभ निचोर, मो सम अधम कुटिल कायर खल, भेटत नहि क्यो ओर॥ ता नञ शरण आइ हरिके हेरू पलक एक बेर, गणिका गिद्ध अजामिल तारो पतित अनेको ढेर॥ दुःख सागरमे हम पड़ल छी, ज्योँ न करब प्रभु खोज, नौँ मेरो दुःख कौन हारावन, छड़ि अहाँ के और॥ विपति निदान पड़ल अछि निशि दिन नाहि सहायक और, रामजी अशरण शरण राखु प्रभु, कृपा दृष्टि अब हेरि॥ ३९. भजन विहाग विपति मोरा काटू औ भगवान॥ एक एक रिपु से भासित जन, तुम राखो रघुवीर, हमरो अनेक शत्रु लतबै अछि, आय करू मेरो त्राण॥ जल बिच जाय गजेन्द्र बचायो, गरुड़ छड़ि मैदान, दौपति चीर बढ़ाय सभामे, ढेर कयल असमान॥ केवट वानर मित्र बनाओल, गिद्ध देल निज धाम, विभीषणके शरणमे राखल राज कल्प भरि दान॥ आरो अधम अनेक अहाँ तारल सवरी ब्याध निधान, रामजी शरण आयल छथि, दुखी परम निदान॥ ४०. महेशवानी हम त’ झाड़ीखण्डी झाड़ीखण्डी हरदम कहबनि औ॥ कर-त्रिशूल शिर गंग विराजे, भसम अंग सोहाई, डामरु-धारी डामरुधारी हरदम कहबनि औ॥ चन्द्रभाल धारी हम कहबनि, विषधरधारी विषधरधारी हरदम कहबनि औ॥ बड़े दयालु दिगम्बर कहबनि,गौरी-शंकर कहबनि औ, रामजीकेँ विपत्ति हटाउ, अशरणधारी कहबनि औ॥ ४१. चैत नारदी जनानी बितल चैत ऋतुराज चित भेल चञ्चल हो, मदल कपल निदान सुमन सर मारल हो॥ फूलल बेलि गुलाब रसाल कत मोजरल हो, भंमर गुंज चहुओर चैन कोना पायब हो॥ युग सम बीतल रैन भवन नहि भावे ओ, सुनि-सुनि कलरव सोर नोर कत झहरत हो॥ रामजी तेजब अब प्राण अवधि कत बीतल हो, मधुपुर गेल भगवान, पलटि नहि आयल हो॥ ४२. भजन लक्ष्मीनारायण लक्ष्मीनारायण हमरा ओर नहि तकय छी ओः॥ दीन दयाल नाम अहाँक सब कहैये यौ हमर दुखः देखि विकट अहूँ हरै छी योः॥ ब्याध गणिका गृध अजामिल गजके उबाड़ल यो कोल किरात भीलनि अधमके ऊबारल यो कतेक पैतके तारल अहाँ गनि के सकत यो रुद्रपुरके भोलानाथ अहाँ धाम गेलायोः॥ ज्योँ नञ हमरा पर कृपा करब हम की करब यौ रामजी अनाथ एक दास राखू योः॥ ४३. महेशवानी शिव हे हेरु पलक एक बेर हम छी पड़ल दुखसागरमे खेबि उतारु एहि बेर॥ ज्योँ नञ कृपा करब शिवशंकर हम ने जियब यहि और॥ तिविध ताप मोहि आय सतायो लेन चहत जीव मोर॥ रामजीकेँ नहि और सहारा, अशरण शरणमे तोर॥ ४४. समदाउन गौनाके दिन हमर लगचाएल सखि हे मिलि लिअ सकल समाजः॥ बहुरिनि हम फेर आयब एहि जग दूरदेश सासुरके राजः॥ निसे दिन भूलि रहलौँ सखिके संग नहि कएल अपन किछु काजः। अवचित चित्त चंचल भेल बुझि मोरा कोना करब हम काजः। कहि संग जाए संदेश संबल किछु दूर देश अछि बाटः॥ ऋण पैंच एको नहि भेटत मारञमे कुश काँटः॥ हमरा पर अब कृपा करब सभ क्षमब शेष अपराध रामजी की पछताए करब अब हम दूर देश कोना जाएबः॥ ४५. महेशवाणी कतेक कठिन तप कएलहुँ गौरी एहि वर ले कोना॥ साँप सभ अंगमे सह सह करनि कोना, बाघ छाल ऊपरमे देखल, मुण्डमाल गहना॥ संगमे जे बाघ छनि,बड़द चढ़ना, भूत प्रेत संगमे नाचए छनि कोना॥ गंगाजी जटामे हुहुआइ छथि कोना, चन्द्रमा कपार पर शोभए छथि कोना। भनथि रामजी सुनुए मैना, शुभ शुभ के गौरी विवाह हठ छोड़ू अपना॥ [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] संदेश १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अंक जखन प्रिंट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे। ..सुभाष चन्द्र यादवक कथापर अहाँक आमुखक पहिल दस पंक्तिमे आ आगाँ हिन्दी, उर्दू तथा अंग्रेजी शब्द अछि (बेबाक, आद्योपान्त, फोकलोर..)..लोक नहि कहत जे चालनि दुशलनि बाढ़निकेँ जिनका अपना बहत्तरि टा भूर!..( स्पष्टीकरण- अहाँ द्वारा उद्घृत अंश यादवजीक कथा संग्रह बनैत-बिगड़ैतक आमुख १ जे कैलास कुमार मिश्रजी द्वारा लिखल गेल अछि-हमरा द्वारा नहि- केँ संबोधित करैत अछि। कैलासजीक सम्पूर्ण आमुख हम पढ़ने छी आ ओ अपन विषयक विशेषज्ञ छथि आ हुनका प्रति कएल अपशब्दक प्रयोग अनुचित-गजेन्द्र ठाकुर)...अहाँक मंतव्य क्यो चित्रगुप्त सभा खोलि मणिपद्मकेँ बेचि रहल छथि तँ क्यो मैथिल (ब्राह्मण) सभा खोलि सुमनजीक व्यापारमे लागल छथि-मणिपद्म आ सुमनजीक आरिमे अपन धंधा चमका रहल छथि आ मणिपद्म आ सुमनजीकेँ अपमानित कए रहल छथि।..तखन लोक तँ कहबे करत जे अपन घेघ नहि सुझैत छन्हि, लोकक टेटर आ से बिना देखनहि, अधलाह लागैत छनि.....ओना अहाँ तँ अपनहुँ बड़ पैघ धंधा कऽ रहल छी। मात्र सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे http://www.videha.co.in/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि आ किएक रखने छथि वा आगाँसँ दाम नहि राखथु- ई सभटा परामर्श अहाँ प्रकाशककेँ पत्र/ ई-पत्र द्वारा पठा सकै छियन्हि।- गजेन्द्र ठाकुर)... अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रशंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। विदेह सदेह:३४|| 1455 1454 || विदेह सदेह:३४
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(¢ a. » i | we 3 ¥ —S = i J?) Le J किये ar oy fea ? ey | |i : नताशा मम गण _— Se lo2= ) Onmiga Brae me : 7 BE Es visit : www.devanshuvatsa.com E-mail - devanshuvatsa@gmail.com 3 कोनो बदमाशी | | नहि नताशा, vet Pp | / हम एक हफ्ताक .आ' gg दिनक बाद : /.. dap a की ?| Lao नहि अछि... & aa आगरा जा. | हिनकर परीक्षाक रिजल्ट __ Wor —vi ei, रहल Bt आबि रहल अछि !!! LY कि = ae
_—— स्कूलक रस्ता में oe ( { ४ 2.० | जा थे नताशा J on was 2 eee fC ल् कि ६. 2 6 देवांशु वत्स | OR 7 हि | | 2०2० चर .devanshuvatsa.com mS E-mail - devanshuvatsa@gmail.com ~ गे, उं सिर का एतबा काने att आदमी ओकरा | ओ ! हम त' at ait strat) हा कियेक रहै ? कसाइ लग a जायत का स्कूल of wat wall! A LLP an हक Ba, तेँ कानें रहै. | का / V—_ll ne | Us | Bs Se सच
Ce Pe ies: है पक eae “= : ISG ir “Oy, Aq lay A (6 देवांशु वत्स | Le कै आड है; दे | | visit: www.devanshuvatsa.com E-mail- devanshuvatsa@gmail.com मुदा वापस ७ | / आगरा सं. "| कि to anfa पता नहि | अखनि त' जाइये ( ava? वापसीक जायब आगरा सं ? के प्रोग्राम afe बनल अछि !!! द् न sh Uae a G as Rt 2: -e we we. a a a ——_—— | = Sian wa 4 ho oe [| है \ | =) मे)
लि नताशा, अहांक मैथिली ges कमजोर अछि | काल्हि नताशा, अहां कें artes - . अहां घर सं अपना बारे मे 20 पंक्ति मे लीख क' हम foe कहने रही | — | oe ie OS ao CL] Beol. altel ee ae 4 © देवांशु वत्स Vass) थे » Gr हि visit: www.devanshuvatsa.com E-mail- devanshuvatsa@gmail.com oe a ig _ 2 की सार | दिखास | ओह | इ त' आहां सर, असल मे att... | |...हमर गणितो कमजोर अछि !! a eas पंद्रहे पंक्ति मे ‘ |_| 7 — — | लिखने छी..... : a a | F 2 4 ‘si LK f » i YF | ऊ ८ | E a mS he Soe: we नल है) | हट ट r= (TP) | ae ५७ | | | — i ramen
on खेल-कूद! छोटका के [) पीलू ... दूई आ' Bw a किछु अहां पढ़ा नहि सकैत छी ? चारि होयत अछि त' 4 eS “ in if - \ स्ल्ल्ल __ _ visit: www.devanshuvatsa.com E-mail- devanshuvatsa@gmail.com a आ' नौ केतना होबाक = = a जहां TES FRAN छी Pay भारी सवाल हमरा लेल चाही ? ] ii | see सवाल कें जवाब त' छोडि देलिय |! eum MP -<3.. , homer = me on “कि |
आय हम अहीं ar ae "AHIR, एन व्लनंधी Statret पूछने ज॑ल॑क we) a off i SAS... d TT a ace ts losis ITY ze | Be तर visit : www.devanshuvatsa.com E-mail - devanshuvatsa@gmail.com F op) x & fet हा =) (3 ही रत Ne जलंक॑ YA ‘et टू aff ob, Cot, एम... ‘~ पा महल कहने बहियं,. होड़त॑ अछि रद qh - ३ a oo el — : io | Am peo yea
नताशाक पड़ोंसी उस्ताद हल्ला चंद. a ....कियों संगीत अधि अहों एक दिन प्रेमी आयब गे संगीत के दुनिया मे की....? ८ (9 छा कर WI Sa) a ies — Abs fen हां visit : www.devanshuvatsa.com E-mail : devanshuvatsa@gmail.com {cant आय लेल हां हां किय नहि | दि कका, एहन कोनों i स' Yaar चाहैत छी! set अपन Tae जरूर कोनों संगीतक बात नहि अछि | असल ar हरमोनियम द' पोग्राम होयत अहांक में आय राति हमसबं... हल wi? t >: मे | jan | हि ad) Cf दर ii ‘i हु | Re (2 का | Ri 2)
% om pr feat... aN | ear सी भी. आर Je) लेल जाएं पच्चीस सौ ey Bot ea “tie 0 || or Ge cll)) | 3, [है © देवांशु वत्स / | डी » “ea se >a exe) visit : www.devanshuvatsa.com E-mail : devanshuvatsa@gmail.com सात सा क फ्रॉक [aa चारिसो | weque yeas) (ues Paar ill La aR सौ क' चूड़ी क' सेण्ट.....आ'....आ' जोड़ की निकलत Fe ar Hg = - gf a... तीन सौ क' अस्सी co... » | 2 sl | Ye क्रीम =| wa न जे 4 जि ॥ > BL be 5 cy “ जा रे... A की हल [जिया [ AN [| | १2.22 | \ S
— कक्षा मे...... Bt त' बुतरु लोकनि, et आब set सब से जे इतिहासक दोसर पाठ पूछि yo N os भेल... न oan De all LN || Ses _तकर जवाब 5) ee बताउ.... अकबर दि फटाफट I! दे जाउ ता “s के ware ? 4 तो a ae Ss हो a
arctan str Shi वेक्टोवेंट | erat लग कोनो नात नह. — Al भोजन _chotich ate... | "नहि अछि! जज अंहिताम देवान 4 ५. जाए फाड़ et आागनें Ga पट ौ बा लिनस पं जी até eater! J) ‘| eo a i जज feet... A ae’ Piams, eee ial LS Gta वत्स imo ) Je: a “4 a Sm sk Al हि www.devanshuvatsa.com devanshuvatsa@gmail.com ..पाय 9 \ ( देवीर i aac __ fatferct दहद,..कियो। [..ऊफ्द अहांक Sorry aig Act Vor ag नीम! lor भदूद भ' SoS eer संकर्त.. es जें टांगल॑ Fed! LK es F we J eal ic iy oa [es nv = La | दा CXS Rf A a fi a.
एक टा गप्प एक cl बच्चा ae, 2 oN हु | md |, Ey, sly शत Se |. 0 es pa 3b aa सा कक कह जनक, | ian Guba TP a < ं ox ((/ सच at adele Some nee: | os ite 5 i in es
व्यय न॑तीथा नानी गाम stot 3° | ( xe ferer, & a } ®& feterrar ae Se Sie a |S थी @. . ogy é Wiki, ™ atts © देवांशु वत्स N " a: Al) aa pee ee visit : www.devanshuvatsa.com E-mail - devanshuvatsa@gmail.con aa atrotenta वी Hat, fatettat a’ Ha, Het FL) 7 aes ves sHrcfat फूटिय atcter जीय॑बं....देववबं एननन॑ फूंटबी नहि | [sets कियेका (ज्ुझलिय..] | या cP’ डापंड ager at ets tafe नहि atte, chetcet... gay pM देलिय? / SS 4 IAA af ater (!! Ay ON ers weg S Po - am pe | ie - oe aD पक rf Ant ROG
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पिकनिकक योर्जना otf बहल छल... eee हम पूड़ी आ STE... ae sc Li Ca oe we i fo की न itt g s) FUP Cae A ws | © देवांशु वत्स Rom, "S| Hadise el visit : www.devanshuvatsa.com E-mail - devanshuvatsa@gmail.con hd atar BH St st Ae | | अहीँ art a’ art चीज हम माय-पंपा केँ ap atict आनंब॑ acta) | आनिय॑ et... अहिंलेल... Sak नि लेन !! a nat
नताशा स्कूल जायबाक लेल तैयार भ' रहल छल. दी न So 2 ay | ae aE re, %S a \e [ my “ ATTA |e ला रै A LF ese [DIN ioe _ _ visit : www.devanshuvatsa.com E-mail - devanshuvatsa@gmail.com एना भीख मांगै fa... अहां कें त' अखनि ओतहियों गेल छलिय .....ओतहिं फूटियो-कौड़ी ate wea I . स्कूल जाना चाही...... 2 = दी कि कम ) en aad: a fal S ‘GO? aes
नंतीकषा, एक Se | cts ? } ta a afee गप्प॑ कहूँ कि? A कि atét cd’ asta 25 की का कर i | aan 68 देवांशु वत्स |. em Been Mi ल् लि हा, कहना | <8 अहों of] [agen ल' av fasten] | atte aot कि ye ) है yy yon अपन भुगी > RV छथिन?| | Srlotgig नंनंल॑ Yee ! | दा “ लंगं.... y YY —_— = y = उन ४ PR |e) eh oat
हि , i | एतेंक देवी af स्कूल कप, सकती में sng dts i w Safe eset छी....7 . हक टकांक किंकका हवा stot a कक । रू है... 2 हि ब्लू ं a की e व . |, क्र ll ह () 9 ome (ah |S i Sg ....हम ANB ) = wis. Stl stat, ) ae: i Salat वही... अहाँ? पद जल @ aractet | न 7 डर oe दि a5 7 Eso 9. ay aoe हक _ दू वन Smee
Ss ८ ..ड़ FSR ae) गप्प॑ अछि SHEET ACIQM Sats, x नें अहीं att आने नंवंका कक्षा A एक पीषलवि लंग Gar ं 2 = मे आनिं गेल छी EA ct Ht act छल... 2. | y3- aa i 2d be kK Ro 2 ; Fall a ही था हज i jo देवां * ~~ TS wae = yy fy © देवांशु वत्स जद “नस i ae मे et एक ct | (वर, ऐको टा aa afett tT, नहि BR, Yet शायद अहीं मं" Hat पानि मे घुस stot नहि ! stat @ गणित मे tes Natron aot नंहिं a asx कै at Har A कंमजौर ot | Sfetot अछि! ! J 7 r = oF Se * ‘—2 2 § Se ee | ah. oy ae Teele te? A ——— é = = Cl | Gt Bes’ || AEs
alereme) pod, निंगलय लेल॑ कहने नही....लिंनलने a ? —< है] | |: Le dae - | ae a Ee Sai = rS\ CS I ही i || re} o tig वत्स Ot लिन | | I visit : www.devanshuvatsa.com -mail - devanshuvatsa gmail.com Part ! नतीवषा आ | | ater नंतीज [ OB] निकल नहिं are, generat | | ered कुकर ua ee cl Cg ook oe अछि हम ga शायंद..... | [Feteter लीगल goer arf य...! = on 5 | 7 2 &. =) he 7 — a i fad cS 20.60: sO Bic zz eB) ec a - i aI | है जा | Gah Sie aie = S Lo ७ = pam | roe
ला Ps ae _ ( नताशा, अहॉक ओहिठाम A | ex pes ae — Se ““s He ह. py घोड़ा ! a [] लेल aie D4 | (> ee oY ee? ae ae बा नताशा * * Oc _ : visit : www.devanshuvatsa.com _ E-mail - devanshuvatsa@gmail.com sh | काकी अपन वजन \ LG antl ea ?) & { ...हा, घोड़ाक aN au घटवाक लेल तीन | [oS कि हार | | ५ किलो कम भ' 4a !!! महीना सं घुड़सवारी | PL Ne me | a Ag दा ड hy ~~" w रहल छथिन, | i a ils ad eet 4 Zs थी maa! Sy OR ade ) i | wl दी कह fia \ | हर | a
_ नताशाक मामा आयल रहथिन.... i: श चुप रह जा के मामा As (Py . Feat एलेक बजा दर a= 2 कक का रोटी....!? दिगग ey LO eT | के ८ ae ——! F मताणा Et ad सा? शा Mek हि Oke visit : www.devanshuvatsa.com _ E-mail - devanshuvatsa@gmail.com =i ..पंचपने टा है. |. हमरा लेल पचपन टा रोटी! मता की. जज we मे से तीन अछि! ! छीं की ? woe रोटी हम खा eal दा रोटी !!! ey Aigo eS yr —_ PSS RRS Oe: a न SS — — = 2 =] om AE WO के Vi SU | | a (a
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कैल्हि wet सब के मदति Mey ‘li - करबाक पाठ सिखेन' असर भेल के द्लि जे ला हर ss yr) ke rey wy Cob ise £2: Pe Pe \ S नताशा Gh nies हाँ यो सर जी, भेलै की! | आह, अति उतमा! मुदा गा a त' हम असगरे MS बुढ़िया पार हेबाक गरे नै आई सब पांच नताशा, अहिमे पाँच ा छलिए wa टा बच्चा oer aft fe Nea We के कोन काज? दि as करत yl कु'सड़क पार करेलिये A a |_ Ace + हि ७ हि. 3s a (2: है Ls SA Sy ८9 एल Ht { 4 ठे A) = x am —_ (2. समय J
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4 ec ई नहि भेल बुचु कि fer, Tram og ae ... किछू आर THR स्वाद आहाँ नहि | अहाँ सभ के* 'ठगनाय कियो है faa... _बिसरब... भला करय ! हमरा a M ie कि सीख oi... 3 | « OO) ro. fe) ies af cal PW 2 oe =] a "vst wn dovanshuvatsa.com malt: devanshuvatsa@gmall.com War ue] Ca बाप, ई की? दल आबि गेल! a y _. ० के कर ट ge Sane SS 09 4 >>
a raat I. कालक बाद Coe सेहाब a “हद ~~ बुची | (( कतेक पाइ भ' o> Gf? oo 4 fal: eal 2 ग Ea cr Ret visit : www.devanshuvatsa.com . 43 E-mail - devanshuvatsa@gmail.com सकर सौ है दू सौ ? मुदा | | हां, Fer seta ....तीन टा पेसैंट परा \ मात्र ! बोर्ड पर त' बंचियाक ae) Tel ? i ae a पचासें टका हर सुनि SFR... नल | —s Ray i NS लिखल य'... | Et ८
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/ ड कु छी ?./ { घुमा देय छ...अहां eae | { दौड़ब रह. || . हु पमा दिया ने ! [ रत Cy Fel EL at ee me r a a ARTS नी. ' ss हि ७ हि © देवांशु वत्स a : aS | LS ||; fe th? | एहिना ६ ...कनेक = au... | | (...कनेक आर.... J a0 Ey तेज !!! - = <i एकरा नहि घुमाबैत val!
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Oo हम आइयों ओतबहिं ~ | | sei इ बात कोना iN ताकतवर छी जेतना आय से तीस न / कहि सकैत Br? © देवांशु वत्स i) 4 a | au a __ visit : www.devanshuvatsa.com E-mail - devanshuvatsa@gmail.com अहां ओ पत्थर wa ६ रहल श्ट ओकरा हम तीस ray a आइयो नहि उठा waa दर Me ? | पहिने नहि उठा a छी ll <i) > i A > 4 FG.
3 x a a हम्मर भाग्य हम सभ om ee aes नीक अछि! wa = 3 = GO Cy ~ visit: wadevanshuvatsa.com Toallio:devanshuvatsa@gmalicom एना aa at wa P एक टा उपाय इम्हर घोघी बाबू...! $ चपर...चपर...आह मजा हम सभ भुखले जाया कि सुझि गेल ! ‘ fe) आबि गेल! fe जायब! 4, ! #5 & q is cae = L | E> Seo ath ad N ( 2% it al sa a dil
एक दिन नताशाक ओहिठाम चोइर भ' गेलै.... मुदा माय wed रहो पौने | ! Care तोहर पापा कहैत रहो जे BS YY | | ४ लाखक..... से किया a } टी A Ww | aD तक... omigen = oS QF] 9 कका, नै बुझलिय, ae सदमा a | | ie हुनकर इलाजों ....जोड़ि देत छथिन HT!) | BA 2%) | = er rae © > | a ही ने
———_______— — l 'कियैक नहिं aS -4 'घोषी बाबू... 'बनभोज कयल विचार अछि! 5 aria OO ay च्लानिंग भा 0 of D \ / On oo (0) 6 A || [0 = (OO) दि seq O A = ( eas eet Wh | ian ay | fs के a eC: स्का पक! die Sora जाए ! (GO 29 5?) 2 OG) ee a ee (Bs = _ Gal. y |
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ऋषि वशिष्ठ- पूत कमाल (पृ. ६६१-६६९) देवांशु वत्स- बनभोज, बुल्लुक टॉफी, नताशा (पृ. ६७०-७०७)
face सदेह:३४|| 67I ay 2 D(a aan, an wen aA ; S \ भ' रहल अछि! आ गरीब ममा के खाए 0... fader नंद at “a A care Ps 7 @ a od ममा! ई लिय... 4 é ea) be मना फल i थी Ge | o> (अं x of a दे कै ee at ide orehietn con rallo derenetursnegiowalcon आह, AES स्वादिष्ट! कफ मुद्दा पेट afi भरल... | [TU लोकनि, ओहि में मजा आबि गेल ! la’ पेट नहीं = =) y > 0) 6 / आर frm. e. ry ६ १६ ol ) jp alee =< 0 पद af 5 3 आय त' हम्मर भाग्य हम सभ om as othe अछि! wa छी.... Ne a “est ‘ rad b5 | 5 st छत raw om aon P ला [eae Pe हम सभ Get aa? सुझि गेल ! a O ie जायब! |) } © ay be ‘eo 5 a v जम 7 ~ (a v =e & 20) Oo a | SK Naa
672 || विदेह सदेह:३४ 4 te a i — a, लोकनि... किल्ठु आर wart स्वाद आहाँ नहि हाँ सभ को * amare कियों खियाउ... fra... ला करय ! fa a i सीख oa > Q Cem | | ie awe ~ ANG Fr Te Coe . 2 Foo ratio: dnansnnateaggralcon fart एरि | ८ जि बाप, ई कौ? Caan: ) ( मजा आबि गेल! लिंग, aoe =—A—f%
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674 || विदेह सदेह:३४ iatasen जे [aaa 5 _\ करबाक पाठ सिखेन' छलों..... J] = (कि दा] प्र a Cw iol fe 2 ey fae 3.३ oy Ss) 4 रख d \Anps OP agi ha (Ss Sar (Uo 2 L 6 देवांशु वत्स S| RY Ly 4 US 024) io : nt - wwwidevanshuvaisacom हो यो सर जी, मेले की॥ आह, अति उतम! गुदा [CR | Tm असगरे) | (ga बुढ़िया पार हेबाक गरे नै ong भोर हम सब पांच | | नताशा, अहिमे पांच | | SS गेल छतिए.... we II! J] व टा बच्चा एकटा ae मैया पद _ rg a \SF ease पार Bees ed a ) nal | Le ‘a. ee ‘| ole) | RSet a Ml JSS eal oN एक दिन नताशाक ओहिठाम चोइर भ गले फिर कहेत से जे are लाखक...... से किया ot “के “किन &व्वंथुवत्त = IRS wv. अर रन Tae कर रूस | [Cae हल een Pare WS देत | ददा क' हर्ट अटैक भ' गे ay खर्चा, (Te el le | , A | Sy ‘ er & DC.
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विदेह सदेह:३४|| 679 । f ह है S&S : fOr कका केहन कि ea at a | > TT ny a quia Loi i hy \ | L i Para al Otay व Tad Gas t= IL ey _ Visit: waw.devanshuvatsa.com E-mail - devanshuvatsa@gmail.com ठीक एथिन| उ aaa Ge Raaa |) |) | -वेमारी अपनहि ठीक मं g त समय रत हम || fa जायो डॉ. | Dr !! pe ऑपरेशन क cat साहब ? Fil \ लमि/ : i VS PP in QO" ; "Pe J ahs Peon) ही C 6 = \ I) भी ts plat is / || We Fed il fa a 2 Fo | im) mer” aan | ह | न हा
680 || विदेह सदेह:३४ नताशाक मामा आयल TEM... [ a... ff है) af, peley i ¥) | eam rv eee = 4 Ky | Wis ता का Eales लो! “a ..पंचपने ot) [anes rae “| ...निकालूं एहि मे है तीन x i fll pet] वी? were P| | टारोटी!! Era, eo | i, (2 \g =) f दा i US Sook mt) kD SEN Es Eo mi Les ol ya
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682 || विदेह सदेह:३४ नताशा स्कूत जायवाक ते तैयार में रह परत, सेवी किए ) Se मे eas (UN in “Al vat deen ral-deashase@neln ना भीख मांगे fia. आहां दें त' we ओतहियों गेल wee आतहि hata है tae Ill स्कूत जना चाही... ला a मुद्दा... कु ee i)
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विदेह सदेह:३४|| 685 हा it) कक््का, waar, टिक्कू कें / | A ) yes rey किये मारि रहल छिये ? Op ae Ee I in J नशा ae 6 देवांशु वत्स टू = Ke) a | लिन visit : www.devanshuvatsa.com E-mail - devanshuvatsa@gmail.com = ort बदमाशी| | नहि नताशा, एहन हम एक हफ्ताक | ...आ' gg दिनक बाद केलक a की ?| |_गप्प ate अछि लेल आगरा जा. | हिनकर परीक्षाक रिजल्ती Po ae ? रहल छी..... | | si रहल af !!! WO ISS Ase Y
686 || विदेह सदेह:३४ . बुची oF खाय लेल डा fz... * S EE: col es) | द fe ug | - ‘sei & पड़ोसिया आ' अहांक खट्टर -अहां की खियायब ? है ई fea, हाजमाक गोली I! मिसर काकी a ves या काकी त॑ खूब तरह ; पेट चूड़ा-दही केँ मिठाइयो.... ies fd tL, i fat के. री” लकी Se Siew
विदेह सदेह:३४|| 687 ‘i wi q | cd गे, दवा, ae if ~ \ न > WG... ie ae el पक RS हिल ही ___sicwinidevanshuvatsa.com _ E-mal devanshuvatse@yehoo oo in me कह है | | fee खा धो seai.. || [raga tea दा | गहिए ae गे नींद किसी गेत सी tl ठप ही | an / हे Fe! ं 5 Ji > ee)
688 || विदेह सदेह:३४ ही fia नही |¢ | ° et मेक 4 धर नपाए। रै | | & |) | | स्स्थ्- है zl i ba omy = LT ee i | Visit: www.devanshuvatsa.com E-mail devanshuvatsa@gmal.com Toe Tah ama \ & ie ame पता नहिं ! अखनि त' जाइये A wa? amis जायब आगरा मं ), के प्रोग्राम नहिं बनत at Il क | Ap \ # N j ही पं ——__— Ps —
विदेह सदेह:३४]|| 689 = ml नताशा, Sela मेथिली aes कमजोर अछि । ake | [ नताशा, जहां के काल्हि = आहां घर सं अपना बारे में 20 पंक्ति मे लीख क' हम किछू कहने रही | s ही ara | याद अष्ठि ? शक, | cy om an) eas |S दा ही IN 2 © देवांशु वत्स | ) 00 ५. i visit wiww.devanshuvatsa com -mral- devanshuvatsa@gmall com ला गा ae Ras |) | ओह | of sei conned असल में ओ.... | |...हमर गणितों कमजोर at !! | मात्र पंद्रहे पंक्ति में. | Pp o A ) लिखने छी... : ae 2) | A हर bs 2 ~~ Py. शा No! A os: <a Co | Gb re , CG) tai. |e car a. | | ee cash] तो कट | | > QB न दि ek
690 || विदेह सदेह:३४ दिन-राति eas) छोटका के फेर... पीतू .. दूई आ' दुई =. fag वहां पढ़ा नहि संत छी ? चारि होयत af 7 | Ps oe गण i Fa बताए.. a है. | ar | Otay बस ma + _ Visit: ww.devanshuvatsa.com E-mail- devenshuvatsa@gmailcom | | [tar नो aan होबक : पद, आ बढ बुर की | |. ....आ' भारी सवाल हमरा लेत चाही? || | i | | हल्तुक सवाल कें जवाब त॑ are देलिय !! (ina ; ae अपने द' te. - 5 AL >
विदेह सदेह:३४|| 694 rey 6 मे... Be & ete Stes RR पठ W.. IME) SL लिए fod |) b 2 Aj} | ) PYAR PA | | N \ उस: J) Zz PI \- Otay aa 3 al a \ पु जि ity + [हा लक 8 नताश कार... अकबर था गा दे जाए त'... \ duaR? | ही \ | [De yf z | \ = fe गए ८ | "कल i % का f) फेर K Sa \ 4 Y mi Ye | % | |
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विदेह सदेह:३४|| 693 'नताशाक पड़ोसी उस्ताद हल्ला चंद....... aah Raat संगीत ——_— AW मालिक, अहों एक दिन प्रेमी आयब > 7 ia के दुनिया मे की...? दि है (9 (9 छा जायब |! ही a ip PG as po POW se | न Orga A (EZ Aaa visit : www.devanshuvatsa.com E-mail: devanshuvatsa@gmail.com [aor wate | 7 # ide नहि ! | [ae कका, wart | [aaa सुत्बाक aes छी! आहां अपन तबला जरूर कोनो संगीतक | || बात नहि अछि | असल ar हरमोनियम द' rat erat अहांक | | * में आय aft हमसद... सकैत Bl ?, : जे किक. | 4 Whi ~ A>POO f) LO
694 || विदेह सदेह:३४ ,. ae हे (ws शा ma हि ke et... a? WP fc arn को [ : [ ही | \e= j a = “ 0वेवंशुव्स | (nS q visit: wiww.devanshuvatsa.com E-mail: devanshuvatsa@gmail.com कवका, अहाँक | हमर ate आयें (| | कबका, हुमर कंवंका ange |......उ दुकाबंदारि ob com देल॑ a, नारे atte तंग | ॥तंगतनि टका,..अतंलंब | छथिन कि पंहिबे.... वी जिरंकां 2 ई att किन॑ल॑ गेल यहै ! तक मैं! Sega दर "| am lS cs ae ik L__/\faa_. = j | f
विदेह सदेह:३४|| 695 काका सब बहिन, $ हम । [aa aad को = ~ } aon deze । के ata (ही आह । —|| \w i Cf | | het iy | a me OP wae |! र भ्छुक || हा ” GU! Aes _ www.devanshuvaisa.com _ devarshuvatsa@gmeil com आब हा | दुई Rich बाद) | ‘an, te yl @ 7] (Gat, ऑब-अफ कब लेल rite DY er | [at ye cw) (7 बे को aaa iat में / Ra (Pe NN Ket af.) Pap | ld tee af
696 || विदेह सदेह:३४ at at Shit BNE | ( Kee 4 Ce fare owarct किन मात नह: co मं भोजन efetren ore. 2 ar | Steen da जाए ate क orate (<i co Se fe y ८5८: कि | ate obferer fA A fo MED के | a-Si SS, 4 MSS! Ac - sat ie) i y e ) 6 वेवांशु वत्स as Pe <4 ie Cal ली www.devanshuvatsa.com devanshuvatsa@gmail.com ret Recta देनाद | क्यो aac जिवियत 3G,.febe] er sets stanly ete Ret देल॑ पद attr! || cr ora oF ae Bet Sena] | X ciotet Ie! Be atretet | जेतैक | Ds at 40) "लि car | (ae, न ia A Cra) eal SaaS a = § Blot cHtett g » pm s प्र by लि लय eS meer | Game) __ 6वेवांशु वत्स EEE ee eee He ersten लजदण!| || नताथा, siqcot में हम पहलवान कंकका हीं नतब्सति स्काबण ! मर्द्लम 2 Ly 4 LO\eRCI क' हाँसि फंडल रही ! ! हैः [= Ey) Sy aS 5) पे oe 3 WP 5 | Wats DROS F [|
विदेह सदेह:३४|| 697 qea मैया, aes खुश m, उ i नताशा, आय मास्टर —- छिये। की बात ? साहेब त' aq बनि ४ गेलखिन !!! f&f } il, m0 | it ( ही हि की e i (i | oS y 3 al —> 4 7 ( rie he | ys ह & __ 6 देवांशु वत्स wredevanstuvatsacom devanshuvalsa@gral.com Gs.) ie आय हमरा ...मुददा हम हुनका इ बतैबे ...गुल्लू BY I! कोना मे मास्टर साहेब 'नहि कैलिय कि हम राजू नहि. as {¥) राजू बुझि क ite रहथिन... em - Ge ( | में कतका।नाति se , 4 a मे हां छत पर यो ger री | की weet नहिंयं..... * Be ) कि K हा ( किए भी es CAY aa (6 देवांशु वत्स का! जज “ 2-2 fan = _ vw. cevanshuvatsa.com devanshuvatsa@omaiicom भगनान! Bt) हां कनका, Ys उ जिर्नक्रा 42 अंहां बल बहिंवं!! Wis { तीनों मरि stort...) =e ia A] — | = } ee = गले लए Sia Wen ROS oF | सी | || & | ie iS c S ; Ges eo ‘oo! 3 Ss coal
698 || विदेह सदेह:३४ a a जुदा एक कटाक बाद... नल हल छी। पीलू UR ध्यान देन, मी न a मै Mp! (6१४ 2 न _— he 6 न a Yate ee 2 yall my C4 = a — कै | _ visit: www devanshuvatsa.com _ pe | sain ee फैन औहि में पानि भक्ति MER सहित ई Rouge pangs pe हि कप जिद oo Bot अखि H...... y | कोठवी मे ल' sal !| C Ps न cy — छिलका, की A w_° KS 5° = | i » पा पा मय व | Ce SI pi न (6 देवांशु वत्स J Le 0. | ‘a a css चनाय चठल थी. | हिडेनाक कोन | | Usa कि... | RT A ‘Bh A * नौत॑ 2 a a | Co j ) ae d aan न ्फ | > डॉ पक in << Ss of | me i
विदेह सदेह:३४|| 699 Pig = g cin कि जा अहि ठाम वला कोनों वस्तु-जात | सूलब, तु नहिं अछि 7 wee < es pene दबे 4 Seat | | दि पक aig 2८... he = omg ay Aa >> | | था कि ih व all कि अहाँ सम लग TATE, हमर at aes पातर Vee afi] [or कलमक ta खड़खड़ा क खेलौना, रेडियो आदि त' अछि | अहाँ सभ गप्प आहाँ |} ecto अछि !!! af अधि? aft करव. सुत्य में तैयो | + Y Vi, i दिक्कत is a Ped होयत. + C * has: + > € ei y ee हट ४ कै एव _ % By | acai, aie a aie उठा 7 y कि पंडौकी दीनी जी. Oy — Ee: taeda नर a) At “em || BS may I हि ewe हद | | : € Tt Cus Ae =| | amend उनका, डे | a \ a | organ ep eller 3 है Sees | A 5 न ns eo Let हुनका त' पुलिव्स | | eee, उनाल में Got axcvien ABT को औहिं sot मे छथिव [ Bot ot Reta, PG | sat ato आ' oncrenh... 5 = x fae) Canes a 2 Z Al
700 || विदेह सदेह:३४ सदी, पहलवान ककाक हालत Bae [पठलकान open... aa fh A नंदूड वां अछि... याति कद किक व | जिया Bb ‘ पर |. Brae पंत जेल 3. |” अछि... [हि है | गा S ) = ‘4 wv rE | | len ree BY 6 ae (6 देवांशु वत्स एल] एक अब बह जा ora |. ae जुदा हा ने; Bat gotten मालिक 'कका, STIR | है| etn ee में. | Dat एतेक acararen, HES बवतबनाक यहीं ! Jags HIRAI yi = तु गहि...... हो ener! ys ee a iia EU | Gos 3 F नगद हे | हि Rae | ( कै 2 )) « ¥ oN 0 ही हक | | (दि AW a oy >| f हि (क्रकता, एक cI kD था हब 7 ~~ का, एक छठ iG geen खत IST = = J organ FEE इक Na ASH Gp Visit us : www.kapish-solutions.com हाय! कका, हमर टिकट GR acta cf act... SRR Mate फैन BREA Ferret Foret argt सो किरनंय vasa (]. औ शुषलल Ise... tel a =I a S I £> Fool | Ls Se 0 a vast = ay
विदेह सदेह:३४|| 702 री (sis, जद 77 आन दीदी, scat eo" माय > G HMSUATA कर्तय ada wef, दो देगाँशु बरस ae? 228s है ore Hs. जबत था [Pe ae NY [उक्त Sa aeeet rca, wel 7 cask well = Fo E J Ss ] a: ocd | Bia) all Ae 4 =e | k - E | aS im area tra ठग RS (een 4 (mal. Coal ey) ania fa oes oe एतेक तेज शॉर्ककिलं... > | a“ सैलंगैत छी.... सर 4 = > x Orig वत्स (43 —) Sy ie का जा दर a stet क' डर नहिं, अहिं में Opal बवर्तननीक IS ...अपन॑ HtRet steat TE St Rete वी जाव॑ त' अहों हमदे जौतीं.. eo) लेल cy Ls a ie Pent
702 || विदेह सदेह:३४ feat. He a and @ & ee et लक U a, * A 7 | 6 देवांशु वत्स — (eS) hs eh ee ek | eon मे नालायकक' लक si Get ई HE त' दूईक | || वाह ! cRetor Bolt न | | १ बदले ter afte चंढ़य | || एकमा लियैक || | पैजामा फाइट BE सीढ़ी चलल कर जाहि 2 लंगलैक...! ait Baten 7] ।. गेलैक ! Stet क्रम निलयाय, ap एड eile ि टुक कह दि 3. @) B > : (oe जन; ong | SESSA [Se | Wy 30 sex fetes \ | GA त Sid कहबे woig मे ] //S घोड़े कहने wig कि aia घर ag Faondet eet था cer घने में 4 Ae Rew! हम्मद घन a’ at | age ie 4 fllon E/44 !!! 8 Be (| dpa || sy eli x by es 4 AP i xl oal— ad
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विदेह सदेह:३४|| 705 चिक्तनित्कर योजना ofa बल Set... ( हम Rtas o J] a, | A ) ह हम gan | | stot... a r : 4 roe a दालिं आन... he AIT POSES | me eR a gma mee Cis Ss | be 6 देवांशु वत्स wi 5 Se, “04 = ee Vist wi devanshuvatsa.com E-mail - devanshuvatsa@gmailcon -हम Ae हम ast आ Be | | अहाँ ger त grat चीज { Gr माय॑-पंपा के गज, es ee aera) | आनिय लेन.... अहिलेल... C4 आनि aet !! ae J a aie 7 s 7. न wk Maal INC LSS. We | (ES I J earl THY SA कका cor ! व हनताथा aes, sami : eae Ts) =) एक at चीज a. oS Ty oat | OX ab tn a Te न — an ss aan = ye बा: न ~ पृ = i rt | (6 देवांशु वत्स Od fit Sz L ~ Bef ‘al _ vist: www. devanshuvatse.com E-mail -devenshuvalse@amal.com हम उ कोनी मे .औकना भोग में i (|. [छि ate stagger] किवका, ana क्रलाकृति =) मकनीक जीतलंक हमर नौकर अ्संती| कलाौक्कृति? | |अहॉक atten मेहनती नौकर + feta atatterer.... | | aige क' घंटा भरत eat नाल [8 ange भ' ager atfey pow ate करतिं x | A] लि ge, i & a] [| Ke Ik ee. oo दि (522 fee faz : | Gl Pe 4 Ree) | Eee! हर || Eee 5 J \ है पक पर 2 ERS | yee Pia = re. be Y om = CNM \_ x की fia 5 ey. | as? <i [Eee EN]
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