ISSN 2229-547X विदेह सदेह ३५ रचनात्मक गद्य-पद्य लेखन भाग-४ (विदेह www.videha.co.in/ पेटार अंक १-३५० सँ) विदेह-सदेह शृंखला- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ गद्य आ पद्यक एकटा समानान्तर संकलन विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथीक सर्वाधिकार सुरक्षित अछि। काॅपीराइट (©) धारकक लिखित अनुमतिक बिना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रतिएवं रिकॉडिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक अथवा यांत्रिक, कोनो माध्यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्पादित अथवा संचारित-प्रसारित नै कएल जा सकैत अछि। (c) २०००- अद्यतन। सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर) केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ "विदेह" पड़लै।इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA (c)२०००- अद्यतन। सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि। सम्पादक 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऐ ई-पत्रिकामे ई-प्रकाशित/ प्रथम प्रकाशित रचनाक प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ मूल आ अनूदित आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। (The Editor, Videha holds the right for print-web archive/ right to translate those archives and/ or e-publish/ print-publish the original/ translated archive). ऐ ई-पत्रिकामे कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। ISSN: 2229-547X मूल्य : भा. रू. ५,०००/- संस्करण: २०२२ Videha Sadeha 35: A Collection (Vol.IV) of Creative Maithili Writings in Prose and Verse e-published in Videha e-journal issues 1-350 at www.videha.co.in). अनुक्रम गद्य-खण्ड (पृ. १-१४४९) आशीष अनचिन्हार- बिजनेसमे अप्पन नाम करितौं, पत्नीभक्त (पृ. २-७) वीरेन्द्र कुमार यादव- राजदेव मंडलक बाढ़िक चित्रपर, कथा- नाह आओर जिनगी (पृ. ८-१०) विनीत उत्पल- लघुकथा- निमंत्रण, दीर्घकथा- घोड़ीपर चढ़ि लेब हम डिग्री, विनीत उत्पलक साक्षात्कार प्रबोध सम्मान २००४ सँ सम्मानित मायानंद मिश्रसँ (पृ. ११-७१) सुजीत कुमार झा- नेपालक राष्ट्रपतिक नेपाली प्रेम- लोककें किया नहि पचि रहल!, संस्मरण- मोबाइलक घण्टी जेना रुकिय नहि रहल छल, बिहारोमे मैथिली—मैथिली- मिथिलाक विधायक सभ मैथिलीमे सपथ लेलन्हि, नेपालोमे सपथ, नेपालमे मैथिली भाषामे पढाइ: उत्साह कम निराशा बेसी, होरीके परिवर्तित रुप- जनकपुरमे महामूर्ख सम्मेलन, जनकपुरमे कोजागरा महोत्सव, मिनापक लेल एकटा आओर उपलब्धी- दू लाखक पुरस्कार, जनकपुरमे पागे पाग- पागक व्यवसायीकरण पर किया नहि सोची?, लघुकथा- भौजी (पृ. ७२-११८) सुमित आनन्द- भाषणमाला, भारत-नेपालक मिथिला हस्तशिल्प कलामे असीम सम्भावना, आचार्य सुरेन्द्र झा “सुमन” जयन्ती-२०१०, आचार्य रमानाथ झा आ प्रो. तंत्रनाथ झाक भाषणमाला-२०१० (पृ. ११९-१२९) मनोज झा मुक्ति- महोत्तरीक यूवाके देशव्यापी अभियान, अमर शहिद दुर्गानन्द जिनक सपना छल गणतन्त्र, मैथिली दिवसमे विभिन्न कार्यक्रम सम्पन्न, मिथिला महोत्सव आ एकर उपलब्धि, महाशिवरात्री मेला आ गाँजाक व्यापार, मिडिया सेन्टरक स्थापना (पृ. १३०-१४९) रमानन्द झा "रमण"- मैथिली लोक गीतक अवस्था, नेपालमे मैथिली कथाक विकास ओ प्रवृत्ति (पृ. १५०-१९५) बृषेश चन्द्र लाल- लघुकथा-गोलबा (पृ. १९६-२०३) दुर्गानन्द मंडल- लघुकथा- पारस, बुढ़िया फूसि, दुर्गानन्द मंडलक समस्त मैथिलक लेल राखीक शुभकामना (पृ. २०४-२२०) उमेश मंडल- रोहनियाँ आम, जेहन मन तेहन जिनगी, निर्मलीसँ जनकपुर धाम, कबिलपुरक कथा गाेष्ठी, सगर राति श्रोता कथा-सागरमे डुबकी लगेलन्हि, सुपौलक कथा गोष्ठी: ४ दिसम्बर २०१० (पृ. २२१-२४४) मुन्ना जी- सामाजिक सरोकारकेँ छुबैत मैथिली लघुकथा, विदेहक विहनि कथा (लघुकथा) विशेषांक (६७म अंकक मादेँ), किएक अछोप बनल अछि मैथिली लघुकथा विधा, रिपोर्ताज (पृ. २४५-२६५) अनिल गौतमक वार्तालाप तारानन्द वियोगीक संग (पृ. २६६-२७४) तारानन्द वियोगी- साहित्य अकादेमीक विशेष समारोह (१५.११.१०) मे तारानन्द वियोगीक वक्तव्य (पृ. २७५-२८२) गंगेश गुंजन- लाट साहेबक किरानी (पृ. २८३-२८६) किशन कारीगर- किरीम लगाउ-मुँह चमकाउ, मूरही-कचरी (पृ. २८७-२९४) सत्येन्द्र कुमार झा- हिस्सक, भैयारी, स्थानान्तरित दोष, अप्रासंगिक (पृ. २९५-२९८) मिथिलेश कुमार झा- कानून, दर्शन, कन्यादानक चिन्ता, महानगर-संस्कृति (पृ. २९९-३०३) चण्डेश्वर खाँ- कोटा (पृ. ३०४-३०४) धीरेन्द्र प्रेमर्षि- विचार टिप्पणी (पृ. ३०५-३०७) जितेन्द्र झा- के राखत रुमालक इज्जति, नेपालक राजनीतिक अबस्थासँ उपजल- ग्लानि, नव विवाहिताक लेल नव उमंग लाबए एहन मधुश्रावणि, काठमाण्डू। विदेशमे भविष्य देखैत अछि विद्यार्थी, काठमाण्डूमेँ कोहबर घर: वर ने कनिञा तैइयो बढिञा, परम्पराके निरन्तरतामेँ प्रवास बाधक नहि, उपटैत गाम बसाओत बाबा , महाकवि विद्यापति अक्षयकोष (पृ. ३०८-३३७) बिपिन झा- कृतारिषड्वर्गजयेनमानवीम्…। (सफलताक मूलसूत्र), प्रदेश केर विकास : एक चिन्तन (बिहार-विकास सन्दर्भ मे आलोचनात्मक अभिव्यक्ति), हे हृदयेश्वरी: एक कटाक्षालोचन, की नब साल की पुरान साल..!, समसामयिक सन्दर्भ मे गाँधीविचारक महत्ता, मिथिलांचल आ बिहार चुनाव, विरासत केर संरक्षण केकर उत्तरदायित्व?, विषवेलक सिञ्चन, गुरुशिष्य परम्परा आओर आधुनिकता, बालमजदूर पर हमर लेखिनीक दृष्टि, किछु पजरैत प्रश्न, भारत-नेपाल आओर मिथिलांचल, मजदूर सँ दूर मजदूर दिवस, शहीद कऽ चिताकऽ धूँआ क अभिलाषा, पर्वक ’औचित्यक उपेक्षा’सर्वथा चिन्तनीय (पृ. ३३८-३७४) खड़ानन्द यादव- गहूमक बोरा (पृ. ३७५-३७६) सत्यानंद पाठक- लघुकथा- स्वान विमर्श (पृ. ३७७-३८५) प्रो. वीणा ठाकुर- लघुकथा- परिणीता (प्. ३८६-३९५) साकेतानन्द- आछे दिन पाछे गए (पृ. ३९६-४०४) नवेन्दु कुमार झा- रेल लाइनसँ जुड़त भारत आ नेपाल, भारतीय सामाजिक व्यवस्थामे आइयो जीवन्त अछि जाति व्यवस्था- प्रो. शर्मा, प्रदेशमे लागत चौदहटा नव उद्योग समूह, असोचैम कएलक एहि दिस पहल- मिथिलांचलमे सेहो लागत नव उद्योग, मतदाता सभक उत्साह मध्य सम्पन्न भेल तीन चरणक मतदान- राजनीतिक दलक बेचैनी बढ़ौने अछि मतदाताक चुप्पी, राहुलक मिशन बिहारसँ बढ़ल सत्ता आ विपक्षक परेशानी:मिथिलांचलक भूमिसँ कांग्रेसक युवराज कएलनि चुनावी शंखनाद, दू वर्ष पूरा कएलक मैथिली दैनिक मिथिला समाद (पृ. ४०५-४१६) देवशंकर नवीन- बिलाड़ि, मोटर साइकिल (पृ. ४१७-४३९) डॉ. शेफालिका वर्मा- एकांकी- एकटा आर महाभिनिष्क्रमण, शैतानक वारिस, प्रतिवादक स्वर (पृ. ४४०-४६३) भारत भूषण झा- लघु कथा- आत्मबल (पृ. ४६४-४६७) कपिलेश्वर राउत- अप्पन गप- किछु विहनि आ लघु कथा [१. वंश २. उलहन ३. थरथरी ४. भोग ५. कुमारि भोजन ६. कीर्तन आ सम्मेलन ७. मूर्दा ८. सतमाए ९. तकरीर १० पान ११ मई दिवस १२ भूख १३ बेथा १४ किसानक पूजी १५ छूआ-छूत १६ कलियुगक निर्णए] (पृ. ४६८-५४०) प्रकाश झा- विश्व रंगमंच दिवस: 27 मार्च (पृ. ५४१-५४३) अनमोल झा- रिलेशन-२, तंग, डेरायल, पिछड़ल राज्य, एटेचमेन्ट, बढ़ैत चलू, दुःख, समाज, रिटर्न, फर्ज, तेल, प्रश्न, पाप, माता न कुमाता भवति, आँखिक पानि, चिन्ता, बुद्धि, कंट्रोल, चिन्तन, बोध (पृ. ५४४-५६७) रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’- जट–जटिन (लोकनाट्य- रुपान्तर - राम भरोस कापडि ‘भ्रमर’), नाटक-एकांकी भैया, अएलै अपन सोराज, राजविराजमे मैथिली लोक संस्कृति संगोष्ठी सम्पन्न (पृ. ५६८-६०५) राधा कान्त मंडल ‘रमण’- मैथिली एकांकी- कने हमहूँ पढ़व (पृ. ६०६-६१०) ऋषि वशिष्ठ- अन्हरजाली (पृ. ६११-६१५) नन्द विलास राय- लघुकथा- चौठचन्द्रक दही (पृ. ६१६-६२०) धीरेन्द्र कुमार- लघुकथा- अहींक लेल, जगदीश प्रसाद मंडलक उपन्यास- “मौलाइल गाछक फूल” (पृ. ६२१-६३०) जीवकान्त- जगदीश प्रसाद मंडलक उपन्यास “मौलाइल गाछक फूल” (पृ. ६३१-६३३) बेचन ठाकुर- बेटीक अपमान, छीनरदेवी (पृ. ६३४-७३२) अर्चना कुमर- आस, विद्वान (दादीसँ सुनल कथाक पुनर्लेखन), बेटा (पृ. ७३३-७३९) शिव कुमार झा ‘टिल्लू’- समीक्षा- सूर्यमुखी, मैथिली कथाक विकासमे गामक जिनगीक योगदान, ‘समकालीन मैथिली कविता’क समीक्षा, समीक्षा- मैथिली चित्रकथा (पृ. ७४०-७८०) गजेन्द्र ठाकुर- स॒हस्र॑ शीर्षा॒ (पृ. ७८१-११०४), जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा बायोग्राफी (पृ. ११०५-१२५०), मैथिली गजल शास्त्र (पृ. १२५१-१३२१), मैथिली समीक्षाशास्त्र (१३२२-१४१६), बाल गुरु, एकटा पत्र, माए-बेटाक मनोविज्ञान, शारदानगर (पृ. ७८१-१४२३) प्रोफेसर प्रेमशंकर सिंह- मैथिली बाल काव्यधारा (पृ. १४२४-१४४४) देवांशु वत्स- प्रगतिक रहस्य (पृ. १४४५-१४४९) पद्य-खण्ड (पृ. १४५०-१६९०) डॉ. नरेश कुमार ‘विकल’- किछु आजाद गजल (पृ. १४५१-१४५५) सुबोध ठाकुर- नव वर्षक रंग, प्रयास, प्रतीक्षा (पृ. १४५६-१४६०) सतीश चन्द्र झा- सौंसे बिहार एखनो बेहाल (पृ. १४६१-१४६३) जीवकान्त- बबलू बनबय छक्का-सत्ता (पृ. १४६४-१४६७) राजेश मोहन झा- घुरना मोन पड़ैए (पृ. १४६८-१४६९) अरविन्द ठाकुर- आजाद गजल-१-२ (पृ. १४७०-१४७१) रवि भूषण पाठक- कि भेलए एकरा? (पृ. १४७२-१४७२) प्रवीण कश्यप- पौरुष पिशाच (पृ. १४७३-१४७४) राम विलास साहु- चौवनिया नेता (पृ. १४७५-१४७६) महाकान्त ठाकुर- साहेब (पृ. १४७७-१४७८) डॉ. शेफालिका वर्मा- स्मृति-शेष, बच्चा आ व्यवस्था, देश (पृ. १४७९-१४८४) सरोज ‘खिलाडी’- गीत (पृ. १४८५-१४८६) श्यामल सुमन- कहू कि फूसि बजय छी? (पृ. १४८७-१४८७) काली नाथ ठाकुर- दहेज़ विरोधी रचना (पृ. १४८८-१४९०) किशन कारीगर- दौगल चलि जाएब गाम, आबि गेल नव वर्ष, बँटवारा, एकटा तऽ ओ छलीह, गलचोटका बर, लिखैत रही, नबकनियाँ, किडनी चोर, बीर जबान, हमरो जीबऽ दिअ, हाकिम भऽ गेलाह, पियक्कर, दहेज, देशऽक चिन्ता (पृ. १४९१-१५१८) नवीन कुमार “आशा”- मच्छर मच्छर, याद अबैए बाबाक लावा (पृ. १५१९-१५२३) मनीष झा "बौआभाई"- फहराइयै पताका (पृ. १५२४-१५२५) मुन्नी कामत- समाजक विडम्बना (पृ. १५२६-१५२६) मृदुला प्रधान- ई त बूझू (पृ. १५२७-१५३०) रमा कान्त झा- की होइत अछि कश्मीरमे आब, रही रही मोन पड़ै अछि गामक, हम की हमर पहचान की, माता के चरण कमलमे आरती प्रस्तुत, की गलती हमरासँ भेल, बिबाह ने भेल एकटा सोगातक संग भेटल, मिथिला अछि नगरी , सौराठ अछि हमर गाम, नाम सुनीता रूप आब्निता अछि, नचारी, बसन्त आबि गेल नव कालिया सगरो गाछ छा गेल (पृ. १५३१-१५४२) मनोज कुमार मंडल- बूढ़, किसान (पृ. १५४३-१५४७) बेचन ठाकुर- घरनी-बीसा (पृ. १५४८-१५५०) नन्द विलास राय- अकाल, प्रदूषण रोकू कविता (पृ. १५५१-१५५४) गजेन्द्र ठाकुर- घृणाक तरहरिमे/ बुढ़िया डाही संग अछि, घड़ी पूजा, नजरि लागि जाइ छै, ठाढ़ लत्तीकेँ पढ़ैत छी, हमर आकांक्षाक अग्नि, उजाहिमे उपलाइत हम आ माँछ, बकछुछरु खेलाइत हम आ भीखू, कटिहारी, भाग्यशाली, हाइकू/ शेनर्यू/ टनका/ हैबून, कुण्डलिया १-४, रुबाइ, कता १-२, गजल १-४१ (धांगि बाट बनेबाक दाम अगूबार पेने छँ) (पृ. १५५५-१६४८) श्वेता झा चौधरी- मिथिला चित्रकला (पृ. १६४९-१६७०) अनुपमा प्रियदर्शिनी- चित्रकला (प्. १६७१-१६७२) श्वेता झा (सिंगापुर)- चित्रकला (पृ. १६७३-१६८५) गुंजन कर्ण- चित्रकला (पृ. १६८६-१६८६) तुनिशा प्रियम-किछु चित्र (पृ. १६८७-१६९०) 2
गद्य खण्ड मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत् - हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम् अक्खर (अक्षर ) खम्भा तिहुअन खेत्तहि काञि तसु कित्तिवल्लि पसरेइ। अक्खर खम्भारम्भ जउ मञ्चो बन्धि न देइ॥ [कीर्तिलता प्रथमः पल्लवः पहिल दोहा।]माने अक्षररूपी स्तम्भ निर्माण कए ओहिपर (काव्यरूपी) मंच जँ नहि बान्हल जाए तँ एहि त्रिभुवनरूपी क्षेत्रमे ओकर कीर्तिरूपी लता (वल्लि) प्रसारित कोना होयत। आशीष अनचिन्हार बिजनेसमे अप्पन नाम करितौं मैथिलीमे आत्मकथाक नामपर जे वस्तु अबैए तइसँ अरुचि भेनाइ आवश्यक, कारण प्रत्येक आत्मकथा एहन लागत जेना लेखक सत्य हरिश्चंद्रक जेठ बालक होथि। ओइ आत्मकथा सबहक पाँति-पाँतिमे षडयंत्रक गंध भेटत। पढ़ैत-पढ़ैत एना लागत जेना लेखक बहुत रास तथ्य छोड़ि देने छथि। एकर कारण जे आत्मकथा लेखक अपन उज्जरका पक्ष मात्र देखबै छथि आ अपना द्वारा कएल गेल कारी अध्यायकेँ छोड़ि दै छथि। तँए पाठक औना क' रहि जाइ छथि आ हुनका वाग्जालक अतिरिक्त किछु नै भेटै छनि। मैथिली आत्मकथामे "कतेक डारिपर " महत्वपूर्ण अछि मुदा हमरा जनैत मात्र प्रतिक्रियासँ जन्मल अछि। १९९१सँ ल' क' २००० धरि एकटा ब्राम्हण अधिकारीकेँ लालू राजमे की-की भोगए पड़लै तकर एकभगाह विवरण अछि ऐमे। एकभगाह ऐ दुआरे जे लालू राजमे की-की फाएदा भेलै तकर ऐ पोथीमे कोनो विवरण नै अछि। ओना जँ हमर व्यक्तिगत विचार पूछल जाए तँ ई आत्मकथा कम आ संस्मरण बेसी लागैए। ऐकेँ अतिरिक्त आर आत्मकथा सभ उपलब्ध अछि मुदा वएह रोगसँ ग्रसित। ऐ ठाम ईहो गप्प मोन राखब जरूरी जे मैथिलीमे दलित आत्मकथाक घोर अभाव। घोर अभाव की मने छलैहे नै। जँ कोनो लेखक अपन आत्मकथाक शुरूआत एना करथि "जीवन एगो संघर्ष होइत अछि, संघर्षमय होइत अछि। ऐ संघर्षमे कियो-कियो आगू निकलि जाइत अछि तँ कियो अप्पन जीवनमे बहुत पाछू छूटि जाइत अछि" तँ पाठककेँ बूझि लेबाक चाही जे ई लेखक कोनो आन ग्रहसँ आएल छथि आ मैथिलीमे चलि अबैत उज्जरका पक्षबला प्रसंशात्मक आत्मकथाक जमाना खत्म होमए बला छै। ताहूमे जँ लेखक आगू बढ़ि कहथि जे "हम फेर बंगलोर चलि एलौं। ऐठाम काज भेटल खानाक केटरिंगमे, कुक सबहक कपड़ा धोइ कऽ काज भेटल" तँ पाठककेँ स्वतः ई बुझना जाइ छनि जे ई आत्मकथा वास्तवमे आत्मकथा छै। संदीप कुमार साफी मैथिलीक युवा लेखक छथि आ विभिन्न आयामक संग मैथिलीमे एलाह अछि। "बैशाखमे दलानपर" कुल पाँच खंडमे बाँटल अछि "आत्मकथा खण्ड, कविता खण्ड, विहनि कथा खण्ड, लघुकथा खण्ड आ विचार बिन्दु खण्ड"। हिनक आत्मकथाक कोनो अलग शीर्षक नै अछि जे की मैथिली लेल एकटा नव वस्तु अछि। ऐ आत्मकथामे बहुत रास नव विचार अछि मुदा हमरा बुझैत ई दलित आत्मकथा होइतो कोनो गरीब ब्राम्हणक आत्मकथा सेहो अछि। उदाहरण लेल "किछु दिन बाद गामपर सँ हमर विवाहक बातचीतक समाचार आएल जे तूँ गाम आबऽ। फरबरी-मार्चमे हम गाम गेलौं। बाबूजीकेँ कहलियनि जे विवाहमे जे दहेज देतऽ ओइ दहेजसँ अओर एक सालमे किछु रुपैया अओर लगा कऽ बहिनक कन्यादान सेहो कऽ लेब। किछु भाड़ा-बर्तन अओर ओइमे लगा देबै। ई सभ मजबूरी देख हमर विवाह २००२ मे भेल.."। आब ई देखू वर्णित विचार मात्र लेखक नै भ' क' पूरा पूरा सामाजिक बनि गेल अछि। अधिकांश मैथिल ब्राम्हण वर्ग एनाहिते करै छथि। बेटाक दहेजसँ बेटीक बियाह करै छथि। ऐ विचार सबहक अतिरिक्त ऐ आत्मकथामे बहुत रास एहन छोट छोट विचार छै जकर परिधि पूरा समाजिक छै आ ऐ छोट आलेखमे ओकरा फड़िछाएब संभव नै। ऐ पोथीक पाँचो खंडक वैचारिक परिधि एक दोसरासँ जुड़ल अछि। कने कविता खंडक ऐ कविता अंश दिस देखू-- "भाइ रौ सपनो कतौ सच भेलैए महीसक पीठपर कहूँ मंच होइए" ऐ पाँतिमे आएल बिंबकेँ देखू। कोनो परंपरासँ आयातित बिंब नै अछि ई । एहन बिंब ओहने लेखक बना सकैए जकरामे कहबी बनेबाक क्षमता होइ। से क्षमता ई नव लेखक देखा रहल छथि। ओना मैथिलीमे आन भाषा जकाँ स्त्री विमर्श सेहो पसरि गेल अछि। आ तथाकथित किछु पुरुष वर्ग सेहो अपनाकेँ फैशनक तहत स्त्री विमर्शकार मानै छथि। संदीप जी सेहो स्त्रीक उपर कविता लिखला मुदा पूरा अलग मिजाजसँ। कने देखल जाए-- "मारैके मन घरवालीकेँ तऽ कहैए सागमे किए ने हरदी देलही" मने बिल्कुल टटका आ अनगढ़ बिंबक प्रयोग कर' मे माहिर छथि ई लेखक। -कोनाकेँ बुझाएब पियास विलुप्त भऽ रहल अछि इनार------- ऐ पाँतिकेँ पढ़िते हठात् आजुक परिवेश मोन पड़ैए। एखन तँ मात्र २० टके लीटर पानि अछि ५० साल बाद की हएत ? ऐ कवितामे इनार मात्र प्रतीक अछि। --बहुत दिनसँ आइ-काइ करै छी जे एकटा महीस लेब बेटा-पुतौह बाहरे रहैए गामपर असगर बैसल नीक नै लागैए..... जँ ऐ कविताकेँ पढ़बै तँ स्पष्ट रूपें पता लागत जे एकर नायक आ नायिका गैर ब्राम्हण आ गैर कायस्थ वर्गक छथि। आइसँ १५-२० साल पहिने मात्र ब्राम्हण आ कायस्थ वर्गमे पड़ाइन होइ छलै। मुदा आजुक स्थिति भिन्न अछि आ तकरे उपज अछि ई कविता। एकटा नवका मनोभूमिक कविता थिक "मन लगले रहि गेल" से ऐ दुआरे जे कवि बिजनेस करबाक इच्छा रखने छथि। मैथिल ( खास क' ब्राम्हण आ कायस्थ) नौकरी क' लेत मुदा बिजनेस नै करत। गैर ब्राम्हण-कायस्थ तँ गाम-घरमे साइकिलकेँ चिप्पी साट' केर दोकान खोलि क' ओतबे कमा लै छथि जतेक की बाहरमे नौकरीसँ भेटै छै। तँए ई कविता हमरा हिसाबे टटका विचारक जन्म अछि मैथिलीमे। देखल जाए दू पाँति-- बिजनेसमे अप्पन नाम करितौं मिथिलाक आगू नाम करितौं पोथीमे विहिनि कथा ओ लघु कथा खंड सेहो अछि मुदा हमर अपन विचार जे लेखक केर आत्मकथा ओ कविताक सामने हमरा ई दूनू खंड झुझुआन लागल। हमर विचार जे संदीफ साफी जी जँ कवितापर गँहिकी नजरि राखि रचना करथि तँ मैथिलीकेँ भविष्यमे नीक कवि भेटतै। ऐ ठाम ई मतलब नै जे ओ विहिनि कथा ओ लघु कथा खराप लीखै छथि। मुदा एकट समीक्षकक तौरपर हमरा लगैए जे साफीजीक कवितामे किछु बात जरूर छै। आलोचक केर काजे छै जे इशारा करै जे लेखक कत' सुधार क' क' नीक लीखि सकै छथि वा कोन विधामे महारत हासिल क' सकै छथि। पत्नीभक्त भोज खएबाक लेल बैसल छलहुँ। पात पर भात, दालि आ दू प्रकारक तीमन आबि गेल छल। बारिक सभ मनोयोग सँ परसि रहल छलाह । एही क्रम मे एक गोट बारिक बजलाह-- " एखन धरि फेकू बाबू नहि पहुँचलाह आछि"। गप्प सुनतहि रमेश बाबू फरिझौलखिन्ह-- "औताह कोना पत्नी-भक्त छथि ने।घरवालीक पएर जतैत हेताह"। सुधीर फेकू बाबूक समांग छलखिन्ह, तुरछि कए बजलाह--- पत्नी-भक्त भेनाइ खराप छैक की ? जबाब दैत रमेश कहलखिन्ह तखन बैसल छी किएक जाउ अहूँ। एहि बेर सुधीर गप्प के थोड़ेक मोड़ दैत बजलाह- " त की अहाँक सिद्धान्तक मोताबिक पुरुष पत्नी-भक्त नहि भए वेश्या-भक्त बनि जाए" आ हुनक वाक्य समाप्त होइतहि सपासपक ध्वनि शुरु भए गेल। वीरेन्द्र कुमार यादव, ग्राम- घोघड़रिया, पोस्ट- मनोहपट्टी, भाया- निर्मली, जिला सुपौल राजदेव मंडलक बाढ़िक चित्रपर मैथिली साहित्यक उत्कृष्ट संकलन विदेह पद्द २००९-१० पढ़ि खूब खुशी भेल। अनेको रचनाकारक संग मैथिली साहित्य जगतमे आधुनिकतासँ ओत प्रोत कवि राजदेव मंडलजीक रचना वर्ष २००९मे कोशीक विभिषिका जे कुसहा त्रासदीक नामसँ जानल जाइत अछि। अपन देश धरि नहि किन्तु समूचा विश्वक लोकक रोइयॉं-रोइयॉं ठाढ़ कएलक, संचार साधनक विभिन्न माध्यमसँ कोशीक मध्य बसनिहारक व्यथा-कथा जतेक भोगलहुँ-सुनलहुँ ओहिसँ बेसी मंडल जीक रचनामे कोशी बीच रहनिहारक दर्द मात्र छ: दृश्यमे दृष्टिगोचर भेल अछि। मंडलजीक रचना रूचिकर लागल। एतेक दिन हिनकर रचना हिन्दी साहित्यमे पढ़ैत छलहुँ, आब मैथिलीमे हिनक रचना मिथिलाक माटि-पािन आ मिथिलामे रहनिहार लोकक लेल होमए लगल। एहि लेल मंडलजी धन्यवादक पात्र छथि। आशा करब जे मैथिली साहित्यमे िहनक रचना बराबरि आबए, हमरा सभकेँ पढ़बाक अवसर भेटए आ हमर मैथिली साहित्य समृद्ध हुअए। कथा- नाह आओर जिनगी ग्यारह अगस्त 2010क कोलाहल भरल साँझ। रूदन आ क्रन्दनक आवाज कमल किशाेरक अंगनासँ शुरू भेल आ कम समएमे ई दर्दनाक आ मर्माहतक दृश्य सौंसे गाम पसरि गेल। कियो ककरो ढाढ़स बान्हएबला नहि बचल। सबहक आँखिसँ गंगा-यमुनाक धार जकाँ जल बहए लागल। रधिया छाती पीट-पीट कऽ बाजैत- “जवान बेटीक बिआह कोना होएत? आब असगरे हम की करब? बुढ़ ससुरक गुजर कोना कराएब? हमर हीरा हमरा खोंइछासँ हेराए गेल।” दिनहिसँ धीया-पुताक मन हर्षित छल जे सांझमे भोज खएबाक लेल जाएब। चारि बजितहि कोशीक कछेर कुआटोल गामक लोक सभ अपन-अपन धीया-पुताकेँ संग कए खएबाक लेल ितलजुगा धारमे ब्रह्मोत्तर घाटपर नाहपर चढ़य लागल। भोज खएबाक उत्साहमे ई सुधि नहि रहल जे छोट नाहपर बेसी गोटे नहि चढ़ि। भोज खएनिहारक लाटमे सँ एक गोटे नाह खेबए लगल। बीच धारमे नाहमे पानि फुलए लागल। लोक सभमे भगदड़ मचि गेल। नाह डुबि गेल। तिलयुगा धार राकस जकाँ मुँहबौने लोक सभकेँ अपना पेटमे समबए लगलीह। आगि जकाँ ई खबर चारू भर पसरि गेल। चारू भरसँ झोल अन्हारिमे लोक सभ दोड़ए लगलाह आ क्षणहिमे हँसैत मनुक्खक लहास पानिसँ लोक सभ छानए लागल। भरि राति लोकसभ लहास छानिते रहि गेल। भोर होइतहि नगरक लोक, पत्रकार, सरकारक अमला-झमला घटना स्थलपर पहुँचए लागल। सौंसे गाम रूदन-क्रन्दन आवाजसँ भरल छल। कतहु सियान, कतहुँ बच्चा, बचीयाक लहास पकड़ि लोक सभ कानैत छल। कमल किशोरक जवान बेटी मुनियाँ माए रधियासँ कहलथिन्ह- “अहाँ धीरज बान्हु, जिनगीक ठेकान थोड़बे अछि जे के कखन आ कोन विधि मरताह। जनमक संगहि मरण लागल अछि। हमरा सभकेँ यएह लिखल छल। बाबू जीक संग एतबए दिनक छल। एहि दुनियाँमे सभ गोटे अपन-अपन भाग-तकदरीर लए आएल अछि।” (अपूर्ण) विनीत उत्पल लघुकथा- निमंत्रण नीताक एकटा मेल सचिनक दिमागकेँ सोचैक लेल मजबूर कऽ देलकै। आजुक बाजारवादक युगमे संबंध एहने भऽ गेल छैक जे काज भेलाक बाद लोक एक-दोसराकेँ बिसरि जाइत अछि। संबंध एहन वस्तु भऽ गेल अछि जेकरा प्रयोग केलाक बाद छोड़हिमे लोक नीक बुझैत अछि। दू गोटेक अंतरंगताक मूल्य किछु नहि अछि। केकरोसँ अपनत्व मात्र स्वार्थ लेल बनाओल जाइत अछि। सचिनकेँ मोन पड़ै लागल नृत्यांगना नीताक दोस्ती आ अंतरंगता। ............................................. ओ जूनक महिना छल जहिया पहिलुक बेर ओ नीताकेँ देखने छल। ओहि काल सचिन दिल्लीसँ ठामे दूर फरीदाबादमे काज करैत छल। ओ देशक प्रतििष्ठत एकटा अखबारमे रिपोर्टर छल। काजक संगे हुनका पढ़ै-लिखैमे बेसी मन लागैत छल। जखन ओ फरीदाबादमे छल तखन एकटा संस्था ‘वाइस ऑफ फरीदाबाद’ नामक कार्यक्रम कएने रहै जइमे नीता निर्णायक बनि आएल छल। संजोग छल जे ओहि प्रोग्रामकेँ कवर करबाले सचिन अपन संस्थान दिससँ गेल छल। प्रोग्राममे नीतासँ ओकरा नीक जेकाँ भेंट तँ नहि भेलै मुदा सचिन ओकर फोन नंबर लऽ कऽ घुरि गेल। संगे कहि देलक जे काल्हि ओ फोन करत आ एकटा छोट सन इंटरव्यू लेत। दोसर दिन जखन आफिसक मीटिंग-सिंटिंगक निपटारा कऽ सचिन नीताकेँ फोन केलक तँ नीताक खुशीक ठेकाना नहि रहलै। गपे-गपमे सचिन जानि गेल जे ओ सेहि बिहारेक अछि। दिल्लीमे काकाक संग रहैत छलीह नीता। ओ दिल्लीक कथक केंद्रसँ कथकक प्रशिक्षण लेलक अछि। संगे-संग पूरा इंटरव्यू बड नीक भेलै जे दू दिन बाद अखबारमे छपलै। भोरे-भोर जखन सचिन सुतले छलाह तखने नीताक फोन मोबाइल पर अएलै। आँखिकेँ मिरने सचिन अपन मोबाइलपर नबका नंबर देखि कऽ अलसा गेल आ साइलेंटमे कऽ देलक। किछु काल बाद फेरसँ मोबाइल टनटनाए लागल। ताधरि हुनकर निन्न टूटि गेल छलै। -हेलो, के...? -हम नीता बाजैत छी। -की, की हाल ? -नीक अछि, आइ हमर इंटरव्यू छपल, अहाँक अखबारमे। -हँ, से तँ अछि। -आँय यौ, अहाँ तँ बड्ड नीक लिखैत छी। -नहि, ओतेक नहि, जतेक अहाँ सोचैत छी। -तखन कहियौ, दिल्ली कहिया आबि रहल छी। नीता बाजि गेलीह। -देखियौ, कहिया धरि आबैत छी, जहिया आएब, कहि देब। चलु हम फोन राखैत छी। एखन धरि बिछोनकेँ नहि छोड़ने छी। -हँ, हँ, अहाँ जाऊ, फ्रेश भऽ आऊ। -ओ.के. बाय। -ओ.के. बाय। ई तँ मात्र अरम्भक गप छल जकरा बाद दुनू गोटेमे राति-बिराती गप हुअए लागल। एहि बीचमे नीता किछु प्रोग्राम करबाक लेल अमेरिका गेलीह। हुनका जाइसँ पहिलुक साँझ सचिन फरीदाबादसँ दिल्ली आएल छल आ नीतासँ मंडी हाउसमे मिलल छल। मंडी हाउसमे ओहि समए वाणी प्रकाशनक एकटा किताबक दोकान छल, जाहि ठामसँ कतेको किताब ओ किनने छल। नेनेसँ सचिनकेँ पोथी किनैक शौक रहै जे एखनो धरि छलै। अमेरिका गेलापर दू दिन नीता सचिनकेँ फोन केलक। जखन नीता अमेरिकामे छल तखने सचिनकेँ अपन आफिसक नबका बॉससँ सामान्य गपपर झगड़ा भऽ गेलै। सचिन तखन किछु बाजल तँ नहि मुदा ओहि गपक पाँचम दिन ओ नोकरी छोड़ि देलक। ओ आगराक एकटा अखबार ज्वाइन कऽ लेलक। भरि ठंढी ओ सभ दिन फरीदाबादसँ पाँच घंटाक रस्ता ट्रेनसँ कऽ आगरा जाइत छल। बादमे एकटा डेरा फरीदाबादमे आ एकटा डेरा आगरामे राखलक। एहि बीच नीता अमेरिकासँ घुरि गेल छल। दुनू मोबाइल फोनसँ भोर आ साँझ एक-दोसराक हालचाल लैत छल। एक बेर तँ एहन भेल जे एक महीनाक मोबाइल फोनक बिल एत्ते अएलै जतेक सचिनक दरमाह रहै। कारण फरीदाबादमे जे मोबाइल फोन हुनका संग छल ओ आगरामे रोमिंगपर छलै। ओहिपर इनकमिंग अएलापर सेहो पाइ कटैत छलै। दुनू युवा छल आ ओहि समएमे वैलेंटाइन डे एकटा एहन ‘डे’ बनि गेल छल जाहि दिन सभ प्रेमी एक-दोसराकेँ ‘विश’ करैत छल। संजोग छल जे तेरह तारीकक रातिमे सचिन दिल्ली आबि गेल छल, कोनो काजक लेल। ई गप नीताकेँ बुझल भऽ गेल छलै। ओ सचिनकेँ नाकोदम कऽ देलकै जे आइ अहाँ मंडी हाउसक रेस्टोरेंटमे आऊ। भोर भेलापर सचिन भेँट करबाक लेल मंडी हाउस पहुँचलाह तँ नीता पहिनेसँ ओत्तै बाट ताकैत रहै। दुनू गोटे नास्ता कऽ चाह पीबि हाय-हेलो कहि कऽ बिदा भेल। साँझ खन जखन ओ आगरामे अपन ऑफिसमे काजमे लागल छल तखने नीताक फोन अएलै आ ओ ऊकरा प्रपोज कऽ देलकै। ओहि दिन नीता सचिनक जिनगीमे पहिल लड़की छल जेकरा ओ प्रेमक प्रस्ताव देने छल। ओकर दिमाग कनी काल लेल सुन्न भऽ गेलै जे ई की सुनि रहल छी। दोसर दिन पन्द्रह तारीख छल आ नीता ओकरा दिल्ली आबैक लेल जिद करए लागल। एखन धरि सचिनकेँ दिल्ली काटि रहल छलै आ ओ दिल्लीक नाम पर नाक-भौंह सिकुड़ैत छल। मुदा एहि गपक बाद ओकरा ताजमहलक नगरी आगरासँ विरक्ति होमए लगलै। ओ जिदिया गेल छल। दोसर दिन अपन बॉससँ छुट्टी मांगलक मुदा नहि भेटलै। ओकरा एतेक तामस उठलै जे ओ नोकरी छोड़ि कऽ दिल्ली बिदा भऽ गेल। नहि आगाँक सोचलक आ नहिये पाछाँक जे दिल्लीमे आगू की करब। खाली एकेटा गप मोनमे छलै जे आब ओकर जिनगीमे नीता आबि गेल छै, किछु ने किछु तँ कैये लेत। दिल्ली अएलापर ओकर शुरू भऽ गेलै द्वारि-द्वारि भटकब आ घूमब आ ताकब नोकरीक नब ठिकाना। एहि बीच सचिनकेँ गोसाँइ भऽ गेलै। जहि दिन ओकर जन्म दिन छल ओही दिन ओ गोसाँइक कारण बोखारसँ जड़ि रहल छल। एहि दिन पहिलुक बेर दिल्लीक शकरपुरक डेरापर नीता ओकरा देखबा लेल आएल छलि। सचिनकेँ सभ किछु एकटा सपना सन लागैत छलै। ओहि दिन गपे-गप मे सचिन नीतासँ पुछिये देलखिन। ‘नीता, अहाँ हमरासँ दोस्ती किऐ करैले चाहै छी।’ ‘अहाँमे हम एकटा किछु पाबैत छी, जे हमरा नीक लगैत अछि।’ ‘देखियौ नीता, जिनगी बड पैघ अछि, हमन एखन छी बेरोजगार। हमरा संगे अहाँ खुश नहि रहि सकब।’ ‘ओ सभ छोड़ि दियौ। से कहब तखन तँ हम तँ नृत्य करैत छी। जखन कोनो कार्यक्रम भेटैत अछि तखने हम कमबैत छी। से ताहि हिसाबे हम तँ अहूँसँ पैघ बेरोजगार छी।’ ई कहि कऽ नीता ठठा कऽ हँसि देलक। नीताक तर्क आ गोसाँइ भेलापर मना करबाक बादो देखैले आबैक गप सचिनक आत्मामे बसि गेलै। ओ सोचै लगलाह जे गोसाँइक कारण दुनियामे कतेक लोक मरि गेल। हुनकर नीक दोस्तो छाँह काटैए। ई छूतिक बीमारी छिऐ तखनो नीता हुनका देखबा लेल आएलि। ई कतेक सोचै बला गप अछि। समए बीतैत गेल, दुनूक दोस्ती प्रगाढ़ भेल गेल। एहि बीज सचिनकेँ एक ठाम नौकरी लगलै मुदा दू मास नहि बीतल होएतैक जखन ओकरा फेर नीक अखबारमे नौकरी भऽ गेलै। पी.एफ कटै लगलै, नीक दरमाहा भेटै लगलै। एहि बीच एक दिन जखन सचिन दिल्लीक पश्चिम-विहारमे नीताक घर गेलाह तँ ओ नीताकेँ चुम्बनक प्रस्ताव रखलखिन तँ ओ मानि मुदा दुनूक मुँह लाल-लाल भऽ गेलन्हि। एहि बीच दुनू एक-दोसराक पूरक भऽ गेल छल। जतए सचिन नीकसँ अपन ऑफिसमे काज करैत छल ओतए नीता बाल-उत्सव, बिहार-उत्सव आ आर कतेक कार्यक्रमक नीकसँ आयोजन कएलक। संगे-संग दुनू खूब घुमैत छल। कहियो सचिनक डेरापर नीता आबि जाइत छलि तँ कहियो नीताक घरपर सचिन पहुँचि जाइत छल। दुनू गोटेकेँ निन्न एक दोसराकेँ शुभ-रात्रि करबाक बादे आबैत छलै। नीताक सभटा मेल सचिन आपरेट करैत छल। अमृतसरक एकटा नामी स्कूल लेल नीताकेँ प्रोजेक्ट भेटलै। ओ ओतए जाए लगलीह आ बिदा करबाक लेल सचिन नई दिल्ली स्टेशन पहुँचल छल। ओ चिंतित छल जे जाहि लड़कीक लेल ओ एतेक समए बरबाद कऽ रहल छल से ओकर जिनगीसँ जा तँ नहि रहल छलै। गपमे सचिन कहि देलखिन- ‘हे नीता, एहन पागल लोककेँ अहाँ देखने छिऐ जेकरा बुझल छै जे ई ओकरा नञि भेटतै तकरा बादो ओ प्रेम करैत अछि।’ पत्रकार हेबाक कारण सचिन कोनो गप एहन आसानीसँ कहि दैत छल जे ककरो मोनकेँ तीत कऽ दैत अछि। ई ओकर आदति बनि गेल रहै जेकरा ओ चाहियो कऽ नहि बदलि सकैत छल। ई गप सुनि कऽ नीता ओकर हाथ पकड़ि लेलक आ आपन आंगुरकेँ ओकर आंगुरमे फँसा कऽ कहलक- ‘सचिन, एना अहाँ किऐ बाजैत छी। जे भगवान चाहलक तँ हम अहाँक भऽ जाइब।’ ‘तखन की हमर मरण होएत। एक दिस घरक लोक रहत, दोसर दिस हमर प्रेम।’ ई सुनि लागल जे नीताक देहमे जान नहि छैक। ओकर मुँह चुप रहि गेल आ ओ एकटक्कीसँ सचिनक मुँह देखए लागल। ताधरि शताब्दी ट्रेनक सीटी बाजि गेल आ दुनू गोटे एक-दोसरक गरा मिलि बिदा लेलक। जाधरि ट्रेन नई दिल्लीक एक नंबर प्लेटफार्मसँ निकलि नहि गेल ताधरि सचिन चलैत ट्रेनकेँ देखैत रहि गेल। सत मानू तँ दुनू गोटाक बीच प्रेम तकरा बादे बढल। अमृतसर तँ नीता चलि गेलि मुदा कोनो दिन नहि बीतल होएत जाहि दिन भोर ओ रातिमे सुतएसँ पहिने फोन नहि करथि। आठ दिन बीतल, एना लागैत छल जेना आठ बरख बीति गेल छल। बारह बजे राति तँ छोड़ि दियौ चारि बजे भोर सेहो नीता फोन करैत छल। जेखनकि ओ जानैत छल जे तीन बजे सचिन आफिससँ आबैत अछि। अमृतसरक डी.ए.वी. कॉलेजक छात्र-छात्राकेँ ओ नृत्य सिखाबैत छल। ओकर कोरियोग्राफी क्षमताक आकलन एना कऽ सकैत छिऐ जे ओहि साल डी.ए. वी. कॉलेज ऑल इंडिया इंटर कॉलेज कंपीटिशनमे पहिल रहल। जखन ओकर सिखायल टीम एनाउंस भेल छल, नीताक आँखिमे पानि आबि गेल छल। सचिनसँ फोनपर गप करबाक लेल ओ व्याकुल भऽ गेल। ठामसँ बाहर निकलि ओ फोनपर कहलक, ‘हेलो। सचिन अहाँकेँ बुझल अछि ?’ ‘की ?’ ‘हमर टीम देशमे फर्स्ट आएल छल। जहिना रिजल्ट एनाउंस भेल तहिना प्रिसिंपल सभ लोकक आगू मंचपर गरा लगा लेलक।’ ‘ओहो। की गप अछि, अहाँकेँ मेहनतिक फल भेटि गेल।’ ‘हँ, से तँ अछि’ तखने सचिन हंसी-ठठ्ठा कएलक। ‘मुदा अहाँ जेकरासँ प्रेम करैत छी से ई रिजल्ट नहि होइत तँ की होइत ?’ ‘हँ, अहाँक संग नहि भेटितए तँ ई नहि भऽ सकैत छल’- सकुचाइत नीता फोनपर बाजलि। ‘एहिमे हमर की योगदान अछि ? अहाँक मेहनति अछि।’ देर राति भऽ गेल छल। नीताक प्रेमक अंकुरण ओकर मोनमे भऽ रहल छलै। अन्तमे बाजल- ‘आइ अहाँक मोन पड़ि रहल अछि।’ ‘किए ?’ ‘किएक तँ हम अहाँसँ प्रेम करैत छी ।’ ‘चलू अहाँ खेनाइ खा कऽ जा कऽ सुति जाऊ, भोरेसँ कार्यक्रममे लागल छी ।’ एकर बाद दूनू गोटे फोन राखि देलखिन। दूनू गोटे कैरियरकेँ लऽ कऽ सीरियस रहथि। सचिन एहि बीच नीताक वेबसाइटो बना देलखिन। सभटा फोटो खीचाबैक लेल नीता सचिनक संग दिल्लीक लोधी गार्डन गेल छल। जेना-जेना सचिन कहलक तेहने-तेहने फोटोग्राफर फोटो खिचलक। सभटा फोटो हुनकर बेवसाइटपर धऽ देलखिन्ह। एहि बीच फोर्ड फाउंडेशनक फार्म भरैक आवेदन निकलल। अहाँकेँ बता दी जे जिनका फोर्ड फाउंडेशनक अन्तर्गत स्कॉलरशिप भेटल अछि ओ दुनियाक कोनो संस्थानसँ एम.ए. क पढ़ाइ कऽ सकैत अछि। सभटा पाइ संस्थान दैत अछि। सचिन अप्पन तँ नहि मुदा नीताक फार्म भरि देलखिन। संजोग एहन जे पहिलुक स्टेपमे नीताक चयन भऽ गेल। नीताक सफलता सचिनक सफलता छल। दुनू गोटे खुश भऽ गेलाह आ घरक लोक सेहो खुश भऽ गेल। भोरसँ लऽ कऽ रातिमे सुतै धरि पचासो बेर फोनसँ सभटा गप दूनू एक-दोसराकेँ बताबथि। दुनू झगड़ो खूब करथि मुदा प्रेममे कोनो कमी नहि आएल। सचिन तँ हुनका पर एकटा कवितो लिखने रहथि। दुनू दिल्लीक मंडी हाउससँ लऽ कऽ लक्ष्मीनगर, मयूर विहार फेज तीन, रमेशनगर, पश्चिम विहार आर कतेक ठाम जाइ छलाह। एहि बीच नीताक स्तनमे दर्द रहए लागल। हुनका डर भऽ गेलन्हि जे ब्रेस्ट कैंसर भऽ गेल छनि। दिल्लीमे ओ अपन काकाक संग रहैत छल से हुनका ई गप नहि कहि सकल। ओ सचिनकेँ ई गप कहलन्हि। नीता चिंतामे रहए लागल जे कैंसर भऽ गेल छन्हि। आब जिनगी तँ ओंगरीपर गनैक गप अछि। ओ डॉक्टरोसँ देखबैक पक्षमे नहि छल। मुदा सचिन अप्पन जिदपर नीताकेँ एस्कार्ट अस्पताल लग होली फैमिली अस्पतालमे देखाबैक लेल लऽ गेल। सचिनक कहब छलनि जे होली फैमिलीमे देखा लेब। नहि किछु भेटत तँ ठीक, नहि तँ दोसर अस्पतालमे देखाएब। दुनू गोटे अस्पताल गेलाह मुदा किछु नहि भेटलन्हि। डॉक्टर कहलखिन जे ‘पीरियड’ क आगू-पाछू भेलासँ एना भऽ जाइत अछि। किछु दिन बाद ठीक भऽ जाएत। नीता डॉक्टरक एहि गपसँ संतुष्ट नहि भेल। ओ किछु दिन धरि परेशान रहलि मुदा एकटा पुरान दोस्तक संग ‘सर गंगाराम अस्पताल’ मे जाँच करौलनि। दू दिन धरि भाग-दौड़ कएलनि आ सचिनकेँ ओतए आबैसँ मना कऽ देलखिन। ओतहु जाँच भेल मुदा रिपोर्ट पहिलुके जना रहल। अहाँ ई गप मानू वा नहि मानू मुदा अपना सभक इलाज सस्तेमे भऽ जाइत अछि तँ मोन संतुष्ट नहि होइत अछि। जखन कोनो डॉक्टर इलाजक खूब पाइ लैत अछि आ खूब आडंबर देखाबैत अछि तँ अपना सभकेँ लागैत अछि जे ई नीकसँ इलाज केलक। आर जखन कोनो डॉक्टर इलाज काल खूब इंतजार करबैत अछि तँ हम ई बुझैत छी जे ई डॉक्टर बेसी व्यस्त अछि ताहिसँ ई नीक डॉक्टर अछि। ई गप सत्तो होइत अछि मुदा देशमे 90 प्रतिशत डॉक्टर नौटंकी करैत अछि। नीता ओहि समाजसँ छल जे एहि गपकेँ नहि बुझैत छल। सर गंगाराम अस्पतालमे जखन पाइ खर्च भेल तखन हुनका संतुष्टि भेलन्हि जे हमर इलाज भेल। एहि बीच दुनू गोटेक घरक लोग ब्याह करैक लेल गप शुरू कएने छल। सचिनक घरक लोक ब्याहक लेल कएक गोटेक संग गप चलौलक मुदा पसीन नहि पड़लैल। दोसर कात नीताक ब्याहक लेल सेहो गप चलैत छल। दूनू एक-दोसराकेँ सभटा गप कहैत छल, दुनू एक-दोसरासँ प्रेम तँ करैत छल, मुदा बियाहक लेल चुप छल। एहि बीच भगवान जानए जे की भेल। नीताक बात-व्यहार बदलि गेल छल। कोनो ने कोनो गपपर ओ सचिनसँ झगड़ा कऽ लैत छल। सचिन तखन तँ नहि किछु बाजैत छल। घर एलाक बाद ओकर आँखिमे नोर आबि जाइत छल जे जकरासँ ओ प्रेम करैत अछि, ओ एना किए करैत अछि। नीता आब एहन भऽ गेल छल जे रिक्शापर, ऑटोपर, मेट्रोपर जतए मौका भेटैत छल ओ सचिनसँ झगड़ैत छल। जखन सचिनसँ काज पड़ैत छलै तखन ओ नीक भऽ जाइत छल मुदा काज भेलाक बाद मीन-मेख निकालैत छल। लोकक आगू सचिन लग एना ओ रहए लागल जे ओकरा नहि चिन्हैत अछि। जूनक मास छल जखन नीताकेँ फेर अमेरिका जएबाक छलै। एक महीना रहैक छलै आ कतेक कार्यक्रम छलै। दू दिन पहिने ओ सचिनकेँ अप्पन घर बजौलखिन। हुनकर परोक्षमे जे सभटा काज होएत, सभटा कागज, एतए तक तक जे अपन साइन कऽ खाली चेक दऽ देलक। घरमे कियो नहि छल। दूनू गोटा खूब एक-दोसराक प्रेममे डूमि गेल छल। संगे खेनाइ खएलक। तकर बाद अप्पन-अप्पन काजक लेल कनॉट प्लेस पहुँचि कऽ बिदा भऽ गेल। दुनूक बीच संबंध तहिना छल। कखैन झगड़ा भऽ जाइत कियो नहि जनैत छल। हँ एकटा गप जरूर छल जे बिना नागा दू सालसँ रातिमे सुतैसँ पहिने नीता ‘गुड नाइट’ क संदेश मोबाइलसँ जरूर दैत छल। कहियो ‘आई लव यू’ आ ‘आई किस यू’ क मैसेजो भेज दैत छल। जाहि दिन नीताकेँ अमेरिका जएबाक छल ओहि भोर ओ सचिनकेँ अपन घरपर बजौलखिन। जखन सचिन नीताक घर पहुँचलाह तँ ओ फोनसँ टैक्सीबलासँ गप कऽ रहल छल। ओ कहि रहल छल जे एयरपोर्टसँ ओकरा एक गोटाकेँ लऽ कऽ मुखर्जीनगर जाए पड़तै। मुदा नीता सचिनकेँ देखितहि तुरंत फोन राखि देलक। सचिन एहि गपकेँ अन्ठिया देलक। दुनू गोटे संगे चाह पीबि कऽ घरसँ बहरेलाह। नीता कहलक जे हुनकर काका एयरपोर्ट छोड़ए लेल जएताह। ताहिसँ ओ अपन काज करए। ओकरा कोनो दिक्कत नहि होएतैक। नीताकेँ नाट्य वैले सेंटर जेबाक छलै आ सचिनकेँ ऑफिस। शिकागोक होटलक टिकट नीताक मेलसँ निकालि कऽ, दऽ कऽ ओ शकरपुरक दोस्तक कमरामे आराम करै लेल आबि गेल। दोस्त संग गप करैत सचिनकेँ निन्न आबि गेलै। ओ ओतए सुति गेल। निन्न खुजल तँ साँझक चारि बजैत छल। हनकर ऑफिस साँझ छह बजेसँ छल। फटाफट तैयार भऽ कऽ आफिस लेल बिदा भेल तँ नीताकेँ कऽ फोन लगौलखिन। आवाज कोनो पुरूखक आएल- ‘हेलो’ ‘हेलो के’ ‘नीतासँ गप करबाक अछि’ ‘ओ तँ एतए नहि अछि’ ‘तँ कतए अछि’ ‘अहाँ कहू, की गप अछि आ के बाजैत छी’ ‘हम सचिन बाजैत छी, अहाँ के’ ‘हम समरेंद्र, नीता तँ घरपर अछि, हम घर पहुँचि कऽ अहाँसँ गप करबा देब’ ई सुनि कऽ सचिनक तामस सातम आसमान छुबै लागल। ओकरा नहि रहल गेलै- ‘अहाँ झूठ किऐ बाजि रहल छी’ ‘हुनका हम किछु काल पहिने कनॉट प्लेसमे छोड़ि कऽ आएल छी’ ‘ओ घर कतएसँ पहुँचि गेल’ ‘हम घर पहुँचि कऽ अहाँसँ गप कराबैत छी’ कहि समरेंद्र फोन काटि देलक। सचिन खून घोंटि कऽ रहि गेल। मुदा ओकरा ऑफिस जएबाक रहै से ओ चलि गेल। ऑफिस पहुंचि ओकरा मोन नहि लागलै। कनी देरीमे नीताक फोन आएल। खूब तमसाएल जे फोन उठाबै बलासँ एना किऐ बाजलिऐ। एहि गपपर सचिन आर तमसा गेल। दुनू गोटामे घोर बहस भेलै। नीता अपन घुंघरूक सप्पत खाइत रहि गेल जे ओ ओकरेसँ प्रेम करैत अछि। दूनू गोटामे ताधरि बहस होइल रहल जाधरि नीता हवाइ जहाजपर चढ़ि गेल। सचिनकेँ बेसी तामस एहि गपक छल जे समरेंद्र किए नीताकेँ छी लेल हवाइ अड्डा गेल छल। सचिनकेँ सभसँ बेसी तामस एहि गपक छल जे आगू बला लोक किए झूठ बाजैत छल। नीताक एकटा झूठ ई छल जे ओकर चाचा ओकरा एयरपोर्ट छोड़ै लेल जाएत आ गेल छल समरेंद्र। आ झूठ बाजैबला लोकक संग ओ एयरपोर्ट गेल। ओकरा मोनमे ओ गप आबि गेलै जे भोरमे नीता फोनपर करैत छल। मुखर्जीनगरमे समरेंद्र रहैत छल। आब साफ-साफ सभ किछु सचिनकेँ बुझबामे आबै लागल। अमेरिका गेलाक बाद आठ दिन तक नीताक कोनो फोन नहि अएल। ओहि बीच सचिनकेँ हैदराबाद जाए पड़लै, बहिनकेँ पहुँचाबैक लेल। हैदराबादसँ दिल्ली आबैक रस्तामे ओ छल जखन नीताक फोन आएल। ओ कहलक- ‘सुनु सचिन, हम समरेंद्रसँ ब्याह कऽ रहल छी, घरक लोककेँ ओ पसीन अछि।’ ‘अहाँ जनैत छी जे की कहि रहल छी’ ‘हँ, अहाँक संग हमर जिनगी नहि कटि सकत, आइ हम निर्णय लऽ लेलहुँ’ ‘आब, हम की कहू। अहाँ जे निर्णय लेने छी ओ नीके होएत’ ‘अहाँ नीकसँ रहू, खुश रहू आर हम की कहि सकैत छी।’- सचिन बजलाह। ‘मुदा, अहाँ नीक काज नहि कएलहुँ। समरेंद्र नीक आदमी नहि अछि’ ‘अहाँ हुनका लऽ कऽ किछु नहि कहू’ ‘हँ, हम तँ कहब किएक तँ ओ झूठ बाजैत अछि। आ हम नहि चाहब जे हमरासँ जे लड़की प्रेम करैत छल से कोनो झूट्ठाक संग जीवन जिऐ।’ ई सुनि नीता अपनाकेँ बिसरि गेल। ओ तमैस कऽ जतेक श्राप आबैत छलै से ओ आ॓ सचिनकेँ देलक। सचिन सुनि कऽ काँपै लागल जे नीता ओकरा एतेक श्राप कोना दऽ रहल अछि। सचिनक मुँहक खखार सुखा गेलै, कोनो बकार बाहर नहि आबैत छलै। ओ आस्तेसँ एतबे कहलक- ‘गिद्धक श्रापसँ गाए नहि मरैत अछि आ अहाँ अप्पन श्राप अपनहि लग राखू, हम नहि लेब, जखन जरूत होएय लेने जाएब अहाँ।’ कहिके फोन राखि देलक। एहि बीच नीता अमेरिकासँ घुरि गेल छल। दूनू एक-दोसरक सभटा समान घुरा देलक। दूनूमे गप बंद भऽ गेलै। सचिन अपनाकेँ असगर अनुभव करए लागल आ कहुना कऽ अपनापर नियंत्रण राखलक। दोसर कियो रहितए तँ पागल भऽ जैतए। एहि बीच एक दिन सचिनक मोबाइलपर नीताक फोन आएल- ‘हेलो सचिन’ ‘हँ’ ‘केहेन छी अहाँ’ ‘जी, नीक छी। अहाँक बात भऽ गेल। समरेंद्र मरि गेलाह।’ ‘ओह, अहाँ की कहि रहल छी’ ‘हँ, अहाँ आब खुश भऽ जाउ’ ‘अहाँ झूठि बाजि रहल छी, एना नहि भऽ सकैत अछि’ ‘हँ, ई सत अछि’ ‘कोना भेल ई गप’ ‘अहाँक श्राप हमरा लागि गेल’ ‘हम तँ अहाँकेँ कोनो श्राप नहि देलहुँ, अहीं देने छलहुँ’ ‘हँ, तँ सभटा हमरा परल’ ई गप सुनि कऽ सचिन जतए ठाढ़ छल ओतहि ठाढ़ रहि गेल। ओकरा नहि फुरल जे ओ की बाजै। ‘सचिन आजुक बाद अहाँ कहियो हमरा फोन नहि करब। हम अहाँक संग कोनो संबंध नहि रखैत छी।’ ई कहि नीता फोन काटि देलखिन। सचिन सोचए लागल जे ई की भऽ गेल। हुनकासँ जे प्रेम करैत छल ओ आइ एतेक दूर भऽ गेल छल जे चाहियो कऽ ओ किछु नहि कऽ सकैत छल। मुदा, समए सभकेँ अपना तरहे जीबाक योग्य बना दैत अछि। सभ लोक कालक मोहरा अछि आ शतरंजक प्यादासँ अलग केकरो अस्तित्व नहि अछि। समय बीतैत गेल आ सचिन आइ एकटा अखबारमे नीक पोस्टपर पहुँचि गेल अछि। असगरे जखन रहैत छल तखन नीताक याद ओकरा तंग कऽ दैत छल। ताहि लेल ओ हरदम अपनाकेँ व्यस्त राखैत छल। नीतासँ दूर भेलाक बाद एखन धरि ओ तीनटा किताब लिख लेने छल। एहि बीच नहि तँ नीता ओकरा कहियो फोन कएलक आ नहि सचिन नीताकेँ केलक। ............................................................. आइ कएक साल बाद नीताक संस्थान मेलसँ नीता सचिनकेँ अपन कार्यक्रमक निमंत्रण पठेने छल। मंडी हाउसक एल.टी.जी. सभागारमे मंगल दिन साँझमे नृत्यक कार्यक्रम अछि। आइ सोम दिन अछि। तखने सचिनक मोबाइल फोनक घंटी बाजल। दोसर तरफ ओकर बॉस छल। ‘जी सर’ ‘सचिन, अहाँकेँ आइ साँझमे न्यूयार्कक फ्लाइट पकड़हि पड़त। एखन दू बाजि रहल अछि, साँझ छह बजैत टिकट आबि जाएत। जल्दीसँ घर जा कऽ तैयार भऽ जाउ। ओतए अहाँकेँ तीन दिन धरि संयुक्त राष्ट्रसंघक अधिवेशनकेँ संबोधित करए पड़त। भारत सरकार एकमात्र अहाँकेँ अपन प्रतिनिधि बना कऽ पठा रहल अछि।‘ फोन राखि सचिन अमेरिका जाइ लेल तैयार होमए लेल मेल बंद कऽ आफिससँ बिदा भऽ गेल। दीर्घकथा- घोड़ीपर चढ़ि लेब हम डिग्री जे कथाकार नहि हुअए ओ कोन आ केहन कथा लिखत, एकर ठेकान तँ कियो नहि कऽ सकैत अछि। मुदा युवा पीढ़ीकेँ देखि कऽ कोनो कथा लिखब संभव नहि अछि आजुक कालमे। तकर बादो कियो हुनका लऽ कऽ लिखैत अछि तँ कहि सकैत छी जे ओ सभटा फूइस लिखि रहल अछि। एकरा मादे हमर ई तर्क अछि, जे युवा अछि ओ केना बुझता जे ओ सतमे युवा छथि या नहि। जखन एहि भारत मे 80 बरखक बुढ़ जे.पी. युवाक नेतृत्व कऽ सकैत अछि, जीवनक आखिर कालमे देशमे संपूर्ण क्रांतिक बिगूलि फूकि सकैत अछि, तखन युवाक उम्रक की सीमा मानैत अछि कियो। नेनामे जखन स्कूल जाइत अछि तखन सभ सोचैत अछि जे कॉलेजमे खूब उछल-धक्का करब। कॉलेजमे गेलापर लागैत अछि जे करियर बना लेब तकर बाद तँ अपन जिनगी अछि आओर जखन करियर बनि गेल, ब्याह भऽ गेल तकरा बाद दुनिया सूझै लागैत अछि। जखन जिनगीक ई परिभाषा अछि तखन युवाक कोन कथा लोक सभकेँ सुनाओल जाइत अछि। मां-बापक सपना, भाइ-बहिनक इच्छाक आगू अप्पन सपना तँ अधूरे रहि जाइत अछि। यएह हाल तँ आलोकक छल। हुनकर नजरिसँ देखियौ तँ ओ कहियो युवा भेल या नहि स्वयं नहि जानैत अछि। एकटा आओर गप, एहि कथाक शीर्षकपर एखन नहि जाऊ। अहाँ तँ जानतै छी जे ब्याह करहि लेल लड़का घोड़ीपर बैसि कऽ बाराती जाइत अछि। मुदा आब हमरा ई नहि कहबै, ‘आंय हो, हमरामे तँ लड़का घोड़ीपर बैसि कऽ बराती नहि जाइत अछि। ई कोन गप अहाँ कऽ रहल छी’। एहि गपमे हम एतेबे टा कहब जे अहाँक बिरादरीमे ई विधि नहि होइत अछि, एकरामे हम कत्तौसँ दोषी नहि छी। किएक तँ जिनकर जाति, वंशमे जे भेल आयल अछि, आ॓हि विधिकेँ हटायब 21म शताब्दीमे बड़ कठिन गप अछि। फेर ईहो गप अहाँ हमरा नहि कहि सकैत छी जे कत्तौ घोड़ी पर चढ़ि कऽ डिग्री लेल जाइत अछि। तँ सुनू ई, जे गप छैक, ‘घोड़ी पर चढ़ि लेब हम डिग्री’, ई हमर नहि अछि। ई गप आलोक बाबू हमेशा कहैत छला। आलोककेँ अहों तँ नहि जानैत छी। ओ, ओ आलोक नहि अछि जकर अर्थ रोशनी होइत अछि। ओ, ओ आलोक अछि जे माँ, पिता, बहिनक कारण अप्पन सपनाकेँ घूरिमे जरा कऽ आस्ट्रेलियाक ब्रिसबनमे रहैत अछि। पिछला तीन बरखसँ ओ अप्पन देश नहि आयल अछि। ओतय तीन शिफ्टमे काज करैत अछि। हुनका नीन नहि होइत अछि। लागैत अछि जे हुनका नहि सुतबाक बीमारी भऽ गेल छनि। मुदा आलोक बाबू एकटा जिंदा मशीन अछि जे अप्पन सपनाकेँ मारि कऽ लोकक सपनाकेँ यथार्थमे बदलहि लेल काज करि रहल अछि। हुनकर जिनगीक कथा मझधारक एहन नावक कथा अछि जकरा कोनो दिशा नहि देल जाइत अछि। मां-पिता हुनकर जिनगीक खेवनिहार अछि, जेना ओ चाहता, ओहिना हुनकर दिशा भऽ जाएत। छत्तीसगढ़क राजधानी अछि रायपुर। ओहि शहरमे एकटा मोहल्ला अछि शंकरनगर। एतय पिता बड़ मनोयोगसँ एक-एक पाइ जोड़ि कऽ घर बनौने रहथिन। आलोकक पैतृक घर तँ भिंड-मुरैना लग रहनि। जतौका जंगलमे कहियो डकैतक राज चलैत रहै। पिता, के.जी.कुशवाह, फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया मे काज करैत रहथि। हुनकर ब्याह भोपाल भेल छल। दूटा बच्चा छल। पहिलुक आलोक आ दोसर बेटी किनू। दुनू पढ़ैमे खूब तेज। मुदा रायपुरमे रहैक कारण हिन्दी माध्यममे पढ़ाइ भेल छलनि। तहिसँ हुनकर अंग्रेजी कमजोर छल। मां-पिताक सपना छल जे हुनकर बेटा खूब पढ़ि-लिखि कऽ बड़का आदमी बनि जाए । इंटर केनहि कालमे माँ सोचथिन जे हमर बेटा सी.ए. बनि कऽ नाम कमाबै। ताहिसँ हुनकर एडमिशन बी.कॉममे कएबा लेल जिद पकड़ि लेलखिन। एकटा बेटा ओहिनो माँकेँ बेसी दुलारु होइत अछि। आखिरकार माँक जिद मानल गेल आओर आलोक बी.कॉम मे एडमिशन लऽ लेलक। बी.कॉम मे नीक मार्क्स अएलै आओर सी.ए. क तैयारी लेल आलोक दिल्ली आबि गेलाह. दिल्लीक पूर्वी इलाका लक्ष्मीनगर सी.ए. क गढ़ मानल जाइत अछि। एतय कतेक सी.ए. केँ तैयारी करबैक लेल कोचिंग संस्थान अछि, अंगुरीपर गिनलो नहि जा सकैत अछि। आलोक एकटा नीक कोचिंग संस्थानमे एडमिशन लेलक। कामर्स तँ नीक लागैत छल हुनका मुदा सी.ए. बनैक कोनो चार्म नहि छल। कोचिंग करैत, एक-दू बेर ओ परीक्षा देलक मुदा ढ़ाकक तीन पात रहल। ओहिनो हर बरख पाँच पर्सेंट तँ सी.ए.क रिजल्ट होइत अछि। करीब तीन साल तक दिल्लीमे रहलाक बाद रायपुर घुरि आयल। मायक सपना अपूर्ण रहि गेलनि। सी.ए. बनैक कोशिश रंग नहि आयल। एकटा आलोक छल जे कखनो मां-पिताक आगू अप्पन सपनाक गप नहि बतैलखिन। जहिना जे गप दुनू प्राणि कहैत छल, तहिना आ॓ मानैत छल। किछु दिन डिप्रेशनमे रहलाह आलोक। मुदा माय तँ माइये होइत अछि। नया सपना देखैमे कोनो दोषो नहि अछि। किछु दिन बीतल तँ घरमे कलह हुअए लागल जे आलोक आबि कऽ की करताह? घरमे अनुशासन एतेक कड़ा जेकर गप कहलो नहि जाय। दुनू भाइ-बहिनकेँ माँ-पिता जे कहतियै, से ओ सभ करै। अहिमे एक दिन मांक मनमे आयल जे बेटा सी.ए. नहि बनल तँ की भेल, ओ वकील बनताह। हुनका कियो सुझाव देलनि जे वकील तँ गांधीजी सेहो छल, जवाहरलाल नेहरू सेहो, जखन ओ प्रधानमंत्री बनि सकैत अछि तखन अहाँक बेटा तँ ओकरोसँ तेज अछि। आलोककेँ कहियौ जे ओ एल.एल.बी. मे एडमिशन करा लेताह आओर शहरमे कॉलेज अछि। खूब मन लगाकऽ पढ़ताह आ रायपुर राजधानी भऽ गेल अछि, खूब केस-मुकदमा हेबे करत, ताहिसँ हुनकर वकालतक धंधा खूब चलत। आखिरकार जहिना माँ क मन बदलल आलोकक करियरक राह सेहो बदलि गेल। आब ओ बैरिस्टरीक पढ़ाइ लेल एडमिशनमे जुटि गेल। हुनकर मेहनत आओर माँक आशीर्वाद रंग आनलक। कॉलेज तँ कॉलेज। ओहियो मे लॉ कॉलेज। पढ़ाइ की होएत। नहियो गेलाक बाद एटेंडेंस बनि जाइत छल। बस प्रोफेसर के आगा-पाछां करैत रहू, एटेंडेंस बनि जाइत। फार्म भरू, गेस पेपर से पढ़ि लियौ आओर परीक्षा के एकाध हफता पहिलै टीचर से ‘सजेशन’ लऽ लियौ। अहियो स नहि संतुषि्ट हुए तँ पिछला पांच सालक क्वैचश्न पेपर देखिकर खास-खास सवाल कऽ रटि जाऊ। ओकरो से नहि हुए तँ जे अहांक रूम मे गार्डिंग कऽ रहल अछि, हुनका सेट कऽ दिओ कि ओ परीक्षा हॉल मे एक कोना धरि के पूरे काल उंघैत रहै। बस फेर की। गेस पेपर छबे करल नहि तँ ‘सर’ के बनाओल नोट्स कोन दिन काज आयत। ओकरा बिथायर कऽ सभटा सवालक जवाब लिखैत जाऊ। एतबैयो साहस नहि अछि तँ परीक्षा के एक दिन पहिलुका राति मे छोट-छोट पुरजा बना लियै आओर मोजा, कॉलरक पाछां नहि तँ अंगाक आस्तीन मोरि कऽ ओकरा मे नुका लियो ओ पुरजा कऽ। जब देसक एहन शिक्षा होएत तखन शिक्षा प्राप्त करहि बला केहन। अनुमान लगा लियौ। आखिर जे सभ शिक्षक बनल अछि ओ की कोनो पूरा कोर्से पढ़िकै बनल अछि। जे हुनि आदर्शक गप करत। चोरी तँ चोरी होएत अछि। चाहे अहां दू टा पाई चोरि करू या फेर परीक्षा मे ‘चीटिंग’। यहि कारण छल जे बाप बेटा कऽ कहैत छलाह जे कोर्स खत्म नहि भेल अछि तँ कोना चीटिंग कऽ लिओ। ओहिनो हमर सभक मतलब मैथिल मे दैत छी गप लिओ लपालप चलतै अछि। आओर मारि कम बपराहैट बेसी अहि लेल तँ कहल जाइत छल। पूरा साल तँ उछल-धक्का करै सं फुरसत नहि, मुदा परीक्षा नहि पास करहि सकलहुं तँ माय-बाप सं लऽ कऽ सभ कियो कहैत रहताह, ‘हेयौ जानैत छिये। अहि बेर बड़ कठिन सवाल आयल छल। हमरो टीचर से कहैत छलाह।’ और तँ और, अपन मौनक जोगर टीचर से कहा लेत, ‘दस टा मे से पांच टा कोश्चन तँ सिलेबस से बाहर के रहैत, तँ कोनो कियो सवालक जवाब लिखतै।’ आओर कानाफूसी ईहो होएत, ‘अहि बेर खूब टाइट परीक्षा भेल। ओ दरोगा मंडल,जे आयल छल, बड़ बदमास अछि। हिलै तक नहि देलक।’ ई तँ भेल परीक्षाक गप। जखन परीक्षा भऽ जाइत अछि। तखन कॉपी कतय जचां रहल अछि, ओकर पता लगाबै लेल दिनराति बौआ रहल अछि। मिथिला मे ते जानते छी, बेटा-बेटी मे की फर्क होएत अछि। बेटा जे जखन चाहत ओ मिलै ओकरा। मुदा बेटी तँ ऑन घर जाइत। ओकरा खिया-पिया के की होएत। बेटी के पेट तँ नून रोटी खायक भरि जाइत मुदा बेटा कऽ तँ दूध-भात चाहि। बेटा अंग्रेजी मीडियम मे पढ़त, मुदा बेटी ते सरकारी स्कूल मे जाइत अछि, ई की कम अछि। यहि हाल छत्तीसगढ़ के छल। जे कहियो आलोक बाबू के घर आओर जे समाज मे ओ रहैत छल, ओहिने छल। आलोक बाबू लॉ कॉलेज मे एडमिशन लेलाह तँ जरूर मुदा पढ़ैक जरूरत की छल। शुरू मे एकाध दिन कॉलेज गेलाह, जखन दोस्त-मुहिम बनि गेलाह, टीचर चिनहै लगलाह तखन फेर बाते की। घर से रोज टाइमे पर निकलैत छलाह, मुदा लॉ पढ़ैत छलाह या किछु आओर, से आलोक बाबू टा जानैत छल। मुदा सांझ मित्झर भेला पर घर जरूर टाइम से घुरि जाइत छल। घर मे सभ कियो बुझैत छल जे ओ तँ क्लास कऽ कऽ आबि रहल अछि। कहियो हाथ मे दू टा लॉ के किताब झूलाबैत घुरैत छलाह, तँ कहियो कोनो हाथ मे केकरो नोट्स लऽ कऽ। मुदा नीक गप हो या अधलाह, नुकायल तँ नहि रहैत अछि। आलोक बाबूक किरदानी लोकक आगू आबै लागल। शहर मे हुनकर नीक दोस्त छल तँ बदमाशो दोस्त ओतबै छल। हुनकर कॉलेज मे 25 साल से एकटा परंपरा छल, जे क्लास के बदमाश लड़का सभ आगूक बैंच पर बैसैत छलाह। मुदा आलोक बाबू जखन एडमिशन लेलक तँ हुनकर दोस्त किछु अहिनो छल। ताहि से ओ अगलका बेंच पर बैसऽ लगलाह। चूंकि हुनकर पिता के शहर मे एकटा इज्जत छल। ताहि सं लोक मानैत छल जे आलोक बाबू नीक होएत। मुदा लोक ई नहि बुझैत छल जे यदि अहांक खानदान नीक अछि, एकर मने ई नहि भेल जे अहों नीक होयब। लेकिन ई गप की बुझैता लोक-बेद कऽ। एखनो देखियो नै, ई जाति, गोत्र, मूल, मूलक ग्राम की होएत अछि। ओहि काल मे जे ऋषि भेल हुनकर हम सभ वंशज अछि। एकर मने ई तँ नहि भेल जे हमहूं ऋषि भऽ गेलहुं। हाथक पांच आंगुर की बराबर अछि। घर मे चारि भाई अछि, सभक अलग-अलग विचार आओर आदत अछि। तखन हम कोना कहि सकैत अछि जे खानदान से लोकक आदत, संस्कारक निर्धारण होएत अछि। की राजेंद्र प्रसाद के खानदान की राष्ट्रपतिये छलाह। ललित नारायण मिश्र कतेक बड़का नेता भेलाह, मुदा खानदान मे कियो क्या नहि भेल। जगन्नाथ मिश्रक नाम चारा घोटाला मे आयल। लालू यादवक खानदान चरवाहा के अछि। मुदा ओ बिहार पर एतेक दिन शासन करलाह जे एखैन धरि कियो नहि करलाह छल आओर आगू के करताह कहल नहि जाई सकैत छी। तखन आलोक बाबू तँ आलोक बाबू छल। पढ़हि मे नीक छल ताहि से नीक स्टूडेंट हुनका सं दोस्ती करते छलाह, मुदा अधलाहो सोचैत छलाह जे हुनका संग रहि के किछु तँ नीक गप आ पढ़ैक लेल जानकारी भेटत। अहि बीच एक दिन हुनकर मन मे आयल जे अंग्रेजी नीक नहि होएत तँ जिनगी मे किछु नहि कऽ सकब। फेर की छल। ओ पूरा शहर ताकि गेलाह जतय अंग्रेजी बाजै लेल आओर ग्रामर कियो सिखा दिया। मुदा रायपुर तँ रायपुर छल। ओहि काल ओतय एडवांस नहि भेल छल जे अंग्रेजी पढ़ाबैक लेल कियो भेटतियै। ओ निराश भऽ गेल छलाह। मुदा एक दिन हुनका पता चलल जे शहर के बीचोबीच जे ‘होटल निहार’ अछि ओतय किछु भेट सकैत अछि। रायपुर मे जतय कॉलेज अछि ओकरा मे पढै बला नीक सभ छात्र सभ शुक्रवार के आबैत छलाह। शहर के जे छात्र बैंक क्लर्क, पीआ॓, एसएससी, एमबीए के परीक्षाक तैयारी करैत छलाह, ओ ओतय सांझ मे आबैत छल। बैनर छल रोट्रेक्ट क्लब। रोटरी के यूथ विंग। एकर बैनर तल सभ मिलि कए खूब ग्रुप डिस्कशन करैत छल। जेनरल नॉलेज एक-दोसरा से पूछैत छलाह। एक्सटेंपरी मे सेहो भाग लैत छल। लड़का-लड़की मे कोनो भेद नहि होएत छल। एतय लागैत छल जे किछु सार्थक काज भऽ रहल अछि। रायपुरक रोट्रेक्ट क्लबक इतिहास रहल अछि जे ओतेक बेसी सदस्य देशक कोनो परीक्षा हुए सभमे खूब नीक करलक छल। आबि आलोक बाबू के जिनकी बदलि गेल छल। ओ सभ शुक्र कऽ रोज होटल निहार जाय लगलाह। आपस मे अंग्रेजी बाजैत छलाह। शुरू मे दिक्कतो भेल, मुदा धीरे-धीरे बाजहि लगलाह। एकाएक आलोकक बात-व्यवहार सभटा सेहो बदलहि लागल। एक दिन क्लब मे फिल्म कऽ लऽ कऽ गप शुरू भो गेल। आखिरकार गपशप मे ई गप पर जोर देल गेल जे सभ कियो अप्पन-अप्पन वृतांत सुनाओल जाए जे हुनकर फिल्म देखबात आतुरता आओर फिल्म संस्कार कोना भेटल। जतेक गोटा रहैत ओतय, सभ अप्पन-अप्पन गप सुनाबहि लागल। कियो कहलक, पापा के पॉकेट से पैसा चुराकऽ देखलहि रहि फिल्म। कियो कहलक जे माम के साथ गेल रहि तँ किओ कहलक स्कूल से भागि के गेल रहुं फिल्म देखने। आप जखन आलोक बाबू के पारि आयल फेर की छल। हुना संग तँ गपक खजाना आओर अनुभव के विस्तर छल। ओहिनो अहां जानैत हेबै जे मुकि्तबोध कहने छलाह जे जिनका संग जतबे अनुभव हेता हुनकर रचनात्मक क्षमता ततबेक बेसी हेता। ई गप आलोक बाबू पर बेसी बैसल रहै। फेर की छल, शुरू भऽ गेलाह आलोक बाबू। ओहि दिन जे ओ ओतय भाषण देलैन से महीना भरि सभक मुंह पर छल। जे जतय मिलतियै ओ ओतय आलोक बाबूक फिल्म देखहिके किस्सा बाजैत छल। आहि बैठकक गप क्लब के पत्रिका मे सेहो छपल छल। फिल्मक लाऽ कऽ कहने की छल, लोक कऽ आनंद विभोर कऽ देलक। ओ लिखने छलाह, फिल्म, फ़िल्म और फ़िल्म। ,ई शब्द छल कि आओर कुछु। एकरा सं परिचय कोनो भे, क्या भेल, एकर मैन तँ अछि। दिवाल पर चिपकल पोस्टर, अखबार मे छपल फोटो, गली-मोहल्ला मे लाउडस्पीकर मे बाजैत गाना आओर डायलॉग या रेडियो मे प्रसारित होए बला गाना मन-मस्तिष्क कऽ खटाखटा कऽ राखि दैत छल। शादी-ब्याहक काल माहौल कऽ मदमस्त करैत फिल्मी गाना हुए या जनवरी आ अगस्त मे बजै बला देशभक्तिक तराना, नेना मे अठखेली के संग कौतुहलक विषय छल। ओ एहन काल छल जखन फिल्मी पोस्टर देखहि कऽ मन होएत छल जे हमहूं स्मार्ट बनि जाय आैर ओहिने फैशन करैत रहि। एकटा समय रहिक जखन फिल्म कऽ लऽ कऽ किछु नहि जानैत रहि आओर सभटा हीरोइन एक्के जना लागैत छल। मन ही मन सोचैत रहि जे गाना बजैत कोना अछि, डायलॉग कोना बाजैत अछि, हीरो मैटि से उपर उठि कऽ परदा पर कोना आबैत अछि। की पोस्टर पर जे स्टंट होएत अछि ओ सच्चे मे होएत अछि की नहि। आगू लिखने छल, 'मां कहैत अछि। कोनो अहिनो काल छल, जखन हम सभ सभटा शनि दिन फिल्म देखैने जाइत छलहुं। अहि दिन घरक सभ लोक फिल्म देखहि लेल जाइत छलहुं। ई ओहि कालक गप अछि, जखन हम जन्म नहि लेलहुं छलहुं। मां के मन मे एखनो घुमरैत रहि अछि ओ दिन।" जखन हम होश संभालनौ तँ घर मे ओ रेडियो कऽ बाजैत देखलहुं जे पापा कऽ शादी मे भेटल छल। घर के जे सभ फुर्सत मे रहताह ओ आकाशवाणी से प्रसारित होहुं बला गाना सुनैत रहैक, एफएम ते ओहि काल मे रहबे नहि करै। जकर एहन घर रहताह, ते नेना से गाना सुनहि के आदत केकरा नहि लागत। ओनो बाबा खूब गाना सुनैत छल आ गाबैतो छल। एकटा गप तँ छल। आलोक बाबू के मुंह में सरस्वती बैसेत छलि, क्याकि जखन ओ बाजब शुरू करैत छल, तँ लोक बेद सभ काजि छोड़िकऽ हुनकर गप सुनैहि मे लागि जाइत छल। वैह भेल ओहि दिन। रायपुर के लोक कहैत अछि जे ओ दिन शहर के लिए अलगे दिन छल। भरि राति हुनकर भाषण चलल रहल। क्लब मे जे सभ छल ओ ओहि राति घर नहि गेल छल। तीन बजे भोर धरि फिल्मक संस्कारक गप ओ कैने छलाह। घर मे मां-पापा सभकियो हुनका लेल तंग भऽ गेल छल जे ओ राति मे नहि आयल छल। मुदा सभ कियो जानैत छल जे आलोक बाबू कतो हेता तँ नीके से हेता आओर कोनो काजक कारणे घर नहि आयल छल। हुनकर संगी नीलेंद्र बाजैत छल जे ओ एक गिलाह पानि पिब के फेर बाजब शुरू करने छल। घर मे रेडियो से जानल छलौंह जे गाना की होएत अछि। लाउडस्पीकर मे बाजैत आ गाम मे होय बला नाटक से जानलौंह जे कोन शहंशाह के डायलॉग अछि आओर कोन गब्बर सिंहक। आहि काल मे टेलीविजनो देखलहुं। इंदिरा गांधी आओर राजीव गांधीक अंतिम संस्कार के टीवी पर देखने रहि। मन चंचल आओर स्वभाव अछि जिद्दी। रविक सांझ मे फीचर फिल्म देखैने दोसरा कतए जाइत रहि। बुध आओर शुक्र के सेहो चित्रहार देखैत रहि। मुदा फिल्म तँ इंटरवले तक देखैत रहि क्याकि ओहि काल साढ़े आठ बजे राति बड़का राति भो जाइत छल। आलोक बाबू कहैत छल जे हम ओ उम्र के ओ पड़ाव से गुजैर रहल रहि जखन हमर संगी-साथी नुका कऽ बीड़ी-सिगरेट पिबैत छलाह, फिल्म देखैले जाइत छल, सेक्स कऽ गप करैत छलाह आओर एतय तक कि मारपीट सेहो। मुदा हमर सोच ओहियो काल आओर आजु उल्टा छल। हमर कहब छल जे सभटा लोक काज करैत अछि ओ काज हम नहि कर। यहि कारण छल जे हमर दोस्तक ग्रुप नहि बनल। दोस्तक देखौंश में सिगरेट के मुंह तँ लगैलो मुदा नुका कऽ काज नहि नीग लागैत छल ताहि से नहि पिबलहुं। शाकाहारी तँ नेने से छी। फिल्म देखैक मन भेल तँ लागल जे तीन घंटा धरि भूखिहि रहै पड़त। घरक लोग फिल्म देखहि लेल नहि जाइत छल तखर हमर अकेले जाइत कोनो सवाल नहि रहैक। आलोक बाबू तँ पूरे किस्सागो छल। एक-एक शब्द सोचि-समझि आओर कऽ कहैत जा रहल छल। एक-एकटा गप ख्याल पारि कऽ कहैत रहि आओर लोक सुनैत छल। कहैत अछि स्कूल मे गर्मी आैर दशहरा के नब्हर छुट्टी होएत छल। सभकियो गाम जाइत छलौंह। गामक लोक फिल्म देखहि कऽ लऽ कऽ खूब गप करैत छल। सभटा गप हम चुपचुाप सुनैत रहि। गाम मे जिनकर ब्याह होएत छल, ओ अपन कतनया के फिल्म देखाबैक लेल लऽ जाइत छल। हमहुं सोचैत छलहुं जे सच्चे फिल्म देखबाक कतेक रोमांचक होएत हेता। किछु नहि किछु मन लागै बला जरूर देखाबैक अछि जे गामक लोक ब्याह के बाद फिल्म देखहि लेल जाइत अछि। हमूहि मन मे प्लानिंग बनबैत रहि जे ब्याह हैत तँ सबसे पहिलुक काज करब जे कनिया कऽ लऽ कऽ फिल्म देखहि लेल जायब। आलोक बाबू ओहि सांझ पूरे मूड में छल। मुदा राति बेसी भऽ गेल छल। सभक आंखि मे नीन आबैत छल। कियो देवार से सटि के उंघय लागल तऽ केकरो सुनैत-सुनैत झपकियो लियै लागल। भुजाक संग दालमोट आओर कतेक देर चलतियै। सभक पेट मे चूहा कूदै लागल। प्यासो लागल छल। जतेक पैन के बिसलरी के बोतल छल, सभ खत्म भऽ गेल छल। आबि एतेक राति भऽ गेल छल जे कोनो दोकानो नहि खुजैत रहल, जाहि सं किछु खाय-पीबै बला समान आबतियैथ। उमढ़, स्टेज पर आलोक बाबू छल, जिनका जिह्रा पर सरस्वती बैसल छल। हुनकर खिस्सा सुनाबै मे ब्रोक नहि लागल छल। हुनकी मीठ बोल आओर खिस्सा कहैक स्टाइल छोड़ि कऽ कियो जाइलै नहि चाहैत छल। अपन श्रोताक भाव-मुद्रा जे कथाकार चिह्न लिये, ओ होशियार होयत अछि। आलोक बाबू तऽ होशियार छेबे करल। ओ लोकक मुद्रा के पढ़ि लेलैन आओर घोषणा करलैन जे आब बेसी राति भऽ गेल अछि, ताहि से आजुक कथा एतय बंद करैत छी। आब अगला बैठकी मे समूचे खिस्सा अहां सभकऽ सुनायब। ई सुनैत सभ सुनहि बला कऽ लागल जे पेटक भूख पेट में रहि गेल। कियैकि पेटक भूखक आगू मानसिक भूख भारि पडि़ जाइत अछि। एक हफ्ता लोक सभक कोना बीतल कियो नहि कहि सकैत अछि। मुदा, एक गप भेल जे आलोक बाबूक फिल्मक खिस्सा पूरे रायपुर मे कानाफूसी जना बाजल जायत छल। आय ओ सभागार मे शहर के आओर लोक आबि गेल छल, आलोक बाबूक सुनैक लेल। ठाढ़ रहैक जगह नहि छल। लोक कऽ जतय जगह भेटल ताहि ठां नीचे मे बैसि गेल। जहिला रोट्रेक्ट क्लब के अध्यक्ष राजेश चौधरी बजलाह जे आब अहां सभ शांत भऽ कऽ बैसि जाऊ, आब आलोक बाबू अपन फिल्म देखहि के खिस्सा सुनायैत। पूरे हॉल मे 'पिन ड्राप साइलेंट" भऽ गेल। आलोक बाबू तऽ आलोक बाबू छलाह। आव नहि देखलक ताव, शुरू भऽ गेल खिस्सा सुनाबैय लेल। एकटा हाथ डांड़ पर धरि, दोसर हाथ से खिस्सा कऽ लऽ कऽ हवा मे लपटाबैत कहलाह, 'हमर सौभाग्य अछि जे हमरा रास्ता देखाबै बला हमर पापा अछि। कोनो पाय कऽ लऽ कऽ गप होयत या दुनिया जहानक। खेलक मैदान सं लऽ कऽ फिल्मी दुनियाक गप, राजनीतिक रपटीली डेगक गप सं लऽ कऽ कोनो बीमारी सं छुटकारा पाबैक नुक्सा, पापा अलराउंडर अछि। हमरा लागैत अछि जेना फिल्मोक गप हम पापा से जानल छी। एखन धरि जिनगीक बेसी काल मामा लग नहि रहि कऽ पापा संग रहल छी। नीक काज करैत रहि तऽ ओ खुश होयत छल नहि तऽ खूब मारि खाइत रहि। पापा के मुह से सुनल छलौंंह जे अमिताभ बच्चन हीरो अछि आओर हुनकर पिता हरिवंशराय बच्चन एकटा कविक संग प्रोफेसर सेहो छल।" आलोक बाबू अपन पापा कऽ लऽ कऽ कहै लगलाह जे ओ कहैत अछि जे फिल्म देखहि मे पाय आैर टाइम बरबाद होयत अछि। तीन घंटा मे जे नेना कोर्सक पोथी पढ़ि लियै या कोनो खेल खेलय तऽ ओ क्लास में नीक करत या ओकर देह नीक भऽ जाइत। ओ पढ़ाई कऽ लऽ कऽ कोनो सामंजस्व बैसाबैक विरूद्ध खड़ा भऽ जाइत छल। मुदा हमरा बेर ओ आपन वसूल बदलि लेलखिन। हमहूं फिल्म देखहि लेल जाइत रहि मुदा की दैखैत रहि, बुझैत मे नहि आबैत छल। रविक सांझ मे दूरदर्शन मे फीचर फिल्म देखाओल जाइत छल, जकरा दैखैत लेल हम जाइ रहि दोसर के घर। मुदा एकरा लेल बड़का साध्य करै पड़ैत छल। भोरि भऽ कऽ सबसे पहिले जागैत रहि। तकर बाद दिन भरि खूब मन लगा कऽ पढ़ैत रहि। एतेक पढ़ैत रहि जे पापा सांझ तक खुश भऽ जाय। पापा खुश तऽ फिल्म देखि सकैत रहि मुदा हुनकर कोनो सवालक जवाब नहि दऽ सकलौंह तऽ सभटा प्लान धरि की धरि रहि के डर बनल रहैत छल। पापा के सीधे कहबाक रहि जे क्लास मे नीक करैक संग टास्क पूरा होयत तखने अहांक गप मानल जाइत। नहि ते जे हम कहैत छी, ओ अहां मानू। नेने से मन मे एकटा विद्रोह स्वाभाव रहल अछि। जे हम जे कहि, से दुनिया मानै। हम किया केकरो गप मानब, हमर गप किया नहि कियो मानैत। नेने से अपन सपना के हकीकत मे बदलहि लेल एके टा रास्ता रहि जे खूब मन लगाकर पढ़ि। पापा आओर हमर बीच ई हरदमे चलैत छल जे के कखैन जीतत। कखनो पापा जीतैत छल तऽ कखनो हम। लागैत छल जे पापा अपने बेटा सं हारिक खुश भऽ जाइत छल। हेतै किया नहि, ई तऽ सभ बापक होबाक चाहि। बेटा आगू बढ़ै, एकरा सं नीक की होयत। हम जखैन जीतैत रहि तऽ पापा हंसि कऽ हमरा अपना तरहे जिनगी जियबाक लेल छूट दैत छल। हम जखन हारैत रहि तऽ कनिक काल तऽ झल्ला जाइत रहि। मुदा, सोचैत रहि जे आगू से जे भी हेता, हम नहि हारब। खूब मन लगाकऽ पढ़। अहिना तरहे हम अमर अकबर एंटोनी, नागिन, कालीचरण, शोले, रोटी कपड़ा आैर मकान, सीता आैर गीता, राम आैर श्याम, हाथी मेरा साथी, सत्यम शिवम सुंदरम, क्रांति एहन फिल्म देखलहुं। मुदा ई सभ फिल्म इंटरवल धरि। आब बाजैत-बाजैत आलोक बाबूक कंठ सूखि गेल छल। ओ टेबल सं पैन के गिलास उठा कऽ दू घंूट पानि पीबि कऽ फेर सं बाजब शुरू करलखिन। तखन आठवां क्लास में पढ़ैत रहि जखन सिनेमा घर मे जाइकै फिल्म देखल रहि। घर मे दादाजीक बटुआ से साढ़े तीन टका चुराइल रहि। तीन टका मे दू टा टिकट आयल छल आओर एक अठन्नीक सिक्का मे झालमुढ़ी खायल रहि। फिल्म छल जंगबाज, जहि मे हीरो छल गोविंदा आओर राजकुमार। गेल तऽ रहि फिल्म देखहि लेल मुदा घरक लोकक डर सं हॉल मे फिल्म कम हॉलक सीन बेसी देखैत रहि। डर लागैत छल जे किसी चिन्है बला एतय देखि लेत तऽ घर मे खबर भऽ जाइत। फेर बिना पूछि के फिल्म देखहि कऽ सजा भेट जाइत। जकरा संगे फिल्म देखहि लेल आइल छलौंह हुनका पहिने कहि देने रहि जे ककरो सं ई गपक चर्चा करब तऽ हम टिकट के पाई अहां के नहि दे। हम अपन मिशन मे कामयाब रहल रहि। आलोक बाबू के मुख मुद्रा एहन रहि जे लोग हुनकर मुंह से निकलल एक-एकटा बोल कऽ गांठि बना कऽ सुनैत छलाह। ओ सत्तर आओर अस्सी के दशक मे अपना कऽ लऽ गेलखिन। कहै लगलाह। ओहि काल रायपुर बड़ छोट शहर रहैक। एतेक गली मे हमर नेना बीतल। एकेटा सिनेमा हॉल छल, कल्पना टॉकिज। आब तऽ ओ छेबो नहि करल। अहि टॉकिज में पंद्रह अगस्त आओर छब्बीस जनवरी के टिकट ब्लैक मे बिकायत छल। जखन अहां एक बेर कोनो काज कऽ लऽ सकैत छी तखन अहांक मन बढ़ि जाइत अछि। ये हमरा संग सेहो भेल। दोसर बेर हम 'एक फूल दो माली" देखहि लेल सिनेमा हॉल गेलहुं। फिल्म नीक लागल। मुदा एखन धरि रायपुर मे यै टा दू टा फिल्म देखने छी। अगां के खिस्सा तऽ अहां सभ जानैत छी। ई कहि के मुंह पर आयल पसीना के आलोक बाबू जेबी से रूमाल निकालि के पोछलक आओर अपन ठाम पर बैस गेल। सभ लोग गदगद छल। आलोक बाबू कऽ सभ वाहवाही करै लागल। एहि दिन एतिहासिक छल रायपुरक इतिहास मे। जे सभ नहि जानैत छल आलोक बाबू के सेहो जानय लागल। शहर के लड़की सभक बीच आलोक बाबू खूब पोपुलर भऽ गेल। कॉलेज जाई बाली लड़की सोचैत छल जे कोना आलोक बाबू से गप करि। मुदा, आलोक बाबू कऽ अहां जानैत छी। नहि केकरो से बाजब, जे काज अछि, बस काजि कऽ घर आबि गेलहुं। ओ जमाना मोबाइल के नहि छल। लैंडलाइन के छल। आलोक बाबूक घर मे सेहो लैंडलाइनलागल रहैक। मुदा, ओ केकरो अपन घरक नंबर नहि दैत छल। कियै कि केकरो फोन आयत आओर पापा उठा लेत, तऽ बिगैड़ लागत। आजुक दुनिया मे कोनो चीज कतेक दिन धरि अहां नुका सकैत छी। सेह आलोक बाबूक भेल। लोक-बेद के हुनकर घरक लैंडलाइन फोनक जानकारी भऽ गेल। जेकरा जरूरत होयत ओ आलोक बाबू कऽ कखनो फोन कऽ दैत छल। आहि काल लॉ कॉलेज मे पढ़ैत आलोक बाबू एतेक पोपुलर भऽ गेल छल जे लड़की सभ हुनकर कोनो-कोनो दोस्त कऽ अप्पन फोन नंबर दैत छल जे हुनका कहबै जे ओ फोन करताह। मुदा, आलोक बाबू कहियो कोनो लड़की के किया फोन करताह। ओ दिन एक जनवरी छल। भोरि उठि के आलोक बाबू नहाय-नास्ता कऽ पढ़ैत छलाह। तखने फोनक घंटी बाजल। मां फोन उठैलखिन आओर बाजलखिन, 'हैलो" 'जी, आलोक बाबू अछि" दोसर दिस से कोनो लड़की के आवाज छल। 'हां, अछि, अहां के" मां कहलखिन। 'जी, हम आलोक बाबूक दोस्त।" एतबै कहैत आे लड़की के सांस फूलि गेल आओर ओ फोन राखि देलक। आब मां तऽ मां होयत अछि। आन मां जना आलोक बाबूक मां छल। ओ चिंतित भऽ गेलि जे कोन लड़कीक फोन आलोक बाबू लेल आयल। मुदा कोनो आईडी कॉलर ते लागल नहि छल जे कियो जानि सकैतियै जे कोन नंबर से फोन आयल। फेर दूपहरिया मे फोन आयल। तखन हुनकर बहिन फोन उठैलक। फेर ओहिने घटना भेल। आब घरक सभक मन मे हुयए लागल जे की गप अछि, जे ओ फोन करहि बला लड़की गप नहि करैत अछि। फेर सांझ भेल पर सै गप भेल। अहि बेर आलोक बाबू अपने सं फोन उठैलखिन। मुदा सामने बला नहि तऽ हुनकर आवाज चिह्नलखिन आओर नहि ओ। ई जरूर फस्र्ट जनवरीक गप छल। मुदा, जहिना-जहिना आलोक बाबूक नाम होयत जाहि छल, ताहिना-ताहिना कतेको लड़की के फोन आबहि लगलाह। घर के सभ गोटे तंग रहैत छल जे आलोक बाबू दिन भर की करैत अछि। समय-काल बीतैत जाइत छल। लॉ के सेकेंड ईयरक परीक्षा भऽ गेल आआैर कॉलेज मे सबसे नीक नम्बर आलोक बाबू के आयल। थर्ड पार्टक क्लास शुरू भऽ गेल छल। मुदा आबै बला समयक देखैत क्षमता तऽ हुनका मे नहियै छल। एक रात दू बजैत रहै। घरक सभ कियो सुतल छल। आलोक बाबू एक बजे राति धरि पढ़ि के बिछौन पर गेने छल आओर किछु सोचैत-बिचारैत नींद के बजबैत छलाह। तखने दरवाजा के कियो खटकटायल। दू बजे राति मे ओहिनो कियो धक्का दियै तऽ लोक-बेद ते यैह नहि बुझता जे चोर-उचक्का किछु कऽ रहल अछि। मुदा, ओतय मिली ठार छल। किवाड़ी आलोक बाबू खोल लक। मिली कहलक हमर घर मे पार्टी छल आओर अहां से कतेक दिन से भेंट नहि भेल छल, ताहि से हम सोचलहुं जे अहां से भेंट कऽ आबि। अहां के देखि लेलहुं, आब हम जाइत छी। ई गप कहि के मिली तऽ चलि गेल मुदा घर मे तूफान आनि देलक। मिली चारि घर बाद रहि बला चंद्रभूषण बाबूक बेटी छल। ओ लॉ मे पढ़ैत छल। आलोक बाबू से जूनियर रहैत कॉलेज मे। मिथिला मे ते जानते छियै। ककरो बेटी ओहिनो कोनो लड़का से गप कऽ लैत अछि, ते की ओयत अछि। तखन ई राति मे कियो मिलहि लेल आबि तऽ की होयत, सोचहि सकैत अछि। पूरा मोहल्ला जानि गेल जे आलोक बाबू से मिली राति मे भेंट करहि लेल आयल छल। जानतै छियै कहल जाइत अछि दीवारो कऽ कान होयत अछि। आस-पड़ोसक लोग-बेद पुछैत छल आओर कानफुसकी करैत छल, जे मिली के आबैक प्रयोजन की छल। घरक लोक तऽ ई गप जानतै छल। हुनको कान मे गेल जे आसपड़ोसक लोक बाजैत छलाह। आलोक बाबूक मां के अहां चिह्नतै छियै। हुनकर तरबा के लहर मगज पर रोज चढहि लागल। रोज दूटा अनटेटल गप आलोक बाबू के सुना दैत छल। ओहि काम हुनकर मां सुनलक जे लॉ करने से आलोक बाबू वकील तऽ बनि जायत मुदा, जखन कोनो केस आयत तखैन नहि ओ वकालत करताह। अहि काज से तऽ नीक पत्रकार होयत। जहिना कियो किछु अनटेटल करैत, ओ अखबार मे छापि दैत। तखन लोक के मालूम होयत जे इज्जत बनाबै मे केकरो जिंदगी बीति जाइत अछि, ओकरा माटि मे मिलाबै मे कोनो टाइम नहि लागैत अछि। आब घर मे दोसर गप होय लागल। आलोक बाबू के पत्रकार बनहि लेल पत्रकारिता के कोर्स करैक गप होय लागल। कियो कहैत छल जे रायपुरक कोनो संस्थान मे हुनकर नाम लिखा दियो। कियो कहैत छल जे भोपालक माखनलाख चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय नीक अछि। कियो राय दैत छल जे दिल्ली पत्रकारिता के गढ़ अछि, आलोक बाबू के ओतय पठा दियो। मां ते मां अछि। हुनका लागल जे हमर सभटा लऽर जऽर बाहरे पढ़ैत अछि आओर हुनकर मां-बाप खूब गप्प दैत अछि। ताहि सं हम आलोक कऽ दिल्ली भेज दैत छी आओर ओतय ई पढ़ताह। आखिरकार एक दिन एहन आयल, जे आलोक बाबू बड़ मनसुआ लऽ कऽ बिलासपुर एक्प्रेस से दिल्ली उतरलाह। कियो चिन्हार तऽ नहि छल दिल्ली मे, से रेलवे स्टेशन से उतरि के पहाड़गंजक साइड के होटल मे टहरलाह। रायपुर से दिल्ली के किछु पत्रकारिता संस्थानक पता आओर फोन नंबर संगे लेलहि आयल छल। दोसरे दिन से सब ठाम घुरहि लगलाह। कनाट प्लेसक कस्तूरबा गांधी रोड पर अछि भारतीय विद्या भवन। ओतहि गेला पर मालूम भेल जे ओतय एडमिशन लैके तारीख अछि जे दू दिन बात खत्म भऽ रहल अछि। ओ आव नहि देखलक ताव, चार सौ टका मे फार्म कीन कै भरि देलैक। पंद्रह दिन बाद ओकर इंट्रेस परीक्षा अछि। ओहो अंग्रेजी मे। दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस सेहो गेलाह। ओतोको फॉर्म भरि देलक। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के सेहो एकटा सेंटर नोएडा में छल, ओतौको फार्म भरहि लेल आलोक बाबू नहि बिसरल। ता धरि जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता लेल फार्म नहि भेटैत छल। अहि बीच ओ अप्पन डेरा ताकि लेलक। होटल मे कतेक दिन रहतियैथ। दक्षिण दिल्ली मे एकटा गाम अछि, बेरसराय। पुरैनका जेएनयू कैंपसक आगू आओर आईआईटी के बीच ई गाम अछि। ओतय डेरा लेलखिन। किराया छल 16 सौ टका महीना। आलोक बाबू की करतियैथ। डेरा की छल। एकटा कमरा बस। तीन मंजिल के बिल्डिंग छल। ओहि मे कम से कम नहि तऽ 40 टा कमरा रहैक। सभमे बिहार, बंगाल, झारखंड, उत्तरप्रदेश से दिल्ली आयल लड़का सभ रहैत छल। सभक सपना छल जे दिल्ली से जायब तऽ किछु बनि के जायब। ओहि बिल्डिंग के एक-एक फ्लोर पर दू टा शौचालय आैर स्नानघर बनल छल। सभ कियो बारी-बारी से ओहि मे जाइ के नित्यक्रिया से निवृत होयत छल। सभठाम के फार्म भरि के आलोक बाबू तैयारी करै मे जुटल। खूब जीके याद करैत छल। अंग्रेजी में कॉमिल बुल्के से सभटा मीनिंग याद कऽ लेलक। नहि हुनका राति पता चलैत छल आओर नहि दिन। बस एक्के टा धुन छल जे पत्रकार बनैक अछि ते हम बनबे करब। कोनो-कोनो विषय पर लिखहि के खूब प्रैक्टिस सेहो करैत छल। कनि-कनि अंग्रेजी बाजैक कोशिश सेहो आलोक बाबू करैत छलाह। आखिर भारतीय विद्या भवन में परीक्षा देलहि लेल गेल। लागल सभटा सवाल ते जानैत छियै। मुदा, हुनका मे से अंग्रेजीक लऽ कऽ एकटा झिझक रहैक, ताहि से ओ सोचैत छल जे इंट्रेस परीक्षा मे पास करै के कोनो सवाले नहि अछि। मुदा, बगल बला रूम मे रहै बला राजीव कहलक, 'ओ आलोक बाबू, मानि लियौ जे अहां इंट्रेस टेस्ट पास नहि करने छी, मुदा एक बेर नोटिस बोर्ड पर अपन नाम आ रोल नंबर देखहि मे की जाइत अछि।" 'ना, हम ओते अंग्रेजी नहि जानैत छी, जे अंग्रेजी दिल्ली के लोक बाजैत अछि।" 'हौ, अहां बूर छी, आंय यो दिल्ली बला के कोन अंग्रेजी आबैत अछि। अहांके के कहि देलक।" 'नहि हौ, परीक्षा देने गेल रहौं ते ओतय ते सभ कियो हिन्दी मे बाजैत छल।" 'अहां ध्यान से सुनने रहि", राजीव पूछलाह। 'नहि, मुदा ओ सभ अंग्रेजी में बाजैत रहि" 'ते सुनू, दिल्ली बला के फोकस छाड़हि लेल खूब आबैत अछि। ई सभटा जे अंग्रेजी बाजैत अछि, ओ कोनो अंग्रेजी बाजैत अछि। टिपिर-टिपिर करैत अछि, मुदा सभटा गलते बाजैत अछि। केकरो ग्रामर अहां से नीक होयत ते अहां हमर नाम पर कुकुड़ पोसि लेब।" राजीवक गप सुनहि के आलोक बाबू के लागल जे हुनकर गप मे दम अछि। 'जानैत छियै आलोक बाबू, हिन्दी के पैघ पत्रकार आआर साहित्यकार अछि कमलेश्वर, ओ कहैत अछि जे दिल्ली बला के अंग्रेजी डेढ़ मिनट के होयत अछि। डेढ़ मिनट के बाद हुनकर भाषा हिन्दी भऽ जाइत अछि। ताहि से दिल्ली के अंग्रेजी से नहि घबराऊ", राजीव ई कहि के एकटा सवाल आगू कऽ देलक। 'अहां कतेक सवाल लिखने रहि।" 'सभटा, मुदा दू टा आब्जेक्टिव सवाल गलत भऽ गेल छल।" 'तब अहां कियै घबराइत अछि", राजीव बजलाह। 'अहां जरूर पास करल होयब।" ता धरि आओर रूमक स्टूडेंट बाहर आबि गेल आओर आलोक बाबू के कहि लागल जे अहां रिजल्ट देखहि लेल जाऊ। अहांक जरूर सलेक्शन भेल होयत। आलोक बाबू के एकरा बादो साहस नहि भेल जे ओ अकेले भारतीय विद्या भवन जाइके अप्पन रिजल्ट देखतियै। हुनकर चेष्टा देखहि के राजीव संग भऽ गेल जे दूनू गोटे रिजल्ट देखहि लेल जायब। बेरसराय से 615 नंबरक बस पकड़ि के कनाट प्लेस अइलाह आओर फेर ओतय स भारतीय विद्या भवन। फिल्म 'थ्री इडियट्स" मे जैसे राजू रस्तोगी आैर फरहान अख्तर अपना नाम रिजल्ट के आखिर मे देखैत अछि, ताहिना आलोक बाबू देखहि लगलाह। चारि पन्ना मे रिजल्ट चस्पा छल। आखिर के तीन पन्ना मे रिजल्ट देखहि के राजीव से आलोक बाबू कहला, 'यौ हम कहैत रहि ने जे हम पास न कऽ सकब। देखियो अहि लिस्ट मे नहि तऽ हमर नाम अछि आओर नहि कतो हमर रोल नंबर अछि।" 'अहां पूरा लिस्ट देखलियै", राजीव पूछलाह। 'जी" 'अहां लिस्टक तीन पन्ना मे रोल नंबर तऽ देखलियै, मुदा शुरू बला पन्ना नहि देखलियै। अहांक नाम तऽ पहिलुक पन्ना मे अछि आओर अहांक पोजिशन पांचवां अछि।" ई सुनि के आलोक बाबू ठामे ठार रहि गेल। ओ सोचहि लगलाह जे की ओ एतेक काबिल अछि जे सैकड़ो स्टूडेंट के पछाड़ कऽ पांचवां स्थान पर रहब, ओहि मे जे परीक्षा अंग्रेजी मे भेल छल। भारतीय भवन मे एडमिशन भेलाह के बाद आलोक मे आत्मविश्वास बढ़ि गेल। अहि बीच हुनकर एडमिशन जामिया मिल्लिया इस्लामिया मे सेहो भऽ गेल। जतय हमरा से भेंट भेल। हम माने गोविंद। माने आलोक बाबू के सबसे निकट रहै बला। आई धरि आलोक बाबू से सभटा काज करने छल आैर कऽ रहै छल, सभक गवाह हम छी। ई गप भऽ सकैत अछि जे किछु उन्नीस या बीस बाजै मे भऽ सकैत अछि, मुदा, डडीर से एक्को बीत आगू-पाछू नहि होयत। हम फूसक घर मे बैसल छी आओर हमर हाथ मे कलम यै। ब्राह्म बबाक ठामक कसम खाइत छी जे कहब सत कहबू फूइस नहि। पहिलुक दिन आलोक बाबू से भेंट हमरा 507 नंबर बला बस मे भेल छल। ओ एडमिशन लऽ कऽ घुरैत छल। हमहूं घुरैत रहि संगे। देखहि मे ते टटैल छल मुदा दिमाग तऽ हुनका गोसार्इंयै देने छल। बाजै-भूकै मे होहन लोक सं हमरा आय धरि नहि भेंट छल। आओर दक्षिणी दिल्लीक बेरसराय मे रहैत छल आओर हर खानपुर मे। हम ते दू दोस्त साथ मे रहैत रहि मुदा आलोक असगरे। बेरसराय पुरान जेएनयू कैंपस के आगू अछि आओर ओकर पांछा आईआईटी के कैंपस अछि। ओतय मंदिर वाली गलि मे दिलपत पवारक मकान मे आलोक बाबू रहैत छल। कमरा नंबर-28, जकरा लेल कहैत जाइत रहै जे ओहि कमरा मे पत्रकारक आत्मा वास करैत अछि। कारण जे पिछला पांच साल से ओहि कमरा मे कोनो-नै-कोनो पत्रकार रहैत छलाह। ठामे आईआईएमसी अछि जे एशिया के बड़का संस्थान अछि आओर ओतय बड़का-बड़का पत्रकार निकलि के सभटा टीवी आओर अखबार मे भड़ल अछि। दिल्ली मे अइलहि के बाद आलोक बाबूक व्यस्तता बढ़ि गेल। ओ केवल सुतहि लेल कमरा पर आबैत छल। दिन-राति भटकैत रहैत छल। लोक हुनकर नाम राखि देने छल 'भटकैत आत्मा"। कियैकि हुनकर एक काल एकटा पाइर एक ठाम रहैत छल दोसर काल हुनकर दोसर पाइर दोसर ठाम। दूपहरिया मे दो बजे से लऽ कऽ पांच बजे तक ओ जामिया आओर एक घंटा मे मंडी हाउस आबि के पैदल भारतीय भवन पहुंचैत छल। ओतय सांझ छह बजे से आठ बजै धरि क्लास कऽ ओ राति नौ बजे धरि डेरा आबैत छलाह। फेर ग्यारह-बारह बजे धरि पढैत छल। खाइ के कोनो चिंता नहि छल, कियैकि रातिक खाना लेल ओ टिफिन मंगाबैत छल। भोरि भेलाह पर शर्माजीक चाहक दुकान पर जाइत छल जतय ओ ब्रोड-पकौड़ा खाइत छल। ओ शर्माजीक दुकान कऽ लऽ कऽ एकटा लेख 'शर्माजी टी स्टाल, ब्रोड पकौडे नान स्टाप" सेहो लिखने छल। ओ भूख मिटाहि लेल आ समय के बचत करहि लेल एतय ब्रोड पकौड़ा खाइत छल जे हुनकर मिता सब हुनकर नाम 'ब्रोड पकौड़ा" राखि देने छल। लेख एतबेक नीक छल जे मन हैयै जे अहोंक सुनाबी। ई एकटा पत्रिका मे छपल छल। आलोक बाबूक भाषा मे सुनबै तखन अहां के लागत जे हुनकर कलम मे सरस्वती बास करैत अछि। ते सुनू, 'दक्खिण दिल्लीक पौश इलाका। एक दिस जेएनयू के ओल्ड कैम्पस ते दोसर कात आईआईटी कैम्पस। अहि बीच अछि बेर सराय, जतय इंजीनियरिंग से लऽ कऽ सिविल सर्विसक तैयारी करहि बला गाम-घर से दूर रहिके खून-पसीना एक करैत अछि। नहि हुनका खाइके फिक्र होइत अछि आओर नहि सुतहि के। पढ़ै के आओर तैयारक टेंशन एहन होइत अछि जे ओ चाह बनाबै सं लऽ कऽ खाना बनाबहि मे ओ परहेज करैत अछि। बस एकहि टा धुन रहैत अछि हुनका मेहनत आओर सफलता। जखन धुन होयत जे किछु करबाक अछि तखन जानले गप अचि जे कोनो काज मे मन ते नहि लागत। मुदा राति बीतले आओर भिनसर भेला पर चाह आओर नास्ताक तलब अहि इलाका मे रहै बला छात्र के शर्माजी के टी-स्टॉल पर जाहि लेल मजबूर कऽ दैत अछि। करीब 15 साल से एतय के छोट गली में ओ दुकान लगाबैत अछि आओर ओ फुर्सत संगे पेटक बीच तारतम्य बनाबैत अछि। भिनसरे पांच बजे खुलहि बला ई चाहक स्टाल देर रात एक बजे तक खुलल रहैत अछि। अप्पन चटनीक लेल नामी शर्माजीक दुकानक चटनी ब्रोड-पकौड़ाक संग खाहि बला कतेक लोग आईएएस बनि गेल तऽ कतेक आईआईटी मे एडमिशन लऽ कऽ देश मे नहि विदेशो मे बसि गेल अछि। मुदा, शर्माजीक दुकानक समोसा, ब्रोड पकौड़ा आओर कचौड़ीक स्वाद नहि बिसुरने अछि। सेल्फ सर्विस आओर अपने से वाजिब पाय दैक एतय आबै बला लोकक फितरत अछि। आलोक बाबू आगू लिखने अछि जे दुकानक मालिक अप्पन पुरैनका गप मन मे आनहि के कहैत अछि जे जम्मू के सरकारी नौकरी करैत रहि मुदा ओतय से गुवाहाटी ट्रांसफर भऽ गेल। हमर बेटा के पाइर खराब छल आओर एकर इलाज कराबैक छल। हम गुवाहाटी नहि जाइके इलाजक लेल दिल्ली आबि गेलहुं। अप्पन बेटाक आओर परिवारक लेल सरकारी नौकरी के छोड़ि देलहुं। हमरा पूंजीक अभाव छल। घर जम्मू-कश्मीरक उधमपुर जिलाक एकटा छोटा गाम मे छल, जतय आतंकवाद के कारणे हम घुरि नहि सकैत रहि। बस मजबूरी छल ताहि सं हम अप्पन दुकान खोलहि देलहुं। शर्माजी खुश भऽ कऽ कहैत अछि जे हरका चटनी बनाबै लेल हम नेने से जानैत रहि आओ किछु नव काज ओकरा मे करैत रहैत छी। ताहि सं हम जखन दुकान खोलहुं तऽ लोक सभ के हमर चटनी बड़ नीक लागहि लागल। हमरो नीक लागल आओर एकरा से उत्साह बढ़ल। किछु काल बीतल तऽ जकरा भूख लागैत छल ओ हमरा मन पाड़हि लागल। शर्माजी कहैत अछि जे ओ जखन दुकान खोनने छल तखन एतय एकको टा जलखहि करैक दुकान नहि छल, मुदा आब तऽ देखियौ कतेक दुकान खुजल अछि। एतौय सं रहि के कंपीटिशन मे पास करहि बला कतेक लोक कहैत अछि, जे बेरसराय मे एक बेर रहि गेल ओ कोना शर्माजीक चाह आ ब्रोड-पकौड़ा के बिसुरि सकैत अछि।" ई लेख लिखी के आलोक बाबू बेरसराय मे नाम कमाय लेलक। जे कियो लोक दुकान पर जाइत छल, शर्माजी हुनका लेख देखाबैक छल मुदा पढ़ैक लेल कहैत छल। जखन आलोक बाबू आबैत छलाह तखन ओ पांचक बदला मे दूए टा पाय लैत छल। एक ठाम जतय भारतीय भवन मे अंग्रेजी मे पत्रकारिताक पढ़ाई करैत छलाह ओहि ठाम जामिया मेे हिन्दी मे पढ़ैत रहैत। बेरसराय मे रहैत काल आलोक बाबूक जानपहचान आईआईएमसी मे पढैक बला छात्र आओर पढाबैक बला प्रोफेसर से सेहो भऽ गेल। आईआईएमसी के प्रोफेसर राजेंद्र जोशी से हुनका खूब पटैत छल आओर जखन हुनका नहि मन लागैत छल तखन हुनके संग बैसैत छल। जोशी के कारणे आलोक बाबू आईआईएमसीक लाइब्रोरी भेटहि गेल जतय कतेक किताब छल आओर आलोक बाबू खूब पढैत छल। अहि बीच एकटा एहन गप भेल जे आलोक बाबूक जिनगीक सीख दऽ देलक। आगू बढि से पहिने अहां से एकटा गप करब आवश्यक अछि। जे यहि ठाम छी जतय से शीर्षक गप 'घोड़ि पर चढ़ि लेब हम डिग्री" के गप शुरू भेल। एक ठाम जामिया मिल्लिया इस्लामिया के हिन्दी विभाग छल जतय आलोक बाबू हिन्दी मे पढ़ैत छल। एतय हिन्दी भाषाक प्रकांड विद्वान सभ हुनका पढाबैक लेल आबैत छल। ओहि काल मे हास्य कवि डॉ. अशोक चक्रधर हिन्दी विभाग के कमान संभालने छल आओर विभाग मे 'जो लाहौर नहीं देख्या ओ जन्मया नहीं" के लेखक असगर वजाहत छल तऽ 'भीनी-भीनी बीनी चदरिया" उपन्यासक लेखक अब्दुल बिस्मिल्लाह सेहो ओतय छल। अहांके ते जानतै छियै जे असगर वजाहतक नाटक 'जो लाहौर नहीं देख्या ओ जन्मया नहीं" भारत-पाकिस्तान विभाजन पर आधारित अछि। अपना सब जे नाटक गाम-घर मे देखैत छी, ओहिना अहि नाटक के नहि देखल जाइत अछि। टाऊन मे जखन ई नाटक देखाअल जाइत अछि ते मारि परैत अछि। एतेक नीक नाटक ओहिने नहि लिखल जा सकैत अछि। पाय दैके, टिकस लैके लोक सभ ई या अहिने नाटक लोक देखैत छै। भारते टा मे नहि विदेशो मे अहि नाटक के मंचन भऽ चुकल अछि। यै हाल 'भीनी-भीनी बीनी चदरिया" उपन्यासक अछि। बनारसक जुलाहा पर लिखल गेल ई उपन्यास कथा के नब आयाम लिखने अछि। दोसर ठाम छल भारतीय विद्या भवन। जतय ओ अंग्रेजी मे पत्रकारिताक कोर्स करैत छल। अंग्रेजी हुनकर मजबूत नहि छल, मुदा जोश मे आबि के अंग्रेजी मे पत्रकारिता करहि लागल छल। किछु दिन तऽ नीक लागल मुदा भीतरे-भीतर जे हुनका पर बीतैत छल, से वैह ठा जानैत छल। ओना ई गप हम बता दैलहुं तऽ अहां ई नहि बुझियो जे कथाक अंत भऽ गेल। क्याकि जे आलोक बाबू के अंग्रेजी के नाम से सांप सूघि जाइत छल ओ आय आस्ट्रेलिया मे अछि तऽ कोनो नहि कोनो गप तऽ जरूर होयत। क्योकि आस्ट्रेलिया मे बिन अंग्रेजी जानल तऽ काज नहियै होयत। फेर आजुक दिन आलोक बाबू तऽ पैघ पोस्ट पर अछि। दिल्ली, दुबई, हांगकांग, न्यूयार्क मे घुमैत रहैत अछि। फेर हुनका इंटरनेट से जते मन लागैत अछि, ओकरा लेल हम की कहि। जहिना हमर जीमेलक स्टेटस पर हरका बल्ब जलैत देखैत अछि, ओ टिपटिपबै लागैत अछि। ओना ई आदत ओ कोनो रायपुर से संगे नहि आनलै छल। बेरसराय मे जखन ओ रहै लगलाह तखन ते एक्के-दूई टा ओतय साइबर कैफे छल मुदा कनिक ठामे मुनिरका मे कतेक साइबर कैफे खुजल छल जकरा अंगुरी मे गिनब आसान नहि अछि। बेरसराय में एक-दूई टा सेहो दोस्त बनि गेल छल। जखन सांझ राति आठ-नौ बजे ओ क्लास से फारिग भऽ कऽ डेरा घुरैत छल तऽ अप्पन दोस्तक संग मुनिरका के साइबर कैफे मे देर राति धरि चैटिंग करैत छल। ओहिनो ओहि काल मे चैटिंग करब बरका गप छल, क्याकि कम्मे लोक छल जकरा चैटिंग करै लेल आबैत छल। मुदा, आब तऽ लोक अप्पन मोबाइल से चैटिंग करैत अछि। ओहि काल याहू, रेडिफ छल। आओर आर्कुट के तखने अहि दुनिया मे आयल छल। फेसबुक, ट्विटर ओहि काल भविष्यक गर्भ मे छल। लोक याहू मैसेंजर पर घंटों लागत रहैत छल। आलोक बाबू के लऽ कऽ एकटा गप तऽ छल, जे ओ जतय जाइत छल या बैसैत छल, ओतय तुरंते लोक सभ जानै लागैत छल। मेहनती आ कर्मठ ते रहबे करल। अहि बीच एक सांझ जखन ओ जामिया मिल्लिया इस्लामिया से घुरि के भारतीय विद्या भवनक क्लास मे छल तखने एकटा लड़की हुनकर नाम लऽ कऽ बजौलखिन, 'आलोक अहांके नाम अछि। प्रोफेसर राजेंद्र जोशी हमरा अहांक लग पठौलखिन अछि।" 'हां, कहूं।", आलोक अनमनने ढंग से ओहि लड़की दिस ताकि के कहलखिन। 'हम तऽ एतय पार्ट टाइम कोर्स कऽ रहल छी।" 'नीक गप।" 'हम संयुक्त राष्ट्र संघक यूएनडीपी मे काज करैत छी आओर हमर नाम करिश्मा सिंह अछि।" 'ते हमरा से कोन गप।", आलोक बाबू कहलखिन। 'क्याकि हमरा आफिस से टाइम नहि भेटैत अछि। ताहि सं हमरा पढ़ै मे दिक्कत होयत अछि। जोशीजी कहलखिन जे जतय हमरा कोनो दिक्कत होय ओतय हमरा अहां सहयोग कऽ देब।" 'हम ते ओना कोनो नियम नहि बनौले छी, जे अहां के हेल्प नहि करब। मुदा, जहिना हम सभ के करैत छी, अहों कऽ हेल्प कऽ देब।" 'ठीक अछि।" 'जी।" ई कहिके आलोक बाबू एक कात आओर करिश्मा दोसर कात चलि देलक। आब दिक्कत ई छल जे एक कात हुनका अंग्रेजी भारि लागै तऽ दोसर कात करिश्मा हुनका नीन खराब कऽ के राखि देन छल। उमढ़ हिन्दी मे ओ कतेक रास काज सभ कऽ रहल छल। जामिया मे पढ़ैत काल हुनकर आलेख हिन्दी के सभ पैघ-पैछ अखबार मे छपि लागल छल। करिश्मा जतय हुनका सं अंग्रेजी मे गप करैत छल ओतय हुनका अंग्रेजी मे बाजहि मे सांप सूंघि जाइत छल। आलोक जखन तंग भऽ जाइत छल तखन हुनकर मुंह सं निकलि जाइत छल, 'देखब,जखन हम भारतीय विद्या भवन सं कोर्स भऽ जाइत ते हम घोड़िपर चढ़ि हम लेब डिग्री।" मुदा, आलोक बाबूक ई गप भारतीय विद्या भवनक कोर्सक बादे खत्म नहि भेल। ई गप कहि-कहि के ओ आओर लोक सभ के अंग्रेजी से डरा दैत छल जे अहि बेर ओ परीक्षा मे फेल जरूर करत आओर कनि-कनि अंग्रेजी मे पढ़ैत-पढ़ैत एहि भाषा के नीक कऽ लेलक। ई गप हमरे टा मालूम छल जे ओ खूब मन सं अंग्रेजी भाषा कऽ लऽ के मेहनत कऽ रहल छल। आगू बढ़हि सं पहिले अहांके ई गप हम कहि दैत छी जे अंिह ठाम आलोक बाबूक ई कथाक अंत नहि भऽ रहल अछि। क्याकि आय जदि ओ अंग्रेजी नहि जानैत अछि ते कोना आस्ट्रेलिया मे अछि। आओर जहिया सं आस्ट्रेलिया गेल अछि तहिया सं फोन-ते-फोन चैटिंगो हमरा सं खूब करैत अछि। हमहूं खूब करैत छी। ओहि दिन हमरा संग खूब चैट करलक। आलोक: हाय (अंग्रेजी बला) हम: मजे मे छी, अहां सुनाबू। 'अहां फोटू देखलहुं की, अहां के एकटा आओर मेल कईने छी"। 'हां, हम तऽ सभटा फोटो देखहि ुचुकल छी"। 'अहां ओकरे मे हुनका चिन्ह सकैत छी"। ई कहिके आलोक बाबू हमरा फेकरा बुझाबै लागल। 'दूनू अलबम देखलहुं अहां"। फेसबुक पर कुछु फोटू लोड केने छी की? हां, पुरैनका आओर नबका दोनो फोटू अछि ओतय"? 'ओके" 'यार अप्पन किछु ग्रुप फोटू अहांक लग अछि आओर संभव हुए तऽ अहां ओकरा स्कैन कऽ पठाह देब। हमहूं सभटा फोटू पटाह देब। आइये अप्पन लैपटॉप पर सेव कईने छी", आलोक बाबू हमरा कहलखिन। 'हां, हम भागलपुर से सभटा फोटू ले आइने छी"। हम कहलहुं। (एकटा गप तऽ बिसुरि गेलहुं जे हम माने गोविंद भागलपुरक छी। तिलकामांझी एकटा मोहल्ला अछि। ओहि ठाम सबौर जाहि बला रोड मे शीतला स्थान रोड अछि जतय हम रहैत रहि आओर आय-काल पापा-मम्मी रहैत अछि।) 'कोनो दिन बैसि कऽ सभटा फोटू स्कैन कऽ लेब, तखन अहां के पठा देब।' हम कहलहुं। एकटा अलबम भेजि रहल छी, चेक कऽ लियौ।" हम कहलहुं। 'ओके" 'अहि फोटू में अहां नहि छी"। 'कोनो बात नहि"। 'ओह मजा आबि गेल।" 'हमरो मजा आबि गेल।" कतेक पुरनका गप ख्याल आबि गेल आओर हमरा मन मे किछु आओर गप छल। हम जे लिखने छी, अहां पढ़लियै की नहि", आलोक बाबू कहलखिन। 'कोन गप"। 'अहि बीच हम कवि बनि गेल छलौंह"। 'अच्छा, आस्ट्रेलिया मे"। 'तीन-चारि दिन पहीने बहुत दिन बाद किछु लिखने रहि हिन्दी मे, 'लम्हे क्या लम्हे।" 'भेज देब नहि, ओकरा हम पढ़ब"। 'अलबम मे नहि पढ़लौ कि। गुरु ओतय पढ़हि के मजा अछि"। 'ओतय तऽ पढ़लौ, आओर की लिखने छी", हम कहलहुं। 'लम्हे के विस्तार देने छी"। 'हा, हा, मजा आबि गेल"। 'अइयों अहां खराब चौक के ट¬ूब लाइट छी की, केहन लिखने छी, ई गप हम पुछि रहल छी" आलोक बाबू हमरा पर व्यंग्य करलखिन। (अपूर्ण) विनीत उत्पलक साक्षात्कार प्रबोध सम्मान २००४ सँ सम्मानित मायानंद मिश्रसँ सभ दिन रहताह विद्यापति : मायानंद मिश्र विनीत उत्पल : अहाँक जन्म कोन ईस्वीमे भेल छल आ लालन-पालन कोना भेल? मायानंद मिश्र : हमर सर्टिफिकेट जन्मतिथि 1934 ईस्वी थिक, मुदा कुंडलीमे अछि 1930 ईस्वी। माइक देहावसान बादे सन 1936-37 ईस्वीमे जखन हम पांचो-छओ वर्षक रही, मातृक सुपौल आनल गेल होएब। मुदा बीच-बीचमे गामो लऽ गेल जाइत रही तकर किछु-किछु खंडित स्मृति अछि। गामक स्मृति ओ ज्ञान क्रमश: सन 1940-41 ईस्वीसँ होमऽ लागल जे हमरा एकटा छोट बहिनि सेहो अछि आ हमरा चारिटा पित्ती तथा दुइ टा पीसी सेहो छथि। हमर लालन-पालन छठमे-सातमे वर्षसँ मातृकेमे होमऽ लागल छल आ छोट बहीनक गाममे। विनीत उत्पल : कोशीक झमारल अहाँक परिवार रहए, तखन साहित्यसँ कोना जुड़ाव भेल? मायानंद मिश्र : जखन गाममे कोसी बाढ़िक उत्पातक कारण सन 1940-41 ईस्वीमे गाम छोड़िकेँ प्रतापगंज थानाक गोविंदपुर जा कऽ हमरा सभकेँ रहऽ पड़ल। ओतए ओहि मातृवत बहीनक अपन पतिकुलक किछु जमीन छल, जाहिसँ मात्र पेट टा भरल जा सकैत छल। एहि गोविंदपुरमे सन 1945-46 ईस्वीमे हमर प्राथमिक कवित्व प्रतिभाक अंकुरण भेल छल। जखन ओहि ठामक कालीस्थानक लेल सुपौलक कोने ग्रामोफोनक कोनो गीतक सुरमे भगवतीक अर्चना-गीत लिखने छलहुँ, जकरा हम स्वयं गाबितो छलहुँ कीर्तन मंडलीमे। विनीत उत्पल : उच्च शिक्षा कतएसँ भेटल? विस्तारसँ बताऊ? मायानंद मिश्र : सन 1950 ईस्वीमे सुपौलसँ मैट्रिक पास कएलाक बाद आगू पढ़बाक समस्या छल जाहिमे आर्थिक-समस्या मुख्य छल। उत्साह सभक छलनि जे हम आगू पढी विशेषत: ज्येष्ठ माम पंडित रामकृष्ण झा किशुनजी तथा पिताजी पंडित बाबू नन्दन मिश्रजीक। उत्साह एहि लेल सभक छलनि जे हमरा मैट्रिकमे सेकेंड डिवीजन भेल छल जे ताहि दिनमे बहुत कम होइत छलैक। अपन इच्छा छल पटना कालेजक। आवेदन सेहो कएल। नामांकनक स्वीकृति-सूचना सेहो भेटल। किंतु अंतिम कालमे किसुनजीक विचार बदलि गेलनि जे दरभंगे। दरभंगामे पंडित श्री चंद्रनाथ मिश्र अमरजी छथिन, हुनके अभिभावकत्वमे। सन 52 ईस्वीमे विवाह कारणे आई.ए. क परीक्षा नहि देल आ सन 54 ईस्वीमे आगराक मैथिली महासभाक कारणे बी.ए. क परीक्षा नहि दऽ सकलहुँ। विनीत उत्पल : मैथिली साहित्य दिश कोन मन आएल? मायानंद मिश्र : सन 50 ईस्वीमे सी.एम. कॉलेजमे नाम लिखाओल। श्री अमरजीक डेरापर अधिक काल साहित्यिक गोष्ठी, दरभंगासँ सुपौल-मुरलीगंज-कटिहार तथा मुजफ्फरपुरसँ जयनगर धरि विभिन्न स्थानपर कवि सम्मेलन, वैदेही-कार्यालय तथा गीत लेखन। ‘भाङक लोटा’क प्रकाशन। समए चलैत गेल, परिचय-परिधि बढ़ैत गेल। एहि बीच दरभंगामे राजकमलजीसँ परिचय भेल। फेर ललित-राजकमल-मायानंद क गोष्ठी सभ, साहित्यिक चर्चा सभ जाहिमे रामू अर्थात रमाकांत मिश्र ओ दिवानाथजीक निरंतर सहभागिता। सन 54 ईस्वीमे ललितजी सब-डिप्टी कलक्टर बनि दरभंगा चल गेलाह। राजकमलजी ता पटने छलाह। हमहूँ 56 ईस्वीक अंतमे रेडियो, पटना आबि गेलहुँ। विनीत उत्पल : ओहिकालमे पटनामे साहित्यिक परिदृश्य केहन रहए ? मायानंद मिश्र : पटनामे रेडियो स्टेशन, हास्य-व्यंग्य-सम्राट हरिमोहन बाबूक डेरा, पंडित जयनाथ बाबूक डेरा, गोपेशजीक डेरा, प्रो. आनंद बाबूक डेरा, फणीश्वरनाथ रेणुक डेरा, मुरादपुर खादी भंडार, श्री रूपनारायण ठाकुरजीक कार्यकर्ता-निवासमे माछ-भातक मासिक भोज आ चेतना समिति, पुस्तक भंडारक रामायण-गोष्ठी, अभिव्यंजना-प्रकाशन, विभिन्न समए ओ विभिन्न स्थानपर घनघोर साहित्यिक चर्चा होइत छल। ओहि कालमे दक्षिण बिहारसँ मिथिलांचल धरि सभ जगह कवि सम्मेलनमे शामिल भेलहुँ। विनीत उत्पल : पटनासँ सहरसा अएलहुँ, एतए केहन बीतल? मायानंद मिश्र : एम.ए. क पश्चात सन 61 ईस्वीमे आबि गेलहुँ सहरसा कॉलेज, सहरसा। कॉलेज अध्ययन-अध्यापन, सघन-लेखन, बलुआसँ बम्बइ धरि विद्यापति पर्व-समारोहमे मंच संचालन, भाषणो आ कविता पाठ सेहो, विभिन्न संस्थाक संगठनात्मक प्रक्रियाक अध्ययन, सहरसामे विभिन्न पर्व-समारोहक आयोजन, मैथिली चेतना परिषद, सहरसाक गठन, पटनामे मैथिली महासंघक संगठन, डाकबंगला चौक-जाम क कार्यक्रम, लेखन आ पाठन, प्राचीन इतिहासक सघन अध्ययन, पुन: प्रथम शैलपुत्री च, मंत्रपुत्र, पुरोहित आ स्त्रीधनक लेखन आ तकर हिन्दी आ॓ मैथिलीमे प्रकाशन, दिशांतर, अवांतर, चंद्रबिंदु क प्रकाशन। तकैत-तकैत सहरसा कॉलेज, सहरसा आ स्नातकोत्तर केंद्र, सहरसामे 33 वर्षक सेवा-काल समाप्त भऽ गेल आ 1994 ईस्वीमे अवकाश ग्रहण कऽ लेलहुँ। विनीत उत्पल : अहाँक दृष्टिक विस्तार कोना भेल? मायानंद मिश्र : दृष्टिक विस्तार वस्तुत: मामक रूपमे युगांतकारी मैथिली साहित्यकार पंडित रामकृष्ण झा ‘किशुन’ द्वारा स्थापित मिथिला पुस्तकालयक कारणे भेल। ओहि ठाम 47 सँ 50 ईस्वीक बीचमे पढलहुँ जाहिमे प्रेमचंद, जैनेंद्र, इलाचंद्र जोशी, भगवतीचरण वर्मा, शरतचंद्र, बंकिम बाबू, रवींद्रनाथ ठाकुर तथा ताराशंकर वन्धोपाध्याय आदि प्रमुख छलाह। एहि समएमे किसुनजीक आदेश-निर्देशक विरूद्ध रातिकेँ चोरा कऽ चंद्रकांता ओ चंद्रकांता संतति संगहि शरलक होम्स सिरीज सेहो पढ़ि गेल रही। ओहि समएक ‘माया’ समकालीन ‘नई कहानियां’ छल जे नियमित पढ़ैत रही। विनीत उत्पल : पहिल रचना कोन छल? मायानंद मिश्र : 49 ईस्वीमे हरिमोहन बाबूक प्रभावक प्रचंड प्रतापे, हम प्रथम-प्रथम मैथिलीमे ‘हम रेल देखब’ नामक एकटा गद्य रचना कथात्मक शैलीमे लिखलहुँ जे हाइस्कूलक वार्षिक पत्रिकामे छपल। एहि प्रकाशन-प्रोत्साहनक कारणे भांगक लोटाक अधिकांश कथा, अही 49-50 ईस्वीमे लीखि गेलहुँ जकर प्रकाशन 51 ईस्वीमे प्रो. श्री कृष्णकांत मिश्रक वैदेही प्रकाशनक द्वारा भेल। विनीत उत्पल : भांगक लोटा कतएसँ प्रकाशित भेल छल आ कहिया ? मायानंद मिश्र : भांगक लोटाक दुइ गोट अंतिम कथा मैट्रिक परीक्षाक बाद लिखने छलहुँ जकर प्रतिलिपि श्री अमरजी कृपापूर्वक देखि देलनि, मुदा ओहूसँ पैघ उपलब्धि हमरा लेल भेल जे आचार्य सुमनजी दुइ बिन्दु नामे आ॓कर भूमिका लीखि देलनि आ प्रो कृष्णकांत मिश्रजी ओकरा सन 51 ई.मे छापि देल वैदेही प्रकाशनक दिससँ, हमरासँ एक्कोटा टाका नहि लेलनि। अपितु एक गोट टाका देलनि, मना कएलाक उपरांतो, पंडित त्रिलोकनाथ मिश्रजी आ॓कर मूल्य, जे ओहिपर छपल छल। विनीत उत्पल : भांगक लोटामे तँ हास्य छल, मुदा गंभीर लेखन दिश कोना घुरि गेलहुँ ? मायानंद मिश्र : भांगक लोटाक पश्चात हम हास्य कथा नहि लिखलहुँ। ई प्रकाशन प्रोत्साहन हमर कथा-लेखनक प्रेरणा अवश्य बनल जाहि कारणे , 51-52 ई सँ हास्य छोड़ि, सामाजिक जीवन-संघर्षपर आधारित मनोविज्ञानक गंभीर भावक कथा सभ लीखऽ लगलहुँ जाहिमे प्रमुख छल रूपिया, सुरबा, आगि मोम आ पाथर तथा सतदेवक कथा जे कालांतरमे, सन 60 ई.मे कलकत्ताक मैथिली प्रकाशनक दिससँ प्रकाशित ‘आगि मोम आ पाथर’ नामक संग्रहमे संकलित अछि, जकर अधिकांश कथा 59-60 ई.क मिथिला दर्शनमे प्रति मास छपल छल। मुदा मंच-जीवनमे हमर प्रवेश कथा-लेखनसँ नहि अपितु काव्य रचना विशेषत: गीत-रचनासँ भेल छल। विनीत उत्पल : साहित्यिक यात्रामे केकर लेखनसँ प्रभावित भेलहुँ ? मायानंद मिश्र : 40-50 ई. धरि अबैत-अबैत नेपाली आ॓ बच्चन क गीत-रचनाक प्रभाव हमरापर बहुत छल। सन 59 ई सँ बहुत पूर्वहि अर्थात दरभंगे कालमे सी.एम. कॉलेजक हिन्दी प्रोफेसर श्री सुरेंद्र मोहनजीसँ अज्ञेय द्वारा संपादित प्रतीक आ॓ तार सप्तक दुइ भाग पढ़ने छलहुँ आ अतिशय प्रभावित भेल छलहुँ। क्लासमे पढ़ल प्रसाद-पंत-निराला-महादेवी वर्मासँ सर्वथा भिन्न छल ई काव्य धारा, जाहि पर टी. एस. इलियट- एजरा पाउंड सँ लऽ कऽ एलेन गिन्सबर्ग आ॓ एंग्रीजेनरेशन तथा ब्रिटेनक कवि लोकनिक प्रभाव छल। शरतचंद चट्टोपाध्याय, रवींद्रनाथ ठाकुर, टालस्टॉयसँ प्रभावित रही। विनीत उत्पल : अहाँ तँ हिन्दीमे किछु लिखने रहि? मायानंद मिश्र : सन 49 ई मे किछु हिन्दी गीत लिखलहुँ, जकर तीन गोट मुखरा, पंक्ति एखनहुं मोन अछि, ‘अरमान मेरे दिल के सभी टूट चुके हैं’, ‘अधजली कामनाएं लेकर अपलक मैं गगन निहार रहा’ तथा ‘मैं अंतर मे तूफान लिए चलता हूं’ मुदा, 50 ई.क मैथिलीमे रचित ‘आ॓हि दिल छलहुँ हम भांग पीने’ तथा ‘नोचनी तोर गुण कते गैब’ अत्यंत लोकप्रिय भेल। ‘स्त्रीधन’ नामक उपन्यास नेशनल बुक ट्रस्ट छापने अछि। विनीत उत्पल : गीतनाद, स्वरसंधानकेँ कोना साधलिऐ? मायानंद मिश्र : गीत गाबऽ लागल छलहुँ 1942-43 ईस्वीसँ सुपौलमे अपन मातामहक कीर्तन मंडलीमे। हमरा लगैत अछि जे हमरामे कंठ-स्वर, स्वर-संधान-प्रतिभा तथा सुरताल-ज्ञान आदि जकर अनेक प्रशंसा भेल-मातामह पंडित नागेश्वर झासँ आएल अछि। एना गुनगुना कऽ तँ किछु ने किछु गबैत छलाह आ तेँ कालान्तरमे जे हम गीत-रचना कएल से कोनो ने कोनो सुरतालमे रहैत छल। आ॓हि कारणे हम स्वयं सेहो गबैत छलहुँ तथा किछु गीत किछु गायक जाहिमे गायक चूड़ामणि पंडित रघु झाजी सेहो छथि, गबैत छलाह। विनीत उत्पल : अहाँ गायन ज्ञान कतएसँ पेलिऐ ? मायानंद मिश्र : सन 50 ई.क अंतिम चरणमे जखन ‘नभ आंगनमे पवनक रथ पर कारी-कारी बादरि आयल’ नामक गीत लिखलहुँ तँ गाबिये कऽ लिखलहुँ। यएह गायन-ज्ञान हमर छन्द-ज्ञान छल। जहाँ धरि आइयो मोन अछि, बिनु छन्द-ज्ञाने प्रारम्भोमे लिखल हमर गीत-रचनामे छन्द दोष, शास्त्रीय संगीत मर्मज्ञ पंडित कवि नै ईशनाथ झा ताकि सकलाह, जे एकर पहिल आधिकारिक श्रोता बनलाह आ ने आचार्य रमानाथ झा जे एहि गीतकेँ आई.ए.क लेल संकलित ‘कविता कुसुम’ मे सर्वप्रथम संकलित कएलनि। विनीत उत्पल : अहाँ जहि साल आई.ए. मे रही, ओहि साल पाठ्यक्रममे अहाँक लिखल कविता सेहो छल की? मायानंद मिश्र : अत्यधिक प्रसन्नता भेल छल आ॓हि दिन, जाहि दिन सन 52 ई.मे आचार्य पंडित रमानाथ झा आई.ए. क पाठ्यग्रंथक रूपमे कविता कुसुमक संकलन-संपादन कएलनि तथा आ॓हिमे ‘नभ आंगनमे पवनक रथपर’ नामक गीतकेँ स्थान दैत संकलित कएने छलाह। एना तँ कोनो संकलनमे स्थान भेटलासँ प्रसन्नता होइत किंतु एतए तँ स्वयं रमानाथ बाबू द्वारा संपादित ग्रंथक गप्प छल आ सेहो आई.ए. क पाठ्यग्रंथमे, जखन की हम ताधरि स्वयं आई.ए. पास नहि कएने छलहुँ। विनीत उत्पल : आ॓हिकालमे अहाँ कोन-कोन पत्रिकामे लिखैत छलहुँ ? मायानंद मिश्र : जहिना आ॓हि समएमे दरभंगासँ ‘वैदेही’ प्रकाशित होइत छल, तहिना कलकत्तासँ ‘मिथिलादर्शन’ आ॓ बादमे ‘मैथिली दर्शन।’ ललित आ॓ राजकमल सामान्यत: वैदेहीमे अधिक लिखैत छलाह तथा हम स्वयं अपेक्षाकृत मिथिला दर्शनमे। नाटको लिखने छी, कथा-कविता सेहो लिखने छी। विनीत उत्पल : अभिव्यंजनावादी काव्य की छल? मायानंद मिश्र : 59 ई मे मैथिलीमे अनेक नवीन काव्यक लेखन प्रथम-प्रथम कएल, जकरा हम अभिव्यंजनावादी काव्य कहने छी तथा जकर प्रथम प्रकाशन सन 60 ई. क आरंभमे ‘अभिव्यंजना’ नामक पत्रमे भेल अछि। संगहि अही 59 ई. मे हम एक वर्ष पूर्वक मैथिली पांडुलिपि ‘माटिक लोक’ क आधारपर प्रथम-प्रथम ‘माटी के लोक: सोने की नैया’ क नामसँ हिन्दीमे लेखनारंभ कएने छलहुँ। आ जहिना सन 50 ई. मे एकटा मैथिली कृति प्रकाशित भेल छल, तहिना सन 60 ई मे दुइ गोट मैथिली कृति ‘बिहाड़ि पात आ पाथर’ तथा ‘आगि मोम आ पाथर’ प्रकाशित भेल। विनीत उत्पल : आ॓हि काल की सपना छल? मायानंद मिश्र : हिंदीक आ॓हि अज्ञेयी नई कविता जकाँ मैथिलीमे नवीन काव्यान्दोलन ठाढ़ करबाक उद्देश्यसँ अभिव्यंजनाक प्रकाशन-योजना मोनमे आएल छल, जाहिमे मात्र ‘नवीन काव्य’ टा रहत। आ ताहि लेल पहिने स्वयं किछु नवीन काव्य लिखल। आ ओ दू-चारि दिनपर हरिमोहन बाबूकेँ सुनाबी जे अभिव्यंजनामे हमरा एहने कविता चाही। आ ओ देबो केलनि जे अभिव्यंजनामे छपल छल। आधा 59 ई. क घोर व्यस्तताक फलस्वरूप सन 60 ई.क आरंभमे अभिव्यंजनाक प्रकाशन संभव भेल। प्रकाशनक खर्च ओ लोकार्पण समारोहक सभटा खर्च स्वयं पंडित जयनाथ मिश्र, एकटा अर्द्ध परिचित किशोर युवा संपादकक उत्कट उत्कंठा ओ महत्वपूर्ण महत्वाकांक्षापर द्रवित होइत, कयने छलाह। सन 60 ई हमर लेखकीय जीवनक लेल अति व्यस्ततापूर्ण रहल। एहि समएमे जँ एक दिस अनेक कथा लिखल तँ दोसर दिस अनेक नवीन काव्यक सेहो रचना कएल जे कालांतर ‘दिशांतर’ मे संकलित अछि। तेसर दिस जँ अभिव्यंजनाक संपादन कएल तँ किछु समीक्षा सेहो एहि कालखंडमे लिखल, जाहिमे सँ किछु मिथिला दर्शन, वैदेही आ॓ कृष्णकांत बाबूक मैथिली सम्मेलनक रचना संग्रहमे अछि। ओहि काल एकटा काल्पनिक रेडियो नाटक सेहो लिखने छी- इतिहासक बिसरल। विनीत उत्पल : कोन-कोन पैघ साहित्यकारसँ भेट भेल छल? मायानंद मिश्र : दिनकरजी सँ हमर परिचय पंडित जयनाथे बाबू करौने छलाह मैथिली कवि ओ चौपाल स्वरक रूपमे। पहिल बेर दिनकरजी चौंकल छलाह आ चौपालक हमर स्वर आ॓ अभिव्यक्तिक अतिशय प्रशंसा कएने छलाह। रेणुजी सँ परिचय अति त्वरित गतिसँ अंतरंग आत्मीयतामे बदलि गेल छल। प्राय: नित्य रेडियो स्टेशनमे अथवा बुध दिनकेँ अधिक खन हुनका डेरापर सायंकालकेँ सांध्य गोष्ठीमे भेंट होइत रहल। विनीत उत्पल : अहाँ जवाहरलाल नेहरू आ इंदिरा गांधीसँ सेहो भेंट कएने छलहुँ ? मायानंद मिश्र : भारतक प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरूक चिर ऋणी रहब, जनिक विशेष आग्रहक कारणे, एतेक शीघ्र सन 65 ई मे मैथिलीकें देशक एकटा स्वतंत्र साहित्यिक भाषाक रूपमे साहित्य अकादमी मान्यता देलक। 73 ई मे तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधीसँ सेहो भेंट भेल छल। विनीत उत्पल : मैथिली चेतना परिषद संस्थानक निर्माण कोना कएलहुँ आ कोना कएलहुँ ? मायानंद मिश्र : 62 ई. मे हम सहरसा मैथिली चेतना परिषद नामक संस्थाक निर्माण कएलहुँ पंडित श्री अमरेंद्र मिश्रजीक डेरापर। एहि संस्थाक तत्वावधानमे अभिव्यंजनाक प्रकशनक संगहि सन 62-63 ई मे प्रथम-प्रथम कविश्वर चंद्र प्रसिद्ध चंदा झाक जयंती समारोहक आयोजन कएने छलहुँ सहरसा परिसरमे। सहरसाक ई समारोह पूर्वांचल मिथिलांचलक पहिल ओ आदिम समारोह तँ छलहे (प्राय:) संभव पिंडारूछ गामक पचासक दशक अनेक आयोजनक पश्चात ई दोसर स्थान छल, जाहि ठाम एहि प्रकारे हुनकर स्मरण कएल गेल। एहि स्मरण समारोहक एकटा कारणो हमरा मोनमे छल। हुनक मातृक बड़गाम छलनि, जतऽ हुनक प्रारंभिक शिक्षा भेल छलनि आ जे आधुनिक मैथिलीक सूत्रधार छलाह। विनीत उत्पल : जीवनक एहि मोड़पर अहाँक जीवनदर्शन की अछि ? मायानंद मिश्र : हम दर्शनक गप्प नहि करैत छी। किछु-किछु निष्काम कर्मक मर्म पढल अछि, किछु-किछु बुझलो अछि। की सभक जीवन-दर्शनक अनुकूल चलि पबैत अछि। माया चलऽ दैत अछि ? अनेक-अनेक प्रश्न अछि जे अनुत्तरिते रहि जाइत अछि तथापि जीवन-प्रवाह अछि जे प्रवाहित होइत चल जाइत अछि, चल जाइत रहत, अविरल, अविराम। विनीत उत्पल : कालगतिकेँ की मानैत छी ? मायानंद मिश्र : सर्वोपरि काल-गति। मुदा, मनुष्य गति तँ एकमात्र संघर्षक गाथा थिक। जखन-जखन समाजक ई गति ओ दुर्गति होइत अछि, तखन-तखन समाजमे पुनर्जागरण होइत अछि। युगक धाराकेँ मोड़ि समाजमे रचनात्मक परिवर्तन अबैत अछि, निश्चित अबैत अछि। अबैत रहल अछि, जकर साक्षी थिक इतिहास, मानव इतिहास। आब ओही इतिहासक प्रतीक्षा अछि। प्रतीक्षाक एकटा भिन्ने सुख होइत छैक। विनीत उत्पल : एखुनका कालमे केकर रचना नीक लगैत अछि? मायानंद मिश्र : मैथिलीमे नचिकेता, सुभाषचंद्र यादव, जयधारी सिंह आ डॉ महेंद्र झाक लिखल नीक लागैत अछि। विनीत उत्पल : मैथिलीक भूत, वर्तमान आ भविष्यकेँ लऽ कऽ की सोचैत छी ? मायानंद मिश्र : सभ दिन रहताह विघापति। मैथिलीक सौभाग्य अछि जे अंग्रेज एहि भाषाकेँ लोकक आगू आनलक। मैथिलीमे लोक पढ़ैत अछि, मुदा कीनए लागत तखन लेखक आओर प्रकाशक आगू आएत। विनीत उत्पल : अहाँक परिवारमे के सभ अछि, ओ सभ की करैत छथि ? मायानंद मिश्र : तीन लड़का, एक लड़की अछि। पैघ बेटा प्रो. विघानंद मिश्र जे पीजी सेंटर, सहरसामे इतिहासक प्रोफेसर अछि। दोसर डॉ. भवानंद मिश्र, राजेंद्र मिश्र कॉलेज मे इतिहासक प्रोफेसर अछि। छोट कामनानंद मिश्र दिल्लीमे हिन्दुस्तान अखबारक वेबसाइट संस्करणक इंचार्ज अछि। बेटी वंदना मिश्र जमशेदपुरमे रहैत अछि। दामाद स्टेट बैंक मे अफसर छथि। सुजीत कुमार झा नेपालक राष्ट्रपतिक नेपाली प्रेम- लोककें किया नहि पचि रहल ! काठमाण्डूमे सम्पन्न अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली सम्मेलनमे नेपालक राष्ट्रपति डा. रामवरण यादवकेँ भाषण फेरसँ विवादमे आएल अछि । राष्ट्रपति डा. रामवरण यादवकेँ अपन सम्बोधन नेपालीमे देलाक बाद मैथिल सभबीच कड़ा आलोचना भऽ रहल अछि । साहित्यकार डा. रेवतीरमण लाल कहैत छथि–मैथिलीमे बजला सँ डा. रामवरण यादवजीकेँ राष्ट्रपति पद नहि छिन्ना जइतैन्हि जे डर भऽ गेलन्हि । अखनो नेपालमे बड़का लोक सभ लग नेपाली बाहेककेँ महत्व नहि अछि एकर छोट उदाहरण राष्ट्रपतिक भाषण सँ लेल जा सकैत अछि ओ कहलन्हि । फेसबुक पर चारि दर्जन सँ बेसी व्यक्ति राष्ट्रपति यादवकेँ नेपाली भाषा प्रेमकेँ कडा आलोचना कएलन्हि अछि । सुरज यादव नामक एक व्यक्ति अपन फेसबुकमे लिखैत छथि — नेपालमे एखनो राजा जिवैत छथि तेकर गन्ध राष्ट्रपतिक भाषणमे भेटल । ओ आगा लिखैत छथि–नेपालक गणतान्त्रिक राष्ट्रपति सँ लोककेँ अपेक्षा छैक जे सम्पूर्ण देशक लोक बनय, सभ जाति, धर्म, भेष भुसा सँ प्रेम करय मुदा डा. रामवरण यादवकेँ कार्यकालमे शायद पुरा नहि हैत लगैत अछि । राष्ट्रपति डा. यादव धोती कुर्तामे सजि कऽ कार्यक्रम अवितथि हुनका कोनो कानून नहि रोकैत । फेर मैथिलीमे भाषण करितथि तऽ तइयो नहि कोनो कानून रोकैत कानूनक जानकारसभ कहैत छथि । अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनमे सहभागी रहल प्राध्यापक विजय दत्त कहैत छथि–नेपालक संस्कृति मन्त्री मिनेन्द्र रिजाल अपन भाषण शुरु करय सँ पहिने बाजल छलथि –हमरा मैथिली नहि बाजय अवैत अछि तएँ नेपालीमे बजैत छी अहुना राष्ट्रपति कएने रहितैथ तऽ संतोष होइत मुदा सच्चा मैथिल भेलाक बादो ओ नेपालीमे भाषण कएलन्हि लोककेँ पचि नहि रहल अछि । राष्ट्रपति होवय सँ पहिने ओ प्रायः कुर्ता पाइजामा आ गमछा लगौने रहैत छलथि मुदा राष्ट्रपति भेलाक बाद दौरा सुरुवाल आ ढाका टोपी हुनकर पहिरन बनि गेल अछि । कहियो काल पाग आ अन्य टोपी पहिरहो परैत छन्हि तऽ टोपीए परसँ लगा लैत छथि जे टोपी हटि गेल तऽ हुनक राष्ट्रपति पद कहि नहि हटि जएतन्हि । अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओवामा किछुए दिन पूर्व भारत आएल छलथि । भारत भ्रमणक क्रममे हुनका जतय भाषण देवय परलन्हि कनिको नहि कनिको हिन्दी वजवे करैत छलथि । भारतमे हिन्दीमे वजला सँ हुनक पगरी तऽ नहिए छिन्यलन्हि संगहि पूरे भारत वासीके हृदय जीत लेलन्हि । कनी अमेरिकी राष्ट्रपति सँ इम्हरके नेतासभ सिखथि ? अहि ठाम तऽ लोक अपने भाषा विसरि जाइत अछि । महाराज महेश ठाकुर कँालेज दरभंगाक प्राध्यापक एवं साहित्यकार चन्द्र मोहन झा ‘पडवा’ कहैत छथि— नेपालक राष्ट्रपतिक मैथिली सम्मेलनमे नेपाली भाषामे भाषण करवाक की वाध्यता छलन्हि हमरा नहि वुझल अछि यदि नेपालक कानूनमे राष्ट्रपति सभ भाषामे वाजि सकैत अछि इ वुझलहु तऽ वहुत निराशा भेल । राष्ट्रपति होवय सँ पूर्व कतेको वेर डा. रामवरण यादवकेँ भाषण मैथिलीमे सुन्ने छी ओ जानकारी देलन्हि । राष्ट्रपति यादवकेँ एहनो रुप राष्ट्रपति डा. यादव एक दिस मैथिली कार्यक्रममे धोती कुर्ताक स्थानपर नेपाली पोशाक दौरा सुरुवाल पहिर कऽ पहुचलथि आ नेपाली भाषामे भाषण कएलन्हि तऽ एक दिस मैथिलीसभमे व्यापक आलोचना भऽ रहल अछि । राष्ट्रपति यादवकेँ राष्ट्रपति होवय सँ पूर्व मैथिली आन्दोलनीक भूमिका सेहो रहल अछि । नेपालमे मैथिलीकेँ कात कऽ हिन्दी भाषाके वढावा देने वातकेँ ओ कडा विरोधी छलथि । अहिकेँ लेल जगह जगह ओ वजैत छलथि । राष्ट्रपति भेलाकवादो अपन गृह नगर जनकपुरमे एलाकवाद कोनो कार्यक्रममे सहभागि होइत छलथि तऽ मैथिलीएमे भाषण कएने छथि । काठमाण्डू स्थित हुनक निवासमे जलपानक व्यवस्था चुरा दही चिनी आचार कएलगेल अछि । एकरो पाछु हुनकाद्वारा अपनाके मैथिल वुझव रहल जानकारसभ कहैत छथि । मैथिल सभक प्रियगर जलपान रहल चुरादही राष्ट्रपति निवासमे पहुँचयवला हरेक व्यक्तिके देल जाइत अछि । नेपालक सभासद एवं सार्वजनिक लेखा समितिक सभापति रामकृष्ण यादव कहैत छथि— राष्ट्रपतिक आदेश पर ३ सय ६५ ओ दिन राष्ट्रपति निवासमे चुरा दहीक व्यवस्था कएलगेल अछि । राष्ट्रपति यादवके पसन्दीदा जलपान चुरादही छन्हि आ ओ वहुत मन सँ लोककेँ जलपान सेहो करवैत छथि । संस्मरण- मोबाइलक घण्टी जेना रुकिय नहि रहल छल नेपालक सभ सँ प्रतिष्ठित पुरस्कार जगदम्बाश्रीक लेल डा. राजेन्द्र विमलकेँ चयन कएल गेल ई समाचार जखन हमरा पता चलल शीघ्र हुनक मोवाइल पर बधाई देबाक लेल फोन लगेलौ, मुदा मोवाइल तऽ ईङ्गेज छल । आसिन ६ गते घण्टो प्रयास कएने रही । ई क्रम ७ गते सेहो रहल । कनिकालकेँ लेल मोनो तमसाएल जे एतेक कमाई छथि आ एकोटा टेलीफोन ठिक नहि रखैत छथि । खैर टेलीफोनमे बधाई वा बातचित नहि तऽ की ? घरे चली । जखन हुनक देवी चौक स्थित घर पर पहुँचलौं तऽ ओतयकेँ स्थितिए अलग छल । डा. विमलकेँ बधाई देबाक लेल लोकसभकेँ ओतबे भीड तऽ टेलीफोन आ मोबाइल कहैन हमहुँ आइए बाजब । डा. विमलक कनियाँ जिनका हमसभ विणा अन्टी कहैत छियन्हि ओ जे बधाई देबाक लेल हुनका घरमे पहुँचथि तिनका मिठाइ खुवबैत छली । हमरे संगे ओतय पहुँचल श्याम भाइजी (श्याम सुन्दर शशि) कहलथि ‘मिठाइ आइए चललैक अछि से नहि बुधदिन साँझे सँ चलि रहल अछि ।’ ओ बुधक साँझ सेहो ओहि ठाम पहुँचल छलथि आ मिठाई सेहो खएने रहथि । अस्तु मैथिली, नेपाली, हिन्दी, भोजपुरी, नेवारीसभ भाषाक चोटीक साहित्यकारकेँ टेलीफोन मात्र नहि शुभेच्छुक सभकेँ बधाई पर बधाई आबि रहल छल । डा. विमल सर सँ १८–१९ वर्ष सँ परिचय अछि । एतेक खुशी हुनका कहियो नहि देखने छलौं । फेर लोकक रिसपौन्स नहि पुछु । अहि रुपमे भऽ सकैया व्यक्तिगत रुप सँ हम कल्पना तक नहि कऽ सकैत छी । जगदम्बाश्रीक पुरस्कार राशी २ लाख टका अछि । डा. विमल सनक व्यक्तित्वक लेल नहि जगदम्बाश्री बडका अछि आ नहि दू लाख टका । हमरा स्मरण अबैत अछि । जहिया हम काठमाण्डू सँ प्रकाशन होबयबला ब्रोडसिड अखवार लोकपत्रमे काज करैत छलौं विमल सरकेँ ओहिमे लेख लिखबाक लेल आग्रह कएलियैन्हि आ ओ दू टा लेख लिखने रहथि । ओ दू टा लेख एतेक प्रशंसित भेल छलैक जे सरकेँ नियमित स्तम्भ लिखबाक लेल कम्पनी दिस सँ विशेष अफर आएल छल । ओ जाहि क्षेत्रमे कलम चलौलन्हि, हुनकर जोडा भेटव मुस्किल छल । १२ वर्षक उमेर जहिया लोक साहित्य कि छैक अहि दिस दिमाग नहि लगबैत अछि । हुनक साहित्यिक यात्रा शुरु भऽ गेल छल । हुनक पहिल रचना जहिया ओ १२ वर्षक उमेरक छलथि तहिया भारतक प्रतिष्ठित अखवार आर्यावर्तमे छपल छल, ओ बेर बेर कहैत छथि । हुनकर नेपाल आ भारतकेँ प्रतिष्ठित पत्रिकासभमे रचना छपयकेँ क्रम एखनो जारी अछि । ई सत्य अछि हुनकर अन्य साहित्यकार जकाँ पुस्तक प्रकाशन नहि भेल अछि मुदा इहो सत्य अछि मैथिली साहित्यक आकाशमे डा. विमलकेँ टक्कर देबयबला विरले अछि । जखन कम पुस्तक छपा कऽ ओ अहि स्तरक व्यक्ति भऽ सकैत छथि तऽ आइ हुनकर किछ पुस्तक प्रकाशन भऽ गेल रहैत तहन कि होइत ? हमरा स्मरण अबैत अछि ओ दिन जहिया हुनका प्रज्ञाप्रतिष्ठानक सदस्यमे मनोनित कएने छल आ सपथ ग्रहण होबय सँ पूर्वे हुनकर पद फिर्ता लऽ लेल गेल छल । ओ बहुत निराश रहथि । त्रिभुवन विश्वविद्यालय हुनका प्राध्यापक तक नहि बना सकल एकर पीडा जखन ओ स्वयं मिथिला डटकममे लिखने रहथि तऽ सहियो बुझाएल । लोक जे कहौक ओ अपनाकेँ असफल बुझैत छथि । हुनक लेख पढलाक बाद बुझाएल छल मुुदा ओ हारल नहि छथि से हुनकालग गेलाक बाद बुझाएल । जगदम्बाश्री हुनका कतेक इनर्जी देलकन्हि अछि से एखन नहि कहल जा सकैत अछि । हमरा हुनका लग सँ छुटला चारि पाँच घण्टा भऽ गेल अछि । हम आदरणीय अपन विमल सरकेँ बारेमे सोंचि रहल छी तऽ लगैत अछि हुनका लेल आब एहने दिन सभ दिन होइतैक । ओ रचनापर रचना करतथि । हुनका सम्मान देबयमे लोक कन्जुसी नहि करितैक । फेर टेलिफोन अहिना इङ्गेज रहितैक आ हमसभ विणा अन्टीकेँ मिठाई खाए लेल पहुँचतहु । बिहारोमे मैथिली—मैथिली मिथिलाक विधायक सभ मैथिलीमे सपथ लेलन्हि १५अम बिहार विधान सभाक पहिल दिन मिथिलाक विधायकसभ मैथिली भाषामे सपथ लेलन्हि अछि । बिहार विधान सभामे अहि सँ पहिनहुँ विधायक सभ सपथ लेने छलथि मुदा एतेक संंख्यामे पहिल बेर विधायक सभ सपथ लेलन्हि अछि । ग्रामीण विकास मन्त्री नितिश मिश्र , विनोद नारायण झा, अरुणशंकर प्रसाद , रामदेव महतो, रामलखन राम रमण सहित मधुवनी आ दरभंगाक अधिकांश विधायक मैथिलीमे सपथ लेलन्हि । अहिबेर विहार विधान सभामे मैथिलीक अतिरिक्त हिन्दी, उर्दु आ अंग्रेजीमे सपथ लेबाक व्यवस्था सेहो कएल गेल छल । ग्रामीण विकास मन्त्री नितिश मिश्र बातचित करैत कहलन्हि — ‘हम सभ मैथिल छी एकर बात विधानसभामे सेहो गुंजों अहि दुआरे मैथिलीमे सपथ लेलौं ।’ मैथिली भाषामे अहि सँ बहुत विकास हेतैक से नहि मुदा मिथिलाक सभ विधायक सपथकेँ माध्यम सँ मिथिला आ मैथिलीकेँ विकास करब से बचन सेहो अहिमे छिपल अछि, हुनक कथन छल । मधुवनी सँ विधायक बनल भाजपा नेता रामदेव महतो मैथिलीकेँ विकासमे भारतीय जनता पार्टी सभ दिन लागल अछि आ रहत कहलन्हि । मैथिलीमे सपथ लेलाक बाद बातचित करैत इहो स्मरण कराबय नहि बिसरलथि जे भारतक अष्टम अनुसूचिमे मैथिलीकेँ स्थान अटल विहारी वाजपेयी नेतृत्वक सरकार दियौने छल । अहि बेर विधायक गोपाल जी ठाकुर मैथिलीमे मात्र सपथ नहि लेलन्हि कुर्ता, धोती, गमछा, पाग पहिर विधानसभामे पहुँचल रहथि । हुनक पोशाक देख कऽ पत्रकार सभ घण्टो हुनक फोटो सेशन कएने छल । मैथिली आन्दोलन सँ लम्बा समय सँ जुड़ल एवं विद्यापति सेवा समिति दरभंगाक महासचिव बैद्यनाथ चौधरी बैजु कहैत छथि– ‘मैथिली भाषमे एतेक संख्यामे एतेक विधायक सभ सपथ लेब प्रसन्नताक बात अछि मुदा एतबे सँ काज नहि चलत ।’ ओ कनी फरिछा कऽ कहैत छथि— ‘मैथिली भाषाक विकासक लेल विहार सरकारकेँ एकटा बृहत्त योजना आनय परत ओहिमे भाषा, कला, साहित्य, संस्कृतिक विकास कएल जाए । अहिकेँ लेल शुरुए सँ दबाव देवाक लेल विद्यायक सभ सँ बैजु आग्रह कएलन्हि । किछ वर्ष पूर्व भारतक संसदमे दरभंगा सँ संसद रहल कृति अजाद धोती, कुर्ता, पाग, दोपट्टा पहिर कऽ पहिल दिन पहुँचल रहथि तऽ मैथिली भाषामे सपथ सेहो लेलन्हि । भारतक संसदमे भाकपा नेता चतुरानन्द मिश्र सेहो मैथिलीमे सपथ लेने रहथि । नेपालोमे सपथ नेपालमे मैथिली दोसर सभ सँ बेशी बाजय बला भाषा रहल अछि । कहियो काठमाण्डू उपत्यकाक राज्य भाषा मैथिली छल । ओतयकेँ राजासभ मैथिलीमे साहित्य लेखन सेहो करैत छलथि । मल्ल कालमे कएटा राजा एहन भेलथि । जिनकर एकटा साहित्यकारक रुपमे एखनो आदरकेँ साथ नाम लेल जाइत अछि । मुदा सपथकेँ इतिहास बहुत लम्बा नहि अछि । नेपालक संसदक तथ्याङ्क अनुसार डा. बंशीधर मिश्र नेपालक संसदमे पहिल बेर मैथिली भाषामे सपथ लेलन्हि । नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी (एकीकृत माक्र्सवादी लेलिनवादी)क नेता रहल डा. मिश्र २०५१ सालमे सपथ लेने रहथि । जहिया ओ मैथिली भाषामे सपथ लेलथि तहिया मैथिलीकेँ बात करब अपराध मानल जाइत छल, एहन स्थितिमे सपथ लेने रहथि । आब तऽ मिथिलाञ्चलक अधिकाँश नेता मैथिलीमे सपथ लैत छथि । हिन्दी भाषाकेँ गुणगान करयबला मधेशी जनअधिकार फोरमक सह अध्यक्ष जय प्रकाश प्रसाद गुप्ता सनक व्यक्ति सेहो मैथिलीमे सपथ लेने छलथि । अहि बेरक संविधान सभाक चुनावमे एकीकृत नेकपा माओवादी तऽ अपन सभासदसभ केँ अपन अपन मातृ भाषामे सपथ लेबाक लेल ह्विप जारी कएने छल । मैथिलीक चर्चित युवा साहित्यकार धीरेन्द्र प्रेमर्षिक शब्दमे मैथिली आन्दोलन सही दिसामे जा रहल अछि । तकर संकेत अहि बेरक संविधानसभाक सपथ देखलाक बाद लगैत छल । मन्त्रीक रुपमे पहिल बेर एकीकृत नेकपा माओवादीक तत्कालिन नेता मात्रिका प्रसाद यादव सपथ लेने रहथि । उपराष्ट्रपति परमानन्द झा सेहो मैथिली भाषामे सपथ लेलन्हि । शुरुमे ओ हिन्दी भाषामे सपथ लेलन्हि मुदा बहुत विवाद भेलाक बाद मैथिली भाषामे सपथ लेने रहथि। नेपालमे मैथिली भाषामे पढाइ: उत्साह कम निराशा बेसी अपन मातृभाषाक उत्थानक लेल नेपालक हरेक जनता जागल अछि। कोना बेसी अधिकार प्राप्त हुए ताहिमे सम्बन्धित भाषीसभ लागल रहैत अछि । नेपालक राजा सभद्वारा लागु कएल गेल एकटा भाषा आ एकटा भेषक सूत्रमे परिवर्तन भऽ रहल अछि । एहनमे सभ अपन अधिकारक लेल सचेत अछि । कोनो भाषाक विकासमे ओकर इतिहास, साहित्य आ लिपीके जहिना योगदान होइत छैक ताहि सँ कम ओकर भाषामे पढाइ आ भाषाक माध्यम सँ रोजागारीके सेहो नहि होइत छैक । मैथिलीके स्वर्णिम इतिहास अछि एकर अपन लिपी अछि एकर पढाई सेहो प्राथमिक विद्यालय सँ लऽ कऽ स्नात्तकोत्तरधरि होइत अछि । नेपाल आ भारतक लाखो व्यक्तिक मातृभाषा मैथिली अछि । मुदा एकर विकास जाहि गति सँ होएबाक चाही से नहि भऽ रहल अछि । उपलब्धी सेहो ओतेक नहि अछि । पढाइके स्थिति मैथिलीमे प्राथमिक विद्यालय सँ स्नात्तकोत्तरधरि पढाइ होइत अछि । नेपाल भारतक विभिन्न विश्वविद्यालय में एकर पढाइके मान्यता अछि । नेपालमे मिथिला राज्य स्थापनाकें चर्चा चलिते विद्यार्थीसभ मैथिली पढाइके अपन भविष्य बनाबय लागल छथि । नेपालक त्रिभुवन विश्वविद्यलय अन्तर्गत भऽ रहल एमएकेँ पढाईमे मैथिली विषय लऽ कऽ जनकपुरमे मात्र एक सय सँ बेसी विद्यार्थी अहि वर्ष नामाकंन करौने छथि । पाँच वर्ष पूर्व एमए मे दूटा तीनटा विद्यार्थी रहैत छल । मुदा तीन वर्ष सँ विद्यार्थीसभक चाप एकाएक बढल मैथिली विभागक तथ्यांक देखबैत अछि । तहिना नेपालमे एफएम रेडियो सभक विकासक कारण सेहो मैथिली भाषामे पढाइ दिस लोक अग्रसर भेल अछि । नेपालक ४० टा एफएम रेडियो मैथिली भाषामे समाचार आ कार्यक्रम प्रशारण करैत अछि । नेपालक किछ टेलिभिजन सेहो मैथिलीमे समाचार देबय लागल अछि । अहि सभ सँ मैथिली भाषा लिखय आ जानयबलाके मँाग कसि कऽ बढ़ल अछि । फेर प्राथमिक विद्यालयमे सेहो नेपालमे मैथिलीकेँ पढाइ होइत अछि । २०५६ सालमे मैथिलीकेँ प्राथमिक तहमे पढाइक लेल किताब छपाएल । तहिया सँ विभिन्न विद्यालय सभमे पढाइ होइत अछि । अहि क्रममे अखन फेर सँ प्राथमिक स्तरक पढाईक लेल ४० हजार किताब छपाबयकेँ काज चलि रहल अछि । नेपालक सप्तरीमे मैथिली पढाइकेँ केना व्यवस्थित कएल जाए ताहि लेल बभनगामा कट्टीक प्राधानाध्यापक जबाहर लाल देबक नेतृत्वमे मैथिली पढाइ उत्प्रेरक कार्यदल गठन कएल गेल अछि । ओ दल विभिन्न जिल्लामे कोना किताब पठाओल जाए सँ लऽ कऽ पढाइ केना शुरु कएल जाए ताहिमे अग्रसर रहल कार्यदलक सचिव देवेन्द्र मिश्र जानकारी देलन्हि । धनुषाक बहुअर्बा माध्यमिक विद्यालयक पूर्व प्राधानाध्यापक अयोध्यानाथ चौधरी धनुषामे पहिलवेर प्राथमिक तहमे पढाइ शुरु कएलन्हि । ओ विद्यालयमे प्राथमिक तह तथा ९ आ १० कक्षामे एखनो मैथिलीमे पढाइ होइत अछि । पढाईकेँ इतिहास भारतमे बहुत पहिनहि सँ मैथिलीमे पढाइ शुरु भऽ गेल मुदा नेपालमे २००८ साल सँ पढाइ शुरु भेल इतिहास अछि । जानकी आधार स्कुलमे एकर पहिल पढाई शुरु भेल अछि । ओना २०१९ सालमे सरकारद्वारा पूर्वीय भाषाके रुपमे ९ आ १० कक्षामे पढाइके लेल अनुमति देलाक बाद जोड सँ शुरु भेल अछि । जनकपुरक सरस्वती माविमे पण्डित सच्चिानन्द झा मैथिली पढाइ शुरु कएलन्हि । फेर धनुषाक विभिन्न विद्यालयमे क्रमशः मैथिली पढाइ शुरु भेल । धनुषाक बभनगामा मावि आ नगराइन माविमे बहुत विद्यार्थी रहैत छल । बभनगामामे मैथिलीक प्रसिद्ध नाटककार महेन्द्र मलंगिया लम्बा समयधरि मैथिलीमे पढबैत रहलाह । क्याम्पसक इतिहासक बात कएल जाए तऽ २०१४ साल साउन १४ गते इन्टर कलेजक नाम सँ क्याम्पसकेँ स्थापना भेल आ स्थापने काल सँ मैथिलीक अध्ययन शुरु भेल । मैथिलीक प्रथम प्राध्यापकक रुपमे पण्डित सूर्यकान्त झा नियुक्त भेलाह आ डा. धीरेश्वर झा धिरेन्द्रके आगमन १९६१ इ.धरि ओ कुशल शिक्षकके रुपमे सुशोभित रहलाह । डा. धीरेन्द्रक करिश्माई व्यक्तित्वक कारण सभक ध्यान मैथिली दिस आएल । डा. धीरेन्द्रक प्रयासमे २०३८ सालमे जनकपुरमे त्रिभुवन विश्वविद्यालय मैथिलीकेँ केन्द्रीय विभाग खोललक । ओहि साल सँ मैथिलीके स्नात्तकोत्तरमे पठन पाठन शुरु भेल । पहिल ब्याच मे १६ गोटे छात्र रहथि । एखन क्याम्पसक बात कएल जाएत तऽ जनकपुरक अतिरिक्त सिरहा, सप्तरी आ महोत्तरीमे मैथिलीके पढाइ होइत अछि । ई जिल्ला सभमे रहल प्लस टू क्याम्पस सभमे सेहो मैथिलीके पढाइ होइत अछि । अवरोधक रुपमे मैथिली विभाग नेपाल सरकार मैथिली भाषाक विकासक लेल त्रिभुवन विश्वविद्यालय अन्तर्गत केन्द्रीय मैथिली विभाग खोलने अछि । ओकर कार्यालय जनकपुरमे रहला सँ आ मैथिली भाषाक लेल सरकारक उच्च निकाय सेहो रहला सँ विभागक दायित्व किछ आओर बढि जाइत अछि । मैथिली भाषाक स्नात्तकोत्तरमे मात्र एक सँ बेशी विद्यार्थी नयाँ ब्याचमे अध्ययन कऽ रहल अछि । मुदा पढाई नहि होइत अछि । एकर मुख्य जिम्मेदार विभागाध्यक्ष डा. पशुपति नाथ झा छथि जे तलब भत्ता पकाबय पर मात्र ध्यान केन्द्रित कएने छथि । नेपाल सरकार सँ भाषिक शिक्षाक विकास विस्तारक जिम्मा पौने विभागकेँ अहि क्षेत्रक अन्य क्याम्पस सभमे मैथिलीमे पढाई विस्तारक लेल अखन धरि कोनो योजना नहि लौने अछि । आइए, बीए कोनो विषय सँ करु मुदा एमए मे मैथिली पढि सकैत छी मैथिली विभागद्वारा आनल गेल नयाँ नीति मैथिलीकेेँ समाप्त करबाक प्रयास रहल जानकारसभ कहैत छथि । मैथिली विभागद्वारा आनल गेल नयाँ पाठ्यक्रम सेहो विवाद सँ मुक्त नहि रहल अछि । मैथिली विभागमे कार्यरत सह–प्राध्यापक परमेश्वर कापड़ि कहैत छथि –‘मैथिली विभागक प्रमुख डा. पशुपति नाथ झा मैथिलीकेँ आन्दोलनी नहि मैथिलीक कर्मचारीकेँ रुपमे काज करैत छथि । हुनकर दीर्घ योजना किछ नहि छन्हि । ताहि लेल एतेक समस्या भऽ रहल अछि । ओना डा. झा नयाँ पाठ्यक्रममे किछ गल्ती भेल स्वीकार करैत अहिमे सुधार करब बतबैत छथि । ओना मैथिलीकेँ सभ सँ बडका आन्दोलनी अपने रहल प्रसंगक क्रममे बेर बेर कहलन्हि । पढाइक लेल बर्तमानमे प्रयास पढाईक लेल जे नेपालमे माहौल बनि रहल अछि । ताहि हिसाव सँ विशेष रुप सँ प्रयास नहि भऽ रहल अछि । तखन मैथिलीक यूवा साहित्यकार धीरेन्द्र प्रेमर्षिक प्रयास सराहनीय रहल अछि । ओ कान्तिपुर एफएमक हेल्लो मिथिला मार्फत अभियान चला रहल छथि । मैथिली पढाई उत्प्रेरक दल सप्तरीक सचिव देवेन्द्र मिश्र स्वीकार कएलन्हि ‘यदि धीरेन्द्र प्रेमर्षि बेर बेर नहि खोंचारितथि तऽ सप्तरीमे कार्यदल नहि बनैत ।’ ओना जनकपुरक मिथिला नाट्यकला परिषद, युवा साहित्यकार नित्यानन्द मण्डल, मानवअधिकारवादी विजय दत्तक सेहो महत्वपूर्ण योगदान रहल छन्हि । जनकपुरमे अन्तराष्ट्रीय मातृभाषा दिवसक अवसर पर अहिबेर निकालल गेल जुलुसमे मातृ भाषा शिक्षा पर विशेष जोड देल गेल छल । आब की ? मैथिली भाषाक विकासक लेल बहुत काज भेल अछि । मुदा एतहि सन्तोष करबाक अवस्था नहि अछि । विश्वविद्यालयक पढाईमे हरेक तहमे मैथिली भाषाक पढाई सञ्चालन करबाक लेल लविङ्ग ,कैम्पानिङ्ग, प्रचार प्रसार, क्षेत्र विस्तार, अवसरके सृजना, योजना , अनुगमन, कार्यनीति, रणनीति आ व्यवस्थापनक आवश्यक्ता अछि । अहिके लेल त्रिभुवन विश्वविद्यालय, नेपाल सरकार, गैर सरकारी संस्था, स्थानीय निकाय सहितक अग्रसरताक आवश्यक्ता अछि । तहिना आवश्यक्ता अछि आन्दोलनक आ ओकर कुशल नेतृत्वकेँ । मुदा ई जिम्मेबारी के लेत ? मिथिला ओकर प्रतिक्षा कऽ रहल अछि। होरीके परिवर्तित रुप- जनकपुरमे महामूर्ख सम्मेलन मैथिली सम्मेलन, हिन्दी सम्मेलन, नेपाली सम्मेलन, जातीय सम्मेलन, स्वास्थ्य सम्मेलन, किछ नइ किछ सम्मेलन सभ देश विदेशमे जतय जाऊ ओतय होइते रहैत अछि । मुदा महामूर्ख सम्मेलन नामेसँ लगैत अछि जे कोनो नयाँ सम्मेलन हैत । ठिक । नयाँ सम्मेलन वा कहि महामूर्ख सम्मेलनके नेपालमे धुम अछि । होरीक अवसरपर आइ काल्हि नेपालक विभिन्न स्थानमे महामूर्ख सम्मेलन होइत अछि । सम्मेलन अहि प्रकार सँ उचाई ग्रहण कऽ रहल अछि जे अहिके साल भरि सँ लोकके प्रतिक्षा रहैत अछि । महामूर्ख सम्मेलन भेलैक की ? जहिना अन्य सम्मेलन सभा होइत अछि तहिना महामूर्ख सम्मेलन सेहो होइत अछि । मुदा अहि में जे पदबी भेटइत अछि ओ महामूर्ख नाम सँ जोडल रहैत अछि । जनकपुरमे पाँच वर्ष सँ महामूर्ख सम्मेलनक आयोजन कऽ रहल मिथिला नाट्यकला परिषदक अध्यक्ष सुनिल मल्लिक कहैत छथि —‘विभिन्न क्षेत्रक व्यक्तिसभ एकठाम जम्मा होइत छी घण्टो ब्यंग्यात्मक कार्यक्रम होइत अछि बर्षभरिमे कतय कमजोरी कएलौ ताहिपर विद्वानसभ ब्यंग्य करैत छथि मुख्य रुपसँ महामूर्ख सम्मेलनमे इएह सभ होइत अछि ।’ समान्यतया लोककँे लागत जे महामूर्ख के बनैत हैत ? मुदा आश्चर्यक बात तऽ ई छैक जे लोक कामना करैत रहैत अछि जे महामूर्खक उपाधि हमरा भेटौ । २०६५ सालक महामूर्खक उपाधि प्राप्त कर्ता एवं मैथिलीक बरिष्ठ साहित्यकार डा. राजेन्द्र प्रसाद विमल कहैत छथि ‘उपाधि प्राप्त करब अपनामे बडका बात होइत अछि , प्रेम सँ लोक किछ पिब लैत अछि । तखन महामूर्ख पाएब बडका भारी बात नहि । सम्मेलनक इतिहास महामूर्ख सम्मेलन नेपालक विभिन्न स्थानमे होइत अछि । जनकपुरमे बहुत उचाइ ई सम्मेलन प्राप्त कएने अछि । मुदा एकर प्रारम्भ नेपालक विरगंज सँ भेल अछि । मैथिली साहित्य परिषद विरगंज २०५० साल में एकर पहिल आयोजना कएने छल । पहिल महामूर्ख लाला माधवेन्द्र जी भेल रहथि । इ सम्मेलनकें परिकल्पनाकार रहल मैथिली साहित्य परिषदक पूर्व महासचिव एवं चर्चित पत्रकार चन्द्र किशोर झा कहैत छथि— ‘नेपालमे २०४६ सालमे बहुदल आएल छल । राजनीतिक रुप सँ बदलाबक समय छल । ओ बदलाबमे समाजिक तथा साहित्यिक क्षेत्रक व्यक्तिके सेहो योगदानक आवश्यकता छल तेहनमे ई कन्सेप्ट आएल अछि ।’ समाजमे रहल विकृति विसंगति कें समाप्त करबा मे ब्यंग्य बहुत काम करैत अछि ओ कहलन्हि । विरगंजमे आब होरी मिलन समारोह महामूर्ख सम्मेलनक आयोजना करैत अछि । महामूर्ख सम्मेलन प्रकृतिके कार्यक्रम भारतक किछ राज्यमे पहिनहि सँ होइत आएल अछि । जनकपुरमे २०६१ साल सँ महामूर्ख सम्मेलन होइत आएल अछि । २०६१ सालक महामूर्ख मैथिली कवि नरेश ठाकुर , २०६२ कें एमाले नेता शीतल झा , २०६३ कें जनकपुर नगरपालिकाक तत्कालीन मेयर हरि बहादुर बिसि, २०६४ कें सदभावना नेता ओमकुमार झा , २०६५ कें बरिष्ठ साकित्यकार डा. राजेन्द्र विमल आ २०६६ केँ पूर्व मन्त्री एवं एमाले नेता रामचन्द्र झा कें पदबी देल गेल । महामूर्खक छनौट केना ? महामूर्खक छनौट केना होइत हैत बहुतोकें उत्सुकता भऽ सकैत अछि । सहीमे कम मेहनत नहि होइत अछि । महामूर्ख सम्मेलनक आयोजक मिथिला नाट्यकला परिषदक अध्यक्ष सुनिल मल्लिक कहैत छथि —‘महामूर्खक छनौटक तैयारी आयोजनाक तैयारी सँग शुरु भऽ जाइत अछि । अहिके लेल एकटा कमिटी गठन कएल जाइत छैक । ओहे निर्णय करैत अछि । किछ गोटे तऽ महामूर्ख बनबाक लेल कसिकऽ लगैत अछि । जनकपुरक पत्रिका सभ एक हप्ता पहिनहि सँ अहि बेरक महामूर्ख के बनत तकर नामपर समाचार दऽ चर्चा चलबैत रहैत अछि । तहलका नेपाल दैनिक पत्रिकाक सम्पादक राजेश कुमार कर्ण कहैत छथि —‘महामूर्ख जनकपुरक एकटा लोकप्रिय कार्यक्रम अछि एकरा तऽ मिडिया क्यास करबे करत । फेर मिडियामे नाम सभ एला सँ कार्यक्रमके आकर्षण बढि जाइत अछि । महामूर्खक नामपर बहुतो गीत बनल कोनो चिज जखन लोकप्रिय होइत अछि तखन ओकरा सभ क्यास करय लगैत अछि । महामूर्ख सम्मेलन सँ जोडिकऽ बहुत गीतकार सभ गीत लिखलन्हि अछि । मैथिलीक चर्चित गीतकार कालीकान्त झा त्रिषितक गीत खुब चर्चित भेल अछि । हुनक गीत ..... स्वागत वागत मूर्ख महान महामूर्ख सम्मेलन के अछि अपनेही पर अभिमान निप्पट मूर्ख चौपट्ट भट्ट अही आयब भेल प्रमाण छल प्रपंच पाखण्ड भरल जग सत्यक नहि पहिचान ई सम्मेलन कय प्रमाणित मूर्ख सकल विद्वान बनी प्रतिनिधि संसद सुनैत मूर्ख शिरोमणि शान पेन्ट पहिरि ठाडे भऽ मुतैत कुकुर सभक राग कुर्सी चढि लक्ष्मीके बाहन मूर्ख बनय विद्वान हा कुर्सी हे कुर्सी कुर्सी पक्ष विपक्षक प्राण स्वागत वागत मूर्ख महान महामूर्ख सम्मेलन आ मैथिली आन्दोलन महमूर्ख सम्मेलन सफलताक बाद मैथिली आन्दोलनी सभ एकरा मैथिली आन्दोलन सँ सेहो जोडय लागल अछि । मैथिलीके कोनो पाबनि हुए वा कार्यक्रम जखन सफल हैत तऽ एकरा आन्दोलन सँ जोडबे करत । पत्रकार श्याम सुन्दर शशि कहैत छथि — जनता संगे कोनो कार्यक्रमके जोडि देला सँ केना सफलता भेटैत छैक महामूर्ख सम्मेलनके देख लोक बुझि सकैत अछि । एकर प्रयोग मैथिली आन्दोलनमे सेहो करय परत हुनक कथन अछि। जनकपुरमे कोजागरा महोत्सव महोत्सव केँ आइ काल्हि फैशन चलि आएल अछि । लोककेँ आकर्षित करवाक लेल महोत्सव शब्द बेर–बेर प्रयोग होइत आएल अछि । जनकपुरमे मात्र वर्षमे मिथिला महोत्सव, होली महोत्सव, जुड़शीतल महोत्सव, झुलन महोत्सव, विवाह पञ्चमी महोत्सव, कोजागरा महोत्सव, कि कि महोत्सव होइत अछि । दर्शक तनवाक लेल किया नहि होउ महोत्सव नाम जोड़ला सँ एकटा आकर्षण अवश्य बढल अछि इलेक्ट्रोनिक मिडिया सँ आबद्ध पत्रकार रामअशिष यादव कहैत छथि । कोजागरा महोत्सव कोजागरा समान्यतया नव विवाहितकेँ घरमे होइत अछि । जाहि साल विवाह भेल ओहि साल मात्र बरक घरमे कोजागरा होइत अछि । मुदा अहिठाम तऽ बरक घरमे जे होइत अछि से हेबे करेत अछि मुदा प्रसिद्ध धार्मिक स्थल जानकी मन्दिरमे जे होइत अछि से देखय लाइक रहैत अछि । कोजागराक अवसरपर जानकी मन्दिरमे मखान, खाजा, लड्डुक भार अबैत अछि आ फेर भगवानकेँ चुमाओन होइत अछि । चुमाओन देखवाक लेल मन्दिर प्राङ्गणमे हजारो केँ भीड़ रहैत अछि । जानकी मन्दिरक महन्थ रामतपेश्वर दास वैष्णवक अनुसार चुमाओनक दृश्य देखवाक लेल आगामे बैसवाक लेल लोक दिनमे मन्दिरमे पहुँच जाइत अछि । ओहि ठाम महिलासभ घण्टो गीत गबैत छथि फेर हास परिहासक कार्यक्रम सेहो होइत अछि । जानकी मन्दिरक महन्थ दास कहैत छथि – लोकक घरमे कहाँ एतेक हास परिहास होइत अछि । विधक बाद तऽ हमरा स्नानो करय परैत अछि । ततेक लोक दही लगा दैत अछि । कोजागरा दिन मखान चढावयबलाकेँ सेहो अबेर रातिधरि मन्दिरमे भीड़ लागल रहैत अछि। भारक परम्परा सय वर्ष सँ बेसी पुरान जानकी मन्दिरमे भारक परम्परा एक सय सात वर्ष सँ निरन्तर चलैत आवि रहल अछि । महोत्तरीक रतौली गामक ब्रह्मदेव ठाकुरक घर सँ १ सय १ टा भार प्रत्येक वर्ष अबैत अछि । ओ सभ दशमी शुरु होइते कोजागराक भार साठयकेँ लेल तैयारी शुरु कऽ दैत छथि । ठाकुुर कहैत छथि– भार संगे छोट सँ लऽ कऽ बड़काधरि घरक सभ सदस्य पहुँचैत छी। घरक कोनो सदस्य बाहरो कमाई छथि ओहोसभ कोजागरा महोत्सवमे सहभागि होवयकेँ लेल चलि अबैत छथि । फेर भार पुरे परम्परागत शैलीमे मन्दिरमे पठाओल जाइत अछि । भरियाक परम्परा क्रमशः मिथिलामे हटय लागल समयमे सेहो दर्जनो भरियाकेँ कोजागरामे जानकी मन्दिरमे लऽ जायत देखल जा सकैत अछि । ब्रह्मदेव ठाकुर कहैत छथि–अन्य काल एकोटा भरिया तैयारी नहि होएत मुदा जानकी मन्दिरमे जायकेँ लेल तऽ मारि करय लैत अछि । घरोकेँ कोजागरामे कम आकर्षण नहि मन्दिरमे कोजागरा महोत्सव होइत अछि तऽ घरमे होवयबला कोजागराक आकर्षण समाप्त भऽजाइत हैत से नहि घरोसभमे सेहो ओतवे उत्साह संग कोजागरा होइत अछि। जनकपुरक पण्डित विद्यानन्द झा कहैत छथि–जाहिना मन्दिरक कोजागरामे भव्यता आएल अछि तहिना घरक कोजागरामे। लोक मखान बटैत अछि, भोज करैत अछि कि कि होइत अछि कि कि नहि । आब तऽ गाम–गाममे अहि अवसरपर नाटक सभ सेहो होवय लागल अछि । मिनापक लेल एकटा आओर उपलब्धी- दू लाखक पुरस्कार मैथिली भाषा, कला, साहित्य एवं सांस्कृतिक क्षेत्रमे काज करयबला अग्रणी संस्था मिथिला नाट्यकला परिषद जनकपुरकेँ फलकुमारी महतो मैथिली साधना सम्मान पुरस्कार सँ सम्मानित करबाक निर्णय कएल गेल अछि । फुलकमारी महतो मेमोरियल ट्रष्ट द्वारा स्थापित ओ पुरस्कारक राशि दू लाख एक हजार रुपैया रहल ट्रष्टक सदस्य सचिव एंव मैथिली साहित्यकार धीरेन्द्र प्रेमर्षि जानकारी देलन्हि अछि । ट्रष्ट मिनापक अतिरिक्त फुलकुमारी महतो मैथिली प्रतिभा पुरस्कार राजविराजक मिना ठाकुर आ मोरङ्गक दयानन्द दिगपाल यदुवंशीकेँ देबयकेँ निर्णय कएलक अछि । दूनु गोटेकेँ २५–२५ हजार रुपैया देल जाएत । गैर आवसिय नेपाली डा. उपेन्द्र महतो द्वारा अपन माय फुलकुमारी महतोक नाममे ट्रष्टकेँ स्थापना कएल गेल अछि । पुरस्कारक सिफारिसक लेल मैथिलीक वरिष्ठ साहित्यकार डा. राजेन्द्र विमलक संयोजकत्वमे धीरेन्द्र पे्रमर्षि आ पुनम ठाकुर सदस्य रहल समिति गठन कएल गेल छल । ओ समिति पुरस्कारक घोषणा कएलक अछि । सभ सँ बडका पुरस्कार प्राप्त भेलाक बाद मिनापक अध्यक्ष सुनिल मल्लिक कहलन्हि , हमसभ सही दिशामे काज कऽ रहल छी तकर पुष्टि भेल अछि । आब आओर लगन सँ काज करब बतौलन्हि अछि । मिनापक इतिहास मिनापक स्थापना २०३६ सालमे होइतो एकर पृष्ठभूमि २०२४ साल सँ शुरु भेल मिनापक संस्थापक सभ कहैत छथि । विलट साह एण्डी, पारस प्रसाद बदामी, भरत अकेला आ योगेन्द्र साह नेपाली २०२४ सालमे जनकपुरमे आधुनिक नाटय कला मन्दिर स्थापना कएलन्हि । प्रारम्भिक अवस्थामे अहि संस्थाक माध्यम सँ जनकपुरमे हिन्दी नाटक प्रदर्शन होइत छल । अहि क्रममे २०२८ सालमे मैथिली भाषाक मूर्धन्य साहित्यकार डा. धीरेश्वर झा धीरेन्द्र, योगेन्द्र साह नेपाली सँ भेट कएलन्हि आ आधुनिक नाटय कला मन्दिरक मञ्च पर मैथिली गीत सेहो गायल जाय अनुरोध कएलन्हि आ तकर बाद सँ ओहि मञ्च पर मैथिली गीत चलय लागल मिनापक संस्थापक योगेन्द्र साह नेपाली मिनापक २०४९ सालमे प्रकाशित स्मारिकामे लिखने छथि । ओहि समयमे डा. धीरेन्द्रक ‘तार काटु तरकुन काटु’ आ योगेन्द्र साह नेपाली ‘मरुआक रोटी खेसारीक दालि’, ‘देशी मुर्गी आ बेलायती बोल’ , ‘हे गै सगतोरनी’ सनक गीत लिखलन्हि जे बेस चर्चा पौलक । अहि गीत सभक लोकप्रियता देखि आधुनिक नाटय कला मन्दिरक मञ्च पर मैथिली नाटक सेहो होबय लागल । छिक प्रहसन, चमेलीक विआह, ब्रह्मस्थान सन नाटक मञ्चन भेल । ई क्रम चलिते रहल आ डा. धीरेन्द्रक सभापतित्वमे एकटा बैसार भेल जाहिमे योगेन्द्र साह नेपाली, बलराम प्रसाद राय, भोला दास, राम अशिष ठाकुर आ मदन ठाकुर उपस्थित भेल रहथि । निर्णय भेल जे अहि नाटय संस्थाकेँ विशुद्ध मैथिली नाटय मञ्चक रुप देल जाय । जेकर किछ गोटे विरोध कएलन्हि मुदा चारि वर्ष नहि बितैत मिनाप नामक नाटय संस्थाक गठन भऽ गेल । योगेन्द्र साह नेपाली स्मारिकामे लिखने छथि, ‘हम, धीरेन्द्र आ राजेन्द्र कुसवाहा मिल कऽ समाजसेवी राजदेव मिश्रक अध्यक्षतामे एकटा बैसार कएलहुँ जाहिमे सुदर्शन लालक नेतृत्वमे एकटा कमिटी गठन कएल गेल । मिनापक संस्थापक के छथि ? जखन कोनो संस्था बड्ड बेसी चर्चामे अबैत अछि तऽ क्रेडिट लेबाक लेल होड़ चलि अबैत अछि । अहुमे मिनाप सनक संस्थाक तऽ स्वभाविके अछि । डा. धीरेन्द्रक प्रेरणा आ योगेन्द्र साह नेपालीक अपन भाषा, साहित्य एवं सांस्कृतिक लेल किछ करी से सोच एकर स्थापनामे किछ बहुत मद्दत कएने अछि । मिनापक संस्थापक कमिटीक अध्यक्षमे सुदर्शन लाल कर्ण, उपाध्यक्षमे योगेन्द्र साह नेपाली, सचिवमे भोला दास, निर्देशकमे वलराम प्रसाद राय, कोषाध्यक्षमे महेश साह आ सदस्यमे राम अशिष ठाकुर, मदन ठाकुर, राजेन्द्र अकेला, राजेन्द्र कुशवाहा, परमेश्वर साह, नवीन मिश्र, पुरुषोतम शर्मा आ देव नारायण जी रहथि । ओना मिनापक स्थापना सम्बन्धि बैसार राजदेव मिश्रक अध्यक्षतामे जानकी पुस्तक भण्डारमे भेल छल । मिनापक उपलब्धी मिनाप जनकपुरमे मात्र नहि नेपाल आ भारतक विभिन्न स्थानमे झण्डा गारि चुकल अछि । मैथिली सम्बन्धि कतहु नाटक वा सांस्कृतिक कार्यक्रम होइ यदि मिनाप नहि रहत तऽ अपूर्ण लगैत अछि । स्वयं चर्चित नाटककार महेन्द्र मलंगिया कहैत छथि –‘जतय रमेश रंजन, मदन ठाकुर, सुनिल मिश्र, विष्णुकान्त मिश्र आ राम नारायण ठाकुर सन कलाकार हुए कोनो नाटक टिमक लेल चुनौती ठाढ़ कऽ सकैत अछि ।’ फेर नयाँ युवा युवती सभ सेहो ओहि रुपमे आएल अछि । अनिल चन्द्र झा, रविन्द्र झा, घनश्याम मिश्र, रंजु झा आ प्रियंका झा सनक कलाकार काइल्हो मिनापेक दिन छैक तकर संकेत दऽ रहल अछि । फेर सांस्कृतिक टिमकेँ एकटा फौजे मिनापक संग अछि । सुनिल मल्लिककेँ नेतृत्वमे प्रवेश मल्लिक, रमेश मल्लिक, नेहा प्रियदर्शिनी, संगीता देव, ललित कापर, शम्भु कर्ण, राम नारायण ठाकुर, दिगम्वर झा दिनमणि सहितक छथि । मिनापकेँ सर्वनाम, रामानन्द युवा क्लव, साँस्कृतिक संस्थान काठमाण्डू, सहित दर्जनो संस्था सम्मानित कएने अछि । तहिना सुनिल मिश्र, रमेश रञ्जन झा, मदन ठाकुर, रंजु झा, महेन्द्र मलंगिया, रेखा कर्ण सभ बहुतो बेर सम्मानित भऽ चुकल छथि । मिनापक एकटा आओर योजना मिनाप अखन अपन भवन निमार्णमे लागल अछि । नाट्यशाला आ कार्यालय भवनक लेल नाटक मञ्चन कऽ रहल अछि । मिनापक प्राङ्गणमे अस्थायी नाटक घर बनाय टिकटमे प्रत्येक राति नाटक मञ्चन करैत अछि । मिनापक महासचिव अनिल चन्द्र झा कहैत छथि, भवनक लेल नाटक मञ्चनके क्रममे टिकट सँ प्राप्त भेल आम्दानी आ अन्य व्यक्तिसभ सँ सहयोग लेबयकेँ काज शुरु कएल गेल अछि । किछु महिना पूर्व मैथिलीक वरिष्ठ नाटककार महेन्द्र मलंगिया नाटक घरकेँ शिलान्यास कएने छलथि । ओना पुस्तकक प्रकाशन दिस सेहो मिनाप आगा आएल अछि । डा. धीरेन्द्रक कथा संग्रह प्रकाशन कएलक अछि । तहिना जीवनाथ झाकेँ कृति सेहो प्रकाशन करबाक निर्णय कएलक अछि । मिनाप अध्यक्ष सुनिल मल्लिक कहैत छथि, मिनाप मैथिलीक हरेक पक्षकेँ लेल काज करैत रहत । अहिमे डगमगायत नहि । जनकपुरमे पागे पाग- पागक व्यवसायीकरण पर किया नहि सोची ? राष्ट्रीय निजी तथा अवासिय विद्यालय एशोसिएशन (एनप्याब्सन)क राष्ट्रीय अधिवेशनमे सहभागि होवय जनकपुर आएल सदस्य सभकेँ माथ पर एखन कोनो अन्य टोपी नहि पाग मात्र रहैत अछि । जतय जाउ खाली पाग पहिरने लोक भेटत । राष्ट्रीय समाचार समितिक काठमाण्डू कार्यालयमे कार्यरत पत्रकार प्रकाश सिलवाल कहैत छथि — अहि बेर जनकपुर सँ पागे सनेश लऽ जा रहल छी । एन प्याब्सनक कार्यक्रममे हुनका पाग पहिराओल गेल छल । ओ समारोहमे एक हजार सँ बेसी पाग वितरण भेल छल । एन प्याब्सनक केन्द्रीय अध्यक्ष गीता राणा पागकेँ देशक पहिचान सँ जोडैत छथि । बातचितक क्रममे ओ कहलन्हि — ‘ढाका टोपी जतबे नेपालीक लेल प्रियगर अछि ओतबे प्रियगर पाग सेहो अछि ।’ हुनका सेहो जनकपुरमे पाग पहिरने घुमैत देखल गेल । पाग पहिराबयकेँ परम्परा मिथिलाञ्चलमे बहुत लम्बा समय सँ चलैत आएल अछि । विवाह, उपनयनमे विशेष रुपसँ पाग पहिराओल जाइत अछि । ओना किछ वर्ष सँ सम्मान स्वरुप पाग पहिराओल जएबाक चलन बढल अछि । आब पागकेँ सम्मानमे मात्र नहि व्यवसायिक रुपमे विकासक बात सेहो उठय लागल अछि । पत्रकार एवं मैथिली साहित्यकार श्याम सुन्दर शशि कहैत छथि — ‘व्यवसायिक रुपमे आगा बढावयसँ पहिने बनावटमे समय सापेक्ष बदलाब करय परत ।’ माथमे खप्प सँ बैसत तखने लोक एकरा कस्सि कऽ स्वीकार करत ओ कहलन्हि । पागक दोकानदारसभ कहैत छथि— ‘एन प्याब्सनक कार्यक्रममे बहुत पाग बिक्री भेल अछि एक गोटे चारि–चारि टा पाग किनलन्हि ।’ पाग उद्योग पर विचार पागकेँ बढैत मांगकेँ ध्यानमे रखैत जनकपुरमे सेहो अहि सँ जुडल लघु उद्योग खोलल जाय अहि पर जनकपुरक व्यापारीसभ छलफल करय लागल छथि । पहिले वर्षमे ४÷५ हजार पाग बिक्री होइत छल ओ पाग मधुवनी सँ आनि काम चलाओल जाइत छल । मुदा आब तीन चारि गुणा बिक्रीमे बढोतरी भेल अछि एहनमे बाहर सँ नहि आनल जा सकैत अछि व्यापारीसभ कहैत अछि । व्यापारी रामकुमार साह लगनमे मात्र नहि आन समयमे सेहो पागकेँ खोजी होइत रहैत अछि जानकारी दैत छथि । जनकपुर उद्योग वाणिज्य संघक कोषाध्यक्ष जितेन्द्र प्रसाद साह कहैत छथि ‘पाग उद्योग खोलवाक लेल वाणिज्य संघ सेहो प्रयत्न करत । १० वर्ष पूर्व जनकपुरमे पागो नहि भेटैत छल जनकपुरमे पाग उद्योगकेँ बात उठि रहल अछि । मुदा १० वर्ष पूर्व एतयकेँ दोकानसभ पर पाग नहि भेटैत छल विवाह दानोक लेल मधुवनी आ दरभंगा सँ लोक पाग अनैत छल । पहिने विवाहदान सौराठ सँ होइत छल । ओतहि विवाह तय कएलक आ पाग लऽ आएल । जाहि कारण जनकपुरमे नहि कियौ पाग खोजी करैत छल आ नहि एतह बिक्री । जनकपुरक प्रसिद्ध स्थान जानकी मन्दिरक महन्थ रामतपेश्वर दास वैष्णव कहैत छथि—‘जानकी मन्दिरकेँ शतवार्षिकी हुऐ वा विशेष उत्सव दश वर्ष पहिने मधुवनी सँ पाग मंगबैत छलहँु ।’ अहि ठाम बिक्री भेला सँ सभकेँ सुविधा भेल अछि ओ कहलन्हि । मैथिलक पहिचान बनि रहल मैथिलक पहिचान कि अछि ? अहि पर किछु वर्ष पूर्व तक पान मखान, माछ सहितक बात लोक कहैत छल । मुदा आब पाग बनि गेल अछि । पूरे मिथिलाञ्चलमे जतह कतहु कार्यक्रम होइत अछि सम्मानमे पागे रहैत अछि । नेपाल संगीत तथा नाट्य प्रज्ञा प्रतिष्ठानक प्राज्ञ रमेश रञ्जन झा कहैत छथि पाग आइ सँ मात्र नहि सभ दिन सँ अपन क्रेज बनौने अछि । मुदा जाहि रुप सँ एकर प्रसार भऽ रहल अछि ई सुखद अछि । पागक विकासक लेल सरकार दिस सँ एकटा योजना आनय परत इमेज च्यानल टेलिभिजन सँ आवद्ध पत्रकार रामअशिष यादव कहैत छथि । ओ आगा कहलन्हि पाग आव सम्पूर्ण मैथिलक पहिचान वनि गेल अछि अहिमे वहस कएनाइ बुद्धिमता नहि भऽ सकैत अछि । लघुकथा- भौजी सार्वजनिक पुस्तकालयक बोर्डपर नजरि पड़िते राधाक हृदयक गति एना भऽ गेलन्हि, जेना कोनो मशीनक ईन्जिन चलैत होइ । ओ डेरायले नजरिसँ भौजीकेँ देखलन्हि । राधाकेँ डर रहन्हि, कहीं हृदयक धक—धकी भौजी नहि सूनि लैथ । राधा पुरा एक महिनाकेँ बाद आइ पुस्तकालय आयल छली । आईएस्सी परीक्षाक तैयारीमे व्यस्त भेलाक कारण मास दिन पुस्तकालय नहि आबि सकल छली । काल्हि परीक्षा समाप्त भऽ चुकल छल । भौजीकेँ आदेश रहन्हि जाधरि परीक्षा समाप्त नहि हैत ताधरि पढाÞइक अतिरिक्त किछु नहि । राधा सेहो पढाÞइकेँ प्रति पुरे समर्पित रहयकेँ प्रयत्न कएली । मुदा मन तैयो बेर—बेर पुस्कालयकेँ लग—पास मडराइत रहैत छलन्हि । राधा देखलन्हि, भौजीकेँ चालिमे थोड़ेक गति आएल अछि । मुदा ओ जानि बुझि कऽ ओही गतिमे चलैत रहली, जाहिसँ भौजीसँ थोड़ेक पाछु रही आ मौका भेटिते एक नजरि—हुनका देखली, जकरा लेल ओ मास दिनसँ प्रतिक्षा करैत रहल छली । हुनका विश्वास छलन्हि, ओ आइयो ओही गाछ तर नयन बिछौने हुनकर प्रतिक्षामे ठाढ़ हैत । ताहि विश्वासँ मनक सितार झन झना रहल छल । मुदा गाछपर नजरि पड़िते हृदयक रोमाञ्च करपूरक गोटी जेकाँ उड़ि गेल आ मनमे कतेको आशंका आ बिचार हिलोरि मारय लगलन्हि । ओ ओतय नहि छल । किए ? भऽ सकैत अछि एक महिनासँ राधाकँे नहि अएलासँ हुनका प्रति निराश भऽ गेल होइक । इहो भऽ सकैत अछि की कही विमार भऽ गेल होइ । ६ महिना पहिने भौजी एहि पुस्कालयकेँ सदस्यता लेने छली आ तहियेसँ राधा सेहो भौजीसं पुस्तकालयमे आवय लागल छली । एक दिन ओ युवक अहि गाछक निचा ठाढ़ देखाइ देने छल । आ ताहिकँे बाद तऽ दिनचर्या बनि गेल छलै । आकर्षक व्यक्तित्वक धनी ओ पहिले नजरिमे राधाकेँ प्रभावित कएने छल । मौन प्रेमक प्रस्ताव राधाकेँ हृदयमे बैस गेल छल ओ युवक । राधा आ भौजीकेँ संगे—संगे देखि ओ थोड़े संकुचित भऽ चोर दृष्टिसँ क्रमशः राधा आ भौजीकेँ देखैत रहैत छल जे कखनो राधाक नजरि पड़ि जाइत तऽ ओ युवक अपन दुष्टि दोसर दिश घुमालैत छल । एक महिनासँ ओहि युवककेँ देखबाक कौतुहलता आ ओकरा भेटाबाक विश्वास, मुदा सुनसान ठाढ़ ओहि गाछकेँ देख असहय पीडाÞ भेल राधाकँे । आइ ओकरा ओतय नहि होएब राधाकेँ लेल कोनो आघात सँ कम नहि छल । हृदयक टीस आँखिमे नोर बनि छलछलाय लागल रहैक मुदा ओहि नोरकेँ पिव कहुना अपना पर काबु कएलन्हि आ अपन बेदनाकँे उजागर नहि होबय देलैथ । सहज होबएकँे कोशिस करैत भौजीकँे पाछु–पाछु पुस्तकालयमे प्रवेश कऽ गेली । भौजी पुस्तक फिर्ता कऽ अलमारीमेसँ दोसर पुस्तक खोजय लगालथि । राधा सेहो पुस्तक खोजवाक अभिनय करय लगली, मुदा हुनक मनोभाव त.....। ‘राधा, राजकमल, गोविन्द झा, रामानन्द रेणुकेँ सम्पूर्ण किताब हम पढि चुकलौ आब डा. धीरेन्द्रकेँ पढबाक इच्छा अछि’ भौजी डा. धीरेन्द्रकेँ कविता संग्रह ‘हैगरमे टांगल कोट’ केँ अपन हातमे उलटबैत कहली तऽ राधा चुप भऽ एक मौन स्वीकृति दऽ देली । ‘अहाँ डा. धीरेन्द्रकँे पढ़ि रहल छी ?’ अनायसे एक अपरिचित युवककेँ स्वर सुनि राधा आ भौजी एक्कहि संग पाछा घूमि देखलथि तऽ राधाकँे आश्चर्य आ रोमाञ्च एक्कहि सँग झक्झोरि देलकन्हि आ अपलक ओ देखिते रहि गेली । हाथमे पुस्तक लेने उएहे युवक ठाढ़ छल । ‘ई लऽ लिअ, डा. धीरेन्द्रकँे उपन्यास छन्हि, ‘भोरुकवा’ विद्वान सभक कहव छैक एकरा जतेक बेर पढू ततेक नव बात भेटत’ ओ बाजल । आगा भौजी ठाड़ रहथि तएँ भौजीए ओ पुस्तक हुनका हाथ सँ लेलन्हि । राधा अपन प्रसन्नता नुकेवाकमे जेना असमर्थ भऽ रहल छली, अपनाकँे सामान्य करबाक हेतु भौजीकँे हाथसँ ‘भोरुकवा’ कितावकँे झपटि लेली आ बहुत तेजीसँ पन्न उल्टाबैत अपन मनोभाव कँे रोकबाक प्रयास करय लगली । तखने हुनक नजरि एक मोडल कागतपर पड़लन्हि जे पुस्तककेँ भितरमे छल ओ नजरि उठा कऽ युवक दिश देखली, मुदा युवक तऽ पुस्तकालयसँ बाहर जाइत छल । भौजी पुस्तक राधाकँे हाथसँ लऽ ओकरा अपना नामसँ जारी करबा लेली । घर घुरैत काल राधा अपन भितरमे एक प्रकारक घवराहट अनुभव करैत रहली । हुनका विश्वास छलन्हि, पुस्तक भित्तर राखल ओ मोड़ल कागतमे हुनका लेल कोनो संदेश छिपल छल । हुनका भय रहन्हि यदि तेजतर्रार भौजी ओकरा देख लेती तऽ की हैत ? ओना राधा पर आंच आएबाक कोनो संभावना नहि छल । हुनका विश्वास छलन्हि की ओइ पर हुनका लेल कोनो सम्बोधन नहि हैत कारण ओ युवककेँ राधाक नामो नहि बुझल छन्हि । यदि भौजी ओइ कागजकेँ देखबो करती तऽ सन्देहकेँ तऽ कोनो प्रश्ने नहि अछि । राधाक मोन तऽ इएह चाहि रहल छल, की भौजीकेँे हाथसँ पुस्तक ली, मुदा हुनका इहो सोचि भय भऽ रहल छल की यदि भौजीकेँ सन्देह भऽ गेलैन्हि की ? ओ धीरेसँ भौजी दिस देखली, जे पुस्तककँे दहिना हाथमे धएने राधाकँे सोचसँ बेखबर आगा बढि रहल छली । घर पहुँचला पर राधा आओर बेसी व्यग्र भऽ गेल छली । सोचि रहल छली जे कोनो तरहे पुस्तक हाथ लागि जाय तऽ पता चलत हुनक सोच सही छैक वा मात्र भ्रम भऽ गेल अछि । भौजी कँे प्रकृति कनी गम्भीर छन्हि आ ओ अपन प्रत्येक क्रियाकलापकेँ सीमा तय कऽ कऽ रखने छथि, जेकरा ओ नहि स्वंय उल्लंघन करैत छथि आ नहि केकरो द्वारा कएलगेल सहन करैत छथि । आवश्यकता सँ वेसी हँसी मजाक हुनका कनिको पसिन नहि छन्हि । ओना इ नहि छैक जे हुनकामे इ परिवर्तन भैऐकँे मरलाक बाद एलन्हि अछि । ओ पहिनहि सँ एहने छथि । विवाहक २ महिनाकँे बाद भैयाक मोन खराब भेल रहन्हि । भैयाकेँ दिन—दिन देह गलल जाए लगलन्हि । धरान लऽ जाए पड़लन्हि, ओतय डाक्टर कहलन्हि, ‘ब्लड क्यान्सर भऽ गेल छैक ।’ जाहिया तक भैया जिवित रहलाह भौजी सदैव इएह प्रयास कएलन्हि, की हुनकर जीवनमे कोनो प्रकारक अभाव नहि रहैक । भैयाकँे रेखदेख ओ स्वंय करथि । साँझखन भैयाकेँ घुमाबय लजाथि । पहिने—पहिने तऽ भैया पैदले चलथि, मुदा किछुए दिनक बाद आशक्त भऽ गेलापर भौजी हुनका ब्हील चेयर पर लऽ जायकँे शुरु कऽ देलन्हि । भौजी भैयाकेँ सन्तुष्टीकँे लेल हरेक समय मुस्कुराइत रहैत छली मधुर आ स्नेहिल शब्दकँे वर्षा कऽ हुनकर पीडाÞकँे हरि लेवाक लेल प्रयास करथि । राधा अपन माय बावुकेँ संगे स्तब्ध भऽ ओ सशक्त महिलाकेँ तकैत रहि जाइथि जे दुःखक अथाह समुद्रकँे सामने पाबि कऽ सेहो भैयाक हेतु मुसकुराइत आगा बढि रहल छली । मुदा भैयाक शरीरसँ प्राण निकलिते भौजी पस्त भऽ गेली । दुःखक असीम पीड़ा सँ छटपटाइत भौजीकेँ सम्हारयमे सभ असमर्थ भऽ रहल छल । कनैत कनैत अन्ततः भौजी बेहोस भऽ गेल छली । भैयाक मरलाक बाद भौजीकँे बाबु भऽ गेल रहथिन बाबुजी, ससुर नहि । ओ अपन कमजोर कन्हा पर भौजीकेँ जिम्मेवारी उठा लेलन्हि । बड़का भैया आ भौजी जे काठमाण्डूमे रहैछथि, ओ बाबुजीकँे आगा प्रस्ताव राखने रहथिन की ओ, भौजीकँे अपनासंग लऽ जाऽ चाहैत छथि मुदा बाबुजी साफ—साफ मना कऽ देने रहथि । हुनका लेल राधा आ पुतौहुमे कोनो अन्तर नहि छल । भौजीक वेदना कम करबाक उद्देश्यसँ बाबजुजी भौजीकँे पुस्तकसँ मित्रता करबाक सल्लाह देने रहथिन्ह । ‘बेटी पुस्तकसँ बढिया आओर कोनो मित्र नहि भऽ सकैत अछि । ओइमे हरेक समस्याकँे निकास सेहो भेटि सकैत अछि । पुस्तकसँ जतय हमरा संकटसँ जुझयकेँ प्रेरणा मिलैत अछि, ओतहि ओहिमे हरेक समस्याकेँ समाधान सेहो भेटैत अछि । मन उदास अछि तऽ व्यङ्ग रस पढि ली, किछुवे देरमे हँसयकेँ लेल विवस भऽ जायव । यदि पुस्तक सँ प्रेम भऽ जाय तऽ जीवय असान भऽ जाएत ।’ बाबुजीक उपदेश भौजीकँे पुस्तक प्रेमी बना देलकन्हि । भौजी सार्वजनिक पुस्तकालयकँे सदस्यता लऽ लेली हुनकेँ संगे रहि कऽ राधामे सेहो पढयÞकँे शौख जागि गेलन्हि आ ओ सेहो पुस्तकालय जाय लगली । भौजी कहियो कोनो पुस्तक पढ़य सँ अकछाइत नहि छली बरु, जे पुस्तक पढय शुरु करैत छली ओकर एके बैसारमे पढ़ि जाइत छली । बाबुजी तऽ किताबी कीडा छलथि । अई दुआरे भौजी बाबुजीसँ ओइ पुस्तकपर विशेष रुपसँ परिचर्चा करैत छली । कहियो ओ लेखककँे दूरदर्शिता पर अचम्भित भऽ कऽ ओकर लेखन शैलीकँे सराहना करैत तऽ कहियो लेखककँे विचारसँ कुंठित भऽ ओकर तीव्र आलोचना करथि । घरमे भौजीकँे बेसीसँ बेसी ध्यान राखल जाइक । भौजी स्वयं कहियो अपन साउस, ससुर वा राधाकँे भावनाकँे अपमान नहि कएने छली । घरक पुरा जिम्मेवारी उठा रखने छली । कहियो माँ भौजीकँे कर्तव्यनिष्ठासँ गौरवान्वित होइथि तऽ कहियो हुनकर उज्जर आँचरकेँ देखि चुपचाप नोर बहालैत छली । राधाकेँं एतेक साहस नहि छलन्हि की ओ भौजीसँ मजाक कऽ ली अन्यथा ओ अवश्य ओहि पुस्तककेँ छिन लितथि ताकि कोनो तरहे ओइ कागतकेँ पुस्तकमेसँ निकालि एकान्तमे पढि आश्वस्त भऽ सकती । एखन ओना किछु करव सम्भव नहि छल । राधा बरन्डामे चलि अएलि । माँ आ बाबुजी बड़का भइयाकेँ ८ वर्षीय पुत्रकँे लेवय काठमाण्डू गेल छलथि । भौजीकँे बच्चासँ बहुत लगाव रहैत छलन्हि । ताहि दुआरे ओ सदैव छुट्टी शुरु होइते माँ बाबुजीसँ आग्रह करैत की ओ काठमाण्डू जाथि आ बड़का भइयाकँे बच्चाकँे लऽ कऽ आबथि अहि सँ बेसी किछु नहि । भौजीकँे इच्छा रखबाक हेतु माँ बाबुजी काठमाण्डू गेल रहथि । ‘राधा’, अचानक भौजीकेँ अवाज सुनि कऽ राधा चौक पड़ली । अहि पुस्तककेँ हम पढि लेने छी अहाँ, चाही तऽ पढि सकैत छी’ भौजी बरन्डामे राखल टेबुलपर पुस्तक रखथि कहलथि, आ तेजीसँ भितर घुमि गेलथि । ‘भोरुकवा’ कँे पुनः अपन समिप पावि राधाकँे हृदयक धडकन कँे गती बढैत चलि गेल । ओ झपटि कऽ पुस्तककँे उठा लेली आ तेजीसँ पन्नाकँे उलटावय शुरु कऽ देली, किताबक बिचमे मोडल राखल कागज ओहिना नजरि आएल । राधा ओकरा खोलि पढ़य लगली । हुनकर अनुमान सही छल । ओ प्रेम पत्रे छल आ सम्बोधन सेहो मोहक आ आश्चर्यजनक छल । ‘सुनु’ । हम काल्हि साँझ ६ बजे रंगभूमि मैदानमे अहाँकँे प्रतिक्षा करब । आशा अछि, अहाँ अवश्य आएब । राजन । राधा क्षणभरिकँे लेल ओइ पत्रकँे अपन छातीसँ लगा लेली । फेर ओइपत्रकँे निचा लिखल नामकेँ चुप्पेसँ चुमलाक बाद मनकेँ कठोर करैत पत्रकेँ टुकरा टुकरा करैत सड़क पर फेक देली । ओहि राति भावना आ विचारक बीच उड़ान भरैत रहली राधा, आँखिसँ निन्न पुरा हेरा गेल रहन्हि । दोसर दिन साँझ ६ बजे, रंगभूमि मैदान जायब उचित हैत की नहि, जाएब तऽ की कहबै, ओ की कहता । कखनो माँ, बाबुजी आ भौजीकँे की कहवै एहने सोचमे ओ क्षणभरि कँे लेल सेहो नहि सुति सकली । यदि गेलौ तऽ भऽ सकैत अछि राजन हुनका एक अवारा लड़की सम्झय लागय जे एकबेर बजविते भागिते चलि अबैत अछि आ यदि नहि गेलौ तऽ सम्झय नहि लगथि जे राधाकँे हुनका कोनो लगावे नहि छन्हि आ ओ अपना लेल कोनो.....। राजन विना किछु कहने राधाकेँ हृदयमे अपन स्थान बना लेने छल । वितल कए महिनासँ राधा अपन अन्तर मनमे राजनकँे लेल एक निश्छल स्नेहकँे अनुभुति कऽ रहल छली । राजन अपन प्रतिक्षा सँ ई सिद्ध कऽ देने छल, की राधा हुनका लेल बहुत महत्व रखैत होइ आ ओहीक परिणाम छल हुनक प्रति सम्वेदनशील रहयबाली राधाकँे हृदय राजनकेँ पक्षमे निर्णय लेलक । राजनसँ भेटबाक निर्णय लेलाक बाद राधाकँे किछु शान्ति भेटलन्हि, मुदा रंगभूमि मैदान तक जायकँे लेल भौजीकेँ आदेश आवश्यक छल । पता नहि भौजी मानती वा नहि, फेर कही खिसिया कऽ मना नहि कऽ दैथ । माँ काठमाण्डू गेल छली नहि तऽ राधा माँ सँ कोनो ने कोनो तरहे जायकेँ आदेश मांगि लितथि, मुदा की अनुशासन प्रिय आ अपन जिवन शैलीकँे शालिनताक भितर बान्हि कऽ राखयवाली भौजी अहि तरहे हुनका कोनो युवक सँ भेटवाक आदेश देती ? दुपहरियामे खायकेँ टेबुलपर भौजीकेँ संगै बैसैत राधा ई निर्णय लेली की भौजीकँे निसंकोच अपन मनक बात बतादेती आ यदि भौजी तमसा जेती तऽ तत्काल अपन गल्तीकेँ लेल क्षमा सेहो मांगि लेती । भौजीकेँ बतौने विना जायब संभव नहि छल । अतः ओ भौजीसँ आदेश लेवयकेँ लेल उचित शब्द खोजिए कऽ रहल छली की अनायसे भौजी पुछि बैसली ‘राधा, अहाँसँ किछु पुछय चाहैत छी ?’ ‘जी भौजी’ ‘अहाँ ओ पुस्तक भितर लिखल पत्रकँे पढ़लियै अछि ?’ जी, राधा ई जान्हि कऽ चौंक गोली की भौजी सेहो पत्रकँे पढि लेने छली । जी हँ, ओ डराइते उत्तर देली । ‘अहाँकेँ नजरिमे राजन केहन छथि ?’ जी, राधा पुनः चौंक गेली आ थरथराइते स्वरमे मात्र एतवे कहि सकली ‘ठीके छैक ।’ फेर तऽ अहाँकेँ नजरिमे कोनो खरावी छैक राधा ? नइ—नइ ठिक नहि बहुत निक छैक, कहि राधाकँे मुँहसँ ई शब्द सुनि भौजीकँे चेहरा... आ राधा सेहो... पहिने कहियो भौजी आ राधा एहन विषय पर चर्चा नहि कएने छली, इएह कारण छलैक जे दूनुकँे चेहरापर संकोच आ लज्जाकँे एक्के तरहक भाव छल आ राधाकँे हालत तऽ एहन छलन्हि जे ओ माथ झुका कऽ बैसयकेँ लेल विवश छली । भौजीकेँ चेहराकँे ध्यानसँ देख कऽ, हुनकर मनोभावकेँ सही अन्दाज लगायबमे असमर्थ भऽ रल छली । ‘किछु दिन अहाँ पुस्तकलय नहि अएलौ, तखन ओ हमरा सँ गप्पो कएने रहथि । हुनकर गप्पसँ ओ भ्रद आ बुद्धिमान छथि से बुझाएल । जी, राधा चुपचाप सुनैत रहली । राधा, आइ अहाँ रंगभूमि चलि जाउ ।’ जी.., राधाकँे विश्वास नहि भऽ रहल छल, जे भौजी एतेक सहजतापूर्वक जाए देती । हँ, राधा, हम अपना हिसाबे हुनका परखि लेने छी मुदा अहाँक राय सेहो बहुत आवश्यक अछि । अहि विषय पर बाबुजीसँ अहीकेँ बात करय परत । ओना अहाँ हुनको सेहे कहबन्हि जे जल्दीबाजी मे निर्णय नहि लैथ । खुब सोचि बिचारि कऽ निर्णय लैथ । अपना घरक लोकसँ सेहो गप्प कऽ लैथ एना नइ होइ जे......। जी’ राधा माथ झुकौने भौजीकेँ बात सुनि रहल छली । हम जनैत छी राधा की अहिकेँ ई सभ बड़ उटपटांग लगैत हैत । हँ की नहि ? हम स्वाभिमानी, कर्तव्यनिष्ट आ शालिन तऽ छी, मुदा रुढीबादी नहि छी । हमरा लगैत अछि प्रत्येक महिलाकेँ अपन जिवन पर पूरा अधिकार होइत छैक । रुढीवादी परम्पराकेँ चादरि ओढि कुहरैत पुरा जिवन जिवाक की औचित्य ? तएँ अहाँ हुनका परखु आ यदि अहाँकँे ओ बढियाँ लगाथि तऽ विना संकोच विना हिचाकिचाहट अहि विषयपर माँ आ बाबुजीसँ बात करब । सभ बात अहिकेँ करबाक अछि कहि कऽ भौजी अपना रुम दिस चलि गेली । राधाकँे मोन खुशी सँ नाचय लागल । भौजी हुनका पसिनक बात कहि हुनकर मनोवलकँे आओर बढा देने रहथि । आब भौजीकँे आदेशानुसार हुनका परखयकँे मात्र छलन्हि । साँझ खन राधा निर्धारित समय सँ किछु पहिने तैयार भऽ रंगभूमि पहँुच गेली मुदा ओहु सँ पहिने राजन रंगभूमि मे बेचैनी पूर्वक इम्हर ओम्हर घूमि रहल छल, देख कऽ राधा एकटा गाछक पाछा नुका गेली आ हुनका देखय लगली । कढ़ाहिदार कुर्ता आ पाइजामा पहिरने आन दिनसँ बेसी आकर्षक लागि रहल छल । हुनकर नजरि प्रतिक्षासँ व्यग्र चारुभर ताकि रहल छल । कायबेर घुमिते–घुमिते ओ रुकि गेला । झुकि कऽ जमिनसँ एकटा दूभि उपर उखारि लैथ आ ओकरा धीरेसँ कनि दाँतमे दबालथि आ घुमा कऽ हाथमे नचावय लगथि आ फेर वएह प्रतिक्षा..... । इ उपक्रमकँे कतेको बेर चलैत देखलाक बाद अपन भावनाकँे संयम रखबाक प्रयास करैत राधा धीरेसँ राजनकेँ सोझा आबि ठाढ भऽ गेली । लाजे मूड़ि गोतने पएरक अंगूठासँ जमिन खोदय लगली । ओ चाहियो कऽ अपन माथ उाठ कऽ हुनका दिस नहि देखि पावि रहल छली । मनमे एकटा उदवेग, समाजक लोक लाज, इहो पहिलबेर.... । अहाँ..... अहाँ एतय कोना ? आश्चर्यसँ भरल हुनक ई प्रश्न सुनि कऽ राधा चकित होइत अपन मुँह उठेलन्हि तऽ राजनकेँ चेहरा पर आश्चर्यक भाव देख ओ स्तव्ध रही गेली । राजन, ‘ओ नहि अएली ? अहाँक भौजी ......। राधा नहिमे मँुह हिला देली । ‘किए ?’ ओ हमरे पठा देलन्हि । ताकि हम हुनका अपन राय दऽ सकियन्हि । ओह.....किछु झुंझुलाहट भऽ रहल मुदा शान्त स्वरमे । की ५÷६ भेटघाटक बाद ओ स्वंय कोनो राय नहि बना सकली ? देखु राधाजी अहाँकेँ अएने हमरा कनियो खराव नहि लागल अछि, मुदा पहिलबेर हुनका बजेवाक कारण महत्वपूर्ण बात छल । आइ हुनका सँ एहन बात कहितियन्हि, जाहि सँ हुनका बहुत खुशी होइतन्हि से ओहि खुशी देखय सँ हमरो बञ्चीत होवय परि रहल अछि । ‘की ओ बात हमरा नहि बताओल जा सकैत अछि ? राधा जल्दीए हुनकर अटपटाङ्ग व्यवहारकेँ कारण जानि लेवय चाहैत छली । ‘किया नहि अवश्य बताओल जा सकैत अछि । बात.... , बात इ अछि की हमर माय बाबु हमर विवाहक हेतु मानि गेलथि । ओना तऽ ओ विधवा विवाहक विरुद्ध कहियो नहि छलथि, मुदा अपने घरमे एकटा विधवा पुतहुकेँ रुपमे स्वीकार करावयमे संकोच भऽ रहल छलन्हि, चुकीं हम मनावयमे सफल भऽ गेलहँु । राजन आओर बहुत किछु कहय चाहि रहल छला, मुदा राधा स्तव्ध ठाढ़ छली । मानु हुनकर शरीरकेँ सम्पूर्ण शक्ति बिलिन भऽ गेल होइ आ ओ सुखल पात जकाँ हावामे उधिया रहल होइथि । मस्तिष्क अपन काज करव बन्द कऽ देने होइ, कानमे यतेक हल्ला भऽ रहल छलन्हि की राजन द्वारा ओहि सँ आगा कहल गेल शब्द मे सँ एकहु शब्द कानधरि नहि पहुँच पाएल छल । राजन हुनका सँ नहि भौजी सँ.....। ओ मात्र भौजीकेँ प्रतिक्षा करैत छला इ जानि राधाकेँ अस्तित्व तहस नहस होवयकेँ लेल उद्यत भऽ रहल छल । भौजी दुपहरीयामे जे कहने छली ओ राधाकँे लेल नहि अपना आओर राजनकेँ लेल । भौजी बहुत विश्वासक संग राधाकेँ इ जिम्मेवारी सोपने छली की ओ माँ बावु जी सँ अहि विषयपर बात करवाक हेतु । राधाक लेल भौजीकँे यैह विश्वासक मान राखव अति आवश्यक भऽ गेल छलन्हि । अहि विचारकँे अविते राधा अपना पर कावु पएवाक प्रयत्न करय लगली आ ओहि परिस्थिति सँ उवरवाक । भौजीकेँ सुनसान जिवनमे सतरंगी रंग भरवाक लेल उद्यत ओहि महान युवककेँ आगा कानय सँ हुनकर महानताकेँ अपमान सेहो भऽ जायत जे राधा सोचने छली , ओ युवक कहियो नहि सोचने छल । अहिदुआरे राधाकँे अपन श्रद्धेय पुरुष प्रति हृदयमे उत्पन्न सिनेह भावनाकेँ बहुत निष्ठुरता सँ दवा देवय परलन्हि । राधा अपन सपना टुटय सँ बेसी प्रसन्न छली जे हुनक अपन प्रिय भौजीक लेल त्याग करयकेँ अवसर भेटल अछि । ओ कोनो किम्मत पर अहि अवसरकेँ गमावय नहि चाहैत छली । भौजी चाहने छली की ओ राजनकेँ परखि कऽ निर्णय ....। राजनकेँ परखयकेँ प्रश्ने नहि उठैत छल, हुनकर दृष्टीमे हुनक जे योग्यता बुझाइत छलन्हि ओकरा शब्दमे कहव राधाक लेल मुस्कील छल । अपनाकँे सम्हारि राधा हुनका सँ विदा लऽ आगा रहल रिक्सावालाकँे इसारा कएलन्हि । तखने राजन एकटा प्रश्न पुछलन्हि ‘राधा जी अहाँ कहियो केकरो सँ प्रेम कएने छी ?’ ‘प्रेम.!.. नहि.......’ बहुत सफाइ सँ झुट बजैत राधा रिक्सामे बैस रहली । आ राजनकेँ प्रस्तावकँे स्वागत करैत शुभकामना दैत रिक्सावाला सँ रिक्सा बढावयकेँ इसारा कएली । रिक्सा चलि परल । सुमित आनन्द भाषणमाला मैथिली अकादमी, पटना द्वारा द्वि दिवसीय भाशणमालाक आयोजन विष्वविद्यालय मैथिली विभाग, .मे दिनांक 5-12-2010 तथा 6-12-2010 केँ भेल। पहिल दिन अर्थात् 5-12-2010 केँ सरस कवि ईषनाथ झा भाषणमालाक उद्घाटन ल0 ना0 मिथिला विष्वविद्यालयक कुलपति डॉ एस0 पी0 सिंह कयलनि तथा मुख्य अतिथि डॉ नीता झा छलीह। एहि अवसरपर मुख्य वक्ता छलीह डॉ वीणा ठाकुर, प्राचार्य एवं अध्यक्षा, विष्वविद्यालय मैथिली विभाग, ल0 ना0 मिथिला विष्वविद्यालय, दरभंगा जनिक व्याख्यानक विषय छल - मैथिली गीत साहित्यक विकास आओर परंपरा । दिनांक 6-12-2010केँ स्व0 सुषील झा व्याख्यानमालाक उद्घाटन ल0 ना0 मिथिला विष्वविद्यालय, दरभंगाक कुल सचिव डॉ विमल कुमार कयलनि। एहि अवसरपर मुख्य अतिथि छलाह डॉ मंजर सुलैमान तथा मुख्यवक्ता छलाह डॉ अमरनाथ झा, दर्षन विभाग, ल0 ना0 मिथिला विष्वविद्यालय, दरभंगा जे मिथिलामे न्याय दर्षनक विकासपर अपन व्याख्यान प्रस्तुत कयलनि। दुनू दिनक अध्यक्षता मैथिनी अकादमीक अध्यक्ष श्री कमलाकान्त झाजी कयलनि। एहि अवसरपर , डॉ शषिनाथ झा, डॉ भीमनाथ झा , डॉ वैद्यनाथ चौधरी ‘बैजू’, डॉ अषोक ठाकुर, डॉ रमण झा , डॉ विभूति आनन्द , डॉ मुरलीधर झा, डॉ योगानन्द झा, डॉ फूलचन्द्र झा प्रवीण सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति सभ उपस्थित छलाह । भारत-नेपालक मिथिला हस्तशिल्प कलामे असीम सम्भावना भारत-नेपालक मिथिला हस्तशिल्प कलामे असीम सम्भावनापर संगोष्ठी बी.पी.कोइराला नेपाल-भारत प्रतिष्ठान, नेपाल राजदूतावास, नई दिल्लीक तत्वावधानमे मधुबनी नगर भवनमे भेल। आलेख वाचन सत्र १८.०९.१० केँ आयोजित भेल। उद्घाटन सत्रक प्रारम्भ १८.०९.१० केँ मधुबनीक जिलाधिकारी श्री संजीव हंस (आइ.ए.एस.) द्वारा दीप प्रज्वलितक संग भेल। श्री जयप्रकाश नारायण पाठक, नयन कुमार मांझी, मेधा कुमारी, आरती मिश्रा आ ज्योति द्वारा मंगलाचरण तथा ओडिसी नृत्य प्रस्तुत कयल गेल। अतिथि गण सभक सम्मान एवं स्वागत भाषण अध्यक्ष, विश्वविद्यालय संगीत एवं नाट्य विभाग डॉ. पुष्पम नारायण द्वारा कयल गेल। अंजली श्वेता आ तुलसी द्वारा स्वागतगान गाओल गेल। मंच संचालक डॉ. अमरनाथ सिंह बीजभाषण लेल विश्वविद्यालय इतिहास विभागक अवकाशप्राप्त विभागाध्यक्ष डॉ. रत्नेश्वर मिश्रकेँ आमंत्रित कयलनि। उद्घाटन भाषण जिलाधिकारी श्री संजीव हंस कयलनि। एहि कार्यक्रममे दुनू देशक कलाकारगण उपस्थित छलाह। मुख्य अतिथिक रूपमे श्री उमाकान्त पाराजुली, सांस्कृतिक परामर्शदाता, नेपाल राजदूतावास, नई दिल्ली छलाह। मुख्य अतिथि अधीक्षण पुरातत्वविद् डॉ. संजय कुमार मंजुल छलाह। अध्यक्षीय उद्बोधन विश्वविद्यालय हिन्दी विभागक अवकाश प्राप्त विभागाध्यक्ष डॉ. अजीत कुमार वर्मा कयलनि। कार्यक्रमक संचालन डॉ. अमरनाथ सिंह, अंग्रेजी विभाग, कुंवर सिंह महाविद्यालय, दरभंगा कयलनि। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. शम्भू कुमार साहू, अध्यक्ष, भूगोल विभाग, जे.एम.डी.पी.एल., महिला कॉलेज, मधुबनी कयलनि। प्रथम सत्र आलेख वाचन सत्रक शुभारम्भ अपराह्ण ०४.३० बजे भेल। कार्यक्रमक संयोजिका डॉ. पुष्पम नारायण पाग एवं चादरिसँ विद्वान आलेख वाचक एवं मंचस्थ अतिथि लोकनिक स्वागत कयलनि। एहि सत्रक अध्यक्षता श्री उमाकान्त पाराजुली कयलनि। एहि सत्रक आलेख वाचक लोकनि छलाह- श्री महेन्द्र मलंगिया, श्री कृष्ण कुमार कश्यप, श्रीमति मंजू ठाकुर, श्रीमति रानी झा, डॉ. सुरेन्द्र प्रसाद साहा एवं डॉ. कमलानन्द झा। हिनका लोकनिक व्याख्यानक विषय क्रमसँ छलनि: -भारत की मिथिला हस्तशिल्प कला की प्राचीनता एवं आज का स्वरूप -मिथिला हस्तशिल्प कला में बाजारीकरण की सम्भावना -मिथिला हस्तशिल्प और महिला रोजगार- नेपाल के सम्बन्ध में -मिथिला हस्तशिल्प कला और महिला रोजगार- भारत के सम्बन्ध में - मिथिला हस्तशिल्प कला की कठिनाइयाँ - मिथिला हस्तशिल्प कला में ह्रास- एक चिन्तन सांस्कृतिक कार्यक्रम सत्र १८.०९.१० सांस्कृतिक कार्यक्रमक अन्तर्गत डोमकछ आ पमरियाक प्रस्तुति कलाकार द्वारा कयल गेल। एहि सत्रक संचालक रंगकर्मी डॉ. सुनील कुमार ठाकुरजी रामचरित मानसक प्रथम श्लोकसँ वाणी आ विनायकक आराधना कयलनि। कार्यक्रमक अन्तमे डॉ. सुनील कुमार ठाकुर सत्रावसान “जय हिन्द, जय नेपाल” कहि कऽ कयलनि। द्वितीय सत्र १९.०९.२०१० केँ १०.३० बजे डॉ. नरेन्द्र नारायण सिंह निराला जीक अध्यक्षता तथा श्री सुनील मंजुल एवं श्रीमति रानी झा क मंच संचालनसँ सत्र प्रारम्भ भेल। एहि सत्रमे मुख्य अतिथिक रूपमे नेपाल राजदूतावासक सांस्कृतिक परामर्शदाता श्री उमाकान्त पाराजुली एवं श्रीमति शशिकला देवी छलथिन। हस्तशिल्प एवं वस्त्र मन्त्रालय, भारत सरकारक प्रतिनिधि विपन कुमार दास, चित्रकार कृष्ण कुमार कश्यप, रमेश झा (भारतीय स्टेट बैंक), प्रो. अरुण कुमार मिश्र, प्रो. ब्रज किशोर भंडारी, स्वैच्छिक संस्थाक सुनील कुमार चौधरी, महेन्द्र लाल कर्ण एवं प्रो. गंगा राम झा प्रश्न, समस्या एवं सुझाव प्राप्त कयलनि। आचार्य सुरेन्द्र झा “सुमन” जयन्ती-२०१० आचार्य सुरेन्द्र झा “सुमन” जयन्ती १२ अक्टूबर २०१० केँ सुमन स्मृति समिति, दरभंगा द्वारा स्थानीय एम.एल.एस.एम. कॉलेज दरभंगामे अपराह्ण ३ बजे आयोजित भेल। एहि कार्यक्रमक उद्घाटनकर्ता साहित्यकार प्रो. शिवकान्त पाठक कहलनि जे आचार्य सुमन परिवर्तनकारी छलाह आ परम्पराक संगहि संग आधुनिकताकेँ स्वीकार करबामे हुनका कोनो झिझक नहि होइत छलनि। एम.आर.एम. कॉलेजक प्रधानाचार्य डॉ. कामेश्वर झाक अध्यक्षतामे आयोजित एहि कार्यक्रममे विशिष्ट अतिथिक रूपमे एम.एल.एस.एम. कॉलेजक प्रधानाचार्य डॉ. विद्यानाथ झा कहलनि जे आचार्य सुमनक दृष्टि व्यापक छलनि आ हुनक साहित्यमे सभटा पक्षकेँ स्थान छैक। समितिक अध्यक्ष सह मैथिली अकादमीक अध्यक्ष श्री कमलाकांत झा मंच संचालनक क्रम मे कहलनि जे आचार्य सुमनक समग्र व्यक्तित्वे अनुकरणीय अछि। श्री फूलचन्द्र झा ‘प्रवीण’क द्वारा आचार्य ‘सुमन’ रचित शिवपंक्षारक गायन सँ प्रारंभ भेल कार्यक्रममे स्वागत गीत शिखा कुमारी द्वारा गओल गेल। आगत अतिथि गणक स्वागत समितिक उपाध्यक्ष विनोद कुमार द्वारा कयल गेल। एहि अवसर पर संस्कृत साहित्य मे अवदानक हेतु डॉ. शशिनाथ झा केँ, हिन्दी हेतु, डॉ. अजीत कुमार वर्मा केँ तथा मैथिली हेतु डॉ. श्री शंकर झा केँ ‘सुमन’ स्मृति सम्मान सँ सम्मानित कयल गेलैन। समारोह मे आयोजित कवि सम्मेलन मे डॉ. विद्याधर मिश्र, हरिश्चन्द्र ‘हरित’ एवं अशोक कुमार मेहता द्वारा काव्य पाठ कयल गेल। एहि अवसर पर विधायक संजय सरावगी, डॉ. भीमनाथ झा, डॉ. गणपति मिश्र, डॉ. रमण झा, डॉ. उपेन्द्र झा, श्री मुनीन्द्र झा, श्री महानंद ठाकुर, श्री जगदीश साह, श्री भोला चौधरी, श्री गणेशकांत झा सहित दर्जनों साहित्यकार उपस्थित छलाह। धन्यवाद ज्ञापन समितिक सचिव श्री चन्द्रशेखर झा ‘बूढ़ा भाइ’ कयलनि। आचार्य रमानाथ झा आ प्रो. तंत्रनाथ झाक भाषणमाला-२०१० आचार्य रमानाथ झा आ प्रो. तंत्रनाथ झा भाषणमालाक आयोजन मैथिली अकादेमी पटना, द्वारा प्रायः पहिल बेर दरभंगामे भेल। आचार्य रमानाथ झा भाषणमाला २१ सितम्बर २०१० केँ आर प्रो. तंत्रनाथ झा भाषणमाला २२ सितम्बर २०१० केँ चन्द्रधारी संग्रहालयक सभागारमे मनाओल गेल जाहिमे मुख्य वक्ता छलाह क्रमशः डॉ. रमण झा, विश्वविद्यालय मैथिली विभाग, ल. ना. मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा आर डॉ. बीरेन्द्र झा प्राचार्य आ अध्यक्ष, मैथिली विभाग, पटना विश्वविद्यालय, पटना। मैथिली अकादेमी, पटनाक अध्यक्ष, श्री कमलाकांत झाजीक द्वारा अध्यक्षीय प्रभार ग्रहण कयलाक पश्चात् ई पहिल आयोजन छल जे सफलतापूर्वक सम्पन्न भेल। पहिल दिन अर्थात् २१.०९.२०१० केँ आचार्य रमानाथ झा भाषणमालाक आयोजन २:३० बजे दिनसँ प्रारम्भ भेल। एहि कार्यक्रमक उद्घाटनकर्त्ता-सह-मुख्य अतिथि पं. चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’ अपन उद्घाटन भाषणमे कहलनि जे महान साहित्यकार लोकनिक जयंती हुनक अंग्रेजी तारीखक अनुसार नहि मनाए पंचांगक तिथिक अनुसार मनाओल जएबाक चाही। ओ कहलनि जे १९६० ई.सँ आचार्य रमानाथ झा मैथिली भाषा आ साहित्यकेँ ध्यानमे राखि रचना कयलनि। एहि अवसरपर विशिष्ट अतिथिक रूपमे विचार व्यक्त करैत विद्यापति सेवा संस्थानक महासचिव डॉ. वैद्यनाथ चौधरी ‘बैजू’ कहलनि जे आचार्य रमानाथ झा साहित्यकार, रचनाकार, कवि सहित सर्वगुण सम्पन्न छलाह। मुख्य वक्ता डॉ. रमण झा ‘मैथिली भक्ति-काव्यमे अलङ्कार-विधान’पर अपन व्याख्यान देबाक क्रममे कहलनि जे विद्यापतिक अधिकांश श्रृंगार विषयक गीत राधा-कृष्णसँ सम्बन्ध अछि जकरा भक्तिक कोटिमे राखल जा सकैत अछि। ‘नन्दक नन्दन कदम्बक तरू तर धीरे-धीरे मुरली बजाव’ केर व्याख्या करैत ओ कहलनि जे अलङ्कार (सौन्दर्य) मनुष्ये जकाँ काव्योक हेतु आवश्यक छैक। एहिसँ काव्यमे सरसता बढ़ैत छैक। एहि क्रममे ओ शब्दालङ्कार, अथलिङ्कार, आ उभयालङ्कारक कत्तोक सुन्दर-सुन्दर उदाहरण दैत अपन कथनकेँ प्रमाणित कयलनि। उदाहरणक हेतु ओ विद्यापतिक मधुप, सुमन इत्यादिक रचनासँ सुन्दर-सुन्दर पदक उल्लेख करैत, ओकर अलङ्कारकेँ फड़िछबैत रहलाह। कविशेखर जीक काव्यमे तऽ एक संग अनेक अलङ्कारक गुंफनकेँ सेहो सोझरबैत रहलाह। श्री ब्रह्मेन्द्र झाक संचालनमे कार्यक्रमक समापन मैथिली अकादेमीक अध्यक्ष श्री कमलाकांत झाजीक भाषणसँ भेल। दोसर दिन अर्थात् २२.०९.२०१० केँ प्रो. तंत्रनाथ झा भाषणमालाक उद्घाटन प्रसिद्ध हृदयरोग विशेषज्ञ आ अखिल भारतीय मैथिली साहित्य परिषद, दरभंगाक महामंत्री डॉ. गणपति मिश्रक द्वारा दीप प्रज्वलित कए कएल गेल। डॉ. मिश्र तंत्रनाथ झाक प्रसिद्ध ‘मुसरी झा’ कविताक उल्लेख करैत कहलनि जे ओ अत्यंत लोकप्रिय कवि छलाह। हुनक कथन छलनि जे ‘कीचक वध’ सन महाकाव्य लिखि ओ एकटा नव परिपाटी जन्म देलनि। यात्रीक सम्बन्धमे, जनिकापर ओहि दिनक व्याख्यान केन्द्रित छल, सेहो ओ कतेक गूढ़ गप्प कहलनि कारण जे बारह वर्ष धरि ओ यात्रीजीक चिकित्सकक रूपमे सेवा कएने छलथिन। हुनक कथन छलनि जे अस्वस्थतोक समएमे ओ सर्जनात्मक कार्यमे तल्लीन रहैत छलाह। विशिष्ट अतिथिक पदसँ बजैत मैथिली पुत्र प्रदीप प्रो. तंत्रनाथ झाक किछु स्मृतिक उल्लेख कयलनि। ओ तंत्रनाथ झाक आदेशपर हुनका गीत सुनबैत छलथिन तकर किछु पाँती श्रोता लोकनिकेँ सस्वर सुनओलथिन। मुख्य वक्ता डॉ. बीरेन्द्र झा ‘यात्री साहित्यमे लोक जीवन ओ राजनीतिक चेतना’ विषयपर अपन व्याख्यान दैत हुनका जन कवि कहलनि। डॉ. झा यात्री चित्रासँ अनेक पाँतीक उल्लेख करैत सिद्ध कयलनि जे ओ कमजोर वर्गकेँ उपर उठयबाक हेतु ओकरा समाजक मुख्यधारामे अनबाक हेतु सतत प्रयत्नशील रहलाह। बूढ़वर, विलाप, अंतिम प्रणाम इत्यादिक उदाहरण दए ओ प्रमाणित कयलनि जे यात्री जी वस्तुतः कविताक धारा बदलि देलनि। एहि अवसरपर अध्यक्ष श्री कमलाकांत झाजी अध्यक्षीय भाषणमे घोषणा कयलनि जे ओ अकादेमीक सभ समारोहमे एकटा मैथिली सेवीकेँ पाग तौनी दए सम्मान करताह आ एहि क्रमे ओ बूढ़ा भाइक सम्मान कयलनि। कार्यक्रमक संचालन ब्रह्मेन्द्र झा कयलनि। एहि कार्यक्रमक अवसरपर अनेक गणमान्य व्यक्ति सभ उपस्थित छलाह जाहिमे प्रमुख छलाह- डॉ. पं. शशिनाथ झा, डॉ. भीमनाथ झा, डॉ. श्रीमति वीणा ठाकुर, डॉ. फूलचन्द्र मिश्र ‘रमण’, डॉ. विभूति आनन्द, श्री रवीन्द्र झा, श्रीमति आशा मिश्र, श्री मुरलीधर झा, श्री चन्द्रेश, ई. श्री अशोक ठाकुर ‘प्रभृति’ आ समस्त मैथिली अकादेमी पटनाक सदस्यगण उपस्थित छलाह। मनोज झा मुक्ति महोत्तरीक यूवाके देशव्यापी अभियान ‘अपना गामठामक विकास करबाकलेल सरकारी पाई एन.जि.ओ. या आ.एन.जि.ओ.क आवश्यकता नहिं अछि आवश्यकता अछि त सकारात्मक दृष्टिकोणकेँ आ अपना माटिप्रतिक आस्था एवं आत्मबलकेँ’ यैह नारा लऽ कऽ महोत्तरी जिलाक यूवा शंखनाद कएने अछि– देशके सुन्दर बनएवाक अभियानकेँ । जौँ पाइयक बलपर विकास भऽ सकैत त नेपालक सभ गाम स्वर्ग भऽ गेल रहैत । नेपालक कोनहुँ स्थान विकाससँ बञ्चित नईं रहैत । सरकार नेपालक प्रत्येक गामें प्रतिवर्ष २० सँ ३० लाख अनुदान दैत अछि जिला विकास समितिक मादे अरबोक बजेट रहैत अछि विकासकलेल से अलग सँ । एकरा अतिरिक्त सभासद सबके क्षेत्र विकासलेल बजेट भेटैत अछि तकर बाते छोडु । तहिना समाज आ देशक विकास हेतु एन.जि.ओ. आ आ.एन.जि.ओ. मार्फत नेपालमे प्रति वर्ष खरबो रुपैया अवैत अछि ताइसँ कतऽके विकास होइत अछि भगवाने जानथु । चाहे गामक कोनो पार्टीक नेता हुए जे गामक विकासकलेल गा.वि.स.के प्रतिनिधि बनल करैत छथि या जिला विकास समितिमे पार्टीक प्रतिनिधि बनैत छथि जँ ओसब अपना कर्तव्यप्रति कनिक्को सचेत रहितथि त नेपालक गामसब पूर्ण नहि त बहुत विकसीत भऽगेल रहैत । अपना गामकलेल या जिलाक लेल आएल बजेटमेंसँ कमीशन खाकऽ कागजपर विकासक काज गा.वि.स. सचिव आ जि.वि.स.क एल.डि.यो.सँ करौनिहार नेतेसबके एहि तरहक रवैया अछि तहन कोना भऽ सकत नेपालक विकास ? आश्चर्य त तखन लगैत अछि जखन देश विकासक लेल आएल बजेटके खएनिहार नेतासब अपनाके देश आ जनताक हितैषी आ अगुवा कहैत नईं थकैत अछि । ईमान्दारी आ सत्यपर सँ आम जनताके विश्वास उठाबऽमे नायकक भूमिकामे रहल अधिकांश कमिशनखोर नेताक कारण किछु ईमान्दार एवं नैतिकवान राजनीतिकर्मीसब अनेरे बदनाम भेल करैत अछि । ताँए जरुरी अछि आम जनतामे आत्म विश्वास जगएवाक आ सत्यपर भरोषा बढएवाक । आ एकर शुरुवात कऽ रहल अछि महोत्तरी जिलाक किछु यूवासब । महोत्तरीमें अभियानमे लागल यूवाक कहब छन्हि– ‘अपना गामठामक विकास करबाकलेल सरकारी पाई एन.जि.ओ. या आ.एन.जि.ओ.क आवश्यकता नहिं अछि आवश्यकता अछि त सकारात्मक दृष्टिकोणकेँ आ अपना माटिप्रतिक आस्था एवं आत्मबलकेँ’ । ओसब अभियानक शुरुवात कऽ रहल छथि–वृक्षारोपणक काजसँ । जखन हुनकासबसँ जिज्ञासा राखल गेल कि वृक्षेरोपण किया ? त हुनक कहब छन्हि–‘ गामघर या जिलामे जत्र–तत्र व्याप्त भ्रष्टाचारके एक्कहिवेर कम नहि कएल जा सकैय । कोनो गाममे जौँ कोनो विकास निर्माणक काज होइत अछि त स्थानिय नेता कार्यकर्ता या यूवा ओहि काजमे निक जकाँ अभिरुचि लैत अछि । मुदा दुर्भाग्यक बात हूनका सबमेंसँ ९८ प्रतिशत लोकक अभिरुचिक अभिप्राय रहैत छन्हि–कमिशन लेवाक काज चाहे कागजेपर किए नई भऽ जाय । ताँए पहिने काज कएल जाए तकरा बाद कर्मचारी जनता आ नेताके सचेत करबाक काज शुरु हुए ।’ अपना अभियानक शुरुवात ओसब नेपालक गाम–ठाममें वृक्षारोपण क कऽ करऽ चाहैत छथि । हुनकसबहक कहब छन्हि–‘काज ककरो देखयवाकलेल नहिं होएवाक चाही अपना आपसँ इमान्दारिता करैत काज करैत जाउ लोक चाहे जे कहय । जँ नीक काज करबई त दुश्मनो के ई कहैएटा पडतैक जे–‘....ओना त छौंडा बदमाश अछि मुदा काज नीक कऽ रहल अछि ।’ एहि उद्देश्य ल कऽ हमसब जतबे सकब सबहक सहयोगसँ नेपालक कोना–कोनामें वृक्षारोपण करब आ कराएब । ओसब अपना वृक्षारोपणक अभियानमें आम देशवासी सँ एहि तरहक अनुरोध कएल करैत छथि–‘ हमरा सबहक वृक्षारोपणक अभियानमें जँ आँहाँ सहयोग करऽ चाहैत छी त एकटा बाँस दऽ दिय नहिं त एकटा कोनो फूलक या फलक गाछ दऽ दिय । जँ से नहि त एकदिन आबिकए पानि पटा दिय नहिं त सप्ताहमे आधा घण्टा आबिकऽ वृक्षारोपण स्थलमें बैसि जाऊ । जँ आँहाँलग समयक आभाव अछि आँहाँ कर्मचारी छी त अपना गाम गेल वेरमे अपना खेतमे या दरबज्जापर एहि अभियानक नामपर एकटा अपना नीक लागऽबला वृक्ष लगालिय आ नहिं त जँ आहाँके ई अभियान नीक लगैय त कम स कम हमरा अभियानी मीत्रके हौसला बढादिय । हमर स्वार्थ याह अछि जे केओ कतौ गाछ–वृक्ष लगाओत या लगौने हायत त ओकर आक्सिजन हमहुँ लेब आ सबकियो लेत बटोहीके रौदमे छाहरि भेटतैक एवं बहुतो गरीबकेँ घरक आँचकलेल ओकर पात काज औतैक । ताएँ सब गाम–शहरकेँ फूल आ वृक्षसँ सजाबी जतऽ किछुदेर कियो वैसिकऽ स्वच्छ हावा लऽ सकय ।’ तहिना ओ सब कहैत छथि जे जतेक नेताके देखू सब देशे विकासके बात करत । आर्मी पुलिस कर्मचारी देशक या कहु माटिक सपथ खाइत रहत । पत्रकार या बुद्धिजीवि दिन–राति देशक उन्नतिक गप्प करैत नईं थाकत । जे अपनाके जनता कहैत छथि ओ सब दिन–राति नेतासबके गारि पढैत नहिं थकैत छथि जे नेतासब देशके बेच देलक । एकर मतलब जे गारि पढनिहारक भीतर सेहो देश या कहु माटिप्रतिक सिनेह छन्हि ताईमें दू मत नहि । एहि बातक विश्लेषण करैत अभियानी यूवा सब सम्पूर्ण नेपाली सँ एहि तरहें अभियानमे जुटवाक आग्रह करवाक सोंच बनैने छथि–‘सबकियो अपन काज करैत अपना माटिकलेल किछु कऽ सकैत छी । जौँ आहाँ किसान छी सबदिन अपना खेतमे काज करु आ ४÷५ दिनमें एक घण्टाकलेल कोनो दोसर चौरी÷बाधमे टहलि जाऊ आ ककरो खेतक लगाओल बालीमे कोनो प्रकारक रोग या गड़बड़ी देखाइत अछि त सम्बन्धित किसानकेँ सलाह दऽ दियौक । जौँ आँहाँ शिक्षित छी आ अपना कोनो काजमे लागल छी या कर्मचारी छी त अपना ड्यूटीक अतिरिक्त प्रतिदिन÷दूदिनक एक घण्टा नियमित रुपसँ ओतुक्का बच्चाके पढ़ा देल करियौ । एहिं तरहें अपन काजके हर्जा नहिं करैत अपन नियमित जेब खर्चमे कटौति ककऽ अपना धर्तीकलेल बहुत किछु कऽ सकैत छी । जँ हमसब एहि तरहक काज करबैक त विकासक नामपर पाइ हजम करऽबला सबके आँखिमे अवश्य लाज लगतैक आ एकदिन हमरो धर्ती हँसबेटा करतैक ।’ महोत्तरीक यूवाक अभियानक आहाँके नीक लगैय जौं अहुँ एहि अभियानक सहयात्री बनऽ चाहैतछी त जुटि जाऊ आइए सँ आ अहुँ शंकनाद कऽ दिय अपना गाममे वृक्षारोपणक अभियानक संग। अमर शहिद दुर्गानन्द जिनक सपना छल गणतन्त्र आई देश दोसर गणतन्त्र दिवस मनावि रहल अछि । गणतन्त्रक परिभाषाधरि नीक जका नई बुझने सरकारमे रहल एवं विपक्षीक भूमिका निर्वाह करैत आएल पार्टीसबक रवैया दुर्गानन्द झा सनक शहादतपर पानि फेरैत बुझारहल अछि । गणतन्त्रक मतलव मात्र मनमौजी बुझने नेतासब एहू गणतन्त्रक दिवसपर सुधरत कि ? दुर्गानन्द झा सबहक आत्मा सबहक हिसाब राखि रहल अछि । कि दुर्गानन्दक शहादत एहिलेल छल ? गणतन्त्र स्थापनाक धुनमे बीसोवर्ष पूरा नहि कएने दुर्गानन्द झा, राजा महेन्द्रके उपर २०१८ माघ ९ गते जनकपुरधामक जानकी चौकपर बम प्रहार कएने रहथि । हँसैत–हँसैत, बिनुकोनो लोभ लालचमे फँसने २०२० माघ १५ गते शहादत प्राप्त कएने दुर्गानन्द झाक बलिदान आई देशमे गणतन्त्र एलाकबादो गणतन्त्रके ताकि रहल अछि, जकरालेल ओ बलिदान देने रहथि । विद्यालयमे अध्ययन करितेकाल २०१५ सालक प्रथम आम निर्वाचनमे प्रजातन्त्रक पक्षमे अपनाके होमिदेने दुर्गानन्द, राजा महेन्द्रद्वारा २०१७ पुस १ गते संसद आ संसदीय सरकार विघटन कऽ प्रजातन्त्रवादी नेतासबके जेलमे राखिदेवाक सामाचार सुनिते मर्माहत आ क्षुब्ध भऽगेलथि । भारतीय स्वतन्त्रता संग्रामक वीर सेनानी भगतसिंह आ चन्द्रशेखर आजादक जीवनीसँ प्रभावित दुर्गानन्द, प्रजातन्त्रक हत्याराके नहि छोडवाक विचार कएलथि । आपन मायबाबुक एक मात्र सन्तान आ नवविवाहिता युवक भेलाकवादो दुर्गानन्द अपन लक्ष्यमे अडिग रहथि । २०१८ माघ ८ गते बम लऽ कऽ रातारात जनकपुरधाम पहुँचल दुर्गानन्द झा प्रातभिने अर्थात माघ ९ गते जानकी चौकपर साँझ पाँच बिजे दिस तानाशाह राजा महेन्द्रक गाडी रोकिते आपन प्रतिज्ञा पूरा कएलथि । राजा चढल लैण्डरोभर गाडीउपर फेकल बम भूर करैत नीचा जानकी मन्दिरक पूर्र्वी द्वारक दक्षिणवारी देवालपर पर्खालमा फुटेल छल । बम प्रहार कएलाकवादो क्रान्तिकारी दुर्गानन्दके पुलिस नहि पकड़ऽ सकल । हजारो सुरक्षाकर्मी तैनाथ रहलाक बावजुदो नईं पकराएल क्रान्तिकारी युवक ओहि राति जनकपुरधामक एकटा कुटी मे रहिरहल अपनलोक हेमचन्द्र चौधरी आ भोगेन्द्र चौधरी लग रहलथि एवं प्रातभिने उमगाव पहुँचि गेलथि । एम्हर, नेपालमे बम काण्डक अनुसन्धानक नाममे ५६ गोटेके पकरिड़कऽ नीतदिन मारिपिट कऽ बम प्रहार कएने कहिकऽ सकारबाक दुष्प्रयास भऽरहल छल । निर्र्दाषसबके यातना देल जाऽरहल सुनिकऽ एक दिन अनायास जयनगरसँ जनकपुर रेल्वेद्वारा नेपाल आविकऽ ओ अपन गिरफ्तारी देने रहथि । सरकारद्वारा ताहि बीचमे एकटा विशेष अदालत गठन भेल छल जे दुर्गानन्द झाके बिनु सफाइक मौका देनहिं २०१९ साल भादो १९ गते मृत्युदण्डक निर्णय सुनादेलक । ताहि समय नेपालमे ब्राहृमणके मृत्यु दण्ड नई देल जाइत छल, ताहीलेल मुलुकी ऐन २०२० भादो १ गतेके संशोधन काएलगेल । विशेष अदालतक फैसला सर्वोच्च अदालतसँ अनुमोदन करओलाकबाद २०२० माघ १५ गते महानक्रान्तिकारी दुर्गानन्दझाके सुन्धारा जेलमे मध्यरातिमे मृत्युदण्ड देवाक वास्ते जहन दरबज्जा खोललगेल त, मृत्युक लेल तैयार भऽ वैसल क्रान्तिकारीके देखिकऽ हत्यारासब चकित भऽगेल छल । प्राणदण्डक लेल लऽजाइत समयमे अपन अन्तिम इच्छा महान क्रान्तिकारीले एहि तरहें व्यक्त कएने रहथि –‘हमरा दीर्घ यात्रामे गेलाकबादो लोकतन्त्रके केओ नई रोकऽ सकत ।’ १९९७ साल माघ १० सँ १५ धरि शुक्रराज, धर्मभक्त, गङ्गालाल आ दशरथ चन्दके फाँसी (मृत्युदण्ड) देलगेल सवाएक वर्षकवाद १९९९ साल वैशाख १४ गते (वैशाख शुक्ल एकादशी तिथि)में अमर सहिद दुर्गानन्द झाक जन्म धनुषाक जटही गाममे देवनारायण झा आ सुकुमारीदेवी झाक एक मात्र सन्तानक रूपमे भेल छल । पं. भोलानाथ झाक तीन भाइमें एक मात्र उत्तराधिकारी दुर्गानन्द झाक पीताक मृत्यु दुर्गानन्दक बाल्यकालमे भऽगेल छल । माइयक देखभालमे गामसँ ५ किलोमिटर दूर रहल क्षेत्रक उमगावस्थित दिनदयाल हाई स्कुलमे झाक शिक्षादीक्षा भेल छल । घरक एसगर सन्तान होएवाक कारणे मेट्रिकमे पढैतकाल २०१७ साल विवाह पञ्चमीक दिन काशीदेवीक सँग हूनक विवाह भेल छल । २०६० साल भादोमे वृद्ध मायक निधनकेबाद आब एसगर हूनक अर्घाड्ढनी काशीदेवी झा बाँचल छथि आ संविधानसभामा तमलोपापार्टीक सभासद् छथि । देशमे गणतन्त्र अएला दू साल भेलाकवादो, गणतान्त्रिक कहावऽबला सरकार आ देश दुर्गानन्द झाके लेल किछु नहि कऽसकल अछि । जाहि गणतन्त्रकलेल ओ हँसैत–हँसैत अपन जान दऽदेलथि ओ गणतन्त्रात्मक सरकार अखनधरि हूनका राष्ट्रीय शहिदधरि घोषणा नई करऽ सकल अछि । देशमे गणतन्त्र अएलाक दू वर्ष बितिगेलाकवादो दूर्गानन्द झा सन–सन जे देशक बेटा अपन जानके कनिको पर्वाह नई कएलथि, हूनका सभक शहादतपर सरकार आ पार्टीक नेतासब गणतन्त्रक गुलछर्रा उडावि रहल अछि । कि दुर्गानन्द झाक आत्माके दुःखीत कऽ हमसब शान्तिसँ जीवि सकव ? मैथिली दिवसमे विभिन्न कार्यक्रम सम्पन्न जानकी नवमी अर्थात मैथिली दिवसक अवसरमे उपत्यकामे विभिन्न कार्यक्रम सम्पन्न भेल अछि । १९९६ सालसँ सांगठनिकरुपसँ काठमाण्डूक गुह्येश्वरीमे मैथिल ब्राह्मण समाजद्वारा आयोजना होइत आएल जानकी नवमी एहुवेर धुमधामसँ सम्पन्न भेल अछि । काठमाण्डू उपत्यकामे ३÷४ सय वर्ष पहिनेसँ रहनिहार मैथिल ब्राह्मण सबद्वारा होइत आएल जानकी नवमीमे एहिवेर उपराष्ट्रपति परमानन्द झा आ नेपाल पत्रकार महासँघक अध्यक्ष धर्मेन्दं्र झाके सम्मान कएलगेल छल । तहिना अपना स्थापनाकालसँ मैथिली दिवस मनवैत आएल ‘मैथिल यूवा क्लव’ शान्तिनगर एहिवेर मैथिली साहित्यिक गोष्ठीके आयोजना कऽ कऽ मनौलक अछि । मैथिली दिवसक अवसरमें क्लवद्वारा जगत जननी माता सीताक आदर्शपर नेपाली भाषामे ‘सीतायन’ ग्रन्थ लिखिरहल डा. रमेशचन्द्र अधिकारीके सम्मान काएल गेल छल । क्लवक अध्यक्ष विजयकुमार झाक अध्यक्षतामे सम्पन्न साहित्यिक गोष्ठीमे सचिन्द्र यादव, गोविन्द साह, मनोज क्रान्तिकारी, धनेश्वर राउत, श्याम कामत, महिनारायण झा आजुक परिप्रेक्ष्यमे मैथिली दिवसक अपरिहार्यताक विषयमे अपन विचार रखने रहथि । आदर्श झाक उदघोषणमे शान्तिनगर स्थित ग्लोसियर एकेडमीमे सम्पन्न गोष्ठीमे लालबावु कर्ण आ मनोज झा मुक्ति अपन रचना पाठ कएने रहथि । मिथिला महोत्सव आ एकर उपलब्धि जगत जननी माता जानकी अर्थात माँ मैथिलीक जन्मस्थल, प्राचीन विदेह राज्यक राजधानी आ अखुनक परिवेशमे प्रस्तावित मिथिला राज्यक प्रमुख नगरी जनकपुरमें अखन ‘मिथिला महोत्सव’क तैयारी धुमधामसँ भऽ रहल अछि । जनकपुरके यथासंभव चिक्कन–चुनमुन देखयवाकलेल युद्ध स्तरपर काज कयल जाऽरहल अछि । ओना एहि तरहें जनकपुरकेँ सजएवाक काज ई पहिलके खेप नहिं भऽरहल अछि, एहिसँ पहिनहुँ बहुतोवेर जनकपुरके सजाओल गेल छल । कहियो मिथिला महोत्सवक नामपर त कहियो कोनो राजनीतिक पार्टीक महाधिवेशन, सम्मेलन आ कहियो विवाह–पञ्चमी त कहियो आन–आन प्रयोजनक नामपर । मिथिलाक संस्कृति केहन अछि, एतुक्का वातावरण केहन अछि, बाहरसँ आओल पाहुन सबके सैह देखएवाक लेल नाना प्रकारक तामझाम कएल जाइत अछि । जनकपुर संसारक सबठामक हिन्दूक लेल आस्थाक केन्द्रके रुपमे रहल अछि । जे कियो रामायण पढने या सुनने छथि, हुनका जीवनमें जनकपुर जाएव सम्भवतः एकटा प्रवल मनोभावना बढि जाइत छन्हि । ताँए बहुत दुर–दुरसँ लोक जनकपुर देखवाकलेल अवैत छथि । ईच्छा होइतो जे देशी/विदेशी कहियो जनकपुर नहि आएल रहैत छथि, हुनका सबके एहि तरहक सम्मेलन/महोत्सव अएवाकलेल नीक अवसर जुरवैत अछि । सम्मेलन/महोत्सवक दिनक अलावा आनदिन सेहो जनकपुरमे प्रायः भिडभाड रहिते अछि, तथापि विषेश अवसरमें अनदिनासँ तेब्बर–चौबर लोकक भिडभाड़ लागि जाइत अछि । एहि तरहक विषेश प्रयोजनकलेल जखन जनकपुरके सजाओल जाइए, तहन ई सोंचवाकलेल विवश होमय पड़ैए जे विषेश प्रयोजन बाहेक जनकपुरक कोनहुँ महत्व नहिं ? जौं आनदिन सेहो जनकपुरक महत्व हमसब बुझितहुँ त जनकपुरके ई दुर्दशा किया रहैत ? सामान्य दिनमे दूर्गन्धित आ अव्यवस्थित शहरक नमूना लगैत जनकपुरमें विषेश दिन या महोत्सवमें मात्र डेन्ट–पेन्ट कऽ कऽ हमसब कि देखबऽ चाहैत छी ? कोनहुँ पार्टीक महाधिवेशन या सम्मेलन जनकपुरमें होइत अछि त ओहि पार्टीक नेता आ कार्यकर्ता जनकपुरके जीजानसँ लागिकऽ सजवैत अछि । विवाहपञ्चमी या परिक्रमा सन धार्मिक प्रयोजनकलेल गुठी संस्थानक माध्यमसँ आ निजी स्तरसँ मठ–मन्दिरसब खर्च कऽ जनकपुरके सजाओल करैत अछि । तहिना मिथिला महोत्सव सन सन काजकलेल वृहत्तर जनकपुर क्षेत्र विकास परिषद अपन साधन–श्रोतसब परिचालन कऽकऽ जनकपुरके सजएवामे कोनो कसर बाँकि नहि रखैत अछि । आ ई अवस्था अर्थात जनकपुरके सजएवाक काज प्रत्येक ६ मास/एक वर्षपर होइते रहैत अछि, जाहिमें लगभग सऽभ मिलाकऽ करोड़ो रुपैया खर्च भऽ जाइत अछि । आ फेर–फेर हमसब एहि खर्चके निरन्तरता देवामे अपनाके गर्वान्वित महशुश करैत छी । मात्र आ मात्र क्षणिक प्रशंसाकलेल जनकपुरके सजएबाक काज हमसब कहिया धरि करैत रहब ? सम्मेलन/महोत्सवक बाद जनकपुरके किया ओ सम्मेलन/महोत्सवक आयोजक सबके जनकपुर बिसरा जाइत छन्हि ? जनकपुरक विकासकलेल दीर्घ योजना नहि बनऽमें कोन कारण अछि ? बेर–बेर जनकपुरेक सजाबऽमे जे खर्च कएल जाइत अछि से ठोसरुपसँ एकैबेर किया नहि करबाक सोंच किनकोमे अवैत अछि ? कोनो विषेश प्रयोजमे नीक आ सामान्य दिनमें अशान्त, अव्यवस्थित आ दूर्गन्धित रहऽवला जनकपुरके, सऽभ दिनलेल किया नहिं नीक आ आकर्षक/मनमोहक बनाओल जाऽ सकैया ? सम्मेलन/महोत्सवक वाहेक जनकपुरक विकासके ध्यान नहिं देवाक कारण बहुतो भऽ सकैय । राजनीतिक पार्टीक नेता सबहक गैर जिम्मेवारीपन, स्थानियवासीक जनकपुरक विकासमे अभिरुचि नहिं लेब, राज्यद्वारा जनकपुरके उपेक्षाक सिकार बनाएब, सार्वजनिक सम्पतिके व्यक्तिगत प्रयोजनमे नेता, मठाधिश सबद्वारा प्रयोग करबाक प्रवृति । एहिके अतिरिक्त जनकपुरक विकास नहिं होएबामे एकटा प्रमुख कारण अछि– एक्कहिटा काजक नामपर फेर–फेर खएबाक मनोवृति । किछुलोक एहनो छथि जिनकर सोंच रहैत छन्हि जे काज जौं एक्कहि वेरमे नीक भऽगेल त फेरसँ ओही नामपर पाई नहि निकालल जा सकैय, ताँए काज एहन कमजोर हुए जे फेरफेर करबाक मौका अवैत रहय । किछु काज जनकपुरमे एहनो देखलगेल जे दोसर प्रमुख जौं कऽदेने अछि त ओकरा फेरसँ तोरबाओलगेल आ पुनःनिर्माणक नामपर बजेटके उड़यबाक काज सेहो भेल । सबसँ प्रमुख बात ई अछि जे हमसब जनकपुरक विकासके नामपर कमाए चाहैत छी, कि वास्तविकरुपमे जनकपुरके विकास करऽ चाहैत छी ? ताइमे प्रष्ट होमय पड़त । मिथिला महोत्सव मनाएब बहुत नीक बात अछि, मुदा ई निर्भर करैत अछि एकरा आयोजन करबाक मनसाय पर । जौं वास्तविक रुपमे मिथिलाक संस्कृति, मैथिली भाषाक विकासक लेल एहि तरहक आयोजन होइत अछि त स्वागत योग्य आ प्रशंसनिय काज अछि । आ जौं अपना पार्टीक नेताके चाकड़ी करबाकलेल, एकर नामपर बजेट खएवाकलेल आ मात्र सुरखुरु बनवाक मनसायसँ महोत्सवक आयोजन कएल जाइत अछि त मिथिला एवं जनकपुरकलेल ओहिसँ पैघ दुर्भाग्य किछु नहि होएत । ‘चार दिनकी चान्दनी फिर आधेरी रात’ जे हिन्दीक कहवी अछि सैह जनकपुरके नियति बनल अछि । जनकपुरके एहिसँ उठएवाक दायित्व कि एहि तरहक सम्मेलन/महोत्सवक आयोजककेँ नहिं ? जनकपुर, मिथिला आ मधेशक राजनीतिकके प्रमुख केन्द्रक रुपमे रहल अछि । जनकपुर मिथिला, मधेश, नेपाल आ सम्पूर्ण हिन्दू सबहक परिचायक अछि । जौं जनकपुरके सबदिनलेल स्वच्छ आ व्यवस्थित हमसब राखऽसकलहुँ त जनकपुरके परिचय करेबाकलेल सम्मेलन आ महोत्सव अएनाइ या मनेनाई जरुरी नहि रहि जायत । मात्र सम्मेलन आ महोत्सवमे जनकपुरके सजाएव अखन कौआके बकुला बनाएब जकाँ हाँस्यास्पद काज मात्र प्रतीत होइत अछि । किया त अनदिना अर्थात सम्मेलन आ महोत्सवक बाहेकदिनक जनकपुर हमरा सबके वास्तविक परिचय दैत अछि । कहियाधरि जनकपुर नीक बनवाकलेल सम्मेलन आ महोत्सवेके बाट जोहैत रहत ? हमसब सोंचव की... ? महाशिवरात्री मेला आ गाँजाक व्यापार संसारमे सबसँ प्रसिद्ध शिवलिङ्ग रहल नेपालक काठमाण्डू स्थित मन्दिर सबठामक हिन्दू सबहकलेल पैघ आस्थाक केन्द्रकरुपमे परिचित रहल अछि । विभिन्न अवसरपर एतऽ लागऽवला मेलामे कसिकऽ दर्शनार्थिक भीड़ लगैत अछि । ओना बेगर मेलोके पशुपतिनाथक दर्शनकलेल संसारक सभ कोनासँ हिन्दूसब आओल करैत अछि । विषेश रुपसँ शिवरात्रीमे पशुपतिनाथक मन्दिरमे अपार भीडभाड लगैत अछि । बहुत दुर–दुरसँ योगीसब बाबाक दर्शनकलेल सेहो अवैत अछि । नेपाल सरकारक दिससँ जोगी सबहकलेल विषेश व्यवस्था होएबाक कारणे सेहो जोगी सबहक आकर्षणक केन्द्र पशुपतिनाथ बनल अछि । शिवरात्रीक अवसरपर आओल जोगीके एतऽ सेवा सत्कारक अलावा सम्मानक सँग विदाई करबाक परम्परा चलैत आएल अछि । नेपाली भाषामे एकटा कहबी छैक,‘पशुपतिको यात्रा, सीद्राको व्यापार’ । जकर अर्थ होइछ, पशुपतिक यात्रा आ सिधरीक व्यापार । सिधरीक उदाहरण एहिलेल देलगेल होएबाक चाही कि निरंकारक दरबारमे, दर्शनक बहन्नासँ सभ तरहक लोक अपन–अपन कार्य सिद्धि करैत छथि । पशुपतिनाथक प्राँगणमे शिवरात्रीक समयमे लागऽवलामे औनिहार जोगी सबमे बहुत लोक त जोगीक भेषमे मात्र आ मात्र गाँजाक व्यापार करबाकलेल अवैत अछि । एकटा आओल जोगीक कहब रहनि जे ‘दू दिन गाँजा बेच लेलहुँ त भरि सालक जेबखर्ची चलि जाइत अछि ।’ हुनक कहब रहनि जे हम सबदिन गाँजा नई बेचैछी, मुदा शिवरात्रीमे गाँजाक बेचवामे कोनो रोकटोक नई रहबाक कारणे हमहुँ ओइदिन गाँजा बेचलेल करैत छी । एहि बेरुका वितल शिवरात्रीमे हमहुँ गेल छलहुँ ई देखबाकलेल जे कोन तरहें गाँजाक खुलेआम बाजार लगैत अछि पशुपतिनाथक मेलामे । जखन पशुपतिनाथक मन्दिरक सटले रहल आर्यघाटक सँगेक पुलसँ वाग्मतीके ओहिपार राम मन्दिरक प्राँगणमे प्रवेश केलहुँ त विभुतसँ अपना शरीरके रंगने बाबासभ अपन अपन खन्ति गाड़िकऽ धुनी रमौने बैसल भेटलाह । हम आ हमरा संगे तीनटा आओर मीत्र रहैथ । हमसब पहिनहींसँ गाँजाक बाजारमे जाऽकऽ मोलजोल करबाक, मुदा नहिं किनवाक बात विचारिकऽ ओतऽ गेल छलहुँ । ओतऽ देखलियैक प्रायः बाबासब अपना अपना आगामे नीक चीप्पीबला गाँजा एकटा प्लास्टिकवला पुडियामे देखयबाकलेल धेने छथि आ एकटा छोट वासनमें गाँजाक बुकनी रखने ओकरा सिकरेटमें भरैत अछि । सिकरेट भरि–भरिकऽ आगामे सजाविकऽ राखिरहल छथि । हुनकासँ पुछलियैन,‘बाबा गाँजा केना देते हैं ?’ बाबा कहलथि,‘ दश रुपैयाका एक सिकरेट ’ हम कहलियैन,‘बाबा, बहुत महँग भऽ गया, कनि कम नही होगा ?’ बाबा,‘हम दुसरे बाबाजी जैसे भाँगको गाँजा कहकर नही बेचते हैं, एकदम असली माल है ।’ हम, ‘बाबा केना बुझेंगे जे ई असली है ?’ बाबा(गाँजाक चीप्पी देखवैत), ‘ई देखता है, वस ऐसाही माल हमारे ईहां मिलेगा ’ हम, ‘बाबा २५ रुपैयामे चारिटा दिजिएगा ?’ जखन हम १० रुपैयामे एकटा दाम कहने सिकरेटके २५ रुपैयामे चारिटा देवाक बात कहलियैन्ह त बाबा मोनके मसोरैत देवाकलेल तैयार भऽ गेलाह । मुदा हमरा सबके लेबाक नई छल ताँए दुआरे ओतऽसँ आगा बढलहुँ । आगा बढलहुँ त देखैत छी जे सब बाबाक आगामे ओहिना सिकरेट सजाओल अछि आ गहिंकीसब किनमे आ बाबाजीसब बेचऽमे व्यस्त छथि । फेर एकटा बाबालग पहुँचलहु आ पुछलियैन्ह, ‘बाबा परसाद है ?’ बाबा( हमरा दिस निचासँ उपरदिस घुरैत), ‘बेचनेके लिए त नही है, लेकिन पीनेके लिए मिल जाएगा ’ हम,‘कते पैसा लगेगा ?’ बाबा,‘१००÷५० जो देना हो देदो’ हम,‘बाबा ५ रुपैयाके नही मिलेगा ?’ बाबा,‘यहाँसे जाओ, पाँच रुपैयाके गाँजा नही मिलता है ।’ हमसब फेर ओतसँ आगा बढलहु त एकठाम ५÷६ टा बाबाजी चारुकातमे वैसिकऽ धुनी तपैत देखलियैन । हम ओतऽ जाकऽ पुछलियै जे बाबा परसाद मिलेगा ? केओ किछु नई बाजल तहन हमसब आगा बढऽ लगलहुँ । हमरा सबके आगा बढैत देखि ओहिमेंसँ एकटा बाबा बजौलथि आ कहलथि,‘ जादा त नही है, हँ कमसम पानेके लिए परसाद मिल जाएगा ,’ हम,‘कते रुपैया देना पडेगा ?’ बाबा,‘कमसेकम १० रुपैयाका’ हम,‘बाबा दू रुपैयाके नही मिलेगा ?’ बाबा(हमरा मुँहपर ठिकियवैत),‘ अच्छा लाओ लेले ।’ बाबाके देवाक तैयारी भेल देखिकऽ हमर मित्र कहलथिजे छोडू चलु–चलु कहैत हमसब आगा बढि गेलहुँ । ओहि प्राँगणमे किछु विदेशी महिला आ पुरुषसेहो बाबाक धुनीक बगलमे गाँजा भरल चीलम सुनगवैत नजर आओल । ओहि परिसरमे भिडभाड बहुत कसिकऽ छल, आ ओहि परिसरमे घुमैत प्रायः दर्शनार्थीक आँगि देखवा योग्य छल । किनको आँखि बुझाइत छल जे लाल भऽकऽ आब निकलही बला अछि त किनको आँखि डुबिगेल अछि । जाहीमे युवा आ युवती सभ सामेल छल । सबहक चलबाक दृश्य सेहो देखवा योग्य छल । एकटा डेग एम्हर त दोसर ओम्हर । ओहीमे गाँजाक अवैद्य बिक्रि नई हो ताहिलेल सुरक्षा निकाय प्रहरीक ड्यूटी सेहो खटौने छल । गाँजा रोकबाकलेल आएल पुलिस सेहो बाबाक धुनीक आगा गाँजाक सोंटा लगवैत नजरि आएल । नजारा सब देखैत हमसब ओतऽसँ बाहर निकललहुँ आ शिवरात्रीक अवसरपर पशुपतिनाथक दर्शन करबाकलेल आओल अधिकांश बाबाक असली कारणसँ भिज्ञ भेलहुँ । बुझाइया ताहु दुआरे अनदिनो जौं केओ कहैत अछि जे पशुपति जाऽकऽ अवैत छी त अधिकांश लोक ई बुझैत अछि जे,‘ ई पक्के गाँजा पिवऽ जाऽरहल छथि ।’ जौं एहि तरहक गाँजाक खुल्ला व्यापार होइत रहल त लोक अपना धियापुताके शिवरात्रीक मेलामे पशुपतिनाथक मन्दिरमे पठेवासँ परहेज नई करत तकर कोनो ग्यारेन्टी नहि । मिडिया सेन्टरक स्थापना पशुपति क्षेत्र विकास कोषद्वारा पशुपतिनाथक महिमाके राष्ट्रिय÷अन्तरराष्ट्रिय रुपमे प्रचार प्रसार करबाकलेल मिडिया सेन्टरक स्थापना केलक अछि । पशुपतिनाथक सम्बन्धमे देश÷विदेशमे रहल हिन्दू आ गैर हिन्दू सबहक पशुपतिनाथक सम्बन्धमे जानकारी कराएब प्रमुख उद्देश्यक संग स्थापित मिडिया सेन्टर पशुपतिनाथ सम्बन्धि सभ तरहक सूचना संसार भरि संप्रेषण करबाक काज करत से बात मिडिया सेन्टरके उद्घाटन करैत कोषक सदस्य–सचिव सुशील नाहटा बतौलन्हि । श्रीपशुपतिनाथक परिसरमे लागऽवला हरेक मेला÷महोत्सवमे सूचना प्रकाशन÷प्रशारणकलेल आबऽवला संचारकर्मीके यथा संभव सहयोग करबाक काज मिडिया सेन्टरके रहल बात बताओलगेल अछि । तहिना संसारभरि घरेमे बैसल–बैसल पशुपतिनाथ सम्बन्धि हरेक गतिविधिके देखवाकलेल कोषद्वारा मिडिया सेन्टर मार्फत वेभ साइटक शुरुवात सेहो कयलगेल अछि । धधध।उबकजगउबतष्।यचन।लउ ठेगाना रहल एहि साइटक उद्घाटन संस्कृति मन्त्री मिनेन्द्र रिजाल कयने रहथि । रमानन्द झा "रमण", जन्म: 02 जनबरी,1949, शिक्षा-एम.ए., पीएच.डी., आजीविका-भारतीय रिजर्व बैंक, पटना (सेवा निवृत्त)। प्रकाशन: 1. नवीन मैथिली कविता,1982, 2. मैथिली नऽव कविता,1993, 3. मैथिली साहित्य ओ राजनीति, 1994, 4. अखियासल, 1995, 5. बेसाहल,2003, 6. भजारल, 2005., 7. निर्यात कैसे शुरू करें? हिन्दी- रिजर्व बैंक, पटनाक प्रकाशन सम्पादित 8. मैथिलीक आरम्भिक कथा, 1978 समीक्षा, 9. श्यामानन्द रचनावली, 1981, 10. जनार्दन झा जनसीदन कृत निर्दयीसासु (1914) आ पुनर्विवाह (1926), 1984, 11. चेतनाथझाकृत श्रीजगन्नाथपुरी यात्रा (1910), 1994, 12. तेजनाथ झाकृत सुरराजविजय नाटक (1919), 1994, 13. रासबिहारीलाल दासकृत सुमति (1918), 1996, 14. जीबछ मिश्रकृत रामेश्वर (1916), 1996, 15. भेटघॉंट (भेटवार्ता), 1998, 16. रूचय तँ सत्य ने तँ फूसि, 1998, 17. पुण्यानन्द झाकृत मिथिला दर्पण (1925), 2003, 18. यदुवर रचनावली (1888-1934) 2003, 19. श्रीवल्लभ झा (1905-1940) कृत विद्यापति विवरण, 2005, 20. मैथिली उपन्यासमे चित्रित समाज, 2003, 21. पण्डित गोविन्द झाः अर्चा ओ चर्चा, 1997 प्रबन्ध सम्पादक, 22. कवीश्वर चेतना, 2008, चेतना समिति, पटना अनुवाद आदि। मैथिली लोक गीतक अवस्था जनकपुर, नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान एवं रामानन्द युवा क्लव, जनकपुरधामक संयुक्त तत्त्वावधानमे मैथिली लोक संस्कृतिपर जनकपुरधाममे आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी - जेठ 9, 10 गते, तदनुसार 23-24 मई, 2010 उपस्थित लोकज्ञ एवं शास्त्रज्ञ महोदय! डा.महेन्द्रनारायण रामक उपर्युक्त विषयक कार्यपत्र परिश्रमपूर्वक तैआर कएल गेल अछि। डा. राम मैथिली लोक साहित्यक क्षेत्रमे किछु मौलिक काज कएलनि अछि। किन्तु एहि स्तरक संगोष्ठीमे कार्यपत्र प्रस्तुत करबाक समय किछु बिन्दुके ँ ध्यानमे राखब आवश्यक होइत छैक। से एहि हेतु जे संगोष्ठीक श्रोता ओहन नहि रहैत छथि जनिका ककहरा पढ़ाओल जाए। श्रोतावर्गमे सामान्यतः बहुपठित एवं अपन-अपन क्षेत्रक विशेषज्ञ उपस्थित रहैत छथि। उपस्थित छथिओ। ते ँ ई मानि कार्यपत्र प्रस्तुत कएल जएबाक चाहैत छलनि जे हमर कार्यपत्रक श्रोता असामान्य ज्ञान आ’ प्रतिभाक लोक रहताह। प्रस्तुत कार्यपत्र विशिष्ट श्रोताके ँ समक्ष राखि नहि लिखल गेल अछि। कार्यपत्र परिचयात्मक आ’ इतिवृत्तात्मक अछि। विश्लेषणात्मक होएबाक चाहैत छलैक। एहन विश्लेषणात्मक जे श्रोता/पाठकके ँ वैचारिक स्तरपर उद्वेलित करबाक क्षमता रखैत हो। उदाहरण लेल विशेष अवसर आ’ भासक गीत लगनीक नाम लेब। लगनी कोन संस्कृतिक उपज थिक। जाँत चलओला पर जे थकनी होइत छैक, तकरा गीत गाबि कोना बिसरल जाइत छल। ओहि माध्यमे ननदि-भाउजक हास-परिहाससँ वातावरण कोना महमहा उठैत छलैक। सम्प्रति जखन जाँतक स्थान मिक्सी लेने जाइत अछि आ’ ढ़ेकीक स्थान मील, तखन एहि तरहक श्रम-गीतक विलुप्तिक सम्भावना कोना बढ़ि रहल अछि, आदि। कहबाक तात्पर्य जे लोकगीत संस्कृतिक संवाहक थिक। लोकगीतमे सम्बन्धित क्षेत्रक संस्कृति झलकैत रहैत छैक। एहन स्फीत विश्लेषणात्मक दृष्टिक अभाव डा.रामक कार्यपत्रमे खटकैत अछि। कार्यपत्रक विषय अछि, लोक गीतक अवस्था। एहिमे तीन टा पद अछि - लोक, गीत आ’ अवस्था। गीतक महत्त्व सर्वकालिक छैक। जहिआसँ मानवक अस्तित्व छैक, कोनो ने कोनो प्रकारक गीत ओकर कंठसँ स्वतः निःसृत होइत रहल अछि। अपन परिवेश वा सजातीय किंवा मानव जातिक प्रति रागात्मक होएब लोकक स्वभावगत विशेषता थिकैक। ते ँ सभ भौगोलिक वा सांस्कृतिक क्षेत्रक लोकक जीवनमे गीतक महत्त्व छैक आ’ सदा रहतैक। एतेक धरि जे हमरालोकनिक देवी देवता सेहो संगीत प्रेमी छथि। केओ डमरू बजा के ँ ताण्डब करैत छथि तँ केओ वीणावादिनी कहबैत छथि। दोसर पद अछि लोक। लोक तँ सभ दिनसँ अछि। लोक अछि, ते ँ राग अछि, विराग अछि। ते ँ गीत अछि। मैथिल संस्कृतिमे जेना वेदक अर्थात् शास्त्रक महत्त्व अछि ओहिना लोकक अर्थात् शास्त्रीयतासँ मुक्त आचार-व्यवहारक महत्त्व अछि। लोक आ’ वेद समानान्तर मानल गेल अछि। ‘लोके च वेदे च’। व्यावहारिको जीवनमे लोकवेदक पुछारी करब सामान्य शिष्टाचार भए गेल अछि। समाजमे दूनू वर्गक लोक रहैत आएल अछि। जे शास्त्रीय शब्दावलीमे आभिजात्य वर्ग आ’ सामान्य वर्ग थिक। एही आधार पर साहित्योक वर्गीकरण - शिष्ट साहित्य एवं लोक साहित्य अछि। सिद्धाचार्य लोकनि तथाकथित शिष्टवर्गक लोक नहि छलाह। किन्तु मैथिलीमे जे प्राचीनतम गीत साहित्य उपलब्ध अछि, से सिद्धाचार्य लोकनिक रचना थिक। ओ जीवनक रागात्मक अनुभूतिक स्थानपर अपन अनुभव आ’ दर्शनक अभिव्यक्तिक माध्यम लोकभाषाके ँ बनाए गीतक रचना कएल। कविकोकिल विद्यापति लोकक महत्त्व आ’ लोकक भाषाक महत्त्व बूझलनि। ते ँ सर्वत्र पूज्य आ’ मान्य छथि। लोक हुनक रचनामे अपन राग-विरागके ँ अभिव्यक्त भेल अनुभव करैत अछि। लोकक महत्त्वके ँ देखैत महाकवि भवभूति रामके ँ आदर्श शासकक रूपमे चित्रित करैत हुनकासँ कहबाओल अछि - राज्य, सुख आ’ देशके ँ - एतेक धरि जे सीता के ँ लोकक आराधनाक हेतु छोड़बामे व्यथा नहि होएत - राज्यं, दयां च सौख्यं च, यदि वा जानकीमपि। आराधनाय लोकस्य मुंचतो नास्तिमेकथा।। लोक की कहत? से सोचि राजा राम सीताक निर्वासन कए देलनि। किन्तु हुनकामे लोकतन्त्रीय जीवन-मूल्यक अभाव छल। एकर विपरीत सीता लोकतन्त्रीय शासन-व्यवस्थामे जनमल छलीह। लोकतन्त्रमे अपन विचार व्यक्त करबाक स्वतन्त्रता होइत छैक, से हृदयंगम छलनि। ओ जनैत छलीह जे मिथिलामे लोकशक्तिक महत्त्व अछि आ’ राजा जनक लोकहिक प्रतिनिधि थिकाह। लोकतन्त्रक भूमिमे जनमलि सीता अश्वमेध यज्ञक प्रसंगमे राजा रामक समक्ष मिथिलाक ‘मिथिलाक लोक नहि थिकनि राजाक दास स्वाधीनमना लोकक प्रतिनिधि थिकाह मिथिलेश अहाँ करबैक आक्रमण। मिथिला भ’ जैत पुरुषहीन, तखने ने अहाँक जीत? पति-पुत्र विहीना नारीक नोरसँ मिथिलाक भूमि हैत पाँक हेंक। फोड़ल लहठीक लागत ढे़र-पहाड़, माङक सिन्दूरसँ पोखरि झाँखडि हैत लाल, कन्ना-रोहटसँ भरत मिथिलाक भू, नभ, दिगन्त, सोहर, कोबर, बटगबनी, लगनी, मलार, रास, संगीतक सब राग-भास मरि लुप्त हैत।’1 राजतन्त्रमे वैचारिक मतभिन्नताक अवकाश नहि छैक। राजतन्त्रीय शासन-व्यवस्थामे प्रशिक्षित राजा रामक लेल वैचारिक मतभिन्नताक महत्त्व नहि छल। सीता द्वारा मिथिलाक प्रसंग स्थिति कथन राजद्रोह भए गेल। राजद्रोहक दण्ड होइत अछि - मृत्यु दण्ड वा देश निष्कासन। देश निष्कासनक दण्ड सीताके ँ भेटलनि। मिथिलाक संस्कृतिमे लोकतन्त्रात्मक मूल्य कतेक प्रगाढ़ अछि तकर साक्ष्य नेपाल तराइक घुमन्तू गायकक मुहे ँ सुनि लिपिबद्ध भेल जार्ज अब्राहम ग्रिअर्सन संकलित गीत दीनाभद्रीसँ सेहो प्रमाणित होइत अछि। मुसाहु बनियँा जखन अकारण दीनाभद्रीके ँ अपन दोकान परसँ ठोंठिआ दैत अछि तँ ओ तकर प्रतिकार अपन शारीरिक बलसँ नहि कए, निसाफक हेतु पंचक ओतए जाए नालिस करैत अछि - पंच मे ँ भद्री देलन्हि नालिस कराय। छोट पंच बड़ पंच सिरक मटुक। बिनु अपराधे ँ गरदनियाँ देलक मुसाहु, करू मोर निसाफ। किअ कहौ, हे मुसाहु, बिनु अपराधे ँ गरदनियाँ देलह।। तोहर दोकान मना परि जाएत।2 हमर देश अर्थात् भारत विदेशी आक्रमण, राजतन्त्र आ’ उपनिवेशवादक पीड़ा कतेको शताब्दी धरि भोगि स्वतन्त्र भेल एवं लोकतन्त्रक स्थापना भेलैक अछि। भारतक नागरिक अपन भाषा-साहित्य एवं संस्कृतिक प्रचार-प्रसार एवं संरक्षण लेल स्वतन्त्र अछि। ओहि लेल पूर्ण अवसर छनि। अपने लोकनि (नेपालवासी) कतेको शताब्दी धरि राजतन्त्रके ँ भोगैत ओहिसँ मुक्तिक लेल अनवरत संषर्घ करैत अएलहुँ अछि। ओहि संघर्षसँ लोकतन्त्रक उदय भेल अछि। सुन्दर विहान समक्ष अछि। एहि लोकतन्त्रक युगमे जाहि कोनो शक्तिक सबसँ बेसी महत्त्व छैक से थिक लोकसत्ता आ’ लोकक राग-विराग एवं लोक जीवनके ँ प्रतिनिधित्व करएबाला लोक साहित्यक। एहि सन्दर्भमे ‘मैथिली लोक संस्कृति’ पर संगोष्ठी आयोजित करब, लोकशक्तिक प्रतिष्ठापनक दिशामे एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण डेग थिक। अपने लोकनि लोकतन्त्रक स्थापना लेल कतेक लालायित छलहुँ आ’ कतेक आशान्वित छी,, तकरा ई संगोष्ठी प्रतिध्वनित करैत अछि। तेसर पद अछि अवस्था। अवस्था कालक द्योतक थिक - भूत, वर्तमान आ’ भविष्य। अर्थात् मैथिली लोकगीतक अवस्था की छलैक, वर्तमान कालमे कोन अवस्थामे अछि तथा भविष्यमे मैथिली लोकगीत कोन अवस्थामे रहत। ई सभ केओ एक स्वरे ँ एवं मुक्त कण्ठसँ स्वीकारैत छी जे मैथिलीक लोकगीत हमर महान संस्कृतिक वाहिका थिक। एहि लोकगीतमे हमर राग-विराग, आशा-आकांक्षा, सुख-दुख, ज्ञान-विज्ञान, हमर जातीय इतिहास, हमर भौगोलिक स्थिति एवं प्राकृतिक सुषमा, जीवन-शैली तथा सांस्कृतिक वैविध्य अनादि कालसँ संवाहित होइत आबि रहल अछि। ई सांस्कृतिक सम्पदा अनेक रूपमे अछि - दृश्य आ’ अदृश्य दूनू। रागात्मकतासँ लबालब भरल अछि। जीवनक एहन कोनो पक्ष नहि छैक जकर रागात्मक अभिव्यक्ति लोकगीतमे नहि हो। तुलसी, कुश, आम, महु, नीम, बाँस, काछु, पुरैनिक पात, तिलकोरक पातसँ लए के ँ भोजन-विन्यास धरि लोकगीतमे भेटत। गर्भ धारणसँ मृत्यु धरिक समस्त संस्कार लोकगीतमे अपन पृथक राग-भास एवं विषय-वस्तुक संग अनुस्यूत अछि। लोकगीतमे युग-युगक अनुभव सुरक्षित रहैत अछि। ई अनुभव सम्प्रति पारम्परिक लोक ज्ञान स्रोतक रूपमे मान्यता पाबि गेल अछि। एहि प्रसंग एक दू टा उदाहरण प्रस्तुत अछि। विवाह पूर्व वा अन्यो अवसर पर उवटन लगेबाक प्रथा अदौकालसँ प्रचलित अछि। उबटनमे मेथीक प्रयोग होइत अछि। ओहिना हरदि लगेबाक प्रथा अछि। एहि दूनूमे औषधीय गुण छैक जे विज्ञान द्वारा प्रमाणित अछि। घर-घरमे तुलसीक गाछ अछि। धी-सुआसिन ओकर जड़िमे जल ढ़ारैत छथि। सांझमे दीप लेसैत छथि। बेलक पात शिवजीके ँ चढ़बैत छथि। मैथिली लोकगीतमे एहि वनस्पतिक सभक महत्त्व अकारण नहि अछि। समय-शीला पर परीक्षित एवं अनुभवसिद्ध अछि। ई वनस्पति सभ औषधीय एवं पर्यावरणीय महत्त्वक बस्तुक थिक जकर उपयोग होइत आएल अछि। लोकगीतमे आ’ व्यवहारमे रहलाक कारणे ँ ई पारम्परिक ज्ञानक स्रोत भए गेल अछि। एहि पारम्परिक लोकज्ञानक स्रोतसँ मानवजाति लाभान्वित भेल अछि। लोकगीतमे वैज्ञानिक तत्त्वक रहबाक ई स्पष्ट उदाहरण थिक। उबटनक गीतमे मेथी पीसबाक चर्च बेर-बेर अबैत अछि। कओन नाना मेथिया बेसाहल? कओने नानी पीसल? अपन नाना मेथिया बेसाहल, सूहब नानी पीसल। कनि बिलमि एहि गीत पर विचार कएल जाए। बेसाहब, अपन खेत-पथारसँं आवश्यकताक पूर्ति नहि होएब थिक। बेसाह लगैत छनि, अर्थात् अन्न-पानिक अभाव छनि। ई लोकगीत परिवारक आर्थिक स्थितिके ँ सेहो देखबैत अछि। तथापि मातामह द्वारा दौहित्रीक उबटन हेतु मेथी बेसाहल जाइत अछि। बेसाहल मेथी मातामही नातिन लेल पीसैत छथि। आनो केओ पीसि सकैत छलीह। मुदा रागात्मकताक महत्त्व छैक। ते ँ नानीक पीसल मेथी लगाओल जएबाक चर्च अछि। रागात्मकताक रंगमे व्यावहारिकता एवं लाभप्रदताके ँ बोरि जीवनमे अंगीकृत कए लेब मैथिल संस्कृतिक अनुपम विशेषता थिकैक। ई विशेषता उबटनक एहि गीतमे वर्तमान अछि। एहिना हरदिक प्रसंग लोकगीतमे पर्याप्त चर्च अछि: - हरदीके बड़ा सजाबट जनक जी, हरदीमे बड़ा सजाबट। पहिल हरदी दादा चढ़ावे पाछू सँ दादी सोहागिन, जनक जी। हरदी बड़ा सजाबट। लोक जीवनमे उपयोगिता, रागात्मकता, सौन्दर्यप्रियता एवं सामाजिकताक अत्यन्त महत्त्व अछि। सामाजिकता रागात्मकतासँ कोना मंडित रहैत अछि तकर उदाहरण निम्नलिखित गीतक पांतीमे द्रष्टव्य अछि। ‘सेन्टो गमकदार’ प्राचीन प्रयोग नहि थिक। ई लोकगीतक लोचकताके ँ प्रदर्शित करैत अछि। जनकपुरमे धूम मचल अछि, संगीता पसाहिन आइ अछि।.... चाचीक हाथमे तेल फुलेल, मामीक हाथ कसाइ अछि मौसीक हाथमे अत्तर सुगन्धित, सेन्टो गमकदार अछि। जनकपुरमे धूम मचल अछि, संगीता पसाहिन आइ अछि। विवाहक अवसर पर सोहाग देबाक प्रथा अछि। सोहाग थिक सौभाग्य-कामना, मंगलमय दाम्पत्य जीवनक हेतु आशीर्वचन। मैथिल संस्कृतिमे सामाजिक समरसताक तत्त्व प्रगाढ़ अछि। एहि तत्त्वक गीतात्मक अभिव्यक्ति हास्य-विनोदक सृष्टिक संग कोना कएल जाइत अछि से प्रस्तुत सोहाग गीतक ‘लट छिलकी धोबिनयाँ’क प्रयोगमे वर्तमान अछि। धोबिनियाँ सामान्य नहि अछि, सौन्दर्य चेतना छैक। कपोल पर लट लटकौने अछि। एहि लटक कतेको कवि ‘कारी सियाह नाग’सँ तुलना कएने छथि। एहिठाम आनो केओ भए सकैत छलि, धोबिनियाँ किएक? एकरहु एक पौराणिक कारण छैक। शिवजीक मानस पुत्रीक विवाहक अवसर पर समाजक अनेकहु महिला लोकनि सोहाग लेल उपस्थित भेल छलीह। किन्तु ओहिमे सभसँ आगू छलि एक धोबिन। गणेशजीसँ ओकरा अखण्ड सौभाग्यक वरदान भेटलैक। एहि हेतु सभसँ पहिने अखण्ड सौभाग्यक वरदान प्राप्त धोबिनसँ सोहागक परिपाटी अछि। एहि एक शब्दमे एक संस्कृति अछि। एक कथा गुम्फित अछि। सियाजी के दही ने सोहाग गे, लट छिलकी धोबिनियाँ हमरो सियाजी कें पिअरे पिताम्बर सेहो तों लिहे फेराए गे, लट छिलकी धोबिनियाँ। हमरो सियाजीकें सोना अशर्फी। सेहो तों लए गे, लट छिलकी धोबिनियाँ। समाजमे कन्याके ँ पुत्रवत् सुविधा, विकासक अवसर आ’ अधिकार प्राप्त नहि छैक। ई विभेद जन्मकालहिसँ आरम्भ भए जाइत अछि। एकोटा एहन सोहर नहि भेटत जाहिमे सीता, पार्वती, राधा, लक्ष्मी वा सरस्वतीक जन्मक उल्लास हो। सभटा राम वा कृष्णक जन्मसँ सम्बन्धित अछि। पुत्रक जन्मक अवसर पर बहिंगा फेंकबाक कतेको ठाम प्रथा अछि। ई प्रसन्नताक संग शौर्यक अभिव्यक्ति थिक। बेटीक जन्मसँ उल्लासक स्थान पर परिवारमे अवसाद पसरि जाइत छैक। धरतीक झझकब, नार-पुरैनि काटबा लेल हाँसू तकबाक क्रममे चक्कूओ नहि भेटब आ’ अन्ततः खुरचनसँ नार काटब, सासु एवं ननदिक व्यवहारमे रुच्छता तथा पतिक मुखाकृतिमे अप्रसन्नताक चेन्ह आदिक अभिव्यक्ति लोकगीतमे पर्याप्त भेल अछि। ‘जाहि दिन आगे बेटी तोहरो विवाह भेल, तारा गिरल आधी रात’ बेटीक विवाहक लेल माइक चिन्ताके ँ स्वर दैत अछि। जाहि दिन आगे बेटी तोहरो जनम भेल, धरती उठल झझकाइ हे। हंसुआ खोजइते गे बेटी छुरियो न भेटल, सितुआसँ नार कटाओल हे। सासु ननदी गे बेटी मुखहुँ न बोलए, स्वामी जीके ँ जियरा उदास हे। जाहि दिन आगे बेटी तोहरो विवाह भेल तारा गिरल आधी रात हे। भ्रूण-परीक्षण आधुनिक विज्ञानक देन थिक। एहि परीक्षणसँ अनिच्छित संतानके ँ सूर्यक प्रथम रश्मि देखबाक अवसर नहि भेटैत छैक। पहिने ई सुविधा नहि छलैक। किन्तु बेटीक जन्मसँ माइके ँ जे पारिवारिक आ’ सामाजिक प्रतारण एवं उपेक्षा होइत छलैक, लोकगीतमे तकर चित्रण अत्यन्त कारुणिक अछि। नारीक प्रति ई उपेक्षा भाव वर्तमान समय धरि व्याप्त अछि। एहि मानसिकतासँ स्त्री-पुरुषक जनसंख्यामे भेल असंतुलनके ँ समाज वैज्ञानिक सामाजिक संकटक रूपमे देखय लगलाह अछि। परिवारमे पुत्रीक जन्मसँ होइत अवसादक लोकगीतमे भेल अभिव्यक्ति मानवीय संवेदनाक तारके ँ झनझना दैत अछि। पहिले जे जनितउँ धिया रे जनम लेत, खएतउँ मरिच पचास हे। मरिचक झाँस धिया दुरि जाइत, छुटितइ धियाक संताप हे। पितृसत्तात्मक समाजमे पुरुष मानसिकताक दोसर उदाहरण थिक पत्नी के ँ सेविका मानबाक मानसिकता। एहि मानसिकतामे विवेकक अभाव तँ अछिए अर्थलोलुपता सेहो अछि। निम्नलिखित लोकगीतमे ‘रुनझुन-रुनझुन’ शब्द नव विवाहिताक पति-मिलनक उत्कंठा, पूर्ण रागात्मक संवेदनाक संग अभिव्यक्ति भेल अछि। प्रतीत होइछ नव कनियाँक पएरक नुपूर नहि बजैत हो, ओकर हृदय एवं शरीरक अंग-अंग पुलकित एवं झंकृत भए निनाद कए रहल हो। किन्तु स्वामीक आदेशपर ओ भरि राति बिअनि हौंकैत रहि जाइत अछि – ‘आध राति हौंकल, पहर राति हौंकल’- रुनझुन-रुनझुन, इहो नबि कोहबर हे। आहे माइ, ताहि कोहवर सुतलनि कओन दुलहा, बेनिया डोलए मांगे हे।। आध राति हौंकल, पहर राति हौंकल हे। होत भिनसर बेनिया टूटि गेल, बंनिया ला रूसि गेला हे।। ककरा भेजब बाबा घर, ककरा भेजब भइया घर हे। परभुजी अरजल बेनिया टूटि गेल, बेनिया ला रूसि गेल हे।। हजमा भेजऽ बाबा घर, ब्राह्मन भेजऽ भइया घर हे। आगे माइ, हरिजी अरजल बेनिया टूटि गेल, बेनिया ला रूसल छथि हे।। हाथी चढ़ल बाबा आबे, घोड़ा चढ़ल भइया आबे हे। बीचहिं बेनिया झलकैत आबे, आब हम नैहर जएबै।। उपर्युक्त उदाहरणमे प्रभु जीक अर्थात् पतिक अरजल बिअनि प्रभु जीके ँ अनवरत हौंकैत रहलासँ पत्नीक हाथमे टूटि जाइत अछि। एहिमे ओकर कोन दोष छलैक? किन्तु त्रासद पक्ष अछि जे पतिक आचरणसँ पत्नीमे असामान्य ग्लानिक बोध होइत छैक। कोनो आन उपाय नहि देखि, नैहर समाद पठाए तकर प्रतिपूर्ति करबाक निर्णय करैत अछि। एक प्रकारे ँ ओ जुर्माना भरैत अछि। तकर बादे नैहर जएबाक अनुमति भेटैत छैक। अर्थात् पतिक अरजल बिअनि टूटि गेलासँ जुर्माना भरबा धरि ओ सासुरमे बन्धक बनल छलि। ‘हाथी चढ़ल बाबा आबे, घोड़ा चढ़ल भइया आबे हे’, बीचहिं बेनिया झलकैत आबे’ आ’ आब हम नैहर जएबै’ नारी जातिक एही त्रासदीक अभिव्यक्ति थिक। ई सामाजिक विकृति एवं अर्थलोलुपता कमल नहि अछि। दहेज लोभी लोकक आखेट नव विवाहिता निरन्तर भए रहल छथि। लोकगीतमे पुरुष मानसिकता आ’ नारी उत्पीड़नक पर्याप्त चित्रण अछि। ई चित्रण सभ वस्तुतः सामाजिक मनोवृत्तिक एक करुण इतिहास थिक। कृषि संस्कृतिक देन लगनी, विशेष भास एवं अवसरक गीत थिक। एहि कोटिक गीतमे सेहो बधू उत्पीड़नक चित्रण अछि - घर पछुअरबा लौंग केर गछिया, लौंग फूलेल आधि रतिया रे दइबा। लौंगवाके चुनी चुनी संजिया ओछइली, सुती रहलइ सासुजीके बेटबा हो दइया। घुरि सुतु फिरि सुतु सासुजीके बेटबा ननदी जीके भैया। तोहर घामसँ भीजल सभ चोलिया हे दइया। उपर्युक्त गीतक पाँतीमे प्रयुक्त ‘सासुजी के बेटबा’ एवं ‘ननदी जीके भैया’ पर विचार कएल जाए। ओ पति, स्वामी आदि कहि सम्बोधित नहि करैत अछि। स्पष्ट अछि जे पति अपन पत्नीक निकट नहि छथि। ओ माइ-बहिनिक कहलमे छथि। सासु एवं ननदि सुनियोजित रूपसँ अत्यधिक परिश्रम करबैत छैक जाहिसँ पुतहुक स्वेदसिक्त अंगबस्त्र पतिक विकर्षणक कारण बनल रहए। ‘घुरि सुतु फिरि सुतु सासुजीके बेटबा ननदी जीके भैया’- एही स्थिति दिस संकेत करैत अछि। प्रस्तुत गीतमे मिलनोत्कंठित नायिकाक मनोदशाक सूक्ष्म एवं सुन्दर वर्णन अछि। ओ अपन तुलना लवंगक फूलसँ करैत अछि। जे पूर्णतः प्रस्फुटित होएबासँ पहिने अधरतियेमे तोड़ि लेल गेल हो। ई नायिकाक अर्ध विकसित रहबाक द्योतक थिक। किन्तु प्रस्फुटनक उष्मासँ अवश्य ओ मातलि अछि। जे ‘लौंगवाके चुनी चुनी संजिया ओछइली’ सँ स्पष्ट अछि। एहि गीतमे अप्रस्तुत एवं प्रस्तुत विधानक अद्भुत नियोजन भेल छैक। एक बेर नायिका लेल, जे प्रस्तुत अछि, प्रस्तुत लवंगक फूल आ’ दोसर बेर अप्रस्तुत मनक उल्लास लेल प्रस्तुत लवंगक फूलक प्रयोग भेल अछि। बेली चमेली वा केओलाक प्रयोग मैथिली लोकगीतमे ठाम-ठाम भेटैत अछि। किन्तु औषधीय गुणसँ युक्त एवं मिथिलासँ भिन्न प्राकृतिक एवं भौगोलिक क्षेत्रमे सुलभ लवंगक फूलक संग नायिकाक मनोदशाक वर्णन दुर्लभ अछि। एही लगनीक अगिला पांतीमे अछि - घर पछुअरबामे बसे एक मलहा, मलहा रे जमुनामे फेंकू महजाल रे दइबा। तोहरेा के देबौ मलहा दही-चूड़ा भेाजन रे, जमुनामे फेकू महजाल रे दइबा। एक जाल फेंकले मलहा, दुइ जाल फेंकले, तेसर जाल घोंघटा संए मारलए रे दइबा। एक जाल फेंकले मलहा दुइ जाल फेंकले, तेसर जाल धनीके लहरबा रे दइबा। कृषि संस्कृतिक नायिकाक कृषि संस्कृतिक नायकक (घर पछुअरबामे बसे एक मलहा) प्रति आर्कषण सहज अछि। किन्तु नायिका द्वारा जमुनामे जाल फेंकबा लेल कहब कम महत्त्वपूर्ण नहि अछि। गंगा शान्त छथि तँ जमुना तीव्र प्रवाहिनी। एहि हेतु जमुनामे पार होएब लेल अपेक्षाकृत बेसी साहस, धैर्य आ’ परिश्रम चाही। स्पष्ट अछि जे नायिका तेसर बेर जाल फेंकला पर आकर्षित होइत अछि। अपन तुलना ओ जमुनासँ करैत अछि। एहि आकर्षणक नाटकीय अभिव्यक्ति प्रस्तुत लोकगीतमे भेल अछि। लोक गीतक विशेषता गीतक विशेषताके ँ मोटामोटी निम्नलिखित रूपमे विभाजित कएल जाए सकैत अछि - 1. सामूहिकता - लोकगीत सामूहिक रूपसँ गाओल जाइत अछि। ओ लगनी, बटगमनी हो वा मांगलिक अवसर पर गाओल जाइत गीत। एकल गायन कुशल गायक/गायिका टा श्रोताक ध्यान आकर्षित करैत अछि। ई लोकात्मक होएबाक सेहो प्रमाण थिक। 2. सहभोगिता आ’ व्यापकता - संग-संग भोगब भेल सहभोगिता। लोक गीतमे समाज वा सांस्कृतिक समूहक राग-विराग, विजय-पराजयक आदिक रागात्मक अभिव्यक्ति रहैत अछि। 3. परिस्थिति एवं मनःस्थितक अनुरूप अनुकूलन - लोक गीत एक दिनमे नहि सहस्रो वर्ष धरि अनुभवक उपरान्त वर्तमान स्वरूपमे आएल अछि। जे युगक घात सहि नहि सकल छिटकैत गेल। लोकक नव-नव अनुभव जोड़ाइत गेलैक। लोक गीतक ई लोचकता ओकरा टटका आ’ सुस्वादु बनौने रहैत अछि। 4. नृत्यक संग प्रगाढ़ एवं सुदृढ़ सम्बन्ध - लोकगीतक नृत्यक संग प्रगाढ़ सम्बन्ध सामूहिक गायनक समय अकस्मात दर्शन भए जाइत अछि। वर्तमान परिवेश बदलैत अछि। लोकक आवश्यकता आ’ रुचि बदलैत अछि। सम्बन्ध आ’ सरोकार बदलैत अछि। एहिसँ सामाजिक जीवनमे परिवर्तन अबैत अछि। एहि परिवर्तनक प्रभाव लोकक जीवन-यापन पर पड़ैत छैक। उद्योगीकरण आ’ शहरीकरणसँ श्रमक पलायन आरम्भ भेल। गाम-घर, खेत पथार पोखरि -झांखरि, वन-पर्वतक स्थान पर लोकके ँ गोठुल्लामे रहबाक बाध्यता भए गेलैक। ओ भिन्न भाषा-भाषी एवं संस्कृतिक लोकक बीच जीबैत रहबा लेल विवश होइत रहल। पहिने देशहिक एक कोणसँ दोसर कोन लोक जाइत छल। आब विश्वक एक कोणसँ दोसर कोण धरि उड़ि जाइत अछि। जाहिठाम सभ किछु अनचिन्हार रहैत छैक। अपरिचित रहैत छैक। बाजारबाद अपन अकादारुण मुह बाबि सभ किछु गीरि अपन रंग पसारबा लेल दु्रत वेगसँ चतुर्दिक पसरि रहल अछि। जॉँत पीसब वा ढ़ेकी कूटब अनावश्यक भए गेलैक अछि। तखन लगनीक कोन प्रयोजन रहि जाएत। पहिनहिसँ वर कनियाँ ‘हाय! हेलो!’ करैत रहैत छथि, तखन मुहबज्जी वा कोवरक गीतक की होएतैक? बाजारमे रंग-विरंगक क्रीम आ’ लोशन उपलब्ध छैक, नानी मेथी कथी लेल पीसतीह। गोदना आब गोदौल नहि जाइत अछि। खोदपारनि आओत कतए सँ जे अवसरोचित गीत द्वारा हास-परिहास होएत। टेटूक फाहामे लहरिया कतयसँ आओत, जकर तुलना पति वियोगक लहरिसँ कएल जा सकैछ। (हमरो लहरिया गे सुन्दरी सहलो ने जाइ छउ रे जान! जान सूइया के लहरिया कोना सहबे रे जान! सूइया के लहरिया हे पिअबे घड़ी रे दंइ घड़िए रे जान! जान तोहरो लहरिया हो पिअबे सगर रतिया रे जान! )। नवजातक वा नेनाक स्स्वास्थ्य रक्षा लेल विभिन्न प्रकारक औधषि एवं सूर्इ्र आदिक निर्माण भेल अछि। तखन पाच आ’ ओहि अवसर पर गबै जाए बाला पाच गीतक कोन प्रयोजन रहि जएतैक। पसरैत यान्त्रिकता, सांस्कृतिक परिवेशसँ दूर जीवन-यापन, प्रदर्शन-प्रभाव एवं बाजारबाद तथा संचार माध्यमक माध्यमे अहर्निश प्रहारसँ लोक संस्कृति प्रभावित एवं विकृत भए रहल अछि। ओकर कतेको वैशिष्ठ्य लुप्त हेाएबाक कनगी पर छैक। संरक्षणक उपाय पारम्परिक ज्ञानक स्रोत एवं मानव जातिक विकासक भावात्मक अभिलेखक संरक्षण दिस विश्व समुदाय (यूनेस्को)क ध्यान हालहिमे गेल अछि। पहिने विश्व समुदाय इंटा-पाथरहिके ँसांस्कृतिक सम्पदा मानि विश्वस्तर पर ओकर संरक्षणक हेतु नीति-निर्धारण करैत छल। ओहि लेल सुविधा दैत छलैक। किन्तु भूमण्डलीकरणक चपेटमे विश्वक सम्पन्न सांस्कृतिक वैविध्य पर बढ़ल संकट एवं कतेको राष्ट्र तथा एवं नृवर्गक; (ethnic group) सांस्कृतिक परिचितिके ँ संकटापन्न स्थितिमे अनुभव कए यूनेस्कोक ध्यान अस्पृश्य, अभौतिक एवं निराकार; (Intangible) सांस्कृतिक सम्पदाक संरक्षणक महत्त्व दिस गेलैक अछि। आ’ ई विश्वास बलवती भए गेलैक अछि जे अभौतिक एवं निराकार सांस्कृतिक सम्पदा कोनहुँ प्रकारसँ साकार भौतिक; (tangible) सांस्कृतिक सम्पदासँ दऽब नहि अछि। इहो ओहिना संरक्षणीय अछि जेना साकार भौतिक सम्पदा। एहि निमित्त आहूत बैसारमे अभौतिक एवं निराकार सांस्कृतिक सम्पदाके ँ परिभाषित करैत विश्वक सभ देशसँ संरक्षण हेतु आवश्यक उपाय करबाक हेतु कहल गेल अछि।3 यूनेस्कोक वैविध्य सांस्कृतिक सम्पदाक सार्वभौम घोषणक ; (UNESCO Universal Declaration on Cultural Diversity) अनुसार सांस्कृतिक विविधता मानवजातिक सामूहिक सम्पदा थिक एवं वर्तमान तथा भविष्यक संततिक लाभक हेतु एकरा स्वीकृत आ’ सम्पुष्ट कएल जएबाक चाही। सांस्कृतिक सम्पदाक संरक्षण हेतु यूनेस्कोक द्वारा दू टा बाटक अनुशंसा कएल गेल अछि- क. चिन्हित करब एवं ख. संरक्षण। क. चिन्हित करब ;(Identification) निम्नलिखित मार्ग निर्देशनक आधार लोकगीत के ँ चिन्हित कएल जा सकैत अछि: - पद्ध लोक गीतक सार्वत्रिक (ग्लोबल) उपयोग हेतु सामान्य मार्ग निर्देश लोक गीतक एक व्यपाक रजिस्टर तैआर करब, तथा लोकगीतक क्षेत्रीय वर्गीकरण ख. लोकगीतक संरक्षण ;(Conservation of folklore) एक राष्ट्रीय अभिलेखागारक स्थापना करब जतय लोकगीत नीक जकाँ संकलित रहए तथा जिज्ञासुके ँ उपलब्ध भए सकए। एक केन्द्रीय अभिलेखागारक स्थापना करब जे सेवा कार्यक हेतु काज करए। * एक संग्रहालय स्थापित कएल जाए अथवा स्थापित संग्रहालयमे पारम्परिक एवं लोकप्रिय संस्कृति एवं कलाकृति प्रदर्शित रहए। * पारम्परिक एवं लोकप्रिय संस्कृतिके ँ प्रस्तुतिमे प्राथमिकता देल जाए तथा यथासम्भव ओही परिवेश/पृष्ठभूमिक जीवन-यापन, कौशल तकनीकी आदिक सृजन रहए। * लोकगीतक संकलन एवं अभिलेखनके ँ सुमेलित कएल जाए। * संकलनकर्ता, अभिलेखकर्ता, एवं अन्य विशेषज्ञके ँ लोकगीतक भौतिकसँ विश्लेषणात्मक संरक्षण लेल प्रशिक्षित करब, तथा * संकलित सांस्कृतिक सम्पदाक सुरक्षाक हेतु लोकगीतक प्रतिलिपि सांस्कृतिक समुदाय एवं क्षेत्रीय संस्थाके ँ उपलब्ध कराएब जाहिसँ ओ सब सक्रिय बनल रहथि। नृविज्ञानक मत अछि जे मानवताक विकासक क्रममे सर्वप्रथम समष्टि चेतना; (Tribal consciousness) तदुपरान्त, हम-चेतना ;(we - consciousness) आ’ ‘अहं चेतना ; (I - consciousness) विकसित भेल। मानवक विकासक वास्तविक यात्रा एतहिसँ प्रारम्भ होइत छैक। ओना हम के छी ? से बूझबा लेल कहि सकैत छी जे एक प्राणी छी, मनुष्य छी, नेपाली छी, भारतीय छी, उच्चवर्गमे जनमल छी, निम्नवर्गमे जनमल छी, आरक्षित वर्गमे छी, अनारक्षित वर्गमे छी आदि। मुदा, व्यष्टि चेतनाक सोड़ समष्टि चेतनामे ततेक गहींर धरि छैक जे चाहिओ के ँ समष्टि चेतनासँ विलग नहि भए सकैत अछि आ’ अपन परिचितिक अभिव्यक्ति वा प्रदर्शन समष्टि चेतनामे एकाकार भए करैत अछि। विभिन्न सांस्कृतिक अनुष्ठान, विद्यापति स्मृतिपर्व अथवा मिथिला महोत्सव आदि आयोजित कएल जाएब व्यष्टि-चेतनाक समष्टि चेतनामे एकाकार होएबे थिक। एहिसँ स्पष्ट अछि जे विकासक उत्कर्षक परिचयक हेतु भूतमे जाएब आवश्यक भए जाइछ। बिना भूतके ँ देखने, बूझने आ’ गमने वर्तमानमे ने प्रासंगिक रहि सकैत छी आ’ ने नीक भविष्यक कल्पना कए सकैत छी। लोक गीतमे इएह समिष्ट चेतना, हमर राग-विराग, उल्लास, अवसाद पराजय आदि, गीतक माध्यमसँ अभिव्यंजित अछि। आ’ जखन वा जतए कतहु पारम्परिक भासक गीत, जाहिमे हमर अतीकक समस्त अनुभूति अपन सन्दर्भ आ’ परिवेशक संग साकार भेल रहैत अछि, कानमे पड़ैत अछि, हमर सुषुप्त आत्मीय रागात्मक तन्तु अकस्मात झनझना उठैत अछि। एही हेतु लोकगीतके ँ संस्कृतिक सर्वाधिक बलिष्ठ आ’ सुरक्षित तत्त्व मानल गेल अछि। संस्कृतिक उपयोगिताक प्रसंग एक अमेरिकन समाजशास्त्रीक मत4 सर्वथा समीचीन अछि जे द्रुत सामाजिक विकास एवं नवोन्मेष लेल सांस्कृतिक तत्त्वक वैविध्य महत्त्वपूर्ण अछि। अर्थात् जतेक सांस्कृतिक वैविध्य एवं चेतना प्रखर, ततेक विकासक गति द्रुततर होएत। मैथिल, सीमाक एहि पारक होथि वा ओहि पारक, अपेक्षित विकासक अवसर लेल अवश्य लालायित रहलाह छथि। एहना स्थितिमे द्रुत सामाजिक आ’ आर्थिक विकासक लेल एक मात्र समाधान सांस्कृतिक चेतनाक जागृति एवं सबलता थिक। एहि अभियानमे मैथिली लोकगीतक संरक्षण प्रयोजनीये नहि, अनिवार्य सेहो अछि। सन्दर्भ - 1. पराशर, कांचीनाथ ‘किरण’ 2. गीत दीनाभद्रीक ओ नेबारक,2010, सम्पादक डा.रमानन्द झा ‘रमण’, पृ.सं. 68 3."Convention for the safeguarding of the intangible cultural heritage" Article 2 : The 'intangible cultural heriage" means the practices, representation, expressions, knowledge, skill as well as the instruments, objects, artifacts and cultural space associated therewith - that communities, groups and in some cases, individual recognize as part of cultural heritage. At his intangible cultural heritage, transmitted from generation to generation, is constantly recreated by communities and groups in response to their environment, their interaction with nature and their history, and provides them with a sense of identity and continuity, thus promoting respect for cultural diversity and human creativity. For the purpose of this Convention, consideration will be given solely to such intangible cultural heritage as in compitible with existing international human rights instruments, as well as with the requirement of mutual respect among communities, groups and individuals and sustainable develpoment. The " intangible cultural heritage" as defined in paragraph 1 above, is manifested inter alia in the followed domains : a) Oral traditions and expressions, including language as a vehicle of the intangible cultural heritage; b) Performing arts. 4-ओगबर्न - The large number of cultural elements, the greater number of inventions and faster the rate of social change. नेपालमे मैथिली कथाक विकास ओ प्रवृत्ति साहित्यके ँदेशक आधर पर विभाजित कए विश्लेषित करबाक अनेक कारण अछि। पहिल अछि राजनीतिक -सामाजिक-सांस्कृतिक पार्थक्य। ई पार्थक्य लोकक विचारधरा एवं जीवन-मूल्यके ँप्रभावित करैत अछि। देशक राजनीतिक स्थितिसँ निवासीक रहन-सहन एवं विचारधरा प्रभावित होइत अछि। लेखन-प्रकाशन प्रभावित होइत अछि। एहि लेल राजनीतिक शासन-व्यवस्थाक आधर पर भाषा विशेषक साहित्यिक प्रवृत्तिक विवेचनक प्रयोजन होइत छैक। दोसर कारण अछि राजनीतिक स्वायत्तताक प्रदर्शनक हेतु क्षेत्राीय आधार पर साहित्यक विकास आ’ ओहिमे अभिव्यक्त प्रवृत्तिक अनुसन्धन लेल उपयोगी होएब। मैथिली भाषा, मैथिल संस्कृति आ’ मैथिलीक साहित्यकार दू स्वतन्त्रा सार्वभौम राष्ट्रक भौगोलिक सीमामे निवास करितहु भावात्मक रूपसँ ततेक सन्निकट छथि जे राजनीतिक पाया आत्मीय तरलताक प्रवाहके ँ छेकि रखबामे सर्वथा अससर्थ होइत रहल अछि। तथापि, जेना बिना आरि ध्ूरक प्रवाहित जल राशिके ँ चिन्हेबा लेल देश अथवा भू-खण्डक नाम जोड़ि देल जाइत अछि, ओहिना दू देशक भौगालिक सीमामे रचल जाइत साहित्यक भौगोलिक नामकरण स्वीकार कएल जाएब अप्रीतिकर नहि कहल जाएत। प्रायः एहनहि मानसिकताक कारणेे ँ ‘नेपालीय मैथिली साहित्य’ नामकरण भेल होएत। ई ओहिना स्वीकार कएल जाए सकैत अछि जेना अमेरिकरन अङरेेजी, भारतीय अङरेेजी आदि। पंरच, ई धरि निर्विवाद जे एहि नामकरणमे साहित्यिकसँ बेसी पृथक व्यत्तिफत्व-स्थापनाक मानसिकता प्रतिध्वनि अछि। ‘नेपालीय मैथिली’ एक नवजात नामकरण थिक। पहिने नेपालमे रचित मैथिली नाटक, मैथिली कथा आदि लिखाइत छल। आब किछु गोटे ‘नेपालीय मैथिली नाटक, नेपालीय मैथिली कविता, नेपालीय मैथिली कथा आदि लिखैत छथि। ध्ूमकेतु1 सांस्कृतिक शुद्धता, अशुद्धताक आधर पर मैथिली भाषी क्षेत्रा तथा भाषा-साहित्यके ँ दू खण्डमे बांटल अछि ;नेपालक मैथिली स्वतन्त्रा रूपसँ विकसित भए रहल अछिµभेटकर्ता डा. रेवती रमण लाल। ओ थिक मोगलानक मिथिला ;भारतीय क्षेत्रा आ’ शुद्ध मिथिला ;नेपालक क्षेत्र। ‘मोगलानक’ शब्द सांस्कृतिक-धर्मिक अशुद्धताक बोध् करबैत अछि। ई ऐतिहासिक घटनाक ओहि अवस्थाके ँ स्पष्ट करैत अछि जखन विजातीय धर्मक प्रति अस्पृश्यताक भाव घनीभूत रहैत छल। एहि हेतु ध्ूमकेतुक ई विभाजन सांस्कृतिक, धर्मिक आधर पर सत्य होइतहु, अतीत गानक द्वारा उद्बोधित करबाक अभिप्रायसँ विशेष प्रयोजन-सिद्ध नहि करैत अछि। इतिहासक जाहि कालखण्डमे मोगलान मिथिला सन विभाजन भेल होएत, तकर आब आधार नेपालहुमे नहि रहलैक। तथापि एहन विभाजन वा नामकरण मात्रा धर्मिक मान्यताक आधर पर श्रेष्ठता स्थापन कए अपन परिचित लेल भए सकैत अछि। प्रायः एही परिचय स्थापना लेल रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’ प्रश्न ठाढ़ कएलनि2 ‘की नेपालक मैथिली साहित्यमे पायापारक कथा लिखाइत अछि?’ ओ एहन बात ओहि प्रकारक व्यक्ति द्वारा बाजल जाएब मानल अछि जकरा नेपालक मैथिली साहित्यक सम्बन्ध्मे किछुओ ज्ञान नहि छैक एवं एखनो धरि ओहन लोक परान्मुखी चरित्राक अछि। ओ ने किछु पढ़ने अछि आ’ ने किछु ने देखने अछि। ‘पायापार’ शब्दक प्रयोग अनचोखमे नहि भेल अछि। आ’ ने संकेतक प्रति कोनो भ्रम उत्पन्न करैत अछि। एहि सम्बन्ध्मे अत्यल्पहु शंकाक समाधान गामघर3 मे प्रकाशित निम्न समाचारसँ निर्मूल भए जाइत अछि। समाचार अछि -‘बैसारमे एक दू प्राध्यापक लोकनि नेपालीय मैथिली साहित्यक अपन मूल ज्ञानक परिचय दैत भारतीयक तीन-चारि दशक पूर्वक लेखक सभक पुरने रचना सभके ँ पेफर-पेफर पाठ्यक्रममे रखबाक षड्यन्त्रामे संलग्न रहलाह अछि। मानसिक स्तरसँ सेहो सीमापारक लेखकवृन्दसँ अपन स्वार्थवश लगाबक काज कए रहल छैक।’ एहिना प्रो. राजेन्द्र विमल4 अपन लेख ‘नेपालक आध्ुनिक मैथिली कथा साहित्य’ मे ‘गुरांस’ आ’ क्रोटनक चर्चा कएने छथि। ओ मानैन छथि जे जावत धरि क्रोटनक डारि तोड़ि के ँ मैथिली साहित्य आनठामसँ आनि एहि माटिमे रोपल रहत ता’ धरि नेपालमे मैथिलीक पूर्ण विकास असम्भव। मैथिलीक विकास लेल मैथिलीके ँ गुराँसक गाछ जकाँ एहिठाम माटि-पानिमे जनमि, बढ़ि, खाँटी नेपालीय सौरभक प्रसार करए पड़तैक। एहिसँ पूर्व प्रकाशित अपन एक लेख ;नेपालमे मैथिली- प्रो. विमल5 ई स्थापित कएने छथि जे 2007 सालक बाद नेपालमे दू टा ‘स्कूल’ द्वारा मैथिली साहित्यक विकास भेल। पहिल थिक शिल्प एवं भावबोध्क दृष्टिसँ ‘आध्ुनिक स्कूल’, जकरा ‘डा. ध्ीरेन्द्रक स्कूल’ कहल जाइत अछि। एहि दूनू ‘स्कूलक’ प्रधनक कार्य-क्षेत्रा, भाव-क्षेत्रा, अनुराग-क्षेत्रा आ’ जँ एक शब्दमे कही, सक्रियताक समस्त क्षेत्रा नेपालहि रहल अछि। साहित्यिक गुराँसक अंकुरण हेतु अनुकूल भावभूमिक सृजनकर्ता तथा हुनक कृतिके ँ क्रोटनक संज्ञासँ अभिहित करब, हमरा जनैत नेपालक राजतन्त्राीय युगक मानसिकता थिक। ‘पाया पारक कथा’ अथवा ‘गुराँस’क आशय नेपालमे लिखल जाइत मैथिली कथा पर विदेशी साहित्य ;भारतीयक प्रभावसँ अछि। अथवा ओहि ढंगक कथासँ अछि, जाहिमे नेपाली जन-जीवनक अनुगंज नहि अछि। एकरहु सम्भावना अछि जे नेपालमे मैथिली साहित्यक द्रुत गतिसँ भए रहल विकाससँ आतंकित किछु लोकक ई चक्रचालि रहल हेा। मुदा, एकटा महत्त्वपूर्ण प्रश्न ई अछि, की कोनो भाषा-साहित्यक विकासके ँ ‘पाया’ मे बान्हि राखल जा सकैत अछि? की कालिदास, विद्यापति, शेक्सपीयर, गोर्की, चेखब, भानुभक्तक साहित्यके ँ हुनक देशक शासक अपन सीमासँ बाहर जएबासँ रोकि सकलाह अछि? जाहि जमानामे आवागमनक पूर्ण असुविधा छलैक, मार्ग दुर्गम छलैक, ओ महान साहित्य सभ लोक धरि पहुँचि गेलैक। आब तँ सहजहिं उन्मुक्त आकाशक नीचा सभ केओ आबि गेल अछि। वास्तविकता तँ ई अछि जे एक देशक राजनीतिक सीमामे जनमल दार्शनिक, समाजशास्त्राी आ’ मानवशास्त्राी द्वारा कएल गेल सत्यक प्रत्यक्षीकरण विश्वचेतनाके ँ प्रभावित करैत आएल अछि। एक कृत्रिम उपग्रहक क्षमताक समक्ष जेना देश-देशक भौगोलिक सीमा पोता जाइत अछि, ओहिना विश्वक एक कोणक मानवतावादी दृष्टि, मानव स्वान्तत्रय आ’ मानवाध्किारक चेतनाके ँ सहस्रो चीनक देबाल छेकि रखबामे असमर्थ भए जाइत अछि। आजुक लोकक पहिल चिन्ता उपभोक्ता आ’ उपयोगिता पर रहैत छैक। एहि संस्कृतिक विशेषता थिक प्रदर्शन-प्रभाव ;क्मउवदेजतंजपवद मििमबज। विकास आ’ विस्तारक सम्प्रति ई प्रमुख घटक थिक। ई प्रदर्शन प्रभाव लोकक जीवन प्रणालीके ँ प्रभावित करैत देशक अर्थतन्त्राके ँ प्रभावित कए दैत अछि। ई तँ एक स्थूल उदाहरण भेल। साहित्यकारक चेतनाक एंटीना उत्यन्त संवेदनशील आ’ वधर््िष्णु होइत अछि। सुदूर प्रान्तहुक पीड़ित मानवक आर्तनाद अकानि उद्वेलित भए उठैत अछि। रंग-भेद नीतिक आधर पर अंटकल शासकक बज्र कपाटमे छटपटाइत लोकके ँ ओ देखि लैत अछि। ओहि व्यक्तिक मुक्तिक आकांक्षा आ’ संघर्षक गतिके ँ तीव्रता प्रदान करबाक हेतु शब्द-सन्धन करैत अछि। अर्थात् ज्ञानक क्षेत्रा, संवेदनाक क्षेत्रा, सहानुभूतिक क्षेत्रा, वैचारिक मंथनक क्षेत्रा, कोनो सीमा नहि मानैत अछि। क्षेत्रा-विशेषक लोकक सुखमय जीवनक कामना, शोषण आ’ अत्याचारसँ मुक्तिक उत्कण्ठा, वर्णभेद जातिभेद आदिक आधर पर विभाजन ओ अत्याचारक विरोध, अभिव्यतिक स्वतन्त्राता पर प्रतिबन्ध्, प्रजातन्त्राीय मूल्यक गला टीपबाक प्रशासनिक षड्यन्त्रा आदिक विरोध्मे उठैत धहके ँ कोनो ‘पाया’ आजुक युगमे बेसी कालधरि अवरुद्ध कए नहि राखि सकैत अछि। मानवता पर होइत अत्याचारक घटनाक प्रभावके ँ यदि एक देशक शासक तहिआ सकैत छल तँ दक्षिण अप्रिफकाक रंगभेदी गोरा सरकारक विरुद्ध विश्व जनमत एकमत नहि होइत। एहि हेतु अभिव्यक्तिक माध्यम भलहि भिन्न-भिन्न रहौक, साहित्यक अभिप्रेतके ँ देशक पायाक भीतर पकड़ि राखब साहित्यके ँ मानव-मुक्तिक सक्षम माध्यम बनबासँ रोकब होएत। एकर तात्पर्य इहो नहि जे भाषा-भाषाक साहित्यमे कोनो अन्तर नहि रहैक। एकार्णव भए जाइक। देश, काल आ’ पात्राक महत्त्व समाप्त भए जाइक। एहि सभक महत्त्व स्थानीय अथवा क्षेत्राीय विशेषताके ँ बूझबा लेल सभ दिन महत्त्वपूर्ण रहत। क्षेत्रा विशेषक लोकक जीवन-दृष्टि ओ हृदयक ध्ुकध्ुकीके ँ अकानवा लेल आवश्यके नहि, अनिवार्य सेहो अछि। रचनाकार अपन व्यक्तित्व तथा रचनागत वैशिष्ठ्यक आधर पर विभिन्न भाषा साहित्यक बीच अपन परिचय स्थापित करैत अछि। रचनाकारक संवदेनशील व्यक्तित्व पर सबसँ बेसी प्रभाव पड़ैत छैक, ओकर परिवेशक। परिवेशक घटक थिक देशक राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक आदि स्थिति। ओहिसँ लोकके ँ भेटैत सुविध-असुविधा एवं जनताक आशा-आकांक्षाक प्रति प्रशासकीय दृष्टि। प्रशासन अपन मनमोहिनी आँखि आ’ हाथमे दानवीय दण्डक आधर पर चाहैत अछि रचनाकारके ँ अपन अनुकूल बनाके ँ राखब। से एहि हेतु जे प्रशासनके ँ सबसँ बेसी खतरा संवेदनशील आ’ निर्भीक रचनाकारे सँ रहैत छैक। एहनहि प्रतिकूल स्थितिमे रचनाकारक रचनात्मक दायित्वक वास्तविक परिचय तत्काल वा कालान्तरमे होइत अछि। की ओ व्यवस्थाक मोहिनी मन्त्रा आ’ दानवीय दण्डसँ भयांकित भए सुरमे सुर मिलबैत प्रशासनक जनसम्पर्क विभागक प्रवक्ता बनि प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सुविधा भोगैत अछि अथवा दीन-दुखी, अभावग्रसत, पीड़ित आ’ स्वाधीनताकामी जनताक हृदयक धुकधकीके ँ अकानैत एक जाग्रत प्रतिपक्षीक रूपमे अपनाके ँ ठाढ़ करैत अछि। नेपालमे लिखाइत मैथिली कथाक शिल्प-विधनक प्रसंग रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’6 लिखल अछि जे नेपालक मैथिली कथाके ँ आन कोनो ठामक कथाकारक मध्य बेछप रूपे ँ चिन्हल जा सकैछ, बूझल जा सकैछ, एकर स्थानीय बिम्ब प्रयोग, दृश्य-योजना आ’ भाषाक प्रयोगक कारणे ँ। अनेको कथामे नेपाली शब्दक सुन्दर प्रयोग नेपालीय मैथिली रचनाक महत्त्वपूर्ण विशेषता कहल जा सकैछ। परिवेशजन्य चित्राण नेपालीयताक स्पष्ट छाप छोड़ैत बूझि पड़त।’ एहि कथनक अनुसार, जेना नेपाली टोपीसँ नेपाली संस्कृतिक बोध् होइछ, ओहिना कथामे नेपाली शब्द आ’ नेपालक स्थल सभक नामसँ नेपालमे लिखाएल मैथिली कथाक परिचय भए जाएत। परंच, एकटा प्रश्न उठैत अछि। नेपालीपनाक वास्तविक परिचय बाह्य आवरण थिक आ कि ओहि भू-भागक निवासीक आभ्यान्तरिक गुणधर्म। जनकपुर अंचल, विराटनगर अंचल अथवा काठमाण्डूक मध्यम प्रकाशमे धन-कुबेरक रंगरभस ओ जीवन दृष्टिमे नेपालीपना ताकल जाए कि जनपद विशेषक आशा-निराशा, हर्ष-विषाद, भूख-पियास, शोषण-प्रताड़न, प्रशासनिक भ्रष्टाचार, सांस्कृतिक अवमूल्यन तथा राजनीतिक दाव-पेंचके ँ चुपचाप सहि लेब नेपालीपना थिक। आ कि ओकर बीचसँ जन्म लैत संघर्षमयी चेतना, ध्ैर्य, साहस आ’ जीवनक विकृत्ति एवं विडम्बनाके ँ सहैत मानवक अभ्युत्थानक प्रति अपन आस्थाके ँ अक्षुण्ण रखबाक चिन्ता नेपालीपना थिक। निश्चित रूपे विवेचनीय विषय थिक। ‘नेपालीय मैथिली’ नामकरण हो, नेपालीपना हो, अथवा गुराँसक चर्चा µ ई सभ थिक स्वतन्त्रा अस्तित्वक स्थापनाक प्रयास। देशक साहित्यकार आ’ जनताक मनमे बढ़ैत आत्म-विश्वासके ँ ई नामकरण प्रकाशित करैत अछि। आत्मविश्वाससँ आत्मनिर्भरता दिस नेपाली जन-जीवनक बढ़ि रहल डेगक प्रतिध्वनि एहिमे गुंजित अछि। परंच, एहो ध्यान रखबाक थिक जे राजनीतिक दाव-पेंच तात्कालिक लाभक सदिखन अपेक्षा रखैत अछि। दू देशक बीच चल अबैत सांस्कृतिक समन्वय एवं भावात्मक एकताक लुहलुहान गाछके ँ छकरबा दैत अछि। एहि हेतु एक भाषाक दू देशक सीमामे रहैत साहित्यकारक दायित्व कतेको गुणा बढ़ि जाइत अछि। ठीके आब डा. विमल मिथिलाक संस्कृतिमे सह-अस्तित्वक चेतनाक महत्त्व प्रतिपादन कएल अछि।7 ई ऐतिहासिक सत्य थिक जे नेपाल सन् 1950 ई. ;2007 साल मे अपन निकटतम दक्षिणी पड़ोसी देशक सहयोगे राणाशाहीक क्रूरपाशासँ मुक्ति पओलक तथा राजतन्त्राीय व्यवस्थाक अन्तर्गतहि प्रजातन्त्राीय मूल्य आ’ सिद्धान्तक अनुसार शासन-व्यवस्था स्थापित भेलैक। राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक आदि क्षेत्रामे नव विहानक सूर्य करिआ मेघके ँ फाड़ि आबए लागल। विश्व संस्थामे नेपाल एक स्वतन्त्रा राष्ट्रक रूपमे मान्यता पओलक। कतेको देशक संगे दौत्य सम्बन्ध् स्थापित भेलैक। राष्ट्र समूहक बीच प्रतिष्ठा बढ़लैक। दूनू देशक बीच भेल ‘2007 सालक मैत्राी संध्’ि क अनुसार नेपालक प्रजाके ँ भारतमे भारतहिक नागरिक जकाँ जीविका प्राप्त करबाक सुविधा भेटलैक। किन्तु प्रजातन्त्राीय मूल्य आ’ परम्पराक जड़ि ध्रतीमे नीक जकाँ जमबासँ पूर्वहि 2017 सालमे एक शाहीघोषणा द्वारा जड़ि पकड़ैत लोकतन्त्राक गाछके ँ एकहि छटकामे उखाड़ि देल गेलैक। पंचायत भंग भेल। प्रधनमन्त्राी बन्दी भेलाह। नेपाली प्रजा अभिव्यक्तिक स्वतन्त्राता आ’ अध्किारक मुहधरि पहुँचैत-पहुँचैत, ओहिसँ वंचित भए गेल। थोपल गेल दलविहीन पंचायती व्यवस्था जाहिमे प्रजाक अध्किार अत्यन्त सीमित भए गेलैक। सामान्य लोकक स्थिति दिन प्रतिदिन दयनीय होइत रहल। निश्चित प्रकारक लोकोपकारी शासन-व्यवस्था लेल सिहाइत नेपाली प्रजाक बीच संघर्षक चिनगी कहिओ-कहिओ ध्ध्कैत रहल। एहिसँ संविधनमे संशोध्नक प्रयोजन होइत रहलैक। एहि क्रममे 2038 सालमे बालिग मताध्किारक आधर पर दलविहीन पंचायत लेल पहिल आमनिर्वाचन भेल। नेपालक प्रजाके ँ प्रजातन्त्राीय मूल्य एवं मताधिकारक लाभक अत्यल्प रसानुभूतिक अवसर भेटलैक। एहि सँ नेपालक नव युवक वर्ग शासन-व्यवस्थामे व्यापक स्तर पर अध्किारक प्राप्तिक प्रति मानसिक रूपे ँ उद्वेलित भए उठल। व्यापक संघर्षक लेल मोन बनबैत गेल जकर कतेको वर्षक संघर्षक बाद परिणाम हालहिमे समक्ष आएल अछि। राणाशाहीक समाप्ति पर आध्ुनिक शिक्षा प्रचार-प्रसार दिस ध्यान देल गेल छैक। स्कूल-कालेज खूजल। त्रिभुवन विश्वविद्यालयक स्थापना भेल। ‘कोलम्बो योजना’, ‘इंण्डिया एड मीशन, आ ‘इण्डिया को आपरेशन मीशन’क अन्तर्गत भारतसँ विभिन्न विषयक विशेषज्ञ, अभियन्ता एवं प्राध्यापक शिक्षाके ँ आध्ुनिक स्तर धरि अनबाक हेतु नेपाल पठाओल गेलाह। एहिसँ कतेको विषयक उच्च शिक्षा लेल भारत पर निर्भरता क्रमशः कमय लागल। शिक्षाक विकासक संग शिक्षित नवयुवकक संख्या सेहो बढ़ैत गेल। जीविकार्थीक संख्या बढ़ल। श्रमक पलायन शुरू भेल। ई पलायन एक दिशाह नहि छल। नेपालमे राजमार्गक निर्माण भेला पर पर्यटकक संख्या बढ़ल। विश्वक कतेको देशक संग दौत्य सम्बन्ध् भेला पर विभिन्न सभ्यता आ’ संस्कृतिक बहरिया लोकक अबर-जात क्रमशः बढ़ैत गेल। पर्यटन एक लाभकारी उद्योगक रूपमे विकसित भए गेलैक। संगहिं पाश्चात्य जगतक रहन-सहन आहार-विहारक अन्धनुकरण सेहो होअए लागल। औद्योगिक रूपे ँ समृद्ध देश तथा केन्द्रक प्रति नेपालक आकर्षण बढ़ल। एहि आकर्षणक कारणे ँ सामाजिक जीवनमे युग-युगसँ व्याप्त अपनत्व आ’ निश्छलताक स्थान पर असामाजिकता बढ़य लागल। लोकमे अर्थाकांक्षा बढ़ल। आनक नजरिमे अपन ओहदाके ँ उफपर उठल देखेबाक आकांक्षासँ सामाजिकता कमैत गेल। सत्ताक केन्द्रीकरण छले, ओहि केन्द्रक प्रभामंडलक हाथमे सम्पत्ति आ’ सुख-सुविधक सभ साध्न सम्पुटित होइत रहल। नेपालमे विभिन्न प्रजातिक लोक निवास करैत अछि तथा सम्पूर्ण देश दू प्रकारक भौगोलिक क्षेत्रामे विभाजित अछि। विभिन्नतामे एकता स्थापित करबाक प्रयासक बदलामे एहि प्रजातीय आ’ भौगोलिक विविध्ताके ँ विभेदक प्रचारित कए, पारस्परिक विद्वेषक स्थितिके ँ बना के ँ राखब प्रशासन-तन्त्रा अपना लेल लाभप्रद बूझलक। एहि सभसँ सामाजिकताक गति अधेमुख भए गेल। सामाजिक मूल्यक विघटनक प्रक्रिया तीव्र भए गेल। प्रजातन्त्राीय शासन-व्यवस्थाक लाभसँ परिचित नेपालक जनता अपन देशक शासन-व्यवस्थामे अपना के ँ सहभागी अनुभव नहि कएलक। अपनहि घरमे अपनाके ँ असहाय पओलक। अपन अध्किारके ँ अत्यन्त सीमित भेल देखलक। ओहि पर अभिव्यक्तिक स्वतन्त्राता पर प्रतिबन्ध, लेखन-भाषण पर प्रतिबन्ध्, उठब-बैसब पर प्रतिबन्ध्, अर्थात् सभ प्रकारक प्रतिबन्ध्ति क्षेत्रामे राखल पीजरामे बन्द नेपालक जनमानस भोर-साँझ ‘राम नाम’ रटैत रहल। तिलकोराक लाल-लाल फड़ देखि कौखन-कौखन पाँखि फड़फड़बैत रहल। नेपालमे मैथिली साहित्यक सर्जनाक सुदीर्घ परम्पराक अछैतो राणाशाहीक शासन-कालमे राजनीतिक उठा-पटक साहित्यिक सर्जनाक ड्डोतके ँ सोंखि लेने छल। लोकक ध्यान साहित्य आ’ कला पर कम रहलैक। मुदा, ओहि व्यवस्थाक समाप्ति पर साहित्य, संस्कृति आ’ कलाक विकासक दिस लोकक ध्यान गेल। जागरण आएल। जागरणक राजनीतिक कारण छल। राणाशाहीक समाप्ति पर, सम्भावित खतरासँ ‘हनुमानढ़ोका’क सुरक्षा लेल भारतीय सेनाके ँ रखबाक आनुबन्ध्कि व्यवस्था छलैक जे असुरक्षात्मक स्थितिक समाप्ति पर एक स्वतन्त्रा राष्ट्रक आत्मसम्मान लेल अखरए बाला छल। आर्थिक आ’ विकासात्मक योजनामे मदतिक लेल बनल ‘इण्डिया एड मिशन’क ‘इण्डिया को-आपरेशन मिशन’क रूपमे नामान्तर ओही पृष्टभूमिमे भेल छलैक। क्रान्तिक समय नेपालमे भारतीय नेताक प्रभाव छल। एहि संग हिन्दीक प्रभाव सेहो बढ़ल। ई प्रभाव बादमे नेपाली भाषा आ’ साहित्यके ँ आच्छन्न कएने जाइत छल। स्थानीय भाषा आ’ साहित्यक विकास प्रभावित भेल।8 । ई सूलफाक टीस जकाँ पीड़ादायक छल। एही अवध्मिे नेपालक राजनीति पर देशक उत्तरी पाया पारक ;चीनक प्रभाव सुआदल गेल। उत्तरी पाया पारक बढ़ल प्रभाव तथा दक्षिणी पाया पारक ;भारतक प्रभावके ँ कम करबा लेल निर्दलीय पंचायती व्यवस्थामे ‘एक राष्ट्र एक भाषा’क सिद्धान्तक आधर पर नेपालीके ँ राष्ट्रभाषाक रूपमे विकास करबाक निर्णय लेल गेल। हिन्दीक प्रभाव ओ प्रचारके ँ कम करबाक लेल स्थानीय भाषाक विकास पर ध्यान देव नेपाली शासन-तन्त्राक राजीनतिक विवशता भए गेलैक। राष्ट्रीय जनगणनामे मैथिली भाषी दोसर स्थान पर छलाह, ते ँ मैथिलीक विकास आ’ पठन-पाठनक बाट अनायास खूजि गेल। राजकीय सुदृष्टिसँ मैथिली संस्थाक संघटन आ’ पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन लेल मैथिली-भाषी प्रेरित भेलाह। हमरा जनैत ‘नेपालीय मैथिली’क प्रयोग ओही जागरणक परिचायक थिक। मैथिली पत्रा पत्रिकाक प्रकाशन भारतसँ हो अथवा नेपालसँ ग्रहण लगैत रहलैक अछि। तथापि जखन-जखन अपन भाषा-साहित्यक प्रति सचेत वर्ग आएल अछि, अपन जीवन्तताके ँ स्थापित करबा लेल पत्रा-पत्रिकाक प्रकाशन कएल अछि। एहि सक्रियताक पहिल उदाहरण थिक ‘नव-जागरण’ ;1957 ई.। ओकर बाद ‘फूलपात’, ;1970 ‘इजोत’ ;1972, ‘मैथिली’ ;1972, ‘अर्चना’ ;1974, ‘सनेस’ ;1984, ‘वाणी’ ;1984, ‘हिलकोर’ ;1986 आदि प्रकाशित भेल। एहि पत्रिकाक माध्यमे नव-नव हस्ताक्षर समक्ष अबैत गेलाह। एहि पत्रिका सभमे ‘अर्चना’क प्रवेशांकमे प्रकाशनक उद्देश्यके ँ स्पष्ट करैत लिखल अछि- ‘एकर ;अर्चनाक प्रमुख उद्देश्य स्वस्थ साहित्यके ँ जन-समक्ष पहुँचाएब रहतैक।’ जेना ‘मिथिला मिहिर’क माध्यमसँ मैथिली साहित्यकारक कतेको पीढ़ी समक्ष आएल तथा अपन उत्कृष्ट रचनासँ मैथिली साहित्यक श्रीवृद्धि कएल अछि, ओहिना नेपालमे मैथिली साहित्यक सर्जनात्मक सक्रियताके ँ ‘अर्चना’ पुष्ट कएलक अछि। किन्तु ‘गामघरक’ प्रकाशन धरि राजतन्त्राीय व्यवस्था नेपालक जन-जीवनके ँ संत्रास्त कए देलक। ‘अर्चना’क प्रकाशनक उद्देश्य जतय साहित्यिक छल, ‘गामघरक’ धरि अबैत-अबैत ओही सम्पादकक पत्रिका प्रकाशनक उद्देश्य साहित्यिक पायाके ँ पर कए राजनीतिक क्षेत्रामे प्रवेश कए जाइत अछि। ‘गामघर’क प्रकाशनक उद्देश्य भए जाइछµ‘राष्ट्र, राजमुकुट एवं व्यवस्थाक प्रति वफादार रहब।’ राष्ट्र आ’ राजमुकुटक प्रति कोनो पत्रिकाक वफादारी करब तँ बुझबामे आबि सकैत अछि, मुदा व्यवस्थाक प्रति वफादारीक निर्वाहक शपथ लेब रचनाकारके ँ सुविधाभोगी वर्गक पक्षध्रक पाँतीमे ठाढ़ कए दैत अछि। सन् 1947 ई. अथवा 2007 सालक किहु एम्हर-ओम्हर जनमल मैथिलीक कथाकार ने तँ परतन्त्राताक पीड़ा भोगने छथि आ ने स्वाध्ीनता लेल आत्मोसर्ग करैत राष्ट्रभक्तक विहुँसबे देखने छथि। ओ ने तँ राणाशाहीक क्रूर शासन-तन्त्रामे पीसाएल अछि आ’ ने प्रजातन्त्राीय अध्किारक प्राप्तिक लेल भेल उथल-पुथलक ध्ुक-ध्ुकी सुनने अछि। किन्तु, गत शताब्दीक आठम दशक धरि अबैत-अबैत देश-विदेशक स्थिति बुझबाक बोध् अवश्य भए गेल छलैक। अपन पूर्व पीढ़ीक संघर्ष-गाथा आ’ त्यागक अनुपातमे आशा-आकांक्षाक पूर्तिक समीक्षाक विवेक अवश्य अर्जित कए लेनें छल। राजनीतिक एवं प्रशासनिक भ्रष्टाचार तथा समाजक किछु व्यक्तिक हाथमे सत्ता आ’ सम्पत्तिक केन्द्रीकरणसँ बढ़ैत अभाव, भूख, रोग-शोक, आ’ महगीसँ त्रास्त जनसाधरणक स्थितिके ँ बूझय लागल। एहि प्रकारे ँ कोनो व्यवस्थाक विरोध्मे उध्वा उठेबा लेल जाहि-जाहि परिस्थितिक प्रयोजन होइत अछि, ओहिमे सँ अध्किांश नेपालक समाजमे विद्यमान छल। नवयुवक वर्गमे अपन अनुभूतिके ँ स्वर देबाक आतुरता सेहो छलैक। मुदा, अभिव्यक्तिक स्वतन्त्राता पर प्रतिबन्ध् एवं तदनुरूप राजनीतिक चेतनाक अभावसँ, राज्यादेश कतबो जनविरोध्ी हो, उल्लंघनक साहस कमले रहल। कहि सकैत दी, कोपभाजन बनि यातना पएबाक साहस नव युवक वर्ग नहि जुटा सकल छल । एहि प्रकारक प्रतिबन्ध्क स्थितिमे रचनात्मक अनुभूतिक अभिव्यक्ति दू टा बाट ध्ए लैत अछि - लोक विरोध्ी शासनादेशक विरोध्मे प्रतीकात्मक शैली अपनलाए लोकके ँ प्रेरित करब तथा अपन कारयित्राी प्रतिभाके ँ सर्वथा निरापद क्षेत्रा दिस मोड़ि देब। भारतमे आपात कालक समय जखन अभिव्यक्तिक स्वतन्त्राताक अपहरण भए गेल छलैक, कतेको साहित्यकार प्रतीकात्मक शैलीमे व्यवस्थाक विरोध् करैत रहलाह। किछु पत्रा-पत्रिका सम्पादकीयक स्थानके ँ रिक्त छोड़ि दैत छल। दोसरो स्थितिक पर्याप्त उदाहरण मैथिली साहित्यमे अछि। भारतक स्वतन्त्राता संग्रामक समय जखन राष्ट्रपिता महात्मा गाँधीक आह्नानक अनुगुंज गाम-गाममे सुनाइत छल, विभिन्न भाषा साहित्यक गतिविध्सिँ नीक जकाँ परिचित मैथिलीक कतेको रचनाकार सासु-ननदि अथवा वैवाहिक समस्या दिस अपन लेखनीके ँ घूमा के ँ सर्वथा निरापद क्षेत्रामे रहैत छलाह। नेपालक मैथिली कथाकार अथवा हुनक रचना द्वितीय स्थितिमे अबैत अछि। एहि अवध्मिे एही तूरक भारतीय क्षेत्राक मैथिली कथाकारमे गड़ारके ँ ताकि-ताकि खण्डित करबाक प्रवृत्ति भेटैत अछि। मुदा राजनीति आ’ शासन-व्यवस्थाक भिन्न पृष्ठभूमिक कारणे ँ नेपाली क्षेत्राक एही तूरक मैथिली कथाकारमे ओहि प्रवृत्तिक अभाव अछि। नेपालमे मैथिली कथा लेखनक प्रथम उदाहरण मानल जाइछ वासुदेव ठाकुरक ‘सप्तव्याध’। ओहो ‘पण्डित जीवनाथ झा स्कूलक’ रचनाकार छथि। एहि स्कूलक प्रवृत्ति शास्त्राीय विशेष छल, प्रगतिशील कम, ते ँ लसकि गेल। ‘डा. ध्ीरेन्द्रक स्कूल’ उर्जा सम्पन्न छल। अपन परिवेश आ’ युग-जीवनक प्रति संवेदनशील छल। अतः नव-नव रचनाकारक सक्रियता अभिव्यक्त होइत गेल। यद्यपि ध्ूमकेतुक अध्किांश कथा नेपालहिक प्रवासमे लिखाएल अछि। मुदा ओहिसँ नवयुवक वर्ग प्रभावित भए कथा लेखन दिस प्रवृत्त भेल तकर सम्भावना क्षीण अछि। डा. ध्ीरेन्द्रक कथा नेपालक जनजीवनके ँ समेटने अछि, ओतय ध्ूमकेतुक कथा मनुष्यक ओहि सत्यके ँ उद्घाटित कएल, जे एक क्षेत्रा आ’ भाषाक वस्तु नहि थिक। नेपालमे मैथिली कथाक विकासक क्रममे डा. ध्ीरेन्द्रक अवदानक प्रसंग रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’क विचार तथ्यपूर्ण अछि जे साठि इस्बीक बाद नेपालीय मैथिली साहित्यमे आएल जड़ता टूटल आ’ ओ ;डा. ध्ीरेन्द्र नव रचनाकारक एकटा पैघ जमाति ठाढ़ कएलनि, प्रेरणा-उद्बोध्नक संग। मानव जीवनक वृहत्तर फलकके ँ अपन कथाक विषय-वस्तु बनाए पात्राक जीवनसँ सोझे-सोझ जोड़ि ओकर व्यथा-कथाक जीवन्त प्रस्तुति डा. ध्ीरेन्द्रक कथाक विशेषता रहलनि अछि। ई एकटा गाइड लाइन भेलैक एतुक्का ;नेपालक कथाकार लोकनिक हेतु, जे आगाँ बढ़ि अपन रचनामे, माटि-पानिक गन्ध्के ँ लएबाक प्रयास कएलनि’।9 एहि प्रकारे ँ गत शताब्दीक सातम दशकक प्रारम्भेमे नेपालक धरती पर मैथिली कथाक बनल किआरी आठम दशक अबैत-अबैत चतरि गेल। कथाकारक नवतूरक बाट प्रशस्त भए गेलैक तथा अध्किांश पत्रा-पत्रिकाक प्रकाशन एही तूरक प्रयासे भेल अछि। नेपालमे लिखाएल मैथिली कथाक प्राप्तिक दू टा ड्डोत अछि। पहिल ड्डोत थिक भारत आ’ नेपालसँ प्रकाशित मैथिलीक पत्रा-पत्रिका। अध्किांश कथा, एही ड्डोतमे छिड़िआएल अछि। दोसर ड्डोत थिक संग्रह। दू टा संग्रहक प्रकाशन भेल अछि। ‘नेपालक प्रतिनिध् िगल्प-;सं-डा. ध्ीरेन्द्र,1981 तथा ‘नेपालीय मैथिली गल्प’ ;स. सुरेन्द्र लाभ, 1989। पहिल संग्रह मे 17 टा तथा दोसर संग्रह मे 10 टा कथा संगृहीत अछि। एहि दूनू संग्रहमे डा. ध्ीरेन्द्रक अतिरिक्त राजेन्द्र किशोर, विजय, रामभद्र, रेवती रमण लाल, रामभरोस कापड़ि, ‘भ्रमर’, राजेन्द्र प्रसाद विमल, उपाध्याय भूषण, लोकेश्वर व्यथित, भुवनेश्वर पाथेय, महेनद्र मलंगिया, अयोध्यानाथ चौधरी, राम नारायण सुधकर, ब्रज किशोर ठाकुर, डा. अरुणा कुमार झा, जीतेन्द्र जीत, योगेन्द्र नेपाली, मीनाक्षी ठाकुर, कुबेर घिमिरे, आ’ सुरेन्द्र लाभक कथा संगृहीत अछि। एहि कथाकारमे सँ मात्रा रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’ ;तोरा संगे जयबौ रे कुजबा, मैथिली अकादमी, पटना तथा रेवती रमण लाल ;माध्व नहि अएला मधुपुरसँक व्यक्तिगत संग्रह प्रकाशित अछि। शेष कथाकारक कथा पत्रा-पत्रिकामे छिड़िआएल अछि। एहिमे सँ अध्किांश कथाकारक प्रकाशित कथाक संख्या दू दर्जनसँ वेशी होएबाक सम्भावना नहि अंिछ। ओना महत्त्व छैक गुणात्मकताक, परंच कथाक संख्या कथाकारक सर्जनात्मक सक्रियताक निरन्तरताके ँ अवश्य द्योतित करैत विविध्ताक बाट प्रशस्त करैत अछि। साहित्यमे व्यापकता अनैत अछि। भाषाके ँ समृद्ध करैत विकासक चेतनाके ँ प्रखर करैत अछि। कथाक प्रवृत्ति: नेपालमे लिखाएल मैथिली कथामे राजनीतिक चेतनाक अभाव अछि। राजनीतिक दाव-पेंच आ’ ओहिसँ प्रभावित लोकक दयनीय स्थितिक चित्राण, ओहि स्थितिसँ उवरबाक अकुलाहटि अथवा अन्याय, अत्याचार, शोषण, प्रताड़ण आ’ अध्किारक हननक विरोध्क मानसिकताक कथा अपवाद स्वरूपहि भेटत। ‘ध्ध्कैत भविष्य’ ;राजेन्द्र प्रसाद विमल कथामे चुनाव प्रचारक स्थिति, जाति, धर्म आदिक आधर पर लोकके ँ बांटब, युग-युगसँ पीड़ित, अभावग्रस्तक एक जुट भए प्रतिपक्षीक रूपमे ठाढ़ होएब, आदि वर्णित अछि। किन्तु निर्णयक स्थितिसँ पूर्वहि ओहि वर्गक उर्जासम्पन्न आ’ नेतृत्व प्रदान करबामे सक्षम नव युवकक हत्या कराए, ओकर पिताके ँ कीनि, सुविध सम्पन्न वर्गक चुनाव जुलूसक नेतृत्व कराए देल जाइछ। अभावग्रस्त, भूखल आ’ नाघटक लेल पाइक महत्त्व निर्विवाद अछि। परंच, जाहि प्रकारे ँ शोषित-प्रताड़ित वर्गक एक नव युवकक हत्याक बदलामे पिताके ँ पुत्रा मृत्युक हर्जाना लेल मनाओल जाइत अछि, दलित-शोषितके ँ अध्किार प्राप्तिक चेतनासँ वंचित कए, शोषक, प्रताड़क आ’ सुविध सम्पन्न वर्गक भीति-नीतिक परिचायक थिक। एकहि ठाम रहैत पानि पड़बाक गप्प कहबा लेल मालिकक आघन दौगि जाएब, मालिकक दरद थिक, माटिक दरद नहि ;‘माटिक दरद’-रामभरोस कापड़ि भ्रमर’ अछि। ब्रज किशोर ठाकुरक कथा ‘घिना गेल लतामक गाछ’10 मे घराड़ी छल छप्र सँ हथिआ लेल जाइछ। मुदा, प्रतिकारक स्थान पर चारि गोट मनुष्यक एक गोट कापिफला गामसँ बाहर जा रहल छल। कोन ठेकान कतए, पाछाँ-पाछाँ चलैत एकटा छौंड़ा वेर-वेर उँचकि बाड़ीक लतामक गाछ दिस ताकए आ’ फेर मुह घुमा लिअए। रतिचरक खाएल लतामके ँ दू टा नेना द्वारा उठा लेब, एहि पर रखबार द्वारा पीटल जाएब, प्रतिकारमे लतामक गाछ रोपब, पटाएब, लताम बाँटि आह्लादित होएब आदि स्थिति तथा मानसिकताक स्पष्ट चित्रा अछि। मुदा बच्चा बाबू द्वारा फर्जी केवाला पर उपटि जाएब, बिना एको शब्द बजने गामसँ पलायन कए जाएब, संघर्षमयी चेतनाक अभावक परिचायक थिक। नेपालक शासन व्यवस्थामे जेना-जेना परिवर्तन आएल, मैथिली कथाक धरमे सेहो परिवर्तन होइत रहल। पंचायतक समय अभिव्यक्तिक स्वतन्त्राताक अभाव छलैक। परंच, बहुदलीय शासन व्यवस्थामे पूर्व जकाँ प्रशासनक आतंक नहि रहल। एकर अनुगुंज राम भरोस कापड़ि ‘भ्रमर’क कथा, कामरेड11 मे अछि। सुखिया बजैत अछि-‘सेहे, राणा कालमे जिमदार सभ हुकुम चलवै। वेगारी खटबै। पंचायतमे गिरहत सभ मनमानी करैत छल। बड़का ध्निक सभक राज चलै छल। आब तँ हमरा सभक युग अएलै है। आब तँ हमरो सबके बात के ँ मोजर देतै सब। तब एना कए बिना देखने-सुनले पीट देनाइ नीक बात ने भेलै।’ रामचन्द्र झाक कथा ‘चिनगी सुनगि रहल छौ’12 मे कथा नायकक कहब जे आँखि उठा कए नइ तकइ छल से सब मुह लागल बजै है-देशक राजनीतिक परिवेशमे आएल परिवर्तनक द्योतक थिक। नेपालक मैथिली कथामे समाज आ’ परिवारक विखण्डन प्रतिध्वनि अछि। शिक्षाक विकास, पाश्चात्य संस्कृति एवं सभ्यताक व्यक्तिवादी प्रवृत्तिक प्रति आकर्षण, गिरिवन, प्रान्तरक लोकक कष्ट आ’ अभावमय जीवनके ँछोड़ि, नगर-उपनगरक सुविधपूर्ण जीवनाकांक्षा एवं चकमक इजोतक लोभ, नेपालीय समाजमे युग-युगसँ प्रवाहित आत्मीयताक रसके ँ सोंखने जा रहल अछि। माए बापक बीच सम्बन्ध्, भाए भाएक बीच सम्बन्ध्, व्यक्ति आ’ समाजक बीच स्नेहिल सम्बन्ध्, पुरान वस्त्रा जकाँ मसकि रहल अछि। बढ़ैत सम्बन्ध्हीनता एक ओहन समाजक छवि प्रस्तुत करैत अछि, जतय माए-बापक समस्त आशा-आकांक्षा पुत्राक लेल कोनो मूल्य नहि रखैत अछि। व्यक्गित लाभक चिन्ताक समक्ष सामाजिक दायित्व-पालन निरर्थक भए जाइत अछि। जाहि घरमे ओ जन्म लैत अछि, जे समाज ओकर विकास आ’ शिक्षाक व्यवस्था करैत छैक, ओकरहि ओ खोभाड़13 कहि घृणा करैत अछि। रक्तक सम्बन्ध् शिथिल भए जाइत अछि। अपनहि गामघरमे परिचय हेरा जाइत छैक ;‘हेराएल परिचय’-सुरेन्द्र लाभ-नेपालीय मैथिली गल्प। गाम उजड़ि रहल अछि। गामक आत्मीय वातावरणसँ लोक शहरक स्पन्दनहीन सम्बन्ध्क बन्हनमे बान्हल रहबाक चेष्टा करैत अछि ‘छुट्टीक दिन’ ;रा. ना. सुधकर। माए-बाप साध्नहीन पुत्राक कर्तव्यपरायणताके ँ बिसरि दुराचारी छोट पुत्राक सुख समृद्धिक प्रकाशमे ओकरहि असली श्रवण कुमार मानि लेत अछि। ;‘रामे छापक श्रवण कुमार’-विमल। एहि प्रकारे ँ नेपालक मैथिली कथामे ग्राम विमुखता, नगर-महानगरक प्रति आकर्षण, अर्थाश्रित सम्बन्ध्, व्यक्तिगत सुख-सुविधाक प्रति व्यामोह तथा समूहो मे एकसरूआ भए जाएब ;उधरक कथा’-गंगा प्रसाद अकेला आदि स्थितिक अभिव्यक्ति होअए लागल अछि। नेपालक मैथिली कथामे मनुष्यक जैविक विवशताक अभिव्यक्ति भेटैत अछि। अन्य भाषा साहित्य जकाँ ओ धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य, आचार-अनाचारक सीमाके ँ तोड़ि शुद्ध जैविक विवशताक रूपमे अभिव्यक्त भेल अछि। अध्किांश कथामे अतृप्त पत्नी डेग उठबैत अछि। एहि दृष्टिसँ रा. ना. सुधकरक कथा ‘चान असोथकित अछि ;मिथिला सौरभ, ‘नुकाचोरी’ ;मिथिला सौरभ, ‘चिल्होरि उड़ि रहल अछि’14, ‘चोलियामे चोर बसै गोरी’15 ‘खुट्टी पर टाघल ब्रा’16 , रेवती रमण लालक कथा ‘कुहेसक बीच’ तथा ‘दरारि’, ‘भुवनेश्वर पाथेयक’ खाली क्षितिज’17, रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’क ‘मनः स्थितिक दंश’ आदि। ‘मनः स्थितिक दंश’ मे ससुर पुत्राक रातुक ओवरटाइमक अवध्मिे बहुरियाक फटकी खोलि प्रवेश करैत अछि तँ ‘खुट्टी पर टाघल ब्रा’ मे जैविक विवशता लम्पटताक सीमाधरि बढ़ि गेल अछि। वेशी कथामे पत्नी पतिसँ चोरा कए अपन जैविक विवशताक तृप्तिक बाट तकैत अछि। ओतय ‘चान असोथकित अछि’ मे पति सब किछु जनितहुँ प्रतिवादक स्थितिमे नहि अछि। नेपालक मैथिली अध्किांश कथा स्त्राी-पुरुष सम्बन्ध्, विशेषतः दाम्पत्य जीवनक आधर पर अछि। ई दाम्पत्य जीवन शिक्षा, नागरिक जीवनक जटिलता आ’ नारी स्वावलम्बनसँ जीवनमे अबैत तनातनी आदि सँ अप्रभावित अछि। कहि सकैत छी एक पक्षीय अछि। पत्नी पतिसँ नाना प्रकारक यातना पबैत अछि, घरसँ निष्कासित भए अभाव आ’ अमर्यादक जीवन जीवा लेल वाध्य होइत अछि। नारी चरित्रामे प्रतिकारक हेतु आत्मबलक अभाव छैक। निराश आ’ असहाय भए आत्महत्या मात्रा उपाय बचैत छैक। नारी पात्राक एक दोसर वर्ग अछि। ओ महत्त्वाकांक्षी अछि। पतिक सीमित आयक सीमामे असहज भए अपन आचरण आ’ शब्द-वाणसँ पतिके ँ आहत करैत रहब अपन स्वभाव बना लैत अछि। ‘चोर’, ;राजेन्द्र किशोर, ‘मनःस्थितिक दंश’ ;भ्रमर, ‘चिल्होरि उड़ि रहल अछि’ ;रा.ना.सुधकर आदि एही मूलगोत्राक कथा थिक। पुफलिया ;बिरड़ो-भ्रमर निर्दोष अछि। आत्मसम्मानक समस्त प्रयास बेकार भए जाइत छैक। जखन बोल-भरोस आ’ सहानुभूतिक आवश्यकता छलैक, अत्याचारक घटना सुनि, पति शहर घूमि जाइत छैक। नेपालक समाजने नारीक होइत अवहेलना दिस संकेत करैत अछि कुवेर घिमिरेक कथा ‘बिनु हाटक बिक्री’। पुत्राीके ँ बेचव आ’ प्रतिकूल लोकक संग पंचायतक अनुमति लए विवाह कराए विदा करा देब, नेपाली समाजक एहि विकृतिक उद्घाटन एहि कथामे भेल अछि। माल जालक हाट बाजार लगैत अछि, मुदा बिना हाटक बेटी बेचब निश्चित रूपे ँ सामाजिक मूल्यक अवमूल्यनक परिचायक थिक। नेपालक मैथिलीक बड़ कम कथामे पत्नीक व्यक्तित्व गढ़ल गेल अछि। ओ कनिको लोभ-लाभ पर वंचकता पर आतुर भए जाएत। एकर अपवाद अछि जीतेन्द्र जीतक कथा ‘प्रश्नचिर्’िं18। मित्राक पत्नीक प्रति लोभित शैलेन्द्रके ँ मित्राक शिक्षिता पत्नी आत्मबोध् कराए दैत छनि। पतिक शारीरिक यातनाक प्रतिकार दोसर पत्नी शारीरिक स्तर पर करैत अछि ;‘दरुपिबा’-रेवती रमण लाल। नेपालक मैथिली कथामे नारीक स्थान अत्यन्त गौण अछि। ओ अशिक्षिता अछि, श्रमक महत्त्वसँ अपरिचित अछि। यातना आ’ अत्याचार सहबा लेल वाध्य अछि। प्रेम नहि वंचलता छैक। तथापि एक आध् एहनो कथा अछि जाहिमे प्रेम-समर्पण परिवारक प्रति दायित्वबोध् आदि व्यक्त भेल अछि। एहि दृष्टिसँ रेवती रमण लालक ‘चतुर्थो’ ‘धेकराक मारि’, ‘माध्व नहि अएला मध्ुपुरसँ’, ‘भुवनेश्वर पाथेयक जीवन वृत्त’19 आ ‘फूटल चूड़ी’ रा. ना. सुधकरक ‘सन्ध्’ि ;प्रभात, राजेश कुमार वर्माक ‘पागल माय’ ;प्रभात-2 आदिक नामोल्लेख कएल जा सकैछ। नैहरसँ चीज-वस्तु नहि आएब, पर्याप्त विदाइ नहि भेटब आदिक कारणे ँ पुतहुक यातना तँ प्रायः समाजक सामान्य विषय भए गेल अछि। एकर आधर पर नारी उत्पीड़नक कतेको कथा लिखल गेल अछि। मुदा, सासुरमे जमायक उत्पीड़नक कथा अपवाद स्वरूपहि भेटत। एहि प्रकारक कथा थिक जीतेन्द्र जीतक ‘सासुर’20 विवाहमे कनियाँ लेल किछु नहि अनबाक कारण कन्या-पक्षक लोक द्वारा वरक उपेक्षा तथा व्यंग्यवाणसँ आहत भेला पर बनल मानसिकताक विलक्षण उपस्थापन ‘सासुर’ कथामे भेल अछि। कनियाँक माएक आक्रोशके ँ सहदैत दोसर स्त्राी बजैत अछिµ‘ठीके तँ कहै छथिन, हिनकर सब खर्च कएल व्यर्थे मे चल गेलनि। विवाहक दिनसँ ई वर एक्को टा विध्मिे किछुओ देलकै? ‘चतुर्थीक राति रूनियाक माए अपन नवविवाहिता बेटीके ँ पतिक निकट पठेबाक बदलामे अपन कोठलीमे बन्द कए लैछ तथा लांछित-अपमानित जमायक आँखिक नोरके ँ बिछोहक नोर मानि लेल जाइत अछि। व्यवस्थाक असामाजिक नीतिक प्रत्यक्ष विरोध् अथवा एहन वातावरणक निर्माण करब जाहिसँ जनमानस प्रशासनक विरोध्मे मानसिकता बना लेबा लेल तत्पर भए जाए, नेपालक मैथिली कथामे साधरणतया नहि भेटैत अछि। पुफलिया ;बिरड़ो, भ्रमर शान्ति व्यवस्थाक रक्षक थानासँ अपन रक्षाक अनुरोध् करैत अछि। परंच, ओतय तँ ओ औरा अरक्षित भए जाइत अछि। एहिसँ शासन-व्यवस्थाक प्रति आक्रोशक सुगबुगी होइत अछि, जे गुणात्मक आ’ सार्वजनिक भेला पर प्रभावी भए सकैत छल, मुदा देशक राजनीतिक परिदृश्य जे छलैक, से नहि होअए देलकैक। बदरी नारायण वर्माक कथा ‘सुनगैत गाम’ ;प्रभात-2 मे बहुदलीय शासन व्यवस्थाक बाद युग-युगसँ प्रताड़ित वर्गमे आएल चेतनाक स्वर अछि। एहि क्रममे रा. ना. सुधकरक कथा ‘थकुचल मांसुक बुट्टी’ ;आंजुर नेपालमे एखन धरि प्रकाशित समस्त मैथिली कथासँ भिन्न कथ्य वर्गक अछि। बहिनिक अपहरण आ’ हत्या तथा पिताक हत्या एक मेधवी आ’ निधर््न छात्राके ँ असहाय बना दैत अछि। ओ वर्तमान व्यवस्थामे अपना के ँ पूर्णतः अरक्षित आ’ आतंकित अनुभव करैत अछि। किन्तु, क्रमशः अपन असहायता पर विजय पाबि साहसक बटोर-सघोर करैत अछि। ओ एहि निर्णय पर पहुँचैत अछि जे वर्तमान अत्याचारी शासन-व्यवस्थाक अन्तक एकमात्रा उपाय थिक गुरिल्लावार। भ्रष्ट व्यवस्था, समाजक तथाकथित संभ्रान्त व्यक्तिक दुराचार, धन-सम्पत्तिक मदमे सभ किछु अपना अनुकूल बना लेबाक व्यूह-रचना आदि पर प्रायः प्रथमहि बेर अतेक मुक्तरूपे ँ प्रहार कएल गेल अछि। कथाकार द्वारा कथा-चयन आ प्राप्त सामग्रीक उपयोग रचनात्मक दृष्टि पर निर्भर करैत अछि। जतए धरि नेपालक मैथिली कथाकार द्वारा कथा-चयनक प्रश्न अछि कथाक विषय-वस्तु समाजक निम्न आ’ मध्यम निम्नवर्गक अछि। ओकर निधर््ना भूख पियास अछि। प्रशासनक दुष्चक्रमे पीसाआइत जीवन-यापन अछि। श्रमक पलायनसँ टुटैत सामाजिक-पारिवारिक जीवन अछि। शिक्षित-अशिक्षित नवयुवकक बेकारी बैसारीजन्य मानसिकता अछि। कथाक ई विषय-वस्तु आ’ चित्रित परिवेश नेपालक सामाजिक जीवनक बिम्ब प्रस्तुत करबामे सफल प्रतीत होइत अछि। परंच, त्रासद राजनीतिक आ’ सामाजिक जीवनक बीचसँ निःसृत होइत संघर्षक जे वेगवती धर स्वतः पुफटि जएबाक चाही, ओहन स्थिति अथवा पात्राक सर्जना नहि भेल भेटैत अछि। अत्याचारी शासन-व्यवस्था, डेेग-डेग पर व्याप्त भ्रष्टाचार आ’ कुटिलताक विरोध्मे ठाढ़ होएबाक लेल मानसिकरूपे ँ तैआर करैत हो, ओहन वैचारिक संघर्ष कथाक अभाव अछि। नेपालक मैथिली कथाक एक सहज समानता अछि पात्राक कानब। जेना सभ समस्याक निदान नोरे हो। बात-बात पर कानब परिस्थितिक प्रति पात्राक भावुकता आ’ आत्मीयता अवश्य द्योतित करैत अछि। परंच, संघर्ष आ’ निर्भीकताक एहन भावुक स्थितिमे पिछड़ि जाइत अछि। सम्प्रति, समाज जाहि द्रुतगतिसँ बदलि रहल अछि, सामाजिक आ’ पारिवारिक मूल्यक अवमूल्यन जाहि गतिसँ भए रहल अछि, नोरके ँ पीबि संघर्ष लेल ठाढ़ होएब श्रेयस्कर अछि। नेपालसँ पत्रा-पत्रिकाक नियमित प्रकाशन आ’ बदलल राजनीतिक स्थितिक कारणे ँ नेपालक मैथिली कथाक प्रवृत्ति विभिन्न दिशामे अभिव्यक्त भए रहल अछि। एहिसँ विषय-वस्तुमे व्यापकता आएल अछि। परिवेश, स्थिति, सामयिक घटना कथाक विषय वस्तु बनबाक हेतु कथाकारके ँ प्रेरित करैत अछि। देशक राजनीतिक परिस्थितिसँ समाजक सांस्कृतिक मानसिकतामे आएल अन्तर कथामे अछि। एहि तथ्यके ँ भारत आ’ नेपालक बीच किछु वर्ष पूर्व नियति आयतक ट्रांजिट बिन्दुक कारणे ँ भेल मतान्तरसँ दूनू देशक जनताके ँ दैनिक जीवनमे जे अपार कष्ट भेलैक ओहि पृष्ठभूमिमे रा. ना. सुधकर कथा ‘सन्ध्’ि अछि। माए बापक तनातनीसँ ध्ीया पूता प्रभावित होइत अछि आ’ पति, पत्नीमे मिलान होइतहि पारिवारिक जीवनमे महमही आबि जाइत छैक। सएह स्थिति सन्ध्कि बाद दूनू कातक लोकक भेलैक। कहबाक तात्पर्य जे विषय वस्तुक व्यापकता आ’ राजनीतिक व्यवस्थामे आएल परिवर्तनसँ नेपालक मैथिली कथामे प्रगतिशील ओ युग-जीवनसँ परिपूर्ण कथा दृष्टिक परिचय होइत अछि। निश्चित रूप ई शुभ लक्षण थिक। एहि शुभ संकेतक आकलन हम आइसँ लगभग दू दशक पहिने ;1992 ई. कएने छलहुँ। एहि दू दशकमे नेपालक राजनीतिक परिदृश्य पूर्णतः बदलि गेल। जनताक सम्मिलित आकांक्षाक समक्ष राजतन्त्रा इतिहासक वस्तु बनल। असल राजा भेल जनता। ओकरहि हाथमे अपन नेताक निर्वाचनक चयनक शक्ति अएलैक। जनताक आशा-आकांक्षाक अनुरूप देशक संविधन निर्माणक प्रक्रिया निर्णायक स्वरूप ग्रहण करबा पर अछि। अपन भाषा-साहित्य एवं संस्कृतिक संग अपन क्षेत्राक विकासक प्रति सतर्कता कतेको गुणा बढ़ि गेल अछि। समाजो पहिने सँ बेसी टुटल अछि। व्यक्तिवदिता बढ़ल अछि। गाम उजड़ल अछि। शहरमे जाए बसबाक आकांक्षा द्विगुणित भ्ेालैक अछि। संगहि, अपन सांस्कृतिक अस्मिताक रक्षाक प्रति सामान्य लोकक चेतना बलवती भेल अछि। एहि बलवती चेतनाक अभिव्यक्ति एलेक्ट्रोनिक आ’ प्रिन्ट- दूनू प्रकारक प्रचार माध्यमसँ भए रहल अछि। जनकपुरधममे मिथिला महोत्सवक नियमित आयोजन वा आने प्रकारक साहित्यिक - सांस्कृतिक कार्यक्रमक नियमित आयोजन - एही चेतनाक रूपान्तरण थिक। ‘नैमिकानन’, ‘सयपत्राी’ एवं ‘आघन’ सहित ‘विद्यापति टाइम्स’, ‘मिथिला डाट कम’ आदि पत्रा-पत्रिका एहि चेतनाक सबलता आ’ निरन्तरतामे पर्याप्त सहायक भेल अछि। एहि बीच कतेको उल्लेखनीय व्यक्तिगत कथा संग्रह, जेना, ‘ई हमरे कथा थिक’;डा. राजेन्द्र विमल, ‘कथा-यात्रा’;डा. सुरेन्द्र लाभ, ‘हुगली उपर बहैत गंगा’;रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’, ‘एकटा हेरायल सम्बोधन’;अयोध्यानाथ चौधरी,;वृषेश चन्द्र लाल आदि आएल अछि। ओहिना किछु संग्रह, जेना ‘कथायात्रा’ ;सम्पादक रमेश रंजन एवं अशोक दत्त - संकलित कथाकार- डा.राजेन्द्र विमल, डा.रेवती रमण लाल, अयोध्यानाथ चौधरी, डा.सुरेन्द्र लाभ, श्यामसुन्दर शशि, रमेश रंजन, ध्ीरेन्द्र प्रेमर्षि, जे. एन. जिज्ञासु, परमेश्वर कापड़ि, रामनारायण देव, रूपा ध्ीरू आ’ सुजीतकुमार झा तथा ‘नैमिकानन मैथिली कथा संग्रह’;सम्पादक डा.रेवती रमण लाल, संकलित कथाकार-सुन्दर झा शास्त्राी, डा.ध्ीरेन्द्र, राजेन्द्र किशोर, डा.राजेन्द्र विमल, डा.हरिश्चन्द्र झा, उपाध्याय भूषण, भुवनेश्वर पाथेय, बदरीनारायण वर्मा, अयोध्यानाथ चौधरी, रा.ना.सुधकर, जीतेन्द्र जीत, डा. सुरेन्द्र लाभ, जयनारायण झा ‘जिज्ञासु’, रमेश रंजन तथा ध्ीरेन्द्र प्रेमर्षि प्रकाशित भेल अछि। बहुतो कथाकारक रचना असंकलित अछि। नेपालमे राजतन्त्राक समयमे जे ‘मोगलान मिथिला’ कहाइत छल, से ‘दक्षिण मिथिला’ सम्बोधित होइत सुनलहुँ अछि। सन्दर्भ: - 1. रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’ ;आंजुर, वर्ष-1 अंक-3 2. रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’; गामघर,जनकपुर 14 मार्च 1985 ई. 3. रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’; गामघर, जनकपुर, 7 जून 1988 4. रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’; आंजुर, वर्ष-1 अंक-1,जनकपुर एवं भाखा, पटना 5. रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’; अर्चना’, अंक-5, तथा गामघर-6.12.1984 6. वैदेही विशेषांक, दरभंगा, 1989 7. घर बाहर, पटना, जुलाइ सितम्बर, 2010 8. कुमार अभिनदन -मैथिली भाषा, साहित्य सांस्कृतिक पच्चीस वर्ष, गामघर, पूस 2043 9. कापड़ि-नेपालक मैथिली कथामे माटि पानिक गन्ध्’-वैदेही विशेषांक, 1989 10. जनक, वर्ष-8, अंक-1, वैशाख 2047 11. पूर्वाञ्चल, नई दिल्ली, अंक-2, दिसम्बर 1991 12. मिथिला वाणी, आसिन 2050 13. खोभाड़’-सुरेन्द्र लाभ, मिथिला मिहिर, 28.1.1976 14. मिथिला मिहिर. 11.12.1979 15. माटिपानि 1984 16. माटि पानि,1984 17. सोनामाटि, नवम्बर-दिसम्बर, 1970 18. आंजुर, 2047 साल 19. वैदेही, दिसम्बर 1989 20. प्रभात-1, विराटनगर सितम्बर,1990 बृषेश चन्द्र लाल लघुकथा-गोलबा जहिया ओ जनमल, बड़कीमाइ धरतीपर खसहु नहि देलकैकि कहा“दोन माटि लागि जइतैक कहैत छैक जे पशु जाति गन्धेस“ चिन्हऐत छैक आ प्रायः तैं गोलबा सभस“ पहिने बड़कीमाइक गन्ध थाह पओलकैक आ लगले तखनहिं सोनी, मोनी आ बब्बूक । अपन माइ चितकबरीक गन्ध त“ ओ पेटहिंस“ पओने रहए । ओकरा कहियो नहि बुझएलैक जे ओ पशु अछि । ओ अपनाके“ सोनी, मोनी आ बब्बूये जका“ बड़कीमाइक सन्तान बुझैत रहल । बड़कीमाइ कहैतिरहैति छलैकि जे गोलबा जनमल त“ ओकरा जखने पोछिपाछि कए ठाढ कएल गेलैक, चभकि–चभकि कए चितकबरीक थनस“ दूध पिबए लगलैक आ जखने पेट भरि गेलैक त“ दौडि कए ओकरि दुनू पएरक बीचमे साड़ीक कोंचामे गरदनि नुका लेलकैक । आ तहियास“ ई क्रम चलिते रहलैक । कुदि–फानि क’ आएल आ बड़कीमाइक साड़ीक कोंचामे गरदनि पैसाकए उपर–नीचा करए लागल । बड़कीमाइ ओकरा कोरामे उठाकए ताबरतोड चुम्मा लेबए लगैकि आ गोलबा बड़कीमाइक स्नेहस“ मुग्ध भ’ जाइक । संसारमे एहिस“ बेशी सुख ओकरा आओर कतहु कखनो नहि बुझएलैक । ओकरा बड़कीमाइ सभ दिन ममताक समुद्र लगैत रहलैक । कहा“दोन, सन्तानस“ प्रेम करएबलाकप्रति सन्तानक माय मुग्ध भ’ जाइत छैक । ओकर माइ चितकबरी बड़कीमाइक सभ दिन आदर करैति रहलैकि । जखने बड़कीमाइ कहैकि — “चितकबरी आह ..आह ।” कि ओकर माइ चितकबरी चाहे कतबो दूर किएक ने रहौक, कानमे आवाज झरिते“ चट बड़कीमाइ लग दौड़ि जाइक । आ बड़कीमाइ जेना–जेना इशारा करैकि चितकबरी चुप्पे मुड़ी गोंतने आदेशक पालन करैति जाइक । करौक कोना नहि ?† भोरे–भोरे चितकबरीलेल घास, कोराइ आ कहियो काल दालिक कुन्नीक ओरिआओन त“ वएह करैकि ने । रौद उगैक त“ बड़का रस्सीमे खुट्टीमे बान्हि ओकरा चरएलेल छोडि दैकि आ फेर दुपहरियामे चौरीमे ल’ जाइकि । आरिक दुबि खाएमे कतेक आनन्द अबैत छैक से जे खाए सएह ने जानए † तहिना करैक गोलबा । ओहो कहियो बड़कीमाइक आदेशक अवज्ञा नहि कएलक । ह“, चितकबरी स्थिरस“ अबैकि त“ ओ दौडैत–कुदैत–फानैत कहियो काल जखन बड़कीमाइ कोनो काज –धन्धामे लागलि रहैति छलि अथवा ककरोस“ बतिआइतिरहैति छलि त“ गोलबाके“ दुलारस“ धकेलि दैति छलैकि । मुदा, गोलबा ताधरि जान नहि छोड़ैत छलैक जाधरि बड़कीमाइ ओकरा उठाकए चुमि नहि लैति छलैकि । ... चितकबरी बड़कीमाइ आ गोलबाक सिनेह देखि मुग्ध रहैति छलि । ओ सभ दिन गोलबाके“ सिखबैतिरहलि जे जननाहरिस“ पोसनाहरि बड़की होइत छैक । आ ओ तै“ सभ दिन बड़कीमाइके“ अपन माइ चितकबरीस“ उपरे देखलकैक । सोनी आ मोनी त“ गोलबालेल अपन जाने न्योछारि देने छलि । नामो त“ ओकरेसभक देल रहैक ने । गोलबा जनमलैक त“ गोल, गुटमुटाएल आ लेपटाएल रहैक कहा“दोन † आ तै“ ओकरा सोनी–मोनी ‘गोलबा’ कहि देलकैकि । ओकर नामाकरण अहिना भेल रहैक । पहिल बेरस“ ल’ क’ बहुत दिनधरि सा“झु पहर, रातिमे आ सुति–उठिकए ओसभ ओकरा ओकर माइ चितकबरी लग ल’ जाइक आ मुह“ पकड़िकए थन छुअबैकि । गोलबा मस्त“ दूध पिबए लागए । दिनोमे ओकरा मोनस“ कुद–फान कहा“ करए दैकि ओसभ । भरि दिन कोरामे लदने छी, लदने छी † तहिया गोलबाके“ नीक नहि लगैक । मोन होइक जे छोड़ितए त“ कुद–फान करितए । मुदा, बादमे जखन ओ नम्हर भ’ गेल त“ रहि–रहि कए मोन होइक जे कने सोनी–मोनी ओकरा कोरमे उठैबितैकि । सोनी–मोनी ओकरालेल सुतएलेल ओछाओन आ पहिरएलेल मिरजइक व्यवस्था कएने रहैक । ओ मुति दैक त“ ओसभ बड्ड पिताइक । रातिमे उठा–उठा कए पेसाप कराबए ल’ जाइक । गोलबाके“ तामस होइक । ओ की जानए गेलैक जे ओकरा मुतक छैक । पेसाप लागल रहैक त“ ने † जखन पेसाप लगैक ओ उठिकए गड़गड़ा दैक । ... सोनी–मोनी ओकरा अपने कोठरीमे सुतबैकि । बड़कीमाइ कए दिन कहलकैकि जे ओकरा चितकबरी लग पथियास“ झ“ापि दौक । मुदा सोनी कहैकि जे कहु“ हुराड ल’ जएतैक तखन † आ ओसभ एक बरखधरि गोलबाके“ अपने कोठरीमे सुतबिते रहि गेलैकि । ओ नम्हर भेलैक त“ चट्टीमे गहु“मक भूस्सा भरि कए ओसभ ओछाओन बना देने रहैकि । आमक पात, दुबि, रामझिमनी आदि गोलबाक प्रिय भोजन रहैक । सोनी–मोनी चाऊर भुजि ओहिमे करुतेल सानि क’ खुअबैति छलैकि । गोलबा मस्तस“ खाए । कहैकि जे एहिस“ देह मोटाइत छैक । गोलबाके“ लोक मोट आ कसगर कहकि त“ बड्ड आनन्द अबैक । आ तैँ ओ चपर–चपर क’ खाइक । गेरुका मेला लगलैक त“ सोनी–मोनी मेलास“ फुदना अनने रहैकि आ लाल, हरियर, कारी फुदना ओकरा गरमे बान्हि देने रहैकि । कहैकि जे लालस“ शक्ति बढतैक, हरियरस“ तन्दुरुस्ती आ कारी रहलापर ककरो नजरि नहि लगतैक। जेना–जेना ओ बढ़ैत गेल बब्बू ओकर दोस बनैत गेलैक । शुरु–शुरुमे ओ अपन दीदीसभक संगे“ आगा“–पाछा“ करैक । मुदा बादमे बब्बू ओकरापर बेशी ध्यान देबए लगलैक । जखन–तखन ओकर देह सेहारैक । कतहु, कनेको, कोनो दाग नहि लगबाक चाही। कनेको किछु लागि जाइक त“ ओ तुरत साफ करैक, देह मलैक आ पोछ–पाछ करैक । .... एकदिन पेठियास“ चारिगोट घुंघरुबला पट्टा किनि बब्बू ओकर गरमे सोनी–मोनीक फुदना संगहिं बान्हि देने रहैक । गोलबाकेँ अपन गर कनेक भारी जका“ लगलैक आ कुद–फानमे सेहो असहज भ’ गेलैक । घुंघरुक आवाज कानमे झर दैक । कर्कश लगैक । गोलबा मुड़ी हिलाकए पट्टा निकालक प्रयत्न कएलक मुदा ओ निकलएबला थोडेÞ रहैक † उन्टे कान फाड़ए लगलैक । आब त“ दौड़एमे, पछिलका पएरपर ठाढ़ भ’ क’ गरदनि आ आ“खि टेढ़ कए धाही मारएमे सेहो असोकर्य होमए लगलैक । मुदा करो की ? अपने निकालि सकैत नहि अछि † भगवान बोली त“ देने छथिन्ह मुदा सहज भाषा नहि जे ओ बब्बूके“ सम्झाबए सकओ । अन्ततः मन मसोसही पड़लैक । गोलबाक सिंघ जनमए लगलैक त“ माथपर कुरिऐनी ध’ लेलकैक। ओ दाबा, खम्हा, आड़ि जहा“ पाबए माथ रगड़ए आ धाही मारए । बब्बू आब ओकर माथके“ पकड़िकए ठेलए लगलैक । ओकरा नीक लगैक । ओ छड़पिकए पछिला टांगपर ठाढ भ’ बब्बूक हाथपर धाही मारए लागल । बब्बू आ गोलबाक नित्य कर्ममे इहो एकगोट अभ्यास जुड़ि गेलैक आ तकर बाद त“ ओ लड़ाका बनि गेल । दुपहरियामे बब्बू ओकरा गाछीमे टहलाबए ल’ जाइक आ ओतए ओकरा कएटास“ भिड़ए पड़ैक । बेशीके“ ओ लगले भगा दैक मुदा एक दिन ओ हारही लागल छल । ओ त“ बब्बू जे चलाकीस“ ओकरा जीता देलकैक । ततेक जोड़स“ ने जोश बढ़ओलकैक जे विपक्षी डरे भागि पड़ा गेलैक । मुदा, तीन दिनधरि ओकर सिंघलग माथ दुखाइते रहलैक । नहि जानि किएक एकाएक घरमे भीड़–भाड़ बढ़ि गेल रहैक । बड़कीमाइ एकदिन बुढ़िया दाईक“े बजओने रहैकि आ तकर लगले दोसर दिन सभ दर–देआदसभक जमघट भेल रहैक । गोलबाके“ घरक गतिविधि किछु विशेष त“ बुझएलैक मुदा ओ किछु बुझि नहि सकल । ओ देखि सकैत अछि । प्राकृतिक रुपस“ ओकरा अपनालेल आवश्यक विषयमे भगवान बुझक जतबे सामथ्र्य देने छथिन्ह ओ ततबे ने बुझत ओ अपन दिनचर्या क’ सकैत अछि, अपनप्रतिक स्नेह आ बजारल चोटके“ छू सकैत अछि, मुदा दोसरक छुपल भाव वा मनुखक भाषायी अभिव्यक्ति ओकर प्रकृति प्रदत्त सामथ्र्यस“ फाजिलक विषय छैक । तै“ घरमे की चलिरहल रहैक ओ बुझि नहि सकल । ह“, गोलबाप्रति स्नेह किछु बेशीये बढ़ि गेल रहैक । ओना गोलबाके“ केओ ऐंठ–का“ठ खाए नहि देलकैक । शुरुअेस“ कोनो घाओ–घौस नहि होउक, कतहु कटाउक नहि तकर ख्याल सभ केओ रखैत अएलैक अछि । मुदा, एखन ओकर खान–पानपर पहिनेस“ किछु आओर विशेष ध्यान राखल जारहल छलैक । ... एक दिन पुरहित अएलखिन्ह । बड़ीकालधरि पतरा उनटअबैत रहलखिन्ह । जाएकाल बड़Þकीमाइ बहुते रास चाउर दालि , अल्लू आ नूनक संगहिं किछु टका सेहो देने रहैकि । आ तकरबाद घरक नीप–पोत, हाट–बजारक गतिविधि बढ़ि गेल रहैक । दसे दिनक बाद घरमे ढ़ोल–पिपही बाजए लगलैक । सा“झखन क’ गोसांउनि–घरमे कनिया“–मनिया“ आ बुढ़ियादाइ सभक जमघट तथा गीतनाद होमए लगलैक । बब्बूक“े आगा“ राखि नहि जानि कतेक विधवाध कएल गेलैक । ढ़ोल–पिपही आ गीतनादस“ ओकर कान भारी भ’ गेल छलैक । मुदा तैयो सभ किछु रमनगर लगैक । बब्बू हर्षित रहैक तै“ । ओहि दिन भोरेस“ भीड़–भाड़ रहैक । गोसाउनि–घरमे पूजा–पाठ भेलैक । ओही क्रममे गोलबाके“ दू गोट छौंड़ा पकड़िकए पोखरि ल’ गेलैक आ नहा देललैक । बड्ड जाढ़ भेलैक गोलबाके“ । माघ महीनाक जाढ़ आ ठढ़ल पोखरिक पानि † छौंडासभ सोझे पोखरिमे बुड़का देने रहैक । बेचारा गोलबा मेमिआए लागल, पैखाना–पेसाप सभ भ’ गेलैक । डरे परान निकलए लगलैक । विवश गोलबाक गर लागि गेलैक । ओ बब्बूक स्मरण कएलक । एखन बब्बू रहितैक त“ एना होइतैक ? .... छौंड़ासभ ओकरा कोरमे उठओने गोसाउनि–घरमे ल’ गेलैक आ बब्बू लग ठाढ़ क’ देलकैक । तखन जा क’ ओकर परान पलटलैक । बुझएलैक, ओकरो एहि समारोहमे सहभागी बनाओल जारहल छैक । ओ चारु भर देखए लागल । जाढ़े देह थरथराइक मुदा तैयो ओ अपनाके“ स्थिर करक पूरा प्रयत्नमे लागि गेल । ओ अपनाके“ स्थिर करएमे लागले रहए कि पण्डितजी जोड़–जोड़स“ मन्त्र पढलखिन्ह आ बब्बू ओकर माथपर अक्षत, फूल आ पानि ढ़ाड़ि देलकैक । माथ सर्द भ’ गेलैक आ केशमे अक्षत फूल घुसिआ गेलाक कारणे“ ओकरा कुरिअइनी लागि गेलैक । ओ जोड़स“ अपन माथ झटकए लागल । पण्डितजी ‘ जय भगवती † जय माते †† ’ चिचिआए लगलखिन्ह । बब्बू पाछाँ हटि गेलैक । एक गोटे पाछा“स“ ओकर दुनू पएर पकड़ि लेलकैक । दोसर ओकर गर्दनपर हाथ फेरए लगलैक । .... आ .... छपाक † आहिरो † ई की भेलैक ?† ओ त“ अपन धरस“ अलग भ’ गेल अछि ††† आब ने ओ धरस“ अलगे फेकाएल माथमे अछि ने धरेमे । ओ अपन अलग भेल मुड़ीक मुआयना करैत अछि । असह्य पीड़ाक प्रतिविम्व छैक – उनटल आ“खि आ दा“त तर दने निकलक जीभ । दा“तक दबाब एतेक जे आधा जीभ कटाइये गेल छैक । धरोक हालत ठीक नहि छैक । छिड़िआएल चारु टांग आ तानल धर एकदम कड़ा भ’ गेल छैक । ओ अपनाके“ एकदम हल्लुक पाबिरहल अछि । अनन्त अन्तरिक्षक यात्राक हड़बड़ी भ’ गेल छैक एहि अनन्त यात्राक कतहु कोनो पड़ावपर ओकरा दोसर शरीर धारण करक छैक । नहि जानि ओ पड़ाव कतए हएतैक ? तखने ओ पुनः दुःःख–सुख आ भावनाक संवेगके“ भोगि सकत । स्वाद आ श्रंगारक रस पिबि सकत । अथवा अन्य कोनो अनुभूति ल’ सकत । .... गोलबा पुनः एकबेर स्थितिक जायजा लैत अछि । सोनी–मोनी पानि गरमारहलि छैकि । छौंड़ासभ ओकर धर छोलएलेल केराक पात आ औजारसभ ठीक क’ रहल अछि । भन्सीआसभ बडका कराह आ भट्ठीक प्रबन्ध मिलारहल अछि । बड़कीमाइ कनिया“–मनिया“सभके“ मर–मसल्ला, तेल, पिआउज आदिक वन्दोवस्तमे लगओने छैकि । पिअर, धोती, कुत्र्ता आ गमछामे मुण्डित माथ नेने बब्बू अपन दोससभक संग ह“सि–ह“सि क’ बतिआरहल अछि । दरबज्जापर दरदेआदसभ मस्त खैनी चुनबैत गप्प–सप्पमे लागल छैक । चितकबरी नोराएल आ“खिस“ अपन पहिल बेटाक धरदिसि टुकुर–टुकुर ताकिरहलि अछि । .... ओ कोनो झोंका जका“ अन्तरिक्षदिसि उधिया जाइत अछि । एकदम निस्पृह भावे“ † ई सभ स्वाभाविक छैक । ओहो स्वाभाविक रुपे“ प्रकृतिक स्वाभाविक प्रक्रियामे आगा“ बढि जाइत अछि । आब ओ गोलबा कहा“ अछि † दुर्गानन्द मंडल, , गोधनपुर लघुकथा- पारस “शान्ति यै शान्ति कतए नुकाएल छी यै फूलकुम्मरि?” शान्ति- “एलौं याए एलौं।” आंगनसँ शान्ति हाक दैत लग आिब सोझामे ठाढ़ि होइत पुन: बाजि उठैत छथि- “कथीले एतै जोर-जोरसँ हाक दैत छलौं? कोनो खास बात छै की?” हम- “ऐह, अहॉंकेँ तँ सदिखन मजाके सुझाइत अछि। खास बात की रहत। अहॉं छी तँ सब खासे बात बूझु। ओना आइ विद्यालयक छुट्टी समाप्त भऽ गेल तेँ झब दऽ खाइले किछु बनाउ। जे हम समएसँ विद्यालय चल जाएव।” शान्ति बजलीह- “ओ..., आब ने बुझलहुँ। अहॉं तँ सब दिन गोलहे गीतकेँ गबै छी। ओना हे, आइ बड्ड सखसँ अपनहि बाड़ीसँ सुआ आ लौफक साग काटि अनलहुँहेँ। तेँ आइ साग-भात आ आल्लुक सानाक संग भाटा-अदौरीक तीमन बनवितहुँ से निआरने रही। मुदा ताहिमे तँ देरी होएत। तावत अहॉं स्नान-पूजा करू आ हम जलखैक ओरिओन कऽ दैत छी।” “बेस, बड्ड बढ़ियॉं। कने अंग-पोछा आ धोती-कुरता बहार कऽ दिअ।” हम धोलूकेँ हाक दैत छी- “धोलू हौ धोलू। कतऽ छह हौ?” “ऐलौं, याए ऐलौं बावू जी, कने नदी फीरि रहल छी।” “वेस, बड्ड बढ़ियॉं। आ वौआ, है सुनै छह? आइ हमरा विद्यालय जेवाक अछि। से जात हम स्नान करै छी। तात् तौं साइिकलकेँ बढ़ियॉं जेकॉं झारि-पोछि दाए।” ई कहैत हम स्नान करबाक लेल डोल-लोटा लऽ कलपर चलि जाइत छी। स्नानोपरान्त पूजा-पाठ कऽ धोती पहीिर तैयार होइते छी तात् शान्तिक आग्रह- “सुनै छी, अहॉंले जलखै निकालि देने छी, कऽ लिअ।” ई कहैत आगॉंमे सिकीक चंगेरी, जे रंग-विरंगक रंगसँ रंगल मुजसँ बनौल गेल रहए, ताहिमे मुरही-चूड़ा, दूटा चूड़लाइ आ गोर पाँचेक तीलक लाइ संगमे कॉंच मेरचाइ आ नोन परसल छल, आगॉं बढ़ौलनि। एक क्षणक लेल हम मिथिला, मैथिल आ मैथिलक संस्कार आ स्भयतासँ बहुत बेसी आनन्दित भेलहुँ। मन गद्-गद् भऽ गेल। तात् शान्तिक मधुर आवाज- “कतए हेरा गेलहुँ? एखन यएह खा, विद्यालयसँ भऽ आउ, जखन आएव तँ गरमा-गरम साग, भात, अल्लुक साना अा भाँटा-अदौरीक तीमन भरि मन खाएव। ओना जाड़ मास छै यदि किछु आरो मनमे हुअए तँ कोनो हर्ज नहि।” कहैत, हँसैत सोझासँ अढ़ भऽ गेलीह। आ हम जलखै करैत एहि मादक अदाक मादे सोचए लगलहुँ। हमरो मनमे गुदगुदी लागए लागल। जलखै करैत एक बेरि पुन: हाक देलिऐनि- “शान्ति, यै शान्ति....।” नहि जानि जे हुनको मनमे कोनो बात उमरि रहल छलन्हि। ओ गुनगुनाइत ई गीत- “एगो चुम्मा दे दऽ राजा जी, बन जाइ जतरा....।” आवि वाणभटक नायिका जेकॉं लगमे सटि कऽ ठाढ़ि होइत प्रेमानुरूप एकटा चुम्मा लऽ छथि आ मुस्की दैत घरसँ बहार भऽ जाइत छथि। हम लजा जाइत छी। करीब चालीस मिनटक उपरान्त विद्यालय पहुँचैत छी। हाथ-पएर धोलाक वाद हाजरी बनवैत छी। प्राथनाक घंटी बजैत अछि आ धिया-पूताक संग हमहुँ एक पातिमे ठाढ़ भऽ जाइत छी। उपरान्त ऐकर नवम्-बी मे हमर वर्ग रहैत अछि। हाजरी बही लऽ वर्गमे प्रवेश करैत छी। वर्ग नवम बी जे एकछाहा लड़कीएक वर्ग रहैत अछि, स्वागतार्थ सभ बच्चिया उठि कऽ ठाढ़ि भऽ जाइत अछि। वैसबाक आदेश पावि यथास्थान सभ बैसि जाइत अछि। सबहक हाजरी लेब सम्पन्न होइत अछि। तखन किछु बच्चिया सभ बाजि उठैत अछि- “मा-साएब, आइ ललका पाग पढ़बियौ, क्यो कहति अछि जी नइ सर आइ ग्रेजुएत पुतोहू पढ़बियौ। मुदा किछु खास बच्चिया यथा- राखी, गीतांजली, खुसवू, बबिता, रिंकी आ पिंकी कहि उठैत अछि- “जी नै सर आइ अहॉं अपने िलखल कोना कथा कहियौ। आ हम ओहि आग्रहकेँ नहि टारि पबैत छी। शुरू कऽ दैत छी अपन लिखल ई कथा- .....पारस।” मॉं मिथिलाक गोद आ कमला महरानीक कछरिमे बसल एकटा गाम दीप-गोधनपुर। जाहिमे छल एकटा चाहबला ओकर नाम छल पारस पिता श्री सत्य नारायण जी नामक अनुरूप दुनू बापूत विपरीत छल। पिता श्री सत्य नारायण जरूर मुदा, सब चीजले खगले रहैत छलाह। एकटा प्राइवेट स्कूलमे अध्यापण कार्य करथि आ कोनो तरहेँ बाल-बच्चाकेँ पोसथि-पालथि। हुनकेर बालकक नाम पारस। नामक अनुरूप एकदम िवपरीत, मझौले कदक जवान देहो-हाथ सुखले-टटाएल कारी-झामर हाथ-पाएर एकदम सुखल-साखल मुदा, पेट जरूर कदीमा सन अलगल। देहो-वगेह ओहने, सदिखन जेना मुँससँ लेर चुविते छलै। फाटले-चिटले कोनो जूता-चप्पल पहिर ओही प्राइवेट स्कूलमे पढ़ैत छल। मुदा अकिलगल कम नहि। सत्य नारायणजीक घर जरूर बान्हेँ कातक सौ फिट्टा अर्थात् सरकारी जमीनमे छल, मुदा संस्कार कोनो सुसभ्य समाजक प्रतिक छल। सत्य नारायण बावूकेँ हरलैन्हि ने फुरलैन्हि खेलवा देलखिन पारसकेँ एकटा एकचारी देल चाहक दोकान। अर्थाभावक कारणे पारस उधार-पैंच लऽ कीनि अनलक चाहक दोकानक लेल बरतन-वासन यथा केटली, ससपेन, चाहछन्नी, स्टोव, दूध राखक लेल दूटा टोकना आ दूआ माटिक मटकुरी छाल्ही राखक लेल। चाहक दोकान जे नित्य समएसँ खुलैत आ बन्द होइत छल। क्रमश: महिसिक अगब दूधक चाह, एक्को ठोप पानिक छुति नहि, बरतन-वासन खुब पवित्र आ संस्कारी होएवाक कारणे ग्राहककेँ सेहो उचित सम्मान भेटनि। चाहक दोकान खुब चलनि। क्रमश: पॉंच सेर दूधक बदला आध-आध दूध खपत होमए लागल। आमदनी नीक होमए लगलैक। किछु पुंजी जमा केलाक बाद ओ एकचारी छोड़ि लऽ लेलक पक्काबला एकटा घर दोकान खोलए लेल। बना लेलक एकटा काउन्टर आ बढ़ा लेलक दोकानक मेल। साझु पहरकेँ बनाबए लागल सिंहहारा आ गरमा-गरम जिलेबी बात एककानसँ दूकान होइत गेलै एकर दोकानक नाम भऽ गेलै दोकान खूब चलए लागल। समए पाबि 26 जनवरी आ 15 अगस्तमे प्रसादक लेल विशेष आदर पावि बनाबए लागल मनक मन बुनियॉं आ भुजिया। अगल-बगलमे प्राइवेट कोचिंग चलौनिहार संचालक आ िनदेशक महोदयक योगदान एहि देाकनकेँ चलाबएमे अहम भूमिका रखलक। दिन दुना आ राति चौगुना उन्नति होमए लगलैक। मनक-मन दूध खपत होएवाक कारणे घी सेहो बनबाए आ नीक दाममे बेचाए। देखैत-देखैत चाहक देाकानक अामदनीसँ कीनि लेलक ओ तीन बीघा जमीन। मुदा एकर उपरान्तो ओ चाहो बेचाए आ पढ़बो करए। समए पाबि प्राइवेट स्कूलसँ सातमा पास कऽ ओ एकटा संस्कृत विद्यालयमे नाओ लिखा लेलक, आ मध्यमाक फारम भरि फस्ट डिविजनसँ पास केलक। आव तँ ओ किछु बेसिए खुश रहैत छल। मध्यमा पास केलाक बाद ओ अपन नाओ जनता काओलेजमे झंझारपुरमे लिखा लेलक। तखनो ओ वेचारा चाहो बेचए आ पढ़बो करए। आइ.ए. पास केलाक बादो ओकरामे कोनो परिवर्तन नहि। काओलेजसँ ऐलाक वाद चाहक दोकानपर ओ जमि जाए। यद्यपि चाह बेचब एकटा तेहन काज मानल जएतैक ई विवादक विषए अछि। ओकरा एक्को पाइ लाज-संकोच नहि। किएक तँ कर्म कोनो खराप नहि होइत छैक। कमा कऽ खाइ एहिमे कोन लाज कोनो कि ककरोसँ भिख मंगबै जे लाज होएत। तेँ चाह बेचब अधलाह काज नहि से मानि ओ खुब जतनसँ अपन कतर्व्यक निर्वहन करए। बुझिनिहार मैथिलमे एकर चर्च होमए लागल, जे देखू पारस चाहो बेचैए आ पढ़बो करैए। देखिते-देखति ओ मैथिली औनर्ससँ बी.ए. पास केलक। परोपट्टामे नाम भऽ गेलैक जे एकटा चाहबला चाह बेचैत बी.ए. पास केलकहेँ। तखनो ओ चाह बेचब नहि छोड़लक। बात पसरैत गेल। एकबेरि एकटा कथा गोष्ठीक मादे सुपौल जेबाक छल। चारि गोट मात्र कथाकार विदा भेलथि दिन अछैते मुदा, कोशी महरानीक अभिशापे नावसँ यात्रा करए पड़ल आ घंटा भरिक बाट मात्र चारि घंटामे तय भेल। सुपौलसँ पहिनहि झल अन्हार भऽ जरा सेहो गेल रही। तेँ चारू कथाकार चाह पिबाक लाथे बैसलौं एकटा चाहक दोकानपर। दोकानदारसँ- “हौ, चारि कप चाह िदहह।” ओ बाजल- “जी, श्रीमान् दै छी।” कहैत ओ चाहक जोगार लगबए लगल। “शान्ति यै शान्ति कतए नुकाएल छी यै फूलकुम्मरि?” शान्ति- “एलौं याए एलौं।” आंगनसँ शान्ति हाक दैत लग आिब सोझामे ठाढ़ि होइत पुन: बाजि उठैत छथि- “कथीले एतै जोर-जोरसँ हाक दैत छलौं? कोनो खास बात छै की?” हम- “ऐह, अहॉंकेँ तँ सदिखन मजाके सुझाइत अछि। खास बात की रहत, अहॉं छी तँ सब खासे बात बूझु। ओना आइ विद्यालयक छुट्टी समाप्त भऽ गेल तेँ झब दऽ खाइले किछु बनाउ। जे हम समएसँ विद्यालय चल जाएव।” शान्ति बजलीह- “ओ..., आब ने बुझलहुँ। अहॉं तँ सब दिन गोलहे गीतकेँ गबै छी। ओना हे, आइ बड्ड सखसँ अपनहि बाड़ीसँ सुआ आ लौफक साग काटि अनलहुँहेँ। तेँ आइ साग-भात आ आल्लुक सानाक संग भाटा-अदौरीक तीमन बनवितहुँ से निआरने रही। मुदा ताहिमे तँ देरी होएत। तावत अहॉं स्नान-पूजा करू आ हम जलखैक ओरिओन कऽ दैत छी।” “बेस, बड्ड बढ़ियॉं। कने अंग-पोछा आ धोती-कुरता बहार कऽ दिअ।” हम धोलूकेँ हाक दैत छी- “धोलू हौ धोलू। कतऽ छह हौ?” “ऐलौं, याए ऐलौं बावू जी, कने नदी फीरि रहल छी।” “वेस, बड्ड बढ़ियॉं। आ वौआ, है सुनै छह? आइ हमरा विद्यालय जेवाक अछि। से जात हम स्नान करै छी। तात् तौं साइिकलकेँ बढ़ियॉं जेकॉं झारि-पोछि दाए।” ई कहैत हम स्नान करबाक लेल डोल-लोटा लऽ कलपर चलि जाइत छी। स्नानोपरान्त पूजा-पाठ कऽ धोती पहीिर तैयार होइते छी तात् शान्तिक आग्रह- “सुनै छी, अहॉंले जलखै निकालि देने छी, कऽ लिअ।” ई कहैत आगॉंमे सिकीक चंगेरी, जे रंग-विरंगक रंगसँ रंगल मुजसँ बनौल गेल रहए, ताहिमे मुरही-चूड़ा, दूटा चूड़लाइ आ गोर पाँचेक तीलक लाइ संगमे कॉंच मेरचाइ आ नोन परसल छल, आगॉं बढ़ौलनि। एक क्षणक लेल हम मिथिला, मैथिल, मैथिलक संस्कार आ स्भयतासँ बहुत बेसी आनन्दित भेलहुँ। मन गद्-गद् भऽ गेल। तात् शान्तिक मधुर आवाज- “कतए हेरा गेलहुँ? एखन यएह खा, विद्यालयसँ भऽ आउ, जखन आएव तँ गरमे-गरम साग, भात, अल्लुक साना अा भाँटा-अदौरीक तीमन भरि मन खाएव। ओना जाड़ मास छै यदि किछु आरो मनमे हुअए तँ कोनो हर्ज नहि।” कहैत, हँसैत सोझासँ अढ़ भऽ गेलीह। आ हम जलखै करैत एहि मादक अदाक मादे सोचए लगलहुँ। हमरो मनमे गुदगुदी लागए लागल। जलखै करैत एक बेरि पुन: हाक देलिऐनि- “शान्ति, यै शान्ति....।” नहि जानि जे हुनको मनमे कोनो बात उमरि रहल छलन्हि। ओ गुनगुनाइत ई गीत- “एगो चुम्मा दे दऽ राजा जी, बन जाइ जतरा....।” आवि वाणभटक नायिका जेकॉं लगमे सटि कऽ ठाढ़ि होइत प्रेमानुरूप एकटा चुम्मा लऽ छथि आ मुस्की दैत घरसँ बहार भऽ जाइत छथि। हम लजा जाइत छी। करीब चालीस मिनटक उपरान्त विद्यालय पहुँचैत छी। हाथ-पएर धोलाक वाद हाजरी बनवैत छी। प्राथनाक घंटी बजैत अछि आ धिया-पूताक संग हमहुँ एक पातिमे ठाढ़ भऽ जाइत छी। उपरान्त ऐकर नवम्-बी मे हमर वर्ग रहैत अछि। हाजरी बही लऽ वर्गमे प्रवेश करैत छी। वर्ग नवम बी जे एकछाहा लड़कीएक वर्ग रहैत अछि, स्वागतार्थ सभ बच्चिया उठि कऽ ठाढ़ि भऽ जाइत अछि। वैसबाक आदेश पावि यथास्थान सभ बैसि जाइत अछि। सबहक हाजरी लेब सम्पन्न होइत अछि। तखन किछु बच्चिया सभ बाजि उठैत अछि- “मा-साएब, आइ ललका पाग पढ़बियौ, क्यो कहति अछि जी नइ सर आइ ग्रेजुएत पुतोहू पढ़बियौ। मुदा किछु खास बच्चिया यथा- राखी, गीतांजली, खुसवू, बबिता, रिंकी आ पिंकी कहि उठैत अछि- “जी नै सर आइ अहॉं अपने िलखल कोना कथा कहियौ। आ हम ओहि आग्रहकेँ नहि टारि पबैत छी। शुरू कऽ दैत छी अपन लिखल ई कथा- .....पारस।” मॉं मिथिलाक गोद आ कमला महरानीक कछरिमे बसल एकटा गाम दीप-गोधनपुर। जाहिमे छल एकटा चाहबला ओकर नाम छल पारस पिता श्री सत्य नारायण जी। नामक अनुरूप दुनू बापूत विपरीत छल। पिता श्री सत्य नारायण जरूर मुदा, सब चीजले खगले रहैत छलाह। एकटा प्राइवेट स्कूलमे अध्यापण कार्य करथि आ कोनो तरहेँ बाल-बच्चाकेँ पोसथि-पालथि। हुनकेर बालकक नाम पारस। नामक अनुरूप एकदम िवपरीत, मझौले कदक जवान देहो-हाथ सुखले-टटाएल कारी-झामर हाथ-पाएर एकदम सुखल-साखल मुदा, पेट जरूर कदीमा सन अलगल। देहो-वगेह ओहने, सदिखन जेना मुँससँ लेर चुविते छलै। फाटले-चिटले कोनो जूता-चप्पल पहिर ओही प्राइवेट स्कूलमे पढ़ैत छल। मुदा अकिलगल कम नहि। सत्य नारायणजीक घर जरूर बान्हेँ कातक सौ फिट्टा अर्थात् सरकारी जमीनमे छल, मुदा संस्कार कोनो सुसभ्य समाजक प्रतिक छल। सत्य नारायण बावूकेँ हरलैन्हि ने फुरलैन्हि खेलवा देलखिन पारसकेँ एकटा एकचारी देल चाहक दोकान। अर्थाभावक कारणे पारस उधार-पैंच लऽ कीनि अनलक चाहक दोकानक लेल बरतन-वासन यथा केटली, ससपेन, चाहछन्नी, स्टोव, दूध राखक लेल दूटा टोकना आ दूआ माटिक मटकुरी छाल्ही राखक लेल। चाहक दोकान जे नित्य समएसँ खुलैत आ बन्द होइत छल। क्रमश: महिसिक अगब दूधक चाह, एक्को ठोप पानिक छुति नहि, बरतन-वासन खुब पवित्र आ संस्कारी होएवाक कारणे ग्राहककेँ सेहो उचित सम्मान भेटनि। चाहक दोकान खुब चलनि। क्रमश: पॉंच सेर दूधक बदला आध-आध मन दूध खपत होमए लागल। आमदनी नीक होमए लगलैक। किछु पुंजी जमा केलाक बाद ओ एकचारी छोड़ि लऽ लेलक पक्काबला एकटा घर दोकान खोलए लेल। बना लेलक एकटा काउन्टर आ बढ़ा लेलक दोकानक मेल। साझु पहरकेँ बनाबए लागल सिंहहारा आ गरमा-गरम जिलेबी बात एककानसँ दूकान होइत गेलै एकर दोकानक नाम भऽ गेलै दोकान खूब चलए लागल। समए पाबि 26 जनवरी आ 15 अगस्तमे प्रसादक लेल विशेष आदर पावि बनाबए लागल मनक मन बुनियॉं आ भुजिया। अगल-बगलमे प्राइवेट कोचिंग चलौनिहार संचालक आ िनदेशक महोदयक योगदान एहि देाकनकेँ चलाबएमे अहम भूमिका रखलक। दिन दुना आ राति चौगुना उन्नति होमए लगलैक। मनक-मन दूध खपत होएवाक कारणे घी सेहो बनबाए आ नीक दाममे बेचाए। देखैत-देखैत चाहक देाकानक अामदनीसँ कीनि लेलक ओ तीन बीघा जमीन। मुदा एकर उपरान्तो ओ चाहो बेचाए आ पढ़बो करए। समए पाबि प्राइवेट स्कूलसँ सातमा पास कऽ ओ एकटा संस्कृत विद्यालयमे नाओ लिखा लेलक, आ मध्यमाक फारम भरि फस्ट डिविजनसँ पास केलक। आव तँ ओ किछु बेसिए खुश रहैत छल। मध्यमा पास केलाक बाद ओ अपन नाओ जनता काओलेजमे झंझारपुरमे लिखा लेलक। तखनो ओ वेचारा चाहो बेचए आ पढ़बो करए। आइ.ए. पास केलाक बादो ओकरामे कोनो परिवर्तन नहि। काओलेजसँ ऐलाक वाद चाहक दोकानपर ओ जमि जाए। यद्यपि चाह बेचब एकटा केहन काज मानल जएतैक ई विवादक विषए अछि। ओकरा एक्को पाइ लाज-संकोच नहि। किएक तँ कर्म कोनो खराप नहि होइत छैक। कमा कऽ खाइ एहिमे कोन लाज कोनो कि ककरोसँ भिख मंगबै जे लाज होएत। तेँ चाह बेचब अधलाह काज नहि से मानि ओ खुब जतनसँ अपन कतर्व्यक निर्वहन करए। बुझिनिहार मैथिलमे एकर चर्च होमए लागल, जे देखू पारस चाहो बेचैए आ पढ़बो करैए। देखिते-देखति ओ मैथिली औनर्ससँ बी.ए. पास केलक। परोपट्टामे नाम भऽ गेलैक जे एकटा चाहबला चाह बेचैत बी.ए. पास केलकहेँ। तखनो ओ चाह बेचब नहि छोड़लक। बात पसरैत गेल। एकबेरि एकटा कथा गोष्ठीक मादे सुपौल जेबाक छल। चारि गोट मात्र कथाकार विदा भेलथि दिन अछैते मुदा, कोशी महरानीक अभिशापे नावसँ यात्रा करए पड़ल आ घंटा भरिक बाट मात्र चारि घंटामे तय भेल। सुपौलसँ पहिनहि झल अन्हार भऽ जरा सेहो गेल रही। तेँ चारू कथाकार चाह पिबाक लाथे बैसलौं एकटा चाहक दोकानपर। दोकानदारसँ- “हौ, चारि कप चाह िदहह।” ओ बाजल- “जी, श्रीमान् दै छी।” कहैत ओ चाहक जोगार लगबए लगल। तात् ओतए गप्प कियो तेसरे आदमी चलौलन्हि। जे गोधनपुर गाममे एकटा चाहबला अछि पारस बी.ए. पास। बी.ए. पास केलाक बादो ओ चाह बेचब अधला नहि बुझैत अछि। चाहो ततवेक सुन्दर आ व्यवहारो ओकर ततवेक सुन्दर छै। वाह। हर्ष भेल जे समाजकेँ एहि वातक नजरि जरूर छैन्हिह जे एकटा पढ़ल-लिखल लोक चाह बेचैत अछि। ओकर नजरिमे कोनो काज करबामे हर्ज नहि। एम्हर देखु जे वर्तमान सरकारमे नगर-पंचायत, जिला परिषद, टेन पलस टू विद्यालयमे नियोजनक भेकेन्सी भेल। तात पारस मैथिलीसँ एम.ए. सेहो कऽ लेलक। भैकेन्सीक अनुसार विभिन्न जिलामे आवेदन केलक। समए तँ जरूर लागल। मधुबनी जिलाक मेघा सुचीक प्रकाशित भेल उपरहिमे ओकर नाम छलै। नियोजनक निमित्त सभ आवश्यक कागजात, मूल प्रमाण पत्र एवं शपथ पत्र देलाक वाद ओकर चयन इच्छानुकूल परियोजना विद्यालय मनसापुरमे मैथिलीक लेल भेल। समाजक सभ वर्गकेँ एहि बातसँ हर्ष भेल जे सत्यनारायण जीक बालक पारस आइ टेन पलस टू विद्यालयमे मैथिली पद्पर नियोजित भेलाह। साझखन सभ ओही चाहक दोकानपर उपस्थित भऽ पारस आ हुनक पिता सत्य नारायणजीकेँ सभ शुभकामना आ बधाइ दैत कहलकनि- “सत्य नारायण आव ओना काज नहि चतल, आव भोज-भातक आयोजन कएल जाउ। भोज लागत।” सत्य नारायण आरो अह्लादित होइत बजलाह- “सभ एहि समाजक आशीर्वाद थिक। अहीं सबहक अशीर्वाद थिक जे आइ पारस चाह बेचैत-बेचैत एकटा टेन-पलस टू विद्यालयक शिक्षक भेल। हम एहि समाजक ऋृणी थिकहूँ। आइ जे समाज नहि तँ हमर कोनो अस्तित्व नहि। आइ हमहूँ गौरवान्वित भऽ रहल छी जे हमर बेटा हमरे बेटा नहि एहि समाजोक बेटा। जे एहि समाजमे सिर उठा कऽ जिवक, एकटा अलग स्वाभिमान देलक। एकटा आदर्श देलक। तेँ हम भोज देवेटा करब। भोज जरूर करब।” समए सुअवसर पावि सत्यनारायण बावू केलनि बड़का भोजक आयोजन। लगुआ-भगुआ हित अपेक्षित मित्र-बन्धु आदि एहि भोजमे नहि छुटथि आ हुनकर उचित सम्मान हुअए एहि बातक सदिखन खियाल रखलनि। दुनू तरहक आयोजन छल, शाकाहारी आ मांसाहारी। निमंत्रित व्यक्ति सभ समएसँ उपस्थित भऽ आ स्वरूचि भोजन केलनि। शाकाहारीक लेल आयोजन छल। पुरान तीन-सलिया बासमती चाउरक भात, राहरीक दालि आमिल देल, पालक पूड़ी, पालक पनीर, आमक चटनी, सलाद, तरल मिरचाइ, मटर-आलू-परोर देल डलना, बड़ी अदौड़ी, सकरौड़ी ताहिपर डब्बूक डब्बूक घी। महीसीक अगव दूधक तौलाक-तौला दही, तरहत्थी सन मोट छाल्ही बुझु तँ खेनिहार तर आ भोजेतक व्यवस्था उपर। दहीक तँ कथा नहि पुछू खेनिहार कम आ तौले बेशी। सभ क्यो गद्-गद् भऽ गेलाह। एम्हर मांसाहरी लोकनिकेँ लेल अरवा चाउरक भात आ आध-आध मनक जुआएल खस्सीक लद-वद करैत मांस। किसिम-किसिमक मश्साला देल गम-गम करैत एकहक टा पीस बुझू जे सए-डेढ़ सए ग्रामक। ऐह अजोध खस्सी, माउस। बनलौ ततवेक सनगर। सभ भरि मन खएलाह। आ उपरसँ सेरक सेर दही फी आदमीपर। तर-बत्तर छलाह, भोज तँ जस-जस भऽ भेल। सभ कियो भोजनो करथि आ पारसक चर्चो करथि। जे पारस तँ पारसे अछि। वस्तुत: पारस आब ओ पारस नहि रहल जे चाह मात्र बेचै छल। चाहे बेचेत ओ पारस तँ आव समाजक लेल ओ पारस भऽ गेल। जेकर गुणसँ कतेको नेना-भूटका आव चाहेटा नहि बेच समाजक बीच शिक्षाक ज्योति जगाओता। जाहिसँ अपना समाजमे पारस, पारस मणि गुणसँ प्रभावित होएत आ पारसक गुणसँ अपना समाजक कतेको बच्चा पारस बनताह। अन्तत: बाउ लोकनि अहीं सभ कहू जे अहॉं सभ घर आंगनाक काज करैत पढ़ि लिखि की बनए चाहैत छी?” एक स्वरमे उत्तर भेटैत अछि मास्सैव हमहूँ पारस बनवै पारस। कहैत सभ बच्चियाक संग राखी, गीतांजली, खुशवू, बवीता, रिंकू, पिकूक नोरसँ भरल ऑंखिमे एकटा विशेष आत्म विश्वास हमरा वुझना जाइत अछि। जेना ओ प्रखर ज्योति बहराएल हुअए अनमोल मोती पारससँ। बुढ़िया फूसि किछु कहैत संकोच नहि, लाजो नहि होइत अछि जेना निर्लज्ज भऽ गेल छी। आँखिक पानि जेना सुखि पड़ल हो। एहन बुझना जाइत अछि जेना द्वापरेसँ अथार्थ ६३जन्म पहिनहिसँ फूसिक खेती करैत आिव रहल छी, निश्तुकी बाप-पुरखा सेहो एहेने सिद्धस्त खेतिहर हेताह। मुदा उपजा ताहि समएमे कम होइत छल, आ आइ बुझू जे बोड़े कट्ठा फूसि सभठाँ उपजि रहल अछि। आ सभ सभ दिन सभठाम फूसिये फूसि बाजि रहल हो। यर्थातोमे २६जनवरी हो या १५अगस्त, एहनो राष्ट्रीय पावनिक सुअवसरोपर बाजव हमरा लोकनि अपन जन्म सिद्ध अधिकार बुझैत छी। सरकारी वा कोनो गैर सरकारी कार्यालय किएक ने हो, राष्ट्रक सम्मानक अढ़मे अपमान करब हमरा लोकनि नहि विसरि पवैत छी। िसया लैत छी बेस नम्हर-चारि मीटर खादीक एकटा डलगर कुर्त्ता, एक गोट पैजामा आ एकटा गाँधी टोपी। आध सेर सुतरी दू जिस्ता सभ रंगक कागत आ कागतेक बनल प्लेट। उज्जर आ ईंटा रंगक बुकनी, पुरने झंडाकेँ साफ-सुथरा कऽ किछु फूल लऽ सए-पचास झूठाक समक्ष झंडोतोलनक वाद छोड़ए लगैत छी, फूसिक गपौड़ी। अनेने व्यर्थ- किएक तँ आत्मासँ एहेन कोनो गप्प नहि जे स्वीकार करैत हो, मुदा अनेरे ठोर पटपटा-पटपटा अपनाकेँ सूच्चा देश भक्त, कर्मठ, सुयोग्य, इमानदार पदाधिकारी वा कर्मचारी सावित करए लगैत छी- फूसिक बखारी खोलि दैत छी। एकसँ बढ़ि कऽ एक फूसि बजैत छी झुट्ठा सभ थोपड़ी बजवैत अछि। उहो थपड़ी पारए लगैत अछि। फूसिए चन्द्रशेखर आजाद, गाँधी, नेहरू, भगत सिंह, उधम सिंह, सुभाष आदिक नाम लऽ बच्चा सभकेँ फूसलाबए चाहैत छी। फूसिये राष्ट्रक विकासक लेल छिट्टाक-छिट्टा सप्पत किरिया खाइत छी। किरिया खाइत-खाइत ने तँ पेट भरैत अछि आ ने मुँह दुखाइत अछि। एकरो एकटा कारण अछि जे हमरा लोकनि पुस्तैनी झुट्टा छी। सालमे तीन-चारिटा एहेन पावनि तँ जरूर अबैत अछि जे भरि मन फूसि बजैत छी से कोनो की चोरा कऽ नै यौ िचकरि-िचकरि फूसि बजैत छी। आ फूसियाही सभ सुनैत रहैत अछि। मुदा जखन सेबै-बुनियाँ रूपी प्रसादक तलक लगैत अछि तखने फूसिक सप्पत खा विराम लैत अछि। तत्पश्चात बुनियाँ-भुजिया खा तृप्तिक ढेकार लऽ उगरलाहा बुनियाँ-भुजिया रूमालमे बान्हि अपन-अपन जन्म स्थानपर अबैत छी। कहूँ जे एहेन तरहक जे व्यर्थ बातक संभाषण करब कहाँ तक उचित? राष्ट्रकेँ ठकब कि अपने ठकाएव नहि थिक। कि फूसि बाजि अपने आपकेँ नहि परतारि रहल छी? राष्ट्र ध्वजक समक्ष लेल यएह सभटा सप्पत साँच अछि आकि बुढ़िया फूसि? सत्ते- ई थिक बुढ़िया फूसि। दुर्गानन्द मंडलक समस्त मैथिलक लेल राखीक शुभकामना ओना तँ अपन देश सभ दिनेसँ पावनिये तिहारक देश रहल अछि। जतए सभ दिन कोनो ने कोनो पावनि-तिहार मनाओल जाइत अछि। आइ होली, तँ काल्हि दीवाली, परसू दुर्गापुजा, तँ तरसू कालीपूजा। आइ अनन्त चतुरदशी तँ काल्हि नरक-नरावन चतुरदशी। आइ भ्रातृ द्वितिया तँ काल्हि जितिया, आइ शनियाही घड़ी, तँ काल्हि बुधवारि घड़ी। कहियो सिर पंचमी, कहियो वसन्त पंचमी। तातपर्य सालो भरि सभ दिन पावनिए-पावनि। जहिमे सभ पावनिकेँ एकटा अलग महत्व होइत अछि। कोनो पावनि रंग-अबीरसँ जुड़ल होइत अछि तँ कोनो अटूट भक्तिसँ। कोनो पावनि साँए-बेटासँ जुड़ल अछि तँ कोनो भाए-भतीजासँ, ओहि पावनिमे अपना देशमे रक्षा बन्धनक एकटा खास लौकिक तथा अलौकिक दुनू तरहक महत्व होइत अछि। तँ भारतक पावन पावनिमे रक्षा बन्धन अति पावन मानल गेल अछि। जहि पावनिमे कलाइपर धागा बान्हव भृकूटिक बीचमे टीका लगाएव आ मुँह मीठ कराएव देखल जाइत अछि। औझके दिन बहीन अपन भायक गट्टापर राखीक धागा बान्हि अपन रक्षाक दान लैत अछि। एकटा समए छलै जे युद्धक समएमे एकटा बहीन मुसलमान भाइक गट्टापर राखी बान्हि अपनाकेँ सुरक्षित बुझैत छल। किएक तँ एक भाय अपन बहीनक सतीत्वक ओकर मान-मर्यादाक रक्षा जरूर करत। परन्च मनुक्ख तँ पूर्ण समर्थ छथि नहि। नहि जानि जे एकर बादो कतेको माए-बहीनक लाज लुटल गेल हएत। आ लुटल जाइए। वास्तवमे एहि अपवित्र वृति, दृष्टि आ कृतिकेँ पवित्र बनाबए पड़त। आर मन, वचन, कर्मसँ पवित्र रहि सभसँ अपन बहीनक समान बर्ताव करए पड़त। रक्षा बन्धनक रहस्यकेँ जानए पड़त, मानए पड़त। आजूक तारीखमे एहि बातक खगता अछि जे बहीनो आइक तारीखमे अपन भायसँ कोन प्रकारक रक्षा चाहैत छथि? तनक रक्षा, धर्मक रक्षा, सतीत्वक रक्षा आदि महत्वपूर्ण तत्व अछि। आइ एकपेरिया धेने, चूप-चाप चलैत एसगरूआ बहीनकेँ एहि बातक सदिखन आशंका बनल रहैत छैक जे क्यो आसूरी प्रवृतिबला लोक रावण बनि ओकर लोक-लाजकेँ समाप्त ने कऽ दै। एहि लेल सभ बहीनक तरफसँ हम राखीक शुभ अवसरपर सभ भाइसँ दान स्वरूप ई लेबए चाहैत छी जे ओ अपन आसूरी प्रवृति, क्रोध, लोभ, मोह आदि दान कऽ दथि। जाहिसँ हम अवला बहीनकेँ ई बुझना जाएत जे हमर पवित्रता, हमर सतीत्व, हमर मान-मर्यादा सदिखन सुरक्षित अछि। आ हमरा एक-आधटा नहि अपितु संसारक सभ पुरूष भाय बनि हमर रक्षकक रूपमे सभठाम ठाढ़ छथि। ओना परम-पिता परमात्मा सभ आत्माक पिता छथि। सबहक रक्षक पालक वएह छथि। हुनका समक्ष स्त्री-पुरूषक देहकेँ कोनो भेद नहि छै। एहि हेतु हम समस्त मैथिल आ मैथिली प्रेमीसँ हमर रक्षा-सिनेह रूपी बन्धन स्वीकार करू। परमात्मा अहाँक जीवनमे, शांति, शुभभावना, सिनेह, सहानुभूति, मधुरता पवित्रता आदि गुणसँ भरने रहथि। ई हमर शुभभावना अछि। आऊ एहि अमुल्य पावनिमे आत्मीक राखी अपन-अपन गट्टापर बान्हि, आत्म चेतनाक टीका लगा आ मीठ-मीठ बोलक मधुरसँ अपन मन आ आत्माकेँ मीठ राखी। उमेश मंडल रोहनियाँ आम ओसारक ओछाइनपर सुतल सुगियाकेँ भोरहरबेमे निन्न टुटि गेल। निन्न टुटिते आंगन दिस तकलक। अमावश्याक बारह बजे रातिक अन्हार तँ नहि मुदा ओहिसँ कने साफ-फरिच्छ देखि तीनि बर्खक बेटा डोमनाक मँुह देखलक। मन कनए लगलै नीन टुटलापर की खाइले देबै..... साँझे सुति रहल तेँ ने, नै तँ रातियोमे कनैत।’’ दुनू हाथसँ दुनू आँखि मीड़ि ओछाइनसँ उठि, बाढ़नि लऽ आंगन बहारए लगल। एहि आशाक संग जे नहि बहारने लछमीक बास नहि होइत छनि। मनमे उठलै, भोरसँ लऽ कऽ आध पहर राति धरि खटै छी तइयो दुनू साँझ चुल्हि नहि पजडै़त अछि। भुखल जिनगी जीवैसँ नीक बिनु दुख कटने मरि जाएब नीक। कोन लोभे जीवै छी। एत्तेटा दुनियाँमे हमर किछु नहि छी? जँ किछु नहि छी तँ रहब कतए? जँ रहौ चाहब तँ रहए के देत? विस्मित भऽ सोचैत टाटक खूँटामे बाढ़नि झाड़ि रस्ता दिशि देखए लगल। ओछाइनपर पड़ल गुलेतीक मनमे नचैत जे ने एको धुर खेत अछि जइमे खेती करब आ ने गाममे काज लगैत अछि जे खटियो कऽ गुजर करब। सरकारो तेहन धौंछ अछि जे घरारीक लेल चारि डिसमिल कि दू डिसमिल देत से जोड़िनिहारे ने कियो छैक। तखन ककरो घरारियो कना हेतइ। सोगक तर गुलेतीक मन पिचाए लगलै। मुदा तरे-तर बुद्धि ससरि बहराए गेलै। बुद्धिकेँ बहराइतै आंगन दिस तकलक तँ मन पड़लै चान। जहि ठाम लोक पहुँच रहल अछि। मनमे खुशी एलै जे एहिठामसँ नीक बास ओइठीन हएत। केहन शीतल जगह, मड़कड़ीक इजोत सन इजोत। अशोभक गाछ तर बुढ़िया टौकरी कटैए। मुदा लगले मन कसाइन हुअए लगलै। जहि चान सन रुपक आ अंगूर सन फलक बेटीक पाछु कते कोठा-कोठी, खेत-पथार डूबि गेल तेकर तयात नहि। अंगनाक मुहथरिये लगसँ सुगिया डोमन दिशि तकलक। मातृत्व जगलै। बाढ़िनिकेँ टाटक कातमे रखि बेटा लग आबि बैसलि। हवाक झोंक मनमे लगलै। अनायास मुँहसँ निकलए लगलै... नीन टुटतै कनिते उठत। साँझे सुति रहल तेँ ने, नइ तँ रातिमे सुतैयो नइ दइते। जेकरा दस मास पेटमे रखलौं तकर नोरो पोछै जोकर नइ छी। छातियो छुट्टिये गेले नइ तँ छतिये लगा लैतिऐक। तहि काल डोमन कनैत उठल। पुचकारि कऽ सुगिया कोरामे वैसाए कहलक- ‘‘धान रोपै जेबै। तइमे धान फड़तै। धान काटि अनवै। तेकर चूड़ा कुटबै। नीकहा थारीमे वौआकँे आम-चूड़ा देवई। वौआ हमर खेतै। माइयक गीति सुनैत-सुनैत डोमन चुप भऽ बाजल- ‘‘हमहूँ धान रोपए जेबउ।’’ मुस्कुराइत सुगिया बाजलि- ‘‘ताबे बुलू-भाँगू। लगले हम अबै छी।’’ सुगियाकेँ मन पड़ल रहै रोहनिया आमक चोकर। जेठक रोहणि नक्षत्र। वर्खा नहि भेने सुपक तँ नहि मुदा रौद-पक्कू रोहनिया पकै लगल। घरसँ थोड़वे हटिकेँ एकटा गाछी। आम नहि पकने बगवार नहि रहैत। आठ-दस दिनसँ चोकर सभ खसैत। जे सुगियाकेँ बुझल। तहूमे काल्हि एकटा पाकल सेहो भेटल रहै। ओहि आशासँ सुगिया गाछी गेलि। गाछक उपरमे कौआ सभ आँखि गुरेड़ि-गुरेड़ि पकलाहा आम तकैत रहए। कौआक लोल मारल दूटा आम खसल। दुनू आम नेने हँसैत सुगिया आंगन आबि बेटाकेँ दैत पुछलक-‘‘कोन आम छियै बौआ?’’ डोमन बाजल- ‘‘लोहनिया।’’ जेहन मन तेहन जिनगी सभ दिनेक समयानुसार एकटा साधु सबेरे स्नान करए लेल नदीक पानिमे पैसलाह। डॉंड़ भरि पानिमे पहुँच पूब मुँहे सूर्य दिस तकलनि। जहिना माटिक तरक बीजक अंकुर बीजसँ निकलि धरतीक उपर अबैत रहैत तहिना सूर्यो अन्हारक गर्भसँ निकलि अकास दिशि चढ़ैत रहथि। जहिना धरतीक उपरका परत अंकुरक पाग सदृश्य बनि जाइत तहिना सूर्यक िकरिण अन्हारक पाग पहीिर लेलक। तहि काल ओ साधु एकटा मुसरी माने चुहियाकेँ पानिक बेगमे भसैत अबैत देखलनि। अवग्रहमे पड़ल मुसरीकेँ साधु हाथसँ उठा उपर आिब राखि पुन: स्नान करए पानिमे पैसलाह। स्नानक उपरान्त ओकरा अपना संगे कुट्टीमे अनलनि। कुट्टीमे मुसरी रहए लागलि। साधुक क्रिया-कलाप देखैत िकछु मासक उपरान्त मुसरी नमहर भेलि। ओकरो साधुक बरदान पबैक मन भेलइ। अबसर पाबि मुसरी साधुकेँ कहलकनि- ‘‘आब हम जुआन भेलौं। जुआनक पछाति बूढ़ि हएब। बूढ़ि भऽ मरि जाएब। मुइलाक पछाति तँ वंश समाप्त भऽ जाएत। तेँ विआह करा दिअ?’’ सूर्यकेँ देखबैत साधु कहलखिन- ‘‘एकरासँ िवआह करब?’’ आिग जेकॉं धधकैत सूर्यकेँ देखि मुसरी बाजलि- ‘‘ओ तँ आिगक गोला छयैक। हमरा शान्त स्वभावक चाही।’’ बादलकेँ देखबैत साधु कहलखिन- ‘‘ओ तँ ठंढ़ो अछि आ सूर्यसँ नम्हरो अछि। देखैते छहक जे सूर्योकेँ झॉंपि दैत छन्हि?’’ मुसरीक मनमे नहि जँचल िकऐक तँ ओहूसँ नम्हर पति जाचैत छलि। बाजलि- ‘‘नहि, ओहूसँ नमहरसँ करा दिअ।’’ पवनकेँ देखबैत साधु कहलखिन- ‘‘ओ तँ बादलोसँ नमहर अछि। िकएक तँ बादलोकेँ ऐम्हरसँ ओम्हर उड़बैत अछि।’’ मुसरीकेँ ओहो पसिन्न नहि भेल। अपन नापसन्दगी साधुकेँ जनौलक। तखन मुस्कुराइत साधु पहारकेँ देखबैत कहलखिन- ‘‘ओ तँ पवनोकेँ रोकि दैत अछि।’’ फेरि अपन नापसन्दगी मुसरी व्यक्त केलक। तखन पहाड़मे िबल खुनैत मूसकेँ देखबैत साधु पुछलखिन। मुसरीकेँ पसिन्न भऽ गेल। चौवन्नियॉं मुस्की दैत बाजलि- ‘‘विल्कुल पसिन्न अछि। कदो एकरंगाहे अछि। छोट कद रहितहुँ। पहाड़केँ खुनि खोखला बनाओत। जखने पहाड़ खोखला बनत तखने जेमहर गुड़कबैक मन हेतइ तेमहर गुड़कौत।’’ मूसकेँ बजा मुसरीसँ विआह करबैत बरिआती सभकेँ साधु कहलखिन- ‘‘जिनगीमे सभकेँ एहिना रंग-विरंगक अवसर अबैत अछि। मुदा, ओ अपन मनेक अनुरूप अपन पति चुनि जिनगी िवतबैत अछि।’’ निर्मलीसँ जनकपुर धाम प्राय: बच्चेसँ जनकपुर धाम जेबाक जिज्ञासा छल जे आयोजित कथा गोष्ठी ‘‘सगर राति दीप जरय’’ क 69म खेपमे शामिल भऽ 3 अप्रैल 2010 केँ पूरा भेल। जहिसँ दोहरी खुशी भेटल। चारिए बजे भोरमे निर्मली टीशनपर पहुँचलहुँ। करीब पॉंच बजे गाड़ी खुजल आ समएसँ सकड़ी टीशनपर उतरलहुँ। सकड़ीसँ जयनगरक मेल नहि रहने मेक्सी पकड़ि मधुबनी गेलहुँ। मधुबनीसँ पुन: मेक्सी पकड़ि कलवाही, नगर कोठी होइत जयनगर गेलौं। तखन ढाइ बजैत रहै। जयनगरसँ जनकपुर लेल नेपाली ट्रेन तीन बजेमे खुलत से जानकरी भेल। तहि बीच हमसभ भोजन केलौं आ समएसँ अबिब ट्रेनमे बैसि रहलौं। मैक्सीमे जखन भीड़ आ गुमारसँ परेशान रही तँ मनमे हुअए जे कोनो तरहेँ जयनगर तक पहुँचक अछि। ओइठॉंसँ तँ ट्रेनक यात्रा रहत। मुदा, ट्रेनक नमती आ भीड़ देखि हुअए जे बसे जेकॉं हाल हएत। सएह भेल। मुदा, तइयो मनमे खुशी रहए िकएक तँ दस-बारह गोटाक संगवे रहए जहिसँ यात्रामे कोनो कठिनाइ नहि बुझना गेल, भरि रस्ता गप-सप्प चलैत रहल। नव कथाकारक संग-संग श्री जगदीश प्रसाद मंडल आ श्री राजदेव मंडल सेहो संगमे रहथि, जे हमरा सबहक लेल सौभाग्य छल। गोसॉंइ लुक-झुक करिते छल तावत् गाड़ी जनकपुर धाम पहुँचि गेल। ट्रेनसँ उतरि हमसभ रामानन्द युवा क्लब जेबाक लेल आगॉं बढ़लौं। िमथिला महोत्सवसँ जनकपुर भरि बाजारमे रमणीय वातावरण छल। जहिसँ चाह-जलपान केनाइ आकि रिक्सासँ गेनाइ सभ कियो िबसरि गेलाह। पएरे सभ बिदा भेलौं। देखैत-सुनैत समए रामानन्द युवा क्लबमे प्रवेश केलौं। दोसर मंजिलपर पएर दइते रही आकि श्री राजाराम सिंह राठौरजी भेंट भऽ गेला। हमरा सभकेँ देखते हाथ पकड़ि बड़ी अहलाद्सँ यथोचित स्थानपर लऽ गेलथि। उपस्थित साहित्यकार लोकनिकेँ देखि हर्ष भेल। दीप जरा गोष्ठिक शुभारम्भ भेल। संयोजक महोदय श्री राजाराम सिंह राठौर सभ व्यवस्था बड़ नीक जेकॉं कएने रहथि। कथा जानकीक नामसँ एकटा बैनर टांगल रहै। आदरणीय रमानन्द झा “रमण”जी पहिनहिसँ उपस्थित रहथि। गोष्ठीक संचालन आदरणीय फूलचन्द्र िमश्रजीकेँ देल गेलनि। गोष्ठिक शुरूहेँमे दर्जन भरि पोथीक लोकार्पण कएल गेल, जहिमे मौलाइल गाछक फूल (उपन्यास) आ िमथिलाक बेटी (नाटक)- जगदीश प्रसाद मंडल। भाग रौ आ बलचन्द्रा (नाटक)- िवभा रानी। हम पुछैत छी (कविता संग्रह)- विनीत उत्पल। नताशा (कॉंिमक्स)- देवांशु वत्स। अर्चिस (कविता संग्रह)- ज्योति सुनीत चौधरी। नेपथ्य (नाटक संग्रह) आ नैमिकानन (कथा संग्रह)- सम्पादक- रेबती रमण लाल। िमथिला सृजन (पत्रिका) सम्पादक ऋृषि बशिष्ठ। विदेह- कथा 2009-10, प्रबन्ध समालोचना 2009-10 आ विदेह पद्य 2009-10 सम्पादक गजेन्द ठाकुर जीक रहनि। एहि तरहेँ बारह गोट पोथीक लोर्कापणक शिलशिला करीब घंटा भरिक रहल। फोटोग्राफर सभ फोटो खिचलनि। तहिबीच चाह-जलपान सेहो चलल। रजिस्टरपर सभ कथाकार अपन-अपन उपस्थिति आ कथाक नाम दर्ज केलनि। पहिल कथा श्री सुरेन्द्र नाथ, दोसर श्रीमती िवजेता चौधरी, तेसर िवभूति आनन्द फेर िजज्ञासु जी, जगदीश प्रसाद मंडल, रौशन जनकपुरी, अरविन्द ठाकुर, ऋृषि बशिष्ठ, उमेश मंडल, रघुनाथ मुखिया, महाकान्त ठाकुर, चौधरी जयंत तुलसी, बेचन ठाकुर, कपिलेश्वर राउत, मनोज कुमार मंडल, खड़ा नन्द यादव, राजदेव मंडल, दुर्गानन्द मंडल इत्यादि तीस गोट कथाकार कथा पाठ केलनि। तीन-तीन कथाक पाली होइत छल। एक पालीक पठित कथापर समीक्षा होइत रहए। प्रखर समीक्षक डॉ. रामावतार यादव, डॉ राजेन्द्र िवमल, रौशन जनकपुरी, डॉ रमानन्द झा रमण, श्री हीरेन्द्र कुमार झा, श्री योगानन्द झा, श्री अजीत आजाद आदि अपन दृष्टिकोण दैत समीक्षा रखलखिन। ई शिलशिला राति भरि चलैत रहल। लागि रहल छल जे ई नव कथाकारक लेल ट्रेनिंग काॅलेज सदृश्य अछि। भिनसर छह बजे गोष्ठिक समापन भेल। अगिला कथा गोष्ठी 70म सगर राति दीप जरय केँ प्रस्ताव श्री योगानन्द झाजी रखलनि। आदरणीय रमानन्द झा रमण जीक संग-संग सभ साहित्यकार लोकनि सहर्ष एकरा स्वीकार केलनि। रजिस्टर आ दीप श्री राजाराम सिंह राठौर जी अगिला कथा उत्पल हेतु श्री योगानन्द झा जीकेँ देलनि। एकबेर सभ खुशी-खुशी थोपड़ी बजेलनि। अगिला कथा गोष्ठीक स्थान- कविलपुर लहेरियासरय (दरभंगा) तिथि- 12 जून 2010 संयोजक- श्री योगानन्द झा कबिलपुर (दरभंगा) रामानन्द युवा कल्व जनकपुर धाममे ३ अप्रैल २०१० 69म सगर राित दीप जरय- कथा गोष्ठीकेँ उद्दघाटन- डॉ रामावतार यादवकेँ द्वारा कएल गेल। संयोजक श्री राजाराम सिंह राठौर आ रामानन्द युवा कल्व रहथि। 12टा पोथीक विमोचनक कएल भेल 1 मौलाइल गाछक फूल (उपन्यास) जगदीश प्रसाद मंडल -- डॉ राजेन्द विमल -- -- श्री रामनन्द झा ‘‘रमण’’ 2 िमथिलाक बेटी (नाटक) जगदीश प्रसाद मंडल -- डॉ राजेन्द्र विमल -- श्री रामानन्द झा ‘‘रमण’’ -- 3 विदेह पद्द 2009-10 -- श्री हीरेन्द्र कुमार झा -- -- श्री रामानन्द झा ‘‘रमण’’ 4 िवदेह प्रवन्ध-समालोचना 2009-10 -- डॉ विभूति आनन्द -- -- 5 विदेह कथा 2009-10 -- डॉ विभूति आनन्द -- श्री अजीत आजाद -- 6 हम पुछैत छी (कविता संग्रह) विनीत उत्पल -- राम भरोस कापड़ि ‘‘भ्रमर’’ -- -- 7 भाग रौ आ बलचन्द्रा (नाटक) विभा रानी -- श्री अरविन्द ठाकुर -- -- 8 अिर्चस (कविता संग्रह) ज्योति सुनीत चाैधरी -- डॉ विभूति आनन्द -- -- श्री रामानन्द झा ‘‘रमण’’ 9 नताशा पहिल चित्र श्रंृखला देवांशु वत्स -- श्री प्रफूल कुमार मौन -- -- 10 नेपथ्य (नाटक) -- डॉ रेबती रमण लाल -- डाॅ रामावतार यादव -- -- -- 11 नैमिकानन (कथा संग्रह) -- श्री फूलचन्द्र िमश्र -- -- -- -- 12 िमथिला सृजन पत्रिका सम्पादक- ऋृषि बशिष्ठ -- डॉ राजेन्द्र विमल -- -- -- -- एहि तरहेँ दर्जन भरि पोथीक लोकार्पण भेल। आ एहि कथा गोष्ठीमे 30 टा कथाक पाठ भेल जाहिमे सभसँ खुशीक बात ई जे दजनोसँ बेसी नव कथा कारक उपस्थिति रहय। कथाकार आ कथाक नाम एहि तरहेँ छल- श्री सुरेन्द्र नाथ सुमन- संस्कृति श्रीमती विजेता चौधरी- भ्रूण िवभूति आनन्द- अरे जिज्ञासू जी- विवस्ता जगदीश प्रसाद मंडल- प्रेमी रौशन जनक पुरी- ऋृषि बशिष्ठ- जौवॉं उमेश मंडल- जेहन मन तेहन जिनगी रघुनाथ मुखिया- वंश महाकान्त ठाकुर- दियादी चौधरी ज्यंत तुलसी- के वुरि बेचन ठाकुर- पत्तावाली कपिलेश्वर राउत- सलाह मनोज कुमार मंडल- घासवाहिनी खड़ानन्द यादव- गहुमक बोड़ा दुर्गानन्द मंडल- लाल भौजी कबिलपुरक कथा गाेष्ठी मैथिली भाषा विकासक एक सशक्त माध्यम्- “सगर राति दीप जरय”क ७०म कथा गोष्ठि गत १२जून २०१०केँ डॉं योगा नन्द झाक संयोजकत्वमे रमा िनवास -कबिलपुर- मे सम्पन्न भेल। पं चन्दकान्त मिश्र “अमर” दीप प्रज्वलित कए संघ्या ७ बजे सुभारम्भ केलनि। कार्यक्रम आगॉं बढ़ौल गेल उद्घाटन सत्रसँ जेकर अध्यक्षता डॉं रामदेव झा आ मंच संचालन डाॅ मुरलीधर झा केलनि। मुख्य अतिथि डॉ सुरेश्वर झा मैथिली भाषाक भविष्य आ आवश्यकतापर प्रकाश देलनि। लोकार्पण सत्रक संचालन डॉ विभूति आनन्द केलनि। डेढ़ दर्जन पोथीक लोकार्पण क्रमश: भारती (उपन्यास), विधकरी (उपन्यास), उचाट (बाल उपन्यास), उत्थान-पतन (उपन्यास), जिनगीक जीत (उपन्यास), गामक जिनगी (कथा संग्रह), मैथिली चित्रकथा (चित्रकथा संग्रह), गोनू झा आ आन मैथिली चित्रकथा (चित्रकथा संग्रह), पक्षधर (पत्रिका), हमरो लेने चलू- (कथा संग्रह), पिलपिलहा गाछ- (बाल कथा), अमर जीक साहित्यमे हास्य-व्यंग (समालोचना), समाचार कथा (कथा संग्रह), कथा-लोककथा (कथा संग्रह), खिस्सा (कथा संग्रह), मिथिलाक पंजी प्रबंध (तारपत्र आदिक डिजिटल इमेजिंग, डी.भी.डी), मैथिली भाषा साहित्य: बीसम शताब्दी (अलोचनात्मक निबंध संग्रह) आ जमीनेमे फुटे छै अंकुर (कविता संग्रह), भेल। डॉ रामदेव झा, डॉ सुरेश्वर झा, पं. चन्द्रनाथ िमश्र “अमर”, डॉ भीमनाथ झा, डॉ रामानन्द झा “रमण”, मैथिली पुत्र प्रदीप, डॉ. मोहन मिश्र, डॉ वीणा ठाकुर, डॉ कमला चौधरी, डॉ आशा मिश्र आ ज्योत्स्ना चंद्रम द्वारा लोकार्पण कराओल गेल। सभ रचनाकार/लेखक/लेखिका स्वयं सेहो उपस्थित रहथि। कथा सत्रक अध्यक्षता डॉ श्रीशंकर झा आ संचालन अजीत आजाद जी केलनि। कथाकार- चण्डेश्वर खॉं, मुन्ना जी, उमेश नारायण कर्ण, रमाकान्त राय “रमा”, ऋृषि बशिष्ठ, राजाराम सिंह “राठौड़”, ज्योत्स्ना चन्द्रम, कमला चौधरी, विनय विश्व बंधु, चन्द्र मोहन झा “पड़वा”, नन्द विलास राय, बिरेन्द्र कुमार मिश्र, जगदीश प्रसाद मंडल, कपिलेश्वर राउत, उमेश मंडल, दुर्गा नन्द मंडल, संजय कुमार मंडल, मनोज कुमार मंडल, निखिल कुमार झा, बेचन ठाकुर, देवकान्त मिश्र, महेन्द्र नारायण राम, मैथिली पुत्र प्रदीप, गजेन्द्र ठाकुर, लालपरी देवी, राजाराम प्रसाद, आनन्द कुमार झा, सतेन्द्र कुमार झा, उषा चौधरी आ नीता झा अपन-अपन नूतन कथा पाठ कए गोष्ठिक गरिमाकेँ बढ़ौलनि। संगहि अनेको साहित्य प्रेमी सबहक उपस्थिति सेहो गोष्ठिक महत्व बनल रहलाह। पठित एहि कथा सभपर समिक्षा केलनि- हिरेन्द्र कुमार झा, कमल मोहन चुन्नू, रमानन्द झा रमण, गजेन्द्र ठाकुर, कमलेश झा, जगदीश प्रसाद मंडल, अमलेन्दु शेखर पाठक, देवकान्त मिश्र, फूलचन्द्र मिझ आ नीता झा। भरि राति कथापर कथा, चारि कथाक एक पाली तेकर समिक्षा होइत रहल। ई सिलसिला कोनो एक-आध-दू घंटाक मात्र नहि रहल वरण् भिनसर छह बजे धरिक। बारह घंटाक एहि अल्प समएमे उपस्थित ४५सो कथाकारक कथापाठ नहि भऽ सकलनि। ३० गोट कथाक पाठ भेल। बॉचल १५ गोट कथाकारकेँ (जिनकर कथा पाठ नहि भऽ सकलनि) अगिला गोष्ठीमे शुरूहेमे अवसर देल जेतनि से निर्णए भेल। अग्रिम ७१म आयोजन २ अक्टूवर २०१०केँ संध्या ६:३० बजेसँ श्री जगदीश प्रसाद मंडल, बेरमा, मधुबनी (बिहार)क आयोजकत्वमे बुढ़िया गाछी दुर्गा स्थान स्थित मध्य विद्यालय परिसारमे सम्पन्न होएवाक संकल्प लेल गेल अछि जाहिमे समस्त “सगर राति दीप जरय”क प्रेमी आ कथाकार लोकनि आमंत्रित छथि। स्थानपर पहुँचवाक लेल ट्रेनसँ तमुरिया आ बससँ चनौरागंज आबि बेरमाक लेल मात्र तीन किलोमीटर दूरी तँइ कएल जाए। टेम्पू,रिक्सा,टमटम इत्यादिक सुविधा दुनूठाम (तमुरिया आ चनौरागंज) प्राय: उपलब्ध रहैत अछि। सगर राति श्रोता कथा-सागरमे डुबकी लगेलन्हि मधुबनी जिलाक लखनौर प्रखण्डक बेरमा गामक मध्य विद्यालय परिसरमे २ अक्टूबर २०१०केँ मैथिली कथा आन्दोलनकेँ समर्पित ‘सगर राति दीप जरय’क ७१म आयोजन श्री जगदीश प्रसाद मंडलक संयोजकत्वमे कएल गेल। दीप प्रज्वलन सह उद्घाटन श्री उग्र नारायण मिश्र ‘कनक’ संध्या ६:३० बजे केलनि। तत्पश्चात डॉ. रमानन्द झा रमण, बेरमाक स्व. विजय नाथ ठाकुर (चेतना समितिसँ जुड़ल रहथि।) चर्चा करैत गामक (बेरमाक) साहित्यक इतिहासक चर्चा केलनि। गोष्ठिक सुभारम्भ स्वागत गीतसँ, सपत्नी संजीव कुमार ‘समा’, अजय कुमार कर्ण, बेचन ठाकुर, आ जागेश्वर प्रसाद राउत जीक द्वारा भेल। तत्पश्चात ‘मंगला चरण’क उच्चारण शिवकुमार मिश्र जी केलनि। गोष्ठिक अध्यक्षता डॉ. तारानन्द वियोगी आ संचालन श्री अशोक कुमार मेहता जी केलनि। कार्यक्रमकेँ आगाँ बढ़ाओल गेल पोथीक लोकार्पणसँ जेकर सूचि एहि तरहेँ अछि- १ प्रलय रहस्य (कविता संग्रह) लेखक- तारानन्द वियोगी, लोकार्पणकर्ता- डॉ. रमानन्द झा रमण, २ जीबन-मरण (उपन्यास) ले. जगदीश प्रसाद मंडल, लो.- श्री कुमार सहाएब आ श्री रमाकान्त राय ‘रमा’, ३ तरेगन (बाल प्रेरक कथा संग्रह) ले. जगदीश प्रसाद मंडल, लो.- डॉ. रमानन्द झा ‘रमण’ आ डॉ. फूलचन्द्र मिश्र ‘रमण’, ४ जीवन-संघर्ष (उपन्यास) ले. जगदीश प्रसाद मंडल, लो.- श्री अशोक (पटना) आ श्री उग्रनारायण मिश्र ‘कनक’, ५ सी.डी. तिरहुत्ता (विदेह ई पत्रिका, ६०म अंक धरि) संपादक गजेन्द्र ठाकुर, लो.- डॉ. योगानन्द झा, श्री उग्रनारायण मिश्र ‘कनक’ आ श्री नारायण जी, ६ सी.डी. देवनागरी (विदेह ई पत्रिका, ६०म अंक धरि) सं. गजेन्द्र ठाकुर, लो.- डॉ. तारानन्द वियोगी, डॉ. मंजर सुलेमान आ श्री अजीत आजाद, ७ निबंध-तरंग (निबंध-संग्रह) ले. श्रीपति सिंह, लो.- डॉ. रमानन्द झा ‘रमण’ ८ अलका (कथा संग्रह) ले. कमलकान्त झा, लो.- डॉ. धनाकर ठाकुर आ डॉ. खुशीलाल झा। छह गोट पोथी आ दू गोट सी.डी.क लोकार्पणक पश्चात कथा पाठ आ तेकर समीक्षा/समालोचना प्रारम्भ भेल। चारि-पाँच कथा/लघुकथाक पाठ आ तेकर समीक्षा चारि-पाँच समीक्षकक एक पालीमे होइत रहल। एहि तरहेँ भरि रातिमे सात पालीक सुन्दर प्रदर्शन भेल। नव पुरान कथाकारक अलावे बाल-कथाकार सेहो अपन नूतन कथाक पाठ केलनि। कथा आ कथाक समीक्षा संपूर्ण श्रोताकेँ आकर्षित कएलकनि। ताहिपर श्रोताक टिप्पणी सेहो आएल। नव-कथाकारकेँ श्री अशोक, डॉ. फूलचन्द्र मिश्र रमण आ डाँ रमानन्द झा रमणक संग-संग आरो समीक्षक आपन खुशी व्यक्त केलनि आ दिशा निर्देश सेहो देलनि। अध्यक्षीय भाषणमे डाँ तारानन्द वियोगी सेहो बेरमाक नव-कथाकारक संग-संग नव दृष्टिकोणक कथाकारक कथापर साकारात्मक विचार रखलनि। श्रोताक मनोयोग श्रवणसँ प्रभावित भऽ कथाकार लोकनिक उत्साह भरि राति बनल रहल। उपरोक्त वर्णित कथाकार आ समीक्षकक अलावे कमलेश झा, उमेश नारायण कर्ण, शंकर झा, बुचरू पासवान, महेन्द्र नारायण राम, विनय विश्व वन्धु, रघुनाथ मुखिया, आशीष चमन, पंकज सत्यम्, ऋृषि बशिष्ठ, राजदेव मंडल, िवनय मोहन ‘जगदीश’ इत्यादिक गरिमाय उपस्थित छल रहए। दर्जनोसँ ऊपर श्रोताक टिप्पणीमे- रमण किशोर झा, शशिकान्त झा, विरेन्द्र यादव, लाल कुमार राय, घुरन राम, मो. इब्राहिम, दीपक कुमार झा, राम विलास साहु आ राम प्रवेश मंडलक महत्वपूर्ण रहल। श्रोताक अनेको विषए-वस्तुपर टिप्पणीक संग-संग एकटा महत्वपूर्ण टिप्पणी कपिलेश्वर राउत जीक द्वारा- ‘दर्जनक-दर्जन कथा पाठ भेल नीक लागल मुदा हम सभ किसान छी किसानी जिनगीक (खेती-बाड़ी) बात-चीत/विषए-वस्तुक चर्च कथामे नहि भऽ पावि रहल अछि।’ एहि टिप्पणीपर श्री अशोक अपन विचार व्यक्त करैत कहलनि- ‘खेती-बाड़ी, किसानी जिनगी आ गाम-घरक चर्चा वास्तवमे कम कएल गेल अछि, ने सिर्फ मैथिली साहित्यमे वरण् हिन्दी साहित्यमे सेहो एकर अभाव माने जतेक अबैक चाही ओते नहि आएल अछि। भिनसर छह बजे एहि ७१ गोष्ठीकेँ अन्त करैत श्री अरविन्द ठाकुर (सुपौल) अग्रिम कथा गोष्ठी ७२म आयोजन हेतु दीप आ उपस्थिति पुस्तिका लेलनि। स्पष्ट अछि जे अगिला कथा गोष्ठी दिसम्बर मासमे सुपौलमे आयोजित हएत। सुपौलक कथा गोष्ठी : ४ दिसम्बर २०१० व्यापार संघ भवन सुपौलमे दिनांक ४.१२.२०१०केँ सगर राति दीप जरय'क ७२म कथा गोष्ठी श्री अरविन्द कुमार ठाकुरक संयोजकत्वमे बिपल्व फाउण्डेसन आ प्रगतिशील लेखक संघ द्वारा आयोजित कएल गेल। सांझ ६ बजे प्रो. सचिन्द्र महतोजी दीप प्रज्वलन सह उद्घाटन केलनि। मंच संचालन श्री अजीत झा आजादजी केलनि आ गोष्ठीक अध्यक्षता श्री रमानन्द झा रमणजी केलनि। एहि अवसरपर जीवकान्त जीक पोथी 'एकहि पच्छ इजोर'क लोकार्पण अजीत आजादक माध्यमसँ अरविन्द ठाकुर जीक द्वारा भेल। कुल २१गोट नव-पुरान कथाकार अपन-अपन नूतन कथा वा लघुकथाक पाठ केलनि। जे एहि तरहेँ अछि- रंजीत कुमार खाँ राही- (फाेंक), रजनीश कुमार तिवारी- (गप्पी), अरविन्द कुमार ठाकुर- (युटोपिया), अजीत आजाद- (रोग), पंकज सत्यम्- (तर्दनकृवा घुमैत पिबैत), महाकान्त ठाकुर- (शिक्षाक प्रयोजन), चौधरी जयंत तुलसी- (धीपल फाढ़), आशीष चमन- (निष्कर्ष), राजाराम सिंह राठौर- (राखीक रंग फीका), विजय महापात्रा- (मोन किएक पाड़लेँ), जगदीश प्रसाद मंडल- (दोहरी मारि), दुर्गानन्द मंडल- (लबकी कनियाँ), कपिलेश्वर राउत- (किसानक पुजी), मनोज कुमार मंडल- (बेमेल विआह), रामबिलास साहु- (गामक गाछी), बेचन ठाकुर- (अनैतिक विआह), संजय कुमार मंडल- (सिनेह), अकलेश मंडल- (टिटनेस), मुकेश मंडल- (लोभक फल), लक्ष्मी दास- (बुड़िबकक बुड़िबक) आ उमेश मंडल- (युगक खेल आ आधा भगवान)क पाठ केलनि। प्रो. सचिन्द्र महतो, शैलेन्द्र शैली, महेन्द्र, किशलय कृष्ण, अरविन्द्र ठाकुर पठित कथापर समीक्षा केलनि। ओना तुलसी जयंत चौधरी, राजाराम सिंह राठौर, जगदीश प्रसाद मंडल, महाकान्त ठाकुर, दुर्गानन्द मंडल, आशीष चमन, विजय महापात्रा इत्यादि सेहो किछु कथापर अपन टिप्पणी केलनि। श्री अजीत कुमार झा आजाद मंच संचालनक संग-संग पठित कथा सभपर आ कएल समीक्षापर अपन किछु विचार माने टिप्पणी करैत रहला, तहिना संयोजक श्री अरविन्द ठाकुरजी सेहो विशेष बात रखलनि जेकर कछु विचारणीय अंश निम्नांकित अछि- भोजनक वादक समए छल। उमेश मंडल, कपिलेश्वर राउत, अकलेश मंडल, दुर्गानन्द मंडल, लक्ष्मी दास, रामविलास साहु, मनोज कुमार मंडल, बेचन ठाकुरक कथा पाठ भऽ गेल छल। प्राय: एकसँ दू पालीमे। समीक्षक लोकनि हिनकर सबहक कथापर बाजि चूकल छलाह। जाहिमे उमेश मंडलक अाधा भगवान कथापर श्री शैलेन्द्र शैल, अरविन्द ठाकुर राजाराम सिंह राठौर आ तुलसी जयंत चौधरी, कर्मवादी कथाक रूपमे समीक्षा केलनि। जेकर पुन: एकबेर दोहरबैत संचालक श्री अजीत आजाद जी बजै छथि- “उमेश मंडलक कथा आधा भगवान भाग्यवादीसँ कर्मवादी दिशि लऽ जाइत अछि। वास्तवमे ई कथा किसानी जिनगीक लेल नीक प्रयास मानल।” अकलेश मंडलक कथा टिटनेस आ दुर्गानन्द मंडलक कथा लबकी कनियाँ'पर श्री अरविन्द ठाकुर बजै छथि- “लबकी कनियाँ कथा मंडलजी बला सुनलहुँ ठीके शैलेन्द्र शैलजी कहलथिहेँ जे ई कथा विषए-वस्तुक खियालसँ ओहिना लगैत अछि जेना राजश्री प्रोजेक्टक सिनेमा चलि रहल हुअए। अकलेश मंडलक कथा टिटनेसपर हम एतबए कहब जे ई कोनाे हेल्थ मेग्जिनमे छपैत तँ उत्तम। हमरा लगैए जे आइ मैथिली साहित्यक चौराहापर किछु ओहन आदमीक उपस्थिति भऽ रहल अछि जे देखबा, सुनबा आ विचार करबा योग्य अछि। आइ बेरमा कथा गोष्ठीकेँ लेल जाए। जेकर संयोजक जगदीश प्रसाद मंडल, मंच संचालक अशोक कुमार मेहता आ अध्यक्ष तारानन्द वियोगी रहथि। तँ हम कहलौं जे ई जे पौतीमे बन्द मैथिलीक दुर्दशा छल ओ आब फूटि बहराएलहेँ। एकरा अहाँ कि कहि सकै छिऐ? आइ साहित्यिक मंचपर टाल ठाेकि कऽ ओ सभ चुनौती बुझू दऽ रहला छथि जे कहियो खबास होइत छलाह। एकरा अन्यथा नहि लेल जाए। जे सत्य छै ओ सोझाँ राखलौं अछि। जगदीश प्रसाद मंडल जीक कथा-उपन्यास जखन हमरा सभ पढ़ै छी तँ जेना लगैए जे एकटा नव दुनियाँमे प्रवेश पौलहुँ अछि। एकदमसँ ओहेन दुनियाँ जै दुनियाँक कल्पनो ने बुझू भेल छल। जहिना विषए-वस्तु तहिना शब्द-संयोजन तहिना दृष्टिकोण....। तँ आब अहाँ सभ ई बुझियौ जे जगदीश मंडलजी एकटा एहेन रेखा खिंचि देलनि। जेकरा धियानमे राखि कऽ अहाँ कथा लिखी तँ उत्तम। आइ जै वर्गसँ अहाँ सभ आबि रहल छी ओइ वर्गमे माने किसानी जिनगीक अनेकानेक विषए-वस्तुक चर्च मंडलजी केलनि अछि। ओकरा धियानमे राखि अहाँ सभ आगाँ लिखी।” अरविन्द ठाकुरजीक वक्तव्यक बाद माइक लैत अजीत आजादजी बजै छथि- “अरविन्द बाबू ठिके कहै छथि। हिनका बातकेँ हम समर्थन करैत छिअनि। अहुँ सभ कथा गोष्ठीमे अबै छी पहिने तँ जगदीश मंडल एलथि बादमे अहाँ सभकेँ सेहो अनलाह आ अबै छी। जगदीश मंडल आ उमेश मंडलजीकेँ आब हम सभ दूरेसँ चिन्है छिअनि। लेकिन अहाँ सभ ऐ बातकेँ बुझियौ जे कथा कोना लिखा रहलैहेँ। अबै छी, कथा पढ़ै छी, जाइ छी। बड़ नीक मुदा ई बुझियौ जे जै वर्गक अहाँ सभ लोक छी मतलब किसान वर्ग जे आधार भेलै। कृषि आधार छिऐ कि नहि छिऐ? तँ ओइमे जे बात सभ छै, जटीलता सभ छै ओकरा अहाँ सभ नै लिखबै तँ के लिखताह...? तँ ई कहलौं जे एम्हर-ओम्हर नै लिखि ओ सभ लिखल जाए। जैमे एकटा बड़का रेखा, कहबे केलथिहेँ अरविन्द बाबू जे जगदीश मंडल द्वारा खिचि देल गेलहेँ। जँ एकरा नै धियान राखब तँ गोष्ठिमे एनाइ-गेनाइ बुझू नीक नहि। ओना ऐ गोष्ठिसँ बाहरो निकालल जाइ छै।” ई गप्प अध्यक्ष महोदय दिशि तकैत आ मुड़ी डोलबैत अजीत जी अगाँ बजै छथि- “आब एकटा खिस्सा सुनबै छी- यंत्रनाथ मिश्रकेँ गोष्ठीसँ निकालल गेलन्हि, की यौ.....? आश्चर्य लागत जे गेट आउट कहि देल गेलन्हि माने गेटसँ बाहर कऽ देल गेलन्हि।” वातावरणमे खटमिट्ठी बुझू पसरि गेल। एत्ते बात बजबाक प्रयोजनपर सभकेँ सब तरहक चिन्तन-मनन हुअए लागल। दू-चारि मिनटक लेल शान्त...। एकदम्म शान्ति, सन्नाटा। किछु लोक एक-दोसराक मुँह दिशि तकैत। आ किछु लोक गोष्ठिक गार्जियन श्री रमानन्द झा रमणजी दिशि गोरसपट टकधियान लगेने। मुदा जे किछु....। आगाँ उमेश मंडल (माने हम) हमर नामक चर्च संचालक महोदय पहिनहि उद्वोधित कऽ चूकल छलाह जे एहि पालीक पठित कथापर हमहुँ किछु टिप्पणी करबै। हम प्राय: छुब्ध रही जे ई कोन समीक्षा भेल। एहि तरहक समीक्षासँ नवाङकुरपर आखिर की प्रभाव पड़तनि। खएर जे से हम आगू जा माइक हाथमे लैत बजलहुँ- “जहिना पठित पालीपर समीक्षाक बहाने अन्यान्न विषए-वस्तुपर गप-सप्प राखल तहिना हमहुँ किछु बात राखि रहल छी। सभसँ पहिने हम ओइ कथाकार सभकेँ कहि देबऽ चाहैत छियनि जे पहिल या दोसर कथा लऽ कऽ उपस्थित भेलहुँ आ कथा पाठ केलौं। सबहक कथामे यथार्थ अछि, सुन्नर अछि, कथ्य, शिल्प, भाषा, शैली सभ किछु उत्तम। एक्को पैसा उदास हेबाक प्रयोजन नहि। दोसर गप्प जे अपने सभ एहि बातकेँ बुझल जाए जे जहिना भोजक पाँतिमे बैसल पंचक आगाँ पहिल खेपमे परसल व्यंजनपर कोनो तरहक टिका-तिरस्कारक व्यवहार नहि कएल जाइत हँ, दोसर-तेसर बेर माने परसन लेबाकाल ई जरूर धियान राखल जाइत जे की नीक आ की बेजाए....। तेसर बात अपने सभक द्वारा नव लोककेँ कहल गेलन्हिहेँ जे एना नै ओना आकि ओना नै एना लिखू। कृषि विकासक बात लिखू आ से ई के लिखता अहीं सभ ने लिखबै। ठीक बात मुदा इंजिनियर डाॅक्टरक पढ़ाइ करैबलाक भरमार लागल अछि आनो-आन क्षेत्रमे जिनका पढ़ाइ-लिखाइक सुविधा पर्याप्त छन्हि नम्बर लगौने छथि। लेकिन कृषि-कार्यक पढ़ाइ हेतू किएक ओ सभ विमुख भेल छथि। ई गप्प आ समस्याकेँ के लिखताह? ऐ पर कथा किएक नै लिखल जाइत अछि। ऐ पर अहुँ सभ विचार करू।” अपन बातपर विराम लगा हम माइक संचालक महोदयकेँ हाथमे दैत यथास्थान जा बैस रहलहुँ। गोष्ठिमे बैसल सभ कथाकार आ समीक्षकक मनमे जेना समीक्षाक नव-नव बिम्व नॉचए लगलनि। अध्यक्ष महोदय सेहो उठि कऽ बैस रहला। अध्यक्ष महोदय दिशि देखैत संचालक एक बेर पुन: अपन बात स्पष्ट करैत बजलाह- “देखियौ हमर कहब छल जे अहाँ सभ एत्ते दूरसँ एलौं जेबा-एबामे बड़ कठिनाइ होइ छै। हमर कहबाक भाव रहए जे जहिना जगदीश बाबू लिखै छथि ओ जे रेखा खिचलन्हिहेँ ओकरा धियानमे राखि.....। अहाँसँ साहित्यमे कि लाभ भेलै। मतलब कि देलिऐ। से जौं नइ तखन तँ.....।” ऐ बातपर हम पुन: बाजलहुँ- “अजीत बाबू अपने साहित्यिक लाभक बात एहि नव लोकमे तकै छी। मुदा एकबेर अपना दिशि देखल जाए जे स्वयं थोड़ेखन पहिने बजलाैंहेँ जे सत्तरह सालसँ लगातार अहाँ सभ कथा गोष्ठिमे भाग लेलहुँ। आइसँ नै सत्तरह सालसँ। मुदा कएकटा कथा संग्रह देलिऐहेँ?” अजीत आजाद- “अहीं जकाँ हमरा प्रकाशन नै ने भेट गेल जे......। अक्खैन कियो भार लेथि हम परसू तक तीनटा कथा संग्रह थम्हा दैत छियनि। लेकिन ओहोसँ पैघ बात जे कै स्तरक कथा सभ हमर विभिन्न पत्र-पत्रिकामे छपि चूकल अछि आ कहियासँ तेकरो तँ देखबै।” अगल-बगलसँ पाँच-छह गोटा एक्केबेर- हँ, से तँ ठीके बात। हँ से तँ ठीके बात। बजैत अागाँक कथा पाठ लेल अग्रसरक विचार प्रकट केलाह। माहौलमे परिवर्त्तन भेल। लगभग चारिटा कथापाठ फेर भेल आ तेकर संक्षिप्त समीक्षा सेहो कएल गेल। तात् भिनसर ६बाजि गेल। श्री रमानन्द झा रमण अपन अध्यक्षीय उद्वोधनमे उपरोक्त झजमझ (मतांतर)पर एक्को शब्द नै बजलाह। अगिला कथा गोष्ठिक आयोजन श्री विजय महापात्रा जीक संयोजकत्वमे हुनके मातृभूमि महिषी मे कएल जाएत ताहि लेल सुपौलक संयोजक श्री अरविन्द ठाकुरजीक द्वारा दीप आ उपस्थिति पुस्तिका भावी संयोजककेँ समर्पित करैत गोष्ठिक समापन कएल गेल। मुन्ना जी सामाजिक सरोकारकेँ छुबैत मैथिली लघुकथा जिनगीमे उठैत उकस-पाकसकेँ सम्वेदनापूर्ण मानवताक संग सरियबैत रचनाकार पत्र-पत्रिकासँ समाज आ पाठकक मोनमे बैसि गेलाग अछि। रेशम आ सूतीक बीच फाँक भेल जिनगीकेँ स्पष्ट करैत, आरामदायक आ सुखद अनुभवकेँ सोझाँ आनब आब रचनाकार अपन रचनाधर्म बुझि गेलाह अछि। तेँ आजुक समस्त रचनामे जिनगीक उतार-चढ़ाव, खसैत-उठैत सम्बन्ध सुखाइत सन सिनेह सभकेँ अपना हृदएमे बसा रचना रचैत छथि लेखक। एहि युगक रचनाकारकेँ आब गरीब भाभनबला किताबी खिस्सा आ राजा-रानीबला पिहानीसँ ऊपर उठि अपन सामाजिक समरसताक निस्सन निशानीक बोध भऽ गेल बुझाइत अछि। तेँ रचना सेहो लोकक जिनगीक गहींरता नपैत ओकर सुख-दुखक फाँटक बीचसँ निकलि ओहि फाँटकेँ भरैत ओकर एक-एक अंश धरि जुड़ि जिनगीक दर्शन करबैत सोझाँ आबि रहल अछि मैथिली लघुकथा सभ। मोम आ पाथर पहिने एक दोसराक विपरीत जिनगीकेँ आरेखित करैत रहल। मुदा आब नै, आब तँ एक्कै हिदएमे क्षणक बदलैत गतिक संग मोम आ पाथर दुनूक समन्वयक बनि जिनगीक सभ अन्तरंगताकेँ छुबैत उद्वेलित कऽ बेरा-बेरी मुदा एक्कै ठाम केन्द्रित भऽ देखार भऽ उठैत अछि। आजुक मानवक संवेदना एतेक परिवर्तनीय भऽ गेल अछि जे एक्के संग अहाँक चरित्रमे मोम आ पाथर दुनूक रूप दृष्टिगोचर होइत, रचनाकार सोझाँ आनि ओकर सत्यकेँ साबित कऽ रहलाह अछि। सत्य! एकटा काल्पनिक विजय मात्र नै थिक, सत्य कतौसँ अनायास नै टपकि पड़ैए। सत्य पूर्णतः मानव जीवनक यथार्थ थिक। सत्य मानवकेँ अनुचित कार्यसँ रोकबाक वा विधर्मी हेबासँ बचेबाक श्रीयंत्र जकाँ अछि, जकरा आजुक रचनाकार अपना रचनाधर्मितासँ लोकक हृदए धरि छुआ ओकर यथार्थ बोध करौलनि अछि। पहिनुक लघुकथा सभ दहेजक दानवकेँ उघार कऽ, दहेज पीड़िताक मर्मकेँ वा दहेजसँ भेल परिणामकेँ अपन केन्द्रमे आनि सम्वेदित करैत छल। ओहिसँ इतर चुटुक्का वा हास्य-कणिका लऽ तत्कालीन नेता सबहक विपटावादी चरित्रकेँ उजागर कऽ अपन रचनाक इतिश्री बुझैत छला। एहेन नै छलै जे तहियाक रचनाकारक सोच संकुचित छल। ओहो सभ दूर धरि सोचैत छला, गमै छला आ तखन ओकरा सोझाँ अनै छला। मुदा ई परिवेशक दोष सेहो कहल जा सकैए जे तहियाक रचनाकार सभ विषए-बैस्तुकेँ संकुचित कऽ मैथिली लघुकथाकेँ सेहो संकुचित कऽ देलनि। २०म सदीक छट्ठम-सातम दशकमे प्रायः ओहने परिवेश संरचित छल। जकर परिणामे लघुकथा मात्र नै वरन् आनो विधा यथा कथा/ नाटक/ उपन्यास आदिमे वएह दहेज आ खिस्सा आ नेताजीक करनीकेँ सोझाँ आनल जाइत रहल छल। आब परिवेश बदललै, दृष्ज्टिगत फरिछता एलै, सामाजिक समरसता पसरलै। तहन समाजक छुआछूत मात्रक अवलोकन होइत छलै। मुदा आइ ओहि छुआछूतसँ भेल परिणाम, जाति-पातिमे बान्हल लोकक दृष्टि-परिवर्तन, आर्थिक सम्पन्नता, पैघक संग सभ बिन्दु। विषय वा स्थानपर ओहो अछोप सन, निंघेष बनल लोकक सहचर बनब, सभकेँ देखाओल जाए लागल आजुक लोककथामे। आब विषय विस्तार स्वतः सभ तरहक घटनाकेँ छुबैत कागचपर आबऽ लागल अछि। आबक परिवेशमे दहेजक पसार भऽ गेल अछि। एहेन पसार जकरा आब विशेष मुद्दा नै बना, बल्कि ओकरा जीवनक सामान्य क्रियाकलाप बुझि, परम्पराकेँ उघबाक प्रक्रियाकेँ दर्शाओल जाए लागल अछि। तहिया दहेज दानव जकाँ छलै। जे रचनाकारक लेल प्रमुख विषए छल। आइ दहेज दानव मात्र नै महादानव बनि ठाढ़ अछि मुदा परिवेश बदलल छै, माने कि आब तहियाक अपेक्षा आर्थिक सम्पन्नता बढ़ि गेलैए तेँ लोककेँ ई महादानव अपन जीवनक एकटा अंग बनि गेल अछि, कोनो बड्ड पैघ समस्या नै। आब तँ ओइसँ पैघ-पैघ समस्या रचनाकारकेँ उद्वेलित करैत अछि। यथा बिआहक खुजल रस्ता, कियो कोनो जाति-धर्मसँ बिआह कऽ सकैए आ ओकरा न्यायालय प्रमाणित तँ करिते अछि। सरकारी संरक्षण सेहो भेटै छै। ओहिसँ ऊपर दहेज उन्मूलनक दिशामे समलिंगी बिआह समाजकेँ जतऽ डेरा रहल अछि, ओतै रचनाकारकेँ एकटा नव दृश्यांकनक अवसर दऽ रहल अछि।एहि सन्दर्भमे दूटा अन्तर्राष्ट्रीय लेखकक तीनटा लघुकथा राखि रहल छी- ग्रिगोरी गोरिन (रूसी नाटककार) एकटा इमानदार आदमी “हम टैक्सीबलाकेँ अबाज देलौं आ टैक्सी रुकि गेल। “की हमरा अहाँ सोमोकन्या स्क्वेयर लऽ चलब? ओ जगह एतऽ सँ बड्ड दूर नै छै, मुदा हमरा जल्दी अछि।” पाँच मिनट बाद हम ओकरा रोकलौं। मीटर उनचास कोपेक देखबैत छल। हम एक रूबल निकाललौं। “हमरा लग छुट्टा पाइ नै अछि।” ड्राइवर कहलक। हम अपन जेबीमे तकलौं तँ पचास कोपेकक एकटा सिक्का भेटल। “अफसोच अछि जे हमरा लग एको कोपेक नै अछि।” “कोनो बात नै।” “किएक नै! ” ड्राइवर विरोध प्रकट केलक, “हम एना नै कऽ सकैत छी। अहाँ जनैत छी जे सवारीसँ मीटरसँ बेसी पाइ नै लेल जा सकैत अछि। हम इनामो नै लैत छी।” “बड्ड नीक, मुदा हम की करू? ” “वामा कोनापर एकटा तमाकूबलाक दोकान अछि, ओ खुल्ला कऽ देत।” पाँच मिनट पछाति हम ओइ दोकानपर पहुँचलौं, मुदा तावत धरि खेबाक छुट्टी भऽ गेल छल। मीटर आब सन्तानबे कोपेक बता रहल छल। “कोनो बात नै”- ड्राइवर सहानुभूति जतौलक, “कीव टीशनलग एकटा बैंक अछि, ओइमे काज करऽवाली लड़कीकेँ हम जनैत छिऐक, ओ अहाँकेँ पाइ खुल्ला कऽ देत।” हम कीव टीशन दिस गेलौं, मुदा बैंक बन्द छल। मीटर पूरे तीन रूबल देखा रहल छल। हम ड्राइवरकेँ तीन रूबल देलौं, ओ पाइ जेबीमे राखिकऽ मीटर बन्न कऽ देलक। “हमरा बड्ड दुख अछि”, ओ कहलक। हम सवारीसँ बेसी पाइ नै लैत छी। “बहुत आभारी छी, मुदा हम सोमोकन्या स्क्वायर कोना पहुँचब? ” “हम अहाँकेँ ओतऽ लऽ चलब।” ड्राइवर कहलक आ हमरा टैक्सीमे बैसते मीटर चालू कऽ देलक। पाँच मिनट बाद हम पहुँच गेलौं। मीटर फेरो उनचास कोपेक देखा रहल छल। हम छोट छीन चक्कू निकालि कऽ ड्राइवरक गरदनि लग व्लगा देलौं आ ड्राइवरक हाथमे जबरदस्ती पचास कोपेकक सिक्का राखि टैक्सीसँ कूदि कऽ भागि गेलौं। बादमे बहुत बाद धरि, जे नैतिक भ्रष्टाचार हम ओइ इमानदार आदमीक संग केने छलौं, हमरा ग्लानिक अनुभव होइत रहल। बर्तोल्ट ब्रेख्त (जर्मन नाटककार) गपशप “आब हम सभ आपसमे किन्नहुँ गप्प-सप्प नै कऽ सकैत छी”, महाशय “क” एकटा लोकसँ कहलनि। “किएक”?, ओ चौकैत पुछलक। “हम अपन तर्कपूर्ण गप्प आब अहाँक सोझाँ नै राखि सकैत छी। ”, महाशय “क” लचारीवश अपन विचार रखलनि। “मुदा अइ बातसँ हमरापर कोनो फर्क नै पड़त। ”, दोसर अपन संतुष्टि देखौलक। “हमरा बूझल अछि।”, महाशय “क” खौंझाइत कहलक, मुदा हमरापर एकर असरि अवश्य पड़त। महाशय “क” जखन कोनो व्यक्तिसँ प्रेम करैत अछि महाशय “क” सँ पूछल गेल, जखन अहाँ कोनो व्यक्तिसँ प्रेम करैत छी तखन की करैत छी? ” महाशय “क” उतारा देलक, “हम ओहि व्यक्तिक एकटा खाका बनबैत छी आ फेर ऐ फिकिरमे रहैत छी जे ओ हुबहु ओकरे जकाँ बनए। ” “के, ओ खाका? ” “नै।”, महाशय “क” जवाब देलक, “ओ आदमी।” पहिने लोकक विपन्नता सेहो दृष्टि संकुचनक पर्याय छल। ई स्वाभाविक छै जे पेट भरल रहतै तखने लोकक सोच ओइसँ दूर धरि जेतै। नै तँ सभटा सोच भूखसँ उत्पन्न भेल आकुलतामे समाहित भऽ रहि जाएत। आब स्थिति उनटल अछि। आर्थिक उदारीकरण आ वैश्वीकरणक आएल चलनसारिमे आब लोक आर्थिक रूपेँ सम्पन्न भेल अछि। आर्थिक सम्पन्नता आब पेटक भूखसँ इतर आन-आन भूख जगेलक अछि। जाहि कारणेँ चोरि, हत्या आ बलात्कारक सेहो बढ़ावा भेल अछि जे ओकरे रूप/ प्रतिरूप बदलि गेल अछि। तँ आजुक लेखककेँ कलम चलेबा लेल आ बदलल प्रतिरूप हथियारक रूपमे भेटि गेल आ रचनाकार सभ ऐ सभ अपराधक अपन कलमक माध्यमे नवीनीकरण कऽ सोझाँ आनि रहल छथि। सम्प्रति रचनाकार सभ पदयात्रासँ ऊपर उठि मंगलग्रह यात्रापर जा रचनारत छथि। पहिलका जमानामे लोक शुद्ध दूध ग्रहण करैत छल, आब दूध तँ दूर पानिक समस्या लोककेँ घेरने जा रहल छै। कतौ पानिक कमीसँ हाहाकार मचैए तँ कतौ लोक बाढ़िक कोप भाजन बनि भूखे बिलबिलाइत नाङट भेल छतविहीन लोकक असरा तकैए। आ लेखक ऐ सभपर अपन दृष्टिए नजरि गरा कागचपर अनै छथि। भारतमे सम्विधान सम्मत पितृसत्तात्मक परिवारकेँ उघबाक निमित्ते पुत्रक पैदाइशकेँ बढ़ावा देल जाइत रहल अछि। ओना तँ आइयो लोक बेटाक लिलसामे बेटीक हत्या (भ्रूण हत्या) कऽ रहल अछि जे दुनू अवस्था मैथिली लघुकथा लेखकक कलमक धारकेँ पिजौलक अछि। मुदा ऐ सबहक बावजूद जे मुद्दा लेखककेँ मसाला देलक ओ अछि नारी सशक्तिकरण। पहिने मौगीक मूँह जाबि कऽ ओकर सुरैतकेँ घोघमे नुकाएल रखबाक परिपाटी छल। मुदा आइ पुरुष सभ अपन कमाइकेँ द्वितीयक आ मौगीक नोकरीकेँ प्राथमिकता दऽ रहल अछि। शहरक कोन जे गाम देहातक मौगी सभ आब सरकारी नोकरी राजनीतिमे आगाँ बढ़ि कऽ आबि रहल अछि आ घरबला सभ पिछलगुआ बनि जीवन बिता रहल छथि, जकरा मैथिली लघुकथाकार सभ अपन कलमक माध्यमे भजा रहल छथि। महिलाकेँ आरक्षण दऽ एक दिस सरकार अप्पन कुर्सी बचबैए तँ दोसर दिस पुरुष सभ अपन घर बचेबा लेल संघर्षरत देखाइत छथि। जाहि सभ क्रियाकलापपर कलमकारक वक्र दृष्टि अछि। उपरोक्त बदलावक अतिरिक्त सभसँ पैघ परिवर्तन देखल जा रहल अछि तकनीकी चलनसारि। आइ मोबाइल इन्टरनेट डिश टी.वी./ एल.सी.डी. आ लेड टी.वी. लोकक जीवनकेँ एगदमसँ चलायमान बना देलक अछि। तेँ लोक धरतीक भीड़ आ भार कम करबाक लेल चान दिस नजरि दऽ रहल अछि। आजुक मैथिली लघुकथाकार सेहो उपरोक्त सभ बिन्दुकेँ छुबैत अपन रचनाक एक-एक सूक्ष्म गतिविधिक सुन्दर वर्णन करैत देखार भऽ रहलाह अछि। ऐ मे सभसँ ऊपर नाम अछि श्री अनमोल झा जीक जे अपना रचनामे अपन सर-समाज आ गामक जिनगीक दैनिक व्यवहारक प्रत्येक बिन्दुपर दृष्टिगत होइत कलम चला रहलाह अछि। लोकक एक-एक क्षणक बदलैत परिस्थितिक जमीनसँ ऊपर उठि हवामे उधियाइत मन मस्तिष्कक। समाजक लोकक प्रत्येक सरोकारक चित्रण अपन लघुकथामे केलनि अछि। तहिना मिथिलेश झा/ गजेन्द्र ठाकुरजी अपन सूक्ष्म दृष्टिएँ समाजमे होइत उत्थान-पतन/ नैतिक क्षीणता/ सामाजिक दायित्व, विछोह आदिकेँ जतऽ तक लोककेँ छूबि संशित वा क्षोभित करैए सभ मैथिली लघुकथाकार ओकरा कलमबद्न कऽ लोकक बन्न नजरिकेँ खोलबाक वा नवपथ दर्शन देबाक सुन्नर प्रयास कऽ रहल छथि। ऐ सभसँ ऊपर एक नाम अछि श्री सत्येन्द्र कुमार झा जीक जे अपन दृष्टिएँ भौतिकवादी मुदा मौलिक नैतिक क्षरणकेँ एकटा फराक दृष्टिएँ सबहक सोझाँ अनबाक प्रयास च्केलनि अछि। हिनको कलम विषय विविधतापर नजरि राखि सभ कोनमे दौगि रहल अछि। अए सभसँ फराक गामक वा गमैय्या जिनगी मात्रक अवलोकन ओकर परिस्थितिवश बदलैत जीवनक प्रत्येक अंशकेँ शुद्ध गमैये सोचे दृष्टिगत कऽ सोझाँ आनाऽबला तीन प्रमुख नाम अछि- जगदीश प्रसाद मंडल, उमेश मंडल आ रघुनाथ मुखिया जीक। ऐ तरहेँ समाजक बदलैत घटनाक्रमक प्रत्येक बिन्दुपर चाहे ओ सामाजिक समरसता हो , परिस्थितिगत बदलैत परिवेश हो, तकनीकी चलनक प्रभाव हो, आर्थिक सम्पन्नता- वैश्वीकरण- वा कोनो अन्यान्य खाँहिसँ जनमल कोनो समस्या। आजुक मैथिली लघुकथाकार ओइ प्रत्येक बिन्दुकेँ अपन कलमसँ उठा कागचपर आनि सोझाँ अनैत छथि। जाहिसँ सामाजिक सरोकारसँ जुड़ल एक घटना मैथिली लघुकथाक विषत बनि लोकक सोझाँ आबि रहल अछि। ऐ सँ ई स्पष्ट होइछ जे पहिनुका मैथिली लघुकथा वा लघुकथाकारक एकटा सीमामे बान्हल सोचसँ आगू बढ़ि आजुक रचनाकार मैथिली लघुकथा भण्डारकेँ एना भरि रहलाह अछि जाहिसँ कोनो उमेरक कोनो लोकक कोनो सोचक खाहिसँ पूरा भऽ सकए। तेँ समाजक सभ प्रकारक गतिविधिकेँ समेटकऽ चलि रहल छथि मैथिली लघुकथाकार। पहिल मैथिली लघुकथा गोष्ठीक आयोजन:- २० फरवरी १९९५ ई. केँ चित्रगुप्त प्राङ्गन हटाढ़ रुपौली (मधुबनी)मे भेल छल। संयोजकद्वय मुन्नाजी आ मलयनाथ मण्डन। अध्यक्षता- श्री भवनाथ भवन मंच संचालन- कुमार राहुल उपस्थित- १९ गोट लघुकथाकारक २६ गोट लघुकथा पाठ भेल। उपस्थित जनमे- पं.मतिनाथ मिश्र, पं. यन्त्रनाथ मिश्र, श्री श्यामानन्द ठाकुर, उमाशंकर पाठक, ललन प्रसाद, सचिदानन्द सच्चू, मुन्नाजी, कुमार राहुल, अतुल ठाकुर, प्रेमचन्द्र पंकज, मलयनाथ मण्डन, मीरा भारती कर्ण एवं सुनील कर्ण अपन रचना पाठ केलनि। विदेहक विहनि कथा (लघुकथा) विशेषांक (६७म अंकक मादेँ) कतेक दशकक उकस-पाकस एवं स्वतंत्र विधाक उहाफोहक बीच एक बेर फेरसँ “विहनि कथा”- जे लघुकथाक नामे चर्चित अछि- केँ मैथिलीमे स्वतंत्र विधा हेतु समेटि स्थिर करबाक अथक प्रयास कएल जा रहल अछि। अखन धरि भेल काजकेँ सेहो शिरोधार्य करै छी। ओहि डेगकेँ आगाँ बढ़बैत मोकाम धरि पहुँचबाक एकटा ठोस डेग हुअए अही आशामे कुल एक सए दू गोटेसँ दूरभाषिक सम्पर्क साधि विहनि कथाक मादेँ विभिन्न विषए-बौस्तु संकलित कऽ सोझाँ अनबाक एकटा प्रयास अछि। “विहनि कथा” विहनि अर्थात् बीआ। हम एकरा हिन्दीक “लघुकथा” शब्दसँ फराक मैथिलीक स्वतंत्र नामेँ आगू बढ़ेबाक प्रयास १९९५ ई. मे मैथिली मासिक “विचार” (सहयात्री प्रकाशन, लोहना, मधुबनी) द्वारा केने रही। ई अंग्रेजीक शॉर्ट-स्टोरीसँ इतर एकटा बीज-कथा (विहनि कथा) अछि। जाहिमे कथाक छोट गातमे सम्पूर्णता पाओल जाइत अछि। लघुकथा हिन्दी शब्देँ प्रचलित अछि। गएर हिन्दी भाषाक सभ भाषाक लघुकथाकेँ ओहि भाषा नामेँ स्वतंत्र नाम देल गेल अछि, तँ मैथिलीमे किएक नै? यथा उड़ियामे क्षुद्रकथा (खुद्र कथा), पंजाबीमे “मिन्नी कथा”, बांग्लामे “एक मिनिटेर कथा”, मलयालममे “निमिषा”। तहिना मैथिलीमे “विहनि कथा” नामेँ लघुकथाकेँ आगाँ बढ़ाओल जाए। विहनि कथा मादेँ वरिष्ठ कथा/ लघुकथाकार श्री “राज”क मत छनि- जेना एकटा छोटछीन बीआमे गाछक सम्पूर्णता निहित अछि, तहिना लघुकथा अपने-आपमे कोनो कथाक सम्पूर्णताकेँ समेटने अछि।” विहनि कथा मादेँ मध्यम पीढ़ी (यानि सातम-आठम दशकमे प्रवेश करऽबला पीढ़ीक) काजे ई बेसी जगजियार भेल। मुदा मोकाम नै पाबि सकल। हमरा जनतबे ई सभ किछु लोकक एकटा समूहमे एकरा बान्हि आगू बढ़ेलनि आ ओतबे धरि समेटि कऽ राखि लेलनि। तँ एकर प्रारम्भिक सद्गतिक पछाति एकर दुर्गतियो ओही पीढ़ीक रचनाकारक मध्य देखाइए। ओ मध्यम पीढ़ी जे कथा साहित्यमे नवसंचार अनलक आब सुस्ता गेल अछि। लगैए ओ सभ आब अपन कएल परिश्रमक पारिश्रमिक यानी पुरस्कार ग्रहण मात्रक सोद्देश्ये सक्रिय भेल बुझाइत अछि। लघुकथाक दुर्गति अए पीढ़ीक द्वारा भेल तकर एकटा सुन्दर उदाहरण छथि श्री अमरनाथजी (सम्प्रति- सदस्य, परामर्शदात्री समिति, साहित्य अकादमी) जे लघुकथा लिखब छठम दशकमे शुरू केलनि आ सातम दशकमे अपन लघुकथा संग्रह- “क्षणिका” (१९७५ई.) लऽ उपस्थिति दर्ज करौलनि, जे हमरा जनतबे मैथिलीक पहिल लघुकथा संग्रह थिक। एखनो दूरभाषिक सम्पर्के ओ ओही दिनक ऊर्जावान रूपेँ विदेहकेँ अपन टटका पाँच गोट लघुकथा उपलब्ध करौलनि जखन कि मध्यम पीढ़ीक मोटा-मोटी अनुपस्थिति ई देखार करैए जे ओ सभ थाकि कऽ आब सुस्ता रहल छथि। तथैव नव-मध्यम-पुरान पीढ़ीक समन्वये ऐ अंकमे ढेर रास नव रचना आएल अछि, तँ पेटारमे किछु पहिनेसँ प्रकाशित रचना साभार देल गेल अछि। विहनि कथा मादेँ प्रारम्भेसँ हमर रुचि एकर विभिन्न क्रिया-कलापे यथा पहिल लघुकथा गोष्ठीक आयोजन (संयोजकद्वय मुन्नाजी आ मलयनाथ मण्डन) १९९५ एवं कएकटा लघुकथा विशेषांक (पत्रिका सभक)मे सहयोगी रहलौं। एहि निमित्त श्री गजेन्द्र ठाकुरजीक सोझाँ प्रस्ताव राखलहुँ- प्रस्तावकेँ ओ सहृदए अनुमोदन तँ करबे केलनि जे हमरोसँ एक डेग आगाँ बढ़ि तन-मनसँ आ अपन विज्ञ मानसिकताकेँ प्रदर्शित करैत अहाँ सभक सोझाँ एहि अंककेँ अनलनि, ताहि हेतु हुनकर हार्दिक आभार। श्री अनमोल झा आ स्त्येन्द्र कुमार झाक सेहो भरपूर सहयोग भेटल, अइ द्वय सहयोगीकेँ हार्दिक धन्यवाद। ऐ यज्ञमे जे सहयोगी छथि सभसँ हमर आग्रह जे ऐ आहुतिक पछाति सुति नै रहथि। अपन विहनि कथा रचना माध्यमे निरन्तरता बनौने मैथिली विहनि कथा भंडारमे श्रीवृद्धि करैत रहथि। किएक अछोप बनल अछि मैथिली लघुकथा विधा चलनमे जे आबि जाए वैह परम्परा बनि जाइ छै। आ लोक द्वारा ओतैसँ ओकरा उघबाक प्रक्रिया प्रारम्भ भऽ जाइत अछि। आ आगू पीढ़ी दर पीढ़ी ओ स्वयं हस्तान्तरित होइत आगाँ बढ़ल चलि जाइत अछि। मुदा जे अपन परम्परा ठाढ़ करबा लेल पुरना परम्पराकेँ तोड़ि वा धकेल कऽ अपन अलग रस्ता बनबैत अछि ओकर सर्वग्राही हएब कठिनाहे नै वरन् असम्भव होइत छैक। एहिना मैथिली लघुकथा मैथिलीक आने विधा जकाँ हिन्दी वा अन्यान्य भाषाक देखाउँसे लिखाए तँ लागल मुदा लगभग तीन दशकक स्वतंत्र यात्राक पछातियो अपन स्वतंत्र विधा वास्ते अपने दुरापर अछोप नहाइत ठाढ़ बुझना जाइत अछि। अपन शैशवावस्थामे सभ भाषाक लघुकथा कथाक छेँट वा आकार मात्रे लघु भऽ सोझाँ आएल। जेना मैथिलियोमे सैह भेल। प्रारम्भिक अवस्थामे कियो लघुकथाक प्रकृति बुझबासँ बेसी एकरा लिखि अपन नामकेँ एकटा आर विधासँ जोड़बाक लौल केलनि। लौल शब्दक प्रयोह ऐ द्वारे जे ओइ विधाक रचनासँ तारतम्यता वा नियमितता नै राखि अपन पारम्परिक विधाक संग सटल रहि गेला। जँ ओ सभ प्रारम्भेसँ ऐ पर ध्यान देने रहितथि तँ शाइत इहो मोकाम पौने रहैत। मैथिलीयो लघुकथा आन भाषाक लघुकथासँ नव नै अछि। मुदा आइ हिन्दी समेत अन्य क्षेत्रीयो भाषाक लघुकथा अपन मोकाम बना लेवामे सक्षम भऽ गेल अछि। यथा ओड़िया, असमिया, मलयालम। मुदा मैथिली लघुकथा आइयो देहरिये-दुरुखे अछोप नहाँइत बौआइत देखाइत अछि। प्रारम्भमे कथाकार आ कवि सबहक समवेत उद्वेगक परिणामे जनमल मैथिली लघुकथाकेँ अपन शैशव कालक सुखद परिणाम कहल जा सकैछ जे लघुकथाक बीया मैथिलीयोमे बागि देल गेल। समयान्तरे ई जेना-जेना आन विधासँ विलगल गेल तेना-तेना ऐ रचना प्रक्रियाक घनिष्ठता गद्य रचनाकार संग भेल गेल। मुदा ओहि समयक स्थापित सभ कथाकारक ई उत्कंठा नै छलनि आ नै रहलनि जे कथे जेकाँ लघुकथोपर अपन छाप रखितथि। ओना ई सत्य अछि जे कथाकार जँ लघुकथाक स्वरूप (प्रकृति) वा शिल्प नै पकड़ि सकलाह तँ ओ नीक कथाकार भलहिं होथु मुदा नीक लघु कथाकार किन्नहुँ नै भऽ सकैत छलाह। प्रायः तहू डरे शुरुआतीमे लघु कथा लेखनक पछाति ओ सभ एहि विधासँ अपन हाथ पएर समेटिये लै मे अपन कबिलताइ बुझलनि, जे मैथिली लघुकथाक लेल अशुभ संकेत दैए। कथाकारक उदासीनताक कारणे सेहो एकरा अछोप सन रहबाक लेल ग्रसित केलकै। पूर्वार्द्धमे जे कथाकार सभ एकरा लिखलनि ओहिमे सँ किछु गीनल, बीछल कथाकार एकरा लिखैत रहि गेलाह जाहिमे शैलेन्द्र आनन्द, तारानन्द वियोगी, प्रदीप बिहारी, देवशंकर नवीन, परमेश्वर कापड़ि, सुस्मिता पाठक, चण्डेश्वर खाँ, नवीनचन्द्र कर्ण सदृश कथाकारक नाम उल्लेखनीय अछि। समयान्तरे उपरोक्त अधिकांश रचनाकार ऐ सँ विमुख होइत गेलाह। सम्प्रति तीन गोट रचनाकार यथा तारानन्द वियोगी, प्रदीप बिहारी आ चण्डेश्वर खाँ अपन निरन्तरता बनौने छथि, जाहिमे वियोगीजीक ऐ विधाक प्रति कएल काज ऐतिहासिक वा अविस्मरणीय कहल जा सकैत अछि। ऐ पीढ़ीक सशक्त कथाकार श्री विभूति आनन्दक ठाम ठीम लघुकथा देखबा-पढ़बामे आएल। हुनकर लघुकथाक प्रति उदासीनता वा कथाक प्रति आदर्शता की कहि सकैत छी? एकर प्रामाणिकता हुनकासँ भेल दूरभाषिक सामान्य वार्तालापेँ एना सोझाँ आएल। ओ कहलनि- शुरुआतमे किछु लघुकथा लिखलौं, मुदा बादमे जे लघुकथा सभ लिखै छी ओ जहाँ चारि-पाँच गोट लघुकथा होइत छैक तँ एकटा कथा बनि जाइत अछि। एकदम अनसोहाँत लागल। हमरा विचलित केलक हुनक ई वाक्य। मुदा अगिले क्षण ध्यान ओतऽ टिकल- ओ कथा विधाक निस्सन हस्ताक्षर छथि। हुनक सोच कथाक प्रति गम्भीर छनि। तेँ हुनक कोनो छोट-पैघ सोच कथाक प्रतिरूप होइछ। कारण जे किछु रहौ, हुनका सनक आनो कथाकारक एहि सोचसँ लघुकथाक प्रति उदासीनता स्पष्ट झलकैए। हम बड्ड आह्लादित भेलौं विदेह ई-पाक्षिकक अंक ६१मे अग्रणी पीढ़ीक कथाकारक रूपेँ फराक अस्तित्व राखऽवाली “शेफालिका वर्मा” जीक लघुकथा देखि। जे शिल्पक आ कथानकक दुनू दृष्टियेँ आ संपूर्ण रूपेँ प्रतिनिधि लघुकथाक श्रेणीमे राखऽबला छल। मैथिली रचनाकार द्वारा प्रारम्भमे एकरा नव चीज बुझि लघुकथा लेखनमे अपन उपस्थिति तँ दर्ज कराओल गेल मुदा समयान्तरे हुनका सभकेँ एहि विधाक रचनाक संग उत्सुकता वा जुड़ाव नै बनल रहबाक प्रमुख कारण रहल जे हुनका सभकेँ एहि विधा मादेँ आगाँ कोनो आर्थिक वा साहित्यिक लाभ दूर-दूर धरि नै देखा पड़ल हेतैन। तकरो ऐ सँ विमुखताक प्रमुख बिन्दु मानि सकैत छी। आर्थिक लाभसँ तात्पर्य जे लघुकथाक माध्यमेँ ओ कोनो मंचपर नै बजाओल जा सकैत छलाह, कारण जे सरकारी तँ दूर निजी रूपेँ सेहो एकर कोनो मंच आइ धरि स्थापित नै भेल अछि। जेना आन विधामे किछु तथाकथित रचनाकार वरु अस्तित्व नै बना पाओल होथु, मुदा कतौ सरकारी वा गएर सरकारी लाभक बेर अबै यथा रचना प्रकाशन वा रचना पाठ्ज- जतऽ पारिश्रमिक वा किराया भत्ता भेटौ तँ ओतऽ धरि भाइ-भैयारिये वा जी हुजुरिये, पछिलगुआ संस्कृतिक संचरण करैत स्थापितो रचनाकारकेँ धकिया, कात कऽ अपन खुट्टा गारि लैत छथि। ओहोन कोनो प्रकारक लाभक आशा हुनका सभकेँ दूर-दूर धरि दृष्टिगोचर नै भेलनि वा नै भेल हेतैन तेँ अपनाकेँ ऐ विधासँ कात केने रहलाह। ऐ विधासँ साहित्यिक लाभ सेहो भेटैबला नहि। साहित्यिक लाभक अर्थ जे- जे किछु रचनाकार ऐ विधामे निःस्वार्थ भावे लिखैत रहि गेलाह, तिनकर एखन धरि लघुकथाकारक रूपेँ पहिचानक कोनो आशा नै आ ने मैथिली लघुकथा विधाक फराक कोनो जग्गह भेटि सकल। हँ, दू गोट रचनाकार अप्पन करनीये मैथिली लघुकथाकारक रूपमे देखार तँ भेलाह। श्री तारानन्द वियोगी, जिनकर शिलालेख लघुकथा संग्रह आ कर्मधारय लघुकथाक समीक्षात्मक पोथी एवं प्रदीप बिहारी जिनक खण्ड-खण्ड जिनगी लघुकथाक संग्रह प्रकाशित अछि। मुदा मैथिलीक मठाधीश सभ द्वारा “नै उठलौ तँ भारी तँ लगलौ” बला कहावतकेँ चरितार्थ करैत कहल गेल- दुनू गोटे पाइबला लोक छथि तँ अपन संकलन प्रकाशित कऽ लैत छथि तै सँ की लघुकथाकार कहेता? मुदा हिनक श्रमक महत्व वा संग्रहक महत्वकेँ बुझबाक प्रयास नै कएल गेल। महत्व नै देबाक ऐतिहासिक कारण रहल। उपरोक्त दुनू व्यक्तिक गएर ब्राह्मण हेबाक। “मैथिलीमे बभनौटी (बाभनवाद) अदौसँ चलि आबि रहल अछि। जखनकि प्रारम्भ सँ ई लिखतममे पूर्णतः कायस्थक द्वारा संचालित भाषा छल (जकरा कि बाभान आकि रार ककरोसँ कोनो रागद्वेष नै छलै)। भाभनक भाषा तँ संस्कृत छल (बोली-चालीमे सभ कियो मैथिलीये बजै छल) जकरा ओ पंडिताइक माध्यमे भजबैत छलाह। मुदा जखन मैथिली स्थापित होमऽ लगलै, जखन ऐ मे कमाइक जोगार देखेलै तखन सभ ठाम कुण्डली मारि बैसि गेला ब्राह्मण बभनौटी देखाबऽ लगला। ओइमे ठठल रहल एकमात्र कर्ण कायस्थ। रारकेँ ई सभ ऐ तरहक कोनो गतिविधिमे टपऽ नै देबाक संकल्प लेलनि आ जकर मूल वैचारिक भाषा मैथिली छलै ओएह सभ ऐ सँ दूर कऽ देल गेलाह” (रमानन्द रेणु, मिथिलांगन, अप्रैल-जून २०१०)- सएह दुराग्रह। पक्षपात मैथिली लघुकथाक संग सेहो भेल। ओना आब ई मिथक टूटि गेल अछि। मैथिलीक भाषा सहित्यिक विकासक मादेँ बहुत रास सरकारी, गएर सरकारी संस्थान काज कऽ रहल अछि। यथा- साहित्य अकादेमी, दिल्ली; मैथिली अकादमी, पटना; भोजपुरी-मैथिली अकादमी, दिल्ली; पूर्व क्षेत्रीय भाषा केन्द्र, भुवनेश्वर; भारतीय भाषा संस्थान (सी.आइ.आइ.एल.)मैसूरक अतिरिक्त किछु निजी संस्था सभ जे प्रकाशन सेहो करैत अछि। एकर जेकियो प्रतिनिधि बनाओल गेलाह ओ सभपारम्परिक विधा यानी कविता, कथा किछु हद तक निबन्धक वास्ते विभिन्न तरहक कार्य/ गोष्ठी केलनि। हँ ठाम-ठीम नाटकक वास्ते सेहो काज भेल। मुदा लघुकथा मादेँ हिनका सबहक स्वतंत्र सोचब तँ दूर कथा संग्रह प्रकाशनक समय कथा संग्रहमे सतौत या पितियौत भाय नहाँइत संग लगा सकैत छलाह। आ ओहि माध्यमे ई थोड़े आओर जगजियार होइत।जेना कि तमिष वा मलयालम साहित्यिक संस्थाक प्रतिनिधि सभ कऽ रहल छथि आ ई दुनू भाषाक लघुकथा अपना बलेँ देखार भेल अछि। मैथिलीमे तँ दूर-दूर धरि एहेन सोच या काज देखार भऽ सोझाँ नै आबि सकल अछि। ताहिमे प्रमुख दूटा कारण हमरा जनतबेँ प्रमुख अछि- पहिल ओहि प्रतिनिधि सभक लघुकथाक प्रति अज्ञानता, दोसर ओइ प्रतिनिधि सबहक नजरीये लघुकथाक उसराहा खेत। मध्यम पीढ़ीक रचनाकार सभमे सँ किछु लोक अप्पन सर्जनात्मक ऊर्जा स्रोतेँ ऐ विधाक अलग जमीन तैयार करबाक अथक प्रयास केलनि। सत्य कही तँ वैह सभ ऊसर खेतकेँ कोड़ि-पटा कऽ एकर आधार रखबामे सक्षम भेलाह। हँ, ओ आधारकेँ मजगुत करैत एहि जमीनकेँ तीन फसिला सन बनेबाक वा हरल-भरल बनेबाक पूर्ण श्रेय नवका पीढ़ीकेँ जाइत अछि। सत्य! नवका पीढ़ीक किछु रचनाकार सक्रिय आ स्वतंत्र रूपेँ लघुकथाकेँ मोकाम धरि लऽ जेबाक लेल अपन रचना स्रोतक सर्वस्व ऊर्जा खर्च कऽ रहल छथि, जाहिमे सभसँ ऊपर नाम अबैत अछि श्री अनमोल झा जीक, जे लगभग डेढ़ दशक पहिने (११९४-९५ क करीब) अपन लघुकथा लेखन, कथा गोष्ठीक माध्यमे शुरू कऽ लघुकथा माध्यमे अप्पन पहिचान बना पौलाह अछि। ओ एखन धरि लगभग तीन सए लघुकथा रचना कऽ गेल छथि, जाहिमे सँ सए सँ ऊपर लघुकथा विभिन्न पत्र-पत्रिका/ स्मारिकामे बहार भऽ देखार भेल अछि। ओना एखन धरि कोनो संकलन नै बहार भऽ पौलनि अछि। तकर पछाति नवका पीढ़ीक ऊर्जावान आ प्रयोगवादी रचनाकार “अहीं केँ कहै छी” संग्रह लऽ जोरदार उपस्थिति दर्ज करौलनि अछि श्री सत्येन्द्र कुमार झाजी, जे मूलतः लघुकथाक धुरझार लेखन करैत अपन दोसर लघुकथा संग्रहक शीघ्र प्रकाशनक प्रतीक्षारत छथि। अही पीढ़ीक तेजस्वी पत्रकार बहुविधानुरागी श्री गजेन्द्र ठाकुर अपन बहुविधाक संगोर- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक” मे किछु बीछल लघुकथा लऽ जोरगर उपस्थिति देखौलनि अछि।एहने प्रमुख रचनाकारमे नाम अबैछ मुन्नाजीक जे वर्ष १९९४ मे कथागोष्ठीक माध्यमे अपन पहिल रचना “नामरद” जाहिपर सहयात्री मंच, लोहना (मधुबनी) द्वारा “बहस”क आयोजन कएल गेल छल, आ पहिल प्रकाशित रचना लघुकथा- काँद भारती मण्डनक माध्यमे शुरू कऽ एखन धरि मूलतः अही विधाक रचना आ आलेखमे ऊर्जा खर्च कऽ रहल छथि। एकर अतिरिक्त मधुकर भारद्वाज, रघुनाथ मुखिया जीक सेहो रचनात्मक रूपेँ समृद्ध रचना सभ देखएल। गोटा-गोटी कऽ ठाम ठीम आर कतेको गोटे आब अय विधामे सहयोगी छथि। उपरोक्त नामसँ अलग एकटा महत्वपूर्ण नाम अछि श्री चण्डेश्वर खाँ जीक जे मध्यम पीढ़ीसँ नवका पीढ़ीक बीच लघुकथा रचनाक निरन्तरताक बलेँ एकटा सेतु (पुल)क काज कऽ रहल छथि। ई सत्य अछि जे किछु गीनल वा बीछल रचनाकारक समूहे एकर स्वतंत्र विधामे स्थापित हेबामे अखन किछु भांगठ बुझना जाइत अछि। कोनो एहेन विधा जकर गोटेक दर्जन सक्रिय रचनाकार नै हुअए तँ ओकर स्वतंत्रता आन्दोलन भारतक स्वतंत्रता आन्दोलन १९४२ आ १९४७ क नै वरन् १८५७ क संग्राम सन भऽ कऽ रहि जाएत। नवका पीढ़ीकेँ एकरा छटपटाहटसँ तँ बाहर आनि लेलक अछि आ आब एकर उग्रास होइत बुझैए। मुदा ऐ नवका पीढ़ीक एहेन रचनाकार सबहक कथालोचक वा समीक्षक द्वारा कोनो नोटिस नै लेल गेल अछि। ओना ई पीढ़ी पक्षपात/ गुटबाजी वा राग-द्वएषसँ दूर निःस्वार्थ भावेँ परिश्रम करैत सीढ़ी दर सीढ़ी आगाँ बढ़ि रहल अछि। मुदा कखनो कऽ ई सभ उपरका पीढ़ीक असहयोगक चलते वा कुटिलचालिये निरुत्साहित (मुदा अनाथ नै) सन अनुभव करैत अछि। एकर अतिरिक्त किछु लोक (रचनाकार) जे मैथिली भाषासँ इतर (यथा हिन्दी, बांग्ला एवं असमिया इत्यादि) पत्र-पत्रिकामे मैथिली कथा साहित्यक मादेँ लिखलनि, ओहो सभ ऐ मे लघुकथाक चर्चासँ अपनाकेँ एगदम दूर रखलनि। एकर दूटा प्रमुख कारण सोझाँ अबैत अछि-१.जे ओहि लेखक/ रचनाकारकेँ लघुकथाक ज्ञाने नहि हेतैन २.लघुकथाकेँ अखन अस्तित्वहीन मानि कऽ अछोप सन विलगा कऽ रखबाक साजिश भऽ सकैए। रिपोर्ताज ४ दिसम्बर २०१० (शनि दिन) मिथिला सेवा संघ, जैतपुर (बदरपुर, नई दिल्ली) द्वारा भव्यरूपेँ विद्यापति पर्व समारोहक सफल आयोजन कएल गेल। उक्त आयोजनक अध्यक्षता केलनि मैथिली/ हिन्दीक वरिष्ठ साहित्यकार श्री गंगेश गुंजन आ विशिष्ट अतिथि रहथि युवा पत्रकार ओ बहुविध रचनाकार श्री गजेन्द्र ठाकुर। अध्यक्षीय भाषणक नमहर कड़ीमे श्री गंगेश गुंजन आग्रह जतौलनि जे ऐ आयोजनमे कविगोष्ठीक आयोजन आ महिलाक अनुपस्थितिकेँ भरल जाए। आतिथ्य भाषणमे श्री गजेन्द्र ठाकुर एक मात्र पाँतीमे गएरबाभनक उपस्थितिकेँ सेहो निश्चित करबाक विचार देलनि। विजय मिश्र आ गंगेश गुंजन द्वारा दीप प्रज्वलनक पछाति मैथिलीक चर्चित-परिचित कलाकार द्वारा धमगिज्जर गीतनाद प्रस्तुत कएल गेल जे भोर धरि दर्शककेँ नै उठबाक लेल बन्हने रहल। श्रोता/ दर्शकक उपस्थिति सेहो अपेक्षासँ बेशी छल जे प्रशंसनीय अछि। अनिल गौतमक वार्तालाप तारानन्द वियोगीक संग सार्थक बाल साहित्यक प्रसार सं मैथिली कें नवजीवन भेटत अनिल--बाल साहित्यक लेल साहित्य अकादेमी पुरस्कारक लेल अहां कें बधाइ भाइ। हमरा सभक लेल ई बहुत खुशीक बात थिक। घोषणा सुनि क' अहां कें केहन लागल? ता.न.वि.--धन्यवाद भाइ। हमरो नीक लागल अछि। एहि तरहें चयन भेने ई आस्था बनल अछि जे हमरा भाषाक नेतृत्वकर्ता लोकनि मे, निर्णायक लोकनि मे गुणग्राहकता अवश्य छनि। ओना तं कही जे हमर साहित्य-लेखनक जे लक्ष्य अछि से बहुत दूरगामी अछि आ पुरस्कार भेटने वा नहि भेटने कोनो बात बनैत वा बिगडैत हो, से बात एकदम्मे नहि अछि। तखन होइ की छै जे अहां अटट्ट दुपहरी मे सोर-फोर कतहु जा रहल होइ आ रस्ता मे कोनो ठाम छांहदार गाछक शीतलता भेटि जाय वा एक लोटा ठंढा जल भेटि जाय, तं नीक तं लागबे करत। दोसर बात ई होइ छै जे बाहर अहांक भने बहुत सम्मान हो मुदा एकटा विडम्बना जरूर बाहरक लोक कें सालैत रहैत छै जे हिनका घरक लोक सब कतेक हृदयहीन छथिन। जे किछु। नीक तं हमरो लागल अछि। अनिल-- अहां कहलियै जे दूरगामी लक्ष्य अछि। की अछि अहांक दूरगामी लक्ष्य? ता.न.वि.--देखू भाइ, कोनो लेखकक जीवन के चरम सार्थकता की थिक? यैह जे ओ अपन भाषा, जाहि मे लेखन करैत अछि, के तागत बढाबए। एहि-एहि प्रकारक नवीन अनुभूति आ अभिव्यक्ति अपन भाषा मे लाबए, जाहि लेल कदाचित ओकर भाषा एखन धरि अक्षम छल, बेगरतूत छल। आ से कोनो तात्कालिकताक हिसाबें नहि। भाषा-साहित्यक अविरल इतिहासक हिसाबें। से भेल मूल बात। दोसर दिस पुरस्कारे कें जं लिय' तं अनेक एहन पुरस्कार अछि जाहि मे अहांक लेखन कें सम्पूर्ण भारतीय भाषा वा सम्पूर्ण विश्वक भाषाक प्रतिस्पर्धा मे राखल जाइत अछि। जेना ज्ञानपीठ वा बुकर आदि। काल्हि धरि मैथिली मे लिखि क' अहां एतए धरि सोचियो नहि सकैत रही। आइ सोचि सकै छी। मुदा, एहि लेल तं असाधारण कोटिक साधना आ अभ्यास चाही कि ने। अनिल--मुदा मैथिली मे की अहां ताहि तरहक माहौल देखै छियै? एतए तं कहांदन डेग-डेग पर गुटबाजी छै। ता.न.वि.--माहौल कें देखबाक हमरा फुरसति हो, तखन ने? हमरा तं अपन काजे सं फुरसति नहि भेटैत अछि। अहां कें प्रायः बूझल हो जे हम नियमित रूप सं तीन-चारि घंटा रोज लेखन करै छी। दोसर दिस, नोकरी एहन अछि, जाहि मे ने तं अल्ली-टल्ली मारि सकै छी, ने एहन हमर प्रवृत्तिये अछि। एखनहु, एहू जुग मे किताब आ पत्रिके पढब हमर मनोरंजनक साधन अछि। साहित्ये सं जीवन भेटैए, साहित्ये सं मनोरंजन। कहि लिय' जे 'उसी से ठंढा, उसी से गरम'। एहना हालति मे, की हम गुट बनाएब आ की हम गुट सभक गतिविधि बूझब। एकटा समय छल, जखन मैथिली मे जखन किछु गलत होइ तं बड जोर सं रिएक्ट करी। ओहुनो हाइपर सेन्सेटिव टाइप के हम आदमी छी। आब मुदा, हम सोचै छी जे गलत के प्रति रिएक्ट केने अहां बहुत किछु नहि क' सकै छी। सही बात ई भेलै जे अहां सही लाइन परअपन काज केने चलू। ओहुना, जं अहां वास्तविक अर्थ मे एक लेखक छी तं अहांक काज सही लाइन पर लेखने करब हेबाक चाही, गलत लेखनक प्रति रिएक्ट करब मात्र नहि। यौ भाइ, अपन लिखलके अन्ततः काज अबै छै। हम तं अपना गाम-घरक परिसर मे सामाजिक-सांस्कृतिक एक्टिविटी मे सेहो लागल रहलहुं अछि। लेकिन, मानै छी जे लेखनक कोनो विकल्प नहि होइ छै। गुटबाजी के जहां धरि बात अछि, तं एहि सम्बन्ध मे हमर विचार सर्वथा भिन्न अछि। गुटबाजी कें हम किन्नहु अधलाह नहि मानै छी। गुट माने की? दू-चारि गोटे एकठाम जुटलहुं-जुडलहुं, सैह ने? एहि लेल तं लाइक माइंड हएब सर्वथा जरूरी छै। एम्हर, अपना ओतक परंपरित संस्कृति की थिक? हम सब, प्रत्येक व्यक्ति अपने कें सब सं महान, सब सं काबिल मानै छी। एकोऽहम् द्वितीयो नास्ति। एहना स्थिति मे जं दू-चारि गोटे एकठाम बैसथि, विचार-विमर्श करथि आ समाज कें तकर किछुओ आउटपुट भेटैत देखार पडैत हो तं ई तं बहुत नीक बात भेलै। हमरा जं परिभाषा करए कहब तं हम तं गुटबाजीक यैह परिभाषा करब। मुदा, एहि तरहक गुटबाजी कतहु होइत हो मैथिली-परिसर मे, से तं हमरा देखार नहि पडैत अछि। तखन बचल बात-- खिधांस आ कुटिचालि के,तं तकर तं कोनो व्याकरण नहि हो। की एसगर आ की झुंड बना क"। तकर उद्देश्य की तं सृजनात्मक काजक विरोध करब। हम हिनका सभक परबाहि नहि करैत छी। जं परबाहि करितहुं तं आइ महिषी गाम मे हरबाही करैत रहितहुं। अहूं सब कें कहै छी जे हिनका सभक परबाहि नहि करी। अपन भाषा मे किछु वरेण्य साहित्यकार सब भेलाह अछि, जनिकर सान्ध्य-गोष्ठी बहुत नामी अछि आ बहुत फलप्रद भेल अछि। जेना सुमन जीक सान्ध्य-गोष्ठी। एखनहु जं कतहु एहन होइत हो, एहि सं रचनात्मक, सार्थक आउटपुट बहराइत हो,एहि सं समाज मे मिलि-बैसि क' किछु सोचबाक-करबाक (सह वीर्यं करवावहै) उत्साह भेटैत हो, तं हम तकर स्वागत करै छी। अनिल-- अहां कें बाल साहित्यकारक रूप मे पुरस्कृत कएल गेल, जखन कि अहां मूलतः बाल साहित्यकार नहि, एक गंभीर सृजनात्मक लेखक छी। अहां कें तं साहित्य अकादेमी पुरस्कार भेटबाक चाहैत छल। ई बात अहां कें नहि अखडल? ता.न.वि.-- यौ भाइ, हम बाल साहित्यकार छी, एहि बात सं सदैव अपना कें गौरवान्वित अनुभव करैत छी। सार्थक बाल साहित्यक सृजन एक असाधारण बात थिक, से कृपया मोन राखू। (हंसैत) ओना तं हम बहुत किछु छी। एकटा खिस्सा कहै छी। एक कार्यक्रम मे रांची गेल रही। ओतए डा० धनाकर ठाकुर सं परिचय भेल। पहिले भेंट छल। ठाकुर जी हमर नाम पुछलनि। हम कहलियनि--तारानन्द वियोगी। ओ कहए लगलाह--'यौ, मैथिली मे तं कहांदन कैक टा तारानन्द वियोगी छथि। एकटा छथि जे मिथिलाक धरोहर सब पर काज करै छथि। एकटा आर छथि जे सदरि काल 'दलित-दलित' करैत रहै छथि। आ एकटा छथि जे बड सुन्दर कविता-कथा-आलोचना सब लिखै छथि। एहि मे सं अहां कोन तारनन्द वियोगी छी?' तं, से सैह बात। बात पुछलहुं अखडै के। किए अखडत? हम साफ करै छी जे अखडैत नहि अछि। तकर कारण अछि। अहां भने कतबो नीक लेखन करैत होइ, ओकर परखबाक जखन बात अबै छै तं ओहि मे रुचि-भिन्नता एक महत्वपूर्ण कारक बनैत अछि। अहां कें जं हमर लेखन पसिन्न नहि पडल, तं एकर मतलब छै जे ओ अहांक लेल नहि लिखल गेल अछि। रुचि-भिन्नताक कारण ओ अहां कें नहि पसिन्न पडल। मुदा, तै दुआरे हम दुखी होइ वा हमरा अखडए, तकर हम कोनो कारण नहि देखै छी। हमर तं सोच अछि जे लेखक कें एतबा इमान्दार हेबाक चाही जे जं ओकरा बेइंसाफीक संग वा साहित्येतर कारण सं पुरस्कृत कएल जा रहल हो, तं ओकरा पुरस्कार कें ठुकरा देबाक चाही। अहां कें प्रायः बूझल हो जे चेतना समिति, पटना जखन हमरा 'महेश पुरस्कार' देने छल, तं समुचित रूप सं तकर कारण बतबैत हम ओहि पुरस्कार कें स्वीकार करबा सं इनकार क' देने छलियनि। अनिल- मुदा भाइ, सुनबा मे आएल अछि जे फाइनल राउन्ड मे प्रसिद्ध लेखक लोकनिक मोट-मोट किताब सब प्रतिस्पर्धा मे छलै। तकरा सभक बदला अहांक एक पातर-सन पोथी कें पुरस्कारक लेल चुनि लेल गेल। ई बात जरूर जे निर्णय सर्वसम्मति सं भेलै। मुदा की एकरा अहां बेइंसाफी नहि मानै छियै? ता.न.वि.- क्षमा करब भाइ। जं अहां मोट-मोट पोथी आ छोट-छीन-पातर पोथीक आधार पर बाल साहित्य कें बुझबाक दाबी करै छियै तं हम साफ कहब जे बाल साहित्य कें अहां साफे नहि बुझै छियै। ओ बच्चाक लेल लिखल गेलैए ने यौ। सेहो कोन बच्चाक लेल? मिडिल स्कूल मे पढनिहार छठा-सतमाक बच्चाक लेल। सुनियोजित ओकर फारमेट छै। ओकर अपन टारगेट ग्रुप छै। एक दिस अहां कहै छियै जे बच्चाक स्कूल बैग कें हल्लुक करब अपना सभक राष्ट्रीय आवश्यकता छै, आ दोसर दिस, ओकर मनोरंजन आ प्रेरण लेल मोट-मोट पोथीक जरूरति देखैत छिऐक, तं ई तं उचित बात नहि भेलै। मुदा तैयो, अहांक जानकारी लेल कहि दी जे बाल साहित्य-कृतिक लेल जे अन्तर्राष्ट्रीय मानदंड छै, ताहि पर ई पोथी दुरुस्त उतरल अछि। मैथिली मे आई.एस.बी.एन. नंबरक संग कम पोथी छपल अछि। सेहो नंबर एकरा भेटल छै। असल मे, मोट-पातरक आधार पर बाल साहित्यक मूल्यांकने नहि कएल जा सकैए। मूल बात छै जे ओकर विषय-वस्तु, आजुक बच्चा लेल, आजुक जुगक चैलेंज के सन्दर्भ मे, कतेक उपयोगी छै। कतेक प्रासंगिक छै। दोसर जे ओकर भाषा आ शिल्प टारगेट ग्रुपक बच्चाक लेल कतेक सम्प्रेषणीय छै। ई नहि ने हेतै जे अहां लिखबै बच्चाक लेल, आ बिम्ब आ प्रतीक आ कथन-भंगिमा राखबै निज अप्पन। परकाया-प्रवेश तं अहां कें करैए पडत। अनिल- मुदा अहां उपनिषद-कथा पर लिखलियै-ए। की एकरा प्रासंगिक कहल जेतै? की ई मौलिक कृति भेलै? ता.न.वि.--मौलिक कृति तं ई १०० प्रतिशत भेल। कारण, उपनिषदक कोनो कथाक ई अनुवाद नहि थिक। अहां एक सय आठ उपनिषद उनटा लिय'। कत्तहु एक ठाम ई कथा अहां कें अविकल नहि भेटत। असल मे ई शब्द द्वारा ओहि युगक पुनर्सृजन थिक। उद्देश्य अछि- सकारात्मक जीवन-प्रणाली कें बच्चाक सामने उद्घाटित करब। ओहि युगक लोक कोन तरहें सोचै-बिचारै छला, केहन हुनकर जीवन-प्रणाली छलनि, आपसी सम्बन्ध आ पर्यावरणक प्रति हुनकर कतेक सकारात्मक नजरिया छलनि, जीवन मे प्राथमिकताक निर्धारण कोन तरहें करी एहि सम्बन्ध हुनका लोकनिक तरीका छलनि, आदि-आदि अनेको विन्दु सभक पुनर्सृजन ई कथा-पुस्तक थिक। मजेदार बात ई छै जे एहि पोथीक जे प्रेरण-तत्त्व छै से एकर बाल-पाठक कें अलग सं कतहु देखारे नहि पडत। दोसर बात छे जे एहि समस्त कथा-वस्तु कें अत्यन्त मनलग्गू ढंग सं गूथल गेलै-ए। एहि किताबक योजना हम एना कए बनौने रही जे हमर अधिकांश बाल पाठक एकरा दू-तीन सिटिंग मे पढि जाथि। मुदा, बाद मे पता लागल जे बेसी पाठक तं एक्के सिटिंग मे पढि गेलाह अछि। प्रासंगिकताक जहां धरि सवाल अछि, हम तं देखै छी जे आजुक एहि उपभोक्तावादी व्यक्तिवादी कठमुल्लावादी समय मे एहि तरहक सोच राख' बला कृतिक बहुते महत्व छै। ततबे बेसी प्रासंगिकता छै। असल मे, अपना ओतए, मिथिला मे, शुरुहे सं ई चलन रहलै-ए जे उपजीव्य ग्रन्थ तकबाक हो तं रामायण मे ढुकू अथवा महाभारत मे। बड बेसी भेल तं भागवत मे। हम बेबाक भ' क' कह' चाहै छी जे आजुक युगक चुनौती सभक सन्दर्भ मे उपनिषद, जातक-कथा, त्रिपिटक साहित्य आदि बेसी उपयोगी आ प्रासंगिक अछि। महाभारत मे वन कें जराओल जाइ छै जखन कि उपनिषद मे वनक संग मैत्री कएल जाइ छै। अहां कें की चाही? अहांक युगक बच्चा वनक प्रति की रुख अपनाबय? की ओकरा संस्कार मे अहां देब' चाहै छियै? सोचियौ। अनिल-- बहुत अनमोल बात कहलियै भाइ। एही तरहें सोचबाक चाही। बाल साहित्य कें ल' क' आगुओ अहांक कोनो योजना अछि? ता.न.वि.--बहुतो योजना अछि। असल मे, बाल साहित्य पर हम सांस्थानिक ढंग सं काज करए चाहै छी। हमरा स्पष्ट लगैत अछि जे आगू जे मैथिली जीयत आ बढत तं ताहि मे बाल साहित्यक बहुत पैघ भूमिका हेतै।एकर प्रसार मैथिली मे नवजीवन भरि देत। मधुबनी मे जखन हमर पोस्टिंग छल तं अनेक तेजस्वी युवा लोकनिक संग हमर मित्रता भेल। एहि मे वशिष्ठ (ऋषि वशिष्ठ) छला महाकान्त ठाकुर आ प्रकाश झा छला। किशोरनाथ, सुधीर कुमार मिश्र, राकेश कुमार मिश्र, रघुनाथ मुखिया--ई सब गोटे हमरा टीम मे रहथि। हम सब एक सुचिन्तित योजनाक तहत बाल साहित्यक लेखन, प्रकाशन आ वितरणक काज एकदम संस्थागत तरीका सं करब शुरू केलहुं। एक हजार प्रति किताबक संस्करण छपए। टीमक सदस्य लोकनि एकरा स्कूले स्कूल जा क' बेचि आबथि। सही हाथ धरि पोथी पहुंचि जाए। एक बच्चा जं पोथी कीनए तं ओकर परिवारक सदस्य आ अडोसिया-पडोसिया मिला क' पन्द्रह-बीस पाठक हमरा लोकनि कें भेटि जाथि। हम युवक मित्र लोकनि कें लेखन मे आगां केने छलियनि। हम तं बुझू पाछू लागल लिख' लगलहुं। एखनहु वशिष्ठ महाकान्त आ हुनक टीमक सदस्य लोकनि एहि काज कें आगू बढा रहल छथि। हम अपनहु एहि योजना कें जारी रखबाक लेल प्रतिश्रुत छी। लेखन अपन ठाम पर अछि,तकर महत्व सर्वोपरि छै,मुदा एक्टीविज्म के सेहो बहुत बेगरता छै। हम जकरा लेल लिखी तकरा धरि जं पहुंचय, तं एहि सं बढि क' आनन्द नहि हो। अनिल-- हम प्रश्न करए चाहैत रही जे लेखन कें ल' क' की सब योजना अछि? ता.न.वि.-- एकटा तं हमर योजना अछि जे 'मिथिला' सं बच्चाक आत्मीय परिचयक लेल एक पुस्तक-माला तैयार करी। उद्देश्य जे भावी पीढीक भीतर अपन देस-कोसक प्रति अनुराग जाग्रत करए। मिथिलाक गौरवशाली इतिहास, एकर नायक, एकर सांस्कृतिक सौरभ, एकर जीवन-पद्धति---एहि समस्त चीज पर। खास बात ई जे सब टा प्रकरण कथात्मक हेतै आ से तते मनलग्गू जे हमर बालपाठक ओकरा दू-तीन सिटिंग मे पूरा पढि जाथि। उद्देश्य एकैसम शताब्दीक सुपुरुष मैथिल तैयार करब। मात्र अतीत-गान नहि, ओहि मे सकारात्मक तत्वक खोज, आडेन्टिटीक खोज---जे आब' बला युग मे हुनका जीवनक काज आबि सकए। एकटा पोथी हम, एम्हर तैयार केलहुं-ए गोनू झा पर। छुच्छ हंसी-ठट्ठाक लेल गोनू झाक खिस्सा के अनेक पोथी पहिनहि सं प्रकाशित छै। मुदा, ओहि सब मे गोनू झाक कोनो व्यक्तित्व ठाढ करबाक कोशिश नहि भेल अछि, मिथिलाक एहि नायकक चरित्र नहि गढल जा सकल अछि। असल बात छै जे हमरा समक्ष कोनो चीज स्पष्ट रहत तखने ने हम अपन साहित्य द्वारा ओकरा पुनर्सृजित करबाक चेष्टा करब। एहि तरहक एक पोथी हम गोनू झा पर लिखनहु छी, जे नेशनल बुक ट्रस्ट सं प्रकाशित छै। मुदा, ओहि सं हम सन्तुष्ट नहि छी। उदात्त मैथिल मानुसक रूप गोनू झाक व्यक्तित्व ठाढ करबाक लेल जे औपन्यासिक कलेवर चाही, से अहां कें हमर अगिला किताब मे भेटत। तहिना, लोक साहित्य, संस्कृत वाङ्मय,त्रिपिटक साहित्य--एहि सब मे अनेक मजेदार आ अति प्रासंगिक वाकया सब आएल अछि। इच्छा अछि जे तकरा सब कें बच्चाक लेल प्रस्तुत करी। एहि समस्त योजना सभक मूल्यगत उद्देश्य यैह जे अपन बाल पाठक मे हम विज्ञान-बुद्धि, लोकतांत्रिक संस्कृति, पर्यावरणक प्रति संवेदनशीलता, आ अपन आइडेन्टिटीक प्रति आत्मतोष देखए चाहै छी। अनिल-- एहन बहुमूल्य वार्तालापक लेल भाइ, अहां कें धन्यवाद। ता.न.वि.-- अहूं कें धन्यवाद। तारानन्द वियोगी साहित्य अकादेमीक विशेष समारोह (१५.११.१०) मे तारानन्द वियोगीक वक्तव्य- सन्दर्भ : साहित्य अकादेमीक बाल साहित्य पुरस्कार आदरणीय अध्यक्ष महोदय आ मित्र लोकनि, साहित्य अकादेमीक एहि विशेष समारोह मे हम सब गोटे आइ, एतए एकत्र भेलहुं अछि। भारतीय साहित्यक जीवन्त-जागन्त उपवन एतए मौजूद अछि, जाहि मे किसिम-किसिम के, रंग-बिरंग के फूल फुलाएल अछि। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ कहल करथि जे हमर भारत माता बीसो-पचीसो भाषा मे बजैत छथि। से ठीके, ओहि भारत माता कें एतए जीवन्त अनुभव कएल जा सकैत अछि। एहन महत्वशाली अवसर पर हम अपना कें एतए, अहां सभक बीच पाबि क' गौरवान्वित अनुभव क' रहल छी। हम साहित्य अकादेमी कें, हमर मैथिली भाषाक प्रतिनिधि कें, हुनकर सहयोगी लोकनि कें हृदय सं धन्यवाद दैत छियनि। हमरा सं अनुरोध कएल गेल अछि जे एहि अवसर पर हम अपन किछु अनुभव, किछु चिन्ता अपने लोकनिक बीच शेयर करी। ई जरूरियो बहुत अछि। हमरा लोकनिक भारतीय साहित्य आइ जाहि दौर सं गुजरि रहल अछि, जे संकट आ चुनौती आइ एकरा सामने विद्यमान छै, तकरा अकानैत तं ई आरो बेसी जरूरी अछि। बन्धु, हम कोशी क्षेत्रक बसिन्दा छी। अहां सब कें साइत बूझल हो जे कोशी बहुत विकराल, बहुत मनमौजी नदी छैक। ठाम-ठाम एहि नदी पर बान्ह बान्हल गेल छै। अक्सरहां एहन होइ छै जे नदी बान्ह तोडि दैत अछि। पानिक भयावह रेला बहि चलैत अछि। लोक जहां-तहां फंसि जाइत छथि। सरकारी-गैर सरकारी एजेन्सी सब तं बाद मे पहुंचैए, पहिने तं ई होइ छै जे लोक आपस मे मिलि-जुलि क' अपन मदद करै छथि, एक दोसरक जान बचबैत छथि। कोशीक विकराल रेती मे जं क्यो एसकर पडि जाय तं ओकर जान बचब कठिन होइत छैक। एहना स्थिति मे लोक की करै छथि जे एक-दोसरक हाथ मे हाथ ध' क' मानव-शृंखला बना लैत छथि, टेकक लेल दोसर हाथ मे लाठी ल' लैत छथि, आ एहि तरहें सुरक्षित स्थान धरि पहुंचि जाइत छथि। सब गोटे साइत अनुभव करैत हएब जे आइ हमहूं सब क्यो एहने परिस्थिति सं गुजरि रहल छी। भूमण्डलीकरणक एहि दौर मे छोट-छोट भाषा सभक नित्तह मृत्यु भ' रहल छै। साहित्य कें निरन्तर अप्रासंगिक करार देल जा रहल अछि। भावाभिव्यक्ति मे एक जाहिल प्रकारक उथ्थरपनी चारू दिस देखार पडि रहल छै। एत्तेक तेजी सं दुनियां रोज-रोज बदलि रहल अछि जे युग आ काल सं सम्बन्धित हमरा सभक परंपरित अवधारणा कतोक बेर धोखा करैत प्रतीत होइत अछि। ई तं भेल मुदा एक पहलू। दोसर दिस हम सब इहो पाबि रहल छी जे हमर जे पीढी युवा भ' क' आइ दुनियांक मुकाबला करैक लेल तैयार भ' रहल अछि, ताहि पीढी मे अपन आइडेन्टिटी, अपन अस्मिता कें ल' क' एक सात्विक तडप सेहो साफे देखाइत अछि। एक व्यापक आ परिपूर्ण भारतीयताक समझ ओकर सभक आत्माक मांग बनि रहल छै। तं, एहि तरहें, ई एक एहन समय थिक जे बूझि लिय'--थोडे खट्टो अछि, थोडे मिट्ठो अछि। चुनौती हमरा सभक सामने ई अछि जे एहना परिस्थिति मे हम सब, आ हमरा सभक साहित्य एहि पीढीक, आब' बला पीढीक कोन काज आबि सकैत अछि? एकटा जबाना रहए कि जहिया बडका-बडका लोक छोट-छोट बच्चाक लेल लिखब गौरवक बात बूझथि। सेहो जबाना आब बीति चुकल अछि। एहन हाल मे, एक तं हम बुझै छी जे संग-संग मिलि-जुलि क' लगातार काज करबाक प्रयोजन छै, दोसर युग के चुनौती कें एहि तरहें स्वीकार करब सेहो जरूरी छै जे आगू आब' बला पीढी हमरा सब पर ई दोख नहि लगाबए जे जखन रोम जरि रहल छल तं नीरो बंसुरी बजा रहल छल। भाइ लोकनि, अहां अधला नहि मानब, एहि तरहें हम सोचै छी तं घटाटोप अन्हार राति मे बिजलौकाक चमक सन जे चीज हमरा देखाब दैत अछि, से थिक--बाल साहित्य। सार्थक ढंग सं लिखल बाल साहित्ये ई काज क' सकैत अछि जे आब' बला पीढीक लेल साहित्यो एक प्रासंगिक चीज, ओकरा सभक जीवनक काज आब' बला चीज बनि क' रहि सकय। आब' बला युगक अनुभूति-संस्कार कें ई परिमार्जित क' सकैत अछि। भावाभिव्यक्तिक उथ्थरपनीक बदला एक स्थैर्य, एक गहराइ कें ओकर जीवन-शैलीक अंग बना सकैत अछि। भूमंडीक एहि बजारक जीवन-पद्धति अछि--द्विआयामी, जाहि मे बस वस्तु अछि आ क्रिया अछि। त्रिआयामी जीवन-पद्धति, जाहि मे वस्तु आ क्रियाक संग-संग चिन्तन सेहो हो, तकर विकास बाल साहित्य क' सकैत अछि। हमरा तं लगैत अछि जे ठीक ढंग सं लिखल गेल बाल साहित्यक प्रसार छोट-छोट भाषा सभक मृत्यु-दर कें कम क' सकैत अछि आ हमरा सभक उखडैत पएर कें एक ताजगी-भरल मजगूती प्रदान क' सकैत अछि। जे चिन्ता आइ हमर अछि, हमर ख्याल अछि जे ई अहूं सभक चिन्ता अछि, सौंसे देशक, सौंसे दुनियांक चिन्ता अछि। एहना मे हम बहुत आभारक संग साहित्य अकादेमी कें आ संस्कृति मंत्रालय कें धन्यवाद दैत छी जे भारतीय भाषा सभ मे बाल साहित्यक विकास हेतु ओ लोकनि नव तरहें सोचब शुरू केने छथि। लगधग चारि साल भेल, जे एही चिन्ता सब सं जूझैत हम, अपन भाषा मैथिली मे, एहि दिशा मे किछु काज करबाक शुरुआत केने रही। मैथिली मे बाल साहित्यक स्थिति अत्यन्त दुर्बल अछि। दोसर बात इहो छै जे हमरा ओतय, मैथिली-प्रकाशनक सम्बन्ध मे ई कहबी बहुत प्रचलित छै जे लेखकक छपाओल किताब बिकैत नहि अछि आ पाठक कें ओकर पसन्दक किताब भैटैत नहि अछि। हम सब किछु नव तरहें समाधान तकबाक कोसिस केलहुं। युवा लेखक आ साहित्य-कर्मी लोकनिक हम सब टीम बनेलहुं। बाल साहित्य पर गम्भीरताक संग काज शुरू कएल। सतमा-अठमा क्लासक बच्चा कें हम सब टारगेट केलहुं। विषय एहन-एहन चुनलहुं जे एकैसम सदी मे वयस्क होब' बला हमर बालपाठकक जीवनक काज आबि सकय। उपजीव्यो ग्रन्थ जं चुनबाक हो, तैयो हम सब लीक सं हंटि क' चलबाक मन बनाओल। हमरा ओतय दुइये टा उपजीव्य मुख्यतः चलन मे रहल अछि--रामायण आ महाभारत। हम सब उपनिषद कें पकडलहुं, जातक कथा कें पकडलहुं। मिथिला मे लोककथा, लोकगाथा आ लोक-किम्वदन्ती सभक विशाल भंडार एखनो श्रुति-परम्परा मे विद्यमान अछि। हम सब ओकरा पकडलहुं। अहां देखबै जे महाभारत मे जंगल कें जराओल जाइ छै, जखन कि उपनिषद मे जंगल-संग दोस्ती कएल जाइ छै। प्रश्न अछि जे आइ हमरा की चाही? आ, किताब कें फारमेट सेहो हम सब किछु अलग तरीका सं केलहुं। भाषा, अभिव्यक्ति-शैली,कथन-भंगिमा--एहि सभक प्रति सेहो हम सब बहुत सजग रहलहुं। लोक-किम्वदन्तिये सभक पुनर्सृजन करैत हमर महाकवि विद्यापति कहियो 'सुपुरुष' के अवधारणा प्रस्तुत केने छला। हमरा सभक लक्ष्य भेल--'सु-मानुस', जाहि मे सुपुरुषक संग-संग 'सु-नारी' सेहो सम्मिलित अछि।हमरा सभक ई 'सु-मानुस' एक्कहि संग जतबा मैथिल छथि, ततबे भारतीय आ ठीक-ठीक ततबे वैश्विक। मुदा, हम सब इहो अनुभव केलहुं जे ई काज जं भ' सकैए तं अपन मातृभाषाहिक माध्यमें। जाहि भाषा मे बच्चा अपन माय-संग गप करैए, अपन दादी-नानी सं खिस्सा-कहानी सुनैए, ठीक ताही भाषाक माध्यमें ओकरा दुनियां-जहान मे प्रवेश करए देबाक चाही। साहित्यक द्वारा 'सु-मानुस' के विकासक साइत ई अनिवार्य प्रक्रिया थिक। हमरा बच्चाक लेल ओकर सर्वश्रेष्ठ साहित्य अनिवार्यतः ओकरा मातृभाषे मे लिखल जा सकैत अछि। ई सब करबाक कोसिस हमरा लोकनि कएल। हमरा टीमक युवा साहित्य-कर्मी लोकनि मिड्ल स्कूल, हाइ स्कूल मे पहुंचथि आ सस्त संस्करण बला ई पोथी सब प्रत्यक्षतः अपन पाठक सब कें सौंपि आबथि। जाहि घर मे पोथीक एक प्रति पहुंचय, परिवारी-जन आ अडोसी-पडोसी मिला क' औसतन पन्द्रह-बीस पाठक हमरा सब कें भेटि जाथि। बन्धुगण, अहां सब कें लागि रहल हएत जे हम विषयान्तर भ' रहल छी। अहां कहि सकै छी जे साहित्यकारक काज लिखब थिक। एतेक तूर धुनब साहित्यकारक क्षेत्र सं बाहरक बात थिक। ई तं शुद्ध एक्टीविज्म भेल। मुदा, विश्वास करू। हमहूं मूलतः एक साहित्यकारे छी। सृजन करबाक लेल सघन एकान्त हमरो चाहबे करी। किन्तु, अपन अनुभवक बात कहै छी--साहित्यक संग निरन्तर जीबैत कहियो एहनो स्थिति बनै छै जे अहां कें टीम बनेबाक खगता होइए। ओना तं अहां अदृश्य पाठकक लेल लिखै छी मुदा कहियो एहन मोड आबै छै जखन अहां कें अपन पाठक कें दृश्यमान करबाक बेगरता होइए। हमरा लागल अछि जे एहन मोड पर 'साहित्यकार' आ 'साहित्य-कर्मी' के फरक मेटा जाइ छै। मित्र लोकनि, हमरा सभक विडम्बना तं अथाह अछि। उत्तर आधुनिकताक एहि दौर मे आइ जखन हमरा सभक मध्यवर्गीय लोक अपन अस्मिताक प्रति साकांक्ष भेलाह अछि, तं अपन जडि सं, अपन भाषा सं जुड' चाहैत छथि। एम्हर संकट ई अछि जे दुनियां भरि के बात हुनका बूझल छनि, मुदा अपन मातृभाषा पढब नहि जनैत छथि। एक दौर छल, जखन मातृभाषा कें अयोग्य मानि क' ई लोकनि ओकर उपेक्षा केलनि। हिनका सभक सोचब रहनि जे मातृभाषा कें पकडि क' रहब विकास-विरोधी थिक। मोन पाडू जे एही तरहक मनोवृत्ति बला लोक सब, दुनियां भरि मे, अपन-अपन मातृभाषा कें उजाडलनि। मुदा, आइ ई लोकनि आइडेन्टिटी तकैत छथि आ अपन मातृभाषा-संग जुड' चाहैत छथि। हम सब जे लिखै छी से तं असल मे हिनका सभक धियापुताक लेल लिखै छी। मुदा, बच्चाक लेल लिखल ई पोथी सब जखन हमर ई बन्धु लोकनि पढैत छथि तं अपनो मातृभाषा पढबाक हुनर सिखैत छथि। हमरा सब कें तं बुझू दुगूना खुशी भेटैए। भविष्य कें ठीक करबाक प्रयास मे वर्तमानो ठीक होइत जाइए। ई बाल साहित्य क' रहल अछि। बाल साहित्ये ई कइयो सकैत अछि। एखने हम कहने छलहुं जे मैथिली मे बाल साहित्यक स्थिति दुर्बल अछि। मुदा हम साफ करए चाहब जे ई दुर्बलता निज आजुक समयक यथार्थ थिक। अतीत मे ई हालति नहि रहए। साठिक दशकक समय, ओ काल छल, जखन हमर बडका-बडका साहित्यकार लोकनि छोट-छोट बच्चाक लेल लिखलनि। यात्री नागार्जुन लिखलनि। राजकमल चौधरी लिखलनि। मैथिली मे सब सं सुन्दर बालकथा सब जकरा कहबै, से ओही पीढीक लिली रेक लिखल छनि। ओहि दिन मे बडका घरानाक पत्रिका 'मिथिला मिहिर' मे तं बाल साहित्यक लेल स्थायी स्तम्भ होइते छल, बच्चा सभक लेल अलग सं पत्रिका सेहो प्रकाशित होइत रहए। 'बटुक, आ 'धियापुता'क अपन उज्ज्वल इतिहास छैक। मुदा, ई सब तहियाक बात थिक, जहिया मिथिला-क्षेत्रक साक्षरता-दर मात्र एकैस प्रतिशत रहैक। आइ साक्षरता अडतालिस प्रतिशत अछि। साक्षरताक ई बढल प्रतिशत ओहि परिवार सभक कथा सेहो कहैत अछि, जकरा खान्दान मे पहिल बेर अक्षरक इजोत जरल, पहिल बच्चा जन्म लेलक जे 'अ आ क ख' लिखब-पढब सिखलक। लोक साथ अबैत गेला, कारवां बनैत गेलैक। मुदा, बच्चाक लेल लिखै बला लोक सब अलोपित भ' गेला। बच्चा सभक पत्रिका बन्द भ' गेलै। आन पत्रिका सब मे सं बाल साहित्यक कालम हंटा देल गेलै। गाम-घर मे टी.वी. पहुंचल आ हमर एहि होनहार सब कें इल्मी-फिल्मी लुच्चा सब हथिया लेलक। एकर कारण सब निकाल' लगबै तं बहुतो कारण निकलतै। मुदा, एतबा तं साफ अछि जे हमरा लोकनि छोडि देलियै तं क्यो आन हथियौलक। आइ जखन आरो अधिक लोकक जरूरति रहै, आरो बेसी तत्परताक संग काज करबाक खगता रहै, बाल साहित्यक मैदान खाली अछि। हम बडका-बडका लेखक लोकनि बडका-बडका बात लिखै छी आ दुखी होइत रहै छी जे हमर बात क्यो नहि सुनैए। के सुनत? जे सुनत, तकर निर्माणक वास्ते हम की क' रहल छी? आ, सांच पूछी तं हमरा सभक टारगेट एही परिवारक बच्चा थिक भाइ, जाहि मे अक्षरक इजोत पहिल बेर बरलैए। बन्धुगण, एतेक बात एही लेल कहलहुं जे अपना सभक सुख आ दुख दुनू साझी अछि आ अहां सब कें सामने पाबि सुख-दुख बतियेबाक एक अवसर हमरा भेटल। एहि अवसरक लेल पुनः धन्यवाद। हमर अपन भाषाक कर्णधार लोकनि कें, अपन टीमक युवा साहित्य-कर्मी लोकनि कें सेहो धन्यवाद। आ, एतेक ध्यानपूर्वक अहां सब हमरा सुनलहुं, ताहि लेल तं बहुते धन्यवाद। गंगेश गुंजन लाट साहेबक किरानी एकटा राजधानी रहय। राजधनीक राजमार्ग एकटा विशाल पुलसँ बाँटल छलैक दू दिश। वेश उफंच, भव्य। साधरणतः पुल पर प्रजा केँ सेहो चलवाक अनुमति रहैक। खालीश जखन राजधानी वा बड़का राजधनीसँ सम्राट अबथिन आ हुनक गाड़ी राज्यक सुख समृद्धि देख, टहलऽ बूलऽ अबैत तँ ओहि बड़का पुलकेँ मरम्मति कएल जाइक, बाढ़निसँ बहारल जाइक आ मुरैठा बंदूकवला सिपाही सब लोक केँ बैला दैक। सौंसे पुल खाली करवा देल जाइक। पुल पर काते-काते भीख मांगनिहार सब बैसेत रहय। एकटा टंगटुट्टी बुढ़िया आगांमे कारी खोइंझा चैथड़ा पसारने, एकटा कोढ़ि फूटल गत्र-गत्रसँ पीज बहैत वर्ष पैंतीसक पुरुष, एकटा अन्हरी मौगी बामा हाथमे अलमुनियांक पिचकल छिपली लेने दहिना हाथे ढील कुरियबैत आ कएटा आओर भिखारि। क्यौ गलल आंगुर सबपर मैल कुचैल चेथड़ा बन्हने माछी भिनकैत तँ क्यो ठुठ्ठ पएर पसारने। एकटा नक्कट्टा बुढ़वा जे कए वर्षसँ पुलपर भीख मांगऽ बैसैत छल आ जकर मुंह-नाक मिलि कऽ बरौबरि छलैक वीभत्स खाधिजकां, से भरिसक मरि गेल। औरे जगह पर दू टा आन्हर भाय-बहीन हाथ पसारि कऽ भीख मांगऽ बैसऽ लागल रहय। मेही सुरमे राम नाम जपैत दाता धर्मी लोकनिक गुन गबैत। परोपट्टाक लोक सब बड़ दानी रहय। ऋण-पैंच लऽ कऽ दान देनिहार। रोज दिन घामे पसिने अपसियांत, दरबार पहुंचवाक लेल एक दोसराकेँ धकियबैत। हकमैत। तइयो मुदा, बगलीसँ कैंचा निकालि टुन टुन भीख दैत। मनहि मन खौंझाइतो मुदा यथा साध्य देनहुं जाइत। एकटा राजाक किरानी सब दिन अपन डिपटी बजय, ओही बाटे लाट साहेबक कार्यालय जाय। बड़का पुल चढ़ैत काल भिखमंगा सब पर पहिने दयार्द्र, फेर तमसाइत ककरो एकटा पाइ खसबैत चलि जाय। एक दिन ओ लाटक किरानी दुनू नेन्ना अन्हरा भय बहीन केँ देखि कऽ बड़ क्लेशित भेल। ओ सोचलक, सएह देखू सृष्टि। एहि दुनू नेनाकेँ रौद-बसात, जाड़-गरम सबमे दूटा पाइ लेल एहिना बैसऽ पड़तैक भरि जनम। ओहि दिन ओकरा पुल पर चढ़ले ने पार लगैक। दोसर दिन फेर ओ किरानी जाइत रहय। ऽमालिक दू गो पइसा...।ऽ ओ ठमकि गेल। ओहि कोढ़ि फूटल लोककेँ देखलक। पहिने तँ खूब घृणा भेलैक, ओकरासँ भिखारि फेर याचना कयलकैक। माथ पर प्रचण्ड रौद। कतहु सीकी ने डोलैत। अयनिहार गेनहार सब घामे नहायल आ भिखमंगा सब तँ आओर। पजरैत रौदमे बैसि कऽ भीख मंगैत देखि, लाटक किरानीकेँ बड़ क्रोध उठलैक। ऽतोरा एहि रौदमे भीख मांगऽ के कहैत छौ बैसि कऽ...?ऽ ऽकी करबै? ई पेट...? ओ पेट दिस देखबैत दांत बावि देलकै। किरानीकेँ आर तामस उठि गेलैक। ऽतखन मर...।ऽ ओ ओकरा पाइ नै देलकैक। आगां बढ़ि गेल। भिखारि दोसर दिन फेर टोकलकैक ऽमालिक आइ एक्को गो पाइ नै देलक कोनो दाता धर्मी ने...ऽ किरानी ओकरा गुम्हरि कऽ देखलकैक। तँ मारलैं किएक ने पकड़ि कऽ, दाता धर्मी सब केँ जे ऐ लूह रौदमे दांत बाबि कऽ किकियाइत बैसल छें?ऽ ओ क्रोधे माहुर होइत कहलकैक। हम कोढ़ियो लोक... बाबू भैयाकेँ मारबै... कोना कऽ मालिक?ऽ ओ दया ........ दांत चियाड़ि देलकैक। तखन लाटक किरानी गुन-धुनमे पड़ि गेल। ऽएकटा कर। मारि नहि सकैत छहक तँ बाबू भैय सबकेँ एहि पीजुआह हाथे छू तऽ सकैत छऽ? हाथ धऽ कऽ कहि तँ सकैत छहक?ऽ ओ किछु सोचैत कहलकैक आ चलि गेल। दोसरा दिन ओहि भिखारिकेँ फेर बैसल देखि लाटक किरानी केँ तामसे देह जरि गेलैक। मरियो ने जा होइत छऽ जे उसनाइत, कुकुर जकाँ दुर दुरायब सुनैत तरहत्थी औरेत रहैत छऽ?ऽ ओ ग्लानिसँ मूड़ी गोंति लेलक। तेसर दिन ओ फेर पुछलकैक भिखारि के ऽकी सोचलऽ?ऽ आ चलि गेल। चारिम दिन ओहि पुल पर वातावरणें दोसर रहैक। बहुत रास उजरा धेती कुरता वला लोक सब पएर झटकारि कऽ पड़ायल जा रहल छल आ कोढ़िया भिखारि सब हुनका सभक पाछां-पाछां खेहाड़ि रहल छलैन। जे गोटय घेरा गेल रहथि से सब जेबी सँ पाइ निकालि रहल छलाह। पड़ाहि जकां लागल छल। कोढ़िया, आन्हर, नांगर, सब भिखमंगा लोककेँ घेरि कऽ ठाढ़ भऽ जाय। लोककेँ पुल पर दऽ कऽ गेने बिना उपाय नहि छलैक। ओतऽ छोट छिन हड़-बिरड़ो मचल छलैक। राजधनीक ओहि बड़का विशाल पुल पर एकटा भयसँ आतंकित वातावरण चतरल जा रहल छलैक। ओ लाटक किरानी, किछु फराकेसँ डरायल-डरायल पुछलकैक ऽकी हौ?ऽ कोढ़ि लोक सोझ भऽ कऽ ठाढ़ रहैक। ओकर हकमैतहुं मुखाकृति पर खुशी पसरल छलैक। आ ओहि किरानीक प्रतियें कृतज्ञताक पवित्र आभास। ऽकम सँ कम एतवा तँ हमरा सब कइये सकै छी। अपना सड़लाह गन्हाइत हाथे बाबू बबुआन सबकेँ दौड़ि-दौड़ि कऽ छुबियो तँ सकै छी...।ऽ आ ओ किरानी, ओही दिन ओहि राजधनीसँ विदा भऽ गेल। किशन कारीगर किरीम लगाउ-मुँह चमकाउ- एकटा हास्य विहिन कथा बाबूबरही बज़ार सॅ घूमी क अबैत रही जहॉ सतघारा टपलहूॅ की मुक्तेश्वर स्थान लग बाबा भेंट भए गेलाह। हुनका देखैते मातर हम प्रणाम कहलियैन की बाबा बजलाह आबह बच्चा तोरे बाट ताकि रहल छलहूॅ जे कहिया भेंट हेबअ कतेक दिन बाद एमहर माथे एलह कहअ केमहर सॅ ख़बर नेने आबि रहल छह। हम बजलहूॅ बाबा हम त बरही हाट सॅ तीमन तरकारी किनने आबि रहल छी। बाबा हरबड़ाईत बजलाह हौ बच्चा हमरो एगो मुहॅ चमकौआ किरीम देए ने ।हम पुछलियैन बाबा ई कहू जे मुहॅ चमकौआ किरीम केहेन होइत छैक। बाबा खिसियाअैत बजलाह कह त तोंही मीडियावला सभ प्राइम टाइम मे हल्ला कए लोक के कहैत छहक जे मरद भए के माउगीवला किरीम यदि हमरा जॅका गोर बनना है त ईमामी हैण्डसम मरदवला किरीम सिरीफ साते दिन मे दोगुना गोरापन। अहि दुआरे भेल जे हमहॅू कनि गोर-नार भए जाइत छी। हम बजलहूॅ बाबा अहॉ कथि लेल एहि किरीम सबहक फेरा मे परैत छी अहॉ त केहेन बढ़ियॉ सौंसे देह बिभूत लेप के अपने मगन मे रहैत छी। हमहूॅ तए अहिं जॅका साधुए छी हमरा लग मुहॅचमकौआ किरीम नहि अछि। ई सुनि बाबा तामसे अघोर भेल बजलाह तहॅू फूसि बजैत छह देखेत छहक मीडियावला लक तए रंग बिरंगक किरीम रहैत छैक तहूॅ मंगनी मे मदैद नहि करबह त हयिए ले 5रूपया आ लाबह मुहॅचमकौआ किरीम। हम असमंजस मे परि गेलहॅू जे बाबा सन औधरदानी लोक के किरीमक कोन काज से कनेक फरिछा के पूछि लैति छियैन जे की भेल। हम पुछलियैन त बाबा बजलाह हौ बच्चा तोरा सभटा गप की कहियअ। बड्ड सख सॅ चारि बरिख बाद बसहा पर बैसि हम अपन सासुर हरीपुर गेल रही। गौरी दाए त बियाहे दिन सॅ हमर ठोर मुहॅं देखि रूसल छलीह। हम सोचलहॅू जे आई हुनकर सखी सहेली माने हम अपन सारि सभ सॅ हॅसी मज़ाक कए मोन मे संतोख कए लैति छी। हम अपना सारि सॅ पूछलहू कहू कुशल समाचार कि हमर सारि उपकैरि के बजलीह बुरहबा बर बड्ड अनचिनहार बुरहारी मे लगलैन किरीमक बोखार आ सभ गोटे भभा भभा के खूम हॅसैए लगलीह। हम पूछलियैन जे साफ साफ कहू ने की कहि रहल छी कि हमर दोसर सारि आर जोर सॅ हॉ हॉ के हॅसैत बजलीह अईं यौ पाहुन बुरहारी मे सासुर अएलहॅू त अकील रस्ते मे हेरा गेल की\ हम बजलहू से की त एतबाक मे हमर छोटकी सारि मुहॅ चमकबैत बजलीह देखैत छियैक हाट बज़ार मे रंग बिरंगक किरीम पाउण्डस बोरो प्लस डोभ एसनो पाउडर फेरेन लबली बिकायत छै से सब लगा के मुहॅ उजर धब धब बना लेब से नहि। एहेन कारि झोरी मुहॅ पर त घसबैहनियो ने पूछत आ हम तए एम.बी.ए केने छी। जाउ थुथून चमकौने आउ तब हॅसी मज़ाक करब। आब तोंही कहअ जे बिना किरीम लगौनेह जान बॉचत। देखैत छहक नएका नएका छौंड़ा सभ सासुर जाइअ सॅ पहिने ब्यूटी पार्लर जा थूथून चमकबैत अछि। हौ बच्चा कि कहियअ एखुनका छौंड़ीयो सभ कम ने अछि देखैत छहक किरीम लगबैत लगबैत मुहॅ मे फाउंसरी भए जाइत छैक मुदा थुथून चमकबै दुआरे इहो मंजूर। पछिला पूर्णिमा मेला देखबाक लेल छहरे-छहरे पिपराघाट मेला गेल रही त ओतए गौरी दाए के दू चारि टा बहिना सभ भेंट भए गेलीह हम पूछलियैन जे कहू मुहॅ मे एतेक फाउंसरी केना? कि ताबैत हमर साउस केमहरो सॅ बजलीह पाहुन हिनका सभटा गप कि कहियैन ई सभ किरीम लगेबाक फल। ई छाउंड़ी सभ फिलमी हिरोईन सॅ एक्को पाई कम नहि अछि बिना ब्यूटि पार्लर जेने एकरा सभ के अनो पानि नहि नीक लगैत छैक। ई सुनि हमरो भेल जे ब्यूटी पार्लर जा कनेक थुथून चमका लैति छी। मुदा हम जे ब्यूटि पार्लर जाएब से जेबी मे एक्कोटा पाइओ नहि अछि। भागेसर पंडा के कतेको दिन कहलियैअ जे हमरो ब्यूटि पार्लर नेने चलअ से ओकरो भरि भरि दिन फूंसियाहिक पूजा-पाठ सॅ छुट्टी ने। हम बजलहॅू त बाबा दिल्ली चलू ने ओतए त बड्ड नीक एक पर एक ब्यूटि पार्लर छै। बाबा बजलाह हौ बच्चा हम डिल्ली नहिं जाएब हौ कियो नमरो पता नहि बता दैत छैक एक सॅ एक ठग लोक सभ रस्ते पेरे भेटतह हमरा त डर होइए। त बाबा चलू ने फिलिम सिटी नोएडा ओहि ठाम फेसियल करा लेब। बाबा बजलाह नहि हौ बच्चा बुरहारी मे एहेन करम नहि करब जे कोनो न्यूज़ चैनल जाएब। तोरो मीडियावला के सेहो कोनो ठीक नहि छह बेमतलबो गप के ब्रेकींग न्यूज़ बना दैति छहक। हम एमहर ब्यूटि पार्लर आ कोन ठिक तों खटाक दिस चैनल पर चला देबहक ब्रेकींग न्यूज़ किरीम लगाउ-मुहॅ चमकाउ। मूरही-कचरी- एकटा हास्य लघु कथा दिल्ली संॅ दरभंगा होयत अपन गाम मंगरौना जायत रही। रस्ते मे एकटा नियार केलहुँ जे एहि बेर महादेव मंठ जेबेटा करब। एतबाक सोचैते-सोचैते कखन गाम पहुॅंच गेलहुँ सेहो नहिं बूझना गेल। चारि बजे भोरे अंधराठाढ़ी यानी वाचसपतिनगर रेलवे स्टेशन उतरलहुँ रिक्शावला सभ के हाक देलियै। भोला छह हौ भोला। ताबैत दोसर रिक्शावला बाजल जे आई भोला नहि एलै कियो बाजल जे जोगींदर आयल हेतै तकियौ ओकरा। भोला आ जोगींदर दूनू गोटे गामक रिक्शावला रहैए कोनो बेर गाम जाइ तऽ ओकरे रिक्शा पर बैसि क स्टेशन सॅं गाम जाइत छलहुँ। एतबाक मे जोगींदर ओंघायत हरबराएल आएल अनहार सेहो रहै। वो बाजल कतए जेबै अहॉं। हम मंगरौना जाएब कक्का हमरा नहि चिन्हलहुँ की। हॅं यौ बच्चा आवाज़ सॅं आब चिन्हलहुँ आउ-आउ बैसू रिक्शा पर। दूनू गोटे गप सप करैत बिदा भेलहुँ ताबैत जोगींदर सॅं हम पूछलियै कक्का ई कहू जे एहि बेर बाबाक दर्शन केलहूॅ किनहि। हॅं यौ बच्चा एहि बेर सजमैन खूम फरल छलै से हमहुँ चारि बेर बाबा के जल चढ़ा एलहॅू आओर हुनका लेल सजमैन सेहो नेने गेल रहियैन। एतबाक मे भगवति स्थान आबि गेल हम रिक्शा पर सॅं उतरि के भगवति केॅं प्रणाम करैत तकरा बाद अपना आंगन गेलहूॅ। हमरा गामक प्रारंभ मे भगवति स्थान अछि। गाम पर गेलहुँ सभ सॅं दिन भरि भेंट घांट होयत रहल। भिंसर भेलै संयोग सॅं ओहि दिन रवि दिन सेहो रहै। बाबा सॅं भेंट करबाक मोन आओर बेसी आतुर भऽ गेल नियार केलहुँ जे आई महादेव मंठ जाके बाबाक दर्शन कए आबि। हमरा गाम सॅ किछूएक दूर देवहार गाम मे मुक्तेश्वर नाथ महादेवक प्राचीन मंदिर अछि जकरा लोक बोलचाल मे महादेव मंठ कहैत छैक। ओना तऽ सभ दिन बाबाक पूजा होइत छलैक मूदा रवि दिन के भक्त लोकनीक बड् भीड़ होइत छलैक किएक तऽ ओहि दिन मेला सेहो लगैत छलै त दसो-दीस सॅ लोग अबैत छल।दरभंगा पढैत रही तऽ हमहुँ महिना मे एक आध बेर महादेव के जल चढा पूजा कए अबैत छलहॅू। गामे पर भिंसरे नहा के बिदा भेलहुँ माए हमर फूल बेल पात ओरियान कके देलिह। गाम पर सॅ मुक्तेश्वर स्थान बिदा भेलहॅू पैरे-पैरे जायत रही तऽ जहॉं गनौली गाछी टपलहॅू कि रस्ते मे एकटा पिपरक गाछ छलै। ओतए सॅं महादेव मंदिर लगे मे रहै। ओहि पिपर गाछ लक एकटा जटाधारी साधू भेटलाह हम कहलियैन बाबा यौ प्रणाम। एतबाक मे बाबा बजलाह जे कहबाक छह से जल्दी कहअ हमरा आई बड् जार भऽ रहल अछि। बाबाक ई गप सूनी कें हमरा कनेक हॅंसी लागि गेल। हम बजलहॅू आईं यौ बाबा अपने सन औधरदानी के कहॅू जार भेलैए। अपने तऽ एनाहियों सौंसे देह भभूत लेप के मगन रहैत छी। बाबा बजलाह हौ बच्चा आब लोक सभ ततेक जल चढ़बैत अछि जे हमरा कॅपकॅपि धअ लैति अछि। तूहिं कहए तऽ एहि उचित जे भक्त सभ हमर देह भिजा के निछोहे परा जाइत अछि। आब तऽ लोक सभ पूजा करै लेल नहि ओ त मूरही-कचरी खाई लेल अबैत अछि। हम बजलहुँ बाबा अपने किएक खिसियाएल छी आई तऽ हम अहॅाक लेल दूध सेहो नेने आइल छी चलू-चलू मंदिर चलू भक्त लोकनि ओहि ठाम अहॉं के तकैत हेताह। बाबा खिसियाअत बजलाह कियो ने तकैत होयत हमरा तू देख लिहक सभ मूरही कचरी खाए मे मगन होयत। तूॅं दरभंगा पढ़ैत छलह तऽ दूध सजमैन लए के अबैत छेलह मुदा जहिया सॅं पत्रकार भए दिल्ली चलि गेलह हमर कोनो खोजो पूछारी नहि केलह। देखैत छहक मंगरौना चैतीक मेला मे तोहर गामवला सभ लाखक लाख टका खर्च करैत अछि मूदा हमरा लेल भागेश्वर पंडा दिया छूछे विभूत टा पठा दैति अछि। मंगरौनाक चैती मेला बड्ड नामी छलैक ओतए कलकता सॅं मूर्ती बनौनिहार आबि के भगवतिक मूर्ती बनबैत छलैक एहि द्वारे दसो दिस सॅं लोक मेला देखबाक लेल अबैत छलाह। भागेश्वर झा महादेव मंदिरक पंडा रहैत हुनके दिया बाबाक पूजा लेल सभ किछू पठा देल जायत छलैक।बाबा फेर खिसियाअत बजलाह जे आइ हम मंदिर नहि जाएब। हम कहलियैन जे बाबा अपने चलू ने मंदिर अहॉ जे कहबै आई से हेतै आबौ अहॉंक कॅंपकॅंपि दूर भेल किनहि \ नहि हौ बच्चा आई त हमरा बूझना जाए रहल अछि जा धरि मूरही-कचरी नहि खाएब ताबैत हमर ई जार-बोखार नहि छूटत। कहू त बाबा अपने एतबाक गप जे पहिने कहने रहितहॅू त हम एतबाक देरी] बच्चा कतेक दिन मोन भेल जे तोरा कहिअ जे हमरो लेल किछू गरमा-गरम नेने अबिह मुदा नहि कहलियअ ।हम मंदिर सॅं बाहर निकैल देखैत छलहुँ जे लोग सभ हमरा जल ढ़ारी के निछोहे मूरही-कचरी वला लक परा जाइत छल एमहर हम एसगर थर-थर कॅपैत रहैत छलहुँ कियो पूछनिहार नहि। आब लोग हमर पूजा सॅं बेसी अपन पेट पूजा मे धियान लगबैत छथि। चलअ आब तहुँ देखे लिहक जे हम सत्ते कहैत छियअ कि झूठ। ओही पिपर गाछ लक सॅं हम आओर बाबा बिदा भेलहुँ रस्ता मे बाबा बजलाह जे हम किछू काल मंदिर मे रहब पूजा केलाक बाद हमरा बजा लिहअ। हम कहलियैन हे ठिक छै बाबा हम अपनेक लेल मूरही-कचरी किन लेब तकरा बाद अहॉ के बजाएब त चलि आएब। ओही ठाम सॅं बाबाक संग हम मंदिर पहुॅंचलहुँ। ओतए देखलिए जे लोग सभ बाबा के जल चढ़ा निछोहे परा जाइत छल। ओना त मिथिलांचल मे मूरही-कचरीक सुंगध सॅं केकर मोन ने लुपलुपा जाएत अछि। हमहुँ बाबाक पूजा पाठ केलाक बाद मेला घूमए गेलहॅू तऽ सभ सॅं पहिने पस्टनवला लक कचरी किनबाक लेल गेलहुँ। ओकर कचरी एहि परोपट्ा मे नामी छल। हमरा देखैते मातर ओ अहलाद बस बाजल आउ-आउ किशनऽ जी कहू कुशल समाचार। हम कहलियै जे बड्ड निक अपन सुनाबहअ। कचरीवला बाजल जे हमहूॅ ठिके छी दोकान अपना खर्चा जोकर चलि जाएत अछि। अच्छा आब हमरा दस रूपयाक मूरही-कचरी झिल्ली अल्लू चप दए दिहक। ओ हरबराइत बाजल हयिए लिए अखने गरमा-गरम कचरी अल्लू चप सबटा निकालबे केलिए अहिमे सॅं दए दैत छी। हम कहलियै जे दए दहक गरमा गरम एहि मे सॅं। ओकरा हम पाइ दैत मंदिर दिस बिदा भेलहॅू ओतए पहुॅचतैह हम बाबा के हाक देलियैन मुदा कोनो जवाब नहि भेटल। हम एक बेर फेर हाक लगेलहॅू जे बाबा छी यौ कतए छी \ जल्दी चलि आउ कचरी सेराए रहल अछि। मुदा बाबाक कोनो प्रत्युतर नहि भेटल। हमरा बुझना गेल जे बाबा फेर खिसियाकेॅे कतहूॅ अलोपित भए गेलाह। दुःखित मोन सॅं हम गाम पर बिदा भेलहुँ। पैरे-पैरे जाएत रही तऽ जहॉ पिपर गाछ लक एलहुँ कि ओ जटाधारी साधू फेर भेटलाह। हमरा देखैते ओ बजलाह आबह-आबह तोरे बाट तकैत छलहुँ जल्दी लाबअ मूरही-कचरी दूनू गोटे मिलि कए गरमा गरमा खाए लैत छी। तकरा बाद पोटरी खौलैत हम बजलहॅू हयिए लियअ बाबा खाएल जाउ। मुदा ई कि ओ फेर ऑखिक सोझहा सॅं कतहॅू अदृश्य भए गेलाह। बाबा सॅं भेंट तऽ भेल ओहि पिपर गाछ लक मुदा बाबाक लेल किनल मूरही-कचरी रखले रही गेल। सत्येन्द्र कुमार झा हिस्सक महानगरमे दू कोठरीक मकान। एकटा कम्पनीमे छोट पदपर कार्यरत। अल्प वेतन। पति-पत्नीक साझी विचार जे एकटा पेइंग गेस्ट राखि ली तँ आमदनी किछु बढ़त। एकटा महानगरीय बहुरुपियाक, जे अपनाकेँ मल्टीनेशनल कम्पनीक इंजीनियर कहए, पेइंग गेस्ट बनि रहए लागल। आस्ते-आस्ते पति-पत्नी अपन भावी जमाएक रूपमे ओहि बहुरुपियाकेँ देखए लगलाह। हुनक बेटी ओकर कोठरीमे आबए-जाए लगलीह। ईकदिन ओ बहुरुपिया कतौ बिला गेल। संगमे ओकर बेटीक सभ गहना-गुड़िया लऽ गेल आ छोड़ि देलक अपन मोचरल बासि ओछाओन। क्रोध, चिन्ता आ दुःखसँ झमारल पति-पत्नी किछु दिन धरि व्याकुल रहली, फेर अपनाकेँ संयमित करैत अपन नव बसल कॉलोनीमे घोषणा केलन्हि- “हम अपन बेटीक बियाह कोनो इन्जीनियरसँ करब।” भैयारी नेताजी केँ भरि पाँज पकड़लक। “भाइजी...भाइजी...। ” “हट...के भाइजी? ” “अहाँ भाइजी...हमर भाइजी...आर के? ” “हइ...तोरा डर नै होइ छौ हम्मर? ” “नै...भाइयोसँ कहूँ भाइ डेराइत छै? ” “हम तोहर भाइ?...कहिया के? ” “कोनो एक कोखिसँ जन्म नेनहे लोक भाइ बनै छै? एक्के धन्धा कएनिहार सेहो आपसमे भाइये होइ छै...। ” “चुप...। ” नेताजीक समक्ष एकटा भिखमंगा ठाढ़ छल। स्थानान्तरित दोष नौकरीमे अएलाक बाद विभागीय परीक्षाक तैयारीमे जुटल छला। मुदा परिणाम नीक नै भेलनि। असफल भऽ गेला। घरक सभ सदस्य असफलताक मादे जिज्ञासा कएल तँ कहलनि- “एम.डी.क खास छलै...ओकरा नै होइतै तँ ककरा होइतै? ” पुत्रक परीक्षा चलि रहल छल। प्रथम स्थान प्राप्त करबाक मारामारी। मुदा पिता जेना पुत्रोकेँ निराशे हस्तगत भेल- “प्रिन्सिपलक बेटा छै ओ...प्रथम स्थान तँ सुरक्षिते छै...। ” बाप-बेटा दुनू गेन्दकेँ दोसरक आंगनमे फेक निश्चिन्त भऽ गेल छला। गुण कतौ पछुआरमे ठाढ़ छल। अप्रासंगिक आंगनमे दू गोट बालक खेला रहल छल। दुनू माय-बाबू, ओतहि एक कोनमे कुर्सीपर बैसल चाह पीबि रहल छला। एक बालकक हाथमे खिलौनाक पेस्तौल छल। ओ दोसर बालकपर पेस्तौल तानैत अछि-“तोरा लग जे किछु छौ हमरा दऽ दे, नै तँ पेस्तौलक एक गोलीसँ तोहर खोपड़ि उड़ा देबौ।” दोसर बालक सहमि जाइत अछि। हड़बड़ाइत उठैछ- “तोरा की चाहियौ? हमरा लग तीन मोबाइल, एक लैपटॉप, एक कम्प्युटर, एक एल.सी.डी. टीवी, फ्रिज, बैंक लॉकरमे बहुते रास सोन आ रुपैआ अछि...आर हँ, हमरा लग हमर डैडी आ मम्मी सेहो अछि।” पहिल बालक एक्शन दैत पेस्तौल दोसर बालकक कनपट्टीमे सटा दैत अछि आ फेर जोरसँ बजैत अछि- “शटअप...तूँ अपन मम्मी-डैडीकेँ छोड़ि बांकी सभ किछु हम्मर हवाले कऽ दे, नै तँ...। ” कातमे बैसल पहिल बालकक माए-बाबूक मुखपर भएक रेख स्पष्ट होमए लगैत अछि। हुनका लगैत छन्हि जे ओ बेटाक नजरिमे अखनहिसँ अप्रासंगिक भऽ गेल छथि। मिथिलेश कुमार झा कानून चौबटियाक सिंगल पीअरसँ लाल होइत-होइत एकटा फटफटियाबला जोरसँ बिरेक मारलक आ थम्हैत-थम्हैत ओ रुकबाक निर्धारित उरजा चेन्हकेँ पार कऽ गेल। तखने एक गोट सिपाही अएलै आ जुरमानाक रसीदबला जिल्द बहार करैत ओकरासँ लाइसेंस मँगलकै। फटफटियाबला क्षमा याचना करैत कहलकै जे ओकर गाड़ी बड्ड तीव्र गतिमे छलै आ तैँ जोरसँ बिरेक मारलाक बादो चेन्हसँ आगाँ घुसुकि आयल। ओ फटफटियाकेँ चेन्हक पाछाँ घीचि अनलक। एम्हर ई सिपहिया ओकरासँ जुरमाना लेबऽपर बिर्त। कि ताबतेमे एकटा पुलिसक जीप सेहो ओहि चेन्हकेँ पार कऽ सिंगलपर अटकलै। आ एहि सिपाहीपर फटफटियाबलाक अनुनयक कोनो प्रभाव नै। एकाएक ओ फटफटियाबला ताओमे आबि गेल, बाजल जे पहिने एहि पुलिस-गाड़ीसँ जुरमाना असूलह, तखने हमहूँ देबह। कानून सभक लेल एक्के छै। एतबा सुनितहि ओहि सिपहियाक मूह अपने सनक भऽ गेल छलै। दर्शन देवकान्त बाबू दस बर्खपर गाम आयल छलाह बेटाक उपनयन करबाक लेल। ढोल-पिपही, आजन-बाजन आ आर्केस्ट्रा आदिसँ गाम गनगनाइत रहल। तीनू दिन बरबरना भोज, छेना-रसगुल्ला बहि गेल। एहन डील-डलसँ गाँ भरिमे केओ नै कएने छल उपनयन। वाह रे देवकान्त बाबू! रातिमक परात फूदन बाबा देवकान्त बाबूक प्रशंसा करैत कहलखिन- “हओ देबू! तोँ तँ सभक कीर्तिकेँ तोपि देलहुन। ...आब हे, कनी अपन भैयापर नजरि दितहुन। बेचारे बड़ लचरि गेल छथि। आखिर सहोदर छहुन।” “बाबा, हुनका आर कष्ट काटऽ दिअनु। कष्ट हेतनि तखने धियापुता उन्नति करतनि। होबऽ दिअनु कष्ट।” फूदन बाबा अवाक्, हुनका ई दर्शन कहाँ बुझल छलनि! कन्यादानक चिन्ता -गोड़ लगै छी पीसा! -खूब नीके रहऽ। की हालचाल छै हौ? -अहाँ सबहक आशीर्वादसँ सभ ठीक-ठाक छै पीसा। -धिया-पुता नीके छऽ ने? -हँ-हँ, सभ दन-दना रहल छै। -अँए हौ, तोरा चारिटा बेटी छऽ ने? -हँ पीसा। -ओह! एकटा कन्यादानमे तँ लोक नमरि जाइ अए आ चारि-चारिटा कन्यादान...! बड़का चिन्ताक विषय छह। -नै पीसा, हमरा एक्को रत्ती चिन्ता नै ऐ। -से किएक हौ? छह धयल-उसारल की? -नै, से तँ नै ऐ। -तखन चिन्ता कोना नै छह? -पीसा, चिन्ता तँ करए ओ जे अपना जानसँ फाजिल कथाक इच्छा रखैए। हमरा तँ जतबे ओकाइत अछि ताही हिसाबसँ लड़िका अनबै आ हाथ धरेने जेबै। महानगर-संस्कृति स्टेट बैंकक हाकिम राम सरूप यादवक बदली एकटा छोटका नगरसँ एहि महानगरमे भेल छलनि। यादवजी छोटका नगरमे रहि उबिया गेल छलाह- ने मनोरंजनक कोनो तेहन साधन, ने आबाजाहीक सुभितगर व्यवस्था, ने बिजलीक भरोसा, ने बच्चा सभक कैरियर बनेबाक कोनो तेहन सन बाट आदि। आ तैँ एहि महानगरमे बदली होइते यादवजी खूब प्रफुल्लित भेल छलाह। ऐ ठाम सस्तासँ महग धरि एक-पर-एक ततेक मनोरंजक स्थल जे सभटा देखएमे बरख बीत जाए, कत्तौ जेबाक हो तँ बससँ टैक्सी धरिक तेहन सुभितगर साधन जे पाँचो मिनट ठाढ़ नहि होबऽ पड़त, बिजली जेबाक तँ नामे नै, बच्चा सभक कैरियरक मारिते रास विकल्प...। यादवजी गदगद छलाह- महानगर आखिर महानगरे होइ छै! से, यादवजी एकटा नीक एरियामे आधुनिक सरंजामसँ युक्त अपार्टमेंटक एकटा बेस खुसफैल फ्लैट चारिम महलापर लेलनि किरायापर। तीनिये दिन पहिने डेरा-डंटा लऽ कऽ आएल छलाह। आइ शेष बाँचल वस्ति-जातकेँ घरमे सरिया-सरिया कऽ रखैत छलाह कि कॉलबेल गनगना उठलै। यादवजी अपनहि जा केबाड़ फोललनि तँ दूटा सिपाही ठाढ़। ओइमे सँ एक गोटे हिनकर परिचय पुछलकनि आ आगाँ पुछारीक क्रममे जखन बुझबामे अएलै जे ई तीनिये दिन पहिने एलाहेँ तँ ओ सभ हिनका मुहथरिपरसँ हँटि बगलबला फ्लैटक कॉलबेल टिपलक। यादवजीकेँ सिपाही सभक एबाक प्रयोजन बुझा गेल छलनि। से जिज्ञासावश ओहो ठाढ़े रहलाह। बगलक फ्लैटसँ केबाड़ फोलि एकटा अधवयसू पुरुष आ जनाना बहरेलै। सिपाहीक पुछला उत्तर ओ पुरुष अपन नाँ पी.जायसवाल कहलकै। सिपाही अपन क्रमकेँ आगू बढ़बैत पुछलकै- “...सामनेबला फ्लैटमे चारि दिन पहिने एकटा स्त्रीकेँ डाहि कऽ मारि देल गेल अछि। ताहि मादेँ अहाँ की जनै छी? की झगड़ा-दान होइ छलै? ” जायसवालजी किछु मोन पाड़ैत उतारा देलखिन- “अच्छा! हँऽऽऽ! ककरो जोरसँ चिचिएबाक स्वर तँ अकानने रहिऐ, मुदा हमरा सभकेँ भेल जे केबलपर कोनो हॉरर फिल्म भऽ रहल छै। ओकरा आगिमे डाहल जा रहल छलै!! ” सिपाही जायसवालसँ आर किछु पुछऽ लगलै आ यादवजी दुख ओ आश्चर्यक मुद्रा लेने अपन फ्लैटमे ढुकि गेलाह। महानगरक करिया रूप सोझाँमे नाचि उठल छलनि। झमान भेल सोफापर थस्स दऽ बैसि गेलाह। माथ जेना घुरऽ लगलनि...की महानगरक असली रूप एहने छै!...ऐ ठामक मनुक्खकेँ खाली अपनेटा सँ मतलब होइ छै!...एकटा पड़ोसीक घरमे एहन जघन्य घटना आ दोसरकेँ जन्तबो नै! ...की समाज आ टोल-पड़ोसक मतलब ऐ ठाँ बदलि जाइ छै! ...की इएह छै महानगरक संस्कृति!!! चण्डेश्वर खाँ कोटा राजेशजी! अहाँ तँ दलित कोटामे अबैत छी, तेँ अहाँक सीट सुरक्षित अछि। मोहनजी, अहाँ तँ महादलितमे सँ अबैत छी तेँ अहाँक सीट महासुरक्षित अछि। अहाँकेँ के रोकत। विभाजी, पचास प्रतिशतमे अहाँ बाजी मारिए लेब मुदा हमर प्रथम श्रेणीबला डिगरीक की हेतैक? हम तँ ने डोनेशनमे सकबै आ ने रिजर्वेशनमे अएबै। धीरेन्द्र प्रेमर्षि विचार टिप्पणी वर्ष २०६७ क शुभागमन तथा जुडशीतलक मुहथरिपर हमसभ पहुँचल छी। मुदा चैनसँ बैसबाक आ निश्चिन्त रहबाक कोनो दऽर नहि देखा रहल अछि। मिथिलाक सन्दर्भमे जँ गप्प करी तँ नेपालदिस राज्य आमिल पीनहि अछि, अपन समाङसभ सेहो जडि नहि धऽकऽ उपरे उपरे कूदतिसन प्रतीत होइत छथि। एक तरहक समाङ मिथिलारूपी दूधकेँ सौँसे मधेशरूपी पानिमे मिलाकऽ एकर धवलता आ पौष्टिकता नष्ट करबापर तुलल छथि तँ दोसर तरहक समाङ दूधकेँ खालि अपने लोहियामे औँटैत मुट्ठीभरि लोकक लेल खोआ परसऽ चाहैत छथि। जनकपुरमे हालहिँ सम्पन्न मिथिला महोत्सव देखाओल जा चुकल बाटकेँ पर्यन्त ध्यान नहि दऽ मात्र जनकपुरमे केन्द्रित कऽ मनाओल गेल। नेपालहिक विराटनगर, राजविराज, लहान, सर्लाही, वीरगञ्ज आदि जगहक लोककेँ सहभागिताक कोन कथा सूचना तक नहि देल गेलैक। एहि तरहेँ सरकारी खर्चामे जनकपुर उत्सवक रूपमे भेल कोनो कार्यक्रमकेँ मिथिला महोत्सव कहनाइ मिथिलाक व्यापकतापर दोसर रूपेँ आघात पहुँचौनाइ छियैक। पहिने मिथिला खास जातिक कोँचामे लेपटाएल छल। बहुत मुश्किलसँ हमसभ ओहिठामसँ मिथिलाकेँ मुक्त करबामे किछु सफल भेलहुँ तँ आब किछु खास जगहक लोक एकरा जेबीमे राखऽ पर तुलल छथि। दुश्मनसँ लडबामे आसान होइत छैक मुदा अप्पन लोक जँ बैमानी वा नादानीपर उतरि जाए तँ बड मुश्किल भऽ जाइत छैक। तथापि ई नव वर्ष हमरासभकेँ सद्बुद्धि दिअए जे हमसभ मिथिलाकेँ घरमे सैँतिकऽ रखबाक लोभसँ मुक्त होइ आ जँ क्यो बैमानीक भावसँ एहन कृत्य करैत अछि तँ तकरा यथासमय सबक सिखा सकी। जुडशीतलमे हमसभ हरियरीक लेल पानि तँ जरूर पटबैत छियैक मुदा गन्दगी फेकबाक काज सर्वप्रथम करैत छियैक। ई नव वर्ष हमरासभकेँ सएह मार्गदर्शन करएऽ ताहि शुभकामना संग एकटा एहि परिवेशपर लिखाएल गजलक जलथपकी- आजाद गजल— धीरेन्द्र प्रेमर्षि जोरजुलुमसँ जे ने झुकए से भाले लगए पिअरगर यौ इन्द्रधनुषी एहि दुनियामे लाले लगए पिअरगर यौ ठोरे जँ सीयल रहतै तँ गुदुर–बुदुर की हेतै कपार! एहन मुर्दा शान्तिसँ तँ बबाले लगए पिअरगर यौ कुच्ची–कलमक रूप सुरेबगर रहलै, रहतै सबदिनमा जखन अन्हरिया पसरल होइक, मशाले लगए पिअरगर यौ खालि शब्दक जाल बुनल नहि चाही आब जवाब कोनो नगर–डगरमे गुञ्जैत सबल सबाले लगए पिअरगर यौ जुड़शीतलकेर भोरहरियामे धह–धह जरए कपार जखन जलथपकी नहि, तखन जाँघपर ताले लगए पिअरगर यौ माथा बन्हबैत कफन, उड़ाबए लाल गुलाल अकाशे जँ हमरा तँ ओहि समय–सुन्दरीक गाले लगए पिअरगर यौ साल–सालपर अबैत रहैए, सगरो दुनिया नवका साल नवयुगक मुहथरि खोलैत नव साले लगए पिअरगर यौ जितेन्द्र झा के राखत रुमालक इज्जति एकटा मैल, पुरान रुमाल आ गीताक किताब चीरकालधरि सुरक्षित राखऽ चाहैत छथि अरविन्द ठाकुर । कियाकी बलिदानक चिन्हासी आ मित्रताक याद सहजने अछि ई रुमाल । जर्जर रुमाल याद दिअबैत छन्हि हिनका जेल जीवन आ दुर्गानन्दस“गे बिताओल समय। शहिद दुर्गानन्द झाके फांसी देलाक बाद काठमाण्डूक केन्द्रिय कारागारमे हिनका रुमाल आ गीताक पोथी सोंपल गेलनि । गीताक किताब त नहि मुदा रुमाल एखनधरि सहजने छथि अरविन्द । ओहि गीता किताबक प्रतीकके रुपमे ई एकटा ओहने गीता रखने छथि । प्रजातन्त्रक योद्धा ठाकुर ई रुमालक संरक्षण के करत से खोजि रहल छथि । एहि वास्ते ओ बहुतो नेताके आग्रह कऽ चुकल छथि, मुदा केओ हिनक आग्रह के औचित्य नहि बुझि सकल । नेपालक संग्रहालयसभ संस्कृति मन्त्रालय अन्तर्गत पडैत अछि । संस्कृतिमन्त्री नेपाली कांग्रेसक मिनेन्द्र रिजाल छथि । ठाकुर कहैत छथि जे मिनेन्द्र रिजालसहित कतेकोस“ अनुरोध कऽ चुकल छी एकर संरक्षणक लेल मुदा केओ नहि सुनलक । जत्तऽ दुर्गानन्द झाक नामे उपेक्षित अछि, ओत्तऽ हुनक रुमालके के पुछए ? ठाकुरक माग छन्हि जे रुमालके राष्ट्रिय संग्रहालयमे राखल जएबाक चाही । दुर्गानन्दके एकटा शहिदक रुपमे नेपाल सरकार सम्मान नहि कऽ सकल अछि एहनमे गीता आ रुमालक खोजी आ संरक्षण के करत ? वि.स. २०२० माघ १५ गते दुर्गानन्द झाके फांसी देल गेल रहनि । ओहिके तीन दिनबाद जेलर ठाकुरके दुनू वस्तु देने रहथि । आब ४ दशक होबऽ लागल अछि ओहि दिनके, जहिया तत्कालीन राजापर बम फेकबाक आरोपमे दुर्गानन्द झाके फांसी चढाओल गेल रहनि । २०१८ सालमे जनकपुरक जानकी मन्दिरमे तत्कालीन राजा महेन्द्रपर बम प्रहार भेल छल । जाहिमे महेन्द्र सकुशल बांचि गेल छल । दुर्गानन्द आ अरविन्द बमप्रहारक आरोपमे जेल सजाय काटैत रहथि । नावालिग भेलाक कारणे अरविन्दके फांसी नहि देल गेलनि । जेल जीवनक चरम यातनाके याद करैत अरविन्दक आंखि नोरा जाइत छन्हि । अरविन्दक अनुसार दुर्गानन्द झाके तडपा तडपाकऽ मारने रहए तत्कालीन क्रुर शाही शासक । ठाकुर अनुसार एकबेर रस्सीपर लटकाओल गेल फेर कनी काल सांस फेरऽलेल छोडल गेल । तहन फंसरी पर लटकाकऽ यातना देल गेल । आ अन्तमे गोली दागल गेल दुर्गानन्द झापर । एतेक केलाक बादो क्रुुरता जारीए रहलै । दुर्गानन्दके शवधरि हुनक परिवार जनके नहि देल गेल छलैक । राज्य शहिदक जीवनीके सेहो उन्टा पुन्टाकऽ राखि देने अछि । कक्षा १० के पाठयपुस्तकमे दुर्गानन्द जीवनी अछि जाहिमे हुनक बलिदानी तिथिए गलत लिखल छैक । दूर्गानन्द झाक बलिदानके सम्मान करबाक राज्यके दायित्व छैक । मुदा साम्प्रदायिक मानसिकतासं जकडल नेता, मन्त्रीसभ एकरा अनदेखी करैत रहल । लगैछ जे दुर्गानन्द झाके शहिदक रुपमे चिन्हाबहोमे राज्यके लज्जाबोध छैक । हुनका प्रतिक विभेदसं दुखित छथि अरविन्द । नेपालमे प्रजातन्त्र एलाक बाद वएह सभ कुर्सी पओलक जे दुर्गानन्दसंगे आन्दोलनमे छल । मुदा ओ सभ कहियो दुर्गानन्द आ हुनक माय आ पत्नीके याद नहि कएलक । घरक एक्कहिटा सहारा दुर्गानन्दके फांसीक बाद घर सभदिनक लेल अन्हार अन्हार भऽ गेलै । प्रजातन्त्र एलाक बाद सत्तामे सभसं बेशी समय रहल नेपाली कांग्रेस दूर्गानन्द झाके अपन कार्यकर्ता कहैत गर्व करैत अछि मुदा ओकर व्यवहारमे मात्र घृणेटा देखाइ दैत छैक । शहिद झाक माय सुकुमारी देवी आ पत्नी काशी देवीके गुजर बसर करब मुश्किल छलैक । तहिया कोनो कांग्रेसी नेताके याद नहि एलै दुर्गानन्दक शोणित । काशी देवी सिकीमौनी बुनिकऽ संघर्षक पथपर आगु बढैत रहली । वएह काशी देवी आइ संविधान सभाक सदस्य छथि । तराई मधेश लोकतान्त्रिक पार्टी हुनका समानुपातिक सभासद् बनौने छन्हि । नेपाल एखन शहिद सप्ताह मनाबि रहल अछि । शहिदक नामपर नेता लम्बा चौडा भाषण दैत अछि । तालीक गडगडाहटि सेहो सुनाइत छै । मुदा दुर्गानन्द सनके शहिदके पुछनिहार कियो नहि । शहिद परिवारके घरमे चुल्हि जरलै की नहि से के देखत ? नेपालमे बलिदानी देनिहार सभके इएह गति छैक । शहिद परिवारक व्यथा कतबो बखानी कम्मे हएत । वंशवाद र परिवारवादसं रंगल कांग्रेस दुर्गानन्दक उपेक्षासं खिन्न छथि अरविन्द । ओ कहैत छथि हमसभ इएह दिन देखबालेल बलिदान नहि कएने रहौं । नेपालमे शहिदक नामसं कतेको प्रतिष्ठान, अस्पताल, ट्रष्ट संचालित अछि । मुदा दुर्गानन्दक नामसं किछु नहि । हुनक नामक पाछा कोइराला या एहने किछु थर लागल रहैत त बहुत किछु सम्भव छलै । दुर्गानन्दके उचित सम्मान करबास“ वि.पी. कोइराला, गिरिजाप्रसाद कोइरालासभके के रोकलकै से बुझऽ चाहैत अछि जनता । जकर शोणित पर प्रजातन्त्रक जग निर्माण भेलै तकरे सं सौतिनिञा व्यवहार किया ? कांग्रेस पार्टीए जहन कोनो मतलब नहि रखलक शहिदसं तहन दलीय राजनीतिमें आन पार्टी आ सरकारके देखबाक बाते कोन ? गिरिजाप्रसादक मगरमच्छक नोर संविधान सभामे जहन पहिल बेर सभासद् आ तत्कालीन कांग्रेस सभापति गिरिजाप्रसाद कोइराला काशी देवीके देखलनि त कोइरालाके आंखि नोरा गेल रहनि । घटनाक प्रत्यक्षदर्शी सभासद् वसन्तीदेवी झा कहैत जे हमही गिरिजाके याद दिऔलियनि जे ई दुर्गानन्द झाक पत्नी छथि । तहन भावविह्वल होइत गिरिजा काशीदेवीके हाथ पकरिक कहनेरहथि हम किछु नहि कऽ सकलौं । जनकपुरक सभा, सम्मेलनमे गिरिजाप्रसादसं काशीदेवीक भेट होइत छलन्हि । दुर्गानन्दके चिन्हाबऽ लेल एउटा शालिक बनाओल गेल अछि धनुषा जिलाक जटहीमे । देशके लेल ओहन बलिदानी देनिहारक लेल सरकारके कोनो आन महत्वपुर्ण जगह नहि भेटलै । की दुर्गानन्दक प्रतिमा लेल राजधानी काठमाण्डू छोट पडि गेल रहै ? जनकपुरक कोनो चौक खाली नहि रहै ? जानकी मन्दिरमे बम काण्ड भेल छलै, मन्दिर परिसरमे शालिक रखलासं मन्दिर अपवित्र भऽ जइतै ? काठमाण्डूके केन्द्रमे शहिद गेट छैक, की ओत्त दुर्गानन्दके शालिक रखबाक हैसियत नहि रहै ? संघीय गणतन्त्र नेपालक राजधानी काठमाण्डूमे एखनो शाहवंशीय राजासभक शालिक आ राणा क्रुर शासक सभहक चिन्हासी शोभाक वस्तु बनल अछि । व्यवहारमे दुर्गानन्दसं एत्तेक भेदभाव केनिहार कांग्रेस पार्टी दुर्गानन्दके भजाबऽसं पाछु नहि अछि । दूर्गानन्द झाक नाम बेचिकऽ भोट बटोरबाक काज सेहो चुनावमे होइते अछि । ततबे नहि दूर्गानन्द झाक नाममे संघसंस्थारुपी दोकान सेहो खोलल गेल अछि । जकर काज छैक मात्र दुर्गानन्दक नामपर लोकके सहानुभूति आ पाइ बटोरब । नेपालक राजनीतिक अबस्थासँ उपजल- ग्लानि मैथिली भाषामे उपन्यास विधामे न्युन रचना भऽ रहल कहैत साहित्यकारसभ चिन्ता व्यक्त कएलनि अछि । नेपालसँ मैथिलीमे एखन धरि मात्र चारिटा उपन्यास प्रकाशित भेल कहैत साहित्यकारलोकनि औपन्यासिक कृति लेखन आ प्रकाशन नइँ हएब दुखद रहल मन्तव्य व्यक्त कएलनि अछि । राजेश्वर ठाकुर रचित ग्लानि मैथिली राजनीतिक लघु उपन्यासके साओन २७ गते राजधानीक भृकुटीमण्डपमे आयोजित कार्यक्रममे विमोचन कएल गेल । प्राज्ञ रामभरोस कापडि ‘भ्रमर’ ठाकुरक प्रथम कृति ग्लानिके विमोचन कएलनि । भ्रमर नेपालीय मैथिली साहित्यकार उपन्यास रचना करबादिस रुचि नइँ देखौने छथि कहलनि । नेपालमेँ कुल १ सय पचासटा मैथिली पुस्तक प्रकाशित अछि जाहिमे उपन्यासक संख्या मात्र चारि रहल हुनक कहब छलनि । उपलब्ध चारिटा उपन्याससेहो आह्लादकारी नइँ रहल टिप्पणी भ्रमरके छलनि । राजेश्वर ठाकुर ग्लानिक सम्बन्धमे कहलनि जे उपन्यासक प्रमुख पात्र रमेश अछि जे मधेश आ मधेशीके हक अधिकारके लेल लडऽ चाहैत अछि । गजेन्द्र बाबुके मधेश आन्दोलनमे रमेश नौकरी छोडिकऽ कुदि जाइत अछि मुक्ति कामनाक सँग । पहाडिया शासन प्रवृतिक विरोधीक रुपमे आगु बढैत रहैत अछि रमेश । मुदा सत्ता लिप्सामे डुबि जाइत अछि राजनीतिक व्यक्तित्वसभ । एहन अबस्थामे रमेशके ग्लानि उत्पन्न होइत छैक आ लघु उपन्यासक जन्म होइत अछि । ओही अवसरमे मन्तव्य दैत डा रामदयाल राकेश राजेश्वर ठाकुरक ग्लानि कृतिसँ मैथिलीक उपन्यास साहित्यमे एकटा नव अध्याय जुडल कहलनि । कार्यक्रममे सहभागीसभ नेपालीय मैथिलीमे उपन्यास विधामे कलम चलएबादिस साहित्यकारसभके लगबाक आग्रह कएने रहथि । कार्यक्रममे डा गंगा प्रसाद अकेला गोपाल अश्क संचारकर्मी चन्द्रकिशोर झा सहितके व्यक्ति सहभागी रहथि । नव विवाहिताक लेल नव उमंग लाबए एहन मधुश्रावणि बबिता ठाकुर दिल्लीसँ मधुश्रावणी पुजऽ अपन नैहर जनकपुर आएल छथि । भोरसँ साँझधरि पुजेमे अपस्याँत बबिता मिथिलाक सँस्कृति आ परम्परासँ निकजकाँ भिजबाक अवसर भेटल कहैत खुशी व्यक्त करैत छथि । तहिना रीमा झा सेहो काठमाण्डूसँ जनकपुरमेँ आविकऽ मधुश्रावणी पुजलनि । एक निजी च्यानलमे समाचारवाचिका रीमा एहि पावनिसँ आत्मीयता जुडल बतबैत छथि । हिनके सभजकाँ बहुतो मैथिल ललना अपन व्यस्त जीनगीक पन्द्रह दिनमे मधुश्रावणीक आनन्द उठौलनि । पढाइ लिखाइ आ पारिवारिक झन्भटिके कतियबैत नवविवाहितासभ गीत नाद आ खिस्सा पिहानीक आनन्द उठौलनि मधुश्रावणी पावनिमे । साओन महिनाक रीमझिम वर्षा आ ताहिमे सखी बहिनपा सभक सँग फुल लोढबाक आनन्द शायदे कोनो आन संस्कृतिमेँ होइक । नवविवाहिता मैथिल महिलासभक जीवनमेँ नव रोमाञ्च लऽ कऽ आएल मधुश्रावणी । लोककथा आधारित ई मधुश्रावणी वैवाहिक जीवनके एकटा अदभुत आ हृदयस्पर्शी शुरुवात बनल अछि । नवविवाहिता जोडीके एक दोसराके बुझबाक परखबाक अवसर सेहो जुडा दैत अछि ई पाबनि । ‘पावनि पूजू आज सोहागिन प्राण नाथके संग हे । कारी कम्बल झारि गंगाजल काजर सिन्दुर हाथ हे । चानन घसू मेहदी पिसू लिखू मैना पात मे । पावनि साजी भरि भरि आनल जाही जुही पात मे । कतेक सुन्दर साज सजल अछि लिखल मैना पात मे । ’ (पावनिक गीत ) ओना नोकरिहारा वरसभक लेल मधुश्रावणी पावनि फिक्का रहल । कनिञाक संगहि कोहवर घरमेँ बैसकऽ काम दहन आ गौरी महादेवक विवाहक कथा सुनबाक अवसर अमेरिकामे रहल प्रमोद झाके नहि भेटलनि । जनकपुर पिरडियामाइस्थानक प्रमोद वितलाहा अषाढ महिनामे परिणय सुत्रमे बान्हल छलाह । गामसँ कोशो दूर रहल कनिञासभ भलेहि पुजा पुजऽलेल नैहर पँहुच गेलि होथि मुदा वरसभके त मन मसोसिएकऽ रहऽ पडलनि । मिथिलामे पण्डिताइयक प्रथाके विपरीत ई पाबनि महिलेद्वारा पुजाओल जाइत अछि । समाजक वा घर परिवारक प्रौढ महिला पवनैतिके ई पाबनि पुजबैत छथि । ई पाबनि नवकनिञा अपन नैहरमे पुजैत छथि तेँ विवाहक बाद सासुरक जिम्मेवारीवहनके दायित्वक बीच नैहरक मनोरन्जन सुखदायी भऽ जाइत अछि । पुजावास्ते प्रयोग होबऽबला सभ समानसभ कनिञाक सासुरेसँ अबैत छैक, पुजा नैहरमे मुदा पुजाक वस्तु सासुरक । मधुश्रावणी पुजा कोहवर घरमेँ करबाक प्रचलन अछि । वर कनिञाक नितान्त व्यक्तिगत घर कोहवरके मधुश्रावणीलेल निक जकाँ सजाओल जाइत अछि । विवाहक बाद मधुश्रावणीमे वर कनिञा कोहवरके श्रृंगार बनि जाइत अछि । ‘कोवर कोवर सुनियै हे प्रभु कोवर कोना होइ हे । पिसु पिठार लिखू जल पुरहर कोबर एहन होइ हे । ताहि कोवर सासु पलंगा ओछाओल ओलरल धीया जमाय हे । घुरि सुतु फिरि सुतु ससुरक वेटिया अहाँ घामे गरमी बहुत हे । हम नहि घुरबै अहाँक बोलिया पर घर बाज कुवोल हे । ’ (कोबरक गीत )’ साओन इजोरिया पक्षक तृतीया दिन सिन्दुरदान होइत अछि । ई सिन्दुरदान अहिवातक तेसर सिन्दुरदान होइत अछि । एहिसँ पहिने विवाहक राति आ चतुर्थीक भोरमेँे सिन्दुरदान भेल रहैत छै । मधुश्रावणी विवाहके पुर्णता देबऽबला पाबनि बनि गेल अछि । मिथिलामेँ विवाहपुर्व वर कनिञा एक दोसरासँ विल्कुल अन्चिन्हार रहैत अछि एहन मे मधुश्रावणी पावनि आ साओनक महिना सामीप्यतालेल सहज अवसर जुटा दैत अछि । कतबो व्यस्त जीवन होइतो प्रायः नवदम्पत्ति एहिमेँ संगहि कथा सुनैत छथि एहिसँ सामाजिक आ पारिवारिक समरसता बढबामेँ मदति भेटैत अछि । मधुश्रावणीमेँ सासुरसँ पठाओल गेल दीपक टेमी दगबाक चलन अछि । एहि चलनके सभ गोट अपने तरहसँ देखैत अछि । टेमीक फोँका सौभाग्यक प्रतीक मानैत अछि मैथिल महिला । शीतल बहथु समीर, दही दिश शीतल लेथु उसासे । शीतल भानु लहुक लहु उगथु शीतल भरल अकासे । शीतल सजनि गीत पुनि शीतल शीतल विधि व्यवहारे । शीतल मधुश्रावणी विधि हो शीतल वसन श्रृंगारे । शीतल घृत शीतल वर वाती शीतल कामिनी आँगे । शीतल अगर सुशीतल चानन शीतल आबथु माँगे । शीतल कर लए नयन झपावह शीतल देलह पाने । शीतल हो अहिवात कुमर संग शीतल जल अस्नाने । ’ (टेमी कालक गीत) संस्कृतिविद्सभ मिथिलामेँ मुगल शासकके आक्रमणके बाद पतिव्रताक रक्षाके लेल एहन चलन शुरु भेल कहैत छथि । बदलैत समयक प्रभाव मधुश्रावणी पावनि पर सेहो देखा रहल अछि । फुल गुलसँ भरल गामघर आब सुनसान प्राय भऽ रहल अछि । एहनमेँ जाही जुही, अगर तगर, नीम दाडिम आ मेहदीक पातसभ सनके वस्तु भेटब कठिन भऽ जाइत अछि । शहर बजारमे रहनिहार पवनैतिन सभके एहन वस्तुक अभाव खटकल करैत छन्हि । फुल लोढीलेल सेहो आव फुलवारी सभ नहि रहि गेल अछि जे रंग विरंगक फुल तोरि सखी बहिनपा डाला सजेबाक प्रतिस्पर्धा कऽ सकथि । काठमाण्डू। विदेशमे भविष्य देखैत अछि विद्यार्थी पढबालेल विदेश गेनिहार नेपाली विद्यार्थीक सँख्या बढिरहल अछि । पश्चिमी जीवनशैली स्वतन्त्रता आ विलासिता भोगऽलेल सेहो नपाली विद्यार्थी विदेश दिन आकर्षित भऽ रहल अछि । आइटी होटल म्यानेजमेन्ट व्यबस्थापन इन्जिनियरिंग विज्ञान सहित विषयदिस रुचि रहल विद्यार्थी विदेश जएबाक लेल बाध्य सेहो अछि कियाक त नेपालमे एहन विषयक उत्कृष्ट अध्ययन सँस्थानक कमी अछि । विज्ञान आ व्यवस्थापन संकायमें रुचि रहल विद्यार्थी खास कऽ विदेश जाइत अछि । दोसर दिस नेपालमेँ लोडसेडिंग आ पाबनि तिहार जकँ होबऽ बला बन्द हडतालक कारण सेहो विद्यार्थीसभ विदेशमेँ अपन सुरक्षित भविष्य देखैत अछि । एहि वर्ष मात्रे नेपालमें एगारह घण्टाधरि लोडसेडिंग भेल छल तहिना राजनीतिक दल आ सशस्त्र निशस्त्र समूह बन्द हडताल आहवान करिते रहैत अछि । विदेश गेनिहार विद्यार्थीमेँ निजी विद्यालय तथा कलेजमेँ अध्ययनरत विद्यार्थी सभ बेशी अछि । सरकारी क्याम्पस पढाइसँ बेशी राजनीतिके केन्द्र बनल अछि तेँ लगनशील आ मेहनती विद्यार्थी ओम्हर ताकहो नहि चाहैत अछि । नेपालक कन्सल्टयान्सीसभ विद्यार्थीके निजी खर्चमेँ विदेश पढऽ जाएलेल सहज बाट बना देने अछि । शैक्षिक परामर्शदातासभ विद्यार्थीके विदेशमेँ पढाईके जानकारीक सँगहि विदेश जएबालेल विद्यार्थीके प्रेरित सेहोे करैत अछि । शैक्षिक परामर्शदाता ममता उपाध्यायके अनुसार नेपालमें प्रयोगात्मक शिक्षा नहि अछि तें एत्त गुणस्तरीय पढाई सम्भव नहि अछि । तें नेपालमें एम. ए. आ पिच एच डी कएल विद्यार्थीसेहो गुणस्तरहीन होइत अछि ममताक कहब छन्हि । नेपालमें पढलाक बाद नोकरीक अवसर कम अछि ताहिलेल सेहो विद्यार्थी विदेश दिस आकर्षित भऽ रहल अछि । नेपालक आम विद्यार्थीक लेल विदेशक पढाइ सपना सेहो अछि कम आय भेल अभिभावकके धीयापुतासभके त नेपालेमे चित्त बुझएबाक स्थिति छै । विदेशमेँ उच्च शिक्षा अध्ययन करबाक लेल परामर्श लेबऽ आएल विद्यार्थी नेपालोमेँ अध्ययनकऽ कऽ भविष्य बनाओल जा सकैत अछि ताहिमेँ विश्वस्त अछि । सरकार पढबालेल विदेश पलायनकेँ रोकबालेल कोनो खास पहल एखनधरि नइ कएलक अछि नेपाली विद्यार्थी सँगहि प्रतिभा आ देशक पाइसेहो विदेश जाइत अछि से बुझब आबश्यक अछि । शिक्षामन्त्रालय एहिप्रति गम्भीर रहल दाबी शिक्षामन्त्री सर्र्वेन्द्रनाथ शुक्लके छन्हि । नेपालक विद्यालयके गुणस्तरीय बनाओल जाए तऽ विदेश गेनिहार विद्यार्थीक संख्या कम भ सकैया शुक्लके कहब छन्हि । विज्ञान आ व्यवस्थापन अध्ययन होबऽ बला ९० विद्यालयकें सरकार गुणस्तरीय बनाएबालेल सहयोग कऽ रहल शुक्ल जनतब देलनि । विद्यालयके क्षमता पाठयक्रम शिक्षक शैक्षिक सामग्री जेहन विषयवस्तु दिस सुधारके आवश्यकता अछि । नेपालमेँ एक तथ्यांकअनुसार ४० हजार विद्यार्थी प्रतिवर्ष स्नातक उत्तीर्ण करैत अछि जाहिमेँसँ नेपालमेँ मात्र दू हजारके रोजगारी भेटैत छैक । राजनीतिक अबस्था बन्द हडताल जेहन कारणसँ वार्षिक २० हजारसँ बेशी विद्यार्थी उच्च शिक्षा बास्ते विदेश जाइत अछि । ई त सरकारी तथ्यांक अछि । विदेश जाएलेल शिक्षा मन्त्रालयसँ सिफारिस लेनिहार विद्यार्थीक सँख्या मात्र ई अपना निजी खर्चमेँ विदेश गेनिहार विद्यार्थीक संख्या आओर बेशी अछि । विदेशमेँ मात्रे उत्कृष्ट शिक्षा भेटैत छैक से भ्रम चिरबादिस सम्बन्धित सभ पक्षके लागक चाही । राजनीतिक दलके सेहो शिक्षा क्षेत्रके बन्द हडताल मुक्त बनएबामेँ सहयोग करबाक चाही । विद्यार्थी देशक भविष्य होइत अछि भविष्यके अन्धकारमेँ धकेलबाक काज ककरोसँ नहि हुअए । काठमाण्डूमेँ कोहबर घर : वर ने कनिञा तैइयो बढिञा केवाडमेँ स्वागतम् । घरके भितमे वर कनिञाक चित्र, हाथीपर चढिकऽ गौर पुजैत नवविवाहिता, डोली कहार सेहो । कोहबर घर मैथिली सँस्कृतिके एकटा अनुपम नमुना, गवाह नव दाम्पत्यक । वर कनिञाक मिलनके साक्षी सेहो । ई कोहबर घर कोनो बर कनिञालेल नहि अछि, ई अछि मिथिलासँस्कृतिक जीवैत नमुना । मैथिलीक समृद्ध परम्परा आ संस्कारके चिनारी बनल अछि ई कोहबर घर । काठमाण्डूक कुपण्डोलस्थित महागुठी आर्ट ग्यालरीमेँ सजाओल कोहबर घर मैथिली सँस्कृतिके बखान करैत अछि। एहि कोहबरमेँ रहल पाग, डोपटा, वियनि, डोला कहार, गुआ—माला जेहन चीजसभ आओर आकर्षक बना देने अछि । तहिना वियाहक विध सिन्दुरदान, मुँहदेखाइ, विदाइ के पेन्टिंगसभ सेहो कोहबर घर देखनिहारके अपना दिस खिचैत अछि । हस्तकलाक समान उपलब्ध होबऽबला ई दोकान मेँ कोहबर घरके मिथिला पेन्टिंगके उजागर करबाक प्रयास कएल गेल अछि । विवाहमेँ विधके क्रममे काज लागऽबला आ मैथिली घरके प्रतीक उखरि—समाठ, कोठी जेहन वस्तु सेहो गमैया लुक दैत अछि एहि कोहबर घरके । एत्तऽ एलासँ लगैत अछि जे कोनो मिथिलासंग्रहालयमेँ चलि एलहँु । मैथिली सँस्कृतिके संरक्षणक नामपर बडका बडका भाषण केनिहारसभके एहि कोहबर घरसँ किछु ज्ञान भेटि सकैत अछि । मिथिला पेन्टिंगके लोकप्रियता आ मैथिली सँस्कृतिके मौलिकता कारण ई कृत्रिम कोहबर घर देश विदेशक कला प्रेमीके मोन मोहि लैत अछि। मिथिला पेन्टिंगके वाहक मात्र नहि समग्र संस्कृतिके परिचायक ई नमुना कोहबर घर काठमाण्डूसँ देश विदेशक लोकके मैथिली संस्कृति दिस आकर्षित करैत अछि । परम्पराके निरन्तरतामेँ प्रवास बाधक नहि गामसँ कोशोदूर रहितोअपन परम्परा आ सँस्कारके बचाकऽ राखऽमें मैथिल महिलाक बडका योगदान अछि । ग्रामीण परिवेशमेँ सहज रुपेँ पाबनि तिहार केनिहारि महिलाक अपेक्षा शहर आ दूर देशमेँ रहल मैथिल महिलाके पाबनिक ओरिआओनपातीमेँ दिक्कति त होइते छन्हि मुदा पाबनिपर एकर कोनो प्रभाव नहि परैत अछि । काठमाण्डूमेँ बरसाइत पाबनि केनिहारि अर्चना झाक कहब मानी त काठमाण्डूमेँ रहियोकऽ कोनो दिक्कति नहि होइछन्हि एहि पाबनिमेँ । गाममेँ सभ महिला बडका बरक गाछ तर जम्मा भऽ बरक पुजा करैत छथि त शहरमेँ गमलामेँ बरक गाछ राखिकऽ बेगरता पुरा कएल जाइत अछि । बटसावित्री अर्थात बरसाइतमेँ अहिवात महिला अपन पतिक लम्बा आयुक कामना करैत छथि, नव कनियाँकलेल इ पाबनि बेशी महत्व रखैत अछि । नवकनियाँ सभकेँ प्रोढ महिला वरसाइतक विध विधान सिखाकऽ पुजामेँ सहयोग कएल करैत छथिन्ह । काठमाण्डूमेँ महिला सभ सामुहिक रुपेँ एहन पाबनि पुजल करैत छथि। सामाजिक सदभाव आ एकदोसराके बुझबालेल सेहो शहरवासी मैथिल महिलाक लेल एहन पाबनि निक अवसर भऽ गेल अछि । शरिर कतउ रहए मोनमें अपन परम्परा आ सँस्कारप्रति श्रद्धा होएबाक चाही, अपन सँस्कृति आ परम्पराके निरन्तरता देबामेँ प्रवास बाधक नहि होइत अछि । उपटैत गाम बसाओत बाबा सुखी सम्पन्न जीवन बितएबाक ललसा लऽ कऽ लोक अपन गाम छोडि परारहल अछि शहर दिस । वैश्वीकरणक अन्हर विहाडिमे ओ अपन जन्मस्थानके महत्व नहि बुझऽ चाहैत अछि या कही बुझियोकऽ आंखि मुनि लैत अछि । गामक परती ओकरा विरान लागऽ लगैत छै , ओतुक्का फुलबारीमे ओ काँट मात्रे देखैछ अछि । गमैया जीवनसं जनमल एहने वितृष्णा देखएबाक प्रयास कएल गेल अछि मैथिली टेलि श्रृंखला बाबामे । बाबाक लेखक निर्देशक रमेश रञ्जन कहैत छथि मिथिलाक गाम उपटि रहल अछि । बाबा नेपाल टेलिभिजनसँ शनिदिन भोरमे ९ः३० बजे आ रविदिन १ः३० बजे प्रसारण भऽ रहल अछि । ग्रामीण जीवनक नीक बेजाय पक्ष आ बाबा श्रृंखलासं सम्बन्धित रमेश रञ्जनसँ कएएल गेल बातचीतक संक्षेप । बाबाक कथानक की छै ? मिथिलाक वर्तमान अबस्था एकर मूल विषयवस्तु छै । मिथिलाक ग्राम्यजीवनमे दूटा पीढी बीचमे दूरी देखल गेल अछि । दू रंगक सोच छै । पीढीगत अन्तर छै । एकटा पीढी छै जकरा गाम बड नीक लगैत छै, ओतुक्का जनजीवन प्रिय लगैत छै, संस्कार संस्कृति नीक लगैत लगैत छै । गाममे ओ सहज अनूभव करैत छै । एकटा पीढी एहन बनि रहल छै जकरामे गाम प्रतिक विकर्षण छै । ओत्तऽके जीवन जटिल लगैत छ, श्रम करबाक तरिका बहुत बेजाय लगैत छै । ओइठामक स्थायी सम्पत्ति बेकार लगैत छै । एकटा नान्हिटा गामक विकट जीवनके ओझराकऽ राखऽके औचित्य नइैं बुझैत छै । इएह द्वन्द्व नाटकमे केन्द्रिय अन्तरवस्तु छै । मिथिलाक ग्राम्यजीवन आ बाबाक विषयवस्तुमे कतेक समानता छै ? मैथिली भाषा एकटा माध्यम मात्र छै । बाबा सिरियलके स्थान चयन, ग्राम्य सौन्दर्यता, आम आदमीक संघर्ष आदि पीडाक बात छै ओत्तऽ । आम खादमीक हास्य विनोद, ओ कखन खुशी होइत छै, कखन दुःखी होइछै । सामाजिक संरचनासं निःशृत जे बात छै से कथानकमे बुझाइत छै । पात्रके बाजब, चलब, भेषभूषा, आभूषण सभमे मिथिलाक झलक भेटैत छै । तें ई पूर्णरुपें मैथिली सिरियल छै । नेपालक लाखो मजदुर विदेशमे श्रम बेचबालेल बाध्य अछि, देशमे अवसर नहि छैक । की ओहने पलायनके देखएबाक प्रयास भेल अछि ? एकर कथाक ओ अंश मात्र छै । ओ आवश्यक छै या नहि से बहसके विषय हेतै । लेकिन एकटा बात निश्चित छै जे कोनो देशके श्रमिक बाहर जाकऽ श्रम करए से नीक नहि मानल जा सकैत छै । मिथिलाक धर्ती उर्वर छै आ ओत्तऽके सपूतसभ उंट, भेडा चरबैछै । ओ मिथिलामात्रे नहि नेपालोक लेल नीक नहि भऽ सकैत छै । मुदा मुख्य बात ई जे सम्पूर्ण रुपमे ग्रामीण जीवनक वैशिष्टय अप्रिय लागऽ लागल छै एहि पीढीके । आ फरक ढंगके स्वप्नील संसारदिस आकर्षित भऽ रहल अछि । गाममे जीवीका चलाएब कठीन नहि छै । दूटा गाय पोसिकऽ, पाँचटा बकरी पोसिकऽ, हर चलाकऽ, अनकर आरिपर घास काटिकऽ आ खेत बटैया कऽ कऽ ओ जीवीका चला सकैत अछि । सामान्य आदमीक लेल बहुत रास साधन छै गाममे । मुदा शहरमे सामर्थ्यवानक लेल मात्र साधन छै । ओहि आकर्षणमे भोतियाकऽ सभ किछु बिसरि गेल अछि । गाम किया ने नीक लगैत छै तकर विश्लेषण नहि करैत छै बस भागऽकेे कोशिस करैत छै । ओ श्रमके लेल मात्रे भागि रहल छै एहन बात नहि । ओत्तऽ उत्पादनक सम्भावना केहन छै ? ओत्तऽके सम्भावना ओ नहि देखैत छै । ग्राम्यजीवनमे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगारी आदिक अवसर नहि छैक, एहनमे पलायनके स्वभाविक मानल जा सकैत अछि या नहि ? समस्या बहुत रास छै, मुदा समाधान की जे गाम छोडिकऽ भागि जाइ । कत्तऽ जायब, गामसं जनकपुर, जनकपुरसं काठमाण्डू आ ओत्तऽसँ न्यूयोर्क आ वाशिंगटन ़़तैके बाद ? विकल्पके अन्त कत्तऽ छै । गाम उपटि रहल छै । मिथिलामे शहर छइहे नहि, एकर आधारे गाम छै । एहिके मतलब मिथिला उपटि रहल छै । हम तै रुपमे ओकरा देखबाक प्रयास कएने छी । एखनुक मैथिली सिरियल जनशक्ति आ तकनीकी दुनू दृष्टिएँ कमजोर देखल गेल अछि । बाबा सिरियल ओकरे निरन्तरता त नहि ? बाबा सिरियल नेपाल टेलिभिजनक लेल बनाओल गेल अछि । एहिमे नेपाल टेलिभिजनक प्राविधिक सहयोग लेल गेल अछि । मैथिली क्षेत्रक चर्चित कलाकारसभ एहि सिरियलमे सहभागी छथि । मिथिला नाट्य कला परिषद्क कलाकार रंगकर्ममे बेस चर्चित अछि । तें एहि सिरियलमे ओतुका कलाकारके समावेश कएल गेल अछि । सुनिल मिश्र, राम नारायण ठाकुर, मदन ठाकुर, घनश्याम मिश्र, रविन्द्र झा, रञ्जु झा, परमेश झा, राम कैलास ठाकुर सहितके कलाकार एहिमे अभिनय कएने छथि । कथा, पटकथा, संवाद आ निर्देशन हम स्वयं कएने छी । महाकवि विद्यापति अक्षयकोष नेपालमे मैथिली भाषा, संस्कृतिक संरक्षण, सम्बर्द्धनमे सरकार कतेक उदासिनताक नमूना बनल अछि महाकवि विद्यापति अक्षयकोष । एहिकोषक दयनीय अबस्था बयान कऽरहल अछि जे सरकारी संयन्त्र कतेक संवेदनशील अछि नेपालमे सभसं बेशी बाजल जाएबला दोसर भाषा मैथिलीक लेल । नेपाल सरकारे गत आर्थिक वर्ष व़ि स़ ०६६/०६७ क बजेटमे १ करोड टका अलग कएलक विद्यापति अक्षयकोषलेल । जकर उद्देश्य छल अक्षयकोषक स्थापना आ मैथिली भाषाक विकासमे योगदान कएनिहारके पुरस्कृत करब । नेपाल सरकार पहिल बेर बजेट भाषण मार्फत विद्यापतिक सम्मानमे एहि तरहक कोष स्थापनाक घोषणा कएने छल । मूदा बजेट भाषणक १७ महिना बितिगेलाकबादो अक्षयकोषक स्थापना नईं होब सकल अछि । संस्कृति मन्त्रालय अक्षय कोषक भार टारऽ लेल १ करोड राशि बृहत्तर जनकपुर क्षेत्र विकास परिषद्क जिम्मा लगा देने अछि । बृहत्तर जनकपुर क्षेत्र विकास परिषद् संस्कृति मन्त्रालय अन्तर्गतके एकटा कार्यालय अछि जे धनुषा आ महोत्तरी जिलाक धार्मिक तथा ऐतिहासिक सम्पदा संरक्षण करबाक उद्देश्यसं स्थापित अछि । संस्कृति मन्त्रालय अक्षयकोषक काज बृहत्तर जनकपुर क्षेत्र विकास परिषद् करत से कहैत कानमे रुइतेल धऽ कऽ सूतिरहल अछि । भाषा संस्कृतिक विकासक सरकारी ठेकेदार संस्कृति मन्त्रालयक अकर्मन्यतासं अक्षयकोष स्वरुप नईं ल सकल अछि । संगीत तथा नाट्य प्रज्ञा प्रतिष्ठानक प्राज्ञ रमेश रञ्जन कहैत छथि र्अक्षयकोषक राशि फ्रिज होएवाक अबस्थामे पहुंचलाकवाद मन्त्रालय बृहत्तर जनकपुर परिषद्क खातामे पाई पठओलक । एखन बृहत्तर जनकपुर क्षेत्र विकास परिषद् आ संस्कृति मन्त्रालयक सझिया खातामे कोषक राशि राखल अछि । सिमित दायरा रहल जनकपुर क्षेत्र विकास परिषद्मे कोषक राशि पठाओल जएबाक आलोचना सेहो भऽ रहल अछि । परिषद् समग्र मैथिली भाषीक प्रतिनिधित्व नहि करैत अछि कहैत छथि कोषक पूर्व अध्यक्ष रामचन्द्र झा । झा कहैत छथि परिषद् सभक भावनाके नहि समेटि सकैत अछि । विद्यापति अक्षयकोषक उद्देश्य मैथिली भाषामे योगदान कएनिहारके पुरस्कृत करबाक अछि । बृहत्तर दू जिलामे लक्षित कार्यक्रम करैत अछि, एहनमे बृहत्तरके अक्षयकोष स्थापनाक जिम्मा देनाइ औचित्यहीन रहल भाषा संस्कृतिविद्सभ कहैत छथि । परिषद् भ्रष्टाचारमे डुबिगेल आरोप लागि रहल समयमे कोष मूर्त रुप लऽ सकत या नहि कहब कठिन अछि । कोष आकार ग्रहण करए ताहिके लेल संस्कृति मन्त्रालयके कार्यविधि बनाबऽ पडतै, जाहिलेल एखनधरि कोनो काज शुरु नहि भेल अछि । कोषक कार्यविधि आ निर्देशिका नईं भेलाक कारणें कोषक पाई सरकारी खाताक शोभा मात्र बढा रहल अछि । कोषक १ करोड राशि बैंकमे रखैत काल बेशी ब्याज देनिहार बैंकके नहि चुनल गेल कहैत छथि प्राज्ञ रञ्जन । बैंकसभमे पाइके अभाव रहल अबस्थामे बेशी ब्याज लेल बार्गेनिंग हएबाक चाही छल, मुदा मन्त्रालय मनमौजी काठमाण्डू स्थित एक निजी बैंकके शाखामे पाइ राखिदेलक । संस्कृति मन्त्रालयक सचिव मोदराज डोटेल कोषक राशि बैंकमे सुरक्षित रहल प्रतिक्रिया देलनि । अक्षयकोषलेल कार्यविधि बनबाक प्रकृया शुरु भऽ गेल डोटेल जनतब देलनि । मैथिली भाषाक महाकवि विद्यापति नेपालक राष्ट्रिय विभूति भेलाकबादो हूनक परिचय स्थापित नहि होब सकल अछि । मैथिली भाषा आ संस्कृति लेल बजेटक अभाव रहल समयमे विद्यापति कोष सेहो अनिर्णयके बन्दी भऽ गेल अछि । विद्यापति स्मृति पर्वपर मैथिली भाषा संस्कृति उत्थानक भाषण त बहुत देल करैत छथि कथित बौद्धिक वर्ग । एहिबेरके स्मृति पर्व सेहो ओहने भाषणसभसं बितिगेल । महोत्तरी जिलाक बनौलीमे बर्षोसं निर्माणाधीन विद्यापतिद्वार एखनोधरि टकटकी लगौने ठाढ अछि । विद्यापति स्मृति दिवसमे जनकपुरक विदापति चौकपर रहल विद्यापति स्मारकमे घडी रखवाक भाषण सबनेता देलकरैत अछि ,मुदा दशो वर्षक अन्तरालमे घडी लगेवाक कुवत किनको नईं भेलन्हि अछि । भोटक समयमें मैथिली भाषा संस्कृतिक रक्षा एवं विकासक वाचा केनिहार नेतासब मात्र नइभ विद्यापतिक नामपर पेट पोसनिहार सेहो दोषी अछि एहिमे । विद्यापति स्म्ृत्ति पर्व पिण्डदानक पर्व मात्र बनिक रहिगेल अछि । बिपिन झा, स्नातक- ECC. Allahabad University, परास्नातक- Jawaharlal Nehru University, दर्शननिष्णात- Jawaharlal Nehru University, सम्प्रति Cell for Indian Science & Technology in Sanskrit, HSS, IIT Bombay में शोधरत। कृतारिषड्वर्गजयेनमानवीम्…। (सफलताक मूलसूत्र) आजुक युवा में एकटा बहुत पैघ कमी देखै में आबय लागल अछि, जे बाहरी शत्रु पर तऽ ओ सहजता सँऽ विजय प्राप्त कय लैत छथि मुदा आन्तरिक शत्रु काम, क्रोधादि पर ओ विवश भय जाइत छथि। जाहि कारण बहुत बेर ओ सफलता सँऽ वंचित रहि जाइत छथि अथवा ई कहब उचित होयत जे आंशिक सफ़लता प्राप्त करैत छथि। Earl Nightingale केर अनुसार सफलता क आशय “Progressive realization of worthy goal” अछि। अस्तु, सफलता क्षणभरिक कार्य सँ नहि अपितु निरन्तर उद्यम सँ संभव अछि। एहि संदर्भ में किरातार्जुनीयम् (महाकवि भारवि केर अनुपमकृति, संस्कृत महाकाव्य) क प्रथम सर्गक एकटा श्लोक स्मरण में अछि जतय दुर्योधन कें एहि कारण प्रशंसा कयल गेलैक जे ओ अपन समस्त आन्तरिक शत्रु पर विजय प्राप्त कय समय केर नियमपूर्वक विभाजन कय जनता क सेवा में लागल अछि। ओतय ओकर सम्बोधन दुर्योधन केर् अपेक्षा सुयोधन कहनाई उचित बुझल गेल छैक। यदि आन्तरिक शत्रु पर विजय प्राप्त कयल जाय तऽ दुःसाध्य काज सेहो सम्भव छैक। क्षणभरि धैर्य नहि रहब साल भरिक परिश्रम कें व्यर्थजँका सिद्ध कय दैत अछि (’जका’ एहि कारण कहल गेल जे परिश्रम कखनहु व्यर्थ नहिं जाइत अछि )। धैर्य केर उदाहरण एहि प्रकारें देल जा सकैत अछि- एक व्यक्ति केर व्यापार ओहि समय ठप्प भय गेलैक जखनि ओ मात्र २१वर्षक छल। २२ वर्षक अवस्था में ओ चुनाव लडल आ हारि गेल। पुनः व्यापार में आयल जाहि में समुचित सफलता नहिं भेटलैक ओहि समय ओ मात्र् २४वर्षक छल। जखनि ओ २६ वर्षक छल अपन प्रियतमा सँ सदाक लेल दूर भय गेल, स्वाभाविक अछि ओ किछु वर्ष धरि नर्वस जका भय गेल। हारि नहिं मानलक पुनः कांग्रेसियल रेस में आयल किन्तु सफलता नहिं भेटलैक ओहि समय ओ ३४ वर्षक छल। एहि तरहें ओ जीवन रूपी समरांगण में सतत् संघर्ष करैत रहल हारि नहिं मानलक। अन्ततः ओ अमेरिका केर प्रथम राष्ट्रपति बनल। ओ छलाह अब्राहम लिंकन। कहबाक आशय मात्र एतवा अछि जे जाहि क्षेत्र में रुचि हो, ओहि क्षेत्र में बिना विचलित होइत निरन्तर आगू बढी कियाक तऽ एहि राष्ट्र कें विकसित राष्ट्र के पंक्ति में आनव मात्र सरकारी योजना सं संभव नहि अपितु समस्त नागरिक केर अथक, सांविधिक आ नैतिक नियमानुकूल समुचित कार्य सँऽ संभव छैक। प्रदेश केर विकास : एक चिन्तन (बिहार-विकास सन्दर्भ मे आलोचनात्मक अभिव्यक्ति) बिहार विधान सभा चुनाव सम्पन्न भेल। नितीश सरकार ’हाथ’ ओ ’लालटेन’ कें अपन कर्मक समुचित फल हेतु पाछू छोरैत पुनः एक बेर अपन अस्तित्व मे आयल। कलियुग कर्मयुग छैक। ओ अतीतक गप्प करी अथवा वर्तमानक, भारत सनहक गणतन्त्र राष्ट्र मे कर्मक फल जनता द्वारा जनता कें अवश्य भेटैत रहल अछि। आब प्रश्न ई उठैत अछि जे बिहार केर विकास निरन्तर हो एहि हेतु ई केकर उत्तरदायित्त्व अछि? निश्चित रूप सँ उत्तर होयत नितीश सरकारक। जहाँ तक हमर मन्तव्य अछि ’ई उत्तर एकांगी अछि’ कियाक त { 92,257.51 sq. Kms ग्रामीण क्षेत्र, 095.49 sq. Kms शहरी क्षेत्र, (कुल 94,163.00 sq. Km), कुल जिला-38, कुल आवादी- 8,28,78,796 अधिकतम साक्षरता पटना- 63.82%, कुल विश्वविद्याल- 13, इंजीनियरिंग कालेज-08, प्रबन्धन संस्थान 06, मेडीकल कालेज 08, शोध संस्थान 06, ला कालेज 10, आयुर्वेद महाविद्यालय 05, वेटनरी कालेज- 02, कृषि महाविद्यालय 04, फाइन आर्ट्स महाविद्यालय 02, शोधकेन्द्र 04, अन्य शैक्षिक संस्थान 14)} एहि वृहत क्षेत्र बला राज्य केर विकास क उत्तरदायित्त्व मात्र अस्थायी प्रशासक के ऊपर छोडि पल्ला झाडनाई कतय तक समुचित अछि ई अपन विवेक सँ तय कयल जाय। विकास केर उत्तरदायित्त्व एहि प्रकार सँ निर्धारित कयल जा सकैत अछि। · प्रशासक (विकासकर्ता कहब विशेष उचित) o स्थायी § सिविल सेवारत पदाधिकारीगण § अन्य सहयोगी पदाधिकारीगण § जनता स्वयं · निवासी · प्रवासी o अस्थायी § चुनाव मे जीतल जनताक प्रतिनिधि एतय विभाजन किछु विशेष दृष्टि सँ कयल गेल अछि जाहि सँ बिहार अथवा कोनो प्रान्तक विकास केर गप्प केनाई समुचित होयत। सिविल सेवारत पदाधिकारी केर आचरण यद्यपि निर्दुष्ट मानल जा सकैत अछि मुदा वर्तमान समय मे ई बात कदाचित अप्रासंगिक भय गेल अस्तु एहि तरहक पदाधिकारी सँ एतबा कहब उचित जे राष्ट्र अस्मिता, एकता एवं उत्कर्ष समुचित नीतिनिर्माण सँ संभव छैक जेकर कर्णधार सिविलसेवके होइत छथि, आ यदि ओ अपन उत्तरदायित्व प्रलोभन अथवा भयवश बिसरि जेता तऽ भविष्य की होयत ई सहज बुझल जा सकैत अछि। जहाँ तक अन्य सहयोगी पदाधिकारी तथा पुलिस प्रशासनक गप्प अछि, यदि अनुचित नहिं मानल जाय तऽ ई कहब अनुचित नहि होयत जे सबहक कर्ता आ हर्ता ई होइत छथि। यदि पुलिस प्रशासन आ कर्मचारी वर्ग ठानि लथि तऽ भ्रष्टाचार 90% धरि समाप्त भय सकत, शिक्षा तथा अन्य सेवा पंगु नै रहत, यात्री पटना स्टेशन सँऽ बस स्टेशन राति मे जायब अनुचित नै बुझत। एकटा उचित काज हेतु हरियर पत्ती नै देखबय पडत, बिना लाइसेंस अथवा कागज के हजारो गाडी सडक पर नै दौडत, डी० एम० सी० एच० मे चिकित्सा मे लापरवाही नै होयत, लोक के अन्यत्र भटकय नै पडत काज लेल। बहुतो एहेन गप्प छैक जेकरा ई पुलिस, कर्मचारी, चिकित्सक सदृश अधिकारी दूर कय सकति छथि। आब जनता जे मूल निवासी छथि हिनक गप्प। हम नहिं सुधरब ई शपथ खा के कदाचित बैसल छथि। ई अपन हाल नीक जँका बुझैत छथि तैय्यो प्रमाद, प्रलोभन अथवा भयवश अपन कर्तव्य नहिं करता बस अधिकारक गप्प लिअ। दोसर कें चुटकी लेब, टाँग खीचब, ईर्ष्या करब आहा हा परमानन्द दैत छन्हि। आई कोनो तरहें बीत जाय काल्हुक के देखलक? ई हिनकर सोच छन्हि। विकास आ देशक गप्प नै करू ओ त सरकारक काज छियै न!! कतहु क्रिकेट भेल तऽ कान पथता, अपने कोनो खेल मे आगू एता अथवा अपन बच्चा के कोनो क्षेत्र विशेष मे आगू अनता ई तऽ... “की कहू एहेन राज मे हम छी न किछु सम्भव नै अछि”। हँ, ध्यान आयल “पढि लिखि के की हेतै? कोनो नौकरी भेटतै?” ई हिनक सोच छन्हि। गामक चौक पर गाजा आ भांग खायत से बड्ड नीक। कतेक गप्प कहू। हिनको स बस एतबा आग्रह जे अपन कर्तव्य जे छन्हि यथासम्भव ओकर पालन करथु। हमरा सदृश प्रवासी नागरिक तऽ बेचारे पटना धरि गाम जेबाक जोश रखैत छथि ओकर बाद बिहार नहिं सुधरी वाक्य बजैत छथि। की ई उचित अछि? अपना लेल उत्तर देब सदा मुश्किल होइत अछि। किन्तु ई किछु हिनकर कर्तव्य सेहो छन्हि न? गाम जेबा मे होयब समस्या देखाइत छन्हि मुदा घर मे बच्चा के मूँह सँ मैथिली सुनबा मे बज्रपात होइत छन्हि!! बिहार किं वा मिथिला लेल अहाँ की कयल? अपन पेट तऽ कुकुरो पोसैत अछि। आय NBT मे एकटा समाचार देखल नोएडा केर कम्पनी ल्यूना इरगोनोमिक्स केर मुख्य कार्यकारी अधिकारी मेजर अभिजीत भट्टाचार्य ’पाणिनि’ नामक साफ्टवेयर केर जानकारी देलथि जाहि द्वारा 11 भाषा मे SMS पठा सकैत छी। ई न्यूज एहि दृष्टि सँ महत्त्वपूर्ण जे अपन धरोहर केर रक्षण करबाक सोच जुडल अछि। एहि तरहें गजेन्द्र जी सदृश कतिपय व्यक्ति सराहनीय कार्य कय रहल छथि जे प्रवासी होइतो मिथिला/बिहार केर विकास मे योगदान स्वरूप अछि। आब बात नितीश सरकारक...। एहि मे कोनो सन्देह नहिं जे नितीश सरकार लालटेन के मडियल रोशनी सँऽ बिहार के जेनरेटर युग मे अनलक (एकर चर्चा आगू करब)। बिहारक विकास गाथा बिहार सरकार केर साइट पर देखल जा सकैत अछि। RTI Doc. जे ओहि साइट पर अछि, जानकारी के बुझबा मे सहायक होयत। 5 वर्षक भीतर 47000 सँ अधिक अपराधी के सजा भेटब, केन्द्रीय योजना क अतिरिक्त ४० से अधिक योजना केर कार्यान्वयन होयब, सडक केर जाल प्रस्तुत होयब, पलायनक दर कम होयब, बिहार विशेष न्यायालय अधिनियम-2009, 2008-09 मे वार्षिक विकास दर प्रचलित मूल्य पर 24.33% होयब, राज्यक कर राजस्व 2004-05 केर तुलना मे 2009-10 मे 3347 करोड सँ 8130 करोड होयब आदि किछु शुभसंकेत अछि। टीका-टिप्पणी तऽ चलबे करत मुदा एहि बातक प्रतिषेध करब की बिहार विकासक पथ पर अछि, आत्मघाती होयत। लेकिन...! नितीश सरकार अखनहुँ किछु बात लय कें आलोचना के पात्र अछि जेकरा बिन्दुबार तऽ नहि कयल जा सकैत अछि मुदा सुधार हेतु किछु गप्प जरूर कयल जा सकैत अछि। त आगू सुनू- अखनहुँ बिहार जे समस्या सँ त्रस्त अछि ओकर समाधान हेतु निम्न बिन्दुगत क्षेत्रक समाधान अपेक्षित अछि- · शिक्षा- अखनहुँ गुणवत्ता क दृष्टि सँऽ शिक्षा सन्तोषजनक नहि अछि। सुधार अवश्य भेल मुदा अखनहु जरूरत अछि जे शिक्षा मे व्यापक सुधार हो। ताकि विद्यार्थी के अन्य प्रदेश हेतु रुख नहिं करय पडय। शिक्षा मे पारदर्शिता के अभाव अछि। गुणवत्ता के स्थिति एहि बात सँ लगा सकैत छी जे डाक्टरेट के डिग्री ओतय सहजता सँ प्राप्त कय सकैत छी। संस्कृत विश्वविद्यालय सँ स्वर्णपदक प्राप्त व्यक्ति एक पंक्ति संकृत नहिं बाजि सकैत छथि। संस्कृत विद्यालय जाहि हेतु सरकार करोडो खर्च कय रहल अछि ओकर भवन मात्र अछि बाकी सब कागज पर। हरिजन छात्रावास अछि सौ स अधिक कमरा के किन्तु एकहु टा हरिजन आई धरि ओतय नहिं देखल गेल। बहुत रास उदाहरण अछि सबटा नहिं देल जा सकैत अछि। · सुरक्षा- एहि क्षेत्र मे नितीश सरकारक कदम सराहनीय अछि मुदा अखनि धरि अन्य क्षेत्रक गप्प छोडू राजधानी सुरक्षित नहिं अनुभव कयल जाइत अछि। एहि पर विशेष ध्यानक आवश्यकता अछि। · संसाधन – o विद्युत – हम सभ लालटेन युग सँ निवृत्ति लय जेनरेटर युग मे त आबि गेलहु किन्तु बिजली हेतु आइयो दुनिया अन्हार अछि। भगजोगनी आ अतिथि रूपी बिजली रानी के विकास मार्ग मे बाधा हेतु सबसँ पैघ कारक कहल जा सकैत अछि। बिजली केर दुखद स्थितिक उदाहरण हम एना दय सकैत छी- हम अपन प्रथ त्रैमासिक संकृत ई जर्नल जाह्नवी (jahnavisanskritejournal.com) केर तृतीय अंकक लोकार्पण मिथिला मे प्रख्यात साहित्य्क विद्वान प्रो० रामजी ठाकुर सं करायब निश्चित कयल। अस्तु लैप टाप आ इण्टर्नेट सेवा हेतु अपन मोबाइल गाम लय गेलहुं। ओतय बिजली रानी हमरो सँ पैघ अतिथि छली। अन्ततः एक व्यक्ति कें आग्रह कय जेनरेटर पर कोनो तरहें चार्ज कयलहुं आ कार्य सम्पन्न करायल। यदि बिजली व्यवस्था सम्यक हो तऽ गाम आ शहर के चक्कर नहिं रहत। रोजगारक सृजन सेहो होयत। o यातायात- यातायात केर समस्या अखनो धरि अछि। वाहन संचालक केर अनियमितता ओ भाडा, समय, यात्री क सं बदसलूकी, गाडीक कागज अथवा लाइसेंस लय के हो, प्रशासन अधिकांश समय मौने नहि रहैत अछि अपितु हरियर पती गनबा मे व्यस्त रहैत अछि। o रोजगार- रोजगार एकटा एहेन बिन्दु अछि जे लोक कें परदेश जेबाक हेतु विवश कयदैत अछि। समाजिकता के नष्ट कय रहल अछि। व्यक्ति अपन भावना मात्र सं सरोकार रखबाक हेतु विवश अछि। अस्तु रोजगार सृजन अत्यावश्यक अछि। आवश्यकता अछि जे टेण्डर आदि केर दलाल सँ दूर स्वच्छ वातावरण मे रोजगारक अवसर जनता के देल जाय। जनता सतत नीक के संग दैत छैक अन्तःकरण सँ मुदा रोजी क चक्कर मे अनुचित काज सेहो करबाक हेतु विवश होइत अछि। o जागरुकता- अन्त मे नितीश सरकार सँ अपेक्षा जे जनता मे जागरुकता के संचार हो एकर प्रयास कयल जाय। बहुत किछु जनता नहिं बुझबाक कारण अनुचित करैत अछि। किन्तु यदि जागरुकता बढायल जाय तऽ जनता भ्रष्टाचार के संग नहि देत, विविध कार्यक्रम विशेष रूप सँ सफल होयत। अन्त मे निष्कर्षतः हमर वक्तव्य होयत जे बिहारक उत्कर्ष समग्र सहयोग सँऽ संभव अछि नकि केकरहु पर दोषारोपण सँऽ मानवमात्र मे कमी आ गुण दुनू छैक। अस्तु गुणक आलम्बन कय अपन संविधान एवं संस्कृतिक अनुकूल कर्तव्य कय प्रत्येक व्यक्ति आ संस्था समग्ररूप सँऽ राष्ट्रक उत्कर्ष मे योगदान दी ई सादर निवेदन। (लेखक IIT मुम्बई कें शोधछात्र छथि। लेख मे निष्पक्ष लेखिनी केर प्रयोग कयल गेल अछि। कोई कोनो आशय के वैयक्तिक तौर पर नहिं ली। प्रस्तुत कतिपय आँकडा बिहार राज्यक साइट सँऽ लेल गेल अछि। श्रीः ॥ हे हृदयेश्वरी: एक कटाक्षालोचन ॥ यौवनान्माद वशीभूत जनसामान्य केर वचन हो अथवा धीर-गभीर जनक मृदुवचन, प्रियतमा हेतु ’हे हृदयेश्वरी’ एहि पदक प्रयोग सुनि सर्वथा एहि पद केर चिन्तन स्वाभाविक छल। सामान्यरूपें तऽ ’हृदय’ पदक आशय उरोभागस्थ रक्ताभिसरण आदि कार्य करय बला शरीरावयवविशेष मात्र होइत अछि मुदा प्रश्न ई उठैत अछि जे हृदयेश्वरी पदक सन्दर्भ में की ई आशय स्वीकार कयल जा सकैत अछि? कदाचित नहिं । कियाक तऽ कोनो प्राणी दोसर प्राणीक शरीरावयव विशेषक ’ईश्वरी’ अर्थात नियामिका, संचालिका, प्रेरिका अथवा निर्देशिका कोना भय सकैत छैक? एतय प्रश्न स्वाभाविक रहत जे शिरोभागस्थ हृदय सेहो तऽ शरीरावयव विशेषे अछि..? एकर उत्तर ई देल जा सकैत अछि जे दुनू क स्वभाव एवं कार्यप्रणाली पृथकशः छैक। शिरोभागस्थ मूलतः स्नायु सँ सम्बद्ध छैक; जेकर चर्चा आगू कयल जा रहल अछि। अस्तु, चिरकाल चिन्तन एहि लेख केर रूप लेलक आओर एहि बिन्दु पर पहुंचल जे ’हृदयेश्वरी’ पद में हृदय केर आशय जनसामान्य द्वारा स्वीकृत आशय सँऽ भिन्न होइत छैक । एहि प्रश्नक केर उत्तर भेट गेला पर कि हृदय शब्द सँ उरोभागस्थ एक अंगविशेषमात्र केर बोध नहि होइत अछि; हमर दृष्टि अमरकोष आओर मेदिनीकोष दिस गेल अमरकोषानुसार ’चित्त’ हृदय केर पर्याय रूप मे स्वीकरणीय अछि[1]। ओतहि मेदिनीकार सेहो एहि तथ्य के स्वीकार करैत छथि[2]। एहि तरहें दुनू कोषकार मस्तिष्क रूप अर्थ स्वीकार करैत छथि। वैदिकग्रन्थ सेहो एहि तथ्य के समर्थन दैत अछि। शिवसंकल्प सूक्त में मन के हृदयस्थ कहल गेल अछि[3]। योगसूत्र सेहो हृदय केर आशय चित्त सँ लैत अछि[4]। मस्तिष्क सेहो हृदयवत कार्य करैत अछि; अस्तु ओकर अभिधान हृदय देल जा सकैत अछि। शतपथब्राह्मण[5] आओर बृहदारण्यक[6] उपनिषद त्र्यक्षर (हृ, द, य एहि तीन अक्षर) केर एकैकशः व्याख्या करैत अछि। मुण्डकोपनिषद[7] एकरा और स्पष्ट करैत कहैत अछि। caraचरकसंहिता सेहो हृदय केर वर्णन मस्तिष्क केर आशय सँ करैत अछि।[8] महाभारतक वनपर्व तऽ एकरा पूर्णतः स्पष्ट कय दैतब अछि जतय युधिष्ठिरसँ कहल जाइत छन्हि जे ’जीवात्मा’ हृदय में रहैत उत्तम अधम बुद्धि के विभिन्न द्रव्य सँ जोरैत अछि[9]। एवं प्रकारें देखैत छी जे हृदय पद सँ ’उरस्थ हृदय’ शिरस्थ हृदय’ आओर नाभी[10] आशय लेल जाइत अछि। एतय आवश्यक अछि जे उरोभागस्थ हृदय एवं शिरस्थ हृदय में अन्तर स्पष्ट कयल जाए। उरोभागस्थ हृदयक कार्य अछि- · प्रत्येक अंग सँ अशुद्ध रक्त केर आहरण · धमनी द्वारा शुद्धरक्तक प्रदान करब · मस्तिष्क के सदा क्रियाशील राखब शिरस्थ हृदयक कार्य अछि- · संवेदक ज्ञानतन्तु द्वारा ज्ञानक आहरण · कार्यतन्तु द्वारा कर्मेन्द्रिय के कार्यप्रदान करब · सतत गतिशीलता कायम राखब अर्थात नियन्त्रण राखब [1] चित्तं तु चेतो हृदयं स्वान्तं हृन्मानसं मनः। अमरकोष [2] हृदयं मानसे वुक्करसोरपि नपुंसकं...। मेदिनीकोष [3] हृत्प्रतिष्ठं यदजिरंजविष्ठं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु। यजु० ३४.६ [4] हृदये चित्संवित...। योग० ३.३४ [5] शतपथब्राह्मण १४.८.४.१ [6] बृहदा० १४.८.४.१ [7] भिद्यते हृदयग्रन्थिः ...। मुण्डकोपनिषद, २.८ [8] आत्मनः श्रेष्ठमायतनं हृदय...। चरक० निदान० ८.३ [9] स आत्मा पुरुषव्याघ्र भ्रुवोरन्तरमाश्रितः। बुद्धिं द्रव्येषु सृजति विविधेषु परावराम॥ महा० वन० १८१.२२ [10][10] उपयुक्तस्याहारस्य सम्यक...। सुश्रुत० सूत्रस्थान १४ जहिना उरस्थ हृदय के दू भाग होइत अछि- · लघुमस्तिष्क · महामस्तिष्क। लघुमस्तिष्क शरीर सन्तुलन-गतिनियन्त्रण आदि कार्य करैत अछि ओतहि महामस्तिष्क मन, बुद्धि, चित्त आदि रूप में प्रथित होइत अछि। चरकसंहिता उक्त तथ्यक पुष्टि करैत अछि[1]। अस्तु हृदयेश्वरी पद में विद्यमान ’हृदय’ स्वीकार करब उचित कियाक तऽ शिरस्थ स्वीकार करब उचित कियाक तऽ शिरस्थ हृदय आत्मा के आश्रयस्थान, चेतना क केन्द्र, पंचेन्द्रिय के आधार, बुद्धि के संग्रहस्थान, स्मृति केर संचालय, चित्तक आधार, जीवात्माक आश्रयभूमि, स्नायु केर केन्द्र होइत अछि। चिन्तन प्रेरणा आदि शिरस्थ हृदये सँऽ संभव छैक[2]। एहि बातक प्रमाण सुश्रुत सेहो दैत अछि[3]। एहि शिरस्थ हृदय के स्वाशयानुकूल प्रेरित करबाक सामर्थ्य हृदय केर ईश्वरी अर्थात कान्तामात्र कय सकैत अछि। कदाचित एहि आशय के ध्यान में रखैत कहल गेल अछि काव्यप्रकाश[4] में जे काव्य अर्थात साहित्य केर बात कान्ता द्वारा कहल गेल वचनतुल्य होइत अछि जेकरा कखनहुँ उपेक्षित नहि कयल जा सकैत अछि। कियाक तऽ कान्ता में शिरस्थ हृदय के स्वामिगतगुण विद्यमान रहैत अछि जे प्रकृतिप्रदत्त अछि। एतय समीक्षात्मक रूप सँऽ एतेकमात्र कहल जा सकैत अछि जे यदि ओ हृदयेश्वरी प्रकृति प्रदत्त स्वामिगतगुण क प्रयोग स्वाशयानुकूल करबाक अपेक्षा श्रेय-प्रेय एवं योग-क्षेम कें ध्यान में यदि रखैत करैत छथि तऽ ओ हृदय धन्य होयत। अस्तु प्रकारान्तरें हृदयेश्वरी पद आत्मसमर्पणतुल्य अछि जे पूर्णतः शिरस्थ हृदय सँ सम्बद्ध अछि नकि उरोभागस्थ हृदय सँऽ। [1] षडंगमंगं विज्ञानमिन्द्रियाण्यार्थपंचकम। आत्मा च सगुणश्चेतः चिन्त्यं च हृदिस्थितम॥ सूत्रस्थान ३०.४५ [2] चिन्तादि जुष्टं हृदयं प्रदूष्य....। चरक० चिकित्सास्थान उन्मादाध्याय [3] हृदयं चेतना स्थानं...। सुश्रुत० शरीरस्थान ४.३४ [4] काव्यं यशसे अर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये। सद्यः परिनिवर्तये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे। काव्यप्रकाश, प्रथमोल्लास की नब साल की पुरान साल..! {हम सभ अभिनव वर्षक स्वागत हेतु तैयार छी मुदा राष्ट्र मे व्याप्त समस्या यथावत अछि। जाहि सँऽ सामान्य नागरिक सदिखन त्रस्त अछि। एकरे उजागर करवाक आ संभव समाधान प्रस्तुत करब एहि लेख केर लक्ष्य अछि ताकि नव वर्षक स्वागत नूतनसंकल्प केर संग कय सकी। लेखक बिपिन कुमार झा IIT Mumbai मे शोधछात्र छथि। लेख मे अभिव्यक्त कोनो श्ब्दक कोइ वैयक्तिक अभिप्राय नहिं ली।} कहल गेल अछि साहित्य समाज केर उत्थान मे सदिखन योगदान करैत अछि। प्राचीन काल सँऽ काव्य आदि केर माध्यम सँऽ सुनैत आयल छी ओतहि दृश्य काव्य अर्थात एकांकी नाटक आदि केर महत्त्व सर्वथा महनीय अछि। समसामयिक सन्दर्भ मे ओ महनीय कार्य कतिपय सिनेमा केर माध्यम सँ कयल जाइत अछि। हँऽ एहि मे कोनो सन्देह नहिं जे बहुतो फिल्म आ धारावाहिक समाज कें गर्त मे लय जेबाक हेतु पर्याप्त अछि। एहि बीच एकटा फिल्म देखल जाहि मे भारतवर्ष मे व्याप्त Black money saving आ घूसखोरी केर चर्चा आ निदानक उपाय प्रदर्शित कयल गेल अछि।एहि सदृश फिल्म निश्चय भ्रष्टाचार निवारण करबा मे योग देत। एहि तरहक बहुतो विषमता अछि जाहि सँऽ हम सभ अभिमुख होइत छी किन्तु ओकर प्रतिरोध करबाक सामर्थ्य नहिं। एहेन दशा मे विकीलीक्स सदृश अन्तर्जाल आ सूचनाऽधिकार सदृश व्यवस्था केर महती आवश्यकता अछि। सामान्यतया बहुत बात एहेन अछि जे जनता अथवा अधिकारीवर्ग भय अथवा लोभवश जनता अथवा उपयुक्त अधिकारी केर सम्मुख नहिं आनय चाहैत छथि जे उक्त अन्तर्जाल सदृश माध्यम सँऽ जनसामान्य तक पहुँचा सकैत छथि। यद्यपि सरकार सूचनाऽधिकार केर माध्यम सँऽ पारदर्शिता के आदर कयलक मुदा अखनहुं कतेक अधिकारीगण साया मे नुकेबा क काज करैत अछि जे सर्वथा हास्यास्पद। एतय ई कहब उचित नहिं जे सब अधिकारी भ्रष्टे नै होइत छथि अपितु किछु कें भ्रष्ट बनेबाक तथाकथित ट्रेनिंग देल जाइत अछि तऽ किछु कें जनताजनार्दन भ्रष्ट बनबैत छथिन्ह। बहुत कम एहेन छथि जे जन्मना भ्रष्ट हो। भारत तृतीय आर्थिक महाशक्ति बनबाक हेतु तैयार अछि मुदा भारतवर्षक ई हाल अछि जे चोरी, भीखारी, डकैती, घूसखोरी कदाचिते कतहु नहिं भेटत। सरकार नेता आ जनताजनार्दन सभ एके सीढी पर छैथ। कोई अवसर नहिं चूंकय चाहैत छथि। आब यदि सांस्कृतिक दृष्ट्या नब पीढी तऽ देखैत छी जे ओ अन्ध भय दौडि रहल अछि। नब खूनक आगू दोसर कें के देखैत अछि? समाज, संस्कृति, माय बाप....ई सभ तऽ अट्ठारहम शताब्दी केर गप्प भय गेल। पैसा आ अपन इच्छापूर्ति केर अतिरिक्त किछु नहिं बुझैत छथि ई। नब पीढी महिला सशक्तीकरण, जातिवाद विरोध एवं एहेन बहुतो सन्दर्भ मे वकालत करैत भेट जेता मुदा व्यवहार मे ई वकालत अपन स्वार्थ केर अनुरूप परिवर्तित होइत छथि। ई हाल युवावर्गे टा कऽ नहि बुजुर्गो एकरे शिक्षा दैत छथिन्ह। वास्तविक तऽ ई अछि बुजुर्ग राष्ट्र के जे युवावर्ग भेटस्वरूप दैत छथि ओहि एहेन संस्कार रूपी खाद दैत छथि जे भ्रष्टाचार के क्रमिक विकसित करैत अछि आ ई युवा पुनः नव पीढी के अहू सँ भ्रष्टतम राष्ट्र बनेबा मे योगदान दैत छथि। यद्यपि ओ एकरा विकास के पथ रूपी तके दय लोक के चुप करथु मुदा वास्तविकता की अछि से अहूं बुझैत छी हमहू बुझैत छी । एहेन स्थिति मे की नब साल आ की पुरान साल? नव वर्ष तऽ ओहि दिन शुरू होयत जाहि दिन समाज मे व्याप्त पुरान पाप विविध कानूनक व्यावहारिकता सँ धूमिल होयत आ बुजुर्ग सभ नब पीढी के ओहेन संस्कार देथीन्ह जाहि सँ विविधता मे एकता सँ अलंकृत राष्ट्र के प्रति हम सभ गौरव कय सकब। समसामयिक सन्दर्भ मे गाँधीविचारक महत्ता “काल्हि मृत्यु कें प्राप्त होयब एहि चिन्तनक संग जीबाक चाही आ हम अमर छी एहि अवधारणाक संग ज्ञानार्जन करबाक चाही” {M.K.Gandhi} ’गाँधी’ ओहि देदीप्यमान नक्षत्रक नाम अछि जेकर आभा सँऽ भारतवर्ष सतत आलोकित होइत रहल अछि। भारतीय स्वाततन्त्र्य संघर्ष मे हुनक योगदान सर्वविदित अछि। सत्य आ सहिष्णुताक अनुपालनक जे अप्रतिम उदाहरण ओ प्रस्तुत कयलथि कदाचित हुनक आलोचको ओहि समक्ष नतमस्तक रहल। ओ नहिं तऽ राजनीतिक आ नहिं तऽ कोनो अन्य सिद्धान्त प्रस्तुत कयलथि प्रत्युत हुनकर व्यवहार सिद्धान्तक रूप लेलक। जहाँ धरि गाँधीक सिद्धान्तक गप्प अछि; महात्मा गाँधी कोनो नवीन सिद्धान्तक प्रतिपादन नहि कयलथि सनातनधर्म सँ स्वीकृत सिद्धान्त केर अपन जीवन मे प्रयोग कय शिक्षा देलथि जे ई मात्र सैद्धान्तिक नहिं अपितु एकर व्यावहारिक महत्त्व सेहो छैक। स्वतन्त्रता सँऽ पूर्व गाँधीजीक ई व्यावहारिक प्रयोग जतय स्वराज्यप्राप्ति हेतु प्रयत्न के गति देलक ओतहि स्वाधीन भारत मे नीतिनिर्धारण मे आधारभूमि केर कार्य केलक। ध्यातव्य अछि जे परिकल्पना परिपुष्ट भय सिद्धान्तक रूप लैत अछि आ सिद्धान्त परिपुष्ट भय नियम बनैत अछि। गाँधीजीक स्वाराज्य ग्राम परिकल्पना कालान्तर मे सिद्धान्तक रूप लेलक जाहि हेतु हुनक समस्त गतिविधि दृष्टिगत भेल। गाँधीजीक प्रमुख सिद्धन्त कें अनुशासन, सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, सादगी आ विश्वास केर गिनती कयल जा सकैत अछि। आब प्रश्न ई उठैत अछि जे ई सिद्धान्त प्रायोगिक रूप मे कतेक अनुगम्य अछि? कोनो सिद्धान्त “करबाक चाही” एकर निर्देश दैत अछि न कि “करैत छी”। प्रत्येक सिद्धान्त एहि धरातल पर सर्वथा प्रायोगिक रूप सऽ अनुगम्य अछि। अनुशासन एहेन आदर्श अछि जे व्यक्तिमात्र के पशु सँऽ पृथक करैत अछि। अनुशासनक महत्त्व सेना क सन्दर्भ मे नजदीक सँऽ देखल जा सकैत अछि। सत्य केर अनुपालन सर्वथा असत्य बजनिहार सेहो करय चाहैत अछि। अहिंसा सऽ आशय मात्र हत्या सँऽ नहिं लय कायिक वाचिक सेहो लेल जाय त एकर उपादेयता सहजतया बुझल जा सकत। ब्रह्मचर्य व्यक्ति उच्छ्रिंखल नहिं बनय दैत अछि। सादगी बाह्याडम्बर के रोकबा मे महत्त्वपूर्ण भूमिका रखैत अछि। आब सहज प्रश्न उठत जे यदि ई एतेक महत्वपूर्ण अछि तऽ लोक एकर अनुपालन कियाक नै करैत अछि? उत्तर सहज अछि आन्तरिक शत्रु के आधीनता स्वीकरबाक कारणे। पुनश्च एकटा प्रश्न उठैत अछि जे गान्धीजीक विचारक झलक आई कतहु देखबा मे अबैत अछि आ कि बस सैद्धान्तिके अछि? निश्च्य व्यवहार मे देखाई दैत अछि। स्वतन्त्रता सँऽ पूर्व स्वराज्य हेतु पृष्ठबूमिक रूप मे, स्वातन्त्रोत्तर भारतक संविधान क प्रस्तावना, अनुच्छेद 19b, नीतिनिर्देशक तत्त्व, पंचायती राज किछु अप्रतिम उदाहरण अछि। एतबा नहि नेल्सन मंडेला, भारतीय विदेश नीति एहि विचारधारा सँ अप्रभावित नहिं अछि। अस्तु समस्त पाठकवृन्द सँऽ आग्रह जे गाँधी जयन्ती के मात्र एकटा अवकाशदिवस नहि मानि एहि विचारधारा के यथासम्भव अनुसरण कय भारत के सत्यं शिवं सुन्दरं मार्ग मे अवाध गति दी। मिथिलांचल आ बिहार चुनाव एक बेर पुनः अपन मिथिलांचल चुनावी रंगक चादर ओढि एहि महोत्सव मँ जुटल अछि। प्रत्येक बेरक भांति अहू बेर जनसभा, भाषणवाजी, आरोप-प्रत्यारोप केर संग स्वप्नक सौदागर जनता जनार्दन के सेवा मे तत्त्पर भय स्वप्न देखि रहल छथि। मिथिलाक गौरवमयी भूमि ज्ञान-विज्ञानक तपस्थली छी। संगहि गुणवान, विद्वान आओर महात्मा क जन्मस्थली छी मुदा आइ अपन मिथिलांचल अफ्रीका क कालाहाण्डी श्रेणि सम दरिद्रस्थली सेहो बनि गेल अछि जतय दरिद्रता अशिक्षा आ पिछडापन कारुणिक रूप सँ विद्यमान अछि। एहि स्थितिक उत्तरदायी शासकप्रशासकवर्गक संग समाजक बुद्धजीवीवर्ग सेहो छथि। एहि मे कोनो सन्देह नहिं। कतिपय भ्रष्ट राजनितिज्ञ प्रशासक आ भ्रष्ट बुद्धिजीवी वर्ग मिथिलांचल के ओहि स्थिति मे आनिलेलक जतय स्वर्ग स सुन्दर मिथिलाधाम नरक स बदतर मिथिला गाम मे बदलि गेल। चुनाव मे एहि बेर विकासक मुद्दा जोर पकडि लेलक ई सुनि अत्यन्त प्रसन्न्ता केर अनुभूति भेल मुदा चुनवक दिन सवर्ण, पिछडा, दलित गुट्वन्दी आ वोट्बैंकवाजी देखि सवटा वास्तविकता सामने आबि गेल। अस्तु अत्यन्त निराशा केर वातावरण देखि पडल। बुद्धि जीवी वर्गक हृदय एहि कारुणिक स्थिति मे विलाप कय रहल अछि- बाबा आबहु जागू हो मिथिला में अन्याय मचैया बाबा आबहु जागू हो ई प्रार्थना मात्र ईश्वर स नहि अपितु समस्त प्रबुद्ध वर्ग सँ अछि। आब अति भय गेल जागू अपन मिथिला क उत्कर्ष हेतु आब जागू। अपन मिथिलाक उत्कर्ष हेतु कोन शासक आवश्यक अछि ई कोना प्राप्त होयत। एहि प्रश्नक उत्तर सम्पूर्ण बुद्धिजीवी वर्ग लग अछि। एहि पर चर्चा निरर्थक। आब एहि बातक चिन्तन हो कि मातृभूमिक प्रतिष्ठा क रक्षण कोन तरहें हो। आशा अछि जे मिथिला में विद्यमान आ संगहि मिथिला स दूर विद्यमान समस्त बुद्धिजीवी वर्ग अपन अपन भूमिकाक निर्वहन करताह किं वा हुनका कर्तव्यक आत्मबोध हेतन्हि आ एकबेर पुनः अपन मिथिलांचल न केवल सभक निर्णय के प्रतिष्ठान होयत अपितु एहि विश्वक समक्ष एक आदर्श स्वरूप प्रस्तुत कय सकत। (लेखकक मन्तव्य मात्र मिथिला में विद्यमान चुनावगत समस्याक समाधान आ मिथिलाक उन्नति हेतु प्रशासक आ बुद्धजीवी वर्ग के जगायब छन्हि, कोनो शब्दक वैयक्तिक अर्थ नहिं लेल जाय। ) विरासत केर संरक्षण केकर उत्तरदायित्व? अहन्यहनि भूतानि गच्छन्तीह यमालयम्। अपरे स्थातुमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम्॥ यक्ष-युधिष्ठिर सम्वाद मे कहल गेल अछि जे- प्रतिदिन जीव मृत्यु कॆं प्राप्त करैत अछि मुदा ओतहि अन्य लोक ई बुझितो एतहि रहबाक इच्छा करैत अछि। एहि सँऽ आश्चर्य की भय सकैत छैक? एहि भौतिक जगत मे कोनो वस्तु संस्था अथवा कोनो समाज शाश्वत नहिं कहल जा सकैत अछि। ओ डायनासोर हो अथवा हडप्पा, मेसोपोटामिया अथवा कोनो लुप्तप्राय सम्प्रदाय सभ एक न एक दिन कालक गाल मे विलीन भय जायत ई ध्रुव सत्य अछि। हमर संकेत मिथिलाक सिरमौर अपन श्रोत्रिय समाज दिस अछि। प्रश्न अछि श्रोत्रिय समाज के सदस्य होयवा मे गर्व कियाक अनुभूत होइत अछि? की ई समाज कोनो अन्य समाज सँ भिन्न नहिं? यदि भिन्न तऽ कोन आधार पर? रहन सहन-खानपान आकि बात व्यवहारक कारण एकरा पृथक देखल गेल अथवा कोनो अन्तर्निहित गुण अन्य समुदाय सँऽ एकरा पृथक कयल? एहि ठाम पृथकतावादी नीतिक अनुसरण नहिं कयल जा रहल अछि अपितु अपन श्रोत्रिय समाज के अभ्युत्थान दिस एकटा सामान्य दृष्टिपात कयल जारहल अछि जे एकरा अभिलिखित करबा मे मदद करत अन्यथा ई समाज काल केर गाल मे समा गेलाक बाद इतिहासो सँ कोशो दूर भय जायत। एहि समाजक आरम्भ के कयलथि? ई समाज कियाक अस्तित्व मे आयल? एकर संस्कृति की अछि? एकर विधि व्यवहार आदि शास्त्रसम्मत अछि अथवा मात्र परम्परा केर निर्वहण अभिप्राय रहि गेल? यदि शास्त्रसम्मत अछि तऽ कोन ग्रन्थ मे एकर चर्चा अछि? ओहि ग्रन्थ केर प्रामाणिकता निर्विवाद अछि अथवा नहिं? जाति, कुल, पाँजि, मूल, गोत्र की थीक? एकर की औचित्य छल? यदि औचित्य छल तऽ आब एकर अनौचित्य कोना निर्धारित भेल जा रहल अछि? श्रोत्रिय समाज सँ सन्दर्भित उक्त चर्चित किछु एहेन मूलभूत प्रश्न अछि जे आवश्यक अछि एहि समाजक Documentation हेतु। ई कार्य एतेक सहज नहिं। हम किछु ग्रन्थ देखल मुदा ओ एहि मे स किछु प्रश्नक चर्चा तऽ अवश्य करैत छथि मुदा मूल सन्दर्भ देबा मे असमर्थ छथि। ’सारस्वत-निकेतनम्’ जे कि संस्कृत आ अपन संस्कृतिक अभ्युत्थान हेतु सतत् समर्पित अछि, अपन श्रोत्रिय समाज सन्दर्भित मूल स्रोतक आ एकर अक्षुण्ण संस्कृति केर विविध पक्षक Documentation करय जा रहल अछि। एहि कार्य मे अपनें सभ सँऽ विशेषकर एहि समाजक इतिहासक ज्ञाता बुजुर्ग आ सक्रिय युवा कें सहयोगक सर्वथा अपेक्षा अछि। यदि उक्त सन्दर्भ मे कोनो जानकारी उपलब्ध करा (kumarvipin.jha@gmail.com) सकी तऽ एहि विशाल यज्ञ मे एकटा आहूति सदृश होयत। एहि सन्दर्भ मे सूचित करब उचित होयत जे एहि दिशा मे एकटा साइट बनि कें तैयार अछि जेकर URL केर औपचारिक घोषणा यथाशीघ्र कयल जायत। शुभमस्तु विषवेलक सिञ्चन कखनहुँ- कखनहुँ ई निराशाजनक अनुभूति होइत अछि जे भारत 28 राज्य के नहिं अपितु 6000 जातिक संघमात्र अछि। अपन सभक पहचान भारतीयता नहिं बल्कि जाति विशेषमात्र अछि। भारत में दुर्भाग्यक शाश्वत-कालरात्रि के आननिहार ई जातिप्रथा आई अपन वैधानिक स्वरूप सँऽ उपद्रवी भूमिका निभेबाक उद्योग कय रहल अछि। जाति जनगणना ओ विष-बेल अछि जकर जहर आगामी पीढी कें रग-रग में प्रवाहित भय राष्ट्रजीवन कें विषाक्त करत। आखिर स्वाधीनता केर 64 वर्ष बाद, जखनि एकमात्र पहचान राष्ट्रीयता हेबाक चाही , जखनि राष्ट्रजीवन सँ जाति धर्म-लिंग-क्षेत्रजनित पहचान गौण भय जेबाक चाही, जखनि ई घृणित जातिगत विरासत समाप्त भय जेबाक चाही तखनि हम सब ई विनाशकारी संस्था (जातिगत पहचान) सँ नबका आशाक किरण ताकि रहल छी। इतिहास केर ई मोड पर सरकार द्वारा जाति जनगणना क लेल गेल ई निर्णय वर्तमान नेतृत्व कें कहियो भविष्य में जबाब देबाक हेतु बाध्य करतन्हि जे ई रक्तबीज केर पोषण कियाक कयल गेल छल। अतीत में जातिप्रथा कें कोनो उपयोग भेल हो अथवा वर्तमान में ई एकटा वास्तविकता छी तथापि ई तर्क जातिप्रथा कें सम्पोषण कें न्यायसंगत नहिं ठहरा सकैत छियैक। यदि एक शब्द में कहल जाय त ई भारतवर्ष कें विद्यमान अनेंक दुष्प्रवृत्ति केर जनक छी। वोट बैंक केर भूखल नेतागण द्वारा जातिगणना कऽ अनेंकानेक लाभदायक पहलू व्यक्त कयल जा रहल छैक। सामाजिक न्याय केर पूर्तिक हेतु एकरा एकटा प्रमुख माध्य सिद्ध कयल जा रहल छै। वास्तविकता त ई अछि जे ई सब व्यक्ति समाज में जाति जनित संघर्ष उत्पन्न कय जनभावना कें उभारि पोलीटीकल इंश्योरेंश प्राप्त करय चाहि रहल छथि। एहि कारण देश में नितनूतन आरकक्षण केर मांग, अव्यवस्थाजनक आन्दोलन एवं सामाजिक कटुता जे उत्पन्न होयत ओकर नियन्त्रण अपन शासनतन्त्र सँऽ कदाचत् संभव नहि होयत ई स्वार्थी नेतागण द्वारा अपन मानस पिता अंग्रेजक विभाजनकारी ढर्रा अपनेनाई देश कें बड्ड महग पडत। ई समयक मांग आ युग के आह्वान अछि जे जाति धर्म-लिंग-क्षेत्रविषयक पहचान स ऊपर एकात्मकता क आत्मसात कय जाय। आश्चर्य होइत अछि जे बुद्धजीवी आ युवा समाज केहि तरहक विभाजनकारी क्रिया कलाप पर प्रतिक्रिया शून्य च्थि एहि वर्गक चेतना हीनता केर मूल्य राष्ट्र के भविष्य में अवश्य चुकबय पडत। ई दायित्त्व अपन प्रबुद्ध समाज पर अछि जे ओ ई विनाशक जाति-प्रथा कें पोषित करय बला कोनों प्रयास पर अपन प्रभावी विरोध प्रकट करथि। अन्यथा भविष्यक भीषण दुष्परिणाम के प्रतीक्षा करथि। जय हिन्द जय भारत गुरुशिष्य परम्परा आओर आधुनिकता भारतीय संस्कृतिक आधारभूत तत्त्व मे सँ एकटा अनन्यतम तत्त्व रहल गुरुशिष्य परम्परा प्राचीन काल सँ आधुनिक काल तक परिवर्तनशील विशिष्टताक संग विद्यमान रहल अछि। गुरुशिष्यपरम्परा सँ तात्पर्य ओहि व्यवस्था सँ अछि जेकर अन्तर्गत शिष्य बाल्यकाल सँ ब्रह्मचर्यजीवन केर समाप्ति तक गुरुक सान्निध्य मे रहि विद्यार्जन कयल करैत छल। एहि परंपरा के अन्तर्गत ओ अपन परिवार सँ दीर्घावधि तक अलग रहि कें गुरुकुल मे निःशुल्क रहि भिक्षाटनक द्वारा अपना संग संग गुरुक भोजन क प्रबन्ध करैत छल। ई परंपरा जीवनक आधार के निर्मित करवा मे, आ विद्यार्जन एवं चरित्र निर्माण मे सहायक होइत मानल गेल प्राचीन काल सँ क्रमशः मध्यकाल एवं आधुनिक काल अबैत अबैत गुरुशिष्यपरम्परा जीवित रहितो ह्रासमती प्रवृत्ति सँ युक्त रहल। जतय प्राचीन काल मे ई परम्परा विद्यार्जन आ चरित्रनिर्माण केर एकमात्र निर्माणशाला छल ओतय वर्तमान काल मे कालेजकल्चर एवं कोचिंगकल्चर एकरा औपचारिकता मात्र बना देलक। ई एकर असफलता नहिं अपितु समय केर संग होयबला बदलाव अछि। निष्कर्षतः ई कहब समीचीन होयत जे अन्ध आधुनिकता क भागदौडो मे गुरु शिष्यपरम्परा केर गौरवमयी तत्त्वक समावेश आधुनिक शैक्षणिक संस्थान मेम कयल जाय ताकि त्याग, तपस्या व निःस्वार्थ केर प्रतीक गुरुपदक गरिमा अक्षुण्ण रहय। बालमजदूर पर हमर लेखिनीक दृष्टि एहि अंक मे हमर लेखिनी क दृष्टि ओहि बाबू भैया पर अछि जे संवैधानिक आओर सामाजिक नियम के ताख पर राखि के बच्चा के नोकर राखब विशेष नीक बुझैत छथि । एहि मे ओ दूइटा लाभ देखैत छथि- पहिल कम खर्च मे टहलुआ भेटब आ दोसर एकरा रखनाई सहज होयब। ई गप्प केवल गामे घरक नहिं अपितु नीक नीक शैक्षणिक संस्थान तक के अछि। हम एतय एकटा एहने उदाहरण प्रस्तुत कय रहल छी। एकटा एहेन बच्चा जेकर हार्दिक इच्छा पढवाक छलैक ओ अपन शिक्षा सँ कोशो दूर भारतवर्षक एकटा उच्च शिक्षण संस्था क ढाबा मे काज करय हेतु मजबूर छल। ओकर पढबाक इच्छा देखि हमर एकटा मित्र प्रारंभिक रूप सँ पढेनाई शुरू केलखीन्ह| बात ओ बच्चा मात्र के नहिं अछि एहि तरह असंख्य बच्चा अछि जे अपन बाल्यावस्था लोकक टहल टिकोरा मे बिता दैत अछि। स्वतन्त्रता सँ पूर्व १८८१ केर कारखाना अधिनियम, संगहि १९११, १९२२, १९३४, १९४६ केर संशोधित अधिनियम बालमजदूरी के हतोत्साहित करैत रहल अछि। संगहि स्वातंत्रोत्तर भारत मे सेहो संवैधानिक दृष्टि सँऽ यद्यपि अनेकनेक नियम सं संरक्षण प्राप्त छैक ई बच्चा कें मुदा व्यबहार मे कतेक ई अनुपालित होइत अछि ई सर्वविदित अछि। अस्तु, एहि लेखक माध्यम सँ मात्र एतेक अभिव्यक्ति बुझलजाय जे बालमजदूरी के यथासाध्य निवारित करबाक व्यावहारिक स्तर पर प्रयास हो । बालमजदूरी संवैधानिक दृष्टि मात्र सँ अनुचित नहि मानल जाय अपितु एकर सामाजिक बहिष्कार सेहो अपेक्षित। आशा अछि जे ई अभिव्यक्ति जनमानसक सुतल चेतना के जगेबाक यत्न मे सफल रहत आ एहि भारतवर्षक एक एक टा बच्चा "बालोऽहं जगदानन्द" दिस अर्थात ज्ञानपरम्परा कें श्रीवृद्धि करबाक दिशा मे कदम बढा सकत। किछु पजरैत प्रश्न महात्मा कसाब केँ फाँसी सजा के घोषणा कऽ पश्चात मीडिया में जनसामान्य, बुद्धजीवी, सरकार सभक प्रतिक्रिया सूनि मन में हसी छटल। केयो श्रीमान एकराआतंकवाद पर गम्भीर प्रहार घोषित करै छलखिन्ह त केयो एकरा भारतीय सुरक्षा एजेंसी, भारतीय न्यायपालिका सभक विजय कहलथि मुदा अगर ई घटना केँ निष्पक्ष मूल्यांकन करीए त कतेक प्रश्न मन मे उठैत अछि। ई चिन्तनीय प्रश्न अछि जे राष्ट्रीय-सुरक्षा- अखणडता पर की पर की सामान्य नीति हेबाक चाही ? एहि सम्बन्धित कमजोर राजनैतिक इच्छाशक्ति देखि जनसामान्य में कोनो प्रतिक्रिया कियान होइत अछि? राष्ट्रीय सुरक्षा विषयपर न्यायिक-प्राशासनिक-राजनैतिक शिथिलता-लापरवाहीअ कि अक्षम्य अपराधनहि अछि? आखिर ई अफजल-कसाब आदि स्वनामधन्य महात्मा के फाँसी सजा कहियातक क्रियान्वयित हेतन्हि? ई अनुभव होइत अछि जे राष्ट्रक आत्मा कतौ हेरा गेलई राष्ट्रीय संवेदना कतौ सुसुप्त अवस्था में बैसल छै राष्ट्र कऽ रोइओप में भारत असफल भय गेल ! भय सकैत अछि जे ई तमाम उलझन निर्मूल मात्र साबित होई भविष्य में मुदा चिन्तन त अनिवार्य अछि नै? ई सत्युअ आ यथार्थ छी जे भारत बहुत शक्तिशाली अछि आ ई मोट झंझावातक सामना आसानी से कय सकैत अछि मुदा मात्र ई चीज रटि कें वर्तमान समस्या आ लापरवाही सँमूह नहि मोडि सकैत अछि। अपन देशक राजनैतिक स्वरूप अनेक विकृति सँ आप्लावित अछि एतदर्थ एकाएक सुधार सम्भव नहिं मुदा बुद्धिजीवी जनसामान्य अपन लोकतान्तिक समाज में एते सशक्त अछि जे ई कोनो परिवर्तन बड आसानी सँ आनि सकैत अछि। समस्या अनन्त अछि राष्ट्रक समक्ष ! आब सभ व्यक्ति सबटा समस्या स परिचित छथि एतदर्थ आवश्युकता एहि कार्यक अछि जे एकटा सामान्य राष्ट्रीय जनचेतना जागृत होमय आ ई भ समस्या के समाधान हेतु अपन योगदान दथि। ई बात स्मरणीय अछि जी बुद्धिजीवी समाज राष्ट्रक आधार स्तम्भ अछि अतः ओ नेतृत्व प्रशासन तन्त्र पर ओई तरहक हरसम्भव दबाब वनावथि जे राष्टीय सुरक्षा, विकास, प्रगति स सम्बन्धित सभटा लक्ष्य पूर्ण करि सकथि ई विश्वास दृढ अछि जे भारत राष्ट्र अपन ऐतिहासिक यात्रा मे अनेक प्रश्नक उत्तर देलक। वर्तमान सम्मुख अछि आबि राष्ट्र कऽ एकटा व्यष्टि अंग रूप में अपनयोगदान दय अपन दायित्वक निर्वहण करी॥ भारत-नेपाल आओर मिथिलांचल नेपाल और भारतक सम्बन्धक सीधा प्रभाव मिथिलांचल पर पडनाई स्वाभाविक अछि। भारत आ नेपालक वैदेशिक सम्बन्ध सदिखन मधुर रहल अछि। एकर गवाह राजा जनक केर कालक इतिहास आ सुगौली सन्धि अछि। नवंबर १९५५ मऽ नेपाल महाराजक भारत यात्रा आ अक्टूबर १९५६ मे भारतक राष्ट्रपतिक नेपाल यात्रा सम्बन्ध कें औरो मधुर बनेलक। चीनी आक्रमण के बाद लालबहादुर शास्त्रीक नेपाल यात्रा, अक्टूबर १९६६ में इन्दिरा गान्धीक नेपाल यात्रा १९७५ में नेपालक महाराज वीरेन्द्रक भारत यात्रा सम्बन्ध कें मधुर बनेबाक अन्य आयाम रहल अछि। एहि लेख में हम किछु महत्वपूर्ण बिन्दु पर चर्चा करबाक हेतु प्रस्तुत छी जे स्पष्ट करत जे भारत आ नेपाल केर मध्य जे वैदेशिक सम्बन्ध अछि ओहि सं मिथिलांचल के साक्षात लाभ की अछि। ओ एहि बिन्दु पर चर्चित अछि- · अतीतकालीन विवादित मुद्दा- अतीतकालीन प्रमुख विवादित मुद्दा अछि- कालापानी क्षेत्र (महत्वपूर्ण गाम- कुटी, गुंजी आओर नांबे) ई क्षेत्र नेपाल भारत आ चीनक त्रिकोण पर स्थित अछि। नेपाल कहैत अछि जे भारत १९६२ में ई अधिगृहीत कय लेलक। दोसर विवादित मुद्दा अछि- १८१६ कें सुगौली सन्धि। १९९७ में ई विवाद बढि गेल छल। · वर्तमान समस्या- वर्तमान समस्या में प्रमुखतः अछि- § माओवादी द्वारा भारत भूमिक उपयोग § पकिस्तानी खुफिया एजेंसी द्वारा नेपाल भूमिक उपयोग § नेपाल आ चीनक मधुर सम्बन्ध, जे भारतक विदेश नीतिक उल्लंघनो कय जाइत अछि। § असम आ बंगाल में नेपाली क जनसंख्या आधिक्य समस्या § नेपाल में भारतीय नागरिकक संग भेदपूर्ण व्यवहार। · वर्तमान व्यापारिक स्थिति- भारत आ नेपालक मध्य व्यापारिक स्थिति सन्तोषप्रद अछि। वर्ष १९९६ सँ २००९ धरि नेपाल द्वारा भारत कऽ कयल गेल निर्यात ३.७ अरब रुपया सँ बढि के ४०.९ अरब भय गेल ओतहि भारत द्वारा नेपाल कऽ कयल गेल निर्यात २.४ अरब सँ १६३.९ अरब भय गेल। · नेपाल के देल जारहल सहयोग- भारत नेपाल कें सतत सहयोग करैत रहल अछि। वर्तमान परिदृश्य कें गणना अधोलिखित रूप में कय सकैत छी- § नेपालक राष्ट्रीय पुलिस अकादमी भवन निर्माणार्थ भारत ३२० करोड कें मदद करबाक हेतु तयार अछि। § भारत २२ करोड लागत सं पोलीटेक्निक कालेज निर्माण हेतु मदद करत। § बीरगंज-रक्सौल, बिराटनगर-जोगबनी में २०० करोडक आर्थिक मदद ICP हेतु देत। § घेघा नियन्त्रण कार्यक्रम में सहायता दय रहल अछि। § मनमोहन-माधवकुमार केर वर्ताक दौरान ५६०० मेगावाट बला पंचेश्वर पनबिजली परियोजना में गति आनब आ नेपाल में बागमती क सफाई सम्बध में चर्चा भेल अछि। · सम्बन्धक भविष्य- उक्त चर्चाक अनन्तर कहल जा सकैत अछि जे नेपाल भारत सम्बन्ध मधुर रहल अछि आ भविष्यों में मधुर रहत कितु एहि बात सँ मूँह नहि फेरल जा सकैत अछि जे जतेक बात चीत हो ओहि काल में भारतीय विदेश नीतिक उपेक्षा नहि हो। भारत नेपाल क मधुर सम्बन्ध मिथिलांचलक उत्कर्षक स्रोत रहत एहि में कतहु सन्देह नहिं। मजदूर सँ दूर मजदूर दिवस मजदूर दिवस पर किछु लिखै लय सोचलहुँ त विभिन्न लेबर चौराहा पर भौरे-भोर एकत्रित भेल मजदूर सभक छबि सामने आबि जाइत अछि। दीन हीन दशा कमजोर स्वास्थ्य, चेहरा पर काज भेटैकऽ आशा धारण करने, अवैवला व्याqक्त (मालिक) के तरफ दौगैइक सिलसिला आ कते दिन १२-१ बजे तक काज नै भेटला पर आशा समाप्त भेला पर निस्तेज चेहरा लेने घर वापस जाइक प्रक्रम इ सभटा उपनिषद्वाक्य `श्रमेव जयते' कऽ असली आयना देखवै छैक। इ सभटा मजदूर मुल्कराज आनन्द कऽ उपन्यास `कुली' के कुली कऽ भूमिका में एकदम फिट वैसैत छै। आखिर इ प्रश्न बार-बार दिमाग में कौध जाइत अछि जे आइ कऽ श्रम प्रधान विश्व में, श्रमकऽ पूजा करैवला भारत वर्ष में मजदूर वर्ग कऽ विशेषकर असंगठित क्षेत्रकऽ मजदूरकऽ इ कारुणिक दुर्दशा किया छैक। ओकर की अपराध? गरीब भेनै, शोषित भेनै, मजबूर भेनै अथवा विधाता कऽ जगत् प्रपंच कऽ हिस्सा भेनै? र्आिथक असुरक्षा - सामाजिक असुरक्षा - उद्योगपति मालिक वर्ग के शोषण - तथाकथित उच्च वर्ग के अपमानपूर्ण दृष्टिकोण - सरकारी उपेक्षा - भयंकर निम्न जीवन स्तर के अपन नियति माननिहार श्रमिक वर्ग कऽ इ दशा कोनो प्रगतिशील उद्यमशील समाज पर कलंक थीक। यद्यपि श्रमिक वर्ग कऽ कल्याण - न्याय के हेतु कते तरह कऽ नाटक साम्यवाद माक्र्सवाद समाजवाद, Nउध्, ट्रेडयूनियनवाद के रूप में कियान भेलै इ सभ श्रमिक वर्ग कऽ दशा कऽ इंटलेक्चुअल मार्वेâिंटग कय अपन दुकान चले लथि आ परिणाम कऽ के रूप में वार्तानाम केवलम्। ग्रामीण क्षेत्र में चलैत नरेगा कऽ नाम पर सरकार भले कते किया। अपन पीठ ठोकटि वास्तविकता त इ थीक जे इ सभटा कार्यक्रम अपन उद्देश्य सँ कोसो दूर अछि। वास्तव में इ समाज सरकार के प्राथमिक कर्तव्य हेवाक चाही कि ओ समाज क इ मजबूत हाथ के मजबूती प्रदान करैथि अन्यथा राष्ट्र अपन आत्मा कऽ हनन कय किन्हऊ आगा नहि बढ़ि सवैâत अछि। आशा अछि जे इ मजदूर दिवस किछु विशेष रहत जे श्रमिक वर्ग के जीवन में किछु प्रकाश अवश्य आनत ताकि हम सब श्रमेव जयते कऽ सार्थक कय सकी। शहीद कऽ चिताकऽ धूँआ क अभिलाषा तथाकथित मानवाधिकार कार्यकर्त्ता आ बौद्धिक व्यक्ति नक्सलवाद कऽ विभिन्नरूप मे महिमामण्डित करैत छथिन, हुनक दान्तेवाराकाण्ड कऽ वाद आश्चर्यजनक चुप्पी सँ देश स्तब्ध अछि। आतंकधारा नक्सलवाद कँ आर्थिक असमानता कऽ एकमात्र समाधान कहनिआर, स्वघोषित शोषित वर्गकऽ हमदर्द बुद्धिजीवी सभ सदैव नक्सलक्षेत्र मे तैनात सुरक्षा जवान सभ के शोषक, अन्यायी, बलात्कारी रूप मे घृणित एवं झूठ प्रचारित करैत छलकिन्ह मुदा नक्सली सभक पाश्विक अन्यायपूर्ण हिंसा सँ हिनका कोनो आपत्ति नहि छलैन जाहि स आदिवासीवर्ग सबसँ अधिक प्रताड़ित आछि। दान्तेवाड़ा मे 76 जवानकऽ आत्मोत्सर्ग इ सभ पतित विचारक सभ लेल कोनो महत्वकऽ घटना नहि छीक मुदा पूरा समाज एहि विषय पर उदासीन रवैया अपनेने अछि जे अत्यन्त दुर्भाग्य कऽ विषय छीक। हर रूप मे अभावग्रस्त आ चुनौतीपूर्ण जीवन जीवैत सुरक्षाबल के जवान राष्ट्रकऽ अखण्डता हेतु सदा तत्पर रहैत अछि मुदा इ राष्ट्र ओकरा, उत्साह, सम्मान देबाक के स्थान पर घृणित आरोप लगवैत अछि। आशा अछि जे शहीद जवान कऽ चिता सँ उठल धूँआ से कलुषित मानसिकता कऽ बुद्धिजीवी सभक मूँह कारी भ जतैह आ इ राष्ट्र अपन वीर सपूत के सम्मान पर दुबारा कोनो तरहक अपमान जनक टिप्पणी वर्दाश्त नहि करत इ दान्तेवाड़ा मे शहीद सभ कऽ हेतु सभ सँ पैघ श्रद्धाँजलि होयत। आ इहै शहीदकऽ चिताक धुँआ क अभिलाषा सेहो छैक। पर्वक ’औचित्यक उपेक्षा’सर्वथा चिन्तनीय। भारतवर्षक प्रमुख वशेषता अछि ’विविधता में एकता’। ई वैशिष्ट्य एहि रा्ष्ट्र कें अन्य सऽ अलग छवि दैत अछि। ई विविधता एकर संस्कृति, स्थान, भाषा आदि कऽ रूप में प्रस्तुत होइत अछि। जहाँ तक संस्कृतिक बात अछि विविध प्राकारक पर्वक समावेश अपना में कय लैत अछि। विविध प्रान्त में आ प्रत्येक माह में विवध प्रकारक पर्व मनाओल जाइत अछि जेकर सूची http://www.festivalsofindia.in/mw.asp एहि साइट सँ प्राप्त कयल जा सकैत अछि। अस्तु कहवाक आशय जे किछु पर्व मात्र क्षेत्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त अछि तऽ किछु राष्ट्रीय स्तर पर, किछु पर एहनो अछि जे विविध प्रान्त में विविध नाम सँ जेना तिला सँकरैत। एतय हम होली कऽ सन्दर्भ दैत (ई राष्ट्रीय पर्व अछि) हम एहि बातक चर्चा करय चाहैत छी जे - कोन कारण छैक जे दिन प्रति दिन लोक पावनि कें एकटा होलीडे रूप में मात्र स्वीकार करब अधिक पसन्द कय रहल अछि अपेक्षाकृत एहि बात कें कि ई पर्व सभ अपन संस्कृति के किछु विशेष तथ्य के अभिव्यक्त करैत अछि। सामान्यतया युवावर्ग होली क दिन खायब पीयब मस्त रहब एहि दिस ध्यान देनाई उचित बुझैत छथि। होली क आशय मांस मदिरा आ अन्य के रासायनिक रंग सँ यथा सम्भव परेशान करब, भय गेल अछि। ई पर्व कियाक मनाओल जाइत अछि एहि दिस कोई सोचबाक इच्छा नहिं करैत छथि। कदाचित ई बुझैत जे ई सभ बीतल जमानाक गप्प ीक। एतय आवश्यकता अछि जे ई जन चेतना जागृत हो कि ई पर्व सभ जे शुभसंदेश दैत अछि ओकर अनुगमन कयल जाय एहि मऽ निहित सन्देश जे सामाजिक एकता आओर राष्ट्र केर अखण्डता क विकास में सहायक हो ओकर विस्तृत ्विवरण जनमानस के जे ओहि स अपरिचित हो, ओकरा तक पहुंचायल जाय ताकि राष्ट्र विकासक पथ पर सर्वथा अग्रसर हो। खड़ानन्द यादव, ग्राम- बेलही (कचनवा), लोकही, जिला- मधुबनी गहूमक बोरा चारि इस्वीक बाढ़िक विभीषिका। कोसी-कमलाक बीचक एगारहो धारक पानि एकबट भऽ संगे-संग समुद्र बना दछिन मुँहे दौड़ैत। लोकसँ लऽ कऽ मालो जालक जान अवग्रहमे पड़ि गेल। जरल पेट एकत्रित भऽ सरकारीक गहूमक गोदाम अपन बुझि लुटि लेलक। अन्नागांहिस मुद्दालहक नामसँ केस भऽ गेल। जे पकड़ाएत सएह मुद्दालह। भलेहीं ओ लुटने हुअए वा नहि। लुटनिहार बाढ़िक कबचक उपयोग कऽ लेलनि। मुदा, जे नहि गेल रहथि ओ निचेन जे हमरा िक हएत? सरकारी गोदाम लूटि। जहिठाम कुरसीपर बैसि करोड़ाे लुटैत अो थोड़े पकराइत। आिक ओकरा चरित्रमे थोड़े कोनो दोष लगतै जे घुस लैत पकड़ा जहलो जाइत आ घुस दऽ कोर्टसँ िनर्दोषो साबित होइत। ई तँ युगक धरम छी। ओहनो तँ युग होइत जहिमे घुसो एक तरहक कारोबार छी। लोहाक टोपी माने हेलमेट बला सिपाहीकेँ दौड़ शुरू भेल। सभ अपन गर धऽ लेलक। थाना-पुलिसक काज ढोलबा बुझैत नहि। बम्बइयोमे कोठिऐक काज करैत रहै। संयोगसँ गाम आएल रहै। लोकक सुन-गुन पाबि ढोलबाक घर घेरि लेलक। ओ बुझि गेल जे पकड़ा जाएब। िकएक तँ ऐहन-ऐहन घटना बम्बईमे संगी-साथीक मुँहे सुनने रहए। पत्नीकेँ कहलक- ‘‘हम बोरामे पैसि जाइ छी अहॉं बोराक मुँह बाहरसँ बान्हि देबइ।’’ सएह केलक। ऑंखिक सोझे देखै दुआरे बोरामे कने भूर कऽ देलक। एकटा सिपाही घरक बोरा देखि ढोलबाक पत्नीकेँ पुछलक- ‘‘इसमे क्या है?’’ - ‘‘गहूम।’’ लोकक संग-संग गहूमो पकड़ैक रहैक। गहूम सुनि संगीकेँ सोर पाड़ि सिपाही बाजल- ‘‘पकड़ मे आ गया। जल्दी आओ?’’ तीनि-चारिटा सिपाही दौड़ कऽ पहुँच गेल। बीचे घरमे बोरा देखि अपन सफलताक ऐहसास भेलै। बोराक भीतर ढोलबा संच-मच भेलि पड़ल सभ िकछु देखैत-सुनैत रहै। दूटा सिपाही बोराक एक भागक दुनू कोन पकड़ि आ तेसर बोरा मुँहक बान्ह पकड़लक। बान्ह ढील रहै उठैबतहि ससरि गेल। डोरीकेँ ससरितहि ढोलबाक दुनू पाएर निकलि गेल। बोरा निकालि, ढोलबाकेँ पकड़ि, जीपमे चढ़ा सिपाही िवदा भऽ गेल। सत्यानंद पाठक लघुकथा- स्वान विमर्श आइ बारहम दिन बीतय पर अछि, मुदा ओइ बेल्ट वलाक कोनो अता-पता नहि अछि। परचून कें दुकानक आगा राति १० बजे धरि चलय वला चौपाल पर ओ आइयो नहि आयल आ' सभ ओकरहि लेल चिंतित छलथि। ककरो नीक नहि लगैत छलन्हि। ने बतियाय मे आ' ने खेलाय-धूपय मे। गोरकी मौसी आ' भुल्ला काका एक संग जरूर बैसल छलाह, मुदा बतिया नहि रहल छलाह। ओम्हर छोटकन सेहो उदास छल। ओ बेल्टे वलाक संग बेसी रहैत छल। दुनूक उम्र मे बड्ड कम फर्क छलैक। आब ओकरा संग खेलय वला कियो नहि छल। हं, मोती ओकरा बगल मे जरूर बैसल छल। मुदा एहि चितकबराक मन सेहो उदास छल। मिनी दीदी नांगरि डोला रहल छलीह आ' बाट कें निहारि रहल छलीह। दहिना कात कुनो आहट भेला पऽर ओ बगलक गली में सेहो झांकि लैत छलीह। हुनका लगैत छलैन्ह जेना मैक्सी एम्हर सँ तऽ नहि आबि रहल अछि। ओहि बेल्ट वला नटखट कें लोक सभ प्यार सँ मैक्सी कहैत छथि। ओकरा पर सभ जान लुटबैत छलाह। ओ कहां जनमल, ओकर माय-बाप कें छथि ककरो पता नहि। जखन सँ ओ राति कऽ चौपाल पर आबय लागल सभकें पसिन्ह पडि गेल। ओ सिर्फ भुल्ले काका सँ डेराइत अछि। ओ कहियो काल डांटि-डपटि दैत छथिन्ह। मैक्सी भुल्ला काकाक बाहर निकलल दांत सँ डेराइत अछि। मैक्सी कहैत रहैत अछि जे अगर गलतियो सँ भुल्ला काकाक दांत कतहु फंसि गेल तऽ असाध्य घाउ भऽ सकैत अछि। ओना भुल्ला काकाक कोर पर लाल बनल भुल्ल आंखि कम खतरनाक नहि लगैत अछि। हुनकर आंखि सँ तऽ तैयो बचि सकैत अछि। ओना इ अलग बात छल कि भुल्ला काका सेहो ओकरा कम स्नेह नहि करैत छथि। अनुशासन अलग बात अछि। परचूनक दुकानक मालिक गंजू महाजन दुकान समेटब शुरू कऽ देने छलाह। हुनकर तीनू बेटा अपन-अपन दायित्व मे लागि गेल छलाह। नन्हकू खाली पडल कार्टून कें कबाड में फेंकि रहल छल। बडका बेटा दुकान मे घटल समानक चिट्ठा बनबय में अपस्यांत छल। मझिला दुकानक बाहर पसरल समान कें भीतर ठेलि रहल छल आ' गंजू महाजन रोकड मिला रहल छलाह। इ सभ देखि गोरकी मौसीक आंखिक कोर भीजि गेल। नोर टपकहि वला छल। चितकबरा उसांस भरैत बाजल-ङङ्गआइयो नहि फिरल।' गंजू महाजनक दुकानक आगाक खुलल स्थान दिनभरि कतेको तरहक जमघटिक केंद्र अछि। भोर आठ बजे सँ ओतय लगक इस्कूल मे अपना धीया-पूता कें पहुंचावय वला अभिभावक आपस मे बतिया लैत छथि। हिनका लोकनिक गप्प-सप्पक शाश्वत विषय इस्कूलक हेडमास्टरनीक धीया-पूताक प्रति क्रूरता आ' इस्कूल मे अजब-गजब कें नियम होइत अछि। हिनका लोकनिक गेलाक बाद ऑफिस जाय वला सभक हुजूम ओतय अबैत-जाइत रहैत अछि। बैग लटकौने नवका-नवका छौडा सभ बस पकडक लेल ओतय ठाढ भऽ जाइत अछि आओर बस अबैत मांतर इ सभ लपकि कऽ लटकि जाइत अछि। दुपहर एक बजे सँ तीन बजे धरि गार्जियन लोकनि फेर ओतय मंडराय लगैत छथि। हुनकर निशाना इस्कूल गेट होइत अछि। गेट सँ भारी-भरकम बस्ता लटकौने नेना-भुटका निकलैत छथि जिनका हुनकर गार्जियन लपकि लैत छथि। नेना सभ अपना अभिभावक कें ओतय आइसक्रीम, जलपुरी, गोलगप्पाक ठेला दिस खींचय लगैत अछि आओर अभिभावक डांटि-डपटि-चुचकारक अस्त्र सँ हुनका बुझावक कोशिश करैत छथि। सांझ होइत मांतर ओतय थाकल-ठेहियायल लोकसभ, नवतुरिया छौंडा सभक जमघट लगैत अछि। परचून दुकान लगक शराबक दुकान टिमटिमाय लगैत अछि आ' फेर रंगीन सांझक नजारा उपस्थित भऽ जाइत अछि। राति ढहलाक संगहि प्लास्टिकक गिलास आ' छोट-पैघ बोतलक खन-खन सँ ओ स्थान गूंजय लगैत अछि। अलग-अलग झुंड मे लोकसभ सडक पर पासिखानाक आनंद मे डूबि जाइत छथि। इ नवीन संस्कृति किछुए वर्ष सँ पनपल अछि। शराबक प्रचलन आओर ओकर उपलब्धता दुनू समान रूप सँ बढल अछि। पछिला किछु वर्ष मे एहि शहर मे शराब दुकानक बाढिसन आबि गेल अछि। हर पांच मे एक दुकान विदेशी शराबक अछि। शहर मे दूधक अभाव अछि। शराब दुकानक कोनो अभाव नहि। एहि बातक परवाह बिना कएने कि इ दुकान कहां होमय चाही। इस्कूल, मंदिर, व्यायामशाला बगल मे अछि तैयो कोनो परवाह नहि। शराबक दुकान बढलाक कारणहि शहर मे शराब सेवनक ढेरो तरीका इजाद भेल अछि। एहि क्रम मे ङङ्गफोर व्हील बार'क प्रचलन तेजी सँ बढल अछि। आफिस, दुकान आ' अपन प्रतिष्ठान सँ फुर्सत भेटल आओर चारिटा दोस्त तय कएल। बस फेर बोतल, सोडा, नमकीन और जलक बंदोबस्त भेल आओर बाटक कात लागल कारहि मे बार खुजि गेल। आब स्टेंडिंग बार सेहो आबि गेल अछि। शराब दुकानक सामनहि एकटा मोटरसाइकिल कें घेरि कऽ चारिटा दोस्त ठाढ भेटि जाथि तऽ बुझू ओतय ङङ्गस्टेंडिंग बार' चालू अछि। गंजू महाजनक परचूनक दुकानक सामने वला जगह पर भोर छः बजे सँ राति बारह बजे धरि गतिविधि चलैत रहैत अछि। राति साढे नौ बजे सँ ओतय श्वान समाज जुटैत अछि। एहि समाजक लेल हऽम संस्कृतनिष्ठ शब्दक प्रयोग कएल अछि। ओना चालू भाषा मे कतेक शब्द अछि, मुदा एतय जाहि समाजक चरचा कएल जा रहल अछि ओ वास्तव मे साधारण नहि अछि। ओकर संवेदना, चिंतन प्रक्रिया आ' व्यवहार कतहु सँ आम आदमीक स्तर सँ कम नहि अछि। इ समाज जखन जुटैत अछि तऽ समाज, जनजीवन सहित कतेको मुद्दा पर गंभीर चरचा होइत अछि। समाजक लोक दिनभरि छितरायल रहैत अछि। भुल्ला काका आइयो ओहि पुरना दरबारक सामने दिनभरि जुटल रहैत छथि आओर कोनो अनचिन्हार आदमी कें देखैत मांतर भूकय लगैत छथि। गोरकी मौसी ओहि बैंक वला दंपति कें खूब स्नेहिल छथि। आब एहि उम्र मे गोरकी मौसीक लऽग कोनो गंभीर जिम्मेदारी नहि छन्हि। ओ दिनभरि दंपतिक घरक छहरदिवारी मे रहैत छथि आओर सांझ कऽ दंपतिक घर फिरते मांतर हुनकर काज समाप्त भऽ जाइत अछि। राति अन्हार होइत मांतर ओ घर सँ निकलि कऽ एहि चौपाल पर आबि जाइत छथि। मिनी दीदी कतहु बान्हल नहि छथि। ओ जन्महि सँ एहि दुआरि-ओहि दुआरि दौडैत रहली अछि। चितकबरा कें कियो कलकत्ता सँ लायल छल। कीनि कऽ। एक दिन बीमार पडि गेल तऽ ओकर मालिक ओकरा सडक पर छोडि गेल छल। छोटकन तऽ नया अछि। ओकर माय ओकरा एहि इलाका मे छोडि गेल। एहि बीच मैक्सीक एहि समाज मे आगमन भेल। ओ एकटा समृद्ध परिवारक दुलरुआ अछि। राति मे किछु समयक लेल ओ खुलल बसात मे छोडि देल जाइत अछि आओर ओ ओकर फायदा उठाकऽ समाजक चौपाल मे शामिल भऽ जाइत अछि। परंच एहन पहिले कहियो नहि भेल। जखन सँ मैक्सी समाज मे शामिल भेल अछि ओ नियमित रूप सँ चौपाल पर हाजिर होइत रहल अछि। हं, कोनो दिन अपन मालिकक संग कतहु जाइछ तऽ ओ ओहि दिन नहि अबैत छल, मुदा दोसर दिन ओ फेर मौजूद भऽ जाइत छल। इ पहिल मौका छल जे बारह दिन सँ गायब छल। एहिलेल समाजक लोक मे खूब चिंता पसरल छल। गोरकी मौसी कहलनि-ङङ्गमैक्सी के बिना चौपाल सुन्न लगैत अछि।' भुल्ला काका मौसीक तरफ देखैत सहमति मे मुडी हिलौलनि। मौसी फेर बजली-ङङ्गहमरा चिंता एहि बातक भऽ रहल अछि कि ओहि अभिशप्त ३० अक्टूबरहि सँ मैक्सी गायब अछि। ओहि दिन शहर मे कतेको ठाम पैघ-पैघ बम विस्फोट भेल छल। कतहु मैक्सियो तऽ ओकर चपेटि मे नहि आबि गेल?' - ङङ्गअ-रे की बात करै छी मौसी। तीस अक्टूबर कऽ मैक्सीक मालिकक छुट्टी नहि छल। एहिलेल ओहि दिन ओ बाहर नहि निकलल होयत।' चितकबरा कहलक। - ङङ्गआब इ तू कोना कहि सकैत छह? भऽ सकैत अछि ओहि दिन मैक्सीक मालिक छुट्टी लऽ लेने होथि आ' ओ मैक्सी कें लऽ कऽ गणेशगुडी तरकारी कीनऽ गेल होथि, जेना कि कतेक बेर होइत अछि।' - ङङ्गहं, एना भऽ सकैत अछि। मुदा सवाल अछि कि हमसभ एना कियाक सोचू।' मिनी दीदी कहलनि। भुल्ला काका हाफी केलथि आओर कहलथि-ङङ्गएना सोचऽ कें कतेको कारण अछि। कियाक तऽ मैक्सीक कोनो अता-पता नहि अछि। ओकर मालिकक घरक दरबज्जा सभ दिन खुलैत अछि। हम स्वयं देखलहुं अछि। अगर मालिक एतहि छथि तऽ मैक्सी कें सेहो एतहि होमक चाही आओर अगर मैक्सी एतहि अछि तऽ ओकरा चौपाल पर जरूर आबक चाही।' चितकबरा- ङङ्गभऽ सकैत अछि बम विस्फोट वला दिन ओ मालिकक संग नहि निकलल हो।' गोरकी मौसी-ङङ्गभऽ सकैत अछि। मुदा संकट सिर्फ ओही दिनक तऽ नहि अछि। बम विस्फोटक बाद सँ तऽ समाज पर संकटक बादल छारलहि अछि।' चितकबरा-ङङ्गकोना?' गोरकी मौसी-ङङ्गतू एकदम भोला छह चितकबरा। कि तोरा बुझना नहि जाइत छह? जाहि दिन बम फाटल ओहि दिन लागल जेना जलजला आबि गेल अछि। हम ओहि राति चौपाल पर आयल जरूर रही, मुदा दस मिनटक लेल। महाजनक दुकान बंद छल आओर हमरा रातुक भोजन नहि भेल। किछुए काल मे सटका पटकैत किछु वर्दीधारी आयल आओर हमरा सभ कें पडाय पडल। तहिया सँ लऽ कऽ आइधरि माहौल शांतहि नहि भऽ रहल अछि। दिनभरि सायरनक अवाज गूंजैत अछि आओर वर्दीधारी लोकनिक आयब-जायब लागल अछि। बाट पर भीड निट्ठाह घटि गेल अछि आओर सून-मशान बाट हमरा समाजक दोसर मुहल्लाक कतेको गोटेक जान लऽ लेलक अछि।' चितबकरा-ङङ्गअहां ठीक कहैत छी मौसी। हम ओहि दिन गणेशगुडी गेल छलहुं। ओतय कें नजारा देखि कऽ करेज कांपि गेल। गाडीक कबाड, जरल दुकान। कोन मे किछु पूजाक समान आ' जरैत मोमबत्ती।' मिनू-ङङ्गहं, तीस अक्टूबरक ओहि दर्दनाक मंजरक बाद सँ तऽ माहौल बिलकुल अलग भऽ गेल अछि। कतय ओ हलचल आ' कतय इ सन्नाटा। एकदम मरघटसन। किछु लोक भोकासी पाडि कऽ कानि रहल छलथि, तऽ किछु लोक फफकि-फफकि कऽ करेजा गला रहल छलाह। जरल वस्तुक ढेर पर हम देखलहुं इस्कूलक बैग। जूता-चप्पलक अंबार लागल छल। एहि घटनाक बाद शायद पडेबाक क्रम मे लोकक पैर पिछरल हेतनि। लोकसभ बतिया रहल छलाह। ओहि दिन की भेल छल। एकटा बुढवा बाबा फफकि-फफकि कऽ बाजि रहल छलाह-ङङ्गओ अपन नातिन कें लऽ कऽ बजार आयल छलथि। नातिने जिद्द कएने छलन्हि कि हमरा बजार जयबाक अछि। ओ नातिन कें जूता कीनि देलन्हि आओर सोचलन्हि जे किछु तरकारी कीनि ली। इएह सोचब काल साबित भेल। ओ अखन तरकारीक दुकान लग पहुंचल छलाह कि कान सुन्न भऽ गेलन्हि। ओ खसि पडलाह। आओर फेर जखन होश आयल तऽ ........।' बुढवा बाबाक बात सुनि कऽ तऽ हम सन्न रहि गेलहुं। हम हुनकर आओर बात सुनय चाहैत छलहुं। जेना कि हुनकर नातिन कें की भेलनि, मगर सायरनक अवाज गूंजि उठल आओर एकटा वर्दीधारी सटका मारि कऽ हमरा भगा देलक।' गोरकी मौसी-ङङ्गअरे, सभसँ अधलाह बात तऽ हमरा समाजक लेल भेल। बम विस्फोटक घटनाक दिन सँ तऽ हमरालोकनिक जिनाइ हराम भऽ गेल अछि। सडक सुन्न भेल तऽ हमर लोक सडक पर मटरगश्ती करक लेल निकलि पडल। हुनका की पता छलन्हि कि एहन स्थिति मे दु-चारि टा गाडी चलैत अछि ओ काफी लापरवाह होइत अछि। कतेक लोक एहि लापरवाह गाडीक चपेटि मे आबि गेलाह। जहां-तहां खद्दरधारी आओर वर्दीधारी लोक प्रकट भऽ जाइत छथि आ' हमरालोकनिक खैर नहि। सिर्फ यैह लोकनि नहि, बल्कि किछु घडियाल सेहो उभरि कऽ आबि गेल छथि ओ जगह-जगह मजमा लगा रहल छथि आओर मोमबत्ती जरा कऽ घडियाली नोर टपका रहल छथि। ओना घटनास्थल आओर प्रतिष्ठान आ' सरकारी संस्थान मे श्रद्धासुमन अर्पित कए आ' रैली निकालि कऽ अपन एकजुटता प्रदर्शित करय वला लोक सराहनीय काज कऽ रहल छथि। मुदा दुखक बात इ अछि जे घडियाल सभ सेहो एहि मे अपन फायदा बटोरक प्रयास करब शुरू कऽ देलनि अछि। बजार नहि लागि रहल अछि तऽ हमरा लेल लोक की छोडताह। से पेट पर आफत आबि गेल अछि।' भुल्ला काका-ङङ्गतू ठीक कहैत छह। हमरो अंदेशा भऽ रहल अछि। या तऽ मैक्सी ओहि दिन बम विस्फोटक चपेटि मे आबि गेल होयत अथवा ओकर बाद जे हंगामा भऽ रहल अछि ओहि मे कतहु दबि गेल होयत।' गप-सप्प जारी छल। तखने चितकबरा किछु सूंघि लेलक। ओकर चेहराक भाव बदलि गेल। ओ चिकरल। -ङङ्गअरे, देखू.... मैक्सी आबि रहल अछि।' सभ सतर्क भऽ गेल। सचमुच नारंगीक दिश सँ झुमैत मैक्सी आबि रहल छल। ओकर स्वागत मे सभ लोक ठाढ भऽ गेलाह। सभ भाव विह्वल छलथि। ककरो मुंह सँ कोनो अवाज नहि निकलि रहल छल। अबैत मांतर मौसी सँ लेपटा गेल। सभ फफकि पडल। मौसी ममता सानल डांटैत पुछलथि-ङङ्गकतय छलह एतय दिन?' चितकबरा बचल रोटी ओकरा पकडबैत गर्दनि सँ लगा लेलक। छोटकन तऽ कूदि पडल। सभ इ बुझवाक लेल उत्सुक छल जे आखिर एतेक दिन कहां छल? मैक्सी सभक जिज्ञासा शांत करैत कहलक-ङङ्गहमर मालकिन हमरा गणेशगुडी लऽ गेल छलीह। ओ गणेशगुडी फ्लाईओवरक नीचा गाडी पार्क कय आओर हमरा लऽ कऽ दोसर तरफ मिठाइयक दुकान दिश गेलीह। एतबे मे भीषण धमाका भेल आ' हमर मालकिन खसि पडलीह। हम कूं-कूं करय लगलहुं। हम अपन मालकिन के बचबय चाहैत छलहुं। एतबे मे भयभीत लोकक एकटा हुजूम आयल आओर हमरा मालकिन सँ बिछुडा देलक।' - ङङ्गफेर....।' सभगोटे एक संग बाजि उठलाह। - ङङ्गहम भीडक धक्का खाइत फटकी चलल जा रहल छलहुं, मुदा हमर नजरि मालकिनहि पर छल। हम देखलहुं जे मालकिन कोनो तरहें उठली आओर किछु लोक हुनका दुकानक भीतर लऽ गेलाह। ओकरा बाद तऽ हम बस भटकैत रहलहुं। एम्हर आबक रास्ता खोजैत रहलहुं। एहि बीच हम वर्दीवलाक कतेक सटका खएलहुं कहि नहि सकैत छी। एकटा तऽ हमरा पकडि लेने छल आओर रस्सी सँ बान्हि देने छल। शायद ओ हमरा अपन घर लऽ जाय चाहैत छल। मुदा हम कोनो तरहें ओकर चंगुल सँ आजाद भऽ गेलहुं आओर भागि पडेलहुं। एहि बीच हम सिर्फ भागितहि रहलहुं अछि। ओ लोकनि आओर अपना लोकनि सँ सेहो। अपन लोक सभ तऽ हमरा संग अपन इलाका मे घुसपैठीक जकां देखलक आओर कतेक लोक हमरा पर टूटि पडलाह। हम कोनो तरहे बचैत आइ नारंगी तिनाली पहुंचलहुं तऽ ओ अपन इलाकाक पहचान भेल। हम बचि गेलहुं।' एतेक कहि कऽ मैक्सी सांसहि लऽ रहल छल कि सायरन बाजि उठल। सब बुझि गेल कि आब वर्दी वला आबि धमकताह। एहिलेल सभ अपन-अपन बाट पकडलन्हि। प्रो. वीणा ठाकुर १८५४- लघुकथा- परिणीता आइ डोमेस्टिक एयर पोर्ट दिल्लीमे श्यामाक भेँट नीलसँ भेल छलन्हि। श्यामा थोड़ेक काल धरि हतप्रभ रहि गेल छलीह। नील-नील कहि मोनक कोनो कोनमे हहाकारक लहरि उठि गेल छल। एतेक वर्ष बीत गेल। नील एखनहुँ ओहने छथि, कोनो परिवर्त्तन नहि भेल छन्हि। आकर्षक नील, हँसमुख नील, पुर्ण पुरूष नील, उच्च पदस्थ नील, नील-नील। श्यामा कहियो नीलकेँ बिसरि नहि सकल छलीह। सभटा प्रयासश्यामाक विफल भऽ गेल छल। नील सदिखन छाया सदृश्य श्यामाक संग लागले रहलथि। नील कतेक दूर भऽ गेल छथि, श्यामा आब चाहियो कऽ नीलकेँ स्पर्श नहि कऽ सकैत छथि, ओहिना जेना छाया संग रहितहुँ स्पर्श नहि कएल जा सकैत अछि, मनुष्यक संग छायाक अस्तित्व तँ सदिखन रहैत छैक, मुदा ओकर आकार तँ सदिखन नहि रहैत छैक। श्यामाक जिनगी नील, श्यामाक सोच नील, श्यामाक सभ िकछु नील। श्यामाक तन्द्रा भंग भऽ गेल छल, नीलक चिर परिचित हँसि सुनि, नील आश्चर्यचकित होइत प्रसन्न भऽ कहने छलाह- “श्यामा, माइ डियर फ्रेंड हमरा विश्वास होइत अछि, अहाँ फेर भेँट हएत। श्यामा अहाँ एखनहुँ ओहिना सुन्दर छी, यु आर टु मच ब्युटिफुल यार, आइ कैन नॉट विलिभ।” और पुन: ठहाका मारि हँसने छलाह। नील संगक युवतीसँ श्यामाक परिचए करबैत कहने छलाह- “श्यामा, मीट माइ वाइफ नीलिमा, ओना हमर नीलू- नीलू माइ वेस्ट फ्रेंड श्यामा।” नीलू बहुत शालीनतासँ श्यामाक अभिवादन करैत कहने छलीह- “गुड मॉनिंग मैम।” और नील हँसेत बाजि गेल छलाह- “देखू हम आइयो अहाँक पसन्दक ब्लू पैंट शर्ट पहिरने छी।” किछु आॅपचारिक गप्प भेल छल। एयरपोर्टपर एनाउन्समेंट भऽ रहल छल, संभवत: नीलक फ्लाइटक समए भऽ गेल छल। श्यामा पाछासँ नील और श्यामाक जोड़ी निहारैत रहि गेल छलीह। कतेक सुन्दर जोड़ी अछि- राधा-कृष्ण सदृश्य। नीलिमा कतेक सुन्दर छथि, एकदमसँ नील जोगड़क। लगैत अछि जेना ब्रह्मा फुर्सतमे नीलिमाकेँ गढ़ने होएथिन्ह। सुन्दर, सुडॉल शरीर, श्वेत वर्ण, सुन्दर लम्बाइ, उमंग और उत्साहसँ पूर्ण नीलिमा। नीलिमाक प्रत्येक हाव-भाव सुसंस्कृत होएवाक परिचायक अछि। श्यामा अपलक देखैत रहि गेल छलीह। तावत धरि जावत दुनू श्यामाक आँखिसँ ओझल नहि भऽ गेल छलथि। घर अएलाक पश्चात् बिनु किछु सोचने आएना लग आबि अपनाकेँ देखय लागल छलीह। केशक एकटा लटमे किछु श्वेत केश देखि श्यामाकेँ आश्चर्य भेल छलन्हि जे एखन धरि हुनक नजरि एहिपर नहि पड़ल छल। फेर जेना श्यामाकेँ संकोच भेल छलन्हि जे अबैत देरी आखिर अएनामे की देख रहल छथि। भरिसक नीलक प्रशंसा एखनहुँ श्यामाकेँ ओहिना आह्लादित कऽ गेल छल। ई तँ किछु वर्ष पहिने होइत छल। आब तँ प्राय: श्यामा नीलकेँ, नीलक संग बितायल क्षणकेँ बिसरवाक प्रयास कऽ रहल छथि। आखिर नील एखन धरि श्यामाक मस्तिष्कपर ओहिना आच्छादित छथि। समएक अन्तराल किछु मिटा नहि सकल। मिटा देलक तँ श्यामाक जिनगी, श्यामाक खुशी। श्यामाक जिनगी भग्न खण्डहर बनि कऽ रहि गेल, जाहिमे नील आइ हुलकी दऽ गेल छलाह। की नील एखन धरि श्यामाकेँ बिसरने नहि छथि? श्यामाक पसन्द एखनहुँ मोन छन्हि? श्यामाक महत्व एखनहुँ बॉंचल अछि? नहि तँ नील एना नहि बजितथि। चारू-कात देखलनि, ओछाओनसँ लऽ कऽ टेबुल धरि किताब छिड़ियाएल छल। मोन थोड़ेक खौंझा गेल छलन्हि, एहन अस्त-व्यस्त घरक हालत देखि। तथापि किताब एक कात कऽ श्यामा अशोथकित भऽ ओछाओनपर पड़ि रहल छलीह। मोन एकदम थाकि गेल छल, मुदा दिमाग सोचनाइ नहि छोड़ि रहल छल। श्यामा अपन आदत अनुसार डायरी लिखैले बैसि गेल छलीह। आजुक पन्ना-नीलक नाम- नील, आजुक पन्ना अहाँक नाम अछि। हमरा बुझल अछि, आब नहि तँ हमर डायरी कहियो जबरदस्ती पढ़ब, नहि हमरा पढ़ब। नील पाँच वर्ष अहाँक संग बिताएल अवधि हमर जीवनक संचित पूँजी थिक, एहि पूँजीकेँ बड़ नुका कऽ मोनक कोनमे राखने छलहुँ। कतहु एहि अमूल्य निधिकेँ बॉटवाक इच्छा नहि छल, कागजक पन्नोपर नहि। मुदा आइ एतेक पैघ अन्तरालक पश्चात, अहाँकेँ देखि मोन अपना वशमे नहि रहल। मोन की हमरा वशमे अछि। अहाँक संग रहि हम तँ दिन-दुनियाँ बिसरि गेल छलहुँ, कहियो किछु कहबाक इच्छा होएबो कएल तँ अहाँ सुनए लेल तैयार नहि भेलहुँ। अहाँ सतत् कहैत रहलहुँ- “हमरा अहाँक मध्य नहि कहियो तेसर मनुष आएत और नहि कोनो व्यर्थक गप्प, बस मात्र हम और अहाँ, और किछु नहि।” हम मन्त्र मुग्ध भऽ अहाँक गप्प सुनैत सभ किछु बिसरि गेल छलहुँ। मुदा आइ सभ किछु बदलि गेल। आइ जँ सभ किछु लिख अहाँकेँ समर्पित नहि कऽ देब तँ मोन और बेचैन भऽ जाएत। अहाँ हमरासँ दूर भऽ गेल छी, तथापि आइ सभ किछु, जे नहि कहि सकल छलहुँ, हम डायरीमे लिख रहल छी। जखन हम अपनाकेँ अहाँकेँ समर्पित कऽ देलहुँ, तखन किछु बचा कऽ राखब उचित नहि। हमर पिता उच्च विद्यालयमे शिक्षक छलाह, नाम छलन्हि पं. दिवाकर झा। हम दु बहिन एक भाए छी, हम सभसँ पैघ, बहिन श्वेता और भाए विकास। हमर वर्ण किछु कम छल, ताहि कारणे बाबूजी आवेशमे हमर नाम रखलन्हि श्यामा। बाबूजी हरदम कहैत छलाह- “ई हमर बेटी नहि बेटा छथि, हमर जीवनक गौरव छथि श्यामा।” छोट बहिनक नाम श्वेता अछि, श्वेता गौर वर्णक छथि, तेँ माए श्वेता नाम राखने छलथिन्ह। मैट्रिकमे हमरा फर्स्ट डिविजन भेल तँ बाबूजी कतेक प्रसन्न भेल छलाह। महावीर जीकेँ लड्डु चढ़ौने छलाह। सौंसे महल्ला अपनहिसँ प्रसादक लड्डु बॉंटने छलाह। हमरा जिद्दसँ कॉलेजमे हमर नाम लिखओल गेल छल। माए तँ विरोध कएने छलीह। जखन हम बी.ए. पास कऽ गेलहुँ, तँ हमर वियाहक चिन्ता बाबू जीकेँ होमए लागल छलन्हि। एकठाम वियाह ठीक भेल तँ बड़क माए-बहिन हमरा देखय लेल आएल छलथि, मुदा श्वेताकेँ पसिन्न करैत अपन निर्णए सुना देने छलथिन्ह जे अपन बेटाक विआह श्वेतासँ करब। बाबूजी कतेक दुविधामे पड़ि गेल छलाह। पैघ बहिनसँ पहिने छोटक विआह कोना संभव अछि। मुदा माए बाबूजीकेँ बुझाबैत कहने छलथिन्ह-“जे काज भऽ जाइत छैक से भऽ जाइत छैक। विआह तँ लिखलाहा होइत छैक।” नील शास्त्रक कथन अछि-माए बापक असिरवाद फलित होइत छैक। जँ असिरवाद फलित होइत छैक तँ माए बापक निर्णए सन्तानक भाग्यक निर्धारण सेहो करैत हेतैक। भरिसक माएक निर्णए हमर भविष्य भऽ गेल। श्वेताक विआह ओहि वरसँ भऽ गेलनि। अर्थशास्त्रक एम.ए. कएलाक पश्चात विश्वविद्यालयक पी.जी. डिपार्टमेन्टमे हमरा लेक्चररक नौकरी भऽ गेल। ताहि दिन हमरा बुझाएल छल, जेना जीवनक सभटा उद्देश्य पूरा भऽ गेल अछि। बुझबे नहि कएलहुँ, जे एकरा आगाँ सेहो जिनगी छैक। जावत बुझलहुँ तावत सभ समाप्त भऽ गेल छल। जखन पढ़ैत छलहुँ, महिला शिक्षिकाक पहिरब ओढ़ब, वेश-भूषा हमरा वड़ आकषिर्त करैत छल। हमरा आदर्शमे इहो समाहित भऽ गेल छल। हल्लुक रंग साड़ी पहिरब हमर शौख भऽ गेल छल, भरिसक तेँ हमर जिनगी रंग विहिन भऽ गेल। खैर, बाबुजीक प्रसन्नताक कोनो सीमा नहि छलैन्हि। किछु मासक बाद बाबुजी रिटायर भऽ गेल छलाह। स्कूलक शिक्षकक दरमाहा कम छल, बाबूजीक पेंशनसँ घरक खर्च, विकासक इन्जिनियरिंगक पढ़ाइ संभव नहि छल। हमरा पहिल बेर जहिना दरमाहा भेटल, माएक हाथमे राखि देने छलहुँ, तकरा बाद ई एकटा नियम बनि गेल छल। मुदा बाबुजीक मोनमे सतत् एकटा अपराध बोध होइत छलैन्ह। बाबुजी मुँहसँ तँ किदु नहि बजैत छलाह, मुदा हुनक आँखि सभ किछु कहि दैत छल। किछु दिनक बाद बाबुजी एकदमसँ चुप रहए लागल छलाह। माएक व्यवहारमे सेहो परिवर्त्तन भऽ गेल छलैन्ह। हमरा प्रति बाबुजी माएक सिनेह क्रमश: आदरमे परिवर्तित होअए लागल छल। शुरू-शुरूमे एहि आदरसँ हम कतेक असहज भऽ जाइत छलहुँ, पहिने छोट-छोट चीज लेल जिद्दक अधिकार छल, मुदा ई आदर तँ हमरा बहुत रास अधिकारसँ वंचित कऽ देलक। हमरा सतत् लगैत छल जे आहिस्ता-आहिस्ता कर्त्तव्य मजबूत पाशमे हम बान्हल जा रहल छी। हमर स्वतन्त्रता छोट होइत गेल और हम असमए पैघ होइत गेलहुँ। तावत धरि हम बुझवे नहि कएलहुँ जे प्रत्येक मनुष्यक व्यक्तिगत जिनगी होइत अछि, भविष्यक कल्पना होइत अछि और होइत अछि उमंग, उत्साह। बाबुजीक मृत्यु हार्ट अटैक सँ भऽ गेलनि। मृत्युकाल बाबुजीक मुँहपर आच्छादित निरीह भाव, आँखिमे पश्चाताप, ओहिना मोन अछि। बाबुजीक मुँहसँ किदु नहि कहलैथ, मुदा हुनका आँखिक कातरता सभ किदु कहि गेल। आब हम घरक मात्र बेटी नहि रहि गेल छलहुँ। हम घरक कमौआ बेटी, पालन केनिहारि गार्जियन भऽ गेल छलहुँ। विकास पढ़ैत छलाह, हुनक पढ़ाइ, विवाह सभटा हमर उत्तरदायित्व भऽ गेल। ई छोट-छीन गृहस्थी समएक अनुसार चलैत रहल। विकासक पढ़ाइ समाप्त भऽ गेल छलनि, विवाह लेल कन्यागत आवए लागल छलाह। विकाससँ हम विवाह लेल पुछलहुँ, पहिने तँ ओ तैयार नहि भेलाह, बेर-बेर कहैत रहलाह- “दीदी, जावत अहाँक विआह नहि अएत, हम विआह नहि करब।” कतेक बुझौने छलहुँ, अन्तमे हमरा कहए पड़ल जे अहाँक विआह, सेट्लमेन्ट, अहाँक घर बसाएब हमर दायित्व अछि, तखन विकास स्वीकृति देने छलाह। कतेक उत्साहसँ विकासक विवाह कएने छलहुँ। पी.एफ.सँ अधिकतम लोन लऽ कऽ सभटा खर्च कएलहुँ। एक-एक वस्तु कपड़ा, गहना माए अपना इच्छासँ कीनने छलीह। विकासक विवाह सम्भ्रान्त परिवारमे भेल, कनिया पढ़ल-लिखल सुन्दर सुशील छथि। मुदा एकटा बात अछि, सुशीलो व्यक्ति मुँहसँ कहियो एहन कटुसत्य बहरा जाइत अछि, जकर प्रहारसँ दोसरक आत्मा छिन्न-भिन्न भऽ जाइत छैक। एक बेरक घटना हमरा एखन धरि बिसरल नहि भेल अछि, होएबो नहि करत। विकासक बेटा मोनु स्कूल गेल छल, स्कूलसँ अएबामे थोड़ेक देरी भऽ रहल छलैक। विकासक कनियाँ पूजाक बेचैनी देखि हमरा रहल नहि गेल। हम पूजाकेँ भरोस दैत कहने छलहुँ- “परेशान नहि होउ, मोनु अबैत हएत, किछु कारण भऽ गेल हेतैक।” पूजा निछोह भेल बाजि गेल छलीह- “अहाँ की बुझबैक सन्तानक दर्द। एतेक सुनैत।” हम अवाक रहि गेल छलहुँ। पूजा कहलैथ तँ सत्य। मुदा ई सत्य एतेक कटु छल जे हमर आत्मा क्षत-विक्षत भऽ गेल। की हमरा मोनमे मोनु, पूजा आ विकास लेल सिनेह नहि छल। की मात्र कोखिसँ जन्म देलासँ मातृत्वक भाव अबैत छैक? की हम विकासक भविष्यक चिन्तामे अपन जीवन उत्सर्ग नहि कऽ देलहुँ? हमर एतवे महत्व। खएर पूजा नहि बुझैत छथि ताहिसँ की। विकास तँ हमरा बुझैत छथि। यएह सोचि मोनकेँ सांत्वना दैत रहलहु। मुदा मोन की सांत्वनाक भाषा बुझैत छैक। मुँहसँ तँ किछु नहि बाजि सकललहुँ। मुदा तकरा पश्चात् एकटा हीन-भाव क्रमश: हमरा मोनमे बढ़ैत गेल। आब बेधड़क मोनुकेँ दुलारो करवामे हमरा संकोच होअए लागल छल। पहिने हम जाहि अधिकारसँ पूजा मोनुक संग रहैत छलहुँ, आब संकोच होअए लागल छल। नहि जानि कोन बात पूजाकेँ अप्रिय लागि जएतनि, किछु कहैसँ पहिने अनायास सर्तक भऽ जाइत छलहुँ। किछु दिनक वाद विकासकेँ इग्लैण्डमे बढ़िया नौकरी भऽ गेल छलैन्ह। िवकास हमर सहमतिक बाद विदेशक नौकरी स्वीकार कएने छलाह। आइओ मोन अछि, जाहि दिन विकास सपरिवार विदेश गेल छलाह, ओहि राति हमरे बिछाैनपर सुतल छला। विकास कतेक कानल छलाह, हमहुँ अपनाकेँ रोकि नहि सकल छलहुँ। विकास जाइतो काल एकेटा बात कहने छलाह- “दीदी, बाब अहाँ कोना रहब, अपन ख्याल राखब।” ओना विकास छथि तँ हमरासँ छह वर्ष छोट, मुदा परिवारक परिस्थिति हुनकहुँ बुजुर्ग बना देने छल। विकास छोट छथि, ताहिसँ की। यएह उत्तरदायित्व बोध तँ पुरूषक पुरूषत्वक छिऐक, जाहिसँ ओ परिवारक गार्जियन भऽ जाइत अछि। बाबुजीक मृत्युक पश्चात विकास टुटलथि नहि, किएक तँ सहारा हम भऽ गेल छलहुँ। मुदा जावत विकास सभ तरहसँ व्यवस्थित भऽ गेलथि। हमरो उत्तरदायित्व लेवय चाहैत छलाह। खएर विकास विदेश चलि गेलथि। हमहुँ निश्चिन्त भऽ गेल छलहुँ। आव घरमे मात्र हम और माए बचि गेल छलहुँ। कोनो उत्साह नहि, समए अपनहि बितैत जाइत अछि, जिनगीओ बित रहल छल। ओहि समएमे नील वसंतक झोंक बनि अहाँ हमर जिनगीमे आएल छलहुँ। हमरा एखनहुँ ओहिना मोन अछि, हम कॉलेज जएबा लेल तैयार भऽ कऽ घरसँ निकलल छलहुँ। रिक्शा थोड़ेक दूर चौराहापर भेटैत छल। अहाँ हमरा बगलमे गाड़ी रोकि कतेक विश्वाससँ बाजल छलहुँ- “हम नील, एयर इण्डियामे पाएलट छी, अहाँक पड़ोसी, अहाँ कतए जाएब, चलू छोड़ि दैत छी।” हम निर्विकार स्वरे अहाँक अस्वीकार कऽ देने छलहुँ। अहाँ फेर बाजल छलहुँ- “हम अपना परिचए तँ दऽ देलहुँ, अहुँ तँ किछु बाजु।” हम अहाँकेँ टारवाक उद्देश्यसँ कहने छलहुँ- “हमर नाम श्यामा छी, और हम विश्वविद्यालयक पोस्ट ग्रेजुएट विभागमे अर्थशास्त्र पढ़बैत छी।” अहाँ कनेक मुस्कुराइत, हमरा दिश तकैत गाड़ीमे बैसि गेल छलहुँ। नील अहाँक मुहँक स्मित भाव, आत्मविश्वाससँ भरल स्वर, हमरा मस्तिष्कमे एहन कऽ अंकित भऽ गेल जे एतेक वर्ष बितलाक पश्चातो ओहिना सभटा मोन अछि। लगैत अछि जेना ई आजुक घटना थिक। तकरा बाद आठ दिन धरि अहाँसँ भेँट नहि भेल छल। नहि जानि किएक कोनमे नुकाएल अहाँसँ भेँटक इच्छा बलवति होअए लागल छल। तकरा बाद एक दिन जखन हम िडर्पाटमेन्टमे बैसल छलहुँ, चपरासी समाद कहने छल जे विजिटिंग रूपमे एक गोटे भेँट करवा लेल बैसल छथि, और अहाँक कार्ड हमरा देने छल। नाम पढ़ि हम कतेक उद्विग्न भऽ गेल छलहुँ और अहाँ कतेक अह्लादित होइत, मुस्कुराइत हमर स्वागत कएने छलहुँ। हमरा लागल छल जेना एहि मुस्कुराहटसँ हम कतेक परिचित छी। बिना किछु पुछने अहाँ जल्दी-जल्दी बाजल छलहुँ जे फ्लाइट लऽ कऽ अहाँ अमेरिका गेल छलहुँ, ताहि कारणे एतेक देरी भऽ गेल। किंचित अहाँक हड़बड़ी बजवाक शैली सुनि हमरा हँसि लागि गेल छल। और अहाँ आर्श्चचकित होइत बाजल छलहुँ जे- भगवानक शुक्र अिछ, अहाँ हँसलहुँ तऽ।” और कॉफि हाउसक अहाँक निमन्त्रण हम अस्वीकार नहि कऽ सकल छलहुँ। ओहि दिन अहाँसँ दाेसर बेर भेँट कॉफी आउसमे भेल छल। बिना किछु पुछने अहाँ अपन विषएमे कहने छलहुँ जे अहाँक माँ, बाबुजी दुनू डॉक्टर छथि, अहाँ बैचलर छी और माँ-बाबुजीक एक मात्र सन्तान छी, उम्र पचीस वर्ष अछि, एयर इण्डियामे पायलट छी। हम ताहिपर कहने छलहुँ जे हमर उम्र तीस वर्ष अछि। हमर बात सुनि अहाँ हँसैत कहने छलहुँ जे- “दोस्तीमे उम्र कतयसँ आबि गेल।” तकरा बाद अहाँ कहलहुँ जे पता लगा लेने छी जे आहाँ हॉस्टल सुपरिटेन्डेन्ट भऽ गेल छी और सुपरिटेन्डेन्ट क्वाटरमे शिफ्ट कऽ गेल छी। नील, हम कोना कऽ कहितहुँ जे हम अपन घर छोड़ि क्वाटरमे किएक शिफ्ट कऽ गेलहुँ। भला लाजक बात की बाजल जाइत छैक। असलमे ई भेल छल जे श्वेता हमर छोट बहिनक पतिक ट्रान्स्फर अहि शहरमे भऽ गेल छल, माएक घरपर तँ श्वेताक अधिकार सेहो छल, श्वेता अपन पति और बच्चाक संग माएक घरमे रहय लेल आबि गेल छलीह। माएकेँ बड्ड प्रसन्नता भेल छलैन्ह और माएक प्रसन्नता देखि हम चुप रहि गेल छलहुँ। नहि जानि किएक हमरा नीक नहि लागल छल, यद्यपि घरक वातावरण बदलि गेल छल मुदा हमरा श्वेताक पतिक सभ किछुमे दखल अन्दाजी नीक नहि लगैत छल। हम बेचैन रहय लागल छलहुँ। माए सेहो हमर भावनासँ अनभिज्ञ छलीह। संयोगसँ हाेस्टल सुपरिटेन्डेन्ट बनवाक हमरा अवसर भेटल और हम एहि अवसरकेँ वरदान बुझि स्वीकार कऽ लेलहुँ। एहि पद लेल हमरासँ वेशी उपयुक्त और कोनहुँ महिला शिक्षिका नहि छलीह। किएक तँ सभ शादी-सुदा छथि, सभकेँ परिवार छन्हि, गृहस्थी छन्हि और हमरा तँ नहि आगु नाथ नहि पाछु पगहा। यद्यपि संजोगि कऽ बसाएल घरसँ हमर ई पलायन छल मुदा छल उपयुक्त अवसर, हम होस्टल शिफ्ट कऽ गेलहुँ। (अपूर्ण) साकेतानन्द, (1) लेखकीय नाम : साकेतानन्द. (2)पत्रकारिताक नाम : बृहस्पति. (2) असली नाम : साकेतानन्द सिंह (एस.एन.सिंह).(3) पिता : स्व. श्री विजयानन्द सिंह. माता: स्व.श्रीमती राधारमा जी. (4) जन्म : 27 फरवरी 1940 क’ कुमार गंगानन्द सिंहक तत्कालीन आवास “सचिव_सदन” 5, गिरीन्द्र मोहन रोड, दरभंगा. (प्रमाण पत्रमे_26 जनवरी 41 ). (5) शिक्षा: क्रमशः राज स्कूल दरभंगा/ बुनियादी स्कूल श्रीनगर, पूर्णियाँ/ विलियम्स मल्टीलेटरल स्कूल,सुपौल/ पश्चात पटना एवं मगध विश्वविद्यालय स’ अंग्रेजी औनर्स आ मैथिलीमे स्नात्कोत्तर । (6) व्यवसाय: आजीवन आकाशवाणीक चाकरी । आठ राज्यक नौ केन्द्रमे विभिन्न पद पर काज । लटे_पटे 40 वर्षक कार्यकाल । पटना, दरभंगा एवं भागलपुरमे बीसो साल तक मैथिली कार्यक्रमक आयोजन, प्रस्तुतिकरणमे लागल । ओतबे दिन क्रमशः आकाशवाणी पटनाक ग्रामीण कार्यक्रम ‘चौपाल’ आ दरभंगाक ‘गामघर’ कार्यक्रमके मुख्य स्वर”जीवछभाइ’क रूपमे ख्यात। आकाशवाणी दरभंगाक संस्थापक_स्टाफ । (7) साहित्यिक गतिविधि: मैथिली कथा साहित्यमे 1962 स’ सक्रिय । गोडेक चालिस_पचास टा कथा, रिपोर्ताज. संस्मरण, यात्रा_विवरण मैथिलीमे प्रकाशित अधिकांश पत्र_पत्रिकामे छपल । पहिल मैथिली कथा “ग्लेसियर” 1962मे ‘मिथिलामिहिर’मे प्रकाशित । हिन्दियोमे दू दर्जन कथा आदि प्रकाशित । सन 99मे छपल पहिल कथा_संग्रह “गणनायक’ के ओही वर्ष ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार। पैघ बान्ध’ स’ अबैबला विपत्तिके रेखांकित करैत, पर्यावरण के कथा वस्तु बना क’ राजकमल प्रकाशन स’ प्रकाशित एवं अत्यंत चर्चित उपन्यास (‘डौकूमेंट्री फिक्शन’) “सर्वस्वांत” प्रकाशित। आकाशवाणीक विभिन्न केन्द्र लए लिखल आ प्रस्तुत कैल नाटक, डौकुमेंट्री संख्या बहुत रास। आकाशवाणीक राष्ट्रीय कार्यक्रममे प्रसारित दू टा उल्लेखनीय वृत्त रूपक_ ‘महानन्दा अभयारण्य’ पर आधारित “जंगल बोलता है” एवं झारखंड के ग्रामीण क्षेत्रक ज्वलंत डाइनक समस्या पर आधारित वृत्तरूपक “ नैना जोगन “ चर्चित एवं प्रसिद्ध । मैथिली नाटकक कैकटा ‘लैंडमार्क’ यथा डा.रामदेव झा विरचित दू टा नाटक ‘विद्यापति’ आ ‘हरिशचन्द्र’ ; डा. मणिपद्मक ‘चुहड मल्लक मोछ’ । सल्हेस, दीनाभद्री, विदापत आदि लोक गाथा, लोक_नृत्य सब के लोक_गायकक मध्य जा क’, मूल वस्तुक ध्वन्यंकन एवं ओकर संपादन आ प्रसारण “गणनायक” कथासंग्रह के राजस्थानी अनुवाद, राजस्थानी साहित्यक जानल_चीन्हल नाम श्री शंकरसिंह राज पुरोहित एवं हिन्दी अनुवाद, मैथिलीक ख्यातनामा अनुवादिका श्रीमती प्रतिमा पांडॆ केलनि अछि; आ दुनू के साहित्य अकादमिये प्रकाशित केलक । (8) संप्रति: सन 2001मे आकाशवाणी हज़ारीबाग स’ केन्द्र_निदेशक के पद स’ अवकाश प्राप्त केलाक बाद पूर्ण रूपेण मिटः रूपेण मैथिली लेखन, मिथिला क्षेत्रक समस्या सब पर वृत्त__चित्र बनेबाक, मैथिलीक किछु नीक कथा सब के फिल्म रूपांतरणक गुनान__धुनानमे लागल । आछे दिन पाछे गए आइ दिने खराब छनि, भोर नंइ जानि ककर मुंह देखने रहथि मोन नंइ छनि। जे क्यो रहल हुए, अभगला के नीक नंइ हेतै । डेरा स’ निकलले छला कि बगलबला छौंडा तेना छिकने रहनि जे लगलै जेना नाके देने अंतडीं-भोंतडी निकलि जेतै । बडा अबंड सब छैक चारू भर... वैह मिड्ल-क्लास मानसिकता बला लोक। अनेरे एक दोसरा के जिनगी मे ताक-झांक करैत रहत । मिश्रा जीक छोटका बेटा सुनाइये क’ नंइ कहि देलकनि जे “ ई हमरा सीधे क्लास-वन नंइ बुझाइ छथि, क्लास-वन कत्तौ अहिना रहै छै...हौ खाली हिंदी अखबार पढैत देखलहक है कोनो एस.पी. कलक्टर के ?” हिनका हिंदिये स’ काज चलि जाइत रहनि। भरि दिन त’ टीभी देखिते छथि, सब त’ वैह खबरि रहै छैक, तखन गाम-घरक खबरि जेहन ई अखबार मे रहै छै….फेर अपन एकटा गौंआँ छनि अहि अखबारमे। आइ अठारहम दिन छियनि....रिटायर भ’ गेला अछि से दिन भरि मे कैक बेर की कही पग-पग पर मोन पडै छनि...एखन ओ बस कि टैक्सी- स्टैंड दिस लपकलो जाइ छथि आ सोचियो रहल छथि जे कथी स’ जाथि ? जं’ टेम्पो रिजर्व करता त’ एकटा नम्बरी त’ खाइये जेतनि...एह!औफिस के तीन टा गाडी रहै। जं’ कोनो खराब भेल त’ शहर मे टैक्सी छलै । सामने स’ एकटा औटो सर्र स’ निकलि गेलनि। ई जाबे हाथक इशारा कि जोर स’ चिकडि क’ ओकरा रोकितथिन---ओ गोली जेकां निकलि गेल रहै। ताबे सिटी बस बगल स’ पास केलकनि । नंइ जानि कोन रौ मे ओ लपकल रहथि आ पौ-दान पर पैर रोपिते जेना बस चलल छल, जे आइ नंइ मरितथि त’ घायल जरूरे होइतथि । हुनका एना लपकि क’ चढति देखि बस मे पहिने स’ ठाढ दू टा छौंडा हिनका दिस कनडेरिये देखैत किछु बाजल... की बाजल हैत ? चलैत बस मे ठाढे—ठाढ मचकी झूलैत ओ यैह सोचि रहला अछि जे आगां मे हिनके जेकाँ मचकी झूलैत दुनू कौलेजिया की गप्प केने हैत.. कहीं हुनका एना उचकि क’ चलती बस चढैत देखि ओकरा अपन क्षेत्र मे अतिक्रमण बुझायल होइ....जे से !आइ हुनका येन-केन-प्रकारेण अपन चेक--अप करेबाक छनि,बाइ-पास भेल छनि । तैं अइमे त’ कोनो आसकतिक बाते नंइ छैक; डा.मेहरोत्रा नामी हर्ट-स्पेशलिस्ट छथि...ई बुझिते जे हम पूनाक डिफेंस कारखानाक नामी हेड माने एम.डी छी...जकरा युनिट के अनेक बेर कमांडर-इन-चीफ माने माननीय राष्ट्रपति महोदय सम्मानित क’ चुकल छथिन; ओ अति प्रसन्न भेला। ओ सेल्फ-डिफेंस लेल हथियार खरीद’ चाहैत रहथि । तैं ओइ ठाम पंहुचैक देरी छै...डा.मेहरोत्रा स’ की एप्वायंटमेंट लेता....पांच मिनटक त’ काज ! बाबू , भले हिनका सनक लोक सब सीमा पर नंइ लडैत अछि, मुदा कि हिनका लोकनि सन लोक ज राति-दिन नंइ खटै, नंइ पसेना बहबे, त’ की सीमा पर फौज लडत...? किन्नहु ने। कारगिल युध्धक समय....कैक महीना तक कहां क्यो औफ लेलक...अहर्निश कारखाना चलैत रहलइ। समय-समय के बात...” बाबा ! कने आगाँ बढियौ । हमरा सब लए जगह छोडबैक कि नंइ ?” ओ धडफडा गेला । धडफडा क’ ओ दुनू छौंडा स’ कने बेसिये दूर चल गेल छला । यैह, अही सब ठाँ अपन सवारीक कमी खलै छै...की ओ सत्ते एहन भ’ गेला अछि जे ई दुनू छौंडा हुनका स’ काकु करनि ? माने एहन बूढ...नंइ-नंइ एखन त’ रिटायरे केलनि अछि….एखनो टी-शर्ट धारण करै छथिन त’ की कहै छैक...बाइसेप्स—ट्राइसेप्स बांहि मे उछलि जाइ छनि । अपन समयक नीक टेनिसक खेलाडी, एक समय मे हिनका संगे एक्को सेट खेलाइ लए क्लबक सब (पढल जाय सुंदरी सब) लालाइत रहैत छल। से धरि ठीके ; जे केलखिन ताहि मे हरदम औव्वलि...हरदम अलग...सब स’ नीक । से आइ ओ एना कियैक सोचि रहला अछि ? ओ ‘रिटायर्ड’ भेला अछि ‘टायर्ड’ नंइ ?आइकाल्हि साठि कोनो वयस भेलै ? मुदा एकटा बात ! ओ सेवा समाप्त भेला स’ पहिनंहे ई रिटायरमेंटक समय कोना कटता तकर सब बेवस्था क’ लेने रहथि । एत्ते तक जे बुढारी मे बेटा सबहक आगाँ हाथ ने पसार’ पडनि तकर नीक इन्त्जाम ओ बहुत पहिनहें क’ लेने रहथि...इहो सोचने रहथि जे ओ कोनो बेटाक आश्रम मे ताबे तक नंइ रहता,जाबे शरीर की समय सकपंज नंइ क’ दनि। ताबे कथी लए ककरो पर भार बनथिन......... “औ बुढा ! कत’ जैब ? आब त’ अंतिम स्टौप आब’ बला छै ?” मोन त’ पितेलनि। मोन भेलनि जे ठांइ-पठांइ किछु कहि दियनि तेहन, जे फेर अनटोटल बजबे बिसरि जाथि ई तेजस्वी नवयुवक ! मुदा बात बढेबा स’ की फैदा ? एखन काल्हि तक एहन-एहन मथदुक्खा सब स’ बांचल रहै छला...गाडी रहै छलनि । नंइ जानि कियैक, नौकरी जाइ स’ बेसी आहि-- हुनका सर-कारी गाडीक सुविधा खतम भ’ जेबाक अबै छलनि । डा. मेहरोत्रा हिनका चिन्हैत रहथिन, मुदा सब त’ नंइ चिन्हैत रहनि। बस स’ उतरि क’ अस्पताल पंहु--चैत-पंहुचैत पसीना स’ भीज गेल रहथि। पैर पटकि क’गर्दा झाडिते छला---‘एत्त’ एना जुत्ता झाडै छी,से कने बाहरे बढि क’ झाडितंहु से नंइ ?” बजै बला कंपाउंडर सनक लगलनि । सपरतीव केहन !हिनका शिक्षा द’रहल छनि । “डा. साहेब कखन एथिन ?” ओ बात के नंइ सुनैत बजला । “समय भ’गेलनि अछि, अबिते हेता । से कियैक देखेबै ?” “हं, हमरा पेसमेकर लागल अछि....” “से त’ बड बेस, मुदा नंबर लगेने छी ने ?” “डा. साहेब अपेक्षित छथि....तैं ! “तखन त’ नंइ देखायल भेल आइ “ “से कियैक ?” “केहनो अपेक्षित क्यो कियैक ने होथि---डाक्टर साहेब बिनु नंबरे नंइ देखै छथिन ।“ ताबे डा.साहेब के गाडी पोर्टिको मे आबि क’ लागल। ई लपकि क’ आगाँ बढला जे कहीं बाटहि मे काज बनि जानि । मुदा डाक्टर एको बेर नजरिओ उठा क’ हिनका दिस तकबो ने केलखिन त’ हिनका बड आश्चर्य लगलनि। मर, ओना घुठ्ठी-सोहार छलनि, क्लिनिक मे अबिते की भ’ गेलनि, एक बेर ताकियो लितथिन ने त’ कने सांत्वना भेटितनि । मुदा डाक्टर त’ घाड निहुरेने तेना गेलखिन जेना कि कहियो देखनंहु ने होथिन। बेस, हारि क’ ओ बडा याचनाक स्वर मे कंपाउंडर के कहलथिन जे ओ सेनाक कारखाना मे एम.डी.क पद पर स’ हाले रिटायर भेला अछि...बिच्चे मे ओ कंपाउंडरबा बात के लोकति कहकनि--“ अपने एम.डी. रहियै ने, आब नंइ ने छियै....अइ पुर्जा पर अपन नाम आ पता लिख दियौ बाबू साहेब ! चौथा दिन फोन करि क पूछि लेबै...लंबर आबि जायत।“ ….ताबे बाहर कोनो गाडी के रुकब आ चपरासी आ सिक्योरिटी के दौडति देख बुझबा मे भांगठ नंइ रहलनि जे बाहर कोनो भी.आइ.पी.क गाडी लगलै । भी.आइ.पी. के रहथि से ई की जान’ गेलथिं। ई त’ साढे चौबीसे वर्षक वयस मे पूना मे जे नौकरी धेलनि से आब यैह रिटायर भेलाक बाद घुरला अछि । अइ ठामक सब वस्तु तैं ने अनचिन्हार लगै छनि ।फेर भी.आइ,पी. आ हुनका संगे अनेकानेक चमचाज़ एन्ड लगुआ-भगुआ के सड-सडायल डाक्टरक चेम्बर मे ढुकति देखलखिन-- मोन खट्टा भ’ गेलनि । बगल मे ठाढ लोक स’ पुछलखिन त’पता लगलनि जे ई अइ ठामक मेयर सैहेब छथि; आइ.ए.एस. ! हिनका पुर्जा कटेबाक कि लाइन मे लगबाक कोनो जरूरति नंइ ? कियैक त’ ई आइ.ए.एस. अहि ठामक मेयर साहेब छथि ।कियै; अपने जखन एम.डी. रहथि त’ अपने ई सुख नंइ भोगने रहथि की ? अपने प्रश्न पर सहमि गेला ओ ! चारू कात हियासलखिन....सबतरि निश्चिंतता पसरल छलै । ने हर्ष आ ने विस्मय । पेशेंट सब पैर मोडि क’ कुर्सी पर बैसल, गपियाति किछु गोटे हफियाति आ किछू झुकति । अजीब लगलनि हुनका। जेना समय रुकि गेल हुए । जेना एत्तुक्का सब गोटे मिलि क’ समय के ठुठुआ देखा रहल हुए। अपन-अपन दहिना हाथ सामने तनने, औँठा के बामा-दहिना घुमबति । डक्टरक चेम्बर स’ गल्ल—गुल्ल आ ठहाका । एत्ते लोक इम्हर मांछी मारैत अछि त’ मारौ । आगंतुक मेयर छियै, भ’ सकैत छै डाक्टरक दोस्त हुए । एतबा त’ सब दोस्त एक दोसरा लए करै छै। “की गुन-धुन मे लागल छी यौ बाबा ?” कंपाउंडर हिनका दिस आंखि गुडारि क’ देखलक---“ किछु करब ‘डाक सैहेब, बिनु नंबरे किन्न्हु नंइ देखता ।“ हुनका मोन मे एलनि कि आइ स’ किछुए दिन पहिने अइ तरहक लोक के अइ तरहे बजबाक साधंस होइतै ? से छोडूने ! डक्टरबेक ई हिम्मति होइते जे एना भावे ताच्छिल करैत...जेना हम त कहियो किछु रहबे ने करी...हमरा स’ त’ ओकरा कहियो भेंटो नंइ....आदि इत्यादि बात सोचैत ओ तय केलनि जे आब फेर कहियो एकरा क्लिनिक पर पैर ने देता । हुनका लगलनि जे डाक्टर मेह्रोत्रा स’ देखेबाक हुए त’ दुखित पडै स’ तीन मास पूर्वहिं नंबर लगा लिय’,नंइ त’ जाबे डाक्टरक नंबर आओत ओइ स’ पहिने भगवानक घरक नंबर आबि जेतै कारनीक । ई सब सोचैत, आजुक दिन आ आजुक जमाना के मोन भरि गरियबैत आ श्राप दैत ओ फैसला केलनि जे मौगी छैक त’की हेतै ? अपन अस्पतालक डा.यास्मीन नीक डाक्टर छथि। हुनके स’अपन रूटिन चेकप करेता । ओना ओ स्वस्थ छथि, मुदा शरीर त’ अबल भैये गेलनि। जखने देहके काट—खोंट भेल, कि फेर पहिने बला बात नंहि ने रहि जाइ छै ?से त’ पचपने मे सीवियर नंहि त’ माइल्ड धरि हर्ट एटैक रहबे करनि; तीन घंटा पर होश आयल रहनि। फेर मोन पडलनि आइ-काल्हुक रंग—ताल । आब कोनो डाक्टरक पुर्जा ल’ क’ कत्तौ दबाइ नंइ खरीदल जा सकैत अछि। जै मोहल्लाक डाक्टर ओही मुहल्लाक दबाइक दोकान मे हुनकर लिखल दबाइ भेटत । तैं सोचलनि जे दबाइ खरिदिये क’ जाथि । मुदा ओत्तुक्का भीड....बापरे! कत्ते लोक दुखीत पडैत छैक ? काल्हि तक ई फार्मेशियोक मुंह ने देखने रहथिन । आब लाइन मे लाग’ पडतनि। अइमे त’ सांझ भ’ जेतनि ? से जे भ’ जाउन ! आइ आब रत्तन सिंघ की रामगुलाम लाल “बाडाबाबू” नंइ छथिन-- जे सब काज ‘साम दाम दंड भेद” ,माने जे कोनो ने कोनो प्रकारे कैये या करवाइये लैत रहथि...आब ओ स्वंय छथि, सब मोर्चा पर पुनश्च असकर, नितांत एकसर । मुदा ई काज हुनका कर’ पडतनि । संभवतः तीस-चालिस वर्षक बाद फेर स’ हुनका लाइन मे लाग’ पड--तनि ? अत्यंत कटु सत्य यैह छियै---“ एना कछ-मछ कियै क’ रहल छी बुढा...कलमच रहब से नंइ ?”क्यो हिनका नसीहत देलकनि। पांच बाजि गेलै जखन हिनकर हाथ मे मास दिनुका दबाइ एलनि।रौद एखनंहु मुंह पर थापड जेकाँ लागि रहल रहै। घर मुंहा जैं भेला कि सामने स’ खाली औटो जाइत देखखिन । हाथ देलखिन, बैसला आ पांचो डेग ने औटो गेल हेत जे दू टा बलिष्ट कसरतिया जवान हिनका रौद दिस ठेलैत बैस’लगलनि त’ ई ‘हां-हां’ कर’ लगला।मुदा हिनकर ;हाँ-हाँ’ के ओ दुनू पर कोनो प्रभाव नंइ पड्लै ।ओइ मे स’ जकरा गरा मे ताबीज रहै से हिनका कने आर रौद मे ठेलति बिहुंसलनि आ कहलकनि---“बहुत दिन छाहरिक सुख भोगलें बबा ! आबे हमरा सिनी जुआन-जहान के नम्मर छै ।“ आ दुनू ठठा क’ हंसि देलकनि। नवेन्दु कुमार झा रेल लाइनसँ जुड़त भारत आ नेपाल पड़ोसी देश नेपालक संग दोस्तीकेँ आर मजगूत करबाक लेल भारतीय रेल नेपालमे रेल लाइन बनाओत। एक दोसराक संग सहयोग बढ़ेबाक उद्देश्यसँ बनएबला ई रेल लाइन भारतमे मधुबनीक जयनगरसँ नेपालक बरदीवासक मध्य बनाओल जाएत। ई नव रेल लाइन सत्तरि किलोमीटरक होएत, जकर स्वीकृति रेल मंत्रालय दऽ देलक अछि। एहि नव रेल लाइन बनबऽ मे गोटेक चारि सौ सत्तरि करोड़ टाका खर्च होएबाक अनुमान अछि। एकर काज प्रारम्भ करबाक लेल मंत्रालय दस करोड़ टाका दऽ देलक अछि आ वित्तीय वर्ष २०११-१२ मे एकर काज प्रारम्भ भऽ जाएत। ई रेल लाइन दू चरणमे पूरा होएत। पहिल चरणमे जयनगर आ जनकपुरक मध्य तीस किलोमीटर छोटी लाइनक आमान परिवर्तन होएत आ दोसर चरणमे जनकपुरसँ बरदीवास धरि नव रेल लाइन बनेबाक काज प्रारम्भ होएत। नव रेल लाइनक वास्ते जमीन अधिग्रहणक काज जल्दीए प्रारम्भ होएत। भारतीय सामाजिक व्यवस्थामे आइयो जीवन्त अछि जाति व्यवस्था- प्रो. शर्मा दरभंगा स्थित ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालयमे महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह स्मारक व्याख्यानमाला सम्पन्न भेल। एहि व्याख्यानमालाक मुख्य वक्ता राजस्थानक प्रतिष्ठित नेशनल ओपन यूनिवर्सिटीक कुलपति आ जानल-मानल समाजशास्त्री प्रो. के.एल.शर्मा कहलनि जे भारतीय सामाजिक व्यवस्थामे जाति व्यवस्था नियंत्रण बल अछि। श्री शर्मा कहलनि जे सामाजिक व्यवस्थामे आइयो जाति व्यवस्था प्रत्यक्ष आ जीवन्त अछि आ एकटा व्यवस्थाक रूपमे बदलाब अनबाक प्रयास करैत अछि। ओ कहलनि जे देशक राजनीतिक व्यवस्था सेहो जाति व्यवस्थाकेँ जीवन्त रखबामे महत्वपूर्ण भूमिकाक निर्वाह कएलक अछि। वर्ष १८९१ सँ १९३१ धरि सरकारी स्तरपर जाति व्यवस्थाक श्रेणीकरणक काज कएल गेल। स्वतंत्रता प्राप्तिक बाद १९५१ जनगणनामे जातिकेँ छोड़ि देल गेल मुदा एक बेर फेर राजनीतिक उद्देश्य आकि विवशताक अन्तर्गत जाति गणना करेबापर सहमति बनल अछि। ओ कहलनि जे सामाजिक परिवर्तनक संग-संग अहूमे बदलाव आएल अछि मुदा एकर बावजूद आइयो एकर सातत्व कायम अछि। व्याख्यानमालाक अध्यक्षता भारतीय प्रशासनिक सेवाक सेवानिवृत्त अधिकारी एस.एन.सिन्हा कएलनि। प्रदेशमे लागत चौदहटा नव उद्योग समूह, असोचैम कएलक एहि दिस पहल- मिथिलांचलमे सेहो लागत नव उद्योग बिहारमे मुख्यमंत्री नीतीश कुमारक नेतृत्वबला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधनक दोबारा आपसीक संगहि देशक उद्योग जगतक नजरि बिहारपर पड़ल अछि। देशक औद्योगिक संगठन “एसोचैम”प्रदेशमे अगिला तीन वर्षमे तीनटा “बिजनेस मार्ट”क माध्यमसँ चारि लाख टाकाक निवेशक योजना बनौलक अछि। एसोचैम बिहार चेम्बर ऑफ कामर्स (बी.सी.सी.) आ बिहार इन्डस्ट्रीज एसोसिएशनक सहयोगसँ ई बिजनेस मार्ट आयोजित करत। पहिल बिजनेस मार्ट अप्रील २०११ मे होएत जाहिमे पचास हजार करोड़ टाकाक निवेशक लक्ष्य राखल गेल अछि, जखनकि २०१३ मे आयोजित होमएबला दोसर मार्टमे एक लाख पचीस हजार करोड़ टाका आ वर्ष २०१५ मे आयोजित होमएबला तेसर मार्टक माध्यमसँ पचहत्तरि करोड़ टाकाक निवेशक लक्ष्य राखल गेल अछि। ई संगठन चेम्बर ऑफ कामर्स आ इन्डस्ट्रीज एसोसिएशनक सहयोगसँ चौदह टा नव उद्योग समूह दरभंगा, मुजफ्फरपुर, मधुबनी, बरौनी, कटिहार, भागलपुर, मुंगेर, सुपौल, हाजीपुर, पटना, नवादा, गया आ भोजपुरमे स्थापित करत, जाहिमे सभ उद्योग समूहमे अठारह सौसँ दू हजार नव औद्योगिक इकाइ रहत। एहिसँ सरकारकेँ गोटेक बारह प्रतिशत राजस्व भेटत। गोटेक चरि सौ पचास करोड़ टाकाक निवेशबला सभ प्रस्तावित उद्योग समूह गोटेक छह लाख लोककेँ परोक्ष अथवा अपरोक्ष रूपसँ रोजगार उपलब्ध कराओत। एसोचैम सरकारसँ प्रदेशमे “क्लस्टर्स डेवेलपमेन्ट अथोरिटी”क स्थापनाक मांग सेहो कएलक अछि। मतदाता सभक उत्साह मध्य सम्पन्न भेल तीन चरणक मतदान- राजनीतिक दलक बेचैनी बढ़ौने अछि मतदाताक चुप्पी बिहार विधान सभाक छह चरणमे होमएबला मतदानक लेल तीन चरण मतदानक काज समाप्त भऽ गेल। तीन चरणमे भेल मतदानमे१३० विधान सभा क्षेत्रमे २०३९ उम्मीदवारक भविष्य मतदाता इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन (ई.वी.एम.) मे बन्द कऽ देलनि अछि। कड़गर सुरक्षा व्यवस्थाक मध्य किछु छिटपुट घटनाकेँ छोड़ि मतदान शान्तिपूर्वक सम्पन्न भेल। एहि बेरक चुनावमे मतदाता सभमे सेहो उत्साह देखल गेल। पाबनि-तिहारक मध्य सम्पन्न भेल मतदानमे पहिल चरणमे ५४.३१ प्रतिशत, दोसर चरणमे ५२.५५ प्रतिशत आ तेसर चरणमे ५३.६६ प्रतिशत मतदाता अपन मताधिकारक प्रयोग केलनि। एहि मध्य चारि चरणक लेल १ नवम्बरकेँ होमएबला मतदानक लेल चुनाव प्रचारक काज सम्पन्न भऽ गेल अछि तँ पाँचम चरणमे ९ नवम्बरकेँ होमएबला मतदानक लेल सभ दल आ उम्मेदवार प्रचारमे अपन पूरा ताकत लगौने छथि तँ छठम आ अन्तिम चरणक मतदानक लेल नामांकन लेल नामांकन पत्र भरबाक काज चलि रहल अछि। अंतिम चरणमे २० नवम्बरकेँ मतदान भेलाक बाद २४ नवम्बरकेँ मतगणनाक संगहि बिहारमे नव सरकारक स्थिति स्पष्ट होएत। एहि बेरक चुनावमे मुख्य मोकाबला सत्तारूढ़ जद-यू भाजपाक राष्ट्रीय गठबंधन आ राजद-लोजपा गठबंधनक मध्य अछि आ गोटेक दू दशकक बाद असगर सभ २४३ सीटपर चुनाव लड़ि रहल कांग्रेस एकरा त्रिकोणीय बनेबाक लेल प्रयास कऽ रहल अछि। तीनू चरणक मतदानमे मतदाता जाहि तरहेँ मौन राखि मतदान कएलनि अछि ओहिसँ सभ राजनीतिक दल आ उम्मीदवारक होश उड़ल अछि। पहिल चरणमे आठ जिलाक ४७ विधानसभा क्षेत्रमे, दोसर चरणमे छह जिलाक ४५ विधानसभा क्षेत्र आ तेसर चरणमे छह जिलाक ४८ विधानसभा क्षेत्रमे मतदान कराओल गेल अछि तँ चारिम चरणमे आठ जिलाक ४२ विधानसभा क्षेत्रमे १ नवम्बर, पाँचम चरणमे आठ जिलाक ३५ विधानसभा क्षेत्रमे ९ नवम्बर आ छठम चरणमे पाँच जिलाक २६ विधानसभा क्षेत्रमे २० नवम्बरकेँ मतदान काअओल जाएत। तीन चरणक मतदान- एक नजरिमे पहिल चरण दोसर चरण तेसर चरण कुल जिला ८ ६ ६ विधानसभा क्षेत्र ४७(८ सुरक्षित) ४५(६ सुरक्षित) ४८(७ सुरक्षित) कुल मतदाता १०७००७९७ ९८४४९८१ १०३७६०२२ मतदानक प्रतिशत ५४.३१ ५२.५५ ५३.६६ उम्मीदवारक संख्या ६३१ (५२ महिला) ६२३ (४६ महिला) ७८५ (६५ महिला) कुल मतदान बूथ १०८६८ (४१४ अतिरिक्त) १०३१५ ८४२६ कुल मतदान केन्द्र ८८६८ ९९५२ १०८१४ कुल बैलेट यूनिट १३७६० १३६७४ १६६७१ तीन चरणमे दलीय उम्मीदवारक संख्या पहिल चरण दोसर चरण तेसर चरण भारतीय जनता पार्टी २१ १७ २४ जनता दल यूनाइटेड २६ २८ २४ राष्ट्रीय जनता दल ३१ ३४ ३५ लोक जनशक्ति पार्टी १६ ११ १३ राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ३३ ३१ ३८ बहुजन समाज पार्टी ४५ ४५ ४८ भाकपा ११ ०८ १० माकपा ०७ ०८ ०५ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ४७ ४५ ४८ निर्दलीय २३८ २२८ ३५४ आन दल १५६ १६८ १८६ बिहारमे मतदानक प्रतिशत (विधानसभा) १९५२-४२.०५ १९५७-४१.७२ १९६२-४६.९७ १९६७-५१.४९ १९६९-६२.७८ १९७२-५२.७९ १९७७-४९.७२ १९८०-५७.३३ १९८५-५४.३९ १९९०-६२.०४ १९९५-६१.७९ २०००-६७.५७ २००५ फरवरी- ४६.२५ २००५ नवम्बर- ४७.०३ २०१० (पहिल तीन चरणमे)-५३.३६ राहुलक मिशन बिहारसँ बढ़ल सत्ता आ विपक्षक परेशानी:मिथिलांचलक भूमिसँ कांग्रेसक युवराज कएलनि चुनावी शंखनाद अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटीक महासचिव राहुल गाँधी मिथिलांचलसँ कांग्रेसक चुनावी अभियान प्रारम्भ कऽ सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धनक घटक भाजपा आ जद यू तथा विपक्षी राजद-लोजपा गठबंधनक बेचैनीकेँ बढ़ा देलनि अछि। पछिला दू दशकसँ प्रदेशक राजनीतिमे कतिआएल कांग्रेसक युवराज श्री गाँधी मिशन बिहारक अन्तर्गत पार्टीक नेता सभकेँ सक्रिय कएने छथि। एहिसँ पहिनहु श्री गाँधी बिहारक दौरापर आएल छलाह तँ मिथिलांचलक हृदयस्थली दरभंगाक दौराक बिहार राजनीतिक हबा-बयार नेने छलाह। हुनक ओहि दौराक बाद प्रदेशमे कांग्रेसक प्रति आकर्षण बढ़ल अछि। संगहि युवा कांग्रेसक पदाधिकारीक मनोनयनक जे परम्परा छल ओकरा समाप्त कऽ सीधा चुनाव जे करौलनि एहिसँ प्रखण्ड स्तरसँ प्रदेश स्तर धरि युवा नेताक नव समूह ठाढ़ भेल अछि आ ई कांग्रेसक भविष्यक रूपमे अछि। श्री गांधीक बिहार दौराक संगहि प्रदेशमे चुनाबी अभियान प्रारम्भ भऽ गेल। ओ अपन एक दिवसीय दौराक क्रममे कोसी क्षेत्रक सहरसा आ समस्तीपुरमे जनसभाकेँ संबोधित कएलनि। श्री गांधी एहि दरमियान पूरा तरहे युद्धक लेल तैयार बुझि पड़लाह। ओ एक दिस मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आ हुनक सरकारपर हमला कएलनि तँ दोसर दिस एहि बेरक चुनावमे महत्वपूर्ण भूमिकाक निर्वाह करबाक लेल तैयार युवा पीढ़ीकेँ संग जोड़बाक प्रयास सेहो कएलनि। ओ स्वीकार कएलनि जे बिहारमे एखन कांग्रेस कमजोर अछि। मुदा एहि लेल बेसी चिन्ता नहि करबाक अछि। ओ कहलनि जे उत्तरप्रदेशमे सेहो हम जखन प्रयास प्रारम्भ कएने छलहुँ तँ लोक हँसी उड़ौने छल। ओ जनताकेँ विश्वास देऔलनि जे किछु समए तँ जरूर लागत मुदा जमीनी स्तरक समस्या आ गाम घरक बात पटना धरि जरूर पहुँचत। ओ युवा दिस संकेत करैत कहलनि जे बिहारमे जे पछिला बीस वर्षसँ परिस्थिति बनल अछि ओकरा बदलबाक लेल आगाँ आबथि आ एकटा युवा सरकार बनाबथि। एहि लेल युवाकेँ आगाँ आनल जाएत आ थकल लोककेँ कतियाकऽ एकटा विकसित बिहार बनाओल जाएत। कांग्रेस महासचिव एहि दौराक बाद राजनीतिक बजार गर्म होएब स्वाभाविक अछि। दरअसल एहि बेर राजनीतिक गठजोड़ आर मजगूत भऽ रहल अछि। ओना मुख्यमंत्री नीतीश कुमार विकासक मुद्दापर चुनाव लड़बाक बात कहि रहल छथि मुदा ओ भीतरे-भीतर महादलित आ अति पिछड़ाक रूपमे एकटा नव वोट बैंक तैयार कऽ राजद आ लोजपा गठबंधनकेँ चुनौती दऽ रहल छथि तँ दोसर दिस राजद आ लोजपाक पी एम आर वाइ समीकरणक माध्यमसँ जद यू आ भाजपाक मोकाबला करबाक स्थितिमे अछि। एहि राजनीतिक समीकरणक मध्य जे सभसँ महत्वपूर्ण भऽ गेल अछि ओ अछि सवर्ण मतदाता, जाहिपर भाजपा-जद यू आ राजद-लोजपा दुनूक अछि आ कांग्रेसक एहि वर्गमे भऽ रहल घुसपैठ दुनू गठबंधनक लेल खतराक घंटी बनि गेल अछि। राहुल गाँधीक किछु मास पहिने भेल बिहार दौराक केन्द्रमे युवा शक्ति छल आ ओ सभ ठाम युवा सभसँ सीधा संवाद कएलनि। एकर परिणाम सेहो सोझाँ आएल अछि। बिहारमे पछिला बीस वर्षसँ घेराएल पंजा छापबला झण्डा एखन गामे-गाम देखल जा रहल अछि। एकर अर्थ ई नहि जे कांग्रेस सरकार बनेबाक स्थितिमे आबि गेल अछि। मुदा वर्तमान राजनीतिक हवा जे चलि रहल अछि आ ई चलैत रहल तँ अगिला विधान सभाक चुनावमे कांग्रेस सत्ता सन्तुलन करबाक स्थितिमे अवश्य रहत। पार्टीक सूत्रसँ जे जनतब भेटि रहल अछि ओ संकेत करैत अछि जे पार्टी आलाकमान एहि बेर गोटेक १३० सीटपर गम्भीर रूपसँ चुनाव लड़त आ बाकी बाँचल ११३ सीटपर ओ अपन शक्ति बढ़ेबाक लेल चुनाव लड़त। कांग्रेसक ई रणनीति राजग आ राजद-=लोजपाक लेल खतरा बनि सकैत अछि। ओना बेसी खतरा भाजपा आ जद यू गठबन्धनकेँ अछि। एकर परिणाम सेहो सोझाँ आबि गेल अछि। लोकसभा चुनावमे कांग्रेस कतिया गेल छल मुदा ओकर बाद भेल विधानसभाक उप चुनावमे अठारह सीटपर एसगर लड़ि दूटा सीटपर विजय प्राप्त कऽ भाजपा-जद यू केँ कतिया देलक जकर लाभ राजद आ लोजपाकेँ भेल। बिहार प्रदेश कांग्रेसक राहुल गाँधीपर भरोसा अछि तँ राहुलक नजरि बिहारक युवापर अछि। जातिक मजगूत राजनीतिबला एहि प्रदेशमे कांग्रेसक रणनीतिक अनुरूप जातीय हवा चलल तँ एहि बेरक विधान सभा चुनावमे बिहारक युवा राहुलक लेल आगाँक रस्ता तैयार कऽ सकैत छथि। दू वर्ष पूरा कएलक मैथिली दैनिक मिथिला समाद दू वर्ष पहिने कोसी क्षेत्रमे कुसहाक टूटल तटबन्धसँ भेल प्रलयक बाद एहि क्षेत्रक दशा-दिशा बदलि गेल छल तँ एहि दुर्दशाक अबाज बनि कऽ देशक पहिल मैथिली दैनिक “मिथिला समाद” सोझाँ आएल। ३१ अगस्त २००८ केँ प्रवासी मिथिला समाजक प्रयासक बाद एहि दैनिकक प्रकाशन मैथिली पत्रकारिताक एकटा नव अध्याय प्रारम्भ कएलक। एहि दैनिककेँ मैथिलीभाषीक भेटल स्नेहक बदौलति निर्बाध रूपेँ प्रकाशित होइत दू वर्ष पूरा करएमे सफलता भेटल। मैथिली पत्रकारिताक शून्यताकेँ तोड़ि मिथिलांचल आ प्रवासी मिथिला समाजक जन समस्याकेँ सोझाँ अनबाक लेल सतत प्रयत्नशील अछि। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी मैथिलीकेँ संविधानक अष्टम सूचीमे सम्मिलित कऽ सम्मान देलनि तँ पत्रकारितासँ जुड़ल कोलकाताक राजेन्द्र नारायण वाजपेयी मैथिली भाषामे ताराकान्त झाक सम्पादकीय दायित्व मिथिला समादक प्रकाशन कऽ एहि भाषाक मान बढ़ौलनि अछि। मैथिलीमे दैनिक समाचार पत्रक प्रकाशन हो एहि लेल बिहारक राजधानी पटना आ मिथिलांचलमे कतेको बेर मंथन भेल मुदा ओकर कोनो सार्थक परिणाम एखन धरि सोझाँ नहि आएल अछि। आखिरकार प्रवासी मिथिला समाजक प्रयास सफल भेल आ मिथिला समाद डेगा-डेगी दैत दू वर्षक भऽ गेल। ओना कोनो भाषामे दैनिक पत्रक प्रकाशन कठिन काज अछि ओहूमे मैथिली भाषामे पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन कल्पना मात्र कएल जा सकैत अछि तथापि प्रवासी मैथिल हिम्मत देखौलनि अछि। प्रवासी मैथिलक प्रयाससँ कोलकातासँ प्रकाशित दैनिक मिथिला समाद आ नव दिल्लीसँ गजेन्द्र ठाकुरक सम्पादनमे उपलब्ध ई-पत्रिका “विदेह” मैथिली पत्रकारिताकेँ आक्सीजन दऽ जीवित रखने अछि। अल्प संसाधन आ सीमित पाठक वर्ग होएबाक बादो मैथिली भाषी प्रबुद्ध पाठकक बले ठाढ़ भेल अछि। मैथिल समाजक सुधि पाठकक स्नेहक परिणाम अछि जे एकटा गएर मैथिल एहि दैनिकक लेल संसाधन उपलब्ध करा मैथिली पत्रकारिताक भोथ भेल धारकेँ तेज कएलनि अछि आ ई मिथिलांचल आ प्रवासी मैथिल समाजक सशक्त अबाज बनबाक प्रयास कऽ रहल अछि। ज्योँ एहिना पाठकक स्नेह आ सहयोग भेटैत रहल तँ लोकतंत्रक चारिम खम्भा मजगूत होएत आ मिथिलांचलक चतुर्दिक विकासक रस्ता निकलत। संगहि मैथिली पत्रकारिताक क्षेत्रमे एकटा नव युग प्रारम्भ होएत। देवशंकर नवीन (१९६२- ), ओ ना मा सी (गद्य-पद्य मिश्रित हिन्दी-मैथिलीक प्रारम्भिक सर्जना), चानन-काजर (मैथिली कविता संग्रह), आधुनिक (मैथिली) साहित्यक परिदृश्य, गीतिकाव्य के रूप में विद्यापति पदावली, राजकमल चौधरी का रचनाकर्म (आलोचना), जमाना बदल गया, सोना बाबू का यार, पहचान (हिन्दी कहानी), अभिधा (हिन्दी कविता-संग्रह), हाथी चलए बजार (कथा-संग्रह)। बिलाड़ि हम जइ घरमे सुतै छी, तकर पछिला देबालमे बड़ी टा खिड़की अछि। ताहिसँ बाहर एक टा छहरदेवाली। ओइ छहरदेवाली पर कैक टा मैना एक संगे क्रिक्-क्रिक् करैत चहचहा उठल। हम गाढ़ नीनसँ सूतल रही। एक टा अत्यन्त मनोहर सपना देखैत रही। नीन टूटि गेल। सपना भखरि गेल। हमर नीन बड़ दुलारू अछि। बहुत रास मान-मनौवलि केला पर अबैत अछि। तें ककरहु कोनो आचरणसँ काँच नीन टुटै’ए, तँ ओकरा पर बड़ तामस होइ’ए। नीन टूटि गेल, सपना टूटि गेल। ओइ भोर बड़ जोर तामस चढ़ल। नीन नँइ टुटितए त’ एखन आधेक घण्टा आओर सुतितौं। नीनों पूर भ’ जइतए, आ सपनो पूर भ’ जइतए। ई जनितो, जे सपना, सपने होइ छै, वास्तविकतासँ ओकरा कोनो सरोकार नँइ रहै छै, अहू वयसमे हमरा सपनासँ तरुणाइए जकाँ आकर्षण रहैत अछि। वास्तविक जीवनमे तँ वस्तुतः लोक विपत्तिक पहाड़ उघैत रहै’ए। सत्य पूछी तँ ओ विपत्ति मनुष्यक स्वप्नलोक धरि पर राज कर’ च’ल अबैत अछि। एहेन विकराल समयमे मनोहर सपना देखब कोनो उपलब्धिसँ थोड़ कहाँ होइत अछि!... से कहैत रही नीन टूटि गेल। सपना टूटि गेल। मैना-मैनी किलोलह मचा कए नीन तोड़ि देलक, सपना छीन लेलक। बड़ जोर रंज चढ़ल। मुदा ककरा पर तमसबितहुँ? मैनाकें की कहितिऐ? ओकरा हमर, आकि हमर नीन टूटि जेबाक कोनो खबरिओ कहाँ रहल हेतै? हमर रंजसँ ओकरा कोनो भय कहाँ होइत हेतै? क्रिक्-क्रिक्...के ताबड़तोड़ ध्वनिसँ धड़फड़ा क’ उठलहुँ। आँखि मीड़ि क’ खिड़कीक ओइ पार देखलहुँ। अचानक तामस निजा गेल, आ दृश्य नीक लागए लागल। कैक टा मैना रहै। हठात चहचही बन्द भ’ गेलै। सबटा मैना एकाएकी ओतएसँ सहटि गेल। मात्रा दू टा रहि गेल। दुनूक आवाज क्रमे-क्रमे मधुर होअए लगलै। दुनू अपन-अपन लोलसँ एक दोसरकें गुदगुदी लगबए लगलै। पक्षी-विज्ञानी त’ नँइ छी, तें सामान्यतया पक्षीमे न’र-मादाक ज्ञान हमरा नँइ होइत रहै’ए, मुदा एक टा भ्रम हमरा सदति काल बनल रहै’ए, जे मनुष्यक अलावा समस्त जीवमे, सोहनगर आ मोहक बगए-बानि प्रायः न’रे के होइ छै। पता नँइ, हमारा ई भ्रम किऐ होइ’ए।...ओहू दिन अही भ्रमक आधार पर बुझाएल छल जे अइ दुनूमे सँ एक टा न’र थिक, एक टा मादा। दुनू प्रेमी-प्रेमिका थिक भरिसक। प्रेम क’ रहल’ए। बेरा-बेरी दुनू एक दोसरकें गुदगुदी लगबैक अवसर द’ रहल छलै। एक के गुदगुदीसँ दोसर हँसैत-हँसैत कनेक दूर धरि कुदकि कए पड़ा जाए; फेर दोसर सोह लगा क’ आबए आ पहिलकें गुदगुदी लगाबए। विलक्षण दृश्य लगै छल।... कतेक उन्मुक्त होइत अछि पक्षी। जखन चाहैत अछि, जतए चाहैत अछि, प्रेम क’ लैत अछि! कते नीक होइत अछि पक्षी समाज, जखन दू टा पक्षीकें प्रेम करैत देखलक, बाकी सब आस्ते-आस्ते टहलि गेल। अइ दुनूकें नीरव एकान्त द’ क’ स्वच्छन्द प्रेम करबाक अवसर द’ देलक। मुदा केहन होइत अछि मनुक्खक समाज, दू गोटए प्रेम करै’ए, तेसरकें खौंत बाड़ए लगै छै; कुल-मर्यादा, मान-सम्मानक नाम पर, जाति-धर्मक नाम पर ओकर हत्या क’ दै’ए। पहिलुका जमाना जकाँ आजुक मनुक्ख इच्छा रूपधारी होइतए, तँ अवस्से ओ प्रेम करबा लए क्रौंच-क्रौंची बनि जइतए, आ अही मैना-मैनी जकाँ रमण करितए। क्रौंच-क्रौंचीकंे तँ नँइ देखने छी। मुदा अइ दुनूक रासलीला देखि कए लगै’ए ओहो अहिना करैत रहल होएत, आ दोसर दिशसँ व्याधा आबि गेल होएतै। दुनूक अनुराग लगातार बढ़ल जा रहल छलै। आब दुनू गुदगुदीक खेल, मखौल, हास-परिहास छोड़ि कए निकट भ’ गेल छल। साँस रोकि कए हम एकटक देख’ लागल रही। दुनू एक दोसरसँ गरदनि मिला रहल छल...प्रायः दुनूक उत्तेजना तीव्र होइत जा रहल छलै... छपाक्...! ज्जाः! रंगमे भंग भ’ गेलै! अचानक बगलबला मकानक छज्जीसँ एक टा बिलाड़ि झपट्टा मारलक। मुदा ओइ दुष्ट बिलाड़िक दुष्टता पूर्ण नँइ भेलै। एकटा प्रेमकथाकें देखबाक हमर तल्लीनता अइ वज्राघातसँ टूटि कए बिखरि गेल छल; मुदा मैना-मैनीक सतर्कतासँ अत्यन्त प्रसन्नता भेल। ओही प्रसन्नताक कसोहमे हम अपन सपनामे घुरि आबए चाहैत रही। मुदा सपना देख’ लेल तँ फेरसँ नीन चाही, से तँ अछिए नँइ...! मैना-मैनीक प्रेमकें लाख-लाख शुभकामना, ओइ बिलाड़िकें परम धिक्कार!... मोटर साइकिल पहिले बेर जहिया भौजीकें देखलिअनि, हमर आँखिक आकार ओही दिनसँ बढ़ि गेल। ओइसँ पहिने एते सुन्नरि स्त्री हम कोनो फोटोओमे नँइ देखने रही। तकिते रहि गेल रही थोड़े काल धरि--बाप रे! ई सौन्दर्य! ई नाक-नक्श, एहन केश, एहन भौंह, एहन आँखि, एहन ठोर, एहन बाँहि, एहन अँगुरी! छूबि क’ देखतिअइ कने!... मुदा एहि तरहें अखियासि कए देखबाक हमर करतबकें भौजी लक्ष्य क’ गेल रहथि, से हम ग’र केने रही। कोनो हाट-बजार रहितै तँ थोड़े काल भरिसक आओर हम देखैत रहि जैतौं। मुदा हम तँ अपन बरिष्ठ सहकर्मीक घ’रमे बैसल छलहुँ, आ हुनकर पत्नीकें देखि रहल छलहुँ। सन्तृप्त सौन्दर्यसँ तराशल भौजीक रूप-राशि भूख-पियास हरण करैबला छल। प्रसन्न होइथ त’ सिंगरहारक फूल बरसए, बिहुँसथि त’ बिजलौका चमकि जाए, हँसथि त’ जलतंरगक रागिनी पसरि जाए, सन्तूरक ध्वनि उमरि उठए, चलल आबथि त’ लागए जेना दुनियामे कोनो शुभ मुहूर्त्तक प्रवेश भ’ रहल अछि। लगमे ठाठ होथि, त’ लागए जेना कोनो अनन्त सुखक झमटगर छाहरिमे बैसल छी, आँखि उठा क’ ताकि देथि त’ ओइमे डूबि क’ कलमच सूति रहबाक इच्छा करए। तपस्वी, मनस्वीक समाधि हिला देब’वला देह सौष्ठव, आ कान्तिमय मुखमण्डल गढ़’मे विधाताकें कते समय लागल हेतनि! विधाता भरिसक बड़े मनोयोगसँ फुरसतिक क्षणमे हिनकर रचना केने हेताह। बाघ-सिंह सन खूँखार जानवर धरि हिनकर सौन्दर्य आ हिनकर व्यक्तित्वक सम्मोहनसँ वशीभूत भ’ जा सकैत अछि। एहने सौन्दर्य आ एहने व्यक्तित्वक सुकामा स्त्रीकें एक बेर पटनामे गाँधी मैदान बस स्टैण्ड पर देखने रही। वियोगीक संगें हम सहरसा जाइवला बसमे चढ़ल रही। एकटा स्त्री आबि कए हमर अगिला सीट पर बैसल। दुइए पल बाद ओ उठि गेल, बससँ उतरि गेल। हम कोनो जादूक अधीन बिना किछु बजने ओकर पाछू लागि गेलौं। वियोगी हमर अनुशरण केलक। बादमे वियोगी सबटा खेरहा सुनौलक। ओइ काल ओ हमरा बाधित नँइ करए चाहै छल। ओ स्त्री राँची जाइबला बसमे बैसि गेल। हम बगल बला सीट पर बैसि कए ओहि स्त्रीकें एकटक निहारैत रहलहुँ। मन्त्रमुग्ध भेल। पता नँइ ओइ स्त्रीकें देखि की की सोचैत रहलहुँ। बस स्टार्ट भेल, राँची दिश विदा भ’ गेल। वियोगी हाथ पकड़ि क’ घिचैत बाजल--ओकरा संगें राँची जाइ के छौ?... हमर भक्क टूटल। लजा गेलहुँ, फेर दुनू गोटए हँसैत पानक दोकान दिश गेलहुँ। कतोक दिन धरि वियोगी चौल करैत रहल...। सोचै छी, ओ स्त्री भैजिए त’ ने रहथि...! हिनको नैहर राँचीयेमे छनि। भौजीक मतलब हमर कोनो सहोदर अथवा अन्य पारम्परिक सम्बन्धें जेठ भाइक पत्नी नँइ! तइ अर्थें देखी त’ हम परम अभागल। सौंसे कुल-खानदानमे अपना पीढ़ीमे सबसँ जेठ हमही छी। कोनो पितियौत, पिसियौत, मसियौत, ममियौत हमरासँ जेठ नँइ छथि। तें हमरा जीवनमे अइसँ पहिने दीयर-भाउजक सम्बन्धक रंग ओतबे छल, जतबा अनुमान कएल जा सकै छल, अथवा यारी-दोस्तीमे लोकक मुँहें सुनल छल। एतए आबि क’ हमरा लेल भौजीक अर्थ बड्ड विराट भ’ गेल। भौजीक मतलब भौतिक विज्ञानक परम यशस्वी अध्यापक प्रोफेसर तापस चक्रवर्तीक सुकामा, नयनयभिरामा पत्नी सुवर्णा। प्रोफेसर तापस चक्रवर्ती विलक्षण लोक छथि, जेहने सुयोग्य अध्यापक, तेहने श्रेष्ठ मनुष्य। कर्मनिष्ठ एहेन जे आइ धरि कोनो छात्रकें हुनकासँ कोनो शिकाइत नँइ भेलनि। धुरझार ट्यूशन चलै छनि, मुदा तें शहरमे कियो ई नँइ कहताह जे ट्यूशनक कारणें कॉलेजमे गैरहाजिर रहै छथि, अथवा क्लासमे पढ़बै काल कोताही करै छथि। वयसमे हमरासँ दसेक बर्ख पैघ हेताह, मुदा से कहिओ बोध नँइ होअए देलनि। कोनो तरहक अहंकार हुनका स्पर्श धरि नँइ क’ सकल छल। सर्वदा, आ सर्वथा प्रसन्नचित रहै बला लोक। सौंसे कॉलेजक अध्यापक वर्ग हुनका दादा कहनि। हम शुरुह-शुरूमे स’र कहैत रहिअनि। बादमे आन लोकक तर्ज पर हमहूँ कौखन दादा कह’ लगलिअनि। सम्पर्क बढ़ल त’ बूझि सकलहुँ जे हुनकर समस्या हमरासँ विपरीत छलनि, हुनका जेठ हेबाक अपार सेहन्ता छलनि। बहुत अनुरागसँ एक दिन कहने रहथि--देब! अहाँसँ सम्पर्क भेलाक बाद हमरा होअ’ लागल अछि, जेना पछिला जनममे हमरा लोकनि सहोदर भाइ रहल होइ। एकदमसँ हमर अनुज जकाँ लगैत रहै छी अहाँ! हम हुनकर अनुरागक आदर करैत कहलिअनि--सर! नेह-प्रेम लेल कोनो पारम्परिक, वैधानिक अथवा रक्त सम्बन्धक अनिवार्य प्रयोजन थोड़े पड़ै छै! नेह लेल तँ मोनक मिलानी चाही, खानदानक मिलानीसँ प्रेमक अनिवार्य संगति कहाँ सम्भव होइ छै! ई त’ हमर सौभाग्य थिक जे अहाँ सन जेठ भाइक उदात्त स्नेह हमरा एते सहजतासँ भेटि गेल अछि। प्रोफेसर तापस चक्रवर्ती कहलनि--त’ तय रहल जे आइ दिनसँ अहाँ हमरा ‘सर’ नँइ कहब? तापस दा’ कहब? हम कहलिअनि--तय रहल! ताबत ओम्हरसँ प्रोफेसर साहेबक पत्नी चाह नेने, आ प्रसन्नताक अम्बार नेने उपस्थित भेलीह--तखन तँ हमरहु अहाँ आइ दिनसँ मैडम नँइ कहब? नोकरी ज्वाइन करिते देरी अइ कॉलेजक जते अध्यापक लोकनिसँ पहिल किस्तमे परिचय भेल, ताहिमे प्रोफेसर तापस चक्रवर्ती प्रमुख छथि। धीरे-धीरे ओ हमर शिक्षा-दीक्षाक पृष्ठभूमि जान’ लगलाह। पता लगलनि जे हम अगबे मैथिली नँइ, शुरुआती दौरमे साइन्सक छात्र रही, फलस्वरूप आपकता बढ़’ लगलनि। साँझ क’ संगें टहल’-बुल’ चलबाक नोत देब’ लगलाह। कॉलेज परिसरक सरोकार डेरा धरि आबि गेल। पहिल दिन, जहिया हुनकर डेरा पर चाह पीलौं, मोन गद्गद भ’ उठल। अलबत्त चाह बनबै छलीह हुनकर गृहिणी। भव्य व्यक्तित्व, अनिन्द्य सौन्दर्यक स्वामिनी, आ अपूर्व अनुरागमयी तँ ओ रहबे करथि, सम्पूर्ण पाक कलामे सेहो दक्ष रहथि। एहेन डेरामे बरमहल अबरजात राखब, हमरा सन पेटू आ चटोर लोक लेल कोनो अनकुरबी बात नँइ छल। बादमे तँ हम अपनहँु प्रयासें चाह, जलखै लेल ओम्हर टघरि जाइ, भनसा घ’रक अही प्रशंसाक दौरमे तापस दा’क पत्नीसँ परिचय बढ़ल, क्रमे-क्रमे हमहूँ हुनका संगे सहज होअ’ लागल रही। दुइए-तीन भेंटमे ओ हमर जनम-कुुण्डलीक सम्पूर्ण जानकारी जुटा लेलनि। कतए घ’र छी, घ’रमे के-के छथि, कोना पढ़ाइ-लिखाइ केलहुँ, कोना नेनपन बीतल, कोना किशोरावस्था, स’ख-सेहन्ता-स्वादक सीमा की अछि, केहन पुरुष पसिन पड़ै छथि, केहन स्त्री नीक लगै छथि, की पढ़बामे बेसी रुचिशील रहै छी, जीवनक की उद्देश्य अछि...स’ब प्रश्नक उत्तर ओ हमरासँ पूछि लेलनि। ह’म मुदा किछु नँइ पूछि सकिअनि। मात्र हुनकर प्रश्नक जवाब दिअनि, आ निरन्तर हुनका आ हुनकर व्यवहार-अनुरागकें देखी, ग’मी। हुनका सन स्त्रीसँ प्रश्न करब ने उचित छल, ने सम्भव। आँखि उठा क’ ताकि देथि त’ सब टा प्रश्न हेरा जाइ छल। तें हम कोनो प्रश्न नँइ करिअनि। हुनकर परम सौम्य आ सभ्य व्यक्तित्वक अछैत हुनका लग खुजै’मे हमरा थोड़े समय लागि गेल छल। से, एहेन स्त्री जँ एकटा अन्यार्थक सम्बोधन त्यागि क’ भौजी कह’ लेल प्रेरित करथि, त’ के एहेन अभागल हएत, जे मना करत! हम तत्काल उत्तर देलिअनि--आब तापस दा’ त’ स्पष्टे क’ देलनि! ओहुना अहाँकें मैडम कहैत हमरा नीक नँइ लगै छल। आइ दिनसँ अहाँ हमर भौजी भेलहुँ! तापस दा’ प्रसन्नतापूर्वक भौजीकें कनखी मारैत कहलखिन--लिअ’ एहेन सुरेबगर दीयर भेटलाह अछि, तैयो छुच्छे चाह! किछु नीक-निकुइत होइ एकरा संग! भौजी बजलीह--अहाँ हमर पावरकें चुनौती द’ रहल छी? -नँइ यै! हम कोनो बताह छी? अहाँ सन स्त्रीक पावरकें हम जनै नँइ छी की! -जनैत रहितहुँ, बाते किछु आओर रहितए! पति-पत्नीक ई षट्राग आगू नँइ बढ़ल। भौजी भनसा घ’र गेलीह, आ जल्दिए थोड़े रास मिठाइ-निमकीक संग आपस आबि गेलीह। पति दिश कनेक विजयी भावसँ तकैत हमरा दिस तकलनि--देव! अहाँ त’ एखन अपन भाइ संगे उपदेशक जकाँ ग’प करैत रही! -नँइ भौजी! दादाकें हमरा सन प्रोबेशनर उपदेश की देतनि! साहित्यक अध्येता छी, पढ़ैत-लिखैत इएह अनुभव होइत रहै’ए जे सम्बन्धक मूल आधार मोन हेबाक चाही; जाति, धर्म, वंश, परम्परा, धन-दौलत, पद-प्रतिष्ठा, देश आदि किछु नँइ! आजुक समयमे हमरा लोकनि जाहि सामाजिक संरचनामे जीबए लागल छी, ताहिमे सम्बन्धक कोनो न’ब व्याकरण तय हेबाक चाही। सम्बन्धक प्राचीन व्याख्या आब निरर्थक भ’ गेल अछि। अहीं देखिऔ ने, अपना ओतए पहिने बियाह होइ छै, तखन प्रेम! माने? ओही व्यक्तिसँ प्रेम करबा लेल आब ओ विवश अछि। ब’र-कनियाँकें कहियो भेंट नँइ, एकट्ठे दुनू पति-पत्नी भ’ गेल! हद्द अछि! -से नँइ कहियौ देब! हमरा सभक बियाह तेना नँइ भेल अछि। बकायदा हमर फोटो देखा क’ हिनकर इच्छा पूछल गेल छलनि। ई हाँ कहलखिन, तखनहि बात आगू बढ़लै--तापस दा’ बजलाह। -दादा, अहाँक फोटोमे अहाँक चालि-चलन, शील-स्वभावक उल्लेख नँइ रहल हेतै! ओ त’ अहाँ दुनू गोटए भागमन्त रही जे एहेन जोड़ी बनि गेल। भौजी बजलीह--हमरा सभक भाग्यकें एखन छोड़ू! ई कहू, जे अहाँक भाग्य एखन कोन मन्दिरमे अहाँ लेल साधना क’ रहल छथि? अचानक हमर आवेश पर रोक लागि गेल, हम लजा गेलहुँ। कहलिअनि--एखन चलै छी। देरी भ’ रहल अछि। भौजी बजलीह--एखन लाज भ’ गेल त’ जाउ, मुदा काल्हि कहि देब! हमरा कोनो हड़बड़ी नँइ अछि! अइ ठामसँ सम्बन्ध गाढ़ होअए लागल। ओइ डेरा पर स’हे-स’हे हमर आबाजाही बढ़’ लागल। कौखन तीनू गोटए, कौखन हम आ तापस दा’ गप-शपमे लीन होअए लगलहुँ। भौजी भनसा घर चल जाइथ, चाह जलखै बनबै’ लेल। कौखन हम आ भौजी बैसि जाइ टाइम पास कर’मे आ तापस दा’ ट्यूशन पढ़बै’मे व्यस्त भ’ जाइथ। भौजी संग शतरंज खेलएबामे सेहो खूब सोहनगर लागए। ओना बेसी काल जीतथि भौजिए। बादमे बुझाए लागल जे हमरा प्रसन्न कर’ लेल कखनहुँ-कखनहुँ ओ अरबधि कए हारि जाइथ। अर्थशास्त्रमे ओ एम.ए. केने छथि, मुदा इतिहास, राजनीति, सामाजिक आन्दोलन आ साहित्य सम्बन्धी मान्यता पर तर्कपूर्ण बहस करै छथि। तापस दा’कें तँ मिनटे-मिनटे धोबिया पछाड़ दै छथिन। मुदा ताहि सँ तापस दा’क पुरुषवादी अहं अनेरे आहत नँइ होइ छनि। ओ अपन अपढ़पन सहजतासँ स्वीकारि लै छथि। कहै छथि--भाइ, हम त’ फिजिक्ससँ बाहर कहिओ भेलहुँ नँइ। फिजिक्स पढ़लहुँ आ सिनेमा देखलहुँ। आ आब फिजिक्स पढ़बै छी, आ उपन्यास पढ़ि कए मनोरंजन करै छी। आब अइ सब बहस लेल त’ अहाँकें एकटा पाटनर ताकिए देलहुँ अछि, हिनकहिसँ बहस कएल करू! कान्ही मिलान हएत। हम अइ मामिलामे अजोह लोक छी। तापस दा’ उपन्यास खूब पढै़ छथि, मुदा सस्तौआ, फुटपाथी। भौजी कहलनि--अहाँक भाइ साहेब पाथर छथि! उपन्यास पढ़ै छथि, किऐ पढ़ै छथि, नँइ बुझल छनि। जाहि पोथीकें पढ़लाक बाद पाठक स्वयंकें न’व नँइ बुझ’ लागए, ओकर आन्तरिक भव्यता विकसित नँइ होइ, पोथी ओकर विचार शृंखलामे न’व फुनगी नँइ जोड़ए, ओइ पोथीकें पढ़ि कए लोक की करत? टाइम पास लेल लोक किऐ पढ़त? ओइसँ बेसी नीक तँ बाड़ी-झाड़ीमे फूल-पत्ती लगाउ, लत्ती-फत्ती लगाउ! फूल फुलाएत, खीरा-सजमनि फड़त, त’ आँखि जुड़ाएत, मोन हर्षित होएत! रूप-रंगसँ बाइस बर्खक युवती लगनिहारि भौजीक वयस हमर बराबरीक अथवा हमरासँ दू-चारि बर्ख बेसी अवश्य हेतनि, ई अन्दाज लगाएब अइ लेल सम्भव अछि, जे ओ हमरासँ दशक भरि पैघ पुरुखक पत्नी छथि, आ एम.ए. पास क’ चुकल छथि! अन्यथा असम्भव छल। मुदा सांसारिक ज्ञान आ तर्कमे हमरासँ दशक भरि पैघ छथि। जीवन जीवाक कतोक रास बात हमरा ओएह सिखौने छथि। पाप-पुण्यक परिभाषा ओ कोनो शास्त्रीय फारमूलासँ नँइ जीवन-संग्राममे अरजल तर्कक आधार पर दै छथि। मान्यतादिक कतोक बन्धनसँ हमरा ओएह मुक्त करौने छथि। असलमे भौजी सन जीवन्त आ रसवन्ती स्त्रीक संगति बनि गेलनि तापस दा’ सन भौतिक विज्ञानक प्रोफेसरसँ। तापस दा’ सौंसे कॉलेजक विलक्षण अध्यापक मानल जाइ छथि। बेहिसाब ट्यूशन चलै छनि। कॉलेजक क्लास पूरा क’ कए अबै छथि, आ ट्यूशन पढ़बए बैसि जाइ छथि। बैच पर बैच खतम होइ छानि, त’ ओएह सस्तौआ उपन्यास ल’ कए बैसि जाइ छथि। भौजी लेल समय बचिते नँइ छनि। साँझक बेला’मे हमरा संग थोड़े काल सड़क पर घुमै-फिरै छथि। चौक पर हमरा पान खुआ कए, अपने सिगरेट पीबि कए घुरि अबै छथि। फेर ट्यूशनियाँ चेला सब प्रतीक्षा करैत रहै छनि। ओ हमरा बैसबाक आग्रह करैत, पत्नीकें चाहक आदेश दैत ट्यूशनमे लीन भ’ जाइ छथि। भौजीसँ हमर निकटता बढ़ैत जेबाक स्रोत इएह चाह छल, जे क्रमे-क्रमे जलखै, भोजन, आ शतरंजक बिसात धरिमे परिणत भ’ गेल, भौजी धीरे-धीरे तापस दा’क संगें हमर डेरो पर आबए लगलीह। बादमे तँ कहिओ-काल एसगरो आबए लगलीह। बेर-कुबेर तँ भौजी हमर अल्हड़पन पर डाँट-डपट सेहो करए लागल छलीह--समय पर नहाएल करू, समय पर खाएल करू, बेसी चाह नँइ पीबू, जर्दा खाएब पुरुख लेल नीक बात नँइ थिक, केस किऐ उजरल-पुजरल रहै’ए...हम सम्मान भावसँ सबटा बात सुनैत घसकि जाइत रही। तापस दा’ मधुर परिहास करैत कहथि--आइ बढ़ियाँ धुनाइ भेल अछि देब! नीन बढ़ियाँ आओत!...आ जोरसँ ठहाका मारथि...। पढ़बा लेल किताबक चयन पर भौजीक एहन प्रतिक्रिया प्रशंसनीय छल। मुदा तें तापस दा’क निन्दा कोना सूनि लितहुँ! हम कहलिअनि--भौजी! रातिमे कोनो खट-पट भेल अछि की? खौंझाएल देखै छी! भौजी दाँत किचैत, बनावटी तामस करैत, हमरा पर आँखि गुरारैत बजलीह--रहसू नँइ! रसगर लोक छी अहाँ से त’ हमरा पहिले दिन बुझा गेल छल! अबिते देरी अहाँ जाहि तरहें अटकर लगा क’ हमरा देख’ लागल रही...! खेला रहल छी शतरंज, आ ध्यान अछि रंग-रभस पर। सम्हरि क’ चलू! जीवनो एक टा शतरंजे होइ छै देब! प्रतिपक्षक चालि के मर्मकें बुझबाक प्रयास करैक चाही! हम फेरसँ लजा उठलहुँ, अपन ओइ दिनक आचरण पर अफसोच होअ’ लागल छल। हम लजाइत कहलिअनि--भौजी! ओ तँ एक टा अपरिचित व्यक्तिक नजरि छल! ओइ घटनाकें बिसरि जाउ ने! खेलमे तँ बुझले अछि, जे अहाँकें पछारब हमरा लेल आसान नँइ होएत! मुदा अहाँ दादाक मादे जे कहै छिअनि, से उचित नँइ थिक। -ओइ घटना आ ओइ नजरिकें त’ हम जीवन भरि नँइ बिसरि सकब! खेलोमे पराजित हेबाक प्रतीक्षा हम क’ रहल छी। हमर पराजये हमर असली विजय हएत देब! मुदा हम देखि रहल छी जे अहूँकें हुनकर हवा लागल जा रहल अछि। ओ तँ वस्तुतः सूखल काठ भ’ गेलाह अछि। काठकें पोनका क’ हरियरी आनब कठिन अछि। अभिज्ञान शाकुन्तलम, अनामदास का पोथा, गोदान, कर्मभूमि...सब तरहक पोथी हुनका द’ कए देखि लेलहुँ; ओ खून भरी माँग, अन्धकार की चीख... सन-सन किताबसँ बहराइ बला नँइ छथि! भौजीक वाक्य-खण्ड ‘जीवन भरि नँइ बिसरि सकब!’ हमरा भयभीत क’ देने छल। ग्लानि होइ छल अपन ओइ आचरण पर। अपन आचरणकें लगातार पवित्र करैत अपन छवि सुधारबाक छल। दोसर दिश हुनका दुनू प्राणीक बीच लास्यमय आ जीवन्त सम्बन्ध देखल छल। मुदा, भौजी सन बुधियारि, सुन्नरि आ व्यावहारिक स्त्री अपना मुँहें पतिक सम्बन्धमे एहेन कठोर वचन बाजि रहल छथि, बजबा काल भौजीक मुखमण्डल पसरल खौंझ सेहो स्पष्ट रूपें रेखांकित छल। अचरज लागल छल। सोच’ लगलहुँ--वस्तुतः भौजी प्रसन्नताक फुलवारी नँइ छथि, फूजल किताब नँइ छथि, चानक शीतल इजोते टा नँइ छथि, झमटगर गाछक छाहरिए टा नँइ छथि, भौजी बिहारि अनबाक मोखा छथि, बिहारिसँ पहिनेक चुप्प वातावरण छथि, चुपचाप सुनगैत दावानल छथि। हम भौजीक खौंझक कारण तकबाक प्रयास करए लगलहुँ। आ भौजीकें कहलिअनि--भौजी! हमरा पन्द्रह दिनक समय दिअ’। दादा ट्यूशन पढ़ाएब छोड़ताह, से त’ हमरा कठिन लगैत अछि, मुदा सस्तौआ उपन्यास छोड़ि क’ अहाँक मनोनुकूल पोथी पढ़ए लगताह से हम वचन दै छी। पढ़बाक आदति जँ रहए, तँ व्याक्ति खराब चीजसँ नीक चीज पढ़ए लगैत अछि। दू सप्ताह बाद भौजीकें सूचना देलिअनि--देखू भौजी, आइ हम हुनका तेसर किताब द’ रहल छिअनि, श्रीलाल शुक्लक रागदरबारी। -पहिल दुनू किताब कोन छल? -पहिल छल भगवती चरण वर्माक चित्रलेखा, आ दोसर फेर हुनके रेखा! -ई दुनू पोथी हम नँइ पढ़ने छी। देब पढै़ लेल? आइए दिअ’ ने! हमरा लग पर्याप्त समय रहै’ए। अहाँक भाइ साहेबकें नेनपनमे पाइक अभाव ततेक सतेलकनि, जे पाइए टा कमाएब हुनकर जीवनक परम-चरम उद्देश्य भ’ गेल छनि। -भौजी! पाइ कमेबा लेल भाइ साहेब कोनो अवैध काज नँइ करै छथि, कॉलेजमे फाँकी नँइ मारै छथि। मेहनति, आ पवित्र रस्तासँ पाइ कमबै छथि, ताहिसँ अहाँकें गौरव नँइ होइए? -हाँ, पवित्रतासँ पाइ कमाएब नीक बात थिक, मुदा, मनुष्यकें कते पाइ चाही? पाइ कथी लेल चाही? जीवनक सुख सौरभ लेल ने! जीवनक एक-एक साँस पाइ जुटेबामे लगा देब त’ जीवनक की करब!...जाए दिऔ, हम त’ आब अही जीवनकें अवधारि नेने छी। भरि दिन मशीन जकाँ अपन ऊर्जा ट्यूशनमे लगबै छथि, साँझमे काटल गाछ जकाँ निस्पन्द भेल ओछाओन पर खसि पड़ै छथि। हमहूँ करौछ, छोलनी, टी.वी. अखबार संगे दिन काटि लै छी! एसकरे घ’रमे पड़ल रहै छी। अहूँ बेर-कुबेर आएब, से नँइ होइए। शतरंज खेला कए थोड़ेक समय बिता लेब! -अहाँ सन तेजस्विनी स्त्री संगे शतरंज की खेलाएब? हरदम तँ पछाड़िए दै छी। -मौगी जातिसँ हारब अधलाह लगै’ए? मौगी तँ पुरुष जातिसँ हारि जेबा लेल मोन प्राण ओछौने रहैत अछि। हम त’ बिसात ओछा कए पछाड़ खेबा लेल सदति काल तत्पर रहै छी! किऐ नँइ पछाड़ै छी? ‘शह’ के पहचान समय पर किऐ नँइ होइए? एतेक बोधगर लोक त’ छी अहाँ! -भौजी! हमर बोध अहाँक तेजस्विता लग पछड़ि जाइ’ए। आन ठाम त’ जीत जाइ छी। अहाँकें पछाड़ब सम्भव नँइ होइ’ए। -देब! हम अपन हरेक चालि अहाँसँ पछाड़े खेबा लेल चलै छी। मुदा हमर अभाग, जे अहाँ मैदान छोड़ि दै छी। देखी, कहिया अहाँ हमरा पछाड़ै छी। लगै’ए अहाँकें विशेष ट्रेनिंग देब’ पड़त। चित्रलेखा, आ रेखा पढ़लाक बाद एक दिन भौजी कहलनि--देब! की हाल अछि अहाँक भाइ साहेबक? चित्रलेखा, अथवा, रेखाक किछु असर भेलनि कि नँइ? -हाँ भौजी! भेलनि अछि, आब त’ ओ गोदान, सुनीता, मछली मरी हुई धरि पढ़ि गेल छथि। नदी के द्वीप पढ़ि रहलाह अछि। -मुदा हम कहब, जे ओ किछु नँइ पढ़ि सकलाह अछि। पढ़नाइ कोनो यान्त्रिक क्रिया नँइ होइत अछि। अध्ययनशीलता मनुष्यकें भिजाबए नँइ, त’ ओ अध्ययन नँइ भेल। या त’ अध्ययनक उद्देश्यमे दोष अछि, या फेर अध्येताक मूल बनावट दोखावह अछि। सुखाएल गाछमे पानि ढारलासँ ओ हरियर नँइ होएत। सुखाएल गाछकें पोनकबाक आशा हम त्यागि देने छी। हरियर गाछकें भकरार आ विकासोन्मुख हेबाक प्रतीक्षा करै छी। भौजी पढ़लि-लिखल स्त्री छथि। मुदा हुनकर एहन दार्शनिक बात सब सोझ रस्तें हमरा समझमे नँइ अबै छल। भौजी किछु संकेत त’ ने द’ रहल छथि! फेर होअए--नँइ, एहेन पापिष्ठ बात नँइ सोचबाक चाही। तापस दा’ सन पतिक रहैत, ओ एना कोना सोचतीह? मुदा किऐ नँइ सोचतीह, ओएह त’ कहलनि, जे साँझ क’ ओछाओन पर काटल गाछ जकाँ खसि पड़ै छथि। अर्थात् भौजी हमरासँ किछु आओर चाहै छथि। ओ हमरा बड़ मानै छथि। किऐ मानै छथि? की कारण?...नँइ, एना नँइ सोचबाक चाही। ई पाप थिक। विश्वासघात थिक। सम्बन्धक पवित्रता आ नैसर्गिकताक हत्या थिक। मुदा भौजी ओइ दिन पाप, पुण्यक बहसमे मारिते रास उदाहरण देने छलीह। कहने छलीह, सबसँ पैघ पाप थिक मनुष्यक जीवनी शक्तिमे अवरोध लगाएब। छिड़हड़ा खेलाएब भने व्यभिचार हो, मुदा यौन-लिप्साकें दाबन देब पैघ पाप थिक, यौन-लिप्सासँ निर्लिप्त हएब अशक्य व्यक्ति लेल आसान होइत अछि। पुंशत्वपूर्ण पुरुख आ स्त्रीत्व धारण केनिहारि स्त्री एहिसँ मुक्त नँइ भ’ सकैत अछि!...त’ की भौजी हमरा नोत द’ रहली’ए। की भौजी व्याभिचारिणी छथि? कथमपि नँइ। से रहितथि त’ अइ दुनियामे पुरुखक कमी छै?... भौजी की छथि? की चाहै छथि? ओ फूजल किताब जकाँ हमरा सोझाँ पसरल छथि, हम किऐ नँइ पढ़ि पाबै छी। एहेन विलक्षण, एहेन सुन्नरि, एहेन कलावती, एहेन वाग्विदग्ध स्त्रीकें चिन्हबामे हमरा किऐ तरद्दुत भ’ रहल अछि? एक बेर भौजी कहने छलीह--मनुक्खक कैक टा रूप होइ छै देब! सब रूपमे ओकर अलग पहचान होइ छै। अहाँक भौजी हेबासँ पहिने हम एकटा सम्पूर्ण स्त्री छी। जेना पुंशत्वक बिना कोनो पुरुष निरर्थक, तहिना स्त्रीत्वविहीन स्त्री सेहो निरर्थके होइछ! मोन कोनादन करए लगैए। अइ निर्णयक संग सूति रहै छी जे काल्हि भौजीकें स्पष्ट पुछबनि, हमरा कोन ट्रेनिंग देबए चाहै छी अहाँ, आ कहिआसँ देब? अगिला दिन तापस दा’ कॉलेजमे भेटलाह, कहलनि--अहाँक भाउज हमरा आदेश देलनि अछि, जे खाइक समयमे हम अहाँकें संग नेने डेरा घुरी। आइ ओ अहाँक पसिन के किछु भोजन बना रहल छथि। एकटा क्लास समाप्त क’ कए अबै छी, तखन चलब! ठीक ने? हम की कहितिअनि? काल्हि भौजी तेहन-तेहन गप केने छलीह, जे कैक तरहक आशंकासँ मोन तबाह छल! भौजीक ओइ बात, आ भोजनक निमन्त्रणमे ताल-मेल नँइ बैसै छल। तथापि कहलिअनि--मुदा अहाँ तँ घर पहुँचैत देरी चटिया सभमे लागि जाएब! ओ मुस्किआइत बजलाह--ई न्यायपूर्ण बात नँइ भेल। अहाँ एतबहि दिनमे भाउजक गुलाम बनि गेल छी। हुनकहि जकाँ अहाँ हमरा पर निशाना तनने रहै छी। क्लास समाप्त भेलाक बाद हमरा लोकनि डेरा पहुँचलहुँ। डाइनिंग टेबुल पर भोजन लगाओल गेल। थाड़ीमे परसल सोहारीमे चोपरल घी देखि तापस दा’ स्पष्ट लक्ष्य केलनि। बजलाह--देखिऔ देब, अहाँ अपन भाउजक न्याय! अहाँक सोहारीमे घी चोपरल अछि, आ हमर सोहारीमे औंसल अछि! अचक्केमे हम सकदम्म भ’ गेलहुँ। की-की ने आशंका मोनमे उपजए लागल। भौजी मुदा परम सुजान। ओ कनेक दोमि कए बजलीह--देखिअनु! लाज-धाख उठा कए पीबि गेल छथि। पेट लदरल जाइ छनि, आ घी खाइ लेल लेर चुबै छनि। तापस दा’ बजलाह--अरे हम त’ अहाँक प्रशंसा शुरुहे केने रही, अहाँ बीचेमे टपकि गेलहुँ। हम सएह त’ कहैत रही, जे अइ सिकिया पहलमानकें अहाँ तन्दुरुस्त बनबए चाहै छिअनि। अहाँकें तँ प्रशंसो सुनबाक धैर्य नँइ रहैत अछि। -हाँ से बात तँ सत्य थिक। छओ फिट्टा जवान छथि। छब्बीसक वयस छनि। पचास किलो ओजन छनि। स्वास्थ्यक प्रति सावधान तँ रहबाके चाही। कहै छिअनि घरनी आनि लिअ’ त’ से नँइ करताह। स्वच्छन्दता एतेक प्रिय छनि जे भोजन धरिक अभेला करै छथि। -आ तै स्वास्थ्य पर अहाँ कहै छिअनि बुलेट मोटर साइकिल चलबै लए! हम चौंक उठलहुँ। ई कोन सुर लागि गेल। हँसुआक बियाहमे खुरपाक गीत! बेरा-बेरी दुनू प्राणीक मुँह ताकए लगलहुँ। सोचए लगलहुँ--सब किछु त’ सामन्ये छल। एना थाड़ी पर बैसा कए दुनू प्राणी कोन गोत्राध्यायमे लागि गेल छथि। की बात थिकै आखिर! कोनो सूत्र तकबाक ब्यांेतमे हम तापस दा’ दिश तकलहुँ। तापस दा’ बजलाह--देब! हमर कथनकें अन्यथा नँइ मानब। हम अहाँकें अपन सहोदर छोट भाइसँ कनेको कम नँइ बुझै छी। सुवर्णा लेल सेहो अहाँ परम प्रिय दीयर छिअनि। बेकूफीमे हमरासँ ई मोटर साइकिल किना गेल। हमरा बुतें ई निके नाँ चला नँइ होइए। हम निर्णय लैत रही जे एकरा बेच दी। अहाँक भाउजक आदेश भेल अछि, जे जेठ भाइक समस्त बखरामे छोटक अधिकार होइ छै। अहाँ पछिला किछु दिनसँ मोटर साइकिल कीनए चाहैत रही। अहाँकें अधलाह नँइ लागए तँ ई अहाँ ल’ जाउ। न’बे छै, से तँ अहाँ जनिते छी! -मुदा दादा! हम सोचैत त’ अवश्य रही। किन्तु हमरा एखन पाइ कहाँ अछि? -ओह्! तकर चिन्ता अहाँ छोड़ू! पाइ लगबे कते करतै! ऑनरशिप ट्रान्सफर करै’मे ततेक खर्च नँइ होइ छै। हम छी ने! अहाँकें तँ भगवान सुवर्णा सन लछमीपात्र भाउज देने छथि! अहाँकें कोन कमी अछि?--फेर पत्नी दिश तकैत बजलाह--की यै! ऑनरशिप ट्रान्सफरक खर्च अहाँ गछै छिअनि कि नँइ? आब भौजी बजलीह--मुदा तकर आवश्यकता की? अहाँक अनुजकें अहाँ पर एतबो विश्वास नँइ छनि, जे अहाँ मोटरसाइकिल आपस नँइ मँगबनि? आ कि अहाँकें अपन अनुज पर विश्वास नँइ अछि जे ओ अहाँक चीज-वस्तु ओ सम्हारि क’ राखि सकताह! ई ऑनरशिपक बखेरामे किऐ पड़ल छी? तापस दा’ फेर परिहास मिश्रित रंज केलनि--अहाँ तँ गजब स्त्री छी। सदति काल हमरा पर सींघमे माटि लगौने रहै छी! अहाँक दीअर जे कहलनि, हम तकर रस्ता निकालि देलहुँ। आब हम कतए दोषी छी? -से कोन हम साँढ़ छी, जे सिंघमे माटि लागएब! -नँइ, अहाँ गाय छी। मुदा सिंघ त’ गाइयो क’ होइ छै! -मतलब हम झगराही छी? -अरे बाबा, अहाँ परम सुशील छी। मुदा मूल बात सँ किऐ भटकि रहल छी। अहींक प्रस्ताव छल ने, जे मोटरसाइकिल जुनि बेचू। देबकें किनबाक छनि, से किनता किऐ, मूल काज त’ चढ़बाक छै! से चढ़थु अही पर! त’ बुझाउ ने अपन स्वाभिमानी दीयरकें, हमरासँ कथी लए ढूसि लै छी? -से हम कहलहुँ तँ कोन बेजाए केलहुँ। हमर त’ विश्वास अछि जे अहाँक चीज-वस्तुक सम्मान देब निके नाँ करताह। हुनका सुख-भोग करैत देखि अहूँकें नीक लागत, आ हमरहु आत्मा तृप्त होएत। हमरा आब बाज’ पड़ल--दादा! हम ऑनरशिप ट्रान्सफरक गप नँइ करैत रही। हम त’ मोटरसाइकिलक दामक गप करैत रही! तापस दा’क आँखिमे व्यथा उपजलनि...नम्हर सन साँस घिचैत बजलाह--अहाँ ई कोना सोचलहुँ देब? भौजी बजलीह--देब! जेठ भाइक सम्पतिक दाम नँइ लगाओल जाइ छै। दाम लगौला पर ओ पड़ोसिया भ’ जाइ छै। ई वस्तु नँइ थिकै देब! ई ममता थिकै, अनुराग थिकै! तापस दा’ बजलाह--सुवर्णा! हम हिनका बुट्टी-बुट्टी चिन्है छिअनि! हम ई बात जनै छलहुँ। तें कहने रही, जे अहाँक सोझाँमे गप करब। हमर विद्यार्थी सब बैसल अछि। हम हाथ धो कए आब चलै छी पढ़बै लए। अहाँ हिनका भोजन कराउ, आ हिनकर माथमे बैसल भूतकें भगाउ। देखी आइ अहाँक चतुराइ! तापस दा’ हाथ धो क’ ट्यूशन पढ़बै लेल सीढ़ी चढ़’ लगला। समूचा घ’र आब तीन घण्टा लेल निस्पन्द रहत। भौजीकें सिपुर्द रहत। भौजी रहतीह, आ हुनकर चारू कात निःशब्द वातावरण रहत। तापस दा’ गदह बेर धरि ट्यूशनमे लागल रहताह। भौजी थोड़े आओर खाइ लेल आग्रह केलनि। हमरा माथमे घुरिआइत आशंका सब समाप्त भ’ चुकल छल। सुभस्त होइत कहलिअनि--भौजी! अहाँ त’ अन्ने-तीमनमे ततेक स्नेह मिला देने रहै छिऐ, जे हाथ चाटैक मोन करए लगै छै, आग्रहक गुंजाइश बचल कहाँ रहै छै! -ककर हाथ, अपन, कि बनेनिहारिक? हम फेर गुम्म भ’ गेलहुँ। भौजीक बात पर निरुत्तर हेबाक हमरा लेल ई कोनो पहिल घटना नँइ छल। हाजिर जबाबी, आ बोल्डनेशमे भौजीक कोनो जवाब नँइ छल। केहनो बात केहनो परिवेशमे कहि देबाक हुनकर चतुराइ, आ हुनकर साहस विलक्षण छल। बोल्ड त’ हमहूँ कम नँइ रहल छी, मुदा पता नँइ किऐ, हुनका सोझाँ हमर सम्पूर्ण बोल्डनेस बिला जाइ छल। कहि नहि ई हुनकर व्यक्तित्वक प्रभाव छल, कि हुनकर आभामय रूप-सौन्दर्यक, आ कि दीयर भाउजक सम्बन्धक, हुनका सोझाँ पड़िते जेना हम हुनकर अधीनस्थ भ’ जाइ छलहुँ। अपन कोमल हाथक दसो अँगुरीसँ हमर दुनू गालकें चुटकियबैत भौजी बड़े अह्लादसँ बजलीह--अहाँ त’ मौगी जकाँ लजाइ छी देब! पुरुखकें कतौ एते लाज हो! उठू हाथ धोउ! हाथ धोअ’ गेलहुँ, त’ बेसिनमे हाथ धोइते रहि गेलहुँ। सोचए लगलहुँ--भौजी सत्ते बड़ मानै छथि हमरा। कते भागमन्त छी हम! अइ दुनियामे जकरा भाउज नँइ छै, से जीवनमे कते तरहक नेहसँ वंचित रहि जाइ’ए।...मुदा इएह भौजी एते दिनसँ प्रेम करै छथि, कहियो एना कहाँ बुझाइ छल हमरा! आइ एना किऐ लागि रहल आछि! बेर-बेर अपन दुनू गाल छूबै छी, लगै’ए जेना ओतए चम्पा-बेली फुला गेल हो! एना किऐ लागि रहल अछि!... भौजी आबि क’ बगलमे ठाढ़ि भेलीह, बामा हाथें टैप बन्द केलनि, दहिना बाँहि हमरा कन्हा पर आर-पार रखैत बामा हाथें आँचरसँ हमर हाथ पोछलनि, आ कान लग मुँह अनैत कहलनि, मोनमे किछु होअ’ त’ नँइ लागल अछि?...आ खिलखिला कए हँसए लगलीह। खिलखिलाहटिसँ छूटल हुनकर गर्म साँस हमर कनपट्टीसँ कन्हा पर आएल, आ कमीजक त’र बाटें पीठ आ छाती दिश पिछड़ि गेल। सौंसे देहमे झुनझुनी उठि गेल। भौजीक दहिना हाथक चूड़ी हमर दहिना कानमे गर’ लागल छल। मुदा बाँहिक ओ ऊष्मा आ चूड़ीक ओ प्रहार नीक लागि रहल छल। हम भौजीक छाहरि दिश सहटि जाए चाहै छलहुँ, मुदा संकोच भेल।...भौजी फेर धोपलनि--फेर लाज! मन्दबुद्धि! चलू, मोटर साइकिल निकालू। डेरा पहुँचा दै छी! मोटरसाइकिलसँ डेरा विदा भेलहँु। बैचलर डेरा। भौजीक की सत्कार करिअनि! खा-पीबि क’ त’ तुरन्ते आएले छी। पुछलिअनि--भौजी, की सत्कार करू अहाँक? पानि पियाबी? भौजी कहलनि--पिआसल त’ छीहे! पिआ सकब? ... थोड़े काल बाद भौजी बजलीह--हमरा पहुँचा दिअ’ बौआ! -पहुँचा दिअ’? -राखियो त’ नँइ सकब? हम मोटर साइकिल नँइ छी ने? सजीव आ निर्जीवमे इएह अन्तर होइ छै देब! डॉ. शेफालिका वर्मा, जन्म:९ अगस्त, १९४३, जन्म स्थान : बंगाली टोला, भागलपुर । शिक्षा: एम., पी-एच.डी. (पटना विश्वविद्यालय),ए. एन. कालेज, पटनामे हिन्दीक प्राध्यापिका, अवकाशप्राप्त। नारी मनक ग्रन्थिकेँ खोलि करुण रससँ भरल अधिकतर रचना। प्रकाशित रचना: झहरैत नोर, बिजुकैत ठोर, विप्रलब्धा कविता संग्रह, स्मृति रेखा संस्मरण संग्रह, एकटा आकाश कथा संग्रह, यायावरी यात्रावृत्तान्त, भावाञ्जलि काव्यप्रगीत, किस्त-किस्त जीवन (आत्मकथा)। ठहरे हुए पल हिन्दीसंग्रह। २००४ई. मे यात्री-चेतना पुरस्कार। एकांकी- एकटा आर महाभिनिष्क्रमण (सान्झुक बेर.मंद समीरण वातावरण के उन्मादित क रहल छल . पलंग पर बैसल प्रकृति चुप चाप कोनो विस्मृति में डूबल छलीह .ओकर चेहरा पर अतीत आबी बैसी गेल छल. किम्हर दन स वोकर वाल्य- सखी राखी आबि प्रकृतिक सोच के तार तार क देलक ) राखी --अहाँ की सोचैत रहैत छी ,सखी ?जाहि दिन स अहाँ दार्जीलिंग स घुरल छी ,लगैत अछ अहाँ एखनो ओहि घाटी सब में भटकि रहल छी प्रकृति एकटा उसांस भरि निमिष मात्र ले राखी दिसि तकैत अछ फेर बजैत अछ प्रकृति--सांचे बजैत छी राखी ,हम एखनहु ओहि घाटी सब में भोतिया रहल छी . कत्तो कत्तो बाट क दुनू दिस कमल -कुसुम के देखि रबीन्द्रनाथ टैगोर क पाती मोन पड़ी जायत छल 'एय शरद आलोर कमल बने ,वाहिर होय विहार करे जे छिले मोर मोने मोने . ..' अकास में जल भरल मेघ खंड देखि बुझा पडैत छल जेना ओ सागरक लहरि होय ,राखी एहि मोहक सुषमा क संसार में हम हेरा गेल छलों ( प्रकृतिक आंखि डबडबा जैत छैक. मुड़ी नुघरा लैत अछ .राखी बड सिनेह स ओकर चेहरा उठ्वैत अछ ) राखी--प्रकृति , अहाँ बड कोमल छी , बड निश्छल ..... बीचे में बात कटैत प्रकृति बजैत अछ --हँ हँ उहो इयैह कहैत छल राखी ' निश्छल, कोमल '.....ओ जखन हँसैत छल त शत जलतरंग जकां हमर मोन मानस कांपि जायत छल ... ( बजैत बजैत प्रकृतिक डबडबायल नोर धार बनि जायत अछ. अधीर भ राखी बजैत अछ ) ---प्रकृति, हम अहांक वाल्य संगिनी छी. तैयो अहाँ हमरा से कतेक बात नुका लैत छी . अहांक ह्रदय पर जे असह्य बोझ अछ ओकरा हमर सामने फेक दिय . अहांक दारुण व्यथाक राज हम जाने चाहैत छी प्रकृति ( राखी आवेग आ आवेश स भरि जायत अछ ) --बाजु प्रकृति बाजु ( तावत किम्हर दन स एकटा छोट नेना दौडल अबैत अछ आ धप्प दे प्रकृतिक कोर में बैसी जायत अछ . प्रकृति ओकरा अपन करेज स सटाई लैत छैक . ) माँ माँ ,अहाँ कत छलों ?कतेक काल स अहाँ के खोजी रहल छलों की बात छैक प्रसून ,बाजु बेटा ----नेना के दुलरावैत प्रकृति बजैत अछ. माँ, केओ संगी नै आयल आय. अहीं कोनो खिस्सा सुना दिय राखी उत्साहित भ बजैत अछ ..हँ हँ प्रसून, हमहूँ त अहाँक माँ के इयैह कहैत छलों आब प्रसून क ध्यान राखी दिसि जायत अछ ,ओ चोंकि जायत अछ --अरे मौसी ! अहाँ एहिठाम छी. , अहं खिस्सा सुनब ने मौसी.. थपडी पडैत प्रसून बजैत अछ --माँ , आब ते अहांके खिस्सा सुनाबे पडत ..आब अहांक खिस्सा सुनब ,माँ मुदा परि वाला खिस्सा , राक्षस से हमरा भय होयत अछ. प्रसुनक माथ पर हाथ फेरैत प्रकृति बजैत अछ ---बेटा, राक्षस स भय होयत ते अहाँ मर्द कोना कहायब ? मायक बात सुनि प्रसून बजैत अछ..--ठीक छै, तखन एहेन खिस्सा कहू जाहि में परी होई, देवता होय ,राक्षसों होय , कोनो बात नै... प्रसून क गप सुनि प्रकृति आ राखी दुनू हँसैत अछ. राखी जिद्द पकड़ी लैत अछ --आब ते अहाँ के अपन कथा कहये पडत सखी प्रकृतिक आंखि सुदूर अतीत में भटकि जायत अछ , आँखिक कोर में ओ दिन सब मखमली सपना जका छलक लगैत अछ हँ , एकटा परी छल ,बड सुन्नरी, सुन्नर ? नै नै ओकर अंतर बड निश्छल छल , एतेक सरल छलीह जे संसारक छल कपट आदिक नमो नै जनैत छलीह. परी के हरदम लागेक जे ओ कोनो आन लोकक प्राणी छी जे भूलल भटकल कोनो श्राप वश एहि धरती पर आबि गेल हो ....प्रसून एकटक माय के तकैत रहैत अछ .....ओ परी एकटा राजकुमार के देखलक आ देखिते रही गेल..निश्छल शिशु सन रजत हास ओकर चेहरा पर पसरल छल .परीक अंतर से अवाज आयल ' एकरे लेल कतेक युग स ,कतेको कल्प स हमर आत्मा भटकि रहल छल ' राजकुमारों क ह्रदय कांच जकां निरभ्र छल .ओकर ह्रदय में विश्व प्रेम क अपूर्व रागिनी बजैत छल. ओ कोनो दिव्य आत्मा छल , महान चरित्र छल जे भोतिआइत एहि ठाम आबि गेल छल माँ माँ , ओ राजकुमार बड सुन्दर होयत ने --प्रसून मुग्ध भ सुनि रहल छल - प्रकृतिक तन्द्रा भंग भ जायत अछ-हँ बेटा, सुन्दर त अपूर्व छल,मुदा अद्भुद व्यक्तित्व सेहो , ओहि परीक आंखि ओकर सुन्दरता पर नै ओकर निर्मल अंतर पर गेल छल आ प्रकृति पुनः भावाविष्ट भ जायत अछ --बेटा , ओ परी ओहि राजकुमार स बड प्यार कर लगलीह , राज्कुमार क सिनेह देखि परी के मोन में होम लागल .इयाह राजकुमार एहि मर्त्य भुवन स हमर उद्धहार करत ...दुनू सदिखन कल्पना डूबी अकासक गप करैत छल . एक दिन ओहि परी के किछ चोट लगलैक ,ओ पूछी बैसल ओहि राजकुमार स .' हम अहांक आंखि में उपेक्षाक छाहरी देख्लों , किएक , आखिर किएक ? राजकुमार बाजल - अहाँ कतेक सरल छी , कतेक अबोध ,अहाँ हमर आंखि में अपन छाहरी नै देखि उपेक्षाक छाहरी देख्लों . आंखि में त सबहक परछाहीं रहैत छैक ,मुदा, अनमोल निधि धरती में गाडी के राखल जायत छैक. अहं के हम अपन हृदयक अतलता में नुका के रखने छी. आ परी ओकर मोहक गपक स्वप्निल सागर में हेलैत रहल ..--अहाँ हमरा सबदिन एहिना मानब ने ? बताही छी अहाँ, स्वयं पर अविश्वास करू ते करू मुदा, हमरा पर अविश्वास क नरक केर भागी नै बनू. ....आ परी जेना सब किछ पाबि लेलक ओ राजकुमार ओस-तीतल गुलाब सन कमनीय , सुकुमार शब्द क चितेरा बनि कविता करैत रहल, परीक मोन भिजैत रहल ' ओह अपन राजकुमार क प्रेरणा छी हम 'एहि भाव में डूबैत रहलीह ओकर निश्छल अंतर अकास में खिलल सिंगराहारी तारा जका प्रमुदित होइत रहल..... खिस्सा कहैत कहैत प्रक्रितिकं आंखि स दुई बुन्न आहत भ पियासल कपोल पर खसि पडैत अछ . राखि एतेक देर स मूक श्रोता बनि चुपचाप ओकर कथा के आत्मसात क रहल छलीह. (प्रसून ओकर करेज स लागल नै जनि कखन सुति गेल छल ओहि नेनाक अबोध अंतर में परी आ राजकुमार गंभीर गाथा कोना समायत ? )अरे ई त सुतिगेल. (चोंकि बजैत अछ प्रकृति , आस्ते स ओकरा बिछोन पर सुता दैत अछ.) आगू की भेलैक प्रकृति राखि क प्रश्न पर प्रकृति चौंकी जायत अछ ...छोड़ू... बाहीं पकड़ी लैत अछ राखी..बाजु सखी, आय सब किछ बजे पडत ...(कतेक देर धरि प्रकृति चुप रहैत अछ जेना वेदना अपन संगीत ओकर अधर पर राखि देने हो .. राखी कतेक काल धरि ओकर ई स्थिति देखैत रहल फेर) बजैत अछ -चुप किएक भ गेलों प्रकृति बाजु ...आगू बढ़ू ओह हँ ...हँ हँ ते ...जेना शब्द गर में छटपटा रहल होय ---एक दिन ओकरा ज्ञात मुदा चहला स की भेलैक जे ओहि ओस तीतल गुलाब क खेतीक आत्मा ओ नै केओ आर अछ --केओ आन अछ. परीक आत्मा कुहरय लागल , रोम रोम सिसकी भर लागल ....मुदा, ओ राजकुमार निर्विकार रहल. ओ पहिनुके जका रोज एकटा ओअस तीतल गुलाब ओकरा सुन्वैत छल आ परीक अंतर सिसकी उठैत छल काश, एहि गुलाबक खेतीक कारन हम बनि सकतों !मुदा मात्र चाहला स की .? एकदिन ओ बाजल..हम चाहैत छलों ओकरा क्षितिज क क़ात में ठाढ़ क दी आ बाजि 'जखन अन्हार सघन भ जाय त अहाँ आकाशदीप ल हमर पथ प्रदर्शन करब. ' मुदा ओ की जनैत छल जे हम पहिनही किनार में ठाढ़ भ गेल छलों ,आकाशदीप सेहो बारि नेने छलों मुदा ओ राजकुमार ओहि बाटे एवे नहि केलक. ओ गुलाब क खेती सँ भोर क पहिल किरण तोड़ी ओकरा चिर प्रदीप्त करवा लेल चाहैत छल , परी सोचैत छल भोर क नै ,कम से कम सान्झुक प्रहरक कोनो भटकैत रश्मि रेख ओकर जीवनक सौभाग्य बनि जाय.किन्तु, ओ परीक लेल नोरक खेती कर लागल . परी ओहि नोर के पिवैत जिवैत जायत छलीह .ओ रोज ओहि राजकुमार क नाम एकटा चिठ्ठी लिखैत छल आ फेर स्वयं पढैत छल.ओकर आंगुर राजकुमार के आखर,शब्द आ पंक्ति में बान्हि दैत छल आ फेर निर्निमेष ओहि में राजकुमार क रूप के खोजैत छलीह उषा क आँचर स अनुरागिमा झडवाक संगे ओ ओहि पत्र के दुई खंड क दैत छलीह , ओ परी स्वयं अपना के दुई खंड क देने छलीह , एकटा खंड ओ स्वयं छलीह जे पत्र लिखैत छलीह ,दोसर खंड ओ स्वयं राजकुमार बनि ओकरा पढैत छलीह . ( एकटा नमहर साँस लैत प्रकृति कनि काल मौन भ जायत अछ. राखी एकटक ओकरा देखैत अछ उत्सुक आ करुण नयन सँ , )..कतेक भाग्यवान हेतीह ओ जे अहांक प्रेरणा छथि ... ओ की भाग्यवान हेती भाग्यवान ते अहाँ छी --ओ हमर लिखित काव्यक प्रेरणा थिकीह ,अहाँ हमर अलिखित काव्यक प्रेरणा छी, बाजु ते अहाँ कतेक महान छी.....ओ परी चुप रहैत छली .शब्दक एहि अभिधा व्यंजनाक झाडी में ओझरा स्वयं के नितांत असहाय बूझैत छलीह., हम किछ नै जनैत छी ,किछ नै,,अहीं ते कहने छलों अहाँ के हम ह्रदय क अटल गहीर में नुका के रखने छी ... हँ, सांचे बजने छलों . हमरा मानव-जाति स प्रेम अछ ,अहाँ एहि पर अपन सर्वाधिकार सुरक्षित बुझि लेलों ई ते अक्षय कोष थीक जतेक बांटू ओतेक बढत ( प्रकृति क आंखि स नोरक टघार निकल लागल..) राखी--फेर की भेल. ओही परिक ?? ओ राजकुमार एतेक कठोर ,एतेक निर्दय कोना छल ? प्रकृति- नै सखी , ओकरा निर्दय नै कहू. मुदा, छोडू, खिस्सा पिहानी जखन जीवनक संग घटित होम लागैत अछ त बड वेदनामय भ जायत अछ, राखी--नै सखी आय हम कहनी अनकहनी सब टा सुनब ओ राजकुमार एतेक निर्मम किएक छल ? नै सखी, राजकुमार परीक आत्म्घुटन, एकान्तिक प्रेम क विषय में कल्पनो नै क सकैत छल. प्रकृति--ओकरा बेर बेर निर्मम नै बाजु. हमहू एक बेर ओकरा निर्मम कहलों ते जनैत छी ओ हमरा की कहलक राखीक आंखि में हजारो प्रश्न हेल लागैत अछ आ प्रकृति अपन तरंग में ..ओ बाजल नारियर ऊपर स कतेक कठोर होयत छैक, भीतर स कतेक कोमल, कतेक सरस... हूँ हूँ बुझि गेलों किन्तु, कहियो कहियो ओकर गप नेना जका होयत छल. अहाँ एक बेर उन्मुक्त हंसी हंसी दिय जाही स हजारो सिंगरहार झहरी जाय, या नै ते एक बेर कानि दिय ,अहाँक रुदन के हम आत्मसात क लेब. ओ परी ओकर बात के ओकर गप के सुनैत रहैत छलीह, गुनैत रहैत छलीह . ओ अपन वाक्य स, अपन शब्द स ओही परी के एतेक दुलरावैत रहैत छल जे परी निहाल भ जायत छलीह.एक बेर ओ बड निश्छल भाव स पुछलक -अहाँ हमरा स एतेक सिनेह किएक करैत छी ? उत्तर में परीक नयन अश्रुप्लावित भ उठल ओकर वाणी अवरुध्ह भ गेल ,ओ मूक, निष्पंद ,निर्वाक बैसल रहलीह राजकुमार बाजल छल -हमरो ह्रदय अहीं जका निश्छल रहितैक , हमरो आंखि में अहीं जकां नोर आबि जेतियैक जखन ओहि परी स एतेक प्रेम करत छल तं ओ परी किएक बुझलक जे ओ परी स प्रेम नै करैत छैक -बीचे में राखी बजैत अछ ,,नै राखी, ओ परी स प्रेम करैत छल ह्रदय क सम्पूर्ण गहिरता क संग, भावना क सम्पूर्ण सत्यता क संग.मुदा, ओ बेर बेर ओकरा आहत सेहो करैत छल , बेर बेर क्षत करैत छल ..एक दिन ओ परी आकुल व्याकुल सन ओहि राजकुमार लग गेल छलीह त गपे गप में एकटा एहेन बात कहि गेलजे अग्निशलाका जकां ओहि परीक आत्मा के विद्ध क गेल.'अहाँ के हम ओहि रूप में कहियो नै देखलों.परी वेदना स विकल भ उठलीह मुदा, राजकुमार अपना में मस्त रहल. एक दृष्टि इ देखवाक प्रयासों नै केलक जे ओकर एहि एकटा बात से परी के कतेक मर्मान्तक पीड़ा भेटलैक जलकण स भरल आंखि आ कंपित पैर स घुरी आयल.समस्त संसार स ओकर आस्था टूटी गेलैक. ओकरा भगवन क अस्तित्व फुसि लग लगलैक समस्त भावना पर अन्हार क साम्राज्य खसि पडल . केकरो भावना के स्वीकार करब अपनेनाय त नै थीक. ओ कतेक डरी गेल छल .आ परीक मोने एकटा ज्वार उठल आ ओ राजकुमार के एकटा अभिधा द देलक, एकटा संबोधन राखी ( एकटा निसांस भरैत )- मुदा एहि से की फरक पडल ? ( निसांस क दर्द के भोगैत) प्रकृति--ई अहाँ नै बुझि सकब , राखी जखन हम ओकरा ओहि संबोधन स अभिहित केलों त ओ एकटा स्वतन्त्रता क सांस लेलक जेना कोनो मृगछौना के बंधन-मुक्त क देलों ..ओ परी ओकर ख़ुशी देखि खुश भ गेल ..अहाँ खुश राज, हमहूँ खुश.. एतवे नै बाद में ओ बज लागल 'हम ते अहाँ के बंधवा लेल नै कहने छलों अहाँ स्वयं बान्हि देलों ..आ सखी, ओहि परीक अंतर घाह घाह भ गेल.कतेक पैघ प्रवंचना ओकरा छली गेल ...ओ त 'अषाढ़क एक दिन' क 'मल्लिका' बनि जीवन क सभ सुख आत्मसात क लेतियैक मुदा राजकुमार सब टा ऋतू के उनटा पुन्टा देलक कहियो घाह बेसी दुखित छल ते कहियो दवाय.किन्तु, ओ अपन भाव सुमन स परी के एतेक दुलार करैत छल जे ओकर दर्द रहि रहि कुहर लागेक .... बहिन ! -( राखी क खोजपूर्ण दृष्टि प्रकृतिक चेहरा पर पडल छल )- की संबोधन देने मात्र से अहांक प्रेम बदली गेल.. प्रकृति--इयाह ते ट्रेजेडी छैक ,यदि शब्द मात्र स भाव बदलि जेतियैकप्रेम अपन रूप स्वरुप पाबि लेतियैक त संसार क सब स सुखि प्राणी ओ परी रहितैक . मुदा, ओ भीतर भीतर तीतल जारनि सन पजरैत रहल ,घुटैत रहल. मुदा एतवे नै , जखन कोनो शारीरिक व्याधि हमरा घेरि लैत छल ते बेर बेर आब कोना छी, केहेन छी आ हम सोच लगैत छलों देह क कनिक कष्ट लेल एतेक चिंता, एतेक आकुलता मुदा, एकर भीतर जे एकटा कामना घुटन एवं कुंठा स मुक्त हेवा लेल छटपट करैत छल ,व्यथा विगलित छल, एकर चिंता ओकरा नै छल , नै नै हेबो किएक करतियैक.ओकर अपन मोन छल,अपन ह्रदय छल ,अपन भावना..मनुख अपन मोन के ते बूझिये नहि सकैत अछ, आन क कोन कथा..( (प्रकृतिक आंखि स्वप्न बनि जायत अछ , अधर ओकर भाषा) प्रकृति--ओहि कोठरी के देखैत छी राखी, ओहि में आबि ओ बैसैत छल, अपन प्यारक भाषा स कतेक हमरा दुलरावैत छल , ओ चलि जायत छल ते ओकर नाम के परी निह्स्वन बज्वैत छल . मोन नै भरैत छल ते जोर स स्वरित बज्वैत छल ओ नाम सखी, ओहि कोठरी में टांगल नै वरन कोन कोन में प्रसृत भ गेल ,ओ विलय नै भेल मुदा, ओकर अनुगूँज घुरि घुरि ओहि परी के दुलरा जायत छल ...ओकर नाम क ध्वनि एतेक मीठ लागैक्जे बेर बेर अपन अधर पर ओकर नाम आनि एकटा स्पर्शजन्य सूखक अनुभूति ओकरा होयत छल जहिना अगरबत्ती स समस्त घर सुरभित भ जायत अछ ओहिना ओकर नाम स ओ कोठरी सुरभिमय भ गेल. ओहि नामक सहारे ओकर अशरीरी उपस्थितिक आह्वान क अपन घर के मंदिर बना लेलों ( राखी बेचैन भ जायत अछ )-की राजकुमार किछ नै बूझैत छल ओहि परीक एकान्तिक प्रेमक विषय में ? प्रकृति--नै बहिन नै, ओ ते परीक एहि एकान्तिक प्रेम क कल्पनो नै क सकैत छल.ओ ते संबोधन के सम्बन्ध बुझि नेने छल. राखी--एकटा बात पूछी सखी ? आत्मा स आत्मा के प्रकाश भेटैत छैक, फेर ओहि परीक निश्छल प्रेम ओकर ह्रदय के नै छुवलक?इ कोन विडम्बना थीक ? प्रकृति- हँ, विडंबने त थीक जे ओकरा स्पर्श तक नै केलक .राजकुमार क कोठरी में जखन ओ गेल छल ते अपन किछ छाप छोड़ी गेल की नै ई ते परी नै बुझलक,मुदा ,ओकर कोठरी क छाप परीक अंतर पर छपि गेल छल., अस्तु, अपन ' निज' के ओहिठाम छोड़ी नै वरन ,कतेक कुछ ल क ओहिठाम स चलि आयल छल. सखी, अपन सबहक 'चाहना' कागजक नाह थीक,जे यात्री लक नै , इच्छा ,कामना स लदल ,आन आन लोक क कल्पना के स्पर्शानुभुती देवा लेल पहुंची जायत अछ.भनहि, ओकर प्रतिदान ओकरा भेटय या नहि . ओ प्रेम की जे प्रतिदन माँगे ?ओकर ख़ुशी लेल जीवन भरि कालिदास क मल्लिका बनल,व्यथा वेदना भोगैत रही गेलीह.( राखी अस्फुट स्वरे बाजि उठैत अछ -सांचे ओ बड निर्मम छल) बेर बेर ओकरा निर्मम कहि ओकर अपमान नै करू सखी,ओ बड महान अछ ओकर भावना बड उदात्त अछ ओ महान विभूति क महाप्राण स अभिसिंचित छैथ,ओ एक दिन विश्व क सर्वश्रेष्ठ प्राण ,जन जन के हृदय गगन क प्रदीप्त आलोक राशि बनताह ( राखी दुखी स्वरे बजैत अछ ) -छोड़ू,जखन ओ अहांक प्रेम भरल हृदय के आलोकित नै क सकलाह तखन जन जन क , हुनक प्रेम में एतेक सामर्थ्य नै छल....हम इ सब बड़का बात नै बूझैत छी,हमर बुध्ही क्षुद्र अछ,मुदा एतवा अवस्य कहब ... ( बीचे में बात कटैत प्रकृति बजैत अछ )-चुप चुप बहिन, ओ हमरा स अगिला जनम लेल वचन देने छैथ,अगिला जनम में हम हुनक,प्रेरणा,सहचरी,प्रेमिका सब किछ बनब..(प्रकृतिक आंखि में कतेको स्वप्न सम्मोहन नर्तित भ उठैत अछ.). ( हा हा हा..राखी सखिक निश्छलता पर जोर से हँसैत बजैत अछ )..बड दीब,बड बेस,एहि जनम में हुनक प्रेमक माला जपु ,ओकर नामक संग मरू,जिबू आ अगिला जनम अहांक प्रेम के स्वीकार करत ,,,ओह प्रकृति, जे अदृश्य अछ अस्पर्श्य अछ ओहि पर एतेक भरोस ,सौंसे जिनगी अहांक आगू पडल अछ.. प्रकृति भावाविष्ट भ --अहाँ नै बुझब सखी, सिंगरहारक झहरैत सुन्नर मुकुल क कल्पना करू, आस्ते आस्ते लयात्मक गति स झरनाय,शाख स विलग हेवाक कल्पने ओकरा में वेदनाक गान भरि दैत छैक..अपन विनष्टियो में समष्टि सुख क अनुभूति ,इ समर्पण कतेक दुर्भेद्य अछ,कतेक अगम ,अथाह . बस ओकरा निहारैत रही ,एहि स हमरा मुक्ति भेट जायत ..... अहाँ बताही भ गेल छी,--बीचे में बात कटैत राखी बजैत अछ --भरि जिनगी की एहि वेदना में जीवन बिता देब अहाँ -- मुदा, प्रकृति अपन सोह में बजैत रहैत अछ--जनैत छी,काल्हि हम एकटा सपना देखलों..लाल लाल नुआ में हम अपना आप के दर्पण में देखैत छी हमर ठोर स रितेश निकली गेल ,ओहि ध्वनी स हमर सर्वांग रितेशमय भ उठल ,हम विक्षिप्त जका सिहरि उठलों ,धीर गंभीर पैर स चलि गेलों रितेश क घर ...रितेश हमरा अपन बाँहि में भरि पाँज पकड़ी प्रेमक अनमोल वरदान द दैत अछ..हम कतेक काल धरि बेसुध रहलों ..आह ..सखी ओ क्षण सपने रही गेल. हम आय धरि रितेश के चीन्ही नै सक्लों ,,हम अपन हृदय पुस्तक जका खोली ओकर समक्ष राखी दैत छी. मुदा, ओकर ह्रदय में कतेक तह भरल अछ,तह पर तह..हमर सपना सुनि ओ बजल छल......इ नादानी नीक नै..सरिपो, हम त नादाने रहलों ,एहि नादानिये में त अपन मोन के गवांय बैसलों ..हूँ,कहियो काल ई इच्छा जरुर करोट लैत अछ..काश ! एक बेर..हमर प्रेमक किछ ते निशानी हमरा भेटि जेतियैक. प्रकृति अनवरत बजैत जायत अछ -----हमर जीवन पथ क परम पाथेय भेट गेल ..हमर प्रसून ,हमर बेटा..रितेश विवाह केलक रैना स . ,अतीव सुन्नरी ,नंदनवन क कलिका ,जेकर रूपराशि पर कतेको रति लजा जायत छल. ओकर सलज्ज मुस्की पर पजेब्क ध्वनी गूंज लगैत छल कनक सन देह पर पूनम नहवैत छल,अलस अंगेठी स ऋतू बदली जायत छल ...साँच बजैत छी सखी,रितेश्क एहि पसिन्न पर हमरा कनिको इर्षिया नहि भेल ओकर खुशिक संसार देखि हम दुरही स खुश रह लगलों,इ साँच अछ जे हम रितेश के आय धरी बुझि नै स्कलों , केकरो जानवा लेल बुद्धि ,ज्ञान सभक सहारे जनि सकैत छी. ,मुदा,कोनो चीज के बुझ्व्लेल,चिनवा लेल एकर सभक आवश्यकता नहि,,हम अहियो ठाम धोखा खा ग्र्लों ,जकरा चिन्ह्वाक दावा केलों ओ मात्र एकदिन पहिचानल मात्र रही गेल, मुठी स रेत जकां ससरी गेल , साँच कहि राखी,रितेश्क संग बिताओल समय लगैत अछ जेना कोनो ;मोर्निंग वाक़; में बितोल एकटा पल छल ,किछ स्थूल,किछ सूक्ष्म,किछ भाव किछ अनुभाव क आदानप्रदान भेल आ फेर ओ अपन बाट हम अपन बाट ......समय क अदृश्य पक्षी उडैत गेल.....,ओना त प्रत्येक ह्रदय में एकटा ' बुद्ध' रहैत अछ मुदा, दिशा नै भेटैत छैक तैं सब क्यों 'बुद्ध' नै भ सकैत अछ, ( चूँकि प्रकृति आब राजकुमार स अपना आ रितेश्क नाम परआबि गेल छलीह, तै राखी एको बेर बीच में नै टोकैत छलीह ,ओकरा होयत छल आय प्रकृति सब किछ निकाली दैक )...... जनैत छी सखी एक दिन रैना कोर में प्रसून के नेने,हकास्ल पिआसल भीत हिरनी जका भयभीत हमरा लग एलीह--दीदी दीदी,--हम चोंकि उठल छलों रैना..अहांक इ हाल..? रितेश ?रैना भरल बसंत में पतझार बनल छलीह--दीदी, हम एकटा सपना देखने छलों ,हमर मोन कांपी गेल ,रितेश के सुनाय देलों आ ओ घटित क देलक.ओ सपनाक स्यात एयाह महत्व छल, किछ घटित हेवाक असंभावित संभावना , जन जन क करुण स्वर ओकर कर्ण कुहर में गूंजी रहल छल.समस्त मानवताक व्यथा -कथा क उपकृति ओ बनि गेल..पैर पर खसि पडलों -हमर की होयत , बजलाह,यशोधरा कहियो बाधा नै बनली ,हूँ, एतवा अवस्य बजलाह --ओ जे सामने कुटिया देखैत छी हमर जीवन तटी ओ थीक.कहियो हम लहरि जका ओकरा लग जायत छलों,कहियो ओ अंतरीप जकां हमरा लग आबि जायत छलीह .जीवन भरि ओ सभक दुःख ओढने रहलीह ,ओकर दुःख केओ नै ओढ़ी सकल प्रेमक ओहि अखंड साधिका लग जाऊ ....... राखी, हमर समस्त साधना के जेना फल भेटि गेल. मुदा,तुरते मानसिक मूर्छा स आत्मविस्मृत हम सजग भ गेलों ---रैना क चिर कोमल निःशक्त काया ,आँखिक विह्वलता ,निस्तब्ध,निर्वाक आंखि में कतेको प्रश्नचिन्ह,,कोनो प्रताड़ित नेना जका चुप चुप ..करेजा में एकटा हुक उठल.आखिर रैना के कोना दुखक उपनगर में धकेली गेल ओ निर्मम हम दुनू हाथ पसारि देलों.. ओहि मास भरिक राहुल के हमर हाथ में द अचेत खसि पडली रैना .ओकर जीवन प्रदीप ओहि दुर्ग-दीप सन अचक्के मिझाय गेल जे युग युग स स्वत आलोक पसारि रहल हो.... जैत जैत ओ एहि एकाकी शून्य जीवन के सुस्मित स्वप्नक उत्तरदायित्व सौंपी गेल ..आय धरि ओहि 'बुद्ध 'के अयवाक बाट जोहि रहल छी ,ओकर सम्पति के करेज स लगोने.... (प्रकृतिक नेत्र स झर झर अश्रु कण झहरी रहल छल , राखी क आंखि सावन भादो बनल छल , कोना समय अन्हार इजोत बनैत रहल . केओ नै बुझि सकल ) शैतानक वारिस शैतान वृद्ध भ गेल छल , अपन उत्तराधिकारी लेल सर्वगुण सम्पन्न शैतान खोजी रहल छल बेकल भय ; सभा बजाओल गेल. शैतान सभ से पुछलक 'के के कोन कोन काज आय धरि केने छी ? दरबार में से केओ बाजल.. हुजुर हम एतेक गोटे के खून केने छी जकर हिसाब नहि ऐछ, केओ हम एतेक बच्चाक खून, केओ हम एतेक स्त्रीक संग बलात्कार केने छी , हम जते जते डकैती करय गेलों ,ओहिठाम केकरो जीवित नै छोढ़लों, हम गाम क गाम उजारी देने छी , हम कतेक अपहरण केने छी से कही नै सकैत छी.; जतेक मुंह ओतेक बात . मुदा , शैतानक माथ लाज से झुकि गेल , बाजल- छिः ,अहाँ सबहक काज देखि हमरा लाज भ रहल कोनो जोकरक अहाँ सब नहि छी. --परेसान जका चारू क़ात दरबार में ताकलक....... आर केओ छैक ? एकटा प्रौढ़ , सभ्य ,शालीन व्यक्ति उठि के ठाढ़ भेल ,माथ झुकोने विनम्रता से बाजल ----- हमरा ते लहास गिनवाक फुर्सत नहि भेटल , मुदा ,हम जेकर जेकर खून केलों ओ अंत अंत धरि हमरा अपन दोस्त बूझैत रहल.. शैतान ख़ुशी से गद गद भ गेल ..ई थीक हमर राज्यक असली वारिस ....... प्रतिवादक स्वर हँ हम खून केने छी हम सासु बनय नही चाहैत छी. हम माय बनय नही चाहैत छी. ..तैं हम ई खून केलों . तीन तीन टा खून हम नारी छी नारी ग्लानि भ रहल ऐछ हम नारी किएक भेलों ?नारी के किएक महान मानल गेल ? नारी प्रकृति के निकृष्टतम कृति छी तैं हम अपन नारी जीवन जीवा लेल नहि चाहलों. हम माय बनि जीवा लेल चाहैत छलों सासु बनि जीवा लेल नहि चाहैत छी जज साहेब ------सासु ससुर ननदी हम तीन तीन टा खून केलों . जज साहेब हम चाहितों ते भागि के जान बचा सकैत छलों अपन ..दहेजक कारन हिनकर सबहक बनाओल षडयंत्रक हमरा लग कोनो सबूत नहि ऐछ --कोनो पुतोह लग कोनो सबूत नहि रहैत ऐछ..कानून सबूत चाहैत छैक साँच हो व फूसी हो . हमर सासु ससुर हमरा मारवाक षड्यंत्र केलनि एकर सबूत मात्र हम छी अओर हमर भगवान् ...सबुतक आधार पर चलयवाला आन्हर कानून टका पर सबूत अनैत ऐछ.आ ओही किन्लाहा सबूत पर अहाँ न्याय करैत छी जज साहेब --हमरा प्रतिकार लेवाक छल समाजक ठेकेदार सब स . हमरा फांसी दिय जज साहेब फांसी----- सौनसे कोर्ट स्तब्ध . सब वकील पाथरक मुरुत जनताक अपार भीढ़ के काठ मारि गेल छलैक . जज साहेब जेना हिमशिला सन श्वेत सर्द -लहास ---आंखि में अपन बेटाक ब्याहक मोल भाव नाचि गेल हो ...मुदिता हफैसी रहल छलीह . समस्त केशराशि कारी राति सन छिरिआयल छल . दुनू आंखि में घनघोर बरखा . दिनकरक ईजोत कृष्ण-पक्षक रंग ल लेलक. कारी कारी विषधर सांप सौनसे कोर्ट में कतेक काल धरि ससरैत रहल ...... मुदिता जीवनक मात्र बीस बसंत देखने छलीह आ ओ एहेन वीभत्स काज क बैस्तीह ई अकल्पनीय छल.आ मुदिता..?पलक बंद केने..बाबूजी बाबूजी .अहाँ कते छी अहांक बेटी अहांक नाम पर कलंक लगा देलक . हत्यारिन नहि मुदा अहांक आदर्शक रक्षा केलक . बाबूजी हम नारी जीवन नहि जीवी सक्लों . आ आंखि से जेना व्यतीत छलछला गेल..... बेटा आब अहांक ब्याह भ रहल ऐछ . आब पतिक घर अहांक मान मर्यादा जीवन मरण सब किछ अछि .हम सब ते अहाँ लेल पाहून रहब पाहून..---मुदिताक पिता बेटीक माथ पर हाथ फेरैत बजलाह ---- मुदिताक मोने अपन ब्याहक प्रति विरोध भाव उठहल--जमीन जाल बेचि हमर ब्याह नहि करू बाबूजी / मुदिता बड भावुक छलीह सदिखन चिंतन में डूबल खाली अभावे टा ओकर पूंजी छल अभाव क्रांतिक कारन भ सकैत छै मुदा शर्त रही जायत छै विवेकक...पिताक गरीबी समाज में अभिशाप छल आदर्शवादी कीरानिक जीवने की छै --तेज जलधार में कम्पित जलकुम्भी सन. बी ए पास क मुदिता बैसल छलीह जता देखू ओत टका ..एतेक मूल्य वृद्धि वरक भ गेल छल जे वरक बाप के मृत्युक अतरिक्त कोनो बाट नहि देखा परैत छल ..मुदी रातुक भानस में की ऐछ आटा लेल मदना के पठोने छी बाबूजी ओह कतेक महगी आबी गेल छै ---नमहर साँस लैत शिविर बाबु बजलाह बाबु जी एकटा बात ते अहाँ छोडिये देलों ........मुदिता अधर पर मैलछांह हंसी लय बजलीह ---ओही जमाना में बेटीक ब्याह ले लड़का मंगनी में भेटैत छल आब मोलभाव कर पढ़ैत छै--मुदिक गप सुनी शिविर बाबु चौंकी गेल छलाह ---बाबूजी एकटा बात पूछी ? लोग अपन बेटा के किएक बेचैत छैक कोना बेचैत छै..-----शिविर बाबुक आंखि में रेतकण झिलमिला गेल..बाबूजी माय कोना अपन बेटा के बेचैत ऐछ बेटाक दाम लग्वैत ऐछ ..अपन पेट में नाओ मास जीवन दान दैत ऐछ पालैत पोसैत ऐछ ओ माय कोना बेटा बेचवा लेल सहमत भ जायत ऐछ. बाबूजी सौरभ ते छोट ऐछ की ओकरा केओ दस हजार टका देत ते बेचि देवैक अहाँ ? मुदु---भरि स्वर में बजलाह बताही भ गेल छी अहाँ अंट शंट बजने जा रहल छी की भ गेल अहांके ...........नहि बाबूजी हम किनल बर से ब्याह नहि करब शिविर बाबु बेटीक पागल प्रलाप सुनी ओहिठाम से उठी गेल छलाह .....ओही राति ओ अपन माँ बबुजिक गप सुनने छलीह ------------मुदितक ब्याह ओहें घर में करब जे आदर्श हो ओ बड भावुक ऐछ विद्रोही प्रकृति के----आ बाप बेटीक गप सुनी माई दांत कासी लेने छलीह..एही बेटीक भविष्य की ऐछ ईश्वर ! माय आशंकित सब दिन बेटा जकां पोसने छी आदर्श आ सिधांतक शिक्षा देने छी माथ पर गृहस्थिक भार पढ़तैक अपने शान्त भ जेतीह.. आतिश बाबुक बेटा सप्तक अहाँ के केहेन लागैत ऐछ .......बाबूजिक स्वर सुनी मुदी चोंकि गेलीह ---------आतिश बाबु छोट मोट रोजगार करैत छथि बेटा सेहो ओही रोजगार में लागल ऐछ...निक खैत पिबैत घर . सिधान्त्वादी लोक ....मुदा ओ बड टका माँगता मायक आशंका टका....हँसैत शिविर बजलाह .....'दहेज़ विरोधी संघक ' अध्यक्ष छैथ. दहेज़ प्रथा हन्तेवा लेल जी जान से लागल छैथ .. ओ तखन ते बड निक . अपनो विवाह एकटा गरीब घरक लड़की से केने रहैथ आतिश बाबु के के नहि जनित ऐछ ..... हँ से ते ठीके हमहूँ जनैतछी. ....मायक स्वर मुदिताक कान में जायत रहल..हुनकर ससुरक घर दुआरी जगह जमीन सब बिका गेल रहनि हँ दहेज़ नहि नेने छलाह एही में कोनो शंका नए.हँ सप्तक मायबापक परम आज्ञाकारी आ सुशिल ऐछ .. मुदिताक आंखि में सप्तकक रूप नाच लागल आदर्श आ सिधांतक गप सुनी ओकर ह्रदय सप्तके लेल नहि सम्पूर्ण परिवार लेल पूजा पुष्प सन समर्पित होयत रहल ...... आ एक दिन पालकी पर बैसी कनिया बनि मुदिता अपन सासुर आबी गेलीह .................खाली कनिए टा ? सर सामान दान दहेज़ ....आही रोऊ बा ....सासुक प्रथम स्वर सुनतही मुदिता घोघ तर से देख चाहली....माँ भौजी के गहनों नैहरक तेहन सन नै ऐछ .......मुदिताक अंग परिक्षण करैत छोटकी ननदी बाजी उठलीह ......बाबूजी हद्द क देलखिन माँ .......मुदिताक समस्त तन तिक्त गंध से आवेष्टित भ गेलैक ..सासुरक प्रथम स्वागत गान ! मोटा जकां कोन में बैसल मुदिता माँ फ्रिज नहि टी वी नहि पलंग सोफा किछ ते नहि ..कतेक उछाह छल भैयाक ब्याह में ई सब आओत सीपी एखन तोहर बाबूजी के पुछैत छी . दहेज़ विरोधिक सभापति छैथ समाज में की घर में ?अपने घर डाहि हम आइग नहि तापब... एकटा बेटा आ .....पुनः मुदिता डीसी तकैत आग्नेय सवारे बजलीह .....बैसल की टुकुर टुकुर तकैत छी हम भाढ़फोरही ताढ़फोर्ही नै बूझैत छी ..जाऊ भानस भात बनाबू काज धाज करू ..आ की माय एहो सब नै सिखेलक..... अपरिचित घर अनचिन्हार परिवेश में मुदिता निस्सहाय जकां सप्तक के ताकि रहल छलीह मात्र चारि दिनक जकरा से परिचय छल. ओ ते माय बहिनिक उक्ति सुनी कखन घसकि गेलैक कियो नहि बुझलक . मुदिता चुपचाप भनसा घर दिसि चली गेली ........हे पटोर पहिरी भनसा में नहि जाओ आंखि से देखने छलिये पटोर .......सीपी एकटा नुआ असगनी पर से दय दहीक फेरी लेतैक............एकटा मैलछांह नुआ हाथ में नेने मुदिता कांपी रहल छलीह छोलनी करछुलक मध्य ....साँझक कजरायल आंखि नोरा गेल आकास में त्रितियाक चान विधवाक टूटल चुढ़ी सन लटकल छल .....मुदिता सोचैत रहलीह .......कतेक सपना लोक देखैत ऐछ ..सपना कतेक विचित्र शब्द थ्हिक सपना आंखि खुलल आ टूटी गेल..नहि नहि सपना के पक्ढ़वाक चेष्टा नै करवाक चाही ...परछाही कतहु पकरहल जाय .........बाप रे एतेक देर से भंसा घर में की अपन देह डाहि रहल छी ----सासुक कर्कश स्वर ----माय बाप भिखमंगा जकां बेटी के सांठी देलक आ बेटीक मलार कतेक!... एही परिवेश में दिनक पंछी उढ़ैत रहल विद्रोही मुदिताक सब स्वर शांत भ गेल. सब उत्ताप पर हिमपात भ गेल ...सप्तक राति के अवैत छल आ भिनसर होयताही निकलि जायत छल. मुदिताक मोन से ओकर सुखदुख से ओकरा कोनो मतलब नहि छल . ओ सरिपो माता पिता क आज्ञाकारी छल. आतिश बाबु बड पैघ समाज सुधारक छलाह हुनकर नाम प्रतिष्ठा छल दीया तर अन्हार.-----अहाँ शिविर बाबु से की कही विवाह थ्हिक केने छलों?कोनो सर सामान घर में नहि आयल .समाज सुधारवाक चक्कर में अपनाही घर में आगि लगा देलों. हम कहने छलों सिपिक माय इशारा में कतेक बात कहने रही ....हम टका पैसा नहि लेब एकेटा बेटा ऐछ ओकर माय के कतेक सुख सेहनता छै ----------भाढ़ह में जाय अहांक कहब सीपीक माय अगुता गेलीह अहाँ टका नहि लेलों ते अहांके किछ नहि भेटल अहाँ स्थिर राहु टका ते नाहीये भेल टीवी फ्रिज किछ ते नहि भेल...... आतिश बाबु सोच लगलाह कहू ते एकेटा बेटा आब ते हमरा घर में कहियो ई सब नहि आयत .....मुदिताक सासु दुःख आ वेदना से कानय लगलीह.......स्थिर रहु हम उपाय सोचैत छी. घरक एहेन वातावरण में मुदिता देरायल हिरनी जकां राति दिन चौन्कल रहैत छलीह डेरायल सन जंगली भेढ़िया सबहक मध्य एकटा मृग शावक माय बापक अल्हढ़ चंचल विद्रोहिणी मुदिता घरक कण कण में ओकरा षडयंत्रक आभास होइत छले. ..डेरायल चौन्कल भयभीत......... ओही राति सप्तकक बाहीं पर सुतल मुदिताक आंखि में नीन नहि छल. राति दिन खुजल आंखि से ओ भयंकर सपना देखैत छलीह ......की भ जायत ऐछ अहांके नहि ते अपने सुतैत छी नहि ते हमरा सूत दैत छी. मुदिताक चोंकब से अर्धनिद्रा में पडल सप्तक खौन्झा उठैत छल. ..........नीन नहि अबैत ऐछ -जेना अपना आप से बजलीह धन्य छी महाराज निन्न नहि अबैत ऐछ ते चुपचाप पडल रहु चोंकि चोंकि तिरिया चरित्त नहि देखाऊ . मुदी दिसि पीठ कय सप्तक बढ़बढ़हैत रहल--------मुदिता लहुलाहान भ गेलीह . तिरिया चरित्त? भावुक मोन कछोटी उठल तिरिया चरित्त केकरा कहैत छैक के बनोलक एही शब्द के ? पुरुष चरित्त केओ किएक नहि बजैत छैक सबटा वेद-पुराण रामायण गीता सब टा पुरुखक लिखल ऐछ तैं ई पक्षपात ! कतेक असहाय हम सब छी लंका से सीता के आनि राम अग्निपरीक्षा सीता क लेलानी मुदा एको बेर सीता प्रतिवाद नहि केलीहपत्नी से अलग रामो ते छलाह ओ किएक ने परीक्षा देलनि रामायण पुरुषक लिखल छल. ---------निस्तब्ध्ह राति कतो कोनो मर्मर नै मुदिता चुपचाप पडल एही आँखिक नोर बही ओही आंखी में जाय सागर बना रहल छल..सब देशक लोक कहने ऐछ frelty thy name is woman कियो स्त्री के चीन्ही नै सकल. स्वयं स्त्री माय बनि बेटा बेचैत ऐछ पुतोह बनि जरैत ऐछ आ बची जायत ऐछ ते सासु बनि जरावैत ऐछ. बेटा क माय बनि की भ जायत छै स्त्री के ?ई स्त्री स्वातंत्र्य नारी विमर्श ई सब हथिक दांत छी पहिने स्वयं स्त्री के बदल पडत अपन अधिकार अपन शक्ति के चिन्ह पडत.........असहाय मुदिता आक्रोश से भरल छलीह . नाना प्रकारक विचारधारा ओकर मानस मंथन क रहल छल. पतिक प्रेमिल स्वरों से वंचित कोनो माय बाप अपन बेटीक ई स्थितिक कल्पना क सकैत ऐछ कतेक बेटी अपन सासुर में एहिना राति बित्वैत हेती. एकटा माय दोसरक बेटी गंजन करैत ऐछ मुदा स्वयं ओकर बेटीक भविष्य ? ...नींद नहि छल ओकर आंखि में ...राति तितल भिजल नीरवता एहेन जे खिड़की से अवैत हवाक स्वरों वाचाल छल. मुदितक ह्रदय में एकटा आशंका ..एकटा संशायक मेघ जेना कोनो प्रलयंकर झंझा आबे वाला हो समस्त क्षितिज अंधकार से आच्छादित .......अचक्के किछ स्वर जेना ओकर कान में आब लागल...एकटाअनजान भय से ओकर छाती कांपे लागल .ओकर समस्त इन्द्रिय सजग सचेतन भ गेल ओ ओही शब्द सब के आत्मसात करवाक प्रयास कर लागल ...................हमहूँ एयैह सोचैत छी ..सासुक स्वर कान में पडल ..ओ आर सजग भ गेलीह ...शिविर बाबु ते सब सुख मनोरथ डाहि देलनि ..विनिश बाबुक बेटी से बात चलाबी...विनिश बाबु नगरपालिकाक चेयरमेन देब लेब ते खूब करताह मुदा हुनका बेटी के आंखि चमकैत रहैत छैक...दुनू टा आंखि झिप झिप करत ऐछ जेना कनखी मारैत होई... .......सीपीक माय बजली निक आंखि वाली आन्लों ते की भेटल ....ई ते सांचे मुदा एही कनियाक की करब ई ते हल्ला गुल्ला मचाय सबटा प्रतिष्ठा माटी में मिला देत ........एकरो उपाय छैक मुदिताक सर्वांग कांपी रहल छलैक सांस जोर जोर से चली रहल छल .स्वर अस्पष्ट भेल जा रहल छल. पारामार ऐछ हँ पारामार ते दोकाने में अपन पडल रहैत ऐछ. लोक के की कहवैक..लोक के की..कही देवैक ..आत्महत्या क लेलीह..दोसर गोटे से फंसल छलीह आय पकड़ा गेलीह. ........वह.. ई ते उत्तम ..हम ततेक जोर से चिकरी बाजब जे सब केओ हमर कथन के साँच बुझी जायत मुदितक सासुक स्वर में ख़ुशी छल दोसर गोटे से फंसल ...पारामार ..मरणोपरांत चरित्र पर दोषारोपण .... आवेश आ उत्तेजना से कांपी रहल छल मुदिता . आतिश बाबुक ऑफिस घर में तेबुलक दराज में रखल लोडेड रेवाल्वारक ध्यान आबी गेलैक -----माय्बापक आज्ञाकारी पुत्र एही सब से अनभिज्ञ निचिं सुतल छल -------एकटा आवेश एकटा उत्तेजना एकटा एकटा मूर्च्छना में मुदिता ऑफिस घर से रिवाल्वर निकलि यंत्रचलित जकां सासु ससुरक समक्ष ठाढ़ह भ गेलीह ............बहुत भेल बाबूजी अहाँ एहेन समाज सुधारक के प्रतिष्ठाक संग ज्जेनाई एही दुनिया से जेने निक छै आ एक गोली ससुरक छाती पर माय अहाँ माँ शब्द पर कलंक छी नारी रूप पर कलंक छी नारी भ नारी के प्रतिष्ठा नहि द सकैत छी.......दोसर गोली माय के छाती पर सीपी !..पैघ भ अंहु माय बनब सासु बनि पुतोहके पारामार खुआयब तैं ई अहांक लेल... तिनु लहाश ताढ़फर्हा रहल छल सप्तक केराक भालेरी जकां कंपित कखन दरवज्जा पर आबी ठाढ़ह भ गेल छल.....नहि अहांके किछ नहि कहब अहाँ माता पिताक आज्ञाकारी छी अवश्य मुदा हमर सोहाग छी एही सोहागक कारन सीता अपन सासु ससुर महल दोमहला सब के त्यागी के रामक संग वन चली गेल छलीह .....बस अहाँ अपन कलंकक संग जीवु............ भारत भूषण झा लघु कथा- आत्मबल चुनावक सर्गर्मीक चुस्की लेलाक वाद ललित चौकसँ घरपर एलाह। घरपर हुनक पत्नी रेणू तामसे आगि भेल बजैत- “अहाँकेँ कि होइए जिनगी तँ नरके बना देलौं आ वौआकेँ पढ़ाएब-लिखाएब। ओकर जिनगी अहाँ जकाँ नइ हुअए देबै। दोसराक कनिया जे पढ़ल-लिखल नहि छै ओकर घरबला डिग्री किनि कऽ नौकरी करबा देलकै आ एतए हम एम.ए. पास घरोमे कोनो मोजर नहि एते करै छी ककराले। वौआकेँ फार्म भरबाएब से एकटा पाइयो नहि।” ललित एक टकसँ रेणु दिस तकैत चुप भऽ ओकर बात सुनैत मने-मने सोचैत जे ई कोन पैघ बात छै बाबू जीसँ मांगि एकर फार्म भरबा देवइ। अपने जन-मजदूर जकाँ खटै छी खेतसँ खरिहान धरि आ पत्नी नौकरानी जकाँ अांगना-घरमे खटैत अछि। बाबूजी किएक नहि देथिन्ह। ललित धुराएले पएरे बाबूजी लग पहुँच बाजल- “बाबूजी हो दू साए टाका दहक तँ बौआकेँ काल्हि फॉर्म भरतै।” बाबूजी केँ ब्लड प्रेशर हाइ। बजलथि- “कतएसँ कमा कऽ मनिऑडर एलहहेँ जे मंगै छह। हमरा बुत्ते एकोटा पाइ नहि हेतइ।” सुनते ललित सन्न भऽ गेल। आँखिक आगाँ अन्हार भऽ गेलै। ललित मने-मन सोचैत- जतेक एतए खटै छी अगर दोसराक खेतमे खटितौं तँ मजदूरियो भेटताए आ हाथमे किछु पाइयो रहिताए। यएह बात सभ सोचैत मुँह खसल अपन घरमे आबि चुपचाप पलंगपर बैस गेल दोसर दिस रेणुकेँ तेवर चढ़ले बाजलि- “कि भेल कना पढ़त अहाँक बेटा?” ललितकेँ चारू दिस अन्हारे-अन्हार लगै। रेणु फेर बाजलि- “किअए बौक भेल चुप छी, हमरा लग हौसली अए लऽ जाउ सोनरा दोकानमे बेचि कऽ बौआकेँ फाॅर्म भरा दिऔ। लेकिन एक शर्त हम भुखले रहब मुदा आइ भिन होएव।” रेणुक बात सुिन ललितक हालत और गंभीर भऽ गेलै। जे आइ हमरा लग एकटा पाइ नहि अछि। रेणुक बात सुिन ललितक हालत और गंभीर भऽ गेलै। जे आइ हमरा लग एकटा पाइ नहि अछि आ ई भिनक बात कऽ रहल छथि। दोसर दिस बाबू जीक बात खूनकेँ खौलौने ललित कहलकै- “ठीक छै जे मर्जी आब अहींक बात करब।” हौसली बेच बौआकेँ फार्म भरल गेल। ललित घरसँ भिन भऽ गेल। बाबू जीक रूप ओहने तेबर- “रे हमरा तूँ धौस देखबै छेँ हम अपना जीबैत एक धूर जमीन हिस्सा नै देबौ। जो कमा गऽ खो गऽ।” घरमे दू साए मोन चाउर। मुदा ललित किनि कऽ खाए। दोकानदारो उधारी दै लेल तैयार नै। कारण ई देत कतएसँ। बौआ जे अगहनमे खेतसँ ऑटी आनने रहए वएह धानक चाउर ललित कुटेलक। 25 किलो मुदा ओ चाउर कत्ते दिन। जना तना दिन कटैत गेल एक दिन एकटा रजिस्ट्री रेणु पति ललित नामक, डाकिया लऽ कऽ डाकघरसँ आएल। मुदा ककरो विश्वास नै जे ई ललितबाक छिऐ लेकिन नाम तँ ओकरे रहै पढ़ुआ काका ललितकेँ पुछलकै- “जे देकही तँ ई रजिस्ट्री तोरे छिऔ।” रेणु तँ हमरो पुतौहूकेँ नाम छै मुदा पतिमे तोरे नाम छै। ललितकेँ आश्चर्य भेलै। जे हमर कनियाँकेँ रजिस्ट्री कतएसँ आएल हेतै। कहलियन्हि- “जँ हमर नाम छै तहन ते हमरे हेतै। देखए दिअ।” मुदा हमरा दैसँ पहिने पढ़ुआ काका पढ़लनि आ कहलनि- “ई तँ सेन्ट्रल गोभर्नमेन्टक ज्वाइनिंग लेटर छिऔ।” ई सुनि ललितकेँ लागल जे कक्को हमरासँ मजाके करै छथि। मुदा पढ़ुआ काका मजाक नै कऽ सकैत छथि। हम हँसैत, विहुसैत रजिस्ट्री लऽ कऽ अंगना पहुँचलहुँ। रेणुसँ पुछलयन्हि- “देखिओ अहाँकेँ तँ नौकरीबला चिट्ठी आबि गेल। ई कोना भेलै।” सुनिते रेणुक आँखिमे नोर भरि गेलै। आ रूदन स्वरमे बाजए लागलि- “ओ तँ फुदन बौआ, जिनका हम पेपड़मे पढ़लाक वाद कहलयन्हि जे बौआ एकटा हमर काज कऽ देब। ओ कहला कोन काज हम कहलयन्हि जे एकटा पेपड़मे फार्म निकलल छै से हमरा आनि दैतहुँ। ओ आनि देलाह आ ओकरा रजिस्ट्री करबा देलथि।” चिट्ठी लऽ रेणु ज्वाइन करए गेलि। ओतहुओ हुनका घुसक तगेदा। बेचारा ललित मायुस भऽ डी.एम.केँ अपन सभ दुखरा सुना देलकै। डी.एम. भावुक भऽ ओकर ज्वाइनिंगकेँ स्पेशल ऑडर निकालि ओकर योगदान करबा देलक। आब रेणु ललितकेँ संपतिक अम्बार बौआकेँ विआहक चर्च होमए लागल। एकटा गामक घटक आएल ललित कहलकै- “जे हमरा एक्को करोड़ देब तँ हम अहाँकेँ गाममे कुटमैती नहि करब।” ललित कोनो काजसँ बाहर गेल रहथि। ओहि बिच लड़कीक पिता ललितक बाबाकेँ मना लेलक आ हुनका बौआक विआहक लेल किछु पाइ सेहो थम्हा देलक। जखन ललित आएल तँ हुनक बाबूजी कहलकनि- “ललित हौ, हम बौआक विआह ठीक कऽ देलिअहेँ। आ हमरा ओ वयना सेहो दऽ देलकऽ हेन।” ई सुनिते ललितकेँ पाड़ा गरम भऽ गेलै। बाजल- “बाबूजी आबो तँ हमरा अहाँ छोड़ि दिअ। ने हम अहाँक सतरह बिगहामे सँ एक धूर जमीन लेलहुँ आ ने एक्को रूपैआ। जेना तेना अपन जिनगी जीब आ स्थिर भऽ रहल छी। तँ अहाँ हमरा बेचैनीमे डालि रहल छी” जे नै से सभ कहि देलकन्हि। बाबूजी लजाएले ललितकेँ कहलकनि- “हमरासँ गलती भेल हम ओकर टाका आपस कऽ देबै।” ललित बाजल- “निश्चिते नै तँ तूँ जानह।” कहैत अपन घरमे प्रवेश केलक। ई सभ गप्प रेणु सुनैत रहथि। एक गिलास पानि ललितकेँ दैत बाजलि- “जे पहिने पानि पीबू ठंढ़ाऊ। तहन सभ किछु हेतै। बाबूजी जहन वचन हारि गेल छथिन्ह। तहन अहाँ एतेक आमिल किएक पिने छी। ओहो अहाँक पिते छथि। जेना अहाँ बौआक। हुनकर वेइज्जतीमे अहाँक वेइज्जती नै ऐछ। तँए हमर मानू आ बाबू जीसँ माफी मांगू जा कऽ।” ललितकेँ रेणुक बात सुनि कऽ आओर टेंसन भेल जाए। बाजल- “ठीक छै तहन पीठ सक्कत कऽ लेब। ओइ गामक बेटी सभ जै गाम जाइ छै ओतए अपन नाम साउसकेँ पिटैएमे करैए। हमर मानू बाबूजी फेर कोनो चालि चलि रहल छथि। अपना सभकेँ उन्नतिकेँ देख।” रेणु बाजलि- “अरे! जहन बाबूजीकेँ एहने सोच हेतन्हि तँ हम अहाँ की करबै। हमरा सभकेँ अपन बाबू जीक इज्जतक खातीर सभ मंजूर ऐछ।” ललित बात मानि गेल। बौआक विआह ओहि गाममे भेल आ ललित रेणुक पुतोहू तँ साक्षात लक्ष्मी। गामक आदर्श। रेणु ललितकेँ कहलकनि- “देखिओ, बाबू जीक आशीर्वादसँ अपना सभकेँ सभ किछु पाप्ति भऽ गेल। एकटा पुतोहूवो भगवान देलथि सेहो लक्ष्मीये।” कपिलेश्वर राउत अप्पन गप- किछु विहनि आ लघु कथा [१. वंश २. उलहन ३. थरथरी ४. भोग ५. कुमारि भोजन ६. कीर्तन आ सम्मेलन ७. मूर्दा ८. सतमाए ९. तकरीर १० पान ११ मई दिवस १२ भूख १३ बेथा १४ किसानक पूजी १५ छूआ-छूत १६ कलियुगक निर्णए] अप्पन गप हमर पिताजी कृषक छला। रामायण, महाभारतसँ बेसी सिनेह रहनि। रेहलपर रामायण राखि हारमोनियमपर सुर-तालमे गबै छला। हमहूँ पिता जीक संग लागल गाबी। तीन भाँइक भैयारी अछि। आइ.ए. पास केला पछाति बी.ए.मे नाओं लिखौने रही तही दिनमे पिताजी गुजरि गेला। बूढ़ दादा-दादी, माए विधवा भऽ गेली। छह माससँ साल भरिक पेसतर पहिने पत्नी (लक्ष्मी देवी) छह मासक बेटा लाल कुमारकेँ छोड़ि चल गेली पछाति दादीक मृत्यु भऽ गेल। खेत-पथारसँ लऽ कऽ्बरैब-बाड़ी धरिक देख-रेख हमरे ऊपर। तहिया भाए सभ छोट रहथि। परिस्थिति तेना ने झकझोरि देलक जे पढ़नाइ छोड़ए पड़ल। माइक ममता संग रहल। श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक नेतृत्वमे कम्युनिष्ट पार्टीक कार्यकर्ता बनि काज करी। बहुत रास मोकदमामे पार्टीक सदस्य सभकेँ फँसौल गेल। हमहूँ फँसौल गेलौं। पार्टीक पोथी सभ पढ़ी। एकटा अंग्रेजी स्कूल, निजि विद्यालयक उद्घाटनमे भाग लेलौं। ओतए मैथिलीमे अपन वकतव्य देलिऐ। स्कूलक प्राचार्य बादमे कहलनि, अहाँ कोन ‘छी-छा-छथि’मे बजलौं। हम कहलियनि मिथिलाक छी मातृभाषा मैथिली अछि, मैथिलीमे नै बजितौं तँ कि विदेशी भाषामे बजितौं। श्रुति प्रकाशनसँ प्रकाशित जगदीश प्रसाद मण्डल जीक लिखल पोथी (गामक जिनगी, उत्थान-पतन, मौलाइल गाछक फूल, मिथिलाक बेटी जिनगीक जीत इत्यादि) सभ जखनि पढ़लौं तँ हमरो जिज्ञासा भेल किछु लिखबाक। तइ समैमे श्री गजेन्द्र ठाकुर मण्डलजी सँ भेँट करए बेरमा एला, हमरो भेँट भेला, गप-सप्प केलाैं। लिखैक उत्साह ठाकुरजी जगौलनि। धैनवाद दइ छियनि श्री गजेन्द्र ठाकुर आ जगदीश प्रसाद मण्डल जीकेँ। प्राय: तही दिनसँ छोट-छोट कथा सभ लिखए लगलौं। मिथिलाक एक मात्र सर्वहारा मंच “सगर राति दीप जरए” कथा गोष्ठीमे जाए-अबए लगलौं। लघुकथा, विहनि कथा आ कविता विदेह ई पत्रिका आ विदेह-सदेह पत्रिकामे प्रकाशित भेला पछाति आरो उत्साह बढ़ल। धैनवाद दइ छियनि श्री उमेश मण्डलकेँ जे कथा सभकेँ सलैया केलनि संग-संग श्री गजेन्द्र ठाकुरकेँ बेर-बेर धैनवाद। कथाक दृष्टकोण समाजक बीच रीत-रेबाजक संग रीत-कुरीतकेँ सेहो देखेबाक चेष्टा केलौं अछि। अहींक- कपिलेश्वर राउत, जीविकोपार्जन- कृषि, सम्पर्क-गाम- बेरमा, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी, प्रखण्ड- लखनौर, बिहार-८४७४१० वंश परशुरामकेँ बिआह भेना दस साल भऽ गेल छल। परशुराम, जदुवीर बाबूक एक मात्र लड़का। पुत्री दूटा हुनका लोकनिकेँ शादी मुदा भऽ गेल छल ओ दुनू अपन सासुर बसै छेली। जदुवीर बाबू खूब धुम-धामसँ परशुरामकेँ बिआह कौशल्या संग केलनि। कौशल्याकेँ पिता धनी-मनी बेकती पढ़ल-लिखल परिवार, समाजमे अलगे मान प्रतिष्ठा, कौशल्या सेहो बी.ए. तक पढ़ल-लिखल छल। खूब दान दहेजक संग बिआह भेल। मौज-मस्ती संग कौशल्या आ परशुराम रहए लगला। बिआह भेना दस बरख भऽ गेल मुदा कौशल्याकेँ एकोटा पुत्र वा पुत्री नै भेलनि। डाक्टरीओ इलाज केलनि, ओझहाे-गुणीसँ देखौलनि। कौबुला-पातीसँ देवालय तक देखेलक मुदा कोनो सफलता नै भेटलनि। सासु अंजनी फुट्टे कलहन्त रहए लगली। जे वंश आब लुप्त भऽ गेल। ओम्हर जदुवीर बाबू सेहो दुखी रहए लगला। एतेक सम्पति के भोगत। कौशल्याकेँ माए-बाबू फुट्टे दुखी रहए लगला। सर समाज से अलगे कुटी-चालिबला गप-सप्प जहाँ-तहाँ बजै छल। कौशल्याक मन दुखी हुअ लगल। कि कएल जाए...। एकाएक एकटा विचार मनमे उपकल। एक राति लाज-धाक छोड़ि स्वामी परशुरामसँ कहलक- “स्वामीजी एकटा बात पुछौं?” परशुराम बजला- “किएक नै पूछब। जे पुछबाक अछि से पुछू हमरो-अहाँमे कोनो बात छिपेबाक छै। निधोकसँ पुछू।” कौशल्या सिहकैत बाजलि- “आब हमरा धिया-पुता नहियेँ हएत। किएक ने अनाथालयसँ एकटा बच्चाकेँ आनि पुत्र बना ली।” परशुराम- “अहाँ पागल तँ नै भऽ गेलौं।” कौशल्या- “नै-नै सएह पुछै छी। ऐमे कोन हरज छै। हमरा अहाँकेँ पुत्र भऽ जाएत सासु-ससुरकेँ पोता भऽ जेतनि वंशकेँ चलेबाक जोगारो भऽ जाएत।” परशुराम तमसाइत बाजल- “अहाँ पगलाए गेलौं। हम ऐमे किछु नै बाजब। लोक की कहत?” कौशल्या हिम्मतसँ काज लेलनि। विहान भने ससुर जदुवीर बाबू लग जा पुछलखिन- “बाबूजी एकटा विचार लइले एलौं हेन। की आदेश दइ छी।” जदुवीर बाबू- “पुछह ने की कहै चाहै छहक।” कौशल्या- “बाबूजी हमरा कोइखसँ आब धिया-पुता नै हएत तँ किएक नै अनाथालयसँ एकटा बच्चाकेँ आनि पोइस पुत्र बना ली।” जदुवीर बाबू आगि बबूला होइत बजला- “चुप रहू ई की बजै छी। पागल तँ नै भऽ गेलौं। केतए हमर खनदान आ केतए अनाथालय। अनाथालयमे केकर जनमल कोन बच्चा हएत तेकरा अहाँ गोद लेब। डोमक हएत आकि चमारक, मुसहरक हएत आकि मुसलमानक, अवैध सम्बन्धक हएत आकि कन्या कुमारीक। हमरो अहाँ पागल बना देब। ई विचार हम नै देब।” कौशल्या- “बाबूजी वंश चलेबाक तँ जरूरी छै। कोन सरल-गलल विचारमे अहाँ डुमल छी घुरन बाबूकेँ नै देखै छियनि तीन-तीनटा बेटा, बेटो केहन तँ खलीफा सन-सन। तीनू बेटाककेँ घुरन बाबू पढा-लिखा कमाइले बाहर भेज देलखिन। तेकर फल भेलनि जे बुढ़ाकेँ तीनूमे सँ कियो देख-भाल करैबला नै। भैया करथिन देख-भाल, बाबू माएकेँ छोटकाक विचार तँ भैया सोचैत जे मझिला आ छोटका करत। तीनू अपन-अपन घरवाली संग परदेशमे रहै छथि। घुरणबाबू मुइलथि आकि दुखी छथि, धैनसन। धैन कही पहुलका नोकर बिलेँतीया दुसाधकेँ जे घुरनबाबूकेँ वृद्धा आश्रम नै जाए देलकनि आ सेवा टहल कऽ रहल छन्हि। एहने तँ कमलो बाबूकेँ छन्हि दूटा बेटा आ दुनू अमेरिका आ फ्राँसमे रहै छथि कहाँदनि ओत्तै दुनू बिआहो कऽ लेलनि। केतेक उदाहरण देब अपन पुत्र तँ कुपुत्रे ने भऽ गेलनि।” जदुवीर बाबू दुनू आँखि ऊपर करैत किछु सोचैत बजला- “की कहि रहल छी।” “कहलौं तँ ठीके।” कौशल्या- “बाबूजी, अपन बेटा तँ छेलनि किएक बुढ़ाड़ीमे छोड़ि देलकनि। तँ कहब जे अनाथआलयमे केकरो बच्चा होइ तइसँ की, आखिर बच्चा तँ छिऐ ने। हमरा आ स्वामीकेँ पुत्र भऽ जाएत। अहाँकेँ पोता भऽ जाएत, एकटा बच्चाकेँ पालन-पोषण भऽ जेतै वंशक परम्परा कएम भऽ जाएत। हमरा माए-बाबूकेँ नाति भऽ जाएत।” जदुवीर बाबू- “धन्य छी कौशल्या। आइ अहाँ हमर आँखि खोलि देलौं। जाउ आ स्वेच्छासँ अनाथालयसँ बच्चा लऽ आनू।” कौशल्या– “बाबू ओइ बच्चाकेँ श्रवण कुमार जकाँ पढा-लिखा कऽ बनाएब सएह ने माए-बापक करतब होइ छै।” जदुवीर बाबू- “आब अधिक नै कहू। हमर असिरवाद हमेशा अहाँक संग रहत। ठीके कहल गेल छै ‘पुत्र-कुपु्त्र तँ किए धन संचय पुत्र-सपुत्र तँ किए धन संचय।” उलहन जवाना तेना ने बदलि गेल हेन जे। जे काल्हि तक एक रूपैआ लेल जमीन्दारसँ वा कोनो मालिक लग दँतखिसड़ी करैत रहै छल, ओ आइ सभ छान-पगहा तोड़ि कऽ दिल्ली, पंजाब, कलकत्ता, बम्बइ, चलि गेल आ नोकरी-चाकरी करए लगल। ओकर रहन-सहन बात-विचार कपड़ा-लत्तासँ लऽ कऽ रूपैआ तकमे, ओकर संस्कारो बदलि गेल। जेकर बाप कहियो स्कूलक मुँह नै देखलकै तेकर बेटा अपना धिया-पुताकेँ कनभेण्ट स्कूलमे पढ़ा रहल अछि। शंकर छोट-छीन गिरहस्त। परिवारमे सतरह गोटे सदस। भिनसर जाए हर जोतैले से एक डेढ़ बजे दिनमे आबए। कहियो मरूआ बीआ खसौनाइ तँ कहियो रोपनि, कहियो धानक बीआ तँ कहियो धनरोपनी। सभ दिन काज करैत देहक हार जागि गेल। शंकरकेँ पाँचटा धिया-पुता, तीनटा लड़का, दूटा लड़की। बेटाकेँ नाओं छल, ज्ञानचन्द्र, धनिचन्द्र, रामचन्द्र। आ बेटीकेँ नाओं छल चन्द्रकला आ सुग्गावती, बेटी तँ सासुर बसै छेली। बेटा सभमे ज्ञानचन्द्रकेँ दूटा लड़का, धनिचन्द्रकेँ दूटा लड़की आ रामचन्द्रकेँ एकटा लड़की, शंकरक पत्नी बसुन हरिदम धिए-पुतेकेँ टहल-टिकोड़ामे बेस्त। वेचारा शंकर बुढ़ाड़ी तक खेतीए काजमे मन लगैने छेलै। बाम-दहिन किम्हरो नै देखै छल। बेटा सभ संग पूरि दइ छेलै परिवार नमहर रहने तंग रहै छल। कखनो नून-तेल, तँ कखनो चाउर-दालि, कखनो तीमन-तरकारीमे तँ कखनो कपड़ा-लत्ता लेल मन अघोर-अघोर रहै छेलै। कोनो मेला-ठेलामे धिया-पुताकेँ केकरो दू रूपैआ, केकरो दस रूपैआ, केकरो बीस रूपैआ देखैले दइ छल। जमीनो रहने कि हेतै कहियो दाही कहियो रौदी, कोनो तीन महिनाबला फसिल, कोनो छह महिनाबला फसिल, नकदी आमदनीबला सिरिफ दूटा गाए आ एकटा महिंस छेलै, दूधे बेचि कऽ टाका-पैसासँ काज चलबै छल। पाँच बीघा जमीने रहने की हएत तंगहाली बढ़िते जाइ छेलै। परिवारक स्थित देखि कऽ ज्ञानचन्द्र आ धनिचन्द्र, बम्बइ चलि गेल। पहिने तँ दू-चारि दिन घुमिते-फिरते रहल, तेकर बाद जा कऽ ज्ञानचन्द्रकेँ एकटा सेठ लग अँगना-घरक काज भेलै। धनीचन्द्रकेँ एकटा बसक खलासीमे नोकरी भेटलै। इमानदारीसँ दुनू भाए काज करए लगल। सेठकेँ पूतकरण नै ज्ञानचन्द्रकेँ खूब मानै। सेठकेँ एकटा बेटी छेलै सेहो सासूर बसै छेलै। आब ज्ञानचन्द्र चूलही-चौकासँ ऊपर उठि, सेठक कारोबारकेँ देखए लगल सेठो सभ सम्पतिकेँ मालिक ज्ञानचन्द्रेकेँ बना देलक। जे करै सम्पतिकेँ। एम्हर धनिचन्द्र खलासीसँ ड्राइवर बनि गेल, तेकर बाद अपन मोटर गैरेज थोड़ेक जमीन कीनि कऽ चलाबए लागल। खूब रूपैआ कमाए दुनू भाँइ। घर परहक स्थित बदलि गेल। चारि-पाँच बर्खक बाद ज्ञानचन्द्र घर एबाक जोगार केलनि। सेठसँ जा कऽ कहलखिन- “सेठजी चारिम दिन हम घर जाएब आ पनरह दिन घरपर रहब आ सोलहम दिन गाड़ी पकड़ि फेर आपस आबि जाएब।” सेठ तँ थोड़ेक काल नाकूर-नूकूर केलक फेर जाइक आदेश दऽ देलकै। सेठ अपना दिससँ सभ समांगले पच्चीस हजार रूपैआ, कपड़ा-लत्ता, पाँच किलो मिठाइ, धिया-पुताले सट-पेन्ट, ज्ञानचन्द्रक घरवालीले सोनाक मंगलसूत आ सोनेक पायल देलकै। बड़का एटैचीमे भरि एटैची सभ समान लऽ कऽ ज्ञानचन्द्र घर विदा भेल। तीन दिनक बाद घर आएल। पहिने तँ गामक लोक जे देखै ज्ञानचन्द्रकेँ आश्चर्यो लगै। किएक तँ टेम्पूसँ आएल छल। देहो दशा बदलल। तहूमे आँखिमे चश्मा लगौने। घर अबिते माए-बापकेँ गोर लगलनि। माएकेँ गोर लगिते माएक आँखिसँ साैनक बून जकाँ नोर खसए लगल। ज्ञानचन्द्रक घरवालीकेँ पएर तँ धरतीपर पड़िते नै छेलै। चट-पट खाना तैयार भेल। ज्ञानचन्द्रो कलपर जा स्नान साबुनसँ केलनि। भोजन भात खेला पछाति समान बाबू आ माए लग पसारि देलकनि। तीनू दियादनीकेँ कपड़ा-लत्ता, धिया-पुताक अलग कपड़ा-लत्ता, माएले साड़ी-साजा-ब्लौज, दू-दू सेट। बाबूले कूर्ताक कपड़ा, जोर भरि धोती, एकटा चद्दरि, एकटा गमछा, पएरले जुत्ता। सबहक लेल जे जे समान छल सभकेँ दऽ देलक बादमे मिठाइबला पैकिट सभ निकालि-निकालि सबहक हाथमे देलकै। धिया-पुता सभ अँगनामे लबका कपड़ा पहिरि खिलौना लऽ कऽ खेलाए लगल। बादमे माए-बाबूकेँ लगमे बजा कऽ पच्चास हजारक एकटा गड्डी रूपैआक देलक। बाप तँ एते रूपैआ कहियो देखने नै, से अच्मभा लागि गेलनि, बजला- “तोहीं राखऽ ने जेना करैक विचार हएत तेना करब।” “नै बाबू अहीं राखू।” माएकेँ हाथमे पाँच हजारक गड्डी देलकै सभ दियादनीओ केँ दू हजार देलकै। सबहक मन गद-गद। एक दिन दुनू बापूत रामचन्द्र घूर लग आगि तपैत रहए। तखने ज्ञानचन्द्र बाबूकेँ कहलक- “बाबूजी, जखनि हम सभ धिया-पुता रही तखनि हमरा सभकेँ केतेक पाइ दीएे मेला देखैले।” बापकेँ पछिला गरीबी जिनगीक मोन पड़ि गेलै। आ जेना बूझना गेलै जे कियो हथौरीसँ कपाड़पर चोट मारलक हेन। चुपे रहल किछु नै बाजल। थोड़ेक काल चूप रहला पछाति बाजल- “बौआ कहलहक तँ ठीके मुदा बिना सोचने-विचारने बजलहक हेन। बूझि पड़ैए जेना तोरा धनक दाबी भऽ गेलऽ हेन। सुनह एकटा हम अपन घटल घटना कहै छिअ, जखनि हम दस-पनरह बर्खक रही तँ हमरा डाँरमे एकटा भूरही पाइ छल ओकरा डोराडोरिमे गाँथि कऽ पहिरिने रही। रबि दिन रहै बिना माए-बाबूकेँ कहने हर्ड़ी-चन्देसर बाबाकेँ दर्शन करैले चलि गेलौं। किएक तँ दाबी छल, डाँरमे एकटा पाइ अछि। जखनि माए-बाबूकेँ पत्ता लगलनि जे छौड़ा हर्ड़ी मेला देखए गेल हेन तखनि अपने गामक एक गोटे दिया माए थोड़ेक चूड़ा आ दूटा कलकतिया आम पठा देलनि। ताबे हम पाइकेँ मूरही-कचौरी आ लाय कीनि नेने रही। हमरा जखनि गौंआ देखलनि तँ बिगरबो केलनि आ मोटरी हाथमे दैत बजला, ई माए पठा देलकौ हेन। हम चूड़ा आ आम खेलौं आ लाय मूरही कचरी घरपर नेने एलौं। कहैक मतलब समैकेँ हिसाबसँ ने लोककेँ रहन-सहन बदलै छै। जेतेकटा टाँग रहत तेतनीटा ने बिछानो चाही। सुनह हमर जे दादी छेलथि ओ कहै छेली बौआ हम जखनि केकरो खेतमे कमाइले जाइत रही तँ गिरहत एगो ठूरि पाइ दइ छल बोइनमे।’ से बौआ आइ जखनि दू बीघा जमीन आ दू सेर अन्न घरमे अछि तँ हमहीं पाँच किलो अनाज आकि एक सए रूपैआ दइ छिएे बोइनमे। आब तोहीं कहऽ तोरा लोकनिकेँ कम केना दइ छेलियऽ। जहिया दू टाका दइ छेलियऽ तहिया दूओ टाकाक महत छेलै महगाइ बढ़ने वहए दू टाका अखनि सौ रूपैआ भऽ गेल हेन।” ज्ञानचन्द्रकेँ बजलासन पछतावा होइ। वेचाराकेँ ठकमुड़ी लगि गेल। ई की बजा गेल मुँहसँ। ठकमुड़ी लगल बेटाकेँ आँखि पोछेत बाप बाजल- “एहेन उलहन फेर नै दिहऽ कहियो।” थरथरी ओना तँ ऋृतु छहटा होइत अछि। गृष्म, वर्षा, शरद, हेमन्त, शिशिर आ वसन्त। मुदा बेवहारमे लोक तीनटाकेँ मानै छै गरमी, वर्षा आ जाड़। सभ ऋृतुकेँ अपन अलग-अलग गुण अवगुण होइ छै। मुदा जाड़केँ एकटा अपन अलगे गुण अवगुण अछि। कोन भगवान जाड़केँ जनम देलनि से नै कहि। अान ऋृतुमे तँ लोक हर्ष-विषम, रंग-रभस आ वर्षाक फूहारक आनन्द लऽ कऽ िबता दइ छै। मुदा जाड़ तँ कोढ़केँ कँपा दइ छै। गरीब लेल मारूख आ धनिकक वास्ते विलासक ऋृतु बनि जाइए। घुटर एक दिन एहने समैमे सुरेशबाबूक खेत जे मनखप केने छल पटबैले गेल। समए छेलै माघ मासक शुरूआतक। जहिना २००३ई.मे शीतलहरी छेलै तहिना अहू बेर भेलै। पछिया बोहैत जाड़ सुसकारी दैत रहए। सुरूजो भगवान केतए नुका रहला तेकर ठेकान नै। कुहेस लागल रहए। पानिक बून जकाँ वर्फ झहरैत रहए। लोक हरिदम घूरे लग आगि तपैत रहै छल। ठिठुरल घास-पात खेलासँ माल-जालकेँ पीठ पाँजर बैस गेलै। आ बिमारो पड़ए लगल। तन्नुक चिड़ै-चुनमुनी सभ जहिंपटार मरए लगल। साँप सभ कोनो बीलमे तँ कोनो आड़िक कातमे मूइल पड़ल। जीनाइ लोककेँ कठीन भऽ गेलै। एक पनरहियासँ जे शीतलहरी चलल से लदले रहि गेल। एहने समैमे घुटर मनखप गहुम केने छल। तेकरा पटबैले बोरिंगबला जोखन संगे विदा भेल। बोरिंगमे जखनि पम्पसेटसँ पानि धराबए लगल पानि धऽ लेलके। पलास्टिक पाइपसँ पानि लऽ गेनाइ छेलै से जहाँ कि पाइप पम्पसेटमे धराबए लगल आकि पानि दोसर दिसामे फूच्चूका मारलके आकि घुटर आ जोखन दुनू गोटाकेँ भीजा देलके। तथापि कोनो तरहेँ पाइपकेँ बान्हि लेलक। जाड़े दुनू गोटे थरथर काँपए लगल। घुटर खेत जा एक किआरीमे पानि खोलि देलके। आ आगिक जोगारमे घुटर बगलमे कलमवाग छेलै ओतए नार राखल छेलै जइमेसँ एक पाँज नार थरथराइते अनलक। आब जखने सलाइसँ आगि धराबऽ लगल आकि तेहेन जाड़ होइत रहै जे सलाइक काठी खर्ड़ले ने होइत होइ। थरथरीसँ सलाइक काठी मुझा जाइत। जँ कठीमे आगि धरे तँ नारमे धरबेकाल मिझा जाइ। खाएर, कोनो तरहेँ आगि धरौलक आगि धधका दुनू गोटे आगि तापए लगल। थोड़ेक काल पछाति होश भेलै। सुरेशबाबू खेत देखैले विदा भेला। पएर लग तक कोट देने, पएरमे मोजा-जुत्ता लगौने, जाँधमे ट्रोजर देने कानमे मोफलर लगौने तैपर सँ माथमे टोपी देने आँखिओमे चश्मा छेलनि। तैयो जाड़े थरथराइत छला। जखनि बोरिंग लग एला तँ देखलखिन जे दुनू गोटे आगि तापि रहल अछि। सुरेशोबाबू हाथ महक दस्ताना निकािल आगि तापए लगला। आ बजला- “घुटरा केहेन समए भऽ गेलै जे केतनो कपड़ा देहमे देने छिऐ तैयो जाड़ जेना जाइते ने अछि। तूँ सभ केना कऽ रहै छीही।” घुटर बाजल- “याै मालिक, गरीबक जिनगी कोनो जिनगी छिऐ। एक तँ दैविक मारल छी, दोसर सरकारोक बेवस्था तेहेन ने छै जे की कहब। कमाए लंगोटीबला आ खाए धोतीबला। देहमे देखै छिऐ जेतने कपड़ा अछि तइसँ रातिक जाड़मे गुजर करै छी। घरवाली परसौती भेल अछि। एकेटा रहैक घर अछि। दोसर बकरी आ गाएले अछि। तइमे एक कोनमे जारनि-काठी रखै छी। सेहो बकरीबला घरक टाट टुटल अछि।” सुरेशबाबू बजला- “तब तँ बर दिक्कत होइत हेतौ?” घुटर- “यौ मालिक, की कहौं। खएर जाए दियौ। हमरा सभले तँ एकटा ऊपरेबला छथि। मुदा हे एकटा बात कहै छी जे केतनो अहाँ सभ कपड़ा लगाएब, बिजलीक गरमीमे रहब मुदा तीनबेर अहूँ सभकेँ जाड़ पछारबे करत।” सुरेशबाबू अकचकाइत पुछला- “केना रौ।” घुटर- “नै बुझै छिऐ, नहाइ, खाइ आ झाड़ा फिरै कालमे।” सुरेशबाबू- “ठीके कहै छेँ।” घुटर- “मालिक, हमरा सभकेँ कोन अछि। खूब मोटगर कऽ लार बीछा दइ छिऐ तैपर सँ कुछो बीछा दइ छिऐ आ चद्दैर ओढ़ि लइ छी आ तखनो जँ जाड़ होइए तँ झट्टासँ बनेलहा पटिया-गोनरि ओढ़ि लइ छी। बगलमे गोरहन्नी आ खड़ड़न-मड़ड़नकेँ ओरिया कऽ रखने रहै छी नै भेल तँ ओकरो पजारि दइ छिऐ। भरि राति सुनगैत रहल घर गरमाएल रहल। अहाँकेँ तँ बुझलै हएत जे बोरैसक आगि केहेन होइ छै। ठाठसँ सुतै छी।” सुरेशबाबू- “तहन तँ एअर-कण्डीशन बना कऽ घरमे रहै छेँ। बड़ नीक अहिना जाड़सँ बँचैक कोशिश करिहेँ। नै तँ सत्तो डाक्टर जकाँ हेताै, वेचारा कालिखिन पैखानासँ अाएल, कलपर कुरूड़ करिते रहए आकि ठंढ़ा मारि देलकै। टांगि-टुंगि कऽ डाक्टर लग लऽ गेलै। तँए कहलियो जे जाड़सँ बँचि कऽ रहिहेँ। बकरी आ गाएकेँ सेहो झोली ओढ़ा कऽ रखिहेँ।” मुड़ी डोलबैत घुटर बाजल- “ठीके कहै छी मालिक।” सुरेशबाबू- “रौ घुटर, धियो-पुतोकेँ हाँटि-दबािर दिहनि जे ठंढ़ासँ बँिच कऽ रहतौ।” घुटर- “से छौड़ा मानिते ने अछि। खन गुल्ली डण्टा, खन क्रिकेट तँ खन कबड्डी खेलाइत रहैए। की करबै। हम तँ कहबे ने करबै मालिक।” सुरेशबाबू- “सएह हम कहबो ने।” घुटर- “हम तँ भरि दिन काज-धन्धामे लागल रहलौं। अहीं सबहक बँसबिट्टीमे बाँसक ओइद उखारि चीर-फार कऽ लइ छी। जइसँ देहमे घाम फेकैत रहैए। आ राति कऽ बौरेसबला आगि गरमेने रहैए।” सुरेशबाबू- “ठीक करै छेँ। जान छौ तँ जहान छौ। शरीर नै तँ किछु नै। अच्छा एकटा कह जे योगासन करै छेँ आकि नै?” घुटर- “यौ मालिक, हम मूर्ख आदमी की जानए गेलिऐ योगासन आकि परनियाम। हमरा सभले देहे धूनब योगासन आ परनियाम होइ छै। खटनीए सँ ने देह दुहाइत रहैए।” सुरेशबाबू बजला- “ईहो बात ठीके छौ।” घुटर- “मालिक अगहनमे मारि-धुइस कऽ कमेलौं, खूब धान कटलौं जइसँ घरमे एक कोठी धानो अछि आ थोड़ेक चाउरो अछि। खेतसँ खेसारी साग, बथुआ साग, सेरसो साग, तोरी साग सबहक तीमन कऽ लइ छी। कहियो काल अल्लू, कोबी, भाँटा, मुरै सेहो सबहक तीमन खा लइ छी आ बम-बम करैत रहै छी।” सुरेशबाबू- “तहन तँ नीके वस्तु सभ खाइ छेँ।” घुटर- “अहाँ सभ जकाँ की अण्डा, मौस-तौस आकि दूध-दही हमरा सभकेँ भेटै छै। हमरा सबहक देह तँ बैशाख-जेठक रौद, भादवक वर्षा आ माघ मासक जाड़सँ ठाेकाएल-ठठाएल अछि। अहाँ सभ जकाँ की गाइद परहक बाँस जकाँ मोटगर नै ने अछि जे तागत किछु ने। केहनो भीरगर काज देखा दिअ कऽ देब। हँ अहाँ सभ जकाँ पोथी-पतरा नै ने पढ़ने छी। थमहू खेत देखने अबै छी।” कहि खेत आबि दोसर किआरीमे पानि खोलि फेर घूर तर चलि आएल आ गप-सप्प करैत बाजल- “यौ मालिक, अहाँ सभ जकाँ की हमरा सए बीघा खेत अछि। लऽ दऽ कऽ अपन दस कट्ठा खेत अछि। कनीमे तरकारी-फड़कारी, कनीमे दलिहन-तेलहन, कनीमे साग-पात केने छी। धान-गहुम तँ अहीं सबहक खेतमे मनखप कऽ के गुजर करै छी।” सुरेशबाबू- “एकटा कहाबत छै जे लड़ा-चड़ा धन पाइए बैठे देगा कौन। हे बड़ जाड़ होइ छै जल्दी खेत पटा ले आ घरपर जो। हमहूँ आब अधिक घूम-फिड़ नै करब घरेपर जाइ छी।” घुटर कहलक- “जँ गपे-सप्प करै छी तँ एकटा गप औरो सुनि लिअ। हम तँ पंजाब-भदोही आकि दिल्ली-बम्बइ नै ने कमाइले गेलौं। देखै छिऐ जे ढबाहि लागल लोक देासर मुलुक जाइत अछि। हँ ओतएसँ पाइ तँ अनैए मुदा परिवारसँ हटल रहैए। जबकि सरकारो खेतीपर विशेष धियान देलकै हेन। खेत अफर-जात पड़ल अछि केनिहारक चलैत। कम उपजा भेने तंगी तँ बढ़बे करत गाममे माए-बाप से हकन कानै छै। मािलक अहीं अपन दशा देखिओ ने, एते खेत अछि आ धिया-पूता सभ विदेशमे नोकरी करैए। मालकिन बूढ़मे कन्ना कऽ भानस भात करैत हेती से वएह जनैत हेती।” सुरेशबाबू बजला- “से तँ ठीके कहैत छेँ। कखनो कऽ हमरो मनमे होइत अछि जे कथीले एते कमेलौं आ एते जमा केलौं। अच्छा छोर ई सभ बात। हम जाइ छियौ।” कहि सुरेशबाबू घर दिस विदा भेला। आ घुटर अंतिम किआरीमे पानि काटए लगल। भोग सोनाइकेँ सात बीघा खेत छेलनि, एकटा लड़का रामदेव आ एकटा लड़की सुदामा। सोनाइ तँ पढ़ल-लिखल नै मुदा गिरहस्तीमे पारंगत छला। बेटा रामदेव आइसँ चालिस बरख पूर्ब मिडिल पास केने छल। रामदेवक पत्नी-ज्ञानी गिरहस्तक बेटी तँए बड़ कमासूत। सोनाइक पत्नी घुरनी सेहो तेहने कमासूत। दुनू बापूत तेहेन ने खेती करए जे गाममे चर्चाकेँ विषय बनल रहए। खेतीए बले सोनाइ अस्सी हजार ईंटा आनि घर बनौलक। एम्हर रामदेवकेँ तीनटा पुत्र आ एकटा लड़की कौशल्या छेलनि। तीनू लड़काक नाओं छेलनि करण कुमार, जूगे कुमार, विपिन कुमार। तीनू लड़कामे रामदेवकेँ बड़ जोर छेलनि हमरो धिया-पुता पढ़ि-लिख नोकरी चाकरी करत मुदा प्रकृतक डाँग तेहेन ने पड़लै जे जवानीमे करीब पैंतीस बर्खक उमेरमे लकबा बिमारीसँ मरि गेला। आब तँ पूरा परिवार हतोत्साह भऽ गेल। जहिना कोनो गाछ बिहाड़िमे जड़िसँ उखरि कऽ खसि परैए आ डारि पात छिन्न-भिन्न भऽ जाइ छै, तहिना भेलनि रामदेवक धिया-पुता सभ छेलनि पनरह बर्खक, बारह बर्खक, दस बर्खक आ लड़कीक उमेर मात्र पाँच बरख। पिता सोनाइक उमेर लगभग सािठ बरख छेलनि, माए घुरनीकेँ वरसातक समैमे एकटा डेन टूटि गेल छेलनि किएक तँ पिछड़ि कऽ खसि पड़ल छेली। खैर! धिया-पुताकेँ पढ़ेनाइ-लिखेनाइ कमजोर पड़ि गेलनि। एक तरफ परिवारक भार दोसर तरफ रंग-बिरंगक बिमारीमे तीन-तीनटा बूढ़-बुढ़ानूस घरमे। गामक लोक रंग-बिरंगक उड़ेबा उड़बैत। तैपर पड़ोसी एकटा केसमे उलझा देलकनि। करणक हालति नै पुछू। एक सालक बाद दादी घुरनी सेहो मरि गेलनि। करणक बिआह भेना मात्र छह बरख भेल छेलै एकटा लड़का भेल छल। छह महिना पछाति करणक स्त्री सेहो मरि गेल। दू सालक बाद करणक माए सेहो मरि गेल जेना परिवारमे मरैनक ढवाहि लागि गेल। एतेक शोग-संतापक बीच सोनाइक हालति जे भेल होन्हि भगवाने जनैत। तेहेन हालतिमे एक दिन सोनाइकेँ पेटझड़ी बिमारी भऽ गेलनि। कोनो दबाइ असर नै करैत रहनि। हालति दिनो-दिन बिगड़ए लगलनि। एक तँ परिवारक शोग, दोसर बिमारी! मरनासनक स्थितमे लऽ अनलकनि। एम्हर करण झंझारपुरमे प्राइवेट मुंशीक काज करै छल। काज केला पछाति जखनि घर आबऽ लगैत तँ बाबा लेल चारि-पाँच पीस रसगुल्ला नेने अबैत रहए। बाबाकेँ छाती जुड़ा जन्हि बेटा तँ मरि गेल पोता तँ बेटे जकाँ सेवा-टहल कऽ रहल अछि। मुदा सुखेलहा गाछमे केतनो पानि आकि खाद दियौ ओ की हरिअर हएत। सएह स्थित सोनाइकेँ भऽ गेल छल। करो-कुटुम सभ आबि-आबि जिगेसा-बात कऽ जाइत जे बुढ़ा आब नै खेपत। जिगेसे करैक खियालसँ एक दिन मझिला पोता जुगे कुमारक ससुर घनश्याम बाबू झंझारपुरसँ एक किलो पचमेर मिठाय लऽ कऽ बुढ़ाकेँ माने जमाएक दादाकेँ देखैले एला। बुढ़ा तँ अपने बेहोश भेल पड़ल छला। घनश्याम बाबू अबिते दादाकेँ गोड़ लगलनि। सोनाइ कुहरैत बजला- “के छी यौ?” धनश्याम बाबू उत्तर देलखिन- “हम छी धनश्याम।” “निके रहू धिया-पुता सभ निके-ना अछि ने?” “हँ सभ ठीके-ठाक अछि।” घनश्याम बाबू कनी रूकि कऽ कहलखिन- “अहाँले थोड़ेक मिठाय अनने छी कनी खा लियो।” सोनाइ उत्तर देलखिन- “यौ बौआ, आब चित नै मानैए। कोनो वस्तुकेँ खैक इच्छा नै करै अछि। आब भगवानकेँ कहियनु जे उठा लेता। किएक तँ बड़ कष्ट होइत अछि। धियो-पुतोकेँ केतेक भार देबै?” घनश्याम बाबू- “मरनाइ-जिनाइ कोनो अपना हाथमे छै जे जखनि चाहब तखनि मरि जाएब। से तँ नै हएत।” सोनाइ- “हँ से तँ ठीके।” घनश्याम बाबू- “ई मिठाइ कनी खा लिअ। ई रसगूल्ला छिऐ।” सोनाइ उतर देलखिन- “यौ बौआ, करण झंझारपुर जाइ छल तँ सभ दिन थोड़े-थोड़े रसगुल्ला नेने अबै छल बहुत खेलौं-पीलौं। आब की खाएब मोन नै मानैत अछि किछु खाइ-पीबैक, दऽ दियौ अँगनामे। धिया-पुता सभ खा लेत।” घनश्याम बाबू- “नै बाबू, से नै हएत। किछु तँ खाइए पड़त हमरो आनैक साफल भऽ जाएत।” सोनाइ तामसे बिख भऽ गेला। कहलखिन- “अहाँ महा बुड़ि कुटुम छी। कहै छी तँ बूझते नै छिएे।” केतएसँ जोश एलनि से नै कहि। जेना डिबिया बुताए लगैत अछि तँ भक दऽ मारै छै आ खूब जोर सँ इजोत होइत अछि तहिना उठि कऽ बैस गेला आ घनश्यामक हाथ सँ मिठाइक डिब्बा झपटि लेलखिन। किछु मिठाइ अगल-बगलमे खसल। जोरसँ बाजए लगला- “रौ धिया-पुता, केतए गेलेँ? आ, ले मिठाइ खो।” घनश्याम बाबू तँ बौक भऽ गेला। सोनाइ बजला- “जखनि खाइबला छेलौं तँ कहियो भेल जे किछु लऽ जा कऽ बाबूकेँ दियनि आ आब जखनि खाइबला नै छी तँ बजै छथि जे ई रसगुल्ला छी, ई लालमोहन छी, ई जिलेबी तँ ई बदशाही! यौ अखनि अमृतो हमरा लेल बिखे भऽ गेल अछि!” घनश्याम बाबू कथी बजता। बकर-बकर मुँह तकैत रहथिन। एक तरफे सोनाइ बजैत रहलखिन- “ठीके कहावत अछि जे जितामे किदनि भात आ मूइलापर दूध भात। जाउ एतएसँ। हमर मन ठीक नै अछि। हमरा ऐ पृथ्वीपर सँ भोग उठि गेल। भगवानकेँ कहियनु जे उठा लेता। हमर कोनो आस नै। पाकल आम छी कखनि खसब से कोनो ठीक नै।” कहि ठामे बिछौनपर ओंघरा गेला। घनश्याम बाबू देखिते रहला, मुँहसँ किछु ने निकलै छेलनि। कुमारि भोजन मखनाक माए सियावती दुर्गापूजामे साँझ दइले केतौसँ एक पथिया चिकनी माटि अनने रहए। कलशथापनासँ पहिने एक दिन दूर्गा नोतल जेती आ ओही दिनसँ दूर्गास्थानमे साँझ-बाती पड़त। सियावती गरीब घरक स्त्रीगण रहए एकटा बेटा भेले रहै, बाप साँपकटीमे मरि गेलखिन। तीनटा बेटीए भेल रहनि। उमेर करीब पैसठ बर्खक रहनि। बोइन-बुता करि कऽ गूजर-बसर करै छेली। कोनो तरहेँ तीनू-बेटीकेँ बिआह केलनि। बेटी सभ सासुर बसए लगली। मखना जखनि बच्चे रहथि तहिएसँ दूर्गाजीकेँ पूजा करै छेलखिन। मनमे रहनि बच्चा सभ तरहेँ निरोग आ सूखी सम्पन्न रहत। मुदा तीनू बेटीकेँ बिआहक खर्चमे तेना ने कोढ़ तोड़ि देलकनि जे जमीन्दारक चंगुलमे फँसि गेला। जमीन्दार इन्द्रकान्त बाबू तेहेन ने चंठ जे जन बोनिहारकेँ गारि फजहैत, लोभ लालच कर्ज दऽ कऽ फसौंने रहै छल। तथापि सियावती अपन नेम-टेम नै छोड़ै छेली। जखनि बोइन-बुताक पैरूख नै रहलनि तँ बेसीकाल पूजे पाठमे बितबै छेली। बेटा मखना बोइन करि कऽ अानए तखनि गूजर करए। मखना छोट बेटा रहने बिआह नै केने रहए। बेटा धरि एतेक सपूत रहए जे माएकेँ माए बुझैत। अखुनका मजदूर जकाँ नै जे कमा कऽ अबै आ अदहासँ फाजिल ताड़ीए-दारूमे खर्च कऽ लैत। हँ ओकरा बीड़ी पीबैक आदति रहै, सेहो समैसँ। कलशथापनक बाद खष्टी दिन माने बेलनोती दिन, सप्तमीकेँ भगवतीकेँ डिम्हा पड़ैत। आँखि देला पछाति अष्टमी दिन निशाँपूजा होइए। नमीकेँ साँझमे जखनि सियावती साँझ दऽ कऽ एेली तँ संजय पुछलकनि- “काकी, तूँ तँ सभ दिन दूर्गास्थान साँझ दइले जाइ छीही। कह तँ साँझ दइकाल भगवतीसँ कि सभ कहै छीही?” सियावती बजली- “तूँ की बुझबिहिन, अखनि नेना छँह।” संजय- “नै दादी कहए पड़तो, कह ने हमहूँ दूर्गाजीसँ माँगि लेब।” सियावती- “नै, नइ कहबो।” संजय- “नै, कहए पड़तौ।” दुनूमे जिद्दम-जिद्द भऽ गेल। अन्तमे सियावती कहए लगलखिन- “की कहबै, कहै छिएे जे हे दूर्गा महरानी धिया-पुताकेँ समांग दिहेँ, विद्या दिहेँ, धन दिहेँ, सम्पति दिहेँ, हमरो निरोग रखिहेँ। सएह सभ कहै छिएे।” संजय बाजल- “दादी गै, बिना कोनो काज केने सभटा दूर्गाजी दऽ दइ छथिन, तँ तोरा की भेलौं जे नेम-टेम आकि पूजा-पाठ करै छीही, से तँ आइ तक जवानीसँ बुढ़ापा ओहिना छौ। तोहर दिन किए अदिन भेल छौ?” सियावती बजली- “रौ छौड़ा, तूँ बड़ पाखंडी छँह। एक्को रती बजैत लाजो-सरम ने होइ छौ!” संजय- “नै दादी, तोहीं कह ने एतेक पूजा-पाठतँ भरि जनम करैत एलँह मुदा तइसँ की भेलौ?” सियावती जेना दिनेमे तरेगन गिनए लगली। किछु बजबे ने करै छेली। चूप देखि संजय पुछलकनि- “बौक किए भऽ गेलेँ। कौल्हका एकटा घटना दूर्गास्थानक कहै छियौ। काल्हि मिठुआक माए दुलारी ब्राह्मण भोजन आ कुमारि भोजन करबैले दूर्गास्थान आएल छल। ओकरा अपना घरमे चूड़ा लेल अगहनीओ घान नै छेलै तँ रतीबाबूसँ कर्जा उठा कऽ एक पसेरी धान सूदिपर अनने छल ओकरा अपनेसँ चूड़ा कुटलक आ पचीस रूपैए किलो महिंसक दूध तीन किलो अनलक आ दही पौड़लक। दोकानसँ चीनी अनलक आ काल्हि अष्टमी दिन ब्राहमण भोजन आ कुमारि भोजन करेबैले गेल छल। संग लागल पोता वीरेन्द्र सेहो गेल छेलै जेकर उमेर बारह साल आ पोती डोली जेकर उमेर आठ साल छेलै ऊहो गेल छल। दूर्गास्थानमे कुमारि भोजन, ब्राह्मण भोजन, बटूक भोजनक एतेक ने भीड़ छेलै से कहल नै जाए! एक-एकटा ब्राह्मण कुमारि बटूक दस गोटेक नोत मानने छल दक्षिणाक लोभमे जेना उजैहिया चढ़ल होइ! भेल ई जे दुलारी जखनि अपना पुरहीतकेँ ठौंपर नारक बिड़ी बना कऽ दूटा कुमारि, दूटा बटुककेँ केराक पातपर चुड़ा, दही, चिन्नी दऽ भगवतीकेँ भोग लगौलहा लड्डू दू-दूटा दऽ जखनि ओ लोकनि भोजन करए लगलखिन आकि पोती डोली कहए लगलै दादी हमहूँ चुड़ा-दही खेबौ। आकि दुलारी पोतीकेँ गालेपर एक चमेटा लगा देलकै आ बाजलि, चूप पहिने ब्राह्मण भोजन हेतै आ उगरतै तब तोरो देबौ। पोती हवो-ढेकार भऽ कऽ कानए लगलै। बकर-बकर मुहोँ तकै आ कनबो करए। एम्हर पुरहीत आ कुमारि बिना किछु सोचने निर्लज जकाँ खाइत रहल। एकोरती दया नै एलै डोलीपर! सवाल ठाढ़ भऽ जाइत अछि, तँए तँूही कह, की डोली कुमारि नै भेल? की वीरेन्द्र बटूक नै भेल? जखनि कि शास्त्रो-पुरानमे लिखल अछि दस बरख यानी रजस्वबाला होइसँ पहिने कोनो जातिक लड़की कुमारि अछि। कुमारि भोजन कराैल जा सकैत अछि। ई तँ कुमारि भोजनबला भेलौ गै दादी, एकटा और घटना देखलिएे जे किछु स्त्रीगण धनुक टोलीक आ किछु स्त्रीगण बरई टोलक अपने धिया-पुताकेँ लऽ कऽ कुमारि भोजन ओही दूर्गास्थानमे करौलक। ब्राह्मणो सभ तँ अपने धिया-पुताकेँ कुमारि भोजन करबैत अछि। कह तँ ऐमे कोन पेँच छै जे ब्राह्मणेटा केँ धिया-पुताकेँ कुमारि आ बटूक कहल जाइत अछि?” “रौ संजय, कहै तँ छीही ठीके।” संजय फेर कहए लगल- “गै दादी, जइ दू्र्गाकेँ तूँ एतेक नेम-टेमसँ अर्चना करै छीही तेकरा बारेमे किछु बूझितो छिहिन आकि भेड़िया धसान जकाँ सभकेँ देखै छिही तँए तहूँ करए लगैत छँह?” सुन महिषासूर, शूंभ, निशूंभ तँ एहेन आतातायी राजा छल जे केकरो बौह-बेटीकेँ इज्जत आबरू लूटि लइ छेलै। पहुलका रजो-महाराजो सभ एक-एक सए धौरबी रखै छल। तहिना अखुनका नेता आ बड़का अफसर सभ होइए। बहुत कमे नेता आ अफसर आकि जनता धोल पखारल भेटतौ। तेहने छल ओ महिषासूर, शूंभ, निशूंभ। जखनि बड़ अतियाचार, बेविचार राजमे बढ़ले आ लोकक नाकपर ठेकि गेलै तखनि जा कऽ केकरो एकटा लड़की जनम लेलक ओ जनमिते जेना प्रतिभाशाली छल, जेहने देखैमे सुन्दर तेहने काजोमे फूर्तिला जखनि जवानीपर एलै तखनि महिषासूर ओकरोपर अपन खराप नजरि दौड़ौलक, मुदा ओ युवती इटक जवाब पत्थरसँ देलकै। जेतेककेँ महिषासूर सतौने छल ओ सभ ओइ युवतीकेँ संग देलक तँ देखै छिहिन दूर्गाकेँ दसटा हाथ छै आ सभ हाथमे अस्त्र छै। सबहक सहयोगक प्रतीक छिएे। जखनि सभ मिलि कऽ महिषासूरपर चढ़ाइ केलक तँ केतेक दिन तक लड़ाइ चलल अन्तमे महिषासूर मारले गेल। एम्हर जे महिषासूरक किला छेलै तेकरा ओ युवती ढाहि देलकै। तब ने ओइ युवतीकेँ नाओं दूर्गा राखल गेल। दूर्गाक लड़ाइ दस दिन तक चलल। संगठनेमे ने शक्ति होइ छै। सएह शक्तिकेँ माने दूर्गाक पूजा होइ छै।” सियावती बजली- “रौ बौआ, एना फरिछा कऽ कहाँ कियो अखनि तक कहलक हेन।” संजय बाजल- “गै दादी, केतेक कहबो। ओ सभ बुधियार छल, आगू बढ़ल। ओकरा सबहक तुलना करैमे धिया-पुताकेँ पढ़ा-लिखा अपना कर्मपर बिसवास करैत गेल। ओकरा पछुअबे ले तँ खिहारए पड़तो किने। ई जे साँझ दइ बेरमे कहै छिहिन से की केतौ राखल छै जे तोरा दऽ देतौ। तोहीं कह जे केतोसँ चिकनि माटि लऽ अनलेँ फटलहा कपड़ाकेँ बाती बना करूतेलमे भिजौने एलही आ एकटा अगरबतीसँ दूर्गास्थान साँझ दइले चलि गेलेँ। खरचा भेलौं चारिओ आना नै आ मांगि लेलहिन लाखोक सम्पति। केतएसँ भेटतौ। समाजमे जे अगुआएल अछि पहिनेसँ आ अखनो अछि ओ सभ अपना सुख-सुविधा लेल जाल बुनने अछि। अमरूख समाजक लोककेँ दिशाहीन बना कऽ अपन गोटी लाल करैए। हमहूँ तँ बूझि-सूझि कऽ कखनो काल भँसिआइए जाइ छी। जाति-धर्मक नाओंपर कोठलीमे कोठली छै। जेतेक जाति तेतेक देवता। बड़काकेँ बड़का देवता, छोटकाकेँ छोटका देवता भरल अछि।” सियावती बजली- “ठीके कहलेँ बौआ, आब सोचि-समझि कऽ कोनो काज करब।” संजय कहए लगल- “गै दादी, भोजन-भात आकि रहन-सहन ने स्वर्गक रहब छिएे। हम तूँ तँ कठपुतली जकाँ जेना-जेना नचबै छौ तेना-तेना नचै छेँ। तँए ने कहबी छै कमए लंगोटीबला आ खाए धोतीबला। तँए कहबौ, खूब कमा-खटा खूब खो-पी, धिया-पुताकेँ पढ़ा-लिखा जखनि धिया-पुता पढ़ि-लिखि लेतौ आ नोकरी-चाकरी आकि अपन काज-धंधा भऽ जेतौ तँ अपने देखबिहिन जे स्वर्गक भोग कऽ रहल छी। सूखे ने जिनगी छिएे। कुमारि भोजन करा आकि पूजा-पाठ कर, तीर्थ-बिर्त कर, नेम-टेम कर सभटा अपने बुधिए-विवेके काज देतौ। केकरो कष्ट नै दहिन, जहाँ तक भऽ सकौ केकरो उपकारे कऽ दहिन सएह सभसँ पैघ घर्म छिएे। कोन झूठ-फूसिक फेड़मे पड़ल रहै छँह।” सियावती बजली- “रौ बौआ, एतेक जे पूजा-पाठ आकि धरम-करम होइ छै सभ झूठे छिएे की?” संजय पुन: कहए लगलै- “गै दादी, सोझ शब्दमे बुझही जे अन्हारसँ प्रकाश दिस आनै सएह भेल पूजाकेँ शाब्दिक अर्थ आ नीके काज ने धर्म होइ छै। भगवानक केतौ अन्तए छै ओ तँ तोरा हमरा आत्मामे बसै छथिन। वेद तँ बेवहारीक ज्ञान छी, शास्त्र-पुराणमे लिखल अछि जे भगवान कण-कणमे बास करैत अछि तँ कि हमरा तोरा छोड़ि क?” कीर्तन आ सम्मेलन बहुत दिनक बाद आशा पूरा भेलनि घूसर बाबूकेँ। अपने तँ कएकटा मुखिया चुनाव लड़ला मुदा एकोबेर नै जीत सकला। लोक हुनकर धुर्तैसँ परिचित छल। २०११ इस्वीमे मुखिया चुनाव भेल अपना लड़काकेँ ठाढ़ केलनि। लड़का बी.ए. पास चालि-ढालि सेहो नीक छेलै। खाली काैलेज जिनगीमे किछु खराप सतसंग भऽ गेल छेलै तथापि लड़लनि। चुनावो जीत गेला। गामक मुखिया भऽ गेला। जइसँ २०१२ इस्वीमे एकटा नवाह-कीर्तनक आयोजन केलनि। लोककेँ कहथिन जे मुखिया चुनाव जीत गेलौं तँए नवाह करा रहल छी आ माँ दुर्गाक कबुला केने छेलियनि जे हम जीतब तँ अहाँक दरबारमे कीर्तन आ नवाह करब। सएह खूब डील-डालसँ नवाह कीर्तनक आयोजन केलनि। मनरेगाक तहत एकटा पोखरिक उराही छल जे एगारह लाखक योजना छेलै। दर-दियाद, हित-अपेछित सभकेँ सरकारी रेटपर नाओं दर्ज करा रोज असुली लेलनि मजदूर सभसँ किछु टाका भगवतीक नाओंपर लेलनि। हुनक मँुहलगुआ छल बनठा मुसहर। जे अनेरो ताड़ी-दारू पीब कऽ अन्ट-सन्ट बजैत रहै छल। ओ बनठा समरपित भऽ नवाहमे योगदान दइ छल। बैसाख जेठक समए छल। समए रौदियाह जकाँ छेलै। बनठा एक बीघामे पनरह किलो कठ्ठापर धानपर बटाइ केने छल। ओइ साल गरमामे चौदह-पनरहटा पानि लगैत रहए। बनठा कीर्तनक पछति कहियो खेत दिस नै गेल। गमहराइक समए छेलै, पानि नै पड़ने गमहरा भीतरेमे रहि गेल, कुहरि-कहारि कऽ धान फुटलै। कात-करोटमे सबहक धान नीक छल। वेचारा बनठा एक दिन घुमैत-घुमैत खेतक आड़िपर गेल तँ झमान भऽ खसल। कहू! ऐ नवाहक पाछाँ तँ खेतीओ बूड़ि गेल। कोनो तरहक लाभ भेल...! एम्हर गाममे करीब पचीसटा हौरन गामक चारूकात आ बिच्चाेमे टाँगल छल। सौंसे गाम अनघोल भऽ रहल छल। केकरो मोबाइलपर जे केतोसँ फौनो अबै सेहो गप करैमे दिक्कत होइ। केकरोसँ गप करैमे कठिन होइत। गप्पो करू तँ ऊँचे अवाजमे। हँ किछु नव युवती आ स्त्रीगण सभकेँ जेना रोजगार भऽ गेल होइ जे जहियासँ कलश भरलक तहिएसँ अरवा-अरवानि, फल-फलहारी साँझ-भिनसर स्नान करि कऽ कलशक पूजा करब दसो दिनक रोजगार भेट गेल छेलै। कीर्तन मंडलीकेँ तँ बतीसो आना नफे। दसो दिनक फिस छल एकैस हजार। नीक निकुत जलखै-भोजनक आयोजन। दोसर दिस जनरेटर आ साउण्डक भाड़ा छल पैंतीस हजार। साउण्डबला गद-गद रहए। पंडीजी संकल्पेमे जखनि पाँच सए एक टाका लेलनि तँ पूर्णाहुुतमे केतेक लेता। एम्हर आयोजककेँ चैन नै। कथीले एको घंटा कीर्तन करता आगत-भागत प्रसाद बँटैमे तवाह। नवाह दसम दिन सम्पन्न भेल। सम्पन्न होइते आयोजक घूसर बाबूकेँ कियो कहलकनि- “जे ऐसँ नै भेल। अठजाम कीर्तन सेहो काइए लिअ।” तुरन्त फेर अष्ठयाम कीर्तन सेहो शुरू भऽ गेल। अष्ठयामकेँ समाप्त होइते पंडीजी घूसर बाबूकेँ कहलखिन- “ऐ यज्ञक पूर्णाहुत बिना सत्यनारायण भगवानक पूजाक केना हएत।” तँ रातिमे सत्यनारायण भगवानक पूजा सेहो भेल। कीर्तन मंडली सभ बाजल- “बिना साधु भण्डाराक कोनो सफलता नै भेटत।” तुरन्त एक-सए-एक मुरतेक साधुक भण्डारा भेल। गाममे धर्मक अम्बार लगि गेल। मुदा ओइ अनपढ़ मजदूरकेँ ध्वनि प्रदूशनक चलैत आ आनो-आनो बरदाहटिसँ संग-संग श्रमक पाइसँ खेला-बेला भेल तेकर के नफा-नोकसान गनेबला? ठीके कहबी छै माल मारए मुसबा आ खाए युनूसबा। कीर्तन तँ ओ भेल ने जे कोनो भगवानक कृतकेँ अपना ऊपर लागू करी। से नै करब। हुनक कृत हुनके लग रहए दियनु। राम-कृष्ण हमरो लोकनि लेल उदाहरण अछि। सिरिफ हुनके कृत केलहाकेँ अपनाबी जे ॠषि-मुनि कहि गेला से ने असली धर्म भेल। के बिना नीक काज केने पुजनीय भेला अछि। दोसर दिस कबीर पंथी सम्मेलनक आयोजन सेहो भेल। जखनि प्रवचन शुरू भेल आकि एकटा तेसरे विहंगरा ठाढ़ भऽ गेल। मंचक अध्यक्ष वचन बंशी आ प्रवचनकर्ता पारखीमतक अनुसार गप उठलै- “आनंद भेटै वएह स्वर्ग। मनूखे सबहक कर्ता-धर्ता अछि। भगवानक भोग लगाबी नै लगाबी वा भूखले राखी।” तर्क रहनि- “मुसलमान इसलामकेँ मानै छथि, इसाई इशुकेँ आ हिन्दु राम-कृष्णकेँ मानै छथि, तहिना सीख गुरुनानककेँ मानै छथिन। सभ धर्मक लोक एक दोसरकेँ निन्दा सेहो करै छथिन। हमर पैघ तँ हमर पैघ। किएक ने इसलाम मुसलमानेक खेतमे पानि दऽ दौ। राम-कृष्ण हिन्दूएक खेतमे बर्खा दउ। से कहाँ होइत अछि? सभ मनगढ़न्त अछि। हँ पाँचटा देवता अबस्स छथिन जल, आगि, धरती हवा आ अकास। जे सबहक लेल बरबरि।” तइ बिच्चेमे सवाल उठलै कबीर दासक जन्मक सम्बन्धमे। दोसर सवाल रहै कबीर दासक लाशकेँ हिन्दू मूसलीम बाँटि लेलक तइ सम्बन्धमे। तेसर सवाल रहै वेदक विचारधारा आैर कवीर दर्शनक सम्बन्धमे। जहाँ ने कि रामाशंकर साहैब बजला- “बिना स्त्री-पुरुषक संयोगे केतौ धिया-पुता भेलैए!” तँ कियो लोक लाजक चलैत अवैध सम्बन्धवाली कुमारि अपना बच्चाकेँ पोखरिक कनछरिमे फेकि देलक। जेना-तेना आने पोसलक-पाललक। वैदिक धर्म कबीरक दर्शनसँ मिलैत-जुलैत अछि। बेवहारे ने वेद अछि। मृतमे कबीरक लाशकेँ भीतरे साजिशक तहत दफना देल गेल आ चद्दरि ओढ़ा एकटा फूल रखि देल गेल। जे हिन्दू-मुसलिम अदहा-अदहा बाँटि लेलक। आकि अध्यक्षकेँ खौंत फेकि देलकनि। हल्ला भेल! सहीकेँ केतेक काल छिपाैल जाएत। अध्यक्षक अध्यक्षता समाप्त कऽ देल गेलनि। दोसर अध्यक्ष चुनल गेला। तखनि फेरि रमाशंकर साहैब बजला- “यौ श्रोता लोकनि, कबीर पंथीओ तीन तरहक होइत अछि। एकटा वचन बंसी, दोसर ईश्वरवादी आ तेसर पारखी। सहो बात खोंचाह होइ छै। जहिना महिला सिंगार करैत अछि पुरुषकेँ रिझबैले तहिना बबाजीओकेँ देखियनु एकहक हाथक दाढ़ी, दू-दू हाथक केश, चमचमाइत कपड़ा। देखबैएले ने दाढ़ी बढ़ा कऽ सीताहरण भेल छल। ईश्वरवादी सभटा ईश्वरक उपमा देता मुदा अपने करता ओकर विपरीत। पारखी कोनो दृष्टांतकेँ सही गलतकेँ बूझि कऽ वैज्ञानिक तर्ककेँ मानि सोना जकाँ आगिमे धिपा कऽ बजता आ करता। ढोंगी-ढकक चलैत देशक ई हालति अछि। मुँहसँ किछु बजता आ करै बेर किछु करता। एकटा अमेरिकन बबाजी ऐ बेरका कुम्भ मेलामे इलाहावाद आएल छला। ओ मूर्ती सभकेँ देखि कऽ बजला, जितना भगवान है हिन्दूस्तानमे सभ आतंकवादी है क्यौंकि सबो कें हाथ में अस्त्र-शस्त्र है। अस्त्र-शस्त्र के बदौलत राज्य कएम करना चाहते थे। कृष्ण है कर्मवीर क्यौं कि उनके हाथमे बासुरी है। लेकिन कबीर कें हाथ में क्या था कोइ बताबें। गुरुनानक के हाथ में क्या था। इसीलिए आज के समय में कबीर कि जरूरत है। जो वैज्ञानिक तर्कपर खड़ा उतरता है। वही पूज्यनीय है।” अपन बकतब दऽ शंकर साहैब प्रवचन समाप्त केलनि। मूर्दा रामेश्वरकेँ जखनि मोछक पोम्ह एलै तँ एक दिन धिया-पुताकेँ खेलैत देखि भाव-विभोर भऽ गेल। मने-मन सोचए लगल हमहूँ तँ एक दिन अहिना धिया-पुता रहल हएब। माए-बाबू हमरो कोरा-कान्हपर लऽ कऽ खेलबैत हेता। रामेश्वरक पिताक नाओं छेलनि बंसधर आ माएक नाओं कलावती। बंसधरक उमेर करीब पचपन आ कलाबतीक अरतालीस बर्ख रहनि। नीक गिरहस्त। दस बीघा खेत जोतनिहार। दरबज्जापर टेकटर। कामधेनू सन एकटा जरसी गाए रहनि। कलाबतीकेँ मात्र एकटा बेटा आ एकटा बेटी छेलनि। तेकर पछाति औपरेशन करा नेने छेली। बेटीक नाओं सुगाबती। पहिल लड़की तँ बड़ दुलार खास कऽ माए लेल होइते छै जे रहबो करनि। माएकेँ जेतेक पिअरगर बेटी होइ छै तेतेक बेटा नै। बेटी जखनि अठारह बर्खक भेल छल तखने ओकर बिआह निर्मलीक सुबोधकान्तसँ कराैल गेल छल। सुबोधकान्तक परिवार जमीनदार तँ नै मुदा नून-तेल आ कपड़ाक दोकान नीक चलै छेलै। परिवारो छोट-छीन। सिरिफ माए बाप आ दू भाँइक भैयारी। बिआहो आधुनिक ढंगसँ भेल। धूम-धरक्का यानी डिजे बाजा संग लगभग डेढ़ सए बरियाती आएल छल। दानो दहेज नीक जकाँ देलखिन। सुगाबती सासुर बसए लगली। एम्हर छोट बेटा रामेश्वर पढ़ै-लिखैमे बड़ तेज। कोनो वर्गमे फस्ट सकेण्ड छोड़ि तेसर नै भेल। जखनि वी.एस-सी.क सकेण्ड पार्ट छल तखनि जा कऽ घटना घटलै। छोट बेटा रहने तहूमे एकलौता। एकलौता बड़ दुलारू होइते अछि। माए-बाप लेल तँ आँखिक तारा छल। बंसधर अपने गिरहस्ती करथि। एकटा नोकर बिलेतिया टेकटरक डेरबरी करैत आ दोसर नोकर पिचकून घर-बाहरक काज देखैत। जहिना बेटाक प्रति अगाध प्रेम रखै छला तहिना गाएक प्रति सेहो। पहिने देहाती गाए पोसै छला जेकरा खाइ-पीबैले देथिन मुदा दूधक बेरमे मात्र किलो भरि भिनसर आ आध किलो साँझमे होइ छल। सेहो कोनो साँझ झूस भऽ जान्हि। एक दिन तमुरियाक शिव कूमार डाक्टर घुमैत-घुमैत बंसधरक ऐठाम एला आ जरसी गाएकेँ सम्बन्धमे विचार दैत कहलखिन- “ई जे देहाती नसलक गाए पोसने छी से आब छोड़ू। जरसी गाए लिअ। तेतेक ने दूध देत जे अपनो खाएब आ बेचबो करब। जरसी गाए तँ ओहन कामधेनू होइत अछि जे सगरे नफे-नफा, खुट्टापर कारी गाए रहत से शुभ भेल, दोसर सालमे एकटा बाछा वा बाछी देत। तेसर गोबरसँ जारनि आ खेतक उर्वरा शक्ति बढ़बैमे काज देत। रंग-बिरंगक काज कऽ सकै छी। नगदी आमदनी लेल दूध कमसँ कम बीस लीटर तँ देबे करत। पाँच लीटर अपना खाइले रखि लेब आ बाँकी दूधकेँ वेपारी हाथे बेचि लेब। भारततँ कृषि प्रधान देश अछिए अस्सी प्रतिशत आदमी खेतीएपर निर्भर अछि। तँए कहब जे जरसी गाए लिअ हमहूँ अहाँ संग मधुबनी जाएब आ खटालसँ नीक नस्लकेँ गाए कीनि देब।” बंसधर बजला- “ठीक छै। काल्हिए चलल जाउ।” विहान भने शिव कुमार डाक्टर बंसधर बाबू आ एकटा नोकर पिचकूनकेँ संग लऽ मधुबनीसँ सहिवाल नस्लक दूटा गाए एकटा बाछी तरे आ एकटा बछा तरे कीनि अनलनि। सएह गाए बंसधरक खुट्टापर। गाममे चर्चाक विषए बनि गेल। हरिदम पाँच-दस गोटे गाए देखैले अबिते-जाइते रहै छल। शिव कुमार डाक्टर तेहन ने मिलनसार लोक जे हरिदम केकरोसँ गप-सप्प करता तँ हँसिते। बुझने नै जाएत जे एतेक नीक डाक्टर झंझारपुरक पाँच कोस चौतरफामे भेटत। खास गुण हुनकामे तँ ई छन्हि जे जइ बिमारीकेँ ओ नै जनता तँ अपनासँ ऊपरक डाक्टरसँ सलाह लऽ कऽ इलाज करता। तइसँ सगरे मान-सम्मान खूब भेटैत छन्हि। फिसो आन डाक्टर जकाँ नै उचित मजदूरी उचित दबाइक दाम लइ छथिन। एम्हर बंसधरक चर्चा गाममे हुअ लगल। बंसधरो पहिल दिनका दूध दर-दियाद, हित अपेछितमे बाँटि देलखिन घरपर जे आनो दिन कियो आबनि तँ बिना चाह-पान वा जलखैक नै जाए देथिन। समाजिको काजमे तन-मन धनसँ योगदान देथिन। तइ सभसँ समाजमे एकटा अलगे मान-सम्मान भेटै छेलनि। किए ने भेटितनि, कहबीओ छै जे मन हर्षित तँ गाबी गीत, चारू डंडी सूरेब छन्हि। जेना केकरो नीक, दुष्ट आदमीकेँ नै देखल जाइ छै तहिना भगवानोकेँ नै देखल गेलनि। एक दिन बंसधरकेँ जानसँ मारिए कऽ भगवानोकेँ चैन भेटलनि। भेलै ई जे बंसधरकेँ सधारण बोखार लगलनि। बोखार कोनो दबाइकेँ सुनबाइ करिते ने छेलनि। गामसँ लऽ कऽ दरभंगा तक इलाज करौलनि मुदा कोनो सुनबाइ नै भेलनि। हिया-हारि कऽ घरपर आबि गेला। बिछान धऽ लेलनि, शरीर तँ सुखा कऽ संठी जकाँ भऽ गेलनि। केतए ओ दोहारा हार-काठक शरीर लाल मुँगबा जकाँ। ओ आइ केतए गेलनि से नै कहि। पत्नी कलावती तँ फूटमे हवो-डकार भऽ भऽ कनैत रहै छेली। वेचारी कलावती स्वामी भक्त कहियो पतिक आदेशकेँ अवहेलना नै केलनि। वेचारी सोगेसँ एक हड्डा भऽ गेली। बेटा जे कौलेजमे सकेण्ड पार्ट वी.एस-सी.मे पढ़ै छल से घर आबि गेला। रामेश्वर हरिदम सोगेमे डुमल। खन बाबू लेल पानि तँ खन दबाइ तँ खन पथ परहेजपर धियान दैत रहै छला। एक दिन तीन बजेकेँ समाए छल। पत्नी कलावती स्वामीकेँ पएर लग सेवा कऽ रहल छेली तखने बंसधरकेँ हिचकी उठलनि आ प्राण तियागि देलनि। कलावतीकेँ फूटे दाँती-पर-दाँती लागए लगल, हवो-डकार भऽ बपहारि काटए लगली- “यौ चण्डलबा! हमरा छोड़ि केतए परा गेलौं यौ! आब हमर देख-भाल के करत। के आब एतेक सम्पतिक भोग करत। केकरा हम स्वामीनाथ कहबै।” वेचारा रामेश्वर दोसर कोठलीमे सूतल छल। ओहो दौग कऽ आएल। पिताक मृत शरीर देखि कऽ ठकमुड़ी लगि गेलै। बेहोश भऽ धरामसँ खसल। दाँती लागि गेलै। ताबत दर-दियाद गौआँ-घरूआ सभ पहूँचए लगल। सबहक मुँहसँ एक्के शब्द निकलै- “अन्हेर भऽ गेल! भरल-पूरल परिवार छोड़ि कऽ बंसधरबाबू चलि गेला। हमरा सबहक खुट्टा छला। आब हमहूँ सभ अनाथ भऽ गेलौं।” दोसर दिस रामेश्वर मुर्दा जकाँ एकान्तमे बैसल। आँखिसँ नोर खसि रहल छल। कियो कहै- “जल्दी हिनका तुलसीचौरा लग उत्तरमुहेँ सूता दियनु। गाए गोबरसँ ठाँउ करि कऽ सूता दियनु।” कियो बजैत- “जल्दी कपड़ा लाउ।” “जल्दी बाँसक टाटी बनाउ।” “मुइलकेँ जेतेक जल्दी भऽ सकए, जरा दी।” मुदा वेचारा रामेश्वर सबहक विचार सुनैत। एकटकी लगौने सोचैत लोकोकेँ विचार अजीवे अछि काल्हि तक जे पिता एतेक लार-प्यार देलनि प्राणक आधार छला से आइ मुर्दा...। तहिना लोको बाजि रहल अछि। गामक बूढ़-बुढ़ानुस बजथि- “की करबहक, सबहक यएह गति होइ छै। वेचारा वंशधर आइ भरल-पुरल परिवारकेँ छोड़ि स्वर्गधाम गेला। तहूँ कि मुर्दा भेल ठार छह। ई ने मुइला। मुदा अखनि जेतेक लोक देखै छहक, जखनि मेही नजरसँ देखबहक तँ सभ मुइले जकाँ भेटतह। जेना कृष्ण महाभारतमे अपन विराट रूप देखौने छेलखिन आ करूक्षेत्रक मैदानमे सभकेँ मुइले देखौने छेलखिन आ युद्ध लेल ललकारने रहथिन तहिना ई समाजो अछि। सही बात बाजब, करब से कहाँ होइ छै। अपन-पराया सभकेँ देखबहक निर्णए लैत। देखबहक सामनेमे कुर्कम होइत अछि मुदा बजनिहार कियो नै। कहत अपन आदमी छी झाँपि दहक, वहए विजक धारा भरैत-भरैत समाज आइ एतेक भ्रष्ट भऽ गेल अछि। नीको अछि। केतेक कहबह छोड़ह सोच-पीड़ाकेँ। जे हेबाक हेतै से हएत। दहिना हाथमे कोहा आ बामा हाथमे आगि लऽ आ बंसधरकेँ दाह संसकार कऽ दियनु।” तेराति दिन गौआँक बैसार भेल, भतखौखा पंच सभ भोजक इंतजाममे बेस्त भेल। कियो बजैत- “गुड्डीक धागा तँ अपने सबहक पास अछि ने, जेना-जेना कहबनि तेना-तेना करए पड़तनि। तीन दिन भोज कचरि-कचरि कऽ खाएब।” भोजक हिसाबक कर्त रहनि, नह-केश दिन भात-दालि, एकादशीकेँ चूड़ा-दही, द्वादसामे पुड़ी-तरकारीपर लालमोहन-रसगुल्ला। पात्र-पुरहित लेल पंचदान-सराध, बिआएल गाए बाछीक संग वर्तन-बासन, कोंच, तोसक-तकिआ, कपड़ा-लत्ता सहित सभ किछु दान करथि। कोनो कि बेटा अपन कमेलहा दान करत, बापे तेतेक ने अरजि देलकनि जे भोग करैत रहत। किछु जमीनो-जत्था बेचिलापर एहेन पुण्यकाज करबाके चाही। माए-बापक सराध कि दोहरा कऽ होइ छै। अर्जुनबाबू बजला- “हौ रामेसर, हमर विचार सुनह जे वेभव हुअ तेतेसँ निमहि जा। समाजक पेंच-पाँचकेँ तूँ अखनि नै ने बुझैत छहक, आने कहिओ समाजक बीचमे रहलह। सभ दिन बाहरे रहलह। घरक भार कहियो बुझलहक कहाँ। दानो-पूनक कोनो इता छै। कोनो सीमा सरहद छै। पुरहित-पातकेँ केतनो देबहक तैयो ओकर मन झूसे रहै छै। दान तँ ओकर छिऐ जे उपभोग करए, ई नै जे बजारमे जा कऽ बेचि लिअए।” रामेश्वर मुड़ी डोलबैत बजला- “ठीक छै।” ठीक छै कहि, तहिना करबो केलनि। कनी दिनक बाद रामेश्वरक गाएक बच्चा मरि गेलै। लोक सभ बाजए लगल- “जइ गाएक बच्चा मरि जाए तइ गाएक दूध नै दुहक चाही।” ई बात सुनि रामेश्वर गाएकेँ दुहनाइ छोड़ि देलनि। शिवकुमार डाक्टरकेँ जखनि पता लगलनि जे वंसधरबाबू स्वर्गवास भऽ गेला तँ जिगेसा करए एला। वंसधर बाबूकेँ श्रर्द्धाजलि दऽ रामेश्वरकेँ सानत्वना दैत पुछलखिन- “गाए ठीक-ठाक अछि किने?” रामेश्वर कहलकनि- “नै, बच्चा मरि गेलै। लोक सभ दूध दुहब मना कऽ देलनि।” डाक्टर साहैब तामसे बीख भऽ बजला- “गाएसँ तँ दूधे ने लेबै आकि हर जोतल जेतै। कोन सड़ल-गलल विचारमे बौआइ छी। नगदी आमदनीक स्रोत अछि। आमदनी हरेलासँ कमजोर नै हएब। पढ़ल-लिखल छीहे बुधिसँ काज लैत चलू। लोक अहिना कुटिचालिबला बात बजैत रहै छै।” सतमाए मातृभूमी, गौमाता आ माए तीनूकेँ केतनो वर्णन कएल जाए तैयो कम्मे हएत। जे ममता आकि प्रेम माएमे होइत अछि, संयोगे केतो अन्यत्र भेटत। अपन माए तँ माइए होइत अछि। केतौ-केतौ सतमाइयो जीवन सूधारमे मार्ग दर्शक बनि जाइत अछि। सुधीरकेँ बिआह भेना मात्र तीन साल भेल छल। सुधीरक चारि भाँइक भैयारी छेलै। चारू भाँइ खेतीएपर निर्भर छल। मात्र सात बीघा खेत, परिवार नमहर, मुदा खेती तेना कऽ करै छल जे पनरह बीघाबलाकेँ कान कटै छल। पढ़ल-लिखल कोनो खास नै मुदा जानकारी बेसी छेलै। माए-बाप, दादा-दादी जीविते छेलै। सुधीरक बिआह लक्ष्मी संग भेल छल। नीचलो तीनू भाँइक बिआह भऽ गेल छल। सुधीरक बिआह भेना तीन साल भेल छेलै तखने जा कऽ एकटा लड़काक जनम भेलै। छठियार दिन भोज-भात भेलै। परिवारमे पहिल लड़का जनम लेने खुशीक लहर दौग गेलै। पमरिया ढोलकीपर नाचए लागल। सुधीरक माए-बाप, दादा-दादी दिल खोलि कऽ दान देलक। बच्चाक नाओं राखल गेल अनमोल कुमार, बच्चा जहिना देखबामे सुन्दर तहिना हिस्ट-पुस्ट शरीर। बच्चाकेँ देखिते केकरो मोन भऽ जाइ जे कोरामे लऽ खेलैबितौं। जखनि अनमोल कुमार छह मासक भेल आकि माए बिमार पड़ि गेली, डाक्टर प्रभाष लग लऽ जाएल गेलै। रोगीकेँ देखि डाक्टर प्रभाष कहलखिन- “हिनका पेटमे कश रहि गेल छन्हि। वएह काँट जकाँ भऽ गेलनि। कोनो चिन्ताक विषय नै अछि ठीक भऽ जाएत।” दबाइ-दारू भेलनि मुदा ठीक नै भेली। रातिमे सुतली से सुतले रहि गेली। डाक्टरकेँ अचम्भा लागि गेलनि। ई की भऽ गेलै! गेनिहारकेँ के रोकि सकैत अछि लाशकेँ घरपर आनल गेल। परिवारमे कोहराम मचि गेल। परिवारक सभ सदस्य जेना बौक भऽ गेल। जनिजातिसँ अँगनामे भीड़ लगि गेल। कियो बजैत- “ई छहमस्सुआ बच्चा केना कऽ बँचत।” कियो बजै- “भगवान ऐ बच्चा लेल बड़ अन्याय केलखिन।” जेतेक मुँह तेतेक रंगक बात। खैर जे किछु, दाह संस्कार, नह-केस सम्पन्न भेल। सराधमे एक आदमी बजलै- “हमरासँ छोट मुइल हेन तँए हम केना ओकर सराधक भात खाएब।” मुदा एगारह जन पुरेनाइ अछि। कोनो तरहेँ एगारह जन लऽ कऽ सराध भेल। हलाँकी नहो-केस दिन पात्रक संग सुधीरकेँ दक्षिणाक सम्बन्धमे झनझटि भऽ गेलै। सुधीर बाजल- “यौ सरकार, जबान-जहान मुइल हेन। बच्चा अनाथ अछि। बूढ़ दादा-दादी अछि। कोनो तरहेँ उद्धार कऽ दियौ ने।” महापात्र मानेबला नै। तँए झंझटि भेलै। पात्र बजै- “कियो मरतै तइसँ हमरा की, हम कि कोनो भूमि-छेदन करै छी। हमर दोकान तँ यएह छी किने। हमर गुजरक रस्ता तँ यएह अछि किने।” खैर, कोनो तरहेँ सभ किछु सम्पन्न भेल। परिवारो कोनो तरहेँ ससरए लगल, देखैत-दैखैत तीन साल बीति गेल। कियो कहै- “हौ सुधीर दोसर बिआह कऽ लैह ने।” सुधीर बाजल- “दोसर बिआह करब तँ ऐ बच्चाकेँ की हएत। सतमाए भेने कुभेले ने हेतै। हम बिआह नै करब।” परिवारोक लोक बुझबै मुदा सुधीर मानैले तैयार नै। सुधीर समाजिक लोक तँए कियो-ने-कियो दरबज्जापर अबिते-जाइत रहै छल। मुदा एनिहारकेँ कम-सँ-कम चाह-पान हेबाक तँ चाही। से एक दिन मझिली भावोकेँ चाह बनेबैले कहलनि। ओ ठोका जवाब देलकनि- “के हरिदम चाह बनबैत रहतनि, बिआह कऽ लेता से नै।” सुधीरकेँ बड़ दुख भेलनि। करता कि मन मसोसि कऽ रहि गेला। एक दिन अनमोल कुमार आठ बजे जे पैखाना केलक से दस बजे तक कियो ओकरा छोंछ करौनिहार नै। दस बजेमे जखनि सुधीर एला तँ बच्चाकेँ देखि कऽ बुकोर लागि गेलै। बजता तँ केकरापर? दादी पानि ढारि छोंछ करौलखिन। पछाति अन्ट-सन्ट पुतोहुपर बजबो केलखिन। सुधीर सोचला आब बिआह केनाइ अनिवार्य अछि। चारिम-पाँचिम सालमे जा कऽ दोसर बिआह करैक मन बनौलनि। मनमे उठलनि, एक बेर सासुर जा कऽ सासु-ससुरसँ विचार लऽ ली। सासुर विदा भेला। संग लागल अनमोल कुमारकेँ सेहो लेने गेला। सासूरमे आगत-भागतमे कोनो तरहक कमी नै रहलनि। सासु कहलखिन- “पाहुन, किए ने कुलिन कन्या, नीक घर देखि कऽ बिआह कऽ लइ छथि?” सुधीर किछु नै बजला। तीन दिन सासुरमे रहला पछाति आपस आबि गेला। लोकक असिरवाद जेना काज कऽ गेलनि। नीक घरक एकटा लड़कीकेँ बिआह करबैले घटक, सुधीर ऐठाम पहुँचल। नीक तरहेँ छान-बीन केला पछाति सुधीरक दादा हँ भरि देलखिन। सुधीरक दोसर बिआह बुच्चीदाय संग भेलनि। जेहने बरतुहार कहने रहथिन, तेहने लड़की बेवहारिक छेलखिन। अनमोल कुमारकेँ कोनो तरहक कुभेला कहियो नै केलखिन। कुटीचालि वाली स्त्रीगनक कमी तँ कोनो समाजमे नहियेँ अछि। दुष्ट आदमीकेँ जेना अनकर नीक देखले नै जाइत तहिना स्त्रीगनो होइत अछि, स्त्री जातिक दुश्मन जेतेक मर्द नै होइत अछि तेतेक स्त्रीगन होइत अछि। कोनो स्त्रीगन जे हाँट-दबार अपना बच्चा संग करैत अछि तहिना अगर सतौत संग केलक तँ अड़ोसी-पड़ोसी तुरन्ते उलहन जकाँ काना-फुसी करए लगत- “कहुना तँ सतमाए छिएे ने!” तीलकेँ तार बना कऽ स्त्रीगन सभ बाजए लगत। बच्चोकेँ रंग-बिरंगक गप-सप्पसँ कान भरि दइ छै। मुदा सुधीर सभ बातकेँ जनैत हरिदम सतर्क रहै छला। अपना माए संग कहाँ सत्, शब्द लागल अछि, दोसर माएक संग सत् शब्द लागल अछि, सतमाए। बच्चाक बेवहार जेहेन माए संग हेतै सतमाए तँ ओहने बेवहार करैत अछि। हँ बेसी ओहने सतमाए होइत अछि जे अपना बेटाकेँ नीक आ सतौतकेँ अधला करैत अछि। मुदा केतौ-केतौ सतमाए मार्गदर्शकक काज सेहो करैत अछि। स्त्री जातिकेँ अपना स्वभिमानक रक्षा लेल स्वयं आगाँ आबए पड़त। तहिना बच्चोकेँ अपन पुरुषार्थ लेल स्वयं ठाढ़ हुअ पड़त। तकरीर मुसलमान टोलसँ मुहम्मद साहैबक पैगाम लऽ कऽ जमात निकलैबला छल। जहिया महजिदमे बैसार भेल छल तही दिन कियो पाँच दिनक तँ कियो दस दिनक, कियो एक मासक, कियो चारि मासक जमातमे जाइले नाओं लिखा नेने छल। जमातोकेँ अपन निअम छै। जमातमे गेनिहार अपन खेनाइ-खोराकक संग जाइत आ मुहम्मद साहैबक विचारकेँ मुसलमान समाजमे रखैत। जइसँ नीक बातक प्रचार होइत। समाज सुधरत। कैजूम सेहो चालिस दिनक जमातमे भाग लेलक आ जहाँ-तहाँ तकरीर करए लगल। एक दिन महजिदमे मैक लगा कऽ कैजूम तकरीरमे प्रवचन देबए लगल। तकरीर बड़ नीक जकाँ होइ छेलै। संतोष धार्मिक प्रकृतक, ओकरो मन भेलै जे हमहूँ तकरीरमे भाग ली। संतोषो जा कऽ एकटा चटाइपर किछु जगह खाली छेलै ओतै बैस गेल आ तकरीर सुनए लगल। जुम्मा दिन रहने महजिदमे बैसैक जगहोक अभाव छल। इमामत करैत कैजूम तकरीरमे कहए लगल- “हम और आप लोग जो आनेबला दिनमे एक महिना का रोजा रखेगें उस में सिरिफ दिन भर खाना वा पानी नहीं पीने से काज नहीं चलेगा। उसमे निअम पुर्वक मुँह का रोजा, कान का रोजा, आँख का रोजा, हाथ-पएर का रोजा भी रखना है। जिससे बुरा वस्तु को न देखना, न सुनना और न बोलना है। तब जा कर असली रोजा होगा और सबाब मिलेंगे।” फेर दोसर तकरीर स्त्री जातिपर देलखिन- “औरत को हमेशा पर्दामे रहना चाहिए। नख से बाल तक दुसरे मर्द का नजर उनपर ना पड़े।” तेसर तकरीरमे बाजल- “अगर पड़ोसी के घर किसी तरह का अच्छा खाना बने तो बगल के पड़ोसी को उसमे से थोरा अबस्स दे देना चाहिए। जिससे उसके आत्मा को भी शान्ती मिलेगी और आपको भी शवाब मिलेगा।” संतोष पूरा तकरीर सुनलक। सुनला पछाति ओकरामे तर्क-बितर्क शुरू भऽ गेलै। रोजाक सम्बन्धमे मोलबी जे बजला ओ तँ तर्क युक्त आछि मुदा औरत जातिक सम्बन्धमे जे बजला ओ आइ-काल्हिक जुगक लेल केतेक जाइज अछि। कहूँ जे आइ वैज्ञानिक जुग अछि। वैज्ञानिक जुगमे स्त्री आ पुरुष समान अधिकार लेल लड़ि रहल अछि। तहूमे भारत कृषि प्रधान देश अछि। केना सम्भव हएत। पंचायत चुनावक सरगर्मी चलि रहल छल। गाम-गाममे मुखिया, सरपंच, पंचायत समिति आ जिला परिषदक चुनाव हएत। सभ गाममे सीटक आरक्षित कोटा अछि। पिपरौलिया गामक जे मोलबी छला हुनको भतीजी चूनाव लड़ैले तैयार छेली। ओ पंचायत समितिक लेल महिला क्षेत्र छल। तँ भतीजी नसीरा खातून पंचायत समितिसँ नोमिनेशन करेने छेली। नसीरा खातून पढ़ल-लिखल एगारहमी तक। पिपरौलिया गाममेमे अधिक मुसलमान तँए जीतमे कोनो असुविधा नै भेलनि। ब्लौकक मिटिंग सभमे भाग लैत, समाजक नीक-बेजाए काजमे इमानदारी पुर्बक काज करथि। एक दिन अपने फटेदारक संग दिबानी आ फौजदारी मुकदमा भऽ गेलै। आब ओ कोर्ट कचहरीक फेड़ामे पड़ि चलता-फिरता सेहो भऽ गेली। सौहर मरि गेने, कियो हटनिहार-दबारनिहार नै, तँए छमक-छलो भऽ गेली। नसीरा खातूनक ओकिल छला सुलेमान साहैब। सुलेमान साहैबकेँ तीनटा पत्नी पहिल पत्नीमे चारि सन्तान तीनटा लड़का एकटा लड़की, दोसर अपना सैरक इलाकामे छल तेकरे संग बिआह कऽ लेलक। ई सदमासँ पहिल स्त्री जुबेदाकेँ नापसंद भेलै तेकरे सोगसँ मरि गेली। दोसरोमे पाँच सन्तान भेलनि, तीनटा लड़का, दूटा लड़की, तेसर बिआह एकटा गरीबे घरक लड़कीसँ कऽ लेलनि तहूँमे तीनटा धिया-पुता एकटा लड़का आ दूटा लड़की छल। सुलेमान साहैब एक तँ ओकिल छला, बजै-भुकै आ तुक मिलानीमे पारंगत। आब तँ उमेरे करीब पैंसठि-सत्तरि बरख भइए गेल छेलनि। पाकल-पाकल दाढ़ी, माथपर उजरा टोपी इमानदारीक सभ लक्षण मौजूद। मुदा रूपैआ ठकैमे एक नम्बरक चतूर-चलाक। कखनो हाकिमक नाओंपर, तँ कखनो आॅफिसक नाओंपर, तँ कखनो घूसक नाओंपर मोकिर सभसँ पैसा अँठि लैत। कामूक तँ एक नम्बरक छलाहे। नसीरा खातून अपन मुकदमा लड़ै बास्ते ओकिलमे सुलेमान साहैबकेँ रखलनि। नसीरा खातूनकेँ सुन्दरता आ चंचलता देखि कऽ ओकिल साहैब फिदा भऽ गेला। एक दिन कोर्टसँ आपस पाँच बजे भेला, आ नसीरा खातूनकेँ कहलखिन- “साँझमे अहाँ अपन कागत तैयार कऽ लिअ। कोर्टमे सो काउज देनाइ अहाँक मुकदमामे जरूरी अछि।” नसीरा खातून किआँने गेली जे सतरंजक चालि जकाँ उलटा चालि चलत। सुलेमान साहैब डेरा लऽ कऽ झंझारपुरमे रहै छथि। ओत्तैसँ कोर्ट आबाजाही करै छथि। तेसर स्त्रीकेँ डेरापर रखने छला। ओ केम्हरो बजार दिस समान लऽ गेल छेली। डेरा खाली छल। सुलेमान साहैब कामूक नजरि नसीरा खातूनपर दौड़ा देलखिन। केते तरहक भय आ लोभो दऽ कऽ अपन कामुक इच्छा पूर्ति केलनि। ऐ तरहेँ आब समए-समैपर नसिरा खातूनसँ गलत बेवहार करए लगला। जखनि नसीरा खातूनकेँ छह मासक पेटमे बच्चा भऽ गेल, ओकरा आब अपनासँ दूरे राखए लगला। नसीरा खातूनकेँ ऊपर-निच्चाँ सुझए लगल। एक दिन ओकिल साहैबकेँ पुछलखिन- “अहाँ जे कहने रही जे निकाह करब से कहिया करब?” ओकिल साहैब ताउमे आबि बजला- “की कहलिएे निकाह! की हमरा स्त्री नै अछि जे दोसर निकाह करब। जाउ एतएसँ! नै तँ कंठपर हाथ दऽ कऽ भगा देब!” आब तँ नसीरा खातूनकेँ चौन्ह आबि गेल। ओइ दिन तँ घूमि आएल। दिमाग अशान्ति भऽ गेलै। देहमे जेना आगि लगि गेलै। स्त्री जाति जहिना ममता रूपी माए आ बहिन होइत अछि तहिना क्रोध एलापर ओ कालीओ रूप धारण करैत अछि। सएह काली सन रूप बना एक दिन कोर्टक ओकालत खानामे गेल आ सीधे सुलेमान साहैबकेँ भरि मुट्ठी दाढ़ी पकड़ि झूला-झूला कऽ कहए लगलनि- “ई जे हमरा पेटमे छह मासक बच्चा अछि तेकर की हएत?” ओकिल साहैबकेँ किछु फुड़बे नै करनि। मुड़ी गोंतने ठाढ़! किछु बजबे ने करथि। तौं, तौं नसीरो खातून जोर-जोरसँ बजैत- “ओकिलक करतूत देखि लियनु। हमरासँ निकाहक वादा केने छला। हमरासँ अपन काम-पिपासाक पूर्ति केलनि आ पेटमे छह मासक बच्चा अछि। आब की हएत!” एतेक बात सुनिते ओकालतखानामे भीड़ लगि गेल। लोक सभ ओकिल साहैबकेँ धूरछी-धूरछी करए लगल। ओकिल साहैब ताउमे आबि नसीरा खातूनकेँ गालपर एक चमेटा मारि देलखिन आ पएरसँ एक ऐड़ लगा देलखिन। आब तँ आरो तेसर काण्ड भऽ गेल। नसीरा खातूनकेँ ओकिल सभसँ आ किछु दर्शको सभसँ सहानभूति भेटलै। लोक सभ बजै- “कहू तँ ओकिल साहैबकेँ असगरमे पनरहटा धिया-पुता छन्हि, बेटा, बेटी सभकेँ धिया-पुता भऽ गेल छन्हि। अपनो उमेर तेतेक छन्हि जे दाढ़ी केस पाकि गेलनि। तब एहेन काज केला। बड़ अन्याय केलनि!” स्त्रीगण सभ बजैत- “बड़ छुद्दर ओकिल अछि!” नसीरा खातून कोर्टमे बलतकारी मुकदमा डायर कऽ देलकनि। पुलिस सुलेमान साहैबकेँ पकड़ि कऽ जेल पठा देलकनि ३७६ दफामे। आब जेलमे पाँच बखत नमाज अदा करै छथि आ कैदीकेँ बीच तकरीर करै छथि। कैजूम जे जमातक अगूआ छल तिनका संग तेसरे घटना घटलनि। कैजूमकेँ चारिटा लड़का। चारू लड़का अलग-अलग, केकरोमे केकरो मिलाने नै। एतेक धरि जे कैजूमकेँ देखनिहार अपन बेटाे नै। बेटा सभ बजै- “बड़ तकरीर करैत रहै छला, आब खाथु-पीबथु आकि ओरहौन-पिनहौन करैत रहथु। कमेता खटेता नहियेँ आ खेता नीके-निकुत!” मझिला बेटाक घरमे मुर्गा फराइ भेल छल आ गहुमक आँटाक दलिपुड़ी बनल छल। घर-अँगना गमा-गम करै छल। कैजूमकेँ मन होइ जे दूटा पुड़ी आ मुर्गा फराइ केलहा, दइतए तँ खैतौं। बाजत केना अपन तकरीर मोन पड़ि जाइ। मझिला बेटा सनेसक मोटरी बान्हि सासुर चलि देलक। वेचारा कैजूम मुँह तकिते रहि गेल। सोचै लगल हमर तकरीर तँ लोक सभ सुनबेटा केलक। करैबला कहाँ कियो भेल। अपने जँ नीक सोचितौं, बजितौं आ करितौं तँ आइ ई दशा नै होइत। आब पचतेलासँ की हएत। समए तँ निकलि गेल। ठीके कहावत अछि ‘वक्ता एलै कहैले आ बरद एलै बहैले। अपना मोनकेँ संतोष देलनि। पान १९६२ इस्वीक शीतलहरिक समए छल। राम अवतार दू कठ्ठामे बड़ैब केने छल। पानक बिक्री तेहने सन छेलै। राम अवतार तीन भाँइक भैयारी, तीनू भाँइ बड़ैबे पाछू अपसियाँत रहै छल। जमीन मात्र दू बीघा धनहर आ दसकठ्ठा कलम-बाग आ चौमासबला। कनी-मनी तरकारी आ धान-मरूआ उपजाबै छल। तीनू भाँइ पढ़ल-लिखल कमे तँए देश-विदेश जाइक कोनो चरचे नै। भैयारीमे मिलानी नीक छल। तीनू भाँइक बिआह-दुरागमन भऽ गेल छल। तीनू कनियाँ बसै छेलखिन। दियादनीओ सभमे मिलानी नीक छल। धिया-पुता टेलहू सभ छेलै। शीतलहरि तेहेन मारूक भेलै से जूनि पुछू। पनरह नवम्भर दिन जे शुरू भेल से भरि जनवरी तक लधले रहलै। एमहर केतौ कीर्तन तँ केतौ जग, माने परोपट्टामे पूजा-पाठक अम्बार लगि गेल। तथापि शीतलहरि खतमे ने होइत। प्रकृतक डाँग तँ अजीवे होइ छै। केतेक कठुआ कऽ मरल। चिड़ै-चुनमुनीसँ लऽ कऽ गाए-माल तक, साँप-कीड़ासँ लऽ कऽ, बूढ़-बुढ़ानुस धरिक जान अवग्रहमे पड़ि गेल। राम अवतार सन-सन पचासो गोटेकेँ बड़की पोखरि महारक भीठाबला खेतमे बड़ैब छेलै। लगभग पनरह बीघामे। सबहक बड़ैबक पान झड़ि गेल, पानक गाछ सभ जड़िसँ गलि-गलि सुखए लगल। केना कऽ कोन लहरि चललै जे राम अवतारक दू कठ्ठाक बड़ैबमे रूइयाँ भगन तक नै भेल। छोटकी देहाती पान छेलै, गुथल पान छेलै। इलाकामे बड़ैबक खेती सुन्न भऽ गेल। पान खाइबला सभ पान लइले राम अवतार ओइठाम आबए लगल। तेतेक रूपैआ भेलै जे पाही पट्टीबलाकेँ छह बीघा जमीन कीनि लेलक। एक दिन बुचुन मास्टर पान लइले गेलखिन। पाँच रूपैआक राम अवतारसँ पान लऽ कहलखिन- “राम अवतार, तूँ बड़ भागमन्त छह। इलाका सुन्न भऽ गेलै पानसँ आ तोहर केना बँचि गेलह?” “भगवानक दया।” राम अवतार बाजल। बुचुन मास्टर बजला- “ई तँ लंकामे जहिना विभिषणक घर बँचि गेल तहिना बुझना जाइए। हौ, एकटा बात बुझलहक हेन, चीनो कहाँदन भारतपर चढ़ाइ कऽ देलकै आ बहुत रास जमीन अपना लेलकै। अपना सबहक सरकार हारि गेल। चीन बड़ अन्याय केलक हेन। अपना सरकारकेँ तागति नै छेलै की। छब्बीस जनवरीकेँ सुनै छिएे जे अस्त्र-शस्त्रक प्रदशर्न करैत अछि, अखनि ओ अस्त्र-शस्त्र की भेलै। अक्षत-फूल दइले रखने अछि?” राम अवतार बाजल- “खैर जाए दियौ, सरकारक काज छिएे जनताकेँ सुरक्षा केनाइ।” बुचुन बजला- “हँ से तँ ठीके।” राम अवतार हँ-मे-हँ मिलबिते छल आकि तखने बालेसर आबि राम अवतारकेँ पुछलकै- “केना कऽ पानक खेती होइ छै, की सभ गुण-अवगुण छै से कहऽ हमरो मन होइए पानक खेती करौं।” “अहाँ बुते हएत तँ करू, मुदा बड़ भीरगर खेती होइ छै पानक। हँ, आमदनीओ नीक होइ छै। कोनो फसिलसँ नीक आमदनी होइ छै। पानक खेती करब तँ करू हम पानक बीआ देब।” “की गुण छै से तँ कहऽ।” राम अवतार बाजल- “खेती केना होइत अछि पानक से सुनू। एकर शुरूआत दऽ बूढ़-बुढ़ानुस सभ बजै छला जे मध्य प्रदेशक नागपूरमे पानक पत्ताक खोज भेल, खोज केनिहार नागवंसी सभ छला। ओकरा सबहक अगुआ छेलै गोरहू कुमर जेकर पूजा अखनो मुंगेर लगमे एकटा स्थान छै, ओतँ बरइ जातिक लोक बाबा धामक रस्तामे जा कऽ पूजा-पाठ करैत अछि। बरइ जातिक मुल-गोत्र नागवंसीय अछि। पहिने एकर खेती बरइये जातिटा करै छल, मुदा अखनि सभ जातिक लोक करै छथि। पानक आकार दिल जकाँ होइ छै से तँ देखिते छिऐ। दू दिल मिललासँ जहिना दिल प्रसन्न होइत तहिना पानमे चुन, खएर, सुपारीक संग खिल्ली बना मुँहमे देलासँ मुँहक सुर्खीए बदलि जाइ छै। जखनि पानक खेती शुरू करब आ बरेठा लगि जाएत तँ छह महिना धरि तँ आमदनी नै हएत, खाली खर्चे हएत। छह महिना पछाति आमदनी हुअ लगत।” “तूँ कहऽ ने हम मोन बना लेने छी। पानक खेती करबेटा करब।” राम अवतार- “पहिने एकेकठ्ठा खेती करह ओकरा लेल पच्चीसटा बाँस, टाट बान्हैले खरही, छाड़ैले खढ़, बाँसक फट्ठा सात हाथक, सौंसे बाँसक कान्ह फाड़ि लेब, थोड़ेक बती दस हाथक बना लेब, यएह सभ समान भेल भीठाबला खेतकेँ तैयार कऽ लिअ। बीआ हम देबे करब। एक हाथक दूरीपर पान रोपि देबै भऽ गेल। गाछ लगलापर महिना दिन पछाति खैर छीटि कऽ ऊपरसँ माटि दऽ देबै।” “ठीक छै।” कहि बाले घरपर आबि पत्नी-सुग्गीयासँ राय लऽ कऽ पानक खेती करैक विचार केलक। बिहाने भनेसँ खेतोक जोगारमे लगि गेल। पानक गाछ लगि गेलै, राम अवतारक मोताबिक मास दिनक पछाति खैर सेहो देलक, छबे मासक बाद आमदनीओ हुअ लगलै। खुशीसँ दुनू परानी बालेक मन अकास ठेक गेल। बालेकेँ तीनटा धिया-पुता दूटा लड़का, एकटा लड़की। जेठका दसमामे पढैत, छोटका तीसरामे, लड़कीकेँ जनमना एक साल भेल छेलै। जे बालेसर काल्हि तक बोइन-बुता करि कऽ गुजर-बसर करै छल। मन हरिदम कलहन्तमे पड़ल रहै छेलै, तेकरा हाथमे रूपैआ एने आइ मने बदलि गेलै। कपड़ो-लत्ता, रहन-सहन, खेनाइ-पिनाइ सभ बदलि गेलै। एक दिन बालेसर बड़ैठामे काज करै छल। जलखै लऽ कऽ पत्नी आबि कहलखिन- “आउ जलखै कऽ लिअ।” बालेसर बाजल- “थमहूँ अबै छी। कनीए दुर कसियाबैले बाँकी अछि।” आँतर लगा बालेसर जलखै करए लगल आ सुग्गीया पान तोड़ए लगली। एक मोटरी पान तोड़ि सुग्गीया घरपर आबि गेली आ बाले बड़ैबक काज करैत रहल। दुपहरमे घरपर आएल। दुपहरियामे बालेसर पान गोइछ कऽ ढोली बना देलक। सुग्गीया गोछियाैल पान पथियामे लऽ बेरू पहर झंझारपुर बजार बेचै लेल चलि गेली। बालेसर मुनहारि साँझमे राम अवतार ऐठाम आएल। दुनू गोटे गप-सप्प करए लगल। बालेसर राम अवतारसँ पुछलक- “भाय हौ, लोक तँ पान खाइत अछि, खूब खाइत अछि। किछु-किछु कहक। की सभ आनो-आन गुण छै पानक।” खुशीसँ उमकल बालेसरक लटपटाएल प्रश्नक भाव बूझि राम अवतार बाजए लगल- “गुण तँ एतेक छै जे मत पुछू! अपना गाममे महावीर दास बबीजी छला ओ आयुर्वेदक बड़ ज्ञानी, बासठिक शीतलहरिमे हम सभ जे पानक लत्ती फेक दिएे तेकरा महावीर दास बोझक-बोझ आनि ओकरा कुटि कऽ दबाइ बनबै छेलखिन। ओ कहथिन जे ऐमे प्रचुर मात्रामे विटामिन पौल जाइ छै, प्रोटीन, बसा, खनीज, कार्वोहाइड्रेट, विटामिन सी.बी.ए., नाइट्रोजन फाँसफोरस, पोटासियम, कैलसियम, आयोडिन, तेल, उर्जा इत्यादि पौल जाइ छै। तँए पानक लत्ती आनि कऽ हम ओकरा दबाइ बना लइ छी। जेकर उपयोग हम साँस सम्बन्धी बिमारीमे, टी.बी.मे, कब्जियतमे, पेटक किटानुरोधीमे, कोलरा बिमारीमे रोगी सभकेँ दइ छिएे। यौ भाए, एतेक गुण छै।” बालेसर मुड़ी डोलबैत बाजल- “तब ने एकर एतेक महत छै।” राम अवतार बाजल- “पान बड़ कोमल-तन्नुक होइत अछि, एकरा ने अधिक बरसात, ने अधिक गरमी, ने जोरगर हवा आ ने अधिक ठंडा चाही। माने अधिक कोनो चीज नै। सभ समरूपे चाही। देखै नै छहक बड़ैबेक बनाबटि मकरा जाल जकाँ बीनल अछि। कोनो-ने-कोनो काज लधले रहतह बड़ैबमे।” “से तँ नीक छै जे कोनो-ने-कोनो काजमे ओझराएल रहै छी। कर्मे ने जिनगी छिऐ। काज नै करू तँ हरमपाना करैत रहू। एकटा पान खुआ दिअ आब सुग्गीओ बजारसँ पान बेचि कऽ आएल हएत। ओकराे कि कम धौजनि होइ छै। जलखै बना, दुपहरियाक भानस कऽ बेरू पहर पान लऽ कऽ झंझारपुर गेनाइ आ बेचनाइ! साँझमे औत तँ फेर रतुका भानस करत। एहेन घरवाली भगवान सभकेँ देथुन। साक्षात् लक्ष्मी अछि।” पान खा बालेसर घरपर आएल। ताबत सुग्गीया खाना बना लेने छेली। बोलेसरकेँ देखिते सुग्गीया बजली- “एतेक राति धरि केतए रहै छी। सबेरे-सकाल घरपर आबि जाएब से नै?” बालेसर बाजल- “राम अवतार दोस लग गेल छेलौं। पानक गुण-अवगुण आ पानक खेतीओक बारेमे बुझैले।” सुग्गीया पुछलखिन- “सभ गप कहलथि किने?” “हे पानक खेती तँ पुश्तैनी खेती छेलै। आब ने सभ जातिक लोक करए लगल। एकर खेतीसँ आमदनी तँ नीक अछि एकबेर लगेलाक बाद केतेक साल तक उपजा दैत रहत।” सुग्गीया- “से तँ नीक बात छै। सुनै छिएे जे चाहो पत्तीक खेती अहिना होइ छै मुदा पाँचे-साते साल तक होइ छै। ओकरा बर्खा-पालाक डरे नै होइ छै मुदा पानमे तँ से नै छै। सुधरल तँ धेनू गाए नै तँ ठाँठ भेल पड़ल रहत।” बालेसर- “ठीके सुनैत छिएे। और सुनू राम अवतार कहलक, यौ भाए अपना ऐठामक पान दोसरो राज्यमे जाइ छै। एकबेर बनारस गेल रही एकटा पानक दोकानपर पान खाइले गेलौं तँ ओ दोकानदार, ना ठेकान पुछलक, जखनि ना ठेकान कहलिएे तखनि दोकानदार कहए लगल हमहूँ बड़की पोखरिक पान अनै छेलौं, बेरमाकेँ कटोरिया आ मघी पान जानो-मानो पोखरि महार महक साँची आ कलजोरिया पान नामी छेलै। हमरो आश्चर्य लागल।” सुग्गीया बजली- “एतेक दूर तक अपना ऐठामक पान जाइ छल!” बालेसर- “हँ, हे और सुनू पहिलुका जमानामे वादशाह, जमीन्दार सबहक ऐठाम डालामे पाइ, वस्त्र आ पान दऽ कऽ कोनो काजक शुरूआत करै छल। अपनो देखै ने छिएे कोनो तरहक मांगलीक काज हुअ बिना पानक होइ छै। एहेन नीक फसिलपर ग्रहण लगि गेलै। पहिने स्त्रीगण पानेक खिल्लीसँ मुँहक ठोरक लाली रखै छेली। आइ ने रंग-बिरंगक लिपिस्टिक सभ आबि गेल हेन। झाँट-बिहाड़ि आ पालासँ बरइ जातिकेँ नोकसान होइ छै से तँ होइते छै सरकारोकेँ करोड़ोक घटा लगै छै। आब सरकारो बरइ जातिपर धियान देलक मुदा देने कि हएत पानक खेती केनिहार सभ शहर चलि जाइ गेल। खाली बूढ़-सूड़टा अछि। के करत पानक खेती। अपने जेठकाकेँ नै देखै छिएे दिल्ली जा कऽ कोनो कम्पनीमे कम्पूटर चलबैए। कम्पनीबला सभ शिखर, गुटका, रंग-बिरंगक पान मसाला सभ बजारमे भरि देने अछि। मिथिलांचलक पान ने उपटल जा रहल छै मुदा बंगालमे जलवायु नीक रहने ओतुके पान अखनि सौंसे बजारमे पसरल अछि। सएह सभ बुझैले गेल छेलौं। और केतए जाएब। भरि दिन तँ कोनो-ने-कोनो काज करिते रहै छी साँझूपहर कनी टहलि लइ छी।” सुग्गीया बजली- “होउ, खेनाइ खा लिअ। धिया-पुता खा कऽ सुति रहल।” बालेसर खेनाइ खा-पी कऽ सुति रहल। सुग्गीओ खा कऽ सुति रहली। समैक चक्र बदलल। पछिला चारि-पाँच सालमे तेहेन ने पाला खसल जे बरइ सभकेँ रीढ तोड़ि देलकै। जड़ि सहित पानक गाछ सुड्डाह भऽ गेलै। गाम-गामक बरैठा ओहिना झोज परए लगले। सभटा जवान-जुहान सभ दिल्ली-पंजाब, बम्बइ-कलकत्ता पड़ा गेल आ ओतै नोकरी करए लगल। मात्र बूढ़-बुढ़ानुस सभ गाममे रहि गेल। बड़ैब उपटने बालेसर माथा हाथ दऽ सोगमे बैसल छल। सुग्गीया भानस करि कऽ पति लग आएल आ बाजल- “एना माथा हाथ दऽ बैसने काज हएत आकि अगिलो दिन दुनियाँक लेल सोचब।” असमंजसमे पड़ल बालेसर बाजल- “की करू से किछु फुड़िते ने अछि।” सुग्गीया ताना मारैत बजली- “है रे मरद, एके दहारमे किदनि बहार। हमरबला चूड़ी पहिरि लिअ आ घरमे बैस जाउ! सुनू हमरा गारामे हौंसूली अदहा किलोक अछि। तेकरा बन्हकी लगा कऽ पानक कारोबार करू, कलकत्तासँ पान आनू आ बेचू।” बालेकेँ हिम्मति बढ़लै। बाले हौंसली बन्हकी लगा रूपैआ लऽ कऽ कलकत्तासँ पानक कारोबार शुरू कऽ देलक अपने सकरी मधुबनीमे पान बेचए लगल आ सुग्गीया झंझारपुरमे। मुदा मनमे कचोट हरिदम रहबै करै जे केतए गामक रहन-सहन आ केतए शहरक भाग-दौग। ने स्वच्छ हवा ने समाजिकता आ ने ओ बेवहार। गामक बेवहार शहरमे तकनौं नै भेटै छै। गाम तँ गामे छी। मई दिवस महान खगोल शास्त्री गलेलियो सावित कऽ देलखिन जे पृथ्वी गोल अछि, सुर्य स्थिर अछि। तैपर ओइ समैक इसाई धर्मबला सभ मिलि कऽ हुनका फाँसीक सजा देलकनि। मुदा आइ सम्पूर्ण दुनियाँ गलेलियोक दर्शनकेँ सत्य मानि रहल अछि। अतियाचारक खूनसँ रँगल एक मई तँ वहए दिन छी। मजदूरेक खूनसँ रँगल झंडा आ केतेक भाए-बहिन, सर-सम्बन्धी, माए-बापक शहीदक प्रतीक अछि। साम्राज्यवादी आ पूजीपतिकेँ विरोधक प्रतीक अछि। साम्यवादक चेन्ह छी। एक मई उनैस सए नब्बेकेँ मजदूर दिवस केना मनाैल जाए तेकरे तैयारी भऽ रहल छल। पार्टी आॅफिसमे कामरेडक भीड़सँ पएर रखैक जगह नै। एकटा फड़ाके उत्साह सबहक मनकेँ झकझोड़ि कऽ रहल छेलै। एकाएक एकटा घटना घटल। हमर जे बाबा छला मृत्य सज्जापर, हुनक देहावसान भऽ गेलनि। ई समाचार सौंसे पार्टीगणक बीच पसरि गेल। हमरा सभमे एकटा नवके उमंग जगि गेल। तखने सर्व सम्पतिसँ तँए भेलै- “हम सभ मई दिवस क्रान्ति दिवसकेँ रूपमे मनाबी। रूढिवादी, मनूवादी, ब्राह्मणवादी विचार धाराकेँ तोड़ि नव सन्देश समाजक बीचमे दिएे।” सएह भेल। बाबाक संस्कार पहुलके रीति-रिवाजक अनुकूल भेलनि। तेराइत दिन जाति आ परजातिक बैसार केलाैं। बैसारमे ठाढ़ भऽ बजलाैं- “बाबाक सराधमे हम पुरोहित-पात्रकेँ नै आनब। अपने स्वजातिसँ जे जेना हेतै कर्म कराएब।” गौआँमे खलबली मचि गेल। फेर बजलौं एगारह गाम लऽ कऽ पुड़ी-जिलेबी, खाजा-लड्डूक भोज करब। जाति-परजाति, परहित-पात्र आ दलाल सभकेँ बुझू जेना आगि लगि गेलै। पार्टीमे बहुत दिनसँ ऐ सबहक मादे चर्चा होइ जे ई सभ ढोंग छी एकर वहिष्कार कएल जाए। मारि घोल-फचक्काक बाद सर्व सम्मतिसँ तँइ भऽ गेल। “माए-बापक सराध कर्म जेना मोन हुए तेना करू।” हम बजलौं- “यौ भाय-बन्धु लोकनि ई शरीरो तँ पाँचटा तत्वसँ बनल अछि। माटि, पानि, हवा, आगि आ अकाससँ। मूइला पछाति फेर ई शरीर ओही पाँचो तत्वमे विलिन भऽ जाइ छै। आत्माकेँ मृत्यु नै होइ छै। कमर्क अनुसार कोनो-ने-कोनो जीवमे जनम होइ छै। तखनि केतए स्वर्ग आ नरक छै। के सभ देखने छिएे, आकि किनकर माता-पिता कहैले एला जे हमरा कष्ट अछि आकि सुख। बाजू ने। हमर बाबा कुकर्मी नै छला, साधु मिजाजकेँ छला। केकरो नीके केलखिन तँए हमरो बिसवास अछि, जे केतौ स्वर्ग छै तँ हमरो बाबाकेँ स्वर्ग भेटबे करितनि। भोज-भात कइए दइ छी, अहाँक जिद्दपर अपना स्वजातिसँ कर्म सेहो भऽ जेतनि।” हमर बात सुनिते घोंघाैज हुअ लगल। फेर कहलिए- “ब्राह्मण, तेली, यादव, मुसहर, चमार, धानुक, कियोटमे स्वजाजातिये पुरहित-पात्र होइ छै। अपना जातिमे भेलासँ की हर्ज, से कहू।” सएह भेलै। हमहूँ भोज-भातक ओरियानमे लगि गेलौं। गाममे जेना आगि सुनगि गेल। जहिना कुकुरक नांगरिपर मटिया तेल पड़िते दौग एमहर तँ दौग ओमहर करए लगैए छै तहिना लुच्चा सभ करए लगल। जगदीश प्रसाद मंडलक नेतृत्वमे कम्युनिष्ट पार्टीक संघर्ष चलि रहल छल। झंझारपुरक जमीन्दार लक्षीकान्त, रामा कान्तक जमीन बेरमामे लगभग पचास बीघा। जमीनपर बटेदारी मुकदमा कएल गेल छल। गाम दू भागमे बँटि गेल। प्रमुख जमिन्दारक संग दइ छेलखिन। तखने ई घटना घटित भेल छल। प्रमुख किछु जाति सभकेँ सनका कऽ भोज बिगाड़ैक चेष्टा केला मुदा चललनि किछु नै। पार्टी सदस्य छल एक सए पचासक लगभग। एगारहो गामक स्वजाति सभ जातिक पार्टी सदस्यक संग भोज भेल, एगारहो गाममे जे महा दरिद्र (भिखमंगा) केँ अलगसँ पुरुखक दफे धोती, गंजी, गमछा आ स्त्रीगण सभकेँ साड़ी, साया, ब्लौज संग भोज खुआ सम्पन केलौं। कालीकान्त झा आसाममे डी.आई.जी. छला सेवा निवृत भेला पछाति ऊहो आएल छला। हुनका संग लागल पाँच गोटे महापात्र सेहो छेलखिन। काली बाबू अपने संस्कृतक विद्वान। बेरमामे हुनकासँ कियो कर्म काण्डेक बारेमे पूछि देलखिन ओ कहलखिन- “यौ बाबू, जे जेतेक चाटूकार, जे जेतेक घूसखोर, जे जेतेक बेइमान, माने दू नम्बरी कमाइबला ओ सभ किए ने खूब नमहर-नमहर वर्तन-बासन, कपड़ा-लत्ता, टेबूल-पलंग आ बाछा-गाए दान करत। लेनिहार बजारमे जा कऽ बेचि लेत। दान तँ ओकरे दिएे जे ओइ वस्तुकेँ उपयोग कऽ सकए। कर्म काण्डो सभ जे कहि रहल छथि मन गढ़न्त अछि। स्वर्ग-नरक एतै छै। ऊपर केतए तकै छिएे।” एते बात सुनिते संग लागल पाँचो संगी हिनका छोड़ि कऽ घर दिस विदा भऽ गेला। आ बजैत रहथिन- “कहूँ! अपने पएरमे कुरहरि मारै छथि। अपने ने उच्च पदपर छथिन। हमरा लोकनिकेँ तँ रोजी-रोटी यएह छी जैपर लात मारै छथि। हुनका तँ पेनशनों मारे रास भेटै छन्हि।” “हमर बातपर तँ पोंगा-पंडित सभ लेल खोंचाह हेबे करतनि।” काली बाबू कहलखिन। पुन: बाजए लगलखिन- “यौ भाय-बन्धू लोकनि, बुझना जाइत अछि पुरोहित-पात्र लोकनि सीधे स्वर्गसँ कनफर्म टिकट लऽ कऽ आएल छथि आ मृतककेँ सीधे स्वर्ग पठा देथिन।” ई घटना सभ जखनि प्रमुखकेँ पता लगलनि तँ बिदेश्वर ठाकुर नौआकेँ बलजोरी महिंस खोलि लेलक। अनेक तरहक मुकदमामे कामरेड सभकेँ फँसबऽ लगल। बिरासी किता मुकदमा लादि देलक। एकटा-ने-एकटा कौमरेड हरिदम जेलमे रहैत रहथि। लोकक मन पीता गेलै। जहिना शान्तिक बाद बबन्डर अबै छै तहिना एक दिन प्रमुख सभ समांगकेँ तत् मारि लगलनि जे नानी ने मरिहेँ जे फेर कोनो आन्दोलनपर कुठाराघात करता। मई दिवस अखनो कोनो-ने-कोनो रूपे एक मईकेँ मनौल जाइत अछि। हमरा लोकनिकेँ चाहे जइ तरहक खतरा हुअए, खूनसँ रंगल लाल झंडाक सहारा लऽ कऽ काजकेँ सफल बनाबी। नै कि तूँ कमा आ हमरा खुआ हमर स्वर्ग एतै आ तोहर स्वर्ग मुइला पछाति! सर्वसम्मतिसँ निर्णए भेल- “ढोंगी सबहक फेड़ासँ सतर्क रही।” भूख बित भरिक पेट जे ने करए। करे-करे पेट आ छबे-छबे खेत, तहिना मनोकेँ भुख बढ़ले जाइ छै। बास भेल तँ चासक जोगार, कोठलीसँ कोठाक जोगार, साइकिल भेल तँ मोटर साइकिलक जोगार, मोटर साइकिल भेल तँ स्कारपीओक जोगार, काल्हि जा कऽ हवाय जहाजक जोगार! माने ई जोगोर कखनो रूकबाक कोनो नामे ने लैत। जइ कारणे चोरी-डकैती, बेभिचार, अपहरण, एसमाैगलिंग बढ़ले जाइत अछि। शत्रुधन बाबू पैघ जमीनदार दू भाँइक भैयारी। लगभग चारि सए पचास बीघा जोता जमीन छेलनि। तीन बीघामे बाँस आ दस बीघामे कलम-गाछी। तीनटा पोखरि। पोखरिमे रंग-बिरंगक माछ। चौधरा मकान वंगला जकाँ दलान। दसटा नोकर-चाकर, मंशी देवान, मुँहलगुआ सेहो दू-चारिटा रखने छला। आँगनमे तीनटा स्त्रीगणक नोकरानी। मिला जुला कऽ ठाठ-बाठ तेहेन। राजा महाराजा जकाँ छोट भाइक नाओं छल अमरजी। अमरजी सीमापर फौजक डाक्टर। हुनका दूटा लड़का। इमहर शत्रुधन बाबूकेँ दूटा लड़का आ दूटा लड़की। एकटा लड़का डाक्टर दरभंगा अस्पतालमे। दोसर इंजीनियर अहमदावादक सरकारी काजमे। अपने शत्रुधन बाबू घर परहक काज देखिते छथि। कोनो गरिबाहाक खेत जँ हिनका खेतक आड़िमे आकि बीचमे पड़ैत तँ बलजोरी दफानि पछाति औना-पौना दाममे लऽ लथि। केकरो अन्न दऽ कऽ केकरो, बेटी बिआहमे कर्जा दऽ कऽ, केकरो माए-बापक सराधमे कर्जा दऽ दऽ सूदि-दर-सूदि जमीन बटोरैत रहला। गाममे गरीबो-गुरबाक कमी नै। जेतै धनीक रहत ओतै ने गरीबीओ बढ़ैत जाइ छै। केतेक की हुअए तेकर कोनो सीमे सरहद नै। लोभीओ एक नम्बरक। अनको नीकहा वस्तु हमरे भऽ जाए। अजब बाबू सेहो जमीनदार। हुनका एकटा लड़का महावीर। जखनि अजब बाबू मरि गेला तँ सभ कारोबार महावीरक देख-रेखमे चलए लगल। जेहने नाओं महावीर तेहने करबो करैत। भूखल-दूखलकेँ भोजन करौनाइ, जेकरा जइ चीजक दिकत होइ से जँ महावीरसँ माँगै तँ ओकर आवश्यकताक पूर्ति अबस्स कऽ दैत। मिला-जुला कऽ साधु प्रकृतक महावीर। लोभक नामो-निशान नै। एक दिन महावीरक मनमे एलै जे तीन गोटेकेँ आश्रममे एतेक सम्पति लऽ कऽ की करब, से नै तँ गरीब, भूमिहीनकेँ, खगल बेकती जे मागंत तेकरा देबै। सएह केलक। जे अबै केकरो पाँचकठ्ठा, केकरो बीघा तँ केकरो दस कट्ठा, देबए लगल। शत्रुधन बाबू ई बात बुझलनि। लोभी तँ छलाहे पहुँच गेला महावीर बाबू लग। शत्रूधन बाबू कहलखिन- “यौ महावीर बाबू, सुनै छी जमीन दान करै छी। हमरो देल जाउ थोड़ेक जमीन।” महावीर मुड़ी डोलबैत कहलकनि- “अहाँ काल्हि आएब जे मांगब दऽ देब।” “ठीक छै।” कहि शत्रूधन बाबू अपना घरपर आबि गेला। ऐ बिच्चेमे महावीर बाबू, शत्रूधन बाबूक बारेमे पुरा जानकारी लऽ लेलनि। विहान भने जखनि शत्रूधन बाबू एला तखनि महावीर कहलकनि- “ठीक छै अहाँकेँ जेतेक चाही से हम देब मुदा एक शर्तपर।” शत्रूधन पुछलखिन- “कोन शर्त?” “शर्त यएह जे काल्हि छह बजे भिनसरसँ लऽ कऽ साँझ छह बजे तकमे जेतेक दूर अहाँ दौग कऽ घेरि लेब ओ जमीन अहाँक छी।” लोभी शत्रूधन शर्त मानि लेला। विहान भेने महावीर अपन एकटा सिपाहीक हाथमे बाँसक थोड़े खुट्टी दऽ कहलक- “हिनका संगे जा आ जेतएसँ ई दौगनाइ शुरू करता तेतएसँ लऽ कऽ जेतेक जमीनकेँ अपना पएरसँ घेरैत औता खुट्टी गारैत जइहऽ।” छह बजे साँझमे शुरू केलहा स्थानपर ओतए फेर घूमि आबथि। छह बजे भिनसरसँ जे शत्रूधन बाबू दौगए लगला। खेत घेरलथि, आमक बगान घेरलथि, पोखरि घेरलथि, मोटगर देह दौगैत-दौगैत थाकि गेला। जेतए-केतौ रूकथि तँ सिपाही कहनि- “मालिक जल्दी करू। फूलक बगान घेरू। ई मंदिरबला बीस बीघबा कोलाकेँ घेरू!” तौं-तौं शत्रूधन बाबू दौगैत-दौगैत निद्रिश स्थान लग अबैत-अबैत धरामसँ खसला। तखने सिपाही बाजल- “भऽ गेल आब।” शत्रूधन बाबूकेँ होश केतए! हुनका तँ प्राण-पेखरू उड़ि गेलनि सिरिफ साढ़े तीन हाथक ठठर जगह छेकने। महावीर जखनि एला तँ बजला- “देखियनु लोभीकेँ। हिनका सिरिफ सारहे तीन हाथ जमीन चाही। बेकारे ने भीनसरसँ साँझ धरि अपसियाँत भेला!” सुनू यौ भाए लोकनि, संतोषसँ रहू मनमे संतोष राखू। जेतबे अछि तेतबेसँ संतोष करू। सुखी रहब। तँए कहबी छै संतोषम् परम सुखम्। बेथा मधुमास फागुनक जुआनीपर छेलै। कठगुमारी उकठाह मास चैतकेँ शुभ आगमन भऽ रहल छेलै। महाकान्त चौकीपर बैसल मने-मन किछु सोचि रहल छला। सोचता कि अपन दिन-अदिनक विषयमे सोचै छला। आइ-काल्हिक लोक जुआन-जहान सभ, एना किए भऽ गेलै हेन। केकरोसँ जेना कोनो मतलबे नै होइ। जुआन-जहान अपने धुनिमे बेहाल। माए-बाप मरै आकि जीबै कोनो चिन्ते नै। गुन-धून करिते छला तखने पत्नी-सुलोलचना एक कप चाह आ थोड़ेक बिस्कूट नेने एली। भिनसुरका पहर छल। महाकान्त चाहो पीबथि आ तगधले मोने किछु सोचितो रहथि। चेहराकेँ निंग्हारैत सुलोचना पुछलकनि- “मोन खसल किए अछि। कथी गुन-धुन करै छी?” “नै किछु, किछु नै।” महाकान्त कहलखिन। तैयो मुँह लटकले रहनि। सुलोचना फेर पुछलकनि- “हमरा शंका होइत अछि, कोनो-ने-कोनो बात अबस्स भेल हेन। या नै तँ बिमारीक कोनो लक्षण बुझना जाइत अछि। बाजू ने।” किछु सोचैत महाकान्त बजला- “जँ पुछै छी तँ कहै छी। हम पनरहे बर्खक रही तहिए माए-बाबू मरि गेला। पित्ती रामअधिन अहाँ संग हमर बिआह कऽ देलनि। भैयारीमे असगरे छेलौं। बहिन नै छल। पित्तीएक देख-रेखमे सभ काज-धन्धा चलै छल। आब तँ धियो-पुतो भेल। बाबूक अमलदारीमे एक बीघा खेत छल। अखनि दस बीघा खेत अछि। एकटा महिंस छल, दूटा गाए छल, जोरा भरि बरद छल तेकरे बदौलत ने दस बीघा खेत अरजलौं। धिया-पुताकेँ पढ़ेबो केलौं। कल्यानी बेटीकेँ नीक दान दहेजक संग बिआहो केलौं। तीनू बेटा पढ़ि-लिख कऽ जेठका बेटा-महेन्द्र दिल्लीमे, मझिला रितेश मद्रासमे आ छोटका दिनेश जायपुरमे नोकरी करैत अछि। जेठका महेन्द्र जखनि आइ.ए. मे छल तखने ओकर बिआह कऽ देलिए। मझिला मद्रासमे कोनो नर्ससँ बिआह कहाँ दिन कऽ लेलक। छोटका दिनेश सेहो कहाँ दिन ओत्तै बिआह कऽ लेलक। दुनू छौड़ा खबरिओ नै देलक! सएह सभ सोचै छी। अहूँकेँ सभ बुझलै अछि।” सुलोचना कहलकनि- “अहीले मन अघोर अछि। एकर चिन्ता छोड़ू। लाउ चाह पीअल भेल?” बँचलाहा एक घोंट चाह पीब खाली कप सुलोचनाक हाथमे दैत महाकान्त बजला- “ओकर चिन्ता तँ अछिए मुदा अधिक चिन्ता ई अछि जे अपना सबहक जिनगीक की हएत। आब तँ हमरो उमेर साठि बर्खसँ ऊपरे भेल हएत। अहूँक उमेर पच्चपन-छप्पन बरख भेले हएत। केना कऽ दिन कटत। जाबे पैरूख छल ताबे देह धुनि खूब खेबो करी आ खूब काज करै छेलौं। दस बीघा खेतो अरजलौं आ अखनि भोगनिहार कियो नै!” सुलोचना कहलकनि- “से तँ ठीके कहै छी। देखियौं ने छौड़ा सबहक अगरजिद। चिठ्ठीओ-पत्री नै दइए। आब तँ मोबाइल युग आबि गेल। तहूसँ कोनो गप-सप नै। छौड़ा सबहक लेल धैनसन। सएह तँ कखनो काल हमहूँ सोचै छी केहेन निदर्द भऽ गेल। अहूँकेँ दमा बिमारी आ हमरा वातरस तबाह केने रहैत अछि।” “सएह सभ सोचै छेलौं जे कथीले पढ़ेलौं। सभटा खेत बटाइ लगल अछि। उपजाक कोनो ठेकान नै।” माएक ममता जगले- “होउ, खाउ-पिबू भगवान केतौ गाम गेलखिन अछि। बेटा धन छी, केतौ रहऽ नीके-ना रहऽ। अपन गुजर-बसर तँ करिते अछि ने। अइले एतेक चिन्ता जूनि करू।” “ठीक छै जलखै नेने आउ।” सुलोचना थोड़ेक कालक बाद सोहारी आ दूध नेने एली। महाकान्त जलखै खा कऽ सूति रहला। जेठका बेटा महेन्द्र दिल्लीसँ परिवारक संग बेटा अभिषेक बेटी मालतीक संग गाम आएल। अबिते देरी दुआरपर पिता-महाकान्तकेँ गोड़ लगलकनि। धियो-पुतोकेँ गोड़ लगैक इशारा केलक। बेटा अभिषेक बाजल- “यही है दादाजी, नमस्ते दादाजी।” बेटी मालतीओ बाजल- “नमस्ते दादाजी।” पुतोहु कल्यानी सेहो पएर छूइ कऽ गोर लगलनि। सभतूर आँगन जाइ गेल। आँगनोमे महेन्द्र आ कल्यानी माए-सुलोचनाकेँ पएर छूइ कऽ गोड़ लगलनि। मुदा अभिषेक आ मालती नमस्ते-नमस्ते कहि चौकीपर बैस जाइ गेल। जेना कोनो खाना पूर्ति केने हुअए। कोनो तरहेँ पाँच-सात दिन रहल पाँचे-सात दिनमे होइत रहै जे कोन जंगल आकि पीजड़ामे फँसि गेलौं। छान-पगहा तोड़ि कखनि भागि जाइ। अभिषेक बजैत- “दादाजी का दरबज्जा गंध करता है। दादाजी हमेसा ठोँ-ठोँ करते रहते हो। जहाँ सोते हो वही कफ-थूक फेक देते हो। किसी तरह का ज्ञान नहीं है। जल्दी दिल्ली चलिए ने पापा।” बेटी मालतीओक तेहने भाषा। हँ, पुतोहु आ बेटा महेन्द्र बजैत तँ किछु नै मुदा तरे-तर मन अघोर छेलै, जेना घीबक घैल हरा देने होइ माए-बाप। कोनो तरहेँ सात दिन गाममे रहल आठम दिन पितासँ जा कऽ महेन्द्र कहलनि- “बाबूजी, हम सभ दिल्ली जाइ छी।” ई गप सुनिते महाकान्तकेँ जेना चौन्ह आबि गेलनि। बजला- “एतने दिन ले आएल छेलह। कहियो कोनो कुशलो-छेम नै पुछै छह, की बात छिएे। जेहने तूँ तेहने रितेश आ दिनेश भेल। जेकर जेठकी छुलाहि तेकर छोटकी भरे लगल खाइ। माएओ-बाप अछि तेकर कहियो कोनो खोजो-खबरि लइ छहक। सपनोमे नै देखै छहक माए-बापकेँ। की कहबऽ तोरा सभकेँ। जाइ छह तँ जा।” महेन्द्र बाजल- “रितेश आ दिनेश ऊहो सभ नै कोनो खोज-खबरि लइए!” “तीनू तँ एके चटी-बटीक भऽ गेल।” एतेक सुनिते महेन्द्र ताउमे आबि कहलकनि- “एतेक जमीन-जथा अछि तैइसँ गुजर-बसर नै जाइए। नोकर आ नोकरानी रखि लिअ।” ई कहि महेन्द्र विदा भऽ गेल दिल्ली। महाकान्त चूपे रहला। करता की। सुलोचना पतियेपर जोरसँ बजली- “की करबै जबऽने बदलि गेल हेन। आबक लोक पति-पत्नी आ धिया-पुताकेँ मात्र परिवार बुझैत अछि। छोड़ू ई माया जालकेँ। केना-केना कऽ पढ़ेलौं जे बुढ़ाड़ीमे सहेता करत अन्हराक लाठी जकाँ। मुदा हिनका लोकनि लेल धैनसन। सभ अपने-अपने कर्मे-धर्मे जीबैत अछि। नीक डाक्टरसँ दबाइ-दारू कराउ। जे हेबाक हेतै से देखल जेतै।” महाकान्तकेँ आँखिसँ नोर खसए लगलनि। सुलोचनाकेँ कहलखिन- “हे, गाममे जे कमलाकान्त अछि तेकरा देखै छिएे तँ किछु ने फुड़ाइत अछि। कमलाकान्तकेँ चारि गो बेटा छै। चारू बेटा गामेमे रहै छै। जेठका डाक्टर छै। मझिला खेती-वाड़ी सम्हारै छै। सझिला धनकुटिया मशीन चलबै छै। छोटका दबाइ दोकान करै छै। सभ तूर मिलि कऽ रहै जाइए। दसगो धियो-पुतो छै केहेन मिलानी छै भैयारीमे। माए-बापकेँ धिया-पुता तरहत्थीपर रखने छै। गाममे प्रतिष्ठा छै। तीनटा जरसी गाए पोसने अछि। ठाठसँ गुजर करैत अछि।” सुलोचना बजली- “सएह देखि कऽ तँ हमरो छगुन्ता लगैए। हमरा बेटा सभकेँ तँ मौगी सभ नून चटा देने छै।” महाकान्त अपन आँखिक नोर पोछैत बजला- “ऐमे हमरो गलती अछि। बेवहारिक ज्ञान कहियो नै देलिएे। सभ दिन सपने देखैत रहलौं जे बौआ सभ हाकिम बनत तँ हमरो सभकेँ प्रतिष्ठा भेटत। भेल उलटा। मोह छल आखिर बेटा छी ने। मुदा आब नै मोन होइए गाममे बैसार करी आ तेहन काज कऽ दिएे जे सभकेँ सूख हएत आ हमरो अहाँकेँ जे-जे बेथा सभ अछि से दूर भऽ जाएत।” सएह केलनि। रबि दिन स्कूलपर गामक प्रतिष्ठित लोक सभकेँ आ मूखिया-सरपंचक बैसार केलनि। बैसारमे महाकान्त बजला- “हम दुनू परानी बेटा पुतोहुसँ तंग भऽ गेल छी। ओ सभ आब गाममे नै रहत। किएक तँ सभ अपन-अपन घरवालीक संग घर बना-बना दिल्ली मद्रास जायपूरमे रहए लगल। बेटा पुतोहु कियो हमरा सभकेँ देखैबला नै। तँए, हम अपन सम्पति सार्वजनिक कऽ रहल छी अहाँ सबहक जे विचार हुअए कएल जाउ।” मुखियाजीकेँ विचार भेलनि, हाइ स्कूल खोलल जाए। सरपंचक विचार भेलनि, अस्पताल खोलल जाए। तहिना कियो कहनि जे मंदिर बनाएल जाए। तँ कियो कहनि, काैलेज खोलल जाए। सभकेँ सभ तरहक विचार। अंतमे, मुखियाजी महाकान्तेपर छोड़ि पुछलखिन- “अहाँकेँ अपन विचार की अछि से बाजू?” महाकान्त बजला- “हमरा सन गति समाजमे बहुतो गोटेकेँ होइत हेतनि। केतेक गरीब दबाइ बिना मरैत हएत। केतेक पथक बिना। तँए हमर विचार अछि जे वृद्धा आश्रम सह अस्पताल दुनू संगे खोलल जाए।” थोपड़ी पड़ए लगल। उत्साहित भऽ महाकान्त बिच्चेमे बजला- “सुनै जाउ, भीठामे दू बीघा दस कठ्ठाक एकटा कोला अछि, ओतै ई संस्था खोलल जाए। ताबत एक लाख रूपैआ खोलैले दइ छी। अहाँ सभ देहसँ आ बुधिसँ मदत दियौ।” गरीब आ वृद्ध सभ जखनि ई समाचार सुनलक तँ खुशीक ठेकाना नै रहलै। सभ महाकान्त आ सुलोचनाकेँ धन्य कहए लगल। विहान भेने काज शुरू भऽ गेल। कियो बाँस काटैत तँ कियो देबाल जोड़ैत तहिना कियो जाफड़ी बनबैत। बूढ़ सभ डोरीए बाँटैत। सभ अपना-अपना वैभवक अनुरूप काज करए लगल। खूब नमहर एकटा बोर्ड महाकान्त सुलोचना वृद्धा आश्रम सह अस्पतालक लगौल गेल। मास दिनमे घर तैयार भऽ गेल। गामेक एकटा मल्लीक डाक्टर दरभंगा मेडिकलमे छला ओ सपताहमे दू दिन अही अस्पतालमे योगदान देबाक मन बनेलनि। गामैया डाक्टर सेहो दू दिनक समए ओतै निशुल्क देबए लगला। महाकान्त आ सुलोचनाकेँ जे मनक बेथा छेलनि से आश्रमपर अबिते आँखिसँ खुशीक नोर बहए लगलनि। मनमे एकेटा भावना जगलनि हम सबहक छी सभ हमर छी। किसानक पूजी मंगल भोरे धान काटए गेल से दूपहरियामे घरपर आएल। घरपर अबिते रौदेलहा धानक दौनी लेल खोह छिटि तैयारीमे मोस्तैज भऽ गेल। जहिना सरकार लेल मार्च महिना हिसाब-किताव आ आमद-खर्चक होइ छै तहिना बनिया लेल दिवाली, पंडित-पुरोहित लेल यज्ञ आ दूर्गापूजा तहिना गृहस्तक लेल अगहन होइए। खन धान काटू तँ खन धान तैयार करू, खन गहुमक खेत जोत-कोर करू तँ खन गाए-महिंस-बरदकेँ सानी-कुट्टी लगाउ। चन तरहक काज रहने मंगल परेसान रहै छला। साझू पहर मंगल जोगिन्दरक ओइठाम अागि तपैले गेल। गप-सप्प चलए लगलै। मंगल बाजल- “हौ जोगिन्दर भाय, गप-सप्प कि करब, काजे तेतेक अछि जे परेशान-परेशान रहै छी। झरो फिरेक फुरसति नै रहैत अछि। तहूमे अगहन मास।” जोगिन्दर बाजल- “एतेक परेशान होइक कोन काज छै, आब तँ धान खेतक जोताइसँ लऽ कऽ दौनी तकक लेल थ्रेसर, ट्रेक्टर, गहुम बागु करैले मशीन आबि गेलै आरो चन तरहक मशीन सभ भऽ गेलैहेँ। तँए परेशान हेबाक कोनो जरूरत नै छै। एकटा कहबी छै जे, जे पूत परदेश गेल देव पितर सभसँ गेल। से नै ने करए दिमागसँ काज लैह आ सभ दिसि नजरि राखह।” मंगल बाजल- “से तँ ठीके कहै छहक। एकटा परेशानी रहए तब ने। लऽ दऽ कऽ एकटा बेटा अछि सेहो अवण्ड भऽ गेल अछि। केतनो कहै छिऐ जे मन लगा कऽ पढ़-िलखि जे दू अक्षरक बोध हेतो तँ अपने काज देतो से करिते ने अछि। एकटा मोबाइल कीनि लेलकहेँ आ हरिदम गीत-नादक पाछाँ अपसियात रहैए। की कहब गहुमक बिआ ८० किलो एकटा कोठीमे रखने रही से की केलक तँ कखनि-ने-कखनि सभटा बीआ बेचि लेलक आ एकटा मोबाइल कीनि आनलक। तुहीं कहए आब खेती केना करब। छौड़ा बदमास भऽ गेल।” जोगिन्दर बाजल- “ई तँ बड़ खराब काज भेलै। जखनि पूजीए चोरा कऽ बेचि लेत तँ कोनो परिवारकेँ गुजर-वसर आकि उन्नति केना हेतै। एक कोठी अनाज तँ पूजी नै ने होइत छै, पूजी तँ बीआक लेल जे राखल जाइ छै सएह ने होइ छै। जइसँ अधिक उपजा आकि आमदनी होएत सएह ने पूजी भेल। जँ पूजीए कियो खा गेल तँ सभटा वस्तु खा गेल।” मंगल खैनी झारैत आगू बाजल- “एक तँ रौदीक मारल छी दू बीघामे धान छल, ऊपरका खेतक धान तँ मारल गेल, निचला खेतक धान किछु भेल। तैपरसँ छोड़ा बीए बेच लेलक। आब बीआ खरिदू कि खाध खरिदू कि खेत जोताउ। अही सबहक सोचमे पड़ल छी।” जोगिन्दर कहलकै- “खैर परेशान हेबाक जरूरत नै छै। एकटा कहबी छै जे चिन्तासँ चतुराइ घटे शोकसँ घटे शरीर, पापसँ लक्ष्मी घटे कह गये दास कवीर। तँए हमरा लगमे गहुमक बीआ अछि पौरूकेँ साल उन्नति किसमक बीआसँ खेती केने छेलौं। एक साल तकमे बीआ नै ने खराप होइ छै। तँए जे बीआक जरूरत हेतह से हम दऽ देबह। जँ अपना लग नै टाका हुअ तँ हम कहबए जे उन्नति किसिमक बीआसँ खेती करह। खेतमे जँ हाल नै होइ तँ पटा कऽ खेती करिहऽ। नै तँ धानोक खेती मारल गेल आ गहुमोक चलि जेतह। एकटा बात कहऽ जे तरकारी-फरकारीओ सबहक खेती केने छह किने?” “हँ हौ भाय, तरकारीमे अल्लू, मुरै आ फरकारीमे कोबी, भाटा, टमाटरो सबहक खेती केने छी।” जोगिन्दर- “से तँ नीक बात छह, नै तँ ऐ बेरका सन खराब समैमे लोक बौआइऐ कऽ ने मरैत। किसानक तँ यएह सभ ने पूजी होइत छै। समए-साल, आगाँ-पाछाँ देखि कऽ खेती-बाड़ी करक चाही। जइसँ कखनो मुँह मलीन नै हएत। तँए...। कहबीओ छै मन हरखित तँ गाबी गीत।” छूआ-छूत दूर्गापूजाक समए रहए। सभ अपन-अपन उमंगमे मस्त छल। सभ कियो नव-नव परिधानमे सजल छल। कियो पूजामे मस्त तँ कियो नाच देखैमे मस्त, कियो दारू पीबैमे मस्त। तहिना कियो स्टेजक आगूमे लग्धी-विरती कऽ देखैमे मस्त, कियो कुमारि भोजन करबैमे बेस्त। कियो ब्राह्मण भोजनमे मस्त। एक-एकटा कुमारि आ ब्राह्मण पचँ-पँच गोटेक नोत खाइले तैयार छल। तखने शंभू मंडल लड्डू लऽ कऽ भगवतीकेँ चढ़बैले गेल। ओकरा मंदिरक भीतर जाइसँ पंडितजी रोकैत कहलखिन- “सोलकन सभ भगवतीकेँ अपने हाथे लड्डु नै चढ़ा सकै छेँ आ ने प्रणाम कऽ सकै छेँ।” ऐ बातपर थोड़े काल हल्ला-गुल्ला सेहो भेल। अंतमे फैसला भेल जे पुजेगरी आ पुरहित छोड़ि कियो भीतर नै जा सकैत अछि। चाहे कोनो जातिक रहए। एहेन फैसलाक मुख्य कारण छल एक विचरिया पंच। जखनि चौकपर एलौं तँ एकटा दोसरे नाटक पसरल छल। एकटा डोम चाहक दोकानपर बेंचपर बैस कऽ चाह पीबैले तैयार छल दोकानदार रोकि रहल छेलै। अन्तमे बलजोरी ओ बेंचपर बैस गेल आ दोकानदारसँ सवाल पुछलक- “हम हिन्दु छी आकि नै छी। जखनि सभ जाितक अहाँ आइठ धोइ छी तँ हमर आइठ किए नै धुअब। एक तँ अहाँ बबाजी छी, कंठी बन्हनै छी तखनि अहाँ सबहक आइठ धोइ छी से धोनाइ छोड़ि दियौ आ से नै तँ बबाजीबला आडम्बर छोड़ि दियौ।” तीनू प्रश्न विचारनीय छेलै। सुनिते हम सोचमे पड़ि गेलौं। कलियुगक निर्णए सतयुग-त्रेता बीत गेल छल। द्वापरक समए पुरा भऽ गेल छेलै। कयुगक प्रवेश होइएबला छेलै। कलियुग अपन राज-पाट चलबैले सोचि रहल छल। बिच्चेमे तीनू युगक देवता सभ कलयुग लग आबि हाथ जोड़ि ठाढ़ भऽ गेला आ कलियुगो हाथ जोड़ि ठाढ़ भेल। जखनि विचार-विमर्श शुरू भेलै तँ तीनु युगक देवता सभ कहलखिन- “हम सभ तँ कहुना तीन युगक राज-पाट चलेलौं आब अहाँक पारी अछि तँए चिन्तामे छी जे अहाँ केना कऽ राज-पाट चलाएब। किएक तँ हमसभ देवासुर संग्राम, वृतासुर संग्राम कोन-कोन ने केलौं। स्वर्ग-नरकक फेरा सभ केलौं। मुदा लोक सभ आर उडण्ड होइते गेल। अहीले अहाँ लग एलौं। अपने केना चलाएब?” कलियुग कहलकनि- “हे देवगण, हम अहाँ सभ जकाँ फाइल नै राखब। मुन्सी-पेसकार नै राखब। हमर फैसला तुरंते हेतै। जे जेहेन काज करता तिनकर भोग हुनका तुरंते भोगए पड़तनि। अगुआएल-पछुअाएल जनमक फेरा नै राखब। स्वर्ग-नरकक फेरा नै रहए देबै।” तीनू युगक देवता कलियुगक विचार सुनि गुम्म भऽ गेला। फेर कलियुग कहलकनि- “हम कृष्णक किछु अंश लए कऽ चलब आ लोक सभकेँ कहबै जे ‘कर्म केलहा फलक इच्छा नै करब इंसान, जेहेन कर्म करब तेहेन फल देता भगवान।” ई सुनि तीनू युगक देवता अपन-अपन लोक विदा भऽ गेला। प्रकाश झा, नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा विश्व रंगमंच दिवस : 27 मार्च सभ साल 27 मार्च क’ विश्व रंगमंच दिवस मनाओल जाइत अछि । वर्ष 1961 मे इंटरनेशनल थिएटर इस्टीट्यूट (आई. टी. आई.), यूनेस्को एहि दिवसक घोषणा केलक । ई गप्प 1959क अछि - हेलसिंकी शहर मे 27 मार्चक दिन पहिल बेर विश्वक रंगकर्मीक जमाबरा भेल छल । एहि आयोजनक नाम थिएटर कांग्रेस राखल गेल छल । आगू आबि क’ अही दिन के विश्व रंगमंच दिवस घोषित कयल गेल । इंटरनेशनल थिएटर इस्टीट्यूट वर्ष 1962 स’ लगातार 27 मार्च क’ अपन सभ केन्द्र पर आयोजन के रूप मे मनाबैत आबि रहल अछि । 1962 स’ एहन प्रावधान बनाओल गेल जे एहि दिनक लेल कोनो अंतरराष्ट्रीय रंग व्यक्तित्व के मनोनीत कयल जेतनि जे अपन संदेश देताह । एहि संदेश के समूचा विश्व मे प्रसारित कयल जाएत । 27 मार्च क’ सभ रंगकर्मी क बीच एकर पाठ कयल जाइत अछि । वर्ष 1962 मे सबस’ पहिल रंग संदेश ज्याँ कॉक्तो देने छलाह आ एहि बेर 2010 मे ई सौभाग्य ब्रिटेनक रंगकर्मी डेम जूडी डेंच के भेटनहि अछि । एकटा सूचना इहो जे एखन तक मात्र एक्के टा भारतीय के ई सौभाग्य प्राप्त भेलन्हि अछि । ओ छथि भारतक कन्नड भाषी सुप्रसिद्ध नाटककार गिरीश कारनाड - हिनका वर्ष 2002 मे विश्व रंग संदेश देबाक लेल आमंत्रित कयल गेल रहनि । एहि दिन विश्वक सभ केन्द्र कोनो ने कोनो रूपे आयोजन करैत अछि । नेपालक केन्द्र एहि दिनक उपलक्ष्य मे कोनो एकटा वरीष्ठ रंगकर्मी केँ विश्व रंग दिवस सम्मान स’ सम्मानित करैत अछि । एहन सम्मान एखन तक मैथिली रंगमंचक मात्र एक गोटे महेन्द्र मलंगिया केँ प्राप्त भेलन्हि अछि । एहि साल 2010 के संदेश मे डेम जूडी डेंच कहलनि अछि जे : “ रंगमंच मनोरंजन आ प्रेरणाक माध्यम त’ अछिये संगहि एक दोसर सभ्यता आ लोकक बीच संबंध स्थापित करबाक क्षमता सेहो एहि मे निहित अछि । एतबे नहि रंगमंच सर्व साधारण के शिक्षित करैत अछि आ नव नव सूचना, नव नव प्रयोगक जानकारी देबाक काज सेहो करैत अछि । समूचा दुनिया मे रंगमंच कयल जाइत अछि मुदा ई ज़रूरी नहि जे एहि लेल कोनो बनल बनाओल प्रेक्षागृहे टा मात्र मे कयल जाय । एकर मंचन अफ्रीकाक कोनो छोट स’ छोट गाम मे सेहो कयल जा सकैत अछि आ एकरा प्रशांत महासागरक बीच कोनो छोटका द्वीप पर सेहो कयल जा सकैत अछि । हॉ ! जरूरत मात्र एतबे, एकरा लेल कनीटा जगह होइ आ देखबा लेल दर्शक । रंगमंच मे हमरा सभ केँ कनेबाक क्षमता त’ अछिये मुदा हमरा सभ के किछु सोचबा लेल आ विमर्श करबाक लेल सेहो सामर्थ्य एकरा मे होबाक चाही । रंगमंच एकटा टीम वर्क अछि । एहि टीम मे अभिनेता छथि, जिनका हम सभ देखैत छियनि मुदा बहुतो एहन लोक सभ जुटल रहैत छथि, जिनका लोक कहियो नहि देख पबैत छनि । मुदा, ओ लोकनि सेहो ओतबे महत्वपूर्ण होइत छथि जतेक कि अभिनेता । एहि लोकक कतेको तरहक विशेषता आ कार्य कुशलताक कारणे कोनो प्रस्तुति संभव भ’ पबैत अछि । तेँ कोनो प्रस्तुतिक सफलताक श्रेय हुनको लोकनि के ओतबे देबाक चाहियनि । ई सत्य अछि जे 27 मार्च क’ सभ साल रंगमंच दिवस मनाओल जाइत अछि मुदा सालक सभ दिन के रंगमंच दिवसक रूप मे मनेबाक चाही । किएक त’ स ’ दर्शक केँ मनोरंजन प्रदान कयल जाइत छनि , हुनका शिक्षित करबाक आ हुनका मे बुद्धिक बिस्तार लयबाक जिम्मेदारी हमरे लोकनि के अछि । दर्शकक बिना हमरा लोकनिक अस्तित्वक कोनो अर्थ नहि अछि ।” डेम जूडी डेंच के बिचार पढ़ि क’ लगैत अछि जे चाहे मिथिला हो वा सम्पूर्ण भारत, एशिया हो वा यूरोप सभ ठाम रंगकर्मीक सोच आ हुनकर लक्ष्य एक्के तरहक छनि । समाज के मानसिक संबल प्रदान करबाक लेल हमरा सभ के बेसी स’ बेसी रंगकर्म दिस अग्रसर होयबाक चही । अनमोल झा रिलेशन-२ - गोर लगै छी पीसा जी। हम सुमन जी बजै छी, सुमन जी। - दनदनाइत रहू। माँ-पपा, दादी सभ नीके छथि ने? - सभ ठीक अछि पीसा जी। कहलउ जे हमर कएकटा परीक्षा अचि लखनउमे हप्ताह - दस दिन लगतै, से अपना डेरापर दिक्कत नै ने हैत। - दिक्कत? कथीक दिक्कत! अबै सँ पहिने फोन कऽ देब; हम गाड़ी पठबा देब टीसनपर। सोझे डेरेपर एबाक अछि। दीदी खेनाइ-पिनाइ बनेने रहतीह..........!! तंग सम्पर्कक बैसारमे जाइत-जाइत हमरा देरी भऽ गेल छलए। संध्या पाँच बजे सम्पर्कमे रचना पाठ आ ओहिपर आलोचना-समालोचना शुरू भऽ जाइत छलै। दरअसल हमरा डेरेसँ निकलैमे थोड़े देरी भऽ गेल छल। ठीक निकलै कालमे एकटा आप्त लोक डेरापर आबि गेल रहथि आ हुनका संग गप्प-सप्प करैत, चाह-पान होइत थोड़े समय लागि गेल छल। आ छुट्टी दिन रहलासँ बसो सभ कम रहैत छैक। जे से जाहि द्वारे हो, हमरा देरी भऽ गेल छल ओतए पहुँचैमे। हम बससँ उतरि चोट्टहि सम्पर्क जतए होइत छलै तेम्हर नम्हर-नम्हर डेग दैत झटकारि कऽ चल जाइत रही। ठीक हमर उनटा दिससँ तीन-चारि गोटा गप्प करैत आबि रहल छला। गप्प प्रायः ओकरा सभक पहिनेसँ होइत आबि रहल छलै। दुनू गोटा जखन थोड़े लगमे एलौं तँ ओ सभ जे अपनामे बात करै छलै ताहिमे कहलकै जे हम आब तबाह भऽ गेल छी। ओकर ई बात सुनि हमर डेग जे तुफान एक्सप्रेस सन छल से पसिन्जर ट्रेन भऽ गेल आ हम बिसरि गेलौं सम्पर्कक बैसार तखन। हमरा बुझा गेल जे एकरा निश्चय भाए-भैयारीबला झंझट छैक आ ओ ताहिसँ तंग भऽ गेल अछि। मुदा कियो पुछलकै जे ककरासँ तंग भऽ गेलौं से ओकरा मुँहे जबाब सुनि हम अवाक् भऽ गेलौं। ओ कहलकै- हम जमाइसँ तंग भऽ गेल छी। हमरा मोनमे भेल जे निश्चय ऐ ससुर जमाइक तंगीक कारण ई महानगर छी, जतए कोनो रिलेशन नै थीर रहि पबैत छैक। सभ अपन-अपन ड्यूटी आ पाइमे लागल रहैत अछि आ फेर डेग झटकारि कऽ चल गेल रही सम्पर्कमे हम...! डेरायल हम एम.ए. फाइनलक परीक्षा दऽ रहल छलौं। मैथिली आ हिन्दी दुनू विभागक छात्र-छात्राक एकहिटा विशाल घरमे एक बेन्चपर एकटा कऽ विद्यार्थी बैसा कऽ परीक्षा लेल जाइत छलै। परीक्षा खुब कड़ासँ लेल जा रहल छलै। हमरा सभ लिखैमे व्यस्त रही, पूब-पश्चिम की होइत छैक से नै बुझाइत रहए किछु। विश्वविद्यालय द्वारा नियुक्त कएल गेल गाइडक अतिरिक्त प्रशासनिक अधिकारी सभ बीच-बीचमे आबि कऽ पूरा घरे-घर बौआ कऽ देखैत रहै। एकर अलाबा लाल बत्ती लागल गाड़ीसँ प्रशासनिक पदाधिकारी सेहो सभ आबि सभकेँ चेक करै आ कएक गोटाक पकड़ेलापर एक्सपेल कऽ दैत छलै। पहिले दिनक परीक्षाक दू घंटाक बाद एकटा सर्कुलर एलै आ सभ घरे-घर पढ़ि कऽ सुनाएल गेलै जे काल्हि जे परीक्षा देमए अबै जाए से एडमिट कार्डक लेमिनेशन कएल रहक चाही। कारण पता केलापर बुझलिऐ जे कोनो विद्यार्थी पेन्सिलसँ ओहिपर चिट कऽ कए अनने रहए लिख कऽ। दोसर दिन सभक एडमिट कार्ड लेमिनेशन भऽ गेल रहै। छः-सात पेपर जखन परीक्षा भऽ गेलै तँ एक दिन गार्ड कहलकै जे आब बाथरूममे केमरा लगबा देबै। छौंड़ा सभ बेसी काल कहै बाथरूम जाएब, ताहिपर ओ ई बात कहलकै। कहक समएमे ओ ध्यान नै देने रहै जे परीक्षार्थीमे छात्रा सेहो बहुत गोटा छैक। ओकरा जखन ओ बात ध्यानमे एलै तँ कहै छैक जे लड़काबला बाथरूममे। ई सुनैत देरी हम जे उत्तर लिख रहल छलहुँ ताहि दिससँ ध्यान हटि ओहि गार्ड दिस चल गेल रहए। आ लागल रहए जे परीक्षार्थीये जकाँ डेरायल छल, जे ई की बजा गेल। मुदा सभ छात्र-छात्रा लिखैमे व्यस्त छल। आ मोने मोन कहै छल, लगाबऽ ने कैमरा जतऽ लगेबाक छह। जखन अपने कन्फीडेन्ट भऽ परीक्षा दैत छी तखन डर कथीक? पिछड़ल राज्य बी.ए.मे फस्ट क्लास आ साढ़े पैंसठि प्रतिशत मार्कसँ पास भेल रहए ओ। किछु आगाँ पढ़क जोगारसँ ओ गामसँ महानगरमे आएल रहए। नाइट कॉलेजमे नाम लिखा, एकटा प्राइभेट फार्ममे नोकरीक जोगारमे गेल रहए। डायरेक्टरक आमना-सामनी बैसल रहए ओ। डायरेक्टर ओकर बायोडाटा देख रहल छलै। आब मार्कसीट देखलकै। जन्म कुण्डली सन नाम चाकर मार्कसीट आ तकर नीचाँमे लिखल मूल्य बीस रुपये। डायरेक्टर कहलकै – आपके विश्वविद्यालय में यह बीस रुपया में मिलता है क्या? ओकर मोन छोट भऽ गेल अहै आ अपन यू.जी.सी. एफेलिएटेड विश्वविद्यालयक मादे सोचए लागल रहए, सुआइत हमरा सभक राज्यकेँ लोक पिछड़ल राज्य कहैत अछि....! एटेचमेन्ट विवाहक कएक बर्ख बादो तक एना नै होइत रहै। माने जामे तक दरमाहा उठा कऽ पूरा लिफाफ बाबूक हाथमे धरा दैत छलै, अपना जे दू-चारि सए लगैत छलै से फेर माँगि कऽ माए-बाबूसँ लैत रहै, तावत् तक सभ ठीक- एकदम ठीक। परिवार संगमे रहब, बाल-बच्चाक पढ़ब-लिखब खर्चे-खर्चा। से जहियासँ लिफाफ देब बन्द भऽ गेलै तहियासँ माए-बाप, बहिन-बहिनोइ, भाइ-भाउज सभक बैरी भऽ गेल रहए ई सभ। नाक-दम कऽ देल गेल रहै एकरा सभक। गाम कहियो जाए तँ अलग खाइले टा कहलकै। ने चुल्हा, ने बर्तन, ने भनसा घर आ चाउर दालिकेँ के पूछै, किछु ने देलकै। ऊपरसँ गारि-फज्झति सुनए आ ऊपरसँ दोसर बेटाकेँ सभटा लिख देबै सभ सम्पति घर-घरारी, तकर धमकीपर धमकी। बापक पी.एफ.क आ रिटायामेन्टक पाइ सेहो भाइक खातापर ट्रान्सफर कऽ देने रहै बाबू। कोनहुना समए बितल जाइत रहै। स्थिति तेहन भेल जाइत रहै जे होइ कोनो दिन आत्महत्या कऽ ली। झमेला समाप्त। मुदा पत्नी आ बच्चा सभक मूह देखि गम खा जाए जे हमरा रहैत एते करै छैक, पाछाँ की करै जेतै ओ सभ...। आइ रातिमे एकटा सपना देखलक जे एकटा बबाजी, अघोरी बबा एकरा लग एलैहेँ। आ एकटा मुण्ड छापल लॉकेट एकरा देलकैहेँ आ कहलकै जे ई लॉकेट माए-बाप लग जा कऽ एकटा सरबामे कनी पाइन लऽ कऽ ओहिमे भिजा कऽ तीन बेर अपन कपारमे भिरबैत मंत्र पढ़ै लेल जे माए-बाबू चलि जाउ, माए-बाबू चलि जाउ, माए-बाबू चलि जाउ। ई करिते माए-बाबू गामसँ पड़ा जेतौ आ मरिये जेतौ। तोरा सभक झमेला समाप्त। रस्ता साफ। ओ लॉकेट लऽ माए-बाबू लग सरबामे पानि राखि तीन बेर कपारमे भिरेलक। मुदा ओ मंत्र जे कहने रहै पढ़य- माए-बाबू चलि जाउ से नै पढ़ि सकल ओ...! आब खूनक टान हो बा कोनो एटेचमेण्ट से नै बुझि सकल रहए! बढ़ैत चलू मधुबनी कथा-गोष्ठीमे जाए-अबैक दुनू टिकट कटा लेने रहए ओ। टिकट कटा लेने जाए-अबैक तिथिक निश्चिंतताक संग ऑफिसो समए सँ ज्वाइन कऽ लेब से आस्वस्त आ निश्चिंत भऽ गेल रहए। मुदा टिकट कटेलाक बाद हाथपर छः सए रूपैया मात्र रहि गेल छलै। महीना लगैमे एखनो पाँछ-छः दिन तँ छलैहे। दू-तीनटा बाल-बच्चा पत्नी डेराक खर्चा आदि लेल पाँच सए रूपैया डेरामे दऽ चल आएल रहए गोष्ठीमे, एक सए रूपैया हथ खर्चा लेने। ओ बुझैत रहै जे ई छः-सात सए किलोमीटर जाइ आ फेर छः सात सए किलोमीटर अबैक लेल ई सए टका कम अछि एकदम कम। मुदा ओ आर पैंच आ ऋण नै करऽ चाहैत छल। करेंट मंथक आधा दरमाहा पहिले उठि गेल छलै। अगिला महिना कोना चलतै सेहो सोचमे पड़ि जाइत छल कखनो कखनोक। मधुबनी जाएत आ गाम नै जाएत सेहो ओकरा खूनमे ई प्रवृत्ति नै छलै। गामो गेल रहए। माए-बाबूक मोन छलैन जे बौआ आएल तँ किछु पाइ-कौड़ी अवश्य दऽ कऽ जाएत। मुदा जखन जाए बेरमे ओ कहलकैन-बाबू दू सए रूपैया अछि तँ दिअ ने! माए तरपि उठल रहैए-कमाक धऽ गेल छै एतऽ जे पाइ देबउ। गन्जनक ढ़ेर लगा देने रहै माए। ओ बुझै छै-बेटाक कोनो पाइक कमी नै अछि, सभटा नाटक करैत अछि। रस्तामे बड़ दिक्कत भेल रहै। एक कप चाहो पीबैक मोन होइ तँ नै पीबए, कही बस भाड़ा सह डेरा जाइ कालमे कम नै पड़ि जाए। गाड़ीमे ओ निश्चय केलक-नै आब कतउ नै जाएब गोष्ठीमे। पक्का एकदम पक्का। ओ बैगसँ कागत - पेन निकालि एकटा लघुकथा लिखऽ लागल। ई ओकर अगिला कथा गोष्ठीक तैयारी रहै। दुःख - रामबाबू अहाँक एक हजारक मनीआडर कएक दिनसँ पड़ल अछि पोस्ट ऑफिसमे। कएक टा समादो देलउ कियै नै लऽ गेलियै। - के पठेने अछि। - के पठायत, दिल्लीसँ बड़का बचबा पठेने अछि अहाँक। - ओ पाइ आपस कऽ दियौ ओकरा। हमरा नै चाही ओकर पाइ। - आएल लक्ष्मीक कियो ठोकरबैय कका। छोड़ा ने लिअ पाइ। - नै हौ। जखन हम पन्द्रह दिन तक दरभंगामे डॉ. सी. एम. झा लग भर्त्ती छलउ, तखन ने ओ आएल ने पाइये पठेलक। आ आब जखन हम ठीक छी तखन हम ओकर पाइ छूब, राम......राम......। बेटा जन्माइयोक बुझबै बिन बेटेक छी। समाज ओ अपने बेचारा गृहस्थ आदमी छला। बेटा सभ बाहर कमाइत छलनि मुदा तेहन स्थिति ठीक नहि छलनि। तथापि भगवानक दयासँ सभटा ठीके–ठाक चलि जाइत छलनि। कखन ककर कोन गति हैत से भगवाने जनैत छथि। आ से बेचारा जाहियासँ पुतहु फाँसी लगा मरि गेलनि, आ बेटी बला हिनका सभो गोटापर केश ठोकि देलक, तहियासँ कोट; कचहरी आ दरभंगा–पटना करैत–करैत पायरक एँड़ीक सङ हाथक स्थिति सेहो खराप भऽ गेलनि। समाज बड़ पैघ होइत छैक, हम सभ पढ़नेहो छी जे मनुष्य एक सामाजिक प्राणी थिक, ओकरा यदि जंगलमे सभ सुख सुविधा दऽ देतै आ समाज सँ सम्पर्क नहि रहए देतै तँ ओ नहि टीक सकत। तै समाजक एकटा अपन अलग महत्व आ मर्यादा छैक। बेर–कुबेर सभमे समाजे–समाजक काज दैत छैक। आ से हिनको हठात किछु पाइक काज पड़लनि। अपन डॉड़ मुट्ठी तँ पहिने खाली भऽ गेल छलनि। गेलाह घरक सटले, दू–चारि घरक बाद इंजिनियर साहेब ओतए। दस हजारक याचना केलनि आ ओ कहलखिन हमरा हाथपर नहि अछि, बहुत दिन रहि गेलउ गामपर, हमारा काल्हि जाइत छी काजपर ओतएसँ पठा दैत छी। आ ओ गेलापर ठीके पाइ आएल रहै इंजिनियर साहेबक बाबू नामे। जखन ई आनए गेलाह तँ हुनकर बाबू गाछ तरक खेतक कागत बना ओहिपर औठा देमए कहलखिन! बेचारा ओ कजरौटी आ सादा कागत देखि आर एकटा चिंतामे फँसि गेल छलाह..........!! रिटर्न - कहलउ ने बाबू, एहिसँ बेसी पाइ हमरा बुते नञि देल पार लागत। बाहरक खर्चा, धीया-पुताक पढ़ाइ-लिखाइ आ ताहिपर ई महंगी, कतएसँ आनब हम। - महंगीयेक द्वारे कहैत छियौ ने जे तू जे पठबै छै पाइ ताहिमे गामपर घर नञि चलै छउ। - चलत किए नञि। कोनो की गामपर धीया-पुता पढ़ै बला अछि जे ओहोमे खर्चा लागत। हमरा तँ सेहो नञि करए पड़ैत अछि। - जे तोरा आइ करए पड़ैत छउ से हमरा बहुत पहिने करए पड़ल रहए तोरा पढ़ाबैमे। ओ पाइ जे हमारा तखन राखि देने रहितउ तँ निश्चय तोरा सँ नीक रिटर्न भेटितै हमरा। हँ तखन ई जरूर होइतै जे तू मनुक्ख नञि बनितै......! फर्ज - आब तँ ई–मनीआडर सँ तुरंते पाइ फुँचि जाए छैक। एके–आध दिनमे। - हँ, से की। - से बाबू कहाँ फोन-तोन केलनि जे पाइ पहुँचलनि की नहि। - से की करताह ओ फोन, हुनका तँ पाइसँ मतलब छलनि से भेटि गेलनि, बात खतम। - मुदा हुनका सूचना तँ देमक चाही जे समयसँ पाइ देलकनि डाकपीन की नहि! अहीँ फोन कके पुछि ने लिऔन। - नहि, एकदम नहि। ई दायित्व हमर नहि छी। हमर दायित्व छल पाइ पठेबाक से हम पठा देलियनि। आब हुनकर दायित्व छनि हमरा सूचना देमक जे पहुँचल की नहि। - हे, बाप संगे लोक एना अरारि नहि करए अछि। - अरारि कहाँ, ई तँ हुनकर फर्जक बोध ने करा रहल छियनि। आबो नहि सिखतातँ कहिया सिखता........! तेल ओकरा बॉसक बाँहिपर एकटा छोट सन सादा स्पॉटछलै। ओ अपन असिस्टेंटक फाँक समयमे बजेलक आ कहलकै–देखहिन तँ ई की छियै। असिस्टेन्ट ओकर हाथ पकड़ि कऽ घुमाक–फिराक, छू कऽ आदि–आदि भावे देखलक। आ कहलकै किछु नहीं सर, ई ओहिना किछु छी, दू–चारि दिनमे ठीक भऽ जाएत। बॉस जोरसँ कहलकै–हम एकरा दस सालसँ एहिना देखि रहलियैहे आ तू कहै छै जे दू–चारि दिनमे ठीक भऽ जाएत? असिस्टेन्ट आर विश्वाससँ कहलक–तखन सर किछु नहि छी, ओहिना किछु भऽ गेल अछि। कोनो चिंताक बात नहि। से सभ रहितए तँ एखन पसरि ने गेल रहितए ई। बॉसकेँ लगलै जे असिस्टेन्ट तेल लगा कए चलि गेल ........! प्रश्न -सद्दाम हुसैनकेँ किअए मारि देलकै पापा। ओ तँ राष्ट्रपति छलै ने। लोक राष्ट्रपतियोकेँ मारि दै छै? -नै बेटा, लोक बाघकेँ मारि दै छै, गिद्दरकेँ नै। बाघसँ लोक डेराइये ने, तैँ। पाप साधु बाबा लग लोकक भीड़ लागल छलै। सभ अपन नम्बरक हिसाबे जे जकरा बाद आएल ताहि क्रममे हुनका सामने जाइत छल। बाद बाकी लोक कातमे बैसल रहैत छल। जकरा जे दिक्कत, दुःख तकलीफ रहैत छलै से हुनका कहैत छलनि। ओ ककरो फूल, बिभूत, ककरो पढ़ल जल, ककरो यंत्र आदि दैत छलखिन। जकरा हबा-बसात वा तेहेन बात नै रहै छलै आ रोग रहैत छलै तकरा डॉक्टरसँ देखबैक सलाह दऽ बिदा करैत छलखिन। कोनो ठकै-फुसियबैबला बात नै। जकरा हाथ उठा जे दऽ देलखिन ओकर काज होइते टा छलै। खूब जस छलनि साधु बाबाक। जे कियो पूजा लेल फूल, मिठाइ वा सवा रुप्पैय्या, पाँच-दस देलकनि सेहो ठीक नै तँ नै देलकनि सेहो ठीक। कोनो जोर-जबरदस्ती नै छलै ओतए आ तैँ सभ तरहक लोक अपन काजसँ अबैत छल। ओहि दिन ओहि भीड़ लागल महिला वर्गमे सँ एकटा अपूर्व सुन्दरी महिला बाबाक आगाँमे आबि कल जोड़ि प्रणाम केलक आ कहलकनि- बाबा हमर धन्धा कम चलैए, से किछु कऽ दिअ। ओ वेश्या छलै। ओकरा फूल बिभूत दऽ बाबा कहलखिन- जो आब नीकसँ चलतौ। ओ चल गेल रहए हँसैत-हँसैत। ओकरा बादक जे लोक बाबा लग आएल से अपन बात कहैसँ पहिने बाबाकेँ पुछलक- बाबा। अहाँ ओकर पाप कार्यक लेल आशीर्वाद आ फूल-बिभूत देलिऐ। भगवती अहाँक तमसा नै जेती। बाबा कहने रहथिन- नै। कोनो पाप काज नै छलै ओ। ओकर व्यवसाये ओ छैक। ओहिसँ ओकर पेट चलैत छैक। तैँ ओ पाप नै भेलै। पाप ओ भेलै जे घा-संसारी भऽ अपन पति रहैत एहन काज करैत अछि...! माता न कुमाता भवति जखन ओ गाम गेल रहए तँ माए-बाबू नै टोकने रहथिन। ई लग जा कऽ गोर लगलकै। बाबू कहने रहथिन- नीके रहऽ। बस एतबे आर किछु नै। माए तँ पएरे छीपि लेलकै, तैयो ई आगाँ बढ़ि गोर लगलक। माए आशीर्वादक बदलामे मूह घुमा लेने रहै। दुइये दिन रहल ई गाममे। ऑफिसेक काजसँ कतौ पटना-दरभंगा आएल रहै तँ गाम चल आएल। परिवार बच्चा सभ बाहरे छलै। अपना दुःख भेल रहै। जे माय एक रत्ती इसकुलसँ ओकरा अबैमे देरी होइत छलै तँ अंगने-अंगने सभकेँ पूछि जाइ जे तोहर बौआ एलौ की नै। हमर बौआ एखन तक नै एलैहेँ बड़की दाइ आदि-आदि। हरदम मूहे देह निंहारैत रहै छलै, सट्ठका लगमे राखिक खुआबै छलै। नै खेने ओकरा भकौआ धराबै छलै। से माय आइ मूड़ी धुरा लेलकै। जरूर दुःख छैक मायकेँ अपन बेटासँ। निश्चय ओ एकर आशाक अनुरूप नै चललै। निश्चय जे माय-बाबू कहैत छैक से नै करैत छैक ओ। निश्चय ओ अपन बाल-बच्चा लऽ कऽ बाहरे रहैत अछि। सभटा सत्य आ सभटा ठीक। मुदा पुत्रो कुपुत्रो जायताम्, माता न कुमाता भवति...आब नै होइ छै की...!! आँखिक पानि डेरा पहुँचि चश्मा उतारैत देरी पाँच सालक हमर बुच्ची कहैत अछि, पापा अहाँ कनैत किए छी?, अहाँ आँखिमे नोर अछि।, ऑफिसमे मास्टर मारलकहेँ की?, आदि-आदि एके संगे कएकटा प्रश्न ओ कऽ देने रहए तखन। ओ बुझैत अछि जेना हम सभ इसकूल जाइत छी पढ़ए ओहिना पापा सेहो ऑफिस पढ़ए जाइत छथि। नै बेटा हम कनै कहाँ छी। ओ ओहिना नोरा गेल अछि आँखि। ओ कहैत अछि- नै पापा अहाँ झूठ बजै छी, निश्चय अहाँ टास्क नै बना कऽ लऽ गेल हेबै तैँ मारने हएत मैडम। हम तँ अपन टास्क बना लेलहुँ। अहूँ बना लिअ पपा ने। हम तखन सोचऽ लागल रही जे हमरा आँखिमे कनी नोरक रेख देखि एतेक चिन्तित भऽ गेल अछि बुच्ची। आ वएह हमरा सभ छी जे एतेकटा भइयो कऽ माय आ बाबूक झहरैत नोरक धार दिस नै जाइत अछि नजरि कहियो...!! चिन्ता लोआ नसईक बच्चा इसकूलसँ जखन एलै तँ मायकेँ कहलकै- मम्मी-मम्मी हमरा सब इसकुलमे पढ़ै कालमे जखन टीचर नहि रहैत छैक तँ मूड़ी झुकाकऽ पायलकेँ अथी देखै छीयै घघराक नीचाँ। मायक मोन चेहा गेलै। कहलकै कथी रौ, कथी देखै छहिन। बच्चा कहलकै- अथी गै, कछिया, उजरा कछिया। माय कहलकै- गन्दा बात। ई गन्दा बात भेलै। ई नहि करक चाही। आ फेर पुछैत छैक- ओ की देखै छहिन। ओ देखिकऽ की होइत छौ। बच्चा कहने रहै- नीक लगैए गै। देखैत नीक लगैए। मायक चिन्ता बढ़ि गेल अहै...! बुद्धि केकबला दोकानपर बाप-बेटा दुनू जा कऽ ऑडा दऽ देने रहय। अतुलक पाँचम जन्म दिन छलै। दोकानदार कहलकै जे केकपा अतुल लिख देबै सैह ने? ओ बच्चा बाजल नहि। केकमे अतुल चौधरी लिखि कऽ दिअ। हमरा पारा(मोहल्ला)मे चारिटा अतुल छैक। कोन अतुलक जन्म दिन छैक से लोक कोना बुझतै? दोकानदार आ अतुलक पपा दुनू एक दोसराक मुँह देखय लागल रहय। दोकानदाअ एकटा नीक केक दोकानसँ निकालि कऽ अतुलक हाथमे मँगनिये खाइ लेल देलकै आ कहलकै- ठीक छैक बेटा, अतुल चौधरीये लिखल रहत अहाँक केकमे...। कंट्रोल हम रिभियाकेँ इशारा देलियै आ ओ एम्हर ओम्हर ताकि हमरा लग आबि गेल छल। कान लग ओ मुँह सटा कऽ कहलक- तूँ बढ़ कलम, हम अबैत छियौ। एखन माय-बाबू दुनू गोटा अंगनेमे छथि। कनी देरियो हेतै तैयो हम एबे करबौ, तूँ खोपड़ीक मचानपर रहिहेँ! हम ओतऽ सँ की कहाँ सोचैत खेतक आइ आ एक पेरिया रस्ता धेने चल गेल रही कलममे। हम खोपड़ीमे पहुँचलहुँ तँ कियो कतौ नहि छल। हम ओहिपर जा कऽ बैसि रहलहुँ। आमक मास अनेरे बड़ नीक लगैत छैक, से हम गाछ सभकेँ निहारऽ लागल रही। बड़ी कालक बाद रिभिया आयल। मचानपर चढ़ि रबरबला पेन्टकेँ फलका ओहिमेसँ अपना खाय लेल जे माय लीची देने छलै से ओहिमे सँ निकालि दूटा हमरा देलक आ दूटा अपनो खेलक। आ तकरा बाद हमाअ सब नीचाँ उतरि सतघराक धुचि कोड़ल जगह लग आबि दुनू गोटा दुनू भाग बैसि सतघरा खेलाय लागल रही। से ताहि दिनमे जानथि भगवान, हम किछु नहि बुझैत रही। जखन ओ गुलाब कली सँ फूल भऽ फूटल तँ कियो आबि ओकरा तोड़ि कऽ चलि गेल। हम आब जखन ओ समय आ बात सब मोन पाड़ै छी तँ अपना आपकेँ कंट्रोल नहि कऽ पबैत छी! एखनो हम सपनामे ओकरे देखैत छी। पता नहि ओ हमरा देखैत अछि की नहि...! चिन्तन -हे कनी ऋणो-पैंच कऽ कऽ कोनो छोटो-छीन शहरमे एकटा कनियो टाक घर बान्हैक जोगार करू ने। -गाम सन वातावरण कतऽ पायब ओतऽ यै। पाल्युशनसँ भरल, ककरोसँ ककरो कोनो मतलब नहि। सब अपने लए बेहाल। - से जे रहय। धीया-पुताक पढ़ाइ-लिखाइ डाक्टर-वैद्य आदिक सुविधा तँ रहत ने ओतय। आ ई चीज जतय छैक ततय मनुक्खकेँ आगाँ बढ़ैत समय नहि लगैत छैक, से बुझल अछि ने..अहाँकेँ... बोध ऑफिस लेल बैग टांगि बिदा भेल ओ। मेन गेटसँ निकलि गेटक छिटकिन्नी लग तीन-चारि डेग आगाँ बढ़ल आकि पाछाँसँ गेट खोलि तीन सालक प्रियांशु दौगिकऽ आबि पाछाँसँ बैग पकड़ि घिचलक। कहलकै- पपा हमरा चॉकलेट कीनि दिअ। पपा कोरामे उठा कहलकै- नै बेटा, चॉकलेट नै खाइ। -तँ कैडबेरिये कीनि दिअ। -नै बाबू। ई सभ खेलासँ दाँतमे पिल्लू लागि जाइत छैक। -तँ पाँचटा चुम्मा लिअ हमरा, तखने जाए देब अहाँकेँ ऑफिस । पपा ओकरा करेजमे साटि हँसय लागल रहय। आ दुनू गालपर दू-दू टा कऽ चुम्मा लऽ कहलकै- जाउ बेटा, आब चलि जाउ, हमरा अबेर होइत अछि। प्रियांशु कहने अहै, नै पपा, पाँचटा चुम्मा कहाँ भेल। एकटा लोलपर लिअ ने। पपा लोलोपर एकटा चुम्मा लेलकै। आब ओ अपने कोरासँ उतरि गेटक भीतर टाटा-बाइ-बाइ करैत आबि गेल रहय... रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’ जट–जटिन (लोकनाट्य- रुपान्तर - राम भरोस कापडि ‘भ्रमर’) मंच पर प्रकाशक एउटा गोल घेरा डांरमे नगाडा बन्हने नट पर पडैत छैक । ओ नगाडा के सुरताल मे बजबैत रहैत अछि । दोसर प्रकाशक घेरा दहिन कात प्रवेश करैत नटी पर पडैत अछि । ओकरा संग घेरा नट लग धरि अवैत अछि । आव दुनू के उपर प्रकाशक धेरा छै । नट— (नटी के देखि प्रशन्न होइत) अहा,केहन सयंोग अछि ई,प्रिय अहांके देखल, नटिन—(नृत्याभिमूख मुद्रा प्रदर्शित करैत) जट जटाधर व्यग्र बनल हो, पार्वती कोना बैसल । नट— धन्य प्रिय अहां संग पुरै छी सदिखन हमर छी अंग नटिन— जनम—जनम धरि एहिना प्रियतम छोडब अहां के ने संग । नगाडा पर फेरस चोट पाडैत नटक हाथ चलैत अछि । रुकलाक वाद । नटिन— रंगमंच पर किए उपस्थित मनमे की फुरल अछि, आइ ककर उद्घाटन करबै, दर्शक खूब जूटल अछि । नट— मध्यकाल के प्रेमी युगल के खिस्सा कहब महान । जकरा नामे पानि बरसै इन्द्रहुक झुकै कमान । ।नटिन—(आश्चर्यक भाव व्यक्त करैत) नाम की थिक प्रेमी युगल के जनिक कीत्र्ति एहन अपार, नट— जटा जटिनकेर गाथा स प्रिय होइछ जगत उद्धार । नटिन— ई त महिला मात्र करै छै,नाचि नाचिकऽबेंग कुटै छै, नंगटिनी आंगन घैल फैकै छै,गारि सुनै छै,पानि मगै छै । नट— एह,अहां त ज्ञानी छीहे, साज बाज ओरिआउ नटिन, कुटु बेंग उखरि मे ध,आ शुभारंभ करु जट जटिन । उखरिमे बेंग कुटबाक उपक्रम ।तकराबाद महिलासभ दू दलमे बंटि जाइछ ।जट बला समूहक महिला सभ माथमे आ डांरमे गमछा बन्हने रहैछ ।दुनू दल परम्परगत शैलीमे एक दोसरके गरामे बांहि धएने आगा पाछा झुकैत चलैत गीतक पहिल मुखरा गबैत अछि । तकराबाद नव शैलीमे जाइत अछि । गीत १ महिला समूह हाली–हाली बरिसू इन्नर देवता । पानी बिनू पडल अकाल हो राम । चौर सुखले, चांचर सुखलै खेती बारी झारी सुखलै सूखि गेलै बाबाके जिराते हो राम । सूखि गेलै भइया के जिराते हो राम ।। धोबियाके अंगनामे छापर छुपर पनियाँ चमराके आंगनमे छापर–छुपर पनियाँ ओहिमे नहाइ पुजारी बभने हो राम । धोतियो ने भीजलै जनौओ ने भीजलै –२ रचि रचि तिलक लगावै हो राम –२ भीजले तीतले हवेलिया ढुकलै –२ बहुअो लेलक लुलुआइये हो राम –२ रांडी मौगिया हरवा जोतै छै –२ पानी विनू पड़लै अकाले हो राम –२ दयो नहि लगइ छ हो इन्नर लोक मयो नहि लगइ छ हो इन्नर लोक पानी विनू पड़ल अकाले हो राम । हाली–हाली बरिसू इन्नर देवता –२ पानी विनु पडल अकाले हो राम –२ निरसू के धीया–पूता मांड ले कनइ छै खुद्दी ले कनइ छै, अन्न ले कनइ छै पानी बिनू पड़ल अकाले हो राम । गीत १ समाप्त भेलाक बाद मंच पर अन्हार । प्रकाश अएला पर महिला सभ समूह मे नचैत गबैत । गीत २ महिला समूह एगो छलै जट, एगो जटिनियाँ। दुनूमे हो गेलइ परेमे हो राम । दुनूके विआह केना रचैवै बसेबै हो गेलै माइ बापके विरोधे हो राम । नगाडा बजबैत एक दिशसं नटक प्रवेश । दोसर दिशस नचैत नटिनक प्रवेश । वीच मे आबि ठमकि जाइछ । नगाडा पर जोरस लकडी बजारि नट गबैत अछि । नट— एक्कै देश, एक्कै परगन्ना जट आ जटिन, जट गामक सुधुआ मनसा दोसर तेहने नटीन । नटी— (नृत्य रोकैत) की बजलहुं अहां फेरसं बाजु चुगली परोक्षे पीठ, अहां पुरुष के इएह ऐब अछि सदिखन नारी पर दीठ । रुसि जएबाक अभिनय नट—(मनबैत) जटक हयत विआह, प्रशन्न छी, हमर ने अहित मनसाय, आयल वरियाती साज वाज देखि जटिनक माय पछताय । गीत ३ समूह जटक पक्ष – हम अनलियै आजन–बाजन, आब करु वियाह, –२ सांवरि गेरुली, कऽ दियौ जटाके बियाह –२ जटिन पक्ष – आगि लागो आजन–बाजन, नहि करबौ वियाह, –२ साँवरि गेरुली, मोर गौरी रहि जइती कुमारि –२ जटक पक्ष – बज्जर खसौ हाथी घोडा, बज्जर खसौ बाजार –२ सांवरी गेरुली नहि करवौ जटिनसँ वियाह सांवरी गेरुली रहि जयतौ गौरी कुमारि । जटिनक पक्ष – कहाँ रे पयबै, कहाँ रे पयबै, डलवाके साज –२ सांवरी गेरुली मोर जटिन रहतै कुमारि –२ अन्हारक वाद प्रकाश । प्रकाशक धेरा नट पर । नट— भेल विआह जटिन सासुर चललीह,सभ कें आंखि नोरायल, बाबा देहरीक शान ने भेटलै लगले जटिन अकुलायल । गीत ४ जट – लबिकऽ चलिहें गे जटिन लविकऽ चलिहें गे । जइसे लबे काँच करचिया वइसे लविकऽ चलिहेँ गे ।। जटिन नहिये लबबौ रे जटा, नहिये लबवौ रे । हम तऽ बाबाके दुलारि धिया ऐंठिके चलबौ रे । जट लविकऽ चलिहें गे जटिन लविकऽ चलिहें गे । जइसे लबइ बेंतके छड़िया, वइसे लविकऽ चलिहें गे ।। जटिन ऐंठिकेँ चलबै रे जटा एंठिक चलबौ रे । हम त बाबाके दुलारि धीया, तनिकऽ चलबौ रे ।। जट डइनियाँ देखतौ, गुनमा फेकतौ, मारिये देतौ गे । आगे बाबाके समपतिया जटिन, के भोगतौ गे ।। अन्हार÷प्रकाश । खाट पर जट जटिन सुतल । गीत ५ रामा रहे लागलै जटवा–जटिनियाँ हो ना । रामा कहियो काल होबे खन खनियाँ हो ना ।। रामा एक दिन भोरुका कहनियाँ हो ना । रामा लड़इ लगलै जटवा–जटिनियाँ हो ना ।। पुनः अहार । प्रकाश । खाट पर जट सुतल । जटिन उठल मुदा आंचर जटवाक हाथ मे । गीत ५ (दोसर भाग) जटिन भोर भेलइ रे जटा भिनसरवा भेलइ रे कोइली बोललै रे जटा कोइली बोललै रे जटवा छाड़ि देही अंचरवा हम त अँगना बहारबै रे ।। जट मैया वहारतै गे जटिनियाँ, बहिनियाँ बोहारतै गे । जटिनी आजुके रोहिनियाँ हम तऽ पलंगवे गमैबे गे ।।...... जट हमे तोरा पुछियौ गे जटिनीक दिल से गे, जटिन परेम से गे । झुमका कहाँ हेरइले गे ? जटिन सारी राति रे जटवा, तोहरे बिछौनमा रे जटवा तोहरे लगीचवा रे ! जटवा भिनुसरवामे तोहरे मैया चौरौलकौ रे ।..... जटिन टिकवा जब–जब मंगलियौ रे जटा, टिकवा काहे ने लौले रे ।। अरे वाली उमरिया रे जटबा, टिकवा काहे ने लौले रे ।। जट – टिकवा जब–जब अनलियौ गे जटिन, पौतीमेकऽ धएले गे । तोहर वाली उमरिया गे जटिन, टिकवा काहे न पेन्हले गे ।। जटिन – हँसुली जब–जब मंगलियौ रे जटा, हँसुली काहे ने लौलें रे । हमर वाली समैया रे जटबा, हँसुली काहे न लौले रे । जट हँसुली जब–जब अनलियौ गे जटिन, तक्खापरकऽ धएले गे तोहर वाली समैया गे जटिन, हँसुली काहे न पेन्हले गे । अन्हार । प्रकाश नट पर । नट — जट जटिन के वीच मे भैया खटपट बझल बेजोड बाबा के दुलारी धीआ, मनबय जट पुरजोड । गीत ६ जटिन – धनमा कुटइते जटवा, मारलक मुसरवेके मार । सेहो विरोगवे रामा जाइ छियै नैहरवा जट – निम्मन–निम्मन टिकवा जे लैलिये जटिन ले सेहो जटिनिया छोड़ि नैहरबा तों जाइ छे । जट – चीनमा छिटलियौ गे जटिनियां चीनमा छिटलियौ । तू जाइ छै नैहरवा चीनमा के कटतै गे ? जटिन मैयो कटतौ रे जटवा बहिनियां कटतौ रे । अबरी रे समइया हम त नैहरे गमैबै रे ।। जट – घिउरा फड़लौ गे जटिन, झिगुनी फड़लौ गे, तू चल जेबही नैहरवा, घिउरा के बेचतौ गे ? जटिन मैयो बेचतौ रे जटवा, बहिनियां बेचतौ रे । अबरी रे समइया सखी संग झूमर खेलबै रे ।। अन्हार । पुनःप्रकाश नट पर पडैत । नट— लाख मनौलक जिद्दी जटिन, नैहर डेग बढौलक, नदीक धारमे पारक चिन्ता मलहवा के गोहरौलक । गीत ७ जटिन भैया मलहवा रे, नइया लगादे नदियाके पार थारी देबै एवा–खेवा लोटा देबौ इनाम भैया मलहवा रे उतारि दही झिमनापुरके घाट मलाह नहि हम लेबौ एवा–खेवा, नहि लेबौ इनाम । बहिनी बटोहिनी गे, खोजिले गे दोसर घटवार । जटिन खसी देबौ एवा–खेवा, पाठी देबौ इनाम । भइया मलहवा रे, उतारि दही झिमनापुरके घाट । मलाह नहि लेबौ हम एवा–खेवा, नहि लेबौ इनाम । बहिनी बटोहनी गे, खोजि लेही दोसर घटवार । जटिन बड़ दुखछल छी, नैहरा जाइ छी जटा से खाइके मार । कल जोडैÞछी, गोर पडैÞछी, हमरा करि दिए पार । भइया मलहवा रे, नइया लगादे नदियाके पार । मलाह – तोरा देखि कऽ माया लगै, जिया फाटइ हमार । जे कइलें से नकि नइ कइलें, चलें करि दियौ पार । जटिन – भइया मलहवा रे, नइया लगादे नदियाके पार । बहिनी बटोहनी गे, चलें करि दियौ पार । अन्हार । पुनःप्रकाश नट पर पडैत । नट— नटिन वियोगे छटपट जटवा, सभ किछु सुन्न लगैछै, अपने घर छै काट छुटल, पल पल मन पडै छै । गीत ८ जट– हाथी पर के हौदा बिकाय गेल गे जटिन, तोरे विनु तोरे बिनु हमहुँ वेकल भेलौं गे जटिन, तोरे बिनु तोरे बिनु महल उदास भेल गे जटिन, तोरे बिनु तोरे बिनु अंगना मे दुभिया जनमि गेल, गे जटिन, सेजिया पर मकड़ा बिआय गेल गे जटिन, तोरे बिनु अन्हार÷पुनः प्रकाश । नट पर पडैत । नट—रुसि क भागलि जटिन प्रिय,जट वेकल बहुरायल, एम्हर खोजए, ओम्हर खोजए, नाना भेष बनाएल । नटी—इहे होइछै मनसाके बानी,अपने करम पछताबे । घरबाली पर हुकुम चलाबे,लक्ष्मीके ठोकराबे । नट—ठीक कहै छी नटी हमर,अहां सदृश कत्त पाएब, जटबा छै अबोध प्रिय,अहां घर छोडि नै जाएब । गीत ९ जट – सुन मोर जोगिया, सुन मोर भाइ इहो नगरमे जटिन मोर आइल ? सुनमोर भइया, सुन गे दाइ, यही नगरमे जटिन मोर आइल ? मोसाफिर – सुनमोर जटवा, सुन मोर भाइ, इहे नगरमे जटिन नहि आइल । अन्हार । प्रकाश गीत १० जट – दही लेब ? दही लेब ? मिठगर दही लेब ? गामक स्त्री तोर केकर औंटल दूधवा ? तोर केकर पौरल दहिया, तोहर सड़ल गन्हाय छौ दहिया तोहर खट्टा महकौ दहिया । जट – सास–ससुरकें औंटल दूधवा माय, सांची दूधके दहिया माय, बड मीठ लागै दहिया, ग्रामीण स्त्री अगे नहि लेबौ, नहि लेबौ तोहर कोय ने पुछै छौ दहिया । सिपाही हमहूँ त छियै गुवालिन, मालिकके सिपाही मारि डण्टा, फोड़ि के कोहा, खाय लेव दहि–दूधवा । जट – इहो मत जानिहे सिपाही असगर गुवालिन मारि कोहा तोड़व थुथना, राति रहौं कुंजवन, दिन बेचौं दहिया, घेघा सिपाहीके नइ देब दहिया कोय ले गे गहिकी बेची दहिया । अन्हार प्रकाश गीत ११ जट – ससुरे भैसुरे मोर जाल बुनै ना अकसर बलमुआ मोरा माछ मरैना । माछ ले हे, माछ ले हे, गहिकी बेटी, माछ ले हे, माछ ले हे ।। ग्रामीण स्त्री आहे कौने मछरिया केर गोढिन हे ? जट – आहे रेहुआ मछरिया केर गोढिन हे । ग्रामीण स्त्री आहे गहुम के कै खूटे माछ देवय हे ? जट – आहे, गेहुमा के तीन खूटे माछ देवय हे । ग्रामीण स्त्री – तोर मछरी बनबै नइ जानियौ धुए नइ जानियौ, खबैयाके खियावै नइ जानियौ धियापुता परबौधै नइ जानियौ गोढिनियां गे । अन्हार । पुनः प्रकाश नटपर । नट— खोजि खोजिकऽ थाकल जटवा जटिन विनु मुरझायल, तखने नजरि पर अएलै जटिनिया, असली रुप मे आयल । नटी— की बुझलिएै जटिन ओकरा हपसि क धरतै ना । मनमे गरल दरद छै नटबा, दुर दुर करतै ना । गीत १२ जटिन दूर दूर रे जटा । दूर रहिहें रे जटा सड़ल चाउर रे जटा । राख छाउर रे जटा । सड़ल तीमन रे जटा । दूर रहिहें रे जटा । दूर रहिहें रे जटा । जट– दूर दूर गे जटिन । दूर रहिहें गे जटिन । सड़ल चाउर गे जटिन । राख छाउर गे जटिन । बसिया रोटी गे जटिन । सड़ल तीमन गे जटिन । दूर रहिहें गे जटिन । चोटिया गुहइते चलि अबिहें गे जटिन । सेजिया सजैबते चलि अबिहें गे जटिन जटिन जुलफी सम्हारैत चल अविहें रे जटा । धोतिया पेन्हैत चल अबिहें रे जटा । अन्हार । पुनः प्रकाश नट नटी पर नगाडाक धुन पर कनेक काल दुनू नचैत नट— कहैछै जे एहिना होइछै सांइ बौह के झगडा बीच मे पडि कऽ गामक लोक अनेरे बनैए लवडा । नटी— अपनो घर त सएह हाल अछि,अनका कोन उपदेश जटिनके दुलरुवा जटबा,आब चलल परदेश । गीत १३ जट – मोरंग मोरंग सुनियै गे जटिन, मोरंग हमरा जाये दही गे जटिन । मोरंग से हँसुली लऽ अयवौ गे जटिन तोहरे पहिराए हम देखब गे जटिन । जटिन मोरंग मोरंग सुनियौ हो जटा मोरंग देस जनु जाहु हो जटा मोरंग के पनियां कुपनियां छै हो जटा लागि जयतौ कोढ करेज हो जटा । उलटियो ने आवे देतौ हो जटा पलटियो ने आबे देतौ हो जटा रहि जाही रे जटा नैना के हजूर । जट– तोहरे ले लेवौ जटिन मोरंग से टिकवा ओही मे झमकाइ तोरा देखव से जटिन मोरंग हमरा जाय दही गे जटिन । मोरंग हमरा जाय दही गे जटिन । जटिन अते जे कमैले जटा की भेलौ ना सुनु मोर जटवा, जटिनके मंगवा उदास लागे ना जट – टिकवा जब जब लौलियौ गे जटिन टिकवा काहे ने पेन्हले गे जटनी गे सभामे ललचौले गे टिकवा विनु । जटिन जाहो ते जाहो रे जटवा, देस रे विदेस, मोरंग क टिकवा लेने आवहु हो रा अन्हार । पुनः प्रकाश नट पर । नट— मान मनौबल कऽ कऽ जटवा गेलै मोरंग कमाय, एम्हर बेटा भेलै वेमार,जटिनियां वैद्यसं पुछए उपाय । गीत १४ जटिन रघुदासके अँगा–टोपी, रघुदासकेँ अंगा–टोपी तोहरे देवौ रे बैदा, तोहरे देवौ रे वैदा रघुदास के दियौ न जिआय । वैद – रघुदासके अंगा–टोपी, रघुदासके अंगा–टोपी हमे की करबै गे दिदिया, हमे की करबै गे दिदिया रघुदास तँ सडले गेन्हाय । जटिन रघुदास के हाथके बलिया, रघुदासके हाथ के बलिया तोहरे देवौ रे वैदा, तोहरे देवौ रे वैदा रघुदास के दियौ ने जिआय । वैद – रघुदास के हाथ के बलिया, रघुदासके हाथ के बलिया, हमे की करबै गे दिदिया, हमे की करबै गे दिदिया रघुदास त सड़ले गेन्हाय । अन्हार । पुनः प्रकाश नट पर । नट— बेटवा भेलै चंगा, मनमे जटवा बसलै ना, जटवा के वियोगे जटिनियां अहुरिया काटै ना । नटी— चललै पिया उदेश जटिनियां,दर दर भटकै ना,हो रामा,दर..... कोने पापे पिअबा बिछुडलै कि दुनियां बिजुबन लागै ना,हो रामा,दर....। गीत १४ क( थपल गेल) जटिन हे रे सोनरबा भाय, कही दही जटबाके उदेश जहिया से गेलै निरदैया, नै कोनो संदेश पल पल काटे राति अन्हरिया,दिनो लगे भयाओन नै चाही मंगटीका कंगना,पिअबा अपन सोहाओन । हे रे..........। सोनार हे गे जटिनियां दाय,छोड जटके आस, गरबा जोखि जोखि हंसुली पेन्हैबौ,चल हमरे साथ । जटिन हे रे सोनरबा भाय,रे अगिया लगैबौ तोरे हंसुलिया बजर खसैबौ तोरे साथ । रे मोर पटा पुरबे नोकरिया रहबै पटे के आस । बरह बरस हम आंचर बान्हि रहबै रहबै जटे के आस । रे तोरास सुन्नर हमरो जटबा ब्टिया चलैत लचि जाय रे तोरास सुन्नर हमरो बलमुआ चन सुरुज छपि जाए । थाकि हारि क जटिन अपन घर आबि जाइत अछि ।ओसारा पर ओगठि जटक स्मरण करैत हिंचुकि हिंचुकि कानए लगैछ । गीत १५ जटिन जाहि बाटे पियवा गेलै, दुभिया जनमि गेलै बटिया जोहइते वीजूवन लागल रे की । आहे मइया । पियवा मोरंग गेलै, हमरा से कही गेलै, आहे दिदिया । फूल लागल कंगना लेने अइथिन हो राम । मांगे के टिकबा लेने अइथिन हो राम । रचि रचि जटिनके पेन्हयथिन हो राम । जट बिनु लागे दुनियाँ अन्हारे हो राम बेटा सेहो घरस बाहर आबि माय संगे हिंचुक लगैछ । तखने दहिन कातस माथपर मोटरी लेने जटक प्रबेश । लगमे आबि घरबाली आ बेटाके एकटक देख लगैछ ।प्रकाशक घेरा दुनू पर फूट फूट पडैत छैक ।दुनू चरित्र स्थीर भ जाइछ । प्रकाशक घेराक संग नट नटिनक प्रबेश । (नट नगाडा के सुर तालमे बजबैछ । नटिन सुरताल पर नाच लगैछ । नट के चारु कात गोल घेरामे नटिनक नृत्य )। नटी वारह बरिस पर पिअबा अएलै दुअरिया हे जटिन के खातिर । त्यागी देलकै मोंरंग नगरिया हे । जटिन के खातिर । नट चलियौ ने आब नटिन अपन एकचरिया हे । जटिन के खातिर । चमक दियौ मिलन के इजोरिया हे जटिन के खातिर । दुनु नचैत नचैत मंचस बाहर चलि जाइछ ।आब स्थीर चरित्र चलायमान भ उठैछ । ओम्हर प्रकाशक घेरामे जटिन अकानैत जटक लग अबैछ । खुशी सं आंखि छल छला जाइछ । पयर पर झूकि प्रणाम करैछ । माथ परक मोटरी, छाता लऽ घर दिश बढि जाइछ । जट बेटा के छातीस सटा लैछ । जटिन पानि लऽ अवैत अछि, जट पयर पखारैछ । दुनू एक दोसराके आगां ठाढ भऽ नोरायल आंखिए एक दोसराके देखैत अछि । गीत नं.५ क एक टुकडीक पुनरावृति होइछ । गीत ५के पुनरावृति जटिन टिकवा जब–जब मंगलियौ रे जटा, टिकवा काहे ने लौले रे ।। अरे वाली उमरिया रे जटबा, टिकवा काहे ने लौले रे ।। जट – टिकवा जब–जब अनलियौ गे जटिन, पौतीमेकऽ धएले गे । तोहर वाली उमरिया गे जटिन, टिकवा काहे न पेन्हले गे ।। जट जेवीसं लाल डिव्वा निकालैत अछि । ओकरा खोलि मंगटिका बहार कऽ जटिन कें पहिरा दैछ । दुनू नृत्य मुद्रा मे आवि जाइछ। गीत १६ आरे बाली उमेरिया रे जटबा टिकबा हम पहिरलौं रे टिकबा हम पहिरलौं रे रे जटबा टिकबा हम पहिरलौं रे आरे बाली उमेरिया रे जटबा टिकबा हम पहिरलौं रे नचैत नचैत जटिन,जटक बांहिमे आबि जाइत अछि । दुनू प्रिज भऽ जाइछ । अन्हार नाटक-एकांकी भैया, अएलै अपन सोराज आई सँ आठ सओ वर्ष पूर्वक कुनौली बजारक एकटा चौबटिया । घनगर गाछक तरमे माटि आ ईंटसँ बनल चबुतरा । (पुरुष–१ अशोथकित मुद्रामे चबुतरालग अबैत अछि । चारुकात नजरि खिरबैत अछि । कान्हपर अंगपोछा हाथमे लऽ मुहँपर चुहचुहाइत घामकेँ पोछैत चबुतरापर बैसि रहैत अछि ।) (पुरुष–२ कान्हपर हर, हातमे हरक पैनासँ दू गोट बयलकेँ रोमैत चबुतरालग अबैत अछि । पुरुष–१ केँ थकित देखि कनेक बिलमि जाइत अछि ।) पुरुष–२ ः भाई रविया ! अपन केहन हालत बना लेने छह । पुरुष–१ ः (दीर्घ निसास छोड़ि) से की ई आइए केँ हालति है । भाइ आब तऽ जीअब मुश्किल भऽ गेल । बेगारक एकटा हद होइ छै । पुरुष–२ ः माने तोरो....। पुरुष–१ ः साफे की । भोरेसँ बखारीमहक धान निकालि एसगरे तौलैत–तौलैत जानपर आफत आबि गेल । एक मुठ्ठी जलखईयो नै । चण्डलबा ! पुरुष–२ ः (बयलकेँ ठाड़ करैत) हौ रे हौ ! भाई, हमरो हालत कोनो नीक नहि । भोरेसँ पँचबीघबामे हर जोतैत–जोतैत जखन पार नै लागल तऽ बयल खोलि देलियै । तैयो बारहसँ उपरकेँ अमल भऽ गेलै भाई, कैला चण्डलबा सरबा एक टुकड़ि रोटियो पठाएत । पुरुष–१ ः ई हमरे तोहर दुःख नै हौ, सौसे गामकेँ पेरने है ई राक्षस । हमरासभकेँ अपना चास–बासमे बैसौलक इहे बेगारी खटबऽलए ने । आब तऽ हमरासभकेँ अपन कहलए रहिए की गेल है । पुरुष–२ ः (कनेक लग जा) भाइ, ठीके कहै छह । मंगलबा अपन बेटाकेँ गौना करा कऽ पाँच–साते दिन भेलै लैलकैए । सुनै छी काल्हि राति अपन पठ्ठा सँ उठबा लेल कै । भरि राति हबेलीमे रखलकै । पुरुष–१ ः परसूकेँ कथा नै बुझल हौ । सुनरपुरकेँ अजोधी घरबालीकेँ बिदागरी करा कऽ लऽ जाइत रहै, एहि बाटे । सरदारकेँ लठैतसभ पालकीए घेर लेलकै आ हबेली ढुका लेलकै । कतबो बेचारा चिचिआइत रहि गेलै, घरबालीकेँ नहि छोड़लकै । पुरुष–२ ः भाइ, ई चण्डलबा कतेक दिनधरि एना सतौतै, बेगारी खटेतै, लोककेँ बेटी, पुतहुकेँ इज्जति लुटतै । अन्हेर भऽ गेलै भाइ, अन्हेर ! पाश्र्वसँ गीतक सामूहिक स्वर सुनि पड़ैछ– सभ दिन आई खढ़ कटाबै छै सात सओ मुसहरबा से सभ दिन आई खढ़ कटाबै छै सात सओ मुसहरबा से न हय...। आ गे बड़ तऽ बेइज्जति आई करै छलै कुनौली बजरियामे आ बड़ तऽ बेइज्जति करै छलै कुनौली बजरियामे ने हौऽऽऽ । पुरुष–१ ः देखहक, सुनहक गामक हाहाकार । ई सामन्त, राजासभक अत्याचार आब बेसी दिन नै चलतै भाइ । हमरा–तोरा कान्हपर बेगारीकेँ गुलामीकेँ बोझ हटतै बुझाइए । जनता जागरुक भऽ रहल है । कुछ होतै हौ भाई ! पुरुष–२ ः (हरकेँ कान्ह पर धऽ चलबाक उपक्रम करैत) बयल कतहु भागि जएतै तऽ जुते–लाते एक कऽ देत । चल, आइ दिनकेँ आसमे किछु दिन और सहि ली । पुरुष–१ ः भाइ कोनो वीर पैदा नै भेलैए जे एहि चण्डाल सामन्त जोराबर सिंहकेँ मारतै । पुरुष–२ ः (चलैत–चलैत रुकैत) एकटा पताकेँ बात । सुनै छिऐ जे जोगियानगरमे कालू सरदारकेँ बेटा छै दीनाराम, भद्रीराम । आ ओ हमरेसभकेँ जाति छै कहाँदन । खुब चलतीकेँ वीर है । पुरुष–१ ः (उठैत) एह, बात तऽ बड़का बजला । एहि चण्डालकेँ मारि दितै तऽ पोसले खसी चढ़ा दितिऐ दीना–भद्रीकेँ । घर–घर एक–एकटा खसी पोसि देबै सभ सहाय भाई । लगैए हुनके गोहराबऽ पड़तै आब... । पुनः पाश्र्वसँ सस्वर गीतक बोल सुनि पड़ैछ– ताहि दिन ओकरा नाम से आई खसी चढ़ा देबै कुनौली बजरियामे करै छै अराधना सहोदरा अपना तऽ जतिया से करै छै अराधना भैया अपना तऽ जतिया से ने हेय । मञ्चसँ दुनू प्रस्थान । अन्हार । ........... मञ्चपर प्रकाश । पूर्ववत चौबटिया । गाछक चबुतरापर बैसल अछि पुरुष–१ । अंगपोछासँ मुहँपर हवा झोंकैत । पुरुष–२ क धरफराइत प्रवेश । ससरि कऽ पुरुष–१ क लगमे जाइत अछि । पुरुष–२ ः (चारुकात अकानैत । ककरो आगमन नहि बुझि ) भाइ, हमरासभकेँ पुकार सुनि लेलको दीनाभद्री महाराज । पुरुष–१ ः (प्रसन्नता सँ ) ठीके भाइ ! पुरुष–२ ः हँ, हौ ! बजै छलखिन्ह जे अपन जाति–भाइ पर अत्याचार आब नै होब देबै । मारबै जोराबरकेँ जेना हेतै तेना । लगैअ दिन घुरतो अपनोसभकेँ । पुरुष–१ ः लेकिन, जोराबर तऽ बड्ड भारी पहलमान है हौ । सात सओ पठ्ठा सँगे असगरे सर खेलै है फलकापर । सोलह गजकेँ फरुआ लंगोटा पहिरै है । सओ हाथीकेँ बल है हौ । पुरुष–२ ः हमरोसभकेँ दीनाभद्री महाराज कम नै हौ । जखन रूपमे अबै है तऽ केहन केहनकँे चित्त कऽ दै है । जोगियानगरमे कनक सिंह धामी रहै । नाम सुनने छलहो ? पुरुष–१ ः हँ, हौ ! ओइ राक्षसकेँ के नै नाम सुनने होतै । पुरुष–२ ः के मारलकै ओकरा, बुझने छहो ? पुरुष–१ ः कहँंदन दूटा शिकारी छलै । पुरुष–२ ः हौ ! ओहे दीनाभद्री महाराज रहै । बेगारी खटाबला हुनका दरबज्जापर जा कऽ माता निरसो भीलिनियाकेँ मारिपीट देलकै । की छलै–दीनाभद्री एतेक ने मारलकै जे ओ अपन घरबाली बुधनी बतरनी सँगे जंगलमे सोन्हि कोरि कऽ नुका कऽ रह लागल । पुरुष १ ः तब ? पुरुष २ ः तब की ? भद्री महाराज बीलाड़िकेँ रूपमे पत्ता लगा लेलकै आ कनक धामीकेँ मारि कऽ गामकेँ उद्धार कैलकै । पुरुष १ ः लगै है बड्ड भारी लड़ाकू है । पुरुष २ ः हँ, हौ ! वीर योद्धा है ! देखिह जरूर जोराबर मारल जाएत । सम्पूर्ण श्रमिक वर्गकेँ देवता रूपी है दुनू भाई । शोषण आ अत्याचारसँ उएह मुक्त कराओत । पुरुष १ ः सातो सओ मुसहरकेँ घरमे छागरे पोसल छै । हुनकँे नामपर । चौबटिया बाटे ताबत किछु व्यक्ति हतासल झटकारैत गामदिस भागल जाइत । दूनूकेँ देखि ओहिमहक एकगोट स्थिर होइत कहैत छैक–भागऽ मरदे । जोराबरकेँ लठैत लाठी भँजैत आबि रहल छै । बजै है–सरदारकेँ विरोधमे के लागल है, आई ओकर खैर नै होतै । दुनू साकांक्ष भऽ जाइछ । एक दोसरक मुह देखैत अछि । चेहरापर भयक छाप स्पष्ट देखि पड़ैछ । ओहो दुनू पएर झटकारैत गामदिस बढ़ि जाइत अछि । अन्हार । ......... मञ्चपर प्रकाश । दृश्य पूर्ववत् । दू गोट लठैत लाठी भजैत प्रवेश करैछ । मञ्चपर कनेककाल लाठीक करतब देखबैत अछि । फेर शान्त भऽ चबुतरापर बैसि जाइछ । लठैत १ ः आई तऽ मौजे–मौज है गोधिया । लठैत २ ः कथिक मौज रै । लठैत १ ः रे सरदार की कहलकैअ । गाममे घरे–घरे पैस । ई मुसहरबासभ हमरे जमीनपर बैसैअ । हमरे विरुद्धमे गुमीन्टि करैअ । सारसभकेँ पीठी दागि कऽ आ । लठैत २ ः हँ, से तऽ कहलकैअ । तऽ पीठी दागऽ कथिक मौज । ई तऽ रोजकेँ काम भऽ गेल है । लठैत १ ः रे सार । सब दिन तोँ चोन्हबे रहि गेले । घर– घरमे ढुकबैत घरकेँ मालो समान देखबे नै रै । लठैत २ ः तऽ । लठैत १ ः तऽ की । नया–नवेलीकेँ संँग मौजमस्ती नै करबे । लठैत २ ः अच्छा, तऽ तोँ से बात कहै छले । हम तऽ दोसर बात बुझै छलियौ । लठैत १ ः आई तऽ मौजेमौज है । लठैत २ ः कुछो करबही आ सरदारकेँ पता लगतै तऽ ? लठैत १ ः कतेको घरकेँ बेटी पुतहु सरदारकेँ हबेलीमे हमसभ नै पहुँचबै छिऐ ? लठैत २ ः से कतेको ! लठैत १ ः एतेक पहुँचबिते छिऐ तऽ आई दू–चारि हमहुँसभ हाथ लगा देबै तऽ कोन पहाड़ खसि पड़तै ? लठैत २ ः से तऽ है । एह, ठीके कहले । चल सार सदायसभकेँ मजा चखा दै छियै । दुनू उठैत अछि आ चलबाक हेतु उद्दत होइत अछि । फेर की फुराइ छै लठैत १ घुरि कऽ चबुतराकेँ देखैत अछि । किछु सोचैत अछि । लठैत १ ः (लठैत २ सँ) हे, गोधिया । हमसभ एहि चबुतराकेँ तोड़ि दी तऽ नीक । लठैत २ ः कैला ? लठैत १ ः सार मुसहरबासभ एहिपर बैसि कऽ बात लगबैअ । घरमे बैसऽकेँ जगहो नै है, सुगरकेँ खोर है । एतै बैसि कऽ सरदारकेँ खिलाफ साजिश रचैए । तहिसँ...। लठैत २ ः धूत मरदे ! हौ, एहि गाछ आ चबुतराकेँ की दोष । थाकल ठेहिआएल हमहुँसभ अबै छी तऽ एहिपर सुस्ताइ छी । एना नै सोच...। लठैत १ ः लगैए, तोँ ठीक कहै छह । चलऽ । दुनूक प्रस्थान । अन्हार । ....... मञ्चपर प्रकाश । स्थान पूर्ववत । दू गोट योगीक प्रवेश । कान्हसँ सारंगी टंगने । राजा भरथरीक गीत गबैत । गीत गबैत एक चक्कर लगेलाक बाद चबुतरापर बैसि रहैछ । योगी १ ः भैया दीना ! के चिन्हत गऽ हमरासभकेँ एहि ठाम । योगी २ ः हँ भाई ! हमसभ गुरु गोरखनाथक शिष्य लगैत छी । एहि भेषमे जोराबर सिंहकेँ खोजबामे सहुलियत हएत । ताबत ओहि बाटे एकटा बुढ़िया आंगनदिस जाइत देखि पड़ैछ । चबुतरापर गुदरिया बाबासभकेँ बैसल देखि पुछि दैत अछि । बुढ़िया ः गोर लगै छी बाबा ! दुनू योगी ः (एक्केसँग) कल्याण होऔं । बुढिया ः कत्तसँ आसन एलैए बाबा ? योगी १ ः हमसभ गुरु गोरखनाथकेँ शिष्य छियै । एकर नाम वृजमोहन छियै आ हमर नाम बैताली । बुढिया ः की सेवा करियै बाबाकेँ ? योगी २ ः हमसभ तीन दिनसँ भुखल छी । किछु खाएला भेटि जेतै तऽ भगवान गोरखनाथ तोरा कल्याण करितऽथुन । बुढ़िया गुनधुनमे पड़ि जाइत अछि । पृष्ठभूमिमे गीतक स्वर अभरैछ – से कथि लऽ कऽ आव महात्मा अहाँकेँ करबै कथि लऽ कऽ आव महात्मा अहाँकेँ करबै ने हय हौ बाबा ओहो जेहो छलै मरद आइ हमरा जोगिया तऽ नगरियामे चलै छै जोगिया जोगिया नगरियामे । योगी १ ः कथि लेल बुढ़ी सोचमे पड़ि गेल छी ? बुढिया ः की कहू योगी महाराज ! एहि गामक सामन्त जोराबर सिंह सौंसे गौैंआके बेगारेमे खटबैत छैक । एक्को सेर बोइन नै दै छै । घरमे किछु नै रहै छै खाएला । से हम तऽ मुश्किलमे पड़ि गेल छी...। दुनू योगी गम्भीर भऽ एक दोसराकेँ देखैत अछि । किछ सोचि माथ डोलबैत अछि । योगी १ ः बुढ़ी, अहाँक घरमे जतबे चाउर अछि से खाजू । तकरे चूल्हीपर अदहन चढ़ा कऽ ओहिमे राखिदिऔ । हमरासभकेँ ताहीसँ पेट भरि जाएत । बुढ़िया आश्चर्यसँ योगीदिस देखैत अछि । योगी २ ः ठीके कहै छथि बैतालीनाथ । अहाँ जाऊ, चाउर लगाऊ गऽ । बुढ़िआ अछताइत–पछताइत आंगनदिस जाइत अछि । योगी १ ः हे बघेसरी माता ! बुढ़ियाकेँ सहायता करिह । सभ दिन हम तोरा पूजा देलियह, आई तोँ सहाय हौइह ! कनेक कालमे बुढ़िया दू गोट छीपामे भात, दालि आ आलूक चोखा लऽ कऽ चबुतरापर अबैत अछि । दुनूकेँ श्रद्धा भावसँ देखैत आँगामे थारी राखि दैछ । बुढ़िया ः (हाथ जोड़ि) हे योगीसभ ! हमरा नै लगैया अहाँसभ साधारण लोक छी । एक पाव चाउर फटकि कऽ भेल छल, अदहनमे धरिते भरि तौला भात भऽ गेलै । ई चमत्कार मामूली नै छै । जरुर अपने पहुँचल लोक छियै । योगी १ ः बुढ़ी माता ! अहाँकँे अन्न हमरासभकेँ खाएकेँ छलै, से भेटल । आऊ भाई, भुख लागल है । जल्दी खाउ ! बुढ़िया अपन प्रश्नक उत्तर नहि पाबि आर आश्चर्यमे पड़ि गेल अछि । हाथ जोड़ने सोँंझामे ठाढ़ छैक । दुनू भाइ खाना खा कऽ प्रसन्न मुद्रामे आबि जाइछ । योगी २ ः बुढ़ी माता अपने धन्य छी । हमरासभकेँ जुड़ेलहुँ । आब कहू हमसभ की कऽ सकै छी ? बुढ़िया ः (भावविह्वल भऽ) हमरा लगैए हमरासभपर होइत अत्याचार आब अपनेसभकेँ कृपासँ खतम हेतै । योगी १ ः के करैछै अत्याचार ? बुढ़िया ः उएह, जोराबर सिंह । घर–दुआर, खेत, खरिहान, बहु–बेटी ककरो इज्जति नै रहे देलकै महाराज ! योगी २ ः कोइ नै किछु कहै छै ? बुढ़िया ः ककर मजाल छै, ओई सैतनमाकेँ देहोमे केओ भीर लेत । सात सओ पठ्ठाकेँ रोज खेलबै छै । कहाँदन जोगिया गाममे हमरेसभकेँ जाति दीनाभद्री है । ओकरे गोहरबै है भरि गामकेँ सदायसभ । घर–घर छागर पोसने है ओकरालेल । ऊ एतै कि नै पता नै, अपने योगीबाबा आएल छियै, किछु करियौ । योगी १ आ योगी २ चबुतरापरसँ उठि जाइत अछि । भावुक भऽ बुढ़ियाकेँ दुनू कातसँ पकड़ि भाव विह्वल मुद्रामे मञ्चक आगा भागदिस आबि जाइत अछि । प्रकाशक घेरा तीनूक अनुहार होइतपुरे शरीर पर पड़ैत अछि । योगी १ ः अहाँ चिन्ता नै करू मांँ । अहाँक बेटासभ अत्याचारी जोराबरकेँ निघटाबऽ लेल आबि गेल अछि । आब जोराबर मरतै मांँ, अहाँ निश्चित भऽ जाऊ । देखल जेतै उलङ्गी पहाड़क अखराहापर । बुढ़िआ अश्रुपुरित आँखिए दुनूक अनुहारपर देखैत अछि । आँखिमे आबिगेल चमकसँ लगै छै योगीक बातपर ओकरा पूर्ण विश्वास भऽ गेल छै । ....... प्रकाश । दृश्य पूर्ववत । चबुतरापर एकटा नवकनियाँ बूढ़ीया साउसकेँ केसमहक ढील तकैत देखि पड़ैछ । सरदार जोराबर सिंह की जय । ई स्वर सामूहिकरूपेँ पाश्र्वसँ अबैत छैक । स्वर सूनि साउस–पुतहु चौंँकि उठैछ । पुतहु हात बारि साउसकेँ अपनासँगे चबुतरासँ उठा दैत छैक । पुतहु ः माए, चलथु ! चण्डलबा एम्हरे आबि रहल छै । साउस ः हँ, एक्को रत्ति चैनसँ रहऽ नै दै है बइमनमा । चल बहुरिया, एकर छाँंहो ने पड़ऽके चाही । दुनू साउस पुतहु झटकारि कऽ गामदिस बढ़ि जाइछ । जय–जयकार जारी अछि । मञ्चपर एकटा लठैत आगाँ–आगाँ, तकराबाद चारिगोट मुस्तण्ड पालकीसन सिंहासनकेँ कान्हपर लदने आ तकरा पाछा दू गोट लठैतक प्रवेश । पालकीपर खुब मोटसोट, चौड़गर छाती, पैघ–पैघ माँेंछ, ललाटपर टीका, धोती आ पएरमे पनही जुत्ता । रूप रंग आ मान–सम्मान स्पष्ट लगैछ ई जोराबर सिंह अछि । मञ्चपर अबिते चबुतराकेँ देखैत अछि । कहारकेँ रुकबाक ईशारा करैछ । जोराबर ः शमशेर सिंह ? अगिलका लठैत ः जी सरदार ! जोराबर ः कनिक रोक, चबुतरापर सुस्ताले सभ गोटे । अगिलका लठैत ः हेतै सरकार ! कहार पालकी धरतीपर रखैत अछि । जोराबर उतरैत अछि ओहिपरसँ । मोछपर ताव दैत चारुकात देखैत अछि । जोराबर ः रौ, केसर सिंह ! पूरा रस्ता सुन्न लगै छौ । गाममे लोक नै छौ की ? पछिलका लठैत ः सरकार, अपनेकेँ आगामे ठाढ़ रहे से ककर मजाल है हजूर । जोराबर चबुतरापर बैसऽ चाहैत अछि । शमशेर ः सरदार, ई चबुतरा तऽ अपन राजकेँ लेल खतरा भऽ गेल है । जोराबर ः (ठमकि) से केना रौ ? शमशेर ः अइ गामकेँ मुसहरबासभ अहिठाम गोलिया कऽ सह–मातुकेँ खेल खेलैत रहैअ, हजूर । जोराबर ः फरिछा कनि । शमशेर ः बजैत रहैअ जे आब बेगार नै करबै । हमरोसभकेँ मेहनतकेँ मोल छै किने । जोराबर ः अच्छा तऽ आब अपन मोल खोजैअ । केसर ः (लगमे जा) सरकार, कहाँदन जोगियाकेँ कोनो दीनाभद्री है । तकरा अपन गोलैसीमे सामिल करऽकेँ चक्रचालि चलारहल है भीलसभ । जोराबर ः हूँऽऽऽ । शमशेर ः गुप्तचर कहलक अछि जे काल्हि राति एतऽ दूटा योगी गुदरिया गोसाईं आसन देने रहै । ओकरा जीवछी भिलनी बड्ड आगत–स्वागत कऽ पाठ पढ़बैत रहै । जोराबर ः (तनि कऽ) अएँ, एतेक बात भऽ गेलौ आ हमरा खबरि नै । कत्त छौ भिलनी ? ला पकड़ि कऽ । एहि गाछपर लटका बुढ़ियाकेँ । लठैतसभ आदेश पालन करबाक लेल उद्यत होइत गामदिस जाए चाहैत अछि । ठहर ! अखनु तऽ अखाड़ापर जाएकेँ बेर है । पठ्ठासभ बाट तकैत होतै । घुमब तऽ देखबै ओई बुढ़ियाकेँ आ आरो मुसहरबासभकेँ । पाँखि जे निकललैअ । हम कतरि देबै आइए । पालकीदिस बढ़ैत–बढ़ैत रुकि जाइत अछि । रौ शमशेर ! शमशेर ः जी सरकार ! जोराबर ः रौ सब फसादकेँ जड़ि ईहे गाछ आ ई चबुतरा लगै हौ । एक बीत्ता जमिन नै है सार मुसहरबासभकेँ । अहिठाम जम्मा भऽ कऽ हमरे विरोधमे बतकटौअलि करैआ । हे, सभसँ पहिने एकरे उखाड़ । सभ लठैत तमतम करऽ लगैछ । इहो काज घुरलापर करिहे । देह कस–कस करैअ । लगै है, आइ हमरा हाथे ककरो परान गेल है । जोराबर पालकीमे बैसैत अछि । कहार उठबैत छै । पाश्र्वमे गीतक स्वर अभरैत अछि । सात सय पठ्ठाकेँ खेलबऽ चललै जोराबर अखड़ियामे सात सय पठ्ठाकेँ खेलबऽ चललै जोराबर अखड़ियामे ने यौ ! उलङ्गी पहाड़पर भैया घनघोर मल्ल युद्ध होतै आई उलुङ्गी पहाड़पर भैया घनघोर मल्ल युद्ध होतै आई ने हौ । अन्हार । ..... मञ्चपर प्रकाश । दृश्य पूर्ववत । पृष्ठभूमिमे उज्जरका पर्दापर ध्वनि आ प्रकाशक माध्यमसँ मल्ल युद्धक छाया चित्र देखाओल जाइछ । मञ्चपर किछु महिला, पुरुष, बालक एम्हरसँ ओम्हर, ओम्हर सँ एम्हर करैत भगैत । पृष्ठभूमिमे गीतक स्वर सुनि पड़ैछ । आ खैंचकेँ दण्ड जोराबर उलङ्गीमे खिचै छै आ खैंचकेँ दण्ड जोराबर उलङ्गीमे खिचै छै ने हौ । पर्दापर दण्ड बैसकी करैत छाया देखि पड़ैछ । पछिये भर जा कऽ दुलरुआ बैसि गेलै फलकापर आ पछिये भर जा कऽ दुलरुआ बैठिये गेलै फलका उपरबामे ने हय । मल्ल युद्धक तैयारी । भीड़न्त देखाओल जाइछ । आ मैया तऽ बधेसरी नाम से मिट्टी तऽ चढ़ा देलकै आ मैयाक नाम से दादा मिट्टि चढ़ा देलकै ने हेय । घनघोर युद्धक दृश्य । दू गोट भीमकाय योद्धाक मल्ल युद्धक प्रसङ्ग । पड़ि गेलै युद्ध हौ दादा उलङ्गी पहाड़ पर आ पड़ि गेलै युद्ध हो दादा उलङ्गी पहाड़ पर ने हय । प्रेमी हो प्रेमी ओकरा जे डरने से ओहो ने डेराइ छै ककरो ने डरने कोइ नै डेराइ छै हौ । एकटा चित्कारक सँग एकटा योद्धाक हाथमे कटल मुड़ी लटकल छै । अट्टाहासक स्वर । जा के मुड़ी आब खसै छै जोराबर सिंहकेँ अंगनबामे आजाकेँ आई मुड़ी गिरलै जोराबर सिंहकेँ अंगनबामे ने हय । पृष्ठभूमिमे जयजयकार सुनि पड़ैछ । दीना–भद्री महाराजकी जय । मञ्चपरक भगैत सभ रुकि जाइछ आ जय जयकारमे साथ देबऽ लगैछ । .... मञ्चपर प्रकाश । दृश्य पूर्ववत । गामक किछु लोक अपन पारम्परिक भेषभुषामे मञ्चपर अबैत अछि । ककरो कान्हपर हर, कोदारि छै तऽ ककरो माथपर ढाकी । ककरो हातमे डोलमे पानि छैक तऽ ककरो हातमे जलखईक मोटरी । मञ्चपर प्रसन्नतापूर्वक कृषक परिवारक चहलकदमी । पृष्ठभूमिमे गीतक बोल प्रसारित भऽ रहल अछि । अप्पन घर, अप्पन खेत, अप्पन भेलै समैया अप्पन हर, अप्पन पसार, अप्पन भेलै गोसैंया भैया हो ऽ ऽ ऽ ऽ अत्याचारी जोराबरसँ मुक्त भेलै समाज एलै जनताकेँ सोराज, एलै जनताकेँ सोराज ।। हो भैया एलै अपन राज....। क्रमशः अन्हार पटाक्षेप । राजविराजमे मैथिली लोक संस्कृति संगोष्ठी सम्पन्न नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान आ मैथिली साहित्य परिषद्क संयुक्त तत्वावधानमे गत भाद्र २८ गते ‘मैथिली लोक संस्कृति संगोष्ठी’ सम्पन्न भेल अछि । उक्त गोष्ठीक प्रमुख अतिथिक आसनसं समुद्घाटन करैत नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानक उपकुलपति गंगा प्रसाद उप्रेती नेपाल–भारत सांस्कृतिक सम्वन्ध मजवूत बनएबाक हेतु मैथिली भाषा महत्वपूर्ण कडी थिक–बजलाह । बदलैत परिस्थिति अनुसार प्रज्ञा पतिष्ठान सेहो संगठित भऽ रहल ह्यबाक जानकारी दैत उपकुलपति उप्रेती आगां बजालाह– मैथिली भाषाक उत्थान सेहो ताही अनुरुप ह्यत । गोष्ठीमे धन्यवाद ज्ञापन करैत नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानक संस्कृति विभाग प्रमुख रामभरोस कापडि ‘भ्रमर’ प्रज्ञा प्रतिष्ठानमे बढ़ैत मैथिलीक गतिविधिक जानकारी करबैत आर ठोस काज भऽ सकए तकरा लेल मैथिली अनुरागी सभसं दबाबमूलक कार्यक्रम लएबाक आग्रह कएलनि । प्रज्ञा प्रतिष्ठानसं प्राप्त अवसरकें सदुपयोग करबाक हेतु सेहो ओ सभक ध्यानाकर्षण कएलनि । उद्घाटन समारोहमे भारतसं आयल मैथिलीक विद्वानलोकनि डा.प्रफुल्ल कुमार मौन, डा.रामानन्द झा ‘रमण’, चन्द्रेश अपन मन्तव्यमे नेपालक मैथिली साहित्यक बढ़ैत डेग प्रति आश्वस्त होइत संगोष्ठी सन कार्यक्रमक निरन्तरता पर जोड़ देलनि । समारोहकें पूर्वाञ्चल विश्वविद्यालयक उपकुलपति डा.रामावतार यादव, त्रि.वि.वि.क पूर्व भाषा विज्ञान विभाग प्रमुख डा.योगेन्द्र प्र.यादव, त्रि.वि.वि.क मैथिली विभागाध्यक्ष डा.पशुपतिनाथ झा, मैथिलीक सह प्राध्यापक परमेश्वर कापड़ि, मैथिलीक उप–प्राध्यापक उमेश कुमार ललन, डा.सुनिल कु.झा, प्र.जि.अ.रामप्रसाद घिमिरे, जि.शि.अ.शत्रुघ्न प्रसाद यादव आदि व्यक्तित्वलोकनि सम्वोधन कएने रहथि । कार्यक्रम सत्रमे मैथिली लेखन पद्धतिपर डा.रामावतार यादव, लेखन सहजता पर डा.योगेन्द्र प्र.यादव, नेपालक आधुनिक मैथिली साहित्यक स्वरुपपर चन्द्रेश कार्यपत्र प्रस्तुत कएलनि जकर टिप्पणी क्रमशः डा.रामानन्द झा रमण, डा. सुनिल कुमार झा एवं डा.प्रफुल्ल कुमार मौन कएने रहथि । उपस्थित प्रबुद्ध श्रोता लोकनि दिल खोलि कऽ अपन–अपन प्रश्न पुछने रहथि । कार्यपत्र सत्रक अध्यक्षता प्राज्ञ रामभरोस कापडि ‘भ्रमर’ कएने छलाह । कार्यक्रममे विभिन्न व्यक्तित्वकें मैथिली साहित्य परिषद् राजविराजद्वारा पाग, दोपुटा पहिरा सम्मानित कएल गेल । सम्मानित व्यक्तित्वमे प्रज्ञा प्रतिष्ठानक उपकुलपति गंगा प्र.उप्रेती, पूर्वाञ्चल विश्व विद्यालयक उपकुलपति डा.रामावतार यादव, प्राज्ञ डा.योगेन्द्र प्र.यादव, चन्द्रेश, रमण, मौन एवं प्राज्ञ रामभरोस कापडि ‘भ्रमर’ आदि छलाह । तकराबाद एकटा वृहत् कवि गोष्ठी भेलैक जे चन्द्रेशक अध्यक्षतमे ५ वजेसं ८ वजेधरि चलल । पैंतीस गोट कवि लोकनिक कविता पाठ भेल, जाहिमे महिला सभक सहभागिता प्रशंसनीय छल । रातिमे मैथिली लोकगाथा दीनाभद्रीक चरित्रपर आधारित रामभरोस कापडि ‘भ्रमर’क नाटक “भैया, अएलै अपन सुराज”क भव्य मंचन अरुणोदय नाट्य मंचक कलाकार सभद्वारा कएल गेल छल, जकर निर्देशन बद्रीनारायण झा ‘विप्र’ कएने छलाह । राधा कान्त मंडल ‘रमण’, जन्म- 01 03 1978, पिता- श्री तुरन्त लाल मण्डल, गाम- धबौली, लौकही, भाया- निर्मली, जिला-मधुबनी, शिक्षा- स्नातक मैथिली एकांकी- कने हमहूँ पढ़व कने हमहूँ पढ़व पात्र परिचय 1. धनिकलाल पंचाइतक मुखियाजी छथि। 2. चम्पत लाल मुंशी मुखियाजीकेँ 3. दुखना गरीव व्यक्ति 4. दुखनी ‘‘ ’’ 5. अमर ‘‘ ’’ 6. रीता ‘‘ ’’ प्रथम दृश्य (दुखना दुखनी अपन घरमे जीवनकेँ पलक घड़ी दुखसँ वितबैत छलै जेकरा एक सांझक भोजनपर आफद छल। ई बात अपनामे विचार करैत दुखना आ दुखनीक प्रवेश होइत अछि। दुखनी आंगन घरक काज करैत छलि आ मने-मन विचारैत छल जे हे भगवान आइ हम आ हमर धिया पुता खाएत की तहि बीचमे दुखनाक प्रवेश) दुखना- सुनै छहक ने? दुखनी- अहाँ बाजू ने की भेल हेँ? दुखना- आइ बच्चा सभ की खतौ घरमे किछो छौ कि नाइ, हम तू तँ भूख मेटा लेव आ बच्चा कोना रहतौ। (अमरकेँ प्रवेश) अमर- बाबू बाबू हमरा भूख लागल अछि माए भनस कहाँ करै छै? दुखनी- (अमरकेँ कोरामे लैत भगवानकेँ तरफ देखि कऽ छनि) हे भगवान हम तँ नोर पी कऽ अपन जीवन बीता रहल छी आ ई बच्चा कोना जीयत? (दुखनी यएह बजैत सोचमे डूबि जाइत अछि।) दोसर दृश्य (मुखिया जी आ हुनक मुंशीकेँ संग बात चीत) धनिक लाल- (मुंशीकेँ इशारा करैत) हे रौ हे रौ मुंशिया से कतेक दिन भऽ गेलौ बही खाताकेँ लेखा जोखा, बही खाता ठीक छौ की ने। चम्पतलाल- (डराइत बाजल चम्पतलाल मुंशी बाजल) जी ......जी मुखिया जी, ठीके -ठाक छै। धनिकलाल- हेरौ आय कालि तँ लेन-देनक कार-बार भऽ रहल छै किने। दुखनाक प्रवेश दुखना- (मुखिया जीक पएरपर गीर पडैत अछि।) मालिक भऽ....भगवान हमर......। (परएपर सँ दुखनाकेँ उठबैत मुखियाजी) मुखिया- रै दुखन बाज तोरा की भेलौ जे तू एतै व्यग्र छे। दुखना- मुखिजी हमरा घरवालीकेँ बहुत जोर मन खराप भऽ गेलै से अपने लँग दोगल एलौंहेँ घरमे फूटल कौड़ीओ नै छै जे इलाज करबै लऽ जेबे हम अहा पास रुपैआ ले ऐलौं हेन। मुखियाजी- बाज तोरा कतेक टाकाक जरुरी छौ? दुखना- पा..... पाँच सौ रुपैआ। मुखियाजी- (मुंशी तरफ इशारा करैत) हे रौ मुंशीया तिजोरीसँ पाँच सौ टाका दुखनकेँ दही आ सुन ओकरा सँ वापसीक एग्रीमेट करबाले बुझलेँ की नै। मुंशी- (रुपैआ दैत) ले रौ दुखना ई टाका ले आ हमरा सादा वहीपर एग्रीमेट कर। दुखन- (औठामे निशान लगबैत) ई मालिक कतए कऽ देव, आइ अहीं हमर भगवान छी। (दुखनकेँ प्रस्थान) मंुशी- दुखनसँ सुन अगर ई टाका तों समएपर नहि देबही तँ तोरा टाकाक व्याजक ब्याज लगतौ आ सब गिरबी रखऽ पड़तौ से सुनि ले। मुखियाजी- कतेक दिनक बाद ई एकट मोकिर धरैलो हेँ। मुंशीजी- मऽ ... मालिक वहीपर दुखनक नाम कतेक मारबै? मुखियाजी- (तमसाइत बजलाह) रौ मुऽऽ........मुंशीया तोरा हमर छाली घी मठ्ठा खा कऽ बुद्धिये ने तँ मोटा गेलौ। मुंशी- (कपैत बाजलाह) जी......जी हुजूर हम आब बुझि गेलौं, जे...... जे पाँच हजारमे जेतै न मुऽऽ....मुखिया जी। मुखियाजी- (हँसैत) ई भेलौ ने एकटा मुंशीया बुद्धि ई तँ बुझि जे हमरा अन्नक असर। (अपूर्ण) ऋषि वशिष्ठ अन्हरजाली कोर्ट परिसर भीड़सँ खचाखच भरल छलै। सह-सह करैत भीड़मे कियो प्रसन्न मुद्रामे नहि छल! सबहक मुँह-कान सुखाएल-टटाएल। फूफड़ी पड़ैत ठोर जेना जाड़क पछबापर राँइ-बाँइ फाटि गेल हो। वकील सभ वकालत खानामे बैसल बात-विचार करैत छलाह। कियो अपन मोकिरकेँ बुझबैत तँ कियो आश्वस्त करैत छल। मोकिर सबहक मुहेँ देखलासँ ओ असंतुष्ट आ दुविधाक सिथतिमे बुझाइत छल। वकील मुदा ओकरा विश्वास देबाक लेल अनेक उदाहरण दैत छल। एकटा मोकिर हाथ जोड़ने वकील सँ विनती करैत छल- ‘‘ओकील साहेब, हमर घर-घरारी सब दखल कऽ लेने अछि। कहुना उजड़ल के बसाउ, ओकील साहेब।’’ वकील साहेब ओकर स्थितिकेँ सुनैत बजलाह- ‘‘फैसला तँ अहाँक पक्षमे भइये जाएत, खाली अहाँ डाँड़ मजगुत केने ठाढ़ टा रहियौ।..........एखुनका समएमे जेहन माल तेहन कमाल।’’ मोकिरक मलिन मुखड़ापर जेना कनेक प्रसन्ताक रेखा उभरलै। वकील साहेब अपनैतीक भावसँ पुछलनि- ‘‘अहाँ समंगर छी कीने यौ?........कहबी ठीके छलै जे दस टके नै नितराइ, दस समांगे नितराइ।’’ मोकिरक कपाड़पर जेना तीनटा रेखा उभरि गेलै। चिन्ताक रेघा। वकील साहेब अपन बड़ाइक मुद्रामे बजलाह- ‘‘हमरा सभ लग नहि चलतै। अहाँकेँ किग्री दिया देब। उचित आकि अनुचित, हमरा सभ लग नहि चलै। जकरा चाहबै जीततै।..........मुदा, सहर जमीनपर कब्जा तँ अपनहि करए पड़त।’’ उदास भेल मोकिर बाजि उठल- ‘‘तखन तँ जेहने जिनते तेहने हारने। ओइ राक्षसक पालासँ जमीन छोड़ाएब हमरा बुते कहियो पार लागत? से जँ बुत्ता रहैत तँ न्यायालय किएक अबितौं।’’ वकील साहेबकेँ कोनो अशुभक अनुमान लगलनि। ओ मोकिरकेँ उत्साहित करैत बजलाह- ‘‘तैलय चिन्ता करबाक काज नहि छैक। सभ बेवस्था छै किने! पहिने हमरा केश तँ जीतऽ दिअ।’’ मोकिर जेना आरो गंभीर भऽ गेला। वकील साहेब रंग-बिरंगक आर व्यान सभ सुनबए लगलखिन- ‘‘एन्ना, फल्लाँ ठाँ मामिला छलै......... तँ एन्ना जीता देलियै!.......एसेटा पठेलियै कि बस्स......... सभ घर धऽ लेलकै! अपनहि जग्गह खाली कऽ देलकै।’’ मोकिर तैयौ जेना आश्वस्त नहि भऽ रहल छल। हल्ला-गुल्ला सबहक बेचैनी जेना बढ़ले जाइत छलै। भीड़मे कियो स्थित भऽ ठाढ़ नहि छल। सभ अपसियाँत भेल। एम्हर-ओम्हर झटकरैत। एकटा अधवयसू खसैत-पड़ैत वकालतखान दिस दौड़ल आएल। कहाँ छथि ओकील साहेब?..... हमरा बचाउ ओकील साहेब! हमरासँ घोर पाप भऽ गेलए।’’ वकील साहेब सभ साकंच भऽ बैसलाह। सभ एहि मोकिरसँ गप्प करए चाहैत छलाह। आखीर की बात छै? ओना ई मोकिर अछि बेस आर्त्त। अर्थात मोटगर असामी’’ तखन एकरासँ जे मांग करियौ भेटतै।....... मुदा ई लक्ष्मी ककरा कपारमे लिखल छथि से नहि जानि.........!’’ सभ वकील यएह सोचैत छलाह। एकटा सीनियर वकील जेना मोकिरकेँ झपटलनि- ‘‘की बात छै से तँ बाजू। तखन ने कोनो रास्ता निकालब हमसभ।’’ मोकिर मुँहसँ जेना अनायास बजा गेलै- ‘‘भोर-भोर टहलैत छलाह, सड़कक कातमे एकटा मुर्दा छलै। हम ठाढ़ भऽ ओकरा देखिते छलौं कि केम्हरोसँ पुलिस आएल।........ओ कहए लागल जे तोंही खून केलहीए?’’ सीनियर वकील गंभीर भऽ प्रश्न कएलनि- ‘‘पुलिस अहीकेँ खूनी कहैए?’’ - ‘‘हँ! मुदा.......?’’ - ‘‘मुदा तुंदा किछु नहि। पुलिस खूनी कहि देलक तँ अहाँ सरकारक घरमे खूनी घोषित भऽ गेलहुँ। .......आब जखन अहाँकेँ ई प्रायश्चित लागि गेल तँ एकरा कटेबाक प्रयास करु।’’ - ‘‘एहनो अनर्गल भेलैए?’’ - मोकिर आश्चर्यचकित भऽ प्रश्न कएलनि। सीनियर वकील मोकिरकेँ बुझबैत बजलाह- ‘‘देखियौ, उचित-अनुचितक फेरिमे जाएब तँ बातक बतंगर भऽ जाएत। बुधियारी अहीमे अदि जे कहुना एहिसँ फारकत्ती पाउ।’’ मोकिर चिन्तित भऽ बाजल- ‘‘तँ हमरा कहुना उबारु!’’ सीनियर वकील कागजपर किछु लिखए लगलाह। देासर टपकैत बाजल- ‘‘ओना तँ ई खूनी केश छै, एहिमे सजाए फाफ होएब आ सोंस-घड़ियारलक मुँहसँ जीबैत निकलब एक्के बात भेलै।’’ सीनियर वकीलकेँ जेना केश छिनेबाक अनुमान लगलनि। अेा दोसर वकीलकेँ डपटैत बजलाह- ‘‘खूनी केश छै तँ कि भेलै। हम दस आना गारेंटी लेबै जीतबाक।’’ दोसर वकील टेबुल ठोकलक- ‘‘सीनियर भऽ कऽ दसे आना गारेंटी? हम तँ बारह आना गारेंटी लेबनि।’’ मोकिर दुविधामे ठाढ़ भेल दुनूक मुँह तकैत छल। सीनियर वकील अपन बेइज्जतीक अनुभव केलनि ओ तमकेत बजलाह- ‘‘चलह, चलह! कीदन नै चलय तँ केराके भार! सीनियर भेलौं हम आ ठीका लेथिन ई! कहलके जे......मुहक खतियौन नहिये होइछै।’’ मोकिर गुम्मी लधने दुनूक उतरा चौरी देखैत रहल। सभ वकीलो किछु कहबाक लेल सगबगाइत छलाह मुदा सीनियर वकीलक तामस देखि चुप्प छलाह। दोसर वकील गप्पकेँ आगाँ बढ़बैत बाजल- ‘‘हम मुँहसँ दाबी नहि करै छियै, जीता कऽ देखा दै छियै। आइ तक हम एहन एकोटा केश नहि हारलैंहेँ.......ई हमर रेकार्ड अछि।’’ मोकिर देासर वकील दिशि आकृष्ट भेल। सीनियर वकील जेना दोसरकेँ चित्त करबाक प्रयास केलनि- ‘‘ई सरकारी केश भेलै आ सरकारी केश हम आइतक नहि हारलौंहेँ। हमरा आगाँ सरकारी वकीलक कहियो गजहा नहि ठहरै छै। ओ तँ हमरा देखिते नाङरि सुटकाकऽ बिल धऽ लैइए।’’ मोकिर किछु निर्णय लेबामे असमर्थ छल। सीनियर वकील अपनाकेँ निर्लोभ साबित करबाक प्रयार केलनि- ‘‘औ बाबू, हमरा अहाँक केश लड़बाक सेहन्ता नहि अछि अहींक नीक लए कहलौं। आब अहाँकेँ जे नीक बुझाए सएह करु....।’’ देासर वकील संकेतक भाषामे बाजल- ‘‘जाउ! कटाउ ग!’’ एतबा कहैत दोसर वकील ओतए सँ ससरि गेल। मोकिर आ सीनियर वकीलमे खूब विचार-विमश्र भेलै। समए बितैत गेल। वकील साहेब मोकिरकेँ ब्यान देबाक अभ्यास करबैत रहलाह। किछुए दिन कचहरीक दौड़-बढ़हा केने मोकिर सेहो चरफर भेल गेल। ......आइ मोकिरकेँ न्यायाधीसक सोझाँ ब्यान देबाक छलै। सरकारी वकील भिन्ने मोंछ ऐंठैत छल आ सीनियर वकील भिन्ने। न्यायाधीश न्यायालयमे बैसि गेल छलाह। खूनी मामिला छलै तेँ लोकोक भीड़ जूटल छलै- ब्यान सुनबाक लेल। बाहर लोकसब कलबल-कलबल करैत छल आ भीतर मोकिर, सरकारी वकील। सीनियार वकील आ पेशकार जजक समक्ष अपन-अपन भाव भांगिमा बना रहल छल। जजक आदेशसँ कार्यवाही शुरुह भेल- (अपूर्ण) नन्द विलास राय लघुकथा- चौठचन्द्रक दही आइसँ चौठचन्द्र पावनि चारि दिन अछि। चारिम दिन तँ पावनि हेबे करत। तेँ ओइ दिन दही नै पौरल जाएत। सोमनी जन्मअष्टमीसँ पहिनहि गुरकी हटया बनगामासँ तीनटा छाँछी आ दूटा मटकुरी किन कऽ अनने छलि। सोचलक जे पहिने कीनलासँ बासन सस्ता हएत मुदा से नहि भेल। पॉंचटा माटिक बासन पच्चीस टाकामे भेल। अपना ते नै महिसे छल आने गाइये। सोमनी सोचलक अपना गाए-भैंस नहि अछि तँ की हेतै सौंसे गाममे तँ गाइये-भैंस अछि। की हमरा दस गीलास दूध नै हएत। जौं दूओ-दू गिलास कऽ कए पॉंच गोटे दूध दऽ देलक तैयो पॉंचटा बासनमे दही भऽ जाएत। मरर लेल खीर रान्हैले भजैत ओहिठामसँ एक्को गिलास दूध लऽ आनव केनाहिओ कऽ पावनि कऽ लेब। सोमनी आ मंगल दू परानी। मंगल दिल्लीमे दालि मिलमे नौकरी करैत। सोमनी गाममे खेती-बाड़ीक काज करति। सेामनी-मंगलक परिवारमे पॉंच गोटे छल। सोमनी, मंगल, बेटा राधे आ बेटी फूलिया, गुलबिया। पॉंचो परानीक नाओपर सोमनी पॉंचटा बासनमे दही पौर चौठी चॉंद महराजकेँ हाथ उठबैत छलि। सोमनी एक बीघा खेत छल। एकटा बरद रखने छल। गामेमे बीतबासँ हरक भॉंज लगौने रहए। नूनू बावूक दस कट्ठा खेतो बटाइ करैत छलि। अपन खेतीक वाद हर बेचीयो लैत छलि। जहिसँ किछु ढउआ सेहो भऽ जाइत छलै। मंगल तँ दिल्लीएमे कमाइत छल तेँ बीतबा सोमनीओक खेतमे हर जोति दैत छल। बीतबाकेँ अपन डेढ़ बीघा खेत छल आ एक बीघा बटाइ करैत छल। तँइ बीतबा सेामनीओक खेत जोति दैत छल। बीतबाकेँ हर जोतैक बदलामे सोमनी बीतबाकेँ खेत रौपि दैत छलि। दुनू गोटेमे मिलानी खुब रहए। काल्हि चौठचन्द्र छी मुदा आइ सॉंझ धरि सोमनीकेँ कियो एक्को गिलास दूध नहि देलक। जे ओ कोनो बासनमे दैत। ओकर मन घोर-घोर भऽ गेल। ओ बड्ड खौझा गेलि। अपना आंगनमे खौंझाइत बजलि- “हमर बेगरता लोककेँ नै हेतै। जँ गाममे रहब तँ आइ ने काल्हि हमरो बेगरता लोककेँ पड़बे करतै। तहिया मन पाड़ि दैबनि।” माएकेँ खौंझाइत देखि बेटा राधे बाजल- “माए गै चून चून बाबा जे मरल रहथीन तँ हुनकर भोजमे देखलिऐ पाउडरक दही पौरने। चौकोपर दैखै छीऐ जइ चाहबलाकेँ दूध सधि जाइए तँ पाउडरेकेँ घोड़ि कऽ चाह बनबैत अछि। कह ने तँ चौकपर सँ आधा किलो पाउडर आनि दै छिओ। ओकरा खूब कऽ औंट लिहेँ आ बासन सभमे दही पौर लिहेँ।” बेटाक बात सुनि सोमनी बाजलि- “पोडरबला दूधक दहीसँ पावनि कोना हएत।” राधे बाजल- “जँ गाए, भैंसक दूध नै भेटलौ तँ की करबीही। पाउडर तँ गाइये महिसिक दूधकेँ बनैत अछि।” सोमनी गुन-धुन करैत बजली- “ठीक छै। जँ चौठी चॉंद महराज अपना गाए-भैंस नहि देने छथीन तँ पोडरेक दूधसँ पावनि करब। जो भुटकुनक दोकानसँ आसेर नीमनका पाेडर नेने आ। आ हे दू टाकाक जोरनले दहीओ लए लिहेँ।” राधे चौकपर विदा भेल। ओतएसँ पाउडर बला दूध नेने आएल। ओइ दूधकेँ औट दही पोरलक। आइ चौठचन्द्र छी। भोरे सोमनी राधेकेँ लोटा दऽ कऽ बीतबा ओहिठाम दूध आनेले पठौलक। बीतबा आइ बैसले अछि किएक तँ पावनि छीऐ। राधेकेँ देखिते बाजल- “लोटा राखि दही दूध खीर रन्हैले हम तोरा माएकेँ गछने छेलिओ मुदा अखन नै हेतौ। सॉंझमे लऽ जहिहेँ।” सॉंझखन जखन राधे दूध आनैले गेल। बीतबा चाहबला गिलाससँ एक गिलास दूध देलक। दूध देखि सोमनी दुखी भऽ गेलि। सोचलक जे एतबे दूधसँ खीर कोना रान्हल जाएत। मुदा कोनो उपाए नहि। तेँ ओही दूधमे पानि मिला खीर रान्हलक। सोमनी चौठी चाँद महराजकेँ हाथ उठबैत कहलक- “हे चौठी चॉंद महराज जँ हमरा दरवज्जापर एकटा नीक लगहैर गाए भऽ जाएत तँ अगिला साल एक छॉंछी दही आओर देब।” राति नअ बजे दिल्लीसँ मंगलक फोन आएल। घरेक बगलमे एक गोटे मोवाइल रखने अछि। ओकरे मोवाइलपर सोमनीकेँ फोन अाएल। सोमनी फोनमे मंगलसँ गप केलक। कुशल-समाचारक वाद मंगलवार कहलक- “आइ चौठचन्द्र पावनि छी, अहाँसब भरि मोन खीर, पुरी, दही खेने हएब।” सोमनी उदास होइत बजलीह- “की भरि मन खएब, दही पौरैले क्यो एक्को फुच्ची दूध नहि देलक। पोडरक दही लए कऽ पावनि केलौं गऽ मररक खीर रान्हैले भजैत एक्के फुच्ची दूध देलक। एक फुच्ची दूधसँ केहेन खीर हएत।” मंगल कहलक- “अहाँ मोन जुनि छोट करू, हम फगुआमे गाम अबै छी तँ एकटा नीक लगहरि गाए कीनि कऽ आनि देव। दूध खेबो करब आ बेचवो करब। दूटा पाइ हएत तँ नूनो-तेल चलत। बेटी सभ घास काटि-काटि आनि देत।” सोमनीक मन खुश भऽ गेल। फगुआमे मंगल गाम आएल तँ सोमनीकेँ गाए कीनि देलक। गाए अधकिलौआ बार्ली डिब्बासँ छह डिब्बा भोर आ चारि डिब्बा दुपहर लगैत छल। जाबे धरि मंगल गाम रहल ताबे ओ अपने गाए दुहाए। जखन मंगल दिल्ली चलि गेल तँ सोमनीए गाए दुहए लगलीह। भोरका दूध बेचि लै आ दुपहरका दूध परिवारेमे खाए। बेटी फुलिया आ गुलबीया घास आनि-आनि कऽ खुअबै। एक दिन फुलिया लगमावाली खेतक आरिपर कनी घास काटि लेलक। तै लऽ लगमावाली फुलिया आ ओकर माए सोमनीकेँ बिखनि-बिखनि कऽ गडि़औलक। सोमनी फुलियाकेँ मारबो केलक आ लगमावालीसँ गलतीओ मानलक। समए बीतैत देरी नै लगैत छै। आइ कुशी अमवश्या छी। पाँचम दीन चौठचन्द्र पावनि हएत। कल्हिसँ दही पौरल जाएत। सोमनी दरबज्जापर एम्की लगहैर गाए चौठीचान्द्र महराज देने छथिन। सोमनी सोचलक जे एम्की सभ बासनमे नीक जहॉंति दही पौरब। ओकरा पौर सालक सभ गप्प मन रहए जे क्यो एक्को िगलास दूध नइ देलक तँ पोडरक दही लए कऽ पावनि केलौं। मने-मन विचारलक जे हमहुँ ककरो दूध नै देबइ। आइसँ चौठचन्द्रक दही पौरल जाएत। भोरे मुसबा लोटा नेने सोमनी एहिठाम दूध लै लए आएल। राधे कहलक- “माए गै, पौर साल अपना क्यो एक्को गिलास दूध नै देने रहौ तँइ ककरो दूध नै दे।” सोमनी सोचलक जँ सिग्हेसर बाबा लगहरि गाए देने छथि। तँ पावनि नामपर सभकेँ किछु ने किछु दूध देबे करब। जत्ते गोटे सोमनी एहिठाम दूध ले आएल सोमनी सभकेँ दूध दऽ विदा केलक। ओकर अपन छवोटा वासन लए मात्र दू गिलास दूध बँचल। ओहो काल्हि पावनि छिऐ तँ आइ दूपहरक। सोमनी ओही दू गिलास दूधकेँ छवो वासनमे दही पौरलक। आइ चौठचन्द्र छी भोरेसँ लोक सभ लोटा लए लए सोमनी एहिठाम दूध ले पहुँचल। लगमावालीक बेटी दूखनी सेहो अएल। फूलिया सोमनीकेँ कहलक- “माए गै, दूखनीकेँ दूध नै दही। ओकर माए कनिए घासले गिरिऔने रहौ।” सोमनी बाजलि- “पावनिले सभकेँ दूध देबै। गारि देलक तँ कि भेल एकठाम रहलासँ तँ आहिना लड़ाइ-झगर होइत छै तँ कि ओइ बातकेँ जीनगी भरि रखने रखने रहब ओइसँ कि हएत। अनेरे टेंसन रहत।” सेामनी भोरका समूचा दूध लोककेँ दऽ देलक। ओइ दूधक ककरोसँ पाइओ नै लेलक। दुपहरका दूध दूहि कऽ एक गिलास दूध भजैत वितबाकेँ आ एक गिलास मालिक नूनू बाबू ओहिठाम पठौलक एक गिलास अपने रखलक। सॉंझमे जखन ममर लए सोमनी खीर रान्हैले बैसलीह तखने बेरमावाली आबि गेलि। ओ कहऽ लगलीह- “यै दाइ, हमरा तँ खीर रान्हैले दूधे ने भेल। जितबा अखुन्का नाओ कहने रहए। मुदा जखन बेटाकेँ दूधले पठौलिऐ तँ नै देलक। आब कथी लऽ कऽ ममरक खीर रान्हब?” सोमनी अपनाले जे दूध रखने रहए ओहिमेसँ अधा दूध बेरमावालीकेँ देलक। साँझमे सोमनी चौठीचाँद महराजकेँ हाथ उठबैत कहलीह- “हे चौठीचाँद महराज, हमरा दरबज्जापर एहिना देने रहु तँ हम सभकेँ पावनि लए दूध दैत रहब।” धीरेन्द्र कुमार, (हिंदी विभाग, सी.एम. बी. कॉलेज, डेवढ़, मधुबनी), निर्मली, सुपौल। लघुकथा- अहींक लेल “धीरेन्द्र जी, अपनेक प्रति शिकाइत अछि?”- रितु बाजि चुकल छलीह। हम सहज भावे मुसकाइत छी। हमरा अहाँक शिकाइत नीक जकाँ बुझल अछि हम जनैत छी जे अहाँ कहब यएह ने, मिठाइ नै खुऔलहुँ। हम अहाँक ई शिकाइत बहुत दिन पहिनेसँ सुनैत आएल छी आ हम इहो जनैत छी जे बतक्कर बेसी छी। यएह एकटा पैघ कारण अछि जहि कारणे हमहुँ बोल्ड होइत बजैत छी- “शिकाइत कएक ढकिया एक वा चारि?” “नै हमरा सभकेँ शिकाइत अछि” “शिकाइत की अछि बाजू?” “एतऽ नहि डेरापर कहब।” “एतए कहैमे कोन अचरज अछि?” “नै, कोनो खास नै, तैयो डेरेपर कहब।” हम स्वभाविक रूपे एहि पश्नकेँ टारैत छी। “कोर्सेज आॅफ स्टडी भेटत।” “नै तँ।” “हे, यौ अम्बिका बावू कतए रखने छिऐक कोर्सेज आॅफ स्टडी?” “अहींक कोठलीमे तँ रखने छी।” अम्बिका अहाँसँ बाजल छल। हमर प्रश्न छल- “आइ हम अहींसँ भेँट करए जाइत रही। कतए जा रहल छी अहाँ?” “झंझारपुर।” “कहिया अाएव?” “सोम-मंगलकेँ।” “ठीके छै बहुत रास गप करबाक अछि। आउ अहाँ तखनहि गप होएत।” ई गप्प बाजि हम विदा भेल रही आ अनिल अहाँ सेगे गप्प कए रहल छल। अहाँक ई गप्प मोन होएत आ हमर आग्रह अछि जे अहाँ ई गप अबस्स मोन राखब। एकतीस मार्च उनैस सए सतहत्तरि। दिनके दस बाजि कऽ बीस मिनट भऽ रहल अछि। हम अहाँक डेरासँ बहरा कऽ सड़कपर आबि चुकल छी आ अनिर्णीत स्थितमे अपनामे मर्मान्तिक टीसकेँ भोगैत सोचैत छी कोम्हर जाउ। मन होइछ जे सिकरेट धूकी, खूब धूकी आ एकांतमे जा कऽ घूमी। हमर सौंसे देह जरि रहल अछि। सड़कपर ठाढ़ भेल एहि ठामक सड़कक संगे जुटल आत्मीयताकेँ खंडित होइत देखि रहल छी। हमरा मन भऽ अबैत अछि बरखाक ओ राति जहिया मास्टर सहाएव अपन कोठलीसँ बहरा गेल छलाह आ फाटक बन्न करैत काल हमरासँ अहाँ पूछि रहलि रही- “आइ तँ हाथ मारि लेलहुँ?” अहाँक प्रश्न छल। मन होएत ओहि साँझ नीक अछार भेल रहैक! “कामन एररमे, प्रीपोजिशनमे नहि।” हम कहने रही आ अहाँसँ विदा लेने रही। ओहो सड़कपर हम ठाढ़ छी। आ ओहि फाटककेँ ताकि रहल छी। ओहि दिन पहिल बेर हम अपनाकेँ नहि चिन्ह सकल रही आ हमरा अपन मूहेँठ टेढ़ लागि रहल छी। लगैत छल, हमरा आगाँ धीरेन्द्र नहि, क्यो आन व्यक्ति आबि कऽ ठाढ़ भऽ गेल अछि। ओहि काल हमरा स्थितिक आभास भेल छल हमरा दू-चारि व्यक्ति हमर एहि अन्यमनस्कतापर किछु सोचि रहल अछि तेँ बिना किछु सोचने टीशन दिस विदा भऽ गेल छी। हम नहि चाहैत छी जे हमरा एखन क्यो टोकए। हमरा अहाँ सभ एकसर जाए दियऽ। आइ हमर आस्था खंडित भऽ गेल अछि। हम अहाँसँ पूर्ण परिचित छी। अहाँकेँ मन होएत जे हम अहाँ संगे तीन मास बिता चुकल छी। अहाँकेँ इहो मन होएत जे समस्तीपुरमे एहि तरहक गप उठल छल। अहाँ उद्विग्न रही आ हमहूँ। ओहि दिन हम ओतेक संत्रस्त नहि रही, जतेक आइ ओहि दिन हम आरोपित रही दोसरासँ, मुदा आइ हम अपन भीतर उठैत धाहकेँ शांत करए लेल ‘छोटी सी बात’ फिल्म देखए गेल रही। ओहि आरोपक प्रति आक्रोशमे हम दुनू गोटे संग रही, मुदा आइ हम एकसर छी। एक जोड़ा ताड़क गाछ रहैक। एक दिन दुनू अपना अपनामे मग्न छल। नर ताड़केँ किछु निन्न सन लागि गेल रहैक ओ अपना आँखि क्षपकबैत छल आ मुदा ताड़ रानी सरंगाक गीत गाबि सुनाओ रहलि छलीह। आगाँमे एकटा कनही ताड़ रहैक। अकस्मात ओ कनही ताड़ भभा कऽ हँसि पड़लि। मादा ताड़केँ नर ताड़पर क्रोध अएलै आ ओ ओकरे आगाँ गरियाबए लागलि। बेचारा नरताड़ चुपचाप सभ किछु सुनैत रहल। ओकर बोली अँटकि गेल रहैक। ओकरा मुँहेँठपर आन्हीसँ पहिने रहएबला तटस्थता रहैक। ओहि राति दुनूमे किछु कहा-सुनी नहि भेलैक। ओ नर-ताड़केँ खीस लहरैक जे अपन मादा ताड़क मादे बहुत किछु सनैत आएल छल मुदा आइ आँखि क्ष्पकयबाक अर्थ कनखी बूझि क्रोधक पुट देखि ओ भीतरसँ काँपि उठल छल। ओहि दिनसँ ओ नर ताड़ सुखए लागल नदीक कातमे रहितो हमहूँ सएह पीड़ा भोगि रहल छी। हम जनैत छी, अहाँकेँ ई खिस्सा मन नहि लागत मुदा अर्थ बुझबैक, कहक तात्पर्य अबस्स बुझबैक, से हमर विश्वास अछि ओना आउ, हम एकटा आर उदाहरण अहाँकेँ दैत छी- राजा अकबरक नाम बुझल होएत। बुझल अिछ ने?.... ओ एकटा डाँरि पाड़ि देलखिन आ बिरवलसँ कहखिन- “बिरवल, इसे छोटा बनाओ?” बिरवल ओकरे आगाँ एकटा पैघ ओकरासँ डाँरि खींचि देलखिन। अकबरक प्रयोजनक पूर्ति भऽ गेलैक। ओ डाँरि अपने छोट भऽ गेलैक। आ, ओहिना अहाँ हमर नजरिमे भऽ चुकलि छी आ अहाँमे हम। मुदा, ओहि दिन अहाँ पैघ भऽ गेल छलहुँ। लोकसँ आरोपित भेनो अहाँ अडिग रही। एकर यएह कारण छल जे हम-अहाँ ‘फ्रेक’ रही। मुदा आइ की भेल? एहि गपमे कोनो कमी नहि जे हम अहाँक आभारी नहि छी। एहि बीच हम अहाँक हाथे कमसँ कम सए गिलास चाह पीने हएव। अहीं रही हम ओतेक पढ़ैत रही अन्यथा ओ पढ़ाइ हमर बसक बाहरक गप्प छल। समस्तीपुर रीतू, नीतू, मीतू संगे कएक बेर चाह पीबि चुकल छी। अहाँ जनैत होएव जे एतेक भेलापर की हम कृतघ्न भऽ सकैत छी? अहाँ मोने यएह ने भऽ सकैत छी तेँ अहाँ हमरासँ ओ गप्प कहलहुँ आ हम पीबि कऽ रहि गेलहुँ। बेस, हम अहाँक गप्प मानि गेलहुँ तखैन अहाँ एहि विन्दुपर आउ की जँ हम वएह रहितहुँ तँ कि अहाँक ई उत्तर- “धीरेन्द्र जी, अहाँक प्रति शिकाइत अछि।” हम भेँट करए जैतहुँ? अनिलेकेँ शिकाइत छल तँ ताहिखन टीशनपर अहाँ सोझाँ किएक ने ओ बाजल? आब जाहि खन हमरा ई सभ बात मन अबैत अछि, हम छटपटाए लगैत छी। हमर मोनमे रहि-रहि कऽ यएह गप्प अबैत जाइत रहैत अछि। ई गप्प जाए बेर अबैत-जाइत अछि हम अपनाकेँ दर्शकक बीच अखाढ़मे चित्त भेल पहलमान जकाँ लगैत छी। आ, नीतूक मुहेँठ हमरा आगाँ आबि जाइत अछथ्। “अनिल मुँह जबानी कहनो रहए आ चारि पेजमे पत्रो लिखने छल। हम कहने रहिऐक जे हमरासँ हुनाक गप्प नहि होइत अछि? मीतूसँ कहबनि, गप्प करए लेल।” निीतूक ई वाक्य हमर मर्मपर छेनीक चोच करैत अछि। जाए बेर चौट करैत अछि ताए बेर हमर रूप विकृत होइ चल जाइत अछि। ओहि दिन टीशन दिस अबैत काल अशोकसँ भेँट कएने रही। हमरा अशोकोपर खीस छल। ओकरा किशोररिया आ शंकरिया आगाँ कहने रहिऐक- “सार, तोँ अाइदोकानसँ बहरा! हम तोरा की कहने रहियौ जे तोँ अनिलसँ कहने रही?” ओ बेचारा हतप्रभ छल। हम अपन ‘टेम्पर’मे अंट-संट बजैत रही। ओ हमरा संगे किरिया खएने छल जे अनिल जहिया आओत, हम ओकरासँ पुछबैक आ जहिया उनटि जाएत ओकरा पिटबै धरि अबस्स। अहाँकेँ पता होएतजे एम्हर की भेलैक। पता अछि ने? आर तँ आर, दस तारिख धरि जँ अनिल भेटि जाएत हम ओकरा पकड़ब आ नहि तँ लोहना जाएब। ओकर घर। अाब हम की कहू? हम तँ ताकमे छी। मुदा आगाँ जे होइक हम अपन सफाइ नहि देब। आब आस्था-अनास्थाक प्रश्न अहाँपर पूरा निर्भर अिछ। अहाँकेँ जे मोन हुअए से करू। हमरा आन्तरिक पीड़ा जे भोगक अछि, भोगब। हँ, पहिने अहाँकेँ हमरा प्रति शिकाइत छल, मुदा आब हमरा अहाँक प्रति शिकाइत अछि, शिकाइत अछि यएह जे अहाँ विश्वास कोना कएलहुँ। जँ यएह गप होइतैक। हम वएह समस्त पुरवला गप्प चन्दरदेव बाबूक मादे कहितहुँ नहि। तैयो अहाँकेँ हमरापर अविश्वास भेल तेँ हजार बेर धन्यवाद। हम ई अबस्स कहब- “कानसँ सुनल गप्पसँ जखन आस्थासँ अहाँ हटए लागू अहाँ अपन भीतर ओही अएनामे ताकू अहाँकेँ फोटो नहि भेटत जे अहाँ आगाँ बनल छल नहि चिन्हि सकब तँ अहाँक आन्दर हृदयक ओहि घावसँ ठेकि जाइत जे तखने फोँका सन उठल होएत अहाँ भरिसक कानि उठब एकर उनटा जँ अनास्थामे अएनामे ओहि मुँहेँठकेँ ताकब जे बहुत पहिनेसँ बनल अछि तखन घृणास्पद अबस्स बूझि पड़त मुदा आँखिमे डोलबैत भावकेँ देखि भीतरक दाह समाप्त भऽ जाएत।” अहाँ भले एकरा उपदेश मानी मुदा, तथ्य यएह अछि। किन्तु- “अहाँसँ बेसी हम झरकल छी एहि आगिमे नीतूक मूहेँठ जखन आएल अछि-मूर्त्त भेल अछि जाहखन हम अपन भीतर गुरिल्ला-संघर्ष करैत रहैत छी तर्क-वितर्कक घेरामे अपन धाह दैत देहपर मर्यादाक खेल ओढ़ि बीच सड़कपर आएल छी चुप छी ओढ़ने छी अपनेसँ छक्कारैत अहाँक नास्थाक प्रश्नपर अपनाहिमे मर्माहत मर्यादाक खोलमे हमर आक्रोशसँ उठल हाथ अर्थहीन-सन नपुंसक सन डोलि गेल एहि अन्हार गलीमे जतए जे सोचैत छी जे बजैत छी ओहिमे अहाँक अनास्थाक प्रतिघ्वनि होइत अछि जे एकटा पैघ भीड़क हल्लामे परिणत भऽ जाइत अछि।” हमर दाहकेँ अहाँ अहाँ नहि बूझि सकैत छी। ई एकरे पिणति अछि जे हम एक बजे राति धरि लीखि रहल छी। हमरा अहाँ सबहक मुहेँठ मोन पड़ैत अछि आ र्निदोष होइतो मोन पड़ैत अछि आ निर्दोष होइतो मन नहि होइत अछि जे अहाँ आगू जाइ। अहाँ की सोचैत होएब? ओ की सोचैत होएतीह एहीमे हम फँसल मर्माहतक पीड़ा भोगि रहल छी। आब हम कन्नहुँ ने अहाँ लग जाएब। अहाँसब हमरा गारि पढ़ू आ भऽ सकए तँ आगाँ पड़ने हमर मुँह नोचू। यएह अहाँ लेल सार्थक होएत। पहिने, एकतीस मार्च उन्नैस सए सतहत्तरिसँ पहिने नीतू, मीतू सीतू ‘तों’ रही, आत्मीय स्तर छल मुदा आब, किएक तँ अहाँक शिकाइत हमरा बड़ मोन पड़ैत अछि- “धीरेन्द्र जी, अहाँसँ एक शिकाइत अछि?” “की?” “अहाँ हमरा आ अनिल मादे की कहने रहिऐक अशोकसँ?” “अशोक? कोन अशोक?” “बजारक क्यो छैक?” “अशोक साहु, नहि तँ....” “हमरा अहाँसँ ई उम्मीद नहि छल।” अहाँक ई वाक्य हमरा मर्माहित कऽ उठल छल, हम व्यथित भऽ कहने रही- “अशोककेँ बजाबी?” “नहि....” अहाँक उत्तर छल। हम बूझि चुकल छलहुँ जे कोनो अहाँ सभक अनिल संगे नाजाएज धंधाक गप्प छल। हम कहने रही- “दस धरि जँ अनिल आएल हम अशोक लग अबस्स लऽ जाएब” आ हम सड़कपर आबि गेल रही। हमर अहाँक आत्मीय आ पारिवारिक सम्बन्ध टूटि गेल। अहाँ विश्वास करू वा नहि ई अहींपर निर्भर अछि। अहाँ लेल। अहाँकेँ ई कथा भेटल तेँ हम सन्तुष्ट छी, मुदा कतेक.....? (साभार- मिथिला मिहिर, वर्ष १७ द्वितीय आषाढ़ कृषणपक्ष १० शाके १८९९, पटना, रवि, १० जुलाइ, १९७७मे प्रकाशित कथा अहींक लेल।) जगदीश प्रसाद मंडलक उपन्यास- “मौलाइल गाछक फूल” मैथिली साहित्यमे यथेष्ट सामग्री लऽ प्रवेश केनिहार उपन्यासकार/कथाकारमे यशस्वी एक लेखक छथि। २००२मे प्रवेश केनिहार मंडल जीक सामग्री सभकेँ आश्चर्यचकित कऽ दैत छथि। एहन लगैत अछि जे जीवनक चिंतक, समाजक चिंतन आ आस-पासक होइत घटनाक्रमपर सृजन-दृष्टि हिनकर पहिनेसँ कार्यरत रहनि आ शब्द-बद्ध करैत रहलाह आ अनुकूल समए भेटैत अंकुरित भेलाह आ शीघ्रे एकटा गाछक पैघ स्वरूप धऽ लेलनि। प्रस्तुत कृति ग्राम्य-परिवेशक ससक्त अभिव्यक्तिमे सफल अछि। ग्राम्य-जीवनक चित्रणक कमी नै अछि मुदा हिनकर चित्रण आर सभसँ अलग अछि। गामक छोट-छिन मुद्दाकेँ पकड़ैमे यथास्थान प्रस्तुतिकरण, चित्रणक सघनतामे मंडल जी सिद्धस्त छथि। मंडलजी हिन्दी साहित्यसँ एम.ए. केने छथि। हिनका हिंदी साहित्यक कतेको उपन्यास-कथा पढ़बाक अवसर भेटल हेतनि। हिनक “मौलाइल गाछक फूल” उपन्यास पढ़लापर स्पष्ट प्रतीत होइत अछि जे प्रेमचन्दसँ बेसी प्रभावित छथि। गाम-घरमे रहिकए अनुखन समाजक कल्याणक भावना हिनकामे छनि। जाहि कारणें रमाकांत उदारवादी पात्रक रूपमे प्रतिष्ठित छथि। व्यक्तिगत रूपसँ परिपूर्ण छथि। केओ एकटा परिवारक पात्र एहन नहि अछि जे आदर्शवादी रमाकांतक व्यवहारक विरोध केने होथि। गाम-घरसँ पढ़ि-लिखि शहरमे नीक पदपर स्थापित भऽ बेटा-कनियॉं गामक संस्कारसँ परिपूर्ण अछि। आजुक व्यस्तता, पाइक महत्ता आ छद्म-मुखौटाधारी एकोटा पात्र रमाकांतक परिवारमे नै भेटत। उपन्यासकारक विचार-दृष्टि समाजमे मूल्य स्थापित करब अछि तेँ ओइ दृष्टिसँ उपन्यासकेँ देखक चाही। जे अछि जे होइत अछि ताहि माध्यमसँ अबैत भविष्यकेँ सचेत नहि कऽ मानवीय-दृष्टिसँ आदर्श समाजक स्थापनापर हिनकर विस्वास छन्हि। भाषा हिनकर विकासशील अछि। विशेष वर्गमे स्थापित भाषासँ अलग व्यवहारक शब्द आ भाषा हिनक उपन्यासमे छनि ताहि कारणे पाठककेँ अपन समाजक बोध होइत छनि। मंडल जीक उपन्यास और “सेवासदन”क आदर्श एक्के अछि। अपन जीवनकालमे मंडल जी मार्क्सवादसँ प्रभावित छथि। एकर स्पस्ट दर्शन अपनेकेँ जमीन वितरण प्रणालीमे अवस्से देखबामे आओत। किछु लेखक जमीन छिनए लेल ठाढ़ समाजक चित्रण केनिहार भेटताह मुदा, मंडल जीक पात्र रमाकांत अपन मोने प्रसन्न्ा मोने वितरण करैत अछि। श्रृति प्रकाशनसँ प्रकाशित पोथि सुन्दर आ छपाइक आकर्षक आवरणसँ युक्त अछि। पोथिक नाम- मौलाइल गाछक फूल उपन्यासकार- जगदीश प्रसाद मंडल प्रकाशन- श्रृति प्रकाशन, दिल्ली मूल्य- २५० टाका जीवकान्त, डयोढ़ जगदीश प्रसाद मंडलक उपन्यास “मौलाइल गाछक फूल” (१० ०६ २०१०) जगदीश प्रसाद मण्डलक पोथी “मौलाइल गाछक फूल” पढ़ि गेलहुँ। एकटा नव लेखक। एकटा नव भाव-भूमि। उपन्यास थिक। प्रमुख बात थिक गामक गरीबी, अशिक्षा आ खेतक विषम वितरण। आरंभसँ अन्त धरि समाजवादक धारणा गनगनाइत अछि। तेँ पात्र सभ गौण भऽ जाइत अछि। पात्र सभ गरीबी लए कऽ उपस्थित होइत अछि, अपन दीनता, अपन संघर्ष अपन विजय अभियानक दिशा देखबैत अस्त भऽ जाइत अछि। गाम बदलतैक जखन बोनिहारकेँ भूस्वामी बना देल जएतैक, शिक्षा लेल स्कूल फुजतैक, दवाइ लेल डाक्टर आ दवाइ सुलभ हाेएतैक। से सभ एहि “मौलाइल गाछ” (मिथिला आ भारतक अविकसित आ कृषि-प्रधान गाम) मे भऽ जाइत छैक। भूमिक वितरण भऽ जाइत छैक। स्कूल फुजैत छैक। दूटा किशोर-किशोरी मद्रास जा कए चिकित्साक आरंभिक ज्ञान लए गाम आिब जाइत छैक। गाममे पिरवर्तन होइत छैक। गामक स्वर्ण भूस्वामी डोमक नोत मानि सोत्साह भोजमे सम्मिलित हाेइत अछि। बोनिहारक बेटा गामक पैघ जोतदार (आब भूत पूर्व) लेल जर्मनीमे बनल रेडिओ उपहार देवा लेल अनैत अछि। नव जागरण छैक। नया समाजवाद छैक। कतहु मारि-मोकदमा नहि। कतहु भोट-भॉंट नहि। सभ वस्तु आरामसँ स्वत: होइत गेल अछि। एकठाम लाठी चललैक अछि। िसतिया आ ललबाबला प्रसंगमे। दू वर्गक लोक अछि। दुनूक वर्ग चरित्र झलकैत छैक। पोथीमे उल्का जकॉं ई घटना अबैत अछि आ मिझाइत अछि। वर्ग घृणा एकठाम छैक। सुबुध मास्टर नोकरी छोड़बा लेल त्यागपत्र फेकि अबैत अछि। ओकर स्त्री घौना करैत अछि। घसवाहिनी सभ आेकर दुख ओकर जीवन-शैलीक चर्चा कए अपन घृणा प्रकट करैत अछि। गाममे एहेन परिवर्तन होएवाक चाही। से बात उपन्यासकार कहैत छथि। कथानकमे कोनो पार्टीक उपस्थिति नहि छैक। मुदा पार्टीक एजेण्डा जकॉं सभ काज भए जाइत छैक। गाममे एन.जी.ओ. नहि छैक, मुदा एन.जी.ओ.क उपस्थिति अभड़ैत छैक। मार्क्स, गॉंधी, लोहिया, विनोवा इत्यादिक आहट सुनाइत छैक। एहेन परिवर्तन होएव तत्काल संभव नहि छैक। शिक्षा प्रचारसँ आ समाजसेवी सभक सेवा आ श्रमसँ एना भए जाए तँ आश्चर्यक बात नहि। रमाकान्त जखन मद्राससँ घुरैत छथि, तखनसँ अन्त धरि उपन्यास शिथिल भए जाइत अछि। तकर वाद सभ घटनाक अन्दाज पाठककेँ भए जाइत छैक। उपन्यासमे अन्त-अन्त धरि मोड़ अएवाक चाही, घटना सभमे आकस्मिता होएवाक चाही, से नहि छैक। पोथीक भाषा खाँटी लोकक भाषा थिक, किताबी भाषा नहि थिक। सेहो एकटा विशिष्ट आ महत्वपूर्ण बनबैत छैक। साहित्यमे एहेन घर-ऑंगनक पात्र नहि आएल छल, से सभ प्रवेश कएलक अछि। भारतमे गरीबी विशाल अछि। एकर नियति बदलतैक, मंद गतिसँ बदलतैक। एकर उनटा एहिमे अछि। पोथी पढ़ि गेलहुँ। से एकर सफलताक सूचक थिक। बेचन ठाकुर बेटीक अपमान (श्रीमान् अखन संसारक गति-विधिमे दिनानुदिन आशातीत पिरवर्तन भऽ रहल अछि जहिमे लोक अपन सभ्यता-संस्कृति आओर कर्त्तव्य परायणताकेँ िबसरि सांसारिक सुखकेँ अपनाए रहल छथि। लोभ चरम सीमापर अछि। जबकि दहेज देनाइ व लेनाइ कानूनी अपराध छी। एहि अपराधकेँ अपराध नहि बुझि आमदनीक स्त्रोत लोक बुझैत छथि। वर पक्ष मोछ पिजबैत छथि जे हमरा लाखक लाख दहेज भेटत। मुदा कनियॉं पक्ष माथा होंसतैत छथि जे हम लाखक दहेज कतएसँ आनब। एहि संदर्भमे लोक बेटीसँ घृणा करैत छथि आओर बेटीक अपमान करैत छथि तथा बेटा लेल जान-प्राण लगौने रहैत छथि। अल्ट्रासाउण्ड उचित इलाजक एकटा महत्वपूर्ण आविष्कार छी। सामान्यतया एकर प्रयोग गलत ढंगसँ कएल जाइत अछि। अल्ट्रासाउण्ड करा कऽ लोक बेटीकेँ नष्ट करबा लैत छथि आ बेटाकेँ सुरक्षित राखैत छथि एहि क्रममे बेटीक संख्या काफी घटि रहल अछि आओर बेटाक संख्या काफी बढ़ि रहल एहिसँ संसारक संतुलन बिगरि रहल अछि आओर भविष्यमे काफी बिगरि जाएत। संगहि अल्ट्रासाउण्ड करौनिहारिकेँ स्वास्थ्यपर प्रतिकुल प्रभाव पड़ैत अछि आ पड़त। अल्ट्रासाउण्डहि नहि कोनहु विधिसँ गर्भ जॉंच आओर नाश केनाइ बड्ड पैघ पापीक काज छी स्वभाविक अहितकर सिद्ध होएत। प्रस्तुत नाटक “बेटीक अपमान” मे ई दर्शाएल गेल अछि जे गर्भपात नहि हाएवाक चाही आओर बेटा-बेटीमे समानता रहक चाही। बेटा-बेटीमे क्यो ककरोसँ कम नहि अछि। दुनू एहि संसारक आधार छी। मनमौजी वा हुण्डपनी कएलासँ इज्जत नहि बॉंचत। विवेकी आदमी इज्जतहि लेल हरान रहैत छथि। विवेक वा इज्जत बजारू वस्तु नहि थिकैक। ई अपन क्रिया-कलाप व सत्संगहिसँ अबैत अछि। इत्यादि यएह सभ विषए-वस्तु रखैक प्रयास कएलहुँ हेन। -बेचन ठाकुर) पुरूष पात्र- दीपक चौधरी- एकटा साधारण पढ़ल-लिखल िकसान मोहन चौधरी- दीपक चौधीरीक बड़का बेटा सोहन चाधरी- मझिला बेटा गाेपाल चौधरी- छोटका बेटा प्रदीप कुमार ठाकुर- एकटा वार्ड सदस्य (दीपकक) बलवीर चौधरी- पंचायत शिक्षक हरिश्चन्द्र चौधरी- पंचायत शिक्षक हरिचन्द्र चौधरी- गरीब िकसान महेन्द्र पंडित- दीपक चौधरीक लंगोटिया संगी सुरेश कामत- दीपक चौधरीक मामा सेानू- दीपक चौधरी- मामिऔत भाए गंगाराम चौधरी- बलवीर चौधरीक छोट भाए चन्देश्वर चौधरी- बलवीर चौधरीक पैघ भाय हरेराम सिंह- बलवीर चौधरीक गामक एकटा वुजुर्ग बौआ क्षा- एकटा अनपढ़ पुरहित झमालाल महतो- दीपक चौधरीक पड़ोसी सुरेन्द्र चौधरी- हरिश्चन्द्र चौधरीक भाए प्रेमनाथ मेहता- एकटा प्रसिद्ध डाक्टर टुनटुन- बलवीर चौधरीक भातीज रमन कुमार- हरिश्चन्द्र चौधरी पंचायतक मुखिया स्त्री पात्र- वीणा देवी- दीपक चौधरीक पत्नी सुनीता देवी- बलवीर चौधरीक दोसर पत्नी मंजू- बड़की बेटा संजू- छोटकी बेटी राधा देवी- हरिश्चन्द्र चौधरीक पत्नी शालिनी- हरिश्चन्द्र चौधरीक बेटी अंक पहिल- दृश्य पहिल- (दीपक चौधरी एकटा साधारण पढ़ल-लिखल किसान छथि। हिनक घरनी वीणा देवी छथिन्ह। मोहन चौधरी, सोहन चौधरी आ गोपाल चौधरी हिनक तीनिटा पुत्र छथिन्ह। दीपक चौधरी अपन दुआरिपर दुनू परानी बैसि िकछु गप-सप्प करैत छथि।) दीपक- मोहन माए, एगो गप कहु। वीणा- कहुने, एक्केटा िकएक। जत्ते मोन तत्ते। दीपक- एक गोट बेटीक इच्छा होइत अछि। बेटा तँ भगवान तीनि गोट देलनि। वीणा- आब इच्छे कएने की भेटत? ई इच्छा जे पहिने होइताए तहन ने। पहिने बेटे लऽ जान जाइत छल। मोहनो बेरमे अहॉं कहलहुँ जे अल्ट्रासाउण्ड कराए लिअ। जदी बेटी होएत तँ ओकरा हटा देब। दीपक- से तँ हम ठीके कहने रही। समए महगीक अछि। बेटीमे अग्गहसँ बिग्गह खरच अछि। आमदनी कोनो नहि। वीणा- अहॉं तँ सभ दिन आमदनीए बुझलिऐक की टक्के। दीपक- मोहन माए, एकटा कहबी अछि- “टाका हि धर्म:, कटा हि कर्म:, हे टाक तू सर्वोपरि” वीणा- धूर जाउ, अहॉं खाली फकरे सुनबैत रहैत छी सुनु मोहन बाउ, दुनियॉंमे टक्केटा सभ किछु नहि अछि। ओकर सिंगारो ने होएवाक चाही। बेटा- बेटीए ने एहि दुनियॉंका सिंगार छी। दीपक- लगैत अछि जे अहॉं हमर गुरू रही। वीणा- हँ-हँ, कहब नीक तँ लागत दिक। आब हम कहि देब। दीपक- हे हे चुप रहु, पोल नहि खोलु एहि भरल सभामे। वीणा- नहि यौ, हमरा आब बर्दास नहि होएत। आब हम पोल खोलए देब। दीपक- हे हे मोहन माए, अहॉं बड्ड नीक लोक थिकहुँ। हमरा बेज्जती जुनि करू। हे हे पएर पकड़ै छी। वीणा- अहॉं तँ तेना खेखनियॉं करए लागलहुँ से कहि नहि। खाइर आइ छोड़ि दैत छी। दीपक- हे मोएन माए, आब गप-सप्प छोड़ु। हमरा जेबाक अछि जन ताकए लेल। देखै नहि छियैक जन सभकेँ किकेदारीए चाही हफकौरे चाही। वीणा- बरनी आउ। हमरो भनसाक ओरीयान करबाक अछि। दीपक- बेस तहन हम जाइत छी। पस्थान पटाक्षेप दोसर दृश्य- बेटीक अपमान (स्थान- दीपक चौधरीक आवास। दीपक आ वीणामे किछु गप-सप्प होइत अछि।) दीपक- मोहन माए, हम खेत जाइत छी। खेतमे हर बहैत अछि आ दुटा जन सेहो अछि। कने जलखै जल्दीए लेने आएब। वीणा- सुनू ने, तहन जाएब। दीपक- बाजू की कहैत छी? वीणा- की कहब? जारैनक इन्जाम तँ साफे नहि छैक। दीपक- याए जारैन कीनि देने रही। ओ सभटा सधि गेल की? वीणा- सधि नै गल तँ की। अहॉंकेँ बुझाए रहल अछि जे हम खाए लेलहुँ। दीपक- हे मोहन माए, हमरा अबेर भऽ रहल अछि कोनो जोगार कऽ जलखै जल्दी लेने आएब। वीणा- कोन जोगार? कने बताए दिअ ने। दीपक- कहैत तँ लाज होइत अछि। मुदा कहि दैत छी। नहि होएत तँ एहि कलमसँ कने पत्ते खरैर आनब। वीणा- नैहरमे खर्रा पथिया चिन्हबो नहि केलहुँ। मुदा सासुरमे अहॉं की नहि करेलहुँ। ऐँ यौ मोहन बाउ, आब वएह समए छैक जे जखैन तखैन खर्रा-पथिया लऽ कऽ जाउ आ पत्ता खरैर आनू। दीपक- कोनो जोगार करब। हम जाए रहल छी। हरवाहा खेतमे की करैत होएत की नहि। वीणा- सुनि लिअ मोहन बाउ, हम जोगार करैत करैत थाकि गेलहुँ। आब हमरासँ कोनो जोगार नहि होएत। जोगार करैत करैत हमरा दिशि कियो ताकए नहि चाहैत अछि। सभटा प्रतिष्ठा माटिमे मिलि गेल। दीपक- अहॉं बड्ड प्रतिष्ठित भए गेलहुँ? वीणा- हँ यौ तँ की। प्रतिष्ठा कोनो बजारमे बिकाइत अछि की। अपन व्यवहारसँ प्रतिष्ठा आबैत अछि। अहॉंकेँ की प्रतिष्ठा अछि? दीपक- मोहन माए, अहॉं बड्ड चढ़ि कऽ बाजि रहल छी आ हमरा प्रतिष्ठाकेँ उकटि रहल छी आइ अहॉं खेत जलखै नहि आनब, तहन बुझबैक। वीणा- यावत जारैनक जोगार नहि कए देब, ताबत जलखै केर कोनो आशा नहि। हम पत्ता खरैले नहि जाएब। अहॉंकेँ जे करबाक हएत से करब। हम अहॉंक पत्नी छी ने। दीपक- से बुझि लेब। कोन बॉंसक दाहा होइत छैक। वीणा- अइँ यौ मोहान बाउ, नहि बाजी तँ पीचने जाउ। ऐँ यौ, हमरा एहि देहमे किछु अछि। ठाढ़े छी सएह बहुत। सौंसे देह उज्जर भऽ गेल अछि। एक्को रत्ती खून देहमे नहि अछि। खाली जनमाबै ले होइत अछि। उपरेमे अल्हुआ फरैत छैक की? खाली बेटे चाही बेटे। चलु दरिभंगा। अल्ट्रासाउण्ड करए लिअ आ बेटीकेँं हटाए दिऔक बेटाकेँ रहए दिऔक। सफैया कराबैत-कराबैत आ गोटी-दवाइ खाइत-खाइत हमर देह गलल जाए रहल अछि। आब हम नहि बॉंचब। बेटा लेल तारमतोर सफैया हमरा जाए मारि देलक। देहसँ तारमतोर ओतेक-ओतेक खून बहनाइ मामूली बात छैक। समाजमे बेटी दुश्मन अछि की? हए नारायण बेटा-3 (वीणा देवी दम तोिड़ दैत छथि।) दीपक- (माथ पीटैत) मोहन माए यै मोहन माए। आब हम कोना रहबै यै मोहन माए। मोहना रओ मोहना। सोहना रौ सोहना। गोपला रओ गोपला। दौड़ै जाइ जो रओ बौआ सभ। (मोहन, सेाहन, आ गोपालक प्रवेश। तीनू बेसुमार कनि रहल अछि) तीनू- माए गै माए, हम सभ कोना रहबै गै माए। दीपक- बौआ सभ रओ बौआ सभ। आब अपना सभ केना रहबै रओ बौआ सभ। के खाइलए देतै रओ बौआ सभ। मोहन माए यै मोहन माए। हमरे खातिर अहॉं मरलहुँ यै मोहन माए। (चारू बा-पूत कानैत-कनैत वीणाक देहपर मुरी रोइप दैत अछि। पटाक्षेप भऽ जाइत अछि। अन्दरसँ राम-नाम सत्यक आवाज सुनाइ पड़ैत अछि।) दृश्य- तेसर- (स्थान- दीपक चौधरीक आवास। वार्ड सदस्य प्रदीप कुमार ठाकुर दीपक चौधरीकेँ सान्त्वना दैत छथि।) प्रदीप- दीपक बावू, जूलूम भए गेल। घोर अनर्थ भेल। अहा बेचारी बड नीक जनानी छलीह। एहेन जनानी गाममे कियो नहि छलीह। एहेन परिश्रमी आ सहनशील जनानी कियो नहि छलीह। (दीपकक आखिमे नोर आबि जाइत अछि।) दीपक बावू, अहॉं कानि किएक रहल छी? जुनि कानू। आब कानला खिजलासँ कोन फेदा? होनी तँ हाथ धराए कऽ होइत अछि। जे हेबाक छल से भेल। जहन भगवानक यएह मर्जी छेलनि तहन कियो की कए सकैत अछि? दीपक- सर, हमरा किछु फुरए नहि रहल अछि। हम तँ किंकर्त्तव्य विमूढ़ छी। हरदम चिन्तित रहैत छी। प्रदीप- चिन्ता-तिन्ता छोड़ू। चिन्तासँ चतुराइ घटए, शोकसँ घटए शरीर। पापसँ लक्ष्मी घटए, कहलनि दास कबीर। आगू परबस्ती कोना चलत, ओकर जोगारमे लागू। दीपक- सर, हमरा तीनिटा बेटे अछि। एक्कोटा बेटी रहितए, तँ भनसो भात तँ करितए। घरमे कियो केनिहारि नहि अछि। घरमे एगो केनिहारिकेँ बड आवश्यकता महसूस होइत अछि। प्रदीप- मोन होय यऽ जे दाेसर बिआह करी? दीपक- सर, मोन तँ सोलहो आना होय यए मुदा करी की, से किछु नहि फुराइत अछि। प्रदीप- सुनू दीपक बावू, अहॉंकेँ तीनिटा लाल भगवान देने छथि। हुनके सभकेँ पढ़ाउ-लिखाउ आ मनुक्ख बनाउ। बड़का बेटाक िबआह कने जल्दीए कए लेब। घरमे केनिहारि आबि जेतीह। किछु त्याग करू। दू-चारि बरख कष्टे सही। मुदा दोसर बिआहक चक्करमे नहि पड़ू। दीपक- सर, हम अहॉंक बात सभ दिन मानैत रहलहुँ आओर मानैत रहब। प्रदीप- जदि हमर बात मानी तँ दोसर बिआह भूलोसँ नहि करी। दोसर बियाहसँ बाप पीितयो भऽ जाइत अछि। अऍं यौ, सतौत तँ भगवानोकेँ नहि भेलनि। तहन मनुक्ख कोन मालमे माल। जदि हमर बात नहि मानब तहन जीवन भरि पछताएब दीपक बावू। एक बेर की कुकर्म कएलहुँ से ई फल भेटल आओर छोसर कुकर्म फेर करब तहन की फल भेटत की नहि। दीपक- हँ सर, ई कोनो कुकर्महिक फल भोगे रहल छी। आब दोसर कुकर्म नहि करब दोसर बिआह नहि करब। प्रदीप- ई हम ओना नहि बुझब, दीपक बावू। सत्त करू आइ सरस्वती माताक समक्ष। दीपक- एक तत्त दू सत्त, ब्रह्मा बिष्णु सत्त। जे अहॉंक कहल नहि करए, से अस्सी कोस नरकमे खस।। हम दोसर बियाह नहि करब, नहि करब नहि करब। प्रदीप- जौं कएलहुँ तँ पछताएब, पछताएब, पछताएब। दीपक बावू, आब हम जए रहल छी। आइ ब्लौकमे आपातकालीन बैठक अछि। बेस तँ जय राम जी। दीपक- जय राम जी। (ठाढ़ भऽ कऽ) (प्रदीपक प्रस्थान) प्रदीप बावू हमरा समाजक बड अनुभवी लोक छथि। हुनक बातक खंडन नहि कए सकैत छी। तखन हुनक बेटाक बियाह जल्दीए कऽ लेब आ कमो पढ़ल-लिखलमे कऽ लेब। की करव किछु अपए तँ चाही। पटाक्षेप दृश्य- चारिम (स्थान- दीपक चौधरीक दलान। चारू बापुत आपसमे गप-सप्प कए रहल छथि।) दीपक- बौआ सभ, अपना सबहक दिन दुर्दिन अछि। बिना पढ़ने काज चलए बला नहि अछि। केहेन केहेन पढ़लाहा तँ बौआइत अछि। आ अहॉं सभ मुर्ख रहब तहन कुकुरो नहि पूछत। मोहन- बाबू जी, आइ काल्हि पढ़नाइ बड महग अछि। बिना टीशन वा कोचिंगकेँ पढ़नाइ असंभव अछि। दीपक- तैयो पढ़ए बला बिना टीश्न कोचिंगकेँ पढ़ि लैत अछि। मोहन- से एक सएमे एगो आधगो। दीपक- खाइर अहॉं सभ कहैत छी तँ कतहु नीक सर लग कोचिंग पकड़ि लिअ। मोहन- बाबू जी, सुनैत छी जे नीक कोचिंग जे.एम.एस. कोचिंग सेन्टर, चनौरागंज अछि जे श्री बेचन ठाकुर चलबैत छथि। हमरा सभकेँ ओहि कोचिंगमे धराए दिय। सोहन- मुदा ओहि कोचिंगमे सभ नहि पढ़ि सकैत अछि। दीपक- से किएक? सोहन- एकर कारण ई अछि जे ओहि कोचिंगक फीस बड करगर अछि आ सेहो अगुरबारे। जहियासँ पढ़ाइ शुरू करू तहिये फीस जमा कए दियौन। नहि तँ जय राम जी। दीपक- ई तँ हुनक कोनो नीक नियम नहि भेलनि। पढ़लक नहिए, महीना लागल नहिए, पहिने फीसे चाही। अच्छा, हम एहि संबंधमे सोचि रहल छी। गोपाल- बाबू यौ, एगो छौंरा हमरा कहलक की जे हम हुनका लग पढ़ि रहल छी। तोरा पढ़ल होएतौक की नहि। कारण, बेचन सर बड मारैत छथिन्ह आ बड बुरबक बनबैत छथिन्ह। छड़ी जे देखबिहीन तँ बाइ गुरूम भए जएतौक। बाप रओ बाप, यएह मोटके छड़ी। दीपक- आ पढ़ाइ केहेन होइत अछि? मोहन- पढ़ाइमे कोनो शिकाइत नहि। हुनक चेला सभ डाक्टर, इंजिनियर, मास्टर इत्यादि इत्यादि छन्हि। हमरा मोन होइत अछि बाबू जे हमरा सभकेँ श्री बेचन सर लग कोचिंग धराए दिअ। दीपक- बौआ, हम असगरे की करबौक। घर करबौक की बाहर करबौक? मए एहि दुनियॉंसँ चलि गेलथुन्ह। भनसा भातमे बड दिक्कत होइत अछि। एगो करू, अहॉं पढ़ाइ-लिखाइ छोड़ू अहॉं मोहन एहि चक्करमे नहि पड़ू। कारण एक दिनका वा एक महीना वा एक सालक बात तँ पढ़ाइ नहि छी। पढ़ाइमे सालक साल लगैत अछि आ तैयो नोकरीक कोनो गाइरेन्टी नहि। मोहन- बाबू, एक बेर अहॉं कहलहुँ जे बिन पढ़ने काज चलए बला नहि अछि। एक बेर कहैत छी जे पढ़ाइ छोड़ि दहिन। खाइर पढ़ाइ छोड़ि कऽ हम की करब? दीपक- की करब? गाममे रहलासँ पेट भरत मोहन बौआ। मोहन बौआ, अहॉं मामाक संग काल्हि दिल्ली चलि जाउ। एक सालक अन्दर अहॉंक बियाह सेहो केनाइ अछि। भनसा भातमे बड दिक्कत होइत अछि। मोहन- बाबू, हम एखन बियाह नहि करब। हमरा सबहक उमर एखन बियाह करए बला अछि? दीपक- अच्छा देखू, की होइत अछि? अहॉं काल्हि दिल्ली चलि जाउ। एम्हर सोहन आ गोपालकेँ पढ़ाइक कोनो व्यवस्था देखैत छी। पढ़ाइ तँ बड आवश्यक अछि। सोहन- बाबू, हम भरि दिन बकरीए चरबैत रहब की? कतहु हमर पढ़ाइक जोगार कए िदअ। गोपाल- बाबू, हमहुँ पढ़ब यौ, हमहुँ पढ़ब यौ। गोली गोली नहि खेलब यौ, गुल्ली डन्टा नहि खेलब यौ।। दीपक- अच्छा, काल्हि अहॉं दुनू भॉंइकेँ गंज मिडिल स्कूलमे नाओ लिखाए दैत छी। सुनैत छी जे गंज मिडिल स्कूलक पढ़ाइ बढ़ियॉं छैक। संग-संग खिचड़ी, किताब, पाइ, डरेस, टाइ बैच, बेल्ट इत्यादि सेहो भेटत। ओहि स्कूलमे पढ़लासँ बड नफ्फा? सबटा घट्टे-घट्टा बौआ सभ, हम पढ़ल छी कम्मे। मुदा बुझैत बड छी। केहेन-केहेन पढ़ुआकेँ कान काटि लैत छी। गोपाल- बाबू तहन काल्हि हमरा सभकेँ गंज स्कूलमे नाओ लिखाए दिब ने? दीपक- आब काल्हि होएत तहन ने। *पटाक्षेप* दृश्य पाचिम- (स्थान- बलवीर चौधरीक घर। बलवीर चौधरी एकटा पंचायत शिक्षक छथि। हिनक पत्नी सुनीता देवी छथिन्ह। मंजू आ संजू हुनक सुपुत्री। बलवीर आओर सुनीता रविकेँ आपसी गप-सप्प कए रहल छथि।) सुनीता- स्वामी, एगो बेटा अपनो सभकेँ रहितए। बलवीर- एहेन बात किएक बाजलहुँ अहॉं? कि हमरा लोकनि नि:सन्तान छी? की बेटी बेटासँ कम होइछ? अपना अपना जगहपर कियो ककरोसँ कम नहि होइछ। सुनीता- स्वामी, मोन होय अए जे एगो बेटा होएताए। मुदा आब कोन उपाए? बलवीर- यै, अहॉं मोनकेँ किएक बौआबैत छी एतेक? जहन बुझैत छी जे ऑपरेशन कराए लेने छी, तखन बेकार मोनकेँ भरमेनाइ। सुनीता- से तँ ठीके कहैत छी मुदा। बलवीर- मुदा की? मुदा तुदा छोड़ू। यै, बेटा बेटी जनमेलासँ नहि होइत अछि। ओकर प्रतीक्षा चाही प्रतीक्षा अऍं यै, अपन मंजू आ संजूक आगू किनक बेटा कोनो कलामे टीक सकैत छथि। रूप आ गुणमे ओ सभ किनकोसँ कम अछि? एना अपने आपपर घमंड नहि करबाक चाही। अपना सभ दुनू परानीमे गप करैत छी। सुनीता- यौ, संतोषम परम सुखम्। अपन दुनू बेटीकेँ खूब मोनसँ पढ़ाए-लिखाए कऽ डाक्टर-इंजिनियर, एस.पी. कलक्टर बनाउ आ समाजमे खूब प्रतीक्षा पाउ। बहुते जनमा कए कुक्कुर-बिलारि जकॉं रोडपर ढहना कऽ कोन प्रतीक्षा, कोन फेदा? बलवीर- थैंक्स यू वेरी मच, सुनीता। आब अहॉं लाइनपर अएलहुँ। एहिना सदिखन बुद्धि विवेकसँ काज करी। पटाक्षेप- (दृश्य छअम) (स्थान- हरिश्चन्द्र चौधरीक घर। हरिश्चन्द्र चौधरी एकटा गरीब किसान छथि। हुनक पत्नी राधा देवी छथि। हुनका दर-दुनियामे एक्के गोट बेटी शालिनी अछि। हरिश्चन्द्र चौधरी निपुत्र छथि।) हरिश्चन्द्र- यै शालिनी माए, हमरा लोकनि भगवानकेँ की बिगारलियन्हि जे ओ अपना सभकेँ एगो आ सिरीफ एगो बेटीएटा दए भाभट समटि लेलनि। राधा- एहि बातक हमरो बड़ छगुन्ता लागि रहल अछि। भगवानक महिमा अगम अथाह अछि। केकरो बोरे-बोरे नून, केकरो रोटियोपर नहि नून। हरिश्चन्द्र- खाइर छोड़ू, माथा पेच्चीबला गप-सप्प। भगवान जएह देलनि सएह बहुत। ओनो हम बड़ गरीब सेहो छी। जदि भगवान हमरा बेसी धिया-पुता दइतथि तँ हमरा ओकर पतिपाल नहि कएल होएतए। मात्र तीनि परानीक पेट तँ पहाड़ बुझाइत रहैत अछि। राधा- यै शालिनी बाप, जे भगवान मुँह चीरैत छथिन्ह ओ आहारक जुगार अवस्स करैत छथिन्ह। शालिनीकेँ पनरह सोलह बरख भए गेल। मुदा दोसर संतानक कोनो उम्मीद नहि देखए पड़ैत अछि। जबकि कतेकोकेँ देखैत आ सुनैत छी जे अल्ट्रासाउण्डसँ जॉंच करए बेटीकेँ गिरबौलनि, सुइया-दवाइसँ गर्भ नाश करौलनि इत्यादि। मुदा हमरा भगवान। हरिश्चंद्र- यै शालिनी माए, गर्भपात बड घिनौना काज थिक, बड पैघ पापीक काज थिक। ओहि जनानीकेँ धौजनि-धौजनि भए जाइत अछि कोनो करम बॉंकी नहि रहैत अछि जे गर्भ नाश कराबेत अछि। कतेको जनानी एहि बेत्थे सुरधामो चलि जाइत अछि। राधा- रामक नाम लिअ, छोड़ू ई कुकर्मक गप-सप्प यौ, अपन शालिनीकेँ गरीबीक कारणे पढ़एल-लिखाएल तँ नहि होएत। मुदा घर-गृहस्थी तँ जरूर सीखए देबैक। हरिश्चंद्र- यै शालिनी माए, अहॉं बुच्चीकेँ पढ़ाबए लेल हिम्मत किएक हारैत छी? कोशिश नहि छोड़ू शालिनी दाइक पढ़ाइ बास्ते हम यथासंभव पूर्ण कोशिश करब। आगू सरस्वती माताक किरपा। अपन करम करी फलक चिन्ता जुनि करी। पटाक्षेप दृश्य सातम- (स्थान- दीपक चौधरीक घर। वार्ड सदस्य प्रदीप कुमार ठाकुर दीपक चौधरीक घर घुमैत- घुमैत पहुँचैत छथि। दुआरिपर कियो नहि छथिन्ह।) प्रदीप- दीपक बाबू! दीपक बाबू! दीपक बाबू। दीपक- (अन्दरहिसँ) हँ हँ के थिकहुँ? आबि रहल छी। कने बैसु श्रीमान् भात परसाबैत छी। हइए शीघ्र आबि रहल छी। दीपक- परणाम सर। प्रदीप- परणाम् परणाम। कहु दीपक बाबू की हाल चाल? दीपक- सर, हाल-चाल करीब-करीब ठीके जकॉं अछि मुदा। प्रदीप- मुदा की। दीपक- बड़का बेटाक बिआह कने जल्दीए क’ लिअ सुनलहुँ, अहॉंक बड़का बेटा दिल्लीसँ बढ़िया पाइ-कौड़ी पठाबैत छथि। प्रदीप- दीपक बाबू, अहॉंक परिस्थिति देखि हम सलाह दैत छी जे अहॉं बड़का बेटाक बिआह कए लिअ। दीपक बाबू! ई चानन फटक्का कहियासँ यौ। ई तँ हम ध्याने नहि देने रही। दीपक- सर, यएह हालहिसँ। पत्नीक मृत्युक पश्चात् हमर मोन बदलि गेल। पियोर बाबाजी तँ नहि, गृहस्थौआ बाबजी बनि जेबाक निर्णए कएलहुँ, की अहॉंकेँ खराबो लागि रहल अछि? प्रदीप- नहि यौ। हमरा तँ बड नीक लागि रहल अछि बाबाजी बननाइ कोनो खराब बात अछि, बड़ नीक बात अछि। सिरिफ एकटा हमर विनती अछि जे बाबाजी धर्मक पूर्ण पालन करब आओर मरितहु दम धरि भ्रष्ट नहि होएब। दीपक- सर, अपने बड अनुभवी व्यक्ति थिकहुँ। एहेन अनुभवी व्यक्ति ओ वार्ड सदस्य आइ काल्हि भेटब कठिन। सर, हम अपनेक प्रत्येक सलाहकेँ पूर्ण करबाक हार्दिक प्रयास करब। प्रदीप- दीपक बाबू, आब चलबाक आज्ञा देल जाउ। जय राम जी की। (उठि कऽ प्रस्थान) दीपक- जय राम जी की। (उठि कऽ) हम चाहैत छी जे शुरूए लगनमे मोहनक बिआह कऽ ली। कने कम्मो सम्मो दहेज भेटत तँ कोनो बात नहि। मुदा कुल कन्या नीक होएबाक चाही। पटाक्षेप- अंक दोसर दृश्य पहिल- (स्थान- महेन्द्र पंडितक आवास। महेन्द्र पंडित दीपक चौधरीक नङोटिया संगी। दीपक अपन संगी महेन्द्रक ओहिठाम जा रहला अछि।) दीपक- महेन्द्र बावू, यौ महेन्द्र बाबू, महेन्द्र बाबू। महेन्द्र- हँ, हँ आबि रहल छी। कने बरतन गढ़ैमे हाथ लागल अछि। बैसू, तुरत अएलहुँ। (दीपक बैस जाइत छथि। शीध्र महेन्द्रक प्रवेश होइत छन्हि।) महेन्द्र- जय रामजी की दोस। दीपक- जय रामजी की। महेन्द्र- कहु दोस, आइ केम्हर सूर्य उगलैए, कहु कनिया-बहुरिया ओ धिया-पुताक हाल चाल। दीपक- दोस, अहाँ एखन धरि नहि बुझलौहुँ। कनिया हमर पौरे साल स्वर्गवास भए गेली। खूनी बेमारी भए गेल छलन्हि। मुदा धिया-पुताक कुशल बढ़िया अछि। महेन्द्र- बेटा-बेटी कए गोट अछि दोस? दीपक- कहॉं कोनो बेसी अछि। मात्र तीनिटा बेटे अछि बेटी नहि। महेन्द्र- तहन तँ जीतल छी दोस। अगबे चानीए अछि। दीपक- दोस अहॉंकेँ? महेन्द्र- हमहुँ कोनो बेजाए नहि छी। हमरो चारिटा बेटे अछि। दीपक- तहन तँ अहॉंकेँ सोने अछि। महेन्द्र- आब कहु दोस, केमहर-केमहर पधारलहुँ अछि। दीपक- यएह, बड़का बेटा मोहनक लड़िकीक जोगारमे। अपने गाम-घरमे वा आस-पासमे कोनो नीक लड़कीक नहि अछि? महेन्द्र- यौ लड़िकीऽ......, लड़िकीक बड़ अभाव देखि रहल छिऐक।हमरा गाममे बेसी लड़िके देखाइत अछि। चौधरी टोलमे एक दिन कियो बजैत छलाह जे हमरा टोलमे नामो लए बेटी नहि अछि। किनको एगो बेटा, किनको दुगो, किनको पाँच गोट। दीपक- ई तँ समस्या बुझाए रहल अछि दोस। खाइर देखैत छी अपन मामा गाममे जा कऽ। बेस तहन, जय राम जी की। महेन्द्र- जय रामजी की। (दीपकक प्रस्थान) पटाक्षेप दोसर दृश्य- (स्थान- सुरेश कामतक मकान। सुरेश कामत दीपक चौधरीक मामा छथिन्ह। दीपक सुरेश ओहिठाम पहुँच रहला अछि। दीपकक ममिऔत भाए सोनू छथि। दीपक- मामा, मामा, सोनू, सोनू, मामी, मामी। (दीपक सोर पाड़ैत-पाड़ैत अन्दर घुसैत छथि। फेरि शीध्र मामाक संग प्रवेश। दुनू कुर्सीपर बैस कऽ लड़िका-लड़िकीक संबंधमे गप-सप्प करैत छथि।) सुरेश- कहऽ भागिन, पहिने घरक हालचाल। दीपक- मॉं सरस्वतीक किरपासँ आ अपने सबहक चरणक दुआसँ सब ठीके अछि मुदा एक गोट गड़बड़ अछि। सुरेश- से की भागिन? दीपक- से यएह जे कनियाक मूइलाक उपरान्त हमरा भनसा-भातमे, घर-गृहस्थीमे बड़ कष्ट होइत अछि। कोनहुँ लड़िकीक सुर-पता अछि मामा श्री अपन बड़का बौआ लेल। सुरेश- हँ हँ, बलवीर चौधरी एक दिन बजैत छलाह जे हमरा एहि बेर एक गोट कन्यादान केनाइ अछि। दीपक- तहन बुझियौक ने मामीश्री। लड़िकीकेँ भऽ गेलैक वा नहि। लड़िकी अहॉं देखने दिऐक मामा? सुरेश- हँ, हँ, जरूर देखने छिऐक। लड़िकी तँ सएमे एक अछि। दीपक- मामाश्री, कने हुनका एहिठाम जा कऽ बुझियौक। सुरेश- बेस भागिन, अहॉं घर जाउ। जदि लड़िकीकेँ नहि भेल होएतन्हि, तहन ई कुटमैती अवस्स कराए देब। दीपक- पार्टी केहेन अछि मामा? सुरेश- पार्टी गरीबे जकाँ अछि। ओना पहिने हमरा बलवीर चौधरी ओहिठाम जाए दिअ तहन ने। दीपक- बेस, जाउ मामाश्री। (सुरेशक प्रस्थान) पटाक्षेप- दृश्य- तेसर (स्थान- बलवीर चौधरीक घर। सुरेश चौधरी बिआह-दानक संबंधमे गप करए पहुँचि रहल छथि। बलवीर दलानपर कुर्सीपर बैसल छथि। तखनहि सुरेशक प्रवेश) सुरेश- नमस्कार, बलवीर बावू। बलवीर- नमस्कार, नमस्कार। आउ पधारल जाउ। (सुरेश कुर्सीपर बैसल छथि।) बौआ टुनटुन, बौआ टुनटुन, एक लोटा जल लेने आउ। एकटा अभ्यागत पधारलाह अछि। (टुनटुनकेँ एक लोटा जल लए कए प्रवेश) सुरेश बावू, चरण पखारल जाउ। सुरेश- आगू-पाछूबला कोन बात करैत छी। मिथिलाक जे रिवाज अछि से निभाबहि पड़त। पहिने चरण पखारू तहन कोनो बातचीत होएत। सुरेश- बलवीर बावू, यद्यपि हम वर पक्षसँ आएल छी। मुदा किछु बात बनत तहन ने चरण पखारब। हमर बात-ददाक कहब छलनि। ओहि परम्पराकेँ हम कोनो बिसरि सकैत छी? होउ, गप किछु आगू बढ़ाउ। बलवीर- बाजू तखन, केम्हर-केम्हर अएलहुँ अछि? सुरेश- किछु दिन पूर्व अपने हमरा लग बाजल रही जे हमरा एहि बेर एक गोट कन्यादान केनाय अछि। ओ कुटमैती अपने कएलहुँ वा नहि। बलवीर- कहाँ कएलहुँ। नहि ओतेक सम्पत्ति, अछि आ ने कन्यादन कए पाबैत छी। घर तँ वर नहि, वर तँ घर नहि। की अहाँक नजरिमे कोनो लड़िका अछ? सुरेश- हँ अछि हमरे भागिन। बलवीर- केहेन घर-वर अछि? सुरेश- अपना चशमासँ अपने देखब, से बिल्कुल ठीक होएत। ओना हमरा समक्षसँ, नहि बढ़िया तँ खरावो कियो नहि कहि सकैत छथि। बलवीर- अहाँक विचारसँ ई कुटमैती करैबला अछि? सुरेश- हमरा विचारसँ ई कुटमैती आँखि मुनि कऽ कए लिअ। लड़िका-लड़िकी एकदम जोगम-जोग अछि। बलवीर- सुरेश बावू, जदि हम ई कुटमैतीमे ठकेलहुँ तहन हमर गृहणी कोरमे जीवन भरि चटक करैत रहतीह। से यादि राखि लिअ। सुरेश बावू, हम हुनकामे सकबैन की नहि। सुरेश- नहि सकबैन तँ हम सकए देब। हम छी ने। आदर्श कुटमैती होएत। बलवीर- जहन अपने ई डिट्टो पावर लगाबैत छी, तहन हम नहि देखब-तेखब। एक्के बेर काल्हि छेके कए लेब। ई कुटुमैती पक्के बुझु। आबहु चरण पखारब की नहि? सुरेश- आब चरणहिटा पखारब! जे नहि से करब। पान, बीड़ी, सुपारी, सीगरेट, नश्ता, भोजन सबटा करब। पाछू काल कने समधीनो लग जाएव, फुसुर-फुसुर बतियाएब। तहन गाम वापस जाएब। (पाएर धोलनि) बलवीर- बौआ टुनटुन, अन्दरसँ नश्ता पानि लाउ। (टुनटुन अन्दरसँ नश्ता। पान, बीड़ी, सलाइ, सुपारी आनैत छथि। सुरेश ओ बलवीर नश्ता कए पान, सुपारी, बीड़ीक उपयोग करैत छथि।) सुरेश बाबू, हम ठहरलहुँ एकटा साधारण वा गरीब लोक। हम की नश्ता कराएब, की व्यवस्था करब? सुरेश- बाप रे बा..., एहेन नश्ता तँ हम बापो जनम नहि खेने रही। मोन तँ गदगद भए गेल। आब चलबाक आज्ञा देल जाउ। कने भागिनो एहिठाम जेबाक अछि एखनहि। तहन ने काल्हि ओ सभ छेका-छुकीक व्यवस्था करताह। बेस, जाय राम जी की। बलवीर- जय राम जी की। कहल सुनल माफ करबैक सरकार। (सुरेशक प्रस्थान) पटाक्षेप दृश्य चारिम- (स्थान- दीपक चौधरीक घर। मोहनक छेकाक पूर्ण तैयारी। दलानपर एकटा डोलमे पानि ओ लोटा राखल अछि। कुर्सीपर बैसि कऽ प्रदीप कुमार ठाकुर पेपर पढ़ि रहल छथि। किछुए देर पश्चात सुरेश कामत, बलवीर चौधरी, गंगाराम चौधरी, चन्देश्वर चौधरी ओ हरे राम सिंहक छेकाक सामग्रीक संग प्रवेश। गंगाराम आ चन्देश्वर बलवीरक क्रमश: छोट भाए आ पैघ भाए छथिन्ह। हरे राम सिंह बलवीरक बुजुर्ग पड़ोसी छथि। गंगा रामक हाथमे छेकाक श्रमजान अछि। दुआरिपर दस गोट कुर्सी लागल अछि।) प्रदीप- (ठाढ़ भऽ कऽ) नमस्कार कुटुम, नमस्कार कुटुम, नमस्कार कुटुम। (कल जोड़ि दुनू तरफसँ नमस्कार पाती भए होइत।) आउ, आउ, पधारल जाउ, पधारल जाउ। पहिने सभ कियो चरण पखारू। (सभ कियो चरण पखारि रहल छथि। आ बारी-बारीसँ कुर्सीपर बैसैत छथि।) सुरेश बावू, कने हम अन्दरसँ आिब रहल छी। सुरेश- बेस जाउ। (प्रदीप अन्दर जा कऽ दीपकक संग आबैत छथि।) दीपक- नमस्कार समधि, नमस्कार कुटुम, प्रणाम मामाश्री। (कल जोड़ि दुनू तरफसँ नमस्कार पाती भेलनि।) कहु समधि, अपने सभ कियो आबि गेलिऐक। बलवीर- हँ, हँ, हमरा लोकनि सभ िकयो आबि गेलहुँ। दीपक- धन्यवाद। बौआ, गोपाल, गोपाल। (अन्दरसँ गोपाल कहलनि- जी बाबूजी) कने एम्हरौ धियान देब बौआ। (गोपाल नश्ता लऽ कए प्रवेश ट्रे मे संगमे सोहन सेहो छथि। सोहन सभकेँ नश्ता दैत छथि। सभ कियो नश्ता कए हाथ मुँह धोइ कऽ बैसैत छथि।) प्रदीप- गोपाल बौआ, कने चाह-पान, बीड़ी-सुपारी, सिकरेट-सलाइ सेहो देखहक। गोपाल- जी चच्चा, जाइत छी। (गोपाल अन्दर जा कए ट्रे मे सभ किछु आनैत छथि। सोहन सभकेँ पहिने चाह दैत छथि पीवलाक पश्चात पान-बीड़ी-सिकरेट दैत छथि। जनिका जे मोन होएत छनि से लैत छथि। नश्ता-पानिसँ सभ निवृत छथि। सोहन ओ गोपाल ठाढ़ छथि।) सुरेश- भागिन, बौआकेँ बजाउ। गामपर कियो नहि छथि भैंस हमरे हाथपर लगैत अछि। दीपक- हँ, हँ, आबि रहल छथि। तैयार भए रहल छथि। प्रदीप- सुरेश बाबू, अहाँक भैंस अहीं हाथपर लगैत अछि। भैंस बड़ दुलारि छथि। सुरेश बाबू छेका-छुकी तँ होइबहि करत। पहिने दस आदमीक बीचमे लेन-देन फाइनल भऽ जाए। बादमे तू-तू-मै-मै कइलासँ प्रतिष्ठे जाइत अछि। हरेराम- सुरेश बाबू, प्रदीप बाबूक गप्प हमरा बड्ड नीक लागल। हदमद्दीसँ नीक उल्टीए। बाजू, प्रदीप बाबू अहीं, कोना की लेन-देन? प्रदीप- हम नहि बाजब। बजताह सुरेश बाबू। कुटुमकेँ वएह आनलथि। कोना की गप करथिन्ह, से तँ वएह ने कहताह। हरेराम- बाजू सुरेश बाबू, केना की गप्प? सुरेश- कोनो गप्प-सप्प नहि। हम बलवीर बाबूकेँ यएह कहलियन्हि जे ई कुटमैती करैबला अछि आ ओ भऽ कऽ रहत। एहिमे हम पड़ल छी। गंगाराम- तहन छेकामे विलंब िकएक सुरेश बाबू? एत्ते टाइल गुल्ली खेलाबाक कोन प्रयोजन? एत्ते कियो छिरहारा खेलए। चन्देश्वर- यौ सुरेश बाबू, सभटा अहींक चक्कर चालि छी। कहलहुँ आदर्श कुटमैती आ देखि रहल छी बटुआ भरू कुटमैती अऍं यौ, एखुनका युग माने अल्ट्रासाउडक युगमे लड़िकोक अभाव अछि। ओहि हिसाबे लड़िकीएक बड़ अभाव अछि। हमरा ई कुटुमैती नहि करबाक अछि। हरेराम- हरबराउ नहि बौआ। नवका कुटमैतीमे एहिना तोड़-जोर हेाइत अछि। अहाँ शांत रहु। देखियौक की होइत छैक? मॉं सरस्वतीक किरपा हेतैन तँ भऽ जाएत। कोनो काज हरबराए कऽ नहि करी। प्रदीप- हरेराम बाबू, चन्देश्वर बाबू एतेक गैसमे किएक आबि गेलाह। कोनो कुटमैती कएने छथि की नहि। गंगाराम- हँ, हँ, अहींटा कुटमैती कएने छी। आ देखने छी। हमरा एहेन दलालबला कुटुमैती नहि करबाक अछि। लड़िकाक लेल दुनिया, बड़ीटा अछि। प्रदीप- गंगाराम बाबू, अहूँ बड़ भासि रहल छी। कने होशमे बात करू। हरेराम- ओम शांति, ओम शांति, ओम शांति। कृपया सभ कियो शान्त होउ। हल्ला गुल्ला नहि होएवाक चाही। प्रदीप बाबू, कने दीपक बाबूसँ एक बेर अंदर जा कऽ विचार करिऔक। ओना आधुनिक युगमे बेटीक बड़ अभाव अछि आओर बेटा भरमार अछि। प्रदीप- ठीक कहलहुँ हरेराम बाबू, कने हम आ दीपक बाबू अंदरसँ आबि रहल छी। (दीपक ओ प्रदीप अन्दर गेलाह। कुटुम लोकनि दुआरिपर बैसल छथि। फेर सुरेश सेहो अन्दर जाइत छथि। तीनू अंदरमे गप्प करैत छथि।) सुरेश- भागिन प्रदीप, हमर प्रतिष्ठा बचाउ। हम हिनका सभकेँ कहि देने छियन्हि जे बिआह आदर्श होएत। दीपक- से बिना बुझने अहाँ किएक कहि देलिऐक। सुरेश- से हम बड़ पैघ गलती कएलहुँ। दीपक- अहाँकेँ कम-सँ-कम पाँचो लाख टाका नगद आ अलावे सब समान कहबाक चाही की ने। बुढ़ पुरान भऽ कऽ भसिया जाइत छी मामा। सुरेश- तोहर जे मोन छह, ताहिपर कुटमैती नहि हेतह भागिन। जाह, दोसरे कए लिह। हमरा एतेक मोलाइमे सम्हारल नहि होएत। (अन्दरसँ खिसिया कऽ आबि दुआरिपर बैसैत छथि।) प्रदीप- आब ई कुटमैती लागि रहल अछि जे नहि सम्हरत। दीपक बाबू, छोड़ू लोभ-लालच। कहबी अछि- लोभ: पापस्य कारणम्। अहाँ मामाश्रीकेँ कसि कऽ पकड़ू। कुटमैती तँ केनाइ अछि। आदर्शे रहए दियौक। अन्यथा अहुँक प्रतिष्ठा चलि जाएत आओर ममोक प्रतिष्ठा चलि जाएत। दुआरिपर सँ एहेन सम्हरल कुटुमकेँ नहि घुमैबाक चाही। दीपक- तहन की कएल जाए, सर? प्रदीप- कने मामाश्रीकेँ बजाबिऔन आ हुनकेपर सभटा छोड़ि दियौन्ह। दीपक- बेस सर, मामाश्रीकेँ बजाबैत छियन्हि। (बाहर आबि मामाश्रीकेँ कहैत छथि। मामाश्री, यौ मामाश्री, मामाश्री यौ) सुरेश- कने प्रदीप बाबू भीतर बजाबैत छथि। (सुरेश अन्दर जाइत छथि। प्रदीप दीपक ओ सुरेश अन्दरमे गप-सप्प करैत छथि।) प्रदीप- अहीं जे-जेना करबै सुरेश बाबू, सएह होएत। एतय प्रतिष्ठाक सवाल अछि। खाली एना करबाक प्रयास करबैन जाहिसँ साँपो मरि जाए आ लाठीयो नहि टूटए। सुरेश- चलै-चहल दुआरिपर। कुटुम्बो की कहैत होएताह। की नहि। हम एक्के बेर बाजबह। ओहिमे गुंजाइश होएतह तँ करिहह, नहि तँ तोहूँ घर, उहो घर। (सभ दुआरिपर आबैत छथि।) बलवीर- हरेराम बाबू, कने पुछियौन्ह, की केना विचार भेलन्हि? हरेराम- सुरेश बाबू, की केना विचार भेल? हमरा सभकेँ जल्दी कहु। बड़ विलंब भए रहल अछि। सुरेश- हम िहनका सभकेँ कहलिएनि जे बलवीर बाबू नवका टीचर छथि। ई बेचारा गरीबे छथि। ई आदर्श विआह करताह। ताहुमे ओ कोनो अन्न-छेरू नहि छथि, मुर्ख-गमार नहि छथि जे ठकि लेताह। बेचार लड़िकीबला अपना मुँहसँ कहलाह जे हम जे किछु देबैन से अपन बेटी-जमाएकेँ देबैन ने, किनको आनकेँ देबैन फेर ओ बजलन्हि जे हम ओतेक जरूर देबैन जाहिसँ कोनहुँ पक्षकेँ प्रतिष्ठापर नहि पड़ए। प्रदीप- बस करू। लेन-देनक गप्प खतम करू आओर छेका-छुकीक कार्यक्रम शुरू करू। की यौ दीपक बाबू, गप्प मंजूर अछि की नहि? दीपक- जाउ, अपने सभ जे जेना करिऔक। मंजूर अछि। हरेराम- तहन दीपक बाबू, पुरहितकेँ खबर कएने छी? दीपक- आइ भिनसरे खबर केलिएन्हि। ओ अएलो छथि। कखनो देखने रहियन्हि। कोनाे जजमान ओहिठाम गेल होएताह। हरेराम- कने जल्दी, पुरहितोकेँ देखियौन्ह आ लड़िकोकेँ बजाउ। प्रदीप- जाउ बौआ सोहन, पुरहितकेँ जल्दी ताकि आनू (सोहन अंदर जाइत अछि) प्रदीप- जाउ बौआ सोहन, पुरहितकेँ जल्दी ताकि आनू। (सोहन अंदर जाइत अछि।) बौआ गाेपाल, भैयाकेँ बजाउ। (गोपाल सेहो अंदर जाइत अछि। पहिने पुरहितक संग सेाहनक प्रवेश। पुरहितकेँ सभ कियो साग्रह बैसाबैत छथि। तहन गोपालक संग मोहनक प्रवेश। मोहन सभकेँ गोपालक संग मोहनक प्रवेश। मोहन सभकेँ पएर छुबि प्रणाम करैत छथि आ सभ कियो आशीर्वाद दैत छथिन्ह।) हरेराम- बैसु बौआ। (मोहन बैसि जाइत छथि) की नाम छी? मोहन- मोहन कुमार चौधरी। (ठाढ़ भऽ कऽ) हरेराम- पिता जीक की नाम छी? मोहन- श्री प्रदीप चौधरी। हरेराम- परदादाक नाम की छी। मोहन- (असमंजशमे पड़ि) नहि बुझल अछि। हरेराम- खाइर छोड़ू, कोनो बात नहि। अहाँ करैत की छी? मोहन- दिल्लीमे एक्स-पोर्ट छी। हरेराम- अच्छा, बैस जाउ। (मोहन बैस जाइत) पुरहित, आब अपन कार्यक्रम शुरू कएल जाए। बड़ विलंब भए गेल। बौआ- हँ हँ, हमहुँ दुपहरियामे अएलहुँ। एम्हर-ओम्हर घुमि रहल छलहुँ विलंब देखि। आउ बौआ पीढ़िया बैसू। (मोहन पीढ़ियापर आ पुरहित कंबलपर बैसैत छिथि कलशमे पानि छन्हि। बौआ झा दीपकसँ कुश मंगबैत छथि।) सुनू कुटुम सभ, हम विधेटा पुराएव। कारण छेकाकेँ बड़ लेट भए रहल अछि। समए सेहो ठंढ़ी अछि। सुरेश- पंडीजी, अहाँकेँ जे नीक लगए से करू। बौआ- पढ़ु बौआ, ओम श्री गणेशाय नम: -5 मोहन- ओम, श्री गणेशय नम: -5 बौआ- ओम श्री गौरीके शंकराय नम: -5 मोहन- ओम श्री गौरीके शंकराय नम: -5 बौआ- ओम, श्री बराय नम: -5 मोहन- ओम, श्री बराय नम: -5 बौआ- ओम, श्री कन्याय नम: -5 माेहन- ओम, श्री कन्याय नम: -5 बौआ- अोम श्री शुभ िबयाहै नम: -5 मोहन- अोम श्री शुभ िबयाहै नम: -5 (अन्दरमे छेकाक गीत भए रहल अछि छेकाक डाली मोहनक दुनू हाथमे गंगाराम देलखिन।) बौआ- बौआ जाउ, डाली गोसाइ लग राखि आउ। (मोहन सभकेँ पाएर छुबि गोर लगैत छथि कुटुम सभ हुनका गोर लगाइ दैत छथि।) दीपक बाबू, हमरा दक्षिणा दिअ। हमरा बड़ विलंब भए रहल अछि। दीपक- भोजन-साजन कए लिअ आ रातिमे एतै विश्राम करू। बौआ- भोजन-साजन कए लेब, से संभव अछि। मुदा रात्रि विश्राम असंभव अछि। यौ बाबू हमर कन्या बड़ डरबुक छथि। बिना हमरा रहने हुनका नीने नहि होइत छनि। प्रदीप- बलवीर बाबू, अहाँ विआह कहिया करए चाहैत छी? बलवीर- अहाँ जहिया करू। प्रदीप- पंडीजी, कने बिआहक दिन देखियौक। (पंडिजी पतरा देखैत छथि।) बौआ- काल्हुक दिन अछि। परसुओक दिन अछि। चारम-पाँचम-छठम दिन नहि अछि। फेर सातम दिन अछि। (एक सए टका लऽ कऽ प्रस्थान) प्रदीप- बलवीर बाबू, अहाँकेँ कोन दिन पसीन अछि? बलवीर- हम बेटीबला छी। हमरा बड ओरियान करए पड़त। हम सातम दिनका विआहक दिन मंजूर करैत छी। प्रदीप- बेस, बिआहक दिन फैनल भए गेल, सातम दिनका। गोपाल कने भोजनक जुगार देखहक। गोपाल- (गोपाल अन्दर जा कऽ आबि) चाचा भोजन तँ तैयार अछि। भोजन सराए रहल अछि। प्रदीप- हरेराम बाबू, चलै-चलू भोजन करए। सोहन बौआ, लोटा आ बाल्टीनमे पानि नेने आउ। (सोहन अन्दरसँ बाल्टीनमे पानि आनैत छथि।) कुर्रा- उर्रा करै जाइ-जाउ सरकार। (सभ कियो कुर्रा कए तैयार छथि।) चलै चलू भोजनमे। (सबहक प्रस्थान) पटाक्षेप दृश्य पाँचिम- (स्थान बलवीर चौधरीक आवास। बियाहक तैयारी पूर्ण भए गेल अछि। जयमालाक मंच तैयार आ सजल अछि। मचक आगू बाल्टीनमे लोटा आ पानि अछि। कुर्सीपर गंगा राम चौधरी बैसि कऽ आेङहा रहल छथि।) गंगाराम- (नीनमे) हमहुँ बेटाक वियाह करब। दहेजमे एगो उजरा आ एगो करिया बत्तु लेब। ठाँठ बकरी लेब सेहो जरसी। कनिया लेल कानमे बुलकी लेब। अपना लेल एगो फाटलो-चिटलो कनिया लेब। बाआ लेले एगो गदहा लेब। अपना कनिया लेल ठोररंगा लेब। एगो मोचना लेब। ओहिसँ अपन कनियाकेँ सौंसे देहक केश उखारि देबैन। आओर नगद एगारह लाख एगारह सए टाका, डालीमे एक लाख मच्छर आ समधी मिलानमे एक हजार एक उड़ीश लेब। आओर पुतौह लेल.....। (चन्देश्वर चौधरीक प्रवेश) चन्देश्वर- गंगा राम, गंगा राम, रओ गंगा राम। (गंगाराम फुरफुरा कऽ उठि खसैत-पड़ैत) गंगाराम- जी भैया, जी भैया, केम्हर गेलीह भौजी? चन्देश्वर- सपनाइत छेँ की? गंगाराम- नहि भैया, अपन बेटाक छेकामे गेल रही। चन्देश्वर- नीन तोड़ू मुँह-हाथ धोउ। (अन्दरसँ दुइ-चारिटा बमक आवाज होइत अछि।) गंगाराम लगैत अछथ् बरयाती आबि रहल अछि। गंगाराम- आबए दियौन। कटहर-चूड़ा खेताह। एतेक अबेर आएल बरयातीकेँ की स्वागत होएत? अपन ठरल-ठरल खाएत आ सिरसिराइत भागत। (बरयातीक प्रवेश। दीपक चौधरी, मोहन चौधरी, सोहन चौधरी, गोपाल चौधरी, प्रदीप कुमार ठाकुरक आ चारि-पाँच हुनक समाजक लोक बरायातीमे आएल छथि। सभ कियो मंचपर विराजमान छथि। पाछू काल सुरेश कामत पहुँचलाह।) दीपक- गोर लगैत छी मामीश्री। सुरेश- नीके रहू भागिन। दीपक- बरयाती अएवाक मोन पड़ि गेल? सुरेश- की करबैक भागिन, असगरूआ छी। छेका दिन समएपर महीसकेँ नहि दुहलहुँ। तेकर फल यएह भेल, महीस निछए गेल। (सरयातीक प्रवेश। हरे राम सिंह, बरवीर चौधरी, गंगाराम चौधरी, चन्देश्वर चौधरी आ हिनक अपन समाजक लोक छथि) हरेराम- (बरयातीसँ) सरकार सब, चरण पखारल जाउ। बड राति भए गेल। हमर समाजक कतेको लोक चलि गेलाह। नश्तो पानि हरेएतैक। जल्दी चरण पखारल जाउ, सरकार सभ। (सभ कियो चरण पखारि कऽ बैसैत छथि। अन्दरसँ गंगाराम शरबत, नश्ता, चाह, पान, बीड़ी सुपारी इत्यादि आनैत छथि। नश्ता-पानि आरामसँ भए रहल अछि। चाय-पानक बाद सरयाती सभ अंदर जाइत छथि। तहन जनानी सभ जयमाला करेवाक लेल अएलीह। ओ सभ पहिने परिछनिक गीत गाबि परिछन कए रहलीह फेर लड़िकाक परिक्रमा करए जयमाला कराबैत छथि। तहन लड़िकी लड़िकाक आरती उतारि आ प्रणाम कऽ आशीर्वाद लय सभ जनानीक संग अंदर जाइत छथि। प्रदीप कुमार ठाकुरक प्रवेश) प्रदीप- (बरयातीसँ) सरकार सभ भोजनमे चलै चलू। हरेराम- चलै चलू,( बरयाती सभ। भोर होमए जा रहल अछि। चलू, चलै चलू। (सबहक प्रस्थान) पटाक्षैप दृश्य छअम- (स्थान-दीपक चौधरी आवास। दलानपर दीपक चिन्तित मुद्रामे बैसल छथि। ललका धोती ओ बदामी कुरता पहिरने छथि। तखनहि दीपकक एकटा पड़ोसीक प्रवेश जनिक नाम झामलाल महतो छन्हि। झामलाल- (दीपकसँ) की यौ दीपक बाबू, बड़ मनहुस देखि रहल छी। की कारण थिकैक। दीपक- नहि कोनो खास बात। झामलाल- जखन कोनो खास बात नहि अछि तखन एना चिन्तित किएक छी? हमरा लागि रहल अछि जे समधीन अहाँकेँ अपन ओजारसँ घरमे बन्द कए थुरलन्हि। दीपक- छोड़ू मजाक-तजाक। एखन हमरा अनसोहाँत नीक नहि लागैत अछि। गूड़क मारि धोकरे जानैत अछि। अपन हारल बौहक मारल छी झामलाल- समधीन रातिमे गरम दूध नहि पीएलन्हि? दीपक- किएक कप्पार खाइत छी? चुपचाप बैसू। झामलाल- चुपचाप हम किएक बैसब? हम अहीं जेकाँ बौहक मारल छी क? दीपक बाबू, चिन्ता फीकीर छोड़ू। कहु की भए गेल? (हँसि कऽ) दीपक- अहाँ नहिए मानब की? झामलाल- कोना मानब? हम किनको उदास देखैले नहि चाहैत छी। ताहुमे अहाँ पड़ोसी िथकहुँ। हरदम प्रसन्न रहू, प्रसन्न। दीपक- की प्रसन्न रहब झामलाल? मामापर पूर्ण विश्वास कए ई कुटमैटी कएलहुँ। मामा गरदनिमे फाँस लगा देलक। झामलाल- से की? दीपक- यएह जे सोन सनक बेटाकेँ टलहा सनक स्वागत नहि नगद, नहि बरतन, नहि बासन, नहि कपड़ा, नहि लत्ता, नहि लकड़ी, नहि बकरी, नहि डाली, नहि हारी, नहि बिदाइ, नहि गोर लगाइ। सभ किछुमे ठक-ठक सीताराम। झामलाल- ई तँ साफे ठकि लेलनि कुटुम। अहाँ एहेन खतम छी, से नहि बुझल छल। दीपक- देलनि कुटुम सभ किछु। मुदा जत्तऽ एक लाख होएबाक चाही ओत्तऽ सिरीफ एक सए। दूधक डारही। झामलाल- बहुते भेटल दीपक बाबू बहुते। बेचारा नवका मास्टर छथि। जे हुनका संभव भेलनि, से सभ किछु देलनि आ अहींक बेटा कोनो हाकिम-हुकुम छथि की? छेाड़ू लेन-दन, दहेज-तहेज। कहु लड़िकी केहेन भेटल? दीपक- हँ ई पुछलहुँ खल से। (प्रसन्न भए) लड़िकी तँ सौंसे गाममे एहेन सुन्नरि नहि हेतीह। हजारोमे नहि लाखमे एगो छथि। देखबनि तँ जीसँ पानि खसि पड़त। झामलाल- तहन अहाँ हारल नहि छी, जीतल छी। बाजी मारि लेने छी एहि अल्ट्रसाउण्डक जुगमे। देखब, किछु दिनक बाद बेटी बिलुप्त भए जेतीह। सौं कतउ- कतउ भेटबो करतीह तँ ओकरा बाबा डिहबार जेकाँ पूजा करए पड़त। एहि देहेजक जुगमे ओ अल्ट्रासाउण्डक जुगमे बेटी बनि जाएत पीर मियां। अोहिमे अहाँ एखन धरि छक्का मारने छी। दीपक- से तँ जे कही। मुदा दहेजक लोभमे करजा कऽ कए धुमधामसँ बेटा बियाहलहुँ। ओहिमे भेटल डपोरशंख। हम एहि चिन्तेँ मरि जाएब। झामलाल- हम तँ अहाँकेँ कहब जे भगवतीपर भरोसा राखी आ हरदम प्रसन्न रही। मुदा अपनेक जे विचार? हम जए रहल छी दीपक बाबू। हमरा पोखरि दिशि लागि गेल अछि। हमरा गोटेक सप्ताहसँ सुलबाइ भए रहल अछि। दीपक- तहन जल्दी जाउ पोखरि दिशि। (झामलाल धोती पकड़ने भागलथि) तेँ बड़ी कालसँ पहकैत छल। नाक नहि देल जाइत छल। (फेर चिन्तित मुद्रामे बैसैत छथि) एहेन बुझितहुँ तँ बेटाक बियाह नहि करितहुँ। सोचने रही जे ओ जमीन कीनि कऽ मकान बनैबतहुँ ओ करजा-बरजा झारितहुँ। मुदा आब तँ करजो सधेनाइ मुश्किल। एक तँ हम बेमार रहैत छी आ दोसर माथपर करजाक बोझ आब हम एहि बेत्थेँ मरि जाएब, लागि रहल अछि। *पटाक्षेप* अंक तेसर, दृश्य पहिल (स्थान- दीपक चौधरीक घर। दीपक रोगग्रस्त अवस्थामे माथपर हाथ लेने बैस कऽ खांसि रहल छथि।) दीपक : (खासैत) आह! ओह! दुनियाँमे कियो ककरो नहि कियो देखनिहार। जा धरि पैरूख छल, ताधरि झूठ-फूस, एम्हर ओम्हर कए बेटा बियाहलहुँ। मुदा आब कतौ कियो नहि। (खांसैत छथि) (महेन्द्र पंडितक प्रवेश) महेन्द्र : दोस, बड गड़बड़ स्थितिमे देखि रहल छी अहाँकेँ। एना किएक? की भए रहल गेल? दीपक : की हएत दोस? कप्पारमे जे धँसल अछि। सएह ने होएत। (खांसैत छथि) महेन्द्र : बड खाेंखी होइत अछि। दीपक : की कहु दोस, दम्मा जोर कए देलक। एक्को रत्ती सक्क नहि लगैत अछि। ताहिपर सँ भनसा-भात अपने केनाइ। महेन्द्र : (आश्चर्यसँ) से किएक? आ पुतौह? दीपक : पुतौह गेलीह डिल्ली। बेटा नहि मानलक हमर बात। महेन्द्र : कहु दुनियाँ केहेन छैक? बेटा-बेटी जनमाबैत अदि लोक सुख लए आ आगू दिन लए। दीपक : मुदा हमर बेटा स्वार्थमे लीन छथि। आब हम ओकर के? दुश्मने ने। महेन्द्र : एगो गप्प कहु दाेस। दीपक : अवस्स कहुँ। महेन्द्र : झांपि-तोपि कऽ दोसर बियाह कए लिअ। दीपक : मोन तँ होइत अछि दोस। मुदा आब एहि उमरमे लोक की कहत? महेन्द्र : लोक की कहत? कियो एक्को सांझ भनसा बनाए देतीह की? दीपक : ई तँ सपनोमे नहि देखि सकैत छी। अपन जनमल तँ अपन होइते नहि अछि आ दोसरक कोन आशा? महेन्द्र : छोड़ू ई सभ लटारम। दोसर बियाह कए लिअ सभ अपना-अपना लेल हरान अछि। दीपक : (मुँह चटपटबैत आ खांसैत) दोस, मोन तँ बड्ड होइत अिछ। मुदा नहि, बाबाजी थिकहुँ। लोक की कहत? हम सरस्वती माताक समक्ष सत्त कएने रही। सत्तकेँ हम तोड़िओ सकैत छी। मुदा नहि नहि नहि। महेन्द्र : नहि तँ दोसर बेटेकेँ बियाहि लिअ। दीपक : हँ, ई भए सकैत अछि। मोहना तँ गेल आब सोहना जे करए। अहाँक नजरिमे दोस, कोनो लैड़की अछि? महेन्द्र : एखन नहि अछि। ओना लैड़कीक बड्ड अभावो भए गेल अछि। जदि नजरिमे आबि जाएत तँ अवस्स कहब। एखन जए रहल छी अपन समधीयौर। समधीनकेँ शंकरजी जनम लेलथिन। दीपक : बेस, तहन जाउ, शंकर जीकेँ दरशन करू गे। (महेन्द्रक प्रस्थान। दीपक खांसैत-खांसैत बेदम भए जाइत छथि।) पटाक्षेप दृश्य- दोसर (स्थान- दिल्ली। मोहन ओ मंजू बिछौनपर आराम करैत छथि। मुर्गाक बाङ सुनि मंजू उठि कऽ अपन पतिक सेवा कए रहल छथि आ किछु गप-सप्प सेहो कए रहल छथि।) मंजू : (चिट्ठी निकालि कऽ दैत) स्वामी जी, पिताजीक चिट्ठी काल्हि सांक्षमे अएल छल। लिअ। मोहन : कने पढ़ियौक ने, की लिखलन्हि अछि। मंजू : (चिट्ठी पढ़ैत छथि) चिरंजीवी बौआ मोहन, शुभ आशीर्वाद। हमरा बेटा जनमा कऽ की भेल? दम्मासँ तबाह छी। कियो पूछैबला नहि। सोहना ओ गोपला सदिखन नरहेर जकाँ एम्हर-ओम्हर करैत रहैत अछि। तोरा बियाहि कऽ हमरा की भेटल। हँ, एकटा चीज अवस्स भेटल, चिन्ता। खाइर कतउ रहू, नीके रहु। मोहन : (मंजूसँ चिट्ठी लऽ कऽ फंेकैत) जेहेन करनी तेहन भरनी। देखैत छेलिएनि जे भरि दिनमे एक-एक मुट्ठा बीड़ी पीबि जाइत छथि। तहिपर सँ गांजा सेहो धुकैत छथि। एकर फल हुनका नहि भेटतनि तँ ककरा भेटतनि। मंजू : स्वीमी, मुदा छथिन्ह तँ ओ जनम दाता। की कहबैन आब हुनका। बुढ़े जकाँ छथि। तहुपर सँ दम्माक तबाही। स्वामीजी, हमर विचार अछि जे दुइ-चारि दिन लेल गाम चलू आ पिता जीकेँ देखि आबी। हुनको मोनमे संतोष हेतन्हि। मोहन : भोरहि भोर हमरा मोन नहि खिसीआउ। गाम जेबामे माल-पानी खरचा होइत छैक की नहि। बापबला रखने छी तँ चलू। मंजू : (शांत भऽ) जे कहलहुँ से गलती कएलहुँ। मोहन : एखन गाम नहि जाएब। एक्के बेर सोहनक बियाहमे। मंजू : जे मोन हुअए, सहए करू स्वामी। (संजू कुमारीक प्रवेश। संजू अपन पाहुन ओ बहिनकेँ पएर छुबि प्रणाम करैत छथि। दुनू माथपर हाथ दए आशीर्वाद दैत दथिन्हि) मोहन : (संजूसँ) आइ शीताहल नढ़िया जकाँ अहाँ? कोना एतए धरि अहाँ पहुँच पाओलहुँ संजू? संजू : किएक पाहुन, हमरा अहाँ बुरबक बुझैत छी की? अहुँसँ हम काबिल छी, से बुझि लिअ। मोहन : हँ हँ, से तँ अहाँ छी। कहु असगरे कोना-कोना एलहुँ? संजू : गामपर बस धएलहुँ पटना अएलहुँ आ पटनामे राजधानी मकड़ि दिल्ली अएलहुँ। दिल्लीमे टेक्सी पकड़ि अहाँ लग अएलहुँ। नम्बर-पता अहाँ हमरा देनहि रही। मोहन : खाइर एतेक अचानक अहाँक अएबाक कारण? संजू : 26 जनवरी नजदीक छैक। ओहिमे परेड देखए हेतु प्रोग्राम अचानक बनि गेल। मंजू : एहि बीिच लाल किला, इंडिया गेट, ताजमहल, लोटस टेम्पल, चिड़िया घर इत्यादि पाहुन सेहो देखाए आनथुन्ह। आब बुच्ची अहाँ कहिया आएब कहिया नहि। मोहन : संजू, आब अहाँ बड़ीटा भए गेलहुँ। बियाहमे कनिएटा रही। संजू : अहाँक विचारसँ हम सभ िदन कनिएटा रही? मोहन : हँ हँ सएह बुझु। नमहर भेलासँ अहुँकेँ दीदी जकाँ बियाह करए पड़त। बाप-माएकेँ बड्ड खरचा करए पड़त। तैयो बाप-माएकेँ छोड़ि परघर चलि जाएब। नहि तँ हमरे लग सभ दिन रहि जाउ ने संजू। संजू : एगोमे सुखए कऽ संठी भए गेलहुँ आ दोसरकेँ राखैत छी। डाँरमे दम अछि पहिने? केहेन-केहेन गेल्ला तँ मोंछबला एल्ला। एक्के ठुस्सी मारब तँ मुँह भसकि कऽ पेटमे चलि जाएत। मंजू : छोड़ू बुच्ची मजाक-तजाक। काल्हि अहाँ पाहुन संगे घुमै लए चलि जाएब। पटाक्षेप दृश्य- तेसर (स्थान- दीपक चौधरीक घर। दीपक खांसी करैत आ हकमैत बैसल छथि।) दीपक : बेटा, बड़का बेटा चिट्ठीक कोनो जबाबो नहि पठेलन्हि। हमर आब कोनो ठेकान नहि। कखन छी, कखन नहि। बेमारी बड जोर कएने जा रहल अछि। (खांसी करैत-करैत बेदम भए जाइ छथि फेर ओ बीड़ी पीबैत छथि।) सोचने रही जे मझिला बेटाक बियाह कए ली जीबतहि। मुदा हएत की नहि, से कहब कठिन। (प्रदीप कुमार ठाकुरक प्रवेश) प्रदीप : दीपक बाबू, अहाँक हालत बड खराब देखै छी। दीपक : (कलपि कऽ) सर परणाम। प्रदीप : प्रणाम-प्रणाम। दीपक : सर, हम सोचैत रही जे अपना जीबैत बेटा सभकेँ बियाहि ली। मुदा लगैत अछि जे हएत नहि। प्रदीप : से किएक नहि होएत? हिम्मत जुनि हारू। दीपक : हिम्मत की हारब सर। अहु अवस्थामे लड़िकी लेल घुमैत-घुमैत, बौआइत-बौआइत, छिछिआइत-छिछिआइत नवका जूताक शोल खिआ गेल जत्तऽ जाउ बेटो, जत्तऽ जाउ बेटे। प्रदीप : हँ, ई तँ बड़का समस्या अछि लड़िका तँ लड़िकासँ बियाह नहि करत आ लड़िकी भेटैत नहि अछि। दीपक बाबू, बुझैत छिऐक ई किएक भए रहल अछि? दहेज करणे। दहेज दुिनयाक संतुलनकेँ बिगारि देलक आ बिगारि देत। जुग अल्ट्रासाउण्डक भए गेलैए लोक अल्ट्रासाउण्ड करा कऽ बेटीकेँ जेना-तेना नष्ट कऽ दैत छथि। तहन बेटी वा लड़िकी कत्तसँ कत्तसँ आओत? की लड़िकी बरखामे खसत? दीपक : सर, हमहुँ ओहि अल्ट्रासाउण्डक मारल छी। कोनो लड़िकी अहाँक नजरिमे नहि अछि। प्रदीप : हँ यौ। दीपक : जय भगवान, जाय भगवती। कहु कत्त? प्रदीप : (मोन पाड़ैत) यौ बेलौकमे एक दिन कियो कहने रहथि जे एगो हमरा बियाहैवाली बेटी अछि। (नाक छुबैत) हँ हँ, आब मोन पड़ि गेल। ओ छलाह- हरिश्चन्द्र चौधरी। हुनका एक्केटा बेटीए छनि, बेटा-तेटा नहि। दीपक : सर, तहन जल्दी बुझिऔक ने। सर, तहन तँ ओ माल-पानी बढ़िया खरच करताह। प्रदीप : अहाँ बड लोभी छी। सदिखन माल-पानीक जुगारमे रहैत छी। पहिने हमरा बुझऽ दिअ जे लड़िकी छन्हिेँ वा उठि गेलीह। अच्छा रूकु हम घर जाकऽ झामलाल महतोकेँ हुनका ओहिठाम पठबैत छी। हँ की नहि, से हुनके दिया समाद पठा दैत छी। अहाँ असथिर रहु। (प्रदीपक प्रस्थान दीपक खूब खांसैत-खासैत परेशान छथि।) दीपक : बड़का बेटामे तँ सोलहन्नी ठकाए गेलहुँ। मुदा मझिलामे सुधि-मुरि ओसुलि लेब। आखिर एक्केटा बेटी छनि आ बेटा छन्हिें नहि हुनका। हुनक सभटा संपत्ति हमरे होएबाक चाही। (खांसैत-खांसैत परेशान) (झामलालक प्रवेश) झामलाल : दीपक बाबू, प्रदीप भैया हमरा हिरश्चन्द्रक ओहिठाम लड़िकीक संबंधमे पठौने रहथि। हरिश्चन्द्र बाबूक एखन धरि कुमारिए छथि। मुदा हरिश्चन्द्र बाबूक मोन बड्ड अगघाएल देखलियन्हि। पाँचटा कुटुमकेँ गप-सप्प करैत सेहो देखलिएन्हि। ओ हमरा कहलनि जे हुनका जरूरी हेतनि तँ ओ हमरहि एहिठाम आबि गप-सप्प करताह। हमरा भरि सएओ कुटुम आबैत छथि। हमरा पानि छोड़ि कऽ किछु नहि लगैत अछि। सभटा कुटुमे लेने आबैत छथि। दीपक : एहेन बात कहलनि ओ? झामलाल : हँ यौ दीपक बाबू, हम अहाँकेँ फुसि किएक कहब? हमरा ओहिसँ की फेदा? अन्तमे ओ कहलनि जे पियासल इनार लग जाइत अछि, इनार पियासल लग नहि। दीपक : हारल नटुआ झुटका बिछए। काल्हि हमरा लोकनि हुनका ओहिठाम जाएब। नऽ छऽ कएने आएब। कम्मो-सम्मोमे पटटैक तँ हमरा केनाइ परम आवश्यक अछि। पटाक्षेप दृश्य- चारिम (स्थान- हरिश्चन्द्रक चौधरीक घर। हरिश्चन्द्र चौधरी ओ रमण कुमार दलानपर कुर्सीपर बैसि शालिनीक बयाहक संबंधमे गप-सप्प करैत छथि। रमण कुमार हरिश्चन्द्रक मुखिया छथि।) हरिश्चन्द्रक : मुखिया जी, शालिनीक बियाह हेतु लड़िकाबला सभ हमरा नाकोदम कए देने छथि। एखन धरि सैकड़ौ लड़िकाबला हमरा एहिठाम आबि कऽ गेलाह। मुदा हँ किनको नहि कहलियन्हि। रमण- हरिश्चन्द्र जी, सभ दिन होत न एक समाना। कोनो समए छल जाहिमे लड़ककीबला लड़िकाबलाकेँ खुशामद करैत छलाह। मुदा आब एहेन समए आबि गेल अछि जाहिमे लड़िकाबला लड़िकीबलाकेॅँ खुशामद करैत छथि। आ एखन किछु नहि भेल। आगु देखब की-की होइत अछि? (दीपक चाधरी, प्रदीप कुमार ठाकुर, सुरेश कामत, महेन्द्र पंडित अो झामलाल महतोक प्रवेश। हरिश्चन्द्र ओ रमण ठाढ़ भऽ कऽ हिनका लोकनिकेँ बैसाबैत छथि। दुनू पक्षसँ नमस्कार पाती होइत छनि। सभ िकयो बैस कऽ गप-सप्प करैत छथि।) रमण : (प्रदीपसँ) प्रदीप बाबू, कहु की हाल-चाल? प्रदीप : सरस्वती माताक कृपासँ बड़-बढ़िया हाल-चाल अछि आओर अपनेक हाल-चाल? रमण : सभ आनन्द अछि। प्रदीप बाबू, लड़िकाक बाप के छथि? प्रदीप : (दीपक दिशि इशारा करैत) ओ छथि, दीपक चौधरी। दीपक : हम छी सरकार, नमस्कार। रमण : नमस्कार, नमस्कार। दीपक बाबू, अहाँकेँ लड़िकी पसीन छथि? दीपक : हँ, हम एगो विश्वसनीय सूत्रसँ बुझि लड़िकीसँ संतुष्ट छी। रमण : हरिशचन्द्रजी, अपनेकेँ लड़िका पसीन छथि? हरिश्चन्द्र : हँ, हमरो बेलॉकमे प्रदीपे बाबू कहने छलाह जे दीपक बाबूकेँ लड़िका बड नीक छथि। हम हिनकेपर पूर्ण विश्वास राखि लड़िकाकेँ बड नीक मानलहुँ। रमण : यानी दुनू तरफसँ लड़िका-लड़िकी पसीन छथि। तहन दीपक बाबू, बाजू केना की बियाह-दान करब। बेचारा हरिश्चन्द्र बड गरीब छथि। कौहना कऽ ई बेटीकेँ पढ़ौलनि। सुरेश : तैयो किछु बजताह ने हरिश्चनद्र बाबू जे की केना ख्रच करब? हरिश्चन्द्र : हम किछु नहि बाजब। बजताह मुखिए जी। हमरा संबंधमे हुनका सभ किछु बुझल छन्हि। रमण : हरिश्चन्द्र बाबू खरच करताह। जदि अपने लोकनि ई बुझि कऽ आएल छी तहन अपने सभकेँ ई गरीबक कुटमैती नहि भेल। दीपक बाबू, अपन बेटाक बियाहमे की केना खरच करताह से बाजथु। सुरेश: दीपक बाबू की बजताह? ओ तँ अपने सबहक सवाल सुनि दंग छथि। महेन्द्र : यौ सुरेश बाबू, हरिश्चन्द्र बाबू छिरहारा खेलाइ छथि। डुबि कऽ पानि पीबै छथि। हरिश्चन्द्र : हरिश्चन्द्र बाबू डुबि कऽ पानि की पीताह? रहए तँ छपाए नहि, नहि रहए तँ बिकाइ नहि। महेन्द्र : नहि रहए तँ बेटी बियाहए लेल किएक चललहुँ। झामलाल : महेन्द्र बाबू ठीक कहैत छथि। बेटीक बियाह टिटकारीसँ नहि होइत अछि। डाँर मजगूत चाही। हरिश्चन्द्र : जदि अहींक डाँर मजगूत अछि तँ बेटा बियाहि लिअ आनठाम। (बिगरि कऽ) प्रदीप : अपने सभ शांत रहु। हल्ला-गुल्ला जुनि करू। मुखियाजी, अपने किछु साकारात्मक बात बाजू। रमण : हमरा समएक बड अभाव अछि। हम एक बेर बाजि दैत छी- जदि दीपक बाबू गोटेक लाख टका खरच करताह तहन ई लड़की हिनका होएतन्हि। नहि तँ असंभव। एहि अल्ट्रासाउण्डक जुगमे बेटीक बड बेसी अभाव अछि आ बेटाक कोनो अभाव नहि अछि। प्रदीप : मुखियाजी, हमरा लोकनि एक मिनटमे विचारि कऽ कहि दैत छी। (प्रदीप, दीपक ओ सुरेश अन्दरमे जा कऽ गप-सप्प करैत छथि।) सुरेश : आब ओ जमाना नहि रहि गेल जहिमे बेटीबलाकेँ बेटाबला दहेजमे कुहरा दैत छलाह। अल्ट्रासाउण्डक युगमे बेटीक बड अभाव भऽ गेल अछि आओर बेटाबलाकेँ बिआहनाइ मजबूरी अछि तेँ भागीन, हरिश्चन्द्र बाबू कमसँ कम एकाबन हजार टाका तोरासँ लेबे करथुन। प्रदीप : दीपक बाबू, मामाश्री ठीके कहैत छथि। एकाबनमे ई कुटमैती फाइनल कऽ लिअ। दीपक : सर, अपने सभ जे जेना कहबैक से हमरा मान्य होएत। चलु फाइनल कऽ लिअ। (प्रदीप, दीपक, ओ सुरेशक प्रवेश।) रमण : बाजल जाउ प्रदीप बाबू, की केना विचर भेलैक।द्य प्रदीप : दीपक बाबूक ओतेक बढ़िया नहि अछि। ओ मात्र अहाँकेँ एकतीस हजार टाका देताह। रमण : तहन ई कुटमैती अपने सभकेँ नहि भेल। जदि एकावन हजार टाका अपने सभ दऽ सकबनि हतन कुटमैती होएत नहि तँ जय रामजी की। सुरेश : बेस हमरा लोकनि मािन लेलहुँ। रमण : मानि लेलहुँ तँ एखन लड़िकीकेँ चढेबैक की बादमे? सुरेश : बियाहेमे चढ़ए लेब। रमण : दीपक बाबू, बात पक्का। दीकप : हँ यौ मुखियाजी पक्का नहि तँ कच्चा। रमण : प्रदीप बाबू गाइरेन्टर अहींक होमए पड़त। प्रदीप : बेस, हम तँ छिहे। रमण : तहन हरिश्चन्द्र बाबू, चाय-पान-नास्ताक ओरिआन जल्दी करू। (हरिश्चन्द्र अन्दरसँ चाय-पान-नास्ता अनैत छथि। सभ कियो नास्ता, चाय, पान करैत छथि। फेर हाथ मुँह धोइ कऽ सभ कियो अंतीम गप-सप्प करै छथि।) बियाह कहिया करब दीपक बाबू? दीपक : जल्दीए राखू। फेर टकोक इन्तजाम करए पड़त ने? दू-चारि दिनमे राखु। आब मुखियाजी चलबाक आज्ञा देल जाउ। रमण : किएक, समधीन अहाँक प्रतीक्षा करैत हेतीह? दीपक : ओ हमरा सनक हजारोकेँ प्रतिदिन प्रतीक्षा करैत छथिन। तहन जय रामजी की, मुखियाजी। रमण : जय रामजी की। (प्रदीप, सुरेश आ दीपकक प्रस्थान नवस्कार-पातीक पश्चात) पटाक्षेप दृश्य- पाँचिम (स्थान- हरिश्चन्द्र चौधरीक घर। शालिनीक बियाहक पूर्ण तैयारी अछि। जयमालाक मंच सजल अछि। मंचपर बाल्टीनमे जल-लोटा राखल अछि। हरिश्चन्द्रक भाए सुरेन्द्र चौधरी असगरे कुरसीपर बैसि कऽ ओङहाइत छथि आ खैनी खा कऽ छीकैत छथि। मुँहसँ खैनी निकलि जाइत अछि। फेर खैनी खा कऽ नोइस लऽ छीकैत छथि।) महेन्द्र : आ ऽ ऽ ऽ छी। धूर सार खैनी। बड़ खच्चर छेँ। बाप लागल छौक। आ ऽ ऽ ऽ छीं। कोन खैनी अछि कोन नहि। शायद बापक जनमल खैनी नहि अछि, मएक जनमल अछि। आऽ ऽ ऽ छीं। हमरा किएक तङ करैत छेँ, बौहकेँ कर गे। एखनहि हमर मुँह नानीए दादीएकेँ उकटि देतौक। आऽ ऽ ऽ छीं। बुझि पड़ैत अछि बरियाती दुआरे एना करैत छें। सार खैनी नहितन। बापक बियाह पितीयाक सगाइ देखेबौक। आऽ ऽ ऽ छीं। लागि रहल अछि जे लड़िकाक माए चलितर बुढवाक संग उरहैर गेल। हम तेरा खेबौक नहि सार। मुदा नहि खेबौक तँ तों कानबें तहन। आऽ ऽ ऽ छीं। खैनीक पितीआइननहि तन। माएसँ बियाह कऽ लेबौक। नहि तँ अपन चालि छोड। आऽ ऽ ऽ छीं। सार खैनी मुँहे दाबि देबौक आ गरदनिमे फँसरी लगाए देबौक। मरलें तँ नॉङ साथी, जीलें तँ नाॅङ साथी। आऽ ऽ ऽ ऽ छीं। हे हे गोर लगैत छिऔक सार पाएर पकड़ैत छऔक सार आब एना करिहें। बेज्जैत भए जाएब। बरयाती आबैत होएत। आऽ ऽ ऽ छीं। हे हे, एक्के बेर छिऔक ने। अन्तिमे ने। हे हे, एकटा पौआ देबौक आइ। गांंजा देबौक। लुङिया मिरचाइ देबौक। कनियाले सुति देबौक। इज्जत बचाह। प्रतिष्ठा राख। तोरा बगैर हम नहि रहि सकैत छी। हे सार खैनी, तोरा बगैर हमर कनियां एक्को क्षण नहि रहि सकैत छथि। हँ, आब सार मानलक। कतेक कौबला-पाती कएलाक बाद। सार खैनी बड बुधियार अछि। मुदा बापसँ भेँट आइ भेलैक। एतेक दिन बापक साँएसँ होइत छेलैक। (भटक्का आबाज करैत छथि। बरयाती सभ अन्दरमे। ई अबाज सुनि महेन्द्र तीन-तीन हाथ छरपैत छथि। डरसँ कोने-कोन नुकाइत छथि। बाप रऔ, माए गै करैत छथि। बाल्टीन माथपर राखैत छथि। एहि तरहेँ बरियातीक प्रवेश होइत छनि। सभकेँ बाप रअौ, माए गै करैत पाएर छुबि प्रणाम करैत छथि। बरयातीमे छथिन्ह- दीपक चौधरी, प्रदीप कुमार ठाकुर, झाामलाल महतो, सुरेश चौधरी, सोहन चौधरी, मोहन चौधरी आओर गोपल चौधरी। चाय-पान-नास्ताक बाद शिघ्र जयमालाक तैयारी होइत अछि। सुरेश : (सुरेन्द्रसँ) सरकार, जय माला शिघ्र करू। महेन्द्र : सरकार, हम सरकार नहि थिकहुँ सरकार सभ अन्दर छथि। मोहन : सरकार सभकेँ बजाए अनियौन्हि। सुरेन्द्र : बेस, बजाए अनैत छिअनि। (अन्दर जा कऽ आबि।) सभ कियो आबि रहला अछि। (हरिश्चन्द्र चौधरी ओ रमण कुमारक प्रवेश। दुनू पक्षसँ नमस्कार पाती भेलनि।) मोहन : (मुखियाजी सँ) मुखियाजी, जय-मालामे किएक बिलंब भए रहल अछि? रमण : हमरा लोकनिक कोनो बिलंब नहि। अहीं सभकेँ बिलंब अछथ्। मोहन : की बिलंब? रमण : यएह जे दीपक बाबू एखन धरि एकावन हजार टाका हरिश्चन्द्र बाबूकेँ नहि देलथिन्ह। दीपक : हइए लिअ एकावन हजार टाका। (प्रदीप दीपकसँ एकावन हजार टाका गिनि कऽ मुखिया जीक हाथमे दऽ दैत छथिन्ह।) रमण : हँ, आब वादा पूर्ण भेल। आब जय-माला अतिशिघ्र होएत। (हरिश्चन्द्र आ रमण अंदर जाइत अछि। पुन: अन्दरसँ जनानी सभ जय-माला कराबए अबैत छथि। समूहमे शालिनी कुमारी, राधा देवी आओर चारि-पाँच गोट अन्य जनानी छथि। ओ सभ परिछन कऽ जय-माला करौलन्हि। शालिनी, सोहनकेँ पाएर छुबि प्रणाम केलनि। सभ जनानी अन्दर जाइत छथि। तहन सुरेन्द्र चौधरीक प्रवेश।) सुरेन्द्र : बरयाती सभ, आऽ ऽ ऽ छीं। (खैनी खा कऽ) सार फेरो आबि गेल। सार निरलज आऽ ऽ ऽ छीं। पतित आऽ ऽ छीं। हे सार, कुटुम स्ीा हँसैत होएत। हे सार प्रतिष्ठा आऽ ऽ ऽ छीं। बचा बचा आऽ ऽ ऽ छीं। हे हे गोर लागऽ दैत छिऔक। हे हे आइ राति नवकी समधीन लग लऽ जेबौक। बात मान। (छींक रूकि जाइत अछि।) हँ सार समधीनक लोभमे बात मानलक। बरियाती सभ भोजन सराए रहल अछि। चलै चलू भोजनमे। (सबहक प्रस्थान) पटाक्षेप दृश्य छअम (स्थान- दीपक चौधरीक घर। दीपक चौधरी दलानपर मोन मारने माथपर हाथ लऽ कऽ बैसल छथि। खोंखी करैत-करैत बेदम भऽ जाइत छथि। काफी हकमैत छथि। बगलमे कोनो बरतनमे राखल छौरपर कफ फेंकैत छथि।) दीपक : हे भगवान, हे भगवती, हे सरस्वती महरानी आब हमरा ऐ दुनियासँ लऽ चलु। (खोंखी करैत) बेमारी हमर चरम सीमापर पहुँचि गेल ऐछ। कियो देखनिहार नै ऐछ। जै बेटाले अपन परम पियारीक जान गमेलहुँ। ओ बेटा कोनो काज जोकर नै। सात बेटा रामके एक्कोगो नै कामकेँ। (खोंखी करैत-करैत बेदम भऽ जाइत छथि। सुरेश कामतक प्रवेश) सुरेश : भागिन बड़ तबाह देख रहल छी। दीपक : हँ मामा। एक तँ बेमारी चरम सीमापर ऐछ आओर दोसर बिआहक कर्जा माथपर अछि। सुरेश : बेटा सभ िकछु नै सम्हरैत छथुन्ह? दीपक : सभ अपना लेल हरान छथि। सभ भाग-बिलासमे लागल छथि। बेटा लेल सभटा कमाएल, धरल-उसारल अल्ट्रासाण्डमे आ पत्नीक दवाइमे बुिक देलौं। सेहो पानिमे चलि गेल। (खोंखी करैत-करैत बेदम भऽ जाइत छथि।) सुरेश : भागिन, अहाँक स्थिति आब बड़ खराब देख रहल छी। आब जीता-जिनगीमे छोटका बेटा केर बिआह कतौ जल्दी कऽ लिअ। करजा-बरजा सधबे करत। बेटा सभकेँ सबहक करजा कहि दियौन्ह। ओ सभ जेना-तेना, बेचो-बिकिन कऽ करजा अदाए करत। दीपक : हमहुँ बैस कऽ सएह झखैत छी। कोनो लड़िकीक सुर-पता ऐछ अहाँकेँ? कएक गोटेकेँ कहलियन्हि। मुदा कियो कहैत छथि जे आब बेटी कत्त? सभ बेटीकेँ लोक अल्ट्रासाउण्ड कराए-कराए कऽ भगवानपुर पठाए देलखिन्ह। आब बेटाक बिआह बड़ मुश्किल ऐछ बड़ मुश्किल। हमरा सभटा दहेजक लोभ घुसरि रहल ऐछ। ऐसँ चिक्कन हमरा भगवान मौत दैतथि। सुरेश : भागीन हरबड़ाउ नै। भगवानपर भरोसा राखू। भगवानक घर देर ऐछ अंधेर नै। लड़िकीक तँ बड़ अभाव ठीके ऐछ। एे परोपट्टामे एक्के गोट लड़िकी ऐछ। दीपक : मामाश्री, ओ किनक बेटी छथिन्ह? सुरेश : ओ छथिन्ह बलवीर चौधरी अहाँक समधि केर छोटकी बेटी। तैपर भरि दिनमे हजारो लड़िकाबला अबैत-जाइत छथि। बड़की पुतौहूवाला गप्प नै बुझिऔ। मझिलीयोसँ भरिगर बुझाएत अहाँकेँ। बड़ करगर फीस छन्हि बलवीर चौधरीक? दीपक : कत्ते लगभग? सुरेश : बलवीर चौधरीकेँ कमसँ कम पाँच लाख टाका नगद आओर सभ श्रमजान चाही लड़िकी-लड़िकाक मनोरथ वास्ते। (सुनिते दीपककेँ चौन्ह आबि जाइ छन्हि। सुरेश गमछासँ हौंकि कऽ शांत करै छथि। सुरेश अन्दरसँ पानि आनि कऽ दीपककेँ मुँह-हाथ धोइले दैत छथिन्ह। दीपक कुर्रा कऽ मुँह-हाथ धोइ कऽ फेर मामा श्रीसँ गप्प करैत छथि।) दीपक : मामाश्री, समधि एतेक पैघ धराह बनि गेलाह मास्टर भऽ कऽ? सुरेश : भागिन, समए बलवान होइ छै। एक दिन गाड़ीपर नाव तँ एक दिन नावए पर गाड़ी। सदा साहिबी किनको रहलैए? कहबी ऐछ सभ दिन होत न एक समाना। दीपक : मामाश्री, समधि हमरो किछु कम करताह की नै? सुरेश : आखिर ओ अहाँक समधि छथि। किछु कम अवस्य करबाक चाही। दीपक : तहन चलू मामाश्री काल्हि। जदि पटि-सटि गेल तहन छोटको बेटाकेँ कऽ लेब। हमरा मूइला बाद हमरा बेटाकेँ बिआह के करौताह? दर-दियाद केकरा के होइत छैक? सुरेश : भागिन, काल्हि भोरे समधि ओइठाम चलू। काल्हि धरि लड़किकेँ कोनो फैनल नै भेल छल, से हमरा पूर्ण पता ऐछ। दीपक : सबेरे जाएब तहन ने काज बनत। नै तँ समधि किनको जुबान दऽ देलखिन्ह तहन भेल आफद। सुरेश : भागिन, काल्हि भोरसँ भोर अहाँ हमरा ऐठाम चलि आएब। ता हम चलैत छी। (दीपक सुरेशकेँ पएर छुबि प्रणाम करैत छथि। सुरेशक प्रस्थान) दीपक : (खोंखी करैत-करैत बेदम भऽ जाइत छथि।) लागि रहल ऐछ जे ई बिआह हम देखब की नै। आगू माँ सरस्वतीक किरपा। पटाक्षेप दृश्य सातम (स्थान- सुरेश कामतक घर। भोरहि भोर दीपक चौधरी मामाश्री ओइठाम पहुँचलाह) दीपक : मामा, मामा, यौ मामा, मामा यौ। सुरेश : (अन्दरसँ) हँ भागिन, हइए अएलहुँ। शीघ्र आबि रहलहुँ अछि। (किछु बिलंब भए जाइत छन्हि सुरेशकेँ। तहन दीपक अन्दर जा कऽ। दीपक : मामी, मामी, अहाँ मामाकेँ जल्दी किएक नै छोड़ैत छिऐ? ओतेक कसि कऽ पकड़नाइ होइ छै? आउ मामा, जल्दी आउ। हम दलानपर छी। सुरेश : चलू बैसू तुरन्त अएलहुँ। (दीपक दलानपर बैसल छथि। किछुए काल बाद सुरेशक प्रवेश) चलू भागिन, बड़ बिलंब भए गेल। (दीपक ओ सुरेश बलवीरक ओइठाम जा रहला अछि। किछु देरमे बलवीर चौधरीक ओइठाम दुनू गोटे पहुँचि कऽ दलानपर बैसलाह।) सुरेश : घरवारी थिकहुँ। यौ घरवारी। घरवारी। दीपक : छोड़ि दिऔन मामाश्री समधिकेँ। ओ अखन समधीन लग हेथिन। बलवीर : (अन्दरसँ) समधीन लग छेलहुँ ठीके मुदा आब नै छी। एक क्षणमे आबि रहल छी। (दूटा लोटामे पानि लऽ कऽ बलवीरक प्रवेश। सभ िकयो आपसमे नमस्कार पाती करैत छथि। पएर-हाथ धोइ कऽ सुरेश ओ दीपक कुरसीपर बैसैत छथि।) सुरेश : बलवीर बाबू, हमरा लोकनि किछु उद्देश्यसँ आएल छी। ओइ उद्देश्यक पूर्ति अहींक हाथमे अछि। बलवीर : बाजल जाउ, की उद्देश्य अछि अपने सभकेँ। सुरेश : यएह जे अपन छोटकी बुच्चीक विआह दीपक बाबूक छोटका बेटासँ करू। बेचारा समधि अस्वस्थ रहैत छथि। अपन जीता-जिनगी ओ छोटका बेटाकेँ सेहो निमाहि देमए चाहैत छथि। हिनका लड़िकी नै भेट रहल छन्हि। हािर कऽ ओ ऐ उद्देश्यसँ अपनेक दुआरिपर अएलाह अछि। बलवीर : समधि, उद्देश्य किनको खराब नै होइत। मुदा संबंधीमे कुटमैती नीक नै होइत अछि। दीपक : समधि, अपनेक ई कथन बिल्कुल ठीक अछि। मुदा मजबूरीक नाम महात्मा गाँधी छिऐक। बलवीर : अहाँक मजबूरीसँ हमरा की मतलब अछि। तैयो समधि बाजू, बेटाक बिआहमे अपने की केना ख्रच-बरच करब। आब सेबकाहा जमाना नै रहि गेल अछि। सुरेश : समधि की खरच करताह? किछु नै। सिरिफ बेटा देताह, लड़िका देताह। आओर हिनका लग किछु छन्हिए नै। बलवीर : समधि, टिटकारीसँ दही कोना जनमत? सुरेश : बलवीर बाबू बाजू, अपनेक लड़िकी हेतु समधिकेँ की सेवा करए पड़त? बलवीर : समधि छथि तँ की कहबनि, जाउ अढ़ाइए लाख नगद दऽ देबनि अलावे लड़िका-लड़िकीक सभ सनोमान। (सुनितहि दीपक अचेत भऽ जाइत छथि। बलवीर अन्दरसँ बेना आनि कऽ सुरेशकेँ दै छथि। सुरेश हुनका बेना हौंकैत छन्हि। दीपक होशमे नै आबैत छथि। फेर बलवीर लोटामे पानि आनैत छथि। अपनेसँ हुनका बलवीर मुँह पोछि दै छथिन्ह। दीपक होशमे आबि नीक जकाँ बेसैत छथि।) समधि, एना किएक भए गेल? दीपक : से नै कहि। ओना ऐ बीचिमे अस्वस्थ रहि रहलहुँ अछि। हम अपनेसँ कल जोड़ि आग्रह करै छी जे अपन बेटी हमरा बेटा हेतु दए दिअ। हम हर तरहेँ मजबूर छी। बलवीर : ओइ बेटीपर मरूकियाबला चारि लाख एकावन हजार टका नगद आओर सभ श्रमजान दए गेलाह। मुदा हम पाँच लाखसँ कम नै केलिएन्हि। खाइर हमर समधि थिकहुँ आ बड़ मजबूर सेहो थिकहुँ। तँए सबा लाख टाका नगद आ लड़िकी-लड़िकाक वास्ते परमावश्यक सभ चीज-बौस। तहने ई कुटमैती संभव अछि। नै तँ जय रामजी की। ऐसँ कम हम अपना बापोकेँ नै करबनि। स्वीकार अछि तँ बाजू नै तँ कुटुमक नाते, समधिक नाते भोजन साजन करू आ चुपचाप बैस आराम करू। दीपक : समधि, हमरा स्वीकार अछि। तहन बाजू, नगद कहिया लेब आ कोना लेब। बलवीर : समधि, अहींक सुविधा। दीपक : बरयाती लऽ कऽ आएब, तहने गिनि देब। बलवीर : बरयाती लऽ कऽ अहाँ आएब? नै नै। हमहीं आएब। तखनहि हमरा नगद गिनि देब। सुरेश : से कोना होएत? लड़िकाबला हम आ बरयाती लऽ कऽ आएब अहाँ? लोक की कहतथि? बलवीर : लोक की कहतथि? समए बलवान होइछ। सभ दिन लकीरक फकीर बनलासँ काज नै चलैबला अछि। जखन जेहेन हवा बहए तखन ओहने पीठि ओरबाक चाही। समधि, ई सुनि लिअ जे बरयाती लऽ कऽ हमहीं आएब, हमहीं आएब। नै तँ कुटमैती नै होएत। सुरेश : जाउ अपनेक जे विचार। बलवीर : हँ हँ, बरयाती साजि कऽ हमहीं आएब। समधि, मंजूर अछि वा नै? दीपक : नै मंजूर कएने कोनो गुंंजाइश नै। मंजूर करहि पड़त। बलवीर : से जे बुझी आ जेना बुझी। बरयाती हम परसुए आबि रहल आबि रहल छी। परसु अन्तिमहि लगन अछि। दीपक : जेना पदाउ समधि, मादहि पड़त। खाइर जय रामजी की। आब जेबाक आज्ञा देल जाउ। बलवीर : आब जेबाक बेर नै रहि गेल अछि। भोजन-साजन करू आ विश्राम करू। दीपक : नै समधि, बियाहक ओरियान केनाइ अछि। दिन साफे नै अछि। हम जाइ छी। जय रामजी की। (नमस्कार-पातीक पश्चात् दीपक ओ सुरेश प्रस्थान करैत) पटाक्षेप दृश्य- आठम (स्थान- दीपक चौधरीक आवास। गोपालक विआहक तैय्यारी पूर्ण भए गेल अछि। जयामालाक मंच सजल-धजल अछि। दीपक आओर प्रदीप जयमाला-मंचक लगमे राखल कुर्सीपर बैस कऽ गप-सप्प करैत छथि।) प्रदीप : दीपक बाबू, सुनलौं अनरीतक रीत। ठीके गप छी की? दीपक : बिल्कूल ठीक अछि। हम की कए सकै छलौं? मनुष्य परिस्थितिक दास थिकै। प्रदीप : हँ, ई बात तँ सदा सत्य अछि जे समए किनको नै छोड़लनि आ नै छोड़त। खाइर होनीकेँ कियो नै रोकि सकैछ। दीपक बाबू, एखन धरि बलवीर बाबू बरयाती लऽ कऽ नै एलाह। दीपक : अबिते हेताह। बेसी बिलंब करताह तहन बसिऔरा खेताह। (बैंड पार्टीक आवाज सुनि) प्रदीप बाबू, बरआती आबि रहल अिछ। ऐ बीच हम नश्ता-पानि सरिया लै छी। प्रदीप : बेस जाउ। जल्दी करू। (दीपक प्रस्थान करैत छथि। बलवीरक प्रवेश बरिआतीक संग। बरआतीमे संजू लड़िकी छथिन्ह। आअोर गंगाराम, चन्देश्वर ओ हरेराम छथिन्ह। सभ बरिआती कुर्सीपर बैसैत छथि। मोहन ओ सोहन बरिआती बरिआतीकेँ नश्ता-चाह-पान करबैत छै। लड़िका गोपालक जयमाला कराबए अबैत छथि। लड़िकीकेँ चुमा कऽ जयमालाक जोगार करै छथि।) बलवीर : दीपक बाबू, बस करू। ऐसँ आगू जुनि बढ़ू (बिगैर कऽ) (सभ रूकि जाइ छथि।) प्रदीप : किअए नै बिगरब? नगद गिनलथि दीपक बाबू। सवा लाख टाका अखन गिनथु तहन जयमाला करताह। प्रदीप : दीपक बाबू, पहिने बलवीर बाबूकेँ नगद गिनु तहन जयमाला करब। (जयमाला छोड़ि दीपक अन्दरसँ सवालाख टाका आनि बलवीर बाबूकेँ गिनि कऽ दै छथिन्ह। बलवीर रूपैआ लऽ कऽ प्रसन्न छथि।) बलवीर : हँ, आब अपने सभ जयमाला करू। (सभ कियो जयमाला करबै छथि। पहिने लड़िका लड़िकीकेँ जयमाला पहिरौलन्हि। जोरदार तालीक गदगड़ाहटि भेल। लड़िकीबला बिस्कुट चकलेट लुटेलन्हि। लड़िका-लड़िकी मंचपर बैसल छथि। वातावरण बिल्कुल शांत अछि।) समधि, घरपर पार्टीक व्यवस्था पूर्ण भए गेल अछि। यथाशीध्र हमरा लोकनिक विदाइ कऽ दिअ। हमरा लोकनिक िनयम अछि जे लड़िकी-लड़िकीक घर जएताह। फेर एक सप्ताह बाद लड़िका-लड़िकी अहाँक घर आबि स्थायी रूपसँ रहतथि। हरेराम : दीपक बाबू, जल्दी समधी-मिलान कए लिअ। दीपक : सरकार, जे जेना विचार। हरेराम : बलवीर बाबू, जल्दी समधी-मिलन करू। (बलवीर आ दीपक गरदनि मिलि कऽ समधी मिलन कएलन्हि। समधी मिलनमे बलवीर दीपककेँ पच्चीस हजार टाका दै छथिन। बरिआतीक संग लड़िका-लड़िकीक प्रस्थान। आपसमे नमस्का-पाती होइत छन्हि।) पटाक्षेप दृश्य- नवम (स्थान- दीपक चौधरीक आवास। दीपक चौधरी, मोहन चौधरी, मंजू, सोहन चौधरी व शालिनी मंचपर उपस्थित छथि। दीपकक हालत बड्ड गड़बड़ अछि। खोंखी करैत-करैत मरनासन भए जाइत छथि। अन्त कालमे दुनू बेटा-पुतौह हिनक सेवा-सत्कारमे लागल छथि।) दीपक : आइ बुझाए रहल अछि जे हम स्वर्गमे छी। मुदा एहेन पहिने रहितए तँ हमरा चिन्ता नै खैताए। चिन्ते हमर बेमारीकेँ ओते बढ़ाओलक। कहबी ठीके अछि- जे तुकपर नै से कथीदनपर। (खोंखी करैत-करैत बेदम भऽ जाइत छथि।) मंजू : (मोहनसँ) स्वामी, बाबू जीक हालत बड़ खराब छन्हि। जल्दी डाकदरकेँ बजाउ। मोहन : हम अपन बापक हमहीटा बेटा थिकहुँ की? साेहन बाबूकेँ कहिऔन, गोपाल बाबूकेँ कहिऔन। शालिनी : (सोहनसँ) स्वामी, अहीं डाकदरकेँ देखिऔन। सोहन : अहीं देखिऔन ने, बड़ दयालु थिकहुँ तँ। हिस्सा लेताह सभ बराबर-बराबर आ डाकदरकेँ देखिऔ हमहींटा। दीपक : बुझलौं-बुझलौं। अहाँ दुनू भए केहन पितृभक्त थिकहुँ? लोककेँ देखबैबला सेवा कए रहल छी जे हिस्सा कम नै भेटए। अहाँ दुनू भाँइसँ चिक्कन स्वभाव दुनू पुतौह जनीकेँ देख रहल छिअन्हि। मोहन आ सोहन, आब हम नै बाँचब। कने छोटका बेटा आ पुतौहकेँ मुँह देखाए दिअ। मोहन : सोहन, कने गोपाल दुनू परानीकेँ बजाए आनहुन। सोहन : भाइजी, हमरा देखल नै अछि। जदि अपने चलि जइतौं तहन बढ़िया रहितैक। मोहन : बौआ, हमरो नै देखल अछि गोपालक ससुरारि। ओना एक-दू दिनमे गोपाल दुनू परानीक अबैया अछिए। घबरेबाक कोनो काज नै। (दीपक खाेंखी करैत-करैत काफी हकमि रहल छथि) दीपक : आह! ओह!! आब नै बाँचब। छोटका बेटा पुतौहुक मुँह शायद नै देख पाएब। आह! ओह!! आह!! मोहन : बाबू, बाबू, अहाँकेँ की हएत की नै। कतौ किछु धएने-उसारने छी, से हमरा लोकनिकेँ बताए दिअ। दीपक : बौआ सभ, धएल-उसारल तँ किछु नै छौ। मुदा तोरा सबहक बिआहक करजा हमरासँ अदऍं कएल नै भेल। अहीं सभ अदाए कए देब। करजा हम महावीर मालिकसँ लेने छी। मुरि डेढ़ लाख अछि आ सूिदक दर प्रतिशत मासिक अछि। वएह करजा हमरा जान लाए रहल अछि। अहाँ सभ करजा सधेनाइ नै बिसरब। हमर सेवा अहाँ सभ करी वा नै। मोहन : अहाँ पागल कुकुर छी। अहाँक सेवा केनाइ धोर पाप अछि। हमरा सबहक कप्पारपर बड़का बोझ लादि कऽ मरि रहल छी। मंजु : स्वामी, एना बेहोश नै होउ। मोहन: ऐ छोंकरी, होशमे तों रह। गूड़क मारि धोकरा जानत की तों जानमें। सोहन : भैया ठीक कहै छथि एहेन बापकेँ। शालिनी : स्वामी, अहुँ सएह निकललौं बुधियार। सोहन : ऐ बुधयार बापक बेटी, अखन मारैत-मारैत बुढ़बे संग विदा कए देबौ। शालिनी : हँ हँ, किएक नै। अहाँ सनक बुधयारपर कोन भरोस? जे बाबाजी बापकेँ नै देखलनि। दीपक : (खोंखी कऽ) अहाँ सभ एना किअए करै जाइ छी। किनको मानवता नहि अछि। हमरा अहाँ सभ पागल कुकुर कहै छी। अहुँ सभकेँ एक दिन एहेन आओत जइमे अहुँ सभ सुगर भए सकैत छी। बेटा सबहक खातिर हम की की नै केलौं। आ से बेटा आइ हमरा पागल कुकुर कहैत छथि। बेटा सबहक खातिर हम कतेको बेटीकेँ नाश कए देलौं जे बेटा सबहक संपतिमे कोनो घटबी नै होइ। मोहन : अहाँ ठीके कुकुर छी। कुकर्मक फल भोगहि पड़त। बबाजी बनलासँ किछु नै हएत। अहाँ लोभी कुक्कुर छी। दीपक : हँ हँ, जरि-मरि कऽ तोरा सभकेँ एत्तेकटा कए देलिऔ, तेकरे फल हमरा भेटैत अछि। (खोंखी करैत-करैत बेदम छथि। दुनू पुतौह लगमे बैसल छथि आ दुनू बेटा दूरमे बैसल छथि।) आह! आब नै बाँचब। ओह! हे भगवान, आब लऽ चलू। आह! ओहो! आह! आह! (प्रदीपक प्रवेश) प्रदीप : दीपक बाबू, की भए रहल अछि? दीपक : आब नै पुछु सर। आब ऐ दुनियासँ जाए दिअ। प्रदीप : किएक, बेटा सभ इलाज नै करौलनि की? दीपक : ओ सभ हमर इलाज की करौताह? इलाजक बदला हमरा पागल कुक्कुर, लोभी कहैत छथि। कहलियन्हि छोटका बेटा-पुतौहुक मुँह देखए दे, सेहो नै। प्रदीप बाबू, अहाँकेँ मोवाइलमे बलवीर बाबूक नम्बर अछि की? प्रदीप : हँ अछि। हँ कहि दै छिअनि जे जदि अहाँकेँ समधिक मुँह देखबाक अछि तँ जल्दी आउ। आ बेटी-दमादकेँ सेहो लेने आउ। (प्रदीप आ बलवीर मोवाइलसँ गप करै छथि। किछु देर बाद बलवीर गोपाल आ संजूक प्रवेश।) बलवीर : की भए गेल समधि? दीपक : आह! ओह! आब हम जए रहल छी। हमरासँ जे किछु गलती भेल हुअए तकरा माफ करब। गोपाल : बाबूजी, हम कने डाकदरकेँ बजौने अबै छी। दीपक : आब नै बेटा, बेकारमे पाय पािनमे चलि जाएत। संजु : बाबूजी, जए दिऔन। जे होनी हेतै से हएत। अपन कर्त्तव्य करबाक चाही। दीपक : बेस जाउ गोपाल। मुदा फेदा नै हएत। (गोपाल डाक्टर प्रेमनाथ मेहताकेँ अनैत छथि। डाक्टर आला लगा कऽ चेक करैत छथि। आँखिमे टॉर्च बारि कऽ देखैत छथि।) प्रेमनाथ : अहाँक पेसेन्ट सम्हरैबला नै अछि। हिनका अहाँ सभ आगू लऽ जाउ। गोपाल : से हम आगूक व्यवस्था कए रहल छी। तत्काल अपनेसँ जे किछु बनि पड़ै से करियौक। प्रेमनाथ : बेस, हम कोशिश करै छी। (प्रेमनाथ पानिक बोतल टाङैत छथि बोतलमे सूइया-दवाइ दऽ कऽ पानि चढ़बै छथि।) दीपक : (कछमछाइत) आह! ओह! आह! बौआ सभ। प्रदीप : गोपाल, बाबूजी किछु कहै छथि। गोपाल : जी बाबू जी, दीपक : बौआ, तोहर माएक बेमारीबला आ तोरे सबहक विआहक करजा डेढ़ लाख मूइर महावीर मालिककेँ छन्हि, से अवस्स तीनू भाँइ सधाए देबनि आओर दहेज हेतु बेटाक लोभमे नै पड़ब। बेटी-बेटासँ कम नै होइत अछि। बेटा आ बेटी ऐ दुनियाँमे नै रहत तँ दुनियाँक संतुलन बिगरि जाएत। गर्भपातसँ पैघ कोनो पाप नै अछि। (बेटीक अपमान नै हेबाक चाही)- 3 (तीन बेर कहि दिपक दम तोड़ि दैत छथिन्ह।) प्रेमनाथ : आइ.एम.सॉरी। बेचारा चलि गेलाह दुनियासँ। (सभ कियो कानि रहल छथि। प्रेमनाथ ओ प्रदीपक प्रस्थान। पर्दा गिरैत अछि अन्दरसँ राम नाम सत्यक आवाज जोरसँ भए रहल अछि।) इति शुभम् एकांकी मैथिली नाटक ‘छीनरदेवी’ पात्र परिचय- पुरुष पात्र 1. सुभाष ठाकुर- एक साधारण शिक्षित व्यक्ति। 2. ललन ठाकुर- सुभाष ठाकुरक इकलौता पुत्र। 3. पवन- ’’ ’’ भातिज। 4. मटुक- सुभाष ठाकुरक पड़ोसी। 5. राजू- सुभाष ठाकुरक वुजुर्ग भागिन। 6. संजय- सुभाष ठाकुरक भागिन। 7. सुखल कियोट- एकटा साधारण भगत। 8. यदुलाल ठाकुर- सुभाष ठाकुरक छोट भाए। 9. सोमन ठाकुर- यदुलाल ठाकुरक इकलौता बेटा। 10. परबतिया कोइर- एकटा प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक। 11. घटकराज ठाकुर- सुभाष ठाकुरक पीसा। 12. बलदेव महतो- एकटा साधारण किसान। 13. विनोद झा- काली मंदिरक पुजारी। स्त्री पात्र- 1. मीरा देवी- सुभाष ठाकुरक पत्नी। 2. सुकनी देवी -यदुलाल ठाकुरक पत्नी। 3. मालती देवी- बलदेव महतोक पत्नी। 4. अनु अंजना- बलदेव महतोक इकलौती बेटी। पहिल दृश्य- (स्थान- सुभाष ठकुरक घर। मीरा देवी सुभाष ठकुरक पत्नी छथिन्ह। ललन ठाकुर हिनक इकलौता बेटा छथिन्ह। ललन बताह अवस्थामे अपन दरवाजापर अंट-संट करैत छथि। हिनक उपद्रवकेँ देखि सुभाष ओ मीरा मनहुस अवस्थामे) मीरा- स्वामी, ई छौंरा हमरो बताह बनए देत। सुभाष- सहए तँ हमहुँ कहैबला रही। हमर मुहक बात छीनि लेलहुँ। हमरा किछु नहि फुराइत अछि। की करी की नहि। ककरासँ देखाबी, ककरासँ नहि। यै ललन माए, मोन होइत अछि जे एकरा राँची वा दरिभंगा लऽ जाय। की विचार अहाँक? मीरा- हमर विचार इएह अछि जे राँची दरिभंगा लऽ जायसँ पूर्व एकरा कतउ एम्हर-ओम्हर देखए दियौन। नजरि-गुजरि सेहो भए सकैत अछि। सुभाष- तहन ककरासँ देखए दियन्हि? मीरा- यै ललन बाप, सुनैत छी सुखलाहा कियोट एहि सभमे बड़ पहुँचल अछि। हुनकहिसँ देखाए दियौन्ह। सुभाष- हुनक नाम तँ हमहुँ बड़ सुनैत छी। (ललन घरामसँ खसि पड़ैत छथि आ मुँह रगड़ए लगैत छथि। दुआरिपर ललन ओंघराए रहल अथि।) मीरा- (अफसियाँत भऽ) बौआ रओ बौआ। की भए गेलौक रओ बौआ? ललन- (माथ पटकैत) हम तोरे संग जएबौक। हम आब नहि जीबौक। हम तोरो लऽ जेबौक अपनहि संग। हम तोरो खएबौक। हम कोनो भात-दालि खाइत छी। हमरा चाही पियोर खून। हमरा बगिया देने रहौक। बगिएमे सबटा कारामात छल। (सौंसे दुआरि ललन ओंघरए रहल अछि। कपड़ा-लत्ता फारि लैत अछि। पवन, मटुक, राजू आ संजयक प्रवेश। ललनक दृश्य देखि रहल छथि सभ कियो। सुभाषकेँ अक-बक किछु नहि फुराइत छन्हि।) मटुक- यौ सुभाष, बौक जेकाँ ठाढ़ रहने काज नहि चलत। अहाँ सुखल कियोट लग जाउ। हुनका जल्दी बजौने आउ। (सुभाष, सुखल कियोटक ओहिठाम गेलाह। किदुए खानक बाद सुभाषक संग सुखलक प्रवेश।) सुखल- अहाँ सभ कने कात भऽ जाउ। (सभ कियो कात भऽ जाइत छथि। सुखलकेँ देखि कऽ ललन आओर माथ पटकए लगैत अछि।) सुभाष- कने जल्दी देखियौक सरकार। सुखल- अहाँ सभ हरबराउ नहि। हम बैसल नहि छी सभ देखि रहल छी। (अपन जेबीसँ किछु निकालि कऽ ललनपर फेंकैत छथि। ललन बिल्कुल शांत भऽ जाइत अछि।) ललन- आब नहि हओ। आब कहियो नहि अएबह। सुखल- तों, के छिअएँ? ललन- हम नहि कहबह-5 सुखल- नहि हओ। तों हमर के छह, जे तोरा हम कहबह। सुखल- हम तोहर बाप छियौक। ललन- हमहुँ तोहर बाप छियह। (सुखल ललनकेँ एक चाट गालपर मारि दैत छथि।) आब नहि अएबह। सुखल- नाम कऽ ह। ललन- हमर नाम छी देवकी कुमारी। सुखल- के रखने छौक? ललन- छोटकी काकी। सुखल- कत्तए रखने छौक? ललन- से नहि कहबह-3 (फेर सुखल एक चाट छऽ कऽ माथा हाथ दैत छथि।) सुखल- आब कहबें। ललन- हँ हओ। आब कहबह। सुखल- तहन कह। जल्दी बाज। नहि तँ बुझि ले। ललन- मारह नहि, कहि दैत छियह। कोहामे। पैखाना घरमे। सुखल- किएक अएलें? ललन- ललनकेँ लऽ जेबाक लेल। एकसरे हमरा मोन नहि लगैत अछि। हम ललनकेँ नहिए छोड़बै। (सुखल ललनकेँ कसिकए माथा हाथ दैत छथि। भूत भागि जाइत अछि। ललन चंगा भऽ जाइत अछि। देह-हाथ झारि कऽ कुर्सीपर बैस जाइत छथि।) बाबूजी, एतेक भीड़ किएक अछि? सुभाष- नहि कोनो खास बात। हिनका सभकेँ हमरासँ किछु विशेष गप्प छेलन्हि। ललन, तों जाह बौआ। (ललनक प्रस्थान) सुखल गोसांइ, हमर बेटा कोना ठीक होएत? एकरा अछि की? सुखल- एकरा केलहा अछि? एकरा केनिहारि अहाँकेँ अपनहि परिवारमे अछि। सुभाष- गोसांइ, एकर इलाज अहींकेँ करए पड़त। सुखल- सुभाष बाबू, एकर इलाज हमरासँ असंभव अछि, हम आब ई काज छोड़ि देलहुँ। हाथ जोडैत छी, दोसर जुगार कए लिअ। (प्रस्थान) (पटाक्षेप) दृश्य दोसर- (स्थान- सुभाष ठाकुरक घर। दलानपर सुभाष ओ मीरा चिन्तित मुद्रामे बैसल छथि। पवन, मटुक जाजू ओ संजयक प्रवेश।) मटुक- सुभाष भाय, अहाँक बेटा भरि-भरि राति बौआइते रहैत अछि। पवन- हँ सुभाष कका, हमहूँ देखलिएक आठ बजे रातिमे गाछी दिशि जाइत आ कहलियन्हि तँ कहलनि तू हमर बाप छें। राजू- हमहुँ देखलियन्हि, बारह बजे रातिमे मुसहरी दिशि निछोहे भागल जाइत। तखन हम राम एकबाल ओहिठामसँ भोज खा कऽ अबैत रही। संजय- सुभाष मामा, काल्हि साँझमे हमरो एहिठाम गेल रहए। हमरा कहलक- हमहुँ पठबै आ बड़का हाकिम बनबै। शर्ट उनटा पहिरने छल आ एकहि पएरमे जूता छलै। सुभाष- अपने सभ विचार दिअ जे हम की करी? (ललनक प्रवेश। पूर्ण बताह अवस्थामे छथि। अबितहि शर्ट निकालि फेक दैत अछि। गंजी फारैत-चिरैत अछि। बाप रओ बाप, माए गै माए करैत ओंधरा रहल अछि। माथ पकड़ि बसि कऽ झुलि रहल अछि।) ललन- आब हम चारिए दिन जीबौैक। हम तोरे लइ लए आएल छी। हमरा एतऽ नीक नहि लागि रहल अछि। छोटकी काकी देबकी दीदीकेँ खाक सीखलकैक। हमहुँ देबकी दीदी लग रहब। ओ हमरा बड़ मानैतए। देबकी दीदी हमरे खून पीबि ओहि पैखाना घरमे कोहामे रहैत अछि। पाँच दिनक अन्दरमे हम निपत्ता भऽ जेबौक। (फेर ओंधरए रहल अछि। कुकुर जेकाँ माटि भोमहरि कऽ खए रहल अछि। दलानपर दर्शक अपार भीड़ अछि।) सुभाष- यौ श्रोत्रा-समाज लोकनि अपने सभ एकर बकनाइ सुनि रहलहुँ अछि। हम की करी, हमरा अहाँ सभ बिचार दिअ। मटुक- सुभाष भाय, अहाँ किछु नहि करु अहाँ एक्के गोट काज करु। सुभाष- की करु। अहीं बाजू। मटुक- एकरा उठा-पुठा कऽ छोटकी अंगनामे राखि दियौक आओर ओकरा कहियो जे तू एकरा होंसैत दहिन। जदि ओ एकरा होंसैत देतैक तखनहि ई ठीक भए जाएत आन कोनो उपए नहि। ललन- जाधरि छेटकी काकी हमरा नहि छुतैक ताधरि हम बताहे रहब, चारि दिनमे मरि जाएब। मटुक- कहलौं ने सुभाष भाय। एकरा जल्दी लऽ चलू। नहि तऽ ई नहि बाँचत। पवन- कका, अहाँ डरैत किएक छी? हमरा लोकनि छी ने पीठपर। यौ कका, ओ कथीमे फरिएतैक? मारिमे-गारिमे, भालामे-लाठीमे आङमे-समांगमे, घनमे-संपत्तिमे, केशमे फौदारीमे। हम सभ किछुमे सक्षमे छी अहाँ डरु नइ कका। आ नहि तऽ अहाँ अपन जानू। बेटा हाथसँ चलि जाएत। (सुभाष आ मीरा ललनकेँ उठा-पुठा कऽ सुकनी लग लऽ जा रहल अछि। सुकनी यदुलाल ठाकुरक घरवाली आ सोमन ठाकुरक माए छथीन। सुकनी रोटी पकबैत अछि आ सोमन कुट्टी काटि रहल अछि। सुभाष आ मीरा ललनक संग प्रवेश होइत। ओ सभ ललनकेँ सुकनीक अंगनामे पटकि दैत अछि। ललन पहिनहि जेकाँ कऽ रहल अछि।) मीरा- भैडाही एकरा हसौथ, नइ तँ बापसँ भेट करैबौ। सैंखौकी-बेटखौकी एकरा एखन ठीक कर नहि तऽ भकसी झोंकेबौक। सुकनी- ओइ हाथमे लकबा धरतौक। सैंडाही मङजरौनी लुल्ही पकड़तौक। (आंगनमे हो-हल्ला भऽ रहल अछि। हल्ला सुनि यदू लाल आ सोमनक प्रवेश।) सोमन- माए तों शान्त रह। कका, अहाँ नीक काज नहि कएलहुँ एहिसँ कोन फेदा? कोन इज्जत कोन प्रतिष्ठा हमरा सबहक प्रतिष्ठा अहाँ माटिमे मिला देलहुँ। अबहु चेत जाउ नहि तऽ एकर परिणाम बड खराप हएत। सुभाष- परिणाम जे हेबाक हएत से हएत मुदा गै मौगिया एखन तों एकरा एक्को बेरि छुबि दहिन नै तऽ आइ तोहि नइ आकि हमहीं नै। सोमन- गै माए तों एक्को बेर नै बाज आ ने एक्को बेर एतएसँ उठ एै कुत्ता के एहिना भुकए दही। सुभाष- चौट्टा तू हमरा कुत्ता कहमे एखने मारैत-मारैत सोझ कऽ देबो नइ कहीन एै मौगियाकेँ जे ललनमाकेँ चुप-चाप हासौंथि देतौ। सोमन- चौट्टा, अन्हरा कहीं कऽ सभ खचरै निकलि जाएत (राजूक प्रवेश) राजू- हौ सोमन सुनह, हल्ला-गुल्ला नइ करह, एक बेर माए कऽ कहक जे एकरा हसौति देतै एकरो संतोष भऽ जेतै आ हल्लो-गुल्ला शान्त भऽ जेतै तोरा नीक लगै छह ऐहन अशान्ति? सोमन- अहाँ पढ़ल-लिखल लोक भऽ ऐहन भासल गप्प कए रहल छी? ई गप्प हमरा बड अप्रिय लागल। ऐँ यौ राजू बाबू एइ छौँड़ाकेँ माथा खराप भऽ गेलैक। तँ सुकनीसँ छुआ दहीन ठीक भऽ जेतइ। ककरो बोखार लागल तँ सुकनीसँ छुआ दहीन, ककरो ललबा मारि देलक तँ सुकनीसँ छुआ दहीन। सबसँ बुरबक दीनेनाथ होइ छै की ने? ठीके कहबी छै मुँह-दुबरा बौह सभक भौाजइ। राजू- सोमन, हम अपन बात आपस लेलौं हमरासँ गलती भेल। तौं सभ अपसेमे फरिया लएह। वा जे मन हो से करह। हम जाइ छी। (राजूक प्रस्थान) मटुक- सोमन अहाँ माएकेँ कहियौन ललनमाकेँ छुबै लए नै तँ बुझि लिअ। सोमन- हमर माए कोनहुँ हालेत मे नहि छुबि सकैत अछि अइ लेल अहाँ सभकेँ जे करबाक हुअए से करु। मटुक- हरामी नहितन, डाइनकेँ प्रश्रय दैत अछि। ऐहन माएकेँ भरल सभामे जिनदै जरा दैततहुँ। सोमन- निकाल सार, बजा कोन धाइमकेँ बजाबै छेँ। जदि हमर माए डाइन साबीत भेल तखन धाइमक टोटल खर्च हमर आओर माएकेँ भरल सभामे मोटीया तेल ढारि कऽ आगि लगा देब। मटुक- एक महिनाक भीतरे हम तोरा माएकेँ डाइन निकालि कऽ देखा दै छियौ। सार हम तोरा माएकेँ एक तोरा माएकेँ एक महिना कऽ भीतरे भकसी नइ झोंका देलहुँ तऽ हम पाजी। सोमन- सार, तोहूँ सुनि ले, डाइन साबित भेलापर हमहुँ अपन माएकेँ जिनदे नहि जरा देलौं तँ हम पाजी। पवन- कका, चलू अपन आंगन। लऽ चलू ललनमाकेँ। ई खच्चरी नइ छुअत एकरा। एकटा चिक्कन धामिकेँ लाउ आ पहिने एकरा डाइन साबित करु तखन एकरा सभकेँ बापक बिआह आ पितियाक सगाइ देखाएब। रुपैआक बड़ गरमी भऽ गेलैए सोमनाकेँ। चलू कक्का। लऽ चलू सोमनाकेँ। (कहैत सबहक प्रस्थान) -पटाक्षेप- दृश्य तेसर (स्थान-सुभाष ठाकुरक घर। दुनू परानी ललनक विषएमे गप-सप करैत छथि।) मीरा- यै ललनक बाबू, हमर विचार अछि जे आब ललनकेँ कोनो बढ़ियाँ धाइमसँ देखाए दियौक। सुभाष- यै ललनक माए, रातिमे अपन घरक गोसांइ काली बंदी हमरा सप्पन देलनि जे बौआकेँ कोनो चिक्कन धाइमसँ देखा। हम पुछलियनि जे के चिक्कन धाइम छथि तऽ ओ कहलनि जे खोपामे रोडक कातमे परवतिया कोइर नामक एकटा धाइम छथि, ओ एकदम सिद्ध धाइम छथि आ ओ जे किछु कहैत छथि से उचितो मे उचित। ओतए तोरा मोनक भ्रम दूर भऽ जेतौक। मीरा- ललन बाउ, घरक गोसांइ बड़ पैघ होइत छथिन्ह हुनक कहल नहि करबनि तँ किनक कहल करबनि। सुभाष- हँ हँ हुनक कहल करबाके अछि! ललन, ललन, बौआ ललन। (ललनक प्रवेश। ललन बताहक अवस्थामे छथि।) ललन- हमरा तों बौआ किएक कहैत छह? हम तोहर बौआ नहि छियह। हम तोहर नाना छियह। आइसँ तों हमरा नाना कहह। सुभाष- ललन नाना, हमरा सङे चलू एकठाम मेला देखै लए। मएओ जेतीह। ललन- हम पएरहि नहि जेबह। हम कनहापर जेबह। सुभाष- चलह ने, बेसी कनहेपर चलिह आ कने-मने पएरो। ललन- बेस चलह। हमरा ओतए रसगुल्ला, लाय मुरही, झिल्ली किनि दिह। बगियो कीनि दिह। मीरा- चल ने, सबटा कीनि देबौक। (सुभाष, मीरा ओ ललन जा रहलाह अछि परबतिया कोइर ओहिठाम। परबतिया गहबरमे बैसल छथि! मृदंग बाजि रहल अछि। किछए कालमे परबतियाक देहपर काली बंदी सवार भऽ जाइत छथिन्ह। मृदंग बजनाइ बन्द भऽ जाइत अछि) परबतिया- होऽऽऽ बोल जय गंगा। बोल जय गंगा। काली बंदी छियह हम। बोल जय गंगा। बाजह, के कहाली छह? बोल जय गंगा। जल्दी लग आबह। बोल जय गंगा जल्दी आबह। हमरा जेबाक छह बाबा धाम। फेर गंगोकेँ देखनाइ अछि। (तीनू परानी लग जाइत छथि। ललन देह-हाथ पटकि रहल अछि। मूरी हिलाए रहल अछि। भगत पीड़ि परसँ माटि लऽ कऽ ललनक देहपर फेंकलथि। ललन शांत भऽ जाइत अछि। भगत ललनक माथक पूरा पकड़ैत छथि।) परबतिया- हओ बाबू, एकरा केलहा नहि छह। जे कियो तोरा कहैत छह जे एकरा केलहा अछि से तोहर कट्टर दुश्मन छियह। तोरा दुनू दियादमे झगड़ा लगाबए चाहैत छह। बोल जय गंगा। काली बंदी छियह। हओ बाबू ओ तोरासँ ऊपरे ऊपर मुँह धएने रहैत छह। ओ आस्तीनक साँप छियह। हओ बाबू तोड़ै लऽ सब चाहैत अछि मुदा, जोड़ै लऽ कियो नहि। बोल जय गंगा। ओ बड़का धुर्त्त छह, मचण्ड छह। सुभाष- सरकार, हमरा बहुते लोक कहलक जे अहाँक छोटकी भाबो पहुँचल फकीर अछि। ओकरहि ई कारामात छी। परबतिया- बोल जय गंगा। हओ बाबू, कने तोहुँ सोचहक, अकल लगाबहक जे जदि डाइनकेँ एतेक पावर रहितैक तँ ओ अपन विद्यासँ सौंसे दुनियाँपर शासन करैत रहितैक। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्य मंत्री, एस.डी.ओ., कलक्टर, थाना-पुलिस बैंक सभटा वएह रहितैक ने। बोल जय गंगा। हओ बाबू, डायनपर विश्वास केनाइ खाटी अंध विश्वास छी। ई मोनक भ्रम छी। ई मोनक शंका छी। बोल जय गंगा। हओ बाबू, अगर शंकाबला आदमी केकरो हँसैत देखि लेलक तँ ओकरो होइत छैक जे ओ हमरेपर हँसल। तें हम यएह कहबह जे तों नीक लोक लागैत छह, एहि भ्रममे नहि पड़ह। नहि जौं पड़लह तँ सत्यानाश भऽ जेतह। हम तोरहि घर गोसांइ काली बंदी बाजैत छियह। बोल जय गंगा। हओ बाबू, आब हमरा देरी भऽ रहल छह, हमर विमान ऊपरमे लागल छह। मीरा- सरकार, ई ठीक कोना होएत, से उपए बता दथुन्ह न? ई एना किएक करैत अछि? परबतिया- बोल जय गंगा। हओ बाबू, एहि छौंड़ाकेँ छीनर देवी लागलि छह। सुभाष- छीनरदेवी हटत कोना? परबतिया- हँ हटत, नहि किएक हटत? जल्दी तों एकर बिआह केहनो लड़कीसँ करह। सभ ठीक भऽ जेतह। आओरो कोनो कष्ट छह? सुभाष- नहि सरकार, जदि अपने सहाय रहबैक तँ कोनो कष्ट नहि होएतैक। मीरा- सरकार, कने विभूति दए दिअ। (परबतिया मीराकेँ विभूति देलनि।) परबतिया- बोल जय गंगा। बोल जय गंगा। बोल जय गंगा। आब हम जाइ छियह। बाबा धाम। (कहैत कहैत काली बंदी चलि जाइत छथि।) सुभाष- सरकार, अपनेक दक्षिणा? परबतिया- पाँच टका मात्र। सुभाष- सरकार एतबै? परबतिया- हँ पाँचहि टका मात्र। उहो गहबरमे प्रसाद चढ़ाबए लेल। हमरा गहबरमे ठकै फुसलबै बला काज नहि होइत अछि। हमरा गहबरमे कलयाणक आ संतोषक गप होइत अछि। शंका वा भ्रम बढ़ाबए बला नहि, पूर्णतः हटाबए बला गप होइत अछि आब अपने सभ जाउ। एकर बिआह जल्दी करु, छीनरदेवी भागि जाएत। (तीनू परानी माथा टेक कऽ प्रणाम करैत छथि आ आर्शीवाद लऽ कऽ प्रस्थान करैत छथि।) पटाक्षेप दृश्य चारिम (स्थान- सुभाष ठाकुरक आवास। सुभाषक पीसा घटकराज ठाकुर थिकाह। दुनू आदमी दलानपर बैसि कऽ गप-सप्प करैत छथि। ललन चश्मा आ फाटल- चिटल वस्त्र पहिर बताह भेषमे एम्हर-ओम्हर, दर्शकक बीचमे घुिम रहल अछि।) घटकराज- बौआ, रातिमे िकएक फोन कएने रही? तखन हम गामपर नहि रही, पोखरि िदशि गेल रही। सुभाष- की कहियऽ पीसा। कहैत लाजो होइत अछि। मुदा कहबह नहि तँ बुझबहक कोना? हओ, ललनमाकेँ छीनरदेवी लागल अछि तेँ ओ बतहपनी करैत अछि। एगो नीक भगत कहलनि जे एकर िबयाह जल्दी कर, ठीक भए जेतौक। एहि िवषयमे गप केनाइ अनिवार्य छल। एकरा लेल केतौ लड़िकीक जोगार करहक। घटकराज- बौआ, हमरा लग लड़िका-लड़िकीक जुगार सदिखन रहितहि अछि। मुदा एखन तँ नहि अछि आ तोरा करबाक छह जल्दीए। खएर एगो उपए छह एकरा कहुना कऽ दवाइ िखया-पिया कऽ शांत कऽ अमोलागाछी लऽ चलह। ओतय एहेने जरूरीबला िबयाहक लड़िका-लड़िकी प्रतिदिन आबैत अछि आओर काली मंदिरमे िबयाह होइत अछि। आइ एगो लड़िकी अवश्य आएल हेतीह। मुदा ओतए लेन-देनक कोनो गप नहि होइत अिछ। मंदिरक पुजारी दु-चािर बेर फोन हमरा प्रतिदिन करैत छथि। घटकराज- िबलंब जुिन करह, नहि लड़िकी उठि जेतीह। ओना हम पुजारीकेँ फोन कऽ दैत छियन्हि जे हम लड़िका लऽ कऽ जल्दी आबि रहलहुँ अछि। (घटकराज पुजारीकेँ फोन करैत छथि। एहि बीच सुभाष ललनकेँ दवाइ िखया- पिया कऽ शांत करैत छथि। मीराकेँ बजा कऽ ललनकेँ चिक्कन कपड़ा पहिराबैत छथि। पूर्ण तैयार भऽ कऽ सुभाश, ललन आ घटकराज अमोलागाछी जाए रहलाह अछ। िकदु देर ओ सभ ओतए पहुँचि गेलाह। पर्दा हटैत अछ। काली पंदिरमे पुजारी श्री िवनोद झा घंटी डालए पूजा करैत छथि। सुभाष, ललन अो घटकराज माथ टेिक प्रणाम करैत छथि। िवनोद झा उँ श्री काल्यै नम: मंत्र जपि रहल छथि। सुभाष तीनु आदमी कालीकेँ प्रणाम कऽ बैसैत छथि। दोसर कात लड़िकी अनुअंजना अपन माए-बापक संग बैसल छिथ। लड़िकीक बाप बलदेव महतो आओर माए मालती देवी छथिन्ह।) बलदेव- पंडीजी, हमरा लोकनि कखनसँ बैसल छी? विनोद- से हम की करब? लड़िका अएलाह एखन। िबना लड़िकहि िबयाह होयतए। मालती- पंडीजी, लड़िका ओतए छथि। की? िवनोद- हँ हँ, वएह होएताह छोट अहॉंक दमाद। मालती- हनु अंजना बाउ, लड़िका तँ बड खाप-सूरत कच्छे निमन अछि। आओर समधि सेहो राज कुमाररहि जेकॉं छथि। यै अनु अंजना बाउ, एक गोट गप्प कहु। बलदेव- कहु ने, की कहए चाहैत छी? मालती- हमहुँ आइए समधिसँ िबयाह कऽ लिअ। बलदेव- हँ हँ हँ हँ, औगतहु नहि। जुलूम भऽ जाएत। हम कोना जीयब। एक्कोटा बकरीयाे नहि अछि। िवनोद- आउ जजमान सभ। आबै जाइ जाउ आ मैया कालीक दरवारमे बैसै जाउ। (एक कात लड़िकाबला, दोसर कात लड़िकीबला आ बीचमे पंडीजी बैसैत छथि। पंडीजी लड़िका-लड़िकीक हाथमे गंगा जल दैत छथिन्ह।) पढ़ु- ओम अपवित्रो पवित्रो भव- 5 दुनू (ललन ओ अनु अंजना) ओम अपवित्रो पवित्रो भव- 5 िवनोद- अपन-अपन देहकेँ िसद्ध कऽ लिय। (ललन अो अनुअंजना जल देहपर छीटि लैत छथि।) पढ़ु- ओम श्री गणेशाय नम: -5 दुनू- ओम श्री गणेशय नम: -5 िवनोद- ओम श्री काल्यै नम: -5 दुनू- ओम श्री काल्यै नम: -5 ललन- पंडीजी, िबयाह कखन होएत, से मंत्र पढ़ुने। विनोद- एखन कुम्हारम भए रहल अछि आओर िबयाह रातिमे हएत। बलदेव- पंडीजी, एना िकएक यौ? अनुअंजना- ठीके कहैत छथि लड़िका। एत्ते देरी कतउ िबयाहमे होअए। हम िबयाह नहि देखने छी की? एहेन-एहेन कतेको िबयाह देखने छी आ कऽ कए छोड़ि देने छी। (दुनू पक्ष एक-दोसरकेँ मुँह देखैत छथि।) िवनोद- अहॉं सभ औगतउ नहि। एिह दरबारमे सभ कलेश नष्ट भए जाइत अिछ। अहॉं माए कालीपर पूर्ण भरोसा राखू। पढ़ु अहॉं दुनू गोटे- गौरीशंकरभ्याम् नम: -5 दुनू- ओम गौरी शंकराभ्याम नम: -5 (दुनूकेँ िसन्दुरदान करए कहैत छथि पंडीजी।लड़िका-लड़िकीक मांगमे भुसना सेनुर दैत छथि। पंडीजी दुनूकेँ लठबंधन कराए काली देवीकेँ गोर लगबैत छथि। फेर सभ िकयो गोर लागैत छथि। हल्लुक नश्ता-पानि होइत अछि।) ललन- पंडीजी, आब हमरा लोकनि जा सकैत छी घर? िवनोद- हॉं हॉं हॉं हॉं, रूकु। सुभाष बाबू ओ बलदेब बाबू, पहिने दक्षिणा दिअ तहन जाएब। सुभाष- कतेक पंडीजी? िवनोद- मात्र एक सए एक टाका। बलदेव- हमरा कतेक लगतैक पंडीजी? िवनोद- अहॉंकेँ मात्र एकावन टका। (दुनू आदमी पंडीजीकेँ दक्षिणा देलनि आ आशीर्वाद लऽ कऽ अपन-अपन घर हेतु प्रस्थान। लड़िका-लड़िकी दुनू एक-दोसरक कन्हापर हाथ राखि कऽ शानसँ जा रहल छथि पाछु-पाछु) पटाक्षेप अंितम दृश्य (दृश्य ५) (स्थान सुभाष ठाकुरक घर। सुभाष दुनू परानी आपसी गप-सप करै छथि ।) सुभाष- ललन माए, ऐ बीचमे ललनक चािल-चलन अहाँकेँ केहेन लगैए? मीरा- (मुस्कुराइत) हमरा बड़ नीक लगैए। पहिनेसँ साफे बदलल लगैए। अहाँकेँ केहेन बुझाइए? सुभाष- हमरो िबल्कुल शांत बुझाइए। (परबतियाक प्रवेश। दुनू परानी कुर्सीपर सँ उठि पएर छुिब प्रणाम करै छथि । फेर तीनू जन कुर्सीपर बैसै छथि ।) परबतिया- कहु हाल-चाल सुभाष भाय। सुभाष- सरकार अपनेक किरपासँ सभ आनन्द छी। धन्य छी सरकार अपने। मीरा- सरकार, आब चैनक साँस लै छी। अपने हमरा लोकिन केँ परम शांति प्रदान केलॱ। धन्यवाद अपनेकेँ। सरकार, हमरा लोकिनकेँ िकछु अमृत वचन देेल जाउ। परबतिया- अमृत वचन तँ मैया भगवती दै छथिन। तैयो अपन दू शब्द कहि दैै छी। अपने नीक तँ सभ नीक। अंध िवश्वास आत्म शान्तिकेँ भङ करैत अछि । ऐसँ सदिखन बची। यएह मुँह पान िखयाबै अछि आ यएह मुँह जूता। सत्य आ प्रिय वचन सभकेँ अप्पन बनाबै अछि । सुभाष- बौआ, बौआ, बौआ ललन। ललन- (अन्दरेसँ) हँ िपताजी, आबै छी। सुभाष- बौआ, कनियोकेँ लेने अबिहक, सरकार एलिखनहेँ। (ललन आ अनुअंजनाक प्रवेश। दुनू परानी परबतियाकेँ पएर छुिब प्रणाम कऽ ठाढ़ छथि ।) परबतिया- बौअ◌ा, नीकेना रहै छी ने? ललन- जी सरकार, अपनेक कृपासँ आब पूर्ण ठीक छी। परबतिया- आब ठीक रहबे करब। खाली अपन करतब करू आ नीक सत्संगमे रहू। आब हम जाइ छी। (सभ िकयो पएर छुिब प्रणाम केलिन । परबतियाक प्रस्थान।) सुभाष- अंध िवश्वासमे लोक भटकि िजनगीकेँ गर्तमे धकेल लैत अछि । हमहूँ बहकि ओइमे चलि गेलॱ। मुदा आब सतत सचेष्ट रहक चाही। पटाक्षेप इति शुभम् अर्चना कुमर, पिताक नाम: हरिश्चन्द्र मिश्र, पतिक नाम : रविन्द्र कुमर, गाम : चैनपुर, ससुराल: सिहौल, जिला : सहरसा, शिक्षा : दशवी पास (आर. डी. टाटा उच्च विद्यालय, जमशेदपुर) आस आइ हम एकटा एहेन व्यक्तिक कथा लिखि रहल छी जे आजुक युगमे बहुत कम भेटैए। मुन्ना माने प्रकाश। ओ एकटा एहेन घरक बेटा रहथिन जकर बाप बैंकमे रजिस्टार रहनि, घरमे जमीन-जत्था खूब रहनि, पाइक कमी नै रहनि। मुदा जखन ओ छोटे रहथि तखने हुनकर एकटा बहिनकेँ साँप काटि लेलकनि। बहुत जगह हुनकर पापा देखेलखिन मुदा किछु नै भऽ सकलै, आर ओ मरि गेलखिन। मुन्ना अपना मिलाकऽ चारि भैयारी आर तीन बहिन रहथिन, एक आर बहिन रहथिन जे मरि गेलखिन। बेटीक शोकमे हुनकर पिताक दिमागी हालत खराब भऽ गेलनि आर पूरा परिवार शोकमे डूमि गेल। पापाक नोकरीयो छुटि गेल। घरमे जेना-तेना खेती गृहस्थीसँ गुजर जाए लागल। ई सभ एखन बच्चे रहथिन। दियाद-बाद सभ चाहे सभ लुटि लिऐ लेकिन हिनकर माताजी कहुनो सभ किछु बचा कऽ राखलथिन। फेर ई सभ कनी पैघ भेलाह। जखन मुन्ना इन्टर फाइनल पार्टमे गेलखिन तखन गामसँ भागि गेलखिन आर दिल्ली आबि गेलखिन। मुदा एतौ हुनका कम मेहनति नै करए पड़ल। पहिने मालीक काजसँ ई शुरुआत केलखिन। घरपर किछु पता नै रहनि जे ई कत्तऽ छथिन। आस्ते-आस्ते ई पाइ एकट्ठा कऽ अपन उपनेन आ दादीक श्राद्ध केलखिन, ओकर बाद फेर कमेलखिन तँ बड़की बहिनक बियाह केलखिन। ओकर बाद ओ अपन बियाह केलखिन। परिवारक सभकेँ सभ किछु देलखिन मुदा अपनाले एकटा कपड़ा तक नै किनलखिन, किएक तँ फेर हुनका दूटा बहिनक बियाह करबाक रहै। बहुत कष्ट सहित, एते तक कि अपन पत्नीक मधुश्रावनी ओ अपने लग दिल्लीमे करेलखिन ताहि किछु पैसा बचि जाएत। फेर अपन दोसर बहिनक बियाह केलखिन। हुनकर बियाहक बाद २ बर्खक बाद माताजी कहलखिन घर बनेबा लेल। दू रूम ढलैय्या केलखिन, तकर बाद सोचैत रहथिन तेसर बहिनक बियाह करैले तँ बीचबला बहनोइ खतम भऽ गेलखिन। ओहि ठमा जा कऽ बहिनक सभटा व्यवस्था कऽ कऽ एलखिन। ता कमाइत रहथिन ५ हजार टका। आइक जमानामे की होइ छै पाँच हजार टकासँ। कतेक दुःख सहि कऽ ओ पैसा राखैत रहथिन। मुदा अपनाले कहियो नै सोचलखिन। कनियाँ हुनका कतबो तानी देथिन किन्तु ओ अपन फर्जसँ कहियो नै चुकलखिन। आर माइ-पापाक सभ सपना पूर्ण केलखिन। छोटकी बहिनक बियाह ऐ साल खूब धूमधामसँ केलखिन। तेँ ईश्वरसँ कहै छी, भगवान सभकेँ एहेने बेटा देथिन, जे सभकेँ पार उतारि दै। बहिन सभकेँ एत्ते प्रेम करै छथिन जे पुछू नै। बहिन सभक मुँहसँ किछु खसैक काज तुरत्ते आबि जाइ छै। मुदा पत्नी किछु माँगि लैअए तँ बड़ भारी। आइ हम हुनकर पत्नी ई सभ लिखि रहल छी। किन्तु तैयो हमरासँ ओ बड्ड प्रेम करै छथिन। हमराले हुनका किछु नै रहै मुदा प्रेम तँ छै। हम ओहीमे हुनकासँ खुश छी। हुनकर प्रेमे हमरा चाहबो करे। हम जानै छी हुनकर हुनकर मजबूरी। एक इन्सान कत्ते तक कऽ सकैए। आर हम नै बुझबै तँ के बुझतै। अन्तिममे जखन छोटकी बहिनक बियाह दान कऽ लेलखिन तखन जखन बरियाती बिदा भऽ गेल ओहि रातिमे ओ खूब खुश भऽ गेलखिन आ आँखिसँ नोर खसऽ लगलनि। खूब कानलखिन आ बहिनसँ कहथिन, हुनकर नाम लऽ कऽ जे आइ हमर सभ टेंशन दूर भऽ गेल। आब हम ..अपना गाड़ी..लऽ..आर खुबो कानथिन आर कहथिन। बहिनकेँ पकड़ि कऽ कानथिन आ कहथिन, हम तोरा जाइले नै देबौ। तूँ अही ठामे रहबी। कतौ नै जेमी। तोरा हम कतौ जाइले नै देबै। ओहि राति घरमे जतेक लोक रहथिन सभ कानए लागल। कतबो हम सभ बुझाबी मुदा ओ खूब कानैत रहथिन, अपन कर्तव्य पूरा होइपर। लोक खुशियोमे कानैए, से हम ओही राति देखलौं। तकर बाद हम सभ दिल्ली आबि गेलौं। किन्तु आइयो हुनका गाड़ी लैके इच्छा पूरा नै भेल। बच्चा सभ, शाइत परिवारक सोचैबलाकेँ अपन इच्छाक अनादर करए पड़ै छै। विद्वान (दादीसँ सुनल कथाक पुनर्लेखन) एक विद्वान पंडित रहथिन। मुदा ओ बड्ड गरीब रहथिन। ताहि कारण हुनका हुनकर पस्त्नी सदिखन कहथिन- कतहु जाउ कमाइले। किछु करू। बच्चा सभ भूखे मरैए। कृपा कऽ कऽ किछु तँ करू जे दू वक्तक भोजन नसीब हुअए। तँ ओ पत्नीकेँ कहथिन जे हम एतेक पैघ विद्वान छी जे विद्वता लेल पैसा कियो दैये नै सकत। तैयो अहाँ कहै छी तँ हम जाइ छी। आर ओ चारि पाँती लिखि लेलखिन आर बजार जाए ओहि चारि पाँतिक चारि लाख दाम लगा देलखिन। ओहि चारि पाँतिक चारि लाख टका दाम देखि सभ अचम्भित भऽ जाइत रहथिन। आर कियो नै किनथिन। एकटा व्यापारी रहथिन। ओ सोचलखिन जे किछु तँ बात एहि चारि पाँतीमे जरूर हएत जे एकर चारि लाख टाका दाम छै, से नै ई हम लऽ लै छी। आ ओ चारि लाख टाका दऽ कऽ ओ च्रि पाँती कीनि लेलखिन, आर अपन तलवारपर खोदबा लेलखिन। ओ शब्द सभ रहै। आसनम प्रभु चालन। पथ कन्या विर्जयते। पहिल राति निवारी। पहिल क्रोध निवारी। फेर ओ अपना व्यापार करैले निकललखिन। हुनका लग ढेरिक पैसा-कौड़ी सभ रहनि। एक जगह राति हुअए लागल तँ सोचलखिन, अपना दोस्त ओहिठाम रहि जाएब। दोस्त लग गेलखिन तँ बात-बातमे दोस्तकेँ पता लागि गेल जे हिनका जिमा ढेरिक पैसा छनि। भोर भेल, हिनकर दोस्त अपना पत्नीकेँ बतेलखिन जे दोस्त लग ढेरिक पैसा छै। फेर दुनू मिलिकऽ हुनका मारैके सोचलखिन आर अंगनामे बड़का तरहरा खुनि लेलखिन, आर बिना घोरल खाट, अइपर बिछा, नीकसँ ओछैन कऽ देलखिन, आर अपना दोस्तकेँ बजेलखिन जे चलू खाइले। आइ अंगनेमे भोजन लागल ऐ। ई गेलखिन खाइले अंगना, जहिना खटियापर बैसऽ लागलखिन तहिना हुनकर नजरि तलवारपर पड़लनि। ओइमे लिखल रहै- आसनम प्रभु चालन। माने कतौ बैसी तँ बिछौन कनी झाड़ि ली। ओ बिछौनकेँ जहिना झाड़लखिन तहिना अंदर देखि दंग रहि गेलखिन, आर सोचलखिन हमर मौक्षक पूरा इन्तजाम भेल रहै। जे आइ ई शब्द नै पढ़ने रहितहुँ तँ आइ हम ऊपर पहुँचि गेल रहितौं। से नै तँ पंडितकेँ एक लाख आर हम देब। आर ओत्तऽ सँ ई कहि कऽ भागि गेलखिन जे हम पैखानासँ आबै छी। बच्चा सभ आ दोसर कथा सुनू, हम थाकि गेल छी आ दोसर कथा पूरा मोनो नै पड़ि रहल अछि, तखन देखू... ओतएसँ जाइक बाद रस्तामे एकटा बहुत सुन्दर नारी जाइत रहए। आर किछु बदमाश हुनका तंग करैत रहए। हुनका देखि कऽ व्यापारीक मोन मचलि गेल आर ओ ओहि ठाम गेलखिन, तँ राजाक सिपाही आबि गेल आर सभकेँ पकड़ि कऽ लऽ गेल, हिनकोसँ..हिनकोसँ.. लिअ बिसरि गेलहुँ खिस्सा। फेर जखन मोन पड़त तखने... बेटा एकटा सोनू नामक लड़का रहैथ। जिनकर पिताजी बैंकक रजिस्टार रहथिन आ घरक जमीन्दार सेहो रहथिन, मुदा जखन सोनू छोट रहथिन तखन हुनकर छोट बहिनकेँ साँप काटि लेलनि। पहिल जमानामे जखन लोक सभकेँ साँप काटै छलै तखन झाड़ फूकपर बैस ध्यान देल जाइत छलै, इएह द्वारे हुनकर पिताजी आ सोनू दुनू गोटे बहुत जगह देखैलक, मुदा हुनका बचेबामे सोनूक समस्त परिवार विफल रहल जकर परिणाम भेल जे सोनूक बहिन मुइत भऽ गेलैन। सोनूक बहिनक मुइत भऽ जाइक समाचार सुनि हुनकर पिताजीक दिमागी हालत खराब भऽ गेलैक। सोनूक चार भैयारि आ दूटा बहिन छलै जे मे सँ एकटा बहिन मुइत भऽ गेलैन। सोनूक पिताजीक नौकरी सेहो छुटि गेलैन। मुदा खेती गृहस्थीसँ जीवन यापन चलै लागल, मुदा हिनकर दियाद बाद आ पड़ौसी सभ चाहे छलै जे हिनकर सभटा सम्पत्ति हड़ैप लेल जाए, इएह लेल हिनकर दियाद बाद सभ ताना बाना बुनैत रहैत छल, मुदा हिनकर माए हिनका सभकेँ आ सभटा सम्पत्तिकेँ बचाके राखलन्हि। सोनू जखन इंटरक अंतिम सत्रमे छलैन तखन गामसँ भागि दिल्ली पाइ कमेबा लेल आबि गेलैन्ह। मुदा दिल्ली आबि कए सोनू ठाम ठाम भटकए लागल। मुदा अपन पता गाममे ककरो नहि देलखिन्ह। गाममे माए, भाए, पिताजी आ छोट बहिन सभ बड्ड चिंता करए छलै। मुदा सोनूकेँ बहुत दिनक बाद एक जगह मालीकेँ काम भेटल आ धीरे धीरे पैसा इकट्ठा करए लागल आ पैसा जखन इकट्ठा भऽ गेलै तखन सोनू अपन पता गाम पठौलक आ फेर कुछ दिनक बाद गाम गेल आ अपन संग अपन भाएक उपनयन संस्कार कएलक आ इएह बेर हुनक दादी सेहो मुइत भऽ गेलैक फेर हुनक श्राद्ध कर्म कए फेर सोनू दिल्ली आबि गेल आ फेर नित्य क्रियामे लागि गेल मुदा सोनूकेँ रहैन जे हम अपन बहिनक बियाह दान अपने हाथसँ करू इएह बात लऽ कऽ सोनू ढ़ेर रास पाइ कमाए कए अपन गाम गेल आ ओतए अपन बहिनक बियाह दान केलक आ ओकर बाद अपन शादी अपने जिलाक सैतपुर गामक भवेश चन्द्र मिश्रक लड़की जिनकर नाम उषा छथि तिनकासँ बियाह केलक आ खूब नीक जकाँ रहै रहल। मुदा दुखक बात तँ इ अछि जे बियाहक आठ सालक बादो हिनका दुनूक गोदमे एकोटा किलकारी नहि आएल। ई बात लऽ कऽ दुनू गोटे बड्ड परेशान रहैत छलै। मुदा डॉक्टर साहेब कहलखिन्ह जे अहाँ दुनू गोटे चिंता नहि करू अहाँ गोद जरूर भरत आर इलाज शुरू कऽ देलकै। जे इलाजमे बड्ड रास पाइ खर्च सेहो होइत छलै। मुदा दुनू गोटे इ बातसँ तनिक विचलित नहि भेल आ नीक जकाँ दिल्ली एहन शहरमे रहए लागल। शिव कुमार झा ‘टिल्लू’, जमशेदपुर समीक्षा- सूर्यमुखी मैथिली साहित्यमे अंग्रेजी अथवा हिन्दी भाषा साहित्य जकाँ पद्य विधाकेँ कालक आधारपर रेखांकित नै कएल गेल अछि। किएक तँ छायावाद, हालावाद, रीति, क्रांति आदि विषए मूलक पद्यक रचना हमरा सबहक वयनामे सभ युगक साहित्यकार कऽ रहल छथि, कोनो विशेष कालकेँ एकवादसँ जोड़ब उचित आ प्रासंगिक नै। एतदर्थ पद्य विधाक आत्मा जौं आशु कविता आ गीतकेँ मानल जाए तँ किछु पद्य संग्रह मैथिली साहित्यकेँ भारतीय भाषाक प्रवर समूहमे स्थापित करैत अछि ओइमे यात्रीजी रचित चित्रा आ पत्रहीन नग्न गाछ, चंदा झा रचित गीत सप्तसती, सीता राम झा रचित उनटा बसात, भुवन कृत आषाढ़, मधुप कृत शतदल, उपेन्द्र ठाकुर मोहन कृत बाजि उठल मुरली, सुरेन्द्र झा सुमन कृत पयस्विनी, उपेन्द्रनाथ झा व्यास रचित प्रतीक, अमर कृत गुदगुदी, गोपाल जी झा गोपेश कृत गुम्म भेल ठाढ़ छी, चन्द्रभानु सिंह रचित के ई गीत अलापि छेँ, सोमदेव कृत कालध्वनी, नचिकेता कृत कवियो: वदन्ति, रवीन्द्र नाथ ठाकुर कृत रवीन्द्र पदावली, नवल कृत असमंजस, शेफालिका वर्मा रचित मधुगन्धी वसात, श्यामादेवी रचित कामना, इलारानी सिंह रचित विन्दन्ती, मार्कण्देय प्रवासी रचित एतदर्थ, कीर्ति नारायण मिश्र सिंह कृत सीमान्त, सरस रचित आंजुर भरि सिङरहार, कालीकान्त झा बूच जीक संकलित पद्य संग्रह कलानिधि, राजदेव मंडल रचित अम्बरा, ज्योति चौधरी रचित अर्चिस प्रमुख अछि। यात्री जीक दुनू पद्य संग्रहमे साम्यवादक धरातल चिक्कन चुनमुन आ उपेक्षितक प्रति विशेष अनुलोम भाव प्रस्फुटित भेल छै मुदा समग्र साहित्यिक विचार धाराकेँ जौं आधार मानल जाए तँ सर्वकालिक मैथिली भाषा साहित्यिक पद्य संग्रहमे सूर्यमुखी केँ सर्वश्रेष्ठ मानल जा सकैछ। एकर मुख्य कारण जे यात्री जीक रचनामे समाजमे साम्यवादकेँ मान्यता देबाक प्रयास तँ कएल गेल मुदा यात्रीजी असहज जीवनक मनोवृत्तिसँ कतहु-कतहु उद्वेलित भऽ कऽ पलायनवादक पक्षधर भऽ जाइत छथि हुनक मनोदशासँ ककरो कोनो द्वेष नै, समग्र मिथिला यात्री जीक प्रतिभाकेँ नमन करैत छन्हि परंच रचनाकारकेँ अपन हृएयक व्यथाकेँ रचनापर प्रकट नै होमए देलासँ रचनाक स्तर किछु बेसी मान्य भऽ जाइछ जकर प्रत्यक्ष प्रमाण आरसी प्र. सिंह रचित सूर्यमुखी अछि। यात्री भुवन, चंदा आ मधुपकेँ छोड़ि कोनो मैथिली साहित्यकारक कविता आरसीबाबूक सूर्यमुखीक जड़ि धरि नै पहुँच सकल, डाढ़ि आ पातकेँ छूबाक कल्पना सेहो असंभव अछि। सन् 1969सँ लऽ कऽ 1981ई. धरिक रचनाक संकलनमे 61 गोट पद्यक संग-संग 36 गोट लधुकविता संकलित अछि। सन् 1984ई.मे सूर्यमुखी पद्य लेल आरसी प्र. सिंहकेँ साहित्य अकादमी पुरस्कारसँ सम्मानित कएल गेल। रचनाक आरंभमे 22 पृष्ठक आरसी बाबूक शब्दमे लिखित प्रवेशिका सन्निहित कएल गेल अिछ। एे प्रवेशिकाकेँ आमुख वा भूमिका सेहो मानल जाए। कविताक परिभाषाकेँ आन अग्रणी साहित्यसँ जोड़ि कऽ जे बिम्ब तैयार कएल गेल ओकरासँ पाठककेँ काव्यधाराक प्रति निश्चित रूपेँ नव आयाम भेटत। आरसी बाबू हिन्दी साहित्यक प्रवीण कवि छथि। कवि सरोज भुवनेश्वर सिंहक प्रेरणासँ आरसी मैथिली साहित्यमे पएर रखलनि। अपन पहिल कविता शेफालिका'क रचना 1936ई.मे कएलनि। ओइकाल धरि आरसी बाबूक दृष्टिकोणमे मैथिली मात्र एकटा बोली छल मुदा भाषाक हृदएमे प्रवेश करिते कृत-कृत्य भऽ गेलाह आ हिन्दी जकाँ अपन तृण-तृणमे देसिल बयनाकेँ समाहित कऽ लेलनि। शेफालिकामे आरसीकेँ सत्यक बोध भेटलनि तँ रजनीगंधामे सौन्दर्य बोध। सूर्यमुखीमे साक्षात् मंगल मूर्तिक दर्शनसँ कवि भाव विभोर भेल छथि। सूर्यमुखी ऐ पोथीक पहिल कविता अछि कोनो एकटा कविताक शीर्षककेँ कविताक संग्रहक शीर्षक बनएबाक दृष्टिकोण कोनो पाठक लेल झाॅपल नै भऽ सकैछ। निश्चित रूपेँ आरसी सूर्यमुखीकेँ अपन प्रखर कवित्वक आवरण मानैत छलथि। आदित्य आ सूर्यमुखीक मध्यक संबंध विचारणीय अपन सिनेही दिस मात्र देखबाक लेल सूर्यमुखी प्रेरणा स्त्रोत भऽ सकैछ। रीति वा प्रीतिक एहेन रूप मूक जीवे टा मे भेट सकैछ। साकार रहितहुँ आरसीक जीवन िनरंकार जकाँ छल। जलमे रहितहुँ पुरनिपातक जकाँ परंच पुष्पसँ सिनेहकेँ सीख श्रंृगारक भान स्वाभाविक, किएक तँ प्रकृतिस्थ वस्तुमे पुष्पक सौन्दर्यसँ निरंकुशोमे आसक्ति पनपि जएवाक संभावना भऽ सकैछ। सूर्यमुखी पद्यमे ऋृतुराजक अवाहान कालमे आन फूलक सौन्दर्यसँ सूर्यमुखीक तुलनामे परार्थ प्रेमक अनुभव अनुशासित आ निष्ठासँ कएल गेल। वसंतक माधुर्य बेलामे पारिजातकेँ अमरत्व भेटल, हरसिंगार ब्रह्मबेाला मे वसुन्धराकेँ स्पर्श कएलक, रजनीगंधा रैनक मादक मधुगंधी बसातकेँ आलोिकत कएलक। अभिसार पथक प्रशांत बनि बेला मधुर मिलनक स्पर्श कएलक, संगहि जूही आ चमेली सखी बहिनपा बनि वसंतकेँ उन्मादित कएलक। ऐ पावन परिणयकालमे उपेक्षित रहि गेली तँ मात्र- सूर्यमुखी। ऐ नवल विम्बित सिनेहक प्रदर्शन मैथिली की सभटा भारतीय भाषामे विरले देखैमे आबैत अछि। सूर्यमुखीकेँ भेटल मात्र तँ दिवाकरक प्रति सिनेहिल दृष्टि। जखन धरि रवि वसुन्धराकेँ देखैत छथि, तखन धरि सूर्यमुखी हुनक परम समर्पिता प्रेमिका बनि हुनके दिस तकैत छथि, रविक, ज्योति दुआरि बन्न होइते सूर्यमुखीक नयन पट बन्न। सूर्यमुखी जकाँ जौं आदित्यक कोनो आन सिनेही तँ ओ पंकज.....। विरले आत्मा कोनो पंकजे सन उठबै छै माथा जन्म पंक मे लैत, सरोवर-सलिल राशि कऽ लंघन तोहर सन सौभाग्य ककर जे परम प्रकाश बनौलक उद्घाटन ले तोहर आनने अपन चेतना दर्पण प्रभात मे पुनीत प्रेमक झलकि अरूणोदय कविता मे भेटैत अछि। कोनो अनुभव मात्रक व्यथित सिनेहसँ कविक मन भीजल छन्हि मुदा अदृश्य विद्युत धारक अनुभव मात्रसँ अपन सुधि-बुधि बिसरि गेल छथि। उगैत सूर्य केँ प्रणाम पद्यक शीर्षकसँ भान होइछ जे मात्र सकल साध्य पूर्णकेँ नमन करबाक चाही मुदा कविताक बिम्ब एकदम अलग लागल। प्रभातक लालिमासँ पहिने जगबाक उद्घोष कऽ रहल छथि- आशुकवि। अपन स्वदेश भूमिकेँ वैश्विक मानचित्रपर स्थापित करवाक लेल ई कविता जागरण-गान जकाँ छै। चेतना तरंग मैथिली साहित्यमे लिखल गेल छाया गीत रूपक अनुभव करा रहल अछि। प्रकृति सौन्दर्य बोधमे महुआक भंगिमा मिथिलाक बहुत रास संस्कार परम्पराक द्योतक थिक, तँए कोइली पपिहा आ चैतीकेँ चेतना तरंगसँ जोड़ब प्रासंगिक लागल। प्रात:कालमे हरसिङार झड़ि कऽ प्रभातकेँ अनुगामी बनबैत अछि, कविक चंचल मन शरत ऋृतुक उषाकाल जकाँ आ प्राण हरसिंगार बनि गेल। रीतिक निशामे कवि अपन नाआंे आ गाआंे सेहो बिसरि गेल छथि ऐ आशुगीतक अनुभव हरसिंगार कवितामे भेल सनातन पुरूष कवितामे द्वैत आर्य संस्कृतिकेँ नील नदीक सभ्यतासँ जोड़ि कवि सत्य, अहिंसा, करूणा, मैत्री आ सिनेहक पाठ प्रस्तुत करैत छथि। कोनो धर्म यथा-हिन्दू, इस्लाम, बौद्ध, इसाइ पंथक िनर्वाह करैबला लोकक आचार िवचार कतवो भिन्न हुअए मुदा हृदएक स्पन्दन आ रक्तक प्रवाह सरिता सभमे सम अछि। सनातन पुरूष शीर्षक कविताक माध्यमसँ पाथरमे देवत्वक प्रवेश करएबाक प्रयास कएलनि। वर्षा उल्लास शीर्षक कवितामे पावस ऋृतु कालक चराचर जीवनक रंग भावुक लागल। शस्य गान कृषि प्रधान भारत भूमिक हरियरी भरल वसुधाक विप्लव चित्रण करैछ। अखण्डता मे एकताक दृष्टिकोण हम एक छी शीर्षक कवितामे देखएमे आएल परतंत्रताक कलुप अध्याय तँ सन् 1947ई.मे समाप्त भेल मुदा आर्शिक सामाजिक आ वैश्विक दृष्टिसँ हमरा लोकनिक देश सन् 1962ई. धरि पाछाँ रहल। चीन युद्धमे पराजयक कलंक लागल मुदा शनै: शनै: राष्ट्रीय एकताक रक्षा करैत हम सभ 1965मे एकटा पड़ोसी राष्ट्रकेँ धराशायी केलहुँ। तदुपरांत अन्तर्राष्ट्रीय परिदृष्यमे भारत भूमिक चर्च हुअए लागल। सन् 1969ई.मे आरसी बाबू ऐ दशापर हमर देश जागल कविताक रचना कएलनि। मुदा संगहि-संग किछु व्यभिचारसँ कविक मोन उद्विग्न छन्हि- जमाना क मोफिल, जुआनीक नटुआ मगन भेल जनता हेरा गेल बटुआ घरक बेचि कनियाँ लेलक कीनि धनियाँ भगत भेल बनियाँ, जगत ज्ञान जागल हमर भाग जागल हमर देश जागल सन् 1972-73मे मिथिला दर्शन, गोतिया आ अॅजौर सन् पत्रिकामे ई काव्यगीत प्रकाशित भेल आ लोकप्रिय सेहो भेल। एकर प्रमाण जे आरसी बाबूक कवितासँ प्रेरित भऽ कऽ काव्य जगतमे प्रवेश करएबला एकटा कवि काली कान्त झा 'बूच', ऐ ऊपरि लिखित कविताकेँ पढ़ि अपन प्रेरणास्त्रोतकेँ जागरण गान लिख समर्पित कएलनि- असम बंग पंजाब गुजरात जागल अहीं टा पड़ल छी उठू औ अभागल। समाजमे जागृति उत्पन्न करबाक लेल हिन्दी साहित्यमे जे स्थान दिनकर नेपाली, सुभद्रा कुमारी चौहान आ महादेवी वर्मा सन कवि-कवयित्रीकेँ देल गेल अछि ठीक ओहिना आरसी बाबूक किछु कविता जेना जन-जागरण, राष्ट्र गीत, युवाशक्ति, राग भारू, हाक, निबोधन, ललकारा, क्रांतिपूत आदिकेँ पढ़ि मैथिली साहित्यक लेल हिनका देल जा सकैछ। मैथिली मन्दिरमे शीर्षक कविताक माध्यमसँ वैदेहीक संग-संग विदेह आ मिथिलाक वन्दनामे मातृत्वक सिनेह अविरल लागल। आन भाषा जकाँ मैथिली साहित्यक संग ई बिडम्वना रहल जे कविता सभमे अधिक ठाम रीतिक आड़िमे आसक्तिक रूप अवांछित भेटैत अछि। सुमित्रा नंदन पंत जकाँ मैथिलीमे नगण्य रीति कवि छथि- मानस मंदिर मे सती, प्रिय की प्रतिमा थाप, जलती थी प्रिय विरह मे बनी आरती आप। मुदा सूर्यमुखीक किछु पद्य जेना आसंगिनी, मनोरथ, मनक बात शीर्षक कविता सभमे प्रीतिक आकुलता आ लावण्य स्त्रोत कवि पंतसँ कनेको कमतर नै। विचार मूलक कविताक रचनामे आरसी बाबूक एकटा अलग स्थान छन्हि। सूर्यमुखीमे बहुरूपिया, विभावना, आत्मज्योति, सत्यआस्वप्न, अछाह, जगजीवन, विरोधाभास, मिथ्यापाथर, युगवोधक विपति, अस्वीकृतिक आयाम, आनंदक खुजल दुआरि आ जीवन संध्या सन बहुआयामी विचारमूलक कविताकेँ संकलित कऽ पोथीक मर्यादा निश्चित रूपेँ बढ़ल। एक वस्तुकेँ प्राप्त करबाक आशमे कविकेँ कतेको बेर प्रयास करए पड़ैत छन्हि। क्षण भरिक तृप्तिक लेल सम्पूर्ण जीवनकेँ समाप्त कऽ देलनि। जकरा लेल लोक संसारक सुख-दुखकेँ किछु नै बूझैत अछि ओ कतऽ धरि लोकक संग दैत छन्हि। बहुरूपिया शीर्षक कवितामे समाजक द्वैध नीतिक अनमोल प्रदर्शन कएल गेल। ऐ कवितामे समाजक अन्तर्द्वन्दक मध्य विषम अर्थनीतिकेँ छायावादितासँ झाँपि आरसीबाबू रचनाकेँ अमरत्व प्रदान कऽ देलनि- एक मंगल रूप मोहन रूप दोसर घोर एक िनर्मम बनि कनाओल एक पोछय नोर के एहन बहुरूपिया? के कऽ रहल अछि खेल? जान ककरो जाए, उत्सव खेल ककरो लेल। विचार मूलक कवितामे दृष्टिक महत्व होइत छै, किओ एक रूप तँ दोसर आन रूपसँ देख सकैत छथि। उपरलिखित पद्यकेँ बलि प्रथा वा दोहरि मानसिकता कोन रूपमे देखल जाए, एकर दृष्टान्त तँ आब असंभव......। साम्यवादी वएह भऽ सकैत छथि जिनकामे व्यथा हुअए, ओ व्यथा अभावक हो वा संत्रासक मुदा जे मात्र कलमे टा मे नै, नित्य कर्ममे समग्र संसारकेँ आत्म सात् करवाक शक्ति रखैत होथि। आरसी बाबूक जीवन सरल छलनि तँए समाजक ओछ होथि वा उच्च सबहक मानसिकतामे अभावक दर्शन करैत छलाह। कतहु जीवन जीवाक लेल साधनक अभावक दर्शन होइत छलनि तँ कतहु साधनक प्राप्तिक लगातार प्रयास करबाक क्रममे असंतोष दर्शन- डूबै अछि देह मुइल सूर्यक प्रकाशमे, शीशा केर भीत छेद आबै अछि पासमे अप्पन प्रति विम्व सँ अपनहि टकराइ छी धुआँ जकाँ बन्न घर मे हम औनाइ छी हमरा सबहक लेल दुर्भाग्य अछि जे मिथिलाक परिधि कोशी, कमला, गंडकी, बागमती, बलान, करेह आ किछु गंगा माएक हड़होरिसँ साओन मासमे तबाह हुअए प्रारंभ भऽ जाइत अछि। ऐ बाढ़िक विनाश लीलासँ मिथिलाकेँ प्राय: प्रतिवर्ष भारी कलेषक सामना करए पड़ैत छन्हि। कविवरक जन्म भूमि समस्तीपुर जिलाक एरौत गाम बागमतीक किछेरमे छन्हि तँए ऐ विषएपर लेखनी मूक कोना राखथि। बाढ़िक हकरोस, सजल कुशल, वागमतीक धारमे आिद शीर्षक कविताक माध्यमसँ कवि जीवनक नाओं कतऽ लागत केर उद्घोष करैत छथि। बाढ़ि हकरोसमे जनजीवन परेशान भऽ जाइत अछि। मुदा एक अर्थमे बाढ़ि समाजक एकताक प्रतीक सेहो थिक- एहन आपत्काल विसरल वैरियो अरि-भाव, साप मूसक मिलन देखल रंक भेटल राव। मात्र सभ जीवे टा एकत्रित रहैत छथि, किएक तँ सबहक साधन समाप्त भऽ जाइत छन्हि, प्राणकेँ तनमे रखवाक मात्र आशा तँए ककरोसँ कोनो द्वेष नै। ऐ विषम परिस्थितिमे आरसी बाबू बहुत बेरि घेराएल छलथि, तँए राजधर्मसँ निश्चित रूपेँ अवगत भेल हेताह- खाली शुभकामनाक कोनो ने मानि, उपछऽ मे लागि गेला हाथे सँ पानि तर्पण मे भीड़ल छथि, जूटि कऽ किसान दाहर मे डूबि गेल कुशलक सभ धान। एक दिश प्रलयक भयंकर लीला मुदा दोसर दिस हमरा सबहक भौतिकवादी दृष्टिकोणक प्रवृतिमे चार्वाक दर्शनक अनुपालन आवश्यक तँए कवि मर्माहित छथि जे भोजनक अभाव मुदा अय्याशीक साधनक लेल लोक सभ उद्यत छथि- सान्त्वनाक हस्तलिखित पोथी गलि गेल, पान एक ढोली ले गोली चलि गेल....। उछाह शीर्षक कवितामे कवि दु:खक सागरमे गोता तँ लगा रहल छथि मुदा कॅपैत छन्हि आत्मा जे संसारमे दु:ख मुदा कतऽ जाएब। अर्थावलम्वी संसारमे सभटा उनटा-पुनटा भऽ रहल अछि। वाचक चुप्प छथि आ गोंग वाचाल बनवाक प्रयास कऽ रहल छथि। जगजीवन शीर्षक कवितामे विम्ब आ विवेचन दुनू नीक मुदा ऐ कवितासँ अपन जीवनकेँ नीरस मानएबला लोककेँ कोन प्रकारक चेतना भेटत? आरसीक अर्थ होइत अछि-दर्पण मुदा आरसी बाबूक ऐ कवितासँ दार्शनिक केँ तँ अवश्य दर्शन भेटल मुदा अल्पज्ञ समाजकेँ मात्र छोह आ आकुलताक दर्शन भेटतनि तँए ऐ कविताकेँ आरसी बाबू सन रचनाकारक अतिसाधारण प्रस्तुति मानल जाए। विरोधाभास शीर्षक कविता सेहो देशकालक दशासँ उबल मनुक्खक लेल कोनो अर्थमे प्रेरणास्त्रोत नै मानल जा सकैत अछि- कतहु चैन नहि पाबइ छै नर, आशा तृष्णा शरसँ बेधल एक फांस सँऽ जखनहि छूटल, दोसर मे तखने उद्बेगल। ज्ञान झाक वियोग शीर्षक कविता कोनो व्यक्ति विशेषकेँ िनर्देशित नै कए कऽ सरस्वतीक भंगिमामे जीवनक तादात्म्यकेँ झलकाबैत अछि। समए कालक दशापर वृति चित्र जकाँ लिखल गेल कवितामे भ्रष्टाचार आ जाति समाजक कुण्ठाक विवरण प्रसंगिक मानल जा सकैछ। प्रेमक रूप जौं अनुशासित हुअए तँ प्रेमी-प्रेमिकाक चरित्र आ विचारकेँ नकारात्मक मानव उचित नै। मैथिली साहित्यमे ऐ विषएपर बहुत रास कविता लिखल गेल अिछ मुदा सूर्यमुखीमे सन्निहित रूप-राशि कविताकेँ किछु आर अनुशासित पद्यक श्रेणीमे राखब उचित। कविक दृष्टिमे प्रेमिकाक देह चानन जकाँ, कंठ मुरली सन, करतल किसलय सन, रूप दर्पण सन, आँखि कालिन्दी सन आ छाँह चुम्बक जकाँ लगैत छन्हि। कवि प्रेमिकाक गामकेँ वृन्दावन जकाँ आ जइठाम प्रेमिकाक चरण पड़ैछ ओइ भूमिकेँ गोकुल जकाँ पवित्र मानैत छथि। वास्तविक जीवनमे अारसी बाबू पवित्र आचरणक व्यक्ति छलाह तँए व्यक्तिगत जीवनमे भऽ सकैछ जे अपन अर्द्धांगिनीक प्रति समर्पित कविता लिखने होथि वा समाजक लेल प्रेम संदेश सेहो ऐ पद्यकेँ मानल जा सकैछ। राग लय आ गतिमे महाकवि विद्यापतिक पद्य सबहक कोनो तुलना नै भऽ सकैछ मुदा नीक लागल जे आरसी बाबूक दू गोट पद्य विद्यापतिक पदावलीमे सन्निहित गीत जकाँ सूर्यमुखीमे लिखल गेल अछि- हरिगीतिका आ अनुराधा दुनू पद्य विद्यापतिक रचनाक छाँह जकाँ लागल। अनुराधा तँ राग भैरवीमे महाकविक लिखल बहुत रास कवितासँ मिलैत अछि। मैथिली साहित्यमे गजल नाअों सँ तँ बहुत कविक बहुत रास पद्य लिखल गेल अछि मुदा जौं श्रंृगार रसकेँ सरावोरि कऽ गजल वनएबाक चर्च कएल जाए तँ अारसी बाबू रचित गुलाबी गजल केँ एकटा अलग स्थान देल जाए। गजलक पाँति-पाँतिमे विम्ब अलग-अलग होइत छैक। तँए परिधि निश्चित नै। गुलाबी गजल पढ़लाक वाद ई भम्र दूर भऽ गेल जे एकटा प्रेमीकेँ अपन प्रेमिकाकेँ समर्पित कएल गेल अछि। चूॅकि कवि अपन सिनेहीसँ अलग-अलग दिवसक रूप सरिताक चर्च करैत छथि तँए ऐ पद्यकेँ कोनो पतिकेँ अपन पत्नीक प्रति परम सिनेह भरल उद्वोधन मानल जा सकैछ। वसंतक नहुँ-नहुँ शीतल वयारसँ प्रेमिका मोन आ अंग-अंग फूलल गुलाव जकाँ भऽ गेल अछि। विनु िनसा ग्रहन कएने कवि उन्मत्त छथि, अपन प्रेमिका वा वामाक रूप फण बढ़ाएल सर्प जकाँ लहलहाइत देखाइत छन्हि। वास्तवमे फागुनक रंगसँ आरसी रंगा गेल छथि। 1981ई.क होली विशेषांक (मिथिला मिहिर) मे ई कविता छपल छल। कविक मोन कहिओ वृद्ध नै भऽ सकैत छै तँए ने कवि अपन अर्द्धांगिनीसँ कहैत छथि- “कतहु ने जाउ भरि फागुन हमरे लग रहू।” वास्तवमे आरसी बाबू ककरा मुखसँ किनका प्रति समर्पित ई गजल लिखलन्हि ई प्रश्नवाचक चिन्ह रहि गेल। मात्र एतवे मानल जाए जे सामाजिक जीवन आ पारिवारिक मर्यादासँ बान्हल आरसी गृहस्थ धर्मक किछु रूपकेँ सदिखन अपन लेखनीसँ स्पर्श करैत रहलाह। किछु पद्यक विषएमे मैथिली साहित्यमे अखनो मतैक्य नै। ओइमे सँ एक- “विरहमासा” अछि। सामान्य रचनाकार ऐ प्रकारक पद्यकेँ बारहमासा लिखैत छथि आ वर्ख भरिक प्रेमिकाक विरहवेदनाक वर्णन करैत छथि। परंच वास्तवमे वारहमासा नै भऽ कऽ एहेन पद्य विरहमासा थिक। विरहिनी जतेक मास धरि पतिक वियोगमे िवलग छथि मात्र ततेक मासक चर्च कएल जाए। कवि मधुपक विरहमासा तँ कतहु पाॅच-छ: मास तँ कतहु वर्ष धरि लिखल गेल। सूर्यमुखीमे देल गेल विरहमासा कातिकसँ लऽ कऽ आसिन धरिक प्रेमिकाक वेदना थिक। शब्द-शब्दमे स्वत: मर्मस्पर्शी झंकार, मुदा एकटा कमजोर पक्ष जे वर्ख भरिक वेदनामे कार्तिकक पश्चात् अगहनक चर्च तँ कएल गेल मुदा तकरा बाद मूस माध लुप्त। फागुनक पश्चात् सोझे जेठ मासमे कवि प्रवेश कऽ गेलनि। अषाढ़क चर्च आरसीक मोनेमे रहि गेलनि। विरहक सभसँ हिलकोरि भरैबला मास भादवक ऐ पद्यमे कोनो प्रयोग नै कएलनि। तँए विरहमासाकेँ पूर्ण नै मानल जा सकैत अछि। जौं मात्र छ: मासक चर्च करवाक छलनि तँ लगातार करवाक चाही, सम्पूर्ण सालकेँ छ: मासमे समेटब उचित नै लागल। कवि कोनो राजनेता नै जे गरीवी भगेबाक योजना तैयार करथि मुदा लेखनीसँ प्रगती शीर्षक पद्य लिख गरीबी दूर करवाक कल्पना अनुखन लागल। वचनिका, उपराग, िदलासा, मुइल सती, परिपाटी, ज्योतिवरण, ललित स्मृति, ऋृतुराज दर्शन, असीम आहवान, अर्थीक अर्थ, संक्रान्ति आदि कविताक माध्यमसँ ई ज्ञात होइत अछि जे कवि आरसी कोनो योजना बना कऽ कविता नै लिखैत छलाह, कवित्वक संचार हिनक कण-कणमे व्याप्त छलनि यएह कारण जे आधुनिक मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ आशुकविक श्रेणीमे आरसीक स्थान विलक्षण मानल जाए। आरसी वीसम सदीमे रहितहुँ भूतकालमे प्रवेश कऽ कखनो-कखनो कविता लिखैत छलाह, जकर प्रत्यक्ष प्रमाण दोहा दोहन कविता थिक। जइमे 12 गोट दोहा लिखल गेल अछि। कवीर, रहीम जकाँ समए कालक दोहा सभमे वर्त्तमान कालक कलुषित मनोवृत्तिक विविध रूप चित्रण ऐ सभमे भेटैत अछि- पोथी पढ़ि किछु हैत ने, तोड़ऽ चाही रोट, जोड़ू नोट बकोटि कऽ भोट बटोरू मोट अस्पताल सँ नीक अछि हमरा लगै पताल कालक ओतऽ अकाल अछि काल एतऽ तत्काल। दीपक दर्प आ नव पढ़ुआक संग-संग 36 गोट मुक्त मुक्तावली सभमे कविताक विविध धाराक ऑचलमे कवि समाजक लेल किछु नव आ वहुआयामी दृष्टिकोण उत्पन्न करए चाहैत छथि। कखनो कवि बाढ़िक पसाहीमे पानिसँ तबाह छथि तँ लघुकविता पानि मे जल-महिमा क गुणगान करैत छथि- पानि विना नहि धानक जीवन, मोतीक रूप न पानि बिना पानि विना नहि चूनक रौनक शोभित भूप न पानि बिना......।। एवं प्रकारे आरसीक सूर्यमुखी मात्र सूर्येटा केँ नै दर्शन करैत छन्हि, अइमे सम्पूर्ण मानवताक लेल विविध विषएक दृष्टि समाहित अछि। मैथिलीक लेल दुर्भाग्य जे जनिक कविताक अर्थ किओ नै बूझए ओ मंचपर ज्ञानक शेखी छॅटैत छथि, आ आरसी सन आशुकविकेँ अखन धरिक कथाकथित िकछु समाज जेना-तेना कवि स्वीकार कएलकनि। वास्तवमे जौं दृष्टिकेँ हृदएसँ जोड़ि सूर्यमुखी पढ़ल जाए तँ स्पष्ट भऽ सकैत अछि जे ई मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ कविता संग्रह थिक। पोथीक नाआंे- सूर्यमुखी, प्रकाशक- मैथिली अकादमी पटना प्रकाशन वर्ष- 1981, रचनाकार- आरसी प्रसाद सिंह मैथिली कथाक विकासमे गामक जिनगीक योगदान अपन जन्म कालहिंसँ “मैथिली” समाजक अग्र आसनपर बैसल वाचकगण द्वारा महिमामंडित होइत रहलीह। स्वाभाविक अछि शिक्षित लोक ऐ वर्गसँ संबंध रखैत छलथि। आर्य परिवारक सभ भाषा समूहक जननी संस्कृत मानल जाइत अछि तँए मैथिली कोना तत्समसँ बचथि? सरिपहुँ मैथिलीक अधिष्ठाता ब्राह्मण आ कर्ण-कायस्थ रहल छथि, तँए काव्य, महाकाव्य, कथा वा नाटक हुअए सभ साहित्य पल्लवक उदय तत्सम मिश्रित मैथिलीसँ भेल। आदिकवि विद्यापतिक पदावली पुरान-रहितौं एे रूपेँ अपवाद अछि मुदा हुनक पुरूष परीक्षा संस्कृतक आवरणसँ बाहर नै निकलि सकल। संभवत: मैथिलीक कथाक आरंभ पुरूष परीक्षाक मैथिली अनुवाद कऽ चन्दा झा कएलनि। प्रथम मैथिलीक मौलिक कथा विद्यासिन्धुक कथा, कथा संग्रह थिक। तत्पश्चात् स्वतंत्र रूपेँ मैथिलीमे कथा लिखव प्रारंभ भऽ गेल। भुवन जीसँ लऽ कऽ वर्त्तमान युगक कथा यात्रामे किछु एहेन कथाकार भेल छथि जनिक यात्रासँ ऐ भाषाकेँ स्थायी स्तंभ भेटल। ऐमे कुमार गंगानंद सिंह, नागेन्द्र कुमर, मनमोहन झा, रामदेव झा, हंसराज, व्यास, किरण, रमानंद रेणु, गौरी मिश्र, लिलि रे, रूपकान्त ठाकुर, रमेश, धीरेन्द्र धीर, अशोक, मन्त्रेश्वर झा, धूमकेतु, तारानंद वियोगी, विभूति आनंद, चित्रलेखा देवी, रामभरोष कापड़ि भ्रमर, श्यामा देवी, शेफालिका वर्मा, कमला चौधरी, कामिनी कामायनी, प्रदीप बिहारी, हीरेन्द्र, लल्लन प्रसाद ठाकुर, गौड़ीकान्त चौधरी कान्त, अरविन्द ठाकुर, अशोक मेहता, राजाराम सिंह राठौर, परमेश्वर कापड़ि, विजय हरीश, उमानाथ झा, योगानंद झा, सुधांशु शेखर चौधरी, गोविन्द झा, राधाकृष्ण बहेड़, मणिपद्म, मायानंद मिश्र, जीवकान्त, अशोक, राजमोहन झा, प्रभास कुमार चौधरी, नरेश कुमार विकल, सुभाष चन्द्र यादव, केदार कानन, बलराम, अमर, चन्द्रेश, रमाकान्त राय 'रमा', कुमार पवन, सियाराम झा सरस, रामभद्र, रौशन जनकपुरी, राजेन्द्र विमल, रमेश रंजन, सुजीत कुमार झा, जितेन्द्र जीत, नारायणजी, शैलेन्द्र आनन्द, अनमोल झा, उग्रनारायण मिश्र कनक, राजदेव मण्डल, कपिलेश्वर राउत, वीणा ठाकुर, कैलाश कुमार मिश्र, देवशंकर नवीन, महाप्रकाश, धीरेन्द्र नाथ मिश्र, साकेतानंद, शिवशंकर श्रीनिवास, मानेश्वर मनूज, अनलकांत, श्रीधरम, सत्यानंद पाठक, मिथिलेश कुमार झा, नवीन चौधरी, आशीष अनचिनहार, विरेन्द्र यादव, बेचन ठाकुर, मनोज कुमार मण्डल, अजीत आजाद, अकलेश कुमार मण्डल, संजय कुमार मण्डल, भारत भूषण झा, लक्ष्मी दास, नीता झा, उषा किरण खान, ज्योत्सना चंद्रम, सुस्सिमा पाठक, शुभेन्द्र शेखर, कुसुम ठाकुर, दुर्गानन्द मण्डल, नीरजा रेणु, ज्योति सुनीत चौधरी, शंकरदेव झा आ गजेन्द्र ठाकुर प्रमुख छथि। ऐ बीछल कथाकारक समूहसँ विलग किछु एहेन कथाकार भेल छथि जनिक सृजनशीलतासँ मैथिलीकेँ नव गति भेटल। जइमे प्रो. हरिमोहन झा, ललित आ राजकमलकेँ राखल जाए। हरिमोहन बाबू हास्य आ दर्शनसँ समाजक सत्यकेँ नाङट करैत इतिश्री मर्म वा अनुशासित मजाकसँ कएलनि। ललित जीक कथामे सम्यक समाजक परिकल्पना तँ भेटैत अछि मुदा समाजक कात लागल वर्गक विवरण स्वातीक बून जकाँ कतौ-कतौ भेटैत अछि। राजकमल चौधरी प्रयोगवादी कथाकारक रूपेँ प्रसिद्ध छथि। जौं एकैसम शताब्दीक कथा िवकासक चर्च कएल जाए तँ ऐ विधामे संतान रहितौं मैथिली बॉझ जकाँ भऽ गेल छलथि। सन् २००१सँ २००८ईं. धरिक कथा विकासक चर्च करब प्रासंगिक नै अछि। धन्यवाद दैत छी मिथिला दर्शन (कोलकाता) आ घर बाहर (पटना)क संपादककेँ जनिक प्रयाससँ मैथिली साहित्यकेँ एकटा बेछप्प कथाकार भेटल। ओ मात्र कलमें वा वाचक रूपेटा नै जीवनक सभ क्षेत्र, सम्यक चरित्र रखैबला साम्यवादी साहित्यकार श्री जगदीश प्रसाद मण्डल। हिनक पहिलुक कथा भैंटक लावा आ बिसाँढ़ घर बाहरमे आ चूनवाली मिथिला दर्शनमे प्रकाशित भेल। तत्पश्चात विदेहक सौजन्यसँ हिनक रचना क्रमश: मैथिलीक पाठक लोकनिकेँ भेटए लागल। सन् २००९ईं.मे विदेहक संपादक श्री गजेन्द्र ठाकुरक प्रयाससँ श्रुतिप्रकाशन दिल्लीक अधिष्ठाता श्री नागेन्द्र कुमार झा आ हुनक साहित्य प्रेमी धर्मपत्नी श्रीमती नीतू कुमारी हिनक पहिल कथा संग्रह गामक जिनगी प्रकाशित कएलनि। संयोगसँ ऐ पोथीक प्रारंभ भैंटक लावा कथासँ कएल गेल। एक सए पैंसठ पृष्ठक ऐ संग्रहमे १९ गोट कथा संग्रहीत अछि। आमुख देसिल वयनाक सिद्धहस्त कथाकार सुभाष चन्द्र यादव जी लिखने छथि। जेना-तेना सुभाष बाबू कथाकारक महिमामंडन तँ कएलनि, परंच ऊपर मोने आ हियासँ लिखल आमुखमे भिन्नता होइत अछि, जेकर िनर्णए प्रबुद्ध पाठकपर छोड़ि देल जाए। बंगभाषीकेँ कोलकाता सन महानगर, मगधीकेँ पटलिपुत्रसन ऐतिहासिक शहर, भोजपुरी लोकनिकेँ गोरखपुर आ वाराणसी सन धाम भेटल। मैथिली भाषीकेँ गनि-गुथि कऽ दरिभगा आ सहरसा सन ग्राम्य नगरी। तखन भाषाक शहरीकरण आ आदान-प्रदानक सपनों देखब उचित नै। भारतवर्ष जौं गामक देश तँ मिथिला महागामक भूिम। एक वर्ष बाढ़ि तँ दोसर वर्ष सुखाड़। कोनो उद्योगक साधन नै, शिक्षा, स्वास्थ्य आ सड़क सन मौलिक समस्या मकड़जालमे ओझराएल अछि। परिणाम पलाएन अर्थात पड़ाइनक रूप लऽ रहल। भोजपुरी लोक सेहो पलाएन कएलनि परंच अपन भाषाक संग, दृष्टिकोण नीक लगैत अछि। अपन देशकेँ के कहए माॅरीशस आ फिजी धरि अपन बोली धेने छथि। अपन जीवन-आचारकेँ हाइटेक बनेबाक क्रममे मैथिल संस्कृतिक दोहन भऽ रहल अछि। आनक कोन कथा? किछु एहेन साहित्यकार भेलाहेँ जिनका साहित्य आकादमी पुरस्कार तँ मैथिली भाषाक लेल भेटल मुदा हुनक परिवारक नेना-भुटका गलतियोसँ मैथिली नै बजै छथि। कथा जगतक प्रयोगवादी शिल्पी राजकमल जीक कथा रीति-प्रीतिक समागमसँ ओत-प्रोत छन्हि। ललका पाग, साँझक गाछ, कादम्वरी उपकथा सन बहुत रास कथामे सिनेहक मर्मस्पर्शी चित्रण कएल गेल अछि। परंच कतौ-कतौ राजकमल जी सेहो भटकि कऽ अनैतिक प्रेमकेँ चलन्त साहित्यक रूप देलनि। जेना घड़ी शीर्षक कथा कोनो रूपेँ समाजमे नीक संदेशक वाहक नै भऽ सकैत अछि। ऐमे उल्लेख तँ समाजक एकात लागल जहूरनीक कएल गेल परंच की अनुशासित सिनेहक प्रदर्शन राजकमल जी कऽ सकलाह? जखन प्रांजल आ प्रवीण कथाकारक ई दशा तँ आनक विषएमे की लिखल जाए। एक अर्थमे किछु जनवादी साहित्यकार अपन कथा सोतीमे मैथिली पाठककेँ आनन्दित अवश्य कएलनि ओइमे प्रभाष कुमार चौधरी, रामदेव झा आ कांचीनाथ झा किरणक संग-संग धूमकेतु, कुमार पवन, कमला चौधरी आ डॉ. शेफालिका वर्माकेँ राखल जा सकैछ। जौं सम्पूर्णताक चर्च करी तँ जगदीश बाबूकेँ एकैसम शताब्दीक सर्वश्रेष्ठ कथाकार माननाइ यथोचित। किएक तँ ओलती आ चिनुवार बिसरैबला मैथिली प्रेमीकेँ भैंटक लावा, बिसाँढ़, पीरार, करीन आ मरूआसँ परिचए करौलनि। मैथिली भाषाकेँ नव-नव शब्द देलनि। पाग पहिर कऽ सभामे आगाँ बैसैबला लोकसँ लऽ कऽ मुसहर धरिक प्रति सम्यक सिनेह हिनक कथाक विशिष्टता अछि। जगदीश जी समाजक ओइ वर्गसँ अबै छथि जकरा अखन धरि मंचपर आसन िदअमे हमरा सभकेँ संकोच होइत अछि। परंच कतौ हिनक कथामे व्यक्तिगत द्वेष आ पूर्वाग्रहक प्रदर्शन नै। जगदीश जी समाजक आगाँक पिरहीकेँ सम्मानित करैत सम्यक ज्योति जगेबाक आश अपन कथा सभमे रखने छथि। गामक जिनगी'क पहिल कथा भैंटक लावा मिथिलाक बाढ़िक दशाकेँ केन्द्रित कऽ कऽ लिखल गेल अछि। भैंटक लावाक संदर्भमे हमरा सबहक गाम-गाममे एकटा कहबी चर्चित छैक- “बड़-बड़ जनकेँ भैंटक लावा पदनोकेँ मिठाइ।” ऐसँ प्रमाणित होइछ जे सोती, मुरदैया, पोखरि, धनखेतामे जलमग्नक परिणाम स्वरूप जनमल भैंटक लावा-निघृष्ठ भोज्य पदार्थ थिक। भोज्य पदार्थ मात्र समाजमे रहितौं यायावरी जीवन व्यतीत करैबला लोक लेल। ऐ कथाकेँ पढ़ि एकर प्रयोजन कनेक विस्मित करएबला परंच उपयोगी लागल। कथा मुसना ओकर अर्द्धांगिनी जीबछी आ दुनू बच्चाकेँ बाढ़िक जीवन दशासँ जोड़ि बिम्बित कएल गेल अछि। अपना ऐठामक लोक संतान प्राप्तिक लेल जीबछ घाटमे मनौती मनैत अछि। जौं पुत्र लेलक तँ जीबछा आ जौं बेटी आएलि तँ जीबछी। ऐ जीबछीक तँ नेनकाल नै देखाओल गेल, ओहेन मॉगल-चाॅगल छथियो नै मुदा साहस देखनुक। मुसनाकेँ सर्पदंशक काल जीबछी साहस नै छोड़ली। झाड़-फूक सन भ्रांतिकेँ ऐ कथामे देखाओल गेल परंच परिणाम सकारात्मक- “मुदा ढोढ़ सॉप कटने रहए तेँ बिख लगबे नै केलै।” ऐसँ रचनाकारक ग्राम्य जीवनक मनोदशाकेँ परिवर्तन करबाक उद्देश्य प्रमाणित होइत अछि। श्रीकान्त सन गामक छड़ीदारकेँ बाढ़ि उद्देश्य पूरा नै करए देलक। जौं अन्न रहितनि तँ सूदिखोरी चैलतनि मुदा अपने खएबाक लेल नै तँए आगाँ की सोचथि.....? जीवछी हुनके आश्रममे कुटौनी करति छलीह, श्रीकान्तबाबूकेँ सोगाएल देख जीबछीक कथन- “एक्केटा बाढ़िमे चिन्ता करै छथि कक्का, कनी नीक की कनी अधलाह, दिन तँ बितबे करतनि।” मे साहसक संग-संग यथार्थबोध होइत अछि। अभावक नाहमे सवार व्यक्तिकेँ भासि जएबाक कोनो चिन्ता नै, ओ तँ ई सोचि कऽ जल-यात्रा करैत अछि जे अथाह पानिमे नाह डूबबे करत। तँए हेलबाक कला पहिने सीख लेल जाए। दीन-हीन आ साधन विहीन मानवीय जीवनमे विचलन नै होइत छैक। मुसना अर्थात मकसूदन मूसक तीमन आ धुसरी चाउरक भातमे जीबछीक सिनेह आ दुखनीक आश देख अमृत मानि कऽ ग्रहण कऽ लेलक। रातुक कोनो चिन्ता नै जीबछी साक्षात आर्या बनि ठाढ़ छलीह- “ककरो किछु होउ जकरा लूरि रहतै ओ जीबे करत।” बाढ़िसँ सभ कियो तबाह कमला महरानीकेँ दीप बाड़ि अपन प्रभाव कम करबाक प्रार्थना सभ िकयो करैत छल। यएह थिक मिथिलाक गामक जीवन केर मनोवैज्ञानिक रहस्य। हम-सभ भगवतीक आगाँ बलि प्रदानो कऽ सकैत छी तँ कखनो प्रकृत पूजन सेहो। जखन पानि कम भेल तँ सभ कियो अपन डूबल खेत-पथारक गलल डाॅटकेँ गनऽ मे लागि गेलाह मुदा जीबछीक पारखी दृष्टि भैंटक कोखिकेँ देखबामे मग्न छल। श्रीकान्तबाबूसँ आज्ञा लऽ कऽ हुनक खेतसँ भाँटिकेँ उजाड़ि अन्न निका लऽ लगलीह। लावाक सुगंधसँ जीबछीक कल्पनामे चारि चान लागि गेल बाढ़िकेँ जीवनक उपहार मानि कमला-कोसीकेँ धन्यवाद दिअ लगलीह। ऐ प्रकारक सोचसँ कियो विस्मित भऽ सकैत अछि- बाढ़ि कखनहुँ लाभकारी कोना होएत? मुदा जीबछीकेँ डूबैक लेल तँ किछु रहबे नै करए धास-पातक घर फेर बनि जाएत। महींस नहियो तँ गाइये कीनबाक योजना बनाबऽ लगलीह। स्वाभाविक अछि कर्मठ लोककेँ दुआरि ताकए नै पड़ैत अछि। कथाक सभसँ नीक प्रसंग लागल जे पहिलुक भैंटक चाउर श्रीकान्तबाबूकेँ देबामे जीबछीक दृष्टिकोण। गरीब कखनहुँ विश्वासधात नै कऽ सकैत अछि। संग-संग कथाक आकर्षण घटना चक्रक क्रममे जखन ठेंगी मुसनाक भरि पोख खून पीब लेलक तखन मुसनाक शंकाग्रस्त हएब जे जीबछी हुनक मरबाक कामना करैत अछि किएक तँ दोसर पुरूष भेंट जेतनि। समाजक दाबल वर्गमे नारी शोषण नै, किएक तँ नारी पुरूषक संग-संग जीवनक वाहनकेँ गति देवामे गतिशील रहैत छथि। ओ दोसरो विवाह करबाक लेल स्वतंत्र छथि। आगाँक जाति तँ नारीकेँ आब अधिकार दिअ लागल पहिने तँ अो अंगनक लक्ष्मी मात्र छलीह। ऐ कथाकेँ पढ़बाक क्रम सोचऽ मे अबैत अछि जे अागाँ किनका मानल जाए मुसना सन मुसहरकेँ वा हमरा सन......। रचनाकारक एकटा आर दृष्टिकोण नीक मानल जाए जे समाजक दूटा अलग-अलग वर्गक कथा कहितहुँ वर्ग संघर्ष नै वरन् सिनेहिल भाव। श्रीकान्त लावा तँ स्वीकार करै छथि संगहि जीबछीकेँ नव-वस्त्रक संग विदाइ सेहो दै छथि ऐमे सामाजिक सामंजस्यकेँ बढ़ेबाक प्रयास देखएमे आएल। ऐ कथा संग्रहक दोसर कथा “बिसाँढ़” भैंटक लावाक विपरीत सुखारक स्थितिक मध्य घुमैत अछि। प्रकृति प्रदत्त विपदामे सभसँ बशी प्रभावित समाजक पेटकान लाधल वर्ग रहै छथि। कथाक नायक डोमन चारि बर्खक रौदीसँ तप्त छथि। हिनका खेत-पथार नै। अपन कनियाँ सुगियाक संग मेहनति मजूरी कऽ कऽ कहुना जीवन वसर करैत छलाह मुदा जखन गिरहस्ती समाप्त भऽ गेल तँ नीक-नहाँति गुजर करबाक कल्पनो असंभव। परंच सुगिया तँ छथि मैथिल नारी, ओइ समाजक नारी जतए पुरूषसँ बेसी परिवारक भार नारियेपर रहैछ। हािर कोना मानतीह। डोमनकेँ दुखित देख नूतन ओिरयान करबाक लेल अद्यत भऽ गेली। बड़का-बड़का मजाहन जेना नेङरा काका अपन महाजनी बन्न कऽ लेलनि। ओ अपन झाँपल अन्न-पानिकेँ अगिला साल उच्च भाउपर बेचबाक तैयारी कऽ रहल छथि। गाए-बरदकेँ मरनासन्न देख किसान तँ अरण्यरोदन करैत अछि मुदा गिद्ध प्रसन्नचित्त मुक्त गगनमे मॅडराइत रहैछ, यएह हाल छन्हि बौकी काकीकेँ, अपन महाजनीक लेल राखल चाउरकेँ मातृनवमीमे निकालतीह। हाय रे हमरा सबहक संस्कृति नेना भूखसँ कल्हाइत छथि मुदा मातृनवमीमे मरल पूर्वजक स्मृतिमे अरबा चाउर पंडित केर पातपर देल जाएत। सरिपहुँ यथास्थिति जे हुअए परंच दुर्गापूजा, कोजगरा, दीवाली, गोवर्धनपूजा, भरदुतिया छठि आदिकेँ मिथिलाक संस्कृति पर्व मानि रचनाकार सम्यक दृष्टिकोणक परिचय देलनि। जगदीशजीक जन्म एहेन परिवार वा वंशमे भेल जइठाम कोजगरा मनाएब असंभव मुदा ब्रह्मण आ कर्ण कायस्थ सन अपेक्षाकृत कम गणनाक जातिकेँ सेहो आत्मसात् कऽ लेलनि। ऐसँ पूर्व कोनो ब्राह्मण साहित्यकार गोवर्धनपूजा वा सलहेसपूजाकेँ मिथिलाक पावनि मात्र मंचेटा पर मानने हेताह। कथाक इतिश्री सुखारक मध्य एहेन फलक शोधक रूपमे कएल गेल जकर विषयमे बहुत कम लोक सोचने हेताह। सुक्खल पोखरिकेँ डाँड़ भरि कोरि उज्जर-उज्जर अल्हुआ सन फर देख सुगियाक भुक्खल आत्मा जुरा गेल ओतऽ पुरान व्यथाक मध्य वर्त्तमान सुखद अनुभूतिक तुलना करए लगलीह विकल जीक गजल- “शेषांशपर रोदन करू गीत उदित भानपर....।” उपर बिसाँढ़ आ नीचाँ सिंगही माछ जौं वनस्पति शास्त्री रहती छल तँ पुरस्कार निश्चित, मुदा गरीबक शोध तँ पेट खातिर होइत अछि, एकरा अपन समाजमे मोजर नै, आनठाम के देत। धनिया आ पिचकुनक प्रेम आ वैवाहिक जीवनमे भैंटक लावा वा बिसाँढ़ सन एकटा तेसर उपेक्षित फल- पीरारक फड़ सिनेह वृष्टि करैत अछि। जगदीश जीक कथा सभमे बिम्ब विस्मयकारी, शिल्प समाजक जीवन शैलीक विषम परिपेक्ष्यक विवेचन करैत छन्हि, मुदा एकटा कमी जे देखल गेल ओ अछि अलंकार आ हास्यक अभाव। वास्तवमे ऐ कथाक प्रति आकर्षण ओकरामे भऽ सकैत अछि जेकर जीवन अछोप हुअए। जौं पातपर भात नै तँ चटनीक कोन प्रयोजन। हिनक कथा ओइठामक समाजकेँ हिलकोरि देलक जतए धरि पंडित हरिमोहन झा सन मॉजल साहित्यकार कहियो नै पहुँच सकलथि, आनक कोन गप्प? “अनेरूआ बेटा” कथामे एकटा संतानहीन दंपतिकेँ दोसरक फेंकल पूतक पोषण मैथिली साहित्यमे क्रांतिवादकेँ आगाँ बढ़एबाक प्रयास मानल जाए। गंगाराम आ भुलियाक वरदपूत मंगल कथानायक छथि। ओ मात्र साक्षर भेला उत्तर चाहक दोकानदार बनि गेलाह। मंगल, धर्ममाता आ पालक पिताक मृत्युक पश्चात अपन पेटसँ लड़ैत-लड़ैत कोना साहित्यकार भऽ गेलथि संभवत: जगदीशजी लेखनी उठबैसँ पहिने नै सोचने हेताह। एकटा प्रसंग कनेक अनसोहाँत लागल जे गंगारामक स्त्री अबोध मंगलकेँ दुग्धपान करएबाक लेल अपन पितिऔत दियादिनी कबूतरी लग पहुँचै छथि। कबूतरी विस्मित नै भऽ कऽ भुलियासँ कहलनि जे हिनक बुढ़ाढ़ीक नेना कतेक पोरगर। मातृत्वक अवधि नौ मासक होइत अछि जखन पहिने भुलियामे कोनो एहेन लक्षण नै तँ कबूतरीक ऐ प्रकारक संवाद रचनामे कल्पनाशीलता भरबाक असफल प्रयास मात्र मानल जाए। भऽ सकैछ कथाकार कबूतरीकेँ हँसी-ठठाबला प्रवृत्तिक कलाकार बनबैत लिखने होथि। मंगलकेँ साहित्यकार बनेबामे रूपचन सन खिसक्करक बड़ पैघ हाथ छल। कहियो राजा-रानी तँ कहियो रानी-सरंगा तँ कहियो रजनी-सजनीसँ लऽ कऽ गोनू झा, डाकक कथा, अल्हा रूदल, दीना-भदरी, लोरिक आ सलहेसक कथाक संग-संग गामक लोकक मुँहसँ सेहो सुनि-सुनि कऽ चाह विक्रेता मंगल कथाकार बनि गेलथि। ऐ प्रकारक कथा नाट्य रूपमे “भफाइत चाहक जिनगी”मे शेखरजी लिखने छथि। समग्र समाजक प्रति सम्यक दृष्टिकोण रखैत अर्थनीतिकेँ रचनाक मूल विषय वस्तु बनएबामे जगदीश जीक कोनो जोड़ मैथिली साहित्यमे नै भेटत। कलान्तरमे वकील साहेबक पुत्री सुनएना मंगलसँ प्रभावित भऽ हिनका अपन जीवन संगी बनएबाक लेल आतुर भऽ गेली। ऐ िनर्णएमे वकील साहेब सुनयनाक संग छथि। कथाक अंत धरि िनष्कर्ष नै निकलि सकल मुदा एकटा प्रश्न हमरा सबहक माथपर रचनाकर लादि देने छथि- ओ अछि जाति, धर्मसँ ऊपर उठि कऽ आत्मिक मिलनक आधारपर विवाह करबाक िनर्णए। भऽ सकैत अछि जे कथाकार अपन व्यक्तिगत जीवनमे एहेन क्रांतिकारी कदमक विरोधी होथि, मुदा हम अपन छठम ज्ञानेन्द्रिय अनुभूतिक आधारपर कहि सकै छी अगिला पचास वर्षक अंदर हिनक रचना आर्यावर्त्तमे क्रांतिक सूत्रपात करैत बदलैत दृष्टिकोणक प्रत्यक्षदर्शी रहत। समग्र ग्राम्य जीवन शैलीकेँ छुबैत एकसँ बढ़ि कऽ एक कथाक संग्रह “गामक जिनगी” मैथिली साहित्यक लेल बेछप्प संकलन थिक। “डीहक बटवारा”मे शहरी जीवनकेँ जीबि अंतिम अवस्थामे पितृभूमिकेँ अपन शेखी ओ शानक भूमि बनएबाक अविरल प्रस्तुति कएल गेल अछि। गामकेँ खराब शहरी लोक कऽ दैत छथि। “बाबी”कथामे बाबी मुरूख रहितहुँ गामक पथ प्रदर्शक महिला छथि। छठिमे एकटा छोट नेना पूजासँ पूर्व पाकल केरा खा गेल सभ ओकरा मारए लागल मुदा बाबी सिनेह देखबैत भगवानकेँ श्रद्धासँ प्रसन्न करबाक प्रयास करए लगलीह। आडंवरपर मूर्ख महिलाक विजयी उद्घोष ऐसँ नीक शिल्प कतए-कतए देखाओल गेल। रहमतक माए बाबीसँ खरनाक बासि प्रसाद लऽ संध्या अर्घक लेल फल-फूल देलनि आ बाबी हृदेसँ स्वीकार कऽ लेलथिन। वास्तवमे मिथिला यएह छल, मुदा किछु छद्म स्वार्थी तत्व एकरा जाति धर्मक खाधिमे ठाम-ठाम खसा देलक। संध्या अर्ध्यमे रहमतक माए किछु देरीसँ औतीह किएक तँ हटिया जएबाक छन्हि। “कर्म प्रधान विश्व करि राखा”, बाबी हिनक िनर्णएसँ सिनेहिल छथि किएक तँ भगवान प्रेमक भुक्खल, श्रद्धा कियो अखनहुँ प्रकट कऽ सकैत छथि। कामिनी कथाक प्रारंभ अर्थक विजय मुदा अंतमे टकासँ कीनल वर द्वारा अर्धांगिनीक प्रताड़नासँ भेल। अंतमे प्रश्ने रहि गेल “कामिनी कतए गेली?” राजकमल जीक कथा जकाँ जगदीशजी सेहो प्रश्न छोड़ि इतिश्री कएलनि। प्रयोगवादिताकेँ मैथिलीक धरातलपर दोसर बेर प्रयोग, मुदा राजकमलजी सँ नीक रूपेँ कएलनि। गामक जिनगीक कथाकार सभसँ पैघ जे वस्तु मैथिलीकेँ देलनि ओ थिक नव-नव शब्द। ऐ प्रकारक शब्द कोनो अकाशसँ नै खसल, शोषित समाज आ अगिला पातिक गरीब समाजमे एखनो बाजल जाइत अछि, मुदा मैथिली साहित्यकारक रचना सभमे लुप्त। मात्र किरणजी, हरिमोहन झा, सोमदेव आ शेखरजी सन किछु कथाकारक किछुए रचनामे एहेन प्रकार शब्द भेटैत अछि। मुदा ओ सभ शब्द ओतेक रूपक नै जतेक जगदीशबाबूक रचनामे ठाम-ठाम प्रयोगमे अबैत अछि। आब प्रश्न उठैत अछि जे मैथिली साहित्यक सर्वश्रेष्ठ कथा संग्रह “गामक जिनगी”केँ किएक नै मानल जाए। नि:संदेह हरिमोहन झा, किरण, राजकमल, धूमकेतु, ललित आदि मैथिलीक सिद्धहस्त कथाकार छथि। हरिमोहनबाबू हास्य, दर्शन ओ मर्मक त्रिवेणीसँ कथा सभकेँ बोरैत सभसँ जनप्रिय कथाकार मानल गेलाह, मुदा हिनक कथामे हास्य समागमक क्रममे गंभीर लेखन सुशुप्त भऽ गेलनि। चर्चरीमे जौं गंभीरता अछि तँ ओ मात्र समाजक अगिला लोकक प्रतिनिधित्व करैत छन्हि, अगिला लोक साहित्यक अधिकारी तँ छथि, मुदा भाषासँ दूर भऽ रहल छथि। समाजक अंतिम पाँति धरि हरिमोहनजी अधिकांश कथामे नै पहुँचलाह। किरण जीक किछु कथा जेना मधुरमनि ऐ रूपक छन्हि, मुदा जगदीश जीक कथाक दर्शनसँ हुनको तुलना केनाइ उचित नै। फनीश्वरनाथ रेणु जौं मैथिलीमे लिखतथि तँ स्थिति थोड़े फराक भऽ सकैत छल। रेणुजी उपन्यासकारक रूपेँ हिन्दीक प्रेमचन्द्रक पश्चात सर्वश्रेष्ठ गद्यकार मानल जा सकैत छथि मुदा कथाकारक रूपेँ हमरा सबहक जगदीश जीसँ आगाँ नै। पाठक जौं आत्मीय भऽ कऽ “गामक जिनगी” पढ़थि तँ निश्चित रूपेँ हम कहि सकैत छी जे ई पोथी मैथिली साहित्यक एखन धरिक सर्वश्रेष्ठ कथा संग्रह थिक। ‘समकालीन मैथिली कविता’क समीक्षा सािहत्य अकादमी द्वारा सन् 1961सँ लऽ कऽ 1980 धरि प्रकाशित मैथिली कविताक बीछल संकलनक प्रकाशन सन् 1988ई.मे भेल अछि, एकर शीर्षक देल गेल ‘समकालीन मैथिली कविता’। सन् 1909मे मिथिलाक मािटपर जन्म लेल साहित्यकार स्व. तंत्रनाथ झासँ लऽ कऽ आधुनिक पिरहीक कवि श्री सुकान्त सोम सहित 21 गोट कविक 68 गोट कविताक संग्रहक संपादक द्व छथि- श्री भीमनाथ झा आ श्री मोहन भारद्वाज। ‘त्रिधारा’ आ ‘वीणा’ सन चर्चित कविता संग्रहक रचयिता भीमनाथ जी मूलत: कवि छथि आ श्री मोहन जी मैिथलीक चर्चित समीक्षक मानल जाइत छथि। संग, विचार मूलक, श्रैंगारिक विरह, वाल साहित्य आ देशकालक दशापर आधारित रचनाकेँ प्राथमिकता देल गेल। प्रस्तावनामे उल्लेख कएल गेल जे पहिने मात्र पंद्रह गोट कविक रचना संकलन करवाक छल, मुदा विछवामे कठिनता कारणेँ एकरा 21 धरि कऽ देल गेल। आव प्रश्न उठैत अछि जे कविक संख्या 21 आ कविताक गणना 68। वीस खर्खक जे परिधि बनाओल गेल ओहिमे बहुत रास एहेन रचनाकार छूटल छथि जनिक रचना सभ एहि पोथीमे छपल किछु रचनासँ वेसी विम्वित मानल जा सकैछ। जौं ‘समकालीन मैथिली कवि’ शीर्षक रहितए तँ प्रासंगिक मानल जा सकैत छल, परंच कविता-समकालीन लिखल गेल आ किछु चर्चित कविताकेँ कात कऽ देल गेल ई सर्वथा भ्रामक। संपादक मंडल कविताक गणना बढ़ा सकैत छलाह, किएक तँ किछु कविक चारि-चारि रचना छपल अछि मायाबावूक तँ पाँच गोट कविता देल गेल। मायाबावूक रचनासँ कोनो गतिरोध नहि मुदा जौं किछु चर्चित कविता छुटि गेल छल तँ मायाबावूक संग-संग अन्य रचनाकारक छपल कविताक गणना कम कएल जा सकैत छल। मैथिली भाषाक दुर्भाग्य मानल जाए कि एहि संग्रहमे समाजक मुख्य धारसँ कात लागल रचनाकारक संग-संग कवयित्री सबहक एकोटा रचना नहि देल गेल। मैथिलीक चर्चित कवयित्री डाॅ शेफालिका वर्मा जीक कविता संग्रह विप्रलब्धा 1974ई.मे प्रकाशीत भेल। हुनक पहिल कविता ‘पावस प्रतीक्षा’ 1965ई.मे मिथिला मििहरमे छपल छल। श्रीमती सुभद्रा सिंह ‘पाध्या’ 1970 दशकमे मैिथलीक चर्चित कवयित्री छलीह। श्रमती श्यामा देवी, श्रीमती इलारानी सिंह सन् मॉजल कवयित्रीकेँ विसरब आश्चर्य जनक अछि। ‘समय रूपी दर्पणमे’ कविताक कवि गोपेशजी, हे भाई’ कविताक कवि फजलुर रहमान हाशमी जी, ‘कोइली’ शीर्षक कविताक कवि श्री चन्द्रभानु सिंह जी, बालुक करेजपर गीतक रचनाकार श्री विलट पासवान विहंगम, जागरण गान, माला कवि स्व. काली कान्त झा बूच सन रचनाकारक कविता सबहक प्रासंगिकतापर प्रश्नचिन्ह लगाएव उचित नहि। श्री भीमनाथ बावू आ भारद्वाज जी सन पारखी लोक एहि रचनाकेँ कोना विसरि गेलनि! भऽ सकैत अछि कोनो अपरिहार्य परिस्थिति भेल होनि। एहि लेल संपादक मंडलक पूर्वाग्रह नहि मानल जा सकैत अछि, किएक तँ भीमनाथ बाबू प्रायश्चित स्वरूप अपन लिखल कविता सेहो एहि संकलनमे नहि देलनि, जखन कि ओ मैथिलीक प्रांजल कवि छथि। कविताक श्री गणेश तंत्रनाथ जी लिखित कविता ‘प्रायणालाप’ शीर्षक कवितासँ कएल गेल अछि। स्मृति रेखांकनक विषय वस्तुमे एकातक वेदना हृदय स्पर्शी अछि। जीवन संग्रामक रणभूमिमे कवि एकसरि ठाढ़ छथि, सभ किछु अछि, मुदा आत्माक सगरो स्थान रिक्त, ककरो स्मृतिक शेष-अशेष व्यथामे तीजि-भिजि गेल छनि। श्रैंगारिक वेलाक अवसान भेलापर विरह मर्मस्पर्शी होइत अछि, मुदा ई तँ जीवनक गति थिक। निष्कर्षत: ई कविता तृण-तृणकेँ छुबैत अछि। सुमन जी मैथिलीक तत्सम् मिश्रित काव्यधाराक उन्नयक कवि छथि। प्रकृति पूजनक विषय वस्तुक परिपेक्ष्यमे वसुन्धराक महिमाक गुणगान ‘पूजन-उपादान’ शीर्षक कवितामे कएल गेल अछि। संसारक अस्तित्व धरतीक विनु अकल्पनीय अछि। अपन हृदयकेँ रवि तापसँ जाड़ि भाफ उत्पन्न कऽ मॉ धरित्री संसारकेँ जल बून प्रदान करैत छथि। ’परमारथकेँ कारणे साधुन बना शरीर’ जकाँ पृथ्वी मात्र दोसरक लेल अपन अस्तित्वकेँ जीवन्त कएने छथि। ‘भीक्षा-पात्र शीर्षक कवितामे सुमन जी नीति मूलक विचारसँ समाजकेँ डबडब करवाक प्रयास कऽ रहल छथि। व्यष्टिसँ समष्टिक निर्माण होइत अछि, व्यक्तिसँ समाजक निर्माण होइत अछि। समाजक विना व्यक्तिक अस्तित्व क्षीण ठीक ओहिना व्यक्तिक बिनु समाजक कल्पनो टा नहि कएल जा सकैत अछि। दिवस-रात्रि, नव-पुरातन, सनातन-नूतनता, सुख-दुख ई सभटा जीवन मूलक अवस्था थिक, एक बिनु दोसर अस्तित्व विहीन। हिन्दी साहित्यमे अविस्मरणीय कविता स्व. आरसी बावूक लिखल ‘जीवन का झरना’ शीर्षक कवितासँ एहि भिक्षा-पात्रक विषय वस्तु मिलैत-जुलैत अछि, परंच विश्लेषण विलग अछि। ‘जा रहल छी’ कविता सुमन जीक कविताक पुष्पवाटिकामे खिलोओल एकटा महत्वपूर्ण कविता अछि। अपन प्राचीन सभ्यता ओ संस्कृतिक महत्वपूर्ण अध्यायसँ वर्त्तमान अवस्थाक तुलना नीक वुझना जाइत अछि। हमर इतिहास विलक्षण अछि। श्री कृष्ण सत्यक रक्षाक लेल पार्थक सारथी बनि गीताक उपदेश देलनि। व्यक्तित्व मान नहि बचि सकैत अछि जा धरि राष्ट्रमानक भावना जन-जनमे जागृत नहि हएत। वर्तमान समाजमे महाराणा प्रताप सन समर्पित व्यक्तिक अभाव अछि तेँ मानसिंह सन मानव अपन कुकर्मक शंखनाद कऽ रहल अछि। बुद्धि कौशलसँ परिपूर्ण हमर भूमि बुद्धिहीन भऽ गेल। समाजमे चाेरि बजार व्याप्त अछि। कवि एहिसँ हतोत्साहित नहि छथि। समाजमे क्रांतिक शंखनाद कऽ अधर्मी तत्व सभकेँ चेता रहल छथि। एहि कविताकेँ ‘योग धर्मक क्रांति गीत’ मानल जा सकैत अछि। मैथिली साहित्यक काव्य रूपी नौकाक पतवारि जौं ‘यात्री’क हाथमे मानल जाए तँ कोनो अतिशयोक्ति नहि हएत। कवि चूड़ामणि मधुपक पश्चात् मैथिली साहित्यमे यात्री सभसँ वेसी जनप्रिय कवि मानल जाइत अछि। एकर सभसँ महत्वपूर्ण कारण अछि हुनक ‘विषय वस्तुक चयन’। 1968ई.मे हुनक कविता संग्रह ‘पत्रहीन नग्न गाछक’ लेल हुनक साहित्य अकादमी पुरस्कार देल गेल। ओना ‘चित्रा हुनक सभसँ प्रसिद्ध कविता संग्रह मानल जा सकैछ जकर प्रकाशन बहुत पहिने भेल छल। प्रस्तुत संकलनमे यात्री जीक पाँच गोट कविता देल गेल अछि। ‘पिता-पुत्र संवाद’ कविता पत्रहीन नग्न गाछसँ लेल गेल अछि। कविताक भूमिका गणपति आ श्री शिवक संवादक रूपेँ लेल गेल मुदा परिपेक्ष्य अति गूढ़ संगहि प्रासंगिक। शंकर गजाननसँ कुण्ठा, त्रास आ मृत्युवोधक लीलाक विषयमे पूछैत छथि तँ लम्बोदरक उत्तर छन्हि जे स्वयं एहि परिधिसँ दूर रमणीय स्थानपर बैसल हो ओ कोना बूझि सकैत अछि? व्यथा वएह बूझत जे स्वयं व्यथित भेल हुए वा वर्त्तमानमे अिछ। माए चुप करएवाक प्रयास करैत छथि। यात्री जी साम्यवादी विचारधाराकेँ आत्मामे समाहित कएने छथि। तेँ अधमक व्यथाकेँ कतहु ने कतहुँ नीतिसँ जोड़ि दैत छथि। मैथिली भाषाक संग ई विडंबना रहल अछि जे शब्द विन्यास महिमा मंडित होइत अछि विषय-वस्तु दिश पाठक वा समीक्षक विशेष ध्यान नहि दैत छथि। यात्री जी कविता सबहक शब्द-शब्दमे संत्रास अनायास भेट जाइत अछि। ‘भोरे-भोर’ कवितामे प्रकृतिक मनोरम रूपक बहाने यात्रीजी शस्य-श्यामला भूमिक महिमाक गुणगान करैत छथि। ‘भोरे भोर आएल छी धाङि पथारक मोती’क तात्पर्य अछि जे हमर भूमि हरियर अन्नसँ भरल अछि। माघ मास घास, पात, अन्न, साग, तरकारीसँ खेत पथार सजल रहैत अछि। कविक दृष्टि आदित्यक रश्मिसँ तीक्ष्ण होइत अछि। एकर प्रमाण यात्री जीकेँ ‘कंकाले-कंकाल’ शीर्षक कवितामे भेटैत अछि। कंकालक आरिमे कवि की कहऽ चाहैत छथि एकर विश्लेषण करव साधारण नहि। विषय वस्तुसँ यएह बुझना जाइत अछि जे समाजमे लोक अपन स्वार्थकेँ विद्ध करवाक लेल दोसरक नाश तक कऽ दैत छथि। बाल, वृद्ध, रोगी, निरोग ककरोसँ कोनो श्रद्धा वा दया नहि। अपन देश कृषि प्रधान अछि तेँ पावस-प्रतीक्षा सभकेँ रहैत अछि। ‘साओन’ शीर्षक कवितामे कवि पावस ऋृतुक आगमन मास साओनक वरखाक संग-संग सहलेस पूजा आ नागपंचमीक वर्णन करैत छथि। ई मास प्रणयक विहंगम मास सेहो मानल जाइत अछि। यात्री जी सन वैरागी सेहो एहि मासक माधुर्यसँ नहि बचि सकलाह। राधाक उतापक वहाने स्वयं नन्द किशोर बनि गेलनि। ‘सरिता-सर निर्मल जल सोहा’ – वरखाक पश्चात् शरदक अवाहन कवि यात्री ‘ह’ आब भेल वर्षा शिर्षक कविताक माध्यमसँ करैत छथि। विषय वस्तु सामान्य मुदा विश्लेषण अंशत: नीक बुझना जाइत अछि। माटिक दीप, पूजाक फूल, सूर्यमुखी सभटा पोथीमे जीवनक गति वा नियतिक प्रासंगिकता प्रवाहमयी अछि। एहि संकलनमे ‘जीवन’ कविताक विम्व हुनक हिन्दी साहित्यमे लिखल कविता ‘जीवन का झरना’ सँ मिलैत अछि। जन्म-मृत्यु जीबनक सरिताक ई किनार थिक, मुदा एकर शक्ति अपराजेय मानल जा सकैछ। फूलमे काॅट, अन्नमे भुस्सी जीवन सुखक मध्य अवांछित तत्वक वोध करावैत अछि। दूधकेँ महि कऽ घृत बनाओल जाइछ, ठीक ओहिना जीवनमे समग्र तत्वकेँ महि लेवाक चाही। एहिसँ जन्म-मृत्युक मध्य वेदनाक अनुभव नहि भऽ सकत। ओ मानव, मानव नहि जकरा मातृभूमिक प्रति श्रद्धा नहि हो। राष्ट्रभक्ति शीर्षक विम्वमे मैथिली साहित्यमे बहुत गीत लिखल गेल अछि, मुदा आरसी बाबू रचित ‘राष्ट्रगीत’मे मातृभूमिक प्रति श्रद्धाक संग-संग वर्तमान परिस्थितिक अधम दशापर सेहो प्रहार कएल गेल अछि। जखन कंठसँ ध्वनि नहि फूटि सकैत अछि तखन शंखक कोन प्रयोजन? पुरानक लेल भ्रमर अनजान वनि गेल, मनमे संताप आ वाहर गीतक गान भऽ रहल अछि ई व्याथाक उद्वोधन कऽ रहल अछि। समाजक विलगति मानसिकतासँ कवि क्षुब्ध छथि। व्यास जीक कविता स्तरीय होइत अछि, मुदा एहि संकलनमे देल गेल कविताक ‘मेहक बड़द जेकाँ’क विम्वमे वैराग्य भावक बोध होइत अछि। वास्तमे मेहक बड़द अपन कर्मगतिसँ मानव जीवनकेँ तृष्णासँ मुक्ति दैत अछि, परंच अपन कविताक माध्यमसँ व्यासजी कर्मक परिणाम व्याथित रूपेँ प्रकट कएलनि। भऽ सकैछ जीवनक कोनो क्लेशक विवेचन होथि, मुदा एहि प्रकारक कवितासँ समाजकेँ की भेटत, ई अवलोकन करवाक योग्य अछि। व्यासजीक दोसर कविता ‘मृदु मयंक हंस शिशु’मे छायावादक प्रयोग नीक रूपेँ कएल गेल अछि। किसुन जीक दुनू कविता ‘पत्रोतर’ आ वश्लेषण मिथिला मिहिरसँ लेल गेल अछि। पत्रोत्तर कवितामे पीड़ा भरल मोनमे पत्र प्राप्तिक पश्चात पसरल उद्धीपनक विवेचन नीक लगैत अछि। रेलक काट माल डिब्बासँ लऽ कऽ अभिमन्युक बलिदान धरिक तुलनामे छोहक अद्भुत स्पर्शण झकझोरि दैत अछि। अमर जी मैथिली साहित्यक क्रांतिवादी कवि छथि। हास्य हो वा विचारमूलक कविता, सभठॉ हुनक क्रांतिवादी स्वरसँ कविताक विषय वस्तु ओत प्रोत रहैत अछि। ‘युद्ध-एक समाधान’ शीर्षक कवितामे कवि दिनकर जीक ‘शक्ति और क्षमा’ कविता स्वरूप झलकैत अछि। ‘अभियान’ कवितामे हिमालयक गुणगानसँ लऽ कऽ योगक बलवंत स्वरूपक विश्लेषणमे कविक विशाल अध्ययनशीलताक झॉकी देखऽमे अबैछ। राजकमल जी मैथिलीक चर्चित रचनाकार छथि। मैथिली हुअए वा हिन्दी राजकमल जी कथाकारक रूपेँ वेसी चर्चित भेल छथि। मैथिलीमे ‘स्वरगंधा’ कविता संग्रहक संग-संग विविध पत्र पत्रिकामे 57गोट कविता सेहो प्रकाशीत भेल अछि। प्रयोगकेँ वादक धरातलपर प्रतिष्ठित करबाक श्रेय मैथिली साहित्यमे हुनके देल जाइत अछि। प्रस्तुत संग्रहमे हुनक चारि गोट कविता देल गेल अछि। ‘अथतंत्रक चक्रव्यूह’मे कवि की कहए चाहैत छथि ई बूझव क्लिष्ट अछि। कोनो रचनाकारकेँ अनुत्तरित प्रश्न छोड़ि कऽ नहि जएबाक चाही। एहिसँ पाठकक मध्य भ्रमक स्थिति उत्पन्न भऽ जाइत अछि। ‘वासन्ती परकिया विलास’ सर्वथा समीचीन कविता मानल जा सकैत अछि। समकालीन मैथिली कवितामे एहि कविताक स्थान निश्चित रूपेँ स्वर्णिम अछि। प्रकृतिक संग-संग जीवनक दर्शन आ श्रंृगारपर आधारित कवितामे भावक उद्वोधन नीक जकाँ कएल गेल अछि। ‘मेहावन’ कविता सेहो नीक लगैत अछि। सत्य आ नैतिकताक विम्बक मध्य हेराएल स्वपनपर आधारित कवितामे हृदयगत जुआरि प्रदर्षित कएल गेल। ’पत्नी पत्नी कथा’ शीर्षक कविताकेँ सर्वकालीन कविताक श्रेणीमे राखब उचित नहि। एकटा महान कविक साधारण रचना एहि कविताकेँ मानल जा सकैत अछि। सोमदेव जी मूल रूपेँ उपन्यासकार छथि, मुदा एकटा कविता संग्रह ‘कालध्वनि’ सेहो प्रकाशीत भेल अछि। प्रस्तुत संग्रहमे हुनक लिखल चारू कविता खाली आकाश, स्थायी प्रभातक उद्येश्येँ, एकटा अदना सिपाही आ मोह शीर्षक कवितासँ प्रमाणित होइत अछि जे ओ युगान्तरकारी कवि छथि। धीरेन्द्र जी उपन्यासकार छथि, मुदा किछु स्फुट कविता आ गीतक रचना सेहो कएलनि अछि। ‘हैंगरमे टॉगल कोट’ हुनक स्फुट कविता अछि जकर प्रथम प्रकाशन मिथिला मिहिरमे भेल। एहि कवितामे चेतनाक दर्शन स्वरूप नीक मानल जा सकैछ। मुदा अन्य तीनू कविता बुल बुल गीत, लक्ष्य हम्मर दूर आ भोरक आशापर कोनो अर्थे सकमालीन श्रेष्ठ कविताक श्रेणीमे नहि मानल जा सकैत अछि। विम्वक रूपकेँ जौं सम्यक मानल जाए तैयो विवेचन सामान्य लगैत अछि। मैथिली कवितामे नव कवितावादक प्रणेता मायानंद मिश्र जीकेँ मानल जाइत अछि। हुनक कविता संग्रह ‘दिशांतर’ 1965ई.मे प्रकाशीत भेल अछि। एकर अतिरिक्त विविध पत्र पत्रिकामे ओ कविता आ गीतक सेहो प्रकाशीत होइत रहल अछि। प्रस्तुत संग्रहमे हुनक लिखल चारि गोट कविता देल गेल अछि। एकटा नखशिख: एकटा दृश्य, साम्राज्यवाद, मानवता आ लालटेन ई सभ लघुकविता थिक। विषय वस्तुक संयोजन नीक मुदा विवेचन अस्पष्ट अछि। बिरड़ो छोट मुदा प्रासंगिक कविता लागल। जीवकांत जीक कविता संसार बड़ विस्तृत अछि मुदा सभटा अतुकांत। हिनका आशुकवि नहि मानल जा सकैछ। ओना तँ एहि संकलनमे िहनक चारि गोट कविता देल गेल अछि, मुदा मात्र ‘पापक भाेग’ कविताकेँ प्रासंगिक आ समकालीन मैथिली कविताक श्रेणीमे मानल जा सकैछ। ई कविता हुनक कविता संग्रह ‘नाचू हे पृथ्वी’सँ लेल गेल अछि। ‘आकाश पपियाह नहि अछि’ सँ शून्यवादमे आत्मीयताक दर्शन होइत अछि। चिन्तनशील कविताक रचनामे कीर्ति नारायण मिश्र जीक नाओ सादर लेल जा सकैछ। ‘सीमान्त’ कविता संग्रहक द्वारा कीर्ति जी प्रयोग वादकेँ राजकमल जीक पश्चात नव रूप देलनि। एिह संकलनमे प्रकाशीत हिनक चारू कविताक विषय वस्तु नीक, विवेचन उपयुक्त आ भाषा सरल अछि। हिनक जन्म शोकहारा बरौनीमे भेलनि। वर्तमान विहारमे औधोगिकीकरणक सभसँ बेसी प्रभाव एहि ठाम भेल। अपन प्राचीन रूपक गामक िस्थतिक तुलना वर्तमान विकाशील गामसँ करैत ‘कतेक वर्षक वाद’ कविताक रचना कएलनि। हंसराज जीक चारि गोट कविता एहि संकलनमे देल गेल अछि। पहिल कविता ‘गंध’ हुनक कालजयी कविता िथक, प्रवेशिका स्तरक पूर्व पाठ्यक्रममे ई सेहो छल। प्रस्तावनामे एहि कविताकेँ श्रमशील लोकक चामक गंधकेँ ममतासँ जोड़ल गेल, मुदा ई प्रश्न उठैत अछि जे श्रमशील लोकक मध्य ‘गंध’ कतऽ सँ अाएत ओ तँ कर्मसँ वातावरण आ समाजमे सुगंध पसारैत छथि। जौं चर्म उद्योगक श्रमजीवीकेँ चामक गंध लागल तँ ओहि चामकेँ मूर्त्त रूप नहि देल जा सकैछ, जौं कृषककेँ घामक गंध लागल तँ वसुन्धराक कोखि शस्य श्यामला नहि भऽ सकत। ‘कलंक लिप्सा’ कविता सुमधुर आ प्रवाहमयी लागल। चानकेँ साक्षी मानि कऽ लिखल गेल कविता नारीक मान आ पुरूषक स्वाभिमानक विवेचन तथ्यपरक बुझना गेल। ‘नारी’ शीर्षक कवितामे नारी जीवनक व्यथाक मार्मिक चित्रण असहज अछि। साधन विहीन नारीक जीवन चूल्हिक संग प्रारंभ आ इति भऽ जाइत अछि। ‘हम तँ’ नोरेसँ चिक्कस सनैत छी’मे दीनहीन नारीक मनोदशा विवेचन हृदयकेँ झकझोरि दैत अछि। कुलानंद मिश्र जीक कविता ‘स्पष्टीकरण’मे अपन मनोदशाकेँ कवि नुका लेलनि। ‘जड़कालाक साँझ’ कवितामे विम्बक मूल्यन आ निष्कर्ष प्रासंगिक अछि। मिला-जुला कऽ हुनक तीनू कविताकेँ नीक मानल जा सकैत अछि। प्रवासी जीकेँ मैथिली साहित्यक निराला मानल जाए तँ कोनो अतिशयोक्ति नहि। ‘सम्हरि कऽ चलिहेँ’ शीर्षक कवितामे जीबनक गतिकेँ नव आयामसँ कवि निर्दोशित कऽ रहल छथि। परिवर्तन, वसन्त, अनभुआर तीनू कविता लघुकविताक रूपमे लिखल गेल अछि, परंच विम्बक परिधिक रूप व्यापक अछि। गंगेश गुंजन, विनोद जी, मंत्रेश्वर झा आ नचिकेता जीक कविता सभमे दृष्टकोणक व्यापक उद्वोधन स्वत: भऽ जाइछ तेँ एहि कवि सबहक कवितापर प्रश्नचिन्ह ठाढ़ करब प्रासंगिक नहि। सुकान्त सेाम जीक तीनू कविता स्वत: स्फूर्त नहि मानल जा सकैत अछि, कतहु-कतहु लागल जे गद्य रूपमे लिखि कऽ पद्यक रूपेँ परिवर्तित कएल गेल। निष्कर्षत: ‘समकालीन मैथिली कविता’ नीक कविताक संकलन थिक, मुदा समए कालक जाहि परिधिक िनर्धारण कएल गेल अछि ओहिमे किछु चर्चित कविता सबहक तिरस्कार कएल गेल। परिस्थिति की छल? ई तँ नहि कहल जा सकैत अछि, मुदा मैथिली कविता समूहक संग पूर्ण न्याय नहि कएल गेल जकरा कोनो अर्थे उचित नहि मानल जाएत। समीक्षा- मैथिली चित्रकथा आठ वर्ख पहिने ‘मैथिली’ भारतीय संविधानक अष्टम अनुसूचीमे शामिल कएल गेल। कतिपय हर्षित भेलहुँ जे हमरो भाखाकेँ वैधानिक अस्तित्व देल गेल। मोने-मोन ओहि सभ गोटेक प्रति कृतज्ञता आ मंगल कामना करैत छलहुँ जनिक प्रयाससँ ई काज भेल। मुदा! एकटा कचोट अर्न्तमनकेँ हिलकोरि रहल छल जे आगॉं की हएत? अपन भाखाक भविष्य नीक नहि देखि रहल छलहुँ। एहि व्यथाक सभसँ पैघ कारण छल हमरा सबहक भाषा साहित्यकमे कोनो क्रांतिक आश नहि नजरि आवि रहल छल। वर्तमान पीढ़ी मातृभाषासँ दूर भऽ रहल छलाह। अगिला पीढ़ीक गप्प की कहू? कतेक नेनाकेँ ओलती, चिनुआर, थान, छान-पग्घाक अर्थ बूझल अछि? जौं कोनो अभिभावकसँ पूछैत छी जे नेनासँ अपन वयनामे गप्प किए नै करैत छी तँ जवाब भेटैत अछि जे स्कूल जाएत तँ हिन्दी आ अंग्रेजी नहि बूझत तेँ अखनेसँ सिखा रहल छी। नेनोमे चेतना नहि किएक तँ वाल-साहित्य मैथिलीमे लिखले नहि गेल। जौं किछु अछि तँ ओकर अर्थ कतेक नेना बूझैत छथि। महान लेखक वा कविक श्रेष्ठ भाषामे लिखल रचना हम नहि बूझैत छी तँ हमर धीया-पूता कोना बूझतथि? एहि मध्य मैथिलीमे विदेह-सदेहक पदार्पण भेल। नव रूप, नवल सोच आ सकारात्मक दृष्टिकोणक संग। मौलिक विन्दुपर रचना होअए लागल। उपेक्षितकेँ नव आश भेटल। साहित्य आन्दोलनक एकटा परिणामक चर्च हम पाठकसँ कऽ रहल छी- मैथिली चित्रकथा- श्रुति प्रकाशन दिल्ली द्वारा विदेहक सौजन्यसँ ई पोथी सन् २००८मे बहराएल। एहि पोथीक लेखिका छथि श्रीमती प्रीति ठाकुर। हिनक ई दोसर रचना थिक। विषय पूर्णत: नव, बाल साहित्यक चित्रकथा। हम एहिसँ पूर्व एहि विषयक पोथी मैथिलीमे नहि देखने छलहुँ। एकरा रचना नहि कहल जा सकैछ, किएक तँ एहिमे कोनो साहित्यक सृजन नहि, लोक कथा आ जन-श्रुति जे मिथिलामे पहिनेसँ सुनल जा रहल छल ओकरा चित्रक संग चर्च कएल गेल अछि। एहि प्रकारक जन श्रुति गाम-गाममे बूढ़-पुरानक मुँहसँ बाजल जाइत छल मुदा आव विलीन भऽ रहल अछि। ओहि विलुप्त विषयपर चित्रकथा लिखि प्रीति जी बड्ड नीक काज कएलनि। एहि पोथीमे जे विशेष आ नव सकारात्मक पक्ष देखलहुँ ओ अछि- विषयक आ कथाक चयन। सम्पूर्ण मिथिला एहिमे समाएल छथि। सभ जाति समाजक लोक-कथाक चित्रण कएल गेल अछि। मोती दाइ कथामे रजक जातिक निष्ठाक चित्रण तँ राजा सलहेसमे दूधवंशीक भावनाक व्याख्या। मिथिला दरवारक वोधि-कायस्थक गंगा लाभ मनोरम लागल। बहुरा गोधिन आ नटुआ दलाल बेगूसरायक लोक कथा थिक। पहिने लोकक मानसिकता छल जे बेगूसरायक लोक मैथिली भाषी नहि छथि। हमरो मर्म होइत छल किएक तँ हमर मातृक बेगूसरैए जिलामे अछि। एहि कथाकेँ पढ़ि तिरहुतिया आ दछिनाहाक भेद हियासँ मेटा गेल। हमरा सबहक समाजक एकटा उपेक्षित जाति छथि- मुसहर। मुसहरोमे दूटा आदर्श पुरूष भेल छलाह दीना आ भद्री। ओहि दीना भद्रीक कथा बड्ड नीक लागल। पहिने बूझैत छलहुँ जे तपस्वी वनवाक लेल वौद्धिकता आ भौतिकता पैघ मापदंड थिक, मुदा आव ई भ्रम दूर भऽ गेल। एहि प्रकारे बहुत रास कथाक चित्रण कएल गेल अछि। एकबेरि आदरणीय जगदीश प्रसाद मंडल आ बेचन ठाकुर जीक रचना पढ़ि हम लिखने छलहुँ जे ‘विदेह मैिथली साहित्य आन्दोलन’ मैथिली पर लागल जातिवादी कलंककेँ धो देलक। जौं ई गप्प सत्य अछि तँ ओहिमे एहि पोथीक भूमिकाकेँ नहि नजरि अंदाज कऽ सकैत छी। वर्तमान पीढ़ीक लेल प्रेरणादायी आ अगिला पीढ़ीकेँ मैथिलीक प्रति सिनेह जगावए लेल ई पोथी प्रासंगिक अछि। भाषा संपादन नीक लागल। िचत्रक स्तर बड़ सुन्नर आ व्यापक अछि। श्रुित प्रकाशन सेहो धन्यवादक पात्र छथि। नीक कागतक प्रयोग कएलन्हि आ चित्रक रंग संयोजन सेहो सेहंतित लागल। अंतमे हम प्रीति जीकेँ धन्यवाद दैत छिअनि जे हमरा सबहक बीच एकटा झॉंपल विषएपर लेखनीक प्रयोग कएलनि। आगाँ सेहो हम आशा करैत धन्यवाद ज्ञापन करैत छी। पोथिक नाम- मैथिली चित्रकथा प्रकाशन वर्ष- २००९ लेखिका- प्रीति ठाकुर प्रकाशक- श्रुति प्रकाशन, राजेन्द्र नगर- दिल्ली। दाम- १००टाका मात्र पोथी प्राप्ति स्थान- पल्लवी डिस्ट्रीब्यूटर्स वार्ड न. ६ निर्मली, सुपौल, मोवाइल न. ०९५७२४५०४०५ गजेन्द्र ठाकुर स॒हस्र॑ शीर्षा॒ ए.एम. रत्नम, एस.शंकर आ कमल हसन लेल, जिनकर हिन्दुस्तानी (भारतीयुडु, इण्डियन) हमरा अपन पिताक स्मरण करबैत रहैत अछि। स॒हस्र॑ शीर्षा॒ हजार माथ, हजार मुँह, हजार तरहक गप-खिस्सा, सत्य आ …| सहस्रशीर्षा पुरुष: सहस्राक्ष:सहस्रपात्। सभूमिग्वंसर्वतस्पृत्वात्यतिष्ठद्दशांगुलम्॥... हजार माथ, हजार आँखि, हजार पएर संग विश्वकेँ आच्छादित केने अछि, दस आंगुरक गनतीक वशमे नै अछि ओ। … पद्भ्यांशूद्रो अजायत|| ..पद्भ्यां भूमिर्दिशः ...|| पएरसँ शूद्रक उत्पत्ति भेल…. मुदा पएरेसँ भूमियोक उत्पत्ति…. पहिल कल्लोल-गढ़ नारिकेल- महिसबार ब्राह्मणक गाम दोसर कल्लोल-की बन्है छी? पुरबा-पछबा। तेसर कल्लोल-कतेक जना हरिवासर ठानल/ भात बहुत कै सपना चारिम कल्लोल-विश्वकर्माक रखबाड़िमे इन्द्र लग अमृत पाँचम कल्लोल-बो-बो छअम कल्लोल-छुच्छो हाथ भैया अबितथि बैसितथि माड़ब चढ़ि रे/ ललना अपने सड़िया पहिरतौं भैया नाम लितौं रे सातम कल्लोल-धुन-धुन धुन-धुन बोलै चरखा, डर लागै घमासान हो आठम कल्लोल-आजु धीया कोना अमा बिनु रहती/ छन-छन उठति चेहाय नौम कल्लोल-मुँह चन्द्रसन, आँखि कमल सन, भोँह कामदेवक धणुष सन, ठोर पाकल तिलकोर सन, नाक सुग्गाक लोल सन, बोली कोइली सन दसम कल्लोल-किए तोहर आहो लालाजी मुँह मलिन भेल/ किए मन लागैए उदास एगारहम कल्लोल-उक्खड़ि सन सन बीट, समाठ सन सन शीस, सेर बरोबड़ि, सेर बरोबड़ि बारहम कल्लोल-लोभेलै छौड़ा बभना रे दैव ना रे/ रौ पूछऽ जब लगलै बभनमा रौ/ जतिया रौ ठेकनमा रौ दैव ना रे तेरहम कल्लोल-कुशक डेफसँ नथबौ गे धमिआइन तोहरो पनियादराध/ अस्सी मनक पत्थल छेदि कऽ हेबै गे बहार चौदहम कल्लोल-ब्रह्माक देल कोदारि/ विष्णुक चाँछल बाट पंद्रहम कल्लोल-गहना रे जटा तड़बाक धूर/ घरे रहु रे जटा नयना हजूर सोलहम कल्लोल-छाती लात, झोँटा हाथ आ सौतिनक पोखड़िमे अढ़ाइ झाक माटि उघब सतरहम कल्लोल-गविया बाँझिन, बड़द बियाय, बूँदमे देखहुँ समुद्र समाय अठारहम कल्लोल-मारबौ आरे कोइली, फोड़ब दुनू अँखिया/ तोर बोली सुनि पिया गेल परदेस/ तोरे बोली सुनि ना उन्नैसम कल्लोल-सूतलिमे छलिऐ रे सुगना एके संग रे सेजिया/ सपनेमे देखलौं रे सुगना हंसा गेलै रे चोरिया बीसम कल्लोल-मैयाजी हे राखि लियौ अरज केर लाज/ जगदम्बा सेवक कल जोड़ैए हे एकैसम कल्लोल- हजार माथ, हजार मुँह, हजार तरहक गप-खिस्सा, सत्य आ …| सहस्रशीर्षा पुरुष: सहस्राक्ष:सहस्रपात्। सभूमिग्वंसर्वतस्पृत्वात्यतिष्ठद्दशांगुलम्॥... हजार माथ, हजार आँखि, हजार पएर संग विश्वकेँ आच्छादित केने अछि, दस आंगुरक गनतीक वशमे नै अछि ओ। … पद्भ्यांशूद्रो अजायत|| ..पद्भ्यां भूमिर्दिशः ...|| पएरसँ शूद्रक उत्पत्ति भेल…. मुदा पएरेसँ भूमियोक उत्पत्ति…. बाइसम कल्लोल-बछड़ूले कुहकै छै धेनु गाय तेइसम कल्लोल-हर ने बड़द, ढोढ़ाय मड़र चौबीसम कल्लोल-सात पाँच घर तन्हि सजि देल। पिआ देसाँतर आँतर भेल। पचीसम कल्लोल-अंडीक कोरो बघंडीक बाती, केहन घर छारलेँ रे पोदिनमाक नाती छब्बीसम कल्लोल-बैसने पहर चलने कोस सत्ताइसम कल्लोल-एतै दुख देलेँ हे माइ कोसिका एतै दुख देलेँ/ आरी चढि़ रोबै छै किसान अट्ठाइसम कल्लोल-उत्तर दक्खिनसँ एलै नटनियाँ रे जान/ जान बैसि गेलै चनना बिरिछिया रे जान उनतीसम कल्लोल-कटबै सोना सुतरिया बिनबै झुमरि जाल हे तीसम कल्लोल-भगता कहलकै अकास बान्हब पताल बान्हब/ बौहु कहलकै-पहिने घरक कोनटा जे टूटल छै से ने बान्हौ एकतीसम कल्लोल-भादवक अन्हरियो नामी, इजोरियो नामी, रौदो नामी, गुमारो नामी बत्तीसम कल्लोल-चिन्नी आब लगैए कम मीठ होइ छै तैंतीसम कल्लोल-दिनमे कौआ देखि कऽ डेराइ, रातिमे नदी हेलि जाइ चौंतीसम कल्लोल-अगहन उपास कालक कोन डर पैंतीसम कल्लोल-सेर भरि गहूम बरिख दिन खेबै/ पिआकेँ जाए नै देबै हे पहिल कल्लोल गढ़ नारिकेल- महिसबार ब्राह्मणक गाम पहिल पल्लव कोना एकरा कहि दैए कोल्हुमे जोतल बड़दक चालि सन! भोर होइसँ पहिने, सुरुज उगैसँ पहिने सूति-उठि ठाढ़ भऽ जाइए जिनगी। घरमे कतेक काज होइ छै। जिनगी चलबैले कतेक काज होइ छै। भोर होइसँ पहिने शुरू भऽ जाइ छै जिनगी। सभकेँ बुझल छै ओकरा की सभ करबाक छै, सोझे शुरू भऽ जाइ छै बिना रुकने, बिनु ठाढ़ भेने। कतेक फुर्तीसँ चलै छै जिनगी। कोनो सरोकारकेँ बिसरल नै जाइ छै, कोनो काज छोड़ल नै जाइ छै, मुदा ऐ तेजगर जिनगीकेँ कोना कियो कहि दैए आस्ते-आस्ते चलैत जिनगी, ठाढ़ जिनगी; कोना एकरा कहि दैए कोल्हुमे जोतल बड़दक चालि सन! “भैया, कन्हापर चढ़ा कऽ नै घुमा देब?” ममतोड़केँ कन्हापर चढ़ा कऽ कोनो काज करबामे मुखदेवकेँ कोनो दिक्कत कहियो नै होइ छलै, नहिये काज करबा काल आ नहिये खेलबा काल। खेलेबाक समै सेहो फड़िछाएल छलै, ईलम सिखब शिक्षा छलै आ तकर बीच खेल, दौगा-धूपी। ईलमो बाप रे, काज उद्यमसँ लऽ कऽ टाट बनेनाइ, बन्हन देनाइ, बाँस पंगनाइ, पोखरिमे हेलनाइ, माँछ-डोका-काँकोड़ पकड़नाइ, ढोलक बनेनाइ। आ सेहो ईलम सिखबामे कोनो हरबड़ी नै। एक तूरक बच्चाकेँ की सभ अबै छै से सभकेँ बूझल छै। टोलोक बच्चा सभ आबि जाइ, कहियो वर-कनियाँ बनै जाइ, तँ कहियो भाए-बहीन। ममतोड़केँ दू भाइ, दयाराम आ मुखदेव। मुदा दयारामकेँ कहियो काल टोलक दोसर बुचिया अपन भाए बना लै, मुदा ममतोड़क बखड़ामे सदिखन मुखदेवे आबै। “भैया, हमरा बिसरमे तँ नै। भौजी आबि जेतौ तँ हमरा बिसरि तँ नै जेमे।” “भैया बिसरि तँ नै जाएत?”, अपन माए-बाबू सँ सेहो ममतोड़ पुछै छलै। कियो ओकरा कहि देने छलै जे ओकरा घरमे भौजी आबि जेतै आ भैया ओकरा बिसरि जेतै। “भौजीक भरोसे रहबाक छौ तोरा? अपने बियाह हेतौ आ अपन घर जेमे।”, माए ओकरा कहै छलै। “नै, हम बियाह नै करब, आ माए-बाबूए संग भरि जन्म रहब।” बच्चाकेँ माए-बाबू सभसँ बेशी प्रिय होइ छै। आ माए-बाबू कहै- “ठीक छै, हमरे सबहक संग रहिहेँ।” मुदा ममतोड़केँ होइ छलै जे माए-बाबू ओकर मोन बहटारैले से कहि रहल छै। सुतली रातिमे ओ ओकरा सभकेँ झमाड़ि कऽ उठाबै, सकरबाबै आ फेर निश्चिन्त भऽ सुति रहै छलै। माए-बाबू, काका-काकी, मामा-मामी, मौसा-मौसी, दीदी-पीसा। गामक लोक, समाज। आ भाए बहिन; सहोदर, पितियौत, ममियौत, मसियौत आ पिसियौत। -केहेन नीकसँ तँ जिनगी बीति रहल अछि, आत्मनिर्भर जिनगी। ने ककरो आगाँ हाथ पसारै छी, ने ककरोसँ कोनो सरोकार। जे सरोकार समाजसँ अछि ओहो अछि मात्र स्थितप्रज्ञबला, बिनु भावक। ऐ बिधमे हमर काज जँ छै, तँ कऽ देलौं, ढोलहो दऽ देलौं, पिपही बजा देलौं। सेहो एकतरफा, बात खतम। कोनो हृदैसँ जुड़ल हुअए, से नै। हमर घरमे कोन बिध होइए, केना बियाह-शादी होइए, ओइमे दोसराक कोनो ने खगता-बेगरता, नै कोनो समाद-सूचना, ने ओ सभ खोजे-पुछाड़ी बा जिज्ञासे करैले आबैए। बादमे कहियो भेट भऽ गेलापर पुछि दै जाइ छथि, भऽ गेलै सभ काज नीक-नहाँति ने। मुदा सुनबाइ छै, कोनो उपद्रव कियो केलकै तँ चारि गोटे ठाढ़ भऽ जाइ छै अन्यायक विरुद्ध, एकतरफा गप नै रहलै कहियो गढ़ नारिकेलमे। सुनबाइ छै। सुनलौं, बाबू कहै छल आ माए कहै छल- केहेन नीकसँ तँ जिनगी बीति रहल अछि, ओकरा हमर काज मुदा हमरा तँ ओकर कोनो काजे नै। माएक नैहर, माएक बहिन सभक सासुर, बाबूक बहिन सभक सासुर। गढ़ नारिकेलक अलाबे ई किछु आर गाम मुखदेवक जिनगीमे आबै छलै। गढ़ नारिकेलक आन टोलसँ स्वतंत्र आत्म निर्भर जिनगी मुखदेवक टोलक। ऐ किछु आन गामक एक-एकटा टोलसँ सेहो जुड़ल रहै मुखदेवक टोल। बाहरीकेँ आत्मनिर्भरे बुझाइ छै, मुदा एकतरफा कहियो किछु नै रहलै गढ़ नारिकेलमे। रौदी-दाहीमे सौंसे गाम एक भऽ जाइ छै। गढ़ नारिकेलक मुखदेवक टोलक आत्मनिर्भर संस्कृति अही गामक दोसर टोलसँ भिन्न बुझा पड़ै छलै। मुदा माएक नैहर, माएक बहिन सभक सासुर, बाबूक बहिन सभक सासुर, ऐ सभ गामक ई सभ टोल अपन टोल सन बुझा पड़ै। वएह काज, वएह बात। अपन दुनियाँ… अपन दुनियाँमे मस्त लोक। भने केहेन नीकसँ तँ जिनगी बीति रहल अछि, आत्मनिर्भर जिनगी। तोरा हमरासँ काजे भरि सरोकार तँ हमरा तोरासँ कोनो सरोकारे नै, ले जो…। माटिक साम्राज्य.. चिक्कन चुनमुन घर अंगना, गोबरसँ अंगना नीपल जाइत आ चिकनी माटिसँ दुआरि। नारसँ घर छारल जाइत, अहू टोलमे आ दोसरो टोलमे आ पातसँ पटोटन देल जाइत अहू टोलमे आ दोसरो टोलमे। खढ़सँ मात्र कोनो-कोनो धनिकक घर छराइ छलै। -कत्ते सुन्नर लागै छै माए ई घर। खढ़सँ छारल। -धुर, बाहरे टा सँ। खढ़बला चारमे साँप सभ सहसह करैत रहै छै। खढ़मे तेना कऽ सन्हिआएल रहै छै जे बुझाइओ नै पड़तौ। आ ई खढ़ आ नार-पुआर.. सभ माटिक रूप छिऐ। चल देखबै छियौ। माए पछुआर लऽ जाइ छलै मुखदेवकेँ। चारमे जतऽ सँ पानि चुबै, ओतऽ सँ नार घीचि नवका नार दऽ दढ़ कएने रहै बाबू। आ पुरना नार पछुआरमे ठिकिआएल रहै। -देखही, ऊपरमे नार छै मुदा माटिसँ सटल निचुलका नार माटि बनि गेल छै। अहिना आस्ते-आस्ते सभटा नार माटि बनि जेतै। खढ़ सेहो माटि बनि जेतै। माटिक साम्राज्य। बर्तन, चूल्हि, घरक देबाल, सभटा माटिक। आ आब ई नार-पुआर सेहो माटिये छी! रसनचौकी, पिपही। ढोलक, मृदङ। पनही, जुत्ता। गोरोचन। चमराक गंध नै सुंघब तँ चमराक बौस्त कोना बनत। -मनुक्ख आ जानवरक चमड़ामे कोनो खास अन्तर नै छै। घा भेलापर मनुक्खक चाम नै देखै छिहीं, कोना दुर्गन्ध करऽ लागै छै। जानवरे छी ने मनुक्ख, जिनगी छै तेँ चाममे चेँछ लगलापर दर्द होइ छै, जिनगी खतम आ… चाम, खढ़ आ नार सभ माटि बनि जाइ छै। माटि लग राखि देबहीं तँ माटि बनि जेतौ, सुखा देबहीँ तँ मरलाक बादो किछु दिन आर चलतौ। सभ किछु माटिक साम्राज्यक पराधीन छै। आ अही माटिक साम्राज्यमे मुखदेव राम ठेहुनिया देलन्हि आ ठाढ़ भऽ गेला। अपन टोलसँ दोसर टोलक बीच एकटा अदृश्य माटिक देबार देखा पड़ै छलन्हि हुनका। आ तकर ओइ पार सेहो माटियेक साम्राज्य रहै। हँ, ओ माटि दोखर आ चिकनी दुनू तरहक रहै। ऐपार तँ दोखर आ चिकनी माटिक बीचक साम्राज्यमे सामंजस्य रहै; घर-अंगनाक भीतर सेहो आ बाहरमे सेहो, देबार, गहबर सभ ठाम। मुदा ओइ अदृश्य माटिक देबारक ओइ पार दोखर आ चिकनी माटि कखनो काल गरीबी-विपन्नता आ धनिक-आभिजात्यक बीचमे बँटल बुझाइ छलै। कलम-झाड़ीमे बेढ़ लागब शुरू भऽ गेल। पोखरिक महार तँ घेराएल छले, डबरा सेहो बेढ़ल जाए लागल। माटिक साम्राज्य आर विस्तृत बुझाए लागल, बेढ़ल आ बाँटल। घनगर बनल। मुदा रकबा घटल साम्राज्य। साम्राज्य। पोखरि दिस जाइ काल जे कलम-झाड़ी अनन्त बुझाइ छलै ओ माटिक देबार दिस सहटि कऽ आबए लागल। पनिछुआ लेल आ नहाइ लेल जाइ घड़ी पोखरि तँ पहिनहियो अलभ्य छलै। डबरेकेँ एक कातसँ साफ कऽ नहाइक बेबस्था कएल जाइ छल आ दोसर कात साफ कऽ छोँचबाक व्यवस्था होइ छल। आब ओहो माटिक देबारसँ सटऽ लागल। माटिक देबार एतेक भयौन नै लागै छल। सभटा भोर एक्के रङ। मुखदेवक गाम गढ़नारिकेलक गाछ-बृच्छ, माल-जाल, जलचर आ लोक; सभ रङ बिरङक। मुखदेवक संगी साथी सभ गारल कठबोगना। पोखरिक यज्ञमे कोनमे गारल काठक भुट्ट मनुक्ख। लोक कहितो छै, कतबी टा अछि.. जवाब भेटै छै, कतबी टा नै अछि, अदहा तँ जमीनमे गारल अछि। एकपेड़िया सड़कक कातमे मुखदेवक घर। मुदा एकपेड़िया केना, सड़क तँ चकरगर छै, मुदा लोक चलैत-चलैत बीचमे एकपेड़िया बना दै छै। कखनो काल ऐ एकपेड़िया सड़कक दुनू कात एक-एकटा एकपेड़िया खधाइ सन चेन्हासी जे कटही गाड़ीक दुनू चक्का बना दै छै, बरखामे पानी जमा होइले। आ ओइमे छपछप करैत मुखदेव गढ़ नारिकेल आ साहेबगंज आन-जान करैत रहैत अछि। दयाराम आ ममतोड़क संग चलि रहल छलै जिनगी। बँसबिट्टीक अन्हार गुज्ज वातावरण, लगै छल जेना घरक भीतर धरि पैसि जाइ छल। घरक, टोलक ओहार बनि जाइ छलै ई अन्हार। ऐ अन्हारसँ सुरक्षित छल दयाराम आ ममतोड़क संग मुखदेवक जिनगी। मुदा लोकक कमी गाछ-बिरिछ, धान-माँछ, चिड़ै-चुनमुनी आ माल-जालक विविधता पूर्ण कऽ दै छल, मुखदेव, दयाराम आ ममतोड़ मनुक्खसँ बेशी अही सभसँ लग रहथि। खेल-धूप, गीत-नाद सभ ततेक तरहक, बिधे-बाध सन। सभकेँ ततेक लगसँ आ कतेक गहींरसँ चिन्हैत रहथि। रंग, समए, गुण। पटोटन, नार, खढ़ आ माटि। कोल्हुक बड़दक घेराबा ठाढ़ भऽ कऽ आगाँ चलैत रहै छै गढ़ नारिकेलमे। चक्का घूमऽ लगै छै आ चलैत रहै छै, भोरसँ साँझ धरि एक्के-ठाम ठाढ़ नै रहै छै कोल्हुक बड़द, कटही गाड़ीक बड़द नहाँति आगाँ बढ़ैत रहै छै, भोरसँ साँझ होइत-होइत खेत-पथार, खढ़-पात-बाँस, पोखरि चभच्चाक माटि-पानि-जजात इम्हरसँ उम्हर भऽ जाइ छै, बढ़ि जाइ छै, जे भोरमे अहाँ देखने रहिऐ, से गाम साँझमे नै रहि जाइ छै गढ़ नारिकेल। गामक बाहा, पोखरि सभ अपन जिजीविषा बढ़ा लैए, ई गाम कहियो निश्चिन्त नै होइए। कोनो समस्या चाहे ओ खेत पथारक हुअए, बाड़ी-झाड़ीक बा पोखरि-धारक, लोक सभ पढ़ल पाठ जकाँ ऐ सभमे जिनगी भरि दैए। दयाराम, ममतोड़ आ मुखदेव सेहो अपन ईलम सभ साँझ बढ़ा लै जाइए। दोसर पल्लव चारू कात गाछ-बृच्छ, पोखरि। गाममे एक.. दू.. तीन आ एकटा आर, चारि टा पोखरि। ओना तँ तीन टा आर पोखरि अछि। एकटा उत्तरबरिया पोखरिक उत्तरभर बड़का डकही पोखरि। लोक सभ बजैए जे कोनो डकैत एक्के रातिमे खुनने रहए ई पोखरि। मुदा तकर प्रमाण पुछने यएह पता लागत जे आन तँ कोनो प्रमाण नै मुदा खुनैत-खुनैत भोर भऽ गेल रहै आ तइ कारणसँ ओ डकैत पोखरिमे जाइठ नै गारि सकल रहए। हड़बड़ीमे ओइ डकैतक, डकैत की राक्षस कहू, एक पएरक पनही सेहो रहि गेलै पोखरिक कातमे। बड्ड दिन धरि पोखरिक कातेमे रहै मुदा फेर बाढ़िमे ओहो बहि गेल। से जे एकटा प्रमाण रहए सेहो नै बचल। गामसँ ई पोखरि दूर अछि से छठि पाबनिसँ एकर कोनो सम्बन्ध आइ धरि स्थापित नै भऽ सकल। हँ उपनयनक बिध-बाधमे धरि एकर उपयोग होइतहि अछि। किसिम-किसिमक माँछ रहै छै ऐ पोखरिमे। माँछक कोनो कमी नै। कहियो डकही पोखरिमे जीरा देबाक खगताक अनुभव नै कएल गेल। सलाना मछैर होइए आ सभ टोलक लोककेँ- दछिनबाइ टोल माने गढ़ अरड़नेबाकेँ छोड़ि कऽ– मछैरक सभ दिन अपन-अपन टोलक माँछक हिस्सा देल जाइ छै। दछिनबाइ टोलक दक्षिणमे अछि बुचिया पोखरि। गामसँ दुरगर अछि मुदा जाइठ छै बीचोबीच। काठक ऐ जाइठकेँ गारबा काल पीअर बच्चा, आइक जमीन्दारक अतिवृद्ध प्रपितामह एकटा बड्ड पैघ आयोजन केने छला। बस्तीसँ दुरगर आ खेतक बीचमे रहबाक कारणसँ एतौ लोक सभ स्नानक लेल कम्मे-सम अबैए। मछैर सेहो होइए मुदा से मात्र ऐ दछिनबरिया टोलक लेल। ऐ पोखरिक एकटा आर विशेषता अछि। जखन दुर्गापूजाक समएमे दुर्गाजी फेरसँ नैहरसँ सासुर दसम दिन- जकरा जतरा सेहो कहल जाइ छै- बिदा होइ छथि तँ हुनकर मूर्तिक भसान अही पोखरिमे होइए। पुरुखपात्र तँ नै, हँ महिला लोकनि दुर्गाजीक भसानपर हबोढकार भऽ कनै छथि। दुर्गाजी ऐ टोलकेँ के पूछए, ऐ गामेमे नै बनै छथि। ओ बनै छथि पड़ोसक गढ़ टोलीमे। ऐ गामक लोक तँ अगत्ती सभ। खष्ठी दिन धरि दुर्गाजीकेँ झाँपि कऽ राखल जाइए, मात्र मूर्तिकार हुनका उघारि कऽ देखि सकैए, कारण ओ नै देखत तँ फेर दुर्गाजी बनती कोना। आन कियो देखत तँ आन्हर भऽ जाएत। हँ, खष्ठी दिन बेलनोतीक बाद मूर्तिक अनावरणक बाद हुनकर दर्शन लोक कऽ सकैए। आ ओही दिनसँ मेला सेहो लगैए। ऐ गाममे दुर्गा बनती तँ कतेक लोक खष्ठीक पहिनहिये आन्हर भऽ जाएत। आ पड़ोसक गाम की कम अगत्ती अछि? मुदा पूजाक नामपर देखू, सभ सञ्च-मञ्च भऽ जाइए। नाममे टोल लागल छै- गढ़ टोल, मुदा अछि ई गाम। अही गाम जकाँ महिसबार ब्राह्मणक गाम। अगतपनामे हम आगू आकि हम- एकर तँ बुझु प्रतियोगिता होइत रहै छै दुनू गामक मध्य। गढ़ टोलक गाम दऽ कऽ जाउ तँ ओइ गामक बान्हक कातक दलानपर बैसल छौड़ा सभ किछु ने किछु सुनेबे टा करत। मुदा ऐ गामक फसादी प्रकृतिक छौड़ा सभ अरबधि कऽ ओइ गाम बाटे जेबे टा करत। हँ, सध-बध सभ अही बुचिया पोखरिक बाटे गेनाइ श्रेयस्कर बुझैए, भलहि कनी हटि कऽ रस्ता छै, तेँ की। गाममे एकटा आर पोखरि अछि। मुदा गामक दुनू कात कमला-बलान आ कोसी, ऐ दुनू धारकेँ नियन्त्रित करबा लेल दू-दू टा बान्ह बान्हल जाए, ई चर्चा देर सबेर होइत रहैए। गामसँ सटल पच्छिम दिस उत्तर-दक्षिण दिशामे रहत एकटा छहर, फेर रहत कमला महारानीक भाइ बलान धार आ तखन कमला महरानी आ फेर जा कऽ ओइसँ पच्छिम उत्तर-दक्षिण दिशामे दोसर छहर, ऐ तरहक चर्चा होइत रहैए। बान्हक बीचमे पड़ि जाएत बल्ली पोखरि। कोना ऐ पोखरिकेँ सरकार भरत से नै जानि। ऐ पोखरिसँ बलान एकटा नालासँ जुड़ल अछि, जखन धारमे पानि अबैए तँ लोक नालाक मुँह खोलि दै छथि आ धारक उपरका पाँकबला पानिसँ पोखरि भरि जाइए, बालु धारमे नीचाँमे रहै छै तेँ ओ नै आबि पाबैए। ओनाहितो बलानमे बालु कम आ पाँके बेशी अबै छै। आ ओइ पोखरिसँ पटौनी होइए। बैसाखमे सकराइतिक लगाति गौँआ सभ हेँज बना सभ पोखरिक सफाइ करै छथि, उराहै छथि। आ पूसक पूर्णिमाक मेला। माछ मखान खूब होइ छै। गामक शुरूहेमे साबिकी दूटा इनार। इनारक पानिसँ किछु गोटेकेँ घेघ बहरा गेलै तँ लोक गढ़ नारिकेलकेँ घेघहा गाम, मोटका बुइधबला गाम कहि बनोतरी बनाबैए। धार आ विशाल बल्ली पोखरिक सटले रहए एकटा फुटबॉल क्रीड़ाक्षेत्र- विशाल रमना। जमीन्दारक करतबसँ ई रमना पीअर बच्चाक खेतमे चलि गेल, माने मिला लेल गेल। बड़का जमीन्दार बरबरिया रॉय सेहो ओइ बीचमे नै जानि कोन कारणसँ एक गृहस्थक एकठाम एकट्ठे जमीन हेबापर जोर देने रहए। सुरजू भाइक गोबरसँ सीटल खेत सेहो ऐ क्रममे पीअर बच्चाक खेतमे मिलि गेल छल, माने मिला लेल गेल छल। कमला आ बलानक बीच महिसबार सभक मालक भोजन लेल बौआचौड़ी अछि। महिसबार सभ एतऽ अबै छथि, खेलाइ छथि आ कमलामे हेलै छथि। कखनो ओ सभ अपना-अपनीकेँ कमलाक धारमे बिन प्रतिरोधक बहऽ दै छथि तँ कखनो धारक प्रवाहक उनटा हेलै छथि। बौआ चौरीक ई स्नातक सभ छथि। धारक बीच गुअरटोली। कुञ्जड़ा टोलीमे मोहम्मद शमशूल। बान्हपर। खिस्सा सुनबैत रहै छथि… डिलरीनगर। एकटा सैयद छला ओतऽ। एकटा कनियाँ छलखिन्ह आ कैकटा बेटा छलन्हि। लड़ाका सभ। नूनजागढ़क युद्ध। मुदा ऐबेर सैयद आ हुनकर सभटा बेटा मारल गेल। मुदा हुनकर विधवा गर्भसँ छली। किछु दिनमे बच्चा भेलन्हि। नाम राखल गेल मीरां। ओहो लड़ाका, मुदा माएकेँ ई पसिन्न नै। हुनकर बियाह करबाओल गेल कमे बयसमे, ई सोचि जे मोन युद्धसँ हँटतै। मुदा.. माए आ कनियाँ बड्ड बुझेलखिन्ह मुदा मीरां असगरे नूनजागढ़ गेला आ बाप-भाएक बदला लेलन्हि आ घुरि कऽ डिलरीनगर एला। हुनकर आत्माक प्रभावसँ डिलरीनगरमे हुनकर मृत्युक बादो बहुत दिन धरि शान्ति रहल। बान्हेपर बौधा मलिक आ आर डोमक चारिटा घर सेहो अछि। ईहो दुनू टोल अही गामक सिमानमे अबैए। डोम अपनाकेँ मलिक वा सोपच कहै छथि। बौधा मलिक खिस्सा सुनबै छथि… चारि टा ब्राह्मण स्नान लेल पोखरि जाइ छला तँ एकटा मरल गाए देखलन्हि। मरल गाए के उठाएत? से छोटका भाएकेँ ओ भार दऽ देल गेल आ जखन ओ घुरल तँ जातिसँ बहिष्कृत कऽ देल गेलै। सभ जातिक काज पाबनि-तिहार-संस्कारमे होइते छै। बक्खो जे दान मांगै अंगना नचौनी/ पमरिया जे दान मांगै चिलका खेलौनी/ दगरिन जे दान मांगै नार कऽ छिलौनी/ नौअनि जे दान मांगै आरत लगौनी/ धोबिया जे दान मांगै खिरक घुलौनी सभ जातिक काज पाबनि-तिहार-संस्कारमे होइते छै। डोमक काज सेहो पाबनि-तिहारमे होइ छै। पेटार बनेबासँ सूप, बीअनि सभ किछु बनेबामे डोमक काज, आ पाहुन परख लेल आ बरियाती लेल जे खस्सी काटल जाएत तै लेल मिआँटोलीक काज। खस्सीक मूड़ा दुर्गापूजाक बलिमे कमिटी लऽ लैए। जैनुल मिआँ जे खस्सी काटैत अछि से हलाल कऽ कऽ। गरदनि अदहा लटकले रहै छै, मुदा बना सोना कऽ गरदनि लऽ जाइए आ खलरा सेहो। तखन महिसबार ब्राह्मणमे सँ जे भजन आ अष्टजाम करैत छथि से ओही खलरासँ बनल ढोलक किनै छथि। दाहा लऽ कऽ जखन ओ सभ गढ़ नारिकेल घुरै छथि तकर दृश्य अद्भुते होइए। दाहामे झरनी खेलाइ जाइ छै, बाँसक झरनीसँ। मर्सिया सुनैत ओहिना पुरुखपात हबोढकार भऽ कानऽ लगै जाइए जेना दुर्गाजीक भसान दिन स्त्रीगण हबोढकार भऽ कानऽ लगै छथि। ऐ दसो दिन सैयद बँसवा कटौलक रे हाइ हाइ सेहो बँसवा भेलै बिसरनमा रे हाइ हाइ गढ़ नारिकेलक सभ लोक गबैय्या, खिसक्कर सभ। सुनैत रहू… भाव खेलाइ कालमे मीरांसाहेब अबै छथि आ वर दै छथि। एक्के खिस्सा कए बेर कहबह? सुनने जाह ने.. गढ़ नारिकेल छिऐ। जए बेर सुनबह नव लगतह। डिलरी नगरमे हरफूल सैय्यद रहथि। दिल्लीकेँ तँ डिलरी नगर ने कहै छै हौ? की जानऽ गेलिऐ? हरफूलक कनियाँ रहथि आतम। नूनजागढ़क युद्धमे हरफूल मरि गेला, आतम गढ़ुआरि रहथि। जन्म भेल एकटा बच्चाक, जकर नाम राखल गेल मीरां। आतम मीरांक बच्चेमे बियाह करा देलन्हि, मुदा मीरांकेँ नूनजागढ़क युद्ध आ ओइमे ओकर पिता हरफूलक मृत्युक समाचार देर-सबेर लागिये गेलन्हि। आ ओ नूनजागढ़पर आक्रमण कऽ ओकरा हरेलन्हि आ डिलरीनगर घुरि कऽ आबि गेला। गिर-गिर नगेड़ा दलमे धौंसा बोलै, हे रौ भैया धौंसा भैया हौ, धौंसा कऽ बोल कहलो नै जाइ मार-काटि कऽ लकड़ी दलमे बजना बोल बोलैए, रे भैया बजना बोल बोलैए भैया छिटकल जाइए सिंघिन तलवार करिया रे कुमैता दलमे घोड़ा जे ठनकै, हे रौ भैया घोड़ा भैया घोड़ा पीठ अगिन हो असवार फेर एकटा आर टोल अछि। चर्मकार, मुखदेव राम आ दयाराम राम । पहिने गामसँ बाहर रहए ई टोल, बसबिट्टीक बाद। मुदा आब तँ सभ बाँस काटि कऽ खतम कऽ देने अछि, आ लोकक बसोबास बढ़ैत-बढ़ैत ऐ चर्मकार टोल धरि आबि गेल छै। घरहट आ ईँटा पजेबा सभ अगल-बगलमे खसिते रहैए। ढोलहो देबासँ लऽ कऽ ढोल-पिपही बजेबा धरिमे हिनकर सभक सहयोग अपेक्षित। माल मरलाक बाद जाधरि ई सभ उठा कऽ नै लऽ जाइ छथि लोकक घरमे छुतका लागले रहैए। मुखदेव अछि जागेश्वर झाक संगी। लाला महराज, चर्मकारक लोकदेवता। चौरीसँ माँछ मारि कऽ अनै छलथि। चौरीक माँछपर सभक अधिकार रहै छै। सभ ओतऽ माँछ मारि सकैए। मुदा सोनायमनी कहै छलै जे वएह टा चौरीसँ माँछ मारि सकैए। लाला महराज बलगर रहथि, ओ से नै मानथि। एक दिन ओ माँछ मारि कऽ आबि रहल छला आकि सोनायमनीकेँ पता लागि गेलै। पहिने ऐ इलाका सभमे बाघ रहै छलै। सोनायमनी लग सेहो कएकटा बाघ रहै। ओ एकटा बाघ लाला महराजकेँ मारबा लेल पठेलक। मुदा लाला महराज अपन लाठीसँ ओकरा मारि देलन्हि। सोनायमनीकेँ बड्ड तामस उठलन्हि, ओ गहिल देवीक आराधना केलन्हि। गहिल देवी लाला महराजकेँ एकटा बाघिन पठा कऽ मारि देलन्हि। खसियाक तीर मैया घूरै छै हौ/ हाइ लालाक करै छै नै खोज लालाकेँ खोजै छै जौँ आबे/ कानि कानि कहैए ने बुझाय कतौ नै देखियै रे दैबा जो आब/ कतौ नै लाला बाबीकेँ रे आब केकरासँ से पुछबै केकरा समुझेबै/ केकराकेँ कहबै हम्मे हो उदेश। लाला महराजक मित्र नाथ मिश्र लाला महराजक माए-बाबूकेँ दूध देनाइ बन्न कऽ देलन्हि। डाँटि-डपटि कहै लागलै गे/ रूपामाय मिसरकेँ ने बुझाय जेकरे परसादे नाथ मिसर छह हौ/ धोबिये पाट सनक जे शरीर केराक थम सनक छौ मिसर रे/ तोरो जे अबै नै हौ जाँघ कुनल कुनल बाँही नाथ मिसर हो/ ललिये परसादे छौ ने आब लाला महराजक आत्मा तमसा गेल आ नाथ मिश्रकेँ ओ मारि देलक आ सोनायमनी आ ओकर परिवारकेँ सेहो मारि देलक। फेर लाला महराजकेँ पूजा पाठसँ मनाओल गेल आ तखन जा कऽ ओ शान्त भेला। गढ़ नारिकेलक सभ लोक गबैय्या, खिस्सा कहक्कर सभ। सुनैत रहू… मनसाराम चमार आ छेछनमल डोम। दुनू बहादुर, मनसाराम मोरंगक राजाक सेनापति आ छेछनमल सिरीराजखण्ड राजक सेनापति। मोरंगक राजाकेँ पता रहन्हि जे सिरीराजखण्डक सेनापति छेछनमलकेँ ओना कियो नै जीति सकैए, मनसाराम सेहो नै। छेछनमलकेँ मोरंगराज अपन दरबारमे बजेलन्हि आ ओकरा लालच देलन्हि। मुदा ओ नै मानलन्हि, सिरीजखण्डसँ विश्वासघात? कखनो नै। मोरंगराज हुनका गछारि कऽ बन्हबा देलन्हि। मुदा छेछनमल एक्के बेरमे सभ बन्हन तोड़ि देलन्हि। मोरंगराज फेर डेरा गेला, जतुक्का छेछनमल सन सेनापति ओतऽ सेना सेहो तेहने बलगर हएत। आ सिरीराजखण्डपर आक्रमणक विचार ओ त्यागि देलन्हि। कुछ नै बीति जेतै हौ मनसाराम, चाहे सिरो कियै नै उतरि जाएत। तैयो हम्मे नै टपै लेल देबै हौ, अप्पन राजक रौ भीतर। जौँ तोरा आबो जी-जानक डर छौ हौ, तँ घर घूरि जा हौ नै अप्पन। हम्मे तँ एको करम नै बाकी रखबऽ हौ, हम्मे करबै सिमानक रछिपाल। जौँ तोँए एको डेग आगू बढ़बै हौ, हम्मे तोहर सिर लेबै नै कतारि। गढ़ नारिकेलक खिस्सा सुनैत रहू… एक्के खिस्साक कएकटा रूप। जतऽ जतऽ सँ कनियाँ-मनियाँ एली, ततुक्का खिस्सा नेने एली। लुकेसरी एकटा चर्मकारक पुत्री रहथि। छेछनमलकेँ पति रूपमे प्राप्त करबा लेल एकादशी करथि। मुदा हुनका सपना एलन्हि जे छेछन साधु बनि गेल अछि। आ जखन छेछनक भेँट लुकेसरीसँ भेल तँ छेछन हुनका देवी मानि लेलन्हि, हुनकासँ उपदेश लेलन्हि आ लुकेसरीकेँ देवी बना देलन्हि। लुकेसरी देवी बनि गेली। फेर धनुख टोली। भगवानदत्त मंडल आ अधिकलाल मंडल-धानुक। पहिने यएह लोकनि भार उघैत रहथि मुदा पछाति दुसधटोलीक लोक सेहो भार उघए लागल छथि। खेती करब धनुकटोली आ दुसधटोलीक पुरान पेशा अछि। हँ पहिने ई सभ मात्र बोनिपर काज करैत रहथि, आब बटाइपर करै छथि। बकरी पोसब आ दुर्गापूजामे छागर बलि लेल बेचब, तकरा अहाँ ऐ दुनू टोलक पशुपालनमे गानि सकै छी। एक-एकटा बड़द सेहो कियो कियो राखऽ लागल छथि आ पार लगा कऽ तकर उपयोग जोड़ा बड़दसँ खेती करबामे करै छथि। कोनो झगड़ा-झाँटी भेलापर महिसबार ब्राह्मणक चाइन कारी खापड़िसँ तोड़ैत कोनो टोलक महिलाकेँ अहाँ सालक कोनो एहन मास नै अछि, जइमे नै देखि सकै छी, कारण कहती जे ई सभ निर्लज्ज होइए आ से ऐ कारणसँ जे जन्मेपर एकरा सभक पाछूमे थूक दऽ देल जाइ छै, जइसँ लाज नै हेतै। गढ़ नारिकेलमे कोनो एहेन व्यक्ति जकरासँ समाजकेँ नोकसान होइ छै, ओकर मुइलापर शोक नै मनाओल जाइए, उन्टे ओकरा मुइलापर जनानी सभ खापड़ि फोड़ि कऽ बान्हपर फेकि दै छथि। तीने टा घर रहलोपर धोबियाटोली एकटा टोल बनि गेल अछि। झंझारपुर धरिक मारवाड़ीक कपड़ा एतऽ साफ कएल जाइए। महिसबार ब्राह्मण सभ जे बरियातीमे बेलबटम झाड़ि कऽ सीट-साटि कऽ निकलै छथि से कोनो अपन कपड़ा पहीरि कऽ? वएह मंगनिया कपड़ा महगौआ, मारवाड़ी सभक। मारवाड़ी सभक ई कपड़ा साफी भाइ दू दिन लेल भाड़ापर हिनका सभकेँ दै छथिन्ह। कोरैल, बुधन आ डोमी साफी, धोबि। डोमी साफी आब डोमी दास छथि, कारण कबीरपंथी जोतै छथि। गुरु गोसाँइ जखन अबै छथि तखन डोमी दासक सरस्वती मन्द पड़ि जाइ छन्हि। मैथिली कबीरवाणीक भण्डार छन्हि हुनका लग। प्रथमहि छलौं हम आदि पुरुख संग तब हम रहलौं कुमारि हे भैया मिलल भतारक जनमल ता संग भेल बिआह हे का संग रसलौं का संग बसलौं का संग केलौं धरुआर हे का संग देश देशाउर घुमलौं कोन पुरुख के नारि हे पाँच संग रसलौं पचीस संग बसलौं तीन संग केलौं धरुआर हे संगहिमे देश देशाउर घुमलौं एक पुरुख एक नारि हे साँपिन रूप हम शहर बसलौं डँसलौं मये चारू वेद हे ससुर भैंसुर मिलि एक मत केलौं अचरज कहलो ने जाइ हे एक आद्या तीनि रूप धराए छल मति बुद्धि विस्तार हे कहए कबीर सभकेँ मन मोहे सन्त कोइ उतरए पार हे डोमी दास सालमे एकबेर गढ़ नारिकेलमे सन्त समागम करबै छथि। भरि साल घुमिते रहै छथि। से कत्तौ, कबीर धर्मस्थान, दुहबी, नेपाल; सहजयोग सत्संग केन्द्र, अरेड़ बरही टोल, अरेड़हाट, मधुबनी; कबीरमठ, सतमलपुर, समस्तीपुर; कबीर आश्रम, समस्तीपुर; कबीर आश्रम, तुर्की, मुजफ्फरपुर; कबीर जागू आश्रम, अन्धराठाढ़ी, मधुबनी; कबीर आश्रम, ब्रह्मोत्तरा, मधुबनी; सदगुरु कबीर आश्रम, सुरतगंज, मधुबनी; कबीर आश्रम, भरवाड़ा; कबीर आश्रम, लदौरा, समस्तीपुर; कबीर मठ, कृष्णाटोली, ब्रह्मपुरा, मुजफ्फरपुर; ई कोनो स्थान हुनकासँ छुटल नै छन्हि। कतेको गुरुगादी द्वारा चादरि दऽ मठक महन्थी देबाक कार्यक्रममे हुनकर उपस्थिति अनिवार्य रहैत अछि। गढ़ नारिकेलक सभ लोकक स्मृति बड्ड तेज, पुछबै एकटा गप्प आ तखन सुनैत रहू… नौआटोली सेहो तीन घरक। जयराम ठाकुर, लक्ष्मी ठाकुर आ माले ठाकुर, हजाम। बड़ बजन्ता सभ। जोगिन्दर ठाकुर, गढ़ नारिकेल गामक कमरसारिक बड़ही कमारमे सभसँ समंगर परिवारक। छड़ीदार छथि जोगिन्दर ठाकुर। मुदा माइनजन वा हुनकर देवान जखन भोजमे अबै छथि तखन लगैए जे छड़ीदार जोगिन्दर बाबूक सरस्वती मन्द पड़ि जाइ छन्हि आ नीक आ अनर्गल दुनू गपपर खाली हँ निकलै छन्हि। जोगिन्दरकेँ तीनटा सन्तान- बिहारी, अर्जुन आ शिवनाराएण। सभ गोटे काठक व्यवसायमे लागल छथि मुदा बिहारी संगमे लोहाक काज सेहो करै छथि आ अर्जुन साइकिल मिस्त्री सेहो बनि गेल छथि आ रिक्शा-साइकिलक छोट-मोट भङठीसँ लऽ कऽ पेन्चर साटब धरि सभ काज करै छथि। बच्चा सभक लेल ओधिक गेन्दसँ लऽ कऽ लोहाक तारकेँ नीचाँमे मोड़ि लकड़ीक पहियाकेँ गुड़काबए बला खेल आ कतेक आर खेलाक इजाद केने छथि शिवनाराएण। से लोक कहितो अछि- देखियौ, पढ़ला लिखलासँ नोकरीये टा भेटै छै, से धारणा बदलू। देखियौ शिवनाराएणकेँ। की-की फुराइत रहै छै, कुकाठसँ की-की बना लैए। मुदा बिहारीक हाथक ईलम ककरोमे नै, आराकाट, सोझकटाइ, खड़ाकाट, फेँटकटाइ सभमे शिव नाराएणसँ आगाँ। शिवनाराएण आविष्कार करैए आ तकर बाद ओकर देखा-देखी वएह बौस्तु बिहारी ओकरासँ नीक बना लैए। आब गाममे कोनो बौस्तुक कॉपीराइट आविष्कारककेँ थोड़बे भेटतै। पथरौटी लकड़ीपर शिवनाराएणक आरी, बसुला मुरुछि जाइ छै मुदा बिहारी नै जानि कोना सम्हारि लैए। टोनाह लकड़ीसँ सेहो किछु ने किछु बना कऽ मेला ठेलामे बेचि अबैए। तकथा चिरबाक लेल नम्हर आरी सोझाँमे नै रहने छोटको आरिसँ चीरि दैए। लकड़ीक कामिल भागकेँ असरासँ अलग करबामे बिहारीक जोड़ नै। मोट सूतक बनल अँचरी भगवतीकेँ खोइँछ देबा लेल पटवा जगदीश माइलकेँ ताकल जाइ छन्हि, पटमीनी बड्ड काजुल। भोला पंडित कुम्हार, माटिक कोहा सभसँ लऽ कऽ बच्चा सभक लेल चिड़ै चुनमुनी धरि बनेबाक इन्तजाम छन्हि। मटिकममे कोनो जोड़ नै। बासू चौपाल, खतबे। भार उघैत रहथि, माँछ सेहो उघै छथि, कहार सेहो बनि जाइ छथि। आ माँछ बेचैयो लागल छथि। चलित्तर साहु आ लड्डूलाल साहु हलुआइ, दुर्गापूजामे दोकान लगबै छथि। काज उद्यममे सब्जी-तरकारी बनेबाक ठीका-पट्टा सेहो लेमऽ लागल छथि। शिवनारायण महतो, सूरी। लछमी दास, ततमा। लाल कुमार राय, कुर्मी। भोला पासवान आ मुकेश पासवान- दुसाध। गेना हजारीक निचुलका खाढ़ीक संबंधी। वएह गेना हजारी जे कुशेश्वरस्थानमे एकटा कुशपर एकटा गाए द्वारा आबि कऽ दूध दैत देखने रहथि तँ ओइ स्थानकेँ कोड़ए लगला, महादेव नीचाँ होइत गेला, फेर ताकि लेलन्हि। सीताक बेटा कुश (लवक भाए) द्वारा स्थापित ई महादेव गेना हजारीक ताकल। आब सुनू खिस्सा.. गढ़ नारिकेलमे सभ चीज लेल एकटा खिस्सा अछि.. खिस्सा नै इतिहास… पुहपीनगरमे कीरति पासवानकेँ जोतला खेतमे एकटा बच्चा भेटलै। नाम पड़लै जोति। -जोतला खेतमे भेटलै तैँ ने तँ हौ। ओ ओकरा पोसि-पालि कऽ पैघ केलन्हि। जोतिक दोस रहै हरिया। दुन्नु संगे रहथि। एक दिन जखन हरिया सुग्गर चरबै लेल जोति संग गेल तँ जोति नाचऽ लागल। इन्द्रलोक डोलि गेल। कालिदासकेँ जोतिसँ भेँट भेलन्हि आ कालिदास हुनका ढेर रास शक्ति देलन्हि आ हुनका धर्म आ सत्यक प्रचार लेल कहलन्हि। पुहपीनगरमे जोति धर्मक प्रचार प्रारम्भ केलन्हि। ओ बच्चा सभक हाथमे माटिक ढेपा देथि आ ओ ढेपा शंकरचूड़ लड्डू बनि जाइ छल। जिअए निरबुद्धि बालक जोति हौ/ जगमे तूँ अमर भऽ जा नित दिन करिहैं बलकवा रौ/ आहे धरमक हौ बेबहार जहीं ठीन जे चीज चाहबै बालकबा रौ/ पुरेतौ दाता हौ धर्मराज अमरीताक बेटा कालिदास ब्राह्मणक वेश धरि जोतिसँ भेँट करै लेल गेला, मुदा जोति कोनो कारणसँ हुनकासँ भेँट नै केलन्हि। कालिदास हुनका स्राप दऽ देलन्हि आ जोतिकेँ कोढ़ भऽ गेलै। कालिदास एकटा जोतखीक भेष बना कऽ एला आ जोतिकेँ बोनमे बारह बर्ख भूखे पियासे रहै लेल कहलन्हि। जोति अन्तमे सफल भेला। सत्यनारायण कामत, किओट, दरभंगाक जमीन्दारक कामतपर रहै छला। रामदेव भंडारी। किओटक प्रकार भंडारी, जे दरभंगा जमीन्दारक भनसाघर सम्हारै छला। सत्यनारायण कामत महौत सेहो रहथि, बरबड़िया रॉयक। हाथीक हौदा बनबैमे हुनकर जोड़ इलाकामे नै छल। हाथीक शब्दावली अगत्त, पिछू, थाइत, माइल बिरि ऐ सभक प्रयोगक हुनका अभ्यास भऽ गेल छन्हि, अनेरो आनो ठाम ऐ सभक प्रयोग करैत रहै छथि। कपिलेश्वर राउत आ रामावतार राउत, बरइ। पानक खानदानी पेशा। मलाह जीबछ मुखिया। डकही पोखरिमे सालमे एक बेर मछैर, पन्द्रह दिनसँ मास दिन धरि मलाह ऐमे महाजाल खसबै छथि। मलाहक टोल जुमि अबैए। पोखरिक कातमे मास दिन लेल बाहरी मलाहक गाम बसि जाइए। पहिने तँ मास भरिसँ ऊपर ई सलाना मछैर चलैत रहए मुदा आब घीच तीर कऽ बीस दिन। फेर मलाहक सरदार घोषणा करै छथि- जे आब माँछ शेष भऽ गेल। आब जे मारब, तँ महाजालमे तँ एको टा बड़का माँछ नै आओत। भौरी जालसँ मारब तँ सभटा छोटका माँछ मरि जाएत आ अगिला साल तखन जीरा देमए पड़त। ओइ पन्द्रह-बीस दिनमे गाममे उत्सवक वातावरण रहैए। अही बहन्ने पोखरिक साफ-सफाइ सेहो भऽ जाइ छै। भोरे चारि बजेसँ दुपहरिया धरि माँछ मारल जाइए। आ फेर बेरू पहर धरि सभ टोलक लोककेँ -दछिनबाइ टोलकेँ छोड़ि कऽ- अपन-अपन टोलक हिस्सा दऽ देल जाइ छै। सभ अपन-अपन हिस्सा लऽ गामपर अबै छथि। ओतऽ टोलक सभ परिवार अपन-अपन हिस्सा बाँटि लै छथि। टोलक माँछक कतेक कूड़ी लागत, ऐ विषयपर कहियो काल विवाद सेहो भऽ जाइए। जिबैत भलहि मसोमात काकीसँ टोका-बज्जी नै होइन्ह, भलहि मरबा काल बेटीकेँ हिस्सामे सँ किछु देबाक मसोमातक इच्छाकेँ कंठ मचोड़ि देने होथि; आ बेचारी मसोमातक मुइल शरीरक औँठा स्टाम्प पेपरपर लगबा लेने होथि। हुनकर स्मरण आन काल भले नै अबैत होइन्ह मुदा डकही पोखरिक हिस्सा लेबा काल सभकेँ अपन-अपन मसोमात काकी मोन पड़िये जाइ छन्हि। ऐपर विरोध व्यक्त सेहो होइए आ पहलमान, जिनका सभ प्रेमसँ खलिफ्फा सेहो कहै छन्हि, केँ छोड़ि किनको ऐ प्रकारक हिस्सा नै भेटै छन्हि- भले खलिफ्फाक अंगनाक ओ मसोमात बीस बर्ख पहिनहिये किए ने मरि गेल होथि। डकही पोखरिक एकटा आर विशेषता अछि। ऐमे माँछ, काछु सभ स्वयं बढ़ैए। पोखरिक कातमे मलकोका सभ अनेरुआ, आ मारते रास लीढ़ केचलीक प्रकार। कातमे भेंट-कन्द महिसबार बच्चा सभक भोजन। कमलाक नाहक खेबाह मलाह, गामक लोकसँ तकर बदलामे अन्न लै छथि। अनगौँआसँ हँ, धार पार करेबाक बदला पाइ लै छथि। सुनू खिस्सा… भरौड़ाक दुलरा दयाल मलाह। गोनू झाक गामक। आब गोनू झाक गप आएल तँ ओइ महामहोपाध्याय धूर्तराज गोनूक खिस्सा पहिने… मिथिला राज्यमे भयंकर सुखाड़ पड़ल। राजा ढोलहो पिटबा देलन्हि, जे जे क्यो एकर तोड़ बताओत ओकरा पुरस्कार भेटत। एकटा विशालकाय बाबा दस टा आकि बेसिये ठोप केने राजाक दरबारमे ई कहैत एला जे ओ सए वर्ष हिमालयमे तपस्या केने छथि आ यज्ञसँ वर्षा करा सकै छथि। साँझमे हुनका स्थान आ सामिग्री भेटि गेलन्हि। गोनू झा कतौ पहुनाइ करबा लेल गेल रहथि। जखन साँझमे घुरला तखन कनियाँक मुँहसँ सभटा गप सुनि आश्चर्यचकित भऽ हुनकर दर्शनार्थ विदा भेला। इम्हर भोर भेलासँ पहिनहिये सौँसे सोर भऽ गेल जे एकटा बीस आकि बेसिये ठोपबला बाबा सेहो पधारि चुकल छथि। आब दस ठोप बाबाक भेँट हुनकासँ भेलन्हि तँ ओ कहलन्हि- “अहाँ बीस ठोप बाबा छी तँ हम श्री श्री १०८ बीस ठोप बाबा छी। कहू अहाँ कोन विधिये वर्षा कराएब।” “हम एकटा बाँस रखने छी जकरासँ मेघकेँ खोँचारब आ वर्षा हएत।” “ओतेक टाक बाँस रखै छी कतऽ।” “अहाँ सन ढोंगी साधुक मुँहमे।” आब ओ दस ठोप बाबा शौचक बहन्ना कऽ विदा भेला। “औ। अपन खराम आ कमण्डल तँ लऽ जाउ।” मुदा ओ तँ भागल आ लोक सभ पछोड़ कऽ ओकर दाढ़ी पकड़ि घीचऽ चाहलक। मुदा ओ दाढ़ी छल नकली आ तइसँ ओ नोचा गेल। आ ओ ढोंगी मौका पाबि भागि गेल। तखन गोनू झा सेहो अपन मोछ-दाढ़ी हटा कऽ अपन रूपमे आबि गेला। राजा हुनकर चतुरताक सम्मान केलन्हि। आब ओ खिस्सा… भरौड़ाक दुलरा दयाल मलाहक। ओही गोनू झाक गामक। आब सुनू असली खिस्सा…. दुखहरन सहनीक बेटा। बच्चेमे ओकर बियाह बखरीक बहुरा गोढ़िनक बेटी धनियाँ मरौतीसँ भेलै। मुदा किछु तेहेन भेलै जे सभ बरियातीकेँ कन्यागत जहलमे बन्न कऽ देलक आ दुखहरन अपन बेटाकेँ लऽ कऽ पड़ा कऽ गाम आबि गेला। दुलरा दयाल नाच-गानामे पारंगत छल से लोक ओकरा नटुआ दयाल सेहो कहै छलै। पैघ भेलापर ओ बाबूसँ पुछलक जे ओकर गौना अखन धरि किए नै भेल छै। जखन ओकरा सभ किछु पता लगलै तँ ओ बिदा भऽ गेल बखरी। आ बखरीक सिमानपर इनारपर भेँट भऽ जाइ छै ओकरा अपन कनियाँसँ। विघ्न बाधाक बाद ओ आनि लैए अपन कनियाँकेँ। मुसहर बिचकुन सदाय। डकही पोखरिक सटल गड़खै सभ, थलथल करैत दलदल भूमि सेहो। ओइमे बिसाँढ़ कोरि-कोरि कऽ मुसहर सभ खाइ छथि। अकालमे जखन सभटा पोखरि, गड़खै सुखा जाइए तखनो ई डकही पोखरि मुदा नै सुखाइए। भुमिहार, राधामोहन राय। कोइर, दुखन महतो। सोनार, अशोक ठाकुर। तेली रामचन्द्र साव, बौकू साव आ कारी साव। गामक आमक गाछी सभ, कएक टा। बड़का कलम। खढ़ोरिक नवगछली। भोरहा कातक कलम। पोखरिक महार सभपर गाछी। फेकल आमक आँठीसँ निकलल पिपहीसँ गाछ आ आमक प्रकार बनबैमे ई गौँआ बड्ड माहिर। कालापहाड़, हरिमोहन, मल्लिका, सुरजापुरी, फजली, चौरिया, बम्बै, डोमा बम्बै, सोभजा (सोबजा बम्बै), नाजरा बम्बै, नेङरा बम्बै, दसहरी, कृष्णभोग, जरदालू, गुलाबखास, कलकतिया, फजिली, सजमनियाँ, सपेता (सफेदा), कठमाहा, सतुआहा, भोंट, बरमसिया (बारहो मास), कलमी भदैया, बथुआ (भदैया), कुल्हरिया, केरबा, परोड़िया, सिनुरिआ, घिबहा, भदैया, सोनहा, खीरमोहन, राइर (खूब मीठ), चौरिया, करिअम्मा (देखैयो आ खाइयोमे दब), लरूबा, धुमनाहा (पैघ मुदा सड़ही), भोगहा, कपूरिया, सकचुनियाँ, रोहनियाँ (सड़ही, बरसाइतमे भारमे जाइ छै, मिथिलामे सभ आमसँ पहिने पाकै छै), मिश्रीभोग, मोहन भोग, खटहा, रसहा, अल्हुआ, गुलड़िया, सुपरिआ, बरबड़िआ, कस्तुरिआ, दिबराहा, अनन्दी, दुर्गीदाय, केरबा, दरिमा, मिरचैया, बंशिया, मोहरठाकुर, जलमड़ै, सिपिया। बम्बै आँठी फेक दियौ टिपिया बनि जाएत। कलमी फेकलाहा आँठीसँ नै बनैए, ओकरा बनाओल जाइए। कलमीमे गुद्दा होइए, ई गरिष्ठ होइए; सरहीमे रस होइए आ ई सुपाच्य होइए, कने अम्मत सेहो होइए। तही कारणसँ सरहीक अम्मट बनैए। बरियातीकेँ अगता समएमे बम्बै आ पछता समएमे सपेता देल जाइ छै, ई दुनू आम सभसँ नीक मानल जाइए। कलकतियाक अचार आ आमिल बनैए ओना आनो आमक बनैए। बिन कोसा बला आमक कुच्चा अचार–कसौनी- आ कोसाबला आमक फारा अचार बनैए। कोबी आ परोरसँ अन्तिम कालमे लोक अघा जाइए मुदा आमसँ नै। सभ आमक सभ तरहक स्वाद। खढ़ोरिमे सेहो खेत रहए। मुदा एक गोटे जे नवगछुली लगेलन्हि, तइसँ छाह भेने दोसर खेतक धानक खेती दबि गेल। से ओहो कने चौक-चौराहापर अनट-बनट बजैत आमक गाछी लगा देलन्हि। एक टा जमबोनी सेहो अछि। नमहर-नमगर गाछ सभ, जोम सभ आ पतरगर जोमनी। आ छोटका-छोटका गुलजामुन। पीपरक गाछ सभ डिहबारक स्थानसँ लऽ कऽ स्कूलक प्रांगण धरि एत्तऽ-ओत्तऽ पसरल अछि। पीपर गाछक जड़ि एत्तऽ आ शिरा सभ दहोदिस। नागफनी, पाकड़िक गाछ, बेलक गाछ, तेतैरक गाछ सेहो ठाम-ठीम अछि। बान्ह सभक कातमे बोनसुपारीक गाछ, साहर दातमनिक झोँझ, बँसबिट्टी आ मारिते रास फूल आ काँट सभ। लजबिज्जी तँ सभ कलममे। चाकर आमक गाछपर रखबार सभ ओछैन कऽ सुति रहै छथि। वरक गाछ मुदा एक्केटा, पीचक कातमे मीआँटोली लग। घौका साग, लौफ साग, कुम्हरक लत्ती, राजा-रानी साग, गम्हारि, मड़ुआ, चीन, बथुआ, तिलकोरक पात आ फर, मखान, सिंगरहारक फूल, पोरो साग, अरिकोंछ, ओल, थल कमल, भेंट, करोनाक गाछ आ ओकर फड़क अचार, अण्डी, अपराजिता फूल, अनानास, हुरहुर, आँता फलक गाछ, श्याम तुलसी, जिलेबी, धान, केयोरा, समा, कोदो, जइ, सोआ, कुरथी, मूंग, उरीद, खजूर, नरकट, औरा-धातरीम, पान, मतार, गुलैंच, गुलमोहर, रजनीगन्धा, नूनी साग, ठढ़िया साग, लताम, दाड़िम-अनार, पिरार, बन्धनी, मुरइ, सर्पगन्धा, गुलाब, कुसियार, अशोक, तील, अगस्ती, काउन, भाँटा, आलू, जौ, पलाकी साग, अमरा, कदम, चिरैता, तग्गर, गेना, तेतैर, अर्जुन, कनैल, सिंघारा, परोर, मेथी, गहूम, पतेरा, केरैया, बोरा, मकइ, आद, बैर, मोथा, शीसो, धथूर, गजरा, बाँस, सीम, मड़ुआ, कुश, यूकेलिप्टस, जामुन, गुलजामुन, मखान, कट्ठा, बडा, गुल्लरि, डुम्मरि, पपड़िस, पीपर, सौंफ, गन्धराज, साहोर, गम्हारि, मुरलीमनोहर, बांग, फलसा, सूर्यमुखी, रामतरोइ, अड़हुल, जौ, गोकुलकाँट, अल्हुआ, करमी साग, जूही, चमेली, कुण्ड, बेली, सजमनि, खेसारी, मेहदी, मौसरी, तीसी (चिकना), झिंगुनी, घेरा, टमाटर, आम, नीम, मेथी, पुदीना, चम्पा, लजौनी, भालसरी, संध्या, टूटी, कामिनी, बबूर, खएर, चिरचिड़ी, बेल, मालती, सिरीस, प्याजु, लहसुन, घीकुमारी, ठढ़िया, ओल, चोरकाँटी, जइ, शरिफ्फा, कदम, चिनियाबदाम, कटहरी चम्पा, कटहर, बरहर, जनेर, कमरखा, बाँस, झाँटी, महुआ, कचनार, कुम्हर, चुकन्दर, घापसारी, सिम्मर, तार, शलगम, रैंची, सरिसो, पलाश, राहरि, अकोन, बड़सीम, सर्वजया, भांग, मेरचाइ, कुसुम, अमलताश, अमरलत्ती, बथुआ साग, जटाधारी, गुलदाबड़ी, बदाम, तारबूज, टाभनेबो, कागजी नेबो, जमीरी नेबो, अपराजिता, नारिकेर, पाट, धनी, शोन, खीरा, कदीमा, अम्मादि, हरदि, दूभि, दुद्धि केरा (देखैमे खूब सुन्नर), मरिचमान केरा, गौरिया केरा (खूब मीठ), बागनर केरा (पैघ आ मोट मुदा ओते स्वादिष्ट नै), भोस केरा, कमल, लिच्ची, कनैल, तमाकू, सिंगरहार, भेँट, तुलसी। महिंस जँ समैपर पाल नै खाइए तइ स्थितिमे गरमाइ लेल मेनागोभी पात खिऔल जाइए। खरही टाट-फरक आदिमे उपयोग होइए, पानक लत्ती खरहीयेपर लतरैए आ एकर उपयोग बरैबमे देखल जाइए। गढ़ नारिकेलमे मनुखक जाइतसँ बेशी गाछ-बृच्छ, फल, अन्न आ तरकारीक प्रकार। खूब तरकारी होइ छै- झींगली, सीम, भट्टा, मुनिगा, बन्दकोबी, फूलकोबी, शलजम, मुरइ, गाजर, टमाटर, अरड़नेबा, आलू, ओल, कच्चू, टेकना, चटैल, कैता, करैला, करौंदा, कदीमा, कुम्हर, केरा, कमलककरी, कटहर, खजबा कटहर, खम्हारु, बड़हर, परोर, सजमइन। घेरा, एकर फूलक तरुआ होइ छै। साग आरो प्रकारक- भटपुरैन, कटैया, पेकचा, पटुआ, सिरहोंची, ठढि़या, गेन्हारी (उज्जर आ लाल), चोलाइ, पोरो, तोरी, अल्हुआ, बथुआ, कदीमा, मटर, बदाम, दूम्फा, खेसारी, पाल, रैंचा, फूटिया, नोनी, बरदनोनी, लफ्फा, पलाकी, मुरै। ललठढ़िआ, झल्ला, लौफ, चोलाइ, पलाँकी, कुसुम, मेथी, सुआ, अर्ड़ा पटुआ, घौका, सरहन्ची, करमी, अरिकंचन, अरूआ, औरबी, तिलकोर, कोबी, सेरसो, तोरी, बदाम, केराओ, मटर, खेसारी, तिनपत्ती, अकटा, मिसिआ, कुम्हर, झलरी, केसी झल्ला, पेंची, राजा रानी। मुनिगा(सहजन)क, अल्लूक, मुरइक साग। बनपलाकी। चैतमे नीमक कलसल पत्ता भट्टाक संग प्रयोग होइए। दालिमे कुरथी, मसुरी, खेरही, राहरि, रहरिया, कलाय, खेसारी, मटर, बदाम, मसुरी, तेबखा, केलाइ, रजमा , मटर, केराओ, मेथ, बोड़ा, अकटा, मिसिया, भटपुरनि, रामझुमनी, सीम। राहरिक दालि धनिक खाइए आ रहरिआ दालि गरीब खाइए। डबरा, दसरिया, मलिदा, बेलोर, ई सभ धानक किसिम पाइनमे डुबलो रहलापर खखरी नै होइ छै। बोरी धानक लत्ती होइ छै, ई लत्ती पानिक ऊपरमे लतरै छै आ सभ गिरहसँ गाछ बहराइ छै, एक कट्ठामे दसटा गाछ मुश्किलसँ रहै छै आ ओहीसँ खेत भरि जाइ छै। सोरना, सुगवा, रंगा, दसहरिया, चननचूर, करियाकामौर, मंसूरी, हप्सा (सुगन्धित), रजनी, पाइनझालि, सिंगरा, कर्रावती, गुलांकी, जसुआ, चौंतीस, छत्तीस, नाजिर, जल्ली, धुसरी, पाखरि, पिच्चरि, कजरागौर, ई सभ धान चौरीमे होइ छल, रोपै कालमे तँ पानि नै रहै छलै मुदा बादमे भरि ठेहुन, भरि जांघ पानि तँ चौरीमे रहिते छै। कनेक मोटका चाउर होइ छै, सएह ने। गढ़ नारिकेलक चापी जमीन माने चौरीमे उपजैबला धानमे सुंगहा सतरा, सिंगरा, बेलोर, देसरिआ उजरा, देसरिआ करिआ, गोला, केशौनी गोला, मलिदा, गहुमा, पिच्चरि, पाखरि, सत्तोखरि, परबापाँखि, तत्तो, कसहम, उमट्ठ। मध्यम खेतमे उपजैबला धानमे सतरिआ, रमदुलारी, हरिनकेल, धुसरी, बक्कै, सेहमाना, बासमती, तुलसीभोग, ननियाँ, नाजीर, कनजीर, करिआ कामोर, सीता, पंकज, जया, चननचूर, खेमटी, उलाँक, पनिझाली, तुलसी फूल, अम्माघौर। उपरारि खेतक धान अछि जसबा, कमलकाठी, दूधराज, भालसरी, मंसूरी, भोला मंसूरी, कांक्षीमंसूरी; ऐमे कम्मो पानिमे नीक धानक खेती भऽ जाइए। धान अगहनमे तैयार होइए। धान बिहिया-बिहिया कऽ कमाइए सभ। विहनि लेल बीआ जोगा कऽ लोक राखैए। बिरारमे बीआ छीटि कऽ विहनि तैयार होइए। अरदरा पाबनि दिनसँ रोपनी शुरू होइए। दही, बसिया भात, गुर-चिन्नी, काजर सभटा सानि कऽ कन्चु पातपर तीन वा पाँच कूड़ी बना खेतमे सभ दै छै। जँ ब्राह्मण किसान तीन प्रवर अछि तँ किसान आ बोनिहार बजैए, तीन गव, तीन पान; आ तीन टा कूड़ी बना खेतमे दैए। आ जँ ब्राह्मण किसान पाँच प्रवर अछि तँ किसान आ बोनिहार बजैए पाँच गव पाँच पान; आ पाँच टा कूड़ी बना खेतमे दैए। ई सभ खेतमे बजैत, बिरारसँ उपारि आनल विहनिसँ धानक खेतमे बोनिहार गब लगबैए। जेठहि बिअवा गिरेलौं अषाढ़हि जनमि गेल हे साओन रोपनी करेलौं भादव बिट भेल हे आसिन फूल भेल धान कातिक फर भेल हे अगहन काटल धान दौनिया कराएल हे दौनि कराए कोठी ढारल कूटि-कूटि खाएब हे अदहा बिहब बाकी रहि गेलापर लोक साँस लैत अछि। भद्दैकेँ बुनि दै छै; छिटुआ धानक ऐ खेतीमे गौँआ सभ निपुण अछि। भदै सेहो कएक तरहक, लक्खी, जल्ली, झरहा, बच्चिया, रंगबा, गम्हरी उजरा, गम्हरी करिआ। ई भादवमे तैयार होइए। मिरचाइक विहनि, बिरार। केराक करजान। फलमे लिच्ची, केरा, कटहर, लताम, महु, जिलेबी, बुनियाँ, बैर, आँता, शरिफ्फा, सपाटू, बड़हर, जोम, शहतूत, अनार, नारियल, टाभनेबो, बेल, कदम सभक गाछ चारू दिस। केरा सेहो कए तरहक मरिचमान, गौड़िया मालभोग, झुरकुटिया, दुधी, बंशीबट, अनुपान, दुधमुंगर, बतिसा, मालभोग, सिंगापुरी, बाघनर, बरहरी, चिनिया, मालभोग, कपुरिया। कास, पटेर, झौआक जंगल। खगरा घास। केराओ दालि, सरिसो, तोरी, रैंची आ अण्डीक तेल। तीलै गाछ अफरातमे देखब, ऐ गाछक बरेड़ी देबामे प्रयोग होइए आ बजरकेराइक जारनिमे प्रयोग होइए। आमक बाँझीक घूर होइए। जमाइनक गाछ धोइन ढेकारमे काज अबैए। मंगरैल गाएक दूध बढ़बैए, जनीजाइतक सेहो। सुआ, जमइन- अजमइन, मंगरैल मसल्लामे प्रयोग होइए। मोथी, मोहलीसौंफ, धनी, पुदीना, लहसुन-रसुन, पियौज आ मेथीक गाछ। कागजी आ जमीरी नेबो। तेतैर। चिड़ै जेना कचबचिया, वाक, चुहिया, पिहुआ, हसुवादागैन, टिड्ढ़ी, बटेर, फुद्दी, बंचर (वनबादुर), सारस, हरदी, ललबोङी, टिटही (टिटहरी), चौंचा, चकोर, चकबा, नीलकण्ठ, धनछोहा, कारकौआ, पनिडुम्मी, सिल्ली, हाँस, फुलचोभी, परुकी, लालसर, गागन, मुर्गी (मुर्गा), चेहा, गछखोदही (कठखोदही), मुजेलिया, चमगादर (चमगुदरी), डकहर, बादुर, मुँहदुस्सी (उल्लू), चिल्होरिया, गिद्ध, बगुला, बाझ, बगेरी, बगरा, पपिहा, बुलबुल, सुगा , परबा, बत्तक, मोर, मैना, कौआ, कोइली, लालसर, देशी कौआ, कार कौआ (काग, बाझिल कौआ), सिल्ली, कचबचिया, अगिन, अधङा, कोइली, कठखोधी, खंजनिचिड़ैआ (शरद ऋतु), गरूड़, चकेबा, चाहा–चेहा, चिल्होरि, चुहचुहिया, चोँचा, डकहर, तित्तिर, कंठमे लाल-धारीबला सुग्गा, दिघौंच, धनेस, धोबिनियाँ चिड़ै, पड़बा, पनिडुब्बी, बनमुर्गा, पहाड़ी मैना (मुँहपर लाल), पपीहा, पौड़की, फुद्दी, बगड़ा, बगुला, बगेड़ी, बटेर, बत्तक, बदर (लाल नाम पुच्छी), बाझ, मैनी (कारीपर उज्जर थप्पा, लोल लाल), मुँहदुस्सा, ललमुनियाँ, नीलकंठ, सामा, सारस, साहीन, हरियल (मारि कऽ खाएल जाइ छै), हंस। फतिंगा जे आँखिमे मारैए (अँखिफोड़ा), तितली (दू पाँखिबला रंग बिरंगक, नांगरि रहित), टुकिली (चारि पाँखिबला, नांगरि युक्त), हरियर रंगक हनुमान जीक घोड़ा, एकटा आर होइए अंग्रेजिया मशीन जेकाँ, लगैए एकरे देखि कऽ अंग्रेज सभ जे.सी.बी. मशीन बनेलक। खढ़िया, हरिन, नीलगाय, हरकाछु, हराशंख, बिज्जी, खिखीर, शाही सेहो खूब। घोंघहाक मांसक तीमन खाएल जाइए, सुरका बना सुरकलो जाइए आ कोनो बर्तनमे राखि पाँच-सात घंटा बाद छुटलाहा पानिकेँ ममरखामे धिया-पुताकेँ पिऔल जाइए आ सुलबाइमे सेहो फएदा करैए, पेट ठंढा करैए। माछो किसिम-किसिमक रेखा, टेंगरा, कपटी, कौआ, गरइ, गरचुन्नी, गैंचा, चेंगा, सिंघी, डेरा, कोतरा, लट्टा, कांटी, रेबा, छही, चिनमा, दरही, सौराठ, कबै, सिंघी, मांगुर, पटोरिया, बेलौना, बुआरी, बामी, गागर, भुन्ना, इचना, पोठी, रिट्ठा, भौरा, भुहला, रौह, भाकुर, नैन, ग्लासकप, सिल्वर कप, फोकचा, बद्दो। चिचोर, गढ़ नारिकेलमे होइबला निरर्थक घासक प्रजाति, नाम-नाम धरगर। पाइनिक केशौर। जटाधारी फूलक गाछ। हरदिक गाछ। अगिया ग्रहक गाछ, नजरि-गुजरि नै लगबा लेल एकर डाढ़िकेँ बाँहिपर बान्हि देल जाइ छै। रोटी कएक तरहक- मरूआ, चाउर, खुद्दी, जओ, बदाम, खेसारी, काउन, चीन, मक्कै, बाजरा, जनेर, अल्हुआ, अकटा, मिसिया, मसुरी, फकुआ, खेरही, गुरा, सिंघार, मखान, भैँट। एकाध कट्ठामे गहूमक खेती सेहो पैघ लोक करै छथि आ तकर सोहारी सेहो बनैए। एक्के बौस्तु कए-कए बेर आबि जाइ छै.. टोकियौ नै.. ऐ गामक लोक सुरमे बाजैए.. एक्के चीज कए बेर अबै छै मुदा कतेक नवो चीज आबि जाइ छै ओइ सुरमे। खेल सभ सेहो कए तरहक- संस्कृतक अटकन-मटकन आ कबड्डी। चंपा-चंपा कनैलक फरसँ खेलाएल जाइए, करिया-झुम्मरि खेलै छी ढील पटापट मारै छी, समाचकेबा खेलै छी चुगला धोती फाड़ै छी, चुगला कोठी छाउर भैया कोठी चाउर, चुगला रौ तोहर ई कोन बानि ....... सँ खसलौ निच्छीकै पानि। चल झरनी खेलाइले। बंसी खेलाइले चलू। अम्मन छू अम्मन छू, चैत कबड्डी आबऽ दे। भागवतलीलाक हथियासुर आ उज्जीउज्जी, लालछड़ी.. जकरे नाम लाल छड़ी सएह चलि आबए ठोकर मारि पड़ाए। झिझिया, जट-जटीन, झरनी, हुरियाहा-हुरियाही, हुरा-हुरी, छुतिया, कोइली दौड़, चोर पुलिस, हुक्का-लोली, कनसुप्ती, सिन्गी-पताही, झिझिरकोना.. झिज्झिर कोना झिज्झिर कोना.. कोन कोना, गदहा-गुड़कन, चौसा, सतघरिया, डोलपत्ता, हाथी-चुक्का, गुड़ी कबड्डी, घोड़ा कबड्डी, जूआ, कौड़ी-कौड़ी, कित-कित, डोरी कूद, घरबा-दुअरबा, खो-खो (ई एतुक्का खो-खो छी बम्बैक नै), चोर-सिपाही, चोरानुक्की, गुल्ली-डंटा, पिंगला, लठमार, लुक्का-छिप्पी, जट-जटिन, सोना-डुब्बी, कुश्ती, पचीसी, घास-घास, पचगोटबा, पिट्टो, घोघोरानी, आँखि मिचौनी, कनियाँ-पुतरा, मरूआ-मरूऐनी, मरूआ ढेरी, बनरफान, मालदरी, फुटबॉल, सतरंज, तास, अन्ताक्षरी, पिठियाठोक, गोबरकन्ना, झीलम झाड़, सोल्हगोटिया, झिलहरि, छुली-छुली, ढेंगापानी, चिक्का कब्बडी, अकरो-मकरो, गोली-गोली। बाप रे… गढ़-नारिकेलक चटनी-सन्ना सेहो तरह तरहक। काँच लताम, अरिकोँच, ओल, लहसुन, पिऔज, तेतरि, कदम, मेथी, धनियाँ, पुदिना, तील, तिसी, अमादी, टमाटर, कुतरुम, धात्रीम (धात्री), आमक टुकला, सेरसों, पोस्ता दाना, चठैल, पीरार, भाँटा, घेरा, झुमनी, रामझुमनी, करैला, अल्लु (सन्ना/ चोखा), परोर, कुरली (मधकुरमी), मुड़ै, सागक पतौरा, केरा (सन्ना), बरहर, करौना, अमरोरा, अमरा, आदी (आद), तुइत, आमक मोजर (बौर), मुनगा फूल, घोरजौड़ (घोरक छाँछ), सरिफा, खम्हरूआ, पेंची, औरबी, नारियल, नून-मरचाइ-कसौनी मिला कऽ, माछ (सन्ना), काँकोर (सन्ना), डोका (सन्ना), मोछी (कटहरक), पोरो, कटहरक फरक झक्का। तेलमे सेरसो (करू तेल), तोरी, सूर्यमुखी, रैंची, तोर, अण्डी, कुशुम, मुड़ै, तील, सुआबीन, नारियल, चिनिया बदाम, महु, कटैया, तीसी। खेत पथार सेहो कएक तरहक। दुनू धारक बीचक खेतकेँ सभ ओइ पारबला खेत कहै जाइ छथि। बलुआही खेत आ पाँकबला सेहो। कमला आनै छथि बालु आ बलान आनै छथि पाँक। परोर, तारबूज, फुइट आ अल्हुआक खेती, सभसँ सस्त खेत जे किनबाक हुअए तँ एतए आउ। मुदा बाढ़िक बाद खेतक आरिक मुँह-कान बदलल भेटत। कोनो साल बाढ़िक बाद खेतक रकबा घटि जाए तँ अराड़ि नै ठाढ़ कऽ लेब। अगिला बाढ़िमे भऽ सकैए कमला महरानी ओकर रकबा बढ़ा दैथि। खेती ओना तँ धानोक होइ छै, मुदा से सुतारपर छै। कोनो बर्ख तीन बेर रोपलोपर बेर-बेर बाढ़िमे दहा जाएत तँ कोनो साल कमला महरानी खेतमे ततेक पाँक भरि देती जे जँ दू मोनक कट्ठा मोनमे सोचब तँ तहूसँ बेशी उपजत। कनेक महग खेत किनबाक हुअए तँ मोड़बला आ गम्हारिक गाछ लगबला वा डुम्मरितर बला खेत कीनू। एतऽ लोक खेतीसँ बेशी बसोबास लेल जमीन कीनि रहल छथि। डकही पोखरिबला खेतकेँ बढ़मोतर कहल जाइत अछि। पहिने ब्रह्मोत्तर रूपमे किनको मंगनीमे राजा द्वारा भेटल हेतन्हि। पहिने सुनै छिऐ जे नीक खेती होइत रहै मुदा आइ काल्हि पानि भरल रहै छै। इलाकामे जे छिटुआ धानक खेती होइए से अही बाधमे। महीसक मरलापर कन्नारोहटक स्वर सेहो मास दू मासपर सुनबामे आएत। आ जादूटोना, ककरो दरबज्जापर पूजल फूल रातिमे फेकल, सेहो सालमे एकाध मासमे देखऽमे अबैए। आब लोको मुदा बूझि गेल अछि जे ई कोनो छौड़ाक किरदानी अछि। कृषि-मत्स्य-पशुपालन आधारित महिसबार ब्राह्मण बहुल ऐ गामक चारूकात पढ़ल लिखल, ततेक नै पढ़ल लिखल आ मुँहदुब्बर गाम सभ अछि, मुदा एकटा चोरक गाम सेहो अछि ओतऽ। खाँटी चोर, द्रव्य, बौस्तु-जातक। मुदा गढ़ नारिकेलमे चोरि कऽ लेत से साधांश नै छै। आन गाममे सभ तरहक चोर- साहित्यक, आचारक, विचारक, प्रचारक। पड़ोसक चोर सभक हिम्मत नै छन्हि जे गढ़ नारिकेलमे कोनो जातिक घरमे चोरि कऽ लेथि। ऐ गाममे जकर बियाह भऽ जाइए ओकर सभटा फसादी जमीनक निपटार भऽ जाइ छै। ऐ गाममे कुटमैती भेने लोक समंगर भऽ जाइए। एतऽ सँ हसेरी दूर-दूर धरि जाइए। कुटुमक जमीनक झगड़ाक निपटारासँ लऽ कऽ आन-आन काल हसेरी बहराइए। जे जमीन ऐ गाममे हजार रुपैये कट्ठा अछि, वएह जमीन पड़ोसक बनराहा गाममे एक सए रुपैये कट्ठा। उँचगर जमीन गाममे सस्त अछि कारण बर्खाक पानिसँ उत्थर जमीनक पटौनी नै भऽ सकैए। उपरारि खेतक धान जसबा, कमलकाठी, दूधराज, भालसरी, मंसूरी, भोला मंसूरी, कांक्षीमंसूरी; आ मकै, कुरथी, राहरि, मड़ुआ, कोदो, खेड़ी आ सरिसो उपजाबैए ई बनराहा सभ। बनराहा.. बुझलहुँ नै, ओइ गामक गाछीमे बानर सभ भरल छै आ लोको सभ बानरे सन पीअर कपीश! बाड़ी मुदा गढ़ नारिकेलक सभ घरक पाछाँ भेटबे करत, भट्टा, नेबो, साग, मुरइ, ई सभ बाड़ीमे भेटि जाइए, आ आन आन तरहक जड़ी बूटी सभ सेहो। धरि दुर्गापूजा ऐ गाममे नै शुरू भेल। मुँहदुबरा गाममे आ बनराहा गाममे सेहो शुरू भऽ गेल, मुदा एत्तऽ? चाहबै तँ किए नै हएत। रामलीला एक मास केलौं हम सभ आकि नै। धू, बान्ह लगहीसँ घिना गेल। भने नै होइए दुर्गा पूजा। एक तँ धी बेटीकेँ लियाउन करेबाक झमेला रहत आ जे मेलपेँचसँ रहै जाइ छी सेहो पार्टी-पोलिटिक्स खतम कऽ देत। खुरपीसँ आध माइल एक निशाँसमे छीलि कतेको बोरा घास भरि लैए ऐ गामक ब्राह्मण। ऐ गामक ब्राह्मण महीसक सभटा नीक प्रजाति रखने अछि। ऐ गामक पारा सभकेँ जँ आनो गाममे छूल जाए तँ हँसेरी बहरा जाइए, ओना अनजाने-सुन्जानमे अनगौँआ ऐ गामक पारापर लाठी उसाहैए। गढ़ नारिकेलमे कलाकार सभक कमी नै। खुरदक वादक जंगल राम, कॉरनेट वादक जीतन राम, भगैत गबैया- रूपलाल यादव, खिसक्कर- छुतहरु यादव आ टहल मुखिया। नाच कम्पनी खुशीलाल साहु खोलने छथि, मैनेजर छथिन फुसन यादव। सिमराहा सप्तरी, सिमराहा सुपौल दुनू ठामक नाच कम्पनीसँ नीक। अल्हा रूदल, लछिया रानी- सती लछिया, शीत वसंत, गुगली घटमा, राजा कुँवर वृजभान, धूलक फूल, सुल्ताना डाकू, राजा हरिश्चन्द्र, राजा नल, राजा सलहेस, काँच ताग, आन्हर कानून, लोहा सिंह, माइक कलेजा, चूड़ी आ सिनूर, जंगल बादशाह, वंश उजाड़न, पिआ देशांतर (बिदेसिया), लोरिक मनियार, बापक हत्या, दमाद वध, निशाद वध, गोपीचन, शंकर शोसिला/ उतिमचन/ सुन्दर वनक सुन्दर फूल, विजय सिंह, पिता हत्या, जंगली बादशाह, रास लीला, रुणा-झुणा, कबीर लीला, कलयुग प्रेम आ आर ढेर रास गाथा। नागार्ची (नङेरा/ डिग्री बजबैबला) गुणेश्वर राम, खौजरी वादक सुकदेव साफी। घुनामुना (सारंगी) बजबैबला खट्टर मल्लिक, मामागाम कमरैलक डोम-मल्लिक सभसँ कताक गुणा नीक घुनामुना बजबै छथि । झलिबाह (झालि बजौनिहार) अशर्फी मण्डल। कठझालि/ रमझालि/ करताल बजौनिहार छेदी मण्डल। बौसली वादक गुलाब पासवान/ झोटन मण्डल। घोड़ा नृत्य, मजूर नृत्य केनिहार लाइनसँ महादेव बनियाँ, दसाँइ ठाकुर, दुर्गीलाल ठाकुर, घूरन पंडित। झुनझुन्ना (मजिरा) वादक अर्जुन मण्डल। झालड़ वादक रमजानी पासवान, जलतरंग वादक मलभोगी दास, कठतरंग वादक भयलाल दास, मृदंग वादक छोटकनि दास, बीन वादक दुखरन यादव, तानपुरा गंगाय साहु, तरसा (तासा) हूराहूरी आ दाहामे बजाओल जाइए, कल्लर मल्लिक आ मो. आजम द्वारा। झालड़- बच्चा मण्डल। बिपटा बनै छथि सीताराम राम। डिगरी सेदैबला प्रायः भड़िया सेहो होइए, असला-खसला उघैए, डिगरी सतन मुखिया बजबै छथि आ झोटन मण्डल डिगरी सेदै छथि आ भड़ियाक काज सेहो करै छथि। डिगरीमे छोट पातर स्वर निकलै छै। नङेरामे मोट अबाज निकलै छै, चोट पड़ै छै तँ बुझु नाच शुरू भेल। गुमगुमियाँ (ग्रुमबाजा), बबाजीक धुथू (तुरही) डोमी दास बजबै छथि। सिंगहरिया- धुधुबाजा बड़ी टा होइ छै- थूक फेकऽ पड़ै छै बजेलापर, तते दम लगै छै। बेंजो। नृतक (रघुनाथ सदाय), नारी पात्र (अशोक सिंह)। पुरुष पात्र, अभिनय, गायक, नायक, ठेकैता (ढोलकिया)। ऑर्गन डुब्बी मुखिया, नाल सुनर चौपाल, कॉरनेट फूसन राम, नङेरा अशर्फी गोसाँइ, ढोलक हियालाल, मृदंग वादक- झड़ीलाल सदाय। अल्हा/ महराइ। जोगिरा, पराती (प्रभाती) गौनिहार लेल्हु दास। झरनी- मो. आकुफ। नाल वादक खट्टर मण्डल। ड्रमसेट, हरमुनिया तँ बुझू गढ़ नारिकेलक सभ लोक बजबैए। डंका/ ढोल/ तबला- चुनाइ राम। बीकू राम सन डम्फा होलीमे कियो नै बजबैए । भगैत गबैया बिचकुन सदाय, रसुआरक भगैत पार्टी हुनका लग किछु नै, ओ भगैत गबै छथि आ संगमे खजुरी सेहो बजबै छथि। दीप गामक पटियाबला, मोथाक पटियाक कारीगरी किछु एतुक्को लोककेँ सिखेने छथि। साहेबगंजवाली, बलाटवालीक अरिपन आ मिथिला चित्रकला, बेलमोहनवाली आ बेलाहीवालीक लोकगीत। सिलाइ कढ़ाइमे मछधीवाली। सराइ-कटोरा, माटिक हजार-हजार महादेव एतुक्का बचिया आ स्त्रीगण लेल एक हाथक खेल। बाड़ीमे भँसाओल हजारक-हजार माटिक महादेव जत्तऽ तत्तऽ भेट जाएत। अंगना घर नीपल पोतल, कुटिया-पिसियासँ लऽ कऽ रोपनी पटौनी कथूमे गढ़ नारिकेलक स्त्रीगण पाछाँ नै। सप्ताडोराक कथा हुअए बा मधुश्रावणीक, एतुक्का स्त्रीगण एक्के निसाँसमे सभ कथा कहि जाइ छथि आ जखन एतुक्का बेटी-धी बियाहि कऽ दोसर गाम जाइ छथि तँ ओतुक्को गाममे गुण पसारै छथि। गाम अछि गढ़ नारिकेल, महिसबार ब्राह्मणक गाम। दोसर कल्लोल की बन्है छी? पुरबा-पछबा। पहिल पल्लव देश सुनै छिऐ स्वतंत्र भऽ गेलै। मुखदेव राम अंगैठी-मोड़ करै छथि। स्वतंत्र भऽ गेलै देश। जेलक बाहरमे महात्मा गाँधी आ जमाहिरलालक गुणगान भऽ रहल अछि, लगैए कोनो सरकारी स्कूलक बच्चा सभ छी ई सभ। एतेक रातिमे.. अखबारोमे निकलल रहै, पहिनहियेसँ तिथ निर्धारित भऽ गेलै। तिथ निर्धारित भऽ गेलै जे १४ अगस्त १९४७ केँ पाकिस्तान स्वतंत्र हेतै आ बारह बजे राति धरि जमाहिरलाल झण्डा फहराबै लेल रुकता, बिलमता भारतक स्वतंत्रताक घोषणा करै लेल!! घरमे भिन-भिनाउज भेलैए, से एक्के दिन दुनू समांग कोना अपन जन्म दिन मनाएत? छोटका भाए एक दिन पहिनहिये मनाएत जन्म दिन! सभ काज मेल-पेंचसँ भेलैए। जाधरि भारतक संविधान बनतै माउन्टबेटन रहबे करत भारतमे। मुदा पाकिस्तानमे अंग्रेज नै, जिन्ना बनता गवर्नर जेनेरल। छोट भाए देखेतै जे ओ बेशी क्रान्तिकारी अछि, विदेशीकेँ नै रहऽ देत ओ सभ गवर्नर जेनेरल। सभ काज मेल-पेंचसँ भेलैए। कहि देलकै जे जो तोरा स्वतंत्र कऽ देलियौ। लागैए जे गराक ढोल निकालि कऽ फेकि देलक। आब एतऽ सँ जे लेबाक छलै लऽ लेलक आ आब कऽ देलकै स्वतंत्र। जमाहिरलालक भाषण शुरू.. जेलर साहेबक रेडी बाजि रहल छन्हि.. “..नियति.. निर्धारित दिवस। कतेको शताब्दीक निन्न आ संघर्षक बाद..” नियति.. भाग्य.. एकरे विरोध तँ करै छल जागेश्वर.. निन्न आलस्यक रूप आ संघर्ष, ई दुनू संगे? जमाहिरलाल भाँसि गेल छथि भरिसक। आगाँ सुनू.. “अपन जिनगी आ काजसँ फेरसँ नव इतिहास जे प्रारम्भ भेल अछि, तकर हम निर्माण करब.. आ दोसर गोटे तकरा लिखत..” गप तँ ठीके कहैए जमाहिरलाल.. “… हम ओइ असंख्य स्वतंत्रता सेनानीक स्मरण करै छी जे बिन कोनो स्तुति वा पुरस्कारक अपन जान दऽ देलन्हि..” चलू जागेश्वरक प्रति जमाहिरलालक जिम्मेवारी खतम भेल। “….जय हिन्द” भक टुटलन्हि मुखदेवक। बीच रातिमे जतऽ मुखदेव राम जहलमे रहथि जयरामदास दौलतराम बिहारक राज्यपालक रूपमे शपथ लेलथि। १५ अगस्तकेँ बेरू पहर अगस्त क्रान्तिमे मारल गेल छात्र सभक मोन पड़लन्हि जयरामदास दौलतरामकेँ आ तखन ओ शहीद स्मारकक शिलान्यास केलन्हि। आ अगस्त क्रान्तिक वीर मुखदेव जहलमे अछि बन्न! बिहार प्रान्तक मुस्लिम लीग स्वतंत्रता समारोहमे भाग लेलक, चलू बुधि एलै। मुखदेव राम स्वतंत्रता संग्राममे जेल गेल रहथि आ देश स्वतंत्र भेलाक बाद नवका सरकार हुनकर सोह बिसरि गेल। मुखदेव राम सभ दिन लोक सभसँ पुछैत रहथि जे स्वतंत्र भारतमे की सभ भऽ रहल छै। पता लगै छलन्हि जे गाँधीजीकेँ कियो टेरै नै छन्हि, हिन्दू-मुसलमानक फेरमे हिन्दी-उर्दू भऽ रहल छै। देशक संविधान बनलै आकि नै बनलै। नहिये बनल हेतै तेँ ने नबका सरकार पुरनके कानूनसँ चलि रहल अछि आ देशकेँ चला रहल अछि। आ तेँ ने ओकरा पुरनका कानूनक अन्तर्गत जेलमे ठुसले राखल गेल छै। मुखदेव रामो जेलमे आ चोरो-उचक्का जेलमे! हरही संगे सुरही जाए, घी खिचड़ी बरोबरि खाए। दिन बितैत जाइ छलै। कहियो पता लागै छलन्हि जे गाँधीजीकेँ मारि देल गेलन्हि। तँ कहियो पता चलन्हि जे देशमे शरणार्थीक संख्यामे ततेक बढ़ोतरी भेल छै जे सरकार सभ काज छोड़ि कऽ ओही पाछाँ लागल अछि। बड़का छहरदिवारी। बाहरी लोककेँ तँ पतो नै लगैत हेतै जे ऐ जेलक भितरो एकटा दुनियाँ छै, छहरदिवारीक भीतरमे सड़क छै, घर छै, एकटा सभ्यता छै। छहरदिवारीक भीतर गाछ बृच्छ सेहो छै। छहरदिवारीक बाहरी लोककेँ तँ बुझाइ छै जे ई छहरदिवारी सूर्यकेँ रोकि दैत हेतै, हबा-बसातकेँ रोकि दैत हेतै। मुदा ऐ छहरदिवारीक भितरो सर्दी गर्मी पड़ै छै, मौसम बदलै छै आ अन्हर बिहाड़ि सेहो अबै छै। लोक बुझैए जे ऐ छहरदिवारीक भीतर जइ परिस्थितिमे लोक जाइए ओहने निकलैए, ने एतऽ बोखार लगैत हेतै आ नहिये सुलबाहि धरैत हेतै। मुदा एतऽ लोकक मोनो खराप होइ छै आ डाक्टरो वैद्यक आवश्यकता पड़ै छै। लोक बुझैए जे ऐ जेलक भीतर लोक दुखी रहैत हएत, हँसैत नै हएत। मुदा ऐ छहरदिवारीक भीतर सेहो लोक कुहरैत हँसैए, आ कुहरनाइ बिसरि खुलि कऽ सेहो हँसैए। आ मुखदेव रामकेँ हँसबै छन्हि एतुक्का लोक सभ। माने जे एतऽ जहल काटै लेल नै आएल अछि वरन एतऽ नोकरी करैए। किछु गोटे जेलमे काज करैले बाहरसँ अबैए आ किछुकेँ जेलक भितरे डेरा भेटल छै। जकरा जेलक भितरे डेरा भेटल छै सेहो कखनो काल मासक मास जेलक भितरे रहैए। मुदा ओकर सभक मोन नै अगुताइ छै। ओकर मोन ऐले नै अगुताइ छै जे ओकरा बुझल छै जे ओ जखन चाहि लेत बाहरक दुनियाँसँ घुरि कऽ आबि जाएत। मुदा ओकर दुनियाँ यएह छहरदिवारीक भितुरका छै। एतऽ ओकर घर आ लोकवेद सुरक्षित छै। एतऽ चोरि नै भऽ सकैए। से ओकरा अगुताइ नै छै। मुदा मुखदेव रामकेँ अगुताइ छन्हि। हुनका घुरि कऽ जेबाक छन्हि बाहरक दुनियाँमे। जतऽसँ अंग्रेज अपन देश पड़ा गेल छै आकि स्वेच्छासँ चलि गेल छै। जेलक कर्मचारी सभ हिलि-मिलि गेल छन्हि मुखदेव रामसँ। घनानन्द, हलधर, नोने, दौलति जहाँ, भट्ट भूषण, रुद्रमति ई सभ तँ मुखदेवक गीत आ खिस्सा सुनै लेल जान देने रहै छथि। ओना एकटा कैदी आर अछि, रघुवरन। ओहो सुनैत रहैए सभटा गप। मुदा चुपचाप। ने मुस्की आ ने ककरोसँ कोनो टोकेचाली। मुखदेव राम पटनिया जेलकेँ बना देने छथि मिथिला पाठशाला। बिसरि गेल छथि मुखदेव राम अपन गाम, अपन परिवार। यएह जेल छी, पहिने बाँकीपुर जेल कहै छलै सभ एकरा। १९४२ क स्वतंत्रता संग्राममे जागेश्वर झा आ मुखदेव रामकेँ पकड़ि कऽ गामसँ अही बाँकीपुर कैम्प जेल अनने रहै। १९४२ क स्वतंत्रता संग्राम आकि १९४ २क गढ़ नारिकेलक इनार सभक स्थापना .. संगे संग दुनू काज भेल रहै। कम्यूनिस्ट पार्टी क्विट इण्डिया मूवमेंटक विरोध केने रहै। जागेश्वरकेँ से पसिन्न नै पड़लै आ जँ जागेश्वरकेँ पसिन्न नै पड़लै तँ मुखदेवकेँ ई गप कोना पसिन्न पड़तै। अलगे कॉमरेड छल ओ। जागेश्वरक सासुर पहद्दी गाम रहै। आ इम्हर भारतक १९४२ क अगस्त क्रान्ति शुरू। गढ़ नारिकेलक मुखदेव आ जागेश्वर, मधेपुरक कुञ्जन, तारसरायक चेथरू, बहेरीक मुसाइ, बिरौलक ढिनाइ, दलसिंहसरायक भत्तू, ताजपुरक पिचकुन, बेनीपट्टीक छुतहरू आ मेंहथक घोंघाइ आ धनेसर। ई सभ गोटे जतऽ ततऽ घुमथि- पटना, पूर्णियाँ, चम्पारण, मुजफ्फरपुर, मालदह, राजमहल, जलपाइगुड़ी, बिलासपुर, अलीगढ़, मुंगेर। मुखदेवराम कहै छलखिन्ह जोगिन्दर ठाकुरकेँ, यौ, ओइ बिलासपुर क्षेत्रमे कमार सभ ढेर छथि, ओतऽ लोक सभ हुनका सभकेँ मैथिली बजैत सुनैत रहथि तँ झाजी कहऽ लगला। आ आब हुनकर सभक टाइटिल झा भऽ गेल अछि। आ जे झा सभ मालदह गेला, ओ सभ ओझा टाइटिल राखि लेलन्हि, अरै डंगा गाम छै मालदहमे, सभ मैथिली बजै छै, बहुत रास गाम छै ओइ इलाकामे मैथिल ब्राह्मण सभक। अरै डंगा माने अढ़ाइ जमीन। अलीगढ़मे जे झा सभ गेला ओ शर्मा टाइटिल राखि लेलन्हि, की हौ जागेश्वर। ई राज, महराज, महाराजाधिराज सभ पसरल अछि सभ ठाम, सगर मिथिलामे। ई सभ कोनो महराज-तहराज सभ नै छी। अंग्रेजक स्थायी बन्दोबस्तक कुपरिणाम छी। बेगारी खटबै जाइए। ओकर दलाल सभ अछि ई अबवाब आ अमला एजेन्ट सभ, एकटा तंत्र बना लेने अछि। औरंगजेब लै छलै जजिया आ ई जमीन्दार सभ लै छलै चौकीदारी टैक्स। पुरहित, ई खाली ब्राह्मणेटामे किए होइए, आ जे से छै तखन ओ अछोपक घरमे पुरहिती करै लेल किए नै जाइए। कबिराहा मठ, गुरू गोसाँइ। कबीरमठ, लक्ष्मीपुर बगीचा, रोसड़ामे सेहो उच्च वर्णक लोक महन्थीपर कब्जा कऽ लेलन्हि। कृष्णकारखदास कबीरमठ, लक्ष्मीपुर बगीचा, रोसड़ाक महन्थीपर उच्च वर्गक कब्जाक विरोध केलन्हि। ओ निम्न जातिक रहथि आ वचनवंशीय आचार्य गद्दी, महादेव मठ, रोसड़ाक स्थापना केलन्हि। सुनै छिऐ कबीर साहेब अपने प्रगट भेल छला आ कृष्णकारिखदासकेँ दीक्षित केने रहथि। दुसाधक अप्पन पुरहित सभ होइते छलै। मिथिलामे सत शूद्रकेँ सोलकन्ह आ असत् शूद्रकेँ अछोप कहल जाइए, मुसलमानमे सेहो अछोप होइ छै जकरा अरजल कहल जाइ छै। आब अछोपकेँ छोड़ू शोल्कन्हक घरमे सेहो अपन-अपन पुरहित हेबऽ लगलै जे बियाह दानसँ लऽ कऽ सभ संस्कार कराबैए। हाइ रे जागेश्वर.. … आ हाइ रे मुखदेव। मुदा जागेश्वरकेँ तइ लेल कतेक गोटेसँ भतबरी भऽ गेलै। मुदा ओ की ककरो टेरै छल। अरे की होइ छै भाग्य, किछु नै, मात्र आलस्य। आ जाति की होइ छै? काजक बखरा? तखन फेर शोलकन्ह आ अछोप की? तखन ले, आब सभ जातिमे पुरहित भऽ गेलौ। ले आब! हाइ रे जागेश्वर। मुखदेव रामक आँखि नोरा जाइ छन्हि। मंत्रमे हमरा सभकेँ “ओम” नै पढ़ेबह तँ लऽ लैह, तोरासँ पुरहिती कियो करेबे नै करतौ। सत्यनारायण पूजामे भूजल मिठगर आँटा नै लेबऽ देबहक, केराक प्रसाद लेबऽ तँ लैह, आब तोरा कियो पुरहितमे रखबे नै करतह। किछु अधला नै भऽ जाए। पुरहित ब्राह्मण नै भेने किछु अधला नै भऽ जाए। की अधला हेतै? दू चारि गोटे हिम्मति केलक तँ आब सभ कियो बुझि गेल जे किछु अधला नै होइ छै। सही मंत्र कियो पढ़ाबै, पढ़निहारक सहायता लेल पुरहित छै, पुरहित पूजा नै करैए, करबाबैए। रघुवरन आब किछु बाजऽ लागल अछि। कोनो कॉमरेड आबै छै जेलमे ओकरासँ भेँट करै लेल। रघुवरन आब किछु बुझऽ लागल अछि। पूछऽ लागल अछि। राज दरभंगा आ राज सूर्यपुरा ई दुनू जमीन्दार किसानकेँ ठकऽ चाहै छला, कागजपर दसखत कराबऽ चाहै छला, जकरा बदला अंग्रेज हुनका सभकेँ शोषणक अधिकार दऽ दैतन्हि। अंग्रेजक बिहार सरकार जमीन्दार सभकेँ आदेश देलकै जे टैक्स अगिला पन्द्रह बर्ख धरि नै बढ़ाओल जाए। मुदा दरभंगाक जमीन्दार काश्तकारकेँ जमीनसँ बेदखली करब प्रारम्भ कऽ देलक। बड़बरिया रॉय, जमीन्दारक अमला एजेन्ट, बिना रसीदक बकाश्त जमीन दैत रहथि, जे जखन मोन होइन्ह ओकरा सभकेँ बेदखल कऽ दैथि। मुदा जमीन-आपसी आन्दोलनक शुरुआत जागेश्वर केनहिये छल, मुदा ओ आगाँ बढ़ितै ओइसँ पहिनहिये.. एलै १९४२ क अगस्त क्रान्ति। मुखदेव राम आ जागेश्वर जेल चलि गेला.. मुदा ओ क्रान्ति दुआरे आकि पीअर बच्चाक राधामोहन रायक इनारसँ कैन ओसूलबाक दुआरे…। बारूद रहबे करन्हि हिनका सभ लग। घूमि-घूमि कऽ एकट्ठा केने रहथि। गढ़ नारिकेलक मुखदेव आ जागेश्वर, मधेपुरक कुञ्जन, तारसरायक चेथरू, बहेरीक मुसाइ, बिरौलक ढिनाइ, दलसिंहसरायक भत्तू, ताजपुरक पिचकुन, बेनीपट्टीक छुतहरू आ मेंहथक घोंघाइ आ धनेसर। जटमलपुरक लचका पुल उड़ि गेल। पंडौलक तार काटि देल गेल। नौताल आ धनहरक पुला सेहो बारूदसँ उड़ा देल गेल। फुलपरास थानाक दरोगाकेँ उड़ा देल गेल। आ फेर गढ़ नारिकेलक इनार… बारुद कतऽ सँ आएल.. पुछै छलै अंग्रेज.. मुखदेव रामक अलाबे आर के के संगी छौ जागेसर.. मुदा ने जागेसरे आ ने मुखदेवे ककरो नाम बतेलकै। जेलर मुखदेव आ जागेश्वरकेँ एकटा टॉर्चर रूममे आनै छल। झक्की अंग्रेज। मिनट-मिनटपर आनै छल आ छोड़ै छल। आ जहिया दुनू गोटे टॉर्चर रूममे आनल जाइ छला दुनू गोटे बुझि जाइ छला जे आइ फेर अंगरेजबा आएत आ खाल खीचत। बारूद.. आन्दोलन.. संगठन.. सूचना.. कतेक रास सूचना चाही अंग्रेजकेँ.. कोना तोड़त डाँर.. आन्दोलनक। मुदा तोड़बाक जरूरति की छै, छहोछित भेले छै समाज, नै तँ पीअर बच्चा ई करितए? “असल बदमास ई अछि।”- जागेश्वर दिस आंगुर देखबैए ओ अंग्रेज। ओइ दिन फेर दुनू गोटेकेँ ओधबाध कऽ देलकै, अंग्रेज आ ओकर हिन्दुस्तानी सिपहिया। मुखदेवकेँ घिसिया कऽ टॉर्चर रूमसँ बाहर कऽ देलकै। मुदा जागेश्वर ओतै रहए। मुखदेव बाट ताकैत रहथि, आससँ.. तकिते छथि बाट। आइयो लगै छन्हि जे जागेश्वर आबि रहल अछि, बजा रहल छन्हि। मुदा… मारि कऽ खतम कऽ देलकै जागेश्वरकेँ.. बेचारोकेँ ने कोनो भाइ रहन्हि ने बहिन, आ ने बाले-बच्चा भेल रहन्हि। अखन तँ बियाह भेले रहै.. कुसुमावती.. जागेश्वरकेँ अंग्रेज प्रतारणा दऽ मारि देलकै अही बाँकीपुर जेलमे.. आ घेंघी बेचारी.. कोना हएत घेंघी.. “घेंघी? घेंघी के मुखदेव?”- बिच्चेमे पुछि दै छै रुद्रमति। “घेंघीये ने कहै छलिऐ कुसुमावतीकेँ हम सभ।”–- कहै छथि मुखदेव। मुखदेवो राम कमाले छथि। फेर मुस्की दऽ रहल छथि। कोनो दुख मोन पड़लापर चोट्टे कोनो सुखितगर खिस्सा हुनका मोन पड़ि जाइ छन्हि। कोना मोन पड़ि जाइ छन्हि से नै जानि। घनानन्द, हलधर, नोने, दौलति जहाँ, भट्ट भूषण, रुद्रमति ई सभ मुखदेवकेँ घेर कऽ बैसि जाइ छथि। आ रघुवरन सेहो अछि.. आ मुखदेव राम शुरू.. मौना पञ्चमी- श्रावन मास कृष्णपक्ष पञ्चमीकेँ साँपक माए बिसहराक बर्थडे मनाएल जाइत अछि। “बर्थडे?”- दौलतिजहाँ टीपै छथि। हलधर टीप देलन्हि- “की बुझै छिऐ मुखदेवकेँ, अंग्रेजक जेलमे रहैए.. नै नै, आब तँ भारत स्वतंत्र भऽ गेल, अंग्रेजक नै, स्वतंत्र भारतक जेल अछि ई।” भट्ट भूषण बाजै छथि- “बड्ड टोका-टाकी करै जाइ छह। चेन-मेनसँ सुनै ने जाइ जाह खिस्सा।” मुखदेव राम शुरू.. मधुश्रावणीमे विषहरा गीत.. मिथिलाक ब्राह्मण-कायस्थ नवविवाहिताक बियाहक प्रथम वर्षक मधुश्रावणीक ई प्रथम दिन, धुरखुरपर गोबरक नाग-नागिनपर सिन्दूर-पिठार लगाएल जाएत। जागेश्वरक बियाहक बाद पुरबा-पछबा बान्हने रहथि मुखदेव, “की बन्है छी?”- पुछथि मुखदेव। “पुरबा-पछबा”- कहै छलथि घेंघी। पता नै कोन बिध-बाध सभ जागेश्वर सभमे होइ छै, ओइसँ कोनो फाएदा हेबो करतै आकि नै। मुदा आब कोनो चिन्ता नै। पुरबा-पछबा बन्हा गेलै। बियाहक किछु दिनुका बादे बन्हेलै तैयो कोनो बात नै। -किए? कोनो अन्तर छै बिध-बाधमे की? -नै। मोटा मोटी वएह मटिकोर-कुमरम, घीढारी आ पाँच सूप पानि साँझमे कनियाँपर धऽ देनाइ। हे पाइन-ताइन कनियाँपर नै धऽ दिहक। मटिकोर, बिलौकी, हँ ई सभ उपनयनमे हमरा सभकेँ भऽ जाइए। उपनयन मूड़नमे दिन तकेलाक बाद खा-पी कऽ छऽ-सात दिनक खेलौना सोहर गाएल जाइए। उपनयनमे मड़बापर खेलौना, दसमासी सोहर गाबि कऽ उल्लास मनाएल जाइए। उपनयन भेलाक बाद भोरमे चारि बजेसँ पराती गाएल जाइए जे चारि दिन चलैए, रातिम धरि। रातिम दिन बिलौकी मांगल जाइ छै। बेटीक बियाह, बेटाक बियाह आ बेटाक द्विरागमनमे चारि-चारि दिन पराती भोरमे गाएल जाइए, कोबरक बाद सेहो पराती गाएल जाइए, उपनयनमे खाली पराती आ तकर बाद भजन गाएल जाइए। टोलक ननदि-भाउजमे उतराचौड़ी, मड़बापर स्त्रीगणकेँ पान-सुपारी देल जाइए: नै छलौ परतर छिनरिया किए बजेलेँ गे टुटले पटिया बैसक देलेँ किए देलेँ हकार गै.. टोलक ननदि-भाउजमे उतराचौड़ी होइते रहैए, से ओ उपनयन रहए आकि सामा: सामा खेलऽ गेलौं फलना भैया आंगन हे आहे कनियाँ भउजो लेलनि लुलुआए एतेक वचनियाँ जे सुनलनि भैया भैया मरय लगलनि तिरबा घुमाए बहिनिया मोरा पाहुन हे। परिछनि, ओठंगर कुटनाइ आ लावा छिरियेनाइ, सभ एक्के रङ। हँ घटक तँ रहैए मुदा माइनजन आ छड़ीदार हमरा सभमे नै रहैए। मुदा पीअर बच्चा तँ अछिये असगरे माइनजनो आ छड़ीदारो।- कहै छलथि जागेश्वर। वर मौड़ वा पाग पहिरने लोकनियाँ संग बैसल, फेर परिछनिमे केराक बीर आ आमबीर चिन्हाएल जाइए, जँ वरकेँ मिर्गी हेतै तँ काछुक खपलोइयाक दीप देखिते ओकर बेमारी बियाहक वेदीपर जाइक पहिनहिये देखार भऽ जेतै। फेर रेहीसँ वरक गाल सेदल जाइए। घेंघीक मधुश्रावणी मोन पड़ि जाइ छन्हि मुखदेवकेँ। जागेश्वर तँ जहलेमे मरि गेल, घेंघीकेँ ई समाचार भेटबो केलै आकि नै। नै जानि ई जेल कटत की काटत। पञ्चमीक माटिक थुम्हा घरमे आनि कऽ राखै छी। साँप कटलापर झाड़ा-फूकी लेल। गोसाउनिकेँ खीर-घोरजाउड़क पातरि। बिसहराकेँ नेबो, झौआ, नीमक पातरि। गोसाउनिक, गौरी आ बिसहराक गीत। पूजा-पाठक बाद पाँच बीनी फकड़ा-कवित्त, तीन-तीन बेर सुनलाक बाद कथा। देशक हाल। स्वतंत्र देशक हाल। यएह बिख झाड़ैबला फकड़ा सभसँ जँ भऽ जइतै देशक कल्याण! घेंघीक कल्याण तँ भऽ नै सकलै.. आ.. पाँचो बहिन बिसहरा लग जाइ जाउ, बचल खीर-घोड़जाउड़ मृतकेँ चटाउ। खिस्सामे मृतक जिबिये जाइ छै, मुदा जागेश्वर नै जीअत। मरड़ए नाम पड़लन्हि, जीब गेला तेँ। “मरड़ तँ नै छै हौ। देशक नवका नेता सभ बनि गेल छै मरड़।” “साँपक पोआ सभ।”- घनानन्द आ हलधर संगे बाजि उठै छथि। व्यापारी चन्नू-चन्द्रधरक बच्चा लखन्दर पहाड़पर कोठामे बिज्जी आ बिढ़नीक पहराक बीच कान्याँ बिहुलासँ विवाह केलक। मुखदेव की छथि, बिज्जी आकि बिढ़नी.. बिज्जी आ बिढ़नी तँ ई जेलर आ प्रशासन अछि.. ऐ जेलक पहरेदार सभ तँ खिस्सा सुनि रहल छथि… से..। तेँ ने लगेलन्हि.. आ प्रशासन। मुदा कोहबरमे साँप ओकरा डसि लेलकै। अहू जेलमे तँ नै छै कोनो डसैबला जन्तु हौ। एह, मिथिलाक मुखदेवराम कतेक मीठ बाजै छै। तमसैलोमे मीठ बाजै छै। आगाँ सुनऽ। बिहुला लहाशकेँ केराक थम्हपर राखि गंगाधारमे चलि गेली आ ओ हुनका उनटा प्रयाग पहुँचा देलकन्हि। नै रौ, प्रयागक उत्तर दिससँ आएल हेती, खिस्सा मिथिलामे सुनल जाइ छै तइसँ की। ओतऽ एकटा धोबिनकेँ ओ देखलक। ओ बच्चाकेँ मारि नुआसँ झाँपि देलक आ कपड़ा खिचलाक बाद ओकरा जिआ देलक। बिहुला इन्द्रक दरबार गेलथि, बिसहराक पएर पकड़ि कहलन्हि जे हुनकर पति आ छबो भैंसुर जीबि जेता तखन ओ बिसहरा पूजा करबो करती आ तकर प्रचार सेहो करती। आब बुझलिऐ, ई सभ भेल बिसहराक पूजा नै केलासँ। प्रचार तँ सभकेँ चाही बाबू। प्रचारे भऽ रहल छै जे हम करेलियौ स्वतंत्र, आन सभ जे लड़ल, से छल फूसि। सभ जीबि गेल? हँ हौ, खिस्सामे सभ जीबिये जाइ छै। सत्तोमे जीतै सभ, मुदा देश असलमे स्वतंत्र हेतै तखन ने। दोसर पल्लव खढ़क घर। धनिकहा लोकक घर। मुदा खढ़मे साँप सहसह करै छै!! कोनो चीज नीक लागल आ ओ जँ नै भेटि सकए तँ कहि दियौ जे धुर, ओइमे बुइया छै, सभ नीक आ अलभ्य चीजमे बुइया छै। गढ़ नारिकेलक चारू दिस साँपक साम्राज्य छै। मुदा पोसुआ साँप सभ। साँप कटलासँ मरबाक कोनो घटना मोन नै छै मुखदेवकेँ। मुदा सुनल खिस्सा सभ छै। घरपर लोकक आएब, दूरेसँ सोर करब। अखनो ओ अबाज सभ मुखदेवक कानमे अबैत रहै छन्हि। स्मृतिमे अबै छन्हि बहुत रास घटना, दृश्य तँ कखनो काल देखाइ छन्हि मुदा अबाज बेशी काल सुना पड़ै छन्हि। भोजक एकाधटा स्मृति। भोजक ऐँठ पात बिछबाक स्मृति। बादमे तँ लोक पातपर किछु छोड़नाइ बन्ने कऽ देलकै, अपने समेट कऽ लऽ जाए लगलै। बान्हपर गोलिआएल लोक। भोजक तोड़ खतम हेबाक बाट जोहैत। ओइ एकाधटा स्मृतिमे मुखदेव सेहो छल। अहगरसँ पड़सैत जागेश्वर, बान्ह परका पतबिच्छाकेँ किए एते-एते पड़सै छेँ रौ जागेश्वर… चलू पड़सऽ दियौ, बच्चा छै। मुखदेव आ जागेश्वर दुनू छोटे छल। पाँच बर्खक हएत प्रायः। समाजक एक लोकक दोसर लोकसँ सरोकार देखार होइ छलै ऐ भोज सभमे। पात बिछै लेल दोसर टोलक लोकक संग छलै सरोकार। खुशीक भोज आ मृत्युक भोज सेहो। मृत्यु। मृत्यु कोनो तेहेन अनचिन्हार गप नै छलै। मनुक्खक मृत्यु बँसबिट्टीक अन्हार छाहक ओइपारक लोकक लेल बड़का आडम्बर छलै। मुदा ऐ पारक लोक लेल ओ सामान्य गप छलै। ई माल-जाल, गाछ-बृच्छ, चिड़ै-चुनमुनी आ माछ-काछुक मृत्यु सन आ ओइ सभसँ जुड़ल छलै। मनुक्खक मृत्युमे कननाइ होइ छलै, मुदा ओकर क्षतिपूर्ति केना हएत सेहो महत्वपूर्ण रहै। ऐ जेलमे सेहो किछु गोटे बँसबिट्टीक अन्हार छाहक ऐपारक लोक छथि। रुद्रमतिक बच्चा पानिक हौदमे खसि गेलै। मरि गेलै, डूमि कऽ मरि गेलै। ओ कानलि, मुदा काज करिते रहलि। बँसबिट्टीक अन्हार छाहक ऐपारक लोक जकाँ। खरड़ासँ दरबज्जा खरड़थि मुखदेव आ बाढ़नि सँ अंगना बहारथि ममतोड़। खरड़ासँ खरड़नाइयो एकटा काजे छल। आँकड़-पाथर उड़ै। सम्हारि कऽ। जागेश्वर छलै। आ भोरे-भोर खरड़ा खरड़ै काल जागेश्वरसँ भेँट हेमऽ लगलै। खरड़ा खरड़नाइ छोड़ि कखनो काल खेल-धूप सेहो होइ छलै। बँसबिट्टीक अन्हार छाहक ऐपारक आ ओइपारक लोकक बीचमे अवैयक्तिक सम्बन्ध रहबाक चाही। बिध-बाध धरि। मुदा जागेश्वर से नै मानै छलै, बच्चा छै, पैघ होइत जेतै तँ अपने सभटा गप बूझि जेतै। मुदा मुखदेवकेँ बुझल भऽ गेल छलै। ई जे भोरमे खेलाइ लेल अबैए से देनहार अछि, आ मुखदेव अछि मंगनिहार, बान्ह परका पतबिच्छा। मुदा से खेलाइ कालमे बिसरा जाइ छलै, बच्चाक स्मृति ओनाहियो बड्ड कमजोर होइ छै। मुदा जँ बच्चाक स्मृति कमजोर होइ छै तँ अखन मुखदेवकेँ ओ सभ गप कोना मोन छै? मुदा आस्ते-आस्ते पोखरि आ आमक गाछी जे बँसबिट्टीक अन्हार छाहक ओइपारक बौस्त छलै, ओत्तौ मुखदेव जाए लागल। जागेश्वर ओकरा ओइपार लऽ जाए लगलै। खेला-धूपी बड्ड सनगर चीज छिऐ, कतेक खेल जे ऐपारक लोककेँ आबै छै से ओइपारक लोककेँ नै आबै छलै। आ तेँ मुखदेव ओइपारक दुनियाँमे पएर राखऽ लागल, दुपहरियामे जखन कलममे दूरसँ दुपहरिया नाचै छलै, स्पष्ट, तखन मुखदेव ओइपार प्रवेश करै छल। अजीबे नाचै छलै दुपहरिया, पहिने तँ ओकरा होइ छलै जे ई कोनो करामात छी, आब बुझेलै जे हवा गरम भऽ कऽ ऊपर जाइ छलै आ उपरका नीचाँ आबै छलै, कोनो बुइया आकि डाइनक काज ई नै छलै। तेसर कल्लोल कतेक जना हरिवासर ठानल/ भात बहुत कै सपना पहिल पल्लव जागेश्वर चलि गेल.. सर्वगुणी रहए.. मुदा ओकरा तँ मारल गेल। नै तँ ओहो होइतए दीर्घायु.. सर्वगुणी दीर्घायु!! .... सर्वगुणीकेँ अल्पायु किए बना देल जाइ छै? परिवर्तन रोकबा लेल तँ नै! कशप मुनिक एक हजार साँप आ देशक एतबे नेता सभ, करीब-करीब। कशप मुनि विष झारबाक मन्त्र बनेलन्हि। बिसहरा बनेलन्हि। सएह भेल मनसा। ओ कैलास आ पुष्कर गेलि। बूढ़सँ हुनकर विवाह भेल, तइसँ आस्तीक पुत्र जन्म लेलक। राजा जनमेजयक सर्प-यज्ञमे जरल सर्पकेँ आस्तीक बचा लेलक। बिसहराक पूजा पसीझक डारिपर होइए। कोन पसीझ, जकर रस पोखरिमे मे धऽ देलासँ सभटा माँछ मरि जाइ छै। हँ हौ, ओकर पात छातीपर गर्म कऽ कए धऽ देलापर खोंखी सेहो मेटा जाइ छै। आब नव राजा सभक पूजा कतऽ हएत? श्रुतकीर्ति राजाकेँ भगवती कहलन्हि जे जँ सर्वगुणी बेटा चाही तँ ओ सोलह वर्ष मात्र लेल आएत आ जँ महामूर्ख बेटा चाही तँ ओ दीर्घायु भऽ कऽ आएत। मुदा भेटत कोनो एक्केटा। जागेश्वर चलि गेल.. सर्वगुणी रहए.. ! श्रुतकीर्ति सर्वगुणी मंगलन्हि। ओकर नाम चिरायु राखल गेल। अल्पायुक नाम चिरायु! मंगलागौरी गौरकेँ तेना गोहरने रहथि जे जइ वरक माथपर हुनकर हाथक अक्षत पड़त से दीर्घायु भऽ जाएत। अंग्रेज जेना गोहरने रहथि विजयकेँ, हारियो कऽ जीति जाइत रहथि। आ आब नवका अंग्रेज सभ.. सिन्दूर-दान भेल। चिरायु आ मंगलागौरी पति-पत्नी बनि जाइ गेला। कोहबरमे फेर गहुमन साँप डसबा लेल आएल। गहुमन सोझाँ दूध देखि ओकरा पीबि पुरहरमे पैसि गेल। मंगलागौरी पुरहरक मुँह बन्न कऽ देलनि। पुरहरिक साँप रत्नक हार बनि गेल, मंगलागौरी गरामे से पहीरि लेलन्हि। बाह… महादेव बिख घोँटि गेला, नील रंगक कण्ठ बनि गेलन्हि, ओ नीलकण्ठ आब चिड़ै बनि मिथिलाक बच्चाकेँ पहिल विद्या दै छथि, मांगै तँ सभ अछिये, पता नै ओ दै छथि आकि नै। मंगलागौरी गरामे रत्नक हार बनल साँप पहीरि लेलन्हि। आब के पहिरत ई रत्नमाला आ के घोँटत ई बिख। स्वतंत्र जँ सही अर्थे भऽ जाए ई पृथ्वी.. मुदा घेंघीक पुरहरिक साँप तँ हियासि कऽ जागेश्वरकेँ काटि लेलकै। सेहो ओइ जागेश्वरकेँ, सर्वगुणी… घड़ी पाबनि होइ छलै जागेश्वरक घरमे। भगवतीक पातरि, भगवती घरसँ नवेद बाहर नै जाइ छलै। ओही भगवती घरमे केरा पात सहित ऐँठ-कूइठ गारि दै छलथि। सभ खिस्सो करन्हि- घड़ी पाबनि ब्राह्मणक घरमे? ई तँ शोलकन्हक घरक पाबनि छिऐ। मुदा जागेश्वरक घरमे तँ ई कतेक पुरखासँ होइत आबि रहल छै, नाम छिऐ भगवती घर मुदा स्थान छियन्हि धर्मराज बाबाक। घड़ी पावनि, साओन मास, मधुश्रावणीक बाद जहिया बुध पड़त, तहिया। कतेक ठाम अषाढ़मे घड़ी पावनि होइ छै। नव बर्तन, नव चुल्हामे खीर, दालि भरल पूड़ी, मोतीचूड़क लड्डू। आँचर, आ भगवती घरमे भगवतीक टांगल मौड़, कोठियाक मालिक बनाएल धर्मराजक गोल मड़रानी, मड़रानीपरसँ जनौ टांगल। चौदहो देवान भगवती घरमे। गढ़ नारिकेलमे चौदहो देवानक वास। चौदहटा खीर-पूड़ीक पातरि, लड्डू आ खेरही वा केराओक दालिक दालिपूरीसँ झाँपल। फेर भगवती घर बन्न कऽ देल जाइ छै। फेर थोपड़ी पारि कऽ खोलल जाइ छै। बाले-बच्चे प्रसाद खा भगवती घरमे माटि कोड़ि कऽ गाड़ि देल जाइ छै। आंगनमे सेहो एकटा पूजा होइ छै। खाधि खूनि कऽ, ढेका खोलि कऽ बालापीरक पूजा खीर-पूरी राखि, धूप-दीप देखा कऽ होइ छै आ माटिकेँ फेर नीप देल जाइ छै। बालापीर, बिसहरा, काली, दुर्गा.. काली, दुर्गा, महामाया.. भगवतीक सात बहिन… गहबर, धर्मराजक सेवा.. काली.. नरसिंह.. जलपा.. सेवक.. कालीक सेवक, भगवती। दुर्गा आ भैरव, भैरव आ हनुमानक गीत। चौदहो देवान, माँ भगवती, बाबा धर्मराज। भगवती, धर्मराज आ ब्राह्मणक गीत। रुद्रपुरक गहबर, काली.. शम्भू झा भगत.. सुरेश झा डेलवाह.. डालामे अक्षत-फूल लऽ कऽ डेलवाह भगताकेँ सोझ रस्तापर आनै छै.. कहै छै.. भगता.. भगत-भाव खेलाइ छै, लोकक की तागति जे ओकरा लग किछु बाजत, तखन डेलवाह बजै छै.. हे ओइ स्त्रीक घरमे बच्चा बड्ड दुखित छै.. आ भगता ओकर उपाए बतबै छै। गरीब गुरबा पहिनहियो मिथिलासँ बाहर जाइ छलए। गरीब गुरबा आइयो मिथिलासँ बाहर जाइए। ओतौ मैथिली बाजै छलए, आइयो बाजैए आ ओतुक्का भाषामे मैथिली शब्द फेंटैए। घड़ी पाबनि सेहो किछु एहने सन.. फेँटुआ.. एतुक्का धार सेहो.. फेँटुआ... पूर्णियाँमे बहै छली कोसी। ब्रह्मपुत्रमे मिलि जाइ छली। कोसी पहिने ब्रह्मपुत्रमे मिलै छली आ ओकर सम्मिलित हिलकोर गंगासँ पद्मा धार बहार कऽ देलकै। नै तँ मात्र हुगलीटा पहिने रहै। आ से भेलाक बाद फेर ओ आपस फीरि गेली? कोसी पहिने ब्रह्मपुत्रमे मिलैत हेती आकि नै, से की जानी? मुदा पूर्णियाँक पूबमे तँ बहिते छली। फिरोज तुगलक बंगालसँ घुरती काल कुरसेला लग कोसी पार करैले सोचलथि। हाजी शम्सुद्दीन ऐपार रहथि। हाजीसँ हाजीपुर आ शम्सुद्दीनसँ समस्तीपुर, ई दूटा नग्र ओ बसेने रहथि। हाजी शम्सुद्दीनक सेना ऐपार तैयार रहए। मुदा फिरोज कोसी नै टपि सकला आ उत्तर दिस ओतऽ धरि पहुँचि गेला जेतऽ पहाड़सँ जमीनपर कोसी खसैए। ओतऽ कोसी पार केलन्हि फिरोज आ ई समाचार सुनिते शम्सुद्दीनक सेना भागि गेल। टोडरमल तँ धारक नैहर बला इलाका जे आजुक खगड़ियाक आसपासक जमीन अछि, मे पानिये पानि देखि कऽ नापी नै केलन्हि आ राजस्व ओसूलीसँ ऐ इलाकाकेँ बकसि देलन्हि। मुदा आब बकसैबला कियो नै। जागेश्वर आ मुखदेवक ऐ इलाका सभक यात्राक समाप्ति १९४२ ई. मे भऽ गेल। बाढ़िक बाद अकाल अबै छै। फतूरीलालक फसली बर्ख १२८१ साल १८७३-७४ ई. सन क अकाली कविता रटल छन्हि मुखदेवकेँ। साल एकासिक वर्णन सुनू/ चौदिस पड़ल अकाल भेल बरिसात खिन्न ऐ सालक/ कहाँ लगि वरनौँ हाल रोहिणि आदि थीक बरिसातक/ जेहिँ एला तेहिँ गेला म्रिगिसिरा मन पुरल मनोरथ/ दै झीसा किछु गेला अरदड़ा आडम्बर भारी/ गरजत हइ चहु ओर पुख रुख राखल धरती केर/ भेल बरखा केर ओर पुनर्वसु थिक बड़ पुनीता/ ओहो बड़ा कसरेस बिआ बिड़ारक जे किछु उपटल/ धनि बरिसल असरेस मघा भेल मंगाहिआ कल्लर/ जगभरि के नै जान पुरबा पूर पछ नै राखल/ ककरा करब बखान उत्तरा आइ जाए घर बैसल/ सपतौं लै नै बून हथिआ शृंग मुँड़ दै मूनल/ तनिकौं लागल घून चितरा चित मित नै राखल/ ओहो भेल डाकू धाती नाक रंगौलन्हि सभै नछत्तर/ दोम नुकौलन्हि खाती जोतिष पढ़ि-पढ़ि जे जन ऐलाह/ साधि-साधि भूगोल रेखागणित बीजसौँ ओआकिफ/ तनि कौँ कच्ची बोल श्रीराम कृपागति ओहो ने जानथि/ जाइ कृपा सभ काज पानिक प्रश्न कबौं जौं पुछियन्हि/ सेहो कहैत होइन्हि लाज जेइखन नदी नाल नै भरलै/ तेइखन रौदी सरती बिना जले जग किछु नै उपजल/ दगध भेल छथि धरती ते नर रौदीक आगम बूझल/ जे छल कृषि किसान दैव बेपच्छ पच्छ नै राखल/ जड़ि कटौलक धान कोदो मड़ुआ एको ने उपजल/ नै उपजल किछु साम गम्भड़ि गद्दरि खेते सुखाएल/ भेल विधाता वाम मर्तभुवनमे के कर रच्छा/ कहाँ जाइ केँ भागी सुखल पताल हाल नै ओतौ/ सगरो लागल आगि धृक जीवन ओइ नृपति इन्द्रकेँ/ जे रोकल गहि पानि जीवा-जन्तु विकल पुहमीमे/ ताकेँ हो नै आनि रवी-राय एको नै उपजल/ ने खेढ़ी औ चीन घर-घर सोच करै नर-नारी/ दुरदिन भेल अब बीन धनिक लोक सभ मनहि मगन छथि/ राखथि बहुतो ढेरि हसोथि रुपैया घर कै राखथि/ महगी भेल अब सेर केओ कुरथी खेत मासु बेसाहल/ जइ कौड़ि छल अपना कतेक जना हरिवासर ठानल/ भात बहुत कै सपना कतेक जना मिलि जनेर बेसाहल/ निरधन बैसल ताकइ भेल धनन्तिरि दूइ फसिल जग/ राहड़ि आओर मकइ काल पड़ल तिरहुतिमे भारी/ तेँ ई बहि गेल हावा घर-घर मगन करै नर-नारी/ फाँकि मकइ केर लावा मालिक और महाजन सभकेँ/ घर-घर ढेरी अन्न लोक बुझाओन ओहो तकै छथि/ मूँह गरीबक सन समै देखि बनियाँ सभ सनकल/ डरे लगौलक टट्टी सुन्न दोकान सहरमे परि गेल/ सुन्न भेल सभ चट्टी सूखल गात बात भौ लटपट/ कतेक बात अब सहना नर नारी सभ सान तेआगल/ बिकरी भेल अब गहना मँगटीका खूटी औ तड़की/ नकमुन्नी नै नाक कटसरि बिछिआ औ झिमझिमिआँ/ बाजूबन्द औ बाक चन्द्रहार, हैकल औ सिकड़ी/ और घमौरिक दाना सूति, नवग्रह औ पचखँड़ी/ लशुनी भेल निदाना तापर दर्बजात नै बचले/ करम भेल निखट्ट तमघैल, अढ़ैआ औ पिकदानी/ नै तसला औ तट्टू बाटी, बट्टा औ पनबट्टा/ भोजन करैक थारी माधव सीहि सहित सोबरना/ नै बचले घर झाड़ी धन संपति घर किछु नै बचले/ सभटा पड़ि गेल बंधक तैओ भूख छुटल नै ककरो/ एहन पेट भेल खंधक दैब अंश अबतरल कम्पनी/ जा पर राम सहाए मिथिलापुर बूड़न जब लागय/ से सुनि पहुँचल धाए खरिद अनाज जहाजहिँ बोझल/ भरती करि करि बोरा सदर तिलंगा ओआ पर भरती/ और ओलाइति गोरा हाजीपुरमे लाख हजारम/ कै लाखन हइ पटना बाजितपुर सुलतानपुर गोला/ नै जानत हौँ केतना गाड़ी, बैल, छकड़, ऊँट बिहारे/ उबहत हइ सभ दाना मिसर कन्हैआ केँ पोखरन मे/ पहिलुक अड़ी ठेकाना श्री लक्ष्मीश्वर सिंह नृपति/ महाराज मिथिलेश अचल राज दड़िभंगा/ श्रीपति हरहिं कलेश गाड़ी बैल लाखन हजारन/ ताकेँ परे घड़ेर पहिलुक गोला मधुबन, भौड़ा/ जफरा और अड़ेर बेनीपट्टी, औ पचमहला/ कुम्हरौल औ कमतौल हरिहरपुर, पिड़ारुछ बरनौं/ कारज केतेकाँ बरिऔल बारि पोखरि, बिरसायर बरनौं/ पण्डौल को नै जान नवहद, सरिसो ओ भटपुरा, ता सोँ दक्षिण उजान झंझारपुर,महरैल, कन्हौली/ मधेपुर हइ खास बेनीपुर, कमान, नरैहिओ/ बरनौं फूलपरास झमना हइ जगजानित जगमे/ महथा और बछौर दुहबी औ महिनाथपुर/ और जैनगर तक हइ दौर बलदेबपुर औ ढंगा बरनौं/ मिरजापुर लघु हाट सीबीपटी औ कपसीआ/ सदर गोला सौराठ गुरबाकेँ परबरसी हाकिम/ कर तिरहुतमे आके नै तो मरते कत नर नारी/ बाले बचे सुखा के कत मुरदा गरदा मै मिलते/ असंख जीव चल जाता सर समधी केँ संभा ने लम्भन/ नै बचते जलदाता सभकेँ सभ उपछै भै गेल/ धुर पोखर औ सड़क रहि गेल ब्राह्मण सोती पण्डित/ कायथ पछिमा ठाकुर फरक केओ ओरसिअर नाम लिखाओल/ केओ मोहर्रिर भेँट धर्म्मकार्यमे लुटथि रुपैआ/ तेँ भेल सभ केर भेँट केओ जमानत दैकेँ बचला/ जिनका अमला नेही ककरो मारि केँत पिठि तोड़ैन्हि/ उतरैन्हि जन्मक ठेही ककरो गारत गात सुखाओल/ बहुतो होअय चलाना मातुपिता घर परिजन रोवय/ बाबू गेला जहलखाना ककरो घर भेल खानातलासी/ भेट मोहर्रिर घोँछ केओ अदालतिमे डिड़िआइ छथि/ ककरो उपरैन्हि मोँछ एतना सुनि हाकिम रिसिआओल/ तेँ लागल जन ठीका नाक रंगौलन्हि सभै मोहर्रिर/ लागल चूनक टीका जोग, बिकौआ, लौकिक वंशक/ किरिआमंत सुकूल गाछी, बाँस, बैल औ महिसि/ जगह कैल भकफूल ताइ रुपैआ सौँ करा गजर/ लै कोरट सौँ रीन तेँ कारन बहुतो घर झगड़ा/ भाइ भतीजा भीन आए लाट बहादुर/ औ दड़िभंगा धाम बाबू औ बबुआन सहित मिलि/ कीन्ह कुमैटी खान .............. एह सभ संग बैठि कै/ जाय कुमैटी भेल अजब कार सरकार के/ तिरहुत पहुँचल रेल बाजितपुरसँ सड़क निकालै/ आये दौड़िह दौड़ी हहेया गंडक पुल बन्हाए/ आए चौरही चौरी धर्म्मधीर, बलबीर, कम्पनी/ जानत हइ जगदीशन लछमी सागर के पोखरिमे/ ताहि कीन्ह इसटीसन ………….. धन्य धन्य अंगरेज बहादुर/ सभकेँ जूटल गात गरिब, गनी, गुरबा, करु जै, जै/ ब्राह्मण देत असीस श्री रघुनाथ बढ़ै बदसाही/ गदी लाख बरीस फतुर लाल कवि बरनत हैँ/ एह रौदी के हाल गौरमिंट गौरनल बहादुर/ तिरहुति राखहिँ बहाल दोसर पल्लव गीत खूब गाबैए मुखदेव, से घण्टाक घण्टा। -सभ एहिना गाबै छऽ तोरा गाममे हौ। -गढ़ नारिकेलक लोक सभ इलाकामे गीत आ खिस्सा कहबैकामे नामी छै। केहेन हेतै गढ़ नारिकेल! सोचऽ लागै छलि रुद्रमति। पीअर बच्चा, गामक जमीन्दार। एकटा जमीन्दारी बान्ह रहै गाममे। ओतेक मजगूत नै रहै। बाढ़ि आबै तँ गह सभसँ पानि बहार भऽ जाइ छलै आ कोनो नोकसानी नै होइ छलै। छोट मोट बाढ़ि-पानि तँ ई बान्ह रोकि दै छलै। मुदा इम्हर पीअर बच्चा ऐ जमीन्दारी बान्हकेँ खूब दढ़ कऽ देलक। ओइ बाढ़िसँ पहिने ई बान्ह दढ़ भऽ गेलै। सत्यनारायण कामत दरभंगाक जमीन्दारक भितुरका छोटका जमीन्दार बरबड़िया रॉयक महौत रहथि। जागेश्वर, मुखदेव, दुखन महतो, बासू चौपाल आ जीवछ मुखिया... बाढ़ि आ अकालसँ लड़बा लेल सत्यनारायण कामतकेँ एकटा प्रस्ताव देलन्हि ई लोकनि, बरबड़िया रॉयकेँ कहबा लेल। ऐ बेरुका बाढ़ि पहिने जकाँ नै अछि। लगैए झझा देत बान्ह। आ तखन बान्ह कतौ ने कतौसँ कटि जाएत। मुदा अप्पन सक्क नै रहत ओइपर। कतौसँ कटि सकैए। बस्तीक सोझाँक बान्हपर बेसी अबरजात रहने ओतऽ बान्ह घिसा गेल अछि, नीच भऽ गेल अछि, कमजोर भऽ गेल अछि। तेँ ओतऽ पहिने झझाएत आ फेर कटत। मुदा बरबड़िया रॉय मुखदेव, दुखन महतो, बासू चौपाल आ जीवछ मुखिया सभकेँ छबड़ा कहथि। ई जागेश्वर ऐ छबड़ा सभक संग थइरमे रहैत अछि। एकरा सभसँ किछु नै हेतै। जमीन्दारी बान्ह काटबाक प्रस्ताव छल। मुदा से किए मानत बरबड़िया रॉय? ओ अपन छोटका जमीन्दार पीअर बच्चासँ पुछलक। पीअर बच्चा तँ बाट ताकिये रहल छल। सत्यनारायण कामत मुँह लटकेने फिर्ता होइ छथि। बाढ़ि लगैए जमीन्दारी बान्हकेँ तोड़ि देत बा झझा देत। झझा देत तखनो तँ बान्ह कटनीसँ टुटबे करत। गाम स्वाहा भऽ जाएत। पीअर बच्चाकेँ की लगै छै, ओकर घर थोड़बे बहतै, ऊँचमे घेराबा दऽ कऽ बन्हाएल छै। बान्ह कटलासँ ओकर जजात बहि जेतै आ तइ लेल लोकक घर बहा देत? गाममे कएक ठाम बैसकी भेल। जागेश्वर आ जीवछ मुखिया, ई दुनू गोटे छथि सभसँ पैघ तैराक। भऽ गेलै फैसला, जागेश्वर आ जीवछ मुखिया यएह दुनू गोटे काटता ई बान्ह! भऽ गेलै फैसला। भरि गाममे गप पसरि गेलै। मुदा पीअर बच्चाकेँ पता नै लगलै, के कहतै। गामक हित पीअर बच्चाक हितसँ मेल नै खाइ छै। राति काटबाक छै। मुखदेव ऐठाम जागेश्वर आ जीवछ राति भरि रहता। यएह फैसला भेल छै। रामदेव भण्डारी दू टा टोकना आनि कऽ राखि दै छथि। यएह फैसला भेल छै। की करै जेबै टोकना यौ- रामदेव पुछै छथि। मुखदेव, जीवछ आ जागेश्वर हँसि कऽ चुप भऽ जाइ छथि। रामदेव बहरा जाइ छथि। जोगिन्दर ठाकुर दूटा छोट-छोट कोदारि आनि कऽ राखि जाइ छथि। अलगे डिजाइनक कोदारि, छोट, नाम धरगर। जोगिन्दर ठाकुर दुनू कोदारि आनि कऽ मुखदेवक घरमे राखि दै छथि, यएह फैसला भेल छै। मुखदेव, जागेश्वर आ जीवछ बड़का बड़का दुनू टोकनामे दू-दू टा भूर कऽ कए राखि देलन्हि। आँखिसँ बाहर देखता तखन ने हेलता। गपशप चलैत रहल। हे सुतै जाइ जाह। भोरे निकलबाक अछि। मुदा किए ककरो निन्न हेतै। भरि राति गप सरक्का। कने शंका सेहो। मुदा काज तँ करबाके छै, नै तँ बड्ड हरजा भऽ जेतै। हहाइत धारक अबाज रातिमे सभ सुनि रहल छला। भोरहरबामे तीनू गोटे बहरा गेला। बान्ह धरि मुखदेव सेहो संगमे रहथि। हे, बान्ह धऽ कऽ जाएब तँ कियो चिन्हियो सकैए। आ एतेक टाक टोकना भारी सेहो लागत। कियो पुछियो सकैए। जागेश्वर आ जीवछ बान्ह टपि कऽ हेलि जाइ गेला। मुखदेव दुनू टोकना आ दुनू कोदारि दुनू गोटेकेँ बेरा-बेरी पकड़ा देलन्हि, माथमे दुनू गोटे ई टोकना पहीरि लै जाइ गेला। मुखदेव बान्ह बाटे आगाँ बढ़ि गेला, ओइ बिन्दु लग जतऽ जागेश्वर आ जीवछकेँ बान्ह कटबाक छन्हि। तेजी आबि गेल छै धारमे, बान्हक काते-काते बहि रहल छै पानि। देरी भऽ रहल छै। मुखदेव झटकारि कऽ पहुँचै छथि बिन्दुपर, मुदा दुनू टोकनाकेँ- माने जागेश्वर आ जीवछकेँ- एबामे कने देरी छै। महिसबार सभ महीसकेँ दोसर कात डबरा लग आनि कऽ झम्मासँ रगड़ि रहल अछि। हँ, आबि गेल दुनू बिड़नल। फरिच्छ भऽ गेल अछि। दुइए छह देबाक तँ काज रहै। ऊपरसँ नीचाँ देखलापर बाढ़िक पानि खूब निच्चा देखा पड़ै छै, बस्तीक सोझाँमे तँ बान्हक ऊपर झझाइले छै। बान्हमे भूर बनि रहल अछि। पानि ओतऽ हिलकोर मारि रहल अछि। जागेश्वर आ जीवछ आगाँ बढ़ि जाइ छथि। दू टा टोकना भँसियाइत देखबामे आबि रहल अछि। कने आर फरिच्छ होइ छै। किछु लोक ओतऽ जुमि जाइ छथि। बान्हक माँटिमे सँ बमकोला बहरा रहल छै आ दुनू टोकना दूर जा रहल अछि। भोरमे लोक सभ हुनका सभकेँ पानिमे बहैत देखलक तँ चीन्हि नै सकल। दुइये छहक काज छलै? दू छहक बाद ई जमीन्दारी बान्ह कटि रहल छलै आ पीअर बच्चाक खेत होइत पानि ससरि रहल छलै। पानि तँ उगडुम भैये रहल छलै। टोल दिस बान्ह कमजोर छलै, जँ ई दुनू गोटे बान्हकेँ पीअर बच्चाक खेतक सोझाँ नै कटितथि तँ गामक जल-समाधि निश्चिते छलै। किछु दिन धरि पीअर बच्चा रङ तरङ होइत रहला मुदा गाममे लोकक समर्थन देखि ककरापर आरोप लगबितथि। प्रस्ताव पठाएल गेल छल, जे बान्ह काटि देल जाए, ऐ आधारपर की आरोप लगबितथि? लोकक समर्थन जागेश्वरक पक्षमे भेल देखि मोन मसोसि कऽ रहि गेला। सत्यनारायण कामत, जागेश्वर, मुखदेव, दुखन महतो, बासू चौपाल आ जीवछ मुखिया गामक लोकक सहयोगसँ एकटा बड़का बाहा खोधलन्हि, ई बाहा जागेश्वरक जमीन बाटे आ सड़कक कात बाटे खोधल गेल। जतेक पानि आबै से ऐ बाटे चौरी, डबरा आ पोखरिमे बहि जाए। धारक छारन सेहो कहियो काल ई बाहा बनि जाइ छल। अकाल नै आएल ओइ बर्ख गढ़ नारिकेलमे। अकाली कवित्त नै पढ़लन्हि मुखदेव ओइ बर्ख। बाढ़िक बादक अकाल नै आएल ओइ बर्ख। घनानन्द, हलधर, नोने, दौलति जहाँ, भट्ट भूषण आ रुद्रमतिक संग रघुवरन सेहो निसाँस लेलन्हि। देश स्वतंत्र भेलै आ आब संविधान बनतै। फेर ओ दिन तका कऽ लागू हेतै। शासन जेलक, प्रबन्ध धरमसालाक हेतै! आबऽ दियौ...........। चारिमकल्लोल विश्वकर्माक रखबाड़िमे इन्द्र लग अमृत पहिल पल्लव स्वतंत्रता भेटि गेलै, माने अमृत भेटि गेलै। मुदा कतऽ राखल छै। घनानन्द, हलधर, नोने, दौलति जहाँ, भट्ट भूषण, रुद्रमति आ रघुवरन। पटनाक बाँकीपुर कैम्प जेल। कतऽ राखल छै अमृत? स्वतंत्रता रूपी जेलमे? रखबाड़िमे? ककर रखबाड़िमे? पापसँ पृथ्वी पाताल चलि गेली, प्रार्थनासँ ऊपर एली तँ डगमगाइ छली। पापसँ पतन होइ छै? हमरा तँ लगैए जे तकर उन्टा होइ छै। कारण ऐ शून्यमे किम्हर नीचाँ आ किम्हर ऊपर? गोलाकार......... विष्णु काछु बनि नीचाँ चलि गेला, तैयो पृथ्वी जलपर भँसै छली। अगस्त्यक जाँघ तरसँ माटि आनि, तकर जोड़न दऽ पृथ्वीकेँ स्थिर कएल गेल। भगवान वराह बनि उत्तर माथसँ पृथ्वीकेँ ठोकि ठीक केलन्हि। फेर समुद्र-मन्थन भेल, बासुकीनागकेँ मन्दार पर्वतमे लपेट कऽ समुद्रमे उतारल गेल। मुँह दिसनसँ दानव आ पुच्छी दिसनसँ देवता नागकेँ पकड़ि मन्दारक मथनीसँ मंथन शुरू केलन्हि। रगरसँ मन्दार पर्वतपर जे गाछ-वृक्ष रहै ओइमे आगि लागि गेल। इन्द्र वर्षा केलन्हि आ तखन जा कऽ आगि मिझाएल। समुद्रक नुनगर पानि दूध आ घी बनि गेल। लक्ष्मी, सुरा आ उच्चैःश्रवा घोड़ा बहराएल मन्थनमे, से चन्द्रमा लऽ लेलन्हि। अमृत लेने धन्वन्तरि बहार भेला, विष निकलल से महादेव कण्ठमे लेलन्हि। गौरी बिसहरा, साँप, बिढ़नी, चुट्टीक मदतिसँ महादेवक देहसँ विष निकाललन्हि। अमृत लेल झगड़ा .. होइते रहैए। नै तँ की बिख लेल हएत? …विष्णु मोहिनी बनि सभ देवताकेँ अमृत पिआ देलन्हि। दैत्य राहु भेष बदलि अमृत पीबऽ चाहलक… मुदा चन्द्रमा आ सूर्य हुनका चीन्हि गेल, गर्दनि काटि देल गेल ओकर। मुदा अमृतक जे स्पर्श ओकरा भेल से ओ मरल नै.. बचल अमृत विश्वकर्माक रखबाड़िमे इन्द्रकेँ दऽ देल गेल। बासुकी नागकेँ माइक श्राप नै लगबाक आ जनमेजयक यज्ञमे भागिन आस्तीक द्वारा सपरिवार प्राणरक्षा भेटबाक वर भेटलन्हि। दोसर पल्लव मुखदेव राम आ दयाराम राम। कलम गाछी, पात खरड़ै लेल खेखनिया, गोबर बिछै लेल खेखनिया। मुखदेव रामकेँ मोन छन्हि, आमक मासमे एकटा आम उठा लेने रहथि। बहरबैया मालिकक रखबार छीनि रहल रहन्हि आम। मुखदेवकेँ तखने दूरसँ अबाज सुनाइ पड़लै, जागेश्वरक.. मुखदेव, दाँत लगा दे आममे.. दाँत लगा दे। मुखदेव दाँत लगा देलक। मुदा ओ ओगरबाह तैयो नै देलकै आम। बाजल रहए.. ऐँठ कऽ देलहीं तँ की होइछौ जे दऽ देबौ। आ मुखदेव आ जागेश्वरक सोझाँमे आम खत्तामे फेकि देने छल। फेर जागेश्वर मुखदेवकेँ अपन कलम लऽ गेल आ मचानपर बैसा कऽ एक जलखरी आम सोझाँ राखि देलक। मुखदेवकेँ मुदा मोन मलिने रहलै। जागेश्वर किए नै मानैले तैयार अछि जे ओकरा आ मुखदेव राममे अन्तर छै। घरक चारूकातक बोन जकर ओइ पार गाम छलै, आ गामक लोक जइ बोनमे आबैसँ डेराइ छलै, आ जे बोन मुखदेवक बाप दादाक छलै, से आब कलम भऽ गेलै बहरबैयाक। दयाराम राम आ मुखदेव राम। समाज ओकरा लेल काज निर्धारित केने छै। ढोलहो देबाक काज, पिपही बजेबाक काज। कने पैघ होइ जाइ गेला तँ ढोल छारब सीखि लेलनि। मुइल मालक खल्ला मुरदारी ओदारथि। भारीसँ भारी माल सङरैठा पर दयाराम आ मुखदेव उठा कऽ चमरखल्ला लऽ अनै छला। छूरीसँ बनछोलबामे मुदा दयारामक जोड़ नै। गाइक नाभिसँ निकालल गोरोचन लेबा लेल दूर देशक एकटा आश्रमक एकटा महात्मा अबै छला, रातिमे नुका कऽ। ओइ आश्रममे सुनै छिऐ गोरोचनसँ सभ बिमारीक इलाज होइ छै। मिरदङक दुनू पूराक चामक गद्दा मुदा मुखदेवसँ नीक कियो नै बनबै छल। मुदा मानरि बनबैमे दयाराम आगू छला, टुनमुनिया मिरदङे ने छल मानरि। परमेश्वर राम आ साहेबगंजबालीक बेटा मुखदेव, दयाराम आ बेटी ममतोड़। खड़मास, पूस, चैत आ भादव, लगैए सभ काज बन्न अछि। रोहिणी नक्षत्रमे बर्खा नै भेने खेतीबारी शुरू नै होइए, बर्खा भऽ गेने खेतीबारी शुरू भऽ जाइए। ई जेलक प्रवास खड़मासे तँ छी। सभ काज बन्न अछि। गाममे कहियो खड़मास आएले नै रहए। जनीजाति पिसिया कालमे लगनी गाबै छथि। आ पेटक बिरह आ मोनक कष्टमे बिरहा गबैए लोक सभ। कोन मास बिरहा जनम लेलकै रौ जोड़ीदार कि कोन मास भेलै छठिहार कोन मास परेमियाँ डेगा-डेगी देलकै रौ की कोन मास भेलै परचार अगहन मास परेमियाँ बिरहा रौ जनम लेलकै पूस मास भेलै छठिहार माघ मास परेमियाँ डेगा-डेगी देलकै रौ की फागुन मास भेलै परचार जागेश्वर धरि पाबनि तिहारमे नै छोड़ै छल मुखदेवकेँ। वैशाखमे जूड़िशीतल पाबनि होइए, ओइ दिन पूरी, दलिपूरी, बड़ी बनै छलै। साहेबगंजबाली रातिमे बड़ी झोराबैए। पैघ सभ अपनासँ छोट बच्चाकेँ पानिसँ जुड़बैए। स्त्रीगण सभ रस्तापर पानि पटाबैए, कहबी अछि जे ई केलासँ भाएक औरदा बढ़ै छै। आ बहिनक औरदा… पुरैनिक पातपर सभ गोटे बसिया भात आ बड़ी खाइ छथि। साहेबगंजबाली पोखरिसँ समार आनि ओकरा बसिया भात, बड़ी, सतुआमे मिला कने-कने मोख पर, नीपल पोतल चुल्हापर दै छै, जकरा जुड़ेनाइ कहै छलै। दयाराम, मुखदेव आ जागेश्वर आन बच्चाक संग बाँसक फुछुंगा बना कऽ पोखरि इनारमे खेलाइ-धुपाइ अछि, भिजैत अछि, भिजाबैत अछि। कादो, माटि, गर्दा सभ एक दोसरापर खूब फेकैत अछि, इनार उपछैत अछि, ओइमे दयाराम, मुखदेव आ जागेश्वर यार-दोस्तकेँ फाटल-चीटल, पथिया, मौनी, बान्हि दैत अछि, आ बना दै जाइ अछि मिथिलाक महादेव। सभक दलाने दलान जा कऽ भांग सेहो पीअल जाइत अछि। हँसी मजाक सेहो होइत अछि। महादेवक नचारी ढोल-नगारा संग गबैत रहथि सभ गोटे, सभ गोटे माने…. मुखदेव, जागेश्वर, दयाराम, अधिकलाल मण्डल, मोहम्मद शमशूल, बिचकुन सदाय, रामचन्द्र साव, जीवछ मुखिया, राधामोहन राय, अशोक ठाकुर, बौधा मलिक, दुखन महतो, कपिलेश्वर राउत, सत्यनारायण कामत, रामदेव भण्डारी, भोला पासवान, लछमी दास, लाल कुमार राय, शिव नारायण महतो, चलित्तर साहू, बासू चौपाल, सत्यनारायण यादव, जगदीश माइल, भोला पण्डित, बुधन साफी, जयराम ठाकुर, जोगिन्दर ठाकुर, दरोगा सिंह, सरपंच मण्डल, परसादी झा, फुक्की झा, सीताराम चौधरी, बिशेसर पासवान, सरुफ लाल, महेन्दर राम, जैनुल मियाँ, सिदो मुर्मू, उमेश रजक, भूप यादव। जूड़िशीतलकेँ चाण्डाल संक्रान्ति सेहो कहल जाइत अछि। एकर परात भेल मिथिलाक नव वर्ष। नव वर्षमे चाण्डाल स्पर्श, खेला-धूपी, आ भगवती प्रसाद माने सुरापान। बासि भातक भोजन मद्यपान सदृश मुदा ओकरा पुरैनिक पातपर राखब तँ विकार नष्ट भऽ जाएत। बसहापर भोला असवार हो जिया थरथर काँपै। कथीक आला, कथी केर माला, कथी केर सोलहो सिंगार हो जिया थरथर काँपै। साँपै के आला साँपै के माला साँपेक सोलहो सिंगार हो जिया थरथर काँपै। किनकाले मैना मन्दिर घर पैसलि ठोकि लेल वज्र केवाड़ हो जिया थरथर काँपै। गौरीले मैना मन्दिर घर पैसलि, ठोकि लेल वज्र केवाड़ हो जिया थरथर काँपै। तकर बाद सभ गोटे स्नान-पूजा कऽ कए अपन-अपन घर दिस जाइए। एकटा बात आर, मिथिलाक पहिचान दही सेहो खाएल जाइए। मैथिल जतऽ रहैए, ततऽ ई पाबनि मनबैए। यएह मिथिला समाजक पहिचान अछि। ऐ बाँकीपुर, पटनाक कैम्प जेलमे घनानन्द, हलधर, नोने, भट्ट भूषण आ रघुवरन बनि गेल छथि मिथिलाक महादेव। दोसर दिन। भोरे भोर जेलक भितुरका बाट-घाट पानिसँ सभ खूब पटबैत अछि, सबहक माय, बाबू, बाबा आ मैंया धीया-पुताकेँ पानिसँ खूब जुड़बै अछि। बसिया भात बड़ी पुरैनी पातपर खाइ अछि। घनानन्द आ हलधर पुरैनी पात आनि लेने अछि। ओकर बाद जेलक भितुरके गाछीमे जा कऽ गाछमे सेहो, सभ बड़ी पूरी भात चढ़बैत अछि। सभ मिल कऽ कादो माटि एक दोसरपर दैत अछि। फेर महादेव पार्वती बना कऽ भांग धुथुर लावा फाटल पुरान पथिया बोरी लाधि जेलर बाबू आ जेलमे रहै बला डागडर बाबूक दलान जा कऽ हँसी मजाक करैत ढोल बजा कऽ महादेवक नचारी गबैत खूब धूम-धामसँ ऐ जेलगामामे घुमैत साँझमे पोखरिक डबरामे जा कऽ नहा धो कऽ अपन-अपन जेलक खोली माने घर घुरि जाइए। लोकक संग प्रकृतिक कल्याण, घरक पैघ लोकनि अपनासँ छोटक माथपर पानि दऽ ओकर सुख समृद्धिक कामना करैत अछि, ओतऽ गाछ वृक्षमे सेहो पानि देबाक परंपरा अछि। एक दिन चूल्हा जरेबापर सेहो प्रतिबंध रहैए। घरक स्त्रीगण सड़कपर पानी दैत अछि, ऐसँ घरमे सुख समृद्धि अबैए ! पाबनिक दिन बासी भोजनसँ भगवानक भोग लगाएल जाइए। एक दिन एक संग भारी संख्यामे चूल्हा नै जरेलासँ पर्यावरणकेँ चूल्हासँ निकलैबला धुआसँ मुक्ति भेटैए आ ईंधनक खपत सेहो कम भऽ जाइए। दौलतिजहाँ झोरा देने रहथि बड़ी, रातियेमे। रुद्रमति आनि लेने छथि पोखरिसँ समार आ ओकरा बसिया भात, बड़ी आ सतुआमे मिला कऽ कने-कने जेलमे सभ ठाम जुड़ा देने छथि। तकर बाद वएह बसिया भात बड़ी, पूड़ी-दलिपूड़ी सभ खाइए। बैशक्खा, अगता आम हुअए आकि मौसमी, कोनो मे स्वादे नै। वएह लोक, जे चैतावर गबै छल, लगैए बदलि गेल। ने कोनो हर्खे, ने कोनो विषादे। पुण्य संचय होइए ऐ मासमे। तेँ ने तेल लगाउ, ने दिनमे सुतू। गरीब लोक तेल कतऽ लगबैए, आ ई जे जेल मे ककबासँ केश थकरै जाइए, से बिनु तेल लगेने थकरऽ चाहत तँ थकरेतै? चैत वैशाखक रब्बी!!! वैशक्खा!! भदैया!! सभटा अगहनी भऽ जेतै तँ काज चलतै? आएल चैत बैशाख रबियाक दिनाजी कटि गेल जौ मटरबा रबिया फसल जी बोलय सासु ननदिया पीसू जोकराइ जी मोटे-मोटे रोटी पकाबू कि सभ मिलि खाएब जी दयाराम, मुखदेव आ जागेश्वर… गबैत रहथि लगनी… खेतमे.. जागेश्वरक खेतमे खेती.. केहन कठोर भेलौं हमरा बिसरिये गेलौं कि आहे रामा हमरो जनम एहिना जाएत रे की दिन अनचिन्हारे भेलै, रातियो पहाड़े भेलै कि आहो रामा हमराले दिनकर कहियो ने जागत रे की माघ गेल फागुन एलै आमो मजरि गेलै कि आहो रामा कुहकैत कोयली एहिना कानत रे की दुखमे जनम भेल नोरे मरन भेल कि आहो रामा कहियो ने नैना हमर सुखाएत रे की दयाराम, मुखदेव आ जागेश्वर। साहेबगंजवाली जान बचेने रहै जागेश्वरक माएक। सोइड़ीमे …. कोनो डर-डाक्टर गाममे थोड़बे होइ छै। जागेश्वरक अंगनामे प्रसव करेबामे कोनो जनानीकेँ ईलम नै छलै। बच्चाक पएर नीचाँ आ मूड़ी ऊपर चलि गेल रहै। जागेश्वरक बाप गेल रहए साहेबगंजवालीकेँ बजबैले। साहेबगंजवाली हुलहुली देवीक स्मरण केलक आ बिदा भेलि, संगमे परमेश्वर राम सेहो आएल रहए। नुआसँ घेरल रहै सोइड़ी… कनियाँ आ बच्चा दुनू ने चलि जाए… मुदा साहेबगंजवाली बचा लेने रहै.. माइयो आ बच्चोकेँ। बच्चा जागेश्वरकेँ ई खिस्सा माए सुनेने छै आ मुखदेवकेँ साहेबगंजवाली। से तेँ ने जागेश्वर साहेबगंजवालीकेँ एतेक इज्जत करै छलै.. आ मुखदेव लेल जान दै छलै। मुखदेवसँ जखन ओइ भोजमे जागेश्वरक भेँट भेलै तावत ई गप जागेश्वरकेँ बुझलो नै रहै, बच्चाकेँ आवश्यकता पड़लेपर गप कहल जाइ छै। रुद्रमति बंगालक अछि। चुनुड़ी जातिक, डोका जराकऽ चून बनबैए। प्रसव करबैले चर्मकार नै हाढ़ी जाति होइ छै बंगालमे। खेती आब सभ करै छै। जेठहि बियवा गिरेलौं असाढ़हि जनमि गेल हे साओन रोपनी करेलौं भादव बिट भेल हे आसिन फूल भेल धान कातिक फर भेल हे अगहन काटल धान दउनिया कराएल हे दउनि कराए कोठी ढारल कूटि-कूटि खाएब हे दुपहरिया आ बेरू पहर पुरुख पात सुतैए मुदा ढेकीमे धनकुटनी होइते रहै छै। उक्खड़ि समाठमे चूड़ा कुटाइते रहै छै। ठक-ठक ठों-ठों, बेंग करै गो-गो नन्हकी लोटल भुइयाँ, गोदी लिअ गुइयाँ ठोकरा करे खट-खट, समाठ बोलै धम-धम भैया लग सुतै जाएत के? भौजी कहै हम-हम रुद्रमतिये सन तँ रहै मुखदेव आ दयारामक बहीन, ममतोड़.. सभ ममतोड़िया कहै जाइ छलै। माए आएल छै साहेबगंजसँ गढ़ नारिकेल आ ममतोड़ गेलै गढ़ नारिकेलसँ साहेबगंज। उदासी गाएल गेल जमाएक बिदा होइ घड़ी। घरभड़ी भेल.. भगवती घरमे पटिया ओछा कऽ डाँटबला पानक पात, धान, मखान, दूभि, चानीक रुपैय्या वरक हाथमे देल गेल, कनियाँक हाथ पाछूसँ पकड़ने… सासु-ससुरक घर भरै छी, माए-बापक घर भरऽ जाइ छी.. पाछूसँ उदासी उठैए.. कथीले प्रीत लगओले रे जोगिया प्रीत छोड़ने चलि जाए तोरा हाथ पनमा सपन भेल रे जोगिया तोरा बिनु रहलो ने जाए अंगना जे तोरा लख बिजुबन रे जोगिया घर लागे दिवस अन्हार सुतहुँ के पलंगा विषम सन रे जोगिया तकिया तँ मोहि नै सोहाय जागेश्वर सभ थारीमे सिनूर घोरि कऽ राखल रहै छै, कनियाँक हाथ घोरल सिनूरमे दऽ कऽ पाछूसँ वरक डोपटापर छाप दऽ देल जाइ छै। कनियाँक मुँह वरकेँ देखा देल जाइ छै। चूड़ा, चाउर, बगिया……… बड्ड होइ छलै तँ मड़ुआक रोटी पर नून तेल, आ नै तँ भदैया धान कहियो काल। मुदा हाइ रे जागेश्वर… आ कहै की छलै.. मुखदेव, तोहर माए हमर जीवन बचेनिहारि, हमर माएक जीवन बचेनिहारि.. कथीक अहसान.. कथूक नै.. ई तँ हमर कर्जा अछि। पीअर बच्चा हँसै, आब देखैत ने रहियौ.. ई जागेश्वर आ ओकर बाप एकरा सभकेँ जेना माथपर चढ़ा रहलए, आब देखैत ने रहियौ… कुटू-कुटू सखिया नव नव धान भेल भोगब कहिया कुटू-कुटू सखिया चूड़ा कुटू, चाउर कुटू, करू बगिया लुच-लुच चाउरक पूआ लागत, मचमच खटिया कुटू-कुटू सखिया ठोकरा लिअ समाठ लिअ बान्हू जुटिया चाकर-चाकर चूड़ा कुटू, फटकू सूपिया कुटू-कुटू सखिया पाहुन अओता, सनेह करता, लेता गोदिया ननदो के जुड़एतनि हिआ, कुटू सखिया कुटू-कुटू सखिया जागेश्वरक साहेबगंजवालीदीदी बनि गेल रहथि मुखदेवक माए। तखन ममतोड़ जागेश्वरक पिसयौत बहीन बनि गेली किने। परमेसर, साहेबगंजवाली, ममतोड़, मुखदेव आ दयाराम, सभ संगे खेतमे काज करैत रहथि। जागेश्वर पनपिआइ लऽ कऽ खेत जाइ छल। केहन नीक नहाँति जिनगी चलि रहल छल। पीअर बच्चाकेँ छोड़ि कऽ आन ककरो कोनो दिक्कत नै रहै। आ पीअर बच्चा, अपन लठैत सभसँ घेराएल रहै छल सदिखन। हाथ तोड़ि दियौ, पएर तोड़ि दियौ, कपार भांगि दियौ। यएह सभ गप सबखन होइत रहै छलै पीअर बच्चाक दरबारमे। हँ, बा झा नाम रहै ओइ लठैतक। जखन तखन मरड़ए लागल छल खेतक आसपास। जखने असगर देखै छल, कखनो साहेबगंजवालीकेँ तँ कखनो ममतोड़केँ, की कहाँ बाजि दै छल। ऐ गामक छलैहो नै। बहरबैया लठैत छल बा झा। साहेबगंजवाली आ ममतोड़ ककरो कहबो नै करै किछु, ने परमेसर, मुखदेव आकि दयारामकेँ, आ नहिये जागेश्वरकेँ। मुदा बा झाक भाग- अभाग। एक दिन जागेश्वर ओकरा पकड़ि लेलकै। -बा झा, तोहर हिम्मत कोना भेलौ हमर बहिन आ दीदी संग ऐ तरहेँ गप करबाक। -तोहर दीदी आ बहिन। ममतोड़िया तोहर बहीन आ साहेबगंजवाली दीदी कहियासँ भऽ गेलौ? ऐ आरिमे कोनो खेला तँ नै खेला रहल छँह तूँ? -बा झा….. उठि कऽ बैसि रहै छथि मुखदेव। लगै छन्हि जे जागेश्वरक पघरिया जेना एक्के छहमे बा झाक गरदनि काटि देने रहै आ ओकर शोनितक बमकोला मुखदेवक मुँहपर जेना ओइ दिन आएल रहै, सएह आभास। बा झाक लहास मुखदेव आ जागेश्वर ओही खेतमे गारि देलन्हि। ककरो किछु पता नै चललै। पीअर बच्चा किछु दिन बा झा केँ तकैत रहला। किछु पाइ अगूवार लेने छलन्हि। लगैए नेत खराप भऽ गेलै ओकर। पड़ा गेल गामसँ.. नै जानि कोन गामक छल, बलिष्ठ देखि कऽ लठैतीमे राखि लेने छला। कने शंका जागेश्वरपर भेलो छलन्हि, मुदा पुछलन्हि नै। अपने बदनामीक आशंका भेलन्हि। हाथ तोड़ि दियौ, पएर तोड़ि दियौ, कपार भांगि दियौ; ई कहनिहार दोसर लठैत सभ सेहो आशंकित रहऽ लागल। नै जानि ई पीअर बच्चा आ ओ जागेश्वर, दुनू कोन मन्तर जनै जाइए। मरबाक अपनहिये सभकेँ छौ। बा झा निपत्ता भेल तँ गौँआ सभ निशास लेलक। ओकर पएर जमीनपर पड़ै छलै तँ धरती हिलऽ लागै छलै। हरिश्चन्द्राकेँ मारि कऽ पाड़िये ने देने छलै। गेल तँ भने गेल। आब दोसरो लठैत सभ सञ्च-मञ्च भऽ गेल अछि। आ की ओना ई सभ सञ्च-मञ्च भेल अछि? जे जतऽ पाबै छलै ऐ लठैत सभकेँ थोपड़ा दै छलै। किछु दिनमे सभ शान्त भऽ गेलै। आ इम्हर ममतोड़क बियाह सेहो हरबड़ी-धरफड़ीमे भऽ गेल। साहेबगंज चलि गेली ममतोड़। घेंघी कत्ते कानल रहए आ कनैत-कनैत गेने रहए। जौं हम जनितौं सीता जेती सासुर, रोपितौं गुअबाक गाछ छाहरि छाहरि सीता सासुर जैतथि लगितनि सीतल बसात माथ उखारि सीता दहो दिस ताकल छुटि गेल बाबाक राज चारि कहरिया राम पाँचम लोकनियाँ छअम सहोदर भाइ घुरु घुरु भैया घुरि जइयौ हकन कनैत हेती माय अम्माकेँ कहबनि पाथर भय बैसती हमहूँ बैसब हिअ हारि ममतोड़िया माए, किए हरबड़ा गेल अनेरे। माएक मोन छिऐ। नैहर बेटीकेँ पठा देलक। बोक्खो-गोक्को, घनश्यामपुरक रहै प्रायः, बियाह दिन आबि गेल रहै, खूब झमकौने रहै। ब्रह्मपुरक नट सभकेँ एक्को हाथ नै सकऽ दै छै ई गोक्को सभ। मुखदेव मुँह पोछऽ लगै छथि, जेना बा झाक शोनितक लस्सा पोछि रहल होथि। की छौ पेबाले? सौंसे दुनियाँ। छौ की जे लेतौ? पूस गोइठा डाहि तापब माघ खेसारिक साग यौ फागुन हुनका छिम्मरि माकरि चैत खेसारिक दालि यौ वैशाख टिकुला सोहि राखब जेठ खेरहिक भात यौ अखाढ़ गारा गारि खाएब साओन कटहर कोअ यौ भादव हुनको आँठी-पखुआ आसिन मरुआक रोटी यौ कातिक दुख सुख संगहि खेपब अगहन दुनू साँझ भात यौ पूससँ शुरू आ अगहनपर खतम। दुनू साँझ भात। अमृत, इन्द्रक अमृत, रखबारिमे विश्वकर्मा.. कोन रहस्य छै ऐमे? रखबारिमे हम, मुदा अमृत नै पिअब? अमृत जँ पी लेब तखन? अमृत पी लेब तखन संघर्षक जरूरति खतम भऽ जाएत, निश्चिन्त भऽ जाएब जे कतबो मारि-काटि हएत तैयो जीबे करब। तखन जिनगी नर्के भऽ जाएत ने, तै हिसाबे तखन तँ ई अमृत पिनाइ नीक गप नै ने भेल। मुदा रखबारिमे अमृतक छी आ अमृते नै पीअब तखन ई कोन महत्वपूर्ण बौस्त भेल? अमृत नीके छै तइ हिसाबे। पाँचम कल्लोल बो-बो ईहो मुखराम..बड़का गप्पी.. कोनो कथासँ मनुक्खक कल्याणक गप निकालैए.. आगाँ सुनू.. ईश्वरकेँ विश्वक सृष्टि करबाक छलन्हि… सहस्रशीर्षाबला खिस्सा आब सुनाएत प्रायः ई मुखराम… ईश्वरकेँ विश्वक सृष्टि करबाक छलन्हि…से ओ विष्णु, फेर शिव आ तखन ब्रह्माक रूपमे अवतार लेलन्हि। तखन देवता-ऋषि-मुनि, शतरूपा-स्त्री, स्वयंभुव मनु.. दहिना आँखिसँ अत्रि, कान्हसँ मरीचि, दहिना पाँजरसँ दक्ष-प्रजापतिक रचना केलन्हि.. मरीचीसँ कश्यप, अत्रिसँ चन्द्रमा, मनुक प्रियव्रत आ उत्तानपाद बेटा आ आकृति, देवहूति आ प्रसूति बेटी भेलन्हि। प्रसूतिक विवाह दक्ष प्रजापतिसँ भेल आ तइसँ साठिटा कन्या भेल। साठिमे आठक विवाह धर्म, एगारहक कश्यप, सत्ताइसक चन्द्रमा आ एक गोट जिनकर नाम सती छलन्हि हुनकर विवाह महादेवसँ भेलन्हि। चन्द्रमाकेँ जे सत्ताइस टा पत्नी भेलन्हि तइमेसँ ओ रोहिणीकेँ सभसँ बेशी मानै छला… से २६ टा बहिन अपन पिता दक्षकेँ शिकाइत केलन्हि आ चन्द्रमाक शरीर घटऽ लागल। तखन चन्द्रमा महादेव लग गेला तँ महादेव हुनका अपन कपारपर चढ़ा लेलन्हि। दक्ष महादेवसँ भतबड़ी कऽ लेलन्हि। ओ यज्ञ केलन्हि आ शंकरकेँ नोत नै देलन्हि। सती नैहर जेबा लेल जिद पकड़ि लेलन्हि तँ वीरभद्रक संग शिव हुनका पठा देलखिन्ह। सती चलि तँ गेली मुदा अपमान देखि यज्ञकुण्डमे कूदि पड़ली। वीरभद्र ई देखि दक्षक गरदनि काटि लेलन्हि। महादेवकेँ तमसाएल देखि कऽ देवता सभ महादेवक प्रार्थना केलन्हि, तखन महादेव यज्ञमे काटल छागरक मूड़ी दक्षक धरपर लगा देलखिन्ह… ओ जीबि तँ गेला मुदा बो-बो करऽ लगला… से देखि महादेव प्रसन्न भेला। तहियेसँ महादेवक पूजाक अन्तमे बो कहल जाइए.. अच्छा से.. ई मुखदेव.. सहस्रशीर्षाबला कथा नहिये सुनेलक। ईहो बो-बो कऽ देलक लगैए.. हमरा सभकेँ प्रसन्न करबा लेल। मुदा मुखदेवक ललाटमे कतेक तेज छै, आँखिमे कतेक भद्रता छै, लगैए चन्द्रमा माथपर लेने अछि। पुरुख सभ आपसमे लड़ैए आ स्त्रीगण कुण्डमे कूदैए! मिथिलामे बौद्ध धर्म पसरल, बौद्ध भिक्षुणी मैथिलानी सुमंगलमाता। भिक्षुणी कुमारि रहथि? हँ तँ नै कि बियाहल रहितथि, तखन भिक्षुणी कोना कहेती? हे कहऽ दियौ खिस्सा आगाँ.. सुमंगलमाता बाजै छथि, भनसाघरक हाड़ तोड़ैबला काजसँ, भूखक गछाड़सँ, ढनढनाइत बरतनसँ आ मेघडम्बर बनबैबला ओइ बैमान पुरुखसँ त्राण दिअ। तँ एकटा दोसर मैथिलानी भिक्षुणी मुक्ता कहै छथि- हमरा त्राण दिअ उक्खरि, समाठ, ठकुरा आ अपन हरीफ स्वामीसँ। जखन कुमारि रहत तखन बेइमान आ हरीफ स्वामी कतऽ सँ आएल? दोसराक विषयमे नै लिखि सकैए कियो की? बाजऽ ने दियौ.. सभ स्त्रीगण खूब काज करै छलै, कोनो रोक टोक नै। स्त्री पुरुखसँ डेराइत हुअए, से नै छलै। कलम गाछी, बाट घाट, अंगना बाड़ी सभ ठाम स्त्री सभकेँ एक दोसरासँ भेँट होइ छलै। भोला पण्डितक कनियाँ कुम्हैन बेलाहीवाली, सत्यनारायण यादवक कनियाँ मझारीवाली, बासू चौपालक कनियाँ रामखेतारीवाली, चलित्तर साहुक कनियाँ लछमिनियाँ वाली, शिवनारायण महतोक कनियाँ निर्मलीवाली, लछमी दासक कनियाँ सोनवर्षावाली, लाल कुमार रायक कनियाँ सुखेतवाली, भोला पासवानक कनियाँ बेलमोहनवाली, सत्यनारायण कामतक कनियाँ कदमाहावाली, रामदेव भण्डारीक कनियाँ धर्मडीहावाली, कपिलेश्वर राउतक कनियाँ मेटरसवाली, बौधा मलिकक कनियाँ बेहटवाली, दुखन महतोक कनियाँ धेपुरावाली, राधामोहन रायक कनियाँ मोहलीवाली, अशोक ठाकुरक कनियाँ जगदरवाली, रामचन्द्र सावक कनियाँ कोठियावाली, जीवछ मुखियाक कनियाँ तमुरियावाली, बिचकुन सदायक कनियाँ जेठियाहीवाली, मोहम्मद शमशूलक कनियाँ मछधीवाली, भगवानदत्त मण्डलक कनियाँ बलाटवाली, कोरैल साफीक कनियाँ गंजवाली, जयराम ठाकुरक कनियाँ चनौरावाली, परमेश्वर रामक कनियाँ साहेबगंजवाली, जोगिन्दर ठाकुरक कनियाँ नवानीवाली। आ ममतोड़ भऽ गेल हएत गढ़नारिकेलवाली। नागपंचमी साओन मासमे शुक्ल पंचमी दिन होइए। ओइ दिन सबहक कनियाँ अपन-अपन घर-आंगन खूब नीकसँ चिकनी माटिसँ नीपै छथि। गोबरसँ आंगन नीपै छथि। गाइक गोबरसँ जतेक घर छै ओइमे रेखा खीचल जाइए, जकरा घेरा कहल जाइ छै। ओकर बाद सभ कनियाँ आ बेटी मिलि कऽ चिकनी माटि आनि कऽ आंगनमे थुम्हा बनबै छथि। ओइमे सिनूर पिठार दुइभ लगा कऽ सुखा कऽ घर ओरिया कऽ राखल जाइए। ऐ माइटिक अपन विशेष महत्व अछि। साँझमे सबहक कनियाँ धानक लावा भुजि कऽ ओइमे मूसक माटि मिला कऽ घर आंगनमे छीटैए। देवता पूजा सेहो मानल जाइए। शुभ आगम सेहो होइए। नागपंचमीमे नेङरा कुशमे नीमक पात बान्हि चारमे खोंसल जाइए। नीमक पात, नेबोक रस आ घोरजाउर खेबाक प्रावधान। भादव अमावस्यामे लोहक खुरपीसँ पुरुख सभ भोरमे बाधमे जा कऽ कुश उखारि कऽ कन्हापर दुनू भाग टांगि कऽ अबै छथि। ओहो कुश सुखा कऽ राखल जाइए। ओ कुश बहुत काज अबैए। नागपंचमीक दिन रहै… अशोक ठाकुरक कनियाँ जगदरवाली धाइम छल, केहनो साँपक बिख होइ छोड़ा दै छल, आब ढोढ़िया साँप काटत तँ छोड़ाइये ने देत। मोहम्मद शमशूलक कनियाँ मछधीवाली बड्ड दिनसँ नेहोरापाती कऽ कए ओकरासँ साँपक मंत्र सिखने रहए। कपिलेश्वर राउतक कनियाँ मेटरसवालीकेँ साँप कटने रहए। नागपंचमीयेक दिन रहै.. ई मंत्र पढ़िते दर्द दूर भऽ गेल रहै। चारि साँप लोकनी, बार चित्ती गंडा, ऐनी मेनी खापड़ि टेनी…. आजन भाजन तँ स्वरूप, डोमा डोमा सरपए तारा अनिया लारू पाइनिया लारु, काँच माटि सोने भराउ एस डण्ड बीस करु, संख चित्ती सोम बित्ती हाथ जाइत, बिख लोइट, बाट जाइत सुमेर पर्वत ताँति तोहर धी बिआनी, एका एका एकौत्तर नौ दस अठारह पौआ कोन कोण? खतिरा मतिरा, चाँपसँ बैरनी काँटा नाम पूता जामा जूता, तिन्हके नौ मरए पूता लंका झारी, झार-झार बेंगो पूत दहिने कौर बेंगी पूत गरुड़ भवे, नील कंठ रोना हसन हुसन बहुरे बिखाह, तँहा गरुड़ हाथ पसारए तँहा सरपा नै बिखहा, ब्रह्मा ब्रह्मा ब्रह्मा सोलह हाथक करैत, हाथ जाइत बिख मारए देखिअ एटनियाँ, मेटनियाँ लाकड़ा सूनन करैतर आउर साँखड़ा नेउरारे मारे भैया जे तौरे विष चौरिया आरेहन पेरहन तोर सम्हार, उथ बहुरि घर जाउ रे गरुड़ा तोर भतार, एक पाँखि नै पसरए कुस परिछए नारी, नामे नामे पोखरि सोने फूल फलाइ, तँहि देखल जनमिल कुस तोड़ि कऽ बाँटि ले, तीन खण्ड कऽ काटि लए सिंहिन पूत तोँ छिएँ, सिंह चढ़ि तोँ कए लए घाव माइ तोहर बाघिन बिएलौ, चौसप निरबिख होइ जाइ दोहा ई ईश्वर महादेव गौरा पार्वती कामरु कमरछ, नैना जोगिनक दोहाइ ढोढ़िया साँप जे हबकै छै तँ खूब जोरसँ दुखाइ छै। ई देखलाक बादे मोहम्मद शमशूलक कनियाँ मछधीवाली नेहोरापाती शुरू कऽ देने रहए आ साँपक मंत्र सिखने रहए। महिला सभक बीच कतेक मेल रहै छलै गाममे। पुरुखमे कहाँ छै ओते हौ। छठिमे देखहक ने स्त्रीगण सभमे कतेक मेल रहै छै। बिहने पहरमे डोमिन बेटी हे बेटी धनिया दउरिया लए आउ अरघ केर बेर भेल हे बेटी पिअर कएल सूप लए आउ पुरुख रंथी ठाढ़ भेल हे बिहने पहरमे बनिआइन बेटिया हे बनिआइन नवका कसैलिया लए आउ अरघ केर बेर भेल हे बिहने पहरमे तोँहि मालिन बेटिया मालिन सतरंगा हार लए आउ अरघ केर बेर भेल हे बिहने पहरमे तोँहि बाभन दैया हे बाभनि पिअर जनौ लए आउ अरघ केर बेर भेल हे मोहम्मद शमशूलक कनियाँ मछधीवालीक माए इस्लामपुरक छै। मछधी आ दीपमे बेशी कुञ्जरा सभ छै किछु जोलहा (मोनिन), धुनियाँ (मन्सूर), हजाम (इब्राहिम) सेहो छै, ई सभ अजलब कहाबै छै, हिन्नूक शोल्कन्ह बुझू। आ किछु अछोप मुसलमान जकरा अरजल कहै छै सेहो छै। मुदा इस्लामपुरमे सभ तरहक मुसलमान छै। बाभन, राजपूत, भुमिहार सभ मुसलमान बनल हेतै तँ अशरफ बना देने हेतै, सैय्यद, पठान संगे ई शेख सभ, किंशाइत। कुनौली लग नेउरक राजपूत दरोगा सिंग शमशूल मियाँकेँ ई सभ कहि रहल छलै, तेँ मछधीवाली ई सभ बुझलकै। स्त्रीगण सभ पुरुख सभकेँ बो-बो कहि सकैए! मुदा जागेश्वरक गढ़ नारिकेलमे पहिने तँ स्त्रीगण सभक बेबहार अनुकरण करैबला छलै। घनानन्द, हलधर, नोने आ भट्ट भूषणकेँ आजुक कथा बड़ बढ़ियाँ लगलै मुदा रुद्रमति आ दौलति जहाँकेँ बड्ड सनगर। रघुवरन तँ अपन नोटबुकमे नै जानि की की टिपने जा रहल छल। मुदा आजुक कथाक बाद मुखदेवकेँ अपन वनवासी संगी साथी सभ मोन पड़ऽ लगलै। बोनसँ झाँपल गढ़ नारिकेलक वासी वनवासीये ने भेला, जतऽ कत्ते प्रकारक साँप आ संस्कृति पसरल छै। जय महादेव.. बम-बम-बम-बम ब्रू……… छअम कल्लोल छुच्छो हाथ भैया अबितथि बैसितथि माड़ब चढ़ि रे/ ललना अपने सड़िया पहिरतौं भैया नाम लितौं रे मुखदेवक खिस्सा चलिते रहैए। आ दर्शक वा श्रोता कहू.. सभ कान पथनहिये रहैए। एकटा राजा छला। हुनका दूटा बेटी छलन्हि- कुमरव्रता आ पतिव्रता। कुमरव्रता नन्दनवनमे कुटीमे आ पतिव्रता विवाह कऽ कए सासुर… एकटा योगीक माथपर कौआ चटक कऽ देलकै तँ ओ शाप दऽ कऽ ओकरा भसम कऽ देलन्हि.. नन्दनवनमे आगि लागल रहए। पतिव्रता अपन बहिन कुमरव्रताक कुटी बचेबाले तुलसीक बेढ़ देलन्हि तइमे योगीकेँ भीख देबामे देरी भेलै। योगी तमसाएल तँ पतिव्रता देरीक कारण कहलन्हि। योगी बोनमे गेल तँ देखलक जे सौँसे बोनमे आगि लागल अछि मुदा कुमरव्रताक कुटी बचल अछि। ओ कुमरव्रताकेँ एकर रहस्य बतेलक तँ ओहो निर्णय लेलन्हि जे हमहूँ विवाह कऽ पतिव्रता बनब। भोरमे एकटा कुष्ठरोगीकेँ ओ देखलन्हि आ ओकरेसँ विवाह कऽ लेलन्हि। पति हुनका कहलखिन्ह जे हमरा तीर्थ करा दिअ। ओ हुनका पथियामे लऽ बिदा भेली तँ रस्तामे जखन पथिया उतारि रहल छली तँ ओइसँ एक गोट सूलीपर लटकल ऋषिकेँ चोट लागि गेलै। ओ भोर होइते पतिक मृत्युक शाप हुनका दऽ देलन्हि। से सुनि बेचारी सूर्यक उपासना करऽ लगली, से पति मृत्यु पाबि फेर जीबि उठलखिन्ह आ ऐबेर बिना रोग व्याधिक घुरि एलन्हि। पत्नीव्रता एकोटा नै, सभ पतिव्रता। आ पुरुख महतमा सभ तमसाह, क्षणे-क्षण स्राप दैत रहैए। मोन पड़ि जाइ छन्हि ओ गीत, ममतोड़ आ माय गबैत रहैत छली। बेर बेर बरजह दीनानाथ हे बाबा हे तिरिया जनम जुनि दैह तिरिया जनम जँ दैह हे दीनानाथ बाबा हे सुरति बहुत जुनि दैह सुरति बहुत जँ दैह हे दीनानाथ बाबा पुरुख अमरुख जुनि दैह पुरुख अमरुख जँ दैह हे दीनानाथ बाबा हे कोखिया बिहुन जुनि दैह ममतोड़सँ भेँट करै लेल बिदा भेल रहथि मुखराम, संगमे जागेश्वर सेहो रहथि। बच्चा भेल रहै.. जौँआ.. आ सेहो एकटा बेटा आ एकटा बेटी। दूरे ततेक छलै जे… परमेश्वर रामक बियाह साहेबगंज। ममतोड़, दयाराम आ मुखदेवक मामागाम साहेबगंज। मुखदेव राममेँ गीत सभ सुनाइ पड़ऽ लगै छन्हि आ ओ सुनलाहा गीत सभ मुँहसँ बाजऽ लगै छथि... बाजे बाजे बधाबा नन्द के अंगना कथक नाचे पमरिया नाचे, छोटकी ननदिया नाचे अंगना। किए तोँ ननदी नाचह आंगन, तोरो भैया रहथि पटना। बाजे बाजे बधाबा नन्द के अंगना भैया हमर पटना रहै छथि, ओतहि सँ आओत मोती के कंगना। भाइ मोरा जीबौ भतीजबा जीबौ, देव पुराओल मन कामना। बाजे बाजे बधाबा नन्द के अंगना .. ममतोड़क जन्म। दीपक पमरिया हरबिर्रो उठा देने छल। दोसर पमरियाकेँ खबखब्बी उठि गेलै, तेँ की? डुबकीपर लऽ कऽ डुग-डुग करैत जे ई सभ नाच गाना करैए से कमाले। दसौन-भाट-महाराज जी सभ ब्रह्मपुरसँ आबि गेल रहै। पमरिया मुसलमान आ महराजजी हिन्नू। मुस्लिम नट सभ बेनीपट्टी लगसँ नै जानि कतऽ सँ आबि गेलै। दूटा नट बहिन हिरनी-बिरनीक मोहना पारा, जे ओकरा नाथि देत तकरेसँ ओ दुनू गोटे बियाह करती। दिल्लीमे उज्जैन सिंह मोहना पारासँ लड़ैए, दू दिन धरि लड़िते रहैए, मुदा फेर हारि जाइए आ मरि जाइए.. उज्जैन सिंहक शिष्य पोषण सिंह मोहना पाराकेँ नाथि दैए आ हिरनी-बिरनीसँ बियाह करैए, आ हिरनी-बिरनी दुनूकेँ बेटा होइ छै। ममतोड़ कहियो काल कऽ जे कानऽ लागै छलै तँ कानिते रहि जाइ छलै। नजरि-गुजरि खूब लागै छलै ओकरा। नजरि-गुजरि उतारबाक मंत्र अखनो मोन छै मुखदेवकेँ.. हिन्नू आ मुसलमान दुनू फेँटल मंत्र.. ओम नमो बिस्मिल्ला, रहीम रहमान गजनीसँ चलला मोहम्मद पीर, चढ़ि चलला। सवा सेर के तोसा खाए, अस्सी कोस के धावा जाए। सफेद घोड़ा, सफेद लगाम, ओइपर चढ़ए मोहम्मद पीर। नौ सए पलटन आगाँ चलै, नौ सए पलटन पाछाँ चलए। चल-चल रे बीर, तोहर समान आन नै कोइ। हम्मर शत्रुकेँ पकड़ि कऽ आनह, हाड़-हाड़, चाम-चाम, नखसिख, रोम-रोमसँ पकड़ि कऽ आनह। सिलारजिन्ह पीर भरता, पीटन्त, पछाड़न्त, तोड़न्त, फोड़न्त, हाथमे हथकड़ी, गोरमे तउख, उलटे मुसुक चढ़ाओल। आबह सेमरपर सवारी, खेलह, खा, खुश रहह। मुखदेवक मुँहपर मुस्की आबि जाइत अछि- ओ बाजि उठै छथि.. ओम नमो बिस्मिल्ला, रहीम रहमान…. ईल सन कील सन, धोबियाक पाट सन कुम्हारक चाक सन। ममतोड़केँ तेल कूड़ होइ छलै, हमरो होइत हेतै माए। -हँ तँ तोड़ा किए नै भेल हेतौ… माए कहै छलै। मुखदेवकेँ नजरि-गुजरि नै लागै छलै.. आको मैया चाको, प्रह्लाद मैया राखो, संझा मैया तारनी, सभ दुख निवारणी पहद्दीक बसहा-बड़दबला पचनियाँ.. बसहा जे सजा कऽ राखै जाइए। छोट-छोट कौड़ीसँ सजाओल, छह मास ई सभ बसहा-बड़द लऽ कऽ भिक्षाटन करैए। रहौर-रठौर सभ सेहो भिक्षाटनेसँ गुजर करैए। बच्चाकेँ पाच सेहो लगबैए पहद्दीबला सभ… छोट मोट शीतला मैया अल्प बएस कऽ हे डाला लेने ना, मैया फूल लढ़ऽ चलली हे डाला लेने ना। फूल लोढ़िते मैयाक घामे शरीर हे घमा गेलनि ना मैयाक माथक सिनूर हे घमा गेलनि ना। आ पड़ि गेलै ममतोड़केँ पाच। ममतोड़ सङे खेलाइत बनि जाइ छल मुखदेव राज कोतवाल। मुखदेव- (ठहकैत) हूँ, अँह, हूँ-हूँ… ममतोड़-हमरा बाड़ी हमरा बाड़ी के ठहकैए? मुखदेव-राज कोतवाल.. ममतोड़-की की मंगैए.. मुखदेव- अरबा चाउर नव ढकना, राजा बेटीक बियाह छिऐ एकटा कटहर मंगैए। अखन तँ खिज्जे छै.. मुखदेव- (ठहकैत) हूँ, अँह, हूँ-हूँ… ममतोड़-हमरा बाड़ी हमरा बाड़ी के ठहकैए? मुखदेवक मुँहपर हँसी आ आँखिमे नोर आबि जाइ छन्हि.. रुद्रमति पानि आनि कऽ दै छन्हि.. झिज्झिरकोना- झिज्झिरकोना कोन कोना? ऐ कोना, नै ओइ कोना… साहेबगंजक रस्ता, हम आ मुखदेव.. नै जानि पीअर बच्चाक के रहै खबरी। पीअर बच्चा, हँसैत खेलाइत गाममे टाटी-बेनाठी उठा देलकै। जागेश्वरकेँ धरि सभ बाट देखल रहै। मनिहारीघाट पहुँचबामे तत्ता-सिहर काटऽ पड़लै। कॉमरेड सभक पहुनाइ करैत गंगा टपला आ फेर आगाँ बढ़ला, मुदा पुलिस साहेबगंज पहुँचि गेल रहै। नै जानि के रहै भेदिया। घरक भेदिया। पीअर… भाग मुखदेव… पिंजड़ाक सुग्गा भागि कऽ कतऽ जाएत जागेश्वर… पुलिसबा जँ वर्दीमे रहितै तखन जागेश्वर ओकरा नै पार पाबऽ दैतै। मुदा हमरा सभकेँ तँ भेल जे कुटुम सभ स्वागत करै लेल आएल अछि। लग पासक जेलो नै लऽ गेल, बड़का आतंकीक चार्ज लगलै.. … से पटनाक जेलमे कड़ा सुरक्षामे… …..घनानन्द, हलधर, नोने, दौलति जहाँ, भट्ट भूषण आ रुद्रमतिक सुरक्षामे… पठा देलकै। ममतोड़ बाट ताकिये रहल हेतै.. पीअर बच्चा गाममे नै जानि की कहने हेतै। ममतोड़ की सोचने हेतै.. छुच्छो हाथ भैया अबितथि बैसितथि माड़ब चढ़ि रे ललना अपने सड़िया पहिरतौं भैया नाम लितौं रे सातम कल्लोल धुन-धुन धुन-धुन बोलै चरखा, डर लागै घमासान हो दक्षक पुनर्जन्म भेलन्हि हिमालयक रूपमे, आ ऐ जन्ममे हुनका उमा, पार्वती, गंगा, गौरी आ सन्ध्या ई पाँचटा कन्या भेलन्हि। हिमालय आ मनाइनक बेटी उमा, महादेवकेँ प्राप्त करबा लेल तपस्या करऽ चलि गेली.. माय उमाकेँ रोकलन्हि। मुदा ओ वरक रूपमे महादेवकेँ प्राप्त कऽ लेलन्हि। दोसर पुत्री पार्वती एकदिन कनक शिखरपर गेली आ बसहापर चढ़ि महादेवक संग चलि गेली। तेसर पुत्री गंगा रहथि। एक दिन महादेव भिक्षुक भेष धऽ एला आ गंगाकेँ जटामे नुका चलि गेला। बसहा-बड़द… मुखदेव फेर किछु शुरू करत…. ममतोड़क जन्म। मिथिलाक एकटा दलित परिवारमे भेल, आर्थिक आ सामाजिक दुनू रूपेँ दलित परिवारमे। सभ तरहक लोक गढ़ नारिकेलमे। आर्थिक रूपसँ दलितक संख्या बेशी। दू चारि घर छोड़ि कऽ सभ आर्थिक रूपेँ दलित, मुदा सामाजिक रूपसँ नीच ऊपर केर खधाइ। मुदा स्त्रीगणमे से कम, सामाजिक मेल-मिलाप स्त्रीगणमे बेशी। जखन ममतोड़ पेटमे रहथि तखन साहेबगंजवाली समएसँ खाइ-पीबै छलि, मुदा काज-उद्यम करिते छलि मुदा परमेश्वर हुनका भारी काज नै करऽ दै छला। ममतोड़क जन्म समाजक व्यवस्थासँ अपनाकेँ दूर रखबामे मदति केलक, लोक अपनेमे ओझरा गेल। आ समाजमे पहद्दीक बसहा-बड़दबला, ब्रह्मपुरक भाट, दीपक पमरिया, बेनीपट्टीक नट, घनश्यामपुरक गोक्को सभ सेहो छल। की होइ छै शिक्षा! जे शिक्षा माए आ समाज ममतोड़केँ दऽ रहल रहै की ओ शिक्षा स्कूलमे देल जाइत हेतै? से नै छै जे एकाध थापड़ माए ममतोड़केँ नै मारै छलै, मुदा आस्तेसँ। मुदा तकर ओकरापर कोनो असरि नै पड़ै छलै। हँ जँ कहियो माए ममतोड़सँ वा ममतोड़ माएसँ बाजा भुकी बन्न कऽ दै छल तखन जे एक दोसराक आगाँ-पाछाँ करै छल से मुदा देखबा जोगर होइ छलै, हमरो लेल आ बाबूओ लेल। डेढ़ मास तक तँ ममतोड़ ने बोलारे देलापर हँसिते छल आ ने कोनो काने-बात दै छल। मुदा डेढ़ मासमे ओ हँसऽ लागल। हमर करेज शान्त भेल मुदा माए कहलक जे ई तँ सभ बच्चा संगे होइ छै। तीन मास होइत-होइत ओकर हँसी लागए जे ठहक्कामे बदलि रहल छै। आ किछु दिनक बाद लगै साल भरिसँ पहिने, ओ अप्पन लोक आ अनठियामे भेद केनाइ सीखि गेल। जो……….., भेल ई भगवानसँ दूर, पएरक औंठा मुँहमे देमऽ लागल अछि। पाँच छह बरखक बाद तँ ओ सभ काज अपनेसँ करऽ लागल, खूब बाजए। गीत सभ सीखि गेल। हँ जहिया कहियो कोनो छौड़ी आकि छौड़ा ओकरा किछु तेहन गप कहि दै आ माए ओकर गप नै सुनै छलै तँ ओइ राति ओ खूब दाँत कटकटबै छल। माए कहै छलै जे छौड़ीकेँ पेटमे कीड़ा भऽ गेल छै। खिज्जा नीमक पात खूब खाए पड़ै छलै बेचारीकेँ। जागेश्वर आनि कऽ देने रहै खादीक टुकड़ा आ कहने रहै किछु झोरा बनबै लेल। माए कहलकै जे हम सभ झोरा कहाँ बनबऽ जानै छी, मुदा जागेश्वर कहलक जे ममतोड़ बना लेत, अहाँ निश्चिन्त रहू। आ ममतोड़ बना लेलक। खादी कपड़ा, कोनो छोट भेड़ाक बच्चाक चाम, तूर, मधुमाछीक छत्ता आ लकड़ीक छोट तख्ता। ममतोड़ कुरेड़ीकेँ मधुमाछी छत्तासँ मंत्र पढ़ि मधु निकालैत देखने अछि: आँट बान्हू, साँट बान्हू, बान्हू अपन काया सत गुरुक बान्हू काया, सूर महामाया। मधुमाछीक छत्ता एकटा दुनियाँ अछि, आइ काज आएल। आ तइपर सँ तरह तरहक नक्काशी। धर्मडीहावालीक बेटी लखनी, मेटरसवालीक बेटी फूदो, बेहटवालीक बेटी सुगन, धेपुरावालीक बेटी फुलो, मोहलीवालीक बेटी सोमनी, जगदरवालीक बेटी मरनी, कोठियावालीक बेटी भुल्ली, तमुरियावालीक बेटी भूरी, जेठियाहीवालीक बेटी भुरकुरी, मछधीवालीक बेटी कलकुसरि, बलाटवालीक बेटी घुट्टरि, गंजवालीक बेटी मुनेसरी, चनौरावालीक बेटी लुखिया आ नवानीवालीक बेटी कुसुमा। खादी आ चामक झोरापर जे नक्काशी ई सभ मिलि कऽ केलक से अद्भुते। जागेश्वर सभ टा झोरा कॉमरेड सभमे बाँटि देलक। आ हमरा घरमे चरखा सेहो आबि गेल। हमरे घरमे किए, ममतोड़क सभ संगी साथीक घरमे। आ गढ़ नारिकेलमे रंग बिरंगक कपड़ा लोक सभ पहिरऽ लागल। बनजारा सभसँ शिक्षा लेबा लेल कहै छल जागेश्वर। गामे गाम घुरैए ओ सभ मुदा कपड़ा लत्ता केहन रंग-बिरंगक पहिरै जाइए। धुन-धुन धुन-धुन बोलै चरखा, डर लागै घमासान हो धक-धक धक-धक धड़कै छतिया, डर लागै घमासान हो गुल-गुल गुल-गुल पिउनी लागै, दुलकै हिया झमान हो जाड़ा बीतल, गरमी बीतल, बीतल भादो साओन हो एखनौं धरि नै ऐल निर्मोहिया, हुक-हुक करै परान हो धुन-धुन धुन-धुन बोलै चरखा, डर लागै घमासान हो ऐ देशक स्वतंत्रताक बाद ई चर्खाक धुन-धुन कानमे भय किए उत्पन्न कऽ रहल अछि। मुदा बा झाक घटनाक बाद ओकरामे विचित्र तरहक भय आबि गेल रहै। पहिनहियो ओकरा डर होइ छलै। हमरो होइ छल। ऐ जीवनकेँ लऽ कऽ, ऐ मृत्युकेँ लऽ कऽ। माए कहै छलै ओकरा जे अगिला जन्ममे ओ राजकुमारी बनि कऽ जन्म लेत। आ ऐ जन्ममे की ओ राजकुमारी नै अछि? मुखदेव आ दयाराम सन भाइ छै आ परमेश्वर सन बाप छै। -आ तोरा सन माए। - ई कहैत ममतोड़ हँसऽ लगै छलि। मुदा बा झाक घटनाक बाद.. पहिने बियाहक गपपर ओ कहै छलि जे हम बियाह नै करब, माए-बाप आ भाइ संगे जिनगी भरि रहब। मुदा बा झाक घटनाक बाद ओ एक्को बेर किछु नै बाजलि। जेना ई गाम ओकरा लेल नग्र बनि गेल हुअए जकरा ओ छोड़ि कऽ जाए चाहै छलि। ऐ स्वतंत्र भेल वा नै स्वतंत्र भेल देशक जेलमे मुखदेव राम, स्वतंत्रता सेनानीक प्रश्न सुनि घनानन्द, हलधर, नोने, दौलति जहाँ, भट्ट भूषण, रुद्रमति आ रघुवरन स्तब्ध अछि। आठम कल्लोल आजु धीया कोना अमा बिनु रहती/ छन-छन उठति चेहाय बाह.. मिथिलाक मुखराम… आर एकटा खिस्सा.. सगर राजाक पत्नी रहथि शैब्या आ हुनकासँ असमंजस नामक पुत्र भेलन्हि। असमंजस.. हँ हौ असमंजस… दोसर पत्नी वैदर्भीसँ कोनो बच्चा नै भेलन्हि। वैदर्भी महादेवक सए बरख तपस्या केलन्हि तँ एकटा लोथ जन्म लेलकन्हि। महादेव एला आ लोथकेँ साठि हजार खण्डमे काटि ओतेक तौलामे राखि झाँपि देलनि। ई सभटा किछु दिनमे पुत्रक रूप लेलक। सगर राजाक सएम अश्वमेध यज्ञक इन्द्र विरोधी भेला कारण तखन सगर शतक्रतु इन्द्र भऽ जेता। इन्द्र यज्ञक घोड़ाकेँ लऽ भागि गेला आ कपिलक आश्रममे बान्हि देलखिन्ह। साठियो हजार पुत्र कपिलपर दौगला, ओ तपस्यालीन छला आ अपन क्रुद्ध आँखि खोलि सभकेँ जरा देलन्हि। वैकुण्डसँ गंगाकेँ अनबा लेल असमंजस आ तकर बाद हुनकर पुत्र दिलीप आ तकर बाद तिनकर पुत्र अंशुमान तपस्या करैत-करैत मरि गेला। अंशुमानक पुत्र भगीरथक तपस्यासँ विष्णु प्रसन्न भेला आ गंगाकेँ मृत्युलोक लऽ जेबाक अनुमति दऽ देलन्हि। महादेव हिमालयपर जा कऽ स्वर्गसँ उतरैत गंगाकेँ अपन जटामे राखि सम्हारि लेलन्हि.. मुदा जे ओ आगू बढ़ली तँ जहु ऋषिक कुटी दहाए लागल। जहु ऋषि गंगाकेँ पीबि गेला। मुदा फेर ओ गंगाकेँ छोड़ि देलन्हि आ तहियासँ गंगा हुनकर पुत्री जाह्नवीक रूपमे विख्यात भेली। फेर अन्तमे सगरक पुत्र लोकनि द्वारा घोड़ाक खोजमे खुनल ओइ खाधिमे गंगा खसली जे आब सागर कहाबए लागल आ ऐ तरहेँ सगरक पुत्र सभकेँ सद्गति भेटलन्हि। बाह… सद्गति.. गंगाक किनारमे जागेश्वर आ मुखदेवकेँ अंग्रेजिया सिपाही सभ पकड़लकन्हि आ सद्गति देलकन्हि। मुखदेवकेँ सद्गति कहाँ भेटल छन्हि, हँ गंगाक किनारक ऐ बाँकीपुर कैम्प जेलमे जागेश्वरकेँ धरि सद्गति अवश्य भेटि गेल छन्हि। गाममे रंग-बिरंगक पुरहित सभ। बिन्देश्वर ठाकुर हजाम छथि, ओ हजामक अलाबे इलाकामे केओट आ धानुकक बियाह सेहो करबै छथि। रामावतार राउत बरइ, चमार, ततमा आ धानुकक पुरहित छथि, संगमे अनकर सेहो, सत्यनारायण भगवानक पूजा, सरस्वती पूजा, घरबास पूजा, होम, बिआह, श्राद्ध कर्म करबै छथि। घूरन राम मुसहर आ चमारक पुरहित छथि, ब्राह्मण पुरहित ॐ नै पढ़बै छलै खाली नमो पढ़बै छलै से जागेश्वर आ मुखदेवक कहलापर घूरन राम पुरहित बनि गेला, बियाह करबै छथि, पूजा करबै छथि आ दिन ताकै छथि। मुदा श्राद्धकर्म नै करबै छथि, हिनका सभमे श्राद्ध कर्म गोधनपुर गामक लछमी राम आ कछुआक कोना राम करबै छथिन्ह। ममतोड़क बियाहक पुरहित यएह रहथि आ नौआ रहथि लक्ष्मी ठाकुर। नौआकेँ बेशी खटऽ पड़ै छै मुदा दान दक्षिणामे छहे आना नौआक आ दस आना पुरहितक होइ छै। बिधक बीचेमे ऐ बातपर दुनूमे बहसा-बहसी सेहो होइ छन्हि। लक्ष्मी ठाकुर पुरहित नै बनि सकला, मुदा हिनकर पिता बिदेश्वर ठाकुर केओट, नौआ आ धानुकक पुरहित रहथि, बिआह पूजा आ श्राद्धकर्म करबै छला। जीवछ राम सेहो चर्मकारक पुरहित छथि। नरहियाक सत्तो मण्डल धानुक आ आन आन जातिक पुरहित छथि। कपिलेश्वर राउत सत्यनारायण पूजा, सरस्वती पूजा आ बियाह करबै छथि। रामनारायण राउत पहिने बियाह आ पूजा करबै छला मुदा आब नै। पहिने किछु दिन शंका भेलै जे ब्राह्मण पुरहित नै रहने किछु अनिष्ट भऽ सकैए, मुदा आब सभ किछु ठीक छै, सभ बुझि गेल अछि जे ऐ सभसँ किछु नै होइ छै। बियाहक एकदिन पहिने कुमरम। खेतमे मटकोर, मड़बा भरै लेल ममतोड़ आ चारि गोट स्त्रीगण खेतसँ माटि अनलथि। ओही माटिसँ चूल्हि बनल, ओइमे साँझमे लावा भूजल जाएत। कुमरम दिन बम-ब्राड़ कऽ नोतल जाइए, विघ्न निवारण लेल पितरक अनुमति मांगल जाइए, हुनका उपस्थिति लेल आग्रह कएल जाइए। खूब ढोल-पिपही बजैए। गितगाइन सभकेँ तेल, सिनूर देल जाइए। बिलौकी मांगब माने समाज अहाँक काजमे सहयोग दऽ रहल अछि। बियाहक पहिने रातिमे घरक गोसाँइक सोझाँ बाँसक करची, खड़ही आ केराक पात राखल गेल, ई छी पुरबा-पछबा। आ ऐ पुरबा-पछबाकेँ बान्हल गेल। सभक नजरि-गुजरि खतम आ ममतोड़क वंश बाँसक करची, खड़ही आ केराक पात सन बढ़त। आइ बियाहक दिन अछि। तिरहुत आ बटगवनी गीत सभ, ऐ घरसँ ओइ घर, भगवती घर, केश फेकबा काल आ नगहर भरै लेल जाइ काल गाओल जाइए। मलार, बाटमे, साओन भादवमे, रस्ता काल विध कालमे… पावस, झूलन- रास- ग्वालरि- झूमरि- कजरी, चौमासा- छौमासा, साओनमे रस्तामे। चैतमे चैतावर। कुमारि कनियाँ तुसारि पुजबए। साँझ पाबनि, तिला संक्रान्तिमे। बियाह दिन नगहर भराइ छै, कोबर घरमे राखल रहै छै। पालोपर सिनूर पिठार लगा कऽ अरिपन दऽ कऽ, वर कनियाँ बैसा कऽ कौआ डकैसँ पहिने भगवती गीत, गोसाउनि गीत, ब्राह्मण गीत गाबि कऽ… ब्राह्मणक गीत माने ग्रामदेवताक गीत। मधुखार पाँच गो अहिबाती लगबै छथि, नगहरक पानि ढारल जाइए, धोअल जाइए… शुभे हे शुभे बजै छथि.. बियाहमे शुभे हे शुभे आ मूड़न आ जागेश्वरक उपनयनमे जीबह हे जीबह.. गनियारि पिसबाक गीत, चिल्कौरकेँ बच्चा भेलापर पिबऽ लेल देल जाइ छलै... तेल-कसाय- मधुखार-, मूड़न, उपनयन, बेटीक बियाहमे, दही हरदि माथपर लगेने आ पानि ढारि धोअल जाइए। ममतोड़क हाथसँ पाँच हाथ चाकर आ सात हाथ नाम मड़बा बान्हल गेल, नौ-एगारह हाथक मड़बा लेल आंगनमे जगह नै अछि। साहेबगंजवाली ऐ मड़बाकेँ निपबा रहल छथि, सात बेर अवश्य निपबाक अछि साँझ धरि। बर-बरियाती अबैए। मौर लेल मालीकेँ साइ देल छै, आनल जाइए, पानिसँ परिछल जाइए। ब्रह्मस्थानमे घोड़ा राखल अछि, माँटिक घोड़ा। बरहम बाबाक दर्शन-पूजा वर-बरियाती करै छथि। गामक रक्षक छथि ई बरहम बाबा। आ वरक संग लोकनियाँ हर-हमेशा मौजूद, मर-मजाक रोकबा लेल। आमक पातपर वरक पुरखा आ कनियाँक पुरखा पुरहित लिखै छथि, आङनक दुआरिपर वरक परीक्षण कएल जाइए, ऐ परीक्षणमे सभ पास होइते अछि। काछुक खपलोइयामे सरिसौ तेलक बाती, कच्छदीप अछि तँ कच्छपे सन दीर्घ उमेर ममतोड़ आ ओकर वर लेल निश्चित… वर मड़बाक तीन फेर चक्कर लगबैए। फेर जागेश्वर वर पक्ष आ कन्या पक्षसँ ५-५ मुट्ठी धान लैए आ आङनक दक्खिन-पच्छिम कोणमे राखल उक्खरिमे दैए। वर आ ओकरा गामक आर सात गोटे सौंस सुपारी हाथमे लऽ समाठ लऽ ठाढ़। माले ठाकुर पीअर ताग समाठमे बान्हि ओइसँ आठो गोटेकेँ बान्है छथि, सभ तीन-तीन बेर उक्खरिक धान समाठसँ कुटै छथि। फेर हाथक सुपारी पुरहितकेँ देल जाइए। माले ठाकुर उक्खरिसँ चाउर बहार करै छथि, आमक पातपर दही, चाउर दै छथि, पीअर तागक कंगन कनियाँ आ वर लेल बनबै छथि आ परमेश्वरकेँ दै छथि। मड़बापर ममतोड़क वर पूब मुँहे बैसैए। परमेश्वर वरक सोझाँ पच्छिम मुँहे बैसैए। आमक पल्लोक बैसकी परमेश्वर वरकेँ दै छथि, ओ ओकरा पएरक तरमे उत्तर दिशामे राखि लै छथि। फेर वरकेँ आँजुरसँ जल दै छथि परमेश्वर। वर पहिने दहिन फेर वाम पएर धोबै छथि। फेर दोसर आमक पल्लोक बैसकी परमेश्वर वरकेँ दै छथि, ओ ओकरो पएरक तरमे उत्तर दिशामे राखि लै छथि। सम्मर गाओल जाइए, बियाह काल। सीता सम्मर, गौरी सम्मर, रुक्मिणी सम्मर। फेर परमेश्वर अर्घपात्रमे दूभि, अच्छत, फूल, चानन दऽ वरकेँ दै छथि। वर कने दूभि, अच्छत, फूल, चानन अपन माथपर लै छथि आ शेष पूब आ उत्तर कोणमे फेकै छथि। फेर परमेश्वर वरकेँ जल दै छथि आचमल लेल। वर आचमन करै छथि; वाम हाथक तर्जनीकेँ औंठासँ दबाबै छथि, फेर मध्यमा, कनिष्ठा आ अनामिका जोड़ै छथि आ फेर हाथक नीचाँ तीन बेर ठोढ़ सटा कऽ गट्टा लगसँ जल ग्रहण करै छथि आ चारिमे बेर ओकरा गट्टा दिससँ पात्रमे खसबै छथि। फेर परमेश्वर कांस्यपात्रमे झाँपल राखल बाटीमे दही, मधु, घी वरकेँ दै छथि। वर ऐ मधुपर्ककेँ वाम हाथमे राखि ढकना उघारै छथि। अनामिकासँ सभ वौस्त मिलबै छथि। अनामिका आ औंठासँ तीन बेर फेकै छथि फेर अनामिका आ औंठासँ तीन बेर ठोढ़मे लगबै छथि आ अपन वाम राखि दै छथि। फेर वर हाथ धोबै छथि। आचमन करै छथि आ फेर मुँह, नाक, आँखि, कान, कान्ह आ जाँघ पहिने दहिन-फेर वाम एना बेरा-बेरी छुबै छथि। फेर सौंसे देहकेँ हँसोथै छथि। फेर माले ठाकुर वरक आँजुरमे एकटा खढ़ दै छथि। वर मंत्र पढ़ि खढ़ तोड़ैए। वर वेदीपर जाइए, पुरहित मारि होम करैए। भुस्सा, आँकड़-पाथर आ केश नै रहबाक चाही ओतऽ। पुरहित एकहाथ नाम आ चाकर भूमि कुशसँ बहारैए, ओइ कुशकेँ पूब आ उत्तर कोणमे फेकैए, स्थानकेँ गाइक गोबरसँ नीपैए। फेर ठुट्ठी, औँठा आ तर्जनी पसारि दच्छिन, बीच आ उत्तर भागमे पूबे-पछिमे नापैए। ई तीनू नापल स्थानपर स्रुवसँ पच्छिमसँ पूब रेखा बनबैए। स्रुवकेँ दक्षिणमे राखि तीनू रेखापरसँ औंठा आ अनामिका आङुरसँ माटि लऽ फेकैए। भूमिपर जलक छिच्चा दैए। कांस्यक पात्रसँ आगि आनैए आ पच्छिम मुँहे अग्नि राखैए आ आमक ठहुरी ओइमे दैए। वर उठैए आ कोबर घरसँ ममतोड़केँ आनैए, कोबर घरमे सुगापंछी रंगक पाँखि आ लाल ठोरबला दूटा लटपटिया सुग्गाक चित्र भीतपर लिखल छै। चारू कोणपर नैना योगिन माथपर डाली लेने लिखल अछि। पहिल कोणमे फकड़ा पढ़ल जाइए: थिकौं बंगालिन बसी बंगाला, सुरपुरसँ एलौं अछि बिना नदी कऽ नाओ बहाओल, अपन तरहत्थी दही जमाओल कोठी ऊपर वर नचाओल आलरि-झालरि कावरि माथे, सिर ऊपर बीअनि माथे पहिल योगिनी अपन सासु हे, आबे बाबू पड़ल योगिनियाँ बास हे दोसर कोणमे फकड़ा पढ़ल जाइए: यमुना तीरे कुंज कृष्ण बसै छथि गोपी दधि लए चलि नै सकै छथि बालक माए चेहों चेहों करै छथि। आलरि-झालरि कान्हे कामरु, हाथे बीअनि ई योगिनियाँ पितिया सासु हे आबे बाबू पड़लौं योगिनियाँ बास हे तेसर कोणमे फकड़ा पढ़ल जाइए: सोहए रे पनपट्टा पानी भरए लए जाएले बाटपर ठाढ़ि बेटी बसिया बजाएले तोरा के कहलकौ बेटी लाजो ने भेल रे तोँ तँ भेलि जुआनि बेटी तेँ सम्हारि ने सकलेँ मन रे आलरि-झालरि कान्हें कामरु माथे बियनी तेसर योगिनियाँ पिसिया सासु हे आबे बाबू पड़ल योगिनियाँ बास हे चारिम कोणमे फकड़ा पढ़ल जाइए: काँच बाँस काटि कऽ बंगाल घर छारि कऽ एत्ते एत्ते राति पिया कतएसँ एलौं हे राहड़िक खेत पोखरौनासँ आएल छी हाथमे टुन-टुन पएरमे काड़ा कर दमनियाँ नैन योगिनियाँ एक पटोर तर दुइ रे कुमारि बाम छौ कनियाँ दहिन छौ सारि आलरि-झालरि कान्हें कामरु माथे बीयनि चारिम योगिनियाँ मसिया सासु हे आबे बाबू पड़ल योगिनियाँ बास हे वर ममतोड़केँ मड़बापरबैसाबैए। खादीक साड़ी आ खादीक आंगी दैए। परमेश्वर वरकेँ एक जोड़ धोती दै छथि। वर आ ममतोड़ दू-दू बेर आचमन करै छथि। परमेश्वरक कहलापर ममतोड़ आ ओकर वर एक दोसराकेँ देखै छथि। परमेश्वर वरक दहिना हाथक गट्टामे आ ममतोड़क वाम हाथक गट्टामे आमक पातक कंगन पहिराबै छथि। फेर पीअर नव वस्त्रक टुकरामे दू मुट्ठी धान, दू ढेकी हरदि, दू गोट सुपारी, दूभि आ पाइ बान्हि जन्मग्रन्थि बनबै छथि आ वरक तौनीक खूँटमे बान्है छथि। परमेश्वर अर्घपात्रमे दूभि, अच्छत, फूल, श्रीखण्डचन्दन, सुपारी लऽ वरक दहिन हाथपर ममतोड़क दहिन हाथ राखै छथि, ओइपर अर्घपात्रकेँ पूब मुँहे दऽ अपन दहिना हाथे ऊपरसँ पकड़ि कन्यादान करै छथि। फेर परमेश्वर अर्घपात्रक ऊपर दक्षिणाक पाइ राखि जलसँ सिक्त करै छथि, वरकेँ ई दक्षिणा दै छथि। वर आ ममतोड़ वेदीपर जाइए। वेदीक दक्खिन घैलमे पानि आ पल्लव राखल रहैए। परमेश्वरक कहलापर वर आ ममतोड़ फेर एक दोसराकेँ देखै छथि। तखन आगाँ पुरहित, फेर ममतोड़ आ तकर पाछाँ वर अग्निकेँ दहिन कऽ चारू कात घुरै छथि। फेर आगिक पच्छिममे सभ पूब मुँह भऽ बैसै छथि। पुरहित, तकर दक्षिण वर आ तकर दक्षिण ममतोड़। पुरहित कुशक ब्रह्मा आ कुश तिल जल लऽ मंत्र पढ़ै छथि। फेर आगिक दक्खिनमे अच्छतपर ब्रह्माकेँ बैसबै छथि। पुरहित प्रणीता-पात्र आगू करै छथि, ओकरा इनारसँ आनल जलसँ भरै छथि, कुशसँ झाँपै छथि, ब्रह्मा दिस ताकै छथि, आ पात्र आगिक उत्तर कुशपर राखै छथि। आब पुरहित कुश पसारऽ लागै छथि; दक्खिनसँ पूब-उत्तर दिस; फेर ब्रह्मासँ अग्नि धरि; फेर दक्खिन पच्छिमसँ पच्छिम-उत्तर धरि; आ फेर आगिसँ प्रणीता-पात्र धरि। कुशक आगाँक भाग सदिखन उत्तर दिशामे रहैए। आगि उत्तर पच्छिमसँ पूब तेकुशा, दू पातक दू कुश (पैता बनेबा लेल), पशुपर पानि छीटल जाइबला पात्र (प्रोक्षणीपात्र), घीक बाटी, सम्मर्जन कुश, कुशक गूहल विरनी, तीनटा समिधा लकड़ी, स्रुव, घृत, आरब चाउरक बासन, लावामे शनिक पात मिलाओल, चन्द्रौटा, कोनियाँ। आ ओइसँ आगाँ मुखदेव। तखन एक ठुट्ठीक दूटा पैता कुशसँ बना, हाथमे लऽ प्रणीता पात्रक जल प्रोक्षणी पात्रमे तीन बेर दऽ, दुनू हाथक अनामिका आ औँठासँ उत्तर दिश नोक कऽ पैता धऽ तीन बेर प्रोक्षणीक जलसँ अपन माथपर मार्जन। प्रोक्षणीपात्र आ प्रणीतापात्र। पशुपर पानि छीटल जाइबला पात्र अछि प्रोक्षणीपात्र, आ राधामोहन रायक खुनाओल गढ़ नारिकेलक सभ टोलक इनारक जल अछि प्रणीतापात्रमे। फेर प्रोक्षणीपात्रकेँ वाम हाथमे राखि दहिना औंठा आ अनामिकासँ पैंता पकड़ि तीन बेर ओकर जलकेँ ऊपर छीटि प्रणीताक जलसँ प्रोक्षणीक जलकेँ सिक्त कएल गेल आ प्रोक्षणीक जलसँ सभ वौस्तकेँ सिक्त कएल गेल। फेर आगि आ प्रणीताक बीचमे प्रोक्षणीकेँ राखि देल गेल। स्रुवकेँ धिपा कऽ कुशक अग्रभागसँ स्रुवक भीतर आ कुशक जड़िसँ स्रुवक पाछाँक भागकेँ झाड़ि, प्रणीताक जलसँ सिक्त कऽ तीन बेर स्रुवकेँ आगिमे धिपा दक्खिन भागमे कुश राखल गेल। घीकेँ अग्निक चारू दिस घुमा ओइमे दऽ पैता हाथे अनामिका आ औंठासँ घी लऽ माथपर मार्जन कऽ माने निर्मल शुद्ध कऽ, घीक बाटीकेँ देखि ओइमेसँ जँ काठी वा आन चीज जे उड़ि कऽ गेल रहै, से हटा देल गेल। फेर माथपर मार्जन कएल गेल। फेर विरनी वाम हाथमे राखि मोनसँ प्रजापति ब्रह्माक ध्यान धऽ घी लगाओल तीनू ठुहड़ी-समिधा आगिमे धऽ देल गेल। फेर पुरहित बैसि गेल। प्रोक्षणीक जलसँ हाथसँ आगिक प्रदिक्षणा करैए आ आगिकेँ सिक्त करैए। प्रणीतापात्रमे दुनू पैता राखि, दहिन ठेहुन खसा कऽ कुशसँ ब्रह्मासँ सम्पर्क करैए। धधकैत आगिमे स्रुवसँ आहुति दैए आ अवशिष्ट घृतकेँ प्रोक्षणीपात्रमे खसा दैए। पुरहितक होम खतम भेल। ममतोड़ आ ओकर वर आगिक पच्छिममे पूब मुँहे ठाढ़ भऽ गेलथि। आगाँ ममतोड़ आ पाछाँ वर। वर पाछाँसँ दुनू दिससँ हाथ आगाँ कऽ अपन आँजुरमे ममतोड़क आँजुर लऽ लेलक। हम शनिक पात मिलाओल लावा आ घी ओइ आँजुरपर राखि देलिऐ। ममतोड़ लावा आगिमे धऽ दैए। वर ममतोड़क दहिन हाथ पाँचो आंगुर धऽ दहिना हाथे पकड़ैए, ममतोड़केँ आगिक उत्तरमे पूब मुँहे ठाढ़ कऽ चन्द्रौटापर ओकर दहिना पएर रखबाबैए। ममतोड़क रक्षाक ओ प्रतिज्ञा लैए। आगू ममतोड़ पाछाँ वर प्रणीता आ ब्रह्माक संग आगिक प्रदीक्षणा करैए। ममतोड़ आ ओकर वर आगिक पच्छिम-पूब मुँहे ठाढ़ भऽ लावा छिरियाबै छथि। फेर वर ममतोड़क दहिन हाथ पाँचो आंगुर धऽ दहिना हाथे पकड़ैए, ममतोड़केँ आगिक उत्तरमे पूब मुँहे ठाढ़ कऽ पाथरपर पएर रखबाबैए आ आगिक प्रदीक्षणा करैए आ ममतोड़ आ ओकर वर आगिक पच्छिम-पूब मुँहे ठाढ़ भऽ लावा छिरियाबैए। फेर तेसर बेर वर ममतोड़क दहिन हाथ पाँचो आंगुर धऽ दहिना हाथे पकड़ैए, ममतोड़केँ आगिक उत्तरमे पूब मुँहे ठाढ़ कऽ पाथरपर पएर रखबाबैए आ आगिक प्रदिक्षणा करैए आ ममतोड़ आ ओकर वर आगिक पच्छिम-पूब मुँहे ठाढ़ भऽ लावा छिरियाबैए। आब ममतोड़ अपन दुनू हाथपर कोनियाँ राखैए आ हम ओइपर लावा दै छी। वर ममतोड़क पाछाँसँ दुनू हाथेँ कोनियाँ पकड़ैए आ ममतोड़ आगिमे लावा दैए, फेर वर आ ममतोड़ चारिम बेर प्रदिक्षणा करै छथि। फेर वर आ ममतोड़ बैसि गेल। पुरहित कुशसँ ब्रह्माकेँ छुबैत, मोनसँ अगिला मंत्र पढ़ैए, श्रुवसँ घी लऽ आगिमे हवन करैए, आ स्रुवमे लागल घीकेँ प्रोक्षणीपात्रमे झाड़ैए। आगिक उत्तर सातटा गोल अरिपनमे पएर रखैत ममतोड़। पुरहित हवनमे लागले अछि; स्रुवसँ घी लऽ आगिमे हवन करैए, आ स्रुवमे लागल घीकेँ प्रोक्षणीपात्रमे झाड़ैए; फेर भरल घैलक जलमे देल आमक पल्लोसँ वर-वधूपर जल छीटैए। वर ममतोड़केँ ध्रुवतारा देखबैत अछि। वर ममतोड़क दहिन कान्हपर बाँहि धऽ ओकर हृदयक स्पर्श करैए। पुरहित कुशसँ ब्रह्माकेँ छुबैत मोनसँ अगिला मंत्र पढ़ैए, स्रुवसँ घी लऽ आगिमे हवन करैए, आ स्रुवमे लागल घीकेँ प्रोक्षणीपात्रमे झाड़ैए। आचमन कऽ, अनामिका आंगुरसँ घी ठोरमे लगा, फेर आचमन कऽ, तेकुशा तिल-जल लऽ घैल भरि चाउर ब्रह्मा लेल पुरहितकेँ देल जाइए। तखन आगिक प्रदीक्षणाक क्रममे कुशक ब्रह्माक गीरह खोलि देल गेल, दुनू पैता लऽ प्रणीतापात्रक जलसँ पुरहित अपन आ वरवधूक माथ सिक्त करैए आ पूब-उत्तर कोणमे प्रणीतापात्र ओंघरा दैए। छिड़िआएल कुशकेँ एकट्ठा कऽ घी लगा आगिमे धऽ दैए। पुरहित उठैए, स्रुवसँ घी, फूल, फल, सुपारी लऽ आगिमे धऽ दैए। वर स्रुवसँ भस्म आनि अपन दहिन हाथक अनामिकासँ भस्म लऽ अपन कपारपर ठोप करैए। ममतोड़क कपारपर सिन्दूर फेंटल भस्मसँ वर ठोप कऽ दैए। वर ममतोड़क पाछाँ ठाढ़ भऽ सिन्दूरदानक पात्र लऽ शनिक पात, पटुआक सोन, साँख, सोहगैली आ घेंघीक देल सुवर्ण संगे सिन्दूर लऽ कनियाँक सीथमे नीचाँसँ ऊपर मुँहे सिन्दुरदान करैए आ घोघटक पटोरसँ झाँपि दैए। तीन बेर ओ ई करैए। साहेबगंजवालीक आँखिसँ नोर टघरि गेल छै। वर बैसि जाइए, कुश-तिल-जल लऽ पुरहितकेँ दक्षिणा दैए। फेर वर आ ममतोड़ वेदीपरसँ मड़बापर आबि गेल आ सभक आशीर्वाद लेबऽ लागल, सोहाग लेबऽ लागलि ममतोड़। बरियाती खाइ काल डहकन गाओल जाइत अछि, बरियत्ता गीत तकर बाद गारि बला गीत। जोग वरकेँ जादू-टोनासँ बचेबा लेल; ग्राम देवता लेल बाह्मन-ब्रह्मा, धर्मराज लेल धर्माक गीत। अगिला दिन तेल-उबटन लगेलक दुनूँ गोटे आ सूर्यकेँ प्रणाम केलक। दिनुका बियाह रहितै तँ वेदीयेपर सूर्य देखितए मुदा रतुका बियाह रहै तेँ ध्रुवतारा देखने रहए। चलू आइ सूर्य नमस्कार केलक। घरसँ बहराएल ममतोड़, फेर घुरि कऽ आएल। फेर साड़ी बदलि खोँइछ लऽ घूर-बहूर भेलै। आ ओ बिदा भऽ गेलि, साहेबगंज लेल। दीन-द्विरागमन बियाहमे घूर-बहूर भऽ गेल आ ममतोड़क बिदाइ भऽ गेल, लोकनियाँ संग गेल ममतोड़। बेटा कुमार गीत वरक घरपर गाओल जाइत अछि। ऐहबऽ फर वरक ऐठाम गौना-द्विरागमनमे बाँटल जाइत अछि। विदागरी बियाहक अगिला दिन, समधी मिलान, चादरिसँ दुनू समधि झँपा जाइ छथि आ गरा मिलै छथि। मड़बापर एक्कोटा लावा पएरतर नै पड़ऽ देल जाइए, एक गोटे ओकरा बिछै छथि, ई संग जाइए कनियाँक। वरक ऐठाम सेहो लावा भूजल जाइए, ओइ भूजैबला बासनमे चारिम दिन, चौठारी दिन वर कनियाँ गामक बाहर जाइबला चौराहापर बासन फोड़ि दै छथि। जे लावा मड़बापर ककरो पएरमे नै लागैए से लोक सभक पएरसँ पिसीमाल होइए। जतेक लोक ओकरा पिसीमाल करत ततेक बड़कति ऐ वैवाहिक गठबंधनमे हएत। जागेश्वर सभमे चतुर्थी कनिये ऐठाम होइ छै, सावर्ण, वत्स आ काश्यप गोत्रमे बियाह दिन लगा कऽ पाँचम दिन सूर्योदयसँ पूर्व- पाँच थारी आ शाण्डिल्य आ आन गोत्रमे बियाह दिन लगा कऽ चारिम दिन सूर्योदय भेलापर- माने चारि थारी। बा झाक घटनाक बाद जे भय ममतोड़मे हम देखने रहिऐ से आइ खतम बुझाएल। बड़ रे जतन सँ सिया जी केँ पोसल सेहो रघुवंशी नेने जाय। कौने रंग डोलिया कौने रंग ओहरिया लागि गेल बतीसो कहार। लऽ कऽ निकसल बिजुवन सखिया ओइ वन केओ ने हमार। केयो जे कानय राजमहलमे केओ कानय दरबार। केओ जे कानय मिथिला नगरमे जोड़ि सँ बिजोड़ि केने जाय। आजु धीया कोना अमा बिनु रहती छन-छन उठति चेहाय। लोकनियाँ घुरि कऽ आएल आ सभटा जानकारी देलक। माएकेँ भरोस भेलै। सात दिनपर जे भार जाइ छै से संगे लोकनियाँ लऽ कऽ गेल छल। दौलति जहाँ आ रुद्रमतिक फरमाइसपर रहए मुखदेवक अझुका खिस्सा। दौलति जहाँ आ रुद्रमतिकेँ अपन-अपन बेटीक बिदाइ मोन पड़ि गेलन्हि। नोरसँ डबडबाएल आँखि तँ पुरुष स्रोताक सेहो छलन्हि। मुदा मुखदेवक आँखि कोनो शून्यमे बौआ रहल छल। नौम कल्लोल मुँह चन्द्रसन, आँखि कमलसन, भोँह कामदेवक धणुषसन, ठोर पाकल तिलकोरसन, नाक सुग्गाक लोलसन, बोली कोइलीसन आर एकटा खिस्सा.. सतीक मृत्युक बाद महादेवकेँ विरक्ति भऽ गेलन्हि। तखन ताड़कासुर ब्रह्माकेँ प्रसन्न कऽ महादेवक पुत्रक अतिरिक्त ककरो आनसँ नै मरबाक वर लऽ लेलक आ देवताकेँ स्वर्गसँ भगा देलक। तखन देवता लोकनि महामाया दुर्गाक आराधना केलन्हि आ ओ हिमालयक घरमे जन्म लेलन्हि। ओ बड़ गोर-नार छली से हुनकर नाम पड़ल गौरी। नारद एकदिन हिमालय ओइठाम एला आ गौरीक हाथ देखि कहलन्हि जे हिनकर विवाह महादेवसँ हेतन्हि। हिमालय गौरीकेँ दूटा सखीक संग महादेवक सेवामे पठा देलखिन्ह। देवतागण कामदेवकेँ हुनकर मित्र वसन्त आ स्त्री रतिक संग पठेलन्हि। वसन्त तँ ऋतु होइ छै.. हँ हौ, खिस्सा छिऐ, सुनने ने जाह.. गौरी जखन पहुँचली तखन कामदेव वाण चलेलखिन्ह। महादेव आँखि खोलि गौरीकेँ देखलन्हि। गौरी पूजा केलन्हि। महादेव हुनका देखि ढेर रास उपमा देलन्हि.. मुँह चन्द्रसन, आँखि कमलसन, भोँह कामदेवक धणुषसन, ठोर पाकल तिलकोरसन, नाक सुग्गाक लोलसन, बोली कोइलीसन। मुदा तखने झाँखुरमे कामदेवकेँ महादेव देखलन्हि तँ तेसर नेत्र क्रोधित भऽ खोलि देल आ कामदेव जरि गेल। रति मूर्छित भऽ गेली। रतिक विलाप देखि देवतागण एला आ कहलन्हि जे ताड़कासुरक वध लेल ई सभटा रचल गेल। महादेव कहलन्हि जे रति समुद्रमे शम्बर दैत्य लग जाथि। कृष्णक पुत्र प्रद्युम्नकेँ ओ दैत्य उठा कऽ लऽ जाएत। जखन प्रद्युम्न पैघ हेता तखन ओ शम्बरकेँ मारि रतिकेँ बियाहि द्वारका लऽ जेता। वएह प्रद्युम्न कामदेव हेता। बाह… ईहो नीक… गौरी कामदेवक दहन देखि डेरा गेली। नारद गौरीकेँ तपस्या करऽ लेल कहलखिन्ह। गौरी फेर पटोर खोलि देलन्हि आ कृष्णाजिन आ बल्फर पहीरि सखी संग गौरीशिखर चोटीपर चलि गेली। घोर तपस्या देखि ऋषि-मुनि संग नारद महादेव लग पहुँचला। महादेव गौरीक परीक्षा लेल भेष बना गौरीशिखर पहुँचला आ महादेवक ढेर-रास निन्दा केलन्हि। गौरी तमसा गेली तँ ओ सोझाँ आबि गेला आ विवाह लेल तैयार भऽ गेला। बाह.. जय औढरदानी। भूख आ पियास। पियासक इन्तजाम तँ गढ़ नारिकेलमे भऽ गेल आ काजक कोनो कमिये नै से खेबाक इन्तजाम सेहो भैये जाइ छल। बचल खेती, तँ मात्र खेतीये टा काजक गनतीमे थोड़बे अबै छै। मुदा सेहो खेती तँ जागेश्वर दैये देलक। मुदा ई द्वन्द्व, छोट-पैघक द्वन्द्व, लोको छोट-पैघ आ काजो छोट-पैघ। दुसाधक छूलासँ हड्डी छुआ जाइ छै। मुदा से कोना? जागेश्वरकेँ ओकर टोल-पड़ोसबला सभ बतहा नाम राखि देलकै। से किए? खेती नीक आ चमरखल्लाक काज अधला? मुदा खादी आ चमड़ा मिलि कऽ जे झोरा बनलै, ममतोड़ आ ओकर सभक संगी जे स्वतंत्रता संग्रामी सभकेँ बना कऽ देलकै? कमारक बनाओल हर, हाँसूमे धार कोना हएत जँ कमरसारि नै रहत? यएह सभ चिन्तन होइत रहै छलै छबड़ा सभक थइरमे। छबड़ा सभक थइर, ई एकटा पियासक नाम छल। मुखदेव, दुखन महतो, बासू चौपाल, जागेश्वर आ जीवछ मुखियाक बीच समस्या सभपर गप होइ छलै। एकटा समाधान ताकल जाइ छलै आ ओइ समाधानपर काज होइ छलै। पीअर बच्चा बैसकी बजबै छल, जँ ओकर दृष्टिकोण ठीक रहितै तँ हमर सभक काजक ओ समर्थन करितए। ओहो समस्यापर चिन्ता करै छल, मुदा हमर सभक समाधान होइ छलै ओकर चिन्ता! यएह रहै दृष्टिकोणक अन्तर। मुदा ऐ दृष्टिकोणक अन्तरक की कारण? जागेश्वर आ पीअर बच्चाक द्वन्द्व, व्यक्तिक आ संस्कृतिक द्वन्द्व तँ नै। गामक संस्कृतिक पोषक जागेश्वर आ व्यक्तिक वा टोलक सुविधावादी संस्कृतिक पोषक पीअर बच्चा। मुदा लोक पीअर बच्चाक समाजक सम्बन्धक प्रशंसक कहाँ रहै। मुदा जमीन्दार ओकरा मानै छलै आ पाइ आ लठैतक शक्ति ओकरा लगमे आबि गेलै? से किए? जमीन्दारक दृष्टिकोणक अछि ई पीअर बच्चा? हमर सभक चिन्तनसँ सर्जन होइ छल आ ओकर सभक चिन्तनसँ विनाश! से किए? लोकक भितरो तँ द्वन्द्व चलै छै। सभ जाति लेल अलग काज रखलोपर द्वन्द्व किए नै खतम भेलै। कोन दवाब रहै पीअर बच्चापर, समाजक? आ से दवाब जागेश्वरपर किए नै रहै आकि कोनो चेतना रहै जागेश्वरमे जे एकटा पैघ दवाब, प्रतिरोधी दवाब उत्पन्न करै छलै? आकि पीअर बच्चाक ई मात्र जिदपनी छल? जागेश्वर समैक पक्का रहै, अखराहापर जाइ छल, समाजक लोकसँ सरोकार रहै, चिन्तने मनन नै ओइ चिन्तन-मननक निष्कर्षक अनुपालन सेहो ओ करै छल। आ घेंघीकेँ कहै छल- कुसुमावती अहाँक मुँह चन्द्रसन, आँखि कमलसन, भोँह कामदेवक धणुषसन, ठोर पाकल तिलकोरसन, नाक सुग्गाक लोलसन, बोली कोइलीसन। आ ओ लजा जाइ छलि। आ कुसुमावतीक स्कूल प्रारम्भ भऽ गेलै। जइ गाममे पुरुख कम्मे-सम्म पढ़ल छल, मात्र ब्राह्मण-भुमिहार पढ़ै छल मास्टर साहेब लग ओइ गामक बचिया सभ, सेहो सभ जातिक, कुसुमावती लग आबए लागलि। धर्मडीहावालीक बेटी लखनी, मेटरसवालीक बेटी फूदो, बेहटवालीक बेटी सुगन, धेपुरावालीक बेटी फुलो, मोहलीवालीक बेटी सोमनी, जगदरवालीक बेटी मरनी, कोठियावालीक बेटी भुल्ली, तमुरियावालीक बेटी भूरी, जेठियाहीवालीक बेटी भुरकुरी, मछधीवालीक बेटी कलकुसरि, बलाटवालीक बेटी घुट्टरि, गंजवालीक बेटी मुनेसरी, चनौरावालीक बेटी लुखिया आ नवानीवालीक बेटी कुसुमा। आ ममतोड़ तँ रहबे करए। मेटरसवालीक बेटी नौ मासमे फुदकऽ लागल रहए से फुदो नाम पड़ि गेलै आ बेहटवाली बेटीक नाम तँ सुमन राखलक मुदा लोक सुगन कहऽ लगलै। बाप-दादाक खून नै, माए-बापक, शिक्षकक आ समाजक प्रोत्साहन चाही बच्चाकेँ। खादीक झोरा जे ई बचिया सभ बनेलक ओइसँ गामक नाम चमकलै आ स्कूल खुजि गेल एकरा सभ लेल। ऐ बच्चा सभक विशेषता ई रहै जे ओ सभ अपन घरमे किछु ने किछु बनबैते रहै छल, सिखिते रहै छल। आब सभ घरक बच्चा अपन-अपन विशेषता देखबऽ लगलै। एक दोसराकेँ सिखाबै आ एक दोसरासँ सीखै, कित-कित खेलक संग नवो घर दू तरहेँ घुमै छल सभ। आ कएक तरहक त्रिभुज चतुर्भुज सभ सीखै छल। लखनी कम तेलमे आ बारी-झाड़ीक तर-तिलकोड़सँ स्वाथ्यवर्धक खेनाइ बनबै-सिखबै छलि, फूदो पानक पातक खेती आ संरक्षण, सुगन सीकी-मौनी आ आन बाँसक कलाकृति, फुलो छोटो बाड़ीमे किसिम-किसिमक तर-तरकारी उपजेबाक, सोमनी कबीर कानेक खाँत, मरनी गहनाक डिजाइन आ ओकर शुद्धताक जाँच, भुल्ली अण्डी सँ लऽ कऽ कतेक तरहक बीआसँ तेल पेरबाक विधि, भूरी माँछकेँ खत्ता-डबरामे उपजेनाइ, भुरकुरी बिसाँढ़-भेँटक प्रयोग, कलकुसरि शमशूल तरकारीकेँ हफ्ता-पंद्रह दिन धरि शीतमे राखि जोगेबाक विधि, घुट्टरि सवा कट्ठामे जीवनोपार्जनक तरीका, मुनेसरी कोरा-वस्त्रसँ धोआ-वस्त्र बनेबाक विधि, लुखिया शरीरक घा-घोस नहरनीसँ निकालबाक विधि आ कुसुमा किसिम-किसिमक लकड़ीक समान आ खिलौना सभकेँ रंगबाक विध जानै छलि। ममतोड़केँ सेहो चमराक विविध प्रयोग बुझल छलै। मुदा कनिये दिनमे ई सभ गोटे सभ चीजमे माहिर भऽ गेल। जागेश्वर ओकरा सभकेँ हिसाब सिखबै, अन्ध्विश्वाससँ लड़बा लेल तरह-तरहक खिस्सा सुनबै। फाटल पुरान कपड़ासँ जे ई सभ रंग-बिरंगक कनियाँ-पुतरा बनेने छल से अद्भुते, शान्त, लड़ाका, गृहणी, डाक्टर, इन्जीनियर, वनवासी.. सभ तरहक स्त्री, कनियाँ पुतरा। कोनो आनुवंशिक बाधा किए नै एलै ककरोमे? कोइली सन बोल ऐ बचिया सभक, जकरा सभ कचबचिया कहै जाइ छलै, से उठै छलै। कचबचियाक कोइली सन बोल! जतऽ जाएत ई सभ ओइ घरकेँ इजोतमय कऽ देत। घेंघी नै जानि कोना हएत। मुखदेवक दार्शनिक अन्दाज रघुवरनकेँ खूब नीक लागलन्हि। तमिल गीत गुनगुनाइत रहथि ओ, बच्चा सभक गीत। घनानन्द, हलधर, नोने, दौलति जहाँ, भट्ट भूषण आ रुद्रमतिकेँ अबेर भऽ रहल छन्हि। कतेक मोश्किलसँ रघुवरनक मुँहसँ बोल निकलल छै, सेहो गीत बनि कऽ। मुदा अबेर भऽ रहल छन्हि, कहियो फेर…. दसम कल्लोल किए तोहर आहो लालाजी मुँह मलिन भेल/ किए मन लागैए उदास काशीमे सप्तऋषि , वशिष्ठ आ वशिष्ठक स्त्री अरुन्धती एली। महादेव हुनका लोकनिकेँ कथा लऽ हिमालयक ठाम पठेलन्हि। हिमालय आ मैनाक आँखिसँ खुशीक नोर झड़ऽ लगलन्हि। कथा स्थिर भऽ गेल। नारद देवता लोकनिकेँ हकार देलन्हि। चारिम दिन बरियाती लागल। गन्धर्वराजकेँ देखि मैना नारदकेँ पुछलन्हि तँ ओ कहलन्हि जे ई तँ देवताक गबैया छी। फेर धर्मराज, इन्द्र सभ एला। नारद सभक परिचए देलन्हि। मैना सोचलन्हि जे ई सभ एतेक सुन्दर अछि तँ महादेव कतेक सुन्दर हेता। महादेव मैनाक मोनक गप बुझि किछु तमाशा केलन्हि। महादेव आ हुनकर गण, भूत-पिशाचकेँ देखि मैना बेहोश भऽ गेली। बाह रे बाह… मैनाकेँ जखन होश एलन्हि तँ ओ नारद-गौरी सभकेँ बहुत रास बात कहलन्हि आ विवाहसँ मना कऽ देलन्हि। तखन महादेव अपन भव्यरूप देखेलन्हि, तँ मैना देखिते रहि गेली। विवाहक कार्य शुरू भेल। परिछनि, अठोंगर, गोत्राध्यायक बाद कन्यादान सम्पन्न भेल आ ताड़कासुरकेँ मारबाक बाट सोझाँ प्रतीत भेल। परिछनि, अठोंगर सभटा मिथिलेबला… हौ सुनै जा, खिस्सा छिऐ.. बेटी-जमाएकेँ पुष्ट भार साँठि बिदा केलन्हि, से सठबे नै करन्हि। छुलाहि जखन धुरखुर सटि ठाढ़ भेल, तखन सभटा भार बिलाएल। एकबेर महादेव बहिन अशावरीकेँ बजेलन्हि। हुनका बेमाय फाटल छलन्हि, ओ बेमायमे गौरीकेँ नुका लेलन्हि। हे, से कोना हेतै.. सुनै जाउ, खिस्सा छिऐ.. गौरी कानथि तँ क्यो सुनबे नै करन्हि। महादेव पुछाड़ि केलन्हि तँ ओ पएर झाड़लन्हि। गौरी भटसँ खसली। तहिना ननदि लेल माँछ रान्हलन्हि। सभटा माँछ ननदि खा गेलखिन्ह। गौरी अकछ भऽ ननदिकेँ बिदा केलन्हि। गौरी गंगा जल भरऽ गेली तँ पुरबा आ पछबा दुनू भागिन जोरसँ बहऽ लागल। हे से कोना हेतै.. पुरबा-पछबा तँ बियाहमे बान्हल जाइ छै.. सुनै जाह.. खिस्सा छिऐ .. गौरी हाथ जोड़ि हँसी बन्न करऽ लेल कहलन्हि। गौरी महादेवकेँ कहलन्हि जे छिनारिक माथपर सिंह आ चोरनीकेँ नाङरि दऽ दियौ। महादेव तथास्तु कहलन्हि। गौरी माछ आनऽ गेली तँ धारक कातमे महादेव भेष बदलि माँछ बेचबा लेल ठाढ़ भऽ गेला। गौरीकेँ माँछ बेचबासँ ओ मना कऽ देलन्हि, कहलन्हि जे हँसी-ठट्ठा करब तखने हम अहाँकेँ माँछ देब। गौरीकेँ महादेव लेल माँछ लेब जरूरी छलन्हि से ओ हँसी कऽ कऽ माछ आनि, रान्हि महादेवकेँ खुआबए बैसली तँ माथपर सिंघ उगि गेलन्हि। दोसर दिन महादेव गौरीकेँ जल्दीसँ खेनाइ बनाबऽ लेल कहलन्हि, तखने गौरीकेँ दीर्घशंका लागि गेलन्हि। ओ दीर्घशंका कऽ ओकरा पथियासँ झाँपि देलखिन्ह, जखन महादेव उम्हर एला आ पुछलखिन्ह तँ ओ लजा गेली आ गप चोरा लेलन्हि आ हुनका नाङरि भऽ गेलन्हि। गौरी छिनारि आ चोरनीक चेन्ह मेटेबाक अनुरोध केलन्हि। तहियासँ ई चेन्ह मेटा गेल। सभटा चेन्ह मेटा गेल। नीक अधलामे भेद करब कठिनाह भऽ गेल। किए तोहर आहो लाला मुँह मलिन भेल, किए मन लागैए उदास। लालबन बाबा, चर्म्मकारक लोकदेवता, मिथिलाक चर्मकारक लोकदेवता। बाघिनसँ हथियारसँ नै हाथसँ युद्ध केलन्हि, स्त्रीजातिपर हथियार कोना उठबितथि। किए तोहर आहो लाला मुँह मलिन भेल, किए मन लागैए उदास। पान बिना आगे मैया, मुँह मलिन भेल गाँजा बिना लागैए उदास। गाँजा चढ़ौलऽ लाला पान मुँह धेलऽ चलि गेलऽ बिजुवन शिकार। हरिणो नै मारैए लालाजी तितिरो नै मारैए, बिछि-बिछि मारैए मजूर। हकन कानैए लालाजी वन कऽ मजूरनी, वारी बएस हरल सेनूर। कोसी सेहो मजूर मारैए आ लालबन बाबा सेहो। मुदा मिथिलामे मजूर तँ होइते नै छै। होइत हेतै पहिने, सभ मारि कऽ खतम कऽ देने हेतै। बाघो तँ नहिये ने छै तँ लालबन बाबा बाघिनसँ लड़लै किने महीस बचाबऽ लेल। हथियार कोना उठबितै स्त्री बाघिनपर लालबन बाबा। से ओहिना लड़लै आ मारल गेलै। दुश्मनपर एतेक सोच विचार? एतेक ममता? मुदा मजूरपर कोनो ममता नै? बलगरी देखबैमे गेला हमर लालाजी! रघुवरन.. गन्धर्वराज.. देवताक गबैया.. आइ किछु गाएत.. -नै ई गीत अझुका लेल नै अछि आ अहाँ सभ बुझबो नै करब, तमिलमे छै.. -तँ टीका आ भाष्य तँ करब ने अहाँ… -ठीक छै.. सुब्रह्मण्यम भारतीक बच्चाबला गीत अछि ई… ओडि विळैयाडु पाप्पा-नी ओयन्दिरुक्कल आगादु पाप्पा कूडि विळैयाडु पाप्पा- ओरु कुळन्दैयै वैयांदे पाप्पा। बौआ बुच्ची, खूब दौगू आ खेलाउ। कखनो अलसा कऽ समै खराप नै करू। सभ मिलि-जुलि कऽ खेलू-धूपू आ अपन संगी संग झगड़ा नै करू। चिन्नंज चिरु कुरुवि पोले-नी तिरिन्दु परन्दु वा पाप्पा वन्नपरवैगळै कण्डु-नी मनदिल मगिळ्चि कोळ्ळु पाप्पा। छोटका पौड़की सन उड़ू आ हवामे उड़ियाउ आ अपन चारू दिस रंग-बिरंगक चिड़ै देखि कऽ आह्लादित होउ। कालै एळुन्द वुडन पडिप्पु- पिन्बु कनिवु कोडुक्कुम नल्ल पाट्टु मालै मुळुदुम विळैयाट्टु- एन्रु वळक्कप्पडुत्तिकोळ्ळु पाप्पा। भोरे सकाले उठि अपन सबक यादि करू आ तकर बाद फ्रफुल्लित करैबला गीत गाउ। साँझमे खूब खेलाउ। ऐ सभ नीक वौस्तकेँ अपन आदति बनाउ। पादगम सैभवरैक कण्डाल- नाम भयं कौल्ल लागादु पाप्पा मोदि मिदित्तु विडु पाप्पा- अवर मुगत्तिलुमिळ्न्दु विडु पाप्पा। खराप काज करैबलाकेँ देखि कऽ कखनो नै डराउ। ओकरा पिचड़ा कऽ दिअ आ ओकरा जड़िसँ उखारि दिअ, ओकर मुँहपर थुकरू, बौआ बुच्ची। ई रघुवरन तँ जागेश्वरे बुझाइए। खराप काज करैबलाकेँ देखि कऽ कखनो नै डराउ। ओकरा पिचड़ा कऽ दिअ आ ओकरा जड़िसँ उखारि दिअ, ओकर मुँहपर थुकरू, बौआ बुच्ची। खराप काज करैबला, समाजकेँ तोड़ैबलासँ एहने आकि अहूसँ बेशी घृणा करै छल जागेश्वर। मुदा खराप काज करैबला सभ केना कऽ आगाँ बढ़ि गेलै। अंग्रेजक शासन रहै तेँ ने.. मुदा आब तँ फिरंगी सभ गेलै… आ ई देशी फिरंगी सभ! एगारहम कल्लोल उक्खड़ि सन सन बीट, समाठ सन सन शीस, सेर बरोबड़ि, सेर बरोबड़ि महादेव आ गौरीक संभोगसँ जे बच्चा हएत ओ पृथ्वीक नाश कऽ देत, देवता लोकनि हल्ला मचा देलन्हि आ महादेवक अंश पृथ्वीपर खसि पड़ल। गौरी देवताकेँ सरापलन्हि जे आइ दिनसँ हुनका लोकनिकेँ सम्भोगसँ सन्तान नै हेतन्हि। पृथ्वी अंशकेँ आगिमे आ आगि सरपतवनमे भार सहन नै हेबाक कारण दऽ देलन्हि। ओतऽ छऽ मुँहबला बच्चा भेल, ओकरा कृत्तिक सभ पोसलन्हि तेँ नाम कार्तिकेय पड़ि गेलै। कैलाशमे गौरी-महादेव रमण करऽ लगला। विष्णु तपस्वीक भेष बना एला आ भूखसँ प्राण रक्षाक गप केलन्हि। ओछाओनपर अंश खसि पड़ल आ गणेशक जन्म भऽ गेल। शनिकेँ गौरी देखऽ लेल कहलन्हि, मुदा हुनका देखलासँ गणेशक गरदनि कटि कऽ खसि पड़ल। विष्णु एकटा हाथीक गरदनि काटि लगा देलन्हि आ अमृत छीटि जिआ देलन्हि। गणेशक विवाह दक्षप्रजापतिक बेटी पुष्टिसँ भेलन्हि, गणेशक जन्मक बाद महादेव कार्तिकेयकेँ बजा लेलन्हि, देवता लोकनि हुनकर अभिषेक कऽ अपन सेनाध्यक्ष बना लेलन्हि। ओ ताड़कासुरकेँ मारि इन्द्रकेँ राज्य घुरा देलन्हि । आह.. चलू, शिव भेला संहारक तेँ गौरी आ महादेवक संतति विश्वक करत नाश; आ स्रापित भेला देवगण, से मामिले खतम। आब जे करत से मनुक्खे करत। सएह तँ कहै छल जागेश्वर, जे करत से मनुक्खे करत, जे जकरा चाही ओ से करए, दोसराक भरोसे नै रहए। एतऽ किछु आर होइ छै। आसिन पूर्णिमा कोजगरा राति, भरि राति पचीसी आ चौपड़ि खेलाउ, राति जगरनासँ लक्ष्मी प्रसन्न हेती। दियाबाती, कार्तिक अमावस्या राति। भोरे स्त्रीगण सूप बजा कऽ–- अनधन लक्ष्मी घर आउ, दुख दालिद्र्य दूर जाउ- कहि दरिद्राकेँ बैलबै छथि। सुखराती छबे छठि। पखेब पाबनि, जकरा सुकरतिया सेहो कहल जाइ छै, खास कऽ मिथिलामे बड़दक पाबैन होइए। कतौ कतौ अखराहापर कुश्ती प्रतियोगिता होइए। ई दिवालीक दोसर दिन होइ छै, ऐ दिन बड़दक खूब सेवा किसान करैत अछि। मैथिल समाजमे जे बड़द, महीस, गाए रखैए से मालकेँ पोखरि लऽ जाइए आ नीक जकाँ घसि-घसि कऽ नहाबैए। तकर बाद ओकर सिंघमे तेल लगाबैए, पचाबैए। तकरा बाद ओकरा नव गर्दाम, ठेका-लटकन-घण्टी पहिराओल जाइए। नबका बड़का गड़दाम बड़दकेँ देल जाइत अछि। तेल मरीच बड़दक नाकमे देल जाइए। किछु एहेन जड़ी-बूटी होइए जकरा ऊखड़ि समाठसँ कूटि कऽ पानिमे घोरि कऽ सोन्हल बना कऽ बड़द आ महीसकेँ काँड़मे दऽ पिया कऽ फेर ओकरा मुँहमे पान पीस कऽ लोक लगाबैए, किए तँ मिथिलामे पान खुएनाइ शुभ मानल जाइए। देहपर लाल-लाल थप्पा देल जाइए। खेतसँ धान काटि बालक दोसरसँ पुछै छै, ऐँ यौ फलना भाइ हमर बड़द खाइ छै आकि नै, तखन ओ जबाब दै छै, खूब खाइए। तखन गाइ आ महीसक स्त्रीगण पूजा करैए। फेर महीस सभकेँ मैदानमे लऽ जाइए, एकटा आदमी सुगरक बच्चा ठेंगामे लपेट कऽ कहै अछि, हूड़ा-हूड़ी। जबर्दस्त खेला होइए। आ किसान अपन-अपन खेतपर जा कऽ कहै अछि, फलना खेतमे अरबड़ हमरा खेतमे छुच्छे चाउर सेर बराबरि। सेर बराबरि। दिनमे हर नै जोतू, जोतब तँ पितर पन्द्रह बर्ख भुखले रहता। गाछ नै काटू। कातिकमे गबहा संक्रान्तिक अरिपन पारब आ मेटाएब। कुमारि दस टा थुम्हा पाड़ै छथि, सिनूर-पिठार लगा कऽ कुम्हरक फूल साटै छथि। आब ई गोइठा नवान्न दिन आगि पजारबामे प्रयोग हएत। पुरुख पात खेतपर कोनियाँमे हाँसू दूभि सभ लऽ कऽ जाइ छथि आ आरिपर बजै छथि- उक्खड़ि सन सन बीट, समाठ सन सन शीस, सेर बरोबड़ि, सेर बरोबड़ि। उक्खड़ि सन सन बीट, समाठ सन सन शीस, सेर बरोबड़ि, सेर बरोबड़ि। उक्खड़ि सन सन बीट, समाठ सन सन शीस, सेर बरोबड़ि, सेर बरोबड़ि। कातिकमे इजोरिया एकादशीमे सहस्रशीर्षा पढ़ि देवताकेँ उठाएब। -देवता सूतल छथि? -आब लगैए सुनाएत सहस्रशीर्षा। -हौ सुनै ने जाह। सभसँ सनगर अरिपन कहियौ वा जे से देवौठान एकादशीयेक चित्र सभ होइ छै, घरक, भनसाक, खेतीक सभ समान पाड़ल जाइ छै। गरीब गुरबा लेल हरिवासर। एकादशी द्वादशी दुनू दिन व्रत कऽ त्रयोदशी दिन पारण। जँ एकादशी आ द्वादशी एक्के दिन माने बुध दिन भेल तँ आश्चर्ये आ तेँ कहल जाइए देव दुन्दुभी। अखाढ़, भादव आ कातिक इजोरियाक बुध दिन जँ क्रमसँ अनुराधा, श्रवणा वा रेवती नक्षत्र हुअए तँ भेल हरिवासर। कतेक जना हरिवासर ठानल भात बहुत कै सपना.. गरीब-गुरबा तँ जहिये घरमे अन्न नै रहै छै तहिये हरिवासर ठानि लैए। कातिक पूर्णिमा दिन सामाकेँ फोड़ि जोतल खेतमे मिला देल जाइए, भऽ गेल भसान। सामा सप्तमीकेँ नैहर एली आ पूर्णिमाकेँ चलि गेली। छठिक खरना दिनसँ आ कतेक गोटे परना दिनसँ सामा बनबै छथि, भदवा पड़ि गेलापर पूर्णिमे दिन बनबै छथि आ भसबै छथि। सामा नैहरमे रहै छथि तेँ भदवामे नै। भार-भरिया, झाँझी कुकुर, सतभैयाँ, बाटो-बहीन, सामा-चकेवा, हाँस (उन्टा मुँह), वृन्दावन, चुगला। सामचक सामचक ऐहऽ हे, ऐहऽ हे जोतला खेतमे बैठिहऽ हे, बैठिहऽ हे ढेपा फोड़ि फोड़ि खैहऽ हे, खैहऽ हे ऐ पटियापर कए कए जनी, कए कए जनी छोटे बड़े नब्बे जनी, नब्बे जनी हमरा भैया कऽ सोना झड़ी, सोना झड़ी अगहन शुक्लपक्षमे नवान्न होइए मुदा शनि वा मंगलकेँ ई नै भऽ सकैए। गबहा संक्रान्तिक गोबरक थुम्हासँ आगि पजारल जाइए, धानक शीस काटि कऽ चूड़ा कूटल जाइए, नवका चूड़ा, दही आ गूड़क स्वादे किछु आर अछि। सभ काज दिन तका कऽ सभ किए करत। से डाक वचन काज अबैए। रविकेँ पान सोमकेँ दर्पण मंगल किछु-किछु धनियाँ चर्वण बुधकेँ गुड़ बृहस्पति राइ शुक्र कहए जे दही सोहाइ शनि कहए मोरा अदरख भाउ सकल काज कऽ घरकेँ आउ। चर्मकारक उत्पत्तिक सम्बन्धमे कथा अछि जे चारि भाइ ब्राह्मण छला, कोनो माल मरि गेल से ओकरा हटबै लेल सभसँ छोटकेँ कहल गेलै। ओ जनौ बेलक गाछपर राखि माल हटेलक, घुरैए तँ देखैए जे जनौ बिला गेलै, अमरलत्ती बनि गेलै। अमरलत्तीक जड़ि तेँ नँ नै होइ छै। सभ ओइ भाइकेँ बारि देलकै आ ओ चमार जातिक भऽ गेल। आब तँ ऐमे मारते रास पंघत भऽ गेलैए। डोमोक उत्पत्ति एनाहिये छै। चारि भाँइ जे पोखरि नहाए गेल तँ घाटपर मरल गाएकेँ हटेबाक जिम्मा छोट भाएकेँ भेटलै। आ गाए तँ आदरक बौस्तु ने यौ .. तखन ओ घुरल तँ सहोदर सभकेँ ओकरा बाड़बाक तँ नै ने चाही छलै। मुदा बाड़ि देल गेल आ ओ डोम भऽ गेल!! जे करत से मनुक्खे करत। गढ़ नारिकेल एकटा गणतंत्र बनि गेल छलै। बेहटवालीक बेटी सुगन। समिया बियाह ठीक भेल रहै। मटकोर.. पनिकट्टी.. जागेश्वर सभमे ई विध उपनयनमे होइ छै। हाँसूसँ पानि चारि खण्ड काटि भगवती घरमे हाँसू राखल जाइ छै। पाँचटा खरही, खीर-पूरी खिखिरक बीअरिमे वरुआसँ उसरगबा कऽ हूड़ि दै छै। उपनयनक चारिम दिन, रातिम दिन। साँझमे। लगनबट्टी.. धनबट्टी.. परिछन… डालाहारा… बेहटवाली परेशान छै। बौधा मलिक आ बेहटवालीक बेटी सुगन। दुनियाँ एम्हरो छै, मुदा शेष गामक शेष टोल लेल मात्र खगता पड़लापर, डाला-बीअनि लेल ऐ टोलक आवश्यकताक अनुभव होइ छै। ऐ टोलमे सेहो बियाह दान होइ छै, जन्म मृत्यु होइ छै। तखन जहिना ऐ टोलक सोह शेष गामकेँ नै होइ छै तहिना अहू टोलक लोककेँ शेष गामक सोह नै छै। समानान्तर दुनियाँमे मुदा बिध-बाधक ताग एक दोसराकेँ सालमे कएक बेर बान्हियेटा दै छै। गीतनाद, आ संस्कृति मुदा एक्के; जन्म मृत्यु आ बियाह दानक बिध-बाध एक्के रंग; कोनो रहस्य छै! मुदा जागेश्वर तँ ऐ तागक कतेक भत्ता बान्हि देलकै जे दुनू समानान्तर दुनियाँक बीच असंख्य रस्ता खुजि गेलै, जइपर लोकक, संस्कृतिक, गीतनादक आनजान होइते रहै छलै। दुनू मुख्य समानान्तर सड़कसँ बेशी आबाजाही ऐ असंख्य रस्तापर होमए लगलै। मुदा पुछलापर शेष गामक शेष टोलक बुढ़ो बुढ़ानुस कहता जे एकर सभक संख्या नै ने बढ़ै छै, बियाहक बाद सासुर जा कऽ घरजमाए बनि सासुरेमे बसि जाइ जाइए। मुदा तहिना जमाए सेहो तँ आबि कऽ गढ़ नारिकेलमे बसि जाइत हेतै। मुदा घर ठीके नै बढ़ै छै। कखनो प्लेग, रद्द-दस्त तँ कखनो मियादी बोखार लोकक जान लऽ लै छै। ऐ टोलक खिस्सा... श्याम सिंह….। बौधा मलिकक बेटीक बियाह, बरियाती समियासँ आएल रहै। यावत बिध-बाध हेतै तावत समियाक सोमन बैसल थोड़े रहतै.. सोपच डोम श्याम सिंह, सिंघियाक… सरो खेलाथि आ पहलमानी करथि, बलगर रहथि तेँ दाबी सेहो रहन्हि। चौरासी मोनक लाठी संगे रहै छलन्हि। मुदा अखराहाक पहलमान सभमे एक दोसरासँ भिड़बाक खूबे सख होइ छै। वंशीधर ब्राह्मण, देवधाक, जब्बर-जब्बर सुग्गर संगे सभ दिन कुश्ती लड़ै छला। वंशीधर ब्राह्मणसँ कोनो गप लऽ कऽ माटि फेका फेकावलि भऽ गेलनि। बिदा भेला श्याम सिंह। आगाँ बढ़लापर ठेहिएला। सवा सेर गाजा चिलममे धऽ कंसारसँ आगि मांगैले गेला। कनूनियाँ मना कऽ देलकन्हि। छोट जाति छी तेँ? अस्सी मोनक गुदरासँ सवा सेर गाँजा लटौलाक बाद बिनु आगिक गाजा नै पीब? मुदा गाजाक अम्मल जकरा जागल छै से कोना रुकतै? कनूनियाँकेँ कंसारमे भकसी झोका देलन्हि आ आगि निकालि लेलन्हि। रस्तामे संगी हरिराम आ संगी चुन्नीराम ऐठाम ठहरला। मुदा ओतौ अपमान भेटलनि, सभकेँ ओ जन्मल सुगरक मौस पाहुर परसलक मुदा हुनका दू साल बूढ़ सुगरक मौस डहरा परसलक। मुदा परताप रहै श्याम सिंहक। डहराक मौस निमनगर चर्बीसँ भरि गेलै आ पाहुरमे पानि छुटि गेलै। अजब योद्धा, अजब परताप। हरिरामक बहिन मनियाँसँ दूटा सुग्गर छीनि, काँखतर दाबि कऽ मारि, मनियाँक माथपर पटकि ओ आगाँ बिदा भऽ गेला। आगाँ ढुनमुन गुआर आ अहीमन तेलीक दूटा पाराकेँ मारि, धारक ओइपार गाछीमे पचास हाथक समेना गाड़लन्हि। मुदा ऐमे रहबामे सिकस्त भेलन्हि, पएर मोरऽ पड़ै छलन्हि। -देखा चाही बौधा मलिक की परसैए, पाहुर आकि डहरा। पाथरक अखराहापर वंशीधर आ श्याम सिंहक युद्ध भेलै। मुदा दुर्गा वंशीधरक संग रहथिन्ह से ओ जीति गेल। मुदा श्याम सिंहक बेटा बालाराम गहिलक भक्त। बापक हारि ओकरा बर्दास्त नै भेलै। आ ओ दुर्गाजीक सेहो स्मरण केलक आ वंशीधरकेँ ललकारा देलक। गहील दुर्गासँ बालारामक जीत लेल सत करा लै छथि। बालाराम वंशीधरक दुनू सुग्गरकेँ काँख तर दबा लेलक, आ मोहिनी काँटी फेकि वंशीधरक दुनू जब्बर सुग्गरकेँ ओ मारि दैए। फेर वंशीधरसँ युद्ध शुरू भेल, दुनू गोटे नौ-नौ मोन माँटि देहमे लगेलन्हि। दुनूक हाथमे हाथ, जाँघमे जाँघ आ छातीमे छाती टकरेलै, कियो टससँ मस नै होइ छलै। फेर ओही काँटीसँ वंशीधरक पेट फारि दैए। अंगनामे बिध बाध शुरू छै। सुगनक बियाहक बिध-बाध। सभैती भोज हेतै, दुअरापर सोमनक गाथा चालू छै। सोपच डोम मलिक आ मगहिया डोम एक्के नै बुझि लेब। मगहिया डोम तँ बंजारा-गिदरमारा सभकेँ कहल जाइए। ई समिया आ गढ़ नारिकेलक तिरहुतिया डोम सभ छथि। मुखदेव बाजि उठैए- हे सोमन जी, बड धरफड़ीमे खिस्सा खतम कऽ देलिऐ। वर-कनियाँकेँ लाठीसँ नापि कऽ बियाह स्थिर भेल अछि, तखन यएह होइ। सोमन- तुषरपात किछु दैये नै रहल छिऐ, आ छुच्छे.. मुखदेव- ई की बाजि देलौं… अहाँक कलाकारीमे विघ्न नै पड़ए तेँ रुकल छलौं.. दहो-बहो कऽ देब। भूजल करेजीक सतघरा आनल जाइए। -गजार कदबा कऽ देब खाउ ने कतेक खाइ छी। -कियो बाजि उठैए। आब हएत छत्तीसो देवी आ चौदहो देबानक कथा। सरदार आ माइंजनक चेहरापर मुस्की आबि जाइए। सोमन अङैठी-मोड़ करैए। -औ जी, छत्तीसो देवी आ चौदहो देबान देहपर नै आनि लेब। रोग ब्याधि हरबा लेल कारनीकक अखन काज नै छै। -सतघरा खेलाक बाद किछु तँ हेबे करतै। सोमन करमान छिऐ, माइंजनक दहिना हाथ। की बुझै छिऐ सस्ता?– फेर कियो टोन देलकै। सोपचटोली। बिनु लबनीक पंचैती नै होइ छै। पंच सभ आ सभ लोकक सोझाँ बासन राखल रहै छै। बिनु नशाक पंचैती नै। जे पंचैती कराबऽ चाहै छथि से ने सोचथु। ततेक खर्चा हेतन्हि जे। बगलेमे एकटा पानक दोकान खुजल छै। पंचैती दिन खुजल रहै आ आइ बियाहक दिन सेहो बिक्री लेल खुजलै। चारि गोटे सोपचटोलीसँ जाइए आ कहैए, हे पचीसटा पान लगाबऽ। आ दूरेसँ ठाढ़ भऽ कऽ पान लगाएल जेबाक बाट जोहैए। पानबला पान लगेलाक बाद सोर करैए। एक गोटे दोकानपर जाइए, दोकानबला दूरेसँ बिनु छुएने पान ओकरा गमछामे धऽ दैए। आ सभ घुरि आबै छथि। आसपासक गाममे धोबि, मलिक, चर्मकार आ दूधवंशी ऐ चारि जातिमे अपन-अपन पुरहित होइ छलै। आन सभ जातिमे ब्राह्मण पुरहित होइ छल। मुसलमानमे मौलवी-काजी। अखनो आसपासक गाममे धोबि, मलिक, चर्मकार आ दूधवंशीक अपन-अपन पुरहित होइते छै मुदा आन सभ जातिक पुरहित ब्राह्मणे टा होइ छै। मुदा गढ़ नारिकेलमे आब ब्राह्मण छोड़ि सभ जातिमे गएर-ब्राह्मण पुरहित भऽ गेल छै। आ ओ पुरहित सभ सेहो सभ जातिमे बियाह, दान आ श्राद्ध करबै छथि, छट्ठी-छिल्ला स्त्रीगण सभ अपने कऽ लै छथि। गुरुक बड्ड मान्यता छै, अपन श्रेष्ठसँ मंत्र लिअ आ जपू। गुरुक आदर सम्मान खूब छै। मुदा पुरहित श्राद्धमे खूब खर्चा करबै छै। तेराति, सतलहान, दुधमुँह, नह-केश, सभैती भोज। आ इम्हर मानरिपर थाप पड़ि रहल छै। धारु मलिकक सरदार आ हारु मलिकक माइंजन बनलापर सभ आगाँ मुँहे ताकऽ लागल अछि। सोमन मलिक अछि हारु मलिकक करमान। पुरुखक गरदनिमे उक्खड़ि धऽ दौगेबाक आ स्त्रीक झोँट कटबाक विरोध केलन्हि हारु मलिक आ लोक कहैए जे से ओ धारु मलिकक कहलापर केलन्हि। मुदा पर-पंचैतीमे दारू-गाँजा चलिये रहल अछि, से नै रोकल भेलन्हि हिनका सभकेँ। तारी-दारू, खैनी-पीनी खूब चलै छै। बड कसि कऽ समधी मिलान केने अछि बौधा मलिक। सोमन मानरिक थापपर शुरू अछि… डोम जातिक लोकदेवता छेछन महराज… बड्ड बलगर….. हुनकर संगी साथी सभ बाँसक टोकरी, चङेरा, दौरा, बेना, डाला-डाली, साजी कोनियाँ, चंगेरा, मेघडम्बर, साजी, लिली-डाली, पेटार, छत्ता आ पटिया बेचबा लेल सहिदापुर आ आसपास जाइ छल… ओतुक्का डोम सरदार मानिक चन्दक वीरता देखलक। मानिक चन्द एकटा अखराहा बनेने रहथि आ ओतऽ एकटा पैघ सन डंका राखल रहए। जे डंकापर चोट करै छल ओकरा मानिकचन्दक पोसुआ सुग्गर, चटियासँ लड़ऽ पड़ै छलै। मानिकचन्द प्रण केने रहथि… जे क्यो चटियासँ जीतत से हमरासँ लड़त आ जे हमरा हराएत से बहिन पनमासँ विवाह करत। चटिया सभकेँ हरा दै छलै। पाँच पसेरीक कत्ता लऽ छेछन महराज सहिदापुर दिस विदा भेला। डंकापर चोट करबासँ पहिने छेछन महराज एकटा बुढ़ीसँ आगि मांगलन्हि आ अपन चिलममे आगि आ मेदनीफूल भरि सभटा पीबि गेला आ झुमैत डंकापर चोट देलन्हि। मानिकचन्द छेछनकेँ देखलन्हि आ चटियाकेँ शोर केलन्हि। चटिया दौगि कऽ आएल मुदा छेछनकेँ देखि पड़ा गेल। तखन पनमा आ मानिकचन्द चटियाकेँ ललकारा देलक तँ दौगि कऽओ छेछनपर झपटल। छेछन ओकरा दुनू पएर पकड़ि चीरि देलखिन्ह। फेर मनिकचन्द आ छेछनमे दंगल… छेछन मानिकचन्दकेँ बजारि देलन्हि। तखन खुशी-खुशी मानिकचन्द पनमाक बियाह छेछनक संग करेलन्हि। दिन बितैत गेल… हँसी खुशीसँ दिन बितैत गेल… छेछन दोसराक बसबिट्टीसँ बाँस काटऽ लगला। यादव लोकनिक लोकदेवता कृष्णारामक बसबिट्टीसँ छेछन बहुत रास बाँस काटि लेलन्हि। कृष्णाराम अपन सुबरन हाथीपर चढ़ि एला … आमक कलममे छेछनकेँ पनमा संग सुतल देखलन्हि कृष्णाराम … सुबरन पाँच पसेरीक कत्ताकेँ सूढ़सँ उठेलक आ छेछनक गरदनिपर राखि देलक … सुबरन अपन भरिगर पएर कत्तापर राखि देलक .. छपाक … सभक आँखिसँ नोर चुअ लगलै। मटिकोर, पनकट्टी, लगनबट्टी, परिछन, बियाह, सभ भऽ गेलै। भोज भात सेहो। अगिला दिन सभैती भोज छै। अगिला दिन बेटी विदा भऽ गेलै। उक्खड़िमे पानि राखि पएर डुबा भोज प्रारम्भ। जरूरी नै रहै मुदा मुखदेव कहलकै जे करू, सभैती भोज करू। खूब जमलै भोज सुगरक हरही-सुरही भतसमैया नै रसगर कोहरा-कोहरी आ हड्डीबला सहरीक हरपुसरिया माँसु रान्हल गेलै। आसपासक गाम बाँटल छै, कतेको गामक गाम आपसेमे ई सभ बिक्री कऽ दै छथि, कीनि लै छथि। बिकनिहारकेँ बुझलो नै रहै छन्हि। मृत्युक बाद डोमक आगि, ई बिनु पेने उद्धार कतऽ… -आ सभक उद्धार? जिबैत उद्धार मुखदेव, जिबैत के करैए ककर उद्धार? मरलाक बाद के देखऽ अबैए मुखदेव? मुखदेवक अबाज जहलक कोठरीमे घुमऽ लगलै। आइ तँ घनानन्द, हलधर, नोने, दौलति जहाँ, भट्ट भूषण आ रुद्रमतिकेँ सेहो सुना पड़लै। खाली रघुवरनकेँ ई अबाज नै सुना पड़लै।… चलू आजुक खिस्सा खतम… बारहम कल्लोल लोभेलै छौड़ा बभना रे दैव ना रे/ रौ पूछऽ जब लगलै बभनमा रौ/ जतिया रौ ठेकनमा रौ दैव ना रे गौरीसँ छोट आ हिमालयक पाँचम बेटी संध्यासँ विवाहक लेल महादेव चोरा कऽ चलि गेला। गौरीकेँ दहो-बहो नोर चुबऽ लगलन्हि। घामे-पसीने भऽ गेली। देहसँ मैल छुटऽ लगलन्हि तकरा ओ जमा केलन्हि आ एकटा साँप बना बाटपर छोड़ि देलन्हि। महादेव जखन संध्याक संग विवाह कऽ एला तखन ओइ साँपमे प्राण दऽ देलन्हि। गौरीकेँ कहलन्हि जे ई साँप, लीली, अहाँक बेटी छी आ एकरासँ खेलेबाक लेल संध्याकेँ अनने छी। गौरी भभा कऽ हँसि देलन्हि। नाहर राजा आ ताँती रानीक सए बेटामे सभसँ पैघ बेटा बैरसी महादेव लग नोकरी करऽ गेला। महादेव हुनका कहलखिन्ह जे लीलीकेँ धर्मकुण्डमे स्नान करा दियौन्ह आ सोहागकुण्डमे औँठा डुबा दियौन्ह। मुदा ओ उनटा कऽ देलन्हि। सोहागकुण्डमे डुबलाक कारण सोहाग बड़ पैघ भऽ गेली। मुदा धर्मकुण्डमे मात्र औँठा डुबलन्हि से ओकर लेशमात्र रहलन्हि। से ओ बेरसीसँ विवाह करबाक गप कहलन्हि आ हुनकेसँ हुनकर विवाह भेल। बाह.. मुखदेव रामक टोल। चर्मकार लोकनिक टोल। अहू टोलक लोकक आ शेष गामक शेष टोलक लोकक बीच बड्ड कम सरोकार छलै। मुदा तखन गीतनाद आ संस्कृति,जन्म-मृत्यु आ बियाह दानक बिध-बाध एक्के रंग कोना छै? शेष गामक शेष टोलक लोक हिनकर सभक अनुकरण केलक आकि ई लोकनि शेष टोलक लोकक अनुकरण केलन्हि; आकि दुनूक जड़ि एक्के छै; आकि बहरबैया सभ आएल आ हिनका सभकेँ बसबिट्टीक ओइ पार ठेलि देलक; आकि बहरबैय्या सभ अपन किछु लोककेँ भतबरी कऽ ऐ टोल पठा देलन्हि आकि... नौहट्टामे दू टा संगी रहथि मनसाराम आ लालमैन बाबा। दुनू गोटे संगे-संगे महीस चरबथि। ओइ समयमे नौहट्टामे बड्ड पैघ जंगल रहए, ओतै एक दिन लालमैनक महीसकेँ बघिनिया घेरि लेलकन्हि। लालमैन महीसकेँ बचबऽमे बाघिनसँ लड़ऽ तँ लगला मुदा स्त्रीजातिक बाघिनपर अपन सम्पूर्ण शक्तिक प्रयोग नै केलन्हि आ मारल गेला। मनसारामकेँ ओ मरैत-मरैत कहलन्हि जे मुइलाक बाद हुनकर दाह संस्कार नीकसँ कएल जाइन्हि। मुदा मनसाराम गामपर ककरो ई गप नै कहलन्हि। ऐसँ लालमैन बाबाकेँ बड्ड तामस चढ़लन्हि आ ओ मनसारामकेँ बका कऽ मारि देलन्हि। फेर सभ गोटे मिलि कऽ लालमैन बबाक दाह संस्कार केलन्हि आ हुनकर भगता मानल गेल, अखनो ओ भगताक देहमे पैसि मनता पूरा करै छथि। लालमैन चर्मकार आ मनसाराम ब्राह्मण। दुनूकेँ पूजै छथि लोक, खस्सी, तारी, गाँजा, पान चढ़बै छथि, लालमैन गाँजा लै छथि मुदा मनसाराम गाँजा नै लै छथि। रकतमाला, लुकेसरी, जलपा, गोरैया, ई सभ चर्मकारक गृहदेवता छथि। जलपा, लुकेसरी ई बौद्ध धर्मक अवशेष नै बुझाइए? -कहै छल मुखदेव। पता नै। बौद्ध धर्म गेलापर चर्मकारक जनौ अमरलत्ती बनि गेल हेतै! गै लुखेसरीक सूरति देखि लोभेलै छौड़ा बभना रे दैव ना रे हे लऽ गेलौ रे बभना देश कऽ ओर आब सिया ना रे लऽ रौ गेलौ बभना देश कऽ ओर रौ लुखेसरीक सूरति देखि लोभेलै छौड़ा बभना रे दैव ना रे रौ पूछऽ जब लगलै बभनमा रौ जतिया रौ ठेकनमा रौ दैव ना रे रौ जाति की छिऐ ना रे जाति केर हीनमा रौ माइ-बाप हमरा धेलकै लूखा रे नाम रे रौ जाति की छिऐ बभनमा रौ जाति कऽ हीनमा रे देव रौ छौड़ीयोमे छौड़ीयो बभनमा रौ हमरौ रौ अँचरबा रौ हमर रोवैत हेतै गोदीक बलकवा बभना ना रे गै काँचे छौ उमेरिया गै लूखा देवी गै काँचे छौ बएसवा गै केओ जे देलकौ लूखा गोदीक बलकवा गै तोरा केओ जे देलकौ ना रे आ रौ गेलिऐ जनकपुर बभना रौ पूजलौं श्री जानकी बभनमा रौ सेहो देलकौ ना गोदीक बलकवा बभना रौ देलकौ ना रे सभ गाममे चर्मकारेक पत्नी गढ़ुआरि महिलाक मार्गदर्शन करैए, चमैन आ दगरिन लोक कहैए। आब तँ हस्पताल सभ खुजल छै, ओतऽ केरलक नर्स रहैए, ओकरो लोक चमैन कहैए! आउ आउ दगरिन गोर लागै छी दरद पीड़ा छुटि गेल टांगमे लै छी मुदा चामक व्यवसाय तँ कला भेल। हाथसँ काजकेँ अपना समाजमे प्रतिष्ठा किए नै देल जाइए। रघुवरन खिस्सा सुनबै छथि। टॉमस बाटाक परिवार कएक खाढ़ीसँ चर्मकार छल। पहिल विश्वयुद्धमे सैनिक सभक जुत्ताक ततेक मांग भेलै जे आइ ओ पैघ व्यवसायी बनि गेला। बंगालमे बाटानगरमे मारते रास चर्मकार लोकनिकेँ नोकरी भेटल छै। बाटामे चेक देशवासी चर्मकार सेहो छै, मुदा ओतऽ ओकरा खराप आ छोट कहाँ मानल जाइ छै यौ? एतुक्के लोकक कला, आ चामक प्रयोग तँ करैए बाटा। चाम खलि कऽ पकेनाइ सिखेबा लेल चेक विशेषज्ञ आएल रहथि मुदा ओ सभ सिखेथिन्ह की, सीखि कऽ गेला। नव्य न्यायक जनक करियनक उदयन आ फेर ब्राह्मण तत्त्वचिन्तामणिकारक गंगेश। गंगेशकक विवाह चर्मकारिणीसँ भेलन्हि। दार्शनिक वर्धमान गंगेश आ हुनकर चर्मकारिणी पत्नीक पुत्र। उदयन बौद्धकेँ मिथिलासँ भगेलन्हि, वाद-विवादमे हरा कऽ। बौद्ध धर्म गेल आ चर्मकार शिल्पी निम्न कोटिक भऽ गेला? आ गंगेशक विवाह चर्मकारिणीसँ! कोन रहस्य छै ऐमे? जागेश्वरकेँ बुझल हेतै ई रहस्य। मुदा हमरा ई बुद्धि ओइ समएमे रहबे नै करए। खाली ओ जे कहए से केने जाइ छलौं। घनानन्द, हलधर, नोने, दौलति जहाँ, भट्ट भूषण आ रुद्रमतिक संग रघुवरन सेहो सोचमे पड़ि जाइ छथि। ई तँ रघुवरन सेहो नै पढ़ने छथि। तेरहम कल्लोल कुशक डेफसँ नथबौ गे धमिआइन तोहरो पनियादराध/ अस्सी मनक पत्थल छेदि कऽ हेबै गे बहार एकटा राजा- आ चारिटा हुनकर रानी… छोटकी रानीटासँ एकटा बचिया सुकन्या.. एक दिन राजा सुकन्या संगे टहलै छला तँ सुकन्या एकटा दिबड़ाक भीड़ देखलन्हि। ओइमे दूटा चमकैत वस्तु सेहो छल। ओ ओइमे कटकीसँ भूर करऽ चाहलन्हि, तँ ओइमे सँ शोनित बहार भऽ गेल आ कियो चीत्कार कऽ उठल। एकटा मुनि तपस्या कऽ रहल छला आ हुनकर दुनू आँखि फूटि गेल छलन्हि। राजा हाथ जोड़ि क्षमा मांगलन्हि तँ ओ सुकन्याकेँ सेवा लेल मांगि लेलन्हि। राजा कुमोनसँ सुकन्याक विवाह ओइ बूढ़ ऋषिसँ करबा देलन्हि। फेर एक दिन अश्विनीकुमार सुकन्याकेँ भेटलखिन्ह आ हुनका लोकनिक संग पतिकेँ गंगा स्नान करेबा लेल कहलखिन्ह। जखने तीनू गोटे स्नान कऽ कए निकलला तँ एके रंग-रूपक युवा आँखि सहित बाहर आबि गेल। आब सुकन्या हुनका चिन्हतथि कोना। तखने ओ देखलन्हि जे दुनू देवताक पिपनी तँ खसिते नै छन्हि से ओ अपन पतिकेँ चीन्हि गेली। राजा बेटी-जमाएक खुशीमे भोज देलखिन्ह। देवता सभ सेहो एला मुदा देवता सभ अश्वनी कुमारकेँ पाँतीमे बैसि कऽ खाए नै देमए चाहै छला मुदा राजाक कहलापर हुनका सभकेँ एके पाँतीमे बैसऽ देलखिन्ह। ओहो.. मुसहर.. चंगेज खाँ बौद्ध धर्मक रहए, की ओकरे वंशज छथि ई सभ... नेपालक मिथिलांचलमे अछि जोगियानगर जतऽ रहै छला दु भाइ- दीना आ भदरी। मुसहर जातिक रहथि आ खेती करै छला। पाँच-पाँच मोनक कोदारि छलन्हि आ बिगहा भरि जमीन तामि लै छला दिन भरिमे। जोगियानगरक बगलमे जाँजर गाम छल। ओतुक्का जमीन्दार छल कनक सिंह आ ओकर पत्नी रहए बुधनी। बड़ बदमाश दुनू टा। बोनिहार केँ देखऽ नै चाहै छल। कनक सिंहकेँ पता लगलै जे दीना-भदरी लग पाँच-पाँच मोनक कोदारि छै आ ओ सभ बिगहा-बिगहा भरि जमीन तामि लै छथि दिन भरिमे। ओ जोगियानगर गेल आ दीना-भदरीकेँ अपन गाम बजेलकै खेती करबा लेल। दीना-भदरीकेँ कनक सिंहक बोनिहारपर कएल जा रहल अत्याचार बुझल रहै। मारि-मारि कऽ छुटला ओ दुनू गोटे कनक सिंहपर। भागल कनक सिंह। बुधनीकेँ पता चललै। ओ सलहेस थान गेल। कठोर तपस्या केलक। सलहेस प्रकट भेला। -माँग की चाही! -दीना-भदरीक प्राण। -आह। सलहेस मूर्छित भऽ गेला। मुदा वचनक हारल। की करता? रातिमे दीना-भदरीकेँ सपना देलन्हि सलहेस। -कटैया बोन मे आउ। बड्ड शिकार भेटत। रातिएमे बिदा भेला दीना-भदरी, तीर-धनुष लेने। संगमे मामा बहुरन। रस्तामे नंगड़ागोड़िया गाम, ओतऽ रहै छला हुनकर सभक दोस जीतन यादव। हुनको शिकार लेल चलबा लेल कहलन्हि। अमावस्याक राति! अन्हार गुज्ज। मुदा शिकार एक्को टा नै। बादुर घुमैत। दीना असगरे जंगलक बीचमे चलि गेला। ओतऽ ठाढ़ि छलि बुधनी, सलहेस सेहो संगमे छला। बुधनी बाजल: -बोनक जानवरक देवता सलहेस अपन खुनीमा बाघ बजाउ। दीना बाण चलेलन्हि मुदा बाण रस्ता बिसरि जाइ छल। मल्ल युद्ध भेल। दीना सलहेसक नाम लऽ आक्रमण केलन्हि, बाघकेँ मारि देलन्हि। बुधनी बाजलि- भेष बदलैवाली अपघात भेलि बाघिनकेँ बजाउ। सलहेस दीनाक वीरतासँ प्रसन्न छला मुदा करथि तँ करथि की? बगराक भेष बना कऽ बाघिन आएल आ दीनाकेँ अपन बिखाह चांगुरसँ मारि देलक। तखने भदरीक मोन बिखिन्न सन भेलै। -बहुरन मामा। हम जा रहल छी भैया लग। अहाँ गाछपर बैसि कऽ प्रतीक्षा करू। लहास लग पहुँचला भदरी मुदा ओ बहुरुपिया बगरा हुनको मारि देलकन्हि। बुधनी घर घुरि गेलि। दीना आ भदरीक आत्मा दु गोटेक शरीरमे पैस गेल। बहुरन लग पहुँचला दुनू गोटे। -अहाँक दुनू भागिन मारल गेला। गाम खबरि करू। लहास लऽ जाउ। श्राद्ध करबाउ। तावत जीतन सेहो पहुँचि गेला। जीतन गाम लऽ गेला दुनू गोटेक लहासकेँ आ स्वयं अग्नि देलन्हि दुनू गोटेकेँ। दीना-भदरीक माए निरसो। श्राद्ध लेल पाइये नै। की करती? सपना देलन्हि दीना-भदरी। -माए। घरमे तूर अछि। बनीमा लग लऽ जाउ। ओकर बदलामे ओ जे देत तइसँ हमर श्राद्ध भऽ जाएत। बनीमा जोखलक तूरकेँ- हँसैत। एक दिस तूर आ दोसर दिस बताशा। मुदा ई की? भरि दोकानक समान तौला गेल मुदा तूरबला पलड़ा नै उठल। दीना-भदरी बैसि गेल रहथि ओइपर। बनीमा हाथ जोड़ि कऽ ठाढ़ भऽ गेल, निरसो संग बोनिहार आ समान पठा देलक। जेवार देलन्हि निरसो। दीना-भदरी रूप बदलि बारिक बनला। सभकेँ पड़सि कऽ खुएलन्हि। तखने दीना असल रूपमे आबि गेला। हुनकर कनियाँ हंसा हुनका देखि लेलन्हि। निरसोकेँ ओ ई गप कहलन्हि- मुदा ओ गप नै मानलन्हि। -अपन छाती सात तह कपड़ासँ बान्हि लिअ आ ओकरा लग चलू जे दीना बनि गेल छल। निरसो ओतऽ गेली। दूध निकलि कऽ दीना-भदरीक मुँहमे चलि गेल आ ओ दुनू गोटे बिला गेला। फेर दीना-भदरी बिदा भेला मोरंग। जोरावरसिंह केँ मारि मुसहरक उत्थान केलन्हि। फेर ताहिरकेँ मारलन्हि। फेर सुनरियाकेँ मारलन्हि। फेर धारक कातमे मारलन्हि डैनियाही बुधनीकेँ। डेढ़ सए दुष्टक नाश केलन्हि दीना-भदरी। सलहेस बजला: -जतऽ–जतऽ हमर पूजा हएत, ततऽ–ततऽ अहाँक पूजा सेहो हएत। सलहेस आ दीना-भदरीक गहमर संगे रहए लागल तहियासँ। फेर दीना-भदरीकेँ मुक्ति भेटि गेलन्हि। परलोकमे सलहेस आ दीना-भदरी संगे रहऽ लगला। अखनो मनुखदेवा बनि लोकक मदति करै छथि। मुसहर.. चंगेज खाँ बौद्ध धर्मक रहए, की ओकरे वंशज छथि ई सभ... मुदा चंगेज सभ गोर होइ छल, ई सभ होइ छथि कारी। बिचकुन सदाय। मूसक बिल होइ वा बिसाँढ़, कमलघट्टा, वा अन्हइ माँछ। सभमे स्वाद छै, सभ पौष्टिक छै। आ तेँ ने मुसहर टोलीमे सभ छरेछाँट। कियो ककरो उखराही नै करैए। शबरीक सन्तान, लक्ष्मण बूटी.. बुढ़ बुढ़ानुस कहै छथि जे मुसहरमे जे टेबैता छथि से बंजारा जकाँ घुमैत रहै छथि मुदा झोलैता एक्के गाममे कए खाढ़ीसँ रहै छथि। जेठियाहीवालीक बेटी भुरकुरी। बिचकुन सदाय, पाँखू सदाय आ जगतू सदाय। खेत तामैमे बिरनल। भीत आ फूसक घर, केरा डोपरि भीतक देबालमे दऽ भुरकी सभ बनल। जेठियाहीमे टेबैता सभकेँ बसेने रहए अंग्रेज बहादुर। आ गढ़ नारिकेलक बिचकुन सदायक बियाह भेलै जेठियाही। गढ़ नारिकेलक मुसहर मूस नै पकड़ै छथि, मुदा जेठियाहीक मुसहर अखनो मूस मारै छथि। जखन ब्रह्मा मुसहर बनेलन्हि आ ओकरा चढ़ैले घोड़ा देलन्हि तखन ओ मुसहर सोचऽ लागल जे घोड़ापर चढ़ब तखन पएर कतऽ राखब? से ओ घोड़ाक पेटक बीचोबीच पएर रखबा लेल भूर कऽ देलक। ब्रह्मा तमसा कऽ ओकरा भूर बनबैत आ ताकैत रहबाक स्राप दऽ देलन्हि, आ मूस मारि कऽ खेनाइ मुसहरक आजीविका भऽ गेल। मुसहरीमे सुग्गर सेहो भेटि जाएत। पाँखू सदाय आ जगतू सदाय राधामोहन राय आ पीअर बच्चा लेल बोनिहारक बेबस्था करै छथि। पाँखू सदाय भगैत छथि, ताड़ी आ सुगरक खून पीबि बघेसरिक पूजा करै छथि, दीना भदरी गाबै छथि। गामक पछिम कोड़ौलनि एगो नव पोखरिया ओही पोखरिया गे धमिआइन रोपलैं पुरइन ओइ जनि पैसिहऽ हो दीनाराम धरतऽ तोरा पनियादराध ओइ जनि पैसिहऽ हो भदरी धरतऽ तोरा पनियादराध घुरमी सहैते गे धमिआइन तोरो हम सधबौ कुशक डेफसँ नथबौ गे धमिआइन तोहरो पनियादराध अस्सी मनक पत्थल छेदि कऽ हेबै गे बहार मुदा बिचकुन सदाय जागेश्वरक संगी बनि गेल छला। किछु खेतीबारी करऽ लागल रहथि। घर सेहो चिक्कन-चुनमुन बना लेलक। भुरकुरी तँ घेंघी आ जागेश्वरक स्कूलमे पढ़ऽ लागल छलि। बिचकुन जेठियाहीमे सेहो खेतीबारी करबा आ मजूरीसँ आगाँ बढ़बा लेल लोककेँ प्रोत्साहित करै छला। भुरकुरी लोक सभकेँ मधुमाछी पोसब सँ लऽ कऽ सिलाइ-फड़ाइ सिखबऽ लागलि रहए। के कहैए जे मुसहरक बेटीकेँ ने नैहरे सुख ने सासुरे सुख। देखै जाहीं जेठियाहीवाली आ भुरकुरीकेँ। मुसहरीमे दीन-दुनियाँ बदलल सन बुझाइत रहए। जागेश्वर कहैत रहै छल जे किछु तँ बात छै। उदयन बौद्ध सभकेँ शास्त्रार्थमे पराजित केलन्हि। गंगेशक चर्मकारिणीसँ बियाह। उदयन पुरीमे भगवानकेँ माटि देलन्हि आ दीना भदरी सेहो पुरीमे भगवानकेँ माटि देलन्हि। किछु तँ रहस्य छै। नै जानि मुसहरीक की हाल हेतै। पाँखू सदाय आ जगतू सदायक लेल नै मुदा बिचकुन सदाय, जेठियाहीवाली आ भुरकुरी लेल मोन टाङल रहैए। चौदहम कल्लोल ब्रह्माक देल कोदारि/ विष्णुक चाँछल बाट एकटा ब्राह्मणीक सात टा बेटा छलन्हि। छोटकी पुतोहु गरीब घरक छली से सासु-ससुर नै मानै छलन्हि। हुनका गर्भ भेलन्हि तँ खीर पूरी खेबाक इच्छा पतिकेँ कहलखिन्ह। पति कहलखिन्ह जे माय हम खेत जाइ छी, हमरा पनपिआइमे आइ खीर-पूरी कनिआक हाथे पठा दिअ। मायकेँ बुझेलन्हि जे हो नै हो, ई अपन कनिआकेँ खीर-पूरी खुआएत। से ओ पुतोहुक जीहपर लिखि कहलन्हि, जे घुरि कऽ आबी तँ ई लिखल रहबाक चाही। पुतोहु खीर-पूरी लऽ खेत पहुँचली तँ पति आधा-आधा खा लै लेल कहलखिन्ह। मुदा ओ जीह देखा देलखिन्ह। तखन ओ पीपरक धोधरिमे खीर-पूरी राखि कहलन्हि जे जाउ, मायकेँ जीह देखा कऽ घुरि आउ। जखन ओ घुरली तँ ओइ धोधरिक बीहरिमे रहऽबला बासुकी साँपक कनियाँ, जे गर्भवती छलि, से सभटा खीर-पूरी खा गेल। ओइ सापिनकेँ बाल आ बसन्त दूटा पोआ भेलै। एक दिन चरबाहा सभ ओकरा सभकेँ मारऽ लेल दौगल तँ छोटकी पुतोहू ओकरा बचेलक। फेर एकर उत्तरमे बाल-बसन्त हुनका वर मंगबा लेल कहलखिन्ह। पुतोहू वर मंगलन्हि जे एहन कऽ दिअ जे हमरो नैहरक आस रहए। सएह भेल। बाल-बसन्त विदागरी करेबा लेल पहुँचि गेला, मनुष्यरूप धारण कऽ कए। बाल-बसन्त अपन परिचए दऽ कहलन्हि जे हमरा सभक जन्म बहिनक द्विरागमनक बाद भेल छल। बिदागरी करा कऽ रस्तामे बीहरिमे पैसि कऽ जे निकलला तँ घर आबि गेल। बासुकीनि स्वागत कऽ साँझमे सुआसिनक काज साँझमे दीअठिपर दीप जरेनाइ अछि- से कहलन्हि। बासुकीनागक फनपर ओ दीप जरबथि तँ ओ खौँझा कऽ पत्नीकेँ कहल जे एकरा हम डसि लेब। पत्नी मना केलन्हि जे अजश हएत, से बिदा करऽ दिअ। सासुर चलि जाएत तँ जे मोन हुअए से करब। बसुकिनी नूआ-लहठी दऽ बिदा करैत काल धरि ई केलन्हि जे साँप रक्षकमंत्र कनिआकेँ सिखा कऽ बाल-बसन्तक संग बिदा कऽ देलन्हि। कहलन्हि जे ई मंत्र सूतऽ काल पढ़ि सूतब। दीप-दीपहरा आगू हरा मोती मानिक भरू धरा। नाग बढ़थु, नागिन बढ़थु, पाँचो बहिन विषहरा बढ़थु। बाल बसन्त भैय्या बढ़थु, डाढ़ि-खोढ़ि मौसी बढ़थु। आशावरी पीसी बढ़थु, खोना-मोना मामा बढ़थु। राही शब्द लऽ सुती, काँसा शब्द लऽ उठी। होइत प्रात सोना कटोरामे दूध-भात खाइ। साँझ सुती, प्रात उठी, पटोर पहिरी कचोर ओढ़ी। ब्रह्माक देल कोदारि, विष्णुक चाँछल बाट। भाग-भाग रे कीड़ा-मकोड़ा, ताहि बाटे आओत। ईश्वर महादेव, पड़ए गरुड़केँ ठाठ। आस्तीक, आस्तीक, आस्तीक। बासुकी डसए लऽ आबथि मुदा ई मंत्र सुनि घुरि जाथि। चारिम दिन सासुकेँ डसि तीन बेर नाङरि पटकि घर सोना-चानीसँ भरि देलखिन्ह। ई भेल ने… भुमिहार.. बौद्ध मठ लग जमीन रहै, जे ब्राह्मण बौद्ध बनि गेल से जखन बौद्ध धर्म खतम भेलाक बाद घुरल तँ ओकरा ब्राह्मण लोकनि भुमिहार आ पछिमा कहऽ लगला। मुदा ई सभ अपनाकेँ ब्राह्मण कहै छथि, दान लै बला नै, दान दैबला ब्राह्मण.. मंगोल मुसहर सभ बौद्ध धर्म गेलाक बाद मूस मारऽ लगला मुदा ई सभ बौद्ध मठक जमीनक बदौलति खेतिहर भऽ गेला... कियो गोटे जैन सेहो बनल हेता की? महावीर मिथिलामे सेहो खूब घुमल रहथि। आइ काल्हि तँ कियो नै अछि। मिथिलाक बाहर तँ जैन मे मात्र वैश्य अछि। मगध देशमे अशोकक पिता बिम्बिसारक राज्य छल। संपूर्ण शांति व्याप्त छल मुदा एकटा डाकू रौहिणेयक आतंक छल। ओकर पिता रहए डाकू लौहखुर। मरैत-मरैत ओ ओकरा कहि गेल जे महावीर स्वामीक प्रवचन नै सुनए आ जौँ कतौ प्रवचन हुअए तँ अप्पन कान बन्द कऽ लिअए, अन्यथा बर्बादी निश्चिते। रौहिणेय मात्र पाइ बलाकेँ लुटै छल आ गरीबमे बाँटै छल, तइ द्वारे गामक लोक ओकर मदति करैत रहए आ ओ पकड़ल नै जा सकल छल। एक बेर तँ ओ अप्पन संगीक संग वाटिकामे पाटलिपुत्रक सभसँ पैघ सेठक पुतोहु मदनवतीक अपहरण कऽ लेलक, जखन ओकर पति फूल लेबा लेल गेल रहै। जखन ओकर पति आएल तँ रौहिणेयक संगी ओकरा गलत जानकारी दऽ भ्रममे दऽ देलकै। ओकरा बाद सुभद्र सेठक पुत्रक विवाह रहै। बराती जखन लौटि रहल छल तखन रौहिणेय सेठानी मनोरमाक भेष बनेलक आ ओकर संगी नर्त्तक बनि गेल। नकली नर्त्तक जखन नाचऽ लागल, तखन रौहिणेय भीड़मे कपड़ाक साँप छोड़ि देलक। रौहिणेय गहनासँ लदल वरकेँ उठा निपत्ता भऽ गेल। राजा शहरक कोतवालकेँ बजेलक। ओ तँ रौहिणेयकेँ पकड़बामे असमर्थता व्यक्त केलक आ कोतवाली छोड़बाक बातो केलक। मंत्री अभयकुमार पाँच दिनमे डाकू रौहिणेयकेँ पकड़ि कऽ अनबाक बात कहलक। राजा ततेक तामसमे छल जे पाँच दिनका बाद डाकू रौहिणेयकेँ नै अनला उत्तर अभयकुमारकेँ गरदनि काटि लेबाक बात कहलक। डाकू रौहिणेयकेँ सभ बातक पता चलि गेल छलै। अभयकुमार जासूस सभ लगेलक। रौहिणेयक मोनमे एलै जे सेठ साहूकार बहुत भेल, आब किए नै राजमहलमे डकैती कएल जाए। ओ राजमहलक रस्तापर बिदा भेल। रस्तामे वाटिकामे महावीरस्वामीक प्रवचन चलि रहल छल। रौहिणेय तुरत अपन कान बन्द कऽ लेलक। मुदा तखने ओकरा पैरमे काँट गरि गेलै। महावीर स्वामी कहि रहल छला- “देवता लोकनिकेँ कहियो घाम नै छुटै छन्हि। हुनकर मालाक फूल मौलाइत नै अछि, हुनकर पएर धरतीपर नै पड़ै छन्हि आ हुनकर पिपनी नै खसै छन्हि।” -देवताक पिपनी नै खसैबला खिस्सा तँ मधुश्रावणीओ मे रहै मुखदेव!! तावत रौहिणेय काँट निकालि कान फेर बन्न कऽ लेलक आ राजमहल दिशि चलि पड़ल। राजमहलमे सभ पहरेदार सुतल बुझाइत छल। मुदा ई अभयकुमारक चालि रहए। ओकर जासूस बता रहल रहए जे डाकू नगर आ महल दिशि आबि रहल अछि। जखने ओ महलमे पैसैत रहए तँ पहरेदार ललकारा देलक। ओ छड़पि कऽ कालीमंदिरमे चलि गेल। सिपाही सभ मंदिरकेँ घेरि लेलक। ओ जखन देखलक जे बाहरसँ सभ घेरने अछि तँ सिपाहीक मध्यसँ मंदिरक चहरदिवारी छड़पि गेल। मुदा ओतौ सिपाही सभ छल आ ओ पकड़ल गेल। राजा ओकरा सूलीपर चढ़ेबाक आदेश देलकै। मुदा मंत्री कहलन्हि जे बिना चोरीक माल बरामद केने आ बिना चिन्हासीक एकरा कोना फाँसी देल जाए। रौहिणेय मौका देखि कऽ गुहारि लगेलक जे ओ शालि गामक दुर्गा किसान छी, ओकर घर परिवार ओइ गाममे छै। ओ तँ नगर मंदिर दर्शन हेतु आएल छल, ततबेमे सिपाही घेरि लेलकै। राजा ओइ गाममे हरकारा पठेलक मुदा ग्रामीण सभ रौहिणेयक पक्षमे छल। सभ कहलकै जे दुर्गा ओइ गाममे रहैत अछि मुदा तखन कतौ बाहर गेल छल। अभयकुमार सोचलक जे एकरासँ गलती कोना स्वीकार करबाबी। से ओ डाकूकेँ नीक महलमे कैदी बना कऽ रखलक। डाकू महाराज ऐश आराममे डूमि गेला। अभयकुमार एक दिन डाकूकेँ खूब मदिरा पिया देलन्हि। ओ जखन होशमे आएल तँ चारू कात गंधर्व-अप्सरा नाचि रहल छल। ओ सभ कहलकै जे ई स्वर्गपुरी थीक आ इन्द्र रौहिणेयसँ भेँट करबा लेल आबऽ बला रहथि। रौहिणेय सोचलक जे राजा हमरा सूलीपर चढ़ा देलक। मुदा ओ सभ तँ मंत्रीक पठाओल गबैया सभ छल। तखने इंद्रक दूत आएल आ कहलक जे रौहिणेयकेँ देवताक रूपमे अभिषेक हेतै मुदा तइसँ पहिने ओकरा अपन पृथ्वी लोकपर कएल नीक-अधला कार्यक विवरण देमऽ पड़तै। तखन रौहिणेयकेँ भेलै जे सभटा पाप स्वीकार कऽ लिअए। मुदा तखने ओ देखलक जे देव लोकक जीव सभ घामे-पसीने अछि, माला मौलाएल छै, पएर धरतीपर छै आ पिपनी उठि-खसि रहल छै। ओ अपन पुण्यक गुणगाण शुरू कऽ देलक। अभयकुमार राजाकेँ कहलक जे अहाँ जौँ ओकरा अभयदान दऽ देबै तँ ओ सभटा गप्प बता देत। सएह भेलै। रौहिणेय नगरक बाहरक अपन जंगलक गुफाक पता बता देलकै, जतऽ सभटा खजाना आ अपहृत व्यक्ति सभ छल। राजा कहलन्हि जे किएक तँ ओकरा अभयदान भेटि गेल छै तइ हेतु ओ सभ संपदा राखि सकैत अछि। मुदा रौहिणेय कोनोटा वस्तु नै लेलक। ओ कहलक जे जइ महावीर स्वामीक एकटा वचन सुनलासँ ओकर जान बचि गेलै, तकर दीक्षा लेत आ ओकर सभटा वचन सुनि जीवन धन्य करत। महावीर स्वामी विदेहमे छह टा वस्सावास बितेलन्हि। घनानन्द, हलधर, नोने, दौलति जहाँ, भट्ट भूषण आ रुद्रमति एक्के संगे पूछि बैसै छथि- वस्सावास। मुदा रघुवरनकेँ से बुझल छन्हि। तीन मास बर्खा मासमे थाल-कीचमे एक्के ठाम निवास करै छला महावीर। महावीर छहटा वस्सावास विदेहमे बितेलन्हि आ बारहटा वस्सावास वैशालीमे बितेलन्हि। मुदा बुद्ध एक्कोटा वस्सावास विदेहमे नै बितेलन्हि। बुद्ध वर्ण व्यवस्थाक कट्टर विरोधी रहथि, मुदा महावीर ब्राह्मण, क्षत्रिय आ वैश्यक त्रिवर्णकेँ मान्यता देलन्हि। तेँ उदयनाचार्य सहित सभ मैथिल विद्वान बौद्धक जतेक निर्दयतासँ विरोध केलन्हि ततेक जैन महावीरक नै। महावीर रहथि २४ म तीर्थंकर, वैशालीमे जन्म भेल रहन्हि, माता वैदही त्रिशला रहथिन्ह आ हुनको विदेह सुकुमार कहल जाइ छलन्हि। जैन ओइसँ पहिनहियो मिथिलामे रहथि, २१ म तीर्थंकर नेमिनाथ सेहो मिथिलेक रहथि। कर्मकाण्डक विरोध उपनिषदमे भेलै, मुण्डक उपनिषदमे तँ बड्ड गम्भीर भऽ कऽ। मुदा ज्ञानपर जे प्रतिबन्ध रहै, किछुए लोक धरि जे ओ सीमित रहै, बीस-पच्चीस सालक जे विशाल कालावधि ज्ञान प्राप्ति लेल निर्धारित रहै, सामान्य ज्ञान लेल छोट कालावधिक जे कोनो पाठ्यक्रम नै रहै, तखन ई विरोध, कर्मकाण्डक ई विरोध सफल होइतए कोना? मुदा विदेहमे कर्मकाण्डक विरोध नै रुकल। जनक सेहो क्रान्तिकारी रहथि, आ बुद्ध, नेमिनाथ आ महावीर सेहो। तेँ ने मनु तमसा कऽ विदेहवासीकेँ व्रात्य कहै छथि। हरिहर क्षेत्रमे बौद्धसंघ मैथिलक अपमान केलन्हि। से ओ सभ परमार विक्रमादित्य लग गेला आ तखन ओ बौद्ध लोकनिकेँ हरा मिथिलामे शासन स्थापित केलन्हि। मिथिलाक गंधवरिया राजपूत लोकनि अपनाकेँ हुनके वंशज कहै छथि। ओना ई गंधवरिया राजपूत लोकनि मिथिलाक कर्णाट वंशक संस्थापक नान्यदेवक पुत्र मल्लदेवकेँ अपन बीजीपुरुष मानै छथि। मुदा मिथिलाक लोक ने बुद्धक अनादर केलन्हि, ने महावीरक। बुद्धक विरोध बेशी तीव्रतासँ भेल, मुदा बौद्धसंघक पराजित भेलाक बाद बुद्धकेँ विष्णुक नौम अवतार मानि लेल गेल। बौद्ध शाखा महायान गीतासँ प्रभावित भेल छल, महायानसँ मिथिलामे तंत्र पसरल, पागक फेँच, अरिपन सभमे तंत्र सिद्धांतक प्रयोग होइए। उदयन आ गंगेश नव्य न्यायक जन्मदाता छथि। मुदा न्यायमे ऐसँ पहिने जैन सेहो योगदान देलन्हि। रघुवरन बाजैए नै आ जखन बाजैए तँ खूब बाजैए। पंद्रहम कल्लोल गहना रे जटा तड़बाक धूर/ घरे रहु रे जटा नयना हजूर मधस्थ राजाक एक सए एक बेटीक विवाह नाहर राजाक एकसए एक बेटासँ भेलन्हि। सभसँ पैघ भाए बैरसीक विवाह सभसँ पैघ कान्या गोसाउनीसँ भेलन्हि। विवाहकालमे बैरसीक पागसँ पहिल कनियाँ महादेवक पुत्री लीली खसि पड़लन्हि। लीली लाबा बिछि खाए लागलि। गोसाउनिक पिता मधस्थ सरापलन्हि जे बैरसी डेग पाछाँ पानक बिड़िया खेता आ कोश पाछाँ तिरियासँ गप करता तँ जीता, नै तँ मरि जेता। मुदा बैरसी लीलीकेँ मानथि। सासुरमे गोसाउनि अपन व्यथा दिअर चनाइकेँ कहलन्हि। ओ भाइकेँ कहलन्हि जे बाहर घुमि फिरि आउ। तँ बैरसी ससुरक सरापक कथा कहलन्हि। मुदा चनाइ सभटा व्यवस्था कऽ भौजीकेँ कहलन्हि जे हम पाँच-पाँच कोसपर ठहरबाक व्यवस्था करब, अहाँ भायसंगे भेष बदलि रहब आ संगमे पासाक गोटी लऽ तकरा प्रमाण रूपमे गाड़ैत जाएब। सएह भेल। पाँच विश्रामक बाद जखन सभ घुरि एला, तखन गोसाउनिकेँ ओधु, काछु, महानाग, श्रीनाग, आ नग्नश्री, पाँचटा पुत्र भेलन्हि। लीली बैरसीकेँ कहलन्हि जे ई चनाइक सन्तान छी। मुदा गोसाउनि पासाक गोटी देखेलन्हि। तखन बैरसी लीलीकेँ मालभोग चाउर आ खेड़हीक दालि आ गोसाउनिकेँ लोहाक चाउर आ पाथरक दालि सिद्ध करऽ कहलन्हि। मुदा तैयो लीली बुते सिद्ध नै कएल भेलन्हि, मुदा गोसाउनि सुसिद्ध कऽ देलन्हि। ई देखि कऽ गोसाउनिक शरीर गौरवे फाटि गेलन्हि। गौरवे फाटि गेलन्हि.. हँ हौ खिस्सा छिऐ.. महाराज शिव सिंह (१४१२-१४४६) मिथिलाक राजा रहथि। विद्यापति ठक्कुर, संस्कृत आ अवहट्टबला, हुनके शासनकालमे भेल छला आ राजा शिव सिंह आ हुनकर रानी लखिमा रानी हुनकासँ बड़ प्रेम करैत रहथि। एक टा जयट वा जट नाम्ना बड़ पैघ संगीतकार सेहो छला ओइ समएमे। राजा शिव सिंह हुनकासँ ज्योतिरीश्वर पूर्व बिस्फीक नौआ ठाकुर महेश ठाकुरक पुत्र मैथिल कोकिल विद्यापतिक गीतकेँ राग-रागिनीमे बन्हबा लेल कहने रहथि। वएह जयट जट-जटिन नाटकक रचना केलन्हि आ जटक भूमिका सेहो केने छला। साओन-भादवक शुक्ल-पक्षक रातिमे ई नाटक स्त्रीगण द्वारा होइत अछि। इन्द्र भगवान लेल, साओन भादवमे पानि नै भेलापर बेङ पकड़ि कऽ उक्खरिमे कूटै छै। जट छथि पहिरने पुरुष-परिधान आ जटिन पहिरने छथि छीटबला नूआ। आ देखू दुनू गोटे अपना संग अपन-अपन संगीकेँ लऽ आबि गेल छथि। बियाहक पहिल सालक साओन, जटिन जाए चाहै छथि नैहर मुदा धारमे बाढ़ि छै, हे माय कोनो नौआ-ठाकुर-ब्राह्मण आकि पैघ भाए केर बदलामे छोटका भायकेँ पठबिहँ बिदागरी लेल नै तँ सासुर बला सभ बिदागरी आपिस कऽ देत। जइ नवकनियाँकेँ नैहर नै जाए देल गेल ओ अपन पतिकेँ कहै छथि जे जट-जटिनक नृत्यमे तँ भाग लेबऽ दिअ। मुदा वर झूमर खेलेबासँ मना कऽ दै छथि, तखन ओ घामक बहन्ना बना दूर भऽ जाइ छथि। जट-जटिन बीचमे छथि आ दुनूक संगीमे बहस चलि रहल अछि। -चलू झूमर खेलाए। -कोन पातपर चढ़ि कऽ। -पुरैनीक। जट-जटिनमे बिआह हुअए बला अछि, मुदा जट किछु बातपर अड़ि गेल, जेना धानक शीस जकाँ लीबि कऽ चलत जटिन, किछु देखावटी विरोधक बाद जटिन सभटा गप मानि जाइ छथि। फेर दुनू गोटे बिआह कऽ लै छथि। फेर भोर होइत अछि, जटिन कहै छथि जे जाए दिअ, अंगना बहारबाक अछि, मुदा जटा कहै छथि जे अंगना माए-बहिन बहारि लेत। फेर दिन बितैत अछि तँ जटिन कहै छथि जे गहना किए नै बनबा रहल छी हमरा लेल, आर बहन्ना करब तँ हम सोनारक घर चलि जाएब। जटिन ततेक खरचा करबै छन्हि जे जटाक हाथी तक बिका जाइ छन्हि आ हाथीक सिक्कड़ि मात्र बचल रहि जाइ छन्हि। जटिन कहै छथि जे हमरा नैहर जेबाक अछि, तँ जटा कहै छथि जे धानक फसिल तैयार अछि, तकरा काटि कऽ जाउ। जटिन नै मानै छथि, कहै छथि जे ऐबेर जे हम जाएब तँ घुरि कऽ नै आएब। मुदा सौतिनक गप सुनि कऽ डरा जाइ छथि। बीचमे स्वांग जेना कोनो रोगीक इलाज आदि सेहो होइत रहैत अछि। जट मोरंग बिदा भऽ जाइ छथि कमाए। जटिनकेँ सोनार प्रलोभन दै छन्हि गहनाक, मुदा जटिन जटाक सुन्दरताक वर्णन करै छथि। फेर जटा घुरि अबैत अछि। एक दिन दुनू गोटेमे कोनो गप लऽ कऽ झगड़ा भऽ जाइ छन्हि। जट छौँकीसँ जटिनकेँ छूबि दै छथि। जटिन रूसि कऽ घर छोड़ि दै छथि। जटा गोपी, मनिहारिन आ आन-आन रूप धरि ताकै छथि हुनका। मुदा जटाक घरमे झोल-मकड़ा भरि जाइ छन्हि आ अंगनामे दूभि उगि जाइ छन्हि। तखन जटिन हुनका लग आबि जाइ छथि। फेर स्त्रीगण लोकनि बेंगकेँ एकटा खद्धा खुनि कऽ ओइमे दऽ दै छथि आ ऊपरसँ ओकरा कूटै छथि आ मरल बेंगकेँ झगराहि स्त्रीक दरबज्जापर फेकि अबै छथि। ओ स्त्री भोरमे मरल बेंगकेँ देखला उत्तर जतेक गारि पढ़ै छथि, ततेक बेसी बरखा होइत अछि। जाए दहिन गे जटिन देश रे विदेश तोरा लऽ लएबौ जटिन गहना सनेस गहना रे जटा तरबाक धूर घरे रहु रे जटा नयना हुजूर दरबारे रहु रे जटा नयना हुजुर जाए दहिन गे जटिन देश रे विदेश तोरा लऽ जे लएबौ जटिन साड़ी-सनेस साड़ी तऽ रे जटा तड़बाक धूर घरे रहु रे जटा नयना हुजूर दरबारे रहु रे जटा नयना हुजुर जाए दहिन गे जटिन देश रे विदेश तोरा लऽ लएबौ जटिन सिनुर-सनेस सिनुरा रे जटा मांगक सिनूर घरे रहु रे जटा नयना हुजूर दरबारे रहु रे जटा नयना हुजुर जाए दहिन गे जटिन देश रे विदेश तोरा लऽ लएबौ जटिन नथिया सनेस नथिया तँ रे जटा तड़बाक धूर घरे रहु रे जटा नयना हुजूर दरबारे रहु रे जटा नयना हुजुर घेंघीकेँ बुझलो छै जे ओकर जटा विदेश चलि गेलै, घुरि कऽ घर नै एतै। गंगेश उपाध्यायक पुत्र वर्धमान झूठ गवाही देनिहार, तांत्रिक आदिकेँ समाज लेल अहितकर प्रकाश तस्कर कहै छथि, मुदा पीअर बच्चा… बहलमानी करू, खबासी करू, बोनि करू.. सभ जमीन्दारे बनल फिरैए। बड़का जमीन्दार, मझोलबा जमीन्दार, छोटका जमीन्दार। जोंकही पोखड़िमे बड़का जमीन्दार छोटका जमीन्दारकेँ धऽ दैए मुदा बहलमानी, खबासी, आ बोनिसँ निस्तार दियो नै देत। सभ छोटका-बड़का जमीन्दार तइ बेरमे मिलि जाइए। अंग्रेजोसँ मिलि गेल ई सभ.. आ तकर विरोध जँ जागेश्वर करैए तँ ई प्रकाश तस्कर सभ…… सोलहम कल्लोल छाती लात, झोँटा हाथ आ सौतिनक पोखड़िमे अढ़ाइ झाक माटि उघब राजा श्रीकरक कन्याक टीपणिमे छाती लात, झोँटा हाथ आ सौतिनक पोखड़िमे अढ़ाइ झाक माटि उघब लिखल छल। हुनकर मुइलाक बाद हुनकर बेटा चन्द्रकर जंगलमे एकटा सोन्हि बना कऽ एकटा चेरी संगमे दऽ राजकुमारीकेँ ओतऽ राखि देलन्हि। जंगलमे सुवर्ण राजाकेँ ओ भेँट भेली तँ दुनू गोटे जाए लगला तँ राजकुमारी मधुश्रावणी पाबनिक लेल सासुरक अन्न खेबाक आ वस्त्र पहिरबाक प्रथाकेँ मोन पाड़ि कहलन्हि जे ई दुनू वस्तु अवश्य पठाएब। राजा राज्य जा कारीगरकेँ वस्त्र लेल कहलन्हि तँ बड़की रानी सुनि लेलन्हि आ वस्त्रमे छाती-लात आ झोँटा हाथ लिखि देबा लेल कहलन्हि। कौआकेँ जखन ई वस्त्र पहुँचेबाक भार राजा देलन्हि तँ ओ रस्तामे कतौ भोज-भात खाए लागल आ सनेस पहुँचेनाइ बिसरि गेल। राजा सेहो सभटा बिसरि गेला। मधुश्रावणी दिन राजकुमारी गौरीक पूजन उज्जर चानन-फूलसँ केलन्हि आ कहलन्हि जे जहिया राजा भेँट होथि तहिया हम बौक भऽ जाइ। जखन चन्द्रकरकेँ पता चलल जे राजकुमारी विवाह कऽ लेलन्हि तँ ओ खरचा बन्द कऽ देलन्हि। आब दुनू गोटे राजकुमारी आ चेरी, सुवर्ण राजाक बड़की रानी द्वारा खुनाओल जा रहल पोखड़िमे माटि उघऽ लगली। सुवर्ण एक दिन हिनका लोकनिकेँ देखलखिन्ह तँ हुनका सभटा मोन पड़ि गेलन्हि। ओ हुनका राज्य लऽ अनलन्हि। मुदा राजकुमारी बजबे नै करथि। चेरी सभटा गप बुझेलन्हि तँ राजा कहलन्हि जे ई कौआक गलती अछि। तखन रानी अगिला मधुश्रावणीमे लाल चाननसँ गौर पुजलन्हि आ हुनकर बकार घुरि गेलन्हि आ सुखसँ जीवन बिताबऽ लगली। श्रीगणेशजी मधुश्रावणी दिन माए गौरीसँ कहलन्हि जे आइ हम सोहाग मथब आ बाँटब। धन-धान्य, काठक तामा, नीम बेल आ आमक काठीसँ ओ सोहाग मथि सभकेँ बँटलन्हि। बाह… मुखदेवक खिस्सा चलिते रहै छै। जेल तँ निन्नक समान छै। निन्नमे सभ चिन्ता-फिकिर-हर्ष-उल्लास खतम भऽ जाइ छै। निन्नसँ जागू तँ फेर सभ हर्ष-उल्लास-चिन्ता-फिकिर सोझाँ आबि जाइ छै। जेलक हर्ष-उल्लास-चिन्ता-फिकिर निन्नक सपना हर्ष-उल्लास-चिन्ता-फिकिर सन… कतेक रास गप बाजै छल जागेश्वर… जे आर्य छथि से भारतक पच्छिम भागसँ मिथिलामे एला, आ हुनका सभक एबासँ पूर्व वेदक किछु अंश विद्यमान छल, तेँ ने बहुत रास शब्द जे मैथिलीमे अछि, बहुत रास उच्चारण जे मैथिलीमे अछि ओ वैदिक संस्कृतमे अछि, मुदा लौकिक संस्कृतमे नै अछि। अविद्या, कर्मसिद्धान्त, जन्म आ पुनर्जन्मक आवाजाही आ मोक्ष ई सभ अनार्यसँ आर्यकेँ भेटलै। तेँ ने उपनिषदमे मोक्ष प्राप्तिक मार्ग छै, स्वर्ग प्राप्तिक नै। मोक्ष भेटत केना? यज्ञ केलासँ? नै, ई भेटत ज्ञानसँ आ मनन-चिन्तन आ समाधिसँ। राजा जनकक संरक्षणमे याज्ञवल्क्य बृहदारण्यक उपनिषदक तिरहुतक अनार्य क्षेत्रमे रचना केलन्हि। वाचस्पति मिश्र सांख्यकारिकाक सन्तावनम सूत्रक व्याख्या करैत कहै छथि जे की ई कहि सकै छी जे अचेतन दूध केर पोषणसँ परु पोसाइए आ अचेतन प्रकृतिक संचालनसँ जीवकेँ मुक्तिक ज्ञान भेटैए? ईश्वर तँ स्वयंमे पूर्ण छथि तँ ओ कोन उद्देश्ये विश्वक सृष्टि करता आ जीव लेल जँ ओ सृष्टि करता तँ सृष्टिक बादे तँ जीव बन्हाइए आ सृष्टिसँ पूर्व तँ बन्हेबाक प्रश्ने नै अछि, तखन जीवक प्रति कथीक दया? से प्रकृति द्वारा सृष्टि होइए आ जीव अपन प्रयाससँ अपवर्गक प्राप्ति करै छथि। आ विवेकसँ होइए प्रलय। से ईश्वरवाद नै निरीश्वरवाद अछि वाचस्पतिक व्याख्या। प्रकृति संचालनमे जँ ईश्वर भाग लै छथि तँ ओ चेतन प्रक्रिया हएत जे कोनो उद्देश्येसँ हएत आ तकर कोनो खगता ईश्वरकेँ छन्हिये नै। न्यायसूत्रक रचना केनिहार मिथिलाक गौतम सोलह पदार्थक ज्ञानसँ जीवक निःश्रेयस प्राप्त करबाक चर्च करै छथि, मुदा ऐ सभमे ईश्वरक कतौ चर्च नै अछि जे हुनको द्वारा मुक्ति सम्भव अछि। वैशेषिक सूत्र कहैए जे वेद विद्वान लोकनि द्वारा रचल गेल अछि नै कि ईश्वर द्वारा। कुमारिल भट्ट कहै छथि जे सृष्टिक पूर्व ईश्वरक विषयमे कोनो विश्वसनीय चर्चा असम्भव अछि। डाइन-जोगिन, रैयत-लगान.. ईश्वर, मोक्ष.. प्रकृति… हहाइट। दूटा धार मिलि रहल अछि। ओकर अवाज हृदयमे उद्वेग उत्पन्न कऽ रहल अछि। भमरासँ बनल मोइनमे मुखदेव पैसि गेल छथि। नचैत भाउर मोइनकेँ आर गहींर करबाक प्रयासमे अछि। निशाभाग करनिनियाँ राति, मुखदेव काजरकेँ मोसिहानि बना किछु लिखऽ चाहै छथि… सतरहम कल्लोल गविया बाँझिन, बड़द बियाय, बूँदमे देखहुँ समुद्र समाय काठक झूला। आङी, टोपी, चद्दरि, रेशमी डोरीसँ सजावट कऽ झूला गाउ सभ.. झूला लगै कदम्बक डारि झूलथि कृष्ण मुरारी ना कोने काठक बनै हिलोरा कथिएक डोरी ना ओइपर झूलत कृष्ण मुरारी संगमे राधा प्यारी ना चन्दन काठ बनल हिलोरा रेशम डोरी ना ओइपर झूलथि कृष्ण मुरारी संगमे राधा प्यारी ना राधा झूले राधिका झुलाबे बेरा-बेरी ना ओइपर झूलथि कृष्ण मुरारी संगमे राधा प्यारी ना बाह.. लचका पुल, झूला, अंग्रेजक झूला... जटमलपुरक लचका पुला उड़ि गेल। मुखदेव भोरे भोर बहार भऽ गेल रहथि। धनेसरक कामतपर पहुँचला मुखदेव। लचका। ऐ लचका पुलक विशेषता होइ छै जे बाढ़ि-बर्खामे पानि पुलक ऊपरसँ बहि जाइ छै। जँ कही तँ ई पुल होइते नै छै जे नीचाँमे जगह खाली रहतै आ नीचासँ पानि बहतै। माछी रोमैयोक शक्ति नै छै गरीबमे, दशा ततेक खराप छै। समाजमे हरमाज उठा दैतै गरीब सभ मिलि कऽ। मुदा ओ तँ प्रेम करै छै समाजसँ, देशसँ। धनेसरक कामतपर जागेश्वरक संग किछु लोक बैसल रहथि। मधेपुरक कुञ्जन, तारसरायक चेथरू, बहेरीक मुसाइ, बिरौलक ढिनाइ, दलसिंहसरायक भत्तू, ताजपुरक पिचकुन, बेनीपट्टीक छुतहरू; आ मेंहथक घोंघाइ आ धनेसर। आ संगमे जागेश्वरक किछु कॉमरेड, चारिटा। लचकाकेँ तोड़बा लेल बम कोना राखल जाए, बमकेँ गंतव्य स्थान धरि कोना पहुँचाएल जाए। बम विस्फोटक बाद सभ गोटे सुरक्षित कोना बहराइ जाइ, ऐ सभ गपपर चर्चा भेल। जटमलपुर लचका.. -मुदा पुल टुटलासँ लोककेँ तँ सेहो असुविधा हेतै। - पुछने रहै मुखदेव। जागेश्वरक संग बैसल कॉमरेडमे सँ एक गोटे उत्तर देने रहै- देखू, हमर सभक मूल उद्देश्य की अछि? आ वएह कॉमरेड जवाब सेहो देने रहए- हमर सभक मूल उद्देश्य अछि अंग्रेजी राज आ जमीन्दारी राजक समाप्ति। ई पुल आ रस्ता जतेक सुविधा लोक सभकेँ दै छै ओइसँ बेशी ई सहायक होइ छै ओइ जमीन्दारक आ अंग्रेजी राजक यथास्थितिवादी व्यवस्थाक यथास्थिति बनेबामे। यथास्थिति माने जेहने छी तेहने, माने परिवर्तन शून्य।–- मुखदेवक मुँहसँ बहार भेल रहै। पहिल दल बनल कुञ्जन, चेथरू, मुसाइ आ पहिल कॉमरेडक; ढिनाइ, भत्तू, पिचकुन आ दोसर कॉमरेडक बनल दोसर दल; छुतहरू, घोंघाइ, धनेसर आ तेसर कॉमरेडक बनल तेसर दल; आ मुखदेव, जागेश्वर आ चारिम कॉमरेडक बनल चारिम दल। अगिला दिन रातियेमे बिदा हेबाक अछि। बलेसरी काँटी, बारूद आ की की। अलगे सुगन्ध रहै… चारू कॉमरेड आ जागेश्वर भिरल रहथि, डिब्बा बना बना कऽ रखने जा रहल छला। एक गोटे खेनाइ दऽ गेलन्हि, धनेसर बाहरेसँ खेनाइ लऽ भीतर एला। फेर रातिमे सभकेँ कटही गाड़ीपर अलग-अलग रस्तासँ बहरेबाक रहै। जटमलपुरसँ बेसी दुरस्त धनेसरक कामत नै रहै। चारू दल पहुँचि तँ गेल रहए मुदा हमर सभक दल आ कुञ्जन, चेथरू, मुसाइ आ पहिल कॉमरेडक दलकेँ आक्रमण करबाक रहए। दूटा दल सुस्ताएत, जँ हम सभ पकड़ेलौं तखन अंग्रेज सरकार बुझत जे मामिला सुनझा लेल गेल। आ तखने ओ दुनू दल कने बिलमि कऽ आक्रमण करत आ लचकाकेँ तोड़ि देत। आ जँ पहिल दुनू दलमे बेशी घाएल होइ छै तँ आसपासमे घुमैत ओ दुनू दल सोझाँ आएत आ जँ एकाधे टा घाएल होइ छै तखन ओ दुनू दल सोझाँ नै आएत। मेंहथक घोंघाइ कथा शुरू केलक:- सतयुगमे केदार राजा परम्परानुसार वृद्धावस्था प्राप्त भेलापर पुत्रकेँ राज्यभार दऽ तपस्याक लेल बोन चलि गेला। केदारक एकेटा पुत्री छलन्हि वृन्दा। ओ भरि जिनगी यमुना तटपर घोर तपस्या केलन्हि। अन्तमे भगवान प्रकट भऽ वर मँगबा लेल कहलखिन्ह। वृन्दा कहलखिन्ह जे अहाँ हमर वर बनू। ओ बोन जतऽ बृन्दा तपस्या केलन्हि, वृन्दावन नामसँ प्रसिद्ध भेल। यमुना नदीक निचुलका दक्षिण तटपर मधुपुरी नगर बसल। शत्रुघन ओइ दैत्यकेँ मारि मधुपुर माने मथुरा जितलन्हि। किछु तुषरपात भेल आ तकर बाद दलसिंहसरायक भत्तूक संग ताजपुरक पिचकुन कहै छथि: सुरजापुरी सभ भारतमे बिहारक किशनगंज आ पूर्णियाँ आदिमे गामे-गाम रहैए, राजबंशी महादलित जाति द्वारा ई भाषा बाजल जाइत अछि। किशनगंजमे मुस्लिममे स्वामी जाति खोट्टा आ सेवक जाति कुल्हिया कहल जाइ छथि। कुल्हिया जाति सेहो सुरजापुरी भाषा बजै छथि। राजबंशी आ जे आन जाति सभ कुल्हियाक आसपास रहै छथि से सुरजापुरी बजै छथि। ई भाषा मैथिली आ बांग्लाक मिश्रण अछि। कियो कियो बंगालक कूच बिहारक बाहे बंगाली आ नेपालक राजबंशी भाषाकेँ सेहो सुरजापुरी भाषा कहै छथि। किछु गोटेक मत छन्हि जे बांग्लादेशक लोकक भाषाक क्षेत्रीय भाषासँ मिश्रणक परिणामस्वरूप सुरजापुरी भाषा निकलल। पूर्णियाँ आ किशनगंजमे एक्के गाममे कुल्हिया आ राजबंशी लोकनि सुरजापुरी बजै छथि, संथाल लोकनि संथाली बजै छथि, बंजारा लोकनि बंजारा भाषा बजै छथि जखन कि शेष सभ गोटे मैथिली बजै छथि। मुखदेव दिस ताकि जागेश्वर बाजै छथि:- खण्डेबलासँ सुरपतिसुत दूवे सुत चन्द्र पतिक पुत्रीक विवाह, आसामक कोच राजवंशी राजा सँ छलन्हि पुत्रीक नाम सोहागो। ताजपुरक पिचकुन फेर बजैए: जँ राज्यमे ऐ क्षेत्र सभकेँ लेल जाए तँ हुनका सभकेँ हुनकर भाषाक विकासक गारन्टी देबऽ पड़त। की नव देश-राज्य राज्य अभियानकर्मी सभक सोच एतऽ धरि पहुँचलनि अछि? जागेश्वर बजै छथि, यौ ई विभिन्न तरहक जाति- जन- विस् आदिक खेरहा बड्ड पुरान छै। ओ आगाँ कहै छथि:- प्राकृतसँ वैदिक संस्कृत बहार भेल आकि वैदिक संस्कृतसँ प्राकृत? वेदमे नाराशंसी नाम्ना जन आख्यान यएह सिद्ध करैत अछि जे दुनू समानान्तर रूपेँ बहुत दिन धरि चलल। ई समानान्तर परम्परा दुनूकेँ प्रभावित केलक। आब ऋगवेद देखू- ओतऽ दुर्लभ लेल- दूलभ, (ऋगवेद ४.९.८) प्रयोग की सिद्ध करैत अछि? अथर्ववेदमे पश्चात् लेल पश्चा (अथर्ववेद १०.४.१०) की सिद्ध करैत अछि? गोपथ ब्राह्मणमे प्रतिसन्धाय लेल प्रतिसंहाय की सिद्द करैत अछि? (गोपथ ब्राह्मण २.४)। आ वैदिक आ लौकिक संस्कृतकेँ ओइ कालमे संस्कृत नै वरन क्रमसँ छन्दस (वैदिक संस्कृतकेँ यास्क आ पाणिनी छन्दस कहै छथि) आ भाषा (लौकिक संस्कृतकेँ पाणिनी भाषा कहै छथि) कहल जाइ छल। आ जकरा आइ प्राकृत कहै छिऐ से पालिक बाद ओइ रूपमे बुझल गेल (साहित्य लेखन सम्बन्धमे)। भरत नाट्यशास्त्रमे ७ टा आ वररुचि ४ टा प्राकृतक चर्चा करै छथि। ओना तँ महावीरक वचन अर्ध-मागधी प्राकृत आ बुद्धक वचन मागधी-प्राकृतमे देल गेल मुदा ई दुनू मूलतः जनभाषा रहए। मुदा जखन विभिन्न क्षेत्रक लोक जुमला तँ बुद्ध सभकेँ अपन क्षेत्रक भाषामे बुद्धवचन सिखबा लेल कहलन्हि: अनुजानामि भिक्खवे, सकायनिरुत्तियाबुद्धवचनं परियापुणितं- माने भिक्षु लोकनि, अपन-अपन भाषामे बुद्धवचन सिखबाक अनुमति दै छी। आ बुद्धवचनमे प्रधान तत्व जनभाषा मागधीक रहल मुदा आन आन भाषाक तत्व सेहो फेँटाएल; आ से भाषा पालि भऽ गेल। ओना मूल बात यएह अछि जे सभ प्राकृत शब्दक संस्कृत रूप नै अछि। निकलबाक बेर भऽ गेल अछि। संघर्ष, जन संघर्ष। माछी रोमैयोक शक्ति नै छै गरीबमे, दशा ततेक खराप छै। समाजमे हरमाज उठा दैतै गरीब सभ मिलि कऽ। मुदा ओ तँ प्रेम करै छै समाजसँ, देशसँ। ई संघर्ष तँ लोकक प्रतिष्ठा बचेबा लेल छै। कुञ्जन, चेथरू, मुसाइ आ कॉमरेडक बहार भेलाक किछु बाद जागेश्वर, मुखदेव आ कॉमरेड बहराइ छथि। डिब्बा सभ झोरामे लेने, कान्हपर भिरखा लेने, आ बोरामे कोदारि, खन्ती लऽ कऽ सभ गोटे विदा भेल। निर्गुण शुरू केलक जागेश्वर:- बघवाक बच्चा बिलैया लेने जाइ रे, बाबू कियो नै पतियाय धरती बरिसय सुरुज नहाय, ओलतीक पानि बरेड़ी ठेकल जाय चलत मुसाफिर थाकल बाट, तर सुतवैया उपर लागे खाट नौका डूबय, लोहा उपलाय, कुदु-कुदु मछरी बगुलवेकेँ खाय जरए बुढ़िया गोइठा तापै आगि, रिन्हल रसोइया भनसियेकेँ खाय गविया बाँझिन, बड़द बियाय, बूँदमे देखहुँ समुद्र समाय कहत कबीर सुनू साधु भाय, ईहो पढ़ि अर्थ केयो बिरले लगाय लचकाक एक दिस मुखदेव आ दोसर दिस चेथरू खधाइ खुननाइ शुरू कऽ देलन्हि। कुञ्जन भिरखा पसारि कऽ लचकाक एक दिस आ मुसाइ भिरखा पसारि कऽ लचकाक दोसर दिस सड़कपर बैसि जाइ छथि आ ससरफानी बनबऽ आ उघारऽ लगै छथि। जागेश्वर दुनू कॉमरेडक संग लचकाक बीचमे दुनू कात खधाइ कऽ दै छथि आ ओइमे बारुद आ बम फोड़ै छथि फेर बेरा बेरी लचकाक दुनू कात अबै छथि। मुखदेव दिसुका लचका सेहो टूटि जाइए। मुदा चेथरू… ओकर पएरमे कोनो लत्ती ओझरा जाइ छै। जागेश्वर ओकरा भागैले कहै छै मुदा ओ खसि पड़ैए आ… बलेसरी काँटी सभ चेथरूक देहकेँ शोनितामे केने छै। आसपास अन्हार पसरल छै। लोकक कोनो आवाजाही नै छै। चेथरूकेँ कोनाहु कऽ उठा कऽ धनेसरक कामतपर आनल जाइए। ओकर छातीक धुकधुकी बन्न नै भेल छै। अठारहम कल्लोल मारबौ आरे कोइली, फोड़ब दुनू अँखिया/ तोर बोली सुनि पिया गेल परदेस/ तोरे बोली सुनि ना चेथरूकेँ धनेसरक कामतपर राखल गेल। कॉमरेड सभक संग धनेसर बहरा गेला। फेर भोर होइसँ कने पहिने धनेसर एकटा वैदकेँ लऽ कऽ एला। कॉमरेड सभ घुरि कऽ नै आएल छला। सुसुम पानिमे लत्ता भिजा कऽ मुसाइ, जागेश्वर आ मुखदेव चेथरूकेँ साफ कऽ देने छथि। मुदा धँसल काँटी उखारबाक प्रयास विफल होइ छन्हि, कुहड़ि उठै छथि, कामतमे अगरमस्तक गाछ छै, छोट आ मोटपातमे पानि भरल, मुखदेवकेँ सुनल छलन्हि जे कटलापर एकर रस लगेलासँ खून बहनाइ रुकि जाइ छै। मुखदेव अगरमस्तक पात तोड़ि कऽ आनै छथि, रस बहार कऽ काँटी सभक ऊपर गाड़ै छथि। खून रुकल सन लागि रहल अछि। मुसाइ कथा कहै छथि… पार्वती शिवसँ शिवसन वरप्राप्तिक व्रतक विषयमे पुछै छथि.. …तँ ओ उत्तर दै छथि जे हिमवान पहाड़पर अहाँ बारह वर्ष उल्टा टांग मात्र धुँआ पीबि कऽ, माघमे जलमे बैसि, साओनमे वर्षामे आ बैसाख दुपहरियामे पंचाग्निमे बैसि तप केलौं। मुदा अहाँक पिता नारदकेँ कहलन्हि जे ओ पार्वतीक विवाह विष्णुसँ करेता। ई सुनि अहाँ सखीक घरपर कानऽ लगलौं जे हम तँ पात्र शिवकेँ अपन पति बनाएब आ अपन सखीक संग गंगाकात खोहमे चलि गेलौं आ भादवमे हमर बालूक प्रतिमाक पूजा केलौं, तखन हम आबि अहाँकेँ पति हेबाक वर देलौं। बाह… चेथरू पानि माँगैए.. फेर बाजैए… आ किछु कहए चाहैए चेथरू, राष्ट्रीयता, ओकर कतेक प्रकार, बाइमे अछि… माछी रोमैयोक शक्ति नै छै गरीबमे, दशा ततेक खराप छै। समाजमे हरमाज उठा दैतै गरीब सभ मिलि कऽ। मुदा ओ तँ प्रेम करै छै समाजसँ, देशसँ। मुदा वैद आबि जाइ छै… तारसरायक चेथरू। बम फुटलै आ घाएल भऽ गेल। धनेसरक कामतपर आनल गेल छै। की सभ पीसि कऽ वैदा खुएलकै। बाजै छल वैदा, असली बेटा मऽर नै, असली सोना जऽर नै। जेलसँ बहरेलाक बाद कतऽ जाएत मुखदेव? तंत्रमंत्र सीखि जीवित करत ओइ लोककेँ? धुर.. ततेक बहसा-बहसी जागेश्वर आ कॉमरेड सभ संगे केने अछि जे ऐ तंत्र-मंत्र सभक भितरिया गप बुझि गेल अछि। मुदा जँ जिआ नै सकत ओकरा सभकेँ तँ ओकर विचार तँ जिआ सकत। बहुरा गोढ़िनक पुत्री। छलि ओहो तांत्रिक। कमला-बलानक कातक केवटी छलि बहुरा, बखरी, बेगूसरायक रहनिहारि। हकलि छलि ओ, कमरू सँ सिखलक जादू। दुलरा दयाल छल मिथिला राज्यक भरौड़क राजकुमार, ओकरे नाम छल नटुआ दयाल। नृत्य जे ओ बहुरासँ सिखलक तँ सभ नामे राखि देलकै ओकर नटुआ। नटुआ दयालक गुरू छला मंगल। सिद्ध पुरुष। अकाशमे बिन खुट्टीक धोती टंगै छला, सुखला पर उतारै छला। बहुरा गाछ हँकैत छलि, जकरासँ झगड़ा भेल ओकरा सुग्गा बना पोसि लै छली। कमला कातमे रहै छला आ भजै छला- कमलेक आसन, ओहीमे बास हे कमला मैय्या… बहुरा वरकेँ मारि सीखने छलि जादू। राजकुमारक विवाहक प्रस्तावकेँ नै ठुकरा सकलि मुदा। बरियाती दरबज्जा लागल तँ भऽ गेलै कहा-सुनी आ सभकेँ बना देलक ओ बत्तू। मंत्री मल्लक एक आँखिक रोशनी खतम। आहि रे बा। व्यापारी जयसिंह छल मोहित, बहुराक बेटी पर। ओकरे खडयंत्र। आहि रे बा। गुरू लग गेल राजकुमार आ आदेश भेलै, जो कामाख्या, सीखऽ लेल षट् नृत्य, आ जादू। चण्डिका मंदिरमे योगिनीसँ षट्नृत्य सिखलक आ आदेश भेलै- सरैया ग्रामक भुवन मोहिनीसँ षट् नृत्यक एक अंग सिखबाक। ओइ गामक सिद्ध देवी रहथि वागेश्वरी। नरबलि चढै छल ओतऽ। दैत्य अबै छल ओतऽ। सिखलक राजकुमार सिद्ध नृत्य अनहद आ आज्ञा चक्र। करिया जादूकेँ काटए बला मंत्र फुकलक राजकुमारक कानमे। कमला बलानमे आएल राजकुमार। बहुरा सुखेलक धारक पानि। राजा पता लगेलक जूकियासँ, अनलक बहुराकेँ, मुदा ओ तँ लगा देलक दोष राजकुमारपर। यज्ञ भेल तैयो कमलामे पानि नै आएल, नटुआ पठेलक सभटा पानिकेँ पताल? नटुआकेँ पकड़ि कऽ आनल गेल। ओ अपन नृत्यसँ जलाजल केलक कमलाकेँ। मुदा कहलक बहुराकेँ माफी दियौ। बहुरा कहलक आब तोँ भेलह हमर बेटीक योग्य। आबह बरियाती लऽ कऽ। नटुआ बरियाती लऽ कऽ पहुँचल। तीटा पान एलै, एक कमलाक पानिक हेतु, दोसर बहुराकेँ माफ करबाक हेतु। आ तेसर ओकर बेटीसँ बियाह करबाक हेतु। तीनूटा पान उठेलक नटुआ आ शुरू भेल गीत-नाद। पियास लगलै नटुआकेँ, शिष्य झिलमिलकेँ पठेलक इनार पर। डोरी छोट भऽ गेलै। अपने गेल नटुआ, डोरी पैघ भऽ गेलै। फूलमती छलि ओतऽ, पतिक प्रतिभासँ प्रसन्न छलि ओ। मल्लक आँखि ठीक केलक बहुरा। कमला कात पहुँचल कनियाँक संग नटुआ, मुदा आहि रे बा। नटुआकेँ चक्कू मारलक, बहुरासँ तमसाएल शिष्य। मुदा नटुआ चढ़ेने छल पटोर कमला मैय्याकेँ। कमलाक धार खूने-खुनामे। मुदा कामाख्याक जदूगरनी एली, आजीवित केलन्हि नटुआकेँ। दुश्मनक बलि चढ़ेलक कमलाकेँ। आ बलि चढ़ि गेल चेथरू.. तीन दिनुका बाद.. आ मरि गेल जागेश्वर जेलमे… बाजै छल वैदा, असली बेटा मऽर नै, असली सोना जऽर नै। चेथरू आ जागेश्वरक बलि तँ चढ़ि गेलै, देशसँ अंग्रेजकेँ ससम्मान विदा कऽ देल गेलै। माउन्टबेटन गवर्नर जेनेरल बनि गेलै। देशक नव राजा मुखदेवकेँ जेलमे रखने छै। मुखदेवकेँ बनिसार भेटि गेल छै। ककर चढ़ाएत बलि। आपसेमे झगड़ा छै, खीराक तीन फाँक, ऊपरेसँ टा एक छै। जाँत पिसै कालक लगनी मोन पड़ै छन्हि मुखदेवकेँ:- घर पछुवरिया नीम केर गछिया वएह तरनमा कोइली बोलै अधिरतिया वएह रे तरनमा आन दिन बोलै कोइली, भोर रे भिनसरवा आजुक दिन कोइली बोलै अधिरतिया आजुक दिन ना मारबौ आरे कोइली, फोड़ब दुनू अँखिया तोर बोली सुनि पिया गेल परदेस तोरे बोली सुनि ना गछिया बैठल वृन्दावनमे बँसुरिया किनकर बोलै ना किनकर बोलै ना करु-करु आहो भौजो सोलहो शृंगार बँसुरिया वृन्दावनमे भैयाक बोलै ना भैयाक बोलै ना तोरा देबौ ननदो गलाक गिरमल हार तोहीं दिलक बतिया कहलीं ना तोहीं दिलक बतिया कहलीं ना उन्नैसम कल्लोल सूतलिमे छलिऐ रे सुगना एके संग रे सेजिया/ सपनेमे देखलौं रे सुगना हंसा गेलै रे चोरिया गढ़ नारिकेलक मुखदेव आ जागेश्वर, मधेपुरक कुञ्जन, बहेरीक मुसाइ, बिरौलक ढिनाइ, दलसिंहसरायक भत्तू, ताजपुरक पिचकुन, बेनीपट्टीक छुतहरू आ मेंहथक घोंघाइ आ धनेसर। तारसरायक चेथरू गेल… किछु दिनुका बाद मुखदेव आ जागेश्वर लग दूटा कॉमरेड आएल। पंडौलक तार काटि देलक सभ मिलि कऽ। नौताल आ धनहरक पुला सेहो बारूदसँ उड़ा देल गेल। मधेपुरक कुञ्जन नौताल पुला उड़बै घड़ी स्वाहा भऽ गेला आ बहेरीक मुसाइ धनहर पुला उड़बै घड़ी। फुलपरास थानाक दरोगाकेँ उड़ा देल गेल। बिरौलक ढिनाइ थानासँ चलल गोलीमे मारल गेला। मुखदेव आ जागेश्वर बचि गेल। की कोनो त्रुटि रहि गेल जे ओ दुनू गोटे नै मरला। आ मुखदेवक खिस्सा शुरू… कृष्ण मिथ्या आरोपसँ दुखित भऽ गणेश आ चन्द्रमाक पूजा केलन्हि। पृथ्वीक भार उतारऽ लेल बलराम, कृष्ण आ कमलनाभ उत्पन्न भेला। कंसक वध कृष्ण केलन्हि। मुदा कंसक ससुर जरासन्धक आक्रमण संकट देखि छप्पन करोड़ यदुवंशी आ सोलह हजार आठ स्त्रीवर्गक संग ओ द्वारका एला। संत्राजित सूर्यक उपासना द्वारका तटपर कऽ स्यामन्तक मणि- जे सभ दिन आठ भरि सोना उत्पन्न करै छल- प्राप्त केलन्हि। ओ एकरा अपन भाइ प्रसेनकेँ दऽ देलन्हि। राजा उग्रक ई दुनू सन्तान छला- संत्राजित आ प्रसेन। एक दिन कृष्ण आ प्रसेन शिकार खेलाइ लेल बोन गेल तँ एकटा सिंह प्रसेनकेँ मारि मणि लऽ विदा भेल तँ जाम्बवान भालु ओइ सिंहकेँ मारि मणि अपन पुत्रकेँ खेलाइ लेल दऽ देलक। कृष्ण जखन असगरे आपिस भेला तखन सभ हुनकापर प्रसेनक हत्या मणिक लोभमे करबाक आरोप लगेलक। तखन कृष्ण सभकेँ लऽ बोन गेला तँ सिंह आ प्रसेनकेँ मुइल देखलन्हि आ जाम्बवानक पुत्र सुकुमारक झूलामे लटकल मणि देखलन्हि। जाम्बवानक पुत्री कृष्णकेँ मणि लऽ भागऽ कहलन्हि, मुदा कृष्ण शंख फूकि खोहमे युद्ध कएल। सात दिन बाद द्वारकावासी द्वारका घुरि कृष्णक अन्तिम संस्कार मृत बुझि कएल, मुदा २१ म दिन जाम्बवान हारि मानि अपन पुत्रीक विवाह हुनकासँ करा मणि उपहारमे देलन्हि। कृष्ण ओइ मणिकेँ संत्राजितकेँ दऽ देलन्हि। संत्राजित हुनकापर मिथ्या आरोपसँ दुखी भऽ अपन पुत्रीक विवाह कृष्णसँ कराओल आ स्यामन्तक मणि कृष्णकेँ देल मुदा कृष्ण नै लेलन्हि। फेर कृष्ण-बलराम जखन बाहर छला तखन शतधन्वा संत्राजितकेँ मारि मणि लऽ लेलक आ अक्रूर यादवकेँ दऽ अपने भागि गेल। सत्यभामाक कहलापर कृष्ण-बलराम ओकरा खेहारलन्हि, कृष्ण ओकरा मारल मुदा मणि नै भेटल, ई कथा सुनिते बलरामकेँ ई शंका भेल जे कृष्ण कपट करै छथि, से कृष्ण द्वारका एला मुदा बलराम विदर्भ चल गेला, अक्रूर तीर्थयात्रापर निकलि गेल, मणि धारण कऽ काशीमे सूर्यक उपासना करऽ लागल। ब्रह्मा-विष्णु-महेश निर्विघ्नदेवक अष्टसिद्धि पूजा कएल आ जखन ओ घुरि रहल छला तँ चन्द्रमा हुनकर हाथी बला मस्तक, पैघ पेट देखि कऽ हँसि देलन्हि। रूपक गर्व लेल चन्द्रमाकेँ गणेशजी श्राप देलन्हि जे एक दिन हुनकर दर्शन करऽ बलाकेँ कलंक लागत। बाह.. मुदा ई आरोप तँ कियो लगेनहियो नै रहै तखन किए दुखी भऽ रहल छल जागेश्वर। गरीबक समाजसँ प्रेमक ईएह परिणाम हएत जे ओकरा खतम कऽ देल जाए, आन्दोलनमे स्वाहा कऽ देल जाए। ओकर बाल-बच्चा बिलटि जाए।– -जागेश्वर बजै छथि। -मुदा गरीबक बच्चा तँ ओनाहितो बिलटले रहै छे जागेश्वर, बाप रहौ वा नै रहौ।– बाजल रहथि मुखदेव। आ हँसि देने रहए जागेश्वर… आ जखन अंगरेजबा आ ओकर भारतीय सिपहिया जागेश्वरकेँ बारुद आ कॉमरेड सभक विषयमे पुछलकै तँ ओ उत्तर नै देलक। मरबाक मौका भेट गेलौ रौ भजार तोरा, आन बुझौ नै बुझौ हम बुझि गेलियौ रौ जागेश्वर.. मुखदेवक स्वरसँ घनानन्द, हलधर, नोने, दौलति जहाँ, भट्ट भूषण रुद्रमति आ रघुवरन व्यथित भऽ जाइ छथि। सूतलिमे छलिऐ रे सुगना एके संग रे सेजिया सपनेमे देखलौं रे सुगना हंसा गेलै रे चोरिया ई हम जनितौं रे सुगना हंसा जेतै रे चोरिया कसि-कसि बन्हितौं रे सुगना रेशमक रे डोरिया रेशमक रे डोरिया रे सुगना टूटि फाटि रे जेतै कसि-कसि बन्हितौं रे सुगना प्रेम के रे डोरिया कायापुर मायापुर लागल छै ने बजरिया सोचि समझिए सौदा कइ लिअ हे सखिया बीसम कल्लोल मैयाजी हे राखि लियौ अरज केर लाज/ जगदम्बा सेवक कल जोड़ैए हे मेंहथक घोंघाइक नाम परशुराम रहै। परशुराम आ धनेसरक बहिन झंझारपुरमे मल्लिकजीसँ पढ़ैले जाइत रहथि आ तेँ धनाढ्य सभ द्वारा बारि देल गेला। परशुरामजीक बहिनक पढ़ाइमे बाधा पड़लन्हि। मुदा धनेश्वरजी जे कनेक उमेरमे सेहो पैघ रहथि, अड़ल रहला। अंग्रेजी पुलिससँ हुनका पकड़बाएल गेल आ जे पीअर बच्चा पकड़बेलन्हि से आब स्वाधीनता पेंशन पाबि रहल छथि, रघुवरन ई सूचना मुखदेवकेँ दै छथि। १९४२ ई.मे धनेश्वरजी झंझारपुर थानासँ अंग्रेज पुलिसकेँ भगा देने रहथि आ फेकन मुन्शीकेँ थानेदार बना देने रहथि। पीअर बच्चा सुनलिऐ १९५२ ई. मे एम.एल.ए. बनि गेल। गाम बगलक विद्यार्थी कृपानन्दक स्कॉलरशिपबला फॉर्मपर साइन करबासँ मना कऽ देने रहथिन्ह एम.एल.ए. साहेब मुदा तैयो चन्दासँ एम.आइ.टी. मुजफ्फरपुरमे रॉल नं.१ लऽ सर्वोच्च अंकक संग अभियन्त्रणमे नाम लिखबा लेलन्हि कृपानन्द। एक बेर धनेश्वरजी, परशुरामजी, कृपानन्द सभ गोटे गोपेशजी ऐठाम जा कऽ खेने छला, कारण गोपेशजी केँ बारल गेल छलन्हि कारण ओ अंडा खेने रहथि आ पीअर बच्चा आ ऐ गामक धनाढ्य सभक नेतृत्वमे हुनका बारल गेल छल। रघुवरन नव सूचना सभ दैत रहै छन्हि मुखदेवकेँ। स्वतंत्रता दिवसपर नै जानि कोना ई सभ चर्च शुरू भऽ जाइ छै आ स्मरण आबि जाइ छै मुखदेवकेँ सभ गप। फेर खिस्सा शुरू… जुआमे हारल युधिष्ठिरकेँ बोनमे कृष्ण एकटा व्रत करबा लेल कहलन्हि आ कथा सुनेलन्हि। सत्ययुगमे सुमन्त नाम्ना ब्राह्मण भृगुक कन्या दीक्षासँ विवाह केलन्हि। मुदा शीलाक जन्मक बाद दीक्षाक मृत्यु भऽ गेल। फेर सुमन्तक विवाह कर्कशासँ भेलन्हि, ओ शीलाकेँ कष्ट देमऽ लागलि। फेर शीलाक विवाह कौण्डिन्यसँ भेलन्हि। दुनू गोटे अनन्त चतुर्दशीक दिन यमुना तटपर घुरै जाइ छला तँ स्त्रीगण लोकनि हुनका बाँहिपर अनन्तक ताग बान्हि देलन्हि जइसँ हुनकर सभक घर गृहस्तीमे समृद्धि आएल। घरमे माणिक्य रहितो ई ताग देखि एक दिन पति ओकरा तोड़ि आगिमे फेकि देलन्हि। शीला जड़ल डोरकेँ निकालि दूधमे राखि लेल। आब विपत्ति शुरू भऽ गेल आ घरमे आएल दरिद्राकेँ देखि कौण्डिन्य बोन चलि गेला। ओतऽ अनन्त भगवान हुनका विष्णु लग लऽ गेलखिन्ह। ओ हुनका अनन्त व्रत चौदह बरख धरि करबाक लेल कहलन्हि। बिपति तँ शुरू भैए गेलै घेंगही लेल। आ मुखदेव रामक व्रत कहिया खतम हएत। आकि व्रत शुरू हएत। जेलसँ बाहर भेला दिनसँ शुरू हएत व्रत। मुदा ओ दिन कहिया आएत। कहिया आएत जे गाछमे खेनाइ-पिनाइक समान फड़तै, कियो ककरोसँ नै जड़तै। घेंगही सुनबैत रहै रहथि खिस्सा पिहानी, गामक शिष्या सभकेँ…. घेंगहीक खिस्सा सुनैले के अबैत हेतै। पीअर बच्चा एम.एल.ए. बनि गेल अछि। देश स्वतंत्र भऽ गेल अछि। स्वतंत्रता सेनानी जेलमे बन्न अछि। बाँकीपुर कैम्प जेल। आ गढ़ नारिकेलमे भगता, मुखदेव आ जागेश्वर लेल, गोहारि कऽ रहल अछि, कहलन्हि रघुवरन। मुदा जागेश्वर तँ गेल। मुदा से बुझल नै छै गढ़ नारिकेलक लोककेँ:- अरही जे बोनसँ मैया खरही कटेलिऐ हे मैया खरही कटेलिऐ हे मैयाजी हे बिजुवन कटेलिऐ बिट बाँस जगदम्बा रचि-रचि महल बनेलिऐ हे गोड़ लागूँ पैयाँ पड़ूँ मैया जगदम्बा आइ मैया मैया गहबर अबियौ हे मैया जी हे राखि लियौ भगत केर लाज जगदम्बा कलजोरि पैयाँ पड़ै छी हे जहिना बलकबा खेलै माताक गोदिया हे भवानी माताक गोदिया हे मैया जी हे तहिना खेलाबहु जग बीच जगदम्बा आब मैया गहबर अबियौ हे नामो ने जनै छी मैया पदो नै बुझै छी हे मैया पदो ने बुझै छी हे मैया जी हे सेवक बीच कण्ठ लियौ बास जगदम्बा आब मैया लाज रखियौ हे गोड़ लागू पैयाँ परूँ आद्या जोलामुखी हे मैया आद्या जोलामुखी हे मैयाजी हे राखि लियौ अरज केर लाज जगदम्बा सेवक कल जोड़ैए हे एक्कैसम कल्लोल बछड़ूले कुहकै छै धेनु गाय ब्राह्मणमे पीअर बच्चा आ हुनकर पुत्र इन्द्रकान्त मिश्र। दछिनबारि टोलमे मिश्र सभ आ शेष सभ टोलमे झा सभ। रमण किशोर झा आ अरुणा झा। सुखराती दिन हूड़ा-हूड़ीक खेल जे ऐ महिसबाड़ ब्राह्मण सभक देखब तँ गुम्म पड़ि जाएब, बौधा मलिकसँ कीनल सुग्गरकेँ भाँग पीबि मातल महीस द्वारा हूड़ा लेब। एकटा जागेश्वर झा रहथि, स्वतंत्रता चाही छलन्हि, देशोक आ लोकोक। मुखदेव राम संगी रहन्हि। मुदा पीअर बच्चाक धोखा देलासँ अंग्रेज पकड़ि कऽ धऽ देलकन्हि जेलमे आ ओतै मारि देलकन्हि। मेदिनी लोकमे अहंकाल पसरि रहल अछि…. गढ़ नारिकेल गाममे ब्राह्मणक अतिरिक्त आनो जाति अछि। दुनू बान्हक बीचमे उँचका भीरपर गुअरटोली तँ अछिये। बाढ़ियोमे ओ टोल नै डुमैत अछि। नाहसँ आबाजाही होइए। सत्यनारायण यादव एम्हुरका सभटा खेतक आरि-धूरक जानकारी राखै छथि। बियाह दिन उपनयन संस्कारमे यादवजी ऐठाम गीत गाओल जाइए: बकलेल बभना मधु चाटय एला हमर अंगना चाउर देलियनि दालि देलियनि धेलनि अंगना एक रत्ती नोन लेल करै छथि खेखना बकलेल बभना मधु चाटय एला हमर अंगना धोती देलियनि तौनी देलियनि धेलनि अंगना एकटा गमछा लेल करै छथि खेखना बकलेल बभना मधु चाटय एला हमर अंगना सोना देलियनि रूपा देलियनि धेलनि अंगना एकटा पैसा लेल करै छथि खेखना बकलेल बभना मधु चाटय एला हमर अंगना सत्यनारायण यादव, राउतजी आ गुआरसँ आब यादव। बाभनक गाम छिऐ, बनोतरी बनबऽ दियौ। दुग्धक व्यापारसँ खेतीबारी आ गामक सड़कक माँटि भराइ, सभ काज हाथमे छन्हि। कालिदासक यादवजी सभ पूजा करै छथि। मिथिलाक लोकदेवता कालिदास, मनुखदेवा…। कालिदास। मिथिलेक रहथि कालिदास। कमलदहमे पड़ल अनाथ शिशु, अमरीता देखलनि ऐ बालककेँ। आनि कऽ पोसलन्हि। मुदा ओ पैघ भेल आ महामूर्ख भऽ गेल। सभ क्षेत्रमे विद्वानक विषयमे एहेन कथा भेटिते अछि। भट्टोजि दीक्षितक शिष्य वरदराज, जे लघु आ मध्य सिद्धान्त कौमुदी सन श्रेष्ठ संस्कृत व्याकरणक रचना केलन्हि, हुनको मानल जाइ छलन्हि जे ओ मूर्ख जड़मति रहथि, बड़दक राजा सन। मुदा ओ इनारक लहराक पाथरपर रस्सी द्वारा बेर-बेर घर्षणसँ पड़ल निशान देखि निश्चित केलन्हि जे ओ विद्याक बेर-बेर अभ्यास करता, आ से ओ केलन्हि आ विद्वान बनि गेला। गंगेश उपाध्यायक विषयमे सेहो एहने कहल जाइए, ओ मिथिलेक रहथि। मुदा ओ तँ कालिदासक बाद भेला। नै ओ कालिदास नै, ई कालिदास दोसर छथि। ई कालिदास सेहो जइ ठाढ़िपर बैसल रहथि, तकरे काटि रहल रहथि। तिरहुतिया राजा सुबाय सिंहक बेटी बहुरा.. बखरीक बहुरा गोढ़िन हौ.. जकर बेटीसँ गोनू झाक गौँआ दुलरा दयाल बियाह केने रहए। नै ई दोसर बहुरा.. राजा सुबाय सिंहक बेटी बहुरा विदुषी रहथि। मुदा राजदरबारक ब्राह्मण आ नौआ ठाकुर हुनकापर कनखरल रहथि से ओ सभ अही बालकक चयन केलन्हि आ बहुरा संग अमरीताक पुत्रक विवाह भऽ गेल। मुदा पत्नी शीघ्र पतिक मूर्खताकेँ चीन्हि गेली आ पतिकेँ दसटा गप सुनेलन्हि। आब पतिक आत्मसम्मान जगलन्हि आ ओ घर छोड़ि विद्या प्राप्तिक लेल एकटा चौपाड़ि पहुँचि गेला। गुरुजी हुनका उच्चैठ भगवतीक पूजा लेल पठेलन्हि आ देवी हुनकर पूजासँ प्रसन्न भऽ हुनका वरदान देलन्हि। आ ओ चौपाड़िक सभटा पोथी घोंटि गेला.. विद्वान भऽ गेला। गुरुजी हुनकासँ प्रसन्न भेला आ प्रसिद्ध विद्वान कालिदासक नामपर हुनकर नाम कालिदास राखि देलन्हि। गुअरटोलीक अमरीताक बेटा कालिदास। कालिदास इन्द्र लोक धरि घुमि आबै छलथि। देवता सभ हुनका नागराजक कमलदहसँ पाँच टा कमलक फूल अनबा लेल कहलखिन्ह। नागराज कालिदासकेँ काटि लेलन्हि आ ओ मरि गेला। मुदा देवता सभ हुनका जिआ देलखिन्ह आ ओ कमल लऽ कऽ इन्द्रलोक पहुँचला। देवता सभ हुनका पृथ्वीलोक पठा देलखिन्ह, धर्म आ सत्यक प्रचार लेल। दूध लेल बछड़ू कुहकै हौ, बाबू हौ बछड़ूले कुहकै छै धेनु गाय। दह लेल हंसा चकेवा कुहकै हौ, बाबू हौ जोड़ी लेल कुहकै छै मजूर। बृच्छ लेल कारी कोइली कुहकै हौ, बाबू हौ पूत लेल कुहकै छै अबला तिरिया नारि। आब तँ मिथिलाक भगताक देहमे कालिदास आबऽ लागल छथि। सत्यनारायण यादव पहिने दछिनबारि टोलमे रहै छलथि मुदा आब गुअरटोलीमे बसि गेल छथि, पीअर बच्चाक उछन्नरसँ तंग आबि कऽ गुअरटोलीमे बसि गेल छथि। पीअर बच्चाकेँ शंका रहै जे सत्यनारायण यादव जागेश्वर आ मुखदेवक संगी छथि। मुदा ऐ सँ सत्यनारायण यादवकेँ सुविधे भेलन्हि। बौआचौरीक लग घर भऽ गेलन्हि आ ओइसँ माल जाल चराबैमे सुविधा भेलन्हि। रघुवरनक कॉमरेड सभ सूचना अनने अछि। नव संविधान लागू भेलै। बिहारमे चुनाव भेलै, वोट खसलै। अपन अपन जोगार लगेबाक ब्योँतमे सभ कियो अछि। कियो कोनो पार्टी तँ कियो कोनो पार्टी, समाजवादी बनि गेल कम्यूनिस्ट, कम्यूनिस्ट बनि गेल कांग्रेसी आ कांग्रेसी बनि गेल समाजवादी। अगिला बेर राधामोहन राय समाजवादी पार्टीसँ ठाढ़ हेता आ पीअर बच्चा कांग्रेससँ। सत्यनारायण यादव मुदा एकटा शक्ति बनि कऽ सोझाँ आएल छथि। “जे देश लेल जान देलक से जागेश्वर आ मुखदेव जेलमे बन्द अछि आ जे किछु नै केलन्हि, जे ओइ दुनू गोटेकेँ पकड़बेलन्हि, से जन प्रतिनिधि!! स्वतंत्र देशक जन प्रतिनिधि जँ एहेन लोक बनता तखन देशक की हएत? आ वोटक अधिकार आब स्त्री-पुरुष, छोट-पैघ सभकेँ देल जाएत। आब संख्या बल महत्वपूर्ण भऽ जाएत। आब समए आबि गेल अछि जे हम सभ अपन अधिकारक मोल बुझी। ओकर नीक जकाँ प्रयोग करब, तखने अधिकारक मोल बुझाएत, आ नै जँ अपन अधिकारक मोल नै बुझी तँ ई वोटक अधिकारो निरर्थके जाएत।”- सत्यनारायण यादव बाजि रहल छथि। “देश भऽ गेल रहए स्वतंत्र, आ ई आब बनि जाएत गणतंत्र। देशक नव संविधान लागू हएत। कोना कऽ वोट खसेतै यौ…” “माने हम कहबै जे ई बनए जमीन्दार तँ से बनत जमीन्दार आ जँ ओ नवका जमीन्दार नीकसँ काज नै करत तँ अगिला चुनावमे दोसर जमीन्दार चुनल जाएत?” हँ, चुनल जेबाक बाद सभ जमीन्दारे बनत, से बनत तखने ने पुरना जमीन्दारसँ लड़ि सकत, ओकरा दबा सकत। मुदा पीअर बच्चा तँ जीत गेल तखन? तखन तँ जमीन्दारे जमीन्दार बनल! आ अगिला बेर… राधामोहन रॉय इनार खुनबेने छथि आ जमाहिरलाल आ महात्मा गाँधी देशसँ अंग्रेजकेँ भगेने छथि, आकि ओ सभ मेल-पेँचसँ स्वयं भागि गेल अछि। सुनै छिऐ स्त्री-पुरुष, गरीब-धनिक सभसँ पुछल गेलै ओकर विचार। विचार जे ऐ चुनावमे ओकरा दिससँ के बजतै। के बनतै ओकर प्रतिनिधि, ओकर इलाकाक जमीन्दार। मुदा जमीन्दारे बनि गेलै जमीन्दार!! पीअर बच्चा सत्यनारायण यादवक जनतासँ उद्बोधनसँ प्रसन्न नै छथि। राधामोहन रॉय जागेश्वर आ मुखदेव रामक मामिला इम्हर-उम्हर उठा रहल छथि। सत्यनारायण यादवक दलानपर कएक खेप गेल छथि राधामोहन। बा झाक मृत्युक बाद जे लठैत सभ सञ्च-मञ्च भऽ गेल रहथि से आपस अपन रंगमे घुरि रहल छथि। पीअर बच्चा मुखदेव आ जागेश्वरक संघर्षकेँ फूसि बता रहल छथि आ सत्यनारायण यादवकेँ ओइ दुनू फुसियाहाक संगी कहि रहल छथि। स्वतंत्र भारत-सरकार पीअर बच्चाकेँ स्वतंत्रता सेनानी मानि लेने अछि आ हुनका स्वतंत्रता सेनानी पेंशन दऽ रहल अछि। मुखदेव आ जागेश्वरक मादे ढेर रास उड़न्ती-उकबा उड़ि रहल छै। कियो कहैए जे दुनू गोटे बाँकीपुर जेलसँ बिला गेला आ फिरंगी देश दिस उड़ि कऽ चलि गेला। मुदा सत्यनारायण यादव ऐ सभ गपकेँ उड़न्ती कहै छथि। दुनू गोटे घुरि कऽ एता, गढ़ नारिकेल हुनका सभक बाट जोहि रहल अछि। देखै छी की होइए आगाँ-आगाँ… रघुवरनकेँ कहैए कॉमरेड, आ कॉमरेड कहैए मुखदेवकेँ… बाइसम कल्लोल हर ने बड़द, ढोढ़ाय मड़र राधामोहन राय गाममे सभ टोलमे एक-एकटा इनार कोरबेने रहथि। जोतखीसँ दिन तका कऽ सभ टोलक लोक कोदारि खंती लऽ कऽ जुमि गेल रहथि। डोमी मिआँ आ लछमी ततमाक राजमिस्त्रीबला काज लोक देखलक। गौँआ सभ अछि मुदा कलामी, जागेश्वर आ मुखदेवरामक बारूद तेहेन बड़का खधाइ कऽ दै छलै जे की कही। बेचारा जागेश्वर..मारल गेल.. पीअर बच्चा आ राधामोहन रायक झगड़ामे। पुलिससँ पकड़बाइये देलक ई पीअर बच्चा। पुलिस दरोगा सभसँ जान-पहिचान रहबे करै पीअर बच्चाकेँ, राधामोहन रायकेँ यश हेतै से कोना बर्दास्त होइतै। इनार सभसँ पानि बहार हेबऽ लगलै, लोक सुखितगर भऽ गेल आ इज्जतिक संग जीबऽ लागै गेल, तँ राधामोहन रायक प्रशंसा तँ हेबे करितै आ से..। बारुद कतऽ सँ आएल.. पुछै छलै अंग्रेजक भारतीय दरोगा.. मुखदेवराम घुरि कऽ आओत की नै, से नै जानि!.. लोक सभ निर्णय केने अछि जे इनारक लहरा-जगत सहित इनारकेँ लोक कहियो भथम नै हेबऽ देत। बड़का आन्दोलन भेल छलै गाममे। पानिक आन्दोलन, सभ टोलमे इनार! बंजारा सभ सुखेँतसँ आएल रहए आ गीत गेने रहए.. उंड़ो कूवो उंड़ी वावूड़ी, निर्मल पाइ रो टो टो मारो ईरा तरसो जाइ, हाथेधड़ी वालो माइ, मारो बापू तरसो जाइ हाथ चेला वालोये, निर्मल पाइ रो टो टो… बोधा मल्लिकक टोलक इनार खोदैमे बड्ड सहयोग केने रहए ई बंजारा सभ। पाँचटा बंजारा हाथक थप्पा दऽ कऽ स्थान घेरने रहए आ गैंती खन्तीसँ खोदनाइ शुरू भेल छल। देवारक काते-काते सीढ़ी बनेनाइ शुरू भऽ गेल, देवारक काते-काते गोलाइ लैत। जखन खधाइ गहींर भेल तँ लोक ओइ सीढ़ी दऽ कऽ उतरथि आ खुनथि आर गहींर खधाइ। देवारकेँ झाड़ि कऽ गोल कएल जाइ छलै। बेशी गहींर भेलापर पाथरक बड़का-बड़का चेका आबि जाइ छलै, आ तखन काज अबै छल मुखदेव राम आ जागेश्वर झाक बारूद। बोधा मल्लिकक टोलक इनारक पानि सभसँ मीठ बहरेलै.. कहै छला मुखदेव.. हिरनी आ बिरनी दूटा बहिन, दुनू नटिन रहथि। ओ सभ पोसन सिंहकेँ नट बनबऽ चाहै छलथि। ओइ दुनू बहिन लग एकटा बड़का पारा छलन्हि, भयंकर। ओ दुनू बहिन पोसन सिंहकेँ कहलन्हि जे जँ पोसन सिंह ओइ पाराकेँ नाथि देत तँ दुनू बहिन हुनकर नोकरनी बनि जाएत आ जँ नै तँ पोसन सिंहकेँ नट बनऽ पड़तै। पोसन सिंह ओइ पाराकेँ नाथि देलन्हि। गढ़ नारिकेल गामक लोक सभ, सभ जातिक मुँहपुरुख आ सामान्य लोक सभमे मेल-पेँच रहै छै मुदा नै जानि ऐ गपपर किए रुष्ट भऽ गेल पीअर बच्चा। मुखदेव आ जागेश्वर नै जानि कतऽ चलि गेल। पीअर बच्चा घबड़ा गेल अछि। नै जानि कतऽ सँ घुरि कऽ आबि जाएत ई दुनू। पंद्रह साल भऽ गेल छै ओना। ई एम.एल.ए.क चुनाव भऽ जाए कहुना। जमाहिरलालक आ महात्मा गाँधीक नामपर जीत तँ जेबे करत पीअर बच्चा आ ई लठैत सभ कोन दिन काज आएत। आ फेर जाति आ धर्म.. मुस्लिम वोट अछिये, ब्राह्मण सभ सेहो हारि थाकि कऽ वोट देबे करत, दलित आ स्त्रीगण सभक वोट छापिये लेब। मुदा ई मुखदेव आ जागेश्वर ने आबि जाए बिच्चेमे। जँ नै आएल तँ जितलाक बाद फेर पीअर बच्चा सप्पत खाइ लेल पटना जेबे करत आ जहलमे पता लगाएत जे की केना भेलै ओत्तऽ। ई सप्पत की होइ छै हौ। रौ, ई जे नवका नेता जीति कऽ जमीन्दार बनलै से सप्पत खेलकै, सप्पत जे नीक काज करब, ककरो अधला नै करब.. आ सप्पत खेलासँ पुरनका माफ भऽ जेतै हौ। रौ, से किए ने जानऽ गेलिऐ। ई संसार… की हएत, की भेल, सभटा अन्दाजे छै। की पीअर बच्चा केलकै, की मुखदेव आ की जागेश्वर। से पसरलै नै। पसरितै तँ जमाहिरलाल पीअर बच्चाकेँ अप्पन पार्टी सँ ठाढ़ करितै रौ। पीअर बच्चा खादी पहिरै छै, टोपी पहिरै छै। बण्डी पहिरै छै। बड़का-बड़का गप दै छै पीअर बच्चा। मुदा ऐ नवका स्वतंत्र भेल देशमे की हेतै, कोन भविष्य हमरा सभक इन्तजारीमे अछि? कोना कही.. जागेश्वर रहितए तँ कहितए.. पीअर बच्चा कहैए-.. बिसरि जाउ सभटा। लोक हमरा अनेरे बदनामी दैए। ऐबेर जँ हम जीति कऽ जाएब तँ पटनामे पता करब जे की भेलै जागेश्वरक, की भेलै मुखदेवक। जिबैत तँ नहिये होइ जेता, मुदा पता करब की कोना भेलै। मुदा पछिला बेर… मुदा गढ़ नारिकेलसँ बाहर पीअर बच्चा मुखदेव आ जागेश्वरक नामो नै लैए। घेंघीकेँ पेंशन भेटबाक चाही, स्वतंत्रता सेनानीक विधवाक रूपमे.. ऐपर पीअर बच्चा कहैए जे से पहिने देखऽ पड़त जे कोन अपराधमे ओकरा बन्द केलकै फिरंगी। फेर गप तँ लिखियाक मानल जेतै नऽ यौ लोक सभ, मुँहसँ जत्ते बाजि ली। आ फेर मृत्यु प्रमाण-पत्रक बिनु किछु नै हएत। मुदा स्थिर रहै जाउ, सभटा भऽ जेतै.. पहिने ई चुनाव तँ खतम हुअए.. राधामोहन रॉयक सोच सीमित छै, मात्र ओ गढ़ नारिकेल धरि सीमित अछि। गामक बाहर ओ की केलन्हि?- गढ़ नारिकेलक बाहर देल भाषणमे बजैए पीअर बच्चा। गामसँ, क्षेत्रसँ ऊपर उठै लेल कहैए पीअर बच्चा। देशसँ मुदा ऊपर उठै लेल नै कहैए पीअर बच्चा। सम्भावना छै जे देश आगाँ बढ़तै, मुदा से तखने जखन पीअर बच्चा जीतत। यौ पीअर बच्चासँ कैन अछि, मुदा तइ लेल जमाहिरलालक हाथ काटि देबै। कटल हाथसँ की कऽ सकत जमाहिरलाल!! राधामोहन रॉय गरबड़ा रहल छथि। ई कांग्रेस मानि लिअ स्वतंत्र कराइए देलकै, जे ई नै केलकै, तँ की राज ओकरे फेर लगातार देल जाए। तँ की राजक लोभमे देशकेँ ओ स्वतंत्र करेलक? समाजवादी लक्ष्य मात्र देशक भविष्य छी। समाजवादी लक्ष्य अछि समाजवादी सोच। समाजक लेल इनार, समाजक लेल पानि, समाज मिलि कऽ करए काज। पीअर बच्चा बजैए, हे लिअ। सुना ने देलक। आब ओइ राधामोहन रॉयक इनारक पानि ठोंठसँ नीचाँ जाएत? आबऽ दियौ सरकार फेरसँ। तेहेन-तेहेन ने बोरिंग गारत सरकार जे पानिक बमकोला छुटत। तेहेन तेहेन ने बान्ह बान्हत सरकार जे कोसी, कमला सभ मनुक्खक दासी बनि जाएत। आ सरकार जे काज करत तइ लेल ओ किछु नै सुनाएत। मात्र काज लेल काज, श्री भगवद्गीतामे भगवानो सएह कहै छथि। गाँधी बाबा सएह कहै छथि। घेंघी दाइक गुजर वएह गाँधीजीक चरखासँ चलैए भाइ लोकनि, ऐ समाजवादी सभक सोच छै धनिककेँ गरीब केनाइ, हौ गरीबकेँ धनिक बनेबह तखन लोक कलामी कहतऽ.. हे भाइ सभ। चरखा गाँधीजीक नै छी। ई मिथिला समाजमे पहिनहिये सँ अछि, चरखकट्टीक विध उपनयनमे होइ छै आकि नै होइ छै यौ लोक सभ? ई कांग्रेसिया सभ एक्केटा खेती करैत अछि आ ओ खेती अछि फूसिक खेती। मुदा जँ जागेश्वर आ मुखदेवक लहासो आबि जैतए गाम तँ ओकरा घुमा दैतिऐ गाम आ इलाकामे आ असल चेहरा सोझाँ आबि जैतए कांग्रेसिया सभक, जे पीअर बच्चा सन लोककेँ फेर टिकट देबाक घोषणा देलक। सत्यनारायण यादव ऐठाम राधामोहन रॉयक खूब आन जान भऽ गेल छन्हि मुदा पीअर बच्चा हुनकर हँसी करैए.. हर ने बड़द, ढोढ़ाय मड़र.. प्रचार, बाजा, नेता, गाड़ी। लोक सभ अकासमे फेर छोट-छोट हवाइ जहाज देखऽ लागल। नै ई जर्मनीक हवाइ जहाज नै छी। ई अपने देशक नेता सभक हवाइ जहाज छी.. लोक बिसरि गेल… लोक नै बिसरल…….. मुखदेव आ जागेश्वरकेँ लोक नै बिसरल आ बिसरियो गेल, आ तेँ पीअर बच्चा पहिल बेर चुनाव जीति गेल छल…. देखै छी की होइए आगाँ-आगाँ… रघुवरनकेँ कहैए कॉमरेड, आ कॉमरेड कहैए मुखदेवकेँ… तेइसमकल्लोल सात पाँच घर तन्हि सजि देल। पिआ देसाँतर आँतर भेल। देश स्वतंत्र भेलै आ संविधान सेहो बनि गेलै। मुदा लागू भेलै २६ जनवरी १९५० ई.सँ। सभ कहै छल.. शासन जेलक, प्रबन्ध धरमसालाक हेतै, आबऽ दियौ २६ जनवरी १९५०। २६ जनवरी, ऐ दिनक महत्व छै, भारतक पूर्ण स्वतंत्रताक लक्ष्य एकटा राजनैतिक पार्टी घोषित केने रहै ओइ दिन तेँ, झण्डा फहराएल गेल रहै ओही दिन, तेँ। १५ अगस्तक कोनो महत्व नै रहै, मुदा ओ तँ अंग्रेजक निर्णय छलै, आ सत्ता लेबाक हरबड़ीमे के नीक दिन आकि ऐतिहासिक दिनक बाट देखैए। नोने मुखदेव रामकेँ कहै छलन्हि जे संविधान लागू भेलापर भारत सरकारकेँ मुखदेव रामकेँ छोड़ैए पड़तै। स्वतंत्र भारतक स्वतंत्रता सेनानीकेँ नबका कानून आतंकी कोना मानतै? घनानन्द मुखदेव रामकेँ कहै छलन्हि जे सरकार भने हुनका अखन नै छोड़ैए, कारण असल स्वतंत्रता तँ संविधान लागू भेलाक बादे भेटतै। अखन ततेक मारापीटी भऽ रहल छै जे जेलक भीतरे रहबामे नीक रहत। मुदा संविधान लागू भेलाक बाद देशक असल विकास हेतै। घनानन्द, हलधर, नोने, दौलति जहाँ, भट्ट भूषण आ रुद्रमतिक संग मुखदेव राम स्वतंत्र भारतक बाँकीपुर जेलमे स्वतंत्र भारतक सूर्य देखऽ लगला। आ रघुवरन सेहो। ओहो कैदी छल, स्वतंत्रता संग्रामक कैदी। स्वतंत्र भारतक राति, स्वतंत्र भारतक चन्द्रमा। किछुओ नै बदललै। हँ, अंग्रेज जेलरक बदलामे देशी जेलर आबि गेल रहै, आर सभ किछु ओहिना। फेर एलै २६ जनवरी १९५० क हल्ला, जेलक बाहर फेर महात्मा गाँधी आ जमाहिरलालक गुणगान भऽ रहल छै, लगैए सरकारी स्कूलक बच्चा सभ अछि। हँ, आब शुरू भेलैहेँ खेला। हलधर कहलकन्हि जे विनोबा भावे भूदान आन्दोलन शुरु केलन्हि। भूदान, माने सभ अपना मोनसँ अपन जमीन दानमे देतै। भट्ट भूषण टिपलक- जयप्रकाश नारायण सेहो ऐ आन्दोलनमे शामिल भेला। दौलति जहाँ सूचना देलकन्हि- १८ अप्रैल १९५१, आंध्राक पोचमपल्ली गाममे पहिल भूमिक दान सम्पन्न भेल। रघुवरन, एकटा कैदी, जे बेशी काल चुप रहै छल, सएह ई सूचना दौलति जहाँकेँ देने छल। पहिने मास बीतल, फेर बर्ख आ आब छह बर्ख, संविधानबला स्वतंत्रता भेलाक बादो मुखदेव राम जेलेमे रहला। स्वतंत्र भारतक बाँकीपुर, पटना जेलमे अपन समए बिता रहल छथि मुखदेव राम। रघुवरन आन लोक सभसँ कने आर खुजए लागल छल, मुखदेवसँ तँ रघुवरन खुजल छलैहे। मुखदेवक खिस्सा पिहानी ओ खूब सुनने छल। ओहो मुखदेवकेँ खिस्सा-पिहानी सुनबै छल। आ मुखदेवसँ जानकारी प्राप्त करै छल, आ मुखदेवकेँ जानकारी सेहो दै छल। अंग्रेजक एलासँ पहिनहियेसँ नीलक खेती होइ छलै, एतुक्का लोक अपने खेती करै छला। बादमे तिरहुतक कलक्टर ग्रैण्ड, नीलक खेती यूरोपीय पद्धतिसँ शुरू केलन्हि, पहिने स्थानीय पद्धतिसँ ई खेती होइ छल। अंग्रेजक पहिल नील फैक्ट्री ओना ऐसँ पहिने हाजीपुर लग सिंघिया आ लालगंजमे रहै। तिरहुत कलक्टरीमे बारह गोट यूरोपीय रहथि आ ओइमे सँ दस गोटे नीलक खेती करैत रहथि मुदा तइमे अंग्रेजक ईस्ट इण्डिया कम्पनीक एकोटा कर्मचारी नै छला। जेम्स जेंटिल, जान मिलर, फ्रांसिस रोज, ई सभ नीलक खेती प्रारम्भ केलन्हि। फ्रांसिस रोज जबर्दस्ती तिरहुतमे राजवल्लभक जागीरमे नीलक खेती शुरू केलक। १७९३ मे तिरहुतक जज नीवकेँ बाध्य भऽ डोनबल फ्रेंच आ टोमस पार्ककेँ तिरहुत छोड़बाक आदेश देबऽ पड़लै। तिरहुत माने, माने मैथिली बजनिहारक क्षेत्र। ओइ समयमे दरभंगा आ मुजफ्फरपुर जिलाक क्षेत्रकेँ प्रशासन तिरहुत क्षेत्र कहै छल। टोमस पार्क सरैया आ सिंघियामे बिना कोनो लाइसेंसक बसि गेल छल। ढोलीक जेम्स आर्नल्डकेँ सेहो जज स्थानीय लोकक आचारपर ध्यान रखबाक आ तकर विरूद्ध काज नै करबाक आदेश देलन्हि, कारण जेम्स आर्नल्ड एकटा ब्राह्मणकेँ मारने रहथि, अनका जतेक मारू….. प्रारंभिक नीलक कोठी सरायमे विलियम औखी हण्टर, अथरमे जेम्स जेंटिल, शाहपुरमे रिचार्डसन परविस, काँटीमे अलेकजेण्डर नामेल, दयोरियामे फिंच, बनारामे ल्युयिस किक आ शुमानक छल। किछु आर कोठी दाउदपुर, ढोली आ मोतीपुरमे छल। नीलक कारखानाक संख्या बढ़ैत गेल। चीनीक कारबार छोड़ि सभ नीलक खेतीपर उतरि गेला। दलसिंहसराय, तिवारा आ जितवारपुरक कारखाना सभसँ पुरान नीलक कारखाना छल आ तिरहुतमे नीलक सभसँ पैघ कारबार पण्डौलमे होइ छलै। बिहार इण्डिगो प्लांटर्स एशोसियेशनक मुख्यालय मुजफ्फरपुरमे छलै जकरा सरकारी मान्यता भेटल रहए। मुंगेर, भागलपुर, पूर्णियाँ, बेगूसराय, सहरसा, पूर्णियाँ, कटिहार सौँसे निलहा कोठी छल…….. मंझौल, बेगूसराय, भगवानपूर, बेगमसराय, दौलतपुरमे……; सहरसामे चपराम, सिंहेश्वर, पथरघट, राघोपुर; ……… पुर्णियाँ, कटिहार, प्रतापगंज, भवराहा माने भौर, मुहम्मदपुर, बेलसर, पिपराघाट, दलसिंहसराय, जितवारपुर, तिवारा, कमतौल, चितवारा, पुपरी, शाहपुरूण्डी.. …. सौँसे। तिरहुतक निलहा यूरोपियन सैनिक टुकड़ी सेहो बनौने छला। १८५७ क विद्रोहक समयमे सैनिक संगठन करबाक अधिकारक आवेदन ओ सभ देने रहए जे बादमे ओकरा सभकेँ भेटलै आ ई सभ ‘सूबा बिहार माउंटेड राइफिल्स’ संस्था बनेलक जे बादमे ‘बिहार लाइट हार्स’ आ आर बादमे ‘आक्जिलियरी फोर्स’ बनि गेल। रघुवरन बजै छथि- “जर्मनीमे एकटा सिंथेटिक सस्त नीलक आविष्कारसँ नीलक दाम २५० सँ घटि कऽ १५० टके मन भऽ गेल। हँ आ तकरा बाद नीलक बदला तमाकू आ फेरसँ कुसियारक खेती शुरू भेल। सन् १९१४ मे विश्वयुद्धक कारण जर्मनीसँ नील एनाइ बन्द भऽ गेलै, तखन फेर नीलक खेत शुरू भेल मुदा किछु दिनमे नीलक खेती समाप्त भऽ गेल।” मौर्यकालक माइटक मुरुत पुर्णियाँ, सहरसा, दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, बेगूसराय, हाजीपुर, मुजफ्फरपुर आ वैशालीमे भेटैए। फेर दिल्लीक तुगलक राजवंशक फिरोज तुगलक गोरखपुर, खरोसा आ तिरहुतक बाटे बंगाल दिसि गेल छला, राजविराज लग कोसी नदी टपल छला। आ पिरूजगढ़ गाम बाटे गेल छला। राजबिराज लग उतरल बनिजार करैबला सभ। ओइसँ पहिने घियासुद्दीन तुगलक आएल रहथि मिथिला आ हरसिंहदेवकेँ हरेने रहथि। हँ, वएह हरसिंहदेव जे कोसीकेँ बन्हबाक प्रयास केने रहथि, हुनकर मंत्री वीरेश्वर ओइ वीर बान्हकेँ पूरा नै कऽ सकला। बिच्चेमे ई आक्रमण भऽ गेल। वीरेश्वरक नामपर अछि वीरपुर नग्र। तुगलकक सेनाकेँ यएह बंजारा सभ अन्न-पानि दै छलै, किछु कमाइयो होइ छलै। कटही गाड़ीपर ई बनिजार करैबला सभ अन्न पानिक व्यवसाय करए लागल। मुदा फेर ई सभ गिदरमारा कोना बनि गेल? भीख मांगऽ लागल? कोन-कोन अबाज निकालऽ लागल, जइसँ सभ बनैय्या जानवर ओकरा लग आबि जाइए आ ओ तकर शिकार कऽ लैए? मुदा ओकर स्त्रीगण अखनो चोली, घघरा आ तइपर शीसाक जड़ी कएल वस्त्र पहिरै छथि, महरानी सन। ऐ कोसी कमलाक इलाकामे अंग्रेज ओकर बनिजार खतम कऽ देलकै मुदा ओ बंजारा भाषा बजिते अछि। मिथिला अंग्रेजक समयमे लोकक सोझाँ फेर आएल आ सेहो की तँ कोकटी लेल। कोकटी लेल प्रसिद्ध मिथिलाक मधुबनी अखिल भारतीय खादी कार्यालयक मुख्यालय बनल, स्वदेशी आन्दोलनक बुझू धुरी बनल। सौराठ, परतापुर, सुखसेना आदिमे ब्राह्मण वरक सभा गाछी आ मधुबनी आ जगतपुरमे कायस्थ वरक सभागाछी लगै छल। आन जातिमे बियाह कोनो समस्या नै रहै।– बजै छथि मुखदेव। रघुवरनकेँ ई नै बुझल छलन्हि। सभागाछी, हँ, कन्यागत ओतऽ सँ लड़का ताकि कऽ आनै छला। वर सभ चानन-ठोप-काजर लगा कऽ तैयार रहै छला। कन्यागत, घटक आ वरागत सभ एक्केठाम, सालमे एकबेर। संग्राम देवक जयनगर। ताम्रपत्रमे कोलाञ्च ब्राह्मणकेँ दान देबाक बेबस्था, पञ्जी प्रबन्ध नै शुरू भेल रहै तावत आ मैथिल ब्राह्मण नै बनल छल तावत। आ सभागाछी सेहो तकर बादे शुरू भेल हेतै। मिथिलामे सत शूद्रकेँ सोलकन्ह आ असत् शूद्रकेँ अछोप कहल जाइए। मुखदेव राम .... दिमागमे खेला भेल छै। कोलाञ्च ब्राह्मण.. मैथिल ब्राह्मण.. सोलकन्ह.. अछोप.. हँ, आ बाढ़ि आ बान्हक राजनीति सेहो मिथिलामे शुरू भऽ गेल। परिहार आ बाजपट्टी-सीतामढ़ी-क बीचमे मेयर बान्ह। आ बेनीपट्टीक किंग्स बान्ह आ नहर। आहर आ पाइन.. शिवनगरक निलहा गोरा एन्डरसनक नामपर एन्डरसन बान्ह आ क्रॉफ्टक नामपर केरापट्टी बान्ह अछि। निलहा यूरोपीयन सभ बान्ह आ बाहा शुरू केलन्हि। बादमे बान्ह बनाबै जाइ गेल मुदा बाहा बनेनाइ बिसरि गेल, बिसरै नै गेल, ई बाहा ओकरा सभकेँ समएक, स्थानक अपव्यय बुझेलै। माने पानिक निकासी बन्द। माने आवजाही बन्द। आवाजाही तँ सभ चीजेक बन्द भऽ गेलै। विचारक आवाजाही, विमर्शक आवाजाही… …. सभ बन्द। बान्हक भीतरक लोक एकरा काटऽ चाहै छथि- बाहरक लोक नै, अही निकासीक समस्याक कारणसँ। धनजइया, परमाने, घोड़दह, पाँची, खड़ग, तिलजुगा, खाँरो, बलान, भुतही बलान, बिहुल, गहुमा, सुपेन, कमला, जीबछ, गंडक, बुढ़ी गंडक, बागमती, धरौड़ा, अधबारा, धोकरी-धोकरा, गंगा, सोन, कोसी, मेची, कन्कै, पनार, महानन्दा, परमान, करन दिघी, बारसोइ, बरारी, कोढ़ा, कदवा, मनिहारी, कटिहार, महानन्दा, कारी कोसी, सौरा, गंगा, बरण्डी, करेह, सुगरबे। बाप रे। कतेक रास धारक नाम मोन छन्हि मुखदेव रामकेँ। बागमती धार काठकेँ अँकुरा दै छलै, मुदा तइ बागमतीक एकटा धार १९३४ क भूकम्पमे बिखाह भऽ गेलै। मनुषक लेल काल भऽ गेलै, मनुस्मारा भऽ गेलै। मनुस्मारा, बागमतीक पुरान धार। १९३४ ई. क भूकम्पक बाद एकर गुणमे परिवर्तन भेल आ ई मनुस्मारा भऽ गेल। बागमतीक पाँक आ खाद ऐ दुनूमे चुनबाक होइ छलै तँ लोक आनै छल बागमतीक पाँक। मुदा से बिखाह भऽ गेलै। मुदा पूर्णियाँ इलाकाक पानि ऐ भूकम्पक बाद सुनै छिऐ नीक भऽ गेलै। बड़का बान्हसँ बान्हल छलै धार, सिंचाइ भेल, तोड़लौं बान्हकेँ। फेर छोटका बान्हसँ बान्हल रहै छलै बान्ह। फेर सिंचाइ केलौं आ फेर तोड़ि कऽ आगाँ बढ़लौं। बाढ़िक पानि एनाइ बन्न भेल नै आकि जमीनक ताकति खतम भऽ जेतै। अधवारा समूहक हरदी, कन्टावा, रातो, मादा, जमुने, शिकाओ, खिरोइ, सोइली, जमुरा, बुढ़नद आ बागमती घाटीक पुरान धार, कोला धार आ लखनदेइ। ऐ सभ इलाकाक कोन गाम छुटल छै मुखदेव रामसँ? बागमतीक पानि जखन झझाइए आ आन झझाइत धार सभमे मिज्झर होइए, तखन? अधवारा समूह बागमतीक सहायक नदी अछि। एकर धार लेने मध्य बागमतीमे दरभंगा बागमती मिलैए आ करेह बनि जाइए, हायाघाट लग आगाँ खोरमार घाट लग ई कोसीमे मिलि जाइए। ढेर रास गप बुझल छै मुखदेव रामकेँ। पीअर बच्चा एक दिन टेबैत सभ गप पता करैत जेल आएल। -मुखदेव। हमरा बूझल अछि जे आब बेसी दिन तूँ जेलमे नै रहमे। मुदा जागेश्वरक हाल की भेलै से तँ तोरा बुझले छौ। ओकर हाल तूँही कहियियहैं गाम जा कऽ। मुदा आब तोहर आ जागेश्वरक टोकना माथमे लऽ कऽ बान्ह तोड़ैबला करतब काज नै करतौ। लोक सभकेँ पैघ बान्ह चाही छलै, से बनि रहल छै। खूब पैघ। कमला-कोसी दासी बनि जेतै मुखदेव। तूँ स्थिरसँ रहिहेँ… गाममे.. मुदा जतेक स्थिरसँ एतऽ छेँ ततेक निश्चिन्ती गाममे तोरा नै भेटतौ। से रह किछु दिन आर। एलेक्शन अगिला साल १९५७ ई. मे छै। तावत तँ रहबे कर.. की बाजैए पीअर बच्चा? कोसी-कमलाकेँ दासी बना लेत? बड़का बान्हसँ घेरि कऽ दासी बना लेत? किछु नै बुझल छै ओकरा रघुवरन। किछु नै बूझल छै ओकरा। रघुवरन, अबेर भऽ रहल अछि। ऐ जेलमे बड्ड अबेर भऽ गेल। किछु गलत ने भऽ जाए रघुवरन। आब एतऽसँ छूटब आवश्यक अछि।– मुखदेव रघुवरनकेँ कहै छथि। किछु दिनमे रघुवरन जेलसँ छुटि गेला आ मुखदेव राम असगर भऽ गेला। फेर कम्यूनिस्ट पार्टीक एकटा मानव अधिकार समिति जेल आएल। कम्यूनिस्ट पार्टीक नेता श्री रघुवरन, जे किछु दिन पहिनहिये जेलसँ छुटि कऽ गेल छला, ओहो संगमे रहथि! जेलक कर्मचारी आ मुखदेव रामक बीचक सभ गप ओ सुनैत रहैत रहथि। मुदा बाजथि किछु नै। मुदा ओ मुखदेव रामकेँ टेब लेने रहथि। टेब लेने रहथि जे ई गब्बैय्या कम्यूनिस्ट आन्दोलनमे किछु ने किछु करत। आ से ओ मानव अधिकार समितिक संग मुखदेवकेँ छोड़ेबा लेल आबि गेला। आब के अछि चोर-पॉकिटमार आ के अछि स्वाधीनता सेनानी से कोना पता लागत। अंग्रेजक नजरिमे तँ सभ आतंकी छल। चोर-उचक्का सभ अपनाकेँ सेनानीये कहए। घनानन्द, हलधर, नोने, दौलति जहाँ, भट्ट भूषण आ रुद्रमतिक मुदा संग भेटलै मुखदेव रामकेँ। जेलर बाबू सेहो मदति केलखिन्ह। आ छुटि गेला मुखदेव। स्वतंत्र भारतक जेलसँ भारतकेँ स्वाधीनता दियाबैबलाकेँ संविधानबला स्वतंत्रता प्राप्त भेलाक छह बर्ख बाद छोड़ि देल गेल। घनानन्द, हलधर, नोने, दौलति जहाँ, भट्ट भूषण आ रुद्रमतिसँ बिदा लेलन्हि मुखदेव। प्रसन्नता आ बिछुड़ि गेनाइ.. जेल सन जेल नै.. पाठशाला बना देने रहथि भारतक स्वतंत्र जेलकेँ मुखदेव राम। घनानन्द, हलधर, नोने, दौलति जहाँ, भट्ट भूषण आ रुद्रमति ई सभ हुनकर शिष्य रहन्हि। चोरो-उचक्का सभ स्वाधीन भऽ गेल, छुटि जाइ गेल जेलसँ। मुदा मुखदेवकेँ जाइ काल सभ वचन देलकन्हि जे आब ओ सभ मेहनतिक बाटपर चलता। मुखदेव ने हँसिते छथि आ ने अप्रसन्न होइ छथि। बाँकीपुर कैम्प जेल.. कहै छलि रुद्रमति.. बाहरक दुनियाँ बड्ड खराप। एतऽ जे पानि पीबै छी अहाँ मुखदेव ओ अछि निर्मल जल, गंगाजल। कतेक खिस्सा आ गीत सुनेलौं मुखदेव, एकटा गीत हमरो मोन अछि… अहाँ सभक विद्यापतिक.. बड़ सुखसार पाओल तुअ तीरे। छाड़इते निकट नयन बह नीरे। कर जोड़ि बिनमञो विमल तरङ्गे। पुन दरसन होअ पुनिमति गङ्गे। एक अपराध छेँओब मोर जानी। परसल माए पाए तुअ पानी। कि करब जप तप जोग धेआने। जनम सुफल भेल एकहि सनाने। -भनइ विद्यापति समन्दञो तोही । अंत काल जनु बिसरह मोही। हँ रुद्रमति। देखल अछि बाहरक दुनियाँ। आ आब बिनु जागेश्वरक… मुदा बड्ड रास काज बाँकी अछि। युवावस्था खतम जकाँ भऽ गेल अछि। सुनै छिऐ बड़का निकहा चीज सभ आबि रहल छै गाममे। बाहरक दुनियाँ नीक छै रुद्रमति, बड्ड नीक। बसात, फूल, पात, गाछ, खेत, डबरा… आ घेंघी… कोन विद्यापतिक गीत गबैत हेती घेंघी… ओकर पिआ देसाँतरकेँ तँ हम गंगा तटपर छोड़ि कऽ जा रहल छिऐ। फिरंगी सभ जरा कऽ छाउर गंगामे बहा देलकै। निर्मल भऽ गेली गंगा ओ छाउर पाबि कऽ.. …निर्माल.. ……..स्वतंत्रताक पुजेगरीक निर्माल पाबि कऽ निर्मल भऽ गेली गंगा। कोन विद्यापतिक गीत गबैत हेती घेंघी… उचित बसए मोर मनमथ चोर। चेरिआ बुढ़िआ करए अगोर। (कामदेव रूपी चोरक लेल हमर अवस्था ठीक अछि। बुढ़िया चेरी पहरा दऽ रहल छथि।) बारह बरख अवधि कए गेल। चारि बरख तन्हि गेलाँ भेल। (बारहम बरखक रही, तखन ओ गेला आ आब चारि बर्ख तकर भऽ गेल।) बास चाहैत होअ पथिकहु लाज। सासु ननन्द नहि अछए समाज। (सास आ ननदि क्यो संग नै छथि आ पथिक सेहो डेरा देबासँ लजाइ छथि।) सात पाँच घर तन्हि सजि देल। पिआ देसाँतर आँतर भेल। (ओ कामदेव लेल घर सजा कऽ देशान्तर चलि गेला आ हमरा सभक बीचमे अन्तर आबि गेल।) पड़ेओस वास जोएन सत भेल। थाने थाने अवयव सबे गेल। (पड़ोसक बास जेना सय योजनक भऽ गेल सभ सर-सम्बन्धी जतऽ ततऽ चलि गेला।) नुकाबिअ तिमिरक सान्धि। पड़उसिनि देअए फड़की बान्धि। (लोकक समूह अन्हारमे विलीन भऽ गेल, पड़ोसिन फाटकि बन्न कऽ लेलन्हि।) मोरा मन हे खनहि खन भाग। गमन गोपब कत मनमथ जाग। (हमर मोन क्षण-क्षण भागि रहल अछि। कामदेव जागि रहल छथि गमनकेँ कतेक काल धरि नुकाएब।) चौबीसम कल्लोल अंडीक कोरो बघंडीक बाती, केहन घर छारलेँ रे पोदिनमाक नाती रघुवरनक कॉमरेड मुखदेवकेँ लऽ कऽ निकलि जाइ छथि। पीअर बच्चाकेँ पता चलै छन्हि, मुदा दू दिनुका बाद। गाम खबरि करै छथि, जागेश्वर तँ मरि गेल छल, फिरंगी मारलक जागेश्वरकेँ। फिरंगी, जकरा कांग्रेस भगा देने अछि। मुदा बड्ड मोश्किलसँ मुखदेवकेँ छोड़बा लेल गेल अछि। ओना ओकरापर बड्ड पैघ आरोप सभ लागल छलै, मुदा गौँआ लेल एतबो नै करितथि पीअर बच्चा!! लोक आशाबाटी ताकऽ लागल, मुदा मुखदेव गढ़-नारिकेल पहुँचबे नै केला। कॉमरेड, रघुवरनक कॉमरेड गढ़ नारिकेल आ आसपासमे काज कऽ रहल छला। इलाकाक पूरा जानकारी छलन्हि हुनका लग। लोक सभ की बाजै छल, की करै छल। लोक की बाजै छल.. अंग्रेजक सिपाही जागेश्वर आ मुखदेवकेँ पकड़ि कऽ लऽ गेलै। पीअर बच्चा पकड़बेलकै। किए पकड़बेलकै? गामक लोककेँ इनार भेटलै तेँ? आकि तकर यश राधामोहन रायकेँ भेटलै तेँ? आकि पीअर बच्चा बारूदक प्रयोगकेँ गलत मानै छल तेँ, जेना पीअर बच्चा कहैए? ओ तँ यएह कहैए जे आइ ने अहाँ सभकेँ ई बारूद नीक लागि रहल अछि, काल्हि भेने सिंघ कटबाक बदला बारूदसँ उड़ा कऽ डकैती शुरू भऽ जाएत। अरे झुट्ठे कहैए, कोनो स्वतंत्रता सेनानी तेनानी नै अछि ई जागेश्वर आ मुखदेव। आतंकी अछि आतंकी। ई राधामोहनराय हमर अतिवृद्ध प्रपितामहक बरोबरि करऽ चाहैए। बुचिया पोखरिमे जाइठ गारबा लेल हुनका भेटल प्रतिष्ठा कएक खाढ़ीसँ ओकरा सभक आँखिमे गड़ि रहल छलै। इनार.. हुँह.. आ ई मुखदेव राम, हम्मर टोलमे रहैए, बुचिया पोखरिक मछैरिक माँछक बखरा भेटै छै आ संग देत ओइ आतंकी जागेश्वरझाक। मुखदेवक भाए दयारामपर आफत आबि गेलै। इम्हर भाएक शोक तँ उम्हर पीअर बच्चाक अन्ट-शन्ट निर्देश आ उछन्नर सभ। मुदा घेंघीक शोकक कोनो कथे नै। नैहरबला सभ हुनका लऽ जाए चाहलन्हि मुदा ओ नै गेली। अंग्रेज लऽ गेल छन्हि। मुदा ओ ओइ जहलकेँ तोड़ि जँ आबि जाथि आ घरमे कियो नै रहए, तखन? पीअर बच्चा अपना मोने पैघ भऽ गेल। कांग्रेस बुलेटिन संख्या तीन पढ़ि कऽ सुना रहल छथि राधामोहन राय। २० सितम्बर १९४२ अहिंसा हमर अस्त्र अछि! गाँधीजीक अन्तिम संदेश। करू वा मरू। फिरंगी फौज लग बत्तीस फीट खधाइ पार करबाक समान रहै छै.. से चालीस फीट खदाइ कऽ दियौ जइसँ फिरंगी ओकरा पार नै कऽ सकए। सभसँ हड़ताल करबाक अनुरोध छै मुदा डोम-मल्लिककेँ हड़ताल नै करबाक अनुरोध छै। फिरंगी रहौ वा देशी, की अन्तर पड़ै छै डोम-मल्लिककेँ। बहेड़ा, बेगूसराय, बेतिया, भागलपुर, दरभंगा, देवघर, ढोली, गोरौल, मधुबनी, मुजफ्फरपुर, पण्डौल, समस्तीपुर ऐ सभ ठाम कांग्रेसक खादी भण्डार छै। विधवा सभ लेल ई काज तँ कांग्रेसे केलकै बाबू। कुसमावतीक इन्तजाम कऽ दै छिऐ। सूत काटैत रहती चरखापर तँ मोनो बहटरल रहतन्हि। सभ मास खादी भण्डारबला एतन्हि आ तूर दऽ जेतन्हि। खेत पथारक कोन कमी छन्हि। मनखपोपर दऽ देती तँ नीक जकाँ गुजर चलतन्हि। ऐ दछिनबारि टोलबला सभक की हेतै से नै जानि। पटवा जगदीश माइल, कुम्हार भोला पण्डित, सत्यनारायण यादव, बासू चौपाल, चलित्तर साहू आ लड्डूलाल साहू, दयाराम, ई सभ ऐ पीअर बच्चाक चपेटमे छथि। चिन्तित छथि राधामोहन राय। किछु दिन धरि जागेश्वर आ मुखदेव रामक संगी सभ घुरि-घुरि कऽ अबैत रहल। रातिमे आबए आ दयाराम आ कुसुमावतीसँ जागेश्वर आ मुखदेवक समाचार पूछए। मुदा फेर आस्ते आस्ते ओहो सभ नै जानि कतऽ चलि गेल। मरा गेल हएत वा बन्द हएत कोनो जहलमे। इम्हर अंग्रेज सभक कोनो युद्ध चलि रहल छलै जर्मन सेनासँ। अकासमे छोटका-छोटका हवाइ जहाज गौँआ सभकेँ देखा पड़ै छलै। पीअर बच्चा भितरे भितरे समाजवादी पार्टीमे आबि गेल रहथि, कारण राधामोहन राय कांग्रेस पार्टीमे रहथि। साल बीति गेल। कुसुमावती खादीक झण्डा बनेलन्हि, त्रिवार्णिक झण्डा। आ फहरा एली दयारामक घरक आ अपन घरक सोझाँ। राधामोहन राय आ पीअर बच्चा, दुनू गोटे विरोध केलन्हि। नै, ई नै करबाक चाही। चलू सत्यनारायण कामत तँ अपने लोक, चौकीदार छथि तँ की सभ गप दरोगाकेँ जा कऽ कहता गऽ। मौगी-मेहरिबला गप छै। बेचारी कुसुमावती, की जानि जागेश्वर आ मुखदेव जिबितो छै आकि नै। इम्हर सरकारक घोषणा भेलै जे बारह आना एक मोनक दरसँ सरकार कुसियार कीनत। दर ओना कम रहै। पीअर बच्चा खूब कुसियारक खेती करै छलथि। मुदा कांग्रेस किसान सभसँ आग्रह केलकै जे कुसियारक खेती बन्द कएल जाए। राधामोहन राय एकर खूब प्रचार केलन्हि। पीअर बच्चा कहलन्हि जे ईहो प्रस्ताव राधामोहने राय पास करबेने हएत। बड्ड पटना गाम कऽ रहल अछि आइ-काल्हि। यौ, एतेक बेर गेल अछि तँ मुखदेव आ जागेश्वर कोन हालमे पटनाक बाकीपुर जेलमे छथि से ने पता लगबितए। झुट्ठो कऽ हमरा बदनाम करैए। बिहार प्रान्तक मुस्लिम लीग समितिमे डोमी मियाँ सेहो छल। कराँची गेल। देश दू भागमे बटबाके चाही। कराँचीसँ एलाक बाद बिहार प्रान्तक मुस्लिम लीग खूब जोशमे छल। डोमी मियाँ लीगी अखबार “न्यू लाइफ”क पुरान अंक खूब मोन लगा कऽ पढ़ै छथि। ४ फरबरी १९४४ केँ डोमी मियाँ उर्दू दिवस मनेलन्हि, जैनुल ओकर विरोध केलन्हि। ई उर्दू आ हिन्दुस्तानीक झगड़ामे देशकेँ किए बाँटै छेँ, मैथिलीकेँ किए नोकसान पहुँचाबै छेँ? राधामोहन राय खूब दिवस मना रहल छथि। आइ कतऽ जा रहल छी तँ कांग्रेसक ई दिवस छिऐ, काल्हि कतऽ जा रहल छी, तँ कांग्रेसक ओ दिवस छिऐ। कोसी धार अपन रस्ता बदलैत रहैए, अनुग्रह नारायण सिंह ऐपर चिन्ता देखेलन्हि। हैजा आ मलेरियासँ लड़बा लेल कांग्रेस किछु करत। लोक खादी पहिरैये नै चाहैए। बात बुझऽ पड़तै लोककेँ। पीअर बच्चा भितरे भितरे समाजवादी पार्टीमे रहथि। १२ अप्रैल १९४६ ई., अंग्रेज समाजवादी पार्टीपर सँ प्रतिबन्ध उठेलक आ तखन जयप्रकाश नारायणकेँ छोड़ि देल गेलन्हि। आ तखन पीअर बच्चा छाती तानि कऽ समाजवादी पार्टीमे आबि गेला। मुदा बिहार मुस्लिम लीग पूर्णियाँ, दछिनबरिया भागलपुर, दछिनबरिया मुंगेर, जहानाबाद, आ नवादाकेँ बिहारसँ अलग कऽ मुस्लिम पाकिस्तान वा मुस्लिम राज्य बनेबाक विचार देलक। डोमी मियाँ “न्यू लाइफ” मे ई समाचार देखि दौगि कऽ लीगक सम्मेलनमे किशनगंज गेला आ राजा गजनफार अलीसँ भेँट केलन्हि। ई कोन गप भेल। ई कोन पाकिस्तान बनत जइमे गढ़ नारिकेल नै रहत। ऐसँ तँ गढ़ नारिकेलक डोमी मिआँक टोलकेँ सेहो ओइ छोटका छोटका पाकिस्तान जकाँ बना देल जाए। मुदा राजा गजनफार अलीकेँ सेहो असल पाकिस्तानक स्वरूप नै बुझल छलन्हि। दिन बितलै, मुदा ई स्पष्ट भऽ गेल जे छोट छोट पाकिस्तान नै बनत। डोमी मिआँ आ लछमी ततमा, गढ़ नारिकेलक इनार सभक राजमिस्त्री। डोमी मिआँ पटनाक शिविरमे चलि जाइ छथि। एकटा शिविर बनि गेल छै मुस्लिम लोकनिक। सभ तँ जा नै सकै छथि पाकिस्तान। रस्तेमे फँसि जाइ जेता। शिविरमे शरण लेने छथि। हल्ला छै जे नोआखालीमे हिन्नूकेँ मारै गेल छै तकर बदला बिहारमे लेल जेतै। बिहारक मुस्लिम पाकिस्तान बनेबा लेल बेशी हल्ला केने रहथि। आब लिअ, बिहारक कोनो क्षेत्र पाकिस्तानमे गेबे नै कएल। आजाद हिन्द फौजक मेजर जेनरल शाहनवाज पुनर्वासमे लागल छथि, पटनामे। डोमी मिआँ अपन पत्नी आ बच्चाकेँ लऽ कऽ पाकिस्तान लेल बिदा भऽ जाइ छथि। जैनुलकेँ, टोलक आनो गोटेकेँ, ओ कहै छथि चलै लेल। स्वर्ग बनतै पकिस्तान। मुदा कियो तैयार नै होइए। एतऽ तँ सभटा रेहल-खेहल अछि, ओतऽ की-केहेन हएत के जानै गेल। कुसुमावतीक लेल स्वतंत्रताक कोन अर्थ? आ दयाराम, ओहो अपन काजमे लागल रहै छथि। आ डोमी मिआँक स्वतंत्र देश ई नै अछि, ओ अछि पूब दिस, जतऽ सुरुज उगै छै कए घण्टा पहिने। मुदा जैनुल कहै छथि जे ओतऽ साँझो होइत हेतै पहिने। मुदा डोमी किए मानत। जेना-तेना गंगा पार कऽ कए पटना पहुँचैए। मुदा किए कियो बिहार मुस्लिम लीगक लोक कतौ भेटतै। पाइबला सभ अपन इन्तजाम केने छल सीमा पार होइ लेल। रस्तामे तरह-तरहक उकबा उठै, मारि देलकै, काटि देलकै.. आजाद हिन्द फौजक दूटा सिपाही भेट जाइ छन्हि डोमी मिआँकेँ आ लऽ जाइ छन्हि शिविरमे। मारि देलकै, काटि देलकै.. शिविरमे जतेक लोक, ततेक तरहक गप्प। गढ़ नारिकेलमे सभ अपने ताले नाचि रहल अछि। स्वतंत्रताक सभ अलग-अलग अर्थ लगा रहल अछि। मुदा लछमी ततमा। ओकर संगी डोमी मिआँ बिना ओकरासँ पुछने बहार भऽ गेलै। ओ पटने गेल हएत। से कोना? कनियाँ पुछै छथिन्ह। “न्यू लाइफ” अखबार पढ़ि कहि रहल छल, जे पटनासँ सभ बेबस्था बिहार मुस्लिम लीग करतै। कोन भूत सबार भऽ गेलै से नै जानि। पढ़ला लिखलासँ आर झमेला होइ छै। कियो कोनो सम्मेलनमे ओकरा कहि देलकै जे अंग्रेजी पढ़ऽ अबैए आ राजमिस्त्री छी? पाकिस्तान बनतै तँ ओकरा कलक्टर बना देतै। आ आब ओही पाकिस्तानमे कलक्टर बनै लेल बिदा भेल अछि बुरबक। लछमी ततमा बिदा भऽ जाइ छथि पटना। रस्तामे सगरे पाकिस्तान आ शिविरक चर्चा छै। शिविरमे भेँट भऽ जाइ छन्हि डोमी मिआँ। तरह तरहक समाचार सुनलाक बाद डोमी मिआँकेँ गढ़ नारिकेल आ ओकर लोक मोन पड़ि जाइ छन्हि। इनारक पलस्तर, बौधा मल्लिकक इनारक पानि आ बंजाराक गीत रो टो टो… डोमी मिआँक कनियाँ आ चारू बच्चा सेहो अनभुआर लोक सभकेँ देखि कऽ चौंकल रहै छथि। लछमी ततमाकेँ देखि कऽ सभ निश्चिन्त भऽ गेला। घुरबाक मोन तँ रहबे करन्हि, लाज होइ छलन्हि जे कोन मुँहे घुरि कऽ जेता। आब लछमी आबि गेल, सभ सम्हारि लेत। लछमी ततमा घुरा कऽ आनैए डोमी मिआँकेँ। बिहार मुस्लिम लीग भारतक स्वतंत्रता समारोहमे भाग लेबाक निर्णय लैए। डोमी मिआँ मुस्लिम लीगक आब नामो नै सुनऽ चाहै छथि। सभटा गप सुनि रहल छथि मुखदेव। आ राधामोहन राय समाजवादी आ पीअर बच्चा कांग्रेसी कोना भऽ गेला? -पीअर बच्चाक कोनो जोगार छलै। दिल्ली आकि पटनेसँ टिकट भेटि गेलै। कांग्रेसक टिकट.. आ पीअर बच्चा समाजवादीसँ कांग्रेसी भेला तँ राधामोहन कांग्रेसमे कोना रहितथि… से ओ समाजवादी भऽ गेला। आ सत्यनारायण यादव… कम्यूनिस्ट संगठन कमजोर छै मुदा मुइल नै छै। देखू की होइए.. अंडीक कोरो बघंडीक बाती, केहन घर छारलेँ रे पोदिनमाक नाती … गढ़ नारिकेल.. स्वतंत्र भारत…. पच्चीसम कल्लोल बैसने पहर चलने कोस हाइ रे हाइ मुखदेव। कम्यूनिस्ट पार्टी मुखदेवकेँ छोड़बेलकै। आ रघुवरन हुनका अपना भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टीक कार्यालय लऽ गेल, मदुरैमे। मदुरै अधिवेशनक चर्च होइ छलै। १९५३ मे भेल रहै मदुरै अधिवेशन। मदुरै घरो छै रघुवरनक। भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी मानै छल जे भारत स्वतंत्र नै भेल अछि। मुदा ऐ सम्मेलनमे भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी मानलक जे भारत स्वतंत्र विदेश नीतिक पालन कऽ रहल अछि। मुदा अखन अछि १९५६ ई.. मुदा मदुरैमे रघुवरनक घरक सोझाँ बड़का भीड़ अछि। बड़का-बड़का नेता सभ छथि.. भाषण चलि रहल छै…. मुखदेव रामक बेर एलै.. बजबाक बेर एलै… बाजू मुखदेव.. स्वतंत्रतापर.. मानव अधिकारपर.. बाजू? बाजू! -गाबि कऽ बाजू? -गाबि कऽ बाजू। पोलिटब्यूरोक अध्यक्षक कहबाक देरी छलै आकि शुरू भऽ गेल मुखदेव राम। गांगोदेवी के अंगनामे अरहुल के गछिया फर-फूल लोधल ठाढ़ि यै ..राजा सुगा एक आएल बैसल सूगा यै अरहुल फूल गाछ हे बैठल सूगा अरहुल फूल गाछ हे डाढ़िपात केलक क-कचून हे नीक नीक फूलबर सुगबा चुनि चुनि खाय डाढ़ि पात देलक कचून हे कहाँ गेल कियर भेल गाम के बहेलिया मारू सूगा के धनुष चलाइ हे घर से एकसर मरल बहेलिया दोसर मारल तेसर शर सूगा उड़ि जाइ हे घर से बहार भेलि गोसाउन नै मारिय सुगबा के रहत एना सुगबा छोट भाइ हे जौँआ आम दियौ बहेलिया सूगा के केर कान सुगबा सुगा छिऐ छोट भाइ हे ओह, पोलिटब्यूरोक अध्यक्ष किछु नै बुझलन्हि रघुवरन आ ओ कॉमरेड मुदा मैथिली बुझै छला, बुझेलखिन्ह… पोलिटब्यूरोक अध्यक्ष बुझलन्हि जे कोनो समरसताक गप कहि गेला मुखदेव राम.. बजा कऽ पहिने अर्थ पुछलन्हि द्विभाषियासँ.. आ सोझे मंचपर गरा लगा लेलन्हि मुखदेव रामकेँ.. नाम की छियन्हि.. मुखदेव… मुदा लोक सुनलक मोहन.. आ नाम पड़ि गेलन्हि मुखदेवक.. मोहन गबैय्या… गाम घुरि कऽ एला मोहन गबैय्या.. जोश.. लोक सभ आँखि फाड़ि कऽ देखलक .. अंग्रेजक जहलोसँ खराप भारतक स्वतंत्र जहल.. मुदा भारत स्वतंत्र भेल कहाँ अछि? हमर पार्टी भारतकेँ स्वतंत्र नै मानैए। मुखदेव… नै हमर नाम अछि आब मोहना.. मोहन गब्बैय्या.. हाइ रे हइ.. आ मोहना गब्बैय्या तान देबऽ लगला, गाममे, सगरो आसपास। लोक कहै- हौ गाबै तँ पहिनहियो छलथि ई नीक, मुदा जहलसँ घुरलाक बाद तँ कोनो मोकाबिले नै छै हौ, कृष्ण भगवान वास करै छै हौ। तान जे बहराइ छै से दूर धरि जाइ छै हौ। घर द्वारसँ दूर कत्तऽ–कत्तऽ ने सभा समितिमे जाए लगला मोहन गबैय्या, भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टीक सम्मेलन सभमे, सभा सभमे। इम्हर निर्मली, घोघरडीहा सभ ठाम भारत सेवक समाजक कार्यकर्ता सभ सम्मेलन करऽ लगला। -सत्यनारायण यादव कहै छथिन्ह। बाढ़ि, विकास.. मुदा बाढ़िक पानि आनैए पाँक.. अबारमे अबैए माँछ... राजेन्द्र प्रसाद पहिने बान्हक पक्षमे नै रहथि, अनुग्रह नारायण सिंह सेहो धारकेँ बान्हबाक पक्षमे नै रहथि। फेर अनचोक्के ओहो सभ आ गुलजारी लाल नन्दा, ललित नारायण मिश्र आ ई भारत सेवक समाजक कार्यकर्ता सभ, सभ बान्हक पक्षमे आबि गेला! जड़ताकेँ मेटेता ई भारत सेवक समाजक कार्यकर्ता सभ। ई पोखरि, बाहा, माछ-मखान, चौरी, खत्ता, ई सभ हजार सालसँ बाढ़िकेँ रोकनहिये तँ अछि। अंग्रेज सभ दामोदर नदीपर बान्ह बनेलक आ ओकर विनाशलीला देखि कऽ फेरसँ ओकरा तोड़ि देलक। आ फेर कोनो धारकेँ नै बान्हलक। -सत्यनारायण यादव कहै छथिन्ह। हँ छोट-छोट बान्ह निलहा कोठीक गोरका सभ बान्हलक। आर.एस.किंग्सक आहर आ पाइन। बान्ह आ नहरि.. इम्हर १९५४ ई.मे कमला आ बलान पिपराघाट लग मिलि गेल आ आगाँ कमला बलान नामसँ धार बनि गेल। -सत्यनारायण यादव कहै छथिन्ह। -बान्ह बनतै, आब बनाउ कोना बनाबै छी। कमलापर, बलानपर आकि कमला बलानपर! बीति गेल बारह बर्ख जेलेमे।.. बैसने पहर चलने कोस.. देखी घेंघी केहेन अछि… ओहने अछि.. बुधियारि भऽ गेल अछि। बुझि गेल अछि जे जागेश्वर नै एतै घुरि कऽ… बुझि गेल जे पीअर बच्चा नै छोड़बेने छै मुखदेवकेँ… समय रुकि गेल छै। बैसने पहर चलने कोस.. चरखा मुदा चलि रहल छै… गुम्म भेल अछि.. गुम्म जागेश्वर आ कुसुमावती.. गुम्म अछि स्वतंत्रता… बैसने पहर चलने कोस.. देखू की होइ छै आगाँ आगाँ… छब्बीसमकल्लोल एतै दुख देलेँ हे माइ कोसिका एतै दुख देलेँ/ आरी चढि़ रोबै छै किसान सत्यनारायण यादव पीअर बच्चाक फूसिक विषयमे सौँसे बाजि रहल छथि। मुखदेव सुनि रहल छथि। पटवा जगदीश माइल कान पाथि कऽ सभटा सुनि रहल छथि। पटवा जगदीश माइलक बेटा महेश । भरि दिन कपड़ा बुनबाक लेल खद्धामे पैसैत आ तानी आ भरनी मिला कऽ कपड़ा बूनि पेटलरदीपर लपेटैत जगदीश माइल अपनामे भेर रहै छथि। औंटि कऽ निकालल बाङक बङौरा जगदीश माइलक घरक चारूकात एत्तऽ–ओत्तऽ पसरल रहैत अछि। भदैया कोकटीक बूनल वस्त्रक लेल जगदीश माइल नामी छथि। एक बेर भदैया कोकटीक जगदीश माइल द्वारा बूनल वस्त्र कीनू आ भरि जनम पहिरू। जगदीश आ महेश फिटलूम, किसान चरखा आ अमर चरखा सेहो चलबैत छथि। मुदा जगदीशक सूत घुरिआइत नै अछि, एकदम गफ्स। मुदा महेशक सूतक जोड़मे घुरछी खूबे भेटत। अढ़ाइ हाथ चाकर धोती-साड़ी धनिक आ गरीबक हिसाबे छोट-पैघ भेटैत अछि। से पाइबला लेल दसहत्थी धोती मुदा गरिबहा लेल सतहत्थी धोती। तहिना साड़ी सेहो धनिक गरीबक हिसाबे बनबै छथि जगदीश माइल। बहुआसीन लेल बिसहत्थी तँ गरिबनी लेल नओ हत्थी। हँ, मुदा नओहत्थीसँ छोट साड़ी आ सतहत्थीसँ छोट धोती कहियो नै बनेलन्हि जगदीश माइल। मुदा ई खादी-भण्डारबला सभ आब पहिने जकाँ हृदएसँ सेवा नै कऽ रहल अछि। मारते रास दलाल सभ राखि लेने अछि आ जगदीश माइलक बेटाकेँ कोनो ठाम नोकरी करबा लेल पोल्हा रहल अछि। देश स्वतंत्र भेलाक बाद बड़बरिया रॉय कतेको बेर प्रयास केलन्हि जे हुनकर लगान वसूली गढ़ नारिकेलमे चलैत रहए। एक-आध साल चलबो केलन्हि। हाथी लऽ कऽ आबथि आ डेरा-डंटा राखि देथि। मुदा ऐ हाथीकेँ खुऐबेमे लोक परेशान भऽ जाइ छल। -कहै छथि सत्यनारायण यादव। मुदा एक बर्ख ओ सभ एला तँ गढ़ नारिकेलक दछिनबारि टोलमे डेरा-डंटा लगेलन्हि। पीअर बच्चाक बेटा धीरेन्द्र। छोटे रहै, योग मन्तर सभ सिखै छलै, दस-बारह बर्खक हेतै। हाथीकेँ की नै की कऽ देलकै, ओ हाथी बताह भऽ गेल। बड़बरिया रॉयक टेन्टमे हड़कम्प मचि गेल। आ इम्हर छबारी सभ ढेपा फेकऽ लागल। फेर घुरि कऽ बड़बरिया रॉय नै एला। -कहै छथि सत्यनारायण यादव। दछिनबारि टोलेमे छथि पटवा जगदीश माइल। बड़बरिया रॉयक भागिन.. बड़बरिया रॉयक भागिन महेशकेँ पटियाबैमे लागल रहथि। जगदीशकेँ बुझेबो करथिन, महेशकेँ अही काज सभमे जोतने रहबै। बेचाराक जिनगी सेहो खद्धेमे पैसैत आ बहराइत खतम भऽ जेतै। महेश सेहो कान पाथने सभ गप सुनैत रहै छला। मुदा खादी भण्डारबला सभ तँ नीके काज करै छल, बड़बरिया रॉयक भागिन सेहो नीके लोक लगैत रहथि। मधुबनीमे अखिल भारतीय खादीक कोनो केन्द्रक मुख्यालय तँ रहबे करै। मुदा आस्ते-आस्ते जखन जगदीश कखनो काल महेशकेँ खादी भण्डार साड़ी-धोती पहुँचाबैले आकि पाइक तगेदाले पठाबऽ लगला तखन ओतऽ महेश किछु आर चीज-बौस्तु सभ देखऽ लगला। कहियो कोनो प्रदर्शनी लागल देखा पड़ि जाइन्ह तँ कहियो किछु आर, नव जमानाक नव वस्तुजात। फिरंगी सभ मिथिला चित्रकलाबला छपाइ देखि कऽ आँखि चोन्हराबै छल। धुर, ओकर आँखि ओइ छपाइकेँ देख कऽ थोड़बे चोन्हराइ छै, ऐ फिरंगी सभकेँ एतेक इजोत थोड़बे देखबाक हिस्सक रहै छै। ठंढी इलाकाक छिऐ ई सभ, से मिनट-मिनटपर आँखि घोकचेबाक आदति रहै छै एकरा सभकेँ। बड़बरिया रॉयक भागिन महेशक ततेक ने बड़ाइ केलन्हि, ततेक ने बड़ाइ केलन्हि, जे ओ फिरंगी हिनकासँ काज सिखबा वा देखबाले हिनकर गाम जेबापर बिर्त भऽ गेल। आब बड़बरिया रॉयक भागिन पछताए लगला, बेकारे एकर एतेक बड़ाइ कऽ देलिऐ। फिरंगीक गाम अबिते देरी जगदीशक कान ठाढ़ भऽ गेलन्हि। मुदा ओ फिरंगी बुझाइए कोनो कलाकार छल। गाममे जे देखए, जे सुनए तकरा लिखने जाइ छल, फोटो बनेने जाइ छल। पिनसिनसँ कागचपर एन-मेन। खधाइमे पैसै छल आ तानी आ भरनी मिला कऽ कपड़ा बूनि पेटलरदीपर लपेटैत छल, जगदीशकेँ ओ जतेक आदर देलकन्हि, ततेक आइ धरि हुनका कियो कहाँ देने छलन्हि। जगदीश आ महेशकेँ ओ विश्वकर्मा कहऽ लागल छल, ओकर उच्चारण किछु तेहने सन रहै- भिस्वकरमा- मुदा सुनैत-सुनैत सभ आब ओकर भाषाक उच्चारण बुझऽ लागल रहथि। ओइ फिरंगीक कोनो संस्था चलै छलै, इटलीमे। आ ओइ इटलीबला संस्थाक एकटा शाखा छलै दिल्लीमे सेहो। ओ फिरंगी चाहै छल जे महेश आ जगदीश दुनू गोटेकेँ दिल्ली लऽ जाए आ ओतुक्का राजकाज हिनका दुनू गोटेकेँ दऽ दए। जगदीश तँ ओइ फिरंगी द्वारा देल आदरसँ अभिभूत भऽ गेल छला। महेशकेँ गामसँ बाहर पठेबाक पक्षमे ओ नै रहथि मुदा ऐ फिरंगीक गपकेँ काटब हुनकासँ सम्भव नै रहलन्हि। आब उनटे महेश दिल्ली जाइ लेल तैयार नै छल। कोनाकेँ ओ पिताकेँ छोड़ि कऽ जाएत। महेशकेँ लागै छलै जे ओकर पिता महेशक भविष्य वा ओइ फिरंगीक अहसानक बदलामे महेशकेँ दिल्ली पठेबा लेल तैयार भेल छथि, अपना मोने नै। मुदा ओ की करितए, बड़बरिया रॉयक भागिन जगदीशकेँ आबि बुझेबो केलन्हि जे महेशकेँ लग-पास दरभंगा-मधुबनी धरि पठाउ मुदा दिल्ली नै। मुदा जगदीश कहलन्हि जे आब तँ ओ गछि लेने छथि आ अहीं ने कहै छलौं जे हम महेशकेँ किए नै बाहर जाए दै छिऐ। आ बाहर तँ बाहरे होइ छै, से ओ दरभंगा-मधुबनी हुअए वा दिल्ली। फिरंगी तँ कोनो कलाकार छल, कलाक पारखी छल। गढ़ नारिकेलक दछिनबारि टोलक भोला पण्डित ऐठाम जाइए। चाक कोना चलैत अछि, चलैत की अछि, ई तँ बहैत अछि। चक्र सिद्धान्तपर भोला पण्डित गढ़ैत छथि। माटिक मुरुत आ मारिते रास बासन गढ़ैत छथि ओ। पृथ्वीक ब्रह्मा भोला पण्डित झोंकुआ आबामे पका कऽ बौस्तु बनबै छथि। मटकूड़, छाँछ, कौरना, कसतरा सँ लऽ कऽ अथरा आ मसल्लाक लेल लगजोड़ी धरि। लबनी, रीझम, सोबरना, भरुका, फुच्ची, तेलहण्डा, खोला, सिरहर, पुरहर, लगहर, अहिबातक पातिल, दीयठि, बौरकी सभ एकपर सँ एक। भोला पण्डितक हाथ लगला सन्ता कोनो बासन ने नोनिया कऽ झरत आ ने टुनकाह हएत। गढ़ नारिकेलक दछिनबारि टोलक सत्यनारायण यादवक कटियामे दूध दुहनाइसँ लऽ कऽ कुढ़ियामे दूध रखनाइ धरिक सभ लीला ओ फिरंगी देखैए। पाओ भरिक फुच्ची, तीन पाओक तिनपइ आ सेर भरिक चपइ, सभ अपन जरूरतिक हिसाबसँ दूध लऽ जाइ छथि, आ ओ फिरंगी सभटा वर्णन लिखि रहल अछि। गढ़ नारिकेलक दछिनबारि टोलक खतबे बासू चौपालक भार आ माँछ उघबासँ लऽ कऽ कहार बनि महफा उघबसँ रतुका रामलीलामे रावण बननाइ धरिक सभटा खिस्सा.. गढ़ नारिकेलक दछिनबारि टोलक चलित्तर साहू आ लड्डूलाल साहू, हलुआइ। तरौनीपर खोंइचा राखि मिठाइ बेचबासँ लऽ कऽ सीराकेँ गर्म करबाक क्रममे निकलैत फेनयुक्त काही मैलकेँ अलग केनाइ धरिक सभटा काज करै छथि। चिक्कसमे तेल माने मैन दऽ सानबासँ लऽ कऽ सीरामे डुबा कऽ पागब धरि सभ काजमे चलित्तरक जोड़ा नै। चाशनी कड़ा भेने मिठाइ रोड़ाह भऽ जाइए, लड्डूलालक संग ई बेशीकाल होइए। मुदा पाँच मधुरक पँचमेर लड्डूलाल बेशी बेचि लै छथि। मुदा चलित्तर जे चीनीक लड्डू माने सिरनीमे तिल फेँट कऽ गुलाब रेउड़ी बनबै छथि तकर जोड़ा नै। जमीनपर कोड़ि कऽ भमकौला चूल्हि बनबै छथि आ मधुर थकिया कऽ रद्दा लगबै छथि। गढ़ नारिकेलक दछिनबारि टोलक मुखदेव राम माने मोहन गबैय्या। मुइल मालक चाम माने मुरदारी लेल चमरखल्ला धरि सङरैठापर टाङि कऽ मालकेँ आनै छथि मुखदेव, फेर चाम खलै छथि। चामकेँ छूरीसँ बनछोलै छथि। मोम राखै छथि तिजमन माने बकरीक सिंघमे। सुग्गरक चमड़ासँ बनैबला जुत्ता पहीरि कऽ किछु वैदिक यज्ञक क्रिया कएल जाइ छलै- मोहन गबैय्याकेँ ओ फिरंगी कहै छन्हि। गढ़ नारिकेलक दछिनवरिया टोलक मोहन गबैय्यासँ सेहो भेँट होइ छन्हि ओइ फिरंगीकँ! पुरना गीत नै, बनौआ गीत गाबै छथि मोहन गबैय्या। गढ़ नारिकेलक शिवनारायण सूरीक दोकान; कलवार सीताराम चौधरी आ शिवनाथक गोला, लछमी दासक तूर आ सूतक काज; सत्यनारायण किओटक चौकीदारी; रामदेव भण्डारीक भानस; कपिलेश्वर राउत आ रामावतार राउतक पानक बरेब; बौधा मलिकक सुग्गर; दुखन महतोक सवा कट्ठाक तरकारीक बारी; मोहम्म्द शमशूलक तरकारीक व्यवसाय; अशोक ठाकुरक टुमटाम गहना; रामचन्द्र साव आ बौकू सावक कोल्हु; जीवछ मुखियाक पानिक विरुद्ध उठल हवासँ उठल नगदामे हेलब; मुसहर बिचकुन सदायक बिसाँढ़ खा कऽ जिअब; भगवानदत्त मण्डल आ अधिकलाल मण्डलक कृषि सम्बन्धी चमत्कार; कोरैल, बुधन आ डोमी साफीक कान्हपर लटकाओल बकुचा आ लतमारापर ठाढ़ भऽ पाटपर कपड़ा पटकब; जयराम, लक्ष्मी आ माले ठाकुरक नहरनीसँ कारी खून निकालब; जोगिन्दर ठाकुरक हर पालो; सभटा जानकारी लेलक ओ फिरंगी। गढ़ नारिकेलक दछिनबारि टोलक मोहन गबैय्याक गीत आ खिस्सा सेहो लिखै अछि फिरंगी.. कोसीक भित्तापर रानू सरदार अपन अस्सी मोनक कोदारि लऽ कऽ जकर बेंट बिरासी मोनक छै, चलि रहल अछि। चलि रहल अछि आगाँ आगाँ रानू सरदार आ कोसी लेल रस्ता बनबैए। गाममे कटनियाँ लगैए आ खेतमे भरना। धरमपुर कऽ तारलेँ माइ कोसिका कबखंड केँ बोरले सिंहेश्वर थान कइले पयान एतै दुख देलेँ हे माइ कोसिका एतै दुख देलेँ आरी चढ़ि रोबै छै किसान अखनी देबौ मैया पोसल पठिया चढ़तै अगहन दूध घर हे बखसुमे बखसु माइ कोसिका करै छी गोहार हे भारत सेवक समाज जड़ताकेँ मेटाओत? सभ नेता इंजीनियर सभ हो-हल्ला कऽ रहल छल। पूना मे कोनो प्रयोगशाला छै। कतेक पानि एतै, कतेक पाँक एतै सभटा ओ जानि लैए? भारतक सभ धारकेँ जोड़ि देत सरकार? मुदा पाइ छैहे नै सरकार लग। नेपालक सप्तरी जिलामे सेहो ढेर नोकसानी भेल छै। हिमालयमे बान्ह बनतै, तखन तँ आर झमेला हेतै। कोसीक पूब आ पच्छिम दिस नेपालसँ शुरू भऽ कऽ भारतमे बान्ह बनलै। मुदा कतौ जा कऽ तँ ई खतम भेलै, तकर बादक इलाका? आ दुनू बान्हक बीचक इलाकाक हाल? भारतमे भीमनगर बराज बनलासँ पुबरिया कोसी नहरि आ बीरपुर लग नेपालमे बराज बनलासँ पछबरिया कोसी नहरिक रूपरेखा बनलै। नेपालोमे कतेक गामक जमीन लेल गेलै। ओतुक्का जमीनक दाम भारत सरकार बेसी लगेलकै मुदा इन्द्रकान्त मिश्रक जमीनक दाम कम लगेलकै। आ से इन्द्रकान्त मिश्र बुझै छै जे राधामोहन रायक किरदानी छै। कांग्रेसी एम.एल.ए. माने पीअरे बच्चाक सरकार। कोनो बात नै, ई राधामोहन रॉय आ सत्यनारायण यादव मुखदेव आ जागेश्वरक कथाक प्रयोग हुनका विरुद्ध कऽ रहल छन्हि। छी तँ ई राधामोहन कांग्रेसीये। के विरोध करतै? सभ चीजक जवाब लेने ठाढ़ छै पूनाक प्रयोगशाला! मुदा मोहन गबैय्याक ज्ञानसँ बेशी ज्ञान छै ऐ पूना प्रयोगशालाकेँ? जोमक नाह सभसँ नीक। जिलेबी आ शीसोक नाह सेहो नीके होइए। हथियामे बर्खा भेने बाढ़ि अबै छै, अरदरामे पानि भेने कलकतिया आम पाकै छै। चहटी, आइसबर्ग जकाँ, बलान द्वारा आनल माटिसँ निर्मित होइए, कखनो डुमल गाछसँ ई सटि जाइए, कखनो ओनाहिते रहैए, कखनो देखा पड़ैए, कखनो नै। वेगसँ अबैत धार ऐसँ टकरा कऽ आर वेग पकड़ि लैए। नाह नै भेटलापर बाँस सभकेँ बान्हि कऽ बेड़, आ केराक थम्ह सभकेँ बान्हि कऽ गेरुलिया बना कऽ धारपार कएल जाइ छै। हौ, ई बलानक पानि मटिहौन छै, बर्खा भेलैहेँ ऊपर दिस। केसरिया गेरुआ रंग छै बलानक पानिक, तँ बर्फ पिघलि रहल छै हौ। साओन-भादवक इजोरिया पखमे नाहपर झिल्हरि खेलाइत लोक.. काटबै सामर हे सीकिया बेढ़बै गेरूलिया सासु जइबै हे नैहरबा ओइ चढ़ि ना एक चेहरि खेबलेँ रे मलहा दुइ चेहरि खेबलेँ तेसर चेहरि डूबलूँ भइया ते-ने-रे बहिनियाँ बाबा जे सुनतै रे मलहा धरती लोटि रे जएतै भइया जे सुनतै रे मलहा जाल बाँस रे खिरतै आमा जे सुनतै रे मलहा कोसी धँसि रे मरतै भौजो जे सुनतै रे मलहा भरि मुँह रे हँसतै। आब तँ जिनगी झिल्हरि खेला रहल छै। सीता अबै छथि, कमला धार पार करऽ चाहै छथि। मुदा मलाह कहै छन्हि जे हमरा इनाम चाही, आ इनामो की तँ सीताक ननदि। सीता कहै छथिन्ह, देलौं, भोग कर, युग-युग धरि। सीताक ननदि रहन्हि यौ? हौ, मिथिला नैहर छियन्हि सीता मैय्याक। मलाह एतबो हँसी ठट्ठा नै करत। गोढ़ि-मलाहक कमला पूजा। अंगनामे धूजा। देहपर कमला। पीड़ीपर पानक पात। मिथिलामे सभ मिलि जुलि कऽ रहैए। तखन ई कहबी किए छै यौ? भाइ भैयारी महिसी सिंघ जखने जन्मल तखने भीन आ ईहो कहबी किए छै? दियाद आ राहड़िक दालि जत्ते गलए तत्ते नीक हौ, जागेश्वर आ हमरा अंग्रेज पकड़ि कऽ लऽ जाए सकितै? अपने लोकक चलते ने हौ? कम्मे मुदा तेहेन लोक रहिते ने छै हौ, सभ कालमे आ सभ ठाम। …………………….. कांग्रेस १९५७ ई. क चुनावमे पीअर बच्चाकेँ टिकट नै देतै। मुखदेवकेँ बेशी दिन जेलमे रखबा लेल सरकार दुखी छलै, माफी मंगने छलै। अखबारमे कांग्रेसक मुख्यमंत्री कहि देने छलै। पीअर बच्चाक बड़का बेटा इन्द्रकान्त मिश्र तँ नै मुदा पीअर बच्चाक छोटका बेटा धीरेन्द्र सहमेलू अछि। बरबड़िया रॉयक हाथीकेँ वएह भगेने रहै। समाजसँ लागि छै धीरेन्द्रकेँ। मुदा घरक लोक ओकरा बुरबक कहै छै। -कहै छथि सत्यनारायण यादव। सत्ताइसम कल्लोल उत्तर दक्खिनसँ एलै नटनियाँ रे जान/ जान बैसि गेलै चनना बिरिछिया रे जान कोसीक उत्पात.. हँ मुखदेवक जेलसँ बाहर एबा धरि कोसीक बान्ह छेक करबाक गप शुरू भऽ गेलै.. धार सभक उत्पात आकि कोसी बान्हक उत्पात? पालघाट अधिवेशनक एक साल पहिने सभ फसिल खतम भऽ गेल छलै। इलाकाक धान-पान खतम। १९५६ ई. मे पालघाट अधिवेशन भेलै भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टीक। बड़का बहस भेलै। कम्यूनिस्ट पार्टी भारतक लोकतंत्रक एकटा पार्टी बनि गेल अछि, फेर कोन अन्तर रहलै ऐ पार्टीमे आ दोसर पार्टीमे। ओकर विचारधारा तँ वएह भऽ गेलै। मुदा बहस मोड़ लेलक, मोहन गबैय्याक समरसता बला गीत काज केलकै। आ पार्टी मानि लेलक जे भारत १९४७ ई. मे स्वतंत्र भऽ गेल छल। १५ अगस्त १९४७ क दस साल बाद पार्टी मानि लेलक जे भारत दस साल पहिने स्वतंत्र भऽ गेल! मोहन गबैय्या, हाइ रे हइ। घुरि एला मोहन गबैय्या गाम। कांग्रेस पीअर बच्चाकेँ १९५७ ई. मे बिहार विधान सभाक एम.एल.ए. बनबा लेल टिकट नै देलकै। राधामोहन रॉय कांग्रेस घुरि गेला आ पीअर बच्चा राजनीतिसँ संन्यास लऽ लेलन्हि। सत्यनारायण यादव समाजवादी पार्टीसँ टिकट लऽ कऽ ठाढ़ भेला। आ जीति गेला। आ मोहन गबैय्या १९५८ मे अमृतसर गेला। अधिवेशन शान्तिपूर्ण भेलै कम्यूनिस्ट पार्टीक; आ संसदीय रस्ता चुनलक समाजवाद लेल ई पार्टी। देखा चाही की होइ छै आगाँ आगाँ। घुरती काल रघुवरन आ मोहन गबैय्या केँ भेँट होइ छन्हि ढेर रास लोकसँ, ट्रेनमे बसमे। माने रस्तामे। -सभ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आ शूद्रमे दीप्ति भरि दियौ आ ओही दीप्तिसँ हमरो भरि दिअ। यजुर्वेदमे छै। -मुदा लोकक संस्कृतिक विषयमे तँ सेहो विवरण हेतै।– पुछै छथि मोहन गबैय्या। -ऋगवेदमे गीत, वाद्य आ नृत्यकलाक वर्णन अछि। सामूहिक नृत्यसँ उठैबला गर्दाक वर्णन ऋगवेदमे अछि। ऋगवेदमे लोकनृत्यक उल्लेख सेहो अछि। महाव्रत नाम्ना सोमयागमे दासी सभक सामूहिक नृत्यमे तीनसँ छह टा नर्तकी होइ छली। ऋगवेदक शांखायन ब्राह्मणक अनुसार गीत, वाद्य आ नृत्य ऐ तीनटा विधाक उल्लेख अछि। अहीमे वर्णित अछि जे विवाहमे चारिसँ आठ टा सोहागवतीकेँ सुरा पिआओल जाइ छल आ चतुर्वार नृत्यक लेल प्रेरित कएल जाइ छल। वैदिक साहित्यमे वधु द्वारा विवाह विधिमे गायनक उल्लेख अछि। ऐतरेय ब्राह्मणमे नृत्य, गीत आ वादनक गणना दैवी शिल्पमे अछि, जइसँ यजमानक व्यक्तित्व सुसंस्कृत भऽ जाइ छलै। अथर्ववेदमे वसा नाम्ना देवताक नृत्यक वर्णन अछि, ऋक्, साम आ गाथासँ सम्बन्धित। -गाथासँ। -हँ गाथासँ, नाराशंसीसँ। सोमपानक ऐ नृत्यमे प्रयोग होइ छल आ गन्धर्व सेहो ऐमे सहभागी होइ छला। अथर्ववेदमे गीत, वाद्य आ नृत्यक सम्मिलित ध्वनिक प्रयोग होइ छल। वैदिक कालमे साम संगीतक अलाबे गाथा आ नाराशंसी नाम्ना लौकिक कथा-संगीतक प्रयोग सेहो होइ छल। सीमन्तोन्नयन विधिमे पति वीणावादककेँ सोमदेवक सम्बन्धमे वादनयुक्त गान लेल प्रेरित करैत अछि। नवोदित उषाक स्वर्णिम आभाकेँ देखि कऽ वैदिक ऋषिकेँ सजल-धजल ऋषिक अनुभव होइ छन्हि। सभटा नटकिया सभ। -रघुवरन, वैदिक साहित्यमे नाटकक कोनो चर्चा छै? -चर्चा छै। यजुर्वेदमे नाटकक किछु पारिभाषिक शब्द जेना सूत, शैलूष, चित्रकारिणीक प्रयोगसँ लगैए जे नाट्यमंडपक कल्पना छल। -अच्छा। मुदा ऐसँ लगैए जे वेदमे सामान्य जन उपयोगी आ निरपेक्ष साहित्य छल। -हँ, से तँ छल। -फेर कट्टरता कतऽसँ आएल। वेद प्रमाण, वेद प्रमाण किए करैत रहै छलथि इन्द्रकान्त मिश्रक पिता पीअर बच्चा। जखने कोनो गप उठबै छी तँ वेदं प्रमाणम्!! -मन्त्रार्थमे महर्षि पतंजलिक वैज्ञानिक मन्तव्य “यच्छब्द आह तदस्माकं प्रमाणम्” अर्थात् जे शब्द आकि मंत्रक पद कहैए, सएह हमरा हेतु प्रमाण अछि- एकर अर्थ बादमे जा कऽ वेदे प्रमाण अछि- से कोना भेल से नै जानि। रघुवरन चुप भऽ अकास दिस ताकऽ लगै छथि। सभटा नटकिया सभ। रघुवरन, हमरा ई बता दिअ जे वंचितक संग सभ किए छोड़ि देलक, जयप्रकाश नारायण बिड़लाक संगी बनि गेला आ मीनू मसानी टाटाक। श्रीकृष्ण सिंह बिहारक राजा बनि गेला आ अचुत् पटवर्धन बनारसमे स्कूलक मालिक? सभटा नटकिया सभ। रघुवरन चुप भऽ अकास दिस ताकऽ लगै छथि। -हँ संसद देखलिऐ दिल्लीमे, पटनाक विधानसभा ओकर पासंगो नै छै। एम.एल.ए. साहेब जे पेरोलपर जेलसँ छुटि कऽ आएल छथि, सेहो अभियन्ता लोकनिकेँ यएह गप कहि रहल छथि। ट्रेनेमे। -रघुवरन जी, पृथ्वी पश्चिमसँ पूर्वक अलाबे सूर्यक चारूकात सेहो घुमैत अछि जइ कारण विभिन्न ऋतुमे विभिन्न तरेगणक मण्डल देखल जाइत अछि। ई हम सभ अकासकेँ देखि कऽ बुझै छी। मुदा पोथी पढ़ि कऽ छाहकेँ, ग्रहणकेँ पवित्र-अपवित्रक खेल कोना बना देल गेल? ओइ पोथीकेँ पढ़ि कऽ की फाएदा? -कोनो फाएदा नै। किछु कट्टर तत्त्वक कारण शिक्षामे दोष आएल। एकटा स्टेशनपर किछु फैक्ट्रीक मजदूर सभ चढ़ल। -फैक्ट्रीमे निअम छै कान जाम करैबला मशीन धऽ कऽ जाउ। -नेता जी तूर-तेल यौ। -मोहन बिच्चेमे टोकारा दै छथि। -तूर नै यौ, ई निकहा होइ छै। सभ शानसँ रहै छै। ड्रेसबला स्कूलमे कहियो नै पढ़ने छै एको गोटे, मुदा ड्रेस पहीर कऽ नोकरी करै छै यौ। -अच्छा। एकटा स्टेशनपर घुमन्तु सभ चढ़ैए। -गिदरमाराक अलग भाषा होइ छै हौ, लोक सभ ओकरा सभकेँ गिदरमारा आ मगहिया डोम कहै छै मुदा ओ सभ अपनाकेँ बंजारा कहैए, अपन भाषाकेँ बंजारा भाषा कहैए। मुँहपर गिदरमारा कहि कऽ देखियौ, झगड़े कऽ लेत। .. निर्मल पाइ रो टो टो… मोन पड़ि गेलन्हि मोहनकेँ, सुखेँतक बंजाराक गीत, ओ गीत जे ओ सभ गओने रहथि गढ़ नारिकेलक इनार सभक उद्घाटन काल। पहिने बनिजार लेल यएह सभ टा अबै जाइ छला। सुखेँतसँ ओ सभ आएल रहथि गढ़ नारिकेल। झंझारपुर बजारक मारवाड़ी सभ बंजारा सभसँ ओकर भाषामे बाजि लैए। दुनू समाज राजस्थानसँ मिथिला आएल। मारवाड़ी सभसँ धनीक भऽ गेल आ बंजारा सभसँ गरीब भऽ गेल आ बनिजार छोड़ि गिदरमारा बनि गेल, से केना? पुरुख सभ सामान्य मुदा स्त्रीगण सभ बड्ड लहक-चहक चोली, घघरा, गहना सभ पहिरै जाइए। जेना मारवाड़ी सभ अपन भाषा बाजैए, सतार सभ संथाली बाजैए, तहिना ई बंजारा सभ अपन भाषा बजैए। मुदा ई बंजारा सभ अलग होइए। सिमरा लग बड़का टेण्टबला बस्ती छै बंजारा सभक, सुखेंतमे। बनैए उजरैए। जखन ओ सभ अबै छलथि तँ कुकुर, बड़का कानबला बकड़ी- बागड़ि, मुर्गा, घोड़ा, गदहा; बड़का-बड़का हँसिया आ लग्गा; चुल्हा बनबैले ईँटा, बड़का टोपिया, सभटा अनैत रहथि। खीर जे बनबै छै ओ सभ से अद्भुते। घेंघीक पितियौत दियादनीक गोदना गोदने रहए नट्टिन सभ। नट्टिन सभ सातगो नौ गो सुइया बान्हि कऽ बच्चाक माएक दूध गारि कऽ ओइमे कारी मिला कऽ गोदना गोदै छलि, बड्ड दुखाइ.. खोधपाड़नी गीत गबैत सौँसे गोधऽ लगलै.. उत्तर दक्खिनसँ एलै नटनियाँ रे जान जान बैसि गेलै चनना बिरिछिया रे जान झिहरि झिहरि वसय शीतल बतसिया रे जान जान घरसँ बहार भेली सुन्दरि पुतोहुआ रे जान निहुरि निहुरि झारय नामी नामी केशिया रे जान जान पड़ि गेल नटिन मुख दिठिया रे जान मैया बैसल सासु बरैतिन रे जान जान दिअ सासु कोसल कौड़िया रे जान हर फार जोइत अएला प्रभु पहसल अंगनमा रे जान जान बैसि गेल देहरि झमाय रे जान सभकेँ तिरिअबा अमा देखिऐ अंगनमा रे जान जान हमर तिरिया कतए चलि गेली रे जान तोहर तिरिया गोदना विरोगल रे जान जान चलि गेल नटवा सिरिकिया रे जान पीसू अम्मा झिलमिल सतुआ रे जान जान हम जाएब धनिक उदेसबा रे जान एक कोस गेला प्रभु दोसर कोस गेला रे जान जान तेसर कोस नटवा सिरिकिया रे जान कतए गेली किए भेली नटिनी रे जान जान सुन्दरि जोगे गोदना गोदह रे जान गोदना गोदाइ भैया किए देब दनमा रे जान जान गोदना गोदाइ छोट सरहोजिये रे जान हे एकटा गीतमे नै ने गोधऽ देलक, बड्ड दुलारू.., उचिते किने.. आ दोसर गीत शुरू भऽ गेलै… अङना बहारैत सुनरी पुतहुआ रे जान पड़ि गेलै नटनिये मुख दीठि रे जान जान कहाँ गेलै किए गेलै सासु बरैतिनि रे जान दियौ सासु गोदनाक कौड़िया रे जान जान हम नै जनियौ पुतहु गोदनीक कौड़िया रे जान पुछू गऽ अपन गोतिनियाँ रे जान जान कहाँ गेली किए गेली गोतनी बरैतिन रे जान दियौ गोतनी गोदनाक कौड़िया रे जान जान हम नै जनियौ गोतनी गोदनाक रे जान कौड़िया पुछ गे अपन भैंसुरे रे जान जान हम कोना पुछबै गोतनी भैंसुरे बरैतवा रे जान कहाँ गेली किए भेली छोटकी ननदिया रे जान जान पुछू गे छोटका भैया गोदनाक कौड़िया रे जान हम नै जनियौ भौजी गोदनाक कौड़िया रे जान जान अपनहि पुछि लेहु अपन भतरवा रे जान हम कोना पुछब अपन भतरवा रे जान जान हमहूँ जेबै ननदी नटिनियेक सधवा रे जान कहाँ गेलैं किए भेलैं छोटका दियरबा रे जान जान तोरो छाती जाइ छौ नटिनीक उदेशवा रे जान हम नै जनलियौ भौजी तोहूँ सभ हेबेँ मुद्दैया रे जान जान कहाँ गेलैं किए गेलैं हमरो धनियाँ रे जान लियौ ओहे धनि गोदनाक कौड़िया रे जान जान जनि जैयो नटिनी के देशवा रे जान बंजारा सभ ऐ विश्वकेँ नीक आ खराप द्वारा संचालित मानै छथि। बंजारा सभ अपनामे बंजारा भाषामे आ मोहनसँ मैथिलीमे गप्प करैए। मोहन बंजारा सभक बोली बाजऽ चाहै छथि, मुदा हुनकर उच्चारण सुनि कऽ बंजारा सभ हँसऽ लगैए। गढ़नारिकेलमे ई सभ अबिते रहै छथि। टेण्ट खसबै छलथि पहिने ओ सभ, सिमरा लग सुखेँतमे टेण्टबला बस्ती रहै। बनै उजरै। नग्र सभमे कंगला-भिखमंगाक मोहल्ला बसि गेल छै, ऐ मोहल्लामे जाति-पाति नै छै। सतार सभ मधेपुरसँ पूब दक्षिण दुआलकक दक्खिन करहरामे आ टढ़ियामे रहैए। तीर-धनुषमे माहिर संथाल सभ। संथाल वा सतार। ओ सभ कोना आबि गेल मिथिला। सुनू खिस्सा.. ओ सभ दू दिस चारबला घर बंगला ओड़ाक, आ चारि दिस चारबला घर चातोम ओड़ाक मे रहै छथि। हिहिड़ी-पिपड़ी हुनकर सभक जनक आ चाय-चम्पा जन्म स्थल छियन्हि। एक बेर बाँसकरिल अनबाले किछु संथाल युवती गेली, ओइमे सँ एकटा कुमारि गढुआरि छली, ओतै एकटा बौआक जन्म भेलै, ओकरा ओ पातसँ झाँपि देलन्हि। राजा किस्कू जखन शिकार लेल गेल तँ ओइ बच्चाकेँ आनि लेलक आ नाम राखलक माधो सिंह। आब ओ बच्चा पैघ भेल तँ ओकरासँ बियाह के करत? बिटलाहा माने जातिसँ बहिष्कृत अछि ओ? ओ बाजल- जँ कियो अपन बेटी नै देत तँ ओ अपनहियेसँ ककरोसँ बियाह कऽ लेत। ओकरा डरे संथाल सभ विभिन्न दिशामे भागि गेला। आ मिथिलोमे एला। आ फेर स्त्री-पुरुख वसन्त एलापर वएह गीत फेरसँ गाबऽ लागै गेला। स्त्री: गुलाब फुला गेल चम्पा फुला गेल पवन माँति रहल मुदा तूँ कोन सुगन्ध सूंघि कऽ माँतल छँ रे पुरुष: जकर सुगन्धिक समुद्रमे हमर जिनगी हेलि रहल अछि ओ हमर रातिक रानी पूछि रहल छथि- ई सुगन्ध ककर? मोन डरा जाइत अछि जे अदहा रातिक बाद रातिक रानी सन झहड़ि तँ नै जाएब? स्त्री: प्रीत कऽ कए बताह नै बनू प्रीत अछि नागफेनीक बिछौन अट्ठाइसम कल्लोल कटबै सोना सुतरिया बिनबै झुमरि जाल हे सौँसे दरारि फाटल, बरखाक कोनो आस नै। गढ़ नारिकेलक मुसहर बिचकुन सदाय। पोखरि सुखाएल, थलथल करैत दलदली भूमिसँ बिसाँढ़ कोरि-कोरि कऽ मुसहर सभ खाइ छथि। अकालमे जखन सभटा पोखरि, गड़खै सुखा जाइए तखनो ई डकही पोखरि मुदा नै सुखाइए। भारतक महिला प्रधानमंत्री आएल रहथि तँ हुनका देखेने रहन्हि सभ, जे कोना एतऽसँ बिसाँढ़ कोड़ि कऽ मुसहर सभ खाइ छथि आ ऐ अकालोमे जीवित छथि। इम्हर धार सभक ऊपरमे बान्ह बनि रहल छल आ बाढ़िक नव रूप सोझाँमे आबि रहल छल, तीनिये साल पहिने तँ… बड़का कोला, धूरपर, भोरहा आ पुर्णाहा बाधक अतिरिक्त आइ काल्हि किछु गोटे छहरक ढलानपर सीढ़ी बना कऽ सेहो खेती-बारी शुरु कऽ देने छथि, सीढ़ी बना कऽ खेती केनिहारक विषयमे भूगोलक पोथीमे भलहि ई पहाड़पर मात्र देखाएल गेल अछि, एतऽ धारपर बनाएल ऐ कृत्रिम पहाड़ सभपर सेहो ऐ तरहक खेती शुरू भेल अछि ! आ आब ई अकाल। लिअ अहाँ बान्ह-छहर बनाउ, बर्खामे धारकेँ रोकबा लेल आ इम्हर बर्खे बन्न भऽ जाएत। पछिले साल जमाहिरलालक बेटी अमेरिका गेल रहथि, ओत्तौ अपने देश जकाँ वोट-तोट होइ छै आ सरकार चुनल जाइ छै। मुदा रूस तँ सुनै छिऐ गरिबहा लेल बड्ड नीक देश छै। तखन जमाहिरलालक बेटी किए गेली अमेरिका? आ जमाहिरलालक बेटी रूस सेहो गेली, अमेरिकासँ घुरलाक किछु दिनुका बाद। बादमे ओ वियतनामपर बम खसेबा लेल अमेरिकाक विरोध सेहो केलन्हि। अमेरिका भारतक वियतनाम नीतिपर तामसमे छल आ भारतकेँ अन्नक छोट-छोट खेप पठा कऽ अपमानित करै छल। तैँ लिअ ई अकाल आबि गेल। धुर, तँ तइसँ पहिने जे बाढ़ि आएल रहै से... तैयो अकालसँ बाबू बाढ़िये नीक... हँ अखन अकाल छै तेँ एना लगैए... बाढ़ि आएत तखन अकाले नीक लागत। कथी बिनु आ हे कोसिका मुँहमा मलिन भेल कथी हे बिनु गुरमै शरीर पान बिनु आ हो सेवक मुँहमा मलिन भेलै मधुर हो बिनु गुरमै शरीर पान हो खेलियै सेवक मुँहमा रंगेलियै हो लडु जे देलै रे मलहा हिया जुड़ाएल पाठी हो बिनु डोलैए शरीर कर जोड़ि मिनती करै छी मैया कोसिका देबौ गे मैया पाठी कऽ भोगार बेरिया पड़लै गे मैया सुनहि गोहारि गरू बेर होहि नै सहाय ऐ सभ स्थितिमे चुनाव भेल आ कोनो राजनैतिक दलकेँ अपना बलपर राज्य करबाक अवसर नै भेटलै। सभ मिलि कऽ सरकार बनेलक आ परीक्षामे चोरिक, प्रशासनमे बेइमानीक प्रारम्भ भेल। सन् १९६७ तेसर बर्ख भेल, बर्खा नहियेक बराबर। गर्जन-तर्जन भेल मुदा लगैए मेघमे पानि रहबे नै करै। इम्हर खेती खतम भेल आ उम्हर महगीकेँ नै पुछू। १९६२ ई. मे भारत चीनसँ हारल आ १९६५ ई. मे पकिस्तानसँ तेना भऽ कऽ नै जीतल। मुदा ई तीन बर्ख... बाढ़िमे दहेलाक बादक रौदी। कमला-कमला सुनै छलौं कमला बड़ दूर हेऽऽ गहबर पहसैत कमला भए गेल कसहूर हे, अन देलौं धन देलौं लक्ष्मी बहुत हे एकेटा जे माइ बिनु लागै यऽ सुन हे। कोयल-कोयला सुनै छलौं कोयला बड़ी दूर हेऽऽ गोबर पहसैते कोयला भऽ गेल मसहूर हे अन देलौं धन देलौं लक्ष्मी बहुत हे जे भातिज बिनु लागै यऽ सुन हे कोयला-कोयला.....। मातैर-मातैर सुनै छलौं मातैर बड़ी दूर हे अन देलौं धन देलौं, लक्ष्मी बहुत हे एकेटा जे स्वमी बिनु लागै यऽ सुन हे मातैर-मातैर.....। ससिया-ससिया सुनै छलौं, ससिया बड़ी दूर हे अन देलौं धन देलौं, लक्ष्मी बहुत हे एकेटा जे बालक बिनु लागै यऽ सुन हे कमला-कमला......। बिताइ ठाकुरक विवाह छै। ऐ अकाल समएमे। हौ बाबू... सोनारेक तँ चलती छै। सभ गहना-गुड़िया बन्हकी लागल छै लोकक... मुदा बरियाती किए नै बहराएल छै... …हौ बाबू.. तारा निकलतै तखन ने सोनारा बहरेतै, बुझले तँ छहु फकरा। चलै चलू, चलै चलू। दू साँझक भोजक इन्तजाम भेल ऐ अकालमे। मुदा काल्हि बियाह छै तँ आइये किए बरियाती बहराइ छै यौ। हौ बाबू... कोनो कोठिया-पट्टीटोलमे कुटमैती हेतै। ..तँ कत्तऽ हेतै यौ .. …औ बाबू... वएह रानीगंज पहसारा.. कत्तऽ हौ... खुएतै ने कसि कऽ। ..हँ से तँ बुझाइए। जे कन्यागत आएल अछि से सुखितगर लगैए। कमला मैया बसत बड़ी दूर गमक लागे गेंदा फूल कथी डालि लोरहब बेली-चमेली कथी डालि लोरहब अरहूल हे गमक लागे गेंदा फूल कमला मैया..... किनका चढ़ाएब बेली-चमेली किनका चढ़ाएब अरहूल गमक लागे गेंदा फूल कमला चढ़ाएब बेली-चमेली कोयला चढ़ाएब अरहूल, गमक लागे गेंदा फूल हे कमला...किनका सँ मांगब अन-धन सोनमा किनकासँ मांगब सोहाग गे, सोहाग गे मलहिनयाँ देखै मे फूल वर लाल हे ससिया सँ मांगब अन-धन सोनमा मातैर सँ मांगब सोहाग गे मलहिनयाँ देखै मे फूल वर लाल....। दरारि फाटल धरतीक ओर-छोड़ नै देखबामे अबै अछि। इनार सभमे सँ अधिकांश सुखा गेल छै। रस्ताक पोखड़ि सभ सेहो लजबिज्जीक गाछ जकाँ घोंकचि गेल छै। मुदा पहसारामे तँ अजबे लीला छै। खाद-यूरियाक चर्चा छै। ई नलकूप की होइ छै हौ, वएह करिनाल, वएह इनार.. नै हौ, कोनो हरियरका क्रान्तिक चर्चा होइ छै औ।... रौ पातपर जे हरियर माँछ सभ पड़ल छौ, सएह ने हरियरका क्रान्ति भेलै रौ। ... नै रौ, कहै जाइ छै जे बान्ह बान्हि कऽ धार रोकतै, बाढ़ि रोकतै आ नलकूप गारि कऽ बर्खा नै भेलापर पटौनी करतै।... धुर, कत्तऽ छेँ? दू साल पहिने जे बाढ़ि एलै देखलहीं नै। कमला मैयाकेँ सम्हारि सकलै बान्ह। ...पहिने बाढ़ि आबै तँ पसरि जाइ छलै।.. आब बान्हक बीचमे पानि भरल रहै छै, फाटक देने पोखरि सभ, बाड़ी सभ पानिसँ भरि जाइ छै। पानि हटलापर बालु सभ चमकऽ लगै छै। रौ ई पहसारा ने कोसिकन्हा छलै, आब ई ठीक भऽ गेलै मुदा आब तँ अपन गाम कोसिकन्हा बनि गेलौ। ...कत्तऽ छेँ, ई हरियरी सोझाँमे छौ तकर स्वाद ले ने। किनका बाड़ी रोपबै कोसी माइ एली फूल चमेलिया हे किनका हे बाड़ी कोसी माइ अढ़हुल फूल हे बाबा बाड़ी रोपबै कोसी माइ एली फूल चमेलिया हे भइया बाड़ी रोपबै कोसी माइ अढ़हुल फूल हे कौने डाला तोरब कोसी माइ एली फूल चमेलिया हे हे मैया कौने हे डाला तोड़ब अढ़हुल फूल हे सोने डाला तोरब कोसी माइ एली फूल चमेलिया हे रुपा हे डाला तोड़बै कोसी माइ अढ़हुल फूल हे कोन सूत गूथब हे कोसी माइ एली फूल चमेलिया हे हे मैया कौन सूत गूथबै अढ़हुल फूल हे लाले सूता गूथब हे कोसी माइ एली फूल चमेलिया हे हे मैया पीअर सूतकोसी माइ गूथबै अढ़हुल फूल हे। लखनदेइक पूबमे बान्ह, पश्चिम ओहिना खुला, कहियो कोनो जमीन्दार एकरा बनेने रहै वा लोक सभ अपने बनेने रहै आ जमीन्दार तकर यश लऽ लेलकै। १९६० ई. सँ लोक सभ ओइपर माटि देबऽ लगलै, १९६७ ई. मे सरकार सेहो ऐ मे सहायता देलक। अंग्रेज इन्जीनीयर सभ पैघ बान्हक पक्षमे नै रहथि मुदा स्वतंत्रताक बाद गुलजारी लाल नन्दा घोंघड़डीहामे आबि कैम्प लगा देलन्हि। राजेन्द्र प्रसाद सेहो पहिने ऐ बान्ह सभक विरोधमे रहथि मुदा ओहो ऐ बान्हक पक्षमे बादमे भाषण देमऽ लगला। मोहनक गीत सुनैत सुनैत आबि गेलै रानीगंज पहसाराक बरियात भोज। गेनहारी साग सोझाँ छै, आ कटहरक बड़ सेहो। आ बहस से चलि रहल छै। रानीगंज पहसारा सभक लोक लेल तँ जिनगी स्वर्ग भऽ गेलै। कोसीक बाढ़ि एकदम्मे बन्न भऽ गेलै। मुदा एम्हरो कने आर आगाँ सर-कुटुमक गाम दिस से भाग नै भेल। महानन्दाक बारसोइ शाखाकेँ गहींर आ चाकर कएल जा सकै छल, मुदा से नै कएल गेल। गंगापर काढ़ा गोला बान्ह, कुरसेला-जौनिया-बरण्डी बान्ह, बरण्डी नदीक दुनू कात बनल बान्ह। कारी कोसी नदीक पूब कात बान्ह। कारी कोसीक पश्चिमी तटपर बान्हकेँ आगाँ काढ़ागोला बान्हसँ मिलेबाक लेल बान्हपर स्थानीय लोक आन्दोलन करैबला छथि। महानन्दाक पश्चिमी तटपर खाजा हाटसँ चौकिया पहाड़पुर तक, जतऽ महानन्दा गंगासँ मिलैए, एकटा बान्ह छल। महानन्दाक पूबमे बागडोबसँ दिल्ली दीवानगंज धरि बान्ह, महानन्दाक बारसोइ शाखापर बागडोबसँ कुशीदह धरि बान्ह, गंगाक उत्तर चौकिया पहाड़पुरसँ टोपरा धरि बान्ह। कटबै सोना सुतरिया बिनबै झुमरि जाल हे जाल फरि-फरि कमला एलखिन सन-झुन लागै गोहबरिया कहाँ गेली परलोभिया सेवक सुन लगै गोहबरिया हेऽऽ कटबै सोना सुतरिया बिनबै झुमरि जाल हे जाल फरि-फरि गांगो एलखिन रून-झुन लगै गोहबरिया हे कहाँ गेली परलोभिया सेवक, सुन लगै गोहबरिया हे कटबै सोना सुतरिया बिनबै झुमरि जाल हे जाल फरि-फरि मातैर एलखिन रून-झुन लगै गोहबरिया हे कहाँ गेली परलोभिया सेवक सुन लगै गोहबरिया हे कटबै सोना सुतरिया बिनबै झुमरि जाल हे बिनबै झुमरि जाल हे। नहरि धरातलक स्लोपक अनुसारे बनाओल नै जाइए। कच्ची बान्ह सभकेँ तोड़ि कऽ हटा देल जाए आ पक्की बान्हकेँ गाड़ी चलबा योग्य बनाओल जाए, बान्हक दुनू कात पर्याप्त गाछ-वृक्ष लगाओल जाए। स्थानीय गबैय्या छितन ई बाजि रहल छथि। स्थानीय गबैय्या छितन आ मोहन गबैय्याक सुरताल… कमला नदीपर १९६० ई. मे जयनगरसँ झंझारपुर धरि छहरक निर्माण भेल आ ऐसँ सम्पूर्ण क्षेत्रक विनाशलीलाक प्रारम्भ सेहो भऽ गेल, १९६५ ई. सँ छहरक बीचमे रेत एतेक भरि गेल जे एकर ऊँचाइ बढ़ेबाक आवश्यकता भऽ गेल आ ई माँग शुरू भऽ गेल जे छहरकेँ तोड़ि देल जाए ! - मोहन गबैय्या ई सूचना दै छथि। जग मग जग मग ज्योति जलै मंदिरमे देखियौ कमला के श्रृंगर कमला के लट मे तेल सोभे हुनका सेंदुर के अधिकार जग मग जलै मंदिर मे देखियौ मातैर के नाक मे नथिया सोभे हुनका झुमका के अधिकार जग मग जलै मंदिर मे ससिया के मांग मे टिका सोभे हुनका होसली के अधिकार जग मग जग मग ज्योति जलै मंदिर मे कमला श्रृंगार.....। झंझारपुरसँ आगाँक क्षेत्रक की हाल भेल, कारण बान्ह एतऽ खतम भेल आ पानि एकबैग छिरिया गेल, आ सम्पूर्ण क्षेत्र द्वीप बनि गेल। सएह इम्हर रानीगंज पहसारासँ आगाँ सेहो हएत। देखैत रहू आगाँ-आगाँ। एक्केटा कोसी बान्ह थोड़बे अछि, ई बान्ह सभ सेहो बान्ह-छहर बनि जाएत। ऊँच करैत रहू बान्हकेँ, दुनू बान्हक बीच रेत भरैत रहत। आ बान्ह कतऽ जा कऽ अन्त करबै? धारक दुनू काते गंगा धरि बान्हकेँ लऽ जेबै? गाम सभकेँ रिंग बान्हसँ बान्हबै? तखन पुरनका छोटका बान्हपर घुरलौं ने! बड़का बान्ह सभक बीचक गामक की हाल हेतै से बुझल अछि? सगर परबत से नाम्हल कोसिका माता भोटी मुख कयले पयाम आगू आगू कोइला वीर धसना खभारल पाछू पाछू कोसिका उमरल जाए नाम्ही नाम्ही आछर लिखले गंगा माता दिहलनि कोसी जी कऽ हाथ सात रात दिन झड़ी नमावल चरहल चनन केर गाछ यै चानन छेबि छेबि बेड़ बनाबल भोटी मुख देव चढ़ि आइ यै गहिरी से लदिया देखहुँ भेयाओन तहाँ देल झौआ लगाए रोहुआक मूरा चढ़ि हेरए कोसिका केती दूर आबै छै बलान मार-मार कऽ घर बहिये गेल कामरू चलल घहराय पोखरि गहींर भौरए माता कोसिका कमलाकेँ देल उपदेस माछ काछु सभ उसरे लौटाबए पसर चरए धेनु गाय गाबि जगत कऽ लोक कल जोड़ि आजु मइया एबु ने सहाय गढ़ नारिकेल सेहो आबि रहल अछि दुनू बड़का बान्हक बीच, दुनू बड़का की चारू बड़का! कमलाक पूबक पूब आ कोसीक पच्छिमक पच्छिम? कमला जे पुछे छै सुन बहिन कोसिका हे केहेन छथिन रानू सरदार हे भैंसा सन मनुख गे बहिनो बजर सन गात हे मोँछ रानू कऽ बहिंगा सन सन आब हे कोसिका जे पूछै सुन बहिन कमला हे केहन छै कोइला देव आब हे ताड़ सन मनुख गे बहिना बजर सन गात हे मोंछ जइसन भमरा गुलजार हे गाड़ल जे खुटबा से कोइला देव जाल जे पसारल हे भीत चढ़ि भऽ गेल ठाढ़ हे कोसीक प्रेमी बाँतर जातिक लोक देवता रानू सरदार। रानू सरदार अस्सी मोनक कोदारि लऽ कऽ जकर बेंट बिरासी मोनक छै, आगाँ आगाँ कोसी लेल रस्ता बनबैए। आ कोसीक प्रेमी रैय्या रणपाल। उत्तर दिशासँ अबैए रणपाल आ कोसीकेँ देखि कऽ मुग्ध भऽ जाइए। झिमला मल्लाह आ बैदला चमार सेहो कोसीसँ बियाह करऽ चाहैए। हमेँ तोरा पुछियौ रे बैदला जतिया तँ ठेकान रे तोहूँ मांगे हमरो सँ बियाह रे हमहूँ जे छिकियै गे कोसिका ओइछ जाति चमार हे हमेँ मांगियौ तोरे सँ बियाह हे कथी ले खियोलियौ रे बैदला दूध भात कटोरबा रे पोइस-पाइल केलियौ जबान रे तोहूँ जे केलेँ रे बैदला जातियो कुल हरण रे कोसीपर एकटा राक्षस सेहो मुग्ध भेल रहए। कोसी डेरा गेली मुदा राक्षसकेँ कहलखिन्ह जे ओ जँ राति भरिमे हिमालयसँ गंगा धरि कोसीक दुनू कात बान्ह बना दिअए आ तकर दुनू दिस सगरे पोखरि खुनि दिअए तखने ओ ओकर वशमे एती। राक्षस शुरू भऽ गेल बान्ह बन्हबामे, अदहा रातिक बाद कोसी डेरा गेली जे ई रकछसबा तँ हमरा वशमे कऽ लेत। महादेव लग गेली कोसी। ओ महादेव मुर्गा बनि कुकड़ू-कू करऽ लगला, राक्षस डेरा गेल जे भोर भऽ गेल आ भागि गेल। कोसी प्रसन्न भऽ मयूर सभकेँ मारऽ लगली आ ओइ राक्षसक अपूर्ण बान्ह सुपौल शिवनगरक राक्षसक अपूर्ण वीर बान्हक बगलक पोखरि मयूरनी खत्तामे फेकऽ लगली। बचल मयूरनी सभ कोसीकेँ नाच देखेबाक लालच देलन्हि, तखन कोसी सभ मयूरकेँ जिआ देलन्हि आ बचल राति भरि ओकर सभक नाच देखलन्हि। एक कोस गेलै हे कोसी माइ दुइ कोस गेलै हे तेसर कोस बिजुबन सिकार हे बघबो नै मारै हे कोसी माइ हरिणो नै मारै हे चुनि-चुनि मारै छै मजूर हे सात सय मजुरबा हे कोसी माइ मारि एलै हे सात सय मजूरनी केलें राँड़ हे हकन कानै छै कोसी माइ बन कऽ मजूरनी कोसी मैया बारी बेस हरले सिन्दूर नै हम खेलियौ कोसी मैया खेत खरिहनमा नै हम केलियौ लछ अपराध बखसु बखसियौ कोसी माइ सिर कऽ सिन्दूरिया मैया बखसि दियौ सिर के सिन्दूर जब तोरा हम बखसबो सिर कऽ सिन्दुरिया हमरा की देबे इनाम मजूरनी जब तुअ बखसबे कोसी माइ सिर कऽ सिन्दूरिया भरि राति नाचब देबौ देखाय राति नाचब देखायब हएत भिनसरबा बोलिया देबौ सुनाय चुटकी बजाय कोसी माइ मजूर के जियाबै खुसी गे भैलो मैया बन कऽ मजुरनी भरि राति आगे मजुरनी नचबा देखाबै हएत भिनसरबा बोलिया देय सुनाय गाबल सेवक जन दुहु कल जोड़ि बिपति कऽ बेरिया मैया होहु ने सहाय। मिथिलाक राजा हरसिंहदेव कोसीकेँ बन्हबाक प्रयास केने रहथि, हुनकर मंत्री वीरेश्वर ओइ वीर बान्हकेँ पूरा नै कऽ सकलाह, बिच्चेमे एकटा आक्रमण भऽ गेल, दिल्लीक सुल्तान घियासुद्दीन तुगलक एलथि आ मिथिलाक राजा हरसिंहदेवकेँ हरेने रहथि आ ई कार्य बन्न भऽ गेल छल। हरसिंहदेव चलि गेल रहथि उतरबरिया बोनमे। कोसी देवन ऋषिक बेटी रहथि, एक बेर पूजा सामग्रीमे केस चलि गेलापर ऋषि हुनका धार बनि बहऽ लगबाक स्राप दऽ देलन्हि। देवना डीह ओही ऋषिक आश्रम छल। कोसी बान्ह नै मानै छथि, वशमे नै आबै छथि, कारण कुमारि छथि। से लोक हुनकापर सिनूर फेकैए, ओ डेरा कऽ पाछू हटि जाइ छथि। लोकक डीह कटनियाँमे बचि जाइए। बाढ़िक बादक ई अकाल। कोन मुलुक से एलै मोगलबा बान्हि जे देलकै कमला माइ कऽ धार एहेन बान्ह जे बान्हलेँ रे मोगलबा सिकियो ने मझाबे मोगला कऽ बान्ह हिनुओ नै बुझै मोगला तुरको नै बुझै सभसँ चेकरी उगहाबै मोगला राजा शिवसिंह बैठल छलै मचोलबा ओकरोसँ चेकरी ढुआबै एहेन बान्ह बान्हलक मोगलबा सिकियो नै मझाबै मोगलाक बान्ह काइन काइन चिठिया लिखै मैआ कमला दहु ने गे गंगा बहिनो हाथ गंगा बहिनो चिट्ठी पढ़ै माटी भीजि गेलै हमरो सक नै टूटतै मोगलाक बान्ह काइन काइन चिठिया लिखैए मैया कमला दहु ने कोसिका बहिनो हाथ कोसिका बहिनो चिट्ठी पढ़ैते सोचऽ जे लागलै हमरो सक नै टूटतै मोगलाक बान्ह एहन बामी माछ बनबैए बहिन कमला भेदि देलकै मोगलाक बान्ह फोँड़ी करैत कोसी मैया हुलि देलकै केलकै सनमुख धार राजा शिवसिंह सिर नबाबै हे मैया तोहर महिमा अपरमपार गावल सेवक जन माता दुहू कलजोड़ि जुग-जुग जपब तोहर नाम ओइ राक्षस जकाँ बान्हू बान्ह, हिमालयसँ गंगा धरि!! स्थानीय गबैय्या छितन आ मोहन गबैय्याक सुरताल… बाढ़िक बाद गढ़ नारिकेलक दसटा परिवारकेँ निर्मल्ली-लछमिनियाँमे पुनर्वासक जमीन देल गेलै। एक तँ खेतसँ दस माइल दूर आ जखन ओ सभ ओतऽ गेला तँ देखै छथि जे ओतऽ निर्मली कॉलेज छै। कामत नन्दलाल बाबाक देल जमीनपर निर्मली कॉलेज खुजल छलै। हाइ रे नन्दलाल बाबा। पुनर्वास कार्यालयमे धरणा देलन्हि ओ सभ। तखन इन्द्रकान्त मिश्रक किछु जमीन सरकार अधिग्रहण केलक आ हिनका सभकेँ बसेलक। -ई सत्यनारायण यादवक काज छी, आन ककरो नै। -इन्द्रकान्त मिश्र सगरे कहि रहल छथि। -कहने रहथिन्ह बाबू (पीअर बच्चा) राधामोहन रायकेँ, आपसमे लड़मे तँ ई सत्यनारायण यादव फाएदा उठेतौ।– बजै छथि इन्द्रकान्त मिश्र। सरकार जे मुआवजा देलकन्हि से मामूली। ठीक छै, समै समैक गप छै। पीअर बच्चाक घरमे शोक पसरि गेल अछि। कोसी आ कमलाक पानि जखन मिज्झर होइ छलै तखन जा कऽ माटिमे जान अबै छलै, खेत लहलहा जाइ छलै। राधामोहन राय मोँछ पिजा रहल छथि। पीअर बच्चाकेँ आब होश आएल हेतै। अंग्रेजक सरकार गेलै, आब लोकक चलती हेतै। गाममे ओ एलान कऽ रहल छथि, आइ मुखदेव आ जागेश्वरक बदला राधामोहन राय लऽ लेलक। पीअर बच्चासँ बदला.. सत्यनारायण यादवकेँ मुदा ओ कांग्रेसी टिकट भेटलोपर हरा नै सकला। उनतीसम कल्लोल भगता कहलकै अकास बान्हब पताल बान्हब/ बौहु कहलकै-पहिने घरक कोनटा जे टूटल छै से ने बान्हौ खूब घुमै छै मोहन गबैय्या आ घुरि कऽ आबै छै गाम। सुनबै छथि ओ खिस्सा। बागमतीक दहिन किनारपर सोरमार हाटसँ हायाघाटक बीचमे एकटा पँचफुटिया बान्ह अछि। धारमे बेसी पानि भेलापर एकर ऊपरसँ पानि बहि जाइ छल, मुदा एकरा ऊँच कऽ देल गेल, बाहा सभकेँ सेहो बान्हि देल गेल। पानि निकासी बन्न भऽ गेल। बान्हमे स्लुइस गेट भेने किछु तात्कालिक राहत भेटल। विद्यापतिक मृत्यु दिवस सन कर्मकाण्डक रूपमे ऐ बान्ह सभक स्थापना दिवस हम सभ मना रहल छी। मिथिला… मैथिली… मिसिसिपी बान्हसँ लऽ कऽ बूढ़ी गंडक आ कोसी नदीक पच्छिम बान्हमे मूस, खरहा, नढ़िया, छुछुन्नरि सभक बीहरि सभ अछि। जल संसाधन विभागक बान्ध खलासी प्रति तीन किलोमीटरपर मूस आ नढ़ियाक बीहरि मुनै छल। ओकर नोकरी गेलै कारण आब ई काज बाढ़ि निरोधक दस्ताकेँ दऽ देल गेलै। अधवारा आ धौस धार भरि गेल तँ दरभंगा लगक बागमतीसँ पानिक निकासी रुकि गेल। इम्हर इन्द्रकान्तक भाए धीरेन्द्र मिश्र नै जानि कोना घरसँ एक दिन बहरा गेलै। गामपर रहबो करै छलै तँ मारते रास साधु महतमा सभक संग। पोखरिसँ गछारल गढ़ नारिकेल गामक एक दिस बड़का बाहा सभ रहै, कने हटि हटि कऽ। कमलाक भगता अबै छलै उम्हर। एकटा तँ सभ बरिख अबै छलै। एकटा खिस्सा सुनबै छल धीरेन्द्रकेँ ओ। इन्द्रलोकमे रहैवाली कमला। तेँ ने सभ धारक वर्णन इतिहास-पुराण मे छै मुदा कमला धारक नै। इन्द्रलोकमे रहै छली कमला महरानी तेँ। जखन ओ मिथिलामे एली तावत देरी भऽ गेलै। सभ ब्राह्मणकेँ ब्रह्मा कोनो ने कोनो धारक अभ्यर्थनाक भार दऽ देने रहथिन्ह आ से कोनो ब्राह्मण बचबे ने केलै हिनकर अभ्यर्थना करबा लेल। इम्हर मिथिलाक मलाहक जिनगी कमला धार एलासँ सुखितगर भऽ गेलै। ओ सभ खूब माछ मारथि आ बेचथि। से हुनका सभकेँ कमला मैय्यासँ बड्ड सिनेह भऽ गेलन्हि। तखन ब्रह्माकेँ फुरेलन्हि जे किए नै कमलाक अभ्यर्थनाक भार मलाह लोकनिकेँ दऽ देल जाए। से ओ कमलाकेँ कहलखिन्ह जे सिंहवाड़ा लग जे भरौड़ा गाम छै, ओतुक्का बिसम्भर सरदार आ ओकर कनियाँ रानी गजवन्तीकेँ पुत्र हेतै, जकर नाम राखल जेतै दुलरा गर्भी दयाल, सएह भरौड़ाक राजकुमार बनत। ओ तंत्र आ नृत्यमे पटु हएत आ लोक ओकरा नटुआ दयाल कहत। वएह शुरू करत कमलाक अभ्यर्थना। दुलरा दयालक बियाह भेलै बेगूसराय लग बखरीक दुखहरन सरदार आ तंत्र-नृत्य साधिका बहुरा गोढ़िनक बेटी फूलमती धानीसँ। तिलयुगा लग कमला धारक पूजा शुरू केलक नटुआ दयाल। मुदा बहुरा गोढ़िनक किछु पुरान विद्रोही शिष्य मारि देलक नटुआ दयालकेँ। मुदा कामाख्याक योगिनी जिआ देलक नटुआकेँ। कमला पैघ हेबऽ लगली तँ किसान आ मलाह सभक जिनगी सुखितगर हेबऽ लगलन्हि। इम्हर उगला बैदला चमारक मोनमे खोट एलै। ओ कमलासँ बरजोड़ी बियाह करबाक मोनसूबा बान्हलक। मलाह लोकनि भोला बाबाक तपस्या केलन्हि आ कमलाक सतीत्व बचेबाक गोहारि केलन्हि। भोला बाबाक वरदानसँ शिवरा गामक मलाह परिवारमे अमर सिंहक जन्म भेल। कमला पैघ हेबऽ लगली। मलाह कोइलाबीर जकर कुरहड़ि अस्सी मोनक आ कुरहड़िक बेंट चौरासी मोनक रहै, से माटि काटि-काटि कमला लेल रस्ता तैयार करथि। कमला पैघ भऽ गेली। उगला बैदला कमलाकेँ बान्हि देबाक प्रण केलक। बान्हल कमला जखन ऊपर उठती तँ ओ हुनका घीच लेत आ हुनकर सीथमे सिनूर धऽ देत आ बियाह कऽ लेत। कमला ई गप कोइलाबीरकेँ सुनेलन्हि। कोइलाबीर माटिक बान्ह काटि देलक आ कमलाक रस्ता साफ भऽ गेल। मुदा उगला बैदला तँ चामसँ हड्डी निकालबाक कारबार करै छल से ओ सभटा हड्डी मोरंग लग एकट्ठा केलक आ हड्डीक बान्हसँ कमलाकेँ घेर देलक। अपवित्र हड्डीकेँ कोइलाबीर कोना छुबितए। से ओ घुरि गेल। इम्हर अमर सिंह राजा बनि गेला, ओ बाल-ब्रह्मचारी रहथि। हुनकर सात तल्लाक गढ़ छलन्हि जकर दक्षिणमे चाननक गाछ लग सात कोसक घेराबाबला अखराहा छल। कमला ओतऽ गेली आ चाननक गाछपर बैसि गेली। अमर सिंहकेँ लगलन्हि जे कोनो स्त्री अखराहा लग छै कारण ओ बाल-ब्रह्मचारी रहथि आ तेँ हुनका अपन शक्ति घटल बुझना गेलन्हि। ओ तमसेला जे ई स्त्री जँ भेटत तँ ओकरा एक्के घुस्सामे अस्सी हाथ नीचाँ गाड़ि देबै। कमला मुदा नीचाँ आबि गोहारि केलन्हि आ अमरसिंह सत केलन्हि जे ओ कमलाक रक्षा करता नै तँ अस्सी कोस नरकमे खसता। नौ हाथ नाम आ छह हाथ चाकर रहथि अमर सिंह। अमरसिंह अखराहामे माटि देलन्हि आ उगला बैदलाकेँ मारलन्हि। उगला बैदलाक कनियाँ गढ़ुआरि छलि, ओकरा अमर सिंह मारि देलन्हि। मुदा तखने जन्मल उगला बैदलाक बेटा बड्ड बलगर छल। कमला अमर सिंहकेँ किछु भेद बतेलन्हि आ तखने ओ उगला बैदलाक बेटाकेँ मारि सकला। मुदा जखन अमर सिंह बान्ह दिस बढ़ला तँ ओइ हड्डीक बान्ह देख कऽ ठमकि गेला आ कमलाकेँ मीरन फकीरकेँ बजा कऽ अनबा लेल कहलखिन्ह। ओ एला आ हड्डीक बान्हकेँ तोड़लन्हि। जीबछ मुखिया जे सुनेने रहथिन्ह खिस्सा, ओइ खिस्सा आ ऐ खिस्सामे कनियो अन्तर कहाँ रहै। घाट परक घटहा नाहपर सुनबै छथि खिस्सा जीबछ मुखिया धीरेन्द्रकेँ। धीरेन्द्रो मुदा अलबत लोक छल। धीरेन्द्र ओइ जोगीसँ खूब खिस्सा पिहानी सुनथि आ ओ हुनका योग सीख अकासमे उड़बाक कला सिखाबऽ लागल। पढ़ाइ-लिखाइसँ बेसी मोन धीरेन्द्रकेँ अतीन्द्रीय खिस्सा पिहानी सुनैमे लागै छलै। ओ सोचै छल जे कोना योग आ जप-तप केलासँ ओहो अतीन्द्रीय शक्ति प्राप्त कऽ सकत। स्कूलपर बला मन्दिरमे ओ भगता आबि कऽ डेरा दै छलै आ स्कूलक बदलामे धीरेन्द्र ओही मन्दिरक दरबज्जापर साँस फुलबैत रहै छल। भगताक गपसँ धीरेन्द्रकेँ पता लगलै जे ऋषिकेषमे बड़का योगी सभ रहै छथि जे साँस रोकि कऽ अकासमे उड़ि जाइ छथि आ सभ तरहक सिद्धि क्षणमे प्राप्त कऽ सकै छथि। माए बुझाबै… भगता कहलकै अकास बान्हब पताल बान्हब, बौहु कहलकै-पहिने घरक कोनटा जे टूटल छै से ने बान्हौ बाप हँसै… मुदा पन्द्रह बरखक उमेर भेल हेतै आकि कने कम्मे, ओ भगता धीरेन्द्रकेँ लऽ कऽ ऋषिकेष चलि गेल, गामपर सभ बुझलक जे धीरेन्द्र तंत्र-मंत्र सिखबा लेल योगी संगे कतौ भागि गेल छथि। किछु दिन धरि इन्द्रकान्त मिश्रक अंगनामे कन्नारोहट होइत रहल। फेर सभ धीरेन्द्रकेँ बिसरि गेल। तीसम कल्लोल भादवक अन्हरियो नामी, इजोरियो नामी, रौदो नामी, गुमारो नामी गढ़ नारिकेलक जमीन्दारी बान्ह- आ ओकर दछिनबारि टोल, गढ़ अरड़नेबा! शेष गामेकेँ लोक आब गढ़ नारिकेल कहऽ लागल अछि। मुदा पुरना लोकसँ पुछियौ, ओ कहत जे गढ़ नारिकेलक दछिनबारि टोल अछि गढ़ अरड़नेबा। रिंग बान्ह अपूर्ण रहल, कहियासँ से नै जानी। रिंग बान्ह माने गामकेँ घेर कऽ बनाओल जमीन्दारी बान्ह। धार सभपर निलहा गोरका द्वारा बान्ह बनल। नीलक खेती यूरोपियन सभसँ देशी जमीन्दार कीनि लेलक। गढ़ नारिकेलमे अलग समस्या आ ओकर दछिनबारि टोल जकरा लोक आब गढ़ अरड़नेबा कहैए, तकर अलग समस्या। १९६७ ई. मे समाजवादी नेता लोहियाक मृत्यु भऽ गेलन्हि, भारतक पहिल भारतीय गवर्नर जनरल राजगोपालाचारीक मृत्यु सेहो भऽ गेल, हुनकर लिखल संक्षिप्त महाभारत इन्द्रकान्त मिश्र पढ़ने रहथि। मुदा ई गढ़ नारिकेल टोलक अरुण झा, नै जानि की भऽ गेलै एकरा। बाप दादा जमीन जाल जोगा कऽ नै रखलकै आ ई कहैए जे गरीबक अधिकार! यौ एकर बाबा हमर बाबासँ बेशी जमीन जालबला छलखिन्ह मुदा एकर बाप सभटा बुड़ा देलकै तँ तकर भागी हम यौ? कार्ल मार्क्स कहने रहै एकरा बापकेँ भांग पीबि कऽ सभ दिन रौहुक मूड़ा खाइले यौ। कदवा, प्राणपुर, मनिहारी, आजमनगर, अमदाबाद सभ ठाम जेना तेना बान्ह बना कऽ लोक आ ओकर बस्तीकेँ घेर देल गेल। पूर्वमे महानन्दापर बान्ह पश्चिममे कारी कोसीपर बान्ह। १९७५ ई. महानन्दाक बेलगच्छी झौआ बान्हकेँ काटल गेल, लोक काटि कऽ अपन मुक्तिक बाट ताकलन्हि। महानन्दा धार किशनगंज, अररिया, पूर्णियाँ, कटिहार सभ ठाम घेर देल गेल, जेना तेना। नागर, सुधानी, कुलिक आ देवनी नदी, कटिहार, कंकर नदी, महानन्दाक झौआ शाखा, १९८० ई. मे महाकाली नदीपर बराज। ऐमे दूटा नहर, भारत लेल ३.५ मीटर बेसी गहींर, नेपालक लेल बनल नहरक तुलनामे बनल। गंडक बराजमे सेहो पानिक लेवल स्थिर नै राखल गेल। नेपाल सेहो बागमतीपर अपने मोने करमहिया बराज बनेलक आ कमला नदीपर बन्दीग्राम लग गोडार बराज बनेलक। कमला बराजसँ जयनगरक नीचाँक हिस्सामे पानिक कमी। करमहिया बराजक कारण भारतमे बागमती परियोजनामे रमनगरा-गम्हरिया लग बराजक निर्माण नै भऽ सकल। सिंचाइक व्यवस्था नै भऽ सकल। दिन बितैत गेलै। गामपर मारते रास उकबा उठै। हे कोनो बान्ह बनतै, धारकेँ रोकतै। एकटा बभनटोलीक छौरा घरसँ भागि कऽ महात्मा बनि गेल छै, कहाँदन अकासमे आसन लगा कऽ उड़ै छै। ओ कहाँदन भारतक प्रधानमंत्रीकेँ योग सिखबै छै। देखा चाही की होइ छै आगाँ आगाँ। धीरेन्द्र मिश्रक बालसंगी लाल कुमार राय रहथि। हुनका ओ भेटलन्हि दिल्लीमे। कहलकन्हि ढेर रास गप। कहाँदन गामक बाढ़िक निदान करतै ओ। किछु लोक सत्त बुझलकै तँ किछु लोक फुइस। किछु दिन बितलै तँ बेसी लोक ऐ गप्पकेँ फुइसे बुझऽ लागल। तकरा बाद राधामोहन रायकेँ सेहो ओकरासँ भेँट भऽ गेलै। ओ कोनो कवि संगे कोनो कवि सम्मेलन गेल रहथि, दिल्लीक बगलमे सूरज कुण्डमे। ओहो कहलन्हि, वएह धीरेन्द्र छलै, दाढ़ी बढ़ा लेने अछि। बड्ड चलतीबला लोक भऽ गेल अछि। नेता सभकेँ योग विद्या सिखबै छै। देखलासँ तांत्रिक बुझाइत अछि। कोनो कारखाना खोलत गाममे, हवाइ जहाजक ईंधन बनाएल जेतै ओइ कारखानामे। गामसँ लागि अखनो छै, से गपशपसँ बुझा पड़ल। बाढ़ि, अकाल। खेलौना, समदाउन। भादवक अन्हरियो नामी, इजोरियो नामी, रौदो नामी, गुमारो नामी देखा चाही की होइ छै आगाँ आगाँ। गढ़ नारिकेल.. गढ़ अरड़नेबा…. एकतीसम कल्लोल चिन्नी सेहो आब लगैए जे कम मीठ होइ छै धीरेन्द्र मिश्र… सहस्रशीर्षा पुरुषक बलि। ऐ लोकमे पहिने कियो मरै नै छल। से ब्रह्मा अपन प्रतापसँ मृत्युकेँ उत्पन्न करै छथि। ओ मृत्यु रहथि एकटा लाल आ पीअर रंगक स्त्री, सोनाक गहनासँ छाड़ल मृत्युक लाल आ पीअर रंग। मुदा स्त्री ककरो वध कोना करती। मुदा ब्रह्मा हुनका जीवनक अन्त करबाक भार देलन्हि। ओ कोसी कात आबि कऽ तप केलन्हि आ ब्रह्माकेँ मनेबाक प्रयास केलन्हि। मुदा ब्रह्मा किए मानता? धीरेन्द्रकेँ अपन गाम मोन पड़ऽ लगलन्हि, कोसीक खिस्सा सुनि कऽ कमलाक खिस्सा मोन पड़ि गेलन्हि। लाल मोहन रायकेँ ओ वचन देलन्हि जे ओ घुरि कऽ एता गाम। लाल मोहन राय कहलखिन्ह जे धीरेन्द्रक माए अखनो जिबिते छथि। सभकेँ विश्वास भऽ गेल रहै जे धीरेन्द्र आब ऐ दुनियाँमे नै छथि मुदा धीरेन्द्रक माए से मानैले तैयार नै रहथि। आ धीरेन्द्रक गाममे आगमन होइए। देशक प्रधानमंत्रीकेँ योग सिखबैत रहथि धीरेन्द्र। ओ एकटा बड़का आश्रम बनेने छथि दिल्लीमे। भाए इन्द्रकान्त मिश्र आ माएसँ भेँट होइ छन्हि। भरि गामक लोक, की हित की दुश्मन सभ जुमि एलै इन्द्रकान्त मिश्रक दरबज्जापर, पीअर बच्चा तँ बूढ़ झुनकुट भऽ गेल छथि, घरेमे रहै छथि। मारते रास गप चलै, गामक विकास, फैक्ट्री, हॉस्पीटल। मुदा ई बाढ़ि। किए नै गामकेँ एकटा ऊँच बान्हसँ घेर देल जाए। हँ, कोन पैघ गप छै। राज्यक मुख्यमंत्री मानत? ई अरुणा झा बड्ड सटल अछि श्रीप्रकाश झा, मुख्यमंत्रीक। किए नै मानत? जखन हमर धीरेन्द्रक मुट्ठीमे भारतक प्रधानमंत्री छै तखन ऐ राज्यक ई मौगियाहा मुख्यमंत्री! अखन भारतक प्रधानमंत्री तँ स्त्री छथि। भाषण दै लेल अबिते छथि चुनावमे, क्रान्ति पैसि जाइ छै लोकक देहमे। ई अरुणा झा मुदा। ई अरुणा झा किछु नै छी। असल बदमाश अछि ई राधामोहन राय, सत्यनारायण यादव आ ई जागेश्वरक भूत मुखदेव…। धीरेन्द्र घुरि जाइ छथि दिल्ली। पता नै कोन आदेश एलै दिल्लीसँ। राज्य सरकार तुरत्ते योजना स्वीकार कऽ डिवीजनमे काज प्रारम्भ करबाक आदेश दऽ देलकै। बी.डी.ओ. परमानन्द पासवान आ अभियन्ता कृपानन्द, जकर स्कॉलरशिपक कागजपर पीअर बच्चा दसखत नै केने रहै, एला गामक जायजा लेबा लेल। आदेश आएल छै जे धीरेन्द्र जी जेना-जेना कहै छथि बस से करैत जेबाक अछि। मुदा तखने एकटा काण्ड भऽ गेल। प्रधानमंत्रीक बेटा आएल रहथि कोनो उद्घाटन कार्यक्रममे। स्थानीय विधायक सत्यनारायण यादव हुनकासँ भेँट केलन्हि आ कहलन्हि जे गामक लोकक ढेर रास जमीन बिना मतलबक ऐ मे नोकसान हेतै। प्रधानमंत्रीक बेटा राज्यक दूटा मंत्रीकेँ तहकीकात लेल नियुक्त केलन्हि। मुदा ओ दुनू मंत्री राज्यक मुख्यमंत्रीक खिलाफ रिपोर्ट दऽ देलन्हि। आ तकर बाद काज शुरू भऽ गेल। मुदा अरुणा झा ठिकेदारसँ झगड़ा कऽ लेलन्हि आ जेल गेला। सत्यनारायण यादव अरुणा झासँ जेलमे भेँट केलन्हि। सत्यनारायण यादवकेँ पुलिस दिससँ आदेश आएल रहए जे ओ अपन गाम, गढ़ नारिकेल गामक आसपास नै जाथि। से जेलसँ निकललाक बाद नेतृत्व अरुणाक हाथमे आबि गेल। कम्यूनिस्ट पत्र “लाल धार”क सम्पादक एला। मुदा काज शुरू भऽ गेल। धीरेन्द्र हवाइ जहाजसँ तीन बेर गामक निरीक्षण केलन्हि। मुखदेव आ अरुणा झा लेल हवाइ जहाजक टिकट पठेलन्हि धीरेन्द्र। शानदार आश्रम, जेना लाल बाबू राय कहने रहथि। मुदा नै मानला मुखदेव। धीरेन्द्र मिश्रक दछिनबारि टोल, गढ़ अरड़नेबा। गढ़ नारिकेल टोल ककरो किए सुनत, मुदा ओ सभ कहैए जे ओकर सभक गप के सुनत? प्रधानमंत्रीक बेटासँ फेर भेँट। प्रधानमंत्रीक बेटाकेँ धीरेन्द्र मिश्रक दखलसँ परेशानी रहै, मोनमुटाव भऽ गेल रहै। केस भेल। कोर्ट सभटा काज रोकबा देलकै। धीरेन्द्र सेहो स्थानीय राजनीतिसँ परेशान भऽ गेल। संन्यासी छले, आब काज, कारखाना सभसँ सन्यास लऽ लेलक। एनाइ-गेनाइ बन्द। लोक फेर ओकरा बिसरऽ लगलै। लगैए स्वतंत्र देशक बर्खमे एक्के मास, माघ मास। गेल माघ दिन उनतीस बाँकी लोकक बोलीमे लसि खतम भऽ गेलै। चिन्नी सेहो आब लगैए जे कम मीठ होइ छै। बत्तीसम कल्लोल दिनमे कौआ देखि कऽ डेराइ, रातिमे नदी हेलि जाइ गढ़ नारिकेलक मोहन गब्बैय्या। बड़का गबैय्या। गौरीशंकर स्थानमे जखन आस पड़ोसक गामक लोक सभ जुमए लगला तखन सरकार सेहो माटिक सड़क बनबा देलक आ जोन मजूर आसपासक गाम सभसँ एतऽ बोनिपर खटऽ लागल। ने कहियो देखल आ नै सुनल, बजा कऽ काज कियो देने छल आइ धरि, आ पाइ नकद भेटै अछि। बेसी मेन-मीख निकालमे तँ जे भेटै छौ सेहो बन्न भऽ जेतौ। बड़बरिया बाबू साहेबक हाथी आबि जाइ छै। लोक सभमे हड़कम्प मचि गेल अछि। हाथीकेँ खुएबाक भार गौँआ सभपर। हाथीकेँ खुएनाइ आसान थोड़े छै हौ। बड़बरिया बाबू साहेबक मुंशी हिसाब-किताबक पोथी निकालि लै छथि। लगान बाँकी छै लोक सभक। नै, नै, ओ जमाना गेल ई तँ अछि बोनिक दस्तावेज। अहाँ… मुदा मोहन गबैय्या सेहो ओतऽ आबि जाइ छथि। कोन लगानी? जमीन्दारी तँ खतम भऽ गेलै। आब तँ सरकार अछि मालिक।.. नै, नै, ओ जमाना गेल ई तँ अछि अहाँक बोनिक दस्तावेज… किछु बाजऽ चाहैए मोहन गबैय्या। ठीके तँ बाजल छथि। एकटा संगठन खुजल रहै झा आ यादव बाबू सभक, से सभ पक्षमे रहै पहिनहियो। धरना दऽ देने रहै। जमीन्दारी खतम ठीके भऽ गेल छै। मुदा धरणा असफल रहलै। आकि नै जानि मेल-पेँच कऽ लै गेलै। सभटा आन्दोलन, धरणा जे ई सभ करैए, से सभटा असफल किए भऽ जाइ छै। मुदा धीरेन्द्र हाथीकेँ किछु खुआ देने रहै। मुदा आब तँ धीरेन्द्रे… उठला मोहन गबैय्या- ओइ दस्तावेजमे किछु जादू छै- हमरा सभकेँ ओ लेबाक चाही, तखने ठीक मजदूरी हमरा सभकेँ भेटत। जादू!! शुरू भऽ गेला मोहन गबैय्या। वनसप्तो... पाँखिबला गाए, उड़ैवाली गाए। उड़ि कऽ क्षणेमे इम्हरसँ उम्हर चलि जाइ छल। बड्ड परोपकारी, हराएल बच्चाकेँ पीठपर चढ़ा कऽ घर दऽ आबै छल। ई की शुरू केलक मोहन गबैय्या? नग्रक बरोबरि गाम करतै हौ? गाममे छोट-छोट हवाइ जहाज देखाइ पड़ै छै, नगरमे पैघ-पैघ। नग्रमे कतऽ वनशप्तो आ राकश भेटतह? आँखिक देखल राकश, लोथ आ गाछ हँकैत डाइन। झुट्ठे बुझाइ छह, इन्द्रकान्त बाबू, तोहर बाबूक संगे जीपपर अबै छलै इंजीनियर सभ, दू बजे रातिमे। भूत सभ ताल ठोकै छलै। सभ सुनलकै। तोहर बाबू नै कहलखिन तखन, बादमे ओकरा सभकेँ कहलखिन। पहिने प्लेग सभमे बड्डै लोक मरै छलै, से अकाल मृत्युमे भूत बनै छलै। आब डाक्टर बेसी छै, देखलहक नै १९९४ मे कहाँ कियो मरलै, आ १९६६ मे कतेक मरलै। १९९४ मे सूरतसँ लोक सभ भागि-भागि एलै। सुनै छिऐ अमेरिका प्लेगक बैक्टीरिया छोड़ने छलै। धुर, तोहूँ, अमेरिका किए एना करतै? सुनै छिऐ कोनो दवाइक जाँच लेल करै जाइ छै, भगवान जानए की गप छै। झुट्ठो हेतै। खाली राकश छै आब बोनमे। वनसप्तो तँ नहिये। ई कोन धरणा शुरू कऽ देलक मोहन गबैय्या। लोको सभ गढ़ नारिकेलक… कत्ते फुराइ जाइ छै… देशक सर्वोच्च सेवाक भर्तीक प्रश्न-पत्र लीक भऽ गेलै। ऐबेर ने पता चलल छै, पहिनहियो की की होइत हेतै, के जानैए। ई इन्टरव्यू-तिन्टरव्यू तँ सेहो गलतकेँ सही करबाक तरीके ने छै हौ। ईराक देशकक सद्दाम हुसैनक कुवैत देशपर आक्रमण भेलै। हौ, भरि विश्वमे तेलक सप्लाइपर असरि पड़लै मुदा भारतकेँ किछु नै भेलै। किए नै भेलै? हौ अपने सभ तँ लकड़ीपर खापड़ि चढ़ा भुज्जा भूजि कऽ खा लेब। अपना सभकेँ मटिया तेलक कोन खगता। एतुक्का लोककेँ तेलसँ की काज, भानस करबे नै करत। भुज्जा फाँकि कऽ रहि जाएत, साँझ पड़लासँ पहिनहिये लकड़ीपर भानस बना लेत। मुदा कुवैत लग पाइ रहै से अमेरिका ओकरा पक्षमे आबि गेलै। १९९० ई. मे सी.एन.एन. टेलीविजन इराकपर हमलाक रिपोर्ट देमऽ लागल, इराकक कुवैतपर हमलाक रिपोर्ट। फोन बूथ जकाँ टी.वी. चैनल भऽ गेलै आ सभकेँ प्रचार भेटै छै, ओहीपर ओ अपन खर्चा निकालैए। हौ, भारत इंग्लैंडकेँ सोना बन्हकी दऽ देलकै, स्थिति नै कोना सुधरतै? सोना तँ घरक स्थिति खराप भेलापर बेचल जाइ छै। मुदा देशक मान बढ़लै, इज्जत तँ रहलै। हौ, सएमे नब्बै घरमे सोना कियो देखनहियो छै लोक हौ? ई सड़क चारि लेन बला…. ओना भेलैए काकी? वाजपेयीजी १९९८ ई. मे प्रधानमंत्री छला, सेक्रेटरी सिरी किला ऑडीटोरियम लेल ड्राफ्ट भाषण तैयार केलक, मुदा ओइमे किछु विशेष नै छलै। तखन कहलापर ओइमे कश्मीरसँ कन्याकुमारी धरिक सड़कक चर्च जोड़ल गेल। बिजनेसमेन सभ खुश भऽ गेला, यएह बदलि कऽ स्वर्णिम चतुर्भुज सड़क योजना बनल आ ई फारबिसगंजक सड़क सएह छी ने यै काकी। लोकक लग पाइ छै जे फोन करतै, गामे-गाम बूथ खोलै छथि। हावर्ड विश्वविद्यालय छै अमेरिकामे। ओकर प्रोफेसर शोध केलकै जे केरलक मलाह लोकनि जे मोबाइलक प्रयोग केलन्हि तँ आमद बढ़लन्हि, संगे माछ सस्त सेहो भेलै। साम पित्रोदा छलै बाबू मुदा... अपने बरही विश्वकर्मा। अमेरिका चलि गेल रहै, घुरि कऽ एलै आ देशकेँ बदलि देलकै। टुनमुनिया मारुति कार। वएह अम्बेसेडर आ फिएट छलै। वएह प्रिया आ बजाज चेतक। मास्टर साहेबक बेटाक बियाह आगाँ बढ़ि गेलै नै देखलहक। आब ने एलैहेँ हीरो होन्डा, बुलेट होइ छै, जेना करितो छै बम-बम-बम-बम, नामो छै बुलेट, से नैतक नाम राखि देलिऐहेँ बुलेट। मास्टर साहेब कहल जे हीरो होन्डा नै आओत तँ बियाह नै हएत। दरभंगासँ ब्लैकमे आएल। तखन बरियातियोकेँ हिस्सक छोड़ेलक कैथिनियाँ बला सभ। सभटा माछ हीरो होन्डाकेँ सुँघा कऽ पोखरिमे फेक दै गेलै। दत्ता सामन्तकेँ गारि दैत सूती मिलक पूर्व श्रमिक जे आब खोमचाबला, जूता सिबैबला भऽ गेल अछि। मुदा बात किछु आरो छलै। बम्बैमे प्रोपर्टीक दाम बढ़ि गेल छलै से फैक्टरीबला सभ ओइमे कंस्ट्रक्शन करबामे सुविधा पेलक। फैक्ट्री तँ तारापुर जा कऽ खोलि सकै छी। बम्बैइमे फैक्ट्री कोनो बहन्ने बन्न करेबाक छलै.. आर्यभट्टसँ १९७५ ई. मे भारत बाहरी स्पेसमे पहुँचल। वैज्ञानिक आर्यभट्ट भेल रहै हौ, पन्द्रह सए बर्ख पहिने। हँ हौ, की बुझै छहक जे भारतमे खाली धर्मशास्त्री भेलै हेँ। बाहरी स्पेस, अच्छा आब बुझलौं, आउटर स्पेसमे गेल सेटेलाइट, आर्यभट्टपर बाजि गेला एतेक गप मोहन गबैय्या। भाखरा-नांगल- आधुनिक भारतक मन्दिर लेल कोसी बान्हक बलिदान भेल। सभकेँ ठकि ठकि कऽ माटिक बान्ह बान्हल गेल कोसीपर, हाइ रे हाइ ठकहरा नेता सभ। ऑपेरेशन शक्ति माने हाइड्रोजन बम- १९९८ ई.। १९७४ मे ओही ठाम परमाणु बमक टेस्ट भेल रहै- बुद्धा मुस्किआयल रहथि। आब की ओ ऑपेरेशन शक्तिक बाद भभा कऽ हँसल छथि। हर्षद मेहताक देल छिऐ ई झंझारपुरक बौआ बाबूक दुमहला हौ। आब तँ शेयर कम्प्यूटरमे अबै छै। रस्तामे हरेबाक कोनो डर नै। पहिने तँ एक बेर कम्पनीक शेयर हेरा गेलापर कोनो ठौर-ठेकान नै भेटै छलै। ई शेयर की होइ छै हौ मोहन? ई भेलै मलिकाना, माने ओइ कम्पनीक किछु मलिकाना तोरो लग छह। आब बुझलिऐ। विमलक, खाली विमलक कपड़ा चाही, दोसराक नै। ओनली विमल। ई जमाए सभ ससुरकेँ परेशान केनाइ नै छोड़तै। झंझारपुर बजारमे नकली विमलक कपड़ा सभ खूब आबि गेल छै। आब बुझथुन जमाए सभ। हिजली कैम्प जेल, खड़गपुर खाली पड़ल छल, ओतै आइ.आइ.टी. खुजल १९५० ई. मे। १९६१ ई. मे कलकत्तामे पहिल आइ.आइ.एम. खुजल, विश्वविद्यालयसँ बाहर नीक पढ़ाइक आरम्भ। मुदा अपन मिथिलाक जमीन्दार, हाइ रे हइ। लोक पढ़ि जेतै तँ टहल-टिकोरा के करितै, से कॉलेज-स्कूल खोलबे नै केलक। सरकारी कम्पनी सभ प्राइवेट हेबऽ लागल। सरकारी कम्पनीमे दरमाहा बन्द… प्राइवेट टाटा सीमेन्टकेँ लाफार्ज द्वारा किनलासँ सभ कर्मचारी बमबम भऽ गेल। डालमियानगर महावीर डल्डाबलाक बेटी जमाए साहित्यिक पुरस्कार खोललक… मुदा ओ बेटाक मोहमे दोसर बियाह केलक आ बिजनेस आपसी द्वन्द्वमे बन्न भऽ गेलै। बंजारा सभक टेण्टबला बस्ती सिमरा लग सुखेँतमे बनै उजरै। आब बंजारा सभ सिमरामे घर बसा लेने अछि। सौँसे इलाकाक बंजाराकेँ जोगनाथ मण्डल प्रशासनक मदतिसँ सिमरामे बसेलन्हि। एकटा नीतिश कुमार मुख्यमंत्री छै अखन। ओकरे प्रशासनक योजनामे धीरेन्द्र राय ओकर सभक शिक्षाक लेल ढेर रास काज केलन्हि। जोगनाथ मण्डल आ धीरेन्द्र राय एक बेर अबाज दऽ दौ सभ बंजारा एकट्ठा भऽ जेतै। .. निर्मल पाइ रो टो टो… बंजाराक रज्जो देवी, दोसर जातिमे बियाह कऽ आन्दोलने कऽ देलकै, आब सुनै छिऐ कलकत्तामे रहैए, बंजारा-मगहिया डोम आकि गिदरमारा सभ ओकरा अपन कलंक बुझैए। ओकर सभक मुख्य महिला रज्जो देवी… कोनो गएर बंजारासँ बियाह कऽ कए कलकत्ता चलि गेल छै। घुरऽ चाहै छै, मुदा के घुरऽ देतै, बंजाराक नाक कटा देलक ओ! कलंक छी बंजारा लेल ओ!! बंजारा सभमे आपसमे एक मूलक लोकक बीच बियाह नै होइ छै, तखन गएर बंजारामे बियाह? कमरबन्दमे लटकल डोरी आ गोली सभसँ बंजाराक एकटा समूह दोसर बंजारा समूहक मूल जानि जाइए। ललित बाबू तँ बड्ड काज केलक मुदा मारल गेल १९७४ मे, अनुरोध-विरोध दबाबोमे होइ छै। सुनै छिऐ मोँछ बला प्रधानमंत्री मरबेलकै, से १९८४ मे जखन ओइ मोँछ बला प्रधानमंत्रीक हत्या भेल तँ मिथिलाक लोक मिठाइ बँटलक आ ललित बाबूक बेटाकेँ जितबेलकै एम.पी. चुनावमे। केरलक ६८ बर्खक बूढ़ी आयशा साक्षर भेली आ केरल पूर्ण साक्षर भऽ गेल १९९१ ई. मे। बाबू, मोहन गबैय्या खाली अधलाहे समाचार नै सुनबैए, निराशा आ आशा मिज्झड़ कऽ दैए। टाटा- पारम्परिक बिजनेस परिवारमे गनल जाइ छल। मुदा आब अपनासँ चारि गुणा पैघ स्टील फैक्ट्री कोरसकेँ टाटा स्टील किनलक। २००१ ई. मे कलकत्तामे बिगबजार मॉल, सभ समान एक ठाम, लगिते ने छै जे भारत छै, पहिल एहेन प्रयोग छल। सरकारी विकासक आ सरकारी बैंकक हिन्दू विकास दर ३-४ प्रतिशत। ई हिन्नू विकास दर की छिऐ हौ। कम विकास दर आकि बिन विकासक विकास! मुदा फेर गाछबला फाइनेन्स आ आन फाइनेन्स कम्पनी सभ सभटा पाइ लऽ कऽ भागल। गाछबला फाइनेन्स बला सभ एकटा गाछ अहाँक नामसँ लगा देत आ बीस सालक बाद ओकर एक करोड़ टकाक गाछ बनि जेबाक भ्रम देत। अहाँक नामसँ कोन बोनमे कोन गाछ रोपल गेल से के कहत जखन आब ओ सभ कम्पनी अपने निपत्ता भऽ गेल। बोफोर्स १९८७ ई.। स्वेडिश रेडियो, चित्रा सुब्रह्मण्यम आ एन.रामक द हिन्दूक अखबारमे रिपोर्ट। लागल जे भारतमे पहिल आ अन्तिम घोटाला भेलै ई। घोटालाक पाइसँ बेसी खर्च ओकर जाँचमे भऽ गेलै। जेनरल टिक्का खानक अत्याचार पूब पाकिस्तानमे शुरू भेल आ अमेरिकन डिप्लोमेट आर्चर ब्लड अपन देशकेँ खूब रास बात सुनेलन्हि। भारतक सेनाध्यक्ष जेनेरल एस.एच.एफ.जे. मानेकशॉक भाषण, जे रेडियोपर अबै छल, से खून खौला दै छल। भारत पच्छिम पाकिस्तान दिस कराचीमे पी.एन.एस. खिबेर आ आर चारिटा पाकिस्तानी जहाजकेँ डुमेलक आ इम्हर पूब दिस बंगालक खाड़ीमे पी.एन.एस. गाजीकेँ डुमेलक। मुदा बांग्लादेश बनल आ फेर ओतऽ चकमा हिन्दूकेँ, दलित हिन्दूकेँ सताओल गेल, पाकिस्तान अलग दुश्मन भऽ गेल। कश्मीर समस्या तकर बादे बढ़ल। चीनसँ भारतक युद्ध भेल। १९६२क भारत-चीन युद्धमे मात्र २६०० लोक मरल, युद्धमे ३००० सँ ऊपर जँ लोक नै मरल तखन ओ दू देशक युद्ध कोना भेल? पश्चिममे लद्दाख आ पूबमे अरुणाचल-तवांगपर चीन आक्रमण केलक। आ भारत बिन युद्ध लड़नहिये युद्ध हारि गेल! भारतमे आपातकाल आएल, ट्रेन टाइमसँ अबै छल, सत्ता छिनेलाक बाद लोक सेक्यूलर बनै छथि, आ धार्मिक सेहो। २१ मास आपातकाल रहल आ फेर कांग्रेस हारि गेल चुनावमे, वएह चुनाव जइमे टी. एन. शेषणक चुनाव आयुक्त बनलासँ पहिने बहुत ठाम महिला आ वंचित वर्ग कहियो वोट खसेबे नै केने छल। भारतक सभसँ प्रभावकारी चुनाव आयुक्त रहथि टी. एन. शेषण आ तकर बाद सभ चुनाव आयुक्तकेँ प्रभावकारी हुअए पड़लन्हि। उत्तर बंगालक दार्जिलिंग नक्सलबारी गाम। ओतऽ गाम बला सभ एकटा जमीन्दार आ पुलिस निरीक्षककेँ मारि देलक, पुलिस नौ टा युवाकेँ मारलक आ दूटा बच्चाकेँ सेहो। खेतिहर-बोनिहारकेँ जमीन देबाक मांग छल ई, आ ई भरि भारत पसरि गेल। नेपालोमे पसरल। बाबरी मस्जिद १९९२ क दिसम्बर। गामे-गाम ईँटा लऽ कऽ घुमैत लोक, बाबरी मस्जिदकेँ ढाहि रामललाक मन्दिर बनबैले अपस्याँत लोक। एतेक जोश छुआछूत, जाति भेद आ असमानता मेटेबामे जँ लगबितौं!! १९९९ई.मे गीता हरिहरन, एकटा लेखिका, केस जितलन्हि आ अपन बच्चाकेँ अपन उपाधि देलनि, पिताक नै, ऐ लेल हुनका केस जीतऽ पड़लन्हि आ १९८६ मे शाहबानो केस जितियो कऽ हारि गेली। आरिफ मोहम्मद खान विरोध केलन्हि, भारत सरकारक मंत्री रहितो भारत सरकारक कट्टरपंथी तत्वसँ हारि मानबाक विरोध केलन्हि। आश आ निरास मिज्झड़ रहिते छै सभ ठाम। १९९८ मे तेरह मास आ फेर कारगिलक बाद १९९९ मे भारत पार्टी पाँच साल सत्तामे रहल। हजारो सैनिक मरलै। कोन जिला छै जतुक्का लोक नै मरलै ओइ युद्धमे। हँ मुदा देशमे एकता अनबा लेल बीच-बीचमे युद्ध आ बलि देबैए पड़ै छै। लोकक बलि, सैनिकक बलि। आ जीतत देश तँ सत्ताधारीकेँ फाएदा भेटबे करतै। अन्नादुरै रहथि तमिल प्रदेशमे। १९६७ ई. मे द्रविड़ पार्टी तमिलनाडुमे जीतल। द्रविड़ पार्टीक नेता पेरियार। हुनकासँ अलग भऽ अन्नादुर्रै अलग पार्टी बनेलन्हि। पेरियार स्वतंत्रताकेँ ब्राह्मण आ उत्तर भारतक परतंत्रतासँ जोड़ै छला। १९६५ ई. मे हिन्दी विरोधी आन्दोलन तमिल प्रदेशमे शुरू भेल। आ आब.. सर्वस्वान्त.. आतंकवाद। ईहो एकटा वाद बनि गेल। नक्सलवादसँ विपरीत ई भारत विरोधी वाद छल। नक्सलवाद तँ भारतक तंत्रमे बदली करऽ चाहै छल मुदा आतंकवाद भारतकेँ तोड़ऽ चाहलक, कमजोर करऽ चाहलक। १९९१ ई.मे राजीव गाँधीक श्री पेरम्बदूरमे हत्या भेल। हम डरि गेलौं। डरि गेलौं जे फेरसँ सिखक विरुद्ध ने आक्रमण होमए लागए, जेना १९८४ ई.मे इन्दिरा गाँधीक मृत्युक बाद भेल छल। श्रीलंकाक बाघ सेनाक थेनमोझी राजारत्नम प्रसिद्ध धानु केने छल आत्मघाती हमला, अपनो मरि गेल ओ। ई सभटा घटना कैमरामे रेकॉर्ड भऽ गेल, कैमरामेन सेहो मरि गेल। १९८४ ई. मे इन्दिरा गाँधीकेँ २५ बुलेट स्टेनगनसँ सतनाम आ ५ बुलेट बेअंत मारने छल। आ तकर बाद दंगा पसरल, सिक्खक विरुद्ध, तेँ हम डरि गेल छलौं। मण्डल कमीशन बनल। अपन बी. पी. मण्डलक नामपर ई कमीशन बनल। ११ टा आधार पर पिछड़ा वर्गक निर्धारण भेल, सामाजिक आधार ३ अंक, शैक्षिक आधार २ अंक, आर्थिक आधार १ अंक, अहिना कऽ कऽ। ५० प्रतिशत वा अधिकबला जाति बैकवर्ड बनि गेल। गुजरातक राजपूत, मध्य प्रदेशक मराठा आ असमक ब्राह्मण बैकवर्ड बनि गेल। एक दिना क्रिकेट खेलपर रेडियो क्रिकेट कमेन्टरी शुरू भेल आ फुटबॉल भारतसँ निपत्ता भऽ गेल। पाँच-पाँच दिन खेल होइ छलै, बीचमे एकदिन विश्राम सेहो होइ छलै। एक दिन भोरसँ साँझ कम भेलै हौ, लोक काज-धाज छोड़ि कऽ कान पथने रहैए। भोपाल, २ दिसम्बर १९८४ क राति। २५००० लोक मुइल। जहर बला गैसक टंकी फूटि गेल। कतेक अपंग भऽ गेल। विदेशीक गरीब देशमे जहरक व्यवसाय। उद्योग चाही, मुदा केहेन उद्योग चाही? वाइ.टू.के. माने बर्ख २०००, सभटा कम्प्यूटर बन्न भऽ जाएत! विप्रो, इन्फोसिस, टी.सी.एस. ई सभ भारतक कम्प्यूटर कम्पनी खूब बढ़ल। वाइ.टू.के. माने बर्ख २०००=००=१९००; कम्प्यूटर काज बन्न कऽ देत, तकर निदान लेल काज बाहरसँ आएल। इन्टरनेट माने अन्तर्जाल, भारतमे वी.एस.एन.एल. कम्पनी १५ अगस्त १९९५ केँ इन्टरनेट आनलक। आ वंचित वर्ग लेल ई एकटा बड़का हथियार बनि गेल। मठाधीश लोकनिक गढ़ टुटलन्हि। मुदा वंचित वर्गमे एकर प्रवेश अखनो सीमित अछि। ग्रामीण रोजगारक कार्यक्रम शुरू भेल। लोकक हाथमे टका एलै। नै तँ पहिने जिनगी बीत जाइ छलै आ कतेक लोक टाका बिनु देखनहिये गुजरि जाइ चल। बेच दऽ कऽ बौस्तु कीनै छल, अखनो किनैए, मुदा टका एलासँ भुखमरी खतम भेलै। अमूल कॉपरेटिव दूध व्यवसायीकेँ बिजनेस सिखेलक। मुदा अपना सभ दिस ई देरीसँ आएल। सभ चीज देरिये सँ अबैए। न्यू योर्कर पत्रिका- १९९७मे भारतक अंग्रेजी भाषाक लेखक सभपर अंक निकाललक। सलमान रस्दी, अमिताव घोष, अब्राहम वर्गीस, जी. वी. देसानी आ रुथ प्रावर झाबवाला। सभ देखलक जे अंग्रेजी आब भारतक भऽ गेल अछि, भारत ओकरा अपन दास बना लेने अछि! भारतक योगीमे एकटा योगी महेश योगी आ विदेशक बड़का गबैय्याक समूह बीटल्सक काज-धाज छोड़ि हुनकर शरणमे शान्तिक खोजमे एनाइ। ट्रांसेन्डेन्टल मेडीटेशन, ऋषिकेशमे। फेर योगी रजनीश १९७०क दशकमे पुणेसँ शुरू भऽ विश्वमे पसरि गेला। प्रभुपाद शुरू केलन्हि संस्था इस्कोन, भगवान कृष्ण बनि गेला लॉर्ड कृष्ण। भारतक खोजमे, भारतक शान्तिक खोजमे स्टीव जॉब्स भारत एला, हरियाणामे एकटा संन्यासीक आश्रम। मुदा एतुक्का भीड़ आ गरीबी देखि कऽ संन्यासीक आश्रमसँ घुरि गेला, कम्प्यूटरक एपल कम्पनी बनेलन्हि आ कहलन्हि जे ऐ बाबा वा कार्ल मार्क्ससँ पैघ काज तँ लैम्प बनबैबला आविष्कारकक अछि जइसँ हजारक हजार खदान मजूरक जान बचल। क्रिकेट खिलाड़ी सचिन तेन्दुलकरक अनघोल छै। अहिना एशियाड १९८२ क अप्पू हाथीक अनघोल भेल छलै। अप्पू खेलमे करतब नै देखा सकल कारण जानवरकेँ अधिकार दियाबैबला संस्था ओकरा प्रशिक्षणमे सतेबाक बात उठेलक। मनुक्खक अधिकार अखनो पाछू छै। ए. आर. रहमान धर्म परिवर्तनसँ पहिने दिलीप रहथि। विश्वमे अपन संगीत पसारलन्हि। राजश्री प्रोडक्शन पारिवारिक फिल्म बनेलक। एम.एफ. हुसैन, तीजन बाइ, आ “अपना उत्सव” कार्यक्रमसँ बहार भेल कलाकार विश्वमे अपन कलाक प्रदर्शन केलन्हि। “नवोदय विद्यालय” देशक जिला सभमे खुजल आ गरीबक बच्चाक प्रतिभासँ विश्व परिचिति प्राप्त केलक। २१ म शताब्दी छिऐ, आब हमरा सभ दिस राजनीतिज्ञ सेहो जातिक आधारपर वोट नै मांगै छथि, काज करै छथि, ओना साहित्यकार सभमे कतेकोमे घृणा आ जातिवाद भरल छन्हि। किछु साहित्यकार मानै छथि मैथिल माने मैथिल ब्राह्मण, से मैथिलक बदला मैथिली भाषी लोक प्रयुक्त कऽ सकै छी, ई मात्र हमर विचार अछि। हमरा गाममे एक गोटे बूढ़ छला.. लोक कहैए …. डाँरपर हाथ राखि ओ जइ आरिपर ठाढ़ भऽ कहथि- केहन सनगर धान छै… … ओ धान सुड्डाह भऽ जाइ.. आब ऐमे कते सत्य छै आ कते बनोतरी.. के फरिछाएत... सएह गप छै.. मुदा अन्धविश्वासक संग वैज्ञानिकता सेहो चाही, आदिवासी इलाकामे डाक्टर सभ पेनिसिलिनकेँ मंत्रा कऽ दै छथिन्ह, से लोककेँ विश्वास होइ छै जे मंत्रसँ ठीक भेल अछि.... से आब बाते खतम भऽ गेल किने.. बिलमे जाइ काल ने सोझ भऽ जाइ छै, फेर तँ टेढ़े, केस मोकदमा शुरू भेल, कोर्ट कचहरी, न्यायक दरबारमे अन्याय, केस कऽ कए लोककेँ पैमाल करबैत रहै छथि। जेठमे पानि भऽ रहल अछि तँ बादमे अषाढ़मे कम हएत से नीक नै। गन्धवरियाक गन्धवारडीह सकरी आ दरभंगा टीसनक बीचमे अछि, जीवछक पूजा ओ सभ करै छथि। गन्धवरिया वरूआरी, सुखपुर, परशरमा, बरैल आ यदिया मानगंज पँचमहलामे पसरल छथि। सौरिया राजक प्रतिनिधि दुर्गागंजमे छथि। माता–पिताक देहांत भेलापर दुनू अनाथ बालक लखेशराय आ परवेशराय सौरिया गेला। हुनका लोकनिकेँ परासर गोत्र देल गेल जखन कि ओ सभ परमार रहथि आ गोत्र कौण्डिन्य रहन्हि। घरक गोसाओन एक बहुत उत्तम खड्ग देलखिन्ह जइमे समस्त दुर्गा सप्तशती अंकित छल। ई खड्ग दुर्गापुर भद्दीसँ हरिवल्लभ नारायण सिंह सोनबरसा आनलन्हि। खड्गमे बीझ नै लगै छल, पनबट्टामे चौपेतल रहै छल आ झाड़लापर पैघ भऽ खड्ग बनि जाइ छल। युद्धमे लहाश दुर्गन्ध करऽ लागल, तेँ जइ गाममे युद्ध भेल से गाम भेल गंधवारि। ‘जीवछ’ धार हिनकर सभक कुलदेवता छल, गन्धवारि, भीठ भगवानपुर आ सहरसाक आसपासमे गन्धवरिया सभ छथि। डेढ़ सए साल पहिने पूर्णियाँसँ पूबमे कोसी धार बहै छल। मिथिलामे कुसियार, तमाकु, पाट आ मिरचाइ उपजै छल। कोकटी आ बादमे खादी कपड़ा बनै छल। नाथपुर, हाजीपुर, लालगंज, बगहा, गोविन्दपुर, सतराघाट, दरभंगा, कमतौल, खगड़िया, रोसरा, पूसा, समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर, रानीगंज, नबाबगंज, नाथपुर, साहेबगंज, राजगंज, रामपुर, अलीगंज, खबासपुर, दुलालगंज, कलियागंज, देवगंज, किशनगंज, बहादुरगंज, बारसोइ, बेगूसराय, तेघड़ा, दलसिंहसराय सभमे बनिजार सभ अबैत रहथि। मधेपुरा लग शंकरपुर आ ओतऽ मधेली बजार आ वंसतपुर अछि, ओतऽ खिस्सा सीत–वसंतक अवशेष अछि। १९८७-८८ क अकाल, १९८७क बाढ़ि आ १९८८क भूकम्पसँ पहिने हरित क्रान्ति आएल। इम्हर तँ कनिये मनिये। पहिल बेर १९६२-६५मे… … फेर १९७०-७३ मे नाइट्रोजन-फास्फोरस खाद, कीटनाशक, मेक्सिकोक बौन बीज, ट्रेक्टर, सिंचाइ, गहूम बेशी, जय-जवान जय किसान नारा आर आगाँ बढ़ल आ खेतीक क्षेत्रफल बढ़ल। तेसर हरित क्रान्ति १९८०-८३ आ १९९२-९५ मे धानक नीक बीज सेहो आएल आ ई बिहार, असम, उड़ीसा आ प.बंगालमे पसरल। मुदा ऐसँ समस्या सेहो आएल, वर्गीय ध्रुवीकरण, धनिक किसान आ किसान-बटाइदारक किराया बढ़ि गेल, मुदा छोट किसान भूमिहीन नै भेल, मुदा अनियमित भूमिहीन मजदूरक मजदूरी बढ़ल। मुदा तरकारीमे कीटनाशक आबि गेलै। कैन्सर आ ब्रेन ट्यूमर बढ़ऽ लगलै। आब ई हरियरका क्रान्ति की देलक आ की लेलक से सोचै जाइ जाह। भूदान आ नक्सलवाद दुनू १९६४-७० मध्य चलल। १९७० दशकमे भूमि कब्जा शुरू भेल। जमीन्दारी उन्मूलन कने भेल कने नै। भूदानक भूमि प्राप्तिक लक्ष्य ३० करोड़ एकड़मे मात्र ५ करोड़ एकड़ प्राप्त भेल। जयप्रकाश नारायण विनोबा भावेक संग ऐमे शामिल भेला। १९६० धरि ८.७२ लाख एकड़ भूमि बाँटल गेल, बेसी मोकदमाबला आ बंजर भूमि छल। जून १९९९ मे बिहार सरकार राज्य भूदान समितिकेँ अदहो जमीन नै बाँटबाक कारणे भंग केलक। दूधमे गुजरातक अमूल आ चिप्स-पापड़मे राजस्थानक सहकारी लिज्जत आएल। मुदा अपना सभ ऐठाम? लिंगभेदक समस्या कहाँ कम भेल। टेक्नोलोजी आएल मुदा किछु महानगर धरि सीमित रहि गेल। इन्टरनेट वंचित वर्ग लेल आस लऽ कऽ आएल, मुदा अखनो ऐ वर्गमे एकर उपयोग सीमित छै। नग्रमे लोक इन्टरनेटक सदुपयोग कम आ पोर्न देखैमे बेशी करै छथि। जीवन-प्रत्याशा बढ़ल, बाल मृत्यु दर घटल, जे.पी. सम्पूर्ण क्रान्तिक दलहीन जनवाद नै आनि सकल, मुदा परीक्षामे चोरि शुरू भऽ गेल जकरा लोक जयप्रकाशी बैच कहैए। राज्य पुनर्गठन १९५६ मे भेल। राजभाषा विवाद बढ़ल, हिन्दीक संग अंग्रेजी सेहो राजभाषा बनल। मिथिलाक ब्राह्मण लोकनि सामवेद आ शुक्ल यजुर्वेदी रहथि– सामवेदी कौथुम आ यजुर्वेदी माध्यन्दिन। ई दुनू छन्दोग आ वाजसेनयी भेला। जजुआर (यजुर्वेदी शिक्षा), रीगा (ऋग्वेदी शिक्षा), अथरी (अथर्ववेदी शिक्षा), माउबहेट (माध्यनन्दिनी शाखाक शिक्षा), कुथुमा (कौथुमी शाखाक शिक्षा), शकरी (शकारी शाखाक शिक्षा), भट्टसिम्मरि आ भट्टपुर (मीमांसाक भट्ट स्कूलक शिक्षा) आ सामारि सामवेदी शिक्षाक केन्द्र छल। ‘मल्ली’ मैथिलानी जैन लोकनिक एकटा तीर्थकंर भेली। बाइसी-बसैटी, अररियाक मिथिलाक्षर शिलालेख, रानी इन्द्रावती (१७८४-१८०२) जे फूड-फॉर-वर्क आ अन्य कल्याणकारी कार्यक प्रारम्भ केलन्हि केर मिथिलाक्षर अभिलेख एतऽ एकटा मन्दिरक ऊपरमे ताम्र-पत्रपर कीलित अछि.. आब जे ई रानी बोनिहार लेल फूड-फॉर-वर्क चलेलन्हि तँ बसैटीक शिव जी कहाँ बिगड़लखिन्ह... जोड़बामे समए लगै छै, तोड़बामे नै.. खाली एककेँ लऽ कऽ चलब तँ सुविधा हएत, श्रम कम लागत.. लीडरशिप जएबाक खतरा नै रहत.. मुदा सभकेँ जोड़ब तँ दूरगामी हएब.. आब ब्राह्मण समाजकेँ लिअ, सौराठसँ जे लड़का अनै छथि तिनका हेय दृष्टि सँ देखल जाइ छै, सौराठ आब जँ ब्राह्मण समाजक हेबो करतै तँ कतेक गोटेक हेतै.. पंजीकारजीक बेटा पी.ओ. छथिन्ह ओ नोकरी छोडि कऽ पंजीकारी करता आकि हुनकर बेटा करथिन्ह.. राज्यसत्ता दलितक लेल आवास सौराठमे देमए चाहलकै आ ओ सफल नै भऽ सकलै तँ महादेव ठाढ़ छथि??? महादेव स्वयं लोक देवता माने आदिवासी देवता रहथि, इतिहास फेरसँ पढू, से ओ जे ठाढ़ हेबो करथिन्ह तँ अपन भाइक पक्षमे वा विरोधमे? गौरीशंकर स्थान…. ओतऽ पंडित जी बी.डी.ओ. साहेब परमानन्द पासवान जी सँ गप कऽ रहल छला ..परमानन्द पासवान ईमानदार अफसर… एक गोटे पासवानजीकेँ कहलखिन्ह जे अभियन्ता कृपानन्द, जकर स्कॉलरशिपक कागजपर पीअर बच्चा दसखत नै केलकै, बताह छथि तँ ओ कहलखिन्ह जे हँ हमर हाकिम पाइ नै कमाइए तँ बताह आ ओ फलना पाइ कमाइए तँ काबिल। ओही परमानन्द पासवान जीक बदौलत मिथिलाक एकमात्र बिना सरकारी सहायताक स्थल छिऐ ई.. गौरीशंकर स्थान .. पुजेगरीजी हुनका कहि रहल छलखिन्ह जे ऊपरमे जे कनेक मूर्ति फूटल छै तै सँ कताक सप्ताह धरि खून बहि रहल छलै... ओकरा तेलसँ ससारि कऽ कताक सप्ताहक बाद पुजेगरीजी खून बहनाइ रोकलन्हि!!! मुदा असल गप की छै, ओ मूर्ति बोनमे छलै आ ककरो कोदारि लगलै आ फूटि गेलै तँ वएह खोज केलकै..... ई परमानन्द पासवान जीक उद्धार कएल.. आब गजेन्द्र डाक्टर साहेबक योगदान छन्हि, झंझारपुरमे दस टका फीस लै छथि, ५ टका अपन गुजर लेल रखै छथि आ ५ टका गौरीशंकर लेल... गौरीये शंकरमे देखू ने पुजेगरीजी कहलखिन्ह जे गौरीशंकरक माथसँ एक सप्ताह धरि खून बहैत रहलन्हि, पुजेगरीजी मालिस करैत रहलखिन्ह आ एक सप्ताहक बाद जखन गौआँ सभ एला तँ देखलखिन्ह जे महिनाथपुरक ई बतहा पुजेगरी की कऽ रहल अछि, आ लोक सभ सेहो जुमलै... भगवान मदति केलखिन्ह से तँ हमरा नै बुझल अछि मुदा लोक सभकेँ ऐ बातसँ जोश एलै.. आ लोककेँ लीडर भेटि जाए तँ की नै कऽ जाइए.. परमानन्द पासवान एला आ की कऽ गेला कहिये चुकल छी... तीन सए पोखड़ि, पाँच सए इनार, मुदा दलित लेल एक्कोटा इनार नै, मुदा गढ़ नारिकेलमे से राधामोहन राय देलन्हि। गौरीशंकरक कैंपसेमे स्कूल छै, जइमे बगलक दलित बस्तीक नेना सभ पढ़ै छै... हाइ रे परमानन्द पासवान… बगलेमे वैदिक स्कूल सेहो छलै.. सभ हस्त संचालनसँ वैदिक मंत्र पढ़बाक विधि सीखि जर्मनी चलि जाइ गेला.. ताला लागल छै, एक्के कैम्पसमे दुनू भेटत… मुदा तैयो डेवेलपमेंट तँ भेबे केलै.. आ सभ जमीन जाल आसपासक जे रहै, से मन्दिर परिसरमे दलित बच्चा सभक स्कूल लेल स्वतंत्रता सेनानी जागेश्वरक विधवा घेंघी दऽ देलकै। वएह स्वतंत्रता सेनानी जे बाँकीपुर जेलमे अंग्रेज द्वारा मारि देल गेला, हमर संगी। उठला मोहन गबैय्या- ओइ दस्तावेजमे किछु जादू छै- हमरा सभकेँ ओ लेबाक चाही, तखने ठीक मजदूरी हमरा सभकेँ भेटत। जादू!! जादूबला दस्तावेज… दिनमे कौआ देखि कऽ डेराइ, रातिमे नदी हेलि जाइ तैंतीसम कल्लोल अगहन उपास कालक कोन डर गढ़ नारिकेलक मोहन गब्बैय्या। बड़का गबैय्या। सरकारी कार्यक्रम शुरू होइ छै कने देरीयेसँ। गौरीशंकर स्थानमे जखन आस पड़ोसक गामक लोक सभ जुमऽ लगला तखन सरकार सेहो माटिक सड़क बनबा देलक आ जोन मजूर आसपासक गाम सभसँ एतऽ बोनिपर खटऽ लागल। आ बोनि एकदम्मे भेटै। मुदा कतेक लोककेँ कतेक बोनि भेटत से ककरो नै पता रहै। ठेकेदार सभ धाँइ-धाँइ एक्के औँठासँ कतेको लोकक बोनिपर दस्खत कऽ दै। नव-नव कार्यक्रम सभ आएल छै सरकारक। जे भेटै छौ बड्ड भेटै छौ। मोहना- दलित गबैय्या। मजदूरी न्योन दरसँ, सरकारी स्कीममे मजदूरीक दरमे अन्तर किए? कागज नै भेटत, किए नै भेटत? ने कहियो देखल आ नै सुनल, बजा कऽ काज कियो देने छल आइ तक, आ पाइ नकद भेटैए। बेसी मेन-मीख निकालमे तँ जे भेटै छौ सेहो बन्न भऽ जेतौ। एकटा संगठन खुजल छै झा आ यादव बाबू सभक, से धरना देने रहै। असफल रहलै। सभ पोथी पतरामे किछु ने किछु जादू छै। सभ दस्तावेजमे किछु ने किछु जादू छै। हे किछु गप छै। जादू!! मोहन गबैय्याक गप छिऐ बाबू। हमर अधिकार- हमरा की भेट रहल अछि वा भेटबाक चाही, की हक अछि? मोहन गबैय्याक गप छिऐ बाबू, आब जादूसँ आगाँ बढ़ल छै। जीबाक साधन आ ओकर सुरक्षा लेल जन सुनबाहीक प्रारम्भ केलन्हि परमानन्द पासवान, झंझारपुरक बी.डी.ओ. साहेब। सुनबाहीमे तँ सभ मानिये जाइ छलै, ठेकेदार, दलाल सभ। मुदा बादमे फेर वएह होइ छलै। बहन्ना शुरू… आइ कम मजूर चाही। आइ बच्चा मजूर नै चाही। आइ जनी-जाति मजूर नै चाही। आइ पुरुखोमे कम्मे मजूर चाही। ई ठिठरा कमजोर अछि, ई नै चाही। ओ फुलेसरा मजगूत अछि मुदा कोढ़िया अछि, ओहो नै चाही। एतेक काज बाँकीए छै आ मजूर चाहबे नै करी! फेर जन सुनबाही बजेलन्हि परमानन्द पासवान। सभ नेता, ठिकेदार, दलाल; सभ जुटल। बड़ा मारुख सभ। एह परमानन्द पासवान जी, की कहि देलिऐ। अहाँक गप के उठाएत? आहि रे बा!! मुदा फेर वएह; जनी-जाति, कमजोर, बच्चा, कोढ़िया। छोड़; ऐ मोहन गबैय्याक फेरामे पड़ि कऽ भुक्खे मरि जाएब गऽ। मुदा मोहन गबैय्या जे कहलक जे कागज सभमे छै जादू, से! नबी बकस आ ओकर माए। पहिने ईहो सभ धुनियाँ आ जोलहागिरी करै जाइ छल मुदा आब नै। आब नबी बकस राजमिस्त्री बनि गेल अछि। गबैया धरि दुनू गोटा.... मुदा तेँ की, मोहन गबैय्या सन के गाएत ? प्रसिद्ध मोहना- चर्मकार टोलक पिपहीबला। लोक पिपहीबलाक बदलामे गबैय्या कहै छै। हाइ रे हइ। बापो एहने गाबै छलै। तोँ कोना बुझलहीं ? बुढ़ा सभ कहै छथिन्ह। हाइ रे हइ। ई गाम गढ़ नारिकेल, हाइ रे हइ। घर सभ बुझू सुगरक खोभारीये सन। मुदा कोनो खोभारी नै छै जतऽ कोनो ने कोनो कलामी नै रहैत होथि। ई मोहन गबैय्या । बड़का चकरका बान्हपर जे माटि पड़ि रहल छलै तँ ठिकेदार सभ मजदूरी न्यून दरसँ कम सरकारी बोनि दऽ रहल छलै, आने ठाम जकाँ। एह, कहलकै जे। दस्खत आ औंठा। घुटराक औंठा रोशनाइमे भिजले रहै छलै। दे औंठा, दे औंठा, धाँइ- धाँइ घण्टामे तीन सए मजूरक बोनिपर एक्के औंठाक चेन्हासी। सरकारी स्कीममे मजदूरीक दरमे अन्तर किए? मोहन गबैय्या उठा देलकै तान। बड्ड देखलिऐ सरकारी इजलास गौरीशंकर थानपर। मोंछबला सभ ने कनफुसकी करऽ जानै जाइए। ई मोहन से ने तान उठेलन्हि जे की कियो बुझबो केलकै फरिछा कऽ। सभकेँ भेलै जे गबैय्याक तान छिऐ। मुदा ओइ तानमे जे बाबू तागति रहै से परमानन्द पासवान बी.डी.ओ. साहेबकेँ लऽ अनलकै गढ़ नारिकेल। कागज नै भेटत, आहि रे बा। बी.डी.ओ. साहेब तँ तैय्यारे छथि मुदा एस.डी.ओ. तँ जुलुम केलक। मोंछबला सभ कोन कोन झण्डा लऽ कऽ आबि गेल, भूख हड़ताल आ धरना। “मजदूर, किसान, गरीब, भूमिहीन आदि-आदि संघर्ष संगठन”- बाबू बड़बरिया रॉयक धरना असफल। उठला मोहन गबैय्या। दादाके दुअरपर बाजैए बजना उतारब सजना हाइ रे हाइ मोहन । मैया के आसन डोललै हे नबी बकसक माए कत्तऽ सँ नै, हरलै ने फुरलै, आबि गेलै। अम्मा रोबे रोबे ला बहिनियाँ रोबे दुलहिन रोबै हय हाय खटिया के पौवा सैयद जाइ छै आजु दिन लड़ैले हो हाइ हाइ गाछ के रिरितिया रोबै डारीके कोइलिया कुहकै मयुरनी हो हाइ हाइ एकर दिस लड़ै दुनु भैयेँ हो हाय हाय..... गामक स्त्रीगण सभ आबि गेली... बिना तारतमक गीत सभ शुरू, फुसियाहींक घोल फचक्का शुरू भेल। मुदा फुसियाहींक कहाँ रहल ओ.. घर पछुअरबामे बसए मा मलमल सारिया बिसाइ हे सेहो सरिय खरीदऽ गेल बौआ दुल्हा पेहेनिये चललि ससुरारि हे दादा अलारी दादी दुलारु सारी रात हे भरि दिन गमेलियौ दादी रातो चलल ससुरारि हे .... पलंग उछाय हे -ओइ दस्तावेजमे किछु जादू छै। ई की बाजि गेल फेर मोहन गबैय्या। ओइ कागचमे जादू होइ नै होइ, ऐ गपमे बड्ड जादू छै। बाजि गेल कहाँ, बाजिये रहल अछि। -हमरा सभकेँ ओ दस्तावेज लेबाक चाही, तखने ठीक मजूरी हमरा सभकेँ भेटत। कोनो फुसियाहींक जादू-टोनाक गीत फेर शुरू करत ई। काली, बन्दी, गोरैया, बरहम आ बिसहाराक गीत शुरू करत। बिजुबोन शिकार हे एक पूत गेल हे भैरव दुइ कोस गैल बाबू केकर बिजूबोन शिकार हो एक कोस गैल भै दुइ कोस गेलहो बाबू तेसर कोस बिजू बोन शिकार हो एक बोन झोरलओ हो भैर तेसर बोन झोरल हो बाबू तेसर बोन उठल शिकार हो एक बोन झरलहो हे भैरऽ दुइ बोन झोरललऽ ह तेसर बोन उठल शिकार हो कारिया कुकुर हो बिसहर गेलऽ बाबू खोरियेलऽ तेसर बोन एक बोन खोजलहो बिसहर दुइ बोन खोजलह तेसर बोन उठल शिकार हो हरिण हो मरल हो भैरव तितिरो ने मारलऽ हो बाबू बिछि बिछि मारलऽ मयूर हो कहाँ गेल बोन के मयूरनी दाइ कहर ले सेन्दूर गए तितिरो ने मारलऽ हो भैर बिछि बिछि मारलऽ मयूर हो एकबे उमेले भैर सेनूर जे हरि लेल बाबू भेल हो हे, ई गोरिलक गीत गबैत-गबैत मजूरीक गप कखन शुरू कऽ देता से कहब मोश्किल। आ फेर गप उठबे करत, गप अधिकारक। परमानन्द पासवान बी.डी.ओ. साहैब, हाइ रे हइ। बभनीकेँ पुत्र तोहें बाल गोरैय्या, पोथी नेने पढ़न जाइ हे पोथिया नेरौलनि गोरिल जार बिरिछ तर हलुआइ घर पैसल धपाइ हे किछु मधुर खेलनि गोरिल किछो छिरियौला किछु देल लंका पठाइ हे बभनीक पुत्र तोहेँ बाल गोरैय्या ग्वालिन घर पैसल धपाइ हे किछु दूध पीलनि गोरिल किछु ढ़रकओला किछु देल लंका पठाइ हे बभनीक पुत्र तोहेँ बाल गोरैय्या बड़इ घर पैसल धपाइ हे किछु पान खेलनि गोरिल किछु छिड़िऔला किछु देल लंका पठाइ हे बभनीक पुत्र तोहेँ बाल गोरैय्या डोमिन घर पैसल धपाइ हे नीक नीक पाहुर गोरिल अपने चढ़ाओलऽ काना पातर देल हड़काइ हे बभनीक पुत्र तोहेँ बाल गोरैय्या ब्राह्मण घर पैसल धपाइ हे नीक-नीक जनौ गोरिल अपने पहिरलनि औरो देलनि ओझराइ हे हकन कनै छै गोरिल ब्राह्मणीक बेटिया ब्राह्मण बाबू बड़ दुख देल हे भनहि विद्यापति सुनू बाबू गोरिल गहवर पैसिये जस लेल हे -हमर अधिकार। हमरा की भेट रहल अछि वा भेटबाक चाही, की हक अछि। परमानन्द बाबू गपकेँ बुझलन्हि। औ बाबू- “ई अरदराक मेघ ने मानत, रहत बरसि कै” आरसी प्रसाद सिंह आ मोहन गबैया किछु खेला हेबे करत। उम्हर मुसहर टोलीसँ दीना भदरी बाबा आ सलहेस महराज पूजब शुरू भेल। फेर परमवीर, काली, भगवती, कमला, गांगोक गीत शुरू भऽ गेल। हे परमवीर, काली, भगवती, कमला, गांगोकेँ घरमे पूजल जाइ छै, एतऽ कतौ ई गाओल जाइ। दीना भदरी बाबा आ सलहेस महराजक गीत गाबऽ ने, जे बाहरमे गाओल जाइ छै। गांगो गहिल आ जन सुनबाही आ मजूरी! गांगोदेवी के अंगनामे अरहुल के गछिया फर-फूल लोधल ठाढ़ि यै ..राजा सुगा एक आएल बैसल सूगा यै अरहुल फूल गाछ हे बैठल सूगा अरहुल फूल गाछ हे डाढ़िपात केलक क-कचून हे नीक नीक फूलबर सुगबा चुनि चुनि खाय डाढ़ि पात देलक कचून हे कहाँ गेल कियर भेल गाम के बहेलिया मारू सूगा के धनुष चलाइ हे घर से एकसर मरल बहेलिया दोसर मारल तेसर शर सूगा उड़ि जाइ हे घर से बहार भेलि गोसाउन नै मारिय सुगबा के रहत एना सुगबा छोट भाइ हे जौँआ आम दियौ बहेलिया सूगा के केर कान सुगबा सुगा छिऐ छोट भाइ हे जीबाक साधन आ ओकर सुरक्षा लेल जन सुनबाही एस.डी.ओ. शुरू केलन्हि, मोने-मोन तमसाइत। एस.डी.ओ. कहाँदन आइ.ए.एस. छथि, मुदा परमानन्द पासवान, हाइ रे हइ। एस.डी.ओ. हुनका कहबो केलखिन्ह जे अहाँ स्थानीय छी तेँ जखन जे होइए कऽ दै छी, जखन जकरा होइए भड़का दै छी। जन सुनबाहीक प्रारम्भ भेल। मजूरी सभकेँ नीक-नहाँति भेटऽ लगलै। आ ई तखन भेलै जखन सूचनाक अधिकार एतुक्का लोककेँ नै भेटल रहै। २००५ ई. मे सूचनाक अधिकार भेटलै मुदा मोहन गबैय्या जे जन सुनबाही शुरू करबेने रहथि, ओ तँ ऐ सँ पहिनहिये। ओहो तँ सरकारी हाकिमे सभ द्वारा शुरू करबेने रहथि। ई जे सभ ठामक हाकिममे भाव रहितै तँ की दिक्कत रहै। कतेक ठाम कतेक मोहन गबैय्या भेल हेतै आ परमानन्द पासवान सेहो, हाइ रे हइ। आ तखन ई २००५ ई. मे सूचनाक अधिकारमे बदलल अछि। की चाही, समस्त संसार। की छौ जे हेरा जेतौ, गुलामी, जिंजीर, जहल… अगहन उपास कालक कोन डर… चौंतीसम कल्लोल सेर भरि गहूम बरिख दिन खेबै/ पिआकेँ जाए नै देबै हे पहिल पल्लव गढ़ नारिकेल। किशनगढ़मे बसि गेल गढ़ नारिकेल। किशनगढ़ गाम। दिल्लीक पौश एरिया वसन्तकुँजक बगलमे। पाइबला सभ सेक्टरमे रहै छथि आ गरीब सभ किशनगढ़ आ मसूदपुरमे। सेक्टरमे ओतुक्का बसिन्दा सभ कम्युनिटी हॉलमे खैराती हॉस्पीटल खोलने अछि। सेक्टरक पता देलापर फीस देमऽ पड़ै छै। गामक पतापर फीस तँ नहिए देमऽ पड़ै छै, दवाइयो मंगनीमे भेटै छै। बगलमे मॉल अछि। दू तरहक। एकटा सामान्य लोक लेल। आ दोसर डी. एल. एफ. क इम्पोरिया… वसन्तकुँजक नेल्सन मंडेला मार्गपर। असमानता आ अपार्थेइड- छुआछूतक विरुद्ध संघर्ष करऽबला नेल्सन मंडेला। मुदा हुनकर नामपर बनल ऐ मार्गपर बनल ऐ इम्पोरिया मॉलमे लाख रुपैयासँ कममे कोनो समान भेटब असंभव। सभसँ सस्त अछि लाख रुपैयाक स्त्रीगणक लेडीज पर्स। बंगलोरक कस्तूरबा गाँधी मार्गपर शराबक फैक्ट्री आ महात्मा गाँधी मार्गपर बीयर बार सभ। गाइड लोक सभकेँ कहैत अछि- वर शराब बनबैत अछि आ कनिया बेचैत अछि, कारण महात्मा गाँधी मार्ग स्थित ओइ बीयर बार सभमे शराबक बिक्री होइत अछि। तेहने सन कथा अछि नेल्सन मंडेला रोडक। मुदा समाजवाद अछि एतऽ। से पाइ अछि तँ सेक्टरमे रहू आ नै अछि तँ गाममे, दुनु सटले-सटल। जमीनक दलाल एतुक्का सभसँ पाइबला लोक अछि। अपन बिजनेस कार्ड छपबैए ई सभ- रिअल एस्टेट एजेन्ट कऽ कऽ। बगलमे मेहरौली गाम सेहो अछि। माछ मुदा किशनगढ़ आ मेहरौली दुनू ठाम भेटत। दिल्लीक लोक माँछ कम खाइए। अपने दिसुका लोक एकरा सभकेँ माँछ खेनाइ सिखेने छै। आ अही बसन्तकुंज, मेहरौली, किशनगढ़ आ आसपासमे गढ़ नारिकेलक बहुत रास परिवार आबि गेल अछि। ब्राह्मणमे इन्द्रकान्त मिश्रक बेटा उपेन्द्र बसन्तकुञ्जमे अछि। कुञ्जड़ा टोलीक मोहम्मद शमशूलक बेटा इकबाल मेहरौलीमे अछि। धनुख टोलीक भगवानदत्त मंडलक बेटा राजा किशनगढ़मे अछि। धानुक अधिकलाल मंडलक बेटा सुखीलाल डॉक्टर छथिन्ह, रहै छथि बसन्तकुञ्जमे, काज करै छथि कैकटा हॉस्पीटलमे, जेना बत्रा हॉस्पीटल, फोर्टिस, रॉकलैण्ड आ अपोलोमे। मुदा सप्ताहमे एक दिन सोसाइटीक खैराती हॉस्पीटलमे मुफ्त इलाज करै छथि। धोबियाटोलीक डोमी साफीक बेटा ललन बसन्तकुँजमे ठेलापर कपड़ापर लोहा दैत अछि। ओकर कनियाँ बुधनी सेहो घरे-घर कपड़ा बटोरि आनैत अछि आ तकरा लोहा कऽ घरे घर दऽ अबैत अछि। ई सभ मुदा रहै जाइए बसन्तकुँजेमे। कोनो बसिन्दाक दूटा स्कूटरक गैराज किरायापर लऽ लै गेल अछि, एकटामे काज करै जाइए आ दोसरामे रहै जाइए। नौआटोलीक जयराम ठाकुरक माझिल बेटा बसन्त बसन्तकुञ्जक एकटा सेक्टरक सोझाँ गाछक तरमे सैलून खोलि लेने अछि। एकटा कुर्सी लगा देने अछि आ एकटा अएना लटका देने अछि। सोझाँक बजारमे केश कटाइ पचास टका लेत, तँ मुक्ताकाशक ई सैलून पन्द्रह टाकामे केश काटि देत। रहैए मुदा किशनगढ़मे। बीचमे पुलिस तंग केने रहै तँ तीन मास गामसँ घुरि आएल छल। आब मुदा पुलिससँ सेटिंग कऽ लेने अछि। दयाराम रामक बेटा उमेश सेहो ओही मुक्ताकाश सैलूनक बगलमे अपन असला-खसला खसा लेने अछि, रहैए मुदा किशनगढ़मे। चप्पल, जुत्ताक मरोम्मतिक अलाबे तालाक डुप्लीकेट चाभी बनेबाक हुनर सेहो सीखि लेने अछि। कुञ्जी अछि तँ तकर डुप्लीकेट पन्द्रह टकामे। कुञ्जी हेरा गेल अछि तँ तकर डुप्लीकेट सए टकामे। आ जे घर लऽ जेबन्हि तँ तकर फीस दू सए टका अतिरिक्त। बड़ही-कमार टोलक जोगिन्दर ठाकुरक बेटा नमोनारायण अंसल बिल्डर्समे नोकरी करै छथि। किशनगढ़मे मकान कीनि लेने छथि। मुदा ओतुक्का वातावरण देखि दुखी रहै छथि, कारण ओतुक्का वातावरण गामोसँ बत्तर छै। जोगारमे छथि जे कतौ अपार्टमेन्टमे जगह भेटि जाए। आ से कनेक दुरगरो, जेना गाजियाबाद धरि, जेबा लेल तैयार छथि। डोमटोलीक बौधा मल्लिकक बेटा श्रीमन्त सेक्टरक मेन्टेनेन्सक ठेका लेने छथि। हुनका लग दू सए गोटे छन्हि जे सभ क्वार्टरक कूड़ा सभ दिन भोरमे उठेबाक संग रोड आ पार्किंगक भोरे-भोर सफाइ करै जाइ छथि। ऐमे सँ किछु गोटे, विशेष कऽ नेपालक, भोरे-भोर लोकक कारक शीसा महिनबारी दू सए टाकामे पोछै छथि आ अखबारक हॉकर सेहो छथि। रहै छथि किशनगढ़मे मुदा अपन मकानमे। कोइर दुखन महतोक बेटा लखन ठेलापर तरकारी बेचै छथि आ रहै छथि किशनगढ़मे। भुमिहार राधामोहन रायक बेटा बसन्तकुञ्जमे रहै छथि, कन्सल्टेन्ट छथि, डोनेशन बला मेडिकल-इन्जीनियरिंग कॉलेजमे नाम लिखबाबै छथि। सोनार अशोक ठाकुरक बेटा महानन्द सोनाचानीक दोकानमे कारीगर छथि आ रहै छथि किशनगढ़मे । तेली रामचन्द्र सावक बेटा मोहन गुड़गाँवमे फैक्ट्रीमे काज करै छथि, आ रहै छथि किशनगढ़मे। मलाह जीबछ मुखियाक बेटा रवीन्द्र किशनगढ़मे माँछ बेचै छथि आ रहितो छथि किशनगढ़मे । मुसहर बिचकुन सदायक बेटा रघुवीर ड्राइवरी सीखि लेने अछि, बसन्तकुञ्जक एकटा व्यवसायी ऐठाम ड्राइवरी करैए आ रहैत अछि किशनगढ़मे। बसन्तकुंज, मेहरौली आ किशनगढ़ आब गढ़ नारिकेल गामक एकटा छोट-छीन रूप बुझना जाइत अछि। सत्यनारायण यादवक बेटा बिपिन बसन्तकुञ्जक फ्लैटमे रहै छथि। रेलबीक ठिकेदारीमे खूब जथा बना लेने छथि। सत्यनारायण यादव सालमे एक बेर दिल्ली भऽ आबै छथि। बिपिन कताक बेर पिताकेँ एतै रहबा लेल कहनहियो छथिन्ह, माएकेँ सेहो असगरमे कष्ट होइत हेतै। मुदा ने माइये आ ने सत्यनारायणे एक माससँ बेशी दिल्लीमे टिकि सकल छथि। बेटा कहितो छन्हि जे माए, बाबू एम.एल.ए. विधायक बनलाक बादो कटिया, कुढ़िया, फुच्ची आ तिनपइमे लागल छथि। यादव जी ऐठाम उपनयन पहिने जकाँ अलगसँ नै होइए। यादव जी ऐठाम आब उपनयन बियाहे दिन कान्या पक्ष ऐठाम निरीक्षणक बाद होइए। भोला पासवान आ मुकेश पासवान। मुकेश पासवानक समधि बिन्देश्वर पासवानक ददा गढ़ नारिकेलक पुरान बसिन्दा। बिन्देश्वर पासवानक ददाकेँ रोसड़ामे दोखतरी भेट गेल छलन्हि। से ओ ओतै पलायन कऽ गेल छला। भोला पासवान आ मुकेश पासवानक ददा कुशेश्वरस्थानसँ गढ़ नारिकेल आबि गेल छला। मुदा दुनू गोटे एखनो दर्शन करबा लेल सालमे एक बेर कुशेश्वर जाइते छथि। गेना हजारीक वंशजक रूपमे हुनकर ओत्तऽ मानोदान होइ छन्हि। मुकेश पासवानक बेटी मालती आ जमाए मथुरानन्द बसन्तकुञ्ज लग फार्म हाउस लेने छथि आ ओतै रहै जाइ छथि। मथुरानन्द मैथिलीक नीक लेखक छथि आ बसन्तकुञ्जक डी. पी. एस. स्कूलक प्रिंसिपल छथि। मालती बैंक अधिकारी छथि। भोला पासवान आ मुकेश पासवान गामेमे रहै जाइ छथि। गढ़ नारिकेलसँ किशनगढ़ आएल दूटा चिट्ठी। मुकेश पासवानक समधि बिन्देश्वर पासवानक ददा गढ़ नारिकेलक पुरान बसिन्दा रहथि। मुदा फेर ओतऽसँ रोसड़ाक लेल पलायन कऽ गेल रहथि। हुनकर पत्नी अपन बेटाक दिल्ली बसलासँ बड़ दुखी छथिन्ह। आ तकर दोष अपन समधिकेँ सेहो दै छथिन्ह। बिन्देश्वर अपन पत्नी द्वारा पुत्रक नाम लिखल चिट्ठी मुकेशकेँ पठबै छथि। डाक सेवापर हुनका भरोस नै छन्हि। गढ़ नारिकेलक ढेर रास लोक दिल्लीमे रहै छथि, से हथौटी ई चिट्ठी बेटा लग पहुँचि जेतन्हि, तइ द्वारे। दोसर चिट्ठी सत्यनारायण यादवक पत्नी अपन बेटा बिपिनक नामे लिखने छथिन्ह। बरइ कपिलेश्वर राउतक बेटा पालन दुनू चिट्ठी गढ़ नारिकेलसँ किशनगढ़ अनलन्हि अछि। १ पहिल चिट्ठी शुभाशीष। हम एतऽ कुशल छी। अहाँ सबहक कुशलक हेतु सतत् भगवानसँ प्रार्थी रहै छी। आगाँ समाचार ई जे अहाँ सभ हमर खोज खबरि लेनाइ बिल्कुले बिसरि गेल छी। फोन तँ छोड़ू, चिट्ठीयो सँ गप्प केना महिनो बीति जाइत अछि। कमसँ कम सप्ताहमे नै तँ महिनोमे एको बेर तँ माएक लेल गप्प करबाक समए निकालू। एतेक मोटका-मोटका किताब अहाँ लिखै छी, किन्तु माएसँ गप्प करबाक फुर्सत नै अछि। अहाँक किताबक खिस्सा आ कविता सभ दीदी सुनेलक अछि। बहुत मार्मिक लगैत अछि। परन्तु अपन माँक प्रति कोनो जिज्ञासा नै होइत अछि, जे कतऽ रहैत अछि आ कोना अछि। भाएसँ अहाँ अपने समए-समएपर गप्प करू जे हम कतऽ कतेक दिन रहब। गाममे आब हमरा नै रहल हएत, कारण एतऽ कोनो व्यवस्था नै अछि आ कियो जवान पुरुख-पात नै रहै छथिन्ह। अहाँ सभ भाए-बहिनमे छोट छी किन्तु घरमे अहींकेँ घरक व्यवस्था आ इन्तजामक भार शुरुहेसँ अछि। किन्तु इम्हर अहाँ ध्यान नै दै छिऐ। फोनपर अहाँसँ गप्प करबाक बड्ड मोन होइत रहैत अछि। बच्चा सभसँ सेहो गप करबाक मोन होइत रहैत अछि। बच्चा सभकेँ दू-तीन दिनपर बा सँ गप करबा लेल कहबै। जमाएकेँ देखैत रहै छियन्हि जे सभ दू-तीन दिनपर अपन माँ सँ गप करै छथिन्ह, से हमरो सौख लगैत अछि जे हमर बेटा सभ केहेन अछि जे कहियो माँ सँ गप्प करबाक मोन नै होइ छै। सभ कहैत अछि जे अहाँकेँ कोन चीजक कमी अछि, से हमरो चीजक कमी तँ नै अछि मुदा धिया- पुताक प्रेमक हम भूखल छी। पुतोहु अहाँकेँ एखन घरक सभटा काज करऽ पड़ैत हएत। बड्ड मेहनति होइत हएत, मुदा तैयो हमरोपर ध्यान राखब। हम बड्ड घबराएल रहै छी तेँ जे फुराएल से हम चिट्ठीमे लिखा देलौं। अहाँ सभक प्रेमक भूखल- अहींक माँ। २ दोसर चिट्ठी “बेटा, -महींस दूध दऽ रहल अछि, मुदा टोलबैय्या सभ जड़ि रहल अछि।”.. बिपिन चिट्ठी पढ़िते रहै छथि आकि कपिलेश्वर राउतक बेटा पालन बीचेमे बाजि उठै छथि- “अएँ यौ, अहाँक दूध होइये तँ टोलबैय्या सभ किए जड़त? आ से ओ कोना बुझै छथि से पुछियन्हु”। मुदा बेटा —बिपिन- केँ देखू; ओ आगाँ बजै छथि- “अएँ यौ, सएह ने हमहूँ पुछै छी। हमरा दूध होइये तँ लोक सभ किए जड़ैए”? माएपर बेटाकेँ कते विश्वास छै? बिपिन फेर बजै छथि- “से जे ओ सभ मोने-मोने जड़ैए, से हम सभटा बुझै छिऐ”। चिट्ठीमे आर बहुत रास गप छै। “-हमर नैहराक हालति बड्ड खराप। बड़का भाएक बच्चा सभ तँ तैयो ठीके छै, छोटकेक हालत बड्ड दब। मिदनापुरमे क्रेन चलबै छलै। मोन खराप भेलै तँ छह मास गामेमे रहि गेलै। फेर घुरि कऽ गेलै तँ क्रेनपर हाथ थरथराए लगै। हियाउ नै होइ छै। बच्चा सभ टुग्गर जकाँ करै छै। जे कोनो जोगार हुअए तँ देखबै। नै, भाए लेल नै। ओकर तँ आब बएस भेलै, गामेमे रहथि सएह नीक हेतन्हि। ओकर दूमे सँ एक्को टा बेटाक जे जोगार लागि जाइ तँ। बड़का भाउज पहिने माएकेँ देखऽ नै चाहै आ आब छोटकाक सिरपर लागल छै। साझ-सझियामे चौठारी फसिल दैत रहै से तँ बुझलिऐ मुदा आमक मासमे तँ छोटकोक बच्चा सभ कलम ओगरै छै। मुदा आमो चौठारी दै छै, छोटकी भाउज तामसे सेहो नै लेलकै। हम नै किछु बजलिऐ, हमरा तँ सभ कहिते अछि जे छोटकाक पक्ष लै छिऐ, तेँ। -सभ दिल्लीसँ गाम अबैए तँ अहाँक घरक शानक चर्चा करैए, से नीक तँ लगैए, मुदा डरो लगैए जे नजरि ने लागि जाए। आर सभ ठीके अछि। -अहाँक माए। मुकेश पासवानक बेटी मालती आ जमाए मथुरानन्द, वसन्तकुञ्ज लग फार्म हाउस लेने छथि। मथुरानन्द नीक लेखक छथि आ वसन्तकुञ्ज डी.पी.एस. स्कूलक प्रिंसिपल छथि। मालती बैंक अधिकारी छथि। बिन्देश्वर पासवान, रोसड़ा, क बेटा मथुरानन्द। सत्यनारायण यादवक बेटा बिपिन- रेलवे ठिकेदार। सेहो बगलेमे रहै छथि, घरपर आन जान छन्हि। मथुरानन्दकेँ माएक पत्र भेटै छन्हि। एकटा माए-बाप कतेक सेहन्तासँ बेटाकेँ पोसैए। बेटा सेहो पढ़बामे नीक रहै छै। सरकारी नोकरी लेल प्रयत्न करै छै। तैयारीले दिल्ली जाइ छै आ फेर बी.एड. केलाक बाद एकटा एकटा पब्लिक स्कूलमे शिक्षक बनि जाइ छै। ओकर पढ़ेबाक कला अद्भुत छै। जीव-विज्ञान विषयक- प्राणि विज्ञान आ वनस्पति विज्ञान दुनूपर- ओकर अद्भुत नियंत्रण छै। ओइ पब्लिक स्कूलमे ओकर कहलापर मेडिकलक परीक्षा लेल अतिरिक्त कक्षा लेल जाइ छै। ढेर रास विद्यार्थी मेडिकल परीक्षामे उत्तीर्ण होइ छै। आन स्कूलक विद्यार्थी सभ मेडिकल लेल दोसर कोचिंग इन्स्टीट्यूटमे पढ़ैले जाइ छै। ओकर समए खराप होइ छै। परिणाम निराशाजनक होइ छै मुदा ऐ जीव विज्ञानक शिक्षकक स्कूल आगाँ बढ़ि जाइ छै। ओइ स्कूलक शाखा दिल्लीक वसन्तकुञ्जमे खुजै छै आ जीव-विज्ञानक शिक्षक ओइ स्कूलक प्रिंसिपल बनि जाइत अछि। प्रिंसिपलक नाम छै मथुरानन्द। ओकर विवाह नीक घरमे भेल रहै छै। ओकरा संगे रहि ओकर पत्नी सेहो बैंक अधिकारी बनि जाइ छै। मुदा ओ हरा जाइत अछि। माए-बापक सोह बिसरि जाइत अछि। प्रतियोगिताक पाछाँ प्रतियोगी अपन जड़ि बिसरि जाइत अछि आ तखने ई चिट्ठी। माएक चिट्ठी बेटाक नामेँ। ई कोन उपन्यास अछि, कोन जीवन? ऐ नग्रमे कतेक रास बौस्तु आएल अछि, सीमेन्ट, बालु आ मनुक्ख। मनुक्ख जे फैक्ट्रीमे काज करैए। मनुक्ख जे रोड बनबैए, डाक्टरी करैए आ स्कूलमे पढ़बैए। मनुक्ख जे डकैती करैए, चोरि करैए-करबैए, वेश्यावृत्तिमे लागल अछि। ओइ सीढ़ीपर जे स्त्री पाँच सए ईंटा नीचासँ चारि मंजिल ऊपर छतपर लऽ गेल -पचास साठि खेपमे- ओकरासँ पुछने रहथिन- कतुक्का छी अहाँ। ओ किशनगढ़मे रहैत अछि, एकटा बेटा पाँच सालक छै आ एकटा बेटा तीन सालक। ऐ नग्रक अर्थव्यवस्थाक एकटा आर रूप बीयर बारमे नोट फेकैत लोक- नर्तकीपर नोट फेकैत लोक। ईंटाउघनीक रूप, ओकरा प्रति श्रद्धानवत करै छन्हि मथुरानन्दकेँ। मनोरंजन झा ईंटाउघनीपर लिखने छथि, कतेक नीक चित्रण, मुदा ऐ ईंटाउघनी आ ऐ मथुरानन्दमे कोन भिन्नता छै? दुनू दिल्ली आएल अपन रोजगारमे। दुनू अपन गुजर करै जाइ छथि। मुदा ई ईंटाउघनी। कतेक शानसँ रहैत अछि। ककरो रोब-दाब बर्दास्त नै करैत अछि। इज्जत-मान-प्रतिष्ठासँ जीबै अछि। मुदा समाजक व्यवस्थाक चलते ओ दोसर कोनो काज नै कऽ सकत। ओकर बच्चा ठेला चलेतै आकि मथुरानन्द सन बनतै? अवश्य बनतै मथुरानन्द सन... मथुरानन्दक माए-बाप कोन पैघ लोक रहथि! पटवाटोलीक जगदीश माइलक बेटा महेश इस्टीट्यूटो इटालिआनो डि कल्चरा, चाणक्यपुरीमे काज करै छथि। फिरंगी दिल्ली अनलकै आ एत्तै काज धरा देलकै। भोला पंडित कुम्हारक बेटा नवीन, मेहरौलीमे जैन मन्दिरक सोझाँ अपन कलाकृतिक, अपन माटिक मुरुत, फूलक आधुनिक गमला इत्यादिक प्रदर्शन केने छथि। बगलेमे रहै छथि, मेहरौलीक दूधवाली गलीमे। भोला पंडित गामेमे रहै छथि। ओ एक बेर मास भरि दिल्ली रहि नवीनक चाक सभ सुढ़िया आएल छथि। इहलोकक ब्रह्माक चाक बहैत अछि चक्र सिद्धान्तपर आ झोकुआ आबामे पका कऽ निर्माण करै छथि माटिक मुरुत। हँ परलोकक ब्रह्मा माटिक मुरुतमे प्राण भरि दै छथि मुदा से ने भोला पंडित कऽ सकै छथि आ ने नवीन। मटकूड़, कौरना, छाँछ, कसतरा बनबै छथि। अथरा, मसल्लाक लेल लगजोड़ी, लबनी, रीझम, सोबरना, भरुका, फुच्ची, तेलहण्डा, खोला, सिरहर, पुरहर, लगहर, अहिबातक पातिल, दीयठि, बौरकी सभटा छिड़ियाएल रहै छन्हि घरमे। मुदा एकोटा इम्हर-उम्हर भेने भोला पंडित भनसिया घरवालीकेँ टोकि दै छथि। मुदा नवीनक प्रति भोला पंडित कनेक सशंकित रहै छथि। ओ एतेक सतर्क रहै छै मुदा तैयो मुरुत टुनकाह भऽ जाइ छै। बासन सभ नोनिआय लगै छै, झरऽ लगै छै। बासू चौपाल खतबे। भार-माँछ उघै छथि। बेटा सुरेन्द्र गामेमे रहै छथिन्ह। बासू चौपालक डील-डौल बेस भरिगर। तेहने जबरदस्त मोँछ। से आसपासक सभ रामलीला मंडली रावणक पात्र लेल हुनका लेबा लेल उपरौंझ करैत अछि। चलित्तर साहू आ लड्डूलाल साहू हलुआइ। चलित्तर साहूक बेटा सुरेश कुतुबमीनारक सोझाँ पर्यटक सभकेँ किसिम-किसिमक मिठाइ, सिरनी आ गुलाब रेउड़ी बेचै छथि। सुरेश अपन डेरा मेहरौलीमे रखने छथि। भोरे तरौनीपर खोंइचा राखि मिठाइ बेचऽ लगै छथि। चलित्तर साहू आ लड्डूलाल साहू लेटनामे मैदानी भरि डालडामे खसा जिलेबी बनबैत दुर्गापूजाक मेलामे देखा पड़ि जेता। हँ, डालडामे गाएक चर्बीक हल्ला १९८३-८४ साल भेल, ओइ बेर घीमे जिलेबी छानि सभकेँ देलन्हि। ककरो ओइठाम बियाह-दान, उपनयन, एकादशी उद्यापन आदि जखन होइत अछि तखन चलित्तर साहू आ लड्डूलाल साहू राखल जाइ छथि, भमकौला चूल्हि जमीनपर कोड़ि हप्ता दिन काज करै छथि। कोइयासँ जिलेबी छानैत, झाँझसँ बुनिया आ सचबासँ मारते रास पकमान छानैत। लछमी दास, ततमाक बेटा रामप्रवेश गामेमे छन्हि। सूरी शिवनारायण महतोक बेटा प्रशान्त बसन्तकुंज दिल्लीक डी. एल. एफ. इम्पोरियामे काज करै छथि आ अपन दोकान खोलबाक मन्सूबा रखने छथि आ बगलेमे किशनगढ़मे रहै छथि। राति-दिन अपन दोकानक जोगारमे लागल छथि। शिवनारायण गामेमे कनियाँ संगे रहै छथि। घरक दलानबला कोठलीमे दोकान खोलने छथि, गौआँक छोट-मोट दैनिक आवश्यकताक पूर्ति करै छथि। लाल कुमार राय, कुर्मी। हिनकर बेटा सुमन आइ.ए.एस. परीक्षासँ एलाइड सर्विस उत्तीर्ण छथि आ बसन्तकुंजमे सरकारी क्वार्टर भेटल छन्हि। लाल कुमार गामेमे रहै छथि, नीक चास-बास छन्हि। सत्यनारायण कामत, किओट। बेटा मदन बसन्तकुंजक बिगबजार मॉलमे गार्ड छन्हि आ किशनगढ़मे रहै छथिन्ह। सत्यनारायण जीक पुरखा दरभंगाक जमीन्दारक ऐठाम रक्षक छला रामदेव भंडारीक बेटा श्यामानन्द बिगबजार मॉल, बसन्तकुंजक के.एफ.सी. (केनटकी फ्राइड चिकन) दोकानमे काज करै छथि, चिकन एक्सपर्ट छथि। रहै छथि किशनगढ़मे। रामदेवजीक पुरखा दरभंगा जमीन्दारक समएमे ओतऽ भनसियामे काज करै छला। कपिलेश्वर राउत आ रामावतार राउत, बरइ। । बरइ कपिलेश्वर राउतक बेटा पालन पानक गुमटी खोलि लेने छथि, वसन्तकुञ्जक मुक्ताकाश सैलूनक बगलमे। बिहारक लोकक पान खेबाक आवश्यकताक पूर्ति लेल। रहै छथि किशनगढ़मे । कपिलेश्वर आ रामावतार राउत बरेबमे अक्सरहाँ भेटि जेता। सपुराक बगलमे टहलैत। खरहीक इकड़ीपर पानक गछौठौन करैत। मटोरिमे माँटि राखि सपुरामे पानक जड़ि लग माँटि दैत। नौआटोली तेरह घरक। बड़ बजन्ता सभ। कमाइलक लिस्ट लऽ कऽ भरि साल तगेदा करैत रहै छथि। दुर्गापूजामे जे बाहरी लोक अबै छथि से कमाइल बिना देने घुरि नै पबै छथि। पहिने हप्तामे एक बेर दलाने-दलाने केश काटैले जाइत रहथि मुदा आब जिनका केश कटेबाक छन्हि से आबथु हमर दुअरा। हँ, बर-बरियाती जेबाक हएत तँ से सालमे एकाध बेर टोलक कोनो दलानपर चलि जेता। मुदा सेहो एके ठाम। जिनका कटेबाक हेतन्हि पंक्तिबद्ध भऽ बैसथु। ई नै जे क्यो अखन आबि रहल छी तँ क्यो तखन आबि रहल छी। आब हिनकर सभक घरसँ एक-एक गोटे झंझारपुरमे सेहो सैलून खोलि लेने छथि। सैलून कोन, एकटा प्लास्टिक पटरी कातमे ठाढ़ कऽ देने जाइ गेल छै? नहरनीक प्रयोग तँ बन्ने भऽ गेल अछि। नह अपना-अपनी कऽ काटै जाउ। छुतकामे बौआसीनक आंगुर कनियाँ आबि कऽ काटि देत, बस। आ पिजेलहा अस्तूरासँ दाढ़ी काटबा काल जे खून खसि रहल अछि से कोनो हम छह मारि देने छी। फोँसरी रहए। नै बाबू, टोपाजबला अस्तूरा झंझारपुरक सैलून लेल छै। विद्यापति हिनके सभक रहथिन्ह मुदा बादमे बाभन सभ ओकरा पाग पहिरा कऽ छीनैक प्रयास कऽ रहल छन्हि, ऐ गपपर सभ एकमत छथि। इम्हर गढ़ नारिकेलमे कुसियारक खेती शुरू भेल अछि, बलाठ-रामपट्टी बला सभक देखादेखी। लोहट चीनी मिल बन्द भेलापर इलाकाक सभ गाम कुसियारक खेती बन्द कऽ देलक मुदा बलाठ बला सभ नै। रामपट्टीमे सरौता, चक्कू, कत्ता सभक कारीगर तँ बलाठ कोन कम। गौँआ सभ अपना ईलमसँ गुड़ बनेनाइ शुरू कऽ देलन्हि। इलाकामे बलाठक गुड़ बिकाए लागल। आब गढ़ नारिकेलक किछु गोटे ई काज शुरू केने छथि। सेर भरि गहूम बरिख दिन खेबै पिआकेँ जाए नै देबै हे मोहन गबैय्या ओही गुड़क फैक्ट्रीमे आबि गेल छथि। गीत गबैत रहै छथि। लोक सभ अबैए आ देखैए मोहन गबैय्याकेँ। इनार सभ भथम भऽ गेलै, एकाध टा बचल छै। चप्पाकल सभठाँ गरा गेलै। पहिने लोक चप्पाकलक पानिक अछिंजल नै लै छल, कारण चमराक वाशर रहै छलै, इनार पोखरिक पानिये अछिंजल बनै छल, मुदा आब से नै छै। कहाँदनि प्लास्टिकक वाशर लागै छै चप्पा कलमे। अगरमस्तगाछ छोट आ पात मोट होइ छै आ पानि भरल रहै छै, कटलापर एकर रस लगेलासँ खून बहनाइ रुकि जाइ छै। अण्डी, अड़हुल, अरिकंचन, आक, कटहरी चम्पा, कदली पुष्प, करोटन, कल्पनाथ, कुम्हर, केराक घौर आ केराक कोसा, खोखस गुलदाबदी, घ्यूरा, चन्द्रकला, चिरचिड़ी, जटाधारी, जोम, जिलेबी, तग्गर, तुलसी, कोका, भैँट, थलकमल, धथूर, नेपाली तुलसी, पसीझ, पोरो साग, मलकोका, मोती झाबा, राजा-रानी साग, लक्ष्मण-बूटी, लताम, शनि, संझा, सजमनि, सिङगरहार, हरदि, अनानास। आम गाछक शीलमे सारील नै होइए। खजूरक गाछक फड़ खाएल जाइए आ रसकेँ ताड़ी कहल जाइए, तारी पीलासँ निशाँ लगैए। खजूर गाछमे तारी चुऔलहा खातल चेन्ह। खजूर गाछमे पीपड़ आ बर जनमि गेल अछि, कहल जाइए जे ई दुनू कतौ जनमि सकैए। मुदा गढ़ नारिकेलमे एक्कोटा खजूरक गाछ नै भेटत। कदमक फलसँ तरकारी, अचार, चटनी इत्यादि बनैए आ खाएल जाइए। गुल्लैर गाछ, फड़क तरकारी बनैए, दूधक रबड़ बनैए, नवजात शिशु लेल दूधक दवाइ रूपमे किछु काज अबैए, पात बकरीकेँ बिएलापर खुआएल जाइए, तखन बकरीकेँ जल्दी दूध उतरैए। चाफ बाँस। तीन फेरा आमक गाछ। डोमा बम्बै आमक गाछ नव आएल अछि गाममे। तुईन, एकर फड़ मासिक अनियमितता आ ल्युकोरिया बेमारी पीस कऽ पीलापर ठीक भऽ जाइए। तेतैर गाछ, नारिकेल, नीम। पीठारीक लकड़ीसँ सलाइक काठी बनैए। पीपड़ गाछक छालक उपयोग खुरहा बेमारीमे कएल जाइए आ एकर फड़क दवाइ बनैए। पीपड़ गाछ, बर गाछ। बर गाछमे फड़ैए बर मुदा खाएल नै जाइए। बरहरक लकड़ी उपयोगी होइए आ फड़ खाएल जाइए। मिरचाइ। मौह गाछ। मौह गाछक लकड़ी बड नीक होइए। एकर फड़क तेल बनैए आ फड़ खाएल जाइए। सरपतक उपयोग टाट-फड़कमे होइए आ ई जारैन सेहो बनैए। सीसोक शीलमे सारिल बहुत होइए। हुरहुर, सीता सोहागो। खरही, टाट-फरक आदिमे उपयोग होइए। पानक लत्ती खरहीयेपर लतरैए, उपयोग बरैबमे देखल जाइए। कदम गाछ, अजमइन, आदी। इंग्लिश बबुल गाछ। ओल गाछ, कटहर गाछ, कदम गाछ, कनैल फूल, कास, कुम्हर, केक्टस, केचली, केरावीर, केसौर, करबीर, खरही। गाछबला सजमनि, टाभनेबो, अरड़नेबा, बेल। गुलाब फूलक नव कलशल डारि। गुलेच। गुल्लरि गाछ आ फड़। गेन्हारी साग, घ्युरा। चाँदनी फूल। चिचोर चौरीमे होइए। छतबन। डारिमे लुधकी लागल धातरीम। तिलकोर फड़, पकलापर लाल भऽ जाइए, सुग्गाकेँ खाइले देल जाइए। दुधिया गाछ बाबासीरमे फैदा करैए। धथुर गाछ। नीम गाछ, एकर छाल आ पातसँ छनका बना कऽ पीलो जाइए आ घा-घोसकेँ धोलो जाइए। नेपाली तुलसी। परोर। पसीझ गाछमे काँट होइत अछि। पानिक केसौर चौरीमे होइए। पुदीना पातक चटनी बनैए, सरबत बनैए, पात पीस कऽ पीलापर पेटक गैस कम होइए, पेटक पथरीमे उपयोगी। कुरथी दाइल भट्टा संगे बनेलापर स्वाद अबै छै। एकर उपयोगसँ पथरी नै होइ छै। बगहन्डी। बाँसक ओइध। बैजन्त्री। कटहरबा, केरबा फूल। आब एकटा मनी प्लान्ट आएल छै, कियो कहैए ई लगेलासँ पाइ अबै छै, कियो कहैए पाइ बिलाइ छै। मेहदी पात, आरिपर राहैर दालिक गाछ। लत्तीमे फड़ल तिलकोर। ललका पातबला करोटन आ हरियर पातबला खम्हरूआ। श्याम तुलसी पातक छनका सर्दीमे फएदा करैए। सम्मी। सरीफा, सागबान पात। साहोर गाछ, एकर डाढ़िक दतमैन बनैए। कहल जाइए जे साहोर गाछपर ठनका नै खसैए, ठनकाक अबाजपर लोक बजैए, साहोर-साहोर। साहोर गाछमे वृद्धि बहुत कम होइए। नबका सेब गाछ आ सफेदा-यूकेलिप्टस। अंग्रेज फिरंगी महिलाक आनल कुम्ही, केचली फूल। फरहद गाछ, फरहदक डारिक टुकड़ी मालक गाड़ामे बान्हि देने पील मरि जाइए, भागि जाइए। मेनागोबी, गाए-महिंस जँ समएपर पाल नै खा रहल अछि तै स्थितिमे गरमाइ लेल ई पात खिऔल जाइए। अर्जुनक गाछ, ऐमे फड़ होइए। बैर। सदाबहार, डायबिटीजक रोगी एकर पात पीस कऽ पिबै छथि। जोमक आँठीक आँटा खेलासँ सेहो डायबिटीजक रोगीकेँ फएदा होइ छन्हि। चिचोर, मिथिलाक अधिक जमीनमे होइबला अनेरुआ पौध। पानिक केशौर। अम्मट अखनो बनैए। गढ़ नारिकेलमे ई सभ अखनो छै… बलाठमे नै.. मोहन गबैय्या गढ़ नारिकेल अबैत-जाइत रहै छथि। बाढ़ि कहाँ खतम कऽ सकलै ऐ गाछ-पातकेँ। एगच्छा लग कने जमीन खेतीबला छै। गहुमक खेती से शुरू भऽ गेल अछि। अखनो खेतीक वएह तरीका.. मुदा कृत्रिम कऽ खाद देलेटा जाइ छै। जहर देल जाइ छै खेतमे.. सुरजू भाइ गोबर दै छथि तँ तीन मोनक कट्ठा होइ छन्हि, मुदा चारि बजे भोरसँ जे ओ उघै छथि, ओतेक मेहनति के करत.. जोड़ा बड़द हर, ईश- हरमे जोड़ि कऽ पालोमे बान्हल जाइ छै। लगना, पालो- कन्हापर, पालोमे दू टा कनैल दुनू बगल बड़दकेँ एने- उने नै हेबऽ दै छै। कनैलसँ हटि कऽ एक सवा फीटक डोरी बान्हल जाइ छै। समैल (पौन फीटक लकड़ीक/ बाँसक) मे डोरी बान्हल जाइ छै। ईशक नीचाँमे पेटार ईशकेँ खुजऽ नै दै छै, ऊँच-नीच करऽ दै छै। हलमे पुट्ठी, नीचाँमे दू-फीटक अगल फल्ली पुट्ठीमे सेट कएल जाइ छै, माटि उखाड़ै छै। परहत (लगना)- हरवाह ऐपर हाथ धरैए। तीन फीटक/ ६ इन्चक मुट्ठी पकड़ैबला लगनामे ठोकल जाइ छै (मुठिया)। नाधा- पालो-ईशमे बान्हिकेँ जोड़ल जाइ छै, डोरी होइ छै ४-५ फीटक। दू टा मैडोर (डोरी)- १०-११ फीटक दू टा- एकरा चौकीमे बान्हि कऽ बड़दमे बान्हि कऽ हरवाहा चौकी दैए। चौकी- (बाँस/ लकड़ीक) ६-७ फीटक - ऐपर हरवाह चढ़ि कऽ चौकी दैए। हरवाहाक हाथमे एक टा झूर/ ज्वोली/ लाठी बड़द हाँकै लेल रहैत अछि। गहूमक जोताइ ३ इन्च गहींर कऽ ४-५ टा चास दऽ होइत अछि। मक्कइ लेल ४-५ इन्च गहींर करऽ पड़ैत अछि। बीया- एक एकड़ (१०० डिस्मिल) मे २ मन गहूमक बीया, १० किलो मक्कइक बीया। खाद- एकड़मे २० कि. डी.ए.पी., ५ किलो पोटाश, ५ किलो यूरिया, ५ किलो जिंक गहूम बाउग करबा काल देल जाइत अछि। मकइमे डेढ़ सँ दू फीटक भेलाक बाद माटि चढ़ाओल जाइत अछि। २ कतार २ फीट चौड़ाइसँ। एकड़मे २ क्विंटल खाद देल जाइत अछि। १०० किलो डी.ए.पी., ५० किलो यूरिया, २० किलो साल्फिक, १२० किलो पोटाश, १० किलो जिंक। पानि पटवन समएमे खाद दऽ कऽ माटि चढ़बै छिऐ, फेर पानि पटबै छिऐ। पानि पटेलाक बाद यूरिया एक एकड़मे एक क्विंटल देल जाइत अछि। तर-तरकारीक प्रकार सिंघिया करैला- बड़ा- हाइ ब्रेक/ प्लेन। छोटकी करैला- हजरिया/ जुल्मी। सफेद करैला- पटनिआ (नजली- मध्यम खुटक)। तारबूज नामधारी-स्वादिष्ट- भीतरमे लाल, ऊपरमे सफेदी/ चितफुटरा (हरियर-उज्जर)। माइको- हल्का कारी। पहुजा- माइकोसँ बेशी कारी। राजधानी- कारी रंगमे। महाराजा- पैघ छोट कारी रंगमे। सैनी आ सुगरदीबी- कारी रंगक। नाथ- हल्का चितफुटरा (उज्जर/ हरियर)। गंगासागर- कुम्हर जकाँ उज्जर साफ। सोरैय्या- चितफुटरा। खीरा- जुल्मी- छोट। हाइब्रीड। माइको- नमगर/ हरियर/ पीअर। महाराजा- खीरा, खेतीबारी- हरियर रंगक, नमगर कम, पाछाँमे मोट बेशी आगाँ कम। माङुर, सौरबचबा, इचना, कमल काँट, कोतरी, गरचुन्नी, गैंची, छही, गरै, नैनी, पोठी, बिकेट, बुआरी, भुल्ला, कौआ, डेढ़बा माँछ। भुन्ना, गैंची (गैंचा), कबै, टेंगरा, पोठी, इचना (झींगा), सौरा, सिंगही, मांङुर, चेंङा, बचबा, छही, डेढ़बा, मारा, कोतरी, काँटी, खुरसा, नैनी, ढल्लै, रेबा, लप्ची, भाकुर, गोलही, दरही, बुआरी, भोंरा, तोर, हिलसा, पतासी, चन्ना, बगहरि, बमौच, चेलहा, सूही, सिल्बर काप, कोमल काप, बिकेट, चेल्हबा, रेहु, भुनचट्टी, भुल्ला। बाढ़ि कहाँ खतम कऽ सकलै ऐ पानिक माँछ सभकेँ। तड़ल चेचरा पलै रान्हल झोरसँ बहल तेल यौ पूस हे सखि अन्न नबका, रान्हल माघुर माछ यौ दुइ मिलि हम पलै रान्हल, आब ने बाँचत प्राण यौ माघ हे सखि जाड़ भारी, रान्हल माघुर माछ यौ दुइ मिलि हम पलै रान्हल, आब ने बाँचत प्राण यौ फागुन हे सखि आबि पहुँचल, आयल पछबाक ओर यौ सेदैत मारा आगि लागल आब नै बाँचत कौल यौ चैत हे सखि रोग चहु दिससँ, रूप नाना धराय यौ तरै भुटनी सोन्ह रान्हल, वैद करथि दवाइ यौ मास हे सखि आबि पहुँचल, आयल मास बैसाख यौ गेल रुचि ओ प्रेम माछसँ आब नै किछु चाही यौ जेठ हे सखि आबि पहुँचल रान्हल भाकुर माछ यौ दुइ मिलि हम पलै रान्हल आब नै बाँचत प्राण यौ मास हे सखि आबि पहुँचल आयल नवल अखाढ़ यौ आम दय-दय सौर रान्हल झोर भेल बड़ गाढ़ यौ सावन हे सखि सर्व सुहावन रान्हल टेंगरा माछ यौ दुइ मिलि हम पलै रान्हल आब ने बाँचत प्राण यौ भादव हे सखि झिंगा रान्हल संग कोतरी माछ यौ आसिन हे सखि मूर रान्हल गर्म लेल प्रसाद यौ कातिक हे सखि आबि पहुँचल गरै गैंचा माछ यौ गेल रुचि ओ प्रेम माछ सँ आब नै किछु चाही यौ पानिमे अड़कि गेल, बाहर तड़पि गेल बैसल तराजूमे, हाटपर ससरि गेल गरै गंगा कबै काशी, खाइ तँ वैकुण्ठवासी। माघ मास जँ गैंची खाइ, ससरि फसरि वैकुण्ठे जाइ। जेठक गोआरी, माघक बोआरी... सभ केँ पैर नै लगै छै... भुल्ला माछ कबै के झोर, तै लऽ भुल्ला कण्ठी तोर बिनु सरिसो कऽ माछ नै, बिनु धोधि कऽ सेठ माघ मास जँ माङुर खाइ, ससरि फसरि वैकुण्ठे जाइ। रोहूक मूड़ा भुन्नाक पेट सीरा खाय मीरा, पुच्छी खाय गुलाम। साओनक साग, भादवक दही, आसिनक ओस, कातिकक छही -बचले रही। लगेमे बीरपूर भूलि गेलिऐ जनकपुर, एतेक बड़का कोशी कतऽ गेलिऐ पैसी। कहत कबीर सुनो भाइ सन्तो माँछ बिना केकरो नै बनतौ मरुआ रोटी, मारा माछ घोंघीक मांसक तीमन खाएल जाइए, उसीन कऽ सुरका बना सुरकलो जाइए आ कोनो बर्तनमे राखि पाँच-सात घंटा बाद छुटलाहा पानिकेँ ममरखामे धिया-पुताकेँ पिऔल जाइए आ सुलबाइमे सेहो फएदा करैए। काँकोर। डोका। मुदा डकही पोखरिक मछैर बन्न भऽ गेलै। बाढ़िक कारण माछ सभ भागि जाइ से गौँआ सभ ओइमे मखान धऽ देलकै। आ मखानक खेती भेल तँ पोखरिमे माछ खतम। मास हे सखि सरस अगहन भूजल चूड़ाक संग यौ तरल चेचड़ा माछ मुरमुर लागय मोन भरि भंग यौ पूस हे सखि अन्न नवका संग माघुर झोर यौ कबइ कुरमुर दाँत दबैत करय जन जन शोर यौ माघ बदरी जाड़ थर-थर काँपय तन बड़ जोर यौ सुख बोआरी खंड लखि कय मनविनोद विभोर यौ बढ़ल स्वादक माछ टेंगड़ा रान्हल सानल भात यौ चैत हे सखि रोग सभदिन रूप नाना देखि यौ तरल भुन्ना पलइ राखल खाइत बड़ सुख लेखि यौ मास हे सखि आइ पहुँचल गरम बड़ बैसाख यौ गेल मन रुचि माछ गागर खंड सभ दिन चाख यौ जेठ हे सखि हेठ बरखा मुण्ड भाकुर पात यौ पड़तु बिसरतु आबि ससरतु करू नवका भात यौ मेघ सखि बरसय अषाढ़क जत रसालक डारि यौ तोड़ि काँचे आम-आमिल देल सौरा पाल यौ मास हे सखि आओल साओन भरल अण्डा घेंट यौ तरल दड़ही माछ मारा खाथि भरि-भरि पेट यौ भादव इचना भेटल कहुना खाय भरलहुँ कोठि यौ मास आसिन देव पूजा शंख घंटा नाद यौ रान्हि रहुआ माछ बैसब पूर्ण भेल परसाद यौ मास कातिक बारि मड़ुआ बड़ तरल अपूर्व यौ पूरल बारहमास हरिनाथ गाओल सगर्व यौ कबीरो कहै छथि- मड़ुआ मीन कऽ संग हो कहि गेल दास कबीर सब संतन मिलि खाउ, निर्मल होए शरीर दरही दया काया अति पाचक पोठिया प्राणाधार नैनी नाम नारायण कऽ सउरी संत उदार ढलै बच्चा जनकपुर तीरथ, कबै करबद्ध काशी झिंगा जल प्रयाग महातम सिंगी मथुरा बासी कुरसा सँ कुरुक्षेत्र द्वारिका, मथुरा स्वर्ग समान रहु, रेवा, टेंगरा बुआरी, गैंची पढ़ै कुरान भाकुर ठाकुर भवसागर उतरै चेल्हवा चढ़ै विमान सभ तीरथमे मछरी दान तकरा मिलै गंग असलान जगफल जगदम्बा करै उद्धार सभ मिलि खाउ संसार रहू मूड़ामे जँ पड़ै तेल स्वर्गहु जीतय इन्द्रकेँ ठेलि ताहूमे जे आमिल पड़ै की काशी जे घरे तड़ै माँछ वंशीसँ सेहो मारल जाइत अछि। छोट माँछक लेल जाल- भौरी जालक प्रयोग होइत अछि। भिरखा हाथसँ उठा कऽ फेंकल जाइत अछि। ऐमे सूत आ लोहाक गोली प्रयोग होइत अछि, २५-२५ ग्रामक लोहाक गोली लगभग २-१/२ सँ ५ किलो धरि प्रयोगमे आनल जाइत अछि। अन्ता जाल छोट होइत अछि आ कछारमे रातिमे लगाओल जाइत अछि। कोठी जाल पैघ होइत अछि आ ऐमे बाँसक प्रयोग होइत अछि। बिसारी जाल दिनमे माँछ हरकि जेतै से रातिमे खुट्टी लगा कऽ रातिमे माँछ मारल जाइ छै। चट्टी जाल- प्लास्टिकक, पैघ-छोट दुनू, दिनमे प्रयुक्त, आषाढ़-साओन दुनू मे, ५-१० मिनटमे उठाएल जाइ छै। सूतक मोट पैराशूट जाल, सूत आ नाइलनक मिश्रणक करेन्ट जाल, सूतक बड़का हाटा जाल होइ छै। पैराशूटसँ छोटकी माँछ उड़ि जेतै। पैघ मछली बड़का वंशीसँ, बड़का चट्टी जालसँ, सूताक महाजालसँ मारल जाइत अछि। पैघ छोट दुनू माँछ बाँसक जंघासँ मारल जाइ छै। एकरा ४ हाथ खड़ा नारियल आ नाइलोनक डोरीसँ बान्हल जाइ छै। बाँसक करचीक छीपसँ सेहो माँछ मारल जाइ छै। पटुआक सण्ठीक १००-२०० पुल्ली एक संग लगा कऽ सेहो माँछ मारल जाइ छै। हाटा जाल किलोमीटर धरि पैघ होइत अछि आ सूताक बनैत अछि। चाँच कहड़ा बाँसक होइत अछि। धार/ बदहाल घेरकेँ मारल जाइत अछि। पानिकेँ फुला कऽ डगरी लगाएल जाइ छै, चाँच फहड़ासँ घेरल जाइत अछि। डाँरा मछली (डेरका मछली), मूँहा मछली, पोठी, लत्ता (पिआ माँछ), गड़इ, पलवा, टेंगड़ा, सिंघी, मांगुड़, चपड़ा, पैना, रेवा, गड़ही, उरन्था, मोहुल, बुआरी, बामी, बगहार, चेलवा, कौअल, गोर्रा, सौल, भौरा, कजाल, कलबौस, चित्तल, भोइ, कत्ती, भौकुड़ी, सिलोन, रेहू, मिरका, बिलासकप, सिल्वरकप, चाइना माँगुर, कबइ, चाइना कबइ। दरबा- छोट, पातर- २-३ इन्चक, पीठपर कारी, बगल सफेद। गड़इ- कारी, चोपड़ा- चाकर, कारी, मलिन; पलबा- दुनू दिस काँट, पीठपर सेहो काँट, रंग- पीअर-उज्जर, मोँछ सेहो होइ छै। टेंगड़ा- पैघ माँछ, एकरो तीन टा काँट, मुँहपर मोँछ। सिंघी- पातर, दू टा काँट दुनू दिस, लाल रंगक आ लाल आ हल्का कारी मंगुरी- मोट आ महग सेहो। एकरो दू टा काँट, लाल आ हल्का कारी पैना- सफेद रंगक, पीठपर काँट रेवा- सफेद, पौआ-आधा किलोक। डढ़ी- पीठपर काँट, सफेद। उरन्था- पीठपर काँट, नीचाँ गामे झुकल, सफेद। भालु- लम्बाइ मुँह, सफेद- खड़ा (पीअर), ऊपरमे काँटा, नाभिक लग काँट (सभ माँछमे)। बोआली- पैघ मुँह- २० किलो धरि, सफेद, पीठपर काँट, पखना दुनू दिस (सभ माँछमे)। बामी- लम्बा, बिलमे रहैत अछि, मुँह आगू, गोल मुँह, सूआ जकाँ लम्बा, पीठपर काँट, नाभिपर दू टा काँट। बघार- छोट, १ पौआसँ क्विंटल भरिक, कारी-खैरा (पीअर), काँट- पीठपर एकटा, बगलमे दूटा, पुच्छी-चाकर, मुँह चापट, चकड़ाइ- बेसी। चेलबा- उज्जर, काँट नै होइ छै, चलैक लेल दुनू दिस पखना, माँछमे तेजगर। कौअल- सफेद, मुँह नमगर। गोर्रा- मोँछ, दाढ़ी, काँटा, आगाँमे टेढ़। साउल- लाल आ पीअर, नमगर, २-३-५ किलोक। भौरा (गजाल), साउल, चितफुटरा, पैघ २०-२५-४० किलो तक, गोल-गोल उज्जर, हरियर आ कारी। कलबौस- रंग हल्का कारी। अंदाजी माँछ। चित्तल- चकरगर बेसी, २०-२५ किलोक, २-३ फीट चकरगर। सिलोन- पालतू, ३-४ किलोक, पोखरिमे पोसल जाइत अछि। रोहु-पीअर, हल्का उज्जर, पीठपर काँट। मिरका- हल्का लाल सफेद। सिल्वरकप- पालतू। चैना मांगुर- चलानी (पालतू), दुनू दिस काँट। चैना कबइ- पालतू (चलानी), पीठपर जहाँ-तहाँ काँट। कबइ- कनफर आ पीठ दुनू ठाम काँट। चेंगा माँछ- सुखायलोमे दूर धरि चलि जाइत अछि, कबइ जकाँ। किछु दोसर जलजीव- सौंस- पानिमे माँछ खाइत अछि, आदमीकेँ नोकसान नै, आदमी संगे खेलाइत अछि, सीटीक अवाज (डोलफिन)। घड़ियाल- कुर्सेला लग गंगामे, मुँह लम्बा, एक-डेढ़ हाथ, दाँत- आंगुर जकाँ, रंग लाल, पुछरी नमगर, ३ हाथ । बोँछ- आदमीक रंग रूप, कारी, माथपर चूल- केश पकड़िकेँ डुमा दै छै। मुदा आंध्रासँ ट्रकक ट्रक माँछ उतरैए। अरसी- माछ फसबैबला अखनो अछि। ऊखरि। अखनो अछि। कल्टी हरसँ खेत अखनो जोतल जाइए। कोथी सहत आ गोजी, माछ मारैबला कोथीबला सहत। फीता, परकाल आ गुनियाँ स्केल सभसँ, जिंजीर, गंडरीसँ आ कगचिया पेन्शिलसँ गुल हसन जमीन नाप करैत रहै छथि। लोहाक बाढ़नि सन गोजीसँ माछ मारैए, हफ्फा आ टाइपसँ माँछ फँसबैए। तिआरि अछि माछ फसबैबला फानी। बंसी। कोठीमे अखनो अन्न राखल जाइए। माटिक चूल्हि अखनो । ढक माने ठेकमे अन्न अखनो राखल जाइए। हुक्का। ढकिया, पथिया। आरीसँ लकड़ी काटल जाइए। कच्चककेँ रूखान सेहो कहल जाइए। लकड़ीमे भूर करब एकर मुख्य काज होइए। खत्कस अछि लकड़ीपर निशान दइबला ओजार। गिरमीट लकड़ीमे भूर करैक काज अबैए। गुटका रंदा अछि तक्था साफ करैबला ओजार। गुरूजखापसँ खिड़की, चौकैठकेँ साफ कएल जाइए। चौरसीकेँ बटारी सेहो कहल जाइए, चूर बनेनाइ ऐ ओजारक मुख्य काज अछि। झड़ीकस, चौकैठक खाँच-झड़ी काटए लेल अही ओजारसँ चेन्ह देल जाइए। डोरीसँ केबारी-पल्ला, चौकैठमे निशान देल जाइए। प्लेनसँ लकड़ीक कोण सोझ कएल जाइए। बटाम अछि चौकैठ, केबारी, चौकी, पलंग आदिक कोण शुद्ध करैबला ओजार। बर्मा अछि लकड़ीमे भूर करैबला ओजार। बैसला, काट-छाँटक संग लकड़ीक छेबनाइ ऐ ओजारक मुख्य काज होइत अछि। मरया हथौड़ी सेहो कहबैछ। ठोक-ठाक करैबला जेना काँटी ठोकनाइ आदि अनेक काजमे उपयोग होइबला ओजार अछि ई। लोहा रंदा, तक्था, चौकैठ आदि प्लेन करैबला ओजार अछि। नहाइ अछि लोहारक मुख्य ओजार, कोनो लोहाकेँ पहिले भाथीमे गरमा कऽ नहाइपर राखि हथौरीसँ चोट दऽ समान बनाएल जाइए। भाथी अछि लोहारक मशीन। कुरहरि, टेंगारी अखनो । छेनीसँ हसुआ कुटल जाइए। नबेरी, ओजार पनियबै लेल पानि राखएबला बासन। पत्तर, हाँसू अही पत्तीपर राखि कुटल जाइए। पत्थलपर ओजार पिजौल जाइए। नम्हर लोहामे भूर करैए बड़का सुम्हा। बड़की छेनीसँ लोहा काटल जाइए। बैसला अछि लकड़ी छेबैबला ओजार। रेती- हसुआ, खुरपी छेनी आदिकेँ अही रेतीसँ रेत कऽ धरगर बनाएल जाइए। सरसी गर्म लोहाकेँ पकड़ैमे उपयोग होइए। सुम्हा अछि लोहामे भूर करएबला ओजार। बाढ़ि कहाँ खतम कऽ सकल ई सभ। मुदा आब सभसँ सड़ल बाछा उसरगि आ ओकरा दागि कऽ साँढ़ बनाओल जाइए, आ ई नस्ल खराप कऽ रहल अछि। डकहर अखनो बाजैए। चचरीपुला। कटहीगाड़ी। कार कौआ सगरो। देशी कौआ नै जानि कतऽ चलि गेल। कार कौआ मारि देलकै प्रायः। अरै डंगा मालदहमे, सभ मैथिली बजै छलै। ओइ इलाकामे बांग्ला पढ़ाइ होइ छै आ बच्चा सभ आब मैथिली नै बांग्ला बजै छै। दुनू बान्हक बीच गुअरटोली। पहिने ई गामक टोल छल मुदा आब एतुक्का मतदाता सूची झंझारपुर बजारमे चलि गेल छै। गामक स्कूलपर वोटक बूथ रहने पहिने, बहुत पहिने, एकरा सभकेँ वोट नै देमए दैत रहै। आब तकर उल्टा छै। बान्ह बनलाक बाद बनराहा गामक जमीन सभ सेहो महग भऽ गेल अछि। पहिने घटक अबैत रहए तँ ऐ गामक लड़कापर जे दस कट्ठा आ बनराहा गामक लड़कापर एक बीघा हिस्सा देखै छल तैयो अही गाममे कुटमैती करै छल। कारण बनराहा गाममे दसो बीघा खेत हिस्सा रहने गुजर कठिन छलै। मुदा आब ओकर सभक भाग्य खुजि गेल छै, ओइ गामक जमीन सभ उत्थर छै, से जखन बाढ़ि अबै छै तँ ओकर सभक खेतक पटौनी भऽ जाइ छै। आ मास्टरी पहिने कियो करै नै से सभटा बनराहा सभ मास्टर भऽ गेलै। आ आब मास्टरक दरमाहा देखू। सभटा बनराहा धोआ धोती पहीरि जे निकलैए तँ देहे जरि जाइ छै ऐ गौँआक। ऐ गौँआक माने गढ़ नारिकेलक लोकक। कुञ्जड़ा टोली पीचपर। मिआँटोलीक लोक सभ बगलक गामक वोटर लिस्टमे अपन नाम अंकित करा लेने अछि। ओतै मलिक सभक टोल सेहो अछि। बगलक गामक वोटर लिस्टमे नाम अंकित करा लेबाक कारण वएह अछि जइ कारणसँ गुअरटोली आब ऐ गामक वोटर लिस्टमे नै अछि। मुदा वोटरलिस्टसँ गाम थोड़बेक बनै छै। कतेक तरहक धानक किसिम अखनो होइ छै.. कत्ते दिन धरि हेतै के जानए.. पाइनझालि, सोरना, सीता, जया, सिंगरा, कर्रावती, कल्याणी, कसहन, मलिदा (धान कारी सुगन्धित, सुंग, गाछो सुगन्धित), भथन्नी (मोट दाना, निच्चा जमीनमे), बक्के, सुगवा, खेरहा (धानमे सुंग, मोट दाना), रंगा, पंझाली (नाम-नाम दाना आगाँमे टेढ़), चिनमा, साठी, दसरिया, चननचूर, करियाकामोर (धान कारी सुगन्धित), बाँसमंसूरी (मोट, गद्दरि), कांछी मंसूरी, मंसूरी, धूसरी, रामदुलारी, ममइ, शुक्ला, जगरनथिया, जसुआ, चौंतीस, छत्तेस, नाजिर, जल्ली, डबरा, आर-आर एट, सोनालिका, पंकज, परमल। मिथिलाक फसिलमे आब गरमा धान सेहो आबि गेल अछि। अगहनमे धान तैयार होइए, भादवमे भदै आ आब चैत-वैशाखमे चापबला जमीनमे गरमा धान हेबऽ लागल अछि। गद्दरिक चाउर होइ छै आ तकर भात सेहो, मुदा ई धान नै गद्दरि छी। ओना गहूमक सेहो भात होइए। गाममे पेरुआ दूध आएल अछि। मक्खन कलसँ निकालि लेल जाइए। दू-दू तीन-तीन बेर दूध कलमे जाइए। पेरुआ दूधक दही पातर आ अम्मत होइए। १९३६-३७ मे बर्मासँ सेहो भोजपुर बक्सरक लोक पूर्णियाँ, अररियामे भागि कऽ एला, डुमराँवक हरि बाबू हिनका सभकेँ बर्मामे बसेने छला आ बर्माक भारतसँ अलग भेलाक बाद ई लोकनि शरणार्थी बनि ऐ क्षेत्रमे आबि गेला। कतेको बर्मा टोल ऐ क्षेत्र सभमे अहाँकेँ भेटि जाएत। ऐ क्षेत्रमे कृषि–वाणिज्यपर हिनको सभक दखल भेलन्हि। मिथिलामे भेल पलायनमे १९७१ ई. मे बांग्लादेशक निर्माणक लगाति ओतुक्का हिन्दूक किशनगंजमे आ बादमे ओतुक्का मुस्लिमक पूर्णियाँ किशनगंजमे आगमन भेल। बाहर भेल पलायनक विरूद्ध भीतर आएल ई पलायन मिथिलाक बोली–वाणी सभ वस्तुकेँ प्रभावित केलक। जाति–धर्म आधारित विवाह मुस्लिम, राजपूत आ भूमिहार मध्य मिथिलाक भौगोलिक परिधिसँ बाहर हुअए लागल तइसँ सेहो बोली–वाणीक अंतर दृष्टिगोचर भेल। तीस सालक अवधिमे भेल पलायन मिथिलाक गामकेँ खाली कऽ देलक। १९८१ ई. मे पटनापर बनल महात्मा गाँधी सेतु आ पटना दरभंगा डीलक्स कोच सभक पाँती मिथिलावासीक हेँजक–हेँज बाहर बहरेबामे योगदान केलक। तत्कालीन सरकार सभक राजनैतिक आर्थिक शैक्षिक सामाजिक आ सांस्कृतिक ऐ सभ क्षेत्रमे विफलता एकटा आधार तँ बनबे कएल, स्वतंत्रताक बादक तीस साल बिहार स्थित मिथिला आ नेपाल स्थित मैथिली भाषी क्षेत्रक बीचमे एकटा विभाजक रेखा सेहो खींचि देलक। १९६० ई. मे बनल कमला बान्ह आ अखन धरि अपूर्ण कोसी परियोजना मिथिलाक ग्रामीण आर्थिक आधारकेँ तोड़ि कऽ राखि देलक। प्राचीन कालक पलायन आ आइ काल्हिक पलायन मध्य एकटा मूल अंतर सेहो अछि। मिथिलाक मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थ अपन विद्वत्ताक प्रदर्शन, पठन पाठन आ दोसर राजाक दरबारमे जीविकोपार्जन निमित्त प्राचीन काले सँ जाइ छला, तँ गएर मैथिल ब्राह्मण–कर्ण कायस्थ जाति वाणिज्य, अंगरक्षक आदिक कार्य लेल दूर देशक यात्रा करै छला। प्राचीन कालमे मोरंग आ पछाति भदोही मिथिलाक बोनिहारक श्रम किनबाक केन्द्र बनल, मुदा ऐमे मोरंग नेपालक मिथिलाञ्चलमे पड़ैत अछि मुदा एकरा प्रवास ऐ लेल कहल जाए लागल कारण ओतुक्का शासक गएर मैथिल गोरखा भऽ गेल छला। जातिक भीतरक स्तरीकरण, दू जातिक बीचमे मतभेद, बहु-विवाह, बाल-विवाह, बिकौआ विवाह। बाल-विवाहक विरोध आ विधवा विवाहक पक्षमे कोनो सांकेतिक आन्दोलन धरि नै भेल। शूद्र कवि ऐलूष वैदिक ऋचा लिखलन्हि तँ ओ समाज एतेक सुदृढ़ छल जे शुद्दक गण द्वारा एलेक्जेण्डरकेँ कड़गर विरोध सहऽ पड़लै। मिथिलाक सन्दर्भमे सेहो जखन अपन शिल्पी लोकनि आ सभटा तथाकथित समाजक निम्न स्तरक लोक जखन सुदृढ़ छल तखन जनकक नामकरण जन सँ भेल आ फेर सिमरौनागढ़, पजेबागढ़, बलिराजपुर किला, असुरगढ़ किला, जयनगर किला, नन्दनगढ़, कटरागढ़, नौलागढ़, मंगलगढ़, कीचकगढ़, बेनूगढ़, वरिजनगढ़, आदिक एकटा शृंखला मिथिलाक स्थापत्य कलाक रूपमे उद्घाटित भेल। आ ई किला सभ शत्रुकेँ मथऽ बला मिथिलाक नामकरणक अनुरूप रहल। बौद्ध खोह, ताराक मूर्ति आदि शिल्पी कलाक अन्य रूपक चर्चक रूपमे सेहो उपस्थित अछि। मुदा ई कट्टरता बढ़ैत गेल आ आइ मिथिलामे स्थापत्यक नामपर उपलब्धि सेहो शून्य भऽ गेल। आर्थिक स्थिति एहन भऽ गेल जे एक साँझ उपास रहऽ लागल। माइग्रेशन भुखमरी रोकलक मुदा किछु मूल्यपर। तहिना मैत्रेयीसन विदुषी सहस्राब्दी धरि विलुप्त रहली से जातिगत कट्टरताक (जाति मध्य आन्तरिक स्तरीकरण आ दू जाति मध्य- दुनु प्रकारक) कारणसँ। शिक्षाक ह्रास तँ तेहेन भेल जे षड दर्शनमे चारि टा दर्शन मिथिलासँ निकलल मुदा आइ गामक गाम मैट्रिक परीक्षामे पास नै केनिहारसँ भरल अछि। कुशेश्वरस्थान दिसुका क्षेत्र तँ बिन बाढ़िक, बरखाक समयमये डूमल रहैत अछि। मुदा ई स्थिति १९७८-७९ क बादक छी। पहिने ओ क्षेत्र पूर्ण रूपसँ उपजाउ छल, मुदा भारतमे तटबन्धक अनियन्त्रित निर्माणक संग पानिक जमाव ओतऽ शुरू भऽ गेल। मुदा ओइ क्षेत्रक बाढ़िक कोनो समाचार कहियो नै अबैत अछि, कहियो अबितो रहए तँ मात्र ई दुष्प्रचार जे ई सभटा पानि नेपालसँ छोड़ल गेल पानिक जमाव अछि। कुशेश्वरस्थान दिसुका लोक ऐ नव संकटसँ लड़बाक कला सीखि गेला। कुशेश्वरस्थानसँ महिषी उग्रतारास्थान जेबाक लेल बाढ़िक समएमे एबा लेल कहल जाइए कारण ओइ समएमे नाओसँ गेनाइ सरल अछि। रुख समएमे खत्ता-चभच्चामे नाओ नै चलि पबैत अछि आ सड़कक हाल तँ पुछू जुनि। फसिलक स्वरूपमे परिवर्तन भेल, मत्स्य-पालन जेना तेना कऽ कए ई क्षेत्र जबरदस्तीक एकटा जीवन-कला सिखलक। कौशिकी महारानीक २००८ ई.क प्रकोप सोझाँ आएल। दोसरपल्लव घेंघीक मृत्यु भऽ गेलै। जाइसँ पहिने ओ अपन सभ जमीन गौरीशंकर स्थानकेँ लिखि देलकै। ओत्तै जन सुनवाही आइयो होइ छै। ओहीपर स्कूल चलि रहल छै। मुखदेव कुसियार फैक्ट्रीमे डेरा बसेने अछि। आ मुखदेव खिस्सा सुनबिते रहै छथि… गीत गबिते रहै छथि… पुरान समएक गप अछि… गढ़ नारिकेलक राजा दक्ष रहए। राजा???? सुन ने अपना गाममे पहिने राजा रहै, तेँ ने नाममे गढ़ लागल छै… फैक्ट्र्रीक बाहर गढ़ नारिकेलक बच्चा सभ जुमल अछि… मुखदेव सँ खिस्सा सुनैले… …ओ राजा बड्ड प्रतापी छल। मुदा ओकरा राज्यमे कोनो हाट-बजार नै रहै। राजा सोचलक जे हमर राज्यमे हाट कोना लागत? से राजा अपन राज्यमे ढोलहो पिटबा देलक जे हमरा राज्यमे हाट लागत आ जकर जे समान नै बिकाएत से हम कीनि लेब। सम्पूर्ण राज्यक लोक आबऽ लागल आ हाट लगबऽ लागल। ऐ प्रकारेँ सभ दिन हाटमे जे समान बचि जाइ छलै, तकरा राजा कीनि लै छल। एहिना कतेक दिन बीति गेल। एक बेर एकटा सूतबला सूत बेचै लेल ओतऽ आएल मुदा तावत हाट उठि गेल रहै आ ओकर सूता नै बिकाएल। राजा ओकर सूत कीनि लेलक। मुदा जहियासँ राजा सूता किनलक तहियेसँ ओकर अबस्था घटऽ लागल। किछु दिनुका बाद राजाक हालति गरीब जकाँ भऽ गेल। राजा अपन स्त्रीसँ कहलक- अम्बिका सुनू। अपन राज्यमे गरीबी पसरि गेल अछि। आब अपन राज्य रहबा योग्य नै रहल। ओतऽ सँ राजा बिदा भेल आ जाइत-जाइत कोनो देश पहुँचल। ओइ देशक नाम गढ़ पिंगल रहै। गढ़ अरड़नेबा तँ नै… नै रौ… ओतुक्का राजाक नाम सेहो देशक नामपर छल। गढ़ पिंगल राजाक ओइ नगरमे गढ़ नारिकेल राजा घुमैत-घुमैत पहुँचि गेल आ कहऽ लागल जे हे भाइ हमरा कियो नोकरी राखत? राजा कहलक-हँ। हमरा एकटा नोकरक जरूरी अछि। एकरा राखि लिअ। गढ़ पिंगल राजाकेँ एक सए नोकर रहै आ ओकरा एकटा आर नोकरक आवश्यकता रहै कारण ओकरा लग १०१ टा घोड़ा रहै। ओ राजाक ऐठाम रहि गेल आ सभ दिन घोड़ाक घास लेल जाए लागल आ घास छीलि कऽ आनऽ लागल। गढ़नारिकेलक राजा दक्षक स्त्री गर्भवती रहै आ गढ़पिंगलक राजाक स्त्री सेहो गर्भवती रहै। आ संयोग एहन रहल जे दुनू राजाक स्त्री एक्के दिन बच्चा जन्म दैत अछि। पिंगलक राजा ब्राह्मण बजा कऽ ज्योतिष देखेलक आ राजा अपन पुत्रीक नाम राखलक आ कहलक जे एकर नाम मडुवन किए अछि? ब्राह्मण कहलक जे एकर बियाह छठी रातिकेँ हएत। राजा ओइ दिनसँ अपन राज्यमे ताकैत-ताकैत थाकि गेलथि मुदा हुनका ओ नै भेटल। राजाक खबासिनी कहलक जे अहाँ सभ चिन्ता किए करै छी। राजा साहेब पछिला बेर जे नोकर रखने छथि हुनका ऐठाम एकटा लड़का जन्म लेने अछि। ओकरे संग बियाह करा देल जाए। ओइ बच्चाक नाम राशिक अनुसार राजा ढोलन राखल गेल छल। गढ़पिंगलक राजा सोचलक जे ई बड्ड नीक गप अछि, जखन ई लगेमे अछि तँ ओकरे संग बियाह करा देल जाए। दिन तँ ताकले रहै से ओइ छठिक रातिमे बियाह भऽ गेल। किछु दिनुका बाद राजा दक्ष कहलक जे आब एतऽ रहबा जोगर नै अछि। आब अपन देश जेबाक चाही। राजा जइ साढ़ीनपर चढ़ि कऽ आएल रहथि ओइ साढ़ीनकेँ कहलन्हि जे साढ़िन आब अपन देश चलू। आब साढ़ीनपर चढ़ि कऽ राजा-रानी-बच्चा बिदा भेला। किछु दूर रस्तामे गेला तँ एकटा बोन भेटलन्हि। ओइ बोनमे रस्ताक कातमे एकटा पोखरि रहै। ओइ पोखरिक महारपर दू टा बाघ-बाघिन रहै छल। राजा सोचलक जे हमर सभक बच्चा जखन ऐ रस्तासँ अपन सासुर जाएत, तखन ई बाघ हमर बच्चा सभकेँ खा जाएत। तइ द्वारे एकरा मारि देनाइ ठीक हएत। राजा बाघकेँ मारि देलक आ आगाँ चलल तँ बाघिन कहलक जे राजा तूँ हमरा जेना राँड़ केने जा रहल छह, ओहिना तोहर बेटा जखन अपन सासुर जेतह तँ गढ़ पिङल राजमे ओकर कनियाँकेँ हमहू राँड़ कऽ देबै। बाघिनक ई अबाज मात्र राजा आ साढ़िन सुनलक। राजा अपन घर पहुँचि कऽ ई गप ककरो नै कहलक। ओ अपन साढ़िनकेँ एकटा पैघ खधाइ खूनि कऽ ओइमे धऽ देलकै कारण बाहर रहलासँ ओ ई गप ओकर बच्चाकेँ सुना दैतै। ओही समय ओ छोट बालककेँ अपन फुलवाड़ीक हरेबा-परेबा मालिनक संग दऽ देलक। ओकर दुनू बहिन ओकरा बड्ड नीक जकाँ सेवा करऽ लगली। एहिना करैत किछु दिन बीति गेल तँ ई बच्चा समर्थ भऽ गेल आ तखनो ओकरा किछु बूझल नै भेलै। उम्हर ओ कन्याँ मड़ुअन सेहो पैघ भऽ गेलि। कन्या युवा भऽ गेलि तँ सखी सभक संग घुमैत फिरैत हुनका कोनो संगी कहलक जे हे बहिन। आब अहाँ समर्थ भऽ गेलौं। अहाँक पिताजी अहाँक बियाहक विषयमे किछु नै सोचि रहल छथि। ई बात सुनि कऽ कन्याँ बड़ चिन्तामे पड़ि गेली। अपन महलमे जा कऽ ओ पलंगपर पड़ि रहली आ खेनाइ त्यागि देलन्हि। ऐपर ओकर माए कन्या लग जा कऽ कहलक, बेटी अहाँ खेनाइ किए नै खाइ छी ? कन्याँ बाजलि- माए। सखी सभ बड्ड किचकिचबैत अछि। तइ द्वारे हमरा भूख नै लगैत अछि। माए कहलक- अहाँकेँ की कहि किचकिचबै छथि? कन्याँ बाजल- ओ सभ हमरा कहै छथि जे अहाँक पिताजीकेँ कोन चीजक कमी अछि, जे अहाँक पिताजी अहाँक बियाह नै करा रहल छथि? माए कहलक- बेटी, अहाँक बियाह छठीक रातिमे भऽ गेल अछि। अहाँक सासुर गढ़ नारिकेलमे अछि। नै जानि ओ किए नै अबै छथि? ई सुनि कन्याँ कहलक जे हमरा जबुनाक कातमे एकटा मकान बना दिअ आ सभ वस्तुक व्यवस्था कऽ दिअ। हम बारह बरिख धरि सदाव्रत बाँटब। एतेक सुनि राजा ओहिना केलक। मड़ुवन कन्याँ जबुनाक कातमे सदाव्रत बँटनाइ शुरू कऽ देलक। बनिजारा सभ वाणिज्य करबा लेल गढ़ नारिकेलसँ गढ़ पिंगल जा रहल छल। बनिजारा सभ जखन गढ़ पिंगल पहुँचल तँ जबुना धारक कातसँ होइत आगाँ बढ़ि रहल छल। जाइत-जाइत ओ सभ ओइठाम पहुँचल जतऽ मड़ुवन कन्या सदाव्रत बाँटि रहल छली। ओ कन्याँ पुछलक- अहाँ सभ कतऽ जा रहल छी आ कतऽसँ आएल छी। बनिजारा बाजल- हम सभ गढ़नारिकेलसँ आएल छी आ गढ़ पिंगलमे हीरा-मोतीक वाणिज्य करै छी। कन्याँ बाजल-अहाँ वाणिज्य कऽ कए घुरब तँ हमर एकटा पत्र लऽ जाएब? बनिजारा बाजल- अहाँ पत्र लिखि कऽ राखब, हम जरूर लऽ जाएब। बनिजारा जखन घुरल तँ ओ पत्र लऽ कऽ चलि गेल आ जखन गढ़ नारिकेल पहुँचल तँ हरेबा-परेबा जे दुनू बहिन छल- आ बड्ड पैघ जादूगरनी सभ छल- ओ जादूक जोरसँ पता लगा कऽ राजाकेँ खबरि केलक आ बनिजारासँ ओ पत्र लऽ कऽ ओकरा आगिमे जरा देलक आ ओइ राजाक बेटाकेँ एकर पता नै चलऽ देलक। कन्याँक ई पत्र मारल गेल। ओ बेचारी बाट तकैत रहल। किछु दिन बीतल। ओ कन्याँ एकटा सुग्गा पोसने छली। ओ सुग्गासँ पुछलक- की तूँ हमर पत्र लऽ जा सकै छह। सुग्गा बाजल- हँ। हम पत्र राजाकेँ दऽ देब। कन्याँ पत्र लिखि कऽ सुग्गाक गरदनिमे लटका देलक आ कहलक- जाउ। सुग्गा ओतऽ सँ बिदा भेल। सुग्गा आकासमे उड़ि बिदा भेल आ पहुँचल गढ़ नारिकेल राज्य जतऽ हरेबा-परेबा आ राजा ढोलन रहथि। सुग्गा उड़ि कऽ ओकर कान्हपर बैसि गेल, ठोंठसँ सूता काटि कऽ खसेलक। ओइ समए हरेबा-परेबा राजा ढोलनक फुलवारीमे बैसल रहए। ठंढीक मौसम छल। आगि पजारि कऽ बैसल छल। जखने ओ पत्र खसेलक तखने मालिन ओइ पत्रकेँ आगिमे धऽ देलक। राजा ढोलनकेँ बड्ड तामस उठलै। दुनूकेँ दू-दू चमेटा मारलक आ कहलक जे तूँ दुनू गोटे एतऽसँ चलि जो। दुनू बहिन पकड़ि कऽ ओकरा मनाबए लागल। कन्याँक ओहो पत्र खतम भऽ गेल। कन्याँ बहुत चिन्तामे पड़ि गेल। बहुत समए आर बीति गेल। एक दिन जबुनाक किनारसँ एकटा महात्मा जोगी रूपमे जा रहल छल। कन्याँक नजरि ओइ महात्मापर पड़ि गेल। कन्याँ बड्ड चिन्तित भऽ कानि रहल छली। ओ साधु महात्मा कन्याँक कननाइ सुनि एली आ कारण पुछलक। कन्याँ सभटा हाल बतेलक। महात्मा कहलक जे तूँ एकटा पत्र लिखि कऽ हमरा दे आ हम ओ पत्र ओतऽ पहुँचाएब। कन्याँ पत्र लिखि कऽ महात्माकेँ देलक। महात्मा ओतऽ सँ बिदा भेल। कन्याँ महात्माकेँ गाँजा, भांग आ हफीम देलक। महात्मा खाइत-पिबैत ओतऽ सँ बिदा भेल। किछु दिनुका बाद महात्मा गढ़ नारिकेल पहुँचल, जतऽ हरेबा-परेबा आ राजा ढोलन रहए। ओ फुलबारीक बीचमे अपन डेरा खसेलक। रतुका मौसम छल। भोर होइ बला छल। ओइ समय महात्मा एकटा मोहिनी बाँसुरी निकाललक आ बजबऽ लागल। ओइ बाँसुरीक अबाज सुनि राजा ढोलन उठल आ चलबा लऽ तैयार भेल तँ दुनू बहिन ओइ बाँसुरीपर बहुत रास जादू-गुण चलेलक। मुदा महात्माक किछु नै बिगड़ल। राजा ढोलन उठल आ दुनूकेँ दू-दू लात मारि महात्मा लग गेल। साधुजी ओइ पत्रकेँ निकालि कऽ राजा ढोलनकेँ देलन्हि। आ से पढ़ि राजा ढोलन तामसे बिख-सबिख भऽ गेल आ ओतऽ सँ घर गेल आ एकटा तलबार लऽ पितासँ पूछऽ लागल जे बताउ जे ई हमर बियाह कतऽ भेल अछि? पिताकेँ ओ बाघिन मोन पड़ि गेलै से ओ झूठ बाजल आ कहलक जे हम तोहर बियाह नै करबेने छियौ। तामसे भेर भऽ ओ ओइ पत्रकेँ राजाक सोझाँ राखलक। राजा ओ पढ़ि बड्ड चिन्तामे पड़ि गेल। ओ अपन बेटाकेँ कहलक। देखू बेटा। अहाँक बियाह हम छठीक राति केने छी आ गौना ऐ द्वारे नै केलौं कारण अबै काल हम एकटा बाघकेँ मारि देलौं। फेर ओ सभटा खिस्सा कहि सुनेलक आ कहलक, जे ओ डरे ओकर गौना नै करेलक। ढोलन बाजल- हमर सवारी कतऽ अछि। हमर सवारी दिअ। राजा कहलक- साढ़िन तँ तरहाराक नीचाँ अछि। ओ जीवित अछि वा मरि गेल से नै जानि। राजा ढोलन तरहराक नीचाँसँ साढ़िनकेँ बहार केलक तँ साढ़िनक देहमे पिल्लू लागि गेल छलै। ओ ओकरा साफ केलक आ ओकरा चना-चबेना खुएलक। खुआबैत-खुआबैत ओ पहिने जकाँ तन्दरुस्त भऽ गेल। राजा ढोलन बाजल- साढ़िन, तोहर पएर बहुत दिनसँ बान्हल छह। तूँ चौदह कोसक रस्ताकेँ एक दिनमे चारि चौखड़ लगा देबऽ तँ हम बुझब। हम सभ फेरसँ गढ़ पिंगल पहुँचब। साढ़िन अपन चालि एक दिनमे बना लेलक। राजा ढोलन अपन सासुर बिदा भेल। साढ़िनपर सवार भऽ अपन कान्हपर बन्दूक लेलक आ बिदा भेल। चलैत-चलैत ओ ओही बोनमे पहुँचल। ओही रस्तासँ ओ सभ जा रहल छल, जतऽ ओ बाघिन रहै छली। बाघिनकेँ राजा ढोलन देखलक आ ओइ बाघिनकेँ मारि देलक। फेर ओ अपन सासुर गढ़ पिङल गेल आ फूल बगानमे डेरा खसेलक। साढ़िनकेँ ओ ओतै छोड़ि फूल-बगानकेँ तोड़ि-ताड़ि कऽ तहस-नहस कऽ देलक। मालिन कहलक जे तोरा राजासँ से पिटान पिटबेबउ आ जतेक तोँ बरबादी केने छँह तकर हरजाना लेबउ। राजा ढोलन बाजल- जो तोरा जे करबाक छौ कर। मालिन तामसे बिदा भेलि आ राजा लग गेलि। राजासँ कहलक। राजा पुछलक जे ओ कतुक्का अछि। मालिन कहलक जे ओ अपन घर गढ़ नारिकेल बतेलक अछि। राजा अपन सिपाही सभकेँ पठेलक। ओ सभ ढोलनकेँ पुछलक- अहाँ कतुक्का छी आ कतऽ सँ आएल छी। ढोलन बाजल- हमर घर गढ़ नारिकेल अछि आ हम अपन सासुर गढ़ पिंगल आएल छी। सिपाही सभ ई गप राजाकेँ जा कऽ कहलक। राजा प्रसन्नतासँ स्वागत कऽ डोलीमे बैसा कऽ ढोलनकेँ अपना घर अनलक। किछु दिनुका बाद राजा अपन बेटी-जमाएकेँ गढ़ पिंगलसँ गढ़ नारिकेल लेल बिदा केलक। ओतऽ सँ राजा ढोलन आ ओ मड़ुवन कन्याँ अपन घर गेल आ राज करए लागल। फेर ऐ राजाक राजगद्दी कहिया गेलै? गढ़ कतऽ बिलेलै? नारिकेलसँ ऐ बिलैल गढ़क कोन सरोकार छै? सभ किछु तँ बदलिये गेलै मुदा गाम वएह गढ़ नारिकेल। फरिछाएल … घुरि कऽ देखबाक प्रवृत्ति….. साओन-भादवमे जखन चरैले घासे-घास रहै छै ओ पतरा जाइए, कारण कतबो चरैए आ पाछाँ घुरि कऽ देखैए तँ घासे घास देखा पड़ै छै, ओकरा होइ छै जे किछु नै चरल अछि। आब कनसुप्तीक बदला मटिया तेलमे डुबाएल गेनी, लुड्डो, आइस पाइस, डैस कोस सिंगल बुलबुल मास्टर, क्रिकेट, वॉलीबॉल, बैडमिंटन खेल सभ सेहो आबि गेल अछि। फतिंगा, तितली, टुकिली, हरियर रंगक हनुमान जीक घोड़ा, एकटा फतिंगा, जे.सी.बी. मशीन जकाँ, लगैए एकरे देखि कऽ ई मशीन बनल, ई सभ अखनो गढ़ नारिकेलमे अछि। आसिनसँ माघ धरि ओस खसै छै। वैशाखमे घास नै रहै छै मुदा गदहा मोटा जाइ छै, पाछाँ घुरि कऽ देखै छै तँ एकोटा घास नै देखा पड़ै छै, ओकरा होइ छै जे खूब चरल अछि। गहूम कम्मे शम्म लोक करै छल। पहिने पसेरी कट्ठा होइ छलै, आब मोन कट्ठा होइ छै। झंझारपुरक सरकारी कृषि ऑफिसक सिंहजी सिखेलन्हि गौँआकेँ गहूमक खेतीक नव विधि। सिराउर दऽ कऽ जोतलाक बाद ओइमे बीआ छीटि फेर बाइसम दिन जखन गाछ बहरेलै सिंहजी यूरिया छीटि दै छथि। हरियर कचोर गाछ बहरा जाइ छै। सौंसे गढ़ि नारिकेल जुमि जाइए। यूरियाक परमिट सेहो दिअबा देलन्हि सिंहजी। यूरिया टाएरगाड़ीमे भरि कऽ आनि रहल अछि गौँआ सभ। मोहन गबैय्या कीटनाशक आ यूरियाक विरोध करै छथि, गीत गाबि कऽ, धू ई मोहन गबैय्या सभ चीजक विरोधे करैए, गीत गाबि कऽ। मुदा किछु गप ओ ठीको कहि रहल अछि। छिऐ तँ जहरे ने ई नवका खाद। गोबर खादसँ बलगर थोड़े छै। मुदा गहूम नव फसिल तँ खादो नव! कहि रहल छथि मुखदेव, देखबै दालि-तेलक कमी भऽ जाएत, गहूमक खेती हएत आ दालि आ तेल बजारसँ कीनऽ पड़त। गहूमक खेतीमे खाद-बीआ-कीटनाशक आ पटौनीमे ततेक खर्चा होइए जे बटाइमे घाटा होइए, मुदा धानमे बचत छै। से गहूम नै करबै तँ बटाइपर धानोक खेती लेल जमीन नै भेटत। से गहूमक खेती करऽ पड़ैए। ऐ मुखदेवक सभटा गप सही कोना भऽ जाइ छै? तेसर पल्लव एक मुट्ठी चाउर। अखनो मुठिया चाउर अदहन दै काल मिथिलामे राखल जाइ छै। आ भिखमंगा सभकेँ देल जाइ छै। दाउन-ओसौनीक बाद अगौं राखल जाइ छै। बौकू भाइ तौलै छथि, हुनका ओ अगौं दऽ देल जाइए। बाढ़ि कहाँ खतम कऽ सकलै ई सभ… गढ़ नारिकेलक लोक सभ। मुठिया डाँर, ढकिया सन मूड़ी, डोका सन आँखि, औंठिया केश गालपर लटकल, धोबिया पाटसन छाती, मिसिया सन-सन दाँत, कतरल नाक, सवा हाथ टेरल मोंछ, सुपा सन कान, ऐंठल बाँहि। ओहिना… नौ गज नाम सात गज चाकर। सोलह शृंगार बत्तीसो अभरन केने। बाइस हाथक डोपटा, पचुआ धोती, बाइस गज लपेटा, बारह पसेरीक तारक छड़ी। ओहिना… एन-मेन.. गढ़ नारिकेलक लोक सभ। कारी तँ गोर सेहो। कतरल नाक तँ थोपल सेहो। सोझका केश तँ औंठिया सेहो। मिसिया सन-सन दाँत तँ खुरपा सन-सन सेहो। सोलह गजक पचुआ धोती तँ लंगोट आ धरिया सेहो। ओहिना… लोक मोहन गबैय्याकेँ देखै छन्हि, बूढ़ झुनकुट.. गीत गाबैत.. खिस्सा सुनबैत.. हँसैत-बजैत.. गढ़ नारिकेलक खुशी… ओतुक्का लोकक खुशी.. अपन काजमे भेर। लोक आपसमे बजैए.. कतेक बूढ़ हेता ई.. हौ गोटैक सए साल बूढ़ तँ अबस्से हेता। एहने सभ लोकक प्रतापक चलैत गाम डुमैत नै अछि। कतबो बाढ़ि आबि नै जाओ… एहेन लोक नै मरैए.. खाली गीत गबैत रहैए। आ जँ मरियो जेता मुखदेव राम तँ फेर गढ़ नारिकेलमे जनम लऽ लेत एकटा आर मुखदेव राम गबैय्या, जे वंचितक हक लेल गबैत रहत.. कएक सए बर्ख धरि... आरो.. । नहिये सुनेलक मुखदेव सहस्रशीर्षाबला खिस्सा……………..। (गढ़ नारिकेल उपन्यास त्रयीक पहिल उपन्यास) जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा बायोग्राफी ० सन् सैंतालीस... भारतक स्वतंत्र त्रिवार्णिक झण्डा फहरा रहल छल। मुदा कम्यूनिस्ट पार्टीक माननाइ छल जे भारत स्वतंत्र नै भेल अछि। असली स्वतंत्रता भेटब बाँकी छै... मिथिलाक एकटा गाम… जन्म भेल रहए एकटा बच्चाक.. ओही बर्ख ... ओइ स्वतंत्र वा स्वतंत्र नै भारतमे... पिताक मृत्यु...गरीबी.. केस मोकदमा... वंचितक लेल संघर्षमे भेटलै स्वतंत्र भारतक वा स्वतंत्र नै भेल भारतक जेल.... आइ बेरमामे पाँच-दस बीघासँ पैघ जोत ककरो नै.. ओइ गाममे जीवित अछि आइयो किसानी आत्मनिर्भर संस्कृति... पुरोहितवादपर ब्राह्मणवादक एकछत्र राज्यक जतऽ भेल समाप्ति.. संघर्षक समाप्तिक बाद जिनकर लेखन मैथिली साहित्यमे आनि देलक पुनर्जागरण... जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा बायोग्राफी... गजेन्द्र ठाकुर द्वारा १ जगदीश प्रसाद मण्डल जीक जन्म ५ जुलाइ १९४७ ई. केँ भेलन्हि। भारतक स्वतंत्रताक तिथि तए भऽ गेल रहै। अंग्रेज जाइये बला छल। “दिनांक ५-७-१९४७ ई.केँ जन्म भेल। भरल-पुरल परिवार। तीन पीढ़ीसँ एक पुरुखियाह परिवार चलि अबै छल। जहिना बाबा तहिना पिता छलाह। घर लग पोखरि-इनार रहने पानिक सुविधा रहल।” माता-पिताक संग दीदीयोक परिवारक संग मिलल-जुलल परिवार। तइ संग अपनो किछु जमीन; आ गामक जे बहरबैया मालिक रहथि हुनकर खेतो बटाइ करै जाइ छलाह जइसँ खेबा-पीबाक अभाव सेहो नै। एक तँ वंशगतो आधार दोसर जगदीश प्रसाद मण्डल जीक पितोक ऊपर पारिवारिक-समाजिक प्रभाव पड़ल छलनि जइसँ किछु अगुआएल विचार रहनि। जहिना भतभोजमे बरी पड़िते पंच बूझि जाइत जे भोज अंतिम दौड़मे आबि गेल तँए आब इन्तजार नै करबाक चाही, जँ इन्तजार करब तँ भुखले उठब। तइसँ नीक जे मारि-धूसि झब दऽ कसि ली नै तँ दोख केकर हेतै। तहिना अंग्रेजी शासन अपन सभ किछु समेटि रहल छल। १९४२ईं. मे जे तूफानी आन्दोलन उठल ओ कमल नै, उग्रसँ उग्रतरे भेल जाइत छल, जेकर परिणाम १५ अगस्त १९४७ईं. छी। मुदा देशोक दशा एकमुड़िया नै, अपनोमे खटपट होइते छल। कतौ जातीय उन्माद तँ कतौ साम्प्रादायिक उन्माद। कतौ धन-सम्पतिक तँ कतौ इज्जत-आबरूक। जहिना स्वतंत्रता संग्राम जोर पकड़ने तहिना बंगालक अकाल आ बिहारक भूमकम (१९३४)क प्रभावसँ सेहो आर्थिक स्थिति प्रभावित छल। स्वतंत्रताक लड़ाइमे मिथिलांचलक योगदान देशक कोनो भागसँ कम नै रहल। एक दिस पुस्तैनी सोचक मुँहपुरुख रहथि तँ दोसर दिस १९४०ईं.क बाद सोशलिस्ट पार्टी आ कम्युनिस्ट पार्टी राजनीतिक सोच पैदा करैत रहल छल। समाजोक बीच जागरूकताक लहरि चलैत रहल। जहिना सोशलिस्ट पार्टी अपन किछु कार्यक्रम लऽ ठाढ़ छल तहिना कम्युनिस्ट पार्टी सेहो, दरभंगा जिलाक पहिल टीम १९३९-४० मे पार्टीक सदस्यता ग्रहण कऽ चुकल छलाह, वफादार कार्यकर्ता बनि उतरि चुकल छलाह। तहिना सोशलिस्टो पार्टी, गाम-गाम पहुँचि चुकल छल। १९४२ ईं.क जन-आन्दोलन पुस्तैनी सोचमे धक्का मारलक, धक्कासँ विचारमे टूट-फाट भेल, धक्कासँ टूटि लोक नव सोचक संग सेहो एलाह। सामाजिक परिवेश ई सोच पैदा कऽ चुकल छल जे जमीन्दारी समाप्त हेबे करतै, राजा-रजबार ढहबे करतै, आइ धरिक जे जमीन निलामीक प्रथा छल आ मालगुजारी असुलक जुल्म छल ओ मेटेबे करतै। नव विचार जन-गणक बीच पैदा लऽ चुकल छल। मिथिलांचक बीच झंझारपुर इलाकाक अप्पन प्रतिष्ठा रहल अछि। जहिना शिक्षाक क्षेत्रमे तहिना आर्थिक क्षेत्रमे। देशक पैमानामे इलाका पछुआएल नै छल, अगुआएल छल। एकसँ एक महान पुरुष पैदा लऽ चुकल छथि। ई आजादीक लड़ाइमे खून बहौनिहार क्षेत्र छी। झंझारपुर अंग्रेजक मुख्य अड्डामे छल। दमन नीति कतौ चलल तँ अहू क्षेत्रमे चलल। मिथिलांचलक बीच झंझारपुर इलाका ओ क्षेत्र छी, जइमे मिथिलाक इतिहास-दर्शन, अखनो झलकि रहल अछि। अखनो पाथरमे फूल, माटि-पानिमे सुगंध जीवित अछि। क्षेत्रक गाम-समाजमे दर्जनो जाति, दर्जनो सम्प्रदाय अदौसँ अखन धरि मिलि-जुलि एकठाम बास करैत एलाह अछि। भूमियोक शक्ति ओहने उर्वर अछि, ई देशक एक नम्बर क्षेणीक सघन आबादीबला क्षेत्र अछि। बीसम सताब्दीक पाँचम दशक देशकेँ ऐ रूपेँ आन्दोलित कऽ देलक जे जन-गण घर-परिवारसँ आगू बढ़ि देशक लेल अपनाकेँ अर्पित कऽ देलक। जहिना दशकक पूर्वार्द्ध आन्दोलित केलक, तहिना एक संग अनेको प्रश्न उठि कऽ ठाढ़ भेल। ओना एकसंग खुशी आइ धरिक देशक इतिहासमे कहियो नै भेल छल जते भेल। जेना-जेना आजादीक झंडा फहरबैक दिन लगिचाइत गेल तेना-तेना खुशीमे बढ़ोतरी होइत गेल। अाधा दशक जहिना जगैमे लागल, तहिना अाधा दशक रंग-रंगक सपना देखैमे खुशीसँ बीतल। समाजक बीच तँ नै मुदा देशक राजनीतिमे आर्थिक मुद्दा स्पष्ट विभाजित कऽ देने छल। कियो देशक पूर्ण आजादी देखैत छलाह तँ कियो एकरा नेङरा आजादी बुझैत छलाह। ओना देशक भीतर रौदी, भुमकम, जाति-सम्प्रदायक उन्माद एते जोर पकड़ि लेने छल जे भीतर-बाहरक लड़ाइमे राजनीतिक दल ओझराएल छल। ओना तेलांगना लड़ाइ देशक संघर्षक नक्शामे आबि चुकल छल। भारत-पाकिस्तान विभाजनक एक-एक विभाजक तत्त्व जनमानसकेँ झकझोरि रहल छल। दसो बर्खक जेलक जुड़ल हृदए संगी सभक बीच टुटि रहल छलनि। काला-पानी जहलमे ओ सभ संगे छलाह मुदा गाम-समाज विभाजित भऽ गेलनि। १५ अगस्त (१४ अगस्तक बारह बजे रातिक बाद)केँ ितरंगा झंडा फहराएल। अंग्रेजी शासनक अन्त भेल। जन-मानसक हृदैमे खुशीक लहरि असथिरो नै भेल छल आकि गाँधीजीकेँ राजधानीमे दिन-दहाड़ गोली लगलनि, जे शासनक स्पष्ट चित्र प्रस्तुत करैत अछि। संविधान सभामे संविधान बनब शुरू भेल। संविधान बनल आ १९५२ ई.सँ आम चुनाअो प्रक्रिया शुरू भेल। राज्य आ केन्द्र सरकार बनैक लेल चुनाव भेल आ नव सरकारक गठन भेल। ओना देशक विस्तारो अंग्रेजी शासनसँ भेल, मुदा ई देशकेँ हजारो समस्याक बीच पटकि सेहो देलक। नव सरकारक बीच हजारो समस्या उपस्थिति भऽ गेल। गाम-गाममे बकास्त जमीनक लड़ाइ पसरि गेल छल। राजनीतिक सभ पार्टीक एकमुँहरी समर्थन रहने लड़ाइ सफलो भेल। १९५०ईं.मे जगदीश प्रसाद मण्डल जीक पिताक निधन भऽ भेलनि। “पिताक मृत्युक किछुओ नै यादि अछि, िसर्फ गाछीमे जरैत अछिया टा...। जखन तीन बर्खक रही। दू भाँइक भैयारीमे छह बर्खक भाय (भैया) रहथि। पिताजी करीब एक मास बेमार रहलाह। इलाजोक नीक बेवस्था नै, ताबत दरभंगा अस्पताल नै बनल छलै। झाड़-फूकसँ लऽ कऽ जड़ी-बुटीक इलाज समाजमे चलैत छल।” मुदा पिताक मृत्यु भेने बच्चाक लालन-पालनमे कोनो कमी नै होइ छलै, संयुक्त परिवारक व्यवस्था सुदृढ़ छल। “आजुक परिवार जकाँ नै जे ने बेटा बाप-माएकेँ देखैत, आ ने माए-बाप बेटा-पुतोहुकेँ। कारण अनेक अछि मुदा अपनो परिवारक जँ जिम्मा नै लऽ चलब तँ अनेरे हम सभ मातृभूमि आ देशकेँ महान कहै छिऐ। इमानदारी पूर्वक हृदैपर हाथ रखि कऽ कहै पड़त जे देलिऐ की आ लेलिऐ की। हमरा नै भेल तेकर दोखी हम नै। एक तँ अपनो परिवारमे समांग, दोसर गामक कोनो जाति एहन नै जइ जातिसँ पारिवारिक संबंध नै छल। तइ संग जातियोक नमहर टोल। गामक चारू कातक गाममे कुटुमैती सेहो छलो आ अछियो। ओहो सभ अपनामे समए िनर्धारित कऽ अबैत-जाइत रहैत छलाह। कान्ही सेहो नीक बनौलनि। एकसँ एक खिस्सकर आ एकसँ एक गप केनिहार। तँए दिन-रातिमे कोनो अंतर नै। अभाव परिवारमे नहिये छल तँए अनुकूल परिस्थिति बनल छल।” अनुकूल परिस्थिति बनने परिवारक भविष्य दिसि सेहो नजरि पड़लनि। भैयाक बिआह भऽ गेल रहनि। चारि-पाँच बर्खमे बिआह होइत छल। “तहूमे हमर मौसी (सात-भाए बहिनमे सभसँ जेठ मौसी आ सभसँ छोट माए) विधवा भऽ गेलीह। मौसीकेँ मात्र दुइयेटा बेटी, परिवार अन्त भऽ गेलनि। मौसीक प्रभाव माइक ऊपर, तँए जेठ-भायक बिआह पाँचे बर्खमे भऽ गेलनि। भविष्य दिसि दृष्टि पड़िते हमरापर नजरि पड़लनि। ओछाइन पकड़ल रोगिक अवस्था ओहन होइत जेकर कोनो निश्तुकी नै। जीवियो सकै छथि, मरियो सकै छथि। तँए एहेन अवस्थामे विचारोमे इमानदारी अबै छै।” मछधीमेददिया ससुरक परिवार सुभ्यस्त, ददिया ससुरक कुटुमैती गोधनपुर मौसीक परिवारमे से मौसीक आवाजाही बेरमा बहिन ऐठाम। “ददिया ससुर सुराग भिड़ा कऽ गोधनपुरक मौसाक छोट भाए बचाइ मण्डल संग अाबए लगलाह, छल-प्रपंच विहीन मौसी माएकेँ कहि देलखिन। जेठ-छोटक विचार रखैत माए आश्वासन दऽ देलखिन जे अखन तँ अपने अछोइन धेने छथि, राजा-दैवीक कोनो ठेकान नै छै, तँए अखन किछु नै, बादमे बुझल जेतै।” मछधीक परिवार बेवहारिक दृष्टिये दब। ताड़-खजुरक गाछ बेसी से ताड़ीक पीबाक चलनि ओइ गाममे छल। एक-लगाइत बुढ़ा (ददिया ससुर) अपन पल्लो भरि धोती आ चद्दैर नेनहि पहुँचि मृत्युक आखिरी समए तक बेरमामे रहि गेला। मृत्युक अंतिम राति, डिबिया जरिते सभकेँ अन्हार बूझि पड़ए लगलनि। “जे बोल जीवित छल, बन्न भऽ गेल। हाथ-पएरक डोलब बन्न भऽ गेल।” , माएकेँ लगमे बजा बुढ़ा (ददिया ससुर) गोधनपुरबला मौसाकेँ सम्बोधित करैत कहलखिन- “समधि, ई बच्चा हमरा दऽ दिअ। गोबर पाथैले पोती देबनि।” मिटिंगक प्रस्ताव जकाँ गोधनपुरबला मौसा समर्थन करैत कहलखिन- “ई तँ घर-कथा भेल, ऐमे कि हँ-हूँ कहल जाएत।” तही बीच मौसी टपकि गेलीह- “बहिन, अखन बाल-बोध अछि हिनका बच्चा देलियनि। तीनिये बर्खमे बिआहक बात पक्का भऽ गेल।” “अखन धरि परिवारमे अपनासँ गाए दुहैक, हर जोतैक आ खुट्टापर बच्छा बधिया करेबाक चलनि नै रहए। पिताक परोछ भेनहुँ समैपर स्कूल पहुँचलौं। गाममे लोअर प्राइमरी स्कूल छल। भीतघर रहने भुमकम १९३४ई. मे खसि पड़ल। राजा-दैव भेने जहिना लोक घराड़ी बदलि लइए तहिना स्कूलक घराड़ी बदलल। ओइ समैमे तीनटा कचहरी बेरमामे छल। दछिनबरिया कचहरीक घरमे स्कूल चलए लगल। पछाति ओहो बदलि अखुनका जगहपर पहुँचल। ” बेरमा पंडितक गामक श्रेणीमे गनल जाइत अछि। परोपट्टाक लोक गेठरी झाकेँ जनैत छन्हि, जिनका सात सए बीघा जमीन राज-दरभंगासँ भेटल छलनि। ओना ओ जमीन बेरमा सीमामे नै पड़ैत अछि मुदा दू कोस हटि कऽ छल; आब नै छन्हि। दछिनबरिया कचहरीक घरमे स्कूल आएल। ओतौसँ ओइ स्कूलक दोसर बैचमे चारि गोटे, वेद, व्याकरण साहित्यसँ आचार्य केलनि। दू गोटेकेँ मेडल भेटलनि। ओना तीन गोटे गामसँ बाहर विद्यालय पकड़ि लेलनि, मुदा एक गोटे (मेडलधारी) गाममे नून-तेलक दोकान कऽ लेलनि। ‘पढ़े फारसी बेचए तेल’ चरितार्थ भऽ गेल। मुदा अपन लगन आ मेहनतिसँ ओ तीनू गोटेकेँ आर्थिक क्षेत्रमे पछुआ देलनि, समाजपर बहुत अधिक प्रभाव पड़ल। मेहनती गाम तहियो छल अखनो अछि। आन गाममे कम पढ़ल-लिखल लोककेँ लोक चुटकी लैत अछि, से बेरमामे नै अछि। झंझारपुर बाजारसँ माथपर दोकानक वस्तु-जातक मोटरी बैशाखक रौदमे अनैत छलाह, जे सभ देखैत छल। गाममे एक्केटा दोकान। सबहक लाट दोकानसँ। ओना एकटा झंझारपुरक बनिया सेहो आबि बेरमामे दोकान खोलने रहथि। झंझारपुरक बनियाक परिवार भुमकममे नष्ट भऽ गेलनि। ईंटाक घर रहने सभ दबि कऽ मरि गेलनि। वएह आब बेरमामे आबि बसि गेलाह। जहिना राजनीतिक दृष्टिसँ बेरमा गाम जागल तहिना शैक्षणिक दृष्टिसँ सेहो ई गाम अगुआएल रहल अछि। ओना अंग्रेजी शिक्षा सेहो गाममे कम प्रतिशतमे पहुँचि चुकल छल। गामक उत्तर नवानी विद्यालय आ दछिन दीप विद्यालय चलि रहल छल। तमुरिया हाई स्कूल आ झंझारपुर हाई स्कूल सेहो बनि गेल छल। गामक जे तीनू पंडित बाहर रहैत छलाह हुनको सबहक परिवार गामेमे रहैत छलनि। अपनो छुट्टी गाममे बितबैत छलाह। गाममे स्कूल कहिया बनल, एकर निश्चित तिथिक जानकारी तँ नै मुदा १९३४ ई. क भूमकममे विद्यालयक भीत खसल, ई जानकारीमे अछि। मुदा विद्यालयक जगह बदलि गेल। किएक तँ ओइ जगहकेँ जनमानस अशुभ बुझए लागल। ओना ओ स्थान गामक ब्रह्म स्थान छी, शक्तिशाली जगह। अखन ओइ स्थानमे बाल-बोधक अांगनबारी चलि रहल अछि। ओइठामसँ विद्यालय उठि लछमीकान्त-रमाकान्त साहुक कचहरीमे चलि आएल। शुरूमे लकड़ीक खुट्टापर बाँसेक घर रहै, मुदा पछाति कचहरीमे निच्चाँ सिमटी ईंटा आ ऊपर खढ़क घर गौँआ बनौलनि। ओइ कचहरीमे १९५२ ई.क पहिल चुनावक केन्द्र सेहो बनल। अखन विद्यालय तेसर स्थानपर अछि। जे जगह सरिसव-पाहीक प्रो. हेतुकर झाक छियनि। ओना ओ रजिस्ट्री करैले तैयार भेल छथि, मुदा ई जमीन्दारीक तेहेन ओझरौठमे पड़ल अछि जे हुनका लिखले ने होइ छन्हि! बुढ़िया गाछीक नाओं ऐ जमीनक पड़ि गेल अछि। सम्प्रति पंचायत भवन, आठमा धरिक स्कूल, खंडहर रूपमे अस्पतालक घर आ भव्य दुर्गास्थान सेहो अछि। एकडोरिमे तीनू गाम, नवानी, बेरमा आ दीप, रहितो सामाजिक वातावरणमे तीनूमे बहुत अधिक भिन्ननता अछि। एक तँ परगन्नाक प्रभाव दोसर सामाजिक बनाबट। जइ नवानी आ दीपमे ताड़-खजूरक गाछ सेहो भरपुर अछि, माने ताड़ी पिनहारक नीक संख्या अछि, तइठाम बेरमामे एक्कोटा ताड़-खजूरक गाछ नै अछि। दोसर भिन्नता ई अछि जे मध्य वर्गीय जाति बेरमामे बहुसंख्यक अछि, नवानी आ दीपमे खूब धनिके आकि खूब गरीबे। खास कऽ दीपमे ई स्थिति भयावह अछि, जइ गाममे एक्केटा खूब धनिक परिवार रहैए ओइ गामक शेष लोक पात खरड़ैए, सएह स्थिति दीप गामक अछि। जगदीश प्रसाद मण्डल पाँच-छह बर्खक रहथि तखनेसँ भाइक संग स्कूल जाए लगला। गामेमे लोअर प्राइमरी स्कूल छल जे दुनू पालीमे चलैत छल। अखन तँ आठम धरिक पढ़ाइ हुअए लागल अछि। तहिना आब एक शिक्षकसँ चलैत ई स्कूल सेहो सतरह शिक्षक धरि पहुँचि गेल अछि। तँए कि शिक्षा अगुआ गेल? जिनगीक लेल सर्वांगीन विकास अनिवार्य अछि, जँ से नै तँ ओ अकलांग-विकलांग भेल पड़ल रहत। सामान्य स्कूल-कअोलेज तँ ठाम-ठीम बनल मुदा तकनीकी शिक्षाक विकास नै भेल। परिणाम बनि गेल अछि जे काजक दिशे बदलि गेल अछि। खएर जे होउ, मुदा आजादीक पहिनौं आ पछातियो बेरमा राजनीतिक आ शैक्षणिक दृष्टिसँ अगुआएल रहल। आजादीक आन्दोलनमे बचनू मिश्र उभड़ला। नवानी विद्यालयमे भनसियाक काज करैत रहथि। लिखनाइ तँ नै सीखि भेलनि मुदा वक्ता भऽ गेलाह। देशक प्रति ओहन समर्पित जे आजादीक दौड़मे तीन मास धरि बिना नूनक भट्टे-बैगन उसनि-उसनि खा दिन-राति काज करैत रहलाह, आन्दोलन गाम-गाम पकड़नहि रहए। काजेसँ इमानदारी सेहो अबै छै। १९३४ ईं.क भूमकमक पछाति राशनक जे बँटवारा हुअए लागल, तइमे एतेक इमानदारीक परिचय ओ मधेपुर थानामे देलनि जे समाजक सभ हुनका गाँधीजी कहए लगलनि। तइ संग आरो-आरो लोक रहथि। बेरमा पंचायत बनबैमे हुनकर योगदान बहुत रहलनि। जनसंख्याक हिसाबसँ ओइ समयक पंचायतक हिसाबसँ, बेरमा छोट पड़ैत रहए। सामाजिक बुनाबटि एहेन जे गाम-गामक बीच अपन-अपन संबंध, तँए के केकरा संग रहत, ई जबरदस्त समस्या। मुदा दीप गामक नेतृत्वक सहयोगसँ, जे अपन पंचायत काटि पंचायत बनबैमे सहयोग केलथि, पंचायत बनल। पछाति बचनू मिश्रक दिमाग गड़बड़ा गेलनि। ओना अस्सीसँ ऊपर बर्खक उमेरमे मुइलाह मुदा प्रभाव कमि गेलनि। ब्रेन प्रभावित होइक कारण दूटा भेलनि, पहिल पारिवारिक आर्थिक स्थिति आ दोसर राजनीतिक क्षेत्रमे इमानदारीक अभाव। मुदा अंत-अंत धरि समाजकेँ जगबैत रहलाह। अठारहम शताब्दीक पूर्वार्द्धमे एकहरे खड़का मूलक परिवारमे पं. कंचन झा आ पं. बबुए झा वैदिक भेलाह। ओना ओइ समैमे अंग्रेजी शिक्षाक प्रचार-प्रसार नै भेल छल, मुदा संस्कृत शिक्षाक स्वार्णिम युग अवस्स छल। स्वर्णिम ऐ लेल जे सामाजिक ढाँॅचा, किछु विच्छृंखला छोड़ि, वैदिक पद्धतिसँ चलैत छल। आस्ते-आस्ते बिच्छृंखला बढ़िते गेल। पछाति अंग्रेजी शिक्षाक प्रभाव सेहो खूब पड़ल। पं. कंचन झाक बालक पं. भुटाइ झा प्रसिद्ध गेठरी झा ख्याति प्राप्त वैदिक भेलाह, हुनका दरभंगा राजसँ सात सए बीघा जमीन लाखेराज ब्रह्मोत्तर रूपमे भेटल छलनि। ओइ समैमे किनको ताधरि पंडितक बीच स्थान नै भेटनि जाधरि ओ काशीसँ पढ़ि नै अबैत छलाह। पं. चित्रधर ठाकुर हुनके घरक भगिनमान परिवार। पंडित चित्रधर ठाकुरकेँ तीन बालक, पं. जयनाथ ठाकुर, पं. तेजनाथ ठाकुर आ पं. खर्गनाथ ठाकुर। तीनू पंडित मुदा जेठका भाय खेती करैत किसान बनि गेलाह आ बाकी दुनू भाँइ पं. तेजनाथ ठाकुर आ पं. खर्गनाथ ठाकुर काशीसँ पढ़ि एलाह। उच्चकोटिक श्रेणीमे गिनती छलनि। पंडित तेजनाथ ठाकुर जीवन-पर्यन्त लोहना संस्कृत विद्यालयमे सेवा देलनि। तेकर पछाति परिवारमे पं. गौरीनाथ ठाकुर, अनिरूद्ध ठाकुर आ सुन्दर ठाकुर भेला। शरीरसँ अबाह रहने पं. सुन्दर ठाकुर वैद्यक रूपमे गामेमे वैद्यगिरी करैत रहलाह। पं. अनिरूद्ध ठाकुर व्याकरणक पंडित, ओ सीतामढ़ी जिलाक एकटा विद्यालयमे जिनगी भरि सेवा देलनि। अखन धरि दुइये परिवारक चर्च भेल अछि मुदा एतबे नै अछि। पं. कामेश्वर झा, जे खगड़िया विद्यालयक संग दीप महाविद्यालयमे सेहो सेवा देलनि। ओ वेद-व्याकरणक प्रकाण्ड पंडित छलाह। पंडित चण्डेश्वर झा अरड़िया मध्य विद्यालयक संस्थापित शिक्षक बनि अधवयसेमे मरि गेलाह। पंडित उपेन्द्र मिश्र सभसँ भिन्न छलाह। ओ एक संग ज्योतिष, वेद, व्याकरण आ साहित्यक विशेष ज्ञाता छलाह। कतेको महाविद्यालयमे सेवा दैत शरीर तियाग केलनि। सभसँ भिन्न ओ ऐ अर्थमे छलाह जे कोनो महाविद्यालयमे अधिक दिन नै टिक पबैत छलाह। सालक भीतरे किछु ने किछु खटपट भइये जाइत छलनि। जखने खटपट होइत छलनि, सोझे घरमुँह विदा भऽ जाइत छलाह। मुदा गामो एलापर केकरो किछु कहैत नै छलखिन। कियो पुछबो ने करनि जे ओहिना एलौं आकि झगड़ा-दान कऽ कए एलौं। अद्भुत गुण छलनि जे अपने-आप विमर्श करैत, समए संग अपन कर्त्तव्यकेँ छुटैत देखि दोसर महाविद्यालय दिसि विदा होइत छलाह। खराम छोड़ि पएरमे कहियो जूत्ता-पप्पल नै पहिरलनि। परोपट्टाक विद्वानक बीच अपन पहिचान छलनि, जइसँ कोनो विद्यालय, महाविद्यालयमे स्वागत रहैत छलनि। पंडित उदित नारायण झा, जे गोल्ड मेडलसँ सम्मानित छलाह, शिक्षण कार्य छोड़ि दोकानदारी व्यवसायकेँ अपन जीविका बनौलनि। परिवारक स्थिति खराप छलनि। बिनु उपारजने चलैबला नै छलनि। मुदा किछुए दिनक मेहनतिक फल नीक भेटिलनि। जीवन-यापन करैत बीस बीघा जमीन परिवारमे बनौलनि। पं. रामनारायण झा व्याकरणक ज्ञाता छलाह। शरीरसँ पुष्ट रहने शुरूमे पुलिसक नोकरी शुरू केलनि, मुदा विदेशी शासनक उठैत विरोधमे नोकरी छोड़ि शिक्षण कार्यमे चलि एलाह, बेसिक स्कूल घोघड़डिहामे प्रवासी जीक संग रहि सेवा देलनि। गामक स्कूलसँ १९५६ ई.मे जगदीश प्रसाद मण्डल निकलला। गामसँ सटले पूब कछुबीमे मिड्ल स्कूल बनि गेल छल। तइसँ पहिने ई पँचमा धरिक स्कूल छल। मिड्ल स्कूल अलग बनल। ओना अखन दुनू मिलि एक भऽ गेल अछि मुदा पहिने दुनू अलग-अलग छल। ओइ समएमे पँचमा धरि फीस नै लगैत छल, मुदा छठा-सातमामे अढाइ रूपैआ महीना फीस लगैत छल। जगदीश प्रसाद मण्डल १९६० ईं.मे मिड्ल स्कूलसँ निकलि केजरीबाल हाइस्कूल झंझारपुरमे नाओं लिखेलनि। बेरमाक विद्यार्थी तमुरियामे हाइ स्कूल आ झंझारपुर हाइ स्कूलमे ऐ दुनू ठाम साले-साल विभािजत होइत रहैत छल। कारणो रहै। जइ रूपक शिक्षकक टीम झंझारपुरमे छल ओइ तरहक टीम तमुरियामे नै छल। तमुरिया हाइ स्कूलमे एक-आध शिक्षक साले-साल जाइत-अबैत छलाह जखन कि झंझारपुरमे से नै छल, जइसँ झंझारपुरकेँ नीक मानल जाइत छल। जहिना गामक आन-आन विद्यार्थी पएरे जाइत-अबैत छलाह तहिना ईहो जाइत-अबैत छला। किछु गोटे होस्टलोमे रहैत छला। सालो भरि किछु नै किछु असुविधा रहिते छलनि, ओना अखनो किछु-किछु छन्हिये। सालो भरि ऐ तरहेँ रहै छल। अगहनसँ माघ धरि दिनो छोट होइए, मुदा विद्यालयक समए छोट नै होइत छल। काजक अनुकूल समए भेटने दिन-रातिमे अन्तर भलहिं नै बूझि पड़ैत छै, मुदा गाम-घरक लेल तँ ई कठिन अछिये। मौसमी छुट्टीक नाओंपर दिसम्बरमे आठ-दस दिन बड़ा दिनक छुट्टी होइत छल, जे परीक्षाेपरान्त आ रिजल्टसँ पूर्व होइत छल। गरमियो मासमे असुविधा तँ तहिना मुदा ओ असुविधा दोसर तरहक होइत छल। ओना एकरा आम खाइक छुट्टी सेहो कहल जाइ छै मुदा ग्रीष्मावकासक नाअों सेहो छै, ई नमगर छुट्टी, मास दिनक होइत छल। नीक परिवारक विद्यार्थीकेँ अनुकूल वातावरण रहने दोहरी लाभ होइत छलनि, साधारण परिवारक विद्यार्थी आम खाइत-खाइत आधा-छिधा बिसरि जाइत छला। शैक्षणिक वातावरण स्पष्ट रूपमे विभाजित भऽ जाइत छल। जहिना जाड़क मास बरेड़ी छुबैत अछि तहिना गरमियो गाछक फुनगी छुबैत अछि। जइसँ अप्रील माने चैत सँ ताधरि विद्यालय भिनसुरका होइत छल, जाधरि गर्मी छुट्टी नै भऽ जाइत छल। तमुरिया हाइ स्कूल आ झंझारपुर हाइ स्कूलमे इहो अंतर छल जे आधा घंटा आगू-पाछू खुजबो करैत छल आ बन्नो होइत छल। कारणो छलै, कमला पछिमक गाम मेंहथ, नरूआर आदिसँ लऽ कऽ पूबमे बेरमा धरि आ गंगापुर खरबाइरसँ लऽ कऽ अलपुरा-अरड़िया धरिक विद्यार्थी झंझारपुरमे पढ़ैत छलाह। एत्ते नमहर क्षेत्र, तँए विलम्बसँ स्कूल खुलैत छल। ओइ समए साढ़े एगारह बजे विद्यालयमे छुट्टी होइत रहए। तखन पान-सात मील पएरे चलब कठिन छल। ओना ई बड़ कठिन नै किएक तँ बेरमाक विद्यार्थी पएरे चलि लोहनो विद्यालयसँ पढ़ने छलाह। तहिना बर्खा मासमे सेहो होइत छल। कखन पानि-विहाड़ि आबि जाए, तेकर कोनो ठीक नै। तहूमे कतेकाल बरिसत तेकरो ठेकान नै। खैर जे हो.....। केजरीवाल हाइ स्कूल झंझारपुरमे १९६३ ई.मे हायर सेकेण्ड्रीक पढ़ाइ शुरू भेल। मुदा थोड़े पेंच लागि गेलै। कला-विज्ञान आ वाणिज्य तीनूक पढ़ाइ होइ छलै। कला-विज्ञानक मंजूरी भेटि गेल, वािणज्यक भेटबे ने कएल। कते रंगक हवा बहए लागल। ओना शिक्षकमे बढ़ोत्तरी पछाति भेल, मुदा शुरूमे असुविधा रहल। १९५८ ई.मे जनता कओलेज खुजल। जन-सहयोगसँ कओलेज खुजल। मुदा कओलेजक जे नमगर-चौड़गर घर चाही, जे धड़फड़मे नै भेलै तँए हाइये स्कूलमे साधारण रूपेँ पढ़ाइ शुरू भेल। किछु गनल चुनल विषयक पढ़ाइ शुरू भेल। खएर जे भेल, मुदा शिक्षामे नव जागरण क्षेत्रमे आएल। बहुतोक मनक मुराद पूरा होइक संभावना बढ़ल। बी.ए. तकक पढ़ाइ लगमे हएत, तखन पढ़ैबला बच्चा आ पढ़बैबला गारजनक मनमे किअए ने उत्साह जगतनि। किछु दिनक पछाति कओलेजक अपन कँचका ईंटा आ खपड़ाक मकान बनलै। जगदीश प्रसाद मण्डल १९६५ ई.मे हायर सेकेण्ड्री पास केलापर बी.ए. पार्ट वनमे नाओं लिखेलनि। पहिने दू बर्खक आइ.ए. आ दू बर्खक बी.ए. प्री हुअए लगलै आ दुनू दिससँ विद्यार्थीक प्रवेश हुअए लागल। बी.ए. पार्ट वन केलापर आनर्स पढ़ैक विचार भेलनि। आ आन कओलेजमे आनर्सक पढ़ाइ होइत छल, जनता कओलेजमे नै होइत छल। एक-दू-तीन शिक्षकसँ अधिक कोनो विषयमे शिक्षक नै छल। हिन्दी विभागमे सेहो दुइये गोटे छलाह। ओ प्राइवेट रूपमे तैयारी करए लगला। सी.एम. कओलेजक नाओंसँ फार्म भराएल आ परीक्षो भेल। १९५२ ईं.क चुनावक बाद देशक अपन विधिवत सरकार बनल। मुदा एक संग कतेको प्रश्न उठि कऽ ठाढ़ भऽ गेल। सरकारी कार्यालयमे कर्मचारीक जरूरति भेल। जेकर बहालीमे जातिवाद आ पैरवी-पैगाम शुरू भेल। आम जनताक जगाएल सरकार जनतासँ बहुत दूर हटि गेल। ओना जे कोनो नव-स्वतंत्र देशक स्थिति होइए तहिना अपनो ऐठाम रहए। मुदा ओइ लेल जत्ते सकारात्मक सोच आ काजक औसत हेबाक चाहिये से नै भेल। सामंती सोच; आ सामंत मजगूत छल, जइसँ आम-अवामक बीच आक्रोश पनपए लगलै। राजा-रजबाड़े जकाँ शासन पद्धति चलए लागल। तही बीच भूदान आन्दोलनक उदय सेहो भेल। ओना तेलांगनासँ शुरू भेल भूमि आन्दोलन देशकेँ डोला देने छल। तइ संग केरल, बंगालक संग छिटफुट अनेको राज्यमे भूमि आन्दोलन पकड़ि रहल छल। दरभंगा जिलामे सेहो भूमि आन्दोलन शुरू भेल। १९५७ ई.क चुनावमे काँग्रेस सरकारक स्थिति कमजोर भेल। केरलमे वामपंथी सरकार बनि गेल। आजादीक दौड़क जे जागरण छल आे ताजा छल, जइसँ अखुनका जकाँ नै छल। ऐ बीच गोटि-पङरा हाइ स्कूल, कओलेज, प्राइवेट रूपमे बनए लागल छल। मुदा औसत कम रहल। खादी भंडार उद्योगक ह्रास होइत गेल आ होइत-होइत ई मेटा जकाँ गेल। तहिना नगदी पैदावारमे कुशियार सेहो छल, जे उद्योगपतिक चलैत सेहो मरए लागल। मिथिलांचलमे मूलत: जीविकाक साधन कृषि छल। ओना सघन रूपमे कृषि जीविकाक पैघ साधन छी, मुदा से नै छल। जेहो छल तहूमे रंग-बिरंगक छल-प्रपंच चलि रहल छल। बटाइ खेतीमे अधिया उपज उपजौनिहारकेँ भेटै छलै। जखन कि उपजबैमे, खेती करैमे किछुए अन्नक खेती लाभप्रद छल। उपजाक अनुपातमे लागत खर्च किछुमे कम छल आ किछुमे अधिक। जइमे अधिक छल ओइमे बटेदारकेँ घाटा लगैत छलै। तइ संग रौदी-दाहीक प्रभाव ओहन किसानपर सेहो पड़ैत छल जे खेती करैत छलाह। जे बेसी खेतबला छलाह हुनकर खेती अधिकतर बटाइक माध्यमसँ चलैत छल। तइ संग अधिक अन्न रहने अन्नक महाजनियो चलैत छलनि। महाजनियोक प्रथा गाम-गामक फुट-फुट छल। कोनो गाममे सवाइ (एक मोनक सवा मोन, एक सीजिनक), तँ कोनो गाममे एगारही (आठ पसेरीक मोन, एक मोनक एगारह पसेरी), तँ कोनो गाममे डेढ़िया (एक मोनक बारह पसेरी) छल। जेकर मतलब भेल जे एक मोनक आधा मोन सूदिये भेल। तइ संग ईहो होइत छल जे सालक कर्ज सालमे चुकाएल जाइत छल आ जँ से नै तँ सूदो मूड़े बनि जाइत छलै जइसँ दू साल बितैत-बितैत कर्ज दोबरा जाइ छलै। अखुनका जकाँ बिआह तँ तते भारी नै छल मुदा माए-बापक सराधमे सामाजिक आ जातीय एहेन चाप छल जे खेत-पथार बेचि काज चलैत छल। खेतक हिसाबसँ चारि-पाँच मेलक किसान छलाह। गामक-गाम एक-एक गोटेक छलनि, जखने एकठाम जमीन समटाएल रहत तखन दोसर-तेसरक की आ कते हेतनि? खेतमे काज करैबला बोनिहारोक स्थिति बदसँ बदतर छल। एक तँ दिन भरिक बोनि कम, तहूमे सालक गनल दिन काज होइत। किसानोक बीच खेतीक नव वैज्ञानिक खेतीक पद्धतिक अभाव छलनि। अभावोक कारण छल जे ने सरकारक धियान खेती दिस छल आ ने खेतीक साधन उपलब्ध छल। त्रेता युगक जनकक हर जकाँ खेत जोतैक हर होइत छल! जहिना मरिआएल बड़द तहिना जोतिनिहार। तइ संग खेत पटबैक पानिक कोनो दोसर बेवस्था नै। जहिया पानि हएत तहिया खेती शुरू हएत। जइसँ बेसमए खेती होइत छल। पोखरि-झाँखड़िमे अनेरूआ माछ जे होइ, सएह माछ पोसब कहाइत छल। तहिना तीमनो-तरकारी आ फलो-फलहरीक हाल छल। मोटा-मोटी कृषिक ओहन दशा बनि गेल छल जइपर जीवन यापन करब कठिन भऽ गेल छल। पशुपालनक रूपमे गाए-महींस आ बकरी पोसब मात्र चलैत छल। गाए-महींस पोसैक बीच महाजनीक एहेन सूत्र लागल छल जे पोसिनिहार िसर्फ पोसैत छलाह। एक तँ नस्ल पछुआएल रहने पछुआएल कारोबार, दोसर एहेन जालमे ओझराएल जे धीरे-धीरे ई तेना कमिते गेल जे बढ़ैक कोनो संभावना नै रहल। नगदी फसिलक रूपमे कुशियार आ पटुआक खेती छल। मुदा उद्योगपतिक कारामातसँ ओहो दुनू कमजोरे होइत गेल। मुदा सरकारक प्रति जन-आक्रोश बढ़ल। गाम-घरक लोक सरकारी लाभक माने बुझैत छल मात्र कोटाक वस्तु धरि। सेहो रस्ते-पेरे लुटाइत छल। १९६७ ई.क चुनाव आएल। जगदीश प्रसाद मण्डल बी.ए.क विद्यार्थी रहथि। आजादीक पछाति ई पहिल जन-जागरण छल। पढ़लो-लिखल आ विद्यार्थियो ऐमे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूपेँ मैदानमे उतरल। जगदीश प्रसाद मण्डल बी.ए. पार्ट-१ केलनि आ करिते १९६७ ईस्वीक आम चुनाव आएल। जहिना कांग्रेस पार्टी जन-समूहसँ हटि किछु खास जातिक पार्टी बनि रहल छल तहिना आनो-आन पार्टीक स्थिति छलै। कम्युनिस्ट पार्टी िकछु क्षेत्रमे मजगूत छल मुदा झंझारपुर इलाकामे कमजोर छल, मुदा तैयो ई एतऽ जोर-सोरसँ पकड़ि रहल छल। कांग्रेसक प्रति लोकक आक्रोश बढ़ि रहल छल। सरकार विरोधी (कांग्रेस सरकार) हवा बनि रहल छल। कारणो छलै, स्वतंत्रता आन्दोलनमे स्वतंत्र देशक जे आकांक्षा होइत ओ तँ छलैहे मुदा ओकर पूर्तिक कोनो उपाए नै भेल। संगे-संग कांग्रेस पार्टी जनसमूहक संग छोड़ि परिवार विशेष वा जाति-विशेषमे समटा चुकल छल। ग्रामीण समाजमे स्वतंत्रताक कोनो लाभ स्पष्ट रूपेँ सोझा नै आएल। किसान प्रधान मिथिलांचलक स्थिति आजादी पूर्वेक बनल रहल। ओना देशेमे पंजाबक किसानक स्थिति सुधरि गेल। कारण ओइठामक सरकार कृषिकेँ प्रमुखतासँ पकड़ि पानि-बिजलीक बेवस्था कऽ लेलक। पानि आ बिजली, कृषि लेल ई दुनू साधन प्रमुख अछि। से बिहार (मिथिलांचल)मे नै भेल। शिक्षा-बेवस्थामे सेहो जेहेन हेबाक चाही से नै भेल। संग-संग आरो बहुत कारण भेल, जइसँ विद्यार्थीक बीच आक्रोश सेहो बढ़ल। राजनीतिक चेतना बढ़ने जगौनिहारोक संख्या बढ़ल। मुदा अपनेमे लड़ने-झगड़ने सभ विरोधी पार्टीक स्थिति सेहो खरापे। नव चेतनाक संग विरोधी (कांग्रेस विरोधी) सभ राजनीतिक पार्टी एक मंचपर आएल। अंग्रेजिये शासन जकाँ कांग्रेसो शासनक विरूद्ध लोक उठि कऽ ठाढ़ भेल। ओना देशेक, मुदा बिहारक तँ कहले जेतइ जे स्वतंत्रताक उपरान्त ई पहिल जन-जागरण छल। सभ पार्टीकेँ एक मंचपर एने कोनो निश्चित कार्यक्रम बनब असंभव छल, कारण एते जल्दिबाजीमे भइये कि सकैए। तखन तँ आम-चुनाव पीठपर अछि तँए सरकार बदलैक कार्यक्रम बनल। किसान-बोनिहारक संग बुद्धिजीवियो मैदानमे उतरलाह। कांग्रेस विरोधीक नीक हवा बनल। अपन मधुबनी जिलामे अखन दूटा पार्लियामेंट क्षेत्र अछि, तइ दिन दरभंगे जिला छल। दुनू क्षेत्रमे कांग्रेस हारल। हारबे नै कएल, वोटोक प्रतिशत बहुत निच्चाँ उतरल। एकसूत्री कार्यक्रम, कांग्रेस हटाउ, रहने काेनो राज्यमे एक पार्टीक सरकार नै बनल। खिचड़िये सरकार बिहारो, बंगालो, उत्तरो प्रदेश आ आनो-आन राज्यमे बनल। समस्यासँ ग्रसित राज्य सभ छलैहे, किमहरसँ समस्या पकड़ल जाए, ई मुख्य समस्या छल। तइ बीच चतरल-गछगर भूदानो आन्दोलन उधिआए लागल। मुदा तैयो किछु गोटे भूदानसँ राजनीतिक मंचपर एलाह। भूदानकेँ आन्दोलनक रूपमे ठाढ़ कएल गेल। ओना तेलांगनाक भूमि आन्दोलन चरमपर छल। जमीनक छअम भागक (छअम हिस्सा दान दिअ) हिस्सा मंगैक अभियान शुरू भेल। लोक लाखक-लाख बीघा दान देलनि। सबहक अनुमान भेलनि जे देशक छअम हिस्सा गरीबोक बीच आओत। कोनो गामक दू प्रतिशतसँ लऽ कऽ पनरह बीस प्रतिशत तकक जमीन घर-घराड़ीमे लगै छै। तइठाम छअम हिस्सा सोलह प्रतिशतसँ ऊपर, जमीनक आमद-खर्च दुनू भऽ गेल। भलहिं आइयो, २०१२ ई.मे ढेरो परिवार एहन अछि जेकरा चारि डिसमिल जमीन नै छै जे घरो बना सकत। जहिना हवामे उधिआइत भूदान आन्दोलन आएल आ गेल तेकर ओत्ते प्रभाव नै पड़ल जत्ते गामक एकटा गृह-उद्योग समाप्त भेने भऽ गेल। खादी-भंडारक माध्यमसँ कारोबार चलैत छल, तइमे तेना कऽ मुसहनि लागल जे अन्न-माटि दुनू एकबट्ट भऽ गेल। जेहने दाना अन्न तेहने मुसहनिक माटि, केना बेराओल जाएत। ओना अखनो किछु गोटे भूदानी जमीन पाबि खुशहालीक जिनगी बनौने छथि, तहिना कपड़ोक (खादी) कारोबार चलैए, मुदा नगण्य रूपमे। जहिना लूटमे चरखा नफा कहल जाइ छै तहिना चरखोक नफा सठि रहल छल, मुदा अखनो बुनियादी समस्याक भीड़ कियो जाए नै चाहैत अछि। ओहन समाजो नै बनि सकल अछि। ओना समाजो केना बनत, दुरूस्त केनिहारसँ बेसी भङठेनिहारे अछि। बेरोजगारोक संख्या कम नै छै मुदा ओहनो बेरोजगार तँ अछिये जेकरा मोटर साइकिल, होटल, मोबाइल होइत कपड़ा-लत्ता, भोजन-छाजन सहित बीस हजार रूपैआ महीनाक जिनगी बनि गेल अछि। तैंतीस सूत्री कार्यक्रम लऽ कऽ मिलल-जुलल सरकार बनल। मैट्रिकक परीक्षामे अंग्रेजी भाषाकेँ कमजोर कएल गेल, संग-संग हाइ स्कूल तकक शिक्षा फ्री करैक अावाज उठल। १९५७ ई.क बाद अंग्रेजी शिक्षा आगू बढ़ल। जइ अंग्रेजीक पढ़ाइ आठमा (हाइ स्कूल) सँ शुरू होइत छल ओ मिड्ल स्कूलमे प्रवेश कऽ गेल। छठासँ पढ़ाइ शुरू भऽ गेल। घीच-तीड़ कऽ अठारह महीना सरकार चलल। फेर मध्यावधि चुनाव भेल। मुदा पहिलुका खिचड़ी, जे सोलहन्नी घीसँ अलग छल, ऐबेर घी-खिचड़ी सरकार बनल। समस्या-समाधानक प्रति ओते नै भेलै मुदा जन-जागरण जरूर भेलै। तइ बीच हरित क्रान्ति कृषिमे सेहो भेल। कतौ-कतौ तँ एहेन भेल जे जइ खेतमे पाँच सेर कट्ठा होइत छल ओ क्विन्टल कट्ठा उपजए लागल। मुदा अपना ऐठामक जमीनक ईहो दुर्भाग्य रहल जे खेतबला नोकरी-चाकरी करए शहरसँ विदेश धरि पहुँचि गेलाह, मुदा खेत तँ गामेमे रहि गेलनि। बटाइक एहेन बेवहार जे बटेदारकेँ लाभ नै होइत, पाइ-कौड़ी कमेने संस्कारो तेज भेलनि। अभावमे लोक खेत बेचैए आकि पाइयो-कौड़ी रहने लोक बेचत। से पड़ले रहत। मुदा बेचि कऽ बाप-दादाक नाक केना कटाएब! तइ संग सरकारी कार्यालय कागजी झंझटिक अड्डा बनल अछि। मिथिलांचलक एक-एक समस्या मिथिलावासीक छियनि। अखनो बच्चा सबहक स्कूलमे ऐ ढंगसँ बच्चाकेँ मारल-पीटल जाइ छै जे ओ स्कूल छोड़ि दैत अछि। एक्कैसम शताब्दीमे जँ अठारहम सदीक बेवहार चलत तँ ओइसँ समुचित लाभक आशा नै कएल जा सकैए। जगदीश प्रसाद मण्डल १९६७ ई.क चुनावी दौड़मे जनवरी १९६७ ई.मे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टीक सदस्य बनला। चुनावो पीठेपर रहै, मधेपुरोसँ कांग्रेस पार्टी हारल। गाम-समाजसँ लऽ कऽ देशक राजनीति तकमे अराजक स्थिति बनए लगलै। १९५७ ई.क केरलक वामपंथी सरकार तोड़ैमे सरकारक (कांग्रेस सरकार) साख खसल। स्वतंत्रता सेनानियोक (आजादीक लड़ाइ लड़निहारोक)क संख्यामे बहुत कमी नहिये भेल छल। किछु प्रखर नेता जरूर मरि गेल छलाह। राजनीतिक क्षेत्रमे भाइ-भातिज आ जातिवाद, सम्प्रदायवाद, दल-बदल इत्यादि जोर मारलक। नेतृत्वक साख सेहो घटल। जातिवाद रूपमे जतऽ जनताक साख नेतृत्वक नजरिमे गिरल ततऽ कोनो पार्टीक विधायक सांसद कुरता-धोती पहीरि-पहीरि लोकक बीच अबए लगलाह। बड़का नेताक संग छोटकाक बलि चढ़ए लागल किएक तँ जाति, कुटुम्ब, गौआँ, पड़ोसी आ लेन-देन ओकर आधार बनल। बिहारोक राजनीति जटा-जटिनक नाच जकाँ झिलहोरि खेलए लागल। प्रशासनो लाभ उठौलक। वोटक पार्टीकेँ बिनु वोटक पार्टी दबा-दबा शासन पकड़ए लागल। एक तँ ग्राम-पंचायत सिनेमा पोस्टर जकाँ मात्र नाम गाम छल, जेकरा मजगूत करब सभसँ अहम, मुदा देशक ई एहेन संस्था छल जेकरा आरो कमजोर बना सरकारी तंत्रक हाथमे समेटि कऽ राखि देल गेल छल। कोट-कचहरीक चलती आबि गेल, कोना नै अबैत? एक दिस हारल मुखिया आ आरो-आरो सत्तासीन हुअए लगल आ जनताक प्रतिनिधि सड़कपर रहि गेल। जमीनदार-सामंत घसाइत-घसाइत घसा गेल, गाम-गामक ओकर जमीन गौआँक अखड़ाहा बनि गेल। जेकर लाठी, तेकर भैंसक स्थिति बनि गेल। विचारधाराक बीच राजनीतिक पार्टीक बीच सेहो उठा-पटक हुअए लागल। मोटा-मोटी सामाजिक, आर्थिक, बौद्धिक, राजनीतिक सभ मंचपर वैचारिक संघर्षक संग सामाजिक-आर्थिक विश्लेषण सेहो हुअए लागल, जेकर परिणाम इन्दिरा जीक नेतृत्वकालमे स्पष्ट भऽ गेल। आजादीक बाद ई कांग्रेसक बीच पहिल वैचारिक लड़ाइ छल। गाम-गाममे सेहो पुरोहितवादकेँ धक्का लागल। जतिया आगू पतिया नै लगै छै, ई िनर्णायक भेल। मुदा जइ रूपमे आर्थिक शोषण होइत छल तइमे कमी नै भेल। जातिमे किछु बदलाव आएल मुदा बेवहारिक पक्ष ठामक ठामहि रहि गेल। कतबो ठामक-ठामे रहल तैयो बेवस्थाक विरोधमे किछु ने किछु लाभ भेबे कएल। कारणो भेल, हो-हामे काज तँ शुरू भेल मुदा पोथी-पत्राक भाषा तँ संस्कृते रहए। पढ़निहारोक संख्या कम आ बुझिनिहारक तँ सहजहि नै। मुदा तैयो किछु ने किछु चक-चूक चलिते रहल। कतौ “ॐ” लऽ कऽ मारि-पीटि तँ कतौ किछु। जहिना पोथी-पतराक दशा भेल तहिना राजनीतिक मंचपर गाँधीवादक दशा भेल। एक्के बात एक्के पाँतिक व्याख्या, जते-मुँह तते रंगक व्याख्या हुअए लागल। जरूरत अछि जे ऐ समस्याक समाधान मजगूतीसँ कएल जाए। नै तँ मूड़न आ सराधक भोजमे कोनो भेद नै रहत। शिक्षा-संस्थान आरो एकटा अड्डा बनि गेल। कोनो तरहक प्रतिबंध नै। वएह कओलेजमे गाँधीवादी सिद्धान्तो पढ़ौता आ फील्डमे आबि खिल्लियो उड़ौताह, आ विधानसभा संसदमे ओ सभ बिकेबो करताह। एहेन खेल धड़ल्लेसँ भेल। मुदा एकटा जरूर भेल जे जहिना १९४२ई.क अंगेज विरोधी हवा पैदा केलक, तहिना १९६७ ई.क हवा सेहो केलक। एक दिस रौदीक मारल किसान, सामंत-पूँजीपतिक बीच विवाद, जाति-जातिक आ वर्ग-जातिक बीचक दूरी, जोतल खेत जकाँ चौकिया कऽ एकबट्ट भऽ गेल, मुदा से सोलहन्नी नै भेल। ओना कोसीक पुल-बान्ह (नेपाल फाटक सहित) बनल, कोसी नहरिमे हाथ लागल मुदा की लाभ भेल? देखिते छिऐ। जइ तरहक हलचल कओलेज आ हायर शिक्षण संस्थानमे भेल तइ तरहक हलचल हाइ स्कूलमे नै भेल। मिड्ल स्कूलक तँ चर्चे नै। जे युनिवर्सिटीक सर्वोच्च पद (भी.सी) विद्वत मंडलीक बीच छल ओ प्रशासनिक अफसरक हाथ जाए लगल। केना ने जाइत, विद्वता आ प्रशासनमे तँ किछु बेवहारिक अंतर अछिये। कोनो कारगर निअमो नै लगौल जा सकैए। किछु सरकारी कओलेज तँ किछु गैर सरकारी। किछु बनिते तँ किछु बनैक विचारे करैत। एहना स्थितिमे निअममे मजगूती केना आओत। उपरका धार निच्चा दिस बहल। विद्यार्थियो जे साल भरि नेतागिरी केलनि ओ परीक्षा केना पास करताह। तहूले तँ कानूनेक जरूरति। हूड़ उठल आ एक्के-दुइये किछु कओलेज छोड़ि परीक्षामे चाेरी शुरू भेल। काॅपी जँचनिहारोकेँ अगहन हाथ लगलनि। कतेक कंठी शिक्षकक बीच टुटल। पाइ हाथ लगने लोक शहर दिस सेहो बढ़लाह। मुदा किछु होउ, किछु कमजोर लोकक विद्यार्थीकेँ जरूर लाभ भेलनि, ओना जते हेबाक चाही से नै भेलनि। रंग-बिरंगक प्राइवेट कओलेज कागजेपर उठि कऽ ठाढ़ भेल। कागजेपर पढ़ाइ, कागजेपर परीक्षा आ कागजेक डिग्री बिकाए लागल, जइसँ बुनियादी समस्या छुटि गेल। ने मेडिकल कओलेज बढ़ल आ ने इंजीनियरिंग, ने इंजीनियर ने कारखाना, ने टेकनीकल कओलेज बढ़ल आ ने कुशल कारीगरक िनर्माण भेल। ने एग्रीकल्चर कओलेज बढ़ल आ ने कुशल किसान बढ़ल। उत्तर-दछिन बिहारक संबंधसँ ऐठामक (मिथिलांचल) पढ़ल-लिखलकेँ दछिन बिहारमे नोकरी भेटलनि। बहुत गोटे घरो-अंगना बना लेलनि, मुदा दुनू राज्यकेँ विभाजित भेने भाषाक सीमाबंदी भेल। ओना जेहन एकरंगाह भाषा मिथिलांचलक अछि ओहन दछिन बिहारक नै अछि। कारणो अछि जे जखन कल-कारखाना अछिये नै तखन कोन नोकरी पाबए आन राजक लोक औताह। तँए भाषामे कोनो धक्का नै लागल अछि। हिन्दी आनर्सक संग बी.ए. पास केलन्हि जगदीश प्रसाद मण्डल, १९६९-७१ ई.क बैचमे सी.एम. कओलेजमे नाओं लिखेलन्हि। पढ़ाइक स्तर सेहो कमि चुकल छल। प्रोफेसर आ विद्यार्थीक बीचक संबंधमे जबरदस्त धक्का लागल। जइसँ शिक्षकक प्रतिष्ठामे कमी आबि रहल छल। नीक शिक्षक अपन मुँह बन्न कऽ अपन प्रतिष्ठा बचबैमे लगि गेलाह। आक्रोश शिक्षकोक बीच बढ़बे कएल। पाइ-कौड़ीक लेन-देन आ पैरबी-पैगाम खूब बढ़ल। जाति आधारित छात्र-शिक्षकक बीच संबंध बढ़ल तँ दोसर दिस (आन-जातिक) संबंधमे कमियो भेल। ओना तँ सभ क्लासक मुदा एम.ए.क परीक्षा तीन साल पछुआएल रहए। क्लास सम्पन्न केलाक बाद गाम आबि परीक्षाक प्रतीक्षा करए लगला। तइ बीच गाममे (बेरमा) दुर्गापूजाक विचार उठल। जतऽ-ततऽ चर्चा हुअए लागल। अधिकांश लोक पूजाक पक्षमे रहथि। मुदा दुर्गापूजा तँ आन पूजा नै जे कमो जगहमे कएल जा सकैए। ऐ लेल अधिक जगहक जरूरति होइत अछि। कारण जे एक तँ दस दिनक पूजा, तइपर दोकान-दौरी, मेला, नाच-तमाशा सेहो होइए। गौआँक सहमति बनले रहै, स्कूलक प्रांगनमे बैसार भेलै, ओना तइसँ पहिनौं गौआक बैसार कते बरे भेल मुदा जते लोक ऐ बैसारमे उपस्थित भेल ओते कहियो नै भेल छल। तहिना बैसारमे बजनिहारोक संख्या बढ़ल। नव पीढ़ी कान्ह उठौलनि। बैसारमे पूजा स्थलक चुनाव हुअए लगल। दू-तीनटा जगह ओहन भेटल जइमे दुर्गापूजा सम्हरि सकैए। मुदा खाली जगहेटा सँ नै हुअए, दिन-रातिक मेला, तँए सुरक्षो अनिवार्य अछि। तँए सुरक्षित जगहक महत बढ़ल। स्कूलेक प्रांगनक सहमति बनल। दोसर प्रश्न उठल बलि प्रदानक। परोपट्टाक दुर्गापूजा दुनू ढंगक चलैत, वैष्ण दुर्गा सेहो जतए बलि प्रदान नै होइत। किछु ठाम बलि प्रदानो होइत आ किछु ठाम नहियो होइत। मुदा गप आेझरा गेल। एक मतक गाममे दुनू मत पनपल। जहिना बैसार एक मतसँ शुरू भेल तहिना दू मतमे विभाजित भऽ गेल। बलि प्रदानक पक्षसँ अधिक विपक्षक। दोसर दिस पूजा करीब आबि गेल रहै। जँ हूसि जाएत तँ साले हूसि जाएत, ईहो बात सबहक मनमे रहनि। घमर्थन होइत-होइत बलि प्रदान रूकल। मुदा विवाद बढ़िये गेल। विवाद बढ़ैक कारण भेल जे पंचायतक जे मुखिया रहथि, हुनकर प्रभाव अधिक रहनि। मुदा समाजोमे नव चेतना जागि चुकल छल। शुरूमे (१९५२ ई.) जखन पंचायत बनल तखन जे मुखिया बनलाह ओ १९६२ ई.क चुनावमे हारि चुकल छलाह। ओहो मतभेद रहबे करनि। पूजाक दस-बारह दिन पहिने एकटा जबर्दस घटना घटल। ओ घटना ई जे मौजुदा मुखिया किछु गनन-चुनल लोकक विचारसँ दोसर स्थानपर, माने स्कूलक प्रांगनसँ अलग स्थानपर पूजाक न्यों लऽ लेलनि। समाजक बीच आक्रोश बढ़ल। मुदा आगू बढ़ैक हिम्मति नै। मनमे उत्साह जरूर मुदा डरो। कारणो स्पष्ट छल जे इलाकाक मुड़हन लोकक समर्थन ओही स्थानकेँ भेट गेल। जगदीश प्रसाद मण्डल जी आ आर लोक सभ दोहरा कऽ बैसार केलन्हि। सोझा-सोझी कियो विरोध नै केलखिन्ह, खुलि कऽ अबैयोले कियो तैयार नै। जबर्दस समस्या उठि कऽ ठाढ़ भऽ गेल। ई बात सभ बुझैत जे जहिना खटपट भेलोपर बिआहक बाद समझौता भइये जाइत अछि तहिना ऐबेरक हुसलापर पूजोमे हेबे करत। तँए मौका हाथसँ निकलने पूजे निकलि जाएत। बैसारमे तँइ भेल जे दोसरो पूजा हुअए। सएह भेल। संग-संग ईहो तँइ भेल जे समाजसँ बाहर चंदा करए नै जाएल जाए, भलहिं जतबे चंदा हएत ततबे लऽ कऽ पूजा कएल जाए। नै पान तँ पानक डंटियेसँ काज चलाएल जाए। मुदा दोसर दिस (जइ दिस मुखिया रहथि) चंदाक भरमार भेल। सरकारीसँ लऽ कऽ आनो-आन पंचायतक चंदा भेल। संग-संग ईहो भेल जे गाममे बन्हुआ चंदा सेहो भेल, चंदा देनिहारक विचारसँ होइत अछि नै कि जबर्दस्ती, मुदा सेहो भेल। चंदाक नाओंपर ई जुरिमानाक रूप पकड़लक, खुलि कऽ नै, चुपे-चाप। परिस्थितियो अनुकूले पकड़ाएल। जे आदमी झगड़ा-झंझटिमे ओझरा गेल अछि ओ कतऽ जाएत। मुदा समाज (गाम)मे तँ कोनो बात छपित नहिये रहै छै। तीन-पार्टीमे समाज बँटि गेल। दुनू दुर्गास्थानक दू पार्टी आ दुदिसिया। दुदिसियाबला सभ बन्हुआ चंदामे फँसलाह। पूजाक आरंभ भेल। दुनू स्थानक बीच किछु खास-खास अंतर भेल। ओ ई भेल जे जगदीश प्रसाद मण्डल आ आर लोक सभ गामक लोककेँ नव दोकानदारक रूपमे ठाढ़ केलन्हि। कियो मिठाइ तँ कियो दोसर चीजक दोकान केलनि। समाजक चंदासँ पूजा हएत, समाजेक लोक दोकान करताह, तँए मेलामे बट्टी (टेक्स)क प्रावधान समाप्त कऽ देल गेल। किछु गोटे ताल ठोकि ठाढ़ भऽ गेलाह जे हमहूँ सभ ओहिना पूजाक आयोजन करब जहिना ओ सभ करताह। भलहिं चंदा नै पूरत तँ व्यक्तिगत रूपमे देब। एहेन करीब पान-सात गोटे भेलाह। तइ संग ईहो भेल जे सभ ओइ स्थान (दोसर स्थान) पर नै जेता। फेर दुदिसिया सभ फँसलाह। फँसबे नै केलाह जिमहर जाथि तिमहर लोक लू-लू, थू-थू करनि। एमहर आबथि तँ ओमहुरका आ ओमहर जाथि तँ एमहुरका मुँहेँ-काने बोकिअबए लगलनि। पुरान पीढ़ीक विचारकेँ धक्का लागल। नव पीढ़ीक हाथमे समाज आएल। तइ संग ईहो भेल जे बेरमाक बगलक गाम जगदरो आ कछुबियो बँटा गेल, जइसँ दुनू गामक समर्थन दुनू स्थानकेँ भेटल। मिलि-जुलि सरकार बनने हाइयो स्कूल प्रभावित भेल। किएक तँ किछु स्कूल सरकारक नियंत्रणमे आएल। मुदा सभ नै आएल। जे आएल ओकर हालतो सुधरलै आ शिक्षककेँ वेतनो बढ़लनि। मुदा जे नै आएल ओ ठामक ठामहि रहि गेल। जइसँ एक नव लड़ाइ शिक्षो विभागमे शुरू भेल। २ उन्नैस सए साठिक पछाति जगदीश प्रसाद मण्डल केजरीबाल हाइ स्कूलमे नाओं लिखा लेने रहथि। स्कूल अबै-जाइक परेशानीसँ साइकिल कीनैक विचार परिवारमे भऽ गेल। ओना जखन टेन्थ (स्पेशल नाइन्थ) मे रहथि तखन दू सए बासठि रूपैयामे सैब्रो साइकिल कीनि लेलनि। मुदा जहिना सीमा परक सिपाहीकेँ दुश्मन सिपाहीक हाथ पकड़ेलासँ होइए तहिना समस्याक सिपाही चारू दिससँ परिवारकेँ घेर लेलकन्हि। दुनू पिसियौत भाय (जेठ गोनर मण्डल आ तइसँ छोट कारी मण्डल) केँ अपन बाप-दादाक डीह-डाबर जगलनि। कोसी धारक मुँह जे पछिम दिस जोर केने छलै ओ आब पूब दिस जोर केलक, जइसँ किछु गाम जेना हरिनाही, मैनही अमही हरड़ी इत्यादिक गामक जमीनक किछु भाग जागलै। भागल-पड़ाएल गामक लोक, अपन बाप-दादाक डूमल सम्पतिक आशामे कान ठाढ़ केनहि रहथि, गाम (हरिनाही) घुमबाक विचार केलनि। बनल-बनाएल गाममे लोकक एहेन कने स्वार्थी प्रवृत्ति बनिए जाइए जे सौंसे गामक सभ किछु हमरे भऽ जाए। प्रवृत्ति बेजाए नै, मुदा खाली सम्पत्तिये नै मनुक्खोक भार जँ उठा लेथि। हरिनाहीक कियो कतौ, कियो कतौ, कतौ-कतौ एहनो जे पान-सात परिवार एकोठाम छलाह। अपन कुटुमैतीक संग-संग नेपाल धरि पसरि गेल छलाह। सभसँ दुखद स्थिति गामक तखन भेल जखन सुभ्यस्त परिवार सबहक, जइ परिवारक लोक अपन घर-अंगनाक काजसँ बाहर नै भेल छलि, ओ सभ जखन बोनिहारिन बनि भरि-भरि दिन अनका खेतमे जिनका घरमे पचसमनी कोठी-बखारी सभ छलनि, एक पसेरी (कच्ची) अन्नपर अपन श्रम बेचैले मजबूर भेली। मुदा उपाये की? ई बात सत्य छी जे समयानुसार हाथकेँ हथियार नै भेटत तँ ओ पाछू भगबे करत, हरहरा-हरहरा कऽ पाकल जामुन जकाँ हुनका सबहक जिनगी उतरि गेलनि। जिनगीक सभ किछु हराए लगलनि। हराइये गेलनि। भागल-पड़ाएल लोकक आन देश आ आन गाममे सरकारी सहायताक कते आशा होइत ओ तँ सबहक सोझहेमे अछि। जे अखनो गाममे ओहन गरीब लोककेँ इन्दिरा आवास नै भेट रहल छन्हि जिनका अपना नामे जमीनक कागज नै छन्हि। साठि इसवीक कातिक। अपन गाम देखैले पिसियौत भाय गोनर मण्डल हरिनाही गेलाह। घोघरडीहामे ट्रेनसँ उतरि भाँज लगौलनि तँ पता लगलनि जे पहिने हटनी, हटनीसँ नौआ-बाखरि, नौआ बाखरिसँ अमही तेकर बाद हरिनाही। कते दूर हएत तँ दू कोस। दू कोस बूझि मनमे उत्साह जगलनि जे दू कोस जाइमे बेसी-सँ-बेसी दू घंटा लागतन्हि। मुदा ई नै बूझि पौलनि जे घोघरडीहा हटनीयेक बीच तीनटा धार पार करए पड़तन्हि। तहूमे गमैया सवारी छिऐ किने, लोकेक विचारे ने चलैत अछि। चारि घंटामे हटनी पहुँचलाह। हटनी नौआ-बाखरिक बीचक सीमामे एकटा सेहो नीक धार माने नम्हर धार। सूर्यास्त भेलापर हरिनाही पहुँचलाह। गोनर मण्डलक एकटा दियाद पहिनहि आबि गेल छलाह जइसँ ओ बीघा डेढ़ेक जमीनक मालिक बनि रसाएल खेतक उपजा पाबि कुटुम-परिवार दिस सेहो ताकए लगलाह। हरिनाही पहुँचते दियादी भाय चुल्हाइ मण्डलक पाहुन बनि गेलाह। गरूगर रास्ता देखि दू दिन रहैक आग्रह चुल्हाइ मण्डल केलखिन। गामक जे पहिलुका बास-भूमि छलन्हि ओ गहींर भऽ गेल रहै आ बाध ऊँच बनि गेल छलै। मुदा ओ अखन सुपौल जिलाक सीमा कात। घर मधुबनी जिलाक हरिनाही गाममे आ सभ अगवास सुपौल जिलाक हरड़ी गाममे। जइठामक हेमलताजी छथि जे फुलपराससँ विधायक रहि चुकल छथि। करीब पनरह परिवार आबि गाममे बसि गेल। तइमे दू परिवारक खूँटापर बड़दो आबि गेल। बाकी सभ कोदारिक जिनगीमे। अपन जागल घराड़ी आ पोखरि देखि गोनर मण्डल आकर्षित भऽ गेलाह। बास जोग तँ नै मुदा चास जोग जमीन देखि चुल्हाई मण्डलकेँ कहलखिन- “भैया अगिला आठम एतै छी।” चारिम दिन बेरमा आबि मामीकेँ कहलखनि- “मामी, हम अपन गाम हरिनाही जाएब।” मामी- “केना जेबहक?” गोनर- “बाँस अपना अछिये। एकटा लऽ जा कऽ पहिने घर बनाएब तखन बूझल जेतैक।” जहिना कोनो ब्रह्मचारी ब्रह्माश्रमसँ निकलि दुनियाँ दिस देखिते सतरंगी दुनियाँ देखए लगैत तहिना ओहो (गोनर मण्डल) देखलनि। केना नै देखितथि। पूर्बक हराएल गाम-घर, दियाद-वाद, सर-समाज जे इतिहास बनि चुकल छलनि, से जे सोझामे आबए लगलनि। ओना हुनका (गोनर मण्डल) एक बीघा धनहर आ अढ़ाइ कट्ठा बासक भूमि माम (जगदीश प्रस मण्डल जीक पिताजी) कीनि देने छलखिन। ओहो दुनू भाँइ (गोनर मण्डल आ कारी मण्डल) हरिनाही बिसरि गेल छलाह। केना नै बिसरितथि हराएलो जमीनक दस्ताबेज, खतियान जँ हाथमे छै तँ आशा बनल रहैत छै। जइठाम ओहो (दस्ताबेज, खतियान) नै रहल ओ तँ पानिक पाथर जकाँ कतए डुमल अछि तेकर कोन ठेकान। आ जँ हेलबैया (पानिक भाँज बुझिनिहार) रहल तँ भाँजो-भुज लगा सकैए मुदा अनाड़ी तँ अनाड़िये छी। सातम दिन एकटा बाँस काटि पाँङि-पुङि कऽ गोनर मण्डल तैयार केलनि जे काल्हि गाम जाएब। बेरमासँ हरिनाही जाएब। चारि दिन रहि, पहिने रहै जोकर घर बना लेब, तखन आगू बूझल जेतैक। मामीकेँ गोनर मण्डल कहलखिन- “मामी, चारि दिन रहि पहिने घर बना लेब। पाँचम दिन फेरि एतै छी।” मामी- “बड़बढ़िया, एक अढ़ैया चाउर आ एक अढ़ैया चूड़ासँ तँ काज चलि जेतह?” असमंजसमे गोनर पड़ि गेलाह। जते अधिक बेसी खाइक ओरियान करब ओते रस्तामे भारियो हएत। एक तँ सात-आठ कोस धार-धुरक रास्ता, तइपर बाँस आ खेबाक समान। बहुत भारी हएत। गाममे माने बेरमामे भरि पेट जलखै कऽ लेलथि आ रास्तोले बान्हि लेलथि। अपन लोटा-थारी, आ लत्ता-कपड़ा नै लेब, सेहो नै बनत। अंतमे एकटा छिपली, एकटा लोटा, बिछबैले दूटा बोरा, एक अढ़ैया-चूड़ा आ एक अढ़ैया चाउर लऽ कऽ दोसर दिन बिदा भेलाह। एक तँ ओहन भारी काज जिनगीमे कहियो नै केने रहथि। हँ एते जरूर छलनि जे बँसबारिसँ बाँस काटि आ बाधसँ धानक बोझ उघि कऽ अनैत छलाह तहिना बाधसँ हर जोता दूगोरा चौकी अनै-लऽ जाइ छलाह, मुदा एते भारी काजसँ पहिल दिन भेँट भेलनि। बेरमासँ निकलि कछुबी-तमुरिया होइत सुन्दर-बिराजीत जाइत-जाइत बेदम भऽ गेलाह। पाछू हिअबैत तँ दुइये कोस टपला, आगू हिअबैत, तँ अखन पौनी-चपराम, कलिकापुर, मेटरस तँ कोसी बान्हक बाहरे भेल। मेटरसमे ने कोसी बान्ह टपि भीतर हेता। तैयो तँ मेटरस टपि दू कोस भीतरो जाइये पड़तन्हि। अबूह लागि गेलनि। जिनगीक बाटमे बच्चा जकाँ बुकौर लागि गेलनि। सुसतेलाक किछु काल बाद फेर हूबा केलनि। पानि पीब बाँस उठा विदा भेला। मेटरस बान्हपर पहुँचैत-पहुँचैत धाह-जाड़ आबि गेलनि। एहेन जगहमे के भेँट हएत? क्यो चिन्हारे नै। गाम-घरमे ने माए-बाप रहने बच्चा फोसरियोकेँ गुड़-घाव कहै छै मुदा नै रहने तँ गुड़ो-घाव फोसरिये भऽ जाइ छै। बेरमाक पच्चीसोसँ बेसी कुटुमैती मेटरसमे तहियो छल आ अखनो अछि। कोसी बान्हपर बाँस राखल आ हिनका (गोनर मण्डलकेँ) पड़ल देखि एक गोटे लगमे एलनि। ओ बाधसँ गाम पर जाइत रहथि। लगमे आबि पुछलखिन- “कतए रहै छी?” धाह-जाड़सँ कँपैत गोनर मण्डल कहलखिन- “बेरमा।” “कतए जाएब?” “हेरनाही।” “एहेन अवस्थामे केना जाएब?” “सएह ने किछु फुड़ैए।” “एकटा काज करू। हमहूँ कियो आन नै छी। हमरो बहिन अहीं गाममे बसैए। कुटुमे भेलौं।” कुटुमक नाओं सुनितहि जेना एकाएक कतौसँ होश एलनि। कहलखिन- “कुटुम नारायण, कहुना-कहुना जँ गाम (बेरमा) घूमि जाएब तँ जान बचि जाएत, नै तँ नै बचब।” “ऐठामसँ घोघरडीहा गेल हएत?” “खाली देहे चलि जाएब।” “सभ समान हमरा ऐठीम राखि दिऔ आ अहाँ चलि जाउ। यएह (बान्हसँ सटले पूब) हमर घर छी।” आशा पाबि गोनर बजलाह- “अपना संगमे चूड़ो अछि। चलू कनिये खाइयो लेब आ रखि कऽ चलियो जाएब।” जोशपर तँ घोघरडीहा स्टेशन विदाह भेला मुदा रास्तामे एहेन स्थिति भऽ गेलनि। जे ने बाट सुझन्हि आ ने डेगे उठनि। ओइ समए चारि बजे गाड़ी निरमलीसँ अबैत रहै। संजोग नीक बैसलनि। गाड़ी पकड़ा गेलनि। सात बजे साँझमे गाम (बेरमा) पहुँचलाह। एक तँ भरि दिनक थाकल तइपर बोखार, गाम अबिते बोम फाड़ि ओहिना कानए लगलाह जेना माए-बापक सोजहाँमे बेटा-बेटी कनैए। अपन पोसलक दशा देखि मामी (जगदीश प्रसाद मण्डल जीक माए) ऐ रूपे कानए लगलीह (डाक स्वरमे) जना भागिन नै बँचतनि। ताधरि दुनू भाँइक बिआह-दुरागमन भऽ गेल रहनि। दुनू दियादिनीयो बेरमेमे। ले बलैया जहिना साँझू पहर एकटा नढ़िया कोनो झारीसँ निकलि पू-पहैत आकि जहाँ-तहाँसँ नढ़िया भूकए लगैत। ततबे नै, पास-पड़ोसक नढ़िया सभ समटा-समटा एकठाम भऽ समवैत स्वरमे भुकए लगैए। किअए ने भूकत? डरे जे भरि दिन झाड़ी धेने रहैए, ओकरा तँ अन्हारे ने संगी हेतइ। जहिना चोर दुनू रंगक होइए दिनुको आ रौतुको, तहिना ने नढ़ियोकेँ चरौर करैक समए भेटै छै। तहिना मामीकेँ कनिते दुनू दियादिनी सेहो झौहरि करए लगली। झौहरि सुनि एके-दुइये टोलक लोक ससरि-ससरि आबए लगली। गोनर भैयाकेँ बिनु देखनौं लोक आँखि मीड़ि-मीड़ि कियो ठुनकए लगली तँ कियो पोथी-पतरा उनटाबए लगलीह। पाँच दिन पहिने भदबा बीत चुकल छल मुदा एकटा बुढ़ीकेँ, अंतिम दिन भदबाक पता लगलनि। ओ ओही दिनसँ जोड़ैत जे आइ छठम दिनक भदबा छी। बजली- “केना पहिले-पहिल डेग भदबामे उठौलक। जानि कऽ आगिमे पाकए जाएब तँ जरब नै।” जइठाम सभ कननिहारे जमा भऽ जाएत तइठाम चुप के करत। खैर जे हौ....। मास दिनक पछाति ओ (गोनर) काज-उदेम करैबला भेलाह। अगहनक कटनी बजरि गेल रहै। तहूमे १९५७ ई.मे सेहो नमहर बाढ़ि आएल रहै। कहैले तँ बाढ़ि दहारक कारण छी मुदा उपजोक कारण छी। ई िनर्भर करैत गाम-गामक जमीनक बुनाबटिपर। कोनो गाममे गहींर खेत बेसी अछि जइमे जँ शुरूहोमे दूटा नमहर बरखा भऽ जाएत तँ पानि पकड़ि लैत आ एहनो ऊँचगर गाम सभ अछि (बहुआहा गाम) जइमे जतबे काल बरखा भेल ततबे काल पानि रहल, बाकी बरखो गेल पानियो गेल। गाम सुखल कऽ सुखले रहि गेल। ओहन गामक लेल बाढ़ि खेलौना छी, तँए जँ छहरो-बान्ह काटि कऽ खेल-खेलल जाए तँ की हर्ज जे एहेन खेल नै हुअए। दुश्मन सिपाही हाथे घेराएल सिपाही जकाँ परिवार घेरा गेल रहए। एक तँ १९५८ ई.क बाढ़िसँ परिवार धँसि गेल रहए। किअए ने धँसैत। एक बाढ़ि वा रौदी, कृषि आधारित परिवारकेँ पाँच साल धक्का मारैत अछि। शुरूहे फागुनमे दुनू भाँइ (पिसियौत) एकटा बाँस, खेबा-खरचाक संग हरिनाही गेला। बाँसक खुट्टापर मनेजरक कोरो-बातीक घर ठाढ़ कऽ काशसँ छाड़ि लेलनि। रहैक ठौर होइते अपन पोखरिबला जमीनकेँ साफ कऽ ताम-कोर करए लगलाह। खट्ठा पटेर-झौआक बोन। जहिना बादमे वियतनामक लोक एक-एक इंच भूमि, जे बम-बारूदमे नष्ट भऽ चुकल छल, खेती योग्य बनौलनि। तहिना हरिनाहीक लोक गामक बोन उजाड़ए लगलाह। बोन एहेन जे दस धुर तमनिहार अपनाकेँ मेहनती बुझैत। दुनू भाँइ बोनो तोड़थि आ गाम (बेरमा) आबि-आबि खरचो लऽ जाथि। छह मासक बाद पहिल उपजा हाथ लगलनि। ढेनुआर गाए जकाँ एक संग जली (धान), मकइ, काउन इत्यादि हाथ लगलनि। परिवारक काज बढ़लनि। खेतीक लेल एकटा बड़द सेहो कीनि कऽ लऽ गेलाह। परिवारक एकटा रूप रेखा तैयार भऽ गेलनि। अखन धरि हरिनाही गाममे बीस परिवार बसि चुकल छलाह। तीनटा चापाकल सेहो गरि चुकल छल। पानिक सुविधा से भऽ गेल छलै। बीस फीट पाइप, छह फीट फील्टरमे भऽ जाइ। नगदी फसल पटुआक खेती शुरू भेल। तीस-पेंतीस बीधा जमीन उपजाउक हरिनाही गाम बनि गेल। १९६२ ई.मे कारी मण्डल (जगदीश प्रसाद मण्डल जीक छोट पिसियौत भाए) बीमार पड़लाह। नीक बीमार। इलाजक कोनो सुविधा हरिनाहीमे नै। तइ समैमे दरभंगा जिलाक झगडुआ गामक एक गोटे बेरमेमे डॉक्टरी करैत छलाह। मुसलमान छलाह। मनसारा मात्रिक। मनसारा-झगड़ुआ सटले दुनू गाम। जइसँ हिनका सभक मामा-भगिनाक संबंध ओइ डाॅक्टर सहाएबक संग बनल छलन्हि। ओना ओ रहै छला मुसलमान टोलमे, मुदा मात्रिकक अनेसँ बेसी काल अहीठाम रहै छलाह। हुनका माए कहलकनि जे भैया, भागिन बड़ दुखित अछि। ओ जाइले तैयार भऽ गेलाह। ओइ समए बेरमामे दूटा वैद्य छलाह। पहिल सुन्दर ठाकुर आ दोसर छलाह नीरस महतो। सुन्दर ठाकुर पंडित छलाह। आचार्य छलाह। मुदा शरीरसँ अबाह (नांगर) छलाह आ थोड़ेक बोली तोतराइ छलनि। मुदा ओ जिनगीकेँ एते लगसँ देखै छेलखिन जे परिवारसँ किछु हटि अपन आश्रम बनौने छलाह। औषधालय नाम छलैक। खेत-पथारबला परिवार रहने औषधालय अइल-फइलसँ बनौने छलाह। औषधालयक आंगनमे सइयो रंगक जड़ी-बूटी सभ लगौने छलाह। निअमबद्ध जिनगी छलनि। ओना निअम भंग सेहो होइत छलनि। निअम भंगक कारण रहनि वैदागरी करब। वैदागरी (डॉक्टरी) ओहन पेशा छी जे जिनगीक अंतिम घाट धरि बसैत अछि। तँए कखन कोन घाटक यात्री चलि आओत तेकर ठेकान नै। मुदा वैद्यजी मे किछु कर्मक प्रति मजगुतियो रहनि। मजगूती ई रहनि जखन ओ पूजा करए लगथि तखन कियो हुनका टोकि नै पबैत। तइले ओ एकटा ओगरबाह रखै छलाह। मुदा मनमे ई कचोट रहबे करनि जे जइले पूजा करै छी जँ ओ देवता आगूमे चलि आबथि तखन की करब? मुदा किछुए दिनक पछाति रूटिंग बदलि लेलनि। चौबीस घंटाक गाड़ीमे लोक अपना-अपना ढंगसँ रूटिंग (काजक हिसाबे) बना लैत अछि। तहिना ओहो दिनक पूजा करब छोड़ि रातिमे करए लगलाह। जइसँ सभकेँ बराबरे लाभ हुअए लगलनि। जिनगियो नमहर बनौने छलाह, अठबारे घोड़ापर चढ़ि आन-आन गामक वैद्य सभ ऐठाम जाइ छलाह, हिनको ऐठाम अबै छलनि। जइसँ वैचारिक संबंधसँ लऽ कऽ बेवहारिक (जड़ी-बूटीक गाछ लगबैक संबंधसँ लऽ कऽ दवाइ बनबैक ढंग धरि) संबंध मजगूत छलनि। दोसर वैद्य छलाह नीरस महतो। पं. सुन्दर ठाकुर जकाँ पढ़ल-लिखल नै मुदा मनुक्खोक तँ अजीव बुनाबटि अछि। कियो कओलेजसँ पढ़ि डाॅक्टर-इंजीनियर बनैत छथि तँ कियो गामे-घरमे घूमि-फिरि बनि जाइत छथि। तहिना ओहन रामायण आ महाभारत पढ़निहार (गाबि कऽ पढ़निहार) कतेको छथि जिनका अपन नाओं-गाओं लिखए नै अबैत छन्हि। माटिसँ उपजल वैद्य नीरस महतो छलाह। गाममे दुनू गोटेक इलाज चलैत छलनि। मुदा एलोपैथी दवाइक आगमन गाममे सेहो भऽ चुकल छल। जइसँ बेरमाक बगलक गामक टूनीबाबू आ बुचकुन बाबूक आबा-जाही सेहो भऽ गेल छलनि। झगड़ुआबला डाॅक्टर करीब पनरह बर्ख बेरमामे रहलाह। ओना हुनकर नाओं अखनो नै ककरो बूझल छै। तेकर कारण छै जे सभ ममे कहै छलन्हि आ ओहो भगिने कहै छलखिन्ह। जगदीश प्रसाद मण्डलक माइयो, भइये कहनि आ ओहो बहीनिये कहथिन। टोलक (मुसलमान) लोक डाॅक्टर सहाएब कहनि तँ किछु टोलक लोक मोलबी सहाएब कहनि। ओना ओ नवाजी सेहो छलाह। किछु टोलक लोक मोलबी सहाएब डाॅक्टर कहनि तँए हुनकर असल नाउँए हरा गेल रहनि। जगदीश प्रसाद मण्डलक जेठ भाय (कुलकुल मण्डल) माए आ मामा (डॉक्टर) तीनू गोटे तमुरियामे गाड़ी पकड़ि घोघडीहा बान्ह (कोसी) तक तँ उत्साहसँ गेला, मुदा बान्हपरसँ जे देखलनि तँ माइयो आ भैयोक मन डरि गेलनि। आगू डेग बढ़बैक हिआउए ने होन्हि। बान्हक बगलेमे नमहर धार। जेकर पानि काफी तेज गतिमे चलैत। मामा बूझि गेलखिन। ओ धैर्य बढ़बैत कहलखिन- “बहिन, ई कोन धार छिऐ, ऐसँ नमहर-नमहर धारमे नाव चलबै छी आ हेलबो करै छी। केहन बढ़िया नाव छै। जहिना सभ पार करत तहिना हमहूँ सभ पार करब।” तइ बीच एक गोटे हरिनाहियेक भेट गेलनि। बान्हेपर पूछ-आछसँ भाँज लागि गेलनि। शहर-बाजारमे बिना मतलबे किछु पूछब नीक नै होइ छै मुदा धारक इलाका, बोनक इलाका, मरूभूमिक इलाकामे ओहन नीक होइ छै जे संगी भेट जाइ छै। तीनू गोटे हरिनाही पहुँचलाह। डॉक्टरक नाओं सुनिते आनो-आन परिवारक लोक जमा भऽ गेल। पहुँचते सूइया-दवाइ चालू केलनि। कारी मण्डलक इलाज शुरू भेल। चाहक नीक अभ्यासी डॉक्टर सहाएब। ओना चाहे टा अमलो रहनि। गाममे चाहक दोकानक कोन बात जे चाहपत्ती चिनियोक दोकान नै। बेरमासँ जखन विदा भेला वा घोघडीहामे जखन गाड़ीसँ उतरलाह तैयो नै मन पड़लनि। मनो केना पड़ितनि? बिनु देखल जगह केहेन अछि केहेन नै तइ दिस नजरि किअए पड़ितनि। पहिल दिन तँ कहुना खेपि गेलाह मुदा दोसर दिन तबाही हुअए लगलनि। बिनु चाह पीने मने भङठि गेलनि। इमहर माइयो आ भैयोकेँ बूझि पड़नि जे कतए आबि गेलौं। पहिल दिनक इलाजसँ हुनका (कारी मण्डल) मे किछु सुधार भेलनि। मामाकेँ (डॉक्टर सहाएब) एक दिस चाहक झपनी धेने रहनि तँ दोसर दिस रोगक इलाजसँ मनमे खुशियो उपकैत रहनि। अखन धरि गाममे गोर दसेक महिसो-गाए भऽ गेल छलै। सहरसा जिला (अखन सुपौल) आ मधुबनी जिलाक सीमाक कातमे हरिनाहियो आ हरड़ियो बसल अछि। बीचमे एकटा मरने धार, जे हरिनाहियो आ जएह धार दुनू गामकेँ उपटौने छल। भैयाक घर (गोनर मण्डलक) गाममे सभसँ पछिम। किएक तँ जहिना बजार आगू मुँहे कऽकऽ घुसकैत चलैए तहिना ने नव गामो चलैए। पूवे-पच्छिमे गाम, ओना ओ सूर्यमंडल गाम भेल। जे बासक हिसाबसँ (पहिलुका) नीक नै भेल, किएक तँ आगि-छाय आ हवा-बिहारिक दृष्टिसँ उजार बेसी हएत। धारक भीता-काते-काते जहिना पच्छिम तहिना पूब। जगदीश प्रसाद मण्डलक अपन दियाद चुल्हाइ मण्डल कहलखिन जे सभ दियाद लगाइये कऽ घर बान्हब। पछबारि भाग हुनकर घर तँए जगदीश प्रसाद मण्डलक भैयो पच्छिमे दिस घर बन्हलनि। ओइ समए सभसँ पच्छिम घर रहनि मुदा अखन ओइसँ बहुत पच्छिम तक गाम बढ़ि गेल अछि। दिनक करीब तीन बजे, हरिनाहियोक महींस आ हरड़ियोक पछबारि टोल (जइ टोल परक हेमलताजी छथि।) जे फुलपरासक पूर्व विधायक रहि चुकल छथि।) हरिनाही बीस-पच्चीस घरक गाम आ हरड़ी तीन टोलमे बँटल। जे थोड़े हटि-हटि कऽ बसल। धारेक पेट आ किनछरिमे दुनू गामक महींस सभ चरैत रहै, कि नै आकि चरबाहा सभमे झगड़ा शुरू भेलै। दुनू गाम लगे-लगे। हँसेरा-हँसेरी भऽ गेल। खूब नमहर मारि (लाठी-लठौबलि) भेल। कते गोटेकेँ कपार फुटल, हाथ-पएर टुटल। दू जातिक दुनू टोल, खूब मनसँ मारि भेल। कम घर रहितो हरिनाहीक किछु परिवार सिंहेश्वर स्थान दिससँ आबि बसल रहए, तीनटा सेसर खलीफा रहए, तँए मारि बेसी हरड़ीबला खेलक। मुदा केश-फौदारी नै भेल। तेकर कारणो रहै जे एम्हर फुलपरासकेँ थाना चारि धार टपि आबए पड़ैत तँ ओम्हर सुपौल सन्मुख कोसीक कते छाँट-छुँट पार करए पड़ैत। गोनर मण्डलक घरसँ करीब पाँच बीघा पच्छिम मारि भेल। मरदा-मरदी तँ मारि करए गेल रहथि मुदा स्त्रीगण आ बच्चा सभ तमाशा देखलक। बेरमोक तीनू गोटे- डाँक्टरो सहराएब माइयो आ भैयो मारि देखलनि। मारि देखि तीनू भयभीत भऽ जाइ गेलाह। तीनूक पाछू अपन-अपन कारण रहनि। डाॅक्टर सहाएब थाना-कचहरी जनैत रहथि तँए भयभीत रहथि। अंदाज रहनि जे जखने थाना औत तखने मारि केनिहार गाम छोड़ि देत। मुदा जगदीश प्रसाद मण्डलक.....। तहिना जगदीश प्रसाद मण्डलक माए आ भायकेँ सेहो बेरमाक १९५६-५७ ई.क पुलिसक दौड़ देखल रहनि। साँझू पहर सभ विचार केलनि जे काल्हि भारे ऐठामसँ मरीज (कारी मण्डल) केँ लेने गाम (बेरमा) चलि जाएब। सहए केलनि। अपना ऐठाम (बेरमामे) तीनटा महींस आ दूटा बड़द खूँटापर रहैत छलन्हि। समांग घटने महींस तीनसँ एक भऽ गेल। बड़द बिना बनैबला नै। चारि-पान साल पहिनहि १९५६-५७ ई.मे भाय मिड्ल स्कूल छोड़ि अमानत (अमीनी) मे नाओं लिखा लेलनि छबे मासक पढ़ाइ। मुजफ्फरपुरसँ एकटा शिक्षक (अमीन) आबि गाममे स्कूल चलौने रहथि। जइमे पहिने दस गोटे नाओं लिखौलनि। मुदा किछु दिन पछाति आबि छह गोटे छोड़ि देलनि। चारि गोटे अन्तो-अन्त पढ़ि अमीन बनलाह। अखन धरि जगदीश प्रसाद मण्डल महींस पाछू तँ नीक जकाँ नै पड़ल रहथि मुदा भाय सबहक संगे चरबए जाइत रह्थि। समांग घटने भारे पड़़ि गेलन्हि। परिवारक आमदनी रहन्हि। पिसिऔत भाइक परिवार गेने (हरिनाही गेने) परिवार कमलन्हि। जइसँ परिवारक काजो घटलन्हि। अखन तक माए घरसँ निकलि खेत-पथार नै जाइत छलन्हि, सेहो जाए लगलीह। जगदीश प्रसाद मण्डलक भैयाकेँ (गोनर मण्डल) जे जमीन देल गेल रहनि ओ बेचि कऽ लऽ गेला। जइसँ खेतो कमलन्हि। उपजो कमलन्हि। मुदा चारिम पीढ़ीमे आइयो ओइ परिवारक संग ओहने संबंध बनल छन्हि जहिना पहिने छलन्हि। अखनो उमेश मण्डल (पुत्र) संग जे संजय रहैए ओ पिसिऔते भाइक पोता छियनि। हाइये स्कूलमे रहथि तखन दुरागमन भेलन्हि। बिआह पहिनहि भऽ चूकल छलन्हि। पिसिऔत भायकेँ गेलासँ परिवारे नै कमलन्हि, घरक कारोबार कमि गेलन्हि। परिवारक भीतर अन्दरूनी विवादक जन्म सेहो भेल। जगदीश प्रसाद मण्डलक पढ़ब विवादक कारण मूलमे छल। जेकर दूटा सिर (स्रोत) छलै। पहिल भाय सहाएबक आ दोसर समाजक हित-अपेछितक। खुल्लम-खुल्ला तँ परिवारमे नै छल मुदा भाय सहाएबक क्रिया-कलाप बदलए लगलनि। जइसँ घरक काज छोड़ि भरि दिन नाचक पाछू पड़ि गेला। सासुरोमे नाच पार्टी चलनि। १९६७ ई.क चुनाव आएल। जगदीश प्रसाद मण्डलो कम्युनिस्ट पार्टीक सदस्य बनि गेल रहथि। चुनावमे जिला भरिक बूथपर खूब धाँधली भेल। ओना जहिना खूब धाँधली भेल तहिना गामे-गाम मारियो-पीट खूब भेल। केश-मोकदमा खूब बढ़ल। जहलक आबा-जाही सेहो बढ़ल। केश-मोकदमा भेने कोट-कचहरीक काज बढ़ल। राज्यमे (बिहार) सत्तरहे टा जिला छलै। ओइमे बढ़ोत्तरीक संभावना बढ़ल। सवडिवीजन, ब्लौक इत्यादि सभमे बढ़ोत्तरीक संभावना बढ़ल। १९६७ ई.क चुनावमे (अखुनका मधुबनी जिला, तइ समए अनुमंडले छल) कम्युनिस्ट पार्टीक एम.पी. भोगेन्द्र जी (भोगेन्द्र झा) भेलाह। दूटा पार्लियामेंट सीटमे एकटा कम्युनिस्ट पार्टीकेँ आ एकटा सोशलिस्ट पार्टी (शिवचन्द्र झा) केँ भेल। ओना जिलासँ काँग्रेस जहिना पार्लियामेंटसँ हारल तहिना विधान सभामे सेहो हारल। कम्युनिस्ट पाटीकेँ चारिटा एम.एल.ए. आ एकटा एम.पीक सीट भेटल। राज्यक सरकार बदलि गेल मुदा देशक (दिल्लीक) सरकार नै बदलल। मुदा विरोधी दलक सदस्य बढ़ल। जइ-जइ राज्यमे काँग्रेसी सरकार टुटल ओइ-ओइ राज्यमे विरोधीक सरकार बनल। मुदा एकछाहा कतौ ने बनल। खिचड़ी सरकार बनल। काँग्रेस पार्टीसँ एक ग्रुप टूटि जनक्रान्ति दल बिहारमे बनौने छल। जेकर नेतृत्व माहामाया बाबू करैत छलाह। मुख्यमंत्री बनलाह। अखन भ्रष्टाचार मुख्य समस्या बनि गेल अछि। मुदा ओहू समैमे चोरनुकबा खूब रहए। चाहे जे कोनो विभाग रहै भ्रष्टाचारसँ आक्रान्त छल। माहामाया बाबूक सरकार पछिला काँग्रेसी मंत्रीक विरोधमे सुप्रीम कोर्टक जजक नेतृत्वमे जाँच आयोग बनौलक। अय्यर आयोग नाओं पड़ल। बैद्यनाथ राम अय्यर सुप्रीम कोर्टक जज छलाह। दक्षिणक छथि। करीब पनचानबे-छियानबे बर्खक छथि। जीविते छथि। पूर्व बिहार सरकारक छहटा मंत्रीक विरूद्ध अपन जाँच रिपोर्ट दऽ देलखिन। करोड़ोक लूट सावित कऽ देने रहथिन। १९६६ ई.मे बिहार रौदीक चपेटिमे आबि गेल। ओना पहिल बर्ख रहने ओते बुझियो नै पड़लै। जँ बूझि पड़ितै तँ १९६७ ई.क चुनावी मुद्दा बनैत से नै बनल। मुदा सरकार बनला उत्तर दोसर बर्ख खूब बूझि पड़ए लगलै। भुखमरी हुअए लगल। सरकारक सोझा जबर्दस्त सबाल उठि कऽ ठाढ़ भेल। जमाखोर सबहक विरोधमे अभियान चलबैक िनर्णए भेल। मुदा तेहेन नाटक ठाढ़ भऽ गेल जे अभियान मजाक बनि गेल। नाटक ई भेल जे दस बीसटा ओहन सभ पकडाए लगल जेकर कारोबार (अन्नक कारोबार) घोड़ा-घोड़ीपर चलैत रहए। मुदा सोलहन्नी सएह नै भेल, किछु एहनो जमाखोर पकड़ाएल जेकरा गोदाममे लाखो क्वीन्टल अनाज रहए। पार्लियामेंटक शपथ ग्रहण केला पछाति भोगेन्द्र जी जखन मधुबनी घुमलाह तँ सकरीमे पहिल आम सभा केलनि। एक तँ नव सदस्य रहने दोसर अपन पार्टीक रहने करीब पनरह-बीस गाम (बेरमा) सँ सभामे भाग लिअ गेलथि। गाड़ीक सुविधा रहबे करन्हि। तहूमे लाल झंडाबला सभ दिल्ली तक प्रदर्शन करिते छल। ओना भोगेन्द्र जीक भाषणक गुण रहलनि जे ओ पहिने बाजि दइ छलखिन जे जिनका जे प्रश्न पुछैक हुअए ओ पूछि दिअ। जबाब देब हुनका भाषणक मूल बिन्दु छलनि। भाषणो नमहर करैत छलाह। समए भेटलापर तीन-तीन, चरि-चरि घंटा बजिते रहि जाइत छलाह। ओइ समए िनर्मलीसँ समस्तीपुर एकटा गाड़ी चलैत रहए। बड़ी लाइनक कतौ पता नै। मुदा कम्युनिस्ट पार्टीक लड़ाइक एकटा मुद्दा ईहो रहए। कखनो उग्र तँ कखनो धीमी गतिसँ चलिते रहए। ओना पूबोसँ आ पच्छिमोसँ अबैबला गाड़ीक मेल सकरियेमे रहै मुदा से नै भेलै। ककरघटीमे मेल भेने पछबरिया गाड़ी पछुआ गेल। स्टेशनसँ थोड़बे हटि कऽ दछिनबारि भाग सभाक आयोजन भेल। ओइ समए िनर्मलीसँ समस्तीपुर एकटा गाड़ी चलैत रहै। बड़ी लाइनक कतौ पता नै। मुदा कम्युनिस्ट पार्टीक लड़ाइक एकटा मुद्दा ईहो रहै। कखनो उग्र तँ कखनो धीमी गतिसँ चलिते रहए। ओना पूबोसँ आ पच्छिमोसँ अबैबला गाड़ीक मेल सकरियेमे रहै मुदा से नै भेलै। ककरघटीमे मेल भेने पछबरिया गाड़ी पछुआ गेलनि। जइ कारणे सभाक आयोजन किछु बिलमि कऽ भेल। सकरी स्टेशनसँ थोड़बे हटि कऽ दछिनबारि भाग सभाक आयोजन भेल। गाड़ीसँ उतरि झंडा फहरबैत आ नारा लगबैत जूलूस बनि सभा स्थल पहुँचला। तइ संग झंझारपुरक इर्द-िगर्दक सेहो बहुत गोटे संग भऽ गेल रहथिन्ह। आयोजक रहथिन्ह चीनी मिलक श्रमिक-संगी। ओइ समए छबे मास मिल चलै। सालमे छह मास काज भेने छह मास बैसारीक समस्या रहबे करै। तइ संग किसानकेँ नहिये कुशियारक कटनी होइ आ नहिये समैपर दाम भेटै। सेहो सभ समस्या रहबे करै। कुशियारक एके किस्मक खेती होइ जे अगहनमे तैयार भऽ जाइ। मुदा नमहर इलाकामे खेती भेने, समैपर कटनी नै भऽ पबै। मिले कम। जतबे ओ पेड़ि सकत ततबे ने लेत। तहूमे चलाकी ओकर ई रहै जे शुरूमे तैयार भेने शुरूहेसँ नीक उत्पादन (चीनीक मात्रा) हुअए लगै आ जते पछुआइत तते रस गाढ़ भेने चीनीक मात्रा बढ़ि जाइ। पच्छिमसँ गाड़ी अबिते दरभंगा-जालेक विधायक खादिम हुसेन संगे भोगेन्द्र जी हाथमे चमड़ाक बैग लटकौने आगू-आगू आ दस पनरह गोटे पाछू-पाछू स्टेशनसँ सभा स्थल पहुँचला। हाफ शर्ट धोती पहिरने। पएरमे चमड़ाक जूता। मंचपर सँ नारा हुअए लागल। आधासँ बेसी मंच भरल। जे वक्ता बजैत रहथि ओ अपन विचार सम्पन्न केलनि। चीनी मिलक ट्रेड-युनियनक जे नेता रहथि ओ विस्तारसँ अपन समस्या रखलनि। जगदीश प्रसाद मण्डल सभ आगूसँ निच्चामे बैसल रहथि। भोगेन्द्रजी दिससँ बजैसँ पहिने आने सभा जकाँ प्रश्नक आग्रह भेल। किछु प्रश्न एबो कएल। अढ़ाइ-तीन घंटाक पछाति सभा विसर्जन भेल। सभामे भाग लेनिहार चारू कातक लोक चलि गेलाह, मुदा गाड़ीबला सभ स्टेशनपर आबि गेला। दुनू गाड़ी (निरमली आ जयनगरवाली) मे एक-डेढ़ घंटा देरी रहै। स्टेशनेपर भोगेन्द्रजीसँ पहिल भेँट आ सोझा-सोझी परिचए भेलन्हि। पहिले-पहिल भोगेन्द्रजी पार्लियामेंटक सदस्य भेल रहथि। जहिना १९४२ई.मे अंग्रेजक खिलाफ देशक जन-जनमे राजनीतिक नव चेतना जागल रहै तहिना १९६७ ई.क चुनावक पछाति सेहो भेल। बिहारोमे ओहन-ओहन राजनीतिक पार्टी बहुमतमे आएल जे अखन धरि (१९६७) विधान सभामे नै पहुँचल छल। जे पार्टी (काँग्रेस) अखन धरि बिहारोमे सत्ता-सीन रहल ओ नीक हारिक मुँह देखलक। ओना बिहारे मात्रमे नै आनो-आनो राज्यमे भेल। काँग्रेसो एक ग्रुप टूटि कऽ जनक्रांति दल कऽ कऽ पार्टीमे उतरल छल। काँग्रेस विरोधी दलक स्पष्ट बहुमत भेल छल। मुख्य पार्टीक रूपमे सोशलिस्ट पार्टी आ कमो-बेशी आनो-आनो पार्टी जीतल। िसर्फ विधान सभामे एहेन परिवर्त्तन भेल से बात नै, गाम-गामक जन-गणमे अपन हार-जीत सेहो महसूस भेल। बेवहारिक दौड़मे जे किछु मुदा भाषणक क्रम (सिद्धान्तिक) मे तँ जनताक सभ समस्या सामने ऐबे कएल। कारण जे सभ पार्टीक अपन-अपन विचार तँ लोकक बीच पहिनेसँ आबि रहल छल। ३४ टा सीट माने ३४ टा विधायक विधान सभामे आ पान-सातटा पार्लियामेंटोमे पहुँचलाह। आजादीक पछाति पहिल बेर आम जन सत्ता (शासन) दिस तकलक। ओना अखन धरि सरकारक अर्थ आम जन-गण कोटाक शासनक मटिया तेल आ जे मुख्य विन्दु कोटाक वस्तु बनल छल। डीलरक काजक लेखा-जोखा भरि शासन चलै छल। आन-आन समस्या तँ भाषणेक क्रममे छल। किछु-ने-किछु बाढ़ि-रौदी चलिते छल ओकरे बचबैक उपाए सरकारक कहब रहै छलै। नवका तूर (आजादीक करीब आ पछातिक) सेहो जुआन भेल। जइसँ आनो-आनो काज (सरकारक) सोझामे आएल। अखुनका मधुबनी जिला जे ओइ दिनमे अनुमंडल छल। एगारहटा एम.एल.ए. आ दूटा एम.पी.मे बँटाएल छल। छह-छहटा एम.एल.ए. पर एम.पी. तँ दरभंगाक जाले क्षेत्र सेहो मधुबनियेमे। ओना अखुनका मधुबनी जिलाक पछिमी भागमे जमीनक लड़ाई सेहो नीक जकाँ चलि रहल छल, मुदा मुख्य छल पछिमी कोसी नहर। मिथिलांचलमे कोसी, कमला, बागमतीक जे उपद्रव साले-साल चलि रहल छै आ क्षति पहुँचबै छै, भरिसक ततेटा बजटो ने कते सरकारकेँ होइ छै। खैर जे होउ! उनैस सए साठिक दशकक सवाल, समस्या आ लड़ाई कम्युनिस्ट पार्टीक मुख्य लड़ाई रहल जेकर दशा, मनुष्यक एक जिनगीक (६५-६६ बर्ख) उपरान्तो कि अछि, सबहक सोझेमे अछि। जौं योजना हिसाबसँ काज होइत तँ आजुक मिथिला ई मिथिला नै, ओ मिथिला बनि गेल रहैत जइ मिथिलामे ऋृषि-मुनि इच्छानुसार बर्खा बरिसबैत छलाह। एते पनिबिजलीक उत्पादन होइत जे घर-घरमे पहुँचल रहैत। जइसँ जापान जकाँ लघु-उद्योगक संग-संग भारियो उद्योग लागि गेल रहैत। मुदा आइ कि देखै छी। चुनाव होइत रहल, एमेले-एमपी बदलैत रहलाह। मुदा समस्या आइ ओहन विकराल रूप लऽ लेलक अछि जे आर्थिक तंगीक चलैत दिन-दहार लूट-पाट भऽ रहल अछि। जँ जापान, जर्मनी आ पड़ोसी देश चीनक जमीनक प्रति एकड़ उपजाक तुलना अपन मिथिलांचलक भूमिसँ करब तँ आश्चये नै बिसवासो नै हएत। कि मिथिलामे िसर्फ साढ़े तीन हाथक मनुखेटा अछि जेकरा मात्र पेटेटा छै आकि ओकरा दूटा हाथो-पएर छै आ मातृभूमियो छै। मिथिलांचलक ओ भूमि आ जलवायु अछि जे दुनियाँमे कतौ नै अछि। ने एते सुन्दर मुलाइम माटि अछि आ ने एहेन नीक पानि अछि आ ने एते रंगक मौसम अछि। मुदा आइ कि देखै छी? ने अखन धरि नेपाल सरकारसँ नीक जकाँ समझौता भेल अछि आ ने कोसीक पछिमी-पूर्बी नहरिक समुचित विकास। एक तँ योजनाक काज पछुआएल तइपर काजक एहेन पेंच-पाँच अछि जे एक नहर बनब कठिन अछि, दोसर बनलापर ओ समुचित काज कठिन अछि। पानि ऊपरसँ निच्चाँ असानीसँ अबैत अछि। मुदा निच्चासँ ऊपर असानीसँ जाएत? नै जाएत। जँ गहींरमे नहर खुनि देल जाए तँ ओकर पानि ऊपर केना जेतइ। हँ मशीनक माध्यमसँ जा सकैए, मुदा घरमे फुसि-फासि, सोम दिन बिआह। जइठाम त्रेता युगक तीन िवत्ता हर, आ सतयुगक बसहा बड़दसँ एखनो खेती होइए तइठाम केना मानल जाएत। स्टेशनपर प्लेटफार्म आबि सभ गोलिया कऽ बैसला। पल्था मारि भोगेन्द्रजी सभकेँ सेहो तहिना बैसए कहलखिन। गाड़ी पकड़ैले सबहक मन छनगल। पल्था मािर बैसैक अर्थ निश्चिन्ती। पहिने ओ सभकेँ नाओं-ठेकान पुछलखिन। नाओं-ठेकान पुछला उत्तर कहलखिन, कम्युनिस्ट अपन पार्टी छी, अपन पार्टीक ई अर्थ नै जे कोनो जाति-मजहबक होइ, मनुख-मात्रक पार्टी छी। हमरा सभकेँ ओहन समाज बनाएबाक अछि जइमे ने कियो भूखल रहत आ ने नांगट। सबहक बाल-बच्चा पढ़तै, सभकेँ रोग-व्याधिक इलाज हेतइ तखन ने सभ आगू मुँहेँ बढ़ैक कोशिश करता। अपना ऐठाम जे ऋृषि-मुनि भेलाह, ओ की केलनि? हुनका नै अपन सुखक चिन्ता छलनि। किअए ओ सभ अपन जिनगी गला लेलनि। ओ सभ बहुत केलनि। जँ से नै केलनि तँ एक कट्ठा जमीनमे जीवन बसर करैत केना छला। मुदा अपन धरोहरिकेँ जँ ताला लगा रखबै तँ के बूझत? लखनजी (डॉ. लक्ष्मण झा) मिथिलांचलक लेल जे जिनगी समर्पित केलनि से कि केलनि। के बूझत? तीन दिनक व्यस्त कार्यक्रममे हुनकर पाँचठामक प्रोग्राम रहनि, ओइ समाप्तिक तारीख बिता तेसर दिनक प्रोग्राम ओ जगदीश प्रसाद मण्डलजी केँ दऽ देलनि। दिल्ली जाइसँ पहिने भोगेन्द्रजी कम्युनिस्ट पार्टीक जिला-कार्यालयमे जगदीश प्रसाद मण्डल जी केँ कहि देलखिन जे आब जे आएब तँ बेरमो जेबे करब, तँए ओइपर नजरि राखब। जहिना हाटो-बजारमे आ गामो-घरमे वस्तुक लेन-देन तीन तरहक लोकक बीच होइत अछि, एक वस्तुबला, दोसर लेबाल (कीनैबला)क बीच मुदा ऐ बीच तेसरो फड़ि जाइए, ओ फड़बैए गर्ज। जखन वस्तु बेचिनिहारो आ लेनिहारोकेँ समानक गर्ज रहैए तखुनका बेवहार सुलभ होइए। कारणो होइ छै जे वस्तु बेचि वा कीनि कऽ अमुख काज करब, जे जरूरी अछि। दोसर तरहक होइए जे बेचिनिहारकेँ काजक दुआरे अधिक गर्ज रहल आ कीनिनिहार अगधाएल रहल। तइठाम बेचिनिहार कटाइए आ कीनिनिहार नफगर रहैए। तहिना कतौ लेबाल (कीनिनिहार) गरजू रहल आ बेचिनिहार ना-गरजू। तइठाम कीनिनिहार कटाइए आ बेचिनिहार नफामे रहैए। किएक तँ मने-मन अगधाइत रहल जे पानिमे पाथर सड़ैए। तहिना लेबालोक बीच होइत रहै छै जे पाइ कि कोनो कुट-कुट कटैए जे अनेरे कतौ फेकि देब। यएह बिचला दुनियाँक कलाकार छी, जे अपने संग दुनियोकेँ नचबैए। अदौसँ एक दिसक लोक दोसर दिसक दुनियाँ लेल विकट परिस्थिति पैदा करैत रहल अछि आ कंठ दबैत रहल अछि। मुदा से नै भेल। जहिना भोगेन्द्र जीक कार्यक्रमक जिज्ञासा बेरमा लोककेँ छल तहिना भोगेन्द्रोजी आ कम्युनिस्ट पार्टियोकेँ छलै। सकरी सभाक बात बेरमा गाममे जोर-शोरसँ चलए लागल। नीकसँ नीक कार्यक्रम हुअए, तइ पाछू सभ लागल, तँ दोसर दिस नव क्षेत्र भेटने भोगेन्द्रोजी आ पार्टियो कार्यक्रमकेँ नीकसँ नीक बनबैक फिराकमे लागल। ओना आइसँ १९६७ ई.सँ पूर्व एकबेर कम्युनस्ट पार्टी बेरमामे सेहो बनल छल मुदा बेबहारिक पक्ष कमजोर रहने टिक नै पाएल रहए। नव-युवक बीच पार्टी बनल, कमोबेश अधिकतर युवक पढ़ल-लिखल। सबहक बीच पार्टीक कोनो तौर-तरीका नै बूझल तँए थाहि-थाहि किछु-किछु सिखैत, अकाससँ पताल धरिक बात उड़ि-उड़ि सभक कानमे आबै जइसँ किछु-ने-किछु उत्साह तँ जगिते रहै। जँ से नै होइतै तँ आन पार्टीक (पँूजीवादी) अपेक्षा चरित्र िनर्माण केना एतऽ होइ छै? संघर्षे चरित्र खरादै छै। संसद बैसार समाप्तिक तेसर दिन भोगेन्द्रजी मधुबनी पहुँच गेला। अखन धरि भोगेन्द्रजी केँ तेना भऽ कऽ लोक नै चिन्हैत रहनि तँए औता कि नै औताह से असमंजस बनल रहै, बनबो स्वाभाविके रहै किएक तँ आन-आन कतेक कार्यक्रम एहेन भऽ चुकल रहै जइमे नेता नै पहुँचल रहथि। संसद समाप्तिक पराते भेने भोगेन्द्रजी पटना पहुँच गेल रहथि। पहिल बेर बिहारसँ कांग्रेसक विरोधी दलक सांसद बहुमतमे दिल्ली पहुँचल रहथि। बिहारोमे विरोधिये दलक सरकार महामाया प्रसाद सिंहक नेतृत्वमे बनल रहए। कर्पूरी ठाकुर उपमुख्यमंत्री बनलाह। ओना महामाया बाबू कांग्रेससँ टूटि कऽ आबि जनक्रान्ति दल बनौने रहथि। बिहार सरकारमे सभसँ बेसी सोशलिस्ट पार्टीक विधायक रहथि जइसँ सरकारोमे अधिक भागीदारी भेलनि। पहिल बेर धनिकलाल मण्डल जीत कऽ गेल रहथि, मुदा तैयो विधान सभा अध्यक्ष बनलाह। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टीक कोटामे दूटा केबिनेट आ दूटा राज्य मंत्री बनलाह। दरभंगा जिलाक कोटामे तेजनारायण जी (श्री तेज नारायण झा) राज्य मंत्री बनलाह। ओना चारू गोटे अपना-अपना क्षेत्रमे कर्मठ रहथि। जहिना इन्द्रदीप भाय (श्री इन्द्रदीप सिंह) विद्वान (अर्थशास्त्री) रहथि तहिना चन्द्रशेखर भाय (श्री चन्द्र शेखर सिंह) सेहो क्रान्तिकारी रहथि। श्री शत्रुध्न बेसरा आदिवासीक नेता रहथि तँ तेजनारायण जी किसान नेता। एक तँ ओहिना सरकार दल-दलमे डोलैत रहए तइपर रौदी आरो डोलबैत रहै। किसान नेताक संग-संग भोगेन्द्र जी बिहारक नेता सेहो रहथि तँए काजक भार बहुत अधिक पड़ि गेल रहनि। पटना आबि राज्यक स्थितिक विचार-विमर्श करैत-करैत पहिल दिन बीति गेलनि। मुदा पराते भनेसँ क्षेत्रक समए बना लेने रहथि। राता-राती मधुबनी आबि गेलाह। मधुबनी अबिते सभकेँ खबड़ि भऽ गेल जे काल्हि भोगेन्द्र जी बेरमाक कार्य-क्रममे रहताह। ओना सभ प्रचार करिते रहथि, पर्चो छपबाइये नेने रहथि, दिनमे आम सभा करताह आ रातिमे कार्यकर्ता-मीटिंग। खाइयो-पीबैक ओरियान भेल रहै। आम सभाक अंतिम समए पाँच बजेक बाद भोगेन्द्रजी जीपसँ बेरमा पहुँचलाह। आम सभामे उपस्थित सबहक मनमे भऽ गेलै जे आब ओ नै औताह। फौनो-फान अखुनका जकाँ नहिये रहै, भोगेन्द्र जीकेँ अबैसँ पहिने, आम सभा मरहन्ने जकाँ रहल मुदा हुनका अबिते जना रंगे-रूप बदलि गेल। कते गोटे जे उठि-उठि कऽ रस्ता पकड़ि नेने रहथि, ओहो सभ घुमलाह। संग-संग किछु नवो लोक पहुँचलाह। जीपसँ उतरि भोगेन्द्र जी बजलाह- “एक गिलास पानि आ चाह पिआउ। ताबे मंचपर बैसै छी।” लोक धड़फड़ाएल जे जखन भोगेन्द्रजी पहुँच गेला तखन हुनक समैकेँ अनेरे दुइर करै छियनि। मंचपर भोगेन्द्रजी चुपचाप बैस देखैत-सुनैत रहथि। पानि पीब चाह पीलनि। चाह पीबैते बजैक आग्रह भेलनि। आग्रह होइते ओ कहलखिन जे सभकेँ पूछि लिअनु जे किनको किछु पुछबाक छन्हि। मुदा सभ तँ सुनैले उत्सुक तँए एकोटा प्रश्न नै आएल रहए। उठिते दिल्लीक कांग्रेसी सरकारक खेरहा संक्षेपमे ओ कहलखिन जे केना अखन पूँजीपति, कारखानादार आ सामंत (राजा-महराजाक) क बीच विवाद फँसल अछि। विवादक चर्च करैत कहलखिन जे देशक विकास अवरूद्ध भऽ गेल अछि। मुदा से बात कमे लोक बुझलक। किएक तँ गामक लोक सरकारक माने कोटाक गहुम आ थाना मात्र बुझैत छल, गोटि-पंगरा चापा-कलो गड़ा जाइ छलै। ताबत चीनी-मटिया तेलक कोटाे भेल रहै ओना गहुमो कोटेक हिसाबसँ भेटै मुदा लेबालक अभाव (पाइक दुआरे) रहने से नै बूझि पड़ै। दिल्ली सरकारक लगले बिहार सरकारक चर्च केलखिन। रौदीक स्थिति भयावहता आ बिहार सरकारक आँट-पेट खोलि कऽ राखि देलखिन। कोसी-नहरिक चर्च विस्तारसँ केेलखिन जे ई योजना मिथिलांचलक लेल की अछि? मिथिलांचल चर्चक क्रममे ऐठामक सामाजिक शोषण, जे एक-दोसरकेँ आगू बढ़ैसँ रोकैत अछि, क विस्तारसँ चर्च केलखिन। ओना भोगेन्द्र जीक भाषण दू घंटासँ चारि घंटा होइत छल, मुदा से नै भेल। घंटा पुरैत-पुरैत समए समाप्त भऽ गेल। सभा समाप्ति होइते ओ कहलखिन जे ओना कार्यकर्ता-बैसार करैक कार्यक्रम सेहो अछि मुदा से नीक जकाँ नै भऽ सकत। मुदा तैयो अहाँ सभ तैयारी करब जते काल छी तहीमे ओहो भइये जेतै। तइ बीच चाह एलै, ओ जलखै नै केलनि। चाहे पिबैत काल अय्यर-आयोगक चर्च सेहो केलखिन। किछु कांग्रेसी नेता, जे सभ सरकारमे रहलाह, गोल-मालक जाँच करताह। ओना जइ हिसाबसँ कम्युनिस्ट पार्टीक पहिल आम सभा छल तइ हिसाबसँ बहुत नीक भेल छलै, जे भोगेन्द्रजी अपनो बजलाह। कार्यकर्ता मीटिंग शुरू होइते जना भोगेन्द्र जीक रूप बदलि गेलनि। बजलाह- “कम्युनिस्ट पार्टी राजनीतिक पार्टी छिऐ, अहाँ सभ पार्टीक सदस्य बनि पार्टी बनेलौं, एकरा सम्हारबोक भार अहीं सबहक ऊपर रहत। अहाँ सभ अपनाकेँ क्रान्तिकारी पार्टीक सदस्य बूझि सामाजिक बेवस्थाकेँ बदलि सुधारू, जाधरि सामाजिक बेवस्था नै बदलत ताधरि सर्व-कल्याणकारी समाज नै बनत। जाधरि सर्व-कल्याणकारी समाज नै बनत ताधरि किछु गोटे लुटबे करत आ किछु गोटे लुटेबे करत। कमाएब अहाँ, खा जाएत दोसर। मुदा पार्टी तँ गामसँ लऽ कऽ दुनियाँ भरिमे पसरल अछि। तँए एक-दोसरमे जुटि कऽ केना रहब, ई तौर-तरीका सीखए पड़त। गामसँ लऽ कऽ दुनियाँ भरिमे लूट-खसोट चलि रहल अछि, जे साधारण नै अछि, सभ तरहक शक्ति ओकरा छै। ओइ शक्तिक मुकाबला करैक जे शक्ति छैक ओ बनबए पड़त। अखन तँ हमहूँ औगताएले छी तँए नीक जकाँ नै बुझा पाएब। कनी निचेन होइ छी तखन फेर आएब। अखन किछु मूल बात जे छै से कहि दइ छी। अहाँ गाममे पार्टी बनेलौं, गामक जे समस्या अछि ओकरा पकड़ू। पार्टीक सभ सदस्य एकठाम बैस ओइ समस्यापर विचार करू। लोके लऽ कऽ समाज बनै छैक। जते गोटे अहाँ सभ छी जँ ओतबो गोटे एकजुट भऽ समाधान करब तँ असानीसँ समाधान होइत जाएत। ओना जते असान बुझै छिऐ बेवस्था तोड़ब ओते असान नै छै। विरोधीक आक्रमणक संग अपना पार्टियोमे मतभेद हएत, तइ संग परिवारोमे हएत। बड़-बढ़िया खाइ-पीबैक जोगार सेहो केने छी। सभ एकठाम बैस खाएब-पीब तखन ने खाइ-पीबैक छुआछुतक रोग जे अछि, से टुटत। जाबे से नै टुटत ताबे मन-भेद होइते रहत। नियमित बैसार करू। जाबे अपना पार्टी कार्यालय नै भेल अछि ताबे टोले-टोल बैसार करू। ओइ टोलक की समस्या छै आ ओकर समाधान केना हेतै, बैसारक मुख्य काज भेल। ई तँ सामाजिक स्तरपर भेल मुदा ऐ संग आरो क्षेत्र अछि। कोनो समस्या लऽ कऽ ब्लौकमे प्रदर्शन करब, ब्लौक भरिक पार्टीक प्रदर्शन हएत। ओहीमे बेरमाक जे समस्या अछि ओकरो मुद्दा बनाएब। अहिना जिलोमे होइ छै। राज्यक राजधानियोमे होइ छै, दिल्लियोमे होइ छै। सभमे भाग लेब। दुनू दिसक समस्या रहत, तँए ऊपरका समस्या प्रमुख भेल।” ओ धड़फड़ाएल रहबे करथि, नअ बजे करीब विदा भऽ गेला। हुनका गेला पछाति खेनाइ-पिनाइ भेल। कार्यक्रम समाप्त भेल। गाममे एकटा नव नजरिक जन्म भेल। जेना पहिने गामकेँ लोक बुझैत छल तइसँ भिन्न बुझैक प्रक्रिया शुरू भेल। ओहुना चारि गोटे एकठाम भऽ कोनो काज शुरू केलक। ओना पहिनौं किछु लोक सामाजिक काजमे समाज सहयोगी बनैत छलाह, मुदा ओ दायरा कमि गेल। किछु परिवार धरि समटा गेल छल। अपन काज, अपन बातकेँ छिपा कऽ राखब स्वभाव बनि गेल छल, अखनो अछि। अंतमे, चारि गोटेक बीच रहला आ बजलासँ बजबाक अभ्यास हुअए लगै छै। तइ संग ईहो होइ छै जे दोहरा-तेहरा कऽ एके बात बाजी वा किछु नव गप बाजी। पार्टीमे जुटलासँ दिल्लीक रैली तक जगदीश प्रसाद मण्डल भाग लिअए लगला। नव-नव लोकसँ भेँट-घाँट, क्षेत्रक हिसाबसँ नव-नव कला-संस्कृति देखैक अवसर जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ भेटए लगलन्हि। तइ संग ईहो भेलन्हि जे दू-आना, चारि आनामे नीक किताब भेटए लगलन्हि जइसँ नव-नव जानकारी हुअए लगलन्हि। सरसठिक पछाति गामसँ लऽ कऽ देश भरिमे दोरस हवा उठल। मुदा हवोक रूखिक सीमा तँ भिन्न-भिन्न अछि, कतौ रेत बला भूमिमे अपनो रस चटबैत अछि, तँ कतौ समुद्रमे ज्वार उठबैत अछि, कतौ पहाड़सँ टकरा या तँ मेघे दिस उड़ि जाइत अछि वा पजरबाहि ताकि-ताकि पड़ाइत अछि। कतौ समतल भूमिमे गाछ-विरीछ उखाड़ैत तँ कतौ सरोवरक हल्फी, तँ कतौ मन्द गतिक सुहावन हवा सेहो दैत अछि। अवसरक लाभ जेकरा जते भेटैक चाहिये से नै भेटि पेलै। जँ से नै पेलक तँ औद्योगिक क्षेत्रक अपेक्षा कृषि क्षेत्र किअए पछुआ गेल। भलहिं तमसाएलपर बाजि दिअए जे महाराष्ट्र कर्नाटक औद्योगिक क्षेत्रमे अगुआ गेल आ बिहार पछुआ गेल, ई तामसपर बाजल भेल। मुदा महाराष्ट्र वा कर्नाटकक उद्योगकेँ देखै छिऐ तँ ईहो देखए पड़त जे ओइठाम जमीनपर जीनिहारक दशा की छै। की ई बात झूठ जे बिहारक अपेक्षा ओइठामक किसानकेँ आत्महत्याक नौवत छन्हि। तँए देशक सभ राज्यक अपन-अपन समस्या छै। अपना-अपना ढंगसँ देखए पड़तै। मुदा की ई उचित नै जे बिहारो स्वतंत्र भारतक अंग छी, एकरूपता हेबाक चाहिऐ। आइ बिहारे नै, आनो-आनो राज्यकेँ बिहारोसँ बेसी समस्या छै जेकर समाधान जरूरी अछि। भलहिं बंगाल, केरल जकाँ नै, मुदा आनो-आन राज्यमे देखौंस तँ लगबे कएल। मिथिलांचलो ऐ दोरस हवासँ अलग नै रहल। पुरना दरभंगा जिलाक मधुबनी सवडिवीजनमे, जे अखन जिला अछि, जमीनक भरपूर एकरूपता आएल, मुदा खेत तँ तखन खेत जखन ओकरा भरपूर पानि भेटै। उचित बीआ, उचित खादक संग मशीन नेने कुशल किसान सेहो भेटै। दस बर्ख पूर्वहिसँ कोसी नहर योजनाक पाछू प्रगतिशील किसानो आ वुद्धिजीवियो उठि कऽ ठाढ़ रहलाह, मुदा कियो सुनिनिहार नै। जँ सुनौलो गेल तँ काजक तेहेन रूप धेलक जे पचास बर्खोमे योजना नै पूर्ति भऽ सकल अछि। धार-धुरक संग एहेन लापरवाही भेल जे मिथिलांचलक अधासँ बेसी जमीन माटिसँ बालु बनि गेल अछि। ओना धार बहुतो अछि, जइमे किछु एहनो अछि जे हजारो बर्खसँ अपन दिशा नै बदललक, मुदा कोसी-कमला-बलानकेँ तँ भगैतो खेला-खेला, आ गीतो गाबि-गाबि तते सुआगत होइत रहल अछि जे अधासँ बेसी जमीनकेँ कमजोर माने शक्तिहीन बना देलक अछि। बालु केना उपजाउ भूमि बनत, छोट सवाल नै अछि। राजनीतिक दशा एहेन जे मुँहपुरुखिआइयेक पाछू पड़ि सभ अपनेमे ओझराएल अछि। मिथिलांचलक कोनो समस्या मिथिलेक नै अपितु देशक छी। समस्याक समाधान केना हएत तेहीमे सभ ओझरा-ओझरा राजनीति कऽ रहला अछि। आठ बजे रातिकेँ सितारपर सुनताह जे “पवन प्रिय पावन मिथिला देश!” जहिना बेरमा देशक अंग छी तहिना तँ देशो बेरमाक अंग छिऐ। तँए देशक दाेरस हवा बेरमोमे बहल। साइकिलक ओभर-वाइलिंग जकाँ गामक वाइलिंग शुरू भेल। एक संग रंग-बिरंगक हवाक प्रवेश भेल। अड्डा बन्दी हुअए लागल। किछु लुत्ती गामोसँ उठैए तँ किछु बाहरोसँ पसहि-पसहि आबए लागल। अखन धरि गाममे जाति-सम्प्रदायक हवा नै आएल छल। जहिया कहियो मारि-दंगा हुअए ओ या तँ आन गामसँ हुअए, वा एक-टोल दोसर टोलक बीच। बीसो जातिसँ ऊपरबला गाम बेरमा। पावनि-तिहारमे गजपट होइते आएल अछि। मुदा तैयो तँ चलिते रहलै। गजपटो केना ने होउ, अधासँ बेसी स्त्रीगण भादवक रवि करिते छथि। मुदा पावनिक विधानो भिन्न-भिन्न। कियो दुनू साँझ निखंड करै छथि, तँ कियो एक संझू। कियो नोनेटा परहेज करै छथि, तँ कियो अन्न छोड़ि फलेटा सेवन करै छथि। तहिना घड़ी पावनि। एक तँ सालक दू-तीन मास, साओन, आसीन चैतमे होइए तँ दोसर बुधवारि, सोमवारि आ शुक्रवारि सेहो होइए। कबीर पंथक प्रवचनकर्ता आबि-आबि माया-जालक निन्दा करैत आ सेवक सभकेँ चेतेबो करैत छथि। सेवको रंग-बिरंगक। तहूमे बेरमामे आरो गजपट। एक दिस सए घरक ब्रह्मण बस्ती टोल, टोल ऐ दुआरे नै जे गोठिया नै फुटझाड़ा अछि, मे एकोटा बैष्णव नै। ओना समाजक पंथनिरपेक्षक खियालसँ नीके अछि। तहिना दोसर दिस दलितोक टोल अछि। थाल-पानिसँ लऽ कऽ अकास धरिक शिकारी। बीचक जे जाति अछि ओ धार्मिक पंथ (साम्प्रदायिक) सँ जुड़ल अछि। जातिक भीतर वैष्णव-साकठ केर बीच बिवाद चलैत अछि तँ एक जातिक दोसराक बीच। कबीर पंथक बीच समझौता भेल। समझौता भेल जे श्राद्ध-कर्मक पछाति, सत्यनारायण पूजाक पछाति कबीर पंथी भनडारा सेहो हुअए, से हुअए लागल। एक दिस दोसर सम्प्रदायक विरोधमे बजबो करैत आ दोसर दिस संग मिलि रहबो करैत अछि। तहियो कबीर पंथ मजगूज छल, अधिक समर्थक अछि, आइयो अछि। तइ बीच एकटा घटना मंडल (धानुक) जातिमे फँसल। द्वालख सुबे दासक प्रभाव, मंडलो-मुखियो (धानुक-मलाह) आ बरैइयोमे रहनि। रमौतक चला-चलती गाममे कम। ननौरमे बुद्दी दास रमौतक महंथ बनि गेलाह। दियादिक लाटसँ बेरमा आबि अपने दियादमे एक गोटेकेँ कंठी दऽ सेवक बना लेलनि। दियाद सेवक बनि गेलनि। ओना सालमे एक बेर सुबेदास मास दिनक लेल एबो करैत छलाह मुदा बीचमे जँ कतौ भनडारा भेल तँ दल दऽ बजाइयो लेल जाइत छलनि। ननौरबलाक चेलाकेँ अपन चेला (रमौतसँ कबीर पंथी) बना लेलनि। एक दिस बिनु वैष्णव (साकठ) केँ चेतैबतो तँ दोसर दिस लुटो-पाट चलैत। सेवक लुटेलासँ ननौरबला वुद्दी दास फरमान जारी केलनि- “जहिना ओकर (घुरण दासक सेवक) कानमे मंत्र देलिऐ आ ओ दोसर मंत्र लऽ लेलक तहिना कड़ूतेल टहका कऽ ओकरा कानमे देबै आ ओइ संग लागल मंत्रो निकालि देबै।” डंकापर चोट पड़ल। द्वालखबला जबाब देलखिन जे हुनकर (वुद्दी दासक) पंथे कमजोर छन्हि। ओइसँ जीवकेँ थोड़े गति-मुक्ति हेतै। पहिने वरदान कऽ लौथु। जँ से नै करताह तँ सेवकक कानमे तेल ढारि देताह, से नै चलतनि। कसम-कस हुअए लागल। गामक दुआर-दरबज्जाक मुख्य मुद्दा यएह बनि गेल। समाजक किछु लोक खुशी जे भने धानुक-धानुकक बीच लड़ाइ अछि तँ दोसर दिस जाति-पातिपर चोट पड़ि गेल छल। कारण जे जहिना कम्युनिस्ट पार्टीक रैली, धाक छोड़ सड़कपर अनैत अछि, तहिना समाजक बीच जे कबीर पंथ माननिहार छलाह, हुनका सबहक बीच खेनाइ-पीनाइमे एकरूपता आबि गेल छलै। कबीर पंथीमे भनडाराक महत्वपूर्ण आधार छै। जहिना जगन्नाथमे अँटका परसाद होइ छै तइ सदृश कबीर पंथक बीच एक-दोसराक बीच परसादीक चलनि अछि। कबीर पंथ-रमौत दुनू पंथक तना-तनीमे गाम बटाए लागल। तीन-चारि टुकड़ीमे गाम बँटि गेल। कबीर पंथ (सम्प्रदाय) सँ कमजोर संगठन रमौत सम्प्रदायक छल। एक गाम दू गाम कतेको गामक कबीर पंथबला सभ मैदानमे उतरैक तैयारी करए लगलाह। बेरमाक बगलेक गाम जगदर अछि। ओना परोपट्टामे जगदर-बेरमाक नाओंसँ जानल जाइत अछि। जगदर छोटेटा गाम अछि। भूमिहार ब्रह्मण आ राजपूत बहुसंख्यक अछि। ओना बरही, यादव, तेली, दुसाध, धुनिया, सोनार, मल्लाह सेहो अछि मुदा अल्पसंख्यक। जगदरमे नथुनी सिंहक सरदारी छलनि, आ अस्सी प्रतिशत भूमिहार हुनकर लठैत छलनि। जइसँ पचकोसीमे झगड़ा-झंझटिक कारोबार चलैत छलनि। जगदरक नथुनी सिंह सेहो कबीर पंथी। ओ लोहिया पट्टीक राजपूते महात्माक सेवक। ओ संख्यामे कम मुदा शक्तिशाली रहथि। सम्प्रदायक रूपमे जगदर कतेको टुकड़ीमे बँटल। राजपूत कबीर पंथी दिस तँ भूमिहार राधा-कृष्ण सम्प्रदाय दिस, यादव-बरही, दुसाध कबीर पंथ दिस। तँ धुनियाँ इस्लाम दिस। मल्लाह तँ सहजहि थाल-पानिमे रहनिहार छी तँए वैष्णव सम्प्रदायमे किअए जाएत। कबीर पंथीक झंझटक हल्ला सूनि लोहियापट्टीबला महात्मा जगदरमे आबि कऽ आसन लगा देलनि आ आन-आन सेवकान सभकेँ अबैले सेहो कहि देलखिन। महाभारत लड़ाइ जकाँ बेरमाक धरती सन-सन करए लागल। शास्त्रार्थक समए िनर्धारित भेल। मेला जकाँ गाम भऽ गेल। परोपट्टाक आँखि बेरमा दिस टकटकी लगौने, मुदा उचित भेल, सही भेल ननौरबला वुद्दी दास कनी पाछू हटि मारि-दंगासँ गामकेँ बचा लेलनि। जगदीश प्रसाद मण्डल जीक परिवार आरो सतरंगी। एक दिस समाजक सभ पावनि, देवस्थानसँ जुड़ल तँ पिताजी सुबे दासक पिताक सेवक (कबीर पंथमे जेकरा सेवक कहल जा छै ओकरे दोसर ठाम चेलाे कहल जाइ छै।) जगदीश प्रसाद मण्डल जीक पिताजीपर कबीर पंथी विचारधाराक प्रभाव। मास-मास दिन दरबज्जापर सतसंग-भजन चलिते रहैत छलन्हि। तेसर दिस जगदीश प्रसाद मण्डल जीक माए, समस्तीपुर जिलाक साहो-पटनिया बलाक सेवक। नहिरेसँ सीख भऽ आएल रहथि, हुनकर तेसरे सम्प्रदाय, गुरु वैष्णवो बनबैत आ साकठो चेला मंत्र दऽ बनबैत, सालमे एक बेर घुमैत-घामैत ऊहो आबि कऽ पान-सात दिन रहैत छलाह। ब्राह्मण छलाह, अपने हाथे भोजन बनबै छलाह। बेरमा दुर्गास्थानमे बलि-प्रदान नै हेबाक यएह कारण छल जे एक स्थानक समाज वैष्णव सम्प्रदायसँ जुड़ल तँ दोसर स्थानमे नथुनी सिंहक वर्चस्व रहनि तँए से नै भेल। जहिना चुल्हिपर चढ़ल बर्तनमे चाउर-पानि देला पछाति मड़सटको, मड़बझुओ, गुड़-खीरो खिचड़ियो आ सुन्दर भात सेहो बनैत अछि तहिना बरतन देल चाउर-पानि जकाँ बेरमाक दुर्गा-पूजा एक संग कतेको वस्तु बनौलक। अखन धरि इलाकामे दुर्गा-पूजा एक जातिक वा महनथानाक पूजा छल ओइपर चोट पड़ल। संग ईहो चोट पड़ल जे सभ जातिक कुमारिक पहुँचक संग साँझ सेहो पहुँचौल (दीप लेसि साँझ देब) गेल। जेकर प्रचार आनो-आन गाममे भेल। दोसर दिस बलि प्रदान नै हएब सेहो एकटा रंग पकड़लक। यएह परिस्थिति बेरमा दुर्गापूजाकेँ राजनीतिक रूप पकड़ौलक। दुनू स्थानक बीच एकटा जबरदस्त खाधि बनौलक। एक स्थान छेहा समाजक बनल रहल तँ दोसर सत्तासँ जुड़ि गेल। सत्तासँ जुड़ैक कारण भेल जे मधेपुरक मधेपुर ब्लौक प्रमुख। अट्ठाइस पंचायतक ब्लौक मधेपुर। ओना मिला-जुला कऽ जातिक आधार नै राजनीतिक आधार ठाढ़ भेल। साैंसे मधेपुरमे कते जातिक मुखिया छल। िसर्फ मुसलमान मुखिया हटल रहल। नै तँ सबहक समर्थन रहनि। कारणो छल जे जाति कोनो किएक ने हुअए मुदा मुखियाक माने कांग्रेसी छल। तइसँ आॅफिसो एकछाहा छल। दुनू हथियारक प्रयोग ओ सभ केलनि। जतए जातिक गर लहनि ततए जातिक आ जतए से नै ततए राजनीतिक रंग चढ़बथि। जइसँ चन्दाक रूप रोजगार दिस बढ़ल। ब्लौक ऑफिस उठि कऽ सेहो दुर्गा स्थान पहुँचए लागल। जइ दिन मेला होइ तइ दिन या तँ कोनो नव योजनाक आवेदन लिअए पहुँच जाइत वा कोनो बँटवारा करए। ओना दुर्गापूजाक पहिल लाभ गौंआँकेँ ई भेल जे किछु गोटे छोड़ि अधिकांश परिवारमे वृद्धावस्था पेंशन भेटि गेल। ब्लौकक सभसँ छोट पंचायत बेरमा आ सभसँ बेसी गोटेकेँ पहिल बेर वृद्धा पेंशन भेटल। मुदा भीतरे-भीतर जबरदस्त प्रतिक्रिया भेल। किछु गोटे बलिक प्रसाद दुआरे रूसि रहलाह तँ किछु गोटे फज्झति सुनि गाम-गाम चर्चक मुद्दा बनल। गामक राजनीतिमे सेहो मोड़ आएल। मोड़ अबैक कारण भेल जे गामक भीतर जे जातिक बनाबटि अछि ओहो कते रंगक अछि। ओना दुर्गापूजामे बाह्मण बँटा गेल रहथि। दुनू स्थानकेँ हुनकर समर्थन रहनि। एक दिस पंडित व्याकरणाचार्य उदित नारायण झा पंडित भेलाह तँ दोसर दिस वैदिक, व्याकरणाचार्य पंडित कामेश्वर झा भेलाह। १९६२ ई.क मुखिया (पंचायत मुखिया) चुनावमे ब्राह्मणे मुखिया हारबो केलाह आ जीतबो केलाह। बचनू मिश्र, जिनका अक्षरक बोध नै रहनि मुदा इमानदारीसँ काज करैक चलैत गामे नै अंचलक नेताक श्रेणीमे छलाह। अपने तँ मुखिया नै बनलाह मुदा अपन समर्थक मुखिया रहनि। हारला उत्तर राजनीतिमे पछार खेलनि। सरसठिक चुनावमे काँग्रेसकेँ जबरदस्त धक्का लगल रहए। मधेपुर ब्लौकक नेता जानकी बाबू (श्री जानकीनन्दन सिंह) छलाह, जे विधायक रहि प्रतिनिधित्व कऽ चुकल छलाह। ओ टूटि कऽ महामाया बाबूक संग जनक्रान्ति दलमे आबि चुकल छलाह। जे लाभ सोशलिस्ट पार्टीकेँ भेटल आ वासुदेव बाबू (श्री वासुदेव प्रसाद महतो) एम.एल.ए. भेलाह। जाितक बनाबटि- बेरमाक ब्राह्मण पाँच खण्डमे विभाजित अछि। ओना चुनावक नाओंपर एक रहै छल मुदा सामाजिक व्यवहारमे दूरी बनल छलनि। कम्युनिस्ट पार्टी जे १९६२ ई.मे पहिने बनल छल ओइमे ब्राह्मण सभ टूटि कम्युनिस्ट पार्टी बनेने रहथि। पाँचो खण्डक अलग-अलग सामाजिकता छलनि। कथो-कुटुमैती आ खानो-पीनमे दूरी छलनि। बरइ, कोइर, कियोटमे एकरूपता छल। एकरूपता ई जे खेनाइ-पीनाइ, पावनि-तिहार एकरंगाह छलनि। धानुक दू खण्डमे विभाजित छल, अखनो अछि। दुनूक बीचक दूरी अधिक अछि। तेकर कारण अछि जे बहुत पहिनेसँ धानुक खबासियो करैत आएल अछि आ किसानियो जिनगी बना जीबैत आएल अछि। तहिना मल्लाहो विभाजित अछि। मुसहर परिवार जेरगर अछि मुदा ओकरामे सेहो फुटफाट होइते रहै छै। तेकर कारण होइ छै जे कोनो भोज-काजमे सभकें सभ नै खुआ पबैत अछि जइसँ अपनामे विभाजित रहैए। मधेपुर ब्लौकसँ लऽ कऽ गाम धरिक चोटसँ बचनू मिश्र चोटा गेलाह। पुरना संगी सभ जे रहनि ओ सभ सन्यास लऽ लेलनि। सिद्धान्तक नाओंपर अपन वोट अर्पित केने रहलाह। बचनू मिश्रक ब्रेन प्रभावित भऽ गेलनि। जइसँ यत्र-कुत्र बाजए लगलाह। नतीजा भेलनि जे पोखरिमे डुबा-डुबा एत्ते मुकियौलकनि जे पीठीमे जबरदस्त घा भऽ गेलनि। दरभंगामे ऑपरेशन भेलनि तखन घा ठीक भेलन्हि। …. दुर्गास्थान बनैसँ पूर्व छोट-पैघ अनेको स्थान छल, कोनो नै कोनो रूपमे अखनो अछि। बलदेव बाबू (सरिसब पाही) बेटाक उपलेखनामे एकटा शिवालय बड़की पोखरिक उत्तरवरिया महारपर बनौलनि। अखुनका हिसाबसँ मंदिर छोटे मुदा जइ दिन बनौल गेल बहुत सुन्दर मंदिर रहै। ओना अठासीक भुमकममे खसि पड़ल मुदा स्थान आरो चमकि गेल। ओही मैदानमे दुर्गोपूजा होइए आ मुसलमानक दाहाक मेला सेहो लगैए। मेलामे अकसरहाँ बेपारियो आ देखिनिहारो हिन्दुएक परिवार रहैत अछि। दोसर स्थान राधा-कृष्ण, राम-जानकी, हनुमान-महादेव सबहक सम्मिलित स्थान अछि। एके स्थानपर रामो-जानकी आ राधो-कृष्ण छथि। स्थान बहुत पुरान अछि। बौधू दास स्थान बनौलनि। शुद्ध वैरागी छलाह। परिवार नै छलनि, मुदा स्थानकेँ स्थान बनौने रहथि। कमसँ-कम एक बेर अपनो सौंसे गाम घुमैत छलाह आ सभसँ हब-गब करै छलाह। लोको उपकैड़-उपकैड़ कहै छलनि जे बाबा औझुका सिदहा हमरे दिससँ रहतै। असकरे घुमैत छलाह। ओना ओ ठकुरबाड़ी बनौने छलाह, मुदा बिनु मुर्तिएक। लोकक दुख-दर्दकेँ हृदएसँ पकड़ैत छलाह। भखरौली (सुखेत) नील कोठीक सेहबाक (अंग्रेज बेपारी) अन्याय नै बरदास कऽ सौंसे बेरमा लोककेँ कहलखिन जे एकरा भगबैक अछि। तेपटा जमीन लऽ लऽ सभटा खेत मारने जाइए। डेढ़-हथ्थी लऽ कऽ अपनो घुमै छलाह आ वएह नेने आगू भेलाह। भेबे नै केलाह, कऽ कऽ देखा देलखिन। ओही स्थानपर महावीर दास भेलाह। गरीब परिवारक महावीर दास कबीर पंथक सीख, स्थानपर आबि गेलाह। बौधूओ दासक उमर निच्चा मुँहेँ भेलनि। महावीर दासकेँ राखि लेलनि। वैष्णव रहबे करथि। मुदा बौधू दासक प्रभाव रहबे करनि, जइसँ बहुत उमेरक पछाति बिआह केलनि। साधारण परिवारसँ आएल महावीर दासक विचार बहुत उदार छलनि। भूमिहार रहितो सबहक परिवारमे कबीर पंथी परिवार बूझि भात-रोटी सभ खाइ छलाह। वैदागिरीक ज्ञान भेलनि। वैदागिरी खूब बढ़लनि। वएह आमदनी देखि बिआहो करौल गेलनि आ केबो केलनि। ताधरि स्थानमे बीघा पाँचेक, समाजक दान कएल, जमीनो भऽ गेल छलनि। हफीम खाइ छलाह। मुदा स्वाभवसँ बहुत उदार छलाह। परोपट्टामे नाम कमेने छलाह। भगवानक दरवार (ठकुरवाड़ी) मे पैघसँ पैघ आ छोटसँ छोट जे कियो संगीतज्ञ औताह जहाँ धरि बनि पड़त खुशीसँ विदा करबनि। से भेबो कएल। परोपट्टाक दरवारी दास होथि आकि छठू दास, हिताइ दास होथि कि लखन दास, जिनके ढोलकिया बम्बइमे नामी छथि, तहिना नाटक-नौटंकी इत्यादि-इत्यादि। अपन स्वभाव वएह रहनि जे जखन हफीमक नशा सिरचढ़ रहनि तखन विदा करथि। तेसर स्थान छी ब्रह्म स्थान। अखनो बीघासँ ऊपर जमीन स्थानमे अछि। पक्का माकन। अांगन बाड़ी केन्द्र, धर्मराज स्थान सभ सटले-सटल। जाधरि पंडित उपेन्द्र मिश्र, जे वेद, व्याकरण, साहित्य आ ज्योतिषक आचार्य छलाह, साले-साल कातिक मासमे पनरह दिन भागवत करै छलाह। ओना ओ तते गंभीर आ संयमी छलाह जे एक शब्द फाजिल नै बजैत छलाह जइसँ बनौआ पंडितक बीच उपहासक पात्र बनल छलाह जे हुनका थोिथये ने छन्हि। अपन स्थान बूझि गामेपर सँ चौकी नेने अबैत छलाह आ आसनक जे प्रक्रिया छै से करैत बैसि जाइ छलाह। पहिने दू-तीन दिन परचारे होइमे लागि जाइ छल मुदा जेना-जेना परचार होइत जाइत छलै तेना-तेना सुननिहारोक आ भागवतकेँ आगू बढ़बैक ओरियानो करैत जाइत छलाह। एकटा महावीर जी स्थान, पोखरिक माहरपर अधसुखू कटहरक गाछ लग धूजा गाड़ि स्थान स्थापित भेल। पूजा शुरू भेल। एकटा अद्भुत भेल। अद्भुत ई भेल जे अधसुखू कटहरक गाछ पानि पीब जोर केलक। गाछ लहलहा उठल। मझोलके गाछ, जेना डारि-पात सभमे फड़ैक शक्ति आबि गेलै। डेढ़ सएसँ अढ़ाइ सए तक फड़ हुअए लगलै। भलहिं तीन-चौथाइमे कोह नहिये होइ, कमरिये टा होइ। वएह कटहरक गाछ स्थानक प्रभावकेँ तेज केलक। इलाकामे समाचार पसरि गेल। अष्टयाम कीर्तन (रामनवमी, चैत) शुरू भेल जइमे तीन मनसँ पाँच मनक बीच गहुम-चाउरक परसाद बनैत आ खर्च होइत छल। जे एक-एक मुट्ठी कऽ बाँटल जाइत छल। लकड़ीक मंडप बनल रहैत छल जत्तऽ विसर्जनक पछाति नगर कीर्तन होइत छल। नगर कीर्तनक अर्थ भेल चारि गोटे मंडपकेँ उठा आगू-आगू सौंसे गाम घुमैत छलाह आ पाछू-पाछू कीर्तन-भजन होइत समाजो घुमैत छलाह। जिनका जे जुड़ैत छलनि से चढ़ेबा चढ़बै छलाह। जइसँ साज-बाज कीनल जाइत छल। तहिना मुसहर सभ सेहो आसीन मासमे पूजा करैत छलाह आ अखनो करैत छथि, मिरदंग-झालि लऽ दस गोटे सौंसे गाम घूमि चंदा करै छलथि/ छथि जइसँ पूजाक खर्च चलै/ चलैए। तहिना मुसलमानो सभ दाहा बनबै छथि आ सौंसे गाम घुमै छथि। एहेन भायचारा चलि आबि रहल अछि। तहिना सालमे दू स्थानपर दुर्गा पूजा, महावीर जी स्थानमे दर्जनो अष्टयाम, नवाह, तीन दिनक कबीर पंथक संत सम्मेलन दर्जनो साहित्यिक गोष्ठी, दुआर-दरबज्जापर कीर्तन-भजन इत्यादि-इत्यादि चलिते रहैए। ततबे नै तीन-तीनटा महंथो, तीन सम्प्रदायक, आधा दर्जन कीर्तनो मंडली, जे रोजगार बनौने छथि, सभ चलि रहल अछि। आखिर मिथिलाक समाज छिऐ किने। एक तँ ओहिना सरसठिक चुनाव हवा बहौलक, तइपर बेरमाक भगवती (१९६९ स्थापित) सेहो अपन दुआरि खोलि देलनि। गामक आयात िनर्यात आन-आन समाजसँ बढ़ल। दुनू हवा चलल, एक दिस सभ जातिक बीच दुर्गापूजा एली तँ दोसर-दिस नव जवानक हृदैमे किछु करैक उत्साह सेहो भरल। ओना समाज समुद्रोसँ नमहर अछि। तँए समाजक भीतर की सभ होइ छै, कहब कठिन अछि। मुदा किछु जे देखबामे अबैए ओ छी स्त्रीगणक माध्यमसँ नैहर-सासुरक बीच पाइ-कौड़ी, गहना-जेबरक बन्हकी-छनकी। कोन गामक गहना कोन गाम गेल कहब कठिन। दोसर गामोक बीच महाजनी आ आनो-आनो गामक बीच। जमीन्दारीक रूआब तँ खनदानी रूआब बनैए, जँ से नै बनैए तँ अंग्रेज सेहबा चलि गेल आ सहाएबक बीआ छिटा गेल। मैनजन, महाजन, जमीन्दारक संग जाति साम्प्रदायिक कते सूत्र लागि गेल अछि, बेरमावासीकेँ ऋृण दैमे अगुआएल जातिक। खाली एकटा पछुआएल दाता, मुदा कारोबार छोट। बेपारीक शासनो जमीन्दारसँ भिन्न होइत। खैर जे होउ? श्राद्ध-कर्म आ बिआह कर्म रोकब पुरोहित सभ घोषणा कऽ देलनि। गामक लोकक बीच समस्या ठाढ़ भेल जे आब की हएत? कबीर पंथी महात्मा सभकेँ रास्ता भेटलनि, घोड़-दौड़ शुरू केलनि। समाजमे उठैत आगि ठमकल रहल। कबीर पंथी सभ तेहेन जे जएह घर बसबए चाहै छथि तेहीमे आगि लगबै छथि। गति-मुक्तिक विचार तँ समाजमे दइ छथिन मुदा औझुका बात कहबे ने करै छथिन। आइ हम की छी, सबहक प्रश्न छी। कबीरक पाँति छन्हि जे “साइ इतना दीजिए....।” मुदा कऽ कतएसँ दैथि तइठाम कने झल भऽ जाइ छै। तहिना मायाक बुनियादसँ ऊपर उठि विचार रखै छथि जइसँ झल अन्हार भऽ जाइ छै। अध्यात्म ओहन पद्धति छिऐ जे मनुष्यकेँ मनुष्य बनैक लूरि दइ छै। खाली लुरिये नै ओहन बुधियो दइ छै जेकरा सुपर मैन कहै छिऐ। किनका ई अभिलाषा नै छन्हि जे सुपरमैन बनी। मुदा, से किअए ने भऽ पबैए। जंगलमे लाखो गाछ एक संग जीवन-यापन करैत हवो-विहाड़िक झोंक सहैए। एकैसम शताब्दीक मांग अछि जे स्वतंत्र मनुख बनि स्वतंत्र विचरण कऽ सकी। जइठाम बाट-घाट सभ असुरक्षित अछि तइठाम दिल्ली दूर नै तँ लग अछि। तखन जाए दिऔ जेहो खेलक सेहो पचताएल जे नै खेलक सेहो पचताइए। ओना १९६० ई.सँ जगदीश प्रसाद मण्डल खेतीसँ थोड़ बहुत जुड़ि गेल रहथि। मिरचाइ, भट्टा, कोबी, अल्लू इत्यादिक लगसँ खेती शुरू केलनि। धान, मरूआ, रब्बी-राइक खेती जने हाथे हुअए लगलनि। भायकेँ खेतीसँ कम सरोकार। तहूमे अमानत पढ़ि लेने रहथिन्ह। जमीनक खिस्सा-पिहानी ओहन जे महिनो भरिमे अन्त नै लैत रहए। मुदा अपनो जिनगीले तँ लोक किछु सोचिते अछि। नाच दिस झुकि गेलाह। मुदा गरीबक कलाकेँ उभाड़ब धीया-पुताक खेल नै। खैर जे होउ। भोगेन्द्र जी सम्पर्कमे एला पछाति खेतीक प्रति आरो जिज्ञसा तेज भेलनि। तेज ऐ दुआरे भेलनि जे जर्मनी, जापानक खेतीक बात ओ मनमे बैसा देलखिन्ह। हिसाब जोड़थि तँ दस कट्ठा खेत एक परिवारक (पाँच गोटे) लेल बेशिये बूझि पड़नि। तहूमे साइबेरियाक ओहन किसान अछि जे सालक छह मास, आठ मास ढकल बर्फ हटिते धड़-फड़मे तेना कऽ खेती कऽ लइए जे बढ़िया उपजा उपजा लइए। आइ भलहिं मिथिलांचलक अदहासँ बेसी भाग बलुआ गेल अछि, माटि ऊपर बालु भरि गेल अछि। समस्या ओते भारी अछि जे जहिना बालु तरसँ ऊपर आबि भूमिकेँ मारि देलक तहिना ओकरो अटावेश करैत किसानक हाथमे खेत आबए। बिहारक मूल पूँजी खेत छी, जते खेती समृद्ध हएत तते राज्यो समृद्ध हएत। एक तँ अपन हाथक पूँजी, खेत, दोसर जखन राजनीतिसँ जुड़ि गेलथि तखन तँ काजो बढ़ि गेलनि। खेती िदस ढंगसँ बढ़ैक कोशिश केलनि। पूसा मेलासँ खेतीक किताब कीनि-कीनि अनए लगला। किसानक जे कार्यक्रम होइ तइमे जाए लगला। राजनीतिसँ जुड़ने कोट-कचहरी सेहो घुमए लगला। मधेपुर ब्लौकमे जुबेर सहाएब पी.ओ. रहथिन्ह। बहुत शरीफ लोक। अपनापन बहुत अधिक रहनि। हुनकासँ सम्पर्क भेलनि। ओ एग्रीकल्चर ग्रेजुएट। स्कूल-काओलेज जकाँ घंटो-घंटो खेतीक बात लोककेँ बुझबैत रहथिन। हुनका सम्पर्कसँ ई भेलनि जे जतए हुनकर कार्यक्रम होन्हि जानकारी देथिन। एग्रीकल्चर महाविद्यालय- पूसो-ढोलीमे सालमे एक बेर नमहर आ छोट-मोट कार्यक्रम चलिते रहैत छल। १९६० ई.सँ पूर्व बेरमा गाममे ने एकोटा बोरिंग रहए आ ने दमकल। सभसँ पहिने (१९७१-७२) स्व. सत्य देव झा, जे पढ़ल-लिखल तँ नहिये छलाह मुदा एवरेडी बैट्रीक कम्पनी कलकत्तामे नोकरी भऽ गेल रहनि, सेवा िनवृत्त भेल रहथि। बंगालक खेतीक जानकारी भइये गेल रहनि। सोचलनि जे पाँच बीघा खेत कीनि जँ बोरिंग करा लेब तँ परबरिस चलि जाएत। से करबो केलनि। वएह बोरिंग पहिल छी। खेतीक जानकारी भेने पानिक महत लोक बुझए लगै छै। राजनीतिक पार्टी बनिये गेल रहए। सरसठिक रौदीक पछाति बोरिंग-दमकलक योजना सेहो जनमल, मुदा सतमसुआ। बेरमा गाममे बी.डी.सी.क बैसार भेल। डी.एम. सेहो आएल रहथि। ब्लौकक सभ रहबे करथि। तोहफाक रूपमे डी.एम. सहाएब, तिहाइ सवसिडीक रूपमे बोरिंग-दमकलक चर्चक संग किसानक दशा-दिशाक चर्च सेहो केलनि। चारि श्रेणीमे किसानक बँटबाराक चर्च करैत सबहक लाभक चर्च केलनि। जगदीश प्रसाद मण्डल आ चारि गोटे माने पाँचटा किसान विचार केलनि जे अवसरक उपयोग करता। पूसा-ढोलीसँ लऽ कऽ जिला-ब्लौकक बीच जे किसान मेला वा गोष्ठी होइ तइ सभमे जाइत-अबैत रहथि, ओना पाँचो गोटे बोरिंग गड़बैक विचार केलनि मुदा दू गोटे नै गड़ौलनि। बोरिंग गरौला पछाति नव-नव धान, गहुम इत्यादिक बीआ सेहो आनए लगला। अखन (२०१२ ई.मे) जते धानक उपज नै भऽ रहल अछि तइसँ बेसी आठम दशकमे हुअए लागल छल। सीता धान, जे मेहियो होइत अछि आ खाइयोमे नीक होइत अछि, सवा क्वीन्टल कट्ठा उपजए लागल। िसर्फ धाने गहुम नै, आलू-कोबी, टमाटर इत्यादिक खेती सेहो जोड़ पकड़लक। जे गाम कर्जक तरमे दबल छल ओ अपना पएरपर ठाढ़ हुअए लागल। गामसँ जमीन्दारो सभ चलि गेल रहथि। एक गोटे मात्र बँचल रहला, जिनका भाँजमे एक सय दस बीघा जमीन। जइपर पछाति जबरदस लड़ाइ भेल। बी.डी.सी.क बैसारमे डी.एम. सहाएब सूदखोर महाजनक चर्च विस्तारसँ केने रहथि। संग-संग ईहो कहि देलखिन जे दोबरसँ फाजिल जे महाजन लेताह हुनकापर कानूनी कारवाइ हेतनि। कर्जदार सभ निचेन भऽ गेलाह जे जहिया हएत तहिया ने देबै। नै रहने कतए सँ देबै। मुदा महाजनक आक्रमण भेल। पकड़ा-पकड़ी शुरू भेल। खेतीक संग-संग गाममे आरो-आरो काज सभ हुअए लागल। गामक जते बान्ह–सड़क अछि ओकरा नक्शासँ अनुमूल बनौल गेल। जइसँ गामक रूपे-रेखा बदलि गेल। ई भेल जन-सहयोगसँ। पछाति सरकारियो योजना सभसँ माटिक काज, खरंजा इत्यादि होइत रहल। अखन तँ सहजहि गामक ओहन रूप बनि गेल अछि जे एकोटा परिवार नै अछि, जेकरा घरक आगू चरिपहिया सवारी नै जा सकैए। तहिना प्रति दू परिवारपर पानि पीबैक साधन बनि गेल अछि। तहिना प्रति आठ बीघापर बोरिंग (प्राइवेट) अछि। ओना पछिमी कोसीक नहरिक दूटा शाखा सेहो उत्तरे-दछिने, पूबो आ पछिमो बनि रहल अछि। तइ संग स्टेट बोरिंग सेहो गराएल अछि। मुदा चालू नै भेल अछि। तहिना आबागमनक सुविधा सेहो अछिये। एक दिस रेलबे स्टेशन तीन किलोमीटरपर अछि तँ दाेसर दिस एन.एच. दू किलोमीटरपर अछि। जहिना वसंत ऋृतु अबिते मेघमे ठेकल गाछसँ लऽ कऽ माटिमे ओंघराएल धरतीमे नव पात, नव कलश, नव कोढ़ीक संग नव फूल दैत तहिना समाजक फुलवाड़ीमे फूलक अंकुर दिअए लागल। रंग-बिरंगक समस्या (पोजीटिव-निगेटिव दुनू) उठि-उठि ठाढ़ हुअए लागल। जगदीश प्रसाद मण्डल सभ सेहो विचार केलनि जे समाजक उत्थानमे जातिक कट्टरपन बाधा छी। ओना जँ जातिक बीच कथा-कुटुमैती होइत अछि तँ ओ दू समाजक बीचक प्रश्न बनि जाइत अछि। मुदा समाजक बीच जातिक छुआ-छुत बहुत नमहर खाधि बनबैए। तँए महिनामे एकबेर बैसार करब आ ओ करब टोले-टोल घूमि-घूमि, ई सबहक विचार भेलनि। बैसारमे कोनो बेसी जोगारक प्रश्न नै, मुदा टोलबैयाक विचारसँ, जँ ओ सभ खाइ-पीबैक बेवस्था करथि तँ सेहो बढ़ियाँ, सभ खाएब, ई सबहक विचार भेलनि। अखनो धरि खाइते छथि। सभ जातिक बरिआतियो आ भोजो-काजमे खाइते छथि। हँ ई बात जरूर अछि जे अखनो तितम्हा चलिते रहल अछि, मुदा सभ जातिक सहयोग रहने कम पड़ि जाइए। ई बहुत नीक कदम भेल। परोपट्टामे जेना पसाही लागि गेल। ओना झंझारपुर ब्लौकमे कमलासँ पछिम नागेन्द्रजी (डाॅ. नागेन्द्र कुमार झा डाॅ. धीरेन्द्रक मािझल भाए), पूब फुलपरास ब्लौकमे कामेसर जी (श्री कामेश्वर राम) सेहो क्रान्तिक सूत्रपात केलनि। जमि कऽ तीनू ब्लौकमे पार्टीक प्रभाव बढ़ल। तइ बीच नागेन्द्रजी पार्टी स्कूल चलौलनि। लग रहने तीनू दिन जगदीश प्रसाद मण्डल सभ भाग लेलनि। केन्द्रक नेता सबहक संग रहैक मौका भेटलनि। हुनको सबहक इच्छा भेलनि जे बेरमोमे एहिना हुअए। से भेबो कएल। टोले-टोलक मीटिंगमे टोलक समस्या मुख्य मुद्दा बनल रहैत छल जइसँ गामक अध्ययन अधिकसँ अधिक गोटेकेँ हुअए लगलनि। चौक-चौराहापर सिनेमा-सर्कशक गप-सप नै भऽ गामक समस्याक गप शुरू भेल। मुदा चालैन जकाँ रोगाएल समाज। ओना आन गामसँ भिन्न बेरमाक बनाबटो अछि। तेकर मुख्य कारणमे एकटा ईहो कारण अछि जे आइ धरि गमकट्टा (धार)क पल्ला नै पड़ल। कहैले बहुत पहिनेसँ एकटा सुपैन (प्राचीन नाम सुपर्णा) धार अछि मुदा अजेगर साँप जकाँ ई एकेठाम बैसल रहल। तहूमे तीनिये मास धार रहैए बाकी मास मुर्दघट्टीसँ लऽ कऽ चारागाह बनल रहैए। गाममे अधिक बासभूमि रहने ऊँचगर जमीन पर्याप्त अछि। मझोलका किसान बेसी रहने जमीनक छोट सीमांकन। मुदा पटबैक बेवस्था नै रहने बाड़िओ-झाड़ीमे मड़ूए-गम्हरिक खेती होइत छल। तरकारीक खेतीले ऊँचगर जमीन माने चौमास खाली बरियातिऐक लेल होइए, बाकी मध्यमो जमीन (चौर छोड़ि), दू बेर (दू फसल) उपजैत अछि। किछु बोरिंग भइये गेल, चापाकल सेहो लोक लगौलक। तरकारी खेती जोर पकड़लक। कतेक परिवार उठि कऽ ठाढ़ भऽ गेल। महाजनी सेहो बन्न भइये गेल रहए। जइसँ समस्या सेहो उठल रहए। भुमहुर आगि जकाँ गामक राजनीति तरेतर जोड़ पकड़ए लागल। भगवती स्थान अगुआएल। तइ संग एकटा आरो भेल। आरो ई भेल जे खुदरा-खुदरी सभ कियो सभ-स्थान (देव स्थान) अबै-जाइ छलाह मुदा मने-मन बँटाएल छलाह। खाली डिहवारे स्थान सार्वजनिक बूझल जाइ छल। जेकर स्पष्ट रूप बिआह, मूड़न, उपनैन इत्यादिमे देखल जाइत अछि। डिहवार स्थान एकहरे वंशक स्थापित कएल अछि। दुर्गापूजा एकहरे दियादकेँ तोड़लक। भेल ई जे एकहरे परिवार (दियादी) गामक ब्राह्मणमे सभसँ नमहर दियादी अछि जे दू टोलमे विभाजित छथि। उत्तरवारि टोल आ दछिनवारि टोल। बड़की पोखरिक उत्तरवरियो आ दछिनवरियो महारपर दुर्गापूजा होइत अछि। पोखरि बीचमे सीमा अछि। गामक सीमा (टोल-टोलक) गजपटे रहि गेल। जना आन-आन गाममे कतौ सड़क सीमा होइए तँ कतौ स्कूल, से नै भेल। पानियेमे सीमा गड़ा गेल। उत्तरवारि दुर्गा-स्थानक अगुआइ बेरमा निवासी मधेपुर ब्लौकक प्रमुख आ जगदरक नथुनी सिंह केलनि। प्रमुख गामक भगिनमान, तँए एकहरे परिवारमे गुन-गुनी उठल। मुदा दुनू गोटे माने प्रमुखो आ नथुनियो सिंह एकहरे परिवारसँ दुर्गाक माटि लेलनि। दछिनवारि टोलक एकहरे अपन स्थान बूझि दस-आना छ-आना हुअए लगलाह। आबाजाहीमे बढ़ोतरी भेल। भोज-भात सेहो बढ़ल। ओइ समए बचनू मिश्र जे राजनीतिक दृष्टिसँ माटि धऽ नेने छलाह। आर्थिक विषमता रहबे करनि। ओना चारि भाँइक भैयारी छलनि। चारू भाँइ गामक सेसर देहबला माने हाड़-काठक। मुदा मुकदमामे ओझरा गेल रहथि। दछिनवारि टोलक एकहरे परिवारमे बचनू मिश्रक नीक पइठ रहनि। ओ दिन-राति एकबट्ट कऽ दछिनवरिया दुर्गाक माटि सेहो एकहरे परिवारसँ लिऔलनि। एकहरे परिवार विभाजित भऽ गेल। ब्राह्मण बँटा गेला, जइसँ पूजा-पाठक कोनो अभाव कहियो नै भेल अछि। अही बीच कपिलेश्वर राउतक बाबा मरलनि। पुरोहित अपन ललकारा भरलनि। लड़ाइ फँसि गेल। लड़ाइ ई फँसल जे एक दिस पुरोहित अपन शक्ति देखबए लगलाह तँ दोसर दिस कपिलेश्वर अड़ि कऽ ठाढ़ भऽ गेल। मुदा पाँचे-सात दिनक बीच (सराध-मृत्युक बीच) इलाका गनगना गेल। मृत्यु दिन विवाद तँ नै उठल मुदा नव चेतना जरूर जागल। नव चेतना ई जे पार्टीक भीतर बंधनक रूपमे जिनगीकेँ पकड़लक, मृत्युक समाचार सुनिते लोकक ढबाहि लागि गेल, जना समस्ये हरा गेल। कियो कपड़ा किनए गेल, कियो बाँस काटि चचरी बनबए लागल, कियो अछिया खुनए गेल। बजरूआ करखाना जकाँ कारोबार चलल। मुदा जहिना एक कम्पनीक इंजनक पार्ट दोसर कम्पनीक लगौने अनेरो खड़खड़ाइत-झड़झड़ात रहैत अछि तहिना शुरूहेसँ हुअए लागल। चचरी बनबैसँ पहिने बाँस कटैमे रक्का-टोकी शुरू भेल। रक्का-टोकीक मूल कारण भिन्न-भिन जातिक भिन्न-भिन्न विधि-विधान। मुदा संयोग तँ एहेन भेल जे सभ टोलक लोक एकठाम पहुँच गेलाह। जहिना गजेरी धुआँक गंध लगिते प्रेमी दिस आँखि उठा-उठा देखए लगैए तहिना जइ काजक जे प्रेमी ओ अपन-अपन प्रेमी दिस ताकए लगलाह। मुदा ऐ बातपर सभ सहमत जे जइ जातिक काज छी हुनकर महत बेसी होइ। घरबैया (कपिलेश्वर तीनू भाँइ) कुबेरक खजाना खोलने। जइ काजमे जे जरूरति होइ, पुछैक कोनो खगता नै। अपन गाछी-कलम अछि, बँसबारि अछि। तीनटा बाँस चचरी ले कटल। चचरी बनबै काल केहेन बल्ला आ फट्ठा होइ, तइले फेर रक्का-टोकी उठल। मुदा पार्टीक भीतर एहेन-एहेन नेता रहथि जे घरहटियो रहथि। तँए हुनके जुतिसँ चचरी बनल। फेर लकड़ी कटैमे झंझट उठल। एकटा शीशोक (जइमे सारी नै भेल रहै) सूखल गाछ। जइसँ काज चलि सकै छल। मुदा भेल ई जे बिना बुझने-सुझने अपने फुरने दू गोटे फड़ैबला आमेक गाछ काटि कऽ खसा देलक। मुदा कएले कि जा सकैए। सूखल जरनाक सेहो जरूरत अछिये, ओहो शीशो कटाएल। तीन-चारि दिन तक डोम लकड़ी उघिते रहि गेल। खैर जे होउ..। मुदा सैकड़ो आदमी एकठाम बैसि असमसान देखलक। पसाही जकाँ कोन लुत्ती किमहर उगि कऽ पकड़ि लइत, तेकर ठेकाने ने रहल। एक गोटे असमसानसँ आएल। आन गाम जाइक रहै, दाढ़ी-केश कटा कऽ चलि गेल। दाढ़ी केश तेसर दिन कटाइ छै, तहिना सीमा टपैक बात सेहो उठल। जना सौंसे गाम रंग-बिरंगक पसाही लागि गेल। कोनो एक मुँहरी गप नै, सभ गड़िमुड़ाह। केकरो मुँह किम्हरो तँ केकरो नांगड़ि किम्हरो। मुदा ललकाराक मैदानमे तँ ललकरे जोर पकड़ै छै। तँए कियो अपना तर्ककेँ वितर्क-कुतर्क मानैले तैयारे नै। मुदा जहिना कलकत्ता सड़कपर गाड़ीपर गाड़ी, लगले रहै छै तहिना तते समस्या (गप-सपक क्रममे) उठए लागल जे गप्पे-गपमे ओझरा जाइ छल। कोनो घटनाक गप कोनो घटनामे मिलि जाए। जहिना दू देशक बीच लड़ाइमे सीमा कातक लोककेँ नीन हराम भऽ जाइ छै तहिना गामक लोकक बीच भऽ गेल। पहिल दिन बहुतो गोटे नै बूझि पेला, दोसर दिन पता चललनि जे किछु गोटे जहिना अपन कुरहड़ि-टेंगारी लऽ कऽ गेल रहथि ओ संगे नेने चलियो एला, चलनि अछि जे तेराइत तक सभकेँ छुतका लागि जाइ छै, तँए तीन दिन ओहो सभ किछु ने करत। जे सभ कुरहड़ि-टेंगारी लऽ कऽ आएल रहथि हुनका जगदीश प्रसाद मण्डल पुछलखिन जे किअए अनलिऐ? ओ सभ जबाब देलखिन जे झंझारपुरबला पार्टीक (लकड़ी कारोबार केनिहार) कुरहड़ि छिऐ, आइ समाज दुआरे काज कामै केलौं, जँ कुरहड़ि बरदा जाइत तखन तँ काजे बन्न भऽ जइतए। तही बीच एक गोटा बाजि उठलाह जे आन गामक कुरहड़ि भेल किने, गामक कुरहड़िकेँ ने छुतका लगतै आकि आनो गामक ओजारकेँ छुतका लागत। मुदा कुरहड़िबला गप ओते नै पकड़लक जते केशबला पकड़लक। रंग-रंगक गप चलए लागल। तेरहा सराध होइत तँ दियाद-वाद सहित नह-केश दिन केश कटौताह, तँए घरवालीकेँ कोनो मतलबे नै। समाजमे एक जातिक संग आनो जाति आ एक टोलक संग आनो टोलक लोक रहथि मुदा वैचारिक टकराव टोले-टोल, घरे-घर हुअए लागल। विचित्र स्थिति बनि गेल। जहिना गाममे झंझट बढ़ल तहिना पंचैतियो बढ़ल। अधिक पंचैतियो बढ़ने झंझट कमबो कएल आ बढ़बो कएल। कियो बजै छल जे जखन मुरदा जरौला बाद पोखरिमे नहेलौं, आंगन आबि लोह-पाथर छूलौं, अपना ऐठाम आबि सोहराइ वा मिरचाइ खा नहा कऽ कपड़ा बदलि लेलौं तखन छुतका कतेटा अछि जे तैयो लगले रहि गेल। तँ कियो बजै छल जे केश-कट्टा दियाद होइ छै कि आनो हेतइ। तँ कियो बजै छल जे काल्हिये दस रूपैया दऽ कऽ केश बनौने छलौं, केना कटा लेब। गाममे गपो चलैत आ पराते भने किछु गोटे केश कटा लेलनि। बिना पनचैतियेक पनचैती भऽ गेल जे केशमे किछु लागल रहै छै जिनकर मन मानए कटाबए, नै मन मानए नै कटाबए। दू दिन एहिना चलल। तेसर दिन छाउर-झप्पी हएत। अखन धरि सभ (समाज) कोनो िनर्णए नै केने छल जे की कएल जाए, मुदा परिस्थितिक सामना जरूर कएल जाएत से तय छल, ई सबहक मनमे रहबे करनि। जखन जे समस्या उठत तेकर समाधान तखने करब। जइ दिन छाउर-झप्पी छल ओइ दिन घरवारी (कपिलेश्वर राउत) एकटा समांगकेँ महापात्र ऐठाम पठौलनि। बेरमामे महापात्र नै अछि, कछुबीक पुजबै छथि। जेहो सभ नै बाजक चाही सेहो सभ महापात्र कहि िनर्णए सुना देलखिन जे नै जाएब, कछुबीसँ आबि ओ समांग बाजल। छाउर-झप्पीक समए भेल जाइत रहए। की कएल जाए? बिदेश्वर ठाकुर (नौआ) बाजल जे छाउर-झप्पीक सभ लूरि हमरा अछि। हम झँपबा देबै। सएह भेल। रातिमे सराध कर्ममे पुरोहितक (ब्राह्मण) ओते महत नै होइत अछि जते महापात्रक। िनर्णए किछु नै भेल, भेल एतबे जे जहिना महापात्रकेँ कहलियनि तहिना पुरोहितोकेँ पुछि लिअनु। सएह भेल। दोसर दिन जखन पुरोहितकेँ पुछल गेलनि तखन ओहो ओहने जबाब देलखिन जे नै जाएब। सभ विचारिये नेने रहथि। दिनेमे बेरूपहर अपनामे बैसार भेल। सर्वसम्मति िनर्णए भेल जे पुरोहित-पात्र छोड़ि देल जाए। सराधमे दू काज होइ छै। क्रिया-कर्म आ भोज। जे खर्च क्रिया-कर्ममे हएत ओ भोजेमे लगा दिऔ। ओना बरइ सभ गाममे नै छथि, किछु गनल-गूथल गाममे छथि, सभ कुटुमैतीमे सघन गूथल छथि। जहिना शंख फूकि महाभारत शुरू भेल तहिना शंख फुका गेल। चौबगली गाममे समाचार पसरि गेल। आन-आन गाममे सेहो रंग-बिरंगक सवाल उठए लागल। कतौ उठल जे जँ क्रिया-कर्म नै हएत, तँ भोज नै खाएब। कतौ उठल जे कियो अपन बाप-दादाक करैए तइसँ कि पंचक (भोज खेनिहारक) मुँह छुबा जाएत। कुटुम सभ जिज्ञासा करए अाबए लगलनि। जे आबथि हुनकर जबाब होन्हि जे सामाजिकता टुटने कुटुमैती थोड़े टूटि जाएत। समाज बनि कऽ नै कुटुम बनि कऽ तँ खेबे करब। गामोमे जातिक बीच विवाद उठल। मृत्युक दसम दिन, जइ दिन नह-केश कट्टी हएत। भिनसुरके पहर करीब आठ बजे बैसार भेल। बैसार अइले भेल जे अखन धरिक भोज-भात खाजा-मूंगबापर अँटकल छल। लोकक जीवन स्तर एत्ते निच्चाँ छल। ऐठाम खाजा-मूंगबा वा लड्डू तक पहुँचल छल तँए खान-पानमे धक्का मारल जाए। तँए रसगुल्ला-लालमोहनक संग पर्याप्त दहीक बेवस्था हुअए। भोज-भातक ई स्थिति अखनो थोड़-थाड़ अछिये मुदा पहिने किछु जाति भोजक मामलामे बदनाम छल। एक बरतन चाह बनल, जिनका जते मन फुरलनि से तते पीलनि। पान चलल, ओना पान बर्जित अछि तैयो। अखन धरि जातिक ओझरी छुटि चुकल छल। एगारहो गामक जाति सहमत भऽ गेलाह जे भोज खाएब। वातावरणमे उठल जे कियो अपन माए-बापक किरिया-कर्म करत आकि अनकर। तइसँ अनका कि जे अनेरे कुटुम-परिवारसँ मुँह फूल्ली कऽ लेब। अखन धरिक सोझराएल काज देखि सबहक मन हरिअर। तइपर चाहक झोंक सेहो रहए। तइमे रसगुल्ला-लालमोहन आगूएमे अछि, सभकेँ बुझले जे गौआँसँ अनगौआँ धरिक हिस्सा बराबरे अछि। गप शुरू होइते तीनू बहिन (बेटी) आबि प्रश्न ठाढ़ केलक जे नह-केशक भोज हम करब, प्रश्न जटिल भऽ गेल, तीनू कहै छै हम करब। अच्छा कहि तीनू बहिनकेँ विदा कएल गेल। मुदा ओझरी लगिते गेल। जखन नमहर भोजक योजना बनि गेल तखन छोटका-छोटकाकेँ तँ रोकए पड़त। कुबेरक भंडार तँ नै छिऐ जे जते निकालब तते बढ़तै। नह-केश भोजमे खाइले केकरा देल जाइ छै ओकरे ने जे कठियारी गेल रहल। भोज कथीक होइ छै, तँ भतभोज। सभ जातिक बीच तँ भातक चलनि नै छै। तखन? एक्के काज केनिहारमे दू रीति नीक हएत। होइत-हबाइत नह-केश दिनक भोजे उठाव भऽ गेल। तीनू बहिनकेँ कहल गेल जे भोज नमहर भइये रहल अछि तेहीमे अहूँ सभ जे िदअ चाहै छी से मिला दिऔ। ओते घरवारीकेँ असान हेतइ। तीनू बहिन राजी भऽ गेलीह। दोसर प्रश्न उठल जे पुरोहित-महापात्र नै औताह तेकर की करब। कियो जातिक पुरोहित ताकए लगलाह तँ कियो किछु। मुदा किछु आन जातिमे शुरू भऽ गेल मुदा से नै भेल। तँए जातिमे भेटबे ने कएल। किछु गोटेक विचार जे जखन ओ सभ (पुरोहित-पात्र) एबे नै करताह तखन सोलहो आना छोड़ि दिऔ। किछु गोटेक विचार जे जखन गामेमे देखै छिऐ राम, सदाय, पासवान इत्यादिकेँ अपन सभ किछु छै तखन हमहूँ सभ किअए ने बना ली। तखन कि हुअए? रामअवतार राउतकेँ पुजबैक भार देल गेलनि आ बिदेश्वर ठाकुर सहयोगी बनि पुजा देथिन। पुजौल केना जाए? कोन जरूरी कोनो चीजक अछि, से नै तँ केरे पातपर पुजौताह आ दछिनामे दुनू गोरेकेँ एक-एक जोड़ धोती देल जेतनि। सएह भेल। सराधे दिन (एकादशा) भोज करैक विचार भेल। भोज भलै। काफी जस भोजमे भेल। मुदा जातिक बीच जे रिएकशन भेल ओ...। अखन धरि दसो दिन रंग-रंगक बैसार गामसँ आन गाम धरि होइते रहल। अंतमे रतीश बाबूक (नवानी) िनर्णए भेल, जे जतिया आगू पतिया नै लगै छै। कपिलेश्वर राउतक ऐठामक घटना (बाबाक सराध) गामसँ बाहर धरि जना आगिक लुत्ती भऽ गेल। ऐ घटनासँ छोट-पैघ अनेको घटना जन्म लेलक दूटा घटना ओइमे महत्वपूर्ण रहल, पहिल रामावतार राउतक संग जे भेल आ दोसर बिदेसर ठाकुरक संग जे भेल। दुनू गोटेक योगदानो नीक रहलनि। मधेपुर ब्लौक थानाक संग-संग विधान सभा क्षेत्र सेहो छल। आब नै अछि। ओइ समए अट्ठाइस पंचायतक ब्लौको आ थानो छल, तँए राजनीतिक अड्डा सेहो रहल। कोसी-कमलाक बीच बसल ब्लौक अछि। तँए दुनूक (पूबमे कोसी, पछिममे कमला) बीच जते छोटका बड़का, मुइलहा-जीतहा धार अछि सभ मधेपुर ब्लौक होइत गुजरिते अछि। एक दिस काेसी कटनिया कऽ बालुसँ बलुऔने अछि तँ दोसर दिस कमलो। किम्हरो बालु अछि तँ किम्हरो मोनि-मान सेहो अछि। देशक आजादीक लड़ाइमे मधेपुर ब्लौकक योगदान बिहारक कोनो ब्लौकसँ कम नै रहल अछि। जय प्रकाश बाबू, सुरज बाबू आ लखन जीक (डाॅक्टर लक्ष्मण झा) आवाजाही बेसी रहलनि, जइसँ अधिकांश गाममे स्थानीय नेतृत्व सेहो उभरल, अंचल स्तरपर सेहो उभरल। मधेपुर ब्लौकक उत्तरी छोरपर बेरमा पंचायत अछि जे झंझारपुर आ फुलपराससँ लागल अछि। जहिना उत्तरी छोरपर बेरमा पंचायत अछि तहिना पूर्बी छोरपर मैटरस पंचायत अछि। मैटरस पंचायतक जानल-मानल परिवार रामावतार राउतक छलनि। सम्पतिशाली रहथि मुदा कोसीमे गामे तहस-नहस भऽ गेल। कोसीक पछबरिया बान्हक भीतर पंचायत पड़ैत अछि। गामे होइत धार सेहो बहै छै। १९४७ ई.क आजादीक पछाति क्षेत्रक जे सम्पतिशाली लोक सभ छलाह वएह सभ गामक मुखियो आ मुँह-पुरुखो छलाह। वर्गीय आधारपर राजनीतिक पार्टी (कांग्रेस) ठाढ़ छल। तँए जत्ते गुदगर लोक छलाह, सबहक भितरिया संबंध सेहो छलनि। भितरिया संबंधक माने ई जे हुनका सबहक बीच जातीय बंधन कमजोर छलनि। ऐठाम एकटा विचारणीय प्रश्न अछि जे हुनका सभकेँ अपनामे माने एक-दोसर परिवारक बीच लेन-देन, खान-पीन, मदति-सहायता सभ किछु छलनि मुदा जातिक बीच राजनीतिक विभाजन सेहो पनपि गेल छल, जेकर बल राजनीतिक पार्टी सभकेँ भेटैत छल। लत्ती जकाँ ओ परिवार माने सुभ्यस्त परिवार सभ सजल छलाह। बेरमाक रामावतार राउत जे तहिया मैट्रीक पास नव युवक छलाह, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टीक वफादार कार्यकर्त्ता रहथि। भा.क.पा.मे एक टर्म (तीन वर्ष) जिला परिषद सेहो रहलाह। जहिना कपिलेश्वर राउत तीन भाँइ, कपिलेश्वर, जागेश्वर आ लखन राउत तहिना रामावतार राउत सेहो तीन भाँइ, सीताराम, रामावतार आ राम प्रसाद राउत। दू भाँइ रामावतारक बिआह मैटरसे भेल। ओना बरइ जाति सभ गाममे नहिये अछि मुदा किछु गाम सघन आबादीबला तँ अछिये। जेहने सघन आबादीबला गाम मैटरस तेहने बेरमाे अछि, सए घरक लगभग अखनो अछि। मुदा दुनू गामक बीच एकटा दूरी सेहो अछि। जहिना मैटरसमे एक परिवारक वर्चस्व, जइसँ सामंती सूत्र अधिक मजगूत, मुदा बेरमामे से नै अछि। कम आँट-पेटक (निम्न-मध्यम) परिवार सभ, तँए विचारोमे दूरी अछिये। तहूमे कम्युनिस्ट पार्टी कोनो-ने-कोनो रूपमे १९६२ ई.सँ रहल। ओना ओइसँ पूर्वेसँ केस-फौदारी गाममे पकड़ि लेने छल। मालिक सभ (जमीन्दार) सँ लड़ाइ चलि रहल छल। चाहे ओ बलदेव बाबू (बलदेव झा, सरिसव पाही) होथि आकि लक्ष्मीकान्त, रमाकान्त साहु, झंझारपुर होथि। आन्दोलनक रूपमे तँ नै मुदा व्यक्तिगत रूपमे तँ छलैहे, जइसँ किछु बजनिहार तँ छलाहे। राजनीतिक आधारपर १९६२ ई.सँ मुकदमा उठल जे किछुए दिनक पछाति मरि गेल। सभकेँ (पार्टीबला) अगिलगी केसमे फँसा सजा करबा देलकनि। मैटरसक मुखिया रामावतार राउत बेरमाक रामावतार राउतपर आक्रमण केलक। आक्रमण ई भेल जे दुनू भाँइ सीताराम राउत आ रामावतार राउतक बिआह मैटरसे भेल। सीताराम राउतक ससुर साधारणे परिवारक आ रामावतार राउतक ससुर (बेटाक अभावमे) बबाजिये। दुनू गोटेकेँ मैटरसक रामावतार सामंती चाप दऽ कऽ दुनूकेँ बेटी आपस अनैले कहलखिन। दुनू मजबूर भऽ गेलाह। रामावतारक ससुर तँ कहि देलखिन जे तोरा सबहक गाम छिअह, जे मन-फुरह से करह, हम जाइ छिअ। घुमन्तू बबाजी भऽ गेलाह। अपन दल-बलक संग रामावतार राउत बेरमा एलाह। बेरमाक प्रमुख अपन दल-बलक संग तैयारे रहथिन। जातिक बीच विभाजनक मजगूत बान्ह (खेनाइ-पिनाइ बन्न) पड़िये गेल रहै। विषम स्थिति बनि गेल। विषम ई जे जाति-सम्प्रदाय एते सक्कत बनल छल जेकरा तोड़ब धिया-पुताक खेल नै। जँ रोकल जाए तँ केना? जखने लड़ाइ उठत आकि जातिक मुद्दा बनि जाएत। घटनाक समए करीब बारह बजे रामावतार राउत बेरमा पहुँचल। विन्घ्यनाथ ठाकुर पहिनेसँ मुसताइज। टोलबैये (गामक बड़ै टोल) अगिला वाहन, बेरमाक रामावतार राउतक घरक चारूकात मर्द-औरत थहाथही करैत। रामावतारक पिता सुबध राउत दुनू परानीक संग तीनू बेटाक बीच दरबज्जापर बैसि नौताएल छागर जकाँ मरैले पुस्तैनी घराड़ीपर पीठ अोरि देने रहथि। एक-दोसरक सभ मुँह तकैत, मन कहैत माए तूँ कते काल, बाबू तूँ कते काल, बेटा तूँ कते काल, बौआ तँू कते काल। दुनू दियादिनी (रामावतारक पत्नीयो आ भौजाइयो) भनसा घरक ओसारक खूटा लगा बैसि कनैत रहथि। दुनू दियादिनीकेँ कहल गेलनि- “अपना गहना-गुरिया जे अछि से लऽ लिअ।” मुदा दुनू दियादिनी किछु नै बजलीह। दुनूक बाँहि पकड़ि टोलक स्त्रीगण आंगनसँ निकालि अरियाइत कऽ सीमा टपा देलनि। ऐ संग दोसर घटना-रामावतारकेँ करीब चारि बीघा जमीन छलनि, जइमे जमीन्दारीक घुरछीक चलैत अस्सी प्रतिशत जमीनपर मुकदमा ठाढ़ कएल गेल। कोर्टक सभ बेवस्थाक भार आने-आन लऽ लेलखिन। मुदा जमीनक सबूतो होइ छै आ दखलो होइ छै। दखलबलाकेँ एते लाभ होइ छै जे उपजबैक मौका भेटै छै। सबूतक विवाद कोर्टमे उठल। मुदा समाजक तागत मजगूत। तँए दखल रामावतारेक रहल। पछाति सबूतो कोर्टसँ भइये गेल। करीब देढ़-दू बर्खक पछाति रामावतार राउत (मैटरसबला) समझौता केलनि। समझौताक मुख्य कारक भेल जे सुबध राउत डटि गेलाह जे पहिने ओ अपना बेटीक बिआह करए तखन देखा देबै, देखा देबैक अर्थ भेल जे जाति तोड़ि आन जातिमे कुटुमैती शुरू कऽ देब। होतसँ होतांग होइत देखि सभ सहमलाह। तेकर एकटा कारण ईहो भेल जे कते दिन लाठी उठि चुकल छल। शक्ति परीक्षण भऽ चुकल छल। मुदा असल परीक्षण भेल जइ दिन इन्दिरा गाँधी शहीद भेलीह ऐ घटनाक पछाति। समझौताक पछाति दुनू लड़की आपस तँ एलीह मुदा मानसिक रोगसँ पीड़ित भऽ गेलीह। एक सन्तानक पछाति जेठकी, सीतारामक पत्नी आ दू सन्तानक पछाति मझिली (रामावतारक पत्नी), मरि गेलखिन। दुनू बहिनियेँ। पछाति दुनू भाँइक बिआह भेल जे परिवार अखन चलि रहल अछि। दुर्गा पूजासँ होइत कपिलेश्वरक घटनामे बिदेसर ठाकुरक नीक योगदान रहल। बोनिहार परिवार रहितो बिदेसर ठाकुरकेँ बात पकड़ैक ढंग आ दोसरकेँ बुझै-बुझबैक ढंग नीक छलै। परिवार बड़ नमहर नै मुदा छोटो नै। संयुक्त परिवार टुटैक पैघ कारण गरीबी सेहो होइत अछि। समाजमे एहेन परिवारक कमी नै जे कहता- “ई सएओ घरक टोल फल्लेँक वंश छिअनि।” मुदा अखन तते केसा-केसी भऽ गेल अछि जे सम्पति तँ गेबे केलनि जे एक्कोटा-समांगो एहेन नै बँचलाह जे जहल जा खनदानक मर्यादा नै तोड़लनि। तीन पीढ़ी ऊपरसँ बिदेसर ठाकुरक एक पुरखियाह परिवार तँए पुस्तैनी खेतो आ जजमनिकोमे काट-खोंट नै भेल, पोता धरि सेहो सएह भेल अछि। एकटा बेटा आ चारिटा बेटी बिदेसर ठाकुरकेँ। अपन आठ कट्ठा खेत, जइमे तीन कट्ठा धनहर, डेढ़-दू कट्ठा घराड़ी-महार बड़की पोखरिक ढिमका, बाकी गाछी-विरछी। दस कट्ठा बटाइयो धनहर करैत। गामक जजमनिकामे करीब चौथाइ गाम। जेकर कमाइलक (साली) तरीका सेहो रंग-रंगक। मुदा ओहन गिरहस्त (दाढ़ी-केश कटबैबला) बेसी जे समैपर अगहनमे कमाइल दऽ दइ छथिन। दाढ़ी-केश मिला कऽ एक पूर्ण आदमीक कमाइल एक धारा माने १२ सेर कच्ची, जे करीब सात किलोक लगभग होइए आ आधा कमाइल एकटा केशक होइए। अही जिनगीमे चारू बेटियो-जमाए, नाइतो-नातिन देखलनि, तहिना बेटो-पुतोहु आ पोतो-पोती देखलनि। बिदेसर ठाकुर संग एक बेर जगदीश प्रसाद मण्डल मधुबनीक चकिया जहलमे रहथि आरो करीब दस आदमी। बिदेसर ठाकुर कातमे जा कऽ गाँजा पीबैत रहथि। थानाक जमेदार देख लेलक। पकड़ने आबि डंडा-बेड़ी कऽ देलकनि। एहेन परिस्थितिमे की कएल जाए। खएर जे होउ, पछिमी मधुबनीक एकटा साथी सेहो रहथिन, मुँहगर-कन्हगर। रातिमे खेला-पीला पछाति सांस्कृतिक कार्यक्रम एक-डेढ़ घंटा करै छला। डंडा-बेड़ी नेने बिदेसर ठाकुर सेहो अपने बनाओल गीत- “हमरा सन के अछि बुरिबलेल/ बाले-बच्चे महींस पोसलौं/ प्रमुख-नथुनी सिंह दरोगा खुटापर आबि खोलि लेल। हमरा सन...? जखने जेलक अन्दर एलौं/ पीपरक गाछ तर गांजा लटेलौं/ जेलर आबि डंडा-बेरी ठोकि देल/ हमरा सन...? घामे-पसिने खेती केलौं/ तुलसी-फूल ओ कनकजीर/ खोहे तरसँ सरुप सिंह डेढ़ियामे तोल लेल/ हमरा सन...?, विद्यापतिकेँ पहिनहिये छीनि लेल/ हमरा सन...?” गाबि अपन वृतान्त सुनौलनि। पछमी मधुबनीबला साथी काफी प्रभावित भेला। अपना लग बजा अपनो जिनगीक बात आ बिदेश्वरो ठाकुरक बात सुनौलकनि/सुनलनि। भिनसरे जमेदारकेँ कहि डंडा-बेड़ी हटबैत कवि घोषित कऽ देलकनि। जेलक स्टाफ सभ कवि जी कहए लगलनि। मुदा जहलक भीतरेमे, बाहर नै। मनचोभिया नाचक नीक कलाकारमे बिदेसर ठाकुर। अपन एहेन गुण जे फिल्मो गीत आ सामाजिक गीतमे दू-चारि-पाँति ओही तर्जपर गाबि लै छलाह। मृत्यु दुखद भेलनि। आम तोड़ै काल गाछपरसँ खसि पड़लाह जइमे डाँड़क हड्डी थकुचा गेलनि। ओना इलाज-बात जरूर भेलनि मुदा कोनो कि गट्टा टुटब आकि घुट्ठी टुटब छी जे बड़बढ़िया-बड़ बेश? मुदा साल भरि ओछाइन धेला पछाति उठि कऽ ठाढ़ भेलाह। चौकपर सैलून शुरू केलनि। जइसँ पनरह-बीसक नगदो आ जजमनिको काज सम्हारए लगलाह। सुति कऽ जगदीश प्रसाद मण्डल उठले रहथि कि सुनलनि, बिदेसर ठाकुर मरि गेला। साँझमे गप-सप भेले रहनि। तँए बिसवासे ने होनि, मुदा एहेन गप झूठो तँ नहिये होइत अछि। किअए तँ गारिओक सीमा जीविते धरिक अछि, मृत्यु तँ सराप छी। बिदेसर ठाकुरक घटना देखि जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ सजल-धजल सामंत आँखिक परदापर नाचए लगै छनि। किछु परिवार (जाति-विशेष नै सम्पदा विशेष) केँ छोड़ि अधिकांश परिवार अपन जिनगीक अनुसार काज-उदेम करिते छनि, बिदेसर ठाकुरक पत्नी महींसिक पर्ड़ू कीनि बहनतू महींस बनौलनि। नीक पोस एकटा बड़द सेहो। थानाक दारोगा सिपाही-चौकीदारक संग, नथुनी सिंह अपन लठैतक संग आ विन्ध्यनाथ ठाकुर अपन दूत-भूतक संग बिदेसर ठाकुर ऐठाम पहुँचल। रस्ता कातमे घर, थहाथही लोक करैत। तीनू गोटे नथुनी सिंह, विन्ध्यनाथ ठाकुर आ दरोगा कनफुसकी कऽ महींस खोलि लेलकनि! खोलला पछाति की हुअए। कोनो कि घुमा कऽ देब अछि आकि अपन बनाएब अछि। दरोगाजी कि कहि लऽ जेताह? केतबो ढील कानून छै तैयो तँ कोर्टकेँ कागज चाहबे करी। विन्घ्यनाथ ठाकुरकेँ दमे नै अँटलनि। दुत-भूत मुड़ी डोला देलकनि। लंठोक शक्तिमे जातिक विभाजन रहल अछि। होइत-हबाइत महींस नथुनी सिंह अपना ऐठाम लऽ गेलाह। सभतूर बिदेसर ठाकुर गाममे घूमि-घूमि गौआँकेँ कहलकनि। मुदा एक लोर कानैक सिबा दोसर उपाइये की अछि। जखन बिदेसर ठाकुर सबहक (करीब दस-बारह आदमी) बीच पहुँचलाह तखन जान दइले तैयार। लड़ाइयोक उत्साह होइ छै, जँ से नै तँ मनोरंजनक लेल लोक किअए जान गमबैए। किछु गोटे एहने, तँए एक रंगक विचार उठल। एक पंचायतक समस्या दोसर पंचायत पहुँचि गेल तँए एक पंचायतक नै दू पंचायतक समस्या बनि गेल। मुदा मूल तँ ओतए अछि जे एकटा महींसक खातिर मनुष्यक जिनगी जाए। महींसक तँ बोन लगा सकैए मनुष्य, मुदा हजारो महींसिक बोन बुते एकटा मनुख ठाढ़ कएल हएत? तत्-काल वातावरणमे नरमी आएल। मुदा जहिना हरदी जड़िमे जहर सेहो फड़ैए, किएक तँ हरदी कहै छै हम बिखकट्टा छिऔ। तहिना किछु दिनक पछाति बिदेसर ठाकुर सभकेँ बैसा बाजल- “जते लोक महींस खोललक ओइमे बेसी हमरे जजमान अछि, ओकरा सभकेँ केश-दाढ़ी काटब छोड़ि देबै। हमर कमाइ जाएत, ओकरा बत्तू बना टहलेबै। मुदा कमाइयो केना जाएत? कमेबे ने करबै तँ कमाइ कथीक लेबै।” प्रश्न उठैत अछि जदी कियो अपन समस्याक समाधानक लेल ठाढ़ हुअए तँ कि कएल जाए? सबहक बीचेमे बिदेसर ठाकुर संकल्प लऽ लेलनि जे केश नै कटबै। केश नै कटैक बात जना अकासमे उड़िया गेलै; बलजोरी करैक दम किनको नै अँटलनि। इलाकाक स्थिति भिन्न-भिन्न तरहक, तँए भिन्न-भिन्न तरहक लड़ाइयो। जमीनक लड़ाइमे नागेन्द्रजी (डॉ. नागेन्द्र झा, पैटघाट) केँ थानामे टांगि सैयो लाठीसँ देह चूरि देने रहनि, जइसँ जिनगी भरि हाथ-पएर टेढ़े रहलनि। कामेसर राम (फुलपरास) पच्चीस-तीस गोटेक संग तीन सालसँ जहलमे, जे सभ मडर केसमे फँसल। तहिना राम प्रसाद सहनी (पचही) केँ ट्रकमे उनटा बान्हि रोडपर घिसिऔने रहनि। अखन धरि जे कोनो मुकदमा भेल छल ओकर कोनो जबाब मुकदमासँ नै देल गेल छल, जे महींसक घटनासँ शुरू भेल। तीनू गोरे दरोगा, नथुनी सिंह आ विन्ध्यनाथ ठाकुरपर मुकदमा कएल गेल। ओना दर्जनो केश भऽ चुकल छल। थानाक एक पक्षीय बेवहार देखि सभ िनर्णए कऽ लेलनि जे ने थाना केस करए जेता आ ने कोनो केसक संबंधमे कहए जेता। जे हेतै से कोर्टेसँ हेतै। महींसक बरामदगी हाई कोर्टसँ भेल। वीरेन्द्र जी (माननीय न्यायमूर्ति, उच्च न्यायालय-पटना) काज केने रहथिन। बिदेसर ठाकुरक केशकट्टी झंझटक पंचैतीमे प्रमुख जीक पंच बौकू ठाकुर (नौए) भेला। बिदेसर ठाकुर अपन पंच अपने हेताह, दसटा समाज सुनिनिहार हेताह, प्रमुखोजी अपन सुनिनिहार रखथि, मुदा बजता दुनू पंचेटा, निर्णय भेल। पनचैतीक अजीव आकर्षण, आकर्षणक कारण भेल जे कते-बेर बिदेसर ठाकुर असगरोमे पटका-पटकी कऽ लै छला। तइमे बिदेसर बदनाम भऽ गेल छला। पनचैतीक दोसर आकर्षण छल बौकू ठाकुरक भाषा। “जिनगीक पहिल दिन एहेन भाषासँ भेँट भेल।“, जगदीश प्रसाद मण्डल मोन पाड़ै छथि। एक तँ आलंकारिक शैली, तइ बीच एक पाँति प्रमुख जीक पक्ष आ बिदेसर ठाकुरक विपक्षमे बाजि जाथि तँ दोसर पाँति बिदेसरक पक्षमे प्रमुख जीक विपक्ष बाजि जाथि। सुनिनिहार सभ भाषेक (शब्द-जाल) जालमे ओझरा जाथि। बिदेसरो ठाकुरक समाज आ प्रमुखो जीक समाज बौकू ठाकुरक भाषेमे ओझरा जाथि। पनचैती कि हएत जे घौंघाउजे भऽ जाए। पक्ष-विपक्षक बीच जाधरि समदर्शी बनि सोलह (सोरह) आनापर कील नै गड़त ताधरि ओकर सोर पताल दिस केना जाएत? जाधरि सोरसँ सिर बनि धरतीसँ अकास दिस नै उठत ताधरि सोर पाबि-पाबि सोरहा केना हएत। कते बेर पर-पनचैती बैसल मुदा ने समझौता टुटल आ ने झंझट फड़िआएल। तइ बीच एहेन भेल जे सभ दियाद बिदेसरो ठाकुर अपना समाज (नौआ समाज) मे बैसि फेरसँ गिरहस्तक बँटबारा कऽ लेलनि। मुदा पनचैती पछुआएले रहल। बिनु डायरीक जिनगीमे तारीक-मड़कुमा घटना होइत अछि दिन-महीना नै। तइ बीच लौकहीमे जिला-सम्मेलन भेल। लौकही हाइ स्कूलपर सम्मेलनक आयोजन भेल रहै, लौकहा स्टेशनसँ सवारीक अभावमे किछु गोटे छोड़ि जगदीश प्रसाद मण्डल सभ पएरे गेल रहथि। सवारी अभावक कारण सड़क रहनि। एकटा जीप, तइमे के सभ जेताह। ऑफिसक कागजातक संग जिला कार्यालय। तइ संग भोगेन्द्र जीक चारि दिनक सम्मेलन भेलनि। नीक जुटान भेल छल। जिला भरिक संगी, जिला भरिक चालि-ढालिक संग जुटान। सम्मेलनक दोसर दिन दुनू गोटे प्रतिनिधि, माने जगदीश प्रसाद मण्डल आ रामावतार संगे भोगेन्द्रजी सँ भेँट केलनि, ओ एकटा छोटे कोठरीमे असगरे सिमटियेपर बिछान बिछा चरिहत्थी गमछा ओढ़ने जगले पड़ल रहथि। दुनू गोटेकेँ पहुँचिते उठि कऽ बैसि पुछि देलखिन- “की हाल-चाल गामघरक अछि?” भोगेन्द्रजीमे जबरदस गुण रहनि जे कोनो बातकेँ जड़िसँ पकड़ैत छलखिन। कपिलेश्वर ऐठामक सराधबला घटना भऽ चुकल छल, एक-हरफीमे रामावतार सुना देलकनि। मुदा हालेमे अपनो ओही काजसँ गुजरल रहथि, केस कटौले रहनि। काेनो तरहेँ समाज छानि-बान्हि कऽ पार लगाैलकनि, तइसँ गुजरले रहथि। बिटिया-बिटिया सभ सवाल उठौलखिन। सविस्तार घटनाक चर्च रामावतार कऽ देलखिन, गुम भऽ गेलाह। किछु समए पछाति गुम्मी तोड़ि अपनो घटनाक चर्च केलनि। रामावतार नवका पुरहित भेले रहथि, तँए भोगेन्द्रजी मानि जाथिन। पुन: दोहरबैत रामावतार पुछलखिन- “कॉमरेड, हमरा ऐठामक केहेन भेल?” भोगेन्द्रजी जबाब देलखिन- “जहिना सोझे नाक छुअब होइए आ घुमा कऽ छुअब सेहो होइए, तहिना सूदखोरी, महाजनी सोझे छुअब भेल बाँकी जे भेल से घुमा कऽ छुअब भेल। तँए एकरा सामाजिक आर्थिक रूपमे देखियौ। समाजक भीतर आर्थिक ढाँचा एहेन ठाढ़ अछि जेकर समीकरण जरूरी भऽ गेल अछि। मुदा से के करत?” कहि चुप भऽ गेलाह। तही बीच पूर्व विधायक लाल बिहारी आबि गेलाह। सम्मेलनक काज बूझि दुनू गोटे बहरा गेला। जगदीश प्रसाद मण्डल मधेपुर जिला सम्मेलनक पछाति जिला नेतृत्वमे एला आ क्षेत्रमे समए देब शुरू केलनि। गामे-गाम ओझराएल, अपन-अपन मुद्दा अपन-अपन लड़ाइ। कतौ माछक कारोबार तँ कतौ मुँह-पुरखीक। जमीनक छुतियो ने कतौ, तहिना महाजनियोक। जिला सम्मेलनक कार्यक्रममे जे मुद्दा छै तइसँ भिन्न लड़ाइ छै। लक्ष्मीकान्त-रमाकान्त साहुक जमीनपर बटाइदारी शुरू भेल। अपनो बुझै छथि आ बेरमाक लोक सेहो बुझैत अछि जे अपने खेती करै छलाह आकि बटेदार करैत छल। बटाइदारी शुरू होइते एकटा मुर्दघट्टी परतीपर आठ-दसटा सरधुआ पोखरिक घर जकाँ घर ठाढ़ कऽ जखन जगदीश प्रसाद मण्डल सभ खेत दिस बढ़ला आकि अपना-अपना घरमे आगि लगा, अट्ठाइस गोटेकेँ अगिलग्गी केसमे फँसा देलकनि। आठ-दसटा घर बनबैक कारण छलै केसकेँ सीरियस बनबैले, मुद्दै-गबाह हएत। तइ बीच एकटा घटना घटल। किसुन देव मण्डल चाहक दोकान करैत छलाह। ओहो पार्टीक जुझारू कार्यकर्त्ता। जगदीश प्रसाद मण्डल सबहक बैसारक अड्डा सेहो छलनि। जगदीश प्रसाद मण्डल सभ चारि-पाँच गोटे रहथि। पचाससँ ऊपर सदाए (मुसहर) सभ कोदारि-सहत लेने आबि चाहक दोकानक आगूमे यत्र-कुत्र बाजए लगला। ठाढ़ भऽ कऽ जगदीश प्रसाद मण्डल सभ जबाब दिअए लगलखिन। सदाय सबहक हाथमे हथियार, तइपर ताड़ी-दारू पीने, दोसराक कहलमे। तइ बीच गाम दिस हल्ला भऽ गेलै जे किसुनदेव ऐठाम हसेरा-हसेरी भऽ गेलै। जे जत्तै रहए से तत्तैसँ लाठी नेने दौगल। टोल आ दोकानक बीचेमे मारि फँसि गेल। जबरदस मारि भेल। कते गोटेकेँ कान-कपार फुटल। केस-फौदारी आ जहलक भय समाप्त भऽ गेल छलै। एकतीस दिनक भीतर अट्ठाइसो मुदालहक जमानत भऽ गेलै। जमानतक पछाति जमीनक दखल दिहानी शुरू भेलै। गड़बड़ भऽ गेल रहै जे, जे असल बटेदार रहै ओ केस नै केलक आ जे बटेदार नै रहै ओ केस केलक। स्पष्ट रूपमे गाम दू भागमे बँटा गेल रहै। ओना ऊपरसँ दुइये पार्टी बूझि पड़ै मुदा चोरनुकबा माने भीतरे-भीतर तेसरो पार्टी बनि गेल रहै। तेसर ई रहै जे खूलि कऽ सोझामे नै आबै मुदा दिन-राति कनफुसकी पाछू लागल रहै। पहिलुके धक्कामे जमीनदार बूझि गेल जे जमीन जेबे करत, बनियाँ रहबे करए, तरे-तर जमीन बेचब शुरू केलक। ओना जमीनसँ सम्बन्धित किछु पुरनो कानून छलै, किछु नवको बनल जेना हदबंदी, आ किछु नहियो छलै। तीस-चालीस बर्ख पहिने बकास्तक लड़ाइ भऽ चुकल छल। ओना बकास्तक लड़ाइ असानीसँ सम्पन्न भेल रहै। लोकोक बीच अधिकारक महत छल। किछु गोटे व्यक्तिगत रूपमे केस लड़ि बिनु अधिकारक सेहो जमीन दखल कऽ लेने छला। जमीनक बीच कानूनी ओझरी नीक जकाँ नै मुदा लागि जरूर गेल छल। १९३५ ई.सँ पूर्व जे अंग्रेज विरोधी आजादीक दिशा छल ओइमे धक्का लागल। वामपंथी विचार अपन पहचान बना नेने छल। १९२५ ई.मे कम्युनिस्ट पार्टी सेहो बनि गेल छल। सुभाष बाबू सेहो अपन दृष्टिकोण रखलनि। जमीनक ओझरी ई भेल जे बटाइदारी कानून पछुलका सर्वेमे सिकमी बटाइ कऽ कऽ खतियान बनि चुकल छल। भूदानी आन्दोलन सेहो उठिये चुकल छल। बटाइदारीक संग हदबंदी (अर्थात् बीस बीघासँ ऊपर बलाक जमीन लऽ लेल जेतै।) कानून सेहो बनि चुकल छल। तहूमे पछिमी मधुबनी जिलामे बटाइदारी लड़ाइ धुर-झाड़ चलैत रहए। ओना िसर्फ जमीनदारे नै, बेसियो जमीनबला आ ओकर जे लगुआ-भगुआ रहै ओहो आ किछु राजनीतिक दल सेहो जाति-सम्प्रदायक नामपर राजनीतिक पार्टी ठाढ़ कऽ नेने छल। एक तँ गरीबक बीच सामंती संस्कार धकेल कऽ निच्चा खसौने रहै, दोसर कम्युनिस्ट पार्टीकेँ समाजक भीतर जाति-धर्म विरोधी कहि घृणाक पात्र बनौने रहै, जइसँ दरबज्जापर पहुँचलापर विचित्र स्थति पैदा होइत छल। मधुबनी-दरभंगा जिलाक सौभाग्य रहल जे, जे जाति समाजक नियामक रहलाह ओही जातिक नेतृत्वमे कम्युनिस्ट पार्टी बनल रहए, कम्युनिस्ट पार्टीक भीतर ब्राह्मण नेतृत्व अधिक छल। ओना सभ जातिक बीच कम्युनिस्ट पार्टीक पहुँच रहल। खास कए कऽ खजौली आरक्षित भेने अनिवार्यो भऽ गेल रहै। १९५५ ई.क पूर्व बिहारक राजनीतिमे जातिक प्रभाव नगण्य छल मुदा जोर पकड़ए लागल। जइसँ वर्गीय स्वरूप नै पनपि जातीय स्वरूप पनपि गेल। जाति-जातिक विभाजन भऽ गेल। मुदा आजादीक फल एते तँ भइये गेल छल जे सभकेँ भोटक अधिकार भेट गेल छलै। सरकारक बीच कुर्सी पटका-पटकी १९६२ ई.सँ शुरू भऽ गेल छल। एम.एल.ए, एम.पी.क बदला-बदली हुअए लागल। आमजन ठकाइत रहलाह। ठकाइत-ठकाइत एते ठका गेलाह जे गामक बीस बीघा जमीनबलाकेँ बेटी बिआहमे जमीन बेचए पड़ए लगलनि! क्षेत्रक विकास मात्र रूकबे ने कएल अपितु पाछू मुँहेँ ससरए लागल। पछिमी कोसी नहर, मैथिली भाषा, जमीनक सवाल कम्युनिस्ट पार्टीक मुख्य मुद्दा सभ दिन रहल। एक दिस कोसी नहर हुअए तेकर आन्दोलन! तँ दोसर दिस नै हुअए तेकर आन्दोलन! भूदानी आन्दोलन अपन स्वरूप बिगाड़ि पाइक अड्डा बनि गेल, जइसँ मामिला आरो ओझरा गेल। ओझरा ई गेल जे एक-एक जमीनकेँ तीन-तीन गोटेकेँ पर्चा भेटल। जइसँ जमीनबलाक झगड़ा जमीन लेनिहारोक बीच फँसि गेल। प्रशासनक स्थिति ओहने छल जे एकछाहा बूझि पड़ै। बेरमाक जे कम्युनिस्ट विरोधी रहथि, नमहर साँस छोड़लनि। जहिना अड़ना पाड़ा मुइने नढ़िया सभ साँझू पहरकेँ ढोल बजा-बजा नचैए तहिना साँस छोड़ि नाचए लगलाह। लूटा-लुटी जोर पकड़लक। गाममे खेतक जजातक (तरकारी, अन्न, फल) चोरि बढ़ल। ओना तइसँ पूर्व चोरिसँ गाम एते आक्रान्त रहैत छल जे जबरदस समस्या रहै, मुदा संक्षेपमे एक गोटेकेँ गाछमे टाँगि आ दोसर गोटेकेँ सामूहिक मारि जखन पड़ल तहियेसँ चोरिमे कमी आएल। ओना चोरिक रंग-रूप बदलने चोरक कमी नै भेल मुदा रंग-रूप बदलने लोक ठकेबे करत। चाहे पितरिया सोना होइ आकि एकक तीन। जमीनक लड़ाइ उठने जे जत्तै रहए से ततैसँ बन्सी पाथि देलक। झंझारपुरक लक्ष्मीकान्त रामाकन्त दुनू भाँइ छथि। एक भाँइक हिस्सा कृष्ण चन्द्र झा (कैलू मास्टर) लेलनि दोसर हिस्सा बैजनाथ मण्डल लेलनि। कम्युनिस्ट पार्टी महादेवसँ बटाइदारी केस करबौने छल। जगदीश प्रसाद मण्डल सभ अट्ठाइसो मुदालहक संग अट्ठाइसटा गबाह लऽ कऽ जमानत करबए एक दिन पहिने गेला। कियो-कियो साइकिलसँ जाइ छल, सेहो राखि देलक जे जँ भीतर जाए पड़त तँ साइकिल जपाल भऽ जाएत। जँ थाना गेल तँ पेशेवर मनुक्खक गति हेबे करतै। पहिले दिन, गामसँ निकलला पछाति बैजनाथ मण्डल हल्ला उठौलक, एकटा लिफाफ नेने चिट्ठी गाममे देखौलक जे कैलू मास्टरक बेटा हमरा माए-बहिनकेँ गािर लिख कऽ पठा देलक हेँ। ओना अखनो धरि चिट्ठी देखैक मौका जगदीश प्रसाद मण्डल केँ नै भेटलनि। ओना दुनू गोटेक भीतरिया इच्छा जे सोलहो आना हुअए। एक गोटे जबुरिया करबैक फिराकमे दोसर गोटे बलजोरी कब्जा करैक फेरमे। महादेव मण्डलक बटाइकेँ जगदीश प्रसाद मण्डल सभ रोकि देलनि। रोकैक कारण बैजनाथ मण्डलक जेठ भाय महादेव मण्डल। ओही परिवारक लेल ने जे कीनिये लेलक। अगिलग्गी केसक जमानत करा गाम पहुँचिते किछु गोटे बाजल जे कैलू मास्टरक बेटाकेँ बैजनाथ मारबो केलक आ पकड़ि कऽ दरबज्जापर रखनौं अछि। किछुए काल पछाति कैलू मास्टर सहाएबक बहिन जे जीविते छथि, डाँड़क ऑपरेशन भेल छन्हि, तइसँ जँ ब्रेन प्रभावित भऽ गेल तेकर तँ नै मुदा जँ नीक होन्हि तँ मुखौतरी भऽ जाए, आबि कहलनि जे बैजनाथ हमरा भातिजकेँ मारबो केलक आ पकड़ि कऽ रखने अछि से कहक छोड़ि दइले। जगदीश प्रसाद मण्डल गेला, कहलनि, ओ छोड़ि देलकै। ओ घटना ३०७ क रूपमे उठल। कैलू मास्टर तीनू भाँइ महादेवकेँ आ जगदीश प्रसाद मण्डल, रामावतार राउत आ सत नारायण राउतकेँ मुदालह कऽ देलनि, ओइ केसमे सजा भेलनि जे हाइकोटसँ फड़िआएल। वीरेन्द्रे जी (माननीय न्यायमूर्ति, पटना हाई कोर्टमे छथि।) काज केने रहथि। कैलू मास्टर सहाएबक घटनाक प्रभाव सभसँ बेसी दुर्गा स्थानपर पड़लनि। शुरूक बैचमे कैलूओ मास्टर सहाएब, रामावतारो आ जगदीश प्रसाद मण्डल संगे-संगे चंदा करए जाथि; दुर्गा स्थानक बेवस्था करथि। भलहिं ओ अपना भगवतीकेँ कहथिन जे दुश्मनकेँ सांगि करियह आ जगदीश प्रसाद मण्डल अपना भगवतीकेँ वएह बात कहथिन। पनरह बर्खक पछाति ओहो (कैलू मास्टर सहाएब) आ जगदीश प्रसाद मण्डल आ रामावतार अगिला पीढ़ीकेँ सुमझा देलखिन। लक्ष्मीकान्तबला जमीनक चौथाइसँ अधिया दाममे निकलि गेलनि, किछु इम्हरो-आम्हरो भेल, लूटमे चरखा नफा। एक गोटे रजिस्ट्री आॅफिसमे मुंशीयागरी करै छला, हदवंदीक नकल लऽ नेने रहथि। बिक्रीक सुनि-गुनि पबिते िवरोध कऽ दैथि आ तरेतर झाड़ि लैथि। गामक जमीन गौआँक हाथ आएल। केस-मुकदमा सोलह कऽ समाप्त भेल। लक्ष्मीकान्त साहुक जमीनक लड़ाइक पश्चात आन्दोलनक रूपमे ने जमीन्दार छलाह आ ने लड़ाइ उठल। आन-आन जमीन्दार जमीन बेचि कऽ पहिनहियेँ चलि गेल छला, खाली लक्ष्मियेकान्त-रमाकान्त बँचल रहि गेल छला। सेहो भइये गेल। भूदानी आन्दोलन- बेरमामे भूदानी आन्दोलन तेनाहे जकाँ भेल। कारण जे जइ समए भूदानक जमीन देल गेल ओइ समए बेरमामे तेहेन जमीनबला नहिये छला। एकटा परिवार छल, ओ छल गठरी झाक परिवार। गठरी झाकेँ पण्डिताइमे लाखे राज-ब्रह्मोत्तर कऽ कऽ जमीन भेटल रहनि मुदा ओ जमीन बेरमा गाममे नै गामसँ बाहर छलनि। मालिक-मलिकानक गाम बेरमा, जइसँ भूदानमे कम जमीन देल गेल। तहूमे बँटबारा होइसँ पूर्वे ओ सभ बेचि-बिकीन नेने छलाह। तइ संग ईहो भेल जे तेहेन-तेहेन कार्यकर्त्ताकेँ जमीनक सबूत आ बँटैक भार देल गेलनि जे ओ सभ आरो डुबा देलनि। एक-एक जमीनक सबूत तीन-तीन गोटेकेँ जिला कार्यालयमे भेट गेल। एक तँ ओहिना कमजोर आदमीकेँ उठबैक आन्दोलन छल, मुदा सबूतक ओझरी तेहेन ओझरी लगा देलक जे कोनो लाभ किनको नै भेलनि। जँ थोड़-थाड़ किछु भेबे केलनि तँ ओइसँ समस्याक समाधान थोड़े भऽ पबैत, भूदानी आन्दोलनसँ तँ तेहेन लाभ नहिये भेल मुदा बसैबला घराड़ीक जमीनक समस्या जरूर हल भऽ गेल। तेकर कारण भेल जे एक दिस आम जमीन, दोसर लक्ष्मीकान्त बला, तेसर एक गोटे (गंगाराम/भोला राम मण्डल) गंज परक छलाह हुनको छिना गेल। तइ संग अपनो छलनि आ किछु गोटे किनबो केलनि। लक्ष्मीकान्त, रमाकान्तक लड़ाइक बीचेमे एकटा दोसर झंझट ठाढ़ भऽ गेल। छोट-छीन मुद्दा नमहर बनि गेल। ओ एना भेल-सतदेव झा नामक एक गोटे बेरमामे। शुरूमे माने जुआनी अवस्थामे अपराधिक प्रवृत्तिक छलाह, जे चालीस बर्खसँ ऊपरक भेला तखन गाम छोड़ि कलकत्ता गेलाह। शुरूमे मोटिया सभ संग मोटियागिरी केलनि। किछु साल पछाति बैट्री (अमेरिकन कम्पनी, एवरेडी) फैक्टरीक चिमनीक काज भेलनि। विदेशी कम्पनी रहने नीक दरमाहा भेटलनि। वएह जखन रिटायर कऽ गाम एलाह तँ कम्युनिस्ट पार्टीक संग उलझि नमहर विवाद ठाढ़ कऽ देलनि। भेल ई जे सतदेव झाकेँ बेटा नै भेलनि। िसर्फ एकटा बेटिये टा भेल छलनि। गरीबीक चलैत बेटीक विआह बेसौह लड़काक संग केलनि। दू सन्तानक पछाति जमाए मरि गेलखिन। अपनो परिवार छोटे रहनि। दुनू नातियो आ बेटियोकेँ अपना ऐठाम-बेरमा लऽ अनलनि। अपनो सेवा िनवृत्ति भेला पछाति दुनू परानी कलकत्तासँ गाम आबि गेलाह। गाम आबि पाँच बीघा खेत कीनलनि। एकटा बोरिंग गरौलनि, एकटा दमकल लेलनि। बेवस्था ऐ ढंगसँ शुरू केलनि जे, जँ समुचित ढंगसँ चलाओल जाइत तँ, नीक किसान परिवार ठाढ़ होइत, से नै भेलनि। खेतक बेवस्थाक संग जोड़ा बरद लेलनि, घर बनौलनि। बहुत नीक तँ नै मुदा मजगूत घर जरूर बनौलनि। गौआँक मतभेदक एकटा कारण ईहो भेल जे अपन घराड़ी छोड़ि दोसर घराड़ी कीन दोसर ठाम घर बनौलनि। जे जमीन कीनि घर बनौलनि ओ जमीन बिका गेल छल। दोसर गोटे कीनने रहथि मुदा रजिस्ट्री नै भेल रहए। सतदेव झाकेँ रजिस्ट्री भेलनि, जमीन कब्जा भेलनि, घर बनौलनि। मुदा समाजक मनमे अाबिये गेलनि जे ई अनुचित भेल। पहिलुका कीनििनहार पाछू हटि गेलाह। कलकत्ता सन शहरमे जिनगी बितौनिहार सतदेव झा खेती नै कऽ पाबि सकलाह। दुनू नातियो बचहने रहनि। पैछला (कलकत्ताक) कमाइ सठि गेलनि। मुदा खाइ-पीबैक चसकीक संग जीवन-शैली सेहो खर्चीला बनिये गेल रहनि। खेत बेचब शुरू केलनि। जेठका नातिक बिआह सेहो करा लेलनि। आधासँ बेसी खेत जखन बिका गेलनि, तखन बेटियो आ दुनू नातियो झगड़ा करब शुरू केलकनि। सतदेव झाकेँ बेटियो आ नातियोसँ झगड़ा ऐ लेल शुरू भेलनि जे जखन अपना ऐठाम (बेटीक सासुर आ नातिक गाम) सँ चलि एलौं आ एतुको सभटा बेचिनहिये जाइ छथि तखन हमरा सभकेँ की हएत। अपने दुनू परानी बूढ़ छथि, दू-चारि सालमे मरि जेताह मुदा हम सभ कतए जाएब? उचित विचार रहितो पारिवारिक छल तँए दोसर हाथ नै बढ़बए चाहैत। मुदा बेटीक-नातिक झगड़ासँ सतदेव झाकेँ दूरी बनलनि आ विरोधी (कम्युनिस्ट विरोधी) सँ नजदीकी बनलनि। नाति (प्रमोद झा) सासुर गेल। सासुर रहिका ब्लौकक भोज-परोर। ओइ इलाकामे जमीनक लड़ाइ धुर-झाड़ चलैत। सासुर पहुँच प्रमोद ससुरकेँ सभ बात कहलखिन। संगे लागल ससुर बेरमा एलनि। प्रमोदक ससुर गांजा पीबै छलथि, अखनो छथिये। बेरमा आबि तीनि-चारि दिन रहलाह। गजेरीक पार्टी बना लेलनि। तइमे किछु कम्युनिस्टो पार्टीक। खूब नीक जकाँ खा-पीब भोजनो बनौलनि जे आइ सतदेव झा जतए भेटताह ततए पकड़ि औंठा निशान लऽ लेब। जगदीश प्रसाद मण्डल सबहक जानकारीमे नै रहनि। पान-सात गोटेक बीचक योजना रहै, सैह भेल। बाधमे पकड़ि पाँचो गोटे पटकि कऽ स्टाम्पपर निशान लऽ लेलकनि। विरोधी (कम्युनिस्ट विराधी) केँ मौका हाथ लगलनि। अपन-अपन चालि सभ चालि देलकनि। जगदीश प्रसाद मण्डल सभकेँ मुदालह बना केस कऽ देलकनि। थानासँ कहियो लाट-घाट नै रहलनि, थाना खुलि कऽ विरोधीक संग छल। जखने केस होइ छल तखने कोर्टमे हाजिर भऽ जमानत करा लइ छला। िसर्फ (३०७ दफा) एकटा केसमे एहेन भेल जे जाबे एकटा मुदालह हाजिरा करा जमा कराबथि तइ बीच जप्ती-कुर्कीक आदेश करा थाना घरमे जब्ती-कुर्की कऽ लेलकनि। घरक केबाड़ खोलि लेलकनि, दमकल सीज कऽ लेलकनि। केस भेलनि, जमानत करेलनि। पार्टीक आन्दोलनसँ हटि दोसर दिस मोड़ा गेला। सतदेव झाक एगारह कट्ठा जमीन जगदरक भीड़मे। नथुनी सिंहक विचारसँ ओ जमीन एकटा जगदरेबला हाथसँ बिकरी भऽ गेल। खेतमे धान रहै, धान काटैक झंझट उठल। बेरमा-जगदरक भीड़ानी भेल। ओही दिन नथुनी सिंह अपन दल-बलक संग पाछू हटलाह। मुदा भीतरे-भीतर गरमाहटि बढ़ल। जगदरक संग दूरीक आनो कारण छल, ओ कारण छल पाँचक दशकमे एक गोटे (जगदरेक) बेरमा एलाह। संगमे पाछू-पाछू कुत्तो रहनि। कुत्ता-कुत्तामे पटका-पटकी भऽ गेल। यत्र-कुत्र गारि कुत्ताबलाकेँ पढ़लखिन। बाता-बाती बढ़ि गेल। ओइ समए गरीबीक चलैत बेरमाक बोनिहार जगदरमे काजो करैत छलाह आ रीनो-पैंइच करैत छलाह। बाता-बाती होइते जगदरक हँसेरी बेरमा पहुँचि गेल। निआरल लड़ाइक योजना होइ छै बिनु निआरल लड़ाइ तँ नारेपर होइ छै। बेरमा-जगदरक नारा उठल, जगदरक सभ मारि खा गाम एलाह। मुदा प्रश्न तँ मालिक-बोनिहारक उठल। जेकरा ऐठाम रूपैओ आ धानो कर्जाक अछि ओ सोहाइ लाठी कपारपर मारलक, केना बरदास कियो करत। खूब जमगर आगि उठए लागल मुदा ठंढाएल। तइ बीच एकटा आरो घटना भेल। घटना भेल जे चनौरा महंथकेँ दरभंगा महंथानामे लड़ाइ उठल। चनौरा महंथक दहिन गबैया जगदरक नथुनी सिंह। राय-विचार कऽ दरभंगामे मारि करैक योजना बनौलनि। गेबो केलाह। कानूनक दायरामे झंझट रहबे करै; महंथक संग नथुनी सिंह आ नथुनी सिंहक संग जते जगदर-बेरमाक लंठ सभ रहए ओ सभ, भरि पेट मारियो खेलक, जहलो गेल। मुदा से ततबे नै भेल? भेल ईहो जे जहलोक भीतर ओहिना कुटनी भेलनि। 1978 ई.मे पंचायत चुनाव भेल। सीधा मुकाबला (दुइये उम्मीदवारक) भेल। बहुमत-अल्पमतक परिचय गामक सभ बुझैत छल। एकटा कनीटा उदाहरण- जखन विरोधी नीक जकाँ ओझरा गेला, तइ बीच भोगेन्द्र जीक मध्यस्थतामे पनचैतियो मानि लेल गेल। मुदा पंचेक बीच विवाद फँसि जाए। अंतमे ई भेल जे ने कम्युनिस्ट पार्टीक बहरबैया पंच औता आ ने प्रमुखजी (विन्ध्यनाथ ठाकुर) क बहरबैया पंच अबैले तैयार रहलखिन। मुदा पनचैती तँ पछुआएले अछि। जखन सभ छोड़ि देलनि तखन गामेक पंच बनथि। जइमे एकटा शर्त्त लागल जे दुनू पक्षक बीच जे नै सम्बन्धित होथि ओ पंच हेता। तकतियान भेल तँ एको गोटे शेष नै बँचलाह। ओहने शेष बँचला जे भीम जकाँ अभिमन्युक संग रहथिन। पंचायत चुनावसँ पूर्व 1977 ई.मे दिल्लीयो सरकार आ पटनो सरकार बदलि गेल। एक नव परिस्थिति पैदा लेलक। गामोक पार्टी (कम्युनिस्ट पार्टी) अनेको लड़ाइ लड़ि चुकल छल। जइसँ गुण-अवगुण बूझि चुकल छल। तँए चौगुणा उत्साह रहबे करै। टुटैत सामंती बेवस्थाक एकोटा घृणित काज पंचायत चुनावमे शेष नै रहल। एकटा उदाहरण- बहुमत अल्पमतमे नामो बदलि देल जाइत छल। जहिना कतौ राक्षसक अर्थ रक्षा केनिहार छल, सुरक अर्थ सुरापान करैबला। काज करैमे फल्लाँ राक्षसे छी। असगरे लहासकेँ पीठपर लादि असमसान लऽ गेल। चुनाव घोषणाक विरोधमे मुखियो आ सरपंचोक मामला कोर्ट पहुँचल। सरपंचक मामला निचले कोर्टसँ फड़िया गेल। मुखिया चुनावक मामला हाइ-कोर्ट पहुँचल। चुनाव अवैध भेल। जहिना ठाकुरक बरिआती ठाकुरे-ठाकुर तहिना बिनु पंचायतीक मुखिया बिना सभ मुखिये मुखिया। मुखिया-सरपंचक काजो तहिना। मात्र गामक पनचैती। सरपंच भेने सेहो बदलि गेल। ओना पार्टीक भीतर किछु दरारि बनि गेल। दरारि ई जे जिनका सरपंचक उम्मीदवार बनौल गेलनि ओकरे खिलाफ दोसर नोमीनेशन कऽ देलनि। पार्टी अपन िनर्णए आपस करैत चुनाव लड़ल। गामक वातावरणमे गुमराहट रहए। नीक-नीक अपराधीक गाओं बेरमा। एक ग्रुप छह-छह बर्ख जेल काटि चुकल छलाह। ओहो सभ जीविते। जे चुनाव (पंचायत चुनाव) मे बूथपर लाठी हाथे किछु गोटे बैसलो आ किछु गामोमे घुमैत। कसमकस रहने चुनाव शान्तिसँ भेल। मुदा गिनती काल एक गोटे (प्रमुखक गिनती एजेंट) दस-बारहटा मोहर देल बाइलेट हाँइ-हाँइ कऽ खा गेल। तही बीच पार्टीक एजेंट देखलक कि हाँइ-हाँइ कऽ पान-सात थापर मुँहमे लगा देलकनि। थापर लगिते मुँहसँ उगललक। छह बर्ख जहल कटलाहा एक गोटे एकटा खस्सीक चोरिमे पकड़ा गेल। खस्सी शिवलाल महतोक। चोर-मोट पकड़ाएल। मारि-पीट शुरू भऽ गेल। आदति छोड़बै जोकर मारि लगलनि। संग-संग ईहो भेल जे पकड़ि कऽ थाना पहुँचा देल गेल। तहिना दोसराक संग (दोसर अपराधीक) सेहो भेल। ओना खुदरा-खुदरी झंझट होइते रहैत छल, मुदा से सभ कमल। पंचायतक विधि-विधानक जे किताब छल सेहो तेहने छल। लोक-सभामे भोगेन्द्र जीक प्रस्तावकेँ स्वीकृति भेटल। गाँधी जीक कल्पना आ मगध जनतंत्र वैचारिके दुनियाँमे छल बेवहारिक जमीनपर नै छल। अही बीच (1977 ई.मे) एकटा मित्र जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ भेटलन्हि। ओ रहथि स्व. काली कान्त झा, आइ.पी.एस। बेरमाक बगले पूब कछुबी गाम छै। काली बाबू कछुबीयेक। 1969 ई.क बैचक आइ.पी.एस। ओ गाम आएल रहथि। झंझारपुर बजारक कोनो काज रहनि। बेरमा कछुबीक बीच बाधक अड़िपेरियासँ लऽ कऽ पक्की सड़क धरि कतेको रास्ता अछि। अपना घरसँ सीधा पूब हुनकर घर छन्हि। असकरे पएरे झंझारपुर जाइत रहथि तँए सोझ-साझ रस्ता हिया-हिया बढ़ैत रहथि। जखन बेरमा मुसहरी लग एला तँ रस्ता दू दिशिया बूझि पड़लनि। दुनू घूमि कऽ आगू मिलैत अछि जइठाम सँ झंझारपुरक रास्ता सोझ भऽ जाइ छै। मुसहरी बगले गामक डिहवारक स्थान। स्थान रहने चारू दिससँ लोकक आवाजाही तँए चारू कात रास्ता अछि। ओइठाम आबि जखन आगू हियौलनि तँ सोझका पछिम मुँहेँ बूझि पड़लनि। डिहवार स्थान घरक बगलेमे पूबारि भाग अछि। ओही रस्तासँ आगू बढ़लाह। तँ दरबज्जेपर चलि एला। ओना चेहरासँ जगदीश प्रसाद मण्डल िचन्हैत रहथिन। मुदा एक स्कूलमे पढ़ैक कहियो अवसर नै भेटलनि। तेकर कारण छल, शुरूमे ओ गाममे किछु दिन पढ़ि नवानी विद्यालयमे नाओं लिखाैलनि आ जगदीश प्रसाद मण्डल गामक स्कूलसँ टपि कछुविये अपन प्राइमरीमे नाओं लिखेलनि। अखन तँ मिड्ल स्कूल धरि मिलि गेल अछि मुदा ओइ समए मिड्ल स्कूल अलग छल। सभ बेवस्था अलग छलै। मध्यमा पास कऽ जखन धुड़झाड़ संस्कृत पढ़ए-लिखए आबि गेलनि, पिताकेँ संतोष भऽ गेलनि। तखन ओ (काली बाबू) तमुरिया हाइ स्कूलमे दसमामे नाओं लिखौलनि। ओइ समए बिनु सर्टियो फिकेटक दसमा धरि एडमीशन होइ छल। दसमा-एगरहमाक मिश्रित सिलेवस छल। साल भरिक पछाति दसमाक परीक्षा होइत छल जे स्कूलेमे होइत छल। नहिये जकाँ विद्यार्थी फेल करैत छलाह। जेना आन-आन बहुत देशमे अखनो अछि। दसमा-एगरहमाक बीच एसेसमेंट प्रथा सेहो छल। दू सए नम्बरक होइत छल। जइसँ मैट्रिकक बोर्ड परीक्षामे अस्सिये-अस्सिये नम्बरक विषय होइत छल। असिसमेंटक नम्बर विद्यालये (स्कूले) सँ पठाओल जाइ छलै जे बोर्डक (मैट्रिकक) रिजल्टमे जोड़ि होइ छल। मुदा एकटा बात बीचमे जरूर छलै जे बाइस-बाइस नम्बर एलापर पास होइत छल। मुदा तहू भीतर एकटा आरो छलै जे समाज अध्ययन दसे नम्बरमे पास होइत छल। एकर माने ई नै जे दस नम्बर असान भेल। अधिकांश विद्यार्थी बीस नम्बरक भीतरे रहैत छलाह, गोटि-पङरा आगू बढ़ैत छलाह। आर्ट विषय (फैक्लटी) लऽ कऽ नाओं लिखौलनि। मुदा साले भरिक पछाति (दसमाक परीक्षा) स्कूले नै आनो-आन स्कूलमे चर्चाक पात्र कालीबाबू बनि गेला। कारण भेल जे अखन धरि हाइ स्कूलमे अठमासँ लऽ कऽ बोर्ड धरिक परीक्षामे साइंसक विद्याथीक रिजल्ट अगुआएल रहैत छल। दसमामे फस्ट (पहिल स्थान) भेलनि। आर्ट विषयमे एकटा धक्का लागल। धक्का ई लागल जे अखन धरि परीक्षाक नम्बर दइक बेवहार छल ओ दोसर रंगक छल। घुसुकुनियाँ कटैत आर्टक नम्बर घुसुकैत छल, जखन कि साइंसक विषयमे सए-मे-सए छल। कनीटा उदारहण- जखन हाइ स्कूलक सम्बन्धमे चर्च भेल तखन ओ कहलनि- “खा कऽ स्कूल विदा होइ काल हाथक तरहत्थीपर पाँचटा अंग्रेजी शब्द वा एकटा प्रश्नक उत्तर लिखि लइ छलौं आ स्कूल पहुँचैत-पहुँचैत रटि लइ छलौं। जाइयो काल आ अबैयो काल करै छलौं। स्कूल पहुँचते पहिने कलपर जा बढ़िया जकाँ हाथ धोइ लइ छलौं, तखन बैसै छलौं। ओना शिक्षा पद्धतिमे सेहो किछु अन्तर अछि। रटैक चलनि सभ रंग अछि।” प्रथम श्रेणीसँ मैट्रीक पास केलनि। मुदा घरक स्थिति ओते नीक नै तँ खराबो नै। कारण जे ओ महापात्र परिवारक छलाह। से जमीनदारिये जकाँ पसरल अछि। तहूमे महापात्रक कम जन-संख्या रहने अखनो धरि अबादे छन्हि। ओइ समए सी.एम कओलेज बहुत नीक कओलेज बूझल जाइत छल। नीक विद्यानीक एडमिशनो होइत छल। 1959 ई.मे चारिटा कओलेज खुजल जइमे जनता कओलेज झंझारपुरो आ सरिसो कओलेज सेहो खुजल। मैट्रीक केला पछाति सी.एम. कओलेज नै जा, ओना आर.के. कओलेज सेहो नीक छल, मुदा दुनूक बेवहारिक पद्धतिमे किछु अन्तर छल। जइठाम आर. के. कओलेजमे सबहक गुनजाइश छल तइठाम सी.एम. कओलेजमे नै छल। दोसरो कारण छल सी.एम. कओलेज सरकारी बनि चुकल छल। छात्र प्रवेशक सीमा िनर्धारित छल। सी.एम. कओलेजक इच्छा रहितो काली बाबू सरिसो कओलेजमे नाओं लिखौलनि। कारण भेलनि जे एकठाम दूटा विद्यार्थी पढ़बैक बदलामे रहै-खाइक जोगार लगि गेलनि। परिवारक आमदनी ओते खराब नै जइसँ सी.एम.कओलेज नै जा सकै छलाह मुदा सहयोगक अभाव रहलनि। लिटरेचर इंग्लीशक संग प्रथम श्रेणीमे आइ.ए. पास केलनि। दरभंगामे रहैक गर लागि गेलनि। अंग्रेजी आनर्सक संग सी.एम. कओलेजमे नाओं लिखौलनि। आनर्स ग्रेजुएट भऽ निकललाह। एकटा कनीटा बात- जगदीश प्रसाद मण्डल जइ समएमे जनता कओलेजमे पढ़ैत रहथि तइ समए आनर्सक पढ़ाइ नै होइत रहै। खाली मैथिलीमे तीन शिक्षक रहथि, जइसँ मैथिलीमे होइत रहै। जगदीश प्रसाद मण्डल हिन्दी, राजनीति शास्त्रक विद्यार्थी रहथि। प्राइवेटे सँ हिन्दी आनर्सक तैयारी केलनि। ओना दू गोटे (दूटा शिक्षक) कओलेजमे रहथि मुदा पढ़ाइ नै होइत रहै। बी.ए.क फार्म धरि जनते कओलेजसँ भरलनि, परीक्षा सी.एम. कओलेजमे भेल। जगदीश प्रसाद मण्डल डिहवार स्थानक पछवरिया रस्ता पकड़ने दरवज्जापर आबि गेला। आइ.पी.एस. अफसरक आएब अपनाकेँ सौभाग्यशाली बुझलनि। पकड़ि कऽ दरवज्जापर बैसौलनि। पुछलनि तँ कहलनि जे झंझारपुर जाइ छी, काज अछि। कहलखिन जे अहाँ असकरे छी, तहूमे पाएरे छी दिक्कत हएत। कहलनि जे कोनो दिक्कत नै हएत। फेर कहलनि जे हमहूँ संग भऽ जाइ छी। किछु गप-सप करैक मौका सेहो भेटत। मुदा ओ पुलिस नजरिबला। कहलनि जे साइकिल दिअ घुमैकालमे दऽ देब। साइकिलसँ झंझारपुर गेला। जिनगीक तेना कऽ पहिल भेँट दुनू गोटेक बीच भेल छल। ओइ दिन ई अंदाजमे नै आएल छलनि जे सम्बन्ध एते गाढ़ आ जिनगी भरि निमहतनि। अंदाजमे नै अबैक कारण छलनि जे कतेको पुरान हित-अपेछित टूटि गेल छलनि। ओना नवको बढ़बो कएलनि। एकटा उदाहरण- एकटा गामेक संगी छलखिन, कओलेजमे संगे पढ़ने रहथि। मुदा जाइतक सीमा घेरने छलनि। स्टेट बैंकमे हुनका नोकरी भेलनि। नीक दरमाहा। अनधुन आमदनी। विचार एते बदलि गेलनि जे गाम एलापर भेँट-घाँट नै होइ छलनि। कुसंयोग एहेन भेलनि जे दसे-बारह बर्ख पछाति स्कूटर एक्सीडेंटमे जखमी भेला आ गाम आबि किछु दिनक पछाति मरि गेला। अखनो दुख होइ छनि जे मुइला पछाति देखए (जिज्ञासा) नै गेलखिन। मुदा विचार एहेन बनि गेल छलनि, जिनगीक अनुभवसँ, जे दोस्त-दुश्मनक बीचक दूरीक फलाफल कि होइ छै से बूझि गेल छला। कनीटा उदाहरण- एक गोटे नजदीकी रहथिन। हुनका ऐठाम बिआह रहनि। दिन-राति रहला। मुदा हुनका (जिनकर काज रहनि) दोस्त-दुश्मनक बुझैक नै रहनि। सभ रंगक लोक काजमे लागल छल। एक गोटे जिनका बदनाम करैक विचार मनमे रहनि, चाहे जे पछिला कोनो कारण होउ, दालिमे दोहरा कऽ नून दऽ देलखिन। पछाति जखन दालि नुनगर भऽ गेलै तखन जगदीश प्रसाद मण्डलक नाओं लगा देलखिन। एहिना दोसरठाम भेल। बिनु अदहन देने बरतनमे सुखले दािल दऽ नाओं लगा देलकनि। तहूसँ एकबेर भेल जे गामक दुर्गापूजामे कार्यकर्ता छला, नाचक भार भेटलनि जे नीक नाच हुअए। तइ समए गाम-घरमे नाटक-नौटंकी कम छल आ नाच बेसी अनेको तरहक छल। एक गोटे नाच अनैक भार लऽ लेलनि। बढ़ियाँ नाचक खूब प्रचार भेल। जखन नाच आएल तँ जेहने नीकक प्रचार भेल रहए तेहने हहासो भेल। मुदा जखने कियो परिवारसँ निकलि समाजमे डेग उठबैए तँ ओ ई मानि चलैए जे नमहर काजमे बेशियो आ भारियो, दुनू काज होइ छै अपना भरि लोक परियासे करैए, मुदा किछु त्रुटि रहि जाइ छै, तखन कि कएल जाएत। हँ एते जरूर जे अधिक-सँ-अधिक काजक सभ पहलूपर नजरि राखक चाही। एहिना कोनो घटनोक होइ छै। कियो बेमार छथि वा कोनो दोसरे कारण छन्हि, रंग-बिरंगक सुझाव लोक दैत अछि। नीको रहै छै अधलो रहै छै, तइठाम एहने समस्या उठबाक संभावना रहै छै। स्वर्गीय काली बाबूक पहिल बहाली डी.एस.पी.क रूपमे अगरतला (त्रिपुरा)मे भेल रहनि। चारि सए रूपैया महीना दरमाहा। समैयो सस्त रहए। अन्त तक ई बात बजैत रहलाह जे सिगरेट आ दारू पीबैत छलौं। करीब पाँच बर्ख पीलौं। परिवारमे मतभेदक उभरि गेल रहनि। उभरैक कारण स्पष्टे छल। एक साधारण थाना सिपाही दस बीघाक प्लॉट कीनि, तीनि मंजिला मकान बना, पाँच लाखक बेटियो बिआह कऽ लइए तइ संग समांगो सभकेँ नोकरी लगा लइए तइठाम ई (काली बाबू) छुच्छे हाकिम छथि। मुदा ओ परिवारकेँ बुनियादी ढंगसँ बदलए चाहै छला। अपन खनदानी वृत्तिकेँ अधला वृत्ति कहै छलाह। परिवार कर्जमे डुमल छल। दियादीक झगड़ा कोर्टमे चलैत छलनि। ओइ विवादकेँ जेना-तेना काली बाबू िनपटौलनि। कर्जसँ परिवारकेँ मुक्त केलनि। पछाति घर बनबैक विचार केलनि। भट्ठा लगा बनौलनि। अपनासँ छोट भाए माझिल भाएकेँ अगरतलेक हाइ-स्कूलमे काज धड़ौलनि। सालमे एक बेर निश्चित रूपे अबिते छलाह। मास दिन गाममे रहैत छलाह। तइ-बीच तीन-चारि भेँट जगदीश प्रसाद मण्डलसँ भऽ जाइ छलनि। मुदा मात्र तीन-चारि भेँटमे साल भरिक किरिया-कलापक कि हएत। हुनक अपन रूटिंग छलनि। काजो-उदेम ठेकना कऽ अबैत छलाह। आठ दिन होइत-होइत काज निबटबै छलाह। पछाति कुटुमारे (सासुर-मात्रिक-बहिन इत्यादि) करै छलाह। मास दिन पुरैत-पुरैत काजो निबटि जाइ छलनि। आ छुट्टियो बीत जाइ छलनि। काजक दौड़मे काजे गप-सप करैक मौको दैत छै। एकटा काजक भार अपनो ऊपर रखै छलाह आ समांगो सभकेँ लगबैत छलाह। सम्बन्ध बढ़लनि। एनाइ-गेनाइक संग खेनाइ-पीनाइ सेहो बढ़ि गेलनि। हाइ स्कूलमे फस्ट करैमे भूगोलक योगदान बेसी छलनि। एक दू नम्बर कम होइ छलनि। पूर्वाचलक ित्रपुरा, मणीपुर, मिजोरम, अरूणाचल, नागोलैंड इत्यादिक नीक अध्ययन छलनि। ओना धार्मिक प्रवृत्ति दिस बढ़लाह। पूजा-पाठ दिस बढ़ि गेला। डी.एस.पी. सँ एस.पी. भेला पछाति अपन बदली ट्रेंनिग कओजेलमे करा लेलनि। ता एस.पी. ओहीमे रहलाह। तीन-चारि साल पछाति (अपेछा भेलापर) जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ त्रिपुरा अबैले कहए लगलाह। मुदा जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ दोहरी ओझरी लागल रहनि। परिवारसँ लऽ कऽ मुकदमाक खर्च धरिक। ने कोट-कचहरी अबै-जाइसँ छुट्टी आ ने दोसर दिस जाइ-अबैक छुट्टी। जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ १९९८ ई. धरि अबैत-अबैत पूर्वांचल देखैक एते जिज्ञासा बढ़ि गेलन्हि जे अपनाकेँ ओ नै सम्हारि पेलन्हि। ओना समैक पलखति भेट गेलनि आ से भेटलनि दुर्गापूजाक जिम्मासँ अलग भेलापर। दोसर कारण ईहो भेलनि जे पचासो सँ ऊपर मुकदमा निवटि गेल छलनि जइसँ काेट-कचहरीक आवाजाही सेहो कमि गेलनि। दूटा सेशन केश (३०७ आ ४३६ अर्थात् मृत्युक प्रयास आ अगिलग्गी।) मात्र बचि गेल छलनि। तहूमे ४३६ (अगिलग्गी) केश हराइये गेलै। हरा ई गेलै जे झंझारपुर-मधुबनीक बीच जे कोर्टक बदला-बदली भेलै ओइमे ई केस हरा गेलै। ओना कते गोटे मुँहेँ सुनने रहथि जे कोटसँ केशक फाइलो गाइब होइ छै। आ ईहो सुनने रहथि जे केशो हरा जाइ छै। ओना दुविधा रहबे करन्हि। जइसँ खुशियो होइन्हि आ चिन्तो। दोसर ३०७ (एटेम्प टू मर्डर) रहन्हि ओइमे तँ सजा भऽ गेल रहनि मुदा खुशी ई रहन्हि जे जते सजाए कानूनी दौड़मे हेबाक चाही रहै से नै भेल रहै, तँए मजगूतो डोरी भत्ता तोड़ि-तोड़ि टूटि जाइ छै, लाभ-हानि मुकदमासँ (३०७सँ) जे भेल होइन्हि मुदा एकटा अनुभव जरूर भेलन्हि जे भ्रष्ट न्यायालयक कुरसी केना डोलैत रहै छै। ओना कोट-कचहरीसँ निसचिनती जकाँ जरूर भेला। मुदा चिन्ता तँ रहबे करन्हि। हजार देवी-देवतासँ जहिना एक जगदम्बा तगतगर, तहिना दुनू केश रहन्हि। एक दिन जखन सभ केशकेँ मन पाड़ि आइ.पी.सी.सँ मिलेलन्हि तँ बूझि पड़लन्हि जे जँ शुरूहे सँ सजाए होइत अबैत रहितन्हि तँ भरिसक सभ दिन जहलेमे अगिला केशक फैसला सुनितथि। मुदा केहेनो फड़ल आमक गाछ किअए ने हुअए मुदा पकलापर बा बिहाड़िमे हहरि एक्की-दुक्की गिनतीमे चलि अबैए तहिना भेल रहन्हि। भीम जखन अभिमन्युकेँ सातक फाटक तोड़ैक भार लऽ लेलनि तेहने मनमे उठलनि। फेर ठमकल सभ केशक सजाए जोड़लन्हि तँ १०७ बर्ख पुरैत रहन्हि। जिनगी दिस तकलनि तँ बूझि पड़लन्हि जे सए बर्खक काज तँ पुरिये गेलन्हि। जँ नै केने रहितथि तँ दोखी केना भेला? साउनक साँप जकाँ केचुआ छोड़ैक मौसम देखि जिनगी बदलैक विचार केलनि। पैछला जिनगी तँ अगिला जिनगीक सोंगर बनि गेल छलनि। साहित्य-दिशामे बढ़ैक विचार उठलनि। मुदा साहित्यक विद्यार्थी तँ रहि चुकल छला, सूर-पता तँ बूिझ चुकल छला। टेबिया-टेबिया किछु साहित्यकारक साहित्य पढ़ए लगला, मुदा मन फेर ठमकि गेलनि। मन ठमकि गेलनि ई जे किताब बात जँ आँखिक देखल हुअए ओ बेसी नीक होइए। किताब किनैक खर्चक कटौती कऽ घूमैक विचार केलनि। देशक केरल, कर्नाटक, कश्मीर छोड़ि सभ राज्य देखलनि। मुदा जून २०१२ ई.मे केरलक धरतीपर कोच्चिमे जखन “गामक जिनकी” लघुकथा संग्रह लेल टैगोर साहित्य पुरस्कार प्राप्त भेलनि तँ केरल सेहो घुमि लेलनि। १९५७ ई.मे केरलमे वामपंथी सरकार बनल छल। देशक ओ राज्य जइठाम शत-प्रतिशत पढ़ल-लिखल छथि। खुशी भेलनि। अखन धरि भूगोल एतबे बुझै छला जे देशक पूर्वी भाग असाम छी। आन-आन राज्य जे बनल ओ पछातियो बनल आ चर्चो संक्षेपे छल। हायर सेकेण्ड्री धरि भूगोल पढ़ने छला। पछाति नहिये पढ़लनि। तहूमे किछु घटबिये भऽ गेलनि, घटवियो स्वाभाविके भेलनि। स्वाभाविक ई जे जहिना एम.ए. पास, हाइ स्कूलक शिक्षक बनि, हाइ स्कूल पास मिड्ल स्कूल भेलोपर बरदास कइये लइ छथि तहिना ईहो केलनि। आसीन मास, दुर्गापूजाक समए। जगदीश प्रसाद मण्डल एटलस निकालि अजमबए लगला। घरसँ बिराटनगर पहुँचि जेता, बिराट नगरसँ सिलीगुड़ी। ओतौ रहैक ठौर छन्हि, ओतए सँ असाम आ गौहाटीसँ त्रिपुरा। मुदा दुनूमे बहुत अंतर भेल। गौहाटीसँ अगरतलाक बस चारि बजे अपराहनमे जे खुजलनि ओ दोसर दिन डेढ़ बजे अगरतला पहुँचल। जहिना भेड़ी जेरमे हूड़ार चलि अबैए तहिना बससँ उतरलापर बूझि पड़लनि। भाषाक दूरी, जहिना हिन्दी जननिहार तहिना अंग्रेजी। बस धरि तँ हिन्दीसँ काज चलि चुकल छलनि, बससँ उतरिते, भुखाएल रहबे करथि, पहिने हाेटलमे जा खेलनि। मुदा एकटा स्पष्ट अंतर ई बूझि पड़लनि जे जे सस्त खेनाइ सिलीगुड़ीमे भेटलनि ओ आगू कतौ ने भेटलनि। कनीटा उदाहरण- बरपेटा असाम रातिक एक बजे बस एकटा होटलक आगूमे लागि गेल, अकड़ल यात्री सभ उतरि होटल पहुँचल। हॉल जकाँ होटल जइमे तीन बसक यात्रीक बेवस्था। चारि रोटी-तरकारीक दाम बीस रूपैया लेलकनि। मुदा देखलनि जे एक प्लेट माछ वा मांसबला रहै तँ ओकरा सभसँ एक-एक सए रूपैया लेलकै जे सिलीगुड़ीमे दू रूपैया पचास पाइमे खुअबैत रहै। होटलसँ निकलि थानापर गेला। कियो हिन्दी बुझनिहार नै। काली बाबूक नाआें कहिते एकटा सिपाही डेरापर पहुँचा देलकनि। करीब अढ़ाइ बजे काली बाबूक ऐठाम जगदीश प्रसाद मण्डल पहुँचला। नीक फुलवाड़ी, आठ कोठरीक नीक डेरा, होम गार्डक ड्यूटी। पहिने हुनकर पत्नी देखलखिन कारणो छलै जे ओ रोडे दिसक कोठरीमे रहथि, खिड़की खोलि बाहर आबि गेट खोलि आगू बढ़ि काली बाबूकेँ कहलखिन, ओ डेराक सभसँ दछिनवरिया कोठरीमे भुँइयेँपर शतरंजी बिछा पड़ल रहथि। धड़फड़ाएले उठि आबि कऽ एकटा कोठरी देखा कहलखिन, झोड़ा राखि दिऔ। बाथ रूम देखबैत कहलखिन, गाड़ीक झमाड़ल छी पहिने नहा लिअ। जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ अपनो सएह मन रहनि। सएह केलनि। नहा कऽ कोठरीमे अबिते कहलखिन, खेला बाद अराम करब। जगदीश प्रसाद मण्डल कहलखिन- “भूख लागल छलए, बसे स्टेण्डमे खा लेलौं।” साँझू पहर चाह-ताह पीब दुनू गोटे दोबरा कऽ लुंगी जकाँ धोती आ बिना गंजियेक कुर्ता पहिरने रहथि। कारणो छलै, मौसम। डेरासँ बगलिते पछवरिया डेराक सम्बन्धमे कहए लगलखिन्ह। ओ डेरा डी.एम.क छल जे मणीपुरी छलाह। १९८४ बैचक आइ.ए.एस। डेराक आगूमे ठाढ़ देखि ओ निकलि कऽ एला। अबिते काली बाबू बंगलामे कहलखिन जे बंधु छथि। तखन ओ हिन्दीमे गप-सप केलखिन। आगू बढ़िते आइ.जी.क डेरा। आइ.जी.क बेटा संग कालीबाबूक बेटाकेँ दोस्ती। डेरा लग पहुँचते दुनू गोटे हूल दऽ डेरासँ निकलल। ओ बंगाली छलाह। अगरतलाक बंगला भाषी। पहिल दिन १९६० ई. धरिक अपन चरिकोसीक विद्यार्थीक ओतऽ चर्च भेल छल। दोसर दिन सबेरे चाहे पीबैत काल ओ कहलखिन जे आइ ऑफिस होइत दछिनमे बूढ़ी काली मंदिर अछि तइठाम तक चलब। सबेरे दस बजे संगे दुनू गोटे ऑफिस गेला। ऑफिस सभ नमहर-नमहर रहै मुदा अपन आॅफिस छोटेटा छलनि। एकटा अलमारी, दूटा कुर्सी, एकटा टेबुल। सोझे अपना कोठरीमे पहुँचलाह। पहुँचते एकटा बंगाली प्यून (बी.ए. पास धुड़झाड़ बजैबला) पहुँचलनि। ऑफिसक सम्बन्धमे पुछलखिन। सभ बात सुनि कहलखिन- चाह पिआउ। चाह पीब दुनू गोटे विदा भेला। बाजारसँ निकलिते चाहक खेती दिस बढ़ला। सड़कक दुनू कात पहाड़ी जमीन छै। जहिना अपना ऐठाम पहिने लोक पतिआनी लगा बेढ़ीक काज करैत छलाह तहिना पानक बड़ैब जकाँ ढलुआ बनाओल छल। भरि-भरि छातीक गाछ। ओइमे अधिक महिला पीठपर बोको लदने चाह-पत्ती तोड़ैत छलीह। चाहक गप-सप चलबैत कहलखिन जे हालेमे ग्रीन टी कऽ कऽ नव िकस्म आएल अछि, ओना खेती बहुत अधिक नै भेल अछि मुदा दुनियाँक बजारमे सभसँ बेसी मांग अछि। कीमतो सभसँ ऊपर छै। कनिये आगू बढ़लापर रबड़क गाछ देखलनि। पतिआनी लगा रोपल। गाछक आकारसँ बूझि पड़लनि जे पनरह-बीस बर्खक हएत। बहुत भारी नै देखलनि। छाती भरि ऊपरमे खोधल, जइमे सँ लस्सा (दूध) निकलैत। सभ दिन भिनसरू पहर ओइ दूधकेँ समेटि-समेटि लऽ कऽ रबड़ बनबैत। करीब बारह बजे बूढ़ी काली स्थान पहुँचला। छोट-छीन जगह। कमे दोकान-दौरी। सए बर्खसँ ऊपरक बूझि पड़लनि। सुर्खीपर जोड़ल मकान फाटि-फुटि, झड़ि-झूड़ि गेल छलै। मूर्ति देखि निकलि गेला। पुरान कलाक मूर्ति। मुदा हुनका बहुत रास मंत्र सभ पढ़बाक छलनि तँए ओ मंदिरमे रहलाह। बाहर निकलि गाछ सभ िहयेलनि तँ कैम्पसेमे एकठाम आम, कटहर, गमहारि, शीशो-जामुनक गाछ देखिलनि। अखन धरि गौहाटीक उपरान्त एहेन पचमेल गाछ कतौ ने देखने छला। तँए किछु बात मनमे उठलनि। अंतमे मन-मानि गेलनि जे मिथिलाक कियो पुजेगरी रहल हेताह। जगदीश प्रसाद मण्डल पुजेगरीसँ किछु काल गप-सप करिते रहथि आकि ताबे ओहो निकललाह। निकलिते कहलखिन जे कहने जे छलौं कमल सागर देखब, से यएह छी। हिया कऽ देखलनि तँ बूझि पड़लनि जे बेरमाक बड़की पोखरिसँ छोटे छै। पंचो ठीके-ठाक बूझि पड़लनि। किएक तँ बेरमा बड़की पोखरिसँ ओहो परिचिते। तहूमे बेरमा बड़की पोखरि आ कछुबी बड़की पोखरिक तुलना तँ दुनू गामक लोक करबे करैत रहैए। तइमे बेरमा बीस, तँ बड़कियो पोखरि बीस। जगदीश प्रसाद मण्डल कहलखिन- “एकर नाओं किअए सागर पड़ल?” भूगोलक विद्यार्थी ठमकि गेलाह। ठमकिते दोहरा देलखिन जे बेरमा बड़की पोखरिमे एक महारक लोक दोसर महारबलाकेँ नै चिन्है छै, से तँ देखै छिऐ दस कट्ठा पेट हेतै। पोखरिक पछबरिया महारपर बंगला देसक सीमा गाड़ल। बाँसक खुट्टा। तखने थोड़े हटि चटगाम बला रेल पास केलकै। जगदीश प्रसाद मण्डल विदा होइसँ पहिने मिठाइ खा पानि पीब चाह पीलनि। ओना ओ चीनिया बेमारीसँ ग्रसित, मुदा तैयो परसाद जकाँ खेलनि। दिनगरे डेरापर पहुँचै गेला। अखन धरि काली बाबूक परिवार वैष्णव बनि गेल छलनि। शुद्ध शकाहारी परिवार। चारि बजे भोरेसँ नाचि-नाचि भजन करए लगैत छलाह जे पड़ोसिया, मणीपुरबला कहबो करैत छलनि। ईटा सिमटीक छहरदेवाली नै रहने झलफले झाझनक टाट। हुनका देखथि जे व्यायाम बहुत करैत छलाह। मांसक प्रिय। अपने ओ मिथिलांचलेक लोक जकाँ (शरीरसँ) रहथि मुदा पत्नी पहाड़नी जकाँ छोटे कदक। दुर्गापूजाक समए रहबे करै, बगले पूवारि कात, करीब दू बीघा पूब पूजा होइत छल। अपन-अपन परिवारक संग अफसर सभ देखैत छलाह। अपना सभ ऐठाम जकाँ दस दिनक पूजा नै। परीबसँ शुरू नै भऽ छठम दिनसँ शुरू होइत अछि। मुदा मिथिलांचलसँ बहुत बेसी होइत अछि। काली बाबू कहलखिन जे ऐठाम त्रिपुरो आ बंगलो देशमे काली पूजा सभ करैत अछि। असामसँ उत्तर-पूब लऽ कऽ दछिन धरि मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम, मणिपुर, अरूणाचल, नागालैंड राज्य अछि। ट्रेनक रास्ता थोड़ेक आगू धरि। मुख्य सवारी बस-ट्रक छी। जंगल-पहाड़सँ भरल। हजारो किसिमक गाछ-िवरीछ। उपजाऊ जमीन कम। ओना जइठाम रंग-रंगक गाछ-विरीछ अछि तइठाम खाइबला फल सेहो हेबे करतै। ढकिया साग बाध-बोनक घास जकाँ उपजल। ओना गेलापर कहि देलखिन जे अपना ऐठामसँ जे भिन्न अछि ओ देखबो करब आ खेबो करब। एक तँ ओहिना ओ (कालीबाबू) तते भँजिआह अपने जे सभ ठेकनौने रहथिन। तुलनात्मक दृष्टिसँ ओइ इलाका (त्रिपुरा आदि) मे अपना सभसँ बेसी बरखा होइ छै जइसँ अपने सबहक चौरी खेत जकाँ अधिकांस धानक कटनी पानियेमे होइत अछि। जइसँ अपना सभ जकाँ कतिका खेती कम लगै छै। अपना ऐठाम कातिक नीक मास ऐ लेल बूझल जाइत अछि जे अन्नक एक मौसम बनैत अछि। तइ संग तीमन-तरकारी, फल-फलहरीक सेहो बनैत अछि। मोटामोटी यएह जते किसिमक खेती कातिकमे होइत अछि, ओते ने आन कोनो मौसममे। बिलंबसँ खेतक पानि सूखने किछु तेलहन, पटुआ आ धानक खेती होइत अछि। त्रिपुराक करीब साठि-सत्तरि प्रतिशत जंगल-झाड़, पहाड़सँ घेरल अछि। तीस-चालिस प्रतिशतक जमीन उपजाउ। धान मुख्य फसिल छी। जइ तरहक सम्पदा इलाकामे छै, िवकास नै भेल अछि। जनमानसँ धोखा अखनो कएल जा रहल अछि। त्रिपुराक आदिवासी समुदायकेँ एते महगाइक सामना करए पड़ि रहल छै, जे बिसवास नै कएल जा सकैए। ओना विदेशी संस्था सभ शिक्षाक एहेन ढर्रा धड़ा देने अछि जे रेलक विकास नै होउ। हँ ई बात जरूर अछि जे अपना सभ जकाँ रेलवे लाइन बैसबैमे असान नै छै, पहाड़ी क्षेत्र रहने महग अछि। अोना अपनो ऐठाम किछु राजनीतिक दल ओहनो छथि जे सड़क-पुल िनर्माण, नहर-छहर िनर्माणमे मशीनक प्रयोग नै होउ। ट्रेक्टर माटि नै उघए। लोके उघत आ बनाओत। हुनका सभकेँ देखए पड़तनि जे गाममे िसर्फ गिरहस्तीकेँ समुचित बनाओल जाए तइ लेल केनिहार (श्रमिक) नै भेटतनि। तइठाम नहर-छहर, बान्ह–सड़क बाधित कएल जाए, ई कते उचित भेल। पशुपालन नहिये जकाँ ओइ इलाकामे छैक, तेकर अर्थ ई नै जे से केनहि अछि आकि पशु छइहे नै। जंगलमे ओहन-ओहन पशुक भरमार अछि जेकरा आगू अपना सबहक गाए-महीसिक मूल्य फीका पड़ि जाएत। तहिना गाछो-विरीछक हाल अछि। सुन्दरवन इलाकामे हजारक कोन बात, लाखक कोन बात जे करोड़-करोड़ रूपैया मूल्यक गाछ सभ अछि। बाँसक तँ चर्चे नै। खिस्सा जे फल्लाँ खलीफा बाँसे उखाड़ि कऽ दतमनि करैत छलाह, से प्रत्यक्ष भेलनि। ओहनो बाँसक बोन सभ अछि जे जेहेन बाँसक कड़ची होइए। एकटाकेँ काटि कऽ दतमनि केलनि। एकर माने ई नै भेल जे एहेने बाँस ओइ इलाकामे होइ छै। बाँसक दर्जनो किस्म। कड़चीसँ लऽ कऽ ओहनो-ओहनो बाँस सभ अछि जे अपना ऐठामक सँ डेढ़िया-दोबर मोट अछि। बिनु माटिक खेती पहाड़पर होइ छै। झूम सिस्टम कहल जाइ छै। छोट-छोट किआरी बना ओइमे उगल घास-फूस, बोन-झाड़ काटि आगि लगा जरा देलक आ खेती केलक। ई तीन साल पछाति छोड़ि दोसर खेत बनौलक। बंगला देशक लोक बहुत गरीब छथि। तेकर कारणो अछि एक तँ अपने सभ जकाँ १९४७ ई.सँ पूर्व छला। आजादीक संग बँटा कऽ पाकिस्तानक हाथ पड़ि गेल। दुनूक बीच अनेको रंगक विषमता अछि; भाषा, बेवहार, खेती इत्यादिक। सत्ता पाकिस्तानक हाथ पड़ल, पूर्वी बंगाल पछुआ गेल। एक तँ अहुना समुद्री इलाकाक देश, समुद्री-तूफानसँ बेसी बर्बादी होइत अछि तइपर शासनक विपरीतता, आरो धकिया देलक। एक तँ त्रिपुरोक आर्थिक-स्थिति ओते सुदृढ़ नहिये अछि, मुदा सरकारी अनुदान भरपूर भेटै छै। ओना सरकारी अनुदानक सही उपयोग नै भऽ बेसी लुटाइते छै। मुदा तैयो किछु उद्योग-धंधा छोट पैमानापर चलिते अछि। जूटक एकटा कारखानाक संग लघु उद्योगक रूपमे बाँसक छत्ताक बेंट (डंटा), बाँसक बनल आरो-आरो वस्तु बनैत अछि। अगरतल्लाक बजारो तते नमहर तँ नहिये अछि। अल्मुनिया बर्तन सेहो बनैत अछि। बंगला देशक हजारो श्रमिक अगरतलामे रिक्शो चलबैत अछि आ मजदूरियो करैत अछि। दुनूक बीच बीजाक (पासपोर्टक) बेवस्था प्रायोगिक स्तरपर नै छै। सभदिन बंगला देशक श्रमिक भिनसरे अगरतलामे प्रवेश करैत अछि आ साँझू पहर घूमि जाइत अछि। सीमापर अबितो काल आ जाइतो काल गिनती कऽ लेल जाइ छै वा नै से नै जानि। जगदीश प्रसाद मण्डल जखन सीमाक चौकी देखए गेला, तखन मध्य प्रदेशक सिपाही ड्यूटीमे छलाह। हिन्दी भाषी, तँए किछु गप-सप भेलनि। पुछलखिन तँ कहलकनि जे सभ दिन भिनसर ६ बजेसँ आठ बजे तक ई सभ (बंगलादेशी) प्रवेश करैए, सभकेँ गनि कऽ लइ छिऐ आ वापसी काल ५ बजेसँ सात बजे सेहो गनि लइ छिऐ! भाषाक दृष्टिसँ त्रिपुरामे अंग्रेजी, ककवार्क, बंगला आ मणिपुरी चलैत अछि। जगदीश प्रसाद मण्डल जइ समए गेल रहथि (१९९८) ओइ समए काली बाबू डी.आइ.जी. (होमगार्ड) रहथि। काजो हल्लुके रहनि। अपनो जहिना झड़-झंझटसँ कात रहए चाहै छला तहिना छलनि। जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ चारि दिन जखन पहुँचना भेलनि आकि बदली भऽ गेलनि। डी.आइ.जी. (प्रशासन) बना उत्तरी त्रिपुरा बदली कऽ देलकनि। पाँचम दिन अपनो सभ परिवार आ जगदीश प्रसाद मण्डल कैला शहरक लेल विदा भेला। दस बजे छहटा फोर्सक संग विदा भेला। अगरतला पच्छिमी त्रिपुरामे पड़ैत अछि। बंगलादेशसँ सटले। दछिनी त्रिपुरामे उग्रवादी उपद्रव अधिक छल तँए नै घूमि पेला। ओना जाइ काल बेसी रातियेकेँ पास केने रहथि तँए बेसी नै देखि पेला मुदा अगरतलासँ कैला शहर अबैमे देखैक बेसी समए भेटलनि। दस बजेमे जे विदा भेला अगरतलासँ से साढ़े चारि बजे कैला शहर पहुँचला। बीचमे तीन ठाम, पनरह-बीस मिनट कऽ कऽ रूकबो केला। नव जगहपर सभ नबे रहथि तँए दू दिन घुमै-फिरैक कोनो कार्यक्रम नै बनलनि। तेसर दिनसँ घुमब-फिरब फेर शुरू भेलनि। आसीन मास रहने बाधमे धानोक फसल रहै। ओना ऊँचगर जमीन सेहो तेलहन आ अल्लू लेल तैयारी चलैत रहै। जंगल-पहाड़क क्षेत्र छीहे अपना ऐठामसँ भिन्न गाछ-विरीछ देखथि। ओना आमक गाछ सेहो अछि। मुदा अपना सबहक आमसँ भिन्न अछि। ओइठामक आम अपना सभ जकाँ पकलापर नै खाएल जाइत अछि। जखने आम पकैपर होइत कि ओइमे कीड़ा फड़ि जाइत अछि जे गुद्दाकेँ भुर-भूरा बना दइत, जे खाइ जोकर नै रहि पबैत अछि। त्रिपुराक प्रमुख स्थानमे उनीकुटी सेहो अछि। उनीकुटीक कार्यक्रम बनलनि। उनीकुटीक सम्बन्धमे कहल जाइत अछि जे जखन द्वापर जुगक अन्त हुअए लागल आ कलयुगक आवाहन हुअए लागल तखन देवता सभ सोचलनि जे कलयुग बहुत खराब जुग आबि रहल अछि। मान-मर्यादा, इज्जत-आवरू बँचब कठिन अछि। से नै तँ धरती छोड़ि समुद्रे बास करब नीक हएत। उनक अर्थ एक होइत अछि। जहिना अपना सभ उनचालीस, उन्नैस, उनतीस, उनहतरि इत्यादि कहै छिऐ, जेकर अर्थ होइत चालीसमे एक कम, बीसमे एक कम इत्यादि तहिना उनकुटिक करोड़मे एक कम। स्थानक नाअों सुनि मन खूब खुशी भेलनि। खुशीक कारण ईहो रहै जे काली बाबू तेहन ढंगसँ नाचि-नाचि कथा सुनौलखिन जे आरो जिज्ञासा बढ़ि गेल रहनि। तइपरसँ अखन धरि चौरासिये लाखक नाआें सुनने छला, आइ तँ करोड़ देखैक मौका। लाभ ईहो जे दोसर स्थान नहियो जेता तैयो तँ फल भेटबे करतनि। राता-राती सभ देवता पड़ा कऽ समुद्र दिसक रस्ता धेलनि। पएरे रहथि। जाइत-जाइत त्रिपुरा (उनीकुटि-माताहारी) पहुँचैत-पहुँचैत भोर भऽ जाइ गेलनि। महिंसबार सभ महींस खोलि-खोलि चरबए विदा भेल रहए। सभ देवता सोचलनि जे दिन-देखार पड़ाएब नीक हएत, सभ कियो एकेठाम डेरा खसौलनि। ओहए स्थान उनीकुटी छी। नमहर क्षेत्रमे स्थान पसरल अछि। नमहर-नमहर पहाड़, गाछ-विरीछ, बोन-झाड़सँ भरल। पहाड़पर सँ झरना झहरैत। मनुष्यसँ पूर्वक जे जीव-जन्तु अछि वएह सभ देवी-देवता। पहाड़ी भूमि मुदा रंग-रंगक पाथर सभक अछि। बाल-पाथर काँच पत्थरसँ सक्कत जुआएल पत्थर धरिक स्थान। ओहनो पत्थर जे हाथसँ टूटि जाइत अछि। आ ओहनो पत्थर जे खूब सक्कत अछि। खाइयोबला फलक आ केरोक बोन अछि। बीचमे दोकान-दौड़ी। ओ बाहरे अछि। जइठाम पहाड़पर सँ झरनाक पानि झहरैत अछि तइठाम द्वापर युगक अर्जुन-कृष्णक रथक चित्र बनाओल अछि जे स्थानक मुख्य बिन्दु छी। पूर्वांचल (असाम, मेघालय, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा, अरूणाचल, नागालैंड आ सिक्किम) मिला अपने-आपमे एक देश छी। जंगल, पहाड़, झील, नदी घाटीक समूह। भाषाक दृष्टिसँ सेहो बहुभाषी अछि। अपन-अपन क्षेत्रक भाषा सेहो छै। मोटा-मोटी बंगला, अंग्रेजी, हिन्दी, खासी, गारो, ककवार्क, मणिपुरी, मिजो, आओ, कोंयक, अंगामी, सेमा, लोथा, मोंपा, अका मिजू, शर्दुकमेन, निशि, अपतनी, हिलमिदि, तगिन, अदी, इदु, दिगारू, मिजिखम्री, सिंगफू, तंगला, नोक्टे, वांचू, लोपचा, भोटिया, नेपाली लिंबू इत्यादि।अगरतलाक राजा (सामंती युगमे) बर्म्मन-परिवारक छलाह। अखन जे फिल्मीस्तानमे गीतकार-संगीतकार वर्म्मन सभ छथि ओ ओतुके छथि। हुनके देल मकानमे त्रिपुराक सभा भवन (सदन) अछि। आदिवासीक बीच अपना सभसँ भिन्न भोजनक चलनि अछि। खाइ-पीबैक वस्तुमे सेहो अन्तर अछि। हुनका सबहक भोजमे अपना सभ जकाँ नै जे भात-दालि-तरकारीसँ शुरू केलौं आ जना-जना आगू बढ़ैत जाएत तेना-तेना नीक-नीक विन्यास आओत। ओइठाम से नै छै। नीक-नीक वस्तु पहिने बँटाइत अछि आ जेना-जेना आगू बढ़ैत अछि तेना-तेना पछुआइत जाइत अछि। दू हजार ईस्वीक पछाति काली-बाबू रोगाए लगलाह। पहिने आँखि खराब भेलनि। कलकत्तामे ऑपरेशन करौलनि। कब्जियतक शिकाइत शुरूहेसँ भऽ गेल रहनि। मधुमेह सेहो भऽ गेलनि। आइ.जी. बनला उत्तर किछु दिन नीक रहलाह। ओना बीचमे डी.जी.पी. बनि मेघालय (शिलाँग) सेहो एलाह। मुदा ओइठाम मन नै लगलनि। छह मास पछाति पुन: घूमि कऽ अगरतले आइ.जी. बनि चलि गेलाह। रिटायर होइसँ चारि बर्ख पूर्व ओछाइन पकड़ि लेलनि। नोकरीदार रहने गाम नै एलाह। ओतै इलाज करबैत रहलाह। दिल्ली, कलकत्ता सभ ठाम गेला मुदा स्वस्थ नै भऽ सकलाह। देहक कोनो गंजन नै रहलनि। तीन या चारि बेर पेटक ऑपरेशन भेल छलनि। कष्टसँ मनो चिड़चिड़ा गेलनि। दू बर्ख पछाति (सेवा-निवृत्त होइसँ पहिने) गाम आबि गेलाह। दुनू तरहक रोग -शारीरिक-मानसिक- सँ भीतरे-भीतर ग्रसित भऽ गेलाह। मानसिक रोगक कारण भेलनि- जखन आइ.जी. बनलाह, गृह विभाग ३२ करोड़ रूपैआ बिना योजनाक पठा देलकनि। मंशा जे होउ मुदा कालियो बाबू अपनाकेँ सैद्धान्तिक बुझैत छलाह। बिनु योजनाक रूपैआ कतए खर्च कएल जाए से फुड़बे ने केलनि। एकटा पत्र गृह-विभागकेँ लिखलनि जे रूपैआ प्राप्त भेल मुदा योजना तँ किछु अछिये नै, से योजना पठाउ। तेकर कोनो उत्तर नै भेटलनि। ओ जाल छलै। रूपैया आपस कऽ देलखिन। आपस करब एहेन घातक भेलनि। ओझरा गेलाह। जबाब-तलब भेलनि। लिखितमे जबाब तँ दऽ देलखिन मुदा बिमारियाह शरीर भेने दौड़-धूप तँ कऽ नै सकलाह। ड्यूटीसँ सेहो अलग भऽ गेल रहथि। एक दिश गृह-विभागक चाप, दोसर दिस ड्यूटीसँ अलग हएब, आर्थिक समस्या उपस्थित भऽ गेलनि। तइपर पथ्य-पानि, दवाइ-दारूक खर्च काफी बढ़ि गेल रहनि। बेवस भऽ गेलाह। काली बाबूकेँ पंडित कहैक कारण अछि जे गीता (श्रीमद्भगवदगीता) पर अपन दृष्टिकोण छलनि। आचार्य रजनीशक आठो खंडक (आठ खंडमे संगृहित, जेकर ओइ समैमे अठारह सए दाम छलै) नीक अध्ययन छलनि, जे दृष्टिकोणकेँ बदलने छलनि। जिनगीक आशा टूटि गेलनि। अंतिम दौड़क भेँटमे विभागीय बहुत बात कहलखिन जे देखैआ कि अछि आ चोरौआ कि अछि। नोकरीक शुरूक जिनगीसँ लऽ कऽ अखन धरिक बहुत बात संगी होइक नाते जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ ओ कहलखिन। अगरतला पहुँचते (डी.एस.पी.) अपन पहिचान छबे मासमे बना लेलनि। इमानदार अफसरक रूपमे प्रशासनसँ जनमानसक बीच आबि गेलाह। नगद रूपैआ, गहना-जेबर वा लत्ता-कपड़ा कहियो केकरोसँ नै छुलनि, मुदा खाइ-पीबैक वस्तु नै घुमबैत छलाह। शुरूक पाँच बर्खक जिनगी एक कालखंडक जिनगी बनि गेल छलनि। शराब पिबैत छलाह, सिगरेट पीबैत छलाह, मुर्गी-अंडा खाइत छलाह। ओही दौड़मे (१९७२ ई.) बंगला देशक लड़ाइ-पाकिस्तानक संग भेल रहए। मिथिलांचलक भाय लोकनिकेँ मन हेतनि जे सालो भरि बरखा सेहो भेल रहए। साले बरसातक भऽ गेल। घर छाड़ैले जे कियो खढ़-पात रखलनि सबहक सड़ि गेलनि। एक तँ ओहिना लत्ती-फत्ती माने चार परक सजमनि कदीमा रहने खढ़क घरकेँ कोनो दशा नै रहैत छैक, तँए नै छड़ाएब तँ पटोटनो देबक आवश्यकता भइये जाइत छलै। ओना बोनिहार श्रेणीक अधिकतर धनखेती (धानसँ पहिने जे मड़ूआ होइत छल) ओकर सस्ती छलै। सस्ती ई जे जखन मड़ूआ पाकि जाइ छलै तखन गिरहत खेतमे रहैत छलाह, नार कटनिहार सभ मड़ूआ गिरहतकेँ दऽ दैत छेलखिन आ नार लऽ कऽ अपन घर छाड़ैत छलाह। बंगला देशक (१९७१ ई.) लड़ाइमे बंगला देशकेँ भारत संग देलक। इन्दिराजी प्रधान मंत्री रहथि। रूसक (सोवियत संघक) भरपूर सहयोग भेटलनि। ओही समए सोवियत संघ बहुत शक्तिशाली छल। ओना अखनो अछि मुदा....? बीस बर्खक दोस्तीक समझौता भारत-सोवियत संघक भेल। नीक जबाब पाकिस्तानक संग देनिहार अमेरिकाकेँ भेटल। दुनियाँक इतिहासमे ३१ हजार सेना बंगलेदेशमे हाथ उठौलक। सरेण्डर केलक। बंगला देशक ओइ लड़ाइमे शीर्ष नेता सभ त्रिपुरेक अगरतलामे रहथि। इन्दिराजी सेहो चुप-चाप (बिना किछु जानकारीक) जािथ। त्रिपुरा मलेट्रीक छाबनी बनल रहए। ओइ समए भोलेंट्रीक हाथमे लड़ाइ कमान रहै, सुरक्षाक कमान तँ प्रशासनेपर रहए। ओइ गेस्ट हाउसक जिम्मा हिनके (काली बाबूक) रहनि। जइमे बंगला देशक कर्णधार सभ रहथि। ओइ बीच (बंगला देशक लड़ाइसँ पूर्व) एकटा जिम्मेदार अध्यक्ष केँ गारियो पढ़लखिन आ मारबो केलखिन, भेल ई जे हिनका नाओंपर एकटा माछक बेपारीसँ ओ खूब माछ खाए। बंगाली भाय, तहूमे त्रिपुराक पानि आरो मन्द छै, एक दिन ड्यूटीमे जाइत रहथि कि सलाम ठोकि ओ बेपारी हँसैत कहि देलकनि। ओइ बातकेँ पीठिया ठोक केलनि, वएह (अध्यक्ष) पकड़ा गेला। मुदा लूटमे चरखा नफा। त्रिपुरामे कम्युनिस्ट पार्टी आ कांग्रेस पार्टीक बीच कशमकस राजनीति रहए। तीन गोटेक कमिटी नृपेन बाबूक (नृपेन चक्रवर्ती, जे आजन्म अविवाहित रहलाह, कम्युनिस्ट पार्टीक नेतृत्व करैत रहथि ट्रिपुल एम.ए. रहथि, दू बेर मुख्य मंत्री सेहाे बनलाह) अध्यक्षतामे बनल। जिनगीक संघर्षक अनुभव काली बाबूकेँ विद्यार्थीये जिनगीक रहनि। संगी-साथी प्रशासनिक अफसर सभ कहनि जे मोटरी बान्हि कऽ रखने रहू। तेकर जबाब देथिन- बन्हले अछि। नृपेन बाबू घटनाक जड़ि तक पहुँचलाह। इनक्वाइरी दौड़मे गप-सप करैक बहाने जंगलक एकटा गेस्ट हाउसमे लऽ गेलनि। कोनो जानकारी केकरो नै देलखिन। मुदा देखिनिहारो तँ देखिते रहै। भरि राति ओतै रहलाह। जइसँ आरो प्रतिष्ठा बनि गेल रहनि। मुदा प्रतिष्ठो तँ जनमारा होइ छै। काली बाबू अपने पाँच भाइक भैयारी आ चारि संतान अपने छन्हि। तीन कन्या एक लड़का। तीनू कन्याक बिआह कऽ लेने छलाह। भाए आ पिता जीविते छलखिन। थेहगर दुनू, अपनासँ एक बर्ख पहिने पिता मुइलखिन। भाए छन्हिये। बेटाक बिआह पछुआएल छलनि। ओना गप-सप (बिआहक) सुपौल जिलामे चलैत रहनि। ओहो (कन्यागत) रेलबेक एस.पी., जखन मन मानि गेलनि जे आब नै जीब, तखन हुनका तत्काल बजा मंदिरमे बिआह सम्पन्न केलनि। नोकरी समाप्त भेला पनरहे-बीस दिनक पछाति मरि गेला। मुदा पेंशनक समस्या तँ उठिये गेलनि। जगदीश प्रसाद मण्डल त्रिपुरा जाइसँ पहिने हैदराबाद गेल रहथि। हैदराबादमे राष्ट्रीय स्तरक साहित्यिक, राजनीतिक कार्यक्रम छल। ग्रुपमे मधुबनी जिलासँ गेल छला। रेलक एक मासक पास सभ कियो बनबौने रहथि। मुदा रूटक हिसाबसँ बनल रहनि। ओही समए मधुबनी जिलाक पार्टी अन्तर्गत स्व. अनन्त भगत साहित्यिक मोर्चापर जिम्मामे रहथि। साधारण परिवारसँ आएल अनन्त भगत, जेहने पितमरू रहथि तेहने वफादार। आर्थिक स्थिति नीक नै रहलोपर पार्टीक होलटाइमर नेता रहथि। ओइ समए मधेपुरक भार हुनके भेटल रहनि। चारि दिनक कार्यक्रम हैदराबादमे छल। सािहत्यिक मंचपर प्रेम चन्द साहित्य छल आ राजनीतिक मंचपर देशमे कानून बनैक, ओकर व्याख्या आ िनर्णए लइमे कि समस्या अबैत अछि, तइपर विशद चर्चो आ आगूक लेल कार्यक्रमोक िनर्णए भेल छलै। प्रेमचन्द साहित्यपर विशद व्याख्या रमेश चन्द उद्घाटन भाषणमे देलनि। ओना ओ पंजाबक छलाह मुदा अंग्रेजीमे बाजल रहथि। कारण छल जे एक तँ दछिनी भारतमे कार्यक्रम छल, तहूमे जइठाम हिन्दीसँ अधिक अंग्रेजीक बोलवाला अछि। बहुत पैघ कार्यक्रम छल। एकमतसँ प्रेमचन्द प्रगतिशील विचारक साहित्यकार मानल गेलाह। राजनीतिक मंचपर मुख्य वक्ता छलाह-भूपेश गुप्ता जे राज्य सभामे लगातार एक सएसँ ऊपर बैसारमे सम्मिलित छलाह। कानून बनबैक प्रक्रियामे कि बाधा उपस्थित होइत अछि, तेकर विशद व्याख्या करैत कोन रूपमे काज कएल जाइत अछि, कहलनि। भूपेश गुप्त बंगालक छलाह। आजन्म अविवाहित रहलाह। एक संग स्व. इन्दिराजी (प्रधानमंत्री इन्दिरा गाँधी) स्व. ज्योति बाबू (ज्योति बसु, मुख्यमंत्री बंगाल) आ भूपेश गुप्त इंग्लैडमे कानूनक शिक्षा लेने रहथि। दोसर मुख्य वक्ता रहथि न्यायमूर्ति बी. आर. अय्यर। बी. आर. अय्यर सहाएब सुप्रीम कोर्टसँ सेवा निवृति भेल छथि। समस्याक िनर्णए करब कते कठिन अछि तइपर विशद भाषण देलनि। वएह बी. आर. अय्यर सहाएब जे १९६७ ई. मे बिहारमे महामाया बाबूक सरकारक भ्रष्ट पूर्वमंत्री सभपर जे आयोग बैसौने रहथि। एकटा जानल-मानल न्यायाधीश। तेसर मुख्य वक्ता छलाह, मध्यप्रदेश हाइकोर्टक एकटा सीनियर अधिवक्ता। न्यायालयमे बहस करैमे कि समस्या उपस्थित होइत अछि तइपर विषद चर्च केने रहथि। स्वभावो आ मेहनतोमे ओ सभ दछिन भारतक लोक भिन्न छथि। ओ सभ जी खोलि कऽ काज करैमे विश्वास रखै छथि। जगदीश प्रसाद मण्डलक अपन इच्छा छलनि जे किछु ग्रामीण क्षेत्र देखथि, मुदा से नै भेल। गाड़ीसँ (ट्रेन) जे देखबो केलनि ओ से नै भेल जे देखए चाहै छला। चारिये दिन हैदराबादमे रहबाक छलनि, तहूमे जइ कार्यक्रममे आएल छला ओ छोड़ि केना सकै छला। हैदराबाद शहरो नमहर। तैयो मुख्य-मुख्य जे दर्शनीय अछि से तँ देखबे केलनि। ऊषा कम्पनी, संगमरमरक पहाड़, चारमीनार, निजामक राजशाही मकान, झील इत्यादि देखलनि। काफी व्यस्त शहर हैदराबाद अछि। ओतए गाड़ी-सवारीक पर्याप्त बेवस्था अछि, मुदा तैयो काफी भीड़-भारबला शहर हैदराबाद अछि। खाइ-पीबैक िवन्यास अपना सभसँ किछु भिन्न अछि। मुदा देश स्तरक कार्यक्रम तँए देश भरिक खान-पानक बेवस्था रहबे करै। ओना कटहरक जे विन्यास छलै ओ अपना ऐठाम सँ भिन्ने नै नीको अछि। विदा होइ काल, वापसीमे किछु धड़फड़ी भऽ गेलनि। ओना टिकट आरक्षित रहनि मुदा प्लेटफार्मपर पहुँचैत-पहुँचैत गाड़ी खुजि गेलनि। सभ कियो (मधुबनीक) सभ दिस भऽ गेला। अगिला स्टेशनपर एकठाम हेता, लेडी कम्पार्टमेंट (महिला बोगी) मे चढ़ि गेला। अखन धरि महिला बोगी नै देखने छला। चढ़ि कऽ बइसौक जे विचार तँ सौंसे बोगी महिले बैसल देखलनि। टी.टी सेहो महिला। मुदा अपना ऐठाम जकाँ यात्री झौं-झौं कऽ नै छुटलनि। जगदीश प्रसाद मण्डल ओकरा सभ दिस देखैत जे किछु पूछतनि तखन ने कहथिन। ओहो सभ चुपचाप देखबो करैत आ मुस्कियो दैत। जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ कोनो चिन्ते ने रहनि। एक्के देशक रेलगाड़ीमे दू रीति अछि, तखन कि हेतै? किछु काल पछाति टी.टी. लगमे एलखिन। ओ बूझि गेल रहथिन जे ई उत्तर भारतक मेल गाड़ी छी। कहलकनि जे ई लेडी कम्पार्टमेंट छिऐ। ओना ओ हिन्दियेमे कहलकनि मुदा जहिना अपना ऐठामक मिड्ल स्कूलक बच्चा हिन्दी बजैत अछि तहिना। परिचयक जरूरी बूझि पड़लनि। अपना यात्राक चर्च करैत कहलखिन जे धड़फड़ा कऽ चढ़ि गेला तँए ऐ कोठरीमे चलि एला। ने तँ किअए अबितथि। कहलखिन जे आगू बदलि लेब, संगियो सभ छथिन, ओहो सभ भेट जेतनि। रामपट्टीक जहल बनि गेल छल। मुदा उद्घाटन नै भेने ओहिना पड़ल छल। नरकोमे कि कम ठेलम-ठेल होइ छै। मधुबनी चक्की वार्डमे जे दसो-बीस दिन रहल हेताह, हुनका मोने हेतनि। तइठाम साल के कहए जे कतेको सालसँ कतेको गोटे छलाह। आजादीसँ पहिनौं आ पछोँ मधुबनी जेलक चलती रहबे कएल। तइमे मुदा एकटा जरूर भेल रहै जे जेलक भीतरो विभाजित रहए, वार्ड न. ०२ राजनीति पार्टीबला सभकेँ रहै, बाँकी सहरगंजा। सहरगंजा ऐ लेल जे ने अपराध एक रंगक छै आ ने अपराधी। मुदा जेल तँ जेल छी मठाधीशसँ लऽ कऽ फुलतोड़ा धरि एकेठाम रहता। मुदा जहलोक कारोबारमे चोरी-चपाटी रहबे करै, कियो जलखैक बदाम चोरा लै तँ कियो गुड़। कियो करू तेल हेर फेर कऽ दै, कियो किछु। आजादीक समए मधुबनी जिला (तइ दिनक सवडिवीजन) जखन आजादीक सीमापर आबि गेल तखन कने भाषा-प्रेमी-अंग्रेजक देखिये ली। एकटा एस.डी.ओ. भेला ग्रियर्सन। जे गाम-गाम घूमि भाषाक मर्मकेँ बुझैक कोशिश केलनि। कोशिशे नै केलनि भोलूमक-भोलूम पोथियो लिखने छथि। पैघ-पैघ पुस्तकालयक सिंगारक वस्तु बनि जेवर-जेवरात जकाँ आलमारी धेने अछि। भाषा-साहित्यक लेल सरकारियो-गैर-सरकारियो संस्था सभ खूब काज केलक, मुदा ग्रियर्सनक कएल मैथिली सेवा आलमारीक दराजमे फँसि गेल अछि! जहिना साहित्य सृजन अनुभावात्मक आ बौधात्मक होइत अछि तहिना भाषाक सेहो अछि। मैथिली शब्दकेँ िसर्फ संस्कृतसँ आएल शब्द बुझै छी तँ मैथिली संग अन्याय होइ छै। न्याय तखन हेतै जखन मैथिली शब्दकेँ वैदिक जीवन-पद्धतिक शब्द रूपमे देखल जेतइ। एक-एक शब्द एक-एक जीवनक काजक नक्शा तैयार करैक शक्ति रखैए। संस्कृतक प्रभाव ऐ लेल मानल जाएत जे वैदिक भाषा संस्कृत रहल। ओना भाषाक दौड़मे आगू नै बढ़ब मुदा एकटा बात आवश्यक बूझि पड़ैए तँए वैदिक संस्कृतक शैली अनुभवात्मक अछि जखन कि लौकिक संस्कृतक भावात्मक बेसी। भावात्मक दिशा कल्पनाशील बनैत गेल। जेना-जेना भावात्मक दिशा मजबूत होइत गेल तेना-तेना साहित्य जिनगीसँ (जीवन पद्धति) दूर हटैत गेल। रामपट्टी जेलक उद्घाटन नै होइक कारण रहै जे प्रशासनसँ ठीकेदार धरि कियो फाइनल करैले तैयारे नै। किछु काज पछुआएल तँ किछु बिल-भुगतान पछुआएल। मुदा नजरि सबहक योजना खाइक पाछू। राज्य वामपंथी (भाकपा-माकपा) पार्टी अपन ज्वलंत समस्या सभ लऽ कऽ जेलभरो आन्दोलन केलक। ओना सौंसे राज्यक ज्वलंत समस्या सभ मुद्दा रहए मुदा मिथिलांचलक लेल दूटा प्रमुख मुद्दा छल। पहिल कोसी नहरिक संग नूनथर, शीशापानी आ बराहक्षेत्रमे डैम बना पनिबिजली उत्पादन कएल जाए जइसँ कृषिक संग उद्योगो धंधा बढ़तै। किछु गोटेक एहेन धारणा अखनो छन्हि जे कारखानाक जरूरति खाने क्षेत्रटा मे होइ छै। मुदा से नै, ईहो होइ छै जे जते-रंगक कारखाना अछि तइमे ५५ प्रतिशत जँ खान क्षेत्रक मालसँ चलैत तँ ४५ प्रतिशत कृषि उत्पादित वस्तुसँ सेहो चलैत। दोसर मुद्दा छल मैथिली भाषाकेँ सरकारी मान्यता भेटौ अर्थात् अष्टम अनुसूचीमे शामिल हाेउ। जइसँ मिथिलाक विकासमे एक कड़ी जुड़त। मधुबनी जिला बढ़ि-चढ़ि कऽ ओइ आन्दोलनमे हिस्सेदारी दर्ज करौलक। दर्जनो वकील सेहो रहथि। हजारसँ ऊपर कार्यकर्त्ता जेलमे रहथि। जइ दिन मधेपुर-लखनौर ब्लौकक समए (प्रदर्शनक संग जेल) रहै तइ दिन विस्फीक सेहो रहए। जगदीश प्रसाद मण्डल सभ जिला-कार्यालय (डी.एम. ऑफिस)क गेटक बाहर रहथि। पूर्वेजी (स्व. राजकुमार पूर्वे) कार्यालयक पैछला गेट देने आबि, पाछूमे ठाढ़ भेल एस.पी.केँ कालर पकड़ि लेलखिन। भीतर-बाहर हूड़-बड़ेरा भऽ गेल। लाठी चार्च भऽ गेलै। मुदा बहुत नै भेलइ। जगदीश प्रसाद मण्डल रामपट्टी जेल पहुँचला। बेरमाक अट्ठारह गोटे रहथि। नागेन्द्रजी (डॉ. नागेन्द्र कुमार झा, पैटघाट) आ जगदीश प्रसाद मण्डल सभ लेडी वार्डक ओसारा पकड़ने रहथि। जिलाक सभ विधायको आ विधान पार्षदो रहथि। विधायक रहथि पूर्वेजी (स्व. राज कुमार पुर्वे) तेजनारायण जी (श्री तेज नारायण झा) लाल बिहारीजी (श्री लाल बिहारी यादव) रमणजी (राम लखन ‘रमण’ भाकपा.क विधायक) पूर्व विधायक बैजनाथजी (श्री वैद्यनाथ यादव) चौधरीजी (श्री कृष्ण चन्द्र चौधरी)। जेलक भीतर दू बेर भाषण-भूषण चलै। मुख्य वक्ता रहथि चौधरीजी। माँजल विद्वान। भाषापर एते पकड़ रहनि जे एकाे शब्द कम-बेसी नै होन्हि। कोनो विषयकेँ यथास्थित व्याख्या करैक अद्भुत क्षमता रहनि। ओइ समए पार्टीक जनशक्ति दैनिक पत्रिका निकलैत छल। सम्पादक रहथि चौधरीजी। जगदीश प्रसाद मण्डल जनशक्ति पत्रिकाक संवाददाता रहथि। स्व. कृष्णचन्द्र चौधरी नीक वक्ता छलाह। लिखबो नीक करैत छलाह। मैथिलीमे तँ भरिसक नै मुदा हिन्दी-अंग्रेजीमे कतेको पोथी लिखने छथि। जेहने विद्वान तेहने सुभ्यस्त परिवारक सेहो छलाह। पानो खूब खाइ छलाह आ सिगरेटो पीबैत छलाह। जेल तँ छुच्छे देहे आबि गेलाह मुदा भिनसरू पहर चाह पीला पछाति पान खाइले मन छटपटाए लगलनि। जगदीश प्रसाद मण्डल सभ पानक ओरियान कऽ कऽ रखने रहथि। जहलो कोनो जहल जकाँ नहियेँ रहै। ने सरकारी पर्याप्त स्टाफ रहै आ ने सरकारी बेवस्था। अपने सभ सभ किछु। गेटो खुजले रहै। भीतर बाहर प्रदर्शनकारी लोक सौंसे टहलैत। बेरू पहर ढोलकपर अल्हा होइ। चौधरीजीकेँ चाहोक हिसाब नहियेँ रहनि। आबथि तँ जगदीश प्रसाद मण्डल चाह पिआ पान खुअबथिन। तेकर बाद गप-सप शुरू होइ। ओना बिहारक कतेको जिलाक प्रदर्शनकारी दुइये दिनक पछातिसँ निकलए लगलाह। मुदा मधुबनीक मारि-पीट केस भरिया देलकै। दू दिनक पछाति भोगेन्द्रजी सेहो दरभंगा जेलसँ निकलि मधुबनी जेल चलि एलाह। तेरह दिनक पछाति निकलैक आदेश आएल रहै। मुदा सभक नै। ३५ गोटेकेँ मुजफ्फरपुर जेल पठबैक आदेश सेहो आएल रहै। तेरहम दिन निकलै बेर कियो निकलैले तैयारे नै भेलाह। किछु विदाइ भेने बिना केना निकलताह। गप उठल धोती-कुर्ता, गंजी-गमछा आ चद्दरिक मुदा से नै भेलै। होइत-हबाइत एकटा लूंगी आ एकटा गमछा सभकेँ भेटलनि। पार्टी आन्दोलनक अंतिम जेल यात्रा छलै। तेकर बाद जे जगदीश प्रसाद मण्डल गेबो केला तँ एक-दिना-दु-दिनामे। जे कएक बेर थानेसँ चलि आबथि। ओना जगदीश प्रसाद मण्डल सभ दोहरी जेलक यात्री रहथि। अपनो गाममे तते मुकदमा भऽ गेल रहनि जे एक ने एकटा वारंट सभ दिन रहबे करनि। दू हजार ईस्वी अबैत-अबैत सभ केश समाप्त भऽ गेलनि, खाली दूटा शेष बँचल रहलनि। एकटा ३०७ (हत्याक प्रयास) जे हाई कोर्टमे छलनि, दोसर ४३६ (अगिलग्गी) जे डिस्टिक जजक कोर्टमे छलनि। जहिना बाढ़िक पानि पोखरिमे प्रवेश करैकाल सौंसे पोखरिक पानि गतिशील भऽ जाइए आ घुमती बेर (बाढ़ि सटकैक समए) धीरे-धीरे गतिहीन हुअए लगैए तहिना मुकदमाक दौड़मे भऽ गेलनि। मुदा अस्थिर नै भेल छलै। कारण दुनू केश शेसन छलै। असथिर ई भेलै जे जिलाक केश (अगिलग्गीक) क फाइले तरमे पड़ि गेल आ हाईकोर्टमे दौड़-बरहा कम होइ छलै। अखन धरि माने २०००ई.सँ पूर्व जगदीश प्रसाद मण्डल देशक आधासँ बेसी भ्रमण कऽ नेने छलथि। एक दिस देशक आर्थिक राजधानी मुम्वई देख नेने छलथि तँ दोसर दिस नागालैंड-अरूणाचल सेहो देखने छलथि। रविन्द्र बाबूक (महर्षि रविन्द्र नाथ टैगौर) शान्ति निकेतनक संग सुन्दर वन, गंगासागर, कबीर दासक गाड़ल खन्ती समुद्रक कात, तँ सूर्य मंदिर सेहो देखने छला। रंग-रंगक द्वैत (द्वन्द्व) एक दिस जँ हजारी बाबूक (आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी) जे शान्ति निकेतनमे १९३० ई.सँ १९५० ई. धरि हिन्दीक अध्यापक रहलाह। सिरीसक फूलक महमहीसँ मुग्ध होइत रहथि तँ दोसर दिस मिथिलांचलमे ई सिरीस बर्जित अछि! ने घरक काजमे आऔत आ ने चौकी, कुरसीक काजमे! ततबे नै, फलक गति सेहो सएह। गाछ तँ बड़का-बड़का होइ छै जहिना कहबी छै “मनुख तँ बलवीर मुदा मोछ ने तँ किछु ने।” तहिना। मन मानि गेलनि जे पुरबा-पछियाक लहड़ि छी। फूलक लेल केहेन गाछ लगाओल जाए, फूलक संग फलक लेल केहेन गाछ लगाओल जाए आ बिनु फूल-फलक गाछ कतए लगाओल जाए, ई तँ प्रश्न भेलनि। मुदा पछियाकेँ पूर्वाक लपेट तर कऽ दइ छै। जँ से नै करै छै तँ मिथिलांचलक भूमिमे कतए कहाँसँ आबि बोन-झाड़ लागि गेल छै, जइठाम एक-सँ-एक फल, एक-सँ-एक फूल आ एक-सँ-एक सुकाठ लकड़ीक बास भूमि छी। मिथिलांचलक विकास तखन हएत जखन मिथिलांचलकेँ गहराइसँ अध्ययन कऽ अनुकूल परिस्थिति बना उपयोग हएत। यात्राक दौड़मे राजस्थान सन दर्शनीय जगह सेहो छुटले छलनि। यात्रा तँ गरपर छलनि मुदा समैओ आ पाइओक तंगी छलनि। ममियौत भातिज राजस्थानक पाली जिला अन्तर्गत डी.एल.एफ. सिमेंट कारखानामे सुपर-वाइजर छलखिन जे बेर-बेर अबैक बात करैत रहथिन। ओना ओ (तेज नारायण मण्डल) पढ़ल-लिखल नै। कोसिकन्हा भेने गामक स्कूलो नष्ट भऽ गेलनि आ गामो। जमीन-जत्था गुजर करैबला जरूर छै मुदा कोसी-कमलाक बीच पड़ि गेल छै। भागि कऽ ओ राजस्थान चलि गेला। डी.एल.एफ. सिमेंट कारखानामे उट्ठा मजदूरक रूपमे नोकरी भऽ गेलनि। एन.के. पारीख नाओंक एक गोटे जे चारि कोठरी मकानो बनौने छलाह आ ओही सिमेंट कारखानामे नीक पदपर सेहो छलाह, हुनके मकानमे एकटा कोठरी भाड़ा लऽ तेज नारायण रहए लगला। धीरे-धीरे दुनू गोटेक बीच संबंध बढ़ैत गेलनि। हुनकर (एन.के. पारीखक) सासुर नेपालक काकरभिट्टा तँए पत्नी मिथिलांचलसँ परिचित, सम्बन्धक मजबूतीक कारण वएह भेल। भाए-बहिन जकाँ दुनूक सम्बन्ध बनि गेलनि। एक-दोसरक पारिवारिक जिनगीक सम्बन्ध बढ़लनि। एन.के. पारीख तेजनारायणकेँ कहलखिन जे बैसारीमे पढ़ा देब। सचमुच पढ़ा कऽ कारखानाक सुपर-बाइजर बना देलखिन। जगदीश प्रसाद मण्डल मनमे अँटकारि लेलनि जे मात्र जाइ धरिक समस्या छनि। जखन जेता तँ एतबो ओ नै करत? देखैबला जगहो देख लेता आ ओइठामक माटि-पानि-हवाक क्षेत्रो देख लेता। एक दिन एहिना किछु पारिवारिक आमदनी भेलनि, उठि कऽ विदा भेला। असगरे घुमैक स्वभावो छलन्हिये। दिल्ली होइत राजस्थान पहुँचला। सुपर-वाइजर भेला पछाति तेजनारायण अपना परिवारो (पत्नी) आ एकटा भाइयोकेँ गामसँ लऽ गेला। भाएकेँ ओइ कारखानामे नोकरी धड़ा देलखिन। एन.के. पारीखक मकानसँ हटि तीन कोठरीक मकान भाड़ा लऽ रहए लगला। पैखाना कोठरीक ओतेक जरूरी नै, एक तँ क्षेत्रक हिसाबसँ पातर जनसंख्या दोसर झाड़दार सांगरीक (बगूर जकाँ पातो आ काँटो होइ छै) छिटफुट गाछक परदा। बससँ उतरि सोझे कारखाना गेला आ ऑफिसमे भातीजक सम्बन्धमे पुछलखिन। तेजनारायण ड्यूटीमे नै रहथि। एक गोटे पटनाक संग भेलखिन आ तेजनारायणक डेरापर दोसरि साँझ होइत पहुँचा देलखिन। बिजलीक इजोत। बगलमे तीस-चालीस दोकानक छोट-छीन बाजार। जइ बीच होइत बसक रास्ता। अन्हार रहने बेसी नै देखि पेला। चैत मास रहने गरमी खूब पड़ै, दस बजेक बाद घरसँ िनकलैक मन नै होइ। मुदा बारह बजे रातिक पछाति (जेना-जेना राति ढलै) मोटगर चदरिक जरूरति भऽ जाइ छलै। रहैले एकटा खाट, सिरकक संग भेटल छलनि। भिनसर होइत देखैक अवसर भेटलनि। डेराक आगूमे चारि-पाँचटा अशोकक गाछ लागल, मझोलके गाछ। मकान मालिकक घर अधा किलोमीटर हटि कऽ रहै। मुदा मालक घर बगलेमे बनौने रहए। मालो कि बिनु बच्चा दूटा तौड़िया महींस। तीन बापूत मकान मालिक। पिता बुढ़े जे बेसीकाल महींसक ताक-हेरि करैत छल। एक भाँइ ओही सिमंेट कारखानामे नोकरी करैत छलाह। आ दोसर खेती-गिरहस्तीसँ लऽ कऽ महींस दुहनाइ आ मोटर साइकिलपर दूध बेचनाइ धरि। तीन-किलो मीटरपर एकटा दोकानदारकेँ प्रतिदिन दूध दइत। साइठ बीघा जमीनो रहनि आ एकटा बोरिंग सेहो। शुद्ध दोखरा बालुक खेत। पहाड़-बालुक क्षेत्र। गाछक रूपमे मात्र सांगरी। पहाड़क अतिरिक्त खेत सभमे पाथरक छोट-पैघ टुकड़ा ओंघराएल। पराते भने मकान मालिकसँ चिन्हा-परिचय भऽ गेलनि। पँइसठि-सत्तरिक उमेर, देहमे मात्र एकटा धोती। परात भने जखन बेटा महींस दुहए लगलनि तँ जगदीश प्रसाद मण्डल देखलनि जे दूध तँ कमे भेलै मुदा ओइमे पानि ढारि देलकै। पुलखिन जे पानि किअए देलिऐ? जबाव देलकनि जे जँ दूधमे पानि नै देबै तँ महींसक थन जरि जाएत! जबाव सुनि किछु फुड़बे ने कएलनि। आेहो चलि गेलाह। तेसर दिन अजमेर दरगा देखैक कार्यक्रम बनलनि। बहुत सुन्दर स्थान। पहाड़ी इलाका तँए बेसी चिक्कनो-चुनमुन। स्थानक पूबारि भाग ऊँचगर पहाड़। पहिने तँ मनमे भेलनि जे हिन्दूकेँ रोक हेतै मुदा से नै। देखिनिहारमे बेसी हिन्दू। कबूलो-पाती बेसी। स्थानक भीतरे रहथि कि गांजा-बाजाक संग एकटा जुलुस देखलनि। हाथी, ऊँटक संग मनुखकेँ चलबैत चरिपहिया गाड़ी (बिनु इंजिनक, आगू-पाछू आदमी ठेलैत) मर्द-औरतसँ सजल जुलुस। रंग-रंगक बबाजियोक समूह। नंगासँ लऽ कऽ रइस धरि। दरगा देखलाक पछाति पुष्कर गेला। अजमेरमे आम, जामुन, लताम इत्यादिक गाछ सेहो देखलनि। गुलाब फूलक खेती बहुत बेसी। पुष्कर एकटा नमहर पोखरिनुमा अछि। जइपर ब्रह्माक मंदिर अछि। अनेको धर्मशाला आ अनेको घाट बनल अछि। जहिना दरगामे भीड़ तहिना पुष्करोमे रहए। ओना जेबाकाल जयपुरेमे बससँ उतरला। मुदा रातिमे गेला। भोरे अन्हरगरे दोसर बस पकड़ि लेलनि तँए देखैक अवसर ओइ दिन किछु नै भेटलनि। अजमेरक तेसरा दिन पछाति जयपुर पहुँचला। सचमुच कला-कृत्ति श्रेष्ठ छै खास कऽ प्राचीनक। मीराक स्थान (मैरता) सेहो गेला। बसनुमा रेलक गाड़ी चलै छै। एकटा मंदिर अछि जइमे अनेको मूर्ति अछि। मंदिर बहुत नमहर नै मुदा छिपगरो नै। ढोलपेटा जकाँ अछि। अोना भीतर एबा-जेबा लेल लोहाक केबाड़ी लागल। मुदा सदिखन लगले रहै छै। छाती भरि ऊपर चारू कात नमगर-चौड़गर खिड़कीनुमा मोटगर लोहाक सरी लागल छै। जइ होइत चारू कात घूमि कऽ देखल जाइत अछि। भीतरमे राजदरबारक दृश्य बनल छै। जहिना राजदरबारमे सभ किछु सजल रहै छै तहिना सभ किछु सोनाक बनल छै। ओना देशमे एक-पर-एक स्थानो अछि आ मंदिरो अछि। जहिना कलाक क्षेत्रमे अछि तहिना आर्थिक क्षेत्रमे। मुदा मूल वस्तु अधिकांश स्थानक गाइब अछि। ओ छी ओकर महात्म्य। उदाहरणक रूपमे “कामरूप कामाख्या” कामरूप कामाख्यामे सभ कथूक बलि प्रदान होइत छै, मुदा दोसर-तेसरमे अंतर छै। किछु स्थानमे खास चीजक बलि पड़ै छै। तहिना परसादो अछि। जगन्नाथक परसादक अलग रूप-गुण अछि। ओना कोनो स्थानक महगाइक परिचय बारहो मास रहलापर होइ छै, से तँ राजस्थानमे नै रहला, मुदा जतबे दिन रहला तइमे देखलनि जे बीतभरिक सजमनिक दाम, जेकर दाम अपना ऐठाम आठो आना नै हेतइ ओ दस रूपैयामे बिकाइत। १९९९ ई.मे गेल रहथि। तीन रूपैये चाह बिकाइत छल। तहिया अपना ऐठाम एक रूपैये कप बिकाइत छलै। तीन रूपैये पान बिकाइत छल अपना ऐठाम बारह आना रहै। एक तँ अपना सभ जकाँति सैकड़ो अन्न दोकानमे नै देखलनि मुदा अन्नक भाउमे अपना सभसँ कम अन्तर छलै। किछु सस्तो छलै। जना चीनिया बदाम। चीनिया बदामक खेती होइ छै। खएब-पीअब अपना सभ जकाँ नै, सीमित जिनगी सीमित भोजन। गरीबी सेहो छै। मुदा अपना ऐठामक कारण भिन्न अछि ओइठामक कारण भिन्न छै। जहिना नाओं मरूभूमि तहिना सचमुच मरलो अछि। ने अपना सभ सन मौसम सुहावना आ ने गाछ-बिरीछक आनन्द। मुदा राजाघराना आ औद्योगिक घरानाक बसने कलो-कारखाना आ आरामदेह गाड़ियो-सवारी। ओना ठीक-ठीक नै बूझल छलनि मुदा चारू कात जे छहरदेवाली देने रहै ओ दस किलो मीटरसँ बेसियेमे बूझि पड़लनि। बीचमे सिमेंटक कारखाना बनल। पानि, बिजलीक बेवस्थाक खास बेवस्था सेहो। कारखानासँ दछिन नमगर चौड़गर पहाड़ छै। जइमे सँ डायनामाटिसँ तोड़ि पाथर अबै छै। ओना तीन हजारसँ ऊपर श्रमिक कार्यरत मुदा बिना ठौर-ठेकानक। किछु गोटे छथि जिनका दरमहो नीक छन्हि आ आनो आन सुविधा छन्हि मुदा अधिकांश श्रमिकक जिनगीक कोनो ठौर-ठेकान नै छन्हि। ने कर्मचारीकेँ रहैले आवासक बेवस्था छै आ ने नीक मजूरीक। कारखानाक जे मुख्य प्रबंधक छलाह ओ सेवा-िनवृत्ति आइ.ए.एस छलाह। कारखानाक भीतरे नीक आवासक बेवस्था छलनि। दरमहो नीक। मिथिलांचलक दुर्भाग्य ईहो अछि जे सेवा-निवृत्ति नीक-नीक पदाधिकारियो आ अध्यापको दोहरा-दोहरा नोकरी करए लगलाह अछि। आँइ यौ, अहाँले वानप्रस्थ आश्रम/ सन्यास अवस्था कहिया आओत आकि अबै-ने देबइ! जइठाम मिथि-मालिनक एहेन स्थिति रहत तइठाम भगवान मालिक छोड़ि के हेताह? काँच माटिक एकटा दिआरी बना लिअ। फाटल-पुरान साड़ी फाड़ि टेमी बना लिअ। कड़ू तेलक मालीमे मखा दिऔ आ साँझू पहर डिहवार स्थानमे लेसि दिऔ आ एकटंगा दऽ दुनू हाथ जोड़ि मांगि लिअ जे विद्या दिअ, धन दिअ, समांग दिअ!! मुख्य प्रबंधककेँ देखि मनमे उठलनि जे कि सेवा-िनवृत्तिक पछाति जे नोकरी केनिहार छथि ओइसँ भ्रष्टाचारकेँ बल भेटै छै। चौथाइयोसँ कम कर्मचारीकेँ स्थायी नोकरी भेटल छलनि। जिनका किछु-किछु सुविधो छलनि। बाकी तीन-चौथाइ ठीकेदारक अन्तर्गत काज करैत। ओना दरमाहा कम जरूर छलनि मुदा गामक बोनियातसँ बेसी छलनिहेँ। काजक ढंगो बेवहारिक। जना दूटा सुपर-बाइजर छलाह। दुनूक बीच एकटा मोटर साइकिल। चौबीसो घंटा कारखाना चलैत अछि। जइ सुपार-बाइजरक ड्यूटी समाप्त भेलनि ओ मोटर साइकिलसँ डेरा जेता, ओही गाड़ीसँ जइ गाड़ीसँ ड्यूटी करैबला सुपर-बाइजर आएल छलाह। तँए ड्यूटीक हिसाव लेनिहार संगी भऽ जाइ छलनि। तँए सभ अपन ड्यूटीक पक्का छलाह। दोखरा बालु सभठाम एके रंग नै। कतौ-कतौ मेही बालु सेहो छै जेकरा खेतीक उपयोगमे आनल गेल छै। बहुत तरमे पानि (लेअर) तँए बोरिंगो महग। गहुम, बदाम, चीनिया बदाम, बाजरा, ताेरक खेती ठाम-ठीम रहै। अपना सभ जकाँ ने रंग-रंगक पशु आ ने पक्षी। गोटि पंगरा-मोर। अपना ऐठाम जेरक-जेर कौआ, मेना, बगरा-बुगरी अछि से नै। वातावरणो अनुकूल नै। ने रहैले गाछ-बिरीछ आ खाइक रंग-रंगक वस्तु आ ने पीवैक पानिक बेवस्था। गोटि-पंगरा गाइयो मुदा खढ़-पानिक अभाव जेर बनौने। भिनसरू पहरकेँ ट्रैक्टरपर हरिअरो आ सुखलो ठठेर नेने अबै आ छीटि दइ। गाए-सभ अपन-अपन खाए। परबा सेहो छै मुदा खाएब वर्जित। जँ खेबै आ पकड़ा जाएब तँ जुर्माना लागत। राजस्थान जाइसँ डेढ़ बर्ख पूर्व पनचानबे बर्खक अवस्थामे जगदीश प्रसाद मण्डलक माए मरि गेली। माइक अंतिम दर्शन। दिनक बारह बजैत। जगदीश प्रसाद मण्डलक पत्नीकेँ ओ कहलखिन- “तूँ सभ खाइ-पीबै गेलह?” पुतोहु- “हँ।” “बच्चा, गाममे अछि किने?” खाइ कालमे देखिनेहि रहथिन, मुदा लगले विसरि गेली। मनमे शंका भेलनि। “हमरो कने बिछान कऽ दाए।” पुतोहु ओसारेपर बगलेमे बिछान कऽ देलकनि। बैसले-बैसल घुसुकि कऽ बिछानपर पहुँचिते पड़ि रहली से पड़ले रहि गेलीह! एकादशीक दिन। अंतिम समए धरि माएकेँ आशा नै टुटलनि। जिनगीमे नमहर-नमहर दुर्दिन सेहो एलनि, तँ सेवो एते मजगूत रहलनि जे आशाक बाट पकड़नहि रहलनि। सुभ्यस्त परिवारमे माइक जन्म भेल छलनि। दू भाए-बहीनिक बीच पिताक परिवार छलनि। बहीनिक बेटा नर्सिग मण्डल दीप गामक छलखिन। जिनका १९४२ ई.मे झंझारपुर सर्कलक आन्दोलनमे गोली लागल छलनि। दुनू गोटेक (जगदीश प्रसाद मण्डल आ हुनको) मात्रिक मनसारा (दरभंगा जिला, घनश्यामपुर ब्लौक) एके परिवार। बेरमामे माइक सासुर, दीपमे पीसक (दीदीक, जिनकर बेटा नरसिंग मण्डल) सासुर, गोधनपुरमे जेठ बहिन जे सात भाए-बहिनमे सभसँ जेठ। मनसारा परिवार सम्पत्तियेमे अगुआएल नै समांगोमे अगुआएल। माइक मौसीक सासुर बेरमे। हुनके परिवारक पोखरि अधिकारी पोखरिक नाओंसँ जानल जाइत अछि, जे जगदीश प्रसाद मण्डलक घरक बगलेमे अखनो कारगर अछि। घरे-घरे कल भेने नहाएब तँ कमि गेल छै मुदा माछ-मखानक बखारी छै। तहिना एक लकीरमे तीनटा इनार सेहो छलनि, जे भग्नावशेष मात्र रहि गेल छै। तीन भाँइक भैयारीक बटबारामे चानीक रूपैया गनि कऽ नै तराजूपर तौल कऽ बारह-बारह पसेरीक बटबारा भेलनि। आेइ परिवारक लागिमे जगदीश प्रसाद मण्डलक पिताक बिआह हेबाक कारण छल पैछला इतिहास। जइमे कूल-मूलसँ लऽ कऽ पारिवारिक बेवहार धरि अबैत अछि। जगदीश प्रसाद मण्डल सँ ऊपर सीढ़ी धरि परिवारमे हर जोतब आ गाए दूहब वर्जित छल। मुदा आब नै। मौसीक (माइक मौसी) अनुशंसासँ माइक बिआह एक साधारण परिवारमे भेलनि। घरदेखीमे पाँच गोटे जे एलखिन से पाँचो पाँच रंगक। अपन-अपन नजरिये सभ परिवार देखलनि। एकटा नमगर-छड़गर खलीफा सेहो रहथिन। खेला पछाति घरसँ जखन निकलए लगलाह तँ चौकठिमे कसि कऽ चोट लगलनि। ओइ तामसपर बाजि गेलाह जे एहनो ठाम कुटुमैती करब। जेकरा घर ने दुआर छै। मुदा सभ चुपचाप सुनि लेलनि। मौसीक (माइक मौसी) जिज्ञासा रहनि जे अपना सम्पति नहियेँ छै तँ कि हेतै। अपना खेत-पथार, पोखरि-इनार तखन दुख कथीक हेतइ। कारणो छलनि जे सासुर किछुए दिन बसला पछाति विधवा भऽ गेल रहथि। दोसर सिफारिश (माएक बिआहक) मौसीक रहनि। माइक जेठ बहिन गोधनपुरमे। गोधनपुर बेरमा सटले अछि। सात भाए-बहिनमे मौसी सभसँ जेठ आ माए सभसँ छोट। करीब तीस बर्खक दूरी। ओना ओहो पुत्र विहीन विधवा भऽ गेल छलखिन। मुदा दूटा सन्तान तँ छलनिहेँ। हुनको सिफारिश भेलनि। तेसर सिफरिश दीपक (नरसिंह भाइक) दीदीक भेलनि। परिवारमे महिला समूहक विचार काटब कठिन भऽ गेलै। माएक बिआह भऽ गेलनि। ३५ बर्खक आयुसँ पहिने विधबा भऽ गेलीह। पिता मृत्युक पछाति करीब साठि बर्ख जीवित रहली। ऐ साठि बर्खमे एकटा (नैहरक) सुभ्यस्त परिवारकेँ उजड़ल-उपटल देखलखिन। कोसी-कमलाक चपेटमे मनसारा गाम उजड़ि गेल। बीच बस्ती (पुरना बस्ती) देने कमला बहि रहल अछि। तीनू भातिज आ दुनू पोताकेँ एक-एक साल जहलमे बन्न देखलनि। विधवा मौसी देखलनि, विधवा दीदी आ बहिन देख अपनो वैधव्य स्वीकार केलनि। नरसिंह भायकेँ गोली लागल देखलनि। ततबे नै देखलनि, परिवारक भागिनक उजड़ल परिवार (हरिनाही) सेहो देखलनि। जिनगीक धक्के ने पंजा मजगूत करै छै! मनसारा उजड़लासँ दीप, गोधनपुर आ बेरमाक एक परिवारसँ सम्बन्धित रहने सम्बन्ध मजगूत भऽ गेल। परिवारक दू सूत्र अछि। एक वंशगत दोसर बेवहारगत। एकठाम रहने आ एकठाम नै रहने (हटि कऽ रहने) सम्बन्ध प्रभावित होइते अछि। नरसिंह मण्डलक परिवार आ बेरमाक परिवारमे मात्रिकक सम्बन्ध बनि गेल अछि। जखन नरसिंह मण्डलकेँ गोली लगलनि, इलाजक दरमियान बहुत दिन धरि बेरमेमे रहलाह। माएक मुइला पछाति सराधक सवाल उठलनि। स्थिति नीक नै छलनि, मुदा समाजो तँ ऐ समस्याकेँ मेटा चुकल अछि तँए तेहेन समस्या नहियेँ बूझि पड़लनि। मुदा मनमे दूटा सवाल अपनो उठल रहनि, बाजथि नै। कारण स्पष्ट, बरिआतीक मरजादी भोजक ठहाका तँ नै, तीस-चालीस हजारक काज। प्रश्न रहै जे एक बेर खेलहो-बिनु-खेलहोकेँ खुआ सम्बन्ध तोड़ि लेता। भेरि पेट भोज खाइ दुआरे दिन-रातिक समए लुटा देल जाए, ई नीक नै भेल। मुदा डर ईहो रहनि, एहनो लोकक तँ कमी नै जे अनका ऐठाम पल्था मारि दइ छथिन आ अपना बेरमे...। दोसर कारण मनमे नचैत रहनि जे कर्मकांडकेँ तँ हटेलनि, मुदा भोज तँ लधले रहि गेलनि। एक दिस दिस होइनि जे एक बेर भोज खुआ हरदा बजा दैथि, कम-सँ-कम एतबो तँ हएत जे पाँच गामक पंचो आ समाजो आँखिक सोझमे देख लेथिन। मुदा किछु बाजथि नै। मुदा अखढ़ुआ मेघ तड़तड़ाएल। तेराति (सारा बनौला पछाति) िदन सराधक गप-सप उठल, पिसिऔत भाय (गोनर मण्डल) आबि कऽ (हरिनाहीसँ बेरमा) चालि देलखिन जे मामी तँ बेटे जकाँ पोसलनि तँए हम भोज करबै। आठ बर्ख पहिने गाया सेहो लऽ गेल रहथिन। अपन स्थिति (गोनर मण्डलक) ओते नीक नै, मुदा छोट भाएक बेटा सभ (पाँचो भाँइ) कमासुत तेकर हूबा रहबे करनि। भातिजकेँ पिताक बिमारीक खिस्सा बेर-बेर सुना तैयार (भोज करैले) कऽ नेने रहथि। ओ सभ (भातिज) गछि लेलकनि। जहिना पोखरिमे माछ चाल दैत तहिना भैयाक चाल देखि (जेठ भाय, जे पहिनहि मरि गेल छलाह) भौजी परिवारसँ चाल देलखिन जे जते ओ (पिसिऔत भाय गोनर मण्डल) करथिन तते हमहूँ करबै। कारण छलनि जे दूटा बेटा दिल्लीमे नौकरी करए लागल रहनि। जगदीश प्रसाद मण्डल हिसाब जोड़थि तँ देखथि जे दूटा भोज पचगामामे भेल जइमे तीस-पइतीस हजार खाइ-पीबैमे आ तीस-पइतीस हजार क्रिया-कर्ममे होइ छै। अपन हिसाब आधामे जोड़थि। एकटा नव बीमारी गामक भोजमे सेहो पकड़ि लेने रहै जे मिठाइक भोज रसगुल्लाक भोज भऽ गेल रहए। भोजपर नजरि जाइनि तँ मन भटकि जाइनि। होइनि जे अनेरे फेरामे पड़ता। कर्मकांड अजसक कांड छी। भनसियाक गलती वा बारिकक गलती भोजैतकेँ चटैत अछि। तइ संग मनमे एकटा ईहो उठैत रहनि जे अखुनका जे पचगामा बनल अछि, ई तँ हालमे बनल अछि। एकर खेबे कते केलिनि। भोज खेने छथि ननौर, भोज खेने छथि लकसेना, परसा इत्यादिमे। से तँ आब फुटि कऽ ओहो दोसर दिस चलि गेलै आ जगदीश प्रसाद मण्डल सभ दोसर दिस भऽ गेला। अपन आँट-पेट देखथि तँ चौथाइपर बूझि पड़नि। भात-दालिक भोज केलनि। जहिना कथा गोष्ठी “सगर राति दीप जरय”मे भाय-बंधुकेँ करौने रहथि, तेहने भोज केलनि, नीक जस भेलनि। भोज खुआ भोज खाएब छोड़ि देलनि। माइक मुइला पछाति, जना कुम्हारक आबामे ढबािह लगै छै तहिना ढबाहि लगि गेलनि। किछुए दिनक पछाति सासु मरि गेलनि। हुनको उमेर करीब नब्बे बर्ख छलनि। ओहू भोजकेँ छोट केलनि। छोट एना जे तीन-भाए एक बहिनक बीच सासुक सराध। जेठ भाय सरकारी नोकरी करैत तँए सरकारी धाही। पत्नीसँ तकरार हेबे करतनि। मुदा सुतरलनि। नैहर लग रहने पत्नी माएक जीवित मुँह देखए गेलीह से भरि सराध रहिये गेलीह। जगदीश प्रसाद मण्डल अनठा देलनि। मुदा सासुरेसँ समाद पहुँचलनि जे एक-सवा सए कठिआरी गेल रहै, तेकर खर्च अपने लागत किने। सुनि कऽ अनठा देलनि। जखन आठ दिन बितलै, परसुए नह-केश हएत तँ समाद पठा देलनि जे अहाँ सभ अशौचक भोज नह-केश दिन करै छी। हम सभ (बेरमा) छोड़ि देने छिऐ तखन अहीं कहू जे हमर आएब उचित हएत। मुदा खूब घौचाल भेलै। दुइये दिनमे कते घौचाले हएत, अनठा देलनि। सासुर बिसरलो ने रहथि आकि नरसिंह मामा (करीब ८०-८५ बर्खक रहथिन) मरि गेलखिन। मुदा दीपक भोज नमहर होइतो छोट होइ छै। गाम नमहर तँए सौंसे गामक भोज करैत-करैत भोजैतक दम खड़ा जाइ छै। मुदा आन गाम तँ एको घरक किअए ने हुअए ओ तँ गामे कहाएत। संयोग थोड़ेक नीक भेलनि जे मृत्युसँ करीब आठ बर्ख पूर्व स्वतंत्रा सेनानी भेट गेल रहनि। जइसँ दू-अढ़ाइ बीघा खेत कीनि लेलनि। स्वतंत्रता सेनानी भेटैसँ पूर्व गामेमे एक गोटे ऐठाम नौकरी करए लागल रहथि। जे पेंशन भेटलापर छोड़लनि। चारिम भेलनि जे पत्नीक मामा (ममिऔत ससुर) सेहो ओही पतिआनीमे चलि गेलनि। ओना हुनको उमेर अस्सी पार कऽ गेल रहनि। मुदा ओइठामसँ आबा-जाही नै रहने कोनो भारे ने पड़लनि। एक पीढ़ीक (पुरान पीढ़ीक) अन्त भऽ गेलै। जगदीश प्रसाद मण्डल लेल १९९९ ई. अबैत-अबैत आशा-िनराशाक बीच संक्रमणक स्थिति बनए लगल रहनि। १९९८ ई.मे दफा ३०७क केसमे सजाए भऽ गेल रहनि। हाइ कोर्ट अपील होइमे २०-२५ दिन लागि गेलनि। तइ समैमे रामपट्टी जेलमे रहथि। मने-मन आश्चर्य होन्हि जे बिना किछु केनौं जहलमे छथि। तहियो आ अखनो मन नै मानि रहल छलनि जे कोनो गलती हुनकासँ भेल हुअए। खएर, अपील भेल, जमानत भेलनि। वर्माजी (माननीय न्यायमूर्ति वीरेन्द्र प्रसाद वर्मा, पटना हाइकोर्ट) केँ फोन केलखिन तँ कहलकनि जे किछु ने हएत, निचेनसँ अपन काज करू। सएह भेल। केस समाप्त भेल गेलनि से चारि मासक पछाति बुझलखिन। तेकर कारण रहए जे केस पैरवी करैक जिम्मा नै रहनि। जखन बहुत अधिक केस भऽ गेल रहनि तखन अपनामे विचारि लेलखिन जे एक-एक केसक भार सभ कोइ आपसमे लऽ लिअ। जखन केस खुजत आ खर्च बढ़त तखन चन्दा कऽ लेब तइ बीच एक आदमीक जिम्मामे रहत। हाइ कोर्टबला ३०७-केस पहिनहि जजमेंट तकक खर्च जमा भऽ गेल रहै। तँए नै बूझि सकलाह। दोसर केस जे बचल रहै तइमे समझौताक बात भऽ गेल रहनि। ओना तैयो किछु गोटे छह-पाँच कऽ देबे केलकनि। तँए केसक चिन्ता मनसँ हटि गेल रहनि। ओना तीन बर्खक वारंटक पछाति केसक भाँज तखन लगलनि जखन थानासँ सूचना भेटलनि। झंझारपुर-मधुबनीक बीच जे कोर्टक हेरा-फेरी भेल तइमे केस हरा गेल छलै। फास्ट-ट्रेक कोर्ट खुजला पछाति जखन ताक-हेर भेल तखन भेटलै। किछु गोटे (२८गोटेमे) मरि गेल रहथि, जइमे तीनटा मुद्दालह आ दूटा गवाह सेहो। संगठनक रूप सेहो छिड़िया जकाँ गेल रहनि। तेकर बहुत रास कारण छलै। सामाजिक, आर्थिक, साम्प्रदायिक इत्यादि। जहिना अंतिम केस छलै तहिना समाजक अंतिम अस्त्रक प्रयोग नीक जकाँ भेलै। मुदा जे भेलनि, दिनांक ५-५-२००५ ई.केँ समाप्त भऽ गेलनि। तइ बीच जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ दोसर दिस बढ़ब उचित नै बूझि पड़नि। उपदेशक सभ तँ कहबे करनि जे अनेरे परेशान होइ छी। मुदा सिमरिया पंडाक उपदेशे की। धार गंगा आ विचारधाराक घाट सिमरिया छी आकि की छी से तँ एके धारमे देखाइ छै। एक घाट (उत्तर) दोसर (दछिन) मग्गह। जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ नव काल्हि देखैक इच्छा शुरूहेसँ रहलनि। ओहिना नै केलाक पछाति आरो मजगूत भेलनि। उदाहरण, परिवारमे साधारण शिक्षाक आगमन भेल छलनि। तइठाम एम.ए. तक पढ़लनि। परिवारे नै गामेमे पहिल एम.ए. भेलाह। ओना पछिला पीढ़ीमे संस्कृतक माध्यमसँ एक-पर-एक विद्वान बेरमा भेलाह मुदा जेनरलमे जगदीश प्रसाद मण्डलेटा रहथि। दोसर, बोरिंग-करौने खेतिओमे किछु नवता आबि गेल छलै गाममे। दुनू रंगक खेती करै छलाह मण्डलजी। दुनू रंगकसँ मतलब- अन्नो आ नगदियोक। नगदी खेतीमे तरकारी आ फलक खेती सेहो करए लगलाह। ओना जइ रूपे करए चाहैत छलाह ओइ रूपे नै होइक कारण छल, किछु समैओक अभाव आ किछु उपद्रवो। खेतीक एहेन उजाड़ि होइत रहनि जे जँ मारि-झगड़ा करए लगितथि तँ दिनमे तीन बेर होइतनि। पैघ समस्याक आगू छोट गौण पड़ि जाइ छै। मुदा मन तोड़ैक तँ अस्त्र भेबे कएल। उपद्रवो चाहे जतए होउ मुदा मनकेँ प्रभावित तँ करिते अछि। तहूमे खेतीक उजाड़ि मेहनत, पूँजी, समए सबहक क्षति। जइ दिन मधुबनी कोर्टमे ३०७ केसक जजमेंटमे सजा भेलनि ओइ दिनक घटना- गामक जते देखार विरोधी रहनि ओकरा सभकेँ ई बूझल रहै जे सजा हेतनि, जहल जेताह। जखने जेताह तखने दस बर्खसँ पहिने थोड़े निकलता। सजाए भेलनि जहल गेलाह। तीन कट्ठा बंधा कोबी बोरिंगबला चौमासमे केने रहथि। हाँ एकटा बात आरो बीचमे कहि दिअए चाहै छी जे १९७०-७१सँ १९८६-८७ धरि बेरमाक खेती आगू ससरैत रहल। अनेको दमकल, बोरिंग भऽ गेल। हालर चक्की, थ्रेशर इत्यादि सेहो सभ भऽ गेल। मुदा १९८६-८७क बाढ़ि-भुमकम खेतीकेँ पाछू धक्का मारि देलक। एक तँ सरकारी राशनक चहटि बाढ़ि-भुमकमक पछाति लागि गेल दोसर अनेको बोरिंग माटिक तरमे टूटि-फूटि गेल। गामक खेती पाछू ससरि गेल। मुदा हिनकर तँ जीविका भेलनि, छोड़ने केना हेतनि? जइ दिन ३०७क जजमेंट भेलनि ओइ समए जे कोबी छलनि ओ २ किलोसँ लऽ कऽ चारि किलो धरिक फूल १८ सए गाछ रहनि। बंधा कोबीक भाव २-५ रूपैये किलो रहै। अन्दाजि लिऔ जे केहेन नोकसान भेलनि। अट्ठारहो सए गाछ दिन-देखार उखाड़ि कऽ लऽ गेलनि। दाेसर, जहल निकललाक तीन मास पछाति कछुबी गेलाह। कछुबी उत्तरवारि टोलमे एकटा चाहक दोकानदार, जे बिशौलसँ कछुबी आबि बसि गेल अछि, चाहेक दोकानपर जना कते भारी अपराध कऽ जहलसँ आएल होथि तही ढंगक बेवहार हिनका संग केलकनि। आ से ओ जेकरा अपने ठेकान नै छै, मुदा कि करितथि। कछुबीक रत्न काली बाबूक (काली कान्त झा, आइ.पी.एस.) परिवार संग खेनाइ-पीनाइ आबा-जाही छन्हि। ओना अखन धरि कछुबीमे दुइये गोटे आइ.पी.एस केलनि अछि, तइमे काली बाबू पहिल। तहूमे विद्यार्थिये जीवनसँ मंचक वक्ता बनि गेल रहथि, गीताक मंच (गीता प्रवचन) पर अधिक बैसैत छलाह। राजनीति सेहो ठमकि गेलै। १९६० ई.क पछाति मधुबनी जिला कम्युनिस्ट पार्टीक मुख्य आन्दोलन कोशी नहरि, नूनथर, शीशा पानी, बराह क्षेत्रक डैमपर केन्द्रित भऽ गेल। ओना आनो मुद्दा रहबे करै। बटाइदारी जमीनक लड़ाइ जोर पकड़नहि रहै। नहरिक पानि आ पनिबिजली जना कम्युनिस्टे पार्टीक होइ तहिना लोकक धारणा बनि गेल छलै। जेकरा समाधान भेने मिथिलांचलक उद्धार भऽ जाइत। खेतीसँ उद्योग धरि बढ़ि जाइत, से नै भेल। जते विरोधी (कम्युनिस्ट विरोधी) ताकत छल रंग-रंगक आन्दाेलन, षड्यंत्र कऽ योजनाकेँ अखन धरि सफल नै हुअए देलक। पार्टियोक राजनीतिमे ठहराव आबि गेल। एतबे नै जेकरा सभकेँ बटाइ-जमीन भेल ओहो सभ ओकरा (ओइ खेतकेँ) भरना लगा पंजाब-दिल्ली जाए लागल। परिणाम ओहन आबए लगलनि जे कि केलाह तँ किछु नै। िसर्फ जिलेक राजनीति नै। गामोमे सएह भेलनि। मनमे उठलनि जे हजारो बर्खक गाछ किछु ने किछु अपनामे नवीनता अनिते रहैए। चाहे नव टुसा होउ आकि नव मुड़ी आकि नव पात आकि नव कलश। विचार तँ उठल मुदा मनमे दुनू केस तँ रहबे करनि। जाइ-अबैक परेशानी नै, केसक सजाएक परेशानी। दुनू सेशन केस। दू-दिना-चारि-दिना तँ छी नै जे बुझबै पहुनाइ करए जहल गेल छलाह। सालक-साल दस साल, बारह साल। दुनू मिला बीस सालसँ बेसी। तइ बीच कि कएल जाए। जाधरि केससँ छुटकारा नै पाबि लेता ताधरि दोसर दिस बढ़ब नीक नै हेतनि। केसक छुटकारा पछाति करबे कि करितथि। गुजर लेल खेती करिते छलाह। नोकरी दिस कहियो मनसँ तकबे ने केलाह, बेपार कएले ने हेतनि। मुदा जिनगियो तँ छोट नै अछि। कठही साइकिल (काठक पाइडिल लगाओल साइकिल) तँ नै जे थालो-कादो आकि रस्ताक कटारियोमे कन्हापर उठा लेता आ टपि जेता। जिनगीक गाड़ी छी। एक पटरीपर सँ दोसर पटरीपर आनब। एकर अर्थ ई नै जे जइठाम पाहि कटैक जोगार छै तइठाम गाड़ीकेँ लऽ जा कऽ दोसर पटरीपर चढ़ा दियौ। दोसर पटरीपर आनैक अर्थ ई जे छोटी लाइन (मीटर गेज लाइन) सँ बड़ी लाइनपर चढ़एबाक अछि। ओकर आँट-पेट छोट छै मुदा किछु पार्ट- धुरी-चक्का बदलने तँ डिब्बा आ आनो-आनो वस्तु उपयोगी बनि जाइ छै। प्रश्न एतबे नै अछि, ऐसँ आगूओ अछि। ओ ई अछि जे अदौसँ अबैत ई जिनगीक गाड़ी छी। जते रंगक पटरी तते रंगक पटरीक गति। तइठाम गाड़ीकेँ दोसर पटरीपर लऽ जाएब, असान नै। साहित्यो जगतक जे दशा-दिशा अछि ओ छपित नहियेँ अछि। तहूमे लाठी सबहक हाथ पड़ल अछि। कोनो वस्तु मंगलापर नै दऽ छिपा लेब, लाथ कहबैत अछि। मैथिली साहित्य जगत समाजसँ एते दूर हटि गेल अछि जे जहिना मनुष्य-देवताक बोट बिला गेल छै। ई िसर्फ मैथिलियेमे नै अछि आनो-आन साहित्यमे भरपूर अछि। जना- कबीर दासक चर्च मैथिली साहित्यमे कम अछि मुदा कबीर दासक जे जिनगीक (जीवन पद्धति) इतिहास प्रस्तुत कएल गेल अछि ओ विवेकपूर्ण जकाँ नै अछि। विवेकपूर्ण नै हेबाक कारणे कबीर दर्शन समाजसँ हटि गेल अछि। जेहो सभ दर्शनक प्रचार-प्रसार कऽ रहल छथि ओहो सभ या तँ अपनो गुमराहे छथि नै तँ लाथी छथि जे गुमराह केने छथि। तहिना तुलसी दास गोस्वामी कहबैत छथि, मुदा कतेक गाए पोसने छलाह? जरूरति अछि युगानुसार साहित्यक िनर्माण करब। तहिना जाधरि मैथिलियो साहित्य समाजक वस्तु (समाजक साहित्य) नै बनत ताधरि के केकरा कि कहै छिऐ से भाँज थोड़े लागत? तँए शुभेक्षु साहित्यकारक दायित्व बनैए जे एक आँखि समाजपर राखि दोसर आँखि कागज कलमपर रखताह तखने मैथिली साहित्ये नै मिथिलाक कल्याण हएत। राज्यक अर्थ जँ राजधानीक एकटा कार्यालयसँ लैत छी तँए मिथिलाक समाज छूटि जाइए। मिथिलाक समाजिक पद्धति वैदिक पद्धतिसँ आगू बढ़त तखने सर्वांगीन विकास हएत। जगदीश प्रसाद मण्डल जीक, हाइ स्कूलक एकटा स्मृित, केजरीवाल हाई स्कूलमे नाआें लिखेने छलाह। स्पेशल नाइनक (हायर सेकेण्ड्री) सिलेबसक विस्तार भेल। मुदा तैयो आनर्स जकाँ विषय नै भेलनि, समटाएले रहलनि। पुरने सेकेण्ड्री पद्धतिक रहलनि। मुदा विषयक विस्तार तँ भेबे कएल। अर्थोशास्त्रक पढ़ाइ होइत छलनि। शुरूहक छह-मास पछाति (हायर सेकेण्ड्री कोर्सक) अर्द्धवार्षिक परीक्षा भेलनि। केजरीवाल स्कूलक बेवहार छल जे अर्द्धावार्षिक परीक्षाक काँपिये विद्यार्थीकेँ दऽ देल जाइ छल। किछु विद्यार्थी जे परीक्षा पछाति दोहरा कऽ जे प्रश्नक उत्तर पढ़लनि तँ ओ तँ पढ़िये कऽ मुदा जे से नै केलनि तँ घरपर पोथीसँ मिला देख लैत छलाह। ने शिक्षकक बीच कोनो मलानता छलनि आ ने विद्यार्थीकेँ होन्हि जे मास्टर सहाएब जतिआरए केलनि। ततबे नै लत्ती बाबूक (स्व. यदुनन्दन साहु) अलग सोच रहनि। हुनकर नम्बर दइक अलग कसौटी रहनि। हुनकर समझ रहनि कम नम्बर देने विद्यार्थी आरो मेहनति करत। किएक तँ सभ विद्यार्थी पास करैक जिज्ञासासँ पढ़ैत अछि। फेलक डर हेतै। तइ संग ईहो शिक्षकसँ विद्यार्थी धरि-सभ बुझैत जे लत्ती बाबू हाथसँ जँ बीसो प्रतिशत नम्बर आबि जाएत तँ बोर्डमे पास हेबे करब। हँ, अर्थशास्त्रक चर्च केने छलौं। स्पेशल नाइन्थमे पचास प्रतिशतसँ अधिक नम्बर एलनि। सभ विषयसँ बेसी। क्लासमे जखन श्याम बाबू (स्व. श्यामा नन्द झा) जोर सँ पढ़ि कॉपी देलकनि तखन जना अर्थशास्त्र मनकेँ एना पकड़ि लेलकनि जे दास कैपिटलसँ लऽ कऽ बादमे अमर्त्य सेन धरिक परिचय करा देलकनि। अोना हायर सेकेण्ड्री टपला पछाति मनक दूटा विषय- अर्थशास्त्र आ भूगोल तँ हटि गेलनि मुदा मनसँ नै हटलनि। विषय समटा कऽ अंग्रेजी, हिन्दी आ राजनीति शास्त्र धरि रहि गेलनि। ओहो एम.ए.मे घटि गेलनि। प्रश्न उठैए कियो एक विषयसँ विशेषज्ञ छथि आ कियो बहु विषयी छथि, दुनूमे जिनगीक गाड़ी किनकर समटल चलतनि? बीसम शताब्दीक मृत्यु आ एकैसम शताब्दीक जन्म बुझबे ने केलाह। गुनधुनेमे रहि गेलाह जे कि करी की नै करी। ने बीसम सदीक सराध कऽ पेलाह आ ने एकैसम सदीक जन्मोत्सव। मुदा एकटा लाभ तँ जरूर भेलनि जे सराधोक खर्च बँचलनि आ जनम दिनोक। पंचवर्षीय चुनाव पद्धतिक आगमन भेल। मन्हुआएल मन शिशिरक सिताएल भौम्हरा खुजल। पंचायतसँ जिला-परिषद धरिक योजना बना समाजकेँ ठाढ़ करए चाहलनि। आठ पंचायतक चुनाव जिला परिषदक। आन समाजमे जाइसँ पहिने अपन समाज मजगूत बनाएब आवश्यक बुझलनि। अंचल सम्मेलन गंगापुरक स्कूलमे भेल। पंचायत चुनावक कार्यक्रम बनल। बेरमाक योजना रखलखिन। सर्वमान्य भऽ गेलनि। मुदा एक नै अनेको सूत्र राजनीतिक लागि गेलनि। जइसँ चारिटा जिलो परिषदमे पार्टीक आ चारिटा पंचायतो मुखियाक लेल पार्टीक (कम्युनिस्ट पार्टी) उम्मीदवार बनि कऽ ठाढ़ भऽ गेलनि। खएर जे भेल। पंचायत चुनाव (मुखियाक लेल) हारलथि। चुनाव भरि तँ उत्साह रहलनि मुदा समाजसँ जिला पार्टीक बहुत बात बुझैमे आबि गेलनि। एक दिस सरकारी योजना (चुनावमे आरक्षण) देखथि तँ बूझि पड़नि जे अनेरे ऐ चुनावक भाँजमे पड़लाह। आरक्षणक एहेन तरीका अछि जे एक चुनावसँ दोसर चुनावक रस्ते बन्न भऽ जेतै। पचास प्रतिशत महिला आरक्षणमे एक-एक टर्म हेबाक चाहै छलै। मुदा से नै भेल। जँ दू-दू टर्मपर चुनाव होइए तँ पूर्ण राउण्ड कते दिनमे हएत। खएर जे होउ, मुदा सरकारी लूट तँ बढ़िये गेल। जइ गतिये समाजकेँ ठाढ़ भऽ चलैक गति हेबाक चाही से अखनो धरि नै आबि सकल अछि। अनेको कारणमे मुख्य भ्रष्टाचार बनि गेल अछि। भ्रष्टाचारी ओहन-ओहन अछि जेकर सरकार छिऐ। के केकरा देखार करत। जँ देखारे करत तँ कानूने कि करतै। विचित्र महजालमे समाज फँसि गेल अछि। आम आदमीकेँ आर्थिक तंगी छै। ओ केना पूर्ति हएत? पूर्तिक जे पद्धति अछि ओ एहेन बनल अछि जे चरवाहियेमे गाइयो बिका जाइए! तइपर सँ देखौआ-चोरौआ फुट्टे!! जेकरा लेल अट्ठारह दिन जहलमे रहला ओ आगू आबि ठाढ़ भऽ गेलनि। मन पड़लनि महाभारतक ओ कथा जे महाभारतक उपरान्त भेल। मनमे मिसियो भरि शंकाक जन्म नै भेलनि। विपरीत भेलनि। पाछू उनटि देखलनि तँ बूझि पड़लनि जे अखन धरिक जे मोटा कपार लादल छन्हि ओकरा हेट करैक ऐसँ नीक अवसर नै भेटितनि। सएह केलन्हि। मुदा एकटा प्रश्न तैयो रहबे केलनि जे आगूसँ उसारी आकि पाछूसँ आ दुनू दिससँ आकि एक्के बेर। आगूसँ उसारैक विचार भेलनि। संयोगो नीक रहलनि। मधुबनी जिलाक वासोपट्टीमे पार्टीक (भाकपा) राज्य सम्मेलन भेलै। पार्टीक महासचिव वर्द्धन (ए.बी. वर्द्धन) सहाएबक संग-संग बंगालोक कामरेड सभ रहथि। िबहारक सभ जिलाक रहबे करथि। नीक सम्मेलन भेल। जिलाक एकटा कार्यकर्त्ता होइक नाते रहबे करथि। राज्यक (पार्टीक) जे साहित्य प्रेमी छथि हुनका सभकेँ कहि देलखिन- “जे आब अहीं सबहक संग आबि रहल छी।” मैथिली गजल शास्त्र गजलक उत्पत्ति अरबी साहित्यसँ मानल जा सकैत अछि मुदा ओतए ई अरकान माने कोनो उत्तेजक घटनाक वर्णन विशेषक रूपमे छल। मुदा गजल जँ ऐ अरकान सभक समुच्चय अछि तँ से फारसीक देन छी। फेर ओतऽसँ गजल उर्दू-हिन्दी आ आब मैथिलीमे आएल अछि। मायानन्द मिश्र मैथिली गजलकेँ गीतल कहलन्हि, मुदा हम एतऽ ओकरा गजले कहब आ अरबी फारसीक छन्द-शास्त्रक किछु शब्दावलीक प्रयोग करब। से मैथिली गजल शास्त्रक लेल शब्दावली भेल “अरूज” । बहर: उन्नैस टा अरबी बहर होइत अछि। एतेक बहर मोन रखबाक आवश्यकता नै। किएक तँ बहर माने थाट, राग-रागिनी। ऐ उन्नैसटा अरबी बहरक बदला मैथिली लेल नीचाँमे भारतीय संगीत (स्रोत स्व. श्री रामाश्रय झा रामरंग) दऽ रहल छी। देवनागरी आ मिथिलाक्षरमे जे बाजल जाइत अछि सएह लिखल जाइत अछि (ह्रस्व इ सेहो मैथिलीमे अपवाद नै अछि) से ह्रस्व आ दीर्घ स्वरकेँ गनबाक विधि मैथिलीमे भिन्न अछि, सेहो एतऽ देल जाएत। जइ बहरमे शेरमे आठ (माने शेरक दुनू मिसरामे चारि-चारि) अरकान हुअए से भेल मसम्मन आ जइ बहरमे शेरमे छह (माने शेरक दुनू मिसरामे तीन-तीन) अरकान हुअए से भेल मुसद्दस । एतऽ मैथिलीमे विभक्ति सटा कऽ लिखबाक वैज्ञानिक आधार फेर सिद्ध होइत अछि कारण गजलमे जे विभक्ति हटाइयो कऽ लिखब तैयो अरकान गनबा काल तेना कऽ गानऽ पड़त जेना विभक्ति सटल हुअए, विभक्ति लेल अलगसँ गणना नै भेटत। जइ बहरमे एक्केटा रुक्न हुअए से भेल मफरिद बहर आ जइमे एकटासँ बेशी रुक्न हुअए (रुक्नक बहुवचन अराकान) से भेल मुरक्कब बहर। दूटा अराकान पुनः आबए तँ ओकरा बहरे-शिकस्ता कहल जाएत। मिसरा आ शेर: मैथिली गजलमे दू पाँतीक दोहा जे कोनो उत्तेजक घटनाक विशेष वर्णन करैत अछि तकरा शेर (एक पाँती मिसरा) कहल जाइ छै। दुनू पाँती एकट्ठे भेल शेर आ ओइ दुनू पाँतीकेँ असगरे मिसरा कहब। मतलाक दुनू मिसरामे एकरंग काफिया माने तुकबन्दी हएत। ऊला आ सानी: शेरक पहिल मिसरा ऊला आ दोसर मिसरा सानी भेल। दू मिसरासँ मतला आ दू पाँतीसँ दोहा बनल। अरकान (रुक्न) आ जिहाफ: आठ टा अरकान (एकवचन रुक्न) सँ उन्नैस टा बहर बहराइत अछि। से अरकान मूल राग अछि आ बहर भेल वर्णनात्मक राग। अरकानक छारन भेल जिहाफ । जेना वरेण्यम् सँ वरेणियम्। तकतीअ: दू पाँतीक कोनो उत्तेजक घटनाक विशेष वर्णन करैत दोहा जे मिसरा वा शेर अछि आ कए टा मिसरा वा शेर मिलि कऽ गजल बनैत अछि, तकर शल्य चिकित्सा लेल तकतीअ अछि। से मिसरा कोन राग-रागिनीमे अछि तकर तकतीअसँ बहर ज्ञात होइत अछि। मतला (आरम्भ) आ मकता (अन्त): गजलमे पहिल शेर मतला आ आखिरी शेर मकता भेल। मतलाक दुनू मिसरामे तुक एकरंग होइत अछि आ मकतामे कवि अपन नाम दै छथि। मकताक कखनो काल लोप रहत, एकरा सन्दर्भसँ बुझब थिक, मतला सेहो कखनो काल गजलमे नै रहैत अछि मुदा प्रारम्भमे गजलकारकेँ ई रखबाक चाही। काफिया आ रदीफ: तुकान्त काफियाक बादक वा काफियायुक्त शब्दक पहिनेक अपरिवर्तित शब्द/ शब्द समूहकेँ रदीफ कहै छिऐ। काफिया युक्त शब्द बदलत मुदा रदीफ नै बदलत। काफिया वर्ण वा मात्राक होइ छै आ रदीफ शब्द वा शब्द समूहक। दूटा काफियाबला शेर जू काफिया कहल जाइत अछि। एक दीर्घक बदला दूटा ह्रस्व सेहो देल जा सकैए। जेना काफिया वर्ण आ मात्राक संग शब्दकेँ सेहो प्रयुक्त करैत अछि तहिना रदीफ एकर विपरीत शब्द आ शब्दक समूहमे सन्निहित वर्ण आ मात्राकेँ सेहो प्रयुक्त करिते अछि। ऐ तरहेँ पहिल पाँतीमे जँ शब्द समूह रदीफ अछि तँ दोसर पाँतीमे ओकर कोनो एक शब्द दोसर शब्दक अंंग भऽ सकैए आ ओइ काफिया युक्त शब्दमे रदीफक उपस्थिति रहि सकैए। दूटा काफियाक बीचमे सेहो रदीफ रहि सकैए, रदीफ ऐ तरहेँ अनुपस्थितसँ लऽ कऽ एक शब्द, शब्दक समूह वा वाक्य भऽ सकैत अछि जे अपरिवर्तित रहत। काफिया युक्त शब्द गजलमे बदलैत रहत। मैथिली व्याकरणक दृष्टिसँ अपरिवर्तित मात्रा अपरिवर्तित अपूर्ण शब्दकेँ बिना रदीफक गजल कहि सकै छिऐ, कारण ई काफियाक मूल विशेषता छिऐ (अपरिवर्तित मात्रा वा अपरिवर्तित अपूर्ण शब्द) .. आ जँ शब्द वा शब्दक अपरिवर्तित समूह दृष्टिसँ देखी तँ एतऽ रदीफ अनुपस्थित अछि। ओना रदीफ अनुपस्थित सेहो रहि सकैए, शास्त्रीय दृष्टिसँ कोनो दिक्कत नै अछि। मुदा प्रारम्भमे बिना रदीफक गजलक बदला "एक शब्द, शब्दक समूह वा वाक्य" जे अपरिवर्तित रहए, माने रदीफक प्रयोग करू। बहर आ संगीत पहिने कमसँ कम ३७ ‘की’ बला की-बोर्ड लिअ। ऐमे १२-१२ टा क तीन भाग करू। १३ आ २५ संख्या बला की सा आ सां दुनूक बोध करबैत अछि। सभमे पाँचटा कारी आ सातटा उज्जर ‘की’ अछि। प्रथम १२ मंद्र सप्तक, बादक १२ मध्य सप्तक आ सभसँ दहिन १२ तार सप्तक कहबैछ। १ सँ ३६ धरि मार्करसँ लिखि लिअ। १ आ तेरह सँ क्रमशः वाम आ दहिन हाथ चलत। १२ गोट ‘की’ केर सेटमे ५ टा कारी आ सात टा उज्जर ‘की’ अछि। प्रथम अभ्यासमे मात्र उजरा ‘की’ केर अभ्यास करू। पहिल सात टा उजरा ‘की’ -सा, रे, ग, म, प, ध, नि- अछि आ आठम उजरा की तीव्र- सं - अछि जे अगुलका दोसर सेटक - स - अछि। वाम हाथक अनामिकासँ स, माध्यमिका सँ रे, इंडेक्स फिंगर सँ ग, बुढ़बा आँगुरसँ म, फेर बुढ़बा आँगुरक नीचाँसँ अनामिका आनू आ प, फेर माध्यमिकासँ ध, इंडेक्स फिंगरसँ नि, आ बुढ़बा आँगुरसँ सां- ऐ हिसाबसँ बजेबाक प्रयास करू। दहिन हाथसँ १२ केर सेट पर पहिल ’की’ पर बुढ़बा आंगुरसँ स, इंडेक्स फिंगरसँ रे, माध्यमिकासँ ग, अनामिकासँ म, फेर अनामिकाक नीचाँसँ बुढ़बा आँगुरकेँ आनू आ तखन बुढ़बा आंगुरसँ प, इंडेक्स फिंगरसँ ध, माध्यमिकासँ नि आ अनामिकसँ सां बजाउ। दुनू हाथसँ सां दोसर १२ केर सेटक पहिल उज्जर ‘की’ अछि। आरोहमे पहिल सेटक सां अछि तँ दोसर सेटक प्रथम की रहबाक कारण सा। दोसर गप जे की-बोर्डसँ जखन अवाज निकलए तँ अपन कंठक आवाजसँ एकर मिलान करू। कनियो नीच-ऊँच नै हुअए। तेसर गप जे संगीतक वर्ण अछि सा, रे, ग, म, प, ध, नि, सां एकरा मिथिलाक्षर/ देवनागरीक वर्ण बुझबाक गलती नै करब। आरोह आ अवरोहमे स्वर कतेक नीच-ऊँच हुअए तकरे टा ई बोध करबैत अछि। जेना कोनो आन ध्वनि जेना “क” केँ लिअ आ की-बोर्डपर निकलल सा, रे... केर ध्वनिक अनुसार “क” ध्वनिक आरोह आ अवरोहक अभ्यास करू। ऐ सातू स्वरमे षडज आ पंचम मने सा आ प अचल अछि, एकर सस्वर पाठमे ऊपर नीचाँ हेबाक गुंजाइश नै छै। सा अछि आश्रय आकि विश्राम आ प अछि उल्लासक भाव। शेष जे पाँचटा स्वर सभटा चल अछि, मने ऊपर नीचाँक अर्थात् विकृतिक गुंजाइश अछि ऐमे। सा आ प मात्र शुद्ध होइत अछि, आ विकृति भऽ सकैत अछि दू तरहेँ, शुद्धसँ स्वर ऊपर जाएत आकि नीचाँ। यदि ऊपर रहत स्वर तँ कहब ओकरा तीव्र आ नीचाँ रहत तँ ओ कोमल कहाएत। म कँ छोड़ि कऽ सभ अचल स्वरक विकृति होइत अछि नीचाँ, तखन बुझू जे “रे, ग, ध, नि” ई चारि टा स्वरक दू टा रूप भेल कोमल आ शुद्ध। म केर रूप सेहो दू तरहक अछि, शुद्ध आ तीव्र। रे दैत अछि उत्साह, ग दैत अछि शांति, म सँ होइत अछि भय, ध सँ दुःख आ नि सँ होइत अछि आदेशक भान। शुद्ध स्वर तखन होइत अछि, जखन सातो स्वर अपन निश्चित स्थानपर रहैत अछि। ऐ सातोपर कोनो चेन्ह नै होइत अछि। जखन शुद्ध स्वर अपन स्थानसँ नीचाँ रहैत अछि तँ कोमल कहल जाइत अछि आ ई चारिटा होइत अछि, ऐमे नीचाँ क्षैतिज चेन्ह देल जाइत अछि, यथा- रे॒, ग॒, ध॒, नि॒। शुद्ध आ मध्यम स्वर जखन अपन स्थानसँ ऊपर जाइत अछि, तखन ई तीव्र स्वर कहाइत अछि, ऐमे ऊपर उर्ध्वाधर चेन्ह देल जाइत अछि। ई एकेटा अछि- म॑। एवम प्रकारे सात टा शुद्ध यथा- सा, रे, ग, म, प, ध, नि, चारिटा कोमल यथा- रे॒, ग॒, ध॒, नि॒ आ एकटा तीव्र यथा म॑ सभ मिला कऽ १२ टा स्वर भेल। ऐमे स्पष्ट अछि जे सा आ प अचल अछि, शेष चल वा विकृत। आब फेर की-बोर्ड पर आउ। ३७ टा की बला की-बोर्ड हम ऐ हेतु कहने छलौं, किए तँ १२, १२, १२ केर तीन सेट आ अंतिम ३७म तीव्र सां हेतु। सप्तकमे सातटा शुद्ध आ पाँचटा विकृत मिला कऽ १२ टा भेल! वाम कातसँ १२ टा उजरा आ कारी की मंद्र सप्तक, बीच बला १२ टा की मध्य सप्तक आ २५ सँ ३६ धरि की तार सप्तक कहल जाइत अछि। आरोह- नीचाँसँ ऊपर गेनाइ, जेना मंद्र सप्तकसँ मध्य सप्तक आ मध्य सप्तकसँ तार सप्तक। मंद्र सप्तकमे नीचाँ बिन्दु, मध्य सप्तक सामान्य आ तार सप्तकमे ऊपर बिन्दु देल जाइत अछि, यथा- स़, ऱ, ग़ ,म़, प़, ध़, ऩ सा, रे, ग, म, प, ध, नी सां, रें, गं, मं, पं, धं, निं अवरोह- तारसँ मध्य आ मध्यसँ मंद्रकेँ अवरोह कहल जाइत अछि। वादी स्वर- जइ स्वरक सभसँ बेशी प्रयोग रागमे होइत अछि। समवादी स्वर- जकर प्रयोग वादीक बाद सभसँ बेशी होइत अछि। अनुवादी स्वर- वादी आ समवादी स्वरक बाद शेष स्वर। वर्ज्य स्वर- जइ स्वरक प्रयोग कोनो विशेष रागमे नै होइत अछि। पकड़- जइ स्वरक समुदायसँ कोनो राग विशेषकेँ चिन्है छी। गायन काल सेहो सभ राग-रागिनीक हेतु निश्चित रहैत अछि। १२ बजे दिनसँ १२ बजे राति धरि पूर्वांग आ १२ बजे रातिसँ १२ बजे दिन धरि उत्तरांग राग गाओल-बजाओल जाइत अछि। पूर्वांग रागक वादी स्वरमे कोनो एक टा (सा, रे, ग, म, प) होइत अछि। उत्तरांगक वादी स्वरमे (म, प, ध, नि, सा)मे सँ कोनो एक टा होइत अछि। सूर्योदय आ सूर्यास्तक समयमे गाओल जाएबला रागकेँ संधि प्रकाश राग कहल जाइत अछि। रागक जाति रागक आरोह आ अवरोहमे प्रयुक्त्त स्वरक संख्याक आधारपर रागक जातिक निर्धारण होइत अछि। एकर प्रधान जाति तीन टा अछि। १.संपूर्ण (७) २.षाड़व(६) ३.औड़व(५) आ ऐमे सामान्य स्वर संख्या क्रमशः ७, ६, ५ रहैत अछि। आब ऐ आधारपर तीनूकेँ फेँटू। संपूर्ण-औड़व की भेल? पहिल रहत आरोही आ दोसर रहत अवरोही। कहू आब। (७,५) ऐमे सात आरोही स्वर संख्या आ ५ अवरोही स्वर संख्या अछि। संपूर्णक सामान्य स्वर संख्या ऊपर लिखल अछि (७) आ औड़वक (५)। तखन संपूर्ण-औड़व भेल (७,५)। अहिना ९ तरहक राग जाति हएत। १.संपूर्ण-संपूर्ण (७,७) २.संपूर्ण-षाड़व (७,६) ३.संपूर्ण-औड़व(७,५), ४. षाड़व-संपूर्ण- (६,७), ५. षाड़व- षाड़व - (६,६), ६. षाड़व -औड़व (६,५), ७.औड़व-संपूर्ण(५,७), ८.औड़व- षाड़व(५,६), ९. औड़व- औड़व(५,५)। थाट: थाट- एकटा सप्तकमे सात शुद्ध, चारिटा कोमल आ एकटा तीव्र स्वर (१२ स्वर) होइत अछि। ऐमे सात स्वरक ओ समुदाय जकरासँ कोनो रागक उत्पत्ति होइत अछि, तकरा थाट वा मेल कहल जाइत अछि। थाट रागक जनक अछि, थाटमे सात स्वर होइ छै (संपूर्ण जाति)। थाटमे मात्र आरोही स्वर होइत अछि। थाटमे एक्के स्वरक शुद्ध आ विकृत स्वर संग-संग नै रहैत अछि। विभिन्न रागक नामपर थाट सभक नाम राखल गेल अछि। थाटक सातो टा स्वर क्रमानुसार होइत अछि आ ऐमे गेयता नै होइ छै। थाट १० टा अछि। १. आसावरी-सा रे ग॒ म प ध॒ नि॒ २. कल्याण-सा रे ग म॑ प ध नि ३. काफी-सा रे ग॒ म प ध नि॒ ४. खमाज-सा रे ग म प ध नि॒ ५. पूर्वी-सा रे॒ ग म॑ प ध॒ नि ६. बिलावल-सा रे ग म प ध नि ७. भैरव-सा रे॒ ग म प ध॒ नि ८. भैरवी-सा रे॒ ग॒ म प ध॒ नि॒ ९. मारवा-सा रे॒ ग म॑ प ध नि १०. तोड़ी-सा रे॒ ग॒ म॑ प ध॒ नि वर्ण: वर्णसँ रागक रूप-भाव प्रगट कएल जाइ छै। एकर चारिटा प्रकार छै। १.स्थायी- जखन एकटा स्वर बेर-बेर अबैत अछि, ओकर आवृत्ति होइत अछि। २.अवरोही- ऊपरसँ नीचाँ होइत स्वर समूह, एकरा अवरोही वर्ण कहल जाइत अछि। ३.आरोही- नीचाँसँ ऊपर होइत स्वर समूह, एकरा आरोही वर्ण कहल जाइत अछि। ४.संचारी- जइमे उपरका तीनू रूप लयमे हुअए। लक्षण गीत: रचना जइमे बादी, सम्बादी, जाति आ गायनक समय केर निर्देशक रागक लक्षण स्पष्ट भऽ जाए। स्थायी: कोनो गीतक पहिल भाग, जे सभ अन्तराक बाद दोहराओल जाइत अछि। अन्तरा: जकरा एक्के बेर स्थायीक बाद गाओल जाइत अछि। अलंकार/पलटा: स्वर समुदायक निअमबद्ध गायन/ वादन भेल अलंकार। आलाप: कोनो विशेष रागक अन्तर्गत प्रयुक्त्त भेल स्वर समुदायक विस्तारपूर्ण गायन/ वादन भेल आलाप। तान: रागमे प्रयुक्त्त भेल स्वरक त्वरित गायन/ वादन भेल तान। तानक गति द्रुत होइत अछि आ ऐमे दोबर गतिसँ गायन/ वादन कएल जाइत अछि। आब आउ तालपर। संगीतक गतिक अनूरूपेँ ई झपताल- १० मात्रा, त्रिताल- १६ मात्रा, एक ताल- १२ मात्रा, कहरवा- ८ मात्रा, दादरा- ६ मात्रा होइत अछि। गीत, वाद्य आ नृत्य लेल आवश्यक समए भेल काल आ जइ निश्चित गतिक ई अनुसरण करैत अछि से भेल लय। जखन लय त्वरित अछि तँ भेल द्रुत, जखन आस्ते-आस्ते अछि, तँ भेल विलम्बित आ नै आस्ते अछि आ नै द्रुत तँ भेल मध्य लय। मात्रा ताल केर युनिट अछि आ ऐसँ लय केँ नापल जाइत अछि। तालमे मात्रा संयुक्त रूपसँ उपस्थित रहला उत्तर ओकरा विभाग कहल जाइत अछि- जेना दादरामे तीन मात्रा संयुक्त्त रहला उत्तर २ विभाग। तालक विभागक निअमबद्ध विन्यास अछि छन्द आ तालक प्रथम विभागक प्रथम मात्रा भेल सम आ एकर चेन्ह भेल + वा x आ जतऽ बिना तालीक तालकेँ बुझाओल जाइत अछि से भेल खाली आ एकर चेन्ह अछि ० । ओ सम्पूर्ण रचना जइसँ तालक बोल इंगित होइत अछि, जेना मात्रा, विभाग, ताली, खाली ई सभटा भेल ठेका। चेन्ह- तालीक स्थान पर ताल चेन्ह आ संख्या। सम + वा x खाली ० ऽ अवग्रह/बिकारी - एक मात्राक दू टा बोल - एक मात्राक चारिटा बोल एक मात्राक दूटा बोलकेँ धागे आ चारि टा बोलकेँ धागेतिट सेहो कहल जाइत अछि। तालक परिचय ताल कहरबा ४ टा मात्रा, एकटा विभाग, आ पहिल मात्रा पर सम। धागि नाति नक धिन। तीन ताल त्रिताल १६ टा मात्रा, ४-४ मात्राक ४ टा विभाग। १,५ आ १३ पर ताली आ ९ म मात्रापर खाली रहैत अछि। धा धिं धिं धिं धा धिं धिं धा धा तिं तिं ता ता धिं धिं धा झपताल १० मात्रा। ४ विभाग, जे क्रमसँ २, ३, २, ३ मात्राक होइत अछि। १ मात्रा पर सम, ६ पर खाली, ३, ८ पर ताली रहैत अछि। धी ना धी धी ना ती ना धी धी ना ताल रूपक ७ मात्रा। ३, २, २ मात्राक विभाग। पहिल विभाग खाली, बादक दू टा भरल होइत अछि। पहिल मात्रापर सम आ खाली, चारिम आ छअमपर ताली होइत अछि। धी धा त्रक धी धी धा त्रक ह्रस्व-दीर्घ गणना छन्द दू प्रकारक अछि। मात्रिक आ वार्णिक। वेदमे वार्णिक छन्द अछि। वार्णिक छन्दक परिचय लिअ। ऐमे अक्षर गणना मात्र होइत अछि। हलंतयुक्त अक्षरकेँ नै गानल जाइत अछि। एकार उकार इत्यादि युक्त अक्षरकेँ ओहिना एक गानल जाइत अछि जेना संयुक्ताक्षरकेँ। संगे अ सँ ह केँ सेहो एक गानल जाइत अछि। द्विमानक कोनो अक्षर नै होइछ। मुख्यतः तीनटा बिन्दु मोन राखू- १. हलंतयुक्त्त अक्षर-० २. संयुक्त अक्षर-१ ३. अक्षर अ सँ ह -१ प्रत्येक। आब पहिल उदाहरण देखू :- ई अरदराक मेघ नहि मानत रहत बरसि के=१+५+२+२+३+३+३+१=२० मात्रा आब दोसर उदाहरण देखू ; पश्चात्=२ मात्रा; आब तेसर उदाहरण देखू आब=२ मात्रा; आब चारिम उदाहरण देखू स्क्रिप्ट=२ मात्रा छन्दोबद्ध रचना पद्य कहबैत अछि- अन्यथा ओ गद्य थीक। छन्द माने भेल एहन रचना जे आनन्द प्रदान करए। मुदा ऐसँ ई नै बुझबाक चाही जे आजुक नव कविता गद्य कोटिक अछि कारण वेदक सावित्री-गायत्री मंत्र सेहो शिथिल/ उदार निअमक कारण, सावित्री मंत्र गायत्री छंद मे परिगणित होइत अछि- जेना यदि अक्षर पूरा नै भेल तँ एक आकि दू अक्षर प्रत्येक पादमे बढ़ा लेल जाइत अछि। य आ व केर संयुक्ताक्षरकेँ क्रमशः इ आ उ लगा कऽ अलग कएल जाइत अछि। जेना- वरेण्यम्=वरेणियम् स्वः= सुवः। तमिल छोड़ि शेष सभटा दक्षिण आ समस्त उत्तर-पश्चिमी आ पूर्वी भारतीय लिपि आ देवनागरी लिपिमे वएह स्वर आ कचटतप व्यञ्जन विधान अछि, जइमे जे लिखल जाइत अछि सएह बाजल जाइत अछि। मुदा देवनागरीमे ह्रस्व “इ” एकर अपवाद अछि, ई लिखल जाइत अछि पहिने मुदा बाजल जाइत अछि बादमे। मुदा मैथिलीमे ई अपवाद सेहो नै अछि- यथा 'अछि' ई बाजल जाइत अछि अ, ह्र्स्व 'इ', छ वा अ इ छ। दोसर उदाहरण लिअ- राति- रा इ त। एकटा आर उदाहरण लिअ। सन्धि संस्कृतक विशेषता अछि मुदा की इंग्लिशमे संधि नै अछि? तँ ई की अछि - आइम गोइङ टूवार्ड्सदएन्ड। एकरा लिखल जाइत अछि- आइ एम गोइङ टूवार्ड्स द एन्ड। मुदा पाणिनि ध्वनि विज्ञानक आधारपर संधिक निअम बनओलन्हि मुदा इंग्लिशमे लिखबा कालमे तँ संधिक पालन नै होइत छै -आइ एम केँ ओना आइम फोनेटिकली लिखल जाइत अछि- मुदा बजबा काल एकर प्रयोग होइत अछि। मैथिलीमे सेहो यथासंभव विभक्त्ति शब्दसँ सटा कऽ लिखल आ बाजल जाइत अछि। छन्द दू प्रकारक अछि। मात्रा छन्द आ वर्ण छन्द। वेदमे वर्णवृत्तक प्रयोग अछि। मुख्य वैदिक छन्द सात अछि- गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पङ्क्ति, त्रिष्टुप् आ जगती; शेष ओकर भेद अछि, अतिछन्द आ विच्छन्द। एतऽ छन्दकेँ अक्षरसँ चिन्हल जाइत अछि। जे अक्षर पूरा नै भेल तँ एक आकि दू अक्षर प्रत्येक पादमे बढ़ा लेल जाइत अछि। य आ व केर संयुक्ताक्षरकेँ क्रमशः इ आ उ लगा कऽ अलग कएल जाइत अछि। जेना- वरेण्यम्= वरेणियम् स्वः= सुवः गुण आ वृद्धिकेँ अलग कऽ सेहो अक्षर पूर कऽ सकै छी। ए = अ + इ , ओ = अ + उ , ऐ = अ/आ + ए, औ = अ/आ + ओ छन्दः शास्त्रमे प्रयुक्त ‘गुरु’ आ ‘लघु’ छंदक परिचय प्राप्त करू। तेरह टा स्वर वर्णमे अ, इ, उ, ऋ, लृ ; ई पाँच ह्र्स्व आ आ, ई, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ ; ई आठ दीर्घ स्वर अछि। ई स्वर वर्ण जखन व्यंजन वर्णक संग जुड़ि जाइत अछि तँ ओकरासँ ‘गुणिताक्षर’ बनैत अछि। क्+अ= क, क्+आ=का । एक स्वर मात्रा आकि एक गुणिताक्षरकेँ एक ‘अक्षर’ कहल जाइत अछि। कोनो व्यंजन मात्रकेँ अक्षर नै मानल जाइत अछि- जेना ‘अवाक्’ शब्दमे दू टा अक्षर अछि; अ, वा । " ऐमे एकटा अपवाद अछि ।"म्ह" आ "न्ह" केँ संग एहन नियम नै लगैत अछि ।" !!! मैथिली लेल ई निअम नै छै (हिन्दीमे ई निअम छै, आ किछु मैथिली लेखक ओकर अनुकरण कऽ ई लिखनहियो छथि), एतऽ म्ह आ न्ह केर पहिलुका ह्रस्व सेहो सामान्य रूपसँ दीर्घ होइत अछि। जेना छनि आ छन्हि कोनो बच्चासँ बजबा कऽ देखू- छनि मे छ ह्रस्व, मुदा छन्हि मे छ दीर्घ उच्चारित होइए। तहिना जिम्हर मे जि दीर्घ उच्चरित होइए (पद्यमे)। ओना कोनो लेखक जँ एकाध ठाम ओकरा ह्रस्व लऽ रहल छथि तँ ओ पद्यक पाँति अपवाद रूपमे स्वीकृत भऽ सकैए; मुदा निअममे ऐ अपवादक हिन्दीक अनुकरणमे स्वीकृत करबाक आवश्यकता नै। तहिना जिनका मैथिली गायनक अनुभव छन्हि से आर नीक जकाँ बुझि सकैत छथि जे पद्य पहिने पढ़ल आ फेर गाओल जाइ छै, तेँ "हमर स्वर" गेबा काल "हमर" केर "र" दीर्घ हएत, बावजूद ओकर दोसर शब्दक भाग रहलाक बादो- कारण ओकर निर्धारण पद्यक पाँतिक अनुसार लगातार हएत। हँ जँ पद्यक दोसर पाँतिक पहिल अक्षर संयुक्ताक्षर अछि आ पछिला पाँतिक अन्तिम अक्षर ह्रस्व तँ ओ ह्रस्व दीर्घ नै हएत; कारण पाँतिक अन्तक संग गणनाक अन्त भऽ जाइत अछि। दीर्घ आ बिकारी (संस्कृतमे अवग्रह, बांग्लामे जफला) मे अन्तर छै। बिकारी ऽ जँ चारियोटा दऽ दियौ तैयो दीर्घ नै हएत.. जेना बच्चाक गीतमे घऽऽऽऽऽऽर- ई ह्रस्व-ह्रस्व भेल। पदक अन्तिम अक्षरकेँ आवश्यकतानुसार ह्रस्वकेँ दीर्घ आ दीर्घकेँ ह्रस्व कएल जा सकैत अछि। कोनो गजलक पाँती (मिसरा)क वज्न/ वा शब्दक वज्न तीन तरहेँ निकालि सकै छी, सरल वार्णिक छन्दमे वर्ण गानि कऽ; वार्णिक छन्दमे वर्णक संग ह्रस्व-दीर्घ (मात्रा) क क्रम देखि कऽ; आ मात्रिक छन्दमे ह्रस्व-दीर्घ (मात्रा) क क्रम देखि कऽ। जिनका गायनक कनिकबो ज्ञान छन्हि ओ बुझि सकै छथि जे गजलक एक पाँतीमे शब्दक संख्या दोसर पाँतीक संख्यासँ असमान रहि सकैए, मुदा जँ ऊपर तीन तरहमे सँ कोनो तरहेँ गणना कएल जाए तँ वज्न समान हएत। मुदा आजाद गजल बे-बहर होइत अछि तेँ ओतऽ सभ पाँती वा शब्दमे वज्न समान हेबाक तँ प्रश्ने नै अछि। ऐ तीनू विधिसँ लिखल गजलमे मिसरामे समान वज्न एबे टा करत। ओना ई गजलकार आ गायक दुनूक सामर्थ्यपर निर्भर करैत अछि; गजलकार लेल वार्णिक छन्द सभसँ कठिन, मात्रिक ओइसँ हल्लुक आ सरल वार्णिक सभसँ हल्लुक अछि, मुदा गायक लेल वार्णिक छन्द सभसँ हल्लुक, मात्रिक ओइसँ कठिन, सरल वार्णिक ओहूसँ कठिन आ आजाद गजल (बिनु बहरक) सभसँ कठिन अछि। १. सभटा ह्रस्व स्वर आ ह्रस्व युक्त गुणिताक्षर ‘लघु’ मानल जाइत अछि। एकरा ऊपर U लिखि एकर संकेत देल जाइत अछि। २. सभटा दीर्घ स्वर आर दीर्घ स्वर युक्त गुणिताक्षर ‘गुरु’ मानल जाइत अछि, आ एकर संकेत अछि, ऊपरमे एकटा छोट -। ३. अनुस्वार किंवा विसर्गयुक्त सभ अक्षर गुरू मानल जाइत अछि। ४. कोनो अक्षरक बाद संयुक्ताक्षर किंवा व्यंजन मात्र रहलासँ ओइ अक्षरकेँ गुरु मानल जाइत अछि। जेना- अच्, सत्य। ऐ मे अ आ स दुनू गुरु अछि। ५. जेना वार्णिक छन्द/ वृत्त वेदमे व्यवहार कएल गेल अछि तहिना स्वरक पूर्ण रूपसँ विचार सेहो ओइ युग सँ भेटैत अछि। स्थूल रीतिसँ ई विभक्त अछि:- १. उदात्त २. उदात्ततर ३. अनुदात्त ४. अनुदात्ततर ५. स्वरित ६. अनुदात्तानुरक्तस्वरित, ७. प्रचय (एकटा श्रुति-अनहत नाद जे बिना कोनो चीजक उत्पन्न होइत अछि, शेष सभटा अछि आहत नाद जे कोनो वस्तुसँ टकरओलापर उत्पन्न होइत अछि)। १. उदात्त- जे अकारादि स्वर कण्ठादि स्थानमे ऊर्ध्व भागमे बाजल जाइत अछि। एकरा लेल कोनो चेन्ह नै अछि। २. उदातात्तर- कण्ठादि अति ऊर्ध्व स्थानसँ बाजल जाइत अछि। ३. अनुदात्त- जे कण्ठादि स्थानमे अधोभागमे उच्चारित होइछ।नीचाँमे तीर्यक चेन्ह खचित कएल जाइछ। ४. अनुदातात्ततर- कण्ठादिसँ अत्यंत नीचाँ बाजल जाइत अछि। ५. स्वरित- जइमे अनुदात्त रहैत अछि किछु भाग, आ किछु रहैत अछि उदात्त। ऊपरमे ठाढ़ रेखा खेंचल जाइत अछि, ऐमे। ६. अनुदाक्तानुरक्तस्वरित- जइमे उदात्त, स्वरित किंवा दुनू बादमे होइछ, ई तीन प्रकारक होइछ। ७. प्रचय- स्वरितक बादक अनुदात्त रहलासँ अनाहत नाद प्रचयक, तानक उत्पत्ति होइत अछि। १. पूर्वार्चिकमे क्रमसँ अग्नि, इन्द्र आ सोम पयमानकेँ संबोधित गीत अछि। तदुपरान्त आरण्यक काण्ड आ महानाम्नी आर्चिक अछि। आग्नेय, ऐन्द्र आ पायमान पर्वकेँ ग्रामगेयगण आ पूर्वार्चिकक शेष भागकेँ आरण्यकगण सेहो कहल जाइछ। सम्मिलित रूपेँ एकरा प्रकृतिगण कहैत छी। २.उत्तरार्चिक: विकृति आ उत्तरगण सेहो कहैत छी। ग्रामगेयगण आ आरण्यकगणसँ मंत्र चुनि कऽ क्रमशः उहगण आ ऊह्यगण कहबैछ- तदन्तर प्रत्येक गण दशरात्र, संवत्सर, एकह, अहिन, प्रायश्चित आ क्षुद्र पर्वमे बाँटल जाइछ। पूर्वार्चिक मंत्रक लयकेँ स्मरण कऽ उत्तरार्चिक केर द्विक, त्रिक, आ चतुष्टक आदि (२,३, आ ४ मंत्रक समूह) मे ऐ लय सभक प्रयोग होइछ। अधिकांश त्रिक आदि प्रथम मंत्र पूर्वार्चिक होइत अछि, जकर लयपर पूरा सूक्त (त्रिक आदि) गाओल जाइछ। उत्तरार्चिक उहागण आ उह्यगण प्रत्येक लयकेँ तीन बेर तीन प्रकारेँ पढ़ैछ। वैदिक कर्मकाण्डमे प्रस्ताव प्रस्तोतर द्वारा, उद्गीत उदगातर द्वारा, प्रतिघार प्रतिहातर द्वारा, उपद्रव पुनः उदगातृ द्वारा आ निधान तीनू द्वारा मिलि कऽ गाओल जाइछ। प्रस्तावक पहिने हिंकार (हिं, हुं, हं) तीनू द्वारा आ ॐ उदगातृ द्वारा उदगीतक पहिने गाओल जाइछ। ई पाँच भक्त्ति भेल। हाथक मुद्रा- १.१.औँठा(प्रथम आँगुर)-एक यव दूरी पर २.२. औँठा प्रथम आँगुरकेँ छुबैत ३.३. औँठा बीच आँगुरकेँ छुबैत ४.४. औँठा चारिम आँगुरकेँ छुबैत ५.५. औँठा पाँचम आँगुरकेँ छुबैत ६.११. छठम क्रुष्ट औँठा प्रथम आँगुरसँ दू यव दूरी पर ७.६. सातम अतिश्वर सामवेद ८.७. अभिगीत ऋग्वेद। ग्रामगेयगान- ग्राम आ सार्वजनिक स्थलपर गाओल जाइत छल। आरण्यक गेयगान- वन आ पवित्र स्थानमे गाओल जाइत छल। ऊहगान- सोमयाग एवं विशेष धार्मिक अवसर पर। पूर्वार्चिकसँ संबंधित ग्रामगेयगान ऐ विधिसँ। ऊह्यगान आकि रहस्यगान- वन आ पवित्र स्थानपर गाओल जाइत अछि। पूर्वार्चिकक आरण्यक गानसँ संबंध। नारदीय शिक्षामे सामगानक संबंधमे निर्देश:- १.स्वर-७ ग्राम-३ मूर्छना-२१ तान-४९ सात टा स्वर सा, रे, ग, म, प, ध ,नि, आ तीन टा ग्राम- मध्य, मन्द, तीव्र। ७*३=२१ मूर्छना। सात स्वरक परस्पर मिश्रण ७*७=४९ तान। ऋगवेदक प्रत्येक मंत्र गौतमक २ सामगान (पर्कक) आ काश्यपक १ सामगान (पर्कक) कारण तीन मंत्रक बराबर भऽ जाइत अछि। मैकडॉवेल इन्द्राग्नि, मित्रावरुणौ, इन्द्राविष्णु, अग्निषोमौ ऐ सभकेँ युगलदेवता मानलन्हि अछि। मुदा युगलदेव अछि –विशेषण-विपर्यय। वेदपाठ- १. संहिता पाठ अछि शुद्ध रूपमे पाठ। अ॒ग्निमी॑ळे पुरोहि॑त य॒घ्यस्य॑दे॒वम्त्विज॑म।होतार॑रत्न॒ धातमम्। २. पद पाठ- ऐमे प्रत्येक पदकें पृथक कऽ पढ़ल जाइत अछि। ३. क्रमपाठ- एतऽ एकक बाद दोसर, फेर दोसर तखन तेसर, फेर तेसर तखन चतुर्थ। एना कऽ पाठ कएल जाइत अछि। ४. जटापाठ- ऐमे जँ तीन टा पद क, ख, आ ग अछि तखन पढ़बाक क्रम ऐ रूपमे हएत। कख, खक, कख, खग, गख, खग। ५. घनपाठ- ऐ मे उपरका उदाहरणक अनुसार निम्न रूप हएत- कख, खक, कखग, गखक, कखग। ६. माला, ७. शिखा, ८. रेखा, ९. ध्वज, १०. दण्ड, ११. रथ। अंतिम आठकेँ अष्टविकृति कहल जाइत अछि। साम विकार सेहो ६ टा अछि, जे गानकेँ ध्यानमे रखैत घटाओल, बढ़ाओल जा सकैत अछि। १. विकार-अग्नेकेँ ओग्नाय। २. विश्लेषण- शब्द/पदकेँ तोड़नाइ ३. विकर्षण-स्वरकेँ खिंचनाइ/अधिक मात्राक बराबर बजेनाइ। ४. अभ्यास- बेर-बेर बजनाइ।५. विराम- शब्दकेँ तोड़ि कऽ पदक मध्यमे ‘यति’। ६. स्तोभ- आलाप योग्य पदकेँ जोड़ि लेब। कौथुमीय शाखा ‘हाउ’ ‘राइ’ जोड़ैत छथि। राणानीय शाखा ‘हावु’, ‘रायि’ जोड़ैत छथि। मात्रिक छन्दक प्रयोग वेदमे नै अछि वरन् वर्णवृत्तक प्रयोग अछि आ गणना पाद वा चरणक अनुसार होइत छल। मुख्य छन्द गायत्री, एकर प्रयोग वेदमे सभसँ बेशी अछि। तकर बाद त्रिष्टुप आ जगतीक प्रयोग अछि। १. गायत्री- ८-८ केर तीन पाद। दोसर पादक बाद विराम। वा एक पदमे छह टा अक्षर। २. त्रिष्टुप- ११-११ केर ४ पाद। ३. जगती- १२-१२ केर ४ पाद। ४. उष्णिक- ८-८ केर दू तकर बाद १२ वर्ण-संख्याक पाद। ५. अनुष्टुप- ८-८ केर चारि पाद। एकर प्रयोग वेदक अपेक्षा संस्कृत साहित्यमे बेशी अछि। ६. बृहती- ८-८ केर दू आ तकरा बाद १२ आ ८ मात्राक दू पाद। ७. पंक्त्ति- ८-८ केर पाँच। प्रथम दू पदक बाद विराम अबैछ। यदि अक्षर पूरा नै होइत अछि, तँ एक वा दू अक्षर निम्न प्रकारेँ घटा-बढ़ा लेल जाइत अछि। (अ) वरेण्यम् केँ वरेणियम् स्वः केँ सुवः। (आ) गुण आ वृद्धि सन्धिकेँ अलग कऽ लेल जाइत अछि। ए= अ + इ ओ= अ + उ ऐ= अ/आ + ए औ= अ/आ + ओ अहू प्रकारेँ नै पुरलापर अन्य विराडादि नामसँ एकर नामकरण होइत अछि। यथा- गायत्री (२४)- विराट् (२२), निचृत् (२३), शुद्धा (२४), भुरिक् (२५), स्वराट्(२६)। ॐ भूर्भुवस्वः। तत् सवितुर्वरेण्यं। भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्। वैदिक ऋषि स्वयंकेँ आ देवताकेँ सेहो कवि कहैत छथि। सम्पूर्ण वैदिक साहित्य ऐ कवि चेतनाक वाङ्मय मूर्त्ति अछि। ओतऽ आध्यात्म चेतना, अधिदैवत्वमे उत्तीर्ण भेल अछि, एवम् ओकरा आधिभौतिक भाषामे रूप देल गेल अछि। ओना ओइ समएमे सेहो सम्मिलित रूपेँ ऋचा पाठ करैबलाकेँ बेङ सन टर्र-टर्र करैबला (अथर्ववेदमे) कहल गेल छै, माने गायनमे असहमतिक स्वरक स्वीकृति छलै। देवनागरीक अतिरिक्त्त समस्त उत्तर भारतीय भाषा नेपाल आ दक्षिणमे (तमिलकेँ छोड़ि) सभ भाषा वर्णमालाक रूपमे स्वर आ कचटतप आ य, र ल व, श, स, ह केर वर्णमालाक उपयोग करैत अछि। ग्वाङ केर हेतु संस्कृतमे दोसर वर्ण छैक (छान्दोग्य परम्परामे एकर उच्चारण नै होइत अछि मुदा वाजसनेयी परम्परामे खूब होइत अछि- जेना छान्दोग्य उच्चारण सभूमि तँ वाजसनेयी उच्चारण सभूमीग्वंङ), ई ह्रस्व दीर्घ दुनू होइत अछि। सिद्धिरस्तु लेल सेहो कमसँ कम छह प्रकारक वर्ण मिथिलाक्षरमे प्रयुक्त होइत अछि। वैदिक संस्कृतमे उदात्त, अनुदात्त आ स्वरित (क्रमशः क॑ क॒ क॓) उपयोग तँ मराठीमे ळ आ अर्द्ध ऱ् केर सेहो प्रयोग होइत अछि। मैथिलीमे ऽ (बिकारी वा अवग्रह) केर प्रयोग संस्कृत जकाँ होइत अछि आ आइ काल्हि एकर बदलामे टाइपक सुविधानुसारे द’ (दऽ केर बदलामे) एहन प्रयोग सेहो होइत अछि मुदा ई प्रयोग ओइ फॉंटमे एकटा तकनीकी न्यूनताक परिचायक अछि। मुदा “आ”कार क बाद बिकारीक आवश्यकता नै अछि। जेना फारसीमे अलिफ बे से आ रोमनमे ए बी सी होइत अछि तहिना मोटा-मोटी सभ भारतीय भाषामे लिपिक भिन्नताक अछैत वर्णमालाक स्वरूप एके रङ अछि। वर्णमालामे दू प्रकारक वर्ण अछि- स्वर आ व्यंजन। वर्णक संख्या अछि ६४ जइमे २२ टा स्वर आ ४२ टा व्यञ्जन अछि। पहिने स्वरक वर्णन दै छी- जइ वर्णक उच्चारणमे दोसर वर्णक उच्चारणक अपेक्षा नै रहैत अछि, से भेल स्वर। स्वरक तीन टा भेद अछि- ह्रस्व, दीर्घ आ प्लुत। जइमे बाजैमे एक मात्राक समए लागए से भेल ह्रस्व, जइमे दू मात्रा समए लागल से भेल दीर्घ आ जइमे तीन मात्राक समए लागल से भेल प्लुत। मूलभूत स्वर अछि- अ इ उ ऋ लृ पाणिनिसँ पूर्वक आचार्य एकरा समानाक्षर कहै छला। दीर्घ मिश्र स्वर अछि- ए ऐ ओ औ पाणिनिसँ पूर्वक आचार्य एकरा सन्ध्यक्षर कहै छला। लृ दीर्घ नै होइत अछि आ सन्ध्यक्षर ह्रस्व नै होइत अछि। अ इ उ ऋ ऐ सभक ह्रस्व, दीर्घ (आ ई ऊ ॠ) आ प्लुत (आ३ ई३ ऊ३ ॠ३) सभ मिला कऽ १२ वर्ण भेल। लृ केर ह्रस्व आ प्लुत दू भेद अछि (लॄ३) तँ २ टा ई भेल। ए ऐ ओ औ ई चारू दीर्घ मिश्रित स्वर अछि आ ऐ चारूक प्लुत रूप सेहो (ए३ ऐ३ ओ३ औ३) होइत अछि, तँ ८ टा ई सेहो भेल। भऽ गेल सभटा मिला कऽ २२ टा स्वर। ऐ सभटा २२ स्वरक वैदिक रूप तीन तरहक होइत अछि, उदात्त, अनुदात्त आ स्वरित। ऊँच भाग जेना तालुसँ उत्पन्न अकारादि वर्ण उदात्त गुणक होइत अछि आ तेँ उदात्त कहल जाइत अछि। नीचाँ भागसँ उत्पन्न स्वर अनुदात्त आ जइ अकारादि स्वरक प्रथम भागक उच्चारण उदात्त आ दोसर भागक उच्चारण अनुदात्त रूपेँ होइत अछि से भेल स्वरित। स्वरक दू प्रकार आर अछि, सानुनासिक जेना अँ आ निरनुनासिक जेना अ। दत्तेन निर्वृत्तः कूपो दात्तः। दत्त नाम्ना पुरुष द्वारा विपाट्- ब्यास धारक उतरबरिया तट पर बनबाओल, एतऽ इनार भेल दात्त। अञ प्रत्यान्त भेलासँ ’दात्त’ आद्युदात्त भेल, अण् प्रत्यायान्त होइत तँ प्रत्यय स्वरसँ अन्तोदात्त होइत। रूपमे भेद नै भेलोपर स्वरमे भेद अछि। ऐसँ सिद्ध भेल जे सामान्य कृषक वर्ग सेहो शब्दक सस्वर उच्चारण करै छला। स्वरितकेँ दोसरो रूपमे बुझि सकै छी- जेना ऐमे अन्तिम स्वरक तीव्र स्वरमे पुनरुच्चारण होइत अछि। आब व्यञ्जनपर आउ। व्यञ्जन ४२ टा अछि। क् ख् ग् घ् ङ् च् छ् ज् झ् ञ् ट् ठ् ड् ढ् ण् त् थ् द् ध् न् प् फ् ब् भ् म् य् र् ल् व् श् ष् स् ह् य् व् ल् सानुनासिक सेहो होइत अछि, यँ वँ लँ आ निरुनासिक सेहो। एकर अतिरिक्त्त दू टा आर व्यञ्जन अछि- अनुस्वार आ विसर्जनीय वा विसर्ग। ई दुनूटा स्वरक अनन्तर प्रयुक्त्त होइत अछि। विसर्जनीय मूल वर्ण नै अछि, वरन् स् वा र् केर विकार थीक। विसर्जनीय किछु ध्वनि भेद आ किछु रूप-भेदसँ दू प्रकारक अछि- जिह्वामूलीय आ उपध्मानीय। जिह्वामूलीय मात्र क आ ख सँ पूर्व प्रयुक्त्त होइत अछि, दोसर मात्र प आ फ सँ पूर्व। अनुस्वार, विसर्जनीय, जिह्वामूलीय आ उपध्मानीयकेँ अयोगवाह कहल जाइत अछि। उपरोक्त्त वर्ण सभकेँ छोड़ि ४ टा आर वर्ण अछि, जकरा यम कहल गेल अछि। कुँ खुँ गुँ घुँ (यथा- पलिक् क्नी, चख ख्न्नुतः, अग् ग्निः, घ् घ्नन्ति) पञ्चम वर्ण आगाँ रहलापर पूर्व वर्ण सदृश जे वर्ण बीचमे उच्चारित होइत अछि से यम भेल। यम सेहो अयोगवाह होइत अछि। अ आ कवर्ग ह (असंयुक्त्त) आ विसर्जनीय केर उच्चारण कण्ठमे होइत अछि। इ ई चवर्ग य श केर उच्चारण तालुमे होइत अछि। ऋ ॠ टवर्ग र ष केर उच्चारण मूर्धामे होइत अछि। लृ तवर्ग ल स केर उच्चारण दाँतसँ होइत अछि। उ ऊ पवर्ग आ उपध्मानीय केर उच्चारण ओष्ठसँ होइत अछि। व केर उच्चारण उपरका दाँतसँ अधर ओष्ठ केर सहायतासँ होइत अछि। ए ऐ केर उच्चारण कण्ठ आ तालुसँ होइत अछि। ओ औ केर उच्चारण कण्ठ आ ओष्ठसँ होइत अछि। य र ल व अन्य व्यञ्जन जकाँ उच्चारणमे जिह्वाक अग्रादि भाग ताल्वादि स्थानकेँ पूर्णतया स्पर्श नै करैत अछि। श् ष् स् ह् जकाँ ऐमे तालु आदि स्थानसँ घर्षण सेहो नै होइत अछि। क सँ म धरि स्पर्श (वा स्फोटक कारण जिह्वाक अग्र द्वारा वायु प्रवाह रोकि कऽ छोड़ल जाइत अछि) वर्ण र सँ व अन्तःस्थ आ ष सँ ह घर्षक वर्ण भेल। सभ वर्गक पाँचम वर्ण अनुनासिक कहबैत अछि कारण आन स्थान समान रहितो एकर सभक नासिकामे सेहो उच्चारण होइत अछि- उच्चारणमे वायु, नासिका आ मुँह बाटे बहार होइत अछि। अनुस्वार आ यम केर उच्चारण मात्र नासिकामे होइत अछि- आ ई सभ नासिक्य कहबैत अछि- कारण ऐ सभमे मुखद्वार बन्द रहैत अछि आ नासिकासँ वायु बहार होइत अछि। अनुस्वारक स्थान पर न् वा म् केर उच्चारण नै हेबाक चाही। जखन हमरा सभकेँ गप करबाक इच्छा होइत अछि, तखन संकल्पसँ जठराग्नि प्रेरित होइत अछि। नाभि लगक वायु वेगसँ उठैत मूर्धा धरि पहुँचि, जिह्वाक अग्रादि भाग द्वारा निरोध भेलाक अनन्तर मुखक तालु आदि भागसँ घर्षित होइत अछि आ तखन वर्णक उत्पत्ति होइत अछि। कम्पन भेलासँ वायु नादवान आ यएह गूँजित होइत पहुँचैत अछि मुँहमे आ ओकरा कहल जाइत अछि घोषवान, नादरहित भऽ पहुँचैत अछि श्वासमे आ ओकरा कहल जाइत अछि अघोषवान्। श्वास प्रकृतिक वर्ण भेल “अघोष” , आ नाद प्रकृतिक भेल “घोषवान्”। जइ वर्णक उत्पत्तिमे प्राणवायुक अल्पता होइत अछि से अछि “अल्पप्राण” आ जकर उत्पत्तिमे प्राणवायुक बहुलता होइत अछि, से भेल “महाप्राण”। कचटतप केर पहिल, तेसर आ पाँचम वर्ण भेल अल्पप्राण आ दोसर आ चारिम वर्ण भेल महाप्राण। संगे कचटतप केर पहिल आ दोसर भेल अघोष आ तेसर, चारिम आ पाँचम भेल घोषवान्। य र ल व भेल अल्पप्राण घोष। श ष स भेल महाप्राण अघोष आ ह भेल महाप्राण घोष। स्वर होइछ अल्पप्राण, उदात्त, अनुदात्त आ स्वरित। तँ आब लिखू मैथिली गजल। कविता, अकविता, गद्य-कविता, पद्य सभ लेल तर्क उपलब्ध अछि। से मैथिली गजल सेहो अनिवार्य रूपमे बहर (छन्द) मे सरल-वार्णिक, वार्णिक आ मात्रिक छन्दमे कहल जेबाक चाही। जेना सोरठा, चौपाइ छै तहिना गजल छै। उर्दूमे बे-बहर आजाद गजलक नामसँ प्रयास भेलै। कहबाक आवश्यकता नै जे ओ नै चललै। ५३९ ई.सँ अरबीमे बहर युक्त गजल आइ धरि लिखल जा रहल छै, फारसी आ उर्दूमे सेहो बिना बहरक गजल नै होइ छै। गजलमे भगवान धरिक मजाक उड़ाओल जाइ छै, ओइ अर्थमे ओ उदार छै मुदा बहरक मामिलामे ओ बड्ड कट्टर छै, आ ई कट्टरता ने अरबीमे गजलकेँ कम केलकै आ ने उर्दू-फारसीमे, मात्रा मिलान आ सहज प्रवाह गजलमे एकटा रीतियेँ होइ छै, आ से ओकर विशेषता छिऐ, नै तँ फेर ई नज्म भऽ जेतै। मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम २.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):- दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम, मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ, षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइए आ बाजलो जेबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ ऐछ (उच्चारण) छथि- छ इ थ – छैथ (उच्चारण) पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण) आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजै छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त्+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/ कऽ केर- क (केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के / राम कऽ सेहो) सँ- सऽ (उच्चारण) चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कने एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ) रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर (जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ, तऽ , त , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति “क” क बदला एकर प्रयोग अवांछित। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतऽ अर्थ बदलि जाए ओतै मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल/ ओही लऽ जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ / जेकाँ तँइ/ तैँ/ होएत / हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै सौँसे/ सौंसे बड़ / बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब-सभ सबहक - सभहक धरि- तक गप- बात बूझब – समझब बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ – समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै) होइन/ होनि जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन) पइठ/ जाइठ आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाउ। जेना ऐमे सँ । एकटा, दूटा (मुदा कए टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ, आ/ दिय’ , आ’, आ नै ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतऽ एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतऽ सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे/ ऐमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ, त नै) सँ ( सऽ स नै) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले ऐ/ अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति कतेक दिनसँ कहैत रहैत अइ लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे लहँ/ लौं गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) / ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि ... समए शब्दक संग जखन कोनो विभक्ति जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्यादि। असगरमे हृदए आ विभक्ति जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्यादि। जइ/ जाहि/ जै जहिठाम/ जाहिठाम/ जइठाम/ जैठाम एहि/ अहि/ अइ/ ऐ अइछ/ अछि/ ऐछ तइ/ तहि/ तै/ ताहि ओहि/ ओइ सीखि/ सीख जीवि/ जीवी/ जीब भले/ भलेहीं/ भलहिं तैं/ तँइ/ तँए जाएब/ जएब लइ/ लै छइ/ छै नहि/ नै/ नइ गइ/ गै छनि/ छन्हि चुकल अछि/ गेल गछि लिखू मैथिली गजल: ५ सँ १० टा शेर मोटामोटी एकटा गजलक निर्माण करत। मुदा कोनो ५-७ टा शेरकेँ एकक बाद दोसर लिख देबै तँ गजल नै बनि जाएत। ऐमे दू-चारिटा गपपर ध्यान देमऽ पड़त। जेना वर्ड डोक्युमेन्टमे जस्टीफाइ केलासँ पाँतिक आदि आ अन्तमे एकरूपता आबि जाइ छै तहिना यदि शेरक दुनू पाँती आ गजलक सभ शेरमे बिनु जस्टीफाइ केने पाँतिक आदि आ अन्तमे एकरूपता रहए तँ कहल जाएत जे ओ एक्के बहरमे अछि आ ऐ तरहक शेरक समुच्चय एकटा गजलक भाग हेबाक अधिकारी हएत। मैथिलीक सन्दर्भमे वार्णिक छन्दक गणना पद्धति माने हलंतयुक्त्त अक्षर-० संयुक्त अक्षर-१ अक्षर अ सँ ह -१ प्रत्येक; से उपयोग कएल जाए आ ओइ आधारपर १९ बहरक बदला छोट-मझोला आ पैघ आकारक पाँतिक उपयोग कएल जाए; नामकरणक कोनो आवश्यकता नै। संगे गजलक पहिल शेरक दुनू पाँतीक अन्तमे आ शेष शेरक दोसर पाँतीक अन्तमे एक वा एकसँ बेशी शब्दक समूह दोहराओल जाए (रदीफ) सेहो आवश्यक। ओना बिनु रदीफक सेहो गजल कहि सकै छी-एक्के भावपर सेहो गजल कहि सकै छी, बिनु मतलाक आ बिनु मकताक (लोक तँ मकतासँ सेहो गजलक प्रारम्भ करै छथि) सेहो गजल लिख सकै छी-, मुदा ई सभ अपवादे स्वरूप, आ अपवाद तँ अपूर्ण रहिते अछि। मतला एकसँ बेशी सेहो भऽ सकैए। गजलक कोन शेर हुस्न-ए-गजल (सभसँ नीक शेर) अछि तइमे ओइ गजलक विभिन्न समीक्षकक मध्य मतभिन्नता रहि सकैत अछि। फेर काफिया ओना तँ गजलक सभ शेरमे रहै छै (रदीफक पहिने) आ काफिया युक्त शब्द बदलै छै (एकाध बेर पुनः प्रयोग कऽ सकै छी) मुदा ध्यानसँ देखलापर लागत जे तुकमिलानीक दृष्टिएँ ओहूमे शब्दक आरम्भ-मध्य-आखिरीक किछु अक्षर नै बदलै छै। माने लय रहबाके चाही। आब आउ किछु गजल सुनी: १ सबसबाइत गप्प छल तकैत हमरापर गुम्हराइत (२३ वार्णिक मात्रा - रदीफ गुम्हराइत- काफिया युक्त शब्द हमरापर) आबैत छलए खौंझाइत आ सेहो ओकरेपर गुम्हराइत (२३ वार्णिक मात्रा - रदीफ गुम्हराइत- काफिया युक्त शब्द ओकरापर) हएत हँसारथि की रहि जाएत चुकड़िऔने ओ मोन मारि (२३ वार्णिक मात्रा ) बाजत नै मुँह फुलौने, रहत मुदा मोनपर गुम्हराइत (२३ वार्णिक मात्रा - रदीफ गुम्हराइत- काफिया युक्त शब्द मोनपर) ईह कहलकै जे, मोने-मोन प्रसन्न अछि ओ मारने गबदी (२३ वार्णिक मात्रा ) बुझैए सभ हमहीं बुझै छी, नियारे-भासपर गुम्हराइत (२३ वार्णिक मात्रा - रदीफ गुम्हराइत- काफिया युक्त शब्द नियारे-भासपर) माने तोहूँ आ तोहर बापो हमर सार सम्बन्ध फरिछा देबौ (२३ वार्णिक मात्रा ) गप्पी छथि ! मुँह घुमेने देखैए कोना मचानपर गुम्हराइत (२३ वार्णिक मात्रा- रदीफ गुम्हराइत- काफिया युक्त शब्द मचानपर) बुझै सभटा छी से नै जे नै बुझै छी मुदा मोना कहैए साइत (२३ वार्णिक मात्रा ) बड़बड़ाइए बाइमे, माने अछि ओ स्वयम् पर गुम्हराइत (२३ वार्णिक मात्रा - रदीफ गुम्हराइत- काफिया युक्त शब्द स्वयम् पर) "ऐरावत" बुझैत बुझि गेल छी ई जे सृष्टिक पहिलुके राति (२३ वार्णिक मात्रा ) सभ चरित्र रहल देखैत, एक-दोसरापर गुम्हराइत (२३ वार्णिक मात्रा - रदीफ गुम्हराइत- काफिया युक्त शब्द एक-दोसरापर) आब मैथिली गजलक किछु कठिनाह विषएपर आबी। कठिनाह विषए किछु विविधता आनत आ मैथिलीक परिप्रेक्ष्यमे नूतनता सेहो, मुदा ई ततेक कठिनाह सेहो नै अछि। वैदिक आ मैथिली छन्दक गणना अक्षरसँ होइत अछि से तँ कहिये गेल छी, गुरु-लघुक विचार ओतऽ नै भेटत। मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थ लौकिक संस्कृत आ हिन्दीसँ प्रभावित छथि मुदा गएर मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थक शब्दावलीमे ढेर रास शब्द भेटत जे वैदिक संस्कृतमे अछि मुदा लौकिक संस्कृतमे नै, तेँ कम दूषित आ खाँटी मैथिली भाषा हुनके लोकनिक अछि आ तेँ छन्दक गणना अक्षरसँ करबाक आर बेशी आवश्यकता अछि। गायत्री-२४ अक्षर उष्णिक्- २८ अक्षर अनुष्टुप् – ३२ अक्षर बृहती- ३६ अक्षर पङ्क्ति- ४० अक्षर त्रिष्टुप्- ४४ अक्षर जगती- ४८ अक्षर शूद्र कवि ऐलुष आ आन गोटे द्वारा रचित ऋक् वेद मे गायत्री, त्रिष्टुप् आ जगती छन्द सर्वाधिक परिमाणमे भेटैत अछि, से अही तीनूपर विचारी। गायत्री: ई चारि प्रकारक होइत अछि- द्विपदी, त्रिपदी, चारि पदी आ पाँचपदी। चारि पदी मे ८-८ अक्षरक पद आ एक पदक बाद अर्द्धविराम आ दू पदक बाद पूर्ण विराम दऽ सकै छी, माने एक गायत्री शेर तैयार। ओना ऐठाम हम स्पष्ट करी जे गायत्री मंत्र नै छंद अछि। लोक जकरा गायत्री मंत्र कहै छै ओ सविता मंत्र छी जे गायत्री छंदमे कहल गेल अछि आ सेहो तखन जखन स्वकेँ सुवः आ वरेण्यम् केँ वरेणियम् कहल जाए। त्रिष्टुप्: चारि पद, ११-११ अक्षरक पद आ एक पदक बाद अर्द्धविराम आ दू पदक बाद पूर्णविराम दऽ सकै छी। माने एक त्रिष्टुप् शेर तैयार। जगती: चारि पद १२-१२ अक्षरक पद आ एक पदक बाद अर्द्धविराम आ दू पदक बाद पूर्णविराम दऽ सकै छी। माने एक जगती शेर तैयार। आब जेना पहिने कहल गेल अछि जे गायत्रीमे एक-दू अक्षर कम वा बेशी सेहो भऽ सकैत अछि माने २२ सँ २६ अक्षर धरि, से गायत्रीक प्रकार भेल- विराड् गायत्री- २२, निचृद् गायत्री- २३, भुरिग् गायत्री- २५, आ स्वराड् गायत्री भेल २६ अक्षरक। तँ निअमक अन्तर्गत भेट गेल ने छूट आ स्वतंत्र भऽ गेल ने मैथिली गजल। गजलमे पाँतीक अन्तमे पूर्ण विराम दैयो सकै छी आ छोड़ियो सकै छी। फारसीक काव्यशास्त्रक हिन्दुत्वीकरणक संबंधमे हमरा नै बुझल अछि आ मौलिक गजल रचनामे कोना हिन्दुत्व आनल जाए सेहो हमरा नै बुझल अछि। काव्यकेँ "हिन्दू" आ "विधर्मी" शब्दावलीसँ दूर राखल जाए सएह नीक, हँ "मैथिली गजल" शब्दक प्रयोगमे हमरा कोनो आपत्ति नै आ तकरा हिन्दुत्वीकरण मानल जाए तँ हमर कोनो दोख नै। जतेक सौँसे विश्वमे मिला कऽ कवि/ काव्यशास्त्री भेल हेता ओइसँ बेशी कवि/ काव्यशास्त्री अरबी-फारसीमे भेल छथि। मैथिली भाषामे गजल जे हम लिखी तँ छन्दशास्त्रक अनुसार लिखी, आ से छन्दशास्त्र हम अरबी-फारसीक प्रयुक्त करी, मुदा ओइ प्रयासक अतिरिक्त ऋगवैदिक छन्दशास्त्र टगण-मगणसँ बेशी वैज्ञानिक आ सरल छै आ ऐसँ मैथिली गजल लिखबा-पढ़बा-गुनगुनएबामे लोककेँ सुविधा हेतै से हमर विश्वास अछि। वेदक समएमे हिन्दू शब्दक जन्मो नै भेल रहै से वैदिक छन्दशास्त्रक प्रयोग मात्र, मैथिली गजलकेँ हिन्दू बना देतै से हमरा नै लगैए। हम "मैथिली हाइकूशास्त्र" लिखने रही तहिया सेहो हमरा लग "वार्णिक" आ "मात्रिक"मे एकटा चयन करबाक छल, आ तहियो हम "वार्णिक" गणना पद्धतिक चयन केलौं। "शिन्टो" धर्मावलम्बी जापानी (किछु बौद्ध सेहो) सभक लिपि आ तकर छन्दशास्त्र जँ प्रयोग करी तँ मैथिलीमे हाइकू कहियो नै लिखल जा सकत; कारण ओकर काव्यशास्त्र, जापानी भाषा आ ओकर कएक तरहक लिपिक सापेक्ष छै आ ओइमे धर्म अबितो छलै (टनका/ वाका- ईश्वरक आह्वाण)। अरबी-फारसी गजल मुदा धर्म निरपेक्ष छै, मुदा ओकर काव्यशास्त्र ओकर अपन भाषा-लिपि लेल छै। से भाषा-निरपेक्ष ने जापानी काव्यशास्त्र भऽ सकै छै आ ने अरबी-फारसी काव्यशास्त्र। आउ आब गजल कही: गायत्री गजल छै सुनि देखि कएल, छै ककरासँ ककर कोन गपक सहल, छै ककरासँ ककर हे अछि देखि सहल, अछि की टीस उठल रे चिन्हलकेँ चीन्हल, छै ककरासँ ककर ई सभ सत्यक संगी, सभ छै भेष बदलि के अछि मुँह फेरल, छै ककरासँ ककर हे बिजुलौका देखियौ, छै उकापतङ्ग जेकाँ की माथ सुन्न कएल, छै ककरासँ ककर अगिनवान मैथिली, की सुखि जाएत धार कहै किदनि कहल, छै ककरासँ ककर करू कोन समझौता, करू कोन निपटारा के ललकारि रहल, छै ककरासँ ककर के अछि उठा रहल, अछि के झुका रहल के अछि बाजि रहल, छै ककरासँ ककर ऐरावत छै चकित, अछि की सोचि रहल ई कर्णधार बँचल, छै ककरासँ ककर त्रिष्टुप् गजल अछि चोरबा संग देखू ठाढ़, देखैत रहलि डकलिलामी नहि होएत आब बरदास्त, डाक- डकौअलि डकलिलामी ई सुरकि रहल छल आब, नै भेटत आब फेर की खाद्य अछि कोना भेल ई असम्हार, डघरब चलि डकलिलामी कोना तड़फड़िया सभ अछि, डगहर थस लेने की बात नञि निचेन भेल अछि बाप, ओ मुहानी आनि डकलिलामी औ बुझारति होएत फेरसँ, भेल की ई ढिंढमदरा आब ई ढाबुस बेंगक अछि ठाढ़, ई ककर चालि डकलिलामी पुक्की पाड़ि के रहल पुकारि, बहीर बनि भने अछि ठाढ़ नहि ककरो सुनब पुकार, ई हथौड़ा मारि डकलिलामी कहू यौ किएक छी हूस ठाढ़, ऐरावतक फोंफक अबाज नहि किए बनल बौक ठाढ़ , चिपैले सुआदि डकलिलामी जगती गजल भगवानक बनाओल ई गाम, जखन अछि हो भोर बकटेंट नहि तँ भेटत की कोनो विराम, अछि भेल कोना भेर बकटेंट औ की नहि भेटत आबहु त्राण, छी सुनल सएह सरनरिया कोना मिरदङिया देलक थाप, ई मिरहन्नी शेर बकटेंट जाए रहल पछताए रहल, नहि बाट कोनो सुझाए रहल अछि गोलहत्थी खाइत ई छौड़ा, पँचागि ई बिहटार बकटेंट मोचण्ड बूड़ि रौदमुँहा होइत, साँझक लकधक बैसि रहल धमधूसर सभ बेर लगौरी, आनि रहल गनौर बकटेंट गदा रे गुइँ गुइँ मार गदा रे, गदा रे पुइँ पुइँ, मुक्का मारल गताखोरक छै ई हेँज चलल, गतात संग पथार बकटेंट बेराम पड़ब नै आउ सकल, बेपर्द करब बेदरंग भेल ऐरावत चीन्हि बेपारी सभकेँ, करू भाषाक व्यापार बकटेंट मैथिली आ संस्कृतमे मात्र तुकान्त (अन्तक तुक) लयक निर्माण नै करै छै, मुदा करितो छै। तुक मिलानीक दृष्टिएँ ओहूमे शब्दक आरम्भ-मध्य-आखिरीक किछु अक्षर नै बदलै छै। वेद-ए-मुकद्दस मे वेदक विषएमे अली सरदार जाफरी लिखै छथि- शुऊरे-इन्साँ के आफताबे-अजीम की अव्वलीं शुआएँ- मनुष्यक चेतनाक पहिल किरिण। जेना तमिलमे संस्कृत शब्दक आ तुर्कीमे अरबी शब्दक बहिष्कारक आन्दोलन चलल तहिना फारसीमे (फारसक प्राचीन ग्रन्थ अवेस्ता आ वैदिक-संस्कृतक मध्य समानता द्रष्टव्य) सेहो अरबी शब्दक बहिष्कार आ तकरा स्थानपर आर्य भाषा-समूहक शब्दक ग्रहणक आन्दोलन चलल अछि। मैथिलीमे सेहो हिन्दी-उर्दू शब्दक बहुलतासँ प्रयोग भाषाक अस्तित्वपर संकट जकाँ अछि, खास कऽ मिथिलाक्षरक मैथिल ब्राह्मण संप्रदाय द्वारा दाह-संस्कार केलाक बाद। आब उर्दू गजलपर आबी। १८९३ ई.मे हाली मुकद्दमा-ए-शेर-ओ-शायरी लिखलन्हि जे हुनकर काव्य-संग्रहक भूमिका छल। ओइ काल धरि उर्दू गजलक विषय आ रूप दुनू मृतप्राय छल से हाली विषय-परिवर्तनक आह्वान तँ केबे केलन्हि संगे काफिया आ रदीफक सरल स्वरूपक ओकालति केलन्हि। ओ लिखै छथि जे एकाधे टा शेर आइ-काल्हि नीक रहैए आ शेष गजल फारसीक शब्द सभसँ भरि देल गेल शेरक संकलन भऽ जाइए, जइसँ ओकर स्तरहीनतापर लोकक ध्यान नै जाए। से उर्दू गजल धार्मिक कट्टरतापर व्यंग्यक क्षेत्रमे फारसी गजलसँ आगाँ बढ़ि गेल। संगीत आ गजल गायन ठाठ कल्याणक अन्तर्गत राग यमनमे त्रिताल १६ मात्रा (दू पाँतिक अनुष्टुप् ३२ अक्षर) क एतऽ प्रयोग भऽ सकैए। ठाठ बिलावलक अन्तर्गत राग बिलावल एकताल १२ मात्राक होइत अछि, एतऽ गायत्री- २४ अक्षरक गजलक प्रयोग भऽ सकैए। कारण वार्णिक गणनाक उपरान्त रेघा कऽ गायककेँ कम गाबए पड़तन्हि आ शब्द/ अक्षरक अकाल नै बुझना जाएत। ई मात्र उदाहरण अछि आ से गायकक लेल, मैथिली गजल लिखनिहारक लेल नै। मैथिलीमे अखन धरि जे गजल लिखल गेल अछि ओइमे बहरक एकरूपताक कोनो विचार नै राखल गेल अछि। ने से बहर-विचार फारसी काव्यशास्त्रक हिसाबसँ राखल गेल छै आ ने भारतीय काव्यशास्त्रक हिसाबसँ। आ तइ कारणसँ मैथिली गजल सभकेँ “गजल सन कविता” मात्र कहि सकै छिऐ। ओना बहरक एकरूपता गजलकार लोकनि द्वारा गजल लिखलाक बाद एक गजलपर आध घण्टा लगेला मात्रसँ कएल जा सकैए। गजल सहस्राब्दीक हारि हमर आ जीत ओकर, नै जातिवादीक सोझाँ होएब लरताङर भेष बदलि जातिपंथी जीति रहल कवि, ऐलुष नै फेर हम बनब लरताङर एहि भू मार्गक अछि तँ गप्पे विचित्र सन, प्रकाश आएल अछि भेल अन्हार निवृत्त मयूरपंखी पनिसोखा उगल छै एखने, इन्द्रक मेघकेँ सोंखि करब लरताङर बनि बाल बुद्धि हम पुछने आइ छलहुँ, ई सत्य अहिंसाक पथ ई विजयक पथ जीतल जाइए असत्यक रथ हुनकर, टनकाएब नै फेर होएब लरताङर रस्ता चलैत छलहुँ दिन राति सदिखन, से भेल जाइत छारन नव रस्ता बनल छी देखि रहल रस्ताक केंचुली भरिगर, गऽ जाइत आगाँ नहि होएब लरताङर अबैए ओ सत्यक क्षण कोन विपदा बनि, अछि आएल दौगल ओ सुनझाएल अछि पोखरिक जाइठपर भेल ठाढ़ छी हम, छछड़बाएब घर नै हैब लरताङर छनगा पीबि शिव देखि रहल चारूकात, विषहन्त ओ घूमि रहल बनल बसात तांडव ई अहाँक बुद्धि कहैए से त्रिकटु, तगबाए तकरा नै होएब लरताङर हे भाइ ऐरावत अछि आइ झूमि रहल, कदैमे करैत ओ कदमताल विकराल चरखा कत्तिनक टकुआ काटब देखल, नहि कदरियाएब खोभब लरताङर गजल बरसातिक ई राति बनल सुखराति हे कालि करब षोडशोपचार आर दए बलि हे कालि बाल बसन्त भैया बढ़थु बहिनक अछि आस आस्तीक करैत भैया लेल सुधियो नहि हे कालि लाल झिंगुर, लाल सिन्दुर, लाल अड़हुल फूल ताहूसँ लाल देखल ई दृश्य-देश मिथि हे कालि स्वप्नक सोझाँ सत्यक नै अछि आब कोनो मोल पोखड़ि झाँखड़ि सगरि घूमि ई देखलि हे कालि अमुआ फड़ए लदा लदी डारि लीबि-लीबि जाए ओकर नम्रतामे कोनो अगुताइ सुनलि हे कालि ऐरावत गजल सन कविता देखू देलनि ई मैथिलीक गरिमा एहिठाँ देखू सदति हे कालि गजल जाइत-जाइत देखल ओ ठाढ़ आर मेघडम्बर सन छाती भैयाक पीठ धोबिया पाट हुनकर मेघडम्बर सन छाती पड़ल फेर अकाल करैत हाक्रोस छथि ओ ठाढ़ भेल कात छाती धकधक उन्नत्त ठाढ़ि दुआर मेघडम्बर सन छाती देखल ई चित्कार हम भऽ सोझाँ ठाढ़ देबै ओकरा हुतकारी संकट प्रहारमे धैर्य अपरम्पार मेघडम्बर सन छाती देखल हुनका आइ छन्हि मुँह क्लान्त मुदा नहि कोनो बात कर्तव्यक बिच कोनो विश्राम डगर मेघडम्बर सन छाती सुनू सुनू भाइ गप भेल असम्हार करू पुकार समधानि भेल मानवक ई हाल करू दुत्कार मेघडम्बर सन छाती ऐरावत देखल घुरचालि बनल हथियार ओ लेने जाल छी तैयो ठाढ़ की हम क्षितिजक पार मेघडम्बर सन छाती आब किछु शब्दावली देखी। अरकान :अरकान सामिल पूर्णाक्षर: अरकान सामिल पूर्णाक्षर: फ–ऊ–लुन U।। फा–इ–लुन।U। मफा–ई–लुन U।।। मुस–तफ–इ–लुन ।।U। फा–इ–ला–तुन ।U।। मु–त–फा–इ–लुन UU।U। मफा–इ–ल–तुन U।UU। मफ–ऊ–ला–तु ।।।U सभ पूर्णाक्षरी घटक मारते रास प्रकार। १० पूर्णाक्षरी (सालिम) अराकानसँ १९ बहर आ से दू प्रकारक: मुफरद बहर माने रुक्नक बेर-बेर प्रयोगसँ।सात सालिम (पूर्णाक्षरी) बहर, संगीत शब्दावलीमे एकरा शुद्ध कहि सकै छी।सभ पाँतीमे २-८ बेर दोहरा कऽ शेरमे ४-१६ रुक्नी बहर बनत। ४ रुक्नक बहर- मुरब्बा ६ रुक्नक बहर- मुसद्दस ८ रुक्नक बहर- मुसम्मन / मुफ़रद (विशुद्ध) आठ–रुक्न, छह रुक्न आ चारि–रुक्नक सालिम बहर हजज :-आठ–रुक्न म फा ई लुन (U।।।) – चारि बेर/ छः–रुक्न म फा ई लुन (U।।।) – तीन बेर/ चारि–रुक्न म फा ई लुन (U।।।) – दू बेर रजज़ आठ–रुक्न मुस तफ इ लुन (।।U।) – चारि बेर/ छः–रुक्न मुस तफ इ लुन (।।U।) – तीन बेर/ चारि–रुक्न मुस तफ इ लुन (।।U।) – दू बेर/ रमल आठ–रुक्न फा इ ला तुन (।U।।) – चारि बेर/ छः–रुक्न फा इ ला तुन (।U।।)– तीन बेर/ चारि–रुक्न फा इ ला तुन (।U।।)– दू बेर वाफ़िर आठ–रुक्न म फा इ ल तुन (U।UU।) – चारि बेर/ छः–रुक्न म फा इ ल तुन (U।UU।) – तीन बेर/ चारि–रुक्न म फा इ ल तुन (U।UU।)– दू बेर कामिल आठ–रुक्न मु त फा इ लुन (UU।U।)– चारि बेर/ छः–रुक्न मु त फा इ लुन (UU।U।) – तीन बेर/ चारि–रुक्न मु त फा इ लुन (UU।U।) – दू बेर मुतकारिब आठ–रुक्न फ ऊ लुन (U।।) – चारि बेर/ छः–रुक्न फ ऊ लुन (U।।) – तीन बेर/ चारि–रुक्न फ ऊ लुन (U।।) – दू बेर मुतदारिक आठ–रुक्न फा इ लुन (।U।) – चारि बेर/ छः–रुक्न फा इ लुन (।U।) – तीन बेर/ चारि–रुक्न फा इ लुन (।U।) – दू बेर ऐ सभक मारते रास अपूर्णाक्षरी रूप सेहो। मुरक्कब बहर: दू प्रकारक अरकानक बेर-बेर एलासँ १२ सालिम बहर, संगीतक भाषामे मिश्रित। तीन तरहक- ४ रुक्नक बहर, ६ रुक्नक बहर, ८ रुक्नक बहर/ मुरक्कब (मिश्रित) पूर्णाक्षरी (सालिम) बहर १२ टा –तवील, मदीद, मुनसरेह, मुक्तजब, मज़ारे, मुजतस, खफीफ, बसीत, सरीअ, जदीद, करीब, मुशाकिल। अरकान :मुज़ाहिफ अरकान अपूर्णाक्षर : मुज़ाहिफ अरकान अपूर्णाक्षर :फ–इ–लुन UU। मफा–इ–लुन U।U। फ–इ–ला–लुन UU।। म–फा–ई–लु U।।U मुफ–त–इ–लुन ।UU। फ–ऊ–लु U।U मफ–ऊ–लु ।।U मफ–ऊ–लुन ।।। फै–लुन ।। फा । फ–अल् U। फ–उ–ल् U।U फा अ । U फा इ लुन । U । फ ऊ लुन U । । मुक्तजब (अपूर्णाक्षरी आठ रुक्न): फ ऊ लु U । U फै लुन U । फ ऊ लु U।U फै लुन। । मज़ारे (अपूर्णाक्षरी आठ रुक्न):मफ ऊ लु । । U फा इ ला तु । U । U म फा ई लु U । । U फा इ लुन। U । / फा इ ला न। U । U मुजतस (अपूर्णाक्षरी आठ–रुक्न):म फा इ लुन U । U । फ इ ला तुन U U । । म फा इ लुन U । U । फै लुन। ।/ फ–इ–लुन UU। ख़फीफ़ (अपूर्णाक्षरी छः रुक्न):फा इ ला तुन । U । । म फा इ लुन U । U । फै लुन। । / फ इ लुन U U । आब एक धक्का फेरसँ मैथिलीक उच्चारण निर्देश आ ह्रस्व-दीर्घ विचारपर आउ। जेना कहल गेल रहए जे अनुस्वार आ विसर्गयुक्त भेलासँ दीर्घ हएत तहिना आब कहल जा रहल अछि जे चन्द्रबिन्दु आ ह्रस्वक मेल ह्रस्व हएत। माने चन्द्रबिन्दु+ह्रस्व स्वर= एक मात्रा संयुक्ताक्षर: एतऽ मात्रा गानल जाएत ऐ तरहेँ:- क्ति= क् + त् + इ = ०+०+१= १ क्ती= क् + त् + ई = ०+०+२= २ आब पाँती वा पाँति खण्डक अन्तिम वर्णपर आउ। क्ष= क् + ष= ०+१ त्र= त् + र= ०+१ ज्ञ= ज् + ञ= ०+१ श्र= श् + र= ०+१ स्र= स् +र= ०+१ शृ =श् +ऋ= ०+१ त्व= त् +व= ०+१ त्त्व= त् + त् + व= ० + ० + १ ह्रस्व + ऽ = १ + ० अ वा दीर्घक बाद बिकारीक प्रयोग नै होइत अछि जेना दिअऽ आऽ ओऽ (दोषपूर्ण प्रयोग)। हँ व्यंजन+ अ गुणिताक्षरक बाद बिकारी दऽ सकै छी। ह्रस्व + चन्द्रबिन्दु= १+० दीर्घ+ चन्द्रबिन्दु= २+० जेना हँसल= १+१+१ साँस= २+१ बिकारी आ चन्द्रबिन्दुक गणना शून्य हएत। जा कऽ = २+१ क् =० क= क् +अ= ०+१ क केँ क् पढ़बाक प्रवृत्ति मैथिलीमे आबि गेल तेँ बिकारी देबाक आवश्यकता पड़ल, दीर्घ स्वरमे एहन आवश्यकता नै अछि। U- ह्रस्वक चेन्ह ।- दीर्घक चेन्ह एक दीर्घ । =दूटा ह्रस्व U बहरे मुतकारिब:- सभ पाँतिमे पाँच-पाँच वर्णक संगीत-शब्द चारि बेर ऐ क्रममे: U । । अरकान सामिल पूर्णाक्षर आब मैथिलीमे विभक्ति सटलासँ कनेक सुविधा अछि, तैयो शब्दक संख्या चारिसँ बेशी राखि सकै छी मुदा ह्रस्व दीर्घक क्रम वएह राखू। फ–ऊ–लुन U।। फ–ऊ–लुन फ–ऊ–लुन फ–ऊ–लुन फ–ऊ–लुन फ–ऊ–लुन फ–ऊ–लुन फ–ऊ–लुन फ–ऊ–लुन १ बहरे मुतकारिब मुतकारिब आठ–रुक्न फ ऊ लुन (U।।) – चारि बेर अनेरे धुनेरे जतेको ठकेलौं बकैतो ढ़कैतो सुझेलौं घनेरौं २ बहरे मुतदारिक मुतदारिक आठ–रुक्न फा इ लुन (।U।) – चारि बेर बीकि गेलै तँ की जोतबै खेतमे झीकि लेतै तँ की बोलतै बेरमे ३ बहरे कामिल कामिल आठ–रुक्न मु त फा इ लुन (UU।U।) – चारि बेर इनसान जे कहबैत छै सकुचा कऽ छै जँ ठकैल यौ बहरा कऽ जे कहतै जँ नै सहिते तँ छै कमजोर यौ ४ बहरे वाफिर वाफिर आठ–रुक्न म फा इ ल तुन (U।UU।) – चारि बेर अबै अछि ओ सुनै अछि ओ जँ जाइत छै बसै अछि ओ कहै अछि जे सुनै अछि ओ जँ खाइत छै ढकै अछि ओ ५ बहरे रमल रमल आठ–रुक्न फा इ ला तुन (।U।।) – चारि बेर झूरझामो भेल छी से बात ने की काटने की से समेटू से लपेटू आर की की आरने छी ६ बहरे रजज रजज आठ–रुक्न मुस तफ इ लुन (।।U।) – चारि बेर ऐ ओतऽ की छै केहनो आ की अते की छी अए नै छै कएलो नै सुनै छै की करै भेटैत-ए ७ बहरे हजज हजज :-आठ–रुक्न म फा ई लुन (U।।।) – चारि बेर अबै छै नै सुनै छै नै बहीरो छै बुझै छै से नरैमे छी कटै की से जजातो छै बुझै छै से १.आब सामिल अराकानक आठ–रुक्नक छः–रुक्न - तीन बेर/ आ चारि–रुक्न - दू बेरक प्रयोग देखब। ई सभ मुफरद बहर अछि माने रुक्नक बेर-बेर प्रयोग होइत अछि। २.एकर अतिरिक्त सामिल अराकानक १२ टा मुरक्कब बहर अछि माने दू प्रकारक अरकानक बेर-बेर एलासँ १२ सालिम बहर, संगीतक भाषामे मिश्रित। ई तीन तरहक अछि:- ४ रुक्नक बहर, ६ रुक्नक बहर, ८ रुक्नक बहर / मुरक्कब (मिश्रित) पूर्णाक्षरी (सालिम) बहर- १२ टा –तवील, मदीद, मुनसरेह, मुक्तज़ब, मज़ारे, मुजतस, ख़फीफ, बसीत, सरीअ, जदीद, क़रीब, मुशाकिल। ३.आ तकर बाद सामिल आ मुजाहिफ अराकान दुनूक मेल-पेँचसँ बनल १२ टा बहर मख्बून, अखरब, महजूफ, मक्तूअ, मक्बूज, मुज्मर, मरफू, मासूब, महजूज, मकफूफ, मश्कूल, आ अस्लम बहर। ४.आ ऐमे मात्र मुजाहिफ अराकानसँ बनल बेशी प्रयुक्त चारिटा बहर (मुक्तजब, मजारे, मुजतस आ खफीफ)। १.आब सामिल अराकानक आठ–रुक्नक छः–रुक्न - तीन बेर/ आ चारि–रुक्न - दू बेरक प्रयोग देखब। ई सभ मुफरद बहर अछि माने रुक्नक बेर-बेर प्रयोग होइत अछि। बहरे मुतकारिब छः–रुक्न फ ऊ लुन (U।।) – तीन बेर एके बेरमे जे कएलौं बड़े भेर भेनेँ सुनेलौँ बहरे मुतकारिब चारि–रुक्न फ ऊ लुन (U।।) – दू बेर बड़ी दूर ठाढ़े कनी दूर नाचे बहरे मुतदारिक छः–रुक्न फा इ लुन (।U।) – तीन बेर एकरे केलहा केलहीं तैं अनेरे दुर्गा भेलहीं बहरे मुतदारिक चारि–रुक्न फा इ लुन (।U।) – दू बेर काहि काटी एतै बात बाँटी एतै बहरे हजज :- छः–रुक्न म फा ई लुन (U।।।) – तीन बेर अनेरे भऽ गेलैं ऐ लड़ैले गै तखैनो जे भऽ जेतै की गमैए गै बहरे हजज :- चारि–रुक्न म फा ई लुन (U।।।) – दू बेर कने बेगार बेमारी कते की बात सुनाबी बहरे रजज़ छः–रुक्न मुस तफ इ लुन (।।U।) – तीन बेर ई जे धरा देखैसँ छै हेतै तँ नै ई जे घटा घूमैसँ घूमै नै तँ नै बहरे रजज़ चारि–रुक्न मुस तफ इ लुन (।।U।) – दू बेर भोरे अएलै कोन गै सोझे न एलै फोन गै बहरे रमल छः–रुक्न फा इ ला तुन (।U।।)– तीन बेर की गरीबो की धनीको तैँ सभै छी की समीपो की कतेको जे घुमै छी बहरे रमल चारि–रुक्न फा इ ला तुन (।U।।)– दू बेर की कतेको बात भेलै की जतेको लात खेलै बहरे वाफ़िर छः–रुक्न म फा इ ल तुन (U।UU।) – तीन बेर कने ककरा कहेबइ आ बतेबइ की जते सुनबै तते कहता बतेबइ की बहरे वाफ़िर चारि–रुक्न म फा इ ल तुन (U।UU।)– दू बेर करेजक बात छै कतबो करेजक हाल ई नञि हो बहरे कामिल छः–रुक्न मु त फा इ लुन (UU।U।) – तीन बेर अनका कतौ कहबै कने सुनतै कहाँ सुनि ओ बजौ करतै कने जितबै जहाँ बहरे कामिल चारि–रुक्न मु त फा इ लुन (UU।U।) – दू बेर पहिले अनै तखने सुनै कहबै कते कखनो करै २. एकर अतिरिक्त सामिल अराकानक १२ टा मुरक्कब बहर अछि माने दू प्रकारक अरकानक बेर-बेर एलासँ १२ सालिम बहर, संगीतक भाषामे मिश्रित। ई तीन तरहक अछि:- ४ रुक्नक बहर, ६ रुक्नक बहर, ८ रुक्नक बहर / मुरक्कब (मिश्रित) पूर्णाक्षरी (सालिम) बहर- १२ टा –तवील, मदीद, मुनसरेह, मुक्तज़ब, मज़ारे, मुजतस, ख़फीफ, बसीत, सरीअ, जदीद, क़रीब, मुशाकिल। बहरे तवील फ–ऊ–लुन U।। मफा–ई–लुन U।।। कहेबै सुनेबै की मुदा जे कहेतै से सुनेतै उकारो की मुदा जे बजेतै से बहरे मदीद फा–इ–ला–तुन ।U।। फा–इ–लुन।U। सूनि बाजू मूँहमे कैकटा छै बातमे बूझि बाजूमीत यौ कैकटा छै घातमे बहरे मुनसरेह मुस–तफ–इ–लुन ।।U। मफ–ऊ–ला–तु ।।।U की की रहै की की भेल कोनो भला कोनो सैह माँ माँ करी पैघो भेल सेहो जरौ सेहो जैह बहरे मुक्तजब मफ–ऊ–ला–तु ।।।U मुस–तफ–इ–लुन ।।U। रामोनाम सेहो उठा रामोनाम सेहो जरा रामोनाम मोहो लए रामोनाम बातो करा बहरे मजारे मफा–ई–लुन U।।। फा–इ–ला–तुन ।U।। अरे की छी सैह नै की अरे छी छी वैह ने छी बिसारी की उघारी की अरे की की देब ने की बहरे मुजतस मुस–तफ–इ–लुन ।।U। फा–इ–ला–तुन ।U।। नै छै रमा नै रहीमो नै छै मरा नै मरीजो नै ई कनेको मृतो छै नै ई कनेको जियै ओ बहरे खफीफ फा–इ–ला–तुन ।U।। मुस–तफ–इ–लुन ।।U। फा–इ–ला–तुन ।U।। रेख राखू फेकू तँ नै देख लेलौं सूनि राखू बेरो तँ नै बीति गेलौं बहरे बसीत मुस–तफ–इ–लुन ।।U। फा–इ–लुन।U। की की रहै की भऽ गै की की छलै की भऽ नै रीतो बितै ने कऽ गै गीतो बितै गाबि नै बहरे सरीअ मुस–तफ–इ–लुन ।।U। मुस–तफ–इ–लुन ।।U। मफ–ऊ–ला–तु ।।।U सेहो कने छै ने अते की केहैत लेरो चुबै छै ने अते की केहैत बहरे जदीद फा–इ–ला–तुन ।U।। फा–इ–ला–तुन ।U।। मुस–तफ–इ–लुन ।।U। लेलहेँ ई बेगुणो आ भेलै भने बेलगो ई नैहरो आ गेलै भने बहरे करीब मफा–ई–लुन U।।। मफा–ई–लुन U।।। फा–इ–ला–तुन ।U।। चलै छै ई कने बाटो जाइ छै नै गतातोमे भने कोनो बाइ छै नै बहरे मुशाकिल फा–इ–ला–तुन ।U।। मफा–ई–लुन U।।। मफा–ई–लुन U।।। मोदमानी अहोभागी कनै छै की क्रोध जानी प्रणो खाली बनै छै की ३.आ तकर बाद सामिल आ मुजाहिफ अराकान दुनूक मेलपेँचसँ बनल १२ टा बहर मख्बून, अखरब, महजूफ, मक्तूअ, मक्बूज, मुज्मर, मरफू, मासूब, महजूज, मकफूफ, मश्कूल, आ अस्लम बहर। मख्बून: बहरे रमल मुसद्दस मख्बून फा–इ–ला–तुन ।U।। फ–इ–ला–लुन UU।। फ–इ–ला–लुन UU।। खेल खेला असली ऐ अगबे नै मिलमिला अँखिगौरो बतहे नै अखरब: बहरे हजज मुरब्बा अखरब मफ–ऊ–लु ।।U मफा–ई–लुन U।।। की भेल लटू बूड़ू के गेल अत्ते जोड़ू महजूफ: बहरे रमल मुसम्मन महजूफ फा–इ–ला–तुन ।U।। फा–इ–ला–तुन ।U।। फा–इ–ला–तुन ।U।। फा इ लुन । U । एनमेनो भेल गेलौ आश आगाँ बीतलौ सूनि गेलौं नै भगेलौं नाश नारा गीत यौ मक्तूअ: बहरे मुतदारिक मुसद्दस मक्तूअ फा–इ–लुन।U। फा–इ–लुन।U। फै–लुन ।। कीसँ की भेल छी बाबू कीसँ की कैल छी आगू मक्बूज: बहरे मुतकारिब मुसम्मन मक्बूज (एहिमे सभटा मुज़ाहिफ अरकान) फ ऊ लुन U । । फ ऊ लुन U । । फ ऊ लुन U । । फ–ऊ–लु U।U अरे रे अहाँ जे कहेलौं सिनेह अरे रे अहाँ जे बजेलौं सिनेह मुज्मर: बहरे कामिल मुसद्दस मुज्मर (एहिमे सभटा अरकान सामिल) मु–त–फा–इ–लुन UU।U। मु–त–फा–इ–लुन UU।U। मुस–तफ–इ–लुन ।।U। अनठयने रहबै रहबै हरे हे रोमबै अनठयने रहबै रहबै अरे हे घूरिऐ मरफू: बहरे मुक्तजिब मुसद्दस मरफू मफ–ऊ–ला–तु ।।।U मफ–ऊ–ला–तु ।।।U मफ–ऊ–लु ।।U की की रेह की की सैह निंघेस की की रेह की की यैह निंघेस मासूब – बहरे वाफिर मुसद्दस (एहिमे सभटा अरकान सामिल) मफा–इ–ल–तुन U।UU। मफा–इ–ल–तुन U।UU। मफा–ई–लुन U।।। अरे अनलौं सुहागिन यै अनेरो की अरे अनलौं मुहोथरिमे जनेरो की महजूज: बहरे मुतदारिक मुसम्मन महजूज (एहिमे सभटा मुज़ाहिफ अरकान) फा इ लुन । U । फा इ लुन । U । फा इ लुन । U । फा । के रहै सूनि यै ई अहाँकेँ के रहै कूदि यै ई अहाँकेँ मकफूफ: बहरे हजज मुसम्मन मकफूफ मफा–ई–लुन U।।। मफा–ई–लुन U।।। मफा–ई–लुन U।।। म–फा–ई–लु U।।U अनेरे की अनेरे की धुनेरे की कहेलौं हँ अनेरे की अनेरे की धुनेरे की कहेलौं हँ मश्कूल: बहरे रमल मुसम्मन मश्कूल फा–इ–ला–तुन ।U।। फा–इ–ला–तुन ।U।। फा–इ–ला–तुन ।U।। मफ–ऊ–लु ।।U सूनि सुन्झा केलियै ने कोन पापी छोड़ाइ सूनि सुन्झा केलियै ने कोन पापी छोड़ाइ अस्लम: बहरे मुतकारिब मुसद्दस अस्लम फ–ऊ–लुन U।। फ–ऊ–लुन U।। फ–अल् U। अरे की अरे की अहाँ अरे की अरे की अहाँ ४.आ ऐमे मात्र मुजाहिफ अराकानसँ बनल बेशी प्रयुक्त चारिटा बहर (मुक्तजब, मजारे, मुजतस आ खफीफ)। बहरे मुक्तजब (मुजाहिफ रूप) (अपूर्णाक्षरी आठ रुक्न):फ ऊ लु U । U फै लुन U । फ ऊ लु U।U फै लुन। । कतेक गपो कतेक सप्पो कतेक मिलै रहैत छै ओ बहरे मज़ारे (मुजाहिफ रूप) (अपूर्णाक्षरी आठ रुक्न):मफ ऊ लु । । U फा इ ला तु । U । U म फा ई लु U । । U फा इ लुन। U । / फा इ ला न। U । U ने छैक नै इनाम कते कोन छानि गै ने छैक नै नकाम कते कोन कानि गै बहरे मुजतस (मुजाहिफ रूप) (अपूर्णाक्षरी आठ–रुक्न):म फा इ लुन U । U । फ इ ला तुन U U । । म फा इ लुन U । U । फै लुन। ।/ फ–इ–लुन UU। भने भले करतै की भने भले भेटौ कते कते जरतै ई कते कने देखौ बहरे खफीफ (मुजाहिफ रूप) (अपूर्णाक्षरी छः रुक्न):फा इ ला तुन । U । । म फा इ लुन U । U । फै लुन। । / फ इ लुन U U । देख लेलौं दिवारसँ बेचै कखनो बेख देखै गछारसँ हेतै निक ओ गजल द्वारा किछु संदेश, किछु भावनात्मक अभिव्यक्ति, किछु जीवन दर्शन, सौन्दर्य आकि प्रेम ओ विरहक सौन्दर्य प्रदर्शित रहबाक चाही। किछु एहेन जे सायास नै अनायास हुअए। तेँ गजल आन पद्य-कविता जेना- कहल जेबाक चाही, लिखल नै। लिखल तँ चित्र जाइत अछि- मिथिला चित्रकला लिखिया द्वारा लिखल जाइत अछि, संस्कृतमे हम कहै छिऐ- अहं चित्रं लिखामि। गजलक विषय अलग होइत अछि, गजलशास्त्रक आधारपर भजन लिख देलासँ ओ गजल नै भऽ जाएत। अरबीमे तँ गजलक अर्थे होइ छै स्त्रीसँ वार्तालाप। गजल प्रेम विरहक बादो, नै पौलाक बादो, लोकापवाद आ तथाकथित अवैध रहलाक उत्तरो प्रेमक रस लैत अछि। ई प्रेम भगवान आ भक्तक बीच सेहो भऽ सकैत अछि, शारीरिक आ आध्यात्मिक भऽ सकैत अछि। ई राधाक प्रेम भऽ सकैत अछि तँ मीराक सेहो। ई प्रेम दुनू दिससँ हुअए सेहो जरूरी नै। भावनाक उद्रेक आ संगमे गजल कहि कऽ आत्मतुष्टिक लेल गजलकार भावनाक उद्रेककेँ क्षणिक नै वास्तविक आ स्थायी बनाबथि तखने नीक गजल लिखि सकै छथि। रुबाइ: रुबाइक चतुष्पदीमे पहिल दोसर आ चारिम पाँती काफिया युक्त होइत अछि; आ मात्रा २० वा २१ होइत अछि। रुबाइमे मात्रा २० वा २१ राखू। रुबाइक सभ पाँतीक प्रारम्भ दू तरहेँ होइत अछि- १.दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ (मफ–ऊ–लु ।।U )सँ वा २.दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व (मफ–ऊ–लुन ।।।) सँ। ओना फारसी रुबाइमे पाँती सभ लेल प्रारम्भक आगाँक ह्रस्व-दीर्घ क्रम निर्धारित छै, मुदा मैथिली लेल अहाँ २०-२१ मात्राक कोनो छन्द जे १.दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ (मफ–ऊ–लु ।।U )सँ वा २.दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व (मफ–ऊ–लुन ।।।) सँ प्रारम्भ होइत हुअए, तकरा उठा सकै छी। पाँती २० वा २१ मात्राक हेबाक चाही माने (मफ–ऊ–लु ।।U ) वा (मफ–ऊ–लुन ।।।) सँ प्रारम्भ हेबाक चाही। मुदा एक रुबाइक वाक्य सभक बहर वा छन्द/ लय एकसँ बेशी तरहक भऽ सकैए। चारू पाँतीमे सेहो काफियाक मिलान भऽ सकैए। आन चतुष्पदी जइमे पहिल, दोसर आ चारिम पाँती काफिया युक्त होइत अछि मुदा मात्रा २०-२१ नै हुअए से रुबाइ नै। मैथिलीमे मुदा "कता"क परिभाषामे ओ आओत जँ प्रारम्भ दीर्घ-दीर्घसँ हुअए मुदा छन्द आगाँ सरल वार्णिक, वार्णिक वा, मात्रिक हुअए। “कता”क प्रारम्भ दीर्घ-दीर्घसँ हेबाक छै आगाँ सरल वार्णिक, मात्रिक वा वार्णिकमे सँ कोनो एकमे शेर लिखि सकै छी, कमसँ कम दोसर आ चारिम पाँतीक काफिया मिलबाक चाही। रुबाइक चतुष्पदीक चारिम पाँतीमे भावक चरम हेबाक चाही। रुबाइ कारी अनहार मेघ, आ नै होइए कत्तौ बलुआ माटि, खा नै होइए दाहीजरती देखि, हिलोरै-ए मेघ भगजोगनी भकरार, जा नै होइए बहर आ छन्दक मिलानी गजल कोनो ने कोनो बहर (छन्द) मे हेबाक चाही। वार्णिक छन्दमे सेहो ह्रस्व आ दीर्घक विचार राखल जा सकैत अछि, कारण वैदिक वर्णवृत्तमे बादमे वार्णिक छन्दमे ई विचार शुरू भऽ गेल छल:- जेना तकैत रहैत छी ऐ मेघ दिस तकैत (ह्रस्व+दीर्घ+दीर्घ)- वर्णक संख्या-तीन रहैत (ह्रस्व+दीर्घ+ह्रस्व)- वर्णक संख्या-तीन छी (दीर्घ) वर्णक संख्या-एक ऐ (दीर्घ) वर्णक संख्या-एक मेघ (दीर्घ+ह्रस्व) वर्णक संख्या-दू दिस (ह्रस्व+ह्रस्व) वर्णक संख्या-दू मात्रिक छन्दमे द्विकल, त्रिकल, चतुष्कल, पञ्चकल आ षटकल अन्तर्गत एक वर्ण (एकटा दीर्घ) सँ छह वर्ण (छहटा ह्रस्व) धरि भऽ सकैए। द्विकलमे- कुल मात्रा दू हएत, से एकटा दीर्घ वा दूटा ह्रस्व हएत। त्रिकलमे कुल मात्रा तीन हएत- ह्रस्व+दीर्घ, दीर्घ+ह्रस्व आ ह्रस्व+ह्रस्व+ह्रस्व; ऐ तीन क्रममे। चतुष्कलमे कुल मात्रा चारि; पञ्चकलमे पाँच; षटकलमे छह हएत। वार्णिक छन्द तीन-तीन वर्णक आठ प्रकारक होइत अछि जकरा “यमाताराजसलगम्” सूत्रसँ मोन राखि सकै छी। आब कतेक पाद हएत आ कतऽ काफिया (यति,अन्त्यानुप्रास) देबाक अछि; कोन तरहेँ क्रम बनेबाक अछि से अहाँ स्वयं वार्णिक/ मात्रिक आधारपर कऽ सकै छी, आ विविधता आनि सकै छी। वर्ण छन्दमे तीन-तीन अक्षरक समूहकेँ एक गण कहल जाइत अछि। ई आठ टा अछि- यगण U।। रगण ।U। तगण ।। U भगण । U U जगण U। U सगण U U । मगण ।।। नगण U U U ऐ आठक अतिरिक्त दूटा आर गण अछि- ग / ल ग- गण एकल दीर्घ । ल- गण एकल ह्रस्व U एक सूत्र- आठो गणकेँ मोन रखबा लेल:- यमाताराजभानसलगम् आब ऐ सूत्रकेँ तोड़ू- यमाता U।। = यगण मातारा ।।। = मगण ताराज ।। U = तगण राजभा ।U। = रगण जभान U। U = जगण भानस । U U = भगण नसल U U U = नगण सलगम् U U । = सगण बहर आ संस्कृत छन्दक मिलानी बहरे मुतकारिब मुतकारिब आठ–रुक्न फ ऊ लुन (U।।) – चारि बेर वर्णवृत्त भुजंगप्रयात : प्रति चरण यगण (U।।) – चारि बेर। बारह वर्ण। पहिल, चारिम, सातम आ दसम ह्रस्व, शेष दीर्घ। छअम आ आखिरी वर्णक बाद अर्द्ध-विराम। बहरे मुतकारिब चारि–रुक्न फ ऊ लुन (U।।) – दू बेर वर्ण वृत्त सोमराजी यगण (U।।) – दू बेर। छह वर्ण। पहिल आ चारिम ह्रस्व, शेष दीर्घ। दोसर आ अन्तिम वर्णक बाद अर्द्ध-विराम। मात्रिक रूप- प्रति चरण बीस मात्रा। पहिल, छअम, एगारहम आ सोलहम मात्रा ह्रस्व। बहरे मुतदारिक मुतदारिक आठ–रुक्न फा इ लुन (।U।) – चारि बेर वर्ण वृत्त स्रग्विणी रगण (।U।) – चारि बेर। बारह वर्ण। दोसर, पाँचम, आठम आ एगारहम ह्रस्व आ शेष दीर्घ। छअम आ आखिरी वर्णक बाद अर्द्ध-विराम। मात्रिक रूप- प्रति चरण बीस मात्रा। तेसर, आठम, तेरहम आ अठ्ठारहम मात्रा ह्रस्व। महजूफ: बहरे रमल मुसम्मन महजूफ फा–इ–ला–तुन ।U।। फा–इ–ला–तुन ।U।। फा–इ–ला–तुन ।U।। फा इ लुन । U । मात्रिक छंद गीतिका -प्रति चरण २६ मात्रा। तेसर, दसम, सत्रहम आ चौबीसम मात्रा ह्रस्व। गीतिका-वर्णवृत्त २० वर्ण एकटा सगण, दूटा जगण, एकटा भगण, एकटा रगण, एकटा सगण, एकटा लगण आ एकटा गगण। तेसर, पाँचम, आठम, दसम, तेरहम, पन्द्रहम, अठारहम आ बीसम वर्ण दीर्घ आ शेष ह्रस्व। पाँचम, बारहम आ अन्तिम वर्णक बाद अर्द्ध-विराम। महजूज: बहरे मुतदारिक मुसम्मन महजूज (ऐमे सभटा मुज़ाहिफ अरकान) फा इ लुन । U । फा इ लुन । U । फा इ लुन । U । फा । वर्ण वृत्त बाला-१० वर्ण। प्रति चरण रगण । U । तीन बेर आ फेर एकटा दीर्घ । मात्रिक रूप- प्रति चरण सत्रह मात्रा। तेसर, आठम, तेरहम मात्रा ह्रस्व आ आखिरीमे एक दीर्घ । आकि दूटा ह्रस्व U मैथिली गजलक आरम्भिक स्वरूप "हमरा मानसपटलपर मैथिलीक सम्मानित आलोचक श्री रमानन्द झा “रमणक” ओ वाक्य औखन ओहिना अंकित अछि जइमे ओ मैथिलीक वर्तमान गीत-गजलकेँ मंचीय यश एवं अर्थलाभक औजार कहिकऽ एकर महत्वकेँ एकदम्मे नकारि देने रहथि (सन्दर्भ- मिथिला मिहिर, फरबरी-१९८३); ... कोनो आलोचककेँ एहेन गैर जिम्मेदारीबला वक्तव्य देबाक की अधिकार? भारतीय संविधानमे भाषणक स्वतंत्रता एकटा मौलिक अधिकार छैक तेँ?” (सियाराम झा “सरस”, दीपोत्सव, १८/१०/९०; आमुख, लोकवेद आ लालकिला) वियोगी लोकवेद आ लालकिलाक एकटा दोसर आमुखमे लिखै छथि- “छन्दशास्त्रक निअमपर आधारित हेबाक उपरान्तो ऐमे गजलकारकेँ गणना-निअमक स्वातन्त्र्यक अधिकार रहै छै।” (!) देवशंकर नवीन लिखै छथि –“...पुनः डॉ. रामदेव झाक आलेख आएल। ऐ निबन्धमे दूटा अनर्गल बात ई भेल, जे गजलक पंक्ति लेल, छन्द जकाँ मात्रा निर्धारण करऽ लगला..”। लोकवेद आ लालकिलामे गजल शुरू हेबासँ पहिने कएकटा आलेख अछि, मैथिली गजलपर कोनो सकारात्मक टिप्पणी तँ नै अछि ऐ सभमे, हँ मुदा समीक्षककेँ लाठी हाथे “ई सभ मैथिली गजल थिक, गजले टा थिक” कहबापर विवश करैत प्रहार सभ अवश्य अछि। गजल कतेको ढंगसँ कतेको बहरमे कतेको छन्दमे लिखल जा सकैए, ई सत्य अछि, मुदा गणना निअमक स्वातन्त्र्यक अधिकार ने मात्रिक गणनामे छै आ ने वार्णिक गणनामे। हाइकूमे सिलेबल आ वर्णक मिलानी अंग्रेजी हाइकूक आरम्भिक लेखनमे नै भऽ सकल, देखल गेल जे ५/७/५ सिलेबलमे बेसी अल्फाबेट आबि गेल, जापानीमे ओतेक अल्फाबेट ५/७/५ सिलेबलमे नै छल। मैथिलीक आरम्भिक हाइकूमे सेहो ५/७/५ सिलेबलक अनुकरण करैत ज्योति सुनीत चौधरी अपन कविता संग्रह “अर्चिस्” मे बेसी वर्णक प्रयोग केलन्हि। तेँ हम सलाह देलौं जे मैथिली हाइकू सरल वार्णिक छन्दक आधारपर लिखल जाए, जइमे ह्रस्व-दीर्घक विचार नै हुअए। संस्कृतमे १७ सिलेबलबला वार्णिक छन्दमे नोकमे नोक मिला कऽ १७ टा वर्ण होइ छै- जेना शिखरिणी, वंशपत्र पतितम्, मन्दाक्रान्ता, हरिणी, हारिणी, नरदत्तकम्, कोकिलकम् आ भाराक्रान्ता। से ५/७/५ मे १७ सिलेबल लेल १७ टा वर्ण हाइकू लेल लेल गेल, से आब ज्योतिजी सेहो लऽ रहल छथि, हम सेहो लऽ रहल छी आ मिहिर झा, इरा मल्लिक, उमेश मंडल, रामविलास साहु आदि सेहो लऽ रहल छथि। रुबाइमे हमर सलाह छल जे एतऽ सरल वार्णिक छन्दक प्रयोग सम्भव नै अछि, कारण एकर प्रारम्भ दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ वा दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व सँ होइत अछि से चाहे तँ ह्रस्व-दीर्घक मिलानी खाइत वार्णिक छन्दक प्रयोग करू वा मात्रिक छन्दक। रुबाइक चतुष्पदीमे कमसँ कम पहिल, दोसर आ चारिम पाँती काफिया युक्त होइत अछि; आ मात्रा २० वा २१ हेबाक चाही। कारण चारू पाँती चारि तरहक बहर (छन्द) मे लिखल जा सकैए से निअमकेँ आगाँ नमरेबाक आवश्यकता नै छै, हँ ई निर्णय करैए पड़त जे चारू पाँतीमे वार्णिक वा मात्रिक गणना पद्धति जे ली, से एक्के हेबाक चाही। गजलमे मुदा अहाँ वार्णिक, सरल वार्णिक वा मात्रिक छन्दक प्रयोग कऽ सकै छी, मुदा एक गजलमे दूटा बौस्तु मिज्झर नै करू। बिन छन्द वा बहरक गजल अहाँ कहि सकै छी, समीक्षककेँ लुलुआ कऽ आ लाठी हाथे; मुदा ओ गजल नै हएत, उर्दू/ फारसीमे तँ मुशायरामे अहाँकेँ ढुकैये नै देत। आ आब जखन रोशन झा, प्रवीण चौधरी प्रतीक, आशीष अनचिन्हार आदि युवा गजलकार अन्तर्जालपर एकटा टिप्पणीक बाद सरल वार्णिक छन्दमे गजलकेँ संशोधित कऽ सकै छथि, तँ लालकिलावादी गजलकार लोकनि ई किए नै कऽ सकै छथि? मायानन्द मिश्र “गीतल” कहि आ गंगेश गुंजन “गजल सन किछु मैथिलीमे” कहि जे गलत परम्पराकेँ जारी रखबाक निर्णय लेने छथि तकरा बाद अजित आजाद आ आन युवा गजलकार जँ बिना छन्द/ बहरक गजल लिखै छथि तँ एकरा हम मायानन्द मिश्र, गंगेश गुंजन आ लालकिलावादी अ-गजलकार लोकनिक दुष्प्रभावे बुझै छी। लोकवेद आ लालकिला: आत्ममुग्ध आमुख सभक बाद ऐ संग्रह मे कलानन्द भट्ट, तारानन्द वियोगी, डॉ. देवशंकर नवीन, नरेन्द्र, डॉ. महेन्द्र, रमेश, रामचैतन्य “धीरज”, रामभरोस कापड़ि “भ्रमर”, रवीन्द्र नाथ ठाकुर, विभूति आनन्द, सियाराम झा “सरस” आ सोमदेवक गजल देल गेल अछि। कलानन्द भट्ट भोर आनब हम दोसर उगायब सुरुज करब नूतन निर्माण हम बनायब सुरुज सरल वार्णिकक अनुसारे गणना- पहिल पाँती-१७ वर्ण दोसर पाँती- १८ वर्ण; जखन सरल वार्णिकेमे गणनाक अन्तर अछि तँ ह्रस्व दीर्घ विचारपर जेबाक मेहनति बचि गेल। मात्रिक गणनाक अनुसार- पहिल पाँती-२१ मात्रा, दोसर पाँती- २१ मात्रा, मात्रा मिल गेलासँ आब ह्रस्व दीर्घ पर चली। पहिल पाँती दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व (एतऽ दूटा लगातार ह्रस्वक बदला एकटा दीर्घ दऽ सकै छी, से दोसर पाँतीमे देखब)। दोसर पाँती- ह्रस्व-हस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ- ह्रस्व-हस्व- ह्रस्व-हस्व-दीर्घ- ह्रस्व-हस्व- ह्रस्व-हस्व-ह्रस्व। मुदा एतऽ गाढ़ कएल अक्षरक बाद क्रम टूटि गेल। तारानन्द वियोगी दर्द जँ हद केँ टपल जाए तँ आगि जनमै अछि बर्फ अंगार बनल जाए तँ आगि जनमै अछि सरल वार्णिकक अनुसारे गणना- पहिल पाँती-१९ वर्ण दोसर पाँती- १८ वर्ण; जखन सरल वार्णिकेमे गणनाक अन्तर अछि तँ ह्रस्व दीर्घ विचारपर जेबाक मेहनति बचि गेल। मात्रिक गणनाक अनुसार- पहिल पाँती-२५ मात्रा, दोसर पाँती- २५ मात्रा, मात्रा मिल गेलासँ आब ह्रस्व दीर्घ पर चली। दीर्घ (संयुक्ताक्षरकेँ पहिने)-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्र्अस्व-ह्रस्व।(एतऽ दूटा लगातार ह्रस्वक बदला एकटा दीर्घ दऽ सकै छी, से दोसर पाँतीमे देखब)। दोसर पाँती- दीर्घ (संयुक्ताक्षरकेँ पहिने)-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ एतऽ क्रमभंग भऽ गेल। देवशंकर नवीन अँटा लेब समय-चक्र, सहजहि एहि आँखि बीच नबका प्रभात लेल, क्रान्ति कोनो ठानि लेब सरल वार्णिकक अनुसारे गणना- पहिल पाँती-१९ वर्ण दोसर पाँती- १६ वर्ण; जखन सरल वार्णिकेमे गणनाक अन्तर अछि तँ ह्रस्व दीर्घ विचारपर जेबाक मेहनति बचि गेल। मात्रिक गणनाक अनुसार- पहिल पाँती-२५ मात्रा, दोसर पाँती- २५ मात्रा, मात्रा मिलि गेलासँ आब ह्रस्व दीर्घ पर चली। ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व (एतऽ दूटा लगातार ह्रस्वक बदला एकटा दीर्घ दऽ सकै छी, से दोसर पाँतीमे देखब)। दोसर पाँती- ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ- मुदा एतऽ गाढ़ कएल अक्षरक बाद क्रमटूटि गेल। नरेन्द्र निकलू तँ सजिकऽ सजाकेँ बासन ली ठोकि बजाकेँ सरल वार्णिकक अनुसारे गणना- पहिल पाँती-१० वर्ण दोसर पाँती- ९ वर्ण; जखन सरल वार्णिकेमे गणनाक अन्तर अछि तँ ह्रस्व दीर्घ विचारपर जेबाक मेहनति बचि गेल। मात्रिक गणनाक अनुसार- पहिल पाँती-१३ मात्रा, दोसर पाँती-१४, मात्रा गणनाक अन्तर अछि तँ ह्रस्व दीर्घ विचारपर जेबाक मेहनति बचि गेल। डॉ महेन्द्र चलैछ आदमी सदिखन चलैत रहबा लए जीबैछ आदमी सदिखन कलेस सहबा लए सरल वार्णिकक अनुसारे गणना- पहिल पाँती-१८ वर्ण दोसर पाँती- १८ वर्ण। मुदा तेसर शेरमे दोसर पाँतीमे १६ वर्ण आबि गेल अछि। मात्रिकमे सेहो उपरका दुनू पाँतीमे क्रमसँ २४ आ २५ वर्ण अछि। रमेश जखन-जखन साओनक ओहास पड़ैए हमर छाती मे गजलक लहास बरैए सरल वार्णिकक अनुसारे गणना- पहिल पाँती-१६ वर्ण दोसर पाँती- १६ वर्ण। मुदा दोसर शेरक पहिल पाँतीमे १५ वर्ण। मात्रिकमे सेहो उपरका दुनू पाँतीमे २२ वर्ण अछि। मुदा ह्रस्व-दीर्घ गणनामे दोसरे शब्दमे ई मारि खा जाइए। ई दोष शेष गजलकारमे सेहो देखबामे अबैए। एकर अतिरिक्त सुरेन्द्रनाथक “गजल हमर हथियार थिक”, सियाराम झा “सरस”क “थोड़े आगि थोड़े पानि”, रमेशक “नागफेनी” आ तारानन्द वियोगीक “अपन युद्धक साक्ष्य” मे सँ किछु किताब लाठी हाथे मैथिली साहित्यमे गजल संग्रहक रूपमे साहित्य अकादेमीक सर्वे ऑफ मैथिली लिटेरेचरक उत्तर जयकान्त मिश्र संस्करणमे आबि गेल अछि, किछु ऐ साहित्यक इतिहासक अगिला संस्करणमे आबि जाएत! अरविन्द ठाकुरक गजल सेहो पत्र-पत्रिकामे गजल कहि छपि रहल अछि, से अही परम्पराकेँ आगाँ बढ़बैत अछि। जँ ई सभ गजल नै अछि तँ पद्य तँ अछि आ तइ रूपमे एकर विवेचन तँ हेबाके चाही। ऐ क्रममे रवीन्द्रनाथ ठाकुरक “लेखनी एक रंग अनेक” देखू। मैथिली गजल संग्रहक रूपमे ई पोथी आइसँ २५ बर्ख पूर्व आएल। सोमदेव आ भ्रमरक संग हिनको गजल लालकिलावादक परिभाषामे नै अबैत अछि। गजल नै मुदा पद्यक रूपमे एकर स्थान मैथिली साहित्यमे सुरक्षित छै, मुदा ई आन वर्णित गजलक तथाकथित संकलनक विषयमे नै कहल जा सकैए। एक छन्द, एक बाँसुरी, एक धुन सुनयबालेऽ लियौ ई एक गजल, आई गुनगुनयबालेऽ (रवीन्द्रनाथ ठाकुर “लेखनी एक रंग अनेक”) मैथिली गजलक पहिल दुर्भाग्य तखन देखा पड़ैत अछि जखन एतऽ गजलकेँ मुस्लिम धर्मसँ जोड़ि कऽ देखल जाए लगलै आ मुस्लिम धर्म आ ओकर साहित्यकेँ अछोप मानि लेल गेलै। गजलक प्रारम्भ इस्लामक आगमनसँ पूर्वक घटना अछि आ अवेस्ता आ वैदिक संस्कृत मध्य ढेर रास साम्य अछि। दोसर दुर्भाग्य मायानंद मिश्रक ओ कथन भेल जइमे ओ घोषणा केलथि जे मैथिलीमे गजल लिखले नै जा सकैए, हुनकर तात्पर्य दोसर रहन्हि मुदा लोक अही तरहेँ ओकरा प्रस्तुत करऽ लागल, कारण ओ स्वयम् गीतल नामसँ गजल लिखलन्हि। मैथिली गजलमे "अनचिन्हार आखर" सन अन्तर्जालीय जालवृत्त उपस्थित भेल, जतऽ बहर (छन्दयुक्त) गजल आ गजलकारक लाइन लागि गेल। मुदा सभसँ बड़का दुर्भाग्य ई भेलै जे मैथिलीक किछु तथाकथित शाइर सभ रामदेव झा द्वारा बहर संबंधी विचारकेँ नकारि देलन्हि (देखू- लोकवेद आ लालकिलामे देवशंकर नवीन जीक आलेख)। जँ वर्तमानमे गजलक परिदृश्यकेँ देखी तँ मोटामोटी दूटा रेखा बनैत अछि (जकरा हम दू युगक नाम देने छी), पहिल भेल "जीवन युग" आ दोसर भेल "अनचिन्हार युग"। आब कने दुनू युगपर नजरि देल जाए। १.जीवन युग- ऐ युगक प्रारंभ हम जीवन झासँ केने छी जे आधुनिक मैथिली गजलक पिता मानल जाइ छथि मुदा ओ कम्मे गजल लिख सकला। मुदा हुनका बाद मायानंद, इन्दु, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, सरस, रमेश, नरेन्द्र, राजेन्द्र विमल, धीरेन्द्र प्रेमर्षि, रौशन जनकपुरी, अरविन्द ठाकुर, सुरेन्द्र नाथ, तारानंद वियोगी आदि गजलगो सभ भेला। रामलोचन ठाकुर जीक बहुत रचना गजल अछि मुदा ओ अपने ओकर क्रम-विन्यास कविता-गीत जकाँ बना देने छथिन्ह मुदा किछु गजलक श्रेणीमे सेहो अबैए। ऐ “जीवन युग”क गजलक प्रमुख विशेषता अछि बे-बहर अर्थात बिन छंदक गजल। ओना बहरकेँ के पुछैए जखन सुरेन्द्रनाथ जी काफियेक ओझरीमे फँसल रहि जाइ छथि। एकर अतिरिक्त आर सभ विशेषता अछि ऐ युगक। आ जँ एकै पाँतिमे कहऽ चाही तँ पाँति बनत---"गजल थिक, ई गजल थिक, आ इएह टा गजल थिक"। २.आब कने आबी " अनचिन्हार युग" पर। ऐ युगक प्रारंभ तखन भेल जखन इंटरनेटपर मैथिलीक पहिल गजल आ शेरो-शाइरीकेँ समर्पित ब्लाग "अनचिन्हार आखर" ( http://anchinharakharkolkata.blogspot.com ) क जन्म भेल आ ऐ “अनचिन्हार आखर” जालवृत्तक नामपर हम ऐ युगक नाम "अनचिन्हार युग" रखलौं अछि। ऐ युगक किछु विशेषता देखल जाए- गजलक परिभाषिक शब्द आ बहरक निर्धारण- ई श्रेय "अनचिन्हारे आखर"केँ छै जे ओ हमरासँ "मैथिली गजल शास्त्र" लिखेलक। आ ई मैथिलीक पहिल एहन शास्त्र भेल जइमे गजलक विवेचन मैथिली भाषाक तत्वपर कएल गेलै। तकरा बाद आशीष अनचिन्हार सेहो "गजलक संक्षिप्त परिचय" लिख ऐ परंपराकेँ पुष्ट केलथि। आ एकरे फल थिक जे सभ नव-गजलकार बहरमे गजल कहि रहल छथि। स्कूलिंग- "अनचिन्हार आखर" गजल कहेबाक परंपरा शुरू केलक आ तइमे सुनील कुमार झा, दीप नारायण "विद्यार्थी", रोशन झा, प्रवीन चौधरी "प्रतीक", त्रिपुरारी कुमार शर्मा, विकास झा "रंजन", सद्रे आलम गौहर, ओमप्रकाश झा, मिहिर झा, उमेश मंडल आदि गजलकार उभरि कऽ एला। गजलमे मैथिलीक प्रधानता----"अनचिन्हार युग" सँ पहिने गजलमे उर्दू-हिन्दी शब्दक भरमार छल आ मान्यता छल जे बिना उर्दू-हिन्दी शब्दक गजल कहले नै जा सकैए। मुदा "अनचिन्हार आखर" ऐ कुतर्ककेँ धवस्त केलक आ गजलमे १००% मैथिली शब्दक प्रयोगकेँ सार्वजनिक केलक। गजलक लेल पुरस्कार योजना--- "अनचिन्हार आखर" मैथिली साहित्यक इतिहासमे पहिल बेर गजल लेल अलगसँ पुरस्कार देबाक घोषणा केलक। ऐ पुरस्कारक नाम "गजल कमला-कोसी-बागमती-महानंदा" पुरस्कार अछि। ऊपर चारू विशेषताक आधारपर एकटा अंतिम मुदा सभसँ बड़का विशेषता जे निकलल ओ थिक मायानंद मिश्रक ओइ कथनक खंडन, जकर अभिप्राय छल जे मैथिलीमे बहरयुक्त गजल लिखल नै जा सकैए। "अनचिन्हार आखर" सरल वार्णिक, वार्णिक आ मात्रिक छन्दक अतिरिक्त फारसी/ उर्दू बहरमे सेहो मैथिली गजल लिखबाक शास्त्र ओ उदाहरण खाँटी मैथिली शब्दावलीमे प्रस्तुत केलक। गजल, रुबाइ, कता, हाइकू, शेनर्यू, टनका, हैबून, कुण्डलिया, दोहा, रोला ई सभ एकटा स्थापित विधा अछि। स्थापित विधा माने जकर लिखबाक विधि जइ भाषा सभक ई मूल खोज अछि, ओइ भाषामे स्थापित भऽ गेल अछि। जँ हाइकू लिखबा काल कोनो निअम पालन नै करी तँ ओकर नाम क्षणिका पड़ि गेलासँ ओ हाइकू दोषविहीन नै भऽ जाएत। जँ कोनो भाषासँ हम गजल/ रुबाइ/ कता मैथिलीमे प्रयोग लेल सोचै छी तँ ऐ कारणसँ जे ओ ओइ भाषाक चमत्कारिक चीज अछि, आ मैथिलीक छौंक लगलासँ कोनो आर चमत्कारक हम आशा राखै छी। सएह हाइकू, शेनर्यू, टनका आ हैबून लेल सेहो लागू अछि। आब एतऽ ई देखबाक अछि जे कोनो विधाक आयात सतर्कतासँ हुअए, जइ विधाक सैद्धान्तिक पक्ष सुदृढ़ छै। से जेना तेना आयात कऽ हाथपर हाथ धरि सए बर्ख आर इन्तजार करी ई सोचि जे तकर बाद एकर मैथिली छौंकबला अलग सिद्धान्त बनत, तँ तइ लेल स्थापित विधाक आयातक कोन बेगरता? एते समएमे तँ एकटा आर नव विधा बनि जाएत! हँ, मात्र लिप्यंतरण कऽ देलासँ उर्दूक सभ गजलक निअम हिन्दीक भऽ जाइत अछि, मुदा ओतौ वर्तनीक भिन्नता मारते रास काफियाक उपनिअमक निर्माणक बाध्यता उत्पन्न करैत अछि। मैथिली तँ साफे अलग भाषा अछि तेँ एकर काफियाक निअम सोझे आयातित नै भऽ सकैए। बहरमे वर्ण/ मात्राक गणना पद्धति सेहो हिन्दी-उर्दूमे मात्र कोनो खास शब्दक वर्तनीक भिन्नताक कारण कखनो काल उपनिअम बनेबाक खगता अनुभूत करबैए, मुदा से मैथिलीमे सोझे आयातित नै भऽ सकैए कारण ई साफे अलग भाषा थिक। तँ की काफिया आ बहरक वर्ण/ मात्रा गणना पद्धति मैथिलीमे साफे छोड़ि देल जाए? आकि ओइ मे ततेक ढील दऽ देल जाए जे ओकर कोनो मतलबे नै रहए? आ तखन जे बहरमे लिखथि वा काफियाक शुद्ध प्रयोग करथि से भेलथि कट्टर आकि जे एकर विरोध करथि से भेला कट्टर? आ जँ बिन काफिया आ बहरक गजलकेँ गजल नै कहल जाए तँ ओ रचना महत्वहीन भऽ गेल? ओ गजल नै भेल, वा जीवन युगक मैथिली गजल भेल, मुदा गीत/ कविता तँ भेबे कएल। कोनो गजल मात्र काफिया आ बहरक शुद्धता मात्र रहने उत्कृष्ट तँ नहिए हएत, मुदा उत्कृष्ट हेबाक सम्भावनाक प्रतिशतता कए गुणा बढ़त। तहिना कोनो गजल सन रचना जँ अशुद्ध काफियामे आ बे-बहर अछि तँ सएह मात्र ओकर उत्कृष्टताक प्रमाण भऽ जाएत? एकर विपरीत हम ई कहऽ चाहब जे ओहनो रचना उत्कृष्ट भऽ सकैए, मुदा तकर सम्भावनाक प्रतिशतता भयंकर रूपेँ घटि जाएत। गजल, रुबाइ, कता, हाइकू, शेनर्यू, टनका, हैबून, कुण्डलिया, दोहा आ रोला निअमबद्ध रचना अछि। एकरा अकविता, गद्य-कविता आ गीतक स्वरूप देलासँ अहाँ भाषाक कोन उपकार कऽ सकब, कारण अकविता, गद्य-कविता आ गीत तँ स्वयं स्थापित विधाक स्वरूप लऽ लेने अछि। छोट कविता क्षणिका भऽ सकत, हाइकू नै। कुण्डलिया, दोहा आ रोलाक निअम मैथिलीमे बनेबामे कोनो असोकर्ज नै भेल कारण ई सोझे आयातित भऽ गेल मुदा गजल, रुबाइ, कता, हाइकू, शेनर्यू, टनका, हैबूनमे वर्ण/ मात्रा गणना पद्धति जापानी आ उर्दू-फारसीसँ अहाँ लइए नै सकै छी। जापानक लेखन पद्धति अल्फाबेट (वर्ण) आधारित अछिये नै, तखन अहाँ ओकर गणना पद्धति कोना आयात कऽ सकब। ओकर तरीका छै। पाश्चात्य तरीका आ सिलेबल आधारित लेखन पद्धति सेहो जापानी भाषामे होइ छै, से तकर प्रयोग कऽ ओइ चित्रात्मक लेखनक सिलेबल आधारित शैलीक मिलान संस्कृतक वार्णिक छन्द गणना पद्धतिसँ कएल गेल आ ओकरा हाइकू, शेनर्यू आ टनका लेल प्रयोग कएल गेल। तहिना गजल, कता आ रुबाइमे वैज्ञानिक आधारपर मैथिली भाषाक सापेक्ष निअम बनाओल गेल जइसँ गजल, कता आ रुबाइ मैथिलीमे दोसर भाषासँ एलाक उपरान्तो अपन मूल विशेषता बना कऽ राखि सकल। आ तकर बाद जे मैथिली गजल आ गजलकारक संख्यामे परिणामात्क आ गुणात्मक वृद्धि भेल अछि, से दुनियाँक सोझाँ अछि। मैथिली समीक्षाशास्त्र (१-६) १ गद्य साहित्य मध्य विहनि कथाक स्थान आ विहनि कथाक समीक्षाशास्त्र गद्यक विभिन्न विधा जेना प्रबन्ध, निबन्ध, समालोचना, कथा-गल्प, उपन्यास, पत्रात्मक साहित्य, यात्रा-संस्मरण, रिपोर्ताज आदिक मध्य कथा-गल्प, आख्यान आ उपन्यास अनुभव मिश्रित कल्पनापर विशेष रूपसँ आधारित अछि। जकरा हम सभ खिस्सा-पिहानी कहै छिऐ ताहिसँ ई सभ लग अछि। कथा-गल्प, आख्यान आ उपन्यास आ किछु दूर धरि नाटक आ एकांकी मनोरंजनक लेल सुनल-सुनाओल-पढ़ल जाइत अछि वा मंचित कएल जाइत अछि। ई उद्देश्यपूर्ण भऽ सकैत अछि वा ऐमे निरुद्देश्यता-एबसर्डिटी सेहो रहि सकै छै। जिनगीक भागादौड़ीमे निरुद्देश्यपूर्ण साहित्य सेहो मनोरंजन प्रदान करैत अछि। विहनि कथा कहने एकटा एहेन विधा बनि सोझाँ आएल अछि जे पहिने कथा थिक फेर विहनि कथा। अंग्रेजीमे सेहो लम्बाइक आधारपर शॉर्ट-स्टोरी/ नोवेलेट/ नोवेला/ नोवेल क विभाजन कएल जाइत अछि। मैथिलीमे सभ विधामे शब्द संख्याक घटोत्तरी-बढ़ोत्तरी अंग्रेजी वा दोसर यूरोपियन भाषासँ बेशी होइत अछि, ओना अंग्रेजी वा दोसर यूरोपियन भाषामे सेहो सभ विधामे लेखकक व्यक्तिगत रुचि आ कथ्यक आवश्यकताक अनुसार घटोत्तरी-बढ़ोत्तरी होइते अछि। तहिना वन-एक्ट प्ले भेल एकांकी आ प्ले भेल नाटक। से विहनि कथा कथा तँ छीहे। अहाँक अनुभवमिश्रित कल्पना अहाँसँ किछु कहबा लेल कहैत अछि। आ ई कथ्य हास्य-कणिका वा अहास्य-कणिका बनि सकैत अछि। लोक अहाँकेँ कहि सकै छथि जे अहाँकेँ गप्प बड्ड फुराइए, अहाँ हाजिर जवाब छी। आ तकर बाद अहाँक हिम्मत बढ़ैत अछि आ अहाँ ओहि कथ्यकेँ शिल्पक साँचामे ढलैय्या कऽ विहनि कथा बना दै छी। हास्य-कणिकाक संग सभसँ मुख्य अवरोध छै जे अहाँक सुनाओल हास्य-कणिका घूमि-फिरि अहीं लग आबि जाएत, माने मौलिकता कतौ हेरा जाएत। हास्य-कणिका सेहो एक-दू पाँतीसँ आध-एक पृष्ठ धरिक होइत अछि। कथा-उपन्यासमे एकर समावेश कएल जा सकैत अछि मुदा विहनि कथा एकर पलखति नै दैत अछि। मुदा कथा-उपन्यासमे जेना कएल जाइत अछि जे एकरा कोनो पात्रक मुँहसँ कहाबी वा कोनो आन प्रसंगसँ जोड़ि सार्थक बनाबी तँ से अहाँ विहनि कथामे सेहो कऽ सकै छी। गल्प आख्यानसँ बहराइत अछि आ नैतिक शिक्षा, प्रेरक कथा आ मिस्टिक टेल्स सेहो लघुसँ दीर्घ रूप धरि जाइत अछि। एकर लघु रूप विहनि कथा नै भेल सेहो नै। विहनि कथामे जे त्वरित विचारक उपस्थापन देखल जाइत अछि से कथा-गल्प आ उपन्यासमे सेहो रहैत अछि। मुदा जे त्वरित विचारक उपस्थापन नै रहलासँ ओ विहनि कथा नै रहत सेहो गप नै। उनटे जखन विहनि कथाक समीक्षा करए लागब तखन समीक्षकक ध्यान स्थायी तत्व दिस होएबाक चाही नै कि त्वरित उपस्थापन दिस। त्वरित विचारक उपस्थापनक प्रति बेसी झुकाव ओकरा अहास्य-कणिका बना दैत अछि, ओ विहनि कथा तँ रहत मुदा श्रेष्ठ विहनि कथा नै रहत। विहनि कथा झमारि देत तँ ओ विहनि कथा वा श्रेष्ठ विहनि कथा भेल आ जे ओ झमारि नै सकत तँ ओ विहनि कथा भेबे नै कएल- ई गप नै छै। कोनो त्वरित विचार आएल, ओकरा कागचपर लिखि लेलौं, ऐ डरसँ जे कतौ बिसरा ने जाए- एतऽ धरि तँ ठीक अछि। मुदा हरबड़ा कऽ एकरा विहनि कथा बना देबासँ पहिने विचारकेँ सीझऽ दियौ। ओइमे की मिज्झर करब तँ ओइमे स्थायी तत्व आबि सकत तइपर मनन करू। ओना बिना सिझने जे झमारैबला विहनि कथा लिखि देलौं तँ ओ विहनि कथा तँ भेल मुदा श्रेष्ठ विहनि कथा ओ सेहो भऽ सकत तकर सम्भावना कम। ई ओहिना अछि जेना कोनो झमकौआ गीत अपन प्रभाव बेसी दिन रखबे करत से निश्चित नै अछि तहिना कथाक ई स्वरूप ट्वेंटी-ट्वेंटी सन नै भऽ जाए तइपर विचार करए पड़त। उपन्यास तँ एक उखड़ाहामे नै पढ़ल जा सकैए मुदा लघुकथा एक उखड़ाहामे पढ़ल जा सकैए। एक उखड़ाहामे अहाँ कएकटा विहनि कथा पढ़ि सकै छी। उपन्यासमे लेखक वातावरणक, प्लॉटक, व्यक्तिक जाहि विशदतासँ वर्णन कऽ सकैए से लघुकथामे सम्भव नै। ओ एकटा पक्षपर, जौँ कही तँ एकटा घटनापर केन्द्रित रहैए आ ऐ क्रममे वातावरण आ व्यक्तिक जीवनक एकटा मोटामोटी विवरणात्मक स्केच मात्र खेंचि पबैए। विहनि कथामे वातावरण आ व्यक्तिक जीवनक एकटा मोटामोटी विवरणात्मक स्केच सेहो नै खेंचि सकै छी, से पलखति विहनि कथा अहाँकेँ नै देत, हँ तखन विहनि कथा सेहो एकटा पक्षपर वा एकटा घटनापर केन्द्रित रहैए। आ ई पक्ष वा घटना तेहन रहत जे लेखककेँ ललचबइत रहत जे एकरा स्वतंत्र रूपसँ लिखू, एकरा लघुकथा वा उपन्यासक भाग बना कऽ एकर स्वतंत्रता नष्ट नै करू। तखन उपन्यासक प्लॉटसँ कथाक प्लॉट सरल होएत आ विहनि कथाक लेल तँ एकर आवश्यकते नै अछि, पक्ष वा घटनाक वर्णन शिल्पक साँचामे ढलैय्या केलौं आ पूर्ण विहनि कथा बनि कऽ तैयार। विहनि कथाक समीक्षाशास्त्र विहनि कथाक समीक्षा कोना करी? दू-पाँतीसँ डेढ़-दू पन्ना धरिक (पाँच पन्ना धरि सेहो) अनुभवमिश्रित काल्पनिक खिस्सा विहनि कथा कहएबाक अधिकारी अछि। लघु आकारक कथामे कोनो कथा पूर्ण रूपसँ कहल गेल तँ फेर ओ विहनि कथा नै कहाओत। हँ जे ओइमे एकटा घटनाक शृंखलाक वर्णन एकटा कथ्य कहक लेल आवश्यक अछि तँ शृंखला पूर्ण होएबाक चाही। ऐ शृंखलाक कड़ी कनेक नमगर भऽ सकैए। त्वरित उपस्थापनाक हरबड़ी ऐ शृंखलाकेँ कमजोर कऽ सकैए। सदिखन उल्टा धार बहाबी आ त्वरित उपस्थापना आनी- ई पद्धति किछु गणमान्य विहनि कथा लेखकक फार्मूला बनि गेल अछि। एकाध-दूटा विहनि कथामे ई सिनेमाक “आइटम गीत” सन सोहनगर लगैत अछि मुदा फेर समीक्षकक दृष्टि एकरा पकड़ि लैत अछि, कारण ई प्रो-एक्टिव होएबाक साती रिएक्टिव बनि जाइत अछि। स्थायी प्रभाव ऐसँ नै आबि पबै छै, विहनि कथा लेखकक प्रतिभाक कमी ऐमे प्रतीत होइ छै। विहनि कथा वएह श्रेष्ठ हएत जे एकटा घटनाक शृंखलाक निर्माण करत आ अपन निर्णय सुनेबाक लेल पाठककेँ छोड़ि देत। फरिछेबाक पलखति विहनि कथाकेँ नै छै, मुदा तकर माने ई नै जे दू-चारि पाँतीमे बात कएल जाए। मुदा लेखक जौँ दू-चारि पाँतीक गपकेँ विहनि कथा कहै छथि तँ समीक्षक ओकरा विहनि कथा मानबा लेल बाध्य छथि मुदा ओ श्रेष्ठ विहनि कथा हएत तकर सम्भावना घटि जाइत अछि। विहनि कथाक वर्ण्य विषय मात्र चलैत-फिरैत घटना नै अछि। विहनि कथा-लेखककेँ बच्चाक लेल, नैतिक शिक्षा आ धार्मिक विषयपर सेहो विहनि कथा लिखबाक चाही। ट्रेनमे बसमे जाइ छी, घरमे दलानपर घूरतर गप करै छी आ तकर अनुभव मात्र विहनि कथामे आबि रहल अछि। सामाजिक आ आर्थिक समस्या सेहो एकर स्थायी वर्ण्य विषय भऽ सकैत अछि। राजनैतिक प्रश्न आ प्राकृतिक आपदाकेँ वर्ण्य विषय बनाओल जा सकैत अछि। विहनि कथा समीक्षक समीक्षा करबा काल पौराणिक समीक्षा नै करथि माने शिव पुराणमे सभसँ पैघ शिव आ गरुड़ पुराणमे सभसँ पैघ गरुड़, ऐ तरहक समीक्षा नै करथि। माने ई नै होमए लागए जे, जे अछि से विहनि कथा, चाहे ओ जेहेन हुअए। जेना उपन्यासमे लेखककेँ अपन पूर्ण प्रतिभा देखेबाक लेल पलखतिक अभाव नै रहै छै से लघुकथामे नै रहै छै आ विहनि कथामे तँ से आरो कम रहै छै। मुदा विषयक विस्तार कऽ पाठकक माँगकेँ पूर्ण कएल जा सकैत अछि। कथोपकथनक गुंजाइश कम राखि वा कोनो उपस्थापनासँ पहिने राखि विहनि कथाक कथाकेँ सशक्त बनाओल जा सकैत अछि, अन्यथा ओ एकांकी वा नाटक बनि जाएत। विहनि कथाक समावेश कथा-उपन्यासमे भऽ सकैए मुदा विहनि कथामे हास्य-कणिकाक समावेश नै हुअए तखने ओ समीक्षाक दृष्टिसँ श्रेष्ठ हएत, कारण एक तँ कम जगह, तइमे जे कथोपकथन आ हास्य कणिका घोसियेलहुँ तखन ओकर प्रभाव दीर्घजीवी नै हएत, भनहि ओ बिठुकट्टा विहनि कथा बनि जाए। नीक विहनि कथा त्वरित उपस्थापनक आधारपर नै वरन ओइमे तीक्ष्णतासँ उपस्थापित मानव-मूल्य, सामाजिक समरसताक तत्व आ समानता-न्याय आधारित सामाजिक मान्यताक सिद्धान्त आधार बनत। समाज ओइ आधारपर कोना आगू बढ़ए से संदेश तीक्ष्णतासँ आबैए वा नै से देखए पड़त। पाठकक मनसि बन्धनसँ मुक्त होइत अछि वा नै, ओइमे दोसराक नेतृत्व करबाक क्षमता आ आत्मबल अबै छै वा नै, ओकर चारित्रिक निर्माणक आ श्रमक प्रति सम्मानक प्रति सन्देह दूर होइ छै वा नै- ई सभटा तथ्य विहनि कथाक मानदंड बनत। कात-करोटमे रहनिहार तेहन काज कऽ जाथि जे सुविधासम्पन्न बुते नै सम्भव अछि, आ से कात-करोटमे रहनिहारक आत्मबल बढ़लेसँ हएत। हीन भावनासँ ग्रस्त साहित्य कल्याणकारी कोना भऽ सकत? बदलैत सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक-धार्मिक समीकरणक परिप्रेक्ष्यमे एकभग्गू प्रस्तुतिक रेखांकन, कथाकार-कविक व्यक्तिगत जिनगीक अदृढ़ता, चाहे ओ वादक प्रति होअए वा जाति-धर्मक प्रति, साहित्यमे देखार भइए जाइ छै, शोषक द्वारा शोषितपर कएल उपकार वा अपराधबोधक अन्तर्गत लिखल जाएबला कथामे जे पैघत्वक (जे हीन भावनाक एकटा रूप अछि) भावना होइ छै, तकरा चिन्हित कएल जाए। मेडियोक्रिटी चिन्हित करू- तकिया कलाम आ चालू ब्रेकिंग न्यूज- आधुनिकताक नामपर नै चलत। विहनि कथा एक पक्ष वा घटनाक वर्णन अछि आ ई आवश्यक नै जे ओकरा एक्के पृष्ठमे लिखल जाए। अहाँ ओहि घटनाकेँ ३-४ पृष्ठमे सेहो लिखि सकै छी आ ओ विहनि कथा रहबे करत। जेम्स जॉयसक “डब्लाइनर” लघु-कथा संग्रहक सभ कथा एकटा घटनासँ अनचोके कोनो वस्तुक त्वरित ज्ञान दर्शबैत अछि। १५ टा शॉर्ट-स्टोरीक संग्रह जेम्स जॉयसक “डब्लाइनर” २०० पृष्ठक अछि आ मैथिली विहनि कथाक सभ विशेषतासँ युक्त अछि खास कऽ एक्केटा “एपीफेनी” नाम्ना तत्व एकरा विहनि कथा सिद्ध करैए। तहिना खलील-जिब्रान आ एंटन चेखवक ढेर रास शॉर्ट-स्टोरी नमगर रहितो विहनि कथा अछि। अंग्रेजीमे वा यूरोपियन साहित्यमे शॉर्ट-स्टोरी आ स्टोरीक प्रयोग कखनो पर्यायवाचीक रूपमे होइत अछि। नॉवेल जकरा बांग्ला आ मैथिलीमे उपन्यास आ मराठीमे कादम्बरी कहै छिऐ-क विस्तार बेशी होइ छै। मैथिलीमे ५०-६० पृष्ठसँ उपन्यास शुरू भऽ जाइत छै जे अंग्रेजीक शॉर्ट-स्टोरी / नोवेलेट/ नोवेला/ ऐ सभक ऊपरी सीमाक्षेत्रमे अबैत अछि। मुदा मैथिलीक स्थिति अंग्रेजीसँ फराक छै, ऐमे बालकथा कैक राति धरि चलैत अछि तँ पैघ लोकक कथा मिनटमे सेहो खतम भऽ जाइत अछि। मैथिलीक सन्दर्भमे ई तथ्य आब सोझाँ आबि गेल अछि जे विहनि कथाक सीमा एक पृष्ठ, लघुकथाक तीन-चारि पृष्ठ, दीर्घकथाक १५-२० पृष्ठ आ उपन्यासक ६०-५०० पृष्ठ अछि। ऐमे विहनि कथाक पृष्ठ सीमा १-४ पृष्ठ धरि करबाक बेगरता हम बुझै छी। मैथिलीक किछु सर्वश्रेष्ठ विहनि कथा: मैथिली विहनि कथाक कथ्य आ शब्दावलीमे बड्ड रास गुणात्मक परिवर्तन आएल अछि। ओइ दृष्टिकोणसँ जँ विहनि कथा सभकेँ देखी तँ ज्योति सुनीत चौधरीक “नबका पीढ़ी” आ “घर दिसका रस्ता” विषयवस्तुक दृष्टिसँ २१म शताब्दीक विहनि कथा थिक। नबका पीढ़ीक बच्चा सभ वृद्ध दम्पतिक मोन खराप भेलापर चिन्तित होइ छथि तँ बाहर रहि रहल बेटा, बेटा जकाँ नै डॉक्टर जेकाँ गप करऽ लगैए। “घर दिसका रस्ता”मे बिसलेरी पानिसँ एयरपोर्ट होइत, माटिक ढिमकाकेँ काटि बनल विद्यालय आ समाजक विकृतिकेँ उज्जर मटमैल रंगमे टंगने विधवा युवती धरिक चर्च भेटि जाएत। हिनकर “पानिमे खेती” विज्ञान विषयक मैथिलीक पहिल विहनि कथा अछि। दुर्गानन्द मण्डल जीक “किसना मुट्ठी” विहनि कथा लेल खाँटी शब्दावलीक बेगरता देखबैत अछि। अंग्रेजी शब्द भण्डारक दक्षतापूर्ण प्रयोग जेना आर. के. नारायण करै छथि तहिना दुर्गानन्द मण्डल मैथिली शब्दावलीक दक्षतापूर्ण प्रयोग करै छथि। रामप्रवेश मण्डल अही तरहक शब्दावलीक प्रयोगसँ साधारणो विहनि कथाकेँ असाधारण बना दै छथि। राजदेव मण्डल जेहने कविता लिखै छथि, तेहने उपन्यास आ तेहने विहनि कथा, सभ तरा-उपरी। कथ्य आ शिल्पक संतुलन लेल ओ ओहिना प्रसिद्ध नै छथि। बेचन ठाकुर अंधविश्वासक सामाजिक उपादेयतापर विहनि कथा लिखि जाइ छथि (फुसिक फल)।उमेश मण्डलक रुपैयाक ढेरी नारी सशक्तिकरणपर मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ विहनि कथा अछि। जगदीश प्रसाद मण्डल, परमेश्वर कापड़ि, कौशल कुमार, भवनाथ झा, शम्भु कुमार सिंह, जगदानन्द झा “मनु”, लक्ष्मी दास आ रामलोचन ठाकुरक विहनि कथामे जेम्स जॉयसक एपीफेनी स्पष्ट रूपसँ दृष्टिगोचर होइत अछि जे आन मैथिली विहनि कथाकारमे ओत्ते स्पष्ट रूपमे नै देखबामे अबैत अछि। आशीष अनचिन्हार, अमित मिश्र आ चन्दन कुमार झा नवका पीढ़ीक विषय परिवर्तन आ प्रयोगक साक्षी छथि। ओमप्रकाश झा क “स्पेशल परमिट” आ मिहिर झा क “१०० टाका” कथ्यक नूतनता आ भिन्नताक कारण मैथिली विहनि कथाक इतिहासमे खास स्थान राखत। सन्दीप कुमार साफीक “अन्ध विश्वास” बेचन ठाकुर जीक “फुसिक फल”क उल्टा अछि, आ ई दुनू विहनि कथा अपन प्रभावसँ देखबैत अछि जे कोना अन्धविश्वासक पक्षमे आ विपक्षमे रहि कऽ दुनु गोटे कोना अपन-अपन विहनि कथाकेँ सोद्देश्यता प्राप्त करबैत छथि। मुन्नाजीक “रेवाज” विहनि कथा लिअ। गाम घरमे मसोमातकेँ लोक डाइन कहै छै मुदा मुइलाक बाद घराड़ी लेल ओकरा आगि देबा लेल उपरौंझ होइ छै। एतऽ मुदा विहनि लेल जे बीआ छीटल गेल छै से कने उच्च स्तरक छै। एतऽ मृतककेँ बेटा नै छै मुदा पत्नी आ बेटी छै। से जखन मृतकक भाइ कोहा उठबऽ चाहैए तँ विधवा ओकरा रोकै छै आ बेटीकेँ कोहा उठबैले कहै छै। आ संग के देत ऐ नव रेवाजमे, जे आइयेसँ प्रारम्भ भेल अछि। तखन उत्तरो भेटैए- निपुतराहा सभ। जवाहर लाल कश्यपक “हम्मर माय तोहर माय” आ “भगवानक भाग्य” अद्भुत रूपेँ कथ्यकेँ प्रस्तुत करैत अछि। मैथिली विहनि कथा संसारक संख्यात्मक आ गुणात्मक अभिवृद्धि हर्खित करैबला अछि। २ गद्य साहित्य मध्य लघुकथाक स्थान आ लघुकथाक समीक्षाशास्त्र मैथिलीमे दीर्घकथाकेँ सेहो कखनो-काल उपन्यास कहल जाइए। दीर्घकथामे जीवनक किछु पक्षक विस्तारसँ चर्चा होइत अछि मुदा लघुकथामे से पलखति लेखककेँ नै भेटैत छै। मुदा विहनि कथासँ बेशी पलखति तँ एतऽ रहिते छै। मैथिलीक लेखक आब गाम आ नग्र, देश आ विदेशमे रहैत छथि। प्रस्तुत संग्रहमे कथाक विषय वस्तुक विविधता मैथिलीक लेखकक सभ वर्गक वातावरणक प्रतिनिधित्व करैत अछि। मिथिलाक वातावरणक अतिरिक्त प्रवासी मैथिलक संघर्ष आ समस्या लघुकथाक लेल एकटा फराक समीक्षाशास्त्रक खगतापर ध्यान आकर्षित करैए। लघुकथा समीक्षाशास्त्र: मैथिली लघुकथा बुच्ची दाइ आ कनियाँ काकीसँ बहुत आगाँ बढ़ि गेल अछि। पुरान समस्या अछि, मुदा नव रूपमे। मैथिली लघुकथा ऐ नव समस्याकेँ रेखांकित करैत अछि। एतए नारीवाद (फेमिनिज्म), उत्तर आधुनिक अब्सर्डिटी, हास्य व्यंग्य, कथ्य आ शिल्पक संतुलनक माध्यमसँ लघुकथाकेँ गढ़ल जा रहल अछि। शब्दावलीक संतुलित प्रयोगसँ विषयक जड़ि धरि लेखक पहुँचि रहल छथि। गतिशीलता, उद्योगीकरण, स्वतंत्रता प्राप्तिक बाद नवीन राज्यक राजनैतिक-सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक समस्या परिवर्तन आ एकीकरणक प्रक्रिया, ई सभ कखनो काल परस्पर विरोधी अछि। सामुदायिकताक विकासमे मनोवैज्ञानिक आ शैक्षिक प्रक्रियाक महत्व छै। मिथिलाक गाममे व्यक्तिक प्रतिष्ठा अखनो स्थान-जाति आधारित अछि तँ प्रवासमे ओ प्रतिष्ठा ऐ सभ कारणसँ कखनो काल उनटि जाइत अछि। स्त्री-स्वातंत्र्यवाद आ महिला आन्दोलन मिथिलामे आ प्रवासमे अलग-अलग तरहक अछि। विधि-व्यवस्थाक निर्धन आ पिछड़ल वर्गकेँ न्याय दिअएबामे प्रयोग होएबाक चाही, मुदा से नै भऽ सकल, कारण न्याय ओतेक सुलभ नै। मुदा राजनैतिक समीकरण, जे चुनाव सभ पाँच सालमे बनबैत अछि, से ई काज कऽ रहल अछि। मार्क्सवाद सामाजिक यथार्थक ओकालति करैत अछि। फ्रायड सभ मनुक्खकेँ रहस्यमयी मानैत छथि। ओ साहित्यिक कृतिकेँ साहित्यकारक विश्लेषण लेल चुनैत छथि तँ नव फ्रायडवाद जैविकक बदला सांस्कृतिक तत्वक प्रधानतापर जोर दैत देखबामे अबैत अछि। नव-समीक्षावाद कृतिक विस्तृत विवरणपर आधारित अछि। उत्तर आधुनिक, अस्तित्ववादी, मानवतावादी, ई सभ विचारधारा दर्शनशास्त्रक विचारधारा थिक। पहिने दर्शनमे विज्ञान, इतिहास, समाज-राजनीति, अर्थशास्त्र, कला-विज्ञान आ भाषा सम्मिलित रहैत छल। मुदा जेना-जेना विज्ञान आ कलाक शाखा सभ विशिष्टता प्राप्त करैत गेल, विशेष कऽ विज्ञान, तँ दर्शनमे गणित आ विज्ञान मैथेमेटिकल लॉजिक धरि सीमित रहि गेल। दार्शनिक आगमन आ निगमनक अध्ययन प्रणाली, विश्लेषणात्मक प्रणाली दिस बढ़ल। मार्क्स जे दुनिया भरिक गरीबक लेल एकटा दैवीय हस्तक्षेपक समान छलाह, द्वन्दात्मक प्रणालीकेँ अपन व्याख्याक आधार बनओलन्हि। आइ-काल्हिक “डिसकसन” वा द्वन्द जइमे पक्ष-विपक्ष, दुनू सम्मिलित अछि, दर्शनक (विशेष कए षडदर्शनक- माधवाचार्यक सर्वदर्शन संग्रह-द्रष्टव्य) खण्डन-मण्डन प्रणालीमे पहिनहिसँ विद्यमान छल। से इतिहासक अन्तक घोषणा कएनिहार फ्रांसिस फुकियामा -जे कम्युनिस्ट शासनक समाप्तिपर ई घोषणा कएने छलाह, किछु दिन पहिने ऐसँ पलटि गेलाह, कारण हुनकर पहिने सोचब रहन्हि जे रूसक कम्यूनिज्म खतम भेलाक बाद आब एक्केटा विचारधारा रहत से विचारक संघर्षक अन्त माने इतिहासक अन्त भेल; मुदा आब ओ कहै छथि जे अखनो सत्ता आ वंचितक विचारधारा अलग-अलग अछि आ तँइ विचारधाराक संघर्ष जारी रहत आ इतिहासक सेहो अन्त अखन नै हएत। उत्तर-आधुनिकतावाद सेहो अपन प्रारम्भिक उत्साहक बाद ठमकि गेल अछि। अस्तित्ववाद, मानवतावाद, प्रगतिवाद, रोमेन्टिसिज्म, समाजशास्त्रीय विश्लेषण ई सभ संश्लेषणात्मक समीक्षा प्रणालीमे सम्मिलित भऽ अपन अस्तित्व बचेने अछि। साइको-एनेलिसिस वैज्ञानिकतापर आधारित रहबाक कारण द्वन्दात्मक प्रणाली जेकाँ अपन अस्तित्व बचेने रहत। कोनो लघुकथाक आधार मनोविज्ञान सेहो होइत अछि। लघुकथाक उद्देश्य समाजक आवश्यकताक अनुसार आ ओकर यात्रामे परिवर्तन समाजमे भेल आ होइत परिवर्तनक अनुरूपे होएबाक चाही। मुदा संगमे ओइ समाजक संस्कृतिसँ ई कथा स्वयमेव नियन्त्रित होइत अछि। आ ऐमे ओइ समाजक ऐतिहासिक अस्तित्व सोझाँ अबैत अछि। उत्तर आधुनिकतावादी दृष्टिकोण- विज्ञानक ज्ञानक सम्पूर्णतापर टीका, सत्य-असत्य, सभक अपन-अपन दृष्टिकोणसँ वर्णन, आत्म-केन्द्रित हास्यपूर्ण आ नीक-खराबक भावनाक रहि-रहि खतम होएब, सत्य कखन असत्य भऽ जाएत तकर कोनो ठेकान नै, सतही चिन्तन, आशावादिता तँ नहिए अछि मुदा निराशावादिता सेहो नै, जे अछि तँ से अछि बतहपनी, कोनो चीज एक तरहेँ नै कएक तरहेँ सोचल जा सकैत अछि- ई दृष्टिकोण, कारण, नियन्त्रण आ योजनाक उत्तर परिणामपर विश्वास नै, वरन संयोगक उत्तर परिणामपर बेशी विश्वास, गणतांत्रिक आ नारीवादी दृष्टिकोण आ लाल झंडा आदिक विचारधाराक संगे प्रतीकक रूपमे हास-परिहास, भूमंडलीकरणक कारणसँ मुख्यधारसँ अलग भेल कतेक समुदायक आ नारीक प्रश्नकेँ उत्तर आधुनिकता सोझाँ अनलक। विचारधारा आ सार्वभौमिक लक्ष्यक ई विरोध केलक मुदा कोनो उत्तर नै दऽ सकल। तहिना उत्तर आधुनिकतावादी विचारक जैक्स देरीदा भाषाकेँ विखण्डित कऽ ई सिद्ध केलन्हि जे विखण्डित भाग ढेर रास विभिन्न आधारपर आश्रित अछि आ बिना ओकरा बुझने भाषाक अर्थ हम नै लगा सकैत छी। आ संवादक पुनर्स्थापना लेल कथाकारमे विश्वास होएबाक चाही- तर्क-परक विश्वास आ अनुभवपरक विश्वास। प्रत्यक्षवादक विश्लेषणात्मक दर्शन वस्तुक नै, भाषिक कथन आ अवधारणाक विश्लेषण करैत अछि। विश्लेषणात्मक अथवा तार्किक प्रत्यक्षवाद आ अस्तित्ववादक जन्म विज्ञानक प्रति प्रतिक्रियाक रूपमे भेल। ऐसँ विज्ञानक द्विअर्थी विचारकेँ स्पष्ट कएल गेल। प्रघटनाशास्त्रमे चेतनाक प्रदत्तक प्रदत्त रूपमे अध्ययन होइत अछि। अनुभूति विशिष्ट मानसिक क्रियाक तथ्यक निरीक्षण अछि। वस्तुकेँ निरपेक्ष आ विशुद्ध रूपमे देखबाक ई माध्यम अछि। अस्तित्ववादमे मनुष्य-अहि मात्र मनुष्य अछि। ओ जे किछु निर्माण करैत अछि ओइसँ पृथक ओ किछु नै अछि, स्वतंत्र होएबा लेल अभिशप्त अछि (सार्त्र)। हेगेलक डायलेक्टिक्स द्वारा विश्लेषण आ संश्लेषणक अंतहीन अंतस्संबंध द्वारा प्रक्रियाक गुण निर्णय आ अस्तित्व निर्णय करबापर जोर देल गेल। मूलतत्व जतेक गहींर हएत ओतेक स्वरूपसँ दूर रहत आ वास्तविकतासँ लग। क्वान्टम सिद्धान्त आ अनसरटेन्टी प्रिन्सिपल सेहो आधुनिक चिन्तनकेँ प्रभावित कएने अछि। देखाइ पड़एबला वास्तविकतासँ दूर भीतरक आ बाहरक प्रक्रिया सभ शक्ति-ऊर्जाक छोट तत्वक आदान-प्रदानसँ सम्भव होइत अछि। अनिश्चितताक सिद्धान्त द्वारा स्थिति आ स्वरूप, अन्दाजसँ निश्चित करए पड़ैत अछि। तीनसँ बेशी डाइमेन्सनक विश्वक परिकल्पना आ स्टीफन हॉकिन्सक “अ ब्रिफ हिस्ट्री ऑफ टाइम” सोझे भगवानक अस्तित्वकेँ खतम कऽ रहल अछि कारण ऐसँ भगवानक मृत्युक अवधारणा सेहो सोझाँ आएल अछि।जेना वर्चुअल रिअलिटी वास्तविकताकेँ कृत्रिम रूपेँ सोझाँ आनि चेतनाकेँ ओकरा संग एकाकार करैत अछि तहिना बिना तीनसँ बेशी बीमक परिकल्पनाक हम प्रकाशक गतिसँ जे सिन्धुघाटी सभ्यतासँ चली तँ तइयो ब्रह्माण्डक पार आइ धरि नै पहुँचि सकब। लघुकथाक समक्ष ई सभ वैज्ञानिक आ दार्शनिक तथ्य चुनौतीक रूपमे आएल अछि। होलिस्टिक आकि सम्पूर्णताक समन्वय करए पड़त ! ई दर्शन दार्शनिक सँ वास्तविक तखने बनत। पोस्टस्ट्रक्चरल मेथोडोलोजी भाषाक अर्थ, शब्द, तकर अर्थ, व्याकरणक निअम सँ नै वरन् अर्थ निर्माण प्रक्रियासँ लगबैत अछि। सभ तरहक व्यक्ति, समूह लेल ई विभिन्न अर्थ धारण करैत अछि। भाषा आ विश्वमे कोनो अन्तिम सम्बन्ध नै होइत अछि। शब्द आ ओकर पाठ केर अन्तिम अर्थ वा अपन विशिष्ट अर्थ नै होइत अछि। आधुनिक आ उत्तर आधुनिक तर्क, वास्तविकता, सम्वाद आ विचारक आदान-प्रदानसँ आधुनिकताक जन्म भेल। मुदा फेर नव-वामपंथी आन्दोलन फ्रांसमे आएल आ सर्वनाशवाद आ अराजकतावाद आन्दोलन सन विचारधारा सेहो आएल। ई सभ आधुनिक विचार-प्रक्रिया प्रणाली ओकर आस्था-अवधारणासँ बहार भेल अविश्वासपर आधारित छल। पाठमे नुकाएल अर्थक स्थान-काल संदर्भक परिप्रेक्ष्यमे व्याख्या शुरू भेल आ भाषाकेँ खेलक माध्यम बनाओल गेल- लंगुएज गेम। आ ऐ सभ सत्ताक आ वैधता आ ओकर स्तरीकरणक आलोचनाक रूपमे आएल पोस्टमॉडर्निज्म। कंप्युटर आ सूचना क्रान्ति जइमे कोनो तंत्रांशक निर्माता ओकर निर्माण कऽ ओकरा विश्वव्यापी अन्तर्जालपर राखि दैत छथि आ ओ तंत्रांश अपन निर्मातासँ स्वतंत्र अपन काज करैत रहैत अछि, किछु ओहनो कार्य जे एकर निर्माता ओकरा लेल निर्मित नै कएने छथि। आ किछु हस्तक्षेप-तंत्रांश जेना वायरस, एकरा मार्गसँ हटाबैत अछि, विध्वंसक बनबैत अछि तँ ऐ वायरसक एंटी वायरस सेहो एकटा तंत्रांश अछि, जे ओकरा ठीक करैत अछि आ जे ओकरोसँ ठीक नै होइत अछि तखन कम्प्युटरक बैकप लऽ ओकरा फॉर्मेट कए देल जाइत अछि- क्लीन स्लेट! पूँजीवादक जनम भेल औद्योगिक क्रान्तिसँ आ आब पोस्ट इन्डस्ट्रियल समाजमे उत्पादनक बदला सूचना आ संचारक महत्व बढ़ि गेल अछि, संगणकक भूमिका समाजमे बढ़ि गेल अछि। मोबाइल, क्रेडिट-कार्ड आ सभ एहन वस्तु चिप्स आधारित अछि। डी कन्सट्रक्शन आ री कन्सट्रक्शन विचार रचना प्रक्रियाक पुनर्गठनकेँ देखबैत अछि जे उत्तर औद्योगिक कालमे चेतनाक निर्माण नव रूपमे भऽ रहल अछि। इतिहास तँ नै मुदा परम्परागत इतिहासक अन्त भऽ गेल अछि। राज्य, वर्ग, राष्ट्र, दल, समाज, परिवार, नैतिकता, विवाह सभ फेरसँ परिभाषित कएल जा रहल अछि। मारते रास परिवर्तनक परिणामसँ, विखंडित भए सन्दर्भहीन भऽ गेल अछि कतेक संस्था। मिकेल फोकौल्ट कहै छथि - ज्ञान आ सत्य बनाओल जाइत अछि। डेलीयूज आ गुटारी कहै छथि जे हम सभ इच्छा ऐ द्वारे करै छी कारण हम सभ इच्छा मशीन छी। मिकाहिल बखतिन भाषाकेँ सामाजिक क्रियाक रूपमे लै छथि। रूसक रूपवादी साहित्यकेँ मात्र भाषाक विशिष्ट प्रयोग मानै छथि। जीन फ्रान्कोइस लियोटार्ड कहै छथि- सत्यक आ इतिहासक सत्यता मात्र आभासी अछि। बौड्रीलार्ड कहै छथि- विज्ञापन आ दूरदर्शन सत्य आ आभासीक बीच भेद मेटा देने अछि। दुनू उत्तर आधुनिकताक मुख्य विचारक छथि। लाकानक विशेषता छन्हि जे ओ फ्रायडक पद्धतिक भाषिकी अनुप्रयोग केलन्हि अछि। ओ कहै छथि जे अचेतनताक संरचना भाषा सन छै। जखन बच्चा भाषा सीखैए तखन ओकरा एकटा चेन्ह लेल एकटा शब्द सिखाओल जाइ छै। इच्छा, त्रुटि आ आन ई तीनटा तथ्य लाकान नीक जकाँ राखै छथि। इच्छा आवश्यकता आ माँगनाइ दुनू अछि मुदा एकरा ऐ दू रूपमे विखंडित नै कएल जा सकैत अछि। आनक वर्णनमे त्रुटि आ रिक्तता अबैत अछि। विषय अर्थक क्षणिक प्रभाव अछि आ ई आन सन हएत जखन ई आभासी हएत आ त्रुटिक कारण बनत, जइसँ इच्छाक उदय हएत। उत्तर उपनिवेशवादक तीन विचारक छथि- होमी भाभा (फोकौल्ट आ लाकानसँ लग), गायत्री स्पीवाक (फोकौल्ट आ डेरीडासँ लग) आ एडवर्ड सईद (फोकौल्टसँ लग) जे उपनिवेशवादीक पूर्वक धूर्तताक, शिथिलता आदिक धारणाक लेल कएल गेल कार्य आ सिद्धांतीकरणक व्याख्या करै छथि। रेमण्ड विलियम्सक संस्कृतिक अध्ययन साहित्यक आर्थिक स्थितिसँ सम्बन्ध देखबैत अछि। नव इतिहासवाद इतिहासक शब्दशास्त्र आ शब्दशास्त्रक ऐतिहासिकताक तुलना करैत अछि। इलाइन शोआल्टर महिला लेखनक मानसिक, जैविक आ भाषायी विशेषताकेँ चिन्हित करै छथि। सिमोन डी. बेवोइर नारीक नारीक प्रति प्रतिबद्धतामे वर्ग आ जातिकेँ (जकर बादक नारीवादी सिद्धांत विरोध केलक) बाधक मानै छथि। वर्जीनिया वुल्फ नारी लेखक लेल आर्थिक स्वतंत्रता आ निजताकेँ आवश्यक मानै छथि। हिनकर विचारकेँ क्रान्तिकारी नै मानल गेल। मेरी वोल्स्टोनक्राफ्ट नारी शिक्षामे क्रान्ति आ औचित्यक शिक्षाकेँ सम्मिलित करबापर जोर देलनि। नव समीक्षा- इलिएट कवितामे भावनाक प्रधानताक विरोध कएल आ एकरा गएर वैयक्तिक बनेबाक आग्रह केलनि। समीक्षकक काज लोकक रुचिमे सुधार करब सेहो अछि। विमसैट आ वर्डस्ले कहलनि जे कविक उद्देश्य वा ऐतिहासिक अध्ययनपर समीक्षा आधारित नै रहत। ई पाठकपर पड़ल भावनात्मक प्रभावपर सेहो आधारित नै रहत कारण से सापेक्ष अछि। ओ आधारित रहत वास्तविक शब्दशास्त्रपर। फिलिप सिडनीसँ अंग्रेजी समीक्षाक प्रारम्भ देखि सकै छी- ओ कविताकेँ सौन्दर्य, अर्थ आ मानवीय हितमे देखलन्हि। जॉन ड्राइडन- प्राचीन साहित्यमे नैतिक प्रवचनपर आ एकर लाभ-हानिपर विचार केलनि। सैमुअल जॉनसन सेक्सपिअरक नाटकमे हास्य आ दुखद तत्वपर लिखलन्हि। रूसोक रोमांशवाद मनुक्खक नीक होएबापर शंका नै करैए (क्लासिकल समीक्षक शंका करै छथि मुदा नव-क्लैसिकल कहै छथि जे मानव स्वभावसँ दूषित अछि मुदा संस्था ओकरा नीक बना सकैए) मुदा संगे ई कहैए जे संस्था सभ दूषित अछि आ मात्र दूषित लोकक मदति करैए। आधुनिक स्थितिवाद (साहित्यक अवस्थितिपर कोनो प्रश्न चिन्ह नै) पर संरचनावाद प्रहार केलक आ तकरा बाद लेखक स्वयं लिखल टेकस्टक विश्लेषण करबाक अधिकार गमेलक। उत्तर संरचनावाद कहलक जे साहित्य ओइसँ आगाँक वस्तु अछि जे संरचनावाद बुझै अछि। उत्तर-संरचनावादक एकटा प्रकार अछि उत्तर आधुनिकता। उत्तर संरचनावाद कहलक जे साहित्यमे संरचना संस्कृति आ सिद्धान्त मध्य कार्य करैत अछि जत्तऽ किछु भाव आ सोच वंचित अछि जे निरन्तरताक विरोध करैए। विखण्डनवाद आ उत्तर आधुनिकता उत्तर संरचनावादक बाद आएल। उत्तर उपनिवेशवाद उपनिवेशक नव रूपकेँ नै मानैए आ अव्यवस्थाक सिद्धांत जेना असफल उद्देश्यकेँ उचित परिणाम नै भेटबाक कारण मानैए। संरचनावाद दमित करैबला पाश्चात्य व्यवस्था आ समाजपर चोट करैए आ ऐ सँ मार्क्सवादकेँ बल भेटलै (अलथूजर)। आधुनिकतावादी-स्थिवादी, नव समीक्षा, संरचनावाद आ उत्तर संरचनावादक बाद विखण्डनवाद आ उत्तर आधुनिकतावाद आएल जकरा विलम्बित पूँजीवाद कहल गेल (फ्रेडरिक जेनसन)। अठारहम शताब्दीमे आधुनिक माने छल जड़विहीन मुदा बीसम शताब्दीक प्रारम्भमे एकर अर्थ प्रगतिवादी भऽ गेल। १९७० ई.क बाद आधुनिक शब्द एकटा सिद्धांतक रूप लऽ लेलक से उत्तर-आधुनिक शब्द पारिभाषिक भेल जकर नजरिमे लौकिक महत्वपूर्ण नै रहल। आधुनिक काल धरिक सभ जीवन आ इतिहास अमहत्वपूर्ण भेल आ खतम भेल। ई सिद्धांत भेल इतिहासोत्तर, विकासोत्तर आ कारणोत्तर। सत्य आ आपसी जुड़ावक महत्व खतम भऽ गेल। जादुइ वास्तविकतावाद जइमे वास्तविक स्थितिमे जादुइ वस्तुजात घोसिआओल जाइत अछि। रचनाकार ऐ तरहक प्रयोग कऽ वास्तविकताकेँ नीक जकाँ बुझबाक प्रयास करै छथि। उत्तर आधुनिक पाश्चात्य बुर्जुआ दृश्य-श्रव्य मीडियाक प्रयोक कऽ असमता, अन्याय आ वंचितक अवधारणाकेँ मात्र शब्द कहै छथि जे समता, प्राप्ति आ न्यायक लगक शब्द अछि। गरीबी जे पाश्चात्यमे समस्या नै अछि से आइ भारतमे पैघ समस्या अछि। उत्तर आधुनिकता नारीवादक आ मार्क्सवादक विरोधमे अछि आ एकर नारीवाद आ मार्क्सवाद विरोध केलक अछि। जेना ऐतिहासिक विश्लेषणक पक्षमे मार्क्सवाद अछि आ ओइसँ ओ अपन सिद्धांत फेरसँ सशक्त केलक अछि, संरचनावाद-उत्तर-संरचनावाद आ उत्तर आधुनिकतावादक परिप्रेक्ष्यमे। मार्क्सवाद लौकिक पक्षपर जोर दैत अछि मुदा तेँ ई उपयोगितावाद आ चार्वकक दर्शनक लग नै अछि, कारण उपयोगितावाद आ चार्वकवाद मात्र शारीरिक आवश्यकताकेँ ध्यानमे रखैत अछि। नारीवादी दृष्टिकोण सेहो उत्तर आधुनिकतावादक यथास्थिवादक विरोध केलक अछि कारण यावत से खतम नै हएत ताधरि नारीक स्थितिमे सुधार नै आओत। प्लेटो- प्लेटो कहै छथि जे कोनो कला नीक नै भऽ सकैए किए तँ ई सभटा असत्य आ अवास्तविक अछि। प्लेटोक ई विचार स्पार्टासँ एथेंसक सैन्य संगठनक न्यूनताकेँ देखैत देल विचारक रूपमे सेहो देखल जएबाक चाही। सम्वाद दू तरेहेँ भऽ सकैए- अभिभाषण वा गप द्वारा। गपमे दार्शनिक तत्व कम रहत। डेरीडाक विखण्डन पद्धति ऊँच स्थान प्राप्त रचना/ लेखक केँ नीचाँ लऽ अनैत अछि आ निचुलकाकेँ ऊपर। रोलेण्ड बार्थेस लिखै छथि जे जखन कृति रचनाकारसँ पृथक भऽ जाइए आ ओकर विश्लेषण स्वतंत्र रूपेँ होमए लगै छै तखन कृति महत्वपूर्ण भऽ जाइए जकरा ओ रचनाकारक मृत होएब कहै छथि। उत्तर-संरचनावाद संरचनावादक सम्पूर्ण आ सुगठित हेबाक अवधारणाकेँ माटि देलक। सौसरक भाषा सिद्धान्त- बाजब/ लिखब, वास्तविक समएक साहित्य वा ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्यक शब्दशास्त्र, महत्वपूर्ण कोनो कृति वा मनुक्ख अछि, महत्ता एकटा भाव अछि, वास्तविक समएमे भाषा वा एकर ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य; मुदा एकरा सेहो डेरीडाक विखण्डन सिद्धान्त उल्टा-पल्टा करए लागल। लिंग एकटा जैव वैज्ञानिक तथ्य अछि मुदा महिला/ पुरुषक सिद्धान्त सामाजिकताक प्रतिफल अछि। महिला सापेक्ष साहित्य कला पुरुष द्वारा निर्मित अछि आ पुरुखक नजरिसँ महिलाकेँ देखैत अछि। साहित्यक नारीवादी सिद्धान्त ऐ समस्याक तहमे जाइए। मिथिलाक सन्दर्भमे महिलाक स्थिति ओतेक खराप नै छै मुदा मैथिली साहित्यक एकभगाह प्रवृत्तिक कारण उच्च वर्गक नारीक खराप स्थिति साहित्यमे आएल। आधुनिकीकरण तथाकथित सामाजिक रूपसँ निचुलका जाति सभमे सेहो नारीक स्थितिमे अवनति अनलक अछि। दोसर एकटा आर गप अछि जे जाति आ धर्म नारीक अधिकारकेँ कएक हीसमे बाँटि देने अछि। नारीवादी दृष्टिकोण सेहो कहैए जे सभटा सिद्धांत पुरुष द्वारा बनाओल गेल से ओ सिद्धांत पूर्ण व्याख्या नै कऽ सकैए। सरल मानवतावाद सिद्धांतक विरुद्ध आएल मुदा ई सेहो एकटा सिद्धांत बनि गेल। सार्थक साहित्यक निर्माण एकर अन्तर्गत भेल। अत्यधिक आलोचनासँ बचबाक चाही। समीक्षककेँ अपन विद्वत्ता प्रदर्शनसँ बचबाक चाही। अत्यधिक आलोचनाक क्रममे लोक अपन विद्वता देखबऽ लगै छथि। आलोचनाक क्रममे संयम रखबाक चाही, खराप शब्दावलीक प्रयोग समीक्षकक खराप लालन-पालन देखबैत अछि। लघुकथाकेँ बिना पढ़ने समीक्षा अनैतिक अछि। उदाहरणस्वरूप कर्मधारयमे धूमकेतु लघुकथा “नमाजे शुकराना”क विषयमे तारानन्द वियोगी लिखै छथि- मिथिलाक संस्कृतिमे युग-युगसँ प्रतिष्ठापित साम्प्रदायिक सौहार्दकेँ रेखांकित करैत हिनक कथा “नमाजे शुकराना” बहुत महत्वपूर्ण थिक। (कर्मधारय, पृ. १२७) (!) लघुकथाक शीर्षक देखि कऽ ऐ तरहक समीक्षा भेल अछि कारण ऐ कथामे हाजी सैहेबक नमाजक समएमे पिंजराक सुग्गा “सीता...राम...।” बजैए आ सुग्गाक पिंजराकेँ हाजी सैहेब ताधरि महजिदक देबालपर पटकै छथि जाधरि सूगा मरि नै जाइए। सईदा कानऽ लगैए आ कथा खतम भऽ जाइए। आ ई कथा समीक्षकक मतमे साम्प्रदायिक सौहार्दकेँ रेखांकित करैए! समीक्षककेँ अति प्रशंसासँ सेहो बचबाक चाही। ई देखाओल जएबाक चाही जे ऐ विषयपर लिखल आन लघुकथासँ ई कोन रूपेँ भिन्न अछि, कोना ई रिक्त स्थलक पूर्ति करैए, ऐमे की-की छै आ ओइ विषयपर लिखल आन लघुकथासँ एकर तुलना हेबाक चाही। लघुकथाक सीमित विस्तारकेँ ध्यानमे राखि समीक्षा हजार शब्दमे हेबाक चाही। समीक्षा सम्बन्धित लघुकथाक हेबाक चाही लेखकक नै। लेखकक दोसर रचनाक विश्लेषणसँ समीक्षाकेँ भरब नीक समीक्षा नै, जे ऐ सभ लघुकथाक समीक्षित लघुकथासँ कोनो सोझ सम्बन्ध हुअए तखने ओकर प्रयोग करू। मिथिलाक विविध संस्कृति आ इतिहासकेँ देखैत –मैथिली साहित्यक एकभगाह स्थिति विशेष रूपमे- व्यक्तिगत आक्षेपक आ जिला-जबारकेँ ध्यानमे रखबाक सेहो परम्परा रहल अछि। जाति-धर्म आ क्षेत्रीयता मैथिली भाषा समीक्षामे कम्मे अबैए मुदा दोस-महीमक आधारपर नीक वा अधलाह समीक्षाक प्रवृत्ति वा आग्रहक भयंकर प्रभाव समीक्षकक मध्य छन्हि। कोनो खास समीक्षासँ ओइ लघुकथापर प्रकाश पड़ैए वा नै से देखू। ई तँ नै अछि जे ओ समीक्षा लेखकपर टिप्पणी कऽ रहल अछि वा लेखकक आन रचनापर- गहींरमे जाएब तँ बूझि जाएब जे समीक्षा लघुकथा पढ़ि लिखल गेल छै आकि नै। आलंकारिक भाषाक दिन गेल, शब्दक सटीक प्रयोग करू, अनावश्यक शब्द आ पाँतीकेँ निकालू। आत्मकथात्मक लघुकथाक समीक्षा लेल लेखकक जिनगीपर प्रकाश दऽ सकै छी। लघुकथा समीक्षामे महिला विरोधी वा जाति-क्षेत्रक बन्हनसँ बान्हल मानसिकताकेँ दूर राखू। लघुकथाक वातावरण निर्माणसँ लेखक आगाँ बढ़ैत छथि, ओकर पात्र सभक विवरण, लघुकथाक प्रारूप आ तकरा लेल लोकक आ परिस्थितिक वर्णन। ऐ मेसँ कोनो एक टा पक्ष लऽ कऽ सेहो अहाँ लघुकथा लिख सकै छी। कोनो कृति कोना उत्कृष्ट अछि आ ओइमे की छुटि गेल अछि से समीक्षककेँ देखबाक चाही। ओकर मूल्यांकन एकभगाह नै हेबाक चाही, ओइ रचनामे की संदेश नुकाएल छै, लेखक कोन दिस निर्देशित कऽ रहल अछि से समीक्षककेँ बुझबाक आ लिखबाक चाही। लघुकथाक मुख्य धाराकेँ चिन्हित करबाक चाही। अपन विचारधाराकेँ समीक्षित लघुकथापर आरोपण नै होएबाक चाही। ओइ लघुकथाक आजुक समयक सन्दर्भमे की आवश्यकता अछि से देखाउ। ओइ लघुकथाक महत्ता कोन रूपमे अछि से देखाउ, ओकर मुख्य तत्व चिन्हित करू। लेखकक जीवन दर्शन, वास्तविक, काल्पनिक आ आदर्शक सम्बन्धमे ओकर दृष्टि आ संदेहकेँ चिन्हित करू। लेखकक लेखनशैलीक कलात्मक पक्ष, ओकर गप कहबाक क्षमता, रचनाक ढाँचा आ ओकर विभिन्न भागकेँ जोड़बाक कलाक चर्चा करू, जेना नीक कमार ठोस आ कलात्मक पलंग बनबैत अछि, तँ दोसर कमारक जोर मात्र ठोस हेबापर होइ छै आ तेसरक कलात्मकतापर, तहिना। सिद्धान्तक आवश्यकता की छै? सरल मानवतावाद कहैए जे साहित्यक सिद्धान्तक बदलामे रचनाक की मानवीय दृष्टिकोण छै, ओइमे सार्थकता छै आकि नै से सामान्य बुद्धिसँ कएल जा सकैए। अपन बुद्धिक प्रयोग कऽ रचनाक गुणवत्ता अहाँ देखि सकै छी, कोनो साहित्यिक सिद्धान्तक आवश्यकता समीक्षा लेल नै छै। मैथिलीक किछु सर्वश्रेष्ठ लघुकथा: मीना झाक ब्रेस्ट कैंसर, एकटा एहेन समस्यापर अछि जे महिलाक समस्या थिक आ कोनो महिले एहेन मनोवैज्ञानिक विश्लेषणयुक्त कथा ऐ विषयपर लिखि सकै छलथि। मुदा कोनो महिलो ऐ विषयपर आइ धरि लघुकथा नै लिखने छलीह। पत्नीक ब्रेस्ट कैंसर ऑपरेशनक बाद पतिक मनोदशाक विवरण सटीक भेल अछि। रोशन जनकपुरी वंचितक संघर्षक प्रत्यक्ष गवाही प्रस्तुत करै छथि जे दोसर रूपमे जगदीश प्रसाद मण्डल सेहो आनै छथि, आ महाप्रकाश सेहो एकरा एकटा लघुकथाक कथाक माध्यमसँ कहै छथि। वसंत भगवंत सावंतक कोंकणी कथा रोजी रोटीक जीवनक भावनात्मक जीवनसँ संघर्षक कथा थिक, आ एहने कथा प्रभात राय भट्ट नव फराक परिवेशमे ओइसँ बेशी दर्दसँ कहै छथि। बीनू भाइ विश्लेषणक मास्टर छथि आ शब्दावलीक प्रयोगसँ सम्बन्धित वौस्तुजात विचारकेँ फरिछाबै छथि। शम्भू कुमार सिंह मैथिलीक स्थितिपर लिखै छथि तँ अनमोल झा, सत्यनारायण झा आ ओमप्रकाश झा गाम घर, नोकरी चाकरी आ घर-बाहरक चर्च करै छथि। जँ प्रेम कथाक चर्च करी तँ दुर्गानन्द मण्डलक लाल भौजी, सुजीत कुमार झा क एकटा अधिकार, कैलाश कुमार मिश्रक चन्दा, पंकज कुमार प्रियांशुक जीवनक अनमोल क्षण, अमित मिश्रक प्रेम नै जहर छै, कामिनी कामायिनीक टुटल तारा आ राजनाथ मिश्रक मस्ती सोझ रूपमे प्रेमकथा अछि मुदा ई सभ एक दोसरासँ भिन्न हास्य, गम्भीरता, सामन्तवादकेँ अपना तरहेँ सेहो चिन्हित करैत अछि। असगर वजाहत दंगाक समस्यापर टिप्पणी करैत छथि तँ राजदेव मण्डल एलेक्शपर आ वीरेन्द्र कुमार यादव, सतीश चन्द्र झा, अतुलेश्वर सेहो सामाजिक समस्याक विभिन्न पक्षपर चर्च करैत छथि। उमेश मण्डल, नवीन ठाकुर, किशन कारीगर, शिव कुमार झा आ बचेश्वर झा व्यंग्यकेँ नव दिशा दऽ रहल छथि। नन्द विलास राय आ कपिलेश्वर राउत व्यंग्य आ समस्याकेँ शब्दक जादूगरीसँ पहिने मिज्झर करै छथि आ फेर फराक करै छथि। सन्तोष कुमार मिश्रक कथा मुसीबत आ आशीष अनचिन्हारक काटल कथा उत्तर आधुनिक अब्सर्डिटीक उदाहरण अछि। योगेन्द्र पाठक “वियोगी” परम्परा आ आधुनिकताक द्वन्द्वक ओझरीमे ओझरा जाइ छथि (देववाणी)। मनोज कुमार मण्डल घासवाली लघुकथामे स्त्री-संघर्ष लिखै छथि आ शम्भुनाथ झा “वत्स” स्त्रीक संघर्षकेँ बाढ़िक विभीषिका संग जोड़ि अविस्मरणीय कथा कहि जाइ छथि। मैथिली लघुकथामे आएल कथ्य आ शिल्पकक विशालता आह्लादकारी अछि। ३ पद्य साहित्य आ ओकर समीक्षाशास्त्र साहित्यक दू विधा अछि गद्य आ पद्य । छन्दोबद्ध रचना पद्य कहबैत अछि-अन्यथा ओ गद्य थीक। छन्द माने भेल एहन रचना जे आनन्द प्रदान करए । हरिमोहन झा “अकविताक प्रति : कविताक उक्ति” लिखै छथि आ गोपाल जी झा “गोपेश” “हे कवि कोकिल आजुक युग मे अहाँ जे होइतहुँ” मे कहै छथि –-अपनहि लिखितहुँ अपनहि बुझितहुँ- आ से कहि अपन अपन मत स्पष्ट करै छथि। मुदा ऐसँ ई नै बुझबाक चाही जे आजुक नव कविता गद्य कोटिक अछि कारण वेदक सावित्री (गायत्री छन्दमे) मंत्र सेहो शिथिल/ उदार नियमक कारण गायत्री छंदमे परिगणित होइत अछि, जेना यदि अक्षर पूरा नै भेल तँ प्रत्येक पादमे एक आकि दू अक्षर बढ़ा लेल जाइत अछि, य आ व केर संयुक्ताक्षरकेँ क्रमशः इ आ उ लगा कए अलग कएल जाइत अछि। जेना- वरेण्यम्=वरेणियम् आ स्वः= सुवः। मैथिली पद्य साहित्यक समीक्षाशास्त्र: कविताक लय, बिम्बपर विचार करए पड़त संगहि कविताक खण्डकेँ कविताक मुख्य शरीरसँ मिलान करए पड़त। आजुक नव कविताक संग हाइकू लेल मैथिली भाषा आ लिपि व्यवस्था सर्वाधिक उपयुक्त्त अछि। गजल, रुबाइ आदिमे वार्णिक आ मात्रिक दुनू छन्द व्यवस्था कारगर अछि आ बिनु बहर (छन्दक) आजाद गजल सेहो लिखल जाइत अछि। कोनो रचना अप्रासंगिक नै होइत अछि आ जौँ ओ अहाँकेँ हिलोड़ि दिअए तँ ओ रचना सार्थक कोना नै हएत? प्लेटो- प्लेटो कहै छथि जे कोनो कला नीक नै भऽ सकैए किएक तँ ई सभटा असत्य आ अवास्तविक अछि। प्लेटोक ई विचार स्पार्टासँ एथेंसक सैन्य संगठनक न्यूनताकेँ देखैत देल विचारक रूपमे सेहो देखल जएबाक चाही। ओ काव्य/ नाटकक ऐ रूपेँ विरोध केलन्हि जे सम्वादकेँ रटि कऽ बाजैसँ लोक एकटा कृत्रिम जीवन दिस आकर्षित हएत। अरिस्टोटल कविताकेँ मात्र अनुकृति नै मानै छथि, ओ ऐ मे दर्शन आ सार्वभौम सत्य सेहो देखै छथि। प्राचीन ग्रीसमे कविता भगवानक सनेस बूझल जाइत छल। एरिस्टोफिनीस नीक आ अधला, ऐ दू तरहक कविता देखै छथि तँ थियोफ्रेस्टस कठोर, उत्कृष्ट आ भव्य ऐ तीन तरहेँ कविताकेँ देखै छथि। कविता आ संगीत अभिन्न अछि। मुदा यूरोपक सिम्फोनी, जइमे ढेर रास वादन एके संगे विभिन्न लयमे होइत अछि, सिद्धांतमे अन्तर अनलक। फिलिप सिडनीसँ अंग्रेजी समीक्षाक प्रारम्भ देखि सकै छी- ओ कविताकेँ सौन्दर्य, अर्थ आ मानवीय हितमे देखलन्हि। नव समीक्षा- इलिएट कवितामे भावनाक प्रधानताक विरोध कएल आ एकरा गएर वैयक्तिक बनेबाक आग्रह केलनि। रोमांशवाद कविताक व्यक्तिगत अनुभव होएबाक बात कहैए। बार्थेज संरचनावाद-उत्तर-संरचनावादक सन्दर्भमे लेखकक उद्देश्यसँ पाठकक मुक्तिक लेल लेखकक मृत्युकेँ आवश्यक मानै छथि- लेखकक मृत्यु माने लेखक रचनासँ अलग अछि आ पाठक अपना लेल अर्थ तकैत अछि। जादुइ वास्तविकतावाद जइमे वास्तविक स्थितिमे जादुइ वस्तुजात घोसिआओल जाइत अछि, रचनाकार ऐ तरहक प्रयोग कऽ वास्तविकताकेँ नीक जकाँ बुझबाक प्रयास करै छथि। उत्तर आधुनिक पाश्चात्य बुर्जुआ दृश्य-श्रव्य मीडियाक प्रयोग कऽ असमता, अन्याय आ वंचितक अवधारणाकेँ मात्र शब्द कहै छथि जे समता, प्राप्ति आ न्यायक लगक शब्द अछि। गरीबी जे पाश्चात्यमे समस्या नै अछि से आइ भारतमे पैघ समस्या अछि। उत्तर आधुनिकता नारीवादक आ मार्क्सवादक विरोधमे अछि आ एकर नारीवाद आ मार्क्सवाद विरोध केलक अछि। जेना ऐतिहासिक विश्लेषणक पक्षमे मार्क्सवाद अछि आ संरचनावाद-उत्तर-संरचनावाद आ उत्तर आधुनिकतावादक परिप्रेक्ष्यमे ओइसँ ओ अपन सिद्धांत फेरसँ सशक्त केलक अछि। मार्क्सवाद लौकिक पक्षपर जोर दैत अछि मुदा तेँ ई उपयोगितावाद आ चार्वक दर्शनक लग नै अछि, कारण उपयोगितावाद आ चार्वकवाद मात्र शारीरिक आवश्यकताकेँ ध्यानमे रखैत अछि। नारीवादी दृष्टिकोण सेहो उत्तर आधुनिकतावादक यथास्थिवादक विरोध केलक अछि कारण यावत से खतम नै हएत ताधरि नारीक स्थितिमे सुधार नै आएत। आधुनिकतावादी-स्थितिवाद, नव समीक्षा, संरचनावाद आ उत्तर संरचनावादक बाद विखण्डनवाद आ उत्तर आधुनिकतावाद आएल, जकरा विलम्बित पूँजीवाद कहल गेल (फ्रेडरिक जेनसन)। आधुनिक स्थितिवाद (साहित्यक अवस्थितिपर कोनो प्रश्न चिन्ह नै) पर संरचनावाद प्रहार केलक आ तकरा बाद लेखक स्वयं लिखल टेकस्टक विश्लेषण करबाक अधिकार गमेलक। संरचनावाद दमित करैबला पाश्चात्य व्यवस्था आ समाजपर चोट करैए आ ऐ सँ मार्क्सवादकेँ बल भेटलै (अलथूजर)।उत्तर संरचनावाद कहलक जे साहित्य ओइसँ आगाँक वस्तु अछि जे संरचनावाद बुझै अछि। उत्तर-संरचनावादक एकटा प्रकार अछि उत्तर आधुनिकता। उत्तर संरचनावाद कहलक जे साहित्यमे संरचना संस्कृति आ सिद्धान्त मध्य कार्य करैत अछि, जत्तऽ किछु भाव आ सोच वंचित अछि जे निरन्तरताक विरोध करैए। विखण्डनवाद आ उत्तर आधुनिकता उत्तर संरचनावादक बाद आएल। उत्तर उपनिवेशवाद उपनिवेशक नव रूपकेँ नै मानैए आ अव्यवस्थाक सिद्धांत सन असफल उद्देश्यकेँ उचित परिणाम नै भेटबाक कारण मानैए। काव्यक भारतीय विचार: मोक्षक लेल कलाक अवधारणा, जेना नटराजक मुद्रा देखू। सृजन आ नाश दुनूक लय देखा पड़त। स्थायी भावक गाढ़ भऽ सीझि कऽ रस बनब- आ ऐ सन कतेक रसक सीता आ राम अनुभव केलन्हि (देखू वाल्मीकि रामायण)। कृष्ण भारतीय कर्मवादक शिक्षक छथि तँ संगमे रसिक सेहो। कलाक स्वाद लेल रस सिद्धांतक आवश्यकता भेल आ भरत नाट्यशास्त्र लिखलन्हि। अभिनवगुप्त आनन्दवर्धनक ध्वन्यालोकपर भाष्य लिखलन्हि। भामह ६अम शताब्दी, दण्डी सातम शताब्दी आ रुद्रट ९अम शताब्दी, एकरा आगाँ बढ़ेलन्हि। रस सिद्धान्त: भरत:- नाटकक प्रभावसँ रसक उत्पत्ति होइत अछि। नाटक कथी लेल? नाटक रसक अभिनय लेल आ संगे रसक उत्पत्ति लेल सेहो। रस कोना बहराइए? रस बहराइए कारण (विभाव), परिणाम (अनुभाव) आ संग लागल आन वस्तु (व्यभिचारी)सँ। स्थायीभाव गाढ़ भऽ सीझि कऽ रस बनैए, जकर स्वाद हम लऽ सकै छी। भट्ट लोलट:- स्थायीभाव कारण-परिणाम द्वारा गाढ़ भऽ रस बनैत अछि। अभिनेता-अभिनेत्री अनुसन्धान द्वारा आ कल्पना द्वारा रसक अनुभव करैत छथि। लोलट कविकेँ आ संगमे श्रोता-दर्शककेँ महत्व नै दै छथि। शौनक:- शौनक रसानुभूति लेल दर्शकक प्रदर्शनमे पैसि कऽ रस लेब आवश्यक बुझै छथि, घोड़ाक चित्रकेँ घोड़ा सन बूझि रस लेबा सन। भट्टनायक कहै छथि जे रसक प्रभाव दर्शकपर होइत अछि। कविक भाषाकेँ ओ भिन्न मानैत छथि। रससँ श्रोता-दर्शकक आत्मा, परमात्मासँ मेल करैए। रसक आनन्द अछि स्वरूपानन्द। आ ऐसँ होइत अछि आत्म-साक्षात्कार। रस सिद्धान्त श्रोता-दर्शक-पाठक पर आधारित अछि। ई श्रोता-दर्शक-पाठकपर जोर दैत अछि। ध्वनि सिद्धान्त: आनन्दवर्धन ध्वन्यालोक- साहित्यक उद्देश्य अर्थकेँ परोक्ष रूपेँ बुझाएब वा अर्थ उत्पन्न करब अछि। ई सिद्धान्त दैत अछि परोक्ष अर्थक संरचना आ कार्य, रस माने सौन्दर्यक अनुभव आ अलंकारक सिद्धान्त। आनन्दवर्धन काव्यक आत्मा ध्वनिकेँ मानैत छथि। ध्वनि द्वारा अर्थ तँ परोक्ष रूपेँ अबैत अछि मुदा ओ अबैत अछि सुसंगठित रूपमे। आ ऐसँ अर्थ आ प्रतीक, ई दूटा सिद्धान्त बहार होइत अछि। ऐसँ रसक प्रभाव उत्पन्न होइत अछि, ऐसँ रस उत्पन्न होइत अछि। न्याय आ मीमांसा ऐ सिद्धान्तक विरोध केलक, ई दुनू दर्शन कहैत अछि जे ध्वनिक अस्तित्व कतौ नै अछि, ई परिणाम अछि अनुमानक आ से पहिनहियेसँ लक्षणक अन्तर्गत अछि। आ से सभ शब्द द्वारा वर्णित हएब सम्भव नै अछि। स्फोट सिद्धांत: भर्तृहरीक वाक्यपदीय कहैत अछि जे शब्द आकि वाक्यक अर्थ स्फोट द्वारा संवाहित अछि। वर्ण स्फोटसँ वर्ण, पद स्फोटसँ शब्द आ वाक्य स्फोटसँ वाक्यक निर्माण होइत अछि। कोनो ज्ञान बिनु शब्दक सम्बन्धक सम्भव नै अछि। ई भारतीय दर्शनक ज्ञान सिद्धान्तक एकटा भाग बनि गेल। अर्थक संप्रेषण अक्षर, शब्द आ वाक्यक उत्पत्ति बिन सम्भव अछि। स्फोट अछि शब्दब्रह्म आ से अछि सृजनक मूल कारण। अक्षर, शब्द आ वाक्य संग-संग नै रहैए। बाजल शब्दक फराक अक्षर अपनामे शब्दक अर्थ नै अछि, शब्द पूर्ण हएबा धरि एकर उत्पत्ति आ विनाश होइत रहै छै। स्फोटमे अर्थक संप्रेषण होइत अछि मुदा तखनो स्फोटमे प्राप्ति समए वा संचारक कालमे अक्षर, शब्द वा वाक्यक अस्तित्व नै भेल रहै छै। शब्दक पूर्णता धरि एक अक्षर आर नीक जकाँ क्रमसँ अर्थपूर्ण होइए आ वाक्य पूर्ण हेबा धरि शब्द क्रमसँ अर्थपूर्ण होइए। सांख्य, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा आ वेदान्त ई सभ दर्शन स्फोटकेँ नै मानैत अछि। ऐ सभ दर्शनक मानब अछि जे अक्षर आ ओकर ध्वनि अर्थकेँ नीक जकाँ पूर्ण करैत अछि। फ्रांसक जैक्स डेरीडाक विखण्डन आ पसरबाक सिद्धान्त स्फोट सिद्धान्तक लग अछि। अलंकार सिद्धान्त: भामह अलंकारकेँ समासोक्ति कहै छथि जे आनन्दक कारण बनैए। दण्डी आ उद्भट सेहो अलंकारक सिद्धान्तकेँ आगाँ बढ़बै छथि। अलंकारक मूल रूपसँ दू प्रकार अछि, शब्द आ अर्थ आधारित आ आगाँ सादृश्य-विरोध, तर्कन्याय, लोकन्याय, काव्यन्याय आ गूढ़ार्थ प्रतीति आधारपर। मम्मट ६१ प्रकारक अलंकारकेँ ७ भागमे बाँटै छथि, उपमा माने उदाहरण, रूपक माने कहबी, अप्रस्तुत माने अप्रत्यक्ष प्रशंसा, दीपक माने विभाजित अलंकरण, व्यतिरेक माने असमानता प्रदर्शन, विरोध आ समुच्चय माने संगबे। औचित्य सिद्धान्त: क्षेमेन्द्र औचित्य विचार चर्चामे औचित्यकेँ साहित्यक मुख्य तत्व मानलन्हि। आ औचित्य कतऽ हेबाक चाही? ई हेबाक चाही पद, वाक्य, प्रबन्धक अर्थ, गुण, अलंकार, रस, कारक, क्रिया, लिंग, वचन, विशेषण, उपसर्ग, निपात माने फाजिल, काल, देश कुल, व्रत, तत्व, सत्व माने आन्तरिक गुण, अभिप्राय, स्वभाव, सार-संग्रह, प्रतिभा, अवस्था, विचार, नाम आ आशीर्वादमे। कंपायमान अछि ई ब्रह्माण्ड आ ई अछि कंपन मात्र। कविता वाचनक बाद पसरैत अछि शान्ति, शान्ति सर्वत्र आ शान्ति पसरैत अछि मगजमे। अपन व्यक्तिगत प्रशंसा आ दोसराक प्रति आक्षेपक कवितामे ब्लैकमेलर साहित्यकार द्वारा प्रयोग करबाक गुंजाइश रहैत अछि। मुदा तथ्यपूर्ण मूल्यांकनसँ लेखकक ऐ प्रवृत्तिकेँ समीक्षक चिन्हित करैत छथि। जातिवाद-सांप्रदायिकतावाद आबिये जाइत छैक, तकरा समीक्षक चिन्हित करैत छथि, हीन भावनासँ ग्रस्त साहित्य कल्याणकारी कोना भऽ सकत? समीक्षक ई सेहो चिन्हित करैत छथि। मैथिली साहित्य, जतए पाठकक संख्या शून्य छलै, एक साहित्यकार दोसराक समीक्षा करैत छल आ एतए व्यक्तिगत अहम् आ ब्लैकमेलिंगक पूर्ण गुंजाइश छलै, अखनो सुखाएल मुख्यधारा (!)क पद्यमे ई लक्षण भेटैत अछि। अहाँ दू-चारिटा सुखाएल मुख्यधारा (!)क कवि सम्मेलनमे चलि जाउ, उद्घोषकक उद्घोषणा आ थोपड़ी, उद्घोषकक आ साहित्यकारक पूर्वाग्रहकेँ चिन्हित कऽ देत, माने ब्लैकमेलिंग आ ब्लैक-मार्केटिंग द्वारा कविताक पुरस्कार लेल लिखल जाएब। मुदा बुकर आ नोबल साहित्य पुरस्कार प्राप्त साहित्य सेहो कालातीत नै रहि पबैत अछि, बहुत रासकेँ तँ लोक मोन रखैत अछि मुदा ढेर रास विस्मृत भऽ जाइत छथि आ पाठक ओकर मूल्यांकन ऐ तरहेँ कऽ दैत छथि। पद्य लोक कम पढ़ैत अछि। संस्कृतसन भाषाक प्रचार-प्रसार लेल कएल जा रहल प्रयास अन्तर्गत सम्भाषण-शिविरमे सरल संस्कृतक प्रयोग होइत अछि। कथा-उपन्यासक आधुनिक भाषा सभसँ संस्कृतमे अनुवाद होइत अछि मुदा पद्य ओइ प्रक्रियामे बारल रहैत अछि। कारण पद्य कियो नै पढ़ैत अछि आ जइ भाषा लेल शिविर लगेबाक आवश्यकता भऽ गेल अछि, तइ भाषामे पद्यक अनुवाद ऊर्जाक अनर्गल प्रयोग मानल जाइत अछि। मैथिलीमे स्थिति एहन सन भऽ गेल अछि, जे गाम आइ खतम भऽ जाए तँ ऐ भाषाक बाजएबलाक संख्या बड्ड न्यून भऽ जाएत। लोक सेमीनार आ बैसकीमे मात्र मैथिलीमे बजताह। मैथिली-उच्चारण लेल शिविर लगेबाक आवश्यकता तँ अनुभूत भइए रहल अछि (जातिवादी रंगमंचक नाटक देखि लिअ, ई स्पष्ट भऽ जाएत जे हमरा सभकेँ सुखाएल मुख्यधारा (!)क लेल मैथिली उच्चारणक लेल शिविर लगाबए पड़त)। तँ ऐ स्थितिमे मैथिलीमे पद्य लिखबाक की आवश्यकता आ औचित्य ? समयाभावमे पद्य लिखै छी, ऐ गपपर जोर देलासँ ई स्थिति आर भयावह भऽ सोझाँ अबैत अछि। एहना स्थितिमे आस-पड़ोसक घटनाक्रम, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा, आक्षेप आ यात्रा-विवरणी यएह सुखाएल मुख्यधारा (!)क मैथिली पद्यकक विषय-वस्तु बनि गेल छल। मुदा ऐ सभ लेल गद्यक प्रयोग किए नै? कथाक नाट्य-रूपान्तरण रंगमंच लेल कएल जाइत अछि मुदा गद्यक पद्यमे रूपान्तरण कोन उद्देश्यसँ? समयाभावमे लिखल जा रहल ऐ तरहक पद्य सभक पाठक छथि गोलैसी केनिहार समीक्षक लोकनि आ स्वयं आमुखक माध्यमसँ अपन पद्यक नीक समीक्षा केनिहार गद्यसँ पद्यमे रूपान्तरकार महापद्यकार लोकनि ! पद्य सर्जनाक मोल के बूझत ! व्यक्तिगत लौकिक अनुभव जँ गहींर धरि नै उतरत तँ से तुकान्त रहला उपरान्तो उत्कृष्ट पद्य नै बनि सकत। पारलौकिक चिन्तन कतबो अमूर्त रहत आ जँ ओ लौकिकसँ नै मिलत तँ ओ सेहो अतुकान्त वा गोलैसी आ वादक सोंगरक अछैतो सिहरा नै सकत। मनुक्खक आवश्यकता अछि भोजन, वस्त्र आ आवास, आ तकर बाद पारलौकिक चिन्तन। जखन बुद्ध ई पुछै छथि जे ई सभ उत्सवमे भाग लेनिहार सभ सेहो मृत्युक अवश्यंभाविताकेँ जनै छथि? आ से जँ जनै छथि तखन कोना उत्सवमे भाग लऽ रहल छथि! से आधुनिक मैथिली पद्यकार जखन अपन भाषा-संस्कृतिक आ आर्थिक आधारक आधार अपना पएरक नीचाँसँ विलुप्त होइत देखै छथि आ तखनो आँखि मूनि कऽ ओइ सत्यकेँ नै मानैत छथि, तखन जे देश-विदेशक घटनाक्रम आ वाद पद्यमे घोसिआबए चाहै छथि, देशज दलित समाज लेल जे ओ उपकरि कऽ लिखऽ चाहै छथि, उपकार करऽ चाहै छथि, तँ तइमे धार नै आबि पबैत अछि। तँ पद्यकेँ उत्कृष्टता चाही। भाषा-संस्कृतिक आधार चाही। ओकरा खाली आयातित विषय-वस्तु नै चाही, जे ओकरापर उपकार करबाक दृष्टिएँ आनल गेल छै। ओकरा आयातित सम्वेदना सेहो नै चाही जे ओकर पएरक नीचासँ विलुप्त भाषा-संस्कृति आ आर्थिक आधारकेँ तकबाक उपरझपकी उपकृत प्रयास मात्र हुअए। नीक पद्य कोनो विषयपर लिखल जा सकैत अछि। बुद्धक मानवक भविष्यक चिन्ताकेँ लऽ कए, असञ्जाति मनकेँ सम्बल देबा लेल, नै तँ लोक प्रवचनमे ढोंगी बाबा ऐठाम जाइते रहताह। समाजक भाषा-संस्कृति आ आर्थिक आधारक लेल सेहो, नै तँ मैथिली लेल शिविर लगाबैए पड़त। बिम्बक संप्रेषणीयता सेहो आवश्यक, नै तँ पद्यकार लेल पहिनेसँ वातावरण बनाबए पड़त आ हुनकर पद्यक लेल मंचक ओरिआओन करए पड़त, हुनकर शब्दावली आ वादक लेल शिविर लगा कऽ प्रशिक्षण देल जएबाक आवश्यकता अनुभूत कएल जाएत आ से किछु पद्यकार लोकनि कइयो रहल छथि! मिथिलाक भाषाक कोमल आरोह-अवरोह, एतुक्का सर्वहारा वर्गक सर्वगुणसंपन्नता, संगहि एतुक्का रहन-सहन आ सांस्कृतिक कट्टरता; आ राजनीति, दिनचर्या, सामाजिक मान्यता, आर्थिक स्थिति, नैतिकता, धर्म आ दर्शन सेहो पद्यमे अएबाक चाही। आ से नै भेने पद्य एकभगाह भऽ जाएत, ओलड़ि जाएत, फ्रेम लगा कऽ टंगबा जोगड़ भऽ जाएत। पद्य रचब विवशता अछि, साहित्यिक। जहिया मिथिलाक लोककेँ मैथिली भाषा सिखेबा लेल शिविर लगाओल जएबाक आवश्यकता अनुभूत हएत, तहिया पद्यक अस्तित्वपर प्रश्न सेहो ठाढ़ कएल जा सकत। आ से दिन नै आबए तइ लेल सेहो पद्यकारकेँ सतर्क रहए पड़तन्हि, आ से ओ सभ सतर्क छथि। पद्यमे जे पैघत्वक (जे हीन भावनाक एकटा रूप अछि) भावना होइ छै, तकरा चिन्हित कएल जाए। मेडियोक्रिटी चिन्हित करू- तकिया कलाम आ चालू ब्रेकिंग न्यूज- आधुनिकताक नामपर, युगक प्रमेयकेँ माटि देबाक विचार ऐमे नै भेटत, से ऐ अन्तर्राष्ट्रीय परिदृश्यक, बुश-सद्दामक आलोचनामे धार ओइ कारणसँ नै आबि पबैत अछि। कोनो मन्दिर-मस्जिदक जे ओ समर्थन-विरोध करैत छथि वा कोनो नन्दीग्राम-लालगढ़क सेहो, तँ ओइमे सेहो तइ तरहक धार नै अबैत अछि। दारू पीबि मँतल मानववादी, धर्मनिरपेक्षतावादी, वामपंथवादी आ दक्षिणपंथवादी, हिनकर विचार लागत ओंघाएल, युगक सभ शब्दावली भरताह आ पद्य तैयार। अमेरिकाक आलोचनामे धार कोना आओत आ वामपंथक पक्षमे सेहो- जखन अपन आजीविका दक्षिणपंथक मदतिसँ चलि रहल अछि! संघर्षक अभाव सृजनात्मकताक स्तरकेँ समए बढ़लासँ बढ़ेबाक बदला घटबैत अछि। युगक अनुरूप सभ चलैए, ओकर विपरीत चलब तखन ने सृजनात्मकताक संग चाही, दोसराकेँ पलायनवादी कहनिहार ऐ तरहक सुविधावादी तत्वकेँ चिन्हित करू, गहींर पैसब जिनका लेल संभव नै। इतिहाससँ जुड़ाव ऐतिहासिक मनोभावनासँ जोड़ि सकत। वर्तमान सामाजिक व्यवस्थाकेँ माटि देबामे धारक अभाव- हीनभावनाग्रस्त आ अपराध भावसँ भरल लेखकसँ संभव नै। न्याय वैशेषिक आ सांख्य-योगक वस्तुवाद, बाह्यक यथार्थ आ मायाक विरोध, गृहस्थ जीवन, लोक हित, कला आ साहित्यक कृति; आत्माक भीतरक ज्ञान प्रज्ञापर आधारित होइत अछि जे अखण्ड अछि- गति, स्वतंत्रता, सर्जनात्मक परिवर्तन। इतिहास वा साहित्यक इतिहास हम बदलि नै सकैत छी आ एतए उच्च आ मध्यवर्गक स्मृति आधारित मिथिलाक स्वर्णयुग(!); मुदा तकर महत्व दूरदर्शन आ चलचित्र टामे भऽ सकैत अछि। उदारवाद, औद्योगिकरण आ तकर आर्थिक विकासक सफलता-असफलता, सामाजिक रूपमे समाजक पिछड़ल वर्गक विरोधकेँ आरक्षण आ स्वतंत्रता पसारि देलक मुदा संगहि एकर तीव्रता कम केलक से चाहे ओ नक्सलवाद हुअए वा माओवाद वा मर्क्सवाद-लेनिनवाद। बुर्जुआ वर्गक लेल ई फाएदा रहल। बुर्जुआ वर्गक राजनैतिक आ सांस्कृतिक संगठन पसरल; आ सर्वहारा वर्ग धरि ई पहुँचए से प्रयास; आ महिला लोकनिकेँ ऐमे सम्मिलित करबाक प्रयास। पाइ आ सुविधा अपना संग परम्परागत नैतिकताकेँ तोड़लक। कम्पनी अपन स्वतंत्र अस्तित्व बनेलक आ परिवार आ व्यक्ति ऐ तरहक कम्पनीकेँ नौकरीपेशा लोकक संग चलबए लागल। प्रकृतिपर नियन्त्रण आ मानवीय व्यवहारक अवलोकन, काजक लेल अन्न आ काजक बदला पाइ, रोजगार गारन्टी कार्यक्रम, जनवितरण प्रणालीक दोकान, रोजगार लेल देश-विदेश छोट हएब, परिवारक आधारपर आघात, पूँजीवादी विश्व अर्थव्यवस्था, परिवर्तन आपरूपी नै वरन् संघर्ष आ प्रयाससँ भेटत। स्वतंत्र मानवीय संवेदना जे नीक भविष्यक गारंटी नै दैत अछि तँ ई अधलाहक सेहो गारंटी नै दैत अछि। हमरा लग विकल्प अछि आ मैथिली पद्यक पुनर्जीवनक जे प्रमाण भेटि रहल अछि से आह्लादित करैबला अछि। विकल्प हमरा सभकेँ तकबाक अछि जे सनसनी पसारी आकि कार्य करी। समीक्षाक प्राच्य आ पाश्चात्य सिद्धांत सभक आलोकमे समीक्षा: (सिद्धान्त आ प्रयोग) बूच जीक किछु कविताकेँ समीक्षाशास्त्रक सिद्धान्त आ प्रयोगक पाठशाला लेल हम चुनने छी। आउ आगाँ बढ़ी आ देखी:- जेठी करेह: बूच जीक कविता जेठी करेह, कवितामे कवि कहै छथि जे ई भोरमे उधिआइत अछि, बर्खा हेठ भेलोपर उपलाइत अछि। खतराक बिन्दु बड्ड ऊपर छै तखन ओ किए अकुलाइत अछि? आ आखिरीमे कहै छथि जे बान्ह तोड़ि ई प्रलय मचाओत से बुझाइत अछि! ई भेल ऐ कविताक सामान्य पाठ। आब एतए एकरा संरचनावादी दृष्टिकोणसँ देखी तँ लागत जे करेह सवेरे उधिआइत अछि तँ आशा करू जे आन बेरमे ई नै उधिआइत हएत। बरखा हेठ भेने उपलाइत अछि मुदा से नै हेबाक चाही। इन्होर पानिक चमकब, मोरपर भौरी देब आ तकर परिणाम जे डीहक करेजकेँ ई अपनामे समा लैत अछि। ओकर रेतक बढ़लासँ कविक धैर्य चहकै छन्हि। आब कने संरचनावादसँ हटि कऽ एकर ऐतिहासिक विश्लेषणपर आउ। ई नव युगक लेल एकटा नव अर्थ देत। खतराक बिन्दु जे कविक समएमे उँचगर लगैत हएत आब बान्हक बीचमे भेल जमा धारक मवादक चलते ओतेक उँच नै रहि गेल। से नव पीढ़ी लेल कविक कविता कविसँ फराक एकटा नव स्वरूप लऽ लैत अछि। आब कने संरचनावादसँ हटि कऽ विखण्डनवाद दिस आउ। विखण्डनवादी कहत जे संरचनावादीक ध्रुव दार्शनिक स्वरूप लैत अछि। बर्खा हेठ भेलै, तैयो उपलायब, बान्ह बनबैबला इंजीनियरक करेहकेँ बान्हबाक प्रयासक बुरबकीक रूप लेब आ कविक करेह द्वारा बान्ह तोड़ि प्रलय मचेबाक भविष्यवाणी स्वयं कविक ध्रुवीकरणक स्थायी वा क्षणिक होएबापर प्रश्नचिन्ह लगेबाक प्रमाण अछि। आब फेर कने कविताक ऐतिहासिकतापर जाउ। जादू-वास्तविकतावादी साहित्यमे भूतकालमे गेलापर हम देखै छी जे ६०क दशकमे बान्ह बनेबाक भूत सवार रहै, बान्ह, ऊँच आ चाकर, जे धारकेँ रोकि देत आ मनुक्ख लेल की-की फाएदा ने करत! ओइ स्थितिमे जादू-वास्तविकताबला साहित्यक पात्र लग ई कविता जाएत तँ ओ ऐ कविताक तेसरे अर्थ लगाओत। कविक अस्तित्व ओतए खतम भऽ जाएत आ शब्दशास्त्र अपन खेल शुरू करत। जादू-वास्तविकताबला साहित्यक ओ पात्र जे भविष्यमे जीयत तकरा लेल सेहो ई एकटा अलगे अर्थ लेत, ओ धारक खतराक निशानक ऊँच होमएबला गप बुझबे नै करत आ कविक कविताक भावक ताकिमे रहत। आब फेर विखण्डनवाद दिस आउ आ आगाँ विखण्डन करू। ई तकरा बाद अपने जालमे फँसि जाएत, बहुत रास बात नै रहत मुदा बहुत रास बात रहत। बरखा रहत, धार सेहो परिवर्तित रूपमे रहबे करत, रौदमे ओकर पानि इन्होर होइते रहत। उधियेनाइ आ उपलेनाइ रहबे करत। स्वागत गान: स्वागत गानक सामान्य पाठ- कवि सभक स्वागत कऽ रहल छथि मुदा मिथिलाक उपटैत धरतीक करुण क्रन्दनक बीच उल्लासक गीत कोन हएत। भ्रमर पियासल, फलक गाछ मौलायल, तखन ऐ समारोही गोष्ठीसँ की हएत? कविताक संग लाठी आ रसक संग खोरनाठी लिअए पड़त। कविताक नीचाँमे सूचना अछि- विद्यापति स्मृति पर्व समारोह १९८४, ग्राम-बैद्यनाथपुर, प्रखंड-रोसड़ा, जिला-समस्तीपुरमे आगत अतिथिक स्वागत। ओ कालखण्ड मिथिलासँ पड़ाइनक प्रारम्भ छल। हाजीपुरमे गंगा पुल बनि गेल छल। विकासक प्रतिमान लागल जेना विफल भऽ गेल। पैघ बान्हक प्रति मोहभंग भऽ गेल छल। कृषिक आ कृषकक दुर्दशाक लेल बाढ़िक विभीषिका छल तँ स्थानीय फसिल आधारित औद्योगीकरण निपत्ता छल आ शिक्षाक अभियान कतौ देखबामे नै आबि रहल छल। आ ताइ स्थितिमे समारोही गोष्ठीक स्वागतक भार कविजी सम्हारने रहथि। स्वागत गानक ध्वनि सिद्धान्तक हिसाबसँ पाठ: विद्यापति शिव स्वरूप मृत्युंजय मऽरल छथि कहि कवि अर्थ आ प्रतीक दुनू सोझाँ अनै छथि। ध्वनि सिद्धान्तक न्याय दर्शन विरोध केलक मुदा नैय्यायिक उदयनक गाम करियनक कवि बूच जी दार्शनिक नै छथि, कवि छथि। ओ ध्वनिक जोरगर संरचना सोझाँ अनै छथि- हमरा सबहक अभाग अजरो भऽ जऽड़ल छथि, आ मात्र ई समारोही गोष्ठी सँ की हेतै ? आगाँ ओ कहै छथि- काव्य पाठ करू मुदा कान्ह पर लिअ लाठी, एक हाथ रसक श्रोत दोसर मे खोर नाठी। ऐ प्रतीक सभसँ भरल ई कविता सुगठित रूपे आगाँ बढ़ैत अछि आ अभ्यागतक स्वागत करैत अछि। मार्क्सवादी दृटिकोणसँ देखलापर लागत जे कविक काजकेँ ऐ कवितामे काव्यपाठसँ आगाँ भऽ देखल गेल अछि। ऐमे सकारबाक भावक संग ओकरा फुसियेबाक, पुरान आ नव; आ विकास आ मरण दुनूक नीक जकाँ संयोजन भेल अछि। स्वागत गान अपन परिस्थितिसँ कटि कऽ आह-बाह करऽ लगैत तँ मार्क्सवादी दृष्टिकोणसँ ई निम्न कोटिक कविता भऽ जाइत (जकर भरमार मैथिलीक सुखाएल मुख्यधाराक स्वागत आ ऐश्वर्य गान गीत सभमे अछि), मुदा कवि एकरा एकटा गतिशील प्रक्रियाक अंग बना देलन्हि आ ई मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ स्वागत गान बनि गेल। बेटी बनलि पहाड़: बेटी बनलि पहाड़ कविताक सामान्य पाठ: दुलरैतिन बेटी घेंटक घैल बनल छथि। बेटी अएलीह तँ उड़नखटोला चढ़ि कऽ मुदा हरि गरुड़केँ त्यागि कार माँगि रहल छथिन्ह। पैंतीस ग्राम सोना पुड़ेलन्हि मुदा आब बियाह रातिक खर्चा चाही आ बरियाती दस गाही अओताह; सौँसे बल्ब जड़ि रहल अछि मुदा माझे ठाम अन्हार अछि। दशरथ एको पाइ नै मंगलन्हि, रामो किछु नै बजलाह। इतिहास तँ कृष्णक प्रेमक छल मुदा तैसँ की। जनक वर्तमानमे हाहाकार कऽ रहल छथि। बेटाक कंठ बाप पकड़ने अछि आ घरे-घर बूचड़खाना बनल अछि आ गामे-गाम बजार लागल अछि। बेटी बनलि पहाड़ कविताक समाजशास्त्रीय समीक्षा पद्धतिक दृष्टिसँ पाठ: ई कविता काटर प्रथाक विरोधक कविता अछि। समाजमे ओइ कालमे (अखनो) काटर प्रथाक कारण उड़नखटोलापर चढ़ि कऽ आयलि दुलरैतिन बेटीक बाप अपस्याँत छथि। करूण गीत: करूण गीत कविताक सामान्य पाठ: कोकिलक करुण गीत सुनि श्रवित लोचनसँ कुसमित कानन देखब! सुवर्णक शौर्य शिखरपर शान्ति सागरक सुलभ जीत! जहिना किछु आलिंगन करै छी अनेको वक्रशूल भोका जाइत अछि। सुषमा दू क्षणक लेल आयलि, (आ चलि गेलि!) प्रेमक मधु तीत भऽ गेल। रजनीक रुदन विगलित प्रभात! करूण गीत कविताक रूपवादी दृष्टिकोणसँ पाठ: कुसुमित काननक श्रवित लोचन द्वारा देखब, श्रृंगार सेज पर ज्वलित मसानक रौद्र रूपक आएब आ सुवर्णक शौर्य शिखर पर - शांति सागरक सुलभ जीत केँ देखू। भाषाक अनभुआर पक्षक कवि नीक जकाँ उपयोग करै छथि। आ अहीसँ हुनकर कवितामे कवित्व आबि जाइत अछि। विरोधी शब्द सभक बाहुल्य आ संयोजनक अनभुआर प्रकृति शब्दालंकारसँ युक्त भाषा ऐ कविताकेँ विशिष्ट बनबैत अछि। फूलक शूल सन ढुकब आ एहने आन संयोजन ऐ कविताकेँ रूपवादी दृष्टिकोणसँ श्रेष्ठ बनबैत अछि। गामे मोन पड़ैए: गामे मोन पड़ैए कविताक सामान्य पाठ: गाममे रोटी एकोण रहए आ बथुओ साग अनोन रहए मुदा तैयो कलकत्तामे गामे मोन पड़ि रहल अछि। करेहक पानि पटा कऽ मोती उपजाएब तँ बच्चा सभ बिलटत? हुगलीक बाबू रहब नीक आकि कमला कातक जोन रहब? ईडेन गार्डनसँ नीक कमला कातक बोन अछि, पति पत्नीकेँ ईडेन गार्डनमे माला पहिरा रहल छथि मुदा कमला कातक बोनमे तिरहुतनी अपन भोला लेल धतूर अकोन ताकि रहल छथि! नारीवादी दृष्टिकोणसँ गामे मोन पड़ैए कविताक पाठ: प्रवासक कविता अछि ई। तिरहुतनी अपन भोला लेल धतूर अकोन ताकि रहल छथि, आ भोला प्रवासमे छथि। अस्तित्ववादी दृष्टिकोणसँ देखी तँ ई भोला अपन दशा लेल, असगर जीबा लेल, चिन्ता लेल अपने जिम्मेदार छथि। सोन दाइ: सोन दाइ कविताक सामान्य पाठ: सोन दाइक जीवनमे ने हास रहतन्हि आ ने विलास, मुदा से किए? बाल वृन्द जा रहल छथि, नव युवको चलल छथि आ तकरा बाद बूढ़-सूढ़ गलि गेल छथि। तैयो किए विश्वास छन्हि सोन दाइकेँ? ऐ सभक उत्तर आगाँ जा कऽ भेटैत अछि, देसकोस बिसरि ओ प्रवास काटि रहल छथि। आ जौँ-जौँ उमेर बढ़तै, कहिया धरि सोन दाइक घरमे वास हेतै। नारीवादी दृष्टिकोणसँ सोन दाइ कविताक पाठ: नारीक लेल वएह सिद्धान्त, किए ने ओ काव्येक सिद्धान्त हुअए, जे पुरुष केन्द्रित समाजमे पुरुष लोकनि द्वारा बनाओल गेल अछि, समीचीन नै अछि। सोन दाइ देसकोस बिसरि ककरा लेल प्रवास काटि रहल छथि? अकाल: अकाल कविताक सामान्य पाठ: अकालक वर्णनमे कवि नाङरिमे भूखक ऊक बान्हि ओकर चारपर ताल ठोकबाक वर्णन करैत छथि। अनावृष्टिसँ अकाल आ तइसँ महगीक आगमन भेल, तइसँ जड़ैत गामक अकास लाल भऽ गेल। भारतमे लंका सन मृत्युक ताण्डव शुरू भेल अछि मुदा ऐबेर विभीषणक घर सेहो नै बाँचत कारण ओकर मुंडमाल डोरीसँ बान्हल अछि। माए भरि-भरि पाँज कऽ धरती पकड़ि रहल छथि। दशानन अपन बीसो आँखि ओनारि माथ हिला रहल छथि। अकाल कविताक औचित्य सिद्धान्तक हिसाबसँ पाठ: ई अकाल नहि, महाकाल अछि, भूखक ऊक बान्हि नाड़रि सँ, चारे पर ठोकैत ताल अछि मिथिलाक काल-देशमे अकालक ई वर्णन कविक कविताक औचित्य अछि। रावण तँ उपटबे करत, विभीषण सेहो नै बाँचत। तोहर ठोर: तोहर ठोर कविताक सामान्य पाठ: पानक ठोर आ सुन्नरिक ठोर। सुन्नरि द्वारा बातक चून लगाएब आ कऽथक सन लाल बुन्न कपोल सजाएब! मुदा प्रेमक पुंगी कतए? भोरक लाली सुन्नरिक ठोर सन, बिनु सुन्नरि व्याकुल साँझ जेकाँ। बधिक जे बनत सुन्नरिक वर तँ हम बनब विखण्डित राहु। स्वर्गोमे सुधा कम्मे अछि, तहिना सुन्नरिक ठोर सेहो कतऽ पाबी! सकरी मिल महान बनत जे हम विश्वकर्मासँ विज्ञान सीखब, आ ओइ मिलसँ बहार हएत माधुर्य। कुसियारक पाकल पोर सन सुन्नरिक ठोर अछि। पुनर्जन्ममे सेहो धान आ चिष्टान्न बनि सुन्नरि हम अहाँक लग आएब। मुदबा एतबा बादो शब्दसँ उद्देश्य कहाँ प्रगट भेल। अलंकार सिद्धान्तक हिसाबसँ तोहर ठोर कविताक पाठ: बातक चून लगाएब अप्रस्तुत; कऽथक सन लाल बुन्न कपोल, पानक ठोर आ सुन्नरिक ठोर, भोरक लाली सुन्नरिक ठोर सन, कुसियारक पाकल पोर सन सुन्नरिक ठोर, ई सभ उपमा कवि द्वारा प्रयुक्त भेल अछि। मुदा कतऽ छह प्रेमक पुंगी हूक? मे सादृश्य-विरोध अछि। अहाँ बिनु व्याकुल वाटक माँझ मे रूपक प्रयुक्त भेल अछि। रस सिद्धान्तक हिसाबसँ तोहर ठोर कविताक पाठ: लगौलह बातक पाथर चून । आ सजौलह कऽथ कपोलक खून । विभाव अछि आ ऐ कारणसँ देखि कऽ लहरल हमर करेज अनुभाव माने परिणाम बहार होइत अछि। स्फोट सिद्धांतक आधारपर तोहर ठोर कविताक पाठ: आब नैय्यायिक उदयनक करियनक धरतीपर रहबाक अछैतो न्याय सिद्धान्तक स्फोट सिद्धान्तकेँ नै मानब कविक कविताकेँ नै अरघै छन्हि। मने मे रहल मनक सभ बात कहि ओ अलभ्य चित चोर सँ सुन्नरिक ठोरक तुलना कऽ दै छथि। उदयनक गामक कवि बूच कहै छथि भऽ रहल वर्ण - वर्ण निःशेष, शब्द सँ प्रगटल नहि उद्य़ेश्य; एतए शब्दसँ नै मुदा स्फोटसँ अर्थक संप्रेषण कवि द्वारा तोहर ठोर आ ऐ संग्रहक आन कविता सभमे जाइ तरहेँ भेल अछि, से संसारक सभसँ लयात्मक आ मधुर भाषा मैथिली (यहूदी मेनुहिनक शब्दमे) मे विद्यापतिक बादक सभसँ लयात्मक कविक रूपमे बूचजी केँ प्रस्तुत करैत अछि आ मैथिली कविताकेँ ऐ रूपमे फेरसँ परिभाषित करैत अछि। मैथिलीक किछु सर्वश्रेष्ठ पद्य: अंजनी कुमार वर्मा “दाऊजी” क ओजक भोजमे आत्मीयताकेँ मृगमरीचिका कहल गेल अछि, तँ समस्या मे ओ पूछै छथि जे लोक कोना उल्लसित हएत? आत्मबलमे हुनक मानब छन्हि जे जखन अपन वा अनकर जानक मोह खतम भऽ जाइए तखने अभिमन्युबला खून आबैए। बलराम साह केँ सभ नीक गप अजूबा लगै छन्हि, आ हुनकर नीन टूटि जाइ छन्हि। रवि भूषण पाठक आ विवेकानन्द झा बहुत रास गपकेँ फड़िछाबैत छथि। ऐ बेर छठिमे मे रवि भूषण पाठक सुरुजक उगबाक स्थानक एकटा नूतन बिम्ब लऽ सोझाँ आएल छथि- भगवान तँ ऐबेर दुसधटोलीक पाछूसँ उगि रहल छथि /……दुसधटोलीक पाछू अकास टकाटक लाल छलए....। विवेकानन्द झा हम कवितामे लिखैत छथि- हमही अहाँक फूलडाली सँ उझिक कऽ खसल कनेर/ हमही कोशीक नव-जल भसिआएल काँट कुश अनेर। सतीश चन्द्र झा बाल दिवसपर नेन्ना तेतरीक व्यथाकेँ सुरमे लिखै छथि आ ओ सुर आ लय राजेश मोहन झा गुंजन आ शिव कुमार झा टिल्लू मे सेहो छन्हि। मुन्नाजी बोनिहार आ माटिक ललकार मे पद्यकेँ वर्तमान समस्यासँ जोड़ैत छथि। ज्योति सुनीत चौधरी विचित्र श्रद्दा मे लिखै छथि- ईश्वर अहाँ जौं भेटितौं तँ पुछितौं/ नीक लागैत अछि की एहेन सत्कार । अमित मिश्र, चन्दन कुमार झा, जगदानन्द झा मनु, ओमप्रकाश झा आ आशीष अनचिन्हार, ई सभ बहरमे गजल लिखै छथि आ पुरान गजलकार सभक बहर अज्ञानताकेँ देखार करै छथि। जगदानन्द झा मनु शेर कहै छथि- बरखा खुबे बरिसय तँ गरजय बदरबा/ छतिया दगध भेलै हिया कानै हमर। हिनकर सभक गजलमे जे तीव्रता अछि, स्तर अछि, से बएसमे पैघ राजेन्द्र विमल आ अरविन्द ठाकुरक (२०११ मे दुनू गोटेक आजाद गजलक संग्रह आएल छन्हि) शिथिल गजल सभसँ स्तरमे बड्ड आगाँ अछि। सूर्यास्तसँ पहिनेमे राजेन्द्र विमल बहरक नाम तँ गनबै छथि मुदा बहुत तकलोपर ऐ संग्रहक गजलमे बहरक दर्श नै होइत अछि, ई मोटा-मोटी सियाराम झा सरसक ओइ उक्ति जे ओ स्वयंक विषयमे लिखने रहथि जे ओ (सियाराम झा सरस) गोर-बीसेक बहरमे लिखै छथि, सँ मेल खाइत अछि, कारण सरस जी सेहो राजेन्द्र विमल जकाँ आजाद गजले टा लिखै छथि। जीवन युगक आन आजाद गजलकार लोकनिक शिथिल गजल लेल सेहो ई सभ गजलकार एकटा पैघ चुनौती साबित हेता। नवीन कुमार आशा मे आगाँ बढ़बाक लक्षण छन्हि। किशन कारीगर हास्यसँ गम्भीर दिस आएल छथि आ दुनूमे आगाँ जा रहल छथि। जँ गीत गेबाक हुअए तँ चन्द्रशेखर कामति, जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल, धीरेन्द्र प्रेमर्षि, जगदीश प्रसाद मण्डल, श्यामल सुमन, प्रकाश प्रेमी, रमाकान्त राय रमा, नन्द विलास राय, बेचन ठाकुर आ राम विलास साहुक गीत-गजल पढ़ू-गाउ। जयप्रकाश मण्डल लिखै छथि- एशियाड ओलोपिंकमे नामो घिनेलौं/ धनि ई मल्लेश्वरी जे काँस्य एगो पएलौं । सत्येन्द्र कुमार झा क क्षणिका सभ नीक छन्हि- श्मसानोमे आब कहाँ छै खाली परती/ धरती सभपर कएक बेर कएकटा लाश जरल छै-/ आब तँ आबैबला प्रत्येक शव/ अपना संग अपन पूर्वोजोकेँ/ एक बेर फेर जरा दैत अछि। पंकज कुमार झाक उद्वोधन आ सहजता समाजसँ कविताक जुड़ाव देखबैत अछि। जँ मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ हाइकू/ टनका पढ़बाक अछि तँ वृषेश चन्द्र लाल आ ज्योति सुनीत चौधरीकेँ पढ़ू। मनोज कुमार मण्डल लिखै छथि- अप्पन लगाओल गाछ पतझड़ लेलक। अन्नावरन देवेन्दरक तेलुगु कविता, चम्पा शर्माक डोगरी कविता, परिचय दासक भोजपुरी कविता आ इप्सिता सारंगीक ओड़िया कविता सेहो अलग-अलग विषयपर अछि। अन्नावरन देवेन्दरक कविता आत्महत्याक पहिने किसानक उद्गार अछि तँ चम्पा शर्माक कविता सैनिकक प्रति समर्पित अछि। इप्सिताक दार्शनिक कविता छोट मुदा घनगर बिम्ब लेने अछि। मिहिर झाक रुबाइ मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रुबाइ अछि, छेद भेल करेज मे शराब कोना राखी/ बहकल दिमाग मे हिसाब कोना राखी/ जड़िऐल सिनेह छल सात जनमक/ बितल उलहनक जवाब कोना राखी। मनोज झा मुक्ति लिखै छथि, जौं शुरुएमे भगबे तँ भागि जो । कपिलेश्वर साहु कोसी कवितामे लिखै छथि, बास डीहकेँ कुण्ड बनौलथि, बाँस नै लैत अछि थाह। इन्द्रभूषण कुमार सहास कवितामे लिखै छथि- अचानक मंचपर अवतरित भेल एक नारी/ जेहने देखैमे कारी/ … भय नै, जँ कहि हुसब/ श्रोता सभ भरिमन दूसत …. नै आबैत छल ओकरा शब्दक जाल बुननाइ । मृदुला प्रधान जतेक लिखलनि से खुलि कऽ लिखलनि, हुनकर कवितामे किछु चमत्कार तँ अवश्ये अछि, ओ लिखै छथि.. कलमक माध्यमसँ,/ कुमरपतक गाम-घरमे,/ विचरण करबाक लोभ। कालीनाथ ठाकुरक दहेजपर लिखल कुण्डलिया सभ अद्भुत अछि। निक्की प्रियदर्शिनी लिखै छथि- स्त्रीकें देखक, व्यवहार करइक, अहाँ स्त्री छी ई एहसास सदिखन,कहाँ बदलल अछि। मो. गुल हसन लिखै छथि, एहेन सुन्दर गहुम काका पाड़ा चरि गेल/ दौगू-दौगू यौ काका जुलुम भऽ गेल। रमेश आ शान्तिलक्ष्मी चौधरीक गद्य कविता विलक्षण अछि। मुन्नी कामत लिखै छथि- भऽ जाएब विलीन कतौ/ रूकि जाएत ई कलम/ आर/ हरा जाएत शब्द कतौ। मैथिलीक पहिल जनकवि रामदेव प्रसाद मण्डल झारूदारक झारू सभ ऐ कविक भावनाक नैसर्गिक उद्गार अछि, आ तेँ लोक हिनका मैथिलीक भिखारी ठाकुर कहऽ लागल छन्हि, देखू एकटा झारू, हमरासँ पहिले कोनो नै शासन, नै छै कोनो धर्मक विधान। हमरा बिनु जगत सुन्ना छै, हतैबला छै पशु समान।।। रवि मिश्र भारद्वाज लिखै छथि- बेचैन भऽ कऽ कानए लागल/ हमरेपर जखन हमर आँखि/ हँसि कऽ लोक हमरा देखऽ लागल। प्रमोद रंगीले लिखै छथि- दर्दक बाजैत ताल देखियौ।/ मरदा पर फेकैत जाल देखियौ। राजदेव मण्डल, जे २१म शताब्दीक सर्वश्रेष्ठ मैथिली कविता संग्रह अम्बरा क लेखक छथि, लिखै छथि- जेना करैत अछि खुनियाँ बड़द/ तामसे करैत गरद आइसँ बनलौं असल मरद। उमेश मण्डल, उमेश पासवान, अनामिका राज आ सन्दीप कुमार साफीमे कविताक मर्म छन्हि, शब्दावली छन्हि, भोगल यथार्थ छन्हि आ तँए ऐ चारू गोटेक हाथमे कविताक रासि छन्हि, जखन जइ दिशामे ई सभ कविताक गुड्डी उड़ेताह सएह मैथिली पद्यक दिशा हएत, जतेक आगाँ साहित्य, समाज आ पद्यकेँ ई सभ लऽ जाए चाहताह, लऽ जेताह। अनामिका राजक कविता नवका बाट मे ई पाँती देखू- बोनिहार आकि नारी!/ दुनू सामन्त कि पूँजीवादी द्वारा/ भोगबाक चीज बनि रहि जाइछ/ आ/ भोगनिहार एकर/ मर्दन करैत/ अपन पुरुषारथ देखेबाक माउग प्रयास करैए। ऐ पद्य संग्रहमे कविता, गीत, गद्य-कविता, गजल, आजाद गजल (बेबहर), भक्ति-गजल, रुबाइ, कता, हजल, नात, बन्द, कसीदा, हाइकू, टनका-वाका, हैबून, शेनर्यू, कुण्डलिया (दोहा+रोला), कसीदा आ झारू सभ किछु भेटत। नारीवादी स्वर हुअए वा दलित विमर्श, मार्क्सवाद हुअए वा मानवतावाद वा उत्तर आधुनिक विचारधारा सभक समूह, सभ ठाम ऐ संग्रहक माध्यमसँ एकटा स्तर प्राप्त कएल गेल अछि। ई संग्रह मैथिली पद्यक लेल एकटा दिशा तँ निर्धारित करबे करत, सभ विधा लेल ई जे एकटा बेन्चमार्क बनेने अछि ओइसँ आगाँ बढ़बाक मार्ग सेहो खुजि जाएत। ४ नाट्य साहित्य, समानान्तर मैथिली नाटक आ रंगमंच; आ नाट्य साहित्यक समीक्षाशास्त्र मैथिली नाटकक एकटा समानान्तर दुनियाँ रामखेलावन मण्डल गाम- कटघटरा, प्रखण्ड– शिवाजीनगर, जिला- समस्तीपुर, हिनके संग बिन्देश्वर मण्डल सेहो छलाह। उठैत मैथिली कोरस आ माँ गै माँ तूँ हमरा बंदूक मंगा दे कि हम तँ माँ सिपाही हेबै- एखनो लोककेँ माेन छन्हि। एे मंडली द्वारा रेशमा-चूहड़, शीत-वसन्त, अल्हाऊदल, नटुआ दयाल ई सभ पद्य नाटिका प्रस्तुत कएल जाइत छल। पूर्णियासँ पिआ देसाँतर (मैथिली बिदेसिया)क टीम सुपौल-सहरसा-समस्तीपुर आदि ठाम अबैत छल। हसन हुसन नाटिका होइत छल। रामरक्षा चौधरी नाट्यकला परिषद, ग्राम- गायघाट, पंचायत करियन, पो. वैद्यनाथपुर, जिला- समस्तीपुर विद्यापति नाटक गोरखपुर धरि खेलाएल छल। ऐ मंडली द्वारा प्रस्तुत अन्य नाटक अछि- लौंगिया मेरचाइ, विद्यापति, चीनीक लड्डू आ बसात। अंकिया नाटमे प्रदर्शन तत्वक प्रधानता छल। कीर्तनियाँ एक तरहेँ संगीतक छल आ एतौ अभिनय तत्वक प्रधानता छल। अंकीया नाटकक प्रारम्भ मृदंग वादनसँ होइत छल। सभ साहित्यिक विधा दू प्रकारक होइत अछि। लोकधर्मी आ नाट्यधर्मी, लोकधर्मी भेल ग्राम्य आ नाट्यधर्मी भेल शास्त्रीय उक्ति। ग्राम्य माने भेल कृत्रिमताक अवहेलना मुदा अज्ञानतावश किछु गोटे एकरा गाममे होइबला नाटक बुझै छथि, आ बुझै छथि जे गमैया नाटक दब होइ छै। लोकधर्मीमे स्वभावक अभिनयमे प्रधानता रहैत अछि, लोकक क्रियाक प्रधानता रहैत अछि, सरल आंगिक प्रदर्शन होइत अछि, आ ऐ मे पात्रक से ओ स्त्री हुअए वा पुरुष, तकर संख्या बड्ड बेसी रहैत अछि। नाट्यधर्मीमे वाणी मोने-मोन, संकेतसँ, आकाशवाणी इत्यादि द्वारा होइए आ नृत्यक समावेशसँ, वाक्यमे विलक्षणतासँ, रागबला संगीतसँ, आ साधारण पात्रक अलाबे दिव्य पात्रक आगमन सेहो ऐमे रहैए। कोनो निर्जीव/ वा जन्तु सेहो संवाद करऽ लगैए, एक पात्रक डबल-ट्रिपल रोल, सुख दुखक आवेग संगीतक माध्यमसँ बढ़ाओल जाइए। वैदिक आख्यान, जातक कथा, ऐशप फेबल्स, पंचतंत्र आ हितोपदेश आ संग-संग चलैत रहल लोकगाथा सभ। सभ ठाम अभिजात्य वर्गक कथाक संग लोकगाथा रहिते अछि। ऋगवेदक शिथिर, दूलभ, इन्दर आदि शब्द जनभाषाक साहित्यीकरणक प्रमाण अछि। ओना एकर प्रारम्भिक प्रयोग अशोकक अभिलेखसँ तेरहम शताब्दी ई. धरि भेटि जाएत मुदा पारिभाषिक रूपमे जइ प्राकृतक एतए चर्चा भऽ रहल अछि ओ पहिल ई.सँ छठम ई. धरि साहित्यक भाषा दू अर्थे रहल, पहिल संस्कृत साहित्यक नाटकमे जन सामान्य आ स्त्री पात्र लेल शौरसेनी, महाराष्ट्री आ मागधीक (वररुचि चारिम प्राकृतमे पैशाचीक नाम जोड़ै छथि) प्रयोग सेहो भेल (कालिदासक अभिज्ञान शाकुन्तलम्, मालविकाग्निमित्रम्, शूद्रकक मृच्छकटिकम्, श्रीहर्षक रत्नावली, भवभूतिक उत्तररामचरित, विशाखादत्तक मुद्राराक्षस) आ दोसर जे फेर ऐ प्राकृत सभमे साहित्यक निर्माण स्वतंत्र रूपेँ होमए लागल। फेर ऐ प्राकृत भाषाकेँ सेहो व्याकरणमे बान्हल गेल आ तखन ई भाषा अलंकृत होमए लागल आ अपभ्रंश आ अवहट्ठक प्रयोग लोक करए लगलाह, ओना अपभ्रंश प्राकृतक संग प्रयोग होइत रहए, तकर प्रमाण सेहो उपलब्ध अछि। मोटा-मोटी गद्य लेल शौरसेनी, पद्य लेल महाराष्ट्री आ धार्मिक साहित्य लेल मागधी-अर्धमागधीक प्रयोग भेल। नाटकमे स्त्री-विदूषक बजैत रहथि शौरसेनीमे, मुदा पद्य गाबथि महाराष्ट्रीमे, नाटकक तथाकथित निम्न श्रेणीक लोक मागधी बजैत छलाह। मैथिली नाट्य साहित्य आ नाट्य साहित्यक समीक्षाशास्त्र बच्चा आ पैघ नाटकसँ शिक्षा लैए, लोककेँ आ वातावरणकेँ बुझबाक प्रयास करैए। मन्दिरक उत्सव आ राजाक प्रासादमे होइबला नाटक स्वतंत्र भऽ गेल आ एकर उपयोग वा अनुप्रयोग दोसर विषयकेँ पढ़ेबामे सेहो होमए लागल। दोसर विषयक विशेषज्ञक सहभागिता आवश्यक भऽ गेल। स्वतंत्र रूपेँ सेहो ई विषय अछि आ एकर अनुप्रयोग सेहो कएल जाइत अछि। पारम्परिक नाटक पेशेवर नाटकसँ जुड़त, उदाहरण स्वरूप कएल गेल नाटक, मंचक साजसज्जा, आ असल नाटकक मंचन रंगमंचक इतिहास बनत। मुदा ऐ सँ पहिने रंगमंचक प्रारम्भिक ज्ञानक संग नाटक पढ़बाक आदतिक विकसित भेनाइ सेहो आवश्यक अछि। आ से पढ़बा काल एकर मंच प्रबन्धन आ अभिनयक दृष्टिसँ तकर विश्लेषण सेहो आवश्यक अछि। बच्चा आ पैघ नाटक आ रंगमंचसँ जुड़त तँ जिम्मेवार नागरिक बनत, आर्थिक रूपेँ आत्म-निर्भर बनत आ सक्रिय नागरिक सेहो बनत। नाट्य शास्त्रमे वर्णन अछि जे नाटकक उत्पत्ति इन्द्रक ध्वजा उत्सवसँ भेल। नाट्य शास्त्र नाटककेँ दू प्रकारमे १.अमृत मंथन आ २.शिवक त्रिपुरदाह, मानैत अछि। एहेन लगभग दस टा दृश्य वा रूपकक प्रकार भरत लग छलन्हि (दशरूपक) आ ओइमे नृत्य, संगीत आ अभिनय सम्मिलित छल; आ ऐ दशरूपकक अतिरिक्त श्रव्य गीत सभ सेहो छल। पाँचम शताब्दी ई. पू. मे पाणिनी शिलालिन् आ कृशाश्वक चर्चा करै छथि जे नट सूत्रक संकलन केने रहथि। नट माने अभिनेता आ रंग माने रंगमंच। नटक पर्यायवाची होइत अछि, भरत, शिलालिन् आ कृशाश्व! मैथिली नाटक जे आइ धरि मात्र नृत्य-संगीतसँ बेशी आ चित्रकला आ दस्तकारीसँ मामूली रूपसँ जुड़ल छल, से समानान्तर रंगमंचक हस्तक्षेपक कारण आब भौतिकी, जीव विज्ञान, इतिहास, भूगोल, आ साहित्यसँ सेहो जुड़ि रहल अछि, तकर आर प्रयास हेबाक चाही। ज्योतिरीश्वरक धूर्तसमागम, विद्यापतिक गोरक्षविजय, कीर्तनिञा नाटक, अंकीयानाट, मुंशी रघुनन्दन दासक मिथिला नाटक, जीवन झाक सुन्दर संयोग, ईशनाथ झाक चीनीक लड्डू, गोविन्द झाक बसात, मणिपद्मक तेसर कनियाँ, नचिकेताजीक “नायकक नाम जीवन, एक छल राजा”, श्रीशजीक पुरुषार्थ, सुधांशु शेखर चौधरीक भफाइत चाहक जिनगी, राम भरोस कापड़ि भ्रमरक महिषासुर मुर्दाबाद, गंगेश गुंजनक बुधिबधिया, नचिकेताक नो एण्ट्री: मा प्रविश; माने ज्योतिरीश्वरक धूर्तसमागमक अबसर्डिटी सँ नचिकेताक नो एण्ट्री: मा प्रविश क उत्तर आधुनिक अबसर्डिटी; मैथिली नाटकक एकटा वृत्त सम्पूर्ण भेल। उत्तर आधुनिकताक लक्षण: एके गोटेक कएक तरहक चरित्र निकलि बाहर अबैत अछि, कोनो घटनाक सम्पूर्ण अर्थ नै लागि पबैत अछि, सत्य कखन असत्य भऽ जाएत तकर कोनो ठेकान नै। उत्तर आधुनिकताक सतही चिन्तन आ तेहन चरित्र सभक भरमार लागल अछि, आशावादिता तँ नहिए अछि मुदा निराशावादिता सेहो नै अछि। जे अछि तँ से अछि बतहपनी, कोनो चीज एक तरहेँ नै कएक तरहेँ सोचल जा सकैत अछि- ई दृष्टिकोण विद्यमान अछि। कारण, नियन्त्रण आ योजनाक उत्तर परिणामपर विश्वास नै, वरन संयोगक उत्तर परिणामपर बेशी विश्वास दर्शाओल जाइत अछि। गणतांत्रिक आ नारीवादी दृष्टिकोण आ लाल झंडा आदिक विचारधाराक संगे प्रतीकक रूपमे हास-परिहास सोझाँ अबैत अछि, तेँ नारीवाद आ मार्क्सवाद उत्तर आधुनिक दृष्टिकोणक विरोध केलक अछि। नीक-खराबक भावना रहि-रहि खतम होइत रहैत अछि। सभ मुखौटामे रहि जीबि रहल छथि। भारत आ पाश्चात्य नाट्य सिद्धांतक तुलनात्मक अध्ययनसँ ई ज्ञात होइत अछि जे मानवक चिन्तन भौगोलिक दूरीकक अछैत कतेक समानता लेने रहैत अछि। भारतीय नाट्यशास्त्र मुख्यतः भरतक “नाट्यशास्त्र” आ धनंजयक दशरूपकपर आधारित अछि। पाश्चात्य नाट्यशास्त्रक प्रामाणिक ग्रंथ अछि अरस्तूक “काव्यशास्त्र”। भरत नाट्यकेँ “कृतानुसार” “भावानुकार” कहैत छथि, धनंजय अवस्थाक अनुकृतिकेँ नाट्य कहैत छथि। भारतीय साहित्यशास्त्रमे अनुकरण नट कर्म अछि, कवि कर्म नै। पश्चिममे अनुकरण कर्म थिक कवि कर्म, नटक कतौ चरचा नै अछि। अरस्तू नाटकमे कथानकपर विशेष बल दै छथि। ट्रेजेडीमे कथानक केर संग चरित्र-चित्रण, पद-रचना, विचार तत्व, दृश्य विधान आ गीत रहैत अछि। भरत कहैत छथि जे नायकसँ संबंधित कथावस्तु आधिकारिक आ आधिकारिक कथावस्तुकेँ सहायता पहुँचाबएबला कथा प्रासंगिक कहल जाएत। मुदा सभ नाटकमे प्रासंगिक कथावस्तु हुअए से आवश्यक नै, नो एण्ट्री: मा प्रविश नाम्ना उत्तर-आधुनिक नाटकमे नहिये कोनो तेहन आधिकारिक कथावस्तु अछि आ नहिये कोनो प्रासांगिक, कारण ऐमे नायक कोनो सर्वमान्य नायक नै अछि। कोनो पात्र कमजोर नै छथि आ समय-परिस्थितिपर रिबाउन्ड करैत छथि। कथा इतिवृत्तिक दृष्टिसँ प्रख्यात, उत्पाद्य आ मिश्र तीन प्रकारक होइत अछि। प्रख्यात कथा इतिहास पुराणसँ लेल जाइत अछि आ उत्पाद्य कल्पित होइत अछि। मिश्रमे दुनूक मेल होइत अछि। अरस्तू कथानककेँ सरल आ जटिल दू प्रकारक मानैत छथि। अरस्तू इतिवृत्तकेँ दन्तकथा, कल्पना आ इतिहास ऐ तीन प्रकारसँ सम्बन्धित मानैत छथि। अरस्तूक ट्रेजेडीक चरित्र यशस्वी आ कुलीन छथि- सत् असत् केर मिश्रण। भरत नृत्य संगीतक प्रेमीकेँ धीरललित, शान्त प्रकृतिकेँ धीरप्रशान्त, क्षत्रिय प्रवृत्तिकेँ धीरोदत्त आ ईर्ष्यालूकेँ धीरोद्धत्त कहैत छथि। भारतीय सिद्धांत कार्यक आरम्भ, प्रयत्न, प्राप्त्याशा, नियताप्ति आ फलागम धरिक पाँच टा अवस्थाक वर्णन करैत अछि। प्राप्त्याशामे फल प्राप्तिक प्रति निराशा अबैत अछि तँ नियताप्तिमे फल प्राप्तिक आशा घुरि अबैत अछि। पाश्चात्य सिद्धांतमे अछि आरम्भ, कार्य-विकास, चरम घटना, निगति आ अन्तिम फल। प्रथम तीन अवस्थामे ओझराहटि अबैत अछि, अन्तिम दू मे सोझराहटि। कार्यावस्थाक पंच विभाजन- बीया, बिन्दु, पताका, प्रकरी आ कार्य अछि। पताका आ प्रकरी अवान्तर कथामे होइत अछि। बीआक विकसित रूप कार्य अछि, अरस्तू एकरा बीआ, मध्य आ अवसान कहैत छथि। आब आउ सन्धिपर, मुख-सन्धि भेल बीज आ आरम्भकेँ जोड़एबला, प्रतिमुख-सन्धि भेल बिन्दु आ प्रयत्नकेँ जोड़एबला, गर्भसन्धि भेल पताका आ प्राप्त्याशाकेँ जोड़एबला, विमर्श सन्धि भेल प्रकरी आ नियताप्तिकेँ जोड़एबला आ निर्वहण सन्धि भेल फलागम आ कार्यकेँ जोड़एबला। पाश्चात्य सिद्धांत स्थान, समय आ कार्यक केन्द्र तकैत अछि। अभिनवगुप्त कहैत छथि जे एक अंकमे एक दिनक कार्यसँ बेशीक समावेश नै हुअए आ दू अंकमे एक वर्षसँ बेशीक घटनाक समावेश नै हुअए। त्रिकक विरोध ड्राइडन कएने छलाह आ शेक्सपिअरक नाटकक स्वच्छन्दताक ओ समर्थन कएलन्हि। भारतमे नाटकक दृश्यत्वक समर्थन कएल गेल मुदा अरस्तू आ प्लेटो एकर विरोध कएलन्हि। मुदा १६म शताब्दीमे लोडोविको कैस्टेलवेट्रो दृश्यत्वक समर्थन कएलन्हि। डिटेटार्ट सेहो दृश्यत्वक समर्थन कएलन्हि तँ ड्राइडज नाटकक पठनीयताक समर्थन कएलन्हि। देसियर पठनीयता आ दृश्यत्व दुनूक समर्थन कएलन्हि। अभिनवगुप्त सेहो कहने छलाह जे पूर्ण रसास्वाद अभिनीत भेला उत्तर भेटैत अछि, मुदा पठनसँ सेहो रसास्वाद भेटैत अछि। पश्चिमी रंगमंचक नाट्यविधान वास्तविक अछि मुदा भारतीय रंगमंचपर सांकेतिक। जेना अभिज्ञानशाकुंतलम् मे कालिदास कहैत छथि- इति शरसंधानं नाटयति। सैमुअल जॉनसन सेक्सपिअरक नाटकमे हास्य आ दुखद तत्वपर लिखलन्हि। प्लेटो- प्लेटो कहै छथि जे कोनो कला नीक नै भऽ सकैए किएक तँ ई सभटा असत्य आ अवास्तविक अछि। प्लेटोक ई विचार स्पार्टासँ एथेंसक सैन्य संगठनक न्यूनताकेँ देखैत देल विचारक रूपमे सेहो देखल जएबाक चाही। काव्य/ नाटकक ओ ऐ रूपेँ विरोध केलन्हि जे सम्वादकेँ रटि कऽ बाजैसँ लोक एकटा कृत्रिम जीवन दिस आकर्षित होएत। अरिस्टोटल कविताकेँ मात्र अनुकृति नै मानै छथि, ओ ऐ मे दर्शन आ सार्वभौम सत्य सेहो देखै छथि। ओ नाटकक दुखान्तकेँ आ अनुकृतिकेँ निसास छोड़ैबला कहै छथि जे आनन्द, दया आ भयक बाद अबैत अछि। सम्वाद दू तरेहेँ भऽ सकैए- अभिभाषण वा गप द्वारा। गपमे दार्शनिक तत्व कम रहत। प्राचीन ग्रीसमे कविता भगवानक सनेस बूझल जाइत छल। एरिस्टोफिनीस नीक आ अधला ऐ दू तरहक कविता देखै छथि तँ थियोफ्रेस्टस कठोर, उत्कृष्ट आ भव्य ऐ तीन तरहेँ कविताकेँ देखै छथि। कविता आ संगीत अभिन्न अछि। मुदा यूरोपक सिम्फोनी जइमे ढेर रास वादन एके संगे विभिन्न लयमे होइत अछि, सिद्धांतमे अन्तर अनलक। यएह सभ किछु नाटकक स्टेज लेल सेहो लागू भेल। नाटकमे भावनापूर्ण सम्वाद आ क्रियाकलापक योग रहत। जीवन झा मैथिली नाट्य साहित्यमे हुनका द्वारा आनल नूतन कथ्य-शिल्प लेल मोन राखल जाइत छथि, संस्कृत आ पारसी तत्वक सम्मिश्रण नीक जकाँ जीवन झा केने छथि। उत्तर आधुनिकता: ई तार्किकता आ आधुनिकताक वस्तुनिष्टताकेँ ठाम-ठाम नकारैत अछि, विज्ञानक ज्ञानक सम्पूर्णतापर टीका अछि ई, जे देखि रहल छी से सत्य नै सपनो भऽ सकैत अछि, सत्य-असत्य, सभ अपन-अपन दृष्टिकोणसँ तकर वर्णन करैत छथि। ई आत्म-केन्द्रित हास्यपूर्ण होइत अछि आ नीक-खराबक भावना रहि-रहि खतम होइत रहैत अछि। लोक मुखौटामे रहि जीबि रहल छथि, कोनो घटनाक सम्पूर्ण अर्थ नै लागि पबैत अछि, सत्य कखन असत्य भऽ जाएत तकर कोनो ठेकान नै, उत्तर आधुनिकताक सतही चिन्तन आ तेहन चरित्र सभक भरमार लागल रहैए उत्तर आधुनिक नाटकमे जतए आशावादिता तँ नहिए अछि मुदा निराशावादिता सेहो नै अछि। जे अछि तँ से अछि बतहपनी, कोनो चीज एक तरहेँ नै कएक तरहेँ सोचल जा सकैत अछि- ई दृष्टिकोण एतए विद्यमान अछि। कारण, नियन्त्रण आ योजनाक उत्तर परिणामपर विश्वास नै वरन संयोगक उत्तर परिणामपर बेशी विश्वास दर्शाओल गेल अछि। गणतांत्रिक आ नारीवादी दृष्टिकोण आ लाल झंडा आदिक विचारधाराक संगे प्रतीकक रूपमे हास-परिहास सोझाँ अबैत अछि। दर्शक कथानकक मध्य उठाओल विभिन्न समस्यासँ अपनाकेँ परिचित पबैत छथि। जे द्वन्द ऐ तरहक नाटक मे रहैए जीवनमे तइ तरहक द्वन्दक नित्य सामना लोक करैत छथि। भरतक नाट्यशास्त्र: १९५६ ई. संगीत-नाटक अकादेमी द्वारा प्रथम राष्ट्रीय नाट्य उत्सव- कालिदासक अभिज्ञान शाकुन्तलम् (संस्कृत) सँ उत्सवक प्रारम्भ (गोवा ब्राह्मण सभा द्वारा) भेल, नाटकक कालखण्डक अनुरूप मंच आ पहिराबाक अध्ययन हेबाक चाही। पारसी नाटकक किछु प्रसिद्ध नाटक जेना इन्दर सभा, आलम आरा आ खोन्ने नहाक (सेक्सपियरक हेमलेट आधारित) सिनेमा बनि सेहो प्रस्तुत भेल। नाटक दू प्रकारक लोकधर्मी आ नाट्यधर्मी, लोकधर्मी भेल ग्राम्य आ नाट्यधर्मी भेल शास्त्रीय उक्ति। नाट्यधर्मक आधार अछि लोकधर्म। लोकधर्मीकेँ परिष्कृत करू आ ओ नाट्यधर्मी भऽ जाएत। लोकधर्मीक दू प्रकार- चित्तवृत्यर्पिका (आन्तरिक सुख-दुख) आ बाह्यवस्त्वनुकारिणी (बाह्य- पोखरि, कमलदह)। नाट्यधर्मी-सेहो दू प्रकारक कैशिकी शोभा (अंगक प्रदर्शन- विलासिता गीत-नृत्य-संगीत) आ अंशोपजीवनी (पुष्पक विमान, पहाड़ बोन आदिक सांकेतिक प्रदर्शन)। सम्पूर्ण अभिनय- आंगिक (अंगसँ), वाचिक(वाणीसँ), सात्विक(मोनक भावसँ) आ आहार्य (दृश्य आदिक कल्पना साज-सज्जा आधारित)। आंगिक अभिनय- शरीर, मुख आ चेष्टासँ; वाचिक अभिनय- देव, भूपाल, अनार्य आ जन्तु-चिड़ैक भाषामे; सात्विक- स्तम्भ (हर्ष, भय, शोक), स्वेद (स्तम्भक भाव दबबैले माथ नोचऽ लागब आदि), रोमांच (सात्विकक कारण देह भुकुटनाइ आदि), स्वरभंग (वाणीक भारी भेनाइ, आँखिमे नोर एनाइ), वेपथु (देह थरथरेनाइ आदि), वैवर्ण्य (मुँह पीअर पड़नाइ), अश्रु (नोर ढब-ढब खसनाइ, बेर-बेर आदि), प्रलय (शवासन आदि द्वारा); आ आहार्य- पुस्त (हाथी, बाघ, पहाड़ आदिक मंचपर स्थापन), अलंकार (वस्त्र-अलंकरण), अंग-रचना (रंग, मोंछ, वेश आ केश), संजीव (बिना पएर-साँप, दू पएर-मनुक्ख आ चिड़ै आ चारि पएरबला-जन्तु जीव-जन्तुक प्रस्तुति) द्वारा होइत अछि। दूटा आर अभिनय प्रकार- सामान्य (नाट्यशास्त्र २२म अध्याय) आ चित्राभिनय (नाट्यशास्त्र २२म अध्याय): चतुर्विध अभिनयक बाद सामान्य अभिनयक वर्णन, ई आंगिक, वाचिक आ सात्विक अभिनयक समन्वित रूप अछि आ ऐ मे सात्विक अभिनयक प्रधानता रहैत अछि। चित्राभिनय आंगिकसँ सम्बद्ध- अंगक माध्यसँ चित्र बना कऽ पहाड़, पोखरि चिड़ै आदिक अभिनय विधान। नाट्य-मंचन आ अभिनय: कालिदासक अभिज्ञान शाकुन्तलम् नाट्य निर्देशकक लेल पठनीय नाटक अछि। रंगमंच निर्देश, जेना, रथ वेगं निरूप्य, सूत पश्यैनं व्यापाद्यमानं, इति शरसंधानम् नाटयति, वृक्ष सेचनम् रुपयति, कलशम् अवरजायति, मुखमस्याः समुन्नमयितुमिच्छति, शकुन्तला परिहरति नाट्येन, नाट्येन प्रसाधयतः, कहि कऽ वास्तविकतामे नै वरन् अभिनयसँ ई कएल जाइत अछि। नाट्येन प्रसाधयतः, एतए अनसूया आ प्रियम्वदा मुद्रासँ अपन सखी शकुन्तलाक प्रसाधन करै छथि कारण से चाहे तँ उपलब्ध नै अछि, चाहे तँ ओतेक पलखति नै अछि। तहिना वृक्ष सेचनम् रुपयति सँ गाछमे पानि पटेबाक अभिनय, कलशम् अवरजायति सँ कलश खाली करबाक काल्पनिक निर्देश, रथ वेगं निरूप्य सँ तेज गतिसँ रथमे यात्राक अभिनय, इति शरसंधानम् नाटयति सँ तीरकेँ धनुषपर चढ़ेबाक निर्णय, सूत पश्यैनं व्यापाद्यमानं सँ हरिणकेँ मारि खसेबाक दृश्य देखबाक निर्देश, मुखमस्याः समुन्नमयितुमिच्छति सँ दुश्यन्तक शकुन्तलाक मुँहकेँ उठेबाक इच्छा, शकुन्तला परिहरति नाट्येन सँ शकुन्तला द्वारा दुश्यन्तक ऐ प्रयासकेँ रोकबाक अभिनयक निर्देश होइत अछि। भरतक रंगमंच: ऐ मे होइत अछि- पाछाँक पर्दा, नेपथ्य (मेकप रूम बुझू), आगमन आ निर्गमनक दरबज्जा, विशेष पर्दा जे आगमन आ निर्गमन स्थलकेँ झाँपैत अछि, वेदिका- रंगमंचक बीचमे वादन-दल लेल बनाओल जाइत अछि, रंगशीर्ष- पाछाँक रंगमंच स्थल; मत्तवर्णी- आगाँ दिस दुनू कोणपर अभिनय लेल होइत अछि आ रंगपीठ अछि सोझाँक मुख्य अभिनय स्थल। अभिनय मूल्यांकन माने नाट्य समीक्षा: अध्याय २७ मे भरत सफलताकेँ लक्ष्य बतबै छथि, मंचन सफलतासँ पूर्ण हुअए। दर्शक कहैए, हँ, बाह, कतेक दुखद अन्त, तँ तेहने दर्शक भेलाह सहृदय, भरतक शब्दमे, से ओ नाटककार आ ओकर पात्रक संग एक भऽ जाइत छथि। नाट्य प्रतियोगिता होइत छल आ ओतए निर्णायक लोकनि पुरस्कार सेहो दै छलाह। भरत निर्णायक लोकनि द्वारा धनात्मक आ ऋणात्मक अंक देबाक मानदण्डक निर्धारण करैत कहै छथि जे- १.ध्यानमे कमी, २.दोसर पात्रक सम्वाद बाजब, ३.पात्रक अनुरूप व्यक्तित्व नै हएब, ४.स्मरणमे कमी, ५.पात्रक अभिनयसँ हटि कऽ दोसर रूप धऽ लेब, ६.कोनो वस्तु, पदार्थ खसि पड़ब, ७.बजबा काल लटपटाएब, ८.व्याकरण वा आन दोष, ९.निष्पादनमे कमी, १०.संगीतमे दोष, ११.वाक् मे दोष, १२.दूरदर्शितामे कमी, १३.सामिग्रीमे कमी, १४.मेकप मे कमी, १५. नाटककार वा निर्देशक द्वारा कोनो दोसर नाटकक अंश घोसियाएब, १६.नाटकक भाषा सरल आ साफ नै हएब, ई सभ अभिनय आ मंचनक दोष भेल। निर्णायक सभ क्षेत्रसँ होथि, निरपेक्ष होथि। नाटकक सम्पूर्ण प्रभाव, तारतम्य, विभिन्न गुणक अनुपात, आ भावनात्मक निरूपण ध्यानमे राखल जाए। स्टेजक मैनेजर- सूत्रधार- आ ओकर सहायक –परिपार्श्वक- नाटकक सभ क्षेत्रक ज्ञाता होथि। मुख्य अभिनेत्री संगीत आ नाटकमे निपुण होथि, मुख्य अभिनेता- नायक- अपन क्षमतासँ नाटककेँ सफल बनबै छथि। अभिनेता- नट- क चयन एना करू, जँ छोट कदकाठीक छथि तँ वाणवीर लेल, पातर-दुब्बर होथि तँ नोकर, बकथोथीमे माहिर होथि तँ बिपटा, ऐ तरहेँ पात्रक अभिनेताक निर्धारण करू। संगीत-दलक मुखिया- तौरिक- केँ संगीतक सभ पक्षक ज्ञान हेबाक चाही जइसँ ओ बाजा बजेनिहार- कुशीलव- केँ निर्देशित कऽ सकथि। मैथिली नाटक: बड्ड रास भाषण मैथिली आ आन नाटकक प्राचीनसँ आधुनिक काल धरि रहल तारतम्यक विषयमे देल गेल अछि। मुदा सत्य यएह अछि जे भारत वा नेपालक कोनो कोनमे रंगमंच आ रूपकक निर्देश भरतक नाट्यशास्त्रक अनुरूपेँ उपलब्ध नै अछि, ओकर पुनः स्थापन भरिगर काज तँ अछिये, मुदा समानान्तर रंगमंच एकर प्रयास केलक अछि। बिनु ज्ञानक कालिदासक नाटकक लघुरूप भयंकर विवाद उत्पन्न करैत अछि। लोक नाट्यक नाट्यशास्त्रक अनुरूप निरूपण कऽ उपरूपकक मंचनक सम्भावना मैथिलीमे अछि। बेचन ठाकुर जीक निर्देशनमे विदेह नाट्य उत्सव २०१२ ऐ दिशामे एकटा प्रयास छल। मैथिली नाटक आ रंगमंच लेल एकटा समीक्षाशास्त्र: गद्यमे कथा होइत अछि आ विस्तारक अनुसार ई लघुकथा, कथा आ उपन्यासमे विभक्त कएल जाइत अछि तइ सन्दर्भमे उपन्यास (वा बीच-बीचमे नाटक) क पद्य रूपान्तरण महाकाव्य कहल जाएत। जँ ऋगवैदिक परम्परामे जाइ तँ महाकाव्यकेँ गीत-प्रबन्ध कहल जएबाक चाही। लक्ष्मण-परशुराम सम्वाद हुअए वा मंथरा आ कैकेयीक सम्वाद आकि रावण आ अंगदक सम्वाद, सभ ठाम नाटकक सम्वाद शैली सन रोचक पद्य अहाँकेँ भेटत। कथा-गल्प, आख्यान आ उपन्यास आ किछु दूर धरि नाटक आ एकांकी मनोरंजनक लेल सुनल-सुनाओल-पढ़ल जाइत अछि वा मंचित कएल जाइत अछि। ई उद्देश्यपूर्ण भऽ सकैत अछि वा ऐमे निरुद्देश्यता-एबसर्डिटी सेहो रहि सकै छै- कारण जिनगीक भागादौड़ीमे निरुद्देश्यपूर्ण साहित्य सेहो मनोरंजन प्रदान करैत अछि। वन-एक्ट प्ले भेल एकांकी आ प्ले भेल नाटक। कथोपकथनक गुंजाइश कम राखि वा कोनो उपस्थापनासँ पहिने राखि लघुकथा आ कथाकेँ सशक्त बनाओल जा सकैत अछि, अन्यथा ओ एकांकी वा नाटक बनि जाएत। भरत:- नाटकक प्रभावसँ रस उत्पत्ति होइत अछि। नाटक कथी लेल? नाटक रसक अभिनय लेल आ संगे रसक उत्पत्ति लेल सेहो। रस कोना बहराइए? रस बहराइए कारण (विभाव), परिणाम (अनुभाव) आ संग लागल आन वस्तु (व्यभिचारी)सँ। स्थायीभाव गाढ़ भऽ सीझि कऽ रस बनैए, जकर स्वाद हम लऽ सकै छी। सर्जनात्मक साहित्यमे नाटक सभसँ कठिन अछि, फेर कविता अछि आ तखन कथा, जँ अनुवादकक दृष्टिकोणसँ देखी तखन। नाटकमे नाटकक पृष्ठभूमि आ परोक्ष निहितार्थकेँ चिन्हित करए पड़त संगहि पात्र सभक मनोविज्ञान बूझए पड़त। कालिदासक संस्कृत नाटकमे संस्कृतक अतिरिक्त अपभ्रंशक प्रयोग गएर अभिजात्य वर्गक लेल प्रयुक्त भेल तँ चर्यापदक भाषा सेहो मागधी मिश्रित अपभ्रंश छल। आइ आवश्यकता अछि जे मैथिली नाटक आ रंगमंचमे जातिवादी शब्दावली ककरो अपमानित करबा लेल प्रयोग नै कएल जाए। पुरान लोककथा वा आख्यान नव सन्दर्भमे उपयुक्त तखने भऽ सकैए जखन नाटककारमे सामर्थ्य हुअए। नाटक आ रंगमंच जातिभेदकेँ दूर करबाक आ सामंजस्य उत्पन्न करबाक हथियार भऽ सकैए मुदा यावत लोक ओकरा देखत नै तावत कोना ई हएत? ऐ लेल नाटककार आ रंगमंच निर्देशकमे प्रतिभा हेबाक चाही जइसँ ओ गूढ़ विषयकेँ सोझरा कऽ राखि सकथि। मात्र विषय वा मात्र मनोरंजन श्रेष्ठताक आधार नै बनि सकत। जातिवादी रंगमंच मनोरंजनक नामपर जे खेल खेलाएल तकर परिणाम मैथिलीकेँ भेटि चुकल छै। समस्या, समाधान, मनोरंजन आ शिल्पमे सामंजस्य बनाबए पड़त। आधुनिक मैथिली नाटक: मैथिली नाट्य संस्था आ नाट्य निर्देशक धूर्त्तसमागम: तेरहम शताब्दीमे ज्योतिरीश्वर ठाकुर द्वारा रचल गेल जे संस्कृत आ मैथिलीमे उपलब्ध अछि। ज्योतिरीश्वर ठाकुरक संस्कृत धूर्त्तसमागममे सेहो मैथिली गीतक समावेश अछि। ई प्रहसनक कोटिमे अबैत अछि। मैथिलीक अधिकांश नाटक-नाटिका श्रीकृष्णक अथवा हुनकर वंशधरक चरितपर अवलंबित आ हरण आकि स्वयंवर कथापर आधारित छल। मुदा धूर्त्तसमागममे साधु आ हुनकर शिष्य मुख्य पात्र अछि। धूर्त्तसमागमक सभ पात्र एकसँ-एक धूर्त छथि। तइ हेतु एकर नाम धूर्त्तसमागम सर्वथा उपयुक्त अछि। प्रहसनकेँ संगीतक सेहो कहल जाइए तइ हेतु ऐमे मैथिली गीतक समावेश सर्वथा समीचीन अछि। ऐमे सूत्रधार, नटी, स्नातक, विश्वनगर, मृतांगार, सुरतप्रिया, अनंगसेना, अस्ज्जाति मिश्र, बंधुवंचक, मूलनाशक आ नागरिक मुख्य पात्र छथि। सूत्रधार कर्णाट चूड़ामणि नरसिंहदेवक प्रशस्ति करैत अछि। फेर ज्योतिरीश्वरक प्रशस्ति होइत अछि। ऐमे एक प्रकारक एब्सर्डिटी अछि जे नितांत आधुनिक अछि आ ऐमे जे लोच छै से एकरा लोकनाट्य बनबै छै। विश्वनगर स्त्रीक अभावमे ब्रह्मचारी छथि। शिष्य स्नातक संग भिक्षाक हेतु मृतांगार ठाकुरक घर जाइत छथि तँ अशौचक बहाना भेटै छन्हि। विश्वनगर शिष्य स्नातक संग भिक्षाक हेतु सुरतप्रियाक घर जाइत छथि। फेर अनंगसेना नामक वैश्याकेँ लऽ गुरु-शिष्यमे मारि बजरि जाइ छन्हि। गुरु-शिष्य अनंगसेनाक संग असज्जाति मिश्र लग जाइ छथि, मिश्रजी लंपट छथि जे जुआ खेलाएब आ संगम ईएह दूटाकेँ संसारक सार बुझै छथि। असज्जाति मिश्र पुछै छथि जे के वादी आ के प्रतिवादी? स्नातक उत्तर दै छथि- अभियोग कहबाक लेल हम वादी थिकौं आ शुल्क देबाक हेतु संन्यासी प्रतिवादी थिकाह। विश्वनगर अपन शुल्कमे स्नातकक गाजाक पोटरी प्रस्तुत करै छथि। विदूषक असज्जाति मिश्रक कानमे अनंगसेनाक यौनक प्रशंसा करैत अछि। असज्जाति मिश्र अनंगसेनाकेँ बीचमे राखि दुनूक बदला अपना पक्षमे निर्णय लैत अछि। एम्हर विदूषक अनंगसेनाक कानमे कहैत अछि- ई संन्यासी दरिद्र अछि, स्नातक आवारा अछि आ ई मिश्र मूर्ख तेँ हमरा संग रहू। अनंगसेना चारूक दिशि देखि बजैछ- ई तँ असले धूर्तसमागम भऽ गेल। विश्वनगर स्नातकक संग पुनः सुरतप्रियाक घर दिशि जाइ छथि। एमहर मूलनाशक नौआ अनंगसेनासँ साल भरिक कमैनी मंगैए। ओ हुनका असज्जाति मिश्रक लग पठबैत अछि। मूलनाशक असज्जाति मिश्रकेँ अनंसेनाक वर बुझैत अछि। गाजा शुल्कमे लऽ असज्जाति मिश्रकेँ गतानि कऽ बान्हि तेना मालिश करैत अछि जे ओ बेहोश भऽ जाइत छथि। ओ हुनका मुइल बुझि कऽ भागि जाइत अछि। विदूषक अबैत अछि आ हुनकर बंधन खोलैत अछि आ पुछैत अछि जे हम अहाँक प्राणरक्षा कएल अछि आ जे किछु आन प्रिय कार्य हुअए तँ से कहू। असज्जाति कहैए- जे छलसँ संपूर्ण देशकेँ खएलौं, धूर्त्तवृत्तिसँ ई प्रिया पाओल, सेहो अहाँ सन आज्ञाकारी शिष्य पओलक, ऐसँ प्रिय आब किछु नै अछि, तथापि सर्वत्र सुखशांति हुअए तकर कामना करैत छी। विद्यापति ठाकुरक गोरक्षविजय नाटक- ऐसँ पहिने -धूर्तसमागमकेँ छोड़ि- कृष्णपर आधारित नाटकक प्रचलन छल। ऐ अर्थमे ई सेहो एकटा क्रांतिकरी नाटक कहल जाएत। नाथ संप्रदाय किंवा गोरक्ष संप्रदायक प्रवर्त्तक योगी गोरक्षनाथक कथा लऽ ऐ नाटकक कथावस्तु संगठित भेल अछि। गोरक्षनाथक गुरु मत्स्येन्द्रनाथ योग त्यागि कदलिपुरमे राजा बनि १८ टा रानीक संग भोग कऽ रहल छथि। गोरक्ष आ काननीपादकेँ द्वारपाल रोकि दैत अछि। मंत्री ढोलहो पिटबा दैत अछि जे योगी सभक प्रवेश कतौ नै हुअए आ रानी सभकेँ राजाक मोन मोहने रहबाक हेतु कहल जाइत अछि। गोरक्ष आ काननपाद नटुआक वेष धरैत छथि आ मोहक नृत्य राजाकेँ देखबैत छथि। ऐ बीच राजाक एकमात्र पुत्र बौधनाथ खेलाइत-खेलाइत मरि जाइत अछि। राजाक शंका नट पर जाइ छै आ ओकरा मारबाक आदेश होइ छै। नट बच्चाकेँ जिआ दैत अछि। राजा हुनकर परिचय पुछैत छथि तखन ओ हुनका अपन पूर्व जन्मक सभटा गप बता दै छन्हि, जे अहाँ तँ जोगी छी भोगी नै। ऐ नाटकक पात्रमे महामति(राजाक मंत्री) आ महादेवी-मत्स्येन्द्रनाथक ज्येष्ठ रानी सेहो छथि। मत्स्येन्द्रनाथ कदलीपुरक राजा आ पूर्व जन्मक योगी छथि। मत्स्येन्द्रनाथ अंतमे कहैत छथि जे गोरक्ष जेहन शिष्य हुअए आ महादेवी जेहन सभ नारी होथु। जीवन झा जीवन झा लिखित नाटक सुन्दर संयोग, (1904), मैथिली सट्टक (1906), नर्मदा सागर सट्टक (1906) आ सामवती पुनर्जन्म (1908), ऐ चारू नाटकक सामवेद विद्यालय काशीमे कएक बेर मंचन १९२० ई.सँ पहिनहिये भऽ चुकल अछि, "सुन्दर संयोग" एतैसँ प्रकाशित सेहो भेल। सुन्दर संयोगक किछु आर मंचन: १९७४ ई. माली मोड़तर (हसनपुर चीनीमिलक बगलमे), लक्ष्मीनारायण उच्च विद्यालय परिसरमे- निर्देशक श्री कालीकान्त झा "बूच", मुख्य अतिथि श्री फजलुर रहमान हासमी। दुर्गापूजामे। आयोजक देवनन्दन पाठक चीफ इन्जीनियर, आ केशनन्दन पाठक (ऑडीटर टीका बाबू), उद्घाटन: उदित राय मुखिया। १९७६: करियन, समस्तीपुर। निर्देशक: कामदेव पाठक। १९८१: पण्डित टोल, टभका (दलसिंहसरायक बगलमे): संयोजक डॉ उमेन्द्र झा "विमल", पूर्व प्रो. भाइस चान्सलर, का.सि. संस्कृत वि.वि. आ म.म. चित्रधर मिश्र जे दरभंगा किलाक भीतरक शंकर मन्दिरक अधिष्ठाता रहथि आ म.म. उमेश मिश्र आ म.म. गंगानाथ झा हिनकर शिष्य रहथिन्ह। १९८३:मउ बाजितपुर (विद्यापति नगरक बगलमे)। संस्कृत परम्परा आ पारसी थियेटरक गुणसँ ओतप्रोत जीवन झाक ऐ नाटक सभक अन्यान्यो ठाम मंचन भेल अछि। जातिवादी रंगमंचक ई दुष्प्रचार अछि, ऐ नाटकक पहिल मंचन मलंगिया जीक संस्था करत, जखनकि हुनकर जन्मसँ पहिने कएक बेर ऐ नाटक सभक मंचन भऽ चुकल छै। मलंगिया जीक संस्थाक पुनर्लेखन "सुन्दर संयोग" नाटक केँ सेहो जातिवादी तँ नै बना देतै, मलंगिया जीक इजाद कएल तथाकथित राड़बला मैथिली आ ब्राह्मणबला सामन्तवादी मैथिली आ दोसर "खदेरन की मदर" वा "बुझता है कि नहीं" बला भ्रष्ट हिन्दीक संगम कए कऽ, ई शंका व्यक्त कएल जा रहल अछि। मलंगिया जीक जातिवादी रंगमंचक सरकारी फण्ड लै लेल पहिल मंचनक ई झूठ पसारल जा रहल अछि। ईशनाथ झा उगना: ई नाटक सभ महाशिवरात्रिकेँ गौरीशंकर स्थान, जमथुरिमे खेलाएल जाइत अछि। विद्यापति शिव-भक्त, हुनकर गीत-नचारी सुनबा लेल महादेव विद्यापतिक घरमे उगना नोकर बनि आबि गेला। एक बेर विद्यापति यात्रापर छला आ उगना संगमे छलन्हि। रस्तामे पियास लगलापर उगना जटाक गंगधारसँ पानि निकालि विद्यापतिकेँ पियेलन्हि मुदा विद्यापतिकेँ ओइमे गंगाजलक स्वाद भेटलन्हि आ ओ उगनाक केश भीजल देखि सभटा बुझि गेलाह। उगना अपन असल रूपमे एलाह। मुदा उगना कहलखिन्ह जे विद्यापति ई गप ककरो नै कहताह नै तँ ओ अन्तर्धान भऽ जेताह। पार्वती चालि चललन्हि, विद्यापतिक पत्नी उगनाकेँ बेलपत्र अनबा लेल पठेलन्हि आ देरी भेलापर ओ उगनापर बाढनि उसाहलन्हि, विद्यापति भेद खोलि देलन्हि आ उगना बिला गेलाह। चीनीक लड्डू: सुधाकांत-प्रेमकांतक पिता गुजरि जाइ छथि आ से देखभाल मामा धर्मानन्द ट्रस्टी जकाँ करै छथि आ हुनकर सभक समर्थ भेलाक बाद सुधाकांतकेँ भार दऽ घुरि जाइ छथि। सुधाकांतक मुंशी बटुआ दास प्रेमकांतक पत्नी चण्डिका आ खबासनी छुलहीक सहयोगसँ बखरा करबा दै छथि, सुधाकान्त अपनो हिस्सा प्रेमकान्तकेँ दऽ दै छथि। सुधाकांत, पत्नी सुशीला आ बेटा सुकमार घरसँ बाहर कऽ देल जाइ छथि। सुधाकांतकेँ टी.बी. रोग मारि दै छन्हि। बटुआ दासक संगति प्रेमकांतकेँ सेहो दरिद्र कऽ दैत अछि। माम धर्मानन्द सुकमारकेँ अपन सम्पति लिखि दै छथि कारण हुनका सन्तान नै छन्हि। प्रेमकांत आ बटुआ दास सुकुमारकेँ मारबाक प्रयत्नमे बिख मिला कऽ चीनीक लड्डू सनेसमे सुकमारकेँ दै छथि मुदा ओइसँ बटुआ दास मरि जाइए, आ भेद खुजैए। उदय नारायण सिंह नचिकेता नायकक नाम जीवन : नवल नव विचारक अछि, शक्तिराय धनिक, कलुषित अछि आ अपन सहयोगी विनयपर चोरिक आरोप लगा ओकर बेटीक अपहरण आ बलात्कार करबैए। विनय आत्महत्या कऽ लैए। नवल आ ओकर मित्र प्रकाश आ दीपक सभटा भेद खोलैए। ओकर प्रेमिका बलात्कारक परिणामस्वरूप आत्महत्या करैए। नवल विक्षिप्त भऽ जाइए। एक छल राजा: एकटा राजा अभिमान कुमार देवक दिन मदिरा आ वैश्याक पाछाँ खराप भेलै। ओकरा एक्केटा बेटी मोहिनी छै, टकाक अभावमे ओकर बिआह नै भऽ पाबि रहल छै। मुंशी विरंची, सेवक चतुरलाल आ धर्मकर्मवाली पत्नी संगे नाटक आगाँ बढ़ैए। मोहिनी आ शिक्षक शुभंकरक बीच प्रेम होइ छै। नो एण्ट्री: मा प्रविश: पोस्टमोडर्न ड्रामा, जकर एबसर्डिटी एकरा ज्योतिरीश्वरक धूर्त समागम लग घुरबैए। स्वर्ग आकि नर्कक द्वारपर मुइल सभ अबै छथि आ खिस्सा-खेरहा सुनबै छथि, बादमे पता चलैए जे चित्रगुप्त/ धर्मराज सभ नकली छथि आ द्वारपर लागल अछि ताला, नो एण्ट्री। गोविन्द झा बसात: कृष्णकांत पिता द्वारा ठीक कएल युवती पुष्पा संग विवाह नै करै छथि, ओ शिक्षितसँ विवाह करऽ चाहै छथि, लिलीसँ प्रेम करै छथि। हुनकर पिता घर त्यागि दै छथि। पुष्पा घर छोड़ि महिला जागरणमे लागि गेलथि। पिताकेँ ताकैमे कृष्णकान्त असफल होइ छथि, लिलीकेँ छोड़ि रेलगाड़ीसँ कटऽ चाहै छथि, आश्रमक लोक हुनका बचा लै छन्हि, ओतए पिता, पुष्पा सभसँ भेँट होइ छन्हि, लिली सेहो बताहि भेलि ओतऽ आबि जाइ छथि। सुधांशु शेखर चौधरी भफाइत चाहक जिनगी: महेश बेरोजगार अछि, ओ चाह दोकान खोलैए ओ कवि सेहो अछि। इंजीनियर उमानाथक पत्नी चन्द्रमा दोकानपर देखलन्हि जे पुकार भेलापर महेश कविता पाठ लेल जाइए, चन्द्रमा चाह बेचऽ लगै छथि, उमानाथ तमसा जाइ छथि। महेशक संगी सरिता, जे आइ.ए.एस.क पत्नी छथि, आबै छथि। लेटाइत आँचर: दीनानाथक एकेटा पुत्री ममताकेँ पति काटरक कारणसँ छोड़ि दै छन्हि। मुदा पुत्र मोदनाथक विवाहमे दहेज लेबाक प्रयत्नपर पुत्र हुनका रोकै छन्हि। ५ शिशु, बाल आ किशोर साहित्य आ ओकर समीक्षाशास्त्र बाल साहित्यमे मोटा मोटी एक बर्खसँ कम उमेरक बच्चासँ लऽ कऽ अट्ठारह बर्खक किशोर धरिक उपयोगक साहित्य सम्मिलित अछि। मानसिक रूपसँ आस्ते-आस्ते सीखएबला बच्चा लेल ई वर्गीकरण कने दोसर तरहेँ हएत, जेना जे सामान्य छह बर्खक बच्चा लेल बाल साहित्य मानल जाइए से हुनका लोकनि लेल दस बर्खक आयुमे प्रयुक्त भऽ सकैए। सरस्वती नदी, जल-प्रलय, मनु आ महामत्स्यक कथा, गिल्गमेश कथा काव्य, प्राणवंतक देश गिल्गमेशक खोज, सृष्टिकथा आ देवतंत्रक विकास ई सभ ऋगवेद आ अवेस्ता आदिक सन्दर्भमे प्रारम्भिक बाल साहित्य मानल जा सकैए। अरा-युक्त रथक वर्णन वेदमे भेटैत अछि। नहिये तँ ई पश्चिम एशियामे छल आ नहिये यूरोपमे। भारतीय देवनाम, शिल्प, कथा, अश्वविद्या, संगीत, भाषिक तत्व आ चिंतनक संग ई उद्घाटित होमए लागल पश्चिम एशिया, मिश्र आ यूनानमे। दोसर सहस्राब्दी ई.पूर्व अरायुक्त्त रथ, भारतीय देवनाम, भारतक धार, ऋगवैदिक तत्वचिंतन, अश्वविद्या, शिल्प-तकनीकी आ पुरातन् कथा भारतसँ पच्छिम एशिया, क्रीट-यूनान दिशि जाए लागल। कालक्रमसँ मिश्र, सुमेर-बेबीलोन आदि सभ्यता आ मित्तनी आ हित्ती सभ्यतासँ बहुत पहिनहिये ऋगवेदक अधिकांश मंडलक रचना भऽ गेल छल। वैदिक संस्कृतक प्राचीनतम ग्रन्थ ऋगवेदसँ पहिने सेहो भाषा अस्तित्वमे रहल हएत। कतेक मौखिक साहित्य जेना गाथा, नाराशंसी, दैवत कथा आ आख्यान सभ ओइ भाषामे रचल गेल हएत। एहने गाथा सभक गायकक लेल “गाथिन”, “गातुविद्” आ “गाथपति” ऋगवेदमे प्रयुक्त भेल। प्रख्यात कथा इतिहास पुराणसँ लेल जाइत अछि आ उत्पाद्य कल्पित होइत अछि। वैदिक आख्यान, जातक कथा, ऐशप फेबल्स, पंचतंत्र आ हितोपदेश आ संग-संग चलैत रहल लोकगाथा सभ। सभ ठाम अभिजात्य वर्गक कथाक संग लोकगाथा रहिते अछि। सलहेसक कथाक विवरण लिअ, क्षेत्रीय परिधि पार करिते सलहेस राजासँ चोर बनि जाइत छथि आ चोरसँ राजा। तहिना चूहड़मल क्षेत्रीय परिधि पार करिते जतए सलहेस राजा बनैत छथि ओतए चोर बनि जाइत छथि, आ जतए सलहेस चोर कहल जाइत छथि ओतुक्का राजा/ शक्तिशालीक रूपेँ जानल जाइत छथि। कथा-गाथा सँ बढ़ि आगू जाइ तँ आधुनिक कथा-गल्पक इतिहास उन्नैसम शताब्दीक अन्तमे भेल। एकरा लघुकथा, कथा आ गल्पक रूप मानल गेल। रवीन्द्रनाथ ठाकुरसँ शुरु भेल ई यात्रा भारतक एक कोनसँ दोसर कोन धरि सुधारवाद रूपी आन्दोलनक परिणामस्वरूप आगाँ बढ़ल। जे हम वैदिक आख्यानक गप करी तँ ओ राष्ट्रक संग प्रेमकेँ सोझाँ अनैत अछि। आ समाजक संग मिलि कए रहनाइ सिखबैत अछि। जातक कथा लोक-भाषाक प्रसारक संग बौद्ध-धर्म प्रसारक इच्छा सेहो रखैत अछि, ऐमे जे चिड़ै आ मालजालक माध्यमसँ कथा कहल गेल अछि से पंचतंत्र आ हितोपदेशसँ बहुत पहिने बालसाहित्यक अवधारणा प्रस्तुत करैत अछि। जेना विष्णु शर्मा पंचतंत्रक कथा कहैत-कहैत स्त्री आ शूद्रक पाछाँ अकारण क्रूर भऽ जाइ छथि सएह हाल राम चरित मानसक अछि। ऐसप ग्रीसक दास रहथि आ अपन मालिकक बच्चाकेँ कथा सुनबैत रहथि जे ऐसप्स फेबल्स रूपमे जगतख्यात भेल, अंगूर नै भेटलापर लोमड़ी कहैए जे ई अंगूर बड्ड अम्मत हेतै, ई सभ खिस्सा अमर भऽ चुकल अछि। मुस्लिम जगतक कथा जेना रूमीक “मसनवी” फारसी साहित्यक विशिष्ट ग्रन्थ अछि जे ज्ञानक महत्व आ राज्यक उन्नतिक शिक्षा दैत अछि। कथा पढ़ि सभ प्रबुद्ध नै हेताह तँ स्वस्थ मनोरंजन तँ प्राप्त कऽ सकताह। आ जे एकोटा व्यक्ति कथा पढ़ि ओइ दिशामे सोचत तँ कथाक सार्थकता सिद्ध हएत। आ जकरा लेल रचित अछि ई कथा जँ ओ नै पढ़ताह तँ ओकर ओइ परिस्थितिमे हस्तक्षेप करबामे सक्षम व्यक्ति तँ पढ़ताह। आ जे समाज बदलत तँ सामाजिक मूल्य सनातन रहत? प्रगतिशील कथामे अनुभवक पुनर्निर्माण करब, परिवर्तनशील समाजक लेल, जइसँ प्राकृतिक आ सामाजिक यथार्थक बीच समायोजन हुअए। आकि ऐ परिवर्तनशील समएकेँ स्थायित्व देबा लेल परम्पराक स्थायी आ मूल तत्वपर आधारित कथाक आवश्यकता अछि? व्यक्ति-हित आ समाज-हितमे द्वैध अछि आ दुनू परस्पर विरोधी अछि। ऐमे संयोजन आवश्यक, विश्व दृष्टि आवश्यक। कथा मात्र विचारक उत्पत्ति नै अछि जे रोशनाइसँ कागचपर जेना-तेना उतारि देलिऐ। ई सामाजिक-ऐतिहासिक दशासँ निर्दिशित होइत अछि। तँ कथा अनुभवकेँ पुनर्रचित कऽ गढ़ल जएत आ व्यक्तिगत चेतना तखने सामाजिक आ सामूहिक चेतना बनि आओत। शोषककेँ अपन प्रवृत्तिपर अंकुश लगबए पड़तन्हि तँ शोषितकेँ एकर विरोध मुखर रूपमे करए पड़तन्हि। कथा क्रमबद्ध हुअए आ सुग्राह्य हुअए तखने ई उद्देश्य प्राप्त करत, बुद्धिपरक नै व्यवहारपरक बनत। वैदिक साहित्यक आख्यानक उदारता संवादकेँ जन्म दैत छल जे पौराणिक साहित्यक रुढ़िवादिता खतम कऽ देलक। ई सूर्य अरब-खरब आन सूर्यमेसँ एकटा मध्यम कोटिक तरेगण- मेडिओकर स्टार- अछि। ओइ मेडिओकर स्टारक एकटा ग्रह पृथ्वी आ ओकर एकटा नगर-गाममे रहनिहार हम सभ अपन माथपर हाथ राखि चिन्तित छी जे हमर समस्यासँ पैघ ककर समस्या? हमर कथाक समक्ष ई वैज्ञानिक आ दार्शनिक तथ्य चुनौतीक रूपमे आएल अछि। संवादक पुनर्स्थापना लेल कथाकारमे विश्वास होएबाक चाही- तर्क-परक विश्वास आ अनुभवपरक विश्वास। आत्मप्रशंसा आ परस्पर प्रशंसाक परम्परा जइमे दोसराक निन्दा सेहो सम्मिलित अछि, उत्कृष्ट बाल साहित्यक निर्माणमे बाधक अछि। सरकारपर आलम्बन, प्राथमिकताक अज्ञान- जकर कारणसँ महान बनबा/ बनेबा लेल लेखक-समीक्षक जान अरोपने छथि, आ ओइ स्थितिमे जखन भाषा मरि रहल अछि। कार्ययोजनाक स्पष्ट अभाव अछि आ जेना-तेना किछु मैथिली लेल कऽ देबा लेल सभ व्यग्र छथि, कऽ रहल छथि। स्वयं मैथिली नै बाजि बाल-बच्चाकेँ मैथिलीसँ दूर रखबाक अभियान चलल अछि आ ऐमे मीडिया, कार्टून चैनल आ शिक्षा-प्रणालीक संग एक्के खाढ़ीमे भेल अत्यधिक प्रवास अपन योगदान देलक अछि। मैथिलीक कार्यकर्ता लोकनिक कएक ध्रुवमे बँटल रहबाक कारण समर्थनपरक लॉबिइंग कर्ताक अभाव अछि। क बदला अपन/ अप्पन लोकक की लाभ, ऐ लेल लोक बेशी चिन्तित छथि। मैथिली छात्रक संख्याक अभावक कारण उत्पाद उत्तम रहला उत्तर सेहो विक्रय कौशलक अभाव बढ़ि जाइए। मैथिलीमे उत्तम उत्पादक अभाव तँ अछिए, विक्रयकौशलक सेहो अभाव अछि। मैथिलीक सन्दर्भमे बाल साहित्य आ ओकर समीक्षाशास्त्र बाल साहित्य लेखकसँ अनुरोध जे ङ आ ञ क प्रयोग करथि जइसँ बच्चाकेँ सुविधा हएत। नै बाल साहित्यमे लिखल जा सकैए। भाङ लिखल जएबाक चाही, भांग नै। फेर छनि, कहलनि केँ बच्चा क्रमसँ छनी, कहलनी पढ़ैए, वर्कशापमे एहन देखल गेल; से छन्हि, कहलन्हि आदिक प्रयोग करू। मैथिली बाल साहित्यक लेखनमे संयुक्ताक्षर, आ ङ क प्रयोग भाषाक विशिष्टता काएम रखबामे सहायक हएत। तहिना सरल शब्द मुदा खाँटी मैथिली शब्द जेना अकादारुण आदिक प्रयोग करू। बाल साहित्यमे गद्य आ पद्य दुनू महत्वपूर्ण अछि जँ कही तँ पद्य कने बेसिये। गद्यमे कथामे विषयक समावेश जेना विज्ञान, समाज विज्ञान आदि देलासँ मनोरंजन आ शिक्षाक मध्य तालमेल भऽ सकत। मैथिलीमे बालकथा कएक राति धरि चलैत अछि तँ पैघ लोकक कथा मिनटमे सेहो खतम भऽ जाइत अछि। मैथिलीमे चित्र-शृंखला, चित्रकथा, विज्ञान, समाज विज्ञान, आध्यात्म, भौतिक, रसायन, जीव, स्वास्थ्य आदिक पोथीक अभाव अछि। संध्या विद्यालय आ चित्रकला-संगीतक माध्यमसँ शिक्षा नै देल जा रहल अछि। दूरस्थ शिक्षाक माध्यमसँ/ अन्तर्जालक माध्यमसँ मैथिलीक पढ़ाइक अत्यधिक आवश्यकता अछि। सङे मैथिली लेल सभक हृदएमे अग्नि छन्हि, से ओ परस्पर एक दोसराक विरोधी किए ने होथु। लोकक बीचमे ऐ भाषाक आरोह, अवरोह आ भाषिक वैशिष्ट्यकेँ लऽ कऽ आदर अछि आ ऐ मे मैथिली नै बजनिहार भाषाविद् सम्मिलित छथि। आध्यात्मिक आ सांस्कृतिक महत्वक कारण सेहो मैथिली महत्वपूर्ण अछि। ऐ भाषामे एकटा आन्तरिक शक्ति छै। बहुत रास संस्था, जइमे किछु जातिवादी आ सांप्रदायिक संस्था सेहो सम्मिलित अछि, एकर विकास लेल तत्पर अछि। ऐ भाषाक जननिहार भारत आ नेपाल दू देशमे तँ रहिते छथि आब आन-आन देश-प्रदेशमे सेहो पसरल छथि। शंकराचार्यक विषयमे कहल गेल जे ओ अपन कमंडलमे धार भरि लेलन्हि। भेल ई जे बाढ़िमे बीचेमे पहाड़ रहलाक कारण एक दिस बाढ़ि अबैत छल आ एक दिस दाही। बीचक गुफाकेँ शंकर अपन शिष्यक सहयोगसँ तोड़ि जखन कमण्डल लेने बहरओलाह तँ लोक देखलक जे दोसर कात पानि आबि रहल अछि। सभ शंकराचार्यक स्तुति कएलन्हि जे अहाँ अपन कमंडलमे धार आनि हमरा सभकेँ दाही सँ आ दोसर कातक लोककेँ बाढ़िसँ मुक्त्त कराओल। अहाँ कमण्डलमे पानि आ धार अनलौं! बादमे अवसरवादी लोकनि एकरा चमत्कारसँ जोड़ि देलक। आशा अछि जे मैथिली बाल साहित्य लेखक सेहो अपन लेखमे उगनाक कथाक तर्क आ श्रद्धासँ विवेचना करता। गोनू झाक गाम भरौड़ाक राजकुमार "बहुरा गोढ़िन नटुआ दयाल" लोककथाक मल्लाह कथानायक राजकुमार दुलरा दयाल, भरौड़ामे एखनो हिनकर गहबर छन्हि। मैथिली बाल साहित्य लेखक गोनूसँ आगू ईहो देखथु। ट्रेजेडीमे कथानक संग चरित्र-चित्रण, पद-रचना, विचार तत्व, दृश्य विधान आ गीत रहैत अछि। बाल साहित्यमे ट्रेजेडी नै हुअए, ओइ विचारकेँ हमर समर्थन नै अछि, समाजक निम्न वर्ग वा अस्पृश्य वर्गक लोकदेवता सेहो कोना अस्पृश्य भऽ गेला से बच्चाकेँ बुझबैए पड़त। मुदा बुझबैक ढङ एहेन हेबाक चाही जे बच्चा अपन धरोहरकेँ चीन्हि सकए, ओकर आदर कऽ सकए। मिथिलाक लोककथामे जाति-पाइत नै होइ छै, साम्प्रदायिकता नै होइ छै। गोनू झाक समएमे मुस्लिम मिथिलामे आएले नै रहथि तखन मुस्लिम तहसीलदारक अत्याचारक कथा गोनू झाक खिस्सामे किए घोसियाएल जा रहल अछि। कंप्युटर आ सूचना क्रान्ति जइमे कोनो तंत्रांशक निर्माता ओकर निर्माण कए ओकरा विश्वव्यापी अन्तर्जालपर राखि दैत छथि आ ओ तंत्रांश अपन निर्मातासँ स्वतंत्र अपन काज करैत रहैत अछि, किछु ओहनो कार्य जे एकर निर्माता ओकरा लेल निर्मित नै कएने छथि। आ किछु हस्तक्षेप-तंत्रांश जेना वायरस, एकरा मार्गसँ हटाबैत अछि, विध्वंसक बनबैत अछि तँ ऐ वायरसक एंटी वायरस सेहो एकटा तंत्रांश अछि, जे ओकरा ठीक करैत अछि आ जँ ओकरो सँ ई ठीक नै होइत अछि तखन कम्प्युटरक बैकप लए ओकरा फॉर्मेट कए देल जाइत अछि- क्लीन स्लेट ! बाल साहित्य सेहो एहने तंत्रांश अछि जे बाल मनपर अंकित भऽ जाइत अछि, मुदा एतऽ फॉर्मेट करबाक विकल्प नै छै। तेँ बाल साहित्यक निर्माणमे सतर्की आवश्यक अछि, सावधानी आवश्यक अछि। उमेरक हिसाबसँ बाल साहित्यक वर्गीकरण आ ओकर समीक्षा हेबाक चाही। शिशु (०-५ बर्ख), बाल (५-१२ बर्ख) आ किशोर (१२-१८ बर्ख) उमेर मध्य बाल साहित्यक वर्गीकरण कऽ एकर समीक्षा समीचीन हएत। चित्रकथा पाँच बर्खसँ छोट बच्चा लेल रचल साहित्य होइत अछि, ई स्कूल जाइसँ पहिने अभिभावक द्वारा पढ़ाओल जाइत अछि। अभिभावक बच्चाकेँ कथा पढ़ि कऽ सुनाबै छथि आ बच्चा चित्रक माध्यमसँ ओकर अनुभव करैए। बच्चाक तीव्र मानसिक विकास एकर परिणामस्वरूप होइत अछि। जखन बच्चा स्कूल जाए लगैए आ वर्णमाला सीखि लैए तखन ओ ई पोथी सभ अपने पढ़ऽ लगैए आ एकर संग आन आन पाठ्यपुस्तक आ चित्रित पोथी सभ पढ़ऽ लगैए। सात बर्खक बाद ओ छोट-छोट अध्यायबला पोथी आ नौ-दस बर्खसँ पैघ-पैघ अध्याय बला पोथी पढ़ऽ लगैए। बारह बर्खक बाद बाल उपन्यास आदिक अध्ययन बच्चा सभ शुरू कऽ दैए। बाल साहित्यमे पारम्परिक लोककथा, इतिहास-महाकाव्यक कथा आदि सुनाओल जाइत अछि। साहसिक आ प्रेरणादायक जीवनी आ नीति-प्रेरक कथा सेहो बाल साहित्यक अन्तर्गत अबैए। परीकथा, जादू, गीत आदिक माध्यमसँ सार्थक बाल साहित्यक निर्माण होइए। तेँ बाल साहित्यक समीक्षामे बाल साहित्यक प्रकारपर सेहो ध्यान देबए पड़त। की बाल साहित्य अन्ध्विश्वासकेँ बढ़ावा तँ नै दऽ रहल अछि? की बाल साहित्य अपन धरोहरकेँ चिन्हबामे बच्चाकेँ सहयोग दऽ रहल अछि? की बच्चामे मानव मूल्यक ज्ञान ऐ साहित्यकेँ पढ़बासँ एतै? की जातिवादी आ वैचारिक कट्टरताक विरुद्ध बच्चाकेँ प्रशिक्षित करबाक उद्देश्यमे बाल साहित्य सफल भऽ रहल अछि? वैचारिक तराजू पसङाह तँ नै भऽ रहल अछि, बच्चाक स्वस्थ मनोरंजनमे कोनो कट्टरता तँ सायास-अनायास नै घुसि गेल अछि? सरल शब्दावली, सरल भाषा आ सरल विचार बाल साहित्यक उत्कृष्टताक लेल कसौटी बनत। मैथिलीक किछु सर्वश्रेष्ठ बाल साहित्य रचना: ज्योति सुनीत चौधरीक नानीसँ सुनल खिस्सा (भलुनिया मौसी, सिन्नुरक पुल, एक राजाक सात मेहरी, पन्साया कुम्मरि, सुहान बोन), काश्यप कमलक बाबूक सुनाएल खिस्सा (सहस्रमुखक दीप/ गप्पक अर्थ/ जहियासँ काल धेलक/ नीक करी तँ पैघ के? बेजाए करी तँ पैघ के?/ पढ़बे टा नै करी ओकरा गुनबो करी/ अकिलक मोल), अनिल मल्लिकक दादीक गीत आ अर्चना कुमरक दादीसँ सुनल कथा (विद्वान) मैथिली लोककथा-गीतक रिक्त स्थानक पूर्ति करैत अछि। शिव कुमार झा “टिल्लू” जीक तरेगन देखाइए, दहीक ठोप आ खोंइछक लेल साड़ी बाल मनोविज्ञानकेँ गहिया कऽ पकड़ैत अछि। दुर्गानन्द मण्डल जीक लघुकथा पारस एकटा सत्य चरित्रपर आधारित अछि, आ अदम्य इच्छासँ लोक की-की कऽ सकैए, से देखबैत अछि। वृषेश चन्द्र लाल जीक लघुकथा गोलबा आ जगदानन्द झा “मनु” जीक बाल उपन्यास चोनहा मैथिली बाल साहित्यक अमूल्य धरोहर अछि, गोलबा आ चोनहा मे मनोविज्ञान जबर्दस्त रूपमे सोझाँ आएल अछि। वृषेश चन्द्र लाल बच्चा सभक लेल सुन्दर-सुन्दर कविता सेहो गाबै छथि। पंकज कुमार झाक माए गइ माए आ चन्दन कुमार झा क दूटा अगड़म-बगड़म जइ सरलतासँ गाओल गेल अछि से अद्भुत अछि, दुनू गोटे इन्जीनियर छथि आ गामक संस्कृतिसँ पूर्णतः परिचित छथि। संस्कृति वर्मा ४था मे पढ़ै छथि आ बस्ताक बोझ आ अभिभावकक आ सूचना प्रौद्योगिकीसँ परेशान छथि आ अपन मनोभाव व्यक्त करै छथि। मनोज कुमार मण्डल, शिव कुमार झा टिल्लू, राजेश मोहन झा गुंजन, नरेश कुमार विकल, रमाकान्त राय रमा आ महाकान्त ठाकुरक बाल कवितामे प्रवाह अछि। मुदा जँ बाल मनक हिसाब सँ देखी तँ चन्द्रशेखर कामति प्रवाह आ भावमे सभकेँ पाछाँ छोड़ि दै छथि। मुन्नी कामतक पात्रा कहै छथि नै खेबै तरकारी, रोटी/ हमरा नूने रोटी खाए दे/ मुदा माय गे,/ हमरा तूँ पढ़ै लेल जाए दे। ई पढ़बाक ललक चन्दन कुमार झाक हमहूँ पढ़बै आब मे सेहो देखबामे अबैत अछि। शम्भू नाथ झा मैथिलीमे न्यूटनक सिद्धान्त पढ़बै छथि। प्रभात राय भट्टक चुनमुन चुनमुन करैत चिड़िया सुन्दरतासँ भाव आ शब्दक कएल मिलन अछि। संगमे देवांशु वत्सक प्रगतिक रहस्य आ तुनिशा प्रियम/ गुंजन कर्ण/ ज्योति सुनीत चौधरी/ गणेश ठाकुर/ अनुपमा प्रियदर्शिनी/ श्वेता झा चौधरी/ श्वेता झा (सिंगापुर) क चित्रकला अछि। श्वेता झा चौधरीक मिथिला चित्रकलाक कोनो जोड़ नै अछि। ई शिशु उत्सव मैथिली बाल साहित्यकेँ फरिछेलक अछि आ बच्चा सभ द्वारा एकटा पिकनिकक रूपमेँ एकर प्रयोग आबैबला कएक वर्षतक होइत रहत, से आशा अछि। ६ प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना, समीक्षाशास्त्र आ समालोचनाक समालोचना मैथिली लेल समीक्षाशास्त्रक सिद्धांत- कला आ साहित्य लेल कोनो सैद्धांतिक प्रयोजन हेबाक चाही? साहित्यक विभिन्न विधा जेना पद्य, प्रबन्ध, निबन्ध, समालोचना, कथा-गल्प, उपन्यास, पत्रात्मक साहित्य, यात्रा-संस्मरण, रिपोर्ताज, नाटक आ एकांकी मनोरंजनक लेल सुनल-सुनाओल-पढ़ल जाइत अछि वा मंचित कएल जाइत अछि। ई उद्देश्यपूर्ण भऽ सकैत अछि वा ऐमे निरुद्देश्यता-एबसर्डिटी सेहो रहि सकै छै- कारण जिनगीक उत्थल-धक्कामे निरुद्देश्यपूर्ण साहित्य सेहो मनोरंजन प्रदान करैत अछि। प्राचीन कालमे कला, साहित्य आ संगीत एक खाढ़ीसँ दोसर खाढ़ी मध्य हस्तांतरित होइत छल। पदपाठ, क्रमपाठ, जटा पाठ, शिखापाठ, घनपाठ आदि स्मृतिक वैज्ञानिक पद्धति छल। घर, वेदी आ आन कलाकृतिक बनेबाक विधिक यजुर्वेदमे वर्णन छल जे भाष्य सभमे आर विस्तृत भेल आ पुरातत्वक प्राचीनतम आधार सिद्ध भेल। संगीतक पद्धति सामवेदकेँ विशिष्ट बनेलक। ऐ तरहेँ साहित्य, कला आ संगीतकेँ बान्हबाक प्रयत्न भेल, जइसँ ई विधा दोसरो गोटे द्वारा ओही तरहेँ अनुकृत भऽ सकए। आ ऐ क्रममे कला, साहित्य आ संगीतक समीक्षा वा ओकर गुणक विश्लेषण प्रारम्भ भेल। कला, साहित्य आ संगीतक समाज लेल कोन प्रयोजन, एकर नैतिक मानदण्ड की हुअए, ऐ दिस सेहो प्राच्य आ पाश्चात्य विचारक अपन विचार राखलन्हि। प्लेटो कहै छथि जे कोनो कला नीक नै भऽ सकैए किएक तँ ई सभटा असत्य आ अवास्तविक अछि। मुदा कला, संगीत आ साहित्य कखनो काल स्वान्तः सुखाय सेहो होइत अछि, एकरा पढ़ला, सुनला, देखला आ अनुभव केलासँ प्रसन्नता होइत छै, मानसिक शान्ति भेटै छै, तँ कखनो काल ई उद्वेलित सेहो करैत छै। एरिस्टोटल मुदा कहै छथि जे कलाकार ज्ञानसँ युक्त होइ छथि आ विश्वकेँ बुझबामे सहयोग करै छथि। जगतक सौन्दर्यीकृत प्रस्तुति अछि कला। फ्रायड सभ मनुक्खकेँ रहस्यमयी मानैत छथि। ओ साहित्यिक कृतिकेँ साहित्यकारक विश्लेषण लेल चुनैत छथि तँ नव फ्रायडवादी जैविकक बदला सांस्कृतिक तत्वक प्रधानतापर जोर दैत देखबामे अबैत छथि। नव-समीक्षावाद कृतिक विस्तृत विवरणपर आधारित अछि। उत्तर आधुनिक, अस्तित्ववादी, मानवतावादी, ई सभ विचारधारा दर्शनशास्त्रक विचारधारा थिक। पहिने दर्शनमे विज्ञान, इतिहास, समाज-राजनीति, अर्थशास्त्र, कला-विज्ञान आ भाषा सम्मिलित रहैत छल। मुदा जेना-जेना विज्ञान आ कलाक शाखा सभ विशिष्टता प्राप्त करैत गेल, विशेष कऽ विज्ञान, तँ दर्शनमे गणित आ विज्ञान मैथेमेटिकल लॉजिक धरि सीमित रहि गेल। दार्शनिक आगमन आ निगमनक अध्ययन प्रणाली, विश्लेषणात्मक प्रणाली दिस बढ़ल। मार्क्स, जे दुनियाँ भरिक गरीबक लेल एकटा दैवीय हस्तक्षेपक समान छलाह, द्वन्द्वात्मक प्रणालीकेँ अपन व्याख्याक आधार बनेलन्हि। आइ-काल्हिक “डिसकसन” वा द्वन्द्व, जइमे पक्ष-विपक्ष, दुनू सम्मिलित अछि, दर्शनक (विशेष कऽ षडदर्शनक)- माधवाचार्यक सर्वदर्शन संग्रह-द्रष्टव्य- खण्डन-मण्डन प्रणालीमे पहिनहिसँ विद्यमान छल। से इतिहासक अन्तक घोषणा केनिहार फ्रांसिस फुकियामा -जे कम्युनिस्ट शासनक समाप्तिपर ई घोषणा कएने छलाह- किछु दिन पहिने ऐसँ पलटि गेलाह। कम्यूनिज्मक समाप्तिक बाद लागल जे इतिहास, जे दूटा विचारधाराक संघर्ष अछि, एकटा विचारधाराक खतम भेलाक बाद समाप्त भऽ गेल। फ्रांसिस फुकियामा घोषित कएलन्हि जे विचारधाराक आपसी झगड़ासँ सृजित इतिहासक ई समाप्ति अछि आ आब मानवक हितक विचारधारा मात्र आगाँ बढ़त। मुदा किछु दिन पहिनहि ओ कहलन्हि जे समाजक भीतर आ राष्ट्रीयताक मध्य एखनो बहुत रास भिन्न विचारधारा बाँचल अछि। जर्मनीक देवाल खसलापर हुनक मान्यता रहन्हि जे द्वन्द्व आधारित इतिहासमे कम्यूनिज्म खतम भेलाक बाद इतिहासक अन्त भऽ गेल अछि कारण दुनियाँ यूनीपोलर भऽ गेल अछि मुदा आब ओ मानै छथि जे वंचितक अस्तित्व सभ ठाम छै आ ओकर सभ्यता आ इतिहास द्वन्द्व उत्पन्न करै छै, आ तेँ इतिहास जारी रहत। उत्तर-आधुनिकतावाद सेहो अपन प्रारम्भिक उत्साहक बाद ठमकि गेल अछि। अस्तित्ववाद, मानवतावाद, प्रगतिवाद, रोमेन्टिसिज्म, समाजशास्त्रीय विश्लेषण, ई सभ संश्लेषणात्मक समीक्षा प्रणालीमे सम्मिलित भऽ अपन अस्तित्व बचेने अछि। साइको-एनेलिसिस वैज्ञानिकतापर आधारित रहबाक कारण द्वन्द्वात्मक प्रणाली जेकाँ अपन अस्तित्व बचेने रहत। उत्तर आधुनिकतावादी दृष्टिकोण अछि विज्ञानक ज्ञानक सम्पूर्णतापर टीका, सत्य-असत्य, अपन-अपन दृष्टिकोणसँ तकर वर्णन, आत्म-केन्द्रित हास्यपूर्ण आ नीक-खराबक भावनाक रहि-रहि खतम हएब, सत्य कखन असत्य भऽ जाएत तकर कोनो ठेकान नै, सतही चिन्तन, आशावादिता तँ नहिए अछि मुदा निराशावादिता सेहो नै, जे अछि तँ से अछि बतहपनी, कोनो चीज एक तरहेँ नै कएक तरहेँ सोचल जा सकैत अछि। दृष्टिकोण, कारण, नियन्त्रण आ योजनाक उत्तर परिणामपर विश्वास नै, वरन संयोगक उत्तर परिणामपर बेशी विश्वास, गणतांत्रिक आ नारीवादी दृष्टिकोण आ लाल झंडा आदिक विचारधाराक संगे प्रतीकक रूपमे हास-परिहास। भूमंडलीकरणक कारणसँ मुख्यधारसँ अलग भेल कतेक समुदायक आ नारीक प्रश्नकेँ उत्तर-आधुनिकता सोझाँ अनलक। विचारधारा आ सार्वभौमिक लक्ष्यक विरोध कएलक मुदा कोनो उत्तर नै दऽ सकल। तहिना उत्तर आधुनिकतावादी विचारक जैक्स देरीदा भाषाकेँ विखण्डित कऽ ई सिद्ध कएलन्हि जे विखण्डित भाग ढेर रास विभिन्न आधारपर आश्रित अछि आ बिना ओकरा बुझने भाषाक अर्थ हम नै लगा सकैत छी। प्रत्यक्षवादक विश्लेषणात्मक दर्शन वस्तुक नै, भाषिक कथन आ अवधारणाक विश्लेषण करैत अछि। विश्लेषणात्मक अथवा तार्किक प्रत्यक्षवाद आ अस्तित्ववादक जन्म विज्ञानक प्रति प्रतिक्रियाक रूपमे भेल। ऐसँ विज्ञानक द्विअर्थी विचारकेँ स्पष्ट कएल गेल। प्रघटनाशास्त्रमे चेतनाक प्रदत्तक प्रदत्त रूपमे अध्ययन होइत अछि। अनुभूति विशिष्ट मानसिक क्रियाक तथ्यक निरीक्षण अछि। वस्तुकेँ निरपेक्ष आ विशुद्ध रूपमे देखबाक ई माध्यम अछि। अस्तित्ववादमे मनुष्ये मात्र मनुष्य अछि। ओ जे किछु निर्माण करैत अछि ओइसँ पृथक ओ किछु नै अछि; सार्त्र कहै छथि जे मनुख स्वतंत्र हेबा लेल अभिशप्त अछि। हेगेलक डायलेक्टिक्स द्वारा विश्लेषण आ संश्लेषणक अंतहीन अंतस्संबंध द्वारा प्रक्रियाक गुण निर्णय आ अस्तित्व निर्णय करबापर जोर देलन्हि। मूल तत्व जतेक गहींर हएत ओतेक स्वरूपसँ दूर रहत आ वास्तविकतासँ लग। क्वान्टम सिद्धान्त आ अनसरटेन्टी प्रिन्सिपल सेहो आधुनिक चिन्तनकेँ प्रभावित कएने अछि। देखाइ पड़एबला वास्तविकता सँ दूर भीतरक आ बाहरक प्रक्रिया सभ शक्ति-ऊर्जाक छोट तत्वक आदान-प्रदानसँ सम्भव होइत अछि। अनिश्चितताक सिद्धान्त द्वारा स्थिति आ स्वरूप अन्दाजसँ निश्चित करए पड़ैत अछि। तीनसँ बेशी डाइमेन्सनक विश्वक परिकल्पना आ स्टीफन हॉकिन्सक “अ ब्रिफ हिस्ट्री ऑफ टाइम” सोझे-सोझी भगवानक अस्तित्वकेँ खतम कऽ रहल अछि कारण ऐसँ भगवानक मृत्युक अवधारणा सेहो सोझाँ आएल अछि। जे शुरू भेल अछि से खतम हएत भलहि ओकर आयु बेशी हुअए। जेना वर्चुअल रिअलिटी वास्तविकताकेँ कृत्रिम रूपेँ सोझाँ आनि चेतनाकेँ ओकरा संग एकाकार करैत अछि तहिना बिना तीनसँ बेशी बीमक परिकल्पनाक हम प्रकाशक गतिसँ जँ सिन्धुघाटी सभ्यतासँ चली तँ तइयो ब्रह्माण्डक पार आइ धरि नै पहुँचि सकब। साहित्यक समक्ष ई सभ वैज्ञानिक आ दार्शनिक तथ्य चुनौतीक रूपमे आएल अछि। होलिस्टिक आकि सम्पूर्णताक समन्वय करए पड़त ! ई दर्शन दार्शनिक सँ वास्तविक तखने बनत। पोस्टस्ट्रक्चरल मेथोडोलोजी भाषाक अर्थ, शब्द, तकर अर्थ, व्याकरणक निअम सँ नै वरन् अर्थ निर्माण प्रक्रियासँ लगबैत अछि। सभ तरहक व्यक्ति, समूह लेल ई विभिन्न अर्थ धारण करैत अछि। भाषा आ विश्वमे कोनो अन्तिम सम्बन्ध नै होइत अछि। शब्द आ ओकर पाठ केर अन्तिम अर्थ वा कोनो विशिष्ट अर्थ नै होइत अछि। आधुनिक आ उत्तर आधुनिक तर्क, वास्तविकता, सम्वाद आ विचारक आदान-प्रदानसँ आधुनिकताक जन्म भेल। नव-वामपंथी आन्दोलन फ्रांसमे आएल आ सर्वनाशवाद आ अराजकतावादी आन्दोलन सन विचारधारा सेहो आएल। ई सभ आधुनिक विचार प्रक्रिया प्रणाली, ओकर आस्था-अवधारणासँ बहार भेल अविश्वासपर आधारित छल। पाठमे नुकाएल अर्थक स्थान-काल संदर्भक परिप्रेक्ष्यमे व्याख्या शुरू भेल आ भाषाकेँ खेलक माध्यम बनाओल गेल- लैंगुएज गेम आ ऐ सभ सत्ताक आ वैधता आ ओकर स्तरीकरणक आलोचनाक रूपमे आएल पोस्टमॉडर्निज्म। कंप्युटर आ सूचना क्रान्ति जइमे कोनो तंत्रांशक निर्माता ओकर निर्माण कए ओकरा विश्वव्यापी अन्तर्जालपर राखि दैत छथि आ ओ तंत्रांश अपन निर्मातासँ स्वतंत्र अपन काज करैत रहैत अछि, किछु ओहनो कार्य जे एकर निर्माता ओकरा लेल निर्मित नै कएने छथि। आ किछु हस्तक्षेप-तंत्रांश जेना वायरस, एकरा मार्गसँ हटाबैत अछि, विध्वंसक बनबैत अछि, तँ ऐ वायरसक एंटी वायरस सेहो एकटा तंत्रांश अछि, जे ओकरा ठीक करैत अछि आ जे ओकरो सँ ठीक नै होइत अछि तखन कम्प्युटरक बैकप लऽ ओकरा फॉर्मेट कऽ देल जाइत अछि- क्लीन स्लेट! पूँजीवादक जनम भेल औद्योगिक क्रान्तिसँ आ आब पोस्ट इन्डस्ट्रियल समाजमे उत्पादनक बदला सूचना आ संचारक महत्व बढ़ि गेल अछि, संगणकक भूमिका समाजमे बढ़ि गेल अछि। मोबाइल, क्रेडिट-कार्ड आ सभ एहन वस्तु चिप्स आधारित अछि। डी कन्सट्रक्शन आ री कन्सट्रक्शन विचार रचना प्रक्रियाक पुनर्गठनकेँ देखबैत अछि जे उत्तर औद्योगिक कालमे चेतनाक निर्माणक नव रूपमे भऽ रहल अछि। इतिहास तँ नै मुदा परम्परागत इतिहासक अन्त भऽ गेल अछि। राज्य, वर्ग, राष्ट्र, दल, समाज, परिवार, नैतिकता, विवाह सभ फेरसँ परिभाषित कएल जा रहल अछि। मारते रास परिवर्तनक परिणामसँ विखंडित भऽ सन्दर्भहीन भऽ गेल अछि कतेक संस्था। इन्फॉरमेशन सोसाइटी किंवा सूचना-आधारित-समाज एकटा ओहेन समाज अछि जइमे सूचनाक निर्माण, वितरण, प्रसार, उपयोग, एकीकरण आ संशोधन एकटा महत्त्वपूर्ण आर्थिक, राजनीतिक आ सांस्कृतिक क्रिया होइत अछि। आ ऐ समाजक भाग हेबामे समर्थ लोक अंकीय वा डिजिटल नागरिक कहल जाइ छथि। ऐ उत्तर औद्योगिक समाजमे सूचना-प्रौद्योगिकी उत्पादन, अर्थव्यवस्था आ समाजकेँ निर्धारित करैत अछि। उत्तर-आधुनिक समाज, उत्तर औद्योगिक समाज आदि संकल्पना सँ ई निकट अछि। अर्थशास्त्री फ्रिट्ज मैचलप एकर संकल्पना देने छलाह। हुनकर ज्ञान-उद्योगक धारणा शिक्षा, शोध आ विकास, मीडिआ, सूचना प्रौद्योगिकी आ सूचना सेवाक पाँचटा अंगपर आधारित छल। प्रौद्योगिकी आ सूचनाक समाजपर भेल प्रभाव एतए दर्शित होइत अछि। अंकीय वा डिजिटल विभाजन एकटा ज्ञानक विभाजन, सामाजिक विभाजन आ आर्थिक विभाजन देखबैत अछि आ बिना भेदभावक एकटा सूचना समाजक निर्माणक आवश्यकता देखाबैत अछि, जइसँ सूचना प्रौद्योगिकीपर विकासशील देशक सार्वभौम अधिकार रहए। मानवाधिकार आ सूचना प्रौद्योगिकीक मध्य व्यक्तिक एकान्तक अधिकार सेहो सम्मिलित अछि। विद्वान, मानवाधिकार कार्यकर्ता आ आन सभ व्यक्तिक अभिव्यक्तिक स्वतंत्रता, सूचनाक अधिकार, एकान्त, भेदभाव, स्त्री-समानता, प्रज्ञात्मक संपत्ति, राजनीतिक भागीदारी आ संगठनक मेलक संदर्भमे ऐ गपपर चरचा शुरू भेल अछि जे सूचना आ जनसंचार प्रौद्योगिकी आधारित सूचना समाजमे मानवाधिकारकेँ बल भेटत आकि ओकर हानि हएत। ऑनलाइन पत्राचारक गोपनीयताक अधिकार, अन्तर्जालक सामग्रीक सांस्कृतिक आ भाषायी विविधता आ मीडिया शिक्षा, सूचना समाजक तकनीकी अओजार ओकर अधिकार आ स्वतंत्रतासँ लाभान्वित होइत अछि आ समाजक समग्र विकास, अधिकार आ स्वतंत्रताक सार्वभौमता, अधिकारक आपसी मतभिन्नता, स्वतंत्रता आ मूल्य निरूपणमे सहभागी होइत अछि। ऐसँ सूचना, ज्ञान आ संस्कृतिमे ई सरल पइठक वातावरण बनैत अछि आ ई उपयोगकर्ताकेँ वैश्विक सूचना समाजक अभिनेताक रूपमे परिणत करैत अछि। कारण ई उपयोगकर्ताकेँ पहिनेसँ बेशी अभिव्यक्तिक स्वतंत्रता आ नव सामग्री आ नव सामाजिक अन्तर्जाल-तंत्र निर्माण करबाक सामर्थ्य दैत अछि। ऐसँ एकटा नव विधि, आर्थिक आ सामाजिक मॉडेलक आवश्यकता सेहो अनूभूत कएल जा रहल अछि जइमे साझी कर्तव्य, ज्ञान आ मेल आधार बनत। बच्चाक हित एकटा आर चिन्ता अछि जे पैघक हितसँ सर्वदा ऊपर रखबाक चाही। आधुनिक समाजक आर्थिक, सामाजिक आ सांस्कृतिक धनक एकत्र करबाक प्रवृत्ति सूचना समाजमे बढ़ल अछि आ प्रौद्योगिकी एकटा आधारभूत बेरोजगारी अनलक अछि। गरीबी, मजदूरक अधिकार आ कल्याणकारी राज्यक संकल्पना लाभ-हानिक आगाँ कतौ पाछाँ छूटल जा रहल अछि। आब मात्र किछुए अभिनेता चाही। प्रकाशक लोकनि सेहो मात्र किछु बेशी बिकएबला पोथीक लेखकक प्रचार करै छथि। यएह स्थिति रंगमंच, पेंटिंग, सिनेमा आ आन-आन क्षेत्रमे सेहो दृष्टिगोचर भऽ रहल अछि। मुदा सूचना सर्वदा लाभकारी नै होइत अछि। ई मात्र कला, ग्रंथ धरि सीमित नै अछि वरन सट्टा बाजार आ प्रायोजित सर्वेक्षण रपट सेहो ऐमे सम्मिलित अछि। समए आ स्थानक बीचक दूरीकेँ ई कम करैत अछि आ दुनूक बीचमे एकटा सन्तुलन बनबैत अछि। मानवक गरिमा मानवक जन्म आधारित सामाजिक स्थानसँ हटि कऽ मानवक गरिमाक सर्वभौमिकताक अधिकारपर बल दैत अछि। मुक्ति आ स्त्री-मुक्ति आन्दोलन ऐ दिशाक प्रयास अछि। दुनू विश्वयुद्ध आ फासिज्मक चुनौतीक बाद १० दिसम्बर १९४८ केँ संयुक्त राष्ट्र संघक महासभा द्वारा मानवाधिकारक सार्वभौम घोषणाक उद्घोषणा कएल गेल आ एकरा अंगीकार कएल गेल। ई घोषणा राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक आ धार्मिक भेदभाव रहित एकटा सामान्य मानदण्ड प्रस्तुत करैत अछि जे सभ जन-समाज आ सभ राष्ट्र लेल अछि। सूचनाक स्वतंत्र उपयोग सीमित अछि, लोकक एकान्त खतम भऽ रहल अछि। बिल गेट्ससँ जखन हुनकर भारत यात्राक क्रममे पूछल गेल छलन्हि जे माइक्रोसॉफ्टक एक्स-बॉक्स भारतमे पाइरेसीक डरसँ देरीसँ उतारल गेल तँ ओ कहने रहथि जे माइक्रोसॉफ्ट कहियो कोनो उत्पाद पाइरेसीक डरसँ देरीसँ नै आनलक। स्पैम आ पाइरेसीक डर खतम हेबाक चाही। सूचना समाज वएह समाज छी जकर बीचमे हम सभ आइ-काल्हि रहि रहल छी। लोकतंत्र आ मानवाधिकारक सम्मान सूचना-समाज आ उत्तर सूचना-समाजमे होइत रहत। अभिव्यक्तिक स्वतंत्रता, एकान्तक अधिकार, सूचना साझी करबाक अधिकार आ सूचना धरि पहुँचक अधिकार, जे सूचनाक संचारसँ सम्बन्धित अछि, ई सभ राज्य द्वारा आ सूचना-समाजक बाजारवादी झुकावक कारण खतराक अनुभूतिसँ त्रस्त अछि। अन्तर्जाल लोकक मीडिआ अछि आ एकटा एहन प्रणाली अछि जे लोकक बीच सम्वाद स्थापित करैत अछि। ऐसँ संचार-माध्यमक मठाधीश लोकनिक गढ़ टुटैत अछि। अन्तर्जालमे सामान्य रूपसँ कोनो सम्पादक नै होइत छथि। एतए लोक विषयक आ सामग्रीक निर्माण कऽ स्वयं ओकर संचार करै छथि। ऐसँ कतेक रास सामाजिक सम्वादक प्रारम्भ होइत अछि मुदा कतेक रास समाज-विरोधी सामग्री सेहो अबैत अछि। तँ की ओइपर प्रतिबन्ध हेबाक चाही। मुदा जँ सॉफ्टवेयरक माध्यमसँ मशीनकेँ सामग्रीपर प्रतिबन्ध लगेबाक अधिकार देब तखन ई अभिव्यक्तिक स्वतंत्रतापर पैघ आघात हएत। भारतमे बौद्धिक सम्पदाक अधिकार लेखकक मृत्युक ६० बरख बादो प्रकाशन आ वितरणक अधिकार ओकर उत्तराधिकारीकेँ दैत अछि। अन्तर्जालमे सेहो पाइरेसीकेँ प्रतिबन्धित करए पड़त आ लेखकक मृत्युक ६० बरख बाद धरि लेखकक अधिकार ओकर सामग्रीपर सैद्धांतिके नै प्रायोगिक रूपसँ रहए, से व्यवस्था करए पड़त। मुदा पेटेन्टक बेशी प्रयोग विकाशसील देशक सूचना अभिगमनमे बाधक हएत आ प्रौद्योगिकीक विकासमे सेहो बाधा पहुँचाओत। कॉपीराइटसँ सांस्कृतिक विकास मुदा हएत, जेना संगीत, फिल्म, चित्र-शृंखला(कॉमिक्स) आ चित्रकथाक विकास। डिजिटल वातावरणमे प्रतिकृतिक बिना अहाँ अन्तर्जालपर सेहो सामग्री नै देखि सकब, से ऑफ-लाइन कॉपीराइट आ ऑनलाइन कॉपीराइट दुनूमे थोड़बेक अन्तर अछि। ऑनलाइन कॉपीराइट प्रतिकृतिकेँ सेहो प्रतिबन्धित करैत अछि आ प्रतिकृति कएल सामग्रीकेँ दोसर वस्तुमे जोड़ब वा संशोधित करब सेहो बड्ड सरल अछि। से नाम आ चित्र बिना ओकर निर्माताक अनुमतिक नै प्रयोग हुअए, दोसराक व्यक्तिगत वार्तालाप-चैटिंग-मे हस्तक्षेप नै हुअए आ दोसराक विरुद्ध कोनो एहन बयानबाजी नै हुअए जइसँ कोनो व्यक्तिक विरुद्ध गलत धारणा बनए। तहिना नौकरी-प्रदाता द्वारा कोनो प्रकारक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण अपन कर्मचारीक नियन्त्रण लेल लगबैत अछि तँ से अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संघक दिशा-निर्देशक अनुरूप हेबाक चाही। ई-पत्रमे अनपेक्षित सन्देश आ चिकित्सकीय रिपोर्टक अनपेक्षित संग्रह आ उपयोग सेहो मानवाधिकारक हनन अछि। अन्तर्जालक उपयोग मुदा सीमित अछि कारण बहुत रास सामग्री आ तंत्रांश मंगनीमे उपलब्ध नै अछि आ महग अछि, डिजिटल विभाजन शिक्षाक स्तरकेँ आर बेशी देखार करैत अछि। शारीरिक श्रमक बदलामे मानसिक श्रमक एतए बेशी उपयोग होइत अछि, से ई आशा रहए जे स्त्री-असमानता सूचना-समाजमे घटत मुदा सर्वेक्षण देखबैत अछि जे महिलाक पइठ सूचना प्रौद्योगिकीमे कम छन्हि। इलेक्ट्रॉनिक लाइब्रेरी आ ब्रेल-इनेबल कएल/ ध्वनि-इनेबल कएल कम्प्यूटर स्क्रीन/ इलेक्ट्रॉनिक लाइब्रेरी विकलांग आ अन्ध विकलांग लेल घर पर रहि ई-वाणिज्य करबामे सहायता देत। मुदा ऐ क्षेत्रमे कएल शोध आ ओकर परिणाम महग रहबाक कारणसँ ओतेक लाभ नै दऽ सकल अछि। बाल, वृद्ध, विकलांग, स्त्री, कामगार, प्रवासी-कामगार आ दोसर सामाजिक रूपसँ अब्बल वर्ग सूचना समाजमे सेहो अपनाकेँ अब्बल अनुभव करैत छथि, मुदा जँ-जँ हिनका लोकनिक पइठ सूचना प्रौद्योगिकीमे बढ़त तँ तँ सूचना-समाजमे असमानता घटत। नीक साहित्य/ कला त्वरित उपस्थापनक आधारपर नै बनत वरन ओइमे तीक्ष्णतासँ उपस्थापित मानव-मूल्य, सामाजिक समरसताक तत्व आ समानता-न्याय आधारित सामाजिक मान्यताक सिद्धान्त आधार बनत। समाज ओइ आधारपर कोना आगू बढ़ए से संदेश तीक्ष्णतासँ आबैए वा नै से देखए पड़त। पाठकक मनसि बन्धनसँ मुक्त होइत अछि वा नै, ओइमे दोसराक नेतृत्व करबाक क्षमता आ आत्मबल अबै छै वा नै, ओकर चारित्रिक निर्माणक आ श्रमक प्रति सम्मानक प्रति सन्देह दूर होइ छै वा नै- ई सभटा तथ्य लघुकथाक मानदंड बनत। कात-करोटमे रहनिहार तेहन काज कऽ जाथि जे सुविधासम्पन्न बुते नै सम्भव अछि, आ से कात-करोटमे रहनिहारक आत्मबल बढ़लेसँ सम्भव हएत। हीन भावनासँ ग्रस्त साहित्य कल्याणकारी कोना भऽ सकत? बदलैत सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक-धार्मिक समीकरणक परिप्रेक्ष्यमे एकभग्गू प्रस्तुतिक रेखांकन, कथाकार-कविक व्यक्तिगत जिनगीक अदृढ़ता, चाहे ओ वादक प्रति हुअए वा जाति-धर्मक प्रति, साहित्यमे देखार भइए जाइ छै। शोषक द्वारा शोषितपर कएल उपकार वा अपराधबोधक अन्तर्गत लिखल जाएबला कथामे जे पैघत्वक (जे हीन भावनाक एकटा रूप अछि) भावना होइ छै, तकरा चिन्हित कएल जाए। मेडियोक्रिटीकेँ चिन्हित करू। तकिया कलाम आ चालू ब्रेकिंग न्यूज आधुनिकताक नामपर, युगक प्रमेयकेँ माटि देबाक विचार ऐमे नै भेटत। आधुनिकीकरण, लोकतंत्रीकरण, राष्ट्र-राज्य संकल्पक कार्यान्वयन, प्रशासनिक-वैधानिक विकास, जन सहभागितामे वृद्धि, स्थायित्व आ क्रमबद्ध परिवर्तनक क्षमता, सत्ताक गतिशीलता, उद्योगीकरण; स्वतंत्रता प्राप्तिक बाद नवीन राज्यक राजनैतिक-सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक समस्या-परिवर्तन आ एकीकरणक प्रक्रिया कखनो काल परस्पर विरोधी होइत अछि। सामुदायिकताक विकास, मनोवैज्ञानिक आ शैक्षिक प्रक्रियापर ध्यान देब सेहो आवश्यक। आदिवासी जेना सतार, गिदरमारा (बंजारा) आदि विविधता, प्रकृतिसँ लग, प्रकृति-पूजा, सरलता, निश्छलता, कृतज्ञता आ विकासक स्तरकेँ प्रतिबिम्बित करैत अछि। व्यक्तिक प्रतिष्ठा स्थान-जाति आधारित होइत अछि। किछु प्रतिष्ठा आ विशेषाधिकार प्राप्त जाति अछि तँ किछुसँ तिरस्कार कएल जाइ छै आ हुनकर जीवन कठिन अछि। ऋगवेदमे महिला अपाला, घोषा, श्रद्धा, शची, सार्पराज्ञी, यमी, वैवस्वती, देव जामय, इन्द्राणी, शश्वती, रोमशा, गोधा, उर्वशी, सूर्या, अदिति, नदी, लोपामुद्रा, विश्ववारा, वाक् जुहू, सरमा आ यमी ऐ २१ टा ऋषिकाक वर्णन अछि। महिला आ बाल-विकासमे महिलाकेँ अधिकार दिआबए लेल शिक्षा-प्रणालीकेँ सक्रिय करबापर आ पाठ्यक्रममे महिला अध्ययनपर जोर देबापर ध्यान देमए पड़त। महिलाक व्यावसायिक आ तकनीकी शिक्षामे प्रतिशत बढ़ाओल जाए। स्त्री-स्वातंत्र्यवाद, महिला आन्दोलन ऐ दिशामे प्रभाव उत्पन्न केलक अछि। धर्मनिरपेक्ष- राजनैतिक संस्था संपूर्ण समुदायक आर्थिक आ सामाजिक हितपर आधारित, धर्म-नस्ल-पंथ भेद रहित सामाजिक मूल्यकेँ बढ़ाबैमे सहायक हएत। विकास आर्थिकसँ पहिने जे शैक्षिक हुअए तँ जनसामान्य ओइ विकासमे साझी भऽ सकैए। ऐसँ सर्जन क्षमता बढ़ैत अछि आ लोकमे उत्तरदायित्वक बोध होइत अछि। विज्ञान आ प्रौद्योगिकीक कारण विकसित आ अविकसित (विकासशील) राष्ट्रक बीचक अंतरक कारण मानवीय समस्या, बीमारी, अज्ञानता, असुरक्षाक समाधान- आकांक्षा-आशा आ सुविधाक असीमित विस्तार आ आधारक बीच सामंजस्यमे वृद्धि भेल अछि। विधि-व्यवस्थाक निर्धन आ पिछड़ल वर्गकेँ न्याय दिअएबामे प्रयोग हेबाक चाही। नागरिक स्वतंत्रता, मानवक लोकतांत्रिक अधिकार, मानवक स्वतंत्र चिन्तन, क्षमतापूर्ण समाजक सृष्टि, प्रतिबन्ध आ दबाबसँ मुक्ति, ऐ सभ मूल्यक संग प्रेसक -शासक आ शासितक ई कड़ी- सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक जीवनमे महत्वपूर्ण भूमिका अछि। मुदा आब प्रभावशाली विज्ञापन एजेंसी जनमतकेँ प्रभावित कएनिहार सेहो सिद्ध भऽ रहल अछि। नव संस्थाक निर्माण वा वर्तमानमे सुधार, सामन्तवादी, जनजातीय, जातीय आ पंथगत निष्ठाक विरुद्ध, लोकतंत्र, उदारवाद, गणतंत्रवाद, संविधानवाद, समाजवाद, समतावाद, सांवैधानिक अधिकारक अस्तित्व, समएबद्ध जनप्रिय चुनाव, जन-संप्रभुता, संघीय शक्ति विभाजन, जनमतक महत्व, लोक-प्रशासनिक प्रक्रिया-अभिक्रम, दलीय हित-समूहीकरण, सर्वोच्च व्यवस्थापिका, उत्तरदायी कार्यपालिका आ स्वतंत्र न्यायपालिका अपन भूमिकाक निर्वहण कऽ रहल अछि। जल-थल-वायुक भौतिक रासायनिक जैविक गुणमे हानिकारक परिवर्तन कऽ प्रदूषण, प्रकृति असंतुलन उत्पन्न भऽ रहल अछि। मिकेल फोकौल्ट कहै छथि जे ज्ञान आ सत्य बनाओल जाइत अछि। डेलीयूज आ गुटारी कहै छथि जे हम सभ इच्छा ऐ द्वारे करै छी कारण हम सभ इच्छा मशीन छी। मिकाहिल बखतिन भाषाकेँ सामाजिक क्रियाक रूपमे लै छथि आ हुनकर कार्य उपन्यासपर अछि। रूसक रूपवादी साहित्यकेँ मात्र भाषाक विशिष्ट प्रयोग मानै छथि। जीन फ्रान्कोइस लियोटार्डक अनुसार सत्यक आ इतिहासक सत्यता मात्र आभासी अछि। बौड्रीलार्ड कहै छथि जे विज्ञापन आ दूरदर्शन सत्य आ आभासीक बीच भेद मेटा देने अछि। दुनू उत्तर आधुनिकताक मुख्य विचारक छथि। लाकानक विशेषता छन्हि जे ओ फ्रायडक पद्धतिक भाषिकी अनुप्रयोग केलन्हि अछि। ओ कहै छथि जे अचेतनताक संरचना भाषा सन छै। जखन बच्चा भाषा सीखैए तखन ओकरा एकटा चेन्ह लेल एकटा शब्द सिखाओल जाइत छै। इच्छा, त्रुटि आ आन ई तीनटा तथ्य लाकान नीक जकाँ राखै छथि। इच्छा, आवश्यकता आ माँगनाइ, दुनू अछि मुदा एकरा ऐ दू रूपमे विखंडित नै कएल जा सकैत अछि। आनक वर्णनमे त्रुटि आ रिक्तता अबैत अछि। विषय अर्थक क्षणिक प्रभाव अछि आ ई आन सन हएत जखन ई आभासी हएत आ त्रुटिक कारण बनत, जइसँ इच्छाक उदय हएत। उत्तर उपनिवेशवादक तीन विचारक छथि- होमी भाभा (फोकौल्ट आ लाकानसँ लग), गायत्री स्पीवाक (फोकौल्ट आ डेरीडासँ लग) आ एडवर्ड सईद (फोकौल्टसँ लग) जे उपनिवेशवादीक पूर्वक धूर्तताक, शिथिलता आदिक धारणाक लेल कएल गेल कार्य आ सिद्धांतीकरणक व्याख्या करै छथि। रेमण्ड विलियम्सक संस्कृतिक अध्ययन साहित्यक आर्थिक स्थितिसँ सम्बन्ध देखबैत अछि। नव इतिहासवाद इतिहासक शब्दशास्त्र आ शब्दशास्त्रक ऐतिहासिकताक तुलना करैत अछि। इलाइन शोआल्टर महिला लेखनक मानसिक, जैविक आ भाषायी विशेषताकेँ चिन्हित करै छथि। सिमोन डी. बेवोइर नारीक नारीक प्रति प्रतिबद्धतामे वर्ग आ जातिकेँ (जकर बादक नारीवादी सिद्धांत विरोध केलक) बाधक मानै छथि। वर्जीनिया वुल्फ नारी लेखक लेल आर्थिक स्वतंत्रता आ निजताकेँ आवश्यक मानै छथि, हिनकर विचारकेँ क्रान्तिकारी नै मानल गेल। मेरी वोल्स्टोनक्राफ्ट नारी शिक्षामे क्रान्ति आ औचित्यक शिक्षाकेँ सम्मिलित करबापर जोर देलनि। नव समीक्षा- इलिएट कवितामे भावनाक प्रधानताक विरोध कएलन्हि आ एकरा गएर वैयक्तिक बनेबाक आग्रह केलनि। समीक्षकक काज लोकक रुचिमे सुधार करब सेहो अछि। विमसैट आ वर्डस्ले कहलनि जे कविक उद्देश्य वा ऐतिहासिक अध्ययनपर समीक्षा आधारित नै रहत। ई पाठकपर पड़ल भावनात्मक प्रभावपर सेहो आधारित नै रहत, कारण से सापेक्ष अछि, ओ आधारित रहत वास्तविक शब्दशास्त्रपर। फिलिप सिडनीसँ अंग्रेजी समीक्षाक प्रारम्भ देखि सकै छी, ओ कविताकेँ सौन्दर्य, अर्थ आ मानवीय हितमे देखलन्हि। जॉन ड्राइडन प्राचीन साहित्यमे नैतिक प्रवचनपर आ एकर लाभहानिपर विचार केलनि। सैमुअल जॉनसन सेक्सपिअरक नाटकमे हास्य आ दुखद तत्वपर लिखलन्हि। रूसोक रोमांशवाद मनुक्खक नीक हेबापर शंका नै करैए (क्लासिकल समीक्षक शंका करै छथि मुदा नव-क्लैसिकल कहै छथि जे मानव स्वभावसँ दूषित अछि मुदा संस्था ओकरा नीक बना सकैए) मुदा संगे ई कहैए जे संस्था सभ दूषित अछि आ मात्र दूषित लोकक मदति करैए। रोमांशवाद कविताक व्यक्तिगत अनुभव हेबाक गप कहैए। आधुनिक स्थितिवाद (साहित्यक अवस्थितिपर कोनो प्रश्न चिन्ह नै) पर संरचनावाद प्रहार केलक आ तकरा बाद लेखक स्वयं लिखल टेकस्टक विश्लेषण करबाक अधिकार गमेलक। उत्तर संरचनावाद कहलक जे साहित्य ओइसँ आगाँक वस्तु अछि जे संरचनावाद बुझै अछि। उत्तर-संरचनावादक एकटा प्रकार अछि उत्तर आधुनिकता। उत्तर संरचनावाद कहलक जे साहित्यमे संरचना, संस्कृति आ सिद्धान्त मध्य कार्य करैत अछि जत्तऽ किछु भाव आ सोच वंचित अछि जे निरन्तरताक विरोध करैए। विखण्डनवाद आ उत्तर आधुनिकता उत्तर संरचनावादक बाद आएल। उत्तर उपनिवेशवाद उपनिवेशक नव रूपकेँ नै मानैए आ अव्यवस्थाक सिद्धांत जेना असफल उद्देश्यकेँ उचित परिणाम नै भेटबाक कारण मानैए। संरचनावाद दमित करैबला पाश्चात्य व्यवस्था आ समाजपर चोट करैए आ ऐ सँ मार्क्सवादकेँ बल भेटलै (अलथूजर)। आधुनिकतावादी-स्थितिवादी, नव समीक्षा, संरचनावाद आ उत्तर संरचनावादक बाद विखण्डनवाद आ उत्तर आधुनिकतावाद आएल जकरा विलम्बित पूँजीवाद कहल गेल (फ्रेडरिक जेनसन)। अठारहम शताब्दीमे आधुनिक माने छल जड़विहीन मुदा बीसम शताब्दीक प्रारम्भमे एकर अर्थ प्रगतिवादी भऽ गेल। १९७० ई. क बाद आधुनिक शब्द एकटा सिद्धांतक रूप लऽ लेलक से उत्तर-आधुनिक शब्द पारिभाषिक भेल जकर नजरिमे लौकिक महत्वपूर्ण नै रहल। आधुनिक काल धरिक सभ जीवन आ इतिहास अमहत्वपूर्ण भेल आ खतम भेल। ई सिद्धांत भेल इतिहासोत्तर, विकासोत्तर आ कारणोत्तर। सत्य आ आपसी जुड़ावक महत्व खतम भऽ गेल। जादुइ वास्तविकतावादमे वास्तविक स्थितिमे जादुइ वस्तुजात घोसिआओल जाइत अछि। स्पेनिश उपन्यासकार गैब्रिअल गार्सिया मार्क्विसक “वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सोलीच्यूड” आ सलमान रुस्डीक “मिडनाइट्स चिल्ड्रेन” ऐ तरहक उपन्यास अछि। रचनाकार ऐ तरहक प्रयोग कऽ वास्तविकताकेँ नीक जकाँ बुझबाक प्रयास करै छथि। जोसेफ कोनरेड उपन्यासकेँ इतिहास कहै छथि। जोसेफ कोनरेड पोलिश भाषी रहथि मुदा अंग्रेजीक प्रसिद्ध उपन्यासकार छथि, मुदा धाराप्रवाह अंग्रेजी नै बजैत रहथि। रोलेंड बार्थेज कहै छथि जे उपन्यास इतिहास सेहो छी आ उपन्यास इतिहासक विरोध सेहो करैए। रोलेंड बार्थेज फ्रांसक साहित्यिक सिद्धांकार रहथि आ हिनकर लेखनीक प्रभाव संरचनावादी, मार्क्सवादी आ उत्तर संरचनावादी साहित्यिक सिद्धांतपर पड़ल। उत्तर आधुनिक पाश्चात्य बुर्जुआ दृश्य-श्रव्य मीडियाक प्रयोक कऽ असमता, अन्याय आ वंचितक अवधारणाकेँ मात्र शब्द कहै छथि जे समता, प्राप्ति आ न्यायक लगक शब्द अछि। गरीबी जे पाश्चात्यमे समस्या नै अछि से आइ भारतमे पैघ समस्या अछि। उत्तर आधुनिकता नारीवादक आ मार्क्सवादक विरोधमे अछि आ एकर नारीवाद आ मार्क्सवाद विरोध केलक अछि। ऐतिहासिक विश्लेषणक पक्षमे मार्क्सवाद अछि आ ओइसँ ओ अपन सिद्धांत फेरसँ सशक्त केलक अछि, संरचनावाद-उत्तर-संरचनावाद आ उत्तर आधुनिकतावादक परिप्रेक्ष्यमे। मार्क्सवाद लौकिक पक्षपर जोर दैत अछि मुदा तेँ ई उपयोगितावाद आ चार्वक दर्शनक लग नै अछि, कारण उपयोगितावाद आ चार्वकवाद मात्र शारीरिक आवश्यकताकेँ ध्यानमे रखैत अछि। नारीवादी दृष्टिकोण सेहो उत्तर आधुनिकतावादक यथास्थितिवादक विरोध केलक अछि कारण यावत से खतम नै हएत ताधरि नारीक स्थितिमे सुधार नै आओत। देवता माने प्रतिपाद्य विषय नै कि गॉड (जेना ग्रिफिथ कहने छथि।) मन्त्रार्थमे महर्षि पतञ्जलिक वैज्ञानिक मन्तव्य “यच्छब्द आह तदस्माकं प्रमाणम्” माने जे शब्द आकि मंत्रक पद कहैत अछि सएह हमरा लेल प्रमाण अछि- एकर अर्थ बादमे वेदे प्रमाण अछि- गलत रूपेँ भेल। प्लेटो कहै छथि जे कोनो कला नीक नै भऽ सकैए किएक तँ ई सभटा असत्य आ अवास्तविक अछि। प्लेटोक ई विचार स्पार्टासँ एथेंसक सैन्य संगठनक न्यूनताकेँ देखैत देल विचारक रूपमे सेहो देखल जएबाक चाही, काव्य/ नाटकक ऐ रूपेँ विरोध केलन्हि जे सम्वादकेँ रटि कऽ बाजैसँ लोक एकटा कृत्रिम जीवन दिस आकर्षित हएत। अरिस्टोटल कविताकेँ मात्र अनुकृति नै मानै छथि, ओ ऐ मे दर्शन आ सार्वभौम सत्य सेहो देखै छथि। ओ नाटकक दुखान्तकेँ आ अनुकृतिकेँ निसास छोड़ैबला कहै छथि जे आनन्द, दया आ भयक बाद अबैत अछि। सम्वाद दू तरेहेँ भऽ सकैए, अभिभाषण आ गप द्वारा। गपमे दार्शनिक तत्व कम रहत। प्राचीन ग्रीसमे कविता भगवानक सनेस बूझल जाइत छल। एरिस्टोफिनीस नीक आ अधला ऐ दू तरहक कविता देखै छथि, तँ थियोफ्रेस्टस कठोर, उत्कृष्ट आ भव्य ऐ तीन तरहेँ कविताकेँ देखै छथि। कविता आ संगीत अभिन्न अछि। मुदा यूरोपक सिम्फोनी जइमे ढेर रास वादन एके संगे विभिन्न लयमे होइत अछि, सिद्धांतमे अन्तर अनलक। यएह सभ किछु नाटकक स्टेज लेल सेहो लागू भेल। डेरीडाक विखण्डन पद्धति ऊँच स्थान प्राप्त रचना/ लेखक केँ नीचाँ लऽ अनैत अछि आ निचुलकाकेँ ऊपर। रोलेण्ड बार्थेस लिखै छथि जे जखन कृति रचनाकारसँ पृथक भऽ जाइए आ ओकर विश्लेषण स्वतंत्र रूपेँ होमए लगै छै तखन कृति महत्वपूर्ण भऽ जाइए जकरा ओ रचनाकारक मृत होएब कहै छथि। उत्तर-संरचनावाद संरचनावादक सम्पूर्ण आ सुगठित हेबाक अवधारणाकेँ माटि देलक। सौसरक भाषा सिद्धान्त- बाजब/ लिखब, वास्तविक समएक साहित्य वा ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्यक शब्दशास्त्र, महत्वपूर्ण कोनो कृति वा मनुक्ख अछि/ महत्ता एकटा भाव अछि, वास्तविक समएमे भाषा वा एकर ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य; मुदा एकरा सेहो डेरीडाक विखण्डन सिद्धान्त उल्टा-पल्टा करए लागल। लिंग एकटा जैव वैज्ञानिक तथ्य अछि मुदा महिला/ पुरुषक सिद्धान्त सामाजिकताक प्रतिफल अछि। महिला सापेक्ष साहित्य कला पुरुष द्वारा निर्मित अछि आ पुरुखक नजरिसँ महिलाकेँ देखैत अछि। साहित्यक नारीवादी सिद्धान्त ऐ समस्याक तहमे जाइए। मिथिलाक सन्दर्भमे महिलाक स्थिति ओतेक खराप नै छै मुदा मैथिली साहित्यक एकभगाह प्रवृत्तिक कारण उच्च वर्गक नारीक खराप स्थिति साहित्यमे आएल। आधुनिकीकरण तथाकथित सामाजिक रूपसँ निचुलका जाति सभमे सेहो नारीक स्थितिमे अवनति अनलक अछि। दोसर एकटा आर गप अछि जे जाति आ धर्म नारीक अधिकारकेँ कएक हीसमे बाँटि देने अछि। नारीवादी दृष्टिकोण सेहो कहैए जे सभटा सिद्धांत पुरुष द्वारा बनाओल गेल, से ओ पूर्ण व्याख्या नै कऽ सकैए। सरल मानवतावाद सिद्धांतक विरुद्ध आएल। सरल मानवतावाद कहैए जे साहित्यक सिद्धान्तक बदलामे रचनाक की मानवीय दृष्टिकोण छै, ओइमे सार्थकता छै आकि नै से सामान्य बुद्धिसँ कएल जा सकैए। अपन बुद्धिक प्रयोग कऽ रचनाक गुणवत्ता अहाँ देखि सकै छी, कोनो साहित्यिक सिद्धान्तक आवश्यकता समीक्षा लेल नै छै। मुदा सरल मानवतावाद सेहो एकटा सिद्धांत बनि गेल। सार्थक साहित्यक निर्माण एकर अन्तर्गत भेल। पोथी समीक्षामे अत्यधिक आलोचनासँ बचबाक चाही। समीक्षककेँ अपन विद्वत्ता प्रदर्शन करबासँ बचबाक चाही। अत्यधिक आलोचनाक क्रममे लोक अपन विद्वता देखबऽ लगै छथि। आलोचनाक क्रममे संयम रखबाक चाही, खराप शब्दावलीक प्रयोग समीक्षकक खराप लालन-पालन देखबैत अछि। पोथीक बिना पढ़ने समीक्षा अनैतिक अछि। उदाहरणस्वरूप कर्मधारयमे धूमकेतुक विषयमे तारानन्द वियोगी लिखै छथि- मिथिलाक संस्कृतिमे युग-युगसँ प्रतिष्ठापित साम्प्रदायिक सौहार्दकेँ रेखांकित करैत हिनक कथा “नमाजे शुकराना” बहुत महत्वपूर्ण थिक। (कर्मधारय, पृ. १२७) (!) कथाक शीर्ष देखि कऽ ऐ तरहक समीक्षा भेल अछि कारण ऐ कथामे हाजी सैहेबक नमाजक समएमे पिंजराक सुग्गा “सीता...राम...।” बजैए आ सुग्गाक पिंजराकेँ हाजी सैहेब ताधरि महजिदक देबालपर पटकै छथि जाधरि सूगा मरि नै जाइए। सईदा कानऽ लगैए आ कथा खतम भऽ जाइए। आ ई कथा समीक्षकक मतमे साम्प्रदायिक सौहार्दकेँ रेखांकित करैए! काव्यक भारतीय विचार: मोक्षक लेल कलाक अवधारणा, जेना नटराजक मुद्रा देखू। सृजन आ नाश दुनूक लय देखा पड़त। स्थायी भावक गाढ़ भऽ सीझि कऽ रस बनब- आ ऐ सन कतेक रसक सीता आ राम अनुभव केलन्हि (देखू वाल्मीकि रामायण)। कृष्ण भारतीय कर्मवादक शिक्षक छथि तँ संगमे रसिक सेहो। कलाक स्वाद लेल रस सिद्धांतक आवश्यकता भेल आ भरत नाट्यशास्त्र लिखलन्हि। अभिनवगुप्त आनन्दवर्धनक ध्यन्यालोकपर भाष्य लिखलन्हि। भामह ६अम शताब्दी, दण्डी सातम शताब्दी आ रुद्रट ९अम शताब्दीमे एकरा आगाँ बढ़ेलन्हि। रस सिद्धान्त: भरत:- नाटकक प्रभावसँ रस उत्पत्ति होइत अछि। नाटक कथी लेल? नाटक रसक अभिनय लेल आ संगे रसक उत्पत्ति लेल सेहो। रस कोना बहराइए? रस बहराइए कारण (विभाव), परिणाम (अनुभाव) आ संग लागल आन वस्तु (व्यभिचारी)सँ। स्थायीभाव गाढ़ भऽ सीझि कऽ रस बनैए, जकर स्वाद हम लऽ सकै छी। भट्ट लोलट:- स्थायीभाव कारण-परिणाम द्वारा गाढ़ भऽ रस बनैत अछि। अभिनेता-अभिनेत्री अनुसन्धान द्वारा आ कल्पना द्वारा रसक अनुभव करैत छथि। लोलट कविकेँ आ संगमे श्रोता-दर्शककेँ महत्व नै दै छथि। शौनक:- शौनक रसानुभूति लेल दर्शकक प्रदर्शनमे पैसि कऽ रस लेब आवश्यक बुझै छथि, घोड़ाक चित्रकेँ घोड़ा सन बूझि रस लेबा सन। भट्टनायक कहै छथि जे रसक प्रभाव दर्शकपर होइत अछि। कविक भाषाकेँ ओ भिन्न मानैत छथि। रससँ श्रोता-दर्शकक आत्मा परमात्मासँ मेल करैए। रसक आनन्द अछि स्वरूपानन्द। आ ऐसँ होइत अछि आत्म-साक्षात्कार। रस सिद्धान्त श्रोता-दर्शक-पाठक पर आधारित अछि। ई श्रोता-दर्शक-पाठकपर जोर दैत अछि। ध्वनि सिद्धान्त: आनन्दवर्धन ध्वन्यालोकमे साहित्यक उद्देश्य अर्थकेँ परोक्ष रूपेँ बुझाएब वा अर्थ उत्पन्न करब कहैत छथि। ई सिद्धान्त दैत अछि परोक्ष अर्थक संरचना आ कार्य, रस माने सौन्दर्यक अनुभव आ अलंकारक सिद्धान्त। आनन्दवर्धन काव्यक आत्मा ध्वनिकेँ मानैत छथि। ध्वनि द्वारा अर्थ तँ परोक्ष रूपेँ अबैत अछि मुदा ओ अबैत अछि सुसंगठित रूपमे। आ ऐसँ अर्थ आ प्रतीक दूटा सिद्धान्त बहार होइत अछि। ऐसँ रसक प्रभाव उत्पन्न होइत अछि। ऐसँ रस उत्पन्न होइत अछि। न्याय आ मीमांसा ऐ सिद्धान्तक विरोध केलक, ई दुनू दर्शन कहैत अछि जे ध्वनिक अस्तित्व कतौ नै अछि, ई परिणाम अछि अनुमानक आ से पहिनहियेसँ लक्षणक अन्तर्गत अछि। आ से सभ शब्द द्वारा वर्णित होएब सम्भव नै अछि। स्फोट सिद्धांत: भर्तृहरीक वाक्यपदीय कहैत अछि जे शब्द आकि वाक्यक अर्थ स्फोट द्वारा संवाहित अछि। वर्ण स्फोटसँ वर्ण, पद स्फोटसँ शब्द आ वाक्य स्फोटसँ वाक्यक निर्माण होइत अछि। कोनो ज्ञान बिनु शब्दक सम्बन्धक सम्भव नै अछि। ई भारतीय दर्शनक ज्ञान सिद्धान्तक एकटा भाग बनि गेल। अर्थक संप्रेषण अक्षर, शब्द आ वाक्यक उत्पत्ति बिन सम्भव अछि। स्फोट अछि शब्दब्रह्म आ से अछि सृजनक मूल कारण। अक्षर, शब्द आ वाक्य संग-संग नै रहैए। बाजल शब्दक फराक अक्षर अपनामे शब्दक अर्थ नै अछि, शब्द पूर्ण हेबा धरि एकर उत्पत्ति आ विनाश होइत रहै छै। स्फोटमे अर्थक संप्रेषण होइत अछि मुदा तखनो स्फोटमे प्राप्ति समए वा संचारक कालमे अक्षर, शब्द वा वाक्यक अस्तित्व नै भेल रहै छै। शब्दक पूर्णता धरि एक अक्षर आर नीक जकाँ क्रमसँ अर्थपूर्ण होइए आ वाक्य पूर्ण हेबा धरि शब्द क्रमसँ अर्थपूर्ण होइए। सांख्य, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा आ वेदान्त ई सभ दर्शन स्फोटकेँ नै मानैत अछि। ऐ सभ दर्शनक मानब अछि जे अक्षर आ ओकर ध्वनि अर्थकेँ नीक जेकाँ पूर्ण करैत अछि। फ्रांसक जैक्स डेरीडाक विखण्डन आ पसरबाक सिद्धान्त स्फोट सिद्धान्तक लग अछि। अलंकार सिद्धान्त: भामह अलंकारकेँ समासोक्ति कहै छथि जे आनन्दक कारण बनैए। दण्डी आ उद्भट सेहो अलंकारक सिद्धान्तकेँ आगाँ बढ़बै छथि। अलंकारक मूल रूपसँ दू प्रकार अछि, शब्द आ अर्थ आधारित आ आगाँ सादृश्य-विरोध, तर्कन्याय, लोकन्याय, काव्यन्याय आ गूढ़ार्थ प्रतीति आधारपर। मम्मट ६१ प्रकारक अलंकारकेँ ७ भागमे बाँटै छथि, उपमा माने उदाहरण, रूपक माने कहबी, अप्रस्तुत माने अप्रत्यक्ष प्रशंसा, दीपक माने विभाजित अलंकरण, व्यतिरेक माने असमानता प्रदर्शन, विरोध आ समुच्चय माने संगबे। औचित्य सिद्धान्त: क्षेमेन्द्र औचित्य-विचार-चर्चामे औचित्यकेँ साहित्यक मुख्य तत्व मानलन्हि। आ औचित्य कतऽ हेबाक चाही? ई हेबाक चाही पद, वाक्य, प्रबन्धक अर्थ, गुण, अलंकार, रस, कारक, क्रिया, लिंग, वचन, विशेषण, उपसर्ग, निपात माने फाजिल, काल, देश, कुल, व्रत, तत्व, सत्व माने आन्तरिक गुण, अभिप्राय, स्वभाव, सार-संग्रह, प्रतिभा, अवस्था, विचार, नाम आ आशीर्वादमे। कंपायमान अछि ई ब्रह्माण्ड आ ई अछि कंपन मात्र। कविता वाचनक बाद पसरैत अछि शान्ति, शान्ति सर्वत्र आ शान्ति पसरैत अछि मगजमे। अनुवाद समालोचना: सर्जनात्मक साहित्यमे नाटक सभसँ कठिन अछि, फेर कविता अछि आ तखन कथा, जँ अनुवादकक दृष्टिकोणसँ देखी तखन। नाटकमे नाटकक पृष्ठभूमि आ परोक्ष निहितार्थकेँ चिन्हित करए पड़त संगहि पात्र सभक मनोविज्ञान बूझए पड़त। कवितामे कविताक विधासँ ओकर गढ़निसँ अनुवादकक परिचित भेनाइ आवश्यक, जेना हाइकूक मैथिलीसँ अंग्रेजी अनुवाद करै बेरमे मैथिलीक वार्णिक ५/७/५ क मेल जँ अंग्रेजीक अल्फाबेटसँ करेबै तँ अहाँक अनूदित हाइकू हास्यास्पद भऽ जाएत कारण अंग्रेजीमे ५/७/५ सिलेबलक हाइकू होइ छै आ मैथिलीमे जेना वर्ण आ सिलेबलक समानता होइ छै से अंग्रेजीमे नै होइ छै। ऐ सन्दर्भमे ज्योति सुनीत चौधरीक मैथिलीसँ अंग्रेजी अनुवाद एकटा प्रतिमान प्रस्तुत करैत अछि। कविताक लय, बिम्बपर विचार करए पड़त संगहि कविता खण्डक कविताक मुख्य शरीरसँ मिलान करए पड़त। कथामे कथाकारक आ कथाक पात्रक संग कथाक क्रम, बैकफ्लैशक समय-कालक ज्ञान आ वातावरणक ज्ञान आवश्यक भऽ जाइत अछि। रामलोचन शरणक मैथिली रामचरित मानस अवधीसँ मैथिलीमे अनुवाद अछि मुदा दोहा, चौपाइ, सोरठा सभ शास्त्रीय रूपेँ अनूदित भेल अछि। सिद्धान्तक आवश्यकता की छै? बाल गुरु ओम नाम रहै ओहि बच्चाक। मंशा नाम रहै ओहि बुच्चीक। दिल्लीक कोनो आवासीय परिसरमे दुनु गोटेक परिवार रहै छलै। बच्चा रहए मिथिलाक आ बुच्ची रहए पंजाबक। बच्चाक माए गृहणी आ पिता नोकरिहारा। बुच्चीक माए आ पिता दुनू नोकरिहारा। एह, ओकर पिताक मुरेठा देखैबला रहै छल। मंशाक माए अपन पतिकेँ सरदारजी कहै छलि। मंशाक घरमे ओड़ीसाक एकटा बचिया नोकरी करै छलि, महुआ। वैह मंशाक देख-रेख करै छलि। आवासीय परिसरक घासक पार्कमे मंशाकेँ महुआ आनै छलि। ओम ओहि पार्कमे अपन माएक संग अबै छल। मंशा आ ओम ओही पार्कमे खेलाइ-धुपाइ छल। ओमक जन्मदिनमे मंशा अबिते छली। माए ओकरा लेल उपहार कीनि कऽ राखि दैत छलीह। महुआ मंशाकेँ लऽ कऽ समएसँ ओमक जन्मदिनमे पहुँचि जाइ छलीह। ओम आ मंशा दुनूक चारिम बरख पूरल छलन्हि आ पाँचम चढ़ल छलन्हि। मुदा ओहि आवासीय परिसरमे एकटा बदमाश बच्चा आबि गेल। ओ सभ बच्चाकेँ तंग करए लागल। ओकर नाम रहै सुसेन। “गै मंशा, दुजुट्टी किए बन्हने छेँ?” “तोरा की?” “गै मंशा, मुँह किए फुलेने छेँ?” “मुँह किए फुलेने रहब?” “मंशा गै, तोहर दोस ओम किए एहन गन्दा छौ?” आब तँ मंशाकेँ ततेक तामस भेलै जकर कहब नहि। ओ जोर-जोरसँ बजए लागलि- “ओम हमर दोस छी। जे एकरा गन्दा कहैए से अपने गन्दा अछि।” मंशा ओमक हाथ पकड़ने आगाँ बढ़ि गेलि आ सभ गप ओमक माएकेँ कहलकै। “हम सुसेनपर तमसाइ छलहुँ आ ई चुपचाप ठाढ़ छल।” मंशा ओमक माएकेँ कहलक। “किए ओम। अहाँकेँ सुसेन गन्दा कहलक आ अहाँ चुपचाप ठाढ़ रहि गेलहुँ।”- ओमसँ ओकर माए पुछलखिन्ह। “माए, ओ हमरा नै चिन्हैए। नव आएल अछि। तेँ हमरा गन्दा कहलक। जखन ओ हमरा चीन्हि जाएत तँ थोड़बेक गन्दा कहत।” माए आँखिमे नोर आबि गेलन्हि। हुनको पहिने तामस आबि गेल छलन्हि जे हमर बेटा किए चुप रहि गेल। ओ सुसेनकेँ किछु कहलक किए नै। मुदा तखने हुनका मंशा देखाइ पड़लन्हि। देखियौ कतेक निश्छल अछि। आ दुनू बच्चाकेँ ओ चुम्मा लेमए लगलीह। एकटा पत्र शुभाशीष। हम एतय कुशल छी। अहाँ सबहक कुशलक हेतु सतत् भगवानसँ प्रार्थी रहैत छी। आगाँ समाचार ई जे अहाँ सभ हमर खोज खबरि लेनाइ बिल्कुले बिसरि गेल छी। फोनो तँ छोड़ू, चिट्ठीयोसँ गप्प केना महिनो बीति जाइत अछि। कमसँ कम सप्ताहमे नहि तँ महिनोमे एको बेर तँ मायक लेल गप्प करबाक समय निकालू। एतेक मोटका-मोटका किताब अहाँ लिखैत छी किन्तु मायसँ गप्प करबाक फुर्सति नहि अछि। अहाँक किताबक खिस्सा आ कविता सभ दीदी सुनेलक अछि। बहुत मार्मिक लगैत अछि। परन्तु अपन माँक प्रति कोनो जिज्ञासा नहि होइत अछि, जे कतय रहैत अछि आ कोना अछि। भाएसँ अहाँ अपने समय-समयपर गप्प करू जे हम कतऽ कतेक दिन रहब। गाममे आब हमरा नहि रहल होएत कारण एतए कोनो व्यवस्था नहि अछि आ कियो पुरुख नहि रहैत छथिन्ह। अहाँ सभ भाए-बहिनमे छोट छी किन्तु घरमे अहींकेँ घरक व्यवस्था आ इन्तजामक भार शुरुहेसँ अछि। किन्तु एम्हर अहाँ ध्यान नहि दैत छिऐक। फोनपर अहाँसँ गप्प करबाक बड्ड मोन होइत रहैत अछि। बच्चा सभसँ सेहो गप करबाक मोन होइत रहैत अछि। बच्चा सभकेँ दू-तीन दिनपर बासँ गप करबा लेल कहबै। जमाएकेँ देखैत रहै छियन्हि जे सभ दू-तीन दिनपर अपन माँसँ गप करैत रहैत छथिन्ह, से हमरो सौख लगैत रहैत अछि जे हमर बेटा सभ केहन अछि जे कहियो माँसँ गप्प करबाक मोन नहि होइत छैक। सभ कहैत अछि जे अहाँकेँ कोन चीजक कमी अछि, से हमरो चीजक कमी तँ नहि अछि मुदा धिया- पुताक हम प्रेमक भूखल छी। पुतोहु, अहाँकेँ एखन घरक सभटा काज करए पड़ैत होएत। बड्ड मेहनति होइय होएत, मुदा तैयो हमरोपर ध्यान राखब। हम बड्ड घबराएल रहै छी तेँ जे फुराएल से हम चिट्ठीमे लिखा देलहुँ। अहाँ सभक प्रेमक भूखल- अहींक माँ। माए-बेटाक मनोविज्ञान बेटा, गाम आबैक मोन नै होइए। पुतोहुसँ आब झगड़ा नै होइए। महीस दूध दऽ रहल अछि... मुदा टोलबैय्या सभ एहि लेल जड़ि रहल अछि। ... ... अहाँक माए। “अएँ यै , अहाँक दूध होइये तँ टोलबैय्या सभ किएक जड़त? आ अहाँ से बुझै कोना छिऐक?” से बूढ़ीसँ पुछलकन्हि लिखिया। तँ कहलन्हि बूढ़ी- “जे ओ सभ मोने-मोने जड़ैए, से हम सभटा बुझै छिऐ।” चिट्ठी बेटा लग पहुँचि गेलन्हि। मुदा बेटाकेँ देखू- “अएँ यौ- हमरा दूध होइये तँ लोक सभ किएक जड़ैए? माए लिखलक अछि।” पढ़ुआ बजलाह- “टोलबैय्या सभ किएक जड़त? आ अहाँ से बुझै कोना छिऐक, माए ने लिखलन्हि अछि?” तँ कहलन्हि बेटा- “जे मोने-मोने जड़ैए, से हम सभटा बुझै छिऐ।” हजार कोस दूर रहि रहल निरक्षर दुनू माए-बेटाक बीचक विचार-तंतुक सादृश्यता! माएपर कतेक विश्वास छै? माएकेँ बेटापर आ बेटाकेँ माएपर विश्वास छै, दोसरकेँ विश्वास नै हौ तकर कोनो चिन्ता नै। माए-बेटाक मनोविज्ञान ! शारदानगर दुर्गा पूजाक नाटकक दू दृश्यक बीच नर्तकीक नाच। “शारदानगरक ढोढ़ाँइ दस टाका तहे-तहे दिलसँ दै छथि”- नर्तकी रुखसाना बजै छथि। “बनारसक छै रौ।” “धुर, मुजफ्फरपुरसँ लऽ अनै छै आ झुट्ठो बनारसक..”। “हौ मुदा ई शारदानगर कोन गाम छै”। “बुझलही नहि। पट्टी टोलक जे पाइबला सभ रहै, से सड़कक ओहिपार टोल बना लेलकै आ लक्ष्मीपुर नाम राखि लेलकै- जे पट्टी टोलक हम सभ नहि छी। लक्ष्मी आ सरस्वतीक झगड़ा बुझल नहि छौह। से भगवानक झगड़ाकेँ सोझाँ अनने अछि। पट्टी टोल गाम गरिबहा सभक अछि, सभटा अछि महिसबार सभ। मुदा भगवानक झगड़ामे गामक नाम सरस्वतीक नामपर शारदानगर राखि लै गेल अछि।” “ चल नर्तकीकेँ तँ अही बहन्ने पाइ दै जाइ छै”। प्रोफेसर प्रेमशंकर सिंह मैथिली बाल काव्यधारा कविता सकल जीवनकेँ अपनामे समाहित करैत चमत्कारे नहि, प्रत्युत सत्योद्घाटन आ आत्मान्वेषण सेहो थिक। मैथिली काव्यधाराक सुदीर्घ परम्पराक अवगाहनोपरान्त प्रतिभाषित होइत अछि जे बाल काव्य-धारासँ कविताकार सर्वदा विमुख रहलाह। बाल-काव्य-धाराक इतिहास कतेक प्राचीन अछि ताहि विषयपर विवाद भऽ सकैत अछि, किन्तु सत्यता ई अछि जे ई एक नूतन विधाक रूपमे विकसित भेल जकर इतिहास विगत शताब्दीसँ प्रारम्भ होइछ, कारण एहिसँ पूर्व बाल साहित्यकेँ गम्भीरतासँ नहि अंगीकार कयल जाइत छल आ ई बुझल जाइत छल जे बाल-साहित्यक रचनाकार ओतेक प्रबुद्ध नहि होइत छथि, जतेक अन्य विधाक रचनाकार। किन्तु शनैः-शनैः ई धारणा अघोषित रूपसँ पोषित-पल्लवित कयनिहारकेँ पाछाँ हटय पड़लनि। समय ई सिद्ध कऽ देलक अछि जे बाल साहित्यक सृजनिहारकेँ साहित्यक अन्य विधाक तुलनामे अधिक मौलिकता अपेक्षित अछि। एतबे नहि शिशुक मनोविज्ञानकेँ जनबाक-बुझबाक क्षमता सेहो परमावश्यक अछि। बाल साहित्यान्तर्गत विशेष रूपसँ बाल-काव्य-धाराक प्रसंगमे कहल गेल धारणादिकेँ तोड़ि देलक आ एहि विधामे कविताकार अधिक उन्मुख भेलाह। मैथिलीमे नव जागरणक सूत्रपात भेल बीसम शताब्दीमे जकरा स्वर्णयुगक नामे उद्घोषित कयल गेल आ बाल-काव्यधाराक दिशामे अन्वेषण आ अनुसन्धान स्वातंत्र्योत्तर कालमे सर्वाधिक कविताकार एक स्वस्थ वातावरणमे सृजनरत भेलाह। एही कालावधिमे साहित्य-चिन्तक लोकनि नूतन भावनासँ उत्प्रेरित भऽ मिथिलांचल एवं प्रवासी मैथिल जनसमुदाय बाल पत्रिकाक प्रकाशनक शुभारम्भ कयलनि। बाल पत्रिकाक प्रकाशनोपरान्त बाल साहित्यान्तर्गत बाल-काव्यधाराक प्रस्फुटन भेलैक जे मात्र पृथक विधोक रूपमे नहि प्रतिष्ठित भेल, प्रत्युत पूर्णतः शिशु काव्यक सृजनक परम्पराक सूत्रपात भेलैक तथा एकर नेओकेँ मजगूत करबाक दिशामे ओहि कविताकारकेँ उपेक्षाक दृष्टिएँ नहि देखल जा सकैछ। वस्तुतः ई श्रेय आ प्रेय छैक स्वातन्त्र्योत्तर युगकेँ जखन बाल-पत्रिकामे “शिशु” (१९४९), “बटुक” (१९४९), “धीयापूता” (१९५७), “नेना भुटका” (१९९६) आ “बाल मिथिला” (१९९८) क प्रकाशनक शुभारम्भ भेलैक। उपर्युक्त पत्रिकादिक माध्यमे आरम्भिक युगक सम्भावना प्रारम्भ भेल। बाल पत्रिकाक अतिरिक्त अन्यान्य पत्रिकादिमे सेहो कविताकार उभरलाह जे शिशुक लेल शाश्वत काव्यक सृजन कयलनि। उपयुक्त पत्रिकादिमे शताधिक कविताकारक शताधिक काव्यधारा प्रवाहित भेल, किन्तु दुर्योगक विषय थिक जे कोनो काव्य-संग्रह प्रकाशमे नहि आबि सकल। पटनासँ प्रकाशित “मिथिला मिहिर” (१९६०) मे शिशुकेँ आकर्षित करबाक लेल तथा काव्य-यात्राकेँ प्रोत्साहित करबाक उद्देश्यसँ “नेना भुटकाक चौपाड़ि” नामे दुइ पृष्ठ अवश्य सुरक्षित कयलक, किन्तु ओहिमे बुझौअलि एवं चुटुक्काक संगहि संग यदाकदा कविता सेहो प्रकाशित भेल जे काव्य-यात्राकेँ आगाँ बढ़यबामे सहायक सिद्ध भेल। हँ, एतबा सत्य अछि जे बाल दिवसक अवसरपर ११ नवम्बर १९७९ क अंक एहि प्रवृत्तिक काव्य-धाराकेँ प्रोत्साहित करबाक दिशामे सफल प्रयासक शुभारम्भ कयलक। मैथिली बाल-काव्य-धाराक शुभारम्भ जे मिथिलांचलक शिशुक मानसिक आ भावनात्मक पोषण कयलक; ओकर मुक्त हँसी, उमंग आ मिठगर खिलखिलाहटि काव्यमे प्रवेश पौलक। बाल गोपालक कल्पना आ जिज्ञासाक क्षितिजक विस्तार शनैः-शनैः होमय लागल आ ओकरा सहृदय व्यक्ति आ उत्तमोत्तम नागरिक बनबाक दिशामे जबर्दस्त नेओ देलक। मैथिलीमे उपलब्ध बाल काव्यधाराकेँ दुइ श्रेणीमे विभाजित कऽ कए ओकर शृंखलाबद्ध इतिहासक लेखा-जोखा कयल जा सकैछ- १.मौलिक काव्ययात्रा २.अनूदित काव्ययात्रा मौलिक काव्य-धाराक इतिहासमे विगत शताब्दीक नवम दशकमे दस्तक देलनि उपेन्द्र झा “व्यास” (१९१७-२००२)। हुनकर “अक्षर परिचय” (सत्येन्द्रनाथ झा, श्रीभवन, बोरिंग रोड, पटना, १९८४) प्रकाशमे आयल जाहिमे शैशवावस्थाक आँखिकेँ खोलबाक ओ उपक्रम कयलनि। एहिमे “अ” सँ “ज्ञ” धरि प्रत्येक वर्णपर सरल-सुबोध बाल-काव्यक सृजन कऽ ओ एकर विकास यात्रामे नव आयामक सृष्टि कयलनि। एहिमे कवि स्वदेश प्रेम, उपदेश, चेतावनी, आत्मरक्षा, मातृभाषा प्रेम, पाप-पुण्य आ जीवनक विविध रूपकेँ उद्घाटित कयलनि यथा- जलमे बहुतो जीव रहैछ झट दऽ करब नीक नहि होइछ टटका जलसँ खूब नहाउ ठकक संगमे ने पड़ी बाउ डमरू डिमडिम बजाबी आनि ढढ़क-ढढ़क नहि पीबी पानि (अक्षर परिचय, पृष्ठ-३) मैथिली बाल-काव्ययात्राक परिप्रेक्ष्यमे एकैसम शताब्दी विशेष उपजाऊ भूमि कहल जा सकैछ। एहि कालावधिमे बाल काव्यधाराक अभूतपूर्व विकास भेलैक आ कतिपय कविताकार एहि दिशामे उन्मुख भेलाह जे एकरा सम्वर्द्धित करबाक दिशामे प्रयास करब प्रारम्भ कयलनि। वर्तमान शताब्दीक प्रथम दशकमे लीक तोड़ि कऽ स्वतः बाल-काव्यधाराक अन्तर्गत सशक्त हस्ताक्षर कयलनि जनकवि जीवकान्त (१९३६) जनिक चारि बाल काव्य संग्रह गाछ झूल झूल (चतुरंग प्रकाशन, बेगूसराय, २००४), छाह सोहाओन (शेखर प्रकाशन, पटना (२००६), खीखिरिक बीअरि (किसुन संकल्प लोक, सुपौल, २००७) एवं हमर अठन्नी खसलइ वनमे (जखन-तखन, दरभंगा, २००९) प्रकाशमे आयल अछि जाहिमे कुल मिलाकऽ डेढ़ सयक लगधक कविता संकलित अछि। उपर्युक्त संग्रहादिक कवितादि बाल-काव्यधाराक समुचित प्रतिनिधित्व करैत अछि जाहिमे कवि बालमनक भावनाकेँ देखबाक प्रयास कयलनि अछि। उपर्युक्त कवितादि हृदयकेँ स्पर्श कयनिहार थिक जे शनै:-शनैः बाल मनकेँ हृदयस्पर्शी भऽ आगाँ बढ़ि जाइछ तथा पाठक ओकरा ताधरि देखैत रहैछ जाधरि ओ मानव चक्षुसँ अदृश्य नहि भऽ जाइछ। कवि पहिने स्वयंकेँ डुबौलनि अछि आ बाल मनकेँ डूबबाक हेतु विवश करैत छथि। हिनक बाल-काव्य यात्राकेँ चारि भागमे विभाजित कयल जा सकैछ, १.वात्सल्य भावमय २.वात्सल्यक समय ३.शिशु बोध ४.शिशु कल्पना। हिनक बाल-काव्यक सर्वगम्यता आ सहज संवेद्यता सोझ अभिव्यक्तिक कारणेँ नहि, प्रत्युत जीवन प्रसंगक भूमिकामे कोनो एक भावक्षणकेँ उपस्थित करबाक कारणेँ ओहिमे ओ गुण उत्पन्न भेल अछि, जकरा हम सहज मानवीयता कहि सकैत छी। जीवनक विविध यथार्थ प्रसंगसँ सम्बन्धित संवेदनात्मक प्रतिक्रिया हिनक बाल-काव्यक मूलाधार हैबाक संगहि संग हुनक व्यक्तित्वक विशेषतादिपर हमर दृष्टि केन्द्रित भऽ जाइत अछि। स्थल-स्थलपर एहन अनुभव होइत अछि जेना ओ अपन भावकेँ वैक्यूममे राखि कऽ पुनः ओहिपर काव्य सृजन नहि कयलनि, प्रत्युत टटका सम्वेदनात्मक प्रतिक्रियाकेँ सहज रूपेँ पद्यबद्ध कयलनि। सम्भवतः एहने टटका सम्वेदनात्मक प्रतिक्रियादिकेँ सहज रूपसँ काव्यमे महत्व दऽ कए पद्य-बद्ध कऽ प्रक्रियामे ओ बाल-काव्य-यात्रा अन्तर्गत हस्ताक्षर कयलनि। हिनक बाल कवितादिमे खेलकूद, पढ़ाइ-लिखाइ, प्राकृतिक सुषमाक विविध स्वरूप, विविध जीवनोपयोगी सामग्री, बाध-वन, सर-सम्बन्धी, जीव-जन्तु, इतिहासोद्भव महापुरुषक जीवन वृत्तान्त आ आपसी लड़ाइ-झगड़ा सब हुनका सोझाँ होइत छनि आ अपन आनन्दी स्वभावक कारणेँ हुनका एहि सबमे रस-बोध भेलनि। जीवकान्तक साहित्यिकता अपन सभ्यता-संस्कृति आ भाषाक संग अपनत्वक संगहि काव्यात्मक अनुभव तथा भाषाक रचनात्मक प्रयोग थिक। इएह कारण अछि जे हुनक अपन पृथक् रंग, पृथक् पहचान तँ छनिहे जे ओ परम्परागत व्यञ्जनाक संग नव बात कहबाक उपक्रम कयलनि। ओ अनुभव सत्यकेँ सार्थक एवं रचनात्मक आयाममे बाल-काव्य यात्रा कयलनि। ओ अपन सोचकेँ, काव्य-यात्राकेँ एक नव क्षितिजक अन्वेषण करैत, यथार्थसँ सरोकार रखैत, विसंगति आ विद्रूपताक बीच रस्ता बनबैत सार्थक जीवन मूल्यकेँ स्थापित करबाक अनवरत प्रयासमे लागल छथि। हिनक बाल-काव्य-यात्राक प्रक्रियाक केन्द्र थिक बाल-मन जाहिमे कवि परिश्रमक महत्ताकेँ प्रतिपादित करैत ओकर मनकेँ एहि दिस आकर्षित कयलनि अछि, देअए जीवन उत्सव तत्व जीवन थिक बड़का टा उत्सव खटने सभ सुख पाबी खटबे थिक देशक आजादी खटिकए स्वर्ग बसाबी (हमर अठन्नी खसलइ वनमे, पृष्ठ-३४) जीवकान्तक बाल-काव्य-यात्राक अनुशीलन आ मननसँ स्पष्ट अछि जे लोकसाहित्यान्तर्गत शिशुसँ सम्बन्धित लोक प्रचलित कहबी अछि, ताहिसँ ओ पर्याप्त अनुप्राणित छथि यथा गाछ झूल-झूल मे पीपर, बिरिछ तर, झोंकी हवामे, जामु, बाघक मौसी इत्यादि उपर्युक्त परिवेशमे रचित अछि। बच्चा सब कहैत अछि: मैनाक बच्चा सिलौरीया रे दू गो जामुन गिरा दे उपर्युक्त भावसँ अनुप्राणित भऽ ओ बाल-काव्य सृजन कयलनि: जुमा-जुमा कए ढेपा मारहि जामु गिरा दे, बबलू भैया कारी-कारी जामु खसाबहि गाछ झखा दे, बबलू भैया (गाछ झूल-झूल, पृष्ठ-२८) मैथिलीक विपुल लोकोक्तिक प्रभाव हिनक काव्य-यात्रामे दृष्टिगत होइछ यथा: जाड़ बड़ जाड़, गोसाइँ बड़ पापी तपते खिचड़ि खुआ दे गे काकी (मैथिली लोकोक्ति कोश, पृष्ठ-३१०) उपर्युक्त लोकोक्तिसँ अनुप्राणित भऽ ओ बाल काव्य-यात्राक श्रीगणेश कयलनि यथा: टटका पानि झाँपि कए राखी फटकि बना कए चाउर बेराबी पीरा-पीरा दाल दरड़ि ली अल्लू-कोबी काटि मिलाबी चूल्हि पजारि धरी टोकनीमे सभ सामिग्री मद्धिम धाह पानि टभकाबी हरदि जोग दए पियर बना दे अटकरसँ किछु नोन खसाबी जीर-तेलकेँ धाह देखा कए, सोन्ह बनबिहेँ छौंकि-सानि कए मझनी हमरा लेल परसि दे खिच्चड़ि खा गरमयलहुँ, से हम नहिए कापी तपते खिच्चड़िसँ, टनकओलनि ललकी काकी (गाछ झूल-झूल, पृष्ठ-५५) वस्तुतः शिशु काव्य-धारामे यथार्थतः वैह कवि प्रविष्ट कऽ सकैत छथि, जनिका भाषापर अद्भुत् अधिकार छनि आ वैह सफल भऽ सकैत छथि जे बाल सुलभ चंचलताक संगहि शब्दाडम्बर विहीन भाषाक प्रयोगमे सिद्धहस्त छथि। वस्तुतः कवितामे भाषा नहि, प्रत्युत शब्द होइत अछि। शब्द-अर्थ आ अन्तर्निहित ध्वन्यात्मक लयकेँ जीवकान्त सूक्ष्मताक संग चिन्हलनि आ ओकर सहज अभिव्यक्तिक सादगीमे बदलबाक क्षमता रखैत ओ बाल-काव्यकला रूपकेँ प्रभावित कयलनि। जीवकान्तक बाल-काव्य-धारा समकालीन काव्य-धारासँ सर्वथा पृथक् अछि। दैनंदिन जीवनक छोटसँ छोट घटनादि आ जीवन स्थितिक हल्लुक निजी स्पर्श पाबि कऽ स्वयं कविताक शक्ल धारण कऽ लेलक अछि। हुनक दृष्टिकोण स्पष्ट अछि आ बिनु कोनो रूढ़िकेँ अपन गढ़ल मुहाबरासँ ओ अपन बात बाल-काव्यमे कहलनि अछि। हिनक बाल-काव्य पारिवारिक आ आत्मीय ऊष्माक काव्य थिक। हिनक काव्यमे जीवन्त व्यक्तिक बोली-चालीक छवि प्रस्तुत करैत अछि। हुनक एहि प्रवृत्तिक काव्य भाषा आ मुहाबराक एहन हिस्सा बनि गेल अछि जे समकालीन काव्य-भाषाक अनुपम उदाहरण अछि। स्वाभाविक रूपसँ हिनक बाल-कवितामे रोजमर्राक, हमर दिनचर्या आ घरौआ जीवनक वस्तुजात सदैव उपस्थित रहल अछि। जतय धरि उपमादि आ रूपकमे उपर्युक्त वस्तुक प्राथमिकता अछि जेना देहरी, जुत्ता-चप्पल, डोलमडोल, किकिआइ, झक्कड़, मुहदूबर, सुटकल, विलायल, छिच्चा, छिछरी, भरोस, नोछरा-नोछरी, सकचुन्नी, रोइयाँ, मछरी, फाँक, कटारी, पछारी, खत्ता, ठेलमठेला, उछाह, अगुताइ, रकटल, बेरबाद, लिबलिब, लसकल, फनकइ, पथार, गाछ-बिरीछ, अनघोल, फलिया, गाय, बकरी, बनैया, नेसइ, खोंटब, औंघी, सुटुकि, वेथा, घाम, घमौरी, भीड़-भरक्का, पतनुकान इत्यादिक उपस्थिति बालोचित सिद्ध करैत अछि। हिनक बाल-काव्यमे एक रहस्यपूर्ण, नैसर्गिक गीतमयता अछि जे स्वयं बिम्ब, कथ्य, रूपक शब्द चयन आ कथनक भंगिमा अत्यन्त चमत्कारी रहितहुँ सरल आ हृदयस्पर्शी अछि। जीवनक छोट-छोट अनुभव, प्राकृतिक दृश्य हुनक कवितामे एक नव स्फुरणक संग मुखरित भेल अछि। एहि काव्यमे हिनक आत्मा, मनःस्थिति आ मानसिक व्यथा इत्यादिक वैयक्तिक कल्पना-प्रधानता उपलब्ध होइत अछि। हिनक बाल-काव्य-धारामे मिथिलांचलक आडम्बरहीन हरियर कचोर ग्रामीण परिवेशक अद्भुत् सामंजस्य अछि जतय ओ जीवन व्यतीत कऽ रहल छथि। जीवकान्तक बाल कविताक वैशिष्ट्य थिक जे ओहिमे बच्चा सदृश टटका सम्वेदना, ओकर चंचलता तथा चिदानन्द भावक प्राचूर्य अछि। एहि दृष्टिएँ अनुशीलनोपरान्त ई स्वीकार करय पड़ैछ जे मैथिलीमे हिनक बाल-काव्य-धारा अनुपम धरोहर थिक। वर्तमान दशकमे मैथिली बाल-काव्यधारामे बहुविधावादी प्रतिभासम्पन्न युवा कवि सशक्त हस्ताक्षर कयलनि ओ थिकाह गजेन्द्र ठाकुर (१९७१) जे प्रवासी रहितहुँ मातृभाषानुरागसँ उत्प्रेरित भऽ एहि क्षेत्रमे अपन उपस्थिति दर्ज करौलनि जनिक शताधिक बाल कवितादि “कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक” (२००९) मे संकलित अछि। एहिमे संग्रहित समस्त कवितादिक विषय-वैविध्यकेँ उद्घाटित करैत कवि बालमनक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण, ओकर नानाविध औत्सुक्य, प्रसन्नता, टीस, वेदना, प्राकृतिक सुषमा, बालोचित चांचल्य, वर्षा, रौद-बसात, खेलकूद, बाल श्रमिकक वेदना, किंडर गार्टेन स्कूलक क्रिया-कलाप, अवकाश भेलापर प्रसन्नता, खूजल रहलापर अप्रसन्नता तथा स्कूल जयबामे हनछिन करब आदि-आदि भावक विश्लेषण कवि अत्यन्त सूक्ष्मताक संग विलक्षण ढंगे कयलनि अछि। शिशुकेँ पितामह आ मातामहक अधिक स्नेह भेटैछ, जाहि कारणेँ हुनका सभक लग रहबाक ओ बेसी आकांक्षी रहैछ, कारण ओ दुलार-मलार ओकरा समयाभावक कारणेँ पारिवारिक परिवेशमे अन्य सदस्यसँ नहि भेटि पबैछ। ओकर विविध जिज्ञासाक यथोचित उत्तर ओकरा ओतहि भेटैछ, जाहि कारणेँ ओ सतत हुनका सभक समीप रहब पसिन्न करैछ। बालमन एतेक बेसी सेनसेटिभ होइछ जे सामाजिक परिवेशकेँ देखि ओकरा आत्मबोध भऽ जाइछ सम्पन्नताक आ विपन्नताक। तकर यथार्थ स्थितिक चित्रण निम्नांकित पंक्तिमे कवि कयलनि अछि यथा- गत्र-गत्र अछि पाँजर सन हड्डी निकलल बाहर भेल भात धानक नहि भेटय तँ गद्दरियोक किए नहि देल औ बाबू गहूमक नहि पूछू अछि ओकर दाम बेशी भेल गेल ओ जमाना बड़का बात गप्पक नहि खेलत खेल (कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक, पृ. ७.१३७) बालमनक प्रसन्नताक भाव कवि व्यक्त कयलनि अछि जखन ओकरा स्कूल जयबासँ छुट्टी भेटि जाइछ, तकर दिग्दर्शन तँ करू: आइ छुट्टी काल्हि छुट्टी घूमब-फिरब जाएब गाम नाना-नानी मामा-मामी चिड़ै-चुनमुनी सभसँ मिलान बरखा बुन्नी आएल मेघ दहोदिस भागल कारी मेघ उज्जर मेघ घटा पसरल चिड़ै-चुनमुनी आएल (कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक, पृ. ७.८५) हाथीकेँ जखन शिशु प्रथमे प्रथम देखैछ तँ ओ आश्चर्यित भऽ अकस्मात प्रफुल्लित भऽ जाइछ ओ सहसा बाजि उठैछ, हाथीक सूप सन कान” (कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक, पृ. ७.८४) आ “हाथीक मुँहमे लागल पाइप” (कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक, पृ. ७.७१) । बाल श्रमिकक व्यथा सेहो सोझाँ आएल अछि। जेना- फेर आएल जाड़ कड़कराइत अछि हार बिहारी!! लागए-ये भेल भोर गारिसँ फेर शुरू भेल प्रात बिनु तैय्यारी (कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक, पृ. ७.९०) जतेक दूर धरि भाषा प्रयोगक प्रश्न अछि एहिमे युवा कवि अपन उदार प्रवृत्तिक परिचय देलनि। भूमण्डलीकरणक फलस्वरूप भिन्न-भिन्न भाषादिक बहुप्रचलित हल्लुक शब्दादि मैथिलीमे धुड़झाड़ प्रयोग भऽ रहल अछि तकरा शिशु कोना आत्मसात कऽ अन्तर्राष्ट्रीय भाषा सीखि जाइछ, तकर कतिपय उदाहरण एहि कवितादिमे यत्र-तत्र उपलब्ध होइत अछि। शिशु अपन तोतराइत बोलीमे एहन-एहन शब्दकेँ अनुकरण करबाक प्रयास करैछ जकर फलस्वरूप ओकर भाषा ज्ञानक विस्तार अनायासे भऽ जाइछ तकर कतिपय उदाहरण एहिमे भेटि जाइछ, यथा: ट्रेन गाड़ी धारक कातमे आएल स्टेशन छुटल बातमे ट्रेन चलल दौगल भरि राति सुतल गाछ बृच्छ भेल परात (कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक, पृ. ७.६३) अत्याधुनिक परिवेशमे शिशुकेँ अत्यधिक लगाव खेल-कूदमे भऽ गेलैक अछि जे ओ अपन पुश्तैनी खेल सर्वथा बिसरि गेल अछि आ पाश्चात्य खेलक प्रति आकर्षित भऽ गेल अछि। कवि बालकक एहि चंचलताक विश्लेषण एहि प्रकारेँ कयलनि अछि: हम बाबा करू की पहिने बॉलिंग आकि बैटिंग बॉलिंग कय हम जायब थाकि बैटिंग करि हम खायब मारि? पहिले दिन तूँ भाँसि गेलह से सूनह ई बात बौआ बैटिंग बॉलिंग छोड़ि छाड़ि पहिने करह गऽ फील्डिंग हथौआ (कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक, पृ. ७.१२१) हिनक काव्य भाषा अत्यन्त विस्तृत आ व्यापक अछि जकर प्रयोग ओ कयलनि अछि। महानगरीय परिवेशमे रहितहुँ मैथिलीक ठेंठसँ ठेंठ शब्दादिक प्रयोग ओ अत्यन्त निपुणताक संग कयलनि अछि यथा गाछ-पात, भोरे-सकाल, झहराउ, हियाउ, फुसिये, लुक्खी, खिखीर, पीचल, सुन्न, ढहनाइत, झलफल, सूप, इयार, चाली, छागर, बुरबक, खगता, जलखै, बोन, घटक, गरिपढ़ुआ, थलथल, औंटब, मसौसि, पुरखा, अधखिजू, कोपर, सटका, खौंझाइ, लजकोटर, मुहचुरु, कथूक, दीयाबाती, घटकैती, झड़कलि, धमगिज्जर, चोरुक्का आदि-आदि। युवा कविक गतिशीलताकेँ देखि लगैछ जे भविष्यमे हिनक कवित्व शक्ति आर अधिक विकसित होयतनि, कारण ओ एखन पुष्पक कली सदृश मैथिली बाल-काव्यक संगहि संग वयस्कोक हेतु पर्याप्त मात्रामे काव्य सृजन कयलनि अछि जे आलोकमय थिक। अनूदित बाल-काव्य-धारा मैथिलीमे बाल काव्य-धाराक द्वितीय पड़ावक नव अध्यायक सूत्रपात भेल अनूदित काव्य-धारासँ। सहज आ सम्प्रेषणीय अनुवाद मूल लेखनसँ कठिन काज थिक आ ताहूमे कविताक अनुवाद तँ औरो कठिन थिक। पूर्वांचलीय आर्य भाषामे बाङला आ मैथिली एकहि परिवारक भाषा हैबाक कारणेँ एकर समग्र विशेषतादिक संगहि अपन निजी वैशिष्ट्य रखैत अछि। यद्यपि दुनूक संस्कृतिमे समानता रहितहुँ किछु सांस्कृतिक वैषम्य अछि जाहि कारणेँ शब्दाडम्बरक भिन्नता अछि। बाल-काव्य यात्रान्तर्गत एक नव जागरणक उद्भावना भेल जे समीपवर्ती बाङला भाषा आ साहित्यक विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर (१८६१-१९४१) क अर्द्धशतक काव्य एवं गीत “रवीन्द्रनाथक बाल साहित्य” (साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली, १९९७) प्रकाशमे आयल जकर अनुवादक छथि उदयनारायण सिंह “नचिकेता” (१९५१)। विश्व सृष्टिक नवकर्म सहयोगी एहन कवि बाङला साहित्यक हजार वर्षक इतिहासमे आविर्भूत भेलाह जे एक प्रान्तीय भाषामे बाल-काव्य-धारा प्रवाहित कयलनि जे समस्त भारतीय बाल-काव्य-धारामे सर्वकालिक बालोचित आनन्द, चिन्ता आ जिज्ञासा मे सम्पूर्ण भारतीय भाषा-भाषीक वाणीमे समाहित भऽ गेलाह। मैथिलीमे अनूदित हिनक बाल कविता एहि विषयक साक्षी थिक जे ओ समग्र भारतीय भाषाक कविक रूपमे प्रतिष्ठित भऽ गेलाह जे समस्त देशक सब कालक संग आनन्द-चिन्ताक भाव हुनक बाल-काव्य-धाराक प्रमुख बिन्दु थिक। रवीन्द्रनाथ जीवनक सभ स्तरक कवि, ऋगवेदक भाषामे ओ “कविनामं कवितमः” रूपेँ प्रख्यात भऽ गेलाह। रवीन्द्रकेँ शिशुक प्रति अगाध प्रेम छलनि। ओ शिशुक संग प्रेमे नहि करैत रहथि, प्रत्युत ओकरापर अगाध विश्वास सेहो करैत, समानरूपेँ आदर करैत रहथि, तकर कारण छल जे ओ शैशवावस्थामे मातृप्रेमसँ विमुख रहलाह। इएह कारण थिक जे ओ शिशु-काव्य-धाराक अन्तर्गत एहि भावनाकेँ व्यक्त करबामे कनियो कुंठित नहि भेलाह। हुनक मान्यता छलनि जे शिशु नादान, अबोध, मूर्ख नहि, प्रत्युत बुझनुक होइत अछि। हुनका एहि विषयक विश्वास छलनि जे गम्भीरसँ गम्भीर विषयकेँ सरल बना कऽ बुझाओल जाय तँ कठिनसँ कठिन विषयकेँ ओ सुगमतापूर्वक आत्मसात कऽ सकैछ। शिशुक संग शिशु बनि कऽ ओकरा सभक संग खेलायल जाय वा वार्तालाप कयल जाय तँ ओकरा सभक वास्तविक गुणक विकास सहजतापूर्वक भऽ सकैछ। मूल बाङला बाल-काव्य एवं गीत संग्रहसँ मैथिलीमे “चैताली” (१८९६), “कणिका” (१८९९), “कथा ओ कहिनी” (१९००), “नैवेद्य” (१९०१), “शिशु” (१९०३), “उत्सर्ग” (१९१४), “शिशु भोलानाथ” (१९२२), “चित्र-विचित्र” (१९३३), “खाप छाड़ा” (१९३७), “गीत वितान” (१९४१-४२) एवं “सहजपाठ भाग एक एवं दू” सँ बीछल बेरायल अनूदित रूप प्रकाशमे आयल अछि। वर्षासँ सम्बन्धित रवीन्द्र प्रथमे प्रथम शिशु काव्यक सृजन कयलनि यथा: विस्टि पड़े टापर टुपुर नदे एलो वान। शिव ठाकुरेर विये हवे तिन कन्यादान॥ उपर्युक्त काव्यांशक अनुवाद मैथिलीमे नहि भेल अछि। मैथिलीमे वर्षासँ सम्बन्धित “मेघ बरखा टिपिर टिपिर टप” अनूदित भेल अछि तकर मूल रूप निम्नस्थ अछि: दिनेर आलो निमे एलो सुज्जि डोवे डोवे। आकाश जुड़े मेघ जुटे छे चाँदेर लोभे लोभे। मेघेरे उपर मेघ कोरेछे रङ्गोर उपर अङ्ग। मन्दिरे ते काँसार घण्टा बाजलो ढङ्ग ढङ्ग। उपयुक्त काव्यांशक अनूदित रूप निम्नस्थ अछि: बुझल इजोत दिवस केर सूरज एखनहि डूबल हाय मेघ जुटल अछि चानक लोभें व्योम लोक धरि जाय मेघक ऊपर मेघ धरल अछि रंगक ऊपर रंग मंदिर मध्यक काँसा घण्टा मंद्रित शब्द-तरंग। उपर्युक्त काव्यांशक अन्तिम पंक्तिक अनुवाद अनुवादक सही नहि कऽ पौलनि। “मंद्रित शब्द-तरंग”क बदलामे “काँसा घण्टा- बाजल ढन-ढन” उपयुक्त होइत। रवीन्द्रक बहुचर्चित आ बहु प्रशंसित काव्य थिक “पुरातन भृत्य” जकर प्रारम्भिक मूल बाङला रूप निम्नस्थ अछि: भूतेर मतन चेहरा जे मन, निर्बोध अति घोर। जे किछु हाराय गिन्नी बलेन, केष्टा बेरा चोर। उठिते बसिते करिपान्तो शुनओ ना शुने काने। कत पाय बेंत ना पाय वेतन, तबुना चेतन माने। उपर्युक्त काव्यांशक मैथिलीमे अनूदित रूप निम्नस्थ अछि: भूत जकाँ चेहरा ओकर, निर्बोध अतिघोर। जे किछु हेराय कोसथि घरनी “किसुने निश्चये चोर”। उठइत सुतइत गारिक बरखा, नहि दइ छइ ओ काने। खाइ छइ बेंत ने पाबै वेतन, तहुँ नइ चेतन मानै। अनूदित अंशक किछु शब्द एहन अछि जाहिपर सहसा आपत्ति होइत अछि। जेना “निश्चये”क स्थानपर “बेरहि”, “सुतइत”क स्थानपर “बैसइत”, बरखाक स्थानपर “दैत छी”, “नहि दइ छइ ओ काने”क स्थानपर “तइयो ने सुने”, “खाइ छी”क स्थानपर “मारै छी”, “ने पबे वेतन”क स्थानपर “ने दै छी वेतन” तथा “तहु नइ चेतन” क स्थानपर “तइयो नइ चेते” उपयुक्त होइत। रवीन्द्रक शिशुसँ सम्बन्धित काव्य-यात्रामे मानवताक सम्भवतः सबसँ आदिम आ असंदिग्ध रूप मौलिक भाव वात्सल्यक अज्ञात गाम्भीर्यकेँ उद्घाटित करैत अछि। धियापूताक दुग्रह्यि चारुतत्व, ओकर अनुमेय व्यवहार ओ प्रसन्नतादायक चंचलता, ओकर तर्कातीत कल्पना आ ओकर अमूर्त्त कारुणिकता एहि सबमे कविकेँ विश्वक सर्जनात्मक जीवनक स्पन्दनक अनुभव भेल छनि। वैष्णव पद सबमे बालकक प्रति स्नेह आ श्लाघाकेँ काव्यात्मक स्वीकृति भेटल छलैक। परन्तु ओहि ठामक बालक सामान्य बालक नहि भऽ ईश्वरक अवतार अछि मानव शिशुक ऊपरमे। टैगोरक काव्यमे कोनो प्रकारक देवत्वारोपण नहि छैक, प्रत्युत शाश्वत रूपेँ निर्गत जीवनक चेतनाक रूपमे मानव शिशुक साधारणीकरण अछि। शिशु सम्बन्धी कतोक कवितादि नेना-भुटकाक हेतु उपयुक्त अछि। वस्तुतः ओहिमे किछु रचना हुनक मातृहीन पुत्र-पुत्रीक हेतु रचल गेल छल। हिनक शिशु काव्यक वैशिष्ट्य थिक जे ओहिमे फराक-फराक भाव स्थितिक चित्रण भेल अछि जे कविक अन्तरक बाल मनकेँ उद्घाटित करैत अछि। कवि विश्वकेँ एहन उदास बालकक आँखिए लालसापूर्वक देखैत छथि जकरा ओकर इच्छाक अनुरूप घुमबा-फिरबाक अनुमति नहि हो। बाल गीत शैलीमे ओ छोट-छोट कवितादि सेहो लिखलनि जकर विशेषता थिक जे ओ वयस्को द्वारा समान रूपेँ आस्वाद्य अछि। बाल काव्यान्तर्गत ओ विस्तारपूर्वक नाटकीय शैलीमे खिस्सा कहलनि, जकर कथ्य सामान्यतः ग्राह्य अछि। रवीन्द्र बौद्ध साहित्यमे संगृहीत दन्त कथाक माहात्म्य आ नाटकीय मूल्यक प्रति ध्यानाकर्षित कयलनि। एकरा माध्यमे कवि भारतक शानदार चित्रक कल्पना कयलनि जे अज्ञात आ अकर्मण्यताक व्यामोहसँ जागि रहल अछि। ओ शिशु काव्यमे काव्यात्मक कल्पनाक रुझानक संगहि शिशुक विविध प्रसंगकेँ उद्घाटित कयलनि अछि। “गीत वितान”सँ जतेक गीत एवं काव्यक अनूदित रूप पाठकक समक्ष अछि से ओ मुख्यतः गीताञ्जलि (१९१०), गीतमाल्य (१९१४) एवं गीतालि सँ लेल गेल अछि। एकर वैशिष्ट्य अछि जे ओ जतबे मात्रामे कविता अछि ओ ततबे मात्रामे गीत सेहो। वस्तुतः हिनक काव्यमे प्रायः प्रगीत आ गीतक बीचमे कोनो विभाजन रेखा नहि खीचल जा सकैछ। अपन अद्भुत सांगीतिक प्रतिभासँ ओ अपन किछु विस्तृत आ कठिन कवितादिकेँ सफलतापूर्वक संगीतमे बान्हि देने रहथि। एहिमे हुनक भावनात्मक लालसा मुखर आ स्थायी अछि, छन्द अधिक सहज अछि आ बिम्ब विधान उत्कृष्ट। बाङला भाषा भाषी शिशुकेँ शिक्षित करबाक भावनासँ उत्प्रेरित भऽ ईश्वरचन्द्र विद्यासागर (१८२०-१८९१) बाल पाठक शृंखला प्रारम्भ कयने रहथि तकरा अग्रसर करबाक उद्देश्यसँ रवीन्द्र शिशुक मानसिकताक संगहि आकर्षक ढंगसँ दुइ खण्डमे सहजपाठक रचना कयलनि। एहिमे सहज सुबोध वर्णमालाक परिचय अछि जे बच्चा सभक लेल पाठ अछि जे संयुक्ताक्षर विहीन आ संयुक्ताक्षर सहित अछि। रवीन्द्रक उपलब्ध काव्य-धाराक प्रभाव परवर्ती काव्यधारापर अवश्य पड़ल जकर फलस्वरूप अन्यान्य भाषाक शिशु कविता मैथिलीमे अनूदित भेल। किन्तु एहि तथ्यकेँ स्वीकार करबामे कोनो तारतम्य नहि होइछ जे रवीन्द्र जाहि भावधारा, भाषा आ छन्द विन्यास कयलनि ओहि सबपर सम्यक रूपेँ विचार कयलासँ प्रतिभाषित होइछ जे अनुवादक यथार्थतः ओकर मर्मकेँ स्पर्श नहि कऽ पौलनि। अतएव समग्ररूपेँ अनुशीलनोपरान्त कतिपय एहन स्थल अछि जतय अनुवादककेँ मैथिलीक उपयुक्त शब्दावली नहि उपलब्ध भऽ पौलनि ततय ओ एहन-एहन शब्दादिक प्रयोग कयलनि जे ने तँ मैथिलीक थिक आ ने तँ बाङलाक। रवीन्द्र बाल-काव्य एहि विषयक साक्षी थिक जे देशकेँ सबल राष्ट्र बनयबाक उद्देश्यसँ शान्तिनिकेतनक स्थापना कयलनि। मैथिली बाल-काव्य-धाराक मौलिक एवं अनूदित स्वरूपपर विचार कयलापर ई कहल जा सकैछ जे ई एखन शैशवावस्थामे अछि। एहि विधाकेँ एक सुनिश्चित स्वरूप प्रदान करबाक निमित्त वर्तमान सन्दर्भमे प्रयोजनीय अछि जे कविताकार लोकनिकेँ एहि विधाकेँ शैशवावस्थासँ प्रौढ़ावस्थामे अनबाक दिशामे सबल आ सुदृढ़ बनयबाक दिशामे सयत्न प्रयास करबाक प्रयोजन अछि जे ई साहित्यक अन्यान्य विधादिक समकक्ष आबि टक्कर लऽ सकत। एतबा सत्य अछि जे बाल-काव्य शिक्षाप्रद आ साहित्यक प्रति ममत्व जागृत करबाक दिशामे अहं भूमिकाक निर्माण कऽ सकैछ से हमर विश्वास अछि। देवांशु वत्स पद्य खण्ड डॉ. नरेश कुमार ‘विकल’ आजाद गजल तन भिंजा कए मन जराबए आबि गेल साओन केर दिन। विरह-वेदन तान गाबए आबि गेल साओन केर दिन। खेलि कऽ बरसात अप्पन वस्त्र फेंकल सूर्यपर चानकेँ सेहो लजाबए आबि गेल साओन केर दिन। मधुर फूही भरल अमृत सँ प्लावित ई धरा पान महारकेँ कराबए आबि गेल साओन केर दिन। ई बसातक बात की हो अनल-कन-रंजित बहए मोनकेँ पाथर बनाबए आबि गेल साअोन केर दिन। खोहमे खोंताक खूजल द्वारिपर विधुआएल सन विरहिणीकेँ बस डराबए आबि गेल साअोन केर दिन। बाध हरियर, बोन हरियर हरियरे चहुँ दिस छै धूरसँ आङन सुखाबए आबि गेल साअोन केर दिन। बांसुरीपर टेरि रहलै के एहन रस-रोग राग भेल भुम्हूरकेँ पजारए आबि गेल साअोन केर दिन। सिमसिमाहे नूआ-सन झपसीमे लागए सहज-मन सतलकेँ आओरो सताबए आबि गेल साअोन केर दिन। आजाद गजल शेषांशपर रोदन करू वा गीत उदित भानपर। किन्तु आफत अाबि पहुँचल मान और सम्मानपर। दीप जम्बूद्वीप केर नित्त अकम्पित भए जरए यएह सोचब िथक कठिन अनीति केर दोकानपर। भेल वृद्धि ज्ञानमे, विज्ञानमे, संधानमे जन्म दर केर बात की वृद्धि उत्थानपर। किन्तु नैतिकताक अवनति आचरण, सम भावमे देश हित केर बात तँ चलि गेल कोठीक कान्हपर। देश गांधी, बुद्ध केर रहि गेल ने सुभाष केर देश ई नाचए सदति घोटाला सबहक तानपर। आब विचरण कए रहल नरभक्षी दोसर वेशमे छैक कनिको ने दया एे नेना केर मुसकानपर। आजाद गजल नयन केर नीन्न पड़ाएल की छीनि लेल कोनो मोन केर बात मोनमे रहि गेल कोनो उन्हरिया राति ई गुज-गुज एना कत्ते दिन धरि रहत कम्बल कएक काजर केर तानि देल कोनो काँटक झार राखल छै चौकठि केर दुनू दिस तैयो अयाचित डेग नापि देल कोनो छाहरि ने झरक लागय हमरा नीम गाछीमे बसातक संग बिरड़ो फेर आनि देल कोनो हमर खटक सिरमामे करैए नाग सभ सह-सह काँचक घरमे पाथर राखि देल कोनो बिहुँसल ठोर ने खुजतै कोनो कामिनी आगाँ प्रीतक सींथमे भुम्हूर राखि देल कोनो आजाद गजल पसारल छैक परतीमे हमर पथार सन जिनगी। कहू हम लऽ कऽ की करबै एहन उधार सन जिनगी।। पड़ल छै लुल्ह-नाङर सन कोनो मंदिर केर चौकठिपर। माँगय भीख जिनगी केर हमर लाचार सन जिनगी।। साटल छैक फाटल सन कोनो देवालपर परचा। केओ पढ़बा लेल चाहय ने हमर बीमार सन जिनगी। बाटक कातमे रोपल जेना छी गाछ असगरूआ। ने फड़ैए-फुलाबैए हमर बेकार-सन जिनगी।। कतबा िदनसँ हैंगरमे छी कोनो कोट-सन टाँगल। कुहरैत कोनमे पड़ल ई तिरस्कार-सन जिनगी।। ई िजनगीकेँ कोनो िजनगी जकाँ हम जिनगिये बूझी। ने जिनगी देल जिनगीमे जिनगी सन हमर जिनगी।। सुबोध ठाकुर, गाम- हैंठी बाली, मधुबने सुबोध जी चार्टर्ड एकाउन्टेन्ट छथि। नव वर्षक रंग नव उमंग नव तरंग छाएल सगरो नव रंग परिताहीन धरापर नव प्रभातक पहिल किरण चमकि उठल धरतीक कण-कण परैताहीन धरापर नव प्रभातक पहिल किरण बीतल ऐ तरहेँ जे पूर्व वर्ष देलक ककरो दुख ककरो हर्ष केकरो देलक शुभ संदेश ककरो देलक खाली लिफाफा ककरो उठा कऽ लऽ गेल तोड़ि दुनियाँक फंद ऐ तरहेँ बीतल एक आर वर्षक रम्ग जे बीत गेल से बीत गेल मानल वएह इतिहास रचि गेल परंच आबए नव वर्षमे नव कल्पना करब नव चाँदक संग देखू पसरि गेल सगरो नव वर्षक रंग होअए मंगल सुखमय सभक नव वर्ष रहए सभक जीवनमे हर्ष रहए सदिखन छाएल नव तरंग अछि सुबोधक कामना नव वर्षक संग प्रयास जुनि तोड़ू अपन आस करैत रहू सदिखन अपन प्रयास सोचू सभ दिन नूतन दिन अछि, सोचू आजुक दिन नीमन अछि भरैत चलू निस दिन नव उल्लास करैत रहू सदिखन अपन प्रयास कने सोचियौ मीता, जौँ राम होइतथि अधीर तँ सेतु बना लंका नै पहुँचितथि पाण्डव कौरव संग नै लड़ितथि तँए देख कठिन कार्यकेँ जुनि होउ निराश करैत रहू सदिखन अपन प्रयास देखू कखनो मकड़ाकेँ, सीखू किछु ओकरासँ कए कऽ पुरजोर बेर-बेर अपन प्रयत्न जाल बनाबए सुन्दर नीमन दए सनेस ओ सभकेँ नै छोड़ी कखनो प्रयास विजय निश्चित भेटत कहए सुबोध दैत ई आस राखू अपनापर विश्वास प्रतीक्षा भेल जखन-जखन किछु इच्छा करए पड़ल तखन-तखन प्रतीक्षा जिनगीक बाटमे सगरे भेटल चौबटिया जाएब केम्हर किछु फुराइत नहि छी एकसरे नहि संग सह-बटोहिया काटल कतेक राति गुज-गुज अन्हरिया सनक जे आएत किछु दिन उपरान्त खिल-खिलाएत, राति इजोरिया सनक जुनि पूछू हाल अखनो धरि देमए पड़य अछि परीक्षा कए रहलहुँ अछि अखनो धरि ओहि क्षणक प्रतीक्षा उठए बेर-बेर सवाल मनमे फँसै छी सदिखन अही अन्तर्द्वन्द्वमे जे केहेन निःशोख आ निर्लज्ज होइ छै इच्छा जे करए पड़ै छै जेकरा लेल प्रतीक्षा जे जोगी बनए वा बनए संत नहि छोड़ए ओकरो अही प्रतीक्षाक फन्द रहए ओकरो परम धाम पाबैक इच्छा करए पड़ै अहि लेल तप आ प्रतीक्षा जन्म बालक जे लए तँ ओकरा माइक दूधक इच्छा जे किशोर भेल ओकरा खेल आ उमंगक इच्छा जे जवान भेल ओकरा सुन्दर रमणीक इच्छा तँए कहए सुबोध दैत ई शिक्षा जँ चाह अनन्त आ अद्वितीय इच्छा तँ करए पड़त निश्चय प्रतीक्षा किएकि जिनगीक माने छिऐ प्रतीक्षा सतीश चन्द्र झा सौंसे बिहार एखनो बेहाल। दुख व्यथा बिहारक बाँटि सकय ओ जन्म कहाँ ल’ सकल लाल। सौंसे बिहार एखनो बेहाल। सौंसे बिहार एखनो बेहाल। बीतल चुनाव सरकार बनल मत पड़ल विकासक आशा मे। जातिक टूटल सभ समीकरण डूबल प्रतिपक्ष निराशा मे। उतरल नभ मे नव आशा के जागल प्रभात नव किरिण लाल। सौंसे बिहार एखनो बेहाल। अछि भाग्यहीन सत्ते बिहार नहि बदलि सकल तकदीर एकर। रौदी अकाल बाढ़िक प्रकोप दाहर सुखार तस्वीर एकर। नहि जानि विधाता छथि लिखने की ल’ बिहार के वक्र भाल। सौंसे बिहार एखनो बेहाल। नक्सल बादी के बंदुक सँ पसरल अछि सगरो केहन आगि। छै राजनीति के खेल बेल नहि त’ ई जइतै कतौ भागि। जौं नहि रोकत सरकार आब रक्तिम भ’ उठतै नदी ताल। सौंसे बिहार एखनो बेहाल। उतरत उद्योग एतय कहिया बिजली कहिया चमकत सगरो। मजदूर जाएत नहि दूर देश रोजगार एतय भेटत सगरो। भूखल दूखल के जीवन मे कहिया लौटत सगरो सुकाल। सौंसे बिहार एखनो बेहाल। साहित्य हमर मरि रहल आइ अछि कहाँ सृजनता ओ पहिलुक। सम्मान लेल छथि लीखि रहल अधिकांश लोक व्यर्थे एखनुक। अप्पन भाषा के मान लेल कहिया जागब बाँटब गुलाल। सौंसे बिहार एखनो बेहाल। जीवकान्त बाल साहित्य/ कविता बबलू बनबय छक्का-सत्ता एक टोलमे बबलू अकलू दू नेना छल समतुरिया छल बबलूकेँ छल बन्तिक खुट्टी आमक तख्ता केर ‘पिटना’ छल ओहि ‘पिटना’सँ रबड़ गेनकेँ ओ पिटैत छल ’रन’ बनबै छल अपनहि ‘रन’केँ गनि-गनि लै छल गनि कऽ जोर-जोरसँ बाजय अकलूकेँ ‘एस्कोर’ सुनाबय एक गली छल टोल कातमे ताही ठाम ‘क्रिकेट’ चलै’ छल ... ... ... ... एक दिवस बेरियाँमे बबलू ’बौल’ ‘बैट’ लेने बहराएल अकलूकेँ ओ ताकि निकालल जगह देखि कऽ ईंटा रखलक बल्ला लऽ कऽ भेल ठाढ़ ओ दोसर दिस देलक इटकोरी ’बौल’ करह कोर जगह बनौलक अकलूकेँ ओ मना-मना कऽ ‘बौल’ फेकबाक भारा देलक बबलू पीटय गेन, उड़ाबय दुग्गी-तिग्गी ‘रन’ बनैत छल बहुत जुमा कऽ गेन उड़ाबय चौका-छक्काकेँ गनैत छल अकलू बे-परवाह लगै छल गेन पकड़ि कऽ लऽ अनैत छल आ फेकैत छल कते भेल ‘रन’ से सुनैत छल सुनि-सुनि कऽ ओ दुख ने मानय अथवा कोनो सुख नहि पाबय एक ‘शौट’ तेन्ना कऽ लगलै गेन सरंग-गोलिया भऽ गेलै उड़ि कऽ ओ अँगना चल गेलै गेन तकै ले अकलू भागल अँगना पैसल ओ अँगना छल, अकलुक अँगना माय एक दसटकही देलकै, आर कहलकै- “सुन रे अकलू देखही जे दोकान फुजल छै ओइ दोकानसँ पत्ती ला गय चाहक पत्ती बहुत जरूरी पानि गरम छै डिब्बा पूरा खाली छै, रे! जल्दी चाही, ला दे जल्दी...।” ओ कहलक जे गेन तकै अछि माए कहलकै- “पछिला बाटेँ तोँ बहरा जेा सोझे जा दोकानमे ढुलिहेँ पत्ती लीहेँ दौगल अबिहेँ।” अकलू भागल पछिला रस्तासँ बहराएल .... .... .... .... इमहर बबलू दौगि रहल अछि ’रन’ गनैत अछि चारि भेलै, तँ छब्बो भेलै से भेलैक, तँ छब्बो पुरलै दौड़य बबलू, ‘रन’केँ जोड़य लगले उन्तीस-तीस पुरौलक पुरलै लगले एक पचासा हकमि रहल अछि बबलू भैया दौड़ि रहल अछि आ बनबै अछि साठि बनै छै ’’’ बनल जाइ छै घाम-पसेना बहल जाइ छै। राजेश मोहन झा १९८१- उपनाम- गुंजन, जन्मस्थान- गाम+पत्रालय- करियन, जिला- समस्तीपुर, हास्य कविताक माध्यमसँ समाजक विगलित दशाक वर्णन। बाल साहित्यमे विशेष रुचि। कविता- घुरना मोन पड़ैए घुरना मोन पड़ैए रौ उगना मोन पड़ैए। भागल बौरहबा खेत-पथार दिश, नहि देखलक हमर अश्रुधार दिश, कंठ पियासे सूखि रहल अछि केओ दरस नहि दैए कतऽ पड़ा गेलैं रौ बतहा आनि कऽ कुरता पहिरा दे एखनहिं समाद पठौलनि खलीफा भांगक आश लगैए रौ घुरना हमर बात तोँ माने दौड़ चङेरी चूड़ा भरि आने कहेँ झटहीकेँ भूजि देथि भूखक आभास लगैए राति भेल जुिन होउ निपत्ता बुन्न झड़ै अछि आनू छत्ता नहिं छूटत हथियाक ई झपसी सभटा धान डूबैए।। अरविन्द ठाकुर आजाद गजल-१ तुरछल हमर सौभाग्य, हमर छाहरिक छाहरि सँ भागय जेना जड़काला मे सेरायल लोक पर सँ रौद भागय भाव के लतनर्दन करय, सटका बजारय बेर-बेर हीत-मीतक चोट सहितहुँ मोन सँ नञि मोह भागय निन्न के कोरा मे रहितहुँ किछु सजग भए कए रही चोर-दरब् आजा बहुत, देखब, कोनो सपना ने भागय रूप-रस लोभी भ्रमर सन छै पुरुष के जाति ई सम्बन्ध के सिक्कड़िसँ बान्हू, ऊबिकए छलिया ने भागय एना भागैछ कुकुर-मोन, कुतिया-विमुख, भोगक पछाति मारि डर सँ भूत आ कंगाल-घर सँ चोर भागय इजोतसँ सकपंज छथि काजर के घर मे रहनिहार शायर सदति चैतन्य “अरबिन”, कोन विधि अन्हार भागय आजाद गजल-२ मदन हमर आँखि पर रंगीन सन जाली लगाबय पात हुनकर देह आ टुस्सी हुनक कनफूल लागय नीलहा परिधान सँ छिटकैत हुनक देहक प्रभा शरद मासक व्योम मे ज्योँ पूर्णचन्द्र आभा जगाबय हुनक प्रतिमा हृदय मे बद्धमूल भेलछि एहन सन जेँकि अलगाबय छी बल सँ, हृदय के सभ तन्तु फाटय ई हँसी, ई अंगभंगी, ई कटाक्षक तनल वाण मन्मथ के कारावास मे बान्हल कोनो कैदी की भागय यक्ष छी “अरबिन”, धरा पर आयल छी हम शापवश मोन के परिताप सँ अंतःकरण झरकैत बुझाबय रवि भूषण पाठक, ग्राम-करियन, जिला-समस्तीपुर ,बिहार कि भेलए एकरा ? रौ बहि ! रौ बहि ! कि भेलए एकरा ? मॉगलियइ रोसड़ा आ दऽ देलकए तेघड़ा रौ बहि ! रौ बहि ! कि भेलए ? एकरा पटनाक बात छोड़ू, दिल्लीक बखरा ! रौ बहि ! रौ बहि ! कि भेलए एकरा ? सोचैत रहौं मंत्री बनब, शुरूए मे खतरा रौ बहि ! रौ बहि ! कि भेलए ? एकरा हरम-महल-अंतःपुर या छुपल घरघुसरा ! रौ बहि ! रौ बहि ! कि भेलए ? एकरा दस लाखक टिकट छल, ककरा सॅ बात करी अल्सेसियन ऑखि देखबए, दॉत देखबए झबड़ा ! रौ बहि ! रौ बहि ! कि भेलए एकरा? प्रवीण कश्यप पौरुष पिशाच ए हमर प्रिया अहाँक लेल हमर संबोधनक उपनाम बिला गेल हृदयक गर्त मे भऽ गेल हमर प्रेम सँ अहंकार अहाँकेँ अपना पर! मोबाइलक स्क्रीन पर फेर सँ अछि कोनो हॉलीउडक अभिनेत्री अहाँक फोटो पड़ल अछि कतहु मेमेरी कार्ड मे एकात! अहाँक माय-बाप बुझैत छलाह अहाँके पुत्र! से ठीके अहाँकेँ अछि पुरूषार्थक अभिमान! अहाँ हमरा बनाबऽ चाहलहुँ स्त्री कोनो लाचार स्त्री विधवा-मसोमाति मुदा से त नहि भऽ सकल लटुआयल बिलाइ जकाँ अहाँ कतेक घिसियायब हमरा पराजयक स्वप्न मे हम छिड़ियायल छलहुँ मुदा कहिया धरि कखनहुँ तऽ सुनहे पड़त अहाँकेँ उठैत फणिधर फुफकार आत्महन्ता व्यक्तित्व पाश मे कहिया धरि हम सुखायब भावक समलैंगिकताक द्वंद मे कहाँ बँचल प्रेमक कोनो रस! अहाँक लेल प्रेम अछि गणित सुतब उठब जकाँ दिनचर्या कोनो काज जाहि सँ निवृत होइत रहैत छी अहाँ । अहाँक लेल प्रेमक स्वीकारोक्ति अछि डरक आरंभ, पलायन सत्य सँ तखन कतऽ विलीन भऽ जाइत अछि अहाँक पुरूषार्थ राम विलास साहु चौवनिया नेता केश फुलकल आँखि चमकल ढाढ़ी-मोछ कारी रंगसँ रँगल मुँह सुखल होश ऊड़ल पातर लकड़ी सन देहपर बड़का झोलंगा फाटल लटकल देश-विदेशक बात करै छी चौक-चौराहापर बैसल रहै छी फाटल गमछा, फाटल अंगा जेना लगैत अछि लफंगा घरमे भूजि भांग ने पाबे... चौकक दाेकानपर भूजा पाबे गप-सप्पसँ भाँट करबैत गाम-घरमे ठकि कऽ खाबे जानितो नहि परिवारक हाल कहैत हम मचबैत छी देशमे भूचाल ठकि-ठकि खाइ छी गरीबक माल गामक लोकनिक जिनगीकेँ करै छी फटैहाल बनलौ काम बिगाड़ै छी अपनाकेँ कहै छी अधिकारी रिश्वतसँ चलबैत छी जिनगीक गाड़ी मुदा हमरा नहि अछि कोनो सवारी जइ दलमे देखलौं धन-बल ओहि दलमे केलौं चहल-पहल सत्ताक नहि हमरा आस परायाकेँ के कहे अपनोकेँ करै छी विनाश बड़का नेता करैत बड़का घटोला हम चौवनियाँ छी नेता चारिए अनाक करै छी आशा हमरा नहि सिंहासनक आशा गाम घरमे करैत छी राज। महाकान्त ठाकुर, पाली मोहन, खजौली, मध्ुाबनी साहेब कुकुरक बीचक कुकुर जखन एलशिशियन डॉग भऽ जाइए गली कंची छोड़ि दैत अछि कानूनन लग भऽ जाइए। आइ एस आइ पीएस की बीपीएस आर आर कते की प्रशिक्षित सभ अराजकताक विरुद्ध किन्नहुँ नहि भूकत। ड्योढ़ी राज महल छोड़ि एसगर नहि घूमत। मालिकक विश्वास पात्र अपनहि कूलक सुपात्र/ अपनहि जाति कें हबकत एहन सन डर भऽ जाइए। ई नश्ल पश्चिम सँ आएल अछि छोटके कें पकड़ओ सिखाएल अछि बड़का तऽ ओकर मालिके छैक अपना लेल अनका उजाड़िते छैक। याह तऽ एकर खूबी छैक अपनहि जाति पर भुकैत छैक मालिकक लूटिक संपत्तिक रक्षा करबाक ब्योंत धरबै छै। भूखल देशक भले जेहन अवस्था छैक एकरा लेल पांच सितारा व्यवस्था छैक अनेरुआक संग नहि राखल जा सकैए समूहक अगुआ नहि बनओ तैं विशेष भवन मे राखल रहैए। एहन कुकुरक कुकुरो लेल जनतेक बुट्टी कुट्टी काटल जाइए भूखल कियो नहि छैक धरती पर एहन रिपोर्ट आ प्रमाण देबय लेल बेसी कऽ खाइए। जतय केर लोक एकरा चिन्हि गेल एकर चालि चलन बूझि गेल ओतहिं ओतहिं क्रांति भेल। भारत मे भगत सिंह सुभाषक बाद छोड़ि देल छार भार एकरे हाथ तैं जनता पिटओ माथ परिणाम तऽ देखाइते अछि निर्धन देशक जनता सुखाइते अछि अपनहि बीचक सहोदर चदबी आ पावर पाबि ‘बगऽ भऽ जाइए कुकुरक बीचक कुकुर जखन डॉग भऽ जाइए। डॉ. शेफालिका वर्मा स्मृति-शेष आय बटवृक्ष क मधुर छाहिर कत' दनुजता क लंका मे अंगदक अटल पैर कत' ? काल पंथ पर चलि गेलाह जे सिनेह हुनक सरसावैत अछि मोन प्रानक भ्रमित दिशा के बाट वैय्ह देखाबैत छैथ चिर मंगलमय छल लक्ष्य महान जीवन एक ,पग एक समान ! स्निग्ध अपन जीवन कय क्षार करैत रहलाह आलोक प्रसार श्रृष्टि क इ अमिट विधान मिटबा मे सय वरदान ... सुनी हुनक हुंकार नव यौवन बल पावैत छल माथ पर बाँधी कफ़न कर्मक्षेत्र मे आबि अत्याचार मेटाबैत छल हुनक सहस देखि देखि तरुण सिंह लजावैत छल ! आय मानवता क धवल आकास कत' मानव एक मानवता गुण , बतवै वाला धाम कत' अय विश्व ! अहीं बताबु भारतवर्ष सन गाम कत' ??? बच्चा आ व्यवस्था छोट छोट नेना के देखू व्यवस्था कतेक भारी अछि झुकि रहल कान्ह लचकि रहल पीठ ई बस्ता कतेक भारी अछि ! समस्त देश क ज्ञान नुकायल विदेश क भंडार भरल अछि अंग्रेजी हिसाब क गप नहि पुछू प्रकाशक प्रेसक धूम मचल अछि निरीह आंखि सँ तकैत नेना की पढ़ी की नहि पढ़ी में हेरायल नेना.... फुर्सत नहि माय बाप कें समय नै हुनका लेल केकरो के सम्झाओत , कोना सम्झाओत घरो में त चैन नहि भारी भारी बस्ता देखू लंच , बोतल पानिक देखू प्राइवेट स्कूलक धूम मचल जन जन में होड़ मचल ककर बच्चा कतेक तेज ककरा कतेक आयल अंक आन क नेना आन के भायल बच्चा फंसल व्यवस्था क पंक किन्तु, एहि शिक्षा क की अर्थ एत इंजीनियर करैत ठेकेदारी डाक्टर खोलल दोकान सड़क पर की हश्र एहि नौनिहाल के की भविष्य देशक कर्णधार के ...???? देश हे बौआ ! की बाबा ? सुनैत छी गाँधी फिलिम लागल ऐछ बड़ नीक, बड़ दीब अछि चलू ने देखी अबैत छी ....जेना लुत्ती लागि गेल बौआ के हुंह ..आंधी लागल छल बाबा जाही में हीरो हिरोइन दुनू छल से हम देखवे नै केलों आ ओहि बुडवा के देखै लेल पाई आ समय बर्बाद करी .. हे ऐना नै बाजु बावू आय ई देश स्वतंत्र भेल गाँधी के कारन हम अहाँ देशभक्ति क स्वाद में डूबल रहैत छी गाँधी क कारन देश देश देश ---- ओ स्कूली बच्चा चिचिया उठल जेना कुनैन गर में आबी गेलैक -- बाबा, हम ते कतो देश नै देखैत छी नही ते देश्भाक्तिक कोनो गीत कतो सुनैत छी देश शब्द पढैत छी किताब में देश्भाक्तिक शब्दार्थ बूझैत छी किताब से अहाँ किदन कहाँ बजैत छी..... बाबाक आंखि पनिआय गेल ,सून में तकैत पीठ पर मारल गोराक कोड़ा क दर्द फेर शुरू भ गेल..... सरोज ‘खिलाडी’- नेपालक पहिल मैथिली रेडियो नाटक संचालक गीत अहाँ बिना हम रहि नहि सकैछी । अहाँ बिना हम जीब नहि सकैछी । अॅहु त हमरा चाहैछी तेॅ चोरानुका क तकैछी । अहाँ बिना हम रहि नहि सकैछी । २ सब सँग मिल आहा खुब हसैछी भितरे भितर कनैछी २ मैर नहि जाय अहाँके प्रेममे हमरा किया जचैछी ए अहाँ बिना हम रहि नहि सकैछी । बाजब केम्हरो इसारा अछी केम्हरो निक जका बुझैछी २ सामनेमे चुपचाप रहैछी परोछमे किया खोजैछी । ए अहाँ बिना हम रहि नहि सकैछी । अहाँ बिना हम रहि नहि सकैछी । अहाँ बिना हम जीब नहि सकैछी । अॅहु त हमरा चाहैछी तेॅ चोरानुकाक तकैछी । अहाँ बिना हम रहि नहि सकैछी । २ श्यामल सुमन कहू कि फूसि बजय छी? गप्पे टा हम नीक करय छी सबटा उनटा काज। एहि कारण सँ टूटि रहल अछि मैथिल सकल समाज। कहू कि फूसि बजय छी? टाका देलहूँ बेटी देलहुँ केलहुँ कन्यादान। ओहि टाका सँ फुटल फटाका मन मे भरल गुमान। दाता बनल भिखारी देखियौ केहेन बनल अछि रीत, कोना अयाची के बेटा सब माँगि देखाबथि शान। कहू कि फूसि बजय छी? माछ मांस केर मैथिल प्रेमी मचल जगत मे शोर। सम्हरि सम्हरि केँ घर मे खेता सानि सानिकय झोर। बरियाती मे झोर किनारा काली मांसक बुट्टी, मिथिला केर व्यवहार कोना कय बनल एहेन कमजोर। कहू कि फूसि बजय छी? नहि सम्हरब तऽ सच मानू जे भेटत कष्ट अथाह। जाति-पाति केँ छोड़िकय बेटी करती कतहु बियाह। तखन सुमन केर गोत्र मूल सब करब कोना पहचान, बचा सकी तऽ बचाऊ मिथिला बनिकय अपन गवाह। कहू कि फूसि बजय छी काली नाथ ठाकुर, ग्राम सर्वसीमा दहेज़ विरोधी रचना (सन १९६८ मे रचित) पण्डितजी दण्डित भेलाह जखनहि कन्या पाँच पूर्व जन्म के कर्म फल, वा विधिक कोनो ई जाँच। विधिक कोनो ई जाच, यैह चर्चा भरि गामक लाबथु नोट निकालि जत्ते सम्पत्ति छन्हि मामक। पनही गेलन्हि खियाय, कतौ नहि बसिलनि गोरा धन्यवाद क पात्र छथि ”कलियुग” के घोडा। सत, रज, तम, सभ व्यर्थ थीक शिक्षा शील स्वभाव गुण एकहि अछि अर्थ गुण अवगुण अर्थाभाव अवगुण अर्थाभाव भाव नहि अछि गुण रूपक कन्या कारी , गोर , मूर्ख वा दिव्यस्वरूपक। मायक दूध क दाम जोडि गनबओता टाका पुत्र हुनक गामक गौरब से कहलथि काका बीतल शुद्ध आषाढ के अगहन वैशाख। पहिल कुलच्छन बुझलनि, जखनहि घुरि अयला सौराठ॥ घुरि अयला सौराठ हाट करथु बेचारे विधिक लिखल के मेटल आब रहि जेता कुमारे॥ छोरलनि बीस हजार , लोभ मे तीस हजारक। कए रहला गणना जोतखी, एहि साल बजारक सुनलनि जखनि सुषेण सँ , दहेज निरोधी न्यूज तखनहि जेना दिमाग केर ढिबरी भय गेल फ्यूज ढिबरी भय गेल फ्यूज बराति कन्यागत दुनू घटकैती के करत घटक केर हाल न सूनू बर क हाथ कनिया बरियातीक हाथ हथकड, सरियाी सभ करथु दौडबडहा कचहरी। लूटन झा त लुटि गेला कए दूई कन्या दान मोछ पिजौनहि रहि गेलाह करता की बरदान? करता की बरदान चोट छन्हि नगदी नोटक उजरल बरदक हाट प्रथम ई बात कचोटक घटक राज केर संग करथु बरु तीर्थयात्रा करथु मन्त्रणा गुप्त मुक्त भय सफल सुयात्रा जाति जनौ बाँचत कोना? कुल मर्यादा मान अन्तर्जाति ववाह में घोषित नकद ईनाम घोषित नकद ईनाम संग सर्विस सरकारी कहय शास्त्र ओ वेद मात्र द्विज छथि अधिकारी करथु ग्रहण ककरो कन्या हो डोम चमारक मन डोललनि पण्डित जी के जे उच्च विचारक भेल मनन मन्थन बहुत, ई समाज केर पाप!! की दहेज बन्ले रहत समाजक अभिशाप!! समाजक अभिशाप ब्याज ई पूँजीवादक। बेचि आत्मसम्मान स्वांग धरि कुल मर्यादक सिद्धान्त नहि व्यवहारहु केर करू प्रदर्शन तखनहि त भय सकत रोग उन्मूलन॥ किशन कारीगर, कृष्ण कुमार राय ‘किशन’ , परिचय:- वर्तमानमे आकाशवाणी दिल्लीमे संवाददाता सह समाचार वाचक रूपमे कार्यरत छी। हिंदी आ मैथिलीमे लेखन। शिक्षा- एम. फिल पत्रकारिता व जनसंचार कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरूक्षेत्रसॅं। जन्म:- कलकतामे। मूल निवासी:-ग्राम -मंगरौना, भाया -अंधराठाढ़ी जिला-मधुबनी बिहार। वर्तमान पता:- खेल अनुभाग, कमरा न0-608े, आकाशवाणी दिल्ली संसद मार्ग, नई दिल्ली-110001 दौगल चलि जाएब गाम मनुक्ख दौग रहल अछि मचल अछि आपा-धापी जतए केकरो कियो ने चिन्ह रहल अछि एहेन नगर आ पाथर हृद्य सॅं दूर एखने होइए जे दौगल चलि जाएब गाम।। लोहाक छड़ आ सीमेंट कंक्रीट सॅं बनल ओना तऽ ई एकटा आधुनिक महानगर अछि मुदा शहरक एहि आपा-धापी मे मनुक्खक हृद्य जेना पाथर भऽ गेल अछि।। किएक मचल अछि आधुनिकताक ई हरविड़ो ? कि भेटत एहि सॅं कियो ने किछू बूझि रहल अछि जेकरे दूखू रूपैयाक ढ़ेरी लेल अपसियॉंत रहैत अछि पाथर हृद्य मनुक्ख मानवताक मूल्य केने अछि जीरो।। लिफट लागल उ दसमंजिला मकान एक्के फलैट पर रहितौ लगैत छी अनजान ओ अड़ोसी हम पड़ोसी मुदा एक दोसर के नहि कोनो जान-पहचान।। कहू एहेन कंक्रीटक शहर कोन काजक आधुनिकताक काल कोठरी अछि साजल एहि चमचमाईत कोठरी मे कियो ने केकरो चिन्ह रहल अछि रूपैयाक खातिर आबक मनुक्ख की कि ने कऽ रहल अछि।। अतियौत-पितियौत ममियौत-पिसियौत जेकरा देखू अपने मे मगन चिन्हा परिचे सॅं कोन काज आधुनिकताक काल कोठरी मे आब अनचिन्हार भऽ गेलाह जन्मदाता बूढ़ माए-बाप।। शहरक एहेन अमानवीय आपा-धापी देखि केॅं पसीज गेल हमर हृद्य एहेन अनचिन्हार नगर छोड़ि केॅं मोन होइए एखने आब दौगल चलि जाएब गाम।। हे यौ भलमानुस आधुनिक मनुक्ख एहेन अनचिन्हार नगर ने नीक एहि कंक्रीटक महल सॅ एक बेर तऽ देखू गामक कोनो टूटली मरैया बड्ड नीक।। मनुक्ख एक दोसर के चिन्ह रहल अछि चिड़ै चुनमून चॅू चॅू कए रहल अछि रस्ता-पेरा निश्छल प्रेमक धार बहि रहल अछि हरियर-हरियर खेत-पथार आई सोर कऽ रहल अछि।। टूटलाहा टाट खर-पतारक किछू घर जतए नहि कियो अनचिन्हार नहि कोनो डर चौवटिया लग फरैत अछि खूम आम एहने नगर के औ बाबू लोग कहैत छैक गाम।। आबि गेल नव वर्ष। प्रणाम-प्रणाम औ भाई कि भेल औ भाई हृदयक स्नेह पठा रहल छी औ भाई। आबि गेल नव वर्ष मंगलमय संसार हुए विश्व शांति लेल मंगल कामना करैत छी औ भाई।। नव वर्षऽक नएका-नएका बसंती उमंग सभ मिली बनभोज करब दोस महीमक संग। हम बजाएब ढ़म ढ़म ढ़ोल अहॉ गाउ गीत कक्का खुशी सॅं बजा रहल छथि मृदंग।। कक्का बजलाह कहू की हाल-चाल काकी बजलीह आबि गेल नवका साल। आई सभ मिली एक संगे खशी मनाएब हृदयक स्नेह हम सभ केॅं पठाएब।। नवका आंगी नवका नुऑं नवकी कनियॉं पुरी पकाबैए। बुढ़बा बाबा बड़-बड़ बाजैए धिया-पूता खूम उधम मचाबैए।। पठबैत छी किछू नव-नव सनेश ई सनेश अहॉं सहज स्वीकार करू। नव वर्षऽक अछि सादर शुभकामना सदखनि अहॉं हॅसैत मुस्कुराइत रहू।। जहिना चमकै छै चकमक चॉंद ओहिना अहॉं चमकैत रहू। एतबाक करैत छी हम कामना अपना माटि-पानि लेल किछू सार्थक काज करैत रहू।। बँटवारा कियो धर्मक नाम पर कियो जातिक नाम पर कियो पैघक नाम पर कियो छोटक नाम पर एहि समाजक किछू भलमानुस लोक अपने मे कऽ लेने छथि बँटवारा। हे यौ समाजक कर्ता-धर्ता लोकनि किएक करेलहुॅं अपने मे बटवारा आई धरि की भेटल एतबाक ने छोट पैघक नाम पर अपने मे मैथिलक बॅंटवारा। आई धरि शोक संतापे टा भेटल आबो तऽ बंद करू एहेन बँटवारा नहि तऽ फेर अलोपित भ जाएत मिथिलांचलक एकटा ओ मैथिल धु्रवतारा। हे यौ मिथिला केर मैथिल जूनि करू अपने मे बँटवारा ई मिथिला धाम सबहक थिक एक दोसर केर सम्मान करू ई बड्ड निक। हम कहैत छी मैथिलक कोनो जाति नहि सभ गोटे एक्के छथि मिथिलाक धु्रवतारा नहि कियो पैघ नहि कियो छोट आई सभ मिलि लगाउ एकटा नारा। कहबैत छी बुझनुक मनुक्ख मुदा बँटवारा कऽ तकैत छी अपने टा सूख एक बेर सामाजिक एकता लेल तऽ सोचू गोत्र सगोत्रक फरिछौट मे आबो तऽ ओझराएब छोरू। हम छी मिथिला केर मैथिल हमर ने कोनो जाति अछि सभ मिली मिथिला केर मान बढ़ाएब आई सभ सॅं "किशन" एतबाक नेहोरा करैत अछि। एक्कईसम शताब्दी नवका एकटा ई सोच नहि कोनो भेदभाव नहि कोनो जाति-पाति सभ मिली हॅसी खुशी सॅं करब एकटा भोज एक्के छी सभ मैथिल गीत गाउ आई भोरे-भोर। सबहक देहक खून एक्के रंग लाल अछि मुदा तइयो जातिक नाम पर बँटवारा भऽ गेल अछि सपत खाउ आ सभ मिली लगाउ एकटा नारा आब नहि करब धर्म जातिक नाम पर हिंदुस्तानक बँटवारा। एकटा तऽ ओ छलीह। कनैत छलहुँ माए गे माए-बाप रौ बाप हे रौ नंगट छौंरा रह ने चुपचाप नूनू बाबू कऽ ओ हमरा चुप करा दैत छलीह एकटा तऽ ओ छलीह। बापे-पूते के कनैत छलहुँ कखनो तऽ ओ हमरा दूध-भात खुआ दैत छलीह बौआक मूहॅं मे घुटूर-घुटूर कहि ओ अपन ऑंखिक नोर पोछि हमरा हॅसबैत छलीह। खूम कनैत-कनैत केखनो हम बजैत छलहुँ माए गे हम कोइली बनि जेबउ नहि रे बौआ निक मनुक्ख बनि जो ने आओर कोइली सन बोल सभ के सुनो ने। केखनो किछू फुरायत छल केखनो किछू नाटक मे जोकर बनि बजैत छलहुँ बुरहिया फूसि मुदा तइयो ओ हॅंसि कऽ बजैत छलीह किछू नव सीखबाक प्रयास आओर बेसी करी। रूसि कऽ मुहॅं फुला लैत छलहुँ तऽ ओ हमरा नेहोरा कऽ मनबैत छलीह कतो रही रे बाबू मुदा मातृभाषा मे बजैत रही अपना कोरा मे बैसा ओ एतबाक तऽ सीखबैथि छलीह। मातृभाषाक प्रति अपार स्नेह गाम आबि नान्हि टा मे हुनके सॅं हम सिखलहुँ गाम छोड़ि परदेश मे बसि गेलहुँ मुदा मैथिलीक मिठगर गप नहि बिसरलहुँ। अवस्था भेलाक बाद ओ तऽ चलि गेलीह ओतए जतए सॅं कहियो ओ घूमि कऽ नहि औतीह मुदा माएक फोटो देखि बाप-बाप कनैत छी मोन मे एकटा आस लगेने जे कहियो तऽ बुरहिया औतीह। समाजक लोक बुझौलनि नहि नोर बहाउ औ बौआ बुरहिया छेबे नहि करैथि एहि दुनियॉं मे तऽ कि आब ओ अपना नैहर सॅं घूरि कऽ औतीह मरैयो बेर मे बुरहिया अहॉं कें मनुक्ख बना दए गेलीह। बुरहियाक मूइलाक बाद आब मइटूगर भए गेल किशन’ ओई बुरहिया के हम करैत छी नमन अपन विपैत केकरा सॅं कहू औ बौआ कियो आन नहि ओ बुरहिया तऽ हमर माए छलीह। गलचोटका बर- (एकटा हास्य कविता) देखू.देखू हे दाए.माए केहेन सुनर छथि गलचोटका बर। तिलकक रूपैया छनि जे बॉंकि सासुर मे खाए नहि रहल छथि एक्को कर। अनेरे अपसियॉंत रहैत छथि अल्लूक तरूआ छनि हुनका गारा मे अटकल। खाइत छथि एक सेर तीन पसेरी मुदा देह सुखाएल छनि सनठी जॅंका छथि सटकल। केने छथि पत्रकारिताक लिखाई.पढ़ाई दहेजक मोह मे छथि भटकल। ऑंखि पर लागल छनि बड़का.बड़का चश्मा मुहॅं कान निक तऽ चैन छनि आधा उरल। ओ पढ़हल छथि तऽ खूम बड़ाई करू ने मुदा हमरा पढ़नाईक कोनो मोजर ने। बाबू जी के कतेक कहलियैन जे हमरो पसीन देखू मुदा डॉक्टर इंजीनियर जमाए करबाक मोह हुनका छूटल ने। जेना डॉक्टर इंजीनियरे टा मनुख होइत छथि लेखक समाजसेवीक एको पाई मोजर ने। सोच.सोच के फर्क अछि मुदा केकरा समझाउ दूल्हाक बज़ार अछि सजल खूम रूपैया लूटाउ ने। एहि बज़ार मे अपसियंॉत छथि लड़की के बाप इंजीनियर जमाए कए छोड़ैत छथि अपन सामाजिक छाप। एहि लेल तऽ अपसियॉंत छथि एतबाक तऽ ओ करताह बेटीक निक जिनगी लेल ओ किछू नहि सोचताह। अहॉं बेटी केॅ निक जॅंका राखब दहेज लैत काल हमरा बाबू के ओ तऽ बड़का सपना देखौलनि। ई तऽ बाद मे बूझना गेल जे किछूएक दिनक बाद दहेजक रूपैया सॅं ओ पानक दोकान खोललैनि। नहि यौ बाबू हम नहि पसिन करब एहेन सुनर बर एतबाक सोचिए के हमरा लगैत अछि डर। भले रहि जाएब हम कुमारी मुदा कहियो ने पसिन करबए एहेन दहेज लोभी गलचोटका बर। लिखैत रही। मोन होइए जे एक मिसिया कऽ पिबैत रही मुदा कहियो कऽ किछू-किछू लिखैत रही कनेक हमरो गप पर धियान देबैए मोन होइए जे पाठक सभ सॅं भेंट करैत रही। ग़ालिब सेहो एक मिसिया कऽ पिबैत छलाह मुदा किछू-किछू तऽ लिखैत छलाह अपना लेल नहि पाठक लोकनिक लेल मुदा बड्ड निक लिखैत छलाह। पद्य लिखनाई तऽ आब हम सीख रहल छी हमरा तऽ नहि लिखबाक ढंग अछि मुदा किछू निक पद्य लिखि नेनापन सॅं एतबाक तऽ हमर सख अछि। िक िलखू िकछू ने फुरा रहल अिछ बढलैऍ मँहगाई तऽ अधपेटे भूखले रहैत छी िकऍक ने रही जाऍ भूखल पेट मुदा िकछू िलखबाक लेल मोन सुगबुगा रहल अछी। पोथि लिखलनि महाकवि विद्यापति लिखलनि पोथि बाबा नागार्जुन किछू नव रचना जे नहि लिखब तऽ कोना भेटत मैथिली साहित्यक सद्गुण। लेखक समाजक सजग प्रहरी होइत छथि अपना लेल तऽ नहि अनका लेल लिखैत छथि कतेक लोक हुनका आर्थिक अवस्था पर हॅसैत अछि मुदा तइयो ओ चुपेचाप लिखैत रहैत छथि। कहू एहेन उराउल हॅसी पर कोनो लेखक एक मिसिया कऽ पिबत कि नहि अपन दुःखित भेल मोन के कखनो के अपनेमने हॅंसाउत कि नहि कतेक लोक गरियअबैत अछि एक मिसिया पीब कऽ लिखब ई किएक सीखू मुदा आई किशन’ मोनक गप कहि रहल अछि पिबू आ कि नहि पीबू मुदा किछूएक तऽ लिखब सीखू। आई हमरो मोन भए रहल अछि जे एक मिसिया कऽ पिबैत रही अपना लेल नहि तऽ पाठक लोकनिक लेल मुदा किछू नव रचना लिखैत रही। नबकनियाँ मोन रखियौ कनेक हमरो पिया सोलहो सिंगार कए बैसल छी हम एसगर भेंट होएब कहिया अहॉ मोन मे आस लगेने अहॉक बाट तकैत छी हम एसगर। कौआ कूचरल भोरे-भोर चुपेचाप हमरा केलक सोर कहलक जल्दीए औतहुन तोहर ओझा लिपिस्टीक लगा हम रंगलहुॅ अपन ठोर। परदेश जाइत-मातर यौ पिया किएक बिसैर जाइत छी नबकनियॉ के नहि बिसरब कहियो परदेश मे हमरा सपत खाउ हमरा पैरक पैजनीयॉं के। जूनि रूसू अहॉ सजनी नहि घबराउ यै मोन पड़ैत छी अहॉ तऽ लगैत अछि बुकोर यै मुदा कि करू नहि भेटल तनखा समय पर नहि किनलहुॅ अहॉंक लेल लहंगा पटोर यै। साड़ि पहिर हम गुजर कए लेब नहि चाहि हमरा राजा लहंगा पटोर यौ अहॉक सुख-दुख मे रहब सहभागी देखितहुॅं अहॉ के ऑखि सॅ झहरैत अछि नोर यौ। अहिंक बियोग मे दिन राति जरैत छी इजोरिया मे टुकूर-टुकूर अहिं के देखैत छी अहिंक संग एहि बेर घूमब चैतीक मेला मोने मोन हम एतबाक नियार करैत छी। बड्ड केलहुँ नियार अहॉ आबि कऽ देखू मुस्की माइर रहल छी हम चौअनियॉं जल्दी चलि आउ गाम यौ पिया चिªट्ठी लिख रहल अछि एकटा नबकनियॉं। किडनी चोर देखू-देखू केहेन जमाना आबि गेल मनुखक हृदय भऽ गेल केहेन कठोर सभ सॅं मुॅंह नुकौने, चुपेचाप भागि रहल अछि एकटा किडनी चोर। डॉक्टर भऽ के करैत अछि डकैति कोनो ग़रीबक बेच लैत अछि किडनी पुलिस तकैत अछि ओकरा इंडिया मे मुदा ओ परा जाइत अछि सिडनी। कोनो ग़रीबक किडनी बेचि कऽ संपति अरजबाक, केहेन ई अमानवीय भूख केकरो मजबूरीक फायदा उठा कऽ डॉक्टर तकैत अछि, खाली अपने सूख। केकरो जिनगी बॅंचौनिहार डॉक्टर, रूपयाक लोभ में बनि गेल आब किडनी चोर छटपटा रहल अछि एकटा गरीबक करेजा कनैत-कनैत सूखा गेलै, ओकर ऑंखिक नोर। मनुख आब केहेन लोभी भऽ गेल आब ओ किडनी बेचब सेहो सीख गेल राता-राति अमीर बनबाक सपना देखैत अछि रूपया खातीर ओ किछू कऽ सकैत अछि। मनुख भऽ के मनुखक घेंट काटब कोन नगर में सिखलहुॅं अहॉं आबो तऽ, बंद करू किडनी बेचबाक धंधा मानवताक नाम सगरे घिनेलहुॅं अहॉं। कोनो गरीबक किडनी बेचि कऽ महल अटारी बनाएब उचित नहीं थीक एहेन डॉक्टरीक पेशा सॅं, कतहू मजूरी बोनिहारी करब बड्ड नीक। हम अहिं के कहैत छी, यौ किडनी चोर एक बेर अपने करेजा पर, छूरी चला कऽ देखू कतेक छटपटाइत छैक करेजा एक बेर अपन किडनी बेचि कऽ तऽ देखू। ।स्वतंत्रता दिवस पर एकटा विशेष। बीर जबान मातृभूमीक रक्षा लेल शहीद भऽ जाइत छथि बीर जबान समहारने छथि ओ देशक सीमान नमन करैत अछी ‘कशन ,अहॉ छी बीर जबान। मरब की जीयब तेकर नहि रहैत छनि हुनका धियान मुदा, देशक रक्षा लेल ओ सदखनि न्योछाबर करैत छथि अपन जान। सैनिक छथि ओ इन्सान देशक दुशमन पर रखैत छथि धियान आतंकवादीक छक्का छोड़ा दैत छैक परमवीर छथि, हिन्दुस्तानक बीर जबान। महान छथि ओ बीर जबान, देशक खातिर जे हॅंसैत-हॅंसैत देलथिहिन अपन बलिदान भारतवासी गर्व करैत अछि अहॉ पर नहि बिसरत कहियो अहॉक त्याग आओर बलिदान। सीमा पार सॅं, केलक आतंकी हमला कऽ देलियै आतंक के मटियामेट अहॉं भऽ गेलहुॅं अपने लहु-लुहान मुदा आतंक सॅं बचेलहुॅं सभहक जान कारगील सॅ कूपवाड़ा तक आतंकवादी सॅं लैत छी अहॉं टक्कर अहॉंक बीरता देखी कऽ अबैत छैक ओकरा चक्कर। बीर जबान यौ बीर जबान समहारने छी अहॉं देशक सीमान कोना कऽ हेतै देशक रक्षा सदखनि अहॉ रहैत छी हरान। ।कन्या भू्रण हत्या पर एकटा विशेष। हमरो जीबऽ दिअ कोइखे मे छटपटा रहल छी हम ई दुनियॉं हमरो देखऽ दिअ बेटी भऽ के जनम लेनहि कोनो अपराध नही बाबू यौ, ई जिनगी हमरो जिबऽ दिअ। डाक्टरक आला कहि रहल अछि नहि बचतहु आब तोहर प्राण अल्ट्रªासाउण्डक रिपोट, किछूएक काल मे आब लए लेतहु तोहर जान। करेलहुॅं अल्ट्रªासाउण्ड यौ बाबू मुहॅ भेल अहॉक मलीन डाक्टर संगे केलहुॅ ई प्लान कोइखे में एहि बेटी के, कए दिहक क्लीन। हम बूझैत छी, हमरा जनमलाक बाद नहि बॉंटब अहॉं जिलेबी बुनियॉं दुखित भेल अछि मोन अहॉक, नहि आनब हमरा माए लेल, नाक केर नथुनियॉं। जॅ होइतहॅंू हम बेटा करितहुॅं अहॉ सगरे अनघोल अरोसी-पड़ोसी शुभकामना दितैथि रसगुल्ला बॅटितहुॅ अहॉ टोले-टोल। बेटीक जनम भेला पर,एहेन बेईमानी किएक? आई किछू हमरो कहऽ दिअ बेटी भऽ के जनम लेनहि कोनो अपराध नहि बाबू यौ, ई जिनगी हमरो जिबऽ दिअ। हाकिम भऽ गेलाह किएक चिन्हता आब कका ओ तऽ हाकिम भऽ गेलाह अबैत रहैत छथि कहियो कऽ गाम मुदा अपने लोक सॅं अनचिन्हार भऽ गेलाह। जूनि पूछू यौ बाबू ,हाकिम होइते ओ कि सभ केलाह बूढ़ माए-बाप के छोड़ि कऽ एसगर अपने शहरी बाबू भऽ गेलाह। आस लगेने माए हुनकर,गाम आबि बौआ करताह कनेक टहल-टिकोरा नहि परैत छनि माए-बाप कहियो मोन मुदा खाई मे मगन छथि पनीरक पकौड़ा। झर-झर बहए माएक ऑंखि सॅं नोर किएक नहि अबै छथि हमर बौआ गाम? मरि जाएब तऽ आबिए के कि करबहक हाकिम होइते, किएक भेलह तांे एहेन कठोर? ई सुनतैंह भेल मोन प्रसन्न जे अबैत छथि कका गाम भेंट होइते कहलियैनि कका यौ प्रणाम नहि चिनहलिअ तोरा, बाजह अपन नाम। ऑंखि आनहर भेल, कि देखैत छियै कम एना किएक बजैत छह बाजह कनेक तूंॅ कम आई कनेक बेसिए बाजब हम अहूॅं तऽ होएब बूढ़, औरदा अछि कनेक कम। कि थीक उचित, कि थीक अनुचित मोन मे कनेक अहांॅ विचार करू ‘किशन’ करत एतेबाक नेहोरा जिबैत जिनगी माए-बापक सतकार करू। नहि तऽ टुकूर-टुकूर ताकब एसगर अहिंक धिया पूता अहॉं के देख परेता बरू जल्दी मरि जाए ई बूढ़बा मोने-मोन ओ एतबाक कहता। पियक्कर सॉझ पड़ैत देरी,पीब क ओंघरा जाइत छी हम छी पीयक्कर। पढ़लाहा लिखलाहा के मूर्ख बूझैत, अपना के बुझैत छी लाल बुझक्कर। धिया-पूता पढ़ैत अछि किनैंहि,तेकर नैंहि करैत छी हम खोज मुदा पिबैत छी हम रोज। अपन काज छोड़ि कैं,व्यर्थ हम घूमैत रहैत छी केहेन छी हम घूमक्कर, हम छी पीयक्कर। पाई सधहेलौं दारू में ,भ गेलौंह हम फक्कर महाजनक कर्ज देखि क अबैत अछि हमरा चक्कर। लाधहल अछि हमरा माथ पर कर्जाक पहाड़ लगबैत छी कोर्ट कचहरीक चक्कर,क्याक त हम छी पियक्कर। सॉझ पड़ैत देरी,पीब क ओंघरा जाइत छी हम छी पीयक्कर। एखने हम शपत खाईत छी जे हम नैंहि आब पीयब कियाक कहत आब कियो हमरा पियक्कर। धिया पूता के निक स्कूल कॉलेज में पढ़ाएब एहि लेल त ,लगबैत छी मधुबनी दरभंगाक चक्कर। दहेज दहेजक नाम सुनि कऽ कांइपि उठैत अछि ,माए-बापऽक करेज कतबो छटपटायब तऽ लड़कवला कम नहि करताह अपन दहेज। ओ कहताह, जे बियाह करबाक अछि तऽ हमरा देबैह परत दहेज पाई नहि अछि तऽ बेच लिय अपना जमीनऽक दस्तावेज। दहेज बिना कोना कऽ करब हम अपना बेटाक मैरेज दहेज नहि लेला सऽंॅ खराब होयत समाज में हमर इमेज। एहि मॉडर्न जुग मे तऽ एहेन होइत अछि मैरेज आयल बरियाति घूरीकऽ जाइत छथि जऽंॅ कनियो कम होइत अछि दहेज। मादा-भूर्ण आओर नव कनियाक जान लऽ लैत अछि इ दहेज ई सभ देखि सूनि कऽ काइपि उठैत अछि ‘किशन’ के करेज। समाज के बरबाद केने जा रहल अछि ई दहेज बचेबाक अछि समाज के तऽ हटा दियौ ई मुद्रारूपी दहेज। खाउ एखने सपत ,करू प्रतिज्ञा जे आब नहि मॅंागब दहेज बिन दहेजक हेतै आब सभ ठाम सभहक बेटीक मैरेज। देशऽक चिन्ता किनको छनि स्वार्थक चिन्ता किनको छनि घूस लेबाक चिन्ता नेता सभ के अछि कुर्सीक चिन्ता मुदा किनको नहि अछि, देशऽक चिन्ता। चुनाव जीतलाक बाद, कुर्सी भेटलैन्ह नेताजी के भऽ गेलाह निःफिकीर मुदा भाषणेटा मे खिचैत छथि आर्थिक विकासऽक लकीर । भूखे मरैत अछि गरीब जनता एहि बातक हुनका नहि छनि कोनो चिन्ता शहीद होइत छथि देशऽक सीमा पर जुआन कानब तऽ दूरक गप, श्रद्धांजलियो दैए लेल नहिं औता। नेता सभ मंत्रालय लेल छथि परेशान कियो स्वार्थसिद्धिक लेल अछि हरान कियो भूखे मरि जाए, कियो दहा जाएय बाढ़ि मे मुदा हुनका नहि, जेतैन मरल लोक पर धियान। घूस खाईत-खाईत भऽ गेलाह भ्रष्ट मुदा खादिक अंगा पहिर, अपना के बुझैेत छथि श्रेष्ट कोना कऽ हेतै आर्थिक विकास नहिं सोचैत छथि, नहि छनि चिन्ता। सभ पार्टी के तऽ अछि कुर्सीक चिन्ता मुदा किनको नहिं अछि देशऽक चिन्ता। नवीन कुमार “आशा” (१९८७- ), पिता श्री गंगानाथ झा, माता श्रीमति विनीता झा। गाम- धानेरामपुर, पोस्ट- लोहना रोड, जिला- दरभंगा। मच्छर मच्छर अछि बड़ खच्चर जँ ई काटै मोन पड़ावै दादी नानी गामक जँ नै जरै कोनो बत्ती ताधरि नै प्राण यौ सभ घरक शान बढ़ावै सभ घरक याद दियाबै देखैमे छी छोट मुदा होइ बड़ खच्चर मच्छर मच्छर... धुँआ धुकुरक छै जमाना मुदा ओकर एकटा फसाना खून जाधरि नै चूसै तावत नै रुकै ओ सभ कियो करै सम्मान बूढ़ होए चाहे बच्चा सभ कए दैए खरमैच्चा मच्छर मच्छर... साँझ होए चिन्ता धरै रातिमे खूब सताबै मच्छरदानी जँ नै लगेलौं बादमे प्राण सुखाबै मच्छर मच्छर (मित्र पी.एस.ठाकुर “बबलू” लेल) याद अबैए बाबाक लावा (अपन बाबा स्व. सोमनाथ झाकेँ समर्पित) मालिक मालिक मालिक भोरे ओ आवाज लगाबथि हमराले ओ आनथि सनेस चाहे रहनि कोनो भेष एक दिन ऐला बाबा हाथमे छलनि हुनका लाठी छलनि किछु मन सुस्त मुदा ओ छलथि एखनो मस्त हम पूछल हुनकासँ मीत की भेल अहाँकेँ बाबा कतए अछि हमर लाबा कहलथि हमरासँ बाबा नै अनलियौ तोरा लेल लाबा मन भेल हमर फुस नै बुझल जे कहलथि ओ फुसि फेर लगला बाबा हँसए आ देलथि ओ सनेस कहलथि ओ हमरासँ बौआ जाधरि अछि प्राण ताबे रहत तोहर ध्यान तूँ छह मालिक तूँ छह नेना नै रहू अए तूँ जेना तेना नै बुझि पाओल हुनकर कष्ट की कहला ओ स्पष्ट ओहि दिन जे गेला बाबा नै फेर अनला लाबा दोसर दिन जखन उठल नै पाओल हुनकर आवाज हाथमे लेने कटोरा पहुँचि हुनकर डेरा पाओल हुनका टघरल फेर कहल हम हुनकासँ सुनू यौ बाबा, सुनू यौ बाबा कतए अछि आजुक लावा नै कहला हमरासँ किछु नै बुझि सकलौं हम ई नै रहला ओ जगमे किछु कालमे भेल सभ इकट्ठा फेर केलक हुनका बाहर नै बुझि पाओल हम तखनहुँ नै भेटत हुनकर फेर दुलार जैमे छल नै कोनो भेद याद जखन ओ आबथि अखनो कानी हम फफखि फफखि जहिया पाबी हम अपनाकें अकेला जाइ हुनकर सारापर फेर करी किछु गप नै करी मन हप कहियनि हुनकासँ मीत बाबा याद आबैए अहाँक लावा याद आबैए अहाँक दुलार जे नै घुरि आएत फेर करथि आशा अर्पित ई रचना अपन परम पूज्य दादाजीकेँ जिनकर अछि कमी आशाक जीवनमे जखन देखथि कतहु लावा याद आबथि हुनका बाबा मनीष झा "बौआभाई" फहराइयै पताका देखू मिथिला नगर के फहराइयै पताका जत' बाँचल अछि एखनहु धरि मान ओ मर्यादा जतक नारी जानकी श्रीराम केर भामिनी जतक सभ्य संस्कृति के गाबै छथि रागिनी ई नगरी अपन छोट नगरी जुनि बुझू अछि सगरो जगत में मचौने धमाका जत' बाँचल अछि एखनहु धरि मान ओ मर्यादा हल्ली-मदन-वाचस्पति के ख्याति छन्हि विद्यापतिक गीत सब गुनगुनाइत छन्हि परमज्ञानी सत्यदेव ज्योतिष के ज्ञाता मिथिला कहल जाईछ संपन्न गुणवाला जत' बाँचल अछि एखनहु धरि मान ओ मर्यादा कोइली कुहुकि स्वर पंचम में गाबय झमझम बरसि मेघ कजरी सुनाबय भोरे पराती गाबैइयै सुग्गा परवा स' सजय रोज मंदिर-शिवाला जत' बाँचल अछि एखनहु धरि मान ओ मर्यादा नीपल जाईछ पीढ़ी गोसाऊनिक नित रोजे पूजा के शंखनाद कोश-कोश गूजे घर-घर में शालिग्राम, तुलसी के चौरा घोघ तर में नारी लागय सीता आ राधा जत' बाँचल अछि एखनहु धरि मान ओ मर्यादा तुलसिक पनिसल्ला में कूश आ डाबा नाग पूजल जाइछ ल' क' दूध संग लाबा पातैर में भोग लागय आम-खीर-पूरी जगदम्बाक कृपा स' हटल रहय विघ्न बाधा जत' बाँचल अछि एखनहु धरि मान ओ मर्यादा यश-कीर्ति-वैभव स' परिपूर्ण मिथिलांचल जनक जीक न्याय के देवतो सब मानल "मनीषक" अछि कामना जे बढ़ू सब आँगाँ मैथिलक विचार उच्च, जीवन होइछ सादा जत' बाँचल अछि एखनहु धरि मान ओ मर्यादा मुन्नी कामत, निर्मली, सुपौल समाजक विडम्बना देख कऽ ई समाजक विडम्बना विआहब आब हम धिया कोना चारपर खढ़ नहि पेटमे अन्न नहि नै अछि संगमे एक्को अना मांग भेल ड्राइवरकेँ लाख मास्टर आ डाक्टरक नै पुछूँ बात दिनक उजयारि भेल कारी, भेल घनघर राति ई हमरेटा नहि जन-जनक दुखरा अछि बेटिबलाकेँ मलिछ बेटाबलाकेँ खिलल मुखरा अछि नन्हिटा धिया हमर भेल आब सयानी तिलकक एहि युगमे बिआहव कोना बिटिया रानी बहि रहल यऽ अरमान सभ, जेना मुट्ठीमे पानि मृदुला प्रधान ई त बूझू अपना गोर पर अपने , कुल्हाड़ी मरनाई, भ गेल . द देलीयईक टिप्पणी, मैथिली में, एही भाषाक कविता पर, बस..... बुझलों जे भ गेल, मुदा से नईं भेल . भेल ई जे एकटा नवका द्वार , मुंह बौने ,आँखिक आगाँ,अनायास ठाढ़ भ गेल . पाठक-गण तक भरसक, संकेत पहुंचल- 'निश्चय मैथिल भाषी छथि' फलस्वरूप लिखवाक आग्रह ल क आबि गेल , स्नेह-सम्मान सँ भरपूर 'ई-मेल' आ हमरा भाव-विह्वल होयबाक, पूर्ण व्यवस्था भ गेल . अपनों दोष , कम नईं अछि , कलम क माध्यम सँ , कुमरपत क गाम-घर में , विचरण करवाक लोभ , टाल नईं सकलों आ किछ न किछ , लिख-लिख क , निर्दिष्ट ठेकाना पर , पठावय लगलों. अब आगाँ क यथार्थ ई जे बाल्यकाल सँ किशोरावस्था पर्यन्त, पढ़ल , चारि टा किताब , प्रणम्य-देवता , कन्यादान , द्विरागमन, चर्चरी आ भनसाघर सँ , रसोईया बबाजीक, मैथिल स्वर -लहरी . एतवे ल क, फुरफुरायल छलों. 'येन-तेन-प्रकारेन' एही सभ सँ अर्जित , शब्द-कोषक , लिपा- पोति करैत-करैत , किछ दिन पार लागि गेल किन्तु आब कि ..... आब कि लिखू ? यैह गुन-धुन में अन्ह्ररौखे सँ , चिकैरि-चिकैरि क सोचैत रहैत छी, हे माँ सरस्वती , विनती करैत छी, उठाऊ अपन वरद हस्त, किछ जोगाड़ कय दिय, जेमें छवि बनल रहै, लेखनी में एहन किछ, भरि दिय. रमा कान्त झा, सौराठ मिथिलाक विकासक बात अछि जे मिथिलाक विकास कोना होएत। मिथिलाक विकासक लेल विषय-वस्तुक बारेमे एकजुट हेबेक चाही , एक दोसरकेँ साथ चलबाक विषय हो, जे विकास नेतागण अपन राजनीतिक रोटी नहि सेकथि आर मुद्दा सिर्फ विकासक होबक चाही ! आइ बिहारमे मिथिलाक भूमि विकाससँ वंचित आछि ! आइ हम सभ अपन रोजी रोटीक तलासमे दिल्लीमे छी, कियो पंजाब आ कियो मुम्बयमे कोपक शिकार होइत अछि ! यदि मिथिलामे रोजगार होइत तखन दिल्ली तँ दूर होइत। लोकमे दम होइत, कोशी कमलाक जल संसाधनकेँ मजबूत तटबन्ध रहितै आ गाम आइ जीवित होइत। सरकारक नीति जे बिहारक नामपर घोषना तँ होइत अछि लेकिन पैसा आँखिक नोर सुखलाक बाद जाइत अछि ! फेर जर्जर के जर्जर। एकताक जरूरत आछि आर नितिश जी के नीति सही अछि जे पुनः बिहार बचेबाक नीति विकासक नीति रोजगारक नीति मिथिलाक चौतरफा विकासक नीति ! की होइत अछि कश्मीरमे आब की होइत अछि कश्मीरमे आब, आगि लगा रहल तकदीरमे , जान जान लऽ कऽ भागै अए देखू कश्मीरमे !! स्वर्ग की छलहुँ आब नरक बना देलक तक़दीर हिन्दू मुस्लिम किओ नहि बाकि जड़ि रहल अछी कश्मीरमे , लगि कऽ जाला डेल्ही पहुँचल , राजनीतिक दरबारमे , नेता जी राजनीतिक रोटी सेकथि! जीवन फसल मझधारमे , की होइत अछि कश्मीरमे आब आगि लगा रहल तकदीरमे !! पाकिस्तान आपन चली चालि वा , आतंकवादीकेँ दऽ सहारा अशान्ति फैलाबए कश्मीरमे हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाइ आपसमे हे भाइ-भाइ , कतह गेल ई नारा , की भए रहल कश्मीरमे की होइत अछि कश्मीरमे आब आगि लगा रहल तकदीरमे !! रही रही मोन पड़ै अछि गामक गामक लताम आ आम , पुरबा पछवा ओ दंड हवामे , ओरत बालू के , लेटित हो मन , आमक गाछक निच्चामे खाट बिछा , गोपी आमक आनंद , जीव शहरक जीव बनल पतंग , खोंहू ककरो हाथक डोरी , पेटक बासते दौड़ि रहल छी , सगरो संसार छोट बुझना जाइछ, आखिर कनकन होइत पुरगरम रहि-रहि मोन पड़ै अछि गामक !! हम की हमर पहचान की मिथिलाक पहचान माछ, पान ओ मखान , धोती कुर्ता ओ डोप्टा ओ मुँहमे पान , धैर्यय ओ बलबान सभसँ भेटय सम्मान , आह नहि किनको हरदम मुहपर मुस्कान ! ई हमर मिथिलाक पहचान !! सभसँ पछुआयल छी ओ जग नाम , खान पान हो सबकेँ देता समान , नहि कियो अपन नहि कियो आन , सभकेँ सुआगत एक समान ! ई हमर मिथिलाक पहचान !!, गंगा कोसी जीबछ धार , सभकेँ लगबथि बेर पार , धन समानक कुबेर के अवतार, सगरुओ मिथिलाक महिमा अपरम पार, ई मिथिलाक पहचान !! माता के चरण कमलमे आरती प्रस्तुत जय अम्बे जय अम्बे जय जय अम्बे जय अम्बे नूतन सघन सजल नीरद छवि शंकर नाम लेबैया , योगनी कोटि आंगन डाकनी नाचत ता ता थैया जय अम्बे जय अम्बे जय जय अम्बे जय अम्बे !! मुंडमाल उर बियाल बिराजित बसन बाघम्बर राजे , कर खप्पर अरु कोसल सित अति कति किंकिन अति बाजे, जय अम्बे जय अम्बे जय जय अम्बे जय अम्बे !! संसार पयोनिधि पार उतारिन सभ आसन सुख देया ! डीमिक डीमिक कर डमरू बाजे नाचत ता ता थैया , जय अम्बे जय अम्बे जय जय अम्बे जय अम्बे !! शिव सनकादि आदि मुनि सेवक शुम्भ निशुम्भ बेधैया , रमा कान्त करू बिनती आरती जय जय तारिणी मैया , जय अम्बे जय अम्बे जय जय अम्बे जय अम्बे !! जय श्यामा माताक आरती जय श्यामा जय श्यामा जय जय श्यामा जय श्यामा , पनाचान्न वाहन महिष बिनासिनी नीरद छवि अभिरामा , चंड मुंड महिषासुर मर्दनी त्रिभुवन सुन्दर नामा . जय जय जय श्यामा जय जय श्यामा .......................!! शंभु धरनी समसान निवासिनी जग जननी अभिरामा , सुम्भ निसुम्भ रक्क्त भव मर्दनी श्री गंगाधर बामा ,, जय जय जय श्यामा जय जय श्यामा .......................!! नारायण नरसिंह बिनोदिनी बिन्ध्य शिखर बिश्रामा , चमुंडा चंडासुर घातिनी पूर्ण निज मन कामा , जय जय जय श्यामा जय जय श्यामा .......................!! तुअ गुण वेद पुराण बखानत को नहि जानत नामा , सेवक अधम रमा कान्त पुकारत पुरहु सकल मन कामा जय जय जय श्यामा जय जय श्यामा .......................!! की गलती हमरासँ भेल ओकर सजा किए बेटाकेँ बजा लेलहुँ , हमरासँ दूर किए केलहुँ , आप्रद यदि हमरासँ भेल , तँ हमर किए नहि कष्ट देल, छ्ल आसरा एकटा तकरो , अहाँ राखमे समा लेलहुँ , सभटा अहाँ जानै छी, एना किए नुठुर अहाँ भेलहुँ , पूजा हम करै छी पाठ हम करै छी , नाम अहाँक लय सभ दिन उठी , आँखि खोलू हे माता आन्हर किए , हमर जीबनकेँ साकार करु , बेटाक संग , हमरो ओधर करु जीबन , ककरा मुँह देखि बितायब हम जिन्दगी , आब तँ पहर बनि जाएत जिन्दगी , एकटा कृपा करु माता सभ दुःख हरू , माया जंजालक फंदासँ पार आब करू बिबाह ने भेल एकटा सोगातक संग भेटल बिबाहकेँ एखन धरि झेल रहल छी , जेना बछड़ू बिना महिस बेकार तहिना खेल , भए रहल अछि, सास तँ बुझु जे राँचीक काँके रिटायर आर ससुर बुझू जे सगरु भारतसँ अवकाश प्राप्त , कहैले महिस स्कूलसँ बी.ए. पास , सास इंटर पास कनिया भेटली एम.ए. पास सारकेँ पठेला देसे पार , छोटकी सारि सदिखन मुँहे फइर, देखका दुनियाँ होए बेहाल, कनिक जेंगी होयत पहर . बेटा हमर देखए तँ होय बेहाल , डरे भागए गाछी कात , मिथिला अछि नगरी , सौराठ अछि हमर गाम देखू सभ दुनिया सहभा लगे अहि ठाम , सूरतसँ चलि कऽ सोमनाथ बसलाह बिच गाम , जखन चलला राम बिबाह करए , बाट पड़ैत अछि ई धाम , सोमनाथ आ राम संगहि बिबाह हेतु पहुँचला जनकपुर , सीता सभ सुकमारि कन्या ,पूजए चलली सती माताकेँ , सामने दुल्हा राम आ तीनू लोकोक नाथ , मिथिला अछि नगरी, सौराठ अछि हमर गाम , गोतम ओ तपो ऋषिगन सभ जान आबथि , सुन सुन धाम सब आबए , ई थिक मिथिला गाम . नाम सुनीता रूप आब्निता अछि सगरो गाम घूमी लाज नहि आबैत अछि चुनरी फहराबै गीत गाबै , छौड़ाकेँ लुभबैत, बुढ़बा हो आ जबान सभ सीटी बजबै, कमर लचका कऽ सभ बहकबै छिऐ, तिरछी नजरियासँ सभकेँ जान मारै छी, किनको मुस्कुरा कऽ चाहपर बजबै छी, किए अहाँ सभकेँ घर उजारै छी, चुनरी फहरा कऽ रसीला गीत गाबै छी नचारी कहाँ बैसल छी सोमनाथ यौ , सभ भए अहाँ बनू हम अनाथ , दोगू दौगू बाबा सोमनाथ , फँसलहुँ बिच मजधार , रस्ता देखि नहि ओहि पार , केबल अहाँ खेबन हार , बाबा दरस दिखा करी बेरपर , हमहूँ आयब सिबरातिकेँ सभ साल , लाएब आक धथूर ओ बेल पात , करब बाबाक सिंगार , कहाँ बैसल छी सोमनाथ यौ , हम सभ भेलहुँ अनाथ यौ, बसन्त आबि गेल नव कालिया सगरो गाछ छा गेल ! पुरबा पछवा बसात बहैए, जवानीक ओमद भरैए , दुख ने दर्दक थिक रहैए, आम मंजरमे मधु लगैए , देस दुनियाक हाथ चेला बनैए, बाबाक भाषन सुनैए, कियो रमा देव , कियो कामदेव, सभ दौगी चोला पहिरे , नारी संग नाच नचैए, कियो चिकोटी कियो नागी पेची . आनंद की भोगी बनैए, मदिराकेँ अमृत बुझा , झुट्ठे भगवानक नाम जपैए, अपना अपनीकेँ आबतर बुझैए? कचड़ेमे परला बाबू सांचे , पीबि दारू तारी , भोर साँझ चिकड़ैत रही चित्त मर्म बुझले बानर घूमी फिर कार्य्य ठेक हठात् गप्प पहुँचिकेँ, सुनितु बहावे घरकेँ आबथि , बान्हल महीस डेंगाबथि ! जे किओ सामने आबथि मुँहसँ गारि निकालथि परल साँझ मुनिसिमाक मायक , गारि दैत बजाबथि, की काज कएल भरिदिन , एम्हर आम्हर झगरा लगबथि, चढ़ल नासा माथा ऊपर , सभटा नाम भुलाय!! मनोज कुमार मंडल बूढ़ चिथड़ा वस्त्र हाथमे लाठी शाल चिपड़ा मुँह सिकुड़ल दाँत निपत्ता आँखिक चश्मा माथक अस्तित्व बचौने लगैत जेना नर कंकाल हुअए चारि-पाँच गोट नव तुरिया छाैड़ा जिंस झारने, देह लचकबैत आगू भऽ बाजल- “अँए हौ बूढ़ू हमरा सभकेँ देख लगै छह हमहूँ आब जवान बनी आकि जीवन लीला समाप्त कऽ आब पृथ्वीक भार हल्लुक करी?” मुड़ि उठबैत चश्मा सम्हारैत बूढ़ा बजलाह- “के छिअह बच्चा कने चिन्हए देह जबाब तँ बिनु कहनहुँ भेटतह कने समए जरूर लगतह करनी तँ देखबे करबह मरनी बेर कने आबए दहक।” किसान मुरगाक बॉंग सुिन चिड़ैएक किलोल खुजल ऑंखि आर निकलल बोल कट, कट, कट, कट कुट्टि कटबाक आवाज खुआ-पीआ कए मस्त कऽ देल बैलक कान्ह तानि खड़ा भऽ गेल गलाक घुमरल घंटी टन-टन-टन-टन कान्हपर हल आ हाथमे पेना आगू बैल लऽ चलल किसान। जाधरि लोक कमलासँ गंडक नाधंत ताधरि खुजल पएर आउ, आउ करैत खेतक ढेपा गरदा-गरदा भऽ जाएत खेत देखि थकान मेटाएल घर चलल आब किसान। करमेक धरम बनाउ पूजा बुझलैन्ह खेत-खलिहान अन्न प्रसाद थिक अहि प्रसादक के तिरस्कार करत? सहक तन मोटैलएन्ह अपन देह सुखाबैत किसान। िना अन्न जीन नइ की हुनके जीनगी सबसँ निम्न? कोउन नइ धाराक नियम उल्टा अछि? सबहक मो-फो जिनकासँ तिनके लोक अधलाह कहैत नइ अछि हुनका तेकर चिंता। गाछ बनि छॉंह दैत किसान। अहि दीनकेँ नहि छथि कोइ देखएबला हुनका जे बुरबक बुझैत की हुनक विवेक हेरा गेल? आकि बुइधिक हरण भए गेल? अहि अन्नदाताक देखि जतेक हँसिली नइ होएत विकास बिन किसान। बेचन ठाकुर घरनी-बीसा दोहा- श्रीमती घरनी पिरयै, अपन मन करए काज। सौस ससुर भैंसुर केर, छथि नहि राखै लाज।। लाज धाक सभ छोड़िकेँ, चलए ओ घोघ उधारि। बुढ़ पुरान डॉंटए तहन, हुनका देलनि गारि।। चौपाइ- जै घरनी परम अवगुण आगार। कनिया तीनू लोक उजागर।। घरबलाक मलिकाइन बलगर। नाम ससुरक घिनाबए नैहर।। महा गलगर ढिठगर बहुरंगी। हरदम रहए कुमतक केर संगी।। गोर देह गौरब से आनहर। करै ओ सदिखन खटखट हर हर।। कन फुसकी करबामे कमाल। झगड़ा लगाबैमे बहाल।। कनेको खर खुटखुटए तैयो। धर परान लादि मैयो मैयो।। सदा पसीन करए बैसारी। टिबी सिलेमामे तैयारी।। रूइयॉं रूइयॉं तामस भाबए। दर-दीयादमे आगि लगाबए।। अहॉंक गप घरबला मानए। घरबलाक गप दूर भगाबए।। तील गाछकेँ ताड़ बनाबए। सोझराइल काज ओझराबए।। कनियो डॉंटू लोचन नोर। मटिया तेल डरे लागू गोर।। चप कचौड़ी चटपटी चाही। माछ-मौस लेल ढुकए हाही।। नैहर लेल मुलकित धियान। सोसरा लेल बड कम गियान।। पायन चेन खेत बेचाबए। सखक चीज तुरन्त कीनाबए।। काजक डरसँ भूत लगाबए। आस-पड़ोसकेँ खुब देबाबए।। अपन धिया-पुता अछि महाराज। अनकर बुरबक बकलेल राज।। जे कियो पढ़ए घरनी बीसा। दीयादीमे हरदम नीसा।। जय जय जय टोल-टापर माइ। सौस ससुर घरबलाक साइ।। जे जन सए बेर करए ई पाठ। हरखित मने आशीष दुनू हाथ।। बेचनदास घरनीक चेला। अवगुण छोड़ि करू गुणक खेला।। दोहा- आजूक बौह बड हेहर, परिवार काल रूप। आइ धरि कियो नहि बचलनि, छोट पैघ नर भूप।। प्रेमसँ बाजू पतिवर गृहस्वामी की- जय। ननदिक कट्टर दुश्मन की- जय। सौसक सौस की- जय। परिवार कलहदायिनी की- जय। खापैरपाणि की- जय। बारहैनधारिणी की- जय। इति शुभम् नन्द विलास राय अकाल पानि विना घास-पात सभ जरि गेल धानक वीया सभ पीयर, भऽ भऽ मरि गेल। गाछी-विरछीक सबहक पात झरि गेल बाजारमे जिनिस सबहक दाम चढ़ि गेल। छोट-पैघ किसान सभ पिटैत अछि कपार ओकरा उपर टूटल दुखक पहाड़ लोक सभमे मचि गेल बड़का हाहाकार। खेत सभमे फाटल नम्हर-नम्हर दरारि धरतीकेँ रूपकेँ देलक विगाड़ि। ताल-तलैया सुखले रहि गेल, गोरहो खेत सभ परते पड़ि गेल। गाममे नै इज्जत ककरो बचत आब, झुण्डक झुण्ड लोक सभ विदा भेल दिल्ली-पंजाव। बर्खा नहि भेल समए भेल विकराल सभ बजैत अछि रवि-राइ बुनैले खेतमे नै अछि हाल मालोजाल भऽ जएत जीक जंजाल पड़ि गेल अकाल।। प्रदूषण रोकू कविता 1. जल छी जीवन हवा छी प्राण एहि दुनू बिना बॉंचत नहि प्राण। 2. आउ सभ मिलि कऽ जलकेँ प्रदूषनसँ बचाउ। 3. हवाकेँ प्रदूषनसँ बचेवाक खातिर गाछी-विरछी लगाउ। 4. घर-घरमे शौचालय बनाउ आ खुलामे शौच करए नहि जाउ। 5. नदी-पोखैरमे कचरा नहि गिराउ आ जलमे रहएबला जीब-जन्तुकेँ बचाउ। 6. सौर उर्जा लगाउ साइकिल चलाउ पेट्रोल-डीजल नहि जराउ प्रदूषनसँ हवाकेँ बचाउ। 7. जोर-जोरसँ रेडी नहि बजाउ हवाकेँ ध्वनि प्रदूषनसँ बचाउ। 8. जँ एहि सभपर देबै धियान तँ बचत सभक प्राण आ हएत सबहक कल्याण कियो ने पड़व बेमार भेटत सभकेँ आराम। गजेन्द्र ठाकुर, पिता-स्वर्गीय कृपानन्द ठाकुर, माता-श्रीमती लक्ष्मी ठाकुर, जन्म-स्थान-भागलपुर ३० मार्च १९७१ ई., मूल-गाम-मेंहथ, भाया-झंझारपुर,जिला-मधुबनी। घृणाक तरहरिमे/ बुढ़िया डाही संग अछि, घड़ी पूजा, नजरि लागि जाइ छै, ठाढ़ लत्तीकेँ पढ़ैत छी, हमर आकांक्षाक अग्नि, उजाहिमे उपलाइत हम आ माँछ, बकछुछरु खेलाइत हम आ भीखू, कटिहारी, भाग्यशाली, हाइकू/ शेनर्यू/ टनका/ हैबून, कुण्डलिया १-४, रुबाइ, कता १-२, गजल १-४१ (धांगि बाट बनेबाक दाम अगूबार पेने छँ) घृणाक तरहरिमे प्रेम मुस्कीसँ जीतब घृणा आ ईर्ष्याकेँ घृणाक तरहरि खूनऽ दियौ ओइ तरहरिमे घृणाकेँ गारि देबै अपन प्रेमक शक्तिसँ हँसैत- मुस्कियाइत करबै आग्रह जतेक परिश्रम घृणाक तरहरि बनबऽमे लगौलक कहबै प्रेमक पोखरि काटऽ जइमे प्रेमक पानि बरखा मासमे भरि जाएत आ भरले रहत ततेक गहींर कऽ काटल रहत माटि ओइमे हेलत प्रेम हेलैत रहत आ बहि जाएत, डूमि जाएत घृणा आ ईर्ष्या डूमि जाएत आ बझा कऽ लऽ जेतै पनिडुब्बी ओकरा जावत हम रहब नै छूबि सकत क्यो प्रेमक सत्यक पुत्रकेँ कारण शक्तिसँ, ऊर्जासँ भरल अछि सत्यक पुत्र ओकर चारूकात स्थूल-प्रेमक गिलेबासँ ठाढ़ कएल घेराबा रहत नै करू चिन्ता। आ जहिया हम नै रहब सीखि जाएब अहाँ सभ किछु हमर वियोग बना देत सक्कत, तीव्र आ कठोर सत्यक विरोधी लेल ओइ घेराबाकेँ तोड़बाक प्रयास अहाँक स्थूल-प्रेमी मित्र सभ नै हेमऽ देथिन्ह सफल से हम रही वा नै रही प्रयाण थम्हत नै बतहपना बढ़त नै मारि देब तँ मारि दिअ मुदा मोन राखू हमरा संगे मरत आर बहुत रास वस्तु मुदा रहबे करत स्थूल-प्रेमी साधक सभ आ करत पहिल नृत्य हस्त संचालनसँ चतुरहस्त आनन्दसँ भरल मोन सत्य, झूठ आ तकर निर्णयक लेल सनगोहिक चामसँ छारल डफ-खजुरी लऽ कऽ डोरीक कम्पनसँ ध्वनि निकालत गुमकी, ओइ खजुरीक ध्वनि आ गुमकी, गुम.. गुम.. गुमकी... आ तखन दोसर नृत्य हएत प्रारम्भ शिखरहस्त पर्वतशिखरसन युद्धक आवाहन-प्रदर्शन लेल घृणाक तरहरि खूनऽ दियौ मारि देत तँ मारऽ दिऔ मोन राखू मुदा हमरा संगे मरत आर बहुत रास वस्तु मुदा हमर वियोग बना देत सक्कत, तीव्र आ कठोर रक्तबीजी सत्यपुत्र सभकेँ बुढ़िया डाही संग अछि कमलक मृणाल, पुरैनि, कमलगट्टा, बिसाँढ़सँ भरल खेत ओ नै छथि बुढ़िया डाही खेत जे छलै सनगर यौ आब बनल प्रेमक कमलदह घृणाक विरुद्ध अछि हमर ई बुढ़िया डाही फेर वएह गप आत्मरक्षार्थ सत्यक विरोधमे चोरबा बाजल फेर सर्जनक सुख भेटत चोरिमे? दोसराक कृति अपना नाम केलासँ आकि दोसराक मेहनतिकेँ अपन नाम देलासँ दोसराक प्रतिभाकेँ दबा कऽ कुटीचालि कऽ आर भाँग पीबि घूर तर कऽ गोलैसी कोनाकेँ आँगुर काटब जे लिखब बन्न करत तोड़ि दियौ डाँर, काटि दियौ पएर आँखि निकालि लिअ धऽ दियौ रॉलरक नीचाँमे पिसीमाल उठा दियौ बड़का एलाहेँ सर्जनक सुख पेबाले तँ की हारि जाइ तँ की छोड़ि दिऐ इच्छा जीतत आकि जीतत ईर्ष्या संकल्प हमर जे ऐ धारकेँ मोड़ि देब मुदा किछु ईर्ष्या अछि सोझाँ अबैत ईर्ष्या जे हम धारकेँ नै मोड़ि पाबी बहैत रहए ओ ओहिना ओहिना किए, ओहूसँ भयंकर बनि संकल्प जे हम केने छी इच्छा जे अछि हमर/ से हारि जाए आ जीति जाए द्वेष/ जीति जाए ईर्ष्या हा हारबो करी तेना भऽ कऽ जे लोक देखए!/ जमाना देखए!! तेना कऽ हारए संकल्प हमर/ इच्छा हमर धारकेँ रोकि देबाक/ ठाढ़ भऽ जेबाक सोझाँ ओकर आ मोड़ि देबाक संकल्प ओइ भयंकर उदण्ड धारकेँ मुदा किछु आर ईर्ष्या अछि सोझाँ अबैत ओ द्वेष चाहैए जे हमर प्रयास/ धारकेँ मोड़बाक प्रयास मोड़लाक प्रयासक बाद भऽ जाए धार आर भयंकर पुरान लीखपर चलैत रहए भऽ आर अत्याचारी आ हम जाइ हारि आ हारी तेना भऽ कऽ जे लोक राखए मोन मोन राखए जे कियो दुस्साहसी ठाढ़ भऽ गेल छल धारक सोझाँ तकर भेल ई भयंकर परिणाम जे लोक डरा कऽ नै करए फेर दुस्साहस दुस्साहस ठाढ़ हेबाक उदण्ड-अत्याचारी धारक सोझाँमे लऽ ली हम पतनुकान/ आ से सुनि थरथरी पैसि जाए लोकक हृदयमे मुदा हम हँसै छी हारि तँ जाएब हम मुदा हमर साधनासँ जे रक्तबीज खसत से एक-एकटा ठोपक बीआ बनि जाएत सहस्रबाढ़नि झोँटाबला घृणाक विरुद्ध ठाढ़ि अछि हमर ई बुढ़िया डाही। कमलक मृणाल, पुरैनि, कमलगट्टा, बिसाँढ़सँ भरल खेत बनत खेत जे छलै सनगर यौ, जइमे घृणाक तरहरि खुनेलौं यौ घृणाक तरहरि खूनल ओइ खेतमे कमलक मृणाल, पुरैनि, कमलगट्टा, बिसाँढ़ अछि भरि गेल प्रेमक कमल अछि फुला गेल। बुढ़िया ढाहीकेँ जीविते गारि देने रहिऐ ओकर रक्त सन लाल अरहुल चारू कात झँपने सहस्रबाढ़नि झोँटाबला बुढ़िया डाही केलक ई। आ तखन फैसला हेतै आब जखन उनटि जाइए लोक उनटि जाइ छै बोल छने-छन बदलि जाइए बिचकाबैए ठोर बोलक मधुर वाणी बोली-वाणी बदलि जाइ छै बनि जाइए बिखाह गोबरझार दऽ चमकाबै छी स्मृतिकेँ घृणाक विरुद्ध ठाढ़ छलि तहियो हमर ई बुढ़िया डाही। धारकेँ रोकबाक हिस्सक जकरा लागि गेल छै आ ओ सभ तकर विरुद्ध ठोकि कऽ टाल भऽ जाएत ठाढ़ आ डरा जाएत द्वेष स्मरण कऽ जे फेर रक्तबीजसँ निकलल ऐ सहस्रबाढ़नि सभक रक्तबीज एकर सभक बीआक सन्तान फेर आर बढ़ि जाएत आक्रमणसँ कारण संकल्प अछि, इच्छा अछि ई सभ धारकेँ रोकबाक हिस्सक जकरा लागि गेल छै घृणाक विरुद्ध अछि जे जकरा बुढ़िया डाही अहाँ कहै छिऐ। घड़ी पूजा ऐँ यौ, अहूँ सभमे होइए घड़ी पूजा ई तँ होइ छै छोटका लोक सभमे अगस्त १८ २०१० केँ छै घड़ी पूजा ऐ बेर धर्मराजक भगवती घरमे खा कऽ हाथ धो कऽ गारि दै छिऐ, नै किछु बहराएत बाहर घड़ी पूजा.. कहलकै जे घड़ी पूजा कोन पूजा? यज्ञ नै योग मीमांसा नै तर्क वेदान्तक आगाँ सांख्य ब्राह्मण्यक बाद बौद्ध श्रद्धाक आगाँ तप ब्रह्मक बदला आत्म ऋषि नै मुनि देवता नै गुरु घड़ी पाबनि भगवतीक पातरि भगवती घरसँ नवेद बाहर नै जेतै भगवती घरमे केरा पात सहित ऐँठ-कूइठ गारि दै छी सभ खिस्सा करैए- घड़ी पाबनि ब्राह्मणक घरमे? ई तँ शोलकन्हक घरक पाबनि छिऐ ई तँ कताक पुरखासँ होइत आबि रहल अछि नाम छिऐ भगवती घर मुदा स्थान छियन्हि धर्मराज बाबाक घड़ी पाबनि, साओन मास, मधुश्रावणीक बाद जहिया बुध पड़त, तहिया फेर अषाढ़मे घड़ी पावनि नव बर्तन, नव चुल्हामे खीर, दालि भरल पूड़ी, मोतीचूड़क लड्डू आँचर, आ भगवती घरमे भगवतीक टांगल मौड़ कोठियाक मालि केर बनाएल धर्मराजक गोल मड़रानी मड़रानीपरसँ जनौ टांगल चौदहो देवान भगवती घरमे चौदहो देवानक वास चौदहटा खीर-पूड़ीक पातरि लड्डू आ खेरही वा केराओक दालिक दलिपूरीसँ झाँपल फेर भगवती घर बन्न कऽ देल जाइए फेर थोपड़ी पारि कऽ खोलल जाइए बाले-बच्चे प्रसाद खा भगवती घरमे माटि कोड़ि कऽ गाड़ि देल जाइए आंगनमे सेहो एकटा पूजा होइए हमरा घरमे खाधि खूनि कऽ, ढेका खोलि कऽ बालापीरक पूजा खीर-पूरी राखि धूप-दीप देखा कऽ होइ छै आ माटिकेँ फेर नीप देल जाइ छै बालापीर.... विश वा जन जनसँ जनक जन केर जनक आ एम्हर मेंहथमे बालापीर हमर अंगनामे! आ ओम्हर... मण्डलामे गुरू बालापीर साहबक प्रगट्य दिवस बैसाख शुक्ल पूर्णिमा सद्गुरू कबीर साहब सत्यनाम धुन गुरू महिमा पाठ पूनम महात्म पाठ सतसंग भजन समाधि दर्शन भेंट बंदगी भण्डारा, चौका आरती आ बासनी लग गाम कुम्हारी हसन शहीद बालापीर उर्स मेला तीन दिन फज्रक नमाज दरगाहमे मजार शरीफपर गुस्लक रस्म चादरि चढ़ा अकीदतक फूल देल जाइए कुरानख्वानी नागौरसँ कुम्हारी बासनीसँ कुम्हारी बाला-पीरक स्थान बाला-पीर अबै छथि तँ सुगन्ध पसरैए आ सीवनमे कैथल-पटियाला दिस बाला पीरक दरगाह ढोल-बाजा संग चादरि आनि चादरि चढ़ा भंडारा आ मेंहथमे आंगनमे सेहो एकटा पूजा होइए हमरा घरमे खाधि खूनि कऽ, ढेका खोलि कऽ बालापीरक पूजा खीर-पूरी राखि धूप-दीप देखा कऽ होइ छै आ माटिकेँ फेर नीप देल जाइ छै बालापीर.... अहमदाबाद-मुंबई हाइवे नंबर आठ पर नंदेसरी गाँव बालापीरक दरगाह बाबाक शानमे घड़ीक चढ़ौआ !!! घड़ी पूजा... घड़ी पूजा.. कहलकै जे कोन पूजा पूजा नै यज्ञ यज्ञ नै योग मीमांसा नै तर्क वेदान्तक आगाँ सांख्य ब्राह्मण्यक बाद बौद्ध श्रद्धाक आगाँ तप ब्रह्मक बदला आत्म ऋषि नै मुनि देवता नै गुरु ब्राह्मणनै व्रात्य मुरेठा बन्हने, हाथमे पेना धनुष इन्द्रधनुष पनिसोखा नील पेट लाल-लोहित पीठ विज्ञान, तर्क, बुद्धिक वास कारी केश, वज्र, कुण्डल कारी रङक कपड़ा गरामे चांदीक हँसुली कारी आ उज्जर भेड़ाक चमड़ा डाँड़मे लाल पाढ़ि आँचरमे तह नै खाली पएरे मोनक रथपर असवार क्षणप्रभा ओकर चाबुक धानुकी व्रात्य सांख्यधाराक वाहक ब्राह्मणक सोम व्रात्यक सुरा!! हम व्रात्य कीकट, विदेहक अद्भुत ब्राह्मण षडविंश देव प्रतिमाक हँसब, कानब, नाचब पिपनी खसाएब, हिलाएब देव मन्दिरक थरथरी देव प्रतिमाक फूटब घड़ी पूजा.. कहलकै जे घड़ी पूजा कोन पूजा? यज्ञ नै योग यज्ञ माने आवाहन, समर्पण, योग अछि मुदा सामर्थ्य मीमांसा करैत, तहक तहमे जाइ मुदा उत्तर तर्क सँ अबैए वेदान्तक मिथ्या नै सांख्यक सत्व, रजस, तमस् ब्राह्मण्यक बाद बौद्ध श्रद्धा मात्रसँ की हएत, प्राप्ति लेल तप ब्रह्मपर छोड़लासँ की हएत, सभटा जिम्मा अछि आत्मक ऋषिक ज्ञानक नै काज जे रीछ सन पर्वत कन्दरामे रहै छथि मुनिक राग-द्वेष-तामससँ रहित लोकक बीच रहनाइ अछि पसिन्न बिनु देखल-बुझल देवता नै गुरु चाही, जकरासँ कऽ सकी वार्ता हम व्रात्य अहाँ ताकैत रहू कारण देव प्रतिमाक हँसबाक, कनबाक, नचबाक पिपनी खसेबाक, हिलेबाक देव मन्दिरक थरथरेबाक देव प्रतिमाक फुटबाक हम तँ ताकि रहल छी रहस्य बालापीर हमर अंगनामे! आंगनमे.. खाधि खूनि कऽ…, ढेका खोलि कऽ .. बालापीरक पूजा खीर-पूरी राखि धूप-दीप देखा कऽ किए होइए आ माटिकेँ फेर नीप देल जाइए घड़ी पूजाक कारण ताकै छी… घड़ी पाबनि भगवतीक पातरि भगवती घरसँ नवेद बाहर नै जाइए किए.. भगवती घरमे केरा पात सहित ऐँठ-कूइठ गारि दै छी किए.. नजरि लागि जाइ छै माए कहै छथि जे नजरि लागि जाइ छै बेटाकेँ देखि जे लागैए ओ आइ सुन्दर साँझमे छाह पड़ि जाइ छै ओकर मुँहपर से तँ सत्ते! हमरा सन ककर बेटा मुदा मोनमे ई अबिते नजरि लागि जाइ छै कोनो काज शुरू करैए मारिते रास काज एक्के बेर खतम हेबा धरि सुधि नै रहै छै कियो कहैए जे कतेक नीक अछि अहाँक बेटा तँ माएक करेज धकसँ रहि जाइ छै करेज बैसऽ लगै छै की करै छै? कोन सुन्दर छै? मुदा कहैत रहै छथि माए जे नजरि लागि जाइ छै बाते-बातपर हमर बेटाकेँ कनियाँ कहै छथि सासुकेँ माँ अहाँक बेटा घबराइ बला नै अछि दुष्टक नजरि नै लगै छै अहाँक बेटाकेँ माए मुदा शनि दिन, सरिसौ-तोरी आ मेरचाइ जड़बै छथि सुरसुरी लागि जेतै ओकरा तँ बुझब जे नजरि नै लागल छै आ सुरसुरी जे नै लागतै तँ बुझब जे नजरि लागि जाइ छै कने काल सुरसुरी नै लगलापर माए होइ छथि चिन्तित देखियौ ने, हमरा बेटाकेँ नजरि लागै छै छोटो-छोट गपपर.. नजरि लागि जाइ छै... बाते-बातपर हमर बेटाकेँ... मुदा तखने छिकैत छन्हि बेटा, ओकरा सुरसुरी लागि जाइ छै माएक मुँहपर अबै छन्हि मुस्की सरिसौ-तोरी आ मेरचाइ सरबामे कनेक आर दऽ दै छथि... कहलियन्हि ने माँ दुष्टक नजरि नै लगै छै अहाँक बेटाकेँ ठाढ़ लत्तीकेँ पढ़ैत छी पानक जड़ि लग गारल खरही देखै छी आ ओइपर ठाढ़ लत्तीकेँ पढ़ै छी राड़ी घासक टुकड़ी आ काइससँ बान्हल हमर उल्लास सरपत घासक टुकड़ीपर चढ़ि गेल लत्ती जेकाँ लत्ती जेकाँ हम अपनाकेँ पबै छी बन्हकासँ बान्हल पानक ढोल बनि गेल छी मोड़ल पानकेँ सीकीसँ, बाँसक पातर शलाकासँ गाँथल अछि बेल निकलल शाखा कनार, इकरीसँ गछउठौनी पानक छर्रा लत्ती, गीरहसँ युक्त छर्रा बेल बनि गेल छी लत्तीक छीपकेँ काटब, छपटा करब जड़ि लगक चारि-पाँचटा पानक पात माने घासन जकाँ ऊपर चारि-पाँचटा पानक पात माने कूट-खूट कचलेवारि होइत छीप परक पात मुड़वारि भऽ गेल छी पात तोड़बाकाल कूटक एक-दूटा पात तज्जीबला कठोर पात किछु काल लेल छोड़ि देल जड़िसँ छीप धरि दुपन्ना आ लेवार सभ झलमा बीमारी भेने पान कड़ू भेल फुट्टा बीमारी भेने गलल पात सन हम असकरे घुमै छी तुबैत, तेलगगरा भेने आ झरकैत; बढ़ती भेने अग्रभाग झरैत पातकेँ फेरफार कऽ मृत्युकेँ टारै छी किछु काल धरि, बहुती! चौठैय्या, ढोली, लेसो, भीड़ा बनि गेल छी पातमे बान्हल भीड़ी, से पतौरा जकाँ तैयार भेल कल्लामे जेबा लेल धड़फड़ाइत डंटी लागल सौँस छुट्टा पान सन पूजा लेल निहुछल तबक सन चमकैत पन्नीमे ठूसल बजारक समान बनि गेल छी आ तखन पानक जड़ि लग गारल खरही देखै छी आ ओइपर ठाढ़ लत्तीकेँ पढ़ै छी हमर आकांक्षाक अग्नि आँचब आ प्रज्वलित राखब, हम्हरब आगिकेँ खोरनाठब मुदा, तखन आगि खसत पातक ढेरीपर आ पसाही लागत हमर आकांक्षाक अग्निकेँ मखान उठबैत छलौं पेलनीसँ गूड़ीसँ चोंइटा हटबै छलौं बाङक बङौरा, सुखाएल अछि केहन ई बङठी औंटि कऽ निकाली बङोर, तुमब आ फाहाक पृथक हएब, धुनकीसँ धुनै छलौं लारनिसँ ताँतिपर कऽ आघात, मखान उठबैत रही पेलनीसँ गूड़ीसँ चोंइटा हटबैत रही, रही टकुरी कटैत, मड़िएबैत छिन्नाकेँ पागैत सूत, छल ई हमर आकांक्षाक अग्नि ननगिलाट पहिरने बूढ़ी, सोझाँ नन्हसुतमे मलकिनी कलबत्तू पइसा कऽ गाँथैत आभूषण मोन अछि किरमिची चानीक पानि चढ़ल, मुदा वएह ताम आब हमर आकांक्षाक अग्नि मांगैत अछि पाग नै चाही हमरा मौड़ शंकुक आकारक पैघ, कोढ़िलायुक्त पागक अग्रभागक पेंच नै आब हमर आकांक्षाक अग्नि मांगैत अछि चिरतन, ठिकरी, लहेरिया आ जंगलाती छाप आब हमर आकांक्षाक अग्नि मांगैत अछि पटोर, गुलबदना, नीलाम्बरी, सोइरीक नूआ कलफ लगा कऽ कड़गर कऽ, भेलासँ दऽ चेन्हासी तूरक फाहा, पोखरिया, लहेरिया, बदामी, चानपंखा बेराएब आ सुइया पैसाएब अहाँ हमर आकांक्षाक अग्निकेँ लखिया भेड़ जकाँ आगाँ-आगाँ बथनिञाक बथनाएब अबैत काल, आ खभाएब जाइत काल बीसटा भेड़क लेहड़, एक सए भेड़क बाग चारि-पाँच सए भेड़क गँहेड़, भेड़केँ खउरब, गुलठिआइत तूर सिऐन अधला, खुटिया मिरजइ ओछ हमर आकांक्षाक अग्नि करत ई पुरान लोहझाम, लोहङ्गरकेँ भाथीमे पैसैत वायु जखन आएत तखन भाथी सालब आ प्रज्वलित करब अग्नि लऽ कलम छेनी, चकरसानपर पिजबैत सरौता हमर आकांक्षाक अग्नि सुनैत अछि कबिराहाक कनसीपर उठैत धुन देखैत अछि, छिलुआ पहलदार बासन आ तखन हम आघातसँ मठारब पित्तरि, कलगैञा लोटा निरंजनीक दीप, जलधरी फेर दीयठिमे राखि दीप पहिरि टुमटाम गहना, गोबरियाव सोन, जोकठी आ दसकलम चाँपकली पहिरने ओ लेने छलि हलुमानी नातीक लेल पथरौटी पहिरि हम, पवित्री जनउमे बान्हि श्राद्धक काञ्चनपुरुष जकाँ आकांक्षाक अग्नि हृदयमे लऽ कनसारीक भुज्जा जकाँ दाबापर उझकुन ओइपर राखल बासनमे चुल्हाक पौरी कूरामे धिपाओल बालु दऽ भुजनाठीसँ लाड़ैत छी अपन आकांक्षाक अग्नि मकइक मखानी सोन्हगर आ झूर नीक स्वाद मुदा आब अतिखाइन होइत अछि हमर आकांक्षाक अग्नि अदहन देल पानि आँच दऽ तारब उसीनब कूटि कऽ मुरहीक चाउर बनाएब नोन-पानिसँ मोअब कोड़ाइ, दालिक खोंइचा बिनु जमल गुड़ छाल्हीक पातर ममुरी परतपरसँ काछि कऽ निकालब मलीदा तेबासि नीक, मुदा बसियानि मोटगर भैसाठ आ पातर तुर्री दही आकांक्षाक अग्निकेँ जरैत रहऽ देब ओहिना जेना कोइयासँ तेल निकालै छी। मोहब आ दऽ आएब तेलिहानी तेलीकेँ दऽ बहतौनी, घानी लगाएब आ निकलब धेनुआर घानी घानी निघरब, तेलहनक अवशेष खरी उज्जर रंगक रेह नोनथरा, कोठीसँ निकलल पनारसँ चुबैत पानि, अवशिष्ट सिट्ठी ढेर नोनफर काछल फेन खारीसँ खरिआ नोन हमर आकांक्षाक अग्नि सुच्चा फेर अवशिष्ट पछाड़ी, दोसर खेपमे काही शोरा आ पकवा नोन, तेसर खेप तेलहा शोरा आ नीमक अवशिष्ट जराठी जराठी आ सिट्ठीक मिश्रण बेचुआ, रौदमे सुखा कऽ जरुआ शोरा-आबी शोरा कच्चा शोरा परिशुद्ध भऽ कलमी शोरा नोन- रामरस, कम नोनगर- मधनोन कटियामे मधु राखि चिड़ै मारबा लेल नर-सर नाल गुआमे पैसल, नरक उपरका सिर आ नीचाँ भारू सरमे कमची सभ, पकड़बा लेल चिड़ै कम्पा मन्तुर पढ़ि छत्ता लग जाएब, तुनकारी दऽ बिज्जीक करैत अछि शिकार ई हमर आकांक्षाक अग्नि आँचब आ प्रज्वलित राखब मुदा हम्हरब आगिकेँ खोरनाठब मुदा आगिक खसब पातक ढेरीपर आ पसाही लागत मुदा ई हमर आकांक्षाक अग्निकेँ तँ जरैत रहैए देत चाँपकली पहिरने ओ लेने छलि हलुमानी नातीक लेल हलुमानी, बल-बुद्धि-अभय बेदराक रक्षार्थ विश्वास, श्रद्धा करत तँ सभटा ई बेदरा अपने मुदा जँ पहिरने रहत हलुमानी तँ हनुमानजी संग छथिन्ह से भरोस रहतै मैँयाकेँ आ हलुमानी पहिरने ओ बेदरा लगा रहल अछि पाँखि हमर आकांक्षाक अग्निकेँ चिड़ै बनल हमर आकांक्षाक अग्नि बहत अकासमे आ सहस्रजित् बनत हलुमानी पहिरने ओ बेदरा स प॑वस्व सहस्रजित् ॥ हजारक हजारपर विजय केनिहार एहिना बहैत रहत बहिते रहत जेना बहि रहल अछि धार आ हमर आकांक्षाक अग्नि उजाहिमे उपलाइत हम आ माँछ १ ई नम्माधग्गी बिड़इमे होइत मछहर डकही पोखरिमे भऽ गेल बन्न, डकही पोखरि मखानक पातसँ छाड़ल अछि आब मुदा एतऽ बिड़इमे होइत अछि मछहर कच्छाछोप, हेलैत कबइ काही घुमैत कौआठुट्ठी गाछक फड़ लग हम ठाढ़ कबइजल्ला लग आ हम आबि जाइत छी खींचि फिरचइ पकड़ि कऽ छी जाल खिरबैत आ फेर हम घुरमऽ लगै छी फेर टापी छापि, ठाढ़ भऽ जाइ छी छै उजाहिमे उपलाइत माँछ आ फेर हम जाल छोड़ि दैत छी सहदसँ माछक करै छी शिकार आ आब अछि इछाइन चारू कात २ जाल खिरबैत घुरमा लागि जाइत अछि सोचनी पैसि जाइत अछि इछाइन गन्ध बनि जाइत अछि नियति जीवनक प्रवृत्ति माँछ संगे उपलाय लगैत छी लगैए जाल खिरबैत हमरा बान्हि कियो रहल अछि लगैए शहद लेने छातीमे कियो ढुकल जा रहल अछि। सोचनी पैसि जाइत अछि इछाइन गन्ध बनि जाएत की हमर नियति हमर जीवनक प्रवृत्ति ई नम्माधग्गी बकछुछरु खेलाइत हम आ भीखू १ बँसकरमक विश्वकर्मा भीखूक फारब आ ओदारि कऽ निकालब उजरा औषधि वंशलोचन कोनिञा सूप हकरा पथिया मुदा खजुरिया बान्हमे बान्हल हमर आ ओकर वर्तमान आ भविष्य बकछुछरु खेलाइत हम आ भीखू डोमासीक कातबला पोखरिक महारपर थुथुन घोसियेने माँटिमे सुगरक झुण्ड भीखूक भाए छथि आब सरकारी अधिकारी दोसर भाए हॉस्पीटलक वार्डबॉय आ भीखू एखनो डोमासीमे जिबैत वर्तमानक संग भविष्यक ताकिमे २ स्थिर ओइठाम ठाढ़, मुन्हारि साँझमे लीलीडाली हाथमे लेने बजैत जे भाए बनल अछि अधिकारी मुदा गाम छुटले छै बुझू बियाहो पैघ घरमे ओकर भेल छै दोसर भाए तँ गाम अबिते अछि ओढ़ना पहिरना नीक मुदा काज वएह हमरे नै फुराइए करू की? भविष्य तँ वएह बुझाइत अछि। आगाँ, अहाँ एलौं, कोन काज कहू ? मुँह झलकि गेलै भीखूक ओइ मुन्हारि साँझमे हम चुप्पे रही तावत् ओइ झण्डी ठाढ़ गाछ लग ठाढ़ गाछ कुकाठ लग बाजि उठल भीखू मुदा काज तँ काज तँ हमर ओ हाकिम भाए नहिये करत मुदा अहाँले कहबै धरि अबस्से। आ हम कहै छी, नै भीखू हाकिम तँ काज कइये देत मुदा काज अछि हॉस्पीटलक पिता छथि भरती, जतऽ भाए अहाँक छथि काज करैत। कतेक दिन भेलन्हि भरती भेना मुदा नै आइ-काल्हि होइत ऑपरेशनक तिथि अछि बढ़ेने जाइत आ भीखूक मुँह झलकि उठल मुन्हारि साँझमे। हँ कहबामे जे होइ छै संतुष्टि मदति देबामे जे होइ छै आत्मतृप्ति तइसँ। बँसकरमक विश्वकर्मा भीखूक वंशलोचनसँ तृप्त होइ छी हम सेहो। ओइ मुन्हारि साँझमे कटिहारी १ कनकनी छै बसातमे हाड़मे ढुकि जाएत ई कनकनी पोस्टमार्टम कएल शरीर जे राखल अछि सातटा मोटका शिल्लपर, जड़त कनीकालमे गोइठामे आगि जे अनलन्हिहेँ सुमनजी राखि देल नीचाँ कनकनाइत पानिमे डूम दऽ गोइठाक आगिसँ आगि लऽ शरीरकेँ गति-सद्गति देबा लेल कऽ देलन्हि अग्निकेँ समर्पित तृण, काठ आ घृत समेत घुरि कऽ जेता सभ लोह, पाथर, आगि आ जल नांघि, छूबि डेढ़ मासक बच्चाकेँ कोरामे लेने माएकेँ छोड़ि घर सभ घुरै छथि एक्कैसम शताब्दीक पहिल दशकक अन्तिम रातिक भोरमे मुदा नै छै कोनो अन्तर पहिरावा आ पुरुखपातकेँ छोड़ि दियौ महिलाक अवस्था देखू ऐ कनकनाइत बसातसँ बेशी मारुख हाड़मे ढुकल जाइत अछि कमला कात नै यमुनाक कात हजार माइल दूर गामसँ आबि मिज्झर होइत अछि खररखवाली काकीक श्वेत वस्त्र साठि साल पूर्वक वएह खिस्सा वएह समाज मात्र पहिराबा बदलि गेल मात्र नदी-धार बदलि गेल सातटा शिल्लपर राखल ओ शरीर अग्नि लीलि रहल सुड्डाह कऽ रहल एकटा परिवार फेरसँ बनबए पड़त आ तीस बर्खक बाद देखब ओकर परिणाम ताधरि हाड़मे ढुकल रहत ई सर्द कनकनी ऐ बसातक कनकनीसँ बड्ड बेशी सर्द २ गोपीचानन, गंगौट, माला, उज्जर नव वस्त्र मुँहमे तुलसीदल, सुवर्ण खण्ड गंगाजल कुश पसारल भूमि तुलसी गाछ लग उत्तर मुँहे पोस्टमार्टम कएल शरीर सुमनजी सेहो नव उज्जर वस्त्र पहीरि जनौ, उत्तरी पहीरि, नव माटिक बर्तनक जलसँ तेकुशासँ पूब मुँहे मंत्र पढ़ै छथि आ ओइ जलसँ मृतककेँ शिक्त करै छथि वामा हाथमे ऊक लऽ गोइठाक आगिसँ धधकबै छथि तीन बेर मृतकक प्रदीक्षणा कऽ मुँहमे आगि अर्पित होइत अछि कपास, काठ, घृत, धूमन, कर्पूर, चानन कपोतवेश मृतक पाँच-पाँचटा लकड़ी सभ दै छथि कपोतक दग्ध शरीरावशेष सन मांसपिण्ड भऽ गेलापर सतकठिया लऽ सात बेर प्रदक्षिणा कऽ कुरहरिसँ ओइ ऊकक सात छौ सँ खण्ड कऽ सातो बन्धनकेँ काटि सातो सतकठिया आगिमे फेंकि बाल-वृद्धकेँ आगाँ कऽ एड़ी-दौड़ी बचबैत नहाइले जाइ छथि तिलाञ्जलि मोड़ा-तिल-जलसँ बिनु देह पोछने आ फेर मृतकक आंगनमे द्वारपर क्रमसँ लोह, पाथर, आगि आ पानि स्पर्श कऽ घर घुरि जाइ छथि भाग्यशाली १ हारि गेल छी हेरैत ओइ विचित्र जीव सभकेँ नै आब आर नै फाटि रहल अछि माथ फुला रहल अछि साँस ई नागफाँस विचित्र जीव सभ अछि एक दोसराक विरुद्ध मुदा सभटा एके संग अन्यायक पक्षमे आ सत्यक विरुद्ध, एक दोसराक विरुद्ध मुदा। के की बाजि रहल अछि, कखन के पलटि रहल अछि पलटी मारि मुखाकृति बदलि आबि जाइए सोझाँ हमरो अछि आकांक्षा सुखित रहबाक बिन विवाद जीबाक मुदा तइसँ निसभेर तँ भऽ जाएब, हारि कऽ निन्न आबि जाएत की? २ लगैए जे बड्ड भाग्यशाली छी हम कखनो जे हेबऽ लागै छी हतोत्साहित संगी सभ तेहेन, जे जोश बढ़ा दै छथि जे हारऽ लागै छी, थाकि जाइ छी तँ अरि कऽ ठाढ़ भऽ जाइ छथि ओ तेहेन तेहेन गप कहै छथि जे थकनी मेटा जाइए तेहेन तेहेन प्रतिकार करै छथि जे दुश्मन हारि जाइए कनियाँ, माए, बहिन सेहो सभ तेहने भेटल छथि मुँह मलिन भेल नै आकि जुमि जाइ छथि सभ हमरा हँसेबा लेल कियो हमर मोनक पकमान बनाबऽ लगै छथि कियो हमर माथ धोबै छथि आ कियो सुनबऽ लगै छथि हमर पुरान गाथा सत्यक पक्षमे लड़बाक हमर आकांक्षा जखन बैसाखीपर हम चलैत रही ततेक तेजीसँ जतेक आब हम दुनू पएरपर नै चलि पबैत छी बेटो-बेटी सभ तेहने स्कूलमे पुछै जाइ छन्हि जे अहाँकेँ स्टार भेटल, तकर रहस्य की? तँ कहै जाइ छथि जे हम सभ अपन पितासँ पढ़ै छी आ हमर पिता दुनियाँमे सभसँ बेसी जनै छथि, रहस्योद्घाटन! हमरा सन भाग्यशाली के! ताकै छी एक तँ भेटै छथि सए बेशी मेहनती बेशी प्रगतिशील सहयोगी सभ पाठको सभ तेहने सए पन्नामे घोसिआएल एकटा छोटो गप चीन्हि जाइ छथि नै बाँचि पबैए ओ हिनका सभसँ। ई सभ जान लगा दै छथि हमरा लेल जखन कखनो हमर मुँहपर अबैए रेख एकटा छोटो रेख हमर उद्देश्यकेँ बढ़ेबा लेल हमरा हँसेबा लेल हमरा चलेबा लेल, बैशाखीसँ दुनू पएरपर मुदा हम बैशाखी छुटलाक बाद कहाँ चलि पाबि रहल छी ओतेक झटकारि कऽ बैशाखी धेने जतेक झटकारैत बढ़ैत रही किए तँ हम बड्ड भाग्यशाली छी लोकक प्रेम जे करबा लैए हमरासँ किछु काज आ दऽ दैए विश्राम हमर निराशाकेँ। जीत गेल छी हम! हाइकू/ शेनर्यू/ टनका/ हैबून १ प्रकृति रोष कुश तिल जलसँ विधवा बनि सधवा की विभेद दूबि अक्षत जल (टनका/ वाका) करबीरसँ घर गाछ पहाड़ घेरल अछि (हाइकू) बनैया लोक घरक पनिबह बिदति नहि (शेनर्यू) करहड़ उपारि कऽ खाउ, प्रकृतिकेँ घरमे बसाउ, फुलवारी बनाउ, पहाड़क फोटो बना कऽ घरमे लटकाउ। आ भऽ जाउ प्रकृति प्रेमी। गामकेँ नग्रमे लऽ आउ, चित्रकारीसँ, कलाकारीसँ, बुधियारीसँ। खेलाइ हम करियाझुम्मरिमे नीचाँ अकास एकपेड़िया सड़क कतऽ पाबी आब, आब तँ चारि लेन सेहो कम चकरगर मानल जाइए। छह लेन, आठ लेन। अकास मलिछोंह, गाछक हरियरी मलिछोंह। मोन मलिछोंह। मुदा सड़क, घर सभ फोटो सन चिक्कन चुनमुन। लिखी चित्रसँ घरक खाका आइ छी जङलाह (हैबून) २ १. तागि प्रकृति ताकैले भेलौं पार सुखल पात (हाइकू) २. ई फूल फल चढ़ैत जाइ आगाँ कम होइए उनटि देखी फेर लगमे कम दूरे बेशी (टनका/ वाका) ३. रंग छाड़ल पहाड़ आर गाछ मुदा जीवन (शेनर्यू) ४. झझायल रंग कतेको वर्णक। बच्चाक किताबोसँ बेशी चमकैए ई प्रकृति, फूल, पात, बाट आ अकास। आ एकरा सभकेँ तँ छोड़ू ई बरफ, जे रेगिस्ताने ने छी, बालुक बदला बरफ। मुदा नै अछि ऑक्सीजन आ नहिये फूल-पात। मुदा एकर सेहो देखियौ शान। जइ रस्तासँ अबै छलौं से ओतेक कहाँ चमकै छल। जखन ओइ प्रकृतिक लग छलौं तँ कहाँ ओकर रूप निङहारि पाबै छलौं। कियो दूरसँ देखैत हएत तँ निङहारि पबैत हएत हमरो, प्रकृतिक बीचमे हमहूँ प्रकृति बनल हएब। मुदा ऐ शिखरपर आबि जे सनगर लगैए ई प्रकृति। गाछ भेल छै असगरुआ बौआ पात भेल छै खिलौना प्रकृतिक शिखर देखि मुदा आब ऐ शिखरपर एलाक बाद लगैए जे बेकारे एलौं एतऽ। ऐ शिखरकेँ ओइ ठामसँ देखै छलौं तँ कतेक सुन्नर लगै छल ई शिखर। मुदा शिखरपर एलाक बाद आब तँ वएह गाम नीक लगैए। तुलना तखने ने हएत जखन गामक प्रकृतिकेँ शिखरसँ देखबै। गामसँ शिखर आ शिखरसँ गाम। मुदा लिलसासँ हाइ रे हाइ। आब चलै छी शिखरक ओइ पार। देखै छी ओइ दिसुका लोक समाज। दूरसँ लगैए दुनू कातक गाम नीक, तराउपड़ी। मुदा ओइ कातक गामसँ शिखर ओतेक सुन्नर लागत जतेक ऐ पारक गामसँ लगैए। नै ठाढ़ होउ चलू चली घुरैले बनिजार छी लोकक बीचमे छी जाइत घुरैत छी (हैबून) ३ चतरल छै/ लतरल टाट ई/ झोरा कऽ खाउ ई बिजलौका/ जड़िक शिरा सन/ पसरैए जड़िसँ फूटि /ई कड़कड़ाइत/ दिग दिगन्त/ पसरत सगरे/ करत आच्छादित कारण नै छै/ हारि लेल, विजय/ लेल नै गर्व लोक पताली/ जहाज अकासमे / उनटि गेल / विश्व लोक ब्रह्माण्ड / बात विचार सभ जल दुनियाँ/ समुद्र तलपर/ अद्भुत रंग बिनु हरदि/ चाणक्यक बिखाहि / विषकन्या ओ बिनु हरदि/ बनलि बिखाहि ओ / विषकन्या जे/ पालित भेल छलि/ बिनु हरदिक जे हरदि, गुणे-गुण, सर्दी भेल, दूधमे घी आ हरदि दियौ आ आँखि मूनि घोंटि जाउ। चोट लागल हरदिमे डोकाबला चून मिलाउ आ लेप दियौ। हरदि बिना ने दालि आ ने खिच्चरि लागत पियरगर। खिच्चरि भऽ जाएत मरसटका आ दालि भटरंग। देखैमे लगैए जेना वैजयन्ती फूलक गाछ हुअए, मुदा ई बाड़ीमे होइए, वैजयन्ती सन पोखरिक महारपर नै। हरदि गाछ/ नुकौने जड़िमे ई/ अपन गुण (हैबून) ४ आसक अछि/ पनिसोखा उगल/ चलू बढ़ै छी (हाइकू) भेल उबेर/ उगल पनिसोखा/ काज करै छी/ बहराइ घरसँ/ बाट भेटल अछि (टनका) पनिसोखा ई/ उगल अकासमे/ उपरे ऊपर! (शेनर्यू) आह, आब हएत उबेर, उगि गेल अछि पनिसोखा, खुजि गेल अछि बाट, बनिहार बिदा भेल बनिज करए, आ किसान बीया उखारि रोपनि लेल आ हम बिदा भेलौं कोनो अकाजक काज लेल, अन्तहीन बाटपर, सुकाजक काज लेल , दिशाहीन ठमकल चौबटिया दिस। बाट तकैत ताकी अकास दिस विचित्र भ्रम जेना ई पनिसोखा उगि खोलत बाट तखन फेरसँ ताकब, हेरब अपन समान, आ बर्खा होइ धरि चलैत रहब। तँ ई कहब जे बर्खा होइ धरि चलैत रहब कोनो पलायन तँ नै। पनिसोखा उगले अछि, बाट खुजले अछि आ हम बाट ताकि रहल छी आबैबला बर्खाक? सतरंगिया अछि ई आस उगैए आस डुबबाले अकास बनि गेल संत्रास (हैबून -दू टा गद्य आ दूटा टनका युक्त) हाइकू/ शेनर्यू/ टनका हरित-कञ्च/ लाल-उज्जर ठोप/ हृदै संगोर मरुद्यान नै/ जलोदीपमे द्वीप/ बालु नै पानि ओ नील मेघ/ समुद्र पृथ्वी छोड़ि/ भेल अकासी पात आ चिड़ै/ एक दोसरा सन/ स्किन कलर अकासी जल/ पानिक अकासमे/ रस्ता चीरैए ई हिमपात/ हिम सन अकास/ आ धरा गाछ सूर्यक पूब/ आशाक छै किरण/ मुदा रक्ताभ प्रकृति पानि/ हहारोहक बाद/ शांत प्रशांत व्याकुल चिड़ै/ ठूठ गाछ सुखौंत/ छै हतप्रभ प्रकृति नृत्य/ प्रकृति संग जीब/ प्रकृति भऽ कऽ प्रकृति प्रेम/ प्रकृति संग जीब/ प्रकृति भऽ कऽ अलैचढ़ल/ उत्साह हमर जे/ देखी दोहारा अमरलत्ती/ पनिसोखा जकाँ की/ छूत अकास कजराएब/ अकासक ई गाछ/ मेघक संग देव डघर/ अकाससँ उतरि/ पृथ्वी अबैत धुरिया साओन/ फेर भदबरिया/ रेत पयोधि कचौआबध/ मनोरथ गामक/ जबका मारल गाछ बृच्छ आ/ चिड़ै चुनमुनीक/ बीच खेबै छी संगोर राति/ दिन राति सन-ए/ आ राति राति दूर क्षितिज/ मुँह घुरौने सभ/ अपने भेर दूर क्षितिज/ वृत्तक नहि अंत/ लगक छद्म मेघक सीढ़ी/ अकासक मचान/ हिम छारल अन्हार जोति/ कएल प्रकाशित/ अंतःप्रकाशे सलाढ़ आब/ अरियालङ्घनक/ बादक हाल अगरजित/ खसब नै उठब/ ओतै रहब साँप घुमैत/ पहुँचैए शिखर/ रस्ता बनैए जलपै बेढ़ी/ बोनाठ धमाउर/ उपटाएब डलबाह नै/ पंजियार भगता/ भगैतिया नै केराक बीर/ काज करब कनी/ खाएब टुस्सा घुमौआ मोड़/ चौबटिया बनि कऽ/ आनैए आस झरैए पानि/ बनबैए धार आ/ बढ़ैए आगाँ उगैतोकेँ ई/ कुश तिल अक्षत/ आ डुमैतोकेँ भेड़क जेड़/ बहटाबी ओकरा/ परदेसोमे संस्कृतिक ई/ गलञ्जर उठल/ की हम चली कथकिया कि/ घरदेखिया क्यो नै/ अबैए एतऽ देखै छी हम/ ऊँचगरसँ बनि/ ब्रह्मा-महेश चढ़ाउतार/ नै नड़हा फौदार/ चाही प्रकृति पृथ्वीक अंत/ शुरू भेल प्रारम्भ/ अकास आब लोक ने गाछ/ ई आँखिक सौन्दर्य/ तेँ तँ अछि ई डगहर ई/ ऐ उतरे दछिने/ अगहन छी पथ नभमे/ सहस्रबाढ़निक/ अकास घुरै प्रकृति जेना/ कलमच बैसल/ सीटल सीढ़ी वृत सन ई/ पृथ्वी प्रकृति गोल/ अनंत स्पष्ट छाहक रंग/ कएक तरहक/ तहिआएल बलुआ डोह/ तकर ओइ पार/ पानि अकास बाढ़ि लगैए/ समुद्र सन शान्त/ मुदा ई विद्युत् पनिदुद्दुर/ भेल पनिचहटा/ बाढ़िक देस घुरैत खेत/ रस्ता सन सर्पिल/ प्रकृति रूप इनार-बेंग/ इनारो पैघ, बेंगों/ सीमा छैहै की सौंसक सीटी/ घात करैए नै तेँ/ भेल खतम उगैत चान/ चानक इजोरिया/ डुमैत चान आशालुब्धी छी/ जहरमोहरा छी/ डेलीखोङी नै नील समुद्र/ ककर अछि छाह/ नील अकास दिबड़खौकू/ दिबड़ाक भीड़ छी/ मुदा ठाढ़ छी मेघ ऊपर/ घुरी खदबदाइत/ छी बड़कैत सूर्य छाहक/ पैघत्व दाग लेने/ करेजपर सिंह सिंहिन/ दँतखिस्टी करैए/ हीस मँगैए खरहा तेज/ दौगैए नुकाइए/ बीहरि बना परबा पाँखि/ बजबै छी कहि कऽ/ हँ, ती ती ती ती सुग्गा बजैए/ गुम्म भेल ठाढ़ छी/ बजैए सुग्गा जलोदीप छै/ अथाह मुदा छै नै/ पाथर कहैए चानक रूप/ पूर्णिमामे अन्हार/ लगक सत्य फेंच काढ़ने/ प्रकृतिक गमला/ पड़ैन रोकू बथनियाँ छी/ भेड़केँ हक्का दैत/ ओ जाइ छै/ लखिया भेड़ आगाँ/ भेड़िया धसान नै/ देखै छी ठाढ़े,/ अबैत आ जाइत/ भेड़ चरैले/ जाइतकेँ खभाउ/ अबिते बथनाउ प्रकृति नृत्य/ हंस्याहस्त नृत्य/ प्रकृति रम्भा/ ऊपर ठाढ़/ थल-अकास बिच/ भजियाबैत स्वस्तिकहस्त/ खटकामुखहस्त/ मकरहस्त प्रकृति ओढ़ै/ घासक चद्दरि आ/ ताकै अकास अहरा दैत/ देनहारक तृप्ति/ देखबैछ ई गोरहा ढोल/ छी गोबरकढ़नी/ गोनौर बनै/ वा गोइठाक ढोल/ बढ़ैए ऊँच दिस खट मधुर/ हरियर आ लाल/ संगे-संग छै एकपेड़िया/ धंगाइत ढहैत/ बनत रस्ता लैत ढुइस/ कालिदासे लड़ैए/ टुड़नीपर माछक घर/ सहथ गाँथि आनी/ अपना घर समुद्र थल/ मिलैए अकासमे/ त्रिशंकु भेल प्रकृति ऐना/ उधियाइत दृश्य/ मोनक ऐना! निचुका ढाला/ उपरका चढ़ाइ/ दुनू सरल गोड़ाक लीद/ घोड़े सन रंगक/ आ रूपक छै घर हमर/ नारक टाल सन/ उड़िऐत नै सेहन्ता लेने/ ठाढ़ छी मरियो कऽ/ देखबै दिन कपोत नृत्य /गजदन्त बनल/ छी ठाढ़ सोझाँ टकराइए / हहारोह करैत/ टूटि जाइए अमरलत्ती/ गछारने गाछकेँ/ ओकरा मारि/ अपने बनि गेल/ अछि अमरलत्ती गरजै मेघ/ चमकैए बिजुरी/ प्रकृति नृत्य बिजुरी देखि/ मोन पड़ैए प्रेम / जे नै भेटल / हिलोरैए मेघ ई/ ह्रिदै भीतरधरि घिचै छी आस/ बरफपर नाह/ बिन प्रयास/ मोनक उछाही आ/ आसक प्रयासमे अम्ल बरखा/ नमछुरुक अछि/ देलियन्हि कऽ/ सुड्डाह सेहो बनि/ बनि काल-बरखा जीवन-बर्खा/ बर्खा दैए जीवन/ अम्लक बर्खा/ छद्मवेशी बनि कऽ / बनल मृत्यु-बर्खा जरियो गेल/ तैयो अछि ठाढ़ ई/ मुँह दुसैत सजीव हीन / सृष्टिविहीन लोक/ असगर छी/ कला तैयो मरल?/ नृत्य तैयो रुकल? मखान पान/ दिन तका भेटैए/ पहिचान जे/ पैकारक हाथमे/ बिका रहल अछि अहरा अछि/ पिरारक फड़ ई/ गरीबक यौ रातिक झोंझ/ राति अपने अछि/ कीड़ा आ चिड़ै/ वातावरण अछि/ शान्त आकि भुताह बौआचौरीमे/ चरि पेट लटकै/ घर घुरु ने/ चरबाहकेँ ताकै/ निकेना तँ अछि ओ अपरम्पार/ माइक ममताक/ विलक्षणता कुण्डलिया १ सत असत मे भेद करू, राखू नै किछु रोख ततमत नै करू कनियो, जे छै होनी लेख जे छै होनी लेख, हुए से नीक निकेना सत्यक जीत हएत, जँ करबै अकसतिकस ने डर संग असत केर, डर ढाहू मध्य हृदयक ऐरावतक बुझैत, यएह छी असत्यक सत २ छत्ता घुरछा पल्लौसँ, भेल दिने अन्हार। दिन बितलापर घर घुरी, काल भेल विकराल॥ काल भेल विकराल, पोरे-पोर सिहरैए। सुनत केओ सवाल, बोल बगहा लगबैए। ऐरावत बेहाल, बोल कतऽ भेल निपत्ता। घुरियाए बनि काल, पैसि बिच घोरन छत्ता।। ३ विजय बिन गर्व हएत जँ, बुझू तखन ई नीक हारि भेने घबराउ नै, बात बुझू ई मीत बात बुझू ई मीत, हुअए जँ एक झमेला हारि मानि बढ़ि जाउ, करू ने फेर बखेरा भेल काज प्रसन्न जतऽ, नीक अछि टा सएह मोन ऐरावत बुझि, देखि ली हारि-विजय ४ बोल वचन हुअए नीक, बूझि बाजी जँ बात गुम्म रहनाइए ठीक, हुए जँ नमहर जाल हुए जँ नमहर जाल, लेत ओ लप दऽ भीतर हल्ला बनि जाएत, नै अछि जँ बेर उचित पर सुनू हमर ई बात, बात होइए अनमोल ऐरावत कहि जाय, कहू नै ओल सन बोल रुबाइ कारी अनहार मेघ, आ नै होइए कत्तौ बलुआ माटि, खा नै होइए दाहीजरती देखि, हिलोरै-ए मेघ भगजोगनी भकरार, जा नै होइए कता १ एक्केटा गप बुझबैत साँझ भेल बुझाइए झूरो झमाने इजोरियो तँ कएल बुझाइए ऐमे तँ अन्हरिये नीक कारी छल गुजगुज नै कोनो रातिक आ नै दिनक मेल बुझाइए २ सबहक सपना समेटल आ आगाँ बढ़लौं ई सत्यक पथ छै निकलल सभ चलै चलू निन्नोक बाद खुजल रस्ता बिन लीखक जे छै से धांगल आब बाट बनल सभ चलै चलू गजल (१-४१) १ बझाओल गेलैए चिड़ैया एना रे कहैए हितैषी ई शिकारी बड़ा रे देखल निसाँमे जे जागल घुरै छी सूतलमे जागल सपना सुना रे किए गुम्म भेल जाइए आइ बोली गुमकीक फानी फाड़ै कान एना रे भेख बदलि राजा भिखाड़िसँ पूछै फोँफ काटै छेँ हमरा राजा बना रे ऐरावत देखै ध्वनि आँखि तरंग चढ़ि पार जाइ, हिलकोर उठा रे २ भोरक लाली साँझक लाली देखा देलक किछु नै बदलैए आसक पनिसोखा सतरंगी कहबीक किछु नै बदलैए क्रूर स्वप्न आ सुन्दर जीवन देखलौं निन्नसँ जगलापर कोना हम मानब जँ कियो ई कहलक किछु नै बदलैए जे बदलि गेल विध- बेबहार सगर संसार चारू दिस से जीवन मृत्यु, साँच झूठकेँ देखलक किछु नै बदलैए दिनमे ग्रहण घुरल चिड़ै, दिन गेल कतऽ दुपहरिये जयद्रथ वध हएत फेर विश्वासक किछु नै बदलैए चलू चली बीतल अछि बेर, दोसराक बेर अछि आएल ऐरावत नै कहियौ किछु, भ्रम छै नीक, किछु नै बदलैए ३ बहरे हजज महामाला महाडाला स्वाहा करै लगैए ई अकासी आस छै सोझाँ झझा देतै लगैए ई कहैए ई मिलेबै आइ नोरोमे कने गोला जँ भांगे पीबि एतै, भावना पीतै लगैए ई जहाँ ताकी लगैए प्रेम बाझै छै सरैलामे खने भोकारि पाड़ैए हँसै नै छै लगैए ई टिपौड़ी छै बुझेबै बात की, धाही कनी देखू कटैया पानि जेना ओ, नचै नै छै लगैए ई गजेन्द्र पूब सुरुजक रहत देतै सूर्यकेँ झाँखी चढ़त आकास देखै बानसब्बरै लगैए ई ४ मनुख जरैए गाम कनैए हमरा की चद्दरि तनने फोंफ कटैए हमरा की बान्हक कातमे घर बनेने बाट जोही बाट बिसरि कऽ नै बिलमैए हमरा की सुन्दर सपना रातुक, देखल बिसरी सपना सच नै भेल लगैए, हमरा की चलू चलै छी नव देशमे घृणा जतऽ नै अप्पन देश बिलटि गेलैए, हमरा की गारि देबाले बिर्त, देलक हम नै लेलौं ऐरावत लेत प्रेम, नै दैए हमरा की ५ सोझाँ देखि मोन ललाइए चलू घुरि चली ई आस अपूर्ण बुझाइए चलू घुरि चली कोन पक्का रंगसँ ढौराबी जे धोखराए नै मोनक रंगो धोखराइए चलू घुरि चली छल बुझाइत छली आब बुझि गेल बात छलबाक चालि बुझाइए चलू घुरि चली ठकैए हमरा हम जानि-बूझि ठकाइत प्राप्ति भेलै किछु बुझाइए चलू घुरि चली भारी धापक धम्मक पसरि गेलै सगरे ऐरावत ऐल सुनाइए चलू घुरि चली ६ खेत, आरि, रस्ता सभटा अहीं तँ छी बेढ़ि चारूकात परता अहीं तँ छी ओकर इयाद आबैए घुरि घुरि इयादक याद अगता अहीं तँ छी भजार मोन पड़ैए, बिदा होइ छी टूटल सपनाक झंझा अहीं तँ छी भोरे उदासी उड़ियाइत जाइत जे बुन्नी बुनिऐल छिच्चा अहीं तँ छी खुशी छूटल हँसी छूटल जाइए दुख-सुखक अकाल जा, अहीं तँ छी ७ गुमकी लागै राति बुलैत चान झपाइ छी घुरि जाइ गाम मुदा बीचे असकताइ छी चरको परियानि ई बनेलौं कएक बेर उबेरक बाट ताकी आ सुरुज कहाइ छी अकास बिच सतरंगा पनिसोखा उगलैए निराशसँ आगू जाइ बीचेमे लेभराइ छी जे काज होइए पछता से काज ताकी हम अगता काज आबैए जान कोना गमाइ छी ओकरा देखि बुझलहुँ गढ़निक सोपान बनैत- बनैत बनै मूर्ति अहाँ देखाइ छी ढङीला छौरा धरैए भेष रूप बदलैत दोहरी ई नस-नस बुझी हम चिन्हाइ छी जे संगमे अछि सेहो छोड़ने अहाँ जाइ छी राखब की लगैए पकड़ै लेल पड़ाइ छी कानमे ठेकी आँखिमे गेजर मूह दुसैए लेरचुब्बा नै डिग्गा मदारी जे कहै जाइ छी बूझी बाजी करतेबता सँ बढ़ू एक्के सुरे पेटो पानि नै मूह दुसै कनीले हुसाइ छी छोड़ि कऽ चलि गेल छाह, परात, इजोरिया ऐरावत दोसराइत अहाँ की कसाइ छी ८ नोर झरैए मोनक दागनि दगै छी तराटक लागलए आ बातो बकै छी कोनटा बचल नै एकान्ती ले एकोटा अन्हरोखे उठै छी आ गनती गनै छी अन्हरियासँ बेसी अन्हार जिनगीमे ई इजोरिया किए अहाँ मुँह दुसै छी पिआ गेलाह देशान्तर दूरस्त देस कियो नै घुरै अछि से आसो नै तकै छी भोरे अहाँ बिनु दिन फेर बजरल ऐरावतसँ भारी ऐ दिनकेँ देखै छी ९ बहरे मुतकारिब मुतकारिब आठ–रुक्न फ ऊ लुन (U।।) – चारि बेर उचरि नव रूप अपन लिखैब तखन किने उतर दछिन डगहर बहैब तखन किने कनकन करत बनत सदिखन तलिया यौ सुअद पैब जौँ अहँ झखैब तखन किने मनक भूख असगर नुकैब बुझल अछि अपन बोल-वाणी घुरैब तखन किने खधाइ गढ़ अछि भरल सभतरि दहारे जलक धार बिच घर भरैब तखन किने निमहतासँ निभता निभैब सिखल नहि नव युग कनिक उगल बुझैब तखन किने पड़ाइनपर कनैत अछि भाग जँ कतौ गजेन्द्र मन बूझै हियैब तखन किने १० बहरे मुतकारिब बहरे मुतकारिब मुतकारिब आठ–रुक्न फ ऊ लुन (U।।) – चारि बेर अहाँ बूझि लै छी जुआरी अनेरे जिबै कोन बैबे नियारी अनेरे हहारो उठेलौं उदासी गबेलौं सिहाबै किए छी मदारी अनेरे जतेको नबारी छबारी बुरैए घुरेबै कियो नै सुतारी अनेरे घरोमे उपासे बहारो निरासे दहारे अकाले नचारी अनेरे चलै छी खटोली उठा ऐ भरोसे भसाठी अबैए विचारी अनेरे ११ गुम्म भेल जे ठाढ़ भेल छी मुनल मूह मटकुरिए नीक बाट तकै बहार भेल गजर-गजर तकनहिए नीक धन भेल थोड़ बिपत बड़ जोर प्रेमक राग बिसरलौं प्रेम दफानि बिसारै से गदह-पचीसी बुझनहिए नीक जे देखलक बरियारक गाछ कहलक बिरदाबन ईहे उड़कुस्सी लागै दलानपर छै आब उजड़नहिए नीक जकरा कतहु ने छै पुछारी से अछि सौराठक नोतिहारी चन्द्रोगत नै प्रेम अछिञ्जल से आब बिसरनहिए नीक हाथी अपने पएरे भारी चुट्टी अपने पएरे भारी अछि ऐरावत प्रेम-जिंजीरसँ छारल तैं ठोकरेनहिए नीक १२ अकत तीत प्रेमक जे पथिक अदौकालसँ धतालबूढ़ प्रेमकेँ बोहेलक दुनू हाथजँ निर्मल आंगुरसँ छूबै जे ओकर पुठपुरी फरफैसी पसारै निदरदी अगिलकण्ठ जँ निमरजना प्रेम जे छलै धपोधप निश्छल बिदोरै लेल प्रेमीकेँ छलै ओ कड़ेकमान तँ अकरतब कर्तव्यमे भेद नै बुझलकै जे जराउ प्रेमक गप्प नै कहियो नुकेलकै जँ खञ्जखूहर ऐरावत नै बाटक छेँ बाटमे धांगि बाट बनेबाक दाम अगूबार पेने छँ १३ अंतहीन अंत ऐ सोचनीक होइए भासो नै बनैए नै चित्र पूर लगैए ऐ रंग आ तरंगक नै भेटैए बाट सोचैत भँसियाइत मगज फटैए नै बाजैए बाट जे छोड़ि चललौं कतऽ आँखि बाजैए बिनु बजने बुझबैए आदति जे लागल वेदना सहबाक गेंठ बनैए से सोहनगर लगैए ई गुमकी बढ़ल खत्म हएत की खरचण्डाली प्रेम पिसीमाल भेलैए १४ छोड़ि कऽ हमरा ई जे ओ जा रहल अछि हृदैकेँ चीरैत जे सुनगा रहल अछि नीक लगै छल ओकर बोलक संगोर जाइए आइ हृदए कना रहल अछि नै बुझलिऐ ई एते बढ़ल अछि बात देखल आइ जे ओ भँसिया रहल अछि हमरासँ कते की माँगै छल रहरहाँ जे जुमल ओ बिनु लेने जा रहल अछि ओकर हाक्रोस हमर चुप्पी सुनै छल बाजब से बिनु सुनने जा रहल अछि बात तँ छलै जड़िआएल तहिआयल बीझ काटि बिनु पढ़ने जा रहल अछि ककरा कहबै ई जे पतिआएत आइ उपरागो बिनु सुनेने जा रहल अछि घुरत नै देखैल अपनैती अपन ओ आँखि शून्य हृदए हहरा रहल अछि के टोकत एको बेर रुकि जाउ कहत मुँह सीयल शून्य कनीटा रहल अछि १५ की कहबै, कोना कहबै, जे बुझतै ओ लुझतै ओ आँखिक नोर खसतै, खन रूसतै-बिहुसलै ओ दाबी देखेतै आ हम देखबै नुका कऽ अँचरासँ बहरा जाइ छी घबरा कऽ, नै ताकै ओ ने बाजै ओ देखितिऐ अँचरासँ, आ बहरा जैतौं दुअरासँ मोनसँ बेसी उड़ै चिड़ै, चिड़ैक मोन बनतै ओ बनि माँछ अकुलाइ छी बाझब जालमे कक्खन जँ फँसि त्राण पाएब आँखि बओने से देखतै ओ चम्मन फूल भमरा, गुम्म, जब्बर, छै सोझाँ ठाढ़ जलबाह सोझाँ माँछ, ऐरावत बनल, देखै ओ १६ आँखि ओङठल जाइए कहू की करी नै बुझलौं तमसाइए कहू की करी ज्ञानी बनै लेल जाइए देश छोड़ने ई मोन जे पथराइए कहू की करी धानी रंगक आगि पियासल किए छै धाना निश्छल धखाइए कहू की करी धान छै खखरी बनल अहिठाम आ धानी आगि धुधुआइए कहू की करी आगिक संगी पानि अजगुत देखल धौरबी बनि सोचाइए कहू की करी ऐरावत धोधराह धुधुनमुहाँ नै जरि फाहा बनि जाइए कहू की करी १७ मिरदङियाक तरंग भँसियाइए अङेजब कोना सुनि मोन घुरमाइए अकुलाइए अङेजब कोना आँखिक नोर झरलै बनलै अजस्र धार झझाइए पियासल छी ठाढ़, जी हदबदाइए अङेजब कोना सगुन बान्हसँ बान्हल ऐ मोनक उछाही बिच ठाढ़ सगुनियाँ बनल उसरगाइए अङेजब कोना हरसट्ठे अपने अपन चेन्हासी मेटा लेलक आइ मुरुत हरपटाहि बनेने जाइए अङेजब कोना छरछर बहल छै धार मोनक, देखू चलल अछि धेने जे बाट उधोरनि बनि जाइए अङेजब कोना उड़ैए चिड़ै आ बहैए अनेरे ऐ नील अकाश बिच ऐरावत-मन जखन उधियाइए अङेजब कोना १८ छोड़ि रहल अछि, भिजा कहल अछि ई की होइए, मिझा रहल अछि कैन ओसूलि कऽ ठठा रहल अछि क्षमा करत नै देखा रहल अछि दोसरा सोझाँ नीक बनत आ एसगरमे शैतान बनल अछि बाँचि रहू ओकरासँ ओ जे किछु हारैले नै बचा रखल अछि देखल जानल सेहो आइए रक्षादीप से मिझा रहल अछि सुन्दर स्वप्न देखि देखा कऽ जाएत ओ जे सुना रहल अछि १९ छोट-छीन सन बात बहुत अछि मुँह बिधुऔने ठाढ़ तुरत अछि ककरा की कहबै के पतिआएत गह-गहमे अर्थात बहुत अछि भयौन बनि ओ अछि ठाढ़ सोझाँमे हाथक गहमे हाथ बहुत अछि नीक काज देखि गुमसुम छी ठाढ़ चबासी दऽ दियौ बात बहुत अछि ओकरहि पाछाँ सभ चलू चलै छी बदलि देत विश्वास बहुत अछि २० दोस्तियारी बिना ई राह कठिन अछि निभरोस रहू तँ काल्हि चलब अछि अनठेने नै दै छी कान बात किए यौ घृणो तँ करू जँ सएह भरल अछि केलहुँ जखन जे काज सेहो नै हट्ठे भेल नै होअए से काज केलहुँ अछि सनेस हमर जे नीक नै लगलनि प्रेमक दूट आखर केओ सुनै अछि जे फुलवाड़ी लगा कृपा करै जाइ छी आपरूपी बूढ़ नेना बनैत अछि २१ बिसबासी लोक जे जीवनमे हमर प्रेम लै-दै बला समाजक परिचर चिन्ताक मोटगर रेख कपारपर छल छोट से बनल आब छेबगर जतेक माँगलक देलहुँ बेशिये कऽ रेख नहि आओल कखनो माथपर जकरा पदक होश बेहोश बनौने घृणा चक्कूओसँ बेशी अछि धरगर दोसराक दर्दसँ दुखी भेलहुँ अछि नेनोसँ बेशी जे भेलहुँ सुखितगर २२ खेत-खम्हारक काज कऽ सकलहुँ सप्पत देल गप्प निमाहि देलहुँ बिसबास रहए तेँ झगड़ा-झाँटी पाइ तँ आएल समए गमेलहुँ झगड़ा करैत छी बहुत अहाँसँ प्रेम करैत छी बुझा ने सकलहुँ आकांक्षाक पजरैत अग्निक बिच पैघ छी तकर चेन्हासी कहलहुँ देखै छी बजै ने छी कोना ने ई कहू हमहूँ ओहिना घुरा कऽ कहलहुँ २३ भय रहित सत्यसँ भेँट भेल सुरेब सम्पूर्ण छल अविचल चित्रक रंगक करतब लेल उद्देश्यक पाछाँ भटकि रहल बड़का सन काजक छाह अछि देखल विस्तृत सुन्दर बनल आजुक बात खतम होएत यौ भोरुका बसात से बिर्रो बनल पूछू सभसँ आ छोड़ू नै ककरो नव विहान किए छल रोकल २४ दिन-राति बीतल से मोन पड़ल ऐ अपन आ आनोपर भरोस अछि ऐ आस्ते सँ जे सिहकि उठल ई बसात अन्तर्मनक शक्ति बदलि देत सत्तै विश्वासपर अडिग चलि रहल छी नवजीवनपथ समस्या ने कोनो ऐ सिखबाक ई इच्छा खतम भऽ गेने की मगजक शान्ति भेटत के ई कहै ऐ ओहि सोचल बुनल असत्य बातक सत्यक प्रति ई नरम जे भेलहुँ ऐ मोन पाड़ल नीक खराप बिसरि कऽ मित्र बढ़ल अछि आ शत्रु कमल ऐ २५ छातीक धरधड़ी घटि बढ़ल अछि पएर थाकल बेहोशी थम्हल नहि प्रेममे पड़ि घुरमि हम रहल छी साँस फुलल आ उद्वेग कमल नहि निन्नक मारल अछि आँखि फुलल ई प्रेमक सभटा आख्यान कहल अछि कहू किए अछि ई चित घबड़ाएल स्मृति हँसि सूरति बदलल अछि माँछ बिनु पानिक उन्टा प्रेम हम्मर प्रेम पाबि खटबताह बनल अछि हँसैत ओकर जे मुँह हम देखल सुन्दर सलिल ई धार बहल अछि आस बहुत छल क्षणमे से बीतल आस निराशमे कोनो अन्तर नहि प्रेम पियासल मोन भेल उचाट ई ई बिसरि गेने तँ बाट बहुत अछि २६ बकथोथीसँ काज चलत नै आत्म प्रशंसे बात बनै नै भौकीसँ हम नै घबड़ाएब पथमे प्रतिकार करब नै भार मिलि- कऽ सभ उठबै छी उठल नै आ की गुड़कल नै खतम करू बात बड्ड भेल ठठा हँसू तँ बात बढ़त नै देखि छूबि अनुभूतिक क्षण ई पाँती इतिहास बनत नै २७ तेजगर छी से छद्म ज्ञान भेल खिखिर कटाबै भौकी प्रतिपल हिल्कोरक संग जाइत बहैत संग हमर जे घास-फूस छल अकलबेर मे बिसरि गेल जे गिरिमाल लेने ठाढ़ ओतै छल सूर्य-किरिण से मद्धिम-मद्धिम सेहो गर्दासँ झँपा रहल छल नटुआ बिपटा बनि हँसै अछि तोहूँ हमरे सन अछि देखल जागि अन्हरिया केलहुँ काज जे सेहो मस्त ओंघाएल सन छल आन्ही संग झमटगर अछार बान्ह एखनो अछि सुखा रहल शान्त भंगिमासँ काज करै जाउ निराउ वर्षा अछि देखा रहल मानरि-अबाज रहि कऽ अबैछ झाँपि बोल ई सुना रहल छल गप बिच्च ठकुरा दैत रहै छी काज करू धए कए करिनाल ताहि मनुख-गाछी भुताहि बिच ओ मनुक्ख गन्ध सूंघि सहै छल २८ बानर पट लैले अछि तैयार बिरनल सभ करू ने उद्धार गाएक अर्र-बों सुनि अनठेने दुहै समऐँ जनताक कपार पुल बनेबाक समचा छैक नै अर्थशास्त्र-पोथीक छलै भण्डार कोरो बाती उबही देबाक लेल आउ बजाउ बुढ़ानुस - भजार डरक घाट नहाएल छी हम से सहब दहोदिश अत्याचार ऐरावत अछि देखा - देखा कए सभटा देखैत अछि ओ व्यापार २९ कानैत दुनू बच्चाकेँ देखलहुँ बिछुड़ैत गेल सम्वेदना छै बाँचल जकर चहुँदिस अकाल बिसरी हँसैत खिलखिलाइ अनमुनाह सन अछि बुरबक बताह मथसुन्न अछि ई काल गम्भीर बात विचारेँ ओढ़ल देखल कलुषता काल सन चंठ अछि सम्वेत ई सुन्ने देखाएल लाल सूर्यकेँ पीअर कपीश होइतहिँ ओकर पाँजड़ दबल मनुषता ई-ओ-हे जाइत काल सुन्न-मसान बोनक मचानपर बैसल छी की भगजोगनीक बाड़ल भकराड़ ई राति भेल ऐरावत देखैत इजोतक बिर्रो- बाढ़ि- दुर्भिक्ष ग्रहणक ई सूर्य थाकल देखै छी चोन्हराएल ३० रातिक इजोरिया देखि रहल तारा कहलक तरेगन छोट तैयो इजोतक खिस्सा कहलक चन्द्रमाक इजोतक चर्च तँ बड़ होइ छै एहि पिरौँछ इजोतक खेरहा कहलक उज्जर दपदप इजोतक ई इजोरिया देत संग अन्हरियामे फरिछा कहलक पिरौँछ सरिसव फूल हँसि रहल अछि ई इजोरिया पिरौंछ किए हँसा कहलक ३१ जे ई गप अहाँ हमरासँ ने कहितौं जे फूसि-फटक हमरासँ ने करितौं मोनमे रखबाक हमरा जे रहितै तँ कोनो आन बहन्ना नै बना सकितौं ई ठोढ़क फुफरी चानिपर पसेना घाम चुबैत सुगन्धि पाबि सुरकितौं आरि-धूर बाटे चली आ जा कऽ पहुँची बीच सड़क ठाढ़ छै रोकि ने सकितौं ३२ पिपनी झुकल डिम्हा उठल करजनी सन आँखि छै की की बीतल नै कहि सकब कहि सकब एखन नै आ देखल मेघक टिक्कर खसि रहल छै अकासमे हुलसि ताकल खेत दिस, उल्लास पर्वत चढ़ल ऐ चढ़ल ई आबि रहल, ई धार बाढ़ि बनि कऽ केहन बाँचल रहत हमर जलोदीप की गाम हमर ऐ ३३ जाऊ कत्तऽ टिटही सेहो इजोरियामे भागल अन्हरिया राति आ जिनगी झूर-झाम जे भेल कते बुझाएब ककरा ई, कते सम्हारब की जिनगीक प्रयाण संग रस्ता संग्राम बनल लोथ प्रेत राकश बिच ठाढ़ छी असगर की मनुक्ख लगैए जे लहास जिनगीक उठल साँझ अन्हरगर अछि, राति अछि बाँचल की की भोरक बाट ताकू? फेर साँझ घुरि आएल इजोरिया छैक कतबो, छै तँ रातिये सगरो दिनोमे ग्रहण आ सगरो अन्हार पसरल ३४ दिन देखारे जे अन्हार भऽ गेलै बिन केने अढ़ ओहार भऽ गेलै हनिकय फेकी विचार मोनक फड़िच्छ भेने बेसम्हार भऽ गेलै ओइ कात देखलौं सभ खेरहा ई तँ घाटाक बनिजार भऽ गेलै गोंहि आएल अछि हमरा टोल जलसमाधि तँ व्योपार भऽ गेलै ऐरावत गज-ग्राहक गज नै दुनूमे मेलक नियार भऽ गेलै ३५ आजाद गजल एकटा आस एकटा पियास छोडि आयल छी घुरि एबा लेल एकटा निसास छोडि आयल छी मोन पडैए ओ राति डेरायल आँखि अप्पन डरक इयाद आ अँखियास छोडि आयल छी देखी रूप बदलि अबैत हितक स्वांग भरैत आगि संग अछि, धुंआक झांस छोडि आयल छी देखू जिनगी कतेक सुंदर, स्वप्न डेराओन किए भूत सूति गेल, जागल अकास छोडि आयल छी ऐरावत जागि राति बिता देत स्वप्नसँ हारत नै स्वप्न बदलि जाएत एकटा प्रकास छोडि आयल छी ३६ भोरक बसात धाह दैए रहि रहि नोरक टघार थाह दैए रहि रहि बूझि कऽ सवाल जाइ छी ओइ दिस जँ पूछल सवाल चाह दैए रहि रहि थालक खिचाहिनो अबै छै शिथिल भऽ रोपल पएर आह दैए रहि रहि झूठक बहैत धार छै जे थमकल उनटि बहलै तँ डाह दैए रहि रहि लेलक उमंग संग बोली कुचरल पसरि कऽ गजेन छाह दैए रहि रहि ३७ सम्हरि उठैत डेग सुदिन्न भेल उसरि गेल सम्हरि रखैत मोन बिखिन्न भेल उसरि गेल डंकक अबैत चोट सुनैत भेल दिन कतेक ऊहि अबिते अबैत विभिन्न भेल उसरि गेल ऐ पहर होइए सगरो अबेर नहि उबेर राति अबिते निसाँस कृपिन्न भेल उसरि गेल घामे भिजलौं किएक सकाले रौद बरसि गेल मेघ बरिसैत मुदा छिन्न भेल उसरि गेल साँझे अखनो अबैत पराते जाइत अछि लोक लोक कतए रहता भिन्न भेल उसरि गेल ३८ रौँउ-झाँउ बीच वएह बनलिऐ बूझि फेर बात सएह बनलिऐ बूरि ई बलेल जकाँ हँसिते छलै बेर बेर बाजि सएह बनलिऐ हूलि हूलि काज करैत देखलिऐ हूरि भूर जा कऽ सएह बनलिऐ लच्छनो तँ बापक जिद्द गुनलकै नीक तीक भूलि सएह बनलिऐ जाह जाह ऐलऽ बड़ा बकबकिया मारि मारि मोन सएह बनलिऐ ३९ बूझि सकलौं नै निशाभाग राशिक खेरहा लूझि सकलौं नै परातीक पाँतिक खेरहा से तँ बुझलौं छी अगारीक लोकक भेद ई रूसि तकलौं छी निरासीक कांतिक खेरहा देश बढ़लै बूझि गाबी जँ आगुक गीतकेँ देखि भगला जे टटीबाक शांतिक खेरहा सूंघि देखलौं मूक भेलौं अकच्छ भऽ भूकिकेँ से जँ सहतै से देखेबै अप्राप्तिक खेरहा भागि अबि जैतौं अबेरो अनेरक बात ई गज्जु कटिहारीक टाटी छऽ फूसिक खेरहा ४० आजाद गजल दिन बीतत बर्ख घेरत ढङ बदलब तखनिते सोच बीतल बोल जीतत ढङ बदलब तखनिते सोचैत सोची हम जेहेन हमरे सँ दुनियाँ दुनियाँ बदलब लोक बदलत ढङ बदलब तखनिते जेहेन प्रेम भेटल तहिना नै लुटेलिऐ लुटबियौ प्रेम करियौ प्रेम भेटत ढङ बदलब तखनिते की छै एकरामे फुसियाँहीक झठहा फेकैए पागल बनैक फैशन के टेरत ढङ बदलब तखनिते जे ओ बाजए से ठीक जे हम बाजी से अधला बाउ सुधरू नै सैंतत ढङ बदलब तखनिते ४१ बाल गजल कनियाँ पुतरा छोड़ू आनू बार्बी जँ रंग गुलाबी छै तँ जानू बार्बी बोने-बोने फिरैए जे दैता सभ वनसप्तो लऽ घूरलि मानू बार्बी सात रंग लऽ भोर भेले गाममे परी रहैए गाम अकानू बार्बी कननी दूर हेतै बच्चा सभमे भरल आँखि बिसरी ठानू बार्बी पानि अकास धरती जा-जा घूमी पंख लगा टिकुली अकानू बार्बी धम्म गुड़िया संग खेलू कूदू राति सपनाउ निन्न आनू बार्बी सुता दियौ ऐ गुड़ियाकेँ आ सुतू चढ़ि ऐरावत दिन गानू बार्बी श्वेता झा चौधरी, गाम सरिसव-पाही, ललित कला आ गृहविज्ञानमे स्नातक। मिथिला चित्रकलामे सर्टिफिकेट कोर्स। कला प्रदर्शिनी: एक्स.एल.आर.आइ., जमशेदपुरक सांस्कृतिक कार्यक्रम, ग्राम-श्री मेला जमशेदपुर, कला मन्दिर जमशेदपुर ( एक्जीवीशन आ वर्कशॉप)। कला सम्बन्धी कार्य: एन.आइ.टी. जमशेदपुरमे कला प्रतियोगितामे निर्णायकक रूपमे सहभागिता, २००२-०७ धरि बसेरा, जमशेदपुरमे कला-शिक्षक (मिथिला चित्रकला), वूमेन कॉलेज पुस्तकालय आ हॉटेल बूलेवार्ड लेल वाल-पेंटिंग। प्रतिष्ठित स्पॉन्सर: कॉरपोरेट कम्युनिकेशन्स, टिस्को; टी.एस.आर.डी.एस, टिस्को; ए.आइ.ए.डी.ए., स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया, जमशेदपुर; विभिन्न व्यक्ति, हॉटेल, संगठन आ व्यक्तिगत कला संग्राहक। हॉबी: मिथिला चित्रकला, ललित कला, संगीत आ भानस-भात। ई चित्र धानक कटनी कालक मिथिलाक गामक चित्रण करैत अछि। पुरुख-पात खेतसँ फसिल घर अनैत छथि तँ महिला ओहि फसिलकेँ तैयार कऽ चाउर बनबैत छथि। अपन दैनिक जीवनसँ हटि कऽ एहि अवधिमे महिला एकट्ठा होइ छथि आ गप-सरक्का करै छथि। जखन कखनो प्रेमक गप अबैत अछि तखन सभसँ पहिने मोनमे राधाकृष्णक ध्यान आबि जाइत अछि। ई चित्र ओहि प्रेमकेँ देखेबाक एकटा प्रयास..। सावन मासमे बरखाक फूहीसँ भीजल माटिक सुगन्ध लैत झूला झुलैक आनन्दक कोनो सीमा नहि ..। डोली कहार सासुर जाइत काल नव कनियाँक मोनक दुविधा- नैहरक छुटैक दुख आ नव जीवनक उत्साह। ई सभसँ अनजान कहार सभ उमंगपूर्वक कनियाँकेँ सासुर पहुँचाबैत... करिया झुम्मरि मिथिलाक लड़की सभमे करिया-झुम्मरि खेलक खूब चलनि अछि। छोट आ पैघ सभ एहि खेलक आनन्द लैत छथि... साधुबाबा साधुबाबाक चित्रण मिथिला चित्रकलामे आधुनिक रूपेँ करबाक प्रयास... दुर्गापूजा काली माँ पनिभरनी चित्रक विषयमे: सूर्य आशाक आ संकल्पसिद्धिक प्रतीक अछि, अन्हारक बादक प्रकाशक प्रतीक अछि। ई पृथ्वीक जीवनक जड़ि अछि, दैवत्वक आशीर्वादक प्रतीक अछि। तेँ विश्वक सभ संस्कृतिमे ई पूजित अछि, खास कऽ मैथिल संस्कृतिमे (छठि आ मकर संक्रान्ति)। ई चित्र ऐ सभकेँ चित्रित करबाक प्रयास अछि। चित्रक विषयमे: सूर्य आशाक आ संकल्पसिद्धिक प्रतीक अछि, अन्हारक बादक प्रकाशक प्रतीक अछि। ई पृथ्वीक जीवनक जड़ि अछि, दैवत्वक आशीर्वादक प्रतीक अछि। तेँ विश्वक सभ संस्कृतिमे ई पूजित अछि, खास कऽ मैथिल संस्कृतिमे (छठि आ मकर संक्रान्ति)। ई चित्र ऐ सभकेँ चित्रित करबाक प्रयास अछि। अनुपमा प्रियदर्शिनी, पति डॉ. रतन कर्ण, गाम- उजान (बड़कागाम), पो. लोहना रोड, जिला दरभंगा। सम्प्रति लोजियाना (संयुक्त राज्य अमेरिकामे), शिक्षा- एम.एस.सी. (जंतु विज्ञान), ल.ना. मिथिला वि.वि., दरभंगा; बी.एस.सी. बी.आर. अम्बेडकर वि.वि. मुजफ्फरपुरसँ, हॉबी, मिथिला चित्रकला, कमप्यूटराइज्ड चित्रकला, ललित कला। उपलब्धि: अखिल भारतीय कला आ दस्तकारी प्रतियोगिताक पुरस्कार 1995 मे; संस्कार भारती भाव नृत्य प्रतियोगिता 1989 मे सहभागी। श्वेता झा (सिंगापुर) गुंजन कर्ण, राँटी मधुबनी, सम्प्रति यू.के.मे रहै छथि। तुनिशा प्रियम, माँक नाम- स्व. निभा रानी, पिता- डॉ. रमेश कुमार राय, नाना- प्रो. शिवनाथ मंडार, विभागाध्यक्ष भूगोल, बलिराम भगत कॉलेज, समस्तीपुर। नानी- श्रीमति निरुपमा पटेल, प्रधानाध्यापिका, म.वि.गाँधीपार्क, समस्तीपुर। जन्मतिथि- २०-१०-१९९८ पैतृक गाम- मँझौलिया, प्रखण्ड- बोचहा, जिला मुजफ्फरपुर, मातृक- ग्राम-धोबियाही, पोस्ट- बहेड़ी, जिला-समस्तीपुर। छात्रा- कक्षा- सप्तम “अ”, डी.ए.वी. स्कूल, समस्तेपुर। आदर्श- नानाजी। आवास, आशियाना भवन, रोड नं.०२, आदर्शनगर, समस्तीपुर। किछु चित्र 1686 || विदेह सदेह:३५ विदेह सदेह:३५|| 1687
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446 || विदेह सदेह:३५ प्रमतिक चहक्य- 2 जुदा अपन Jensen हिसान की त॑ erst, at Aone दू यो oat corres ang, खड़ा ye लग Batt af मेरी serena Atel पुराने 3¢fB...otent S| e सम जानंस्छादी ator ates चाही ST mil. Ge - ही उपलन्ध arte था | = aS महामहिम! लटक हू ie ae ant GD las es ‘hail to - devanshuvatsagigmail.com एस, scaqria द्ध ’ जहामल्क्, ऊ Ce See. oe St rater तेजी मा प्रगति कर anon गाव हमर सभ कगे के 4 ee Reet af, y « . “SRR ae - 4 fa हक जे & 7 ©} — AG On ie Pe हा. i ee vrarftten aeaet- 3 ला्रनात्थ ete am उचित - | See ie rk प्रयाकां ones fee NG Ad LO “9.9 We eet जानंलीयं torte... >| VOX y= : + : VES & . \ fe Ce ol = C Jad नर, ae = mailto - devanshuvatsa@grail com [rl ननि, उन . S| ee 6 न का; ws § ait to | RES ae at \ bald { hae: sae A eS Kes ieee ना ATs ES) दे
विदेह सदेह:३५|| 447 ली प्रमतिक aera 4 3 coe . | कि WE JEN mM J हि, हुए sana Senet रन जे लटकन रा fa ‘ i VA ms : t 5 ‘ 5 e की . ay ‘SS Z at aes कप हट मर सन (Gb DF aa Za Sid Stee ate दस \A Vix = ही है हा भानल'...ई अंतरिक्ष और ¢ a RRA अखि, > कप = Ly ४ ख् Le os | 2: yy AN EPS | [| Ld _ a rail to - devanshuvatsa@email.com का, का 8 कक - Sir ८. अर GX अलावा अस्तिष्क्कय wi भर्दति tf अहॉँक ‘aig ameter. ie age जे ste amrctt. * Gabel A @ Yat fey क्लास महिं हल 8. + . : ect * SS ee) — ’ c S| @ ex
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